Shri Jain Swetamber Khartargacch Sangh, Jaipur

Purusarthsidhyupay

Jain, Agrasen · 2011/01

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भी खरतरगच्छीय ज्ञान मन्दिर, जयपुर
ॐ
श्रीमन्मृतच मृरि मिरवित
(जिनप्रवचनरहस्यकोप )
पुरुषार्थसिद्धयुपायः
(स्वर्गीय प० टोडरमल्लजी कृत भापाटीका)
के
२-6010
आधार पर सरल हिन्दी भाषा
स"ह"
श्रीयुत पण्डित उग्रसेन जैन एम ए
वकील रोहतकारा सम्पादित:-
और
लाला लालचन्द जैन B A LL B
ऐडवोकेट, मेसीडेण्ट जैन ऐसोसीयेशन, रोहतक द्वारा प्रकाशित
पीराब्द २४ ९-सन् १९३३१०
प्रथमावृत्ति १०००]
[मूल्य )

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प्राक्कथने लाखों बरस तक भूगर्भ के अन्धकार में पृथ्वी के भार से दा कर, कालो कोयला अपनी कालिपा को दूर करके चमकता हुआ हीरा बन जाता है। किन्तु जब खानि से निकाला जाता है उस समय वह धुपला काच सा होता है । यन्त्री में विशेष घर्पण और मार्जन की यन्त्रणा से उस में कान्ति, जगमगाहट और पारदर्शिता आजाती है, और फिर वह राजा के मुकुट तक पहुच जाता है। इसी प्रकार यह जीवात्मा अनादिकाल से नरक निगोद में दगा पडा है। वहा से निकलने पर भी एकेन्द्रियादि पर्यायो में इस का चैतन्य गुण छिपा सा रहता है, प्रकाशित नहीं हो पाता । मनुष्य जन्म पाकर सदगुरू के ससर्ग और सम्यक् चरित्र की रगड से इस का अनन्त ज्ञानादि स्वचतुष्टय मकाश में आता है, और यह सर्वोच्च सिद्ध पद को पहुच जाता है। जीव को पुरुष भी कहते हैं। पुरुष अपने अर्थ की सिद्धि, अपने मतलब की प्राप्ति, अपने स्वात्म तव का लाभ, किस प्रकार करे, इस का उपाय, घट बढ हजार वर्ष हुए, श्री अमृतवन्द्र आचार्य ने एक अन्य की रचना करके बताया, और यथा नाम तया गुण' की लोकोक्ति अनुसार उस ग्रन्थ का नाम पुरुपार्थ सिद्धयुपाय रक्खा । इस महत्व पूर्ण जैनागम में जिन धर्म का सार सरल सस्कृत इलोको में सक्षेप से भर दिया है। इस ग्रन्य में मगलाचरण रूप से पहले सर्वज्ञ का स्वरूप, फिर उन वीतराग हितोपदेशी जगदगुरु के स्पदरहित होठो मे, कण्ठ तालु आदि शब्द स्थान के हिले बिना, निरक्षरी स्थाबाट द्वादशाग पाणी का व्यवहार और निश्चयात्मक विवेचन, फिर रलवयात्मक मोक्षमाग का दिग्दर्शन और सम्यक् चारित्र के मूल अहिंसा सिद्धान्त का प्रस्पण किया है । अहिंसा धर्म का विस्तार, सक्षेप रूप, योहे शन्ग में ऐसी विशिष्टता से किया है, कि एक एक वाक्य पर एक एक अथ लिग्वा जासकता है।

( २ ) अहिंसा धर्म कहने को नो जगद्व्यापी है, यहूदी, ईसाई, बौद्ध, मुसलिम हिन्दु, सिक्ख, पारसी, आर्यसमाज, ब्रह्मसमाज, देवसमाज, राधास्वामी, थिया- सोफी, आदि सब ही मतों में अहिंसा को धर्म का मूल माना है, परन्तु प्राचीन काल से अब तक किसी न किसी रूप में थोड़ा बहुत हिंसा का प्रचार होता रहा है, और अहिंसा के सिद्धान्त पर पूरा आचरण इन में से किसी भी धर्म में नहीं किया जारहा है। ऐसा क्यों है इस का स्पष्टीकरण जैन सिद्धान्तानुसार भली प्रकार हो जाता है । संसारी जीव अनादिकाल से अज्ञान अवस्था में है, नरक निगोद में रहा है नारकी जीवों के परिणाम गति स्वभाव के कारण क्रूर होते हैं, एक दूसरे को आरे से काटने हैं, मुद्रों से मारते हैं, पैने शस्त्रों से छेदते हैं, पानी में पेलते हैं, और आग में जलाते हैं। नरक का जीवन निरन्तर तीव्र वेदना रूप है और पार- स्परिक हिंसा ही में व्यतीत होता है, पशु पर्याय में भी अनेक योनी ऐसी हैं जहां यह जीव प्रचुर हिंसा में रत रहता है । शेर, भेडिया, नेवला, कुत्ता, बिल्ली, सांप मकडी, चील, गिद्ध, आदि छोटे पशुओं को मार कर खाते रहते हैं। यह अनादि मिथ्या संस्कार मनुष्य जन्म मिलने पर भी लगा रहता है, जीव उल्लं रास्ते पर ही चलता रहना है। माता के उदर में उल्टे मुंह लटका रहता है, मुंह का काम नाभि से लेता है, और सिर के बल ही जन्म लेता है। फिर इस में क्या आश्चर्य कि मनुष्य भव पाने पर भी प्रायः इस जीव की बुद्धि विपरीत ही रहती है। यही कारण है कि वाइविल, कुरान, वेट पुराण आदि धर्म ग्रन्थों में अहिंसा का सिद्धान्त मानते हुए भी कही कहीं हिंसा का प्रचार किया। तृ वध नही करेगा" यह ईश्वर के १० आदेश में वाइविल में दिया है। किन्तु इस का अर्थ यह लगाया जाता है कि इस वाक्य में केवल मनुष्य हिंसा का निषेय किया गया है। महापुरुष इबराहीम ने अपने पुत्र को अपने हाथ से काट कर ईश्वर की भेट करना चाहा । वह हिंसा न थी पुण्य कर्म था। यज्ञ में पशु हिंसा का व्यवहार मिसिर, यूनान, इटली इंगलैंण्ड आदि देशों में होता रहा हैं। हिन्दु धर्म में यज्ञ वलिदान, गोमेध, अश्वमेध, अजमेध, नरमेध तक को हिसा " Thou shalt not kill" " ( ३ ) नहीं बल्कि धार्मिक कर्तव्य कहा गया है। पौरोपीय देशो में तो यज्ञबलि प्रथा कम होती जाती है। किन्तु भारतवर्ष में हिन्दू और मुसलमान दोनों पशुबलि को अब तक धर्म का अश मान रहे है । देशीय राज्यो में दसहरे के दिन भैमे और बकरे काटे जाते है । और नि याचल, कालीघाट आदि स्थानों और देवियो के मठो पर करे, मुरगे, कबूतर आदि पशु हर साल लाखों की संख्या में वर किये जाते हैं। हमारे मुसलमान भाई गोवध को धर्म का अनिवार्य अश मान कर गोलि उत्तम ईद के दिन मनाने है, जिस मे हिन्दु धर्मानुयायीयों के हृदय को आयात होता है, और परिणाम यह होता है कि हर साल आपस की लड़ाई में बहुसख्य मनुष्य घायल होते हैं, और जेल की सना पाने हैं और पारस्परिक द्वेष वढता जाता है। यज्ञ में बलिदान मांस मसादरूप खाने मे मासाहार रत्ति भी प्राचीन काल से चली आरही है। मासाहार से रोग की समावना रहती है, शाकाहार, फला- हार, दूध, दही, मक्खन, घी स्वास्थ्यमद और पलप्रद है । प्रत्येक धर्म में मासा- हार को वर्जित और हेय कहा है । किसी धर्म के भी साधु सन्यासी मासाहार ग्रहण नहीं करते । खेद है कि नौद्ध धर्म के प्रतिपालक चीन जापान ब्रह्मा देश निवासी मास को सर्वया अभक्ष्य नहीं समझते, किन्तु बौद्ध धर्म में मासाहार हेय और निषिद्ध है। पाश्चात्य देशो में मासाहार का प्रचार कम हो रहा है। धर्म के नाम पर घोर सग्राम और भयकर मनुष्य-हिसा ससार में होती भाई है । नीर्थस्थान के सम्बन्ध में ईसाई और मुसलमानो में घरसों तक युद्ध रहा, जिस को ईमाइयों ने सेट Orneade और मुसरमानों ने जहाद कह कर धार्मिक पुण्य सचय का कारण समझ लिया। ईमा मसीह को धर्म द्रोही कह कर समीप पर चाया, और निर्दयता से उस की जान ली। उन के गिप्यों और अनुयायियों को कई तान्दी तक अत्यात निष्ठुरना से सताया गया और उघ किया गया।ईमाइयों के आपस में भी शतान्दीयो तक तीन टेप रहा। Inquestion और Stir Chambert नाम से जिन अत्याचारों का सम्बन्ध है. उन के विव- रण से हृदय काप उठना है।

, " ( ४ ) राजनैतिक हिंसा भी पुराने जमाने से होती आई है, और वर्तमान समय में तो हिसा के उपकरण बहुत ही वढ गये हैं, तीर तलवार की लड़ाई में तो आमने सामने युद्ध होता था, और अब तो बिना देखे, मीलों की दूरी से या आकाश की ऊंचाई से एक समय में अति संख्यक प्राण हरने वाले, वस्तियों को विध्वंस करने वाले वम के गोले, गिरजा, अस्पताल, स्कूल, कालिज, गोदाम, कारखाने, होटल, दफतर आदि का सर्वनाश कर देते हैं। विज्ञान के नाम पर भी निर्दयता से असंख्यात प्राणियों की हिंसा की जाती है। खरगोश, मेडक आदि को काट काट कर शरीर रचना और नसा जाल के भेद बतलाये जाते हैं। वंदर, कुत्ता आदि को विविध प्रकार की शारीरिक यंत्रणा देकर, उन का परिणाम देखा जाता है । पशुओं की नसा ग्रथियां काट कर औपधियां बनाई जाती हैं। किन्तु रोग बढता ही जाता है, कम नहीं होना । नगर प्रबन्ध, स्वास्थ्य रक्षा, कृषि रक्षा आदि के नाम से भी प्रवल संकल्पी हिसा की जाती है। चूहों और कुत्तों को मार डालने के लिये नौकर रखे जाते हैं और इनाम दिये जाते है। नए नए खरचीले महकमे बनाये जाते हैं। चिड़ीमार व्याध का व्यवसाय प्राचीन काल में वर्जित और घृणित था, अब तो मोटी वेतन पाने वाले डाक्टर मच्छरमार, मेंडकमार, कुत्तमार, हेमार, टिड्डीमार, कीडेमार बन रहे है। ऐसी अधम हिसा को परोपकार और अपने को धार्मिक और परो- पकारी कहते हैं। शिकार का शौक भी बढ़ता जाता है, कहा जाता है कि यह वीरता का साधन है और हिसक जीवों के हिसन से अन्य जीवों का उपकार होता है। बंदुक से चिड़ियों को मार गिराने में, भागते हुए हिरन खरगोश या लोमड़ी का घोड़े की सवारी पर पीछा करके मार डालने में, मचान पर बैठ कर छिपे हुए शेर को खेद कर दूर से बन्दुक मार देने में ऐसी ही शूरता है जैसी दंगई बच्चे तालाब में पत्थर फेंक कर मेडको को मार डालने, या चूहा पकड़ कर बिल्ली कुत्ते से फड़वाने में दिखलाते है। कुछ लोगों ने एक यह झूठा ख्याल फैला दिया है कि शेर, भेडिया, सांप, " विन्छ, भिड, खटमल, मच्छर, मक्खी, चींटी आदि मनुप्य जाति के जन्म सस्कार से वैरी है, और इन को मार डालना मनुष्य का धार्मिक कतव्य है। यह भी मनुष्य के पूर्व मिथ्या सस्कार का दुष्परिणाम और भ्रम है। यदि मनुष्य अपने मन में इन अमागे जीवों के प्रति दया भाव, समता भाव रक्खे, तो यह कदापि मनुप्य पर आक्रमण न करें। यह तो अपने बचाव के अर्थ, आत्मरक्षा के निमित्त मनुष्य को हानि पहुचाते है, द्वेष भाव में नहीं। यदि मनुष्य साप या शेर की तरफ समता भाव मे देखना रहे, तो इस के दृष्टि बल से प्रभावित (magnetise or hypnotise ) होकर वह इस आधीन हो जायेंगे और इस के इशारों पर चलेंगे। इसी वैज्ञानिक सिद्धान्त का प्रभाव है महात्मा साधुओ के शरीर पर साप लिपट जाते और गुजर जाते है, और शेर मेडिये उन के चरणों में आ बैठने है। और पशुओं म पारस्परिक वैर भाव भी मिट जाता है। सांप न्योला, शेर, बकरी पास पास बैठ जाते है । जैन साहित्य तो इस प्रकार के उदाहरणो से भरा हुआ ही है। ईसाई धर्म में एक महात्मा सेन्ट फासिस of Aestsऐसे प्रसिद्ध हुए है जिन के वावत कहा जाता है कि सिह जैसे क्रूर परिणामी जीव भी उन के प्रेम से आकर्षित होकर उन के चरणो को चूमते थे। कुछ लोग यह कहते हैं कि यदि कोई पशु ऐसा घायल या रोग ग्रसित हो कि उस के अच्छा होने की आशा न रहे, तो उस को गोली मार देना मनुप्य का कर्तव्य है, निर्दयता नहीं बल्कि दयालुता है, उस को शारीरिक वेदना से रचाया जाता है। यदि यह दयालुता है, तो फिर अपने वालकों, पुत्र, कला, मित्रादि को क्यो इस दयालुता से वंचित रक्खा जाता है, शारीरिक वेदना से व्यथित होकर स्वास्थ्य प्राप्ति से निराश होकर, बुद्धि भ्रष्ट मनुष्य अपघात कर लेते है। किन्तु उन को मारडालने मे कोई भी धर्म नहीं समझता बल्कि मारडालने वाला अपराधी, प्राणदण्ड का भागी होता है । सच्ची बात तो यह है कि जिस प्रकार मनुष्य के विषय में कहा जाता है कि जब तक श्वास, तब तक आस, और रोग और वेदना के निवारणार्थ भरसक प्रयत्न किया जाता है, उसी प्रकार पशु पक्षी आदि जीव मात्र के वास्ते मी भान्ध होना चाहिये । यह बात नो समझ में आती हैं कि मनुष्य अपनी अयोग्यता, निर्धनता, अज्ञानता, निर्बलता, प्रमाद, बेपरवाही आदि से पशु पक्षी के कष्ट निवारणार्थ ऐसा प्रवन्ध नहीं करता, परन्तु रोग ग्रसित वा दुःखिन जीव को मारडालने में धर्म कहना झूठ है, अपनी आत्मा को टगना और अपने पाप को बढ़ाना है। कुछ लोगों का यह भी कहना है कि हिंमा के विना संसार की उन्नति नहीं हो सकती, हिंसा अनिवार्य है. और अहिंसा का सिद्धान्त मनुष्य को कायर बनाता है और सामाजिक पतन का कारण हैं। यह नितान्त भृल और भ्रम है और वह लोग अहिंसा के सिद्धान्त को समझे ही नहीं हैं। अहिंसा नो मनुष्य को वीर, साहसी, पराक्रमी, परीपह-विजयी बनाती है, और सामाजिक उन्नति और विकाश का कारण है। पूर्ण अहिंसा तो सर्व परि- ग्रह सागी दिमम्बर जैन साधु ही पाल सकने है, जिन को जैनागम में महावनी कहा गया है । गृहस्थी अपूर्णरूप, अणुव्रती अहिंसा का पालन करता है । जहां तक हो सकता है हिंसा से बचता है और जब हिंसा से नहीं बच सकता तो अपने भाव में कलुपता न रखता हुआ मजबूरी समझ कर हिंसा करता है, किन्तु उस को बुरा समझता है और हिंसा से उपजिन दुष्कर्म का निराकरण करता रहता है । जैन पुराणों से विदित है कि श्रीरामचन्द्रजी और उन के सेनापती श्रीहनु- मानजी ने अनेक युद्ध किये और दुष्टों के प्राण हरे। पाण्डव जैसे महापुरुप महा भारत जैसे भीपण संग्राम में तत्पर रहे, किन्तु यह सब गज भोग करके संसार साग करते हुए. इन सब ने साधु धर्म ग्रहण करके. महाव्रत पाले, दुदर तपश्चरण किया, पूर्व संचित कर्मों का नाश किया, और अन्त में केवल ज्ञान की प्राप्ति कर तद्गव मोक्षगामी सिद्ध पुरुप हुए, जिन की पूजा, अर्चा और पुण्य स्मृति निर्वाण कांड में प्रति दिन की जाती है। सम्राट चन्द्रगुप्त, मैमरनृपति रायमल्ल, उन के मेनापति भत्रिय कुलोत्पन्न, समरधुरन्धर, वीर मानण्ड, रणराजसिंह, वैरी कुलदण्ड, समर परशुराम आदि पद विभृपित चामुंडराय, जैन साधु होकर सङ्गति को प्राप्त हुए । महामेघ वाहन वंश के राजा खारवेल, जोधपुर राज्यस्थ ओसिया के परमार और सोलंकी राजपुत्र " re अन्टिलपुर पाटन के महाराज कुमारपाल आदि अनेक प्रतापी राजा अहिंसा धर्म को मानते और प्रजा को सुख सम्पनि पूर्ण रखते और समाज कीर्ति को दिगन्त व्यापी करते हुए परम पूज्य पुरुष हुए हैं। सारांश यह है कि जैनधर्मानुयायी सदगृहस्थ, पृथ्वी सम्राट, पटखड विजयी चक्रवर्ती, महान योद्धा, शूरवीर, सेनापती, राजमत्री, न्यायाधीश, राजवैव, इजि- नियर, विज्ञान पारगामी, कारीगर,सगीताचार्य, व्यापारी हो सकता और वढई, लुहार, दरजी, मजदूर आदि का सब ही कुछ काम कर सकता है, और जैन गृहस्थ धर्म में दृढ रह कर दिन प्रतिदिन उन्नति करता हुआ, एक ही जन्म में परमात्मपद तक पा रेता है। जिन धर्म प्रतिपालक के सामने कोई गेक नहीं है । वह उन्नति की पराकाष्ठा को पहुच मकता है और अहिंसा धर्म उस को इस उन्नति मार्ग में पद पद पर सहकारी होता है। जैन-अहिंसा के सिद्धान्त को समाने की आवश्यकता है, वह सरल सीधा है। प्रसेक जीव माणधारी है । प्राण दस हैं। स्पर्श, रस, घाण, चालु, श्रोत्र, पांच तो इन्द्रिय माण,और मन, वचन, काय-बल-रूप, तीन वल माण और पामोश्वास और आयु मिल कर दस माण हुए।शरीरधारी पाणी नाना प्रकार की योनियों में ससार भ्रमण करता है। जैसा जीव मनुष्य में है, वैसा ही जीव पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि, वनस्पति में है। जिस अवस्था में वह स्थावर एकेन्द्रिय कहलाता है, हिर फिर नहीं सक्ता, वह भी उस के कम से कम : प्राण होते है, स्पर्शन इन्द्रिय, काय- चल, श्वासोश्वास और आयु । ल्ट, कीडे जसे जीव के रसना इन्द्रिय और वचन वर के बन जाने से ६ माण होते हैं, और वह द्वीन्द्रिय कहलाता है। चींटी जैसे जीव के घाण इन्द्रिय बह जाने से ७ माण होते है। मक्खी जैसे प्राणी के चक्षु की अधिकता से ८ प्राण हैं । ऐमे पवेनिय जीव, जिन के मन नहीं है, ९ माण- धारी है, सो विरले हैं। अन्य सब मन सहित पवेन्द्रिय जीवों के दश माण हैं। यह १० द्रव्य माण हैं । जीव के स्वभाव रूप, ज्ञानचेतना, स्वानुभवानन्द, अनन्त- वीर्य गुण को भाव प्राण कहते हैं। पुरुषार्य सिद्ध्युपाय शास्त्र के ४३वें श्लोक में अहिंसा का लक्षण इस प्रकार कहा है।

( ८ ) यत्पल कपाय योगात्माणानां द्रव्य भाव स्पाणाम् । व्यपरोपणस्य कारणं सुनिश्चिना भवति मा हिमा || ४३॥ कपाय वश जीव के द्रव्य अथवा भाव प्राणों को हानि पहुंचाने को हिंसा कहते हैं-अर्थात् क्रोध मान, माया लोभ वश, या वेपरवाही से विना विचारे, विना देखे भाले, उतावली, घबराहट से किसी प्राणधारी के द्रव्य प्राण वा भाव प्राण को हानि पहुंचाने को हिंसा कहते हैं । जितने अधिक प्राणों को जितनी अधिक क्रूरता से जितनी अधिक हानि की जावेगी उतनी ही अधिक हिंसा का बंध होगा। हिंसा से निवृत्ति या वचे रहना अहिंसा अहिंसाव्रत दो प्रकार का है, अहिंसा महावत और अहिंसा अणुव्रत, सर्वथा पूर्णतया अहिंसा महाव्रत का पालन साधु वा मुनिराज करते हैं । साधु पद से नीचे श्रावक पदवी में घट वह अहिंसा धर्म का व्यवहार अपनी अपनी भक्ति के अनुसार हर कोई कर सकता है । श्रावक के अणुव्रत की अपेक्षा हिंसा विविध प्रकार की है । सङ्कल्पी हिंसा का तो त्याग व्रतारम्भ होते ही हो जाता है । जान बूझ कर, सोच समझ कर, हिंसा करने के इरादे से, अणुव्रती श्रावक कदापि हिंसा नहीं करेगा, किन्तु संकल्पी हिंसा को छोड़ कर आरम्भी वा विरोधी हिंसा का त्याग श्रावक के यथा शक्ति होता है। यह विपय गहन है, प्रत्येक मनुष्य समय समय पर अपनी अवस्था और परिस्थिति के अनुसार अपनी शक्ति को न छिपाता हुआ अपने वास्ने निश्चय करेगा जैसा संसार के हर काम में निश्चय किया जाता है, और जहां सम्भव होगा अपने से अधिक विद्वान् वा अनुभवी श्रावक मे परामर्श करके काम करेगा। दो चार दृष्टान्त यहां समझने के लिये लिखते हैं। एक जैन डाक्टर को घाव अच्छा करना हैं। घाव में कीड़े पड़ गए हैं। घाव अच्छा करने के लिये कीड़ों को निकालना वा इटाना आवश्यकीय है, ऐसा करने से और दवा लगाने में कीड़ों का माणघात अवश्य होगा। यह हिंसा संकल्पी हिंसा नहीं है। यहां डाक्टर का भाव कीड़ों के प्राणघात का नहीं है, किन्तु घाव के अच्छा करने का है और कीड़ों के प्राण बचाने का कोई उपाय भी नहीं है । यदि ऐसा सम्भव हो कि घाव भी अच्छा हो जाय और कीड़े भी न मरें,तो जैन डाक्टर अवश्य कीड़ों को बचा कर घाव अच्छा करेगा।

रोगी को दवा देने से भी विविध प्रकार के कीटाणु जो रोग का हेतु है, नाश को प्राप्त होते हैं, किंतु यहा भी उन का प्राण व्यपरोपण सकल्पी हिंसा नहीं है। रात को घर में चोर आगया, या किसी ने अपने वा अन्य पुरुप वा पशु पर आक्रमण किया, तो धन रक्षा, आत्म रक्षा, वा अन्य प्राणी की रक्षा के भाव से, चोर या आक्रमण करने वाले को जितनी हानि रक्षा भाव से पहुचाई जायगी और उस में द्वेष, निर्दयता, क्रूरता आदि भाव न होगा, वह हिंसा सकल्पी हिंमा न होगी बल्कि विरोधी हिंसा होगी। भेडिये या शेर से पशु वा मनुष्य को बचाने में यदि उस हिंसक की हिंसा भी हो जाय तो वह सकल्पी हिंसा न होगी । मन्दिर या मकान बनवाने, भोजन बनाने, घर को साफ करने, ग्वेती करने, आदि कार्यों में सामानता पूर्वक काम करने से भी जो अनिवार्य हिंसा हो जाती है, वह सकल्पी हिंसा नहीं है । आरम्भी हिंमा है । वैरी के आक्रमण पर राजा को राज्य और प्रजा की रक्षा के अर्थ जो अनिवार्य हिंसा करनी पडती है, वह सङ्कल्पी हिंसा नहीं है, विरोश हिंसा है। श्रद्धानी श्रावक गृहस्य के मत्र कार्य करता है, किंतु उस के मात्र सदा कोमल दयामय रहते है। अनिवार्य हिंसा हो जाने पर उस को हप नहीं बल्कि खेद ही होता है, और वह उस कर्म का प्रतिक्रपण, और प्रायश्चित करता है । खटमल, मन्छर से वचने के लिये श्रावक पल को साफ रखेंगा, चूल में छिद्र न रहने देगा, पाये के गिर्द कपडा महवा देगा जिम में खटमल न पढे । और यदि खटमल पड ही जावे तों पल कोखोकर खटमर अलग कर के फिर से पनवा लेगा। किंतु ऐसा न करेगा कि पल को धूप में डाल कर पीटे और जो ग्वटमल निकलने जावें, उनको कुचलता नारे, या उबलना हुआ गरम पानी डाल कर खटमलों को मार डारे मच्छर से बचने के लिये, श्रारक मुसहरी तान लेगा। ओह कर सोरेगा । मकान साफ रखेगा। यदि पन्छर गरीर पर पेट तो उस को उड़ा देगा। किंतु मन्छर को हाय परक कर मारेगा नहीं, कुचलेगा नहीं। ना पिसी के भिड काट रेती है, तो सहमा उस को कुचल कर पारडालने और यह मान है कि मिड को मारडालने मे उस का नहा नही चढना पह के ( १० ) घोर निकृष्ट संकल्पी हिंसा है। यदि श्रावक के भिंड़ काट लेगी तो वह दुःख शमन का उपाय करेगा। किन्तु भिड़ के प्रति द्वेष भाव नहीं करेगा। विच्छ वा सांप को लोग देखते ही मार डालते हैं। कहते हैं कि यह मनुष्य के जन्म वैरी हैं इन को मारना मनुष्य का धर्म है । श्रावक के मन में ऐसे हिंसा-भाव उत्पन्न ही नहीं होते । अंग्रेजों की देखादेखी हिन्दु भी अब मक्खीमार हो चले हैं। जह रीला चिपकीला कागज़ मेज पर रखने हैं जिस में फंस कर मक्खियां तड़प तड़प कर मरती हैं, हाथ में चपडे का पान लगा हुआ डंडा रखने हैं और उस से मक्खियां मारा करते हैं। ऐसे निन्दनीय कार्य श्रावक कदापि न करेगा। श्रावक यदि वनिये का रोजगार करेगा, तो नाज को पुराना न होने देगा, घुन न लगने देगा, जल्ढी वेच देगा । वनिये लोभवश भाव बढ़ने की प्रतीक्षा में नाज की कोठियां भरी रखते है और उन में घुन लगता रहता है । भोजन की तय्यारी में श्रावक सावधानता से काम करेगा। जीव जन्तु को बचा कर झाडू. देगा, पानी फेंकेगा । वस्तु धरे या उठावेगा । यदि कोई मक्खी, मकड़ी के जाले में फंस जाय, तो श्रावक उसे निकाल देगा, जाला तोड़ने में और मकडी का भोजन छीन लेने में जो किंचित हिंसा है, उस से कही अधिक पुण्य मक्खी के प्राण रक्षा में है । इयादि सदगृहस्थी श्रावक संसार का प्रसेक कार्य सावधानी से भली प्रकार, सफलना पूर्वक कर सकता है, और सामाजिक उन्नति की पराकाष्ठा के साथ साथ आत्मोन्नति करता हुआ, व्रत-ग्रहण करके चारित्र शुद्धि के क्रम वद्ध ग्यारह पट (जिन को प्रतिमा कहते हैं) प्राप्त करके,मुनि धर्म को अङ्गीकार करता है,पञ्च महाव्रतादि रूप १३प्रकार चारित्र पालता हुआ, पूर्ण श्रुत-ज्ञान, अवधि जान, मनः पर्यय और केवल ज्ञान को माप्ति कर सिद्ध पद पर जा विराजता है। वही पुरुषार्थ सिद्धि है, और उसी का उपाय इस परम उपयोगी ग्रन्थ में बतलाया गया है। जैनं जयतु शासन लाहौर श्रुत पञ्चमी, २४५९ अजितप्रसाद दातारों के शुभ नामों की सूची ५०) (१) सौ. श्रीमती चमेलीदेवी जी धर्मपनी बा० लालचन्द जी एडवोकेट रोहतक अनन्तनत के उद्यापन के उपलक्ष्य में ८०) (२) लालचन्द जी जैन एडवोकेट रोहतक ५०) (३) ला• कपूरचन्द जी जैन रईस रोहतक ५०) (४) ला० शिवदयाल जी जैन रईस रोहतक (५) १० गयसिंहमल्ल जी सर्राफ गोहाना अपने ज्येष्ट भाई स्व० ला. दरवूमल्ल जी की स्मृति में (६) ला० हरद्वारीमल जी जैन सर्राफ रोहतक २५) (७) रायसाहिन ला० रतनलाल जी एम० ए० प्रिन्सिपल इण्टरमीडियेट कालिंज रोहतक २५) (८) ला० जानकीप्रसाद जी एडवोकेट रोहतक २०) (०) ला० फूलचन्द पकमदनलाल जी जैन गोहाना अपनी मातेश्वरी के स्वर्गवास होने पर (0) ला० प्रतापसिंह जी मोटर पजेण्ट रोहतक (१)ला. शिवदयाल जयन्तीप्रसाद जी रोहतक १०) (१०) रा. नानकचन्द जी एडवोकेट रोहतक (१३) ० रतनगल जी वकील रोहतक (११) ला इन्द्रमेन जी वकील रोहतक (१५) ला० चेतनदाम जी वकील गोहाना १०) (१६) रा०विश्वम्भरदास जी साहिर मिलिटरी पेगनर रोहतक १०) (१७) ला. दीपानसिंह जी हेड ट्रेनरी तर्क रोहतक (१८) रा. नन्दलाल जी रईस रोहतक (१९) १० गनपतराय जी जन रोहतक १०)

५)
का
५)
१०)
( २ )
(२०) ला० जिनेश्वरदास जी वकील रोहतक
(२१) ला० श्रीचन्द जी जैन मिलिटरी पेन्शर रोहतक
(२२) ला० विशनस्वरूप जी सर्राफ रोहतक
(२३) ला० सुण्डूमल झुण्डूमल जी जैन रोहतक
(२४) ला० उग्रसेन जी ठेकेदार रोहतक
(२५) सौ० श्रीमती इलायचीदेवी जी
सुपुत्री ला० हरद्वारीमल जी सर्राफ रोहतक
(२६) सौ० श्रीमती पार्वतीदेवी जी धर्मपत्री
ला० महताबसिह जी रईस हांसी
(२७) ला० घासीराम जी सर्राफ रोहतक
६)
६)
२५)
१०)
मन्त्री-
जैन एसोसिएशन रोहतक

प्रस्तावना इस ग्रन्थ का नाम पुरुषार्थ सिद्युपाय है वास्तव में यह "यथा नाम तया गुणा" पुक्ति के अनुसार पुरुप अर्यात आत्मा के अर्थ प्रयोजन की सिद्धि के उपाय, तथा जैन सिद्धान्त के गृह रहस्यों का भण्डार है । मिथ्या श्रद्धान को नष्ट कर अपने आत्मा के स्वरूप में स्थिर होना पुरुषार्थ की सिद्धि का उपाय है-अर्थात् सम्य- रदर्शन सम्पन बान सम्यक चारित्र की एकताप मोलमार्ग ही पुरुषार्थ सिद्ध उपाय है जैसा इस ग्रन्थ के कर्ता अचार्यवर श्रीमद् अमृतचर जी ने गाथा न० ९ से १६ में प्रगट किया है। वैसे तो इस अय में सम्यक दर्शन,सम्यक् ज्ञान, सम्यक् चारित्र का खम्प एक निराल ही में वर्णन किया गया है। परन्तु पृज्पवर आचार्य ने हिंसा अनृतस्तेय अब्रह्म परिग्रह पावों ही पापों को निहायत सूत्री के साथ हिसारूप सिद्ध किया है। वास्तव में अहिंसा धर्म के सम्बन्ध में यह अपनी कोटी का एक अनुग ही ग्रय है। श्रीमद् अमृतचन्द्र जी विक्रम की दशमो शताब्दी में हुए है आप अपने सपय के एक उच्च-कोटी के विद्वान थे। पट्टावलियो से जान पड़ता है कि जिस नदिसद्ध के आचार्यों में पात स्मरणीय परम पूज्य आचार्य श्रीकुन्दकुन्द स्वामी हुए है आपने मी उसी सब को बहुत समय तक मुशोभित किया। श्रीकुन्दकुन्द स्वामी के प्रसिद्ध ग्रन्थ पभास्तिकाप, प्रवचनसार, समयसार पर आरकी परमोत्तम टीकायें मिलती हैं। इससे आपकी विद्वत्ता, आपका सच वात्सल्य, तथा श्रद्धाभाव का भी भली माति परिचय मिल जाता है। आएकी सब टीकार्य असन्त बोधगम्य,भाव व्यत्रक और ममाणीक गिनी जाती है। पुरपार्थ सिद्धियुपाय अथ की भापा टीकायें कई है। परन्तु म ने उनमें से स्वर्गीय प. रोडरमल जी तथा दौरतराम जी कृत और प० नायूराम जी प्रेमी कृत काओं को ही पा है। पं० टोडरमल जी की टीका को मेने रोहतक जैन मंदिर सराय मोहल्ला की शास्त्र सभा में नवम्बर सन १९२० से फरीसन् १९३० तक परकर मनाया । उस समय इस ग्रन्ध को पढकर जैन सिद्धात के रहस्य का वडा (१२) भारी प्रभाव मेरे तथा सभासदों के चित्त पर पड़ा। जिस दिन सभा में यह ग्रंथ समाप्त हुआ, तो श्रोतागण को नियम प्रतीज्ञा दिलाते हुए मैं ने स्वयं यह नियम किया, कि मैं इस ग्रन्थ की टीका को आनकल की सरल और साधारण भाषा में रूपान्तर करने का प्रयत्न करूंगा। पश्चात् अपने धर्म प्रेमी और अनुभवी मित्र वा० लालचन्द जी BA, LL. B. ऐडवोकेट तथा वा० नानकचन्द जी B.A. LL. B ऐडवोकेट से इसके सम्बन्ध में बातें हुई तो उनकी भी यही सम्मति ठहरी कि मूल श्लोक देकर उसके नीचे अन्वयार्थ दिये विना भावार्थ ही सरल भाषा में लिख दिया जाये तो यह बड़ा उपयोगी होगा। इससे वे अंग्रेजी पढ़े लिखे विद्वान तथा स्कूलों और कालिजों में पढ़ाये जाने वाले छात्रगण, तथा वे भाई जो संस्कृत नहीं जानने और जिनको हिन्दी भाषा का भी साधारण ज्ञान है लाभ उठा सकेंगे। इसी आशय को लेकर इस ग्रंथ को यह रूप देने का प्रयत्न किया है। इस ग्रन्थ में मुख्यता गृहस्थाचार का ही वर्णन किया गया है और जो थोड़ा बहुत यतियों के आधार का वर्णन किया है वह भी गृहस्थाचार के ही प्रयोजन से किया गया है ताकि गृहस्थ भी अपनी योग्यता व शक्ति का विचार करके उसको ग्रहण करें और अपना कर्तव्य जान उसका एकदेश पालन करें। यद्यपि मूलग्रन्थ में श्रावक की एकादश प्रतिमाओं का वर्णन नही है तथापि इसमें पाठकों के मुभीते के लिये ग्यारह प्रतिमाओं का स्वरूप भी संक्षिप्त रीति से बतला दिया गया है । दश लक्षण धर्म तथा वाईस परिषहों का वर्णन करते हुए स्वर्गीय कविवर भूधरदास जी कृत पार्श्व पुराण में से और बारह भावनाओं का स्वरूप लिखते हुए स्वर्गीय पं० दौलतराम जी कृत छहढाला में से छन्द भी उद्धृत कर दिये हैं। जिससे उनका वर्णन जरा रोचक प्रतीत हो । यद्यपि मूलग्रन्थ में सम्पूर्ण व्रतों का वर्णन कर चुकने के पाछे सब व्रतों के अंतीचार बताये हैं पर हमने पाठको की मुगमता के लिये प्रसेक व्रत के अतीचार की गाथा लक्षण के साथ ही देदी है और गाथा का नम्बर वही रक्खा है जो मूलग्रंथ की है। इस टीका को लिखने के बाद मैने इसे अपने परम हितैषी श्री जैनधर्म दिवा- (१३) कर जैनधर्म मृपण ब्रह्मचारी शीतलप्रसाद जी के पास सशोधन के लिये भेना- उन्हो ने कृपाकर अपना बहुमूल्य समय देकर इसे भायोपात देखकर हमें उपकृत किया इसके लिये हम उनके अत्यन्त आभारी है। मैं विद्वान नहीं है। मैं ने इस प्रय के सम्बन्ध में कोई भी बात अपनी ओर से नहीं लिखी है, केवल भक्तिभाव और जिन वाणी प्रचार मे ही प्रेरित होकर इस ग्रन्थ को इस रूप में लिखा है, यदि कोई त्रुटि व अशुद्धि हो तो विशेपज्ञ मुझे बुद्धि हीन तथा अल्पन्न जान क्षमा करें और पाठ को सशोधित कर पढ़ें। मै अपने मित्र वा० लालचन्दजी तथा पाय नानकचदजी रोहतक का भी आभारी ह जिनकी सत्सङ्गति तथा प्रेरणा से मुझे इसके लिखने का अवसर प्राप्त हुआ। श्रीमान् प० नाथूराम जी प्रेमी की टीका को इस ग्रन्य के लिखने में मैंने एव ही स्वतन्त्रता पूर्वक काम में लिया है इसके लिये हम उनके चिरऋणी रहेंगे। अत में अपने परममित्र श्रीमान प० अजितमसाट जी MA ,LL B ऐडवो- केट, (जिनकी समाज सेवा तथा धर्म प्रेम मे समाज भली भाति पारीचित है) को धन्यवाद दिये बिना नहीं रह सकता है। कि जिन्होंने अपने घहुमूल्य समय की परवाह न कर इस रथ को उपवाने का पूरा मार अपने ऊपर लिया तथा शिक्षामद माक्यन लिखकर ग्रथ के महत्व को बढाया। उन उदार जिनवाणी भक्त महानुभावों का भी अति आभारी हु कि जिन्होंने उदारता पूर्वक अपना द्रव्य देकर इस ग्रथ के प्रकाशन में हाय पटाया है-उनके शुभ नामों की सूची अप में लगादी है। रोहतक भुनपशमी २४९ उग्रसेन जैन (गोहाना निवासी) BALLB, पकीर, रोहतक

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२० १०० १०० विषयानुक्रमणिका सरया पिपय पृष्ठ सख्या विपय पृष्ठ १ मगलाचरण ग्रन्थ की उत्यानिका १२१ सप्तशीलत • "पुरुषार्थ सिद्धयुपाय" का अर्थ १२/०दिग्नत ३ उपदेश करने की रीति २०२३ दिग्गन के अतिचार ४ श्रावक पर्म व्यारयान २३ २४ देशनत ५ सम्यक् दर्शन का लक्षण ०३.२० देशात के अतिवार ६ सम्यक के अष्ट अङ्ग ३५२६ अनर्थदण्डात ७ सम्यक् दर्शन के ५ अतिचार ४० २७ अनर्थदण्डवत के अतिचार ८ सम्यक् ज्ञान २०२८ सामायिक शिक्षात ९ सम्यक चरिन ५१२९ सामायिकत्रत के अतिचार १० चारित्र के भेद ५३.३० मोपधोपवास शिक्षानत ११ अहिंसानत ४३१ प्रोपधोपपासनत के अतिचार १०३ १० अहिंसानुगत के ५ अतिचार ७४ ३२ भोगोपभोग परिमाण शिक्षानत १०३ । ७४ ३३ भोगोपभोग परिमाणनत के १४ ससाणुनत के अतिचार अतिचार १५ अचौर्यरत ७८३० अतिथिसविभाग शिक्षात १६ अचौर्याणुनत के अतिचार ८०३५दाता के सप्त गुण १०९ १७ ब्रह्मचर्यनत ८३६ दान के पात्र १८ ब्रह्मचर्यानुनत के अतिचार ८२३७ सरिभागनत के अतिचार १९ परिग्रह परिमाणात ८३३८ सहेखना परिग्रह परिमाण अणुव्रत के ३९ सल्लेखना की विधि ११९८ अतिचार ८९४० सल्लेखना के अतिचार ११६ २०रानि भोजन साग २० ४ श्रावक की ११ मतिमायें १३ ससनत ভত १०८ ११० १११ । ११० 50

( २ )
संख्या विषय
४२ सकल चारित्र
४३ वारह प्रकार का तप
४४ पट आवश्यक के नाम
४५ गुप्तित्रय
४६ पंच समिति
४७ दश लक्षण धर्म
पृष्ट संख्या
विपय
१२२ ४१ वाईस परीपहजय
१४१
१२२, ५० रत्नत्रय धर्म
१५०
१२८५१ रत्नत्रय बंध का कारण नहीं है १२६
१२६ ५२ अष्ट कर्म और उनके बंध का
१२६
वर्णन
१५९
१२८५३ स्यादाद नीति का स्वरूप १०८
१३४/५४ ग्रन्थकर्ता की लघुता १६२
४८ बारह भावना

शुध्धाशुद्धि पत्र (Earata) ३३ १ रहति अद्गों को ४१३ येद्ध पृष्ठ पनि अशुद्ध शुद्ध पृष्ठ पक्ति अशुद्ध १ २ मापनुवाद भापानुवाद २२१२ को मुनाकर को न मुनाकर १४ पडनोकेट वकील २८१२ भोग योग ३१८ भी ही ३. ८ शुद्धोपयोगी गुद्धोपयोग ३२३ ६ वह रहित १४ ३ अड़ों के ३३ २ऐश्चय ऐश्वर्य गौद्ध ३४१५विषयक, पापों विपयकपायों ४१८ अथचित् कथचित् ३६ ६ आ जाता है आ जाते हैं ४२३ नास्तिक नास्ति ३६११ प्रमानविशिष्ट हे प्रमादविशिष्ट नहीं है ५१२ रूपोद्धियते स्पोद्धियते ३६ ८ स्थार्थ स्वार्थ नोट-१२ पक्ति से आगेजो नोटदिया| ३७२२ रत्नमय रत्ननय हुया है यह १० वी पति से आगे गाया | ३८१-४ की अतिशय का अतिशय न०३ मे पहिले पढना चाहिये । ३८ ५ होती है होता है ५१६ महीय अद्वितीय ४० ३री प० से पहिले मम्यदर्शन के ८ ३ दीनाता दिखाता अतिचार की गाथा न० १८२, पढनी ८ ३ पुद्गल की चाहिये 'शका नयन फाक्षा चिचिकित्सा ८२७ प्रश्न यदि प्रश्न-यदि मस्तवोऽन्य दृष्टानाम् । मनसाच तत्प्रशसा ९१५फ्यि किया मम्यग्दष्ट रतीचारा ॥१८॥ "२०हो ही ४०२३ जनना ११२२ उज्यानिका उत्यानिका ४०२४नाश झान १२ २रिजिना विसर्जित ४१२१२३ मन पर्याय मन पर्याय १२ ३ घ्याएनाय व्याख्यान ४५ ० उस को २३ ६याधिन भगाधित ४. १८ पथ्यार्थिकनय पय्यायार्थिक नय १३ १३ म्यामार स्यमान ४८ १८ऽध्यवमाय ऽध्यवसाय १३.६परिणामन परिणमन ४९ २दानाडाल घ्यजन ५११८ मम्यम्। मम्यग्न्यपदेश मोने ५२१७ पर भा १५-२३ साने मोने ५४ हिमेते हिमति १५५४ परिणाममानो परिणममानो ५५ ५यिभाव भावों का दिमावमायोंकी पुदल का उसकी डाचा डोर १५४प्यजन १५९सौन १११२ ११६ १३ घेरारण्य घात भी १२० १९ के के ८११० तब्रह्म (२) पृष्ठ पंक्ति अशुद्ध शुद्ध पृष्ठ पंक्तिः अशुद्ध शुद्ध ५८ ६तमेवं तमेव १०९ ४ रतवृषि रतयष्टि ५९ ३परिणम परिणाम ११२ २१ ऽवश्येम ऽवदयमहं ६० ९ करोतिहिंसा करोनि हिमां ११४ ४ नीयन्तेऽक्ष नीयन्तेऽत्र ६३ ३ करने वाले से करने से १२५ ३समय मंयम ६७ ५ स्तोकेकेन्द्रिय स्तोककेन्द्रिय ११५ ४ामा बन रेमा चितवन ६७ ६ विरमाणमपि विरमणमपि १९५० सन्यास सन्यासा: ६९ २३ पूज्यनिमित्त पूज्यनिमित्तं १९५ २१ प्रायश्चितोक्त प्रायश्चित्त आदि ६९ २३ छगादीनां छागादीनां शास्त्रोक्त १६५२३ यचना याचना ६९२४ संजपनस् मंगपनम् १६६ ७अत्यत्त अत्यन्त ७०२० जाविरहरणेन जीवहरणेन वैराग्य ७२१८ साधनं साधन ७६२० पदपरमपि यदपरमपि १२७ ४ याद कराना याद करना के ७२ ६ घात ही १२१ १ बैठ कर खड़े होकर तदता ८४१० परिग्रह को परिग्रह का १२१११ जता है ८६ १केवल केवली १२२ २ चारित्रान्तर भावात् चारित्रान्त- र्भावात् ८७२० परिग्रहण परिग्रह (१२२ ३ ममाहितस्वान्त समाहितस्वान्तः ९० २४ वासरभुक्त वासरभुक्ते १२२ १९ अनशनमदीये अनशनमवमौदर्य्य ९.१६ साधारण राग साधारण राग १२४ ७ भी भेद है भी दो भेद है भावभाव भाव १२५ १९ आचारण ঋষি ९४२३ इस इस के १२५ २० व्युत्सर्गा व्युत्सर्ग ९५ ६ वन्द्य बन्ध (१२६ ३प्रात्याख्यान प्रत्याख्यान ९६ ५ उपकारणों उपकरणो १२६२३ निक्षेपोत्सर्गः निक्षेपोत्सर्गाः २००१२ व्याग्रता व्यग्रता १२८ १९ चिन्मामणि चिन्तामणि १०० २३ चतुर्दशी को चतुर्दशी के १३० ९ अतिन्द्रय अतिन्द्रिय १०३ १ तथोत्सार्ग. तथोत्सर्ग. १३१ १८ संयमपाना संयमपालना १०३ १७ भोगोपभोग परिमाण भोगोपभोग-१३५ ९ बहु । होई बहुहोई। शिक्षा व्रतभोग परिमाण शिक्षा व्रत १३५ १९ सुनदारा सुतदारा १०५ ३सकन्ध स्कन्ध १३६१२ और विष १०६१६ नियमरूप किसी किसी १३७ २३ अनुभव वचन अनुमय वचन १०८ १६ दोन देना दान देना १३८ १ आहारिक आहारक जाता है और मल are- (३) पृष्ठ पक्ति अगुख पृष्ठ पक्ति अगुद्ध १३८१ निज काज काज निज काज १५७ १ नोट-जिस अश से “मम्यक् १३०१४ कमी की कमों को चारित्र है उस अंश से आत्मा के १३९ ८मूख भूख वध नहीं' पहली पचि में यह १४१ ३ दुसव्याधि दुराव्याधि पाठ और पढ़ना चाहिये। सयमनम् महमलम् १५७ ८ प्रकाश अवकाश १४. ८ नग्न्यिारति नाग्न्यारति १७८ २रोप लोय १४.१६कमौका कों की १५८ ३ औदारक औदारिफादि १४२१६ पारण पारणा १६२१९१ मुहत्त अन्तर मुहर्त १४३१९ ठण्डा हवा २६३ १९ मिथ्याटि मिथ्याष्टि के १४८ ९ नरकों का नरकों की १६३ २६ १०७ १५२१० नियंग नियेच १६४ ९ चरित्र चरिने १५४ १३ दर्शमोहनी दर्शनमोहनी २६४२४ मनहोर मनोहर १५.११ उनका उनको १६५ १९ ससार चार ससारसार १५७ २ राग १६५२२ यरणये परणये १५९१८ माग मार्ग १६६११ उस से उस समय १५५१७ निक्लमान विक्लमपि १६८ ९ भगवान भगवान की ठण्डी हवा राग है

