Bundelkhan Uni.Jhansi
Taapsawatshrajam Evam Swapnawaswadtam Natko Ka Tulnatmak
Front matter
BARVONO arwarimarwA 'तापसवत्सराजम् एवं स्वप्नवासवदत्तम् नाटकों का तुलनात्मक नाट्य-शास्त्रीय विवेचन' बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय, झांसी की पी-एच० डी० उपाधि हेतु प्रस्तुत UNIV 1 शोध -- प्रबन्ध CM 135 alihrary 2 NEPALI HANSE ( प्रस्तुतकत्री- कु० पुष्पलता R.7.१ शोधच्छाना; शोध-पर्यवेक्षक- डॉ० रामावतार त्रिपाठी एम०ए०, पी-एच०डी०, व्याकरणाचार्य, संस्कृत-विभागाध्यक्ष, पं0 जवाहरलाल नेहरू महाविद्यालय बाँदा (उ०प्र०) संस्कृत-विभाग, पं0 जवाहरलाल नेहरू महाविद्यालय बांदा (उ०प्र०) संस्कृत - विभाग कला - संकाय बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय, झाँसी (उ0प्र0) दीपावली 1996
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प्रमाणित किया जाता है कि -
यह शोध प्रबन्ध शोध
Tro पुस्पलता का निजी एवं मौलिक
प्रय
इन्होन मेरे निर्देशन विविद्यालय Prरत अवधि तक
काया।
इन्होन विभाग में वाति उपस्थिति भी दी है।
संस्कृत-विभाग
21.12.96
सावतार त्रिपाठी
डॉरामावतार त्रिपाठी,
एम०ए०:पपी-एच0डी0. व्याकरणावार्थ
काव्यतीर्थ
विभागाध्या,
पंजवालाल नेहरू महाविद्यालय,
बौदा 10908
AND
的我,一个学院 r मुख प्रस्तुत शोध-प्रबन्ध के आरम्भ में अपने विनम्र हृदयोबगार व्यक्त करते हुए मुझे अत्यन्त हर्ष का अनुभव हो रहा है । मुझे विध्ययन- काल के प्रारम्भ से ही संस्कृत-भाषा के अध्ययन के प्रति रूचि रही है। प्रत्येक परीक्षा में संस्कृत मेरा एक रूचिपूर्ण विषय रहा है । । अपनी इसी स्वाभाविक रुचि के कारण मैने संस्कृत-विषय लेकर स्नाकोत्तर परीक्षा उत्तीर्ण की थी। संस्कृत-भाषा और साहित्य के निरन्तर अध्ययन त मेरे मन में इस विषय को और आगे पढ़ने की रूचि जागृत हुई। संस्कृत साहित्य की जन्य अनेक विधाओं के होते हुए भी संस्कृत के नाटकों का अध्ययन मुझे बधिक रूचिकर प्रतीत हुआ है । नाटकों के सतत अध्ययन ने मेरे मन में इस विषय में शोध करने की इच्छा का यथासमय उदय हुआ । प्रस्तुत शोध-प्रबन्ध इली लगन का सुपरिणाम है । प्रस्तुत शोध-प्रबन्ध डॉरामावतार त्रिपाठी, संस्कृत विभागा- ध्या, पजवाहरलाल नेहरू महाविद्यालय के विद्वत्तापूर्ण एवं गवेषणात्मक निर्देशन में सम्पन्न हुआ है । वे संस्कृत की प्राज्य-पारचात्य उभयविध शैली के उदय विद्वान है। उनका निर्देशन मेरे लिए गौरव की बात है । उन्होन समय समय पर कृपापूर्वक शोधकार्य सम्बन्धी अपना दिशा-निर्देश देकर मुझे उपकृत बोर बहीत किया है। उनके आविाद से इस शोध-प्रबन्ध को इस में प्रस्तुत करने का अब मो-अवसर इस्तगत हुआ है। प्राचीनकाल से ही विद्रानों ने संस्कृत - नाटकों के अध्ययन के प्रति मचि दिखाई है महात्र प्राध्य-विधा-Pारद डॉ०बी०वीय.
दो प्रो० सिल्वन लेवो, प्रो० वानश्रेडर, पोशल, लूडर्स और कोनो-प्रति पाश्चात्य विद्वानों ने संस्कृत नाटकों का आलोचनात्मक अध्ययन किया है । सौभाग्य से डॉ०बीकीय ने अपना बहुमुल्य ग्रन्थ "संस्कृत-ड्रामा' लिखकर पाश्चात्य विद्वानों के नाटक सम्बन्धी मतमतान्तरों का समाहार प्रस्तुत करते हुए नाटकों के अध्येतागण छात्र-छात्राओं के लिए नवतार ही उद्घाटित कर दिया है। संस्कृत नाटकों के सम्बन्ध में डी०ए०बी०कीय के विचारों का बहुत मूल्य है । संस्कृत नाटकों के अध्यता भारतीय विद्वान् डॉ० भाडारकर. डॉ देवधर, डोoहीरानन्द शास्त्री, डॉ०पी०वी० काणे, डॉoकुन्हन राजा, डॉ००डो पुशाला, आचार्य बल्देव उपाध्याय, डॉ प्रभाकर शास्त्री, प्रो० 40 सरस्वती प्रसाद चतुर्वेदी, और डॉ०कृष्णकान्त त्रिपाठी आदि प्राव्य- विद्या-विशारद है। इन सभी विद्रजजनों ने भिन्न-भिन्न नाटकों की भिन्न-भिन्न समस्याओं और विषयों पर पर्याप्त प्रकाश डाला है । जो सम्प्रति नाटकों के अध्येता और अनुसन्धत्तु छात्र-छात्राओं के लिए कृतवाग- हार' की तरह प्रतीत होते हैं। - प्रस्तुत शोध-प्रबन्ध का शीर्षक ''तापसवत्सराजम' एवं स्वप्नवासवदत्त नाटको का तुलनात्मक नाट्यशास्त्रीय विवचन है । तापसवत्सराजन एक ऐसा नाटक है जो चिरकाल तक दुष्प्राप्य रहा है यद्यपि यह नाटक अपनी नाटकीय और साहित्यिक विशेषताबों के लिए हेमचन्द्र के काव्यानासन' भोजदेव के सरस्वती-ठाभरण' बोरगार-प्रकाश बाचार्य डानन्दवन ध्वन्यालोक', अभिनवगुप्त के ध्वनिलोचन' राजरोखर है तीन की 'काव्यमीमासा' और कुन्तक के 'वक्रोक्तिजीवितम्' जैले मर्धन्य काव्य शास्त्रीय ग्रंथों में उदाहरण के रूप में उद्धरित होता रहा है । poato शताब्दी के प्रथम चरण तक इसकी कोई पाण्डुलिपि प्राप्त नहीं थी । सर्वप्रथम ढाका विक के संस्कृत-विभागाध्यक्षा डॉ० सुशील कुमार डेने कुन्तक के 'वक्रोक्ति जीवित नामक ग्रन्य का सम्पादन कार्य करते समय, इसकी भूमिका में तापसवत्सरा जम् नाटक को मल प्रति के बर्लिन के एक विवविद्यालय में विद्यमान होने की बात का उल्लेख किया था । इस नाटक की पाण्डुलिपि को उपलब्धता का सर्वप्रथम गोरव प्रो हुन्ट्स को है जिसे उन्होन काश्मीर में प्राप्त किया था और बाद में उन्होंने इसे बर्लिन के एक पुस्तकालय में रख दिया था । संस्कृत साहित्य के प्रेमी श्रीयगिरि यतिराज सम्पद कुमार, रामानुजमुनि, मालकोट मैसर ने अपने अधक प्रयत्नी से इसकी एक फोटो वापी प्राप्त करने में सफलता प्राप्त की थी। इस नाटक की यह प्रति शारदा- लिपि में थी। यह अत्याधिक जीर्ण-शीर्ण और उनक स्थलों पर त्रुटिपूर्ण और अस्पष्ट थी किन्तु फिरभी यतिराज सम्पवकुमार जी ने 1929 ई० में इसका मैसर से सम्पादन और प्रकारान किया था किन्तु फिरभी जिस किसी प्रकार प्राणधारण करने वाली यह सुन्दर नाट्यकृति बाधुनिक बालोचकों और इतिहासकारों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित नहीं कर सकी। पंजाब विश्वविद्यालय के प्रवक्ता-अय डॉ०देवीदत्त श और डॉ०इन्द्रदत्त उनियाल, इन दोनों बिधानों ने इस नाटक का सुन्दर सम्पादन करते हुए हिन्दी अनुवाद और बादायक पादटिप्पणियों के साथ साहित्य भाडर मेरठ से 1969 में इसका प्रथम संस्करण प्रकाशित किया था।
चार यही प्रथम संस्करण इस शोध-प्रबन्ध के अध्ययन का विजयीभूत-ग्रन्थ है । इस नाटक को विषयवस्तु अति प्राचीन किन्तु अत्यन्त चर्चित उदयन-वासवदत्ता की प्रणय-क्या है । इसी विषयवस्तु को लेकर इसके बहुत पूर्व कविवर भास ने अपने प्रख्यात नाटक स्वप्नवासवदत्तम का प्रणयन किया था । *स्वप्नवासवदत्तम इस शोध-प्रबन्ध के अध्ययन का दितीय नादयनन्य है। भास के नाटक जिसमें 'स्वप्नवासवदत्त भी सम्मिलित है, शताब्दियों तक अप्राप्य रहे है किन्तु कविकुल-गुरू-कालिदास के गारा मालविकाग्नि-मित्र' नाटक में कविवर भास की प्रशंसा करने और कविवर बाणभट्ट के द्वारा 'हर्ष-चरित' में सूत्रधार से प्रारम्भ होने वाले भाम के नाटकों का यशोगान करने, कशिखर राजशेखर के द्वारा आलोचना की अग्नि में स्वप्नवासवदत्ता के अदम्य होने और प्रसन्नराव' नाटक के प्रणेता कविवर जयदेव के द्वारा भास को कविताकामिनी का हास' बतलाने के भास के नाटकों की खोज का काम बड़ी तीव्रता के सr प्रारंभ हो गया । खोजके परिणामस्वप 1909 में महामहोपाध्याय गणपति । शास्त्री कीकुमारी अन्तरीप लगभग 20मील दूर पदमनाभपुर के समीप भास के नाटक प्राप्त हुए, जिसमें स्वप्नवासवदत्तम् ' नाटक की भी प्राप्ति हुई। डॉगणपति शास्त्री ने बाद में इनका प्रकाशन करवाया और भास के व्यक्तित्व और कृतित्व पर अपने वित्तापूर्ण लेख लि। इधर, नापसवत्सराजध' नाटक का प्रथम संस्करण 1969 में प्रकागित बुबा था। इसलिए बाज भी बिद्धान हल भाटक की गरिमा न पाँच से अभी तक अत्यधिक सुपरिचित नहीं हो पाये थे । 'स्वप्नवासवदत्ताई' और 'तापसवत्सराज' में न केवल कथावस्तु की दृष्टि से प्रत्युत अनेक नाट्य - शास्त्रीय दृष्टियों से साम्य और वषम्य विधमान है ! उन दोनों नाट्य- कृत्तियों का नादयशास्त्रीय और तुलनात्मक विवेचन अद्यावधि नहीं हो सका था, क्योकि तापसवत्सराज बहुत समय से अप्राप्य रहा है । इन दोनों प्रख्यात नाटकों के तुलनात्मक अध्ययन नाट्यशास्त्र को विभिन्न विशेषताओं प्रस्त होने की संभावना है । इसके अतिरिक्त इन दोनों नाटकों की काव्यात्मक और साहित्यक गरिमr भी सराहनीय है । उपर्युक्त नाटक-प्रय के के तुलनात्मक अध्ययन से इस विषय में विस्तृत शोधात्मक सामग्री प्रस्तुत करने का मेरा संकल्प रहा है, जिसर इस प्रकार के अन्य नाट्यग्रन्थों के नव्य अध्ययन का मार्ग प्रशस्त होने की मुझे आशा है, और इसलिए इस पत्र के शोधार्थीगण के लिए इसकी उपादेयता सम्भावित है। यही इस शोध-प्रबन्ध का प्रयोजन -- भी प्रस्तुत शोध-प्रबन्ध नद अध्यायों में विभक्त है । प्रथम अध्याय को विषयवस्तु परिचयात्मक और भूमिकात्मक है, इसके अन्तर्गत वत्सराज उदयन पर rarrरत नाटकों का सामान्य परिचय, उदयन क्या का मूल स्रोत उदयन की लोकप्रियता, मेघदूत में कालिदास दवारा उदयन कथा की प्रसिद्धि का मक्त, शद्रक-प्रणीत 'छकटिय' माटक में उदयन का योगन्धरायण के साथ उस्लम, उदयन बोर वासवदत्ता की प्रणयकथा पर आधारित अनेक नाट्य-ग्रन्ध, उदयन क्या हारा भारतीय रंगमंच को प्राणदान और सर्वोपरि 'स्वप्नवासव दस्ता प्रतिज्ञा-योगन्धराया तथा तापमवत्सराज नाटकों की नाट्य- । ।
छ: शास्त्रीय विशेषताओं पर प्रकाश डालने का प्रयास किया गया है । द्वितीय अध्याय में स्वप्नवासवदत्तम् नाटक के प्रणेता कविवर भास के सम्बन्ध में प्रकाश डालने का प्रयत्न किया गया है। भास के नाटक चक्र में तरह नाटकों का संग्रह है जिसमें दूतवाक्यम, कर्णभारम, इतघटोत्कवा, उस-भगइ, मध्यमव्यायोम, पाचनराम, अभिषक-नाटकम, प्रतिमानाटकम, प्रतिज्ञा योगन्धरायणः, स्वप्नवासवदत्तम, अविमारका और चारुदत्तम् इत्यादि नाटकों को संगृहीत किया गया है । इसी अध्याय में भास का । जीवन, भात की धार्मिक प्रवृत्ति, भास का ज्ञान आदि विषयों पर प्रकाश डालने का प्रयत्न किया गया है । इसके अनन्तर यह बतलाया गया है कि भास का सम्भावित रचनाकाल चतुर्थ या पंचम शताब्दी ई०पूर्ण हो सकता है । इसी के तारतम्य में भास के व्यक्तित्व और कृतित्व भी अनुशीलन परिशीलन क्यr गया है। महान नाटककार भाल की शैली, व्यंजक्ता, नाट्यकोशल और उनको अभिनयता पर यही प्रकाश डाला गया है । । इस अध्याय के दूसरे चरण में तापमवत्सराज नाटक के प्रणेता अनंग हर्ष मातराज के परिचय और उनके वपुष्य पर प्रकाश डालने का प्रयत्न किया गया है। । इस कवि के कवित्व के परिचय के सम्बन्ध में परवर्ती, काव्यशास्त्रियों दवारा उनके नाटक के पी के अपने-अपने अन्धों में उढरण की चर्चा की गई है। इस कवि के रचनाकाल के सम्बन्ध में यही यह बतलाया गया है कि यह नाटककार अष्टम सताब्दी ई० सम्भवल: इस नाटक की खोज की क्या को भी इसी अध्याय में बतलाने का प्रयत्न किया गया।
हुपात
तृतीय अध्याय में दोनों हो नाटकों की विषय-वस्तु का
नाट्यशास्त्रीय विवचन प्रस्तुत किया गया है ।
इसकी आदिकालिक कथावस्तु
वासवदत्ता उदयप्रणय-कथा है ।
इसो अध्याय में दोनों ही नाटकों में महा-
मन्त्री पौगन्धरायण को भिन्न-भिन्न योजनाओं के अनुसार क्या वस्तु का
पल्लवन कियागया है और कथावस्तु की दृष्टि से दोनों नाटकों को समीक्षा
प्रस्तुत की गई है।
शोध-प्रबन्ध के चतुर्थ अध्याय में दोनों ही नाटकों के पात्रों
का तुलनात्मक चरित्र-चित्रण किया गया है ।
नायक के भद, नायक की
प्रकृति, नायक के सहायक, नायिका के भेद और प्रकृति आदि का तुलनात्मक
विरलका भी वियागया है । इसमें उदयन, योगन्धरायण और विदुषक,
वासवदत्ता और पद्मावती के तुलनात्मक चरित्र-चित्रण की एक संक्षिप्त
साकी यहाँ प्रस्तुत की गई है ।
पंचम अध्याय में दोनों ही नाटकों में संवाद योजना.
संवादों की भाषा, पात्रों का उच्चारण, संस्कृत और प्राकृत पाठ्य, संवादों
में औचित्य आदि का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत क्यिा गया है ।
पठ अध्याय में दोनों ही नाटकों में रस-निष्पत्त पर
प्रकाश डाला गया है। तदनुसार विभाव, अनुभाव और व्यभिचारि भाव
की चर्चा की गई है। स्वप्नवासवदत्ता में कविवर भास ने विप्रलम्भ गार
का चित्रक्यिा है तो तापसवलराजविवर अनंग हर्ष ने कान रस का
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वर्णन क्या है।
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आठ सप्तम अध्याय में दोनों ही नाटकों की भाषा है । और कला या के सम्बन्ध में आलोचनात्मक विचार प्रस्तुत किए गए की शैली जहाँ प्रसाद और मासे म उत है, वहीं उनके नाटक में अलंकारों का भी स्वाभाविक प्रयोग हुबा दूसरी और तापसवत्सराजय के कवि के कवित्व और वेदुष्य का परिचय दिया गया है। उनके नाटक में अलकारों के बलात प्रयोग और लम्बे-लम्ब समास वा वाक्यों के प्रयोग से अभिनयता की न्यूनता पर भी प्रकाश डाला गया है । अन्दम अध्याय में मागृह और रंगच सम्बन्धी विधार नाट्यशास्त्र के अनुसार प्रस्तुत किए गए हैं और प्रेक्षागृह के नाट्यशास्त्रानुसार मदों पर भी प्रकाश डाला गया है। भरतमुनि के नाट्यशास्त्र के नियमानुसार रंगमंच पर ब्रियमा मतव्य की चर्चा की गई है । यहा स्वप्नवासवदत्तम और तापलवत्सराज के अध्ययन । तत्कालीन प्रेक्षागृह का अनुमान लगाने का प्रयत्न किया गया है और अभिनय के प्रकारों की दृष्टि से परस्पर तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया गया है । नवा अध्याय में प्रस्तुत शोध प्रबन्ध डा उपसंहार प्रस्तुत किया गया है । इसमें यह बतलाया गया है कि अभिनय की दृष्टि से स्वप्नवासवदत्ता नाटक तापसवत्सराज नाटक की अपेक्षा श्रेष्ठतर है किन्तु काव्यात्मकता की दृष्टि से तापसवत्सराज भी कुछ कम महत्व का नहीं है। अन्त में यह भी बतलाया गया है कि वस्तुत: दोनों ही नाटक चतुर्वर्ग-पान- प्राप्ति के हेतु होने के साथ-सा आनन्द निष्यन्दी है। सोभाय - कर्मियों और कलाकारों की ये दोनों प्राचीन नाकृतिक बोर साहित्यक इनोह धरोहरे काल के गर्भ में क्लुिप्त होने से आज भी हमें सुरक्षित रूप में उपलब्ध हो गई हैं। इन दोनों नाट्यकृतियों का तुलनात्मक अनुशीलन सचमुच सध: परमानन्द की प्राप्ति कराने वाला है । पंजवाहरलाल नेहरू महाविद्यालय के प्राचार्य डॉoहारशंकर शुक्लका मै हृदय ने आभार स्वीकार करती हूँ.जिन्होन मुझे इस कार्य के लिए महाविद्यालय के पुस्तकालय में प्राप्त दुर्लभ ग्रन्थों, शोध-पत्र-पत्रिकाओं को पढ़ने का शुभ अवसर प्रदान किया है । में अपने आदरणीय पिताश्री डॉगिरजाशंकर शर्मा एवं अपने स्नेहीबन्धुओं, अपनी माताश्री श्रीमती देवली देवी तथा डॉoसन्तोष कुमार शर्मा, श्री दिनेश कुमार शर्मा, शैलन्द्र कुमार शर्मा एवं शेखर शर्मा आदि सभी के प्रति मै अपनी विनम्रता एवं स्नह ज्ञापित करती हूँ. जिन्होंने मुझे इस शोध प्रबन्ध को पूरा करने के लिए अपनी प्रेरणा प्रदान कर शुभाशीवाद और शुभकामनाएँ दो है। में अपने आदरणीय जीजाजी श्री लक्ष्मीनारायण जी आयकर निरीक्षक एवं आदरणीया दीदी जी श्रीमती राधा देवी के प्रति भी बना आभार ज्ञापित करती है, जिन्होंन भी मुझे शोध के लिए अपनी प्रेरणा एवं आशीवाद दिया है । सचमुच, प्रस्तुत शोध-प्रबन्ध को पूर्ण करने में मुझे उनक बाधाओं का सामना करना पड़ा है और उनसे जो मे पार लग सकी हुँ, इसे में अपने स्वजनों, मजनों, शुभचिन्तकों और विज्जनो के बाशीर्वाद जोर शुभकामना का ही परिणाम समझती हूँ।
ए दस
इस प्रबन्ध को पूर्ण करने में पूर्व के अनेक विद्वानों के ग्रन्थों,
लेखों, विन्तनों और शोध-पत्र-पत्रिकाओं में सहायता ली गई है। उन सभी
विद्वानों के प्रति मै अपनी कृतज्ञता ज्ञापित करती है।
प्रस्तुत शोध प्रबन्ध के टक्क श्री राकेश कुमार अग्रवाल भी
धन्यवाद के पात्र हैं जो संस्कृत भाषा के ज्ञाता होते हुए भी संस्कृत श्लोकों
के उद्धरणों का टवण यथा-विधि शुद्धता और द्रुततर-गति से पूरा किया है ।
फिरभी वर्ग के पंचम आरों और संयुक्ताक्षरों के टक्ण यन्त्र में न होने के कारण
पर सर्ग-सन्धि, संयुक्ताक्षर और अन्य त्रुटियों के लिए क्षमा प्रार्थिनी है ।
अन्त में, विधr की परमदेवतr सरस्वती जो का स्मरण कर
में आत्मिक सुख का अनुभव कर रही हूँ
"कस्यचिदेव कदाचिददयया विषय सरस्वती विदुषः ।
घयति कपि तमन्यो व्रजति जनो येन वेदग्धीस ॥
संस्कृत-विभाग,
पंजवाहरलाल नेहरू महाविद्यालय
विदुषी विदा
क पुटपाका
कु० पुष्पलता
दवारा-डॉगिरिजाशंकर शर्मा
शास्त्रीनगर, बोंदा उ0प्र08
बौदा,उ0प्र0
2 . 12
-1996
14
SA
या नुक्रम विजया नुक्रम - - - - - - . - vie विषय पृष्ठ संख्या 1 प्रथम अध्याय विषय-प्रवेश : भूमिका - 36 ॥ 02 काव्य भदों में नाटक नाटक, कवित्व की चरमसीमr रूपकों का विभाजन 03-07 वस्तु, नेता और रस के भेद से रूपक के दस प्रकार, नाट्यसाध्या भारतीय उदयन कथा एवं अवस्थाये उदयन कथा का विस्तार मूलस्रोत उदयन कथा का विस्तार, 09-12 नाट्यसाहित्य के विविध क्यास्रोत 13 उदयन की ऐतिहासिकता कौशाम्बी नरेश वत्सराज उदयन।5 उदयन का कला-प्रेम, प्रतिज्ञा-यौगन्धरायण । उदयनवृत्तान्त।7 उदयन रा प्रद्योत-दुहिता वासवदत्ता का अपहरण 19 प्रतिज्ञा-यौगन्धरायणम, स्वप्नवासवदत्तय नाटक की पूर्वपीठिका 20 स्वप्नवासवदत्ता में महामन्त्री योगन्धरायण की योजनr 21-23 तापसवत्सराज में उपलब्ध उदयन कथा एवं महामन्त्री योगन्धरायण की योजना 23-32 उदयन-कथा से सम्बद्ध अन्य बलिया 33-35 न्तिीय अध्याय : आनन्ददायिनी 36-77 36बी स्वप्नवासवदत्तम् के प्रणेतr कविवर-भास भास के नाटक 37-38 - | अध्याय । विष्य | पृष्ठसंख्या ease महामहोपाध्याय गणपति शrस्त्रीभारा भास नाटक-चक्र की खोज 38 भास के तरह नाटक 39-42 दतवाक्यम वर्णभार दृतघटोत्कच उरुभगम मध्यम व्यायोग पाचरात्र बालचरितम् अभिषेकनादमम् प्रतिमानाटकम प्रतिज्ञा-यौगन्धरायण स्वप्नवासवदत्तम अविमारकम चारूदत्तम भास का कृतित्व 42 कालिदास,बाणभट्ट,जयदेव, दण्डी,वामन, अभिनवगुप्त और राजशेखर आदि के द्वारा भास के कृतित्व की प्रशंसा विद्यानों के अनुसार उक्त तेरह नाटकों के प्रणेता नाटककार भास कविवर भात का जीवन 47-48 भास का रचनाकाल 49 भास के रचनाकाल पर डॉ०ए०डी०पुसालकर के विचार 49-52 भास का व्यक्तित्व एवं कृतित्व 53 भास की शैली के विशिष्ट गुण प्रथम एकीकी कारभास 54-55 भास की नाट्यकला 54-55 महानाटककार 57 नाटकों की अभिनयता भासका नीतिविषयकान भास का वैश्य तापसवत्सराजा नाटक के प्रणेता,कविवर बनंगहई मादराब का परिचय .
। - are - - अध्याय पृष्ठ सल्या! muta - I विश्य कवि का वैश्य और कवित्व 63-66 अनंगहर्ष का रचनाकाल 66 रचनाकाल के सम्बंध में विदानों के 67-68 71-76 तापमवत्पराज की खोज 69-70 अनंगहर्ष का नाट्यकोशल 'तापसवत्सराज' एक कालजयीनादयकृति77 विषयवस्तु का नाट्य-शास्त्रीय विवेचन तृतीय अध्याय : 78 - वस्तु भेद 78 आधिकारिक कथावस्तु 79 प्रायगिक क्यावस्तु 80 क्यावस्तु की दृष्टि से साम्य और वैषम्य 81-94 स्वप्नवासवदत्तम् एवं तापसवत्सराज की कथावस्तु की तुलनात्मक समीक्षा 82-93 अनंगहर्ष हारा मुलवधानक की नूतन परिकल्पना 92-94 तापसवत्सराज की समीक्षा 95-101 स्वप्नवासवदत्त की समीक्षा 101-106 पंच-अर्थप्रकृत्तिया, पंच अवस्थाएँ और पच नाट्य-सधिया एवं नाटकीय तत्त्व 107-110 स्वप्नवासवदत्त एवं तापसवत्सराजम संस्कृत के श्रेष्ठ नाटक चतुर्थ अध्याय : पात्रों का तुलनात्मक चरित्र-चित्रण 112 - 158 'HA नायक 112 मायक के भेद धीरललित नायक उदयन नायक के आठ गुण 115 उदयन 116-1298 उदयन का संगीत और सौन्दर्य प्रेम 16-117 वासवदत्ता के दाह के समाचार से उदयन की विड्वलता 120 वासवदत्ता के प्रति उदयन का प्रगाढ़ प्रेम 121 4 - - 20 अध्याय विजय - - - पृष्ठ संख्या नाटकों के अनुसार उदयन का तुलनात्मक चरित्रावन 129 नायिका 129 नायिका के भेद 129 दोनो' नाटकों के अनुसार नायिका का चरित्र-चित्रण 130-141 पदमावती स्वकीया कनिष्ठा नायिका पद्मावती का उदयन के प्रति अपार स्नेह 142 पद्मावती की सहिष्णुता दोनों नाटकों के अनुसार पद्मावती का तुलनात्मक चरित्राकन 147- यौगन्धरायण वत्सराज का महामन्त्री दोनों नाटकों के अनुसार योगन्धरायण का तुलनात्मक चरि-चित्रण 150-154 योगन्धरायण का बुद्धि-कौशल और 153 विदृषक 8154-1578 विभक राजा के मित्र के रूप में 155 दोनों नाटकों के अनुसार विदृश्क का तुलनात्मक चरित्र-चित्रण 155-157 नाटकों के अन्य पात्र 158 नोति नपुण्य पंचम अध्याय : संवाद-योजना 15त्र 180 संवाद-योजना के संदर्भ में भरतमुनि के विचार 159-160 संवाद योजना के लिएभrar-बान 160 उच्चारण के गुण उच्चारण के दोष 152 संवादों की भाषा 163-167 - - - k - N- अध्याय विषय पृष्ठ संख्यr - m मा 168 संवाद के पाय 168 संस्कृत तथा प्राकृत कविवर भास को संवादयोजना।69-178 संवाद-योजना में भास की दक्षता 170-188 तापसवत्सराज संवाद 178 संवादों की क्लिष्टता और बहुविस्तार178-179 संवादों में अभिनय कीन्यूनता 180 सलादों को काव्यात्मकता और रमात्मकता आदि 180 नाटको रस-निष्पत्ति 181-203 विभावादि सामग्रो 182 अनुभाव 182-184 व्यभिचाािभाव 184 स्थायोभाव 185 स्वप्नवा पवदत्ता में रसानपत्ति 186-192 भाrस एक रसासद नाटकार 192 तापसवत्सराजम् रस-निपत्ति 192-203 करुण रस को प्रधानता 193-194 नायक का आयोपान्त रूदन 194-200 विभिन्न उदाहरण आदि 202-205 सप्तम् अध्याय *. नाटकों में कला-पक्षा एवं भाव- 204-222 नाटकों में कला..पत एवं भावपक्ष 002-20% भास की सरल शैली 204 भास की शैली के प्रमुखण 205-207 अलंकार-योजना 208-212 भाप के नाटक में जलात अलंकारों के प्रयोग का अभाव 212 विभिन्न उदाहरण 208-212 तापसवत्सराज में कला-पक्ष एवं भावपक्ष 212-222 काव्यशास्त्रियों ारा उनके भाटको से अनेक पद्यों का उद्धरण 213 - - - - अध्याय विषय | पृष्ठसंख्या तापसवत्सराजम में कवित्व का चमत्कार 1220-2218 तापसवत्सराजम में अलंकार-सौष्ठव 214-221 तपसवत्सराजस की भाषr 221 तापसवत्सराज में भावपक्ष का गाम्भीर्य 222 अष्टम अध्याय प्रेक्षागृह एवं रंगमंच 223-253 ne परिचय प्रेक्षागृह के प्रकार 223 रंगमंच 223-227 पूर्वरंग 227 भरतमुनि के विचार 228 स्वप्नवासवदत्ता के सूत्रधार का सीधे नाट्याला प्रवेश 228 मुद्रालकार द्वारा प्रमुख पात्रों का 229-230 स्वप्नवासवदत्ता की प्रस्तावना ली सुन्दरत 230-231 प्रस्तावना में कविवर भrस नाम के उल्लस का अभाव 231 तापसवत्सराज की प्रस्तावना 231 प्रस्तावना में कवि का परिचय 232-233 अभिनय 233 नृत्य एवं भृन्त 235 नाट्य एवं नृत्य भरतमुनि की अभिनय कला पर विचार 234 अभिनय की परिभाषr 2345235 अभिनय के प्रकार 236 आंगिक अभिनय 236-237 वाचिक अभिनय 237
R
a
-
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-
अध्याय
विषय
पृष्ठ सय
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वाचिक अभिनय के भेद
238
वाचक अभिनय में भाषा का स्वरूप
239-242
आहार्य अभिनय
242
सात्विक अभिनय
243-246,247
अभिग्य की दृष्टि में तापसवत्सराजम
एवं स्वप्नवासवदत्त 248-253
नवम अध्याय :
उपसंहार
254-267
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सहायक ग्रन्थ सची
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प्र ५ म - अध्या य भूमि का काव्य भेदों में नाटक : भmedies काव्य की अनेक विधाओं में नाटकों का महत्व सर्वोपरिख है। सुधी समीक्षकों का कथन है कि काव्य के अन्य भेदों में नाटक अत्यन्त रमणीय होता है । वैसे यह निर्विवाद है कि काव्य क्षितिज में नाटक संदेव प्रतिष्ठित रहे है । इसका सीधा और साधारण कारण यही प्रतीत होता है कि काव्यानन्द से वंचित रहने वाले कोमल बुद्धि वाले साधारण जन भी नाटक का मनोहर अभिनय देखकर असीम और अलोकिक आनन्द की अनुभूति कर लेते हैं । जो एक और काव्य के अन्य भेद श्रवण मार्ग से सहृदयों के हृदयों को आकर्षित करते हैं और प्रभावित करते हैं तो वहीं दूसरी ओर दृश्य काव्य अथवा नाटक नेत्रमार्ग से आशुतर गति से हृदयदेश को चमत्कृत कर आनन्दरस की सृष्टि करता है । यह सर्वमान्य सत्य है कि किसी वस्तु को देखने का आनन्द उसके सुनने की अपेक्षा कहीं अधिक तीव्रतर होता है और दूसरी बात यह भी है कि काव्ध का रसास्वादन सहृदय ही कर सकते है, किन्तु नाटकों में प्रस्तयमान अभिनयादि में रसोपभोग को सम्पूर्ण सामग्री * पथ्य विन्यास, वारचना औरनाना प्रकार के संविधानकों के द्वारा मंच पर ही उपस्थित कर दी जाती है। इस प्रकार नाटकों में रसाभूति के लिए वातावरण स्वयं उपस्थित हो जाता है। यही कारण है कि साधारण -- 1. काव्येषु नाटक रम्य । दशरूपक - भूमिका.प० 21 डॉoभोलारीकर व्यास. चोखम्बा संस्करण 1967.
2 व्यक्तियों के लिए भी काव्य की अपेक्षा नाटक का आकर्षण विशेष प्रभावशाली होता है । इसलिए नाटक को कवित्व को चरमसीम माना जाता है ।। नाटक एक और सार्वजनिक मनोरंजन का हेतु है तो दूसरी और इसकी विषय-वस्तु तीनों लोकों के भावों का तांगोपांग निपण करने वाली है । काव्य की अन्य विधाओं की भाँति नाटकों का प्रयोजन न केवल चतुर्वर्ग फलप्राप्ति है प्रत्युत बहुआयामी है । यह शक्तिहीनों के हृदय में शक्ति का संचार करता है. शरवोरों के हृदय में उत्साह की वृद्धि करता है, अज्ञानियों को ज्ञानी बनाता है और सकल जन मनोरंजन करने के साथ-साथ बुधविश्राम का विधाता । सर्वोपरि रूपक आनन्द की वर्षा करने वाले है, केवल व्युत्पत्ति मात्र ही इसका प्रयोजन नहीं है । 3 नाटक एक प्रकार से लोक्वृत्त का अथवा उसकी भिन्न-भिन्न अवस्थाओं का अनुकरण ही है । दृश्य होने के कारण इस 'रूप' कहा जाता है और नट आदि में रामादि अवस्था का आरोप होने के कारण "रूपक' आदि अभिधानों ने भी यह विवविधुत है । इस विशाल विवपटल में सुख दुःख की जो प्रवृत्तियों अपना न दिखाया करती है और मानव जीवन को सुखमय अथवा दुखमय बनाया करती है.उन सबका चित्रण नाटक में क्या जाता है । इसीलिए नाट्यशास्त्र के प्रणेता मुनिवर भरत का कथन है कि Ww- MAN 1. नाटकान्तम् कवित्वा, संस्कृत साहित्य का इतिहास : उपाध्याय, पृ० 478. 2. चतुर्वर्ग-पाल-प्राप्तिः सुखावल्पधियामपि काव्यादेव यतस्तन तत्स्वाप साउदी नियत ।। मोतीलाल बनारसीदास -1961.पृ० । 2.पृष्ठ-7 3. आनन्द नियन्दिषु रूपए । व्युत्पत्तिमा पालमपतिः । झापा । चोखम्बा 1961.०३ अवस्थातिनाट्यम । दशप 1.7 Yo .
3 कोई भी ज्ञान,शिल्प, विद्या, योग अथवा कर्म ऐसा नहीं है जो नाटकों में दिखाई न देता हो ।। फलतः कविवर कालिदास का यह कथन इस सन्दर्भ में नितान्त सत्य और प्रासंगिक है कि भन्न-भिन्न रूचि वाले लोगों के लिए नाटक सर्वसाधारण और सर्वसामान्य मनोरंजन का साधन है 12 इसके अतिरिक्त आनन्द के साथ चरित्र को उदार बनाना, जीवन स्तर का उदात्तीकरण और आदर्श विधान नाटक के कतिपय अन्य महत्वपूर्ण प्रयोजन है । नादय शास्त्रियों ने रसों पर आश्रित रूपकों का विभाजन दश प्रकार से क्यिा है, तदानुसार रूपक दश प्रकार के है है। नाटक, 2 प्रकरण, 3 भाण, 84 प्रहसन, 5 डिम, 65 व्यायोग, 17 समवकार, 8 वोथि, 98 अंक, 810ईहामृग ।' यद्यपि इन सभी रूपों में अनुकरण को प्रधानता है किन्तु कथावस्तु, रस और नायक के भेद से इनके दश भेद नाट्य-शास्त्रियों ने स्वीकार किए है। कथावस्तु मुख्य रूप से दो प्रकार की होती है,प्रथम आधिकारिक क्यावस्तु अथवा मुख्य कथावस्तु न्तिीय प्रासंगिक कथावस्तु । नाट्यशास्त्रियों ने रूपक के इतिवृत्तको पाँच अर्थ-प्रकृतियों पाँच अवस्थाओं और पाँच संधियों में विभाजित किया है । नाटक की पाँच अर्थ प्रकृतियाँ निम्नवत है । बीज, 23 बिन्दु. ३१ पताका, 14 प्रकरी,858 कार्य । इसी प्रकार . 2. न तज्ज्ञान न तन्छिन्य, साविद्या न सा कला, नस योगो न तटवर्म, नाट्य स्मनयन दृश्यते ।। नाट्यशास्त्र || नाट्य भिन्नार्जनस्य, बहुधाप्ये समाराधन मालविकाग्निमित्रय •,चौखम्बा संस्कृत सीरीज, वाराणसी,1965 14 दशव रसाश्यपदशरूपका 1.7,पृ० 04. दशपद ।.18, चौखम्बा प्रकाशन 1967 संस्करण पृ० । 3.
4
नाटक की पाँच अवस्थाएं भी होती है जो उमा: निम्न प्रकार से है
है। आरम्भ, 2 ४ यत्न, 3 प्राप्त्याशा. 4 नियताति, 5 फलागम।'
पोच अर्थप्रकृतिथों और पाँच अवस्थाओं को मिलाकर नाटक की पाँच
सन्ध्यिा होती है जो क्रममा निम्नवत् हैं -
४ मुख, 20 प्रतिमुस १३, गर्भ, 4 विर्मा, 15 उपसंहति ।
नाटक की उक्त पाँच संधियों का विभाजन 6 सन्ध्यागों
में किया गया है । सन्ध्याकों के इस शिाल विभाग को कुछ विद्वान् जटिल
और अनावश्यक मानत डॉ०ए०बी०वीन अनुसार नाटकीय इतिवृत्त
का यह विभाजन कोई वास्तविक मुख्य नहीं रगता है । इसी प्रकार
नाटकों में कुछ क्यास्त्र होते है जिन्हें अयोrप क्षेपक कहा जाता है । ये पाँच
प्रकार केवोते हैं। विभक, 28 प्रवाक, 3 चूलिका, 48 अंकास्य,
158 अंकाक्तार। इसी प्रकार भावी वस्तु या घटना की सूचना देने के
लिए नाटककार *पताका-स्थान' का भी प्रयोग करता है ।
2
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दो प्रकार का होता है
इ। अन्योक्तिप, 2 समासोक्ति-रूप । किन्तु
सभी नाटकों में यह आवश्यक नहीं है ।
म्पकों का दसरा मेदक तत्व नेता अर्थात नायक होता है।
नायक के साथ नायक का सम्पूर्ण परिवार आ जाता है । नायिका,
के साथी, नायिका की सखियों प्रतिनायक और उसके साथी सभी नेता के
. दशकपक 1.19.वोखम्बा प्रकाशन 1967 संस्करण,प० 13.
2. डॉ०भोलारकर व्यास दपक भूमिका, पुष्क-41,चोलसंस्करण 1967
3. ए०बी०कीय : संस्कृत ड्रामा. o 21.
।
5 अंग माने जाते है । नाटक की कथावस्तु का नायक वही बन सकता है, जिसमें विनीतत्वादि अनेक गुण विद्यमान होते है। नायक विनम्र, मधुर, त्यागी, दक्ष प्रियंवद, लोकप्रिय, शुचि, वाग्मीकुलीन, स्थर और युवा- वस्थावाला होता है, प्रज्ञा, कला तथा मान से युक्त होता है । वह शर, दृव, तेजस्वी, शास्त्रज्ञाता तथा धार्मिक होता है । संस्कृत नाटको नायक चार प्रकार के प्राप्त होते है - है। धीर-ललित, 2 धोरशान्त 36 धीरोदात्त, 48 धीरोद्धत । धीरललित नायक सर्वथा निश्चिन्त रहता है, वह कोमल स्वभाव का सुखी तथा ललितकलाओं से प्रेम करने वाला होता है 12 धीरोदात्त नायक महा- सत्व,अत्यन्त गंभीर, क्षमाशील, अविकत्थन, स्थिर, निगढ़ अहंकारवाल और दृढवतो होता है। धीरोदत नायक दर्ष मात्सर्य से युक्त कपटी बोर मायावी, अभिमानी, दाल, लोधी और आत्मालाधी होता है ।* दुसरी डोर धीर, प्रशान्त नायक सामान्य गुणों से युक्त होता है । विदृषका दि नायक के सहायक होते है। संस्कृत नाटकों में नायिका भी नायक के समान गुणों से युक्त होती है । यह तीन प्रकार की होती है - स्वकीया, 2 परतीया, तथा 338 साधारण स्त्री । नापिकी की परिचारिकाय और सखियों भी -- - -- 2. 3. नेता विनीतो मधुरत्यागी दक्षः प्रियंवदः । रक्तलोकः शुचिर्वामी दो स्थिरोयुवा ॥ बुट्युत्साल स्मृतिप्रसाकलामानसमन्वितः गरी दृढाचतवस्वी शास्त्र-मच धर्मिक: रूपक 2.1.0 TS निश्चिन्ती धीरललित: बनासक्तः सुखीमृदुः । वही,2.3.0 79 महासत्वीडति गंभीरः मावानविकत्यन:स्थ निगृहाकारी धीरोदात्तो ढब्रतः । दाम्पक 2.4.3 स्वान्या साधारणस्वीति तहणा नायिका बिधा ।
6 । होती है जो नायिका की महायिकायें होती है । इस नाटक का तीसरा और महत्वपूर्ण भेदक तत्व होता है। रस नव माने जाते है किन्तु संस्कृत नाटकों में अंगार रस अथवा वीररस में से कोई एक रसही प्रधान होता अन्य रस गोण होते हैं। किन्तु भवभूति काव्य शास्त्र की इस अवधारणा की बालोचना करते हुए कण रस की स्थापना करते है 12 कुछ भी हो नादयशास्त्र के प्रणेता आचार्य भरत मुनि के अनुसार दृश्य-अन्य रूप नाटक को मलकान्त-पदावली वाला, गढ़ शब्दार्थ से राहत, सर्वजन सुखबोध्य, युक्तियुक्त, नृत्यादि ललित कलाओं से युक्त, बकुतर रस मार्ग वाला, नाट्य-सन्धियों के सन्धान से संवलित और प्रेक्षकों के लिए शुभकाब्ध होता है। यही नाटक का आदर्श स्वरूप है । मुनिवर भरतके अनुसार नाटक अधर्म में प्रवृत्त लोगों के लिए धर्म का उपदेश देता है, कामो- पजीवी लोगों के लिए काम का. दुर्विनीतो के लिए विनय का, लिए धृष्टता का, शूर और मानियों के लिए उत्साह का, मुखों को ज्ञान का, विद्वानों को वैदुज्य का उपदेश देता है । वही नाटक दुखी, थके-हारे, शोकाकुल और तपस्वियों के लिए यथासमय विश्राम को देने वाला होता है। 3 इसके अतिरिक्त नाट्य सार्ववर्णिक वद है,जही एक और अन्य वेद केवल जि मात्र के लिए उपयोगी तथा उपादेय होते है,वहीं नादय वेद का उपयोग सभी वर्गों के लिए है । प्रत्येक व्यक्ति इस आनन्द --- ...M एक एव भवेदंगी अंगारो वीर एवं वा । अंगमन्ये रसा: सर्वे ।। दशरूपक 3:33.पृ० 86 एको रस: वरुण एव । उत्तररामचरितम 3.47 दुःवाताना माना गोकाना तपस्विनाम् । विधान्ति बननं काले नाट्यमतद भविष्यति ॥ नाट्यशास्त्र 110 वेदोपवदात्मा सार्ववर्णिक: पंचमी मादय वैदः सध्यमीमामा, चौखम्बा प्रकाशन 1934.पुo 15. - का अधिकारी और पात्र है। कविल-गुरू-कालिदास का क्यन है कि यन मुग्लिोग देवताओं के लिए इसे शान्त चाक्षुष मानते है । शिवजी ने उमा के द्वारा संयुक्त अपने अंग में इसे दो प्रकार से विभक्त किया था जिसके अनुबार इसमें इनके द्वारा ताण्डव और लास्य का प्रयोग किया गया है । इस प्रकार नाटक में तीनों गुणों से उसका नाना रसात्मक लोकवारत का दर्शन होता है, जगत् के प्राणो भिन्न चि वाले अवश्य होते है, परन्तु नाट्य उनका नाना प्रकार से एक अतिीय आर्जन का प्रकार है | किंव, नाटक की विषयवस्तु असीमित है, इसमें तीनों लोकों के भावों का अनुकीर्तन होता है । फलत: नाटक लोक्वृत्त का अनुकरण है । संस्कृत के दो प्रसिद्ध नाटकों स्वप्नवासवदत्त एवं तापस- वत्सराज के तुलनात्मक अध्ययन में उपर्युक्त नाट्य सामग्री के परिप्रेक्ष्य में सोधात्मक परिशोलन प्रस्तुत करना ही इस अध्ययन का प्रयोजन है । भारतीय भारतीय साहित्य में उदयन-कथा : Hotels.atm Ranaawimalakite भारतीय साहित्य सर्वाधिक प्रभावित करने वाले तीन अमर ग्रन्थ रत्न माने जाते हैं - रामायण, महाभारत और वृहत्कथा । यह कहना संशय से परे है कि उक्त तीनो ग्रन्थों में सहस्रो वर्षों से देश के साहित्यकारों, कलाकारों और बुद्धिजीवियों को निरन्तर प्रेरणा प्रदान की है। इसीलिए ये तीनों ग्रन्थ भारतीय साहित्य के लिए उपजीन्य ग्रन्थ के रूप में महिमामण्डित है। ।. देवानाम् इदमामनन्ति मुनयः शान्तन्तु चापय स्रोगद मुमाक्तव्यत्तिको म्यागेविक्त दिया । योभव भत्र लोकांचरित नानारस दृश्यत, नाट्य भिन्न कर्जनस्य बहुधा प्य समाराधन मालविकाग्निमिवय,चोखम्भा प्रकारान 1965. पु० ॥ 2. नाट्यशास्त्र -104 एवं 1-109 उद्यनकथा का मृत्लस्रोत : Narden-do- उदयन क्या का मूल स्रोत गुणादयकृत वृहत् क्या प्रतीत होती है । यह दुर्भाग्य की बात है कि वहरक्या आज उपलब्ध नहीं है । वह काल- कवलित हो गई है । आज वह देश और विदेश के किसी पुस्तकालय में उपलब्ध नहीं है, फिरभी कालकवलित होने के पूर्व ही इस देश के साहित्य को उसने इतना कुछ दे दिया है और प्रभावित कर दिया है कि इसका मल क्लेवर काल के गाल में समा जाने पर भी उसकी आत्मा और उसकी प्रेरणा आज भो सर्वथा अवगण बनी हुई है । सम्प्रति उदयन का आख्यान क्यासरित्सागर और वृहत्कथा मंजरी दोनों में समान रूप से पाया जाता है । जिनसे विलुप्त वृहत्वया में वर्णित उदयनवस्था के स्थूल रूप का आभास प्रतीयमान है। गुणदयकृत वृहत्कथा के अन्य अनेक अमूल्य योगदानों में से अन्यतम और विशिष्टतम योगदान है भारतीय साहित्य के लिए उदयन- कथावस्तु की अमर देन । वृहत्कथा यद्यपि अनेक मधुर और अमर क्याओं का अक्षय निधि है किन्तु उनमें वर्णित उदयन कथा की मधुरता और लालित्य अनिर्वचनीय रही है। रामकथा और कृष्णकथा के पश्चात् यदि किसी अन्य कथा ने भारतीय को क्यो', रसिकों, सहदयों और साधारण जनमन को उदलित किया है, सरस और धन्य बनाया है, हृदयतन्त्री के तारों को अंकृत क्यिा है तो वह बत्वराज उदयन की ललितक्या ही है। यह कहना अतिशयोक नहीं है कि सम्पूर्ण भारतीय साहित्य में उदयन क्था की मधुरता के गीतों की मंजुमनोहर ध्वनि का मुंजन अवामोधर हो रहा है । .. क्या मारत सागर तरंग,.16बहत्यामंजरी लम्बक 2.3 उदयन-कथा का विस्तार : Mara-uae-on- पाली,प्राकृत, अपना तक के साहित्य में उदयन-कथा-वस्तु का उल्लव निरवछिन्न रूप से अधिगत होता है । कहना न होगा कि काव्य नाटक-नाटिका, आख्यान-आख्यायिका पुराण धर्मग्रंन्ध आदि काव्य की कोई ऐसी विधा दृष्टिगोचर नहीं होती जिसमें उदयन क्था को स्थान न मिला हो । उपलब्ध प्रमाण के आधार पर यह प्रतीत होता है कि कविवर भास ने सर्वप्रथम उदयन कथा वस्तु को अपने दो प्रसिद्ध नाटकों का आधार बनाया है, इन दोनों नाटकों के नाम है । है। स्वप्नवालदत्तम् और 12, प्रतिज्ञायौगन्धरामा । ऐसा प्रतीत होता है कि एक ललित नाट्य रचना के लिए वे सभी तत्व और गुण उद्यन क्या विद्यमान है जो गुण एक सफल नाटक के लिए अपेक्षित होते है । लालित्य और अभिनेयता, ला संचार और सहृदयग्रा इयता इसमें रामथा तथा कृष्ण-कथा से किचित् भी न्यून नहीं है । तभी तो "उदयन-कथा" को लोकप्रियता से प्रभावित होकर कविल-गुरू कालिदास ने अपनी विवविश्रुत-अव्यकृति मेघदत में अवन्ती नगरी में उदयन-कथा के मधुर रस में डूबते उतराले ग्राम वृद्धों का उल्लेख करना नहीं भूलते । कवि कुल गुरू के इस उल्लेख से यह ध्वनित होता है कि उस समय 1. स्वप्नवासवदत्तम प्रकाशक-रामनारायणलाल नी माधव, इलाहाबाद- 2. प्रतिज्ञायौं गन्धरायणप. इण्डिया बुक हाउस,जयपुर-1981 1. प्राण्यावन्तीनुदयन-क्या-कोविदग्राम-वहार । मेघदलय. पूर्वमय श्लोक संख्या 1-30.
यह कथा लोकप्रियता की उच्चता का संस्पर्श कर चुकी थी और यह भी कि तत्कालीन सामाजिक जन इसे बड़े चाव से सुनते सुनाते थे तथा अपना मनोरंजन करते थे। यहो यह स्मरणीय है कि कवि-चक्र-बड़ामणि कालिदास का समय ईr पूर्व प्रथम शताब्दी से लेकर ईसr की चतुर्थ शताब्दी गुप्तकाल तक दोला- यमान है ।' मलिदासकालीन समाज परिष्कृत कि , अनुरागी,ललितकलाप्रेमी और संस्कार सम्पन्न था। ऐसे समाज में रसवर्षिणी उदयन-क्या का प्रचार इसके लालत और मधुर भावों का हो पोजक है। इधर सप्तम शताब्दी ई० में सम्राट हर्षवर्धन भी अपनी प्रसिद्ध नाटिका रत्नावली में उदयन' चरित के अत्यधिक लोकप्रिय होने का डिण्डिम योग करते हैं । यह स्मरणीय है कि सम्राट हर्षवर्धन ने भी उदयन- कथा का आधार बनाकर रत्नावली' नाम की अपनी प्रसिद्ध नाटिका का गुम्फन किया है। यदि इनो पूर्व के साहित्य का अनुशोलन परिशीलन क्यिा जाय तो प्रथम शताब्दी ई00 के समय में भी उदयन aur चर्चित और अभि- नन्दित रही है ; उदाहरण के लिए कौटिल्य अपने अर्थशास्त्र में बड़े आदर के साथ वत्सराज उदयन का उल्लेख करते है। इसी सन्दर्भ में प्रसिद्ध नाटककार शुद्रक का नाम भी उल्लेख- इन्होंने अपने प्रख्यात नाटक मृच्छकटिक्स में उदयन क्या का नीय है। 1. संस्कृत साहित्य का इतिहास : बन्देव उपाध्याय,शारदा मन्दिर, 1960.पृ० 179. 2. लोहारि च वत्सराज-चरितम -हर्षवर्धन, रत्नावली 1.5 3. दृष्टा हि जीवतः पुनरावृत्तिर्यया सुयाबीदयनाभ्याए। अास्त्र, पृ50 उपमान के रूप में उल्लेख किया है, तदनुसार मृच्छकटिकम नाटक का पात्र शालिक अपने प्रियभित्र आर्यक को राजकारागार से छुड़ाने के लिए कहता है कि राजा उदयन को छुड़ाने के लिए महामंत्री योगन्धरामण को तरह मैं अपने मित्र आर्यक को बन्दीगृह से छुड़ाने के लिए अपने सजातीय जनों, विटों, या चाहने वाले और राजा से तिरस्कृत राजपुरूषों को उत्तेजित करता है।' इसी प्रकार पाली साहित्य और जैन साहित्य भी उदयन कथा को चर्चा प्राप्त होती है: जिस इसकी निखन्न लोकप्रियता का प्रमाण मिलता है | धम्म-पद बोरमझिम निकाय' को दीकाओं में उदयन क्या का विस्तार से वर्णन प्राप्त होता है । तदनुसार उदयन दारा गजमोहिनी वीणा की प्राप्ति, प्रद्योत द्वारा उदयन को कारावास में रखना, उदयन और वासवदत्ता का परस्पर प्रणय, भद्रावती नाम की हथिनी पर बैठकर दोनों का पलायन इत्यादि प्रमख घटनायें इन औद्ध ग्रन्थों में सविस्तर वर्णित है 12 इसी प्रकार जैन साहित्य के अन्तर्गत हेमचन्द्रकृत त्रिष्टि- शलाकारून चारतम् ' सोमप्रभकृत 'मरपन्न प्रतिबोध' एवं मालाधारी देवपाल क्त मृगावती चारत' आदि ग्रन्ध उदयन-वासवदत्ता-प्रणयकथा के सन्दर्भ में इस कथा की लोकप्रियतr का संकेत करते प्रतीत होते हैं। कारमीरी पंडितों द्वारा विचित वृहत्कथा के सक्षिप्त संस्करणों में तो इस कथा का प्रचुरता के साथ उल्लेख प्राप्त होता है - 'सोमदेव कृत ' कथा- सरित्सागर' कविवर मेन्द्र विचित वृहत्वयामंजरी' -- -- MP । ज्ञातीन बिावस्कविय-लब्ध-वीच राजापमानवृपिताश्च नरेन्द्र भृत्याच । उजयामि सुहवः परिमोक्षगाय योगन्धरायण इवोदयनस्य रज्ञः मृच्छकटिकम 4.26 2. धम्मपद-टीका पृष्ठ 50.मिनिकाय टीका.yo20 12 बुद्ध स्वागी कृत "वृहस्कमार लोक-संग्रह उदयन-था की निरन्तर लोकप्रियता के प्रमाण है। संस्थत के सुप्रसिद्ध कवि "भवति" अपने नाटक 'मालतीमाधव' में उदयन-वासवदत्ता-क्या का बहुसम्मानपूर्वक उल्लेख करते है ।। - इस अमरकथा को आधार बनाकर स्वतन्त्र रूप से विरचित नाट्य-कृतियों कुछ कम नहीं है । कविवर मात प्रणीत दो नाटक वन वा- सव दत्तम् ' और प्रतिक्षा योनन्धरायण, अनगाहर्जमाताजगीत "तापसवत्स- राजन' कवि सम्राट् हाई-वचित रत्नावली' और 'प्रियदर्शिका' इस अमर प्रणयक्या को लोकप्रियता ३ बालजयी निदर्शन है। इ। कथा से सम्बन्धित अन्य कृतिया पयादीणावासवदत्ता उन्मादवासवदत्ता वासवदत्ता नादय धारा' आदि तत्तदअन्योलरित अन्यों जल्लखित है किन्तु सम्प्रति प्राप्त है । इसी प्रकार इस विपुल मालावधि में इस कालजयो कथा से सम्बन्धित अन्य अनेक कृत्तिया बरय विद्यमान रही होगी जो अब संभवत: कालकवलित हो गयी है। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि प्रथम शताब्दी से लेकर लगभग 12वीं शताब्दी तक भारतीय रंगमध एवं साहित्य के विविध अंगों में एक सहावर्षपर्यन्त उदरावासवदत्ता-प्रणयका जीवन-रस-संचारिजी बगी रही है। ऐसा संभवत: कोई कवि, कलाकार और अनुरागी व्यक्ति दिखाई नहीं देता जो इस क्या के प्रादक प्रेम से प्रभावित और पराभूत न हुआ हो । की यह अमरकथr शताब्दियों तक न केवल विदग्धों के भुरवों में पदन्यास करती रही है, प्रत्युत सहृदयों और रसिक ग्राम-वृद्धों को अपने मधुर,रोमा- ण्टिक चमत्कार और आनन्द की आय रसधार से सराबोर करती रही है। --- 1. भवभूति 'मानती माधव' तापत वत्सराजय साहित्य भाडार मेरठ-1969 १. प्राण्यावन्तीनुदयन-कथाकोविद-ग्रामदान, पूर्वोदिदष्टामनुसर पुरी श्री विाला बिलास मेषदतम. 13.
त्रिविध कथाम्रोत : भारतीय साहित्य का अनुशीलन, परशोलन करने पर चाद यह विदित होता है कि भारतीय साहित्यिक कृतियों का आधार बनने वाली तीन क्यावस्तु में मुख्यतया रही है : प्रथम रामाया, दूसरी कृष्ण-कथा और तीसरी उदयन-कया । यह स्मरणीय है कि श्री रामकथा और श्रीकृष्ण क्या- वस्तु में आदर्शवाद और -साता थी, दोनों ईश्वरत्व का बोध अन्त- निहित था, इसीलिए श्रीरान मर्यादा पुरुषोत्तम और अन्नतः विष्णु के अवतार के रूप में प्रतिष्ठित हुए थे और श्रीकृष्ण लीलाधर, मुरलीधर तथा आ- बलावतारो लाar३ ईश्वर के रूप में लोवन्दित रहे हैं 12 पटत: इन दोनों स्थाओं में आदर्शवादी धार्मिक विचारधारा प्रखरताले प्रताडित हुई है। किन्तु भारतीय साहित्य । विशुद्ध कलावादी और धर्म- तिरक्षा विचार-धारा का प्रतिनिधित्व करने वाली प्रमुख कथा उदयनवासव- दत्ता प्रणय-या हो रही है । संस्कृत में रोमाटिक का व्यवादी धारा का प्रतिनिधित्व वत्सराज उदयन क्या ने ही किया था । प्रारम्भकाल से ही संस्त नाटकों में नायक धीर ललित रूप का दर्शन हमें वत्सराज उदयन में होता है । कहना न होगा कि ललित-बदा-विस्तार और मानवीय संविदनाओं की अभिव्यक्ति जितनी वत्सराज और वासवदत्ता प्रणय-प्रलंग में हुई है,उतनी सहज अभिव्यक्ति अन्यत्र नहीं हुई है । यदि अला की दृष्टि से विचार किया जाय तो यह क्या 1. विष्णुना सदृश वीर्य, वाल्मीकि रामायण,वा0रा0 15.31.6.120 2. कृष्णस्तु भगवान स्वयम् श्रीमद्भागवत । 28 एवं 2.6.2.7.
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नाटककारों के लिए बहुत उपयोगी रही है । उनती नाट्यवला इस मधुरकथा
के संयोग से बहुत पल्लवित और पुष्पित हुई है ।
लोकप्रिय नायक के रूप में उदयन का नायकत्व किसी अन्य
नायक के व्यक्तित्व से विचित् मात्र भी न्यन नहीं है। उदयन के व्यक्तित्व
का उत्कर्ष और उसके नामकत्व का चमत्कार हमें उसके उत्थान और पतन में,
स्नेह और सौजन्य में, हर्ष और विषाद में संयोग और वियोग में दिखाई
देता।
मानवीय दुर्बलताओं और महन्ताओं के कारण वत्सराज उदयन
लोकभावना के अधिक निकट है ।
अत: धर्मनिरपेक्ष परिवेश में ऐसा कोई अन्य
नायक नहीं दिखाई देता जो इतने दीर्घकाल तक, इतनी अधिक लोकप्रियता
प्राप्त करने एवं इतने बाल और विपुल साहित्य का नायकत्व करने आ
सौभाग्य प्राप्त कर सका हो ।
ऐसा प्रतीत होता है कि वत्सराज अपने जीवनकाल में ही
वासवदत्ता के प्रणय सम्बन्ध से प्रेम के देवता के रूप में चर्चित हो गए थे।
उनका यह अनुरागी व्यक्तित्व अवन्ति और वत्सप्रदेशों की सीमाओं को
लापकर देश के एक छोर से दूसरे छोर तक चर्चाका विषय बन चुका था।
उदयन की ऐतिहासिकता :
धीर ललित नायक उदयन का व्यक्तित्व अनेक विशेषताओं
से संवलित था, सर्वोपरि इलके अनुरागी और रोमाटिक व्यक्तित्व ने उसको
लोकप्रिय बनाया । उसकी इस असीमित लोकप्रियता के कारण अनेक कल्पित
घटनाओं में उसके ऐतिहासिक स्वाप पर जो पटावरण कर दिया है, इसस
उसके बास्तविक स्वरूप का चित्र याप कुछ कठिन प्रतीत होता है । बाज
Hawe
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1. मेघदुता । 30
15 उदयन क्या में ऐतिहासिक और पौराणिक तत्वों का मिश्रण प्राप्त होता है, उन दोनों को पृथक् पृथक् करना दुकर कार्य प्रतीत होता है । फिरभी अद्यावधि हुए ऐतिहासिक शोधों से यह विदित हो गया है कि उदयन-कया एक ऐतिहासिक तथ्य है ।। यद्यपि नाटकों में उपलब्ध उदयन-कथा में कतिपय कवित्त परिवर्तन दिखाई देते हैं और कविकल्पना से उसका ऐतिहासिक रूप प्रच्छन्न हो गया है, किन्तु उसका जल ऐतिहासिक रूप यथावत् जाना जा सकता है। महाभारत के अनुसार उदयन पुरुवंशी राज है और वह वीरवर पाण्डुपुत्र अर्जुन के तनय अभिमन्यु के शाक्रम में 25वीं पीढ़ी के सन्तान के रूप में जन्मग्रहण करते है। वे वत्लेदेश के राजा के रूप में विख्यात रहे हैं। प्रयाग समीपवर्ती कौशाम्बी नगरी उनकी राजधानी के रूप में विख्यात रही । कुछ विद्वान इसे अर्जुन को 19वीं पीढ़ी का वाज मानते है। किन्तु बौद्ध ग्रन्थों में इसे महात्मा बुद्ध के निकट उत्तरवर्ती शासक माना गया है । तदनुसार यह अवन्ती के चण्डप्रधौत, कोशल के प्रसेनजित के पुत्र विदभ तथा मगध के सम्राट् बिन्दुलार और अजातशत्रु आदि राजाओं का समकालीन था ? इस सम्बन्ध में विद्वानों का अभिमत है कि अवन्ति तथा मगध के राजघरानों के साथ कौशाम्बी नरेश उदयन के वैवाहिक सम्बन्ध थे। उनके अनुसार अजातशत्रु ही उदयन कथाओं में निरूपित राजकुमारी पावती का भाई दर्शक है । उदयन जिस वत्संदेश का राजा था उसकी राजधानी 1. तापसवत्सराज-चरितम भूमिका छ । प्रतिज्ञायौगन्धरामा प्रस्तावना पृ 21.प्रकारन इण्डिया बुक हाउस जयपुर संस्करण 1981 १. तापसवत्सराज-धरिता भूमिका, पृ० 4.
कौशाम्बी थी,जो पाचाल के राज्य से जुड़ी हुई थी। यदि हम कवि कल्पनाओं और उनके अलंकृत वर्णनों के आवरण को हटाकर कविवर भास के नाटकों का अनुशीलन,परशीलन करें तो उदयन-कथा तदनुसार उदयन कथा का मूलरूप कुरु के मूल रूप का उदय मिल सकता है । निम्नवत हो सकता है उदयन वत्स देश का राजा था वह जलाप्रेमी था। वह वीणा का असाधारण वादक या । यह किवात या कि उसकी वीणा की सुमधुर वीगा मधुर ताल और सुमधुर संगीत सुनकर वन्ध गज भी गुग्ध हो जाते थे । उसके वादन का सुथरा तुदर देशो और प्रदेशों तक व्याप्त हो गया था ।' यह वही समय था.जब अवन्ती के राज्य में महाराज प्रद्योत शासनास्ट थे। इनके दूसरे नाम चण्ड प्रोत' और 'महासन भी थे । इन नामों से यह प्रतीत होता है कि यह बलशाली और पराक्रमी थे । इनकी एक रूप- सुन्दरी और गुणवती कन्या थी, जिसका नाम वासवदरता था | वासवदत्ता के पौन्दर्य की सुगन्ध तत्कालीन राजाओं के मध्य चर्चा का विषय थी। उन दिनों प्राय: प्रत्येक राजा वासवदत्ता के अकृत्रिम रूप माधुरी सेवाकृष्ट हो.उसके प्रणय का अभिलाषी और प्रत्याशी था । किन्तु अवन्ति-राज महासत प्रोत उदयन के गुणों पर मुग्ध यr और अपनी पुत्री वासवदत्ता का विवाह जिस किसी प्रकार ने भो वत्सनरेश उदयन के साथ करना चाहता था अपने इसी उदक्षय की सिद्धि के लिए वह अपना एक दूत उदयन के पास भेजता है,तथा यह संदिश प्रेषित करता है कि उसकी बेटी वासवदत्ता उदयन से वीणावादन की NिI ग्रहण काना चाहती है। इसीलिए वे अवन्ती बाकर मा तमहं बीमाप्तिीयः बानयामीति, प्रतिज्ञा-योगन्धरायण जयपुर प्रकारान-1981. फूठ 23.
17 बेटी वासवदत्ता को वोणा-वादन की शिक्षा देने की कृपा करें ।' किन्तु । संगीतकला-शारद स्वाभिमानी उदयन अवन्तो जाकर उसे शिक्षा देना अपना अपमान समझता है, इसलिए अपने प्रत्युत्तर में यह कहला देता है कि यदि उन्हें अपनी बेटी वासदत्तr को वीणा-वादन जी शिr दिलानी हो तो उसे यहीं पर भेज देना चाहिए । उदयन इस पृष्टता पूर्ण प्रत्युत्तर को जलशाली महान प्रद्योत सहन नहीं कर पाता है,फलत: उदयन को अपने वश में करने के लिए वह एक बड्यन्त्र की रचना करता प्रद्योत की अड्यन्त्र-पूर्ण-योजना अनुसार उदयन के मृग- यावन की सीमा पर एक ऐसा कृत्रिम हाथी खड़ा किया जाता जो अपने गज सुलभ गुणों और शुभलाणों से युक्त है । मृगयावन में एक विशाल मागलिक हाथी के विद्यमान होने की सूचना उदयन को प्राप्त होती है । उदयन ऐसे सुन्दर और शुभलक्षण सम्पन्न हाथियों को पकड़ने के लिए सदैव तत्पर और उत्सुक रहा है । वह शीघ्र ही अपने कुछ विश्वस्त सेवकों को साथ लेकर अपनी मोनो घोण सहित उस सधन साल वन को और प्रस्थान करता है 12 मृगया वन के उस सबन साल-वन के मध्य विद्यमान तक लताओं की ओट में वह कृत्रिम गजराज स्थित है, उस हाथी के अन्दर सशस्त्र सैनिक भी विद्यमान है । फिर क्या था.उदयन उस हाथी को अपना कामें करने के लिए वीणा बनाते हुए आगे बढ़ता है । हाथी की निचलता को वह समझाता है है कि वह वीणा की मधुर स्वर लहरी में अत्यन्त मुख है, इसलिए जड़वत् खड़ा है । फलत: उदयन हाथी के बिस्दल निकट पहुंच जाता है । वह बहुत आश्चर्य- 1: तापसवत्सराजय - भूमिका, पृष्ठ 3 2. प्रतिज्ञा योगन्धरायण, इण्ख्यिा बुक हाउस,जयपुर 1981 पृष्ठ 21-22
चकित होता है,जब वह यह देखता है कि हाथी के अन्दर छिपे हुए प्रचीत के
सैनिकों ने जो चारो ओर से घर लिया है और वह इस प्रकार प्रधौत के
बड्यन्त्र का शिकार हो जाता है । प्रधोत के सैनिक उदयन को लाव
अवनती की सीमा में ले जाते है । उदयन के सैनिक उसका पीछा करते है,
किन्तु प्रद्योत के शष सनित उन्हें आगे बढ़ने से रोक देते है ।
अवन्ती प्रोत का लन्दी बना हुआ कारागारत है ।। कौशाम्बी
केशवर गावनी लोटलर राजा उदयन ने अपहरण ती जात महामंत्री
यौगन्धरायण से बतलाते है।
फिर क्या थr : उदयन के Pararyपात्र प्रिय महामंत्री
योगन्धरायण राजा मुक्त कराने
लिए अपनो योजनाओं के अनुसार
प्रयत्न प्रारंभ कर देते है।
तदनुसार महामंत्री योगन्धराया अपना वेष
बदलकर अपने विस्त साथियों के साथ अवन्तो पहुँच जाते हैं और वहाँ
उदयन से सम्पर्क करने में सफल हो जाते है ।
अवन्ती में कुछ दिन रहने के पश्चा३ महामंत्री योगन्ध
रामा प्रयोग के एक गजराज को पागल बनाने में सफल हो जाता है । इस
गजराज से सुरक्षा के लिए बन्दी वत्याधिपति उदयन ले निवेदन किया जाता
फल : कलाप्रवीणउदयन उस उन्मत्त हाथी को अपना वशवर्ती बना
लेता है । इस पर प्रसन्न होकर अवन्ती नरेश प्रधीत उदयन के कारागार के
बन्धन शिक्लि कर देता है और उसे आनी वटी वासवदत्ता को संगीत
भी
लिाने के लिए नियुक्त कर देता है।
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1. प्रतिक्षायोगन्धरायण प्रथम अंक 25-30
2. संस्कृत नाटक : एबीपकीय, अनुबाद डॉउदयभान सिंह,मोतीलाल
बनारसीदास 1963-पृष्ठ 17.
उदयन प्रधोत-दुहिता वासवदत्ता को वीणा वाद्य की शिक्षा देना प्रारंभ कर देता है । प्रथम दर्शन में ही दोनों विमुग्ध हो जाते है दोनों के हृदय में प्रगाढ़ प्रोति का अंकुर फूट पड़ता है । संगीत शिक्षा के व्याज से नायक और नायिका के मन में अनुराग सिन्धु लहराने लगता है। कविवर कालिदास के कथनानुसार भवित व्यता के दरवाजे सभी जगह खुल जाते हैं ।' अथवा कविवर श्री हर्ष के अनुसार बायभावी घटनाओं के लिए विधाता की इच्छा जिस ओर दौड़ा करती है । वात्या- चक्र में पड़े हुए गजाल की तरह व्यक्ति परकश होकर उसी ओर बलात चला जाया करता है 12 फर पुरातन प्रीति को कोन लरव पाता है । फलस्वरूप -- - उदयन और वासवदत्ता प्रणयासक्त हो जाते है और दोनों ही गान्धर्व-विधि से विवाह सत्र में जेध जाते है । यह वेदितव्य है कि गान्धर्व विवाह में नायक नायिका के अतिरिक्त किसी तीसरे व्यक्ति अथवा किसी स्वजन की भागीदारी नहीं होती। फलस्वरूप एक दिन वत्सराज उदयन के प्रेम से उन्मत्त वासव- दत्ता महामंत्री योगन्धरायण की योजनानुसार भद्रवतो हानी मेककर अपने प्रियतम उदयन के साथ कौशाम्बी भाग जाती है । यह बात जब उज्जयिनी नरेश प्रद्योत को विदित होती है तो उसे अपना अभीप्सित सिद्ध होने से हर्ष को अनुभूति होती है क्योकि प्रीत अपनी पुत्री वासवदत्ता का विवाह उदयन से करना चाहता था । विधrता ने स्वयं ही इस विवाह को सम्पन्न करा दिया है उदयन और वासवदत्ता के भाग जाने पर इधर प्रद्योत .. अभवा भवितव्याना राणि भवन्ति सर्वत्र :अभिज्ञानशाकुन्तलम् ।.16 १. अवयभव्यश्वनवग्रयाहा यथायथा धावति वैधतः स्पृहा दोन वात्यैव भावशात्मना जनेन तेनेव पथानुगभ्यत-नेपधीयचरित। 12.0 20 और उत्तकी महारानी अंगारवती चित्रों से ही उदयन और वासवदत्ता के विवाह को रस्म पूरी कर लेते हैं । इस सम्बन्ध की मान्यता को प्रमाणित करते हुए महान प्रयोत एक बहुमल्य सुकापात्र उदयन के महामंत्री श्री योगन्ध-- रायण को सादर भेट करते है ।' उदयन और वासवदत्ता ने इस प्रणय सम्बन्ध में अभ PIचित और सफलता सोपान में पदाद करने का श्रेय महामंत्री योगन्ध- रायण को है। 'प्रतिज्ञा यागन्धरायणम् ' नाटक में वर्णित कथावस्तु 'उदयन- * का पूर्वभाग प्रतीत होता है जबकि 'स्वप्नवासवदत्ता' नाटक में इसो क्या का उत्तर भाग प्राप्त होता है 12 तदनुसार उदयन के वासवदत्ता प्रणयकथा प्रणय-पाश में आबद्ध वासवदत्ता जब राजr उदयन के साथ भागकर उज्जयिनी कोशाम्बी आ जाती है तो नायक नायिका में संभोग श्रृंगार की प्रति योगिता प्रारंभ हो जाती है । परिणामस्वरूप विलासी और अंगारी नायक उदयन अनिन्ध सुन्दरी नवयौवना प्रेयसी वासवदत्ता को पाकर विलासिता के सरोवर में बने और उतराने लगता है । कार्यों का परित्याग कर देता है : लेवल संभोग-श्रृंगार ही उसके जीवन का श्वास और प्रश्वास बन जाता है । राज्य के प्रति वत्साधिपति उदयन की इस उदासीनता को देखकर उसके पड़ोली पाचाल नरेश आरुणि के मन में राज्यविस्तार की इच्छा जागृत होती है जिस आण वत्स राज्य के विस्तृत भूभाग पर अधिकार 1. काचुकीयः, कारणेभियुवतः काम नापत त्वया । गेषु न मे उपोभंगारः प्रतिगृह्यता प्रतिका-यौगन्धरायण 4.21 इण्डिया बुक हाउस,जयपुर 1987.१० 164. 2. संस्कृत नाटका०बी०कीय पुष्ट-17:अनुवादक -डॉदयभानु सिंह मोतीलाल बनारसीदास,संस्करण 1969.
