Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Radar Work Like This
Front matter
ए. डब्ल्यू. * पृथ्वी मानव संसाधन विकास मंत्रालय (शिक्षा-विभाग) भारत सरकार द्वारा स्वीकृत हिन्दी में विज्ञान की विश्वविख्यात सचित्र पुस्तकें * आधुनिक विज्ञान के महान अन्वेषक पैट्रिक प्रिगल * कार्यरत आधुनिक वैज्ञानिक एलिस * जिन्होंने दुनिया बदल दी एगॉन लार्सन * जिन्होंने भविष्य बनाया एगॉन लार्सन * विज्ञान का सहज बोध डॉ.जे. ब्रोनोस्की * दैनिक जीवन में विज्ञान I-III टी. ए. ट्वीडल * विज्ञान की कहानियां I-IV ए. सक्लिफ और ए. पी डी सक्लिफ़ * विज्ञान परिचय 1-8 (सजिल्द) एम. अडरवुड * आदमी कैसे बना? डॉ. आई. डब्ल्यू कॉर्नवाल मानव एक: रंग-रूप अनेक रॉबिन क्लार्क उष्ण कटिबंध के प्राणी ई. एम. पी. वाल्टर्स * अतल गहराई में जीवन मॉरिस बर्टन ★ हमारा ग्रह: डॉ.रोनाल्ड फ्रेज़र आर एस. स्कोरर * ज्ञानेन्द्रियों का संसार जे.डी कार्थी * प्रकृति और मानव जॉन हिलैबी * आधुनिक जीव-विज्ञान सी. एच. वाडिंगटन * खगोल-विज्ञान के महान क्षण आर्ची ई. रॉय * टेलिविजन (एक अद्भुत अविष्कार) जीन और रॉबर्ट बैन्डिक * रेडार एगॉन लार्सन * ध्वनि-अभिलेखन क्लैमेंट ब्राउन * परमाणु जॉन रोलैण्ड * हेलिकॉप्टर बेसिल आर्केल और जॉन डब्ल्यू. आर. टेलर * ट्रांजिस्टर एगॉन लार्सन * जेट-यान जॉन डब्ल्यू आर. टेलर * रॉकेट और अन्तरिक्ष-यान जॉन डब्ल्यू. आर. टेलर * रेलगाड़ी डेविड सेट जान टॉमस * कैमरे की कला मारिम के किड * परिवहन *. मौसम एगॉन लार्सन
रेडार
RADAR
WORKS LIKE
THIS
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मानव संसाधन विकास मंत्रालय (शिक्षा-विभाग) भारत सरकार द्वारा स्वीकृत
रेडार
एगॉन लासन्न
अलंकार प्रकाशन
666, झील, दिल्ली-110051
Hindi Translation of 'RADAR Works Like This'
by Egon Larsen
By arrangement with
J. M. Dent & Sons Ltd., London
केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय (शिक्षा-मत्रालय) भारत सरकार के सहयोग से
कार्यान्वित 'लोकप्रिय पुस्तको की प्रकाशन योजना' के अंतर्गत स्वीकृत एवं
कैपिटल बुक हाउस दिल्ली के निमित्त अलंकार प्रकाशन से प्रकाशित
मनुवादक:
शैलेन्द्र
पुनरीक्षक :
के. एन. दुबे
पचास रुपये (50.00)
संस्करण
दसराः 1990
प्रकाशक
अलकार प्रकाशन
666 भील, दिल्ली-110051
शादेरी प्रिन्टर्स प्रा. लि., नई दिल्ली-110002
दो शब्द हिन्दी के विकास और प्रसार के लिए शिक्षा तथा युवक-सेवा मंत्रालय के तत्वावधान में पुस्तकों के प्रकाशन की विभिन्न योजनाएं कार्यान्वित की जा रही हैं। हिन्दी में अभी तक ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में पर्याप्त साहित्य उपलब्ध नहीं है, इसलिए ऐसे साहित्य के प्रकाशन को विशेष प्रोत्साहन दिया जा रहा है। यह तो प्रावश्यक है हो कि ऐसी पुस्तकें उच्च कोटि की हों, किन्तु यह भी जरूरी है कि वे अधिक महगी न हों ताकि सामान्य हिन्दी पाठक उन्हें खरीदकर पढ़ सकें। इन उद्देश्यों को सामने रखते हुए जो योजनाएं बनाई गई हैं, उनमें से एक योजना प्रकाशकों के सहयोग से पुस्तकें प्रकाशित करने की है। इस योजना के साधीन भारत सरकार निश्चित संख्या में प्रकाशित पुस्तकों को प्रतियां खरीदकर उन्हें मदद पहुंचाती है । प्रस्तुत पुस्तक इसी योजना के अन्तर्गत प्रकाशित की जा रही है। इसके अनुवाद प्रौर कापीराइट इत्यादि की व्यवस्था प्रकाशक ने स्वयं की है तथा इसमें शिक्षा तथा युवक-सेवा मंत्रालय द्वारा निर्मित शब्दावली का उपयोग किया गया है। हमें विश्वास है कि प्रकाशकों के सहयोग से प्रकाशित साहित्य हिन्दी को समृद्ध बनाने में सहायक सिद्ध होगा और साथ ही इसके द्वारा ज्ञान-विज्ञान से सम्बन्धित अधिकाधिक पुस्तकें हिन्दी के पाठको को उपलब्ध हो सकेंगी। प्राशा है, यह योजना सभी क्षेत्रो में लोकप्रिय होगी। win केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय शिक्षा तथा युवक-सेवा मंत्रालय निदेशक
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8 ... ... 10 विषय-सूची रेडार क्या है ? रेडार द्वितीय विश्वयुद्ध में रेडार-तरंगों के बारे में में उपस्कर ययार्थ गति रेडार 12 रेडार समुद्र 14 14 20 21 ... बन्दरगाह रेडार ... 30 ... 31 ... 33 34 35 37 39 40 रेडार प्रत्येक काम में उपयोगी रेडार व्हेल का शिकार करने वालों की मदद करता है रेडार काँगो नदी में नौचालन में मदद करता है रेडार चैनल में तैरने वालों की भी मदद करता है वर्ष में नौचालन समुद्री स्टेशन रेडार गति-पाश रेडार हवा में एयर-लाइनर को 'नीचे उतारना अन्धी उडान और अन्धा अन्तरण बादल और पाधा सम्बन्धी चेतावनी रेडार द्वारा चार्ट बनाना मंचालन सहायक-साधन रेडार और हमारी दुनिया मौसम की भविष्यवाणी रेडार अन्तरिक्ष में रेडार-कार्य में प्रशिक्षण की व्यवस्था पारिभाषिक शब्दावली 40 46 48 50 52 ... 56 56 62 66 68 रेडार क्या है? शब्द 'रेडार' (RADAR) एक नया और बनावटी शब्द है। यह 'रेडियो डिटेक्शन एण्ड रेंजिंग' (Radio Detection And Ranging) का संक्षिप्त रूप है। द्वितीय विश्वयुद्ध के मध्य तक इसे 'रेडियो-लोकेशन' (radio-location) कहा जाता था। उसके बाद इसे रेडार कहा जाने लगा। 'रेडियो द्वारा संसूचन और परासन' वाक्य से स्पष्ट हो जाता है कि रेडार का उपयोग किस काम में हो सकता है। इसके तीन मुख्य काम है : यह पानी के जहाजों और वायुयानों को उनके मार्ग में आने वाली वाधा के बारे में चेतावनी देता है और उन्हें टकराने से बचाता है। यह कठिन परिस्थितियों में जहाजों और वायुयानों का मार्ग- निर्देशन (navigation) करता है। प्रायः ऐसी परिस्थितियाँ तटवर्ती पानी में, भीड़-भाड़ वाले बन्दरगाहों में, पहार्डी के ऊपर उड़ान करते समय और जटिल अवतरण के समय पंदा होती हैं। यह ह्वेल-मछलियों, हिमर्शलों, संकट में या तूफ़ान और वृष्टि में फंसे जलयानों का पता लगाने में जहाजों और वायुयानों की मदद करता है। इनके अलावा अनेक अन्य कार्यों में भी रेडार का उपयोग होता है जिनमें सबसे अधिक दिलचस्प कार्यों का वर्णन इस पुस्तक में किया जायेगा। रेडार का आविष्कार अपेक्षाकृत हाल ही में हुआ है। इसका आवि- प्कार ब्रिटेन के वैज्ञानिकों के एक दल ने सर रॉबर्ट वाट्सन-वाट के नेतृत्व में द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान और उसके पहले के वर्षों में किया। किन्तु इसका सिद्धान्त पुराना है। वास्तव में प्रकृति ने इसका विकास करोड़ों वर्ष पहले कर दिया था जिसके फलस्वरूप दूसरी वस्तुओं से टकराये विना चमगादड़ों को रात में उड़ने में सहायता मिलती है। वे चरमराहट के लघु स्पंद भेजते हैं जिसे ३ केवल वे ही सुन सकते हैं, हम नही सुन सकते। किसी बाधक वस्तु से टकराने के फलस्वरूप लौटी प्रतिध्वनि को वे सुन लेते हैं । उसी प्रकार रेडार भी रेडियो तरंगों के लघु स्पंदों को भेजता है और ठोस वस्तुओं से टकराने के बाद लौटी प्रतिध्वनियों को पकड़ लेता है । इस तरह रेडार दूर-स्थित वस्तुओं का पता लगाकर उनकी दिशा और परास मालूम करता है। रेडार का निर्माण अत्यधिक वैज्ञानिक और तकनीकी अनुसन्धान के फलस्वरूप हुआ। इससे सम्बन्धित अधिकांश अनुसन्धान कार्य सन् 1880 के वाद हुआ। इन अनुसन्धान-कार्यों में विद्युत्-चुम्बकीय तरंगों की खोज तथा उन्हें उत्पन्न और ग्रहण करने वाले उपकरणों का आविष्कार; परमाणु की छोटी-सी दुनिया की खोज, और इलेक्ट्रॉन का अध्ययन एव खोज, धाराओं के उत्पादन और प्रवर्धन के लिये वाल्वों का आविष्कार; बेतार टेलीग्राफी और टेलीफोनी अर्थात् रेडियो का आविष्कार; और, अन्तत', अनन्त सूक्ष्म कालान्तराल और अत्यन्त उच्च आवृति को ठीक-ठीक मापने वाले इलेक्ट्रॉ- निक उपकरणों का विकास आदि सम्मिलित हैं। द्वितीय विश्वयुद्ध मे रेडार से मित्र-राष्ट्रों (Allies) को उनके शत्रुओं की अपेक्षा बहुत लाभ हुआ; आजकल इसका उपयोग समुद्र और हवा में शान्त मार्ग-निर्देशन के लिये होता है। ,
WAR-TIHA
SCANXER
रेडार द्वितीय विश्वयुद्ध में
सन् 1935 में रेडियो-स्थाननिर्धारण सम्बन्धी
प्रयोगों को आरम्भ कार सर रॉबर्ट वाट्सन-वाट का
विचार हवाई-युद्ध में एक नये ढंग की प्रतिरक्षा प्राप्त
करना था; युद्ध छिड़ने पर यह रेडार का प्रमुख काम
हो गया। भूमि स्थित रेडार-स्टेशन चैनल में ही शत्रु-
छापामारों का पता लगाते थे और ब्रिटिश लड़ा
विमानों को उनकी ओर भेज देते थे। इस प्रकार पुरकातीन स्कनर
रेडार की महायता से ब्रिटेन की लड़ाई जीतने में मदद मिली।
इसके बाद रेडार दिन मे बममारी करने वाले वायुयानों को आधात
पहुंचाने में सहायक हुआ । इप्समे इतनी अधिक हानि हुई कि आक्रमणकारी
को दिन के बजाय रात में बममारी करनी पडी; किन्तु रेडार ने ऐसी
मदद की कि उन्हें रात की यममारी भी बहुत महंगी पड़ी। ब्रिटेन के रात
में लड़ने वाले वायुयानों के कॉकपिट में रेडार-सेट लगे रहते थे जिसकी
मदद से पायलट को अपना उड़ान-लक्ष्य साफ़ दिखाई देता था।
एक अन्य प्रकार का रेडार-उपकरण सर्चलाइट के साथ लगा रहता
था। इससे उन्हें लक्ष्य का पता लगाने और अपनी रोशनी दिखाने से पहले
स्वय मार्ग-अनुसरण करने में मदद मिलती थी।
RADAR SCREEN IN
FIGHTER COCKPIT
तडाकू वायुमान के कॉकपिट में रेडार-पर्दा
io
समुद्र में, रेडार, सतह पर छापा मारने वाले जहाजों और रात में हवा लेने के लिये समुद्र के ऊपर आने वाली पनडुब्बियों का पता लगाता था । यह कुहरे में भी उतनी ही आसानी से पता लगा लेता था जितना दिन के प्रकाश में 1 जहाजों मे.लगा रेडार काफ़िले के जहाजों को काफ़िले से अलग होने से बचाता था। समुद्र की सतह से लगभग 600 फुट ऊपर डोवर की चट्टानों पर एक आक्रमण-रोधी रेडार-स्टेशन स्थापित किया गया था। यह सेट 10-सेंटिमीटर की लम्बी तरंगों के साथ काम करता था और इससे फ्रांस के समुद्र-तट का चित्र स्पष्ट दिखाई देता था। एक दृष्टि डालने से ही डोवर जलडमरूमध्य के बहुत बड़े क्षेत्र मे सारे जहाजों की स्थिति का पता लग जाता था और अत्यन्त अनुकूल वातावरण में तो प्रचालक बोलोन बन्दरगाह के बाहर नौचालन वोयाओं (navigational buoys) को भी देख सकता था ! उस समय फांस पर जर्मनी का अधिकार था; उन्हे इस बात का पता ही न था कि डोवर की चट्टानों के ऊपर स्थित जादुई-चक्षु के द्वारा कुहरे और अन्धकार में भी उनका अत्यन्त सावधानी के साथ निरीक्षण किया जा रहा है। नो-रेडार ने शानहोर्ट (scharnhorst) जहाज का पता लगाकर उसे डुवाने में मदद की । उसने 'न डूबने योग्य' बिस्मार्क (Bistarck) का अनुसरण कर उसे भी नष्ट कर दिया। जव युद्ध का रूप रक्षात्मक से बदलकर आक्रामक हो गया तो रेडार के द्वारा असंख्य बममारों को शत्रु के इलाके के महत्वपूर्ण लक्ष्यों तक भेजने में सहायता मिली। उसके पर्दे पर नौ-चालक बादल, कुहरे और अन्धकार में भी नीचे के लक्ष्यों को देख सकना था; यह पर्दा एक कैथोड-किरण नली थी । जब नॉरमण्डी में डी-दिवस अवतरण (D-Day landing) को योजना बनाकर उसे कार्यरूप दिया गया तो रेडार ने इतिहास के सबसे अधिक कठिन संयुक्त प्रचालन में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की।
रेडार-तरंगों के बारे में मनुष्य को आंख किसी भी वस्तु को देख सकती है, इसका कारण यह है कि उस वस्तु से प्रकाश की किरणें परावर्तित होती है। किन्तु प्रकाश की किरणे धुन्ध या वादल में नही गुजर सकती है और रात को जब प्राकृतिक प्रकाश का कोई शक्तिशाली स्रोत नहीं रहता है तो परावर्तन प्राप्त करने के लिये हम प्रकाश के कृत्रिम स्रोतों का उपयोग करते है। DAYLIGHT दिन का प्रकाश ARTIFICIAL LIGHT कृत्रिम प्रकाश सबसे अधिक शक्तिशाली सर्चलाइट का परास भी सीमित होता है; कुहरे में सर्चलाइट प्रभावहीन हो जाती है। किन्तु वेतार-तरंगों पर, जिनका वेग प्रकाश के वेग के बराबर होता है, मौसम का कोई असर नही पड़ता है। दृश्य प्रकाश-तरंगों की भाति बेतार-तरंगे भी विद्युत्- चुम्बकीय तरंगे होती हैं। दोनों प्रकार की तरंगो के अनेक गुण एकसमान होते है । उदाहरण के लिये लघु तरंगदैर्ध्य की वेतार-तरंगे-अर्थात् वे तरंगे जो विद्युत्-चुम्बकीय तरंगों के पैमाने में प्रकाश-तरंगों के सबसे निकट होती है- भांति वस्तुओं द्वारा परावर्तित होती है । विज्ञान की भाषा में यदि आप अत्यन्त लघु तरंगो को किसी वस्तु पर तेजी से टकरायें तो वह वस्तु 'द्वितीयक प्रेपित्र' (secondary transmitter) का काम करने लगती है। इन तरंगों को लम्बाई कुछ ही -प्रकाश की 12