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श्री अमृत चन्द्र आचार्य कृत सस्कृत "पुरुषार्थ सिद्ध्युपाय” ग्रन्थ का हिन्दी भाषनुवाद अर्थात् श्रीयुत् उग्रसेन, एम ए ,ऐडवोकेट, रोहतक, द्वारा, सम्पादित भाषा-पुरुषार्थ सिद्धयुपायः। तनयति पर ज्योति सम समस्तरेनन्त पर्याये । दर्पणतल इस सकला प्रतिफलति पदार्थमालिका यत्र ॥१॥ भावार्य-वह शुद्ध चेतनामई परम ज्योति जयन्ती होवे,जिसमे कि जगत् के जीवादिक समस्त ही पदार्थ अपने अपने आकार,गुण तथा अतीत अनागत वर्तमान सम्बन्धी पर्यायों सहित,ठीक उसी प्रकार प्रति- निम्वित होते है,जैसे कि शीशे में घटपट आदिक पदार्थ प्रतिविम्बित होते हैं। शीशे के इस दृष्टान्त में विशेषता यह है कि शीशे में ऐसी अभिलापा नहीं है कि मैं इन पदार्थों को प्रतिविम्बित करू,या जेसे लोहे की सूई चुम्बक पत्थर के समीपस्खय ही जाती है वैसे शीशा अपने स्वरूप को छोड़कर पदायों को प्रतिविम्बित करने के लिये उनके पास नहीं जाता है ओर न ही वे पदार्थ अपने निज स्वरूप को छोड़ उस शीशे के अन्दर प्रवेश कर जाते है । या जैसे कोई पुरुष किसी दूसरे पुरुष को (२) कहे कि हमारा अमुक कार्य करो ही करो,तैसे वे पदार्थ अपने प्रति- विम्बित होने के वास्ते शीश से कोई प्रार्थना भी नहीं करते हैं। सहज स्वभाव से ही ऐसा सम्बन्ध है कि जैसा जिस पदार्थ का आकार होता है । वह उस रूप हो कर ही शीशे में प्रतिबिम्बित होता है । उसके प्रतिबिम्बित होने से शीशा यह नहीं मानता कि यह पदार्थ मेरे लिये भला है,उपकारी है,राग करने योग्य है,या यह पदार्थ मेरे लिये बुरा है, अपकारी है,द्वेप करने योग्य है,शीशे के लिये तो सवही पदार्थ समान हैं । ठीक इसी प्रकार जैसे शीशे में कितने ही घटपट आदिक पदार्थ प्रतिबिम्बित होते हैं,ज्ञानरूपी शीशे में समस्त जीवादिक पदार्थ प्रति- विम्बित होते हैं। ऐसा कोई द्रव्य या पर्याय नहीं जो ज्ञान में न आया हो । ऐसी शुद्ध चैतन्य परम ज्योति की सर्वोत्कृष्ट महिमा स्तुति करने योग्य है ।) यहाँ कोई प्रश्न करे कि गुण का स्तवन किया, किसी त्रास गुणी का नाम लेकर स्तवन क्यों नहीं किया ? चाहिए तो यह कि पहिले गुणी का नाम लेवे और फिर उसके गुण वर्णन करें । तिसका उत्तर,आचार्य ने प्रथम ही गुण का स्तवन करके अपनी परीक्षा प्रधानता प्रकट की है । भव्य पुरुष दो प्रकार के होते हैं एक तो आज्ञाप्रधानी और दूसरे परीक्षाप्रधानी । जो जीव कुल परम्परा से चले आए मार्ग के अनुसार देव, गुरु उपदेश को ज्यों का त्यों प्रमाण कर, विनय आदि किया रूप प्रवर्तते हैं वे आज्ञाप्रधानी कहलाते हैं । जो पहिले अपने सम्यक् ज्ञान द्वारा स्तुति करने योग्य गुण का निश्चय कर लेते हैं और फिर जिसके अन्दर वह गुण पाया जावे उसके प्रति विनय आदि क्रिया रूप प्रवर्तते हैं वे परीक्षा प्रधानी कहलाते हैं। कोई पद अथवा कोई खास भेष या स्थान पूज्य नहीं होता है । पृज्य तोगुण ही है। इस लिये आचार्य ने यहाँ यह निश्चय किया कि शुद्ध चेतना प्रकाश रूप गुणही (३) पहिले स्तुति करने योग्य है । जिसके अन्दर ऐसा गुण पाया जावे वह फिर सहज हीस्तुति करने योग्य हो जाता है।गुण द्रव्य के ही आधीन होता है,द्रव्य गुणों से जुदा कोई चीज नहीं है निश्चय पूर्वक विचार करने पर यह बात सिद्ध होती है कि यह परम शुद्ध चेतना प्रकाश रूप पूर्ण गुण केवल अरहन्त तथा सिद्ध परमेष्टी में ही पाया जाता है। इस प्रकार श्रीअमृतचन्द्र आचार्य जी ने इस शुद्ध चेतना गुण का स्तवन करके अपने इष्टदेव का ही स्तवन क्यिा है । आगे आचार्य एकान्तपक्षरहित स्यादवाद (अनेकान्त) को नमस्कार करते हैं-कोई तर्क क्रे कि जिनागम को नमस्कार करना चाहिए या स्थावाद को क्यों नमस्कार किया ' तो। परमागमस्य वीज निपिङ जात्यन्ध सिन्धुरविधानम् । सफल नय विलमिताना विरोधमथन नमाम्यनेकान्तम् ॥२॥ उत्तर में आचार्यवर कहते हैं कि जिस स्याद्वादको हमने नमस्कार किया है वह परम उत्कृष्ट जैन सिद्धान्त का बीज या जीव मूल है- जैसे गरीर जीव सहित ही कार्यकारी होता है,जीव विना मृतक शरीर क्सिी भी काम का नहीं होता । जैन सिद्धान्त वचनात्मक है और चन क्रमवर्ती है । अन्य मतावलम्बी जो भी क्यन करते हैं, एक नय की प्रधानता को लिए हुवे भी करते हैं, परन्तु जैन सिद्धान्त सर्वत्र स्याद्वाद से व्यापक है, अर्थात् एकान्त अर्थ से रहित अनेकान्त रूप है।जहाँ एकनय की प्रधानता होती है,वहां दूसरी नय की अपेक्षा होती है। इसी कारण जैन सिद्धान्त जीव के लिए कार्यकारी है और अन्यमत एकान्त पक्ष के कारण कार्यकारी नहीं । यदि कोई जैनागम के उपदेश को भी अपनी अज्ञानतावश अनेकान्त रहित श्रद्धान करता है तोवह विपरीत फल को ही प्राप्त करता है। स्याहाद (अनेकान्त) एकान्त ( ४ ) श्रद्धान का निषेध कर सर्वांग वस्तु के वास्तविक स्वरूप को निश्चय कराने वाला है। दृष्टान्त-जैसे बहुत से जन्मान्ध पुरुष मिले, उन्होंने एक हस्ती के विविध अङ्गों के अपनी २ स्पर्शनइन्द्रिय द्वारा निश्चय किया, नेत्र बिना साग हस्ती को न जाना; हस्ती के स्वरूप को अपने२ निश्चय के अनुसार अनेक प्रकार बता कर आपस में वाद करने लगे तब एक नेत्रवान पुरुष वहाँ आया उसने यथावत् हस्ती के स्वरूप का निर्णय कर उनकी भिन्न २ कल्पनाओं को दूर किया । ठीक इसी प्रकार एकान्तवादी एक ही वस्तु के अनेक अंगों को अपनी २ बुद्धि द्वारा जुदे जुदे अन्य अन्यरीति से निश्चय कर बैठते हैं,सम्यक ज्ञान बिना साग वस्तु को नहीं जानते हैं । तब एक सम्यक-ज्ञानी स्याहाद विद्या के द्वारा यथावत् वस्तु का स्वरूप निर्णय कर उनकी भिन्न २ कल्पनाओं को दूर करता है । (सांख्यमती वस्तु को कूटस्थ नित्य ही मानते हैं, वैद्ध-मती क्षणिक मानते हैं । स्याहादी कहते हैं कि यदि वस्तु सर्वथा नित्य ही है, तो अनेक पर्यायों की पलटन उस में क्यों और कैसे होती है ! यदि वस्तु को सर्वथा क्षणिक ही मानलिया जावे तो 'यह वस्तु वही है जो पहिले देखी थी ऐसा प्रत्यभिज्ञान फिर कैसे हो ! इस प्रकार स्थाबाद सिद्धान्त सर्वथा एकान्तवाद का निषेध कर निर्णय करता है कि अथंचित् , द्रव्य की अपेक्षा वस्तु नित्य भी है, और कथंचित पर्याय की अपेक्षा वस्तु क्षणिक भी है। (स्याहाद एकान्त श्रद्धान का निषेध कर सर्वांग वस्तु का निर्णय करता है । स्याहाद स- मस्त नयों के द्वारा प्रकाशित जो वस्तु का स्वभाव उनके परस्पर विरोध को दूर करने वाला है। नय विवक्षासे वस्तु में अस्ति, नास्तिक एक, अनेक, भेद,अभेद, नित्य, अनित्य आदिक अनेक स्वभाव पाए जाते हैं। जिनमें परस्पर (५) विरोध मालूम पड़ता है । जैसे अस्ति नास्ति में प्रतिपक्षीपना पाया जाता है, परन्तु जब इन्हीं स्वभावों को स्याइद द्वारा बतलाया जाता है, तो सब विरोध दूर हो जाता है, क्योंकि एक ही पदार्थ क्यचित् वचतुष्टय (अपने द्रव्य,क्षेत्र,काल, भाव) की अपेक्षा अस्तिरूप है,क्यचित् ,पर- चतुष्टय की अपेक्षा नास्तिरूप है । समुदाय की अपेक्षा एक रूप है, क्यचित् गुण पर्याय की अपेक्षाअनेक रूप है। क्थचित् सज्ञा,सख्या, लक्षण की अपेक्षा गुण पर्यायादि अनेक भेद रूप है। क्यचित् सत्व की अपेक्षा अभेद रूप है । कथचित् द्रव्य की अपेक्षा नित्य कथाचित पर्याय की अपेक्षा अनित्य हैं । इस प्रकार स्याहाद सर्व विरोध को दूर करने वाला है। लोकत्रयेकनेत्र निरूप्य परमागम प्रयत्नेन । अस्माभिरूपोद्धियते विदुषां पुरुषार्थसिद्धयुपायोय ॥३॥ नोट-(स्यावद स्यात् क्यचित् नय अपेक्षा द्वारा+यादन्यस्तु स्वरूप का कथन करना) अपने इष्ट देव तथा परमागम को स्तवन करने के पश्चात् आचार्य प्रतिज्ञा करते हैं, कि अब हम तीन लोक सम्बन्धी पदार्थों को प्रका- शित करने वाले अदीय नेत्र परमागम को,अनेक उपायों द्वारा साव- धानता पूर्वक परपराय जैनसिद्धान्त के अनुसार निरूपण कर के,ज्ञानी जनों के हित के अर्थ,पुरुषार्थ-सिक्युपाय(चैतन्य पुरुषके प्रयोजन सिद्ध होने का उपाय) नामा अन्य कहेंगे । तात्पर्य यह है कि इस ग्रन्थ में केवली, श्रुतकेवली तथा आचार्यों की परपरा को विचार कर ही उप- देश किया जायेगा स्वमति कल्पित रचनाकोई भी नहीं हैं। मुख्योपचार विवरण निरस्तदुस्तरविनेयदुर्योधा । व्यवहार निश्चयज्ञाः प्रवर्तयन्ते जगति तर्थिम् ॥ प्रथम हो वक्ता तथा उपदेश दाता का लक्षण कहते हैं। इस लोक , में धर्म तीर्थ के प्रवर्तावनेवाले आचार्य होते हैं । उपदेश दाता आचार्य में अनेक गुणों का होना जरूरी है, परन्तु उन सब में मुख्य व्यवहार और निश्चय नय का ज्ञान है; क्योंकि जीवों में जो अनादि काल से अज्ञान भाव चला आता है, वह मुख्य कथन और उपचार कथन के ज्ञान से ही दूर होता है । मुख्य कथन तो निश्चयनय के आधीन है- निश्चयनय-स्वाश्रितोनिश्चयः'-जो अपने ही आश्रय होता है उसे निश्चयनय कहते हैं। जिस द्रव्य के अस्तित्व में जो भाव पाये जावे उस द्रव्य में उन का ही स्थापन कर, परमाणु मात्र भी अन्य कल्पना नहीं करने का नाम स्वाश्रित है । इस निश्चयनय के कथन को ही मुख्य कथन कहते है। इसके ज्ञान से, शरीरादिक परद्रव्यों के साथ अनादि से एकत्व श्रद्धानरूप अज्ञान का अभाव होता है, भेद- विज्ञान की प्राप्ति होती है, सर्व परद्रव्यों से भिन्न अपने शुद्ध चैतन्य- स्वरूप का अनुभव होता है । इस अनुभव अवस्था में ही जीव पर- मानन्द दशा में प्राप्त होकर केवल ज्ञान दशा की प्राप्ति करता है । जो अज्ञानी जीव इसके बिना समझे धर्म में लवलीन होते हैं वे शरीग- श्रित कियाकाण्ड को उपादेय, ग्रहण करने योग्य, जान कर संसार के कारण अशुद्धोपयोग को ही मुक्ति का कारण मान लेते हैं और निज शुद्ध स्वरूप से भ्रष्ट होकर संसार में भ्रमण करते हैं । इसलिए मुख्य कथन का जानना निश्चयनय के आधीन है, इस का ज्ञान उपदेश दाता के लिये परमावश्यक है क्योंकि जो आप ही अनभिज्ञ होता है वह अपने शिष्यों को किसी प्रकार भी नहीं समझा सकता है । व्यवहारनय-पराश्रितो व्यवहारः'-अर्थात् जो परद्रव्य के आश्रय होता है, उसे व्यवहारनय कहते हैं । पराश्रित-कुछ थोड़ा सा भी कारण पाकर किसी द्रव्य का भाव किसी द्रव्य में समावेश करने का । नाम पराश्रित है। व्यहारनयका कथन ही उपचार कथन कहलाता है, इस के ज्ञान से जीव शरीरादिक सम्बन्धरूप ससार दशा को जान ससार के कारण आसप तथा बन्ध के स्वरूप को पहिचान कर,ससार से मुक्त होने के उपाय सवर तथा निर्जरा में लगता है । जो अज्ञानी जीव इस को जाने बिना केवल शुद्धोपयोगी होना चाहते हैं वे पहले ही व्यवहार साधन को छोड पाप के आचरण में लीन हो,नरकादिक के अनेक दु.ख, सकटों में पड़ जाते हैं । इस प्रकार उपदेशदाता के लिये उपचार कथन का जानना भी परमावश्यक है । सारांश यह है कि निश्चय तथा व्यहार दोनों नयों के जानने वाले आचार्य ही धर्म तीर्थ के प्रवर्तक हुआ करते है, और नहीं । निश्चयमिहभूतार्थ व्यवहारं वर्णयन्त्यभूतार्थम् । भूतार्थबोधविमुख. प्राय सर्वोऽपि ससार ॥५॥ आचार्य इन दोनों नयों में से निश्चय नय को भूतार्थ और व्यव- हार नय को भभूतार्थ कहते हैं । भूतार्थ-(भूत, जो पदार्थ में पाये जावें+अर्थ भाव)। भृतार्थ नाम सत्यार्थ का है, जो भाव किसी पदार्थ में पाये जावे उनको ज्यों का त्यों प्रकाश करने और अन्य किसी प्रकार की भी कल्पना न करने को भूतार्थ कहते हैं । सत्यवादी कल्पना से कुछ नहीं कहा करते, वह सत्य ही कहा करते हैं। जैसे-यद्यपि जीव और पुद्गल का अनादि काल से एक्क्षेत्रावगाह सम्बन्ध चला आता हे और दोनों मिले हुए दीखते हैं तथापि निश्चय नय आत्म द्रव्य को शरीरादिक पर द्रव्यों से भिन्न ही प्रकाश करता है और यही भिन्नता मुक्त दशा में प्रकट होती हैं, इस वास्ते निश्चयनय ही भूतार्थ अथवा सत्यार्थ है। अभूतार्थ-नाम असत्यार्थ का है जो भार पदार्थ में नपाए जायें उन्हें अनेक प्रकार

(८)
की कल्पना करके प्रकाश करने को अभृतार्थ कहते हैं जैसे कोई अस-
त्यवादी जरा से भी कारण का बहाना पाकर अनेक कल्पना करके अस-
दृश को सदृश कर दीखाता है जैसे यद्यपि जीव और पुदगल की सत्व
(मौजुदगी) भिन्न २ है, स्वभाव भिन्न है, प्रदेश भिन्न है, तथापि एक
क्षेत्रावगाह का बहाना पाकर आत्मद्रव्य को शरीगदिक परद्रव्यों से
एकत्वरूप कहता है, इस वास्ते व्यवहारनय अभृतार्थ असत्यार्थ है।
आत्मा का परिणाम निश्चयनय के श्रद्धान से विमुख होकर शरीरादिक
परद्रव्यों से एकत्वरूप प्रवर्तन करता है,इसको ही संसार कहते हैं इस
से जुदा संसार कोई पदार्थ नहीं है । इस लिए जो जीव संसार से मुक्त
होना चाहते हैं उनको शुद्ध नय के सन्मुख रहना योग्य है । जैसे कोई
पुरुष ऐसे जल को पीता है जिस का निर्मल स्वभाव कीचड़ के संयोग
से आच्छादित हो गया है, अर्थात् गदले जल को पीता है,और कोई
दूसरा पुरुष अपने ही परिश्रम द्वारा उस गंदले जल में फटकरी डाल
कर जल और कीचड़ को जुदा २ कर देता है, और इस प्रकार शुद्ध
किये हुवे निर्मल जल को आस्वादन करता (पीता) है । ठीक इसी
प्रकार बहुत से अज्ञानी जीव, कर्म संयोग से, जिन का ज्ञान स्वभाव
ढक गया है, ऐसी अशुद्ध आत्मा का अनुभव करते हैं,और कई एक
अपनी बुद्धि से शुद्ध निश्चय नय के स्वरूप को जान,कर्म और आत्मा
कोजुदा २ कर देते हैं और फिर ऐसे निर्मल शुद्धात्मा का स्वानुभव-
रूप आस्वादन करते हैं । शुद्धनय कतक फल (निर्मली) के समान है,
इस के श्रद्धान से सर्वसिद्धि होती है । प्रश्न यदि ऐसा है, तो फिर
आचार्य व्यवहार का उपदेश क्यों करते हैं।
अबुधस्य वोधनार्थ मुनीश्वरादेशयन्त्यभूतार्थम् ।
व्यवहारमेव केवलमवैति यस्तस्य देशना नास्ति ॥६॥

(९) इमका उत्तर यह है कि अनादि काल के अज्ञानी जीव व्यवहारनय के उपदेश दिना वस्तु के स्वरूप को समझ नहीं सकते, इस वास्ते आचार्य उनको व्यवहारना के द्वारा ही समझाया करते हैं । उदा- हरण, जैसे किसी म्लेच्छ को एक ब्राह्मण ने स्वस्ति शब्द कह कर आशीर्वाद दिया, वह म्लेन्छ कुछ न समझा, और ब्राह्मण की ओर देखने लगा । तर वहा एक हिभाषिया (Interpreter) आगया और उमने म्लेच्छ को उस की भाषा में समझा दिया कि पडित जी कहते है कि तुम्हारा भला हो तब उसने आनन्दित हो उस आशीर्वाद को अङ्गीकार किया। ठीक इसी प्रकार अज्ञानी जीव को आचार्य ने 'आत्मा' गब्द कह कर उपदेश दिया, वह अज्ञानी कुछ न समझा और आचार्य की ओर देखने लगा, तर व्यवहार तथा निश्चय दोनों नयों के जानने वाले आचार्य ने व्यवहारनय द्वारा, भेदोनुभेद करके उसे बतलाया, कि यह जो देखने वाला, जानने वाला और आचरण करने वाला पदार्थ है, यह ही आत्मा है । तब उस अज्ञानी ने परम आनन्दित हो आत्मा का निज स्वरूप अङ्गीकार किय । यह सदभूत व्यवहारनय का उदाहरण है । आगे असदद्भुत व्यवहारनय का उदा- हरण देते है । घी से भरे हुवे मिट्टी के घडे को व्यवहार में घी का पड़ा कहते है,और कोई पुरुप जन्म से ही उसे घी का घड़ा जानता है, यहाँ तक कि वह उसे गिना 'घी का घड़ा' कहे समझ ही नहीं सकता । मिट्टी का घड़ा कहने से भी नहीं समझ सकता । और कोई दसरा पुरुष उमे कोरे घडे के नाम से ही समझ लेता ह, यथार्य में पिचारा जारे तो वह घड़ा मिट्टी का ही है, केवल उसको समझाने के लिये ही घो का घड़ा कहा जाता है । ठीक इसी प्रकार चैतन्य स्वरूप आत्मा कम जनितपर्थ्याय सयुक्त है, उसेव्यवहार में देव मनुष्य (१०) इत्यादिक स्वरूप ही जानते हैं। कोई उनको, यदि उस आत्मा को देव, मनुष्य कह कर समझावे तो समझ जावें और यदि अकेला चैतन्य स्वरूप कह कर समझावे तो ठीक न समझे और कदाचित् समझे तो किसी पर-ब्रह्म-परमेश्वर को समझ लेवें । निश्चयपूर्वक विचाग जावे तो आत्मा चैतन्य रूप ही है, परन्तु अज्ञानियों के समझाने के लिये आचार्य गति, जाति आदि भेद द्वारा ही जीव का निरूपण करते हैं, इस प्रकार आचार्य अज्ञानी जीवों को ज्ञान प्राप्त कराने के लिये ही व्यवहार का उपदेश दिया करते हैं। माणवक एव सिंहो यथा भवत्यनवगीत सिंहस्य । व्यवहार एव हि तथा निश्चयतां यात्यनिश्चयज्ञस्य ॥७॥ आगे केवल व्यवहार नय के श्रद्वान होने का ही कारण बत- लाते हैं । जैसे जो बालक सिंह और बिल्ली दोनों को ही नहीं जानता और बिल्ली को ही सिंह मान लेता है, उसी प्रकार अज्ञानी निश्चय स्वरूप को न पहिचान, व्यवहार को ही निश्चय मान लेता है। अपने शुद्ध चैतन्य स्वरूप आत्मा के श्रद्धान, ज्ञान, आचरण रूप मोक्षमार्ग को न पहिचान, केवल व्यवहार दर्शन, ज्ञान चारित्र का ही साधन कर अपने आप को मोक्ष का अधिकारी मान बैठता है, अर्थात् अर- हन्तदेव , निर्ग्रन्थ गुरु और दयामय धर्म को ही श्रद्धान कर अपने आप को सम्यक्ती मानने लग जाता है, थोड़ी सी जिन बाणी को जान अपने को ज्ञानी मान लेता है और व्रतादिक क्रियाओं का सा- धन कर अपने आप को चारित्रवान मानने लग जाता है । इस भांति अज्ञानी जीव इस शुभोपयोग में ही सन्तुष्ट होकर शुद्धोपयोगरूप मोक्ष मार्ग में प्रभादी हो जाते हैं, और इस ही कारण केवल व्यवहार नय के ही अवलम्बी हो जाते हैं । इन को जिन बाणी का उप देश स- फल नहीं होता है अर्थात् वे मोक्षमार्ग न पाकर भटकते ही रहते हैं। यहाँ प्रश्न होता है, कि यदि ऐसे श्रोता उपदेश का लाभ नहीं पाते तो कैसे- गुण-सयुक्त श्रोता पाते हैं। व्यवहार निश्चयो य प्रबुध्य तत्वेन भवति मध्यस्थ । प्रामोति देशनाया स एव फलमविकल शिष्यः ॥८॥ श्रोताओं में अनेक गुण होना चाहिए परन्तु उन सब में व्यर हार निब्बय को जान करके एक पक्ष का हठयाही न होना मुख्यगुण है। उक्तच गाथा । जइ जिणमय पठिजह तोभा ववहार निन्छय मुच । एकेण मिण छिज्जई,तित्य अणेण तच्च च ॥अर्थात् जो तू जिन मत में लगता है, तो व्यवहार और निश्चय को मत छोड़, जो निश्चय का पक्षपाती होकर व्यवहार को छोडेगा तो रत्नत्रयस्वरूप धर्मतीर्थ का अभाव हो जावेगा । और जो व्यवहारका पक्षपाती होकर निश्चय को छोडेगा तो शुद्ध तत्त्व स्वरूप का अनुभव न होगा । इस वास्ते पहिले व्यवहार निश्चय को भली भांति जान,पीछे यथा योग्य अङ्गीकार करना, पक्षपाती न होना, यह उत्तम श्रोता का लक्षण है। यहाँ यदि कोई कहे कि जो गुण निश्चय व्यवहार का जानना पहले वक्ता का बत लाया था, वही श्रोता का क्यों बतलाया ? इसका उत्तर यह ही है कि जो गुण वक्ता में अधिकतारूप बहुत पाये जाते हैं,वही गुण श्रोता में हीनता रूप धोड़े पाये जाते है । अथवा वस्तु का यथार्थ स्वरूप जानने के लिये दोनों को हो, निश्चय व्यवहार का ज्ञान होना आवश्यक है ।। इति उत्स्यानिका गन्ध,रस, ग्रन्थ प्रारम्सः अस्ति पुरुपश्चिदात्मा विर्वजितः स्पर्शगन्धरसवर्णैः। छण-पर्यय-समवेतः समाहितः समुदयव्ययधोव्यैः ।। इस ग्रन्थ में पुरुष के अर्थ की सिद्धि के उपाय का व्याख्नाय किया जावेगा। पहले ही बताते हैं कि पुरुष किसे कहते हैं और उस में क्या क्या गुण होते हैं। पुरुप अर्थात् आत्मा चेतन स्वरूप है,स्पर्श, वर्ण आदिक से रहित अमूर्तिक है । गुण पर्याय संयुक्त है, उत्पादव्यय, ध्रौव्य संयुक्त है। पुरुप = पुर, उत्तम चैतन्य गुण उनमें जो+शेते, स्वामी होकर रहे,या आनन्द लेवे, उसका नाम पुरुष है । या दूसरे शब्दों में कहें, तो ज्ञान दर्शन चेतना के स्वामी का नाम पुरुष है । (क) चेतना आत्मा का, अव्याप्ति, अति व्याप्ति और असम्भव इन तीनों दोषों से रहित एक असाधारण लक्षण है। जो लक्षण कहा जाता है वह यदि किसी लक्ष्य में तो पाया जावे और किसी लक्ष्य न पाया जावे, तो वह लक्षण अव्याप्ति दूषण युक्त लक्षण कहलाता । कोई आत्मा ऐसी नहीं जो चेतना रहित हो, इसलिये आत्मा का चेतना लक्षण अव्याप्ति दूषण से रहित है। यदि आत्मा का लक्षण रागादिक कहें तो अव्याप्ति दूषण आता है, क्योंकि रागादिक संसारी जीवों के ही पाये जाते हैं, सिद्ध जीवों के नहीं । जो लक्षण लक्ष्य में भी पाया जावे और अलक्ष्य में भी पाया जावे तो वह अति-व्याप्ति दूपण युक्त लक्षण कहलाता है। चेतना लक्षण जीव पदार्थ बिना अन्य किसी भी पदार्थ में नहीं पाया जाता है। यदि आत्मा का लक्षण अमू- में ind , र्तिक कहा जावे तो अति-व्याप्ति दूषण आता है, क्योंकि जैसे आत्मा अमूर्तिक है,वैसे ही धर्म, अधर्म, आकाश, काल द्रव्य भी अमूर्तिक हैं। इस कारण आत्मा का चेतना लक्षण अति-व्याप्ति दूषण से भी रहित है।जो लक्षण प्रमाण द्वारा सिद्ध न हो सके उसे असभव कहते है । आत्मा का चेतना लक्षण इस असम्भव दुषण से भी रहित है, क्यांकि यह लक्षण आत्मा में प्रत्यक्ष, परोक्ष प्रमाण से बाधित है। इस प्रकार आत्माका चेतना लक्षण अव्याप्ति अति व्याप्ति और असभव दूषणों से रहित है । यह चेतना दो प्रकार की होती है (१) ज्ञान चेतना (२) दर्शन चेतना। जो चेतना पदार्थों को विशेषता से साकार रूप जाने, उसे ज्ञानचेतना कहते हैं। जो चेतना पढ़ार्थों को सामान्यता से निराकार रूप जाने, उमे दर्शन चेतना कहते हैं । परिणामों की अपेक्षा यह चेतना तीन प्रकार की होती है। ज्ञान चेतना, कर्म चेतना, और कर्म फल-चेतना । जन यह चेतना शुद्ध ज्ञान स्वाभाररूप परि णमन करती है, तो ज्ञान चेतना कहलाती है । यह चेतना सभ्यक्- दृष्टि के ही होती है, इस चेतना में आत्मीय गुण का अनुभव होता है । जब यह चेतना रागादिक कार्यरूप परिणामन करती है तो कर्म चेतना कहलाती है । जब यह चेतना सुख दुख आदि भोगनेरूप परिणामों को करती है, तो कर्म फल चेतना कहलाती है। कर्म चेतना और कर्म फल चेतना में फर्क यह है कि कर्म चेतना में ज्ञान पूर्वक कियाओं द्वारा कर्म की प्रधानता है और कर्मफल चेतना में कर्म करने की प्रधानता नहीं है, कर्मफल भोगने की प्रधानता है। इस प्रकार यह चेतना अनेक स्वाँग करती है, परन्तु इस का अभार कभी नहीं होता, अन्यथा जीव का ही अभाव हो जावे । (ख) यह पुरष आठ प्रकार के स्पर्ण (ठडा, गर्म, रूखा, चिकना है ( १४ ) हलका, भारी, नर्म और कठोर), दो प्रकार के गन्ध (सुगन्ध,दुर्गध), पाँच प्रकार के रस ( तीखा, कडुआ, कषायला, खट्टा, मीठा ) और पाँच प्रकार के वर्ण ( सफेद, लाल, पीला, नीला, काला ) इत्यादि पुद्गलीक लक्षणों से रहित अमूर्तिक है। इस विशेषण से आचार्य ने पुरुष अर्थात् आत्मा की पुद्गल द्रव्य से भिन्नता प्रकट की है। यह आत्मा अनादि सम्बन्ध रूप पुद्गल द्रव्य में, अहंकार, ममकार रूप प्रवृत्ति करता है । यदि अपने चैतन्य स्वभाव को अमूर्तिक जाने तो भाव कर्म, द्रव्य-कर्म, नो-कर्म,धनधान्यादिक पुद्गल द्रव्यों में अहंकार बुद्धि कदापि न करे। (ग) पुरुष अर्थात् आत्मा गुण पर्याय रूप ही है । गुणपर्यायों का समूह ही द्रव्य है । आत्मा द्रव्य है, इसीलिये गुण पर्याय सहित विराजमान है। गुण का लक्षण सद्भूत है (सद्. द्रव्य के साथ है+भूत, सत्ता जिस की) और जो द्रव्य में हमेशा पाये जावें, उन्हें गुण कहते हैं । आत्मा में दो प्रकार के गुण साधारण तथा असाधारण हमेशा पाये जाते हैं । ज्ञानदर्शनादिक असाधारण गुण है जो और द्रव्यों में नहीं पाये जाते हैं । अस्तित्व, वस्तुत्व, प्रमेयत्वादिक साधारण गुण हैं जो और भी द्रव्यों में पाये जाते हैं। पर्याय का लक्षण क्रमवर्ती है, जो द्रव्य में अनुक्रम से उपजें और कदाचित पाई जावे, उन्हें पर्याय कहते हैं। आत्मा में पर्याय दो प्रकार की होती हैं-(१) नर नारकादि आकृ- तिरूप व सिद्धाकृतिरूप व्यंजन पर्याय (२) रागादि परिमणमन रूप वा षट्प्रकार वृद्धिहानि रूप अर्थ पर्याय । इन गुण और पर्सायों से आत्मा की तदात्मक एकता है अर्थात् , (१५) इन गुण और पर्योयो से भिन्न ओर कोई आत्मद्रव्य नहीं है । इस विशेषण द्वारा आत्मा का विशेषपना जाना जाता है। (घ) पुरुप अर्थात् आत्मा उत्पाद व्यय, और ध्रौव्य सयुक्त है नवीन अर्थ-पर्याय तथा व्यजन-पर्याय के पैदा होने को उत्पाद कहते है । पूर्व पर्याय के नाश होने को व्यय कहते हैं और गुण की अपेक्षा या द्रव्य की अपेक्षा शाश्वतपने को ध्रौव्य कहते है । उदाहरण जैसे सौने के कड़े को तोड़ कर कुन्डल बनायें तो जिस समय कुन्डल ब नाये, उसी समय कुन्डल की उत्पत्ति, कड़े का पिनांश (व्यय) और सौने की अपेक्षा ध्रौव्य पना सिद्ध है। इस विशेषण से आत्मा का अस्तित्व प्रकट होता है । यहाँ प्रश्न होता है कि ऐसे चैतन्य पुरुप के अशुद्धता कैसे और क्योंकर हो गई', जिस के कारण कि इसको अपने अर्थ की सिद्धि करने की आवश्य- कता पड़ी। परिणाममानो नित्य ज्ञान विवर्तग्नादि सन्तत्या । परिगामाना स्पा स भपति कर्ता व भोक्ता च ॥१०॥ इस आत्मा की अनादि काल से ही, रागादि परिणामों में परि- णमन करने के कारण, अशुद्ध दशा हो रही है । कोई अप ही नवीन अशुद्धता इस में नहीं आई। अनादि काल में ही यह सिलसिला जारी है, कि द्रव्य कर्म से रागादिक भार होते है, ओर उन रागादि भावों से फिर नवीन द्रव्य कर्मी का बन्ध होता है । "सुवर्ण कीटिका वत्' अर्थात् सौने और कीटिका के ममान अनादि सम्बन्ध है । इस पन्ध के निमित्त मे ही इस आत्मा को अपने ज्ञान सभार की खबर नहीं होती है । और इसी लिये यह उदयागत कर्म पर्यायों में, इष्ट अनिष्ट माव कर, राग, द्वेप, मोहरूप परिणामन करता है । यद्यपि इन (१६) परिणामों का कारण द्रव्य कर्म है, तथापि यह परिणाम अर्थात् भाव- कर्म चैतन्यमय हैं । इस लिये इन का आत्मा के साथ व्याप्य व्यापक भाव होने से आत्मा ही कर्ता और भाव्य भावक भाव से आत्मा ही भोक्ता है। जिस जगह भाव्य भावक का संबन्ध घटित होता है, वहां ही भोग्य भोजक का सम्बंध भी घटित होता है,और जगह नहीं। व्याप्य व्यापक भाव सिहचारी, और क्रमभावी नियम को व्याप्ति कहते हैं । जैसे धूऐं और अग्नि में सहचारीपना पाया जाता है, जहाँ धुआँ हो, वहाँ अग्नि ज़रूर होती है, अग्मि के बिना धुओं हो नहीं सक्ता। ठीक इसी प्रकार रागादिक भावों और आत्मा में सहचारी पना पाया जाता है । जहां रागादिक होते हैं, वहाँ आत्मा ज़रूरी होता है, बिना आत्मा के रागादिक होते नहीं । इस व्याप्ति क्रिया में कर्म व्याप्य और कर्ता व्यापक होते हैं । रागादिक भाव आत्मा के करने से होते हैं, इस लिये वे व्याप्य और उनका कर्ता आत्मा व्यापक कहलाता है। जिस जगह ऐसा व्याप्य व्यापक सम्बन्ध पाया जाता है, वहाँ ही कर्ता वार्म संबन्ध अर्थात् कार्य कारण संबन्ध संभव है। इसी प्रकार जो भाव अनुभव करने योग्य हों उन्हें भाव्य कहते हैं, और अनुभव करने वाले पदार्थ को भावक कहते हैं । आगे दिख- लाते हैं कि पुरुष की अर्थ सिद्धि क्या होती है। सर्व विवत्तॊत्तीर्ण यदा स चैतन्यमचलमाप्नोति । भवति तदा कृतकृत्यः सम्यकपुरुपार्थसिद्धिमापन्नः ॥११॥ जब यह आत्मा स्वपर भेद विज्ञानद्वारा शरीरादिक पर द्रव्यों को जुदा जान लेता है तो उन में 'यह भला, यह बुरा' ऐसी बुद्धि का त्याग कर देता है; क्योंकि जो भला बुरा होता है, वह सब अपने परिणामों से ही होता है, पर द्रव्य का किया हुआ कुछ भला बुरा नहीं होता। इसलिये प्रथम ही सर्व परद्रव्यों में रागद्वेष भावों का त्याग करना चाहिये । यदि ऐसा करने पर भी रांग आदिक की उत्पत्ति हो तो उसका विनाश करने के लिए अनुभव अभ्यास में उद्यमवान होना चाहिये । ऐसा अभ्यास होते होते जिस समय समस्त विभावों का नाश हो जावे, अक्षोभ समुद्रवत् शुडात्म स्वरूप में लवणवत् (नमक की भाति) लीन हो जाय, जहाँ ध्यान, ध्याता, ध्येय का विकल्प न रहे, ऐसा विचार न रहे कि मैं शुद्धात्म का ध्यान करता हूँ, बल्कि आप ही तदात्मक वृत्ति से शुद्धात्म स्वरूप होकर निष्कम्प परि णमन करे, उस समय उस दशा में यह आत्मा कृत्य कृत्य कह लाता है, क्योंकि जो कुछ करना या सो कर चुका, अब कुछ करना वाकी नहीं रहा । आत्मा की इसी अवस्था को पुरुषार्थ-सिद्धि कहते हैं, क्योंकि पुरुष के अर्थ अर्थात् कार्य की सिद्धि जो होनी थी सो हो चुकी । इस पुरुषार्थ सिद्धि का उपाय जानने से पहले यह जानना जरूरी है कि आत्मा का पर द्रव्यों से सम्बन्ध होने का कारण क्या है ? जीव कृत परिणाम निमित्तमात्र प्रपद्य पुनरन्ये स्वयमेव परिणमन्तेऽत्रपुद्गला कर्म भावेन ॥१२॥ जिस समय जीव रागद्धेप, मोह भावरूप (परिणमन) करता है, उस समय उन भावों का निमित्त पाकर पुद्गल द्रव्य आप ही कर्म अवस्था को धारण कर लेते हैं। भेद केवल इतना ही है कि यदि आत्मा देव, गुरु धर्मादिक प्रशस्त रागादि रूप परिणमन करता है तो शुभ कर्म का बन्ध होता है, और यदि अप्रशस्त राग द्वेप मोह रूप परिणमन करता है तो पापबन्ध होता है । यहा कोई प्रश्न करे कि जीवके महा सुक्ष्मरूप भागोंकी खबर जड़ पुद्गल को कैसे हो जाती ( १८ ) है। नहीं तो विना खबर वे पुद्गल परमाणु पुण्य पाप रूप कैसे परि- णमन करते हैं ? इसका उत्तर यह है कि जैसे कोई मन्त्र साधक पुरुष किसी गुप्त जगह में बैठा हुवा मन्त्र को जपता है उसके बिना ही किये उस मन्त्र के निमत्त से किसी को पीड़ा हो जाती है, कोई प्राणान्त हो जाता है, किसी का भला होजाता है कोई पागल हो जाता है . उस मन्त्र में ऐसी शक्ति है, कि उसका निमिच पाकर चेतन अचेतन अनेक पदार्थ अनेक २ अवस्थाओं को धारण कर लेते हैं। ठीक इसी प्रकार अज्ञानी जीव अन्तरङ्ग में विभाव भावरूप परिणमन किया करते हैं । इन विभाव भावों का निमित्त पाकर कोई पुद्गल पुण्य प्रकृतिरूप और कोई पाप प्रकृतिरूप परिणमन करता है। इस जीव के इन भावों में ही ऐसी विलक्षण शक्ति है, कि जिसके निमित्त से पुद्गल आपही अनेक अवस्थाओं को धारण कर लेते हैं। ऐसा ही निमित्त नैमित्तिक संबंध है। प्रश्न-इस जीव के जो विभाव भाव होते हैं, यह आप ही होते हैं या इनका भी कोई निमित्त कारण है। परिणममानस्य चितश्चिदात्मकैः स्वयमपि स्वकीवः । भवति हि निमित्त मात्रं पौगलिक कर्म तस्यापि ॥१३॥ उत्तर-इस जीव के रागद्वेषादिक विभाव भाव आप से ही नहीं होते हैं, क्योंकि यदि यह आप से ही हो तो ज्ञान दर्शन के समान यह भी स्वभाव भाव हो जावें, और इन का कभी भी नाश न होवे। इस लिए यह भाव औपाधिक हैं, क्योंकि यह अन्य निमित्त से अर्थात् ज्ञानावरणादिक द्रव्य कर्मों के निमित्त से ही उत्पन्न होते हैं। जैसे २ द्रव्य कर्म उदय में आते हैं, वैसे २ ही आत्मा विभाव भावरूप परि- णमन करता है। यहाँ कोई प्रश्न करे कि पुद्गल में ऐसी क्या शक्ति है जो चेतनानाथ को विभाव भाव रूप परिणमन करा देती है ?

। १९) उत्तर यह ही है कि जैसे किसी पुरुष के सिर पर मन्त्र से पढ़ी हुई मिट्टी डाल दी जाती है, तो वह उस मिट्टी के निमित्त से अपने आप को भूल कर नाना प्रकार की विपरीत चेष्टायें करने लग जाता है। जैसे मन्त्र के प्रभाव से मिट्टी में ऐसी शक्ति आजाती है, कि स्याने पुरुष को पागल बना देती है, ठीक इसी प्रकार यह आत्मा अपने प्र- देशों में रागादिक के निमित्त से बन्धे हुवे पुद्गल परमाणुओं के कारण अपने आप को भूल कर नाना प्रकार विपरीत भावों में परिणमन करता है । तात्पर्य यह है कि इस के विभावभावों से पुद्गल में ऐसी शक्ति उत्पन्न हो जाती है, जो चैतन्य पुरुष को विपरीत चलाती है। इस प्रकार भाव कर्मों से द्रव्य कर्मों की उत्पत्ति होती है, और द्रव्य कर्मो से भाव कम उत्पन्न होते हैं । इसी का नाम ससार है । एवमय कर्म कृतेभीवरसमाहितोऽपि युक्त इव । प्रतिभाति बालिशाना प्रतिभास स खलु भववीजम् ॥१४॥ यह अभी बतला चुके है कि पुद्गल कर्मोंके कारण भूत रागादि भाव ह और रागादि भावों का कारण पुद्गल कर्म हैं । इससे यह आत्मा निज स्वभाव भावों की अपेक्षा कर्मजनित नाना प्रकारके भावों से सर्वथा भिन्न चैतन्य मात्र वस्तु है जैसे लाल रगके डाक (Setting) के निमित्तमे स्फटिक लाल रगका दिखाई देने लग जाता है । यथार्थ में लाल रंग का नहीं है,स्फटिक तो वास्तव में अपने ही निर्मल सफेद रंग को लिए हुए है और लाल रंग की झलक ऊपर ही ऊपर है, जौहरी लोग जो इस बात के परीक्षक हैं वह स्फटिक रग को भली भांति जानते हैं, परन्तु रत्न परीक्षा से अनमिज्ञ अनाड़ी लोग स्फटिक को वास्तव में रक्त मणिवत लालरग स्वरूप ही देखते व मानते हैं। इसी प्रकार कर्मों के निमित्त से आत्मा रागादि रूप परिणमन करता ( २० ) है, परन्तु यथार्थ में यह रागादिक आत्माके निज भाव नहीं हैं,आत्मा तो अपने शुद्ध निर्मल चैतन्य गुण संयुक्तही विराजमान है । रागादिक आत्माके निज स्वभावसे भिन्न ऊपर२ ही झलक मात्र दिखाई पड़ते हैं । ज्ञानी जीव तो आत्मा के शुद्ध निर्मल स्वभाव को भली भांति जानते हैं,परन्तु जो भेद विज्ञान से शून्य हैं,उनको आत्मा रागादिक विभाव रूप ही प्रतिभासित होता है। यहाँ कोई प्रश्न करे कि पहले तो आपने रागादिक भाव जीव कृत बतलाए थे, यहाँ अब उनको कर्म कृत कैसे बतलाते हो ? उत्तर यह है--रागादिक भाव चेतना रूप हैं, इस वास्ते इनका कर्त्ता जीव ही है ऐसा कहा; परन्तु ये मूल भूत जीव के शुद्ध स्वभाव नहीं हैं, ये रागादिक भाव उदय प्राप्त कर्मों के निमित्त से होते हैं इस लिए इनको कर्मकृत कह दिया गया है । जैसे किसी मनुष्य के भूत आ जावे तो वह मनुष्य उस भूत के निमित्त से नाना प्रकार की विपरीत चेष्टाएं करता है। निश्चयसे उन चेष्टाओं का कर्ता तो मनुष्य ही है, परन्तु यह चेष्टाएं उस मनुष्य का निज भाव नहीं हैं भूतकृत ही कही जाती हैं। इसही प्रकार यह जीव कर्मों के निमित्त से नाना प्रकार विपरीत भावरूप परिणमन करता है। इन भावों का कर्ता तो जीव ही है परन्तु यह भाव जीव के निज स्वभाव न होने के कारण कर्मकृत कहे जाते हैं । अथवा कर्मकृत नाना प्रकार के पर्याय,वर्ण,गंध,रस,स्पर्श,कर्म,नोकर्म,देव,नारकी,मनुष्य,तिर्यञ्च,शरीर, संहनन,संस्थानादि भेद,व पुत्र मित्रादि,धन धान्यादि भेदोंसे शुद्धात्मा प्रत्यक्ष ही भिन्न है । उदाहरण-एक मनुष्य अज्ञानी गुरुके उपदेश से एक छोटे से भौहरेमें बैठ कर भैंसे के रूप का ध्यान करने लगा और अपने को भैंसा मान,भैसे जैसे बड़े और मोटे शरीर के चितवन में आकाश पर्यन्त सींगों वाला बन गया,तब इस चिंता में पड़ा कि , (२१) इस छोटे से भौहरे में से मेरा इतना बड़ा शरीर कैसे निकल सकेगा ? यह भैसो मानने वाला यदि अपने को भैंसा न माने तो मनुष्य तो बना बनाया ही है । ठीक इसी प्रकार यह जीच मोह के निमित्त से अपने को वर्णादि स्वरूप मानकर देवादिक पर्यायों को आपा नमाने, तो निर्मल अमूर्तिक शुद्धात्मा तो आप बना बनाया ही है। साराश यह आत्मा कर्मजनित रागादिक भावों से हमेशा ही भिन्न है । निश्चय पूर्वक आत्मा कर्म जनित भावों से सयुक्त प्रतिभासता ससार का बीज भूत अर्थात् मूलकारण है । दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि मिथ्या दर्शन ही ससार का मूल कारण है। विपरीताभिनिवेशं निरस्य सम्यग्व्यवस्य निजतत्वम् । यत्तस्मादविचलनं स एव पुरुषार्थसिद्धयपायोऽयम् ॥१५॥ मियादर्शन के समूल नष्ट करने को सम्यक् दर्शन कहते हैं- कर्मजनित पर्यायोंसे शुद्ध चैतन्य स्वरूपके यथावत जाननेको सम्यक् ज्ञान, ओर कर्मजनित पर्यायों से उदासीन हो निजस्वरूप में स्थिरीभूत होने को सम्यक् चारित्र कहते है । इन तीनों का समुदाय ही कार्य सिद्धि होने का उपाय है । यह रत्नत्रय धर्म ही मोक्ष का मार्ग है,अन्य नहीं। अनुसरतां पदमेतत् करम्विताचार नित्य निरभिमुखा । एकान्त विरतिरूपा भाति मुनीनामलोकिकी वृत्ति ॥१६॥ इस रत्नत्रय धर्म का पालन मुनिराज सर्वथा किया करते हैं, गृहस्थ एकोदेश पालन करते हैं । महामुनियों की प्रवृति जगत् के लोगों से सर्वया निराली होती है। गृहस्योंका आचरण पापक्रियाओं से मिला हुआ होता है । ऐसे आचरण से महामुनि सर्वथा दूर रहते हैं। मुनि- राज पापक्रियाओं से त्यागस्वरूप,परद्रन्योंसे उदासीन रूप हुआ करते ( २२) हैं,वे केवल अपने ही आत्मीक चैतन्य स्वभाव का अनुभव किया करते हैं। आगे उपदेश देने का अनुक्रम बताते हैं। वहुशः समस्त विरतिं प्रदर्शितां यो न जातु ग्रह्णाति । तस्यैकदेशविरतिः कथनीयानेन बीजेन ॥१७॥ यो यतिधर्ममकथयन्नपदिशति गृहस्थधर्ममल्पमतिः । तस्य भगवत्प्रवचने प्रदर्शितं निग्रहस्थानम् ॥१८॥ अक्रम कथनेन यतः प्रोत्सहमानोऽतिदूरमपि शिष्यः । अपदेऽपि सम्प्रतृप्तः प्रतारितो भवति तेन दुर्मतिना ॥१॥ जो जीव उपदेश सुनने का अभिलापी हो, उसे पहले मुनिधर्म का उपदेश देना चाहिये, और वह यदि मुनि धर्म ग्रहण करने के योग्य सामर्थ्य न रखता हो तो बाद में उसे श्रावक धर्म का उपदेश देवें । क्योंकि यदि उपदेश दाता पहले सुनिधर्म को सुना कर श्रावक धर्म का उपदेश देता है,तो जिन मतमें उसे प्रायश्चितरूप दंड देने योग्य बतलाया गया है। क्योंकि जिस शिष्य के अंतरङ्ग में इतना उत्साह था कि यदि उसे पहले मुनिधर्म सुना दिया जाता तो वह मुनिपद को ही ग्रहण कर लेता,परन्तु उपदेश दाता पहले ही श्रावक धर्मका व्या- ख्यान करने लगा, तो वह उससे ही सन्तुष्ट हो गया । ऐसी हालत में मुनिधर्म को ठगाने का दंड उपदेशदाताको ही देना चाहिये । अब आगे जो जीव मुनिधर्मके भारको उठाने की सामर्थ्य नहीं रखते,उन के लिये आचार्यवर श्रावक धर्म का व्याख्यान करते हैं। - श्रावक धर्म व्याख्यान एव सम्यग्दर्शनवोधचरित्रत्रयात्मको नित्यम् । तस्यापि मोक्षमागों भवति निपन्यो यथाशक्ति ॥२०॥ २०-मुनिराज तो मोक्ष मार्ग का सेवन पूर्ण रूप से करते ही हैं, किन्तु गृहस्थ को भी यथाशक्ति थोडा बहुत सेवन करना चाहिए सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चरित्र की एक्ता होना मोक्ष का मार्ग है-इन्हीं को तीन रत्न या रत्नत्रय कहते हैं ? यही मोक्ष का साधन है॥ तत्रादोसम्यक्त्व समुपाश्रयणीयमखिलयत्नेन । तस्मिन् सत्येव यतो भाति ज्ञान चरित्र च ।।२१।। इस जीव का हितकारी उपाय सम्यक् दर्शन समान् ओर कोई नहीं है,पिना सम्यक् दर्शन ग्यारह अग दस पूर्व तकके पाठीका ज्ञान भी अज्ञान ही कहलाता हे और महाव्रतादि के साधन से अन्तिम चेयक पर्यन्त बन्धयोग्य विशुद्ध परिणामी से भी असयमी कहलाता है। परतु सम्यक् सहित होने से योड़ा सा ज्ञान भी सम्यक ज्ञान और थोड़ासा मी त्यागरूप आचरण सम्यक चारित्र कहलाता है। जैसे अङ्क सहित होने से चिन्दी भी प्रमाणता में आ जाती है । इम लिये सन से पहले सम्यक्त को ही अङ्गीकार करना जरूरी है । अन्य साधन उसके बाद आते हैं। जविाजीवादीना तत्वार्थाना सदैव कर्तव्यम् । श्रद्धान विपरीताभिनिवेगरिविक्तमात्मरूपतत् ॥२०॥ सम्यक दर्शन-ततार्थ श्रद्धान सम्यक्तका लक्षण हे यह तत्वार्थ (२४) श्रद्धान दो प्रकार का होता है एक सामान्य रूप और एक विशेषरूप (तत्वार्थ तत्व सारभूत+अर्थ-जो निश्चय किया जावे, ऐसा पदार्थ) पर भावोंसे भिन्न अपने चैतन्य स्वरूपको आपरुप श्रदान करना सामा- न्य तत्वार्थ श्रद्धान कहलाता है । यह नारकी तिर्यश्चादिक समस्त ही सम्यक दृष्टि जीवों के लब्धि व उपयोगरूप में पाया जाता है । व्यव- हार दृष्टि से जीव अजीबादिक सप्ततत्वों को विशेषता पूर्वक जानकर श्रद्धान करना विशेष तत्वार्थ श्रडान कहलाता है यह मनुष्य देवा- दिक विशेष ज्ञानी जीवों के पाया जाता है। परन्तु राजमार्ग से सप्त तत्वों का जानना ही सम्यक श्रद्धान होने का कारण है; क्योंकि यदि तत्वों के स्वरूप को ही नहीं जाने तो श्रद्धान किसका करे ? इसलिये यहां प्रसंगवश इन सातों तत्वों का संक्षेप से वर्णन करना कुछ अनुचित न होगा। (१) जीवतत्व-जो चेतना लक्षण सहित विराजमान हो उसे जीव कहते हैं, इसके तीन भेद हैं, शुद्ध, अशुद्ध और मिश्र । (क) जिन जीवोंके सर्वगुण, पर्याय, अपने निज भावरूप परि- णमन करते हैं, अर्थात् जिनके केवल ज्ञानादिक शुद्ध परणति पर्याय में विराजमान हो गये हों, वे शुद्ध जीव कहलाते हैं, उनही को पर- मात्मा कहते हैं। (ख) जिन जीवों के सम्पूर्ण गुण पर्याय विकार भाव को प्राप्त हो रहे हों, अर्थात् जिन के ज्ञानादिक गुण कर्मआवरण से आच्छा- दित हो रहे हों । और यदि वे गुण थोड़े बहुत प्रकट रूप हों तो विप- रीत रूप परिणम रहें हो और जिनकी परिणति रागादि रूप परिण- मन कर रही हो, वे मिथ्यादृष्टि अशुद्ध जीव कह लाते हैं । इन को बहिरात्मा कहते हैं।

( २५) ग-जिन जीवों के सम्यक्तादि गुण कुछ विमल रूप हो गये हो और कुछ समल हो । ज्ञानादिक गुणों की कुछ शक्ति शुद्ध हो गई हो और वाकी अशुद्ध रह गई हो, कोई गुण अशुद्ध ही हो रहे हों, और जिनकी परणति शुद्धाशुद्ध रूप परिणमन करती हो, वे जीव शुद्धाशुद्ध रूप मिश्र जीव कहलाते हैं। इनहीं को अन्तरात्मा कहते हैं। २--अजीवतत्व-जो पदार्थ चेतना गुण रहित हों, उन्हें अजीवतत्व कहते है-इसके ५भेद हैं। पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश और काल । पुद्गल-जिस द्रव्य में रस, गन्ध,स्पर्श,वर्ण यह चार गुण पाये जावे, उसे पुद्गल कहते हैं। इस पुद्गल के दो भेद हैं। एक अणु, दूसरा स्कन्ध । अणु-एकाकी अविभागी (जिसकाऔर खण्ड न हो सके) परमाणु को अणु कहते हैं। स्कन्ध-दो यादो से अधिक अणुओं के समुदाय को स्कन्ध कहते है । अनन्त परमाणु के मिलने तक स्कन्ध कहे जाते हैं। निश्चय नय से एक परमाणु को ही पुद्गल द्रव्य कहते हैं। व्यवहार नय से स्कन्धों को पुल द्रव्य कह दिया जाता है । यह स्कन्ध पुद्गल द्रव्य छह प्रकार के होते हैं- १-स्थूल स्थूल-जो छेदने भेदनेतथा दूसरे स्थान पर ले जाने योग्य हो, तथा खण्ड किये जाने पर स्वयमेव न मिल सके,जैसे काष्ट पापाण आदि। २ स्थूल-जोछेदने भेदने तथा अलग अलग किये जाने पर तुरन्त ही स्वय मिल सक्ते हैं । जेसे घी, तेल, जल, दूध आदि । ३-स्थूल सूक्ष्म-जो आंखो से तो दिखाई देवें, परन्तु पकडे न जा सकें । जैसे आताप, चान्दनी, प्रकाश, अन्धकार आदि। ४-सूक्ष्म स्थूल-जो आंखों से तो दिखाई न देवें,परन्तु अन्य चार इन्द्रियों के द्वारा जाने जाते हो । जैसे वायु, रस, शब्द आदि । व्यञ्जना- वग्रह, मन ओर चक्षु से नहीं होता है शेष चार इन्द्रियों से होता है-सूक्ष्म- स्यूल पदार्थों को ही ग्रहण करता है । .

