Adarsh Library, Jaipur

Kitna Sundar Joda

Verma Surendar · 2011/03

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कितना सुंदर जोड़ा कहानी-संग्रह

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सुरेन्द्र वर्मा

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कहानी-क्रम
चेस्टर:
लेडी-किलर : २१
मेहमान:
काउण्टर: ४२
निगरानी: ५०
कितना सुंदर जोड़ा: ६४
प्रस: ६२
घर से घर तक: १०३

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कितना
संदर
जोड़ा

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चैस्टर बीना ने वेचनी मे घड़ी की तरफ देखा। दस बज चुके थे। उसने मेज पर टिकी कुहनियां थोडा आगे-पीछे खिसकायी'कसमसाकर पहलू बदला और सामने खुली किताब पर नजर घुमायो। वायें पन्ने पर न जाने कब का मरा, एक बिल्कुल दबा, मपाट पतंगा चिपका था । टेवुल-लैप के गोलाकार प्रकाश के दायरे में उसकी दायी हथेली और तीन उंगलियों में थमी हुई लाल पेंसिल भी आ गयी थी । जव खुले पृष्ठ पर पंक्ति रेखांकित करती, तो अंगूठी का नग बहुत हल्के मे झिलमिला उठता। घड़ी की अनवरत टिक-टिक के अलावा कमरे में खामोगी थी। लेप के पीये, मेज के कोने में रखी रेडियम डायल की घडी के अंको के विदु और सुइयां चमक रही थी । पेंसिल का सिरा मेज पर खट-खट् बजाते हुए उसने मीढियों की तरफ कान लगाये, लेकिन कोई आहट सुनायी नहीं दी। "आखिर मा आज ऊपर क्यों नही आती ?" उसने मन-ही-मन कहा और झुंझलाकर किताब उठा रंक पर रख दी। कुछ क्षण यों ही चुपचाप बैठी रही। फिर कुमी सोचकर उठी और पर्दा मरकाती हुई दरवाजा खोलकर बाहर आ गयी। छत पर पैर रखते ही हवा का एक झोंका एकदम मुंह पर आकर लगा। मुंडेर के निकट आकर उसने नीचे झाँका । बिन्नो चौका-बर्तन कर चुकी थी और अपने गीले हाथ धोती के छोर से पोंछती हुई आंगन में वरा- मदे की ओर बढ़ रही थी। आंगन की वायी दीवार के कोने पर लगे बल्ब के प्रकाश में उसकी हिलती-डुलती लंबी छाया ने दायीं दीवार के एक बड़े भाग को घेर लिया था। वरामदे में चारपाई पर बैठी मां सामने पानदान रखे पान लगा रही थीं। उन्हीं के निकट एक खंभे की आड़ में आधी छुपी खड़ी उम्मी हाथ में धोबी के कपड़ों की कॉपी लिए शाम को धुलकर आए कपड़े मिला रही थी। हर तरफ सन्नाटा और अंधेरा था। कभी-कभी दायीं तरफ, बाजार में किसी गुजरती हुई कार का हॉर्न सुनायी दे जाता।"वाहर सर्दी और भी ज्यादा थी। 'बीना ने अपनी ठंडी, अकड़ी हुई-सी उँगलियाँ मुंह पर फिरायीं। इतनी ही देर में नाक, कान, गाल, माथा 'एकदम सर्द पड़ चुके थे। बगल के बड़े कमरे में अखबार के पन्ने फड़फड़ाये, तो उसने जाना कि पिताजी अभी तक जागरहे हैं। वह कुछ क्षण अनिश्चय में खड़ी रही। फिर भिड़ा हुआ दरवाजा खोलकर बड़े कमरे में आ गयी। कमरे के बीच दोनों चारपाइयों पर विस्तर विछे हुए थे। दरी और गद्दे पर, पीलो और लाल धारियोंवाली चादरें, कोनों पर कढ़े हुए रंग- विरंगे फूलों वाले गिलाफ और पैताने तह की हुई सफेद खोल-चढ़ी रजाई । बायीं ओर दीवार से सटे छह ट्रंक और एक बांस की पेटी थी। हर ट्रंक पर रंगीन कवर। दायीं और दीवार में लगी दो आलमारियों के पल्लों के ऊपरी भाग में लगे कांच में से, जग, सजी हुई प्लेटें और कप दिखायी दे रहे "वीना! विस्तर से जरा माचिस उठाना बेटी!" "जी!" वह धीरे से बोली और सिरहाने, तकिये के वगल से माचिस उठायी, "लीजिए।" उन्होंने सिगरेट सुलगाकर तीली मेज पर रखी ऐश-ट्रे में फेंक दी। २: कितना सुन्दर जोड़ा फिर गोद में फैला अखवार मोडा, चश्मा उतारा और आंसें सहलाने लगे। तभी सीढ़ियो पर हल्की आहट सुनायी दी और कुछ क्षणो बाद चादर मे लिपटे कपडे उठाये मां प्रविष्ट हुई । उन्होंने कपड़े अपने बिस्तर पर रखे और तकिये के एक मैल गिलाफ के बटन खोलने लगी ।.."उम्मी ने कन- खियों से पिताजी की ओर देखा । उन्होंने आधीपी सिगरेट ऐश-ट्रे में मसल दी और जमुहाई लेते हुए उठकर पलंग पर बैठ गये। फिर पर स्लीपर से निकाले और लेटते हुए रजायी ओडकर उघर को करवट ले ली। मेज पर एक किताब उलटती-पलटती बीना मुड़ी-और उसके मन में बहुत देर से थपेड़े मारती अनकही बात होठो का बांध तोडकर वह निकली, "माँ ! उम्मी दीदी को एक चस्टर क्यो नही बनवा देती ?. आज रीता की मम्मी ने दीदी को दो-तीन वार टोका, वेटी ! ऐसी सर्दी में काली स्वेटर क्यों पहन रखा है. "दीदी वेचारी कुछ भी न कह पायौं । “मव सहेलियाँ जमा थी, मुझे तो ऐसी शर्म लगी..." उन्होंने एक नजर पति की ओर देखा, फिर जरा मुस्कराकर सयत स्वर में कहा, "जब बाहर कहीं जाना हो, तो उम्मी को अपना कोई चेस्टर दे दिया करो न !" "हां, अपना दे दिया करो!" वीना तुनक कर बोली, "जमे मेरी सहे. लियां मेरे कपड़े पहचानी ही नहीं और फिर दीदी को मेरे चैस्टर ठीक आयेंगे भी?" उन्होंने क्षुब्ध हो, घुले गिलाफ की तहें खोलते हुए कहा, "तो फिर जहाँ जाना हो, अकेली आया-जाया करो। किमने कहा है कि तुम्हारे साय उम्मी का जाना भी जरूरी है हां नहीं तो!" फिर पति की ओर मुड़ी, "मुनी आपने अपनी लाड़ली की फरमाइन?" रजाई में से उनके सिर का पिछला भाग और तकिये के एक किनारे पर टिकी दायी हथेली ही दिखाई दे रही थी। बीना की अर्थपूर्ण दृष्टि उन पर जमी थी। वह उनके बहुत हल्के ममतल खर्राटे सुन मकती थी, पर उमे विश्वास था कि वे अभी मोये नहीं होंगे लेकिन उन्होंने कोई उत्तर नहीं दिया। उनके उनर की अपेक्षा भी नहीं की गयी। "कपड़े के भाव तो आजकल आसमान पर चढ़े हुए हैं । चालीस-पचास . तो अच्छा-सा कपड़ा ही आयेगा पैने लगें, तो फिर चीज भी टिकाऊ "फिर बीसेक रुपये सिलायी केसाठ-सत्तर से कम का डॉल नहीं है।" होने उठ कर मला गिलाफ बाँस की पेंटी में डाला, "इन दिनों खर्चे वैसे बढ़े हुए हैं। एक वो सोफामेट लिया. इसी महीने वीमे की किस्त देनी जीजी की बीमारी में..." आवाज धीमी हो गयी, "अस्सी की चपत गयी। रमेश ने अब की पत्रास रुपये ज़्यादा मंगाये हैं। लिखा है, तीन : ताबों की जरूरत है। सत्ताइस तरीख को निशी की शादी है, पाँव- जराई में कम-से-कम एक सोने की चीज तो चाहिए ही। 'अव घर में ई पैड़ तो लगा नहीं है कि हिला दिया और रुपये बरस पड़े।" वीना चुपचाप उंगली में दुपट्टे का कोना लपेटती-खोलती रही। कुछ तण लगातार रॉड की ओर देखा. 'आँखें चौंधिया गयौं, तो बंद कर ली, लेकिन लगा कि बंद आँखों से भी चमचमाता हुआ रॉड दिखलायी दे रहा stic मां ने छत पर जाकर पान की पीक थूकी। फिर कमरे में आकर कोने में रखी सुराही से गिलास में पानी भरते हुए कहा, "आज का जमाना तो ऐसा वेपोर है कि सगा वेटा वाप को नहीं पूछता, लेकिन हमने इसके लिए जितना कर दिया 'सो सब जानते हैं। पूरे सात साल हो गये जेठजी को गुजरे, तब से मां-बेटी पास हैं। कोई कहे तो, किस बात में कसर रह गयी।. बड़ी लड़की को ऐसे घर में व्याह दिया, जैसा दुनिया-जहान में ढूंढे न मिले। जमीन-जायदाद, मोटर-बंगला. पलंग पर बैठी राज करती है। अब भग- वान की दया से मेरे बच्चे भी सयाने हो गये हैं, मुझे भी तो कुछ आगा- पीछा देखना है ! कल तक जितनी गुंजाइश थी, सो किया, आज उतनी गुंजाइश नहीं, तो हाथ खींचना ही पड़ेगा। अपनी चादर देख कर ही तो आदमी पाँव पसारता है।" बीना ने मन में कहा, "रिस्पेक्टेड मदर ! बड़ी गलती हो गयी।... अब अपना लेक्चर बंद करो। 'फॉर गाँसलेक।" "फिर मैं कहती हूँ, क्या हमी ने जनम-जिंदगी का ठेका ले रखा है ? आखिर दूसरे चाचा-चाची भी तो हैं, हजार-पांव नौ कोस दूर नहीं, यहीं फलांग-भर के फासले पर, जिनके यहाँ दो-दो कमाइयाँ आती हैं। ज्यादा - ४:कितना सुन्दर जोड़ा तो हम खुदी नहीं कहते, लेकिन अगर वे विना वाप को भतीजी के लिए सत्तर रुपट्टी का मोह त्याग देंगे, तो सजाने में कौन-मा टोटा आ जायेगा?" . शलवार में नाड़ा डालते हुए बीना ने एक हाथ से सिटकनी नीचे कर साय- वान पर खुलने वाला दरवाजा खोला और उजली, चमकती धूप का एक वडा-मा टुकड़ा सर्राटे मे फर्श पर विछ कारपेट पर लेट गया, जैसे बंद दर- वाजे मे टिका सडा-वडा थक गया हो। कमरा छोटा-मा था। बायी ओर कोने मे सुर्ख लाल रंग के टेवुल- चलाथ वाली रीडिंग टेबुल, उसके एक किनारे पर रंक था और दूसरे पर हल्के गुलाबी रंग के गेड वाला टेवुल-लैप। सामने की तरफ एक बड़ा-सा ‘कांच का टुकड़ा, जिसके नीचे दो-तीन छोटे-छोटे फोटो दवे थे। लंप के वगल में घडी, पेपरवेट, पिन-कुदान, पेन-स्टैड । टेवुल के निकट वार्डरोब थी और दायी तरफ कोने मे ट्रमिंग-टेबुल, जिस पर पाउडर के डिब्बे, श्रीम, नेल-पॉलिग की शीशियां, चूड़ियां आदि विखरी हुई थी। उसके बगल में पलंग पर बड़े-बड़ेनीले फूलों वाला वेड-कवर पड़ा था। दूसरे कोने मे छोटी- सी टेवुल पर एक बड़ा-सा रेडियो था, जिस पर मुस्कराने की मुद्रा में पड़ी एक गुड़िया रेडियो के लाल रेशमी कवर को छूती अपनी सफेद साड़ी मंभाल रही थी। दीवारों पर सफेद फ्रेमो मे सात-आठ फोटो लगे थे। ""ड्रेसिंग-टेवुल के मामने बैठी वीना ने देखा कि उम्मी कमरे में घुस रही है । दरवाजे से निकलकर इस ओर आते हुए उसकी निगाहें क्षण-भर के लिए जो अपने प्रतिबिव पर जम गयी, तो बीना ने खामकर शरारत से कहा, "अरे दीदी ! यहाँ न देखो।" "कगे?" "शीगा न टूट जाये कही !" उसने एक ठंडी सांस ली। "और तुम देख रही हो, सो ?" "अपना क्या है ! "'मामूली सूरत "चाँद-मे मुखड़ों की बात दूसरी है."

"अच्छा, वेकार की बातें न करो।" उम्मी ने तेज आवाज में बात काटी। वीना ने मुड़कर उसकी ओर देखा, "ओपफो दीदी! तुम तो अपने छह महीने बड़े होने का बड़ा फायदा उठाती हो। ऐसे डॉट देती हो मुझे, जैसे मैंने जिदगी की सत्रह नहीं, सात वहारें देखी हों।" "छी:-ठी: बीना ! कैसे बोल-कुबोल बोलती हो तुम ! शरम नहीं आती?..'चाची सुनें, तो क्या कहें !" फिर जरा रुककर कहा, "युनि- वसिटी नहीं जाना है ?" "जाना है।""जा तो रहे हैं।" बीना ठे स्वर में बोली। "अरे, गुस्सा हो गयीं?" उम्मी ने मुस्कराकर कहा, "अच्छा बावा ! गलती हुई, माफ करो।" और दोनों हाथ जोड़कर माथे से लगा लिए, "आगे ऐसा कभी नहीं होगा।" "रहने दो। "हर वार कह देती हो और फिर डाँटने लगती हो।" वीना ने मना करते हुए गर्दन झल्की । "अरे भई, अब नहीं कहेंगे कुछ। जो जी में आये, सो कहा करो।" उम्मी ने उसके गाल पर एक प्यार की चपत लगाते हुए कहा, "आज तुम्हारे कितने पीरियड है?" "दो पीरियड और एक सेमीनार." अनिल भैया का !"वीना ने कीम की शीशी खोली और एक उंगली की पोर से क्रीम की छोटी-छोटी आठ- दस विदियाँ मुंह पर लगायीं। फिर आहिस्ता-आहिस्ता उन्हें मलने लगी। "अनिल नया तुम्हारे कितने पीरियड लेते हैं ?" उम्मी पीछे दीवार से टिकी, दोनों हाथ वक्ष पर बाँधे खड़ी थी "डेली एक पीरियड और वीक में एक सेमीनार !" "अच्छा, पढ़ाते कैसा हैं ?" "बहुत अच्छा 'दीदी ! एकदम फ्लूएंट बोलते हैं।"वीना ने पाउ- डर का डिब्बा उठाया,"उनकी पर्सनल्टी तो बड़ा झप्रेस करती है। लाइट न्यू सूट पहने, बगल में रजिस्टर दवाये जव खट-खट् करतं क्लास में आते हैं तो.." कहते-कहते एकदम हँसकर बोली, "दीदी ! तुन रूप को तो जानती हो न? रूप निगम 'कल रीता के यहाँ भी थी।" - । ६:कितना सुन्दर जोडा "वही न."जिसका कद छोटा है "वात-बात पर हंसती है ?" उम्मी ने सोचते हुए कहा। "हाँ-हो, वही ! उसके साथ तो दीदी,बडो ट्रेजेडी हुई।" वीना हंसकर, चटखारे लेती हुई बोली, "अनिल भैया के एप्वाइंटमेंट के बाद जब उमे पता चला कि मैं उनकी कजिन हूँ, तो उसने मुझसे एकदम दोस्ती बढानी शुरू कर दी। युनिवमिटी-कम्पम मे जहाँ भी मिले, तो 'हैलो बीना, हैलो वीना' करे। हम लोगों के दो पीरियड साथ पडते है, उनमे हमेशा मेरे पास बैठे। एक वार मुझे अपने यहाँ टी पर इन्वाइट किया। मैं परेशान कि आखिर वात क्या है ! फिर एक रोज मुझे रीता ने बतलाया कि ये तुम्हारे अनिल भैया पर बहुत स्वीट हैं। तव मजबूरन मुझे उसके सामने यह हटंद्रोकेन फैक्ट क्लीअर करना पड़ा कि मेरे बदर न सिर्फ ऑलरेडी मैरिड हैं, बल्कि बहुत जल्दी इंडी भी बननेवाले हैं।" उसने एक ठहाका लगाया, "इसके बाद वेचारी पूरे एक हफ्ते तक युनिवसिटी नहीं आयी।" उम्मी दांतों के बीच एक उंगुली दवाये, अनमनी-सी उसकी ओर देख रही थी। वीना उठ खडी हुई, और घूम-फिरकर चारी और मैं अपने को शीशे में देखा। फिर एक पर स्टूल पर रख, शीशे की ओर जरा झुकी और वालो की एक तट उँगली में लपेट कर घुघराली-सी बनाने लगी, फिर बोली, "अनिल भैया को लेक्चररमिप मिल जाने पर सबसे ज्यादा खुनी हुई है मझली चाची को और सबसे ज्यादा दुख हुआ है मुझे।" "क्यों? आपको क्या तकलीफ है ?" उम्मी ने जरा मुस्करा कर पूछा। "अरे दीदी ! सारी लिवर्टी छिन गयी । ठीक टाइम पर आना, ठीक टाइम पर जाना, सारे पीरियड अटेंड करना, डिपार्टमेंट में ऐसे रहना जमे भीगी बिल्ली "या सहमा कबूतर!" कहते समय वीना सीधी खड़ी, मुस्क- राती हुई रिबन बांध रही थी। सफेद, दमकती हुई चार इंच मुहरी की दालवार, चुस्त आसमानी रग का कुर्ता, गले, कधी और नीचे किनारों पर रंग-बिरगी सिलाई की मखमली जैकेट, गले मे लापरवाही में लपेटा हुमा दुपट्टा, एक चोटी पीछे, एक वक्ष पर झूलती हुई, वायी कलाई पर कुछ .

ऊपर की तरफ घड़ी, दाहिनी कलाई में पाँच-छह चूड़ियाँ, पैरों में दो सीधे, काले स्ट्रैप की चप्पलें। "वड़ी चाची के पास कौन है दीदी ? विन्नो?" वीना ने सहसा पूछा। . "उन्हें दवा पिलायी ?" "हाँ"पिला दी है।" फिर जरा रुककर धीमी आवाज में कहा, "वीना! मुझे एक लिफाफा दोगी?" "हाँ-हाँ।" वीना उसकी ओर मुड़ी, "किसे लिखना है ?..'शैल जिज्जी को ?" "हूँ !" उम्मी खोयी-खोयी निगाहों से उसकी ओर देख रही थी। बीना मेज के निकट पहुंची। रैक से एक किताव उठाकर उसके बीच से लिफाफा निकाला और मेज पर पेपरवेटतले दवाती हुई वोली, "जिज्जी 'और जीजाजी को मेरी नमस्ते लिख देना।"अच्छा?" और फाइल वगल में दबाकर उम्मी की ओर मुड़ी, "अरे, फिर तुमने नाखून चबाये दीदी? मैं हमेशा कहती हूँ, लेकिन तुम मेरी सुनती ही नहीं । "देखो तो नाखून कैसे खराव कर डाले हैं ?" उम्मी ने चौंककर उसकी ओर देखा, फिर फीकी-सी मुस्कराहट होंठों पर लिए , न जाने कैसी आवाज में कहा, "मुझे नाखून किसे दिखाना है ?" और सरकता आँचल सँभालती हुई सायवान पर आ गयी। बीना को लेकर रिक्शा जव गली के मोड़ पर मुड़ गया, तब भी उम्मी खंभे से टिकी सायवान पर खड़ी रही। बारह बज रहे थे। घर में खामोशी छायी थी। सामने मकान की छत से उतरकर धूप गली के दोनों किनारों को छूने लगी थी। कभी-कभी दायीं तरफ से बाजार का कोलाहल उभार आता था । ऊँची-ऊँची अस्पष्ट आवाजें, कारों-ट्रकों के हॉर्न और रिक्शों- ताँगों की खड़खड़ाहट का मिला-जुला शोर'सायबान के निकट, बिजली के खंभे पर दो चिड़ियाँ वैठ गयीं, लगातार हिलती-डुलती उनकी गर्दनें, छोटी-छोटी चमकती-सी आँखें.."उड़ी, तो परों की हल्की फड़फड़ाहट सामने खंभे के निचले दो तारों के बीच न जाने कब से एक बहुत फटी पतंग ८:कितना सुन्दर जोड़ा । अटकी हुई थी, वचा-खुचा जरा-सा पतला कागज बारिग में बिल्कुल मट. मैला हो गया था "तारो में उलझा हुआ डोग"हवा के झोके से फटी, बदरग पतंग सरसरा उठती। इस खामोशी-सी दोपहर मे,आज बहुत दिनो के बाद, मन की निचली पों में दवे, जंग लगे सिक्के की तरह एक पुरानी, घुन लगी चाह उभर आयी। काश ! वह भी पढ सकती ! उसका अपना अलग कमरा होता... कपड़ों में भरा वार्डरोब, ड्रेसिंग-टेबुल, शेल्फ, रेडियो हंसी-मुस्कराहट .."एक बहुत प्रिय सहेली, जिसका साथ छोड़ने को कभी मन न हो। वावूनी उसे कितना चाहते थे। शेल जिज्जी हमेशा बनावटी गुस्से में कहती, "माँ ! तुम सब उम्मी को मुझमे ज्यादा प्यार करते हो।". "मा हंसकर रह जाती "अगर आज के दिन बाबूजी होते तो क्यो उसकी पढाई रुक जाती, क्यों उसे इस तरह घर के कामो मे उलझे रहना पड़ता ! ... मुबह से रात तक बस यही आंगन, यही रसोईघर, चूल्हे की आंच, प्लेटों- वनंनो की खनसनाहट. 'या ये अकेले कमरे.. उसकी आंखें भर आयी।उसका कितना मन होता है। वह रोज साड़ियां बदलकर आंचल सरसराती हुई बाहर निकले हाथ मे एकाप किताब, चाल में वेफिकी, होठो पर भीनी-भीनी मुस्कराहट 'कॉलेज की मनोरंजक दिनचर्या "एक महेली के साथ किसी फिल्म का महनी गो'.. हॉल के अंधेरे में उसके कान से मुंह लगाकर हत्की फुसफुसाहट "उसके यहाँ जाना, उसे अपने यहां बुलाना "रात को देर तक पढाई."न आंसू, न उदासी.."न दम घोटने वाला अकेलापन... कंसी तकदीर लेकर आयी है ! लेकिन चाची का क्या दोप? उन्होंने इतना तो कर दिया। कब से बोझ उठा रही है। शैल जिज्जी ने एक बार कहा था, "उम्मी! चाची के लिए मन में मैल मत लाना।" जिज्जी की याद आयी तो उनके सुख की कल्पना में मन को वडा मंतोष मिला। उनकी कितनी अच्छी मसुराल है, सब लोग कितना मानते हैं ! नीचे गली मे खड़े वात करते दो आदमियो में से एक, रह-रहकर कपर मायवान की तरफ देख लेता था, सो वह अंदर कमरे में आ गयी। बीना ने कपड़ों को आलमारी खुली छोड़ दी थी, ड्रेसिंग टेबुल पर तेल और - क्रीम की शीशियाँ भी खुली पड़ी थी, आधे लगे ड्रामर में से एक लाल रिवन नीचे लटक रहा था। शीशे के सामने आकर, वह सहसा रुक गयी।.. दुबली-पतली देह, गोरा रंग, कुछ लंबा-सा चेहरा, खूब बड़ी-बड़ी, काली आँखें पतले-पतले होंठ, मन में कहा "हाँ! मैं सुन्दर हूँ। लेकिन यह क्या है ? चेहरे पर यह कैसा खोया-खोयापन, आँखें कैसी सूनी-सूनी हैं। जैसे कुछ देख रही हों, पर यह न जानती हों कि क्या देख रही हैं। शीशे पर नजर जमाये ही एकाएक बीना का याद आया मजाक होंठों पर मुस्कराहट बन कर जी उठा । उसने टेबुल की चीजें ठीक से रखीं, पलंग पर पड़ी वीना की एक साड़ी तह की। मेज के एक चिकने कोने पर जरा- सा पाउडर बिखर गया था, उसे आँचल के छोर से ही पोंछ दिया। आल. मारी बंद करते हुए, अनजाने ही मुंह से एक ठंडी साँस निकली तो उसे अपने-आप पर बड़ी शर्म आयी, "छी:, छीः ! उसे अपनी वीना से ईया होती है !" . उम्मी घर से चली तो, लेकिन उसका मन बहुत भारी था। कितना कुछ कहा, पर चाची को अगर किसी बात की रट लग जाये तो फिर किसी की सुनती नहीं ! जब से अनिल भैया लेक्चरर हुए थे, मझली चाची के यहाँ की यह दूसरी कमाई उन्हें कांटे की तरह चुभने लगी थी। वात-बात में टेढ़े स्वर में कहती, "उनका क्या शरीगत, उनके यहाँ तो दो-दो कमाइयाँ आती हैं।"..'जरा उनकी तरफ से तो सोचतीं। मझली चाची का वड़ा लड़का ही तो कमा रहा है, एक बाहर और तीन लड़के यहाँ पढ़ रहे हैं, दो छोटी लड़कियाँ, वहू 'भरीपूरी गृहस्थी है। मझली चाची के घर में घुसते ही उसे बड़ा शोरगुल सुनायी दिया।'' आँगन में राजू,रेनू दो-तीन और बच्चों के साथ कतार वाँधे हाथों में छोटी- छोटी झंड़ियाँ थामे गला फाडफाड़कर 'हिंदुस्तान हमारा है' चिल्ला रहे थे। उसे देखा, तो 'उम्मी दीऽऽदी जिंदाऽवाsss' का भी नारा लगा दिया। बरामदे में आलमारी की ओर बढ़ते हुए सांवली-सलोनी भाभी ने मुड़- कर मुस्कराते हुए उसकी तरफ देखा, फिर बनावटी नाराजगी से मुंह फेर १०: कितना सुन्दर जोड़ा