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रेडार समुद्र में उपस्कर किसी जहाज या बन्दरगाह में रेडार-स्टेशन के उपस्कर में निम्न चार भाग होते है । स्कंनर यूनिट पावर यूनिट प्रेपाभिग्राही प्रदर्शन यूनिट सनर से विकिरित होने वाले उच्च-पक्ति स्पंदों का पुंज BLAM OF HICH-POWER PULSES RADIATING FROM SCANNER ENERGY REFLECTED FROM SHIP ENTERS RECEIVING PORTION OF SCANNER जहाज से परावर्तित ऊर्जा स्कनर के पाही भाग में प्रवेश करती है DISTANT SHRA RANGE -24 CABLES BEARING-2900 दूरस्थ जहाज परास-21 केवल बेयरिंग-290° पावर यूनिट पीपी.आई पर जहाज ऐसा TRANSCEIVER स्केल: मील लगता है. UNIT RANCE VACABLES परास : 21 केवल प्रेपाभिप्राही पूनिट BEARING: 290° देयरिंग 290° स्कैनर यूनिट में 6-10 फुट चौड़ा एक एरिअल होता है जो प्रति- मिनट 10-25 चक्कर लगाता है। इसमें एक गियरबॉक्स होता है जो घूर्णन-क्रिया को नियंत्रित करता है। स्कॅनर लघु-तरंग स्पंदों को प्रेषित और ग्रहण भी करता है । यह जहाज में बहुत ऊँचे स्थान पर लगाया जाता है। रेडार-सेट का महत्वपूर्ण कार्य प्रेपाभिमाही में प्रेषण और अभि- ग्रहण के बीच तालमेल रखना है। यह सब सेकड के अत्यन्त सूक्ष्म अंश मे होने वाली 'ट्रिगर' क्रिया पर निर्भर करता है। इसकी आवश्यकता प्रयुक्त तरंगों की वी.एच.एफ. (V.H.F.- Very High Frequencies) अर्थात् अति उच्च आवृत्तियों के विशेष अभिलक्षणों के कारण ही नहीं बल्कि सकेत (signal) भेजने और उसकी प्रतिध्वनि के लौटने के बीच के समय को टीक-ठीक नापने के लिये भी है। स्कैनर प्रतिमेकंड 3-सेंटिमीटर तरंगो के लगभग 1000 स्पद भेजे जाते है। वे एक तंग पुज के रूप में एकत्रित किये जाते है । स्पद-दर आवश्यकतानुसार बदली जा सकती है। कम दूरी परस्पंद प्राप्त करने के लिये लघु स्पद अधिक उपयुक्त होते हैं, लम्बे परास पर काम करने के लिये दीर्घ स्पद ठीक रहते है। प्रेपाभिग्राही का एक महत्वपूर्ण भाग मॉडुलक परिपथ (modulator circuit) है जो कभी-कभी स्कैनर के नीचे लगा रहता है। इसका अभिप्राय बहुत छोटा स्पंद भेजना है जिसमे प्रेपित्र 1000 स्पद प्रतिसेकंड की नियंत्रित दर पर ठीक-ठीक 1000d60 सेकड तक ही दोलन करे। प्रेपित्र वाल्व तथाकथित मैग्नेट्रॉन होता है। यह बहुत छोटा वाल्व होता है जो इन अत्यन्त लघु पदों को बहुत कम तरंग-दैर्ध्य पर भेज सकता है । यह शीघ्र और ठीक-ठीक चालू होता एवं रुकता है और अत्यन्त छोटे अन्तरालों पर प्रेषण और ग्रहण करने के लिये आवश्यक है। 15 जब प्रेषित्र स्पंद भेजता है तो एरिअल से अभिग्राही का सम्बन्ध टूट जाता है। ज्यों ही प्रेपित्र रुकता है अभिग्राही का सम्बन्ध जुड़ जाता है और वह वापिस आने वाली प्रतिध्वनि को 'सुनता' है। एरिअल-बीम को लपेट (sweep) में स्थित वस्तुओं से लौटने वाली प्रतिध्वनियों को स्कैनर का निचला भाग पिकअप करता है और प्रेषाभिग्राही यूनिट में जाने से पहले उनका प्रवर्धन हो जाता है । उपस्कर का यह सबसे अधिक महत्वपूर्ण भाग एक सहत धातु के वक्स में रहता है। उसका एक हिस्सा वी.एच.एफ. स्पंदों को उत्पन्न करता है और दूसरा हिस्सा लौटने वाले प्रतिध्वनि-मंकेतों को प्राप्त कर उनका प्रवर्धन करता है। इसके अतिरिक्त एक 'ट्रिगर' युक्ति होती है जो प्रेपित्र-स्पंद का, पी.पी.आई. में मौजूद परिपथ के माथ तुल्यकालन करती (ममय मिलाती) है। पावर यूनिट उपकरण के लिये आवश्यक विशेष वोल्टता पर पावर सप्लाई करता है। उसमें एक मोटर प्रत्यावर्तिन होता है जो उष्ण- कटिबन्धीय जलवायु में भी विना किसी विशेप देखरेख के बहुत समय तक काम कर सकता है। प्रदर्शन यूनिट उपस्कर का वह भाग है जिसमे पी.पी.आई. रहता है । प्रचालक के लिये यह रेडार का 'मम्मुन भाग' होता है । प्रदर्शन यूनिट में प्रायः वे सब कण्ट्रोल होते हैं जो पूरे रेडार-उपम्यार के प्रचालन के लिये आवश्यक रहते है। बक्स या कनमोल के अन्दर, जिममें कैथोड-किरण नली होती है, दो कुण्डलियां भी होती हैं जो नली में इलेक्ट्रॉनों के माथ उमी नरह की क्रिया करती हैं जैमी प्रकाशिक लम प्रकाश के किरणपुगो पर करते है । ये दोनों कुण्डलियां नली की गर्दन को घेरे रहती है। उनमे एक 'फोरम कुण्डली' होती है जिमके मामने के फलक पर एक निगा घुण्डी होती है जो नित्र की तीवना को मालूम करती है। दुगरी 'विचलन कुण्डली' होती है जो पर्दे पर 'ब्लॉग' का परिकामी ट्रेम (दीप्नि रेगा) उत्पन्न करती है। 16 202 30- प्रदर्शन यूनिट 1 और la, रेडार को खोलने और बन्द करने का स्विच और सूचक । 2 और 2a, स्कैनर को खोलने और बन्द करने का स्विच और सूचक । 3 और 3a, समस्वरण कण्ट्रोल और सूचक । 4 और 4a, प्रापत्- कालिक/प्रेषण स्पद देध्यं स्विच और भूचक । 5 और 5a, कण्ट्रोल और सूचक। 6 और 6a, समुद्र कोलाहल कण्ट्रोल और सूचक । 7, प्रदर्शन प्रचालन कण्ट्रोल । सामान्य तौर पर बिजली के मोटर द्वारा स्कैनर के साथ कुण्डली और ट्रेस दोनों घूमते हैं । इसलिये वह हमेशा उस दिशा की ओर सकेत करता है जहाँ से प्रतिध्वनियाँ प्राप्त होती है अर्थात् वह वस्तुओं के दिक्मान को बतलाता है। घूर्णन विचलन ऐनोड फोकस कुण्डली कुण्डली ANODE for 3 GRID FOCUS COIL ROTATING PEFLECTION COIL कैथोड CATHORE The' alone mode इलेक्ट्रॉन-पुज HEATER FILAMENT BLAM OF ELECTRONS तापक ततु DIAGRAM OF CATHODE RAY TUBE (NOT TO SCALL) कैथोड-किरण नली का चित्र वारतव में ट्रेम उन प्रकाश-विन्दुओं को माला होती है जो एक हजार प्रतिसेकड की दर से केन्द से स्केल के परिमाप (perineter) तक जाते हैं । प्रत्येक प्रकाश-विन्दु को अपनी यात्रा में सेकंड के दम लाखवा हिस्से से भी बहुत कम समय लगता है । इस ट्रेम को पी.पी.आई. का 'टाइम- वेस' (time-base) कहते है । । 17 प्रत्येक ट्रेस ठीक उसी क्षण आरम्भ होता है जब रेडार-ऊर्जा का स्पद भेजा जाता है। जब स्पंद के मार्ग में किसी वस्तु से प्रतिध्वनि प्राप्त होती है तो कैयोड से इलेक्ट्रॉन-धारा मुक्त होती है । यह आरम्भ-स्थल (नली का मध्य) से निश्चित दूरी पर ट्रेस को दीप्त करता है जो रेडार- स्पंद के वस्तु तक जाने और वापिस लौटने में लगे समय के अनुरूप होता है । इस प्रकार परास नापा जा सकता है। पर्दे पर प्रतिदीप्तिशील लेप के कारण चमकीला 'व्लॉय' ट्रेस के आगे बढ़ जाने के बाद भी कुछ सेकडों तक बना रहता है। वह धीरे-धीरे हल्का पड़ता जाता है और अगले परिक्रमण में उसी वस्तु से अधिक प्रतिध्वनियाँ आती है और उसे चमकीला कर देती हैं। चमक, फ़ोकस, गेन (gain), परास-चयन, परास-माकिंग, स्केल- प्रदीप्ति, ऑन और ऑफ़ के लिये अनेक नियंत्रक होते हैं । नली के विद्युत्- केन्द्र को नली के किसी अन्य भाग में स्थानान्तर करने के लिये प्रदर्शन यूनिटों मे विशेष 'ऑफ़ सेंटरिंग' युक्ति होती है जिससे नली का पूरा क्षेत्र स्कनर के सामने के दृश्य को प्रदर्शित करने के लिये इस्तेमाल किया जा सकता है । नली के चारों ओर टाइम-वेस धूमता है और वह स्कैनर की स्थिति को प्रदर्शित करता है। ईस्ट इंडिया गोक्स: हाक बतिन रॉयल एल्बर्ट हॉक इंगेनहम डॉ. रेनहम क्रीक स्ट इंडिया रॉयल विक्टोरिया Bागा कोई मोटो हावर पॉपष्ट हॉक प्रवेश स्टोन बाकिय पार व मि म श्रीनविले कबाल डॉग रेलवे हार्ड डाटकोड कीक बिलाल डॉक्त रोयल नेवी कॉलेज नविन ऊंगे निटल वर पावर स्टेशन ग्रीन हादर टेम्स का रेजार-मान 18 प्रचालक तथाकथित अंशांकन वलयों का भी स्विच खोल सकता है । ये प्रकाश के चमकीले वलय होते है, जो किसी वस्तु की दूरी को एक ही दृष्टि में प्रशित कर देते हैं और पर्दे पर इलेक्ट्रॉनों द्वारा उत्पन्न किये जाते हैं। जहाज में लगे रेडार-सेट में एक 'मार्ग-चिन्हक (heading marker) होता है जो जहाज के जाने की दिशा को बतलाता है। यह एक चमकीली स्थिर रेखा होती है जिसकी स्थिति जहाज के मार्ग के अनुसार बदली जा सकती है। ऐसी पद्धतियाँ भी हैं जिनसे चित्र को कैथोड-किरण नली के एक सिरे के बजाय एक बहुत बड़े पर्दे पर प्रक्षिप्त किया जा सके। यह पर्दा ग्राउण्ड कांच (ground glass) का बना होता है और उस पर प्रतिदीप्त- शील पदार्थ का लेप रहता है। यह इलेक्ट्रॉन-पुज के संघट्टन के प्रभाव में अपनी पारदर्शकता की मात्रा को बदलता रहता है। पो.पी.आई. के सामने बैठकर आप टाइम-बेस को प्रतिमिनट दस, वीस या अधिक बार घूमते हुए,देख सकते हैं । यह एक हल्कीहरी चमकसे निकट- वर्ती दृश्य के चित्र को द्युतिमान कर देता है और एक 'पश्चदीप्ति' छोड़ जाता है। यह पश्चदीप्ति टाइम-वेस के दुवारा आने तक बनी रहती है। नकिगं लाइट होन हेवन जैन संबह टंकीम्स हेवन ईस्ट टिंबरी कोको स्वरी डॉक कोल हाउस सेंट मेरी गाड़ी ताल पह टॅकी हाइएम.सास्टिम्स नॉटिकल मोल पी.पी.प्राई. चित्रों की चित्रकारी 19 यथार्थ गति रेडार - उन्नत प्रकार के रेडार-उपस्कर में, जिमे अधिकाधिक जहाज इस्ते- माल करते जा रहे है, विशेष शुद्धता रहती है : यह पास या दूर को स्थिर या चलायमान वस्तुओं और जहाज की आपेक्षिक गति ही नही बल्कि जहाज की 'वास्तविक' गति भी बतलाता है । आवश्यकतानुसार एक सेट के बजाय. दूसरे सेट को चालू किया जा सकता है, अथवा पी.पी.आई. पर एकसाथ वास्तविक और आपेक्षिक गति दिखलाई जा सकती है। यथार्थ गति प्रदर्शन से प्रचालक को अपने ही जहाज की गति की तुलना में चलायमान और स्थिर वस्तुओं का ठीक-ठीक दृश्य मिल जाता है । यह एक महत्वपूर्ण बात है क्योंकि रूढ़ 'आपेक्षिक' रेडार-सेट से वह दूसरे जहाजों की वास्तविक चाल का शीघ्र पता नहीं लगा सकता है। कभी-कभी एक स्थिर बोया और छोटी-सी नाव मे भेद करना भी मुश्किल हो जाता है क्योंकि उसके अपने जहाज की तुलना मे वोया चलता हुआ-सा लगता है। यथार्थ गति रेडार की मदद से प्रचालक ऐसा भेद कर सकता है क्योंकि उसमें जहाज की अपनी चाल का हिसाव रहता है ; और जहाज की कुतुबनुमा से उसका स्वतः सम्बन्ध रहता है ताकि उसे जहाज के मार्ग का लगातार 'पता' लगता रहे। फलस्वरूप सभी चलायमान वस्तुये पी.पी.आई. मे चलती हुई दिख- लायी देती हैं और सभी स्थिर वस्तुये स्थिर दिखायी देती है । इससे त्रुटियाँ होने और टक्करों से बचने में पर्याप्त सहायता मिलती है। LENAL OF A "TRUE MOTION EQUIPMENT 'यथार्थ गति' उपस्कर का एरिअल 20 वन्दरगाह रेडार जहाज में लगा रेडार कैप्टनों और नौचालकों के लिये 'छठी जानेन्द्रिय के समान होता है, किन्तु एक बड़े और भीड़भाड़ वाले बन्दरगाह में कुहरे की अवस्था में काम करने के लिये यह पूर्ण रूप से उपयुक्त नहीं होता है । बन्दरगाह रेडार इस कमी की पूर्ति कर देता है। सबसे पहले बन्दरगाह रेडार लिवरपूत पोर्ट मे लगाया गया; किन्तु आजकल दुनिया के अधिकांश बड़े पोर्टो में या तो बन्दरगाह रेडार लगा हुआ है अथवा उसे लगाने की तैयारी की जा रही है। बन्दरगाह रेडार पद्धति के तीन मुख अवयव होते हैं : पहला स्कैनर, जिसे उस सारे क्षेत्र की 'देखरेख' करनी होती है जिसके लिये उसे लगाया गया हो; दूसरा प्रेपित्र/अभिग्राही, जिसे एरिअल के नजदीक होना चाहिये; तीसरा प्रदर्शन-तंत्र, जो एरिअल से किसी भी दूरी पर हो सकता है । अनेक बन्दरगाह इतने बड़े और जटिल होते हैं कि उनके लिये एक तंत्र पर्याप्त नही होता है, इसलिये उनमें अनेक तंत्र लगे होते हैं और प्रत्येक तंत्र का पृथक् एरिअल होता है। उदाहरण के लिये हैम्बर्ग में पांच तंत्र लगे है, और वे सभी ब्रिटेन में बने है। यदि रेडार-युक्त कोई जहाज कुहरे की अवस्था में नदी में कुछ मील अन्दर बने एक बहुत बड़े बन्दरगाह मे जाने की कोशिश कर रहा हो तो उसे, नदी के मुहाने और पोर्ट के बीच, चैनल में जाने से पहले रुकना पड़ेगा। जहाज में लगा रेडार इस बात की विशेष जानकारी नहीं दे सकता है कि चैनल के दूसरे सिरे पर क्या है और यदि नदी में मोड़ हो तो वह कुछ भी नहीं बता सकता है क्योंकि रेडार भी मोड़ के आगे नहीं देख सकता है । इसलिये पहले जहाज का मालिक समुद्र-तट के अधिकारियों से रेडियो-टेलीफ़ोन पर वात करता है और चैनल में जहाज चलाने की परिस्थिति पर मलाह और सूचना मागता है। उसके बाद जैसे-जैसे वह बन्दरगाह की ओर बढ़ता है उसे लगातार सूचना और निर्देशन प्राप्त होता रहता है ! बन्दरगाह की ओर जाते समय उसका उन अधिकारियों के साथ लगातार सम्पर्क बना रहता है जो पोर्ट में अपने प्रदर्शन कनसोलों को देखते रहते हैं और उसके जहाज की प्रगति की जांच-पड़ताल करते रहते हैं ; किन्तु उसकी गति 21 पर कोई नियत्रण नहीं रखा जाता है और जहाज के संचालन के लिये वह स्वय जिम्मेदार होता है। नीचे रेडियो-टेलीफोन सन्देशों के लॉग से संक्षिप्त उद्धरण दिया गया है। सन्देशों का यह आदान-प्रदान साउथम्पटन बन्दरगाह में लगे रेडार-केन्द्र कैलशॉट रेडियो और पोर्ट-क्षेत्र में प्रवेश करने वाले एक यात्री- जहाज के बीच आपस में हुआ था। इससे अनुमान लगता है कि संचार- कार्य किस प्रकार होता है : जहाज कलशॉट से-~-चैनल 16 पर कलशॉट से सम्पर्क करना है। कैलशॉट जहान में--कृपया चैनल 12 पर सम्पर्क करें। माउपम्पटना SOUTHAMPTON (निर्यातसगर-स्थान Controlled Onchorage लौट CALSHotgt म्या Castle Pant els for ser शॉट स्पिट PORIS MOUTH पासमाउथ COWE S RTDE साउयम्पटन पर मुख्य प्रदर्शन-क्षेत्र 22
कैलशॉट जहान
जहाज वैलशॉट से-राइड मिडल के उत्तर से आगे बढ रहा हूं। आपकी
दृश्यता क्या है और किन-किन गतियों का मुझ पर असर पड़ रहा है?