21 करना प्रारंभ कर देता है जिस पर उदयन के मन्त्रीगण अत्यधिक चिन्तातुर होते है, महामंत्री योगन्धरायण मगध-नरेश दर्शक की सहायता से पाचाल नरेश आणि के आक्रमण को विफल बनाने की योजना बनाता है। उसकी यह योजना ही स्वप्नवासवदत्तम् नाटक की रचना का मूलाधार है । । इधर उज्जयिनी नरेश प्रधीत अपनी बेटी वासवदत्ता के अपहरण से अपमानित और दुर्थनायित है, इसलिए ऐसे अवसर पर उससे सहायता की अपेक्षा अनभोत्सित और अनभिप्रेत है । किन्तु पूर्व दिशा के पड़ोसी मगध नरेश दर्शक अवश्य सहायक हो सकते है किन्तु उनके साथ मैत्री सम्बन्ध के कोई सधन सत्र नहीं है। सहसा, महामंत्री यौगन्धरायण के मन में विचार उठता है कि याद मगध नरेश दर्शक की बहिन पद्मावती के साथ उदयन का विवाह हो जाय तो दर्शक संग सम्बन्धी बन जायेग और फिर उनकी सहायता में पांचाल नरेश आरुणि के आक्रमण को विफल किया जा सकता है। किन्तु इधर उदयन वासवदत्ता के रहते दूसरे विवाह के विषय में शौच भी नहीं सकता है। ऐसी स्थिति में महामंत्री योगन्धरायण वासवदत्ता को विवात में लेकर योजना बनाता है जिस इस नाटक का सफल प्रणयन संभव हो पाता है। - इस प्रकार महामंत्री योगन्धरायण की सलाह पर वातव- दत्ता त काल के लिए प्रोषित-पतिका का जीवन यापन करने के लिए सहमत हो जाती है । फलस्वरूप राज्य की पश्चिमी सीमा केनिट लावाणक नामक ग्राम में राजकीय पड़ाव डाल दिया जाता है । एक दिन का धुकीय : अस्मीक महाराजो दर्शको भवन्तमाह अमात्यो मावान महताबन समुदाय मोक्यात: बनु बारूणिय बाभ- धातयितहति । स्वप्नवासवदत्तमपृष्ठ 180. रामनरायनलाल बनीमाधव, 1968.
22 राजा उदयन आखेट के लिए वन की और जाता है । तभी योजनानुसार उस ग्राम में आग लगवा दी जाती है और वह मिथ्याप्रचार करवा दिया जाता है कि उस अग्निकाण्ड में वासवदत्ता और योगन्धरायण जल गए है। इसके पश्चात वासवदत्ता और यौगन्धरायण तपोवन में पहुँचत है।' तपोवन में पूर्व से ही मगधराज दर्शक की बहन पधावती विद्यमान है, वह तपोवन के निवासी तपस्विजनों की धार्मिक प्रिया के निर्विधन सम्पादनार्थ,सहयोग और सहायता ली छोणा करती है। मगधरेश दर्शक की अनुना फ्यवती धर्मप्रिया है और तपस्वियों की सेवा उसका कुलव्रत है । वह अपने कंचुकी से तपोवन में यह घोषणा करवाती है कि किस जलपात्र की आवयकता है, कम वस्त्रों की खोज है और कौन तपोधन विद्या प्राप्ति पश्चात अपने गुरु कोई क्या गुरु दक्षिणा देना चाहता है? धर्मप्रिया राजमारी तपोधनों की अक्षौत्सित वस्तुओं को देकर अपने को तपस्वियों का कृपाभाजन बनाना चाहती है 13 इधर वासवदत्त के साथ तपोवन में विद्यमान महामंत्री यौगन्धरायण काल के लिए भगिनी स्पा वासवदत्ता को पधावती के पास रखने के लिए उनसे प्रार्थना करता है- न्यास की था, कठिनता होत हुए भी अपने घोक्ति वचनो' अनुसार राजकुमारी नवागन्तुक तपस्वी योग- न्धरायण को उसकी भगिनी वासवदत्ता की चरित्रमा म वचन देती और उसे अपने आश्रम में रख लेती है । -- । स्वप्नवासवदत्तम् .प्रथम बैंक, पृष्ठ 17-18. 2 धर्मप्रिया नपसुता नहि धर्मपीडाय । इच्छद तपस्वियु कुलतमेतदस्या: स्वप्नवासवदत्तम् ।.6, पृष्ठ-20 3. यदयस्यास्ति समीहिता वदत्तव,कस्याब कि दीपताय । स्वप्नवासवदत्तम् ।
23 कथावस्तु की योजनानुसार आश्रम में उसी समय लावाणक नामक ग्राम से एक ब्रहमचारी बालक प्रवेश करता और अपने अध्ययन में हुए प्रत्यूह के सम्बन्ध में बतलाता है कि राजा उदयन के मृगया-बिहार हेतु चले जाने पर उस ग्राम में आग लग जाती है जिसमें उदयन की प्रिय पत्नी वासवदत्ता और महामंत्री योगन्धरायण जलकर भस्मसाव हो गए है। वियोग में राजा उदयन मर्छित हो जाते है । शनः शनैः मृी दूर होने पर उन्हें चैतना आती है तो वे हा वासवदत्त हा अवान्तराज पुत्रि! हा प्रिय और हाप्रिय- WHAIN ! शिष्ये इत्यादि कहकर विलाप करने लगते हैं जिसे पति का इतना अधिक प्रेम और सम्मान प्राप्त हो, सचमुच वह नारी धन्य होती है । जल जाने पर भी पति के अमर प्रेम के कारण वह अदग्धा अर्थात अमर है ।। नाटक के दितीय और तृतीय अंक के अनुशीलन विदित होता है कि उदयन का मगधराजकुमारी पावती के मा विवाह सम्पन्न हो जाता है,जिसे वहाँ पूर्व से ही उपस्थित वासवदत्ता भी देखती है । अन्त में,कतिपय नाटकीय घटना के अनन्तर वासवदत्ता का नायक से मिलन होने के कारण नाटक का सुखान्त पर्यवसान होता है । कविवर अनंग हर्ष मातराज विरचित नाटक तापस वत्सराजम में उपलब्ध उद्यन-कया स्वप्नवासवदत्तम नाटक के कथानक से विचित भिन्न किन्तु समान प्रयोजन' वाली है । तदनुसार नाटक के प्रारंभ में कंचुकी ओर चेटी के कथनों से विदित होता ह कि वलराज उदयन विषयोपभोग से शिथिलीकृतविग्रह वाला हो गया है और विकासुखों से उसका मन मोहान्वित हो गया है । जिसके कारण इसका विवेक क्षीण हो जाता है,और वह यह भी नहीं जान पाता कि पांचाल नरेश आणि उसके राज्य के कुछ भाग पर ।धन्या सा स्त्री या त्या बैलभता । -नहातमा हिदायदग्या ।। वासवदत्तम् ।.13.
24 - अधिकार कर चुका है। राज्य के प्रति राजा को यह उपाभाव मन्त्रियों को चिन्तित कर देता है । फलस्कप योगन्धरायण के नेतृत्व में राज्य की रक्षा के लिए मन्त्रीगण एक राजनयिक योजना बनाते है । तदनुसार सो त्यायनी एक परिवाजिका का वेष बनाकर वत्सराज उदयन के चित्र के साथ राजगृह मगध की और प्रस्थान लाती है । इधर महामन्त्री योगन्धरायण अवन्ती नरेश महासन प्रघात को राज्य के संकट का समाचार देता है और उनसे अपनी बेटी वासवदत्ता के लिए एक पत्र लिखवा देता लामका मन ब्राहमण को एक सिद्ध का वेष बनाकर प्रयाग मज दिया जाता है; उसके पास एक व्यक्ति उसकी सहायता के लिए शिष्य के रूप में भेजा जाता है,यह शिष्य ही उसके और मन्त्रियों के बीच में सन्देश-प्रेषण आदानप्रदानादि के कार्य सम्पादित करता राजा के मित्र विदृषक को भी इस योजना से अवगत करा दिया जाता है और इसमें उसे उनका कार्य समझा दिया जाता है । । महामंत्री यौगन्धरायण राज्य की सभा के सम्बन्ध में विरचित इस वृहत योजना के सम्बन्ध में महाराबी वासवदत्ता की भूमिका के लिए इन्हें महमत कर लेता है। सम्बन्धित व्यक्तियों के अतिरिक्त अन्य लोगों से इस योजना को गोपनीय रखा जाता है । उधर मगध नरेश से भी सम्पर्क हेतु प्रयास क्यिा जा रहा है 12 इस पृष्ठभूमिका के साथ नाटक के प्रथम बंक में योजनानुसार -- aNimrapaNP -- 11 1. भितीशो येनाय विषयसुखमोहान्निा-मना न पोचान बेलि प्रसभमुपरिन्यस्त- चरण । तापस-वत्तराचम । 2 पुष्ठ- 2. प्रद्योतः स्वसुताप्रवासनविौ दत्ताभ्यमूलः कृतः । प्रारब्धा मगोवरेण बहना तेस्त स्पायनमः ॥ तापसवत्सराज 1.6 पृष्ठ 12.
25 महामन्त्री योगन्धरायण महारानी वासवदत्ता से राज्य पर प्रत्यासन्न संक्ट की सूचना देता है और उसे दूर करने हेतु उनके सहयोग की कामना करता है, उसी समय पूर्वनिर्धारित योजनानुसार महासन प्रचीत का एक अनुवर पत्र के साथ प्रवेश करता अपने पिता प्रधोत का पत्र पढ़कर वासवदत्ता साम्राज्य की रक्षा के लिए विषयासक्त राजr के मंत्री की योजनानुसार वियोग का कष्ट सहन करने और सहयोग करने हेतु प्रस्तुत हो जाती हैं। भावी वियोग की आशंका से रानी वासवदता आकुल और ब्याकुल है, कौमुदी-नहोत्सव के प्रत्यासन्न होने पर भी वह अपना अंगार प्रसाधन नहीं करता है; राजा उसकी व्याकुलता का कारण छता है,जिसके उत्तर में उसे बतलाया जाता है कि पिता के घर पत्र आया है कि अभीष्ट मंगलाचार के साथ जामाता को कन्यादान न कर सकने के कारण उनको माता संदेव रोती रहती है, और उन्हें भी स्लाती रहती है, इसलिए पितृकुल के समाचार ते हो महारानी सम्प्रति खिन्न मनस्क और व्याकुल हैं। इधर मृगया हेतु वन के घिराव की सूचना राजा को दी जाती है, इन दोनों ही कारणों से 'कोमुदी-महोत्सव स्थगित कर दिया जाता है । प्रभात में राजा कतिपय सैनिकों के साथ मृगया हेतु वन की ओर प्रस्थान करता है। यहाँ यह सुस्पष्ट है कि नाटक के प्रथम अंक के संगुकान में कवि की सम्पूर्ण काम्पनामौलिक और युक्तियुक्त है। सम्पूर्ण प्रथा बंक राज्य की सुरक्षा हेतु विचित महामंत्री योगन्धरायण को सफल योजना को AAP- ।. या जाते! नव योन्टैः मंगलेः जामा समर्पितत्यदिवस मदन्ती जननी तब मा रोदयतीति । तापसवत्स-राजमा पुष्ट-29:
26 समर्पित है। महासन प्रद्योत को विवास में लेना और वासवदत्ता के लिए उनका पत्र लेखन लामकामन का प्रयाग-प्रेषण, वासवदतr के सहयोग की स्वीकृति, राजा का मृगया हेतु वन प्रस्थान आदि और प्रयोजना पक्षी है । नाटक के बुनियाद के रूप में विनिर्मित प्रथम अंक की प्रस्तुति नाटककार अनंगह-मातराज की नव-नवोन्मेशालिनी प्रतिमा का स्फुरण प्रतीत होती मा' जिस प्रकार उत्तर रामनरतम् नाटक का प्रथम अंक सम्पूर्ण नाटक का अधिकरण और कविवर भाभूति को अपूर्व प्रतिभा का परिस्फुरण है । कुछ यही बात तापल-वत्सराज के प्रथम अंक और विवर अनंग-ह-मातराज के लिए भी नही जr सक्ती है । प्रथम अंक तो भाति नाटक का तीय अंक भी विकी सफल प्रस्तुति का परिचायक है । तदनुसार महामंत्री योगन्धरायण वासक दत्ता को राजमहल से स्थानान्तरित कर देते हैं और राजमहल में आग लगा दो जाती है । राजमहल धू-धू कर जलने लगता है । महाराज उदयन मृगया विहार से वापत राजमहल आत है.ar par विदृषक आदि भी है । प्रचण्ड अग्नि से विदग्ध होते हुए राजमहल को दागकर अग्नकाण्ड में रानी वासवदत्ता के जलने की आरोत से राजा अत्यन्त काणापूर्ण विलाप करता है और स्वयं भी उस अग्निकाण्ड में जल जाना चाहता है । रानी वासवदत्ता के जल जाने के समाचार ले सम्पूर्ण प्रकृति हाहाकार कर उठती रत्नजटित पिंजरों में रहने वाले शुकस्वरिकायें अग्निपुलिंगों के बीच इवत: भाग रहे है, अग्नि को रक्ताशोक समझने गाम को मेव समझकर भ्रम से मृगण उली और दोड़ रहे है और मयूरो ।- 27 अपने मादक केका-स्वर से उत्कठित हो रहे हैं।' शोक से व्याकुल राजा । स्वयं भी विदग्ध वासवदत्ता का अनुगमन करना चाहता । इसी समय रानी वासवदत्ता द्वारा परिपालित मृगशावक वत्सराज उदयन है दोड़ता हुआ आता है, इसे देखकर राजा का शोक और तीव्र हो जाता है। नायक के शौक को बढ़ाने वाले इस मृगशावक-प्रस्तुति से विदाई के अवसर पर शकुन्तला के चरणों में लिपटने वाले सुत-विशिष मृगशावक की उपस्थिति का स्मरण सम्प्रोत हो रहा है जिससे प्रतोत होता है कि कविरा प्रस्तुत यह प्रसंग कालिदास प्रणोत अभिज्ञानशाकुन्तल के चतुर्य बैंक से प्रभावित है उपर्युक्त कारुणिक वेला पर उज्जयिनो नरेश महासन प्रधात का पत्रवाहक वहाँ पहुँचता है जो शौक को तीव्रतर कर देता है । महामंत्री योगन्धरायण भो वासवदत्ता के साथ अग्नि में विदग्ध हो गए हैं, इस समाचार से उदयन शोक सागर में पुनः बने और उतराने लगता है और राजा वासवदत्ता और यौगन्धरायण के पथ का अनुगमन करने का आग्रह करता है किन्तु वहाँ उपस्थित दुसरा मंत्री रूमावान इसे इसके लिए रोक्ता है और प्रयाग में जाकर वहीं सिद्धजनों के दर्शनार्थ उन्हें परामर्श देता है । MANON-Ajay Missin our -- . राजा समाश्वस्य सहसोत्थाय सखेद रूमावन ! मुंह मुंच किमा निवारयति । अन्तर्बद-पदं न पश्यसि सबै शोकानल येन मास । एवं वारयसि प्रियानुसरणाव पाप करोभ्यत्रीका ॥ तापसवत्सराज-चरितम | पृष्ठ 43. 2. दि में पारमुपैति पत्रक-कृतेः दि वादभिः रया मात्रा त्वं परि- वर्जित: सबभ्या यान्त्यातिदीय भुवः॥ वापसवत्सराज-वरित ।। ३. यस्य त्वया व्रणविरोपणमिदीना, तौल न्याविन्यत मुखा-सचि- विदे श्यामाक-मुष्टिपरिवर्द्धित को जहाति लोडयं न पुत्रकृतक: पदवी मृगस्त । अभिज्ञानशाकुन्तलम् + 28 प्रयाग में ब्राहमण लायकायन पूर्व से ही तापस देश में उपस्थिति है । यही । तापस आगे राजा को वासवदत्ता की प्राप्ति के लिए मगधराजपुत्री पद्यावती से विवाह का परामर्श और उपदेश देता है । तीसरे अंक में वत्सराज उदयन और मगधराजपुत्री पद्मावती के मिलन का वृतान्त उपलब्ध है । कवि ने मुख्यकथा की संगति काने के लिए बहुत है अशी की स्क्यान उद्भावना की है । लामकायन और उसके शिज्य के मध्य हुए वार्तालाप में यह विदित हो जाता है कि मगध राज- कुमारी पधावती सौकृत्यायनी के प्रभाव । परिव्राजिका सांकृत्यायनी मगध के राजगृह पहुँचकर राजकुमारी पद्मावती कोउदयन का सुन्दर चित्र दिखाती है और राजा के अनेक गुणों को उसे सुनाती है । राजकुमारी पद्मावती चित्र और राजा के गुण समूह देख औरसुनकर मुग्ध हो जाती है और देवमूर्ति के समान वह उसकी पूजा करने लगती है। योजनानुसार इधर विदृषक भी राजा को लेकर मगध के राजगृह के तपोवन में पहुँच जाता है। दूसरी और मंत्री योगन्धरायण राजगृह के तपोवन जाते हैं, वह प्रोभिापतिका वासवदत्ता को अपनी प्रोक्ति-पतिका बहिन बताकर उसे कुछ काल के लिए पद्यावती के पास छोड़कर चले जाते है । वासवदत्ता पद्यावती से उसके तपस्विनी के वेष धारण का कारण पूछती है जिसके उत्तर में पद्यावती वत्सराज उदयन के प्रति अपना अनुराग बतलाती है और उदयन की उस प्रतिकृति को दिखाती है जिसकी वह अनिीश पूजा करती है । उदयन की यह प्रतिकृति तापस वा में है।' तस्मिन्नव हुतवह जलब्धमरण-व्यवसाय: अमात्यः परिबी- ध्यमान: मम साम्प्रतम गृहवालनात सर्व परित्यज्य तापसः संवृतत्तः। तापन-वत्सराज-चरितमय पृ० 75. । पावती 29 इसलिए पद्धती ने भी अपने प्रियतम के अनुरूप तपस्विनी का वेष धारण वहीं पर वासवदत्ता की भेट साकृत्यायनी से होती है जो वासवदत्ता को अपनी योजना का बोध कराती है। दोपहर में राजा उदयन के आने का समय समझकर सांकृत्यायनी वालवदत्ता के सा३ वहाँ से चली जाती है । इधर विदुषक, ताप वेष में राजा उदयन को विश्राम के बहाने उसी तपोवन में ले जाता है, जहां पर मगध राजकुमारी पद्यावती तापस वैन में पूर्व से ही विद्यमान है । नक्रान्तुक अतिथि के पूजा-सत्कार हेतु पवावती अयादि--पूजन-सामग्री लेकर राजा के पास जाती है, उसे उदयन के रूप में पहिचान कर वह संकुचित होती है। उदयन सर्वांग-सुन्दरी राजकुमारी को तपस्विनी के वैषी देखकर द्रवित होता है । विदाक की प्रेरणा से राजा पद्मावती की पूजा और अतिथ्य-सत्कार स्वीकार तो ग लेता किन्तु वासवदत्ता की स्मृति उनै क्विलित कर देती है । योजनानुसार मावान् के दूत सिद्धार्थक को राजगृह की गतिविधियों को जानने के लिए परिव्राजका सांकृत्यायनी के पास भेजा जाता है तथा उदयन और राजकुमारी के विवाह योजना को कार्यक्रम में परिणत करने के लिए उसे अमात्य का निर्देश सचित दिया जाता है । साकृत्यायनी और विदुक्क परस्पर मिलकर यह कार्य सम्पादित करते हैं । - सहसावलोक्य सविस्मयम सदस्य बनार-लोचन वा सप्तामा टिः, निर्दथे मकरध्कने रति रो कि याद गृहीताता | संवा माइवनदेवता-मुनि-क- वा-प्रपंच मनः कृत्वत्थ रमत व विद्याहवतीं कि वातपायीरियम्।। तापस-वत्सराजस3*14. म 30 जहाँ एक और राजा उदयन पञ्चावती के वासवदत्ता-सदृश सौन्दर्य से आश्चर्यचकित और उसके तपस्विनी वेष से द्रवित है, वहीं दूसरी और राजकुमारी पावती अपने प्रणय की सफलता से दुःखी होकर आत्महत्या की योजना बनाती है । इतने में ही विकत सहसा वहाँ राजा' साथ प्रवेश करता है और उसके इस दुःसाहस को रोकता है । यही पर नायक नायिका का मिलन होता है और इन दोनों का यह मिलन मंगलमय विवाह में परिणत हो जाता है ।। पंचम अंक के प्रारंभ में मूलान्य का कुछ भाग खण्डित हजिससे मूल कथा का स्वरूप यप सुस्पष्ट नहीं है फिरभी इतना अवश्य विदित होता है कि वासवदता निद्रा निमग्न विदक्क को जगातो है,जागने पर वह उदयन के पास जाता इधर राजा पहावती - परिणय के पश्चात -- अपने प्रिया समागम को स्मात में तल्लीन है किन्तु वासवदत्ता की स्मृति भी धनोभूत होकर स्मालपटल पर छाई हुई है। विदृषक राजा से वासव- दत्ता के मिलन की बात कहते कहते संभलकर कहता है कि वह उसे स्वप्न देख चुका है। बातों ही बात में दोनों विदुषक और राजा पद्मावती के पास पहुंचते है । इसी समय षड्यावती के भाई दर्शक हारा प्रेषित हावाहक कुंजरक वहो आता है और पांचाल नरेश आरुणि के सा५ हुए भयानक युद्ध की चर्चा करता है तथा शत्रु के गिरफ्तार होने और अपनी सेनाओं की विजय की सूचना देता है । का । करतलकालतान-माल्यो समुदित-साध्यामबद्ध-कम्पयो : । क्लरूचिजहानियोरपर इशवरयो समागमः ॥ तापसवलराज 4.20 पृष्ठ 142.
इस सूचना के बाद विदुषक राजा को परामर्श देता है कि अब राजधानी कौशाम्बी लौट क्ला जाय वही शत्रु राजा आरूणि तो दण्ड दिया जाय और अपने सहायक राजr दर्शक एवं वासवदत्ता के बन्धुओं गोपाल और पालक को धन्यवाद स्थापित किया जाय । इस पर राजा सिद्ध की वाणी पर विश्वास करने के कारणप्रयाग में वासवदत्ता की मिलन की आशा सर्वप्रथम प्रयाग जाने की आज्ञा देता है जिससे वे दोनों प्रयाग के लिए प्रस्थान करते है ।। षष्ठ अंक में क्या वृत्त एवं अन्य अवान्तर प्रसंगों का उपसंहार अत्यन्त रोचकता के साथ प्राप्त होता है । तदनुसार धर्मबन्धु यौगन्धरायण पद्यावती के पास न्याय रूप में रहने वाली ब्राहमणी देश धारिणी बहन वासवदत्ता को ठहों ले जाता है । इवर वासवदत्ता निकारण अपने आर्यपुत्र को दुखी करने के कारण आत्मग्लानि से व्यरित है और इस कारण शरोरत्याग का विचार करती है किन्तु योगन्धरायण उसे मरण व्यापार से रोकता है । इसी समय सोकृत्यायनी की शिष्या योगन्ध- रायण को सचित करती है कि कौशाम्बी की ओर जाते हुए राजा उदयन प्रयाग पहुंच चुके है और अब वासदत्ता के मिलन से निराश होकर त्रिवेणी संगम में ही अपना प्राणान्त कर देना चाहते है । अत: त्रिवेणी संगम में दोनों का संगम कराने के लिए यह उपयुक्त अवसर है । ARMATom im-een .. एतन्मतमव तावदनुवर्तमान: प्रयाग गत्वा तत्रेव देवीस्नेहस्य यथोचित मेव आरिपयामि ॥ तापसवत्सराजय. पृ० 189.
32 घटनाओं का योग बहुत विचित्र है। योगधरायण वासवदत्ता के साथ प्रयाग में संगम तट पहुंचता है और वासवदत्ता के प्राणो- त्सर्ग के लिए त्रिवेणी संगम में चिता जनाता है और अग्नि प्रज्वलित करता है राजा उदयन भो विगो तट पर अपने प्राणोत्सर्ग के लिए राजसवको चिता बनाने का आदेशदेता है किन्तु सेवक ऐसा नहीं करते । वासवदत्ता के लिए प्रज्वलत चिता में ही राजा जल जाना चाहता है और इस निमित्त राजा ता की प्रदक्षिणा करता है किन्तु तभी यौगन्धरायण समीप जाकर राजा को रोकता है कि यह उसकी माहन की चिता है,पत्ति के दुख को न देख सकने के कारण वह इस चिता में जलकर मर जाना चाहती है । इस पर राजा क जाता है । उसी समय विदुषक राजा का ध्यान इस ब्राहमण देवाधारी यौगन्धरायण की ओर आकर्षित करता है । राजr उसे योगन्धरायण के रूप में पहचान लेता है। रानी पद्मावती भी महारानी वासवदत्ता को पहचान । जाती है.ऐ अवसर पर मंत्री मावान भी आ जाता है । नायक और नायिका का मिलन होता है और इस प्रकार सुखान्त नाटक का पर्यावसान होता है।' यहाँ यह निर्विवाद रूप से स्पष्ट है कि वासवदत्ता और न वत्सराज उदयन की रस-संचारिणी प्रणयकथा पर आधारित "प्रतिज्ञा-योग- न्धरायण" और "स्वप्नवासवदत्तम तथा तदनुसार तापम-वत्सराज Man - दृष्टा यूयं निर्णित विषन्तः प्राप्ता देवी मृतधात्री च भूयः । सम्बन्धोडमुद् दरकिनापि मा कि दुप्राय यन्न लब्ध भवादाभ्यः । तापसवत्सराज6.9 पृ० 223.
33 अत्यन्त सफल नादय-कृतिया है, जिन्होंने न केवल तत्कालीन समाज प्रत्युत शताब्दियों तक और आज भी रसिकों और सामाजिको तो रससिक्त तय आनन्दित क्यिा है । इस रोचक क्यानक से सम्बद दो अन्य कृतियों भी उपलब्ध होती है- "वीयावासवदत्ता" तथा "उन्मादवासवदत्ता* | इन दोनों कृतियों में क्रमश: वासवदत्ता का संगीत और वीणा में प्रेम और उसके उन्मादकारी सौन्दर्य का चित्रण तदनुसार उसका उद्यन के साथ सफल प्रणय का प्रसंग चर्चित है ।। वत्सराज उदयन और वासवदत्ता के रोमाचक प्रणयकथा से सम्बन्धित कविवर सम्राट हर्षवर्धन विरचित दो अत्यन्त सफल नाटिकायें भी प्राप्त होती है - जो इस क्या की लोकप्रियता में प्रबल प्रमाण है। उदयन कथा चक्र से सम्बद्ध प्रियदर्शिका' चार अंकों की प्रणय-नाटिका है 12 वत्स का सेनापति विजयसेन दृढवर्मा की पुत्री प्रिय- दर्शिका को दरबार मलाता है तथा आरण्यकाधिपति बिन्ध केतु की कन्या के रूप में वहाँ रख देता है। यह राज उसे वासवदत्ता को सौप देते है,जो । । उसकी शिक्षा दीक्षा का प्रबन्ध करती कुछ समय पश्चात राजा उदयन विदूषक के साथ उपवन में धूमने जाते हैं। जहाँ पुष्प-चयन हेतु आई प्रिय- दर्शिका कमलों पर उड़ते हुए भोरों ने व्यक्ति होती है और चिल्लाने लगती राजा लता से प्रक्ट होकर उसकी प्रभारों से रक्षा करता है,यहीं नायक नायिका का प्रथम दर्शन होता है और अनुराग के बीज का बंकुरण गा भूमिका साहित्य प्रकार मेरठ 1961सस्करण,पु०-2 तापस वत्सराज 2. प्रियदर्शिका ०5 34 यह प्रांग आश्चर्यजनक रूप से अभिज्ञानशाकुन्तलम के प्रथम अंक में वर्णित दुज्यन्त द्वारा शकुन्तला की अमरबाधा के वर्णन ते अत्यन्त साम्य रखता है ।। इस नाटिका के अनुसार प्रियदर्शिका की सखी मनोरमा तथा विदूषक युक्ति ने नायक नायिका मिलन की योजना बनाते है । इधर वासवदत्ता उदयन के चरितले सम्मन्धित नाटक का अभिनय करना चाहती है जिसमें मनोरमा को उदयन का अभिनय करना है और वासवदत्ता का अभिनय प्रियदर्शिका को करना किन्तु घटनाचक्र के सुन्दर संयोजन से मनोरमा के स्थान पर उदयन स्वयमेव पहुँच जाता है, और वासवदत्ता का अभिनय करने वाली प्रियदर्शिका से मिलता है । अन्तत: वासवदत्ता के द्वारा उदयन और प्रियदर्शिका का विवाह बा दिया जाता है जिससे नाटिका का पर्यवसात सुखान्त होता है । वासवदत्ता- उदयन-क्या प्रसंग से सम्बद्ध कविवर श्रीहर्ष देव विचित एक दूसरी अत्यन्त प्रसिद्ध नाटिका रत्नावलो उपलब्ध भी है, जिो सर्वश्रष्ठ नाटिका होने का गौरव प्राप्त है 12 रत्नावली की कथावस्तु उदयन के चरित्र के उस भाग से सम्बन्धित है जो वासवदत्ता के विवाह के पश्चात प्रारंभ होता है । तदनुसार सिंहलेश्वर की दुहिता रत्नावली यान भंग के कारण समुद्र में डुबकर भी बच जाती है । एक सामुद्रिक व्यापारी द्वारा वह महामंत्री योगन्धरायण के पास लाई जाती है। मंत्री उसे सागरिका के नाम से वासवदत्ता की देखरेख में रख पाता है । 1. अभिज्ञानशाकुन्तलम प्रथम बैंक 4.23 रत्नावली.साहित्य भंडार मेरठ संस्करण 1986
35
कामदेव के उत्सव के अवसर पर वासवदत्ता कामपुरुष उदयन
की ही पूजा करता है, जिसे की झुरमुट से छिपे तोर से सागरिका प्रथम
आर देख लेती है, उन्हें वह कामदेव सातो तथा प्रणय
मधुर भाव
अंकुरण के लिए पात्र बनती है ।'
जितीय नागरिज अपनी सबो सुसंगता के माधचित्त
विनोद के लिए राजा कr चित्र आकतातो
जिसके पास सुसंगत सागरिका
का ही चित्र खीचकर उस राति सनाय बना देती है।
छ गुप्त प्रणय की
भी वr है । वालि से एक बन्दर के तोड़ाकर भागने में महल में
कोहराम मच जाता है । इसो हड़कम्प में ये दोनों भाग खड़ी होती है।
वित्रफलक वहीं एट जाता. राजा के हाथ में पड़ने में गुप्त प्रेम प्रकट हो
जाता है । इस प्रेम प्रक्ट होने में एक सारिका का भी हाय प्रतीत
होता है ।
उत्तीय अंश इस नाटिका का हृदय-स्थल है । तथा कवि की
मोरि उदभावना भव्य उदाहरण है। वैव-परिवर्तन जनित शान्ति
के कारण जायमान घटना-सार्म बहुल सुन्दर है तश शापयर "काली
आप परल' नामक नाटक के समान है 12सागरिका वासवदत्ता का तथा
सुसंगता दानो काचनमाला का वेग धारण कर राजा से पूर्व रिचय के
अमर मिलने जातो, परन्तु जली वासवदत्ता के इससे पहले आ जाने
के कारण सारा गृह गोबर हो जाता है। बाली नाली का विभेद बड़ी
ही हास्यजनक स्थिति धैदा करता है। अपमानित मानकर सागरिका माता-
पा के TV मरना चाहती है परन्तु राजा उसे बचाता है।
रत्नावली-प्रथम अंशमादित्य भाडार.मेरठ-1906 स्करण
१. संस्कृत साहित्य का इतिहास वाचार्य बन्देव माध्यायशारदामादर,
वाराणसी- 1968.10559.
36 चतुर्थ अंक में जादुगर के अग्निदाह का प्रभावशाली दृश्य है। विविध घटना-संयोजन के पश्चात वासवदत्ता स्वयं प्रसन्न होकर अपनी भगिनीभता सागरिका से राजा का विवाह करा देती है । नायिका परिणय से इस नाटिका का पर्यावसान भी मंगलमय होता है । नायक इस प्रकार उपर्युक्त साहित्यावगाहन विगाहन से यह सुस्पष्ट है कि उदयन-कथा शताब्दियों से रामकथा और कृष्णकथा की भौति भारतीय जनमानस को आनन्दित करती रही है । इसीलिए इस प्रेम-रसासिवत कथा में आधार बनाकर अनेक स्वनामधन्य कवियों ने संस्कृत में विपुल साहित्य की रचना की है । इस मधुर कशा ने तरूणों और ग्राम वृद्धों के हुनयों जैसी ललित और मार भव्य भावनाओं की मधुरतम सृष्टि को , उसकी अनुमॅज न केवल अवन्ती के रसिक वृन्दों के मध्य अगोदर हो रही है ।। प्रत्युत परवर्ती संस्कृत साहित्य भी उसके रस से सराबोर हो गया है ! -- realhe ----- -- ।. प्राप्यावन्तीनुदयन-कथा-कोविदग्राम-वृद्धा३, मेघदुतः ।.50.
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36 द्वितीय अध्याय स्वप्नवासवदत्तम् प्रणेता : Roadies- -- स्वप्नवासवदत्त नाटकमा के प्रणेता कविवर भास है। इसमें कोई सन्देह नहीं है । नाटककार भाल की ख्याति संस्कृतनाट्य-जगत् में बलिदास के उदय के पूर्व ही फैल चुकी थी। कविकुल-गुरु-कालिदास ने स्वयम ही अपने नाटक 'मालविकाग्निमित्रमू में कविवर भास के प्रधित यश का उड़े आदर के साथ उल्लेख किया है ! तदनुसार उनका कथन है कि किल्यात यश वाले भास,सोमिल्ल और कवि पुत्रादि के प्रबन्धों का अति- ब्रमण करके केसे आधुनिक कवि कालिदास की कृति का बहुत सम्मान हो पूर्वमासके सकता है । इस विदित होता है कि कालिदास के नाटक चर्चित और लोकप्रिय थे। भास की लोकप्रियता के तारतम्य में प्रमाणस्वरूप कहा जा सकता है कि परवर्ती विजनों ने भी भास की कृतियों के सम्मान में अपने - हृदयोद्गार व्यक्त किए। सप्तम शताब्दी ईस्वी के कविवर बाण,ने अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ 'हर्षचरितम में कहा है कि सूत्रधार से प्रारंभ होने वाले तथा पताका नामक अवान्तर कथा वाले देवन्दिरों के समान सुन्दर नाटकों से कविवर भास को अत्यधिक ख्याति प्राप्त हुई थी। - ashisewa । प्रथितयासी भास-सोमिल्लज कविपुत्रादीना प्रबन्धानतिक्रम्य कथ वर्तमानस्य क्वे: कालिदासस्य वृतो बहुमानः । मालविकाग्निमित्र - प्रस्तावना.चोखम्बा संस्कृत सीरीज-1965, पृ०-6 १. सूत्रधार तारम्भमाटीमकः । रूपता के-शोले भासी देवकुलखि। चोखम्बा विभवन, 1965 हर्षचरितम् ।.15.०..
काव्यमीमालाकार राजशेखर नवम् शताब्दीई0 कविवर भास इत नाटकचक्र में स्वप्नवासवदत्त के अदग्ध होने की बात कहकर उसकी - भूरि-भूरि प्रशंसा करते है ।' प्रसन्नराधव के प्रणेता कविवर जयदेव के दश शताब्दी ई० भास को कविताकामिनी का हास कहा है 12 काव्यादर्श ते प्रणेता प्रसिद्ध काव्यशास्त्री कविवर दण्डी भास कृत चारुदत्त और बालचरित नाटकों प्राप्त एक श्लोक को करते है। इसी प्रकार आवार्य वामन अपने ग्रन्थ का व्यालंकार सत्रवृत्ति में काववर भार का उल्लेख करते हुए स्वप्नवासवदत्त -8, वास्दत्ता 1.2 और प्रतिज्ञा योगन्धरायणम 4.3 नाटकों के लोगों को उध्दत करते हैं। वाक्यति राज अष्टम-ताब्दी अपनी कृति गउडवही में भास को 'ज्वलन- मित्र' की संज्ञा विभूषित करते है। इन सभी उल्लेखों और उद्धरणों से यह प्रतीत होता है कि नाटककार भात की प्रसिद्धि लोकप्रियता की सीमाओं को लोध चुकी थी। प्रायः सभी परवर्ती कवि और काव्यशास्त्री उनके कालविजयी कवित्व की भूरि-भूमि प्रसा कर रहे हैं जो उनकै निरन्तर लोकप्रिय नाटककार और कवि होने के प्रति प्रबल प्रमाण है। भासले नाटक : यापि नाटककार भास बंस्कृत नाट्य-साहित्य के अति प्राचीन और बहुबर्चित कवि रहे हैं,किन्तु कालान्तर में इनके नाटक लुप्त हो गए थे, और इतिहास में इनका अस्तित्व संदिग्ध हो गया 1909ई०की यह --- . भासनाटक चक्रेडपिछकः क्षिप्ते परीक्षितम् । स्वप्नवासवदत्तस्य दाहकोडमून्न पावकः ॥काव्यमीमासा.पुण्ठ-35 भासो हासाकविकुल गुरु कालिदासो विलासः । प्रसन्नराधव ।.22 मुख निम्पतीव लोडगानि वर्षतीवाचनमः । चारुदत्त 19.बालचरितय -15 काव्यालंकार-सुत्रवृत्ति 15.35 भासे ज्वलनमित्र कुन्तीदेवे च यस्य रकारे । मोबन्धीचबचे हारीचन्द्र चबानन्दः । गाडवडो-गाथा 800 घटना संस्कृत नाट्य-साहित्य के इतिहास में अविस्मरणीय हो गई प्रसिद्ध गवेषक महामहोपाध्याय टीगणपति शास्त्री ने इन लुप्त नाटको को खोज निकाला और विद्वानों के सम्मुख उन्ः विचारार्थ प्रस्तुत किया।' सन् 1909 में महामहोपाध्याय गमापति शास्त्री को तुमारी अन्तरोप से लगभग 20मील दूर स्थित 'पद्मनाभपुरम के समीप प्रललिवकर- -- मप' नामक स्थान में ताम्र पत्रों पर महामालछ असारों में लिखे हुए नाटक हस्तगत हुये। गणपति शास्त्री ने प्रथम बार इन नाटकों को कविवर भास की रचना जतलाकर लोगों को आश्चर्य चकित कर दिया । पश्चात त्रिवेन्द्र से प्रकाशित होने वाली अनन्तशयन ग्रन्धमाला में इन नाटकों का प्रकाशन किया । इन नाटकों की कहाँ देवनागरी प्रतियो प्राप्त नहीं हुई। वल लारापुर के एक प्रसिद्ध ज्योतिषी गोविन्द पिशरोटि संग्रहालय से अभिषेक और प्रतिमा-नाटक की प्रतियो प्राप्त हुई थों 2 भासक नाटक : कविवर भास के सम्प्रति उपलब्ध नाटकों की संख्या 13 है। भारत के नाटको' को कथावस्तु का श्रोत महाभारत, रामायण और वृहत्कथा तीन ग्रन्थ रत्न हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि उस समय महाभारत के पठन पाठन का बहुत प्रचार था और महाभारत की घटनाओं से लोग अत्यधिक परिचित थे । भास ने तत्कालीन जन जीवन में व्याप्त धनाजों को अपने नाटकों का विषय बनाया था | भास के 7 नाटक महाभारत की घटनाओं E NIA . संस्कृत साहित्य का इतिहास,वाचार्य बल्देव उपाध्याय.0 512 संस्कृत साहित्य का इतिहास,बन्देव उपाध्याय,संस्करण 1968.40212 एवं प्रतिज्ञा-योगन्धरायण ० 06, इण्डिया बुक हाउस.जयपुर-1981
39
से सम्बन्धित है,दो नाटक रामायण कथा से, तथा दो वृहत्तया में प्राप्त
उदयन क्या से तथा शेष दो कल्पना मला है ।
नाटकों का क्या नक चाहे जिस ग्रन्थ से सम्बद्ध हो,सर्वत्र भास
के कवित्व और अनुगी कल्पना शक्ति की मौलिकता के दर्शन होते है उनकी
नाट्यकला का कौशल और उनको मौलिक प्रतिभा अवलोकनीय है । भात के
13 नाटकों का अतिसक्षिप्त परिचय निम्नाक्ति है .
दतवाक्य
यह भास अ एकाकी व्यायोग है, इसको कथावस्तु महाभारत
से ली गई है । इस एकाकी में पाण्डवों की ओर से सन्धि का प्रस्ताव लेकर
भावान श्रीकृष्ण औरव पक्ष के शिविर में जाते है और यहों से असफल होकर
लोट आत।'
12 वर्णभारम :
यह भी एकाकी नाटक है । इसमें वर्ण द्वारा ब्राहमण शधारी
इन्द्र को अपने कवच-गुण्डल देने को कथावस्तु प्राप्त होती है । इस नाटक में
स्थान बन्विति का पूर्ण निर्वाह किया गया है ।
13. दृत धाव :
इस एकाकी नाटक में अभिमन्यु की मृत्यु के परचा अर्जुन
जयद्रय-वध की भीषण प्रतिज्ञा करता है इधर श्रीकृष्ण घटोत्कच को दृप्त
बनाकर कोरव पक्ष में भेजकर महाविनाश की सूचना देते है। दुर्योधनादि
घटोत्कव का घोर अपमान करते है। फलस्वरूप उभयपनों में युद्ध प्रारंभ हो
MINORITA:wwwsanile
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जाता है।
संस्कृत माहित्य का इतिहास, पृष्ठ 4, बल्देव उपाध्याय
40 148 उरू भंगा : इस संक्षिप्त एकाकी में भीमसेन और दुर्योधन के अंतिम गदा- युद्ध का मार्मिक चित्रण किया गया है । इसमें करुण रस का पूर्ण परिपाक हुआ है । दुर्योधन का करूणा पूर्ण मरण दृश्य इस नाटक को दुखान्त बना देता है । 153 मध्यम व्यायोग : WALA इस नाटक में भीम एक सालमण पुत्र की रदी घटोत्कच से करवाता है । भीम पाण्डवो में मध्यम थे, इसीलिए इस नाटक का नाम मध्यम व्यायोग रखा गया है ।। पाँचरात्र यह तीन अंकों का समवकार है । इसको भी क्यावस्तु महाभारत से ली गयी है। इसमें द्रोणाचार्य के rरा पाण्डवों को उनका राज्य दे देने का अनुरोध है । 874 बालचरितम् : यह पोच अंको का नाटक है । इसमें श्री कृष्ण बन्म से लेकर स वध पर्यन्त का वरित्र वर्णित है । - M 18 अभिषेक - नाटकम : इसकी कथावस्तु रामायण से ली गई है । इसमें बीनवब से लेकर रावण-वध तक कीकथा अत्यन्त रोचक शैली में प्राप्त होती है। अन्त श्री राम के राज्याभिषेक का वर्णन है। राज्याभिषक कारण ही इसका नाम अभिषेक रखा गया है। जमा गत " स्वप्नवासवदत्तम् : प्रस्तावना.रामनारायनलाल बेबीमाधव 1961 पृष्ठ-04
41
१४ प्रतिमा नाटकम :
इतकी कथावस्तु रामायण से ली गई है। यह नाटक 7
अंकों का है। इसमें श्रीराम के वनवास से लेकर, रावा के अनन्तर राम
के अयोध्या लोटन तक को कथावस्तु अधिगत होतो है ।
भरत जब अपने
ननिहाल से वापस अयोध्या जाने पर अयोध्या के एक प्रतिमा गृह में अपने
मृत पूर्वजों का प्रतिमा के Arय दशरथ की भी प्रतिमा देखते हैं तो उन्हें
दशरथ देहान्त का आभास हो जाता है ।।
810 प्रतिज्ञा-यौगन्धरावंगा :
-
-a-Haram
इसको कथावस्तु का मोत गुणादय कृत वृहत्कथा है । इस
नाटक में महामंत्री यौगन्धरायण प्रतिक्षा करता है कि वह अपने राजा उदयन
को उज्जयिनी के राजा प्रद्योत के कारागार से मुक्त करायेगा । वह अपने
प्रयत्न में सफल होता है, उसकी प्रतिज्ञा सफल होती है
।
उदयन प्रद्योत की
राजकुमारी वासवदत्ता को अपने मंत्री को सहायता से अपहरण करके ले जाता
है और विवाह कर लेता है। योगन्धरायण की प्रतिज्ञा पूर्ण होने के कारण
हो इसका नाम प्रतिr योगन्धरायण' रखा गया है। इसमें अंक है ।
।। स्वप्नवासवदत्ता :
भास के सभी नाटकों में यह अतीय है और अत्यन्त
प्रसिद्ध है। रंगमंच और दृढ़-कथा-बन्ध से यह संस्कृत साहित्य कीअदितीय
रचना है।
यह प्रतिज्ञा योगन्धरायण नाटक का उत्तर भाग प्रतीत होता
है। इसमें मौजवर योगन्धरायण की दूरदर्शिता का प्रखर परिचय उपलब्ध
.. संस्कृत साहित्य का इतिहास : जय किसनलाल खण्डेलवाल,
पृष्ठ-50.
32 होता है । अपनी दूरदृटि के कारण योगन्धरायण वासवदत्ता के जल जाने का प्रचार फैला देता है और उदयन का दूसरा विवाह मगध की राजकुमारी पावतो से करा देता है और फिर मगधराज की सहायता से कौशाम्बी का नष्ट राज्य पुनः प्राप्त कराने में सफल होता है ।' अविमारकम : इस नाटक में 6 अंक है । इसमें कुन्ती भोज की रूपवती कन्या कुरंगी के साथ राजकुमार अविमारक के प्रेम विवाह का,मनोहर वर्णन है। 18 चरिदत्तम: इसके अभो तक अंक प्राप्त होते है । बसन्त-ना और चारुदत्त के प्रणय को अत्यन्त वोमलता के साथ रूपायित किया गया है । यह परवर्ती शूद्रक के मृच्छकटिक्स नाटक का मूलश्रोत प्रतीत होता है । भास का कृतित्व : KHABAR A कविवर भास का कृतित्व उपर्युक्त 13 नाटकों पर आधारित है किन्तु भात ने अपने उक्त 13 नाटक में से किती की प्रस्तावना में रचना- कार के रूप में अपना नामोल्लेख नहीं किया है जिससे कतिपय विद्वान् उक्त 13 नाटकों के प्रणेता के रूपसंद करते हैं जो समीचीन प्रतीत नहीं होता है। सदर प्राचीन काल में भारतीय साहित्यकारों की यह परम्परा रही है कि वे अपने नाम के प्रचारप्रसार और आत्म श्लाचा से दूर रहते थे। फिर भी परवर्ती साहित्यकारों और काव्यशास्त्रियों ग्रन्थों और कृतियों में कविवर भास के काव्यत्व की प्रा जो निरन्तर उन्लख प्राप्त होते है,उनसे भास के कृतित्व पर प्रकाश पड़ता है लेटिन आफ स्कूल बाफ बोरियन्टल स्टडीज,TouTROOTD1919.0- 233 तथा पुष्ट संस्कृत साहित्य का इतिहास-उपाध्याय.पृ०-512 43 कालिदास,बाणभट्ट, प्रसन्नराधार जयदेव, अव्यशास्त्री आचार्य दण्डी, नाट्य दर्पणकार रामचन्द्र और गुणवन्द्र बाबपति राज, वामन और अभिनव गुप्त राजार आदि भार परवर्ती बज्यों और आचाोंने अपने अपने ग्रन्यो नाटकार भासका उल्लेस कर भरसके उक्त नाटकों के प्रणेता के रूप मोहर लगा दिया है।' काव्यमीमांसrकार राजशजर भास को *स्वप्नवासवदत्तम नाटक का प्रणेता मानते और यही नहीं वैभास नाटक चक्र का उन्ले भी करते है। राकर भाल अद्भुत नादय कौशल की भीर- भर प्रपा भी तरते है, आलोचने *स्वप्नवासवदत्ता' नाटका की अग्निपरीक्षा ली लेकिन यह नाटक अदर' ही रहा । इसके अतिरिक्त अन्य नाटक भी नाट्याला दृष्टिले इसी प्रकार भाः। श्री गोलिता का परिचय देते हैं, अत: गणपति शास्त्री सारा प्राप्त समस्त 13 नाटक विवर भास विक्ति ही प्रतीत होते है । दलरी आत यह है कि सप्तम शताब्दी ईक जव बाणभट्ट ने उनके नाटकों के सम्बन्ध में कहते है कि भास के नाटक तधार से प्रारंभ होते देखने पर विदित होता है कि उक्त नाटक सूत्रधार से ही प्रारंभ होते है। अत: इन नाटकों प्रणेता भान अति- रित कोई अन्य नहीं है। प्रसन्न-राभव के प्रणेar जयदेव कविकुल गुरू कालिदास के साथ भाता गौरवपूर्ण र करते है। रमणी हाल की भाँति आलादुस्ता .. भास-मादक-चोकपिछ: क्षिप्त परीक्षित। स्वप्नवासवदत्तव्य दाइकोउभन्न पावकः ॥राजार काव्यमीमामा.0-50 • संस्कृत साहित्य का इतिहास.पूछ-19 उपाध्याय धामसः जबाफ भात,orrotoएRO-1922.Tom १. सूत्रधार तारमनीटमित.. सपना भानो देव गुरव बौखम्बा विr भवन, हर्ष-चरिता. 1 पृष्ठ-08.
इन सभी नाटकों में प्रतीयमान है, इसलिए ये भारत की कृति प्रतीत होते है। इसी तारतम्य में माव्यादर्श प्रणेता आचार्य दण्डी भाग विरचित नाटक- 30. व्य चारुदत्त ।.19 और गलवरित ।.15 T,अपनी उक्त कृत्ति में भाम ar नामोलस करते हुए एक श्लोज उदहरण देते हैं। लिम्पतीव तमोडमान,वर्षतीवाजन नमः । असत्पुरुष विव, दृष्टिविफलता गता ॥ चारूदत्तम । 19 एवं आल चरित 1.15 इसी प्रतीत होता है. इन नाटकों के प्रणेता भाय है, नाट्यदर्पण के प्रणेता रामचन्द्र या गुगवन्द्र ने स्वप्नवासवदत्त के प्रणेता के रूप में भासका ही उल्लेख किया है तथा स्वप्नवासवदत्ता के चतुर्थ के निम्नाकित श्लोक का उद्धरण भी दिया है 12 भारत नाटकों में प्राय: 'अग्निदाह का प्रकरण मिलता है. इसी आधार पर वापतिराज ने अपनी कृति ' गडडवहाँ भार को ज्वलनमित्र के रूप में अभिहित किया है । यथा- - *भामै ज्वलन मित्र कुन्तीदेवेव यस्य रखवारे । सोबन्धवे च बने हारीचन्द्रे व आनन्द: ॥ गडवही गाथा 800 अत: इस उल्लेख से भी यह प्रतीत होता है कि उक्त 13 नाटकों के प्रणेता कविवर भrसही है। 1. भाrera: अविल-गुरु:, बलिदासो विar:.प्रसन्नराव 1.22 चौखम्बा प्रकारान 1965 2 यथा भासत स्वनवासवदत्त शेषनिका शिलाकामवलोक्य वलरा: पादान्तानि पुष्पाणि सोमवेद शिलातला गुनकाचिदिवासीना मी दृष्टवा लखला मता ॥ नाट्यदर्पण, 35 वनवासवदत्ता 4.4.पृष्ठ 120.
45 इधर प्रसिद्ध काव्यशास्त्री वामन ने भी अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ 'काव्यालंकार-सूत्रवृत्ति' में स्वप्नवासवदत्त नाटक के 12 श्लोक तथा प्रतिज्ञा योगन्धरायण के 4.2 श्लोकों T आदर के साथ समुदत किया है। का व्यालंकार सत्रवृत्ति में भास के नाटकों के भिन्न-भिन्न श्लोकों के उद्धरण से यह सिद्ध होता कि उक्त 13 नाटकों के प्रणेता कविवर भास है, इसीलिए संस्कृत साहित्य के अनेक ग्रन्थों में अविच्छन्न रूप से निरन्तर उल्लेख प्राप्त होते है। । महामहोपाध्याय गमापति शास्त्री Tरा प्राप्त तथा त्रिवेन्द्रम की अनन्त शवनम ग्रन्थमाला में प्रकाशित 13 नाटकों के अनुशीलन और परि- शीलन से विदित होता है कि प्राय: सभी नाटकों में यत्र तत्र व्याकरण-शास्त्र के नियमों का वठोरता से पालन नहीं किया गया सभी नाटकों में अनुष्टुप छन्दों का सर्वाधिक प्रयोग तथा दण्डक और सुवदना आदि अप्रचलित छन्दों का सामान्यतया प्रयोग प्राय: सभी में प्राप्त होतr है । इन नाटकों में प्रस्तावना के स्थान पर स्थापना' शब्द का अलख पाया जाता है ; इसके अतिरिक्त प्राय: सभी नाटकों में मुद्रालंकार अर्थात् मंगलाचरण के प्रथम श्लोक में ही नाटक के प्रमुख पात्रों का परिचय उपलब्ध होता हैऔर प्राय: सभी नाटकों में पताका स्थानक का समावा किया गया है । इन नाटकों में प्ररोचना अर्थात लेखक तथा नाटक के नामों का उल्लेख नहीं मिलता है । जबकि अन्य नाटकों में कवि तथा कृति के नामों के उल्लेखों की परम्परा प्राप्त होती है । नाटकों के अन्त में प्राप्त होने वाले भरतवाक्यों आश्चर्यजनक 1. शरच्छशाक गोरेण वातावदेन भामिनि । काश पुष्प लवेनेदं साधुपात मुख मम ॥स्वप्नवासवदत्तम.8 काव्यालंकार सबत्ति 03.3 यासा बनिर्भवति मदहदेहलीनार,चाल्दत्ता । काव्यानकार सूत्रवृत्ति भपिण्डस्य ते मध्येच प्रतिडा-योगन्धराय2.का० सुत्रवति 15.
समानता है और इन नाटकों परस्पर सर्वाधिक समानता यह हैकि ये सभी 13 नाटक सूत्रधार से ही प्रारंभ होते है। सभी नाटकों की भाषा-शैली. प्रसाद गुण और अलकार संयोजन समानान्तर रूप से प्राप्त है। इस मन्धन विमन्थन से यह विदित होता है कि उपर्युक्त 13 नाटक कविवर भास विरचित ही है । डो0 ए0डी0पुसाल्कर ने अपने शोध प्रबन्ध में उक्त विषय पर तव्यों का विस्तार के साथ निरीक्षण और परीक्षण किया है और सभी 13 नाटकों को भाल की मीत माना है । उपर्युक्त मत का समर्थन करते हुए प्रो० ए०बी० कीथ का क्थन है कि इन 13 प्राचीन नाटकों अ शिकत: भास वर्तक कहा जाना मुख्यत: राजरोखर के,जो निश्चिय ही लगभग 100ई0 के आलोचक और आलोचक और नाटककार है, लक्ष्य पर निर्भर है । वे हमें बतलाते है कि इस समय,जबकि भrस के नाटकों की विशेषज्ञों द्वारा कठिन परीक्षा की गई थी, आलोचना की अग्नि से उनकी स्वप्नवासवदत्तम ही जीवित बचा था। स्वप्नवासवदत्ता अनेक आलोचको' के निर्णय में निःसन्देह रूप से सबसे श्रेष्ठ ठहरता है.और प्रत्येक दशा इतना प्रशंसनीय है कि उसमें राजशेखर की गोष्ठी में उक्त ग्रन्थों में सर्वष्ठ होने के रूप में सरलता से सामान्य मान्यता प्राप्त कर ली थी। पुनश्च नाटकों के प्रारंभ के प्रकार के संबंध में व्यामद करनाबों की विस्तृत राशि से यह तथ्य निकल आता है कि भास के नाटकों के विषय में बाण का यह उल्लबकि उनका आरम्भ सूत्रधार -- नान्धन्ते ततः प्रविशति सूत्रधारः स्वप्नवासवदत्तय प्रतिज्ञासौगन्धरायणप.प्रथम बैंक-प्रथम वाक्य सूत्रधार कृतारम्भनाटके बहुभिःमपताशी लेने भासी देवतुलरिब । हर्षचरित ए0डी0 पुलाकर, पृ०७ द्वारा होता है और सब कुछ कर चुकने के बाद, उपका अत्यन्त सरल और स्वाभाविक व्याख्यान इसी स्पट मत से होता है कि वे अर्थात बाण उन्हीं 13, नाटकों का उल्लेख कर रहे है ।। भास का जीवन : संस्कृत के अन्य अनेक कवियों की भाँति कविवर भास के जोवन सम्बन्ध अधावधि निरचयात्मक रूप। जानकारी देने वाली सामग्री का नितान्त अभाव । उनके सम्बन्ध में कुछ विदन्तियों श्रुति- गोचर होती है जिनसे भान्ति की ही सृष्टि होती है । एकक्विदन्ती के अनुसार भास' धावक थे, किन्तु यह सत्य प्रतीत नहीं होती है । आचार्य मम्मट के अनुसार धावक ' सम्राट् हर्षवर्धन के समकालीन थे । कविवर भास का समय कालिदास के पूर्व माना जाता है और हर्षवर्धन सप्त शताब्दी ई० के हैं। दूसरी किंवदन्ती के अनुसार भास और व्यास के मध्य प्रतिष्ठा का विवाद हुआ था, निर्णय के लिए दोनों के ग्रन्थों को अग्नि में डाल दिया गया था । अग्नि भात के ग्रन्धों तो नहीं जला सकी जिमले भास की विजय इस किंवदन्ती से यह प्रतीत होता है कि भास की तुलना यास से की गई है जो इस बात की और संवित करती है कि भास कालिदास के पूर्व- वर्ती है एक अन्य किवदन्ती के अनुसार भास का नाटक-चक्र जब अग्नि में डाला गया तो बनि स्वप्नवासवदत्त नाटक को नहीं जल सका । इसका अभिप्राय यह है कि भास की समस्त कृतियों में 'स्वप्नवासवदत्ता सर्वश्रेष्ठ है।' । संस्कृत साहित्य का इतिहास:०बी०कीय, अनुवादक मर्गलदेव शास्त्री. नान्धन ततः प्रविशति सूत्रधारः.स्वप्नवासवदत्तम् प्रतिहायोगन्धरायण प्रथम बैंक-प्रथम वाच्य सुधारन्तारमेनीटवर्बनिक सपनाशीने भास्ते देवकुलरिवा श्री हनादेविकादीनाम इव बना मम्मटवाव्यप्रकारासानमण्डलपकाशन1960 भास के ग्रन्थों का अनुशीलन परशीलन करने के पश्चात डॉo एण्डीपुलावर ने कहा है कि भात एक धर्मभीरू ब्राहमण थे, वे दक्षिण के नहीं प्रत्युत्त उत्तर भारत के निवासी *स्वप्नवासदत्तम' और 'बाल- चरितम' नाटको 'नाटको के भरत वाक्यों में वे ईश्वर से प्रार्थना करते हैक उनका राजा हिमाचल और विन्ध्या चल रूपी डलवा ली पृथ्वी का एकत्र राज्य करे 12 इसरे यह प्रतीत होता है कि हिमालय और विन्ध्याचल दोनों पर्वतों के मध्य उत्तरी भारत का ही कोई भाग भास का निवास स्थान था। देवताओं और यागादिविधियों तथा वर्णाश्रम व्यवस्था में भाल की पूर्ण आस्था थी। गाय को वै आदर की दृष्टि से देखते। वे किसी राजा के राजपण्डित थे। उन्होन अपने राजा को राजसिंह के नाम से अपनी पत्तियों में अभिहित क्या है : यह विदित नहीं है कि राजसिंह' शब्द व्यक्तिवाचक संज्ञा के रूप में प्रयुक्त हुआ है या विशेषण के रूप में भात राजघरानों और शाही जीवन भलीभौति परिचित थे। वै हास्थप्रिय, विनम्र स्वभाव और प्रत्युमन्नमति वाले पण्डित-प्रवर थे। वे मानव स्वभाव और प्राकृतिक सौन्दर्य के प्रेमी एवं पारखी थे । ऐसा प्रतीत होता है कि उनका पारिवारिक जीवन सुखी था । वे कर्तव्यपरायण पुत्र, साध्वी पत्नी के पति और सन्तान प्रेमी पिता थे। माननीयों का वैमान करते और संयुक्त परिवार प्रणाली के समर्थक थे । वै आशावादी और राष्ट्रीय भावना से ओतप्रोत थे । भास न्याय और स्वतन्त्रता के Munie RANA 1. पण्डीपुसाकर : भास, ए स्टडी, पु0 30 2. हमी सागरपर्यन्ता हिमवादिन्ध्य डलास | महीमेकातपत्राका राजसिंहः प्रशास्तुनः स्वप्नवासवदत्तय: भरतवाक्य 6.19. बालचरितमभरत वाक्यम्.17 ।
49 प्रेमी थे और वैष्णव धर्म के अनुयायी थे। उन्होंन संस्कृत साहित्य और अनेक शास्त्रों का गल्न अध्ययन किया था । सीप में वे विपुल व्यक्तित्व के धनी थे।' भास के नाटकों की संख्या तथा उनके कार्यविषय की विविधता - से यह स्पष्ट रूप से विदित होता है कि उनको प्रतिभा मौलिक थी तथा उना मस्तिष्क अत्यन्त उर्वर और रचनाधर्मी था । भासका रचनाकाल: संस्कृत के अन्य अनेक कवियों और नाटककारों की तरह काक्वर भास के रचनाकाल के सम्बन्ध में नि:सदिग्ध-रूप में और निर्णय के साथ,प्रमाण- । सामग्री के अभाव में बुछ कह पाना संभव नहीं है,फिरभी उनके आविर्भाव काल के सम्बन्ध में एक स्थूल रूपरे या अवय खींची जा सकती है । भास के आविर्भावाल की समस्या को हल करने के लिए पूर्व में अनेक प्राच्य और पारचात्य विद्वानों ने चिन्तन और मननकिया है, बदनुसार उन्होंने अपने अपने मतमतान्तर स्थापित किए हैं। भास के रचना- काल के सम्बन्ध में अपने विचार व्यक्त करने वाले प्रमुख विद्वानों में प्रथम महामहोपाध्याय गणपति शास्त्री,डॉ0ए0डी0पुस्तस्कर, श्री हर प्रसाद शास्त्री, ज डॉ० जायसवाल, स्टेनकोनी, भडारकर, जैकोबी, डॉ०ए०बी०कीयविन्टर- निट्स और महामहोपाध्याय, रामावतार शर्मा प्रभूत विदवज्जन है। यपि उपयुत विद्वानों का एतत्सम्बन्धी चिन्तन प्रस्तुत विषय में प्रवेश हेतु कृतवाधार' की तरह प्रतीत होता है,फिरभी जन्तरंग और अहिरंग प्रमाणी 1. प्रतिज्ञायोगन्धरायण भूमिका- डॉ० प्रभाकर शास्त्रीः इण्डिया बुक हाउस,जयपुर-1981, पृष्ठ-8.
50 के परीक्षण के अनन्तर भास के रचनाकाल के सम्बन्ध में कुछ इस प्रकार कहा जा सकता है ।। भास के स्थितिकाल के सम्बन्ध में आज भी मतभिन्नता विद्यमान है किन्तु प्राप्त प्रमाण सामग्री का संक्ति एक विशेष काल खड की और सक्त करता प्रतीत होता है। सर्वप्रथम कौटिल्य अपनी महा कृति अर्थशास्त्र में युद्धोत्र में वीरों के उत्साहवर्धनार्थ जिन दो रलोकों का उद्धरण देते हैं, उनमें से एक "प्रतिज्ञा योगन्धरायण नामक नाटक से लिया गया है । यह सर्वविदित है कि चाणक्य सम्राट चन्द्रगुप्त के आचार्य थे। ऐतिहासिक माक्ष्यों के आधार पर यह निश्चित है कि चन्द्रगुप्त 321 ई०पूर्व में राजसिंहासन में आसीन हुआ था। कौटिल्य जैसे राजनीति धुरन्धर प्राप्त महापुरूर्षे द्वारा कविवर भास क्त प्रतिज्ञा यौगन्धरायण नाटक के 4.2 श्लोक का आदर के साथ उध्दरण यह सिद्ध करता है कि चाणक्य के समय तक कविवर भास अत्यन्त प्रख्यात हो चुके थे। चाणक्य का समय 400 ई0 पूर्णमाना जाता इस लए भास का समय भी 400 ई०पू० के पहले ही होना चाहिए । भास के ऐतिहासिक नाटकों में मुख्य रूप से तीन राजाओं की कथावस्तु को आधार बनाया गया है, प्रथम कौशाम्बी के राजा उदयन, दुसरे उज्जयिनी के राजा प्रधीत और तीसरे मगध के राजा दर्शक । प्रसिद्ध THI 1. संस्कृत नाटकाए०बी०कीथ, अनुवादक-डोउदयभान सिंह 1965 संस्करण पृष्ठ 86-8. 2. नवं शमव सनिलः सुपर्ण सुसंस्कृत दर्भकृतीस्तरीयप । तत्वस्य माभूवनरक व गच्छेद यो भवीपण्डस्य कृतेन युध्यत । अर्थात्र 10.3.प्रतिज्ञा योगन्धराया 4.2 51 इतिहासकार विसन्ट एof क्षय के अनुसार उपर्युक्त नृपातिय समकालिक थे और इनका शासनकाल 475-450ई0पृ० था । उक्त प्रमाण के प्रकाश में भास का भी समय चतुर्थ और पंचम शताब्दी के मध्य में निरिक्त होता हुवा प्रतीत होता है । भास के बन्य नाटक रामायण और महाभारत की कथr पर आधारित है, रामायण और महाभारत का समय छठी शताब्दी ई०पू०और पंचम शताब्दी ई०पू० माना जाता है। इसलिए भास का स्थितिकाल वाल्मीकि और व्यास का पश्चातदवर्ती काल 475 या 450 ई0पूर्व में होना चाहिए । भास विराचित प्रतिमा नाटकम् में इस नाटक का प्रमुख पात्र रावण अपने को जिन शास्त्रों का महापण्डित बतलाता है वे शास्त्र और उनकै प्रणेता अत्यन्त प्राचीन प्रतीत होते हैं । तदनुसार रावण कहलता है कि मै अयपगोत्री हूँ। मैं सोंगोपांग वेदों का अध्येता हूँ, मानवीय धर्मशास्त्र, महोश्वर योगशास्त्र, वृहस्पति प्रणीत अर्थशास्त्र, धातिथि प्रणीत न्यायशास्त्र और प्राचतस श्राद्धकल्प का ज्ञाता हूँ।' इसमें उल्लिखित मानवीय धर्मशास्त्र मनुस्कृति का सूचक नहीं है, प्रत्युत धर्मसूत्रकार गौतम परा विचित मानवीय धर्मशास्त्र का बोधक है। गोतम का स्थितिकाल 600ई0पू0 माना जाता है । इसी प्रकार मालवर योगशास्त्र अद्यावधिविदित नहीं है, जो अत्यन्त प्राचीन परिलक्षित होता है । सम्प्रति प्राप्त पातंजल योगा स्त्र है जिसका रचनाकालद्वतीय शताब्दी ई०० है । ऐसे ही वृहस्पति विरचित अर्थशास्त्र का भास हारा । राका:-भोः काश्यपगोत्रीडामा मागोपागं वेदम धीये, मानवीय धर्मशास्त्रा. माहवर योगाव.वाईस्पत्य मशास्त्र प्राचेतस बाडकल्प च। प्रतिमानादका रामप्रसाद एड ब्रदर्स-1995संस्करण,अंक-5,40-68 52 उल्लेख यह सिद्ध करता है कि कविवर भास टिल्य से पूर्ववर्ती थे, अन्यथा वै वृहस्पति के अर्थशास्त्र के स्थान पर कोटिल्य के अर्थशास्त्र का उल्लेख करते। वृहस्पति का अर्थशास्त्र आज भी विदित नहीं है जो कोई अति प्राचीन अर्थशास्त्र रहा होगा । अत: प्रतिमानाटक के उपर्युक्त उद्धरणों से यही प्रमाणित होता है कि भास लगभग 400 ई00 से 600ई0पू0 के मध्यान्तर में रहे होगे । भास विरचित चारुदत्तम् ' नाटक का प्रभाव शद्रक के मृच्छकटिकम नाटक पर स्पष्टरूप से दिखाई देता है । इतिहासकार विन्सेन्ट A के अनुसार शुद्रक का समय 220 ई० पूर्व से 197ई0पूर्ण है । अत: भास का रचनाकाल इसके पूर्ववर्ती होना चाहिए ।' डॉ० एostoपुसाल्कर के अनुसार भास के नाटकों में व्यक्त सामाजिक अवस्था मौर्यकाल की सामाजिक अवस्था के सदृश है, इसमें भी भास का समय चतुर्थ या पंचम शताब्दी ई०पूर्व निश्चित होता है 12 इधर कविकुल-गुरु-कालिदास अपने प्रसिद्ध नाटक मालवि- काग्निमित्रम में भास के कवित्व और प्रबन्ध की भरि भूरि प्रशंसा करते है। इससे यह सिद्ध होता है कि ये कालिदास ई०प० प्रथम शताब्दी या चतुर्थ शताब्दी ई० गुप्तकाल से पूर्ववर्ती है ।' कविवर आप्स ने तो भास के -- slemman- 1. प्रतिज्ञा योगन्धरायणः भूमिका.डॉ० प्रभाकर शास्त्री, पृ० ।। इण्ड्यिा बुक हाउस,जयपुर 1981. 2. भास: ए स्टडी. पृष्ठ 15. घ0डी0पुसावकर 3. प्रभित यासा भास सोमिल कवि पुत्रादीनाम प्रबन्धानतिळम्य वर्तमानक्वः कालिदासस्य बुलौ का बहुमानः । मालविकाग्निमित्र...