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. । उन्होंने सिकी हुई, लाल-लाल कुरकुरी पकौड़ियाँ झरिया में लेकर कढ़ाई के ऊपरी हिस्से में हल्के-से दबायीं । तेल की बड़ी-बड़ी बूंदें फिसलती हुई नीचे आ गयीं। फिर बायें हाथ से एक थाली कढ़ाई से सटाकर, उसमें पकौड़ियाँ लेते हुए उन्होंने कहा, "पाँवों का दरद उस दवा से ठीक हुआ ?" "शाम की वेला हो आता है । वैसे पहले से फायदा है।" जरा रुककर, उठने का उपक्रम करते हुए वह बोली, "तुम उठ आओ चाची ! मैं बना देती ।" "वैठो बेटा, वैठो ! वस, थोड़ी-सी तो वची हैं।" उन्होंने व्यस्त होकर कहा। स्टोव से कढ़ाई उत्तरी तो भाभी ने चाय का पानी चढ़ाकर वर्तन उठाये और आँगन के नाली के निकट वाले कोने में, खंभे से टिका कर रख दिये । चाची नल के नीचे हाथ धोने लगीं। उम्मी को लगा, गले में कुछ अटक-सा रहा है । मन फिर भारी-भारी होने लगा । क्या करे, कैसे कहे, उससे तो नहीं कहा जायेगा। जी में आया, बस ! ऐसे ही, बिना कुछ कहे लौट जाये 'लेकिन तभी छोटी चाची का चेहरा आँखों के सामने घूम गया। वे घर में पैर रखते ही पूछेगी, "क्या जवाब दिया ?" उसे रुलायी-सी आने लगी। हे भगवान! क्या मुसीबत है ? रसोईघर की बायीं, चूल्हेवाली दीवार धुएँ से काली हो गयी थी विजली के तारों पर लगी लकड़ी की पट्टी. होल्डर और बल्व पर भी कालिख की एक मोटी तह जमी थी। गेरुए रंग से पुती दीवारें चितकवरी- सी लग रही थीं। दायीं ओर दीवार पर बने दो बड़े-बड़े खानों में से एक में वर्तन लगे थे और दूसरे में मसाले वगैरह के छोटे-बड़े डिव्वे । उसी तरफ, लकड़ी की एक जालीदार आलमारी के ऊपरी हिस्से में रक्खा दूध से भरा, प्लेट से ढका कांच का गिलास दिखायी दे रहा था। वह हथेली पर मुंह टिकाये, एकरस सू-सू आवाज करते स्टोव की ओर देख रही थी। उसके बगल में रक्खी वोतल में स्प्रिट की गंध आ रही थी। पास ही वर्नर और पिनों का लंवा, पीला पैकेट पड़ा हुआ था। वर्नर के नीचे फर्श पर जलने का एक काला निशान बन गया था। पतीली का ढक्कन एक ओर जरा हट जाने से गर्म भाप निकल रही थी। स्टोव की लौ काँप रही थीगोल, । १२ : कितना सुन्दर जोड़ा नोलीली. पानी खोलने लगा तो भाभी ने डिव्याखोला, पनी डाली,फिर पतीली के गर्म, माप छोड़ते किनारे आँचल के छोर से पकड़कर केटली मे चाय छानने लगी। रेनू ने कपर छत पर से झांककर पूछा, "भाभी ! बडे भैया पूछ रहे है, चाय बन गयी?" भाभी सुरीली आवाज मे बोली, "हाँ, बन गयी। वह दो, ला रहे वे एक हाथ में चाय का कप और दूसरे में पकौडियो की तश्तरी लेकर जैसे ही ऊपर जाने को उठी, उम्मी ने धीरे में सांस कर कहा, “भाभी ! कही वही की होकर न रह जाना।" भाभी ने एक नजर इस तरफ माती सास की ओर देखा, फिर भौहें टेढ़ी करके भरसक मुस्कान दबाते हुए, धीमे स्वर में धमकाया, "अभी बताती हूँ, रानी !" चाची उसके सामने चाय रखकर बगल में दूसरे पीढ़े पर बैठ गयी। बस, अब कह देना चाहिए, उसने सोचा, अगर भाभी आ गयी, तो उनके सामने तो वह हर्गिज नहीं कह पायेगी। उसने कहना चाहा, "चाची मैं सच कहती हूं, मुझे चस्टर-स्टर की ऐसी कोई खास जरूरत नहीं ! वाहर मुझे भला जाना ही वहाँ होता है, लेकिन छोटी चाची तीन दिन से मेरे पीछे पड़ी हैं कि मैं तुममे कहूँ कि..." लेकिन वह बाते वक्त, सारे रास्ते में संकडो बार दुहराये हुए, सिर्फ छह पाद ही कह सकी, "चाची! मुझे एक चैस्टर वनवा दो.." और लगा कि गला घ-मा गया है और मन में लगातार एक ही बात चक्कर काट रही है, कार ! आज वायूजी होते. चुछ देर खामोशी रही। वरामद में बैठे हुए राजू ने रवर की गेंद उछाली, तो वह सामने दीवार से टकरायी,फिर टप्पै साती हुई वापस लौट गयी। नल में वाल्टी मे बूंद-बूंद पानी टपक रहा था । भरी बाल्टी से एक- रुककर जरा-सा पानी छलक जाता""धीमी कल-कल आधाज"वह सिर Saritraमामीशी मटप्लेट पर दो और आमने- । सामने तीन लकीरें, दो छोटी, वीच की बड़ी, कप में हैंडिल के निचले भाग पर चटखने का हल्का-सा काला निशान 'गर्म चाय से उठती भाप... चाची जरा खाँसी । कसमसायी, तो चूड़ियाँ खनक गयीं। फिर कहा, "अच्छा बेटी ! • "वैसे हाथ आजकल वड़ा तंग है। दो महीने से मकान का किराया नहीं दिया। वो तो मुरली वाबू मुरव्वती आदमी हैं, सो निभ जाती है। तुम्हारे चाचा को चश्मा वदलाना है। जाने कब से टाले आ रहे हैं। एक साइकिल को अनिल ले जाता है, सो अव दूसरी साइकिल लेनी पड़ेगी ..'अजै को बड़ी परेशानी होती है । बहू के लड़का होना है, पहला मौका .."चाहे कितनी कन्नी काटें, डेढ़-दो सौ से कम नहीं लगने के...।" कुछ रुकी, "सनीचर के रोज अनिल को तनखा मिली थी। एक सूट का कपड़ा ले लिया, सौ रुपै अमर को भेज दिये। इस पढ़ाई के मारे तो जान साँसत में है।" जरा हँसकर कहा, "लो, तुम भी कहोगी, चाची अपना ही दुखड़ा ले वैठीं।" फिर एक लंबी सांस ली, "जी छोटा न करना बेटी ! जल्दी ही कोशिश करेंगे।" तभी सहसा खट-खट करते हुए अजय ने प्रवेश किया, "अम्मा ! शैल जिज्जी आयी हैं।" "अरे, कब?" सीढ़ियां उतरती हुई भाभी ठिठक गयीं। "अच्छा, उम्मी दीदी भी जमी हैं !" उसने निकट आकर कहा, फिर भाभी की ओर मुड़ा, "अभी-अभी "जीजाजी भी हैं..." "आने की कोई बात तो थी नहीं ! ""तुमसे किसने कहा?" चाची उठती हुई बोली। "मैं कल फ्रेंड को सी-ऑफ करने स्टेशन गया था। सडेनली देखा, जिज्जी ठाठ से पर्स लटकाये फर्स्ट क्लास कंपार्टमेंट से उतर रही हैं। यहाँ दो दिन का वेक दे दिया। परसों बॉम्बे चले जायेंगे । वहाँ जीजाजी अपनी फर्म की ब्रांच खोल रहे हैं।" फिर जरा हंसा, बोला, "भाभी! शैल जिज्जी तो अब इतनी स्मार्ट हो गयी हैं, जैसे मिरांडा कॉलेज से निकली हों।... वाई गॉड् भाभी, बिलीव मी।" १४ : कितना सुन्दर जोड़ा ?" "भई बीना! चाय लायी हूँ।" उम्मी ने कमरे में घुसते हुए कहा, "आज थोडी देर हो गयी है..." और ट्रे मेज पर रख दी। "ओफ्फो दीदी ! तुम तो ऐसे एक्सप्लेनेशन देती हो, जैसे..." कहते- कहते एकदम चौंककर वोली "अरे वाह ! रस का गुल्ला "क्यो ? ''अभी तक नजर नही पड़ी थी क्या ?" उम्मी ने मुस्कराते हुए कहा। "अरे, कहाँ दीदी !"वीना "सी-सी" करतोहुए बोली, "जरा प्लेट... इधर"देना।" "हाँ-हाँ लो !.."जल्दी खतम करो।" "तुम भी लो न दीदी !" बीना ने एक रसगुल्ला उसकी ओर बढाया। "मैं तो खा चुकी हूँ।" "एक और!" "न, भई!" "प्लीज.. दीदी !" "मेरे हाथ खराव हैं।" "हम अपने हाथ से खिला देते हैं...।" "भई बीना..." "हाँ, हाँ ! आ s तो करो।"शाब्बास ? "उई, दीदी ! 'कट्ट,- कट्ट, 'नई... उम्मी ने आंचल का छोर हल्के से होंठो पर फिराया, फिर कहा, "तुम चाय जल्दी पी लो, तो मैं कप-प्लेटें लेती जाऊँ।" "वस, अभी पीते हैं, पांच मिनट में !"और चाय का एक बूंट ले हंस- कर वोली, "उम्मी दीदी! एक बात बतलायें ?" "क्या ?" वह उसके सामने विस्तर पर बैठ गयी। "जीजाजी हैं न ! .. अपने जीजाजी..." "हां, तो?" "शल जिज्जी को बहुत प्यार करते हैं ।" वीना शरारत से मुस्करायी, "सुबह मां ने उनसे इतना कहा कि अगर आपका जाना जरूरी है, तो शल को तो छोड़े जाइए "लेकिन उन्होंने घुमा-फिराकर यह फैक्ट क्लीअर कर दिया कि वे जिज्जी के विना नहीं जा सकते।" वह हँसी, "और इधर अपनी जिज्जी भी..." “धत् 'ये भी कोई कहने की बात है !" उन्मी ने उसके गाल पर एक चपत लगायी। तभी नीचे से पुकार लगी, "उम्मोऽऽ ईई...!" "दीदी ! तुम्हें शैल जिज्जी बुला रही हैं।" वीना ने कहा । वह नीचे उतरकर पिछले कमरे में गयी । वे वहाँ अकेली, पलंग पर खुले रखे अपने सूटकेस में कुछ उलट-पुलट रही थीं। उसकी आहट सुनकर पीछे देखे विना वोली, "तू तो बड़ी पगली है, उम्मी! . "मुझी से छिपाती है ?" "क्या छुपाती हूँ जिज्जी ? ..'क्या छुपाया है ?" उसने हैरान होकर कहा। "यही सब बातें.."चैस्टर-वैस्टर की...!" वे उसकी ओर मुड़ी, "वह तो दोपहर में मुझे माँ ने बतला दिया, वर्ना मैं आज चली जाती और मुझे कुछ मालूम भी न होता।" कहते हुए झुककर उन्होंने सूटकेस के पीछे से एक वड़ा-सा बादामी पैकेट निकाला और उसे उम्मी की ओर बढ़ाती हुई बोली, "देख तो, यह चैस्टर तुझे पसंद है ?" उसने धीमे स्वर में कहा, "जीजाजी से मँगवाया है ?" "हाँ, हाँ ! ""तू खोलकर तो देख !" और उन्होंने वाहर झाँककर कि कोई है तो नहीं; दरवाजा बंद कर दिया। उम्मी ने पैकेट खोला, वैलोर का वढ़िया कीमती शॉर्ट-चेस्टर था। रंगीन धारियों के हल्के चौखाने, आस्तीन के निचले भाग, गले और जेव के तीनों किनारों पर दुहरी सिलायी, सामने दो वटन, अन्दर हुक, पीला रेशमी अस्तर "बहुत अच्छा है, जिज्जी !" फिर जरा रुककर वोली, "जीजाजी से देकार कहा । वे अपने मन में क्या सोचते होंगे !' उन्होंने जैसे उसकी बात सुनी ही नहीं, कहा, "जरा पहन तो देखू, ठीक आता है न उसने चैस्टर पहना, तो उन्होंने ऊपर से नीचे तक उसे गौर से देखा - १६ : कितना सुन्दर जोड़ा फिर बड़े मोठे ढग से मुस्करायी, "सच तुझ पर खूब खिल रहा है। देख यहाँ कही काजल तो नही..." "क्यो?" "तुझे डिठोना लगा दूं। कहीं मेरी नजर न लग जाये।" "ॐsss"जिजी...ईई.."" उन्होंने हैसकर उमका माथा चूम लिया। फिर धीमे स्वर में कहा, "सुन उम्मी! मैंने चस्टर छुपाकर मंगवाया है। तेरे जीजाजी मे कह दिया था कि वे इसे किसी बंग-वैग में रखकर लायें, ताकि कोई देसे न ! --चीना को भी एक साडी दे रही हूँ।"चाची मे कह जाऊंगी कि मैं ये चीजें दिल्ली से ही लायी थी।" उन्हें जरा सांसी आ गयी, "यह भी कह दूंगी कि वे मइली चाची से कुछ न कहें।"राजू-रेनू को कुछ दिया नहीं, उन्हे वैकार बुरा लगेगा । ""ठीक है न?" "हूँ !" उसने चैम्टर उतारकर पैकेट में रखा, मोट वादामी कागज में हल्की घरखराहट हुई। कार पहले की तरह पतला, लाल रेगमी फीता बांध दिया। अपरा छाने लगा था, सो बत्ती जला दी।"छोटा-सा कमरा... बीच में दो बारपाइयो "एक पर सिरहाने लपेटा हुआ बिस्तर रखा था। नीली, पीली और लाल धारियों की दरी में से सफेद चादर का एक छोर बाहर निकल आया था। एक तरफ दीवार से मटे, इंटों पर रमे दो-तीन ट्रेक, जिनका रंग-रोगन उतर चुका था और परी हिस्मै पर संव-लंबे खरोच के निशान ये। सामने खिड़की पर पिछवाडे, निचले संदहर में लगे नीम की गायें फैली थी। कुछेक पतली-पतली टहनियाँ मसालों को छू रही थी। सपाट काली, नंगी शाखें जिनके पत्ते झर चुके थे। हवा में टहनियां हल्के-हल्के सटखटाती, जमे कुत्ता मूषी हड्डी चवा रहा हो। बायी तरफ की एक मोटी-मी डाल पर बल्ब के प्रयाग में तीन सलाखों के लंचे साये उभर आये थे 'टेढे-मै... धुंधले माये. जिज्जी को चूडियां खनकी। वे उमकी तरफ पीट किये, मूदवस पर झुको कुछ कपड़े तह कर रही थीं। कमर मे खौमा हुआ माही का छोर दीला हो गया था और गोगे, उजली गर्दन में पड़ी चेन रोशनी में मिल .. मिला उठती। उसने कमरे में देखा, कुछ देर पहले की तरह अब उनकी चीज यहाँ-वहाँ नहीं बिखरी थी। कुछ देर बाद वे भी नहीं होंगी ।""न उनके आंचल की सरसराहट, न चूड़ियों की खनक, न मीठी हसीन प्यार-दुलार" "ट्रेन आठ बजे आती है, न ?" उसने धीरे से पूछा। "हाँss?" "जिज्जी! ..'अब कब आओगी?" अनजाने ही उसकी आवाज भीग गयी। उन्होंने एकदम मुड़कर पीछे देखा, "अरे, रो क्यों रही हो?" "न"नहीं तो!" उसने आंचल आँखों पर रख लिया। "तू तो पगली है विलकुल ! .''वात-बात पर रो देती है।" उन्होंने लंबी-लंबी अँगुलियों से उसके आँसू पोंछे। फिर बाँहों में लेकर उसका सिर अपने कंधे से टिका लिया और स्नेह से पीठ पर हाथ फेरते हुए, रुक- कर बोली, "मैंने देखा, तू अब बहुत अनमनी रहने लगी है । ''यह सब ठीक नहीं। "तू नाहक इतना दुख करती है। अभी तेरी उमर ही क्या है ! • 'देख तो, कितनी दुबली हो गयी है !" कुछ क्षण चुप रहीं,फिर कहा, "ऐसे उदास-उदास मत रहना।''जरा हँसा-बोला कर 'अच्छा !" ...........!" "हाँ करो!" "हाँss...!" उसने आँसू रोकने की कोशिश की, लेकिन आंसू थे कि बस चले ही आ रहे थे, जैसे अगर अभी न निकले, तो फिर हमेशा के लिए घुट-घुटकर रह जायेंगे । एक जोर की सिसकी आयी तो उसने दोनों हाथों में उन्हें घेरकर मुंह विल्कुल उनके गले से सटा लिया कि आवाज निकले ही नहीं! "क्या करें उम्मी! भगवान को यही मंजूर था। अगर आज के दिन..." आवाज भर्रा गयी तो उन्होंने उधर को मुंह फेर लिया।""जरा खांसकर रुलाई दवानी चाही। फिर सूटकेस की ओर मुड़ी, दस-दस के कुछ नोट निकाले और उसकी हथेली पर रख कर मुट्ठी बंद कर दी, "ये रख लो।" - १८ : कितना सुन्दर जोड़ा "मैं क्या करूंगी."जिज्जी!" उम्मी ने अटककर कहा। "जो तुम्हारे जी में आये, सो करना।" उन्होंने उसके माथे पर विसरे बाल संवार दिये. फिर भीगी-सी आवाज में कहा, "उम्मी! मां का ध्यान रखना और हर हफ्ते मुझे चिट्ठी लिख दिया करना । अच्छा !" उसने सिर हिलाया। वे आंसुओं मे हंसकर बोली, "हां करो।" वह चाहते हुए भी नहीं मुस्करा पायो । "कल तो माढे सात बजे तक राह देखती रही कि मझली चाची आती होंगी।" छोटी चाची सामने पानदान रसे, पान पर कत्या लगाती हुई बोली, "फिर सुद मिलने चली, पर हमी ने कहा कि अगर उम घर मिलने जाओगी, तो गाड़ी नहीं मिलेगी । बडी पछताती-पछनाती गयी। सव इसी सोच मे कि आखिर बात क्या है ! तभी अनिल ने आ के बताया कि राजू जीने में गिर पड़ा है।" "दुल्हिन ! बिदाई के वखत लल्ला को टीका भी न कर मके।" वरा- मदे में बैठी हुई मझली चाची ने दुखी स्वर में इतने जोर मे कहा कि पिछले कमरे में लेटी शेल की मां के सुन लेने में सक-सुबहे की गुजाइश न रहे। "अब क्या किया जाय छोटी जीजी।" छोटी चाची ने एक लंबी सांस ली, "शाम को राजू यहू-रानी के संग ऐसा हंसता-खेलता आया था। किसे पता था कि वेचारे को अभी अलफ वदी है।" फिर चौके की ओर मुंह करके बोली, "खाना खा लिया उम्मी?."ये विन्नो वाई वैठी हैं।" उम्मी ने चौंककर परोसी हुई थाली की ओर देखा। दस मिनट से यो ही अकेली, चुपचाप आंसों में आंसू भरे बैठी थी। जिज्जी के जाते समय इतनी रुलायी आयी "वही मुश्किल से होंठ काट-काटकर आम रोके । उनके जाने पर उसका ज्यादा रोना चाची को अच्छा न लगता- "बिन्नो! तमाखू ले लो।" चाची वंभे में टिकी बैठी महरी से कह रही थी। "दुल्हिन ! जे बच्चे मैतान तो इने हैं कि क्या कहें।" मझली चाची - । . . पान खाकर ऊपर से थोड़ी सुपारी फाँकती हुई बोली, "राजू को देखो, मजाल है कि छन भर सांत वैठ जाय । दिन-भर ऊपर-नीचे, नीचे-ऊपर 'सरग उठाये फिरता है। तीन-तीन सीढ़ियाँ इकट्ठे फलाँग रहा था.. अव गिरे न तो क्या हो!" "अरे जिज्जी ! बच्चे तो सभी शैतान होते हैं।" छोटी चाची ने कहा, "अब वो तो होनी थी, सो हो गयी। मैंने सुना, तो मेरा तो जी धक् से रह गया । मैं अभी विन्नो को लिवा के चलूंगी। जरा देख तो लू, वरना रात- भर मेरी आँख न लगेगी।" स्वर में विह्वलता आ गयी, "देखो तो, नन्हा- सा वच्चा और एकदम जीने से गिरना...!" उम्मी ने किसी तरह एक-दो कौर निगल कर पानी पिया और उठः खड़ी हुई। "पहले वह ढहढहाया, तो मैं तो समझी दुल्हिन की छत पर धरा कोई गमला गिरा है..." कहते-कहते सहसा मझली चाची रुकी, फिर दायीं तरफ मेज पर रखे वादामी पैकेट की ओर संकेत करते हुए कहा, "दुल्हिन! जे कोई कपड़ा लिया है क्या?" उम्मी बाहर निकलते-निकलते ठिठकी। छोटी चाची ने जिज्जी के जाने से पहले वहीं बैठे हुए दोनों चीजें देखी थीं। साड़ी बीना ऊपर ले गयी थी, चैस्टर वहीं रखा था। "उम्मी के लिए चैस्टर लिया है, मझली जीजी!.."देखो तो ठीक . - "एल्लो दुल्हिन! तुम भी गजव करती हो!" मझली चाची ने चौंक कर कहा, "कम से कम कहला तो देतीं। हमने आज शाम ही उनसे कहा था कि चैस्टर के लिए उम्दा डेढ़ गज कपड़ा लेते आयें। कहीं वो ले आये हों, तो कटा कपड़ा जाने वापिस हो कि न हो...।" "क्या करें जीजी ! सर्दी खूब पड़ने लगी है, कहाँ तक टालते ? दर्जी ऐसा है कि दस चक्कर लगवाये बिना एक रूमाल भी नहीं सिलता, सो अव तो ने किया है कि रेडीमेड कपड़े ही खरीदा करेंगे। उन्हें तो दम मारने की फुर्सत नहीं मिलती, दर्जी के यहाँ धरना कौन दे ! - उम्मी खाना खा लिया बेटी?"D २० : कितना सुन्दर जोड़ा लेडी-किलर । दिसम्बर को ठंडी खुशनुमा शाम । सुनसान-सी सड़क पर पेड़ों के नीचे अंधेरा गाढ़ा होता जा रहा था। आममान को हल्की नीलाहट मे कही. कही तारे चमकने लगे थे । नीला ड्राइंगरूम मे खिड़की के सामने खड़ी थी, चुपचाप, कुछ सोचती-सी। वीच-बीच में टूट-टूटकर दूर कहीं लाउड़- स्पीकर में किसी फिल्मी गीत की कड़ियां हवा की लहरों पर सरसराती आ जाती। तेजी से आती हुई एक कार मोड़ पर घूमी और हेड लाइट्स की रोशनी में सामने बंगले के गेट पर लगी नेम-प्लेट क्षण-भर को चमक उठी, दूसरे ही क्षण अंधेरा पहिले से भी गहरा हो गया। हवा का ठंडा झोंका बारीक गर्द का हल्का-सा आभास लिए आया और बालों की एक धुंधराली लट नीला के माथे पर आ गिरी। उसने लम्बी-लम्बी अंगुलियों से उसे सँवार लिया। सहसा दरवाजे पर चप्पलें घिसटाकर चलने की प्रभा की जानी-पह- चानी आहट सुनाई दी और बड़े-बड़े रंग-बिरंगे फूलोंवाले परदे के बीच उसका मुस्कराता हुआ चेहरा झाका ।

"आओ.।" नीला मुस्कराती हुई मुड़ी। प्रभा अन्दर आ गयी। वह लाल-नीले रंग के बड़े-बड़े चौखाने का चेस्टर पहने थी। गले में दुपट्टा दुहरा लिपटा हुआ था-"अरे, यहाँ अकेली खड़ी-खड़ी क्या कर रही हो?"---नीला के दोनों हाथं उसने थाम लिए। "कुछ नहीं। ऐसे ही।" "आज यूनिवर्सिटी क्यों नहीं गयी ?" "गयी तो थी।" "झूठ।"---उसने नीला के गाल पर हल्की-सी चपत लगा दी। - "मैंने तेरे डिपार्टमेंट में तेरा क्लास देखा था। तू थी ही नहीं।" "तुम एक-डेढ़ बजे के करीव गयी होगी। फोर्थ पीरियड मैंने कट कर दिया था।" प्रभा ने आँखें मटकायों-"क्यों ? 'जरा हम भी सुनें ?" "यों ही ! कुछ मूड नहीं था आज।"-नीला उसका हाथ पकड़े- पकड़े सोफे की तरफ बढ़ी। "हाँ भई, लिट्रेचर वाले तो मूड के गुलाम होते हैं।" प्रभा बैठ गयी। "चाय पियोगी प्रभा रामू को बुलाती हूँ।" "ॐ हूँ, रहने दो। अभी पीकर ही आ रही हूँ।" उसने दोनों हाथ घुटनों पर बाँध लिए और पीछे टिक गयी। फिर जरा कलाई घुमा कर एक निगाह घड़ी पर डाली, वोली, "नीला डियर ! पिक्चर चलोगी?' "कौन-सी?" "कोई-सी भी!" नीला उसके बरावर बैठ गयी, कहा, "फिर कभी चलना प्रभा! मम्मी से पूछा नहीं है !" "अच्छा, जरा सिविल लाइन्स चलो। मुझे युनिवर्सल में एक काम है।" "क्या काम है ?" नीला ने उसकी ओर देखा। "कुछ बुक्स देखनी हैं।" "आज रहने दे प्रभा !" नीला ने एक जम्हाई ली-'कल चलेंगे।' प्रभा जरा कौतूहल-भरे स्वर में बोली, "बहुत वोर फील कर रही हो २२ : कितना सुन्दर जोड़ा ? है -- 11 आज तुम ! बात क्या है ?" फिर तनिक एककर आहिस्ता से कहा, "नो लेटर फॉम मंजुल?" नोला चुप रही। "या तो रिप्लाई मिलता ही नहीं, और अगर मिलता भी है तो निरी- दिव मे।"-प्रभा मुस्कराई, "किसी खास जगह जाना है तुम्हें या कोई आने वाला है ?" "मेरे एक फ्रेंड आ रहे हैं।" "रहे हैं ? प्रभा चौक पडी।" "रहे हैं।" "अरे वाह !" प्रभा सीधी होकर बैठ गयी, "मम ब्वॉयफ्रेंड?" "रहे' वर्ड किस जेन्डर के लिए यूज होता है ? "च: चः च:"तुम तो नाराज हो गयी नीली हालिंग ? मैं तो सिम्पली पूछ रही थी।" फिर जरा रुककर कहा, "कौन है ?" "मेरा एक क्लासफैली है। बहुत प्रिलियेंट है।" "नाम क्या है ?" "राजीव ! .."राजीव साहनी !" "नाम तो बडा रोमैंटिक है।" फिर एकदम चौंककर बोली; "अरे, यही तो नही, जिसकी एक कॉपी मैंने एक बार तुम्हारे पाग देगी धी?" "हाँ, वही है।" "राइटिंग तो ए-वन यी उमको । गिल्कुल मोती-म अक्षर !" "बेन भी ए-वन है । बी०ए० में और लास्ट ईयर एम०ए० प्रीवियग मे टॉप किया था उसने।" "यहाँ रहना कहाँ है ?" "हॉस्टल में एम एम० एल० हॉस्टल । बहुत रित है। दो गाली मे कन्टीन्यूअमली उमै पस्येदिक मेंम की प्राइज मिल रही है हास्टल में।" "अच्छा, मगर यह मब तुम्हें बताया किमने है ? उसोने?" प्रमा घसारा लेकर बोली। "अरे नहीं।" नीता प-मी मत्री ! " मदर की एक नरकी यही डन्यू० एच० में है, दही वदला रही थी।"

"भई वाह, बड़ी बातें होती हैं लड़कियों में उसकी!" नीला की ओर झुककर बड़े राजदाराना लहजे में प्रभा बोली, "लेडी-किलर है क्या?" सहसा मडगार्ड खड़खड़ाता हुआ एक रिक्शा वाहर पोटिको में रुका। नीला उठकर दरवाजे पर आ गयी। आसमानी रंग का सूट और उसी से मैच करती टाई लगाये एक युवक खट-खट करता हुआ बरामदे की सीढ़ियाँ चढ़ रहा था। उसके हाथों में एक फाइल थी। "नमस्ते।" दोनों हाथ जोड़कर मुस्कराकर उसने कहा। "नमस्ते ! .. आइए 'आइए।" प्रभा उन्हें देखकर उठ खड़ी हुई। "ये हैं मेरी फंड प्रभा; एम० ए० फाइनल इकानॉमिक्स में हैं।" प्रभा ने हाथ जोड़ दिये । उसके होंठ सिकुड़े हुए थे। । ताला खोलकर राजीव कमरे में घुसा और अन्दर से उसने सिटकनी चढ़ा ली। कुछ क्षण वह खामोश खड़ा रहा। कमरे में हल्का अँधेरा था । सामने दायें कोने में मेज पर रक्खी रेडियम डायल की घड़ी की सुइयाँ और अंक चमक रहे थे और घड़ी की टिक्-टिक् उसे साफ सुनाई दे रही थी। सामने की खिड़की खुली हुई थी। हाफ कर्टेन के ऊपर से आकाश दिखाई दे रहा था--गहरा, नीला आकाश और धुंधले-धुंधले चमकते हुए तारे ! बगल में वायीं तरफ मेज पर रक्खे स्टोव से स्प्रिट की हल्की-सी गंध आ रही थी। नीचे सड़क पर खड़-खड़ धड़-धड़ करता हुआ ट्रक निकला। पीछे कॉरी- डोर में किसी के जूतों की खट-खट् सुनाई दी और सीटी में बजती कोई . फिल्मी धुन । राजीव ने हाथ बढ़ाकर स्विच ऑन कर दिया। ऊपर लटकता हुआ वल्व भक् से जल उठा। उसने एक सरसरी निगाह कमरे में डाली। दायीं तरफ विछी चारपाई पर किनारों पर दुहरी काली लकीरों वाला वेड- कवर, आगे बड़ी-सी टेवल और उस पर रक्खे रैक में सजी हुयी किताबें, कुर्सी पर डनलप कुशन, सामने खिड़की के नीचे नीला कवर चढ़ा दीवार से सटा सोफे का बड़ा पीस, उसके सामने रक्खी छोटी-सी गोल टेवल, - २४ : कितना सुन्दर जोड़ा जिसके टेबल क्लॉथ के चारों कोने नीचे फर्श पर विद्ध कालीन को करीव- करीव छूते हुए, वायी तरफ वार्डरोब और उसके आगे ड्रेसिंग टेवल, चारों दीवारों पर माउट कराये हुए विभिन्न फोटो ग्रुप और मेज के निकट मेटलपीस पर रक्खा एक चित्र जिसमे एक सांवला युवक विन्मय का भाव चेहरे पर लिये अंगुलियों के सहारे अर्धोन्मीलित नेत्रोंवाली चांदनी- अति गोरी, आरूपवती युवती का चिबुक ऊपर उठाए हुए। राजीव छोटे-छोटे कदम रखता हुआ ड्रेसिंग टेबल के शीशे के सामने आ खड़ा हुआ; बढिया सिला हुआ सूट, पतली-पतली लकीरोवाली टाई, विल्कुल झक् सफेद कमीज'"वह स्टूल पर बैठ गया"एकदम दुबला- पतला शरीर, रंग इतना सांवला जिसे आसानी से काला कहा जा सके। उमने एक हथेली के सहारे मुंह टिकाकर शीशे में झांका; भद्दी, काली अंगुलियां, लम्बोतरा चेहरा, फैले नयुनों वाली लंबी, बेदगी नाक; छोटी- छोटी आंखें, मोटे-मोटे होंठ और खूब उभरी हुई गालो की हड्डियां । "यह थे तुम्हारे प्रिंस चामिग?" नीला ने कोई जवाब नहीं दिया। चुपचाप हाथ को फाइल के पन्ने उलटती रही। "भई, बोर कर दिया तुमने ।" प्रभा चौथी-पांचवी बार बोली, "इननी तारीफ की, ऐसा प्यारा-सा नाम बताया, खामखाह मैंने सोचा, कोई अच्छा-खासा हैंडमम लड़का होगा, लेकिन जब देखा, तो वही मसल हुई कि खोदा पहाड और।" नीला पूर्ववत् चुप रही। "बाइ द वे नीली डालिंग, एक बात तो बताओ।" प्रभा ने जैसे कुछ सोचकर कहा। "क्या ?" नीला ने बड़ी-बडी पलक ऊपर उठाकर उसे देखा। "इनमें तुम्हारी रियली फेंडशिप ""या सिर्फ नोट्स के लिए लिफ्ट दी है, प्लीज डोंट माइंड !" नीला जरा मुस्करायी, "तुम्हारा क्या ख्याल है ?' . लेसी-किलर:

"मेरे ख्याल में तो दूसरी वात ही सही है, और कोई हर्ज भी नहीं है इसमें । एक टॉपर के नोट्स काफी वेल्यूएबिल होते हैं । फिर मंजुल के होते हुए..." नीला ने घूरकर उसकी तरफ देखा। प्रभा मुस्कराकर चुप हो गयी। हवा की एक लहर अंदर आयी। पर्दे जरा हिलकर रह गये। नीला ने हल्के से वालों पर अंगुलियाँ फिरायी और एक ढीला रिवन बाँधने लगी। नेल- पॉलिश्ड बड़े-बड़े नाखूनोंवाली अंगुलियां धीरे-धीरे उठती-गिरतीं। "मैं तो सोचती हूँ नीला"-प्रभा बोली, "कि जो लोग ऑडिनरी दिखते हैं, उन्हें नाम भी वैसे ही रखना चाहिए। अव यही लेडी-किलर हैं।" वह मुस्करा दी-"अच्छा-खासा नाम स्पॉयल कर रक्खा है। उन्हें कोई ऐसा नाम. सजेस्ट कर दो, जो उन पर सूट करे। जैसे, रामकिशन, दीनानाथ..." "या कालीचरन !" नीला एकदम खिलखिलाकर हँस पड़ी। उसके पतले-पतले होंठों के कोने बड़े आकर्षक ढंग से सिकुड़े हुए थे और सफेद साड़ी का पल्ला सरक जाने से 'वी-कट' ब्लाउज में गले के नीचे का उजलापन झलक रहा था। प्रभा भी हँसने लगी, "हाँ, यह नाम तो विल्कुल सोने में सुहागा " नीला गंभीर हो गयी--"अच्छा, चुप रहो। यों किसी का मजाक उड़ाते शर्म नहीं आती? इसमें किसी का क्या दोप! जैसा भगवान् ने बनाया है, वैसे हैं।" फिर जरा मुस्करा दी, वोली, "अपना नाम क्या वहुत अच्छा समझती हो ?" प्रभा इठलायी, "नाम अच्छा न सही, हम तो अच्छे हैं ! "वाह ! क्या कहना है !" "सच ! इस वीक में दो डाइ हुए हैं हम पै !"-प्रभा दवी हँसी हँस दी! "बहुत रिलायबिल न्यूज सविस है। एक वो है, मीना का कजिन... क्या नाम है उसका?" "सतीश सिन्हा !" नीला ने मुस्कराकर कहा। "नहीं, सतीश नहीं ! उससे यंगर जो है। "सतीश तो उन लड़कों में २६ : कितना सुन्दर जोड़ा है, जिन्होंने यू आउट लाइफ किसी लड़की को छेड़ा नहीं, किसी का पीछा नहीं किया, किसी को आँख..." "डौंट टॉक रविश!"नीला ने आंसें तरेरी~"सतीश से छोटा सरन है. लेकिन वह तो पलर्ट दिखता है एकदम "बिल्कुत!" प्रभा हैस दी-~"उन हजरत ने एक नग्म लिखी है मुझ पर-'ओ कजरारी आँखोवाली, तेरी चाल घडी मतवाली'।" कम्बल ओढे सोफे पर अपलेटा राजीव मुंह मै सिगरेट दवाये एक किताब पढ़ रहा था। खिड़की में रक्स टेबिललम्प के शेड के दोनो ओर मुडा हुआ अखबार रक्खा था, ताकि चार इच का गोलाकार प्रकाश केवल किताब पर पड़े। कमरे में राजीव का प्रिय धुंधला-धुंधला अंधेरा छाया हुआ था। उसके मुंह मे निकलते धुएं के छल्ले धीरे-धीरे टेढे-मेढे होकर ऊपर उठते हुए अंधेरे मे सोते जा रहे थे। "नी.."ला...!" नीला को उसने पहली बार पिछले वर्ष क्लास में देखा था। वह भी उसकी सादगी, उसकी गंभीरता से प्रभावित हो गया था। दूसरी लडकियो के समान वह हमेशा सिर मे सिर जोड़े वातें नही करती थी। चुपचाप बैठी रहती, अपने मे खोयी हुई। गोरी, दुबली-पतली, लम्बी-सी, मासूम चेहरा, पतले-पतले होंठ, शात आंखें, जो कैसी भी कौतुक भरी बात सुनकर चंचल न हों। उत्कृष्ट कशीदाकारी किये हुए बगुले के पंख में दमकले उमक सर्फेद कपडे, दाहिने हाथ में पांच-छह चूडियां, वायी कलाई में नाइलॉन के काले स्ट्रेप में बंधी घड़ी, रिवन में गुंथी एक चोटी वृक्ष पर झूलती, संतुलित चाल। राजीव को उसे देखना बहुत अच्छा लगता। देखता तो आँखो में न जाने कितने सपने तैरने लगते, मन मे बहुत मधुरता भर जाती। वह क्लास में तीसरी-चौथी लाइन में बैठता और नीला की निगाह बचाकर उसे देखा करता। जब पीरियड खत्म हो जाते और नीला क्लास से निकलकर कुछ दूर सड़ी अपनी हिलमैन' की तरफ बढ़ती, तो किसी खंभे की आड़ से उसकी निगाहें नीला का पीछा करती-पतली-नाजुक कमर, सीधी-संतुलित चाल । जी में आता कि कभी कोई उसे भी देखता । वह क्लास में देर से आता लौर किसी की नजरें उसके वड़ी-बड़ी आँखों और तीखे नक्शवाले-धूप से लाल हुए गौरे चेहरे पर जम जाती। वह लापरवाही से साइकिल चलाता, हल्की हवा में उसके धुंघराले वालों की एक लट माथे पर झूमती और तेजी से आती हुई कोई लड़की एक बार मुड़कर उसकी ओर देख लेती "लेकिन ऐसा कभी नहीं हुआ, और जव हुआ तव डिपार्टमेंट लायब्रेरी से एक किताव इशू करवा कर लौटते समय एक अन्य लड़की के साथ नीला पर उसकी निगाह पड़ी। संहसा उस लड़की ने कुछ कहा और नीला ने मुड़कर उसकी तरफ देखा, चार-पाँच सेकेंड... न राजीव के दिल की धड़कन बढ़ी, न उसके हाथ-पैरों में सनसनी हुई। वस, एक ही ख्याल उसके दिमाग पर छाया हुआ था कि उस लड़की ने नीला से कहा क्या ! शायद यही कि इस लड़के ने वी० ए० में टॉप किया - है "जरा रुकिए। मैं चाय के लिए कह कर आयी।" राजीव एकदम उठ खड़ा हुआ-"नहीं-नहीं, रहने दीजिए।"मुझे एक जरूरी काम है । अव चलता हूँ।" "काम आपको कव नहीं रहता! आँधी की तरह आते हैं और तूफान की तरह चले जाते हैं।" नीला मुस्करा दी, "वैठिए, पांच मिनट से ज्यादा नहीं लगेंगे।" वह दरवाजे तक आयी कि पोटिको की सीढ़ियों पर प्रभा दिखाई दी। "आओ नीला डियर ! तुम्हें जरा घुमा लायें।" उसने वहीं से चिल्ला- कर कहा। "सॉरी!" "क्यों ? आज भी राजीव साहनी उर्फ बाबू कालीचरन जी आनेवाले हैं ?" प्रभा हँस दी। २८ : कितना सुन्दर जोड़ा' "शिः शि:..." "शी शी क्या ? तेरा ही सुमार। खुले दरवाजे पर खटखट हुई। "कम इन !"--राजीव ने परी । घुमायो। एक हाय से पर्दा किनारे करसाहन र युवक अंदर घुसा। "आप मि० राजीव साहनी हे %D ?" "जी हां !" राजीव उठ खड़ा हुन। "मुझे मंजुल कहते हैं ।” ने दार -- एक मैसेज लेकर आया हूँ ना निद्रा --- मुस्कान थी। "ओह ! "बैठिए-वैठिएव:- मंजुल सोफे पर बैठ गया। राज- से चाय मंगायी।

। - "जी हाँ ! आजकल वर्मा शैल में हूँ।" मंजुल ने एक सिगरेट सुल- गायी। पतली, लम्बी आर्टिस्टिक अंगुलियाँ, एक अंगुली में नीले नग की चमकती हुई अंगूठी, “नीलू ने ईवनिंग में आपको टी पर बुलायाहै। उसकी कुछ फ्रेंड्स भी आ रही हैं, प्रभा, विभाइ.."र"रा...".---वह अटक गया, मुस्कुराया, "मुझे तो कुछेक लड़कियों के नाम भी ठीक से याद नहीं रहते इतने सिमिलर होते हैं। "जी...ई...!"--राजीव ने समर्थन किया। "यहाँ म्योर हॉस्टल में मैं अपने एक फ्रेंड के यंगर ब्रदर के पास आया था। नीलू ने मुझे आपका नम्बर वतला ही दिया था।" वह बदस्तूर मुस्कराये जा रहा था, "मैंने सोचा, आपसे भी मिलता चलूं।" "इट इज सो गुड ऑफ यू !" उसने एक निगाह कलाई की घड़ी पर डाली, "अच्छा अब मैं चलूंगा।"~-वह उठ खड़ा हुआ, "शाम को आप आ रहे हैं न?" "श्योर, श्योर !" राजीव उसके पीछे दरवाजे तक आया। बगल की मेज से ताला उठा- कर कमरा बंद करने लगा, "व्हरिए ! मैं आपको नीचे तक छोड़ देता ।" "ओह, दैट्स ऑल राइट ! बेकार तकलीफ क्यों करते हैं !" जरा रुककर बोला, "बैंक्स फॉर द टी! 'प्लीज डोंट वी सो फॉर्मल !' मंजुल ने मुस्कराते हुए हाथ मिलाया और चलने के लिए मुड़ा- "ओ० के०, सो लांग।" राजीव कॉरीडोर में खंभे पर हाथ टेककर खड़ा हो गया। नीचे पोटिको में नीला की कार खड़ी थी। मंजुल एक हाथ पेंट की जेब में डाले खट्खट् करता हुआ सीढ़ियाँ उत्तरकर नीचे पहुंचा। कार स्टार्ट हुई और गर्द का हल्का-सा गुबार पीछे छोड़कर गेट से बाहर निकल गयी। पास ही कुर्सी डालकर बैठेसाइड-पार्टनर मेहता ने पूछा, "कोन साहव थे?" "फ्रेंड हैं एक!" " ३० : कितना सुन्दर जोड़ा :