-कलशॉट स्टेशन की दृश्यता लगभग 13 मील है । किसी
भी गति का आप पर असर नहीं पड़ रहा है ।
जहार कैलशॉट से-रोजर, गोदियों पर आपकी दृश्यता क्या है ?
कैलशॉट जहाच से-रुकिये, मालूम करता हूं... साउथम्पटन गोदियों की
दृश्यता 50 से 100 गज है।
जहाज कैलशॉट से हम आगे बढ़ेगे और देखेंगे कि स्थिति कैसी है।
कैलशॉट जहान से--रोजर, आपकी सूचना के लिये यह बता दूं कि नियंत्रित
लंगर-स्थान खाली है।
*
*
जहाज (कैलशॉट स्पिट लाइट जलयान का चक्कर लगाते हुए) कैलशॉट से-- आप हमें
कैसा देख रहे हैं ?
कैलशॉट जहाज से-आप चैनल के बीच में हैं । गोदी से मालूम हुआ है कि
दृश्यता 200 से 300 गज है।
जहाथ कैलशॉट से-क्या मैं चैनल के दाईं ओर हूं?
कैलशॉट जहाश से-आप मध्य चैनल की ओर बढ़ रहे हैं, अभी आप सीधे
रास्ते पर नहीं हैं।
जहार कैलशॉर से-अव मध्य चैनल की ओर बढ़ रहे हैं....
कैलशॉट जहाज से--अब आप वीच की रेखा को पार कर है हैं। लगता
है आप बीच की रेखा पर सीधे चल रहे हैं । आप कैसल प्वायंट
बोया से होते हुए पोर्ट की ओर जा रहे है।
इस प्रकार जहाज के लंगर-स्थान पर पहुँचने तक संवाद होता रहता है ।
23
लिवरपूल का बन्दरगाह पर्यवेक्षण रेडार SCANNER कनर • CONTROL ROOM नियत्रण-नक्ष आइये, अव यह मालूम करें कि लिवरपूल के 'वन्दरगाह पर्यवेक्षण रेडार' का परिचालन केन्द्र कैसा दिखाई देता है। ग्लैडस्टोन गोदी के उत्तर-पश्चिमी कोने में 80 फुट ऊंचे टावर के ऊपर एक बहुत बड़ा घूमने वाला स्कैनर पड़ा है। ग्लैडस्टोन गोदी लिवर- पूल के पोर्ट-क्षेत्र के समुद की ओर के कोने पर स्थित है। 24
इस स्थान से स्कैनर को बिना किसी रोक-टोक के पूरी खाड़ी का
और मर्सी से आगे काफी दूर तक का दृश्य मिल जाता है।
यह 10 परिक्रमण प्रतिमिनट के हिमाव मे घूमता है।
THE 31X-SCREEN
DISPLAY CONSOLE
छः पर्दो वाला प्रदर्शन कनसोल
टावर की नीव के पास एक इमारत है जिसमें प्रेपित्र और अभिग्राही
रखे हैं; इमारत के अन्दर नियत्रण कक्ष है जिसमें प्रदर्शन कनसोल' रखा
है। उसमें 6 पी.पी.आई. पर्दे है जिनमें से प्रत्येक का व्यास 15-इव है।
पहले पर्दे में छोटे पैमाने पर
पूरी लिवरपूल पाडी का
यथार्थ दृश्य दिखाई देता है
FIRST SCREEN SHOWS SMALL
TRUE-SCALE PLAN VIEW OF
THE WHOLE OF LIVERPOOL BAY
-
एक पर्दे पर छोटे पैमाने पर पूरी लिवरपूल खाड़ी का यथार्थ दृश्य दिखाई
देता है जिसका सामान्य अधिकतम परास 13 मील है; किन्तु इच्छानुसार
प्रचालक प्रदर्शन के द्वारा समुद की ओर 20 मील के अधिकतम परास तक
का दृश्य प्राप्त कर सकता है।
25
पारसाइट बलपान . ७ DISPLAS DSANY2 प्रदर्शन प्रदर्शन 3 रेडार का स्थान ATTE OF RADAR LIVERPOOL BAY लियरपल लिवरपूल LIVERPOOL साड़ी प्रदर्शन HENKS LONE IYACE प्रिसेद्ध Moti मोर সম্বন । DIAGRAM SHOWING HOW TXC CHANNEL IS COVCARD W POUZLARGE-SCALL DISPLAYS. अदतरण स्टेज पारेख में दिखाया गया है कि किस प्रकार दंगल में पार यो प्रदर्शन फैले हुए हैं। . अगले चार प्रदर्शन नापरिवहन चैनल का निकटवर्ती' दृश्य प्रस्तुत करते हैं जो किसी विकृति के विना वास्तविक नक्शे के रूप में सही नित्र प्रदर्शित करते हैं। चैनल के चार सेक्टर आंशिक रूप से एक-दूसरे पर अतिव्याप्त रहते हैं। प्रत्येक सेक्टर में चैनल के उस भाग का पारदर्शक चार्ट रहता है जिसे वह अपने सामने प्रदर्शित करता है। उसमें सभी बोया और अन्य संचालन-संकेत हरे रंग में निर्दिष्ट रहते हैं ताकि जव चार्ट को प्रकाशित किया जाय तो पर्दे पर प्रतिध्वनियां शीघ्र और निश्चित रूप से पहनानी जा सकें। इस प्रकार किसी भी जहाज की स्थिति यथाशीघ्र मालूम की जा सकती है। छठा पर्दा परिनामी प्रदर्शन' कहलाता है क्योंकि वह प्रचालक की इच्छानुसार लिवरपूल खाड़ी के किसी भी भाग का चित्र बड़े पैमाने पर प्रस्तुत करता है। उसे 22 भिन्न-भिन्न स्थितियों पर स्विच किया जा सकता है। यह उन क्षेत्रों में उपयोगी रहता है जहाँ भीड़भाड़ बहुत अधिक हो अथवा कोई 'निकटवर्ती' प्रदर्शन खराद हो जाय । अन्य पोटों पर उनकी भौगोलिक स्थिति और उपस्कर द्वारा किये जाने वाले अनेक कार्यों के अनुसार समुद-तट पर स्थित विभिन्न प्रकार 26 के रेडार होते हैं। छः पर्यों से प्राप्त सूचना, नियंत्रण कक्ष से विशेष टेलीफ़ोन द्वारा रॉयल लीवर बिल्डिंग में स्थित समुदी सर्वेक्षक कार्यालय में भेजी जाती है, किन्तु खराब मौसम में पोर्ट में आने वाले या पोर्ट से जाने वाले जहाजों के मालिकों और पायलटों को वह सम्पूर्ण सूचना दे दी जाती है जो उन्हें सीधे रेडार-नियंत्रण कक्ष से मिलनी चाहिये। पहले घने कुहरे के कारण बड़े और भीड़भाड़ वाले पोर्ट में सभी काम पूरी तरह रुक जाते थे। आजकल रेडार की मदद से जहाज़ सामान्य रूप से काम करते रहते हैं। यह अनुमान नहीं लगाया जा सकता कि आर्थिक दृष्टि से इसका क्या अभिप्राय है; किन्तु एक घंटे की देर से एक ज्वारभाटा की हानि हो सकती है जिससे एक सागान्य जहाज को सैकड़ों पोण्ड को और बड़े जहाज को कई हजार पौण्ड की हानि हो सकती है। टैंकरों को.घाट लगाने में देर करने से विशेष खर्च बैठता है। लन्दन के पोर्ट टेम्स हैवन में, जो दुनिया का सबसे बड़ा तेल-बन्दरगाह है, ऐसा उपस्कर लगाया गया है जिससे टेंकर के कैप्टनों और पायलटों को तुरन्त सूचना मिल जाती है जिसे वे कुहरे के कारण स्वयं प्राप्त नहीं कर सकते हैं । इस विशेष बन्दरगाह रेडार-संस्थापन में एक शीघ्र चित्र तैयार करने वाला फ़िल्म-कैमरा होता है, जो रेडार-पर्दो के बार-बार चित्र लेकर उन्हें शीघ्र डेवलप करता, फिक्स करता, धोता और सुखाता है। यह काम इतनी जल्दी होता है कि दे चित्र आठ सेकंड से भी कम समय में प्रक्षेपण के लिये तैयार हो जाते हैं। प्रत्येक क्रमिक चित्र एक मानक नौअधिकरण चार्ट (Admiralty Chart) पर अध्यारोपित बड़े चमकीले प्रदर्शन के रूप में प्रकट होता है जिसे कई लोग एकसाथ देख सकते हैं; गोदी के अधिकारियों द्वारा जहाजों की स्थिति, चाल और दिशा के बारे में सूचना चार्ट से पढ़ी जा सकती है और आने वाले टैकरों की प्रगति मालूम कर लंगर-स्थान की ओर उनका मार्ग-दर्शन किया जा सकता है । यह भी अत्यन्त महत्वपूर्ण बात है कि प्रक्षिप्त चित्र से प्राप्त सूचना किसी भी इच्छुक जहाज को भेजी जा सकती है। बन्दरगाह में आने-जाने वाले जहाजों को सुरक्षा को निश्चित बनाने..... के अतिरिक्त समुद-तट पर स्थित रेडार अनेक कार्य कर सकता है। यह भी 27 नौचालन-चिन्हों को बनाये रखने और स्थिर रखने मे बन्दरगाह के अंधि- कारियों की सहायता करता है। यह एक जटिल और खर्चीला कार्य माना जाता था । समुद-नट पर स्थित रेडार का उपयोग, ऐमी गतियों को शीघ्र और ठीक-ठीक रोकने में हो सकता है । पी.पी.आई. पर बोया, प्रकाश के छोटे-छोटे पिन-शोपों के समान, दिखाये गये है । बोयाओं अथवा दोप- नौकाओं का विस्थापन शीघ्र मालूम किया जा सकता है और नौपरिवहन पर न्यूनतम खतरे के साथ चिन्हक की नई स्थिति का पता लग जाता है । छोटे जहाजो और बोयाओ मे स्पप्ट स्प से भेद किया जा सकता है और लक्ष्य के पीछे लाक्षणिक धूमकेतु के समान पूछ से पता लग जाता है कि वह चल रहा है। साथ ही यह भी मालूम हो जाता है कि वह किस मार्ग को अपना रहा है । दो या तीन हजार टन का जहाज इतना स्पष्ट दिखाई देता है कि उसके अगले और पिछले भाग में भेद किया जा सकता है। माउपएण्ड टंकर रेगर स्टेशन गरिसन पायटा टैम्स के मुहाने पर गरिसन केन्द्र पर लिया गया पी.पी.आई. चित्रों का कम । इन चिों में 35000-टन वाले टंकर को प्रगति की विभिन्न अवस्थायें दिखाई गई हैं। यह टेकर समुद्र की मोर से माइल प्रॉफ प्रेन के तेल-मिनल पर घाट की तरफ प्रवेश कर रहा है। 1. एक देकर मिडवे ऐप्रोच चनल में प्रवेश करने वाला है; दो तपोत चनल में विद्यमान हैं। 2 टेकर चैनल में है। प्रमुख तटोत गरिसन केन्द्र का चक्कर लगा 3. टैकर गरिमन केन्द्र का चाकर लगा रहा है। पायलट नौका पोर्ट के समीप पा रही है और रम्से पीछे की ग्रोर हटते जा रहे है। बाहर की ओर जाने बाला तटपोत चित्र के मध्य में है। 4 टैकर घाट के नजदीक प्राता है, बाई और बीच मे; बाहर को जाने वाला तटपोन गरिमन केन्द्र पर पहुंचता है। 28 मन इसके बावजूद समुद में टक्कर क्यो हो जाती है ? एक कारण यह है कि जहाजों के ऊपर रेडार-एरिअल के होने से कैप्टनों के मे आवश्य- कता से अधिक सुरक्षा की भावना आ जाती है और उसकी स्थापना से पहले वे जितने सावधान रहते थे अब उससे कम मावधान रहने लगे है यह जमीन पर असावधानी के साथ गाड़ी चलाने के समान है। रेडार हो या न हो नौचालन के नियमों का अब भी पालन करना पड़ता है । कभी-कभी रेडार से टक्कर भी हो जाती है वास्तव में यदि रेडार का अत्यन्त सावधानी के साथ प्रचालन न किया जाय तो उसमे दुर्घटनायें भी हो सकती है। हो सकता है कि दो जहाज ठीक आमने-मामने मे एक- दूसरे की ओर आ रहे हों किन्तु उन्हे ऐसा लगे कि वे एक-दूसरे मे बच रहे हैं। आरेख मे वैसा आने वाला रेडार-ब्लिप' (blip) दिखाया गया है जैसा प्रत्येक नौचालक अपने पी.पी.आई. पर देखेगा। जव जलयान B जलयान A को पोर्ट के अगवाडे की ओर आता हुआ देखता है नो परम्परा- गत तरीके से अपनी लाल रोशनी दिखाने के लिये सीधे हाथ की ओर मुडता है। दूसरी ओर जलयान A यह निष्कर्ष निकालता है कि वह मीधे हाथ को ओर मुड़ता चला जायेगा ताकि उनके आपस की दूरी बढ जाय । किन्तु वास्तव मे A, B से टकरा जाता है। रेडार-प्रचालन मे रेडार द्वारा टसर निहित इन खतरो का हाल के वर्षों मे ही पता लगा है। उनमे मालूम होता है कि अत्यन्त सक्षम उपम्कर के साथ भी मनुष्य को हमेशा सजग रहना चाहिये। RADAR ASSISTED CCLLIS ON जलयान 'A' 15. 270 0) 20 180 मालmles'971 23. 200 ००० TOr जलपान 'B' 29 रेडार प्रत्येक काम में उपयोगी महासागर के मध्य किसी लाइनर में सवार यात्री के रूप में शायद आपको इस बात का पता न चले कि उसमें रेडार लगा है; किन्तु यदि माप किसी कुहरे वाले दिन, जब तेज ठण्ड पड़ रही हो, माइल ऑफ़ वाइट में राइट पीर पर उन खिन्न लोगों में से हों जो कुहरे के हटने और पोस- माउय नाव के आने की इन्तजार में हों तो आप समझेंगे कि रेडार की 'मायाक्षि' कितना अच्छा वरदान हो सकती है। अब पोर्ट्समाउथ-राइड सर्विस पर कुहरे के कारण तट पर रुके रहना बहुत पुरानी बात हो गई है। सप्ताहान्त के दिनों में चैनल में समुद भ्रमण करने अथवा साउथएण्ड मोर मार्गेट को दिन में यात्रा करते समय किसी स्टीमर पर नाप रेडार देख सकते हैं । आप अपने-आपको डच मोटर-जलयान कोनिनजन जुलियाना में सवार पा सकते हैं जो दुनिया का सबसे अधिक सुन्दर और आधुनिकतम फेरी जहाज है । यह शेल्ट एस्चुअरी के आर-पार फ्लशिंग और वैस्केन्स के बीच मलता है । गर्मियों में भीड़भाड़ के दिन यह यात्रियों और 1200 तक कारें ले जाता है। यह मोटर-जलयान दो सिरों और दो पुलों वाला है ताकि एक स्थान से दूसरे स्थान को यात्रा करते समय उसे मुड़ना न पड़े। दो चाक- परों में दो पी.पी.आई. प्रदर्शन फिट हैं । रिले-पति के कारण एक यूनिट के स्थान पर दूसरे मूनिट को आसानी से आरम्भ किया जा सकता है। कर KANINERN JULIAMA कोनिनजन लिआना राइन नदी पर भाड़ा और यात्री परिवहन मुख्यतः सुबह नौ बजे से सामं पांच बजे के बीच होता था क्योंकि अन्धेरे में जलयानों से भरी नदी को पार करना कठिन और खतरनाक रहता था; अब रेडार की मदद से नदी में चौबीसों घंटे जहाज चलते हैं। 