53 कवित्व को एक स्वतंत्र श्लोक में भरि भरि प्रशंसा की है ।' इस अनुशीलन परिशीलन से और अनेक विद्वानों से प्राप्त बहुमतों से यह निश्कर्ष प्रस्फुटित होता है कि कविवर भास कौटिल्य कालि- दास, शूद्रक और वाण भट आदि के पूर्ववर्ती तथा चतुर्थ या पंचम शताब्दी ई०पू० के प्रख्यात नाटककार थे। यद्यपि डॉकीय 300ई0 के आसपास ही भात का रचनाकाल मानने के पक्षधर है 12 भास का व्यक्तित्व एवं कृतित्व : भास का व्यक्तित्व और कृतित्व महान है । उनको कृतियों के अध्यान से पदिल होता है कि वे वेद वेदाग,धर्मशास्त्र,योगशास्त्र, अर्थात, न्यायशास्त्र और कला शास्त्र आदि विविध शास्त्रों के अध्येता और वत्ता थे। वे काव्य-शास्त्र, अलकार शास्त्र, ज्याकरण शास्त्र के मर्मत उनकी कृतियों में कविता का उत्कर्ष प्राप्त होता है । नाटकान्त- कवित्व के कथनानुसार उनका कवित्व उनके 13 नाटकों में प्रतीयमान है। जो उनके कवित्व का यूठान्त-निदर्शन है। आज भी भान अपनी कालजयी रचनाओं के कारण संस्कृत साहित्य के सर्वप्रथम और श्रेष्ठ नाटककार के रूप में विख्यात है । विषयवस्तु की विविधता और नाटकों की बडुलता,उनके नाट्य कौशल के ज्वलन्त प्रमाण है। सर्वबनसहज बोष भाषा, प्रसाद गुण युक्त वैदर्भी शेली, यथार्य वर्णन व्यक्ति वैचित्य, मिश्रित चरित्र चित्रण, प्रवाहपूर्ण सजीवता और शक्तिमत्ता का पूर्ण एकाधिकार उनके नाटकों की कतिपय प्रमुख विशेषतायें है । PmM IHAR 1. हर्ष चरितम 1.15 पृष्ठ । 2 संस्कृत नाटक : ए०बी०कीथ, पृष्ठ-88,मोतीलाल बनारसीदास,1985 3. प्रतिभा नाटक्य बैंक-5.पृष्ठ 68 4. संस्कृत साहित्य का इतिहास :ए0बी0कीय अनुवादक मंगलदेव शास्त्री पृष्ठ 12, मोतीलाल बनारसीदास, 1967
54
विशुद्ध मौलिकता तथा कल्पना वेचिश्य के कारण उनके
नाटक कहीं-कहीं नाट्य-शास्त्र के निर्धारित नियमों के अनुपालन में भले ही
शिथिल हो गए हो फिरभी उनके नाटक संस्कृत साहित्य की अमूल्य निधि
हैं। प्रत्येक नाटक की कथावस्तु प्रभावोत्पादक है । घटनाओं द्वारा
विकसित करने के लिए उन्होंन ऐसी शैली का अनुगमन किया है कि उनमें
स्वभाविकता,गतिशीलता के साथ-साथ रस ता सम्यक एवं समुचित परिपाक
होता माना
।
भाल का 'स्वप्नवासवदत्त अनेक आलोचकों के निर्णय
में नि:सन्देह रूप में सर्वश्रेष्ठ है,और प्रत्येक दशा में इतना प्रशसनीय है कि
उसने राजशेखर को गोष्ठी में नाटकचक्र में सर्वश्रेष्ठ नाटक होने का गौरव
प्राप्त कर लिया था।'
कालिदास स्वयं,जो आन्तरिक साक्ष्य से इन नाटकों के
साथ स्पर्धा करने का प्रयत्न करते हुए,से दिखाई देते हैं, खेदपूर्वक उस बड़ी
कठिनता को स्वीकार करते है जिसम अनुभव भास के साथ प्रतियोगिता
करने में एक युवक कवि को होना चाहिए । फिरभी कालिदास को छोड़-
कर भास सबसे बड़े अष्ठ नाटककार है 12
कविवर भास संस्कृत के सर्वप्रथम एकाकी नाटककार है
उन्होन प्रथम बार संस्कृत में अनेक रोचक एकाकी नाटकों की रचना की है-
उनके एकाकी निम्न है -
wamir
motion
। उहभंग
12 इतवाक्य
। भासनाटकचक्रेडपि छ: क्षिप्तीपरीमितुम ।
स्वप्नवासवदत्तस्य दाहकोभून्न पावकः ॥
राजरोखर काव्य-भीमासा.पु. 50
2. संस्कृत साहित्य का इतिहास, ए०बी०कीय,पृष्ठ-12, 1967
13 दृत घटोत्कचम् 148 मध्यम व्यायोगम यह श्रेय नाटककार भास को जाता है,जिन्हौन महाभारत को लतम व्या वस्तु को आश्य बनाकर उपेक्षणीय घटना संघटन में अपने नेपुण्य और नाट्य-कौशल ते पाठकों के लिए रोचक और अभिनय मना दिया है। यही नहीं भात ने अपनी कृतियों में नाटलीय तत्वों को अभिनव कल्पना से अनुजित करके मोहक संजीवनी से ऐसा अनुप्राणित कर दिया है कि नाटक के एक एक तत्व ह रहे है यही नहीं, उनके नाटकों में उनकी कल्पनाशक्ति का सामर्थ्य अवलोकनीय है। उनके नाटकों की सर्वोपरि विशेषता यह है कि जहों एक और संस्कृत के नाटक अभिनय के अयोग्य है, वहीं दूसरी ओर भात के नाटक अभिनय और संस्कृत रंगमंच के लिए सर्वथा उपयुक्त, सरल और सुबोध है ।। बहुशा स्त्रज्ञ होने के कारण जहाँ एक ओर कक्चर भास विपुल व्यक्तित्व के धनी है,वहीं दूसरी ओर उनाट्य ग्रन्थों के प्रणेता होने के कारण उनकी कृतित्व भी महान और संस्कृत के अन्य नाटककारों की तुलना में महनीय है। उनकी अभिनयता एवं भास के नाटकों की सर्वोपरि विशेषता मंचन के सर्वथा उपयुक्त है। इसका मुख्य कारण यह हैकि इन नाटकों में वर्णनों का विस्तार नहीं है जो अभिनय के लिए बनावश्यक अवहेलनीय हो । कथावस्तु भी अधिक विस्तृत नहीं है,जो कायान्वति को बाधित कर सके । ये सब रूपक नाटकीय दृष्टि से चुस्त, व्यवस्थित बोर सुतटित है। पात्रों का संवाद 1. संस्कृत साहित्य का इतिहास : बल्देव उपाध्याय,.1968संस्करण पृष्ठ 522.
सुचिन्तित सुप्रयुक्त और नियोजित है । सभी पात्र प्रयोजनानुसार मितभाषी है। इसीलिए भास के नाटक नाट्य शास्त्र की दृष्टि से अभिनय - और आदर्श हैं। दशरूपक के अनुसार आरोप या अनुकृति के समान होने पर भी वस्तु नेता और रन के भेद से रूपकों में भेद होता है । 1' कथावस्तु की दृष्टि से भास के नाटक रामायण क्या, महाभारत कथा और वृहत्कथा जैसे तीन उपजीव्य ग्रन्थों से सम्बद्ध हैं। रामायण कथाले सम्बन्धित प्रतिमा- नाटक उनका श्रेष्ठ नाटक है । इस नाटक में भाग ने एक नवीन कल्पना से कथानक को विस्तार दिया है । देवकुल की कल्पना उस युग की मान्य कल्पना थी। जन प्रत्येक राजा के राजगृह में एक मन्दिर अलग से निर्मित होता था, जिसमें राजा की मृत्यु के पश्चात उसली पाषाण मूर्ति वहाँ स्थापित की जाती थी। राजगृह के मंदिर में दशरय की पाषाण मूर्ति देखकर राजकुमार भरत को विदित हो जाता है कि उनके पिता दशरथ दिवंगत हो गये है। यह भास की कोरी कल्पना नहीं है, प्रत्युत यह तत्कालीन ऐति- हासिक तथ्यों पर आधारित है । अज्ञातशत्रु तथा बिम्बसार की पुरुषाकृति मूर्तियों से इस तथ्य को पर्याप्त पुष्टि होती है।' कविवर भास नाट्यशास्त्र के निर्धारित नियमों का दृढ़ता के साथ पालन नहीं करते। रंगमंच में बाली का जब इसका निदर्शन हेतु प्रतिभानाटक्य अवलोकनीय है। मादशास्त्र की मान्य परम्परा के अनुसार संस्कृत में दुखान्त नाटक लिखने की परम्परा नहीं है किन्तु भास का 1. वस्तु नेता रसस्तका पदकः । दशपक ...पृष्ठ 7 2 संस्कृत साहित्य का इतिहास, बन्देव उपाध्याय, पृष्ठ 23
57
का उल्भंग संस्कृत का दुखान्त नाटकहे । यहाँ भी दुर्योधन का वध रंगमंच
में दिखलाकर, भास ने अपने स्वतन्त्र चिन्तन का ही परिचय दिया है और
भरत विचित नाट्यशास्त्रीय नियमों की अवहेलना की है।
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यपि
भास के नाटकों में गुणों की प्रचुरता
विदवानों ने उनके नाट्य-दोषों के प्रति भी कित किया है। तदनुसार
उनके नाटको में कालान्विति का अभाव खटकता हैऔर कंचुकीय धात्री तथा
-
चेटी आदि साधारण पात्रों का रंगमंच में दुततरगति से प्रवेश नाटकीय लयम
की सीमा को लांघ जाता किन्तु गुणों के समूह में एक दोष चन्द्रकिरणों
में फलक की भाति अदृश्य हो जाता है 12
महान नाटककार:
कविवर भात की नाट्य नतयों को देखकर यह निश्चित रूप
से कहा जा सकता है कि भास एक महान नाटककार थे।
विषय वस्तु की
विपुलता और नाटकों की बहुलता, उनके महाप्राज्ञ नाटककार होने के प्रजन
प्रमाण है।
उनके नाटकों को भाषा सहज, सुबोध और प्रसाद-गण-सम्पन्न
है। शेली स्वाभाविक होते हुए भी अपनी विशिष्ट महत्ता रखती है ।
इनकी शनी में व्यंजकता तथा प्रभावोत्पादकता का मणिकांचन-सयोग दिखाई
देता है। छोटे-छोटे वाक्यो में गम्भीर तथा रसपेशल भावों की व्यंजना
अपना विशेष महत्व रखती है । इनके नाटकों में भी लघु विस्तारी और
सरल वाक्य प्रयुक्त हुए हैं, इनसे भास सफलता के शिखर पर आसीन हो गए
है। इनके नाटकों की सरल संस्कृत भाषा देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि
भास-नाटक-चनम: बन्देव उपाध्याय, पृष्ठ
2. एको हि दोषी गुणमनिपाते,नितीन्दोः किरणविवाकः ।
58 अस्तृत अवयमेव लोक-व्यवहार की भाषा रही होगी ।। छोटे-छोटे वाक्यो' को लोकोक्तियों तथा सक्तियों से अलंकृत करना भास की शैली का विशिष्ट । गुण है। नाटककार भास की अलेकार विहीन सरल भrar प्रभावो- त्पाद है और भावों को अभिव्यक्त करने में पूर्ण समर्थ है । यही कारण है कि भास के नाटकों के पाठक का हृदय उस ओर बलाव आकृष्ट हो जाता है। । नाटकों में उपलब्ध कथनोपयन भास की विदग्धता और उनके चातुर्य में प्रमाण है। फिर जबक्ति और प्रत्युक्तियों के बीच जहाँ अप्रत्याशित घटना टपक पड़ती हो,वहाँ नाटकीय रसवर्वणा में अत्यन्त मधुरता उत्पन्न हो जाती है । उदाहरण के लिए जब प्रतिज्ञायोगन्धरायणा में महासेन अपनो महारानी से पुत्री वासवदत्ता के वर के विषय में विचार विमर्श कर रहा होता है तो उसी समय कधुकीय सहसा प्रवेश कर उदयन का नाम लेता है 12 यह उक्ति पाठकों और दर्शकों के हृदय को सहसा झमोर देती है । ऐसी आकस्मिक उक्तिया भास की अपनी विशेषता के रूप में हैं और अन्य नाटकों में इनकी सम्यक् उपलब्धि होती है । भास की शैली के तीन प्रमुख गुण हैं - प्रसाद, बोज और माधुर्य । ये तीनों गुण उनके नाटकों में सर्वत्र दिखाई देते हैं । अवस्था व्या समय के अनुसार उनकी शैली में सहसा परिवर्तन हो जाता है जिससे प्रभावी- त्पादकता और व्यंजक्ता में वृद्धि हो जाती है। अपने भावों की व्यंजक्ता में भास इतने सिद्धहस्त है कि कहीं भी विवक्षित भाव दब नहीं पाया । सीमित शब्दों एवं सरल भाषा के द्वारा विभिनत अर्थ की अभिव्यक्ति, १. भासनाटक्या: 0 बल्देव उपाध्याय, पृ० 128. 2. एल नानानाभवन्त गोमात्र । कस्त वे तेवी पात्रता याति राजा ॥ प्रतिज्ञायोगन्धराया 1.8 कदकीयः बत्सराजः। वही,OB यह कविवर भस की असामान्य और सम्मान्य विशेषता है । मौन भाषण भी भास की शैली का एक अतिरिक्त गा प्रतीत होता है । प्रयोग के द्वारा अधिकाधिक भावों की अभिव्यंजना के अतिरिक्त मौन से भी अर्थबोध संकलित है, कवि का यह मौन रस तथा भावों की प्रतीति में सहायक है। भास की नाट्यकला की सफलता में पात्रों के चरित्र चित्रण का भी विशेष महत्व होता है। इनके नाटकों में अनेकविध चरित्र मिलते - है,जिनका चित्रण भास ने बड़ी सफलता के साथ अपने नाटकों में लिया है कविवर घाण का इसविषय में यह कहना कि सत्रधार से आरंभ होने वाले बहु भूमिका वाले पताकायुक्त भास के नाटक देवमन्दिरों की भाँति प्रशंसनीय है. भास के नाटकों में बहुविध पात्रों की ओर संकेत करता है । पर यह बात विशेष महत्व को है कि उनके नाटकों में इतने अधिक पात्रों के होने पर भी एक भी पात्र ऐसा दिखाई नहीं देतr जिसे हटाया जा सके । नाटककार भास के प्राय: सभी पात्र सामान्य धरातल पर खड़े दिखाई देते है । अति सर्वत्र वर्जयत् ' इस सिदान्त का उन्होंन कभी उल्लन नहीं किया है। निम्न पात्रों में भी उन्होंन यथा साध्य गुणों का सन्निका क्या है : उच्च पात्रों के विषय में तो कहना ही क्या है । उनके विभिन्न नाटकों में जिन आदर्श पात्रों की सृष्टि हुई हैं, उनमें भरत बादर्श भाई है, वासवदत्ता और पदमावती आदर्श महारानिया और सपत्निया है, सुमन्त्र और योगन्धराया आदर्श अमात्य है, वसन्तमना आदर्श गणिका है, भास-नाटक-च्छाबाचार्य बन्देव उपाध्याय,1965.पृ० 132. सूत्रधारतारम्नाटकेहु भूमिकः । हर्षचरितय 1.5 60 और उदयन तथा चारुदत्त आदर्श प्रेमीयुगल है । सर्वत्र आदर्श, आदर्श ही है। वे इन पात्रों के चरित्रावन, अपनी उत्कृष्टता और श्रेष्ठता के लिए सदैव स्मरणीय रहेग । भास की नाट्यकला श्रेष्ठ और प्रशंसनीय है। इसमें प्राय: सभी अपेक्षित नाट्य तत्वों का समावेश कवि ने किया है। रूपको में वस्तु, नेता और रन मुख्य रूप से घटक माने जाते है ।' कथावस्तु के चयन में भास का क्षेत्र व्यापक है, रामायण, महाभारत, वृहत्कथा तथा पुराण साहित्य में प्राप्त कथावस्तु को लेकर ही कवि ने अपने नाटकों की कथावस्तु का गुम्थत क्यिा है । नायकों ओर नायिकाओं के चरित्र प्रस्थापन में भास की मौलि- क्ता प्रशंसनीय है । इस परिपाक की दृष्टि से भास के नाटक अपेक्षित उच्चता को संस्पर्श करने में सफल हुए है भास ने नाट्यशास्त्र की परम्परा- नुसार वीर और श्रृंगार रस को ही प्रधान रस के रूप में प्रस्तुत किया है किन्तु इन्होन प्रतिभा नाटका' में ऋण रस को अंगीरस के रूप में प्रस्तुत किया है। अन्य सभी रस गोण रूप से यथा स्थान प्रस्तुत किए गए है । की निपत्ति में भी निपुर्ण है, इसीलिए कविवर जयदेव ने उन्हें कविता- कामिनी का हास' कहा है। कहना न होगा कि भrसके नाटकों में उनका काव्य-कौशल पूर्णरूप से प्रस्फुटित हुवा प्रस्फुटित हुआ है । नाना प्रकार की छन्दोयोजना और अलंकार 1. वस्तु नेता रसोपा भेदकः ।, दशरूपक * पृष्ठ 07 2 एक एव भवेदमी गारी वीर एव वा । अगमन्ये रसा: सर्वे कार्य निर्वहणेतः ॥ दशपक-3.33.40 161 भालो हास: कविकुलगुरू: कालिदासो विलासः । प्रसन्नराधम पु० -5.
विधान प्रशंसनीय है। उनके नाटकों में उपमा, उत्प्रेक्षा और अर्थान्तर न्यास आदि अलंकारों की छटा अवलोकनीय है । नाटकों की अभिनयता : भास के सभी तरह नाटक अभिनय की दृष्टि से सफान नाटक न तो इनमें वर्णों का विस्तार है और न शब्दाडम्बर ही है । । कथानक, वाद, पात्र, भाषा शैली, लघु कलवर आदि सभी दृष्टियों से ये नाटक अभिनय के लिए उपयुक्त जोर आदर्श है । भास का स्वप्नवासवदत्तम' नाटक तो अभिनय के लिए सर्वोत्तम नाटक है। पूर्व की भाँति आज भी इस नाटक का मंचन प्रचुरता से होता है । भास के नाटक चक्र में स्वप्नवासदत्तम के अदग्ध होने की बात इस नाटक की अभिनय की दृष्टि से भी श्रेष्ठता को प्रमाणित करती है | भास का प्रकृति वर्णन स्वाभाविक और मनोहारी है । स्वप्नवासवदत्त के प्रथम अंक में वन प्रान्तीय संध्या का वर्णन दर्शनीय है।। पक्षीगण नीडो में चले गए हैं, मुनिवर स्नान करने के हेतु जल में प्रविष्ट हो गए हैं, सायकालीन अग्नि प्रज्वलित हो गयी है, धूम तपोवन में चारों ओर पैल रहा है बोर भगवान भास्कर अपनी किरणों को सोमटकर अस्ताचल में प्रवेश कर रहे है। कविवर भास के नाटकों में उपलब्ध सुभाषितों के अनुशीलन से विदित होता है कि वे नीतिशास्त्र के प्रखर देता थे, उन्हें जीवन और जगत RANE खगा वासोपेता: सलिलमव गाढी मुनिजन: प्रदीप्तोडाग्नीति प्रविधतिमो मुनिवनय । परिभ्रष्टो दुराद रविपि च संक्षिप्तकिरणो स्थ व्याबासो प्रविाति शनरस्त शिखरम 62 PANI तथा समाज की गति का पूर्ण ज्ञान था । तदनुसार मनुष्य की भाग्यक्ति चक्रार पक्ति की तरह परिवर्तनशील है। इसी प्रकार उनके सभी नाटक में दुर्लभ सुभाकित भरे पड़े है जिनसे उनके नीतिविषयक ज्ञान का चित्र रेखाक्ति किया जा सकता है । अब विस्तार भय से उक्त विस्य पर यहीं विराम लिया जाता है इस प्रकार स्पष्ट है कि कविवर भास संस्कृत नाट्य-साहित्य भितिज के कभी न कुझने वाले ज्योतिपुंज हैं। वै वेद,वेदाग, पुराण, उपपुराण रामायण, महाभारत और वृहत्कथा आदि विविध ग्रन्थों के पडित काव्य- शास्त्र के अतिीय वेत्ता और विपुल नादयकृतियों के महान प्रणेता है । वे एसे रससिद्ध कवीश्वर हैं जिनके यशरूपी शरीर में जरा और मरण का भय नहीं है । 'तापसवत्सराजस' के प्रणेता : 'तापस-वत्सराजम' नाटक के प्रणेता कविवर अनंग हर्ष मातराज है जिस प्रकार संस्कृत के अन्य कवियों के सम्बन्ध में ऐतिहासिक सामग्री प्राप्त न होने के कारण उनके जीवन-काल और जन्म स्थान के सम्बन्ध में निचयात्मक रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता ; उसी प्रकार कविशिरोमणि अनंग हर्ष मातृ- राज के सम्बन्ध में भी निरचयात्मक रूप से कुछ कह पाना संभव नहीं हैं। फिर 2 1. चारपवितरिव गच्छति भाग्य पक्तिः । स्वप्नवासवदत्ता 14 वन्या स्ले सुकृतिनः रससिद्धाः कवीश्वराः । यणी नास्ति याः काये जबामरण भयम् ॥ उभटसाचार पृ०5 63 भी कवि के जीवन-काल के सम्बन्ध में कुछ स्थल रूपरेखा खींची जा सकती है। - तापल-वलराजन नाटकम की प्रस्तावना में कवि ने अपने सम्बन्ध में कतिपय परिचयात्मक बातों का उल्लेख किया है जिससे कवि के जीवनवृत्त पर अति संक्षिप्त प्रकाश डाला जा सकता है । प्रस्तावना में नटी-सत्रधार के संलाप से यह स्पष्ट रूप से विदित है कि 'तापस वत्सराजम' नाटक के प्रणेता कविवर श्री अनंगहर्ष मातराज' ही है। इनके पूज्य पिता का नाम श्री नरेन्द्र वर्धन ' है। यह तत्कालीन राजाओं में तारागण में चन्द्रमा के समान सुप्रतिष्ठत थे । इसलिए कविवर अनंग हर्ष मातराज राजपुत्र हैं। इनके दो नाम है - अनंग हर्ष और मातराज ।' तत्कालीन समाज में कीव की कृति 'तापस वत्सराज के प्रति लोगों में बहुत अनुराग था । नाटक की प्रस्तावना में सूत्रधार के कथनानुसार यह कवि उत्तम आचरणवान, प्रति गुणी लोगों को प्रसन्न करने वाला,प्रणयीजनों को प्राण देकर भी प्रसन्न करने वाला और अन्य कविजनों की रचनायें सुनकर रोमाचित होने वाला सहृदय है 12 इसके पश्चात कवि यह भी कहता है कि उसने तापम-वत्सराज नाटक की रचना अपनी विद्वमाडली से प्रभावित हो कर की है : कवित्व के दर्द या व्याभूचित्त से नहीं । केवल इतना ही सूत्रधारः आर्य, अधीका ननु तस्येव सकल नरेन्द्र चन्द्रमस: श्री नरेन्द्रनि मनो: अनंग हर्षा पर नाम्नः श्री माताजस्य तो कृतानुरागो बनः सम्प्रति । तापमवत्सराजम. प्रस्तावना. पृ० 02 सहवत्तानुगती गली गुगवतामाराधनानुशापाम कतु वाति सर्वदा प्रणयमा प्राणपि प्रीणनय । मात्सर्य दिनाक्तः परकृती:गवन्यात्युवक: रानन्दाजलावा तमुखी रोमाचपीना तनुयावही, 2.पृष्ठ-2 2.
नहीं यह कवि विद्वदगोष्ठियों का प्रवर्तयिता भी रहा है । विदवद् गोष्ठी में पदवाक्य-प्रमाण और वेदवेदीग के धुरन्धर विद्वान था। नाटक के सूत्रधार के उक्त कथनों से यह स्पष्ट रूप से विदित होता है कि यह कवि विद्या-विनय से सम्पन्न था। कवि की कृति तापसवत्सराज में जिल प्रेम, सोजन्य और स्णा का निबन्धन किया गया है,वह स्वयं सीख हृदय से प्रसूत अनुभूति का ही मूर्तरूप है । कविवर अनंगहर्ष की कृति के अनुशीलन से विदित होता है कि कवि की वाणी धनीभूत प्रेम असूनी हुई है । उसमें सुजनता, सुकोमलता, और हृदयदेश को स्पर्श करने वाले गुण विधमान है । । कीव की प्रशंसा सत्रधार में जो कुछ कहा है, उसमें सत्यता प्रतीत होती है । कवि के ववित्व का परिचय तो इस बात से और प्रमाणित हो जाता है कि उसके परवर्ती काव्यशास्त्रियो उसकी कृत 'तापसवत्सराज के पयों का बड़े आदर के साथ अपने अपने ग्रन्थों में उदाहरण दिया है । इससे यह प्रतीत होता है कि अव काव्य-शास्त्र और नाट्यशास्त्र के गहनतम सिद्धान्तों के वेत्ता और अध्येता थे । इसीलिए उसने अपने नाटक में इन सिदान्तों को द्रियात्मक रूप प्रदान किया है । कविवर अनंगहर्ष मातराज में कवित्व का बीजरूप संस्कार विशेष तो है ही,लोकशास्त्र और अपने पूर्ववर्ती काव्य-नाटकादि के अनुशीलन How-MAR -- गत पृष्ठ की पाद टिप्पणी- 3. न कवित्वाभिमान न च व्यामूढ-वेतमा । रचित नाटकमिदं स्वगोष्ठीभावितात्मना ।तापसवत्सराज ।.3 । पदवाक्य प्रमाण सर्वभाषाविनिये । बंगविद्यासु सर्वास पर प्रावीण्यमागता ॥ तापसवत्सराजय ।।
करने से उनमें निपुणता भी कविजनोचित है ।। 'तापसवत्सराजम् ' नाटक के प्रणेता कवि ने अपने पूर्ववर्ती जिन कवियों और नाटककारों को कृतियों का अनुशीलन परिशीलन क्यिा है, उनमें मुख्य रूप से कविवर भास के योदश नाटक, कविकुल-गुरु-कालिदास के महा- काव्य और नाटक करुण रस के चित्रण में सिद्धहस्त ललित और सुकुमार कवि भवभूति तथा श्री हर्ष की रचनाये प्रमुख है क्योकि तापसवलराजम नाटक में उक्त बक्यों और उनकी अलियों का प्रभाव परिलक्षित होता है 12 कविवर अनंगहर्ष भारतीय दर्शनशास्त्र एवं धर्मशास्त्र के गम्भीर अध्येता और वेत्ता थे। उनकी गति को देखने से यह विदित होता है कि व वैदिक धर्म और जीवन पद्धति पर पूर्ण आस्था रखते थे । तपस्वी जीवन को वे आदर्श मानते थे । प्रयाग में गंगा, यमुना और सरस्वती के संगम का उनके मन में विशेष आदर भाव था। उनकी दृष्टि में प्रयाग सिद्धि क्षेत्र था और पापिण्डो को पवित्र करने वाला था।' 'तापसवत्सराजम् ' के अध्ययन से यह भी विदित होता है कि अनंग हर्ष बोद्ध धर्म के प्रति आस्थावान नहीं थे। इस सन्दर्भ में बौद्ध धर्म की आलोचना करते हुए लामकायन कहता कि बौद्ध भिषों का जीवन बहुत आनन्दमय है : एक तो पूर्वाहण में नित्य प्रति भोजन मिलने से उनका स्वास्थ्य Namaalee बर शक्तिर्निपुणता लोकास्त्र-काव्या वाणाव, काव्यरिक्षयाभ्यास इति हेतुस्त दुभवे ॥काव्यप्रकाश I 3,१०-17,1960 2. अभिज्ञान-पाकुन्तला 6.9 एवं तापस-वत्सराजम । 19 तुलनीय ३. संख्यं गता यमुनमा सह यत्र गंगा यबाटनुवन्ति मुनयः स्वसमीहितानि । पापीयता भवति यब पराविधिः तमामिती नपतमिष्टफल प्रयाग। तापसवत्सराज 2*22. रघुरमहाकाव्यम् ।। तुलनीय सर्ग में प्रयागवर्णन 66 ठोक रहता है, मुण्डन । बाल न होने के कारण शिर में खुजली भी नहीं होती है, स्नान जब चाहे किया जासकता है और दूसरे यह बोद्ध धर्म ब्राहमणत्व जाति की नोक-ौक से रहित है, इसीलिए धृों ने प्राणियों की भलाई के लिए बौद्ध धर्म को धारण कर लिया है ।। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि कविवर अनंग हर्ष तत्कालीन समाज के एक प्रख्यात और लोकप्रिय कवि थे, फिरभी ऐतिहासिक सामग्री के अभाव में उनके व्यक्तिगत जीवन, रचना काल और जन्मभूमि इत्यादि के विष्य में सटीक जानकारी का अभाव है किन्तु एक तो 'तापस-वत्सराजम' में गंगा, यमुना, प्रयाग, मगध, कोशल पाचाल आदि का वर्णन उपलब्ध होता है : नव और तादश शताब्दी के कारमीरी कवि जनों और काव्य शास्त्रियों ने उनकी कृति से कतिपय पद्यों का सादर उद्धरण दिया है,दुसरे 'तापसवलराजम' की एकमात्र पाण्डुलिपि शारदालिपि में ही उपलब्ध हुई है, इन सबसे यह संक्ति प्रतीत होता है कि नाटककार अनंग हर्ष उत्तरी भारत के निवासी थे 12 रचनाकाल: कवि के रचनाकाल के सम्बन्ध में यद्यपि निर्णयात्मक रूप से मही जन्मतिथि का उल्लेख संभव नहीं प्रतीत होता है किन्तु कपिय अहिरंग प्रमाणों के प्रकाश में उनके समय की एक स्थूल रूपरेखा का अवलन क्यिा जा - MA 1. पूर्वाहणे कृतभोजनम्यतिरान्नित्येव नीरोगता । कावृतिस्त्वक चादति शिरसः स्नान यदारोचत॥ जात्याचार-कदर्थनावि-रहित ब्राहमण्यमात्मेच्छया ध: सत्वहिताय पिकृत सात सोगतम ॥ तापसवत्सराजम3.3, 2. तापमवत्सराजय प्रस्तावना,साहित्य भावार,मेरठ 1969 संस्करण, पृ० १०.
यह सौभाग्य की बात है विकतिपय का व्य-शास्त्रियों ने अपने ग्रन्थों में इनके नाटक के श्लोकों का काव्यशास्त्रीय विशेषताओं के उदाहरण के रूप में उद्धरण दिया है जिससे कवि के रचनालाल की एक स्थूल रूपरेसा उभर सकती है। पूर्ववर्ती कविजनों और आचार्यों की कृतियों की और दृष्टि- पात किया जाय तो विदित होता है कि सप्तम शताब्दी ई०के प्रख्यात कवि बाणभट्ट, श्री हर्ष एवं प्रसिद्ध काव्यशास्त्री पद और वामन आदि ने नाटककार अनंग हर्ष तथा उनकी कृति आदि का कोई उल्लेख नहीं किया है । इससे यह सिद्ध होता है कि नाटककार अनंगहर्ष की ऊपरी समय सीमा सप्तम शताब्दी है अर्थात सप्तम शताब्दी के पूर्व इस कवि की स्थिति काल नहीं हो सकता। कवि की निम्न समय सीम बरहवीं शताब्दी प्रतीत होती है क्योकि कुमारपाल के सभापडित जैन कवि हेमचंद्र अपनी कृति काव्यानुशासन में अलंकारों के प्रसंग में तापस-वत्सराज के कतिपय बलोकों को उदाहरण के रूप में प्रस्तुत करते है । जैन कवि हेमचन्द्र का समय बारहवीं शताब्दी का अंतिम भाग माना जाता है इसी प्रकार 12वीं शताब्दी के कविवर जन्मण अपनी सक्ति मुक्तावली में इस नाटक के श्लोक का उद्धरण दिया है। एकादश शतक के काव्यशास्त्री भोजदेव भी तापस वत्सराजम नाटक के पयों को अपने काव्यानुशासनय, पृष्ठ 40 बातो भानपरिक्षण गुरुणा दुर समारोपिताय । तापस-वत्सराज 3-17, सूक्ति-अवतावली .पुष्ठ-39
68
ग्रन्थ सरस्वती का भरणा' और 'गार-प्रकाश में उदृत करते
और एकादश शतक के आचार्यगण मरवक, मम्मट और आचार्य कुस्तक प्रभृति
विद्वान् अपने अपने ग्रन्थों अलकार सर्वस्वम 'काव्यप्रकाश और वक्रोक्तिजीवितम
में इस नाटक के श्लोकों का उद्धरण देते है।
दम शताब्दी के कवि और प्रसिद्ध काव्यशास्त्री राजशेखर
अपने प्रसिद्ध ग्रन्य काव्य मीमांसा 'तापस-वत्सराज नाटक के तृतीय अंक
के एक श्लोक का उद्धरण देते हैं, जो निम्नवद है.
सबस्नातजपन्तपो धनजटा: प्रान्तमुता: प्रोन्मुख
पीयन्तडम्बुकापः कुरंगशिशुभिस्ताणाण्यथा विक्लवः।
एता प्रेमभरालसी च सहसा शुष्यन्मुखीमा कुलीन ।
रिलष्टारक्षति पक्षासम्पहछाया शकुन्त: प्रियाम् ॥
तापस-वात्सराजय 3.18
इसी प्रकार ध्वनि तत्व के परमाचार्य आनन्दवर्धन अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ ध्वन्या-
लोक में तापस-वत्सराजम् नाटक के 2.16 श्लोक का उदहरण देते है ।
आनन्दवर्धन का समय नवम शताब्दी का उत्तरार्धकाल है । इसी तारतम्य में
ध्वन्यालोक के प्रसिद्ध टीकाकार अभिनवगुप्त भी इस नाटक के पों का
उद्धरण देते हैं। इस मन्थन वमन्थन से यह प्रतीत होता है कि नाटककार
.
M
1. सरस्वती-कंठाभरणन, पृष्ठ 42, श्रृंगार-प्रकाश, पृष्ठ 30
2. तापस-वत्सराज प्रस्तावना, पृष्ठ ।।
3. काव्य-मीमामा अध्याय 12,चौखम्बा संस्कृत सीरीज संस्करण 1959
पृष्ठ 208
+ उत्कीभ्यनीभय परिस्खलिती एकान्ता
ते सोचने प्रतिक्षिा विधुरै सिपन्ती । तापस-वत्सराज 216
5. ध्वन्यालोक - नोचन, पृष्ठ 50
अनंग हर्ष मातराज अष्टम शताब्दी में विद्यमान थे । तापस वत्सराजम की खोज : Moradaroper तापस-वत्सराजम नाटक की उपलब्धि का विवरण रोमाचक इस नाटक की खोज निकालने का श्रेय श्री यदुगिरि यतिराज सम्पद- कुमार रामानुज मुनि जी मैसूर को है । मुस्तक के अलंकार ग्रन्योक्ति- जीवितम् के सम्पादनका ढाका विश्वविद्यालय के संस्कृत-प्रोफेसर डॉ०सुशील कुमार डे ने अपनी प्रस्तावना में सर्वप्रथम यह बतलाया था कि तापस-वत्स- राजम् नाटक की मूल प्रति बर्लिन के एक विश्वविद्यालय में है । इस मुलप्रति की सर्वप्रथम उपलब्धि प्रोफेसर हुन्दस को काश्मीर में हुई भी और इन्होन इसे इसे बर्लिन के पुस्तकालय में रख दिया था । इस सूचना के आधार पर यतिराज सम्पन कुमार जी, डॉ०एफबाटोश्रोडर के परम सौजन्य से इस नाटक की मूल प्रति की छाया प्रति प्राप्त करने में सफल हो गये । तापस-वत्सराज नाटक की यह मूल प्रति शारदा लिपि में अक्ति है । यद्यपि नाटक की यह मूल प्रति जीर्ण शीर्ण और यत्र तत्र विण्डित, त्रुटित एवं अस्पष्ट किन्तु यतिराज सम्पद कुमार जी ने अपनी निष्ठा, उत्साह और लगन के कारण इस नाटक के सम्पादन कार्य में सफलता प्राप्त की । फलस्वप उन्होन इस नाटक का प्रकाशन मैसर से स-192950 में किया । किन्तु इतना सब होते हुए भी इस नाटक के सर्वजन, सुलभ, शुद्ध और परिष्कृत संस्करण का अभाव बना हुआ था । इस अभाव को दूर करने का सराहनीय प्रयास पंजाब विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग के प्रोफेसर द्रय डॉदेवीदत्त शर्मा और डroइन्द्रदत्त उनियाल ने किया है ।। राम 1. तापस-वत्सराजय, साहित्य भडार, मेरठ - 1969.
70 कहना न होगा कि उक्त दोनों विदवानों ने अपने अथक परिश्रम से तापस-वत्सराजम' नाटक के सर्वजन-सुलभ संस्करण का प्रकाशन 1969 में मेरठ से किया और पाण्डुलिपि के अनेक त्रुटित स्थलों भाषा के अस्पष्ट भागों आदि का सम्मान और परिष्कार किया । एतत्वार्य हेतु उक्त दोनों ही विद्वान् धन्यवाद के पात्र अन्यथा प्रस्तुत शोध प्रसव असंभव था । राजपुत्र होते हुए भी अनंग हर्ष में कवि जनोचित विनम्रता विधमान है। वे सचमुच सहृदय, सुकुमार प्रवीण और कालजयी कवित्व के धनी है। वे न केवल वेद-वेदागादि विविध शास्त्रों के वेत्ता, - नाट्य-शास्त्र के सिद्धान्तों के पारखी नाटककार थे। इसीलिए नवय शताब्दी से लेकर द्वादश शताब्दी तक के प्रमुख काव्य-शास्त्रियों ने अपनी कृतियों में नाटककार अनंग हर्ष के नाटक 'तापस-वत्सराजम' के पद्यों का उद्धरण उदाहरण के रूप में किया है। यद्यपि वत्सराज उदयन और वासवदत्ता की प्रणयकथा से सम्बद्ध कथा-वस्तु प्राचीन, चर्चित और अन्य स्वनामधन्य, प्रख्यात भास एवं हर्ष आदि कवियों और नाटककारों की अतियों का इतिवृत्त रही है । इस कारण इस चर्चित कथावस्तु को अपने नाटक का विषय बनाना पिष्टपैषण ही कहा जायेगा फिर भास जैसे इस विषय-वस्तु के प्रख्यात और चर्चित नाटककार और रत्नावली नाटिका के प्रणेता वर्ष जेस रसिक कवि के होते हुए उसी क्यानक को संग्रहीत कर लखनी चलाना और प्रसिद्धि एवं समादर प्राप्त कर पाना सचमुच विदवान् कवि अनंग हर्ष भातराज के ही वा की बात है .. तापल-वत्सराजय ।.2.3.4. पृष्ठ 2:3.
अनंग हर्ष का नाट्य-कौशल : - उदयन वासवदत्ता कथावस्तु की सम्बद्ध साहित्य से तुलना करने पर विदित होता है कि नाटककार अनंगहर्ष ने अपने नाटक तापस-वत्स- राजम को नाटकीय सफलता प्रदान करने के लिए इस चर्चित कथानक को अनक स्थलों में नवरूप प्रदान किया है। यह कहना न होगा कि इस कथा के । प्रमुख पात्र, उदयन, वासवदत्ता, पावती,योगन्धरायण और मावान तथा मुख्य घटनाक्रम, आणि का आक्रमण, लावणक दाह, वासवदत्ता का पदमावती के पास न्यास के रूप में रखा जाना पदमावती-पारण्य और आरूणि का पराजय इत्यादि को छोड़कर शेष सब कविवर अनंग हर्ष मात राज की अभिनव उदभावना और कल्पना से प्रसृत है । जैसाकि तापस वत्सराजम' नाटक के नाम से विदित होता है कि नायक सत्सराज उदयन और नायिका पदमावती का तापस तथा तपस्विनी बन जाना कवि की मौलिक कल्पना का परिणाम है । अन्य घटनाचक्र इसी कल्पना से सम्बद्ध और अभिप्रेत प्रयोजनानुसार है। नाटक के प्रथम अंक की कथावस्तु का गुम्फन कवि की मोलिक प्रतिभा का परिचायक है, उत्तर रामचरितम नाटक के प्रथम अंक की भौति इस नाटक का प्रथम अंक भी लगभग वही महत्व रखता है.जैसा कि उत्तर रामचरितम के प्रथम अंक का है 12 . तापन-वत्सराजम प्रक्षर बैंक, पृष्ठ8-36 , उत्तर-रामचरितम् - प्रथम अंक, महालामी प्रकाशन, आगरा-1905 पृष्ठ 08 44 सूत्रधार और नटी के सार गर्भित वार्तालाप के साथ तापस- वत्सराजम' नाटक का शुभारभ होता है । इसके पश्चात कंचुकी तथा केटी की चिन्ता के साथ यह विदित होता है कि वत्सराज उदयन विलासिता में निमग्न है और इसलिए राज्यकार्य उपेक्षित हो रहा है, उधर पांचाल नरेश आणि वत्सदेश पर आक्रमण की योजना बना रहा वत्सदेशम - कौमुदी महोत्सव की तैयारियां चल रही है किन्तु महामंत्री योगन्धरायण राज्य की चिन्ता चिन्तित है । इसी अवसर पर एक शिष्य अपने स्वगत कथन के द्वारा सूचित करता है कि राज्य की सुरक्षा चिन्तित मंत्रियों द्वारा एक राजनयिक योजना तयार की जा चुकी है। योजनानुसार सांकृत्यायनी की परिव्राजिका के वेष में राजा के चित्र के साथ राजगृह भेज दिया गया है । इधर महामंत्री योग- न्धरायण महासेन प्रचीत के पास जाकर राज्य पर आसन्न संक्ट सूचित कर देता है और उनसे वासदत्ता के लिए पत्र लिखवा लेता है । ब्राहमण साधु के देश में प्रयाग भेजा जाता है ।' यही शिष्य लाभलायन और मन्त्रियो मध्य संदशवाहक का काम करता है। राजा के मित्र विदृषक को भी इसका कार्य की सफलता हेतु विवाम में ले लिया जाता है । उस सम्पूर्ण योजना की जानकारी दे दी जाती है । इधर मगलवर से भी इस सम्बन्ध में बानचीत की जा रही है। अन्य लोगों से इस योजना को गुप्त रखा गया है। अपनी योजना की सफलता के लिए महामंत्री योगन्धरायण बहुत सान्य है.तदनुसार वह अपनी इस वृहत योजना को महारानी वासवदत्ता 1. तापस-वत्सराजम. प्रथम बैंक पृष्ठ 13-23.
73 से निवेदन करता है और राज्य में आसन्न संक्ट की और संकत करता है । वह इस सम्बन्ध में रानी वासवदत्ता से सहयोग देने की प्रार्थना करता है और राज्य की रक्षा हेतु उनके योगदान की अपेक्षा करता है । इसी समय पूर्वनिर्धारित योजनानुसार महासेन प्रचीत का पत्रवाहक प्रवेश करता है । वासवदत्तr को उसकैपिता प्रधौत का पत्र हस्तगत कराया जातr है-जिसमें राज्य की रक्षा के लिए उल्लिखित उनके उत्सर्ग, त्याग और बलिदान की योगन्धरायण द्वारा भूरि-भूरि प्रशंसा की जाती है । वासवदत्ता मानसिक रूप ले तयार हो जाती है । इसके बाद रानी वासवदत्ता केयं की परीक्षा के लिए विलासी राजा उदयन का अन्तःपुर में प्रवा कराया जाता है, इधर वासवदत्ता भावी व्यिोग की योजना से दुखी होकर आत्म प्रसाधन भी नहीं करती है, पर बेटी राजा को यह समझाकर कि पिता के यहाँ से पत्र आने के कारण रानी कुछ उदास है, सम्पूर्ण स्थिति को संभाल लेती है। इसी बीच राजा को यह सूचना प्राप्त होती है कि जंगल में शिकार योग्य जानवर है। इस सूचना के बाद राजा रानी वासवदत्ता से विदा लेता है और शिकार के लिए वन की और प्रस्थान करता है सम्पूर्ण नाचक्र के मन्थन और विमन्धन से यह स्पष्ट रूपस - प्रतीयमान है कि कविवर अनंग हर्ष ने नाटक की कथावस्तु के इस अंश को मनो- वैज्ञानिकता और रोचकता प्रदान को है । वासवदत्ता को सहसा इस महान्, त्याग के लिए न कहकर पहले उसे सहज भाव में तैयार क्यिा जाता है । सर्व प्रथम उसके सामने भावी महान विपत्ति का पूर्वाभास कराया जाता है जिससे कि वह मनानसिक रूप से चिन्तित हो जाती है। इसी बीपिता के पत्र वासवदत्ता - भात आर्यः. यन्मया यथा कर्तव्य । तापस वत्सराजय 6-20.
74 से उस कर्तव्य-बोध कराया जाता है। वह अब मानसिक रूप में दु:सह पति- वियोग का सामना करने के लिए यथा की चत तथार सी प्रतीत होती है । इसी समय राजा का प्रवेश कराकर उसके हृदय की क्षमता का परीक्षण किया जाता है और उन दोनों के सधन अनुराग को प्रकट कर उसके त्याग की महत्ता प्रक्ट की गई है । यहाँ यह स्मरणीय है कि धनीभूत अनुराग की इस पृष्ठभूमि में भावी विप्रलम्भ की अनुभूति को तीव्रतर किया गया है। इसी समय रॉबरों को भेजकर राजा को शिकार के लिए वन में ले जाने का सुगम उपाय निकाल लिया जाता है। इस प्रकार यह सम्पूर्ण योजना सुसंगत और मोलिक बन जाती है जिसका कि स्वप्नवासव दत्त नाटक में अभाव दिखाई देता है । यहाँ पर तो वासवदत्तr प्रारंभ में ही मगध के तपोवन के मार्ग में अपने भाग्य से असन्तुष्ट सी दिखाई देती है ।। इसी नाटक के दूसरे अंक के अनुशीलन से विदित होता है कि पूर्व प्रदर्शित प्रेम के अनुरूप ही नायक उदयन,महारानी वासवदत्ता के अग्नि में विदग्ध होकर स्वर्गीय हो जाने पर पशु, पक्षी, लता और वनस्पतियों के मध्य शोकाकुल होकर करण विलाप करते है । ऐसा प्रतीत होता है कि कविवर अनंग हर्ष यहाँ पर अभिज्ञान शाकुन्तलम के चतुर्थ अंक और रधुवा महाकाव्य के अजविलाप से प्रभावित हुए है।' अब जीवन से निराश और विरक्त उदयन को मंत्री स्मवाद प्रयाग ले चलने की योजना बनाता है। प्रयाग में लामकायन नामक ब्राहमण .. वासवदत्ता तथा परित्रमः परिसदनोत्पादमति यथाय परिभवः स्वप्नवासवदत्तक प्रथम संक, पृष्ठ-10. १. तापसवत्सराज 24,5.6.11.13. 3. अभिज्ञानशाकुन्तल -4, रामहाकाव्य 8-105.
75 भि के वेष में पहले से ही विद्यमान है जो वहीं पर राजा को वासवदत्ता की प्राप्ति के लिए पदमावती से विवाह कर लेने का उपदेश देता है । नाटकतार अनंग हर्ष ने नाटक के तृतीय अंक का गुम्पन भी अपने कथानक की गति बैठाने के लिए ही किया है। उतीय अंक के विक- म्भक के ज्याज से, लामकायन और उसके शिष्य के मध्य हो रहे वातालाप से यह सूचना प्राप्त होती है कि पद्मावती सांकृत्यायनी के प्रभाव में पूर्ण रूप में r गई है। अब वइ पदमावती घर छोड़कर राजभवन के उधान में वत्सराज उदयन की मूर्ति बनाकर उसके पूजन अर्जन में समय व्यतीत करती है । योग- न्धरायण वासवदत्ता के साथ वहीं पहुंच रहा है और इधर से स्मण्वान राजा के साथ प्रयाग आ रहा है । राजा के साथ विदूषक भी है। रूमावान युक्तिपूर्वक राजा की खा का भार विदुषक को सौंप देता है और स्वय राज्य की रक्षा और युद्ध की तैयारी हेतु राजधानी कौशाम्बी बा जाता है। इसके अनन्तर भी कवि ने कथावस्तु की संगति के लिए अनेक स्तन घटनाओं की तृष्टि की है । साकृत्यायनी अपनी योजनानुसार- वियोग विड्वल पदमावती को नायक से मिलन हेतु सात्वना देती है तो दूसरी और वह अप्रत्यारूप वासवदत्ता को भी धर्य से प्रतीक्षा करने और कालयापन करने की सलाह देती है। विरह व्याकुल पद्मावती द्वारामता - पाश दवारा आत्महत्या की चेष्टा भी कवि की मोलिक उद्भावना है उदयन और वासवदत्ता दोनों के बारा चिताजनकर आत्मदाह की घटना को कवि ने जिस नाट्य कौशल से प्रस्तुत किया है, वह उसकी मोनिकता और उसकी नवनवोनेजिनी प्रतिभा का परिचायक है । वासवदत्ता दवारा बात्मदाह की चेष्टा का उल्लेख यपि क्या सरित्सागर 76 में प्राप्त है किन्तु उदयन दवारा आत्मदाह की चेष्टा का उल्लेख अन्यत्र कहीं भी प्राप्त नहीं होता । इस प्रकार स्पष्ट है कि कवि ने उदयन वासवदत्ता की चर्चित और भूपोभूयः पिष्टपैषित कथावस्तु में कतिपय मौलिक उदभाव नामें प्रस्तुत कर अपने यशस्वी नाट्य कौशल का ही परिचय दिया है । 'तापस वत्सराज' नाटक के साथ एक दुर्योग यह जुड़ा रहा है कि यह एक अत्यन्त सुन्दर, सफल और प्रशस्त नादय-रचना होते हुए भी इसका शीघ्र प्रकाशन नहीं हो पाया, इसलिए साहित्यिक मनीषियों का ध्यान इस ओर बहुत विलम्ब से केन्द्रित हो सका किन्तु नवम शताब्दी से बारहवीं शताब्दी तक यह रचना अत्यन्त दर्चित रही है, इसीलिए तत्कालीन काव्य- शास्त्रियों ने अपने ग्रन्थों में इस नाटक के पों का बड़े आदर के साथ उन्लेख क्या है । किन्तु बारहवीं शताब्दो के पश्चाव बीसवी शताब्दी तक विस्तृत 800 वर्ष के दीर्घकाल तक इस नाटक का न तो कोई उल्लय प्राप्त होता है और न ही कोई प्रकाशित प्रति ही उपलब्ध होती है ।। यह कहना न होगा कि जिस प्रकार भास के नाटक दीर्घकाल तक अप्राप्त रहे और चिरकाल बाद 1902 में महामहोपाध्याय गणपत्ति शास्त्री को बावा वोर, राज्य में हस्तगव हुए यही कुछ बात तापल दत्सराजस' नाटक की उपलब्धि के सम्बन्ध कही जासकती है । डॉromoaps की सूचना पर यतिराज सम्पद कुमार जी में बनिन विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में इस नाटक की पाण्डुलिपि की छाया प्रति को इस्तगत करने में सफलता प्राप्त की थी। .. तापल-वत्सराम-प्रस्तावना. पृष्ठ 24.
77 यह सर्वविदित है कि महाकाल की पाचन शक्ति महान, होती है,वह सभी को अपनी कभी न आने वाली जठराग्नि में विदग्ध कर देता है किन्तु जब काल के इस कठोर प्रहार को सहते हुए कुछ रचनायें आगे बढ़ जाती हैं,वै निरचय ही कालजयी रचनायें होती है । 'तापस-वत्सराजम्' एक ऐसी ही कालजयी रचना है। इसमें निश्चित रूप से सत्य, अपने सम्पूर्ण सौन्दर्य के साथ अभिव्यक्त हुबा है । सत्य ही काव्य का वह अमर तत्व जिसस काव्य कालजयी और अमर कहा जाता । यही सत्य, शिव और सुन्दर होकर राष्ट्र और समाज में जीवन्त रहता है ।' उदयन और वासवदत्ता का यह प्रणय सचमुच अलोक-सामान्य और युगयुगान्तरव्यापी है । वह मानव के अन्तर्मन की अतल गहराइयों में प्रविष्ट होकर आज भी रसानुभूति का हेतु बना हुआ है, यह प्रणय-गाथr वस्तुत: शाश्वत सत्य और अमर है । इस अमर प्रणय- क्थावस्तु पर आधारित 'तापस-वत्सराजम' नाटक में कवि का यह प्रतिपादन कि प्रेम का उत्सव, कभी समाप्त नहीं होता, सत्य प्रेम' को ही रेखाक्ति करता है 12 इस प्रकार यह स्पष्ट है कि अनंग हर्ष प्रणीत तापस वत्सराजम' उदयन-वासवदत्ता के अमर प्रणय की भाँति सुकोमल,सुङमार एक कालजयी नाट्यकृति है । इसमें विरह बोर तप से परिपूत,अनल से अदम्य सत्यप्रेम' कापावन और ललित मोहन रूप दर्शनया है । 1. धन्या सा स्त्री या तथा वत्ति भता भईलहाव सा दिया प्यदग्बा 2. मिथवा प्रेमासमाप्तोत्सवः । लापम-वत्सराज-चरित 1.14.
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तु ती य
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विषय-वस्तु का नाट्य-शास्त्रीय विश्वन
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त ती य
विषयवस्तु का नाट्य
शास्त्रीय विवचन
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MAP
दृश्यकाव्य को नाटक, रूपक जोर रूप इत्यादि नामों से
अभिहित किए जाने की परम्परा रही है। धीरोदातादि नायकोनायिकाओं
तथा अन्य पात्रों के आगिक, वाचिक, बाहार्य तथा सात्विक इन चतुर्विध
अभिनयों के द्वारा विहित अवस्थानुकरण से जो नटों तादात्म्यापत्ति'
होती है, इसीलिए इस नाटक कहा जाता है ।' यही नाटक दृश्यमान होने
के कारण और नट में रामादि की अवस्था के आरोप होने के कारण
रूपक' भी कहा जाता है । जी रसी पर आश्रित होता है और दश प्रकार
का होता है 13
यहाँ यह प्रश्न किया जा सकता है जिनुकरण प्रधान होने के
कारण रूपकों में जमेद होने से दश प्रकार के मद से संभव हो सकते है, इसके
उत्तर में यह क्यनीय है कि कथावस्तु. नायक और रस के भेद से स्पकों में
परस्पर भेद है ।
वस्तुभेद :
-
स्पकों में मुख्य रूप से क्यावस्तु दो प्रकार की होती है ।
प्रथम, अधिकारिक व्यावस्तु और दूसरी प्रासंगिक कथावस्तु । इसमें जो मुख्य
क्यावस्तु है, उसे बाधिकारिक व्यावस्तु कहते है, तथा इस अधिकारिक
-
। अवस्था नतिमाट्यम् - दशपक 1.1
2. का दृश्यतयोभ्यते, स्पर्क तत्समारोपाव । दपक 1.7
3. दशव रमायच , दशरूपक, पृष्ठ ।
वस्तु नेता रसस्तषी भेदकः,
...
79 कथावस्तु के अंग-रूप में जिन उपक्याओं का समावेश होता है, उन्हें प्रासंगिक कथावस्तु कहा जाता है, यथा रामायण कथा में विभीषण अथवा सग्रीव वृत्तान्त या ऐसी कोई अन्य क्या ये प्रालगिक व्यावस्तु कही जाती है।' प्रस्तुत शोध प्रबन्ध के विषयीभूत 'स्वप्नवासवदत्ता और 'तापसवत्सराजई' नाटकों में प्राप्त कथावस्तु के अनुशीलन में विदित होता है कि इन दोनों नाटकों की आधिकारिक या मुख्यकथावस्तु एक ही है और वह है, उदयन-कथा' । आधिकारिक क्यावस्तु के सम्बन्ध में आचार्यो ला कथन है कि फल पर स्वामित्व प्रान करना अधिकार कहा जाता है और उस फूल या पलभोक्ता के दवारा फलप्राप्ति तक निर्वाहित वृत्त अधवा व्यr आधिकारिक पदवाच्य होती है । प्रस्तुत सन्दर्भ में पाचाल नरेश आणि का पराभव शत्रु से मुक्त राज्याधिकार पुनः प्राप्त मगध राजकुमारी पदमावती से विवाह तदनु वासवदत्ता की पुन: प्राप्ति और मगध नरेश दर्शक मैत्री इत्यादि 'उदयन-वधा' का फल है, इसके स्वामी या भोक्ता स्वयं उदयन है। प्रारम्भ से लेकर अन्त तक योगन्धरायण रूमावा के नीति कोराल से शत्रु पराभव, पुन: महारानी वासवदत्ता और विनटराज्य के भूभाग की प्राप्ति और महाराज दर्शक के साथ सुदढ़ सम्बन्ध स्थापना आदि तक की व्या आधिकारिक कथावस्तु है ।' - 1. तत्राधिकारिक मुख्य मंग प्रासंगिक विदुः । चौखम्बा प्रकाशन, 1967, दरारूपक 1. पुण्ठ 07 १. अधिकार पालस्वाम्यमधिकारी बताभ- तन्निईतमभिब्यापि वृत्त स्थादधिकारिका ॥ दशरूपक 112 3. इण्टा युय निर्जिता विद्विषन्स: प्राप्ता देवी भूतधात्री च भूयः सम्बन्धोभूद्र दाकिनापि नाव कि दुधाप यम्न म भनाभ्यः । तापसवत्सराजय'. 29 80 दशल्पक के अनुसार प्रासंगिक कथावस्तु दो प्रकार की होती है, प्रथम पताका और दूसरी प्रकरी । जो क्या या वृत्त दुसरे अर्थात आधिकारिक कथा के प्रयोजन के लिए होती है किन्तु प्रसंगानुसार जिसका स्वयं का फल भी सिद्ध होता है, वह प्रासंगिक वृत्त है । प्रासंगिक इतिवृत्त । का प्रमुख ध्येय आधिकारिक वृत्त को पाल निर्वहता में सहायता प्रतिपादित करना है, किन्तु प्रसंगत: उनका स्वयं का भी फल होता है। यथा सग्रीव क्या का पल या प्रयोजन बालि वध तथा राज्य लाभ है तथा वीणा-क्या का प्रयोजन लंका के राज्य की प्राप्ति है । यह प्रासंगिक इतिवृत्त भी दो प्रकार का होता है, प्रथम पताका और दुसरी प्रकरी । जो प्रासंगिक क्या अनुबन्ध सहित होती है तथा रूपक में दूर तक चलती रहती है, वह पताका कहलाती है तथा जो क्या केवल एक ही प्रदेश तक सीमित रहती है.वह प्रकी कहलाती है। रामायण की कथा में सुग्रीव और किनीषण का वृतान्त पताका है, वह दूर तक चलती है । वह मुख्य नायक के पताका चिन्ह की तरह बाध- कारिक कथा तथा मुख्य नायक की पोषक होती है, किन्तु पताका का नायक भिन्न होता है,वह पताका नायक कहा जाता है । रामायण में छोटे-छोटे वृत्त प्रकरो है यथा श्रमणा शबरी वृत्तान्त ।' प्रासंगिक कथावस्तु की दृष्टि से स्वप्नवासवदत्तम् एवं तापस वत्सराजश्व में प्राप्त आधिकारिक इतिवृत्त उदयन कथावस्तु के अनुशीलन से विदित होता है कि इन नाटकों में दोनों ही कवियों ने प्रासंगिक कथावस्तु का सनिशा नहीं किया है। पताका और प्रकरी न तो स्वप्नवासवदत्ता 1. प्रासगिर्क परार्धस्य स्वार्थो यस्य प्रलगतः । मानुबन्ध पताकारब्ध प्रकरी प्रदेशमा दापक 13.पुष्ठ-08.चौखम्बा प्रकारान 1967.
81 में दिखाई देती है और न ही तापसवत्सराजम' में ही प्राप्त होती है । यहाँ यदि यह कहा जाय कि योगन्धरायण-वृत्तान्त इस मुख्य कथा का प्रासंगिक इतिवृत्त 'पताका माना जा सकता है,और योगन्धराया नाटक के अन्त तक पताका की तरह उपस्थित रहता और मुख्य कथा के नायक की सहायता में सदैव तत्पर है किन्तु यहाँ यह अवश्य है कि महामंत्री योगन्धरायण के सम्पूर्ण व्यापार मुख्यतया के नायक उदयन की सफलता के लिए समर्पित है । उसका कोई सुग्रीव या विभीषण की भाँति प्रसंगत: अपनी स्वार्थसिद्धि का कोई प्रयोजन नहीं है । इसलिए योगन्धरायण-वृत्तान्त को पताका' नहीं कहा जा साता । नाट्यशास्त्र के नियमानुसार प्रासंगिक क्या पताका' और 'प्रकरी' का प्रत्येक रूपक में होना कोई अनिवार्य धर्म नहीं है। इन दोनों नाटकों में प्राप्त सभी पात्रों का प्रयोजन वत्सराज उदयन के प्रयोजन की सिद्धि के लिए ही कथावस्तु की दृष्टि से परस्पर साम्य और वैषम्य : XNain 'स्वप्नवासवदत्तम और तापस-वत्सराज' दोनों ही नाटकों की कथावस्तु का आधार समान है । उदयन और वासवदत्ता की प्रणयकथा ही दोनो नाटकों का प्रतिपादय है । गुणादय कृत 'वृहत्वया । इस कथा का मूल स्रोत है । भास और अनंगहर्ष दोनों ही कवियों ने वृहत्कथा' से इस स्थानक को ग्रहण कर अपने नाटकों की कथावस्तु का गुम्फन किया है। लोकप्रसिद्ध इस कथानक की मुख्य घटना और मूल भाव की रक्षा करते हुए उभय कवियों ने अपनी अपनी कल्पना जोर धारणा के अनुसार इस जी स्वरूप दिया है,वह आनन्ददायी बोर रस संबारी है. फिरभी मुख्य कथावस्तु के 1. प्रासांग परामर्थव्य स्वार्थी यस्य प्रमगत: दरम्पक 1.13.
82 समान होने पर भी दोनों नाटकों के इतिवृत्त के गुम्फन और प्रतिपादन में पर्याप्त भिन्नता है ।। संस्कृत नाटकों के इतिहास का अनुशीलन,परिशीलन करने के पश्चात यह स्पष्ट हो जाता है कि कविवर भास ने सर्वप्रथम अपने दो नाटकों 'प्रतिज्ञा यौगन्धारायण' तथा 'स्वप्नवासवदत्ता में वत्सराज उदयन के जीवन को घटनाओं को नाटकीय रूप दिया था, यद्यपि भास के पश्चात अनेक कवि जनों ने इस दिशा में प्रयत्न किए किन्तु कोई भी नाटककार भास से बढ़कर कोई कलाति प्रस्तुत नहीं कर सका था । कालान्तर में भारतीय नाटककार के रूप में श्री अनंग हर्ष माताज का उदय होता है जिसने इसी चर्चित उदयन तथाकोआधार बनाकर अपने प्रसिद्ध नाटक तापस वत्सराजम् का प्रणयन कर अपने अपूर्व का व्यत्व और नाट्य-कौशल का परिचय दिया है। कविवर अमंगहर्ष ने अपने प्रसिद्ध नाटक 'तापस-वत्सराजम' में अपनी शैली के अनुरूप कथावस्तु में कुछ परिवर्तन किये है, नतन उद्भावनाओं और परिकल्पनाजों से इस अलंकृत किया है। इससे तापस वत्सराजम्' नाटक को नाटकीयता और कवि का काव्यकोशल अत्यन्त सुन्दरता के साथ प्रस्फुटित हुए है। कविवर अनंग हर्षने तापस-वत्सराज नाटक के प्रारंभ में - जो उभावना की है,वह सर्वथा नवीन है। ऐसा प्रतीत होता है कि कवि ने प्रतिज्ञा योगन्धरीण एवं स्वप्नवासवदत्तम' के मध्य की कड़ी को जोड़ने के लिए बहुत सुन्दर प्रयास किया है । स्वप्नवासवदत्त में प्रारंभ में ही वासवदत्ता को प्रोत- पतिका के देश में मगध में देखा जाता है, वह किस योजना के अनुसार मगर 83 पहुँचाई गई है तथा वह व्यक्ति कौन है जो इस मगध ले गया है, इसका प्रारंभ में कुछ पता नहीं चलता है । यहाँ पर यह भी पता नहीं चलता है कि यहाँ मनमाने में वासवदत्ता को कितनी स्वेच्छा है तथा उसके साथ कितना धोखा किया जा रहा है या उससे कोन सी बात छिपाई जा रही है | दूसरी और तापस वत्सराज में वासवदत्ता और यौगन्धरायण ले मध्य में ही योजना । प्रारंभ में ही प्रस्त ली गई है और निर्धारित योजना के अनुसार ही उसकी स्वीकृति पाकर आगे की योजना तो नया रूप दिया जाता है । यहाँ पर वासवदत्ता के धर्य एवं गोपनीयता की भलीभांति परीक्षा कर ली जाती है और उसे सम्पूर्ण बात बतला दी जाती है ताकि आगे की योजना की विपन्नता की आशंका ही न रह जाये । इस कार्य हेतु वासवदत्ता के पिता का भी सहयोग लिया जाता है ।। वासवदत्ता के पिता प्रचौत एक पत्र उसके पास भेजते है और उस पत्र के द्वारा बेटी बासवदत्ता को अपनी भलाई के विषय में स्वयं सोचन के लिए प्रेरित करते है। इस सबका आगे घटित होने वाली घटनाओं के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध है । दोनों ही नाटकों में लावाणक दाह की सूचना दी गई है, परन्तु महारानी वासवदत्ता के द्वारा स्थान त्याग कर कारुणिक चित्र तथा लावाणक दाह की भयंकर ज्वालाओं का लाखों देखा न जितना जीवन्त और -- --- । तापसवत्सराजम ।*7. पृष्ठ 14-15. 2. जालन्जन विषयेषु कार्य-विमुखो यन्न त्वया वार्यत । जामातति विहाय तन्मीय रूप स्वार्थ: स्वयम् चिन्त्यता । तापस-वत्सराज 19, पृष्ठ 9 और प्रभाव पूर्ण रूप ' तापतवत्सराजम में वर्णित है, वह स्वप्नवासवदत्तम नाटक में नहीं प्राप्त होता । तापसवत्सराजम दितीय अंक में लावाणक- दाह की विभीषिका का वर्णन इतना प्रभावकारी है कि उसे पढ़कर ऐसा प्रतीत होता है कि हमारे सामने ही अग्नि की ज्वालाएँ लावाणक ग्राम को अत्मताद कर रही है। अग्निवाह के समय कवि उदयन को भी यहाँ उपस्थित कर देता है और उसके द्वारा वासवदत्ता को अग्नि की ज्वालाजों से बचाने के लिए प्रयत्नशील व्यक्ति के रूप में वह वासवदत्ता के कापत निधन पर विह्वल हो जाता है और विलाप करता है यह सब नाटक प्रमुस रस की पुष्टि के लिए अत्यन्त आवश्यक है। यहाँ पर कवि महारानी वासवदत्ता के प्रति वत्सराज उदयन के अनन्य प्रेम का सुन्दर वर्णन करता है, इनका यह प्रणम्य आगे घटित होने वाली क्रियाओं का सम्यक्ष निर्धारण करता है और अभिलषित है । करुण रस की पुष्टि करता दोनों ही नाटकों में दाह की सूचना निरुपण में एक और अन्तर दिखाई देता है। स्वप्नवासवदत्त महारानी वासवदत्ता और महामन्त्री यौगन्धरायण दोनों को दाह की सूचना लगभग एक साथ ही दे दी जाती है किन्तु तापस-वत्सराज में ऐसा नहीं है, इसमें सर्वप्रथम महारानी वासवदता के दाह की सूचना राजा को दी जाती है और तत्पश्चात् राजा वासवदत्ता से सम्बन्धित पशु-पक्षी, लता-कृl. आभा इत्यादि देख करके अत्यधिक विलाप करता है. इसके पश्चात् राजा उदयन को यह भी सूचित क्यिा जाता है कि इसी अग्निकाण्ड में महारानी की रक्षा करते हुए योगन्धरायण की भी मृत्यु हो गई है। यह सब नाटकीय योजना की दृष्टि Y 85 से विशेष महत्व के है । तापसवत्सराज के अनुशोलन-पारखीलन के पश्चात यह भी विदित होता है कि इसका विदृक भी समण्वान् के समान सम्पूर्ण योजना से सुपरिचित है और योजना के अनुसार, वह आदि से अन्त तक अपना अपेशित योगदान भो देता है । इसके बाद वह बड़े युक्तिपूर्ण ढंग से मृत्यु के लिए उपत राजा को प्रयाग ले चलने के लिए पूरा सहयोग देता है, इस प्रकार यह स्पष्ट है कि जहाँ स्वप्न-वासवदत्तम् नाटक में लावाणत-दाह की जिस घटना के वर्णन को कुछ ही शब्दों में एक शिष्य के मुख से करवाया जाता है । वहीं तापस-वत्सराजा नाटक में लावाणक दाह की घटना अत्यन्त विद एवं प्रभाव- पूर्ण ढंग से प्रस्तुत की गई है। तापसवत्सराजम में इसके आगे के कथानक का अधिकतम भाग कवि की अपनी कल्पना ने प्रसत है लथा जिसका प्रतिरूप हमें स्वप्नवासवदत्तम नाटक में देखने को नहीं मिलता। योजनानुसार स्मण्वान तथा विदूषक राजा को लेकर लामवायन के आश्रम तक पहुंचते है,वहाँ पहुँचकर कमावान विदुषक को राजा के जीवन की रक्षा का भार सोपता है - और झुठा बहाना करके स्यावा राजधानी लोट जाता है। विदूषक राजा को लेकर सीधे राजगृह की ओर जाता है, लाभकायन योगन्धराया से सम्पर्क स्थापित करना इधर सोकृत्यायनी चित्र-दानादि के द्वारा राजकुमारी पद्मावती करता है H 1. तापस-वत्सराजम् 2*21. १. ब्रहमचारी - ततस्ता स्मन मगया-निष्का से राजनि ग्राम-दोहन सा दगया। स्वनवासवदत्तम पृष्ठ 49 प्रकारा- रामनाराकाबनी माधव संस्करण-1968.
86 के हृदय में उदयन के लिए अनुराग उत्पन्न कराती है, इसके पश्चात राजकुमारी पदमावती घर से विरक्त हो जाती है और आश्रम में राजा उदयन की प्रतिमा स्थापित करके उसकी पूजा इत्यादि करती रहती है, बाद में राजा उदयन भी वहाँ पहुँच जाता है, यह सब घटना-संयोजन कवि पर अनग हर्ष की कल्पना ताँ प्रसव है । दोनों ही नाटकों में योगन्धरायण रा पदमावती के हाथों में वासवदत्ता के सौपे जाने का विधान भी भिन्न-भिन्न है । स्वप्न- वासवदत्त नाटक में पद्मावती राजमाता के दर्शन के लिए आश्रम में आती है,वहीं तपोवन में सभी के सामा यौगन्धराया वासवदत्ता को समर्पित करता है और पद्मावती से कहता है कि यह मेरी बहन है, इसके पति परदेश गए हुए हैं, इसलिए मैं चाहता है कि कुछ समय तक माननीय राजकुमारी जी, इसको अपनी देखरेख में रख में ।' किन्तु तापत-वत्सराजम में हमें एक शिष्य के द्वारा उसके लोप जाने की सूचना मिलती है । यद्यपि दोनों में ही वासवदत्ता को प्रोधित-पतिका के रूप में चित्रित किया गया तथा दोनो ही नाटकों में यौगन्धराया को उसके भाई के रूप में चित्रित किया गया है 12 दोनों ही नाटकों में नायिका वासवदत्ता की दाह की घटना के वर्णन में भी भिन्नता दिखाई देती है। स्वप्नवासवदत्ता में प्रथम बैंक में एक ब्रह्मचारी लावाणक ग्राम से आम आता है और वहाँ विश्राम करने के लिए रुक जाता है, बाल समाचार पॅलने पर वह अपने बदा- ध्ययन में हुए नि का कारण बताते हुए कहता है कि लावाणक ग्राम । योगन्धरायण -श्य में स्वमा । प्रोषितभई कामिमामिछाम्यत्र भवत्या *चव काल परिपान्यमाना। स्वप्नवासवदत्ता पृष्ठ 3 2. तापसवत्सराजय, पूष्ठ68.
87 रहने वाले राजा उदयन एक दिन जब शिकार पर थे तब उस गांव में आग लग जाने से उनकी प्रियतमा वासवदत्ता और मन्त्री योगन्धरायण जलकर मर गए हैं। शिकार से लौटने पर जब राजा जो यह दु:खद समाचार मिलता है तो वह उसे आग में जूदकर अपने प्राण देना चाहता है । मन्त्री उन्हें बड़े प्रयत्न से रोकता है और उनकी रक्षा करता है किन्तु दाह की यह घटना तापसवत्सराजम में भिन्न रूप से वर्णित है । खेलने के बrद जब गाँव लोटता तो उसके साथ मन्त्री स्मण्वान् और विदृष्कक है, वहाँ उसे गाँव में हुए अग्निकाण्ड की सूचना दी जाती है, उस अग्निकाण्ड में वासवदत्ता के जल जान की आशंका से स्वयं भी उसमें जलकर मर जाना चाहता है तथा वासवदत्ता के लिए अत्यन्त काणविलाप करता w महारानी वासवदत्ता के नगरा पालित गपोत एवं को देखकर तुन उसकी वेदना तीव्र हो जाती है । मन्त्री और विदृषक उस सान्ववना देते है, परन्तु वह वासवदत्ता की याद में मृर्छित हो जाता है जब उन चेतना आती है तो उसी समय वही महासन का लेखावाहक भी आ जाता है । इससे शाक का वातावरण और भी अधिक तीव्र हो जाता है ।। तापस-वत्सराज में सांकृत्यायनी एवं चित्र-पलक की घटना me का कोई रूप स्वप्नवासवदत्तम् में हमें दिखलाई नहीं देता, तापस राजा को तापसी पद्मावती के आश्रम में लाने तथा उसके द्वारा उसकी पूजा करवाने की घटना भो तापस-वत्सराजम् की अपनी विशिष्ट कल्पना है। स्वप्नवासवदत्ता में उदयन को कार्यका माना जाता है,पर तापस-वत्स- राजस में योजनानुसार सदादेश के द्वारा ही मग भेजा जाता है । 1 लापन-वत्सराजा 2013 पृष्ठ 46 88 तापस-वत्सराजम् नाटक की कथावस्तु की एक सर्वोपरि विशषता यह है कि यहाँ क्यानक को मूलयोजना से निरन्तर सम्बद्ध रखा गया है।" यहाँ पर कथानक दर्शकों की दृष्टि से कभी मोहाल नहीं होता, इसके विपरीत स्वप्नवासवदत्तम् में हम यह देखते हैं कि जिस लल्य की प्राप्ति के लिए यह सब किया गया है, वह लय अन्त तक दर्शकों की दृष्टि से ओझल ही रहता है। अन्त में, हम केवल सफलता की सूचना ही प्राप्त होती है । किन्तु तापस-वत्सराजम में दर्शकों का भी योजना की प्रगति के साथ बराबर सम्बन्ध स्थापित रहता है। अमात्य-जनों के हारा कौशाम्बी तथा मगध में हो रही घटनाओं की प्रगति सूचना बराबर मिलती रहती है। । इसी प्रकार तापस वत्सराजम् में निरारा पद्मावती के द्वारा लतापाश से बात्महत्या की योजना तथा राजा एवं विदूषक के कारा उसकी या सर्वथा नवीन है । दोनो ही नाटकों में नायिका वासवदत्ता के दर्शन की योजना भी भिन्नता के साथ वर्णित है, स्वप्नवासवदत्तम् में वासवदत्ता समुद्र-गृह में सोये हुए राजा को पदमावती समा लेती है और उसंत पलंग पर ले जाती है कि पदमावती नहीं है, अपितु राजा है, तब वह पलंग के नीचे लटके हुए राजा के हाथ को उठाती है और उसे उपर रखने का प्रयत्न करती है,इसी प्रयत्न में स्वप्न में राजा उसका साक्षात्कार कर लेता है। परन्तु तापस- वत्सराजस में वासवदत्ता जब विदुषक को जगाने का प्रयास कर रही होती । तापल-वत्सराज 2-13.पृष्ठ 46 दिष्ट्या स्वप्नायतेबवार्य पुनः यावन्मदर्तक स्थित्वा दृष्टि हृदयं च तोयामि। स्वप्नवासवदत्तएछ 170.