"मडाक्से दरवाजा खोलकर विशन निकला और बड़ी ऊंची आवाज में एक फिल्मी गीत गाने लगा। "अवे साले! एक ट्यून मे हर गाना फिट कर देता है !"-मेहता चिल्लाया। लेकिन वह टीका-टिप्पणी से बेखबर गाये जा रहा था-"मुहब्बत ऐमी धड़कन है जो धड़कायी नही जाती..." ठडी रात । चांदनी और सन्नाटा । पढने मे तबीयत ही नहीं लगती। अन- जानी, अनचाही उदासी मन मे भरती-मी जाती है । "किताव की काली- काली लकीरों पर फिसलती धुंधली नजर । ऐश-ट्रे मे बुझने-बुझने को होती मिगरेट में उठती धुएं की टेढी-मेढ़ी रेखाएं।"कितनी अच्छी है यह खामोशी. "यह हल्का अँधेरा... भड़ाम्-से सड़क पर कोई गिरा"शायद साइकिल टकराने की कंप- पाती झनझनाहट "होगा, मुझे क्या ! "राजीव ने कसमसाकर पहलू बदला'""कुछ दिनों पहले कोई नॉवेल पढ़ते हुए समर्पण देखा था : उमको जो जीवन में आयी और चली गयी तब वह मन-ही-मन कितना हंसा या।ये राइटर्स भी कितने फनी होते हैं. लेकिन अगर वह लिखता होता, तो ममपर्ण मे शायद आज कुछ ऐमा ही लिखता लेकिन नीला उसके जीवन में कहाँ आयी थी, वह खुद ही उसके जीवन में आ गया था." 'और अब खुद ही अलग हुआ जा रहा है. अच्छा किया, उसके यहां नही गया, अब कभी भी नहीं जाना है. लेकिन नीला के सामीप्य का इतना मोह क्यों? अभी तक वह उससे क्यों मिलता-जुलता रहा? शायद उसका प्रेम पाने की आशा मे ? .."प्रेम"जाने-पहचाने सपनों की अनंत शृख- लाएँ पलकों मे तैरने लगी"शाम को, जब पेड़ो की कतारी के साये धीरे- धारे फैलते जा रहे हों, किसी सुनसान-सी सड़क पर वे वाहों में वाहे डालकर टहलें, रात के हल्के सन्नाटे मे वह नीला को गेट पर 'गुडनाइट' कहे और उसकी पतली-पतली अंगुलियां होंठों से छुआ ले " मंजुल ! ""सपनों का ताना-बाना खट्-से टूट गया।"शायद वे दोनो कही धूम रहे होंगे या नाइट-शो देखकर देर से वापस लौटे हों या लॉन में खड़े हों "किसी गेड़ के नीचे।"वह नीला की रेशमी बाहों में सिमटा होगा नीला के गले के निचले, उजले भाग पर रक्खे उसके पतले-पतले होंठ, नीला के गर्म होंठ उसके माथे को छूते हुए, उसके गोरे चेहरे पर फिसलती नीला की नर्म, काँपती अंगुलियाँ । 'अगर नीला उससे प्रेम भी करने लगती, तो 'नीला के साथ चलता वह 'दुबला-पतला, वेढंगा-सा।" नीला की अंगूर-सी गोरी कमर पर रक्खे छोटी, काली अंगुलियों वाले उसके हाथ, नीला के होंठों के फड़कते कोनों पर जमे उसके मोटे-मोटे होंठ, नीला की अंगुलियां उसके गालों की उभरी हड्डियों पर फिसलती. राजीव का मन बड़ी कड़वाहट से भर उठा। यदि नीला उससे प्रेम करने भी लगती, तो क्या ऐसी स्थिति स्वयं उससे स्वीकार की जा सकती थी... फिर नीला के समीप अपना साधारण-सा अस्तित्व बनाये रखने का आग्रह क्यों ? .. सिर्फ इसीलिए कि नीला के पास रहना, उसे देखना उसे अच्छा लगता था, पर यह अभी तक नहीं सोचा कि नीला को उसे देखकर कैसा लगता होगा ! शायद अच्छा नहीं, नहीं तो वह नाम' कालीचरन ! बुरा तो नहीं, अच्छा-खासा नाम है। मामूली आदमी का मामूली-सा नाम । एक दुबला-पतला, काला-सा लड़का। नाम कालीचरन । 'क्या हर्ज है ? कोई हर्ज नहीं! "'जव बदसूरत माँ नहीं रही, तो उसका दिया खूबसूरत नाम क्यों बाकी रहे... उसने लैटर-पैड उठाया और सेक्रेटरी, वोर्ड ऑफ हाइस्कूल ऐंड इंटरमीडियट एजूकेशन के नाम एप्लीकेशन लिखने लगा- "सर, रिस्पेक्ट फुली आइ वेग टू से, दैट आइ वांट टु चेंज माई नेम । माई हाइस्कूल रोल नंवर वाज...॥ लेकिन वह सहसा रुक गया यह क्या वचपना है ? .. पढ़ने-लिखने की बजाय ऐसी वेवकूफी की हरकतें ? ''लव-रोमांस पोयट्स का काम है। "ही इज ए मैन ऑफ एम्बीशंस"उसे अपना कैरियर बनाना है। अच्छा किया, नीला-वीला से मिलना-जुलना छोड़ दिया। खामखाह आने- ३२ : कितना सुन्दर जोड़ा जाने में इतना टाइम वेस्ट होता था। फिर वह उसके नोट्स, हैल्प बुक्स वगैरह दो-दो हफ्ते तक रक्खे रहती थी "मलफिश कही की । हूँ ! .. घस, अब उसे खूब मन लगाकर पढना है "नो लव, नो ड्रीम्स ! लेकिन मन में रह-रहकर कसकती एक टीस"D मेहमान मोती घर के बाहर चबूतरे पर टहल रहा था । चबूतरे से बिल्कुल सटी हुई काली कार खड़ी हुई थी। इसकी छत पर लोहे की छड़ों के दायरे में एक वेडिंग और दो बड़े-बड़े सूटकेस रखे थे। कार पर गर्द की मोटी तह जमी थी। मोती जब हाथ सीने पर वाँधे, चबूतरे के दोनों किनारों पर मुड़ता, तो निगाह कार पर से फिसलती हुई सड़क पर पहुंच जाती। उसकी आँखों में चमक थी, और पैरों में तेजी। पड़ोसी कुंदन अपने घर से निकला, तो मोती इधर-उधर देखकर जरा खाँसा, फिर गर्मजोशी से आवाज लगाई, "क्यों, भई कुंदन, क्या हाल-चाल है ?" "वढ़िया है। 'तुम सुनाओ।" कुंदन ने हुक्के की तरह मुट्ठी में दवी सिगरेट का गहरा कश लिया। "ये कार कब खरीदी ?" मोती ने जोर का ठहाका लगाया, जैसे कुंदन ने कोई बहुत अच्छा मजाक किया हो। फिर कहा, "अपना एक जिगरी दोस्त आया है । बम्बई में है आजकल । एक फर्म में असिस्टेंट मैनेजर है। तनखाह है दो हजार महीना । बढ़िया फ्लैट ले रक्खा है। "बहुत मानता है अपने को।" । ३४ : कितना सुन्दर जोड़ा "क्यो न हो भई, क्यों न हो?" कुदन ने धुएँ के दो छल्ले बनाए, फिर कलाई मोडकर घडी देखी। "अच्छा यार, चलूं । जग वैक मे काम है।" मोनी ने चबूतरे पर दो-तीन चक्कर और लगाए, फिर अदर घुस गया। उसके बरामदे में कदम रपते ही, कौशल ने गुसलखाने का दरवाजा सोला। "बड़ी जल्दी नहा लिया ? 'पानी ठंडा तो नही हुआ था ?" मोती ने मुस्कराकर पूछा। "नही, यार," तौलिए के सूखे कोने से गो का पिछला हिस्सा पोछते हुए, वह बोला "मुझे तो बहुत जल्दी तैयार होने की आदत पड़ गई है। “बम्बई मे शुरू-शुरू मे कार नही थी न, और ठीक साढे आठ की लोकल पकहनी होती थी। सोकर उठते थे आठ बजे । लेकिन ठीक पन्द्रह मिनट में शेविंग, नहाना-धोना, चाय-नाश्ता, सब हो जाता था।" उसने मुडकर आलमारी की ओर इशारा किया । "जरा वो शीशी तो देना।" मोती ने लपक कर शीशी उठाई, फिर सहसा संपकर कहा, "इसमे तो सरसों का तेल है।"ठहरो, मैं..." 'अरे, दे यार। अपन को मव चलता है।" कौगल नै गीशी लेकर, बडे इतमीनान मे एक हथेली की अजली में पतली धार गिराई। बाजार के तेलों मे बस, खुशबू ही तो मिलती है सूंघने को। वाल अलग सफेद हो जाते हैं ।" वह हल्की-हल्की उँगलियों से सिर पर मालिश-सी करने लगा। तब तक मोती ने कंघी एक बार कमीज के निचले हिस्से से रगडकर, उसकी ओर बढा दी। "वाबूजी, अम्मा पूछती है, खाना परोसे ?" राजू ने रसोई-घर की दहलीज पर से पूछा। "हाँ-हाँ, बिल्कुल।" मोती वोला, और जल्दी-जल्दी उम तरफ बढ गया। फौशल ने इधर-उधर गर्दन मोड़ कर, आइने में अपना चेहरा देखा, एक झटका देकर कपी में मे नन्ही-नन्ही बुंदियां टपकाई, फिर आँगन के तार पर भीगी तौलिया फैलाने लगा। "पापा!" नीरू ने गोद का कॉमिक बंद कर दिया। अब बाकी । 3Y सामान भी रखवाइएन ।'"कहते थे, सुवह चलेंगे और अब दोपहर हो गई।" "हाँ-हाँ, बेटे, चलते हैं।" कौशल आस्तीन मोड़ते उसके नजदीक चार- पाई पर बैठ गया। फिर पूछा, "तुमने नहा लिया?" "हूं, हमने तो तभी नहा मम्मी के साथ।" "मम्मी कहाँ है ? ऊपर?" कौशल उसके वालों में उलझा एक धागा निकालने लगा। "नहीं, बो तो है..." उसने रसोई की ओर इशारा किया, "उनके लिया था, पास !" . कौशल ने मुस्कराते हुए पूछा, "किनके ?" "राजू-कुंती की मदुर'.." उसने हंसकर कह दिया। "उनसे कहने के लिए तुम्हें क्या बोला था, कल रात ?" कौशल ने उसकी बंद मुट्ठी हाथ में ले ली, और उँगलियां एक-एक करके खोलने लगा। उसने शर्मीली हँसी हँस दी। कहा, "आंटी !" फिर तनिक रुककर, घीरे से बोली, "पापा, ये कैसा घर है ? यहाँ न तो..." "अच्छा, बेटे, खड़े हो," आँगन में गिलास लिए आते मोती को देख, उसने बीच में जोर से टोक दिया, "ये दरी निकाल लें।" "नहीं-नहीं, रहने दो। बैठक से मेज-कुसियाँ उठा लेता हूँ," मोती ने कुछ हड़बड़ा कर जल्दी-जल्दी कहा। फिर मुस्कराकर आगे जोड़ दिया, "तुम सब को तो वैसी ही आदत है न ?" "अरे, छोड़, यार !" कौशल ने दरीवींच ली, और उसे एक बार जोर से फटकारा। "ठहरो, ठहरो मैं..." मोती ने फुर्ती से झुककर, गिलास फर्श पर रख दिये। तब तक कौशल ने दरी बिछा ली, और अटैची से पैकेट और माचिस निकाली। फिर खुला हुआपकेट मोती की तरफ बढ़ाया। मोती ने संकोच- भरी हँसी हँसते हए, एक सिगरेट निकालकर मुंह में दवाई, फिर कौशल के हाथ से माचिस ले, एक तीली जलाई, और उसकी सिगरेट सुलगाने के ३६ : कितना सुन्दर जोड़ा लिए तत्परता से झुक गया।" "सुबह लखनऊ में चलते वक्त हो मेने इला से कहा था, कि रात मोती के यहां हो ठहरेंगे। लेकिन यहां तुम्हारे आफिस मे जब तुम्हारा पता पूछा, तो जानते हो, पहले क्या जवाब मिला?" "क्या?" मोती का हाथ थाली में ही रुक गया, और निगाह कोमल पर जम गई। "कहने लगे, 'जनाव, उनका ट्रासफर तो दो महीने पहले मेरठ हो गया।' मैं नाउम्मीद होकर चलने लगा। लेकिन तभी एक दूसरे माहब ने वरामदे से साइकिल उतारते हुए कहा, आप मोतीलाल को पूछ रहे हैं, या मोतीचंद को?' मैंने कहा कि मोतीलाल को। तो वोले, 'वे तो यही हैं।... फिर उन्हीने घर बताने को एक चपरासी मेरे साथ बिठा दिया।" "अगर मुझे खबर होती, कि तुम आने वाले हो, तो मैं रात तक आफिस में ही बैठा रहता।" मोती जरा हंस कर बोला, "बल्कि जब बाहर से तुमने पुकारा भी न, तो मुझे सपने में भी स्याल न था, कि में सकते हो।"सदजी दोन।" उमने कौशल की थाली की ओर इशारा तुम हो किया। "ये तो हमेशा आपका जिक्र करते रहते थे, "कुमुम मकोच-भरी हँसी हेस, कटोरे में शोरवा डालते हुए बोली, "जब आपकी शादी का निमंत्रण आया, तो जाने की पूरी तैयारी कर चुके थे, छुट्टी ले ली थी। लेकिन ठीक एक दिन पहले वुधार ने आ पकड़ा। 'बहन जी, ये रायता तो लीजिए।" "अरे भाभी, उस वक्त तो इतनी कोफ्त हुई, जिसकी हद नहीं। रोज सुवह स्टेशन पर आदमी दौड़ाता था। आखिरी दिन तो इमको हुलिया बताकर उससे यही कह दिया था, कि बस जैसे ही दिखाई दे, घसीटकर ते आना, बात-बात करने की जरूरत नहीं !" कहकर कौशल ने एक ठहाका लगाया। कुसुम और मोती भी हँस दिए । कुछ देर चुप्पी रही। फिर निवाले के माथ प्याज का एक टुकडा मुंह में रखते हुए कौशल बोला, "भाभी जी, कभी बम्बई का प्रोग्राम बनाइए न। सब घुमा देंगे आप लोगो को, जुहू, मरिन ड्राइव, चौपाटी, कमला नेहरू पार्क, हैंगिंग गार्डन, तारापुर वाला एक्वेरियम, अजंता, एलोरा, सव।" . कुसुम सकुचाई-सी हँस दी। "क्यों, क्या दिक्कत है, मोती?" कौशल ने मोती की ओर देखा। "अगले महीने पन्द्रह-वीस दिन की छुट्टी ले लो । 'वक्त बहुत अच्छा कटेगा।" "अभी तो बच्चों के स्कूल चल रहे हैं न । 'बेकार की गैरहाजिरी हो जाएगी।' मोती ने नर्मी से कहा । "अरे, हाँ।" कौशल चौंका, फिर कुछ सोचते हुए बोला, "तो इम्ति- हान के बाद सही। 'शायद एप्रिल में खत्म होंगे । क्यों, राजू ?" "जी।" उसने तुरंत सहमतिसूचक सिर हिलाया। "बस, तो फिर तय रहा । "क्यों, भाभी जी, ठीक है न?" "अरे, आप खाइए तो।" कुसुम ने हँसकर, उसके रुके हुए हाथ की ओर इशारा किया। इला मुस्कराकर बोली, "अगर बातें हों, तो खाने की ओर इनका ध्यान कभी नहीं रहता।" "भई, इन लोगों से छ: साल के बाद मिल रहा हूँ, और वह भी चंद घंटों के लिए।" "और यहाँ कल से प्रार्थना कर रहे हैं, कि कम-से-कम तीन-चार दिन तो रु को।" मोती ने इसरार किया। "आखिर ऐसी भी क्या जल्दी है ?" कुसुम बोली, "सच, भाई साहब, अच्छा नहीं लगता, कि रात को आए और सुबह चल दिए । 'बहन जी, आप ही इनसे कहिए न !" इला मुस्कराकर रह गई। "मेरे हाथ की बात होती न, तो मैं महीने-भर यहीं पड़ा रहता।" कौशल ने हँसते हुए चम्मच खीर के प्लेट में रवसी । "लेकिन एक बात मेरे दिमाग में आ रही है।" "क्या ?" मोती ने सवालिया निगाहों से उसकी ओर देखा । होंठों के कोने किसी मजाक की संभावना से मुस्कान में हल्के-से खिंच गए। "यही कि दोस्ती को रिश्तेदारी में बदल लिया जाए।" वह कुसुम की ३८ : कितना सुन्दर जोड़ा ओर देखते हुए हंसा । "क्यों, भाभी जी, अपने राजू के लिए नीरू का रिश्ता आपको मजूर है? "मंजूर है, मजूर है।" मोती खिलखिलाकर हंस पडा। कुसुम मुस्कराई। "हमारे तो भाग जाग उठे।" "भई, ऐसे नहीं? पहले लडके वालो की तरह जरा नखरे तो कीजिए।" और कौशल ने ठहाका रोक, पानी का गिलास मुंह से लगा लिया। इला ने कुसुम और मोती को निगाह वचा कर, क्षण भर कौशल को ओर देखा। फिर अनखनाकर बोली, "जल्दी कीजिए। बारह बज चुके "हां-हां, वम चल ही रहे है," नजर मिली, तो कौशल ने कुछ सकपका कर कहा।" । । कुमुम दीवार से पीठ टिकाए, पीडे पर निढाल-सी बैठी थी। मोती सामने खरहरी चारपाई पर सिर के नीचे एक बाँह लगाए लेटा था। बरामदे की तीनो दीवारो की सफेदी मटमैली हो गई थी, और कोनो मे जगह-जगह लवी दरारें थी। अदर वाले दरवाजे के ऊपर पुराने-से, जंग लगे स्टेड मे बल्ब था, जिस पर गर्द की मोटी तह जमी थी। किवाडी की वानिश कभी की उड चुकी थी। उनकी चूलें हिलने लगी थीं, और निचले हिस्म की दो पट्टियाँ टूटी थी । दाई दीवार पर लंबे-से वांस को दो रस्नियों में बांधकर अलगनी बना दी गई थी, जिस पर कुछ मैले-मे कपड़े लटके थे। सामने की दीवार पर टेढी-मेढ़ी कील के सहारे एक पुराना कलेंडर झूल रहा था। उसका कागज बिल्कुल पीला पड़ चुका था, और तारीखो के पन्ने फट चुके थे। फर्श पर दरी बिछी थी। पाम ही जूठी थालियो का ढेर था, जिम पर मक्खियां भनभना रही थी। देखते-देखते मोती ने गहरी सांस ली, फिर करवट बदलने लगा। "कौशल वाबू का स्वभाव बहुत अच्छा है। तनिक भी घमड नहीं!" कुमुम बोली, और हल्की-हल्की उंगलियों से माथा सहलाने लगी "वो हमेशा से ही ऐसा है," मोती ने कहा ।

- - "नीरू की मां ज़रूर गुरूर वाली है।" उसने मुड़कर देखा।" क्यों ? .."कुछ बात हुई क्या ?" "नहीं वात-बात क्या होती ? .. लेकिन मालूम तो पड़ जाता है।" और कुसुम ने दोनों हथेलियाँ मुंह के आगे कर, जमुहाई ली। "भई, बड़े आदमी की बेटी है, और बड़े घर में व्याही गई है।" कुछ देर चुप्पी रही। फिर कुसुम ने पूछा, "कौशल बाबू से तुम्हारी खूब दोस्ती थी ?" "दोस्ती. 'वस, यों समझ लो, कि दो देह एक जान थे।" वहं आवेश में उठकर बैठ गया। "भाई, बड़े सवेरे मोटर साइकिल घड़धड़ाता हुआ मेरे कमरे पर पहुंच जाता था, और फिर हम आधी रात को ही अलग होते थे.''उठना-बैठना, पढ़ना-लिखना, घूमना -फिरना सव साथ-साथ । 'जिस दिन उसके यहाँ पहुंच जाऊँ, उसकी माँ खाना खिलाए विना नहीं आने देती थीं। ऐसा मानती थीं मुझे जैसे उन्हीं का सगा बेटा होऊँ।" उसने एक हाथ की बंधी मुट्टी पर ठोड़ी टिका ली थी, और खोया खोया-सा सामने देखने लगा था। आंगन के आधे हिस्से में धूप फैली हुई थी। एक दीवार से सटे रक्खे चार-छः सावित और अधटूटे गमलों के पौधे हवा में धीरे-धीरे. हिल रहे थे। ऊपर छत की मुंडेर पर एक कौवा सहसा 'काँव-काँव' करने लगा था। राजू हाथ में गुलेल लिए अंदर घुसा, तो मोती ने इशारे से उसे बुलाया, फिर उसके पास आने पर, घुड़ककर कहा, "सुबह नाश्ते के वक्त तू मरयुक्खों की तरह एक बार में दो-दो मिठाइयां क्यों खा रहा था? ... मिठाई कभी देखने को नहीं मिलती थी क्या ? .''वे लोग अपने मन में क्या सोचते होंगे ?" राजू ने अपराधी की तरह गर्दन झुका ली, और पांव के अँगूठे से फर्श कुरेदने लगा। ''जाने भी दो। बच्चे हैं।" कुसुम धीरे से बोली। मोती की निगाह बचाकर राजू को जाने का इशारा किया। फिर कुछ देर की खामोशी के बाद वोली, "भई, मेरा तो बुरी तरह बदन टूट रहा है। सिर में अलग दर्द है। रात को अच्छी तरह सो नहीं सकी । सुबह भी जल्दी ही उठना पड़ा।" ४० : कितना सुन्दर जोड़ा .

" ." "हां-हां,तो लेट जाओ। आराम करो।"खाना तो बना ही होगा? 'हां, सभी कुछ है-पूरियां, सूखी और रसेदार तरकारी "वस, ठीक है। रात को खाने का मझट मत करना।" वह चारपाई से उठने लगा, तो कुसुम ने आंचल की गांठ खोलकर एक सिक्का निकाला। "मैं चौका-बर्तन करती हूँ। तुम तब तक सम्प्रो को एक टिकिया ला दो।" "अच्छा !" मोती ने हाथ वढाकर सिक्का ले लिया। फिर आंगन को और बढते-बढते, सहमा ठिठक कर कहा, "महरी तुमने वेकार हटा दी।" ऐसा कौन-सा खर्च था ?" "क्या करती?" इस महंगाई में..."आगे की वात गहरी सांस मे टूट गई। । मोती कुछ कहने को हुआ,फिर सहसा सिर झटककर, धीरे-धीरे बाहर चबूतरे पर भा गया। गली में इस किनारे मे उस किनारे तक धूप फैली हुई थी। अभी दोप- हर भी नहीं ढली थी, और पूरा दिन सामने था। उसे उत्साह मे दफ्तर मे छुट्टी ले लेने पर पछतावा होने लगा। आखिर मालूम तो था ही कि वे लोग जल्दी ही चले जाएंगे, फिर छुट्टी को क्या तुक थी? एक केजुअल भी बेकार गई, और बोरियत हुई, सो अलग। उसने चबूतरे के नीचे धूल-भरी सडक पर कार के टायरो के अघपिटे निशान खोजे । फिर खांसते हुए इधर- उधर देखने लगा काउंटर पहलू बदलकर घड़ी की तरफ देखता हूँ, नौ वज चुके हैं और धीर अभी तक नहीं आये। उन्हें अभी से बहुत पहले आ जाना चाहिए था, अपने नियम के अनुसार । दोपहर का खाना वह जरूर देर से खाते हैं-दो वजे के लगभग, लेकिन रात को अगर खाने के लिए मना नहीं करते, तो सात-साढ़े सात तक आ जाते हैं. और आज उन्होंने मना नहीं किया। मुझे अकसरं ताज्जुब होता है कि दोपहर और रात के खाने के बीच वह केवल पाँच घण्टों का अन्तर रखते हैं। लंच टाइम प्रायः उन्हीं पर खत्म होता है और डिनर टाइम उन्हीं से शुरू, जैसे वह वीच की वह कड़ी हैं, जो यहाँ की दो लम्बी जंजीरों को जोड़ती है। "एक छोटा पॉट चाय, दो वेजीटेविल कटलेट, दो हापमाई एग।" वेटर निःशब्द आकर वायीं ओर खड़ा हो गया है। पंखे की हलकी हवा में फड़फड़ाते कार्वन को ठीक से देखता हूँ और विल बनाने लगता हूँ। काली रेशमी डोर मेरी हथेली में लिपट गयी है। उसका एक छोर पेन्सिल के ऊपरी सिरे से जुड़ा है और दूसरा विल-बुक से । विल में ऊपर की तरफ ४२: कितना सुन्दर जोड़ा बडे अक्षरो मे रेस्तरां का नाम छपा है, उससे छोटे अक्षरो में पता और दायें कोने पर लाल स्याही मे जैसे एक ललकार अंकित है-'टम्म कश, मानो ये दो लाल शब्द नही, लाल आँखें हों--प्रोप्राइटर की ! सुसं चेहरा और आंखों पर चढा काला चश्मा सामने तर जाता है। वेटर ने छोटी अलमारी पर से सौंफ और दांत साफ करने की पतली- पतली सीकों से भरी प्लेट उठा ली है। काउण्टर से विल लेकर प्लेट में रखा है और तेज कदमो से टेविल नम्बर सात की ओर बढ़ गया है। एक जमुहाई लेकर इधर-उधर देवता हूँ" केविन भरा है, वडी टेविल भरी है, छोटी टेबिलों में बस एक खाली है। नहीं, एक टेबिल नहीं, चार कुरसियां खाली हैं, क्योकि कुरसियो के भरने पर ही टेविल भरती है। """ योगेश का कहा हुआ कुछ याद आता है। एक बड़ा-सा कमरा, जिसकी दीवारो का निचला डेढ फुट का हिस्सा काली वानिश से रंगा है, दीवार के शेप भाग पर हलका आसमानी रग है और जहाँ ये दोनों हिस्से मिलते हैं,वहाँ एक छह इच चौड़ी लाल पट्टी खेहरा रही है । धायें कोने पर काउण्टर है। काउण्टर के आगे शीशे के स्प्रिंगदार किवाड़ और बगल में प्रोप्राइटर के कमरे का छोटा-सा दरवाजा जिसपर काला परदा पडा है। काउण्टर के नजदीक जालीदार छोटी आलमारी है और पीछे की जरा-सी साली जगह में तख्तनुमा पटरे पर कुछ नियमित ग्राहको के घी के डिव्ये रखे हैं—एलमोनियम और डालडा के छोटे-बड़े डिबै । एकाध के अलावा सव में छोटे-छोटे ताले लगे हैं। उन्ही के पाम सॉस और शरबत की कुछा खाली बोतलें रखी हैं । एक कोने में टोस्ट-क्टर है। मामने एक के बाद एक दो टेबिलें हैं और फिर केविन । दरवाजे की ऊंचाई के बराबर लकड़ी का फेम है, जिसके तीनो हिस्सो को छूता हुआ परदा लहरा रहा है। केविन के वायी ओर सामने की दीवार पर चौकोर आइने के साथ-साथ वाश-वेसिन है और उससे काफी ऊपर वडी-सी गोल घड़ी लगी है । घण्टे और मिनट की सुइयों की गति के क्षण पकड में नहीं आते, लेकिन सेकेण्ड की लम्बी सुई लगातार घूमती हुई दिखाई दे रही है । पही में पेण्डुलम नहीं है, चलने की भी कोई आवाज नहीं होती। बस, देखते-देखते सुइयां सामोशी से मरक जाती हैं । 7.x2 . "गुड ईवनिंग !" शीशे का दरवाजा खुलने के साथ-साथ सुनाई देता है और पंखे की हवा में उड़ते बाल सँभालते हुए योगेश दिखाई देते हैं- मुंह में सिगरेट और मुसकराहट साथ-साथ । "गुड ईवनिंग !" उनकी मुसकान मेरे चेहरे पर भी प्रतिविम्बित होती है। हर नियमित ग्राहक के साथ हमारे संबंध अच्छे होने चाहिए, यह प्रोप्राइटर को नीति है, लेकिन ऐसे ग्राहक दो-तीन ही हैं, जो न केवल ठीक से बात करते हैं, वरन् अक्सर दुआसलाम में पहल भी कर लेते हैं । योगेश खम्भों के दूसरी ओर चले गये हैं। ये दो खम्भे काउण्टर से गज-भर हटकर हैं-गोल, दीवारों की तरह तीन रंगों में रंगे हुए। सामने- वाली दीवार पर छोटा-सा दरवाजा है--किचन में जाने के लिए, जिसमें बीचोंबीच स्प्रिगदार तख्ते लगे हैं। जब भी कोई वेटर अन्दर से बाहर या बाहर से अन्दर जाता है, 'खट् की हलकी आवाज होती है। इस दरवाजे के दोनों ओर शीशे के पल्लों वाली दो बड़ी-बड़ी अलमारियाँ हैं, जिनमे क्रॉकरी, नैपकिन, शरबत, विमटो, लेमन, सॉस आदि की भरी बोतलें लगी हैं । बीच में छह कुरसियों वाली लम्बी टेबिल है और बाकी कोनों में चार छोटी टेबिलें। सब मिलाकर आठ टेविलें और छत्तीस कुरसियाँ । यहाँ एक साथ छत्तीस आदमी बैठ सकते हैं।...३६ ! इस संख्या के सम्बन्ध में मैं अकसर सोचता हूँ। "मैनेजर साव, चावी दीजिए।" मेरी बायीं ओर वेटर खड़ा है। नजर उठाने की जरूरत नहीं। सफेद जूतों से शेख को पहचान रहा है । उस अवज्ञामयी मुसकान को भी देख रहा हूँ, जो उसके बक्र होंठों पर खेल रही होगी। काउण्टर के सिरे पर उसकी खुली हथेली फैली है-चौड़ी, सख्त हथेली, जो अक्सर नन्हे के गाल पर बज उठती है । बीच उँगली में चांदी का मोटा, बड़ा-सा छल्ला है। "केबिन में मेम सा'ब नैपकिन माँगती हैं। सॉस की वोतल भी खलास जहाँ देख रहा हूँ, वहीं देखते हुए दायें हाथ से ड्रायर खोलता हूँ, चाबियों का गुच्छा उठाता हूँ और ड्राअर बन्द करते हुए बायें हाथ से गुच्छा काउण्टर पर फिसला देता हूँ। शीशे पर हलकी खनक होती है। ४४ : कितना सुन्दर जोड़ा । रविल नम्बर दो पर भी खनक हो रही है, लेकिन इससे कुछ दूसरी विस्म की। जब वहाँ कप सॉसर पर टिकाया जाता है, तब बनक कुछ चिकनी-सी होती है--नर्म और नाजुक । अगर इमे रूपायित किया जा सके, नो यह बंधी मुट्ठी को दरारो के बीच मे, नन्ही तडपती मछली की तरह फिसल-फिसल जायेगी। जब कटलेट को काटते हा छुरी-कांटे सहसा प्लेट से टकरा जाते हैं, तो यह खनक कुछ चौंकी और चकित-सी होती है "कि अरे, मैं कैसे हो गयी ! और जब पानी-भरा जग गिलास से टकरा जाता है, तो यह खनक कुछ तीखी और अक्खड-सी होती है, जैसे कह रही "यह पान..." नीमू ने कहा है 'या कह रहा है, समझ में नहीं आता। कोई बात शुरू करने से पहले उसके होठ हिलने लगते हैं और बात खत्म होने के बाद भी कुछ-कुछ हिलते ही रहते हैं, मानो गला सूख गया हो, या बात कहते-कहते वह सहसा भूल गया हो कि क्या कह रहा था। उसने मिगरेट के पैकेट की चमकती पन्नी में लिपटा पान काउण्टर पर खिसका दिया है। उसकी बूढी, कांपती उँगलियां मुझे कुछ टेढी-सी लगती हैं। वह कुछ ठिठका है कि शायद मैं कुछ कहूं, लेकिन मैं कुछ नहीं कहता। पहूँ भी तो क्या ? मैं कह ही क्या सकता हूँ ! "ass rsss rsss" टेबिल नम्बरं छह पर पुकार लगती है। चौककर ड्राअर के बगल में लगे बटन पर उँगली रखता हूँ। अन्दर किचन में घण्टी की आवाज सुनाई देती है । इस टेबिल पर सब यूनिवर्सिटी के लड़के हैं-मुक्त और निर्द्वन्द्व । घण्टे-भर से सिगरेट, कॉफी और कह- कहो का दौर चल रहा है। अभी कोई बिगड़ उठे, तो मुसीयत हो जाये । ''अनगहे ही साल-भर पहले की घटना याद आ जाती है, जब आधी क्रॉकरी चौपट हो गयी थी। "देखो, अभीन से बोलो कि नम्बर छह पर ठीक से सर्व करे,"- सामने ने निकलते नन्हे को रोककर कहता हूँ। पहलू बदलकर काउण्टर पर कुहनियाँ टिकाते हुए निगाह पेपरवेट के बगल में पड़े पैकेट पर पड़ती है। इसमे एक सिगरेट वची है। मुझे याद आता है। सोचता हूँ. पी लूँ? हाँ, पी ली जाये...। लेकिन अभी या कुछ देर बाद ? 'अच्छा, टेबिल नम्बर छह के खाली होने पर पीऊँगा, मन ही मन कहताहूँ। "अपने मापसे इस तरह की शर्ते हमेशा लगती हैं-सिगरेट पीने के लिए, पान खाने के लिए, चाय पीने के लिए 'फलाँ टेबिल खाली हो, फलाँ कस्टमर पानी का गिलास खत्म कर ले, वेसिन पर झुके-झुके कोई आइने में अपना मुंह देख ले.." . . शर्त पूरी हो जाती है, तो पन्नी की गोली बनाकर बास्केट में फेंकते हुए पान मुंह में रखता हूँ, सिगरेट होंठों में दबाता हूँ, फिर सामने ही देखते हुए ड्राअर से स्टाम्प-पैड पर रखी माचिस निकालता हूँ...। इन पाँचों ड्राअरों में मेरी उँगलियाँ देख लेती हैं। दो हाथ लम्बा और एक हाथ चौड़ा, हलकी गोलाई लिये यह काउंटर • "शीशम की चिकनी लकड़ी, ऊपर काला मोटा कांच, जिसमें पंखे का गोल आकार तेजी से घूम रहा है। सुबह से दोपहर तक, दोपहर से शाम तक, शाम से रात तक "जिन्दगी का कितना बड़ा हिस्सा यहाँ बैठे-बैठे गुजार दिया है --बिल बनाते हुए, हिसाब-किताव करते हुए, लोगों को खाते-पीते देखते हुए। पैर सुन्न हो जाते हैं, पीठ अकड़ जाती है, कुहनियाँ दर्द करने. लगती हैं। बचपन में घंटे-भर वेंच पर खड़ा कर दिया जाना दिन-भर रुलाने के लिए काफी था, लेकिन अब लगता है कि बैठा दिया जाना भी छोटी सजा नहीं है। बिल-बुक में दवे कार्वन का एक कोना हवा में सरसरा रहा है । पेंसिल की लाल, रेशमी डोर भी सिहर उठी है--किसी मधुर पुलक में। जब यह डोर नहीं थी, तो पेंसिल को विल-बुक में दवाने की बजाय कभी चिकने काउंटर पर बीचोंबीच रख देता था, एक तरफ विल-बुक, दूसरी ओर ऐश- ट्रे और बीच में पेंसिल हवा की लहरों पर फिसला करती थी---यहाँ से वहां, वहाँ से यहाँ, मगर एक वार सहसा दूसरी ओर मुड़ी, गिरी और . लम्बी नोक टूट गयी शेख अपनी मूंछ उमेठता हुआ आया और चावियों का गुच्छा प्लेट पर रख गया । इस तरह मूंछ ऐंठना उसकी आदत है, या सिर्फ मेरे ही सामने ऐसा करता है? इस सवाल के जवाव से बचता हूँ--ऐसे ही और भी कई संवालों की तरह। प्लेट से नोट और रेजगारी उठाकर गिनने लगता . . ४६ : कितना सुन्दर जोड़ा हूं और मन-ही-मन विल के अनुपात में शेख को मिली टिप का अन्दाज लगाता हूँ"। उसने दायी ओर खड़े होकर बड़े अदब मे केविन का परदा खिसकाया है। साडी का सरकता पल्लू संभालते हुए पहले गोरी युवती निकलती है, पीछे उसका पति ! शेष सम्भे के निकट खड़े अमीन को आँख मारता है। कुछ ऐसी ही युवती थी वह भी-गोरी, लम्बी-सी शाट बस्टर पहने थी। दिसम्बर के उस हफ्ते में कन्वोकेशन की वजह से बेहद रस पा। नीमू सुबह ही मेरे पास आया पा~-चेहरे की झुरियों में दर्द की कंपकंपा. हट लिये। उसका तपता हाथ मैंने खुद छुआ था, लेकिन बुखार कितना ही तेज क्यों न हो, छुट्टी नहीं दी जा सकती थी। प्रोप्राइटर का आदेश था। और नीमू ने दिन-भर मर्च किया था~डगमगाते पैरो से, जैसे एडियों में वधी लोहे की वजनी जंजीर पीछे-पीछे घिसट रही हो, लेकिन परो की कंपकपाहट जब हाथों में भी आ गयी, तो केबिन का पर्दा हटाकर भरी ट्रे टेबिल पर रखता हुआ वह लड़खड़ाया""ट्रे में जलतरंग-जैसी ध्वनियाँ उभरी घी" चिकन करी और कोफ्ते का गर्म शोरवा, गर्म फाई आन्दू. पटर, एगकरी, सलाद और चटनी, पिघला हुआ मक्सन युवती रिवो में घर भेज दी गयी थी, लेकिन काउटर पर चूंसा मारता हुआ पति रक गया था और प्रोप्राइटर के आने पर... नोमू की बारह साल की मविस थी, इसलिए निकाला नहीं गया । लेकिन कैबिनछिन गया"सबमे छिन गया, जहां सबसे ज्यादा टिप मिलती थी। पहले हर हफ्ते टेबिलें बदलती थी, लेकिन अब फिक्स हो गयी। शेन्त के लिए केबिन और टेबिल नम्बर दो, नीमू के लिए तीन और चार, पांच और छह अमीन को और सात-आट केवल के लिए । अमीन को शेख ने पटा लिया था, लेकिन नौमू और केवल के सामने सामोशी के अलावा और कोई चारा नहीं था। केबिन की महीने भर की टिप तनख्वाह में दुगनी पी और नीमू-केवल को जिम्मेदारियां शेख मे दुगनी। तनस्वाह बढाने का कोई सवाल ही पंदा नहीं होता था! तब मैंने एक डिव्या लाकर अपने बगल की अलमारी पर रख दिया था--दस इंच ऊंचा, छोटा-सा पोल डिच्चा, सफंद रग का, कार लकीर जैसा छेद था और हक्न . 1 ताले से बन्द । चारों वेटरों को बुलाकर कह दिया था- 'आज से तुम लोग अपनी-अपनी टिप के पैसे इसी डिब्बे में डालना । रात को तुम सबके सामने ही डिब्बा खुलेगा और पैसे बराबर-बरावर बांट दिये जायेंगे।" लेकिन शेख से सूचना पाने पर रात को प्रोप्राइटर बिगड़ उठे थे- "लाहौलविलाकूवत...! आप यहाँ मालिक हैं, या मुलाजिम...? यह इस्तियारे-तकसीम आपको किसने दिया? गोया कि यह डिब्बा..." केवल ने जालीदार अलमारी झटके से खोली है, तो डिब्बा कुछ हिल उठा है । ड्राभर से सिगरेट का पैकेट निकालते हुए उधर नजर डालता हूँ। निचले खाने में दो बड़े मर्तवान हैं। एक में पेस्ट्री, विस्किट, केक वगैरह, दूसरे में दालमोठ, नमकीन दाल । ऊपरी खाने के एक कोने में कटी स्ला- इसें हैं, बड़े पानी-भरे जग में मक्खन की टिकियाँ, एक कोने में अंडे, लूज टी का बड़ा-सा लिफाफा । केवल दो अंडे निकालकर अलमारी बन्द करता है, तो डिव्या फिर हिल उठा है-हलके-से। नीमू अब वुड्ढा हो गया है। ज्यादा अच्छी तरह काम नहीं कर सकता । प्रोप्राइटर चाहते हैं, कि वह निकल जाये, लेकिन खुद निकालकर तोहमत मोल लेना नहीं चाहते, इसलिए धीरे-धीरे उसके सामने उलझनों के जाल डालते जा रहे हैं। वह नम्बर चार के पास बेकार खड़ा है। पहले की तरह । टेविल का काँच साफ है, फिर भी दो वार पोंछ चुका है। ऐश- ट्रे किनारे पर थी, उसे बीचोंबीच खिसका दिया है। नमक और काली मिर्च की शीशियों के छेददार ढक्कन वन्द कर दिये हैं। चारों कुरसियाँ करीने से लगा दी हैं--इस तरह टेविल के दो पायों के बीच कुरसी के अगले दो पाये घुसे रहें और हाथ सीने पर बाँधे, दीवार का सहारा लिये चुपचाप खड़ा टेविल नम्बर तीन विलकुल सामने पड़ती है। दरवाजा खुलते ही गरमियों में हवा का गरम और सदियों में सर्द झोंका मुंह पर आकर लगता है। फिर आने-जानेवालों से डिस्टर्व भी होता रहता है। शायद इसीलिए यह टेबिल कम भरती है। योगेश के अनुसार इस पर बैठना ऐसा ही है, जैसे पिक्चर में सबसे आगे बैठना और ड्रामे में सबसे पीछे। नम्बर चार बिलकुल कोने में पड़ती है, फिर खम्बे और अलमारी के पीछे छिप-सी गयी ४८ : कितना सुन्दर जोड़ा है, इसलिए कस्टमर घुसते ही दायी ओर की दूसरी टेबिलों की ओर बढ जाते हैं। और नीमू वेकार खड़ा है। कभी वह जव पेमेंट से बचे पैसे लेकर जाता है, तो रेजगारी मे छोटे सिक्को की जगह चवन्नी और अठन्नी रख देता हूँ। कभी उमे टिप ज्यादा मिल जाती है, कभी कस्टमर छोटे सिक्को के लिए वापस भेज देते हैं, कभी अपनी जेब से निकालकर दे देते हैं और कभी जब वे बचे सिक्के जेव के हवाले कर, थोडी-सी सौंफ फांकते हुए लापरवाही में उठ सड़े होते हैं, तो मैं अपने को अपराधी महसूस करता हूँ, मानो वह गलती मुझसे हुई हो, जिसकी वजह मे उमे पैसे नहीं मिले । ... जब वह कांपते हाथों से साली प्लेट काउंटर पर रखता है, तो एकाएक एकाउंट-बुक में व्यस्त हो जाता हूँ। वह कुछ क्षण ठिठकता है कि मैं शायद कुछ कहूँ, लेकिन में कुछ नहीं कहता" कह भी तो क्या..? मैं कह ही क्या सकता हूँ ! "मैनेजर साब!" "क्या है ?" 'आज मेख ने मुझे फिर धप मारी है, साथ | कहता है-स्साले, टेंटुआ मसक दूंगा!" "अच्छा, मैं डांट दूंगा उसे। तुम काम करो अपना । घबराओ मत!" नन्हें को दिलामा देता है, लेकिन गोरे चेहरे पर घबराहट पसीने की बूंदें बनकर उभर रही है, बड़ी-बड़ी आँखों की तरलता में तैर रही है । वह जब भी मिकायत करता है, यही कह देना हूँ"और कुछ नहीं करता। वह भी यह जानता है, मैं भी यह जानता हूं और इसके बावजूद हम दोनो वही कह देते हैं, जो इसके पहले भी कई बार दुहरा चुके हैं। एक हाथ मे चम्मच सहित घी की कटोरी और दूसरे में चाबी लिये वह टेबिल नम्बर दो को और वहा है"। चावी टेबिल पर रखकर कटोरी उमने नियमित ग्राहक को दिवाई है। "ठीक है । इमे प्याज डालकर गरम करवाना।" स्वीकृति में सिर हिलाते हुए नन्हे ने बामे के निकट सडे दोष की ओर देना है-~-सहमी हुई निगाह । आज गेघ को फिर सवी रोटी खानी पड़ेगी ओर नन्हे को चपत ! नन्हे क्या इतना भी नहीं कर सकता कि दिन में दो वार घी ज्यादा निकाल ले और कटोरी कस्टमर को दिखाये विना सीधे किचन में ले जाये...! स्साला..! मेरे सामने से गुजरते हुए नन्हे ठिठका है."किसी ठोस आश्वासन की आशा में, लेकिन मेरे पास ठोस कुछ भी नहीं है । जो कुछ था सब खोखला सावित हुआ है। जो है, उसे सावित करने की भी जरूरत नहीं। उसकी निस्सारता दिन की रोशनी की तरह साफ है-वेपर्द और चमकदार । शेख यह जानता है। तभी वह वेझिझक मेरे सामने कह सकता है- "हाँ, मैंने इसे झापड़ मारा ! इस वदजात लौंडे ने मुझे माँ की गाली दी थी!" और मेरे सामने नन्हे की माँ की आकृति आ जाती है। पहली तारीख को वहीं, काउंटर के सामने खड़ी थी। मैले-कुचले, छेदोंवाले बुर्के का ऊपरी हिस्सा दिखाई दे रहा था। गोरे चेहरे पर नकाब उठा था, लेकिन आँखों पर गिरा मालूम होता था। बेटे की तनख्वाह लेकर बड़ी हिम्मत करके कहा था, धागे-जैसी महीन आवाज में- "वो अभी नादान है, हुजूर ! नेको-बद का कोई गुमान नहीं..'! आप हमारे खैरख्वाह हैं। आप पर खुदा का रहमो-करम हो...! उसका खयाल रखेंगे, तो मैं बेवा, बेसहारा..." और सिसकियों के बीच आवाज टूटने लगी थी। "कहिए, जनाब ! क्या हाल हैं ?" योगेश ने दरवाजे के हैण्डिल पर हाथ रख कहा है। "मेहरवानी !" उनकी ओर देखते हुए विनम्र हँसी हँसता हूँ। वह मुसकराते हुए कदम वाहर बढ़ाते हैं-"ओक्के, गुडनाइट !" "गुडनाइट!" - ड्राअर से नियमित ग्राहकों का रजिस्टर निकालता हूँ। खोलता हूँ और योगेश के नाम के आगे, आज की तारीख के नीचे सही का निशान लगा देता हूँ। इन्हीं के नाम के नीचे धीर का नाम है..! धीर ! मेरी निगाह सामने घड़ी पर चली जाती है। अभी तक नहीं आये तो अब शायद आयें भी नहीं। दोपहर का खाना दो बजे खाया था। उस दिन शायद और भी देर हो चुकी थी। हफ्ता-भर हुआ होगा, जव सनसनाती लू में ५० : कितना सुन्दर जोड़ा साल चेहरा लिये, थके हाथों से दरवाजा ठेलकर अन्दर घुसे थे। शेस बड़ी टेग्लि पर बैठे सरदारजी के सामने लस्सी का गिलास रखकर अन्दर खान- सामा से गणे लड़ाने लगा था। बाकी तीनो वेटर खाना खा रहे थे। मैंने घंटी के बटन पर अंगुली रखी, तो मिनट-भर तस्तों की कोई 'खट' नही हुई। फिर दबे गुस्से की तिलमिलाहट आँखों मे लिये शेख आया था। "शोरदार सब्जी खत्म है "सूखी सब्जी खत्म है !" धीर को देख उसने वेरुखी से कहा था। "दाल तो है ?" मैंने पूछा था। "जी हां!" "बस, थोड़े आलू फ्राइ करवा लो। जल्दी।" फिर धीर की ओर घूमते हुए बोला या, "माफ कीजिएगा, देर हो चुकी है, इसलिए..." उन्हें ऐसी आशा नहीं थी। जिस कस्टमर ने तीन महीने से पेमेट न किया हो, उसके प्रति ऐसा सौजन्य ! वह एकाएक तरल हो आये थे । रक- एककर, धीमी आवाज में बतलाया था कि वह आजकल बडी मुमीवत मे हैं। ढाई सौ की एक अस्थायी जगह थी। उसी में अपना काम चलाते थे, घर भेजते थे। परमानेंट हो जाने की उम्मीद थी, लेकिन नहीं हुए। दिसम्बर में जवाव मिल गया था। तब से"। कुछ देर खामोशी रही थी। वह काउंटर पर कुहनिया टेके, झुके-से खड़े थे। मैं पंखे की एकरस घररघर मुनता हुआ, काले कांच मे उसका गोल आकार देख रहा था। "घर मे कौन-कौन हैं ?" "मां हैं, बहन है, छोटा भाई..." फिर कुछ चौंककर कहा था, "मेरा एकाउंट तो काफी हुआ होगा!" स्वर समतल था-प्रश्न के उतार-चढाव से एकदम रहित, इसलिए समझ नहीं सका कि उनका मतलब क्या है। "मैं कोशिश करूंगा कि जल्दी ही..." उन्होने फोकी हंसी का परदा अपने चेहरे पर लटकाया था। और जैसे उन्हें इस तनाव मे उबारने के लिए मैं एकदम कह उठा था, "ठीक है:"ठीक है, दैट्स ऑल राइट...!' लेकिन प्रोप्राइटर ने उसी हपते एकाउंट-युक देखी थी। फिर आदेश " ।