30 सामान्य रूप से, स्कैनर, जहाज़ के पुल के ऊपर एक विशेष गस्तूल पर आरूड़ रहता है। रेडार की छड़ प्रतिमिनट 20 बार जहाज के चारों ओर चक्कर लगाती है। प्रत्येक बार छड़ जहाज के अगले भाग से गुज़रती है तो कैथोड-किरण नली में अतिरिक्त संकेत मिलता है। यह संकेत प्रकाश की पतली रेखा के रूप में होता है। इस कार रेडार-प्रचालक को जहाज के अगले भाग की दिशा मालूम हो जाती है । तदनुसार वह पी.पी.आई. के चारों और अपने बेरिंग-स्केल को ठीक कर सकता है ताकि शीषक-रेखा 0° पर दिखाई दे, और पर्दे पर दिखाई देने वाली वस्तुओं के बेयरिंग को जहाज की तुलना में उनके स्थान पर 'पढ़ा' जा सके; अथवा वह जहाज के जाइरो दिक्सूचक द्वारा बेयरिंग-स्केल को स्वतः ही समंजित होने देता है ताकि 0 हमेशा उत्तर दिशा में रहे तथा शीपक-रेखा और पर्दे पर अन्य वस्तुयें उनकी अपेक्षा उत्तर की ओर दिखाई दें। रेडार व्हेल का शिकार करने वालों की मदद करता है। FALTCRY SHIP AND CATCHERS फैक्टरी जहाज और माली पकड़ने वाले व्यस्ति ८- वेल पकड़ने वाले बेड़े में कुछ फैक्टरी जहाज होते हैं और प्रत्येक जहाज़ में 10 'कंचर' (Catcher) अर्थात् मछली पकड़ने वाले होते हैं। कैचर का काम ह्वेल का शिकार करना है। प्रत्येक ह्वेल को मारने के बाद, उसमें हवा भर दी जाती है और संकेत के लिये उस पर एक झण्डा लगाकर उसे तैरता हुआछोड़ दिया जाता है। इसके बाद फैक्टरी जहाज के लिये एक रेडियो-संदेश भेज दिया जाता है । फैक्टरी जहाज़ हेल की देखरेख के लिये एक पिक- अप नाव भेज देता है जो उसे खीचकर कंवर हल का शिकार कर रहा है 31 CATCHER MAKING KILL ले आती है। कैचर दूमरी मछली की तलाश में निकल जाता है। मरी हुई मछली को आसानी से ढूंढने के लिये, भले ही चिह्नक झण्डे लगा दिये जाय या संकेत-प्रकाश का उपयोग किया जाय या उसे किसी विशेष आकार के हिमशैल के पास छोड़ दिया जाय फिर भी बहुधा कुहरे और धुन्ध के मौसम में महासागर में आधी डूवी ह्वेल को ढूंढना आसान काम नहीं होता है । वास्तविक सहायता केवल रेडार से मिलती है। यह धुन्ध और अन्धेरे में 'चिह्नक' हिमशैल से आने वाले परावर्तनों को पिक-अप कर कुछ दूरी पर ह्वेल को भी ढूढ़ लेता है। सबसे उत्तम तरीका यह है कि मरी हुई ह्वेल पर एक विशेष परा- वर्तक लगा दिया जाय। यह परावर्तक रेडार प्रतिध्वनि को अधिक शक्तिशाली बना देता है, ताकि उसे 5 मील या उसमें भी फैक्टरी जहाज पर लगा रेडार, बा-भरी मृत व्हेल पर लगे परावर्तक अधिक दूरी से पिक-अप किया का पता लगा रहा है जा सके। अपने संवहन जालों का मार्ग मालूम करने और उन्हे फंसने से बचाने के लिये उत्तरी समुद्रों में हैरिंग मछुओं ने भी रेडार का इस्तेमाल आरम्भ कर दिया है। ये जाल दो मील तक लम्वे होते है । जव इन जालों को 'शॉट' किया जाता है तो कुछ-कुछ दूरी में जाल-सहायक प्लवों पर रेडार-परावर्तन चिह्नक रख दिये जाते है। 32 रेडार कांगो नदी में नौचालन में मदद करता है SCANNER स्कनर GEEM कांगो स्टीमर 'लक्जमबर्ग' जिसमें जल-रेखा से 40 फुट ऊपर स्कैनर लगा है। काँगो पर स्टीमर मे ही दिखाई देते हैं जैसे मार्क ट्वेन के समय में मिसीसिपी में नावें दिखाई देती थीं : उनके पेदे चपटे होते है और उनकी ऊंची तीन डेक वाली धिरनना होती है-- वे पहियों से चलते हैं । इस उथली नदी पर विश्वास नहीं किया जा सकता है और उसके लिये यह सबसे अधिक व्यावहारिक परिवहन है । इन जहाजों में ईधन के रूप में लकडी जलायी जाती है। ये जहाज सूर्योदय के एक घंटा पहले से सूर्यास्त के एक घंटा बाद तक चलते है और उसके बाद वांध दिये जाते है क्योंकि अभी तक रात को यात्रा करने का अर्थ होता था परेशानी में पडना : यहाँ तक कि दिन में भी कर्णधार (helmsman) की सतर्क और अभ्यस्त आँखे ही रेतीले किनारे पर पानी की 'दौड़' का पता लगा सकती हैं। आज लक्जमबर्ग कांगो में मवसे अधिक 'आरामदायक जहाज' है । उसमें विभिन्न परास-म्केलों वाला रेडार-मेट लगा है। इस काम के लिये सबसे अधिक महत्वपूर्ण 'क्लोज-अप' आधा मील परास है । इसकी मदद से रात में भी यात्रा की जा सकती है क्योंकि इसमे छोटे-छोटे पीपा-बोयाओं को देखा जा सकता है जो मात्र नौचालन-चिह्न होते है। यहां तक कि उन्हें दिन में भी खाली आँखों से देखना कठिन होता है क्योंकि वे, पानी में तैरती हुई, घास से ढंक जाते हैं। अफ्रीका के दम भाग में नदियाँ परिवहन का प्रमुख साधन है। उनके बिना व्यापार नही हो सकता है और व्यापार न होने मे उस देश का वैसा ही हाल हो जाता जैसा स्टल और लिविंगस्टोन ने पाया था। इस कार्य के सनालन मे रेडार अत्यन्त महायता कर रहा है। 33
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तरने यानों के साय मलने वाली प्रत्येक नाव जार-मग्जित जहाज के पांना दम गोल परास पाले पद पर सप्ट दियाई देती है। पदि रेटार-राग्जित ना कठिनाइयों में पड़े नेरले बालों, जहाजों अथवा रक्षा- नौकाओं आसपास हो तो पनाय-काय रेगर परे पर पैनल दौर समारम्भ प्रत्पेरपी रिपति का पडा गरे साप के लिये मो तकनीक को इस्तेमाल की नाव से मानेवाली हिम्पनि लिया जाता है। हो मासूम होता है। वर्स में नौचालन के समय रेतार फा उपयोग मासान नहीं होता है अत्यन्त ठण्डे मौसम में स्कनर 'जग' जाता है; किन्तु वर्ष का प्रभाव समाप्त होने पर यह फिर से सन्तोप- पूर्वक घूमने समता है। समतल और मान्त समुद्र की मांति वर्ष की चिकनी चादर भी फंधी चिरनी पादर कोई रेडियो प्रतिपनि रेडार को प्रतिघ्यनियों को नही नहीं लौटाती है। लोटाती है; किन्तु यदि जहाज़ के चलने से पकं पट जाय तो इस प्रकार बनने वाला मार्ग पर्दे पर दिखाई देता है, भले ही जहाज द्वारा फटने के बाद रास्ते पर दर्फ फिर से SHOOTIN SCIT KELETENE Oatc0 जाय। टूटी और फिर से जमी वर्फ़ शक्तिशाली प्रतिध्वनियों को लौटा देती कि बर्फ की सिल्लिो एक-दूसरे के ऊपर जमा हो जाती हैं । २. पर्दे पर यह भारी समुद्री 'काटर' (जगघट) जैसा दिखाई न्तु प्रतिध्वनियां उमी सापेक्ष स्थिति पर रहेंगी, जबकि भारी ने वाली प्रतिध्वनियों में गति होती रहती है। लों के कारण उत्तरी अटलांटिक महासागर में जहाद चलाना है। वहीं रेडार द्वारा हिमशैलों का पता नहीं लगाया जा वार हिमशंग अस्पष्ट रूप में आंखों से दिखाई देते हैं किन्तु प्रतिध्वनि नहीं आती है। 35 रेडार चैनल में तैरने वालों की भी मदद करता है इंगलैण्ड साउथ गुडविन प्रकाश जलयान डोवर कैप निमने, TEL TYSICAL TRACKS HOTTED BY RADAR. रेडार द्वारा आरेखित तीन विशेष मार्ग हाल के वर्षों में चंनल पार करने में रेडार-जहाजों ने इलेक्ट्रॉनिकी शीप-डॉग (भेड़ों की रखवाली करने वाले कुत्ते) की भांति काम किया है और वे दिन-रात पूरे क्षेत्र की देखरेख करते हैं । चार्ट में देखने से 21 मील चैनल को सीधे पार करना बहुत मासान लगता है किन्तु वास्तव में यह उतना आसान नहीं है। बदराते हुए ज्वारभाटों और धाराओं की सहायता प्राप्त करने के लिये समय और स्थिति का ठीक-ठीक ध्यान रखना आवश्यक है। फ्रांस के समुद्र-तट से रवाना होकर तैराक 3 घंटे तक पश्चिम की ओर जाने वाले ज्वारभाटे का लाभ उठाता है। यदि वह अपने कार्य में सफल रहे तो ज्वारभाटे के लौटने का भी लाभ उठाने की स्थिति में रहेगा जो उत्तर- पूर्वी दिशा में बहने लगता है। तत्पश्चात् उसे ठीक समय पर साउथ गुड- विन्स प्रकाश-जलयान के क्षेत्र में पहुंचना चाहिये जिससे वह फिर से पश्चिम की ओर जाने वाले ज्वारभाटे का लाभ उठा सके और उसे डोवर के नज- दीक समुद्र-तट पर पहुंचने में सहायता मिले। रेजार-सज्जित जहाज़ तैरने वालों और उनके साथ चलने वाली नावों का चक्कर लगाता रहता है, और उनके नजदीक आकर उन्हें उनकी स्थिति बतलाता है। बहुधा तेज बारिश में वस्तुयें कुछ ही गज़ तक दिखाई देती हैं और दल का वेयरिंग से सम्बन्ध टूट जाता है; किन्तु रेडार-सज्जित जहाज को तुरन्त सूचना देने से पुनः सम्बन्ध स्थापित हो जाता है और स्थिति का पता लग जाता है। 34 तैरने वालों के साथ चलने वाली प्रत्येक नाव रेडार-सज्जित जहाज के पांच या दस मील परास वाले पर्दे पर सष्ट दिखाई देती है। यदि रेडार-सज्जित नावें कठिनाइयों में पड़े तैरने वालों, जहाजों अथवा रक्षा- नौकाओं के आसपास हो तो बचाव कार्य प्रत्यक को रिमति का पता शो माग रेडार पर्दे पर पनत दौड़ का आरम्भ के लिये इसी तकनीर को इस्तेमाल की नाव से गानेवाली प्रतिध्वनि किया जाता है। से मालूम होता है। SMOOTH SHEET ICE RETURNS NO RADAE ECHO वर्क में नीचालन के समय रेडार का उपयोग आसान नहीं होता है अत्यन्त ठण्डे मौसम में स्कैनर 'जम' जाता है; किन्तु वर्फ का प्रभाव समाप्त होने पर वह फिर से सन्तोप- पूर्वक घूमने लगता है। समतल और शान्त समुद्र की भांति वर्फ की चिकनी चादर भी बर्फ़ की चिकनी रादर कोई रेडियो-प्रतिध्वनि रेटार की प्रतिध्वनियों को नहीं नहीं लौटाती है। लौटाती है; किन्तु यदि जहाज के चलने से वर्क कट जाय तो इस प्रकार बनने वाला मार्ग पर्दे पर दिखाई देता है, भले ही जहाज द्वारा कटने के बाद रास्ते पर बर्फ़ फिर से गिर जाय। टूटी और फिर से जमी वर्फ शक्तिशाली प्रतिध्वनियों को लौटा देती है क्योंकि नर्फ की सिल्लिा एना-दूसरे के ऊपर जमा हो जाती हैं। पी.पी.आई. पर्दे पर यह भारी समुद्री 'वाटर' (जगघट) जैसा दिखाई देगा; किन्तु प्रतिध्वनियाँ उसी सापेक्ष स्थिति पर रहेंगी, जबकि भारी समुद्रों से आने वाली प्रतिध्वनियों में गति होती रहती है। हिमलों के कारण उत्तरी अटलांटिक महासागर में जहाज चलाना खतरनाक होता है। वहाँ रेडार द्वारा हिमशैलों का पता नहीं लगाया जा सकता है। कई बार हिमशैल अस्पष्ट रूप में आँखों से दिखाई देते हैं किन्तु रेडार में उनकी प्रतिध्वनि नही आती है। 35 4TAARCOTIN CEw.LSHOW COT.SCREEN गमा कारण यह कि वधा हिमशनों का अनियमिन आर होता है और उसकी गनर नान होती है। ये गो रेबार-सको विच- लिन गार देनी है । रिन्न जब मिशन र नियमिन फना किरणपुज की और होता है नय उमे काफी दूरी से पहनाना जा सकता है। यह दूरी पायुमण्डलीय स्थितियों के अनुसार भिन्न होती है। इस कारण दक्षिणी ध्रुव में पाये जाने वाले हिमर्शल, जो अपेक्षाकृत अधिक नियमित फलकों यमपटने में वना मार्ग पर्दे पर दियाई देगा। के बने होते है, उत्तरी अटलांटिक के हिमर्शलों की अपेक्षा अधिा शीघ्रता से पहचाने जाते है। फिर भी 'अन्तर्राष्ट्रीय वर्फ़ चौकीदारी' (International Ice Patrol) के कार्य में रेडार का महत्वपूर्ण योगदान है जिसके कर्नक (काटने वाले) और भेदिये वायुयान 150,000 वर्गमीत क्षेत्र में कार्य करते है। किन्तु बर्फ़ रेडार-प्रचालक को भी पथभ्रष्ट कर सकती है : तटवर्ती रेखा के साथ जमी बर्फ की रचनाओं के कारण प्रचालक को समुद्र-तट के नाई के गाथ प्रतिध्वनियों की तुलना करने मे बठिनाई तो सकती है क्योंकि हो सकता है कि भूमि और बर्फ के बीच कोई विभाजक रेखा न हो। तैरती हुई बर्फ बोयाओं के ऊपर भी आ अनियमित प्रकार के हिमर्शल सकती है जिससे उन्हे न तो रेडार और न रेडार-किरणाज को विचलित कर देते है। आंखें ही देख सकती है। यदि जहाज के चारों ओर बर्फ हो तो उस परिस्थिति में नौचालन में रेडार से बहुत बडी मदद मिलती है। विना टूटी वर्फ अधिक आमानी से वेध्य होती है जव कि दुवारा जमो वर्फ जहाज को रोक सकती है अथवा उसे बुरी तरह नष्ट कर सकती है। दृश्यता केवल कुहरे के कारणही नही घटती है। उदाहरणार्थ, उत्तरी अफ्रीका और फ़ारस की खाडी के रेतीले तटो के साथ-साथ भयकर रेतीले तूफान का असर समुद्र कई मील अन्दर तक पड़ता है । अनुभव के आधार IRRCULAR SHAPED ICE DERCS MAY DUPLECT THE RADAR BEAM 36 पर कहा जा सकता है कि रेडार पर रेतीले तूफान का असर नहीं होता और यदि दृश्यता आधा मोन से कम हो तो रेडार प्रतिध्वनि-लक्ष्यों को पकड़ लेता है। समुद्री स्टेशन भविष्य में रेडार की तकनीकों का एक अन्य रोमांचकारी उपयोग हो सकता है। एक बहुत बड़ी ब्रिटिश समुद्रवर्ती इजीनियरिंग मस्था अटलांटिक के ऊपर कृत्रिम द्वीपसमूहों की एक शृखला बनाना चाहती है। ये H समुद्रो स्टेशन जिसमे प्रचालन और प्रावास डेक दिखाये गये हैं । 37