( २६ ) ५-सूक्ष्म-जो इन्द्रिय गम्य न हों अर्थात जो किसी भी इन्द्रिय द्वारा न जाने जावें । जैसे कार्माण वर्गणायें । ६-सूक्ष्म सूक्ष्म-जो इन कर्म वर्गणाओं से भी सूक्ष्म दो अणु के स्कन्ध तक हैं। धर्म द्रव्य-जो द्रव्य जीव और पुद्गल के चलने में सहकारी होता है, उसे धर्म द्रव्य कहते हैं;यह एक अमृर्तिक अखण्ड, लोकाकाश प्रमाण, असंख्यात प्रदेशी द्रव्य है । इस में स्पर्श, रस, गन्ध, वर्ण नहीं है । जैसे जल मछली के गमन में सहायक होता है, उसी प्रकार यह धर्म द्रव्य भी गमन करते हुए जीव और पुद्गल की तरफ उदासीन होते हुए भी, उनकी गति के लिये सहकारी कारण है । अधर्म द्रव्य-जो द्रव्य जीव और पुद्गल के ठहरने में सहकारी कारण होता है, उसे अधर्म द्रव्य कहते हैं। धर्म द्रव्य की तरह यह द्रव्य भी एक अखण्ड, अमृर्तिक लोकाकाश प्रमाण असंख्यात् प्रदेशी है । इस में भी स्पर्श, रस, गन्ध वर्ण आदिक नहीं है । जैसे धर्म द्रव्य जीव और पुग़ल के गमन करने में सहकारी होता है, वैसे ही यह अधर्म द्रव्य उनके ठहरने में सहकारी होता हैं । जैसे छाया पथिकों के ठहरने में कारण होती है, वैसे ही जीव पुद्गल के ठहरने में निश्चय नय से तो उनका ही स्वभाव उनकी स्थिति के लिये उपादान कारण है, व्यवहारनय से अधर्म द्रव्य है । झ-आकाश-जो द्रव्य सर्व-द्रव्यों को अवकाश देने की शक्ति रखता है,उसे आकाश द्रव्य कहते हैं। यह एक सब से बड़ा अमूर्तिक द्रव्य है। इसके दो भेद हैं-एक लोकाकाश दूसरा अलोकाकाश ।जहां जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म और काल यह पांच द्रव्य पाये जाते हैं, वह लोकाकाश कह- लाता है और जहां यह नहीं पाये जाते, केवल आकाश ही आकाश पाया जाता है, वह अलोकाकाश कहलाता है। इन दोनों का सत्व जुदा जुदा ( २७ ) नहीं है, द्रव्य एक है, क्योंकि जुदा होने से अलोकाकाश में काल न होने के कारण, परिणमन न होगा और अपरिणामी होने से द्रव्य का विनाश हो जावेगा। काल द्रव्य-जो द्रव्य सर्व द्रव्यों के परिवर्तन करने में समर्थ है और जो निश्चय से वर्तनाहेतुत्व लक्षण से सयुक्त है उसे काल द्रव्य कहते हैं। यह लोक के एक एक प्रदेश पर स्थित एक परमाणुमात्र असं- ख्यात द्रव्य है। "जैसे रत्नों का ढेर सव स्थान रोक कर भी भिन्न भिन्न रत्न को रखता है। वैसे कालाणु सर लोकाकाश में एक एक प्रदेश एक एक करके व्याप्त हैं तथापि वे कभी किसी से मिलते नहीं हैं।" निश्चय काल से द्रव्यों का परिणमन होता है, द्रव्यों के परिणमन से व्यवहार काल का ज्ञान होता है । जिससे निश्चय काल का बोध होता है-घड़ी, घण्टे,मिनट आदि व्यवहार समय पुद्गलों के परिणमन से ही उत्पन्न होता है । निश्चय काल परिणामों का उत्पन्न करने में सहकारी कारण है,न्यव- हार काल इस निश्चय काल की एक पर्याय है। इस प्रकार जीव,पुद्गल,धर्म,अधर्म, आकाश और काल छह द्रव्यों का सक्षिप्त वर्णन किया गया । इन में से काल बहुप्रदेशी नहीं है, एक प्रदेश मात्र है। इसलिये इस को काय रहित समझकर बाकी पांचों द्रव्यों को बहुप्रदेशी होने के कारण पचान्तिकाय कहा जाता है । जीर अजीव का वर्णन तो ऊपर आचुका-अब बाकी पांच तत्वों अर्थात आसप, बन्ध, सम्बर, निर्जरा और मोक्ष (जो जीव,अजीव दोनों तत्वों के परस्सर सम्बन्ध से होते हैं) का सक्षिप्त वर्णन करते हैं। ३-आस्रव तत्व जीव के रागादिक परिणामों से, मन वचन,काय के योगों द्वारा,पुद्गल परमाणुओं के आने को आस्रव कहते हैं। यह आस्रव दो प्रकार का होता है भावानव और द्रव्यास्त्रव । भावानव-आत्मा के जिन रागादि भावों से पुद्गल द्रव्य कर्म रूप ( २८ ) होते हैं, उन भावों के होने को भावास्रव कहते हैं, भावानव के ३२ भेद होते हैं । मिथ्यात्व ५, अविरति ५,प्रमाद १५, योग ३ और कषाय ४ । (विशेष के लिये देखो आस्रव भावना)। द्रव्यास्रव-ऐसे पुद्गल परमाणुओं का कि जिनमें ज्ञानावर्णादि कर्म- रूप होने की शक्ति होती है, आत्मा के साथ एक क्षेत्रावगाही होने के लिये आना द्रव्यास्रव कहलाता है । ४-वन्धतत्व-जीव के अशुद्ध भावों के कारण खिंचे हुवे पुद्गल परमाणुओं का, ज्ञानावरणादिक रूप, अपनी स्थिति सहित, अपने अपने रस संयुक्त, आत्म प्रदेशों के साथ सम्बन्ध रूप होने का नाम बन्ध तत्व है । बन्ध दो प्रकार का होता है एक भाव बन्ध और एक द्रव्यवन्ध । द्रव्यबन्ध-पुद्गल कार्माण जाति की वर्गणार्ये सबलोक में फैली हुई हैं, इन वर्गणाओं का आत्मा की भोग शक्ति परिणमन से खिंच कर, आत्मा के प्रदेशों के साथ परस्पर एक क्षेत्रावगाह सम्बन्ध कर लेने का नाम द्रव्यबन्ध है। भाव बन्ध-इस द्रव्यवन्ध के निमित्त कारण आत्मा के शुभ तथा अशुभ परिणाम हैं, इन भावों को भाव बन्ध कहते हैं। बन्ध के चार भेद हैं-प्रकृति बन्ध, प्रदेश वन्ध, स्थिति वन्ध और अनुभाग बन्ध। इन में से पहले दो अर्थात् प्रकृति-बन्ध और प्रदेश बन्ध, तो मन, वचन, काय की क्रिया से होते हैं और स्थिति बन्ध और अनु- भाग वन्ध कषायों से होते हैं। (विशेष के लिये देखो रत्नत्रय धर्म में बन्ध का वर्णन) ५-सम्बरतत्व-जीव के रागादिक अशुद्ध परिणामों के अभाव से कर्म परमाणुओं के आस्रव का रुकना संबर तत्व कहलाता है । संवर भी दो प्रकार का होता है-भाव संबर और द्रव्य संवर । निर्मल आत्मा के ( २९ ) अनुभव के बल से शुभ तथा अशुभ भावों का रुकनाभाव संबर है-व्रत, समिति,गुप्ति,दश वर्मवारह भावना आदि सब भाव सबर के ही भेद हैं । द्रव्य कर्मों के आस्रव के रुक जाने को द्रव्य सबर कहते हैं । ६-निर्जरातत्व-जीव के शुद्धोपयोग, व शुभोपयोग के बल से, अथवा स्थिति पूर्ण हो जाने से,बन्धे हुवे कर्मों के एकोदेश नाश होने को निर्जरा कहते हैं । यह निर्जरा दो प्रकार की होती है- १-सविपाक निजरा । • अविपाक निर्जरा । सविपाक निर्जरा-स्थिति पूर्ण हो जाने पर पूर्व वद्ध कर्मों का उदय में आकर, फल देकर या विना निमित्त पाये, यों ही झडजाना सविपाक निजरा है, यह सब ही संसारी जीवों के होती है । यह निर्जरा मोक्ष का कारण भूत नहीं होती। अविपाक निर्जरा-पूर्व बद्ध कर्मों का स्थिति पूर्ण होने से पहले ही, तपश्चरणादि द्वारा बिना फल दिये,गिरा देने का कारण अविपाक निर्जग है,यह निर्जरा मोक्ष का कारण भूत होती है । यह रत्नत्रय गर्भित वीतराग भावों से होती है । जितने अशों में वीतरागता होती है, उतने २ अश पूर्व बद्ध कर्म रस रहित होकर गिरते जाते हैं। निर्जरा का मुख्य उपाय भेद विज्ञान तथा आत्मविचार है। जिन परिणामों से कर्मों का आत्मा से झडना होता है, वह भार निर्जरा है । पूर्व बद्ध कर्म पुग़लों का रस रहित होकर आत्मा के प्रदेशों से झड जाने तथा बन्धस्वरूप न रहने का नाम द्रव्य निर्जरा है। ७-मोक्षतत्व-जीव के समस्त कर्मों के सर्वथा नाश होने और उसके निज स्वभाव के प्रगट होने को मोक्ष कहते हैं। द्रव्य कर्मों के आत्मा से जुदा होने को द्रव्य मोक्ष कहते हैं | आत्मा का जो परिणाम आत्मा के समस्त कर्मी के क्षय होने का कारण है, वह भाव मोक्ष है।

( ३० ) इन उपर्युक्त सात तत्वों के अर्थ का यथार्थ अहान करने का ही सम्यक् दर्शन है। यदि यहां कोई प्रश्न करे कि सम्यक् दर्शन के इस लक्षा अव्याप्ति दूपण आता है, क्योंकि जिस समय सम्यक दृष्टि विषय के की तीव्रता संयुक्त होता है, उस समय उसकी यह श्रद्धा नहीं हो लक्षण ऐसा होना चाहिये जो लक्ष्य में हर समय और हर अवस्थ पाया जावे । उत्तर-जीव के अडानरूप और परिणमनरूप दोभाव हैं, इन में से श्रद्धानरूप तो सम्यक का लक्षण है और परिणमनरूप च का लक्षण है । सम्यक् दृष्टि विषय कपाय की तीव्रता की हालत में। णमनरूप होता है, किन्तु श्रन्द्वानरूप नहीं, तत्वार्थ श्रद्धान में तो उर प्रतीति ठीक वैसी ही है जैसी कि होनी चाहिये । दृष्टान्त-जैस गुमाश्ता किसी साहूकार के यहां नौकर है वह अपने अन्तरङ्ग में साह के कारवार तथा धन सम्पत्ति आदि को अपना न जानते हुवे भी, मेरा" कह कर पुकारता है । उस के नफे टोटे में हर्प विषाद भी करत और परत्व के भाव को (परायेपने का विश्वास) कभी प्रगट नहीं क है। परन्तु यह परत्व का विश्वास उसके अंतरंग में शक्ति रूप विद्या रहता है,कदाचित वह साह के धन की चोरी करके उसके धन को अ समझने लगता है, तो वह अपराधी ठहरता है । किन्तु जिस समय गुमाश्ता साह के सामने अपनाहिसाब पेश करता है,तो उस समय अ अंतरङ्ग के विश्वास को साफ २ प्रगट कर देता है । साह की नौकरी वह पराधीन दुःख जानता है, धन हीन होने के कारण आजीविका वश मजबूरन् नौकरी करता है । ठीक इसी प्रकार ज्ञानी जीव उद् गत कर्मों के फल को भोगता है; अन्तरङ्ग में वह निश्चय पूर्वक जान है कि यह सब औदयिक ठाठ है, मेरा निज स्वरूप जुदा ही (३१) परिणमनरूप से वह इष्ट अनिष्ट में हर्प विषाद भी प्रगट करता है,बाह्य औदायक सम्बन्ध को "मेरा मेरा" भी कहता है, अपनी निश्चय प्रतीति कोबार वार सम्भालता भी नही है,क्योंकि यह प्रतीति कर्म उदय के समय शक्तिरूप विद्य- मानरहती है। परन्तु जिस समय वह उस कर्म का और अपने स्वरूप का विचार करता है,तो अन्तरङ्ग में जैसी प्रतीति है, उसी को प्रगट करता है। ज्ञानी जीव यदि कर्म के उदय को श्रद्वान पूर्वक अपने जानता है,तो मिथ्यात्वी ही कहलाता है । ज्ञानी कर्म के उदय को पराधीन दुःख जानता है। वह अपने शुद्धोपयोगी की हीनता के कारण ही पूर्व-बद्ध कर्मों के वश होकर मजबूरन् कर्म के औदयिक भावों में प्रवृत्ति करता है। इस प्रकार सम्यक् दृष्टि के तत्वार्थ श्रद्वान सामान्यरूपया विशेषरूप, शक्ति अवस्था या व्यक्त(प्रगट)अवस्था को लिये हमेशा ही पाया जाता है। यहा यदि फिर कोई प्रश्न करे कि इस लक्षण में अव्याप्ति दूषण तो नहीं पाया जाता, परन्तु अतिव्याप्ति दूपण तो अवश्य ही आता है, क्योंकि द्रव्यलिङ्गी मुनि जिन प्रणीत सप्त ता को ही मानते हैं,अन्य मत कल्पित तत्वों को नहीं मानते । लक्षण ऐसा होना चाहिये जो लक्ष्य विना और जगह न पाया जावे | इसका उत्तर यह है-द्रव्यलिङ्गी मुनि जिन प्रणीत तत्वों को तो मानते हैं,परन्तु पिपरीताभिनिवेश सयुक्त (उत्टे रूप) मानते है। वे शरीराश्रित क्रियाकाण्ड को ही आपा मान बैठते हैं । अजीव तत्व में ही जीवत्व मानते हैं और फिर आस्रव वन्धरूप शील सयमादिक परि- णामों को ही सम्बर निर्जरा रूप मान मोक्ष का कारण मान बैठते हैं । द्रव्यलिङ्गी मुनि पाप रूप क्रियाओं से तो बेशक चिरक्त हो जाते है, परन्तु पुण्य में ही उपादेय वृद्धि कर परिणमन किया करते हैं । इस लिये उनके यथार्थ तत्वार्थ श्रद्धान नहीं है। इस प्रकार तत्वार्थ श्रद्धानरूप सम्यक् दर्शन का ही अङ्गीकार करनाजरूरी है।

( ३२ )
सम्यक्त के अष्ट अङ्ग
आगे सम्यक्त के आठ अङ्गो का वर्णन करते हैं।
सकलमनेकान्तात्मकमिदमुक्तं वस्तुजातमखिलज्ञैः ।
किमुसत्यमसत्यंवा न जातु शङ्केति कर्तव्या ॥ २३ ॥
१-निःशङ्कित,२-निःकांक्षित,३-निर्विचिकित्सा, ४-अमूढ दृष्टि,५-उपग्रहण,
६-स्थितिकरण,और ७-प्रभावना । ये आठ अङ्ग सम्यक् दर्शन के हैं।
शङ्का अर्थात भय से रहित जो आत्मा का परिणाम वही निःशङ्कित
भाव कहलाता है । सर्वज्ञ देव ने समस्त जीवादिक पदार्थों का समूह अनेक
स्वभाव रूप कहा है, सो क्या यह सत्य है ? या असत्य है ? इस प्रकार की
शंका कभी भी नहीं करनी चाहिये । जिनेन्द्र भगवान अन्यथा वादी नहीं
है,इस लिये जिन प्रणीत पदार्थों में सन्देह नहीं करना,इसको भी निःशक्षित
अङ्ग कहते हैं । “सम्यक दृष्टि को कोई भी भय छुने तक नहीं पाता-भय
तो मिथ्या दृष्टि को ही हुआ करता है । मिथ्या दृष्टि कर्म जनित शरीरादिक
पर्यायों को ही आत्मतत्व समझ बैठते हैं, उन्हें ही मरने जीने आदि के भय
हुआ करते हैं। जो जीव भय सहित पराधीन होते हैं,वह आत्मानुभव से
गिरे हुए होते हैं; जो स्वस्थ हैं वह आत्मानुभव शील होते हैं और उनको
किसी प्रकार का भी भय होना असंभव होता है" (पञ्चाध्यायी भाषा
टीका से उद्धृत)। जिनके स्वानुभव होता है,उन्हें भय नहीं लगता। सम्यक्
दृष्टि स्वानुभवी होने के कारण निःशङ्क होता है । इसी लिये वह शङ्का
रहित अर्थात् भय रहित ही होता है उसके नीचे लिखे सात प्रकार के
भय नहीं होते-१-इस लोक भय,२-परलोक भय,३-वेदनाभय,४-अरक्षा
भय,५-अगुप्ति भय, ६-मरण भय, ७-आकस्मिक भय ।
इह जन्मनि विभवादीनमुत्र चकित्व केशवत्वादीन ।
एकान्तवादपितपरसमयानपि च न काक्षेत् ॥२४॥

( ३३ ) नि काक्षित नाम बाञ्छा रहति का है । सम्यक् दृष्टि जीव इस लोक सम्बन्धी पुण्य के फल, ऐश्वर्य,सम्पदा, पुत्रादिक,और परलोक सम्बन्धी पुण्य के फल चक्रवर्ति, नारायण, इन्द्रादिक पर्दो की बाञ्छा नहीं करता है, क्यों कि वह पुण्य के फल रूप इन्द्रियों के विषय भोगों को आकुलता के निमित्त से दुख रूप ही जानता है । सम्यक्-दृष्टि, एकान्त-बादी अन्य धर्मों को भी ग्रहण करने की बाछा नहीं करता है । इस का नाम निःकांक्षित अङ्ग है। क्षुत्तृष्णाशीतोष्णप्रभृतिषु नानाविधेषु भावेषु । द्रव्येषु पुरीपादिषु विचिकित्सा नैवकरणीया ॥२५॥ विचिकित्सा नाम " न सुहावने" अथवा ग्लानि का है । ग्लानि रहित होने का नाम निर्विचिकित्सा है । पाप कर्म के उदय से दु.खदायक भावों का सयोग होने पर उद्वेग रूप नहीं होना चाहिये, क्योंकि कर्म उदय आधीन कार्य अपने बस का नहीं होता है, और उस उदयाधीन दुःख से अमूर्तीक आत्मा का घात भी नहीं होता है । विष्टादिक निन्द्य वस्तुओं से भी ग्लानि नहीं करनी चाहिये, क्योंकि उन का स्वभाव ही ऐसा है, हमें उस से क्या? जिस शरीर में हमाराज्योति स्वरूपी आत्मा तिष्टता है, वह तो और भी निन्द्य है। "निर्विचिकित्सा गुण का पालन करने वाला अपने में अधिक गुण समझ कर, अपनी प्रशंसा नहीं करता, दूसरों की हीनता सिद्ध करने की बुद्धि नहीं रखता, जो पुरुष खोटे कर्म के उदय से दुखी हो रहा है, और तीन असातावेदनीय कर्म के उदय के कारण निन्द्य स्थान बन रहा है, ऐसे पुरुष के विषय में सम्यक्-दृष्टि अपने चित्त में अदया बुद्धि नहीं होने देता। वह कभी ऐसा अज्ञान रूप विचार नहीं करता, कि मैं सम्पचियों का घर हूँ, यह बेचारादीन विपचियों का घर है मेरे समान यह नहीं हो सकता।"

( ३४ )
पञ्चाध्यायी भाषा टीका) वह विचारता है कि संसारी जीवों में जो भेद
हैं, वह सब कर्म कृत हैं, परन्तु वास्तव में सब हीआत्मायें समान हैं । इस
प्रकार भृख, प्यास, जाड़ा, गर्मी आदि नाना प्रकार के दुःखदायी भावों में
अथवा दीन दुःखी जीवों में या विष्टादिक निन्द्य पदार्थों में ग्लानिन करने
का नाम निर्विचिकित्सा है।
लोके शास्त्राभासे समयाभासे च देवताभासे।
नित्यमपि तत्त्वरचिना कर्तव्यममूढदृष्टित्वम् ॥२६॥
लोक में अनेक जीव विपरीत भाव रूप प्रवृत्ति करते हैं, सम्यक्
दृष्टि को उन की देखा देखी कभी भी प्रवृत्ति नहीं करना चाहिये, ज्ञान
पूर्वक विचार कर ही कार्य करना चाहिये । अन्य मतावलम्बियों द्वारा रचित
कल्पित ग्रन्थ जो सच्चे ग्रन्थ से जचे, अन्य कल्पित मत, किसी एक खास
क्रिया के भली सी दिखाई देने के कारण, सच्चे सरीखे मालूम हो । अन्य
वादियों द्वारा कथित झूठे तत्व किसी खास युक्ति सी को देखने के कारण
सत्य रूप प्रतीत होते हो । अन्य झुठे देव किंचित चमत्कारादि दिखाने
के कारण, सच्चे देव समान मालूम हो । विषयक, पापों का लंपटी,दुर्भेषी,
साधु अपने किसी चमत्कार के कारण, सच्चे गुरु जैसा प्रतिभासे, तो उन
के धोखे में आकर उन में श्रद्धा नहीं करनी चाहिये, और न उन के प्रति
विनय रूप प्रवृत्ति करना चाहिये । सम्यक् दृष्टि को ज्ञान से भ्रष्ट होने के
कारणों से सदैव खबरदार रहना ही उचित है । सारांश यह है कि सम्यक्
दृष्टि भय से, आशा से, प्रेम से, लोभ से, किसी प्रकार भी कुदेव, कुगुरु
और कुधर्म को प्रणाम तथा उनकी विनय नहीं करता । इसी का नाम
अमूढ दृष्टित्व अङ्ग है।
धर्मोऽभिवर्द्धनीयः सदात्मनो मार्दवादि भावनया।
परदोषनिगृहनमपि विधेयमुपबृंहणगुणार्थम् ॥२७॥

. उपव्रहण का अर्थ है वढाना, अपनी आत्मा के धर्म बढाने, तथा अपनी आत्मिक शक्ति के बढाने और उसके प्रकाश करने का नाम उपव्रहण है। उत्तम क्षमा, मार्दवादि भावों द्वारा आत्मा के शुद्ध स्वभाव का बढाना सम्यक् दृष्टि का परम कर्तव्य है। इसी अङ्गको उपगृहन अङ्ग भी कहते हैं, उपगृहन का अर्थ है ढाकना । परायेदोषों को ढांकना उपगृहन अङ्ग है,दूसरे के दोप प्रकट करने से उस की आत्माको बडा सताप तथा क्लेश होता है, उससे हिंसा होती है । सम्यक् दृष्टि दूसरों के दोषों को प्रगट नहीं करता। कामक्रोधमदादिपु चलयितुमुदितेपु वर्त्मनोन्यायात् । श्रुतमात्मन परस्य च युक्त्या स्थितिकरणमपि कार्यम् ॥२८॥ धर्म से जो पतित हो चुका है, या जो भ्रष्ट होने वाला है, उसे जैसे तैसे कर के धर्म में दृढ करने को स्थिति-करण कहते हैं। काम, क्रोध, मद, लोभादिक कपाय भानों के निमित्त से यदि अपने परिणाम भ्रष्ट होते हो तो अपने को, और यदि दूसरों के भ्रष्ट होते हों तो दूसरों को युक्ति पूर्वक, जैम बने, तैसे धर्म में दृढ करना, सम्यक् दृष्टि का परम कर्तव्य है। और यही वास्तविक स्थिति करण है “सम्यक् दृष्टि स्वोपकार पूर्वक ही परोपकार किया करता है, और यही ठीक है। वह बिना किसी प्रकार की इच्छा रखते हुए, धार्मिक बुद्धि से ही परोकार किया करता है,क्योंकि जो परोपकार, लोभ कपाय वश, अथवा मान प्रतिष्ठा की चाह से किया जाता है, वह अनुग्रह अवश्य है, परन्तु वह सत अनुग्रह नहीं कहा जा सकता, नि स्पृह वृत्तियों का ही अनुग्रह प्रशसनीय कहाजा सकता है। सच्चा अनुग्रह यह ही है, कि जो पद से भ्रष्ट हो चुके हों,उन्हें उसी पद में फिर स्थापन कर दिया जावे । धर्म का आदेश और धर्म का उपदेश देकर ही दूसरोंपर अनुग्रह करना उचित है, अपने व्रतों में किसी प्रकार की बाधा न पहुंचा कर दूसरों के रक्षण में तत्पर रहना उचित है। सब से प्रथम आत्महित करना चाहिये, , अपना आत्महित करते हुए जो परहित करने में समर्थ हैं,उन्हें परहित अवश्य ही करना चाहिये । आत्महित ही मुख्य कर्तव्य है उस को न भूलना चाहिये।आचार्य यद्यपि मुनियों का हित करते हैं, उन्हें मोक्ष मार्ग पर लगाते हैं, तथापि उस अवस्था में रह कर वह उच्च-ध्येय को प्राप्त नहीं कर सकते। जिस समय वे उच्च-ध्येय मुक्ति को प्राप्त करना चाहते हैं,वह आचार्य पद का त्यागकर स्वात्म भावनामात्र,साधुपद में आ जाता है। इस लिये यह ठीक है कि आत्महित ही मुख्य कर्तव्य है। यहां कोई कहे कि आत्महित,परोपकार के मुकाबले में स्वार्थ है,उत्तर यह है-आत्महित स्थार्थ में शामिल नहीं है, जो प्रयत्न संसारिक वासनाओं की पूर्ति के लिये किया जाता है,वही स्वार्थ कहलाता है । कारण यही है कि स्वार्थ उसे ही कह सकते हैं, जो प्रमाद विशिष्ट है । आत्महित करने वाला प्रमाद विशिष्ट है, इस लिये उसे स्वार्थ कहना भूल है । इस से कोई यह न समझे कि परोपकार का निषेध किया जाता है । परोपकार का करना तो महापुण्य बन्ध का कारण है; परन्तु जो लोग परोपकार करते हुए स्वयम् भ्रष्ट हो जाते हैं, अथवा आत्महित को स्वार्थ बताते हैं, वे अवश्य आत्महित से कोसों दूर हैं। आचार्यों ने परोपकार को भी स्वार्थ साधन ही बतलाया है । यहाँ पर फिर यह प्रश्न होता है, कि कहीं अवसर आने पर परोपकारार्थ स्वयं भ्रष्ट भी होना पड़ता है, जैसे विष्णुकुमार मुनि ने सात सौ मुनियों की रक्षा के निमिच अपने पद को छोड़ ही दिया । यह शंका ठीक है, कहीं पर विशेष हानि देख कर ऐसा भी किया जाता है । परन्तु आत्महित को गौण कहीं नहीं समझा जाता है, विष्णुकुमार स्वामी ने यद्यपि ऐसा किया, तथापि फिर उन्होंने शीघ्र ही प्रायश्चित्त लेकर स्वपद को ग्रहण कर लिया"। (पञ्चाध्यायी गाथा ८०३- ८०५ भाषा टीका) इस से सिद्ध होता है कि आत्महित करना ही जीवका परम कर्तव्य है,परोपकार अवश्य करना चाहिये, परन्तु परोपकार के समय , निज पद को भुलाना उचित नहीं है । स्वामी समन्तभद्राचार्य अथवा स्वामी विष्णुकुमार के सदृश यदि किसी अनिवार्य कारणवश किसी समय, परो- पकार के निमित्त भ्रष्ट होना भी पड जावे, तो कार्य सफल होने के बाद, प्रायश्चित पूर्वक निजपद को अवश्य ही ग्रहण कर लेना चाहिये, सारांश यह है कि परोपकार करते समय,आत्मिक कल्याण को कभी भी बिसारना नहीं चाहिये । जो परोपकार स्वधर्म स्थिरतातथा चारित्र दृढतापूर्वक होता है, वह स्वोपकार में भी पूर्णतया सहायक होता है । अनवरतमहिसायां शिवसुखलक्ष्मी निबन्धने धर्मे । सर्वेष्वपि च सधर्मिषु परमवात्सल्यमालम्व्यम् ॥२९॥ गौ बच्छे की सी प्रीति करने को वात्सल्य कहते हैं। जैसे गौ बच्छे के प्रेम से खिंच कर अपने प्राणों का नाश होने का भय होने पर भी सिंह के सन्मुख चली जाती है, और ऐसा विचार करती है, कि मेरे भक्षण करने से यदि वच्छे का भला हो जावे तो अच्छा है। ठीक उसी प्रकार सम्यक दृष्टि धर्म तथा धर्मात्माओं में ऐसी ही परम प्रीति रखता है, और तन,मन, धन आदिक अपना सर्वस्व अर्पण कर के वात्सल्य का पालन करता है। जब तक वह अपनी समर्थ देखता है, वह धर्म तथा धर्मात्माओं पर आई हुई किसी बाधा को मी सहन नहीं कर सकता है। हर प्रकार से जैसे भी बन सकता है, वह उन की बाधा तथा उपसर्ग को दूर करने का भरसक प्रयत्न करता है । यह परात्म सबन्धी वात्सल्य है । परीपह और उपसर्गादि से पीड़ित होने पर भी अपने श्रेष्ठ आचरण में, ज्ञान में, ध्यान में शिथिलता नहीं आने देने का नाम स्वात्म वात्सल्य है । आत्माप्रभावनीयो रत्नमयतेजसा सततमेव । दानतपोजिनपूजा विद्यातिशयैश्च जिनधर्म ॥३०॥ धार्मिक कार्यों में उन्नति करने का नाम प्रभावना है। अपनी आत्मा ( ३८ ) तथा जिन धर्म की अतिशय को प्रगट करने को भी प्रभावना कहत हैं। प्रभावना दो प्रकार की होती है। (१) स्वात्म प्रभावना। (२) परात्म प्रभा- वना ( वाह्य प्रभावना)। इन में स्वात्म प्रभावना सर्वोत्तम और उपादेय है, दूसरी भी ग्रहण करने योग्य है । अपनी आत्म की अतिशय तो रत्नत्रय धर्म के प्रताप के बढ़ाने से प्रगट होती है। रत्नत्रय धर्म के पालन करने से आत्मा नित प्रति अधिक अधिक शुद्ध होता चला जाता है। अन्त में कर्म रूपी शत्रु का नाश कर, परम शुद्धता को प्राप्त कर लेता है । यह ही वास्त- विक स्वात्म प्रभावना है । जिन धर्म का अतिशय आहार दान,औषधि दान, अभय दान, विद्या दान देने से,घोर तपश्चरण करने से,भगवत् का बड़े हर्ष तथा उत्साह पूर्वक पूजन अभिषेक आदि करने से,धर्म तत्व प्रचार करने से बढ़ता है । इस प्रकार जैनधर्म के अतिशय के बढ़ाने को बाह्य प्रभावना कहते हैं । श्री समन्तभद्राचार्य ने कहा है- अज्ञानतिमिर व्याप्तिमपाकृत्ययथायथम् । जिनशासनमाहात्म्य प्रकाशः स्यात्प्रभावना ।। अर्थात् जगत् के जीवों का अज्ञान अन्धकार जिस प्रकार हो सके दूर कर के, उन में जिन शासन के माहात्म्य का प्रकाश करना अर्थात् उन को सम्यक् ज्ञानी बनाना सच्ची प्रभावना है। सम्यक् दृष्टि इन आठों अङ्गों का पालन करता है। सम्यक् दृष्टि २५ दोषों से सर्वथा रहित होता है । उपयुक्त आठ गुणों के उलटे रूप शङ्कादि आठ दोष हैं, जो २५ दोषों में गर्भित हैं । सम्यक् दृष्टि के नीचे लिखे आठ प्रकार के मद भी नहीं होते । १-कुलमद (पिता के पक्ष का मद)। २-जाति मद (माता के पक्ष का मद)।३-रूप मद। ४-ज्ञान मद। ५-धन मद ।६-बल मद। ७-तप मद । ८ प्रभुता मद, अर्थात् ऐश्वर्य मद। ये आठ प्रकार के मद सम्यक्त को मलीन करते हैं। छह अनायतन खोटे गुरु, खोटे देव, खोटे धर्म और इन तीनों के सेवक यह छह आयतन नहीं हैं। इन की प्रशसा नहीं करनी चाहिये, और न इन की सगति करनी चाहिये। यदि प्रशसा करे तो यह ही छह दोष हो जाते हैं। तीन मूढता हैं-देव मूढता, गुरु मूढता, लोक मूढता। देव मूढता-वीतरागी, सर्वज्ञ, हितोपदेशी देव को छोड कर रागीपी पाखडी देव को नमस्कार करना । गुरु मृढता- निग्रन्थ गुरु को छोड कर पाखंडी, वेषधारी इन्द्रिय विषय लम्पटी, धूर्त गुरुओं को नमस्कार करना । लोक मृढता-खोटे शास्त्र और खोटे धर्म को नमरकार करना, और खोटी क्रियाओं को जोधर्म नहीं हैं,उनको धर्म मान लेना,जैसे-दशहरे पर दवात कलम पूजना, दिवाली पर रुपया पैसे आदि का पूजन करना आदि । सम्यक् दृष्टि इन उपर्युक्त शङ्कादिक ८ दोप, ८ मद, ६ अनायतन, और ३ मूढता, कुल २५ दोषों को दूर कर अष्टाङ्ग सम्यक् दर्शन को ही ग्रहण करता है । सम्यक् दृष्टि में प्रशम,सवेग,अनु- कम्पा और आस्तिक्य जो सम्यक्त के बाह्य लक्षण हैं,अवश्य ही पाये जाते हैं। प्रशम शान्त भाव को, सवेग ससार शरीर भोगों से उदासीनता को, अनुकम्पा दया को,और आस्तिक्य,धर्म तथातत्वों की दृढ श्रद्धा को कहते हैं। आगे सम्यक् दर्शन के ५ अतिचार बतलाते हैं, परन्तु उनका वर्णन करने से पहले यह बता देना जरूरी है कि अतिचार कहते किसे हैं। अति- क्रम-मन की शुद्धि में क्षति होना, मन में विकार भाव होना अतिक्रम है। व्यतिक्रम शील वृत्ति का अर्थात् वतचर्या का उल्लघन करना व्यतिक्रम है। अर्थात् बत के खण्डन का भाव मात्र होना व्यतिक्रम है । अतिचार व्रतों की ओट रखते हुए, चारित्र में आलस्य अर्थात् शिथिलता होने को अतिचार कहते है, अर्थात् कारण वश मन में ग्लानि रखते हुए किसीव्रत के प्रतिकूल किसी अश में प्रवृत्ति कर लेनाअतिचार है । अनाचार-सर्वथा बत भङ्ग कर देने को, अर्थात् व्रत के तोड़ देने को अनाचार कहते हैं।

(४०) मन, वचन, काय तीनों से व्रत भंग का नाम अनाचार है। सम्यक् दर्शन के ५ अतिचार १-शङ्का-जिनेन्द्र प्रणीत तत्वों में संशय करना।२-कासा-इस लोक, परलोक सम्वन्धी भोगों की वाञ्छा करनी।३-विचिकित्सा-अनिष्ट तथा दुर्गन्धित वस्तुओं को तथा दुःखी, अनाथ, रोगी प्राणियों को देख कर उन से ग्लानि करना।४-अन्य दृष्टि संस्तव-मिथ्या दृष्टि पाखंडियों की तथा उन के मिथ्या धर्म की स्तुति करनी। ५-अन्य दृष्टि प्रशंसा-अपने मन द्वारा मिथ्या दृष्टि पाखण्डियों की, मिथ्यात्व क्रियाओं की सराहना करना या उन की मिथ्यात्व क्रियाओं को अच्छा जानना । पहले सम्यक् दर्शन के आठ दोषों का वर्णन कर चुके हैं, यहाँ प्रश्न होताहै कि पांच अतिचार क्यों कहे?आठ क्यों न कहे?विचार पूर्वक देखने पर मालुम होगा, कि वाकी के सब दोष इन ही पाचों में गर्भित हो जाते हैं। सम्यक् दर्शन का पालन २५ दोष वचा कर, पांचों अतिचाररहित, निर्मलता से करना चाहिये । सम्यक् दर्शन धर्मरूपी वृक्ष की जड़ है, मोक्ष महल की पहली सीढ़ी है। इस के विना ज्ञान और चारित्र सम्यक्पने को प्राप्त नहीं होते । इस लिये, भव्य जीवों को उचित है, कि जिस प्रकार वने सात तत्वों के वास्तविक स्वरूप को समझ कर सम्यक् दर्शन रूपी रत्न से अपने आत्मा को भूषित करें। सम्यक् ज्ञान इत्याश्रित सम्यक्त्वैः सम्यग्ज्ञानं निरुप्य यत्नेन । आम्नाययुक्तियोगैः समुपास्यं नित्यमात्महितैः॥३१॥ पदार्थों का जो स्वरूप जिनागम की परंपरा से मिले, उसे प्रमाण नय पूर्वक अपने उपयोग में निश्चित कर, यथावत् जनना ही सम्यक् नाज्ञ की वास्तविक सेवा है। आगे प्रमाण नय का संक्षेपवर्णन करते हैं। ..- (४१) सम्यक् ज्ञान को ही प्रमाण कहते हैं। पदार्थ के सामान्य तथा विशेष दोनों अशों का एक साथ विषय करने वालाप्रमाण ज्ञान है, ससार में जितने भी पदार्थ पाये जाते हैं, उन सब में सामान्य धर्म और विशेष धर्म दोनों पाये जाते हैं, अर्थात एक वस्तु सामान्य और विशेष रूप है । जैसे एक वाग में पचास वृक्ष कई प्रकार के हैं, उन में वृक्षपना सब में सामान्य है, किन्तु हरएक वृक्ष का आकार, स्वरूप भिन्न भिन्न है यह विशेष है । अस्ति- पना सव द्रव्यों में व्यापक है, उसी में विशेष अस्तित्व जानना, कि यह अमुक है, यह अमुक है, विशेष है । सामान्य और विशेष में यही अन्तर है, कि सामान्य ज्यादह वस्तुओं में रहता है, और विशेष बहुत वस्तुओं में न रह कर खास खास वस्तुओं में जुदा जुदा रहता है। प्रमाण वस्तु के सब धर्मों का विषय करता है, इस के मुख्य भेद दो हैं-प्रत्यक्ष और परोक्ष । जिस ज्ञान में इन्द्रिय और मन की सहायता न लेनी पड़े वह प्रत्यक्ष है। और जो ज्ञान इन्द्रिय और मन की सहायता लेवे वह परोक्ष है। प्रत्यक्ष प्रमाण के भी दो भेद हैं-१-पारमार्थिक प्रत्यक्ष और २- साव्यवहारिक प्रत्यक्ष | जो ज्ञान केवल आत्मा ही के आधीन रह कर अर्थात जो इन्द्रियों की सहायता के बिना, जितना अपना विषय है, उस को विशुद्धता पूर्वक स्पष्ट जाने, वह पारमार्थिक प्रत्यक्ष है । और जोनेना- दिक इन्द्रियों से वर्णादिकों को साक्षात् ग्रहण काल में जाने, वह साव्य- वहारिक प्रत्यक्ष है । यह वास्तव में परोक्षप्रमाण ही है। पारमार्थिक प्रत्यक्ष के भी दो भेद है-१-देश पारमार्थिक और २-सर्व देश पारमार्थिक । अवधि ज्ञान और मन पर्याय ज्ञान तो एक देशपारमार्थिक प्रत्यक्ष है, और केवल ज्ञान सर्व-देश पारमार्थिक प्रत्यक्ष है । एक देश प्रत्यक्ष ज्ञान तो अवधि ज्ञानावरण कर्म अथवा मन पर्याय ज्ञानावरण के क्षयोपशम से होता है और सर्व प्रत्यक्ष अर्थात केवल ज्ञान, जोस्वाभाविक ज्ञान है,केवल - ( ४२ ) ज्ञानावरणीय कर्म के क्षय से प्रगट होता है। सांव्यवहारिक प्रत्यक्ष-यह ज्ञान व्यवहार दृष्टि से ही प्रत्यक्ष कह दिया गया है, परमार्थ दृष्टि से तो परोक्ष ही है, क्योंकि इस के द्वारा स्पष्ट ज्ञान नहीं होता। जैसे आँख से किसी वस्तु के देखते ही ज्ञान हुआ कि यह वस्तु सफेद है । उस वस्तु मलिनता का भी मिलाप है,जो साफ साफ नहीं मालूम हो सका कि कितने अंश सफेदी है और कितने अंश मलिनता है । इस लिये यह व्यवहार मात्र प्रत्यक्ष है । वास्तव में आचार्य इसे परोक्ष ही कहते हैं क्योंकि यह इन्द्रियों से होता है। परोक्ष प्रमाण-मतिज्ञान और श्रुत ज्ञान द्वारा जो जाना जाता है, वह सब परोक्ष प्रमाण कहलाता है। पांचों इन्द्रियों तथा मन इन छहों में से किसी एक इन्द्रिय द्वारा एक समय में किसी पदार्थ का सीधा जानना मति ज्ञान है, जैसे स्पर्श से शीत, उप्ण,चिकने, रूखे,नर्म, कठोर, हलके, भारी पदार्थ को जानना, रसना से खट्टे, मीठे, तीखे, चरपरे व कषायले पदार्थ को, घ्राण से सुगन्ध दुर्गन्ध को, चक्षु से सफेद, लाल, काले, नीले, पीले, पदार्थ को, कान से नाना प्रकार के शब्दों को सीधा जानना, व मन द्वारा एकाएक किसी पदार्थ को जान लेना मति ज्ञान है। मतिज्ञान से जाने हुए पदार्थ के सम्बन्ध से दूसरे पदार्थ को या विषय को जानना श्रुतज्ञान है । जैसे किसी को कुल्हाड़ी का स्पर्श हुआ, तब कठोरता का ज्ञान मति ज्ञान है, पश्चात उस से दुःख अनुभव करना श्रुत ज्ञान है। यह अनक्षरात्मक श्रुत ज्ञान है । कर्ण द्वारा शब्द सुन कर उस के अर्थ को समझना अक्षरात्मक श्रुत ज्ञान है। यह सैनी पंचेन्द्रीय के ही होता है, जैसे जीव शब्द सुन कर जीव द्रव्य का ज्ञान कर लेना । अनक्षरात्मक श्रुत ज्ञान सब जीवों के होता है। परोक्ष प्रमाण के पांच भेद हैं १-स्मृति, २-प्रत्यभि ज्ञान, ३- ।

. (४३) तर्क, ४-अनुमान और ५-आगम । स्मृति-जो पदार्थ पहले जाना था, बाद में किसी समय में उसे मात्र स्मरण करना अर्थात याद करना। इसे स्मृति कहते हैं जैसे किसी पुरुष को पहले देखाथा, उसे फिर याद किया । प्रत्यभिज्ञान | जिस किसी पदार्थ को पहले स्पर्शा, चाखा, सुंघा, देखा व सुना था उसी को फिर स्पर्श कर के,चाख कर के,सूघ कर के,देख कर के सुन कर के, यह निश्चय करना कि यह तो वही पदार्थ है, जिसे पहले स्पर्शा, चाखा, सूघा, देखा, सुना था । जैसे पहले किसी ने सुना था कि "गवय" जानवर गाय जैसा होता है, फिर कभी वह बन में गया और उसने उस “गवय" जानवर को देखा, तो जान लिया कि जिस गाय जैसे जानवर "गवय" की बाबत पहले सुना था, यह वही है । इस प्रकार के जान को प्रत्यभिज्ञान कहते हैं। ३-तर्क-व्याप्ति ज्ञान को तर्क कहते है। "होने पर होना, न होने पर न होना" अर्थात् एक के बिना एक न हो, इसे व्याप्ति कहते हैं-जैसे अग्नि विन धुऑ नहीं रहता । आत्मा के बिना चेतनता नहीं रहती। इसीव्याप्ति के जानने कोतर्क कहते हैं।४-अनुमान- किसी चिन्ह से पदार्थ के खास स्थान पर होने का निश्चय कर लेने को अनुमान कहते हैं जैसे किसी पर्वत के ऊपर धूये को देख कर यह निश्चय करना कि पर्वत पर अग्निहै।५-आप्त वचनों के निमित्त से पदार्थ के निश्चय करने को आगम कहते हैं, जैसे शास्त्रों से लोकादि का स्परूप जानना । प्रमाण प्रत्यक्ष परोक्ष पारमार्थिक सांध्ययहारिक मतिमान आगम ग्रुतमान प्रयदेश मपदेश स्मृति प्रत्यमिधान तक अनुमान भरधियान मनपययमान बेपरज्ञान अक्षरात्मक अनक्षरात्मर (४४ ) प्रमाण के अंश को नय कहते हैं। प्रमाण द्वारा जो पदार्थ ग्रहण किया था, उसके एक एक धर्म को मुख्यता से जो अनुभवन कराता है,वह नय कह- लाता है । नय के दो भेद हैं-द्रव्यार्थिकनय और पार्थिकनय । द्रव्यार्थिक-जो द्रव्य की मुख्यता से पदार्थ का अनुभव कराती है । अर्थात् केवल द्रव्य ही मुख्यता से जिस नय का विषय है,वह द्रव्या- र्थिकनय कहलाती है-जैसे “संसारी जीव सिद्ध भगवान् के समान शुद्ध आत्मा है" ऐसा कहना शुद्ध द्रव्यार्थिक नय का विषय है । द्रव्य नित्य है, द्रव्य सत् है, द्रव्य अभेद है, यह सब द्रव्यार्थिक नय केही विषय हैं। इस द्रव्यार्थिक नय के ३ भेद हैं। नैगम, संग्रह और व्यवहार । नैगम-संकल्पमात्र से ग्रहण करने को नैगम कहते हैं; जो संकल्प- मात्र किसी पदार्थ को बतावे वह नैगम नय है । जितने द्रव्य हैं, वे अपनी भूत, भविष्यत ,वर्तमान पर्यायों से अन्वयरूप अर्थात् जोड़ रूप है। अपनी किसी भी पर्याय से कोई पदार्थ भिन्न नहीं है । सो भूत पर्यायों का तथा भविष्य पर्यायों का वर्तमान काल में संकल्प करना-ऐसे ज्ञान को तथा वचन को नैगम नय कहते हैं । जैसे कोई पुरुष मेज बनाने को लकड़ी लाने के लिये जा रहा था, उससे किसी ने पूछा, कहाँ जा रहे हो ? उसने कहा मेज़ के लिये जा रहा हूँ। अब जहाँ वह जा रहा है, वहाँ उसको मेज़ नहीं मिलेगी, लकड़ी ही मिलेगी; मेज़ तो अभी तय्यार भी नहीं हुई। वह केवल मात्र लकड़ी लाने के लिये ही जा रहा है; परन्तु यह उसके विचार में ज़रूर है कि लकड़ी लाकर मेज़ बनावे । नैगम नय से वह यह कह सकता है, कि मेज़ के लिये जा रहा हूँ। दीवाली के दिन यह कहना कि श्री महावीर प्रभु आज मोक्ष पधारे हैं, यह भूत नैगम नय का उदाहरण है। बालावस्था में ही तीर्थकर प्रभु को कहना कि आप तारनतरन हैं; तारन तरनतोअरहन्त अवस्था में होंगे,इस समय तो नहीं परन्तु भावि नैगम . नय से कह सकते हैं । यह भावि नैगम नय का उदाहरण है । संग्रहनय- जो एक वस्तु की समस्त जाति को व उसको समस्त पर्यायों को सग्रहरूप करके एक स्वरूप कहे, उसको सग्रहनय कहते हैं । जैसे “घट" कहने से सघ घटों को समझना | "द्रव्य"मात्र कह देने से जीव अजीवादिक सब ही छहों द्रव्यों को जान लेना। और भी जैसे “गाय दूध देती है' इस से यह जान लेना कि सब ही गाय दूध देती हैं । व्यवहार नय-सामान्यरूप से कहे हुए पदार्थ को, विधिपूर्वक भेदानुभेद कर विशेषरूप कहना, व्यवहार नय है । व्यवहार नय का विषय,सग्रह नय द्वारा ग्रहण किये हुए पदार्थों को भेद रूप जानना है । व्यवहार नय से ही यह जाना जाता है कि द्रव्य अनन्त गुणों तथा पर्यायों का समुदाय है । पदार्थों का स्वरूप समझने के लिये व्यवहार नय का ज्ञान आवश्यक है। उदाहरण केवल मात्र "द्रव्य" कह देने से द्रव्यों का सामान्य रूप से ही ज्ञान होता है, परन्तु जब यह कहते हैं कि द्रव्य के मुख्य दो भेद हैं, जीव और अजीव । जीव दो प्रकार के होते हैं, समारी और मुक्त । ससारी जीवों के भी और भेदानुभेद कर के कहना । इसी प्रकार यह कहना कि अजीव पाँच प्रकार है,पुद्गल,धर्म, अधर्म, आकाश और काल । फिर आगे इन काऔर विशेष कथन करना यह सर व्यवहार नय का विषय है। २-पर्थिक नय-जो नय द्रव्य दृष्टि से स्वरूप को गौण कर, पर्याय की ही मुख्यता से पदार्थ का ज्ञान करावे, उसे पर्यायार्थिक नय कहते हैं। जैसे यह कहना कि क्रोध भाव क्षणिक है, ज्ञान आत्मा का एक गुण है पर्यायाथिक नय के ४ भेद हैं,ऋजुसुत्र, शब्द, समभिरूढ, एवभृत,ऋजुसूत्र नय-जो नय भूत, भविष्यत् पर्यायों को छोड़ कर वर्तमान पर्याय को ही ग्रहण करता है, उमे ऋजुसुत्र नय कहते हैं । यह नय वर्तमान समय मात्र की पर्याय को ही ग्रहण करती है-जैसे देव को देव कहना, मनुष्य को में ( ४६ ) मनुष्य कहना । यह स्थूल पर्याय का उदाहरण है । सुक्ष्म समयवर्ती पर्याय का कथन करना बाणी से असंभव है, क्योंकि हम जब कहने लगेंगे तब उस में बहुत से समय बीत जावेंगे, और तब तक हम जिस वर्तमान अवस्था को कहेंगे वह उस समय में भूतकालीन हो जावेगी। शब्द नय-व्याकरण आदि मत से शब्द की अशुद्धताई के दूर करने को शब्द नय कहते हैं । अर्थात जो नय व्याकरण सम्बन्धी लिङ्ग, संख्या, साधन, काल आदिक के दोषों को दूर कर के जान वा कहे, उसे शब्द कहते हैं-जैसे नक्षत्र पदार्थ के लिये संस्कृत व्याकरण में तीन शब्द हैं-पुप्यः (पुल्लिङ्ग), तारका (स्त्री लिंग) नक्षत्रम् (नपुं० लिंग)। इन तीनों शब्दों के लिङ्ग भिन्न भिन्न हैं । एक ही पदार्थ के लिये तीन विरोधी लिङ्गों का व्यवहार विरोध रूप या दोष रूप नहीं गिना जावेगा। इसी प्रकार संख्या आदि के सम्बन्ध भी जानना । समभिरूढ नय-वह है जिस के द्वारा एक शब्द के अनेक अर्थ होने पर भी उस शब्द को एक ही अर्थ के प्रतिपादन में मान लिया जावे, एक शब्द के अनेक अर्थ होते हैं, उन को उल्लंघन कर के एक ही अर्थ को मुख्यता से ग्रहण करना समभिरूढ नय का विषय है। जैसे “गौ” शब्द के अर्थ अनेक हैं, मूल धातु की अपेक्षा "गच्छतीति गौ" इस वाक्य के अनुसार जो चले वही गौ होती है, परन्तु समभिरूढ नय के प्रयोग से बैठी हुई, सूती हुई को भी गौ कह देते हैं । एवंभूत नय-वर्तमान क्रिया जैसी हो उसी के अनुसार वैसा ही कहना, अर्थात् एवंभूत नय वह है जो उसी शब्द को उसी समय उस पदार्थ के लिये व्यवहार करेगी जब कि वह पदार्थ उस शब्द के अर्थ वाचक भाव में क्रिया या परिणमन कर रहा होगा । गो शब्द गौ के लिये समभिरूढ नय से प्रचलित है, परन्तु "गो' शब्द के अर्थ चलने वाले के हैं । एवंभूत नय के अनुसार “गौ" तब ही कहेंगे जब कि वह चल रही होगी, बैठी सोती हुई दशा में उसको (४७ ) "गौ" न कहेंगे। जैसे कोई आदमी पूजा कर रहा है, तो जिस समय वह वास्तव में पूजा कर रहा है उसी समय में उस को पुजारी कहना, अन्य समय में नहीं । इस प्रकार यह कुल सात नय हुई । इन में से नेगम नय, सग्रह नय, व्यवहार नय और ऋजुसूत्र नय तो अर्थ नय कहलाती हैं, और शव्द नय, समभिरूढ नय और एवभूत नय शब्द नय कहलाती हैं। नय द्रव्यार्थिक पर्यायार्थिक नैगम संग्रह व्यवहार ऋजुसून शन्द समभिरुढ पचभूत ४ अर्थ नय ३शन्द नय प्रमाण और नय के सयोग को 'नय प्रमाणाभ्या युक्ति" के अनुसार युक्ति कहते हैं। यहां पर प्रमाण नय का थोडा सा वर्णन इस लिये किया गया है कि प्रमाण नय के बिना पदार्थ के स्वरूप का यथार्थ ज्ञान नहीं होता। "प्रमाण नयैरधिगम" इस सुत्र के अनुसार पदार्थ का यथार्थ ज्ञान प्रमाण और नय से ही होता है। प्रथगाराधनमिष्टदर्शनसहभाविनोपि वोधस्य । लक्षण भेदेन यतो नानात्व सभवत्यनयो ।॥३२॥ सम्यक् ज्ञान सम्यक् दर्शन के साथ ही होता है, तथापि इस का जुदा आराधन करना ही क्ल्याणकारी है, जिस समय आत्मा को सम्यक् दर्शन होता है, उस समय मति ज्ञान और श्रुत ज्ञान तो अवश्य होता ही है, सम्यक् ज्ञान को विशेष कर जुदा आराधन करना इस कारण योग्य है, कि इन दोनों के लक्षण भिन्न भिन्न हैं। सम्यक् दर्शन का लक्षण यथार्थ श्रद्धान है, और सम्यक् ज्ञान का लक्षण यथार्थ जानना है । इस लिये इनका जुदा जुदा आराधन करना कल्याणकारी कहा गया है।

( ४८ ) सम्यकज्ञानं कार्य सम्यकत्वं कारणं वदन्ति जिनाः। ज्ञानाराधनमिष्टं सम्यक्त्वानन्तरं तस्मात् ॥३३॥ जिनेन्द्र देव ने सम्यक् ज्ञान को तो कार्य कहा है, और सम्यक् दर्शन को कारण, इस लिये सम्यक् दर्शन के बाद ही सम्यक् ज्ञान का आराधन करना योग्य है । यद्यपि मति ज्ञान और श्रुति ज्ञान पहले पदार्थों को जानते थे, परन्तु बिना सम्यक्त के उन की संज्ञा कुमति और कुश्रुति ही थी। यद्यपि सम्यक् दर्शन और सम्यक् ज्ञान एक ही समय में होते हैं, तो भी इन में कार्य कारण का भेद है, जैसे- कारणकार्यविधानं समकालं जायमानयोरपि हि । दीपप्रकाशयोरिख सम्यक्त्वज्ञानयोः सुघटम् ॥३४॥ दीपक का जलना और उस का प्रकाश एक ही समय में प्रगट होता है-जब तक दीपक जलता है तब तक ही उस का प्रकाश रहता है । दीपक का जलना कारण है,और प्रकाश कार्य है ठीक इसी प्रकार यद्यपि सम्यक् दर्शन और सम्यक् ज्ञान एक ही समय उत्पन्न होते हैं, तथापि दर्शन, सम्यक् ज्ञान का कारण है, और सम्यक् ज्ञान कार्य है । सम्यक्त से ही ज्ञान सम्यक् ज्ञान कहलाता है । कर्तव्योऽध्यवसाय सदनेकान्तात्मकेपु तत्त्वेषु । संशयविपर्यायानध्यवसायविविक्तमात्मरूपं तत् ॥३५॥ पदार्थ के स्वरूप को यथार्थ जानना सम्यक् ज्ञान कहलाता है, और यह सम्यक् ज्ञान निश्चय नय से आत्मा का निज स्वरूप है, यह सम्यक् ज्ञान-स्व-पर प्रकाशक होता है और हमेशा,संशय,विपर्यय और अनध्यवसाय से रहित होता है। संशय-विरुद्ध दो तर्फा ज्ञान होने को संशय कहते हैं-जैसे रात को किसी को देख कर यह सन्देह करे कि यह मनुष्य है, या खम्भा है, या I . (६) कुछ और है । सीप के टुकडे को देख कर यह सदेह करना कि यह सीप है या चादी, इस प्रकार के निर्णय रहित डावाडाल ज्ञान को सशय ज्ञान कहते हैं। विपर्यय-अन्यथा रूप एक तरफी ज्ञान को विपर्यय कहते हैं, जैसे मनुष्य को खम्भा जान लेना-सीप को सीप न समझ, उस के विपरीत चांदीसमझ लेना, यह विपर्यय ज्ञान है । अनध्यवसाय (विमोह), "कुछ है"केवल इतना ही जानपना होना, और ज्यादह विचार न करना, यह अनध्यवसाय है, जैसे रास्ते में चलते चलते तिनके के सर्श हो जाने पर यह जानना "क्या लगा? कुछ होगा। इस प्रकार विचार रहित ज्ञान अनध्यवसाय कहलाता है। ज्ञान की सत्य, असत्य, उभय और अनुभय, चार परिणति होती हैं। सत्य सम्यक्ज्ञान है, असत्य रिपर्यय ज्ञान है, उभय संशय ज्ञन है और अनुभय अनध्यवसाय है। इन्हीं तीनों भावों से रहित ज्ञान को सम्यक् ज्ञान कहते है। यहा प्रश्न होता है कि सम्यक्ती और मिथ्यात्वी के एकसा जानपना होने पर एक का ज्ञान सम्यक् ज्ञान और एक का मिथ्या ज्ञान क्यों कहलाता है ? उत्तर-सम्यक्ती मूलभूत जीवादिक पदार्थों के वास्तविक स्वरूप को जानने वाला होता है, इस वास्तै अन्य पदार्थ जो उस के जानने में आते हैं, वह उन सब का यथार्थ रूप ही श्रद्धान करता है, इस लिये उसका ज्ञान सम्यक् रूप है । मिथ्यात्वी को मूल पदार्थ की खबर नहीं होती, इस लिए जो पदार्थ उसके जानने में आते हैं, वह उन सब का अयथार्थ ही सावन करता है । इसी कारण उसका ज्ञान मिथ्या रूप होता है । मिथ्या दृष्टि का ज्ञान अनिश्चित होता है, सम्यक् दृष्टि के समान पदार्थों को जानते हुवे भी उस के ज्ञान में पदार्थों के वास्तविक स्वम्प के जानने में कमी रहती है। उसके ज्ञान में तीन विरोध होते हैं, कारण विपर्यय, भेदाभेद विपर्यय और स्वरूप विपर्यय ( ५० ) विरोध रूप होने के कारण ही उस का ज्ञान मिथ्या ज्ञान कहलाता है कारण विपर्यय,भेदाभेद विपर्यय, स्वरूप विपर्यय, इन तीनों का स्वरूप यह है कि जगत में जो पदार्थों की अवस्था बदल रही है, उसमें सच्चा कारण क्या है यह उस मिथ्या दृष्टि को प्रतीत नहीं होता है । वह कभी तो ऐसा मान लेता है कि रूपी जड़ पदार्थों का भी मूल कारण एक अमूर्तिक नित्य ब्रह्म है,कोई ऐसा मानते हैं कि पृथ्वी,जल,अग्नि तथा वायु के परमाणु भी सब अलग अलग हैं, ऐसा नहीं कि ये चार अवस्थाएँ एक पुद्गल द्रव्य की हैं। चारों ही में समान स्पर्श रस गंध वर्ण नहीं है। कोई ऐसा मानते कि यह संसारी जीव भी सव एक परमात्मा ही के अंश हैं। कोई कहते हैं, चेतन अपरिणामी हैं। ये क्रोध,मान, माया, लोभ आदि सब मात्र एक प्रकृति के ही विकार हैं, जीव के भाव नहीं हैं इस, प्रकार तो कारण विपर्यय है । भेदाभेद विपर्यय यह है कि कारण से कार्य को सर्वथा अन्य मानना व सर्वथा अन्य नहीं मानना । वास्तव में उपादान रूप से कारण के समान ही कार्य होता है, इससे तो अभेद है, तथापि पर्याय के बदलने की अपेक्षा कारण से कार्य अन्य है । इस प्रकार भेद अभेद को न समझना, सो भेदाभेद विपर्यय है । स्वरूप विपर्यय यह है कि रूपादिक को निर्विकल्प व ब्रह्मभाव रूप समझना व उनको मात्र ज्ञानरूप समझना इत्यादि। मिथ्या दृष्टि अपने ज्ञान से वस्तु को ठीक जान करके भी उन से संसारिक बन्धरूप अभिप्राय की सिद्धि करता है । मोक्षरूप साध्य की सिद्धि नहीं करता है । इस लिये मिथ्या दृष्टि के तीनों ज्ञान मिथ्या या विपर्यय कहलाते हैं। आगे सम्यक् ज्ञानके अष्ट अंगों का वर्णन करते हैं। ग्रन्थार्थोभयपूर्ण काले विनयेन सोपधानं च । बहुमानेन समन्वितमानन्हवं ज्ञानमाराध्यम् ॥३६॥ १. शब्दाचार-व्याकरण के अनुसार अक्षर पद मात्रादि का शुद्धता ( ५१ ) पूर्वक पठन पाठन करने को शब्दाचार कहते हैं। २ अर्थाचार केवल यथार्थ शुद्ध अर्थ मात्र के निश्चय करने को कहते हैं । ३ उभयाचार- शब्द और अर्थ दोनों के शुद्ध पठन पाठन और धारण करने को कहते हैं। ४ कालाचार-उत्तम योग्य काल में पठन पाठन कर ज्ञान के विचार करने को कालाचार कहते हैं । ५ विनयाचार--शुद्ध जल से हाथ, पांव धोकर शुद्ध निर्मल स्थान में पद्मासन बैठकर नमस्कार पूर्वक शास्त्रादिक के पढने को कहते हैं। ६ उपधानाचार-धारना सहित ज्ञान की आरा- धना करने को कहते हैं जो कुछ पढे उसे भूल न जावे, याद रखें । ७ बहुमानाचार-ज्ञान का, पुस्तक पोथी और पढाने वाले का पूर्ण आदर करने को कहते हैं। ८' आनिन्हवाचार-जिस गुरु से या जिस शास्त्र से ज्ञान प्राप्त करे, उसके न छिपाने को कहते हैं। इन आठों अङ्गों सहित ही सम्यक् ज्ञान अङ्गीकार करना योग्य है। सम्यक् चरित्र विगलितदर्शनमोहै समञ्जसज्ञानविदिततत्त्वार्थे । नित्यमपि नि प्रकम्पैः सम्यचारित्रमालम्व्यम् ।।३७|| सम्यक् दर्शन और सम्यक् ज्ञान की प्राप्ति के पश्चात दृढ चित्त पुरुषों को सम्यक् चरित्र की ही सेवा करनी योग्य है । नहि सम्यग्यपदेश चारित्रमज्ञानपूर्वक लभते । ज्ञानानन्तरमुक्त चारित्राराधन तस्मात् ॥३८॥ यदि पहले सम्यक ज्ञान न हो, और पाप क्रियाओं को त्याग कर चारित्र भार को धारण किया जावे, तो वह चारित्र सम्यक चारित्र नहीं कहलाता।जैसे चिनाजानी औपधि के सेवन करने से मृत्यु होना भी सम्भव है, वैसे ही ज्ञान पिनाचारित्र का सेवन करने से ससार की वृद्धि सम्भव है। जीव रिना मुर्दा शरीर में इन्द्रियों के आकार किसी काम के ( ५२ ) नहीं, उसी प्रकार ज्ञान के बिना, शरीर का भेष, क्रिया काण्ड के साधन शुद्धोपयोग की प्राप्ति नहीं करा सकते, इसी लिए यह जरूरी है कि भेद विज्ञान के पश्चात ही विशेष चारित्र को ग्रहण किया जावे । चारित्रं भवति यतः समस्तसावद्ययोगपरिहरणात् । सकल कपायविमुक्तं विशदमुदासीनमात्मरूपं तत् ॥३९॥ पापयुक्त मन, बचन काय के योगों के त्याग से, सम्पूर्ण कषायों से रहित, तथा निर्मल पर पदार्थों से विरक्तता रूप जो चारित्र होता है, वह आत्मा का निज स्वरूप होता है। समस्त कषायों का अभाव होजाने से यथाख्यात चारित्र होता है । सामायिक चारित्र में यद्यपि सकल चारित्री हुआ था, परन्तु संज्वलन कषाय के कारण मलीनता नहीं गई थी, इस लिए सकल कषायों से रहित होने पर भी यथाख्यात चारित्र नाम पाया, अर्थात चारित्र का जैसा स्वरूप था, वह प्रगट हो गया । प्रश्न- शुभोपयोग रूप भाव चारित्र है या नहीं ? उत्तर शुभोपयोग विशुद्ध परि- णामों से होता है, और विशुद्धता मन्द कषाय को कहते हैं । इस लिए कषायों की हीनता के कारण कथंचित (थोडामा-देश) चारित्र कहलाता है, यदि वह शुद्धोपयोग की भावना सहित पाला जावे । प्रश्न-देव, शास्त्र, शील, तप संयमादिक में अत्यन्त रागरूप प्रवृत्ति करते हुवे मन्द कषाय कैसे कहे जा सकते हैं ? उत्तर-यह शुभ रागरूप प्रवृत्ति है, इस में विषय कषायादि राग की अपेक्षा मन्द कषाय ही हैं, क्योंकि इनके राग में क्रोध, मान, माया तो हैं ही नहीं, रहा प्रीति भाव की अपेक्षा लोभ कषाय सो वह भी संसारीक प्रयोजन युक्त नहीं है, इस लिए लोभ कषाय की भी मन्दता ही ठहरी । इसके सिवाय ज्ञानी जीव राग भावों से प्रेरा हुवा अशुभ राग को छोड़ शुभ राग में प्रवृत्ति करता है। कुछ शुभोपयोग को उपादेयरूप श्रद्धान तो नहीं करता है। इस को तो वह अपने शुद्धोपयोग (५३) रूप चारित्र की मलिनता का कारण जानता है । अशुभोपयोग रूप कपायों की तीव्रता दूर हो जाने की अपेक्षा से ही इसे किसी प्रकार चारित्र कह सकते हैं, वास्तव में तो शुद्धोपयोग ही चारित्र है । चारित्र दो प्रकार का होता है-सफल चारित्र और देश चारित्र । हिंसातोऽनृतवचनात्स्तयादब्रह्मतः परिग्रहत । कायकदेशपिरतेश्चारित्र जायते दिविधम् ॥४०॥ निरत का निवृत्ती भवति यति समयसारभूतोऽयम् । यात्वेकदेशविरतिनिरतस्तस्यामुपासको भवति ॥११॥ सकल चारित्र-हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील, परिग्रह इन पाच पापों के सर्वथा त्याग करने को सकल चारित्र कहते हैं । इस चारित्र का यथार्थत पाल्न शुद्धोपयोग स्वरूप में आचरण करने वाले मुनि ही किया करते हैं । देशचारित्र-हिंसादि पाच पापों के एकोदेश त्याग करने को देश चारित्र कहते हैं । इस चारित्र के उपासक श्रावक होते हैं । आत्मपरिणामहिसनहेतुत्वात्सर्वमेव हिंसैतत् । अनृतवचनादिकेवलमुदाहृत शिष्यवोधाय ॥४२॥ यदि वास्तव में देखा जाये तो यह पाचों पाप हिंसा में ही गर्मित हैं, क्योंकि यह सब आत्मा के शुद्धोपयोग रूप परिणामों के घात का कारण है। इस वास्ते यह पाचों पाप हिंसा के ही भेद हैं, यहा प्रश्न होता है कि यदि ये हिंसा के ही भेद हैं तो और भेद क्यों कहे ? उत्तर यही है कि झूठ, चोरी आदिक भेद केवल मात्र शिष्यों को समझाने के अर्थ उदाहरण के तौर पर ही कहे गये हैं। अन्य पापों में भी आत्मपरिणामों का घात होता है इसलिए हिंसा उन में भी दुर्निमार है।आगे अहिंसा का स्वरूप बताते हैं।