89 है तो राजा अर्धनिन्द्रित अवस्था में उसकी झलक पा जाता है । पांचाल नरेश पर वत्सदेश को विजय तथा उसके लिए दर्शक तथा प्रद्योत के द्वारा दी गई सहायता ar संक्ति दोनों में ही पाया जाता है। यौगन्धरायण के द्वारा वासवदत्ता को ले जाने तथउदयन और वासवदत्ता के - पुनर्मिलन की घटना में भी दोनों में अन्तर पाया जाता है । स्वप्नवासवदत्तम में वह उसे लेने के लिए उस समय पहुँचता है,जब उसे वह पहचानी जाने वाली ही होती है,किन्तु तापसवत्सराजम् में राजा वासवदत्ता को मगध के आश्रम से ही ले जाता है । नायक-नापिका के पुनर्मिलन के स्थान एवं प्रकार में भी दोनो नाटकों में अन्तर पाया जाता है। स्वप्नवासवदत्ता के अनुसार प्रधांत एक चित्रफलक मगध भेजता है जिसे देकर पद्मावती और वासवदत्ता की धात्री वासवदत्ता को पहचान लेते हैं, उसी समय यौगन्धराण स्वयं प्रस्तुत होकर सम्पूर्ण रहस्य का उद्घाटन करता है । परन्तु पुनर्मिलन की यह घटना तापस वत्सराज में भिन्न प्रकार से निरूपित की गई है। इसके अनुसार नायक नायिका का पुनर्मिलन प्रयाग में होता है । मन्त्री और विदृषक इसकी योजना बनाते हैं। राजा की ख का भार विदृषक पर है, प्रयाग में गंगा तट पर चिता बनाई जाती है, वासवदत्ता को किसी बहाने सचिता में जलने से रोका जाता है ।' प्रयाग के राजा के साथ विदूषक और पदमावती हैं, वहाँ पर मन्त्री स्याबान के जाने की प्रतीक्षा की जाती है, राजा वहाँ जलती हुई वता में प्रवा करना चाहता है,धर ब्राहमणवाधारी योगन्धराया चिता में जलने के लिए उचत अपनी कल्पित बहिन वासवदत्ता की रक्षा की हो. संम्वलित: भगवान हुतवहः यावद त गत्वा प्रदक्षिणी करोमि। वापस वत्सराजम. पृष्ठ-208.210.211.
90 । पुकार लेकर वहां पहुंच जाता है, राजा जब उसे बचाने के लिए जाता है तो उसी समय योगन्धरायण वासवदत्ता को उसे अर्पित कर देता है । | इस प्रकार नायक-नायिका का पुनर्मिलन हो जाता है ।' स्वप्नवासवदत्तम् में प्रम-वन तथा समुद्र-गृह के विशेष दृश्य है, ऐसे दृश्यों की योजमा वामस-वत्सराजम में दिखाई नहीं देती । रस की द भी दोनों नाटकों में मौलिक अन्तर प्रतीत होता है । वासवदत्तम में मुख्य रूप से विप्रलम्भ गार की पुष्टि हुई है, जबकि तापस वत्सराजम् में मुख्य रूपले कण रस की पुष्टि हुई किन्तु इतना स्पष्ट है कि स्वप्न-वासवदत्त और तापसवत्सराजय दोनों ही नाट्यकृतिया अपने-अपने रूप तथा अपने अपने क्षेत्र में प्रशंसनीय है, दोनों का लय भिन्न होने से इनके - रूप में भिन्नता आ जाना स्वाभाविक है । उदयन क्या से सम्बन्धित साहित्य का तुलनात्मक अनुशीलन करने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि कविवर अनंग हर्ष ने अपने नाटक तापस- वत्सराजम में मूल कथानक को अपने स्थल पर नए रूप में परिकल्पित किया है। दोनों ही नाटकों में प्रमुख पात्र तथा प्रमुख घटनाचक्र समान है,जो निम्नवत है- उदयन वासवदत्ता, पदमावती, योगन्धरायण एवं कमावाच । प्रमुख घटनाचक्र यथा आरुणि का आक्रमण, नावाणक-दाह, वासवदत्ता का पद्मावती को समर्पण, पदमावती-विवाह, बारूणि-पराजय, उदयन-वासवदत्ता-पुनर्मिलन, इत्यादि . इसके अतिरिक्त शेष सब कुछ कवि कल्पना प्रसूत तापम-वत्सराजय नाटक के शीर्षक के अनुसार उदयन और पदमावती के नापस बन जाने की कल्पना विवर बना हर्ष की मोनिक देन 1. वापस-वत्सराजय पृष्ठ 214-215.
91 है, अन्य सम्पूर्ण घटनाचक्र इसो लक्ष्य का अनुसरण करता है कि विचार करने पस्यह प्रतीत होता है कि प्रथम बैंक की सम्पूर्ण कवि कल्पना मोलिक युक्ति- युक्त और सुसंगत है । सर्वप्रथम तापस-वत्सराजम के प्रथम बैंक में वधुवीय तथा चैटी को चिन्ता से हमें यह विदित होता कि उदयन विलास में डूबा हुबा है और वह राज्य के कार्य की उपेक्षा कर रहा है: उसकी इस उपदापांचाल नरेश आणि वलराज पर आक्रमण करता जिसके प्रति उदयनउदासीन है । यहीं पर एक शिष्य के बात्मकथन से यह विदित होता है कि राज्य की सुरक्षा से चिन्तित मन्त्रियों ने एक योजना बनाई है। इसी योजना के अनुसार सा कृत्यायनी परिव्राजका का वश आना कर राजा के चित्र के साथ राजगृह जाती है, इधर यौगन्धरापण स्वयं वासवदत्ता के पिता प्रधीत महासत्र के पास जाता है और उसे राज्य के संक्ट से अवगत कराता है। । प्रद्योतको विश्वास में लेकर वह उनकी बेटी वासवदत्ता के लिए पत्र लिखवा लेता है, दूसरी बोर लामकायन ब्राहमण को सिद्ध का देश बनाकर प्रयाग भेज दिया जाता है। इस कार्य हेतु राजा के मित्र विदुषक को भी विवास में ले लिया जाता है और उसे सारी योजनाएं बतला दी जाती है: योगन्धरायण वासव- दत्ता को सम्पूर्ण योजना को जानकारी देता है और उसे इस योजना में . अपना योगदान देने के लिए राजी कर लेता है। इस सम्बन्ध में मगध के राज से भी बातचीत चलाई जाती है। अपनी योजना के अनुसार महामन्त्री योगन्धरायण महारानी वासवदत्ता के पास पहुंचता है और महारानी के राज्य पर आसन्न संकट की बात बतलाता है। और इसी उन सहयोग की अपेक्षा करता है.जब मानसिक वत्सराजध, पुष्ठ 12-13 92 रूप से वासवदत्ता को भावी विपत्ति के प्रति मलित किया जाता है और उसके द्वारा साम्राज्य की रक्षा के लिए प्रेरित किया जाता है तो उस उसी समय पूर्व निर्धारित योजना के अनुसार महासन प्रद्योत का पत्रवाहक पत्र लेकर आ जाता है ।। पत्र में अभिव्यक्त त्याग और बलिदान सम्बन्धी क्विारों के लिए महासन की भूरि-भूरि प्रशंसा की जाती है । इस प्रकार वासवदत्ता को राज्य रक्षr की योजना में सहयोग देने के लिए मानसिक रूप से पूर्णतया तैयार कर लिया जाता है, तभी उसको वह महान कार्यभार सोपा जाता है जो उपर्युक्त योजना में सहायक होता है । इसके पश्चात् वासवदत्ता के धर्य और निचय की परीक्षा के लिए उसके समक्षा राजा को भी उपस्थित किया grarte इस सम्पूर्ण घटना-चक्र का अनुशीलन-परिशीलन करने के पर चाद यह कहा जा सकता है कि कविवर अनंगहर्ष ने सम्पूर्ण घटना की प्रस्तुति मनोवैज्ञानिक रूप से की । वासवदत्ता को सहसा इतना बड़ा त्याग करने को नहीं कहा जाता है, उसे इसके लिए धीरे-धीरे तयारया जाता है, जिससे वह स्वयं राज्य Ter हेतु चिन्तित हो जाती है, फिर उसी मानसिक स्थिति के मध्य ही उसके पित प्रत का पत्र दिया जाता जिसमें महान बलिदान की प्रेरणा है जोर असहनीय पक्तिवियोग को सहन की बात कही गई है। इसो समय राजा भी वहाँ उपस्थित होता है, अवसर पर वासवदत्ता की कार्यभार वान की क्षमता का परीक्षण किया जाता है तथा दूसरी और नायक-नायिका के बीच गहन अनुराग कानिकपण करके 1. वापस-वत्सराजमा पृष्ठ 17. 2. लापत-वत्सराज बैंक-1.9 पुष्ठ 19.
93 उसकः त्याग की महानता दिलाई जाती है, नायक-नायिका का यह अनुराग आगे विप्रलम्भ-गर्भित करण-रस को तीव्र बना देता है। इसी समय वहाँ शबर जाति के लोग उपस्थित होते है और राजा sapy शिकार के लिए जंगल में ले - चलने का सुगम उपाय निकाल लेते है । इस प्रकार यह सम्पूर्ण योजना सुसंगत और मौलिक है किन्तु स्वप्न-वासवदत्तम् में उपर्युक्त योजना के दर्शन नहीं होते है। स्वप्नवासवदत्ता में हम प्रारंभ में ही वासवदत्ता को मगध के तपोवन के मार्ग में अपने भाग्य से असन्तुष्ट रूप देखते हैं। यही ऐसा प्रतीत होता है कि उसका वह त्याग स्वत: स्फूर्त नहीं है प्रत्युत ऊपर से आरोपित प्रतीत होता है ।। तापस-वत्सराजय का दूसरा अंक भी बहुत सुन्दर है । यहाँ हम यह देखते है कि अपने पूर्व प्रदर्शित प्रेम अनुरूप ही राजा उदयन वासव दत्ता की मृत्यु पर विलाप करता है । इस अंक में वासवदत्ता से सम्बन्धित पशु-पक्षी लता और वनस्पति आदि की उपस्थिति प्रदर्शित की गई है जिससे राजा के शोक में तीव्रता आ जाती है,यहाँ पर योजना के कार्यान्वित होने की सवना महाराज प्रपोत को भी दे दी जाती है और इधर जीवन से निराश जोर विरक्त राजा मन्त्री स्वान के साथ प्रयाग की ओर प्रस्थान करता है। वहाँ पर लाभकायन नामक ब्राइभि के देश में पहले से ही विद्यमान है,वह राजा से कहता है कि यदि वह वासवदत्ता की पुन: प्राप्ति चाहता है तो उसे पद्मावती से विवाह कर लेना चाहिए । तापत वत्सराजा नाटक के तृतीय बैंक का बहुत कुछ भाग कवि तमामिनी मयतमिष्ट-फल प्रयाग । तापम-बलराज 2.22.
ने अपनी योजनानुसार स्वयं उद्भावित किया है । तीसरे अंक में प्राप्त विष्कम्यक से हमें विदित होता है कि लामकायन और उसके शिष्य के बीच में वार्तालाप हो रहा है जिससे यह विदित होता है कि सात्यायनी ने पदमावती को प्रभावित कर लिया है और वह घर पर छोड़कर अपने राज्य- भवन के उद्यान में ही उदयन की मूर्ति बनाकर उसकी पूजा में लगी हुई है. इधर यौगन्धरायण वासवदत्ता को लेकर वहीं जा रहा है और मन्त्री स्वात राजा को लेकर प्रयाग पहुंच रहा है। उनके साथ विदृषक भी है,वहाँ पर मावान बड़ी चतुरता के साथ राजा सेठकर राजधानी कोशाम्बी को लोट आना है, जहाँ पर वह राज्य की स्वयं देखभाल करता है, इधर विदूषक राजा की रक्षा में तत्पर्य है ।। इसके पश्चात हम देखते हैं कि कवि ने क्यावस्तु को उनक नवीन घटनाओं के साम्रस्तुत किया है । सास्कृत्यायनी अपनी योजनानुसार एक और क्यिोगिनी पदमावती को सान्त्वना देती है तो दूसरी ओर वह अप्रत्यक्ष रूप से वासवदत्ता को भी सात्वना देती है । एक समय की बात है कि निराश पदमावती लता पाश से आत्म हत्या की चेष्टा करती है,यह कवि की मौलिक उद्भावना है इसके आगे एक स्थल पर उदयन और वासब- दत्ता दोनों चिता में जलकर बात्मदाह करना चाहते हैं । इस घटना का संयो- - जन भी कीव की प्रोलिक उद्भावना है। यद्यपि कथा-मरित्सागर में वासक- दस्ता के द्वारा आत्मदाह की चेष्टा का वर्णन मिलता है, परन्तु उदयन द्वारा आत्मदाह के लिए तत्पर होने का संक्त और कहीं हमें नहीं मिलता है। इस प्रकार हम देखते है कि विवर बी अनंग हर्ष मातराज में अपने प्रसिद्ध नाटक me .. नापम बलराज-3 पृष्ठ 5 95 तापस-वत्सराज में कतिपय मौलिक उदभावनाओं का समावेश किया है।। तापस-वत्सराज की समीक्षा : - यद्यपि तापस-वत्सराजन नाटक की कथावस्तु अत्यन्त प्राचीन और अत्यधिक पिष्टपति रही है किन्तु फिरभी कवि ने अपनी नव-नवीनमक- शालिनी प्रतिभा से इस नवीन रूप और विधान प्रदान किया है, जिससे यह नाट्यकृति सहृदयों और रसिकों के हृदय में अपना स्थान बना चुकी है । यहाँ ऐसा प्रतीत होता है कि तापस-वत्सराज नाटक के प्रणेता नाटककार अनंग हर्ब प्रसिद्ध नाटककार भास की प्रख्यात कृति स्वप्नवासवदत्त से सम्भवत: समानता करने का प्रयत्न करते है जिसमें उन्हें अनुकूल सफलता भी मिलती है । यदि तापस वत्सराजम् नाटक के विधान में और उसके प्रणयन में कोई नवीनता न होती तो यह निश्चित रूप से कहा जr सकता है कि यह कृति स्वप्नवासव -- दत्त के समक्ष ठहर नहीं सकती थी तापसवत्सराज के नाटक के प्रथम बैंक के ही रचना-विधान में कवि ने कवित्व और नाट्य-कौशल का परिचय दिया है जिससे. कवित्व की दृष्टि से वह वस्तुत: स्वप्नवासवदत्त से कहीं अधिक उन्नति कोटि का प्रतीत होता है। इसमें वर्णित यौगन्धरायण के विधान ले मुद्राराक्षसम्म वर्णित वाणक्य के विधान का स्मरण हो आता है। महामन्त्री चाणक्य की योजनाओं की तरह महामन्त्री यौगन्धरायण की योजनाये अपराजय प्रतीत * होती है। वासवदत्ता के द्वारा किए गए अभिवादन के उत्तर में योग- न्धरायण अत्यन्त सारगर्भित शब्दों में कहता है कि आप अपने भा के अभ्युदय HLN -- Propermananews MORA । तापन-वत्सराजय, अंक-2,एवं 3 १. तापल-वत्सराजम.क-पृष्ठ 19.20.21.22.
96 की कामना करने वाली हूँ. इस बाद योगन्धरायण एक मनोविराजत राजनीतिज्ञ की भाति उपर साक्ष मुख्य प्रयोजन को सहसा सामने न लाकर धीरे-धीरे उसे उसले सामने प्रस्तुत करता है । वासवदत्त के सामने उसके वहा आने का कारण पूछे जाने पर वह अत्यन्त चतुरता के साथ प्रभावपूर्ण ढंग से अपनी बात कहता है- औशाम्बी परिभूय न: कृपणदिषिभिः स्वीता जानास्यैव तथा प्रमादपरता पत्युयदे: स्त्रीणां च प्रियविप्रयोग-विधुर चेतः संदेवान, वक्तु नो सहते मनः परमती जानातु देवी स्वयः ।। यहाँ पर योगन्धरायणदेवकतनीसहते' अपने इस कथन से अपनी सम्पूर्ण बात ही कह दी है। यहाँ पर महान प्रधात की और वासवदत्ता के नाम पत्र प्राप्त करवाने की योजना भी बड़ी महत्वपूर्ण और नाटकीय है । इस पत्र में पिता की ओर से पुत्री के लिए नारी सुलभ मोह को त्यागकर कर्तव्य के पालन करने का अच्छा उपदेश दिया गया है । कहीं वासवदत्ता इस प्रकार के त्याग की बात को सुनकर विचलित न हो जाय, इसलिए योगन्धरायण महासेन दारा प्रेकित उस पत्र के संदेश की भरि-भूरि प्रशंसा करता है । इस प्रकार वह आगे आने वाले कार्यभार को संभालने के लिए वासवदत्ता को तयार करता है और अन्ता, उसकी स्वीकृति भी प्राप्त कर लेता है । इसके पश्चात् कवि ने वासवदत्ता के मानसिक संघर्ष को दिखलाने 1. तापलबलराजा ।.7 2 योगन्धरायणः - सामहालेन) मा नापत्यस्नेहाद वर्तव्य बतिका- तापसवत्सराजय बक-1.पृष्ठ 1.
97
का प्रयत्न किया है,वह इसके लिए राजा उदयन को वहाँ प्रस्तुत करता है ।
ऐसे अवसर पर वासवदत्ता के सामने राजा उदयन की प्रस्तुति उसी प्रकार
प्रतीत होती है जैसे सीता का परित्याग करने का निश्चय कर लेने के बाद
राम के समक्ष सीता की उपस्थिति ।
इस दृश्य में कवि ने वासवदत्ता को
जिस मानसिक संघर्ष की स्थिति में उपस्थित क्या है तथा जिस नाटकीयता
के साथ उस तट से बचाया है,वह सब प्रशंसनीय है ।
इस प्रकार हम कह सकत
है कि तापस-वत्सराज के नाटक के प्रथम अंक की सम्पूर्ण योजना बड़ी सुन्दर
मार्मिक, सजीव और हृदय स्पर्शी है ।
तापस-वत्सराजम् का दितीय अंक नाटकीयता की दृष्टि से
उतना सुन्दर नहीं बन पड़ा है, परन्तु चरित्र की दृष्टि से तथा इस परिपोष
की दृष्टि से यह बैंक भी प्रभावशाली है । यहाँ पर कवि ने अनुराग की
पृष्ठभूमि में उदयन के वैरास्य तथा उसके जीवन की निरपेक्षता की संगति
बैठाई है। बासवदत्ता की स्मृति में उससे सम्बन्धित वस्तुओं को देखकर
नायक करुण विलाप करता है। उसका यह कण किनाप उत्तर रामग्रीवरितय
के पंचम अंक और अभिज्ञानशाकुन्तल के चतुर्थ बैंक की स्मृति दिलाता है, इस
अंक में करुण की जो धारा प्रवाति हुई है, वह सहृदयों के हृदयों को संस्पर्श
करने वाली है। कतिपय उदाहरण दर्शनीय है
दृष्टिनीमतपर्भिणी स्मित-प्रधुम्स्यन्दि वनकि,
नहाई हृदयं न चन्दन-रसस्पर्शानि चाहानि वा ।
किंस्विलब्धपदेन निमिद करेण दग्धाग्निना,
नून कामहोडन्य एव दहनस्तस्यैदमावेष्टितम् ॥
1. तापस-वत्सराज 2.१.
इसी प्रकार एक अन्य पत्र में राजा उदयन अग्नि की हृदय an हीनता और उसकी करता का बहुत मुन्दर चित्रण करता है - "उत्कम्पिनी भयपरिस्सलिताशुकान्ता, ते लोचने प्रतिदिश विधुरे क्षिपन्ती । रेश दाणतया सहसव दग्धा, धूमान्धि तेन दहनेन न वीषितासि ।। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि यद्यपि ना-चक्र की दष्टि से क्यानक इस अंक के आगे नहीं बढ़ पता है परन्तु रस-परिपाक की दृष्टि से इस अंक का विशेष महत्व है। तीवर अंक में विष्कम्भक लम्बा है, यद्यपि इसमें लम्बे कथानक 2 को संक्षिप्त करने का प्रयास किया गया है । इस बैंक की बहुत ही महत्वपूर्ण नाटकीय देन है - कविरा साकृत्यायनी की उदभावना । कि कवि की इस उदभावना से नाटक में संगति आ गई है, क्योकि हम देखते हैं कि सांकृत्यायनी के प्रयास से ही उदयन और पदमावती के विवाह की संगति बन पाती है। जहाँ एक ओर स्वप्नवासवदत्तपक्यिोगिनी वासवदत्ता को अत्यन्त कठोर क्षणों में कोई सहानुभूति के दो शब्द कहने वाला भी नहीं मिलता, वहीं दूसरी ओर तापसवत्सराजम साकृत्यायनी की योजना से दोनों ही वियोगिनी नायिकानों को सांत्वना दिलाने का प्रयत्न हो जाता है जो कि नाटक के कथामक के विकास के लिए परमाायक है, किन्तु इस अंक के अन्त में कविकृत मध्यान्ह-वर्णन नाटक की दृष्टि से महत्वहीन है। यपि इसका जातीय 1. तापमवत्सराज2*16 2 ततः प्रविशति सीकृत्यायनी, तापसवत्सराजम. पृष्ठ .
महत्व हो सकता है । का चोथे अंक के पूर्वाद में कथात्मकता अधिक है और अभिनयात्म- कता कम है । इसके अन्त में पदमावती के द्वारा लतापाश से आत्महत्या दृश्य यद्यपि नाटकीय है फिरभी यह उद्भावना पराम्परा-वांछिनी है । नाट- कीय कोरान की दृष्टि से इस अंक की योजना दुर्बल प्रतीत होती है । यही बात पंचम अंक के सन्दर्भ में भी कही जा पाती है । तापसवत्सराजम् नाटक का छठा अंक नाटकीयता की दृष्टि से महत्वपूर्ण है, इसमें अभिनय, मानसिक - संघर्ष और साय इत्यादि प्रचुर मात्रा में प्रस्तुत किया गया है। इसमें पर्याप्त गतिशीलता दिखाई देती है । और यहाँ पर नाटक अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँचता हुआ दिखलाई देता है । और नायिका दोनों ही आत्मदाह के लिए एक ही स्थान पर जा पहुंचते है, दोनों ही एक दुसरे के मन्तव्य से बिल्कुल अनभिज्ञ है, केवल इस योजना के सूत्रधार हो इसे भलीभाति जानते है। जीवन के इन निराश क्षणों में दोनों अनन्य प्रेमियों का पुनर्मिलन जिस नाटकीयता से कराया गया है, वह नाटक- कार श्री अनंग हर्ष के नाट्य कौशल का निदर्शन है ।। यह सब होते हुए भी तापसवत्सराज नाटक की कतिपय नाटकीय दुर्बलताएँ हमें दिखाई देती है । यद्यपि संस्कृत-नाटकों में पद्यों का प्रयोग काव्यशास्त्रयों और नाटककारोंहारा मान्य है किन्तु जिस रूप में उनकी योजना इस नाटक में की गई है, वह अवश्य ही नाटकीय दृष्टि में जापतिजनक और आवाछनीय है। हम देखते हैं कि इसनाटक का दुसरा अंक सम्पूर्ण रूप से काव्यात्मक है, इसमें वाण जैस सुमार रस की निष्पत्ति के लिए तापमवत्सराजा 6.6.
100 शार्दूल-विक्रीडित जैले दीर्थ एवं कठिन संबो की योजना उचित नहीं कही जा सकती, इसी अंक के प्रारम्भ में बड़े-बड़े श्लोकों के द्वारा अग्नि की ज्वालाओं तथा उसके ारा किए गए विनाशका वर्णन करता नाटकीय दृष्टि से उचित नहीं है ।। तापसवत्सराजय नाटक के स्वगत भाग भी बहुत लम्बे है, जिसस नाटकीयता में बाधा पहुँचती है । नाटक का यह दोष आदि से अन्त तक दिखलाई देता है । लाभकायन तथा उसके शिष्य वासवदत्ता तथा पदमा- वती, राजा तथा विदूषक के क्रमशः तृतीय और पचम अंक के वातालापों में क्या का वा इतना मन्द हो गया है जिससे नाटकीयता में गति अवरुद्ध हो जाती है। तापसवत्सराजम के पंचम अंक में कुंजरक के द्वारा प्रस्तुत युद्ध-वर्णन बिलष्ट समस्त-शैली में प्राप्त होता है जो नाटक के लिए उचित नहीं है यहाँ ऐसा प्रतीत होता है कि हम एक श्रोता के रूप में युद्ध का वर्णन सुन रहे है। रंगमंच पर एक ही पात्र के द्वारा लम्बे-लम्बे वर्णनों को प्रस्तुत करना नाटक की दृष्टि से सर्वथा अनुपयुक्त है किन्तु तापसवत्सराज में ऐसे अनक स्थल प्राप्त होते हैं। सम्पूर्ण पंचम और द्वितीय अंक एक दृश्य में समाप्त हो जाते है। इससे यह स्पष्ट है कि रंगमंच की दृष्टि से तापसवत्सराजम का महत्व अधिक फिरभी तापवत्सराज नाटक प्राचीन काल में अपनी नाट्य- कला बोर काव्यकला के लिए चर्चित रहा है प्राचीन काल के नादय-अव्य- शास्त्रियों ने उस अत्यधिक महत्व प्रदान किया है। इसका कारण इसकी नाट्यकला बोर काव्याला ही है। प्राचीनकाल में नाट्यकला की दृष्टि में 1.तापलबत्सराज 6.6.बैंक-2 2. वही, प्रस्तावना. पृष्ठ 24-25.
यह नाटक इतना सफल था कि इसकी रचना के बाद लगभग दो सौ वर्षों तक अनेक प्रमुख आचार्यों ने अपने लक्ष ग्रन्यों में नाटक के विभिन्न अंगों के उदाहरणों के रूप में इसके अनेक पदयों स्थलों और प्रसंगों को उद्धृत किया है । इसी प्रकार आनंदवर्धनाचार्य से लेकर भोजदेव तक सभी आधाों ने अनेक स्थलों पर रस, भाव, ध्वनि और अलंकार आदि के पारपोस के लिए इस नाटक से अनका- नक पद्यों तथा प्रसंगों को उद्धृत किया है । । इससे इस नाटक के शास्त्रीय पक्ष का महत्व अत्यधिक है । दारूपककार धनिक धनंजय के अनुसार नाटक रसों पर आश्रित होता है । और भरतमुनि का भी कथन है कि रस के बिना कोई भी अर्थ प्रवृत्त नहीं होता है । इससे यह निष्कर्ष निकलता कि संस्कृत नाटको में अभिनय की अपेक्षा रस का अधिक महत्व है। इसीलिए अस्कृत नाटककारी' का ध्यान रंगमंच की अपेक्षा रस-निष्पत्ति को और अधिक रहा है । इस दृष्टि से विव rर करने पर तापसवत्सराजम एक सफल नाट्यकृति है जिसमें विप्रलम्भ- श्रृंगार-मिश्रित वाण-रस अपने सम्पूर्ण सौन्दर्य के साथ प्रस्ट हुआ है । दूसरी ओर जब हम स्वप्नवासवदत्त नाटक की ओर दृष्टि- पात करते हैं तो हमें भास को नाट्यकला का उजवन रूप दिखाई पड़ता है नाट्यकला के अन्तर्गत सभी नाटकीय तत्वों का समावेश होता है । क्यावस्तु का प्रश्न है, दोनों ही नाटको स्वप्नवासवदत्त जोर तापल । जहाँ तक वत्सराजम् का स्रोत वृक्षवाक्या, क्या-सरितसागर और लोक प्रचलित उदयन वासवदत्ता की प्रणय क्या रही है। स्वप्नवासवदत्तम प्रतिज्ञा-यौगन्धरायण का उत्तरार्ट है । प्रतिज्ञायौगन्धराया में पूर्व भाग की व्यावस्तु प्राप्त होती 1. दरावध रसायम् । दपक 7. पृष्ठ ।
102 स्वप्नवासवदत्तम् में नाटक की पंचसन्धिया पचवस्थाएँ और पाँच- अर्थप्रतिया यथोचित रूप से प्राप्त होती है । यह एक अच्छे नाटक की विशेषता है। भास वस्तुत: एक रसांसद प्रख्यात नाटककार थे । सुबोध भाषा, स्वाभाविक शेली, यथार्थवर्णन, चरित्रो का उदातीकरण, भावों - का जीवन्त प्रवाह उनके नाटक की प्रमुख विशेषताये है । विशुद्ध मौलिकता तथा कल्पना-वैचित्राप के कारण उनके नाटक कहीं-कहीं नाट्यशास्त्र के नियमों दे विपरीत होते हुए भी संस्कृत-साहित्य की स्थायी निधि है ।' नाटक की - कथावस्तु को प्रभावोत्पादक घटनाओंरा विकसित करने के लिए उन्होन ऐलो शैली का प्रस्फुरण क्यिा है कि उनमें स्वाभाविक्ता तथा गतिशीलता के साय रस का सम्यक् एवं समुचित परिपाक दुवा है । स्वप्नवासवदत्तम् में घटना की एकता और सार्थकता,बटनाओं का प्रतिधात तथा गति, कवित्व, चरित्रचित्रण तथा स्वाभाविकता और अभिनय के अनुकूल संवादयोजना आदि यथोचित रूप प्राप्त होते है । सजीवता, क्रियाशीलता एवं चरित्रनिर्माण की तीव्रता के कारण उनका यह नाटक विलक्षण है। हविवर भास में मौलिकता तया कल्पनाशक्ति का अजन स्रोत था। उनके बुदि-विलास तथा नाटकीय-कला TT अनुप्राणित उनकी कृतियों से सुस्पष्ट है कि वे नाटकीय तत्वों के सहज सर्जक थे । स्वप्नवासवदत्तम् नाटक के प्रथम बैंक में ही कविवर भास ने मुद्राकार के द्वारा नाटक के प्रमुख पात्रों का नामोल्लख करके परिचय दिया है जो उनकी अपनी विषer है। -- .. भासनाटक्वक्रय बन्देव उपाध्याय,पृष्ठ 25-30. 2. सूत्रधार उदयनवन्दु सवर्णावासदत्ताबलो वनस्य वाम पदमावतीर्णणों वसन्तको भुजोपाताय । स्वप्नवासवदत्त पृष्ठ 2 पात्रों का चरित्र-चित्रण भास ने अपने नाटक में बड़ी दुशलता । उनका प्रत्येक पात्र अपना स्वयं का व्यक्तित्व रखता है.पात्रों को विशेषताओं का विकास भी बड़े व्यवस्थित ढंग से नाटक में हुआ है । भास ने अपने इस नाटक में मानव जीवन की उदात्त कल्पना करके उसका निर्वाह करते हुए पवित्र आदर्श की स्थापना की है । कहना न होगा कि कविवर भास अपने वर्गन चातुर्य और नाट्य नपुण्य के रा अनुपस्थित पात्रों या उपयुक्त घानाओं को रंगमंच पर उपस्थित या घटित किए बिना ही प्रेक्षकों के मन में - उनका ऐसा आभास करा देते है, मानोउनका प्रत्याचित्रण हो रहा हो ।' भास ने अपने इस नाटक में प्रेम, करूणा और विस्मय के दृश्य अत्यन्त सफलतापूर्वक प्रस्तुत किए है, नाटक के संवाद बड़े ही चुस्त संक्षिप्त अनायासपूर्ण तथा नाटकीय दृष्टि से अत्यन्त प्रभावोत्पादक है। उनके इस नाटक में अनावश्यक विवरण और विस्तार नहीं मिलता है। भास की शैली में ओज,प्रसाद और माधुर्य गुण नैसर्गिक है: किन्तु उनका स्वप्नवासवदत्त नाटक विशेष रूप से प्रसाद गुण से डोमोत है जो एक सुन्दर नाटक के लिए सुन्दर गा है। भास कवि पाडित्य-प्रदर्शन नहीं करते, वे अपनविचारों और भावों को स्वाभाविक रूप से प्रक्ट होने देते हैं। - स्वप्नवासवदत्त नाटक का अनुशीलन करने से विदित होता है कि कविवर भास पात्रो तथा भावों के अनुक्ल शब्द-चयन बोर उनके परमित चयन में अत्यन्त दक्ष है। वैकठिन और समाल बहुला प्रदावली का कभी प्रयोग नहीं करते है। स्वाभाविक पद-विन्यास तथा भाव सौष्ठव के साथ,प्रवाह पूर्ण कोमलकान्त पदावली सभी को बादातिरेक से भावविभोर कर देती है। 1. संस्कृत साहित्य की रूपरेखा - चन्द्रशेखर शास्त्री, पुण्ठ 98.
104 वर्ग विस्तार दूर, लाधव और सरसता, युक्त उनका पद-विन्यास संस्कृत के नाट्य-साहित्य में अदितीय है। उनकी पघयोजना हृदय पर है। . गहरा प्रभाव प्रडालती है । प्रसादगुणयुक्त सरल पदयों का समावेश नाटक के प्रवाह को निर्बाध रखता घटनाओं तथा दृश्यों के यथोचित वर्णन करने पर वे सिदहस्त है। अकारों का चयन बड़ा स्वाभाविक है, शब्दों के साथ साथ सुन्दर अलंकार प्रयोग द्वारा श्रोता के हृदय में वे गूढ़तम भावों को भी प्रविष्ट करा देते हैं। भास को उपमाओं के लिए प्रकृति के ही उपादान विशेष रूप से अभीष्ट है । उदाहरण के लिए स्वप्नवासवदत्ता में वे कहते है कि मृत्यु के समय में कौन किसकी रक्षा कर सकता है, रस्सी के टूट जाने पर कौन घड़े को धारण कर सकता है, यह संसार वनों के तुल्य धर्मवाला है जो समय-समय पर बैट जाता है और फिर से उग जाता है ।। इसी प्रकार उपमा- लकार का निम्नाकित मनोरम उदाहरण भी दर्शनीय है यथr "कालक्रमेण जलत: परिवर्तमाना, चक्रारपक्तिसि- गच्छति भाग्यपक्ति: । इस प्रकार मधुर शब्दावली, भावो का सबल प्रवाह और रस का पूर्ण परिपाक भास की नाट्य शैली की विशेषता है। इस नाटक में कहीं भी कृत्रिमता तथा किसी प्रकार का बाडम्बर दिखलाई नहीं देता । यद्यपि कालिदास और भवभूति आदि नाटककारों की भौति भास में कल्पना की इतनी ऊँची उड़ान नहीं है, फिरभी उनके नाटक में मानव जीवन की उदाल-चेतना सहज रूप में प्राप्त होती है। वे उच्च से गच्च भावों को सरलतम भाषा व्यक्त कर देते है। उनकी यह विशेषता उनके नाटक का प्रा है। - कः शक्तो रमित मृत्युकाने रछेदक बधारयन्ति एवं मोस्तुन्यथा बनाना काल-काने ति म्यत छ ।
105 समालोचकों ने एक बार भाम नाटकों की परीक्षा का आयोजन किया था, उन्होंन भास नाटकों को समालोचना की अग्नि में तपाया था, परन्तु उनका स्वप्नवासवदत्त नाटक आलोचना ती अग्नि में नहीं जल सका, अशव परीक्षण के पश्चात् यह नाटक श्रेष्ठतम नाटक के रूप में ख्याति को प्राप्त हुआ था। इसीलिए नवम शताब्दी के राजरेखर कहते हैं कि आलोचकों में परीक्षा के लिए भास के नाटक चक्र को अग्नि में फेक दिया था किन्तु अग्नि स्वप्नवासवदत्ता नाटक को जला नहीं सका ।। वस्तुत: स्वप्नवासवदत्ता महाकवि भास की नाट्यकला का सर्वोकृष्ट उदाहरण है । । बैंकों का, सभी नाटकीय गुणों से सम्पन्न यह नाटक भास की अपूर्व प्रतिभा का परिचायक है । सच बात तो यह है कि रंगमंच की दृष्टि से स्वप्नवासवदत्तय संस्कृत का एक सफल नाटक है । स्वप्नवासवदत्तम् की क्यावस्तु में यद्यपि उदयन नायक है। फिरभी कथावस्तु के विकास में महामन्त्री योगन्धरायण काविशेष योगदान है । अवन्ति कुमारी महारानी वासवदत्ता अग्निदाह में भस्म हो गई है और उनके साथ ही प्रहामन्त्री योगन्धरायण भी जल गया है । इस प्रवाद के प्रचा- रित हो जाने के बाद मन्त्री की योजना अनुसार वत्सराज उदयन का मगध राजकुमारी पदमावती के साथ विवाह हो जाता है और उसके भाई दर्शक की सहायता से उदयन अपने खोये हुए राज्य को पुनः प्राप्त कर लेता है । बस इतन सेल क्यानक को कवि ने छ: बैंकों में विभाजित कर दिया है। कवि इस नाटक घटना की एकता और सार्थकता, कवित्व, चरिक-चित्र और सरल सम्बाद-योजना आदि से अपनी अलोकिक प्रतिभा का परिचय दिया है। नाटक - चोडीपक लिप्त परीक्षित स्वप्नवासवदत्तस्य दाहकोडमुन्न पावकः । काव्य-मीमांसा. राजाबर, पृष्ठ-55.
106 इल कथावस्त का प्रमुख विश्य है अटल, दृढ़ और अमर प्रेम की विजय,जिसके लिए किसी प्रकार का बलिदान साधारण है । स्वप्नवासवदत्तम् के चरित्रों । का विकासक्रम बड़ा हो रूचिकर एवं समीचीन है । पात्रों के चरित्र का मनो- वैज्ञानिक विश्लका बड़ी सुन्दरता के साथ किया गया है । चरित्र, पत्नीव्रत का पवित्र आदर्श है। वासवदत्ता, पतिपरायणा तथr पति- नायक उदयन का हित के लिए सर्वस्व त्याग देने वाली आदर्श पत्नी है । उसी प्रकार उच्च विचारों वाली राजकुमारी पद्मावती भी नारी जगद का श्रृंगार है । स्वप्नवासवदत्त नाटक के नामकरण में भी कवि ने अपनी अपूर्व प्रतिभा का परिचय दिया है । इसमें स्वप्न का दृश्य अत्यन्त ही भावपूर्ण और नाटकीयत से ओत-प्रोत है । यह स्वप्न, नाटक के पंचम अंक में घटित होता है। नाटक का नायक उदयन महारानी वासवदत्ता के प्रथम प्रणव की याद में विहक्ल है और उसके रूप सौन्दर्य के चिन्तन में मग्न है। उसो समय उस नींद आ जाती है। । वह स्वप्न देखने लगता है । उसे अपनी प्रियतम वासवदत्ता का साक्षात्कार होता है। वासवदत्ता उसके प्रश्नों का उत्तर देती है। स्वप्न की इस घटना के पश्चात राजr को अपनी प्रेयसी के जीवित रहने और कालान्तर में प्राप्त हो जाने की दृढ़ बाशा हो जाती है । स्वप्नात यह बाशा ही पति-पत्नी के निश्चित मिलन का मार्ग प्रशस्त करती है। यही नाटक का अन्त भी है। । कवि इस स्वप्न दृश्य से इतना प्रभावित बोर प्रसन्न है कि संभवत: इसी घटना पर इसका नामकरण कर देता है,जो इस नाटक के लिए अत्यन्त उपयुक्त है । नाटक आरम्भ से अन्त तक विप्रलम्भ अंगार का अच्छा परिपाक हुधा 107 दपक के अनुसार रूपक के इतिवृत्त को निम्नांकित पोच अर्थ प्रतियो पाँच अवस्थाओं तथा पाँच सन्धियों में विभक्त किया गया है, जो निम्नवत है - अर्थप्रकृतिया अवस्थाएँ 1- बीज आरम्भ मुख 2- बिन्दु प्रतिमुख गर्भ 4- प्रकरी नियताप्त विमर्श 5- कार्य उपसंहृति अर्थ प्रात्या नाटकीय इतिवृत्त के पाँच तत्व है ।। सम्पूर्ण नाटकीय इतिवृत्त उपर्युक्त नाटकीय तत्वों में विभक्त होते है। बीज, के बीज की तरह वह तत्व है, जो अंकुरित होकर नायक के कार्य या फल की और बढ़ता है । बिन्दु वह स्थिति है, जब बीज पानी में गिरे हुए तेल की बंद की तरह फैलता है : इस दशा में इतिवृत्त का बीज फलकर व्यक्त होने लगता है। पताका और प्रकरी का सभी नाटको प्रयोग अनिवार्य नहीं है। इसलिए स्वप्नवासवदत्ता और तापसवत्सराजम दोनों नाटकों पताका और प्रकरी प्राप्त नहीं होते । बारम्भ से पलागम तक पाँच अवस्थाए नाटकीय इतिवीत्त की गति सूचित करती है। यह देखा जाता यह देखा जाता है कि मानव का जीवन एक सीधी रेखा की तरह अपने लय तक नहीं पहुंचता । वह टेढ़ामढ़ा होता हुआ अपने 1. बीबिन्दु-पताकाध्याकरी-वार्यलग अक्तय: पंचता एता: परिकीर्तिताः । दशरूपक 18.पष्ठ ।। 2. रत्नावली: भूमिका-साहित्य भडार मेरठ-1967 संस्करण, पृष्ठ 46, 108 उद्देश्य तक पहुँचता है। मानव का जीवन संघर्ष से भरा हुआ है । संघर्ष ही उ गति देते है। वह संघर्ष की चट्टानों को तोड़ता हुआ, उन पर विजय प्राप्त करता हुजा 4 आशा और उल्लास के साथ आगे बढ़ता है । भारतीयों को इस बात में पूर्ण विश्वास है कि जीवन के संघर्षों और किनों पर अक्य विजय प्राप्त होगी। भारतीय संस्कृति के अनुसार अपने-अपने लय तया उद्देश्य की प्राप्ति में सभी को सफलता मिलेगी, इसमें कोई संदिह नहीं है। भारत निवासी फलागम में पूर्ण विवास रक्त है । मानव जीवन का लय ही धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष चतुर्वर्ग फल-प्राप्ति है। भारतीयों की धरणr भी परचात्यों की तरह निराशावादी नहीं रही है । इसलिए यहा के नाटक प्राय: सुधान्त होते है ।। नाटकीय कथावस्तु की प्रथम अवस्थr आरम्भ है । इस अवस्था के अन्तर्गत नायक में किसी वस्तु को प्राप्ति की इच्छा होती है, यह दुसरी बात है कि उसका प्रकाशन कोई दूसरा पात्र करे। दूसरी अवस्था प्रयत्न है, इस अवस्था में नायक उस लय को प्राप्त करने के लिए यत्नशील होता है । तीसरी बवस्था प्राप्त्याशा में निबाधr इत्यादि के विचार कर लेने के बाद नायक की लय प्राप्ति की संभावना हो जाती है। चौथी अवस्था नियतप्त - में उसे सफलता का पूरा विशवास हो जाता है और पाचवी अवस्था में वह फ्लागम तक पहुंच जाता है। उदाहरण के लिए स्वप्नवासवदत्त के प्रथा अंक में लावाणक ग्राम में अग्निवाह के पश्चात् नायक उदयन वासवदत्ता से पुनर्मिलन के लिए बाकुल और व्याकुल हो जाता है। नायक की नायिकाले पुनर्मिलन ।. संस्कृत साहित्य का इतिहास : बल्देव उपाध्याय, पृष्ठ 508.509.
109 की इच्छा आरम्भ है। इसके पश्चात नायिका के पुनर्मिलन के लिए पदमावती में विवाह प्रयत्न है, राजा के व्दारा स्वप्न में वासवदत्ता का मिलन प्राप्त्या- शा है और नियतास्त भी है । छठे अंक में नायक-नायिका का मिलन पलागम है । इसी प्रकार अवस्था के क्रम में मुख, प्रतिमुख, गर्भ, विमर्श और उपसंहति इत्यादि पाच सन्धियों का भी विभाजन किया जा सकता है । इसी प्रकार तापसवत्सराजस नाटक में भी पाच अर्थप्रतिया', पाच अवस्थाए और पाच नाटक सन्धिया प्राप्त होती है। यहां भी लावा- णक ग्राम में अग्निदाह के पश्चात प्रियतमा वासवदत्ता से सम्बन्धित वस्तुओं पशुओं और पक्षियों को देखकर नायक, नायिका पुनर्मिलन की तीव्र इच्छा रखता है जो आरम्भ है । रानी के वियोग में तापनवेश धारण करने वाला उदयन अपने मन्त्रियों के सहयोग से पदमावती से विवाह आदि की योजना प्रयल है। वासवदत्ता से विदूषक का मिलन और विदूषक है द्वारा राजा से वासवदत्ता के स्वप्न मिलने की बात बतलाना प्राप्त्याशा है जो पंचम अंत में दिखाई देती है। के अंक में गौगन्धरायण मिलन और अन्तत: वासवदत्ता से पुनर्मिलन नियताप्ति और पलागम है । इसी प्रकार इस नाटक में क्रमश: मुसन्धि, प्रतिमुख संधि, गर्भसन्धि, विपर्श सन्धि और उपसंहत सधि आदि नाटक की पाव तन्धिया प्राप्त होती है। दोनों ही नाटको विम्भक और प्रवाक का संयोजन क्या गया है। उदाहरण के लिए स्वप्नवासवदत्त के छठे बैंक के प्रारम्भ में मिश्र विष्कम्भक का प्रयोग किया गया है, जहाँ पर प्रतिहारी कंचुकीय परस्पर वार्तालाप करताना राजा उदयन की रानी वासवदत्ता की 110 घोष वती वीणा को प्राप्ति की सूचना दी गई। और महाराज उदयन से सूामुख महल से उतरने की भी सूचना दी गई। इसी प्रकार इसी नाटक के तीय और चतुर्थ अंक में प्रवाक का संयोजन किया गया है, जहाँ पर चेटी और कुरिश परस्पर वार्तालाप करते है तथा दूसरे स्थान पर बेटी और विदूषक का वातालाप होता है । इसी प्रकार तापसवत्सराजम में प्रथम *क के प्रारम्भ में विष्क- भक का प्रयोग प्राप्त होता है । जहाँ पर बेटी और कैचुकीय वार्तालाप करते है। इसी प्रकार व्दितीय अंक के प्रारम्भ में भी विष्कम्भक का प्रयोग -- किया गया है.जहों पर विनीत भद्र अग्निदाह की भयानकता की सवना देता है। तृतीय अंक के प्रारम्भ में भी विश्वभक का प्रयोग हुआ है। जहाँ माणवक और लामकायन की बातचीत होती है । प्रवाक का प्रयोग छठे अंक में किया गया है, जहां पर बेटी पद्मावती को सूचना दे रही है । इसीप्रकार दोनो नाटकों में भरतवाक्य का प्रयोग किया गया है जिस नाट्यशास्त्र की प्राचीन परम्परा का परिपालन gar है । इन दोनों ही नाटकों में नाट्यशास्त्र के नियमानुसार अर्यो- पदेपक भी प्राप्त होते हैं जिनमें किम्भक ' और 'प्रवाक ' मुख्य रूप से इन दोनों नाटकों में प्रयुक्त हुए है। भूत और भविष्य में घटित होने वाली घटनाओं की सूचना देने वाले अर्थोपदेपक को विष्कम्भक कहते है । इसके सूचक मध्यम शी के पात्र होते है। प्रशाक भी टनाओं की सूचना पूर्ववत दी जाती है। परन्तु इसमें सुबक पात्र अद्यय भी के होते है। नीच पात्रो से युक्त होने के कारण नाटक के बारम्भ में प्रवाक का प्रारम्भ नहीं होता है, किन्तु विकाभक कहीं भी प्रयुक्त हो सकता है, विष्कम्भक दो प्रकार का ।
होता है, शुद्ध-विष्कम्भक तथा मित्र - विष्कम्भक । शुद्ध-विष्कम्भक मैसभी पात्र मध्यम श्रेणी के तथा संस्कृत बोलने वाले होते है, परन्तु मित्र-विकभक में मध्यम श्रेणी तथा मिश्रेणी दोनों प्रकार के पात्र होते है। इस प्रकार स्पष्ट है कि उदयन और वासवदत्ता की प्रणय- - क्या से गति ये दोनों नाटक स्वप्नवासवदत्त' और 'तापसवत्सराजम' संस्कृत के श्रेष्ठ नाटक है। इन दोनों नाटकों में यदि कुछ साभ्य है तो वैषम्य भो है, दोनों में नाटकोयता भी है और काव्यात्मकता भी है। दोनों में ही चरित्र का उदात्तीकरण और नायक-नायिका का सत्य और पवित्र प्रेम अपने सम्पूर्ण सौन्दर्य के साथ प्रस्फुटित हुआ है 0000000 00000 000 0
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चतुर्थ
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पात्रों का तुलनात्मक चरित्र - चित्रण
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च तु पात्रोक का तुलनात्मक चरित्र-चित्रण -ommamine कथावस्तु के बाद रूपकों का दूसरा भेदक मेता या नायक होता है ।' नेता शब्द के साथ नायक का सम्पूर्ण परिवार आ जाता है । नायक, नायक के साथी, नायिका, नायिका की सख्यिा इत्यादि प्रतिनायक और उसके साथी सभी नेता के अंग माने जाते हैं। नाटक इत्यादि के इति- वृत्त का नायक वही बन सकता है जो विनम्र, मधुर, त्यागी, चतुर प्रियबोलने- वाला, लोगों को प्रसन्न करने वाला, पवित्र मन वाला, वाग्मी, कुलीन, स्थिर मनवाला और युवक होता है । वह बुद्धि, उत्साह, स्मृति, प्रज्ञा कला तथा मान से युक्त होता है । वह शर, दृढ़, तेजस्वी, शास्त्रज्ञाता तथा धार्मिक होता है 12 नाट्यशा के अनुसार नायक चार प्रकार का होता है। यह भेद नायक की प्रकृति के आधार पर किया गया है । भरतमुनि ने पात्रों को प्रकृति के अनुसार तीन वर्षों में विभाजित किया है - उत्तम प्रकृति, 12 मध्यम प्रकृति, अधम प्रकृति । यहाँ पर प्रकृति का अर्थ है स्वभाव । स्वभाव के अनुसार ही पात्रों के यह भेद किए जाते है। प्रकृति के अनुसार ही पात्रों के व्यापार होते है। उत्तम प्रकृति वाला व्यक्ति सदा उदात्त व्यापारों में ही अनुरक्त होता है । वह ऐसा कोई भी कार्य नहीं करता 1. वस्तुनता रसस्तमा भदकः, दापक ।। पृष्ठ । 2. नेता विनीतो मधुरस्त्यागी प्रियंवदा । रक्लोक निर्वाग्मी मावा रोयुवा, बुद्धुत्साहस्मृति प्रज्ञावलाभान-समन्वितः, गरोदय तेजस्वी शस्त्रधार्मिकः । दापक 2.12.पष्ठ संख्या-75.
जिस उसको गम्भीरता तथा सहानुभूति को कभी धक्का लगे । मध्यम प्रकृति का कार्य साधारण लोगों का व्यापार होता है । अधम प्रकृतिवाला पुरूष स्वभाव से ही नीचे की ओर जाने वाला होता है । एक बार जिस पात्र की जो भी प्रकृति स्वीकृत कर ली जाती है, इस नाटक में उसी प्रकार निर्वाह करना पड़ता नाट्यशास्त्र के नियमानुार पात्रों का बोलचाल व्यवहार, संगति और भाषा, वचन इत्यादि लब उसकी प्रकृति के अनुकूल होने चाहिर । दरारूपक के अनुसार नायक चार प्रकार के होते है ।। ये चारों प्रकार के नायक "धीर तो होते ही है, धीरत्व के अतिरिक्त इनमें अपनी- अपनी प्रतिगत विशेषता भी पाई जाती है । नायक का पहला प्रकार, धीर ललित है । दुसरा धीर प्रशान्त', तीसरा धीरोदात' और चौथा MER 'धीरोद्धत' उपर्युक्त इन चारों नायकों के उदाहरण क्रमश: वत्सराज उदयन, चारुदत्त, राम तथा भीमसेन है । है। धीर ललित: धीर ललित वह नायक है जो सर्वथा निश्चिन्त रहता है । वह कोमल स्वभाव का होता है, सुखी रहता है तथा नृत्यगीतादि कलाओं में आसक्त रहता है । धीर ललित नायक राज्यपाट की या दुसरी चिन्ताजों से मुक्त होता है । वह कला का प्रमी और रसिकतीत्त का होता है । प्रेम उसका उपास्य होता है, वह भोग-विनास लिप्त रहता है, तथा प्राय: अनेक पत्नीवाला होता है। बीर मलित' नायक अधिकतर राजा ही होता 1. भेदना ललितनान्तोदातोढनेस्यम. दारूपक 2.3, पृष्ठ 7 2. निचिन्सोवीरमलित: कलासक्तः सुखीमदः ।
है । इसका राज्यकार्य आदि मंत्री संभाल रहते है और वह अन्त:पुर की । चहर दीवारी में प्रेम-क्रीड़ा किया करता है । वह नव्युवतियों और सुन्द- रियों के प्रति अपने प्रेम का प्रदर्शन करता रहता अपन इस व्यापार में वह अपनी महारानी से सदैव डरता हुआ सशक्ति रहता । दत्तम् तथा तापसवत्सराज नाटकों का नायक वत्सराज उदयन एer ही 'धोर ललित' नायक है ।। 128 धीर प्रशान्त : Mos धीर प्रशान्त प्रकृति का नायक धीर प्रकृति से सर्वथा भिन्न होता है । कुल की दृष्टिले शान्त प्रकृति का होता प्रायः ब्राहमण यवैश्य में होती है। इससे यह किकर्ष निकलता है कि धीर प्रशान्त नायक या तो ब्राहमण होता है या तो वैश्य होता है । द्रक के मृच्छकटिक का नायक चारुदत्त तथा भवभूति के मालती-माधव का नायक माधव' धीर प्रशान्त है । वे दोनों ही कुल से ब्राइमण है 12 RLIARRIOTI 138 धीरोदात्त: धीरोदात्त प्रकृति का नायक भी प्राय: राजा या राज्य- कुलोत्पन्न होता है। वह निरभिमानी,अत्यन्त गम्भीर, स्थिर तथr अवि- कत्थन होता है, जिस व्रत को वह धारण कर लेता है, उसे छोड़ता नहीं है । धीरोदात्त नायक, नायक के सम्पूर्ण आदर्शों से युक्त होता है। उत्तरराम- चरित नाटक के नायक श्रीराम धीरोदात्र नायक है।' 1. राज्य निर्जितात्रु योग्बसचिव न्यस्ता समस्ती भरः सम्यक्पामनलालिता: प्रशभितारोमोपलगा प्रजा:। प्रचीतस्य सुता बान्तसमयस्त्वं ति नाम्ना पति कामः समवेत्वयं मा पुर्वन्ये महानुत्सवः रत्नावली 19.06-15 १. सामान्यायुक्तस्तु बीरगान्तो जादिकः । दपक 2.3.पृष्ठ-80 २. महास्वोतिगम्भीररावानविकत्यना.
[48 धोरौध्दत : धीरोदत नायक धाडी, ईया पूर्ण आत्मरलाधी और खल्ली होता है । परशुराम अथवा भीमसन धीरोदक नायक है। । नाट्यशास्त्र में नायक का एक दूसरे प्रकारका भी वर्गीकरण पाया जाता है। यह वर्गीकरण उसके प्रेम व्यापार एवं तत्सम्बन्धी व्यवधर । के अनुरूप होता है। प्रेम की अवस्था में नायक के दक्षिण, ठ, पृष्ट तथा अनुक्ल यह चार रूप देखे जा सकते है। ये रूप अपनी परिणीता पत्नी के प्रति किए गए उसके व्यवहार में पाए जाते हैं, दक्षिण नायक एक से अधिक प्रियाओं को एक ही तरह प्यार करता है। स्वप्नवासवदत्तम. तापस- वत्सराज और रत्नावली नाटिका का नायक वत्सराज उदयन दक्षिण नायक शनायक अपनी जैजनायिका के साथ खराब व्यवहार तो नहीं करता, परन्तु उसले छिप-छिपकर दूसरी नायिकाओं से प्रेम करता है। । अष्ट नायक धोखेबाज होता है, वह ज्येष्ठानायिका कीचिन्ता नहीं करता है । अनुकूल नायक सदा एक नायिका के प्रति ही आसक्त रहता है। उत्तरराम रतन नाटक के नायक श्रीराम अनुकूल नायक है जो केवल सीता के ही प्रति आसक्त है।' नाट्यशास्त्र के अनुसार नायक में आठ प्रकार के सात्विक गुणों का होना पाया जाता है -शौभा.128 विलास.मार्ण,841 गम्भीरता, अर्थ, 16 तेज.17 लालित्य एवं औदार्य ।' 1. दापक 26.7 पृष्ठ87-91 2. शोभा विलासी माधुर्य गाम्भीर्य स्थर्यतजली । बलितोदामित्यष्टो मत्विका: पोल्वागुणाः ॥ दाम्पक 210, पृष्ठ 4.
नायक का शत्रु प्रतिनायक होता है और नायक के साथी पताका नायक और पीठ मर्द कहलात है। नायक के राज्यकार्य तथा धर्मकार्य देखने वाले उनके सहायक मन्त्री,सनापति आदि होते है । प्रेम के समय नायक के सहयोगी और सहकारी विदृषक तथा विट आदि पात्र होते हैं । नाटककार अपनी आवयकतानुसार अपने नाटको पात्रों का संयोजन करता वत्सराज उदयन के चरित्र-चित्रण के लिए प्रतिज्ञा योगन्छ- रायण. स्वप्नवासवदत्ता और तापसवत्सराजम् इन तीनों नाटकों का अनुशीलन परिशीलन अत्यन्त आकयक है । यह सर्वविदित है कि प्रतिहायोगन्धरायण. स्वप्नवासवदत्त नाटक का पूर्वभाग या प्रस्तावना है । । प्रतिता योगन्धरायण के अनुसार वत्सराज उदयन गीत प्रेमी तथा वीणा वादन में सिद्धहस्त है । वह गजशास्त्र का निष्णात विज्ञान है । गजशास्त्र का विान होने के कारण वह दुष्ट से दुष्ट हाथियों को पकड़ लेता है, वह वासुकि नामक सर्पराज के अनुस वसुनाम द्वारा प्रदत्त घोषवती नामक वीणा के बजाने में अत्यन्त निपुण है, वह गज बीमा वशीकरण विमा को जानता है । वह घोषवती वीणा बजाकर दुष्ट से दुष्ट हाथी को भी वश में कर लेता है। यह कहा जाता है कि वत्सराज उदयन महाभारत के प्रमुख पात्र वीरवर अर्जुन के वीरपुत्र अभिमन्यु के वंशानुक्रम में पच्चीसवीं पीढ़ी के सन्तान थे ।' एक और वे जहाँ विद्वान्, गुण बोर संगीतकला के पारंगत विब्दान है तो वहीं दूसरी और वैसर्वाग सुन्दर,पवार, तेजस्वी और लग्नित स्वभाव के धनी है। - शतानीकस्य पुत्रः, महमानीकन्यनता प्रतिज्ञायोगन्धरायण भूमिका.डॉ०प्रभाकर शास्त्री, जयपुर-1991 117 वत्सराज उदयन को श्रेष्ठ हाथियों को वश में करने का बहुत शोक रहा है। गजशास्त्र के अनुसार हाथियों में नीला का हाथी सर्वत्र माना जाता है । उदयन को यह सूचना मिलती है कि नागवन' में एक नील हाथो है, जो दुर्दान्त और दुर्दमनीय है, वह इस सूचना पर अपनी घोषवती वीणा लेकर सीलगज को पकड़ने के लिए नागवन जाता है । प्रतिज्ञा-योगन्धरायणम् नाटक के अनुसार इस घटना से सम्बन्धित दुसरा पर भो उज्जयिनी के राजा प्रयोत महासन यह चाहता था कि वत्सराज उदयन उसकी आधीनता स्वीकार करें, वह इस संबंध में अनेक प्रयत्न भी करता है किन्तु उसे सफलता नहीं मिलती है । वह सर्वगुण सम्पन्न राजा उदयन से अपनी प्रियपुत्री वासवदत्ता का विवाह करना चाहता है। वह इसके लिए नागवन में नीलगज की घटना को प्रचारित करता है, और राजा उदयन को नागवन में पहुंचने के लिए बाध्य कर देता है । उदयन नागवन में दिखाई देने वाले नील हाथी को पकड़ने के लिए जाते है । उस पथी के समीप पहुँचते ही नकली चील हाथी के पेट में अनेक योटा निकलकर उदयन को गिरफ्तार कर लेते हैं और उस प्रीत के पास राजधानी उज्जयिनी - ले जाते हैं, वहाँ पर कंचुकीय उदयन की वीणा को प्रधौत के सामने प्रस्तुत करता है, जिसे वह अपनी बेटी के पास भेज देतr है । इधर उदयन वासव- दत्ता को वीणा बनाने की शिक्षा देता है । महामन्त्री योगन्धरायण की राजनीति और बता से उदयन भरवती हथिनी में वासवदत्ता को बैठाकर अपनी राजधानी बोट जाता है । प्रद्योत पहले ही अपनी पुत्री का विवाह वत्सराज उदयन से करना चाहते थे। किन्तु उन दोनों के भाग जाने पर वह 1. योगन्धरायणः एवं सम्बन्ध मन्यत महासनः । प्रतिज्ञायोगन्धराया बैंक-4 पृष्ठ 167.
चित्रफलक के द्वारा उनकी अनुपस्थिति में दोनों का विवाह सम्पन्न कर बेत है। उदयन और वासवदत्ता का प्रणय अपूर्व है । दोनों ही नायक-नायिका प्रथम दृष्टि में एक दूसरे से प्रणय में आबध्द हो जाते है । उदयन और वासवदत्ता की यह प्रणय-कथा इतनी मादक और आनंददायनो रहा है कि कविकुल-गुरू - कालिदास ने अपनी प्रसिद्ध कृति मेधदृतम् में उदय-कथा के प्रेमी रसिक वृद्धजनों का उल्लेख करना नहीं भूलते है । ऐसा प्रतीत होता है कि अभी भी उज्जयिनी के निवासी उदयन-वासवदत्ता-प्रणयकथा एक दूसरे के सुनाते है और आदित होते हैं।' स्वप्नवासवदत्तात्र और तापसवत्सराजम् नाटकों के अनुसार जब हम उदयन का चरित्र-चित्रण करते है तो उससे विदित होता है कि प्रधोतसुता वासवदत्ता उदयन से अत्यधिक स्नेह करती है और उदयन भी वासवदत्ता से अत्यधिक स्नेह करता है । यह बात तो इसी घटना से सिद्ध हो जाती है कि दोनों प्रेमी प्रेम के बन्धन में बंधकर उज्जयिनी से छिपकर भाग आए थे, दोनों नाटकों के अध्ययन से विदित होता कि वह इतना अधिक विलासी तथा कामप्रिय है कि वासवदत्ता के सौन्दर्य में आसक्त हो जाने के कारण अपने राज्यकार्य की उपेक्षा कर देता है। इसीलिए राजा उदयन को बासरता वासवदत्ता के प्रेम में आसक्त और विकास में डूबा हुबा समझकर पांचाल नरेश वत्संदेश पर आक्रमण करता है और राज्य के बड़े भाग पर अपना अधिकार जमा लेता है । तापसवत्सराज नाटक के अनुसार राज्य की रक्षा के प्रति उदयन का उपेक्षाभाव योगन्धरायण के उस क्धन विदित होता है.जब वह महारानी 1. प्राप्यावन्तीनुदयन-कथाकोविग्रामदान । मेघदुतः ।..
119 वासवदत्ता से राज्य की स्थिति पर बात करता है। योगन्धरायण वासवदत्ता कहता है कि आ7 जानती है कि नीच शत्रुओं ने आक्रमण करते हमारी कौशाम्बी में अधिकार कर लिया है । इधर आपके पति राजनीति से देख करते है और वे राज्य की स्थिति के प्रति असावधान है - कि वह प्रजापालन यौगन्धरायण के उपर्युक्त स्थान से यह स्पष्ट हो जाता उदयन में दूरदर्शिता और राजनयिक सूम- को कमी है । को अपेक्षा अपने सुख और उपभोग का ध्यान अधिक रखता है । यदि उसे यौगन्धरायण और रूमावान जो राजभक्त और दूरदर्शी बुद्धिमा३ मन्त्री न मिले होते तो अवश्य ही उसका राज्य विनष्ट हो जाता और वह पाचाल नरेश आणि का दास बन जाता। ऐसा प्रतीत होता है कि उदयन की अपेक्षा महारानी वासवदत्ता को अपने राज्यरक्षा की ज्यादा वन्ता है । इसीलिए वह महामन्त्री की योजनानुसार अपने पति, राज्य तथा प्रजाजनों । की रक्षा के लिए एक सामान्य प्रोक्ति का नारी का जीवन बिताने के लिए प्रस्तुत हो जाती यहाँ दोनों नाटकों के अध्ययन से यह भी प्रतीत होता है कि राजा उदयन वासवदत्ता जसी रूपयौवनसम्पन्न प्रेमिका को पाकर विनास में इतना अधिक ब जाता है कि उसे अपने मामने स्थित विनाश भी दिखाई नहीं देता है । उदयन में न तो धैर्य दिखाई देता है,न वीरता दिखाई देती है और न ही दूरदर्शिता दिखाई देती है । पक श्रेष्ठराजा के लिए यावश्यक .. मेशाम्बी परिभव नः पणवीषिभि स्वीकृता जानास्येव तथा प्रमादपरता पत्युयनिगः तापसवत्सराज 7, पृष्ठ 14.
119 वासवदत्ता से राज्य की स्थिति पर बात करता है। योगन्धरायण वासवदत्ता कहता है कि आ7 जानती है कि नीच शत्रुओं ने आक्रमण करके हमारी कौशाम्बी में अधिकार कर लिया है । इधर आपके पति राजनीति से देष करते है और वे राज्य की स्थिति के प्रति असावधान है ।' यौगन्धरायण के उपर्युक्त कथन से यह स्पष्ट हो जाता है कि उदयन में दूरदर्शिता और राजनयिक सूझ-न को कमी है । वह प्रजापालन को अपेक्षा अपने सुख और उपभोग का ध्यान अधिक रखता है । यदि उसे योगन्धरायण और रूमावान जो राजभक्त और दूरदर्शी बुद्धिमान मन्त्री न मिले होते तो अक्सय ही उसका राज्य विनष्ट हो जाता और वह पाचाल नरेश आणि का दास बन जाता। ऐसा प्रतीत होता है कि उदयन की अपेक्षा महारानी वासवदत्ता को अपने राज्यरक्षा की ज्यादा चिन्ता है। इसीलिए वह महामन्त्री की योजनामार अपने पति, राज्य तथा प्रजाजनों की रक्षा के लिए एक सामान्य प्रोषित भका नारी का जीवन बिताने के लिए प्रस्तुत हो जाती है। यहाँ दोनों नाटकों के अध्ययन से यह भी प्रतीत होता है कि राजा उदयन वासवदत्ता जसी रूपयौवनसम्पन्न प्रेमिका को पाकर कि उसे अपने सामने स्थित विनाश भी विलास में इतना अधिक हब जाता दिखाई नहीं देता है। उदयन में न तो धर्थ दिखाई देता है,न वीरता दिखाई देती है और न ही दूरदर्शिता दिखाई देती है । एक अण्डराजा के लिए यावायक . कोशाम्बी परिभवन परिषिभि स्वीकृता' जाना स्व तथा प्रमादपरता पत्युनयवभिगः वापसवत्सराजस।.7, पृष्ठ 14.
120 गुण माने जाते है । उसके जो प्रशंसनीय गुण है, उसकी कामदेव जैसी सुन्दरता, आदर्श प्रेमी और श्रेष्ठ पति । वस्तुत: वह एक आदर्श प्रेमी व आदर्श पति है। उसके लिए उसकी प्रेमिका का जीवन और प्रेम ही सब कुछ है । ' वासवदत्ता - के प्रति उनका प्रेम अचल और निष्कपट है। दोनों ही नाटकों में अग्निदाह से वासवदत्ता के जल जाने की बात प्रचारित की गई है । वह इस समाचार से इतना व्यथित होता है कि स्वयं को भी वह उसी अग्नि में भस्मसात कर देना चाहता है किन्तु मन्त्रीगण उसे अग्नि में प्रवेश करने से रोक देत है । वह वासवदत्ता के जले हुए आभूषणों को अपने हा से लगाता है, वह मूति हो जाता है । जाग्रत होने पर वह वासवदत्ता को स्मरणकर कारुणिक विलाप करता है। उसके इस अनन्य प्रणय का वर्णन एक ब्रह्मचारी करता है । कहता है कि इस समय उस राजा के समान न तो कोई चक्रवाक है और न विशिष्ट रमणियों से अलग हुए ऐस कोई दूसरे ही व्यक्ति है । वह नारी धन्य है जिसे उसका पति इतना अधिक प्रेम करता है। निःसन्देह पति के इस अनन्य प्रेम के कारण जलो हुई भी वासवदत्ता न जले हुए के समान है ।' तापसवत्सराजम् में भी वासवदत्ता के दाह का समाचार सुनकर वह विश्वल हो जाता है और अग्नि की कठोरता के सम्बन्ध में विचार व्यक्त करता है । वह कहता है कि क्या तुम्हारी दृष्टि अमृत की वर्षा करने वाली नही थी, क्या तुम्हारा मुख हास्यरूपी मधु को प्रवाहित 1. विम् अथवा प्रेमासमाप्तोसवः । तापलवत्सराज..14 2. अवदानी ताशारवाका वाप्यन्यै स्त्रीविषयुक्ताः,बन्या सास्त्री या तथा वैत भत्ताभग्नहातमा हिदम्बायदम्बा । स्वप्नवासवदत्तम 113 पृष्ठ 55.
121 नहीं करता था, क्या तुम्हारा हृदय प्रेम भीगा हुआ नहीं था , क्या शरीर के प्रत्येक अवयव चंदन के स्पर्श के समान नहीं 29 पता नहीं किस अंग में अपने कदम जमाकर इस निर्दयी अग्नि ने तुम्हें जला दिया है । निश्चित रूप ले व्रज निर्मित यह कोई दूसरी अग्नि है : जिसने यह अनुचित कार्य किया है ।' इसो नाटक के तृतीय अंक में राजा विदूषक से कहता है कि वासवदत्ता को जलाने वाली अग्नि के बुझ जाने पर भी वइ अग्नि अभी भी मुझे निरन्तर जलाये जा रही है, दु:ख के टैग से भाग पड़ा हुआ मैटो अपनी प्रिया के साथ-साथ नहीं चला गया तापस होकर मियr ही में अपने को समझr रहा हूँ। वस्तुत: मैने प्रेम के अनुरूप कार्य नहीं लिया है। मुझे भी अपनी प्रिय- तमा के साथ ही चला जाना चाहिए था। तापन बना हुजा उदयन अपने मित्र विदृषकले पुन: कहता है कि वासवदत्ता के नाम का ही में जप करता हूँ। उपदेश रूप में गुरु रा दिया ग्था मन्त्र न जाने कहाँ लुप्त हो गया है । चित्त । मदेव प्रियतमा की मूर्ति का ध्यान रहता है । किसी अन्य का ध्यान नहीं। उसकी ही बाते कानों में निरन्तर सुनाई देती है ।मुनियों द्वारा दिए गए धर्म के उपदेश सुनाई नहीं देते है। तपस्या करते हुए भी मेरे मन में जो कुछ आता है, देवी वासवदत्ता उसके पीछे-पी हर समय विद्यमान रहती है 12 - दृष्टिमितवार्षिणी स्मित-मनस्यन्दि वक्त्रं नक, महार्द्र हृदय न बन्दन-रस-स्पशानि चागानि वा । की मल्लब्धपदेन दि तिमिदं करेण दग्धाग्निना. जून कामयोन्डन्य एवं दहनस्तस्येदमावेष्टितम । तापस-वत्सराज 29, पृष्ठ 43 तन्नामेव मोमेति जप्यपदकैः प्यन्यतस्तर्गत. नित्यं मा लिखितव ती सरव ध्येय विष्य न तव । व अगले पृष्ठ पर 2.