दिया था, "इनसे कहिए, तीन दिन में पूरा पेमेंट करें वरना छोड़ दें ! लाहौल विला..." वह जानते हैं, साल-दो साल में एकाध रेगुलर कस्टमर ऐसा भी मिलता है। शुरू में वरावर एडवान्स देता है, फिर एडवान्स नहीं देता, फिर एकाउंट चलाने लगता है और होते-होते आखिर उसे जवाब दे दिया . जाता है। कानूनी कार्रवाई के झंझट में कौन पड़े ! सही सौ-डेढ़ सौ की एक चपत ! उन्होंने तीन दिन के लिए कहा था तीन दिन हुए, चार और पांच और छह 'एकाउंट-बुक में दवा हुआ धीर का विल निकालता हूँ, एक सौ सत्ताइस रुपये, ग्यारह आने 'आज तक का वैलेन्स.. आज विल दे दूंगा और कल से धीर नहीं आयेंगे । रजिस्टर में उनका नाम अपने ऊपर एक लाल लकीर का कफन ओढ़ लेगा। लम्बी साँस लेता हूँ और सामने देखता हूँ."टेविलों पर.छनक और खनखनाहट वातचीत की बारीक, भौंरों-सी भनभनाहट, जैसे तेज कोला- हल को छान दिया गया हो। तस्तों की 'खट-खट्', कुरसियों के पीछे खिसकाने की आहट, बेसिन पर पानी की हलकी कलकल सुबह से दोप- हर तक, दोपहर से शाम तक, शाम से रात तक 'वस, यही कुछ आवाजें और चलते हुए मुंह चाहता हूँ कि हर होटल और रेस्तरां में बाहर बड़े रंग-बिरंगे बोर्ड पर वस, आदमी का एक खुला मुंह हो "मुंह, जो जव चलता है, तो माथे के दोनों ओर कुछ नसें उभरती हैं, गालों की खाल के नीचे दाँतों की कतारें चलती हैं और चबाया हुआ कौर गले के उभरे हिस्से. को ऊपर-नीचे करता हुआ गायब हो जाता है। दिन-भर यही देखता हूँ- एक नाटक, जिसके प्रारंभ में चरम सीमा होती है और अन्त में शैथिल्य । बुखार का टेम्परेचर नीचे से ऊपर जाता है, लेकिन भूख का टेम्परेचर ऊपर से नीचे आता है। मैं लोगों को उनकी वेशभूषा और व्यक्तित्व से नहीं जानता, पद और प्रतिभा से नहीं जानता, खुराक और खाने के ढंग से जानता हूँ। मेरी नजरें अखबार में छपी किसी की तसवीर का बन्द मुंह खोल देती हैं और माथे के दोनों ओर नसें व गालों की खाल के नीचे बत्तीसी चलते देखती हैं। रात को घर पर खाना खाने बैठता हूँ - ...५२ : कितना सुन्दर जोड़ा तो आँखो के सामने सैकडो चलते हुए मुंह आ जाते हैं, बड़े-बड़े भगौने और देगचियां, बांस की टोकरी में चपातियों का ढेर प्लेटों की लम्बी कतार, जो भरती है, फिर खाली होती है, फिर भरती है, फिर खाली होती है। और लगता है कि मैं तो सा चुका हूँ, मेरा पेट बुरी तरह भरा - - घर की याद से वहां का नक्शा सामने आ जाता है."। विल फाडकर वेटर की ओर बढाते हुए सोचता हूँ, इस बारे में आज ही बात कर लेनी है। इतने दिनो से टाले जा रहा हूँ। कहूंगा--"मर, जिस तनख्वाह पर आठ साल पहले यहाँ ज्वायन किया था, अब उसमे काम चलना बहुत मुस्किल हो गया है। अगर इन्क्रीमेंट मिल सके, तो बडी मेहरवानी हो।" नम्बर आठ पर प्लेट रखकर वेटर पानी लेने चला गया है। नीली कमीज पहने जिस लड़के ने ऑर्डर दिया था, वह अपना हाथ टेबिल के नीचे कर लेता है और वाकी दोनो लडकी के हाथ नीचे-नीचे ही उससे मिलते हैं। नीली कमीजवाला लड़का इधर-उधर देखता है, फिर प्लेट में दिल के ऊपर एक-एक के तीन नोट रख देता है। यह सब अक्सर देखता हूँ। एक दोस्त पर्म खोलकर चेंज गिनता है, दूसरा जेव में हाथ डाल लेता है। एक- डेढ मिनट तक न रेजगारी की गिनती हो पाती है, न रुपये ढूंढे मिलते हैं। आपिर एक को गर्म बिल पर रुपये रखती है, तो दूसरा चौंककर कहता है--"रुको "रको, आय'म गिविंग !" वेटर ने प्लेट काउंटर पर खिसकायी है। नोट उठाकर ड्राअर मे रखता हूँ। तभी शीशे का दरवाजा खुलता है और धीर अदर आते हैं। उनके साथ दोयक्ति और है । एक पण्ट-वुश्शर्ट पहने है, दूसरा पायजामा- कुरता। धीर 'हेलो' कहते हुए टेबुल नम्बर छह की ओर बढ़ जाते हैं । उन्होंने वेटर से तीनो के लिए खाना लगाने को कहा है। कौन हो सकते हैं ये ? इन्हें पहले धीर के साथ कभी नही देखा । बायी ओर जरा गरदन मुकाता हूँ। घोर कोने की कुरसी पर, सामने की ओर मुंह किये बैठे हैं। उन्होंने एक पुरानी खाकी कमीज पहन रखी है, दाढी कुछ बढी हुई और बाल बिखरे ढंग से संवारे हुए । टेविल पर बुहनियां टेके हथेली पर मुंह झुकाये वह चुप हैं-अनमने भाव मे नमक की शीशी इधर-उधर घुमाते हुए।

पहलू बदलते हुए सामने घड़ी की ओर देखता हूँ। धीर आदत के अनु- सार शायद काफी देर तक बैठेंगे। दोपहर के खाने के समय उन्हें बहुत जल्दी रहती है। अमूमन सभी को जल्दी रहती है । धीर तो ठीक से खाना लगने का भी इन्तजार नहीं करते। खाना लगता जाता है और खाते जाते हैं। एक आँख टेबिल पर होती है, एक घड़ी पर। लेकिन रात को वहुत इत- मीनान से खाते हैं। लंच के समय वड़ो गहमागहमी होती है, भाग-दौंड और ऊँची आवाजें, जैसे आँधी आ रही हो । मेरी अंगुली वार-बार बटन पर रहती है, किचन में घंटी वरावर टनटनाती रहती है, लेकिन डिनर के समय ऐसा कुछ नहीं होता। वेटर इनमीनान से सर्व करते हैं, कस्टमर इतमीनान से वैठते हैं एक आलस-भरी खामोशी, जैसे आँधी थम चुकी हो और साफ खुले आसमान में भेड़ों के नन्हे बच्चों-से सफेद बादल उड़ने लगे हों। लगता है, जैसे लंच एक जोश-भरी नज्म है, कुछ कर गुजरने की उमंग में सोडे की तरह उफनती हुई और डिनर फिरनी की तरह जमी एक रिवायती गजल है-रूमानी, स्वप्निल वातावरण की सर्जक, सुकून और ठहराव से भरपूर दस बजने को हैं। केविन खाली है। परदा छल्लों की खनक के साथ आधा खुल गया है। उसका निचला हिस्सा वायीं ओर उड़ रहा है- हल्के-हल्के । परदे पर लाल जमीन में सीधी और तिरछी लकीरें हैं-मोटी और रंगबिरंगी "दूसरी टेबिलें भी खाली हो गयी हैं। वेटरों ने काँच साफ कर दिये हैं। कुरसियाँ ठीक से लगा दी हैं और अन्दर चले गये हैं। वहाँ से बातचीत और हँसी-ठहाकों की आवाजें आ रही हैं। सोचता हूँ, मना कर दूं, लेकिन उठते-उठते रुक जाता हूँ। किचन में जाना अच्छा नहीं लगता। भट्ठी की तपती हुई आँच और बड़े-बड़े देगचों के बीच काले, नंगे शरीर पर तहमद लगाये, पसीने की धारें बहाता खानसामा, एक कोने में नल के नीचे गन्दी प्लेटों का ढेर, मसालों की तेज गन्ध... विलों का हिसाव जोड़ लिया है, ड्राअर के रुपये गिन लिए हैं और अव एकाउंट-वुक खोले वैठा हूँ-नियमित ग्राहकों का खाने के अलावा आज का क्रेडिट चढ़ाने के लिए। धीर का विल बना लिया है, दो गेस्ट- मील्स । सोचता हूँ, नीमू को कल के लिए निर्देश दे दूं। मुझे सुवह फ्लोर ५४ : कितना सुन्दर जोड़ा मिल होते हुए आना है । उन लोगों ने कल शाम को आटा भिजवाने के लिए कहा था, मगर अभी तक नहीं भिजवाया।बंडेवाला जाए, तो अंडे तीस ही लें, ग्रेड दस और कह दे कि पैसे अगले हफ्तं मिलेंगे। याद करता हूँ कि अभी धौर को बिल दे देना है। फिर प्रोप्राइटर बामें, तो उन्हें बताना है कि दिल दे दिया और आज एक जग टूटा है और इन्त्रीमेंट'वह दे सकते हैं, या शायद नही ही देंगे। कहेंगे-'यहाँ के लिए एक रेफ्रिजरेटर खरीदने की सोच रहा हूँ। फिलहाल मजदूरी है।' तब...? तब क्या रहूंगा..? कुछ नही"। कहूंगा भी क्या ! मैं कह ही क्या मकना हूँ ! कुरसियों के पीछे को आहट होती है । धीर ने वेसिन पर हाय घोये, फिर वहीं कील से लटकते तौलिए से हाथ पोछ रहे हैं। मुझे अपनी हये. लियां पसीजी-सी लगती हैं । काउटर पर दोनो बिल मेरे सामने हैं--एक, जो बिल-बुक से फाड़ा नहीं गया और दूमरा, जो पेपरवेट तले दवा है। धीर निकट आ गये हैं। उनके दोस्तों ने प्लेट से थोडी-थोडी सौंफ ली है। घोर ने अनमने ढंग से एक पतली सीक उठायी है। वह सौंफ नही पाते। प्लेट काउंटर पर होती है, तो उसे एक ओर खिसका देते हैं। उन्होंने बिल- बुक अपनी ओर घुमा ली है और पेन्सिल अंगुलियो मे थामे, बिल पर दस्तखत कर रहे हैं। उनके दोस्त उनके साथ हैं और मैं उनकी ओर देख रहा हूँ। उन्होंने जाने क्या पढ़ा है मेरे चेहरे पर कि उनकी आंखों मे किसी आशंका की छाया उतर आयी है। मेरे दिमाग में लगातार यही यात चक्कर काट रही है कि आखिर इन लोगो में क्या बात हुई है। शायद किसी नौकरी के बारे मे हो । धीर को नौकरी मिल जायेगी, वह एडवान्स ले लेंगे और यहां का पूरा हिसाब चुकता हो जायेगा। शीशे का दरवाजा वन्द होकर खुला है और प्रोप्राइटर तेजी से अपने कमरे में चले गए हैं. इतनी तेजी मे कि मुझे खड़े होने का अवकाश भी नहीं मिला । बस, उनकी एक झलक देखी है । सुर्ख चेहरा और आसों पर चढ़ा काला चश्मा । कई बार सोच चुका हूँ कि जब उनके आने के वक्त का अन्दाज है, तो सावधानी बरतनी चाहिए, लेकिन गलती हो ही जाती तस्तों के पीछे से इस ओर देखता शेख हट गया है। उमे धीर पसन्द काउंटर:५.

नहीं। नियमित ग्राहक महीने में जिस दिन अपना विल चुकाते हैं, सभी वेटरों को कुछ-न-कुछ टिप मिल जाता है, लेकिन धीर ने शायद इसे कभी कुछ नहीं दिया। प्रोप्राइटर के कमरे से बातचीत की भनक सुनाई देती है। अन्दाज लगाता हूँ कि धीर को विल न देने पर मेरी शिकायत हो रही होगी। शीशे का दरवाजा वन्द है । केविन और सातों टेविलें खाली हैं । काउं- टर के ऊपरवाले पंखे के अलावा बाकी आठों पंखे बन्द हैं । मेरी वायीं ओर का ट्यूव जल रहा है। बाकी तीनों ट्यूब वुझ चुके हैं। काउंटर के काँच पर ट्यूब का अक्स पड़ रहा है। कुछ छण उस ओर देखता हूँ तो आँखें चौंधियाने लगती हैं । वेसिन का नल किसी ने खुला छोड़ दिया है। पानी की पतली धार निःशब्द नीचे गिर रही है। एक नीम-अँधेरा, खामोशी... "आपको साहव याद फरमाते हैं," शेख ने पीछे से कहा है। बहुत हल्की 'हूँ' करता हूँ जिसे खुद भी नहीं सुन पाता। मेरा चेहरा विलकुल भावहीन है-निर्वेर और निर्विकार । काउंटर पर विल-बुक है, विल-बुक पर नोटों का बंडल और बंडल पर दो मुट्ठी चेंज । अकसर सोचता हूँ कि मैं क्या हूँ-~-मैनेजर हूँ, काउंटर-क्लर्क या रिसेप्शनिस्ट ...? अगर कोई शुगर-पाँट से रिसेप्शनिस्ट-सी मीठी दो चम्मच चीनी कप में डाले,केतली से ब्लैक टी जैसी क्लर्क की कड़वी दिनचर्या और मिल्कपॉट से दूध सार-जैसा मैनेजर का प्रबन्ध-कौशल, तो शायद वह मेरा तरल जीवन हो। एक नजर सामने घड़ी पर डालता हूँ। फिर कुर्सी के हत्यों पर कुहनियाँ टिकाता हूँ. अब मैं उठ रहा हूँ ''अव मैं उठ रहा हूँ–तीन घंटे और छत्तीस मिनटों के वाद'३६ ! इस संख्या के सम्बन्ध में अकसर सोचता हूँ। मैंने वेसिन की ओर बढ़कर नल बन्द किया है। पैर सुन्न हो रहे हैं, पीठ अकड़ गयी है, कुहनियाँ दर्द कर रही हैं."नसों में तीखा तनाव. जोड़ में चटख"स्विच ऑफ करता हूँ तो पंखे की एकरस घररघरै सहसा वीच से कट जाती है। काले कांच में सनसनाता गोल आकार धीरे-धीरे थमने लगता है। आँखों में ट्यूब की चमक अभी भी रेंग रही है। रोशनी की चिकनी लहरों पर नन्है, उसकी मां, नीमू, धीर और स्वयं मेरा चेहरा फिसल-फिसल जाता है। सामने लम्बी सुई चुपचाप घूमे जारही है. ५६ : कितना सुन्दर जोड़ा :

निगरानी मैंने घडी पर नजर डाली. सात बजने मे आधा मिनट बाकी था। प्रश्नपत्रों के चारों गुलाबी बडल उठा लिए और उन पर बंधी कागज को पतली चिप्पियो फाड दी। फिर उन्हें करीने से लगाते हुए हाल के बिल्कुल किनारे पर आ गया। कोने की इन दो कतारों मे मुझे पर्चे बांटने हैं। कुछ ने कापी के पिछले कवर पर परीक्षार्थियों के लिए नियम पढ लिए हैं। सब ने अपनी- अपनी कापी पर आज का दिन और तारीख लिख ली है, एनरोलमेट नंबर और रोल नंबर डाल लिया है, विषय का नाम और पर्चे की क्रमसंख्या दर्ज कर दी है। किसीने हाशिए के तौर परकापी का किनारा मोड़ दिया है, किसी ने पंसिल औरस्केल का सहारा लिया है। जिनका हाथ सघा है उन्होंने कुछ नहीं किया। वे लिखते हुए ही वायें सिरे को एक-डेढ इंची जगह खाली छोड़ते जायेंगे। एकाएक मैंने महसूस किया, जैसे मैं स्टेज पर सडा हूँ। आँसो के कितने जोड़े मेरी तरफ थे-छोटे-बड़े, सीधे-तिरछे, कुछ सादे, कुछ काजल लगे। हल्की-सी वेचनी महसूस हुई। मैंने पर्चों वाला हाय सामने उठा लिया। राजनीति शास्त्र"समय : तीन घटेपूर्णांक : १००."किन्ही पांच - प्रश्नों के उत्तर "सव प्रश्नों के अंक समान हैं। नंबर एक । अरस्तू के वित्त संबंधी विचार क्या थे? संक्षिप्त समीक्षा कीजिए"नंबर दो। रोन के राजनीतिक विचार रोम की संस्थाओं से कहाँ तक प्रभावित हुए हैं ? उन्ल ने घंटा बजा। दोनों हाथों से दायें बोर वार्च डेस्क पर एक-एक पर्चा रखता हुला मैं फुर्ती से भागे बढ़ता गया 'कागज को सरसराहट और बढ़े हुए लातुर हाय"कभी अनूठीवाली मंगुलियां, कभी बड़े या छोटे डायल की घड़ी, कभी चूड़ियों की सनक डेस्क के एक सिरे पर कील ने का रोल नंबर का कार्ड.."स्याही को दवात रूमाल, पेन, पेंसिल... एडमिट कार्ड"संतरा"कुछ पर्चे व गये थे। उन्हें सामने दीवार से सटी रखी बड़ी नेज के बंडलों में निला दिया। लोग सर झुकाये सवालों को पढ़ लौर समझ रहे थे। लिखना शुरू करते-करते अभी पांच-छह मिनट लग जायेंगे। "तुमने अपने यहां का पेपर देखा?" कपिल ने पूछा। "नहीं।" उतने पर्चा मेरी ओर बढ़ाया। भेद-भरे लहजे में कहा, "जानते हो, किसका है?" मेरा मन हुआ कि उसे बतला कि दूं प्रोफेसर रस्तोगी के ऐसे कितने ही तथाकथित गोपनीय काम न करता हूँ, लेकिन वह अपने गुट के अंदर क्या, उसकी सीमा-रेखा पर भी नहीं जाता था, इसलिए दवा गया। भोले भाव से पूछा, "चंडीगढ़ का है ? डाक्टर दिल्लन?" "नहीं, उस्मानियाँ के डाक्टर राव का है।" फिर बाहिस्ता से जोड़ा, "मेरे पैस० जोर छियासठ के दो पों से पांच-पांच सवाल उतार लिए हैं। वत्त, सीरियल नंबर की तब्दीली हुई है।" मैंने गौर से उसके चेहरे की तरफ देखा और नापने की कोशिश की कि यह जुमला सादा है या नानीभरा-क्योंकि पेपर बनाने का यही ढंग मेरा भी था। नंतर बस यही था कि मैं दो के बजाय पांच-छह पत्रों को नाधार बनाकर उतार लिया करता था। इस तरह एम० ए० का एक पेपर तपार करने में जाधे घंटे से ज्यादा नहीं लगता, जब कि सुनते हैं कि कुछ ईनानदार जिस्म के लोग दो-दो दिन लगा देते हैं, क्योंकि प्रश्नपन्न ऐसा बनना चाहिए, ५८ : कितना सुन्दरजोड़ा

इस इनविजिलेशन का आश पापा नि है। तीन दिस और बाकी
है."पांच रोज में इस हाल में किसना व गुजरा' हीन और सीris
और तीन और नौ बारह और सीन पर परे। अगर Chan
हाल के दो सौ चक्कर लगाये, तो कुल कितने हुए! एक हमारा
गुडनस ! "इतनी देर मे कितनी कॉपिया नियत समता था। जागा
की याद आयो, जो आधे फमरे को घेरे हुए है। भागपुर fanfult.
रजिस्ट्रार का तो टेलीग्राम भी आ गुफा है। गुगते है, pin. WE PA
नियम बनने वाले हैं कि विलंब को अनुपात रो पारिया factी ती
जायेगी"अगले साल अपने अंदर में किसी तरह पोसिमानानि
चाहिए । काम काफी बढ़ गया है । योगेा को गम गाना
पड़ता है। भय उराका काम भी करवाना पाहिए। म. That
की नियुक्ति हो जाये। एक तो यगारराम पाली
जगह मेरा नाम देखते ही बिना पीगिग पर भी रिपोर Minी.
एच० डी० दे दी जाये। दूसरा ? होने को मी गानाs, rani
सकते हैं, लेकिन यह वादग पोरामर गति । हिमा
एक प्रोफेसर योर एक रीडर होना पाहिए।
कपिल हाल के उग तरफ. एम.-. शक नागनारामा
दस्तखत करने लगा था। मैंने भी पन निकामा "
पहली लाइन के पहले रेम्क पर पक गया RAIPUR
चंद्रा३०।४...
बिड्डी के योरेना हिण में साक्षा [atamperacts
नगी। नीच कृष्ठ कारें और शुद-Amrai turery

एक लोग आ-जा रहे थे। आखिरी कश लेने के बाद सिगरेट चौखट से रगड़कर बुझायी और नीचे फेंक दी। मुड़ा और पिछली तरफ से निःशब्द आगे आने लगा । यकायक एक कापी का पन्ना पलट गया, तो स्लिप फिसलकर फर्श पर आ गिरी.."विनय ! . ''मेरे ही ट्यूटोरियल में था। सामने पड़ने पर हमेशा सलाम ठोकता है। ठिठककर देखा; स्लिप पर बारीक-बारीक अक्षरों में जैसे नक्काशी की गई थी। दायीं ओर जूतों की आहट हुई। एक-एक डेस्क खोजभरी निगाह से देखता चौधरी चला आ रहा था- टीचिंग की बनिस्बत इनविजिलेशन को ज्यादासीरियसली लेता है न ! मैंने एक पैर स्लिप पर रख लिया और लापरवाही के भांव से पीछे दीवार से टिक गया। कपिल के आगे निकल जाने पर झुका और स्लिप उठाकर जेव में डाल ली। दरवाजे तक पहुंचा, तो चपरासी ने कहा कि साव, चाय वन गयी है। . कमरे में छह-सात लोग थे। चीफ इनविजिलेटर मेज पर एक थीसिस खोल बैठे थे। बतलाने लगे कि जून तक पाँच देख कर सबमिट करवानी हैं. .."सीनियर प्रोफेसर थे, विश्वविद्यालय की राजनीति के प्रमुख स्तंभ, इस- लिए सव सर झुकाये चुपचाप सुनते रहे। बाहर निकला, तो ऊपरी हाल की सीढ़ियों से डॉ० मणि उतर रहे थे। सलाम के लिए हाथ उठाया,तो वह वोले, "आप ही की तरफ आ रहा था। एक गुजारिश है "यों कल रात भी आपके यहाँ हाजिर हुआ था, पर आप थे नहीं।" "कल हम लोग पिक्चर चले गए थे। हुक्म दीजिए, क्या बात है ?" वह कंधे पर हाथ रख एक कोने में खींच ले गये । कुछ अटपटा-सा लगा। सीनियर रीडर हैं, ऐसी बेतकल्लुफी तो पहले कभी नहीं दिखायी। "मेरा भतीजा मोहन यहीं पढ़ रहा है।''बी० ए० फाइनल में । शायद जानते हों।" "नाम तो सुना हुआ-सा लगता है।" "वात यह है कि उसका सेलेक्शन एन०सी०सी० की आफिसर्स ट्रेनिंग यूनिट में हो गया है। आप तो जानते हैं, ट्रेनिंग के बाद सीधे लेफ्टिनेंट की हैसियत से कमीशन मिल जाता है।" ६० : कितना सुन्दर जोड़ा "बड़ी खुशी की बात है।" "लेकिन मुश्किल यह आ पड़ी है कि उसके लिए ग्रेजुएट होना जरूरी है और इन हजरत ने परसों का पेपर बहुत विगाड दिया है."एग्जामिनेशन सेक्दान से मालूम पड़ा कि वह आपके पास है। अब अगर आप इनायत करें, तो..." "डॉक्टर साहब! आपसे मुझे ऐसी उम्मीद नहीं थी."यानी आप मुझे गर समझते हैं ?" मैंने उलाहना दिया, "यह तो विल्कुल घर की बात है।" उन्होंने मेरा हाथ अपने हाथों में दबा लिया, "थैवयू |..'थैक्यू वेरी । मच !" "मिदा मत कीजिए."रोल नंबर क्या है ?" उन्होंने जेब से एक चिट निकालकर मेरी तरफ वढा दी। 'डेस्क की दो लाइनों के बीच चहलकदमी करते हुए सोचता रहा कि डॉ० मणि के मामा एक्जीक्युटिव काउसिल के मैवर और वाइस-चास- लर के गुट के हैं। जब अपनी रीडरशिप का मसला आयेगा, तो मदद मिल .. जायेगी। चपरासी उपस्थिति का रजिस्टर लेकर आ गया, तो अपने हस्ताक्षर किये । किसी को प्यास लगी, तो पानी वाले को बुलवा दिया। डेस्क पर पेन को खटखट हुई, तो सप्लोमेट्री कापी दी। लिस्ट पर रोल नंबर नोट किया। एक निगाह देखने से मालूम होता था कि लोगो के लिखने की रफ्तार काफी तेज हो गयी है। "देखिए, सप्लीमेट्री कापी जव लें,तभी उसे बांध दीजिए।" कपिल ने एलान किया, "वाद मे एक्स्ट्रा टाइम नहीं दिया जायेगा।" मेज से टिककर हाथ सीने पर बांध लिए"इस हाल में एक दरवाजा है और पंद्रह खिड़कियां, तीन दीवारो पर पांच-पांच । चौथी दीवार में सटाकर गोदरेज की आलमारियां रखी गयी हैं । चालीस ट्यूब हैं, एक-एक दीवार पर पांच, और पांच-पांव करके छत पर चार लाइनें । पखो की चार कतारें। हर कतार में छह हाल में कुल मिलाकर सत्तर डेस्क हैं ! लड- कियां चौतीस । लडके छत्तीम। तीन जगह वुर्ता-पायजामा-धोती 1 वाकी पेंट-कमीज-बुश्शर्ट । प्रारह चूड़ीदार-कमीज । एक स्कर्ट। शेष साड़ियो।

नजर आ रहा है कि लिखते समय पल्लू या दुपट्टा बार-बार फिसल जाता है। हर लड़की को हर पाँच मिनट में दो-तीन वार तो सँभालना ही पड़ता होगा। कापीऔर स्याही सोखते के साथ ही एक-एक सेफ्टीपिन भी दी जानी चाहिए या फिर वह काम भी इनविजिलेटर को ही क्यों नहीं सौंप दिया जाता? दरवाजे से झांककर डॉ० सरन ने देखा। पास आये, तो वधाई दी। उन्हें विसकांमिन से पोस्ट-डाक्टरल फैलोशिप मिली है। पूछा, रवानगी कब है ? जवाव मिला, अगस्त के आखिर में। ऐसे लोगों को देखकर अजीव- सा लगता है, जिनमें शादी और वच्चों के बावजूद भी रिसर्च की हिम्मत है। एक हम हैं--पाँच सालों में पी-एच० डी० की थकान भी नहीं उतार पाये। "आपका बाहर जाने का इरादा नहीं है ?" पूछा गया । "है क्यों नहीं!" "तो फिर?" "जाऊँगा लेकिन कोई ऐसी फेलोशिप मिले, जिसमें काम न करना पड़े, घूम-फिरकर वापस आ जाऊँ।" वह स्टेट्स के किसी विश्वविद्यालय के बारे में बतलाने लगे, जहाँ आमतौर से नये लोगों की स्थायी नियुक्तियाँ नहीं होती कांट्रैक्ट होता है और उसकी अवधि समाप्त होते-होते कोई-न-कोई नयी शोधकरके दिखानी होती है । इस तरह वास्तविक एकेडेमिक रुचि के लोग ही शिक्षा के क्षेत्र में आते हैं और वातावरण बहुत अच्छा रहता है 'आदि-आदि। एक के बाद एक लगातार तीन जमुहाइयाँ आयीं। अव यहाँ से जाते ही खाना खाकर, सो जाऊँगा। कापियाँ योगेश ही देख लेगा। रिजर्वेशन के बारे में पता लगाने स्टेशन भी वही चला जायेगा। अब भाग-दौड़ की हिम्मत नहीं है.''ऊव-ऊवा-सा लड़कों को देखता रहा। इनका क्या होगा? मेरे जैसे कुछ दुनियादार या अच्छे कांटेक्ट वाले ठीक जगह पा जायेंगे,वीस- पच्चीस रिसर्च में फंस जायेंगे, और बाकी ?..'कोई सेल्समैन होगा, कोई टाइपिस्ट, कोई क्लर्क। अगले साल तक इनके चेहरे काफी बदल जायेंगे दाढ़ी हलकी-सी बढ़ी,आँखों के गिर्द झुर्रियां, गालों की हड्डियां उभरी हुई ६२ : कितना सुन्दर जोड़ा 'अरस्तू के वित्त संबंधी विचारों पर वैचारे चिंतन-मनन करते रहेंगे! 'कुर्सी पीछे खिसकने की आहट हुई। एक साहब उठे। इशारे ने वाथरूम जाने की अनुमति मांगी। पान आये, लिस्ट पर रोल नवर लिखा, फिर बाहर जाने लगे। मन हुआ कि कहूं, यार, स्लि फ्लश मे बहाने की जरूरत नहीं। लाओ, मुझे दे दो पर वे बहुत संजीदा ये। चुनांचे चुप रहा।