( ५५ )
अहिंसा
यत्खलु कपाययोगात्प्राणानां द्रव्यभावरूपाणाम् ।
व्यपरोपणस्य करणं सुनिश्रिता भवति साहिंसा ॥४३||
निश्चय से कपायरूप परिणमन से, मन,वचन,काय के योगों द्वारा
अपने तथा पर के, भाव और द्रव्य रूप, दो प्रकार के प्राणों का घात
करना हिंसा कहलाता है । जब किसी पुरुप के मन में, या बचन में, या
काय में क्रोधादिक कषाय प्रगट होते हैं, तो उसके अपने शुद्धोपयोगरूप
भाव प्राणों का घात तो पहले हो जाता है । यह हिंसा अपने भाव प्राणों
के घात से हुई-यह पहली हिंसा है। अन्य जीव की हिंमा होवे या न
भी होवे । बाद में यदि कपाय की तीव्रता से. दीर्घ स्वासादिक से, अपने
हाथ पांव आदि से, वह अपने अङ्गों को पीड़ा उपजाता है, या अपघात
द्वारा अपने प्राणों का घात कर डालता है, तो उसके अपने द्रव्य प्राणों
के घात होने से, उसकी द्रव्य हिंसा होती है। यह दूसरी हिंसा है। फिर
यदि कषाय के वशीभूत होकर, वह दूसरे किसी जीव से मर्म भेदी खोटे
वचन कहता है, या उसकी हंसी उड़ाता है, या कोई और ऐसा कार्य
करता है कि जिससे उस दूसरे का अन्तरङ्ग पीड़ित होकर कषाय रूप
परिणमन हो जाता है, तो उस दूसरे के भाव प्राणों का घात होता है ।
यह तीसरी हिंसा है और फिर यदि कपाय और प्रमाद के वश होकर वह उस
दुसरे जीव के शरीर को पीड़ा पहुँचाता है। या उसके अङ्ग आदि छेद
कर उसको प्राणान्त कर देता है, तो दूसरे के द्रव्य प्राणों का घात होता
है। यह चौथी हिंमा है। इस तरह हिंसा के चार भेद हुवे, १- स्वभाव
हिंसा, २-स्वद्रव्य हिंसा, ३-परभाव हिंसा, ४-परद्रव्य हिंसा ।
अप्रादुर्भावः खलु सगादीनां भवत्यहिंसेति ।
तेषामेवोत्पत्तिर्हिसेते जिनागमस्य संक्षेपः॥४॥

( ५५ ) Anima?
जीव के अपने शुद्धोपयोगरूप प्राणों का घात रागादिक अर्थात
(राग, द्वेष, मोह, काम, क्रोध, मान, माया, लोभ, हास्य, भय, शोक,
जुगुप्सा, प्रमाद) भावों से होता है । इस लिये इन रागादिक भावों
का अभाव ही भाव अहिंसा है । रागादिक समस्त विभाव भाव हिंसा के
ही पर्याय हैं । इन विभाव भावों का आत्मा में उत्पत्ति होने का नाम ही
भाव हिंसा है-जैन सिद्धान्त का यही रहस्य है । धर्मका लक्षण अहिंसा
है। रागादिक विभाव भावों का अभाव अहिसा कहलाता है । इसलिए
जिस प्रकार मी बने, और जितना भी बने, रागादिक विभाव भावों का
नाश करना ही धर्म है।
युक्ताचरणस्य सतो रागाद्यावेशमन्तरेणापि ।
नहि मवति जातु हिसा प्राणव्यपरोपणादेव ॥४५॥
यहा कोई प्रश्न करे कि हिंसा का लक्षण पर जीव के प्राणों को
पीडा पहुंचाना मात्र ही क्यों न किया ? उत्तर यह है कि इस लक्षण में
"अतिव्याप्ति" और "अव्याप्ति" दोनों दूषण आते हैं, जैसा कि आगे
दिखाते हैं। यदि कोई महान पुरुष ध्यान में बैठा हुवा है तथा सावधानता
पूर्वक आदि क्रियाओं को कर रहा है, कदाचित उस के शरीर
सम्बन्ध से किसी जीव के प्राणों को पीडा पहुच जाती है, तो भी उसको
हिंसा का दोष नहीं लगता, क्योंकि उसके परिणामों में कषाय तो था ही
नहीं , उस के परिणामों में तो शान्त भाव या दया भाव है, हिंसक भाव
नहीं है। यहाजीप के प्राणों को पीडा पहुँचते हुवे भी हिंसा नहीं कहलाई।
इस प्रकार प्राणों को पीडा देना मात्र ही यदि हिंसा का लक्षण कहा जाये
तो उस में अनि व्याप्ति टुपण आता है।
व्युत्थानावस्थाया रागादीना वशप्रवृत्तायाम् ।
प्रियता जीवो मा वा पारत्यग्रे ध्रुव हिंसा ॥१६॥

यदि कोई प्रमादी जीव कपायों के वशीभूत होकर गमनादि क्रिया यत्न पूर्वक नहीं करता है, और क्रोधादिक भाव रूप परिणमन करता है तो उस हालत में जीव मरे चाहे न मरें, वह तो कषाय भाव के कारण अवश्य ही हिंसा के दोष का भागी बन जाता है। यहां पर जीव के प्राणों को पीड़ा न होते हुवे भी प्रमाद के सद्भाव से ही हिंमा हुई । इस प्रकार यदि "प्राणों को पीड़ा देना मात्र ही" हिंसा का लक्षण कहा जावे तो अव्याप्ति दूषण आता है। यस्मात्सकपायः सन् हन्त्यात्मा प्रथममात्मनात्मानम् । पश्चाज्जायेत न वा हिंसा प्राण्यन्तराणां तु ॥४७॥ यहां फिर कोई प्रश्न करे कि "हिंसा" शब्द का अर्थ घात करना है। पर जीव के प्राणों के घात किए बिना हिंसा कैसे हो गई ? उत्तर- हिंसा शब्द का अर्थ तो घात करना ही है, परन्तु घात दो प्रकार का होता है। एक आत्मघात और दूसरी परघात । जिम समय आत्मा कषाय भाव रूप परिणमन करता है, तो उसी समय आत्मघात हो जाता है । बाद में अन्य जीव का, यदि आयु कर्म पूरा हो गया हो या उसके पाप का उदय आगया हो, तो उसका भी घात हो जाता है । अन्यथा यदि उसका आयु कर्म पूरा न हुआ हो, या उसके पापकर्म का उदय ही न आया हो तो उसका कौन क्या कर सकता है ? उसका घात तो उसके कर्मके आधीन है । इस (हिंसक) को तो इसके भाव कषाय रूप होते ही हिंसा का दोष लग गया। हिंसायामविरमणं हिंसा परिणमनमपि भवति हिंसा । तस्मात्प्रमत्तयोगे प्राणव्यपरोपणं नित्यम् ॥४८॥ परजीव के घातरूप हिंसा दो प्रकार की होती है-एक अविरमण- रूप, दूसरी परिणमनरूप। अविरमणरूप हिंसा उसे कहते हैं, जो परजीव के घात में प्रवृत्ति न करते हुए भी, हिंसा त्याग प्रतिज्ञा बिना हुआ करती है। जिस पुरुष के हिंसा का त्याग नहीं, और वह किसी समय हिंसा में प्रवृत्ति भी नहीं करता, परन्तु उसके अन्तरङ्ग में हिसा करने का अस्तित्व भाव मौजूद है, इसलिए वह अविरमणरूप हिंसा का भागी होता है। जैसे किसी ने हरित काय(सबजी) का त्याग नहीं किया, और वह किसी समय सबजी खाभी नहीं रहा है, परन्तु उसके अन्तरङ्ग में उस हरित काय की हिंसा करने का अस्तित्व है। इसलिए वह अविरमण रूप हिंसा का भागी बनता है। परिणमनरूप हिंसा उसे कहते हैं जो जीव के स्वपर जीव के घात में, मन,वचन, काय से प्रवृत्त होने पर होती है। इन दोनों प्रकार की हिसाओं में प्रमाद सहित योग का अस्तित्व पाया जाता है । प्रमाद योग में स्वव पर जीव की अपेक्षा प्राणघात का सद्भाव पाया जाता है। और इसका अभाव तनही हो सकता है, जबकि जीन क्रोधादि भाव हिंसाका त्याग कर प्रमाद रूप परिणमन न करे । जब तक प्रमाद पाया जाता है,तब तक हिंसा का अभाव किसी प्रकार भी नहीं होसकता। प्रश्न-यदि आत्माके प्रमादरूप परिणामों से ही हिंसा होती है, तो बाह्य परिग्रहादि का त्याग क्यों कराया जाता है? उत्तर- सूक्ष्मापि न खलु हिसा परवस्तु निवन्धना भवति पुसः। हिंसायतननिवृत्ति परिणामविशुद्धये तदपि कार्या ॥१९॥ पहले बताया जा चुका है कि आत्मा में रागादिक कपाय मावा का होना ही हिंसा है । यह रागादिक भाव परिग्रहादिक के निमित्त से ही होते हैं, इसलिए परिणामों की निर्मलता के लिए, हिंसा के ठिकाने, परिग्रहादिक का त्याग करना जरूरी है। जिसमाता का सुभटपुत्र हो जाता है, उसीसे कहा जाता है कि "तेरे पुत्र को मारुगा" और जिप्स स्त्री के पुत्र ही नहीं, उसके प्रति ऐसे परिणाम कैसे हो सकते हैं, कि मैं तेरे - , ( ५८ ) बांझ के पुत्र को मारूँगा। सारांश यह है कि वाह्य परिग्रहादिक के निमित्त से ही कषायरूप परिणाम होते हैं, यदि परिग्रहादिक का त्याग कर दिया जावे तो निमित्त के विना कषाय परिणाम कैसे हो ? इसीलिए यह जरूरी है कि अपने परिणामों की शुद्धता के लिए बाह्य कारण परिग्रहादि का त्याग किया जावे। निश्चयमबुध्यमानो यो निश्चयतस्तमेवं संश्रयते । नाशयति करणचरणां स बहिः करणालसो बालः ॥५०॥ कोई कोई पुरुष,यथार्थ निश्चय के स्वरूप को नजानकर भी,केवल निश्चय के श्रद्धानी बनकर यह कहदिया करते हैं,कि हमारे अन्तरङ्ग परिणाम ठीक होने चाहिए । बाह्य परिग्रहादि रखने, या भ्रष्टाचार रूप प्रवृत्ति करने से हमारे में क्या दोष आसकता है? ऐसे पुरुष दया के आचरण को नष्ट करते हैं, वह नहीं समझते कि बाह्य के निमित्त से अन्तरङ्ग परिणाम भी, अवश्य अशुद्ध हो जाते हैं । वाह्य क्रिया की अपेक्षा से तो वे निर्दयी होते ही हैं, बाह्य का निमित्त पाकर जब उनके परिणाम भी अशुद्ध होजाते हैं, तो वे अन्तरङ्ग की अपेक्षा भी निर्दयी हो जाते हैं। कोई जीव ऐसे होते हैं,जो निश्चयनयके स्वरूपको तो जानते नहीं, केवल व्यवहारमात्र वाह्य परिग्रहादि का त्याग कर,उपवासादि किया करते हैं। पर जीवों की दयारूप धर्म के ही साधन में धर्म मान बैठते हैं। परन्तु शुद्धोपयोग की प्राप्ति के लिये कोई उद्यम ही नहीं करते हैं,वे केवल व्यवहार मात्र एकान्त पक्ष को ग्रहण कर निजस्व- रूपानुभवरूप शुद्धोपयोगमई परम अहिंसा धर्म को नष्ट कर डालते हैं। इसलिए जोअहिंसाधर्म के वास्तविक स्वरूप को जानने के लिए अभिलाषी हैं, उन्हें एकही पक्ष ग्रहण न करके निश्चय और व्यवहार दोनों ही अङ्गीकार करने चाहिये । आगे द्रव्यहिंसा तथा भावहिंसा की अपेक्षा सेनाना प्रकार के भंगों को दिखाते हैं। 1 A ए (५६) अविधायापि हि हिंसा हिसाफलभाजन भवत्येक । कृत्वाप्यपरो हिसा हिंसाफलभाजन न स्यात् ॥५१॥ जिस जीव के परिणम हिंसारूप होजाते हैं, चाहे वह हिंसा का कोई कार्य न कर सके, तो भी वह जीव उदय काल में हिंसा फल को भोगेगा। और जिस जी के शरीर से किसी कारण वश हिंसा तो हो गई, परन्तु परिणामों में प्रमाद भाव नहीं आया, तो वह हिसा के फल भोगने का पान न होगा। एकस्याल्याहिंसा ददाति काले फलमनल्पम् । अन्यस्य महाहिसा स्वल्पफला भवति परिपाके ॥५२॥ एक जीवथोडी हिंसा करने पर भी अपने तीन कपाय रूप परिणामों के कारण,उदय काल में हिंसा का बहुत फल पाता है । दूसरा कारण वश बाह्य हिंसा बहुत करने पर भी अपने भावों की उदासीनता और मन्द कपाय रूप परिणामों के कारण,उदय काल में हिंसा का फल थोड़ा ही पाता है। एकस्य सैप तीव्र दिशति फलं सैव मन्दमन्यस्य । प्रजाति सहकारिणोरपि हिसावैचित्र्यमत्रफलकाले ॥५३॥ यदि दो पुरुषमिलकर बाह्यहिंसा करते हैं,तो उनमें से जिसके परिणाम तीन कपायरूप होते हैं, उसे उदयकाल में तीन फल को भोगना पड़ेगा। और जिसके मन्दकपायरहते हैं, उसे उदयकाल में मन्दफल भोगना पड़ेगा। मागेव फलति हिंसा क्रियमाणा फलति फलति च कृतापि। आरभ्यकर्तुमकृतापि फलति हिंसानुभावेन ॥५॥ किसी जीपने हिंसा का विचारतो कर लिया, परन्तु अवसर न मिलने के कारण हिंसा न कर सका। अपने विचार से जो कर्म बन्ध किया,वह उदय में आगया। बाद में इच्छित हिंसा का अवसर मिलने पर वह भी कर डाली ऐसी हालत में हिंसा करने से पहले ही उसका फल भोग लिया जाता है। .

( ६० ) किसी ने हिंसा का विचार किया, इस विचार से जो कर्म बन्ध किया वह जिस समय उदय में आया, उसी समय वह इच्छित हिंसा को करने को भी समर्थ हो सका । इस हालत में हिंसा करते समय ही उस हिंसा का फल भोग लिया गया। किसी ने हिंसा करने का आरम्भ किया,परन्तु किसी कारणवश पीछे हिंसा को नहीं कर सका, प्रारम्भजनित कर्म बन्ध का फल उसे जरूर भोगना पड़ेगा। इस हालत में हिंसा न करने पर भी हिंसा का फल भोगना पड़ेगा। सारांश यह है कि कपाय भावों के अनुसार ही हिंसा का फल भोगना पड़ता है। एकः करोति हिंसा भवन्ति फलभागिनो वहवः । वहवो विदधाति हिंसा हिंसा फलभुरभवत्येकः ॥५५॥ कहीं एक पुरुष हिंसा को करता है, परन्तु फल भोगने वाले बहुत होते हैं जैसे कहींकहीं दशहरे पर भैसे को मारता तो अकेलाचाण्डाल ही है; परन्तु अन्य सर्व देखने वाले जो"अच्छा अच्छा"कहते हैं,और प्रसन्न होते हैं,अपने अपने रुद्र परिणामों के कारण,हिंसा फल के भागी होते हैं। कहीं हिंसा करते तो बहुत पुरुष हैं,और हिंसा के फल का भोक्ता होता है एक ही पुरुष । जैसे संग्राम में हिंसा तो बहुत से पुरुष करते हैं,परन्तु उन का स्वामी राजा उस सब हिंसा के फल का भागी होता है। कस्यापि दिशति हिंसा हिंसाफलमेकमेवफलकाले । अन्यस्य सैव हिंसा दिशत्यहिंसाफलं विपुलम् ॥५६॥ किसी पुरुष को तो हिंसा उद्य काल में एक ही हिंसा के फल को देती है, और किसी पुरुष को वही हिंसा बहुत से अहिंसा के फल को देती है। जैसे किसी बन में मुनिराज ध्यानस्थ अवस्था में तिष्ठते हैं । एक सिंह महाक्रूर परिणामी उनको भक्षण करना चाहता है, इतने में एक शूकर कोमल अहिंसा मई परिणामों को लिए हुए सिंह से मुनिराज की रक्षा करना चाहता (१) है। सिंह और शूकर दोनों परस्पर में लड़ लड कर मर जाते हैं। सिंह अपने कर परिणामों के कारण हिंसा करते हुए नरक में जाता है । शूकर उसी हिंसा को करते हुए शुभ भावों के निमित्त स्वर्ग में जाता है। हिंसाफलमपरस्य तु ददात्यहिंसा तु परिणामे । इतरस्य पुनार्हसा दिशत्यहिसा फल नान्यत् ॥५७॥ किसी को अहिंसा उदय काल में हिंसा फल को देती है,और किसी को हिंसा अहिंसा के फल को देती है। अन्य फल को नहीं । जैसे किसी के दिल में तो किसी दूसरे का बुरा करने के परिणाम हैं,बाहर से वह उसके विश्वास के निमित्त भला करता है। या यह कि बुरा करने का यत्न तो कर रहा है, परन्तु उस दूसरे जीव के पुण्य प्रभाव से उसका बुरे की जगह भला हो जाता है, तो भी बुराई का यत्न करने वाला अपने अन्तरङ्ग में हिंसामई परिणामों के कारण,बाहर से दया करते हुए भी,बुराई के ही फल का भोगी होता है। किसी के अन्तरङ्ग में तो दया भाव है, बाहर से वह किसी जीव को दुखी देख, उसके दुख निवारण के यत्न में लगता है। यत्न करते करते दुखी को तत्काल पीडा हो जाती है, या उस यत्न के निमित्त से ही उस दुखी के प्राणान्त हो जाते हैं। यहाँ बाहरी हिंसा होते हुए भी,अन्तरङ्ग में अहिंसा मई परिणामों के कारण अहिंसा ही के फल की प्राप्ति होगी। जैसे कोई डाक्टर किसी रोगी को दुखी देख कर उस पर करुणाभाव करता है,और यत्नपूर्वक उसका चीर फाड(operation) कर उसके कष्ट को दूर करना चाहता है। चीरफाड़ करते करते यदि रोगीकी पीड़ा बढ जाती है, या वह रोगी मर जाता है, तो डाक्टर कोतो बाह्य में हिंसा होते हुए भी, अन्तरङ्ग में अहिंसा मई परिणाम होने के कारण, अहिंसा का ही फल मिलेगा।

( २ ) इति विविधभङ्गगहने सुदुस्तरे मार्गमूढदृष्टीनाम् । गुरखो भवन्ति शरणं प्रबुद्ध नयचक्रसञ्चाराः ॥५०॥ अत्यन्तनिशितधार दुरासदं जिनवरस्य नयचक्रम । खण्डयति धार्यमाणं मूर्धानं झटिति दुर्विदग्धानाम ॥५९॥ हिंसा के अनेक भेदों को वे ही गुरु समझा सकते हैं,जो नय चक्र के ज्ञाता हैं। जैन धर्म के नय चक्र का समझना बड़ा कठिन है,जो बुद्धि. मान विचार करते हैं,वे नय के(aifferent points of view)भेदों को समझा सक्ते हैं । जो मूढ दृष्टि बिना समझे हुए हिंसा का स्वरूप मनमाना करते हैं, वे लाभ के बदले हानि उठाते हैं। अवबुध्य हिंस्यहिंसक हिंसा हिंसाफलानि तत्त्वेन । नित्यमवगृहमानैः निजशक्त्या त्यज्यतां हिंसां ॥६॥ जो पुरुष सदाकाल संवर पालन करने में उद्यमवान होते हैं, उन्हें चाहिए कि वे पहले यथार्थतासे हिंस्य, हिंसक, हिंसा और हिंसाफल, इन चारों भावों को भली भाँति जान लेवें,और फिर अपनी शक्ति अनुसार हिंसा कात्याग करें। हिंस्य-जिनकी हिंसा की जावें अपने और पर जीव के द्रव्य- प्राण और भावप्राण,अथवा एकेन्द्रियादिक जीवसमास । हिंसक हिंसा करने वाला जीव, हिंसा-हिंसा के प्राण पीड़न की अथवा प्राणघात की क्रिया, हिंसाफल-हिंसा से प्राप्त होने वाले,नर्क,निगोदादिक दुःखदायक फल । मद्यं मांसं क्षौद्रं पञ्चोदुम्बरफलानि यत्नेन । हिंसा व्युपरतिकामैर्मोक्तव्यानि प्रथममेव ॥६१॥ जो जीव हिंसा का त्याग करना चाहते हैं, उनको पहले यत्नाचार पूर्वक, मद्य, मांस, मधु इन तीनों मकार ('म' से शुरू होने वाले) और ऊमर,कठूमर,पीपल,बड़,और पाकर इन पांच फलोंका त्याग करना चाहिए।

मद्यं मोहयति मनो मोहितचित्तस्तु विस्मरति धर्मम् । विस्मृतधर्मा जीवो हिसामविशङ्कमाचरति ॥६२।। मदिरा--यह बडी ही निंद्य वस्तु है, मनको मोहित कर देती है अर्थात जीवको बेहोश बना देती है। मोहित चित्त धर्म को भूल जाता है, और धर्म भूला जीव,विना किसी डर के बेधडक होकर हिंसा करनेल्गजाता है। रसजानां च बहूना जीवानां योनिरिष्यते मद्यम् । मद्य भजता तेपां हिसा सजायतेऽवश्यम् ॥६॥ मदिरा अनेक जीवों की योनि होती है, मदिरा पान करने से, उन सब जीवों का निश्चय से ही नाश होजाता है, इसलिए मदिरा सेवन में निरन्तर हिंसा का होना जरूरी है । अभिमानभयजुगुप्सा हास्यरतिशोककामकोपाद्याः। हिसाया• पाया सर्वेऽपि च सरकसन्निहिता ॥६॥ मदिरा पान करने वाले से जोभाव उत्पन्न होते हैं, वे सब हिंसा की ही पर्याय हैं अर्थात भेद है (अभिमान,भय, जुगुप्सा, हास्य, अरति,शोक, काम, क्रोध, आदिक विभाव सर्व मदिरा के निकटवर्ती हैं। मदिरा का त्याग जीवहिंसा की दृष्टि से तथा मादरता की दृष्टि से, दोनों ही दृष्टि से करना भव्य आत्माओं के लिए अति आवश्यक है। नविना प्राणविघातान्मांसस्योत्पत्तिरिष्यते यस्मात् । मांस भजतस्तस्मात् प्रसरत्यनिवारिता हिसा ॥६५॥ मास इन्द्रियादि के शरीर में ही पाया जाता है । हीन्द्रियादिक जीवों के घात किए बिना इसकी प्राप्ति नहीं हो सकती। इसलिए यह स्वय सिद्ध है, कि मांस-भक्षी को अनिवार्य हिंसा होती है। कोई कहे कि आप से मरे हुए पशुओं का मास भक्षण करने में हिंसा नहीं होती, तो उनका यह विचार सर्वथा गलत है, क्योंकि- (६४) यदपि किल भवति मांसं स्वयमेव मृतस्य महिपवृषभादेः। तत्रापि भवति हिंसा तदाश्रितनिगोतनिर्मथनात् ।।६।। भरे हुए जीव के मांस में, जिस जीव का किं वह मांस है, उसी जाति के निगोदरूप अनन्तजीव पैदा होते रहते हैं, इसलिए उस मांस के भक्षण में उन जीवों का घात होने से हिंसा होती है। आमास्वपि पक्कास्वपि विपच्यमानासु मांसपेशीषु । सातत्येनोत्पादस्तजातीनां निगोतानाम् ॥६७।। आमांवा पक्कां वा खादति यः स्पृशति वा पिशितपेशीम् । स निहन्ति सततनिचितं पिण्डं बहुजीवकोटीनाम् ॥६८॥ मांस की डलियों की सर्व ही अवस्थाओं में समय समय अनन्त जीव निरन्तर उन्पन्न होते रहते हैं । इस लिए जो पुरुष मांस की डली को भक्षण करता है, या छूता भी है, वह अनेक जीव समूह की हिंसा का भागी होता है। मधुशकलमपि प्रायो मधुकरहिंसात्मकं भवति लोके । भजति मधु मूढ धीको यः स भवति हिंसकोऽत्यन्तम् ।।६९॥ स्वयमेव विगलितम् यो गृह्णीयादा छलेन मधुगोलात् । तत्रापि भवति हिंसा तदाश्रयप्राणिनां घातात् ।। ७०॥ मधु या शहद-यह मक्खियों का उगाल होता है, इसके आश्रय भूत बहुत से जीव होते हैं । मधुछत्ते में से छल कपट करके लिया जाता है।छत्ता तोड़ने में उसके आश्रय भूत प्राणियों का घात होता है । शहद भक्षण करने वाला मनुष्य अत्यन्त हिंसा का भागी होता है । यदि छत्ते को न तोड़ कर सूराख करके शहद निकाल लिया जावेतोभी उसमें अनेक जन्तु, रस के कारण पैदा होते रहते व मरते रहते हैं। सद्गृहस्थों को इन तीनों मकारों का त्याग करना ही योग्य है।

है परन्तु और भी , मधु मय नरनीत पिशित च महाविकृतयस्ता । वल्भ्यन्ते न तिना तदर्णा जन्तवस्तत्र ।। ७१ ॥ श्रापक से इन तीनों का त्याग तो मुख्यतापूर्वक कराया ही जाता वस्तुए जैसे मक्खन, चर्मस्पर्शित घी, तेल, जल विष मादिक अभक्ष्य पदार्थों का त्याग करना भी श्रावक के लिए उचित है। मक्खन से पौने दो घडी के भीतर ही जो घी बनाया जावे, वह धी खाने याग्य है । (मक्खन मन को विकारी बनाता है, इसलिये पौने दो घड़ी के भीतर भी न खाने योग्य है)। मधु में मधुके,मदिरा में मदिरा के, मक्खन में मस्खन के, और मास में मांस के रङ्ग के जीव उत्पन्न हो जाते हैं, जो दृष्टि गोवर नहीं होते हैं, इस लिए महान हिंसा के कारण, इन वस्तुओं को खाना किमी प्रकार भी उचित नहीं है। योनिरुदुम्वरयुग्म प्लान्यग्रोधपिप्पल फलानि । त्रमजीवाना तस्मात्तेपां तद्भक्षणे हिंसा ॥ ७२ ॥ ऊमर, कठूमर, पीलफल, बडफल और पीपल फल ये पाचों ही त्रस जीरों की उत्पत्ति के स्थान हैं। कभी कभी उडते हुए जानवर इनमें दिखाई पड़ते हैं। इन के भक्षण करने से त्रस जीवों की हिंसा होती है। कोई कि यदि इन को सुखाकर खा लिया जाये तो क्या दोप है ? यानि तु पुनर्वभेयु कालोच्छिन्नत्रसाणि शुप्फाणि । भजतस्तान्यपि हिंसा विशिष्टरागादिरूपास्यात् ॥७३॥ जो पुरुष ऐसी निंद्य वस्तु को सुखाकर ग्रहण करेगा, तो उस के रागादि भावों की अधिकता तो जर ही होगी, और विशेष रागरूप भावों का होना ही हिंसा है। सुरवाने में उस जीवों की निराधना होने के कारण अधिक हिंमा होगी। कोई पुरुष हरित (सरजी) वस्तुको तो नहीं खाता, परन्तु टम घस्तु मे गगभार कर,सुखाकर खालेता है,तोरागकी अधिकता , ( ६६ ) से वह भी एकन्द्रियों की हिंसा का भागी बनता है। यदि राग न हो तो इतना प्रयास क्यों किया जावे ? यहां फिर कोई प्रश्न करे कि यदि सूखी वस्तु में भी दोष है, तो अन्न क्यों खाया जाता है ? प्रथम तो अन्न निंद्य वस्तु नहीं है, दूसरे वह रागभाव बिना साहजिक प्रवृत्ति से ही सूख जाता है । अन्न को साधारणतया पेट भरने की गरज से ही खाया जाता है, वह कोई विशेष राग होने का कारण नहीं । विशेष रागरूप परिणामों के होने को ही हिंसा बतलाया गया है, इस लिये, अन्न के खाने में वह दोष नहीं होता,जो पंच उदम्बर और अन्य हरित वस्तुओं को सुखाकर खाने में होता है। हरित वस्तु को बनाकर व सुखाकर खाना दोनों ही समान हिंसा कारक हैं। अष्टावनिष्टदुस्तरदुरितायतनान्यमूनि परिवयं । जिनधर्मदेशनायाभवन्ति पात्राणि शुद्धधियः ॥७॥ ऊपर कहे हुए तीनों मकार और ऊमर आदि पांचों फल, ये आठों ही महापाप के कारण हैं। इनके सर्वथा त्याग द्वारा, निर्मल बुद्धि को धारण कर के ही, जीव जिन धर्म के उपदेश का पात्र होता है,इनके त्याग बिना श्रावक नहीं हो सकता, जैसे जड़के बिना वृक्ष नहीं हो सकता। इसी लिये इनके त्याग को "अष्टमूल गुण' कहा जाता है। धर्ममहिंसारूपं संशृण्वन्तोपि ये परित्यक्तम् । स्थावरहिंसामसहास्त्रसहिंसा तेऽपिमुञ्चन्तु ॥७५॥ जो जीव अहिंसाधर्म को अच्छी तरह सुनकर भी स्थावर जीवों की हिंसा छोड़नेको असमर्थ है, उन्हें त्रस जीवोंकी हिंसा तो छोड़नी ही चाहिये। कृतकारितानुमननैर्वाकाय मनोभिरिष्यते नवधा । औत्सर्गिकी निवृत्तिर्विचित्ररूपापवादिकीत्वेषा ॥७॥ हिंसादिक का त्याग दो प्रकार का होता है । एक उत्सर्ग त्याग और दुसरा अपवाद त्याग । सामान्यतः सर्वथा त्याग को उत्सर्ग कहते हैं। इस - के कृत, कारित अनुमोदनारूप, मन, वचन, काय करके नव भेद होते हैं। मन से, बचन से, काय से आप न करना, दूसरे से न कराना और करने वाले को भला नहीं समझना। इन नौ भेदों में से किसी भेदका थोड़ा बहुत किसीरीति से त्याग करने को, अपवाद त्याग कहते हैं। इसके अनेक भेद हैं। स्तोकेकेन्द्रियघातादगृहिणांसम्पन्नयोग्यविषयाणाम् । शेपस्थावरमारण विरमाणमपि भवति करणीयम् ॥७७॥ हिंसा का सर्वथा त्याग तो मुनि धर्म में ही हो सकता है । यदि कोई मुनि धर्म को नहीं ग्रहण कर सकता, तो उसे श्रावक का धर्म पालन करते हुए, त्रस जीरों की हिंस का तोत्याग अवश्य ही कर देना चाहिये । गृहस्थी एकेन्द्रिय जीवों की हिंसा का सर्वथा त्याग नहीं कर सकता, तो भी वृथा हिंसा तो नहीं करनी चाहिये। प्रयोजन सिवाय, अन्य स्थावर जीवों की हिंसा जो असावधानी से प्रवृत्ति करते हुए होती है, उस का तो अवश्यही त्याग कर देना चाहिये । श्रावक को दयाल होना योग्य है । त्रस तथा स्थावर जीवों का ब्यौरा निम्न प्रकार है। संसारी जीव प्रसजीव स्थावरजीव ती इन्द्रिय पृथ्वी इन्दिय इन्द्रिय पञ्चेन्द्रिय पवन बनस्पति काय काय काय फाय सैनी असनी तियथ मनुष्य । भ्यन्तर ज्योतिषी वैमानिद आय म्लेक्ष यामी नारक सातों नरकों क सात भेदरूप जीप धर चर देख कर; ( ६८ ) अमृतत्वहेतुभूतं परममाहंसारसायणं लब्ध्वा । अवलोक्य बालिशानामसमञ्जसमाकुलैन भवितव्यम् ॥७८|| सूक्ष्मोभगवद्धर्मों धर्मार्थ हिंसने न दोपोऽस्ति । इति धर्ममुग्धहृदयैर्न जातु भूत्वा शरीरिणो हिंस्या ॥७९॥ किसी जीव को हिंसा करते हुवे भी (उसके पूर्व पुण्योदय के कारण) सुखसातायुक्त और अपने आपको अहिंसा धर्म का पालन करते हुवे भी, (पूर्व पापोदय के कारण) दुःखी जानकर, धर्म में आकु- लता नहीं करनी चाहिये । यह विचारना चाहिये कि हिंसा का फल तो दुःखरूप ही है । यह जो हिंसा करते हुवे भी सुख सामग्री को भोग रहा है, यह उसके पूर्व उपार्जित पुण्य का फल है । और मैं जो अब अहिंसा धर्म का पालन करते हुवे भी दुःखी हूँ, यह दुःख अहिंसा का फल नहीं है, यह मेरे किसी पूर्वबह पापकर्म का ही फल है। अहिंसा तो सुखरूप ही है । कभी ऐसा होता है कि एक अहिंसा धर्म का पालन करने वाला किसी मिथ्यादृष्टि को हिंसा में धर्मसिद्ध करते हुवे, और उसकी पुष्टि करते हुवे देख कर, धर्म से डिगने लगता है । जो वास्तव में धर्मात्मा होते हैं, वे मिथ्या दृष्टियों के फन्दे में नहीं फँसते हैं, स्वयम वस्तु स्वरूप को विचार अपने धर्म में दृढ़ रहते हैं। कोई कोई अज्ञानी यह कह दिया करता है, कि हिंसा में पाप तो बेशक है, परन्तु यज्ञादिक में धर्म के निमित्त हिंसा करने में कोई दोष नहीं है । ऐसा श्रद्धान कर, हिंसा में प्रवृत्ति करना योग्य नहीं है, क्योंकि जहाँ हिंसा है, वहाँ हिंसा में धर्म कदापि नहीं हो सकता। यहाँ यह प्रश्न होता है कि जैनमत में भी तो मन्दिर का बन- वाना पूजा प्रतिष्ठादि करना कहा गया है, तो क्या इन कार्यों में धर्म या नहीं ? उत्तर यह है कि मन्दिर बनवाना, पूजा प्रतिष्ठादि के कार्य,यदि यत्नाचार रहित, बेपरवाई से, केवल मान बड़ाई के वास्ते किये जावे तो

धर्म नहीं हो सकता, पाप ही होगा। और यदि यत्न के साथ, धर्म बुद्धि
पूर्वक क्येि जायें, तो आरभ जनित हिसा तो थोड़ी ही होती है, जिसका
फल भी तुच्छ होता है । परन्तु धर्मानुराग के कारण पुण्यबन्ध
विशेष होता है। हिमा का पाप, पुण्य की अपेक्षा बहुत ही अल्प होता
। इसके सिवाय ऐमे शुभ कार्यों में धन खर्च करने से लोभ कषाय
रूप अन्तरग हिंमा का त्याग होता है । हिंसा का मूल कारण कपाय है,
तीव्रकपाय रूप होकर, वाह्य हिंसा न करते हुवे भी पाप होता है। इसलिये
पूजा प्रतिष्ठादि शुभ कार्य करने में विशेष धर्म ही होता है। जैसे समुद्र में एक
वूद विष की कुछ दोष नहीं कर सकती । ऐसे ही शुभकार्यों के करने में
जो हिंसा का पाप होता है, वह पुण्य बन्ध की अपेक्षा बहुत थोडा होता है,
ओर वह कोई दोष नहीं कर सकता। यह धन शुभकार्य के सिवाय यदि
पापकों में खर्च किया जाता तो महान पाप के बन्ध का कारण होता।
इस अपेक्षा से भी इस को शुभकार्य में खर्च करना अच्छा है। ऐसा करने
से पापों से दूर रह शुभ मार्ग की ही प्रवृत्ति होती है। ऐसा शुभ कार्य आरम्भी
श्रावक किया करते हैं । इस लिय मामान्यतया ऐसा उपदेश दिया गया
है। इसमें प्रयोजन अन्तरग भाव अहिंसा या वीतरागता के बढाने का है,
हिंसा का प्रयोजन नहीं है, आप भी हिंसा का बचाना अशक्य है ।
वर्मों हि देवताभ्य प्रभाति ताभ्य प्रदेयामिहसर्वम् ।
इति दुर्विवेककलिता धिपणा प्राप्य नदेहिनो हिस्सा ॥८॥
कोई काई कहा करते हैं किजन देवता धर्म का क्ता है तो उनके
निमित्त तो पशुओं के मासादिक की बलि आदि सब कुछ देदेना योग्य ही
है । ऐसा कह देना विवेत्शून्य है । यह कदापि मानने योग्य नहीं है।
पूज्यनिमित्त घाते छगादीना न कोऽपि दोपोऽस्ति ।
इति सप्रधार्य कार्य नातिथये सत्त्वसज्ञपनस् ॥८॥

देवताओं के लिए, अथवा श्रेष्ठ पूज्य पुरुषों के सत्कार आदि के लिए भी जीवादिक का घात करना कभी भी पुण्य का कारण नहीं हो सकता । हिंसा में दोपही दोष है, हिंसा में धर्म मान लेना बड़ी भारी भूल है । तथा कोई देवी देवता पशु बलि मे प्रसन्न होगा, या कोई माननीय पुरुष राजी होगा, यह हमारी कल्पना झूठी है, देवी देवता व बड़े पुरुष पशुओं के भी मान्य हैं, पशु उनके सामने दीन हैं । उनको कष्ट पहुँचाने से वे राजी कैसे हो सकते हैं ? बहुसत्वघातजनिता दशनादरमेकसत्त्वघातोत्थम् । इत्याकलय्य कार्य न महासत्त्वस्य हिंसनं जातु ॥२॥ कभी कभी यह कुतर्क की जाती है कि अन्नके आहार में बहुत से जीव मरते हैं, उनके बदले यदि एक बड़ा जानवर मारकर खालिया जावे तो भला है । ऐसा कहना मूर्खतापूर्ण है; क्योंकि हिंसा तो प्राणघात से होती है । एकेन्द्रिय की अपेक्षा पंचेन्द्रिय जीव के द्रव्य प्राण और भाव प्राण बहुत ज्यादा होते हैं । इसलिए बहुत से छोटे छोटे जीवों के घात से भी बड़े प्राणी के मारने से बहुत हिंसा होती है।जब एक जीव के घात से द्वीन्द्रिय जीव के घात में असंख्यात गुणा पाप है,तो पञ्चेन्द्रिय के मारने में तो और भी ज्यादह पाप है। तथा जलादि एकेन्द्रियों के बिना तो किसी का कार्य भी नहीं चल सकता। मांसादि कोई आवश्यक नहीं है । बड़े पशु को मार कर उसकी और उसके आश्रित अनेक जीवों की क्यों हिंसा की जावे। रक्षा भवति बहूनामेकस्यैवास्य जविहरणेन । इति मत्वा कर्त्तव्यं न हिंसनं हिंस्रसत्त्वानाम् ॥८३॥ कोई कोई ऐसा विचार प्रकट किया करते हैं कि सर्प, बिच्छू, सिंह आदिक हिंसक जीवों के मार डालने से, और अनेक जीवों की रक्षा होगी इस वास्ते इनके मारने में पाप नहीं होगा। ऐसा पाप श्रद्धान करना भी . ( ७१ ) ठीक नहीं है। क्योंकि जो हिंसा यह जीव करते हैं, उसके पाप के भागी यह ही होंगे। लोक में अनेक जीव पाप पुप्य किया करते हैं हम उनकी चिन्ता कहा तक करें। हिंसक जीव जो हिंसा करते हैं, वह पाप कर्म का बन्ध करेंगे, हम उनकी हिंसा करके क्यों पाप उपार्जन करें। यदिहमभी उनकी हिंसा करें, तन हम भी हिंसक होजायेंगे । सर्प, सिंहादिक सताए जाने पर व भय पाने पर हमला करते हैं, अन्यथा वे अपने काम में लगे रहते हैं। उनके मारने में धर्म मानना मिथ्या श्रद्वान है । परन्तु यदि कोई मानव सर्प या सिंहादि से मागजाता हो तो हमें मानव को बचाना योग्य है, क्योंकि उसके प्राण उस पशु की अपेक्षा अधिक मूल्यवान हैं । तब यदि सर्प या सिंह की हिंसा होगी, वह हमारे द्वारा आरम्भी हिंसा होगी । हमने मानव को बचाया, यह तो धर्म किया, परन्तु आरम्भी हिंसा की यह पाप किया। यहा पाप कम, पुण्य अधिक है। बहुसत्वघातिनोऽमी जीवन्त उपार्जयन्ति गुरुपापम् । इत्यनुकम्पा कृत्वा न हिसनीया शरीरिणो हिस्रा ॥८॥ बहुत जीवों के घाती जीव जैसे चिडीमार आदि “यदि यह जीते रहेंगे तोऔर अधिक पाप करेंगे" इस प्रकार की दया करके हिंसक जीवों को नहीं मारना चाहिये, वह हिंसक जीव अपने पाप के भागी आप बनते हैं। हमारे से बन सके तो हम उनमे इस पाप क्रिया के छुडाने का यत्न करें, और उनको कल्याण के मार्ग पर लगा देवें । मार देने से उनका आत्मा हिंसक भावों से छूट नहीं सकता। बहुदु सासंज्ञपिता प्रयान्ति त्वचिरेण दुखविच्छित्तिम् ।।। इति वासना कृपाणीमादाय नदु सिनोऽपि हन्तव्या॥८५|| बहुत से यह कहा करते हैं कि जो जीव रोग अथवा दरिद्र आदि दुखों से बहुत ही दुखी हो रहा हो, यदि उसको मार दिया जावे तो वह ( ७२ ) तत्कालीन दुःखों से तो अवश्य छूट जावेगा । यह भृल है, ऐसा मिथ्या श्रद्धान कभी भी नहीं करना चाहिये । प्रथम तो कोई जीव केवल शरीर त्याग देने से दुःख से नहीं छूट सकता,दूसरे यह अटल नियम है कि उसे अपने कर्मों का फल भोगना पड़ेगा, चाहे वह इमी जन्म में भाग लेवे, चाहे दूसरे किसी जन्म में । जैसा जिस जीव के कर्मोदय होता है,उसे अवश्य ही भोगना पड़ता है। घात करने से प्राणों को पीड़ा होती है, जो हिंसक तथा हिंस्य दोनों के लिये ही अशुभ बन्ध का कारण होती है । हमें उचित है कि कष्ट प्राप्त मानव की सेवा करें, ऐनी शिक्षा देवे कि वह दुःख उसे कम मालूम पड़े।मार डालना कोई सेवा नहीं है,न किमी को यह हक है कि दूसरे प्राणी को मार डाले । कष्ट पीड़ित प्राणी कष्ट से मुक्त भी हो सकते हैं। कृच्छ्रेण सुखावाप्तिर्भवन्ति सुखिनो हताः सुखिन एव । इति तर्कमण्डलानः सुखिनां घाताय नादेयः ॥८६॥ कुछ पुरुषों का यह मत होता है,कि बड़े बड़े कष्ट सहन करने से ही, सुख की प्राप्ति होती है, इसलिये यदि सुखी जीवों को काशी करौत आदि की रीति से कष्ट देकर मार डालें तो परलोक में भी यह सुखी रहेंगे। यह श्रद्धान भी मिथ्या श्रद्धान ही है । सुखी तो सत्यार्थ धर्म के साधन से होते हैं, न कि इस प्रकार सुख में मरने मारने से । उपलब्धि सुगतिसाधनं समाधिसारस्य भूयसोऽभ्यासात् । स्वगुरोः शिष्येण शिरो न कर्त्तनीयं सुधर्ममभिलपिताः ८७ कोई कोई मिथ्या दृष्टि यह श्रद्धान कर बैठते हैं कि हमारे गुरु ने बहुत दिनों तक अभ्यास किया है, और अब समाधि में लीन हो रहे हैं, इस समय यदि इनको प्राणान्त कर दिया जावे, तो उच्चपद को प्राप्त हो जायेंगे। ऐसा मिथ्या श्रद्धान कर शिष्य को अपने गुरु का सिर काटना योग्य नहीं है । गुरु महाराज तो अपने अभ्यास आदि का फल आप ही आगे या पीछे पा . ( ३ ) लेवेगे, शिष्य को पापकर्म के बन्ध करने के सिवाय और क्या मिलेगा? कुछ नहीं। गुरु का जीवन जबतक वह जीवित रहेंगे अधिक आत्मोन्नति कर सकता है। धनलवपिपासिताना विनेय विश्वासनायदर्शयताम् । झटितिघटचटकमोक्ष श्रद्धेय नेव खारपटिकानाम् ॥८॥ खारपटिक मत के मानने वाले कहा करते हैं कि जैसे कोई चिड़िया घडे में वन्द हो तो जितना जल्दी उस घड़े को फोड़ दिया जावे, उतनी ही जल्दी उस चिडिया की मुक्ति हो जाती है। ठीक उसी प्रकार यदि किसी के शरीर का नाश कर दिया जाये तो बन्धन से रहित होकर जीव की मुक्ति हो जाती है। ऐसा मिथ्या श्रद्धान कर किसी भी जीव को अपने तथा अन्य के शरीर को कभी भी नाश नहीं करना चाहिये।क्योंकि किसी का बध करने से यद्यपि स्थूल शरीर छूटेगा, परन्तु अष्ट कर्मों का रचा हुवा सूक्ष्म शरीर नहीं छूट सकता है,वह तो आत्मध्यान की अग्नि से ही जल सकता है। दृष्ट्वापर पुरस्तादशनाय क्षामकुक्षमायान्तम् । निज मासदानरभसादालभनीयो नचात्मापि ॥८॥ बहुत से पुरुष इसी में पुण्य समझ बैठते हैं,कि यदि कोई भूखा मनुष्य सामने आकर खाने के लिये याचना करे, तो उस पर दया करके अपने शरीर का मास दे डाले। यह स्वात्मघात है,ऐसा नहीं करना चाहिये।मास का दान अति निन्द्य और धर्म विरुद्ध है तथा हिंसा का कारण है । उसे भक्ष्य पदार्थ ही खाने के लिये देकर सन्तोषित करना योग्य है। को नाम विशति मोह नयभङ्गविशारदानुपास्यगुरून् । विदितजिनमतरहस्य श्रयन्नहिसा विशुद्धमति ॥१०॥ जिस किसी ने नयभङ्ग के ज्ञाता गुरु महाराज से जिनमत के रहस्य को समझ कर अहिंसा धर्म के वास्तविक स्वरूप को जान लिया है, वह .