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देख रही है। सन् 1955 में अगस्त से दिसम्बर तक लंकाशायर में 4,264 दुर्घटनायें हुई; रेडार को आरम्भ करने के फलस्वरूप सन् 1957 की इसी अवधि में दुर्घटनाओं की संख्या घटकर 3,724 रह गई, अर्थात् 123% घट गई। उस सफल प्रयोग के बाद उन अनेक देशों में रेडार गति-पाश'(Speed Traps)आरम्भ किये गये हैं जहाँ मोटरगाड़ियां बड़ी संख्या में चलती हैं और गति-सीमा का उल्लंघन करने वाले चालकों के खिलाफ कार्यवाही करते समय न्यायालय उनके प्रमाण को स्वीकार करते है। सामान्य रूप से यह उपकरण एक फ़ोटोग्राफ़ भी लेता है जिसमें कार की रजिस्ट्रेशन सख्या तथा दुर्घटना की तिथि, समय और स्थान चित्रित रहते हैं। 39 द्वीप गहरे समुद्र में होंगे तथा उनका सम्बन्ध पनडुब्बी-देवलों, रेडियो- टेलीफोन और रेडार से होगा। ये यूरोप और अमेरिका के बीच बढ़ते हुए हवाई और समुद्री यातायात के लिये विश्वमनीय सचार प्रस्तुत करेंगे। इस प्रकार के तीन या चार 'समुद्री स्टेशन' यातायात-नियंत्रण, हवाई या समुद्री वचाद-कार्य और अन्य सकटकालीन अवस्थाओं में एक महत्वपूर्ण सचार-तत्र प्रस्तुत कर सकते है। प्रत्येक समुद्री स्टेशन नली के आकार का होगा जिसकी लम्बाई 400 फुट और व्यास 16 फुट होगा; यह ऊर्ध्व स्थिति में समुद्र में डूबी रहेगी, केवल 80 फुट लम्बा भाग समुद्र के वाहर रहेगा। इसका तल बहुत भारी होगा और इसकी जड़त्व इतनी अधिक होगी कि भारी समुद्र में भी वह ऊपर-नीचे नही होगा और न धूमेगा । सिलिण्डर के ऊपर एक अधिरचना वदी होगी जहां लहरें न पहुंच सकेगी। उसमे कर्मीदल के लिये आवास, प्रचालन कक्ष, उपस्कर और डीज़ल-इजन कक्ष, हेलीकॉप्टर के उतरने का डेक और अनेक एरिअलों के लिये स्थान होगा। इस योजना को बनाने वाले इजीनियरों का विश्वास है कि इस प्रकार के प्रत्येक समुद्री स्टेशन में एक दर्जन आदमी काम करेंगे। ये स्टेशन अटलां- टिक के दोनों ओर यातायात-नियंत्रण केन्द्रों को रेडार द्वारा सूचना भेजने में अत्यन्त उपयोगी सिद्ध हो सकते हैं। वे नोचालन-सकेतकों के रूप में काम करेंगे और मौसमी आँकड़े इकट्ठा कर मौसम-सम्बन्धी जहाजों की जगह इस्तेमाल हो सकेंगे। मौसम-सम्बन्धी जहाज की अपेक्षा समुद्री स्टेशन पर काम करना अधिक रुचिकर होगा क्योंकि उसमे पर्याप्त आराम और अधिकतम सुरक्षा होगी। अनुमान है कि समुद्री स्टेशन का जीवन कम-से- कम 20 वर्ष होगा। जमीन पर रेडार का उपयोग सबसे पहले सन् 1957/58 में ब्रिटेन में हुआ। वहां पुलिस ने तेज मोटर-चालकों के खिलाफ प्रचार करने में इसे इस्तेमाल किया । उस काम में यह अत्यन्त सफल सिद्ध हुआ ! लंका- शायर और लन्दन की सीमा पर ऐसे 'रेडार-मीटर' लगे थे जो मोटरगाड़ी की गति को स्वयं ही रजिस्टर कर लेते थे। ये मोटर विशेष रूप से सड़क के उन भागों में लगे होते थे जहाँ दुर्घटनायें अधिक होती थी और मोटर- चालकों को चेतावनी दी जाती थी कि रेडार की 'मायाक्षि' उनकी ओर 38
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पायलट पूरे अनुशासन से काम करता है और नियंत्रण-बुर्ज के साथ रेडियो-टेलीफ़ोन द्वारा सम्पर्क स्थापित करने के बाद वह उसके अनुदेशों का पालन करता है क्योंकि केवल बुजं में काम करने वाले रेडार-प्रचालक यह जानते हैं कि अनेक वायुमार्गों में पूरे हवाई अड्डे के नियंत्रण-क्षेत्र में क्या हो रहा है । ये वायुमार्ग हवाई अड्डे पर उसी प्रकार आकर मिलते हैं जिस प्रकार मोटरमार्ग किमी चौराहे पर आकर मिलते हैं। उनका काम है ट्रैफिक को निकालते जाना, चकार लगवाकर वायुयानों के समय को नियमित करना ताकि वे सुरक्षित रूप से नीचे उतर आये, और जमीन पर उतरने के लगभग आधा मील पहले से उनका निर्देशन करना। उसके बाद वायुयान के धावनपथ पर आकर रुकने तक पायलट फिर से पूरी जिम्मेदारी के साथ वायुयान पर नियंत्रण रगता है। एक पायलट और लन्दन हवाई अड्डे पर लगे 'रेडार' के बीच आपस में होने वाला 'पहुंन वार्तालाप' कुछ इस प्रकार होगा : पायलट : हेलो, लन्दन, यह वीलाइन होटेल सीरा [वी.ई.ए. एयर-लाइनर एच. एस. का नाम-संकेत] है जो जर्सी से लन्दन हवाई अड्डे की ओर आ रहा है। ऊंचाई 2000 फुट। 14:35 पर डन्सफ़ोल्ड के ऊपर पहुंच जायेगा और अनुमान है कि 14-40 पर एप्सम मे होगा। रडार : रोजर । यह एका 'निगरानी रेडार पहुंच' होगी जो रपर्श-स्थल से आधा मीत पहले समाप्त होगी । आधा मील के परास पर उपयुक्त ऊंचाई के बारे में बताया जायेगा ! देख लो कि तुम्हारे पहिये नीचे की ओर है और लॉक है। पायलट : रोजर । पहिये नीचे की ओर है और लॉक है । रेटार : स्पर्श-स्थल से 63 मील पर पहुंच रहे हो, नीचे उतरना शुरू करो और 3 डिगी विसर्पण-पथ बनाये रखो। पागलट : रोजर। रेडार : परास 6 मील-देख लो ऊंचाई 1850 फुट है। वायुयान के हर आधा मील आगे बढने पर वार्तालाप की पु राति होती रहती है। हर आधे मील पर पायलट को वायुयान को ऊंचाई 150 फुट कम कर देनी चाहिये और अन्तत. उसे 'रेडार' से ये शब्द सुनाई देते है : "परास एक मील-ध्यान दो कि तुम्हारी ऊचाई 350 फुट है स्पर्श-स्थल से पराम आधा मोल-पहुंच पूरी।" इसके बाद पायलट को कुछ 41 tramwana from ऐम्बर दो AMBER TWO. ABirmingham विमिघम से लैचने utpan मान एक RED ONE बोविन्डोन somcow ऐटर से हरा एक GREEN OWE साइनहम से tram Lynonom Coreon हवाई अड्डा A ज AIRPORT एप्सम ECON मार से Irom Lomond 'सेवेनोपस लाल एक RED ONE गटविक साउपम्पटन से ATrom Hamal 'हेस्टिग्स का रिपोर्ट स्थान 2. निर्दिष्ट रिपोर्ट.स्यान . प्रार्थना पर रिपोर्ट स्थान अन्दर माने शाले मार्ग नियतण-झोत्र प्रापत्कालीन होल्डिग स्टक लन्दन प्रतिम स्थल निपन क्षेत्र AMBER ONE ऐम्बर एक वायु-पप- सन्दन हवाई अड्डे के नियंत्रण-क्षेत्र के पश्चिमी और उत्तरी भाग एरिप्रल RADOME रंडोम ए.एस.एम.माई.-3 के स्कंनर मे एक रंडोम में रखा और एक प्लास्टिक कोतस्तरीमेसांचा पाचोर' (पनीर) एरिमल होता है। मोटर ROTAT.NG JOINI परिश्रमीमाधि 42 और कहने या सुनने की आवश्यकता नहीं और वह पूरी कुशलता और अनुभव के साथ अपने वायुयान को नीने उतारने लगता है। वास्तव में लन्दन हवाई अड्डे में अनेक परासों के लिये अनेक रेडार- उपारण हैं तथा जमीन पर यातायात की देखभाल और नियंत्रण करने के लिये एक विशेष तंत्र ए.एस.एम.आई.-3 (A.S.M.I.-3) है। इसकी एरिअल-परिभ्रमण-दर असामान्य रूप से बहुत अधिक अर्थात् 1000 परि- भ्रमण प्रतिमिनट है जिससे सेट धावनपय पर किसी भी प्रकार की गति की लगातार सूचना दे सकता है। जब वायुयानों को उच्च-गति मार्गों पर ले जाना हो नो घुमाव-बिन्दु ठीक-ठीक दिया जाना चाहिये जिससे अनिलघन का कोई यनरा न रहे । धावनमय के किनारे, पास वाले क्षेत्रों में 'टेक्ती' मार्ग आदि स्पष्ट देगे जा सकते हैं जो वम होने को हालत में महत्वपूर्ण होंगे। उपकरण में बहुरगी कथोड-किरण नलियां लगाई जा सकती हैं, जिससे पी.पी.आई. पर गतिशील वस्तुयें एक रंग में और स्थायी प्रतिध्वनियाँ दूसरे रंग में दिखाई देती हैं। L ख ब ग रा ग ग प मानक हवाई प्रडा संस्थापन के चार ताके क-हवाई उपस्कर वक्ष, ख-प्रेषित्र कक्ष; ग-प्रचालन कक्षा । एरिमल मे 2000 गज दूरी पर प्रदर्शन हो सकते हैं । आजकल दुनिया में मध्यम और छोटे आकार के असंख्य हवाई अड्डे और हवाई मैदान है। बटे हवाई अड्डों की भांति उनमें उपकरण लगाने को जरूरत नहीं पड़ती है और न वे ऐसे उपकरणों को लगा सकते हैं। अधि. कांशतः उनमें 'हवाई मैदान नियंत्रण रेडार तत्र' होते हैं जिनमें अन्तिम पहुच के समय नियंत्रण करने और निगरानी रखने की मुविधाये होती हैं । प्लेस्सी-424 इस प्रकार का एक विशेष उपकरण है। वह केवल 20 किलोवाट पावर के साथ 3-सेंटिमीटर तरंगों पर काम करता है जिसमें 24 परिभ्रमण प्रतिमिनट के हिमाव में चक्कर लगाने वाला सकीर्ण-छड़ का एरिअल होता 43 960 ०० एक विशिष्ट '424' संस्थापन जिसमें एक छोटे से हवाई मैदान का नियंत्रण-कक्ष दिखाया गया है। है। उसमें लम्बे परासों के लिये 05 माइक्रोसेकंड और छोटे परासों के लिये 0.1 माइक्रोसेकंड की दो वैकल्पिक स्पंद-लम्बाइयाँ होती है। उसमें दो पी.पी.आई. प्रदर्शन होते है जो दो नियत्रकों की देखरेख में रहते हैं; एक प्रदर्शन आने वाले वायुयान के 5 मील की दूरी तक लम्बी परास 'विन्यासन' के लिये जिम्मेदार होता है, और दूसरा अन्तत. उतारने में मदद करता है । हवाई अड्डों में इस्तेमाल होने वाले रेडार में एक महत्वपूर्ण संशोधन 'चल लक्ष्य सूचक' (एम.टी.आई.) (Moving Target Indicator- M.T.I.) है। यह एक प्रकार का रेडार उपस्कर है जो पी.पी.आई. पर केवल चलायमान वायुयानों को ही दिखाता है और भूमि-चिल्ल, इमारत मादि सभी स्थिर वस्तुओं को छोड़ देता है। किन्तु प्रचालक किसी भी समय पूरा चित्र अथवा स्थायी प्रतिध्वनि पंटर्न' अथवा मिलाजुला एम.टी.आई. या सामान्य चित्र देख सकता है जो चलायमान लक्ष्यों को पूरी तीनता के साथ चित्रित करता है किन्तु स्थायी प्रतिध्वनि पृष्ठभूमि की उतना ही दिपाता है जितना प्रचालक चाहता है।
TRANSMITIER ROOM नॉन स्पद LOCK PULSE निषित का . mamal FREQUENCY DIVERSNY UNIT : भावृति परिवर्तन यूनिट ट्रिगर मामान्य वाइडिपो V DEO 10 NORMAL TAGGER Intel PRGER दिगर मापक ANCILLAR ES NII VIDEO NII एमटी माई वाइडिया MIXEDHILमिथित एम NORMAL VIDEO टी पाई. TRIGGER OPERATIONS ROOM प्रधालन कक्ष CIRCULAR POLA! Larow TO AERIAL ܝܐܢܪܝ ܙܢ ܥ ०० ratnam VIDEOMAP याडिग्रोभाण TURNING DATA FROM AERIAL हवाई अड्डे के लिये 'चल लक्ष्य सूचक' (एम.टी.माइ.) का खाका 1. स्यायो प्रतिध्वनि पंटन। 2. एम टी प्राई. को स्विच करने से प्रवरुद्ध स्थायी प्रतिध्वनियां : वायुयान लक्ष्य प्रासानी से पहचाने जा सकने योग्य। 3. मिश्रित एम.टो प्राई./सामान्य बाइडिनो। विशेष प्रावश्यक्तानों के लिये प्रचालक स्थायी प्रति. ध्वनियों को नियंत्रित कर सकता है। 45 अन्धी उड़ान और अन्धा अवतरण रेडार उड़ान के समय वायुयान के संचालन में सहायता करता है और लिन द्वारा एयर-लाइनर को यात्रा को यथासम्भव सुरक्षित बनाने की कोलश करता है । वास्तव में यद्यपि जेट एपर-लाइनर के यात्री को इस बात कास्ता नहीं रहता है किन्तु उड़ान के बाद (जब उसे अपनी सीट-बेल्ट ढील ही करने को कहा जाता है) से नीचे उतरने के कुछ ही पहले तक (जव उसे पेटं बाधने को कहा जाता है) उसका वायुयान स्वतः नियंत्रित रहता है। पिट में बैठे पायलट प्रत्येक स्टेज पर गति, दिशा, ऊंचाई का निर्णय लेते कॉक और अपने आदेशों को 'स्वतःपायलट' (auto-pilot) को भेज देते हैं। 'स्वत.