कितना सुन्दर जोड़ा बंबई सेंट्रल के अहाते में गाड़ी पार्क करके जब जल्दी-जल्दी फॉयर में पहुंचा, तो पूछताछ के सामने रक्खे ब्लकबोर्ड पर निगाह अपने-आप पड़ गयी- नवसे पर ही एयरकंडीशंड एक्सप्रेस के पैंतालीस मिनट देर से आने की सूचना थी "जैसा व्यत्र जा रहा था, वैसा ही जड़ खड़ा रह गया." अब?" बाहर चिलचिलाती धूप देखी, तो देर से सूखते अपने गले का ध्यान माया। स्टाल तक बढ़ा और माथे का पसीना पोंछते हुए एक बोतल कोक हलक में उँडेली। देह के उप्ण कांटों को हिमानी ठंडक ने छुआ, सहलाया .."? अचानक खयाल माया कि पास के एयरकंडीशंड मार्केट में एक पुराना परिचित है, जो कई बार आने के लिए कह चुका है। सव-वे से होता हुआ स्टेशन के बायें गेट से बाहर निकल आया और एक सिगरेट सुलगाकर पैदल ही तारदेव पहुँचा । नंयोग से दोस्त दफ्तर में ही था। उसने अपने फर्म के बने हुए नट-बोल्ट दिखलाये। एक मल्टी-पर्पज स्क्रू-ड्राइवर निकाला, ६४ : कितना सुन्दर जोड़ा जिमके लिए स्टेट गवर्नमेट मे ऋण पाने की उम्मीद यो । चाय पी। जब घड़ी पर मेरी निगाह गयी, तो चालीस मिनट हो चुके थे। मैंने हड़बडाकर विदा मांगी। उसने कुछ देर और रुकने का हठ किया । मैं यह जाहिर नहीं करना चाहता था कि अपने काम से आया तो स्टेशन ही था और यहां सिर्फ वीच का वक्त भरने के लिए पहुंचा हूँ, इसलिए दफ्तर के एक जरूरी काम का बहाना बनाया। वह मान गया और दरवाजे तक मुझे छोड़ने आया। नीचे उतरकर मैंने टैक्सी ले ली। स्टेशन पर आ ड्राइवर को एक का नोट थमाया और जल्दी-जल्दी अन्दर पहुंचा। गाड़ी प्लेटफॉर्म पर आ चुकी थी और मुसाफिरी का पहला रेला कुलियों के साथ बाहर निकल रहा था। इधर-उधर मे रास्ता बनाता हुआ भीड़ में धंसता गया"कुछ ही दूर, एयरकडीशड चेयरकार के सामने सडी निंदी दिखलाई दी। उसके कंधे पर पसं झूल रहा था, वायें हाथ में प्लास्टिक की छोटी-सी जालीदार टोकरी थी और दायें मे सूटकेस । पहले में कुछ दुबली लग रही थी और सांवली भी। तलाग करते उसके चेहरे पर गहरी व्यग्रता थी-एमे देख रही थी, जैसे न मिलने पर कहीं खो जायेगी। "हैलो..." उमकी पीठ पर हल्की-सी थपकी मारकर मैंने कहा । वह मुड़ी, मुस्करायी 'मैंने उसके हाथ से टोकरी ले ली और दायी और देखकर पुकार लगायी, "कुलोऽऽ...!" "कुती की क्या जरूरत है ?" मैंने पलटकर देखा, "वस, यही है तुम्हारा सामान ?" मैंने उसके हाथ से मूटकेस लिया, तो उसने टोकरी मुझसे वापस ले ली। तब तक एक कुली पास आकर रुक गया था! आगे बढ़ते हुए मैंने कहा, "नहीं चाहिए भई।" कुछ वढ कर जोड़ा, "बहुत हल्के होकर सफर " मेरे बराबर चलने की कोशिश मे दो-तीन सवे डग भरकर पल्लू संभालते हुए निंदी बोली, "सहलियत रहती है।" "मुझे तो तुम्हारी पुरानी आदत का खयाल था।" करने लगी हो तुम . वह खंभों पर लगे गोलाकार चौखटों के फिल्मी पोस्टर देखती रही... गेट पर आकर मैं ठिठका, जेव में हाथ डाला, तो याद आया कि प्लेटफॉर्म टिकट तो लिया ही नहीं था। टिकट-कलेक्टर ने निंदी के बढ़े हुए हाथ से टिकट ले लिया और सवालिया निगाह से हम दोनों की तरफ देखा। "मुझे अफसोस है।" मैंने हल्की मुस्कान से अटककर कहा, "ट्रेन प्लेटफॉर्म पर आ चुकी थी 'जल्दी में मुझे खयाल ही नहीं रहा कि..." मेरे एक हाथ में झूलती कार की चाबी पर नजर डालते हुए वह टिकट वढ़ाये दूसरे दो-तीन लोगों की तरफ मुखातिब हो गया। ''अगली सीट पर बैठकर काँच नीचे गिराते हुए निदी बोली, "वड़ी गर्मी है यहाँ ।" और पल्लू का कोना हल्के-हल्के चेहरे पर फिराने लगी। "हाँ । जब तक वारिश नहीं होती, तव तक तो..." उसने टोकरी में से पानी की बोतल निकाली, खोली और प्लास्टिक के छोटे-से गिलास में थोड़ा पानी उँडेला, "अभी भी ठंडा है पानी । बड़ौदा से भरा था.. लोगे?" "तुम पी लो। फिर..." पर उसने गिलास सामने वढ़ा दिया, तो तीन-चार चूंट ले लिए। .. साढ़े चार के लगभग वाथरूम का दरवाजा खुलने की आहट हुई । तब तक मैंने विजली की केतली में पानी रख दिया था और एक सिगरेट सुलगाकर ड्राइंगरूम में हल्की-सी झाड़-पोंछ के बाद कुशन करीने से लगा रहा था। हफ्ते-भर पुराने अखवार समेटकर आलमारी में बंद कर दिये थे। पुरानी पत्रिकाएँ मेज के निचले खाने में लगा दी थी और भरी हुई तीनों ऐश-ट्रे गैलरी के डिब्बे में उलट आया था। किचन में आने पर देखा, केतली की नली से.सू-तूं की तेज आवाज के साथ भाप के फुहार छूट रहे थे। उसे ऑफ करके चाय का डिब्बा खोला। गैस जलाकर थोड़ा-सा दूध गर्म किया। रैक से दूसरा मग उठाया, तो उस पर धूल की मोटी तह जमी थी। थोड़ा गर्म पानी डालकर साफ किया। आलमारी से विस्कुट का डिब्बा निकाला और सव ट्रे में संभालकर बाहर . ६६ : कितना सुन्दर जोड़ा

ले आया।
जब मैंने एक मग मे चाय बना ली, तो पर्दा हिला और हाउसकोट में
दूसरी बांह डालते हुए निदी वाहर आयी।
"हैलो"."मैने मुस्कराकर कहा, "नीद बायो कि नहीं?"
"थोड़ी देर।" वह आकर सामने दीवान पर बैठ गयी।
"चाय भी बना लो तुमने !"नहाने के बाद दीली-ढाली चोटी को एक
रिवन में बांध लिया था। अखिों में अभी भी आलम था और तद्वा।
"हूँ"तुम जरा रुककर लेना "दूसरा कप । ज्यादा स्ट्राग बनेगी।"
उसने हामी में मिर हिलाया। छोटी-मी जमुहाई ली। फिर आँखें बंद
करके हल्के हाथों में माथा सहलाने लगी।
"क्या बात है ? दर्द है सिर मे ?"
उसने फिर स्वीकृति में सिर हिलाया, "तुम्हारे पास कोई टिकिया
पड़ी होगी ?"
"हाँ।"
वह अपनी पुरानी लचक में खड़ी हो गयी, "वता दो, उठा लूंगी।"
"पलंग के सिरहाने है-मेज को दराज में।"
मैंने दूसरे मग में एक चम्मच चीनी डाली और चाय बनाने लगा।
कुछ क्षणी वाद निंदी आयी और वगल के मोफे पर बैठ गयी। मखमली
चप्पलों से पर निकालकर सामने तिपाई पर टिका लिये। स्ट्रिप फाड़कर
एस्सो को दो टिकियां निकाली, मुंह में रखी और मेरे हाय में मग लेकर
एक बडा मा पूंट भर लिया।
"कल मेरा वापसी का रिजर्वेशन करवा देना। हफ्ते-भर वाद का तो
मिल जायेगा?"
"आते ही जाने की भी बात शुरू कर दी !"
"जरूरी है।"
"करा जरूरी है ?" आगू की तो छुट्टियां हैं अभी, तुम और ले सकती
हो।"
"वाको नही हैं अब । जनवरी में लागू को टाइफाइड हुआ था, तो ले
ली थीं।" उसने दो-तीन छोटे-छोटे यूंट लिए । अटककर कहा, "फिर बार
कितना सुन्दर जोडा : ६५

। यह है कि..." और रुक गयी। ऐसे विरामों से मेरा पुराना परिचय था । यह इस बात का सूचक था कि आगे ऐसी बात आ रही है, जिसे विवशता में कहना पड़ रहा है, जिसे वह अपने तक ही रखना चाहती थी, ताकि मुझे चिंतित न होना पड़े, पर अब मेरी जिद है, तो बतलाये बिना कोई चारा नहीं। मैंने एक नमकीन विस्कुट का टुकड़ा काटा, "तो?" "दरअसल जल्द ही वोर्ड की एक मीटिंग है, जिसमें मेरे सीनियर ग्रेड का भी फैसला होना है और ट्रांसफर का भी। पहली चीज के लिए कोशिश करनी है और दूसरी किसी तरह रुकवानी है। इसलिए वेहतर होगा, अगर एक बार चेयरमैन और दो-तीन सीनियर लोगों से मिल लूं।" "तुम अकेली लोगों से मिल-विल लेती हो? बात कर लेती हो?" वह झेंपी-सी मुस्करायी। फिर मग मुंह से लगा लिया। "आशु का रिजल्ट आया?" "हाँ, अच्छे नंबरों से पास हुई है।" एक कुशन उठाकर पीछे रख लिया। कुछ सोचती-सी रही। धीमे स्वर में वोली, "तुम सदियों में आये क्यों नहीं ? मैंने इतना इसरार किया था।". पल-भर के लिए मेरे सामने मर्मातक यंत्रणा के वे दिन कौंध गये। सिगरेट जलाने को माचिस उठायी,तो तीली दो बार टूटी। लंबा कश लेकर जैसे अपने-आपसे ही कहा, "मैं उन दिनों बहुत उखड़ा हुआ था।" निंदी स्थिर दृष्टि से सामने देखती रही, जहाँ दीवारों के कोने में एक वड़ा-सा जाला लगा हुआ था। उसके पास ही कॉनिस पर जो डैकोरेशन- पीसेज थे, उन पर जमी धूल की मोटी तह का अंदाज भी दूर से ही हो जाता था। "नौकर को हटा दिया क्या ?" सहमति में सिर हिलाया। "परेशान होते होगे?" "नहीं तो वल्कि उसके होने से ही थी कुछ परेशानी मैं तो एक तरह से सोने के लिए आता हूँ यहाँ।" विराम । उन दिनों की बात आयी, तो वातावरण में वह तनाव जैसे फिर से सुलग उठा-दम घोंटनेवाला धुआँ देने लगा। यही कमरे, दरवाजे ६८ : कितना सुन्दर जोड़ा । और टैरेस-जिनके साथ जुडी हुई कितनी ही तीखी स्मृतियां कसक उठी .."कुछ वैताबी मे सिगरेट ऐश-ट्रे में मसलकर उठ खडा हुआ, "तुम तैयार हो जाओ, तो कहीं बाहर निकलें।" "हाँ-हाँ, बस, पांच मिनट लूंगी।" एक वडे धूंट के माथ प्याला खाली करके वह भीतर चली गयी, तो वाहर कॉरीडोर में निकल आया। लिफ्ट का बटन दवाया और नीचे आ गया। दरवान के सलाम के जवाब में सिर हिलाकर मडक तक पहुंचा। मामने बेकरी में अपनी सहेली के साथ खडी एक लड़की हंस-हंग कर फोन पर बातें कर रही थी "ओह हां, फोन । एकदम याद आया। सुबह से ही लग रहा था कि कुछ है, जो भूल रहा हूँ। कुछ मिनट वाहर चहलकदमी की। लडकियां चली गयी, तो भीतर आगया। वह नंबर डायल किया, तो एंगेज्ड मिला,मिनट-भर प्रतीक्षा की। दुबारा डायल किया, तब भी एगेज्ड था। रिसीवर रखकर जेबें देखी, नो पैकेट नही पाया । नुक्कड़ की दुकान से नया पैकेट लिया और सिगरेट मुलगायो। कुछेक लवे कम खीचकर फिर फोन के पास आया 'सात- चार-जीरो-नो-पांच-एक "तत्क्षण घंटी बजने लगी। रिमोवर कुछ ठहर- कर उठाया गया। 'हैलो..." उघर मे सुनाई दिया। "वहुत पॉपुलर हो रही हो। लाइन वरावर एगेज्ड मिलती है।" वह हंसी, "जलन हो रही है ?" "इम एहसास के सुख ने तो मुद्दत पहले निजात मिल गयी।" हल्की-सी चुभन हुई शायद । क्षणिक विराम । फिर सुनाई दिया, "तो शिकायत किस बात की थी?" "वक्त खराब होने की।" वह थोडा इठलायी, "जी हाँ, हमारे माथ आपका वक्त ही तो खराव होता है।" "वेशक । पर इस वीक-एंड को नहीं कर पाऊंगा।" लगा कि वह संजीदा हो गयी, "क्या बात है ?" "एक मेहमान आये हुए हैं।"

कुछ रुककर उसने कहा, "पहले वतला देते। दो अच्छे इन्वीटेशन छूट गये वेकार-आंटी माथेरान जा रही थी और कुसुम महावलेश्वर।" "तुम्हें खवर करने का मुझे खयाल ही नहीं रहा। पिछले दो-तीन दिन वहुत काम था। सुवह अचानक टिकिट देखे, तो याद आया "मुझे अफसोस "खैर, ऐसी तो कोई बात नहीं'इतवार को सो लेंगे दिन-भर ।" विराम । "अच्छा..." "ओक्के 'वाई..." . नरीमन प्वाइंट, दीवार के निचले हिस्से पर लहरों के लगातार थपेड़े। दूधिया झाग के बड़े-बड़े थक्के । कभी जब कोई लहर ज्यादा तेजी से टक- राती है, तो कुछेक बूंदें हमारे ऊपर आ उछलती हैं । सामने वहुत दूर, पानी की सतह पर सूरज डूब रहा है। मटमैले आकाश में हल्की-सी लालिमा का आभास है 'नारियल के चार-छह पूंट लेकर निंदी ने उसे फेंक दिया है। कुछेक पलों के लिए वह डूब जाता है। फिर ऊपर उभरता है, तो उस ओर से आती एक लहर उसे दीवार तक फिसला देती है । लहर पर लहर दीवार पर चलते हुए दो-तीन लड़के इस तरफ आते हैं, तो निंदी मेरी वगल में-बल्कि मेरी ओट में आ जाती है और पूर्ववत् घुटनों को बाँहों से घेर लेती है। उसने पल्लू कंधों पर ले रखा है। दोनों हाथों की बँधी अंजली पर चिवुक टिकाती है, तो हवा के झोंकों में उसके बाल मेरी गर्दन छूने लगते हैं 'लहर पर लहर। साल पर साल...'कच्चे बचपन के वे दिन । घर की घुटन । घर का तनाव । बहुत-सी बातों का समझ में न आना- गोपनीय संकेत, द्विअर्थी फिकरे, कुत्सित दृष्टियाँ "रात का सन्नाटा । बीच-बीच में डैडी के कमरे से एक पतली आवाज के साथ चूड़ियों की खन- खनाहट । तीन पैगों के बाद डैडी का संतुलन टूट जाता। उनके कमरे का दरवाजा भड़ाक से खुलता, "मो ऽऽनूऽ."हराऽऽम खो ऽऽर..." निंदी लैंप बहुत धीमा कर देती। वे आकर बंद दरवाजा भडभड़ाते। - ७० : कितना सुन्दर जोड़ा वह सूखे गले से कहती, "बाहर गया है।" "कहाँ ?" "पढने "शर्मा जी के घर।" "आने दो नालायक को, फिर देखता हूं।" और उनका दरवाजा फिर बंद हो जाता। निदी अल्मारी के पीछे से मुझं निकालती-वाल, चेहरे और कपड़ों पर धूल । पल्लू से मुंह पोंछते हुए रेधे स्वर मे कहती, "छिह, इतना वडा होकर रोता है !" और खुद मुंह फेरकर आंखें पोछने लगती... लहर पर लहर । साल पर साल । गर्मी को चिलचिलाती धूप का एक दिन । निदी की अनुपस्थिति में विना किसी अपराध के तो मे बुरी तरह पिटायी । दो दिन के लिए गायव । तीसरे रोज दूसरे शहर से पकड़- कर लाया गया"सामने निंदी वाल विखरे, आये लाल। देखते ही जन्नाटे का ऐसा थप्पड़ कि गाल पर पांचो उंगलियां उभर आयो..."मैं तो नही भाग सकती घर से, फिर तू कैमे भागा? "बोल, फिर जायेगा मुझे यहाँ छोड़ के ?" ..."सदियों को रात । निदी के पास । विस्तर में । "निंदी!" एक साल बड़ी होने के बावजूद शुरूमे ही नाम लेकर पुका. रने की आदत। "मां ने आत्महत्या की थी?" वह कोहनी के चल उठ आती है, "तू कैसी-कैसी ऊटपटांग वातें सुना करता है !' कडा स्वर, "मैं क्या पूछ रहा हूँ ? हो या ना मे जवाव दो।" विराम..."हां, की थी. वो जो एक डायन है न"खा गयी हमारा सब कुछ।" साल पर साल। बंबई। नौकरी। निदोगुरू से मेरे पास है। छूटी पढाई पूरी कर रही है"तार"हम फिर एक बार उस गहर मे। उस मकान में। उस कमरे में "चादर से ढका हुआ शव । निदी मेरी वगल में, मुझसे सटी हुई"गहरा सन्नाटा । पनचक्को की एकरस आवाज"जिदगी का कोई कितना सुन्दर जोड़ा : ७१ अध्याय बंद करने से ही तो बंद नहीं हो जाता। उसकी कितनी स्मृतियाँ, कितनी कचोटें, कितने दंश साथ-साथ चलते हैं। वर्तमान का कितना प्रति- शत उसी अतीत की तो उपज होता है।" टॉक ऑफ द टाउन । तेज धुनों के साथ माइक लिए खड़ी क्रेनर का उन्मादी स्वर । वातचीत। हंसी-ठहाके । मद्धिम रोशनी। निंदी एक स्लिप पर जूडी कॉलिंस के अपने प्रिय 'डेविड'स सांग' की फरमाइश भेजती है. द स्टार्ज इन योर आइज आर द स्टार्ज इन माइन/एंड वोथ प्रिजनर्स ऑफ दिस लाइफ आर वी/यू द सेम ट्रबुल्ड वाटर्ज वी कैरी अवर टाइम" पता नहीं, कितनी रात बीत चुकी थी ! नींद से भारी पलकें बंद किये ही बाथरूम से निकला और विस्तर की ओर बढ़ा। अचानक खिड़की की राह पर्दे के पार टैरेसवाले हिस्से में रोशनी का आभास मिला 'यानी वहाँ का दरवाजा खुला रह गया है। हाल में आसपास कुछेक वारदातें हुईं थीं, जिनमें भीतर घुसने का रास्ता टैरेस ही था। इसलिए सोचा कि निकलकर बंद कर दूं."ड्राइंगरूम के बीच तक पहुँचने पर देखा कि कोने में एक आकृति झुकी-सी खड़ी है-रेलिंग पर कुहनियाँ, हथेलियों में मुंह । "निंदी !" उसने मुड़कर देखा। "क्या कर रही हो यहाँ ?" "नींद नहीं आ रही थी।" वह बहुत हल्की स्मित के साथ वोली- अपराधी-से लहजे में। "गलती मेरी ही है। वहाँ रेस्तरां में तुम्हें इतनी स्ट्रांग कॉफी नहीं पिलानी चाहिए थी।" "कॉफी की बात नहीं..." फिर लगा कि कुछ कहते-कहते हिचक गयी। "तो नींद न आने का वो सिलसिला चल रहा है अभी ?" "कभी-कभी हो जाता है।" उसने हल्के आसमानी रंग का पायजामा व कमीज पहन रक्खी थी, कुछ लड़के-जैसी भी लग रही थी और दुवली भी। कमीज का उपरी ७२ : कितना सुन्दर जोड़ा बटन दुनः या मिलेरने का मानक Re में कराने का कीडोरगत रस्से ... हजाराहा सलादारभीकभी रिसर का होरहाई देजादा पादूर. नाँचे समुद्र की सतह पर माहोसीपीये। उसकी दाह का अंदाज कशील नस्लेस की हकी. गोसागर होता या। चौतादीने नरीमन पाइंट तर सिनो हो रोका और निदान-नाईनों के जुगनू पा रहे है"रात की सामोपी, सीर किनारे पर कभी-कभी तहरो के टकराने को हाराज सुनाई दे जाती थी। "सुनो "एक बात कहनी यो तुमने।" उनका स्वर इतना धीमा या कि फुसफुमाहट-जंसा मगा। मैंने उसको तरफ देखा, पर वह नीचे देख रही थी- चेहरे पर उद्वेग । "मने तुम्हें आर० के बारे में लिसा था।" मैंने हामी में मिर हिलाया.''उस पत्र की अच्छी तरह मादधी । भाग को दफ्तर से आने पर विनीता ने विद्रूप से मेज की ओर सपेरा के साथ कहा था, "तुम्हारी लाडली का खत आया है।" देया तो लिफाफा पहोगे ही लापरवाही से फाड़ा गया, पन्ने फूहड़ नग से अदर टूरो एपाने के वाद स्थिर स्वर में पूछा, "ये सोला क्यो तुमने ?" "आपफो. "खोल लिया, तो कौन-मा गजव हो गया ऐगा? आगिर बहन की ही तो चिट्ठी है !" 'मेरे सामने निदी की बारीकलिसावट के अक्षर उभरनेलग-अगररा । हाल में ही विल्कुल संयोग से मेरी मुलाकात एक ऐमे व्यपिरा गे हुई, गिरी अगर मैं नहीं जानती तो पुरुष के बारे मे मेरी धारणा यिल्युस एकांगी और अधूरी रह जाती सितबंर । भापा कितनी अनावश्यक और अपूर्ण है, यह मुझे अब मालूम पड़ा। बस, एक नजर देखने में ही यह मय पुछ माह दिया जा सकता है, जिसे शब्दो मे गायद बांधा ही नहीं जा गवता.. बक्तूबर । पिछला इतवार बहुत अच्छा बीता। हम लोग सुबह में ही गूगज- कैड चले गये थे। पहले तो कुछ भीड थी, पर दोपहर तक गन्नाटा हो गय ""दो पुरुषों के स्पर्श तक मे इतना अतर होता है? 'पुनश्च : गाम उपने में पहले ही हम वापस आ गये थे."नवंबर । आज बार० के बहुत बारा अध्याय बंद करने से ही तो बंद नहीं हो जाता। उसकी कितनी स्मृतियाँ, कितनी कचोटें, कितने दंश साथ-साथ चलते हैं । वर्तमान का कितना प्रति- शत उसी अतीत की तो उपज होता है... टॉक ऑफ द टाउन । तेज धुनों के साथ माइक लिए खड़ी क्रूनर का उन्मादी स्वर । वातचीत । हंसी-ठहाके । मद्धिम रोशनी। निंदी एक स्लिप पर जूडी कॉलिंस के अपने प्रिय 'डेविडस सांग' की फरमाइश भेजती हैं- द स्टार्ज इन योर आइज आर द स्टार्ज इन माइन/एंड वोथ प्रिजनर्स ऑफ दिस लाइफ आर बी/थ्र द सेम ट्रबुल्ड वाटर्ज वी कैरी अवर टाइम.. । पता नहीं, कितनी रात बीत चुकी थी ! नींद से भारी पलकें बंद किये ही वाथरूम से निकला और विस्तर की ओर बढ़ा । अचानक खिड़की की राह पर्दे के पार टैरेसवाले हिस्से में रोशनी का आभास मिला'यानी वहाँ का दरवाजा खुला रह गया है । हाल में आसपास कुछेक वारदातें हुईं थीं, जिनमें भीतर घुसने का रास्ता टैरेस ही था। इसलिए सोचा कि निकलकर बंद कर दूं""ड्राइंगरूम के बीच तक पहुँचने पर देखा कि कोने में एक आकृति झुकी-सी खड़ी है-रेलिंग पर कुहनियाँ, हथेलियों में मुंह । "निदी !" उसने मुड़कर देखा । "क्या कर रही हो यहाँ ?" "नींद नहीं आ रही थी।" वह बहुत हल्की स्मित के साथ बोली- अपराधी-से लहजे में। "गलती मेरी ही है। वहाँ रेस्तरां में तुम्हें इतनी स्ट्रांग कॉफी नहीं पिलानी चाहिए थी।" "कॉफी की बात नहीं..." फिर लगा कि कुछ कहते-कहते हिचक गयी। "तो नींद न आने का वो सिलसिला चल रहा है अभी ?" "कभी-कभी हो जाता है।" उसने हल्के आसमानी रंग का पायजामा व कमीज पहन रक्खी थी, कुछ लड़के-जैसी भी लग रही थी और दुवली भी। कमीज का 'उपरी ७२ : कितना सुन्दर जोड़ा अब उसके टूट जाने के बाद जीने की शर्ते दूसरी होगी ही.. जिंदगी जिंदगी है, उममे भला-बुरा कुछ नहीं होता।" कहने के साथ ही मुझे अपनी स्थिति याद आयी--कही मैं अप्रत्यक्ष ढंग से अपने आपको ही तो न्यायोचित नहीं ठहरा रहा था? क्षण-मर के लिए मैं चौंक गया। क्या यह बात मेरे भीतर इम तरह पंठ गयी है कि में अनजाने ही उसकी मफाई देने लगा हूँ? अगर मेरा खुद का वैवाहिक संवध टूटा न होता-और मैने उम टूटने से लेकर वर्तमान को इस तरह स्वीकार कर लेने को पूरी प्रक्रिया को स्वयं मेलान होता- -तब भी क्या निदी को लेकर मेरी धारणा यही होतो? मैंने अपने मन को टटोलने की कोमिश की। मेरे लिए सबसे बड़ी चीज निदी को खुशी है, अगर वह इसे पा रही है, लेकिन ढग ऐसा है, जिसमें मुझे कुछ मामाजिक तनाव बर्दाश्त करना पड़ता है-~-गोपनीय सकेत, द्विअर्थी फिकरे, कुत्सित दृष्टियां- तो क्या उसके तन-मन का गहन मंतोप कहीं मेरे साथ ज्यादती है ? "मेरे भीतर एक हिलक-सो उठी. निदी । तेरे लिए मैं क्या कुछ नहीं करूं..' - अगले दिन देर से सोकर उठा। पर्दे के पार धूप को तेजी मे ही अदाज हो गया था कि मूरज काफी कार चढ़ चुका है । ड्राइंगरूम में आया, तो निदो दीवान पर चार-पांच कुरानों के सहारे बैठी थी-सामने सुला बसधार और चाय की प्याली, लेकिन गुमसुम-सी मामने देखे जा रही थी। "उठ गये !" आहट से उसका ध्यान बंटा । सीधी हुई और ट्रे से दूसरा का निकालकर चाय बनाने लगी "वह नहा चुकी थी। वायल की हल्की- सी क्रीम रंग को साड़ी पहने थी। वाल एक रिबन में बांध लिये थे। "तुम कब में जागी हुई हो?" सामने सोफे पर बैठ कर मैंने पैर छोटी मेज पर टिका लिये। "बहुत देर में "यह तीसरी बार चाय बनायी है।" "अरे""आवाज क्यों नहीं दे ली मुझे?" वह सिर झुकाय चीनी मिलाती रही, फिर का मेरे सामने रख दिया। उठकर दूसरे कमरे में गयी और पैकेट व माचिस उठा लायी। फिर कुशन पर मैं पहली बार उनके यहाँ गयी । उनका परिवार कहीं बाहर गया हुआ है। बहुत सुंदर घर है-बड़े ही सुरुचिपूर्ण ढंग से सजाया गया.''पुनश्च : मैं उनके वैडरूम में नहीं गयी थी... "सोचा तो नहीं था पहले । शारीरिक संबंधों का जो रूप मैनेजाना था, उसकी याद करके ही सिहरन होती थी. पर इन सर्दियों में यकायक लगा कि अपने कड़वे अनुभव की वजह से हमेशा के लिए दुराग्रही नहीं हुआ जा सकता और फिर अपने पर विल्कुल काबू नहींरहा। लगा, कि अगर जिंदा रहना है, तो किसी भी मूल्य पर..." वह अटक गयी । दो-तीन बार खाँस कर गले की खराश साफ की। हवा का एक झोंका हमें छूकर गुजर गया, नम-सा । अब बरसात आने' से पहले की बौछारें गिरनी चाहिए, मैंने सोचा। "मैंने जव तुम्हें लांग-डिस्टेंस कॉल किया था, तब इस बारे में बताना चाहती थी, पर एक-दो बातें करते ही अचानक लगा कि ''ठीक से कह नहीं पाऊँगी, क्योंकि सामने न होने से मालूम नहीं पड़ेगा कि तुम इसे किस तरह से ले रहे हो!" मैंने सोचा कि हँस कर कहूँ, लेकिन देख तुम अभी भी नीचे ही रही हो। "तुम्हें घिन हो रही है मुझसे ?" "पागलपन नहीं करते।" मैंने हल्के हाथ से उसका कंधा छुआ, "मैंने भी यही सव किया है--और बिना किसी भावना के।" "तुम्हारी वात दूसरी है। तुम पुरुप हो।" आवेग से उसकी पीठ हिल उठी, "मैंने सपने में भी नहीं सोचा था कि मैं यहाँ तक जाऊंगी-जाना पड़ेगा'कभी-कभी मैं अपनी ही नजरों में खुद को इतना गिरा हुआ मह- सूस करती हूँ कि 'आशू जानेगी कभी, तो क्या सोचेगी..." मैंने सांत्वना का हाथ उसके सिर पर रक्खा, तो वह मेरी एक वाह का सहारा लेकर सीधी हो गयी। उसकी उंगलियों की पकड़ नर्म थी, चेहरा दूसरी ओर घूमा हुआ। कोहनी मुड़े हुए एक हाथ को मुंह के सामने कर " , रखा था। "जब तक तुम्हारी शादी चली, तब तक तो कुछ गलत नहीं था कहीं। ७४ : कितना सुन्दर जोड़ा अब उसके टूट जाने के बाद जीने की शर्ते दूसरी होगी ही जिंदगी जिंदगी है, उसमें भला-बुरा कुछ नही होता।" कहने के साथ ही मुझे अपनी स्थिति याद आयो-कही मैं अप्रत्यक्ष ढंग से अपने आपको ही तो न्यायोचित नहीं ठहरा रहा था? क्षण-भर के लिए मैं चौंक गया । क्या यह बात मेरे भीतर इस तरह पैड गयी है कि मैं अनजाने ही उमको सफाई देने लगा हूँ? अगर मेरा खुद का वैवाहिक संबंध टूटा न होता-और मैंने उस टूटने मे लेकर वर्तमान को इस तरह स्वीकार कर लेने की पूरी प्रक्रिया को स्वयं झेला न होता तब भी क्या निदी को लेकर मेरी धारणा यही होती? मैंने अपने मन को टटोलने की कोशिश की। मेरे लिए सबसे बड़ी चीज निंदी की खुशी है, अगर वह इमे पा रही है, लेकिन ढग ऐसा है, जिसमे मुझे कुछ सामाजिक तनाव बर्दाश्त करना पडता है--गोपनीय सकेत, द्विअर्थी फिकरे, कुत्सित दृष्टियां-तो क्या उसके तन-मन का गहन सतोप कही मेरे साथ ज्यादती है ? "मेरे भीतर एक हिलक-सी उठी निंदी ! तेरे लिए मैं क्या कुछ नहीं करूं... अगले दिन देर मे सोकर उठा। पर्दे के पार घूप को तेजी से ही अंदाज हो गया था कि सूरज काफी ऊपर चढ चुका है । ड्राइंगरूम मे आया, तो निदी दीवान पर चार-पांच कुरानों के सहारे बैठी थी-सामने खुला अखवार और चाय को प्याली, लेकिन गुममुम-सी सामने देखे जा रही थी। "उठ गये !" आहट से उसका ध्यान बंटा । सीधी हुई और ट्रे से दूसरा का निकालकर चाय बनाने लगी"वह नहा चुकी थी। वायल की हल्की- सी क्रीम रंग की साड़ी पहने थी। वाल एक रिवन में बांध लिये थे। "तुम कब से जागी हुई हो?" सामने सोफे पर बैठ कर मैंने पर छोटी मेज पर टिका लिये। "बहुत देर मे ""यह तीसरी बार चाय बनायी है।" "अरे""आवाज क्यों नहीं दे लो मुझे?" वह सिर झुकाय चीनी मिलाती रही, फिर कप मेरे सामने रख दिया। उठकर दूसरे कमरे में गयी और पैकेट व माचिस उठा लायो। फिर कुशन -- के नीचे से एक लिफाफा निकालकर मेरी तरफ बढ़ा दिया, "आशू का खत माया है।" चाय के दो-तीन बडे-बड़े चूंट भरकर मैंने सिगरेट सुलगायी.. अपने पापा के पैड पर ही आशू ने संभाल-संभालकर लिखा था, "पापा हमें रोजाना घुमाने ले जाते हैं । नरसों हम बोट ने वैलूर मठ गये थे--बहुत मजा आया। परसों वोटेनिकल गार्डन, कल जू । लेक तो कई बार जा चुके हैं.''आज हमारी बंपर शापिंग हुई थी-फ्रॉक, स्ट्रेच पैंट, वैलबॉटम, लुंगी, कुरते, जूते । हमने तुम्हारे लिए भी एक बहुत बढ़िया चिज्जी ली है, पर अभी बतलायेंगे नहीं "हमें यहाँ बहुत अच्छा लग रहा है। बस, तुम्हारी याद आती है और कभी-कभी रुलाई भी आ जाती है। हम सात तारीख को चटर्जी अंकल (पापा के दोस्त) के साथ दिल्ली पहुंचेंगे। पापा ने कहा है- (यह पंक्ति अच्छी तरह काट दी गयी थी)। पापा अब लिखना बंद करके सोने को कह रहे हैं, क्योंकि शाम से हमें देंप्रेचर है, पर घबराने की कोई बात नहीं है तुम्हें बहुत-बहुत प्यार और मामा को भी... तुम्हारी, आशू पी० एस०-स्पैलिंग की गलतियां माइंड मत करना प्लीज! हम तुम्हारी जिद से ही हिंदी में लिगते हैं. "ए।" लिफाफे पर पता आशू के पापा ने ही लिखा था-पहले निंदी का नाम, फिर मार्फत और मेरा नाम नीचे के वायें कोने पर लिख दिया था- फ्राम आशू'लैटर-हैड पर सजावटी अक्षरों में पूरा नाम छपा था." कागज की चिकनी सतह पर से वे जाने-पहचाने नक्सा उभरने लगे-छोटी, तेज आँखें, होंठों को कुटिल वक्रता, चमकते नग की अंगूठीवाले हाथ का सिगार थामे हुए ऊपर उठना, चेहरे पर गहरा आत्मविश्वास''यह है वह पहला पुरुष, जो निंदी के जीवन में आया। जिसने अपने पति के अधिकार का उपयोग करते हुए उसकी देह को अच्छी तरह जाना-पहचाना, फई वार उसकी इच्छा के विपरीत भी। इसने उसे कैसी शारीरिक अरुचि और मानसिक यंत्रणा दी-और यही है निंदी की उस बच्ची का पिता, जो उसके लिए बेहद गहरी भावात्मक तृप्ति का कारण वनी । जो आज अगर न होती, तो निदी शायद जीवित भी न रह पाती... "चाय ठंडी हो रही है !" । ७६ : कितना सुन्दर जोड़ा निदी की आवाज से मैं चौंका । वह लेटर-हैड पर जमी मेरी निगाह देख कर अखबार उठाने लगी थी। पल भर के लिए हमारी नजरें मिली और साथ के अनगिनत आसग मामने चमक गये-उनके एक के बाद एक सामने खुलते गये चारित्रिक दोप, निदी के द्वारा समझौते को अस्वीकृति, उनका दुव्यवहार, मेरा विनम्र समझाना, उनके द्वारा मैरी उपेक्षा, अप- मान."मेरे सीने पर सिर रख निंदी का फूट-फूटकर रोना, साड़ी का पल्लू पकड़े पीछे आसू की रुआंमी सूरत "एक गहरी सांस लेकर मैंने कप उठा लिया। "आज कोई पिक्चर दिखलाओ।" दूसरे पन्ने पर इधर-उधर देखते हुए निंदी बोली। "जरूरतय कर ली। मंटनी मे ही चलेंगे।" फिर कुछ देर चुप्पी । “आशू की पढाई-कढाई ठीक चल रही है ?" "हां।" "वो जानती है उनको?" निंदी ने मेरी तरफ देखा । फिर नीचे देखने लगी, "हां, क्यो नहीं।" "एस कैसा है उसका?" "वस, ठीक-ठाक । कुछ खास नहीं। हैलो-हैलो कर लेती है । अपने पाषा मे बहुत अटेच्ड है, इसलिए"." कुछ क्षण अंतर्मुख-सी मेज की ओर देखनी रही, फिर मिर झटककर वोली, "और दो-चार साल । आशू कुछ वड़ी हो जाये, मैं कुछ बूढी हो जाऊँ, फिर ठंडा पड जायेगा सव ।" कुर क्षण टैरेस की ओर उडते झोने पर्दे को देखता रहा। निंदी ने विना पूर्व ही उस प्रश्न का उत्तर दे दिया था, जो इधर कुछ समय से मुझे पुरेदने लगा था। शायद उमे लगा होगा कि ऐसी कोई बात मेरे मन मे है, इसलिए क्यों मुझे पूछन की दुविधा या प्रतीक्षा की अनावश्यक व्यग्रता दी जाये"हम लोग एक-दूसरे को कितनी अच्छी तरह समझते हैं---बहुत लवे साथवाले किमी सुखी दंपति मे भी अधिक।

। जुहू, नीचे, दूर चौपाटी से नरीमन प्वाइंट तक का नमुद्र । वायीं और पांच-छह ना दिसलाई दे रही हैं-घोड़े-थोड़े फासले पर । दायीं तरफ एक के बाद एक विल्डिगों का सिलसिला। निंदी सामने कुछ पिक्चर-पोस्टकार्ड लिये बैठी है और उन पर आशू का पता लिख रही है। दोनों कोहनियाँ मेज पर टिकी हुई। मुंह थोड़ा तिरछा व झुका हुआ "कल मुबह निंदी चली जायेगी 'कुछ क्षण एकटक उसे देखता हूँ। उसका एक कुंडल बहुत माहिस्ता से कांपा है"कल से मैं अपनी पुरानी जिंदगी में वापस लौट जाऊँगा। विश्वास नहीं होता कि एक हफ्ता बीत गया-इतनी जल्दी, पलक झपकते। और वार्ते भी बहुत अधिक नहीं की। लेकिन फिर भी बहुत भरा-पूरा-सा महसूस हो रहा है । सात दिनों की वह निश्चित दिनचर्या कभी भी बाहर निकले, कहीं भी घूम पड़े---विहार लेक, मिल्क कॉलोनी, "देबीलीज, समोवार, कई डिस्कोपिक' और फिल्में। "टिकट लगा दो।" निदी मेरे सामने कुछ पोस्टकार्ड खिसका देती है, तो मैं एक-एक टिकट काट कर चिपकाने लगता है..."गेटवे ऑफ इंडिया। ताजमहल होटल । फ्लोरा फाउंटेन । चर्चगेट स्टेशन । हँगिंग गार्डन। कमला नेहरू पार्क । बूट हाउस'"माविरी पोस्टकार्ड पर पता देखकर कुछ चौंकता हूँ। "यह भेज रही हो बार० को?" निदी मुंह नीत्रा किये शरारत से मुस्करा देती है "मुझे दो दिन पहले के उन पत्र का ध्यान आता है, जो निदी ने मेरी ओर बढ़ा दिया था। लिफाफे पर पहले निदी का नाम-शादी से पहले के सरनेम के साथ। फिर मार्फत मेरा नान''सफेद लैटर-पेपर पर इस तरह की गिनी-चुनी पंक्तियाँ थीं.."प्रिय निदी, तुम सकुशल पहुंच गयी होगी । तुम्हारे जाने के अगले दिन ही कंपनी के एक काम से अचानक मुझे गौहाटी जाना पड़ गया । मौसम की खराबी के कारण प्लेन वहाँ लैंड नहीं कर सका, इसलिए कई परेशानियां हुई। वापसी में दिल्ली में मौसम खराव था, इसलिए जहाज आगरा उतरा। है न मजेदार संयोग?.."इस हफ्ते जोनल डाय- रेक्टर के ना जाने से दफ्तर में काफी व्यस्तता है। पूरा दिन कैसे निकल ७८ : कितना सुन्दर जोड़ा

पुरुष,
गया-पता ही नहीं चलता "तुम यहां नहीं हो और
कोमसार
अच्छे रेस्तरां बंद है--वेटरो की हडताल पल रही है। भाई थे साम
तुम्हारा वक्त तो बहुत अच्छा कट रहा होगा (जन्हे मेरेरिगाई देवा)।
वहाँ शायद धूप में उतनी जलन न हो, जितनी कि यही है.""तिमा काम
आ रही हो ! सस्नेह, आर० ।
उस पत्न को ध्यान से देखा, तो सतरो मे मीप से एक हसी
आकृति उभरने लगी सौम्य, आकर्षक, विगतो यह है मन इस
जो निदी के जीवन में आया। जिसने अपने प्रेम अधिकार नदी
के जिस्म को अच्छी तरह जाना-पहचाना, हमेशा उसपी भा.
सार । इसने उसे कैसी शारीरिक तृप्ति और मानसिक सयरा माजी
अगर न होता, तो पुरुप के बारे मे निंदी की पारणा हमेशा गती...
"अपने दोस्त से मुझे नहीं मिलवाोगी?" पोस्टकार्ड निधीत
खिसकाते हुए मैंने कहा।
वह मुस्करायी, "चलो दिल्ली।"
"क्रिसमस की छुट्टियों में जब आशू यसपारो पनी गाय, गय मुगाना
यहाँ क्यों नही आ जाते ? .."मैं उन्हें औपचारिक पर लिय देगा।"
निदो गंभीर हो गयी। कुछ क्षण मोचनी नही, "ट, मापद भूष्ठ
हिचकिचाहट हो। मैं बात कहेंगी।" पांडा कर दी, "mr ar,
प्रोग्राम नहीं बना-और शायद ही वने-नो तुम बडो पाटामा
मसूरी चलेंगे."मैंने कई मालों में म्नौ-कति नहीं देगा।"
"वच्छा।"
"नीचे उतरते हुए पहली मोदी पर गवत हार की सियों में
निदी बरामी लहसडायी, दौलाकागदपानमा
रकोकाला पाने के माय वगवर दम और देवरामी
दोनदियों में
दुमरी में इमारती, "माटर
सर!"...