के (७४) कभी भी हिंसा में धर्म मानने वाले मतमतान्तरों के फन्दे में नहीं फंस सकता। छेदनताड़नवन्धा भारस्यारोपणं समधिकस्य । पानानयोश्च रोधः पञ्चाहिंसा व्रतस्योति ॥१८॥ अहिंसा अनुव्रत के ५ अतिचार हैं। १-छेदन अतिचार, किसी जीव हाथ पाव आदि अङ्ग तथा नाक कान आदि उपङ्गों को काट कर या छेद कर दुःख पहुँचाना | २-ताड़न, लकड़ी, कोड़ा, चाबुक आदि से मारना, पीटना । ३-बन्धन, पशु आदि जीवों को बांध कर रोके रखना। ४-अतिभारारोपण, शक्ति से अधिक बोझ भार का लादना । ५-अन्नपाननिरोध, खाना पीना न देकर भूखा प्यासा रखना । इन अतिचारों से व्रत का एकोदेश भङ्ग होकर अहिंसा व्रत में दोष लगता है। जहां कषाय या प्रमाद वश होकर बर्ताव होता है, वहां अतिचार होते हैं । अन्तरङ्ग में सुधार के हेतु से किसी को दंड देना अतिचार नहीं है,जैसे अपराधी को कैद में डालना, विद्यार्थी को, अपराध होजाने पर, ताड़ना करना अथवा उपवास आदि अन्य दण्ड देना । इस प्रकार अहिंसा के स्वरूप को भली भांति जान, ज्ञानी तथा विवेकीजनों का यह कर्तव्य है, कि अपने अपने पद के अनुसार हिंसा को त्याग,आहंसाधर्म का पालन करें। अहिंसा धर्म के पालन करने से ही यह जीव धर्म मार्ग को ग्रहण कर अपना आत्म कल्याण कर सकता है। सत्य व्रत यदिदं प्रमादयोगादसदभिधानं विधीयते किमपि । तदनृतमपि विज्ञेयं तद्भेदाः सन्ति चत्वारः॥९॥ प्रमाद कषाय के योग से स्व तथा पर को हानिकारक अथवा अन्यथा रूप बचन कहने को अनृत या असत्य कहते हैं,इसके चार भेद हैं। . -- स्वक्षेत्रकालभाचे सदपि हि यस्मिन्निपिच्यते वस्तु । तत्पथममसत्य स्यान्नास्ति यथा देवदत्तोऽत्र ।।१२।। अपने द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव से अस्तित्वरूप (मौजूद) वस्तु को नास्तिरूप (गैर मौजूद) कहना असत्य का पहला भेद है-जैसे देवदत्त नाम का कोई पुरुष किसी जगह बैठा हुआ है, उसके बारे में किसी ने प्रश्न किया कि देवदत्त है ? तो उत्तर में कहना कि नहीं है। यहा पर द्रव्य, क्षेत्र, काल और भावका सक्षिप्त स्वरूप जान लेना जरूरी है। द्रव्य-जो सव हो,अर्थात जिसकी सचासदा बनी रहे। द्रव्य का यह (सत)लक्षण,उत्पाद,व्ययध्रुवपने कर सहित होता है। गुण तथा पर्यायों के समुदाय का नाम ही द्रव्य है । क्षेत्र-जिस क्षेत्र को रोक कर द्रव्य उस में स्थित हो,वह उसका क्षेत्र कहलाता है । काल-जिस काल में द्रव्य जिस रूपसे परिणमे,वह उसका काल कहलाता है। भाव-द्रव्य का निज भाव । असदपि हि वस्तुरूपं यत्र परक्षेत्रकालभावैस्तै । उद्भाव्यते दितीय तदनृतमस्मिन् यथास्ति घट• ॥९॥ अपने द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव से नास्तिरूप वस्तु को अस्तिरूप कह देना असत्य का दूसरा भेद है । जैसे किसी जगह घड़े के द्रव्य क्षेत्र काल, भाव का अस्तित्व नहीं है, वहा किसी के प्रश्न करने पर कि घड़ा है ? यह कह देना कि घड़ा है । अर्थात घड़े के न होते हुवे यह कह देना कि घड़ा है, असत्य का दूसरा भेद है। वस्तु सदपि स्वरूपात् पररूपेणाभिधीयते यस्मिन् । अनृतमिद च तृतीय विज्ञेय गोरिति ययाश्वः ॥९॥ अपने चतुष्टय (द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव) से विद्यमान भी पदार्थ को अन्य स्वरूप कहना तीसरा भेद है। जैसे किसी जगह बैल स्वचतुष्टय से मौजुद है, तब वहा किसी के यह पूछने पर कि वहा क्या है ? यह कह ।

देना कि घोड़ा है। अर्थात कुछ का कुछ कह देना असत्य का तीसराभेद है। गर्हितमवद्यसंयुतमप्रियमपि भवति वचनरूपं यत् । सामान्येन त्रेधामतमिदमनृतं तुरीयं तु ॥९५|| ४-अनृत का चौथा भेद तीन प्रकार है । गर्हित,सावद्य और अप्रिय। पैशुन्यहासगर्भ कर्कशमसमञ्जसं प्रलपितं च । अन्यदपि यदुत्सूत्रं तत्सर्वं गर्हितं गदितम् ॥१६॥ (क) गर्हित-जिन वचनों में दुष्टता होवे, जिन से दूसरों का बुरा होवे, अपने को रौद्र ध्यान होवे । ऐसे हँसी मजाक के बचन जिनसे दूसरे जीवों का मर्म छेद होवे । कठोर, मिथ्या श्रद्धान रूप बचन,प्रलाप अर्थात व्यर्थ के गपशप, तथा और भी अनेक शास्त्र विरुद्ध बचन गर्हित अर्थात निन्ध कहलाते हैं। छेदनभेदनमारणकर्पणवाणिज्यचौर्यवचनादि । तत्सावा यस्मात्माणिवधाद्याः प्रवर्तन्ते ॥९७॥ (ख) सावद्य-"अवद्य" का अर्थ “पाप" । जिन बचनों से पाप की प्रवृत्ति होती है;वे सावद्य वचन कहलाते हैं। जो अन्य जीवों के छेदने, भेदने मारने, काटने, बँचने रूप बचन है, अथवा हिंसा मई व्यापाररूप बचन हैं या चोरी रूप बचन हैं, यह सवही सावध बचन कहलाते हैं, क्योंकि इन बचनों से प्राणियों के घातरूप हिंसा आदि पापों की प्रवृत्ति होती है। अरतिकर भीतिकरं खेदकर वैरशोककलहकरम् । पदपरमपि तापकर परस्य तत्सर्वमाप्रियं ज्ञेयम् ॥१०॥ (ग) अप्रिय-जो बचन दूसरे जीवों के अप्रीति करने वाले, भय करने वाले,वैर शोक तथा कलह करने वाले होते हैं,सब अप्रिय वचन कहलाते हैं। सर्वस्मिन्नप्यस्मिन्प्रमत्तयोगैकहेतुकथनं यत् । अनृतवचनेऽपि तस्मानियतं हिंसा समवतरति ॥९९।।

। पहले बता चुके हैं कि जिस जगह प्रमाद अर्थात बहुकपाय होते हैं वहाही हिंसा होती है। असत्य भाषण तथा झुठ बोलना भी कषाय के कारण से ही होता है, इसलिए असत्य वचन में हिंसा अवश्य होती है । हेतौ प्रमत्तयोगे निर्दिष्टे सकलवितथवचनानाम् । हेयानुष्ठानादेरनुवदन भवति नासत्यम् ।।१००॥ अनृत वचनों के सर्वथा त्यागी महा मुनीश्वर, हेयोपादेय का उपदेश बारम्बार करते हैं। पुराण और कथाओं में नाना प्रकार के अलङ्कार गर्भित नवरसपूर्ण विषयों का वर्णन करते हैं। पाप की निन्दा करते हुए, पापी जीवों को उनका उपदेश अप्रिय लगता है। कोई कोई उनको अपने प्यारे बन्धुओं तथा रिश्तेदारों को धर्मोपदेश देते हुए देख कर दुखी होते हैं । परन्तु उन आचार्यों को अनृत वचन का दोपनहीं लगता, क्योंकि उनके बचन कपाय प्रमाद सहित नहीं हैं । प्रमाद सहित योग से यथार्थ बचन बोलने का नाम ही अनृत है। भोगोपभोगमापनमात्र सावद्यमक्षमा मोक्तुम् । ये तेऽपि शेपमनृत समस्तमपि नित्यमेव मुश्चन्तु ||१०१।। मुनिराज तो सर्वथा ही समस्त अनृत का त्याग किया करते हैं, परन्तु गृहस्थों के अपने ससारिक कार्य सावद्य वचनों के बिना नहीं चल सकते। उनके लिए यह उचित है कि वह सावद्य को छोड़ बाकी समस्त अनृत वचनों का त्याग करें और सापद्य बचन भी केवल उतना ही कहें जितना उन्हें अपने भोग उपभोग के निमित्त लाचारी से कहने पड़े,बाकी उसकाभीत्यागकरें। मिथ्योपदेशदान रहसोऽभ्याख्यानकूटलेखकृती । न्यासापहारवचन साकारकमन्त्रभेदश्च ॥१८॥ सत्याणुव्रत के ५ अतिचार हैं। मिथ्योपदेश-शास्त्र के विरुद्ध कुछ का कुछ झूठा उपदेश देना । रहोभ्याख्यान-स्त्री पुरुषादि की गुप्त वार्ता ।

तथा गुप्त आचरणों को प्रकट करना-कूटलेख क्रिया-झूठे ख़त, कागज़ दस्तावेज़ादिक का लिखना, बनाना, जालीफर्जी दस्तावेज़ बनाना । न्यासापहार-कोई पुरुप रुपया, जेवर आदि द्रव्य धरोहर रख जावे, फिर मांगने आवे, यदि वह भूल कर थोड़ा मांगने लगे, उस से उस समय इस प्रकार कहना कि जितना और जो कुछ तुम्हारा हो ले जाओ, इस प्रकार जान बूझ कर पूरा द्रव्य न देना । साकार मन्त्र भेद-किसी के चेहरे आदि की चेष्टाओं से उसके मन का गुप्त अभिप्राय जानकर प्रगट कर देना, या कहीं चार आदमी गुप्त सम्मति कर रहे हो, उनके मुखादि की चेष्टा से उनका भेद जानकर के दूसरों को प्रगट कर देना जिससे उनकी हानि सम्भव है । इस प्रकार सत्यव्रत के स्वरूप को जानकर मोक्षाभिलाषी भव्यात्माओं को सत्यव्रत को ग्रहण कर अपना आत्म कल्याण करना चाहिए। अचौर्यव्रत अवितीर्णस्य ग्रहणं परिग्रहस्य प्रमत्तयोगाद्यत् । तत्प्रत्येयं स्तेयं सैव च हिंसा वधस्य हेतुत्वात् ।।१०२॥ लोभादि प्रमादों के योगसे, दूसरों के वस्त्रादिक पदार्थों को बिना उन के दिये अङ्गीकार करने का नाम स्तेय अर्थात् चोरी है। दूसरे की गिरी हुई पड़ी हुई वस्तु को उठा लेना, जबरदस्ती करके ले लेना, ठगी करके भोले मारकर किसी न किसी प्रकार स्वामी की आज्ञा बिना वस्तु का ले लेना चोरी है। चोरी करने में भी हिंसा होती है-अन्य जीव के प्राणघात करने के हेतु से, प्रमाद अर्थात् कषायमई भाव होते ही, चोरी करने वाले के भाव प्राणों का तो घात हो ही जाता है । चोरी प्रगट हो जाने पर राजा की ओर से दण्ड मिलने पर या मार पीट होजाने से उसके द्रव्य प्राणों का भी घात हो जाता है । जिस पुरुष की वस्तु चोरी जाती है, इष्टवस्तु के वियोग से उसके अन्तरङ्ग में पीड़ा होने के कारण उसके भाव प्राणों की हिंसा . होती है, वस्तु के हरण होने से उसके द्रव्य प्राणों का घात भी सम्भव है। प्रथम तो कभी कभी ऐसा होता है कि निमित्त पाकर, वियोग के कारण वस्तु का स्वामी आप ही अपना घात कर डालता है, दूसरे चोरी गई वस्तु के निमित्त से उसके द्रव्य प्राणों की पुष्टि होती थी, वह पुष्टि कम हो जाती है। इसलिए उस वस्तु के गुम हो जाने से स्वामी के द्रव्य प्राणों का घात ही अवश्य हो जाता है। अर्था नाम य एते प्राणा एते वाहिश्चरा. पुसाम् । हरति स तस्य प्राणान् यो यस्य जनो हरत्यर्थान् ।।१०३।। जिस प्रकार ससारी जीवों के, उन के जीवन के कारण मृत इद्रिय श्वासोश्वासादि अन्तरङ्ग के प्राण होते हैं, वैसे ही धन धान्य सम्पदा, बैल घोडा, दासी,दास,महल,जमीन, पुत्र,स्त्री, वस्त्राभूषण आदिक जितने पदार्थ पाये जाते हैं, वे सब उनके जीवन के कारण मृत बाह्य प्राण हैं। उन में से किसी एक पदार्थ का नियोग हो जाने पर, जीवों को प्राणघात के समान दुख होता है। इसी कारण जो जीव जिस के धनादिक वस्तु का हरण करता है, वह उस के प्राणों का ही हरण करता है। इस प्रकार चोरी में साक्षात हिंसा है। हिंसाया स्तेयस्य च नाव्याप्ति सुघटमेव सा यस्मात् । , ग्रहणे प्रमत्तयोगो द्रव्यस्य स्वीकृतस्यान्यै ॥१०॥ चोरी के इस लक्षण में कि जहा चोरी होती है, वहा हिंसा अवश्य होती है, अन्यात दुषण नहीं आता है, क्योंकि प्रमाद के पिना चोरी होती नहीं, और जैसा पहले बता चुके हैं, जहा प्रमाद होता है वहा हिंसा अवश्य होती है। नातिव्याप्तिश्च तयो प्रमत्तयोगेककारणविरोधात् । अपि कानुग्रहणे नीरागाणामविद्यमानत्वात् ।।१०।। । .

( ८० ) बिनादी हुई वस्तु के ग्रहण करने को चोरी कहते हैं, सो वीतराग अर्हन्त देव भी जिस समय द्रव्य कर्म, नोकर्म वर्गणाओं को ग्रहण करते हैं, तो उनको भी चोरी का दोष लगता है, क्योंकि वह वर्गणायें किसी की दी हुई तो नहीं होती । ऐसी तर्क करना ठीक नहीं है। वीतराग देव हिंसक नहीं हैं। मोहनीय कर्म के सर्वथा अभाव हो जाने से, प्रमाद योग रूप कारणों का भी अभाव है । इस लिए ऊपर कहे हुए चोरी के लक्षण में अति व्याप्ति दूषण भी नहीं आ सकता, क्योंकि प्रमाद् योग से, दुमरों की बिना दी हुई वस्तुओं के अङ्गीकार करने का नाम ही चारी है । कार्माण वर्गणाओं में चोरी का व्यवहार नहीं होता, क्योंकि जहां लेना देना रूप व्यवहार सम्भव होता है, वहां ही चोरी का दूपण आता है। इस प्रकार जहां चोरी है वहां हिंसा अवश्य है अर्थात स्तेय हिंसा रूप ही है। असमर्था ये कर्तु निपानतोयादिहरणविनिवृत्तिम् । तैरपि समस्तमपरं नित्यमदत्तं परित्याज्यम् ॥१०६|| चोरी का सर्वथा त्याग तो मुनि धर्म में ही हो सकता है । जो पुरुष सर्वथा त्याग करने के लिए असमर्थ हो, उन्हें एक देश त्याग तो अवश्य ही कर देना चाहिये । एक देश त्यागी (श्रावक) कुएँ, तालाब आदि का जल, खेत की साधारण मिट्टी आदि जिन के बिना दिए ग्रहण करने में संसार में चोर नहीं कहलाता,ग्रहण कर सकता है । ऐसी वस्तुओं के सिवाय बाकी और सब ही विना दी हुई वस्तुओं के ग्रहण करने का त्याग करना ही योग्य है । सर्वथा त्यागी तो जल तथा मिट्टी भी बिना दिए ग्रहण नहीं कर सकता। प्रतिरूपव्यवहारः स्तेननियोगस्तदाहृतादानम् । राजविरोधातिकम हीनाधिकमानकरणे च ॥१८५।।

कर, अचौर्याणु व्रत के ५ अतिचार हैं । स्तेन प्रयोग-चोरी करने के उपाय बताना, चोरी करने वालों की सहायता करना। तदाहता दान- चोरी का माल लेना। विरुद्ध राज्यातिकम-अप्रबन्ध या विरुद्ध राज्य का प्रबन्ध होने पर मर्यादा को उल्लघन कर वर्तना, नीति छोड़ कर लेन देन करना । हीनाधिक मान करण-लेन देन के वाट, तराजूगज आदि का कम ज्यादह रखना । प्रतिरूपक व्यवहार-अच्छी चीज में खोटी चीज मिला और अच्छी कह कर बेचना-कम कीमत वाली चीज को ज्यादह कीमत वाली चीज में मिला कर बढिया कह कर बेचना। शील तथा ब्रह्मचर्य व्रत यदेदरागयोगान्मैथुनमभिधीयते तद्ब्रह्म । अवतरति तत्र हिसा वधस्य सर्वत्र सद्भावात् ॥१०७॥ हिंस्यन्ते तिलानाल्या तप्तायसिविनहिते तिला यदत् । बहवो जीवा योनौ हिंस्यन्ते मेथुने तद्वत् ॥१०॥ पुरुष वेद, स्त्री वे, नपुसक वेद, इन तीनों वेदों के राग रूप योग से, स्त्री पुरुष का मिल कर काम सेवन करने का, या काम सेवन का पिचार करने का नाम ही अब्रह्म अर्थात कुशील है । हिंसा के बिना अब्रह्म होता ही नहीं । अब्रह्म में हिंसा का सब ही स्थानों में सद्भाव पाया जाता है । भैयुन सेवन में योनि और वीर्य के जीवों के द्रव्य प्राणों का घात तो अवश्य ही होता है। यदपि क्रियते किंश्चित्मदनोटेकादनगरमणादि । तत्रापि भवति हिंसा रागायुपीत्ततन्त्रत्वात् ॥१०९॥ ये निज कलत्रमात्र परिहर्तुशक्नुवन्ति नहि मोहात् । नि शेपशेषयोपिनिपेषण तैरपि न कार्यम् ।।११०॥ काम रूप परिणामों से स्त्री पुरुप दोनों के भाव प्राणों का घात होता ( ८२ ) है, शरीर में शिथिलतादिक अन्य निमित्तों के कारण द्रव्य प्राणों की भी हिंसा होती है । इसके सिवाय काम की तीव्रता के कारण मैथुन सेवन करने योग्य अङ्गों को छोड़, अन्य अङ्गों द्वारा जो अनङ्ग क्रीड़ा की जाती है, उसमें भी रागादिक कषायों की बाहुल्यता के कारण हिंसा अवश्य होती है। मैथुन सेवन का त्याग भी दो प्रकार का ही है,एक सर्वथा त्याग और दूसरा एक देश त्याग । इनमें से सर्वथा त्याग तो मुनि धर्म में ही हो सक्ता है। जहां तक बन सके सर्वथा त्याग करना ही योग्य है। यदि इतनी सामर्थ न होवे तो एक देश त्याग तो श्रावक को अवश्य ही करना चाहिए, श्रावक धर्म में अपनी विवाहिता स्त्री के सिवाय वेश्या, दासी, परस्त्री का सेवन करना सर्वथा त्याज्य है। स्मरतीभिनिवेशोऽनङ्गक्रीडान्यपरिणयन करणम् । अपरिगृहीतेतरयोगमने चेत्वरिकयोः पञ्च ॥१८६॥ ब्रह्मचर्याणु ब्रत के ५ अतिचार हैं । कामतीब्राभिनिवेश-काम सेवन की अत्यन्त अभिलाष रखना, वा काम क्रीड़ा में अत्यन्त मग्न रहना अनङ्गक्रीड़ा-काम क्रीड़ा के अङ्गों को छोड़ कर अन्य अङ्गों से काम-क्रीड़ा करनी । पर विवाह करण-दूसरे के लड़को,लड़कियों का विवाह करा देना। परिगृहीतेत्वरिकागमन-दूसरे की विवाही हुई शीलभ्रष्ट स्त्री के हां आना जाना, कुवचनालाप करना, कुचेष्टा करना। अपरगृहीतत्वरिकागमन-विना विवाही वेश्या दासी आदि से कुवचनालाप करना, कुचेष्टा करना ।ब्रह्मचर्य व्रत सर्वोत्कृष्ट और महादुद्धरव्रत है। ब्रह्मचर्य के बिना व्रत करना, तप करना सब व्यर्थ है। ब्रह्मचर्य के बिना अन्य सब कायक्लेश भी वृथा ही हैं। ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करने वाला समस्त लोगों के बन्दने योग्य होता है । देवगण, इन्द्र, अहमिन्द्रादिक सबही उसकी पूजा करते हैं। जो ब्रह्मचर्य व्रत को पालन करना चाहते हैं उन्हें नीचे लिखी परमागम की शिक्षा को अवश्यही अपने चित्त में धारण करना चाहिए। स्त्रियों की कथा तथा विषयोत्पादक विवरण सुनने, कहने तथा पढने का त्याग, स्त्रियों का रागरङ्ग, कौतूहल, या उनकी चेष्टाओं के देखने का त्याग । अपनी दृष्टि सदानीची ओर विकार रहित रखना । ब्रह्मचर्यव्रत पालन करने वाले को मेले, नाटक, सिनेमा, नाच आदि विकार बढाने वाले दृश्य नहीं देखने चाहिये। व्यभिचारी पुरुषों की सङ्गति से बचना चाहिए। मादक वस्तु का त्याग करो, ताम्योल, पुष्पमाला, अतर फुलेल आदि शील व्रत भङ्ग के कारणों को दूर से टालो गीत नृत्यादि कामोद्दीपन के कारणों का त्याग कगारात्रिभोजन का त्याग करो। विकार के कारण लोक विरुद्ध वस्त्राभरण मत पहनो । एकान्त में किसी भी स्त्री से ससर्गमत करो । रसना इन्द्रिय की लम्पटता छोडो। जिह्वा की लम्पटता के साथ साथ हजारों दोष उत्पन्न होजाते हैं। जिद्वा इन्द्रिय के लोलुपी पुरुष के सन्तोष नष्ट होजाता है, समताभाव कोवह स्वप्न में भी धारण नहीं कर सकता, उसकालोक व्यवहार नष्ट हो जाता है और ब्रह्मचर्यव्रत भी भङ्गहोजाता है। इस प्रकार ब्रह्मचर्य व्रत के स्वरूप को जान, इसकी रक्षा करना ही योग्य है। भव्यात्माओं को चाहिए कि कुशील सेवन को घोर अन्याय तथा महान पाप का कारण जान त्याग करें और शील व्रत को पुण्य प्राप्ति तथा कर्मों के क्षय का कारण जान ग्रहण करें परिग्रह परिमाण बत यामूर्छानामेद विज्ञातव्य परिग्रहो ह्येप । मोहोदयादुदीर्णो मूर्छा तु ममत्वपरिणाम ॥१११|| मूल ही परिग्रह है, मोह के उदय से भावों का ममत्वरूप परिणमन होना ही मूी है । परिग्रह का यह लक्षण अव्याप्ति या अतिव्याप्ति दूषण से रहित है।

मूर्छा लक्षणकरणात् सुघटा व्याीप्तः परिग्रहत्वस्य । सग्रन्थो मूर्छावान् विनापि किल शेप सङ्गेभ्यः ॥११२।। यदि कोई पुरुप सर्वथा नग्न है, अर्थात् सर्व प्रकार के बाह्य परिग्रह से रहित है, परन्तु अन्तरङ्ग में मृ» मौजूद है तो वह पुरुष परिग्रहवान ही कहलायेगा, परिग्रह रहित नहीं कहला सकता, क्योंकि जहां जहां मूर्छा होती है, वहां वहां परिग्रह अवश्य होता है। इस लिये परिग्रह का उपर्युक्त लक्षण अव्याप्ति दृषण से रहित है। यद्येवं भवति तदा परिग्रहो न खलु कोपि बहिरङ्ग। भवति नितरां यतोऽसौ धत्ते मूर्छा मिमित्तत्वम् ११३।। यहां कोई कहे कि यदि मूी ही परिग्रह को लक्षण है, तो वाह्य धन धान्यादिक पदार्थों में परिग्रहत्व सिद्ध नहीं होगा। इस का उत्तर यह ही है, कि वाह्य पदार्थ धन धान्य आदिक ही मूर्छा की उत्पत्ति के कारण हैं। इस लिए कारण में कार्य के उपचार से वाह्य पदार्थों में,परिग्रहत्व मिद्ध होता है। एवमतिव्याप्तिः स्यात्परिग्रहस्यति चेद्भवेन्नैवम् । यस्मादकपायाणां कर्मग्रहणे न मूर्छास्ति ॥११॥ यहां फिर कोई प्रश्न करे कि यदि बाह्य पदार्थों को मूर्छा का अवश्य कारण मानते हो तो परिग्रह के लक्षण में अतिव्याप्ति दूषण आता है। वीतरागी, नि:परिग्रही महान पुरुषों के कार्माण वर्गणायें ग्रहण करने में मूर्छा होगी, जिस को परिग्रह कह सकेंगे ? इस का उत्तर यह है कि मोह के सर्वथा अभाव होजाने के कारण वीतराग निःपरिग्रही महान पुरुषों के कार्माण वर्गाओं के ग्रहण करने में मूर्छा का सर्वथा ही अभाव है। और जहां मूछी नहीं है, वहां परिग्रह नहीं है । जहां परिग्रह है, वहां मूळ अवश्य है । इस प्रकार परिग्रह का उपर्युक्त लक्षण अतिव्याप्ति दृषण से भी रहित है।

अति सक्षेपाद विविध स भवेदाभ्यन्तरश्च बाह्यश्च । प्रथमश्चतुर्दशविधो भवति दिविधो द्वितीयस्तु ॥११५॥ परिग्रह दो प्रकार का होता है, एक अतरग, दूमरा वहिरग परिग्रह । मिथ्यात्ववेदरागास्तथैव हास्यादयश्च पड्दोष । चत्वारश्च कपायाश्चतुर्दशाभ्यन्तराग्रन्था ॥११६॥ अन्तरग परिग्रह के १४ मेद है, मिथ्यात्व, स्त्रीवेद, पुरुष-वेद, नपुसक-वेद,हास्य,रति,अरति,शोक,भय,जुगुप्सा,क्रोध, मान, माया,लोभा अथ निश्चित्तसचित्तो वाह्यस्य परिग्रहस्य भेदौ दो। नैप कदापि सङ्ग. सर्वोऽप्यतिवर्तते हिंसाम् ।।११७।। बहिरंग के परिग्रह के भी चेतन अचेतन दो भेद हैं। सोना, चान्दी, मकान,जमीन, वस्त्राभूषण, आदिक पदार्थ अचेतन परिग्रह कहलाते हैं । और पुत्र, स्त्री, दासी, दास, घोडा, हाथी, आदि पदार्थ चेतन परिग्रह हैं। कोई मी परिग्रह किसी समय हिंसा से खाली नहीं होता, अर्थात परिग्रह सदैव ही हिंसारूप है। उभय परिग्रहवर्जनमाचार्या सूचयन्त्यहिंसेति । विविध परिग्रहवहन हिंसेति जिनप्रवचनज्ञा ||११|| जैन सिद्धांतानुसार अन्तरग, बहिरग दोनों प्रकार के परिग्रह का त्याग अहिंसा है, और दोनों प्रकार के परिग्रह का अगीकार करना हिंसा है। हिसा पर्यायत्वात्सिद्धा हिंसान्तरङ्गसङ्गेषु । बहिरङ्गेपु तु नियत प्रयातु मुझेच हिंसात्वम् ॥११९॥ ऊपर कहे हुए अन्तरङ्ग के परिग्रह के १४ भेद तो सर्व ही हिंसा की पर्याय है, क्योंकि वे विभाव परिणाम हैं। इसलिए अन्तरग परिग्रह तो आपही हिंसा रूप है । वहिरग परिग्रह भी ममत्व भार के बिना अगीकार नहीं किया जाता, इसलिए उस में भी हिंसा है । ममत्व परिणामों के ( ८६ ) कारण ही तो परिग्रह होता है, अन्यथा नहीं । केवल भगवान के समव. सरण आदि विभूति होती है, परन्तु ममत्व के अभाव के कारण, वह परिग्रह संज्ञा नहीं पाती। एवं न विशेषः स्यादुन्दररिपुहरिणशावकादीनाम् । नैवं भवति विशेपस्तेषां मूछी विशेषण ॥१२०॥ यहां कोई प्रश्न करे कि यदि बहिरंग में ममत्व परिणाम का ही नाम परिग्रह है, तो चूहे के शत्रु बिलाव, और हरिण के बच्चे आदिक जीवों में खास कोई फर्क (विशेषता)न होगी ? ऐसा नहीं है, क्योंकि ममत्व परिणामों के फर्क के कारण इन जीवों में विशेषता अर्थात् फर्क है समानता नहीं है। हरित तृणाकुरचारिणिमन्दा मृगशावके भवति मूर्छा। उन्दर निकरोन्माथिनि मार्जार सैव जायते तीब्रा ॥१२१॥ हरी दूब के चरने वाले हरिण के बच्चे में तो मूर्छा मन्द होती है,क्योंकि प्रथम ही तो हरिण हरी दूब को ज्यादह लोलुपता के साथ तलाश ही नहीं करता, दूसरे यदि उसको दूब मिल भी जाती है तो खाते समय उसके बहुत सरागता नहीं होती । जरासी भी आहट आदि कारण पाने पर तुरन्त ही छोड़ कर भाग जाता है। इस प्रकार उसके ममत्व परिणाम थोड़े हैं । चूहों के समूह को विध्वंश करने वाले विलाव में वही मूर्छा तीव्र रूप होती है, प्रथम ही तो वह अपने शिकार को बड़ी ही लोलुपता से तलाश करता है,फिर शिकार के मिल जाने पर उसका बड़ी सरागता पूर्वक घात करता है, और संहार करते समय यदि उसके सिर पर लाठिये भी पड़ती हैं, तो भी वह उस शिकार को नहीं छोड़ता है । इस प्रकार बिलाव के ममत्व परिणाम तीव्र होते हैं। यह दो उदाहरण मन्द मूर्छा और तीव्र मूर्छा के दिए गए है। ठीक इसी प्रकार बहु आरम्भी, बहुपरिग्रही,और,तुच्छ आरम्भी, तुच्छ परिग्रही के परिणामों का भी फर्क जान लेना चाहिये। निर्वाध ससियेत्कार्यविशेपो हि कारणविशेपात् । औधस्य खण्डयोरिह माधुर्य्यप्रीतिभेद इव ।।१२२॥ माधुर्य्यप्रीति किल दुग्धे मन्दैव मन्दमाधुयें। सेवोत्कटमाधुर्ये खण्डे व्यपदिश्यते तीना ॥१२३।। यह बात भले प्रकार निश्चित है कि कारण की विशेषता से कार्य भी विशेषरूप होता है । थोडे मिठास वाले दूध में मिठास की रुचि थोडी ही कहीजाती है, और वही रुचि बहुत मिठास वाली खाड में अधिकक ही जाती है। जैसे दूध में मिठास थोड़ा होता है, और खाण्ड में ज्यादह मिठास होता है, तो मिष्टग्स का लोलुपी पुरुष थोडी मिठास के कारण दूध से कम प्रीति करता है,और ज्यादह मिठास के कारण खाड से ज्यादह प्रीति करता है। इसी प्रकार बाह्य कारणों के अनुसार ही अन्तरगपरिणाम हुआ करते हैं। यदि आरम्भ परिग्रह बहुत होता है, तो ममत्व भी बहुत होता है, और यदि आरम्भ परिग्रह थोडा होता है तो ममत्व भी थोडा होता है, किसी पुरुष के वर्तमान समय में परिग्रहथोड़ा होते हुए भी, अभिलापारूप ममत्वपरिणाम ज्यादह होते हैं, सो वह आगामी काल में बाह्य परिग्रह होने कासकरप करता है और यह ममत्र भाव है। यदि कोई पुरुषवाह्य परिग्रह को तो अगीकार करता जाये और कहे कि मेरे अन्तरगमें ममत्वभाव नहीं है,तो यह गलत है, क्योंकि विना ममत्व के परिग्रह का ग्रहण सर्वथानहीं हो सकता। इस वास्ते ममत्व परिणामों के नाश के लिए बाह्य परिग्रहण का त्याग मी जरूरी है। तत्वार्थाश्रद्धाने नियुक्त प्रथममेव मिथ्यात्वम् । सम्पदर्शन चौरा प्रथमकपायाश्च चत्वार ॥१२॥ प्रविहायचद्वितीयान् देशचरित्रस्य सन्मुखायात ।

(८८ ) नियतं ते हि कपायाः देश चरित्रं निरुन्धन्ति ॥१२५॥ निजशक्त्या शेषाणां सर्वेपामन्तरङ्गसङ्गानाम् । कर्तव्यः परिहारो माईवशौचादिभावनया ॥१२६॥ कषाय चार हैं, क्रोध,मान,माया, लोभ । इन चारों में से हर एक के चार चार भेद होते हैं-अनन्तानुबन्धी,अप्रत्यख्यानावरणीय,प्रत्याख्यानावरणीय, सचलन । इस प्रकार इन चारों कषायों के १६ भेद होते हैं। यह पहले बता चुके हैं कि तत्वार्थ के श्रद्धान न होने का नाम ही मिथ्यात्व है। मिथ्यात्व के अभाव होने पर और सम्यक् दर्शन के प्रकट होने पर कषायों की पहली चौकड़ी अर्थात् अनन्तानुवन्धी क्रोध,अनन्तानुबन्धीमान, अनन्तानुवन्धी माया,और अनन्तानुवन्धी लोभ तो विदा ही हो जाते हैं, क्योंकि यह सम्यक् दर्शन के चोर हैं। इनके होते हुए सम्यकत्व की प्राप्ति नहीं होती। दूसरे शब्दों में यह कह सकते हैं कि अनन्तानुबन्धी की चौकड़ी के क्षय हुए बिना या उपशम हुवे बिना सम्यक् दर्शन नहीं हो सकता। इनको अनन्तानुबन्धी भी इसी कारण कहा जाता है कि इनके होने से मिथ्यात्व होता है और मिथ्यात्व अनन्त संसार का कारण है। इनकी वासना भी अनन्त काल तक रहती है । अप्रत्यख्यानावरणी-अ+ईषत, थोड़ा+प्रत्या- ख्यान, त्याग+आवरण परदा, रुकावट डालनेवाला । अप्रत्याख्यानावरणी कषायों की मौजूदगी में श्रावक का एकोदेश चारित्र नहीं हो सकता । कषायों की यह दूसरी चौकड़ी निश्चयपूर्वक एकोदेश चारित्र को रोकती है, और इसी लिए इनको अप्रत्याख्यानावरणी कहते हैं। इनकी वासना छह महीने तक रहती है। प्रत्याख्यानावरण-क्रोध, मान, माया, लोभ सकलसंयम अर्थात मुनि चारित्र को रोकते हैं। कषायों की इस चौकड़ी के नाश से ही मुनिपद प्राप्त होता है इस चौकड़ी का वासना काल एकपक्ष का है।

संचलनकषाय-सयम के साथ दैदीप्यमान रहती है। सचलन कपाय की चौकडी और हास्य, रति, अगति, शोक, भय, जुगुप्सा और स्त्रीवेद, पुरुषवेद,नपुसकवेद इनके नाश से यथाख्यात चारित्र की प्राप्ति होती है। इस वास्ते जहा तक बन मके इन मन का त्याग ही करना चाहिये। जो न बने तो श्रावक धर्म में मिथ्यात्व अनन्तानुबन्धी कपाय की चौकड़ी, अप्रत्याख्यानाचरणी कषाय की चौक्डी का त्याग तो सर्वथा ही करना चाहिये । और बाकी जो और अन्तरग के परिग्रह है,उनका भी यथाशक्ति त्याग करना चाहिये। वहिरङ्गादपि सङ्गाद्यस्मात्मभवत्यसयमोऽनुचित । परिवर्जयेदशेप तमचित्त वा सचित्त वा ॥१२७॥ योऽपि न शक्यस्यक्तु बनधान्यमनुष्यवास्तुवित्तादि । सोऽपि तनूकरणायो निगृत्तिरूप यतस्तत्त्वम् ॥१२८॥ बाह्य परिग्रह के त्याग पिना,सयम,चारित्र का पालन नहीं हो सकता। इसी कारण चेतन, अचेतन दोनों प्रकार के परिग्रह का सर्वथा त्याग करना ही जी के लिये कल्याणकारी है, परन्तु जो पुरुष सर्वथा त्याग नहीं कर सक्ते, उन्हें जहा तक भी हो सके परिग्रह का त्याग ही करना चाहिये । तत्व त्यागरूप ही है । जितना जितना त्याग होता जाता है, उतना उतना ही आत्मस्वरूप प्रगट होता जाता है । इस प्रकार होते होते जिस समय सर्वथा त्याग हो जाता है, तर ही आत्मा मुक्त हो जाता है । इसी कारण मुक्ति का नाम निवृश्चि भी है। वास्तुक्षेत्राष्टापदहिरण्यपनधान्यदामदासीनाम् । कुप्यस्य भेदयोरपि परिमाणातिक्रिमा पञ्च ॥१८७॥ परिग्रह परिमाण अणुव्रत के ५अतिचार है। १--क्षेत्र वास्तु,२--हिरण्य, सुवर्ण,३-बनधान्य, मामी दास,५ कुप्य भाण्डाइन पाचोंके परिमाणको उलंघन करना परिग्रह परिमाण अणु व्रत के पांच अतिचार हैं। वास्तु-रहने के घर मकान आदि(मकनी जायदाद),क्षेत्र-धान्य आदि उपजने के स्थान (जरई जमीन); हिरण्य-रुपये, चांदी वगैरह,सुवर्ण-साना,मोने के गहने, सिक्के आदि,धन-गौ,बैल,भैंस आदि,धान्य-गेहूं,चने, चावल आदि दासी दास-टहल करने वाले चाकर,बाँदी आदि; कुप्य, भाण्ड-वस्त्र, वर्नन,चन्दन आदि इस प्रकार ये ५ जोड़ होते हैं, तव जिसने उपर्युक्त १० प्रकार की परिग्रह का नियम किया है, वह ५ जोड़े में हर एक जोड़े में हर एक में एक को घटाकर दूसरे को बढ़ा ले, मो अतिचार है । जैसे जमीन ज़रई (क्षेत्र) १० बीघा थी और मकान दो थे । मकान ३ कर लिये और जमीन ९ वीघा कर ली-यह अतिचार है। रात्रि भोजन त्याग रात्रौ भुञ्जानानां यस्मादनिवारिता भवति हिंसा । हिंसा विरतैस्तस्मात्त्यक्तव्या रात्रिभुक्तिरपि ॥१२९|| जो जीव रात्रि में भोजन करते हैं,वे अवश्य ही हिंमा के भागी होते हैं। इस वास्ते जो हिंसा के त्यागी होते हैं,उन्हें रात्रि में भोजन करने का अवश्य ही त्याग करना चाहिये। रागायुदयपरत्वादनिवृत्ति तिवर्तते हिंसाम् । रात्रिं दिवमाहरतः कथं हि हिंसा न सम्भवति ॥१३०॥ जिस जीव के तीव्र रागभाव होते हैं, वह त्याग नहीं कर सकता। जिनको भोजन से अधिक रागभाव हुआ करता है,वह ही रात दिन भोजन किया करते हैं, और जहां रागभाव होता है,वहां हिंसा अवश्य ही होती है। यद्येवं तर्हि दिवा कर्तव्यो भोजनस्य परिहारः । भोक्तव्यं तु निशायां नेत्यं नित्यं भवति हिंसा ॥१३|| नैवं वासरभुक्तैर्भवति हि रागोऽधिको रजनिभुक्तौ ।

अन्नकवलस्यभुक्तेर्भुक्ताविव मासकवलस्य ॥१३२॥ अर्कालोकेन विना भुञ्जानः परिहरेत कथ हिसाम् । अपि वोधित प्रदीपे भोज्यजुषां सूक्ष्मजीवानाम् ॥१३३।। किं वा बहुप्रलपितैरिति सिद्ध यो मनो वचनकायै । परिहरति रात्रिभुक्ति सततमहिंसा स पालयति ॥१३॥ इत्यत्र त्रितयात्मनि मागें मोक्षस्य ये खहितकामा । अनुपरत प्रयतन्ते प्रयान्ति ते मुक्तिमचिरेण ॥१३५॥ यहा कोई प्रश्न करे,कि यदि सदाकाल भोजन करने में हिंसा होती है, तो दिन में भोजन मत करो । रात्रि में भोजन कर लो। केवल रात्रि में आहार करने से सदाकाल हिंसा नहीं होगी। इसका उत्तर यह है कि ऐसा कहना ठीक नहीं है। क्योंकि उदरपूर्ति की अपेक्षा तो सब ही भोजन बरा- बर है, परन्तु अन्न के भोजन में जैसे साधारण भाव होते हैं, वैसे मास भोजन में नहीं होते, अन्न का भोजन तो सर्व जीवों को ही सहज मिलता है। माम भोजन में रागमात्र अविक होते हैं, मांस भोजन कामादि की अपेक्षा अथवा शरीर मोह की अपेक्षा विशेषरागपूर्वक किया जाता है । इसी प्रकार दिन के भोजन में तो साधारण रागभार भाव होता है और रात्रि में भोजन शरीरादि की अपेक्षा अथवा कामादि की अपेक्षा रागभाव अधिक ही होता है। इसी वास्ते रात्रि का भोजन त्यागने योग्य है । रात्रि भोजन करने में द्रव्य हिंसा भी बहुत होती है । रात्रि में यदि चिराग न जलाया जावे, तो अन्धेरे में भोजन करते समय बडे बडे जीवों की भी खबर नहीं रहती, और यदि चिगग जला लिया जावे,तो रोशनी से खिंचकर नाना प्रकार के अनेक छोटे बड़े कीट,पतङ्ग आदिक जीव एकत्र हो जाते हैं,भोजन में गिर पड़ते है । जिन जीवों का इस प्रकार घात होता है,उनकी हिंसाअवश्य ही होती इस लिये रानि भोजन करने वाला अवश्य ही हिंसा का भागी होती है। रात्रि भोजन का त्याग किये विना अहिंसा व्रत की मिडि नहीं होती। इसी कारण किसी किसी आचार्य ने तो इसको अहिंसाणुव्रत में ही गर्भित कर दिया है और किसी किसी ने इसको जुदा ही छठा अणु व्रत कह दिया है। श्रावक की ११ प्रतिमाएं हैं,उनमें से छठी प्रतिमा में प्रवेश होने पर नियमरूप से सर्वथा रात्रि को भोजन करने कराने का त्याग होता है। इसके पहले पांच प्रतिमाओं तक जल पानादिक का त्याग जितना बने उतना करे। सप्त शील व्रत परिचय इव नगराणि व्रतानि किल पालयन्ति शीलानि । व्रतपालनाय तस्माच्छीलान्यपि पालनीयानि ॥१३६|| पांच अणु व्रतों का वर्णन करने के बाद,अब सप्त शील व्रतों का वर्णन करते हैं। जैसे किसी नगर की रक्षा के लिये कोट(फसील) बनाया जाता है, उसी प्रकार तीन गुण व्रत और चार शिक्षा व्रत, सप्त शील व्रतों का पालन करना भी,पंच अणुव्रतों के पालन के निमित्त अवश्य बतलाया गया है। प्रविधाय सुप्रसिद्धैमर्यादां सर्वतोप्यभिज्ञानैः। प्राच्यादिभ्यो दिग्भ्यः कर्तव्या विरतिरविचलिता ॥१३७॥ दिग्वत-इस व्रत में उत्तर, दक्षिण, पूर्व,पश्चिम,ईशान,आग्नेय,नैऋत्य, वायव्य, अधो और ऊर्ध्व, इन दसों दिशाओं में गमन करने का परिमाण जीवन भर के लिये किया जाता है । यह परिमाण किसी प्रसिद्ध नगर, पर्वत,दरिया आदिक स्थानोंकी हद को लिये होता है। जैसे किसी पुरुष ने परिमाण किया कि पूर्व में वह देहली से आगे यावज्जीव नहीं जावेगा;तोवह दिग्व्रत का पालन करते हुए देहली से आगे पूर्व दिशा में कभी नहीं जावेगा। इसी प्रकार अन्यदिशाओं का भी जानना। पर्वतादि चढ़ने की अपेक्षा ऊर्ध्व दिशा का और कूप,खान,समुद्र आदि में नीचे उतरने की अपेक्षा अधो दिशा का परिमाण कर लेना बतलाया गया है। - इति नियमितदिग्भागे प्रवर्तते यस्ततो बहिस्तस्य । सकला सयमविरहाद्भवत्यहिसा व्रत पूर्णम् ॥१३०॥ जो पुरुष जितने क्षेत्र का परिमाण करता है,वह उतने ही क्षेत्र के अन्दर अन्दर, थोडा बहुत पच पापरूप असयम में प्रवृत्तक है,उससे बाहर के क्षेत्र की अपेक्षा तो वह सकल सयमी ही हो जाता है । इस वास्ते दिग्चत नाम गुण बत का धारण करना आवश्यक है। ऊर्वमधस्तात्तिर्यग्व्यतिकमा क्षेत्रवृद्धिराधानम् । स्मृत्यन्तरस्य गदिता पञ्चेति प्रथमशीलस्य ॥१८८|| दिग्नत के ५अतिचार हैं। 9-अतिक्रम-परिमाण से यादह ऊचाई के वृक्ष,पर्वतादिकों पर चढना। २-अधोतिक्रम-परिमाण से अधिक निचाई के कुयें, बारडी,समुद्र में उतरना। ३-तिर्यक् अतिक्रम-बिल, पर्वतादि की गुफाओं,सुग्ङ्गो आदि में टेढा जाना। ४-क्षेत्र वृद्धि-परिमाण की हुई दिशाओं के क्षेत्र से अधिक क्षेत्र वढा लेना । ५-स्मृत्यन्तराधान-दिशाओं की की हुई मर्यादा को भूल जाना। तत्रापि च परिमाण ग्रामापणभवनपाटकादीनाम् । प्रनिधाय नियतकाल करणीय विरमण देशात् ।।१३९।। इति विरतो वहुदेशात् तदुत्थहिसा विशेपपरिहारात् । तत्काल विरलमति श्रयत्यहिसा विशेपेण ॥१४॥ दिग्नत में जितने क्षेत्र की मर्यादा की जाती है, देश व्रत में उस ही क्षेत्र के अन्दर अन्दर काल की मर्यादा को लिये हुए, और भी थोडे क्षेत्र का परिमाण किया जाता है। जैसे किसी ने प्रतिज्ञा की कि मैं देहली सूने से बाहर कदापि जीवन भर नहीं जाऊँगा,यह दिग्वत हुआ।और फिर आगे वह यह और प्रतिज्ञा करता है कि मैं खास देहली शहर से बाहर एकमास तक कहीं नहीं जाऊँगा, या देहली के किसी खास मुहल्ले से बाहर १५ दिन तक नहीं जाऊँगा। यह देश व्रत हैं । दिग्वत और देश व्रत में यह ही अन्तर है कि दिग्नत तो सदाकाल के लिये अर्थात यावजीब होता है और देश व्रत में काल की मवींदापूर्वक वर्ष, छह महीन, पन्द्रह दिन, १ दिन, घण्टे, घड़ी, मिनट आदि के लिये न्याग किया जाता है, और देश व्रत में दिग्बत की अपेक्षा क्षेत्र भी थोड़ा होता है। देश नत में जितने काल के लिये जितने थोड़े क्षेत्र का परिमाण किया जाता है। उस काल के लिये वाकी वाहर के क्षेत्र की अपेक्षा तो मकल संयमी ही हो गया। देश व्रत, दिग्बत के भीतर ही किया जाता है। इस प्रकार देश व्रतकं धारण करने से विशेष हिंसा का त्याग होता है। प्रेप्यस्य सम्प्रयोजनमानयनं शब्दरूपविनिपातौ । क्षेपोऽपि पुद्गलानां द्वितीयशीलस्य पञ्चति ।।१८९।। देश व्रत के ५ अतिचार हैं। -प्रेग्य प्रयोग-परिमाण किये हुए क्षेत्र से बाहर आप न जाकर दूसरे मनुष्य सेवकादिकों को भेजना । २- आनयन-मर्यादा से बाहर के क्षेत्र की वस्तुएं मंगाना । ३-शब्दानुपात- मर्यादा से बाहर के क्षेत्र में तिष्टे हुए पुरुष को गन्द मुना कर अपना अभि प्राय समझा देना ! १-रूपानुपात-परिमाण किये क्षेत्र से बाहर तिष्टते हुए पुरुष को अपना रूप दिवाकर अथवा इनारों ने समझाकर काम कराना। ५-पुद्गल क्षेप-मर्यादा से बाहर के क्षेत्र में कङ्कर पत्थर आदि फेंक कर इशारा करना। अनर्थ दंड व्रत व्यर्थ ही निष्प्रयोजन पाप करने को अनर्थ-दंड कहते हैं, और व्यर्थ पाप करन के त्याग को अनर्थ-दंड व्रत कहते हैं। इस म्यूलरूप से पांच भेद हैं, जो आगे संक्षेप से वर्णन किये जाते हैं।

पापर्द्धिजयपराजयसङ्गरपरदारगमनचौर्याद्या । न कदाचनापि चिन्सा पापफल केवल यस्मात् ॥१४॥ अपध्यान अनर्थ दड व्रत-शिकार-जय, पराजय, पर स्त्रीगमन, पर द्रव्यहरण आदिक का कभी किसी समय भी चिन्तवन नहीं करना चाहिये। बिना प्रयोजन नाना प्रकार के पाप सम्बन्धी विक्ल्प करने से अपने तो किसी कार्य की सिद्धि नहीं होती पाप वन्ध अवश्य तीब हो जाता है । इस प्रकार के पापरूप विकल्पों के त्यागने का नाम ही अपध्यान अनर्थ दड व्रत है। विद्यावाणिज्यमपीकृपिसेवाशिल्पजीविना पुसाम् । पापोपदेशदान कदाचिदपि नेव वक्तव्यम् ॥१४२॥ पापोपदेश अनर्थ दड व्रत-विना प्रयोजन किसी पुरुष को आजीविका के कारण, विद्या, वाणिज्य,लेखन कला,खेती, नौकरी और शिल्प आदिक नाना प्रकार के काम तथा हुनर करने का उपदेश देना, पापोपदेश अनर्थ दड कहलाता है। ऐसे उपदेश से अपने को तो कोई लाभ होता नहीं, पार का बन्ध अवश्य हो जाता है। पापोपदेश अनर्थ दड के त्याग का ही नाम पापोपदेश अनर्थ दंड व्रत है। भूखननवृक्षमोहनशाहवलदलनाम्बुसेवनाादीनि । निष्कारण न कुर्याद्दलफलकुसुमोचयानपि च ॥१३॥ प्रमादचर्या अनर्थ दड बूत-बिना प्रयोजन जमीन का खोदना,वृक्षादिक को उखेड़ना, दुव आदिक हरी घास को रौंदना,या खोदना, पानी सींचना, फल फूल पत्रादिक का तोडना इत्यादिक पाप क्रियाओं का करना प्रमाद- चर्या अनर्थ दड है। गृहम्धीस जीनों की तोरक्षा नियम पूर्वक करताही है,बिनाप्रयोजन स्वार्थ केबममें होकर न्यावर जीवों का भी हिंसा नहीं करनी चाहिये।पिचार पूर्वर ही कार्य करना चाहिये। ऊपर कही हुई पाप क्रियाओं का त्याग करना ही प्रमादचर्या अनर्थ दंड व्रत कहलाता है। असिधेनुविपहुताशनलाङ्गलकरवालकार्मुकादीनाम् । वितरणमुपकरणानां हिंसायाः परिहरेद्यनात् ॥१४४|| हिंसा प्रदान अनर्थ दंड व्रत-खड्ग, बी, छुरी,तलवार,बन्दूक,पिस्तौल, जहर,अग्नि,तीर, भाला, करौंत, कस्सी कुदाल आदि अनेक हिंसा के उपका- रणों को दूसरे पुरुषों को मांगा देने का त्याग करना, हिंसा प्रदान अनर्थ दड व्रत है। हिंसा के जिन जिन उपकरणों बिना अपना काम न चले,उनको अपने प्रयोजन की सिद्धि के लिये रख लेवे, परन्तु बिना प्रयोजन दूसरों को न देवे, क्योंकि ऐसा करने से हिंसा का भागी व्यर्थ ही बनना पड़ता है। रागादिवर्द्धनानां दुष्टकथानामवोधबहुलानाम् । न कदाचन कुर्वीत श्रवणार्जनशिक्षणादीनि ॥१४॥ दुःश्रुति अनर्थ दंड व्रत-रागद्वेष, मोह आदिक विभाव भावों के बढ़ाने वाली, अज्ञान भाव से भरी हुई दुष्ट कथाओं को सुनना, बनाना, एकत्रित करना, या सीखना आदि का त्याग करने का नाम दुःश्रुति अनर्थ दंड व्रत है। दुष्ट शृंगारादि,तथा राजादि की वार्तारूप,राग द्वेष बढ़ाने वाली कथाओं के सुनने में,बनाने में कोई धर्म नहीं होता,व्यर्थ ही उपयोग लगाना पड़ता है। पापरूप कथन होने के कारण उपयोग भी पापरूप हो जाता है। पाप का बन्ध होता है, जिसका फल भोगना पड़ता है। इसी कारण खाटी पापरूप कथाओं का सुनना, संग्रह करना, सीखना इत्यादिक सब ही बातें त्यागने योग्य ही हैं। सर्वानर्थप्रथमं मथनं शौचस्य सझमायायाः। दूरात्परिहरणीयं चौ-सत्यास्पदं द्यूतम् ॥१४६॥ आगे आचार्य बताते हैं कि जुआ भी एक प्रकार का अनर्थ दण्ड है, इसका भी त्याग करना चाहिये, जुआ समस्त अनर्थों का सर्दार है ।

सन्तोष का नाश करने वाला, मायाचारी का घर और चोरी तथा झुठ का अड्डा है। एवविधमपरमपि ज्ञात्वा मुञ्चयनर्थदण्ड य । तस्यानिशमनवद्य विजयमहिंसाबत लभते ॥१४७|| साराश यह है कि जुआ खेलने में पाप का बन्ध अधिक होता है। इस लिये विवेकवान पुरुषों को इसे दूर से ही त्याग देना चाहिये । जो पुरुष इस प्रकार और भी अनर्थ दडों को जान कर उनका त्याग कर देते हैं, वह निरन्तर अहिंसा व्रत का निर्दोष पालन करते हैं। कन्दर्प. कौत्कुच्य भोगानर्थक्यमपि च मौखय॑म् । असमीक्षिताधिकरण तृतीयशीलस्य पञ्चेति ॥१९॥ अनर्थ दड चूत के ५ अतिचार है। कदर्प-राग भाव की अधिकता से हास्य मिश्रित भड बचन बोलना । कौत्कुच्य-रागभाव की तीव्रता से हास्य अशिष्ट भंड बचन बोलना और साथ में ही काय से भी निन्दनीय क्रिया करना। मौखर्य-धीठता से व्यर्थ ही प्रलाप करना,बकवासकरना। असमीक्ष्याधिकरण प्रयोजन के बिना विचारे अधिकता से प्रवर्तन करना(कार्य करना)। उपभोगपरिभोगनर्थक्य-भोगोपभोग के जितने पदार्थों से अपना काम चल सके उनसे ज्यादह का समह करना । इन उपयुक्त तीन शील व्रतो को गुण व्रत कहते हैं और इस लिये कहते हैं कि यह अणुव्रतों का मूल्य गुणन रूप बढा देते हैं। दिग्बत में मर्यादा करने से मर्यादा से बाहर के क्षेत्र का सब पाप टला। देशव्रत में क्षेत्र घटाया तब और भी पापटला। नियमित क्षेत्रों में भी वे मतलब पापन किया तव और भी पाप टला।अब आगे चार शिक्षा वनों का वर्णन करते हैं। रागदेपत्यागानिखिलद्रव्येषु साम्यमवलम्ब्य । तत्वोपलब्धिमूल बहुश सामायिक कार्यम् ।।१४।।

( १८ ) सामायिक-समस्त ही इष्ट अनिष्ट पदार्थों में राग द्वेष भावों का त्याग कर, समताभाव को ग्रहण कर,वारंवार शुद्ध चैतन्य स्वरूप की प्राप्ति का मूल कारण, सामायिक करना चाहिये। समय-सम, एक रूप हो कर+ अयः, स्वरूप से गमन करना; गमन करना; अर्थात् एक रूप हो कर निज स्वरूप में गमन करने का नाम समय है। और जिसका प्रयोजन "समय" है, वह सामायिक है । इस प्रकार साम्यभाव का नाम ही सामायिक है । अपने को सुखदायी इष्ट वस्तु में राग न करने,और अपने को दुःखदायी अनिष्ट वस्तु में हेष न करने को साम्यभाव कहते हैं, इस साम्यभाव के होने पर निज शुद्ध चेतन स्वरूप में मग्न होनाही परम कर्तव्य है। यदि यह न वन सके तो शुभोपयोग रूप भक्ति या तत्व विचार में प्रवृत्ति करना योग्य है, अथवा सामायिक सम्बन्धी दो नमस्कार, बारा आवत, चार शिरोनति, आदिक क्रिया काण्ड के करने में तत्पर होना चाहिये।नमस्कार-अङ्गों को धरती से लगा कर मस्तक के नवाने को नमस्कार कहते हैं। दोनों हाथों को जोड़ कर अपने बायें से दाहनी ओर घुमाने को आवर्त कहते हैं । आवर्त में जोड़े हुवे हाथों पर अपने मस्तक के झुकाने को शिरोनति कहते हैं। सामयिक की विधि-सामयिक करते समय प्रथम ही तो ईर्या पथ की शुद्धि करे, फिर पूर्व में या उत्तर में मुंह करके हाथ लटका कर खड़ा होवे नौ वार णमोकार मंत्र अपने मन में पढ़े और फिर मस्तक भूमि में लगा कर नमस्कार करे और मन में यह प्रतिज्ञा करे,कि जब तक सामायिक में हूं, जो कुछ मेरे पास है उसके सिवाय अन्य सर्व परिग्रह का त्याग करता हूं। फिर कार्योत्सर्ग खड़ा हो कर ना वार या तीन वार णमोकार मन्त्र पढ़े, तीन आवर्त और एक शिरोनति करे। फिर अपने दाहने की ओर खड़ा खड़ा हाथ लटकाये हुवे मुड़ जावे। इस ओर भी तीन बार या नव बार णमोकार मंत्र पढ़ तीन आवर्त और एक शिरोनति करे । इसी प्रकार शेष अन्य दो दिशाओं (Ek ) में भी करे । बाद में जिधर पहले मुह करके खड़ा हुवा था, उधर ही मुह करके बैठ जावे । पद्मासन या पल्यकासनजमालेवे या कायोत्सर्ग ही रहे। फिर काल का प्रमाण कर साम्यभाव सयुक्त शुभोपयोग रूप या शुद्धो- पयोगरूपरहे, अर्थात सामायिक पाठ पढे, जाप करे, या ध्यान का अभ्यास करे। इस प्रकार काल पूर्ण हो जाने पर जब पाठ, जाप ध्यान समाप्त हो जावे तो कायोत्सर्ग खडा हो जावे,या खड़ा हो तो वैसे ही नव बार णमो- कार मत्र पढे और अन्तिम दण्डवत कर सामायिक को पूर्ण करे। सामा- यिक के साधन से सहज स्वरूपानन्द की प्राप्ति होती है। रजनी दिनयोरन्ते तदवश्यभावनीयमविचलितम् । इतरत्र पुन समये न कृत दोपाय तद्गुणाय कृतम् ।।१४९॥ गृहस्थ के लिए एक दिन में कम से कम दो बार दोनों सन्ध्याओं के समय, चित्त की एकाग्रता पूर्वक सामायिक करना जरूरी है। इन दोनों सन्ध्याओं के सिवाय यदि किसी और समय में भी सामायिक की जावे तो कोई निषेध नहीं है। सामायिक केलिए योग्य क्षेत्र, योग्य काल, योग्य आसन, योग्य बिनय और इनके अतिरिक्त, मन, बचन, काय की शुद्धि की बडी आवश्यकता है । यह मनुष्य के भाव निर्मल और निश्चल करने में सहकारी होते हैं। सामायिक श्रितानां समस्तसावद्ययोगपरिहारात् । भवति महानतमेपामुदयेऽपि चरित्रमोहस्य ॥१५०॥ सामायिक करते समय समस्त पाप क्रियाओं का त्याग होता है । सामायिक के समय श्रावक के यद्यपि प्रत्याख्यानावरण चारित्र मोहनी का उदय होता है, परन्तु समस्त पाप क्रियाओं का सर्वथा त्याग होने के कारण महा व्रती सरीखा ही है।