122 वस्तुत: सम्पूर्ण नाटक में तथा उसके अन्त तक हम देखते है कि उदयन वासवदत्ता की याद में आसू बहाता रहता है । हम यह देको हैं कि वासवदत्ता के अभाव में उदयन का जीवन सारहीन हो जाता है । उससे पुनर्मिलन की एक आग है और वह है सिदादेश । सिदादेश के नारा उसे यह विवास है कि वासवदत्ता से उसका पुनर्मिलन होगा, ऐसा प्रतीत होता है कि सिद्धादेश प सत्यता को प्रमाणित होने तक वह अपने प्राण धारण किए ह । अन्त में उसे जब यह विश्वास होने लगता है कि वासवदत्ता से पुनर्मिलन की आशा नहीं है तो वह चिता जलकर अपना प्राणान्त कर देना चाहता है। इधर स्वप्नवासवदत्ता नाटक का जब हम अवलोकन करते है तो देखते हैं कि राजा का पासवदत्ता-वियोगजन्य संताप असहनीय है, वह अपनी आँखों से संदेव वासवदत्ता को प्रत्या की तरह देखता है । - वासवदत्त । को भूलना उसके लिए एक बड़ी समस्या है । उसका राजकुमारी पदमावती दुसरा विवाह हो चुका है और नवपरिणीता वधू पदमावती का लोन्दर्य भी अन्तिीय है । फिरभी उसका सौन्दर्य राजा को आकर्षित नहीं कर पाता, इसीलिए वह विदुषक से कहता है कि यपि राजकुमारी पदमावती अपने रूप शील और माधु से बहुत प्रिय है, फिरभी बासवदत्ता में बालक्त मेरे मन को वह खींच नहीं सकती । इसका यह तात्पर्य नहीं है कि वह अपनी दूसरी - 1. 'तद्राच: अतिमामनन्ति न पुनर्धमोपदेशा मुने र्यन्मे यातितपस्यतोडवि हृदये देव्या तदन्वीयते ।' arपसवत्सराजस3.12, पृष्ठ 1 कष्टकेवालमेव राजतनया दग्या बराकी प्रथा । तापसवत्सराज 6.4, पृष्ठ 203 पदमावती बहुमता मम याप स्पशीलमाधुर्ये: वासवदत्तावईनdarवी मनी हरति । स्वप्नवासवदत्त पृष्ठ 126. 2.
123 पत्नी पदमावती से कम प्रेम करता है वह जब पदमावती को शिशेवदना की बात सुनता है तो उससे वह व्याकुल हो जाता है और मन में अनेक प्रकार की आशंका करते हुए कहता है कि रूप सम्पत्ति तथा गुणों से युक्त प्रिय दुसरी पत्नी को प्राप्त करके पहली चोटसे दुखी हुआ भी मेरा शोक अब कुछ कम सा हो गया था किन्तु भुक्तभोगी होने के कारण मै पदमावती को भी उसी तरह वासवदत्ता के समान दिवंगत होने वाली समा रहा वह वासवदत्ता को स्वप्न में देखता है और अपने प्रश्नों का उत्तर मागता है। यह उसके आसक्ति दी चरमसीमा है। वह उससे पूछता है कि क्या तुम मुझसे नाराज हो? यदि तुम नाराज नहीं हो तो तुमने अलकार क्यों नहीं धारण किए । विदूषक के यह कहने पर कि वासवदत्ता की मृत्यु हो चुकी है, आपने स्वप्न देखा होगा । इस पर वह भावविभोर होकर कह उठता है कि यदि वह स्वप्न है तो मेरा न जागना ही अच्छा होता औरयदि यह मेरा मतिभ्रम है तो वह मेरा मतिभ्रम चिरकाल तक बना रहे 12 तापलवत्सराजम नाटक के अनुसार पद्मावती से दूसरा विवाह उदयन को कचकर नहीं है, इस जितीय विवाह उनके मन में यह प्रतीति कई M होती है कि वह वासवदत्ता को प्रति विवासघात करने जा रहा है । - 1. पश्यिा समृद्धिता गुणताच युक्ता लब्ध्वा प्रिया मम तु मन्द इवाशीक:। पूर्वाभिवातजोडप्यनगदुःखः पदमावतीमपि तैयव सधियामि ॥ वनवासवदत्ता 2 पृष्ठ 153. 2. यदि तावदयं स्वतों धन्यमप्रतिबोधन । स्थाय किमी वा स्याद् यिोध्यस्तु में चिरम । स्वप्नवासवदत्ता5.9.पृष्ठ 176 तुलनीय-स्वप्नी नुमाया नु मतिमी : अभिज्ञानशाकुन्तलम 6.10.
124 दूसरा विवाह उस महापातक जैसा प्रतीत होता है । वह इस प्रसंग में पद्मावती का मुख से नाम भी नहीं लेना चाहता । शोकाकुल होकर वह कहता है कि है देवी ! मेरी और कभी तुम्हारे मुस से हटकर कहीं भी शान्ति प्राप्त नहीं करती थी, मेरा का संदेव तुम्हारे शयन के लिए शपया के रूप में प्रस्तुत रहता था, मैने यह भी तुमसे कहा था कि तुम्हारे बिना यह सम्पूर्ण संसार मेरे लिए शून्य हो जाता है, वही दूसरा विवाह करने का विचार काँगा, इस प्रकार की कल्पना कोई भी नहीं कर सकता था । पर तुम्हारे वियोग में सन्यास को दीक्षा का पापड करने वाला में है प्रियतम। दूसरे विवाह के लिए स्वीकृति देकर न जाने क्या अनर्थ करने के लिए प्रस्तुत हो गया है।' उक्त कथन से यह प्रतीत होता है कि उदयन वासवदत्ता के प्रति प्रेमान्ध है। उसका प्रेम एकीगी प्रतीत होता है । इसलिए वह स्वयं अपनो ऑखो से पद्मावती की भक्ति और त्याग को देखकर भी वह उसे अपना स्नेह नहीं दे पाता है 12 पद्मावती के प्रति उदयन का प्रेम हार्दिक और स्वाभाविक नहीं है क्योकि पदमावती के साथ उसका विवाह उसके अनुराग के कारण नहीं अपितु सिद्धादेश के अनुरूप वासवदत्ता की प्राप्ति के लिए होता है।' -- Pleas- कर्पस्य तवाननादपगत नाभूत्ववीचन्मित, येना सतत स्वदेवायन काथली कल्पिता । तोक्तासि विनालयामम जगच्चन्य गाजायत, सोड्य दम्भपतनत: प्रियतम कर्नु किमप्यत: ॥ तापस-वत्सराजस13. पृष्ठ 128 तपस-वत्सराजय4.8 तापलबत्तराज 4.12.14 पृष्ठ 126-130 2. 3 125 पद्मावती के पास भी प्रेमी और स्पन्दनशील हृदय है, उसे भी अपने प्रेम का प्रतिदान चाहिए किन्तु उदयन को इस बात का बिल्कुल ध्यान नहीं है । यद्यपि नायक का पद्मावती में दूसरा विवाह हो गया है,फिरभी जब उसे वासवदत्ता से मिलने को आशा नहीं रहती है तब वह नवपरिणीता स्नेह की मूर्ति पद्मावती की चिन्ता न करते हुए वासवदत्ता की स्मृति में चिता मलजकर प्राणान्त कर देना चाहता है । उदयन के चरित्र की यह बहुत बड़ी विडम्बना है कि जिस राजवुमारी पदमावती ने उसके स्नेह में पागल होकर अपना घरबार छोड़ दिया, तपस्विनी का रूप धारण कर कठोर साधना की,उसके साथ नायक का परिणय भी हो गया : फिरभी उसे जीवन की देहली पर खड़ा करके चिता कृदने की इच्छा करना उसकी हृदयहीनता का परिचायक है । जहाँ एक और वासवदत्ता के प्रति उसके हृदय की उदारता और उसका आदर्श प्रेम प्रशंसा के योग्य है, वहीं दूसरी ओर पद्मावती के प्रति उसकी यह संकीर्णता निन्दनीय है । दोनों नाटकों के मन्धन और वमन्थन करने के पश्चात हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते है कि वासवदत्ता के प्रेम ने उदयन को अन्धा बना दिया है । इसीलिए नायक का सम्पूर्ण जीवन उसी में केन्द्रित होकर वासवदत्तामय हो गया है। महामन्त्री यौगन्धरायण के जल मरने के समाचार वह इसलिए दुखी होता है कि उस पर अपने सम्पूर्ण राज्य का भार सोप कर वह स्वयं सुखोपभोग में डूब सकता था।' नाटककार कविवर अनंग हर्ष ने यधपि अपने नाटक में बस्सराज 1. रागान् मवि कस्य माणत मनः बदामसमुत्पति मनु राज्यभर यि सल सेव सुखानीच्या ॥ तापसवत्सराजय 2*18. पृष्ठ 126 को प्रमुख स्थान दिया है और उसी के नाम से नाटक का नामकरण भी किया है, फिरभी जब हम तुलनात्मक रूप से समीक्षा करते है तो पाते हैं कि तापस वत्सराज का नायक स्वप्न-वासवदत्तम के नायक को उच्चता को प्राप्त नहीं कर सका है। कविवर अनंग हर्ष ने अपनी कति में उदयन के प्रेमी पक्षा का ही भरपुर चित्रण किया है और अपनो सम्पूर्ण शक्ति उनके एकागी प्रेम के कान में लगा दी है । और नायक के जीवन से सम्बन्धित अन्य पक्षों की उपेक्षा की है। किन्तु कविवर भास के स्वनवासवदत्त नाटक में यह बात नहीं है । याप स्वप्नवासवदत्तम् नाटक में भी वासवदत्तागत प्रेम की प्रधानता है परन्तु नवविवाहिता राजकुमारी पदमावती के प्रति राजा कासर्वथा निरपेक्षा भाव स्वप्नवासवदत्तम् का नायक उदयन वासवदत्ता के प्रेम में अन्दर ही बन्दर चाहे जितना विगलित होता रहा हो, परन्तु उसने अपनी इस चिन्ता को पदमावती पर कभी व्यक्त होने नहीं दिया है । नायक यह कदापि नहीं चाहता कि उसके इसप्रकार के व्यवहार में नवविवाहिता पदमावती के हृदय को किसी प्रकार का कोई आधात लगे । শাহ সাহ্নে ৯ चतुर्थ बैंक में राजा को बाबो में वासवदत्ता की स्मृति के कारण ऑस उमड़ रहे है। उसी अवसर पर वहाँ पदमावती प्रवेश करती है और वह विदूषक से राजा की ओख में आसुओं का कारण पूछती है । राजा उसके उत्तर में पदमावती से कहता है कि शरदात के चन्द्रमा के समान उज्जवल कारा पुष्प का का हवा में उड़कर आँखों में पड़ गया है। राजा अपने मन में कहता है कि नवविवाहिता राजकुमारी पदमावती रोने का वास्तविक कारण सुनकर बहुत . राजा : पदमावती बहुमता मम यद्यपि स्पशीलमाः । स्वप्नवासवदत्तम 4.5, रामनारायनलाल बनी माधव 1961 संस्करण इलाहाबाद, पृष्ठ 126 स्वप्नापासवदत्ता 8.पृष्ठ 140 127 दुखी होगी। यधपि यह बहुत गम्भीर प्रकृति को है किन्तु नारियों का स्वभाव बहुत कातर होता है । इसलिए मुझे अपने आसुओं के वास्तविक कारण को नहीं बतलाना चाहिए ।। स्वप्नवासवदत्तम नाटक के उदयन में लोकव्यवहार की उदारता है और इसका परिणाम पदमावती के उस टिप्पणी से मिलता है, जहाँ वह कहती है कि चतुर व्यक्ति का सेवक भी चतुर ही होता है । यदि सेवक मूर्ख होता तो यहाँ झट से कह देता कि राजा वासवदत्ता की याद में रो रहे हैं तब कितनी विषम स्थिति हो जाती। इसी प्रकार अतिम दृश्य में वह जिस स्नेह और सम्मान के साथ पदमावती को अपने बराबर के आसन पर बठने का आदर देता है वह उसके दक्षिण एवं पदमावती के कोमल हृदय की रक्षा के भाव का ही परिचायक है। इसके अतिरिक्त स्वप्नवासवदत्तम् नाटक में और भी ऐसे प्रसंग है जिनसे सिद्ध होता है कि उसने वासवदत्ता के प्रति अपन अगाध स्नेह के कारण अपनमन और बुद्धि का सन्तुलन खोया नहीं है । र्म,नीति और लोकव्यवहार का वह बराबर ध्यान रखता है । उदयन को महान् पाडवो से उत्तराधिकार में स्वाभिमान और शोर्य मिला था । वह पाडववंशीय राजाओं की 26वीं पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करता है। इसलिए वह राजो- चित गुणों से भी सम्पन्न है । जब मगध राज का कंचुकीय उसे युद्ध में चलने | इयं बाला नवोदाहा सत्य श्रुत्वा व्यथी व्रत काम धीरस्वभाव्यं स्त्रीस्वाभाबस्तु कातरः स्वप्नवासवदत्ता 9. पृष्ठ 141. 2. पदमावती आत्मगत हो सदाशियस्य जनस्य परिजनोडपि सदायि एव भवति । जयत्वार्यपुत्रः । इद मुखोदका ।
128 के लिए बुलाने आता है तो वह वीरोचित शब्दों में कहता है कि मैं अभी आक्रमण करके जिाल हाथियों एवं घोड़ो पार किर हुए और चलाये हुए बाणों रूपा भयंकर लहरों वाले महासागर के तमान युद्ध मेघोर कर्म करने में चतुर उल आणि को मार डालता । ऐसे वाक्य कोई वीर और साहसी राज ही कह सकता है, भीरू और विलासी नहीं । नाटक के अन्तर में, महासेन का कंचुकीय वत्सराज उदयन को उसके तादल और उत्साह के लिए बधाई देते हुए कहता है कि जो उत्साही होते है.वे ही राजलमी का उपभोग करते हैं। अज्ञातवास के बाद जन्न वा नवदत्ता पुनः प्रकट होती है तो राजा उस पर कोई दिह नहीं करता। इसी प्रकार स्वाद के रहस्य को नितान्त गोपनीय रखने पर वह आश्चर्य तो करता है, किन्तु उस पर कुछ नहीं होता है। प्रमोदवन में अपने आसुओं का सत्य कारण इसलिए नहीं बताता कि इससे पदमावती को दु:ख होगा । इतना ही नहीं वह मगधनाकर युद्ध के लिए दर्शक से सहायता प्राप्त करने में सफल होता है । इससे इसकी व्यावहा- रिक कुशलता का परिचय प्राप्त होता है । इस प्रकार हम देखते है कि स्वप्न वासवदत्तम का नायक उदयन एक और साहस.उत्साह और धर्म का परिचय देता है तो दूसरी ओर वह धर्म, नीति और लोकव्यवहार का बराबर ध्यान इस दृष्टिस तापसवत्सराज नाटक का नायक उदयन बहुत पीछे । उपत्य नागेन्द्रतुरंगतीर्णे तमारूणि दाम्पादन विकीर्णवाणीग्रतरंगी महार्णवायुविनाशयामि ॥ स्वप्नवासवदत्ता.13, पृष्ठ 183 १. प्रावण नरेन्द्र श्री सोसारव भुज्यते । स्वप्नवासवदत्त6*7. पृष्ठ 206.
129 रह जाता है । यहाँ पर उसका प्रेम आधीन और अन्धा दिखाई देता है । इस नाटक में हम उसे आदि से अन्त तक व वासवदत्ता के लिए रोते ही पात 1 है और उसमें राजोचित गुणों का अभाव दिखाई देता है ।' अत: स्पष्ट है कि कविवर भास ने अपने नाटक स्वप्नवासव- दत्तम् ने नायक उदयन के जिस चरित्र का गुम्फन क्यिा है, वह प्रशंसनीय है, किन्तु कविवर अनंग हर्ष अपने नाटक के नायक के चरित्र को सृष्टि उसके शान- कूल नहीं कर सके है । नायिका : नाट्यशास्त्र के अनुसार नाटकों में नायिका का भी उतना ही महत्व है जितना नायक का स्थल रूप से नायिका को तीन तरह का माना जा सकता है । स्वकीया : यह नायक की स्वयं की विवाहिता पत्नी होती है । जैसे- उत्तररामचरितम् ' नाटक की नायिका सीता । 12 अन्याब : वह नायिका को नायक की पत्नी नहीं है । यह तो किसी व्यक्ति की अविवाहिता हो सकती है या तो लिपी की विवाहिता पत्नी । परस्त्री या अन्य पत्नी का नायिका के रूप में प्रयोग नीति और धर्म के विरूद्ध होने के कारण नाटकादि में इसका प्रयोग नहीं यिाजाता है। 31 सामान्या : इस साधारण स्त्री या गणिका कहते है। अनक रूपको विशेष रूप से प्रकरण आदि में इसका प्रयोग किया जाता है। उदाहरण के निए 'पुन्छकटिकम' की नायिका वसन्तसना गणिका ही है । हम देखते है - 1. राजा साम्रा देवि बवाना में प्रयच्छ प्रतिवधनम् । तापसवत्सराजयक-05 पृष्ठ 159 स्वान्या साधारण स्त्रीति-तद्गुणा नायिका त्रिधा ॥ सापक 2-19.898 2.
130 अवस्था और प्रकृति के अनुसार नायिका के तेरह भेद होते है । और उसकी दशा के अनुसार नायिका के आठ भेद भी होते है । नायक के गुणों की भाति नायिका में भी गुणों की स्थिति मानी जाती है। नायिका में ये गुण उसके आभूषण या अलंकार कहे जाते है। यह गणना में बीस है। इन बील अलंकारों में पहले तीन शारीरिक गुण है । दुसरे सात अयत्नज है तथा आकी दस स्वभावज है जो निम्नाक्ति है हाव, हला, शोभा,कान्ति, दीप्ति, माधुर्य, प्रगल्भता, औदार्य, धर्य, लीला, विलास, विच्छित्ति, विम, किला की क्त, मोहायित, कुटमित, विम्बोक, ललित तथा वित्त आदि । वासवदत्ता : वासवदत्ता स्वप्नवासवदत्तम् तथा तापसवत्सराजम् दोनों नाटकों की प्रधान स्वकीया नायिका है, उसमें महारानी के अनुरूप तथा प्रधान नायिका के अनुकूल रूप-लावण्य, गम्भीरता, बुद्धिमत्ता, वदनायुक्त नोतिकता और नाट्यशास्त्र में वर्णित नायिका के भावादि अनेक गुण विद्यमान है । तापस- वत्सराजम का नामकरण कवि ने नायक को प्रधान मानकरके ही किया है और स्वप्नवासवदत्तम् के नामकरण में कवि ने नायिका को प्रधानता दी है। फिर भी कविवर अनंग हर्ष ने अपने नाटक में वासवदत्ता के जिस उन्नत व्यक्तित्व का चित्रण क्या है,वह भास के नाटक में प्राप्त नहीं होता है । बालामश्ववस्थाः स्यु: स्वाधीनपतिकादिका: ॥ दाम्पक 2.13, पृष्ठ ।।3. योने सत्वना: स्त्रीणामकारास्तु विशतिः । भावो हावा हेलाच अयस्ता शरीरar: बापक 230. पृष्ठ 121. ... OUR 131 तापसवत्सराज वादक की नायिका की साल महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि वह यौगन्धरायण आदि मन्त्रियों की योजना से पूरी तरह अवगत है। इतना ही नहीं उसके पिता प्रचौत भी इस योजना सुपरिचित है । नाटक के प्रारम्भ में विष्कम्भक से विदित होता है कि पाचाल नरेश आरुणि वत्सदेश पर आक्रमण की तैयारी कर चुका है और इधर वत्सराज उदयन इस विपत्ति प्रति चिन्तित नहीं है। वा अपने सुख-विलास में डूबा हुआ है किन्तु उसका प्रहा- मन्त्री योगन्धरारण अपने राज्य की रक्षा दलए चिन्तित है और वह अपनी योजनानुसार वासवदत्ता के पिता प्रीत को किवा में देता है तथा वासव- दत्ता को भी अपनी योजना बताता है और राज्य की erलिए उमर सहयोग की रक्षा करता है । इधर प्रद्योत अपनी पुत्री वासवदत्ता के लिए पत्र हारा यह सन्देश भेजता कि वह राज्यकाज के किस एवं भोग-विलास में रत अपने पति को नहीं समझा रही है । वह अपनी पुत्री यासवदत्ता में राज्य की रक्षा के लिए बड़े में का बलिदान हेतु उधत रहने के लिए प्रेरित करताहै। हम देखते है कि महारानी वासवदत्ता यह सुनकर घबड़ाती है बल्कि अपने गंभीर स्वभाव का ही परिचय देती है। पोगन्धरायण से सम्पूर्ण योजना की जान- कारी देता है और उस योजना में उसके द्वारा दिए जाने वाले योगदान की अपेक्षा करता है। सहक वासवदत्ता के चरित्र में कठोरतम परीक्षण के मन कहे जा सका है। यद्यपि भर के लिए बह इस महान उत्तरदायित्व के भार 2 1. यौगन्धरायण: भर्तः प्रतीपतरणे नोरिव बहुभिर्युक्ता। तापसवत्सराज 13.पष्ठ 23. १. महामन: बासमन्विषयेषु का वो यन्न त्वया वार्यत । जामासति विहाय सम्माधि स्वार्थ: स्वयं चिन्त्यताम।। लायसवस्वराज।..पुष्ट, 1.
132 को वहन करने के विवार से किचित विचलित सी हो जाती है । इस योजना के अनुसार उसे दीकाल तक अपने पति से नियुक्त रहना है । इस बात से वह कम्पित हो जाती है । इस बात का उसके प्रेमी हृदय पर ऐसा आधात लगता है कि वह कुछ समय के लिए मखित तक हो जाती है किन्तु हम देखते है कि वह बड़े धर्य से अपने को संभाल लेती है और महामन्त्री की योजनानुसार राज्य की रक्षा के लिए अपना कोई श्री योगदान देने के लिए प्रस्तुत हो जातीहै। इसी अवसर पर वहा राजा का आगमन होता है । इसस - वासवदता के साहस और उसकी दृढ़ता की परीक्षा होती है । अपने प्रियतम की उपस्थिति में उससे दीर्घकालीन योग का विचार और भी अधिक असहय हो जाता है। वह उदयन को देखकर इतनी भावाधीन हो जाती है कि अपने पूर्ण प्रयत्न के बावजूद भी वह अपने भावों को राजा और विदुषक से पूरी तरह पिा नहीं पाती, परन्तु उनै सर्वथा व्यक्त भी नहीं होने देती है । इस समय वह संकटापन्न मानसिक स्थिति में दिखाई देती है। उसया वह नारी हृदयजो कि एक दिन उदयन के प्रेम ले उन्मस्त होकर माता-पिता की Ba अनुमति के बिना ही उदयन के साथ भागने पर विदा हो गया था । आज वही उसका हृदय राजा से एक बहुत बड़ा छल करने और एक गहरे रहस्य को छिपाने में कातर दिखाई देता है । नाटककार ने इस अवसर पर अत्यन्त सुन्दरता के साथ वासवदत्ता के हृदय की कोमलता एवं दृढ़ता को सामने रखन का प्रयत्न क्यिा है,और उसके स्नेह तथा सौजन्य को व्यक्त किया है। राजr जब वासवदत्ता को वही देखता तो वह अपने भाव छिपाने की चेष्टा करती तब राजा उससे कहता है कि है देवी सहना देखने पर तुम उमड़ते हुए - .. राजा: प्रयाग मनितः प्रसाधनांवाचव्या सम्पादित: । तापसवत्सराज 1.15. पृष्ठ 29. wiele 133 आसुओं से व्याकुल दृष्टि धारण कर रही हो । विषमता से निकलते हुए स्वासों को जोर से छोड़ रही हो । यद्यपि मेरा कोतुहल स्थिर है फिरभी चिन्ताकुल तुम बोल नहौरही हो । है प्रिये ! क्या तुम : पहले की तरह नवविवाहिता वधू की भाति आचरण कर रही हो ।' नायक और नायिका में कहा तो एक और इतना अनन्य प्रेम, अनन्थ-आसक्ति और दुसरो और वहातो राज्य की रक्षा के लिए इतना कठोर कर्तव्य-पालन और इतना सुकोमल प्यार का बन्धन । महामन्त्री योगन्धरायण ने उसे जो कठोर कार्य सोपा है तथा उसके लिए जिन कठोरस्थितियों का सृजन क्यिा है, उसे देखकर कोई भी भावुक सहृदय का हृदय उसके प्रति सहानुभूति और श्रद्धा से बिना भी नहीं रह सकता है । वासवदत्ता जैसी प्रेमिका नायिका के लिए स्वेच्छा से इतने बड़े बलिदान के लिए तैयार कर पाना कोई सरल कार्य नहीं था। दोनों ही नाटकों के अनुसार नायिका वासवदत्तr एक सचमुच भारतीय पतिव्रता नारी है और अपने पति के प्रति उसके मन में अगाध स्नेह है। वह अपने पति के कल्याण के लिए सभी प्रकार का कष्ट उठाने तथा त्याग करने को तत्पर रहती है, परन्तु पति की विपति को सहन नहीं कर सकती। स्वप्नवासवदत्तम् के अनुसार वह योगन्धरायण की योजना बिना किसी तर्क- वितर्क के स्वीकार कर लेती है। योजना की सफलता तक उस अनेक प्रकार के कष्ट उठाने पड़ते हैं किन्तु उसमें भी वह जानन्द का अनुभव करती है क्योकि उसमें उसके पति का निहित है। उसके लिए पति का सुख ही सर्वस्व है। राजा: वहसि सहसा दृष्टा दृष्टि वृतागुलवाकुला. विकृतविमोदभिन्ना श्वासानतीव विचसि । बदाम नपर ध्यानामामयिस्थरकोतुक, पुनरपि गताविव व तदेव वलय ॥ तापसवत्सराज 18. पृष्ठ 28. aning अपना एक समय की बात है कि नवविवाहिता पदमावती रूग्ण हो जाती है । ' इस समाचार से उसे असह्य पीड़ा होती है क्योंकि उसका पति पद्मावती की अवस्थता से बहुत दुखी हो जाता है । एक तो उसका वियोग, दुसरा मनोविनोद का एक मात्र साधन पदमावती की अवस्थता इसलिए वह कह उठती है कि मेरे आर्यपुत्र की विश्राम स्थान यह पदमावती भी अस्वस्थ हो गई है,यह बड़े खेद की बात है 12 राजr उदयन वासवदत्ता की कल्पित मृत्यु का समाचार सनुकर अपने प्राण त्यागने को तैयार हो जाता है । वासवदत्त के प्रति वत्सराज उदयन के अनन्य प्रेम को देखकर ब्रहमचारी का यह कथन सचमुच बहुत ठीक है कि वह स्त्री धन्य है जिसका पति मरने के पश्चात भी उसे इस प्रकार स्मरण करता है। तापसवत्सराज के अनुसार देवालय में राजा के दर्शन का प्रसंग ही उदयन के प्रति नायिका के प्रगाढ़ प्रेम का परिचय देता है जब तक उसे यह विदित नहीं होता कि देवालय में उदयन साक्षाव नहीं है अपितु उसकी मूर्ति है, तब तक उसके हृदय में उसे देखने की तीन लालसा दिखाई देती है । उदयन के दर्शन के लिए अदम्य प्रलोभन है तो दूसरी ओर रहस्योदभेदन हो जाने का महान भय भी है। वस्तुत: उदयन के प्रति उसका प्रेम महान् है । वह उसकी पाषाण-मृति को ही देखकर स्नेहल रोमाचत हो जाती है । वह अपनी ग New 1. घटी : दृढ खनु भदारिका शीर्ष-वदन्या दुखिता । स्वप्नवासवदत्तम बैंक-5.पृष्ठ 165. 2. वासदत्ता: आर्यपुत्रस्य विश्रामन्याता इयमपि नाम पदमावती स्वप्नवासवदत्ता बैंक-.पृष्ठ 167 ३.धन्या मा स्त्री या व्या ति भला, भर्तनवाद सा हि दया प्यदम्या । स्वप्नवासवदत्ता 1-13. पृष्ठ 5 .......................
135 इस भावना को सूचना साकृत्यायनी के अतिरिक्त और किसी को प्रक्ट नहीं होने देतो है ! साकृत्यायनी वासवदत्ता के धर्य और संयम की प्रशंसा करती हुई कहती है कि राजा को और आकृष्ट हुई पदमावती के हाथ में अपने प्रियतम के चित्र को देखते ही वह अपने दुःख को अन्दर ही अन्दर छिपा रही किन्तु अपने भावों को प्रकट नहीं होने देती है । किन्तु वासवदत्ता का अगाध प्रेम उसके उत्तरदायित्व के मार्ग में बrक नहीं बनता है 12 वासवदत्त के उज्जवल चरित्र में प्रशंसनीय विदग्धता भी विद्यमान है, वह इस सम्पूर्ण व्यिोग-व्यथा को बड़ी शान्ति और धर्म के साथ सहन करती है, न तो उपमधलडाइट का भाव दिखाई देता है और न ही वह राजा.मन्त्री अथवा अपने भा थ के प्रति किसी प्रकार का कोई क्रोध करती है। उसके चरित्र में हमें कहीं भी हृदय-द्रता और संकीर्णता के दर्शन नहीं होते है। उसकी सहनशीलता प्रशंसनीय है । पदमावती उदयन के प्रति वासवदत्ता के आदर्श प्रेम की बहुत प्रशंसा करती है । । तापसवत्सराज नाटक की वासवदत्ता,सीता के समान अपने सुख दुःख के प्रति सर्वयr निरपेक्ष दिखाई 17 देती है और अपने पति के सुख को अपना सुय समसकर सब कुछ सहने के लिए तत्पर रहती है । जहाँ एक और उसके चरित्र में दृढ़ता है, वहीं दूसरी ओर उसमें अति विनमता भी है, उसमें अभिमान के कोई दिखाई नहीं देते है। तापसवत्सराजम की नायिका में जो एक विशिष्ट गुग परि- लक्षित होता है तो वह यह है कि उसमें राजनीतिक जागकता, स्वप्नवासव 1. सांकृत्यायनी : दयितं विलोक्यम्ती तद्गतमनसोडपि हस्तगलमस्या:। सती नयमित-दुःखान मनामपि विकृतिमायाति ॥ तापसवत्सराज 3.8.पुष्ठ86 2. बामवदस्ता:- नासिईदशी. विस्त्रधा भव । तापसवत्सराज- चतुर्थ बैंक, पृष्ठ 138.
136 दत्तम् की अपेक्षा अधिक है । वह राजनैतिक स्थितियों को यहाँ अधिक समझती है । तयोजसमें वह अपना स्वयं योगदान समझती है। योगन्धरायण जब उसे - राज्य की आन्तरिक तथा बाह्य स्थितियों को अवगत कराता है तो वह शीत्र ही रहयोग हेतु अपनी सहमति दे देती है । इस हेतु पिता की ओर से प्राप्त संदश का भी वह यथावत पालन करती है 12 तापसवत्सराजम् के अनुसार वासवदत्ता युक्ती होने पर भी अत्यधिक चतुर और दूरदर्शी हमे उसमें चारित्रिक दृढ़ता, विचारशीलता, त्याग, अनन्य प्रेम, साहस, र्य और साहिष्णुता इत्यादि दुर्लभ गुण दिखाई देत है। यह जानते हुए भो कि राजकुमारी पदमावती उसके प्रिय पति से स्नेह करती है, उसको पाने के लिए प्रयत्नशील है लेकिन हम कहीं भी वासवदत्ता में पदमावती के प्रति ईष्याभाव नहीं देखी । ऐसा प्रतीत होता है कि कोई भी पात्र जी महारानी बासवदत्ता के सम्पर्क में आया है, वह उसके स्वभाव पर मुग्ध हो गया है । यद्यपि तापसवत्सराज नाटक में नाटस्कार का ध्यान विशेष रूप से नायद के चरित्र-चित्रण में अत्यधिक केन्द्रित रहा है, फिरभी वासवदत्ता अपने जन्मजात-गगों और परित्र को उदारता के कारण नाटक में एक महत्वपूर्ण स्थान की अधिकारिणी बन गई है । उसका निरल स्नेह और उनका त्याग उस महान बना देता उसका गर्वहीन स्वाभिमान, वासनाहीनप्रेम, दुर्बलताहीन सरलता, स्वभाविक नारीगत माधुर्यादि गुण, चारित्रिक दृढ़ता और दूरदर्शिता सभीने सम्मलित रूप से उसके रूप ओर चरित्र FORmaa 1. तापसवत्सराज 17. पृष्ठ 14. १. महामनः बासमन्विषयेषु कार्याचमुखी मन्न त्वया बायत । जमातति विहाय लम्गाय कब स्वार्थमस्वयं चिन्मयता। .............
137 को सामान्य नायिका के स्तर से बहुत ऊपर उठा दिया है । स्वप्नवासवदत्ता के अनुसार वासवदत्ता उदयन के हृदय की एक मात्र अधिकारिणी है । यही वासवदत्ता अपनी सपत्नी राजकुमारी पद्मावती के संरक्षण के जीवन-यापन कर रही है । ऐसी विकट स्थिति में उसके अन्तःकरण में छिपे ईया के भाव कभी-कभी उसे कोसने लगते हैं। देखो है कि इस नाटक के तृतीय अंक में जब धात्री राजकुमारी पदमावती से वासवदत्ता के सामने कहती है कि राजकुमारी तुम्हारी सगाई हो गई है तो वासवदत्ता पूछती है कि किसके साथ इनकी सगाई हुई है ? तब धात्री कहती है कि किसी दूसरे उददेश्य से आए हुए उदयन के कुल, शिल्प, शास्त्रज्ञान,योवन तथा सौन्दर्य को देखकर महाराज ने उसे राजकुमारी पदमावती के दान का संकल्प लिया है ।। उधर बेटी कहती है कि हमारी महारानी का विचार है कि आज ही उत्तम मात्र है, इसलिए आज ही बरकन्या के हाथों में कंगन बाँधने । का मंगलाचरण हो जाना चाहिए । इस समाचार से वासवदत्ता कहती है कि 2 जैसे-जैसे यह शीता कर रही है, वैत-वेने मेरा हृदय शुन्य होता जा रहा है। विवाह के आमोद-प्रमोद से परिपूर्ण अन्त:पुर के चोसाले में पद्मावती को छोड़कर वासवदत्ता प्रमदवन आ जाती है और दुर्भाग्य से अपने प्रियतम के हितीय विवाहजन्य दुख को किसी प्रकार शान्त करती है, और धमते हुए कहती है कि विपत्ति में फस गई है। मेरे प्रियतम आर्यपुत्र बाज से पराये हो गए है। वासवदत्ता के इस कथन से उसके हृदय की व्यथा के गहरे भाव अभिव्यक्त होते हैं। उसके हृदय मन्दिर का अराध्यदेव बाज .......... । स्वप्नवासवदत्ता - वतीय बैंक, पृष्ठ 79. 2. वासवदत्ता:वात्मगत यथा यथा त्वरते तथा लथान्धीकरोति में हृदयम्। खलीय बैंक, पृष्ठ-82. 3. वासवदत्ता: बहो । अत्याहिता । बायपुरोडपि नाम परकीय:सवृत्तः । स्वप्नवासवदत्तन-तीय अंक.पृष्ठ 3 NOR सल्यानमालगालिक का नाम 138 अन्य हृदय में प्रतिष्ठित हो रहा है । यह उसके लिए नितान्त असहय है । इसीलिए वह पदमावती के विवाह संस्कार के समय वहा से प्रमदवन चली जाती है किन्तु फिरभी वह निरन्तर संघष्ट है कि महामन्त्री योगन्धरायण की योजना विसी प्रकार सफल हो जाये । जब वह पद्मावती के साथ विवाह होने के पश्चात राजा के मुख से यह सुनती है कि वासवदत्ता में अनुरक्त मेरे मन को पदमावती आकर्षित नहीं कर पा रही है। यह सुनकर वासवदत्ता को अत्यधिक बानन्दानुभात होती है। अन्त में, वह कह उठती है कि इस कथन से मेरे प्रियतम ने मुझे इस दुःख का पुरस्कार दे दिया है। मेरे पति उनकी इस नहा- नति ने अज्ञातवास के अवसर पर मेरे आनन्द का कारण बन गई है कविवर भास के अनुसार ऐसा प्रतीत होता है कि वासवदत्ता नारी सुलभ समस्त गुण दोनों से युक्त है, फिरभी वह एक आदर्श पहिला है, विधाता की कमनीय कला का विशुद्ध उदाहरण है । स्वप्नवासवदत्तम् और तापसवत्सराजम दोनों नाटकों की नायिकानों के तुलनात्मक अध्ययन से यह विदित होता है कि तापसवत्सराज की नायिका पासवदत्ता' नाटक की सम्पूर्ण योजना से अवगत है । किन्तु स्वप्नवासवदत्त नाटक की नायिका केवल उसकी भूमिल रूपरेखा से ही अवगत वह सर्वध आकार नहीं है। वह यह भी जाती है कि उसके पिता i प्रद्योत मात्रयों की इस योजना की सफलता चाहते है। इसलिए उसे किसी में कोई शिकायत नहीं है जबकि वनवासवदत्तम्की नायिका की स्थिति इन सबसे बहुत कुछ भिन्न है। इस नाटक में महामन्त्री योगन्धरायण नायिका । बामवदत्ता: दन्त तनाथ परिवदस्य होमातवासोप्यत्र सम्पयत । स्वप्नवासवदत्ता.क.पण्ड-127. पति MORA 139 को उत्तरदायित्वपूर्ण कार्यभार सोपता है किन्तु स्वप्नवासवदत्त में ऐसा अवसर हो नहीं उपस्थित होता है जबकि स्वप्नवासवदत्तम माटक में वह प्रारंभ में ही अपने साथ सामान्य जनों की तरह व्यवहार करने के विषय में योगन्धरायण से शिकायत करती है । तापसवत्सराजम की नायिका जहाँ एक और अपने कर्तव्यपालन के प्रति अत्यन्त जागरूक है, वहीं दूसरी और स्वप्न बासवदत्ता की नायिका अपनी विपत्तियों के लिए रोती रहती है । तापस- वत्सराजम की नायिका अपने व्यवहार और प्रेम में अधिक धैर्यवान एवं प्रोढ़ है, उसमें पद्मावती के प्रति कहीं कोई ईष्या नहीं है और न प्रेम में किसी प्रकार की विलासिता की गन्ध ही है। जबकि स्वप्नवासवदत्ता की नायिका इनसे सर्वथा मुक्त नहीं है। स्वप्नवासवदत्तम की नायिका के पास मानसिक व्यथr के गों में कोई सात्वना देने वाला नहीं है जबकि तापसवत्सराजम* इस हेतु सांकृत्यायनी की योजना बनाई गई है। प्रतिकूल परिस्थितियों में शिकायत न करने एवं अपने यि पर दृढ़ रहने की जो किषता है. तापसवत्सराज की नायिका में पाई जाती है, वह स्वप्नवासवदत्त की नायिका में नहीं । राजकुमारी पदमावती के प्रति दोनो नाटकों की नायिकाओं का व्यवहार उनके स्वभाव के अन्तर को स्पष्ट कर देता है । इस दृष्टि से तापसवत्सराज की नायिका का स्थान स्वप्नवासवदत्त कीनायिका से कहीं अधिक उन्नत प्रतीत होता है। जब वह युवती पदमावती को योवन का सुख भोग स्यागकर तापस an में देखती है, उससे उसको बड़ा कष्ट होता है । वह - HI- ।, योगन्धरायणः नाचिन्ता कार्या। कालक्रमण जगतः परिमाना चकारपश्चिखि गच्छति स्वप्नवासवदत्त पूष्ठ 12. WARAM । भी स्नेह और सहानुभूति उससे व्यवहार करती है, इससे प्रभावित होकर पदमावती वासवदत्ता को अपने हृदय का सारा रहस्य बता देती है। अपने पति के प्रति राजकुमारी पदमावती के अनुराग और त्याग को देखकर वासवदत्ता बहुत प्रभावित होती है और उसके प्रति किसी प्रकार की ईा मन में नहीं आने देती है । इसके विपरीत वह उसके प्रेम को खुले हृदय से उसकी प्रशंसा करती । है तथा उसकी प्राप्ति के लिए उसे सात्वना देती है । लापसवत्सराजम् के छठे बैंक में विदित होता है कि पदमावती के प्रति उसका नह ईष्याहीन है । यहाँ वासवदत्त आत्मदाह के लिए तत्पर । जोर उसकी सखी कान्चन माला इस विपत्ति के लिए पद्मावती को भी दोषी ठहराने की भावना से कहती है कि पद्मावती भी आपको दुखी कर रही है। सुना है उसके साथ विवाइ भो तुम्हें पुन: पाने लिए किया गया है. इस पर वासवदत्ता बिना विनम्ब के ही उसको सावधान करते हुए कहती है कि इस विषय में पद्मावती से कोई मतलब नहीं हैऔर इस सम्बन्ध में मुझसे कुछ न वह अपनी विपत्ति के लिए किसी रूप में भी पदमावती को दोष नहीं देती है। नाटक के अन्त में, स्पष्टरूप से प्रतीत होता है कि जब पदमावती को उसकी वास्तविकता का पता लगता है तो वह वासवदत्ता - से क्षमा याचना के लिए उनके पैरोंगर जाती है। बड़े नेह राजकुमारी पदमावती को उठाती और अपने गले से लगाती है और कहती है कि है ! उदार हृदया पदमावती। उठो, में तुम्हारी वासवदत्ता : अकिमत्र पदमावत्या.न किचिदह भणितव्या । तापसवत्सराज बैंक-6.पुण्ठ 208. यानमाला सहेली ही हूँ , मुझे तुम कुछ और मत समझो ।' यहा पर उसके इन शब्दों में जो स्नेह और सौजन्य प्रकट होता है । उसके दर्शन हमें स्वप्नवासवदत्तम् की नायिका के उन शब्दों में नहीं होते,जो कि उसने ऐसे ही अवसर पर कहे हैं। तापसवत्सराज की नायिका केरा की गई आत्मदाह की योजना यद्यपि उसके चरित्र की दुर्बलता कही जा सकती है, परन्तु उसकी यह भावना किसी निराशा या पराजय से उत्पन्न नहीं, अपितु कर्तव्य भावना वे ही उत्पन्न प्रतीत होती है। वह उस युग की नारी प्रतीत होती है जबकि कोई पतिव्रता स्त्री इस बात को अपने लिए सबसे बड़ा पाप या कलंक समझती थी कि उसके कारण ही उसके पति को अनेक प्रकार से दुःखी होना पड़ता है। सम्भवत: अपने इसी तथाकथित पाप के प्रायश्चित के लिए तापसवत्सराज की नायिका वासवदत्ता आत्मदाह की योजना का निर्माण करती है। पद्मावती: स्वप्नवासवदत्तम् के और तापसवत्सराज के अनुसार पद्मावती नाटक की दूसरी स्वकीया कनिष्ठा नायिका है । यह दोनों नाटकों की उप नायिका है। दोनों ही नाटको इसका प्रथम दर्शन कन्या के रूप में होता - यह मगध नरेश दर्शक की छोटी बहन है । वह युवती है तथा अत्यन्त सुन्दरी भी है । वह स्वभाव से उदार है. धर्मप्रिय है, सहानभतिशील जोर - वासवदत्ता : आर्य महानुभाव,त्तिष्ठ, सख्येव ते वह, ममामन्यथा सम्भाव्य । तापसवत्सराज बैंक-6, पृष्ठ 215 2. वासवदत्ता :विठोतिष्ठाडावावे। स्तिष्ठ । बर्थिव नाम गरीरमपराध्यति । वनवासवदत्तव बैंक-6. पृष्ठ 234.
142 प्रतिभा सम्पन्न महिला है । वह जब आश्रम जाती है तो वह आश्रमवासियों तपस्वियों की विविध वस्तुओं के दान की घोषणा करवाती है जिसे जलपात्र चाहिए वह जलपात्र ले ले और जिसे वस्त्र चाहिए,वह वस्त्र ग्रहण कर ले और जिसे गुरु को देने के लिए दक्षिणा चाहिए, वह दक्षिणा प्राप्त कर ले । राज- कुमारी पद्मावती धर्म में आनन्द लेने वालों में प्रेम करती है और वह तपस्वियों * की कृपामात्र चाहती है।। पद्मावती का स्वभाव अत्यन्त निर्मल है, स्नेह और सौहार्द से भरा हुआ है । जब योगन्धरायण वासवदत्ता को उसके पास धरोहर के रूप में सौपता है तो शीद्र कहती है कि ठीक है कि वह आया अब मेरी आत्मीय हो गई है । दोनों का पारस्परिक स्नेह बहुत प्रगाढ़ हो जाता है । ब्रहम- चारी जब वह उदयन का शौक तुनती है तो उसे दुःख का अनुभव होता जब वह उसकी मोह-मुक्ति का समाचार सुनती है तो वह ईश्वर को । धन्यवाद देती है। स्वप्नवासवदत्त के अनुसार पदमावती के हृदय में अपने पति के लिए अपार स्नेह है । वह अपने पति में किसी प्रकार का दोष देखना या सुनना नहीं चाहती है। स्वयं कष्ट उठाकर उसे सुखी देखने के लिए प्रयत्नशील रहती है। एक बार बेटी पदमावती से कहती कि उदयन बापकी अपेक्षा वासवदत्ता पर अधिक प्रेम करते है। इसलिए वह बदाक्षिण्य है तो वह तुरन्त । काचुकीय : यस्यास्ति समीप्सितं वदतु तव कस्यादि दीयताम् । स्वप्नवासवदत्ता...पुष्ठ 30 21 पदमावती : भवतु भवतु जात्मीयदानी संवृत्ता । स्वप्नवासवदत्तम- बैंक प्रथम पृष्ठ 3 ...
143 चेटी को रोकते हुए कहती कि सखी ऐसा मत कहो । आर्यपुत्र दानिय ही है जो इससमय भी देश आर्या वासवदत्ता के गुणों का स्मरण करते हैं।' तापसवत्सराजा नाटक के अनुसार राजा उदयन जब पदमावती को तपस्वनी के रूप में देखता है तो वह उसकी अदभुत रूपराशि को देखकर चकित हो जाता है । वह कभी उसे साक्षात रति कहता है, कभी उसे वनदेवता कहता है और कभी साक्षात शरीर को धारण करने वाली देवी के रूप में उस समझता है 12 इतना सब होते हुए भी पदमावती अभिमान से रहित है, वह कोमल और भावुक हृदय की नवयुवती । योगन्धरायण के वहा से चले जाने पर वासवदत्ता को रोते हुए देखकर वह स्वयं रोने लगती है।" पदमावती अपने दुःख को स्वयं ही सहना चाहती है,किसी वासवदत्ता जब को अपना दुःख सुनाकर उसे दुःखी नहीं करना चाहती है । उससे प्रव्रज्या धारण करने का कारण पूछती है तो वह उत्तर में कहती है कि तुम्हें उसके जानने से क्या लाभ होगा,अवाय ही मेरी यह बात तुम्हें दुःखी करेगी। लेकिन वह सखी के अनुरोध को त्याग नहीं सकती। वह उसे हृदय का सारा रहस्य प्रकट करदेती है । वह वासवदत्ता के सुक-दुःख का ध्यान रखती है । तापसवत्सराज के अनुसार पदमावती एक शुद्ध हृदयवानी 1. पदमावती : मा मेवा । सदानिय एवार्यपुत्रः य इदानीमण्यार्याया वासवदत्ताया गुणाव स्मति । स्वप्नवासवदत्ता.क.पृष्ठ 120. १. राजा : निर्दक मकरध्दको रतिरमोदि स्याद् गहीव्रता । arपसवत्सराज3.14 पृष्ठ 103. ३ वासवदत्ता: क्या एका प्रवाभावा भी दाखता य वाष्पपर्यालामुखी वापसवत्सराजयक वृतीय, पष्ठ ० प्रेमिका है । प्रेम के मार्ग में आगे चरण बढ़ाकर पीछे हटना उसने सीखा नहीं है। उसका दृढ़ विवास है कि हृदय का दान केवल एक बार ही हो सकता है। उसमें पुनर्विचार के लिए कोई अवकाश नहीं है । नाटक के अनुशीलन से हमें विदित होता है कि मन्त्रियों की योजना के अनुसार जब उसका हृदय एक बार उदयन के गुणों पर अनुरक्त हो जाता है तो फिर उदयन-विराग भी उसे विरक्त नहीं कर सकता है । वासवदत्ता के लावाणक ग्राम में विदग्ध हो जाने के समाचार से उदयन तपस्वी का वेश धारण कर लेता है, तो पदमावती भी उसी के अनुसार सपस्वनी बन जाती है और प्रेम-योगिनी का रूप धारण कर लेती है। पद्मावती के द्वारा तापस कर-धारण लिए जाने का कारण पूछने वाली वासवदस्ता से वह कहती है कि में अधिक क्या कर, उदयन के गणों के प्रेम के कारण मेरा मन उसकी और आकृष्ट हो गया है । पदमावती ने मन से राजा उदयन का वरण कर लिया है, इसलिए अपने अनन्य प्रेम के कारण उदयन के चित्र की ही वह अराधना करती है। यह उसके अनन्य प्रेम का निदर्शन है । . पद्मावती 'अतिथि देवो भव' के अनुसार अतिथि सत्कार के प्रति बहुत जागत है। आश्रम में कोई अतिथि आया है,यह सुनते ही वह वर्ध्य की सामग्री लेकर उसके पूजन अर्जन के लिए दौड़ पड़ती है। स्वयं अपने प्रेमी को साक्षात अपने घर पर आया हुआ देखकर उसका हृदय तरंगित हो उठता यह विडम्बना ही कही जावेगी कि जिस प्रियव्यक्ति के गुणों पर रीझकर वह परोन ही उसे अपना हृदय अर्पित कर देती है.जिसके लिए वह अपना घर छोड़ देती है: राजसुख और वैभव छोड़ देती है,और उसकी 1. पद्मावती : विलय एतेन ज्ञातन,अवयमता प्रियमध्ये दुःखमुत्थादयति। नापसवत्सराज उतीय बैंक, पृष्ठ 3 145 प्राप्तिके लिए तापस वेश धारण करती है,वही प्रिय जब वहा सामने आता है तो वह उसके छिल समर्पण को अपनी अन्य मनस्कता और उदासीनता से करा देता है किन्तु पदमावती का अत्यन्त कोमल हृदय अपने अनन्य प्रेम की इस अवज्ञा को सहन नहीं कर पाता है, इसलिए विफल रहने पर अपने जीवन का ही अन्त कर देना चाहती है। इसी भाव से प्रेरित होकर वह ब्राड्य रूप से अपने को प्रसन्न सी दिखाती हुई अकेले लता माडप में पहुँच जाती है और वहाँ पर लतापाश से अपने जीवन का अन्त कर देना चाहती है । पदमावती अपने इस कठोर उददेश्य से सफल हो जाती, यदि समय पर राजा उदयन और विदृषक वहाँ न पहुँच जाते । उदयन के प्रति पदमावती का प्रेम अत्यन्त पवित्र और निकाट तथा अन्त में, सच्चे प्रेम की विजय होती है। राजा लता माडप में पहुंचकर स्वयं उससे कहता है कि इस बन्धन को छोड़ दीजिए और प्रेरा प्रिय कार्य कीजिए । मेरा यह एक स्नेहपूर्वक क्यिा हुवा अनुरोध स्वीकार कीजिए बाप जिस चाहती है वह व्यक्ति आपके समान उपस्थित है ? पदमावती जब राजा के द्वारा स्पष्ट शब्दों में वासवदत्ता के प्रति प्रेम के दृढबन्धन के कारण अपनी उपेक्षा की बात सुनती है तो वह उसके प्रेम की दृढ़ता की प्रशंसा करती है कि यह स्थिर प्रेम वाले व्यक्ति है, 1. पद्मावती : हा तात, हा बंब! हा भ्रातरः । अतशीले बढनेहा परयल दुहितरम बत्र प्रियमाणी मास तापसवत्सराजय बैंक-वार.पृष्ठ 135 2. राजा : विच पाशमिम कुक में प्रिय, प्रणयममम प्रतिमान्य । असहने किमिदं क्रियते त्वया.प्रणयवानयास्का तवागत: । तापलवस्मराजा 17. पृष्ठ 19. ...
इसीलिए में इन पर अनुरक्त हूँ।' दोनों ही नाटकों के अनुसार पदमावती वासवदत्ता के प्रति उदयन के प्रेम को देखकर न दुःखी होती है,न ईष्या करती है । वासवदत्त के प्रति वह आदर का भाव रखती है । । जब भी उसका वह नाम लेती है तो उसके नाम से पूर्व वा शब्द का प्रयोग अवश्य करती है । इतना ही नहीं चित्रपालक में अवन्तिका के समान वासवदत्ता का रूप देखकर वह वासवदत्ता के जीवित होने के विचार से अत्यन्त प्रसन्न होती है । जब वासवदत्ता प्रकट । होती है तो वह ईष्या से रहित होकर अपने स्वभाविक स्नेह का परिचय देत हुए उसके पैरों में गिरकर क्षमा मांगते हुए कहती है कि -वहन, सटीजन के व्यव- हार से मेने शिष्टाचार का अतिक्रमण क्या है। इसलिए में आपके पैरों में गिरकर आपको प्रसन्न करतो हूँ। वे स्वप्नवासवदत्ता के विदृषक के अनुसार पदमावती ताणी, दर्शनीय, क्रोध न करने वाली, मधुरभाषिणी और उदार व्यवहार वाली नायिका है12 तापसवत्सराजद नाटक के अनुसार राजा जब पदमावती के साथ विवाह कर लेता है.फिरभी वह वासवदत्ता की याद करता रहता है, तब भी पद्मावती को उससे कोई शिकायत नहीं होती है । इस बात से पदमावती के प्रेम में कोई कमी दिकनाई नहीं देती है । इस पर यही विदूषक उसके त्याग औरधर्य की प्रशंसा करता है पदमावती के चरित्र की यह अपूर्व । पदमावती :सो र सोहद एव इति, अतएव में एतस्योपरि अभिनिवाः । तापमवत्सराजमाबंक-4.5 141 2. विणका लगभवती पद्मावती सम्णी, दर्शनीया, अको पना, अनहकारा, मधुरवाव.सदारिया । स्वप्नवासवदत्तम.बैंक-04.पष्ठ 130.'
विशेषता है कि वह अपने स्वार्थ को अपने पति के स्वार्थ से ऊपर नहीं समझती है । इसी की पूर्ति के लिए वह अपने प्रियतम के लिए अपने जीवन का बलिदान करती है । राजा भी उसके इस अभूतपूर्व बलिदान और अनन्य प्रेम से अत्यधिक प्रभावित है। वह हृदय से उसके अनन्य प्रेम का अनुभव करता है, परन्तु वासव- दत्ता के प्रति अत्यन्त आसक्ति के कारण वह अपने को विवश पता है । वह कहता है कि बड़े सैद की बात है कि मैने इस बबारी कन्या को अपने उदासीनता पूर्ण कार्यों से जलाया ही है, कोई सुध नहीं दिया है ।' अन्त में, हम कह सकते हैं कि पद्मावती में नारी हृदय की स्वाभाविक प्रतिक्रिया का अभाव और संघर्ष का कोई संक्त उसके चरित्र में दिख- लाई नहीं देता है, किन्तु उसके चरित्र में हमें जो दृढ़ता और धर्य दिनाई देता वह साधारण नारी-हृदय में दुर्लभ है । पदमावती के चरित्र में दुर्बलताएँ बहुत कम दिखलाई देती है: दृढ़ता अधिक दिखाई देती है। हम यह कह सकते है कि तापलवस्मराजा नाटक ती पदमावती त्याग, दृढ़ता और बलिदान में स्वप्नवासवदत्त की पदमावती से बहुत आगे अनन्य प्रेम और अपने बलोक-सामान्य सोजन्य के लिए पदमावती एक स्मरणीय नारी-पात्र है स्वप्नवासवदत्ता नाटक में वासवदत्ता और पदमावती के अतिरिक्त अनेक नारी पात्र वर्णित है जिनमें तापसी.बेटी. पदमिनिका. माधुरिका, धात्री, विजया आदि किन्तु ये नारी पात्र नायिका बोर उप- नायिका की सहायता करने वाले है। इनका चरित्र-चित्र प्रस्तुत शो-प्रबन्ध । राजा : कष्ट देवमेव राजतनया दग्या बराकीमया । तापमवत्सराज पृष्ठ 203. ARRA ARSunilion 148 में विस्तार भय से अनावश्यक प्रतीत होता है ।' इसी प्रकार तापसवत्सराज में भी वासवदत्ता और पदमावती के अतिरिक्त अनेक नारी-पात्रों की तृष्टि हुई है। जो इस नाटक की नायिका और उपनायिका की सहायता करने वाले और कथावस्तु को आगे बढ़ाने में सहायक होते है। जिनमें नटी, सांकृत्यायनी, बेटी, कोसलिका, तापसी, प्रतीहारी और कांचनमाला आदि । इन सभी नारी पात्रों का चरित्र-चित्रण विस्तार भय आवासनीय । यौगन्धरायण: स्वप्नवासवदत्ता और तापस-वत्सराजम दोनोंडी नाटकों में यौगन्धरायण एक सर्वाधिक महत्वपूर्ण पात्र है। यदि यह कहा जाय कि उक्त दोनों ही नाटकों के तथा सूत्रों का वह सत्रधार है तो कोई अतियोक्ति नहीं होगी। दोनों नाटकों में योगन्धरायण का परिचय हमें प्रथम बैंक से ही प्राप्त होता है । नाटकों के अतिम अंक में भी योगन्धरायण की उपस्थिति विद्यमान है फिरभी योगन्धरायण का प्रभाव सम्पूर्ण नाटक में पूर्णतया ओत- प्रोत है । -- हम देखते है कि दोनों ही नाटकों के सम्पूर्ण क्रियाकलापों का me- 1. स्वप्नवासवदत्ता, प्रकाशक-रामनारायणलाल बनीमाधव, 1968,संस्करण 2. तापसवत्सराजम: साहित्य भण्डार, मेरठ-1969,संस्करण 3 ततः प्रविाति परिव्राजकवषो यौगन्धरायण: अवन्तिकावधारिणी
40
संचालन योगन्धरायण की योजनानुसार ही होता है। ऐसा प्रतीत होता
है कि दोनों ही नाटकों के सम्पूर्ण पात्र योगन्धरायण के हाथ के खिलौने है,
इसीलिए नाटकों के सभी पात्रों को वह जैसे चाहता है, उन्हें नचाता है ।
उसमें इतनी निपुणता और कोशल है कि अन्त तक किसी पात्र को यह विदित
नहीं होता कि नेपथ्य में इस क्या सूत्र का कौन संचालन कर रहा है । यद्यपि
कुछ पात्र जो उसके विश्वस्त है, उन्हें अपनी योजना का ज्ञान वह स्वयं करा
देता है । यौगन्धरायण के बुद्धि कोशल और उसकी दूरदृष्टि को देखकर आश्चर्य
चकित हो जाना पड़ता । उसको स्वामी भात और कार्य करने की क्षमता
अपूर्व है ।।
यौगन्धरायण वलराज उदयन का महामन्त्री है और राजनीति
में चाणक्य के समान दरदर्शी है । यह दोनों ही नाटकों की कथावस्तु का एक
प्रकार से केन्द्र बिन्दु जेसा प्रतीत होता है। योगन्धरायण उदयन की स्वामी
भक्त मन्त्री है,वह अपने स्वामी तथा राज्य के हित के लिए सर्वस्त्र त्यागकर
सकता है।
वह प्रारम्भ से लेकर अन्त तक राज्य और स्वामी के लिए अनेक
प्रकार की आपत्तियों को सहन करता है।
राजा उदयन उसकी प्रशंसा करते
हुए कहता है कि हे ! योगन्धरायण, आपने कृत्रिम पागल जैसी चेष्टाओं,
युद्धी, शास्त्रमम्मत परामों और प्रयलों के द्वारा निःसन्देह विपत्ति सागर
में डूबते हुए हमको उबारा है 12
1. यौगन्धरायण : वर्ण दवा कथा - इहा प्युस्सायत ।
स्वप्नवासवदत्ता 3.पृष्ठ 08.
१. राजा : मियोन्मादाच युव शास्त्रदन्टेरच माता
भवाने मनु वयं सम्यमानाः समुहताः
6.16.पृष्ठ 232.
मा
Krishna
योगन्धरायण एक प्रखर प्रज्ञावान और कार्यकुशल मन्त्री है । स्वप्नवासवदत्ता नाटक में हम देखते है कि जब पदमावती दान की घोषणा करती है,वह शीघ्र याचक बनकर उपस्थिति हो जाता है और अपनी निपुणता के कारण वासवदत्ता को अपनी भगिनी के रूप में राजकुमारी पदमावती के पास धरोहर के रूप में रहने का प्रबन्ध कर देता है । यह यौगन्धरायण की बुद्धि का विलास है जो शत्रु बारूण से अधिकृत राज को उदयन पुन: प्राप्त कर लेता है। योगन्धरायण गुण्याही मन्त्री है। उसे गुणों की और क्षमता की अद्भुत पहचान है । अपने कनिष्ठ मन्त्री मणवान के कार्य की वह मुक्त के से प्रशंसा करता है । वह कहता है कि सचमुच स्यण्वान प्रशसनीय है, वह राजा की रक्षा में तत्पर है जिसके हाथ में राजा की देखभाल होती है.उसी । के हाथ में सब कुछ निहित होता है।' स्वप्नवासवदत्तम् नाटक के योगन्धरायण के साथ तापस- वत्सराज नाटक योगन्धरायण की तुलना करने पर हम विदित होता है कि तापसवत्सराजम् का योगन्धरायण कहीं अधिक दूरदर्शी सफल एवं जागरूक है । वह यह जानता है कि पूर्ण विवात के लिए बिना तथा पूरी तरह परिक्षण किए बिना किसी व्यक्ति को कोई महान कार्यभार सोपना उचित नहीं - क्योंकि किसी भी कठिन परिस्थिति के आने पर सम्पूर्ण योजना का रहस्य प्रकाशित हो सकता है। किसी की इच्छा के बिना किसी से कोई महत्वपूर्ण H M ।. योगन्धरायणः धौरा कन्येय दृष्ट-धर्मप्रचारा राक्ता चारश्य जितु में भगिन्या: । स्वप्नवासवदत्त 19,पृष्ठ 34 १. योगन्धरायणः तस्मिन्नु सर्वप्रवीन हि यत्राबीनो नराधिपः । स्वप्नवासवदत्तम् ।.15, पृष्ठ १.
और रहस्यात्मक कार्य नहीं कराया जा सकता है । इसीलिए वह बड़ी निपुणता के साथ महारानी वासवदत्ता के समान राष्ट्र के महान संक्ट का चित्र प्रस्तुत कमता है और अपनी योजना सार वासवदत्ता को स्वच्छा से उसमें योगदान करने के लिए सहमत कर लेता है । वह अपनी योजना के अनुसार वासवदत्ता के पिता प्रद्योत के द्वारा लिखित पत्र को अपने आप न पढ़कर कांचनमाला से पढ़वाता है और प्रधौत के द्वारावासवदत्ता के लिए कहे संदेश को सुनकर उसकी भार-भूरि प्रशंसा करता है । अन्त में, वासवदत्ता को राज्य की rar हेतु सम्पूर्ण योजनाओं अवगत कराकर अपने कार्य में व्यस्त हो जाता है । योगन्धरायण को दूरदर्शिता का परिणाम है कि हम वासवदत्ता को कहीं। भी बड़े से बड़े संक्ट की स्थिति में अपनी योजना से विचलित हुए नहीं देखता हम देखते है कि वह "स्वप्नवासवदत्ता नाटक की वासवदला की भौति संक्ट में घबहाती नहीं है औरप्रतिकूल परिस्थितियों में अपने भाग्य को कोसती नहीं है । DREA8- तापसवत्सराज के सभी पात्र विदूषक, स्यावा.लामकायन, साकृत्यायनी,सिद्धार्थक आदि महामन्त्री योगन्धरायण की योजना के अनुसार अपने-अपने कार्य में तत्पर है और योगन्धरायण की योजना के बशर्ती है । यौगन्धरायण की योजना के अनुसार ही साकृत्यानयनी उदयन का चित्र लेकर राज्यगृह जाती है और वह वही उदयन के गुणों का वर्णन करके तथा उसका चित्र दिखा करके राजकुमारी पद्मावती को उदयन के प्रति अनुरक्त कराने में सफल हो जाती है । इसीलिए जब राजकुमारी पदमावती उदयन के तापस -- 1. वक्तु नोत्सहते मनः परमतो जानातु देवी स्वयम् । योगन्यायण-कचनमाने कांचनमाले) वाच्य त्वमेव । तापसवत्सराजाक-1, पृष्ठ 18.
152 होने का वृत्तान्त सुनती है तो वह स्वयं ही तापस वेश धारण कर वहीं आश्रम में रहने लगती है । इसो बीच यौगन्धरायण ब्राह्मण देश में वही आता है और वासवदत्ता को प्रोत-पतिका के रूप में पद्मावती के पास कुछ समय के लिए छोड़कर आगे की योजनाओं को सफल करने के लिए प्रयत्नशील हो जाता है। चतुर्थ अंक में गुप्तबर सिद्धार्थक विदित होता कि उसने इस बीच में मगध और अवन्ती दोनों राज्यों से अपने शत्रु आरुणि के विरुद्ध सैनिक सहायता प्राप्त कर लो है और इधर वह साकृत्यायनी से निरन्तर सम्पर्क बनाये हुए है, दोनों ओर के कार्यों की प्रगति की वह निरन्तर समीक्षा कर रहा है। योगन्धरायण की तथाकथित कम्पित-मृत्यु का समाचार सुनकर ANDESHEREFORE वस्तराज उदयन उसकी प्रशंसr में कहता है कि मेरे प्रेम से विवेकहीन होकर प्रमाद करने पर अब किसका मन खिन्न होगा । कितको सम्पूर्ण राज्य का भार सौप कर इन्छानुATT सुख भोग कागा । अब योगन्धरायण के चले जाने पर मेरे साथ युद्ध स्थान में आगे-आगे भपकर शत्रु को सेना को विनाश करने वाला कोन होगा। महामन्त्री योगन्धरायण के दूर चले जाने पर अब मैं किस आशा के सहारे जीवित रहुँगा । है 2 - -- बेटी : यथा साम्प्रतमव नापि प्राइमणे मदारिकायै प्रोक्ति- भईका ब्राह्मणी समर्पिता तापसवत्सराज अंक-3.पृष्ठ 678 2: राजा: रागाने मयि कस्य मागत मनः खेद स्वमुत्पत, कस्मिन राज्यमा निवाय सकसिब सुखानीमाया । दुन्तिारिवाधिनी प्रमथन: कस्यामाग्रेलरः. कामाशामवलम्च्य सम्प्रति गोदर त्वयि प्राणिमि ॥
153 इसी प्रकार नाटक के प्रायः सभी पात्र महामन्त्री योगन्ध- रायण के युद्ध-कोराल की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हैं महामन्त्री योगन्धरायण में जैसा बु-विलास था.मा ही युद्ध कौशल भी था । पांचाल नरेश के विरुद्ध उसने संग्राम में जो कौशल दिखलाया,वह अद्भुत था । वत्सराज उदयन योगन्धरायण के सम्बन्ध में कहता कि महामन्त्री योगन्धरायण वित्तिरूपी समुद्र में मेरे लिए जहाज के समान थे और उसके पराक्रम को सिंह भी प्राप्त नहीं कर सकते । परिहास की बाते यौगन्धरायण से ही मैने सीखी थी। यौगन्धरायण के किन-किन गुणों का HEEZEREST स्मरण करके, आसू बहाया जाय,वह सभी गुणों का निधान था । अपनी सम्पूर्ण योजनाओं में सफल हो जाने पर भी उगमें कहीं भी गर्व या अभिमान का भाव दिखलाई नहीं पड़ता है। उसकी विनमता का इससे बड़ा परिणाम और क्या हो सकता है कि वह चिता में जलने के लिए तयार वासवदत्ता से कहता है कि आपको इस प्रकार का कष्ट देने का । अपराधी मैं ही हूँ और अन्त में, अपने आपको अपराधी कहकर राजा से अपने अपराध के लिए क्षमचाहता है यह केका महामन्त्री योगन्धरायण का बुद्धि कोशा है कि उसने आक्रान्ता ऑणि ते वत्स-प्रदेश की रक्षा की और इतना बड़ा संकट उपस्थिति हो जाने पर भी राजा और महारानी में से किसी की भी हानि नहीं होने दी। उसने सभी संभावित संक्टों का सामना करने के लिए पहले . राज: पोत: सातत्व विपवारिरासो तल मोर्य नास्तपूर्व मृगेन्द्र : । क्रीडामापा स्त्वत्त एव प्रस्ता: किस्मृत्वा रोदिमित्वगुणानाम। तापलवलराजा 19.पष्ठ 54.
154 से ही बड़ी सुनियोजित योजना तयार कर ली थी। इसीलिए सभी ओर से राजा को पूर्ण सफलता प्राप्त होती है । अन्त में, हम कह सतत है कि इन नाटकों में योगन्धरायण का बुद्धि-कौशल मुद्रा राक्षस नाटक के महामन्त्री चाणक्य के बुद्धि-काशल से और नीति प्रयोग से किचत कम नहीं है । GESH है विदुषक : विदूषक संस्कृत नाटकों का एक महत्वपूर्ण पात्र है । वह नाटक में हास्य तथा व्यय का रचनाकर नाटकीय मनोरंजन का साधन बनता है, किन्तु उir इस भी गम्भीर कार्य है । वह राजा के अन्त:पुर का आलोचक भी बनकर आता है। कभी-कभी वह संवाद में अपनी चतुरता का संक्त करता किन्तु स्कूल रूप वह मोदक प्रिय और पूर्व दिखलाई पड़ता । विदृषक ब्राहमण जाति का होता है, उसको आमा, चाल-ढाल, व्यवहार तथा बात- चीत का ढंग हास्यजनक होता है । विदृषक राजा का विश्वास पात्र व्यक्ति होता है, जिसे राजा अपनी गुप्त प्रेम मन्त्रणा तक बता देता है । वह कभी- कभी राजा के गुप्त प्रेम व्यवहार में सहायक भी होता है।' स्वप्नवासवदत्त और तापसवत्सराजम इन दोनों ही नाटकों में कवियों ने विदुषक का प्रयोग किया स्वप्नवासवदत्ता के अनुशीलन से विदित होता है कि विदुषक केवल हास्य रस का साबन और भोजन भट ही नहीं है.वरन वह सदैव राजा के साथ रहकर उसके प्रत्येक कार्य में सहायता करता है। वह अपनी सजगता के कारण राजा को सभी विषम परिस्थितियों से बचा लेता है और एक आदर्श मित्र की भाति उसे अपने कर्तव्य को प्रेरित - 1. हास्यकृम्ब विदुषक: । दापक १.१. पृष्ठ १७.
155
करता है, जब राजा वासवदत्ता की याद में रोने लगता है और वह अचानक
पद्मावती आजाती है,उस समय वह बड़ी सावधानी से पदमावती को राजा
की आखों में आंसू आने का कारण बतलाता है कि काश के फूल की फुल हवा
में उड़कर आँखों में पड़ जाने से जीस आ गए है, इसलिए उनके मुख धोने का जल
आप लोजिए ।' फिर वह राजा को स्मरण दिलाकर कि आपको मगरवर के
।
साथ स्वागत समारोह में चलना है, शीघ्र प्रस्थान के लिए यह कहकर वहाँ से
इटा देता है।
स्वप्नवासवदत्ता का विदूषक भोजन के प्रति अधिक रूचि नहीं
रखता है।
वह अजीर्ण होने से भयभीत है, जब चेटी उससे भोजन न करने का
कारण पूछती है तो वह कहता है कि कोयल के अति परिवर्तन की भोति मुहा
भाग्यहीन का इक्षिपरिवर्तन हो गया है ।
स्वप्नवासवदत्ता नाटक का विदूषक अत्यधिक स्वामि-भक्त
और सेवक है । मानव के सम्पूर्ण गण, सुजनता, सहानुभूति कामा इत्यादि
उसमें पूर्ण रूप से विद्यमान है। वह राजा के दु:समें दुःखी और सुप में सुखी
रहता है। इसीलिए वह राजा का विवास-पात्र है। राजा अपनी दोनों
पत्नियों के सम्बन्ध में उससे अपने विचारों को व्यक्त करता है 12
MATLABELA
Memon
I. विदक : भवति ! वातनी तैन बारातुमरेणनाशिनिपतितेन
सापात तत्रभवतो मुना ।
तद धातु भक्तीदं मुखोदय ।
स्वप्नवासवदत्ता अंक-4.पृष्ठ 138.
2. विदुषक : भो मा एवं भग, एका खानु दास्याहिता ज्ञातिकुलप्रवृत्ति:
पक्षया बखिताप स्त्रीजन रोदयति ।
तापसवत्सराजम् क-1, पृष्ठ 29.