देख रहा था । तब सेल्स-गर्ल ने नम्र मुस्कान से अंग्रेजी में कहा, "अपने पति से पसंद करा लीजिए।" •"पार्क । रेलिंग के सहारे। पीछे जालीदार छप्पर से आती परिंदों की लगातार चहचहाहट। नीचे हरियाली का सिलसिला और सामने समुद्र का अपार विस्तार । "सुनो।" वह बोली। "विनीता का कुछ सामान रह गया है यहाँ ? उसने कहलवाया था." मेरा एक कुलीग उसका दोस्त है।" घड़ी-भर याद करके कहा, "मैंने तो सब कुछ भिजवा दिया था- -- बहुत पहले ही।" । "देख लेमा । शायद एक तो ट्रांजिस्टर है और दो-तीन जेवर।" "लॉकर में देख लूंगा। मैं तो मुद्दत से गया ही नहीं उस तरफ।' थोड़ी देर चुप्पी । हवा के दो-तीन तेज झोंके आये, तो निंदी ने पल्लू माथे पर ले लिया। दूर, नीचे देखते हुए आहिस्ता से कहा, "विनीता वाहर जा रही है।" पल-भर के लिए हमारी दृष्टि मिली और साथ के अनगिनत आसंग सामने कौंध गये-विनीता का तेज स्वभाव, उसका भिन्न जीवन-दर्शन --शादी से पहले दोनों ही चीजें इस तरह सामने नहीं आयी थीं. 'विवाह के महीने-भर बाद से ही नसों को तोड़नेवाला घर का तनाव, सोने के अलग कमरे, धुटा हुआ सन्नाटा'फिर पति का घर छोड़ कर आयी हुई क्लांत निदी विनीता की कटूक्तियाँ, व्यंग्य, तिरस्कार ''मेरे सीने पर सिर रख निंदी का बिलख-विलखकर रोना। साड़ी का पल्लू पकड़े पीछे आशू की रुआंसी सूरत की फर्श पर तीखी छनछनाहट और विनीता का क्रोधोन्मत्त स्वर, "योर्स इज ए कंडेम्ड फैमिली!" एक सिगरेट सुलगायी, तो दो तीलियाँ टूटीं। चार-छह लंवे-लवे कश - ... "बिल्लौरी फूलदान लिये। । "अव मुझे लगता है कि विनीता ठीक ही कहती थी। हम दोनों ही शायद कुछ गलत ढंग के मूल्य ढो रहे थे. 'नहीं?" ८० : कितना सुन्दर जोड़ा निदी जवाव के लिए पल भर मेरी ओर देखती रही, लेकिन विनीता की पंख फडफड़ाती मैकडों स्मृतियों ने यकायक मुझे ढक लिया-विनीता का लंबा, छरहरा, सांवला जिस्म, गर्दन के पास जहां ब्लाउज का किनारा होता है, वहां एक सुकुमार तिल, भावावेश में होंठों के कोनो की हल्की कपकपाहट ''मेरे मन मे सहसा आवेग-मा उठा कि काश! केवल एक क्षण के लिए.. इस बिंदु पर मैं और निदी अलग-अलग खडे थे-मुझे बीते हुए कल से भावात्मक लगाव था, उसे मौजूदा आज से । मैं चाहते हुए भी विनीता को भूल नहीं पाया या, निदी के लिए उसका पति केवल बच्ची के पिता के रूप में जीवित बचा था-और कितना समय लगेगा इन यादों के मिटने में? तो दायां हाथ रैलिंग पर रक्से निदी के एक हाथ मे छू गया। यों ही उसकी नम उँगलियां खोल कर देखी..."तुम तो बडे नाखून रखती थी पहले? "काट दिये.""केयर करनी पडती थी।" सीधा हुआ, सुबह देर से आंख खुली । विस्तर में निकला, तो निदी तयार थी। मामान पंक कर लिया था "जल्दी से दोव करके नहाया। कपडे बदले । नाश्ता किया। सामान नीचे गाडी में पहुंच गया, तो उठते हुए निंदी ने पसं में दम के कुछ नोट निकाले और मेज पर रव पेपरवेट से दवा दिये। मेरी सवालिया निगाह के उत्तर में वोली, "टिकट के पैसे है।" मैंने पल-भर ध्यान से उसे देखा, तो जैसे पृष्ठभूमि में विनीता वा ऊंचा स्वर सुनाई दे गया। नर्मी मे कहा, "ये सव क्यों कर रही हो निदी ? "अब कोई शगड़ा करने वाला नहीं है।" "वो बात नहीं।" "तो फिर क्या बात है?" अटक-अटक कर कहा, "मैंने वो घर छोड़ा या अपने को वधाने .

देख रहा था । तव सेल्स-गर्ल ने नम्र मुस्कान से अंग्रेजी में कहा, "अपने पति से पसंद करा लीजिए।" .."पार्क । रेलिंग के सहारे। पीछे जालीदार छप्पर से आती परिंदों की लगातार चहचहाहट। नीचे हरियाली का सिलसिला और सामने समुद्र का अपार विस्तार । "सुनो।" वह वोली। " - "विनीता का कुछ सामान रह गया है यहाँ ? उसने कहलवाया था मेरा एक कुलीग उसका दोस्त है।" घड़ी-भर याद करके कहा, "मैंने तो सब कुछ भिजवा दिया था- बहुत पहले ही।" "देख लेमा । शायद एक तो ट्रांजिस्टर है और दो-तीन जेवर।" "लॉकर में देख लूंगा। मैं तो मुद्दत से गया ही नहीं उस तरफ।" थोड़ी देर चुप्पी । हवा के दो-तीन तेज झोंके आये, तो निंदी ने पल्लू माथे पर ले लिया। दूर, नीचे देखते हुए आहिस्ता से कहा, "विनीता बाहर जा रही है। पल-भर के लिए हमारी दृष्टि मिली और साथ के अनगिनत आसंग सामने कौंध गये---विनीता का तेज स्वभाव, उसका भिन्न जीवन-दर्शन -शादी से पहले दोनों ही चीजें इस तरह सामने नहीं आयी थीं. 'विवाह के महीने-भर बाद से ही नसों को तोड़नेवाला घर का तनाव, सोने के अलग कमरे, घुटा हुआ सन्नाटा फिर पति का घर छोड़ कर आयी हुई क्लांत निंदी "विनीता की कटूक्तियाँ, व्यंग्य, तिरस्कार 'मेरे सीने पर सिर रख निदी का बिलख-विलखकर रोना। साड़ी का पल्लू पकड़े पीछे आशू की रुआंसी सूरत'"विल्लौरी फूलदान की फर्श पर तीखी छनछनाहट और विनीता का क्रोधोन्मत्त स्वर, “योर्स इज ए कंडेम्ड फैमिली!" एक सिगरेट सुलगायी, तो दो तीलियाँ टूटी। चार-छह लंबे-लंबे कश लिये। "अव मुझे लगता है कि विनीता ठीक ही कहती थी। हम दोनों ही शायद कुछ गलत ढंग के मूल्य ढो रहे थे "नहीं ?" ८० : कितना सुन्दर जोड़ा निदी जवाब के लिए पल-भर मेरी और देखती रही, लेकिन विनीता की पंख फड़फड़ाती सैकड़ों स्मृतियों ने यकायक मुझे ढक लिया--विनीता का लंबा, छरहरा, सांवला जिस्म, गर्दन के पास जहाँ ब्लाउज का किनारा होता है, वहाँ एक सुकुमार तिल, भावावेश में होंठों के कोनों की हल्की कंपकंपाहट.. मेरे मन में सहसा आवेग-मा उठा कि काश! केवल एक क्षण के लिए इस बिंदु पर मैं और निदी अलग-अलग खड़े थे--मुझे वीते हुए कल से भावात्मक लगाव था, उसे मौजूदा आज से। मैं चाहते हुए भी विनीता को मूल नहीं पाया था, निदी के लिए उसका पति केवल बच्ची के पिता के रूप में जीवित बचा था---और कितना समय लगेगा इन यादों के मिटने मे? सीधा हुआ, तो दायां हाथ रेलिंग पर रक्से निदी के एक हाथ मे छू गया। यों ही उसकी नर्म उंगलियां खोल कर देखी""तुम तो बडे नाखून रखती थीं पहले?" "काट दिये 'केयर करनी पड़ती थी।" सुबह देर से आंख खुली । विस्तर से निकला, तो निंदी तैयार थी । सामान पंक कर लिया था "जल्दी से शेव करके नहाया। कपडे बदले। नाश्ता किया। सामान नीचे गाडी में पहुंच गया, तो उठते हुए निदी ने पर्स मे दम के कुछ नोट निकाले और मेज पर रस पेपरवेट से दवा दिये । मेरी सवालिया निगाह के उत्तर में वोली, "टिकट के पैसे है।" मैंने पल-भर ध्यान से उसे देखा, तो जैसे पृष्ठभूमि में विनीता वा ऊंचा स्वर सुनाई दे गया। नर्मी में कहा, "ये सब क्यों कर रही हो निदी? .."अब कोई झगड़ा करने वाला नहीं है।" "वो बात नहीं।" "तो फिर क्या बात है ?" अटक-अटक कर कहा, "मैंने वो घर छोड़ा था अपने को बचाने की "-. कितना सन्दर जोगा:

1 खातिर, पर बोझ तुम पर बनी थी। किसी के कहने की बात नहीं है, लेकिन क्या अपने ही मन में चुभन नहीं होती? फिर अब सब ठीक-ठाक चल रहा है, तो क्यों वेकार और जव जरूरत होगी, तो मैं खुद ही माँग लूंगी 'तुमसे नहीं मांगूंगी, तो किससे माँगेंगी?" रास्ते में लगभग चुप्पी रही । नाना चौक पर ट्रैफिक जाम था, इस- लिए बंबई सेंट्रल पहुँचते-पहुँचते नौ बजकर छह-सात मिनट हो चुके थे। पर निंदी के कम सामान से इत्मीनान था। सूटकेस मैंने उठा लिया, प्लास्टिक की डलिया उसने । चेयरकार में सीट ढूंढने में भी कोई मुश्किल नहीं हुई। संयोग ने सीट भी खिड़की से लगी हुई ही थी। जब तक निंदी सामान रक्खे और बैठे, आखिरी हिसिल सुनाई दे गई। मैंने उसके सिर पर हाथ रक्खा,"अच्छा..." वह तरल आँखों के साथ मुस्करायी। रेंगना शुरू कर चुकी ट्रेन से मैं नीचे उतर आया। निदी खिड़की से हाथ हिला रही थी "वस, इसी झलक के साथ डिव्या ओझल हो गया' एक के बाद एक पहियों की खट्-खट् और आसपास का कोलाहल' 'निदी चली गयी-~मुड़ते हुए बड़ी-सी घड़ी पर निगाह के साथ इस अहसास का खालीपन जैसे पहली बार महसूस हुआ'अव? "दिन-भर तो खर दफ्तर में निकल जाएगा। फिर शाम ?.."छह अंकों के उस फोन नंबर की याद आयी, जो डायल करने पर अक्सर एंगेज्ड मिलता है। "टिकट?" मैं चौंका टिकट कलेक्टर सवालिया निगाह से मेरी ओर देख रहा था। मैंने ठिठक कर जेब में हाथ डाला, तो याद आया कि प्लेटफॉर्म टिकट तो लिया ही नहीं था। "मुझे अफसोस है," मैं अटक कर बोला, "ट्रेन चलने ही वाली थी। जल्दी में मुझे खयाल ही नहीं रहा कि..." उसने एक नजर मेरे हाथ में झूलती कार की चावी पर डाली, फिर टिकट बढ़ाये दूसरे दो-तीन लोगों की तरफ मुड़ गया। ८२ : कितना सुन्दर जोड़ा

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“यस्सर?" मैंने एक जेब से सिगरेट के पैकेट को निकालकर टेबल पर रखा था और एक जेब से माचिस को। फिर टेवल पर कुहनियाँ टिकाते हुए कहा "कॉफी ! "जब मेम सा'ब आयेंगा, तब ?" उसके होठों पर भेद-भरी मुसकान था, थी। " मैं एकदम निश्चय नहीं कर पाया कि यह वदतमीजी है या नहीं, लेकिन वेटर की आँखों में सहसा किसी आशंका की छाया उतर आयी थी -शायद मेरी संभावित नाराजगी के भय से.."और जैसे उसे इसी स्थिति से उबारने के लिए मैं कह गया था-"अभी भी और तब भी!" उसके होठों की मुसकान आँखों की चमक में प्रतिविम्बित हुई थी और मैं समझ गया था कि मेरा बुरा न मानना उसे अच्छा लगा है। "अभी दो मिन्ट में लायेंगा सा'व!...एकदम हाइकिलास ! मैंने अपने आप ही मुसकराते हुए सिगरेट सुलगायी थी और एक लम्बा कश लेकर सिनेमाई अन्दाज में धुएं के छल्ले बनाने लगा था।" नजरें घड़ी पर फिसलती हुई दरवाजे तक पहुंची थीं। "साढ़े पाँच वज चुके थे। पाँच बजे आफिस बन्द हुआ होगा। वहाँ से पांच मिनट में वस स्टॉप, बस से पन्द्रह मिनट में कोलाबा और तीन-चार मिनट में इस लियोपोल्ड तक..'यानी अब किसी भी क्षण शीशे का बन्द दरवाजा आहिस्ता से खुल सकता था और सैंडिलों की खट-खट ठीक मेरी टेबल तक आकर रुक सकती थी। "हेल्लो निक!" "हैल्लो स्वीटीss...!" .. 'वेटर ने सट-से टेबल पर रख दी थी और मैं कप में चम्मत्र चलाते हुए, हाथ के हिलने के कारण कमीज और लेदर जैकेट के वीच चिकने पन्नों को सरसराहट महसूस कर रहा था और सोच रहा था कि जब मैं यह नया रंग-बिरंगा कॉमिक माहिस्ते से उसके हाथों में दूंगा, तो वह किस तरह मेरी आँखों में देखकर डूबी-सी मुसकरायेगी-"निक ! यू आर वण्डरफुल !"."तव मुझे वह पहली मुलाकात भी याद आयी थी। ८४ : कितना सुन्दर जोड़ा - .' मैं डिक के यहाँ गया था और जूली दरवाजे पर ही मिली थी। "आओ, तुम्हे मिलवायें।" वॉल्ड, धुंघराले वालो पर आहिस्ते से उंगलियां फिराते हुए उसने कहा था। "किससे?" लेकिन जवाब देने की बजाय उसने आगे बढकर ड्राइंगरूम का परदा खिसका दिया था। सामने लम्बे सोफे पर एक लड़की घुटने मोह, पीठ के पीछे कुदान लगाये अघलेटी थी। एक हाथ मे मुड़ा हुआ कॉमिक या और दूसरे मे लम्बा चॉकलेट जिने धीरे-धीरे चूहो की तरह कुतरा जा रहा था।"दरवाजे पर आहट सुन यह सहसा सकपकाकर स्कर्ट का निचला घेर मंभालने लगी थी। "शर्ली ! .."माय फ्रेण्ड ऐण्ड कुलीग ! 'कॉमिक्स के पीछे दीवानी है।" फिर दुष्टता से जोड़ दिया था, "जस्ट गिव हर ए कॉमिक ऐण्ड हैव वाक्य सत्म होते न होते मी ने मेज की आड में जूली का पर जोर मे दबा दिया था।"वह दर्द के बावजूद मुसकराती हुई अलग हटकर 'सी सी' करने लगी थी। में गरदन मे हिलती-डुलती बडे-बड़े मोतियो की माला के ऊपर मी का सांबला, आकर्पक चेहरा देख रहा था। उसकी नाक लम्बी और सुघड़ थी। आंखें मामूली और होठ बहुत सफाई मे तराशे हुए जमे बस, चूमने के लिए बने हों! .."मुझे लगा था कि लिपस्टिक का शेड उसके रंग से मैच नहीं कर रहा है । 'कभी मौका मिला तो कहूँगा, मैंने सोचा था। "निक्की,मैं और डिक आज जरा विजी हैं।"वी आर गोइंड टु सीए मूवी!" जूली ने फिज से कोकाकोला की बोतलें निकालते हुए मेरी ओर मुडकर आजिजी से कहा था, "तुम शर्ली को उसके यहाँ तक छोड दोगे? .""प्लीज!" और उसने गली की ओर ऐसे पेट्रोनाइजिंग प्यार से देखा था जमे वह एक मामूली बच्ची हो। "हाँ"हां, निक! "प्लीज! "डू इट ऐज ए फेवर टु मो!" मुंह में सिगरेट दवाये, टाई की नॉट टोक करता हुआ डिक पिछले कमरे में निकल आया था और कुछ देर बाद वाहर से लिफ्ट का दरवाजा बन्द करते हुए उसने धीरे से कहा था, तुम आजकल विलकुल खाली हो।"टेक "किडी, ए चान्स !" .. कुछ क्षणों .""मैं एक सिगरेट जलाता हूँ और तीली ऐश-ट्रे में डाल देता हूँ। वह जलती रहती है, फिर सहसा भभककर बुझ जाती है। और धुएँ की पतली लकीर लहराती, वल खाती हुई ऊपर उठने लगती है। 'मैं कसमसाकर पहलू बदलता हूँ।""अब मुझे कहीं नहीं जाना है । 'अब मुझे वक्त का कोई खयाल नहीं..और एक उड़ती-उड़ती नजर घड़ी पर डालता हूँ .. अगर गर्ली आ गयी होती, तो हम इस समय किसी सिनेमा- हाउस के करीडोर में घूमते हुए तस्वीरें देख रहे होते. या अन्दर बैठे फिल्म शुरू होने के इन्तजार में पॉटेटो-चिप्स चवाते हुए चल रहा इन्स्ट्र- मेण्टल सुन रहे होते. 'या अभी-अभी शुरू हुई फिल्म का राइट-अप पढ़ रहे होते। "डिनर के बाद टहलते हुए गेटवे ऑव इण्डिया तक जाते. फिर रात के अंधेरे में चमकती हुई नियान वत्तियाँ देखते हुए 'गुलमोहर' से 'ताज' की भोर' चाकलेट लेने के लिए कोने की छोटी-सी 'लिटिल पीक' में घुसते तो काउण्टर पर चश्मा लगाये खड़ी लड़की हमेशा की तरह मुस्क- राती और बाहर निकलने पर अँगुलियाँ ऊपर हवा में हिलाकर विश् करती. "वह लड़की मुझे अच्छी लगती है," एक बार शी ने कहा था। "यऽऽअ.''शी इज स्वीट एण्ड सिम्पल !" हम उस समय समुन्दर के किनारे कफ परेड में एक बेंच पर बैठे थे। नजदीक की वेंचें खाली थीं और अँधेरे में 'नेकलेस' की वत्तियाँ शिलमिला रही थीं। पीछे से कोई कार गुजरती, तो हॉर्न की आवाज या एंजिन की घरघराहट सुनाई दे जाती।''उसका दायाँ हाथ मेरे हाथ में था और मैं उसकी कलाई में बँधी नन्ही-सी घड़ी और बीच की अंगुली की बड़ी-सी अंगूठी को छू रहा था। देखा है ?" "न ! "देखोगी?" "तुमने पूना ८६ : कितना सुन्दर जोड़ा "डाऽऽलिंग...।" आवेग में मेरे हाथ पर उसकी पकड सख्त हो गयी "मैं गैराज से कोई गाड़ी मैनेज कर लूंगा। अगले वीक-एण्ड पर चलेंगे।" मैंने आहिस्ता में उसकी कमर अपने हाथ की गिरफ्त मे ले ली थी-"यूं तो बाम्बे-पूना हाइवे इज द बेस्ट हाइवे ऑव इण्डिया !" उसने मेरे कंधे पर गाल टिकाकर खोयी-खोयी आवाज मे कहा था-- "आइस्सी'"" .."वैटर ने ट्रे टेवल पर रखी है और मेरे इशारे पर कॉफी बनाकर कप सामने खिसका दिया है। कप की ऊपरी गोलाई में भाप उठ रही है। "एक कश का घुआं मुंह में भरे-भरे झुककर कॉफी का एक चूंट लेता हूँ.. और धुआं और कॉफी, दोनो निगल जाता हूँ। "एक सिहरन-सी होती है और पलकें मुंदने-सी लगती हैं । यहाँ वैठा हूँ, लेकिन कानों में वार- बार लहरो के छाको को आवाज गूंज रही है। विल्डिंग तक छोड़ने के पहले भी को हर वार किनारे पर ले गया हूँ"जो कभी सूखा रहता पा और कभी जिसे लहरें बार-बार भिगोने आती थी। "मुझे समुन्दर पसन्द है," गीलो रेत पर दो कदम नगे पांव चलकर एक बार उसने कहा था, "तुम्हे ?" "इस बारे मे कभी सीरियसली सोचा नहीं।" मैं बोला था। "फिर भी?" उस दिन शायद वह कुछ न कुछ पूछते जाने के ही मूड मेथी। "हाँ, चीज अच्छी है । "पसन्द की जा सकती है।" मैंने भरमक मुसकान दवाते हुए अटक-अटककर कहा था और एक नजर उसके छोटे- छोटे पांवों के निशान पर डाली थी-"अब यहां आ जाओ।"लहरें आ रही हैं।" "लेट देम कम !" उसने दोनो हाथ कमर पर टिका बड़े हिरोइक अन्दाज में कहा था, लेकिन फिर सहसा दौड़ती हुई नजदीक आ गयी थी। ""उसके कुछ बाल माथे पर विसर गये थे और सांस तेज-तेज चलने लगी थी। "यह देख रही हो?" हाथ थामकर उसे सहारा देते मैंने पूछा था। कॉमिक : ८७ आया था और कुछ देर बाद वाहर से लिफ्ट का दरवाजा बन्द करते हुए उसने धीरे से कहा था, "किडी, तुम आजकल विलकुल खाली हो। 'टेक ए चान्स !" ''मैं एक सिगरेट जलाता हूँ और तीली ऐश-ट्रे में डाल देता हूँ।... कुछ क्षणों वह जलती रहती है, फिर सहसा भभककर बुझ जाती है और धुएँ की पतली लकीर लहराती, बल खाती हुई ऊपर उठने लगती है। मैं कसमसाकर पहलू बदलता हूँ। "अब मुझे कहीं नहीं जाना है । ''अब मुझे वक्त का कोई खयाल नहीं.. और एक उड़ती-उड़ती नजर घड़ी पर डालता हूँ "अगर शर्ली आ गयी होती, तो हम इस समय किसी सिनेमा- हाउस के करीडोर में घूमते हुए तस्वीरें देख रहे होते. या अन्दर बैठे फिल्म शुरू होने के इन्तजार में पॉटेटो-चिप्स चवाते हुएं चल रहा इन्स्ट्र- मेण्टल सुन रहे होते. 'या अभी-अभी शुरू हुई फिल्म का राइट-अप पढ़ रहे होते। "डिनर के बाद टहलते हुए गेटवे ऑव इण्डिया तक जाते. 'फिर रात के अंधेरे में चमकती हुई नियान वत्तियाँ देखते हुए 'गुलमोहर' से 'ताज' की ओर''चाकलेट लेने के लिए कोने की छोटी-सी 'लिटिल पीक' में घुसते तो काउण्टर पर चश्मा लगाये खड़ी लड़की हमेशा की तरह मुस्क- राती.. और बाहर निकलने पर अंगुलियाँ ऊपर हवा में हिलाकर विश् करती "वह लड़की मुझे अच्छी लगती है," एक बार शर्ली ने कहा था। "यऽऽअ'''शी इज स्वीट एण्ड सिम्पल !" हम उस समय समुन्दर के किनारे कफ परेड में एक बेंच पर बैठे थे। नजदीक की वेंचें खाली थीं और अँधेरे में 'नेकलेस' की वत्तियाँ झिलमिला रही थीं। पीछे से कोई कार गुजरती, तो हॉर्न की आवाज या एंजिन की घरघराहट सुनाई दे जाती।"उसका दायाँ हाथ मेरे हाथ में था और मैं उसकी कलाई में बँधी नन्ही-सी घड़ी और बीच की अंगुली की बड़ी-सी अँगूठी को छू रहा था। "तुमने पूना देखा है ? "न ! "देखोगी?" ८६ : कितना सुन्दर जोड़ा “डानन..!" आवेरा मेरेहाप पर उससे पर सरसहोदरी पी। "रान कोई गाड़ी मैनेज करतूंगा।"अग योग- चलेंगे।" मैंने जाहिस्ता से उसकी कमर सपने हार की दिशा मे सो -"यूं तो वाम्ब-पूना हाइवे इज द रेट हाइवे कॉर!" उसने मेरे कंधे पर माल टिकाकर सोनी सोनी आवाज में रहा पा- "प्राइस्सी." .."वेटर ने ट्रैटेवल पर रखी है और मेरे सारे पर कॉफी बनाएर कप सामने खिसका दिया है। "प की ऊपरी गोसाई से भार रही है।"एक कश का घुआं मुंह में भरे-भरे झुककर कॉफी का एक ट सेशा हूँ..'ओर घुओं और कांफी, दोनो निगल जाता हूँ।"एक हिरासी होती है और पलकें मुंदने-सी लगती हैं। यहाँ बैठा हूँ, लेग्नि कानो मे गर. वार लहरों के छाकों की आवाज गूंज रही है। विहिंग समा जोडने के पहले साली को हर वार किनारे पर ले गया हूँ""जो कभी मूता रहता और कभी जिम लहरें बार-बार भिगोने आती थी। "मुझे समुन्दर पसन्द है," गीली रेत पर दो कदम नगे पार पार एक बार उसने कहा था, "तुम्हे ?" "इस बारे में कभी सीरियसली सोचा नही।" मैं बोला था। "फिर भी ?" उस दिन शायद वह कुछ न कुछ पूण्ने जाने से हो र में थी। "हाँ, चीज अच्छी है ।" पसन्द की जा सकती है।" tar मुसकान दबाते हुए अटक-अटककर कहा था और एक मार छोटे पांवो के निशान पर डाली थी-"अब यहाँ पा शास" "लेट देम कम !" उसने दोनों हाथ कमर पर रिहाई हिरोहा अन्दाज में कहा था, लेकिन फिर सहमा दौड़ती हुई गलतीक मा गमी थी। "उमके कुछ बाल माथे पर बिखर गये थे और सास सेगसेस माने लगी "यह देख रही हो?" हाथ थामकर उसे राहात देते हुए ने पूछा था। Matine आया था और कुछ देर बाद वाहर से लिफ्ट का दरवाजा बन्द करते हुए उसने धीरे से कहा था, "किडी, तुम आजकल विलकुल खाली हो। "टेक ए चान्स ! ''मैं एक सिगरेट जलाता हूँ और तीली ऐश-ट्रे में डाल देता हूँ। कुछ क्षणों वह जलती रहती है, फिर सहसा भभककर बुझ जाती है। और धुएँ की पतली लकीर लहराती, वल खाती हुई ऊपर उठने लगती है''मैं कसमसाकर पहलू बदलता हूँ। 'अव मुझे कहीं नहीं जाना है । 'अब मुझे वक्त का कोई खयाल नहीं. और एक उड़ती-उड़ती नजर घड़ी पर डालता हूँ .. अगर शर्ली आ गयी होती, तो हम इस समय किसी सिनेमा- हाउस के करीडोर में घूमते हुए तस्वीरें देख रहे होते. या अन्दर बैठे फिल्म शुरू होने के इन्तजार में पॉटेटो-चिप्स चवाते हुएं चल रहा इन्स्ट्र- मेण्टल सुन रहे होते 'या अभी-अभी शुरू हुई फिल्म का राइट-अप पढ़ रहे होते। "डिनर के बाद टहलते हुए गेटवे ऑव इण्डिया तक जाते. "फिर रात के अंधेरे में चमकती हुई नियान वत्तियाँ देखते हुए 'गुलमोहर' से 'ताज' की ओर'चाकलेट लेने के लिए कोने की छोटी-सी 'लिटिल पीक' में घुसते तो काउण्टर पर चश्मा लगाये खड़ी लड़की हमेशा की तरह मुस्क- राती.. और बाहर निकलने पर अंगुलियाँ ऊपर हवा में हिलाकर विश् करती। "वह लड़की मुझे अच्छी लगती है," एक बार शर्ली ने कहा था । "यऽऽअ.'शी इज स्वीट एण्ड सिम्पल !" हम उस समय समुन्दर के किनारे कफ परेड में एक वेंच पर बैठे थे। नजदीक की बेंचें खाली थीं और अँधेरे में 'नेकलेस' की वत्तियाँ झिलमिला रही थीं। पीछे से कोई कार गुजरती, तो हॉर्न की आवाज यां एंजिन की घरघराहट सुनाई दे जाती ।'उसका दायाँ हाथ मेरे हाथ में था और मैं उसकी कलाई में बँधी नन्ही-सी घड़ी और बीच की अंगुली की बड़ी-सी अंगूठी को छू रहा था। देखा है ?" - "तुमने पूना "न !" "देखोगी?" ८६ : कितना सुन्दर जोड़ा "डालिग ...."आवेश मे मेरे हाथ पर उसकी पकड़ सख्त हो गयी थी। "मैं गैराज से कोई गाडी मैनेज कर लूंगा ।'' अगले वीक-एण्ड पर चलेंगे।" मैंने आहिस्ता से उसकी कमर अपने हाथ की गिरफ्त में ले ली थो-"यूं तो 'बाम्ब-पूना हाइव इज द वैस्ट हाइवे ऑव इण्डिया!" उसने मेरे कंधे पर गाल टिकाकर खोयी-सोयी आवाज मे कहा था- "आइस्सी."" "वेटर ने ट्रे टेबल पर रखी है और मेरे इशारे पर कॉफी बनाकर कप सामने सिसका दिया है। 'कप की ऊपरी गोलाई में भाप उठ रही है । "एक कश का धुआं मुंह में भरे-भरे झुककर कॉफी का एक बूंट लेता हूँ."और धुओं और कॉफी, दोनो निगल जाता हूँ।"एक मिहरन-सी होती है और पलकें मुंदने-सी लगती हैं । यहाँ वैठा हूँ, लेकिन कानों मे वार- बार लहरों के छाको की आवाज गूंज रही है। विल्डिंग तक छोड़ने के पहले गर्ली को हर वार किनारे पर ले गया हूं.""जो कभी मूखा रहता था और कभी जिसे लहरें वार-बार भिगोने आती थी। "मुझे समुन्दर पसन्द है," गीली रेत पर दो कदम नगे पांव चलकर एक बार उसने कहा था, "तुम्हें ?" "इस बारे में कभी सीरियसली सोचा नहीं।" मैं बोला था। "फिर भी ?" उस दिन शायद वह कुछ न कुछ पूछते जाने के ही मूड मेथी। "हां, चीज अच्छी है ।"पसन्द की जा सकती है।" मैंने भरसक मुसकान दवाते हुए अटक-अटककर कहा था और एक नजर उसके छोटे- छोटे पांवो के निशान पर डाली थी-"अब यहां आ जाओ।"लहरें आ "लेट देम कम!" उसने दोनी हाथ कमर पर टिका वडे हिरोइक अन्दाज में कहा था, लेकिन फिर सहसा दौड़ती हुई नजदीक आ गयी थी। ""उमके कुछ बाल माये पर विखर गये थे और सांस तेज-तेज चलने लगी थी। "यह देख रही हो?" हाथ थामकर उसे सहारा देते हुए मैंने पूछा था।