वर सरतमा १०० ) 11 सामायिकसंस्कार प्रतिदिनमारोपितं स्थिरीकर्तुम् । पक्षार्द्धयोर्दयोरपि कर्त्तव्योऽवश्यमुपवासः ॥१५१|| रोजाना सामायिक की स्थिरता के लिए शुक्ल तथा कृष्ण पक्ष की अष्टमी और चतुर्दशी के दिन उपवास भी अवश्य ही करना चाहिए। वचनमनःकायानां दुःप्रणिधानं त्वनादरश्चैव । स्मृत्यनुपस्थानयुताः पञ्चेति चतुर्थशीलस्य ||१९१॥ सामायिक शिक्षा व्रत के ५ अतिचार हैं । मनोदुःप्रणिधान-सामायिक करते समय मन को अन्यथा चलायमान करना । वाग्दुःप्रणिधान-सामायिक करते समय वचन का अन्यथा चलायमान करना। कायदुःप्रणिधान-सामा- यिक करते समय काय का अन्यथा चलायमान करना अनादर-उत्साह रहित होकर अनादर से सामायिक करना । स्मृत्यनुपस्थान-सामायिक में एकाग्रता विना, चित्त की व्याग्रता से पाट्य क्रियाओं को भूल जाना । मुक्तसमस्तारम्भः प्रोषधदिनपूर्ववासरस्याद्धे । उपवासं ग्रहणीयान्ममत्वमपहाय देहादी ॥१५२|| श्रित्वा विविक्तवसतिं समस्तसावद्ययोगमपनीय । सन्द्रियार्थविरतः कायमनोवचनगुप्तिभिस्तिष्ठेत् ।।१५३।। धर्मध्यानासक्तो वासरमतिवाह्य विहितसाध्यविधिम् । शुचिसंस्तरे त्रियामां गमयेत्स्वाध्यायजितनिद्रः ॥१५॥ प्रातः प्रोत्थाय ततः कृत्वा तात्कालिक क्रियाकल्पम् । निर्वतयेद्यथोक्तं जिनपूजां प्रासुकैव्यैः ॥१५५|| उक्तेन ततो विधिना नीत्वा दिवसं द्वितीयरात्रिं च । अतिवाहयेत्प्रयत्नादर्द्ध च तृतीयदिवसस्य ॥१५६।। प्रोषध अष्टमी चतुर्दशी को दिन को कहत हैं। इन दिनों में इच्छा पूर्वक चारों प्रकार के आहार का त्याग करना और पाप क्रियाओं से छूट कर धर्म

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सेवन करने का नाम प्रोषधोपवास है । जिस दिन उपवास करना हो,उससे
पहले दिन मध्यान्ह के समय (दोपहर को) सर्व प्रसार के आरम्भ को
छोड,शरीरादिक से ममत्वभाव कात्यागकर उपपासधारण करे। इसके बाद
चित्त की शान्ति के निमित्त किसी निर्जन वस्तिका में जावे।समस्त पापरूप
योगों का त्याग करे।पाचोइन्द्रियों के सर्व विषयों से विरक्त होकर,मन गुप्ति,
बचन गुप्ति तथा काय गुप्ति सहित स्थिर होवे,अर्थात काय को निश्चल रक्खे।
यदि काय से कुछ चेष्टा करनी हो तो परिमाण पूर्वक क्षेत्र के ही अन्दर
अन्दर धर्म रूप करे। मौन धारण करे । यदि कुछ कहे तो थोड़े और धर्म
रूप वचन कहे और मन में किसी प्रकार का विकल्प न करे, यदि करे
तो धर्म रूप विकल्प करे । इस प्रकार उपवास करने वाला उपवास के
पहले दिन को धर्मध्यानपूर्वक व्यतीत करे, फिर पवित्र प्रासुक सथारे
पर पठन पाठन द्वाग निद्रा को जीत रात्रि को पूर्ण करे, प्रभात होते ही
प्रात काल सम्बन्धी सामायिकादि क्रियाओं को करके, प्रासुक द्रव्य से
शास्त्रोक्त विधि पूर्वक भगवत् की पूजा करे । जिस प्रकार उपवास ग्रहण
करने वाद उपवास के पहले दिन, रात्रि को पूर्ण किया,ठीक उसी प्रकार
उपवास के दिन को रात्रि को, और तीसरे दिन दोपहर तक के समय को
धर्म ध्यान आदिक शुभ क्रियाओं में ही यत्नाचार पूर्वक व्यतीत करे ।
इति य पोडशयामान् गमयति परिमुक्तसकलसावद्यः ।
तस्य तदानीं नियत पूर्णमहिंसा व्रत भवति ॥१५७॥
जो जीव इस प्रकार समस्त पाप कियाओं से रहित होकर उपवास
के १६ पहर को व्यतीत करता है वह अवश्य ही उतने समय तक निश्चय
पूर्वक सपूर्ण अहिंसा व्रत का पालन करता है।
भोगोपभोगहेतो स्थावरहिसा भवेत्किलामीषाम् ।
भोगोपभोगविरहाद्भवति न लेशोऽपि हिसायाः ॥१५॥

( १०२ ) वाग्गुप्तेर्नास्त्यनृतं न समस्तादानविरहतः स्तेयम् । नाब्रह्ममैथुनमुचः सङ्गो नाङ्गेप्यमूर्छस्य ॥ युग्मम् ॥१५९॥ देश व्रती श्रावकों के भोगोपभोग के निमित्त से स्थावर जीवों की हिंसा हुआ करती है, परन्तु उपवास में भोगोपभोग के त्याग से हिंसा का लेश भी नहीं होता। उपवास में अहिंसा व्रत का पालन न होने के अलावा,बाकी व्रतों का भी पालन होता है। उपवासधारी पुरुष के बचन गुप्ति होने से झूठ बोलना नहीं है। समस्त अदत्तादान के त्याग होने से चोरी नहीं है,मैथुन का सर्वथा त्याग होने से अब्रह्म नहीं है और शरीर में ममत्व भाव के अभाव के कारण परिग्रह भी नहीं है। इत्थमशेपितहिंसः प्रयाति स महाबतित्वमुपचारात् । उदयति चरित्रमोहे लभते तु न संयमस्थानम् ॥१६०॥ इस प्रकार प्रोषधोपवासवत के धारण करने वाले श्रावक को उपचार से महाव्रती कह सक्ते हैं, परन्तु प्रत्याख्यानावरण चरित्र मोहनी के उदय रूप होने के कारण, संयम के स्थान प्रमत्त गुण स्थान को वह नहीं पा सक्ता ।इस लिये पूर्णतया महाव्रतीन कह कर "महावती सरीखा"कह सकते हैं । इस प्रकार का एक उपवास भी बहुत कार्य कारी होता है, और जो उपवास केवल मान वड़ाई के निमित्त किये जाते हैं,वह चाहे जितन किये जावें, उन से किसी भी प्रयोजन की सिद्धि नहीं होती। यह १६ प्रहर का उत्कृष्ट प्रोषधोषवास है । मध्यम १२ प्रहर का है जैसे सप्तमी की संध्या से नौमी के प्रातःकाल तक । जघन्य८प्रहर का है,खानपान तो १२प्रहर ही छोड़े, परन्तु आरम्भ ८ प्रहर छोड़ सकता है । दूसरी विधि यह है कि १६ प्रहर धर्म ध्यान करे,आरंभ छोड़े। मध्यम में जल आवश्यकतानुसार पी सक्ता है । जघन्य में वीच के दिन एकासन भी कर सकता है।

( १०३ ) अनवेक्षिताप्रमार्जितमादान सस्तरस्तथोत्सार्ग । स्मृत्यनुपस्थानमनादरश्च पञ्चोपवासस्य ।।१९२॥ प्रोपयोपवासबत के ५ अतिचार हैं।अप्रत्येपेक्षिताप्रमार्जितोत्सर्ग-नेत्रों से देखे बिना व कोमल पिच्छिका से शोधन किये बिना भूमि पर मल मूत्रादि डालना । अप्रत्यवेक्षिताप्रमार्जितादान-बिना देखें, बिना झाडे,बिना शोधी हुई पूजन की सामग्री तथा उपकरणों को घसीट कर उठाना । अप्रत्यक्षिता प्रमार्जित सस्तरोपक्रमण-बिनादेखी, बिनाझाडी,विनाशोधी भूमि पर बैठने तथासोने का सथारा आदि करना ।स्मृत्यनुपसार-प्रोष गोपवासके दिन करी जाने वाली योग्य तथा आवश्यक क्रियाओं को भूल जाना। अनादर-उप- वास में भूख प्यास की बाधा हो जाने के कारण आवश्यकीय क्रियाओं में उत्साह रहित होकर प्रवर्तना । इस प्रकार जो जीव कपाय, विषय तथा आहार का त्याग कर, इस लोक परलोक सम्बन्धी भोगों की अभिलापा छोड, एक भी उपवास अतिचार रहित करते हैं, वह बहुत से कर्मों की निजरा कर डालते हैं। और जो विषय कषायों के छोडे विना केवल आहार मात्र ही को छोडते हैं,और गृहस्थ सम्बन्धी कारोवार को भी करते रहते है, बे देह को वृथा ही कष्ट देते हैं। कर्मों की निजरा लेशमात्र भी नहीं करते हैं। भोगोपभोगपरिमाण शिक्षावतभोर-जो वस्तु एक बार भोगी जावे, उसे भोग कहते हैं जैसे भोजन, पुष्प आदिक । भोगोपभोग-जो बस्तु चारचार भोगने में आवे उसे उपभोग रहते हैं,जैसे वस्त्र,जेनर, सवारी आदि। भोगोपभोगमूला विस्ताविरतस्य नान्यतो हिसा । अधिगम्य वस्तुतल स्वशक्तिमपि तावपि त्याज्यौ ॥१६॥ देश व्रती श्रावक के भोग और उपभोगों के निमित्त से ही थोडी बहुत हिंसा हुवा करती है । इस लिये उससे बचने के बारते वस्तु के स्वरूप को जानना चाहिये, कि किस वस्तु के सेवन करने में पाप ज्यादह होता है, ( १०४ ) और किस में कम। बस्तु के स्वरूप को जानने के बाद अपनी सामर्थ्य तथा अपने परिणामों और शरीर की शक्ति को भली भान्ति जांच कर उसके अनुसार भोगोपभोग का त्याग करना चाहिये । एकमपि प्रजिघांसुर्निहन्त्यनन्तान्यतस्ततोऽवश्यम् । करणीयमशेषाणां परिहरणमनन्तकायानाम् ॥१६२॥ साधारण बनस्पति तथा अन्य पदार्थ जो अनन्त काय होते हैं अभक्ष्य हैं। उन का त्याग करना जरूरी है। यहां प्रसंग वश यह बताना जरूरी मालूम होता है कि साधारण तथा अनन्त काय किसे कहते हैं। यह पहले बता चुके हैं कि स्थावर जीव पांच प्रकार के होते हैं-पृथ्वी, अप, तेज, वायु और बनस्पति।इन में से बनस्पति के दो भेद हैं,साधारण और प्रत्येक । साधारण उसे कहते हैं जिसके एक शरीर में अनन्त जीव स्वामी पाये जावें जैसे कंद । कंद कभी भी प्रत्येक अवस्था को प्राप्त ही नहीं होते,साधारण ही रहते हैं । कन्द का शरीर ही जीवराशि का पिण्ड होता है, उस में अनन्त जीव उत्पन्न होते रहते हैं, और उस कंद को बढ़ाते रहते हैं। प्रत्येक बनस्पति उसे कहते हैं जिस के एक शरीर में एक ही जीव स्वामी पाया जावे।प्रत्येक बनस्पति के भी दो भेद होते हैं। सप्रतिष्ठित और अप्र- तिष्ठित। निगोद सहित प्रत्येक बनस्पति को सप्रतिष्ठित कहते हैं। दूब,बेल, छोटे वृक्ष आदि,या ऐसी वनस्पतिये जिनमें लंबी लंबी रेखायें,गांठे या सन्धिये नजर न आवे,अथवा जो काटने के बाद फिर उगसके, जिनके तन्तुन हों, अथवा जिनमें तोड़ने पर तन्तु नलगे रहें सप्रतिष्ठित कहलाती हैं । निगोद रहित प्रत्येक बनस्पति को अप्रतिष्ठित कहते हैं। जिनमें रेखा,गांठे,संधिये साफ नजर आयें,जोकाटने के बाद फिर न उग सके, जिनमें तन्तुहोवें, और जिनमें तोड़ने पर तन्तु लगे रहें, उन्हें अप्रतिष्ठित कहते हैं । उपर्युक्त सप्रति- ठित बनस्पति को साधारण भी कहते हैं इस साधारण बनस्पति में अनन्त ( १०५ ) जीव पाये जाते हैं । इस वास्ते इसको अनन्तकाय कहते हैं । उदाहरण- अदरक आदि साधारण वनस्पतियों में लोक के जितने प्रदेश हैं, उन से असख्यात गुणे जीव तो प्रत्येक शरीर में पाये जाते हैं, जिन्हें सकन्ध कहते हैं, जैसे अपना शरीर । इन स्कन्धों में असख्यात लोक प्रमाण अन्डर पाये जाते हैं, जैसे शरीर में हाथ पांव आदि। एक अन्डर में असख्यात लोक प्रमाण पुलवी पाये जाते हैं, जैसे हाथ पाव में उगली आदि । एक पुलबी में असख्यात लोक प्रमाण आवास पाये जाते हैं, जैसे अगुली में तीन पोरी । एक आवास में असख्यात लोक प्रमाण निगोद पाये जाते हैं,जैसे अगुली के एक भाग में अनेक रेखायें पायी जाती हैं। एक निगोद शरीर में सिद्ध समूह से अनन्त गुणे जीव पाये जाते हैं। जैसे एक रेखा में अनेक प्रदेश । इस प्रकार एक सप्रतिष्ठित वनस्पति के टुकड़े में अनन्तजारों का अस्तित्व पाया जाता है । एक हरित काय में अप्र- तिष्ठित प्रत्येक शरीर असंख्यात या संख्यात पाये जाते हैं, उन में जितने शरीर होते हैं उतनेही जीव पाये जाते हैं। इस लिये जिह्वा इन्द्रिय के जरा से स्वाद के लिये अनन्त जीवों का घात करना सर्व प्रकारअनुचित है। नवनीत च त्याज्य योनिस्थानं प्रभूतजीवानाम् । यदापि पिण्डशुद्धौ विरुद्धमभिधीयते किञ्चित् ॥१६॥ दही में से निकाले हुए मक्खन को यदितत्काल ही अग्नि पर ता कर घी न बना लिया जाये, तो वह दो ही घड़ी बादअनन्त जीवरूप होजाता है । व्रती गृहस्थ को इसका त्याग अवश्य ही करना चाहिए। इसके सिवाय आचार ग्रन्थों में जिन जिन वस्तुओं को अभक्ष्य बताया गया है, उनका भी अवश्य त्याग करना चाहिये-जैसे चर्म स्पर्शित घी, तेल,जल,होग,दूध, दही,मीठा,अनजानफल,अनछाना पानी, वीझा हुआ अन्न, अचार,मुरब्बा, बैंगन,बहुवीजा आदि वस्तुए जिनका शास्त्र में निषेध किया गया है। कच्चा ( १०६ ) दूध अन्तर्मुहूर्त (४८मिनट)के बाद पीने योग्य नहीं रहता, दही २४घण्टे बाद अयोग्य हो जाता है। योग्य मर्यादा से बाहर का आटा, लाडू, मीठा आदि भी अभक्ष्य हो जाते हैं । छना हुआ जल पीना योग्य है,छलना गाढ़े कपड़े का हो, छलने को दोहरा करके जल छानना चाहिये। छने हुए जल की मर्यादा अन्तर्मुहूर्त की है, जो जल लवंग आदि डालकर प्रासुक कर लिया जाता है, उसकी मर्यादा दो पहर की है। उबले हुए जल की मर्यादा आठ पहर की है। अविरुद्धा अपि भोगा निजशक्तिमवेक्ष्य धीमता त्याज्याः। अत्याज्येष्वपि सीमा कार्यैकदिवानिशोपभोग्यतया ॥१६॥ विवेकवान पुरुष जो मोक्षाभिलाषी होते हैं, अयोग्य पदार्थों का तो आजन्म त्याग कर ही देते हैं,परन्तु यथाशक्ति उनको योग्य पदार्थों का भी त्याग करना चाहिये । यदि किसी में योग्य पदार्थों के त्याग करने की शक्ति न हो तो वे उन पदार्थों को नियमित मर्यादा करके एक दिन, दो दिन के लिये तो अवश्य छोड़ दिया करें । त्याग दो प्रकार का होता है, एक यम रूप और दूसरा नियम रूप। नियम रूप किसी पदार्थ के जीवन पर्यन्त छोड़ देने को यम और वर्ष मास, पक्ष, दिन, घंटे आदि की मर्यादा रूप छोड़ने को नियम कहते हैं । अयोग्य पदार्थों का त्याग तो यम रूप से किया ही जाता है, योग्य पदार्थों के जीवन पर्यन्त त्याग की यदि शक्ति न हो, तो वह नियम रूप वर्ष महीना दिन, घंटे की मर्यादा पूर्वक त्याग किये जा सकते हैं। गृहस्थ को नीचे लिखे १७ प्रसिद्ध दैनिक नियमों को निरन्तर ग्रहण करना चाहिये। १-भोजन कितनी बार ग्रहण करे,२-पीने की चीजें कितनी और कै बार, ३-छहों रसों में से कौनसा छोड़ना कौनसा ग्रहण करना,४-तेल साबुन उबटना के बार लगावना,५-फूल सुंघना कै बार,६-पान तंबोल खाना कै बार,७-सांसारिक गाना बजानाकै बार,८-सांसारिक नृत्य 2 (१०७) देखना कैवार,९ काम सेवन,१०.नान कैवार,११ वस्त्र कितनेजोडे,१२- जेवर कितने,१३-बैठने के आसन कितने,१४-सोने की शय्या कितनी,१५. सवारी कितनी और कै बार,१६-हरी सनजी तथा सचित्त वस्तु कितनी, १७-कुल खाने पीने की वस्तुओं की सख्या।इन में से जिस किसी को न भोगना हो उस को सर्वथा त्याग देवे। पुनरपि पूर्वकृतायां समीक्ष्य तात्कालिकी निजां शक्तिम् । सीमन्यन्तरसीमा प्रतिदिवस भवति कर्तव्या ॥१६५।। एक बार भोगोपभोग परिमाण व्रत ग्रहण करने के बाद, अपनी शक्ति अनुसार मर्यादा में भी मर्यादा कर लेनी चाहिये। इति य परिमितभोगे सन्तुष्टस्त्यजति बहुतरान भोगान् । बहुतरहिंसाविरहात्तस्याऽहिंसा विशिष्टा स्यात् ।।१६६॥ जो श्रावक इस प्रकार भोगोपभोगों का निरन्तर त्याग करते हैं उन के लोभ कपाय के त्याग से सतोप प्रगट हो जाता है, और हुवे भागोपभोग सम्बन्धी हिंसा का भी त्याग हो जाता है, और उनके, अहिंसा व्रत में वृद्धि होती है। आहारा हि सचित्त सचित्तमिश्रस्सचित्तसम्बन्ध । दुप्पकोऽभिपवोपि च पञ्चामी पष्टशीलस्य ॥१९३।। भौगोपभोग परिमाण जन के ५ अतिचार है। सचित्ताहार-सचित्त त्यागी होकर जीव सहित सचित्त वस्तु का आहार करना। सचित्त मित्राहार- रयागी हो पर सचित्त यस्तु ने मिली हुई वस्तु का आहार करना ।सचित्त सम्पन्याहार-सचित्त त्यागी हो कर सचित्त बस्तु से ईई ईई वस्तु का आहार करना-जमे हरे पत्ते पर रखा हुआ दही साना। दुपकाहार-कच्चा पका आहार-जोअग्नि में अच्छी तरह पकाने में न आया हो, अथवा ऐसा आहार जो हजम न हो सके । अभिष व सामोत्पादक-कामोद्दीपक,पुष्टि- त्याग किये - - (१०८ ) कारक आहार करना। अतिथि संविभाग शिक्षा व्रत विधिना दातृगुणवता द्रव्यविशेपस्य जातरूपाय । स्वपरानुग्रहहेतोः कर्तव्योऽवश्यमतिथये भागः ॥१६७।। अतिथि (जिन का आना तिथि के नियम रहित होता है) साधु को भक्ति पूर्वक दान देकर भोजन करना, अपने कुटुम्ब के लिये बनाये भोजन में से उत्तम, मध्यम, जघन्य तीन प्रकार के पात्रों को भक्ति पूर्वक दान देने को अतिथि सैविभाग कहते हैं। यह गृहस्थ के नित्य पट कर्मों में से एक है। इस प्रकार का दान, देने वाले और लेने वाले दोनों के लिये ही उपकारी होता है। दातार को उत्तम पात्र को दान देने से विशेष पुण्य का बन्ध होता है, पात्र को ज्ञान संयमादि की वृद्धि रूप फल होता है । दान दो प्रकार होता है एक पात्र दान, दूसरा करुणा दान । सङ्ग्रहमुच्चस्थानं पादोदकमर्चनं प्रणामं च । वाकायमनः शुद्धिरेपणशुद्धिश्च विधिमाहुः ॥१६८|| उत्तम पात्रों को दान नवधाभक्ति पूर्वक दिया जाता है पात्रों को अपने और उनके गुण विचार कर यथोचित विधिपूर्वक दोन दना चाहिये अपात्रों को भक्तिपूर्वक दान नहीं देना चाहिये,क्योंकि विषय कषाययुक्त अश्रद्धानी पापी जीवों का आदर सत्कार करने से पाप का बन्ध होता है । अपात्रों को दुःखी पीड़ित देखो तो उन पर दयाभाव करके उनका दुःख कष्ट अवश्य ही दूर कर दो,परन्तु उनके प्रति भक्तिभाव न करो; क्योंकि भक्तिभाव करने से उनके पाप की अनुमोदना होती है। नवधाभक्ति १-भक्तिपूर्वक पड़गाह कर घर में ले जाना, २-उच्च आसन देना, ३-चरण प्रक्षालन करना, ४-नमस्कार करना, ५-पूजा करना, ६-मन शुद्धि, ७-बचन शुद्धि ८- काय शुद्धि, ९-आहार शुद्धि अर्थात देने योग्य शुद्ध आहार का देना । १ ( १ ) दाता के सात गुण यह हैं ऐहिकफलानपेक्षा क्षान्तिनिष्कपटतानसूयत्वम् । अविपादित्वमुदित्वे निरहकारित्वमिति हि दातृगुणा ॥१६९।। १-इस लोक सम्बन्धी फल जैसे रत्न वृषि, यश, सौभाग्य आदि की चाह का न होना,२-क्षमा,३-निष्कपटता अर्थात् कपट न हो,कि बाहर से तो भक्ति करे अन्तरङ्ग में उसे बुरा जाने, ४-दूसरे दातार से ईर्षाभाव न रक्खे, ५-अखिन्नभार अर्थात ऐसा भाव न करे कि अमुक अच्छी वस्तु हमारे लिये थी, हमने यही व्यर्थ उनको दान में देदी,६-दान देकर अपने चित्त में हर्षित होना, ७--निरभिमानता,दान देकर अहकार का यह भाव न करे कि हम बडे दातार हैं। दानदाता इन गुणों से सयुक्त होना चाहिये। दान का फल दातार के इन गुणों के न्यूनाधिक होने के अनुसार होता है। रागदेपासयममददु खभयादिक न यत्कुरुते । द्रव्य तदेव देय सुतप. स्वाध्याय वृद्धिकरम् ॥१७०॥ दान देने योग्य पदार्थ-जिन वस्तुओं के देने से राग, द्वेष,मान,दुख, भय आदिक पापो की उत्पत्ति होती है, वह देने योग्य नहीं। जिन वस्तुओं के देने से तपश्वरण, पठन पाठन, स्वाध्यायादि कार्यों में वृद्धि होती है,वही देने योग्य हैं। रागादिक भावों के उत्पन्न करने वाले, पृथ्वी, मकान,घोड़ा, हाथी,मोना,चादी,शस्त्रादि अथवा कामोद्दीपनादिक विकार पैदा करने वाले पदार्थ या विष आदिक दु.ख देने वाले पदार्थ दान देने योग्य नहीं है । इन वस्तुओं के निमित्त से दान लेने वालाजो पाप बन्ध करता है उसका फल दान देने वाले को भी सहायक कारण होने से भोगना पडता है । इस लिये ऐसी वस्तुयें ही दान देने योग्य हैं कि जिनके देने से विकार भाव उत्पन्न न हो, और तपश्चरण आदि गुणों की वृद्धि हो।क्षुधा मेटने के निमित्त आहार दान, रोग दूर करने के लिये औषधि दान,अज्ञान दूर करने के लिये शास्त्र दान ३ ( १२० ) अथवा ज्ञान दान, भय निवारण के निमित्त अभय दान देना ही श्रेष्ठ है। अथवा यह चार प्रकार का दान ही योग्य है,और पुण्य बन्ध का कारण है। पात्रं त्रिभेदमुक्तं संयोगो मोक्षकारणगुणानाम् । अविरतसम्यग्दृष्टिः विरताविरतश्च सकलविरतश्च ।।१७१|| दान के पात्र-जो दान लेने वाले पुरुष सम्यक् दर्शन सम्यक्ज्ञान और सम्यक् चारित्र रूप रत्न त्रय से संयुक्त होते हैं, वेही पात्र कहलाते हैं। पात्र के ३ भेद हैं, उत्तम, मध्यम और जघन्य । सकल चारित्र के धारक सम्यक्त युक्त मुनिराज तोउत्तम पात्र, देश व्रती श्रावक मध्यमपात्र और अव्रती सम्यक् दृष्टि जघन्य पात्र होते हैं । पात्र को जिस भाव से दान दिया जाता है, दाता को वैसा ही फल मिलता है। सत्पुरुषों को दान देना कल्प वृक्ष के समान है । शोभा भी होती है, और मन बांछित फल की प्राप्ति भी होती है । लोभी, लम्पटी, पापी पुरुषों को दान देना मुर्दे के विमान कैसी शोभा रखता है । मुर्दे के विमान निकालने में शोभा तो है, परन्तु कुटुम्बियों को कोई सुख न होकर छाती कूटना ही होता है। ठीक इसी प्रकार अपात्र को दान देने से शोभा तो होती है, परन्तु दाता को महापाप का बन्ध होता है। हिंसायाः पर्यायो लोभोऽत्र निरस्यते यतो दाने । तस्मादतिथिवितरणं हिंसाव्युपरमणमेवेष्टम् ॥ १७२ ।। लोभ कषाय हिंसा का ही एक पर्याय है, लोभ के त्याग किए बिना दान नहीं दिया जा सकता । इस लिए दान में लोभ का त्याग होने के कारण अहिंसा धर्म का पालन भी सिद्ध होता है। गृहमागताय गुणिने मधुकरवृत्त्या परान पीडयते । वितरति यो नातिथये स कथन हिलोभवान् भवति ॥१७॥ जैसे भौंरा भ्रमता भ्रमता जहां बने वहां से फूलों को किसी प्रकार भी कष्ट न पहुचाता हुवा, उनकी वासना को लेलेता है, ठीक उसी प्रकार तपोधन के धारक परम वैरागी मुनिराज भी जहा आहार की योग्य विधि बने, वहा दातार को किसी प्रकार भी बाधा न पहुचाते हुवे आहार लेते हैं। ऐसे सन्तोषी, परम उदासीन वृत्ति के धारक साधु को भी जो दान नहीं देते, वे अवश्य ही लोभी हैं। कृतमात्मार्थ मुनये ददाति भक्तमिति भावितस्त्यागः । अरति विपाद विमुक्त शियलितलोभो भवत्सहिसव ॥१७॥ इस अतिथि संविभाग व्रत में द्रव्य अहिंसा तो परजीवों को दुख दूर करने के निमित्त प्रत्यक्ष ही है, रही भावित अहिंसा, वह भी लोभ कपाय के त्याग की अपेक्षा समझनी चाहिये। परदातृव्यपदेश. सचितनिक्षेपतत्पिधानेच । कालस्यातिक्रमण मात्सर्य चेत्यतिथिदाने ॥१९॥ - अतिथि सविभाग व्रत के ५ अतिचार हैं। १ परदातृव्यपदेश-अपने हाथ से दान न देना, दूसरे से कह कर दान दिलाना, दूसरे की वस्तु दान देना, २ सचित्त निक्षेप-कमल पत्रादिक सचित्त वस्तुओं में आहार रख कर देना । ३ सचित्ताभिधान-सचिच कमलादि पत्रों से ढके हुवे आहार को दान में देना। ४ कालातिकम-दान देने के काल को उल्लघन कर के अकाल में आहार देना, आहार का समय भूल जाना, ५ मात्सर्य- अनादर से देना, या अन्यदातार से ईर्षा भाव कर के दान देना । जिस प्रकार अच्छी पृथ्वी में बोया हुवा छोटा सा भी वड़ का बीज अपने समय पर बड़ी भारी छाया को और बहुत से फलों को देता है, उसी प्रकार पात्र को दिया हुवा थोडासा भी दान जीवों के लिये समय पर वडीभारी विभूति और इच्छानुसार अनेक फलों को देता है।" (समतभद्र आचार्य)।

( ११२ ) सल्लखना मरण का काल निकट होने पर श्रावक शान्त भाव से अपने शरीर का त्याग करे, इस लिये आहार और कषाय के त्याग रूप सलेखना की भावना निरन्तर करनी योग्य है । सम्यक् प्रकार से काय व कषाय के क्षीण करने को सल्लेखना कहते हैं । सल्लेखना के दो भेद हैं, एक अभ्यन्तर सल्लेखना, और दूसरी बाह्य सल्लेखना । अन्तरङ्ग में क्रोधादिक कपार्यों के क्षीण करने को अभ्यन्तर सल्लेखना कहते हैं। अनुक्रम पूर्वक आहार को घटा कर अथवा सर्वथा त्याग करके काय के क्षीण करने को वाह्य सल्लेखना कहते हैं। इयमेकैव समर्थाधर्मस्वं मे मया समं नेतुम् । सततमिति भावनीया पश्चिमसल्लखना भक्तया ॥१७५॥ अन्त समय सल्लेखना की भावना इस प्रकार करनी चाहिये, कि इस मनुष्य भव में जो व्रत नियमादि का पालन करके मैंने धर्मरून धन कमाया है, उसे मेरे साथ परलोक में ले जाने के लिये केवल सल्लेखना ही सामर्थ है। यदि मरणान्त समय में सल्लखना न धारण कर सके और परिणाम भ्रष्ट हो जावें तो दुर्गति में जाना पड़ेगा। इस लिये अन्त समय में सल्लेखना अवश्य ही अङ्गीकार करनी चाहिये । मरण दो प्रकार का होता है-एक नित्य मरण और दूसरा तन्द्व मरण । आयु श्वासोश्वासादिक दश प्राणों का जो समय समय वियोग होता है, उसे नित्य मरण कहते हैं । और जन्म के नाश होने को तन्द्रव मरण कहते हैं। मरणान्तेऽवश्येमहं विधिना सल्लेखनां करिष्यामि । इतिभावनापरिणतो नागतमपि पालयेदिदं शीलम् ।।१७६।। सल्लेखना काधारण अन्त समय में होता है,परन्तु जीव की आयु समय समय घटती ही जाती है, जिस से निदान मरण ध्रुव है । इस लिये पहले । ११३ ) ही ऐसी प्रतिज्ञा कर लेनी चाहिये कि 'मैं मरण समय सन्यास अवश्य ही धारण करूगा। इस प्रतिज्ञा की अपेक्षा यह व्रत पहले ही पाला हुवा समझा जावेगा। यहा कोई प्रश्न करे कि सल्लेखना धारण करने में तोअप- धात होता है, आचार्य उसका समाधान इस प्रकार करते हैं। मरणेऽवश्यभाविनि कपायसल्लेखना तनूकरणमात्रे । रागादिमन्तरेण व्याप्रियमाणस्य नात्मघातोऽस्ति ।।१७७॥ जब जीव यह निश्चय कर लेवे कि अव मेरा मरण समय निकट ही है, तो उस समय सल्लखना व्रत को धारण करे और उस दशा में विषय कपायादिक को घटाने और राग द्वेष मोहादिक भावों का अभाव करे । ऐसा करने में आत्मघात का दोष नहीं लगता। जैसे कोई व्यापारी अपने मकान में आग लग जाने पर, पहले तो उस आग के बुझाने का प्रयत्न करता है, परन्तु जब उस का बुझाना असम्भव समझने लगता है, तो वह फिर ऐसा कोई प्रयत्न करता है कि उसका व्यवहार न बिगडे और उसका माल सुरक्षित रहे । ठीक इसी प्रकार जव शरीर में कोई व्याधि उत्पन्न हो जाती है तो धर्मात्मा पुरुष निर्दोष रीति से उस व्याधि को दूर करने के लिये औषधादिक का सेवन करता है। परन्तु जब यह समझने लगता है कि अब रोग से बचना असम्भव है, तो सल्लेखना धारण कर लेता है, ताकि उसका धर्म न बिगडने पाये। इस प्रकार मरणान्त समय निश्चय करने के बाद धर्म की रक्षा के निमित्त सल्लेखना व्रत का धारण करना अपघात नहीं है । इसी तरह अन्य आपत्ति, सकट, उपसर्ग के पहते हुवे भी सल्लेखना से ही मरना योग्य है। यो हि कपायाविष्ट कुम्भकजलधूमकेतुविषशस्त्रै । व्यपरोपयति प्राणान् तस्य स्यात्सत्यमात्मवध ॥१७८॥ जो जीव क्रोध, मान, माया, लोभ कपाय के वश हो कर या इष्ट १ ( ११४ ) वियोग के खेद वश होकर, या आगामी निदान के वश हो कर अपने प्राणों का घात फांसी खा कर,जल में डूब कर, अथवा विष, अग्नि, शस्त्रा. दिकों द्वारा, कर डालते हैं उनको निःसंदेह, अपघात का दोष लगता है। नीयन्तेऽथ कषायाः हिंसाया हेतवो यतस्तनुताम् । सल्लेखनामपि ततः प्राहुरहिंसा प्रसिद्ध्यर्थम् ॥१७९॥ सल्लेखना पूर्वक मरण करने वालों को अपघात का दोष नहीं लगता सल्लेखना में कषायों का क्षीण करना परमावश्यक है। कषाय हिंसा के मूल कारण हैं । इस लिये सल्लेखना में कषायों के क्षीण होने से अहिंसा की सिद्धि होती है। इति यो व्रतरक्षार्थ सततं पालयति सकलशीलानि । वरयति पतिवरेव खयमेव तमुत्सुका शिवपदश्रीः॥१८०॥ जिस प्रकार स्वयम्बर मण्डप में कन्या आप ही अपने योग्य वर को तलाश करके उसके गले में वर माला पहना देती है, ठीक उसी प्रकार मुक्ति लक्ष्मी अपने योग्य व्रतादि संयुक्त जीव को स्वयं अपना स्वामी बना लेती है अर्थात् व्रती श्रावक अवश्य ही कभी न कभी मुक्ति पद को प्राप्त कर लेता है। ऐसा जान कर हर जीव को व्रती श्रावक होना ही योग्य है। आगे समाधि मरण की संक्षिप्त विधि बताते हैं । जब शरीर किसी असाध्य रोग से अथवा वृद्धावस्था से असमर्थ हो जावे, या चेतन अचे- तन कृत कोई उपसर्ग उपस्थित हो जावे, या धर्म के विनाश करने वाला कोई विशेष कारण पैदा हो जावे, तब अपने शरीर को पक्के पान के समान, तथा तेल रहित दीपक के समान स्वयमेव विनाश के सम्मुख जान सन्यास धारण करे । यदि मरण में किसी प्रकार का सन्देह हो तो मर्यादा पूर्वक ऐसी प्रतिज्ञा करे, कि जो इस उपसर्ग में मेरी मृत्यु हो जावेगी तो मेरे आहारादिक का सर्वथा त्याग है, और, जो कदाचित् जीवन बाकी रहेगा ( १९५ ) तो आहारादिक ग्रहण करूंगा। असाध्य रोग हो जाने पर जब किसी भी इलाज से आराम होता नजर न आवे, तो क्लेशित परिणाम भी न हो कर समय पूर्वक मन, वचन, काय के व्यापारों को आत्मा में एकत्रित करना चाहिये । और "जन्म जरा मृत्यु शरीर सम्बन्धी हैं, मेरे नहीं हैं, मैं तो निर्विकार शुद्ध, शिवस्वरूप है" ऐसा वन क्रनिर्ममत्व हो कर विधिपूर्वक आहार घटा कर शरीर को कृश करना चाहिये। फिर चार प्रकार के संग को साक्षी कर समाधि मरण में उद्यमवान होना चाहिये। समाधिमरण करने वाला पहर दोपहर काल की मर्यादा पूर्वक भी त्याग कर सक्ता है । यदि समाधि मरण के बिना मृत्यु हो जाती है तो अन्त मरण निगड जाता है, और कुगति में जाना पडता है। सन्यास पुरप के लिये उचित्त है कि जहा तक वन,जिन भगवान की जन्मादितीर्थ भूमियों का आश्रय ग्रहण करे,और यदि ऐसा स्थान न प्राप्त हो सके तो अपने घर में ही निर्मोही होकर धर्मा- स्माओं तथा सयमी जनों के आश्रय में रहे । सबसे क्षमा की याचना करे और आप भी मन,वचन,काय पूर्वक सब प्राणियों को क्षमा करे,क्योंकि अन्त समयक्षमा करने वाला ससार का पारगामी होता है। सहधर्मी तथा आचार्यों की सहायता प्राप्त कर लेना सल्लेखना व्रत के पालन के लिये बड़ा उप- योगी होता है। यदि असावधानता के कारण व्रत में कोई दोष लगता नजर आता है, तो वह अपने उपदेश द्वारा उसको सावधान कर सल्लेखनात्रत को निर्विघ्नता पूर्वक पूर्ण करने में उसकी पूरी पूरी सहायता करते हैं। यदि व्रत में कोई किसी प्रकार का अतिचार लगा हो तो सहधर्मियों अथवा आचार्य के सामने प्रगट कर, नि शल्य होकर प्रतिक्रमण, प्रायश्चित्तोक्त विधियों से शोधन करना चाहिये । समाधि भरण के लिये पूर्व तथा उत्तर दिशा की ओर मस्तक रखना चाहिये । यदि श्रावक महाव्रत की यचना करे तो आचार्यों को उचित्त है कि उसे महावत देव, महावत में नम होना ( ११६ ) चाहिये । आचार्य को चाहिये कि अपने उपदेश हारा शरीर की निस्सारता तथा कृतघ्नता दिखा भोजन की इच्छा छुड़ावे--अन्न की तृष्णा दूर कराके, दूध आदि पीने की वस्तुओं को रखावे । फिर उनको घटाकर क्रम से गर्म जल मात्र का नियम करा देवे, और यदि देश, काल, तथा प्रकृति के कारण प्यास की बाधा सहन करने में असमर्थ होवे तो ठंडा पानी मात्र रख लेना चाहिये, और सम्बोधना करनी चाहिये कि हे श्रावक ! सल्लेखना अत्यन्त दुर्लभ है, तुम्हें विचारपूर्वक अतिचार आदि दूषणों से इस की रक्षा करना चाहिये । इस के बाद शारीरिक कमजोरी को बढ़ते हुए देख कर और मृत्यु को निकट जानकर आचार्य को उचित है, कि समस्त संघ की अनुमत से संन्यास में दृढ़ कराने के निमित्त जल का भी त्याग करा देवे । इस अनुक्रम से चारों प्रकार के आहार का त्याग होने पर समस्त संघ से क्षमा करावे, और निर्विघ्न समाधि की सिद्धि के लिए कायोत्सर्ग करावे । फिर संसार से वैराग्य तथा उदासीनता उत्पन्न करने वाले कारणों का जप मन्द मन्द वाणी से संन्यासी के कान में करे । महान पुरुषों के दृष्टान्त सुना सुना कर व्यवहार आराधना में स्थिर करे और निश्चय आराधना के निमित्त उपदेश करे, और भली भान्ति मनोहर शब्दों में यह जटलावे,कि हे श्रावक ! इस समय तो यह कर्तव्य है कि अन्त- रङ्ग बाह्य परिग्रह के त्याग पूर्वक साम्यभाव से निर्विकल्प समाधि में स्थिर हो कर परम आनन्दामृत का पान करो । इस प्रकार विधि पूर्वक कषाय कुंश करते हुवे रत्नत्रय भावनारूप परिणमन से, पंच नमस्कार मन्त्र स्मरण पूर्वक प्राण विसर्जन करना चाहिये । जीवितमरणाशंसे सुहृदनुरागः सुखानुवन्धश्च । सनिदानः पञ्चते भवन्ति सल्लेखनाकाले ।।१९५॥ सल्लेखना व्रत के ५ अतिचार हैं । १. जीवित शंसा-सलेखना - ( ११७ ) धारण करने के बाद जीने की अधिक इच्छा करना । २ मरणाशसा- रोगादिक की पीडा के भय से घबरा कर जल्दी मरने की वाछा करना। ३ सुहृदानुराग (मित्रानुराग)-अपने मित्रों के साथ की हुई क्रीडाओं को याद करना,अथवा मित्रों को याद कराना। ४ सुखानुवन्ध-पूर्व काल में भोगे हुवे भोगों को याद करना। ५ निदान-अगले जन्म में विषय भोगादि सुखों के प्राप्त होने की वाछा करना। इत्येतानतिचारानपरानपि सम्प्रतयं परिवर्य । सम्यक्त्वव्रतशीलरमलै पुरुपार्थसिद्धिमेयचिरात् ।।१९६।। पच अणु व्रत, सप्त शील व्रत तथा सल्लेखना व्रत का निरतिचार पालना ही योग्य है । अतिचारों के परिहार से सम्यक्त, व्रत और शील शुद्ध होते हैं, और उन के शुद्ध होने पर आत्मा शीघ्र ही अपने इष्ट पद को प्राप्त हो जाता है, इस ग्रन्थ में सामान्यतया सम्यक दर्शन, १२ व्रत और सल्लेखना का कथन है, अन्य ग्रन्थों में श्रापकों का चारित्र, दर्शन व्रत आदि ११ प्रतिमाओं में वाट दिया गया है, जिससे एक श्रावक धीरे धीरे उन्नति करते हुए मुनि पद की योग्यता प्राप्त कर सके । यहाँ पाठकों के सुभीते के लिए ११ प्रतिमाओं का कुछ सक्षिप्त वर्णन कर देना उचित प्रतीत होता है । श्रावकों के आचरण की उन्नति के लिए ११ श्रेणियां ह, जिन में पहली पहली श्रेणी का आचरण पालते रह कर आगे का आचरण और वढालिया जाता है। इन्हीं को प्रतिमा कहते है। प्रतिमा जैसे अपने आसन में दृढ रहती है, वैसे ही वर्तव्य में श्रावक को दृढ रहना चाहिये । १ दर्शन प्रतिमा-इस प्रतिमा का धारी श्रावक अपने सम्यक् दर्शन में ५ दोष नहीं लगाता-अष्टाग सम्यक् दर्शन का आराधन करता है । पञ्च परमेष्टी के चरण कमल में ही श्रद्धा रखता है, अष्टमूल गुण का धारक होता है, अर्थात् मदिरा, मांस और मधु इन तीन ( १९८ ) मकारों और बड़, पीपल, ऊमर, कठूमर, पाकर पांच उदम्बर फलों का सर्वथा त्यागी होता है । सप्त व्यसन का भूल कर भी सेवन नहीं करता। इस प्रतिमा का पालन करने वाला श्रावक दृढ़ चित्त निर्भय होता है, यदि कोई परीपह या कष्ट उस पर आ पड़ता है तो अपने नियम की प्रतिज्ञा से चिगता नहीं । निदान शल्य, अर्थात इस लोक सम्बन्धी यश सुख; संपत्ति, या परलोक सम्बन्धी शुभ गति की वांछा से रहित होकर वैराग्य भावना का ही चिंतबन किया करता है । अभक्ष और अन्याय को अत्यन्त अनर्थ का कारण जान त्याग करता है। संसार शरीर और भोगों से विरक्त होता है। माया, मिथ्या और निदान तीनों शल्यों से रहित होकर सम्यक् दर्शन को निरतिचार पालन करता है। २. व्रतप्रतिमा-बारह व्रतों को पालना। इस प्रतिमा का पालन करने वाला पांच अणुव्रता का अतिचार रहित पालन करता है और उनके सहायक तीन गुण व्रत, और चार शिक्षाबत अर्थात् सप्तशील व्रतों को भी निर्दोष पालन करता है। व्रत प्रतिमा का धारक श्रावक दृढचित्त,समभाव संयुक्त,और ज्ञानवान हुवा करता है । ३.सामायिक प्रतिमा-इस प्रतिमा का धारी श्रावक नियम पूर्वक, सवरे, दोपहर, और सन्ध्या समय, प्रतिदिन तीन बार विधि पूर्वक निरतिचार सामायिक किया करता है । सामायिक में कम से कम समय अन्तर्मुहूर्त अर्थात् ४८ मिनट अवश्य लगाना चाहिये । ४. प्रोषधोपचास प्रतिमा-इस प्रतिमा का धारी श्रावक धर्म ध्यान में लीन होकर,प्रत्येक महीने की दो अष्टमी, दो चतुर्दशी, चारों ही पर्व के दिनों में, अपनी शक्ति को न छिपा कर, नियम पूर्वक निरतिचार प्रोषधोपवास किया करता है । ५. सचित्त त्याग प्रतिमा-इस प्रतिमा का धारी श्रावक कंद मूल फल,शाक,कोपल, जमीकन्द,फूल,वीज आदि पदार्थों को कच्चे नहीं खाता है। जिला इन्द्रिय के विषय को जीतने के आशय से गर्म या प्राशुक पानी पीता है । सचित्त पदार्थ का भक्षण नहीं करता है । सचित्त को अचित्त बनाने की विधि यह है- सुकं पक तत्त अविल लवणे हि मिस्सिय दव्य । जंजतेण या लिएराण तं सव्व फासुय भणिय ॥१॥ अर्थात सुखाया हुवा, पकाया हुवा, तपाया हुवा, खटाई और नमक से मिला हुवा, तथा जो यत्र से छिन्न भिन्न किया हुवा, अर्थात शोधा हुदा ऐसा सब हरित काय प्रासुक कहिये जीव रहित अचित्त होता है । ६-रात्रिभुक्ति त्याग प्रतिमा-इस प्रतिमा का धारी ज्ञानीसम्यक् दृष्टि श्रावक रात्रि कोनतोआप ही किसी प्रकार का जल पान व भोजन करता, और नहीं दूसरे को कराता है । खाद्य,स्वाद्य,लेय और पेय चारों ही प्रकार के अहार का रात्रि के समय सर्वथा त्यागी होता है।दो घडी अर्थात ०८ मिनट सूर्यास्त से पहले तक व ४८ मिनट सूर्योदय होने पर भोजन पान करना। रात्रि को भोजन सम्बन्धी आरम्भ भी नहीं करना पूर्ण सन्तोष रखना। ७-ब्रह्मचर्य प्रतिमा-जो ज्ञानी सम्यक् दृष्टि श्रावक,समस्त ही चार प्रकार की स्त्री, देवागना, मनुष्यणी, तिथंचनी और चित्राम-रूप आदिक स्त्रीकी अभिलाषा मन, वचन, काय से नहीं करता है, वही ब्रह्मचर्य प्रतिमा का धारक कहा जाता है । इस प्रतिमा का धारक अपनी स्त्री के भोग का भी स्यागी होता है,उदासीन वस्त्र पहनता है और वैराग्य भावना में लीन रहता है।८-आरम्भ त्याग प्रतिमा-जोश्रापक गृहकार्यसम्बन्धी,नौकरी,चाकरी, खेती, व्यापार आदि समस्त ही आरम्भ से विरक्त हो जाता है अर्थात इन सब का त्याग कर देता है, वह आरम्म त्याग प्रतिमा का धारी कहलाता है। इस प्रतिमा के धारी को यदि अपना पुत्र आदिक या अन्य कोई और भोजन के लिये बुलावे तोजीम आना।परन्तु इस प्रतिमा को धारण करने चाला, अभिषेक,दान, पूजा आदि का त्याग नहीं करता।९-परिग्रह त्याग प्रतिमा-जो ज्ञानी सम्यक् दृष्टि श्रावक अन्तरङ्ग और बाह्य दोनों२४प्रकार .

( १२० ) के परिग्रह को पाप का कारण जान हर्ष भाव के साथ त्याग करता है वही परिग्रह त्याग प्रतिमा का धारी कहलाता है। इस प्रतिमा का धारी श्रावक अपने लिये कुछ आवश्यक वस्त्र रख लेता है, धर्मशाला आदि में ठहरता है और भक्ति से बुलाये जाने पर जो मिले सन्तोष पूर्वक जीम लेता है। १०.अनुमतित्याग प्रतिमा-जोखेती,व्यापार आदि आरंभ,धन धान्य आदि परिग्रह, और विवाह आदि इस लोक सम्बन्धी कार्य को पाप का मूल कारण जान कर इन में अपनी सम्मति नहीं देता, वह ममत्व रहित पुरुष अनु- मति त्याग प्रतिमा को धारण करने वाला कहलाता है। इस प्रतिमा का धारक घर में भी बैठता है, बाहर चैत्यालय,मठ,मन्दिर में भी रहता है। भोजन के लिये यदि कोई घर का या और कोई श्रावक बुलाने के लिये आता है तो जाकर भोजन कर आता है, जो कुछ गृहस्थ जिमाता है, जीम आता है, ऐसा नहीं कहता कि हमारे लिये अमुक वस्तु तय्यार कर दीजिये। ११-उद्दिष्ट त्याग प्रतिमा जो सम्यक् दृष्टि श्रावक घर को छोड़ मठ में, मंडप में या मुनियों की वस्तिका में जाकर रहता है, गुरु के पास व्रत धारण कर तपश्चरण करता है, अनेक घरों से प्राप्त हुई भिक्षा का भोजन करता है और कोपीन मात्र खण्ड वस्त्र को धारण करता है, वह उद्दिष्ट त्याग प्रतिमा का धारण करने वाला उत्कृष्ट श्रावक कहलाता है। इस प्रतिमा में अपने निमित्त बनाये हुवे भोजन का त्यग किया जाता है। जो भोजन ग्रहस्थ ने अपने कुटुम्ब के के लिये बनाया हो, उसी में से भिक्षा द्वारा भक्ति से दिये जाने पर ग्रहण किया जाता है । इस के दो भेद हैं। क्षुल्लक-जो एक खन्ड चादर व एक कोपीन या लंगोट रखते हैं, मोर पंख की पीछी और एक कमण्डल रखते हैं। बालों को कतराते हैं, ग्रहस्थ के यहांथाली में बैठ कर एक बार भोजन करते हैं। ऐलक-जो केवल एक लंगोटी रखते है, मुनि की क्रियाओं का अभ्यास करते है । गृहस्थ के यहां .