156 तापसवत्सराजा नाटक के अनुशीलन ते विदित होता है कि इसनाटक का विदुष्का अत्यन्त गम्भीर और उत्तरदायित्वपूर्ण कार्यभार को निभाने वाला है। वह संस्कृत नाटकों के अन्य विदुषकों की भाँति वाचाल, पूर्व और पेटपूजा करने वाला नहीं है । राष्ट्र की रक्षा के लिए मन्त्रियों ने जो गुप्त योजना बनाई है,वह स्वयं ही उसका एक सदस्य है । वह राजr की रक्षा का सम्पूर्ण उत्तरदायित्व अपने ऊपर ले लेता है, वह रात-दिन छाया की भाति राजा का अनुसरण करता है और मन्त्रियों की योजना को राजा से मना नहीं करता है। यौगन्धरायण को कल्पित मृत्यु पर राजा को शौका- कुल देखकर वह स्वयं भी रोने लगता है और जानता हुआ भी अनजान सा बन- कर कहने लगता है - है ! मन्त्रीवर, हम सबको छोड़कर महारानी के साथ जाते हुए आपने बड़ा दुष्कर कार्य क्या है ।। VISISTERSNEW हम देखते है कि स्यावान एवं उसकी सहमति से ही राजा को प्रयाग में लामकायन के पास ले जाया जाता है और वहां से राज की रक्षा का सम्पूर्ण उत्तरदायित्व विदूषक को सोपकर कमावान स्वयं कोशाम्बी लोट जाता है, विदुषक को आगे के सम्पूर्ण कार्यक्रमविदित है और उसी अनुसार वह किसी बहाने से राजा को लेकर राजगृह पहुँचता है और शोकाकुल राजा को अनेक प्रकार से धर्य और सांत्वना देता है । वह धीरे-धीरे राजा को दूसरे विवाह के लिए प्रेरित करता है और इसी दृष्टि वै वह राजा को पदमावती के तपोवन में ले चलता है और वहाँ वान का बहाना करके ऐसा लेट जाता है कि पदमावती के द्वारा राजा की अर्चनाये जाने तक उठने का - - 1. बिपक :दहा समात्य ! अस्माद परित्यज्य देवीमनुगच्छन्न दुष्करमध्यवीमतोमि । तापसवत्सराजम. - पृष्ठ 54. VAR 157 नाम नहीं लेता है और बीच में बातें बनाया कर राजा का ध्यान पद्मावती की ओर आकर्षित करने का प्रयत्न करता है चतुर्थ बैंक में लतापारा में शरीर त्याग के लिए उधत पद्मावती के पास राजा को वह यथासमय ले जाता है, जिससे पद्मावतीकमृत्युपाश से रक्षा हो जाती है । तापसवत्सराज नाटक का विदृष्भक प्रत्युत्पन्नमति है और उसकी दष्टि भी बहुत पैनी है। वह यथानमय बात बनाकर स्थिति को संभाल लेता है, उस जहाँ कोर उत्तरदायित्व को निभाने की दृता एवं बुद्धि की चतुरता है, वहीं उसमें हृदय की कोमलता भी है । प्राणान्त के लिए उद्यत और वासवदता के लिए व्याकुल राजा को देखकर वह कहता है कि आपकी यह दशा देखकर मेरा हृदय अत्यन्त दुःखी हो रहा है ।' संस्कृत के अन्य नाटकों के विदूषक प्रायः भोजनप्रिय और विनोदीस्वभाव के होते है, किन्तु तापसवत्सराज नाटक के विदूषक में भोजन प्रियता और परिहास बहुत कम तथा परिसीमित मात्रा देखा जाता है । उतका परिहास मृदु हऔरउसमें भोजनप्रियता अधिक नहीं है । इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि तापसवत्सराजम का FESSIOTERE विदूषक अनेक अशी अन्य नाटकों के विदूषकों से भिन्न है । इस नाटक के अन्तर्गत घटित होने वालो घटनाओं में उकया अपना विशिष्ट योगदान है और वह अपने मन्त्रियों की योजना के अनुसार अपना योगदान देने में पीछे नहीं रहता है। इस नाटक का विदुषक उत्तरदायित्व को निभाने वाला Heta 1. विदृषक: सटो वृत्त जानामि तथापि एतव्यस्यस्य व्यवसितम् प्रय जाविध्यत्व में एदया । तापसवत्सराजा बंक-6, पृष्ठ 202, 158 गम्भीर और संयत पात्र है। नाटक में सूत्रधार, रूमण्वान, लामकायन, विनीत भद्र, लेख्वाहक, शिष्य, कंचुकीय, कुंजरक, माणवक और शबर आदि अनेक पात्र है किन्तु विस्तार भय से इन सब का चरित्र-चित्रण यहाँ अपेक्षित नहीं है। निष्कर्षस्वरूप कहा जा सकता है कि दोनों ही नाटककार भास* एवं अनंगहर्षमातराज' पात्रों के चरित्राकन में अत्यन्त निपुण और नव- नवोन्मेषशालिनी प्रतिभा के धनी है। 0000000 00000 000 RELESELETEE
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संवाद - योजना
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159 पच म - . . ध्या य संवाद योजना: नाटकों में संवादों का अतिशय महत्व है। संवादों के द्वारा नाटक का क्यानक आगे बढ़ता है और अपनी चरमसिद्धि को प्राप्त करता नाटकों के संवाद के विषय में नाट्यशास्त्रियों ने बड़ी महत्वपूर्ण बातें बतलाई है। कोन सा नाडक दर्शकों के लिए सुन्दर तथा उपयोगी होता इसके उत्तर में आचार्य भरत का कथन है कि नाटक मृदु तथा ललित पदों से युक्त तथा स्पष्ट शब्द और अर्थ में युक्त होना चाहिए । बुद्धिमानी है १ को सुख देने वाला, चतुर लोगों के द्वारा लr जा सकने वाला, बहुत से रतो को व्यक्त करने का मार्ग उघाटित करने वाला और नाट्य सन्धियों से सधा हुआ नाटक दर्शकों के लिए उपयोगी होता है । भरत मुनि के उपर्युक्त कथन का आशय यह प्रकट होता है कि उन्होन संवाद योजना के । SEASERNPOTA विषय में तीन बाते स्पष्ट रूप से प्रतिपादित कर दी है। एक तो यह कि संवाद कहीं भी ऐसr नहीं होना चाहिए जिसके अर्थ को समझने में श्रोताओं को कठिनाई हो भरत मुनि के कथन का यह अभिप्राय है कि संवाद को सुनते ही वक्ता का भाव स्पष्ट हो जाना चाहिए । ऐसे होने चाहिए जिससे दर्शकों को शीघ्र रसानुभूति हो सके । संवादको न तो नीरस होना चाहिए और न केवल सूचना देने वाला होना चाहिए, बकि उनका रस युक्त होना अत्यन्त आवयक । भरतमुनि का स्पष्ट । संस्कृत बालोचना : बलदेव उपाध्याय, प्रथम संस्करण 1997.पृष्ठ 88 160 अभिमत है कि संवाद की योजना करते समय नाटककार को अलंकार के प्रपंच में नहीं पड़ना चाहिए जो श्रोताओं के समा के परे हो, या अस्वाभाविक प्रतीत होती हों, अथवा जो उचित न हो और जिसके अनुसार अभिनय करने में श्रोताओं को असुविधा प्रतीत होती हो । अन्य विधानों के अनुसार संवाद-योजना के लिए औचित्य का बहुत अधिक महत्व होता है । पात्र को क्या कहना चाहिए,किस समय कहना चाहिए, कैसे कहना चाहिए, इन प्रश्नों को rErr पाकर विचित संवाद ही प्रेक्षकों के हृदय को आकर्षित करता है । इसका अर्थ यह नहीं है कि नाटककार को काव्यशास्त्र का अध्ययन नहीं करना चाहिए। काव कर्म के लिए काव्य-स्त्रका अनुशीलन कवि के लिए नितान्त वाक्यक होता है, परन्तु कवि को चाहिए कि वह अपने नाटक में बलपूर्वक खोजकर अलंकारों का बालात प्रयोग न करें अन्यथा नाटक की भाषा दुम्ह, अस्वाभा- विक, कठिन औरबर्बोध हो जाती है, जिससे रसानुभूति में बाधा होती है। संवाद-योजना के लिए भाषा का अच्छा मान परम आवश्यक है । संस्कृत के नाटकों में संवाद संस्कृत और प्राकृत भाषाओं में रहते है। पात्रों को सामाजिक और सांस्कृतिक योजना के अनुसार ही संवाद की योजना की जाती है। | विज्ञानों का क्थन है कि संवाद रचना के लिए काव्य के समस्त गुण जावयक होते है। परन्तु दो गुणों की आवश्यकता अनिवार्य है। एक है प्रसाद गुम और दूसरा गुण है संवादों मैंकोतवन । प्रसाद गुण केरा वक्ता की बात श्रोता के हृदय तक सरलता पहुँच जाती है। बह उसे भलीभाँति समझ लेता और उसका आनन्द लेने की बोर प्रवृत्त होता है।" । संस्कृत बानोचना: बन्देव उपाध्याय, प्रधान संस्करण 1957. पृष्ठ 89.
161 दूसरे गुण कौतुहल के द्वारा दर्शक की प्रवृत्ति नाटक देखने की और स्वयं प्रातर होती है। यदि नाटकों के संवादों में कोतुहल नहीं है तो वह फीका, अरुचिकर तथा आकर्षण विहीन होगा। संवाद में संदेव आकर्षण का होना अत्यन्त आवयक है । इस आग से दर्शक नाटक के संवादों से सम्बद्ध रहता है । नाटककार को संवाद की रचना करते समय उसके दोषों से बचना चाहिए । संवाद के दोष वही है जो सामान्य रूप से काव्य के दोष होते है। क्लिष्ट, अलील, अमंगल और संदि- ग्धार्थ इत्यादि । नाट्यशास्त्रियों ने पात्रों के उच्चारण लिए विशेष नियमों का निर्माण किया है। उच्चारण करने वाले या पढ़ने वाले पात्र के छ: गुण होते हैं - माधुर्य, आर की स्पष्टअभिव्यक्ति, पदच्छेद, सुस्वरता, धर्थ तथा लथसमर्थता | इस कथन का तात्पर्य यह है कि शब्दों का उच्चारण मधुर होना चाहिए, वर्गक्टु नहीं । अारों का उच्चारण बहुत स्पष्ट और पृथक - पृथक होना चाहिए। उन्धारण में स्वरों का उचित उतार-चढ़ाव भी आवयक है ! सुस्वरतr बहुत ही महत्वपूर्ण न माना जाता है । रसो' के अनुसार स्वर-परिवर्तन होता है। श्रृंगार रस के प्रतिपादन में कोमल स्वरों का प्रयोग करना चाहिए और रोद्र रस के प्रतिपादन में उग्रस्वरो का प्रयोग करना चाहिए । प्रसंग और वियानुसार स्वरों में उतार- चढ़ाव करना चाहिए। तभी बवता का प्रभाव श्रोता पर ठीक से होता 1. माधुर्य आरव्यक्तिः पदच्छेदस्तुसुस्वरः । अर्थ लयसमयि च पडते पाठका गुणा: पाणनीय-शि. ॥
162 है और श्रोता का ध्यान उस ओर आकर्षित होता है । बोलने में उचित लय का होना भी अत्यन्त आवयक इस प्रकार यह स्पष्ट है कि -- संवाद का कथन इस प्रकार होनr चाहिए कि श्रोतागण आकर्षित हो जाव - तथा नाटक के पात्रों के कथनोपकथन में रस ग्रहण करते हुए उसे ध्यान से सुन। पात्रों को भाषाभ उक्त प्रकार से आकर्षक उत्पन्न हो जाता है । जो पात्र गाकर वाव्यों का उच्चारण करते हैं, शीघ्र बिना रोके हुए कथनोपकथन करते है, अनायक शिरकम्पन सहित उच्चारण करते है तथा जो लिखकर अपने संवादों को काट देते है। ऐ पाठक अक्षम होत ।' आचार्य भारत अति ने तो संवाद के दोनों तत्वो', भाषा तत्व तथा वा व्यतत्व पर अपने गम्भीर विचार प्रस्तुत किए है। जिसका अनुकरण आज भी नाटक को रोचक बनाने के लिए उपयोगी है। विद्वानों का कथन है कि भारतीय संस्कृत नाटक न केवल आदर्शवाद पर प्रतिष्ठित रहता है और न केवन यथार्थवाद पर ही प्रतिष्ठित रहता है, प्रत्युत उसमें दोनों का मन्जुल समन्व्य बटित होता है और यही कारण है कि आज भी विज्ञानिक रंगमंच के युग में भी संस्कृत के नाटकों का अभिनय उतना ही WOMANPOST आकर्षक तथा मनोरंजक होart 2 - memale 1. गीती. शीत्री रिम्पी तथा लिखितपाठकः । पाणिनीय शि. पृ० 5. 2. संस्कृत आलोचना : बल्देव उपाध्याय, मस्करण 1957, पृष्ठ 90.
163 आचार्य भरत ने अभिनय के चार प्रकार मान है -18गिक, 12 वाचिक, आहार्य तथा सात्विक । इन चारों अभिनयों के द्वारा प्रस्तुत कथावस्तु ही दर्शकों के सामने अभिनय-पदार्थ तथा यथार्थ रूप दिखला सकती है तथा उनका मनोरंजन कर सकती है । वाचिक अभिनय में नटों तथा पात्रों के संवाद का विधान रहता है। संवाद के द्वारा ही कोई पात्र अपनी भावना अभिव्यक्त करतr है तथा अन्य पात्रों के साथ कथनो पक्थन में प्रवृत्त होता है । इसीलिए भरत मुनि ने वाचिक अभिनय को नाट्य का शरीर कहा है तथा इस कार्य में पात्रों को विशेष प्रयत्न करने के लिए निर्देशित किया है ।। संवादों की भाषा : eas- नाटककार भाषा के प्रयोग में अपने मानसिक साक्षात्कार से वस्तु के सार बिन्दु को आत्मिक रूपों में ग्रहण करने का प्रयत्न करता है । वह वस्तुओं तथा परिस्थितियों को उनकी तार्किक सम्बन्धों को स्थिति से अलग कर वास्तविक संवदनात्मक प्रतिक्यिों में वर्णित करता है । नाटक- कार भो कलाकार है औरवह अपने पात्रों के सम्भाषणों में ताकि.स्थितियों के स्थान पर व्यक्ति तथा वस्तुओं की संवदनात्मक प्रति छवियों को व्यजित करना चाहता है इसीलिए विद्वानों का कथन है कि उसकी भाषा जीवन के सजीव भावात्मक संदर्भ को व्यजित करने वाली होनी चाहिए । अभिनेताबों हारा अपने सम्भाषण में सहज रूप से स्पष्ट तथा बाल संगति उत्पन्न करनी चाहिए । इस प्रकार भाषा निति को प्रकाशित करती है और प्रत्येक 1. वाचि यत्नस्तु कर्तव्यो नाटयस्यय तनुः स्मृता । बंगनेपभ्यत्वानि वाक्यार्थ-व्ययान्ताह नाट्यशास्त्र.2 164 भाव बोध के अन्तर्निहित अर्थ को निर्दिष्ट तथा व्यजित कर देती है । नाटकीय सम्भाषण में भाषा के प्रयोग दो स्तर होते हैं, भाजा तो वास्तव में वाणी ही है, लिक्ति रूप में कुछ प्रतीकों के सहारे और नियमों के आधार परचलती है । नाटक को रचना में नाटककार जीवन की भाषा को यथा- सम्भव ऐसे सक्तो तथा प्रतीकों के माध्यम लिपिबद्ध करता है जिनमें उसकी सजीवता तथा जोवन के संदों को ग्रहण करने की अधिक से अधिक सम्भावना रहती है और इसके बाद सूत्रधार निर्देशक पूर्ण भावनाओं या संदर्भो को लिपिबदकर नाटकीय वस्तु से परिकल्पित करता है और अभिनेता इसी आधार पर अपने क्योपकथानों में कलात्मक सर्जन को सम्भावनाओं का अविष्कार करते हैं। प्राय: यह कहा जाता । PिE भाव प्रदर्शन संवदन की भाषा है और सम्भाषण विचार की भाषा है, परन्तु इस स्थान में आशिक मात्र प्रतीत होता है, विचारों की भाषा का प्रयोग ही भाव प्रदर्शन में निरन्तर देखा जा सकता है। केवल विचारों को प्रकट करने लिए शब्दों का प्रयोग नहीं क्यिा जाता है, वरन संवगों को जागृत करने की शक्ति भी उनमें रहती है। कभी-कभी केवल एक वाक्याश ही हमारे मन .उन शब्दों के संदर्भ के कारण, ऐता भाव जागत कर देता है.जो सम्पूर्ण विधार की संवगात्मक स्थिति से कोई समता नहीं रखता है फिरभी भाव दर्शन का सम्बन्ध अधिकतर इच्छाशक्ति से है और कथनोपकधान विचार मुलक होते है। इस कारण भाव प्रदर्शन के अध्ययन का सम्बन्ध लवदनायो रहा है और वाणो के अध्ययन में अधिकतर विचारों की कोमल तथा तीव्र उच्चारणात्मक नाट्यकला डॉ० रखना प्रथम संस्करण 1961, पृष्ठ 2 165 विभिन्नताएं महत्वपूर्ण होती है ।' लेक या कवि को अपने अर्थ को पूर्णरूप से व्यजित करने के लिए सदा अधिक कधन के स्थान पर कम कथन ही करना चाहिए । इसीप्रकार अभिनेता को यह ध्यान में रखना चाहिए कि उसके लिए अपने भाव को व्यक्त करने के लिए समस्त उपयुक्त शब्दों का प्रयोग करना ही जरूरी नहीं है । उसको श्रोता तथा दृश्टा की स्मरण शक्ति पर विवास करके कुछ शब्दों को छोड़ देना चाहिए क्योंकि वे स्वयं संदर्भ और प्रसंग के सहारे उद्दिष्ट अर्थ को ग्रहण करते अधिक सही व्यजन्ना तक पहुंच सक्ते है । संवाद योजना के अन्तर्गत प्रत्येत वाक्य में एक या दो शब्द विशेष महत्व के रहते है, उनका स्थान भी निर्धारित होता है, जिन पर सम्पूर्ण वाक्य का अर्थ निर्भर रहता है। अभिनेता को इन शब्दों की स्थिति तथा अभिनय का अनुमान होना चाहिए । इसका तात्पर्य यह कदापि नहीं है कि वह ऐ प्रत्येक शब्द या वाक्याश पर बल ही देगा क्योकि कुछ शब्द भारी और कुछ हल्के होने पर ही विशिष्ट की बजना देते एक ही शब्द औरत, प्रलंग तथा वाक्य में अपने स्थान के अनुसार कभी भारी और कभी हल्का प्रयुक्त हो सकता है । इस प्रकार के संतुलन का ज्ञान नाटककार को कथोपकथन की शैली के अनुरूप शब्द-संचयन के लिए और अभिनेता लो यथार्थ भाग उसे उपयुक्त करने के लिए होना चाहिए । अस्कृत नाटकों की कल्पना रस पर आधारित है, अत: उसमें MAHAN PM 1. नाट्यकला : डॉ.भरवश, प्रथम संस्करण 1961, पृष्ठ 167.
166 वाचिक अभिनय की परिकल्पना रस को लेकर ही चलती है । भरत ने । इसीलिए अलंकार, छन्द तथा गुण आदि की चर्चा इसी दृष्टि से की है। आचार्य भरत ने अपने नाट्यशास्त्र में विस्तृत चर्चा के बाद नाटकीय उच्चारण के सम्बन्ध में निश्चित नियमों कीचr की है। उन्होन पाक्ष्य के विषय में सात स्वर, तीन स्थान, चार वर्ण, दो काव्य और छ: अलंकारों का उल्लेख क्यिा है । वस्तुत: वाचिक अभिनय के विषय में इन्हीं को विशिष्ट निर्देशों के रूप में माना जा सकता है । सात स्वरोज अकम, गान्धार, मध्यम, पंचम, धवत और नियाद है । हास्य तथा श्रृंगार में स्वर मध्यम तथा पंचम, वीर रौद्र तथा अदभुत रसोज तथा ऋकम करुण रस में गान्धार और निषाद, वीभत्स तथा भयानक रसोधवत स्वरों का प्रयोग अपेक्षित माना गया ध्वान निकालने के तीन स्थानों में उर, काठ, तथा शिर माने गए है। मानवर भरत का कथन है कि दूर के व्यक्ति को सम्बोधित करने के लिए स्थान, निकट के व्यक्ति को सम्बोधित करने के लिए काठ- स्थान तथा बिल्कुल समीप के व्यक्ति से बाबतीत करने के लिए उर-स्थान सेवनि निकालना चाहिए।' मुनिवर भरतनेअपने नाट्यशास्त्र में वाधिक अभिनय का विस्तृत विवेचन किया है, यहाँ यह बात स्पष्ट होना चाहिए कि संस्कृत नाटकों में राष्ट बी प्रधान तथा बनमें पद्य का प्रयोग मुख्य रूप से दिया गया है। 1. नाट्यशास्त्र अध्याय 17 2. नाट्य स्व. अध्याय 19 3. नाट्यशास्त्र अध्याय 19 नाट्यशास्त्र अध्याय 19, 167 नाटकों की भाषा के सम्बन्ध में सम्यक् दृष्टि नहीं है कि उसे जहाँ तक सम्भव हो, स्वाभाविक और सहज होना चाहिए और भाव- स्थिति के अनुरूप अलंकरण से भी शा नहीं होनी चाहिए । नाटकों की भाषा को सरल और सरल होना चाहिए । सामान्य और नीरस नहीं । नाटककार के पास अपनी बात कहने के लिए सीमित समय और अवकाश होना चाहिए, जल-जब वह अपनी भाषा का चयन नहीं करेगा : सागर में गागर नहीं करेगा और स्वभाविक अलंकरण नहीं करेगा तब तक उनके हा से अवसर में चले जाने की आशल अनाबर बनी रहेगी। नाटक के लिए वही भाषा आदर्श मानो जाती है जो सरल दिarई देते हुए भी अत्यन्त प्रभावाजी होती है । आभा की दृष्टि से भो भाषा को यही स्थिति आदर्श है, क्योंकि भाषा के सरल और साधारण होने तो अभिनेतr को उसके स्मरण और उन्चारण में raurरहती है और प्रभावी होने के कारण ही वह उसके माध्यम से प्रेक्षक की रस-रज से बोधे रहता है । अभिनेता को अपने संवाद रटना नहीं चाहिए,अपितु हृदयंगम करना चाहिए, सभामा को रटकर बोलने में यह भय बना रहता है कि अभिनेता इस बात के लिए सजग रहता है कि उसने ध्वनि साह का उच्चारण कर दिया है अथवा नहीं। जो उसे उस संदर्भ में उच्चारित करना था । संवादों को रटने वाला अभिनेता यह भी सोच सकता है कि उसके बारा उच्चारत ध्वनि समय से इस संदर्भ का अर्थ प्रकट हुआ है अथवा नहीं किन्तु वाचिक अभिनय तो उच्चारण मात्र, न कि अर्थ की अभिव्यक्ति मात्र वह तो एक विशिष्ट भाव स्थिति का वाणीगत रूप है, अभिनय तो मूलत:
168 भाद का ही होता है ।। अभिनेता को यह बिन्दुतदापि विस्मृत नहीं होना चाहिए कि उसे एक विशिष्ट भावस्थिति का अभिनय करना है । सवादों को हृदयंगम करने के परचार अभिनेता को भाव स्थिति का ध्यान रखने में सुगमता रहती है और फिर प्रत्येक शब्दों के उच्चारण से सम्बन्धित स्वर, अलाधत तथr अन्तराल का निर्णय स्वयं हो जाता है । इन्ही को ध्यान में रखने से दि वचिक अभिय, प्रभाब उत्पन्न हो जाता है । a NRNER कि यह संवादों के वाक्य या arrer शब्दों के सापेक्षित महत्व को पहचान कर उनका अपत बलाघात और अन्तराल के साथ उच्चारण करें12 संस्कृत नाटकों में पाय दो प्रकार का होता है-स्कृत उच्चकोटि के पात्रों को भारत होती है तथा मध्यम तथा नीच श्रेणी के पात्रों की भाषा प्राक्त होती है । नादयता शाक्य कवित्व-मय होता। अत: संवादों की रचना करते समय राटककार को चाहिए कि वह दोनों का परिहार कर ले और गण तथा अलंकारों का संग्रह करके प्रभााली संवादों की रचना करे । नाटक की संवाद योजना संदेव औचित्य का ध्यान परमायक होता और वो भी अभिनय सर्वस्व औचित्य का विधान होता है | इस प्रकार उपर्युक्त कथन और सिढीत प्रतिपादन के प्रकाश में जब हम स्वप्नवासवदत्त और तापसवत्सराजस नाटकों में प्राप्त संवादों का तुलनात्मक अध्ययन करते है तो हमें दोनों पवियों के चातुर्य .. नाटकों का विकास : डासुन्दरलाल शा.संस्करण 197.पुण्ठ-157 2. वही, पृ० 158.
169 पूर्ण परिचय प्राप्त होता है । नाटककार भास अपने प्रसिद्ध नाटक स्वप्न- वासवदार के प्रथम अंक में ही मुद्रालंकार के द्वारा प्रमुख पात्रों का नामो- ल्लेख करते हुए परिचय दे देते है । यह उनकी अपनी विशेषता वर भा की दूसरी प्रमुख विशेषता यह भी है कि कभी-कभी वे नाटकीय | कवि- पात्रों का संवाद श्लोक में करात है। श्लोक के एक ही चरण में दो पात्रों का संवाद हो जातr है । इस प्रकार का उदाहरण प्रतिमा नाटक अंक तीन, शलोक एक में अवलोकनीय है । कविवर भास के नाटकों के संवाद बड़े ही चुस्त, लक्षिप्त, सरल, राजीव, प्रसादगुणयुक्त, अनायासपूर्ण और नाटकीय दृष्टि से अत्यन्त प्रभावोत्पादक है। ऐसा प्रतीत होता है कि नाटककार भाल को अनावश्यक विवरण तथा विस्तार से चिढ़ है । कविवर भास ने अपने नाटक की संवाद-योजना में यथावश्यक ओज, प्रसाद और माधुर्य गुणों का समावेश किया है । सर्वोपरि उनके संवादों में प्रसाद गुण की भरमार है । पात्र तथा भावों के अनुवृत शब्द चयन एवं उनके परामत प्रयोग में भान अत्यन्त निपुण है। नाटक के पात्रो के संवादों में मिलष्ट एवं समास बहुला शब्दावली का सर्वथा अभाव है । नाटक के संवादो* स्वाभाविक पद विन्यास तथा भाव सौष्ठव के साथ प्रवाहमयी दावली सभी को अपूर्व वानन्दातिरेक से भाव विभोर कर देती भास के संवार अनावश्यक वर्ग विस्तार से दूर लाधव और सरलता - से युक्त उनका पद विन्यास संस्कृत के नाट्य साहित्य में अद्वितीय है । 1. उदयनवेन्दु सना वासवदत्तातो बनस्य स्वा । पदमावतीर्णनों वक्षन्तको नोपाता 170 - उनके संवाद हृदय पर गहरा प्रभाव डालने वाले हैं। उनकी जैसी पदयोजना और संवाद-योजना संस्कृत के परवर्ती नाटककारों में दुर्लभ है । संवादों के अन्तर्गत पद्यों का समावेश नाटक के प्रवाह को अgण रखने में सहायक है । उनके संवादों के माध्यम से घटनाओं तथा दृश्यों का यथोचित वर्णन हो जाता है । इसके आंतरिक्त उनके संवादों में अलंकारों का चयन भी अत्यधिक स्वाभाविक रूप से हुआ है । संवादों में प्रयुक्त शब्दों के साथ हो अलंकारों के सुन्दर प्रयोग से श्वी श्रीता और दरक के हृदय में गद स गढ़ भाव प्रविष्ट हो जाते है। वासवदत्ता औरयोगन्धरायणके संवादों में कवि को उपमाओं के लिए प्रकृति के हो उपादान विशेष रूप से अभीष्ट प्रतीत होते है । संवादों की सरलता और अकुला अवलोकनीय है । यथा वासवदत्ता : - आर्य ! तथा परिश्रम: पारखद नोत्पादयति यथाय परिभवः । यौगन्धरायणः- भुक्तावित एव विषयोडवाभवत्या । नात्र चिन्ताका ! पूर्व त्व्याप्यभिमतं मत मेवमासीन्चलाध्य गमिष्यसि पुनर्विजयेन भर्तुः । कालक्रमेण जगतः परिवर्तमाना चक्रारपंक्तिरिवगच्छति भाक्ति: । स्वप्नवासवदत्ता 1.48 कविवर भास ने अपने नाटक स्वप्नवासवदत्तय छोटे-छोटे वाक्यों के द्वारा संवादो की रचना की है। वासवदत्ता :- स्वात. इय सा राजदारिका । अभिजनाकप खन्य स्या 1. स्वप्नवासवदत्ता अंक-..ष्ठ 25.
पदमावती : आर्ये वन्दे । तापसी चिरंजीव । प्रविश जाते! प्रकिया। तपोवनानिनामातिधिजनस्य स्वगहा । स्वप्नवासवदत्तम् प्रथम अंक, 3.25 एक ब्रह्मचारी मगध के आश्रम में प्रवेश करताहे, जहाँ पर महामन्त्री योगन्धरायण और वासवदत्ता प्रच्छन्न देश में उपस्थित है, वहीं पर मगध की राजकुमारी पदमावती भी है । वह ब्रह्मचारी लावाणक ग्राम से आया हुआ है। वह वहाँ पर वेदाध्ययन करने के लिए रूक चुका है । यौगन्धरायण उससे पूछता क्या आपका अध्ययन समाप्त हो गया ब्रह्मचारी कहता है अभी नहीं। योगन्धरायण पुन: कहता है कि यदि अध्ययन समाप्त नहीं हुआ है तो आगमन का प्रयोजन क्या है ब्रह्मचारी कहता है कि वहाँ पर बड़ी भारी विपत्ति आ गई है। योग- बरायण पूछता है कि वैसी विपत्ति है ? इसपर ब्रह्मचारी कहता है कि वहा पर उदयन नाम के राजा रहते है और उनकी अवन्तिराज पुत्री वासव- १ । दत्ता अत्यन्त प्रिय पत्नी है । राजा है मृगार के लिए चले जाने पर गाँव में आग लग जान पर जल गई है। यौगन्धरायणः - अथ परिसमाप्ता विद्या ब्रह्मचारी योगन्धरायणः - यद्यानवमिता विशक्यिागमन प्रयोजना ब्रहमचारी तत्र सम्बतिदारुण व्यसन संवृत्त । योगन्धरायणः - क्यवि, ब्रहमचारी तत्रौदयनो नाम राजा प्रति वति । योगन्धरायणः अयते तवानुदयन: सि, तस्यामितराजपुत्री वासवदत्ता नाम पत्नीदृढ़यभिप्रेता 172 उपर्युक्त उत्रारणों से यह स्पष्ट हो जाता है कि नाटककार भास ने पात्रों के संवादों में विशेष दक्षता प्रदर्शित को है। संवाद प्रायः ल विस्तार वाले हैं। वाग्विस्तार का परिहार भास की महती विशेषता नाटक का कोई भी पात्र उतना हो बोलता है जितना आवयक है - पाठक या दर्शक को यह कहीं भी प्रतीत नहीं होता कि वातालाप का अमुक यह संवाद सर्वत्र विवक्षित भाव के धोतक है । -- अर्थ के प्रकाशन में कहीं कोई कमी दिखाई नहीं देती है। वार्तालापों के आश्य से हो सम्पूर्ण दृश्य को उपस्थित करने में नाटककार भास सफल रहे । वार्तालापों को सुनकर दर्शकों के लिए याद सभ्य विषय है तो भी उसका पूरा दृश्य सामने आ जाता । संवादों में भास की सरल तथा असमस्त भाषा ने श्रीवृद्धि की है। भास सरल शब्दावली के आचार्य है । यह बात HERPOTA नितान्त अपेक्षित है कि नाटक की भाषा को यथा-साध्य सरल तथा भाव व्यंजन में समर्थ होना चाहिए। तभी नाटक सार्ववर्णिक और सार्वजनिक हो सकता है। नाटक के दर्शक परिष्कृत और अपरिष्कृत दोनों प्रकार होते है। इसीलिए नाटककार का यह प्रधान कर्तव्य है कि वह भाषा को Im सरल तथा भावबोधन में समर्थ बनाये । जब इस दृष्टिसे हम विचार करत हैं तो भास एक सपाल नाटककार के रूप दिखाई देते है। वस्तुत: नाटक कार भास कि इतनी प्रसिद्धि का कारण उनकी प्रभावपूर्णल समासहित छोटे-छोटे संवाद है।। त मत पृष्ठ का फुटनोट: बोगन्धरायणः - भावव्या । लतस्तत: ततस्तनि मृगयानिकान्त राजनि ग्रामदाहेन सा दग्धा भास-नाटक-बक्रमबन्देव उपाध्याय, पृष्ठ 138 173 महामहोपाध्याय पंगणपति शास्त्री ने भास की वाक्य रचना की भरि-भीर प्रसा की है। उनका कथन है कि भास के नाटकों के वाक्य सुन्दर विचारों की सम्पत्ति से भरे हुए हैं, जिनकी अभिव्यक्ति बड़ी सुन्दरता के साथ हुई है, जिनकी कोई भी संस्कारवान व्यक्ति अत्यधिक प्रशंसा करेगा। अग्निदाह के पश्चात ब्रह्मचारी का संवाद कितना सरल और प्रसाद गुण-युक्त है । यथा ब्रहमचारी - तत: स राजा महीतलपरिसर्पणपा सुपाटलशरीरः सहसोत्याय 'हा वासवदत्ते ! हा अवन्तिराजपुत्रि ! हा प्रिय ! हा शिष्ये । इति किमपि विमपि बडु प्रलापवाव कि बहुना । इसके बाद वह ब्रह्मधारो कहता है कि इस समय उस राजा के समान न तो चावाद है और न ही अपनी प्रिय नारियों से अलग हुए दूसरे हो कोई व्यक्ति है। वह नारी धन्य है जिस उसका पति इतना अधिक प्रेम करतr इसमें कोई संदेह नहीं है कि अग्नि में जली हुई भी वह वासवदत्ता पति के अतिशय प्रेम के कारण न जनी हुई के समान है ।' स्वप्नवासवदत्ता के डिलीय बैंक में वासवदत्ता पदमावती से कहती है कि सखी यह तुम्हारी मैद है, इस पर पदमावती कहती है कि आर्य इस समय इतना ही न पर्याप्त है । उसपर वासवदत्ता बड़ी सुन्दरता के साथ कहती है कि सखी | बधिक देर तक बंद खेलने के कारण लालिमा HERE word । एक्रिटिकल स्टडी आफ भान, म०म० गणपति शास्त्री.पृष्ठ 27 2. वेदानीं लादकारचक्रवाकानेवारयन्ये स्त्रीवियुक्ताः। धन्या सा स्त्री या तथावत भत्ता भईलहाव साहिदम्बाप्यदच स्वप्नवासवदत्त 13, पृष्ठ 55.
से युक्त तुम्हारे दोनों हाथ अब शीघ्र ही पाणिग्रहण होने पर पराये हो जाव।। द्वितीय अंक में ही वहाँ आये हुए उदयन के रूप सौन्दर्य और अवस्था को देखकर मगधराज दर्शक पदमावती का वाग्दान कर देता है । बेटो तुरन्त प्रवेश करके अन्त:पुर में मंचित करती है कि देवी शीता के लिए हमारी महारानी कहती है कि बाज ही उत्तम रात्र है। इसलिए आज ही कंगन बोधने का मंगलाचार सम्पन्न हो जाना चाहिए । इस पर वासव- दत्ता अपने मन में कहती है कि यह जैसे-जैसे शीता कर रही है.वैस-वेस मेरा हृदय सूना होता जा रहा है 12 तृतीय अंक में नायिका वासवदत्ता के संवादों की चास्ता .. पदमावती वासवदत्त -- हला । पचते कन्दुकः । आर्ये । भवतु इदानीम् एतावत इला ! अतिचिरं कन्दुकन क्रीडित्वाधिकसंजातरागौ परिकीयावियले हस्तो संतो ! स्वप्नवासवदत्त बैंक-हितीय, पृष्ठ 70-71 24 घेटी त्वरती स्वरता तावदार्या । - अमेव कोतवमंगलं कर्तव्यमित्यस्मा दिटनी भात । आत्मगतम्,यथा यथा त्वरते तथा तथान्धीकरोति में हृदयम्। इनवासवदत्तम अंक-दितीय, पृष्ठ 81-82.
175 51 दार्शनीय है। एक ओर उदयन का पदमावती से विवाह होतr है,वहीं पर दूसरी ओर उपस्थित वासवदत्ता बहुत दु:खी होती है और कहती है कि मेरे पतिदेव पराप्रय हो गए हैं । वह कहती है कि चक्रवाक को वधू धन्य है जो एक दुसरे के विरह होने पर जीवित नहीं रहती है। मैं प्राण नहीं छोड़ रही हूँ। मैं आर्य पुत्र को देख रही है। इस मनोरथ से मन्द- भागिनी में जीवित हूँ। तभी बेटी शीघ्र प्रवेश कर वासवदत्ता से कहती है कि महारानी ने कहा है कि आप उन्चकुल में उत्पन्न हुई है, नह रखती है और निपुण है, इसलिए आप पद्मावती के लिए सुहाग की माला गये । इस पर वासवदत्त कहती है कि यह माला किसके लिए गॅयनी है, इस पर बेटी कहती है कि राजकुमारी पदमावती के लिए | वासवदत्ता इस पर दुःखी होती है । वासवदत्ता बेटी से पूछती है कि क्या तुमने दूल्हे को देखा है १ इसपर बेटी कहती है कि राजकुमारी के स्नेह और अपने कोतहल से उन्हें देख है । वासवदत्ता पूछती है कि दुल्हा केसा है, इस पर चेटी कहती है कि है देवी । मैं सत्य कहती है कि ऐसा दृल्हा मैने कभी नहीं देखा इसपर वासवदत्ता कहती है कि सखी बतलाओ क्या वह सबमुच इस पर बेटी कहती है कि वह दृल्हा धनुषा और बाण से रहित साक्षात् कामदेव है । 3-7RELETERESENIETY । 1. वासवदत्ता - कौनो जामाता, चेटी-बायें बार्ये । गामि तावद नदृशी दृष्टपूर्वः । हला भाभण कि दर्शनीयः टी-शय भणितुं शरवायहीनः कामदेव इति । स्वप्नवासवदत्ता बैंक-वतीय, पृष्ठ 88-89.
176 इस अनन्तर पंचम अंक में नायक वत्सराज उदयन का स्वप्न में वासवदत्ता के साथ संवाद अवलोकनीय । राजा सो रहा है और क्या में स्वप्न में कहता है कि है ! वासवदत्त । वही पर वासवदत्ता उपस्थित है। वह कहती है कि यह कार्यपुत्र हैं - पदमावती नहीं है । इनके रा देखी गई हूँ? आर्य योगन्धरायण की प्रतिज्ञा इस दर्शन से निष्फल हो जावेगी । राजा पुन: स्वप्न में कहता है हा अवन्ति-राजपुत्रि इस पर वासवदत्ता कहती है कि भाग्य से आर्यपुत्र सपना देख रहे है । यही पर कोई व्यक्ति नहीं है तब तक क्षणभर यहाँ ठहर कर अपनी बोखो और हृदय को संतुष्ट करती है। राजा पुन: सपने में कहता है- है प्रिय ! है शिष्ये ! मुझे उत्तर दो । वासवदत्ता कहती है कि है स्वामी । उत्तर देती है, उत्तर देती है। राजा कहता है कि क्या तुम रूष्ट हो गई हो? वासवदता कहती है कि नहीं-नहीम दुःसी हूँ । तब राजा पुनः पॉडता है कि तुमने गार क्यों नहीं किया है तब तासवदत्ता कहती है कि इसम बढ़कर दूसरा कारण हो सकता है क्या ? तब वासवदत्ता कहती है कि इससे बढ़कर दूसरा कारण हो सकता क्यr 9 इसके बाद वासवदत्तr शपया पर लटके हुए नायक के हाथ को शपया पर रखकर चल देती है । इसके बाद राजा का सपना टूट जाता है।' BATHROTHERO fh h ith . राजा -स्वमायती हा वासदले । वासवदत्ता-समोत्थाय ! आर्यपुत्रः न खलु पदमावती । किन्तु बनु दृष्टामि राजा - हा बसिराजपुत्रि! शिष्या स्वप्नायत खम्बार्यपुत्रः, मात्र कश्चिनः । यावन्तर्क स्थित्वा दृष्टि हृदयं च तोयानि । प्रिय ! प्रियशिष्ये । दैहि में प्रतिवचनय । शष अगले पृष्ठ पर...
177 नाटक के अन्त में, पदमाक्तो, वासवदत्ताऔर नायक उदयन के संवादों की चारुता और स्पष्टता अवलोकनीय है । यौगन्धरायण ने ब्राइमण के वा में वासवदत्ता को अपनी भीगनी के रूप में पद्मावती के पास न्यास की तरह रख दिया था। योगन्धरायण अपनीबहिन को लेने 4966 पदमावती के पास आता है । वहीं राजा उदयन भी है । पद्मावती अवन्तिका वासवदत्ता से कहती है आया इधर आय में लापको प्रिय समाचार सुनाती है। अवन्तिका कहती है क्या ! क्या ! पदमावती कहती है कि आपके भाई जाए है। तब अवन्तिका कहती है कि धन्य भाग्य, भाई अभी भी याद करते है। पदमावती उदयन के समीप जाकर कहती है कि सस वार्मपुत्र की जय हो । यह धरोहर है, तब राजा कहता कि पदमावती धरोहर लोहा दो। साक्षी के सामने धरोहर लौटानी चाहिए । पदमावती यौगन्धरायण से कहती है कि आप अपनी बहन को ALSEXSIPHOTE ले जाये। वहाँ पर उपस्थित धात्री पहचान कर कहती है कि यह तो राजकुमारी वासवदत्ता है । राजा लो बहुत आरक्षर्य होता है कि क्या यह महालेन की पुत्री वासवदता है। उन्हें पदमावती के अन्दर भजा ब्राहमण उपस्थित योगन्धरायण कहता है कि नहीं, नहीं, इन्हें भीतर नहीं जाना चाहिए । यह सचमुच मेरी बहिन है । राजा उसके धुघट हटाने का आदेश देता है और फिर सम्पूर्ण भेद खुल जाता है । पिछले पृष्ठ का शेष- बालपामि भत: आलपामि । कुपितालि। नहि भी दुःवितामि। नवासवदत्ता बैंक-5. पृष्ठ170-171.
178 योगन्धरायण और वासवदत्ता एक साथ राजा की जय-जयकार करते इस प्रकार स्पष्ट है कि नाटककार भास ने पात्रों के संवादों में विशेष दक्षता प्रदर्शित की है। उनके संवाद अत्यन्त लघु और मार्मिक है। संवादों में कहीं वाणी का विस्तार प्राप्त नहीं होता है । प्रत्येक पात्र बआवयकता के अनुरुप की बोलता है। उनके संवाद सम्पूर्ण भाव को प्रस्फ- टित करने में समर्थ है। संवादों में भाग की सरल शब्दावली प्रशंसनीय है। इसीलिए सचमुच यह नाटक भारतीय रंगमंच में अभिनय के लिए सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। संवाद योजना की दृष्टि से जब हम तापसवत्सराज नाटक का अनुशीलन करते है तो विदित होता है कि स्वप्नवासवदत्ता नाटक की तुलना में इसके संवाद और पट लम्बे-लम्ले दीर्घ, बहु-विस्तारी और विष्ट इस नाटक में स्वगत भाजण इतने बम्ब है कि वक्ता अकेले ही सम्पूर्ण क्या को ह जाता है। नाटक का यह दोष आदि से अन्त तक सर्वत्र - पाया जाता है । इसी प्रकार तृतीय अंत में लापकायन तथा उसके शिष्य .. पदमावती - एत्वेत्वार्य। प्रिय ते निवदयामि । बावन्तिका- विकिमी पदमावती - माता ले आगतः । अवन्तिका - दिष्ट्येदानीमपि स्मरति । पदमावती - जयत्वार्यपुत्रः एष न्यासः । नियात्य पदमावति । सामिन्न्यासो नियातयितत्य: इशत्र भवान रैम्य: । अत्र भवती चाधिकरण भविष्यतः पदमावती- आर्य नीयतामिदानीमा । धात्री बम्मों। मतदारका वासवदत्ता ! स्वप्नवासवदत्तय अंक-6, पृष्ठ 226-227.
179 माणवक के संवाद बहुत लम्बे हैं। जिससे क्या का वेग मन्द होता दुवा दिखाई देता है । यहीं पर पदमावती औरवासवदत्ता के संवाद भी लम्बे लम्ब है जिनमें कथा के प्रवाह भयिनिता दिखाई देती है । इसी प्रकार पंचम अंक में राजा और विदूषक के संवादों को देखने से प्रतीत है कि हम जैसे किसी भी स्थान पर बैठकर कोई कथा ही सुन रहे हो । इसी नाटक के पंचम बैंक में कुंजरक के द्वारा प्रस्तुत युद्ध वर्णन अत्यन्त विस्तृत है । हम कथा के श्रोता के समान उस युद्ध का वर्णन मात्र सुनते रहते है। रंगमंच पर एक ही व्यक्ति के नारा लम्ब-लम्बे वर्णनों को प्रस्तुत करना नाटक को दृष्टि उचित नहीं है किन्तु तापसवत्सराज में ऐसे अनेक स्थान है जो एक नाटक के लिए उपयुक्त नहीं है । सम्पूर्ण पंचम और तीय अंक एक ही दृश्य में समाप्त हो जाते हैं। नाटककार इसम परि- वर्तन कर सकता था | जरक के युद्ध वर्णन में क्लिष्ट समरूल ली में घटित लम्बे-लम्बे संवाद नाटकीय शैली के लिए उचित नहीं कहे जा सकते हैं।' LEARHHORTAL for M प्रश्न बैंक के प्रारम्भ में ही शिष्य का एक लम्बा संवाद है बोर लम्बे - लम्बे श्लोक प्राप्त होते है जिन काव्यात्मकता तो अधिक है लेकिन मंचन हे लिए यह सफल नाटक प्रतीत नहीं होता है । इसी प्रकार तीय बैंक में अग्निदाह के वर्णन में कवि ने बड़े-बड़े श्लोकों के रूप में 29 .. कुंजरक: तत: संमुख - कुन्त-प्रहाराउभारो-पस्त-सुभट-प्रतिनियन्त्रित- प्रतिभट वीक्ष्य-बगाडकर्षण-दर-पाणि-चलन-विहवन-योध- प्रहीरोधातपरकाबला तापसवत्सराजमअंक-5, पृष्ठ 170-171.
संवादों का गठन क्यिा है औरवातालाप भी बहुविस्तारी है । तृतीय अंक जोर चतुर्थ अंक में भी नाटककार ने संवाद-योजना में बहुविस्तार का प्रदर्शन क्या है। । पंचम अंक में तो कुलरक का युद्ध वर्णन कादम्बरी के गद्य साड की तरह प्रतीत होता है । छठे अंक में यद्यपि संवाद छोटे-छोटे है किन्तु कुल मिलाकर स्वप्नवासवदत्ता को तुलना में इस नाटक की सवाद योजना अत्यधिक विस्तृत है जिससे इसकी नाटकीयता में न्यूनता आ गई है । यह कहना न होगा कि संवाद-योजना की दृष्टि से विचार करने पर तापस वत्सराजम का महत्व रंगमंच के लिए बहुत ही न्यून रह जाता है । किन्तु इसकी सफलता का एक रूप यह भी है, जिनके आधार पर प्राचीन आवायों * ने इसको इतना महत्त्व प्रदान किया है कि उन्होंने अपने लग-ग्रन्थों में नाटक के विभिन्न अंगों के उदाहरणों के रूप में इसके विभिन्न स्थलों और प्रसंगों को उद्धृत किया है । अभिनवगुप्त, आनन्दवर्धन और भोजदेव आदि गायों ने रस.भावनि और अलंकार इत्यादि के परिपोण के लिए इस नाटक के अनेकानेक पद्यों और प्रसंगों को उध्दत क्यिा है । जिससे इसके शास्त्रीय पा का महत्व बढ़ जाता है । भारतीय नाट्य-परम्परा में अभिनय की अपेक्षा रत का अधिक महत्व माना जाता है । इसीलिए नाटककारों का ध्यान रंगमंच की अपेक्षा रस परिपाक की ओर अधिक रहाहै । इस दृष्टि से विचार करने पर स्पष्ट हो जाता है कि तापसवत्सराजम् एक सफलनाट्य- कृति है । यद्यपि मंचन को दृष्टि से स्वप्नवासवदत्ता की तुलना में तापस । वत्सराजम का महत्व न्यून प्रतीत होता है । 0000000 00000 नहि-रसादत करिषदर्भ: प्रवर्तीत-भरत-नाशास्त्र.15
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العالم
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अध्याय
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181 - रसनिष्पत्ति: के पठन, नाटक में रस का महत्वपूर्ण स्थान है । रस संचार के बिना कोई भी प्रयोजन सिद्ध नहीं होता है, अत: स-निष्पत्ति संस्कृत नाटककारों का मुख्य लय होता है । दरारूपककार धनिक धनंजय ने इसीलिए नाटक को रसों पर आश्रित माना है ।' रस एक प्रकार का विशेष आनन्द है,जो काव्य श्रवण अथवा नाटक के अभिनय देखने से सामाजिक को प्राप्त होता है। रस-निष्पत्ति के सम्बन्ध में आचार्य भरतमुनि का प्रसिद्ध रस-भूत्र है - "विभावानुभावब्यभिवारियोगदसनिष्पत्ति:' अर्थात् विभाव, अनुभाव तथा व्यभिचार भावों के संयोग से रस की निष्पत्ति होती है । यह रस केवल शास्त्रीय वस्तु ही नहीं है प्रत्युत व्यावहारिक अनुभवगम्य वस्तु | नाट्य- शास्त्र में इसे स्पष्ट करते हुए कहा गया है जिस प्रकार अनक व्यंजनों, है औषधियों और द्रव्यों से युक्त होने पर भोजी भोजन में एक विशेष स्वाद का अनुभव करते है। उसी प्रकार रसिक जन अनेक भावों के अनुभव से युक्त स्थायी भावों का बास्वादन करते हैं। यही नाटकों की रसानुभति है माना भावों से संयुक्त होने पर स्थायी भाव अपने सामान्य नहीं, वरन विशेष मानसिक आनन्द को प्रदान करते है। इस प्रसंग में एक बात ध्यान करने की यह है कि जिस प्रकार अनेक व्यंजनों से युक्त भोजन का पूर्ण आनन्द --- नहि रमादबदते करदर्थः प्रवर्तत भात, नाट्यशास्त्र5.15 दलायम - शापक IT.पृष्ठ 4 182 पाने के लिए भय और स्वाद शिष आवश्यक है, उसी प्रकार रसानुभूति की पूर्णता के लिए सहदयता, विदनशील संस्कारों और विवेक की आक्यकता रहती है । रस सत्र में विभाव, अनुभाव और संचारी-भाव का उल्लेख क्यिा गया है। तदनुसार विशेष रूप से जो भावों को प्रकट करते हैं, वे विभाव कह जाते है। विभाव रसानुभूति के कारण है। वे दो प्रकार के होते है- है। आलम्बन विभाव, 28 उद्दीपन विभाव । जिसको आलम्कन* करके रन की उत्पत्ति होती है, उसको पालम्बन विभाव कहते ! लिए वासवदत्ता को देखकर उदयन के मन में, और उदयन को देखकर वासवदत्ता के मन में रति की उत्पति होती है और उन दोनों को देखकर सामाजिक के भीतर रस की आंभब्यात होती है । इसीलिए वासवदत्तr और उदयन आदि श्रृंगार रस आलम्बन-विभाग' कहे जाते है। चादनी, उद्यान और एकान्त स्थान इत्यादि के द्वारा उस रात का उद्दीपन' होता है, इसलिए इनको श्रृंगाररस का उद्दीपन विभाग' कहा जाता है।' - अनुभाव : अपने अपने बालम्बन अथवा उददीपन कारणों से,वासवदत्ता जोर उदयन आदि के भीतर उदबुद्धरति आदि स्थायीभाव को बाइय रूप में जो प्रकाशित करता है,वह रति आदि का कार्य रूप काव्य और नाटक में 'अनुभाव' के नाम से जाना जाता है। दूसरे शब्दों में कह सकते है कि हृदय में स्थित भावी को प्रकट करने वाले अंग विकार और विन्न प्रकार Hom- काव्य-प्रकाश 27-28, पृष्ठ 5 की शारीरिक चेष्टाए इत्यादि अनुभाव है।' भरत मुनि के अनुसार जो वाचिक या आगिक अभिनय के दारा ति इत्यादि स्थायी भाव की आन्तरिक अभिव्यक्ति रूप अर्थ का बाह्य रूप में अनुभव कराता है, उसे *अनुभाव' कहते है 12 भरतमुनि के नादयशास्त्र के अनुसार अनुभावों का विशेष उपयोग अनुभव को दृष्टि से हो होता है, किसी रत को बाह्य अभिव्यक्ति के लिए अलग-अलग बभिनय शैली का अवलम्बन दिया जाता है । रस को प्रकाशित करने वाले स्मित आदि बाध्य व्यापार 'अनुभाव' कहलाते हैं, और यह प्रत्येक रस में अलग-अलग होते हैं और अनुकार्य की दृष्टि । भी वे उसकी रसानुभूति से बाहय प्रदर्शक होते । भरतमुनि के द्वारा अनुभावो, का यह जो विशेष रूप से अभिनय में प्रयोग दिखलायr गया है, उससे प्रतीत होता है कि अनुभाव वस्तुत: आन्तरिक रसानुभूति की बाह्य अभिव्यंजना के साधन है और उनमें शारीरिक व्यापार को प्रधानता रहती है । । कृत्रिम रूप से इन अनुभावों' का अभिनय करता है परन्तु अनुकार्य उदयन वासवदत्ता आदि की हृदय में स्थित रसानुभति की बाह्य अभिव्यक्ति इन साधनों के द्वारा होती है । अनु पश्चाद् भवन्ति । इति 'अनुभावा: । अर्थात् ये 'अनुभाव' रसानुभूति के बाद में होते है, रसानुभूति के कार्य होते 1. उद्दं कारणः स्वभाव प्रकारायच । लोके यः कार्यकप: सौडनुभाव: काव्यनाट्ययो:।। साहित्य दर्पण बागडभिनयना यशस्वॉडभाव्यते । शाखागोमाग संयुक्तस्त्वभावस्ततः स्मृतः ॥ नाट्यशास्त्र 7.5 184 हैं। इसी लए इन्हें अनुभाव' कहा जाता । दूसरे शब्दों में अनुकार्य उदयन-वासवदत्ता आदि लो रसानुभूति का अनुभव या अनुमान सामाजिको' को कराते है। इसलिए 'अनुभाव' कहलाते है । 'अनुभावों की कोई निश्चित संख्या नहीं है, परन्तु आठ अनुभाव जो सहज है और सात्विक विकारों के रूप में आते हैं, सात्विक भाव केले जाते हैं, ये अनायास महज रूप से प्रक्ट होते हैं। आठ सात्विक अनुभावो निम्नवत है स्तम्भ, स्त्रद, रोमांच, वितर्णता, कम्प, अश्रु, स्वरभंग और मुठी आदि ! स्थायी भाव को प्रकट करने के लिए रोमाचित होना, मुस्कराना. पास खड़े होकर देखना, स्तम्भत बडीत हो जाना आदि 'अनुभाव' के अन्तर्गत है - व्यभिवरभाव: इन्हें संवारी भाव भी कहते है। उदद्ध हुए स्थायी भावों की पुष्टि तथा उपन्य जो उनके सहकारी होते है, उनको व्यभिचारी- भाव' यrriarरी भाव एक व्यभिचारी-भाव विसी स्थायी भाव या रस के साथ ही नहीं रहता है, तरन अनेक रसों में देखा जा सकता है। यही इसका व्यभिवार है। उदाहरण के लिए शंका वियोगगार होती है, सण में भी और भयानक में भी होती है । एक संचारी भाव का कोई एक स्थायी भाव या रस से सम्बन्ध नहीं, ते रसी में मानारूप विवरण करते है और रसों को पुष्टकर बास्वाद के योग्य बनाते हैं, इसलिए उन्हें 'व्यभिचारी-भाव' कहते नाट्य-शास्त्र के अनुसार व्यभिचारी भाव की संख्या 33 है । ये निर्वेद, ग्लानि, शंका, अस्था, मद, श्रम, बालस्य, दीनता, चिन्ता, मोह, स्मृति जोर पति इत्यादि 33 प्रकार के है।।
185 स्थायी-भाव : स्थायी-भाव रसानुभात का आन्तरिक और मुख्य कारणहैं । स्थायी-भाव मन के भीतर स्थिर रूप से रहने वाला प्रसुप्त संस्कार है जो अनुकूल, बालम्बन तथा उद्दीपन रूप उदबोधक सामग्री को प्राप्त कर अभिव्यक्त हो उठता है और हृदय में एक अपूर्व आनन्द का संचार कर देता है । इस *स्थायीभाव' की अभिव्यक्ति ही रसास्वादजनक या रस्थमान होने से रस शब्द से बोध्य होती है ।' दूसरे शब्दो में कह सकते है कि विभाव, अनुभाव तथा व्यभिवारि भावो के संयोग से व्यक्त होने वाले स्थायी भाव को रस कहते है। काव्य प्रकाशकार ने नाटक में नवरस मोन है और उनके नवस्थायी भाव बतलाये है जो निम्नवत है ति, हास्थ, शोक, क्रोध, उत्साह, भय, जुगुप्ता, विस्मय और निर्वेद । तदनुसार नाटक में गार, हास्य, करूण, रोद्र, वीर, भयानक, वीभत्स, अदभुत और शान्त यै नव रस माने गये है। उक्त नव स्थायी भाव अनुष्य के हृदय में स्थायी रूप से सदा विद्यमान रहते है, इसीलिए स्थायीभाव कहलाते हैं । । सामान्य रूप से व अव्यक्त अवस्था में रहते है, किन्तु जब जिम स्थायी भाव के अनुकूल विभावदि सामग्री प्राप्त हो जाती है, तब वह व्यक्त हो जाता है और रस्थमान या आस्वादयim मान होकर रसरूपता को प्राप्त हो जाती है । -- . व्यक्तः स तेर्विभावाचः स्थायी भावी रसः स्मृतः । काव्यप्रकारा4.28, पृष्ठ 5 प्रकाराव-मानमण्डल,वाराणसी-1960. 2. काव्य-प्रकारा। 30 -3" काव्यशास्त्र : डॉ०भगीरथ निक, कट संस्करण 1980, पृष्ठ-106 186 स्वप्नवासवदत्तम् में रस : - प्रसिद्ध नाटककार भास के प्रख्यात नाटक स्वप्नवासवदत्त में -- रस का परिपाक अत्यन्त स्वाभाविक रूप से हुआ है । भरतमुनि के रस सिद्धान्त का उन्होन अत्यन्त निपुणता के साथ अनुपालन किया है । भारतीय टको' की परम्परा रही है कि नाटकों में अंगार अथवा वीर-रस,प्रधान होता है और अन्य रस उनके सहायक होते है । इस प्रकार हम देखते है M कि स्वप्नवासवदत्त नाटकम में श्रृंगार रस की प्रधानता है । श्रृंगार रस दो प्रकार का होता है । संयोग श्रृंगार और विप्रलम्भ श्रृंगार , स्वप्न- वासवदत्ता नाटकम का प्रारंभ ही विप्रलम्भ श्रृंगार से होता । बैंक से लेकर छठे अंक के प्रारम्भ तक हमें केवल विप्रलम्भ श्रृंगार के दर्शन होते है। ॐ अंक के अन्त में नायक-नायिका मिलन के पश्चात सयोग गार का प्रसंग उपस्थित होता है किन्तु तब तक नाटक की समाप्ति हो जाती है । पदमावती का उदयन के साथ विवाह भो वासवदत्ता के विप्रलम्भ । की अभिव्यक्ति का माध्यम है। अत: हम कह सकते है कि सम्पूर्ण नाटक में विप्रलम्भ भंगार का सौन्दर्य अनुभव किया जा सकता है । नाटककार भास विरचित स्वप्नवासवदत्त नाटक में विलम्भ गार की, सम्पूर्ण चारुता के साथ निष्पत्ति हुई है। चतुर्थ अंक का प्रसंग है कि पदमावती का उदयन से विवाह हो जाता है। है। वहाँ पर महारानी वासवदत्ता योगन्धरायण की भगिनी के रूप में रह रही है। दोनों में w -- । एको रतौडगी वर्तव्यो वीरः गार एवं वा । अंगमन्यै रमा: सर्वे यानिर्वक्षणोऊ-दुतम दरम्पक 3-33, संस्करण- 1967. पृष्ठ 160. ॥
187
वीणा सीखने के सम्बन्ध में वर्तालाप होता है : पदमावती कहती है कि
मैने भी उनसे वीणा सीखने के लिए निवेदन किया था,किन्तु वे बिना कुछ
को ही लम्बी सास लेकर चुप रह गए ।' वासवदत्ता उससे पूछती है कि
इससे तुम्हारा क्या अनुमान है, तब वह कहती है कि मेरा अनुमान है कि
बार्या वासवदत्ता के गुणों का स्मरण करके उदारता के कारण वे मेरे सामने
SAR
नहीं रुक सके।
इस पर वासवदत्ता अपने मन में कहती है कि यदि यह
।
सत्य है तो मैं सचमुच कृतज्ञ हो गई है। इसके पश्चात वहा पर
विदुषक के साथ प्रदेश करता है । राजा विदृषक से कहता है कि उस समय
उज्जयिनी पर मालव राजकुमारी वासवदत्ता को इच्छानुसार देखकर किसी
विचित्र अवस्था को प्राप्त हुए, मुझ पर कामदेव ने अपने पाचो बाण गिरा
दिए थे । उनले अब भी मेरा हृदय पीड़ित है फिरभी पुन: कामदेव ने हमें
अपने बाण से वेध दिया है । जब कामदेव के पाच ही बाण है तो पदमा-
बती का उदेश्य लेकर यह छठा बाण उसने कहा फका है।
यथा
"कामनोज्जयिनी गतमयि तदा कामध्यवस्थागत
दृष्ट्वा स्वरमवन्तिराजतनया पंचवः पतिता:
तरचापि सामव हृदय भयच विडा क्य
पचर्मदनो यदा क्यायपाठ: शरः पातित: ॥
॥2
उपर्युक्त पद्य के दो पंक्तियों में वासवदत्ता और उदयन बालम्बन विभाव है।
1. पद्मावती - बणित्वा विचिद दीर्थ नि:श्वस्य तृष्णीकः संवत्तः ।
स्वप्नवासवदत्त बैंक-बार.पुण्ठ 106
मान
MishreEAMERSONA 18S वासवदत्ता के सुन्दर रूप का दर्शन उद्दीपन विभाव है। प्रिया के संयोग न होने से उत्पन्न चिन्ता अनुभाव है और रति वियोग श्रृंगार का स्थायी भाव है। वियोग श्रृंगार की यही स्थिति नायल का नायिका के प्रति पूर्व राग हे । अन्त की दो पक्तियों में उदयन की दूसरी पत्नीपदमावती और उदयन आलम्बन विभाव हैं और प्रियतम के संयोग न होने से उत्पन्न अनुराग की तीव्रता और तत्सम्बन्धिनी चिन्ता अनुभाव है और सुन्दर 1 बगीचा तथा एकान्त स्थान उददीपन विभाव है। यहाँ पर इनसे पुष्ट । स्थायी भाव रति विप्रलम्भ श्रृंगार रस के रूप में प्रक्ट हो रहा है । जहाँ पर ति स्थायी-भाव स्वप्न,चित्र, प्रत्या और श्रवण आदि से प्रकट होता है, परन्तु प्रिय से संयोग न होने के कारणोर भी तीत होता रहता है अथवा मिलन के बाद फिर वियोग के अवसर पर मान, प्रवास आदि के समय विभिन्न दशाओं में प्रकट होता है, वहीं पर विप्रलम्भ श्रृंगार होता है। । इसकी स्थितियां या रूप है - पूर्वराग, मान और प्रवास इत्यादि। विप्रलम्भ श्रृंगार का दूसरा उदाहरण भी दर्शनीय है । के छठे बैंक का प्रसंग है । वत्सराज उदयन इस समय सामु राजमहल में है, वही पर वासवदत्ता की वीणा घोषवती का स्वर उन्हें सुनाई देता है । उन घोषवती वीणा दी जाती है, उससे उन्हें महारानी वासवदत्ता का स्मरण हो जाता है। राजा घोषवती वीणा को सम्बोधित करते हुए कहत है कि हे कानो को सुपं देने वाली स्वरवाली वीणा ! तुम तो महारानी वासवदत्ता के दोनों स्तनों और जीवों पर सोती थी. फिर पक्षियों के समुह की बाही भरे हुए उन्हें बानी होकर भयंकर जंगल में किस प्रकार
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-
रही हो ।'
यहाँ पर वासवदत्ता और उदयन आलम्बन विभाव घोषवती,
वीणा की प्राप्ति उद्दीपन विभाव, वीणा दर्शन से उत्पन्न शोक और चिन्तन
अनुभाव, दीनताब्बाभिवारिभाव इनसे पुष्टि स्थायी भाव रति विप्रलम्भ
अंगार के रूप में प्रकट हो रहा है ।
महारानी वासवदत्ता के वियोग में उदयन की भाव शलता
का यह चित्र दर्शनीय है -
अहमवजित: पूर्व तावर अत: सह लालितो
दृढमपहना कन्या भूयो म्यान दलिता ।
निधनममपि च श्रुत्वा तस्यास्तव मयि स्वता
ननु यचितान्यता प्राप्तुंनषोउन हि कारण ॥2
अर्थात उदयन का कथन है कि पहले मैं जीत जाने पर भी महाराज प्रधोत
के द्वारा अपने पुत्रों के साथ समान भाव पाला गयr | फिरभी में उनकी
पुत्री वासवदत्ता को अनपूर्वक अपने साथ भगा ले आया,पर उसको मैं मा
नहीं कर सका । उसकी मृत्यु की बात सुनकर भी महासन प्रद्योत जुझ पर
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पहले की भौति ममता और मह रखते है।
यह निश्चित है कि मेने जो
न्याययुक्त वत्सराज्य को पुनः प्राप्त कर सका है, उसमें राजा प्रद्योत ही
कारण है। प्रस्तुत पद्य में चार या पाच प्रकार के भावों का उदय हुबा है.
1. राजा -तिसुखनिनदे ! क न देव्या: स्तनयुगल सधनस्थल च सुप्ता ।
विमल-जीविकीनाडा,प्रतिम्मामध्य-मिताडस्थरण्यवासम् ।।
१. स्वप्नवासवदत्त 68. पृष्ठ 208.
190 इसलिए यह भाव शबलता का उदाहरण है । जहाँ पर दो से अधिक भावों का योग होता है । वहीं भाव शबनता मानी जाती । प्रस्तुत उदाहरण - में वितर्क, दीनता, चिन्ता, स्मरण आदि चार प्रकार केव्यभिचारिभावों का योग होने से भावो की शबलता दर्शनीय है ।। वासवदत्ता आत्रित विप्रलम्भश्रृंगार का एक अन्य गधात्मक उदाहरण भी दर्शनीय है नाटक के तृतीय अंक का प्रसंग है । वासवदत्ता कहती है कि विवाह के आमोद-प्रमोद से परिपूर्ण निवास के चौसाले में पदमावती को छोड़कर मै यहाँ क्रीडोधान में चलो बाथी हुँ । अभी दुर्भाग्य से उपस्थित दुःख को तब तक कुछ शान्त करती है । बड़े दु:ख के साथ कहना पड़ रहा है कि आज आर्यपुत्र भी पराये हो गए है । वह आगे कहती है कि निःसन्देय चक्रवाक को वधू चक्रबाकी धन्य है जो एक दूसरे में अलग होकर नहीं जीती है। में तो ऐसी स्थिति में प्राण भी नहीं छोड़ सहत हूँ। आर्य पुत्र को देखेंगी । इसी आशा और अभिलाषा ये में अभागिनी अभी तक जी रही हूँ। प्रस्तुत कधन में वासवदत्ता आश्रित विप्रलम्भ श्रृंगार की पूर्णतया निपत्ति हुई । नायिका वासवदत्ता के मन में आर्यपुत्रीपि परकीयः संवृत्त: ' अर्थाव मेरे पतिदेव अब दूसरों के हो गये है। इस कथन से विप्रलम्भ अंगार की तीव्रता ध्वनित होती है । स्वप्नवासवदत्त नाटक के पंचम अंक में करुणरसrभास के अंगभूत संयोगगार की मनोरम अभिव्यक्ति हुई है | राजा निद्रा से पीड़ित है .. भावस्य शान्तादयः सन्धि: शबलता तथा । काव्यप्रकाश 4.36.जान मण्डन प्रकाशन 1960.पृष्ठ 143. 2. वासवदत्ता कार्यपत्र पायामीति यौन मनोरचन जीवामि मन्दभामा । स्वप्नवासवदत्ता बतीय प्रम माश, पृष्ठ 3 21 और विदुना से पूर्वकथा तुनाने को कहता है कथा भुनाने के प्रसंग में वह उज्जयिनी का नाम लेता है, राजा को तब वासवदत्ता का स्मरण हो जाना है और वह कहता है कि उज्जयिनी से चलने के समय अपने परिवार वालों का स्मरण करती हुई और लेह के कारण निकले हुए एवं औखों की कोर में लगे हुए आसुवों को मेरे पर गिरातो हुई अन्ति-राजकुमारी वासवदत्ता की में याद कर रहा हूँ।' यथा इसी नाटक के पंचम अंक में शान्त रस का एक मनोरम उदाहरण है जो निम्नवत् है - पदमावती शिरोवदना से व्यथित है, राज उसके पास जा रहा है और कहता है - कि रूपसम्पत्ति तथा गुणों से युक्त प्यारी दूसरी पत्नो पदमावती को प्राप्त करके पहली शेट से दुःखो हुए भी मेरा शोक अब कुछ कम सा हो गया ,किन्तु भुक्तभोगी होने के कारण पदमावती को भी उसी तरह अर्थाद वासवदत्ता के समान मर जाने वाली समझ रहा है । या रूपश्यिा समुदिता गुणताच युक्ताल वा प्रिया समतुमन्दरवाध शोकः। पूर्वाभिवातसम्जोडप्यनुस्तदुःख: पदमावतीमपि तव समर्थयामि प्रस्तुत पद्य में निर्वेद स्थायी भाव वासवदत्ता और उदयन बालम्बन विभाव, पूर्वाभिधात उद्दीपन विभाग से परिपूष्टि शान्तरस की अभिव्यक्ति हो रही है । इसी प्रकार स्वप्नवासवदत्तम् के अनेक स्थलों पर विप्रलम्भ गार और करुण रस की मनोरम निपत्ति हुई है। विस्तार भव से स्मराम्यवन्त्याधिपत: सुलाया: प्रस्थानकाले स्वजनंस्मरन्त्याः । वाप प्रवृत्त नयनातलग्न स्नेहान्योरसि पातत्या: ॥ स्वप्नवासवदत्त...पुष्ठ 16.
192
SA
अन्य उदाहरण अपेक्षित नहीं है ।
कविवर जयदेव ने भास को कविताकामिनी का हास हा
है ।। इससे स्पष्ट है कि जयदेव को भास के नाटकों के हास्य प्रशंसनीय
लगे थे। भात के नाटकों में हास्य रस के प्रचुर उदाहरण मिलते है ।
स्वप्नवासवदत्ता में विदूषक कहता है कि कोकिला के अधिपरिवर्तन की
भाति उसका पट उलट-पलट हो गया है 12
भास के अन्य नाटकों में श्रृंगार हास्य रस के अतिरिक्त करूण,
रौद्र, वीर,भयानक, अदभूत, शान्त आदि रसो का सुन्दर परिपाक हुआ है,
इससे स्पष्ट है कि भास एक रससिद्ध कवि और नाटककार है, जिनके काव्य
में जरा और मृत्यु का भय नहीं है।'
तापसवत्सराज में रस:
इस काव्य की आत्मा है ।
कोई भी काव्य चाहे वह श्रव्य
हो या दृश्य, रीति, गुण और अलंकारों के होते हुए भी यदि उसमें रस
नहीं है तो वह काव्य कहलाने का अधिकारी नहीं है । आचार्य भरत का
तो यह कहना है कि रस के बिना कोई भी काव्यप्रवृत्त नहीं हो सकता
"माह रमाइत करि चदर्थः प्रवर्तत । अनेक काव्य शास्त्रकारों का अभि-
---
..
2.
भातोशुस: कविकुलगुरु : कालिदासोविलास: । जयदेव प्रसनराधवम् 1.22
संस्कृत साहित्य का इतिहास-बल्देव उपाध्याय, पृष्ठ 500
अधन्यस्य मम कोकिलाना अनिवरिवर्तइव क्षिपरिवर्त:सवृत्तः ।
स्वप्नवासवदत्ता बक-04.पष्ठ 99
धन्यात सुकृतिनः रमसिदाः कवीश्वराः ।
येणी नास्ति या: काय जरामाणभवम् ।
उटसागर, पृष्ठ 1033
3.
193 681 मत है कि रस ही काब्य का जीवन है । -"रलएवारजीवित भारतीय काव्य-१ की परम्परा के अनुसार काव्य में श्रृंगार अथवा वीर रस की प्रधानता होती है ।' तथा अन्य रस गौण होते है किन्तु भवभूति ने इस परम्परा को नहीं माना था । उनकी मान्यता थी कि जीवन में करुण रस की ही प्रधानता है । जैस पानी में भवर, बुलडुले, बॅद और लहर आदि में जल का ही रूपान्तरण है, जल अतिरिक्त इनकी पृथक् सत्ता नहीं है, केर ही मानव जीवन का प्रमुख रस करुण रस है जो भिन्न-भिन्न अवसरों पर विभिन्न कारणों से विभिन्न रसो का रूप ग्रहण करता है 2 काव्यशास्त्र के समीक्षकों ने श्रृंगार को भले ही 'रसराज' कहा - हो.किन्तु भवभूति के अनुसार करुण रस रसराज' ही नहीं बल्कि एकमात्र रस है । इसके लिए उन्हें समालोचकों की खरीखोटी भी सुननी पड़ी और डाप्रय जनता का भी बहुत कुछ अनादर सहना पड़ा,किन्तु काण रस के उता भवति ने कभी धर्थ नहीं छोड़ा और उन्होंन अपने नाटक उत्तर रामचरितम् में करुण रस को ही प्रधान रस के रूप में चित्रित किया है। - M -- - 1. एको रसोउंगी कर्तव्यो वीरः गार एव बा अंगमन्ये रसा: सर्वे कुर्यान्निर्वहणे दुतम् दरारूपक 3.33.पष्ठ 167. १. "एको रस: वाण एव निमित्तभदाद-भिन्नःपथक पुगिवायत विवान । बावर्त-बदतरंगमया विकारान,अम्भो.यथा सलिनमेव हि तत्समग्रम्॥ उत्तर-रामचरितम 3.47.महालकमी प्रकाशन, पृष्ठ ।।। प्रोमरस्वती प्रसाद चतुर्वेदी, संस्करण-19.पष्ठ 127.