आया था और कुछ देर बाद वाहर से लिफ्ट का दरवाजा बन्द करते हुए उसने धीरे से कहा था, "किडी, तुम आजकल बिलकुल खाली हो।टेक ए चान्स !" ... - 'मैं एक सिगरेट जलाता हूँ और तीली ऐश-ट्रे में डाल देता हूँ। कुछ क्षणों वह जलती रहती है, फिर सहसा भभककर बुझ जाती है और धुएँ की पतली लकीर लहराती, वल खाती हुई ऊपर उठने लगती है. मैं कसमसाकर पहलू वदलता हूँ। 'अव मुझे कहीं नहीं जाना है । अब मुझे वक्त का कोई खयाल नहीं.. और एक उड़ती-उड़ती नजर घड़ी पर डालता हूँ "अगर शर्ली आ गयी होती, तो हम इस समय किसी सिनेमा- . हाउस के करीडोर में घूमते हुए तस्वीरें देख रहे होते. या अन्दर बैठे फिल्म शुरू होने के इन्तजार में पॉटेटो-चिप्स चवाते हुएं चल रहा इन्स्ट्र- मेण्टल सुन रहे होते. 'या अभी-अभी शुरू हुई फिल्म का राइट-अप पढ़ रहे होते।"डिनर के बाद टहलते हुए गेटवे ऑव इण्डिया तक जाते. फिर रात के अंधेरे में चमकती हुई नियान वत्तियाँ देखते हुए 'गुलमोहर' से 'ताज' की ओर' 'चाकलेट लेने के लिए कोने की छोटी-सी 'लिटिल पीक' में घुसते तो काउण्टर पर चश्मा लगाये खड़ी लड़की हमेशा की तरह मुस्क- राती.. और बाहर निकलने पर अंगुलियाँ ऊपर हवा में हिलाकर विश् करती "वह लड़की मुझे अच्छी लगती है," एक बार शर्ली ने कहा था। "यऽऽअशी इज स्वीट एण्ड सिम्पल !" हम उस समय समुन्दर के किनारे कफ परेड में एक वेंच पर बैठे थे। नजदीक की वेंचें खाली थीं और अँधेरे में 'नेकलेस' की बत्तियाँ झिलमिला रही थीं। पीछे से कोई कार गुजरती, तो हॉर्न की आवाज या एंजिन की घरघराहट सुनाई दे जाती।"उसका दायाँ हाथ मेरे हाथ में था और मैं उसकी कलाई में बँधी नन्ही-सी घड़ी और बीच की अंगुली की बड़ी-सी अँगूठी को छू रहा था। "तुमने पूना देखा है ?" "न !" "देखोगी?" ८६ : कितना सुन्दर जोड़ा "डालिंग""!" मावेश ने मेरे हाथ पर उसकी पकड़ सख्त हो गयी थी। "मैं गैराज से कोई गाड़ी मैनेज कर लूंगा।"अगले वीक-एण्ड पर चलेंगे।" मैंने आहिस्ता से उसकी कमर अपने हाथ गिरफ्त में ले लो थी-"यूं तो 'वाम्बे-पूना हाइवे इज द बेस्ट हाइवे ऑद इण्डिया!" उमने मेरे कधे पर गाल टिकाकर खोयी-सोपी आवाज में कहा या- "आइस्सी." ."वेटर ने ट्रे टेवल पर रखी है और मेरे इशारे पर कॉफी बनाकर कप सामने खिसका दिया है। कप की ऊपरी गोलाई ने भाप उठ रही है। "एक कश का धुआं मुंह में भरे-भरे झुककर कॉफी का एक चूंट लेता हूँ. और घुओं और कॉफी, दोनो निगल आता हूँ।"एक सिहरन-सी होती है और पलकें मुंदने-सी लगती हैं। यहां बैठा हूं, लेकिन कानो में वार- वार लहरो के छाकों की आवाज गूंज रही है। विल्डिग तक छोड़ने के पहले गली को हर वार किनारे पर ले गया हूँ."जो कभी सूखा रहता पा और कभी जिसे लहरें वार-बार भिगोने आती थी। "मुझे समुन्दर पसन्द है," गीली रेत पर दो कदम नंगे पाँव चलकर एक बार उसने कहा था, "तुम्हें ?" "इस बारे में कभी सीरियमली सोचा नहीं।" मैं वोला था। "फिर भी ?" उस दिन शायद वह कुछ न कुछ पूछते जाने के ही मूड मेथी। "हां, चीज अच्छी है ।.."पसन्द की जा सकती है।" मैंने भरसर मुसकान दवाते हुए अटक-अटककर कहा था और एक नजर उसके छोटे- छोटे पांवो के निशान पर डाली थी-"अब यहां आ जाओ।"सहरें आ रही हैं।" "लेट देम कम !" उसने दोनों हाथ कमर पर टिका बडे हिरोइक अन्दाज में कहा था, लेकिन फिर सहसा दौड़ती हुई नजदीक आ गयी थी। .."उसके कुछ बाल माथे पर विखर गये थे और सांस तेज-तेज चलने लगी थी। "यह देख रही हो?" हाथ थामकर उसे सहारा देते हुए मैंने पूछा था।

मैंने अपने कोट के कालर की ओर इशारा किया था। "ह क्या है?" .. "तुम्हारी लिपस्टिक का निशान !" उनने दो-तीन बार जल्दी-जल्दी पलक झपकायी थी और कुछ कांपती हुई-सी अंगुलियों से नाये पर बिखरी र संवारने की कोशिश की थी उनले गालों पर लाली ना गयी थी और होठों के कोने हलके हलके फड़क रहे थे। कोहनी नोकर मने उसका बेहरा अपने सामने किया था। मेरे और उसके होठों के बीच बस दो इंच का फासला था कि एक घूमती हुई कार की तेज हेडलाइट में गीली रेस मकने लगी थी। वह अपना हाच सृजाकर अलग बैठ गयी थी और हायों से घुटने बांध लिये थे। नने जेब से चॉकलेट निकालकर उसकी ओर बढ़ाया था। उसने नीचे- ही देखते हुए वॉलेट लिया था और पर फेंकने को ही थी कि मैंने उनले पर लेकर जेब में रख लिया था। वह मेरी ओर देखते हुए भरमायी मिठास से हँसी थी---"तुम ये रैपर हमेशा रख लेते हो !आखिर क्यों?" "मैं इनका एलबम बना रहा है जो हमारे "हमारा 'माइ मीन वृने रेकॉर्ड होगा।" मैंने अटकते हुए किसी तरह वाक्य पूरा कर दिया वह मेरा मतलब समझकर झेंप गयी थी । “यू आर क्रेजी...!" उसने प्यार ने कहा था। उसे मेरी यह हरकत बहुत भली लगती है। "सिगरेट का टुकड़ा अब झना छोटा हो गया है कि अँगुलियों पर आंत्र महसूस होने लगी है। "उने हमले में फेंकता हूँ, तो धुएँ की मोटी लकीर लहराती, बल खाती हुई ऊपर उठने लगती है । ""याद आ रहा है कि यहां आने की मुझे कितनी जल्दी थी ! .."गैराज से सीधा कमरे में पहुंचा था और दस मिनट में तैयार होकर यहाँ आ गया था। बीच में 'लिटिल पोक' चॉकलेट ली थीं। पांत्र का नोट काउण्टर पर रखते ही बाहर सड़क पर उबल डेकर की घरघराहट सुनाई दी थी और मैं तेजी से दरवाजे की बोर बढ़ गया था। + ८८ : कितना सुन्दर जोड़ा ... "वाकी पैसे तो..." चश्मेवाली लड़की चौंककर जोर से बोली थी। "बाद में ले लूंगा' कहता हुआ में फुटपाय पर आ गया था। "अपना वह आवेश और अधीरता अब कितनी बेमानी मालूम हो रही है ! .. अपनी ही इस निरर्थक भागदौड को मैं होठो पर वक्र मुसकान लिये बहुत ऊपर से देख रहा हूँ। अपने को झुठलाने की कोशिश कर रहा हूँ कि वह सारा आवेश अपने से ही दिखाया था। दरअसल मुझे नभी अन्दाज था कि यह होगा और इस तरह जो हुआ है, वह अकस्मात् नहीं है, एक धक्का नही है जो सहमा मुझे लगा एक सिलसिले की कडी है, अपने क्रम पर उभरकर ऊपर आनेवाली' इसीलिए शीशे के दरवाजे मे जूली को आते देख मुझे ताज्जुब नही हुआ था और जब उसने पर्स से निकालकर लिफाफा मेज पर रख दिया था, तो मैंने उसकी और एक नामालूम-सी निगाह डाली थी और उसे खोलने का जरा भी आग्रह दिखाये बिना जोग मे वेटर को बुलाकर उसके लिए कॉफी और संण्डविचेज का ऑर्डर दिया था। जूली बार-बार घड़ी की ओर देख रही थी-"नो' 'मैं कुछ लूंगी नही ! • 'मैं लेट हो गयी हूँ|""डिक मेरा वेट कर रहा होगा।" "अऽय"सिट डाउन वेवी!" मैंने लापरवाही से कहा था। "खत तो पढ़ लो।" लिफाफे के प्रति मेरे रवैये से उसे झुंझलाहट हो रही थी। "ओक्के ओक्के! मैंने चौड़ी तरफ से लिफाफे का एक पतला-सा कोना फाडकर ऐश-ट्रै में डाल दिया था और एक फूक मारकर किनारे की चिपक गयी परतें खोली थी। "मेरा मन हुआ कि जोर से ठहाका लगाऊँ, 'लियोपोल्ड' को कहकहों से गुंजा दूं। एक अरसे से मैंने इतना बढ़िया मजाक नहीं सुना था"एक युवा, आकर्षक स्टेनो अपनी गर्ल-फ्रेण्ड के साथ वीक-एण्ड पर महाबलेश्वर जाये ! ...मैंने सत लिफाफे में रखा था और लिफाफा मेज पर "और मेरे होठो पर एक मुसकान मा गयी थी। जूली ने जल्दी-जल्दी 'मुझे समझाने की कोशिश की थी कि खत मे झूठ कुछ भी नहीं है। मैंने उसको कोई बात नहीं कही थी. मैंने एक लफ्ज नहीं कहा था।

... .. आँखों के आगे बार-बार किसी नयी कार में आगे बैठी, खिड़की पर कुहनी टिकाये शर्ली की तस्वीर आ रही थी-हवा के झोकों से उड़-उड़ जाती वालों की लटें संवारती हुई, माला के बड़े-बड़े मोतियों को हलके-हलके छूती हुई. -उसकी बगल में कोई भी हो सकता था-उसकी फर्म का मैनेजर''या ए, बी, सी, कोई भी-बम्बई बहुत बड़ी है। "अचानक ही मन में सूनापन भरने लगा था। "मी"उसकी मुसकराहट "उसका वात करने का ढंग "उसकी मोतियों की माला घड़ी, अंगूठी-उसकी याद बहुत ही हलकी और सतही लग रही थी और महसूस हो रहा था कि इन सवका मेरी खुशी से कोई सरोकार नहीं है। • "मैं अनमने ढंग से जूली को वोलते हुए देख रहा था उसके हिलते हुए ताल-लाल होठ, उजले दाँतों की कतार, बड़ी-बड़ी आँखें,जल्दी-- जल्दी झपकती हुई पलकों की लम्बी वरीनियाँ "वह कॉफी लिये विना उठ गयी थी। मैं उसकी अनजाने ही शोख हो रही चाल का ग्रेस देख रहा था और मेरे मुंह से एक ठण्डी साँस निकल गयी थी'काश, यह लड़की डिक की फियान्स न होती! .. 'वेटर ने पानी का गिलास खट से टेवल पर रखा है। सिगरेट का टुकड़ा ऐश-ट्रे में फेंकते हुए गिलास की ओर हाथ वढ़ाता हूँ और इशारे से बिल लाने के लिए कह देता हूँ।"सिगरेट का पैकेट कोने की ओर फिसल गया है और माचिस आड़ी खड़ी है। एक चूंट लेकर गिलास टेबल पर रख देता हूँ।'शुगर-पॉट और ऐश-ट्रे के बीच में लिफाफा तिरछा हो गया है। इसका रंग कुछ फीका-सा है, जैसे काफी दिनों कागजों में दवा रहा हो। लेटर-पेपर कफन की तरह सफेद है; न' कोई रंग है न सुगन्ध और लिखावट काफी भद्दी है. सिर्फ दो सतरें टेढ़ी-मेढ़ी, अक्षरनुमा लकीरों के बीच मेरे आगे एक परायी पुरानी कार उभर रही है "ह्वील पर मैं हूँ, एक दिन की रंगीन छुट्टी के उन्माद में... और मेरी बगल में 'जेब में रखी चॉकलेटों को हलके-से छूता हुआ अपने आप ही वुदबुदाता हूँ-"आइ विल हैव टू मैनेजर..." .."विल पे करके वाहर निकल आता हूँ। "अँधेरा हो चुका है और दुकानों पर नियॉन वत्तियाँ झिलमिला रही हैं। सड़क पर वदस्तूर का रे- ६० : कितना सुन्दर जोड़ा बसें आ-जा रही हैं "हॉर्न की आवाज और एजिन की घरघराहट आगे आती जाती हेडलाइट और पीछे फिसलती हुई पिछली बत्तियां ""दुकानों के शो-केसो पर अनमनी नजर डालता हुआ मैं फुटपाथ पर खामोश चल रहा हूँ।"सिगरेट जलाकर एक लम्बा कर लेता हूँ, तो अकस्मात् धुओं • गले में फंस जाता है, सांस रुकती-सी महसूस होती है और मुझे खांसी आने लगती है। अलग एक खम्भे मे टिककर लगातार सांस चला जाता हूँ और आँखो की कोरों से पानी बहने लगता है। "मैं अपने को बहुत थका हुआ महसूस कर रहा हूँ और मेरा मिर भारी-भारी-सा हो रहा है। धीरे- धीरे चलता हुआ सहसा 'लिटिल पीक' के आगे ठिठक जाता हूँ। दुकान खाली है और चश्मेवाली लडकी काउण्टर पर खुले एक रजिस्टर पर झुकी है। जूतों की आहट ने चौंककर वह सिर उठाती है और मुसकराने लगती "आप एकदम ही चले आये !" उसने ड्राअर मे नोट और कुछ पैसे निकालकर मेरी ओर खिसका दिये हैं। वह मेरे पीछे देख रही है... लेकिन जब कोई भी नहीं दिखाई देता, तो सहमा मेरी ओर देखने लगती है।"खांसी से मेरा चेहरा लाल हो गया है और मेरी आंखें शायद अभी भी गोली हैं। देखते-देखते उसकी निगाहों में कुछ बदल-सा जाता है और होठों पर उदास मुसकान सिमट आती है। "दिस इज लाइफ, व्यॉय ! "टेक इट ईजी !" उसने कुछ क्षणों रुककर बुजुर्माना अन्दाज में कहा है । "हट""टु यू मीऽऽन ?" "टेक इट ईजी, ब्वॉय टेक इज ईजी!" में एकटक उसकी और देख रहा हूँ। मेरा चेहरा विल्कुल भावहीन है। "आपको कोई गलतफहमी हुई है। "शी इज माइ सिस्टर।" "सिस्टर ?" "सिस्टर।" मैं काउण्टर पर टिके उसके हाथ देख रहा हूँ-पतले, सुडौल हाय." दायी कलाई में बंधी नन्ही-सी घड़ी, एक अंगुली में अंगूठी "लम्बी-लम्बी - अंगुलियां, लम्बे-लम्बे नाखून मेरी निगाह ऊपर को चढ़ती हुई उसके चेहरे पर आ जाती है "खूब गोरे चेहरे पर काले फ्रेम का चश्मा'माथे पर बिखरी दो-तीन धुंधराली लटें 'बायें गाल पर एक नन्हा-सा तिल" और पतले-पतले तराशे हुए होठ, जैसे सिर्फ चूमने के लिए बने हों! ''नोट उठाने के लिए झुकते हुए कमीज और लैदर-जैकेट के बीच दवे कॉमिक के चिकने पन्ने सरसरा उठे थे। "आर यु इण्टरेस्टेड इन कॉमिक ?" मैंने सहसा पलटकर पूछा था। “मैं वेझिझक उसके चेहरे की ओर देख रहा था जहाँ चश्मे के काँचों में ट्यूब का अक्स झिलमिला जाता था। "नो!" आवाज समतल थी-नऊंची, न नीत्री। लम्बे-लम्ब कदम रखता हुआ मैं बौखलाकर बाहर निकल आया था "हाथ पैण्ट की जेब में डाले थे और लिफाफे को दो अंगुलियों में थाम कर बाफलेट के रैपरों की तरह जमीन पर उछाल दिया था १२ : कितना सुन्दर जोड़ा अक्स वायी और की बड़ी खिड़की खुली है और बाहर लॉन का एक हिस्सा दिखाई दे रहा है, हरी साड़ी के आंचल की तरह, जिसके किनारे-किनारे मेंहदी की ऊंची घनी कतार है। सफाई से तरागी गयी ऊपरी सतह पर पीली-सी धूप का एक टुकड़ा अलसाया पड़ा है। लॉन के एक सिरे पर रवर का भारी पाइप घसीट दिया गया है, जिसमें पानी की मोटी धार निःशब्द बह रही है। सड़क के रेस्तरां तक आने वाले रास्ते पर लाल वजरी बिछी है और दोनों ओर गमलों की कतार है। ""दुपट्टा सरक्ता है, तो उसे संवारते हुए मुड़ती हूँ"वे उसी तरह वैठी हैं, मेज पर दोनों कुहनियां टिकाये, कप में धीरे-धीरे चम्मच चलाते हुए पलकें नीचे झुकी हैं और हमे वालों की दो-तीन लटें माथे पर विसर आयी हैं। "वे सामने हैं, लेकिन फिर भी जमे विश्वास नहीं हो रहा कि मैं उनमे मिली हूँ, उनके साथ हूँ। कितने दिनों के बाद आज.. मन-ही-मन हिसाव लगाती हूँ, तीन साल तो पूरे हो गये हैं और ऊपर से शायद तीन या चार महीने "वह अप्रैल का महीना था, चौथे हफ्ते का दन''जब इम्तहान खत्म होने के बाद आखिरी बार उनसे "आप बीच में इधर आयी तो होंगी?" सहना पूछ लेती हूँ। "हाँ"दो वार।" वे आहिस्ता से कहती हैं, कुछ सोचती हुई-सी, नमी की तबीयत खराब हो गयी थी।" "कब की बात है ?" कोमलता से पूछती हूं। "इसी साल तो "अगस्त में अटैक हुआ था।" जी में आता है कि उलाहना दे दूं वे दो वार आयीं और मुझसे मिलीं भी नहीं ! उनकी ओर देखती हूँ, तो लगता है जैसे उन्हें इस सम्बन्ध में मेरी ओर से किसी शिकायत की अपेक्षा नहीं। अगर मैंने कुछ कहा भी, तो वे शायद यही सोचेंगी कि मैं कुछ समझ नहीं पा रही हूँ। मेरी जगह कोई और लड़की होती, तो शायद जिन्दगी-भर उनसे मिलना पसन्द न करती ..'लेकिन मेरे मन में तो लगातार यही वात चक्कर काट रही है कि वे इस शहर में दो बार आयीं और मुझ से मिलीं भी नहीं और मैं हूँ कि उनके बारे में कितना-कितना सोचती रहती हूं, जाने-अनजाने "और इस वार भी यह महज एक संयोग ही है कि उनसे मिलना हो गया, वर्ना इतने बड़े दशहर में क्या पता चलता है कि कौन आया और कौन गया।"उनका घर भी तो शहर के एक कोने में है।... "मैं एक बार आपकी तरफ से निकली थी," मैं कहती हूँ, "लेकिन बंगला बन्द था।" "हाँ.. वीच में ममी हम लोगों के साथ थीं और पापा तो ज्यादा दौरे पर ही रहते हैं।" फिर कुछ रुककर बोली, "उस तरफ कौन है ? कोई फ्रेण्ड ?" "जी, मेरी एक सहेली है. प्रिया..." महसूस करती हूँ कि स्व अनजाने ही आ गये उत्साह से उनके होंठों पर एक वारीक मुस्कान आयी है, "आप शायद जानती हों, उसके फादर डाक्टर अस्थानात "हाँ हाँ 'नाम सुना है।" वे सहमति में सिर हिलाती हैं। "दरअसल इस वक्त यहाँ आने के लिए उसने ही कहा था।" "आइसक्रीम का प्रोग्राम है ?" उन्होंने उदास मुस्कराहट ते १४ : कितना सुन्दर जोड़ा 1.

मैंने भी होंठों पर एक मुस्कान लाकर बात आगे बढ़ा दी, "आते समय लगातार यही सोच रही थी कि देर हो जाने से प्रिया नाराज होगी, अन्दर घुसते-घुसते एक बहाना भी सोच लिया था, लेकिन अचानक आपको देखा, तो..॥ कुछ क्षण खामोश रहकर उन्होंने कहा है, "हम लोग इसी तरह मिलते हैं। क्यो ?" और मेरी ओर देखकर न जाने कैसे मुस्कराती हैं."कितनी गहरी मुस्कराहट...! सरकता हुआ दुपट्टा मवारती हूँ और आँखो के आगे नवम्बर को वह शाम उभरने लगती है "यूनिवसिटी में एक प्रोग्राम था! मैया ने कहा था कि मेरे साथ ही चली चलना, लेकिन दोपहर को जो आप निकले, तो शाम के छह बजे तक शक्ल नहीं दिखायी। हारकर मुझे अकेले ही भाना पड़ा। गेट के पास रिक्शे से उतरी, तो यूनियन हॉल से आता हुमा गोर सुनायी दिया। वरामदे में कदम रखा, तो देखा कि हॉल ठसा- ठस भरा है। सामने एक ओर लड़कियों के लिए जगह थी। दरवाजे पर ठिठककर कोई परिचित चेहरा खोजने लगी, जो मेरे लिए अपनी कुर्सी पर जरा-सी जगह कर दे"लेकिन कोई नजर नहीं आया !"इसी बीच लड़के अपनी आदत से मजबूर होकर फब्तियां कसने लगे थे कि यहां आ जाइए, जगह खाली है । "परेशानी और गुम्से से आँसू आने लगे। तभी दूसरी कतार में कोने पर बैठी एक लड़की ने हाथ हिला कर मुझे बुलाया "एक वार''दो वार"चेस्टर की जेवोमे हाथ डाले,सिरझुकाये मैं उसके निकट पहुंची, तो उसने एक ओर खिसककर मुझे अपने साथ बैठा लिया, फिर एक वाह से घेरकर, कान से मुंह सटा, मुस्कराते हुए धीरे से कहा, "क्यों जी, जब हमने पहली बार बुलाया, तभी क्यों नही आयो ?:"शरमा रही यो?" मैं झेंपकर कुछ भी न कह सकी ! .."प्रोग्राम के दौरान नजर यचा-बचाकर उसे देखा"लडकी खूब सुन्दर थी। दुबली-पतली, गोरे रग को "तीखे नक्श, बड़ी-बडी काली आँखें कम हुए आममानी कॉडिंगन में बहुत कोमल और कमनीय ! ""मुझसे बड़ी लग रही थी। "एम०ए०मे होगी, मैंने मन-ही-मन सोचा।"प्रोग्राम खत्म हुआ, तो वह वैसे ही वाह मे लिये-लिये मुझे बाहर ले आयी। मेनगेट से लाइब्रेरी की ओर जाने वाली सड़क पर लम्बी-सी कार खड़ी थी। उसने पिछले दरवाजे के हैण्डिल , रखा, तो मैंने अटकते हुए इजाजत चाही ! चलो, तुम्हें घर तक छोड़ दूं।" वैठने के लिए इशारा करते हुए, बीच में ही कहा। "फिर खट्ने दरवाजा बन्द करते हुए, गर्दन कर पीछे देख रहे शोफर से बोली, “म्योर रोड से चलना। "आपको कैसे पता कि मैं वहाँ रहती हूँ?" मैंने चौंककर कहा। उन्होंने दूसरी ओर मुंह घुमा लिया था।"प्रोफाइल से मालूम हुला हंस रही हैं। दूसरे दिन लाल पेन्सिल के लिए नैया की मेज की नातलागी ली, तो ड्रायर में नीले लिफाफे से एक तस्वीर निकली, समें वही बड़ी-बड़ी आँखें किती गहरे सोच में डूबी हुई थीं। "तस्वीर ने अपने पास रख ली और घर-भर को दिखाने की धमकी देकर भैया से तव उगलवा लिया 'नाम, पता-ठिकाना "उन्हीं की क्लासफेलो थी और मुझे भैया के साथ ही एक चैरिटी शो में देखा था। दूसरे दिन लाय- ब्रेरी के सामने पांच-छह लड़कियों के एक गुच्छे में उन्हें देखा। मुझ पर निगाह पड़ते ही वे ठिठक कर पीछे रह गयीं। निकट पहुंचकर, निचला होंठ दांतों तले दबा, भरसक मुस्कान दवाते हुए मैंने सलाम किया। वे समझ गयीं कि मैं सब जान गयी हूँ।"दुरी तरह झेंपी, मेरा बढ़ा हुना हाथ थामकर, किसी तरह 'हलो' कहा "और गोरे-गोरे गाल सुर्ख हो गये। "सड़क पर सहसा एक कार ब्रेक लगाकर रोकी गयी है और कुत्ता भौंकता हुआ एक ओर भाग गया है। दूसरी ओर की दुकानों के बड़े-बड़े रंगीन बोर्ड अब पहले की तरह धूप में नहीं चमक रहे, वरामदों में पड़े भारी काले पर्दे भी हवा लिए गये हैं और कोने पर एक लड़कासँभाल-संभाल कर पत्रिकाओं का स्टैण्ड रख रहा है। "सड़क पर चहल-पहल बढ़ने लगी है। कारें सरतराती हुई गुजर जाती हैं और विछुड़े हॉर्न की कंपकंपाती लरजती आवाज यहाँ तक आ जैसे वेदम हो जाती है।... "अव यह बाहर काफी मॉडर्न हो गया है।" उन्होंने धीरे से कहा है" जैसे सिर्फ कुछ कहने के लिए ही। - १६ : कितना सुन्दर जोड़ा "कुछ इण्डस्ट्रीज भी शुरू हो रही हैं न?" वे कुछ रुककर कहती हैं। ""आवाज समतल है, उसमें कोई उतार-चढाव नहीं। "हाँ" कुछ क्षणों तक वे एकटक मेरी ओर देखती है और तरल हो आती हैं। ..."डालिंग"." धीरे से मेरा हाथ थाम, भीगे स्वर में उन्होंने कहा है. "तुम भी मुझमे नाराज हो?" "यह आप क्या कह रही हैं"!" मैं अटक-अटककर, माहत हो बोली हूं, "जहां तक मेरा सवाल है..." सहसा टूटकर कहा है, "अब मैं कैसे यकीन दिला. ..." और झुककर उनकी उल्टी, नर्म हथेली पर होठ टिका. दिये हैं।" 4 .."मीठे स्पर्श-जैसे वे चन्द दिन, जो उनके साथ गुजरे ! ""हम दोनो कितने करीव आ गये थे। "यूनिवर्सिटी मे साथ-साथ घूमते, लॉन में फव्वारे के निकट, पीपल की बनी छाया में घण्टो बैठे रहते । "जिस दिन छुट्टी होती, सुबह से उनकी कार लेने आ जाती।"उनका बंगला हमेशा खाली-सा रहता । बीमार मां अपने कमरे में होती और पापा दौरे पर।... हम बैडमिण्टन खेलते, कहानियाँ पढते, नये रेकॉर्ड सुनते, आइस्क्रीम पाते, पिक्चर देखते..'या उनके कमरे मे, खिडकी के शीशों पर बारिश की एकरम आवाज सुनते हुए, घण्टो बातें करते। वे शरमाकर लाख 'वस, वस' करतीं, हथेलियो में सिन्दूरी हो रहा चेहरा छुपा लेती, मेरे गाल पर चपत लगाती, लेकिन मैंने यह बहुत अच्छी तरह जाहिर कर दिया था कि जब वे हमेशा-हमेशा के लिए मेरे घर में आ जायेंगी, तो मैं उनका बहुत- बहुत खयाल रखूगो, मैं उनको कभी कोई तकलीफ नहीं होने दूंगी, मैं सारा का सारा काम करूंगी, उनके लिए अपना कमरा खाली कर दूंगी, उन्हे रोज शाम को घुमाने ले जाया करूंगी और वह सब कुछ कहेंगी, जो वे चाहेगी, ताकि उन्हे कभी अपने निर्णय पर पछताने का मौका न मिले। ""यह सब कहते-कहते कभी मेरी आवाज भीग जाती, तो सहसा वे हंस- .. कर कहती, "डालिंग ! तुम तो इतनी सीरियस हो।" "नेचुरली!" मैं जवाव देती, "हम आपको इतना चाहते भी तो हैं।" .."अपने इम्तहान के दौरान वीस-बाईस दिनों तक उन्हें देखा भी नहीं। फिर जिस दिन आखिरी पर्चा हुआ, उसी दिन पहुँची।" देर तक हम लोग बातें करते रहे।"चुप-चुप वे हमेशा ही रहती थीं, लेकिन उस दिन कुछ संजीदा भी लगीं। मैं किसी बात पर हँसती, तो वे बड़े भूले-भूले ढंग से मुस्करा देती ! ""बीच में एक-आध बार एकटक मुझे देखा, होंठ कुछ कांपे लगा कि अन्दर कुछ है, जो उफनकर बाहर आना चाहता है, "लेकिन ज्यों ही अपने चेहरे पर मेरी नजर महसूस की, एकदम चौंककर दूसरी ओर देखने लगीं और जल्दी-जल्दी अटकते हुए अपने किसी पेपर की बात शुरू कर दी। शाम ढली तो बोली, "मेरी एक सहेली की साल- गिरह है। "तुम जल्दी से कपड़े बदल लो।''वहाँ चलेंगे।" "कौन-सी सहेली?" मैंने पूछा। "तुम जानती नहीं होगी।" वार्ड रोब की ओर बढ़ते हुए उन्होंने कहा, "यूनिवसिटी में नहीं है।" और हैंगर पर लटकती एक साड़ी बाहर निकाली, उसे उलट-पलटकर देखा, फिर बोली, "यह ठीक रहेगी।" "न"साड़ी नहीं .." मैं ठुकनी, "हमें शरम लगती है।" "कैसी पगली लड़की है ! .. क्या जिन्दगी-भर सलवार-कमीज पहनेगी ?" "हमें पहननी भी नहीं आती।" "तो हम पहना देते हैं।" उन्होंने मेरे लहजे की नकल की, "चलो, फेंको दुपट्टा । "वन "टू..."..'कुछ मिनटों बाद गहरे चाकलेटी साड़ी- ब्लाउज में, चप्पलें छूता हुआ पल्ला सँभालते हुए, आईने के आगे खड़ी थी। चोटियां खोलकर, कानों को ढंकता हुआ बड़ा-सा जूड़ा वाँच दिया गया था और गले में बड़े-बड़े मोतियों की एक माला पहना दी गयी थी। वे झुककर साड़ी की पटलियां ठीक करने के बाद सीधी खड़ी हुई, दो कदम पीछे हटकर, ऊपर से नीचे तक कई बार मुझे देखा, फिर एक गहरी सांस लेकर कहा, "सच बहुत प्यारी लग रही हो !" अपनी झेप मिटाने के लिए कुनमुनाते हुए "अव चलें ?" कहकर मैं १८ : कितना सुन्दर जोड़ा .