पायलट' इलेक्ट्रॉनिक उपस्कर का एक अत्यन्त जटिल भाग होता यह है। आदेश प्राप्त होने के बाद वह एयर-लाइनर को उड़ाने तथा कर्मीदल का करिन किन्तु म्वत कार्य स्वयं करने लगता है। इस प्रकार नीचे उतरते समय फिर से कार्य सम्भालने के लिये पायलट तरोताजा महसूस करते है । किन्तु दुनिया की बड़ी हवाई कम्पनियाँ इन आश्चर्यजनक स्वचालित लटो द्वारा वायुयान को नीचे उतरवाने में क्यों हिचकिचाती हैं ? पाय आईएल.एस. (I.L.S.--Instrument Landing System अर्थात् उप- ण अवतरण तय) को मदद से नीचे उतारने का काम किया जा सकता है र प्रयोग के रूप में अनेक वार किया जा चुका है। आई.एल.एस. कम्प्यूटर की द से काम करता है और इसे सबसे पहले सन् 1949 में ब्रिटेन के रॉयल रजापट संस्थान ने स्थापित किया था। तब से अटलांटिक के दोनों ओर एय अनेक प्रकारकतत्रो का विकास कियागया है और स्वचालित अवतरण आरम्भ ने से पहले अन्तर्राष्ट्रीय हवाई कम्पनियों को यह निश्चय करना है कि नसा तंत्र सबसे अधिक उपयुक्त होगा ताकि उसे अपनाने वाला वायुयान एवं मानकित उपस्कर से काम कर सके । अच्छे मौसम में ही नहीं, बल्कि अल्प यता अथवा कुहरे की अवस्था में भी पूर्ण सुरक्षा की दृष्टि से परीक्षण तौर पर लाखों स्वचालित अवतरण करने होंगे। प्रत्येक वायुयान में दो ई.एल.एस. स्वतःपायलट लगाने पड़ेंगे, ताकि यदि एक में कुछ गड़बड़ी हो जाय तो मग उसकी जगह काम कर सके। मूलतः वर्तमान "द्वितीयक निगरानी रेडार' तंत्र को पूर्णतः स्वचालित पाया जा सकता है। वह जमीन पर 'अन्वपित्र' की और वायुयान में मद सा 46 4-.. TRANSPONDER प्रेएग्राही एस.एस.पार. (द्वितीयर पिगगनगे रेटार) S.SR (Secondary Surre l'orce अन्वेषित्र Radar INTERROGATOR 'प्रेषग्राही' को मदद से कामकरता है। अन्वेपिन' 'प्रेपग्राहो' से प्राप्त किरण- पुंज को वापिस भेजता है जिससे वायुयान को पहचानने और स्वय उसकी ऊचाई और गति का अनुमान लगाने में भू-काण्ट्रोल को सहायता मिलती है । अन्ध-अवतरण में 'ऑटोपलेयर' (autelare) तत्र सहायक होताहै हवाई अड्डे के मैदान से चला रेडियो-किरणपुंज आने वाले वायुयान की पाश्विक गति पर नियंत्रण रखता है ताकि वह धावनपथ के केन्द्र की ओर जाये । इसमें कोई सन्देह नहीं कि एक दिन स्वतः अवतरण और उड़ान अवश्य होंगे; किन्तु शायद यह 1970 से पहले सम्भव न हो । तब तक सुरक्षा और मानकीकरण की सभी आवश्यकतायें पूरी हो जायेगी और उस काम मे रेडार का महत्वपूर्ण योगदान होगा। AUTOFLARC APPROACH प्रॉटोपले पर पहुंच आई एल एस युग्मित पहुँच IL S coupled आई एल.एल. नियोजित । cpproOCA प्यूटर दाग निपवण Ils disconnected Control by computer 200 फर 2011 रेन्धिोतरतामापी सागर Astotlandy rod yo'l meter भ-स्पर्श Touch down Asp each angler पहरण वादल और बाधा सम्बन्धी चेतावनी रेडार के विकास के समय यह आशा की जाती थी कि दिमानवाहित रेडार-सेट विशेष रुप से रात मे या कम दृश्यता के समय वायुयान को उतारने में वायुयान के चालकों का अत्यन्त सहायक सिद्ध होगा। किन्तु अनुभव से पता लगा है कि हवाई अड्डे में भू-स्थित रेडार इससे कहीं अधिक उपयोगी होता है। साथ ही रेडार के अलावा अन्य निर्देशक यंत्र भी वायुयान-चालक की विशेष आवश्यकताओं के लिये बनाये गये थे। उनका वर्णन पृष्ठ 52-55 में किया गया है। विमानवाहित पी.पो.आई. रेडार की अपनी विशेष उपयोगिता है। यह पायलट को दो प्रकार के खतरों से सचेत करता है जिनसे पहले समय में, जव रेडार नहीं था, बहुत से लोगों की मृत्यु हो जाती थी। एयर-लाइनर में यात्री को वादलों का दृश्य बहुत सुन्दर दिखाई देता है किन्तु पायलट को सीट से वही वादल खतरनाक लगते हैं। CUMULO-NIMBUS CLOUDS.SEANAT A RANGE OF 20 MIQ5, AT ID QOFT 20 गोल के परास पर 10,000 फुट पर देखे गये कपासी-वर्षी चावल तथाकथित कपासी-वर्षी बादलों से, जो अत्यन्त गड़बड़ी पैदा कर सकते है, वायुयान को बचाना चाहिये । विमान में लगा रेडार 40 मील की दूरी से इन बादलों को पहचानने में पायलट की मदद करता है। मुख्य रूप से कपासी-वी वादलों को पहचानने के लिये बना यह विमानवाहित रेडार-उपरकर 3-सेंटिमीटर तरंग दैर्ध्य पर काग करता है। पी.पी.आई. पर्दे पर बादल स्पष्ट दिखाई देते हैं तथा रात में अथवा अल्प दश्यता की अवस्था में पायलट खतरनाक बादलो के बीच मे से एक सुरक्षित मार्ग का चयन कर सकता है। 48 उसी विमानवाहित रेडार-उपस्कर में भूमि के उस भाग का नित्र भी दियाई देता है जिस के ऊपर से वायुयान उड़ता है। इस प्रकार यह पायलट को पहाड़ों मे टकराने के पतरे मे सचेत करता है तथा हांगकांग जैसे दुष्कर एव स्थलरुद्ध बन्दरगाहों में आने-जाने में एयर-लाइनरों को मदद करता है। रेडार की मदद से पायलट बन्दर- पी.पी आई पर्दै गाह के क्षेत्र में प्रवेश कर आसपास के पहाड़ों को सतह मे बहुत निचाई पर उड़ान कर सकता है। इम प्रेपित्र-अभिग्राही में घूर्णाक्षम्यापी लगा रहता है जो वायुयान की 'उडान की ऊंचाई पर ध्यान दिये बिना उमे मही स्थिति में रखना है चाहे मशीन मोड़ ले रही हो, उतर रही हो अथवा उड़ रही हो। पर बादल तरग मार्ग-निर्देशक WAVEGUIDE .CYRD- STABILISER Dorfettarit TRANSMITTER ENCEIVER पिन अभिग्राही .REFLECTOR परावर्तक SCANNER AND TRAMSMITTER-RECEIVER UNIT.COMAINED WITH G20-STABLISER. घूर्णाक्षम्यापीयुक्त स्कैनर और प्रेषित्र-अभिप्राही यूनिट खड़ी चट्टानों वाली तटीय रेखाओं से 40 मील तक स्पष्ट संकेत मिलते हैं; निचले रेतीले किनारे 30 मील या इससे अधिक दुरी तक दिखलाई देते हैं-यह सब पेड़-पौधी अथवा इमारतों की उपस्थिति पर निर्भर करता है। प्रतिध्वनियों की भांति, पोत 5 से 25 मील की दूरी तक, आकार एवं सामग्री के अनुमार (लकड़ी या लोहा) दिखलाई देते हैं, और वायुयान 12 मील तक देखे जा सकते है । 49 रेडार द्वारा चार्ट बनाना । रॉयल एयर फ़ोर्स का कार्य उपनिवेश मत्रालय के लिये हवाई फोटो- ग्राफी द्वारा सर्वेक्षण करना है। जिन वडे-बड़े क्षेत्रों का ठीक ढंग से नार्ट नहीं बना है उनका हवा से फोटोग्राफ लिया जाता है और प्राप्त चित्रों का नवशा वनाने में उपयोग किया जाता है। यह काम मुग्यत नम्बर 82 मरवाड्रन द्वारा किया जाता है जिसके लैकास्टरों ने सन् 1946-1951 के दौरान अफ्रीका में 800,000 वर्गमील क्षेत्र के फोटोग्राफ लिये। यह क्षेत्रफल ब्रिटिश द्वीपसमूह का आठ गुना है ! किन्तु मर्वेक्षण में सम्बन्धित अनेक समस्याओं को केवल हवाई फोटोग्राफ़ी हल नही कर मकती है। अत यह काम रेडार को सौपा गया है । वात यह मालूम करनी हे कि फोटोग्राफ लेते समय वायुयान की मही स्थिति मालूम करना मवमे अधिक महत्वपूर्ण काम होता है। रेडार-फोटोग्राफी-सर्वेक्षण इस भांति काम करता है : प्रस्तावित कार्यों के लिये बेस के पास पहुंचने पर एक रेडार-बीकन स्थापित किया जाता है और सर्वेक्षण मशीन बीकन के चारों और अधिकतम परास पर पहुचने तक एक के बाद एक चौड़े चक्कर लगाती जाती है। प्रत्येक लैकाग्टर में एक रेडार-सेट फ़िट रहता है तथा कैथोड- किरण नली पर प्रदर्शन को देखकर वायुयान को ठीक मार्ग पर लाने में मार्ग-निर्देशक पायलट की मदद करता है । अधिक यथार्थता के लिये मुख्य कैमरे के साथ एक रिकार्ड करने वाला कैमरा भी इस्तेमाल किया जाता है। वह 'बेस वीकन' और अनेक मार्ग-निर्देशक उप- करणो को प्रदर्शित करने वाले पर्दे का फोटो लेता है और इस प्रकार क्षेत्र का पूरा चित्र मुख्य कैमरे के सामने आ जाता है और साथ ही मशीन की वास्तविक स्थिति का फोटोग्राफीय प्रमाण भी अभिलेखित हो जाता है। अधिकाश कार्य जमीन से 15,000 फुट की ऊंचाई से किया जाता है। O RECEIVER SECTION पाही पण्ड 50 फोटोग्राफ पट्टियों में लिये जाते हैं किन्तु बादल या कुहासे की हालत में सर्वेक्षण-फोटोग्राफ़ों की श्रेणी में रिक्त स्थान होते हैं। ऐसी परिस्थिति में रिक्त स्थानों को भरने का दुष्कर कार्य बाद में करना पड़ता है ! इस प्रकार के काम के लिये एक विशेष कैमरे की जरूरत होती है जिसका विस्तृत-कोण लेंस 6-इंच चौड़ा होता है और जो से प्रति- सेकंड की कपाट क्षिप्रता से स्वत: 5 से 60 सेकंड में 200 एक्सपोज़र ले सकता है। एक माइक्रो-स्विच एक रेडार-स्पंद का प्रचालन करता जो यह बत- लाता है कि कुछ ही मिलि-सेकंडों में कितनी बार उद्भासन हुआ । यह कैमरा ऊष्णकटिबन्धीय ताप से लेकर शून्य से भी कम ताप तक हर परि- स्थिति में काम कर सकता है । किन्तु हवाई सर्वेक्षण करना उस दीर्घकालीन जटिल कार्य का केवल एक भाग होता है । इसके बाद ऊष्णकटिवन्धीय परिस्थितियों में फ़िल्म को डेवलप और प्रिंट करना पड़ता है और अन्ततः उन प्रदेशों के नक्शे तैयार हो जाते है जहाँ अभी तक किसी गोरे आदमी-और शायद किसी काले आदमी के भी पैर न पड़े हों। वायुयानवाहित रेडार की अन्य सम्भावनाओं का परीक्षण किया जा रहा है। युद्धकालीन ए.एस.वी. (A.S.V.--Aircraft to Surface Vessel) तंत्र का एक उपयोग सतह के पास तैरती हुई मछलियों के झुण्ड का पता लगाना है। कैनेडा के तालावों में यह कार्य सफलतापूर्वक किया गया है। रेडार-युक्त भेदिया (spotter) वायुयान मछली मारने वाले जलयानों का मार्ग-निर्देशन करते हैं। दूसरा आकर्पक उपयोग पक्षी-प्रवसन (bird migration) को प्लॉट करना है। पक्षियों के बड़े-बड़े झुण्ड जहाज या वायुयान के पी.पी.आई. पर दिखलाई देते हैं तथा रेडार द्वारा बड़े-बड़े समुद्रों अथवा दुर्गम रेगि- स्तानों को पार करने वाले पक्षियों के बारे में अत्यन्त उपयोगी सूचना प्राप्त होती है जो शायद अन्ग किमी भी प्रकार से प्राप्त नहीं हो सकती है । सम्भ- वतः रेडार एक दिन पक्षियों की उस भीतरी घड़ी' के रहस्य का भी पता लगा ले जो उन्हें वार्षिक प्रवमन में महायक होती है; अर्थात् वह रहस्य जिससे वे पता लगा लेते हैं कि कब और कहाँ प्रवमन करना चाहिये जव कि हजारों मील दूर अपने बच्चों का पालन-पोषण करने के लिये उन्हें 'घर' मिल जाते हैं। 51
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atta (LORAN-LOng RAnge Navigation erfa दूर-परास सबालन) नामक अमेरिकी तंत्र में स्पंद-प्रेषण स्टेशनों के युग्म इस्तेमाल किये जाते हैं जो एक-दूसरे से 600 मील तक की दूरी पर कार्य करते हैं । स्पंद, अभिग्राही-पर्दे पर प्रदर्शित किये जाते हैं और दो स्पंदों के आगम-समय के अन्तर से सचालक को अपनी स्थिति का पता लग जाता है। इस काम में उसे पाच मिनट लगते हैं अतः यह विधि वायुयान की अपेक्षा जहाजों के लिये अधिक उपयुक्त है । परास दिन में लगभग 700 मील और रात में 1500 मील तक होता है। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान उत्तरी अटलांटिक और प्रशान्त महासागर इन संचालन सहायक-साधनों से परिपूर्ण थे। मोसमी जहाज - लोरेन स्टेशन (बैम ममि मे. MAD SHOWING OOSITIONS OF WEATHER SHIPS AND LAND-BASED LORAN STATIONS नक्शा जिममे मौसमी जहाजों और जमीन में वेस वाले लोरेन स्टेशनो को दिखाया गया है । आजकल उत्तरी अटलांटिक, यूरोपीय और अमेरिकी वायु-पथ एवं 'हवाई अडडे अनेक रेडारों और रेडियो-महायक-साधनों से परिपूर्ण है। डेक्का और लोरेन के अतिरिक्त, दूर-परास दिशाज्ञापक ब्रिटिश कनसोल तंत्र जिसे पायलट विना किसी विशेष उपस्कर के इस्तेमाल कर सकते है। अपदृश्यता के लिये अनेक अमेरिकी उपकरण-अवतरण तंत्र; मध्य-आवृति बीकन जिन पर रेडियो-दिक्मूचक की मदद से पायलट अपने बेयरिंग ले सकता है; आर.आर. (R.R.~Radio Range) जो एक अल्प पराम वाला साधन है और उसमें होने वाले किरणपुंज के सहारे वायुगान का संचालन हो सकता है, स्वतः दिशा-बोधयः; नियमित वायु-मार्गों पर रेडियो-स्थिनिदर्शक, और वायुयान का जमीन 53 से सम्बन्ध स्थापित करने वाला वी.