। १२१ ) बैठ कर हाथ में ही भोजन करे। स्वयं मस्तक, दाढी और मूछ के केशों को हाथ से उखाड डालता है। जन इस जीव के अप्रत्याख्यानावरण कषाय का अभाव हो जाता है,तो यह जीव पाचवे गुण स्थान में पदारोपण करता है, और उस गुण स्थान सम्बन्धी प्रतिज्ञाओं का निरतिचार पालन करता है। इस गुणस्थान में ही प्रत्याख्यानावरण कषाय के तीव्र मन्द भेदों की अपेक्षा ग्यारह प्रतिमारूप श्रावक के एकोदेश चारित्र के भेद किये गये हैं । ज्यों ज्यों क्षाय मन्द होते जाते हैं-त्यों त्यो अगली अगली प्रतिमा की प्रतिज्ञा होती चली जाती है। इन प्रतिज्ञाओं में आत्मध्यान का अभ्यास वढाया जाता है और इस से जीन को धीरे धीरे उन्नति होती चली जाती है। यदि जीव के प्रत्या- ख्यानावरण कषाय का अभाव हो जाता है तो वह मुनि पद को ग्रहण कर दिगम्बरी दीक्षा ले अपनी आत्मा का अधिक कल्याण करता है। और यदि मुनि पद को ग्रहण करने की शक्ति तथा योग्यताअपने में नहीं देखता तो श्रावक के धर्म का ही पालन करता हुआ मरणान्त समय में अराधना सहित होकर, एकाग्र चित्त कर, पञ्च परमेष्टी काही ध्यान करते हुए सल्ले. खना पूर्वक अपने प्राणों का त्याग करता है, और विशेष पुण्य का बन्ध कर शुभगति को प्राप्त होता है । पहली प्रतिमा से छठी प्रतिमा तक पालन करने वाला जघन्य श्रावक कहलाता है, सातवी, आठवी, नवमी प्रतिमा का धारक मध्यम श्रावक, और दसवीं ग्यारहवीं प्रतिमा का धारक उत्कृष्ट श्रावक कहलाता है । इस प्रकार ग्यारह प्रतिमाओं का सक्षिप्त वर्णन किया गया। जो भव्य मुनिधर्म के पालन के लिये असमर्थ है, उन्हें योग्य कि अपनी शक्ति के अनुसार गृहस्थ धर्म का निर्दोष पालन करें, और अपने जीवन को सफल बनावें। इति देशचारित्रक्यानम् (१२२ ) अथ सकलचारित्रकथन चारित्रान्तरभावात् तपोपि मोक्षाङ्गमागमे गदितम् । अनिग्रहितनिजधीयस्तदपि निपेव्यं समाहितस्वान्तै ।।१९७।। देश चरित्र का वर्णन करने के बाद अब आगे सफल चरित्र का वर्णन करते हैं। पहले बता चुके हैं कि सम्यक् दर्शन सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चरित्र की एकता का ही नाम मोक्षमार्ग है। तप चरित्र का ही एक भेद है। "तपसा निर्जरा च" तप करने से निर्जरा और संवर दोनों होते हैं। मोक्षामिलापी पुरुषों के लिये तप सेवन करने योग्य है । तपश्चरण के लिये दो वातों का होना जरूरी है, एक तो अपनी शक्ति को न छिपाना, और दूसरे मन को वस में करना । जो पुरुष अपनी शक्ति को छुपाता है और कहता है कि मुझ से तो तप नहीं हो सकता, उस के लिये ता अङ्गीकार करना असम्भव है । और यदि मन वशीभूत न होवे,तो तप करते हुए भी इच्छा बनी रहेगी, इच्छा के अभाव विना तप नहीं होता। "इच्छानिरोध- स्तपः" इच्छा के निरोध का ही नाम तप है । तप दो प्रकार का होता है एक बाह्य तप और दूसरा अन्तरङ्ग तप। जो तप वाह्य द्रव्य की अपेक्षा होता है, और सब को बाहर से दीखता है वह वाह्य तप कहलाता है । जिस तप का साधन मन के निरोध द्वारा किया जाता है और जो वाह्य से दूसरों को दिखाई नहीं देता वह अन्तरङ्ग तप है। अनशनमवमदौर्य विविक्तशय्यासनं रसत्यागः । कायक्केशो वृत्तेः सङ्ख्या च निपेव्यमिति तपो बाह्यम् ॥१९८|| वाह्य तप छह प्रकार का होता है । १.अनशन-लौकिक मान वड़ाई की वांछा न कर के संयम सिद्धि के अर्थ, कर्मों के क्षय के निमित्त, कपाय भावों को दूर करने के अभिप्राय से,ध्यान स्वाध्याय की सिद्धि के लिये,स्वाद्य, खाद्यलेय और पेय चार प्रकार के आहार के त्याग करने का नाम अनशन है ।

(१२३ ) २ अपमौदर्यसयम की सिद्धि के अर्थ, निद्रा को जीतने के लिये,सन्तोप, स्वाध्याय की प्राप्ति के निमित्त, भूख से थोड़ा आहार लेने का नाम अवमौदर्य तपहै। ३ विविक्तशय्यासन-जीवों की रक्षार्थ,प्रासुफ क्षेत्र में,ब्रह्मचर्यपालन तथा स्वाध्याय, ध्यानाध्ययनादिक क्रियाओं को निर्विघ्नता पूर्वक करने के लिये पर्वत गुफा, वस्तिका, श्मशान भूमि, वन, खण्डर, आदि एकान्त स्थानों में सोने बैठने का नाम विविक्तशय्यासन तप है। ४ रसपरित्याग- इन्द्रियों के दमनार्थ, स्वाध्याय आनन्द की प्राप्ति के लिये, आलस्य तथा निद्रा को जीतने के निमित्त दूध, दही, घी, तेल, मठा, नमक आदि सब रसों का याकुछ का त्याग करना रसपरित्याग कहलाता है। ५ कायक्लेश- शरीर से ममत्व भाव को त्याग कर कठिन कठिन रीति से तपस्या करते हुए, पीडा के सहन करने को कायक्लेश नामा तप कहते हैं । इस तप के करने से सुख की अभिलापा क्षीण होती है, राग का अभाव होता है । दुख सहन करने की सामर्थ्य प्राप्त होती है, जैन धर्म की प्रभावना बढती है । ६ व्रतपरिसख्यान-इस प्रकार की प्रतिज्ञा करके कि अमुक आहार मिलेगा, अमुक मुहल्ले में मिलेगा, या अमुक रीति से मिलेगा तो आहार करूगा अन्यथा नहीं"अहार के लिये जाना, और यदि योग्यभिक्षा विधि न बने,तो वापस बन में आकर उपवासादि करना,इस का नाम व्रतपारसख्यान नामा तप है । इस तप से आशा, तृष्णा का नाश होता है । विनयोवैय्यात्त्य प्रायश्चित्त तथैव चोत्सर्ग । स्वाध्यायोऽय ध्यान भवति निपेव्य तपोन्तरङ्गमिति ॥१९९॥ अन्तरङ्ग तप भी छह प्रकार का होता है । १ विनय-पूज्य पुरुषों का आदर करना विनय तप हे । विनय दो प्रकार की होती है । एक मुख्य निनय, दूसरी उपचार विनय । सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान ओर सम्पन् चरित्र को पृय बुद्धि से आदर भावपूर्वक अङ्गीकार करना मुख्य विनय है ।

( १२४ ) सम्यक् दर्शन,सम्यक् ज्ञान, सम्यक् चरित्र इन तीनों के धारण करने वाले आचार्यादिकों को आदर पूर्वक नमस्कारादि करना उपचार विनय है । इन्हीं आचार्यादिकों की भक्ति से प्रेरित होकर परोक्ष रूप में उनके तीर्थ क्षेत्रादिकों की वन्दना करना भी उपचार विनय का ही विशेष भेद है। विनय तप से मान कषायक्षीण होता है, ज्ञानादिक गुणों की प्राप्ति होती है। २. वैयावृत्य-पूज्य पुरुषों की भक्ति पूर्वक सेवा, चाकरी तथा टहल करना। इसके भी भेद हैं । कायचेष्टाजन्य-जैसे हाथ से पांव आदि का दवाना; परवस्तुजन्य-जैसे भोजन में औषधादिक देकर साधुओं के रोग मिटाना । इस तप से गुणानुराग होकर मान कषाय का अभाव होता है। ३. प्रायश्चित्त-प्रमाद से लगे हुवे दोषों को प्रतिक्रमण आदि पाठ, अथवा गुरु के सामने, तप व्रतादि अङ्गीकार करके, या कायोत्सर्गादि करके दूर करने को प्रायश्चित्त कहते है । इस तप से व्रतादिकों की शुद्धता होती है। परिणामों की शल्य मिट जाती है, और भी अनेक गुणों की प्राप्ति होती है। ४. उत्सर्ग-धन धान्यादिक बाह्य, और क्रोध मानादिक अन्तरङ्ग परिग्रहों में अहंकार ममकार रूप भावों के त्याग करने को उत्सर्ग तप कहते हैं। इस तप से निप्परिग्रहत्व और निर्भयत्व प्रगट होकर मोहक्षीण होता है । ५. स्वाध्याय-ज्ञान भावना में आलस्य न करना,जो कुछ आप जानता है, उसको खुद पढ़ना, दूसरों को सुनाना, किसी शब्द तथा अर्थ में संशय हो जाने पर उसे दूर करने के लिये विशेष ज्ञानियों से पूछना, श्रद्धानपूर्वक जाने हुवे अर्थ को मनन करके अभ्यास करना और बारंबार चिन्तवन करना, पाठ को शुद्धता पूर्वक बारम्बार घोखना (पढ़ना), धर्म के इच्छुक भव्य पुरुषों को धर्मोपदेश देना। यह स्वाध्याय तप है। इस से बुद्धि का विकाश होता है, परिणाम उज्ज्वल रहते हैं। संवेगहोता है, धर्म की वृद्धि होती है । इत्यादिक अनेक गुणों की प्राप्ति होती है । ६. ध्यान- . समस्त चिन्ता का निरोध कर धर्म में या आत्म चिन्तवन में एकाय होने का नाम ध्यान है । अर्हन्त आदिक के चिन्तवन में प्रर्वतना शुभ ध्यान है। केवल शुद्धात्माओं में एकाग्र होना शुद्ध ध्यान है । ध्यान चार प्रकार का होता है आत ध्यान, रौद्र ध्यान, धर्म ध्यान तथा शुक्ल ध्यान । इन में से आर्तध्यान और रौद्र ध्यान तो सर्वथा ही त्याज्य है । धर्म ध्यान तथा शुक्ल ध्यान ग्रहण करने योग्य हैं। इन दोनों ध्यानों के सिवाय अन्य समस्त ध्यान भयानक ससार का कारण हैं । इस तप से चरित्र भान सम्र्पूणता को प्राप्त होता है, मन वशीभूत होकर अनाकुलता की प्राप्ति होती है, और मन आनन्द में मग्न हो जाता है । ध्यान के विशेष स्वरूप के लिये ज्ञाना र्णव ग्रन्थ को पढना चाहिये। जिनपुङ्गव प्रवचने मुनीश्वराणा यदुक्तमाचरणम् । सुनिरूप्य निजां पदवीं शक्ति च निपेव्यमेतदपि ॥२०॥ इस ग्रन्थ में मुख्यता से गृहस्थाचरण का ही वर्णन किया गया है, मुनि आचरण का जो कुछ भी थोडा बहुत वर्णन किया गया है, वह भी गृहस्थाचार के प्रयोजन से ही किया गया है। जिस प्रकार मुनीश्वर मोक्ष मार्ग के साधन में सर्वदेश प्रवृत्ति करते हैं, उसी प्रकार गृहस्थी का भी मोक्ष मार्ग में एकोदेश प्रवृत्ति करना कर्तव्य है । इसलिये श्रावकों को भी अपनी पदवी के अनुसार अपनी योग्यता और शक्ति का विचार करके मुनियों के आचारण को भी एकोदेश ग्रहण करना चाहिये। इदमावश्यक पटक समतास्तव वन्दना प्रतिक्रमणम् । प्रत्याख्यान वपुपो व्युत्सर्गाश्चेति कर्तव्यम् ॥२०१॥ साधुओं के पट आवश्यक यह हैं । १ समता-राग द्वेष रहित,साग्य भार का करना अर्थात सामायिक करना । • स्तवन-तीर्थकरके गुणों का कीर्तन करना, उनके गुणों की महिमा गाना, स्तुति करना। ३ बन्दना- तीर्थकर को नमस्कार करना, उनके सन्मुख सिर आदि अङ्गा को नम्री भृत करना। ४.प्रतिक्रमण-प्रमाद द्वारा लगे हुए पिछले दोषों को दूर करना। ५.प्रात्याख्यान-त्याग भाव से आगामी काल संवन्धी आस्रव का रोकना। ६.कायोत्सर्ग-काय से ममत्व भाव का त्याग करना । सामायिक या ध्यान के समय पाषाण की मूर्ति के समान निष्कम्प और अचल होना, ऐसा कि अनेक कारण मिलने पर भी चलाचल न होवे । इन छहाँ क्रियाओं का नित प्रति करना जरूरी है। इसलिये इनको पट आवश्यक क्रिया कहा जाता है। मुनियों को तो इन को नित प्रति करना ही पड़ता है, श्रावकों को भी चाहिये, कि अपनी पद्वी के अनुसार जो किया उन से बन सके उस को ग्रहण करें। सम्यग्दण्डो वपुपः सम्यग्दण्डस्तथा च वचनस्य । मनसः सम्यग्दण्डो गुप्तीनां त्रितयमवगम्यम् ||२०२|| भले प्रकार मन वचन काय योगों की यथेच्छा प्रवृत्ति के रोकने को गुप्ति कहते हैं । गुप्ति तीन है-१. मनोगुप्ति-ख्याति, लाभ,मान की बांछा के बिना, मनोयोग को रोकना। २.वाग्गुप्ति-ख्याति, लाभ, मान की वांछा के विना, वचनयोग को रोकना। ३.कायगुप्ति-ख्याति, लाभ, मान वांछा के बिना, काययोग को रोकना । गुप्ति ही मुनि पद का मूल है, गुप्ति बिना सम्यक् चरित्र नहीं होता और सम्यक् चरित्र विना मोक्ष की प्राप्ति नहीं हो सकती। सम्यग्गमनागमनं सम्यग्भाषा तथैषणा सम्यक् । सम्यग्ग्रहनिक्षेपौ व्युत्सर्गाः सम्यगिति समितिः ॥२०३।। समिति-सावधानता पूर्वक प्रवृत्ति को समिति कहते हैं। समिति पांच होती हैं । "ईर्या भाषणादाननिक्षेपोत्सर्ग: समितियः।" (तत्वार्थसूत्र अ० ९,सू०५)१.ईर्या समिति-"परमाद तज चौकर मही लखि समिति ईर्या- .

तेचलें" परम अहिंसा के धारक, जीवों की उत्पत्ति स्थानों के जाननहारे साधु सावधान होकर, सूर्योदय के बाद, जब हर एक चीज अन्छी तरह से दिखाई देने लगे, और पृथ्वी मनुष्य,हाथी,घोडे, गाडी आदि के चल्ने फिरने से मदित होकर प्रासुक होजावे, तब आगे की चार हाथ प्रमाण- भृमि को भले प्रकार देख कर धीरे धीरे चलते हैं। इस प्रकार चलने की क्रिया का नाम सम्यगार्या-समिति है ।२ भापासमिति-"जगसुहित कर- सर अहित हर श्रुति-सुखद सब सशय हरे । भ्रमरोग हर जिन के बचन मुख चन्द्र तं अमृत झरे।" हित, मित, सन्देह रहित बचाका बोलना, कर्कश, निष्ठुर, अप्रिय बचन न बोलना । इस का नाम सम्यक् भाषा समिति है । ३ एपणासमिति-विधिपूर्वक दिन में एक बार निर्दोप आहार ग्रहण करना, "छयालीस दोष पिना, सुकुल श्रावक तने घर अशन को, लै तप बढावन हेतु, नहिं तन पोपते,तज रसन को "मुनिराज छयालीस दोषों को टाल कर कुलीन श्रावक के घर केवल तपवृद्धि के अभिप्राय से, दिन में एक वार आहार लेते हैं, शरीर के पुष्ट करने का उन का मतलब नहीं होता । इस का नाम सम्यक् एपणासमिति है । ४ आदान निक्षेपण समिति-शरीर, पुस्तक, कमण्डल आदि उपकरणों को देख कर और पीछी से शोध कर यत्नाचार पूर्वक उठानातथा रखना।इस का नाम सम्यगादान निक्षेपण समिति है। “शुचि ज्ञान सञ्जमठपकरण,लखि कर गहें, लखि के धरै"। ५ व्युत्सर्गसमिति-नेत्रों से देख कर, यनाचार पूर्वक प्रासुक जीवजन्तु रहित भूमि पर मलमूनादि कोडारना। भूमि गीलीन हो, उस में हरे अकुरे न फूट रहे हो, लोर्गा के आने जाने के रास्ते से दूर हो, ऐसे स्थान में मलमून डालना । इस का नाम व्युत्सर्गसमिति है। "निर्ज- न्तु धान पिलोक तनमल, मूत्र, श्लेपम परिहरें"। ये पाञ्च समिति मुनिव्रत का मूल है । मुनिराज अपने चरित्र की शद्धि के लिए इन का निदोप . 11 ( १२८ ) पालन किया करते हैं। श्रावकों को भी यथा शक्ति इन का पालन करना चाहिये। मुनिराज तो पूर्णतया पालन करते हैं,श्रावक एकोदेश कर सक्ते हैं। धर्मः सेव्यः क्षान्तिप॑दुत्वमृजुता च शौचमथ सत्यम् । आकिञ्चन्यं ब्रह्म त्यागश्च तपश्च संयमश्चेति ॥२०४|| "उत्तमक्षमामार्दवार्जवशौचसत्यसंयमतपस्त्यागाकिञ्चन्यब्रह्मचर्याणि धर्मः' (तत्वा० सू०अ० ९८०६)उत्तम क्षमा,उत्तम मार्दव उत्तम आर्जव, उत्तम शौच, उत्तम सत्य, उत्तम संयम, उत्तम तप, उत्तम त्याग, उत्तम आकिञ्चन्य, उत्तम ब्रह्मचर्य ये दश धर्म हैं । १. उत्तम क्षमा-"बिना दोष दुर्जन दुख देय; समरथ होय सकल सह लेय। क्रोध कषाय न उपजे जहां, उत्तम छिमा कहावे तहां"। (पार्श्व पुराण) दुष्ट लोगों के द्वारा तिरस्कार, हास्य, ताड़न, मारण आदि क्रोध की उत्पत्ति के कारण मिलने पर भी और अपने में सामर्थ्य होते हुए भी, परिणामों में क्रोध कषायरूप मलिनता न लाने को उत्तम क्षमा कहते हैं । क्रोध कषाय जीव का एक महान बैरी है, इस क्रोध बैरी का जीतना क्षमा है । क्रोध इस जीव के सन्तोषभाव, निराकुलताभाव आदि समस्त ही गुणों को दग्ध करने के लिए अग्नि के समान है । क्रोध जीव की बुद्धि को भ्रष्ट कर निर्दयी बना देता है । वे जीव लोक में पुण्यवान हैं, जिन के क्षमा गुण प्रगट होता है। जहां उत्तम क्षमा होता है, वहां रत्न त्रय धर्म होता है। विद्वानों के लिए उत्तम क्षमा चिन्मामणि रत्न के समान है। मिथ्यात्वरूपी अन्धकार को दूर करने के लिए उत्तम क्षमा दीपक के समान है। जहां असमर्थ जीवों के दोष क्षमा किये जाते हैं,जहां असमर्थों के ऊपर क्रोधनहीं किया जाता, जहां आक्रोश वचनों को समता भाव के साथ सहन कियाजाता है, जहां दूसरों के दोष प्रगट नहीं किए जाते, जहां चित्त में आत्मा का चैतन्य गुण धारण किया जाता है, वहां ही उत्तम क्षमा होती है । उत्तम क्षमा का ( १०६) धारण करने वाला जीव समस्त लोक में पूज्य होता है, परम्पराय से मोक्ष को प्राप्त होता है। २ उत्तममार्दव-"आठ महा मद पाय अनूप,निरभिमान वरतै मृदुरूप। मान कपाय जहा नहीं होय,मार्दव नाम धरम है सोय॥ कुलमद, जातिमद,रूपमद,ज्ञानमद,धनमद, वलमद तपमद,प्रभुतामद इन आठ प्रकार के मद अर्थात मान न करने को उत्तम मार्दव कहते हैं। मान कपाय का अभाव होने पर ही मार्दव नामा गुण आत्मा में प्रकाश मान होता है। मार्दव धर्म दया धर्म का मूल कारण है, जिस के हृदय में मार्दव गुण होता है वह सब जीवों का हित करने वाला होता है। मार्दव गुण सहित जीवों का ही व्रत पालना, सयमधारण करना, ज्ञान काअभ्यास करना सफल है, अभिमानी का निष्फल है। अभिमानी के जिनेन्द्र भग- वान के गुणों में भी प्रीति नहीं होती, और अन्य साधारण पुरुषों की विनय करने की तो बात ही क्या है ? मार्दव धर्म मे ही जिनेन्द्र देव की भक्ति प्रकाश होती है मार्दव धर्म कुमति का नाश करने वाला है। दर्शन,ज्ञान, चारित्र विनय और व्यवहार विनय मार्दव धर्म से ही बढती है।मार्दव धर्म से आत्मा के परिणाम अत्यन्त निर्मल हो जाते हैं । मार्दव गुण का धारी पुस्प तीनों लोक को मोहित कर लेता है। मार्दव गुण के धारी, बालक का,बूढे का, निर्जन का, रोगी का, मूर्ख का तयाजाति कुलादिहीन पुरुषों का भी यथा योग्य प्रिय वचनों द्वारा, तथा यथायोग्य स्थान-दान द्वारा आदर सत्कार करने में कदाचित भी नहीं चूकते। वे कभी भी न कोई उद्धतता का वचन कहते हैं और न कोई अन्य उद्वतता का व्यवहार करते हैं, वे सदैव ही जद्वतता रहित, अभिमान रहित, नम्रता तथा विनयसहित ही जगत में प्रवर्तते हैं। ऐसा जान मान,कपाय का अभाव कर,मार्दव गुण का प्रकाश करना ही भव्य आत्माओं का कर्तव्य है। .

, ( १३० ) ३. उत्तम आर्जव-जो मनचिते सो मुख कहे, करे कायमों कारज वहे । माया चार न उरपाइये, आजब धर्म यही गाइये। मन बचन काय की कुटिलता के अभाव का नाम आर्जव है,अर्थात कपट, छल, फरेव, दगा बाजी के त्याग को आर्जव कहते हैं। मायावी पुरुष के व्रत, संयम, तपश्चरणादिक सभी निष्फल होते हैं । माया एक शल्य है। जिस के हृदय में शल्य है वह "निःशल्यो व्रती" के अनुसार बाह्य में व्रतादिक के करते हुवे भी व्रती नहीं कहा जा सकता। आर्जव धर्म आत्मा का एक गुण है जो माया कषाय के अभाव से प्रगट होता है । आर्जव धर्म अतिन्द्रय सुख का पिटारा है, संसार रूप समुद्र से पार होने के लिये जहाज़ के समान है,अतीन्द्रिय अविनाशी सुख को प्राप्त कराने हारा है। ऐमा जान कुटिलता को त्याग,आर्जव धर्म का धारण करना ही योग्य है। ४.उत्तम शौच-पर कामिनि पर दरव मंझार, जोविरक्त वर्ते छल छार । अन्तर शुद्ध होय सर्वग, सोई शौच धर्म को अंग ॥ अन्तरङ्ग में लोभ कपाय के अभाव होने को और बाह्य में शरीरादिक के पवित्र रखने को शौच कहते हैं । स्नान रूप बाह्य शौच ग्रहस्थों के ही लिये है, मुनियों के लिये नहीं । शौच धर्म आत्मा का एक अखंड गुण है, लोभ कषाय के अभाव होने से प्रगट होता है, शास्त्रों के पठन पाठन से, उत्तम उत्तम गुणों के मनन करने व विचार करने से शौच धर्म होता है। माया, मिथ्या, निदान इन तीन शल्यों के अभाव और क्रोध, मान, माया, लोभ इन चार कार्यों के त्याग से शौच धर्म होता है। ब्रह्मचर्य व्रत का धारण करना ही शौच धर्म है, आत्मा के निर्मल परिणाम होने से शौच धर्म है, शौच धर्म का ऐसा स्वरूप जान, अपने निजस्वरूप में दृष्टिधार अशुभ भावों का अभाव कर अपने आत्मा को शुद्ध करो।

( १३१ ) ५ उत्तमसत्य-बोले बचन स्वपरहितकार, सत्य स्वरूप सुधा उनहार । मिथ्या वचन कहे नहिं भूल,सोई सत्य धर्म तरु मूल ।। मीठे, हित मित, स्वपरहितकारी सत्य वचन बोलना, कुबचन का त्याग करना, इसका नाम उत्तम सत्य है । सत्य वचन दया धर्म का कारण है, समस्त दोषों को दूर करने वाला है,इस भर और परभव में सुख देने वाला है,सत्य बचन ससार में निरुपमेय है । सत्य धर्म से अन्य गुणों की महिमा बढती है,सत्य धर्म से समस्त आपत्तिया नाश हो जाती है। ऐसाजान सदा हितरूप और परिमित वचन कहो, दूसरे को दुख पहुचाने वाले या दूसरे को किसी प्रकार भी बाधा करने वाले बचन कदापि न कहो । ६ उत्तम सयम-मन समेत ये इन्द्री पञ्च, इनको शिथिल करे नहीं रञ्च । बस स्थावर की रक्षाजोय, सयम धर्म बखान्यो सोय ॥ पाच इन्द्रिय और मन का निरोध करना,तथा छह काय के जीवों की रक्षा करनासयम कहलाता है। यह सयम दो प्रकार का होता है-१ इन्द्रिय सयम २ प्राण सयम,इन्द्रियों के विषयों में रागभाव के अभाव को इन्द्रिय सयम कहते हैं। छह काय के जीनों की रक्षा करने का नाम प्राण सयम है । पच व्रतों का धारण करना, पच समिति का पालन करना, कपायों का निग्रह करना, मन, बचन, काय तीनों योगों की अशुभ प्रवृत्ति को रोकना, तथा इन्द्रिय विजय को ही परमागम में सयम कहा गयाहै । सयम पाना महान दुर्लभ है । सयम सम्यग्दर्शन को पुष्ट करता है, सयम मोक्ष का मार्ग है, सयम विना मनुष्यभव शून्य है,गुण रहित है।सयम विना यह जीवअनेक दुर्गतियों को प्राप्त होता है । सयम बिना दीक्षा ग्रहण करना, व्रत धारना मुण्ड मुण्डावना,नम रहना,भेष धारना,ये सब ही वृथा है। सयम हीजीन को इस भर में और परभव में शरण है । दुर्गतिरूप सरोवर के शोषण के लिये सयम ही सूर्य के समान है, ससार परिभ्रमण का नाश निना सयम नहीं हो सक्ता। ऐसा जान संयम को यथाशक्ति धारण करो और निरन्तर ऐसी भावना करो कि संयम विना जीवन की एक घड़ी भी न जावे। ७. उत्तमतप-ख्याति लाभ पूजा सब छण्ड, पञ्चकरण को दीजे दण्ड । सोतप धर्म कहो जग सार, अनशनादि बारह परकार। मान बड़ाई के भाव बिना,कर्म क्षय करने के लिये,अनशन आदि बारह प्रकार के तय करना,तथा इच्छा का निरोध करना उत्तम तप है ।इच्छा का निरोध कर विषयों में राग घटावना तप है।तप से जीव का कल्याण होता है, काम, निद्रा, प्रमाद को नष्ट करने वाला है। इस लिये मद छोड़ बारह प्रकार तप में से जैसा जैसा करने को अपनी सामर्थ होवे,वैसा ही तप करना चाहिये । अपना संहनन,बल,वीर्य,तथा देश,काल,आहार की योग्यताको देख कर ही तप करना चाहिये। जिस तप में उत्साह बढ़ता रहे और परिणामों की उज्ज्वलता बढ़ती जावे, वही तपश्चरण करना योग्य है । ८. उत्तम त्याग-संयमधारी व्रति परधान, द जैचउ विधि उत्तम दान। तथा दुष्ट विकलप परिहार, त्यागधर्म बहुसुख करतार । सर्व विभाव भावों का त्याग करना,निज चेतन स्वभाव का ग्रहण करना निश्चय त्याग है। व्यवहार में त्याग दान को कहते हैं। निःपरिग्रही होने के कारण मुनि शास्त्र व्याख्यान अर्थात् ज्ञान दान और सर्व जीवों को अभय दान ही दे सकते हैं । श्रावक के लिये ज़रूरी है कि चार प्रकार का दान, आहारदान, औषधि दान,शास्त्रदान और अभय दान, पात्रों को भक्ति पूर्वक और दीन दुःखी जीवों को करुणा बुद्धि पूर्वक देवे । ९.उत्तम आकिञ्चन्य-वाहिज परिग्रह को परित्याग,अन्तर ममता रहे न लाग। आकिञ्चन्य यह धर्म महान,शिव पदायक निश्चय जान।। अन्तरङ्ग तथा वाह्य के २४ प्रकार के परिग्रह के अभाव,को तथा शरीरादिक में ममत्व भाव न रखने को उत्तम आकिञ्चन्य कहते हैं। "अपने ज्ञान, ( १३३ ) दर्शनमय स्वरूप पिना अन्य किञ्चित मात्र भी हमारा नहीं है । में किसी अन्य द्रव्य का नहीं हूँ, मेरा कोई अन्य द्रव्य नहीं है। ऐसे अनुभव को आकिञ्चन्य कहते हैं । आकिञ्चन्य परम वीतरागपने की ही दशा का नाम है। आकिंचन्य धर्म मुख्यतया साधुजनों को ही होता है। तथापि एकोदेश धर्म का पालनहारा गृहस्थ भी है जोइस धर्म के ग्रहण करने की इच्छा करता है, गृहस्थाचार में मन्द रागी होता है, परिणामों में उदासीनता धारण करता है और प्रमाणीक परिग्रह को ही रखता है । आगामी वाञ्छा रहित होता है, अन्याय का धन कदापि ग्रहण नहीं करता है । अल्पपरिग्रह में सन्तुष्ट रहता है, परिग्रह को दु ख देने वालाजान उमे अत्यन्त अस्थिर मानता है। १० उत्तमब्रह्मचर्य-वडीनारी जननी ममजान,ल घु पुत्री समवहिन बखान। तज विकार मन वर्ते जेह, ब्रह्मचर्य परिपूरण एह ॥ स्त्री सभोग के त्याग तथा परम ब्रह्म आत्मा में ही रमण करने को उत्तम ब्रह्मचर्य कहते हैं। ब्रह्मचर्य के बिना समस्त बत, तप असार है, ब्रह्मचर्य निना समस्त काय केश निष्फल है । ब्रह्मचर्य व्रत को मन, वचन, काय द्वारा प्रेमपूर्वक पालन करने से जीव परमपद को प्राप्त हो जाता है, यदि शील की रक्षा चाहते हो,उज्वल यश तथा कीर्ति चाहते हो,धर्म को निर्दोष पालन करना चाहते हो, तो ब्रह्मचर्य का पूर्णतया पालन करो,जिस प्रकार अपना आत्मा काम के राग से मलीन न होवे, उस प्रकार यन करो और इन्द्रिय के सुख से विरक्त होकर अन्तरङ्ग परमात्मस्वरूप आत्मा की उचलता तथा निर्मलता को ही अवलोक्न करो। इस प्रकार दश रक्षण धर्म का सक्षिप्त वर्णन किया गया है । दश लक्षण धर्म कोई परवस्तु नहीं है, यह आत्मा का निज स्वभाव है। मोधादिक कर्मजनित उपाधियों के दूर होने पर स्वयमेव ही यह दश-रक्षण रूप आत्मा का निज स्वभाव प्रगट हो जाता है । क्रोध के अभाव से क्षमा,मान के अभाव से मार्दव, माया के - (१४) अभाव से आर्जव, लोभ के अभाव से शौच, असत्य के अभाव से सत्य- धर्म, कपार्यों के अभाव से संयमगुण, इच्छा के अभाव से तप गुण प्रगट होते हैं । परमें ममतारूप परिणामों के अभाव से त्याग धर्म होता है,पर द्रव्यों से भिन्न अपने आत्मा का अनुभव करने से आकिञ्चन्य धर्म प्रगट होता है। तीन वेद छह कपाय के अभाव से तथा आत्मस्वरूप में प्रवृत्ति करने से ब्रह्मचर्य धर्म प्रगट होता है । यह दस प्रकार का धर्म आत्मा का स्वभाव है । यह किसी जगह से मोल देकर लिया नहीं जा सकता, किसी जगह पहाड़ में, बन में, तीर्थ में, मन्दिर में,रखा नहीं जो वैसे ही उठाकर लाया जा सके, यह तो आत्मा का निज स्वभाव है, समस्त क्लेश दुःख रहित स्वाधीन आत्मा का ही सत्य परिणमन है। इस का लाभ सम्यक् दर्शन तथा सम्यक् ज्ञान से ही होता है । यह दश लक्षण धर्म मोक्ष मार्ग का मूल है । मुनिराज तो इस धर्म का पूर्णतया पालन करते हैं,श्रावकों को भी इन का पालन अपनी योग्यतानुसार यथाशक्ति अवश्य ही करना चाहिये । अध्रुवमशरणमेकत्वमन्यत्वशौचमास्रवो जन्म । लोकवृपवोषिसंवरनिर्जराः सततमनुप्रेक्ष्याः॥२०५॥ हादशानुप्रेक्षा बारह भावना"अनित्याशरणसंसारकत्वान्यत्वाशुच्यास्रव- संवर निजरा लोक बोधि दुर्लभधर्मस्वाख्यातत्वानुचिंतनमनुप्रेक्षाः ।" (तत्वा०सू० अध्या०९०७),अनित्य, अशरण, संसार,एकत्व,अन्यत्व अशुचि आस्रव,संवर,निर्जरा,लोक, बोधिदुर्लभ,धर्म, इन बारह भावनाओं का चितवन बार बार करना योग्य है । यह भावनायें वैराग्य उत्पन्न करने के लिये माता के समान हैं। जैसे हवा के लगने से अग्नि प्रकाशित होती है,वैसे ही बारह भावनाओं का चितवन करने से समता रूपी सुख प्रकाशमान होता है । छह ढाला में इन का स्वरूप भली प्रकार वर्णन किया गया है।

. . जोजन ग्रह गो धन नारी । य गय जन आज्ञा कारी ॥ इन्द्रीय भोग छिन थाई । सुर चनु चपला चपलाई ।। ससार, शरीर भोग, इन्द्रियों के विषय, धन यौवन आदि सब असार हैं, थिर रहने वाले नहीं है ।जैसे इन्द्र धनुष देखते देखते नष्ट हो जाता है निजली झट से अपना चमत्कार दिखा नष्ट हो जाती है, वैसे ही इन्द्रियों के भोग तथा धन यौवन आदि क्षण भगुर है । आत्मा ही नित्य है, अखड है, ध्रुव है। ऐसा विचार बार २ करना, यह अनित्य अनुप्रेक्षा है। सुर असुर खगाधिप जेते । मृग यो हरि काल दलेते। मणि मत्र तत्र बहु । होई मरते न बचावे कोई ।। जैसे सिंह हरिण को आ दवोचता है, उसी तरह काल,देव, असुर, चक्र वर्ती आदि सब को आदबोचता है, और नष्ट कर डालता है, मणि यत्रतत्र आदि कितने ही उपाय क्यों न किये जावे, आयु कर्म के पूर्ण हो जाने पर कोई भी जीप से मरण से नहीं बचा सकता । जीव को ससार में किसी की भी शरण नहीं है । व्यवहार नय से तो चार शरण है,अरहन्त परमेष्टी की शरण, सिद्ध परमेष्टो की शरण, साधु परमेष्टी की शरण और जिनधर्म की शरण। निश्चय नय से केवल अपनी आत्मा की ही शरण है, इस प्रकार निरन्तर चिन्तवन करने का नाम अशरण भावना है। शुभ, अशुभ कर्म फल जेते । भोगे जिय एक हि तेते ॥ सुनदारा होय न सीरी । सर स्वारथ के है भीरी ॥ अपने शुभ अशुभ कर्मों के फलों को यह जीव आप अकेलाही भोगता है। पुत्र स्त्री आदि कोई भी इस के दुख सुख के साथी नहीं होते। ये सब अपने स्वार्थ के ही सगे होते हैं। आत्मासदाहीअकेला है। जन्म मरण मे अकेला होता है, अकेलाही अनेक अवस्थाओं कोधारण करता है । इस ससार में इसजीव काधर्म सिवाय और कोई भी हिंतु नहीं है । निरन्तर इस प्रकार , ( १३६ ) चिन्तवन करना एकत्व भावना है जल पय ज्यों जिय तन मेला । पै भिन्न भिन्न नहीं भेला ॥ तो प्रगट जुदे धन धामा । क्यों है मिल इक सुतरामा॥ जल और दूध की तरह शरीर और जीव का मेल अनादि काल से हो रहा है, परन्तु दोनों जुदा जुदा हैं, एक नहीं है । जव अनादि काल से मिले हुवे हो कर भी यह एक नहीं हैं, तो धन धान्य , मकान, पुत्र, स्त्री आदि जो सर्वथा ही अपने से जुदा हैं अपने कैसे होंगे। इस प्रकार शरीर कुटुम्बादिक से अपने स्वरूप को सर्वथा भिन्न चिन्तवन करने का नाम अन्यत्व भावना है। पल रुधिर राध मल थैली । कीकसवसादित मैली ॥ नव द्वार वई घिन कारी । अस देह करे किमयारी ॥ यह शरीर मांस, खून, पीप, और विष की थैली है। हड्डी, चरबी आदि अपवित्र वस्तुओं के कारण मैली है। जिस शरीर के नौ रास्तों से महा घृणा उत्पन्न करने वाला मैल बहा करता है,उस मैले शरीर से क्या यारी करनी। यह शरीर महा अशुचि है, आत्मा ज्ञानमई महा पवित्र है,आत्मा का शरीर से क्या सम्बन्ध ? केवल विचार मात्र से ही भावना नहीं होती। देह को अशुचि विचार करने से, यदि परिणामों में वैराज्ञ भाव प्रगट होता है तो भावना सत्यार्थ कही जाती है, अन्यथा नहीं । ऐसा चितवन करने का नाम अशुचि भावना है। जो योगन की चपलाई । ताते हो आस्रव भाई ॥ आस्रव दुःख कार घनेरे । वुद्धिवन्त तिन्हें निरवरे ॥ हे भाई मन वचन काय की चञ्चलताई से कर्मों का आना होता है। यह कर्मों का आना बड़ा ही दुःखदायी है, वुद्विवान पुरुष सदैव ही कर्म आस्रव को दूर करने का यत्न किया करते हैं। पांच मिथ्यात्व, बारह अव्रत, २५ ।

( १३७ ) कपाय और १५ योग इस प्रकार ५७ द्वारों से जीव के शुभाशुभ कर्मों का आना होता है, इसी का नाम आसप है । यह आस्रव दो प्रकार का होता है, शुभासा और अशुभास्रव। शुभयोगजन्य कर्मों के आस्रव को शुभ आस्रव और अशुभयोगजन्य कर्मों के आस्रव को अशुभास्रव कहते हैं । आस्रव से बन्धहोता है,जोससार का मूल कारण है। इसलिए मोक्षाभिलाषी पुरुषों कोउचित है कि वह आत्रपऔर बन्ध के कारणों से चिमुखरहें। इस प्रकार आम्रव के स्वरूप काचिन्तवन करना आस्रव भावना है। ५७ आस्रवद्वार का विवरण इस प्रकार है- पच प्रकार का मिथ्यात्व। एकान्त मिथ्यात्व-वस्तु में अनेक स्वभाव होते हुए भी एक ही को ग्रहण करना। विपरीत मिथ्यात्व-अधर्म कोधर्मजानना, उल्टे श्रद्वान को विपरीत मिथ्यात्व रहते हैं। विनय मिथ्यात्व-समस्तप्रकार के देव, कुदेव, सुगुरु कुगुरु, धर्म अधर्म आदि सबको एक सा मानना तथा सबकीही विनय भक्ति करना। संशय मिथ्यात्व-जिनेन्द्र भगवान के वचनों में सन्देह करना । निर्णय न करना अज्ञान मिथ्यात्व-हिताहित की परीक्षा रहित देखा देखी श्रदान करना ।। बारह अव्रत-पाच इन्द्रिय और छठे मन का असयम और छह काय के जीवों की अदया ॥ २५ कषाय-अनन्तानु- बन्धी कोध, मान,माया, लोभ, अप्रत्यख्यानावरणी क्रोध, मान, माया,लोम, प्रत्याख्यानावरणीकोध,मान,माया, लोभ, सजलन क्रोध,मान,माया,लोम, इस प्रकार ये १६ क्पाय, और हास्य, रति, अरति, शोक, भय, जुगुप्सा, स्त्री वेद, पुरुप वेद, नपुसक वेद, ये नौ नोकषाय, कुल मिल कर २५ कपाय होते हैं। १५योग-४ मनोयोग, सत्यमनोयोग, असत्यमनोयोग, उभयमनो योग, अनुभय मनोयोग, ४ वचनयोग, सत्य वचन योग, असत्य वचनयोग उभय वचन योगाअनुभववचन योग, ७-काययोग-औदारिक काययोग, औदारिक मिश्र काययोग, वौक्रिय काययोग, वैक्रिया-मिश्र काययोग,आहा- ( १३८ ) रिक काययोग, आहारक-मिश्र काययोग, कार्माण काययोग । इस प्रकार कुल मिल कर ५७ आनत्र के कारण होते है। जिन पुण्य पाप नहीं कीना, आतम अनुभव चित दीना । तिन ही विधि आवत रोके, संवर लहि सुख अवलोके ।। जिन जीवों ने अपने भावों को पुण्य और पापरूप न होने देकर अपने आत्म अनुभव में ही अपने मन को लगाया, उन्होंने ही आते हुए कर्मा को रोका, और संबर की प्राप्ति कर सुख को प्राप्त किया। कमा के आम्रव को रोकने का नाम संबर है। संबर के कारण पंच महा व्रत, पंच समिति, तीन गुप्ति, दश लक्षण धर्म, बारह भावना और बाईस,परीषहों के स्वरूप का बार बार चितवन करना, संवर अनुप्रेक्षा है। निज काल पाय विधि झरना, तासौं निज काज काजन सरना । तप कर जो कर्म खिपावे, सोई शिव सुख दर्शावे ॥ अपनी स्थिति पूर्ण होने पर जो कर्म झड़ जाते हैं, उससे अपना कार्य नहीं वनता, तपश्चरण करके जो कर्मों की, उनकी स्थिति पूर्ण होने से पहले ही नष्ट कर डालता है, वह ही अपने में मोक्ष सुख को दर्शाता है । पूर्व संचित कमाँ के उदय में आकर खिर जाने को निर्जरा कहते हैं, यह निर्जरा दो प्रकार की होती है, एक सविपाक निर्जरा और दूसरी अविपाक निर्जरा । कर्म की स्थिति पूर्ण होने पर, फल दे कर स्वयं कर्म झड़ जाने को सविपाक निर्जरा कहते हैं। यह निर्जरा सब ही संसारी जीवों के हुआ करती है । कर्मों की स्थिति पूर्ण होने से पहले ही, उनको तपश्चरण आदि द्वारा, अनुदय अवस्था में झाड़ देने को अविपाक निर्जरा कहते हैं। यह निर्जरा सम्यक् दृष्टि व यतीश्वरों के हुआ करती है। इस प्रकार निर्जरा के स्वरूप तथा उसके उपायों का बार बार चितवन करना निर्जरा भावना है।

चहु गति दुख जीव भरे है, परिवर्तन पच धरे हैं। सब विधि ससार असारा, तामें सुख नाहि लगारा ॥ जीव अनादि काल से कर्मोदय के अनुसार चारों गतियों में भ्रमण करता हुआ अनेक दुखों को सहन करता है,और द्रव्य क्षेत्र, काल,भय और भाव रूप पञ्च परिवर्तन किया करता है। ससार सब प्रकार से असार है, इसमें जरासा भी सुख कहीं नहीं है । नरक गति में नानाप्रकार के छेदन, भेदन ताइन, तापन आदिक अनेक पीडायें उठानी पड़ती है। तिर्यच गति में मुख, प्यास, यादह बोझा उठाना, इत्यादिक कष्ट सहन करने पड़ते हैं। मनुष्य गति मैइष्टवियोग, अनिष्ट सयोग द्वारा अनेक दुख भुगतने पड़ते हैं। अनेक मानसिक चिंतायें नित प्रति सताया करती है। देवगति में भी देवाङ्गनाओं के वियोग के समय देव को बडा खेद होता है, अन्य देवों को मरते देवि अपने मरने काभय सताता है । अपने मरण से पहले माला मुर- झाई देख महा व्याकुलता को प्राप्त होता है, तथा अन्य देवों की अधिक सम्पत्ति देखकर ईपी पैदा होती है, इत्यादिक अनेक कष्टों का अनुभव करना पड़ता है। इस प्रकार चारों ही गति दु ख रूप हैं, ससार में कहीं भी सुख नहीं है । पञ्चमगति मोक्ष में ही अतीन्द्रिय,निरानाच, निराकुलता रूप सुख की प्राप्ति इस जीव को होती है। ससार का ऐसा स्वरूप विचार, चारों गतियों से उदासीन हो, मोक्ष का उपाय करना ही जीव का परम कर्तव्य है। निरन्तर ऐसा चिन्तयन करने का नाम ससार भावना है। किन न करो न धरो को, पट् द्रव्य मयी न हरै को । सो लोक माहि दिन समता,दुख सहै जौर नितभ्रमता ॥ इस लोक को न किसी ने बनाया है और न कोई इसे धारण किए हुए है। यह लोक जीव,पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश और काल ऐमे छ द्रव्यों से भरा हुआ है, कोई भी इसका नाश नहीं कर सकता। इस लोक की ( १४० ) आकृति पुरुषाकार है, लोकाकाश के शिखर भाग में सिद्ध शिला है, जहां अनन्त सिद्ध निवास करते हैं। इत्यादिक लोक की रचना तथा स्वरूप के चितवन करने को लोक भावना कहते हैं अन्तिम ग्रीवक लों की हद, पायो अनन्त विरियां पद । पर सभ्यक् ज्ञान न लाध्यो, दुर्लभ निज में मुनि साधो॥ इस जीव ने नौग्रीवक तक जाकर अनन्तवार वहां का अहमिन्द्र पद पाया, परन्तु सम्यक् ज्ञान की प्राप्ति न हुई। ऐसे कठिन सम्यज्ञान को मुनियों ने निज आत्मा में ही साधन किया है, यथार्थ ज्ञान की प्राप्ति बड़ी दुर्लभ है जैसा कि भूधरदास जी ने भी कहा है। धन कन कञ्चन राज सुख, सबै सुलभ कर जान । दुर्लभ है संसार में, एक यथारथ ज्ञान ॥ इस प्रकार यथार्थ ज्ञान की दुर्लभता का वार बार चितवन करना बोधिदुर्लभ भावना है। जो भाव मोह ते न्यारे, दृग ज्ञान व्रतादिक सारे । सो धर्म जबै जिय धारे, तव ही सुख अचल निहारे ॥ सम्यक् दर्शन, ज्ञान चारित्र तप आदिक जो भाव हैं, वे सब मोह भाव से जुदे हैं, और यही भाव धर्म रूप हैं । इस रत्नत्रय धर्म को जब जीव धारण करता है, तब स्थिर सुख अर्थात मोक्ष के सुख को प्राप्त कर लेता है । वस्तु का निज स्वभाव ही उसका धर्म है । जीव का स्वभाव चैतन्य मई है, इस निर्मल चैतन्यता को प्राप्त करना ही जीव का परम धर्म है । धर्म रत्नत्रय रूप है, धर्म दशल क्षणरूप है, अथवा अहिंसा रूप है । इस प्रकार धर्म के स्वरूप को वार वार चितवन करने को धर्म भावना कहते हैं। मुनिराज इनका विचार नित प्रति किया करते हैं, श्रावकों को चाहिये कि इनके चिन्तवन द्वारावे भी अपने मन को कोमल तथा निर्मल बनावें।

(१४१) इन भावनाओं के विचार से धर्म में प्रीति वढती है। क्षुत्तष्णा हिममुष्णं नमत्व याचनारतिरलाभ । दशोमशकादीनामाकोशो व्याविदु खसयमनम् ॥२०६।। स्पर्शश्च तृणादीनामज्ञानमदर्शन तथा प्रज्ञा । सत्कारपुरस्कार शय्या चा वधो निपद्या स्त्री ॥२०७॥ दानिशतिरप्येते परिपोदव्या परीपहा सततम् । सक्लेशमुक्तमनसा सक्लेशनिमित्तभीतेन ॥२०८|| वाईस परीपह जय। "क्षुत्पिरामाशीतोष्ण दंश मशक नग्न्यिारति स्त्री- चर्यानिषद्याशग्याकोशवधयाचनालाभरोगतृणस्पर्शमर सत्कारपुरस्कारप्रज्ञा- ऽज्ञानाऽदर्शनानि ।" (तत्वा.सु.अ. ९८०९)१ अधा,२ तृपा, ३ शीत, ४ उष्ण,५ दश मशक ६ नाग्न्य,७ अरति८ स्त्री,९ ची, १० निषद्या,११ शय्या१२ आकोश, १३ वध,१४ याचना,१५ अलाभ,१६ रोग, १७ तृण सर्श,१८ मल,१९ मत्कार,पुरस्कार,२० प्रज्ञा, १ अज्ञान २२ अदर्शन, यह वाईस परीपह ह । इन सब परीपहों से शरीर सबधी वा मनसबंधीजो अत्यत पीड़ा होती है,उसे समता मात्र पूर्वक सहन कर लेने से सबर होता है। और पूर्व वह कर्मों का निराहोती है। मुनिराज तो इन परीपहों को पूर्णतया जय करते हैं । गृहस्थों के लिये भी इनका जय करना परम कर्तव्य है। आगे इनका भिन्न २ स्वरूप कहते हैं । अनशन ऊनोदर तप पोएत, पाग्व मास दिन बीत गये हैं । जोग न बने योग्य भिक्षा निधि, सुख अग सन शिथिल भये है। तन नहु दुम्सह भृग्व की वेदन सहत सावु नहीं नेक नये है। तिन के चरण कमल प्रतिदिन दिन, हाथ जोड हम शीत नये ह ।। मुनिराज परववाडों, महीनों तक अनशन ऊनोटर आदिक कठिन से कठिन तपश्चरण क्यिा करते हैं, यदि,योग्य विधि पूर्वक,निदोप,अन्तराय ( १४२ ) रहित आहार उनको मिलता है तो ले लेते हैं, अन्यथा फिर उपवासे धारण कर लेते हैं। इस प्रकार करते करते यह दशा हो जाती है कि शरीर के सब ही अगोपांग शिथिल हो जाते हैं। भूख की तीव्र दुःस्सह वेदना होने पर भी मुनिराज भूख की बाधा को समता भाव पूर्वक सहन करते हैं। ऐसी वेदना के समय वे विचार करते हैं कि हे जीव ! पाप के कारण तू नरक में गया, वहां क्षुधा तो अति तीव्र थी, परन्तु खाने को एक कण मात्र भी नहीं मिलता था, पशु गति में, तथा मनुष्य गति में पराधीन हो कर बन्दीखाने में पड़े पड़े अनेक बार क्षुधा की वेदना को सहन कियाहै, अब तो मुनि पद को धारण कर तू स्वाधीन हो गया है। इस क्षुधा की अल्प वेदना से क्यो कायर होता है, अन्य मुनीश्वर तो पक्षोपवास, मासोपवास कर रहे हैं, उन्हें क्षुधा की बाधा नहीं होती,तुझे ही क्यों हो ? अब तो तू भोजन की लालसा को छोड़, भूख की बाधा को मेट,ज्ञानामृत का पान कर, इस प्रकार क्षुधा की परीषह को जीतने वाले मुनिराज को बारम्बर नमस्कार हो। पराधीन मुनिवर की भिक्षा, पर घर लेय कहें कछु नाहीं। प्रकृति विरुद्ध पारण भुंजत, बढत प्यास की त्रास तहां हौं । श्रीषम काल पित्त अति कोप, लोचन दोय फिरै जब जांहीं । नीर न चहें सहें तिसते मुनि, जयवन्ते वर्तो जग माही। मुनिराज का आहार पराधीन होता है, वे दूसरे के घर आहार लेते हैं, अपने मुख से आहार के सम्बन्ध में कभी कुछ नहीं कहते, उद्दिष्ट आहार के सर्वथा त्यागी होते हैं। ऐसी दशा में गर्मी की ऋतु में यदि कोई श्रावक उन को प्रकृति विरुद्ध आहार दे देता है, तो प्यास बड़े जोर की लगती है, पित्त की अधिकता से व्याकुलता बढ़ जाती है यहां तक कि गर्मी तथा प्यास के कारण दोनों आंखें फिर जाती हैं। ऐसी हालत हो जाने पर भी (४३) वह जेल की याचना किसी से नहीं करते हैं और नही जल को ग्रहण करते है। समताभार पूर्वक प्यास की बाबा को सहन करते है । ऐसी अवस्था में विचारते है कि हे जीव तने ससार में बहुत भ्रमण किया है, फितना ही जल अनेक भव भवान्तरों में तूपी चुका है, परन्तु अब तक तेरी तृषा की वेदना नहीं मिटी । नरक में ऐसी प्याम लगी कि समुद्र जल से भी तृप्त न हो सके, परन्तु वहा एक बून्द मात्र जल भी न मिला। तिर्यच्च गति में अनेक बार तृपा के कारण अनेक कष्ट सहन किये। मनुष्य गति में परके आधीन हो कर तुपा की वेदना को अनेक वार सहन किया। अब जो तृपा की वेदना है, यह तो उन सब वेदना की अपेक्षा कुछ भी नहीं है। इस वेदना से तृ कायर क्यों होता है ? अब तो तृस्त्राधीन है, तृने परम उत्कृष्ट साधु पद को धारण किया है, तृपा परीपह को सहन कर, समभाव रख, सयम से न डिग, दुर्लभ ज्ञानामृत का पान कर । जो मुनिराज इस प्रकार तुपा परीपह को जीतते हैं वे जग में जयन्ते हो। शीत काल सन ही जन कप, खडे जहा बन वृक्ष दहे है। झझा वायु बहे वी मतु, वर्पत बादल झुम रहे हैं। तहा धीर तटनी तट चौपट, ताल पाल पर कर्म दहे हैं। सहे सभाल शीत की वावा, ते मुनि तारन तग्न कहे हैं। शरद ऋतु में सब ही जीन जाड़े के कारण कापने लग जाते हैं, हरे वृक्ष भी पाले के मारे सूख जाते है,वर्षा हो जाने पर जोर की ठडा हा चरती है,बादल घूम वृम कर आकाश में छा जाते हैं। ऐसे में वे तपोवन मुनिराज चौर वीर होकर किसी नदी के किनारे, अथरा कहीं किसी ताल की पाल पर जाडे की हवा की जरा मी परवान करते हुए, ध्यान में निश्चल है। कमी की निर्जरा क्यिा करते हैं। वे विचारते हैं हे जीव ! तूने नरक में महाशीत की वेदना को सहन क्यिा है, उसके सामने यह वेदना कुछ भी .