कुछ हिली-डुली। उन्होंने कुछ सुना ही नहीं ! वैसे ही एकटक देखते हुए बिल्कुल नजदीक आ गयी, "तुम दोनो के फीचर्म कितने मिलते हैं..." नाजुक थे- लियों में मेरा चेहरा थामकर, आहिस्ता-से वोली,"और आँखें तो जैसे..." कहते-कहते सहसा झुकी और कांपते, गर्म-गर्म होठ मेरी फडफड़ाती पलको पर रख दिये!... यह आखिरी मुलाकात थी! खिड़की में नजर आ रहा आसमान विल्कुल साफ है "जैसे हल्के नीले रंग का पोल जमा दिया गया हो। मूरज डूब चुका है और दूर, एक निचले कोने में लाली के कुछ छोटे हैं । "मेहदी की ऊपरी सतह से धूप का टुकड़ा गायब हो चुका है और लॉन मे पड़े पाइप से पानी की धार अभी भी बह रही है। "लाल बजरी पर टायरों के निशान हैं । दोनों ओर रखे गमलों के पौधे हल्की हवा में धीरे-धीरे हिल रहे हैं। .. "तुम्हारा रिजल्ट कब तक आयेगा?" वे मेरी ओर देखकर तनिक मुस्करायी हैं। "वस, आठ-दस रोज और हैं ।" मैं कहती हूँ"फिर झुककर कप से एक चूंट भरती हूँ। "अब क्या इरादा है ?" वे कुछ रुककर पूछती हैं,"रिसर्च करोगी?" मेज के काले कांच पर लम्बे नाखूनो से मैं हल्की 'टिक-टिक' करती हूं। "दरअमल अभी कुछ तय नहीं है..." अटकते हुए मैंने कहा, "चाहूँ तो रिसर्च भी कर मकती हूँ। '.."वट आए'म नोट इण्टरेस्टेड..." "फिर?" "कहा न कि अभी कुछ सोच नही पा रही हूं।" पड़ी की नन्ही-सी चाबी मैंने अनमने भाव से घुमायी है, "मैया को लिखा है। जो वे ठीक समझेगे .." मैं सिर झुकाये, एकटक प्लेट के फूल को देख रही हूँ"टेढी. मेही, काली लकीरों का फूल"कैसी अजीब बनाक्ट है इसकी "शायद ये मिर्फ झूठी सजावट के लिए उभार दिये जाते हैं, कभी किन्ही क्यारियो में नहीं महकते 'वस, इसी तरह वेजान खुद को और दूसरों को धोखा दिये जाते हैं । "इन दिनों कहां हैं ?''.'आवाज कैसी हो गयी है ? ''मैं सामने देखना चाहती हूँ, लेकिन अनायास पलकें ऐसी वोझिल महसूस होती हैं कि उठाये नहीं उठती... कलकत्ता।"सिरे पर रखे गिलास को लम्बी-लम्बी उँगलियों से छूते हुए मैंने कहा है। ऊपर पंखे से आती हवा की लहरें पानी की ऊपरी सतह को धीरे-धीरे कँपा रही हैं। "जानना चाहती हूँ कि उनकी नजर कहाँ है मेरे ऊपर ''या मुझसे बचने की कोशिश में केविन के खिचे पर्दे या खुली खिड़की पर फिसलती हुई .''वे सिर झुकाये हुए, एकटक पर्स की ओर देख रही हैं, एक हाथ की स्थिर उँगलियाँ स्ट्रैप से उलझी हैं और दूसरे हाथ की बँधी मुट्ठी पर मुंह टिका है । एक उंगली की अंगूठी का कड़ा-सा नग गाल में चुभ रहा है।" देखते-देखते जैसे मुझे पहली बार एहसास होता है कि वे बदल गयी हैं।" आँखों के इर्द-गिर्द वारीक झुर्रियां फैली हैं और गालों की हड्डियाँ हल्के- हल्के उभर आयी हैं । दुवली, दाहिनी कलाई की तीन सफेद चूड़ियां काफी नीचे फिसल गयी हैं और मुट्ठी के शिथिल बंधाव में विवश-सा खुलापन है।"कमजोरी चेहरे की हर मुद्रा और देह की हर हरकत से झलकती है, चाहे वे गहरी उदासी-भरी आँखों से चुपचाप सामने देखें, आँखों पर बड़ी- वड़ी पलकों का साया लिये व्यथा से मुस्करायें या किसी बात की प्रतिक्रिया में ऊपरी होंठ धीरे-धीरे काँपने लगें..'चाहे वे साड़ी का पल्लू ठीक करें, माथे पर आ गिरी रूखी लट सँभालें.'या आहिस्ता से, दुबली-लम्बी उँगलियों को हिलाते हुए जूड़े को टटोलें ! ... "कलकत्ता गयी हो तुमा? "निगाहें उठाकर उन्होंने मेरी ओर देखा है और होंठों पर करुणा-भरी उदास मुस्कान सिमट आयी है. लेकिन काली आँखों की तरलता में जो प्रश्न तैर रहा है, इस सारे अनमनेपन के बावजूद, उसे समझने में मुझसे भूल नहीं होती। कुछ रुककर कहती हूँ, "अभी तक तो नहीं, लेकिन अब जल्द ही इरादा है । "भैया अकेले वहाँ बहुत वोर होते हैं।" लमहे भर के लिए हमारी नजरें मिली हैं, "वैसे भी वह शहर देखने के लिए मैं बहुत उत्सुक हूँ।" अन्तिम वाक्य कुछ हड़बड़ा- १०० : कितना सुन्दर जोड़ा । कर जोड देती हूँ"और आगे भी जल्दी-जल्दी कुछ कहना चाहती हूं, ताकि यह जाहिर न हो मके कि जिस बात के बारे में मैंने कहा है, वह मेरे मन को कहाँ, किन-किन स्तरों पर छूती आयी है. लेकिन कहने लायक कोई बात नहीं सूझती, बीते दिनों की यादें ही सहसा भर आयी आंखों में झिल- मिलाने लगती हैं, एक-दूसरे से गुंयी हुई कोई सुबह, कोई शाम, कोई रात ऐसी न गुजरी होगी, जब उन्हें याद न किया हो। अचानक उनकी शादी की खबर सुनकर शुरू-शुरू मे तो बम, स्तब्ध भाव ने उनकी दी हुई चीजें ही सहेजा करती थी किता, तस्वीरें, मालाएं, रूमाल, दुपट्टे, एलबम .."और किसी शादी की बात सुनते ही आंखें भर आती थी। "कमरा बन्द किये, तकिये मे मुंह छुपाये, घण्टो पड़ी रहती थी। चारों ओर गहरा सन्नाटा होता, खिडकी पर गाढा अंधेरा मंडराने लगता, और हल्की हवा में कैलेण्डर के पन्ने फड़फडाते रहते। तब जिन्दगी अच्छी तरह समझ मे नही आती थी। "आप यहां कब तक हैं ?" नन्हे-मे रुमाल मे हथेली को नमी सुखाते हुए मैंने पूछा है। "ग""आठ-दस घण्टे और..." वे मेरी ओर देखकर व्यथा से मुस्करा दी हैं, फिर कुछ रुककर कहा है, "पापा रिटायर हो चुके हैं, अब देहरादून में ही रहना चाहते हैं । ""यहां का सत्र 'वेच-वाच' दिया है।" "ममी-पापा भी साथ ही जा रहे हैं ?" कुछ स्ककर पूछती हूँ। "हाँ..." वे नीचे फिसली चूड़ियां कार सरकाती हैं, फिर एक नजर वायी कलाई को नन्ही-सी घड़ी पर डालती हैं, "तुम अब चलोगी न?" "जी!" "मैं तुम्हें घर छोडती चलूंगी।"तुम्हारी सहेली तो शायद अब आयेगी नहीं।" कहते हुए वे जिप खीचकर पर्स खोलती हैं। ""वेटर पर्दा खिसकाता हुआ निकल जाता है, तो मैं कुर्सी पीछे सरकाकर उठती हूँ।"कमीज के सामने के दोनों कोने थाम, हल्के मे नीचे बींचती हूँ, दुपट्टा मभालती हूँ और आगे झूल आयी चोटी पीछे झटक देती हूँ।"कितनी लटें उडकर माथे पर ना गिरी है। मेरी सांस तेज-तेज चलने लगी है और मुझे अपनी पसीजी उंगलियां कांपती-सी महसूस होती हैं। "एक हाथ सीने पर वाँध, दूसरे की मुट्ठी में जोर से स्माल भींच लेती हूँ। "सहसा खिड़की से हवा का एक तेज झोंका आता है और मेज के चमकदार काले कांच में उनके उड़ते पल्ले का अक्स दिखायी देने लगता है पल्ला कबूतर के परों जैसा उजला, साफ-सफेद है. लेकिन मेरी भरी-भरी आँखें उसमें टेढ़ी-मेढ़ी, काली लकीरों के फूल देख रही हैं। । १०२ : कितना सुन्दर जोड़ा घर से घर तक रंजीत ने गेट पर घूमती गाड़ी मे से हाथ हिलाया और लंबे हॉर्न के साथ दायी ओर मुड़ गया। वह हाउसकोट की जेबों में हाथ डाले, एक संमें से टिको, टैरेस पर सड़ी रही। पोटिको के बाहरी हिस्से में नीचे तक बड़ी- बड़ी वेलें झूल रही थीं और उनसे उलझकर आती धूप ने दीवार पर आड़े- तिरछे ढांचे बना दिये थे। कपर किसी कोने में कुछेक चिडियों का झुर वरावर चूं-चू कर रहा था। पोस्टमैन तेज-तेज चलता हुआ आया और लेटरबॉक्स में कुछ डालकर निकल गया। वह एक गहरी सांस लेकर मुड़ी और अन्दर आ गयी। एक सोफे में धमकर दोनो अंगूठों से बंद पलकें सहलायीं। गहरे अंधेरे मे चमकते तारे- से टूटने का आभास हुआ। साथ ही माये के भीतर वायें किनारे पर एक नस हलके से तड़क उठी। रात चार बजे के लगभग अनायास उसकी नीद टूट गयी थी और फिर सुबह धूप निकलने तक बरावर करवटें बदलीं। याया ने कप मेज पर रखा। फिर अन्दर दराज खुलने और बंद होने की आहट आयो। उसने हाथ बढ़ा कर एम्प्रो की स्ट्रिप ले ली। एक गोली . । मुंह में रखी। फिर एक बड़ा-सा चूंट लिया। फिर दूसरी गोली मुंह में रखी। फिर एक और छूट लिया। मन में आया, अगर इसी तरह स्ट्रिप खत्म कर दे, तो? ये नींद की गोलियाँ थोड़े ही हैं। मौत नहीं आयेगी जैसे इतमीनान-सा हुआ। उसने सिर झटका। इसी तरह खाली रहने से बेकार की बातें तो दिमाग में आयेंगी ही। उसने हाथ बढ़ाया और सेटी पर पड़ा कॉमिक उठा लिया। ऊपर दायें कोने में बड़े-बड़े अक्षरों में शालू ने अपना नाम लिखा था। उसके इर्द-गिर्द गोलाकार लकीरों से दो फूल बना दिये थे। उराने एक पन्ना पलटा । स्त्री-पुरुप की दो तसवीरों को शालू ने 'मम्मी-पापा' का दर्जा दिया था। बकरी के एक चित्र पर 'आया' दर्ज कर दिया था। आज दोपहर को क्या किया जाये ? रक्षा, या सुमति ? पर किसी के पास भी कुछ देर बैठना उनके साथ अन्याय मालूम देता है। वह सिर्फ हूँ-हाँ करना चाहती है और पास बैठे व्यक्ति के बोलने के साथ ध्यान सतह से नीचे डूबकर स्मृतियों में उलझने लगता है। कॉमिक एक और फेंकते हुए उसने सोचा, कितनी नृशंस और वर्वर होती हैं ये यादें...! वह एक झटके-से उठी और कैविनेट तक आयी। रेडियो का स्विच दवाया। फिर बंद किया। फिर दवाया। फिर बंद किया। स्टक के रिकार्ड करीने से लगा दिये । हाथ अनायास कोने के एल० पी० पर ठिठका, जो उसने दिया था। जैकेट की रंग-बिरंगी डिजाइन देखी। उँगलियाँ चिकनी सतह पर फिसलीं। ध्यान नीचे डूबने लगा। उसने शुरू में प्रतिरोध का कितना प्रयत्न किया था."उससे और अपने आपसे। चेहरे पर वरावर गंभीरता का मुखौटा रहता था और उसके साथ निरंतर सूक्ष्म-सी, सर्द दूरी चल रही थी। वह कारोवारी वारीक मुसकान से उसके केविन में दाखिल होती थी और निगाह झुकाये हुए हस्ताक्षर के लिए खुली फाइल मेज पर रख देती थी। पर वापस लौटते हुए खुले अंगों की त्वचा पर वरावर उसकी दृष्टि की ऊष्मा का अनुभव होता था और वह बार-बार अपने को झुठ- लाती थी कि यह एहसास उसे तनिक भी उमंग नहीं देता। लेकिन रात के १०४ : कितना सुन्दर जोड़ा अंधेरे में जब एकाएक नौद टूटतो, तो कही भी बदन पर सोये हुए रंजीत के स्पर्श मे वितृष्णा होती थी और सहसा जी मे आता कि उसे छूती हुई यह बांह केवल एक पल के लिए किसी और की होती... उसे इस नयी जगह के पिछले कुछ दिन याद आये--सूने-सूने, उदाम । पर का सन्नाटा । सुबह से शाम तक का खालीपन । रंजीत और भालू के न होने पर एकाकीपन की कचोट और उनके होने पर भी अकसर मन के 'किसी कोने में उसी अकेलेपन की कसक । पलंट में इधर-से-उधर का निरु- द्देश्य चक्कर । इस कुर्सी पर बैठना। उस खिडकी के सामने खडे हो जाना । शालू का होमवर्क । रंजीत की धुली बनियान। गालू का ओवल्टीन । रंजीत को चाय । शालू के मोजे । रंजीत की सिगरेट । 'उसने ठंडी सांस ली और अन्दर कमरे में आ गयी। सब दुरस्त था। बिस्तर ठीक करके कवर बिछा दिये गये थे। नाइट टेवल से जग व गिलास हट चुके थे। भरी ऐश-ट्रे खाली हो गयी यो । शालू और रंजीत के फेंके कपड़े चार्डरोब में पहुंच गये थे। वह कुछ क्षण सोजभरी दृष्टि से इधर-उधर देखती रही। नही, करने को कुछ भी नही था । तो फिर नहा ही लिया जाये, वह मन-ही-मन वोली। गुसलखाने का दरवाजा बंद कर हाउसकोट उतारा और मुड़ कर टैप के निकट पहुँचते-पहुंचते ठिठक गयी । उंगली यंत्रचालित-सी सफेद स्विच पर पहुंची और दीवार पर जड़े बड़े आईने में उसका अक्स चमक उठा। आंवों में वही सूनापन। उसने तीन-चार वार पलकें झपकायी, जैसे इसी तरह उस भाव से छुटकारा पा लेगी। दीवार पर कोहनी टिकाकर यो ही चैमिन का टप खोलते-बंद करते हुए याद करने की कोशिश की कि खुली पलकों के दायरे में भरा यह शून्य पहले पहल कव लक्ष्य किया था शायद यहां आने के कुछ समय बाद । अनायास । ऐसे ही किसी दिन.. दरवाजे पर हल्की-मी थपकी पड़ी। उसने पलटकर देखा । कुछ जोर मै पूछा-क्या है ? उघर के आया की आवाज आयी-आपका फोन । वह पल भर के लिए ठिठकी रही। फिर खूटी से हाउसकोट लिया और एक आस्तीन मे वह डालते हए दूसरी से सिटकनी खोल कर बाहर आ गयी। आया तार पर पड़ी शालू की गीली शमीज पर क्लिप लगाने लगी थी। ---किसका है? आया रुक गयी-जी, उन्होंने कुछ बतलाया तो था, पर मेरी समझ में नहीं आया। वह पैसेज से घूमकर ड्राइंगरूम में आयी। रक्षा, सुमति या मिसेज. वना, इन तीनों में से कोई होनी चाहिए। रिसीवर उठाते हुए उत्तने देखा, वगल के रैक पर रखे सुनहरे फ्रेम पर घूल की एक वारीक तह जम गयी है। -हैलो...! दूसरी ओर पल-भर चुप्पी रही। फिर वीमा पुरुष-स्वर सुनायी दिया-हैलो, बुलू ! उसका दिल एक बार जल्दी से घड़का। फिर अपनी समरस ताल पर ना गया। -कैसी हो? उसने चूंट-सा भरा। मृदु स्वर में कहा-ठीक । क्षण-भर का मौन । फिर-कब आये? ___-परसों..'कान्फरेंस थी। दोनों दिन उसी में उलझा रहा। वह निकट के मोढ़े पर बैठ गयी--कब तक हो यहाँ ? -कल जाऊंगा "सुवह की फ्लाइट से। फिर लमहे-भर की खामोशी के बाद-और'? क्या हालचाल है ? उसकी आवाज में खराश थी, जैसे खांसी हो रही हो। सिगरेटें बहुत पी होंगी। -~-ठीक। -घर के दोनों लोग मजे में हैं ! ? --और तुम -मैं...? गले के अन्दर जैसे कहीं कुछ फंसने लगा। दूसरा हाथ घुटनों के बीच दवा कर वह निश्चल बैठी रही। क्षणिक विराम। उसने मन-ही-मन समझ लिया, अव वहीं मोड़ ना गया है। १०६ : कितना सुन्दर जोड़ा -खाली हो रिनी दस? पल-भर बार उल्ने कानेजाको रहते सुना। और wer गला साफ किया। ---शान को र? नहीं, मान को नहीं। दफ्तर से आ जाये। -एक तो बज हो गया है."दो के करो""सुपर हमसे ठोक? या लमहे-भर रुककर उसने रिसीवर रख दियाहवा के एक सेर तोके से खिडकी का पल्ला खुला और मेज पर रसो परिका के पन्ने फहराने लगे। उसने वडकर चिटसनी लगायी। फिर पर पूरा सोप feer रंक से फ्रेम उठाया और आस्तीन से दो-तीन बार ASER तर देसी, तो पल भर के लिए लगा कि नहीं, यह मैं नहीं हो सकती । ति शे साल पहले "वह बीच में बैठी यो। एक कंधे पर पति कहा था. दूसरे पर शालू का । उसकी मुमकान में संतोष था और बालों में गमक र केशर दो वर्ष पहले। शालू की इसी वर्षगांठ के बाद हो तो उससे परिभरमा बदन पर तोलिये के रेशों को मुलायम एअन महसूस करते हुए ३६ कुछ क्षण गुसलखाने में आईने के सामने खड़ी रही। पिछले महीने बा फिर कुछ बढ़ गया था, हालांकि साने-पीने में यह परामर एहरित रही थी। उसने हलके हाथों से कमर सहलामो । दुख का महधूम नही हुआ। तोलिया खोलते हुए उसने डिम्बा उठाया और हलके हाथो से १६३. हर छिड़कने लगी। बार्डरोब के सामने वह कुछ क्षण टिकी । दा को मेशिकार की वह साड़ी थी, जो उसने दफ्तर मे पहरी मुंबन के गमप पहा रती थी। इसी के पल्लू मे खेलते हुए उमने उसके कंधे पर शिर कर पा कान को लो हलक से काट ली थी। पल भर के लिए उसकी निगाह अपने आप -- । धुंधला गयी और वह पहला रोमांच अन्दर कहीं सुगबुगा उठा। कपड़े पहनकर वह स्टूल पर आ वैठी। जूड़ा बाँधा । हलका-सा मेकअप किया। दराज से एक चेन निकालकर गले में डाल ली। दायीं कलाई में तीन चूड़ियाँ पहन लीं। फिर उठ खड़ी हुई और ऊपर से नीचे तक अपना जायजा लिया। दरवाजा खोलकर आया को आवाज देते हुए वह टैरेस पर आ गयी । वेंत की गोलाकार कुर्सी एक कोने में खींची, अख- बार उठाया और सरसरी निगाह से सुखियाँ देखने लगी। अन्दर के पन्ने पर रिआयती विक्री का विज्ञापन पलटा । आज के कार्यक्रमों पर एक नजर डाली। अगले हफ्ते से बदल रही और इतवार को सुबह के शो में दिखायी जाने वाली फिल्मों के नाम पढ़े। आया ने आकर ट्रै खाली की। उसने सेंडविच का एक टुकड़ा काटा। फिर कॉफी का चूंट लिया। तो यह हो गया है! बंबई छोड़ने के बाद उसने कई बार इस घटना की कल्पना की थी और कई तरह से इसे बनते हुए देखा था। उसकी अपनी भूमिका भी कई प्रकार की थी। लेकिन आज जो हुआ, वैसा उसने एकाध बार ही सोचा था। शायद कम इसलिए ही सोचा था कि अगर सचमुच होने की बात आये, तो..? क्या इन महीनों के अंतर्द्वन्द्व और यातना में कहीं-न-कहीं अपने आप ही यह निश्चय हो रहा था कि...? जोर की खनक के साथ मग रख कर वह उठ खड़ी हुई। अन्दर आ, मेज से पर्स उठाया। दराज से दो-तीन नोट निकाल कर पर्स में डाले। तभी एक कोने में एक गुलाबी-सा कागज दिखायी दिया। लेकर खोला, तो लांड्री की रसीद थी शालू का गरारा-कमीज। वापसी की जगह दस तोज पहले की तारीख पड़ी थी। उसने दाँतों-तले होठ दवा लिया. यह उसे क्या होने लगा है ! दरवाजे पर आकर वह रुकी। आया से कहा कि वह बाहर जा रही है। लौटने में शायद देर हो जाये। शालू के स्कूल से वापस आने पर दूध व स्नैक्स दे देना। सफेद शीशी से एक टिकिया अपने सामने खिलाना और खेलने के लिए कंपाउंड से बाहर मत जाने देना। वह धीमे कदमों से नीचे उतरी । लेटरवॉक्स खोलकर देखा, लिफाफा नीचे वालों का था। गेट से निकल कर वह कुंडा लगाने लगी। क्षण-भर । १०८ : कितना सुन्दर जोड़ा के लिए निगाह कार व्ही "सब चुपचाप । रुका हुआ। -टेक्सी...! अन्दर घुसने पर वह दो पल के लिए ठिठकी। तभी कोने को मेज से झक् सफेद कफ पर काले कोट की आस्तीन वाले एक हाय ने ऊपर उठकर हल्की-मी चुटकी बजायी। दह दहत बारीक स्मित से आगे बढी। उतना फासला तय करते हुए उसकी आंखें एक तरह में मेज पर ही टिकी रही। --हैलो...! वही मघा स्वर । वह तनिक-सा मुसकरायी। कुर्सी सीवकर बैठी। पनं एक कोने में। हाथ मेज पर। अधखुली मुट्ठियाँ । अगस्त-मी। निगाह कपर उटी और टाई की गांठ तक आकर टिक गयी। तभी उसने अपने एक हाथ पर दवाव महमूस क्यिा यही स्पर्श तो था, जिसके लिए वह उसके अन्दर कहीं कुछ पिघलने लगा और पलको की कोरी पर नामालूम-सी नमी महसूस हुई। हाय में ट्रे लिये इस ओर आते वेटर को देखकर दह सीधा हुआ। पंकेट से सिगरेट निकाली। सुलगायी। लंवा कश। ऐश-ट्र से उठती धुएँ वी मद्धिम लकीर। -कैसी हो? - ठीक । उसने स्निग्ध मुसकान से कप मे एक क्यूव डाला और चम्मच चलाने लगी। -यहां कैसा लग रहा है ? -इनके लिए तो अच्छा है। मैनेजर से पहले से मुलाकात है। फ्लैट के लिए बहृत कम अपने पास से देना होता है। कंपनी से गाड़ी भी मिली हुई है। एक चूंट लिया-शाल को भी अपना स्कूल वहाँ से बहतर लगता है। पड़ोस में भी उसके साथ के दो-तीन बच्चे है। वह नाखून से सीधी-टेढ़ी रेखाएं खींचने लगी। - मैं तुम्हारे बारे में पूछ रहा हूँ ! उँगली जहां-की-तहाँ रक गयी । पल भर के लिए उसकी निगाह फिर नीचे देखने लगी। अन्दर से फुरहरी-सी उठी और गहरी ठंडी सांस मे ? बदल गयी। यहाँ के वे शुरुआती दिन याद आये, जब वह दोपहर को कमरा बंद किये, खिड़कियों पर परदे चढ़ाये, तकिये में मुंह छिपाये पड़ी रहती थी 'जव कितनी बार एकाएक चौंककर पति ने कहना पड़ता था-तुमने क्या कहा -कुछ कहोगी नहीं? उसे लगा कि वह हथेलियों में चेहरा छिपाकर फफक पड़ेगी। उसने हाथ गोद में लेकर मुट्ठियाँ सस्ती ने भींच ली। फिर चूंट-सा भरते हुए पर देखा । सामने की आँखों में वही आहत भाव था, जो पिछले दिनों लगातार उसे चुभता रहा था जिसने सारी यादों में तीखे होकर उसे इस तरह बेचन किया था कि कई वार रात को विस्तर पर कोई आहट न होने देने के लिए उसे तन-मन का सारा वल लगा देना पड़ता था। कुछ मत पूछो 'मुझसे कुछ मत पूछो ! उसने अस्फुट स्वर में कहा-तुमने मुझे बहुत मजबूर कर दिया है... आगे कुछ कह सकना संभव नहीं हुआ। वह दायीं ओर देखने लगा, जहाँ मेज पर तीन व्यक्ति एकाएक कुछ ऊँचे स्वर में बात करने लगे थे। उसने वेवजह ही पर्स खोल लिया और जब कुछ करने को न हुआ, तो रुमाल निकालकर मुट्ठी में भींच लिया। फिर थोड़ा झुकी और तीन-चार बड़े-बड़े चूंट लिये। -अपने बारे में तो कुछ नहीं बताया ! -क्या बताऊँ ? वह क्षण-भर रुकी-कैसे हो 'क्या कर रहे हो ? उसने मुसकान के साथ कहा-मजे में हूँ'नौकरी कर रहा हूँ। वह झेंपी-सी हँसी-आफिस में सब लोग ठीक हैं ? –हाँ। -~-मेरी जगह पर कोन आया है ? उसकी आंखों में फिर वही त्रोट खाया भाव तैर आया-कोई भी आये, तुम्हारे लिए क्या फर्क पड़ता है ! वह नीचे देखने लगी। कुछ ठहरकर बोली-मिसेज़ रोशन अच्छी तरह हैं ? लगा, वह इसी बात की प्रतीक्षा कर रहा था-क्या यह सच है कि ११० : कितना सुन्दर जोड़ा उन्होंने तुम्हें दो सत लिखे थे? उसने आहिस्ता से हामी मे सिर हिलाया। -~-वह काफी दुखी और हैरान थी कि तुमने जवाब क्यो नही दिया ! --मैं कोशिश कर रही थी कि शायद ऐसा हो सके.'' वह सवालिया निगाह से देखता रहा। --उस बीते हुए से हट पाना..! उसे अपने पर हलका-सा माश्चर्य हुआ । अब वह कितनी सहजता से बोल रही थी! अब किसी आवेग का अवरोध नहीं था। वपा यहाँ तक आ जाने से वह कममकदा बुझ गयी, जो पिछले दिनों कितनी गहराई से उसे मथती रही है ? --एक बात पूर्वी ? -हूँ ? उसने सिगरेट का टुकड़ा ऐश-ट्रे मे रगड़ दिया। फिर कप पर केतली झुका दी। हाल मे तुम कितनी बार यहाँ आये हो ? वह अभिप्राय समझ गया। तुरन्त नीचे देखने लगा। घोडा-पा उड़ेला । चम्मच चलाया। एक चूंट भरा। फिर उसकी ओर देखा-तीन बार। एक सिगरेट जलायी। दो-तीन करा खींचे-पहली बार हाय में तुम्हारा नंबर तिये फोन तक आया। फिर इरादा छोड़ दिया। दूमगेवार आते ही सात-तीन-एक तक मिलाया, फिर रुक गया। दो रोज वाद शाम को वापस जाने के दस मिनट पहले नंबर डायल किया, तो तुम्हारे पनि को 'हैलो' मुनकर रिसीवर रख दिया। --शाम से पहले तो कर सकते थे? वह एकाएक बोल उठी। उमने स्थिर दृष्टि मे देखा-तुमने मना नहीं किया था? तब मुझे कहां पता था"यह मन-ही-मन बोली, तब मुझे कहाँन्दा या कि इतनी विवश हो जाऊँगी ! उसने एक गहरी सांस ली।हिदे दिन याद आये "न हंसी, न मुसकान । न आना, न जाना । न दादन कंटा पति उसके रूखे वालों पर स्नेह का हाय फरसर कहने- बुलू ? यहाँ अच्छा नहीं लगता? शालू दोनों बाहों में, उलाहना देती-तुम कैसी चुप्पी-चुप्पी हो गयी हो! -~-तो..? वह मुसकराया-क्या होता है दिनमा । .

. उसने सरकता हुआ पल्लू संभाला। मंद स्मित से कहा-होता क्या है, अपना घर संभालते हैं ! सामने की दृष्टि कुछ क्षणों तक एकटक देखती रही-संभल जाता है? अन्दर पैठती हुई आँखों में चुनौती"उसे अनायास ही जुहू की वह शाम याद आयी, जब उसने शादी का प्रस्ताव रखा था। वह ऊपर की ओर देख नहीं सकी। उसकी मुसकान होठों में ही जज्व हो गयी। यों ही हाथ बढ़ाकर ऐश-ट्र में सिगरेट का टुकड़ा छुआ । फिल्टर के किनारों पर होठों की नमी मिली हरारत महसूस हुई। तुम कितनी आसानी से पूछ सकते हो सव''वह मन-ही-मन वोली । -~-अभी कहीं जॉब नहीं लिया? उसने पूर्ववत् नीचे देखते हुए नाहीं में सिर हिलाया 'धीरे से तनिक व्हरकर कहा-कुछ दिनों बाद करूँगी। -कश्यप आज बतला रहे थे "यहाँ की ब्रांच में शायद एकाध जगह है। -नहीं। इस कंपनी में नहीं। -क्यों? कुछ पल निगाह मिली रही। कातर स्वर में कहा-तुमसे दूर..! लगा कि आवेग से गला रुंच जायेगा। मन हुआ कि बाहों में घेरते हुए उसके सीने में मुंह छिपा ले। आँखें सिल्क की चौड़ी टाई पर टिक गयीं। फिर नीचे । मेज की सतह । लंवा विराम। --तुम्हारा पी० एफ० वगैरह आ गया है ? उसने नयी सिगरेट सुलगायी। --अभी नहीं। क्यों? -ग्रेच्युइटी को लेकर कुछ पेचीदगी है। -अच्छा "मैं देखूगा। फिर लंवा विराम। उसने सिगरेट खत्म कर ऐश-ट्रे में मसल दी] सरसरी नजर से इधर-उधर देखा । वह समझ गयी, वह क्षण आ गया है। shes ११२ : कितना सुन्दर जोड़ा । -सुनो! स्वर धीमा। उसने निगाह पर उठायो। -मैं कमरे में चल रहा हूँ। तुम पांच मिनट रुक कर आ जाना." नंबर सात सो ग्यारह। वह नीचे देखने लगी। रुकी हुई सांस छोड़ दी। उसने बदली हुई आवाज मे कहा-अगर चाहो, तो उस बार की तरह यहाँ से निकल कर मीधी घर भी जा सकती हो। मैं वस, दस मिनट कार ठहरकर कही घूमने निकल जाऊँगा, इसलिए तुम्हें इस फिक्र में पड़ने की जरूरत नहीं है कि मैं फिजूल परेशान हो रहा होऊँगा। विना देखे वह समझ गयी कि उसकी आँखों में फिर वही चोट साया भाव उभर आया है । वह उठ खडा हुआ और लबे कदमों से बाहर निकल गया। उसने हताश भाव में मेज पर कुहनियाँ टिकापी और हथेलियों में मुंह छिपा लिया। फिर सहसा हाथ हटा लिये और सीधी हो गयी। आंखें सुद-ब-खुद अधमुंदी हो उठी। होठो के कोनो पर वह सिहरन सुगयुगाने लगी, जिसे कितनी ही वार दवाने की असफल कोशिका की थी। एकाएक निगाह घड़ी पर चली गयी। हाथ में अटैची उठाये शालू वापस आ गयो होगी। अगर दरवाजा बंद होगा, तो जब तक खुलेगा नहीं, तब तक घंटी के बटन पर बराबर उँगली। फिर पूरे घर में गूंजती पुकार--मम मम-मम-मम-मम-मम-मम-मम-मम-मम्मी...! और वह जहाँ भी हो, वही किलकारी के साथ गले में बाहें । उसने कुर्सी पीछे खीची और पर्स उठाते हुए सीधे बाहर निकल आयी। लाउंज मे से गुजरते हुए दायें या वायें किसी तरफ नहीं देखा। रिसेप्शन की लडकियों पर एक उडती निगाह डालते हुए वह पहली लिपट मै दाखिल हुई और हत्ये पर उंगलियां रखी ही थी कि सहसा एक युवक सामने आकर ठिटका। उसने हाथ हटा लिया और सामने देखने लगी। युवक ने अन्दर आकर सीखचा बंद किया। -व्हिच पलोर? -सेवेय। लिफ्ट चौथे मंजिल पर रुकी। युवक के निकल जाने पर उसने सात के बदन पर उंगली रखी। बाहर निकली, तो कारीडॉर बिल्कुल खाली था। पर तीन-चार कदम चलते ही एकाएक दरवाजा खुला और कोई स्टीवन बाहर निकली। उसकी दृष्टि पूर्ववत सामने रही। ७११ के दरवाजे पर 'डोंट डिस्टर्व' की तन्ती लगी हुई थी। उसने हैंडिल पर हाथ रखा, पल-भर ळिकी, फिर एक लंबी सांस लेकर अन्दर घुस गयी। । . कंघी घुमायी, तो लगा कि एक ओर के बाल उलझ गये हैं। आहिस्ता- आहिस्ता उंगलियां चलाते हुए कलाई की घड़ी देखी। पति को दफ्तर से जाये कुछ देर हो चुकी होगी। क्योंकि वह बुलाने को नहीं हैं, इसलिए हो सकता है कि बालू पड़ोस में या पार्क में खेल रही हो। पता नहीं, आया उसे कुछ खिला-पिला पायी होगी, या नहीं। उसने जूड़ा बनाया। कपड़े पहने। हलका-सा मेकलप किया। होठों पर मैक्सफैक्टर की स्टिक फिराते हुए सहसा ठिक गयी। ध्यान से आईना देखा । क्या अभी भी लाखों में वही महीनों पुराना नाव है ? मन में बातिरावाजी के बनार की तरह यातना के वेक्षण कौवे और आवेग से भीतर यरथराहट-ती भर गयी। उसनहाय बढ़ाकर दीवार का सहारा ले लिया बेसिन का टैप खुला छूट गया था और बारीक छेदों ने धारा के वहने की सरसराहट सुनायी दे रही थी। दरवाजे पर एक बार हलकी-सी 'वट' हुई-बुलू"मैंने कब से चाय बना दी है। वह दीर्घ निःश्वास लेकर सीधी हुई। टेप बंद किया। पर्स उठाया और वापरूम से बाहर निकल बायी। पल-भर के लिए पलकें अधमुंदी हो गयीं। सोफे के एक कोने में बैठने के बाद उसे ध्यान बाया कि कमरे की सारी रोशनियां जली हुई हैं। कप उठाकर उनने तीन-चार बड़े-बड़े चूंट भरे। -उंडी तो नहीं हुई? उसने इनकार में सिर हिलाया। फिर तीन-चार चूंटों में कप खाली कर दिया। पीछे टिक गयी और हाय बम पर वांव लिये। सामने वाली ११४ : कितना सुन्दर जोड़ा दीवार पर शीशे के बहुत बड़े पैनल के पार अँधेरे की स्याही। उसने हामी मे सिरहिलाया। केतली से पानी उडेले जाने की आवाज सुनी। चम्मच की हलकी सनखनाहट । बस, यही कुछ क्षण है । इसके बाद फिर वही नीम-अंधेरा कमरा। वही लंबी, मूनी दोपहर। इसी एक स्पर्श के लिए जिस्म की तीखी ललक गले में कुछ अटकने-सा लगा। माथ ही इस बात का एहसास कि आँखो की नमी मे मेकअप कहीं खराव न हो जाये। चूडियों की हलकी टकराहट के साथ पर्म में रूमाल निकाला। क्षण- भर बाद कंधे पर हलका स्पर्श । सांत्वना देता-सा-क्या बात है, वुलू ? हिलककर उसके सीने मेमुंह छिपा लिया । यहाँ मे वहाँ चेहरा घुमाती रही। फिर उसके गले पर होठ जमाकर परथराहट दवाने की कोशिश की। चुप्पी । भीगापन । सुकून। --अब कब आओगे? -सितबर में। उसने कप को हाथ लगाकर देखा-यह तो विल्कुल ठडी हो गयो है ! और मंगवाता हूँ। फोन की तरफ हाथ बढाया। नहीं । अब मैं चलूंगी। वह यो उतावली से बोल उठी, जैसे एह- सास इसी घडी हुआ हो-बहुत देर हो गयी है। वह ठिठक गया-श्यो? -~-हूँ। यह उठ खड़ी हुई। पर्स मेंभाला और दरवाजे की और बढी-अच्छा...! ड्रेसिंग गाउन की जेबों में हाथ डाले, वह कुछ पल एकटक देखता रहा। फिर निकट आया."अन्तिम चुवन । विदा के क्षणो का कुछ और खिचना. दरवाजा बद हुआ, तो 'डोंट डिस्टर्व' की शरुती हलके से हिली। उसने की मांस छोड़ी और स्थिर कदमी गे लिपट तक आयी। बदन दबाया। कुछ लमही वाद तीवचे खुले। वह किसी की ओर देसे दिना एक कोने में टिक गयी। "दरवान ने तपाक से दरवाजा बंद किया और सलाम । गोलाकार मोड । तेजी से पोछे छूटते लेंपपोस्ट । छिपी रोशनी देकर घर से परा:R . - की चमकती बौछार । हवा का एक तेज झोंका आया, तो काँच चढ़ा लिया। एक कोने में सिमटी। पलकें खुद-ब-खुद मुंद गयीं। बंद आँखों के अंधेरे में रंग-बिरंगे अनार फूटे 'अनेक स्मृतियों से चेहरे पर स्निग्ध मुसकान । लाल बत्ती पर एकाकक झटका लगा, तो आँखें खुल गयीं। वगल में खड़ी कार के रेडियो से किसी धुन के मंद स्वर हवा में तैरते हुए मँडराये। रुके हुए ट्रैफिक का आकुल शोर । हॉर्न की लंबी, घायल चीत्कार । दायीं ओर मुड़ते ही उसने टैक्सी रुकवायी। लांड्री का शटर आधा गिरा हुआ था। उसने उँगली से खट्-खट् की। फिर नीचे झुककर भीतर आ गयी और रसीद निकालकर काउंटर पर रखी। गरारा-कमीज ध्यान से देखा, तो शोरवे के धब्बों का हलका आभास अभी भी शेप था। उसकी आपत्ति पर सामने वाले ने नर्मी से कहा कि एक-दो और धुलाइयों में बिल्कुल साफ हो जायेंगे। वह बोली कि उसने इसी दार विल्कुल साफ हो जाने का भरोसा दिये जाने पर ही कपड़े डाले थे और कि पुराने ग्राहकों के साथ ऐसा व्यवहार अच्छा नहीं है। उसने बिल से दो रुपये काट लिये। काउंटर के व्यक्ति ने एक बार प्रतिवाद किया, फिर कड़ी 'ठीक है' सुन- कर चुपचाप पैक करने लगा। .. 'सड़क के सामने वाले हिस्से में रोशनी की कँपकँपाहट । पहियों के निकलने पर पानी के छपाके। फव्वारा। पार्क का सामने का गेट । मिल्क बूथ । क्लिनिक । पार्क का कोना। वेकरी। आइसक्रीम स्टाल । पार्क का पिछला गेट । -वस। । दरवाजा बंद होने की खट् । चार-नव्वे ''उसने मीटर देखकर पर्स खोला और एक नोट बढ़ाते हुए मुड़ गयी। मरामदे में रोशनी थी। पोर्च में गाड़ी खड़ी थी। ऊपर ड्राइंगरूम की खुली खिड़कियों से मद्धिम संगीत। छोटे कदमों से जीना पार किया। आहट पाकर पति ने अखवार से निगाह उठायी-हैलो...! वह मुसकान से उत्तर देकर अन्दर चली गयी। आहट पा, प्याज के टुकड़े कतरते हुए आया ने इस ओर देखा। ११६ : कितना सुन्दर जोड़ा ~खाना तैयार है। -जी। वह पैसेय ने निकलकर कमरे में आयो। पमं मेज पर रखा, वडा लिफाफा वार्डरोब को दराज में। माईने के आगे, स्टूल पर आ बैटी। बकल खोलकर मंडिल निकाले। जूडे की क्लिप व जाली सोली। उठने को ही थी कि परदा लहराकर हटा और रुआमा स्वर-कहा थो तुम हम इनी देर से ढूंढ रहे थे। पल-भर ठहरकर हलकी मुसकान मे कहा-रक्षा आंटी के यहाँ। और उसका स्पर्श पाते ही एकाएक अन्दर कुछ धसक गया। उसने हिलका- कर भालू को बाहों में भर लिया, जैसे कहीं खोने के बाद मिली हो और उसकी हथेलियो को, माथे को, कपोलो और आंखों को उन्मत्त की तरह चूमने लगी। ? । -मैडम ने कहा कि तुम क्लियोपेट्रा बन जाना। फाउन और संप्टर हम बनाकर दे देंगे। ड्रेम रगीन होनी चाहिए और खूब लबी। मुनहरे डिजा. इन वाली जूतियां तुम्हारे पास हैं हो.'' खाना खत्म होने पर वह बिना कपड़े बदले भालू के माय उसी विस्तर में लेटी थी। मालू अपनी नाइट ड्रेस पहनकर आयी थी और उसके ऊपर एक बाह रखते हुए रोजनामचा मुना रही थी। वह अपने में ही डूबी हुई बीच-बीच में 'हाँ हूँ' कर देती थी। उमे मालूम ही नही पडा कि शालू का बोलना कब नीद की समतल सांसो में डब गया। जब ध्यान आया, तो उसने शालू पर चादर ठोक-से समेट दी और उनके रूखे बालो को छुन चेहरे पर महसूस करते हुए आंखें मूंद ली। कुछ देर बाद बाहर पति की आहट सुनायो दो । दरवाजा बंद हुआ। सिटकनी लगी। लेप का स्विच दबाया जाना। बंद पलकों पर मद्धिम रोशनी का आभास । चप्पलों का निकट आना। घोमा स्वर-बुलू..! वह मांस रोककर निश्चल रही। कुछ क्षणो बाद पास के हवल पर दवाव । हलको 'खट्' के साथ अघेरा । कुछ मिनटों तक दो .

करवट बदली जाने की सरसराहट । फिर मौन । सड़क पर चौकीदार के लाठी टेकने की 'ठक्-ठक्' हुई। किसी कार का लंवा हॉर्न सुनायी दिया । ऊपर की छत पर कहीं दो विल्लियाँ गुरीयीं। बाहर टैरेस पर हलकी-सी खनक हुई। उसने सिर उठाकर अँधेरे में ही इधर-उधर देखा। फिर शालू के एक नर्म कंधे पर मुंह टिका, आँखें वंद कर लीं-00

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Kitna Sundar Joda

Author
Verma Surendar
Title
Kitna Sundar Joda
File name
Kitna Sundar Joda
Text
OCR done
Published
2011/03
Publisher
Delhi,the Printing Press
Language
Sanskrit
Pages
138
Library
Adarsh Library, Jaipur
Classification
Art
DLI number
552221
Barcode
4990010032935.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library of India
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XICw7ArKWH0
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