एच.एफ़.-आर.टी. (VHF-RT--- very high frequency radio-telephone अर्थात् अति उच्च आवृति रेडियो-टेलीफ़ोन) आदि इस्तेमाल होते हैं । अन्य उपयोगी सहायक-साधन निगरानी-तंत्र है जिसका वर्णन पहले किया जा चुका है । यह रेडार द्वारा हवाई अड्डे से वायुयान की दूरी और स्थिति बतलाता है। रेडार-तुंगतामापी भी एक उपयोगी साधन है जो एरिअल पिछला पोर्ट किरणपुज पिछला 'स्टारबोर्ड किरणपुज भाग वायुयान की ओर परिवर्तित हो 'किरणपुंज द्वारा प्रदीप्त-क्षेन- अगला स्टारबोर्ड किरणपज, 4-बाहर की ओर प्रेपित किरणपुज- अगला पोटी किरणपुंज . किरणपुज द्वारा प्रदीप्त क्षेत्र अगला किरणपून वापपान मे पहले प्रेरित होता है मोर प्रतिसेकर दोबार प्रत्यार होता है। वायुयान से पुन परातित सरतो को पाति जमीन के अपर वायपान पास के पनुगत में यह गाती हैं। पिछला हिरणपुंज पिछले भाग प्रेरित परता है पोर पोर्ट से स्टागोमा प्रतिम दो बार प्रत्यार्वतन परता है। वापपान को पुन परावर्तित मोनाको पातान जमीन पर वायुयान को पान के अनुपात मे 'पट जाती हैं। 54 । रेडार-प्रतिध्वनियों की मदद से संचालक को जमीन से उसकी मशीन की दूरी बतलाता है। 'मार्कोनी कम्पनी' और 'रेडियो कॉर्पोरेशन ऑफ़ अमेरिका द्वारा विकसित सबसे अधिक महत्वपूर्ण संचालन-सहायक तंत्र में किसी भी भूमि स्थित स्टेशन की आवश्यकता नहीं होती है । इसे डॉपलर (DOPPLER) तंत्र कहते हैं क्योंकि इसमें डॉपलर सिद्धान्त लागू होता है। डॉपलर सिद्धान्त इस प्रकार है : जब किसी रेल-इंजन की सीटी हमारे पास पहुंचकर आगे निकल जाती है तो उसका तारत्व कम हो जाता है जिसका कारण यह है कि जैसे-जैसे तरंगों (ध्वनि-तरंगों और विद्युत्-चुम्बकीय तरंगों) का स्रोत प्रेक्षक के निकट आता है वह तरंगों को उच्च आवृति पर प्राप्त करता है और जब स्रोत उससे दूर होता जाता है तो उन्हें निम्न आवृति पर प्राप्त करता है । डॉपलर संचालन तंत्र में उड़ान की अवधि में वायुयान में प्रेषित्र से दो रेडार-किरणपुंज भेजे जाते हैं जिनमें एक किरणपुंज दूसरे की अपेक्षा जमीन से थोड़ा पहले टकराता है। वायुयान में अभिग्नाही द्वारा पिकअप की गई प्रतिध्वनियों की आवृति का परिवर्तन जमीन पर उसकी गति को बतलाता है । दोनों किरणपुजों के प्रतिसेकंड दो बार स्टारवोर्ड से पोर्ट की ओर जाने के कारण संचालक को अपनी मशीन के अपवहन कोण का पता भी लग जाता है। 55 रेडार और हमारी दुनिया मौसम की भविष्यवाणी माना मध्यमुण्ड सोपी प्रगण किरण DIRCT 10 मोल पर उच्च भभि ज्ञान रेडार-भिनित्र 12 मील पर HISTLANOATSOHLS UDYO HOULOH DETECTED श्वाश-क्षितिज ATHIMLES १मील पर OPTICAL HORIZON AT9MILEIN रेडार (62 फट SHIP AT 20 MEES NOT DETECTED LOW LAND AS 20 मील पर जहाज अजात SHILESHPT25 मोन पा DETECTED निम्न भूमि पजान सामान्य रेडार व्याप्ति-स्थन STANDARD MAIH LODE ममः को मार जब सर रॉबर्ट वाट्सन-बाट कुछ मौसम सम्बन्धी तथ्यों का अध्य- यन कर रहे थे तो दूर की वस्तुओं को रेडियो-तरंगों द्वारा पहनानने का विचार पहली बार उनके दिमाग में आया । तब से रेडार और मौसम- विज्ञान अनेक ढंग से एक-दूसरे से सम्बन्धित हो गये है। यह साहचर्य हमेशा उपयोगी नही रहता है। जब रेडार का उपयोग आरम्भ हो हुआ था तब रेडार-प्रेषण पर वायुमण्डलीय परिवर्तनो के प्रभाव के अपर्याप्त ज्ञान से अनेक त्रुटियों हुई। सामान्यत. रेडार-बीम एक पुलिस- मंन के बहुत बडे डडे का म्प ले लेती है जिसके नियमित और विस्तारी पार्श्व होते है। यदि वायुमण्डल की निचली परतो का घनत्व बदल जाता है, जैसा मौसम बदलते समय प्राय हो जाता ह तब उसके साथ हवा मे से दियो क्षितिज 12 मोल पर LADAR HORZON AT 12MILS प्रमाण क्षितिज onkan HORIZON भाना मुम्पस LOBE मील पर AT PLUS 17मोल पर उच्चभूमि HIGH LANG AT 17 LES SIG IT BUT MOT DETECTS दन्टिनाचा किन्तु अज्ञात OPTICA. Alat MAIN "DARD (67 कर . चहाजमीन कोरी पर दिनु प्रज्ञा उपोपवनन 56 रेडार-तरंगों का मार्ग भी बदल जाता है । इस कारण रेडार-बीम भिन्न रूप ले लेती है। या तो वह ऊपर की ओर मुड़ जाती है जिसमें कुछ ही मील दूर भूमि की सतह पर स्थित वस्तुयें नहीं पहचानी जा सकती है, इसे 'उपोपवर्तन' कहते है । अथवा वह भूमि की सतह के साथ मुड़ जाती है जिस से मामान्य परात ने कई मील परे तक 'व्याप्ति क्षेत्र' बढ जाता है; किन्तु वह अधिक ऊँचाई पर स्थित वस्तुओं को पूर्णतया छोड़ देती है। इसे 'अधि- अपवर्तन' कहते हैं अथवा अधिक आधुनिक भाषा में उसे 'अमंगत सचरण' या संक्षेप में ऐनाझोप (ANAPROP) कहेंगे। विशेष स्थिति में लन्दन के निकट रेडार-पर्दो पर पेरिस की ईफेल (Eiffel)मीनार देखी जा सकती है। 20 मील पर 33 मोन पर 50 कुट 12पील पर रेडियो-क्षितिज जहाशात ऊचा द्वीप ज्ञान RADIO MORITOM AT 12 MILES SK AT IO MIES FDITISLANDST DETECTED UMILLS DETECTED पृष्ठ रेडियो प्रति क्षितिज :55 मील पर मुख्य अमि ज्ञात ELECARE BADIO DUET शिनारे पर 162 पद मीन पर HAR सतह के निस्ट 54sath SUPER-REFRACTION अधि-प्रपवर्तन ऊँचाई के बढने के माथ ताप के शीघ्र गिर जाने से उपोपवर्तन होता है । सम्भवत. ताप में यह गिरावट समुद्र के हिमाच्छादित भाग मे खुले पानी वाले भाग की ओर चलने वाली हवा के कारण आती है। ऊँचाई के वढ़ने के साथ ताप के एकाएक बढ जाने से अधि-अपवर्तन होता है। ताप में यह वृद्धि हवा के, गरम भू-भाग से ठण्डे समुद्री क्षेत्र की ओर, बहने से होती है । नम हवा या पानी अथवा वर्फ के गिरने से रेडार-प्रतिध्वनियों की शक्ति घट जाती है और अनुभवहीन रेडार-प्रचालक इसमे भुलावे में पड़ सकता है । उच्चभार वाली हवाओं में रेडार के पर्दे पर 'सडखडाहट' उत्पन्न हो सकती है। आजकल त्रुटियों के ये सम्पूर्ण स्रोत एक विटोपन रेडार मदालक को मालूम रहते है। दूसरी ओर रेडार-उपस्कर पर मौसम-सम्बन्धी घटनाओं के प्रभावो का उपयोग मौसम की भविप्यवाणी के लिये किया जा सकता है। वादत्त-चेतावनी-पद्धति भी, जिसका उल्लेख किया जा चुका: है, एक अनुप्रयोग है। रेडार के विकास से पहले वायुमण्डलीय 'कड़क, 57
(crackles) का स्रोत भी
में सर रॉबर्ट वाट्सन-वाट ने
नम पर्तों में रेडार-तरगों
वैज्ञानिक मौसम-परिवर्तनों
से प्राप्त प्रतिध्वनियों को
बूदें जितनी बडी होंगी पर्दे
वर्षा-बादल, आँधी-पानी के
स्पष्ट प्रतिध्वनियाँ प्राप्त ह.
मील या इससे भी अधिक दू
ऊधिर स्थिति में खडी ए
मण्डल का अवलोकन करती.
उपकरणों पर बादलों के
विस्तार से सूचना देती है।
रेडियो
बहुधा 'रेडियो सांदे' में ताप, नमी और दाव को नापने वाले मौसम सम्बन्धी उपकरण होते हैं और एक छोटा-सा रेडियो-प्रेपित्र भी लगा होता जो स्वयं ही इस सूचना को भू-स्थित स्टेशन को भेजता है। हवा द्वारा प्रचालित एक 'हवा-मिल स्विच' स्वयमेव प्रेपणों को एक उपकरण से दूसरे उपकरण में भेजता है ताकि ताप, नमी और दाब के पाठ्यांकों का वारी- वारी से प्रसारण किया जा सके । हवाई छतरी की मदद से 'रेडियो सादे' धीरे-धीरे नीचे उतारा जाता है ताकि उपकरणों को सुरक्षित प्राप्त किया जा सके। जैसे-जैसे वायुयान की उड़ान सम्बन्धी ऊंचाइयां बढती जा रही हैं, वैसे-वैसे ऊपरी वायुमण्डल में हवा के बारे में ठीक-ठीक आंकड़ों की आव- श्यकता भी बढ़ती जा रही है क्योंकि आधुनिक मौसम के पूर्वानुमान के लिये अधिक विस्तृत जानकारी की आवश्यकता है। जमीन पर प्रचालक का केविन एक आदमी के लिये एक स्वतःपूर्ण 'प्रयोगशाला' होती है। इस केबिन से सांदे पर रेडार-किरणपुंज भेजा जा सकता है और प्रतिध्वनि प्राप्त की जा सकती है। उसे किसी भी दिशा में घुमाया जा सकता है क्योंकि वह किसी भी परिस्थिति का सामना कर सकता है । बहुधा दूर स्थित टाइप- राइटर के समान 'स्वचालित आंकड़े-मुद्रक' में पाठ्यांक भेजे जाते है जो 5 सेकंड में उपकरणों से प्राप्त सूचना को टाइप कर देता है। आजकल दुनिया के प्रत्येक हवाई अड्डे के लिये मौसम-रेडार सबसे अधिक महत्वपूर्ण उपस्कर है । यह 3 सैंटिमीटर और 10 सेंटिमीटर दोनों तरंग-दो पर कार्य करता है तथा 200 समुद्री मीलों के अर्धव्यास में वर्षण को प्रगति, मात्रा और गति के बारे में बतलाता है। 'रेडियो सांदे' की मदद से हवा के बारे में जानकारी प्राप्त करने के अलावा रेडार, साधारण रूप से घूमने वाले एरिअलों के दूर से नियंत्रित तंत्र द्वारा, मौसम का सर्वेक्षण करता है। सामान्यतया ये एरिअल 10 परिभ्रमण प्रतिमिनट की दर से घूमते हैं और किसी भी दिशा में घूमकर कुण्डलित रूप में अव- लोकन कर सकते हैं। 59 18 5 -17 -15 6 15 14 7 IIIHIE 13 10 LAYOUT OF THE EQUIPMERIT FOR WINDFINDING RADAR वाय बोपर रेडार के उपस्कर का साया 1. शंबु-अपलोकन के लिये स्पिनरचालित 12. उत्थापन पांच लेक पौर हिमी- मोटर भवन तथा पठन' नियत्रण 2. 75-kiV प्रेपित्र/अभिग्राही 13. उत्थापन पोर दिगंशचालित हाथ- 3. केविन के लिये प्रशीतक/तापक यूनिट चक्र 4. परास यूनिट 14. प्रदर्शन पर्दा 5. वातानुकलन-तन 15. अनुरक्षण के लिये प्लग मोर सॉकेट 6. उत्थापन और दिगंश डायल 16. संरेरान को रोकने के लिये 'पुला 7. मुख्य नियंत्रण पैनल स्थान' ४. प्रचालक केविन (तन्तु-काच) 17. गियर लगाना 9. प्रचालक की शीट 18. सहायक किरएपंज विस्तारक परा- 10. परिभ्रामी मेज़ वतंक के लिये सांचा (recess) 11. समायोजनीय पवि 19. ऐल्युमीनियम हाचा और परावर्तक 60 दिगंश सूचक प्रदर्शन-यूनिट REFLECTOR ASSEMBLY परावर्तक वायु उत्थापक और, परास यूनिट NERAL ELEVATORSI RANGEut AXINUTH INDICATORS 000 00 00 DISPLAY UNIT संयोजक प्रेषित TRANS- MITTER नियन्त्रण-यूनिय | मुख्यतार निविष्ट UNIT MAINSPUR DOSTLUUTION URT WITH POWER AND DELATED TRIGGER LINIT CONTROL UNIT REMOTE AUTOMATIC! DATA PRINTER नियत्रण-यूनिट दर SEQUENC NG LINIT स्वत.आंकडे अनुक्रमण-यूनिट पावोर विलवित ट्रिगर- यूनिट सहित वितरण-यूनिट W ALTERNATOR प्रत्यावर्तक मुदक LAYOUT FOR WINDFINDING RADAR वायुबोधक रेडार का खाका 61
रेडार अन्तरिक्ष में
ब्रिटिश वैज्ञानिक सर एडवर्ड ऐपल्टन ने सन् 1945 में बतलाया कि
रेडार-तरंगे चन्द्रमा तक पहुंच सकती हैं। कुछ महीनों बाद अमेरिकन आर्मी
सिगनल कोर ने सूचना दी कि उन्होने रेडार-तरंगों द्वारा चन्द्रमा से सम्पर्क
स्थापित कर लिया है। रेडार-सिगनल के चन्द्रमा तक पहुंचकर वापिस आने
में अर्थात् 477,720 मील की दूरी तय करने में 23 सेकंड लगते हैं । इस
प्रयोग की वैज्ञानिक उपयोगिता यह थी कि इससे पृथ्वी और चन्द्रमा के बीच
की दूरी अन्य विधियों को अपेक्षा अधिक यथार्थता से मापी जा सकती थी।
इससे भी अधिक महत्वपूर्ण वात यह थी कि रेडार द्वारा सम्पर्क स्थापित
करने के लिये चन्द्रमा का दिखलाई देना आवश्यक नहीं है; और दिन में भी
उससे 'सम्पर्क स्थापित किया जा सकता है।
इसके बाद सूर्य पर रेडार-शॉटों को
प्रेषित कर उनके परावर्तन प्राप्त किये गये।
सन् 1947 में मान्चेस्टर विश्वविद्यालय के
प्रोफेसर ए.सी. वी. लॉवेल और पी. एम. एम
ब्लैकेट को रेडार-तरगों के द्वारा उल्का-वृष्टि
(showers of meteors) का अनुरेखण
करने में सफलता मिली। कुछ ही वर्षो बाद
जब पहली बार कृत्रिम उपग्रह छोड़े गये तो
उनका भी उसी प्रकार अनुरेखण किया
गया।
द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद प्रोफेसर
लॉवल ने शायर के जाँड्रेल बैंक नामक
रेडार चन्द्रमा को
स्थान में पहली 'रेडियो-खगोलिकी' वेध.