( १४४ ) नहीं है, अब तो तूने मुनि पद को धारण किया है, शीत परीपह को आदर भाव पूर्वक सहन कर । जो मुनिराज इस प्रकार शीत परीषह को मन बचन काय की शुद्धि पूर्वक सहन करते हैं, सच्चे तरण तारण कहलाते हैं। भूख प्यास पीडै उर अन्तर, प्रचलै आंत देह सब दागे। अग्नि स्वरूप धूप ग्रीष्म की, ताती बाल झालसी लागे॥ तपै पहार ताप तन उपजत, कोपै पित्त देह ज्वर जागे। इत्यादिक ग्रीष्म की बाधा, सहत साधु धीरज नहि त्यागे॥ ग्रीष्म काल में अन्तरङ्ग में भूख प्यास की पीड़ा सताती है, अन्तडिया में जलन होने लगती है, शरीर गर्मी के कारण व्याकुल हो जाता है,ग्रीष्म काल की धूप अग्नि सारिखी होती है, गर्म लूएं भट्टी की झलों के समान लगती हैं, पित्त का जोर हो जाता है । ज्वर आदि रोग सताने लगते हैं। ऐसे प्रचण्ड ग्रीष्म काल में मुनिराज पर्वतों के उच्च शिखरों पर ध्यान लगाते हैं, नीचे से पहाड़ तपता है, ऊपर से सूर्य की तेज शरीर को जलाती है। इस प्रकार ग्रीप्म ऋतु की अनेक बाधाओं को मुनिराज समता भाव पूर्वक सहन कहते हैं। अन्तर विषय वासना वर्ते, बाहर लोक लाज भय भारी। ताते परम दिगम्बर मुद्रा, धर नहिं सकें दीन संसारी ॥ ऐसी दुदर नग्न परीषह, जीतें साधु शील व्रतधारी। निर्विकार बालकवत निर्भय, तिन के पायन धौक हमारी ॥ नग्न मुद्रा के धारी, महा अविकारी मुनिराज भयंकर बन में एकाकी रहा करते हैं । साधारण संसारी लोग तो दिगम्बर मुद्रा को धारण ही नहीं कर सक्ते, क्योंकि उनके अन्तरङ्ग में तो विषय वासना होती है, और बाहर से उनको लोक लाज का बड़ा भारी भय होता है । परम शील. के धारी दिगम्बर साधु ही नग्न परीषह सहन करने को समर्थ होते हैं। काम कषाय (१४५ ) का सर्वथा अभाव होने के कारण वे, वाल्कवत, विकार भाव से शून्य होते है, निर्मोही तथा निर्भय होने के कारण रेशम ऊन, सुत, सन वृक्षों के वल्कल आदि के किसी प्रकार के वस्त्र कीभी उनको आवश्यकता नहीं होती दशों दिशायें ही उनके वस्त्र का काम देती हैं । ऐसी दुहर नग्न परीपह के जीतने वाले साधु ही वन्दना के योग्य हैं। डास मास माखी तन काटे, पोडे बन पंछी बहुतेरे । डसे व्याल विपयारे वीजू, लगे खजूरे आन घनेरे ॥ सिंह स्याल सुडाल सतावें, रीछ रोझ दुख देय बडेरे । ऐसे कष्ट सहें सम भावन, ते मुनिराज हरो अघ मेरे ।। ससारी जीव डास मच्छर आदि के ज़रा काट जाने पर भी खेद खिन्न हो जाते हैं, योगीश्वर नम होते हैं,शरीरको नाम पाकर वन में डास,मच्छर,चिंवटी, मकोडे, कान खरे,सर्प आदि विषयाले जीव उनसे लिपट जाते हैं, और उनके शरीर कोबाधा पहुंचाते हैं। ऐसा होने पर भी वेधीर वीर सायमन में जरा भी खेद नहीं करते बतिक सारी व्यथा को समताभार पूर्वक सहनकर अपनी ध्यान अवस्था में ही निश्चल रहते हैं। ऐसे मुनिराज मेरी पापरूपी कालिमा को दूर करें! देश काल को कारण लहिके, होत अचैन अनेक प्रकारे । न तहा खिन्न होय जगवासी, कलमलाय थिरता पद छाडे ॥ ऐसी अरति परीपद उपजत, तहा धीर धीरज उर धारे । ऐसे साधुन के उर अन्तर, वसे निरन्तर नाम हमारे ॥ देश तथा काल सम्बन्धी कारणों के मिलने पर समारी जीव अनेक प्रकार से पेद खिन्न तथा चैन होजाया करते हैं,परन्तु परम दिगम्बर साधु ऐसे कारणों के उपस्थित होजाने पर जराभी चित्त में डापाडोल नहीं होते। अपने चिच में निचलता को ही धारण करते हैं। किसी प्रकार भी अपने मयम में क्सिी प्रकार की अरुचि नहीं होने देताससारी जीव इष्ट पदार्थ के संयोग होने पर हर्ष करते हैं और उस पदार्थ से राग करते हैं,अनिष्ट पदार्थों के संयोग होने पर खेद खिन्न तथा व्याकुल होते हैं,और उन पदार्थों से द्वेष करते हैं। मुनिराज कदापि किसी भी वस्तु से राग द्वेष नहीं करते,मदैव समता भाव पूर्वक ही व्यवहार करते हैं, उनके लिये शत्रु मित्र,महल और मसान,सोना और काश्च, निन्दा और स्तुति,पूजन करना तलवार से मारना,ये सब समान हैं। ऐसी अरति परीषह को जीतने वाले साधु का नाम ही नित प्रति स्मरण करने योग्य है। जे प्रधान केहरि को पकड़े, पन्नग पकड़ पांव से चपत । जिन की तिनक देख भौं वांकी, कोटक शूर दीनता जपत । ऐसे पुरुष पहाड़ उड़ावन, प्रलय पवन तिय-वेद पयंपत । धन्य धन्य ते साधु साहसी, मन सुमेरु जिनके नहिं कंपत । महान पुरुष भी जो सिंह को वश में कर लेते हैं, सर्पको पांव के नीचे कुचल सकते हैं,जो पहाड़ उड़ाने के लिये भी सामर्थ हैं, और बड़े ही वीर हैं, स्त्रियों के हाव भावादिकों से अति विह्वल हो कर मोहित हो जाते हैं और उन्हें अपनी कुछ भी सुधि नहीं रहती । मुनिराज महाशील व्रत के पालनहारे स्त्री के सङ्ग को ऐसा त्याग देते हैं, जेसे कोई सज्जन पुरुष दुर्जन की सङ्गति को छोड़ देता है । स्त्री के शरीर को महामलीन, दुर्गति का कारण जान उस में आसक्त नहीं होते । समस्त विभाव परणति का त्याग कर, अपनी ही ज्ञानानन्द रूप स्वाभाविक परणति में लीन होते हैं चार हाथ परमाण निरख पथ, चलत दृष्टि इत उत नहिं ताने । कोमल पांव कठिन धरती पर, धरत धीर वाधा नहीं माने। नाग तुरङ्ग यान चढ़ चलते, ते सवाद उर याद न आने । यो मुनिराज भैरै चर्या दुःख, तब दृढ़ कर्म कुलाचल भाने ॥ संसारी जीव सफ़र में जाते हुवे ऋतु काल का विचार करते हैं अपने ( १४७ ) शारीरिक आराम की अनेक सामग्री साथ में ले, घोडा, हाथी, रथ, रेल, मोटर आदि में चढ कर चरते है, फिर भी यदि कुछ जरा सी तकलीफ होती है तो खेद खिन्न हो जाते हैं । यतीश्वर ईर्या पथ शोधते चरते हैं,ग्रीष्म ऋतु में टों दिशायें तपने लग जाती है, लूए सताती हैं, मार्ग में क्र काटे आदि पारों में चुभते हैं,परन्तु वे इन सब कारणों के मिलने पर भी खेद खिन्न नहीं होते। पहले भोगे हुने समारी के सुग्वों को याद तक नहीं करते । इस प्रकार समता मात्र पूर्वक चर्या परीपह को सहन करने वाले मुनिराज ही कर्मम्पी पहाड़ को भेदते हैं । गुफा मसान शैल तरु कोटर, निसें जहा शुद्ध भृहरें। परिमित काल रहे निश्चल तन,वार वार आसन नहीं फेरें । मानुष देव अचेतन पशु कृत, बैठे विपति आन जर घेरे । ठौर न तजें भजे थिरता पद, ते गुरु चमो मदा उर मेरे॥ सब ही ससारी जीव सुन्दर स्थानों में रह कर सुश होते हैं। मुनिराज दीक्षा ग्रहण करने से पहले, मनोग्य, सुन्दर, विशाल महलों में रहा करते थे, अनेक प्रकार के भोग विलास करते थे। अन निजस्वरूप को पहिचान निश्चय से अपनी आत्मा को ही अपना स्थान जाना है। परिग्रह का सर्वथा त्याग किया है और निर्जन वन में जहा सिंहादिक अनेक वनचर जीव रहते हैं। पहाड़ों की अन्धेरी गुफाओं में, अथवा श्मशान भूमि में रहना अङ्गीकार किया है । ऐसे विषम स्थानों में निवास करते हो, अथवा ध्यान के समय जन कि मुनिराज एकामन स्थित होते हैं तो चेतन, अचेतन कृत अनेक उरसों के उपस्थित होने पर भी महाधीर पीर साधु खेद नहीं मानने, स्थान को छोड़ भागने नहीं, अपने निज सम्प कोपिचार समता भार पूर्व उपसर्ग को सहन करते हैं । ऐसे साधु नितप्रति रमरण करने योग्य हैं।

जावे। जे महान सोन के महलन, सुन्दर सेज सोय सुख ते अब अचल अङ्ग एकासन, कोमल कठिन भृमि पर सोवे ॥ पाहन खंड कठोर कांकरी, गड़त कोर कायर नहीं होवे । ऐसी शयन परीषह जीतत, ते मुनि कर्म कालिमा धौवें ।। जगत के सब ही जीव विषयाभिलापी होने के कारण कोमल शय्या आदि पर ही सोना पसन्द करते हैं । परम योगीश्वर नोने चान्दी के विशाल महलों को तथा सुन्दर और कोमल सेज को छोड़ कर,बन खण्डहर आदि में शयनासन किया करते हैं। क्षीण शरीर में कठोर कंकरी आदि चुभती हैं, तो खेद खिन्न नहीं होते, वे विचारते हैं कि हे जीव ! तूने नरकों का वेदना अनेक बार सहन की, नरक की भूमि के समान विषम भूमि कहीं भी नहीं है, यह क्या विषम भृमि है, जिससे तृ खेद खिन्न होता है। तृने तो उत्तम जिन मुद्रा को धारण किया है, भव समुद्र से पार हो मोक्ष पद को प्राप्त करना चाहता है। मोह निद्रा को छोड़, योग (ध्यान) निद्रा में आरूढ़ हो । सदैव काल जाग्रत रह कर निज स्वरूप में मन हो । शय्या का खयाल तक भी दिल में नला। पहले राज्य अवस्था में अनेक भोग विलास किये। मनोग्य महलों में सुन्दर सेजों पर जो मजे उड़ाये, उन को याद न कर, संसार के समस्त ही भोगों को रोग समान समझ । इस प्रकार शय्यापरीषह को जीतने वाले मुनिराज ही कर्म रूपी कलङ्क को धोने के लिये समर्थ हुवा करते हैं। जगत जीव यावन्त चराचर, सब के हितु सब के सुखदानी । तिन्हें देख दुर्वचन कहें शठ, पाखंडी ठग यह अभिमानी ॥ मारो याहि पकड़ पापी को, तपसी भेप चोर है छानी । ऐसे वचन वाण की विरियां,क्षमा ढाल औटें मुनिज्ञानी ।। मुनिराज जगत के समस्त ही जीवों के सच्चे हितैषी तथा सुख पहुंचाने वाले होते हैं, दुष्ट लोग उन्हें देख कर नाना प्रकार के खोटे बचन कहते है, उन की निंदा करते हैं, गाली देते हैं, कोई कहते हैं, कि इस पापी को मारो, यह पाखडी है अभिमानी है, तपस्वी के भेष में चोर है। ऐसे निष्ठुर वचनों के सुनने पर भी वे उत्तम क्षमा के धरणहारे सावुकोध नहीं करते, चित्त को रचमात्र भी कलुपित नहीं होने देते । परम क्षमारूपी ढाल से दुष्टजनों के वचनरूपी बाणों के प्रहार को रोकते हैं। निरपराध निर्वर महा मुनि, तिन्हें दुष्ट लोग मिल मारें। केई खेंच थभ से वावत, केई पावक में परजारें । तापर कोप न करहिं कदाचित, पूर्व कर्म विपाक विचारे । समरथ होय सहें बध बन्धन, ते गुरु सदा सहाय हमारे ।। ससारी जीवों को यदि कोई बधवन्धन द्वारा कष्ट पहुचाता है, तो वे उस से बड़ा द्वेष करते हैं, किसी न किसी प्रकार अपना बदला लेने का प्रयत्न करते हैं । उत्तम क्षमा के धारक महा मुनि को यदि कोई दुष्ट पापी जीव मारते हैं, खेंच कर यम से वान्ध देते हैं या कोई और उपद्रव करते है, तो वे मुनिराज सामर्थवान होते हुये भी उन पर कोई क्रोधादि नहीं करते, विचारते हैं कि यह सब कष्ट शरीर सम्बन्धी है,कोई पूर्ववड,अशुभ कर्म उदय में आकर अपना फल दे रहा है । मेरा आत्मा अप॑तिक है, शुद्ध स्वभाव ज्ञानानन्द स्वरूप है, उसको कोई बाधा नहीं पहुंच सकती। ऐसे ही साधु सदा हमारी सहाय करें। घोर वीर तप करत तपोधन, भये क्षीण सूखी गल वाही। अस्थि चाम अवशेष रह्यो तन नसाजाल झलके जिस माहीं॥ औपधि अशन पान इत्यादिक, प्राण जाय पर याचत नाही। दुदर अयाचीक व्रत धारें, करहिं न मरिन धरम परवाही। तपोधन मुनिराज घोर तपश्चरण किया करते हैं, जिस के कारण उन , ( १५० ) का शरीर क्षीण हो जाता है । यहां तक कि नसाजाल उस चमड़े में से चमकने लग जाता है । शरीर की ऐसी अवस्था हो जाने पर भी वह औषधि, आहार, जल आदि की याचना किसी से नहीं करते, चाहे उन के प्राण निकल जावें, पर वह अयाचीक व्रत का पालन करते हैं । वह विचारते हैं कि याचना से समस्त ही संसारी जीव दीन हो रहे हैं, इन्द्र चक्रवर्ति आदि भी अभिलाषाओं के वश हो कर रङ्ग हो रहे हैं । मुनि की वृत्ति अयाचीक है, जब वह जिनेन्द्र प्रभु से मोक्ष ही नहीं मांगते, तो और किसी से क्या मांगना । याचना न करना मुनि व्रत का मूल है, याचना जीव को संसार में नीच बनाती है, अयाचना व्रत का पालन करने से ही जीव उत्कृष्ट होता है। एक वार भोजन की विरियां, मौन साध बस्ती में आवें। जो नहीं बने योग्य भिक्षा विधि, ते महन्त मन खेद न लावें॥ ऐसे भ्रमत बहुत दिन बीते, तव तप विरद भावना भावें। योअलाभ की परम परीषह, सहें साधु सोही शिव पावें ॥ मुनिराज अनेक उपवास करने के वाद, पारणे के दिन बस्ती में आते हैं। यदि योग्य विधि पूर्वक आहार नहीं मिलता है, तो रंचमात्र भी खेद खिन्न नहीं होते हैं । लाभ अलाभ दोनों को समान गिनते हैं। इस प्रकार अलाभ परीषह के जीतने वाले साधु ही मोक्ष के पात्र होते हैं। बात पित्त कफ शोणित चारों, ये जब घटे बढ़े तन माहीं। रोग संजोग सोग तन उपजत, जगत जीव कायर हो जाहीं॥ ऐसी व्याधि वेदना दारुण, सहे शूर उपचार न चाही। आतम लीन देहसों विरकत, जैन यती निज नेम निबाही ॥ शरीर रोगों का घर है, बात पित्त कफ आदि के घटने बढ़ने से अनेक रोग शरीर में हो जाते हैं । संसारी जीव इन रोगों के हो जाने पर बड़े ( १५१ ) खेद खिन्न हो जाते हैं। नाना प्रकार के इलाज कराते हैं और रोग जनित पीड़ा के सहन करने में कायर हो जाते हैं । परन्तु जैन यति तीबसे तीव्र रोग के उपस्थित हो जाने पर भी खेद खिन्न नहीं होते, इलाज की इच्छा तक नहीं करते । शरीर से ममत्व त्याग अपनी आत्मा मेंहीलीन रहते हैं। सूखे तृण और तीक्ष्ण काटें, कठिन काफरी पाय विदारें । रज उड़ आय पड़े लोचन में, तीर फास तन पीर विथारें ॥ तापर पर सहाय नहीं बाछत, अपने करसों काढ न डारें। यो तृण परस परीपह विजयी, ते गुरु भव भव शरण हमारे ॥ जगत के जीव जरासी फास लग जाने पर खेद खिन्न हो जाते हैं, योगीन्द्र के शरीर में यदि त्रण, कङ्करी, फास आदि चुभ जाते हैं तो वे शूरवीर साहसी, संयम रूपी धन के स्वामी रंचमात्र भी खेद चित्त में नहीं करते, अपने हाथ से त्रण आदि को निकालते नहीं, और न किसी दूसरे से उम के निकालने के लिये प्रार्थना करते हैं । सर्वथा नियाकुल हो निज स्वभाव में ही लीन रहते हैं। यावजीव जल न्हवन तजो जिन, नम रूप बन थान खरे हैं। चले पसेव यूप की विग्यिो, उडत धूल सन अङ्ग भरे हैं। मलिन देह को देख महामुनि, मरिन भाव उर नाहिं करे हैं। यो मल जनित परीपह विजई, तिन्हें हाथ हम शीश धरे हैं। जगत के जीवो के शरीर में जरासा भी पसीना आकर रचमात्र भी धूल लग जाती है, तो बेचैन हो जाते हैं, साबुन आदि से स्नान कर शरीर को आराम पहुचाने के अनेक उपाय करते हैं । मुनिराज के यावजीव स्नानादि का सर्वथा त्याग होता है, ग्रीष्म काल में धूप की तेजी से पसीना आने से शरीर पर रेत, धूल उड़ कर जम जाता है, शरीर मैला हो जाता है, रेत काटने लगती है । ऐसा होने पर भी मुनिराज अपने चिचमें जरा .

( १५२ ) भी खेद नहीं करते । वे विचारते हैं कि हे जीव ! यह तेरा शरीर तो इतना मलीन है, कि यदि सारे समुद्र के जल से भी इसे शुद्ध किया जावे, तो भी यह पवित्र नहीं हो सकता । तू तो परम पवित्र, अमूर्तिक, शुद्ध चैतन्य स्वरूप है। धूल आदिक मूर्तिक पदार्थ तुझे कैसे स्पर्श कर सकते हैं। ऐसा विचार देह के नेह को त्यागो और निज स्वरूप में स्थिर रहो। जे महान विद्या निधि विजई, चिर तपसी गुण अतुल भरे हैं । तिनकी विनय वचन सो अथवा, उठ प्रणाम जन नाहिं करे हैं । तो मुनि तहां खेद नहिं माने, उर मलीनता भाव हेरे ऐसे परम साधु के अहनिशि, हाथ जोड़ हम पांव पड़े हैं। संसार में देव, मनुष्य,तिर्यग आदिक सब ही जीव आदर किये जाने पर हर्षित होते हैं,सत्कार करने वाले को अपना मित्र समझते हैं। अनादर करने वाले को शत्रु समझते हैं। इस प्रकार आदर अनादर के कारण सदैव रागद्वेषरूप परिणति किया करते हैं। वीतरागी यतीश्वरों की इन्द्र,चक्रवर्ति आदिक सव स्तुति वन्दना किया करते हैं,यदि कोई अविवेकी रंक पुरुष उन की निन्दा करता है, तो उनके लिये दोनों समान हैं। वह ऐसा विचार किया करते हैं, कि हमारा आत्मा तो अमूर्तिक पदार्थ है, दृष्टिगोचर नहीं, बचन गोचर नहीं, उसका सत्कार कोई कैसे कर सकता है। शरीर पुद्गल- रूप पर पदार्थ है, मलमूत्र का भाजन है,इस में कौनसी ऐसी बात है कि जिसके कारण इसकी स्तुतिकी जावे । इसलिये,स्तुति होने पर या निन्दा किये जाने पर हर्ष विषाद का मानना सर्वथा व्यर्थ है ।जो साधु इस प्रकार सत्कार पुरस्कार की परीषह समताभाव पूर्वक सहन करते हैं,वे वन्दनाके योग्य हैं। तर्क छन्द व्याकरण कला निधि, आगम अलङ्कार पढ़ जाने । जाकी सुमति देख परवादी, विलखे होय लाज उर आने । जैसे नाद सुनत केहरि को, बनगयन्द भागत भयमाने । ऐसी महा बुद्धि के भाजन, पैमुनीश मद रंच न ठाने ।

( १५३ ) ससारी जीव जरा से लौकिक ज्ञान प्राप्त हो जाने पर ही मान करने लग जाते हैं, कि हमारे जैमा और कोई विद्वान तथा बुद्धिमान नहीं है। महा- मुनीश्वर तर्क छन्द, व्याकरण, कला, आगम, अलङ्कार आदि का सपूर्ण जान रखते हुवे भी मान नहीं करते। सावधान वरतं निशिवासर, सयम शूर परम वैरागी । पालत गुप्ति गये दीरघ दिन, सकल सग ममता परित्यागी। अवधि ज्ञान अथवा मन-पर्यय, केवल किरण अजों नहि जागी। यो विकलप नहिं करहिं कदाचित, सो अज्ञान विजई बई भागी। अनादि काल से ससारी जीव, अज्ञान के फन्दे में फंसे हुवे हैं, निज स्वरूप का ज्ञान नहीं होता और कदापि पढने का अभ्यास भी करें, और शब्दार्थ का ज्ञान न होतो मन में अति-क्लेशित होकर पढने से मुह मोड लेते हैं,पढना पढाना छोड़ देते हैं। मुनिराज को महा तप करते करते वर्षों वीत जाते है, तो भी परिपूर्ण श्रुत ज्ञान नहीं होता, या अवधि ज्ञान, मन पर्यय ज्ञान, या केवल ज्ञान की प्राप्ति नहीं होती, तो वह तपोधन मन में खेद नहीं करते। ऐसा विकल्प तक भी नहीं करते कि देखो घोर तपश्चरण करते करते बहुत समय बीत गया है, परन्तु हमारे ज्ञान में कोई भी वृद्धि नहीं हुई। मैं चिर घोर घोर तप कीने, अजौ सिद्धि अतिशय नहिं जागे । तप नल सिद्धि होहि सन सुनिये, सो कछुवात झुठ सी लागे॥ यो कदापि चित्त में नहिं वितत, समकित शुद्ध शान्त रसपागे। सोई साधु अदर्शन विजई, ताके दर्शन सो अघमागे ॥ ससारी जीव सन काम किसी न किसी प्रयोजन से किया करते हैं। इन्छित प्रयोजन के सिद्ध होने में यदि कमी रह जाती है, तो केश मानते हैं। कोई मूट पुरुष तो कार्य की सिद्धि न होने पर अपना अपघात तक कर ( १५४ ) बैठते हैं । ऋषिराज को महाव्रत धारण करते, और घोर तपश्चरण करते करते बहुत काल बीत जाता है, फिर भी यदि तप के फल रूप किसी ऋद्धि सिद्धि की प्राप्ति नहीं होती, तो ऐसा विकल्प कभी भी नहीं करते कि शास्त्र में तो सुनने में आता है कि तप के बल से सब सिद्धि प्राप्त होजाती है, यह सब बातें झूठी ढकोसला सी ही मालूम पड़ता है। वह संयम के फल में जरासी भी शङ्का न रख अपने धर्म मार्ग में निश्चल रहते हैं और अपने सम्यक् दर्शन को किसी प्रकार भी मलीन नहीं होने देते । इन बाईस परीषहों में से जीव के एक साथ उन्नीस परीषह उदय में आ सक्ती है। क्योंकि शीत उष्ण में से एक काल में शीत या उष्ण एक ही परीषह होगी.। और शय्या, चर्या, निषद्या इन तीनों में से भी एक काल में एक ही होगी । इस प्रकार एक समय में ३ परीषहों का अभाव होने के कारण १९ परीषह ही एक साथ उदय हो सक्ती हैं । प्रज्ञापरीषह और अज्ञान परीषह ज्ञानावरण कर्म के उदय होने पर होती हैं । दर्शमोहनी के उदय से अदर्शन परीषह और अन्तराय के उदय से अलाभ परीषह होती है । चारित्र मोहनीय के उदय से नग्नता, अरति, स्त्री, निषद्या, आक्रोश, याचना और सत्कार पुरस्कार ये सात परीषह होती हैं । बाकी की क्षुधा, तृषा, शीत, उष्ण, दंश मशक, चर्या, शय्या बध, रोग, तृण स्पर्श और मल ये ग्यारह परीषह वेदनीय कर्म के उदय होने पर होती हैं । इन बाइस परीषहों का सहन कर लेना परम संबर का कारण है,परीषहों के सहन करने से चित्त निश्चल होता है। चित्त की निश्चलता से ध्यान की सिद्धि होती है, ध्यान से कर्मों की निजरा हो मोक्ष पद की प्राप्ति होती है। इसलिये मोक्षाभिलाषी मुनि के लिये इन २२ परीषहों का सहन करना अति अवश्यक है। , रत्नत्रय-धर्म सम्यकत्ववोधचारित्रलक्षणो मोक्षमार्ग इत्येप। मुख्योपचाररूप प्रापयति पर पदं पुरुपम् ॥२२२॥ सम्यक् दर्शन,सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चारित्र की एकता होना मोक्ष मार्ग है। इन्ही को तीन रत्न अर्थात रत्नत्रय कहते हैं। इनका पालन करना ही मोक्ष का साधन है । यह रत्नत्रय धर्म निश्चय तथा व्यवहारनय की अपेक्षा दो प्रकार का है। निश्चयनय से शुद्धात्मा के सच्चे स्वरूप का श्रद्धान करना सम्यक् दर्शन है। शुद्वात्मा के सच्चे स्वरूप का जानना सम्यक् ज्ञान है, और शुद्धात्मा के स्वरूप में रमना सम्यक् चारित्र है, अर्थात श्रहाऔर ज्ञान सहित आत्मध्यान को ही मोक्ष मार्ग कहते हैं । व्यवहार मोक्ष मार्ग निश्चय मोक्ष मार्ग का साधक है। जिनके द्वारा निश्चय रत्नत्रय का लाभ हो, उनका व्यवहार रत्नत्रय कहते हैं । जीर,अजीव,आम्रप, बन्ध, सवर, निर्जरा और मोक्ष इन सप्त तत्वों के, या इन में पुण्य पाप और मिला कर नौ पदार्थों के यथार्थ श्रद्धान को सम्यक् दर्शन, तथा जिनेन्द्र प्रतिपादित आगम के ज्ञान को व्यवहार सम्यक् ज्ञान कहते हैं।अशुभ मार्ग की निवृत्ति, शुभ मार्ग की प्रवृत्ति, व्यवहार सम्यक् चारित्र है। इति रत्नत्रयमेतत्पतिसमय विकलमविगृहस्थेन । परिपालनीयमनिश निरत्यया मुक्तिमभिलपता ॥२०॥ बद्धोद्यमेन नित्य लभ्वा समय च बोधि लाभस्य । पदमवलम्ब्य मुनीना कर्त्तव्य सपदि परिपूर्णम् ॥२१०|| असमग्र भावयतो रत्नत्रयमस्ति कर्म वन्धो यः । सविपतकृतोऽवश्य मोक्षोपायो न बन्धनोपाय ॥२१॥ इस रत्नत्रय धर्म का पालन मुनिराज तो पूर्णतया करते हैं और गृहस्थ एकोदेश करते हैं। दोनों प्रकार कारत्नत्रय मोक्ष कामार्ग है। निश्चय रत्नत्रय - ( १५६ ) साक्षात मोक्ष मार्ग है और व्यवहार परम्परा मोक्ष मार्ग है । ज्ञानी तथा विवेकी जीव गृहस्थ में रहते हुए भी संसार के विषय भोगों से विरक्त,तथा मोक्ष मार्ग के साधन करने में उद्यमी रहते हैं। उन्हें योग्य है कि अवसर प्राप्त होने पर मुनिपद को धारण कर लेवें और सकल रत्नत्रय धर्म का पालन कर मोक्ष पद को प्राप्त करें। जीव तीन प्रकार के होते हैं । बहिरात्मा, अन्तरात्मा,परमात्मा । इनमें से बहिरात्मा जीव तो मिथ्या दृष्टि होते हैं, वह शरीर और आत्मा को एक गिनते हैं, तत्वों से अजान होते हैं। इनके सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान, सम्यक् चारित्र नहीं होते । इनके परिणाम द्वेष मई ही हुआ करते हैं । इस लिये इनके सर्वथा कर्म बन्ध अवश्य हुआ ही करता है । अन्तरात्मा-जो आत्मा को जानते हैं, (सम्यक् दृष्टि जीव) ये तीन प्रकार के होते हैं,उत्तम,मध्यम और जघन्य । उत्तम अन्तरात्मा- जो २४ प्रकार के परिग्रह रहित, शुद्ध परिणामी, आत्मध्यानी मुनीश्वर हैं वे उत्तम अन्तरात्मा हैं । मध्यम अन्तरात्मा-पंचम गुणस्थानवर्ती,देशवती श्रावक और छठे गुणस्थानवर्ती मुनिराज मध्यम अन्तरात्मा कहलाते हैं। जघन्य अन्तरात्मा-चतुर्थम गुणस्थानवर्ती अविरत सम्यक् दृष्टि जघन्य अन्तरात्मा कहलाते हैं। अन्तर आत्माओं के जितने अंशों में रागभाव का अभाव होता है, उतने अंशो में ही बन्ध का अभाव भी होता है। येनांशेन सुदृष्टिस्तेनांशेनास्य बन्धनं नास्ति । येनांशेन तु रागस्तेनांशेनास्य बन्धनं भवति ॥२१२॥ येनांशेन ज्ञानं तेनांशेनास्य बन्धनं नास्ति । येनांशेन तु रागस्तेनांशेनास्य बन्धनं भवति ॥२१३॥ येनांशेन चरित्रं तेनांशेनास्य बन्धनं नास्ति । येनांशेन तु रागस्तेनांशेनास्य बन्धनं भवति ॥२१॥ इस आत्मा के जिस अंश से सम्यक् दर्शन है,उस अंश से बन्ध नहीं 02 है । जिप्स अश से इस आत्मा के सम्यक् ज्ञान है,उस अंश से इसके बन्ध नही है। जिप्स अश से राग, उस अश से इसके बन्ध है। योगात्मदेशबन्ध स्थितिवन्धो भवति य कपायातु । दर्शनबोधचरित्र न योगरूप कषायरूप च ॥२१५।। दर्शनमात्मविनिश्चितिरात्मपरिज्ञानमिष्यते बोधः । स्थितिरात्मनि चारित्र कुत एतेभ्यो भवति बन्धः ॥२१॥ अभेद रत्नत्रय की दशा में दर्शन ज्ञान चारित्र एकरूप होकर प्रकाशमान होते हैं,शुद्ध भावों की निश्चल दशा होती है । ऐसी हालत में बन्ध का प्रकाश कहा । अर्थात ऐसी दशा में रागभार के अभाव के कारण बन्ध होता ही नहीं तात्पर्य यह है कि जिन अशों से आत्मा अपने स्वभावरूप परिणमन करता है,वह अश सर्वथा बन्ध के हेतु नहीं है,किन्तु जिन अशों से यह आत्मा रागादिक विभावरूप परिणमन करता है,वह ही अश बन्ध के हेतु हैं। इस प्रकार अन्तरात्माएं अपने अपने रागभाव के अनुसार ही कर्मों का बन्ध किया करते हैं। रत्नत्रय बन्ध का कारण नहीं है। परमात्मा के दो भेद हैं। सकल परमात्मा-जिन्होंने चारों घातिया कर्मी अर्थात दर्शनावरणीय, मोहनीय, ज्ञानावरणीय और अन्तराय कर्मों का क्षय कर दिया है और लोकालोक को देखने वाले सर्वदर्शी है। यह परमात्मा,क्षुधा,तृषा,भय,क्रोध, रोग,मोह,चिन्ता,जरा,जन्म,मृत्यु,पसीना,खेद,मद,रति,आश्चर्य, निद्रा,राग, आकुलता, इन अठारह दोषों से सर्वथा रहित होते हैं और समवसरण,अष्ट प्रतिहार्य आदि विभूति सयुक्त होते हैं । परमौदारिक शरीर के धारी सर्वज्ञ, वीतराग, हितोपदेशी,जीवन्मुक्त अरहन्त भगवान ही सकल परमात्मा हैं। निकल परमात्मा-भाव कर्म, द्रव्य कर्म और नो कर्म रूप तीन प्रकार के कर्म मल से रहित,निर्मल,शरीर रहित सिह भगवान ही निकल परमात्मा कहलाते हैं। .

( १५८ ) गाथा--ण कम्मदेहो लोयालोयस्यजाण ओट्टा । पुरिसायारो अप्पासिहोझाएह लोपसिहरत्थो ॥ (द्रव्यसंग्रहगा०५२) अर्थात् अष्ट कर्म और औदारिक पञ्च शरीरों को नष्ट कर चुकने वाला, लोकालोक को जानने वाला तथा देखने वाला,पुरुष के आकार मात्र का धारक और लोक के अग्रभाग में स्थित आत्मा सिद्ध परमेष्टी है । वह ही ध्यावने योग्य है,वह ही स्मरण करने योग्य है । निश्चयनय से जीव अपने शुद्ध दर्शन, ज्ञान,सुख वीर्यमयी स्वभाव में रहने वाला है। अनादि काल से मिथ्यात्व तथा अज्ञान के कारण निज स्वम्प को न जानता हुआ, कर्म जनित अवस्थाओं में ही तन्मय होकर उनके अनुकूल आचरण करता हुआ पर समय रूप हो रहा है । यही जीव जव कर्म जनित अवस्थाओं को अपना स्वभाव न जान,अपने निज स्वभाव को भली भान्ति पहचान कर,उसमें ही रमण करता है,तो वह वीतरागभाव को बढ़ाता हुआ कर्म के बन्धनों से छूटता चला जाता है और परम्परा से कर्मों से सर्वथा रहित हो मोक्षपद को प्राप्त कर लेता है। अविरत सम्यक् दृष्टि, तथाअणुव्रती सम्यक् दृष्टि और छठे प्रमत्त गुण स्थानवर्ति साधु यद्यपि स्वात्मानुभव में लीन न हो; लौकिक व्यवहार तथा शुभ क्रिया आदि रूप धार्मिक व्यवहार में अपना उपयोग लगाते हो। चारित्र की अपेक्षा उस समय वे स्वसमय रत नहीं हैं,तथापि श्रद्धान व ज्ञान की अपेक्षा वह पर समय रत नहीं हैं । वे. भली भान्ति जानते है और श्रद्वान रखते हैं कि आत्मा का हित निज स्वभाव में रमण करना ही है, वह जानते हैं कि चारित्र में जो कुछ भी कमी है वह चारित्र मोहनीय कर्म के उदय का कार्य है। मिथ्या दृष्टि सर्वथा भेद विज्ञान से रहित होता है, वह निज आत्मस्वभाव को जानता हुआ, श्रद्धान, ज्ञान तथा आचरण तीनों में ही पर समयरूप है । सर्वथा राग मई परिणाम होने के कारण वह गाढ़ कर्मों के बन्धनों से बन्धत रहता है सराग सम्यक् दृष्टि बहुत कम और वीतराग सम्यक् दृष्टि और भी थोड़े बन्ध को करता है । जब कपाय रहित होकर क्षीण मोह गुण स्थान में शुद्धोपयोगी हो जाता है, तब तुरन्त ही चार घातिया कर्मों को क्षय करके अरहन्त परमात्मा हो जाता है ननु कथमेवं सिध्यति देवायुः प्रभृतिसत्प्रकृतिबन्ध । सकलजनसुप्रसिद्धो रत्नत्रयधारिणां मुनिवराणाम् ।।२१९॥ रत्नत्रय धारी मुनियों के देवायुआदिक पुण्य प्रकृतियों का बन्ध होता है, यह सब जानते हैं, परन्तु आप जब रत्नत्रय को निर्वन्ध सिद्ध कर चुके हैं, तब यह बतलाइये कि इन के वधका कारण क्या कोई और है या यही रत्नत्रय है। रनत्रयमिह हेतुर्निर्वाणस्यैव भवति नान्यस्य । आस्रवति यत्तु पुण्य शुभोपयोगोऽयमपराध ॥२२०|| उत्तर-जहा मुनिराज गुण स्थानों के अनुसार रत्नत्रय की आराधना करते हैं,वहा उनके देव,गुरु,शास्त्र की सेवा,भक्ति और उपवास आदि रूप शुभोपयोग का भी अनुष्ठान होता है, यह शुभोपयोग का अनुष्ठान ही देवायु आदि पुण्य प्रकृतियों के बन्ध का कारण होता है। इस पुण्य प्रकृति वन्ध में शुभोपयोग का ही अपराध है, रत्नत्रय का नहीं, त्रय तो मोक्ष का ही मार्ग | दृष्टान्त-जैसे घृत आदि पदार्थ स्वभाव से ठडे होने पर भी अग्नि के सयोग से दाह का कारण हो जाते हैं, तैसे ही यह रत्नत्रय स्वभाव से तो मुक्ति के कारण हैं। तौभी पच परमेष्टी आदिशुभ द्रव्य के आश्रय में होने से पुण्य वन्ध के कारण कह दिये जाते हैं। वास्तव में तो शुभोपयोग पुण्य बन्ध रूप कार्य में कारण है, और रत्नत्रय मोक्ष रूप कार्य में कारण है। आगे अष्ट द्रव्य कर्म और उनके बन्ध का सक्षिप्त वर्णन करते हैं।

( १६० ) समस्त लोक में पुद्गल परमाणु भरे हुवे हैं,उनमें कार्माण वर्गणा के परमाणु भी हर जगह मौजूद हैं । यह आत्मा जब मन, वचन, कायरूप योगों के द्वारा सकम्प वा कपाय सहित होता है, तब वे कार्माण वर्गणय कर्म रूप हो कर आत्मा से सम्बन्ध कर लेती हैं। इसी को कर्म बन्ध कहते हैं । उस समय कषाय यदि मन्द होते हैं, तो कर्मों का बन्ध मन्द होता है । और कषाय यदि तीव्र होते हैं, तो कर्म बन्ध भी तीत्र होते हैं, कर्म बन्ध चार प्रकार का होता है। प्रकृति-बन्ध, स्थिति-बन्ध, अनुभाग वन्ध, प्रदेश-बन्ध । इन में से प्रकृति-बन्ध, और प्रदेश-बन्ध तो मन, वचन, काय के योगों की क्रिया से आस्रव पूर्वक होता है, और स्थिति बन्ध और अनुभाग-बन्ध के कारण काषय ही होते हैं। प्रकृति-बन्ध- प्रकृति नाम स्वभाव का है, जैसे नीम का स्वभाव कडुआ है। और गुड़ का मीठा, कर्मों में आठ प्रकार के स्वभाव का या रसों का पड़ना प्रकृतिबन्ध है । कर्मों की मूल प्रकृतिये आठ हैं ज्ञानावरण, दर्शनावरण, वेदनीय, मोहनीय, आयु, नाम, गोत्र और अन्तराय। ज्ञानावरणीय कर्म की प्रकृति है ज्ञान को ढक देना ।इस का स्वभाव परदे के समान है, जैसे परदे के पड़ जाने से वस्तु दिखाई नहीं देती, वैसे ही ज्ञानावरण कर्म की प्रकृति आत्मा से सम्बन्ध कर तत्व ज्ञान को नहीं होने देती। दर्शनावर्णीय कर्म की प्रकृति है दर्शन को ढक देना, रोक देना । इस का स्वभाव दरबान जैसा है । जैसे दरवान राजा के दर्शन नहीं होने देता, वैसे ही यह कर्म प्रकृति दर्शन को ढक देती है अर्थात आत्मा को सामान्य लोक महासत्ता का ज्ञान नहीं होने देती। वेदनीय कर्म-वेदनीय का अर्थ है अनुभव कराना जो कर्म संसारिक सुख दुख की सामग्री जोड़ कर सुख दुख का भोग करावे, उसे वेदनीय कर्म प्रकृति कहते हैं । यह वेदनीय कर्म दो प्रकार का होता है साता वेदनीय, जिस के उदय से शारीरिक मासिक अनेक प्रकार को सुख रूप सामग्री प्राप्त होती है । दूसरीअसातादनीय-जिस के उदय से दुखदायक सामग्री की प्राप्ति होती है ।वेदनीय कर्म का स्वभाव शहद लपेटीहुई तलवार के समान है। जैसे वह चाटने से तो मीठीलगती है,परन्तु जिह्वा को काट डालती है, उसी प्रकार वेदनीय कर्म कुछ थोडी देर साता दिखा कर फिर असातासे पीडित रखता है ।मोहनीय कर्म का स्वभाव मदिरा जैसा है। जैसे मदिरा जीवों को असावधान(होश) बना देती है, उसी प्रकार मोहनीकर्म आत्मा को ससार में पागलसा बना देता है।मोहनी कर्म के दो भेद है-दर्शन मोहनीय और चरित्र मोहनीया इनमें से दर्शन मोहनीयतो आत्मा का दर्शन अर्थात सम्यक्त गुण काघात करता है,और चारित्र मोहनीय आत्मा के चारित्रगुण का घात करता है।आयु कर्म का स्वभाव आत्माको किसी भी शरीर में नियमित समय तक रोके रखने का है। इसका स्वभाव शिकजे (काठ) के समान है।जैसे शिकजे में पाव को अंटका देते हैं, और शिकंजे से पाव को निकाल कर चोर आदि भाग नहीं सकते, वैसे ही आयु कर्म के पूर्ण हुए बिना जीव नरकादि से निकल नहीं सक्ते । नाम कर्म का स्वभार चित्रकार के समान है जैसे चित्रकार नानाप्रकार के आकार बनाता है,उसी प्रकार नाम कर्म आत्मा से सम्बन्ध करके नाना प्रकार के मनुष्य तिर्यश्चादिक आकार बनाता है। शरीर, सहनन, सस्थान अङ्गोपाङ्ग, जाति आदि का निर्माण नाम कर्म ही से होता है । गोत्रकर्म का स्वभाव कुम्भ- कार के समान है।जैसे कुम्भकार छोटे, बडे नाना प्रकार के वर्तन बनाता है, उसी प्रकार गोत्रकर्म उच्च नीच गोत्रों में जीव का व्यवहार कराता है। जिमकर्म के उदय से लोक पृय कुल में जन्म होता है, उसे उच गोत्र- कर्म कहते हैं। और जिसके उदय से निय, दारिद्री अप्रसिद्ध, दुखों से से आकुलित, नीच कुल में जन्म होता है उसे नीच गोत्र कर्म कहते हैं। अन्तराय कर्म का स्वभार राजा के उस भडारी के समान है, जो ( १६२ ) राजा के दिलाने पर भी किसी को दान नहीं देता। जैसे भंडारी भिक्षुकों को दान का लाभ नहीं होने देता,उसी प्रकार अन्तराय कर्म जीवों के दान, लाभादि में अन्तराय डाल देता है । इन में से ज्ञानावरणी, दर्शनावरणीय, मोहनीय और अन्तराय ये चारों तो घातिया कर्म कहलाते हैं क्योंकि यह आत्मा के ज्ञानादि गुणोंका घात करने वाले हैं। बाकी चारों कर्म अर्थात वेदनीय,आयु, नाम और गोत्र कर्म अघातिया कर्म कहलाते हैं। इनमें आत्मा के गुणों के घात करने की तो शक्ति नहीं होती, तो भी घातिया कर्मों के सहायक जरूर है प्रदेश बन्ध-उक्त आठ प्रकार के कर्मों का आत्मा के प्रदेशों से एक क्षेत्रावगाह रूपसे,संख्या को लिये हुवे,सम्बन्ध होना,प्रदेश वन्ध है । स्थिति बन्ध-आत्मा के साथ कर्मों के बन्ध रहने की मर्यादा को कहते हैं । जो कर्म बन्ध को प्राप्त हुवा,वह कितने काल तक आत्मा के साथ रहेगा,इसी का नाम स्थिति बंध है। ज्ञानावरणीय, दर्शनावरणीय, वेदनीय और अन्तराय इन चारों की उत्कृष्ट स्थिति ३० कोड़ा कोड़ी सागर की है। मोहनीय कर्म के दो भेद हैं, दर्शन मोहनीय और चारित्र मोहनीय इन में से दर्शन मोहनीय की उत्कृष्ट स्थिति ७० कोड़ा कोड़ी सागर की है, और चारित्र मोहनीय की उत्कृष्ट स्थिति २. कोड़ा कोड़ी सागर है। नाम और गोत्र कर्म दोनों की उत्कृष्ट स्थिति २०कोड़ा कोड़ी सागर की है। आयु कर्म की उत्कृष्ट स्थिति३३सागर की है। जघन्य स्थिति इस प्रकार है । वेदनीयकी १२मुहूर्त,नाम,गोत्र की८मुहूर्त और बाकी सब कर्मों की १ मुहूर्त है। इस प्रकार उत्कृष्ट और जघन्य स्थिति बतलाई गई। मध्यम स्थिति के अनेक भेद हैं । अनुभागवन्ध-उपर्युक्त आठों कर्मों के विपाक होने को अर्थात उदय में आकर रस देने के शक्ति की हीनाधिकता होने कोअनुभागवन्ध कहते हैं। घातिया कर्म सब ही अशुभ हैं। परन्तु अघातिया कर्म सब ही अशुभ नहीं हैं,उनमें से साता वेदनीय, शुभ आयु शुभ नाम और उच्च गोत्र शुभ है। अशुभ अघातिया कर्म प्रकृतियों , (१३) में नीम कांजी,विष तथा हलाहल के समान उत्तरोचर फल देने की शक्ति है। शुभ प्रकृतियों में भी गुड़, खाड, मिश्री तथा अमृत के समान उत्तो- चरफल देने की शक्ति है। धातिया कर्मों मेस्ता,दारु,अस्थिऔर पाषाणरूप फल दान शक्ति होती है। जितने जितने कषाय पुष्ट होते हैं, उतनी उतनी ही कर्मों की स्थिति ज्यादह ज्यादह होती है, और जितनी जितनी कपाय निर्बल अथवा मन्द होती है, उतनी उतनी ही कर्मों की स्थिति हीन होती है, परन्तु आयु कर्म में नरक की स्थिति तीब कषाय से अधिक पड़ती है। शुभ आयु कम की स्थिति मद कपाय से अधिक व तीन कषाय से कम पड़ती है। पाप कर्मों का रस या अनुभागतीव कपाय से अधिक व मन्द कपाय से कम, तथा पुण्य कर्मों का अनुभागमद कपाय से अधिक वतीन कपाय से कम पडता है। प्रकृति बन्ध में जो कर्मों की आठ मूल प्रकृतिय बतलाई गई है उन में से ज्ञानावरण के पाच, दर्शनावरण के नौ, वेदनीय के दो,मोहनीय के अठाईस,आयु कर्म के चार,और अन्तरायकर्म के पाच भेद हैं नाम कर्म की ४२ प्रकृतियों के भेदानुभेद करने से कुल प्रकृतिये नाम कर्म की ९३ हो जाती है । इस प्रकार आठों कर्मों की कुल प्रकृति १४८ होती हैं । (जो कर्म प्रकृतियों के सम्बन्ध में विशेष जानना चाहे यह तत्वार्थ सूत्रजी या गोमहसार कर्मकाड से देखें) इन ११८ प्रकृतियों में से बन्ध दशा में अभेद विवक्षा से १२०,उदय में १२२,और सत्व में १४८ ही हैं। इनमें से मिथ्यादृष्टि,तीर्थकर प्रकृति,आहारक शरीर प्रकृिति, और आहारक अङ्गोपाङ्ग नाम की प्रकृति इन तीनों प्रकृतियों को छोड़ कर १०७ का बन्ध हुआ करता है। सम्यकत्वचरित्राभ्या तीर्थकराहारकर्मणो कन्धः । योऽप्युपदिष्ट समयेन नयविदां सोऽपि दोपाय ॥२१७॥ यहां यह प्रश्न होता है कि जन पहले यह कह चुके हैं कि रनत्रय मोक्ष ( ९६४ ) रूप ही है,बन्ध का कारण नहीं है, तो इन तीनों प्रकृतियों का बन्ध सम्यक्त में कैसे होता है ? इस प्रश्न का समाधान यह ही है कि सम्यक्त के दो भेद है, एक सराग सम्यक्त, दूसरा वीतराग सम्यक्त । सराग सम्यक्त कुछ रागभाव से युक्त होता है, और वीतराग सम्यक्त रागभाव मुक्त होता है। इस लिये सराग सम्यक्त में ही रागभाव के मेल के कारण ही इन तीन प्रकृतियों का बन्ध होता है, वीतराग सम्यक्त में नहीं सराग सम्यक्त में तथा चारित्र में ही योग और कषायों के संयोग से इनका बन्ध होता है । बन्ध का कारण योगऔर कषाय ही हैं,सम्यक्त और चारित्र तो उदासीन रूप हैं। सति सम्यकत्वचरित्रं तीर्थकराहारवन्धकौ भवतः । योगकपायौ नासति तत्पुनरस्मिन्नुदासीनम् ॥२१८॥ उदाहरण-जैसे महामुनीश्वरोंके समीपवर्ती जाति विरोधी जीव अपने अपने बैर भाव को त्याग देते हैं, परन्तु मुनिराज इस बैर-भाव त्यागरूप कार्य के न तो की ही हैं और न अकर्ता ही हैं। कर्तातो इस कारण नहीं हैं कि वे ध्यानारूढ परम उदासीन वृत्ति के धारक वाह्य कार्यों से सर्वथा पराङ्गमुख होते हैं । अकर्ता इस कारण नहीं है कि यदि मुनिराज न होते तो परस्पर जाति विरोधी जीव बैर भाव को नहीं त्यागते इसलिए वह तो की अकर्ता न होकर उदासीन ही हैं। इसी प्रकार तीर्थकर प्रकृति-बन्ध आहारक प्रकृति-बन्ध में सम्यक्त तथा चारित्र उदासीन ही होते हैं। इस प्रकार रत्नत्रय मोक्ष रूप ही है, पुण्य प्रकृति के बन्ध का कारण कदापि नहीं हो सकता । तात्पर्य यह है कि राग अंश मात्र भी मोक्ष मार्ग में बाधक । अभेद रत्नत्रय ही साक्षात मोक्ष का कारण है। वीतरागरूप शुद्धो- पयोग के बिना संसार से मुक्त होना असंभव है । आत्मा मेस्थिरता ही मोक्ष का कारण है, मुक्ति का लाभ जवही होगा जब कि निर्विकल्प समाधि का लाभ होगा। निर्विकल्प समाधि की दशा को स्वर्गीय पं.दौलतराम जी ने अपने छहढाले में मनहोर शब्दों में दर्शाया है।

जिन परम पैनी सुबुधि छैनी डार अन्तर भेदिया। वरणादि अरु रागादि ते निज भाव को न्यारा किया । निज माहि निज के हेत निज कर, आपको आप गयो । गुण गुणी ज्ञाता ज्ञान क्षेय, मझार क्छु भेद न रह्यो ॥१॥ जहा ध्यान ध्याता ध्येय को, न विकल्प बच भेद न जहाँ । चिद्भाव कर्म चिंदेश कर्ता, चेतना किरिया तहा ।। तीनों आभिन्न अखिन्न शुह, उपयोग की निश्चल दशा । प्रगटी जहा दृग ज्ञान व्रत, ये तीनधा एकै लसा ॥२॥ पग्माण नय निक्षेप को, न उद्योत अनुभर में दिपै । हग ज्ञान सुख बल भप सदा, नहि आन भार जु मो विपै ॥ मैं साध्य साधक मैं अपराधक, कर्म अरु तसु फलनि ते । चित पिंड चड अखड सुगुण करड, न्युत पुनि कलनि तै ॥३॥ यो चिन्त निज में थिर भये, तिन अकय जो आनन्द लह्यो । सो इन्द्र नाग नरेन्द्र वा, अहमिन्द्र के नाही कह्यौ । तर ही शुरुल ध्यानामिकर, चउ घात विधि कानन दह्यो । सब र ख्यो केवल ज्ञान कर, भविलोक को शिव मग कह्यो ॥४॥ फुनि घाति शेष अघाति विधि, छिन माहि अष्टम भृ बसे । बसु करम निनशे सुगुण वसु, सम्यक्त आदिक सन लसे ।। ससार वार अपार पारावार तरि, तीरहिं गयो । अविकार अफल अरूप शुचि, चिद्रूप अविनाश भयो ॥५॥ निज माहि लोक अलोक गुण, पर्याय प्रतिबिंधित ठये। रहि है अनन्तानन्त काल, यथा तथा शिव वरणये ॥ धन धन्य है जे जीव, नर भत्र पाय यह कारज कियो । तिन ही अनादि भ्रमण पच प्रकार तजि वर सुख लियो ॥६॥ M ( १६६ ) मुख्योपचार दुभेद यों बड़ भाग रत्नत्रय धरें । अरु धरेंगे ते शिव लहँ, तिन सुयश जल जग मल हरॆ ॥७॥ जब मुनिराज पूर्ण स्वरूपाचरण के समय भेद ज्ञान रूपी बहुत तेज छैनी से अपने अन्तरङ्ग का परदा तोड़ कर और शरीर के वर्णादि वीस गुणों और राग द्वेष, क्रोध मान आदि भावों से अपने आत्मिक भावों को जुदा करके, अपने आत्मा में अपने आत्म हित के लिये, अपने आत्मा के द्वारा अपने आत्मा को आप ही ग्रहण करते हैं, तब गुण गुणी, ज्ञाता, ज्ञान,ज्ञेय में कुछ भेद नहीं रह जाता है, अर्थात् ध्यान मय अवस्था में सब एक हो जाते हैं, विकल्प मिट जाता है । जिस, आत्म ध्यान की अवस्था में न ध्यान का, न ध्याता का और न ध्येय का कोई भेद है,और न बचन से कहने योग्य ही इन में भेद है । उस से तो चेतना भाव ही कर्म, चेतना ही की और चेतना ही क्रिया है। यहां कर्ता, कर्म, क्रिया भाव बिलकुल जुदा नहीं है। यहां तो शुद्ध भाव की स्थिर दशा है, जिस में दर्शन, ज्ञान चारित्र भी एक रूप हो कर प्रकाशमान हो रहे हैं। जिस ध्यान अवस्था में प्रमाण, निक्षेप का प्रकाश अनुभव में नहीं आता। यही अनुभव होता है कि मैं दर्शन, ज्ञान, सुख वीर्य रूप हूं, मेरे में दूसरा अन्य कोई भाव नहीं है । मैं ही साध्य हूं और मैं ही साधक हूं, तथा कर्म और कर्म फल से रहित भी मैं ही हूं। मैं चैतन्य पिंड हूं और मैं ही प्रचंड, खड रहित उत्तम गुणों का पिटारा हूं और सर्व पापों से भिन्न हूं। इस प्रकार मुनिराज जब आत्म ध्यान में लीन होते हैं तो उस दशा में जो अकथनीय आनन्द उन को प्राप्त होता है वह आनन्द न तो इन्द्र अहमिन्द्र को प्राप्त होता है और न नागेन्द्र को मिलता है और न चक्रवर्ति को कभी प्राप्त होता है । उस समय वह शुक्ल ध्यान रूपी आनि के द्वाराचार घातिया कम रूपी बन को भस्म कर, केवल ज्ञान को प्राप्त करते हैं और उस के द्वारा तीन काल की बातों को जान कर भव्य जीवों को मोक्ष मार्ग का उपदेश करते हैं। यह उनकी अरहन्त अवस्था कहलाती है। इसके बाद आयु कर्म के पूर्ण होने पर आयु, नाम, गोत्र और वेदनीय इन चार अघातिया कर्मों का क्षण भर में नाश कर मोक्षपद को प्राप्त कर लेते हैं। इन अष्ट कर्मों का नाश हो जाने से उन में सम्यक्त आदि अष्ट गुण प्रगट हो जाते हैं । जैसे मोह के नाश से सम्यक्त, ज्ञानावरणीय के नाश से ज्ञान, दर्शनावरणीय कर्म के नाश से दर्शन,अन्तराय के नाश से वीर्य, आयु के नाश से अवगाहना नाम के नाश से सुक्ष्मत्व,गोत्र के नाश से अगुरु लघुत्व,ओर वेदनीय के नाश से अव्यापाधत्व गुण प्रगट होते हैं। ऐसे वे कर्म रहित परमात्मा ससार रूपी समुद्र से तरकर पार पहुंच जाते हैं, सर्व प्रकार के विकारों से शरीरादिक से रहित अमूर्तिक हो शुद्ध चैतन्यमय अविनाशी सिद्ध हो जाते हैं। सिद्ध भगवान की आत्मा में तीन लोक और अलोक अपने गुण पर्याय सहित ऐसे झलकते हैं जैसे दर्पण मे अनेक पदार्थ झरकते हैं। मोक्ष में जैसे और सिद्ध हैं, वैसे ही यह भी अनन्तानन्त काल तक रहेंगे। वे जीव धन्य हैं जिन्होंने मनुष्य भव को पाकर ऐसा कार्य किया। ऐसे ही जीनों ने अनादि काल से चले आये पच परावर्तन रूप ससार को त्याग कर उत्तम सुख की प्राप्ति की है। वास्तव में जैनधर्म के अनुसार मुक्ति आत्मा का शुद्ध स्वरूप है। इस दशा में जीव कर्मों से सर्वथारहित हो सिद्ध पदको प्राप्त कर लेता है। मोक्ष दशा में यह जीप अपने स्वभाव में स्थिर रहता है। एकस्मिन् समवायादत्यन्तविरुद्धकार्ययोरपि हि । इह दहति घृतमिति यथा व्यवहारस्तादृशोऽपिरुढिमित ॥२२१ नित्यमपि निरुपलेप स्वरूपसमवस्थिता निरुपघात । गमनमिव परमपुरुष परमपदे स्फुरति विशदतम ॥२२३।।

क ( १६८ ) कृतकृत्यः परमपदे परमात्मा सकलविषयविषयात्मा । परमानन्दनिममो ज्ञानमयो नन्दति सदैव ॥२२४॥ और कृतकृत्य हो जाता है अर्थात जो कुछ करना था वह कर चुकता है और कुछ करना बाकी नहीं रहता। जिस प्रकार आकाश रजयुक्त नहीं होता, अपने स्वभाव में स्थित रहता है, किसी के द्वारा घाता नहीं जाता और अत्यन्त निर्मल होता है,उसी प्रकार मुक्तात्मा अपनी निरावरण अनन्त शक्ति महित,अपने अनन्त दर्शन तथा अनन्तज्ञान स्वरूप को लिये,परम- ज्ञानानन्द में अतिशय मन्न,निरन्तर ही लोक के शिखरस्थित मोक्ष स्थान में प्रकाशमान होता है । कविवर पं० बनारसीदासजी ने सिद्ध भगवान स्तुति इस प्रकार की है। अविनाशी अविकार परमरस धाम हैं। समाधान सर्वज्ञ सहज अभिराम हैं । शुद्ध बुद्ध अविरुद्ध अनादि अनन्त हैं। जगत शिरोमाण सिद्ध सदा जयवन्त हैं ॥१॥ ध्यान अग्नि कर कर्म कलंक सबै दहै । नित्य निरंजन देव स्वरूपी है रहै ॥ ज्ञायकके आकार ममत्व निवारिकै । सो परमातम सिद्ध नमूं सिर नायकै ॥२॥ भव्य जीवों को उचित है कि आलस्य छोड़ें, विषय भोगों से विमुख हो, और भेद विज्ञान की प्राप्ति करें, निश्चय तथा व्यवहार दो भेद रत्नत्रय धर्म को धारण कर मोक्ष पद को प्राप्ति करें। एकेनाकर्षन्ती श्लथयन्ती वस्तुतत्वमितरेण । अन्तेन जयति जैनी नीतिर्मन्थाननेत्रमिव गोपी ॥२२५॥ आगे आचार्य एक विलक्षण उदाहरण द्वारा बताते हैं कि जैन नीति वस्तुस्वरूप का साधन किस प्रकार करती है। जिस प्रकार दही विलोने वाली मालिनी मथानी की रस्सी को एक हाथ सेखोंचती है,दूसरे से ढीली कर देती है, और दोनों की क्रिया से दहीसे मक्खन बनाने रूप कार्य की सिद्धि करती है, उसी प्रकार जिन वाणी ग्वालिनी सम्यक् दर्शन से तत्व स्वरूप को अपनी ओर खींचती है,सम्यक् ज्ञान से पदार्थ के भाव को ग्रहण करती है, और दर्शन ज्ञान की आचरणरूप क्रिया से अर्थात सम्यक् चारित्र से परमात्म पद की सिद्धि करती है। वर्ण कृतानि चित्रे पदानितु पदै कृतानि वाक्यानि। वाक्यै कृत पवित्रशास्त्रमिदन पुनरस्माभि ॥२२६|| अन्त में आचार्य पर श्री अमृतचन्द्रजी महाराज अपनी लघुता प्रगट करने के लिये कहते हैं कि २७ स्वर ३३ व्यञ्जन अनादि निधन हैं । उन अक्षरों से पद बने हैं पदों से छन्द बने हे और छन्दों से यह समुदायरूप अन्य वन गया ।इस में मेरी कुछ भी कृति नहीं है। यह स्वाभाविक रचना है। इति श्रीमदमृतचन्द्रसूरीणा कृति पुरुषार्थसिद्धयुपायोऽय नाम ग्रन्थ समाप्त । સમમાં

शान्तिप्रिय मैनेजर के प्रवन्ध से चाम्बे मैशीन प्रेस, मोहनलाल रोड, लाहौर
ने
ला० लालचन्दजी जैन वकील रोहतक के लिये छापी ।

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Purusarthsidhyupay

Author
Jain, Agrasen
Title
Purusarthsidhyupay
File name
Purusarthsidhyupay
Text
OCR done
Citation
1933
Published
2011/01
Publisher
Lahor., Mohanlal Rod
Language
Sanskrit
Pages
196
Library
Shri Jain Swetamber Khartargacch Sangh, Jaipur
Classification
Devotional
DLI number
446075
Barcode
99999990027922.00
Scanning centre
Banasthali University
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