यहाँ यह प्रतीत होता है कि तापसवत्सराजा नाटक के प्रणेता कविवर श्री अनंग हर्ष ने उत्तररामचरितम नाटक के प्रणेता कविवर 10 भवभूति से प्रेरणा ग्रहण को है और उन्होन एक बार पुनः करुण रत को प्रमुप कप में अपने नाटक में चित्रित करने का प्रयास किया है। रस ही नहीं अपितु भावाभिव्यक्ति को दृष्टि से भी इसनेकविवर भवभूति का बहुत प्रभाव प्रतीत होता है । तापसवत्सराज नाटक के अनुशीलन से विदित होता है कि रस परिपाक की दृष्टि से करुण-रस के चित्रण के अपने प्रयास में उन्हें पर्याप्त सफलता प्राप्त हुई है । सम्पूर्ण नाटक में अचोपान्त करुण को उन्होंन बड़ी सुन्दरता के साथ चित्रित किया है । प्रथम अंक से लेकर छठे अंक तक करुण रस की धारा प्रवाहमान है । प्रसिद्ध काव्यशास्त्री आचार्य हेमचन्द्र का स्थान है कि तापसवत्सराज एक ऐसा नाटक है कि जिसमें प्रधान करुण रस की धारा कहीं टूटने नहीं पाई है ।' तापसवत्सराज के प्रथम अंक से ही वरुण-रस का शुभारम्भ हो जाता है। नायक वत्सराज उदयन कहता है कि नायिका वासवदत्ता के मुखचन्द्र को देखकर सम्पूर्ण दिवस बिताया है । उसके साथ वार्तालाप करते हुए प्रदोषकाल भी बिता दिया है । । इसके पहले विनोद और आनन्द से युक्त उसके साथ रहते हुए सुन्दर रात्रिया व्यतीत की है, पर इतना होने पर भी अब भी रास्ते को और आये गढ़ाये हुए उसको देखने के लिए तत्पर मेरा मन इतना क्यों व्याकुल हो रहा है ? अथवा प्रेम का उत्सव कभी समाप्त नहीं होता है। यथा सदृक्वेन्दविलीन दिवसो गीत: प्रदोषस्तया तहगोच्छयेवनि विनोदमहिला याता: पुरानन्ददाः । 1. काव्यानातन : हेमचन्द्र, ध्याय-3.
195
ता संप्रत्यपि मार्गदत्तनयना द्रष्टु प्रवृत्तस्य में
बढोकामिदं मनः किमथवा प्रेमासमाप्तोत्सवः ।।
।
नाटक का Pतीय बैंक करुण रस की धारा से गीला हो गया है । महा-
रानी वासवदत्ता के दाह का समाचार सुनकर राजा जिम विह्वलता से
विलाप करता है,यह बहुत ही मार्मिक है । वासवदत्ता की याद करते
हुए वह कहता है कि प्रिय वासवदत्त ! क्या तुम्हारी दृष्टि अमृत को
बरसाने वाली नहीं थी क्या तुम्हारा मुख मधुर हास्य रूपी शब्रह्मको
प्रवाहित करने वाला नहीं था? क्या तुम्हारा हृदय प्रेम से भीगा हुआ
नहीं था ?
क्या शरीर के प्रत्येक अवयव चन्दन के स्पर्श के समान ठण्डे
-
नहीं थे पता नहीं कि तुम्हारे किस अंग में पैर जमाकर निर्दयी इस
अम्मि ने तुम्हें जला दिया है, विषय ही बारा बनी हुई यह
कोई दूसरी ही अग्नि है जिसने यह कार्य किया है ।
दृष्टिभृितवाणी Pम्मतमनस्यन्दि व न कि
नेहार्द्र हृदय न बन्दनरमपर्णानि चौगानि वा ।
कम्मल्लब्धपदेन कि कृतमिदरेण दग्धाग्निना
नन वजमयोडन्य एवदहनस्तस्यैदमाचेष्टितम
यहा पर दयावासवदत्ता आलम्बन विभाव है, उसका विदग्ध
शरीर औरउसकी मति आदि उद्दीपन विभाव है । विलाप और रूदन
बादि बनुभाव है। निर्वेद, जड़ता.चिन्ता और भय संचारि भाव है,शोक
स्थायी भाव जो यही क्षण रस के रूप में प्रकट दुबा है।
तापसवत्सराजय 1-14पृष्ठ 24
तपसवत्सराजय, 29, पृष्ठ
196
इसी बीच महारानी वासवदत्ता के द्वारा पुत्र कीतरह पाला
दुबा एक मृगावक राजा के पीछे-पीछे आता है, उसे देखकर राजा का मन
करूणा से भर जाता है, वह दुःखो होकर कहता है कि वासवदता को
इंढता हुआ उसके द्वारा पुत्र की तरह पालित यह मृगराक्क धारागृह को
देखकर दुःखी हो रहा है और वासवदत्ता के लीलागृह को देखकर लम्बी
सास छोड़ रहा है। पुनः अतिशीघ्र केसर और लताओं की क्यारियों की
बोर दृष्टि डालता हुआ, जब वही वासवदत्ता को नहीं देखता है तो मेरे
पास आ रहा है।
राजा उस शावत को समझाते हुए कहता है कि तेरी
निष्कर माता दूरदेश स्वर्ग की यात्रा को जाती हुई, मेरे साथ तो भी
यहीं छोड़ गई है।
"धारावम विलोक्य दीनवदनोभ्रान्त्वा च लीलागृहा
निवस्यायतमाशु केसरलतावीथी कृत्वा द्वरा ।
P4 में पारर्वमुपेपि पुत्रकृते: । वादभिः गया,
मात्रा त्वं परिवर्जित: सहमया मानत्यातिदीर्घा
भवः ।।
यही पर वासवदत्ता वालम्बन विभाव उसके द्वारा पालित
मृगशावक आदि उददीपन विभाव,किलाप, रोदन आदि अनुभावनिर्वेद,
विषाद, भय आदि संधारिभाव शोक स्थायीभाव करुण रस रूप में प्रक्ट
हुवा है।
18
इसी प्रकार वासवदत्ता के द्वारा पालित शुक को देखकर
राजा के मन में यण रस की निष्पत्ति हुई है । राजा कहता है कि
है देवि! जिस गुरु कान में लगी हुई लाल रंग की पदभरागमणि के
1. तापसवत्सराज || पृष्ठ 5
197 टुकड़े को अनार के दानेले भ्रम ने बार-बार सीचत हुए तुम्हारे पालों पर अपने पंजों से प्रहार किया था। अपनी गार क्रीड़ा के सहायक दुःख से बार-बार चिल्लाते हुए उस सुक को तुम उत्तर क्यों नहीं दे रही हो?' राजा बड़े दुःखके साथ कहता है कि कापती हुई तथा भय के कारण छूटे हुए वस्त्र के अंचलवाली अपने उन विकल नेत्रों को दारों और दौड़ाती हुई तो धुंए से युक्त अग्नि ने देखा नहों; अपितु उस र अग्नि ने कठोरता के साथ तुम्हे एकदम जला दिया है 12 तीसरे अंक में नायक आस भरकर लम्बी-लम्बो सास लेता है और अपनो प्रियतमा को याद में शोकाकुल हो जाता है । वह दुःखी होकर कहता है कि पूरे घर में चारों ओर आग लगी होने पर अत्यन्त भय के कारण अपने प्राण बचाने के लिए सखियों के भाग जाने पर भय और कंपन से हाथ और पैरों के फूल जाने से पग-पग पर गिरती और पड़ती हुई हा नाथ ! हा नाय! ऐसे बार-बार चिल्लातो हुई वह खचारी वासव- दत्ता तो जल गई,पर गाज उल अग्नि के बुझ जाने पर भी हम उस आग से जल ही जा रहे है। "सर्वत्र ज्वालतेषु मस्तु भयादालीजने विद्भुत, बासीकम्पविहत्तय प्रतिपद देव्या पतन्त्या तदा । हा नाति मुहुः प्रलापरया दग्ध वराक्यातया शान्तनापि क्यं तुतनदहननामपिदड्यामहे ।। Ha- 1. राजा : धर्मान्तस्थितपदभरागालको भूय: समाकर्षता! तापमवत्सराजम2.13. पृष्ठ 46. राजा : हौण दास्णतया सहव बधा मान्धितेन दहन न बीक्षितासि ॥ तापमवत्सराज?-16ष्ठ 48 ३. तापलवस्तराज 3.10, पृष्ठ 89. SHE 198 यही पर वासवदतr आलम्बन विभाव, उसका अत्रि में जल जाना उददीपन विभाव, विलाप, रोदन आदि अनुभाव, निर्वेद,विषाद, भय आदि संधारी भाव, शोक स्थायी भाव, करुण रस रूप में प्रक्ट हुआ है। इसी प्रकार पद्मावती के साथ विवाह के प्रसंग में विदृषक से बात करते हुए राजा अपने मन में बड़ी काणा के साथ कहता है कि है देवि जो मेरी कभी तुम्हारे मुख से हटकर कहीं भीशान्ति प्राप्त नहीं करती थी, जिसने अपने भास्थल को हमेशा तुम्हारे सोने के लिए प्यारूप बनाया था,जिपने कभी तुम्हें यह कहा था कि तुम्हारे बिना मेरे लिए यह सम्पूर्ण संसार शुन्य हो जाता है, वहीं में दूसरा विवाह करने का विचार करूगा, इस प्रकार की कल्पना कोई कर भी नहीं सकता था। पर तुम्हारे वियोग में संयास की दीक्षा का पाखण्ड करने वाला मैं । हे प्रियतम ! दूसरे विवाह के लिए स्वीकृति देकर न जाने क्या बनर्थ करने पर उतर गया है। यथा 'कर्षस्य तवाननादपगत नाभूत्वव िवनित येनषा सतत स्वदेवायन कास्थली कल्पिता । येनोन्तासि विना त्वमा मम जगन्य क्षण जायते सोड्य दम्मतन्त: प्रियतम ! बॉकिमप्युद्यतः ।। यही पर भी वासवदत्ता आलम्बन विभाव, उसके बिना संसार का समापन उद्दीपन विभाव,स्दन और विलाप इत्यादि अनुभाव,निर्वेद विवाद, चिन्ता.भय इत्यादि संवारी भाव शोक स्थायी भाव, करण रस के रूप अभिव्यक्त होता है। इसी प्रकार पाचचे अंक में राजा कहता है कि सिद्ध महात्मा तापसवत्सराज*13, पृष्ठ 127.
के वचनों के अनुसार यस कुछ उसी रूप में घटित हो जाने पर और प्रेरे अपराधी होने पर, मेरी प्रियतमा वासवदत्ता बड़े प्रयत्न से क्रोध लो हृदय में छिपाये हुए मेरे समीप आयेगी। उसके क्रुद्ध होकर मेरे पास आने पर आखो से बहुते हुए आतुओं का पान करते हुए वह मेरे पास आकर बैठ जावेगी । इसका तात्पर्य यह है कि एक सिद्ध महात्मा ने कहा था कि - वासवदत्ता के समान सुन्दर राजकुमारी के साथ विवाह होने पर पुन: वासवदत्ता की प्राप्ति हो जावेगी । इस पर राजा विचार करता है कि यदि सचमुव दूसरे विवाह के पश्चात वासवदत्ता मिल जाती है तो वह दुसरे विवाह करने का अपराधी बन जायेगा जिस पर वासवदत्ता के अत्याधिक कष्ट हो जाने की संभावना है । राजा इस कल्पना से बहुत दु:खी है वह कहता है कि ऐसी स्थिति में जब वासवदत्ता मेरे पास आयेगी तो वह अपने सुन्दर ललाट के ऊपर भृकुटी चढ़ा देगी ।आसुओं के प्रवाह में कपोल स्थली की पत्र रचना को प्रवाहित कर देगी और मेरे सामने मखी को देखकर लज्जा से अबनत हो जायेगी । इस प्रकार व्यर्थ के क्रोध से प्रियतमा वासवदत्ता मुझे दुःखी करेगी। विदूषक राजा से कहता है कि आज जब में सुखपूर्वक सोया हुआ था तो स्वप्न में मैने देवि वासवदत्ता को देखा था: आज उसने ही मुझे जगाया है । इस पर बास भरकर कहता है कि देवि तुम कहा हो ? Simire 1. व्यावत्येव समागते मयि सीमालोक्य नजानता. ४६ तिष्ठविकृतकोपचाररणरायावन्मी प्रिया तापसवत्सराज, पृष्ठ 154. ॥
200 मुझे उत्तर तुम क्यों नहीं देतो हो ? वह कहता हैकि है प्रिये मैने अपने प्राणों को तुम्हारे अनुगमन आने के लिए गुहे प्रोत्साहित नहीं क्यिा है । क्या मैने तुम्हारे लिए जटाओं को धारण नहीं किया है और निर्जन वन में प्रत्येक के नीचे नहीं भटकता रहा ? सिद्ध महात्मा के वक्षानुसार तुम्हें पाने के लोभ से मुल पापीले क्या दूसरा विवाह नहीं क्या है ? तुम किस लिए मुझसे इस प्रकार रूठी हो कि मेरी बात का १ उत्तर भी नहीं दे रही हो । 'कि प्राणा न मया तवा नुगमनं कर्तुं समुल्लाहिता:, बदा: किं न जटा 7 वा प्रतिक भान्त वने निर्जन । त्वत्सम्प्राप्तिविनोभितेन पुनर प्यूर्ट न पापेन कि. किं कृत्वा कुपित यदध न वच स्त्वं मे ददासि प्रिये ।। यहा पर वासवदत्तr आलम विभाव, उसका वियोग उददीपन विभाव, उसको प्राप्ति के लिए राजा के ारा जटाओं को धारण करना और वन-वन में भटकना अनुभाव ! जड़ता, विषाद और निर्वेद इत्यादि संधारि-भाव, शोक स्थायी-भाव कण-रस में अभिव्यक्त हो रहा है। छठे बैंक में भी कण रस की धारा बराबर प्रवाहित होती दिखाई देती है । प्रयाग में राजा को देखकर योगन्धरायण कहता महाराज के बाल बिखरे हुए हैं, उनमें से पानी की बेदे टपक रही है और वे आग में प्रवेश करना चाहते हैं घबराई हुई मगध राजपुत्री पदमावती उनके पीछमी सी प्रतीत हो रही है। मेरे इन कार्यों सजिनकी सोचनीय दया हो गई है. इसे महाराज उदयन यही आ रहे है। वह आगे कहता है Randesh 1 तापमवत्सराज 5.5, पृष्ठ 159, भार जीवnepal 201 कि में स्वयं ही नहीं समझ पा रहा हूँ कि मेरी नीति अच्छी रही है या खराब । प्रयाग में विगी के पास शोकाकुल राजा कहता है कि है देवि ! मन्त्रियों ने मुझे प्रलोभन दियाथा कि वासवदत्ता पुनः प्राप्त हो जावेगी. इस लालच से मैं अपने प्राणों को धारण किए रहा हूँ, पर तुम नहीं मिल सकती हो, यह जानकर इस शरीर को छोड़ते हुए तुम्हारे प्रति प्रेम का अभाव नहीं है, शीघ्र ही तुम्हारे पीछे चलने से तुम्हे मिलने का समय मिल जायेगा, यह जानकर धर्य हो गया पर इतना दु:ख अवश्य है कि उन भयलर समय में मेरे हृदय के सेकड़ों टुकड़े क्यों नहीं हो गए थे। विदूषक राजा को समझाता है कि और कहता है कि आप पदमावती को नहीं देख रहे है । आपके कारण इनको क्या दशा हो रही है । इस पर राजा पद्मावती की ओर देखकर बड़े शौक के साथ कहता है कि बिवासपूर्वक न तो कभी मैने इसी ओर कदम ही बढ़ाये है और न ही उसके साथ बातचीत करने के लिए मेरा मन खना है । विस्तर पर लेटी हुई प्रेमालाप न करने के कारण रूठ कर पीठ फेरे, धीरे-धीरे आस बहाती हुई पद्मावती को कभी मैने मनाया नहीं, शोक विवश मेरे लिए भी इसने ऐसा सातजन्मों तक मरने का कठोर निश्चय क्यिा है, बड़े खद की बात है कि मैने इस बेचारी राजकुमारी को जलाया ही हैऔर कोई PA सुख नहीं दिया है आसन्सबमरस्तधानुगमने जाता ति: कित्वियाइ सदौ यता गतं न हृदयं तस्यको दारुण । तापसवत्सराजय 6.3, पृष्ठ 202.
202 विलोक्य विशेषकरूणा क्यमनयापि व्यवसितम, अहो नु खनु भो- "विनम्पान्न विसर्पित न च मनो नियन्त्रण मन्त्रित, व्यावृत्तापि विवर्तिता न शयने बाप त्यजन्तीशनः । मामुदिदरय तथानया व्यवसित तत्रोपरू शुवा, कष्ट केवलमेव राजतनया दग्ध वराकी मया यहा पर भी करुण रस अपनी सम्पूर्ण वास्ता के साथ प्रक्ट हो रहा है । उपर्युक्त उद्धरणों वदित होता है कि कविवर अनंग हर्ष ने अपने इस नाटक में कण रस का सफल विणकरने में सफल हुए वस्तुतः वे उस-सिद्ध कवि है. इस सम्बन्ध में उनकी जितनी प्रशंसा की जाय, वह कम ही प्रतीत होती है । करूण रम के चित्र में उनका कवित्व और काव्य- कोतुक दर्शनीय है। उन्होने एक ही विष्य को अपनी कल्पना शक्ति के माध्यम से नए-नए रूपों में प्रस्तुत करके पुनक्ति और प्रिन्टपेक्षा से बचाया है । कवि ने इतनी विविधता के साथ एक ही विषयवस्तु को इस प्रकार प्रस्तुत किया है कि उसमें पाठक या सहदय की रूचि बराबर बनी रहती है। इस प्रकार हम कह सक्त है कि कविवर बनंग हर्ष रस-निरूपण में एक सिद्धहस्त कवि है। यपि नाटक का प्रमुख रस सकति विचित उत्तरराम चरित के समान करुण रस ही प्रतीत होता है; परन्तु संस्कृत काव्यशास्त्र की परम्परा के अनुसार इस करणविलम्भगार रस बहना सीमीचीन होगा क्योकि अन्त में, इसकी परिणति वासवदत्ता मिलन के कारण संयोग-भंगार में ही होती है तथा इसके मध्य में भी पदमावती के साथ उदयन के विवाह THA .. तापमवत्सराज 64Tठ 203.
203
से दुसरी नायिका की प्राप्ति भी संभोग
अंगार है । यह अवाय हेकि
कवि ने संभोग-श्रृंगार की योजना करके भी करुण-रस को आदि से अन्त तक
बड़ी निपुणता के साथ चित्रित किया है। इसके अतिरिक्त इस नाटक में
विदृषक के वार्तालाप में यत्र-तत्र हास्य परिहास के भाव भी दृष्टिगोचर
A
होते है।
इस प्रकार उपर्युक्त विश्वन में सुस्पष्ट है कि दोनों ही
नाटककारों भास और अनंग-हर्ष ने रस-निष्पत्ति के क्षेत्र में भी अपनी अपूर्व
प्रतिभा का परिचय दिया है।
५४
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های اخیر بوده و به معنها عقلا بين 3
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अध्याय maram monawane बनाया एवं भाषाशैली : दोनों ही नाटकों स्वप्नवासवदत्ता और तापसवत्सराज में भावप की चास्ताकयतिरिक्त बला- पक्षप्रसौन्दर्य भी अपनी सम्पूर्ण चास्ता के सr विद्यमान स्वप्नवासवदत्त नाटक में लघु वाक्यों के द्वारा गम्भीर तथा रसपैशल भावों की व्यंजना अपना विषमहत्व रखता है। दीर्घ विस्तारी समासयुक्त पदों की संरचना भले ही काव्य के लिए कोई उपयोगी बतलाये पर नाटक में लघु-बीवस्तारी एवं सरल वाक्यों की महत्ता प्रशंसनीय होती है। इस दृष्टिले भास सफलता के शिखर पर आसीन दिखाई देते है। इनकी भाषा एवं शैली से स्पष्ट लक्षित होता है कि कविवर भास के समय संस्कृतलोकव्यवहार की भाषा रही होगी। छोटे-छोटे वाक्यो, लोकोक्तियों तथा सक्लियों को जलकृत करना भास की शैली का विशेष गुण है। प्रसादगुण-युक्त और सरल भाषा यदि भाव व्यंजना में सफल रहती है,तो यह कबि की महती कोणता मानी जाती है । भास के नाटकों में हमें यही विशेषता परिलवित होती है। भास की प्रवाहपूर्ण और प्रभावोत्पादक सरल भाषा भाव की अभिव्यक्ति में अत्याधिक समर्थ है । दर्शक अथवा पाठक का हृदय बाना बाकी हो जाता है। भान की शैली की किता उनके कथनों में देखी जाती है। क्योधन में इनके पावनितान्त विदग्ध है। कविवर भाल अपने कान विषय को बड़ीमता के साथ प्रस्तुत करते है। विषय या किसी दृश्य का वर्णन करते समय उनके समाति साम ी को भी के उपस्थिति का देते । यदि किसी दय का वर्णन करने लगते है तो इतनी भास-नाटक-चामपष्ठ 128.
205 स्पष्टता के साथ उसे उपस्थित करते है कि पाठक को मन में पूर्ण बिम्ब उपस्थित हो जाता है । उदाहरण के लिए स्वप्नवासवदत्ता का संध्या - वर्गन अवलोकनीय है। बाकीय वासवदत्ता से संध्या का वर्णन कर रहा है कि पक्षी अपने घोसनों में चले गए है। मुनि लोग स्नान करने के लिए जल का अवगाहन कर रहे है। जलती हुई आग बभक रही है और हम तपोवन में पल रहा है । दर से गिरा दुजा तथr अपनी किरणों को नष्ट लेने वाला वह सूर्य भी धीरे-धीरे अस्ताचल की चोटी को और जा रहा है । यथा - सगा धासोपेतr: मलितममाढी निजन: प्रदीप्तोगनिभर्ति प्रविधीत धूमो भूनिवना । परिभष्टो दुराविपि च संलिप्तकिरणो. रय व्यावयानो प्रविाति धानेर स्तशिखरच ! भान सरल पति के जनक है। शास्त्रीय दृष्टि से इनकी भामा प्रसादगुण से युक्त है। समारता, रसपशलता, भावों की सम्यक अभि व्यक्ति, मनोरजकता, गम्भीरता, उदारता और माधुर्य इनकी शैली के गुण प्रतीत होते है। अवस्था तथा पात्रों के अनुसार उग्रतr एवं नयम का प्रयोग इनके नाटकों की किता। हास्य की यथोचित योजना भी इनकी शैली को सफलता का एक कारण विदुषक की उक्तियों को सुनकर पाठक बिना हस नहीं रह सकता । वाक्य रचना को काबला भी भास की निरानी है। महामहोपाध्याय-गणपति-शास्त्री ने इनको इस गुण की भरि-भूरि प्रशंसा की । उनके अनुसार भास ही रोली की तुलना अन्य किसी कवि से नहीं की स्वप्नवासवदत्ता, पूष्ठ 66.
206 जा सकती है। चरित्र चि, भात ने इतनी सफलता प्राप्त की है कि पात्रों में काल्पनिकता का भान तक नहीं हो पाता है इनकी भाषा, - - पहाड़ी नदी के भाति बिना किसी तड़क-भड़क के स्वाभाविक गति से प्रवाहित होती है। भास भारतीय वृत्ति के महनीय आचार्य है । शब्दार्थ- योजना अभिब्धजना का arय आवक है । भाव, रस, शाल और पात्रों के अनुसार इनकी भाभा परिवर्तन दिखलाई देता है । भास की शैली में स्वाभाविक्ता है, आडमार नहीं है । सामान्य अद्धि का पाक जोर द भी इस परमानंद को अभीत कर लेता है । इनकी भाशनी में बोज, प्रसाद और पार्थ का मणिकान्वन संयोग है। विव्दानों का कथन है कि ओज और समास की जहुलता भरत गा का प्राण है, नवोर विक्टाक्षर बन्ध भी संम्पल गा के लिए आवयक है । पर कविवर भान की मान्यता कि समरस विहीन भावा श्री गा की उच्च मा विराजमान हो सकती है। हनके संस्कृत में गतिशीलता और प्रवाह है। इनकी शैली रसाभिव्यक्ति और भावना को प्रधान मानकर चलने वाली है । विब्दानों का कथन कि भालकी मानली रामायण का प्रभाव भास की शैली की प्रशंसा प्रहामहोपाध्याय गणपति शास्त्री अत्यन्त प्रशस्त शब्दों को उनके अनुसार इन नाटको कोशेली जातीय 1. भावनाटा : बल्देव उपाध्याय, पृष्ठ 130. १. बोजा समासप्रश्वा एतद गवन्यजीवितम् । संस्कृत साहित्यकामावदेव उपाध्याय, पृष्ठ 600 मोजातिमाया लिमा स्पष्टः स्युदो रमः । विक्टालावन्याच नमवाय दुर्लभ धर्म-वास्ता, बागाट, पृष्ठ 10.
207 भास की सरल शैली का कारण उस पर काव्यों की शैली का प्रभाव है। वे उददाम भावनाओं का बहुत ही मशक्त वर्णन करते है। वै विपत्तियों का चित्रण बड़ी सफलता के साथ करते हैं । माय करते है। नाटककार भाप की दृष्टि नाटकों की अभिनेता पर सर्वाधिक थी । इसीलिए उनके नाटकों में कृत्रिमता ओर अस्वाभाविक अलंकार प्रयोगों का अभाव है। य काका के लिए अनेकार बायक है, परन्तु बालात अलंकारों का प्रयोग नाटक की अभिनयता का बाधक होतr है । इसीलिए भास के नाटकों में अलंकरण की प्रचुरता नहीं है।' प्रबाद, बीज और माधुर्थ ये तीन गुण भास की शैली में प्राप्त बधस्था तथा समय के अनुसार अपनी शैली में परिवर्तन कर लेते हैं। उनकी शैली व्यंजकता और प्रभावोत्पादकता है, अपने भावों को व्यजक्ता में उन् सिद्धि प्राप्त है। कहीं भी विवक्षित भाव दा नहीं सकता है। भास की शैली को यह महती विशेषता है कि सीनित शब्दो और सरल भाषा केरा वैविधक्ति का प्रकाशन कर देते है। भास की शैली का एक गुण मोन भाषा भी है । अल्प शब्दों के rरा अधिकाधिक भावों की व्यंजना के अतिरिक्त वे अपने मोन भी अर्थ बोध कराते । “य मोन' राब्दों से कहीं अधिक प्रभाशाली हुए है एवं रस तथा भावों की प्रतीति में सहायक हुए है। इसी कारण समीक्षकों ने उन्हें "मोन के आचार्य विषय में दिक्षित पिया है । काव्यप्रकाशकार मम्मट के अनुसार दोषों से राहत, गुपयुक्त भासनाटकचाय बन्दव उपाध्याय,समीक्षा. भान नाटकम : बल्देव उपाध्याय, समीक्षा. पुन्छ । - ra a अशा 208 और सामान्य रूप से अलंकार सहित परन्तु कहाँकहीं अलकार हित शब्द और अर्थ दोनों की समष्टि काव्य कहलाती है ।' यहाँ पर 'अनलकृतीपुन: कापि' का अभिवाय यह है कि को तो काव्य में अलंकार होना चाहिए, परन्तु जहाँ कहीं व्ययार्थ या रसादि की स्थिति विद्यमान हो,वही स्पष्ट रूप से अलंकार की सत्तr न होने पर भी काव्यत्व की हानि नहीं होती है लेकिन फिरभी स्वप्नवासवदत्त में नाटककार भास ने स्वाभाविक रूप से अलंकारों का प्रयोग किया है । ॥ नाटक में कहीं भी उन्होन बलकारों का बालाद प्रयोग नहीं क्या है । अलंकार योजना : S स्वप्नवासवदत्तम की भाषा प्रसाद गुणयुक्त है । कविवर भास ने अपने नाटक में एसी भाषा का प्रयोग किया है जो उस समय की प्रायः बोल- चाल की भाषr प्रतात होती है । भास की कविता अलंकारों के बोझ से दबी हुई नहीं है, किन्तु फिरभी अपने आप स्वाभाविक रूप से जो अलंकार दिखाई देते है.उनमें कृत्रिमता नहीं है । भास की कविता में स्वाभाविक अर्थ निबन्धन में उपमा,अनुप्रास, व्यतिकर, स्वभावोक्त, परितण्या और अर्थान्तरन्यास अलंकार अपने आप चहा-तही आ गए है। वे कवि ब्दारा बलात प्रयुक्त नहीं प्रतीत होते है, बकि पात्रों के संवाद प्रवाह में कुल-मिले प्रतीत होते है। उन्होने अपने नाटक स्वप्नवासवदत्ता में अनेक उपमालकारों का प्रयोग किया है । उनके उपमानकारों की सुन्दरता को देखकर कविकुलगुरू कालिदास की उपमाओं की चाहता का स्मरण हो जाता है। ३२ दोषीराब्दार्थों मुगुणावलक्ती पुनःक्वापि । काव्यप्रकाशान मण्डल प्रकाशन, 1960.पृष्ठ 1.
209 उपमालकार का एक मनोरम उदाहरण दर्शनीय है । । । का प्रसंग है महारानी वासवदत्ता महामन्त्री योगन्धरायण के साथ मगध के एक तपोवन में प्रवा करती है, वहा पर मगध राजकुमारी पदमावती पधार रहीं है, सेवकगण रास्ते से लोगों को हटा रहे हैं । वासवदत्ता अपने संबंध में हटाये जाने को कल्पना से व्यथित होती है । वह यौगन्धरायण से कहती है कि आर्य । मुझे तपोवन बाने का परिश्रम इतना दुःख नहीं दे रहा है, जितना कि यह अपमान । इसपर योगन्धरायण उन्हें समझातr है कि आपन इस विषय का उपभोग करके पहले ही छोड़ दिया है.अब आपको इसकी चिन्ता नहीं करनी चाहिए। क्योकि पहले आपभी इसी प्रकार श्लाघनीय मनोरथों को प्राप्त करती रही है अर्थात इसी प्रकार राजकीय ठाठ-बाट से चला करती थी और पुन: पतिदेव के विजयी होने पर इसी प्रकार चला करेगी. क्योकि लोगों का भाग्यचक्र पहिये के आरों की भौति समयानुसार ऊपर-नीचे धूमता रहता है अर्थात जिस प्रकार रथ के पहिले आरै कभी नीचे हो जाते है और कभी पर, उसी प्रकार मनुष्य का भाग्य भी कभी मुख देता है, कभी दुःख देता है। यहां पर पूर्णोपमा अलंकार है। इसका विलका निम्नवत । - चकारपक्ति: 2- उपमेय भाग्यपक्तिः 3-वाचकशब्द-इब +- साधारण परिवर्तमाना । - स्वप्नवासवदत्ता १. योगन्धरायणः पूर्व त्वयाप्यभिात गतमेवयानीन्छलाध्यं गमिष्यसिपुनर्विजयेन भतः कारण जगतः परिवर्तमानाचारपंडिक्सरमच्छति भाग्यपवित स्वप्नवासवदत्ता 4 पुष्ठ 12. ॥
210
ऐसा प्रतीत होता है कि कविकुल गुरू कालिदास ने इस श्लोक से प्रभावित
होकर अपने प्रसिद्ध खडकाव्य भयदृतम्' में इसका छाया भाव ही उल्लेखित
क्यिा है जिसके अनुसार या मेघ से अपनी प्रियतमा के लिए सन्देश भेजता
कि जिस प्रकार में अपने आप धीरज रख रहा हूँ तो है कल्याणि! तुम भी
ज्यादा दुखी न होना। क्योकि सदा के लिए कभी कोई सुखी नहीं होता
है और न ही कोई सदा के लिए दुःखी होता है । चछ की नमिले समान
सुख:- दुःख की दशा उमर-नीचे होती रहती है ।।
काव्यलिग अलकार का एक सुन्दर उदाहरण भी दर्शनीयहे ।
जहाँ पर वाक्यार्थ का हेतु प्रदर्शित किया जाता है, वहाँ पर काव्यलिंग अलंकार
होता है 12
यथा
--
पद्मावती नरपतर्महणी भवित्री,
विनिता प्रदिष्टा ।
न्युत्क्रम्य गच्छति विीः सुपरीक्षितानि ||
Versage
स्वप्नवासवदत्तम् ।।
प्रस्तुत पत्र में कहा गया है जिन सिदों ने पहले जाने वाली विपत्ति को
बतलाया था.उन्होंने ही यह बतलाया है कि पद्मावती राजा उदयन की
पत्नी होगी.उनकी भविष्य वाणी में विवास कर यहा वासवदत्ता को सोपा
जा रहा है, क्योंकि भाग्य अच्छी तरह परखे हुए सिद्धों के वचनों का उल्लंघन
1. कस्यात्यन्त सुखापत दुःखमेवान्तली वा ।
नीच्छत्युपरिचया चम्मकोण
मादल उत्तराई,लोक संख्या
॥
देतीकाव्यमिग दिगदयते
साहित्य-दर्षण, पृष्ठ 220
211
करके नहीं चलता है । यहा पर वाक्यार्थ का हेतु बतलाया गया है ।
।
33.
इसलिए काव्यलिग अलंकार है ।
प्रथम अंक में भी तपोवन के वर्णन में भास के स्वभावोक्ति
अलकार की मंजुलता देखने को मिल जाती है ।
यथा -
..
"गा वासोपता: सलिलमवगाढ़ी मुनिजनः
प्रदीप्तोडग्निभाति प्रतिववरतिधमी मुनिवनः ।
परिभ्रष्टो दूराद्रविरपि च संक्षिप्तकिरणो
रथं व्यावासो प्रविाति शनरस्तशिखरम ।।
यही पर संध्याकाल का स्वाभाविक वर्णन किया गया है, इसलिए यहाँ स्वभा-
वोक्ति अलंकार है अथवा अनेक देतुओं से संध्या काल का अनुमान किया गया है,
इसलिए अनुमान अलकार भी है।
परिसच्या अलंकार के साथ-साथ अन्तरन्यास अलंकार का
१
CE
मंजुला नदर्शन कविवर भास की समर्थ-बाणी का प्रमाण है। कंचुकीय राजा को
समझाते हुए कहता है कि मृत्यु के समय कोन-किसकी रक्षा कर सकता है
रस्सी के टूट जाने पर कोन बड़े को गिरने से रोक सकता है ? इसी प्रकार
कों के समान स्वभाव वाले मनुष्य समय-समय पर मर जाते हैं और फिर
उत्पन्न हो जाते है। अव समय आने पर कट जाते है और फिर समय
जाने पर उत्पन्न हो जाते हैं, उसी प्रकार मनुष्य भी समय-समय पर मरते और
उत्पन्न होते रहते हैं। यथा
क: केशवतो रमितु मृत्युकाने रद के धारयन्ति ।
एवं बोवस्तुन्यों माना जाने-काले छियत सहयत च ॥
स्वप्नवासवदत्ता
१. स्वप्नवासवदलम 600
212 यही पूर्वाद में परिसंख्यालंकार और उत्तरार्द्ध में सामान्य बात का समर्थन किया गया है, इसलिए अर्थान्तरन्याय अलंकार है । नाटक में वृत्यनुप्रास का एक तुन्दर उदाहरण भी दर्शनीय है यथा- - मधुमदकला मकरा मदनातीभिः प्रियाभिपगूढाः । पादन्यासविषाणा क्यमिव कान्तायुक्ताः स्युः ॥ उपमान से उपमेय की अधिकता जहाँ बतलाई जाती है, उसे 'व्यतिरेक' बलकार कहते है। निम्न पध में वासवदत्ता को पदमावती से अधिक सुन्दर सिद्ध करने के लिए उसके मनोहरण रूप विशेष गुण की चर्चा अत्यन्त सरल शब्दों में की गई है। यथा - पदमावती बहुभता मम यपि रूपशील माधुर्यः । वासवदत्ताबद न तु सावन्मे मनो हरति 2 इस प्रकार हम देखते है कि स्वप्नवासवदत्ता नाटक में अलंकार निसर्गरूप से अपने आप वोपकथन से आ गए है। कवि ने इनका बालाद प्रयोग नहीं किया है। यही इनकी शैली की विशेषता है। विस्तारमय के कारण नाटक से अन्य उदाहरण अलंकारों को प्रदर्शित करने के लिए अपमित नहीं है। तापसवत्सराज : बलाप एवं भाषा-शैली: तापसवत्सराज नाटक में काव्यशास्त्र के विविध स्प और पा स्मृटित हुहे.बसीलिए ध्वन्यालोक के प्रणेता प्रख्यात विन्दान बाचार्य बानन्द- १. वनवासवदत्ता
213
वर्षन से लेकर हेमचन्द्र तक प्राय: सभी आचार्यों ने इ. नाटक के अनेक पद्यों
और सन्दर्भी का प्रयोग किया है । आचार्य आनन्दवर्धन ने अल. यक्रम व्यंग्य
ध्वनि को स्पष्ट करने के लिए इसके पद्य का उदाहरण दिया है जो निम्नवत है-
"उत्कीम्पनी भयपरिस्खलिताराकान्ता
से लोचने प्रतिदिश विधुरे पिन्ती ।
।
+Y
..
रेण दाम्णतया सहसवदराधा,
धूमान्छितेन दहनन न वीक्षितासि ।।
प्रस्तुत पद्य में आनन्दवर्धनाचार्य ने कहा है कि यहां पर
तिलोचने' में 'त' पद के नारा नायिका के उन क्षेत्रों की और व्यंजना होती है
जो किलिकता, सुन्दरता और भरिकोप के कारण अपने जाताय रतिभाव को
जागृत करने वाले थे और आज अग्नि के ब्दारा उनके नष्ट किए जाने के कारण
ही प्रगाढ़ काणा को उत्पन्न कर रहे है। इससे यहाँ पर करुण रस के परिपोष
T
में बसाधरण सफलता मिल रही है।
अत: ध्वनिकार का कथन है कि
यहा पर ध्वनितत्व की अभिव्यक्ति होने के कारण यह उत्तम काव्य है 12
प्रस्तुत पद्य के सम्बन्ध में बाचार्य मम्मट का कथन है कि इस
पनो में मोचन जोशब्द का प्रयोग किया गया है, उन नेत्रों के
व्यापार और सोन्दर्य की उदयन दवारा की गई पूर्वाति का सूचक है।
इसलिए यहाँ भी त' शब्द के साथ ' शब्द का प्रयोग नहीं क्यिा गया है।
यपिसल औरया' शब्द का नित्य सम्बन्ध माना जाता है । इस सामान्य
.
PHER
तापलवत्सराज 216
2 ध्वन्यालोक उौत 3, पृष्ठ 40.
214 नयम के बाद उसके अपवाद रूप में पहला नियम यह होता है कि प्रकान्त, प्रसिद अनुभूतार्थक, 'त' शब्द के सा५ यत् ' शब्द के प्रयोग की आवश्यकता नहीं होती है ।' यहा पर कवि का आशय यह है कि धुएं ओखें बन्द हो जाने पर अग्नि ने वासवदत्ता को जलाया है, यदि ऐसा न होता तो अग्नि चाहे कितना भी दूर होता.उसके मुख और नेत्रों की सुन्दरता को देखकरकभी भी जलाने का दुस्साहस न करता । कोक्ति जीवितकार आचार्य कुन्तक ने तापसवत्सराज में बोक्ति के विविध रूपों को खोजा है। उनके अनुसार इस नाटक का कोई ऐसा बैंक नहीं है जिसमें सुन्दर वक्रोक्तिया न हो। वचनवक्रता, प्रकरणवक्रता आदि नाटक की सुन्दरता का वर्णन करते है। इस प्रकार तापसवत्सराज का भाव पा जहाँ एक और अत्यन्त सुन्दर है,वहीं दूसरी ओर भाषा,भाव और बलकारों की दृष्टि से कालापन भी चाहतर है। तापसवत्सराजम् नाटक में असंगति अलंकार का एक सुन्दर उदाहरण दर्शनीय है । जहाँ पर कार्यकारण भूत दो धर्मो की भिन्न देशतया और युगपत् एक साथ प्रतीति है, वही असंगति अलंकार होता है। लोक में जिस स्थान पर कारण होता है, उसी स्थान पर कार्य की उत्पत्ति देखी जाती है । जैसादि कार्य वहीं उत्पन्न होता है,जहाँ पर उसका कारण अग्नि आदि रहता है । परन्तु जहाँ कार्यकारण भूत दो वर्षों की किसी विपता के कारण भिन्न देश अथवा एक मात्र प्रतीत होती है, उन दोनो की स्वभावान्य परसर संगति त्याग देने से असंगति वर्मकार होता है। । काव्यप्रकाश : सप्तम उल्लास.वान मान प्रकारान 1960. पृष्ठ-289. १ कोक्ति जीविनय पृष्ठ 25. 3. भिन्मदेशवयात्यन्त कार्यकारणभूतयोः । युगपर्मयोर्वत्र ख्याति: सा स्थादसंगतिः "काव्यप्रकाश 10.124.0-57.
215
04901
असंगतिअलंकार के उदाहरण के लिए तापसवत्सराजस का निम्न
SIM
पच अवलोकनीय है -
'प्रायः पथ्यपराइमुखा विषयिणी भूपा भवन्त्यात्मना,
निर्दोषाव सचिवान्भजत्यतिमहा लोकापवादग्वरः
-
वन्दया: श्लाध्यगुणा स्त एव विपिने सन्तोषभाज: पर,
बाहयोग्य वरमेव सेवकजनोपसर्वथा मन्त्रिणः ॥
यहा पर 'पथ्यपराङ्मयता' और 'उपालम्भज्वर' रूपी कार्यकारण के भिन्न-भिन्न
देश में होने के कारण असंगति अलंकार है ।
इसी प्रकार विरोध अलंकार का उदाहरण भी दर्शनीय है ।
जहा पर वास्तव में विरोध नहीं होता है,कभी विरोष को प्रतीतिी कराने
बाल धर्म का विरुद्ध रूप ले वर्णन करना विरोध या विरोधालकार कहलाता
है। उदाहरण के लिए
"सर्वत्र ज्वनिलेवामा भयादालीजने विद्वते
बासीकम्पविहस्तया प्रतिपदव्या पतन्त्या तदा ।
हा नाति मुहुः प्रलापयस्या दग्ध वराव्या तया
गान्तनापि व्यं तु तेन दानाधाषि दयामहे ॥
यही पर राजा का यह कथन किग्नि के शान्त हो जाने पर भी हम उमर
जले जा रहे है. विरोधाभास को व्यक्त कर रहा है।
.. तापसवत्सराज 15.पृष्ठ 2
१. विरोधासौगवरोधषि वित्वेन यदुवः ।
तापमवत्लाजा 3*10. पृष्ठ...
216
इसी प्रकार इसी नाटक में उत्प्रेक्षr अलंकार की सुन्दरता
0...
भी दर्शनीय है।
'दीष्ट मृतवाणी स्यतमधुप्रस्थान्द वक्त्रं न कि,
स्नेहार्द्र हृदयं न चन्दनरत पनि चागानि वा ।
की स्मेलब्धपदेन किं कृतमिदं रैण दग्धाग्निना,
म कामयाच्य एव दत्त स्यैदमाचेष्टितम् ॥
यहा पर व दद्वारा बनी हुई कोई दूसरी ही आग होगी जिसने यह कार्य
क्यिा है। यहाँ पर उपमेय में वारूप अग्नि की सम्भावना की गई है, इसलिए
उत्प्रेक्षालकार है।
'तनु-छाया' और प्रिया' के बीच एक मनोरम साम्य को दिखाने
वाली उपमा,रूपक और उभा की Er निम्न में दर्शनीय है
बादो मानपरिग्रहण गुरुणा दूर समारोपिता
पश्चात्तापभरेण तानवता नीता पर लाया ।
उत्संगान्तरवर्तिनीमनुगमा मम्पिण्डिता गोमिमा,
सागरणया प्रियामिव तकराया समालम्बते ।।2
इसी प्रकार एक जीवन्त उपमा का उदाहरण भी दर्शनीय है
करतलकलिलाममायोः समुदितसाध्वसबदकस्पयो:
तरुचिरटानिवाधारपर इववरयोः समागमः॥
प्रस्तुत श्लोक में कैथुकीय कहता है कि हाथों में जयमाला लिए हुए,भय या
मात्विक भाव उत्पन्न हो जाने हो जाने से कार्य करने में असमर्थ हाथवाल
SANA
!
तापसवत्सराज 2-9, पृष्ठ 3
तापलबलराज 3-17.पष्ठ 109.
3. तापसवल्लराजय 4-20, पृष्ठ 142
। और जटाओं की सुन्दर रचना किए हुए अर्थात् जटा बाधे हुए दोनों उदयन पद्मावती का दूसरे शिव-पार्वती के समान समागम हुआ है । यहाँ पर शिव और पार्वती उपमान है, उदयन और पदमावती उपमेय है, प्रीतिपूर्वक जटाबन्धन समान धर्म है,और "इव वाचक शब्द है, इसलिए यही पृषोपमा- ल्मकार है । तापसवत्सराज में निम्नाक्ति पत्र में नायिता के अनुपम अनिन्दय सौन्दर्य की अभिव्यक्ति करने के लिए कविवर अनंगहर्ष ने शरत' 235 के रूपक की जो सुन्दर योजना बनाई है, वह प्रशंसनीय है । दत्ता से कहता है कि तुम्हारी दोनों आसे खिल हुए कमल के वन तथा हाथ कमलों से भरे हुए तालाब है। सौन्दर्य उपवन है, मुख चन्द्रमा है और दोतो की पंक्ति चमेली के फूल है। राजा बागै कहता है कि तुम्हारे प्रत्येक अंग इस समय शरदकाल की एक नवीन शोभा दिखाई दे रही है । इसलिए इस समय शरद् के चिन्हों में सजावट लिए तुम्हें परिश्रम करने की कोई आवयकता नहीं है - "फुल्लन्दीवाका नतानि नयने पाणी सरोजाकरा:, *सौन्दयों पवनी शशाकवदना जाती प्रस्तीरदाः । प्रत्यगेषु नवव सम्प्रति गरल मीरियं दृश्यते । साब है रचना प्रसाधनविधौ बढी वैधवादरः ।। जहाँ पर उपमान और उपमेय का अभिद वर्णन होता है,उत रूपक अलंकार कहते है। प्रस्तुत पत्र में वासवदत्ता की बास बोर कमल तथा हाथी और ..तापसवत्सराजय16.पृष्ठ 2 काव्य-प्रकाश 130. पृष्ठ 463 218 जोर कमलों से भरे हुए तालाब में, सौन्दर्य और उपवन में, मुख और चन्द्रमा में, दन्त पक्ति बोर चमेली के पुष्यों में, अभेद सम्बन्ध है । इसलिए यहा पर रूपक अलंकार है। इसी प्रकार उत्प्रेक्षातकार का सुन्दर उदाहरण भी दर्शनीय है। राजा उदयन वासवदत्ता को देखकर कहता है कि आसुओं के जल से महारानी के नेत्रों का अंजन कुल गया है, अधर पल्लव श्वासो से लख गया है । इनके शरीर क्षीणता सी धारण कर ली है। ऐसा प्रतीत होता है कि प्रानी महारानी वासवदत्ता दुखद दिखाई देती है। यथा 'मुचितमजलनयनाजन स्वसित-सरितोडधरपल्लवः । तरिय तनुतामिवलम्भिता किमिव मन्युमना इव जयते ।। प्रस्तुत पत्र में वासवदत्ता में क्रोध की सम्भावना की गई है, इसलिए यहाँ उत्प्रक्षालकार है। कविवर अनंगहर्षमावराज ने अपने प्रख्यात नाटक तापसवत्सराजम ANDE REERO में अत्यन्त चास्ता के साथ अलकारों की योजना प्रस्तुत की है, अलंकार सरन बोर स्वाभाविक है, तथा रसागामी है । करुण रस के परिवेश में कवि के लिए अनकारों की किष्ट कम्पना का अवसर नहीं था। इसलिए उसने प्राय: स्वाभावोक्ति अलंकार का ही आश्रय लिया है और सादृश्य- PUNE मूलक अलंकारों की योजना प्रस्तुत की है। प्रस्तुत नाटक का मापा और भावमा इतना रमणीय है, अनेक पोर प्रसंग इलने सुन्दर है कि वे अपने काव्य सौन्दर्य के कारण बामात सहपयों के हृदयों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं। प्रयाग के तापसवत्सराजम 147 पृष्ठ 26 219 03 सुन्दर वर्णन , कवि का काव्य-कौतुक दर्शनीय है । राजा रूमावा और विदुषक से कहता है कि जहाँ गंगा-यमुना के साथ मित्रता को प्राप्त हुई है, जहां पर मुनि लोग अपनी अभीष्ट सिद्धि को प्राप्त करते हैं । पापी- जन भी जहा पर परमपवित्र हो जाते है । तुम दोनो यहा से अभीष्ट पल्ल देने वाले उसी प्रयाग राज में मुझे ले चलो । "सख्यं गता यमुनया सह पत्र गंगा, यात्राप्नुवन्ति मुनयः स्वरामी हतानि । a पापीयता भवति यक परा विद्धि सर्व माप्रिती मयतभिष्टपल प्रयाग ।। . वासवदत्ता को लक्ष्य का किया गया उदयन का समस्त विलाप अत्यन्त 142194 my SHRI मार्मिक और रस से परिपूर्ण है । राजा का निम्नाकित कपन कि हे देवि ! जो मेरी आखे कभी तुम्हारे मुख पर से हटकर कहीं भी शान्ति प्राप्त नहीं करती थी,जिसने अपने का को सदेव तुम्हारे सीन के लिए शैश्या के रूप में प्रस्तुत किया था, जिसने कभी तुम्हें यह कहा था कि तुम्हारे बिना मेरे लिए यह संसार सुना हो जाता है । वहीं में दूसरा विवाह करने का विचार गा, इस प्रकार की कल्पना कोई कर भी नहीं सकता था । पर तुम्हारे वियोग में सन्यास की दीक्षा का पाखड करने वाला है प्रियतमे ! दुसरे ववाह के लिए स्वीकृति देकर न जाने क्या अनर्थ करने पर उतर गया है। प्रस्तुत पत्र में करण रस की पुष्टि के लिए कबि ने उद्दीपन विभावों की बड़ी मजलयोजना प्रस्तुत की है। नायक अपनी पूर्व की बातों का स्मरण ..तापमवत्सराज 2-224 पृष्ठ 56 मोब्यदम्भवतः प्रियतम कमियत: तामसवत्सराज 4-13, पृष्ठ 120.
220 अलंकार भी अवलोकनीय है । नाटक के चतुर्थ बैंक में जब राजकुमार पदमावती उदयन के वियोग में लतापाराले आत्महत्या करना चाहती है तो उस समय विदूषक की सूचना पर राजा बड़ाहट के साथ वही तत्काल पहुंच जाता है। राजकुमारी पदमावती के प्रति उस समय राजा की निम्नाक्ति उक्ति में कितना स्नेह, सौजन्य और माधुर्य प्रस्फुटित हो रहा है, वह अवलोकनीय है ! राजा कहता है कि है प्रियतमे ! इस लता पाश के बन्धन को छोड़ दो, मेरा यह एक प्रणय- पूर्वक अनुरोध स्वीकार कर लो । बायें असहिष्णु ! यह तुम क्या कर रही हो, तुम जिससे प्रेम करती हो वह मैं तुम्हारे सामने उपस्थित हूँ । विस्त पारामिम कुरुमे प्रिय प्रणयममा प्रतिमान्य 2 असहने, किमिद क्रियते त्दया, BATO प्रणयवानयमस्मि तवागत: ॥ teria इसी प्रकार दूसरे बैंक में विनीतभद्र के द्वारा की गयी अग्नि की ज्वाला का चित्रण भी काव्यत्व की दृष्टि से जीवन्त और प्रभावोत्पादक है। ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे अग्नि की लपलपाती हुई ज्वालाएं हमारे सामने ही लावणत को भस्मसात कर रही है। तापसवत्सराज के अनुशीलन से प्रतीत होता है कि कविवर अनंग हर्ष मातराज का यह नाटक कविकुलगुरू कालिदास और कण रस के प्रसिद्ध कवि भवति से अत्यधिक प्रभावित है। इसमें कविकुलगुरू कालिदास तापसवत्सराजम 4.17 पष्ठ 130. 2. तापसवत्सराचा 24,5,6 पृष्ठ 39-40. Coun 221 के काव्यों के समान कहीं-कहीं कोमलकान्त पदावली के दर्शन होते है । कण- रस के चित्रण में सहसा उत्तरराम चरित के प्रणेता कविवर भवभूति का स्मरण हो जाता है। ऐसा प्रतीत होता है कि यह नाटक काव्यत्व की दृष्टि से स्वप्नवासवदत्ता से कहीं आगे है। तापसवत्सराज नाटक की भाषा अत्यन्त सन्तुलित प्रसंगानुकूल और काव्यात्मक है । इस नाटक का अंगीरस कण है तथा अंग श्रृंगार रस है। - मायः इसलिए कविवर अनग हर्ष ने सर्वत्र, सरल, मधुर और को मलकान्त पदावली वाली भाषा का प्रयोग क्या है। भाभा में स्वाभाविक प्रवाह है तथा प-योजना प्रसंगानुकूल है। कोमलकान्त पदावली के लिए निम्नाकित पद्य अवलोकनीय "मतिमथुजलनयनाजन श्वलित तरितोडधरपल्लव: तरिय तनुलामिवलम्भिता किमिव भन्युमना इव लत्यते ।। अथवा प्रसाद गुण और माधुर्य के लिए निम्न पत्र का सौन्दर्य अवलोकनीय है " विणे नवकेतकीदलचा शोभा न सम्पादितr. प्रत्यय न मगालनालवलयं पाणी समरोपितय । मलाबदलजिता सुमनसो मोतीलतr: वि यथा प्रेयाय मनित: प्रसाधनविधिव्या न सम्पादित: 2 किन्तु इसके विपरीत जहाँ अग्नि की प्रलयंकारी ज्वालाओं और ग्रीम के चित्रका प्रसंग आता है। वही कवि की भाषा भी वैसा ही प्रचंड बोर 2011 तापसवत्सराजा 117, पृष्ठ 426. तापसवत्सराजय 1.15, पृष्ठ 25.
222 और तीव्र रूप धारण कर लेती है । तीसरे बैंक में पद्मावती और सांकृत्यायनी बैठी हुई है, वासवदत्ता सांकृत्यायनी को प्रणाम करती है और वह उस आशीवाद देती है कि तुम सदा सौभाभ्यशानिनी हो । कार्य सफल होने पर तुम शीघ्र ही अपने पति के संयोग को प्राप्त हो ।' यह क्तिनी गढ़ और अर्थपूर्ण वाणी है । वे दोनों ही इसके विशेष अर्थ को समझ रही है, किन्तु पदमावती इन सामान्य अर्थ में ही ग्रहण कर रही है । शोध प्रबन्ध में प्रयुक्त तापसवत्सराजम के इस संस्करण में कुछ अपाणनीय प्रयोग यथा “गमध्ये भविष्य' इत्यादि भी प्राप्त होते हैं जिससे प्रतीत होता है कि भाषा की ये व्याकरणात्मक त्रुटिया कवि अनंग सज-हर्ष की नहीं है, किसी उत्तरवर्ती लेखक ने पाण्डुलिपि तयार करते समय असावधानी अथवा जानका ऐसी त्रुटिया कर दी है । इस प्रकार हम देखते है कि तापसवत्सराजम् भाषा और भाव की दृष्टि से गुण और अलंकार की दृष्टि से एक उत्तमकाव्यजातीय नाटक है। दोनों ही नाटक स्वप्नवासवदत्त और तापसबलराज कलापा एवं भावपक्षा के मौन्दर्य से समलकृत है। 0000000 00000 000 -- साकृत्यायनी-चिरविधवा भवतु तान भी सह संघटता । तापस्वत्सराजाक-तृतीय, पष्ठ 4
अध्यय
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प्रेक्षागृह एवं रंगमंच
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223 अध्याय प्रेक्षागृह एवं रंगमंच e प्रेक्षागृह और रंगमंच सम्बन्धी विस्तीर्णवधि और विषदवर्णन आचार्य भरतमुनि विरचित नाट्य-शास्त्र में उपलब्ध होते है। भरतमुनि के मतानुसार नाट्य एक वैद है और प्रेमागृह की स्थापना एक यज्ञ है, इसी दृष्टि से नाट्यशास्त्र में रंग-यजन का विवरणप्राप्त होता है । अत्यन्त प्राचीनकाल # नाटक का अभिनय बाकाश के नीचे बाहर मैदान में हुआ करता था.परन्तु नाना प्रकार के विनों के उठ खड़े होने पर कालान्सर में रंगमंच का अविभाव हुवा था । नाट्यशास्त्र के अनुसार प्रेक्षागृह तीन प्रकार के होते थे विकृष्ट, 20 चतुरम, अपन । इन विकृष्ट नामक प्रेक्षागृह विस्तृत होता था, जिसमें देवताओं से सम्बद्ध दृश्य दिखलाये जाते थे। इस प्रेक्षागृह की लम्बाई 108 हाथ होती थी। चतुरन्न प्रेक्षागृह चौकोर होता था, इसकी लम्बाई हाथ होती थी। यह परिमाण मध्यम आकार का होता विशेष रूप से यह प्रेमागृह राजाओं के लिए निश्चित किया गया था। अया' नामक प्रेक्षागृह परिमाण में सबसे छोटा होता था.जिसकी लम्बाई 32 हाथ होती थी। यह प्रेक्षागृह मामान्य प्रकृति के लिए विहित था । भरत- मुनि के अनुसार प्रेक्षाग्रह का बांधा विस्तार नहीं होना चाहिए। क्योंकि प्रेमागृह के बकि विस्तत होने पर उन्चारित बद सष्ट रूप में दर्शकों के कान तक पहुंच नहीं सकते। नाटक का प्रधान गण इसवी भुषव्पता' हे बोर यह मया परिमाणवानेभामही ही सम्भव हो सकती है इसलिए इन १. नाट्यशास्त्र, बध्याय 2-10 HERE 224 प्रेक्षागृहों में मध्यम प्रकार के प्रेक्षागृह को उत्तम माना गया है जिससे वाय, गीत और संवाद सहज रूप से सुने जा सकते है ।' प्रेक्षागृह के निर्माण का विधान नाट्शास्त्र के अनुसार निम्नवत है । भरतमुनि के अनुसार सर्वप्रथम कुशल व्यक्तियों के द्वारा भूमिशोधन करना चाहिए । समान, स्थिर और कठिन तथा काली और गौरळ की भूमि पर नाट्यमण्डप का निर्माण करना चाहिए । उत्तम समय और शुभ भावों में भूमि को नापना चाहिए । 64 हाथ के भखण्ड पर आधे हिस्स में नेपथ्य गृह और रंगशीर्ष की रचना करनी चाहिए। उसके भीतर से अनिष्ट, पाखाडी, तपस्वी. गेल्वे वस्त्रधारी-सन्यासी और पागल व्यक्तियों को अलग कर देना चाहिए । रात्रि में दसों दिशाओं का पुष्पादि से अर्चन और वन्दन करना चाहिए । भिस निर्माण और स्तम्भ-रचना शुभ मुहूर्त में करना चाहिए । नास्त्र के निर्देशानुसार रंगपीठ और रंगशीर्ष की विधिपूर्वक रचना करनी चाहिए। मनी मिट्टी के बने नेपथ्यगृह में दो बार होना चाहिए । रंगशीर्ष को न तो मध्य में बा और न मध्य में नीचा होना चाहिए। दर्पण के समान समतल रंगशीर्ष को उत्तम माना जाता है । मुनि का क्या है कि रंगशीर्ष को रत्नाटित होना चाहिए । तदनुसार पूर्व 2014 की और हीरा, दक्षिण की बोर नीलम, पश्चिम में स्फटिक और उत्तर प्रवान रत्न होना चाहिए और मध्य में सुवर्ण जटित होना चाहिए । इसके परचाव काष्ठ का काम होना चाहिए। जिसमें अनेक प्रकार की कारीगरी, तिम्रो मासे विक्री तुपाव्यमुच्चारितवरम । बभिव्यक्तवर्णत्वाव विस्वरत्व भाव। नाट्याल.
225 साजसज्जा, पुतलिया, पक्षो और गवाक्ष इत्यादि से चित्रों की रचना होनी चाहिए । भिस्तिकार्य के साथ स्तम्भ,नागदन्त और वातायन आदि होना चाहिए । रंगशीर्ष में पर्वत, कन्दरा आदि का भी निर्माण होना चाहिए, दीवार पर चूने का लेप होना चाहिए, उस पर अनेक प्रकार के चित्रादि और बले, होनी चाहिए । इसी प्रकार विधिवत नियमानुसार प्रेमागृहों का निर्माण करना चाहिए।' प्रेक्षागृह का rur भाग दर्शकों के निमित्त सुरक्षित रखा जाता था और rur भाग नटों के व्यवसाय के लिए निश्चित रहना था । इसमें भी आधr भाग रंगपीठ कहलाता था, जिसके उपर अभिनय कार्य निष्पन्न होता था । सबसे पिछले भाग को रंगपीठ कहा जाता था और यहीं नटों के लिए नेपथ्य-विधान होता था । प्रेक्षागृहों के विभिन्न स्थानों पर नाना देवताओं की पूजा होती थी। इन आवयक विधानों का सम्पादन सूत्रधार का मुख्य कार्य होता था। यह बाम्भिक पूजन पूर्वरंग कहलाता था और यह एक विस्तृत व्यापार होता था । आजकल इसका अन्तिम अंश नादी के नाम से संस्कृत नाटकों में अब भी दिखाई देता है । साहित्यदर्पणकार आचार्य विनाथ के अनुसार नान्दी उसे कहते है, जिसके दवारा देव, ब्राह्मण, राजा आदि की बार्शीवाद से युक्त स्तुति की जाती है: अथवा आशीर्वाद युक्त स्तुति की जाती है अथवा बागीवाद और मस्त्रिया मे युक्त और काव्या की सूचना देने वाले नोक को नान्दी कहते है। । दृष्टव्य: भरतमुनि, बध्याय- १. बागीर्वचनसंयुक्ता स्तुतियमाव प्रयुज्यते । देवटिजन्पादीना तस्मान्मान्दीति साजता॥ साहित्यदर्पण- पृष्ठ 50.
226 फलत: नान्दी वह मंगलाचरणात्मक आशीर्वचनयुक्त श्लोक होते हैं, जिनसे काव्या की सूचना के साथ-साथ देवा जनृपादि की स्तुति की जाती है । संस्कृत नाटकों में नान्दीपाठ के अनतर भी पात्रों का प्रवा होता था । पूर्वरंग के अवसान में श्रोताओं के हृदयावर्जन के लिए संगीत का यथावत नाटकों में प्रयोग किया जातr था । इस अवसर पर गाए जाने वाले गीत का गायन विशिष्ट स्वर में विशिष्ट ताल तथा मात्रा के योग होता था । प्राचीनकाल में दर्शकों के बैठने के लिए आसनों का उचित प्रबन्ध होतr था। आजकल के समान दर्शकों के बैठने के लिए उस समय की गैलरी या सीढ़ीनुमा आसन की व्यवस्था आरचर्यजनक नहीं है । दर्शकों के बैठने के लिए उस समय सोपानाकृत आसान होते थे। भूमि से सोदिया एक हाथ सेवी रखी जाती थीं और इनका निर्माण लकड़ी तथा ईट की सहायता से क्या जाता थr | निवशनों की बनावट तथा व्यवस्था एसी होती थी कि कहीं पर बैठकर रंगपीठ के ऊपर अभिनय का सrerकार * PRAS 90 भलीभाँतिक्यिा जा सकता थr भारत का प्राचीन रंगमय यथार्थवादी होते हुए भी आदर्शवादी था। वहीं धोत्पादक अथवा उधाजनक दृश्यों का प्रदर्शन सर्वथा वर्जित था। रंगपीठ का भोजन तथा शयन युद्ध तथा बाक्रम आदि का प्रदर्शन सर्वधा वर्जित था, फिरभी अक्षयकतानुसार घोड़े-औराधी रंगमंच पर दिखलाये *RN इष्टवादानामा कार्यकाणी निवालय नाट्याव225.
227 जाते थे। प्राचीनकाल में घासफूस के बने पदार्थो को चमड़े से मढ़कर घोड़े या हाथी का रूप बनाकर रंगमंच पर दिखलाने की प्रथा थी । भारतीय रंगमंच के प्रभाव का वृहत्तर भारत की रंगशाला पर पड़ना कोई आश्चर्य की बात नहीं है। कम्बोज, जावा तथा स्थाम की रंगशालायें के भारतीय रंगशालr के समान होती थी। आज भी जावा में छाया-नाटकों का बहुत प्रचार है जो भारत के 'पु-तलिका नृत्य के समान ही प्रयोग में लाये जाते है । इस प्रकार जावा का साहित्य, नाटकों की विश्यवस्तु तथा प्रकार के समान अभिनय और प्रयोग के लिए भी भारत वर्ष का चरणी है । पूर्व रंग : प्रेक्षागृह को रचना के बाद नादयशास्त्र में रंगदेवता के पूजन का विधान बतलाया गया है । इसके पश्चात नाटक के अभिनय प्रारम्भ से पहले पूर्वरंग की व्यवस्था के नियम बतलाये गए है। पूर्वरंग वास्तविक अभिनय के पहले आता है, इसलिए सम्भवतः इसका पूर्वरंग यह नाम रखा गया है । इसमें मायकों का प्रका, गीतारम्भ, नाम्दीपाठ और वन्दना आदि का विधान सर्वप्रथम होता है। सबसे पहले रंगपीठ के मध्य में स्थित ब्रहमा का अभिवादन दिया जाता है और तब सूत्रधार वन्दना करने वालों के साथ प्रवेश करता है । नाट्यशास्त्र के नियमानुसार सर्वप्रथम प्राचीदिली वन्दना की जाती है जिसके स्वामी इन्द्र है, फिर दक्षिण परिचम और उत्तर दिशा की वन्दना होती है। तत्पश्चात पुनः शंकर, ब्रह्मा और विष्णु की वन्दना की जाती है इसके बाद सूत्रधार सस्वर नान्दीपाठ करता है और फिर विभिन्न गीतों में स्तुति की जाती है। इसके पश्चात विदुषक और सुधार १५० संस्कृत बालोचना : बाबार्य बन्देव उपाध्याय, 199संस्करण. पृष्ठ 4 228 अथवा नटी तथा सूत्रधार का ज्योपकथन होता है और रंग-सिद्धि के लिए काव्यवस्तु का निरूपण संक्षेप में किया जाता है । यहाँ का व्यवन्तु की प्रस्थापना के साथ कवि के नाम का भी अनुकीर्तन होता है ।। नादयशास्त्र की मान्यता है कि इस प्रकार पूर्वरंग का विधि- वतपालन करने से असंगत और अनिष्ट नहीं होता है। आचार्य मम्मट के अनुसार ही काव्य के अन्य प्रयोजनों के सासाथ एक मुख्य प्रयोजन शिवत- स्मोति' भी है । PO भरतमुनि प्रणोत नाट्यशास्त्र में रंगमंच की उपर कही हुई व्यवस्था के साथ-साथ अभिनय के विभिन्न अंगो, रूपों और विधाओं का अत्यन्त विषद और विस्तृत विवरण प्राप्त होता है, इससे यह प्रतीत होता है कि प्राचीनकाल में रंगमंच और नाट्यकला का कितना उत्कृष्ट विकास हो गया था । भरतमुनि बारा वर्णित इपसमद रंगमंच और उन्नत नादम कला को आधार बनाकर संस्कृत में अत्यन्त उत्कृष्ट नाट्यशास्त्र की रचना सम्भव हो सकी है। नाट्यशास्त्र में वर्णित प्रेक्षागृह और रंगमंच के सन्दर्भ में जब हम कविधर भाम प्रणीत वासवदत्ता का अनुशीलन करते है हमें विदित होता है कि कवि में तत्कालीन प्रेक्षागृह बोर रंगमंच का कोई संक्त नहीं दिया है। नाटककार भास के नाटक नान्दीपा के अन्त में सुधार के प्रयासे प्रारंभ होत नान्दीका कि नाटक के बारम्भ करने के पहले उसकी चियिसमाप्ति के लिए देवला आदि को जो स्तुति की जाती है उसे नान्दी कहते है ना मंगलागानवाचको मान्दी कहा जाता है। स्वच- बामान: डॉoभगीरथमिक,संस्करण-1980.पृष्ठ 112 भात : नाट्यास्त्र अध्याय-काय काव्यम् यतले व्यवहारविद शिवितरणातये । सबः परनिर्वतये कान्तामम्मितलयोपदेशपुणे काव्यप्रकारा 12.५०-10 कमा:- 229 वासवदत्तम् नाटक में नान्दो-पाठ रंगमंच में न होकर नेपथ्य में हुआ है । जबकि संस्कृत के अन्य नाटककार अपने नाटकों का प्रारम्भ नान्दी पाठ से ही करते है। अन्य नाटकारों से भास के नाटकों को यही विलक्षणता और विशेषता है। इसीलिए कविवर बाणभट्ट का कथन है कि नाटककार भाग के नाटक सत्रधार से प्रारम्भ होते है सत्रधार उस प्रधान अभिनेता को कहते है जो रंगमंच पर घटित होने वाली घटना को नियमित रूप से चलाता है । वह रंगमंच का अधिष्ठाता होता है । वह प्रस्तावना अथ्वा स्थापना मुख्य रूप से उपस्थित होकर नाटक का प्रारम्भ करता है और नाटकीय पात्रों को पाक्यक निर्देश देता है । नाट्य की उत्पत्ति के साथ उसके अनुष्ठान को सब कहते हैं, और उसको धारण करने वाला तथा रंगमंच के देवता का पूजन करने वाला और नाटक की कथावस्तु तथा उसके प्रमुख पात्रों का परिचय देने वाला नाटक का व्यवस्थापक कहलाता है । स्वप्नवासवदत्ता नाटक में हम देखते है कि सूत्रधार नाट्यशाला में प्रवेश करके दर्शकों को एक पद्य सुनाता है जिसमें वह कहता जिसमें वह कहता है कि उदय- कालीन बन्द्रमा के समान रंगवाली, अपनी प्रियतमr रेवती को मद्य देने वाली अथवा मदिरापान विशेष बलशाली, श्री तथा शुभ लग से सुसम्पन्न और बसन्तपतु के समान मनोहर बामदेव जी की दोनों भुजायें आप सभी दर्शकवृन्द की रक्षा करें ।' नाटकार भास सत्रधार के द्वारा प्रस्तुत श्लोक स मुद्राकार मान्यन्ते तत: प्रविाति सुत्रधारः । नवासवदत्तप.प्रथम अंक, पृष्ठ-1 'नन्दन्ति काव्यानि कवीन्द्रवालवा: पारिषदारच सन्तः।. •नान्दी। नाट्यदर्पण पष्ठ-10 सुत्रधार क्लारम्भमनाटी । बाण-वर्षरिता 1-15, पृष्ठ-5 उदयनोन्दुसवर्गवासवदत्तावली बलस्य त्वाय। पदमावतीर्णमुणों वसन्ती भयो पानाम स्वप्नवासवदत्ता 11.पछ? HARE 230 द्वारा बड़ी निपुणता के साथ नाटक के प्रमुख पात्रो उदयन, वासवदत्ता, पद्मा- वती बोर वतन्तक आदि का परिचय देता है । उन सभी पात्रों में उदयन- प्रधान पात्र है। । इसलिए सबसे पहले उसका ही नाम श्लोकों में निर्दिष्ट हुवा है । मुद्रालंकार उसे कहते है,जही प्रकृतार्थ बोधक शब्दों से सच्यार्य की सुचना मिल जाती है, अथवा उनाब्दी ते नाटक के पात्रों का बोधहो जाता यही यह कहना न होगा कि नाटककार भास ने सूत्रधार के माध्यम से भगवा३ बलराम का स्मरण कर जहा एक और मंगल कामना करते हैं, वहीं दूसरी जोर वे काव्या की सूचना हेतु नाटक के प्रमुख पात्रों का भी परिचय दे देत यह उनका नाटकीय चातुर्य है। इसके अनन्ता हली नाटक में नेपथ्य में लोगों के हटाने की याद आती है। सूत्रधार हटाने की इस आवाज को सुनकर उसका अर्थ समजाता है और कहता है कि मगधराज की पुत्री पदमावती के पीछे-पीछे चलने वाले प्रिय सेवकगण तपोवन में रहने वाले लोगों को कृष्टता- पूर्वक हटा रहे है।' यह कहकर का नाटक का सम्पूर्ण प्रसंग और संदर्भ दर्शकों के समानरूपित कर निकल जाता है,यही नाटक की सक्षिप्त स्थापना या प्रस्तावना है और यहीं से नाटक के प्रभा क का शुभारभ होता है । नाटककार भाम की इस संक्षिप्त स्थापना या प्रस्तावना से दर्शक अतिमी मुख्य कथावस्तु के सम्पर्क में बा जाते हैं। और झटिति नाटक की रसपर्वगा ने भगत । दर्शकों और भाटक के बीच में किसी प्रकार की कोई बाधा व उपस्थित नहीं करता है और नलम्ब-लम्ब वर्गनों से SANE सूत्रधारः भवतु विज्ञान ऋत्येनंगवराजस्य लिः सम्यागामिभिः अष्टमुत्लायत सर्वस्तपोवनगतो जनः स्वप्नवासवदत्तम् । 2.पष्ट 231 कोई व्यवधान ही उपस्थित करता है। यही भास के नाटकों की सर्वोपरि विणता प्रतीत होती है । रंगमंच पर, पात्र उपस्थित होकर कथावस्तु के अनुरूप अपमा अभिनय प्रस्तुत करते है और आकर्षित चित्तवृत्ति वाले दर्शक तत्परता के साथ नाटक की घटनाओं का आनन्द उठाते है। भास के नाटकों कोई जटिलता, कृत्रिमता और बाडम्बर नहीं है। इसीलिए भास के नाटक तत्कालीन समाज में अत्यन्त लोकप्रिय थे। नाटककार भास प्रस्थापना में अपने नाटक स्वप्नवासवदत्तन में अपने नाम का उलस और परिचय नहीं देते है। जबकि संस्कृत के अन्य नाटककार सुधार के दवारा अपना नामोल्लेख और थोड़ा परिक्ष्य अवश्य कराते हैं। उपर्युक्त दृष्टि से जब हम तापसवत्सराज नाटक का अनुशीलन और परिशीलन करते है तो हमें विदित होता है कि तापसवत्सराजस का सूत्रधार नटी प्रथम श्लोक जो सूत्रधार के देवारा कहा गया अपूर्ण है। उसकी केवल दो ही पवितया प्रस्तुत संस्करण में प्राप्त होती है। सूत्रधार इसमें नटी की सुन्दरता का प्रस्तुत कार्य में बाधा के रूप में वर्णन करता है । में कहता है कि रात के गुणों को प्रक्ट करने वाली वस्त्रभूषा मे तुम वासव- दत्ता का अभिनय करोगी और मे बलराज का अभिनय गर । नटी इस पर सुत्रधार पैलती है कि क्या सामाजिक तापलबत्सराज नाटक को देखना चाहते हैं। इस पर सुत्रधार कहता है कि इस समय बनता की चि सम्पूर्ण । स्वप्नवासवदत्तय-प्रस्तावना, पुष्ठ ।
232 भरपतियों में चन्द्रमा के सदृश महाराज नरेन्द्रवर्धन के पुत्र अनंगहर्षमातराज प्रणीत तापसवत्स राजस में है । यही सूत्रधार काव का विस्तृत परिचय देता है कि वह उत्तम आचरण वाला है और प्रत्येक क्षण गुणी लोगों को प्रसन्न करने में लगा रहता है.प्रियपात्रों को तो सदा अपने प्राण देकर भी सन्तुष्ट करना चाहता है। वह दूसरों के गुणों को देखकर जलता नहीं है । अन्य गुणी कवियों की रचनाओं को सुनकर वह रोमाक्ति हो जाता है । मूत्रधार कवि का परिचय देते हुए आगे कहता है कि उस कवि ने विहानों से प्रभावित एक 23.1 होकर ही इस नाटक ही रचना की है। किसी कवित्व के अभिमान से नहीं। यद्यपि वह व्याकरण, मीमांसा और न्यायशसिक शास्त्रों में तथा सभी भाषाओं परिचय में एवं सम्पूर्ण अंग विद्याओं में दा है ।। यह प्रतीत होता है कि तापसवत्सराजम् की प्रस्तावना में वह सौन्दर्य, और पैनापना नहीं है जो स्वप्नवासवदत्ता को प्रस्तावना में प्राप्त होता है। इसमें स्वप्नवासवदत्ता नाटक की भाति मुद्रालंकार के गरा नाटक के प्रमुख पात्रों का परिचय दर्शकों को नहीं दिया जा सका है । यहाँ पर तो सत्रधार सम्पूर्ण प्रस्तावना में कविवर अनग हर्ष-मातराज के व्यक्तित्व जोर बवत्व का ही वर्णन करता हुआ दिखाई देता है। जबकि भास अपने नाटक की प्रस्तावना में अपना नामोल्लख भी नहीं करते है। वस्तुत: इस म कवित्वाभिमानेन च व्यायढतसा । रचित नाटकमिदं स्वगोष्ठीभावितात्मना ।। पदवास्यामाणेषु सर्वभाषाविनिये । बंगावयासु मातु पर प्रवीण्यमानता ॥ तापसवत्सराजछ।.3, पृष्ठ 2-3.