शाला ('Radio Astronomy' observatory) स्थापित की। उसमें
मुख्य उपकरण रेडियो-दूरदर्शक है जो विद्युत्-चुम्बकीय तरंगों को प्रेषण
और ग्रहण कर सकता है। उसमें इस्पात की छड़ों के सहारे एक कटोरा
स्थित है जिसके बीच से एक एरिअल निकलता है । कटोरा परावर्तक का
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काम करता है और अन्दर आने वाली तरंगों को एरिअल पर एकत्रित कर देता है । सर्चलाइट-परावर्तक की भाँति यह बाहर जाने वाले सकेतों को एक तंग किरणपुंज में बाहर भेजता है, और आकाश के किसी भी भाग की ओर इसे भेजा जा सकता है। रेडियो-दूरदर्शी का मुख्य कार्य एक शोध पर केन्द्रित था जिसका अभी तक पूर्ण उपयोग नहीं किया गया है और सम्भव है कि उससे विश्व की संकल्पना ही बदल जाय । सन् 1932 में एक अमेरिकी रेडियो-इंजीनियर ने खोज निकाला था कि कुछ तारे रेडियो तरंगे भेजते है। किन्तु केवल आधुनिक रेडार और रेडियो-तकनीक के विकास से ही उन तारों की ठीक-ठीक स्थिति का पता लगाने में सहायता मिली है और साथ ही आकाश का एक नया चार्ट संकलन करने का कार्य आरम्भ किया गया है जिसमें शायद उतने ही अदृश्य 'अदीप्त तारे' हैं जितने दृश्य । अब तक ऐसे हजारों रेडियो-तारों का मानचित्रण किया जा चुका है और सम्भवतः असंख्य अन्य तारे विश्व की गहराइयों में छिपे हों। हमारी निकटतम पड़ोसिन आकाशगंगा (Galaxy), एण्ड्रोमेडा नेबुला, से रेडियो- तरंगें प्राप्त हुई हैं जिनसे मालूम होता है कि उसका कुछ भाग अदीप्त तारों का वना है । इस खोज से पता लगता है कि देतार तरंगों के लिये हमारी अपनी आकाशगंगा के बीच का स्थान ही नहीं बल्कि सभी आकाशगंगाओं के बीच का स्थान 'पारदर्शक' है। हमारी आकाशगंगा और एण्ड्रोमेडा के बीच द्वि-पथ रेडियो-संचार की सम्भावनाओं का पता नहीं लगाया जा सकता है क्योंकि किसी रेडियो-संकेत को एण्ड्रोमेडा तक पहुँचकर लौटने में 15 लाख वर्ष लगेगे। अभी तक इन अदीप्त रेडियो-तारों की प्रकृति मालूम नहीं हो सकी है । आकाश में जिन स्थानों से संकेत प्राप्त होते हैं उन पर प्राकाशिक दूरदर्शी से कुछ नहीं दिखाई देता है । अव तक खोजे गये अधिकांश अदीप्त तारे आकाशगंगा (Milky Way) के लगभग मध्य में एकत्रित है। क्या वे वहुत छोटे तारे हैं जिनका पूर्ण विकास नहीं हुआ है और जिनसे अभी दृश्य तरंगें नहीं निकलती है ? अथवा क्या वे बहुत गरम तारे हैं और 63 आपेक्षिकत: 'शीत' दृश्य प्रकाश के परास से परे हैं ? अथवा क्या वे गैसों से ढंके गरम और चमकीले तारे हैं और ये गैसे उनके प्रकाश का पूर्ण रूप से अवशोपण कर लेती है ? अथवा क्या वे ऐसे बेतार 'सन्देश' हैं जिनका उत्सर्जन स्वयं तारे नहीं बल्कि उनके चारों ओर स्थित गैसें करती है जो प्रोटॉनों तथा इलेक्ट्रॉनों में विघटित हो जाती है और इस प्रकार प्राप्त इलेक्ट्रॉन अपनी ऊर्जा को बेतार तरंगों के रूप मे भेलते हैं ? रेडियो खगोलिकी अभी इतनी विकसित नहीं कि उससे इन सब प्रश्नों का उत्तर मिल जाय। 1950 से आरम्भ होने वाले दशक के उत्तरार्द्ध के बों में कैवेण्डिश प्रयोगशाला के प्रोफेसर मार्टिन राइल के निर्देशन में केम्ब्रिज के निकट 'मुलई रेडियो खगोल वेधशाला' का निर्माण किया गया। वहां पर उपकरणों के बहुत बड़े संग्रह का उपयोग केवल खगोलीय प्रेक्षणों के लिये होता है और उनसे विश्व के अकल्पनीय 9 अरब प्रकाश-वर्षों तक दूर वाले स्थानों की जांच-पड़ताल करने में सफलता मिली है। प्रोफेसर राइल को आशा है कि मम्भवतः वे एक दिन मनुष्य के वर्षो पुराने इस प्रश्न के उत्तर में प्रमाण प्रस्तुत कर सकें कि, विश्व का आरम्भ किस प्रकार हुआ?~अथवा वे यह दिखा सके कि विश्व का आरम्भ कभी नही हुआ बल्कि उसका सतत विकास हो रहा है जो कभी समाप्त नहीं होगा। पृथ्वी से रेडार द्वारा मानवयुक्त और मानवरहित उपगहों के अनु. सरण से लेकर रॉकेट द्वारा स्वयं रेडार-उपस्कर को अन्तरिक्ष में भेजना केवल एक कदम है। भू-अनुसरण तत्र के अतिरिक्त~जो पृथ्वी से 200 मोल पर किसी अन्तरिक्षयान का उतनी ही यथार्थता के साथ अनुसरण करता है जितनी यथार्थता के साथ राइफल को गोली एक मील की दूरी पर किसी छः ऐनी के सिक्के पर निशाना लगा सकती है रेडार का उपयोग अन्तरिक्ष-युक्तिचालनों के लिये वढ़ता जा रहा है जैसे कक्षा में दो उपग्रहों को जोड़ना आदि। मिलन-स्थत रेडार' (Rendezvous Radar) के, जैसा इस तंत्र को कहा जाता है, एक अन्तरिक्षमान में प्रेषित्र, और दूसरे में प्रेपग्राही होता है। रेडार-संकेतों द्वारा सनिय किया गया प्रेपग्राही अपने स्पंदों को प्रेषित करता है जिन्हे प्रथम उपग्रह पिकअप कर लेता है। वहीं 64 एक परिकलन यंत्र से अन्तरिक्ष यात्रियों को तुरन्त दूसरे यान की दिशा, गति, दूरी आदि अनुसरण सम्बन्धी आंकड़े प्राप्त हो जाते हैं । इन आंकड़ों की मदद से कर्मीदल अन्तरिक्ष में मिलन के लिये आवश्यक युक्तिचालन (manoeuvres) मालूम कर लेता है। निस्सन्देह इस प्रकार अन्तरिक्ष- यान उन अन्तरिक्ष-स्टेशनों पर भी पहुंच सकेंगे जो भविष्य में पृथ्वी से बहुत ऊंचाई पर कक्षा में चक्कर लगायेंगे। अन्तरिक्ष में 'डॉकिंग' मिलन-स्थल अन्य चित्र : रेडार-प्रेषित्र और चमकीले प्रकाशयुक्त मिलन-स्थल 'पॉड' जो इलेक्ट्रॉनिक और प्रकाशीय संकेतकों का काम करते हैं । 65 रेडार-कार्य में प्रशिक्षण की व्यवस्था ग्रेट ब्रिटेन में तरुण तकनीकविदों और मर अण्ट नेवी अधिकारियों के लिये रेडार-कार्य में अनेक प्रशिक्षण-कोर्म उपल ध हैं ! लीय, साउथम्पटन, साउथ शील्ड्स, हल्ल और लिवरपूल के संचालन एवं रेडियो-स्कूलों और लन्दन, ग्रिम्सबाई तथा काडिफ़ स्थित कॉलेजों में पूरा कोर्स पढ़ाया जाता है। साउथम्पटन में जिस स्थान में पानी अन्दर की ओर प्रवेश करता है वहाँ पानी के एक टावर में प्रशिक्षण-उपस्कर रखा हुआ है जहाँ से आइल ऑफ़ इिट तक जहाजों की गति को आरेखित किया जा सकता है। हल्ल में अनुसरण-कोर्स करने वाले जो लोग इस विपय पर अपनाज्ञान ताजा करना चाहते हैं उन्हें रेडियो और विद्युत् विषय पर चा र सप्ताह का आरम्भिक कोर्स पढ़ाया जाता है । कुछ स्कूलों में रेडार-सेटे २ मे युक्त समुद्र की ओर जाने वाली नावों को प्रशिक्षण के लिये काम में लाया जाता है । नौ-चालकों के लिये 'प्रेक्षक-कोर्स' की रोजना है जिससे रेडार- उपस्कर का अतकनीकी किन्तु बहुत विस्तृत ज्ञान प्राप्त हो जाता है। कोर्स को पूरा करने में 2 सप्ताह लगते हैं और पूरा कर ने पर सफल उम्मीदवारों को स्कूल की ओर से एक प्रमाण-पत्र दिया जात है जो प्रमाणित करता है कि वे कोर्म पूरा कर परीक्षा में उत्तीर्ण हो गये हैं 'अनुरक्षण-कोर्स' मर्चेण्ट नेवी के मभी अ कारियों को करना होता है । इसमें समुद्री रेडार-उपस्कर के अनुसरण के सिद्धान्त और अभ्यास पर । ग्रीनॉक, हैम्बल, हल्ल, आठ से बारह सप्ताह का प्रशिक्षण दिया जाता है लोय, साउथम्पटन और साउथ शील्ड्स में कोर्स करने की व्यवस्था है। "मंत्रालय उम्मीदवारों की 'अनुरक्षण-कोर्स' पूरा कर लेने के बाद परिवहन- परीक्षा लेता है और सफल उम्मीदवारों को प्रमा अ-पत्र दिये जाते है। इन कोसों के बारे में विस्तृत जानकारी स्कूलों से प्राप्त की जा यम से मर्चेण्ट नेवी अस्टै- सकती है। उम्मीदवार को अपने नियोक्ता के मा प्रतिनिधि को प्रार्थना-पत्र ब्लिशमंण्ट ऐडमिनिस्ट्रेशन अथवा किसी यूनियन- देना होता है। लन्दन में दो डेक्का स्कूल भी है जिनमें से एक प्रचालन और दूसरा अनुरक्षण के लिये है। पहला स्कूल उन अधिकारियों के लिये है गो सेट 66 - को संचालन कार्यों के लिये इस्तेमाल करते हैं और दूसरा उन अधिकारियों और जहाजों के विद्युतज्ञों के लिये है जिन्हें अनुरक्षण करना होता है । प्रचालकों का स्कूल लम्बेथ ब्रिज के नीचे लम्बेथ पीयर पर स्थित है। यह कोर्स दो दिन का होता है। 'अनुरक्षण-कोर्स' क्रॉयडन स्थित डेक्का रेडार के सविस डिपार्टमेण्ट हेडक्वार्टर में पढ़ाया जाता है। यह कोर्स दो सप्ताह का होता है। दोनों को निःशुल्क हैं। आइल ऑफ़ वाइट में डेक्का- टेस्ट और निदर्शन-केन्द्र में भी प्रशिक्षण-कोर्स की व्यवस्था है। आइल ऑफ़ वाइट में कोवेज़ नामक स्थान में अपनी फैक्टरी और प्रयोगशाला के निकट 'प्लेसी रेडार लिमिटेड' का भी एक तकनीकी प्रशिक्षण स्कूल है। इस स्कूल की स्थापना मुख्यत: फ़र्म के ग्राहकों द्वारा भेजे गये विद्याथियों के प्रशिक्षण के लिये की गई है। अतः प्रशिक्षणार्थी दुनिया के सभी भागों से आते हैं ; केवल ब्रिटेन के प्रशिक्षणार्थियों की संख्या बहुत कम होती है। माइल प्रॉक घाइट में 'प्लेसी रेडार प्रशिक्षण फूल' 67 पारिभाषिक शब्दावली अतिपरवलयिक hyperbolic चिन्हक marker प्रतिलंघन overshooting जड़त्व inertia प्रतिय्याप्त overlapped जलयान Vessel प्रपिप्रवर्तन super refraction जल-रेखा water-line अधिरचना superstructure जाइरो दिक्सूचक Byro compass प्रध्यारोपित superimposed जादुई-चक्षु magic eye अनन्त सूक्ष्म infimmisimal तटपोत coaster अनुदेश instruction तटवर्ती पानी coastal waters अनुरेखण tracing तरग-देध्यं wave-length अन्वेपित्र interrogator तारत्व pitch अपहश्यता bad visibility तंत्र network अपवहन drift fa7917 bearing अवतरण landing दिशा-बोधक direction-finder असगत सचरण anomalous दीपनीका lightship i propagation दृश्यता visibility प्राकाशगगा galaxy द्वितीयक प्रेषित्र secondary पाक्रमण-रोयी anti-invasion transmitter प्रागम-काल time of arrival घावनपथ runway पाति frequency नाम-सकेत call sign उपोपवर्तन subrefraction f777777 surveillance अंशाकन वलय cambrating ring निदर्शन demonstration कतंक cutter नियोक्ता employer कपासी-वर्षी मेघ cumulo-nimbus नौ-चालक navigator clouds नौ-परिवहन shipping कर्मीदल crew नौ-रेडार naval radar किरणपुज beam नियंत्रण-बुर्ज control tower खगोलिकी astronomy पक्षी-प्रदसन bird migration खांचा recess परमाणु atom घुमाव-बिन्दु turning point परावर्तन Teflection पूरिस्थापी gyro-stabiliser परासन ranging चाक-घर wheel-house परिकलन यंत्र computor - परिचालन केन्द्र operational विन्यासन marshalling centre विसर्पग-पथ glide path परिपथ circuit वेधशाला observatory परिवहन transport alezat voltage पर्यवेक्षण supervision शोषक-रेखा heading-line पाश्विक lateral समकालित synchronized प्रक्षेपण projection समन्वयन coordination प्रचालक operator समस्वरण tuning प्रतिदीप्तशील fluorescent सर्वेक्षक surveyor प्रतिध्वनि echo सकल्पना concept प्रत्यातिम alternator संकेतक beacon प्रवर्धन amplification संचार-तंत्र communication प्रेषग्राही transponder network प्रेषाभिग्राही transceiver संवहन जाल drift net प्लव float संसूचन detection मायाक्षि magic eye #F4197 installation मिलन स्थल rendeavous संहत compact मौसमी माकड़े meteorological स्थलरुद्ध landlocked data स्थिति सूचक position भेदिया spotter indicator conventional स्वचालन automation short burst स्वचालित अवतरण automatic वर्षा precipitation landing विद्युत्-चुम्बकीय electro. स्वतः कार्य automatic task तरंगें magnetic waves हिमाल iceberg लघु स्पंद 69
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*परमाणु केन्द्रीय हिन्दी निदेशातप (शिक्षा-मंत्रालय) भारत सरकार द्वारा स्वीकृत विज्ञान की विश्वविख्यात पुस्तकें जॉन रोलण्ड (ATOMS Work Like This by John Rowland) इस पुस्तक में परमाणु की रचना का सरल वर्णन किया गया है। जहाँ इसकी महान शक्ति के दुरुपयोग से दुनिया का खात्मा हो सकता है वहाँ इसमें मनुष्य जाति को भलाई के लिए महान शक्ति भी है, इस पुस्तक में इसी रचनात्मक और उपयोगी पहलू पर जोर दिया गया है । * हेलिकॉप्टर बेसिल प्रार्केल और जॉन डब्ल्यू मार, टेलर (HELICOPTERS Work Like This by Arkell & Taylor) गणतन्त्र दिवस पर उपस्थित जन-समुदाय पर फूल बिखरने से लेकर डाक और अन्न सामग्री पहुंचाने वाला प्राधुनिक उड़नखटोला जो भविष्य की वस के रूप में आपके सामने आने वाला है । एगान लार्सन * रेडार (RADAR Works Like This by Egon Larsen) प्रासमान में उड़ते विमान और बादलों तक की ठीक-ठीक स्थिति बताने वाले अद्भुत यन्त्र का रोचक परिचय । * ट्रांजिस्टर एगॉन लासन (TRANSISTORS Work Like This by Egon Larsen) पढिए और समझिए कि ट्राजिस्टर कैसे काम करता है। ट्रांजिस्टर-परिवार के नमे सदस्य ट्रांस्तुपसर' और 'एक्पुट्रॉन' की जानकारी के लिए नवीनतम पुस्तक । *जेट-यान जॉन डब्ल्यू. प्रार. टेलर (JET PLANES Work Like This by J.W.R. Taylor) इन वायुयानो की तेजी के पीछे वैज्ञानिकों और यांत्रिकीविदों का कितना परिषम है-यह इस पुस्तक को पढकर ही जाना जा सकता है। * रॉकेट और उपग्रह जॉन उग्ल्यू. प्रार. टेलर (ROCKETS AND SATELLITES Work Like This by J. W.R. Taylor) चन्द्रमा पर सफलतापूर्वक उतरना भंतरिक्ष खोजी उपग्रहों और रेटो के कारण ही सम्भव हुमा है जिनका मंतरंग परिचय पढ़िए टेलर की रोचक शैली में। एलेमेंट धाउन * ध्वनि-अभिलेखन (SOUND RECORDING Works Like This by Clement Brown) अत्यन्त स्पष्ट रूप से बताया गया है कि किस तरह प्रावाज रिकार्ड की जाती है - रिवाहों मे, टेप पर और फिल्म पर।
* रेलगाड़ी रेवर संट जॉन टॉमस (TRAINS Work Like This by Dd. St. John Thomas) रेली में रचि रमने वाले बच्चे के माता-पिता यदि इस पुस्तक को उसे पढ़ने को दें तो सर्वोत्तम रहेगा। हमने इसे मालोचक को दृष्टि से बार-बार पढ़ा है किन्तु हमें इसमें कोई दोष नहीं दिखाई दिया। इसमें रेलवे को तकनीकी बातों को मरल, स्पष्ट भोर रोचक ढग से बताया गया है। बच्चों के लिए इस लिगय पर यह गोराम पुस्तक है। * अतल गहराई में जीवन मॉरिमर्टन (LIFE IN THE DCCP by Maurice Busion) चन्द्रलोक से पही पपादा रहस्यमय है सागरतल को मनोमी दुनिया जिसके भेद अब मुलते जा रहे हैं। * नये पदार्थ जिराल्ड तीच (THE NEW MATERIALS by Gerald Leich) कृत्रिम उपग्रहों और परमाणु-रिएक्टरों से लेकर माधुनिक विमानो भोर रॉकेटों के निर्माण के लिए नित नई योजी जा रही अदभुन पातुएँ, रेसे और प्लास्टिक । * रेडियो-खगोलिकी निजेल कास्टर (RADIO ASTRONOMY by Nigel Caldes} सितारों की दुनिया के अनजाने रास्तों के राहियों और उनकी खोनों की रोचक गापागलीलियो से हॉवल पोर ना कर तक । * परिवहन (TRANSPORT by Egon Larsen) मोड़-भरी सड़कें और यातायात व्यवस्था अब परिवर्तन की मांग करती है: प्रस्तुत हैं इस क्षेत्र में की जा रही प्राशाप्रद खोजें जो प्राज प्रयोगशाला में है और कल सड़कों पर होगी। *मौसम मार. एस.कोरर (WEATHER by R.S.Scorer) मोसम तरह-तरह के खेल खेलता है-कभी सूखा, कमी बाढ़-विज्ञान मौसम के भेद खोलकर उसको अपना मुट्ठी में करने के प्रयास कर रहा है। बादलों को देखकर प्रांधी और तुफान पाने को भविष्यवाणी कैसे की जाती है, इसका सरल परिचय । एगॉन सासन
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