233 नाटक में नाटक की कथावस्तु का शुभारम्भ नायक का वर्णन करते हुए कंचुकीय ही करता है । इस प्रकार हम देखते हैं कि रंगमंच में दोनो नाटकों के शुभारम्भ में प्रस्तावना में अत्यधिक अन्तर है । । स्वप्नवासवदत्त नाटक की प्रस्तावना जहाँ अधिक चमत्कारणी है,वहीं तापसवलराजा नाटक की प्रस्ता- - 403RDU बना चमत्कार शून्य प्रतीत होती है । अभिनय : नाटक में अभिनय का अतिशय महत्व है। नाटक में अवस्था की अनुकृति का प्रधान्य होता है ।' पात्र जिस मल व्यक्तित्व की अवस्था का अनुकरण करता है,उसका तदरुप सटीक अभिनय भी होना चाहिए । सटीक बभिनय से सामाजिकों को रसात में सहायता होती है और परस्पर तादात्म्य में स्थापित हो जाता है। सटीक और अनुरूप अभिनय से साधा- रणीकरण व्यापार के द्वारा सामाजिक को शीघ्र रसानुभीत होने लगती है । इसीलिए अभिनय का नाटक में अतिशय महत्व है । अभिनव गुप्त रम का संचार केवल रचनाकार एवं दर्शक में होता है, किन्तु धनंजय, अभिनेता अभी रस-संचार की स्थिति को स्वीकार करते है। यह सत्य भी है कि अभिनेता अभिनय-प्रक्रिया के भागों में स्वयं भी आनन्द की अनुभूति करता है । यदि उसके अनुकार्य रोचकता के तत्व विधमान है । अभिनय अनुकरण के अतिरिक्त स्वाधीन प्रजनशील कला है, बभिनेता अपने अनुकार्य चरित्र को V: अवस्थानुकृतिः नाट्या, रूपक 1.1. ० 04. १. डॉलरका : नाट्यकला प्रथम संस्करण पृष्ठ 38.
234 पहले अपने भाव और विस्तार के स्तर पर सर्जित करता है,फिर अंग, वाणी तथा आभूषा आदि के माध्यम से अभिव्यक्त करता है । वह अपने अनुकार्य के व्यक्तित्व के अभिनव आयाम उदघाटित और नव व्याख्या प्रस्तुत करता है। अभिनेता ही रंगमंच का वह सात साधन है औ अभिनय कौशल दवारा दर्शक को मंच से बांधे रखकर रचनाकार का सन्देश उस तक सम्प्रेषित करता है । M । नाटक यदि जीवन की अनुकृति है तो उसमें जीवन का आम अभिनेता ही समस अधिक उत्पन्न करता है । हम दूसरे शब्दों में कह सकते है कि अभिनेता एक और मूल व्या के व्यक्तियों का आरोषण निभाता है : और दूसरी ओर अभिनय द्वारा विविध प्रकार के भावों की अभिव्यक्ति देता हुआ, दर्शकों में उन भावों को जगाता हुआ, सारे नाट्य अनुष्ठान को रसमय त्रता है । आचार्य भरत ने अपने नाट्यशास्त्र में अभिनय शब्द के पद-पदार्थ को उद्घाटित क्यिा है, तदनुसार अभिपूर्वक नी धातु से अप्रत्यय होने पर अभिनय' शब्द निष्पन्न होता है, जिसका अर्थ है प्रयोग के माध्यम से नाटक के बर्थ का प्रत्यानित्य कराना । अभिनय शब्द का निर्वचन है- 'अभिनयत्ति- हृदयगतभावान प्रकाशयति इति अभिनय: ।' अर्थात अभिनय, मन के भावों को प्रक्ट करने वाली बामिक चन्टाजों दवारा किसी विषय अथवा व्यक्ति का अनुकरण करके प्रदर्शित करने की एक कला है। उपर्युक्त दोनों कथनों से यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि अभिनय 'अभिपूर्वस्तु सीधातुराभिमुख्यानाय । यस्मात्प्रयोग नयति तस्यादभिनयः स्मृतः । नाट्यशास्त्र 8.7 ।
235 का सम्बन्ध हमारे भाव और विचार जगत् से है, बाह्य वैष्टाओं का उत्स हमारा आन्तरिक जगत है, भाव और विचार की आन्तरिक प्रक्रिया की बाहयाभिव्यक्ति को ही अभिनय कहा जा सकता है, इस बाड्याभिव्यक्ति का उददेश्य भी दर्शक के मानस में उन्हीं भावो को जागृत करना है जिनसे उस बाहयाभिव्यक्ति का जन्म अभिनेता की चेष्टाओं में हुआ है । संस्कृत नाट्यशास्त्रियों के अनुसार अभिय मन के भावो की अनुमति कराने वाला तत्व है । अनुकरण में मोलिक उद्भावना का अधिक अवकाश नहीं दिखाई देता है, किन्तु अभिनय में उदास्त कलास्तर को प्राप्ति का विचार संनिहित है । भारतीय अभिनय परिकल्पना के द्वारा अभिनयकला आदि सर्जनशीलता का स्तर प्राप्त कर चुकी है। नृत्य एवं नृत्त: दशल्पककार धनक धनंजय ने 'नत्य ' और 'तत्त' को अभिनय के बन्तर्गत ही माना है । 'नृत्य में भावों का अनुकरण मुख्य रूप से होता है, जबकि वृत्त' में केवल बग-विप होता है जो ताल और लय पर आश्रित होता है । यहा यह स्पष्ट कर देना उचित है कि नृत्य और नादय भिन्न भिन्न है । नाट्य रसों पर आश्रित होता है और नृत्य भावों पर आश्रित होता है। इसलिए इन दोनों में विस्यभेद है । नृत्य शब्द की व्युत्पत्ति 'धातु में हुई है जिसका अर्थ है गाविप, इसमें बोगिक अभिनय की बकुलता होती है, जबकि नाट्य में चार प्रकार के अभाव पाये जाते है। डॉorgan: भाट्यकला प्रथम संस्करण, पृष्ठ 1. संस्कृत बालोचना : बल्देव उपाध्याय, पृ०17. 2. बन्यदभ्यावाय त्या-त्त तामल्याश्या । वाच पदाभिनयो मायाँ देशी तथा परम ॥ दरम्पक ।-9, पृष्ठ ..
236
नाटक वैवल भावों पर आश्रित न होकर रस-परक होते है।
काव्य के उस वाक्यार्थ से निष्पन्न होता है, जो काव्य में प्रयुक्त पदों के
अर्थप, विभाव, अनुभाव और व्यभिचारि-भावो के संपर्ग से युक्त होता है,
इसलिए नाटकों में वाक्यार्थ-रूप अभिनय पाया जाता है जो नाटकों को
रसाश्य होने की और भक्त करता है ।
नाट्य एवं नृत्य :
नाट्य शब्द की व्युत्पत्ति'र अवस्पन्दने' धातु से हुई है,जही
पर र धातु का अर्थ अवस्पन्दन अर्थात कुछ-कुछ चंचलता करना है, अत:
नादय में सात्विक अभिनय की बहुलता होती है, इसीलिए नाट्य-विशारद
'ट' कहलाते है। इसलिए नाटक वाक्यार्थ-रूप अभिनयवाला होता है और
• पदार्थ-स्प अभिनय वाला भिन्न होता
अभिनय के प्रकार :
-
नादया स्त्र के अनुसार अभिनय को निम्नावित चार भागों में
विभाजित किया गया है-जोगिक, 12 वाचिक आहार्य, 14 सात्विक,
इन चारों प्रकार के अभिनयों के शरा प्रस्तुत कथावस्तु ही दर्शकों के सामने
यथार्थ रूप दिखलता सकती है तथा उनका मनोरंजन कर सकती है ।
आगिक अभिनय:
ASHA
शरीर, शारीरिक बेष्टाबों तथा मुख के द्वारा नाट्यस्थितियों
का प्रदर्शन करना बागिक अभिनय कहलाता है। नाशास्त्र के अनुसार
शरीर के अन्तर्गत निर, कांद, डाक
पारर्व और वरण, कन्छ, भुजायें
H
दम्पद - परित्त । १, पृष्ठ 5-6
237 पीठ, उदर, उरू, जक, आखें भृकोट, नाक, अधरोष्ठ, कपोल, इन सबके अभिनय आगिक अभिनय के अन्तर्गत बात है। आचार्य भरतने अंगों.प्रत्यगो और उपागों, दृष्टि और विलास आदि के अभिनयों का सविस्तार र्गन अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ नाट्यशास्त्र में क्या है ।' वाचिक अभिनय : अभिनेता अपनी अभिनय प्रक्रिया में जो कुछ भी बोलता है,वह लब वाचिक अभिनय के अन्तर्गत आता है । आचार्य भरत के अनुसार वाचिक अभिनय नाट्य का शरीर है और यह कपन नितान्त सत्य भी है कि यदि दिली नाट्यकृति से उसके क्योपकथन को हटा दिया जाय तो उसकी नाट्य- संता ही समाप्त हो जावेगी । हम यह कह सकते है कि बहुत कुछ सीमा तक कथोपकथन यr वाचिक अभिनय में ही नाटक की रसरूप आत्मr निवास करती वैसे अभिनय के अन्य विभाग भी सम्भाषण के बर्थ को ही अभिव्यक्त करते है। पाक्ष्य दो प्रकार का होता हे- संस्कृत तथा प्राक्त । भी के पात्रों कीभाषा संस्कृत होती है तथा नीच श्रेणी के पात्रों की भाषा प्राक्त होती है । नाट्य का पाल्य कवित्वमय होता है। अत: उसके लिए दोषों का परिहार, तया अकारों का संग्रह करना नितान्त आवश्यक होता है कुछ विद्वानों के अनुसार अभिनय का सर्वस्व होता है - बौचित्य नाट्यशास्त्र अध्याय-05 वाच यत्नस्तु कर्तव्यो नाट्य स्वयं तनुः स्मृता । अंगनेषभ्यतत्वानि वयार्थ व्यायन्ति नाट्यास्त्र ।
238 का विधान । वस्तु जिस प्रकार की होती है, उसे उसी प्रकार से रंगमंच पर दिखलाना औचित्य की परिधि के भीतर आता है । । आचार्य भरत ने जो अपने ग्रर्थ नाट्यशास्त्र में अभिनय को समझने । अपने विचार अभि- व्यक्त किए हैं, वे बड़े ही साहित्यिक, सरस तया उपादेय है। अभिनेता को उनके विचार से उचित वा धारण करना चाहिए और देश के अनुसार उसकी गति और व्रिया होनी चाहिए । पाव्यगति प्रचार के अनुरूप होनी चाहिए तथा पाक्ष्य के अनुरूप अभिनय करना चाहिए । इस नियम के यथावत पालन करने से ही नाट्यकला में सिद्ध हो सकती है। ४.211 वाचिक अभिनय के भेद : 41 वाधिक अभिनय के तीन भेद है। सर्वश्राव्य, अनाव्य और नियतश्राव्य । सर्वबाव्य वे क्योपकथन है,जो सबके सुनने के लिए होते है, इस प्रकाशन भी कहते है, और प्राध्य वह कथन है जो सबके सुनने के लिए नहीं होता है, वह स्वगत या आत्मगत कथन कहलाता है । नियतव्य नाटक का वह कयो पक्थन है जो कुछ पात्रों के सुनने के लिए होता है और कुतु के लिए इस कथोपकथन के तीन रूप नाट्य स्त्र में बतलाये गये है । अबवारित नहीं । जनानतिक और आकाश भाषिल। अयवास्ति में जिस पात्र से बात न कहनी हो, उसकी और से मुंह फेरकर बात की जाती है । जनानतिक में जिससे बात न कहनी हो, उसके सामने विपताका हाथ करके अन्य पात्रों से । संस्कृत बालोचना 1957 संस्करण, पुण्ठ 3 2. इयत्य वचो यत्तन्तदात्मगतीमध्यते । इत्यस्य सविता भावस्त पात्मगतमेव । भरत-नागा स्त्र 26.82.83. . दरम्पक 1-66, पृष्ठ 3
NIRMANCE
239
बात कही जाती है । आकाशभाषित में पात्र आकाश को और मुंह उठाकर
क्सिी दर में स्थित व्यक्ति से, जिनका शरीर दिखाई नहीं देता, परोक्ष
में बात की जाती है, इस आकाश भाषित कहा जाता है 12
वाचिक अभिनय में भाषा का स्वरूप :
भाषा के स्वप के सम्बन्ध में स्वरूप से दो दृष्टिया प्राप्त
होती है। एक दाट लो अलंकार-वादियों की है,जो कविता में अलंकार
को अनिवार्य धर्म मानते है । चन्द्रालोकवार का क्यान है कि जो लोग अलंकार
-
से राहत शब्द और अर्थ तो काव्य मानते है, वैग्नि को उष्णता से रहित
क्यों नहीं मानते ।' अलंकारवादियों के अनुसार उच्च धरातल की अलंकृत
सुसज्जित भाषा ही उच्चानुभूति का माध्यम बन सकती है । जिस प्रकार
कोई रमणी अपने सम्पूर्ण आभूषणों से सुसज्जित होकर रसिकों को आकर्षित
करती है, उसी प्रकार वाणी अपने समस्त अलंकरणों से सुसज्जित होकर व्यंजना
शक्ति को प्राप्त कर "ध्वनि को प्रस्फुटित करती है।
दुसरे विद्वानों का मत है कि नाटक को यथाई धरातल में
जुड़ा हुआ होना चाहिए, इसलिए उसकी भाषा भी सरल स्वाभाविक उक्तियों,
सहज कमान पतियो. जटिल अनकारों से राहत बोर प्रसाद गुण सम्पन्न
होना चाहिए ।
A
SIC
। दशरूपक 1.65, पृष्ठ 3
2 दिब्रवीण्यवमित्यादि बिना पाब्रवीति यत् ।
श्रुत्ववानुक्तमयकस्तरस्यादाकाराभाषित ॥
दापक 1.67. पृष्ठ
चन्द्रानोक. पृष्ठ 1.
240 वस्तुत: नाटकों की भाषा के सम्बन्ध सम्यक् दृष्टि यही प्रतीत होती है कि उसे जहाँ तक सम्भव हो, स्वाभाविक और सहर होना चाहिए और भाव स्थिति के बिन्दु पर स्वाभाविक अलंकारों से युक्त रसात्मक कोतालवर्षक, सरल और प्रसाद-गण-युक्त होना वाहए । नाटक की भाषा में 'गागर में सागर' भरा होना चाहिए । नाटक के लिए वही भाषr 83tor आदर्श भाषा मानी जावेगा जो साधारण सरल दिखलाई देते हुए भी अत्यन्त प्रभावशाली हो । अभिनय की दृष्टिले भी भाषा को यही स्थिति आदर्श प्रतीत होतो है क्योकि भाका के प्रकृत बोर सामान्य होने से अभिनेता को उसके स्मरण, उच्चारण में सुविधा रहेगी और प्रभावी होने से वह उसके माध्यम से प्रेक्षक को रस-रल से बांधे रह सकेगा । सम्भापा का हृदयंगमी- करण अभिनेता को अपना सम्भाणसनानचाहिए बल्कि हृदयंगम करना चाहिए । सम्भाषणको रट कर बोलने में यह भय सदा बना रहता है कि वह उस ध्वनिसमूह का उच्चारण कर सका है अथवा नहीं जो उसे उस सम्बन्ध में उन्चारित करना था। वस्तुत: वाचिक अभिनय तो उन्धारण मात्र है. अर्थ की अभिव्यक्ति मात्र नहीं है। एक विशिष्ट भाव स्थिति का वाणीगत रूप ही वाचिक अभिनय है, क्योकि मलत: भावो का ही अभिनय होता है, सबभाषा को हृदयंगम करने के पश्चात अभिनेता को भावी स्थति का ध्यान रखने में सुगमता रहती है.फिर प्रत्येक शब्द के उच्चारण में सम्बन्धित स्वर, बलायात तथा अन्तरान का निर्णय स्वयं हो जाता है,इन्हीं के ध्यान वाचिक अभिनय में प्रभविष्णता उत्पन्न हो जाती है। सम्भाग के वारण में तीन नियमों का अनुपालन उसके प्रभाव प भवृद्धि कर देता है- मावात. खरमात्रा तथा अधि।
241
भारत ने अपने नाट्यशा में वाचिक अभिनय को प्रभावी बनाने
वाले अनेक उपादानों की वर्षा की है। उन्होन वाचिक अभिनय के अन्तर्गत
व्याकरण के नियमों, ध्वनियों के वर्गीकरण तथा काव्य लक्षणों की चर्चा की
है। आचार्य भरत ने भूषण, मार-संघात, शोभा, उदाहरण और हेतु इत्यादि
36 उपादान बतलाये है ।।
माट्यशास्त्र में वाचिक अभिनय के अन्तर्गत इस बात की भी
चर्चा की है कि किसी रस-प्रकरण में किस छन्द और किस अलकार का प्रयोग
होना चाहिए ।
वीर रस और भयानक रस के सम्बन्ध में आर्या
छन्द, रूपक तथा दीपक बलकार का प्रयोग होना चाहिए ।
नाटकीय प्रयोग
में आने वाली भाषा के सन्दर्भ में उनका कथन है कि शिष्टजनों को संस्कृत
भाषा का प्रयोग करना चाहिए और निम्न स्तर के जनों को प्राकृत भाषा
का प्रयोग करना चाहिए । नाट्यशास्त्र में बोलियों के प्रयोग की भी
चर्चा की गई। प्राक्त-भाषाओं
। प्राकृत-भाषाओं - मागधी, अवन्ती का प्राध्य
शौर्यसनी अर्धमागधी तथा अन्य विभाषाएँ ।
अन्त में आचार्य भरत ने बाटकीय सम्बोधनों की भी
विस्तार से चर्चा की है। देवताओं, बचायाँ तथा व्रतियों के लिए भगवन'
राजा के लिए 'महाराज' गुरू के लिए 'वाचार्य और वृद्ध के लिए 'ताव' कहकर
सम्बोधित करते है। ब्राह्मण राजा को किसी नाम से पुकार सकता है ।
वह मन्त्रियों को अमात्य और सचिव कह सकता है।
अन्य लोग इनको केवल
चार्य' शब्द सम्बोधित करते है। बराबर बाबी का नाम लेकर सम्बोधित
। भरतनाट्यास्त्र अध्याय-17
2. भरत : नादास्त्र, ध्याय-18
।
।
242
या जा सकता है ।
। इन्हें क्यस्य भी कहा जा सकता है ।
आदरणीय
व्यक्ति को 'भाव' तथा अपने में कुछ छोटे को मार्षक' या 'मा' कहकर
पुकारते है
रथवाहक अपने स्वामी को बायुष्मान कहता है और सन्यासी
को माधो' कहकर सम्बोधित किया जाता है । युवराज को स्वामिन या
भकारक कहा जाता है । अपने से छोटे पद वालो को सौम्य, आदि कहकर
पुकारते है । रिभ्य या पुत्र को वत्स, पुत्रक, पिता को तात, बौद्ध तथा
जैन, श्रमण को भदन्त कहते है। राजा विदुषक को 'क्यस्य ' कहकर पुकारता
वह रानी तथा उसकी सहेलियों को भवति' कहेगा । स्त्रिया विवाहित
होने पर अपने पति को कार्यपत्र' कहती है अन्यथा उन्हें 'आर्य' से सम्बोधित
करती है । बहानारी को अम्ब, राजा की पत्नी को स्वामिनी,तथा देवी,
अविवाहित राजकुमारीको भदारिका, बहिन को भगिनी, बेटी को वो,
इला इत्यादि शब्दों से
पत्नी को बार्थ, नारिया अपनी सहेलियों
सम्बोधित करती है।'
आहार्य बभिनय :
वस्त्र लम्बन्धी या बाभूषा सम्बन्धी नियमों को आहार्य
अभिनय कहा जाता है । अभिनेता दवारा अपने अनुकार्य की शभूषा धारण
करना नाटक में यथार्थ सष्टि के लिए अत्यधिक सहायक है। संस्कृत रंगमंच के
सन्दर्भ में यही कहा जा सकता कि उस पर जो दरय-सब्जा का विधान
था. वह यथार्थ का सामग्री दवारा बनुकरण न होकर अधिकाश: वाणी या
गवटाबा दवारा मिल कराया जाता था। उदाहरण
उदाहरण के लिए यदि
किसी नेता को अपनी भूमिका सब पर बढ़ने का अभिनय करना होता
1. भात : नाट्यास्त्र, न्याय 1.
243 था तो मंच पर अश्व न हो उपस्थित किया जाता था, अपितु अभिनेता अपनी वाणी और बोगिक चेष्टाओं द्वारा प्रेक्षकों तक इस सम्पूर्ण स्थिति का सम्प्रेक्षा कर देता था। यहां पर उक्त कथन का तात्पर्य यह है कि संस्कृत रंगमंच में यथार्थ का सबसे अधिक अनुकरण या तत्व वस्त्र विन्यास और अंग रचना में ही विद्यमान था । संस्कृत रंग-विधान में प्राय: लम्बे कथोप- क्यान और विवरणयुक्त दरयावली के वर्णन होते हैं। उपरेर अधिक दृश्य-सज्जा की आवयकता नहीं पड़ती थी। सम्पूर्ण दृश्य कल्पित करा दिया जाता इस प्रकार हम देखते है कि वाहार्य अभिनय में आभूषा का अत्यधिक महत्व था । आचार्य भरत ने अपने नाट्यशास्त्र में आहार्य अभिनय की विस्तृत चर्चा को है। पुरुषों के प्रकार के अलंकरण नारियो के अनेक प्रकार के अलंकरण तथा विविध प्रकार की अंग रचना तथा अलंकरणों के अनेक भदोपमेद नादयशास्त्र में वर्णित है ।। सात्विक अभिनय : यह अन्तिम प्रकार का अभिनय है जिसमें पुरूषों तथा स्त्रियों की नाना प्रकार की बेष्टाबो हाव और हेला आदि का प्रदर्शन दिखलायr जाता था, दूसरे शब्दों में हम यह कह सकते है कि अन्त:करण के विशेष धर्म सत्व से जन्म लेने वाले अंग-विकारों को रस प्रकरण में मात्विक अनुभाव कहते है। इन्हीं को मात्विक अभिन्य कहा जाता है.सात्विक अनुभवों की TA भरत: नाशास्त्र अध्याय 23, अलकाको 244 संख्या आठ है जो निम्नवत ह- स्तम्भ, स्वेद, रोमांच, स्वरभंग, कम्प, विवर्णत्व, अश्रु और प्रलय | सात्विक अनुभावों के अभिनय से अन्त:करण और शरीर का बिम्ब-प्रतिबिम्ब-भाव सम्बन्ध स्थापित हो जाता है प्राचीन भारतीय परम्परा के अनुसार अभिनय को रसाय माना जाता है । मुनिवर भरत का क्यन है कि इन रसों कोनाटक में नाना प्रकार के अभिनय से सम्बद्ध करके अभिव्यक्त किया जाता है ।। अभिनय के विविध पक्षों का मन्थन-विमन्धन, करने के पश्चात १८. जब हम नाटककार भाल प्रणात स्वप्नवासवदत्ता नाटक पर दृष्टिपात करते है,तो विदित होता है कि अभिनय की दृष्टिले यह एक सर्वश्रेष्ठ नाटक है । सर्वप्रथम आगिक अभिनय की दृष्टिले यह नाटक अपनी अठता प्रमाणित कर देता है। नाटक के प्रथम अंक में यौगन्धरायण जब मगध के तपोवन में पहुंक्ता है और वहा पर राजपुरूषों हारा मगध राजकुमारी पदमावती के आगमन पर उत्सारण की ध्वनि सुनता है तो वह कान लगाकर कहता है कि क्या इस तपोवन में भी लोगों को हटाया जाता है?' हती नाटक के प्रथम बैंक में तपोवन एक ब्रहमचारी का प्रवेश होता है, पर की ओर देखने का अभिनय करता है और कहता है कि मध्याहनकान हो गया है.यहा पर वह बाघों में जोगिक अभिनय कर रहा है। फिर वह वहीं पर पता है और अपने पैरों को इधर-उधर चलाता है जिससे उसके पैरों से अभिनय प्रकट होता है। इसके आगे ब्रामवारी तपोवन का HARNSAR . नानाभिनयस भावयन्ति मानिमा । भरतानाट्यशास्त्र, 06.35. योगन्धरायणे:-दन्त्या महायुत्लायत ! स्वप्नवासवदत्ता -पृष्ठ- ३. ब्रमवारी मनोव्यस्तो मध्याहन: परिणम्य भवतु दुष्ट । भितस्तपोवन भवितव्यया स्वप्नवासवदत्तप्र.बैंक-1.पृष्ठ 43.
245 अतिथिसत्कार स्वीकार करते हुए जल का आचमन करता है । इसमें उसका मुख संचालित होता है । जब वह ब्रहमचारी बतलाता है कि वासवदत्ता के जल जाने से उसके बजे हुए आभूषणों को कासे लगाकर राजा मुक्ति हो जाता है तो यह समाचार सुनकर वासवदत्ता रोने लगती है, उसकी आखों में बासू भर आते है।' राजा की मृा और वासवदत्ता का रूदन यह दोनों आगिक अभिनय है । ब्रहमचारी आगे बतलाता है कि मन्त्री स्माता राजा की तरह भोजन नहीं करता है और जिस प्रकार राजा निरन्तर रोत रहने से सब बहरे वाला हो गया है.उली प्रकार वह भी दुःख से शारीरिक संस्कार अर्थात स्नानादि क्रियाय नहीं करता है। यहाँ पर जागिक अभिनय का चमत्कार दर्शनीय है। नाटक के हितीय अंक में गेंद से गलती हुई पदमा- क्ती का मंच पर प्रवेश होता है । पदमावती अपने परिजनों के साथ और प्रच्छन्न वासवदत्ता के साथ है। वासवदत्ता गेंद खेलती हुई पद्मावती से बहती है कि सखी अधिक देर तक गद खेलने के कारण, लालिमा बढ़ जाने से ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे नवीन मेहदी लगी होने के कारण तुम्हारे हर मानी पराये हो गए। यहा पर हाथ का अभिनय अत्यन्त प्रभावशाली है। गदखलते हुए वासबदस्ता पदमावती के सुन्दर मुख की और टक्टकी लगाकर देख रही है, पदमावती इस पर कहती है कि सखी मेरी हसी उड़ाने के लिए मुझे क्यों ताक रही हो । इस पर वासवदत्ता कहती है कि सखी बाज तुम्हारा मुस बहुत अच्छा लग रहा है । अब में 4 ..
246 तुम्हारे वर का मुख जति निक्ट देख रही है । इसके अनन्तर घटी मचना देती है कि बाज शुभ ग्रह, महारानी कहती है कि आज ही कंगन बाधने का मंगलाचर सम्पन्न हो जाना चाहिए । इस पर वासवदत्ता अपने मन में कहती है कि जैसे-जैसे यह मेरे प्रियतम उदयन के साथ पदमावती की सगाई के लिए शीता कर रही है, वैसे- मेरा हृदय शना होता जा रहा है 12 विवाह के पश्चात वासवदत्ता बेटी से वर को सुन्दरता के विषय में पूछती है तो वह उस धनुषबाण से रहित कामदेव के रूप में चित्रित करती है । वासव- दस्ता उदयन के परकीय हो जाने पर अपने दुःख को दूर करने के लिए निद्रा का अभिनय करती है। नाटक के पंचम बैंक में यह विदित होता है कि राजा के वियोग में राजकुमारी पदमावती शिरोवेदना से पीड़ित है बोर समुद्रगृह में उसकी शपया बिछी हुई है । चेटी उसके सिर में लेप लगाने के लिए शीता से जा रही है, राजा जब वहां पहुंचता है तो ऐपया को खाली पाता है.वह उसमें लेटकर सो जाता है और वहाँ वह स्वप्न का अभिनय करता है। छठे अंक में राजा वासवदत्ता की मृत्यु पर जब शोक करता तो बंधकीय उमस कहता है कि मृत्यु के समय में कौन किसकी रक्षा कर सकता रस्सी के टुट जाने पर घड़े को कोन धारण कर सकता है । हाथ का अभिनय दर्शनीय है । अन्त में, यह कह सकते है कि इस नाटक में ॥ वासवदत्ता नाह माह हला! अधिकमशोभते । मतवा वरमुख पायाम नवासवदत्तय बैंक-2, पृष्ठ 2 वासवदत्ता-आत्मगतमा यथा यथा त्वरते तथान्धीकरोति में हृदया । प्रवासवदत्ता यातीय पृष्ठ 2 247 बनक स्थलों पर आगिक अभिनय के अनेक उदाहरण प्राप्त होते है । वाचिक अभिनय : वाचिक अभिनय में तो स्वप्नवासवदत्तम् अदितीय प्रतीत होता है। उच्च-पात्र संस्कृत-भाषा का प्रयोग करते है और निम्न-पात्र प्राकृत- भाषा का प्रयोग करते है। भाषा, सरल प्रांजल और प्रसादगुण-युक्त है । कयो पक्थन अत्यन्त प्रभावशाली और चमत्कारपूर्ण है । इसकौशली श्रोता के मानस पर संगीत के समान एक विशिष्ट प्रभाव छोड़ देती है । इसके कथोपकथन में भाव सम्बन्धी स्पष्टता का श्रोता के मन में सीधा प्रभाव पड़ता 1504 है कतिपय उदाहरण दर्शनीय है - वासवदत्ता बहो। अत्याहिता । आर्यपुत्रोडपि नाम परकीयः संवृत्तः । यावद् उपविवामि। धन्या बलु चक्रवाag:, याडन्योन्य- विहितान जीवति । न खल्वई प्राणान परित्यजामि । बार्यपुर्व परयामीति एतेन मनोरधन जीवामि मन्दभागा । .. इसी प्रकार इस नाटक में वाचिक अभिनय के एक से एक सुन्दर उदाहरण भी पड़े है जिन्हें विस्तार के भय से यहाँ प्रस्तुत करना सम्भव नहीं है । आहार्य अभिनय : आहार्य अभिनय की दृष्टिले भी यह नाटक प्रशंसनीय है । नाटक के प्रथम बैंक में ही परिव्राजक का वेष धारण किए हुए यौगन्धरायण बोर बावन्तका का वैव धारण किए हुए वासवदत्ता का प्रया होता है । VES । स्वप्नवासवदत्ता बैंक दलीय, पृष्ठ 83. १ ततः प्रविाति परिव्राजक्शी यौगन्यायणः बावस्तिकावाधारिणो वासवदत्ताच स्वप्नवासवदत्तम् बैंक-एक, पृष्ठ 248 इस प्रकार चौधे अंक में राजकुमारी पद्मावती और मालविका वेशधारिणी वासवदत्ता का प्रवेश होता है। नाटक के सभी पात्र यौगन्धरायण, ब्रहमचारी, राजा, विदूषक, वासवदत्ता, पदमावती और बेटी इत्यादि अपने-अपने अनुकार्य पात्रों का वेश धारण करके ही रंगमंच पर उपस्थित होते है । इस नाटक में रुपसजा पर भी विशेष ध्यान दिया गया है, इसलिए आहार्य अभिनय में भी इसकी श्रेष्ठता प्रमाणित हो जाती है । सात्विक अभिनय : सात्विक अभिनय में सात्विक भावों, हावो आदि का अभिनय आता है। भाव और रसों का अभिनय सात्विक के अन्तर्गत माना जाता है। इसदृष्टि में भी यह नाटक खरा उतरता है । इसी पात्र अपनेहाव, भाव की सुन्दर प्रस्तुति करते है और यही काण रस-मिश्रित विप्रलम्भ श्रृंगार अपनी सम्पूर्ण सुन्दरता के साथ प्रस्फुटित होता है । यह नाटक के प्रमुख पात्रों के अभिनय का ही परिणाम है । वस्तुत: नाटककार भास इस दृष्टि से सम्पूर्ण संस्कृत नाट्यसाहित्य में बैठ प्रतीत होते है उनका यह नाटक मञ्चन के सर्वथा एक सफल नाटक में जो गुण होने चाहिए वे सब इस विमान इसीलिए आलोचकों का यह सत्य प्रतीत होता है कि भास नाटक- उपयुक्त है। चढ़ के नाटक, परीक्षा के लिए अग्नि में डाल दिए गए किन्तु आलोचना की अनि स्वप्नवासवदत्त नाटक को नहीं बना सकी। अभिनय की दृष्टि से तापसवत्सराजय: जब हम अभिनय की दृष्टि में तापसवत्सराजन नाटक का अनुशीलन । भामाटक-पिके मिले पीमितम् । स्वप्नवासदत्तस्य बाबकोभुन्न पावकः राजाजर - काव्यमीमांसा.पृष्ठ 249 परिशीलन करते है तो विदित होता है कि यह नाटक स्वप्नवासवदत्तम की तुलना में उसके समकदा नहीं ठहरता । यद्यपि नाटककार अनंग हर्ष ने अपने इस नाटक में अनेक नाटकीय गुणों का समावेश किया है किन्तु लम्बे-लम्ब समानयुक्त गा खण्ड कादम्बरी के गाड की भौति क्लिष्ट और दुरूह होने के कारण इसकी अभिन्यता पर प्रश्नचिन्ह लगा देते हैं।' इसके अतिरिक्त तापमवत्सराज, शार्दाकोडित. अराधरा इत्यादि बड़े-बड़े छन्दों का अनेक बार प्रयोग क्यिा था है जिससे इस नाटक को अभिनयता मन्द हो गई है 12 इन उपर्युक्त कारणों से विचार करने पर यह प्रतीत होता है कि तापसवत्सराजय नाटक का महत्व रंगमंच की दृष्टि से अत्यन्त न्यून है, FOR फिर भी ऐसr प्रतीत होतr है कि नाटककार अनंगहर्ष का ध्यान रंगमंच की अपना रसपरिपाक की और अधिक रहा है क्योकि काव्य अथवा नाटक की पक आत्मा की रस ही है । दशरूपककार धानक धनंजय के अनुसार, रमाश्य होत है, उनमें रस का महत्व सर्वोपरि है। महामुनि भरत का भी अभिमत है कि रस के बिना कोई बर्थ प्रवृत्त नहीं होता है । इसलिए इस नाटक में जो करूण रस की निम्पत्ति हुई है और इस रस की जो अाधारा प्रवाहित हुई है, वह विवा भवभूति प्रणीत उत्तररामचरितम का स्मरण दिलाती है 1. कुवरक - ततः संभूर-कुन्त-प्रहारानुसारोपस्त-सुभ-प्रतिनियन्त्रित 21 तापलबत्सराजमक-उ.पछ 170-170. 2.वापसवत्सराज 13.5.6.7.12.14.15.16.19.21.22.23. 115.14.15.18. अपरान 3-3.5.7.9.10.11.12.15.16.17.18 4-7,9,11,12,13,14 *3,4,5,.: 61. 4.7.10.
250 इसीलिए पूर्ववर्ती अनेक काव्यशास्त्रियों ने इस नाटक के विभिन्न स्थलों और प्रसंगों का अत्यन्त आदर के साथ अपने अन्यों में उद्धरण दिया है । कहनr न होगा कि आन्नदवर्धन से लेकर भोजदेव तक सभी आचार्यों ने रस,भाव,ध्वनि और अलंकार आदि के परिपोच के लिए इस नाटक से अनकानक पद्यों और प्रसंगों को उध्दृत किया है ।' अभिनय की अपेक्षा इसमें करिव का कवित्व अत्यन्त चारुता के साथ प्रस्फुटित हुआ है । कभी कालिदास की कोमलकान्त पदावली की मधुरता और मादक्ता का इसमें अनुभव होता है; तो कभी भवभूति के उत्तर रामचरितम की करूण-रस-सिकत सुको मल-पदशयया सहृदयो' के हृदयों को आवर्जित कर रही है । अभिनय : - नाट्यशास्त्र में जो वागिक, वाचिक, आहार्य और सात्विक आदि अभिनय के चार प्रकार बतलाये गये हैं, उनको यपि कवि ने अपने इस नाटक में यथोचित रूप से अनुपालन करने का प्रयत्ल क्यिा है किन्तु उनके कवित्व ने उन्हें अभिनय की अपेक्षा अधिक प्रभावित क्यिा है । वत्सराज - - उदयन प्रथम अंक में जब बड़ी उत्सुकता और चिन्तr के साथ देवी वासवदत्ता को देखता है कि उसने नव केतकी दल की कान्ति से अपने कर्गों को सुशोभित नहीं क्या है, तब नायक की भवभगिमा देखते ही बनती है। इधर वासव- दत्ता के महामन्बी यौगन्धरायण की योजना के विषय में सोचकर अत्यन्त दुःखी और खेद का अनुभव करती है और यह कि भविष्य में चिरकाल तक बार्यपुत्र के दर्शन नहीं होग, आखो को अश्रुपूरित करने का अभिनय करती है, --- 1. तापसवत्सराजम - भूमिका, साहित्य भाडार, मेरठ प्रथम संस्करण 1969 पृष्ठ 28.
251 उधर वासवदत्ता को अग्नि में जल जाने की बात सुनकर राजा शोकाकुल होकर विरह का सुन्दर अभिनय करता है जिससे प्रतीत होता है कि इस नाटक आगिक अभिनय भी नादकोचित बन गया है । वाचिक अभिनय की दृष्टि से यह नाटक उच्चकोटि का है । वाचिक अभिनय में भाषा प्रयोग भाव,और अर्थ का प्रदर्शन देखा जाता है,यहाँ भी उच्च पात्र संस्कृत भाषा का प्रयोग करते है और निम्न पात्र, प्राकृत भाषा का प्रयोग करते है। भाव और भाव को दृष्टि भाव और भाव को दृष्टि से यह नाटक अत्यन्त चास्तर इ. का भाव पर और क्लाफा कालिदास और भवभूति का अनुवई है सौष्ठव, अर्थ को सुकुमारता. व्यंजनावृत्ति, ध्वनि और भाव की गम्भीरता इसके साहित्यिक मौन्दर्य का वर्धन कर रहे है। इस नाटक के प्रथम, द्वितीय, तृतीय, चतुर्थ और पंचम अंक साहित्यिक-सौन्दर्य के लिए पठनीय, रसनिष्यन्दी एवं हृदयावर्गक है । वाचिक अभिनय के अन्तर्गत क्योपान का अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान है । इस नाटक के क्योपधन भी अत्यन्त रसात्मक है । क्योपकथन के नाट्यशास्त्र में तीन भेद बतलाये गये है। सर्वश्राव्य, अाव्य, MADAR नाटककार ने इसमें योचित रूप से अत्यन्त चास्ता केसा कधनोय बधनों का मानना क्या है। विस्तार भय से यही धनोपकथनों के उद्धरण बानीय प्रतीत होते है। अस माह में हार्य अभिनय का भी अपना महत्व है, इसमें अनुकार्य की बाभूषा. बकरण, बाबादि को धारण क्या जाता है। इस नाटक का नायक राजा उदयन तापसका धारण करता है और 252 और नायिका योगिनी का वेष धारण किए हुए है। इस नाटक की द्वितीया नायिका भी व्रतवैष को धारण किए है ।' पद्मावती की दासी कोसनिका वत्सराज का चित्रपालक लाती है और पदमावती उसके पूजन का अभिनय करती है, वही पर तापसवाधारी राजा और परिव्राट् वषधारी विदृषक का प्रवेश होता है । पद्माजी राजा को देखकर जनान्तिक में कोसलिका से कहती है, वह वहा लज्जा, विस्मय और प्रेम का भी अभिनय करती है । विदृषक अपने हाथ में दण्डकाठ लिए रहता है । नाटक अन्त में नायक बोर नायिका दोनों ही बड़ी नाटकीयता के साथ चिताम प्रया माने का अभिनय करते है किन्तु योगन्धराया और विदूषक बड़ी नाटकीयता के साथ सम्पूर्ण बटनाचक्र का पटाक्षेप कर देते हैं और नायक नायिका का अन्त में मधुर मिलन होता है तथा नाटक का इस प्रकार सुन्दर पर्यवसान होता है।" सात्विक अभिनय की दृष्टि से भी यह नाटक सुन्दर है । मात्विक अभिनय के अन्तर्गत सात्विक हाव-भाव का अभिनय प्रदर्शित किया जाता है। आचार्यगा हावभाव और रसों का अभिनय सात्विक 1. ततः प्रविशति योगौचित वषा वालदस्ता गृहीताता च पदमावती । तापसवत्सराजम् बैंक-3, पृष्ठ 60 2. तापसवत्सराजम बैंक-3, पृष्ठ 9 3. विणकावर उपत्य भी व्यस्य । विनिवर्य साम्राकुल नबनु, या मे योगन्धरायणः । त्यालिगांव तापलबल्लराजय बैंक-7, पृष्ठ 24 253 अभिनय के अन्तर्गत मानते है। सात्विक अभिनय एक प्रकार सात्विक अभिनय एक प्रकार से सम्म आन्तरिक भावों का प्रकाशन है जो इस नाटक में अत्यन्त चास्ता और सफलता के साथ अभिव्यक्त हुआ है। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि अभिनय की दृष्टिसे भी यह नाटक सुन्दर है । यद्यपि इस दृष्टि 'स्वप्नवासव- दत्ता अप्रतिम प्रतीत होता है। 00000000000 000000000 0000000 00000 000 0
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उपसंहार
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254 नवम उपसंहार तापसवत्सराजम बोर स्वप्नवासवदत्तम् नाटकों के तुलनात्मक नाट्यशास्त्रीय अध्ययन से हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते है कि काव्य की अन्य अनेक विधाओं में नाटक का महत्व सर्वोपरि है, इसीलिए समीक्षक काव्यो में नाटक को अत्यन्त रमणीय मानते हैं। कुछ विद्वान तो नाटक को कवित्व RA की चरम सीमा मानते है। नाट्यास्त्रियों के अनुसार वस्तु, नेता और रस के मद से यपि नाटक दस प्रकार के होते है किन्तु नाटकों का मुख्य बाश्य रस ही है। जिस प्रकार भारतीय साहित्य के गुम्फन में रामक्या और श्रीकृष्ण कथा का योगदान रहा है, उसी प्रकार उदयन क्था ने भी भारतीय साहित्य को अनुप्राणित किया है । उदयन-कथा गुणादय-विरचित वृहतकथा में प्राप्त थी. किन्तु सम्प्रति वृहवक्था के लुप्त हो जाने के पश्चात क्या- तरितसागर और वृहतकथा मंजरी में इस कथा का उलय उपलब्ध है । रामकथा बोर ष्णया के पश्चात् यदि किसी अन्य क्या ने भारतीय कवियो', सिकों, सड़दयों और साधारण जनमन को उद्वेलित क्यिा है, मरस और अन्य बनाया है और सब्यनी हृदयतन्त्री के तारों को संकृत বেলতলা दरम्प 1 7. पृष्ठ 4
255
क्यिा है तो वह वत्सराज उदयन की ललित-कथा ही है ।
आज भी
उदयनवधा की मधुरता के गीतों की मंजु मनोहरध्वनि का गुजन सहृदयों
के में हो रहा है। प्राचीनकाल में कविकुल-गुरू-कालिदास ने अपनी
विवक्यिात रचना मेघदूतम में अवन्ती नगरी में उदयन वासवदत्ता
प्रणयकथा के मधुर रस में गोता लगाते ग्रामवृद्धों का उल्लेस करना नहीं
भले थे।
इस अमर प्रणय-कथा को आधार बनाकर विरचित संस्कृत
में अनक काव्यजातीय ग्रन्थ है किन्तु कविवर भास प्रणीत 'स्वप्नवासवदत्ता'
और अमाह-मालराज विरचित 'तापसवत्सराज ' इस सम्बन्ध में अतिशय
।
महत्व के है। उदयन
वासवदत्त
NP
प्रणयकथा वस्तुत: विशुद्ध कलावादी
और भनिरपेट विचारधारा का प्रतिनिधित्व करने वाली, साधारण जनों
के हृदयतल का स्पर्श करने वाली क्या रही है।
इस कथr में ललितकला
विस्तार और मानवीय
-
संवदनाबों की सहज अभिव्यक्ति हुई है । एक
तण का एक तरूणी के प्रति और एक ताणी का एक ताण के प्रति जी
बनन्य प्रेम. बिना किसी संकोच, मर्यादा और बाधा के इस कथा में
प्रस्फुटित हुवा है, वह लोक में यथाई की धरा से जुड़ा हुवा है ।
my
। प्राप्यावन्तीनुदयनकथा-कोविद्याम-हा।
मेघदूतम पूर्व-मध श्लोक संख्या 1 30.
256 इसीलिए इस कथा को आधार बनाकर विरचित नाटक - इय लोक में प्रसिद्धि की पराकाष्ठा को पराकर गए है । ऐसा प्रतीत होता है कि - प्राचीनकाल में वत्सराज उदयन, वासवदत्ता के प्रणय में आबद्ध होकर प्रेम के देवता के रूप में चर्चित हो गए थे। उनका यह अनुरागी व्यक्तित्व अवन्ति और वत्स प्रदेशों की सीमाओं को नापकर देश के एक छोर से दुसरे छोर तक चर्चित हो गया था । 'स्वप्नवासवदत्ता' और 'तापमवत्सराजम' नाटकों की रचना का हेतु विलासी और मारी नायक उदयन का अनिन्दय सुन्दरी नव- यौवना वासवदत्ता के प्रेम में डूब जाना है। वह समस्त राज्यकार्यों का adio परित्यागकर देता है और भार ही उसके जीवन का प्रयोजन बन जाता है। राज्य के प्रति उदयन की उदासीनता के कारण पाचाल नरेश बारूणि वत्सराज के विस्तृत भूभाग पर अधिकार कर लेता है। हटाने के लिए महामन्त्री योगन्धरायण इत्यादि मगध नरेश दर्शक की सहायता की अपेक्षा करते है और इसीलिए उदयन के साथ पद्मावती के विवाह की योजना बनाते हैं। स्वप्नवासवदत्ता नाटक की रचना का यही मूलाधार है | Pफर क्या है : नाटककार भास की कल्पनाशक्ति और कवित्व-शक्ति दोनों ने मिलकर इस नाटक को बड़ी रमणीयता के दत्तस्य दाहकोडमून्न पावकः । काव्यमीमामा राजरोबर पुष्ठ.
NEHA
257
साथ गम्पित क्यिा है ।
दूसरी ओर अनंग हर्ष मातराज विरचित नाटक तापस
वत्सराजम में उपलब्ध उदयन-क्या स्वप्नवासवदत्ता नाटक के कथानक
विचित भिन्न किन्तु समान प्रयोजन वाली
।
इस नाटक के प्रारंभ में
कंचुकीय और बेटी के कथनो
विदित होता है कि वत्सराज उदयन
विषयोपभोग शिथिलीकृत-विग्रह वाला हो गया है, जिसके कारण इसका
विवेक क्षीण हो माता है और इसीलिए वह यह भी नहीं जान पाता कि
पाचाल नरेश आरूणि उसके राज्य के कुछ भाग पर अधिकार कर चुला
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--
राज्य के प्रति राजा का यह उपेक्षा भावन्त्रियों को चिन्तित करता है।
मन्त्रीगण यहा भी राज्य की रक्षा के लिए एक राजनयिक योजना बनाते
है। इस प्रकार हम देखते है कि दोनों ही नाटकों में महामन्त्री
योगन्धरायण वत्सराज की रक्षा के लिए चिन्तातुर है। दोनों ही
नाटकों में महामन्त्री योगन्धरायण की राजनीति विषयक निपुणता, उसका
कूटनीतिक व्यक्तित्व और सर्वोपरि उसकी राजा के प्रति स्वामि भक्ति
का परिचय मिलता है। ऐसा प्रतीत होता है कि उस समय मन्त्रिवर
यौगन्धरायण चाणक्य के पर्याय थे ।
इधर दोनों ही नाटकों में वासवदत्ता के अग्नि में जल
जाने का मिथ्या प्रचार किया जाता है। दोनों ही नाटको मगध
तापमवत्सराज 16. पृष्ठ 2
स्वप्नवासवदत्तम बैंक-1 एवं?
258 राजकुमारी पदमावती के साथ उदयन के द्वितीय विवाह की योजनाएं । दोनों में ही विभक इस सम्बन्ध में राजा की सहायता करता है । दोनो ही नाटकों में महामन्त्री योगधरायण का राजनीतिक कौशल दर्शनीय है । स्वप्नवासवदत्त में यदि महामन्त्री योगन्धरायण मगध के तपोवन में वासवदत्ता को पदमावती के पास अपनी बहिन के रूप में रखते हैं, तो तापसवत्सराज में भी महामन्त्री योगन्धरायण ब्राहमणेवा में मगध बात है और वासवदत्ता को अपनी प्रोषित-पतिका बहिन बताकर पदमावती पास उसे रखकर चले जाते हैं। यही पद्मावतीतपस्विनी का वेष धारण किए है और वह राजा उदयन को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए तपस्या कर रही है। इन समान-बना-बनवाली और समान-प्रयोजन वाली क्या को आधार बनाकर इन दोनों नाटकों की रचना की गई है। यद्यपि दोनों के कथानक समान है लेकिन दोनों नाटकों में वन विविधता कल्पना-वार्य भावों की सुकुमारता और अर्थता मधुर-संयोजन भिन्न-भिन्न होने के कारण उनमें कोतहल, रमणीयता और नवीनता विद्यमान है । संस्कृत साहित्य के अनुशीलन परिशीलन से विदित होता है कि स्वप्नवासवदत्त नाटक के प्रणेता कबिवर भास की प्रशंसा परवर्ती संस्कृत साहित्य के गन्धों में निरन्तर प्राप्त होती है। कविकुलगुरू काबिदा भास के विस्व और उनके नाटकीय कौशल की भूरि-भीर प्रसा मत तापसवत्सराज बैंक-1, वं मानवकाग्निमित्रम प्रस्तावना पृष्ठ 259 ग-कानन-केसरी कवि-पंचानन बाणभट, कावाखर राजरोवर, प्रसन्न-रावकार कविवर जयदेव और वापति राज जैसे कविजन भास के व्यक्तित्व, कवित्व पर अपनी प्रतापूर्ण टिप्पणी करते है।' वस्तुत: भास का कृतित्व और व्यक्तित्व बहुत महान है । समीक्षकों ने अपनी । बालोचना की अग्नि में भास के तैरह नाटक झोक दिए थे किन्तु उनकी बालोचना की अग्नि स्वप्नवासवदत्ता नाटक को जला नहीं पाई 12 यह भास के अलोकिक कवित्व और उनके अमितीय नाट्य कौशल का प्रमाण है । दोनों ही कविवर और नाटककार भास एवं अनंग-हर्ष मात- राज संस्कृत साहित्य के देदीप्यमान मात्र है। दोनों ही नाटककारों की कतिया काल के गर्भ में विलीन होते-होते बची है। यह सौभाग्य और गौरव की बात है कि 190950में प्रसिद्ध प्राव्य-विधा-विरद और गवणक महामहोपाध्याय टी0 गणपति शास्त्री ने भास के लुप्त तेरह नाटकों को खोज निकाला था, जिसमें से सबसे सर्वचष्ठ नाटक एक स्वप्नवासवदत्त भी भास के सभी नाटकों में यह नाटक अद्वितीय है । रंगमंच, अभिनय बोर दृढ़कथा बन्ध में यह संस्कृत साहित्य की प्रशस्त रखना है इस अध्ययन से यह भी विदित होता है कि भास एक धर्म- सील ब्राहमण और उत्तर भारत के निवासी थे। स्वप्नवासवदत्ता भरत वाक्य सेविदित होता है कि कविवर भात नेहमालय और विध्या- । सपताकशाली भासी देवतुलरिव । बाण-हर्षचरितय..पष्ठ 08 भासो हाम: - जयदेव प्रसन्नरावा ।.22 १. स्वप्नवासवदत्तस्य दाबकोभून पाकः । काव्यमीमामा राजोवर - पृष्ठ 2 ganelynited 260 चल दोनों पर्वतो मध्य उत्तरी भारत के ही किसी भू-भाग को अपने जन्म लक्त किया था । वह अद्भुत पाण्डित्य और वित्व के धनी थे। उनकी प्रतिभा मौलिक थी तथा उनका मस्तक अत्यन्त उर्वर और रचनाओ था। उनका सम्भावित रचनाकाल 400 ई0 पूर्व रहा है ।' भास के नाटक प्रसाद, ओज और मार्य गुणों के पर्याय है। इसीलिए उनकी नाट्यकला आज भी श्रेष्ठ और प्रशंसनीय बनी हुई है । पात्रों के चरि-चित्रण में भी भास की मौलिकता प्रशंसनीय है । रस-निपत्ति में - भी वेनिपुर्ण है। इसीलिए जयदेव ने उन्हें कविता कामिनी' का 'हास' - कहा है, वस्तुत: भास ऐसे कवीश्वर हैं जिनके यशरूपी शरीर में जरा और मरण का भय नहीं है ।। दूसरी और तापसवत्सराजम् नाटक के प्रणेता कविवर अनंग हर्ष मातराज संस्कृत साहित्य के जाज्वल्यमान कवरत्न है, ये राजपुत्र है और उच्च-कोटि के कवि भी है। इनकी कृति तापसवत्सराजय के अनुशीलन विदित होता है कि कवि की बाणी धनीभूति प्रेम ले ओत-प्रोत है, उनमें सुजनता, सुकोमलता और हृदयदेश को स्पर्श करने वाले गुण विद्यमान है। कविवर भास को भौति नाटककार बनेग हर्ष भी उत्तर भारत के निवासी । इनका रचनाकाल अष्टम शताब्दी से बारहवीं शताब्दी तक प्रतीत होता है। अनेक काव्यास्त्रियों में इनके नाटक के पद्यों का । येकी नास्ति या: बाये जमरामरण भया । उदट-सागर गुरुदास चट्टोपाध्याय, कलकत्ता-1841, पृष्ठ 3 १. तापमवत्सराज- प्रस्तावना, पृष्ठ 105 261 अपने ग्रन्थों में उद्धरण दिया : इससे उनके कवित्व और वैदुश्य का परिचय मिल जाता है । जिस प्रकार भास-मादक-चक्र की खोज महा- महोपाध्याय टीगणपति शास्त्री ने की है, उसी प्रकार तापसवत्सराज नाटक की खोजका श्रेय श्रीयगिरि यति राज सम्पत्-िकुमार रामानुज ५ मुनि जी मैसर को है । वस्तुत: इस नाटक की मूल प्रति बर्जिन के एक विविद्यालय में सुरक्षित रही है और इस मूल प्रति को सर्वप्रथम उपलब्धि प्रो० हुन्टस को काश्मीर में हुई थी और उन्होन ही उसे बर्लिन विश्व- विद्यालय के पुस्तकालय में रख दिया था । पंजाब विवविद्यालय के संस्कृत विभाग के प्रो०-द्वय डॉ० देवीदत्त शर्मा और डॉ० इन्द्रदत्त उनियालके अथक परिश्रम से 1969 में इसका प्रकाशन किया था जो इस शोधप्रबन्ध का अध्ययन-विश्यीत नाट्य-ग्रन्थ है । नाटककार अनंग-हर्ष ने अपने नाटक तापसवत्सराज में प्राचीन और चर्चित कथानक को आधार बनाने के बाद ही इसमैनबीनता पैदा की है। इस नाटक में नायक उदयन और नायिका पदमावती क्रमास प" तापस और तपस्विनी के रूप में चित्रित किए गए है जो कवि की मौलिक कल्पना का परिचायक है। इस नाटक के अध्ययन में यह विदित होता है कि उदयन और वासवदत्ता का प्रणय सचमुच अलोक-सामान्य और युगान्तर व्यापी है। यह एक कालजयी मादयति है जिसमें विरह जोर तप से परिपूत, बनल ने अबग्य, सत्य प्रेम' का पावन और ललित मोहन रूप प्रस्फुटित हुया है।' 1. तापसवत्सराव साहित्य भाडार मेरठ-1969 संस्करण 262 भास और अनंग-हर्ष मातराज दोनों ही नाट्यकला में दुराल है किन्तु इस नाट्यकला प्रदर्शन में दोनों के दृष्टिकोण में अन्तर है । भात अपने नाटक में पाडित्य प्रदर्शन नहीं करते है जबकि दूसरी और अनंग-हर्ष मातराज ने अपने नाटक में अपने कवित्व और प्रखर पाडित्य का परिचय दिया है। उनके इस वेदुव्य प्रदर्शन से नाटकोयता में कुछ बाधr पड़ी है । यद्यपि उनके नाटक में नाटकीयता की छाया सर्वत्र विद्यमान है । शार्दल-विक्रीति जैसे दीर्घ उन्द और कुचरक के लम्बे लम्बे समामबाहुल्य गद्य नाटक की गति अकाद्ध कर देते है, फिरभी प्राचीन आचार्यों ने इस नाटक की भूरि-भूरि प्रशंसा की है। करूण और विप्रलम्भ रस पर आश्रित यह नाटक शताब्दियों तक चर्चित रहा है । वरि-चित्रण, संवाद-योजना, संवादों की भाषा,संस्कृत और प्राकृत भाषा के पाव्य दोनों ही नाटकों में अत्यन्त प्रभावपूर्ण ढंग से प्रस्तुत किए गए हैं, फिरभी स्वप्नवासवदत्तम् नाटक में संवादों की स्वाभाविकता बोर सरलता कहीं अधिक हृदय को स्पर्श करने वाली है । 00035 रस-निपत्ति की दृष्टि से दोनों ही नाटक प्रशंसनीय हैं। स्वप्नवासवदत्ता में विप्रलम्भ गार अपनी सम्पूर्ण वास्ता के साथ प्रस्फुटित हुधा है। वस्तुत: कविवर भास रसमिद्ध महाकवि है। इसीलिए उनके उनके नाटको दर्शक बोर पाठक रहते है और आनन्द विभोर हो जाते दूसरी और तापसवत्सराजा नाटक में वाण रस की 263 निष्पत्ति अत्यन्त सुन्दरता के साथ हुई है । नाटक के प्रारम्भ से लेकर अन्त तक करुण रस की अजन धारा प्रवाहित हो रही है जो हमें कविवर भवभूति के उत्तररामचरित' की याद दिला रही है दोनों ही नाटकों में कला पक्ष और भावपक्ष का सौन्दर्य अपनी सम्पूर्ण चास्ता के साथ प्रक्ट हुआ है, जहाँ एक और भास की शैली में प्रसाद, ओज और माधुर्य गुणों का साम्राज्य है । शब्द-सौष्ठव और व्यंजना का चमत्कार है, वहीं वे कहीं कहीं अपने मोनसे भी अधिक अर्थ - MPSC की अभिव्यक्ति करते हुए दिखलाई देते है। उनकी भाषा अलंकारों के अनावश्यक बोले दबी हुई नहीं है : किन्तु फिरभी उसम तेज, प्रभाव और कोतुहल विद्यमान है ; यद्यपि अलंकार कविता का अनिवार्य धर्म नहीं है, किन्तु फिरभी भात के नाटक में उपमा, अनुप्रास, व्यतिकर और अr- स्तर भ्यास इत्यादि अलंकार स्वाभाविक रूप से भाषा के प्रवाह में आ गए है। वै प्रकृति के वर्णन में लिदहस्त है। तपोवन में मध्यासमय का वर्णन अद्वितीय है। उनके नाटक में इतने सुन्दर सुभाजित वाव्यों का प्रयोग . हुआ है जिनमें जीवन की सत्यता प्रस्फुटित होती है, वे आधीपान्त कंठस्थ करने के योग्य है । .. छापतिरिव गछति भाग्यपतिः । स्वप्नवासवदत्तम् 14 बाक शक्ती रसितु मृत्युकाले । स्वप्नवासवदत्ता 6.10.
264 उदयन-वासवदत्ता प्रणय-कथा से सम्बन्धित तापसवत्स- राजय नाटक भो अपने अनेक काव्यजातीय गुणों के कारण शताब्दियों से विद्वानों के मध्य मान्य रहा है। इसीलिए आचार्य आनन्दवर्धन से लेकर हेमवन्द्र तक तथा राजोपर और आचार्य कुस्तक जैसे काव्यशास्त्रियों ने उनके नाटक के पद्यों का सम्मानपूर्वक उद्धरण दिया । इस नाटक में एक से एक सुन्दर अलकार, शब्द-सौष्ठव, वचनवद्धता और प्रकरण-वक्रता, अर्थ की रमणीयता बोर भाव की भव्यता देखते ही बनती है । अलंकारों के प्रयोग में कविवर अनंग-हर्ष मातराज अत्यन्त चतुर है, उनके अलंकार सरल, स्वाभाविक और रसानुगामी है। इस नाटक में कलापक्ष बोर भावपक्ष एक साथ प्रतिस्पर्धा करत प्रतीत होते है करुण रस के चित्रण में यह कवि द्वितीय भवभूति प्रतीत होता है । जैसे उत्तररामचिरत के नायक श्रीराम सीता के वियोग में आधोपान्त बाखों बासु भरे रहते है। उसी प्रकार तापसवत्सराज का नायक उदयन भी आद्योपान्त दन करता दिखाई पड़ता है । दोनों में अन्तर दिखाई यह देता है कि श्रीराम ने कभी दूसरा विवाह नहीं किया था, जबकि उदयन ने राजकुमारी पदमावती के साथ दूसरा विवाह भी कर लिया था किन्तु फिरभी इसका मन वासवदत्ता के प्रेम से एक an भी विलग नहीं होता है। भवभूति के बाद कण रस को इतना बधिक महत्व यदि किसी सपना के कवि ने दिया है तो वह कविवर अनंग हर्ष मातराज ही प्रतीत होते है। इनके काव्य में कविकुलगुरू 265 कालिदास के काव्यो ली जैसी मादकता और कोमलता प्रतीत होती है । इनके नाटक की भाषा करुण-रस-प्रधान विप्रलम्भ श्रृंगार के अनुकूल है। संस्कृत साहित्य में उदयन एक धीर ललित नायक के रूप में विख्यात है। वह विलासी और श्रृंगारी है। प्रतिज्ञा-यौगन्धरायण नाटक से विदित होता है कि वह प्रयोत की पुत्री वासवदत्ता को अपने साथ अपहरण कर ले आया था, इससे उसकी कामुकता और विलासिता का परिचय मिलता है। लेकिन यह नायक का नायिका के प्रति अनन्य प्रेम है, जिसके कारण उसकी अमरनायकों के मध्य गणना की जाती है । फिरभी ऐसे विलासी, कामुक और श्रृंगारी राजा वत्सराज उदयन को एक तापस के रूप में चित्रित करने का कार्य कविवर अनंग-हर्ष मातराज ही कर सकने में समर्थ है। वासवदत्ता के अनन्य प्रेम के कारण ही वियोग काल में Hai वैतापस के रूप में मंच पर दिखाई देते है। उनके जीवन में यह परिवर्तन कवि की अहितीय नाट्यकला का ही परिणाम है । यपि रंगमंच और प्रेक्षागृह के सम्बन्धमें इन दोनों नाटकों से साक्षात कोई जानकारी प्राप्त नहीं होती है किन्तु इतना अनुमान बवाय होता है कि उस समय नाट्य प्रेक्षागृह दर्शकों के अनुकूल और अपेक्षित साज-सज्जाले युक्त रहे होगे। दोनों ही नाटकों का प्रारम्भ यद्यपि सबधार से होता है किन्तु प्रस्तावना में भाल अपना नामोल्लेख नहीं करते हैं। जबकि नग 266 मातराज सूत्रधार के माध्यम से अपने व्यक्तित्व और कृतित्व का परिचय भान को प्रस्तावना में मुद्रालंकार के प्रयोग से जो सौन्दर्य और देते हैं। चमत्कार प्रतीत होता है । वह तापसवत्सराजम नाटक की प्रस्तावना में नहीं है । यपि दोनों ही नाटकों में आगिक,वाचिक, आहार्य बोर सात्विक अभिनयों का यथोचित सनि दिखाई देता है लेकिन नाटककार भासने प्रत्येक दृष्टि से अभिनय की चास्ता का जितना ध्यान रखा है, उतना कविवर अनंग हर्ष मातराज ने नहीं रखा है । भास के स्वप्न- वासवदत्त नाटक की मंचन के लिए विगन सर्वध उपयुक्त मानते है । भाषा, भाव, अभिनय, चात्राकन और नाटक का लघु आकार संस्कृत रंगमंच के लिए सर्वथा उपयुक्त है । इसलिए सम्भवतः सवप्नवासवदत्ता बालोचकों की परीक्षापी अग्नि में आज तक 'अदम्ब बना हुवा है। दुसरी और अभिनय की दृष्टि से तापतवत्सराज का उतना महत्व प्रतीत नहीं होता है। यद्यपि कवि ने अपने नाटक अपेक्षित नाटकीय गुणों का यथोचित समावा क्यिा है किन्तु दीर्घ छन्दी में निबद बड़े-बड़े नोको और कादम्बरी के गाड की भाँति क्लिष्ट जोर दुरूह बड़े-बड़े गव बडोम इसकी अभिनय-कला को विण्डित कर दिया है। उपर्युक्त कारणों से यद्यपि स्वप्नवासवदत्ता नाटक की तुलना में रंगमंच की दृष्टि सेवापसवत्सराज भाटक का महत्व कुछ न्यून 267 प्रतीत होता है किन्तु रसात्मकता की दृष्टि से यह नाटक अत्यन्त प्रशंसनीय है। ऐसा प्रतीत होता है कि कविवर अनंग-हर्ष ने नाटक को रसाश्य मानते हुए रस निष्पत्ति पर अधिक ध्यान दिया है ।। में रस का प्रमुख स्थान होने के कारण उन्होंने इसमें काव्यात्मकता अधिक प्रदर्शित की है । यपि तापसवत्सराज नाटक में नाटकीय गुण भी प्रचुरता में विद्यमान है, फिरभी इस अध्ययन से यह निष्कर्ष निकलता है कि इसमें स्वप्नवासवदत्त नाटक की तुलना में नाटकीय गुणों की अपेक्षा काव्यात्मक गुणों की प्रधानता अधिक है। दोनों ही नाटक चतुर्वर्ग-पर-प्राप्ति के हेतु होने के साथ- साय आनन्द निष्पन्दी है। सौभाग्य से रंगकर्मियों और कलाकारों की इन दोनों ये दोनों प्राचीन सास्कृतिक और साहित्यिक धरोहरें काल के गर्भ में विलुप्त होने से आज भी हमें सुरक्षित रूप में उपलब्ध है नाट्य-कृतियों का तुलनात्मक अनुशीलन सचमुच सब: परमानन्द की प्राप्ति कराने वाला है। 000000000 00000000 00000 000 000 00000 0000000 000000000 । रसाश्या.दशरूपक 1.7.संस्करण-1967, पृष्ठ- 04. Patel ar स बी
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सह य क ग न्य
सूची
तापसवत्सराजम
अनंग हर्ष मातराज
स्वप्नवासवदत्तम
**
प्रतिज्ञा-योगन्धरायण
भास नाटकचक्रम
प्रतिमा नाटकम
अभिषेकनाटकम
भास
बालचरितम
भाल
पंचरात्र
भास
मध्यमव्यायोस
इतवा क्या
इतघटोत्क्या
वर्णभारम
अविमारकम
..
अभिज्ञानशाकुन्तला
कालिदास
12101
मालविकाग्निमित्रम
कानिदान
का
269 विक्रमोर्वशीयम कालिदास उत्तररामचरितम .. भवभूति अनराधवम् मुरार महावीर चरितम भवभूति . मृच्छकटिका *. विशाखदत्त वेणीसंहार भट्टनारायण रत्नावली श्री हर्ष प्रियदर्शिका श्री हर्ष श्री हर्ष पालतीमाधव मिनिकाय .. बुधव हर्षचरितम भेषदत .. কালিম 154 कथासरित्सागर .. सोमदेव क्षेमेन्द्र वृहत्वयामंजरी वृहत्वधारमोवसंग्रह दिटनीमत दामोदर गुप्त "YEU ध्वन्यालोक बानन्दवर्धनाचार्य 270 प्रत्याभिवादर्शिनी अभिनव गुप्त नाट्यशास्त्र : भरतमुनि काव्यमीमांसा राजशेखर अलंकारसर्वस्व .. काव्यप्रकाश वक्रोक्तिजीवित सरस्वतीवाठाभरणम .. भोजदेव दशरूपक धनवधनंजय साहित्यार्पण: জৱিা ক্ষিপ্ত संस्कृत नाटक ए०बी०कीथ काव्यालंकार सत्रवृत्ति गरडकहो वाक्पतिराज संस्कृतसाहित्य का इतिहास .. ए०बी०कीय, अनुवादक- मंगलदेव शास्त्री संस्कृत साहित्य का इतिहास बन्देव उपाध्याय संस्कृत साहित्य का इतिहास वाचस्पति गैरोला अक्टव ऊमा-माम जयकिसानलाल खण्डेलवाल संस्कृत बालोचना संस्कारतिहास प्रोसरस्वती प्रसाद चतुर्वेदी पखजाकभास : जयदेव नाट्य दर्पण रामचन्द्र तथा गुणवन्द्र प०डी०पुसानकर कौटिस्य शास्त्र कुमारसम्भवम कालिदास कालिदास राय उदभ्सागर उटाचार्य काव्यानुशासन संस्कृत साहित्य की रूपरेलr चन्द्रशेखर शास्त्री धर्मशास्त्र का इतिहास पी०वी०काणे पाणिनीव शिar पाणिनि नाट्यकला डोर नाटकों का विकास .. डॉoसुन्दरलाल श ए ब्रिटिकल स्टडी आफ भास गणपति शास्त्री डॉoभागीरथमिब वेदव्यास रामायण बाल्मीकि श्रीमदभागवत महापुराण वेदव्यास भारतीय काव्यशास्त्र की परपरा: डroनगेन्द्र संस्कृत बाग्मय का विधानात्मक: डॉ० सूर्यकान्त संस्कृत साहित्य का इतिहास डॉ० कपिलदेव शिवदी वाममशिवरामवाट.दिल्ली
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हिन्दी विश्वकोश
नगेन्द्र वसु
..
राधाकान्तदेव वाराणसी
कालिदास ग्रन्थावली
आचार्य सीताराम चतुर्वेदी
भारतीय साहित्य का इतिहास :
विन्टर निट्स
सागरिका शो-पत्रिका
सागर विवविद्यालय
दुर्वा शोध-पत्रिका
म०प्र०संस्कृत अकादमी
भवन्स जर्नल, चौपाटी :बम्बई :
सम्पादव-डाroभास्कराचार्य
त्रिपाठी
अनल आफ भाण्डारकर बोरियन्टल रिसर्च इन्स्टीट्यूट आफ पूना
: जर्नल आफ गंगानाथ ar रिसर्च इन्स्टीट्यूट, इलाहाबाद
: इण्डियन इन्टीक्वेरी रिसर्च जर्नल एवं अन्य शोध-पत्र पत्रिकाएँ ।
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