Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
Shiv Sanhita
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शिवसंहितास्थविषयानुक्रमणिका ।. २ ८८ णम्. विषयाः पृष्ठांकाः विषयाः पृष्ठांकाः प्रथमः पटलः १८ ववालीमुद्दाकयनम. ११३ अथ मंगलाचरणम्. १९ शक्तिचालनकथनम. १ अथ रयाकरणम्. पञ्चमः पटलः द्वितीयः पटलः २० अथ योगविमादिकथनम्.१२४ २ अथ तत्त्वज्ञानोपदेशः २१ धर्मरूपयोगविनकथनम.१२५ २२ ज्ञानरूपयोगविनकथनम्.१२६ तृतीयः पटलः २३ चतुर्विधबोधकथनम्. १२८ ३ अथ ये गानुष्ठानपद्धतियों- गाभ्यासवर्णनश्च. २४ मृदुसाधकलक्षणम्. १२९ ४ लिदासनकथनम्. २५ अधिमात्रसाधकलक्षणम्.१३० ५पद्मासनकथनम्. ८६ २६ अधिमानतमसाधकलक्ष- ६ उमापनकथनम्. ७ स्वस्तिकासनकथनम्. ८९.२७ प्रतीकोपासनाकथनम्. १३२ चतुर्यः पटलः २८ मूटाधारपद्मविवरणम्. १३८ २९ स्वाधिष्ठानचा विवरणम्. १५५ ८ अथ मुद्राकथनम्. ९० ९ योनिमुद्राकथनम्. ३० मणिपूरचक्रविवरणम्. . १५७ १० महामुद्राकथनम्. ९७/३१ अनाहनचकविवरणम्. १५८ १२ महाबंधकथनम्. १००, ३२ विशुद्धचक्रविवरणम्. १६१ १२ महावकथनम्. १.२ ३३ आज्ञाचक्रविवरणम्. १३ खेचरीमुद्राकथनम्. १०५/३४ सहस्त्रारपद्मविवरणम्. १७२ १४ जालन्धरबन्धकपनम्. १०८, ३५ राजयोगकथनम्, १८२ १५ मूलबन्धकथनम्. १५९/३६ रानाधिरानयोगकथनम. १९५ १६ विपरीतफरणीकथनम्. २१०३७ शिवसहिताफलकथनम्. २०३ १७ उड्डाणबन्धकथनम्, १११ ३८ उमामहेश्वरमाहात्म्यम्. ६०५ इत्यनुक्रमणिका। 4 ओ३म् श्रीगणेशाय नमः। अथ शिवसंहिता। मंगलाचरणम् । विघ्रहरण गणनाथजी, बुद्धिगेह तुअ माहि ॥ विघ्न बुद्धि दोनों विकल, नशत जात जगमाहिं ॥१॥ बुद्धिराज दीजे हमें, बुद्धि पुत्र गौरीश ॥ योगयुक्ति भापा करौंधरि गुरुआज्ञा शीश ॥ २॥ शिव आलयमें जायके, होत जीव भवपार ॥ पाय कृपा गुरु शम्भुकी, भनन चहों केंवार ॥ ३॥ गौरी अब मोहिं दीजिए, अनुशासन सुत जानि ॥ शिवभापित भापा रचों, छूटों भवभ्रम जानि ॥४॥ फिर नहिं आवों जगतमें, योग युक्ति सब जानि ॥ मातु कृपा मोपर करहु, शिक्षहुदेहुमोहिंज्ञान ॥५॥ नाम हमारोहै नहीं, नहीं कर्म गुण वास ॥ मातु पुकारत पै महौं, रामचरणपुरि दास ॥६॥ श्लोक-यंज्ञातुमेधयतिनो मतिपूर्वमेतत् संसारसृत्वरकलत्रसुतादिसर्वम् ॥ त्यत्वासमाधिविधिमेवसमाश्रयन्ते वन्देकमप्यहमजञ्जगदादिवीजम् ॥१॥ - शिवसंहिता। भापाटीका। प्रथमपटलः । मूलम्-एकंज्ञानं नित्यमाद्यन्तशून्यं ना- न्यत् किञ्चिद्वर्त्तते वस्तु सत्यम् ॥ यद्दे- दोस्मि निन्द्रियोपाधिना वैज्ञानस्यायं भासते नान्यथैव ॥१॥ टीका केवल एक ज्ञान नित्य आदि अन्तरहित है ज्ञानसे अलग अन्य कोई वस्तु सत्य संसारमें वर्तमान नहीं है केवल इन्द्रियोपाधिद्वारा संसार जो भिन्न भिन्न बोध होताहै सो यह ज्ञानमात्रही प्रकाश होता है और कुछ नहीं है अर्थात ज्ञानसे भिन्न कुछ नहीं है ॥ १॥ मूलम्-अथ भक्तानुरक्तोऽहं वक्ष्ये योगानु- शासनम् ॥ ईश्वरः सर्वभूतानामात्ममुक्ति- प्रदायकः॥२॥ त्यक्त्वा विवादशीलानां मतं दुर्ज्ञानहेतुकम् ॥आत्मज्ञानाय भूता- नामनन्यगतिचेतसाम् ॥३॥ टीका-सर्व प्राणिमात्रके ईश्वर आत्ममुक्तिप्रदायक भक्तवत्सल जिन मनुष्योंको सिवाय आत्मज्ञानके अन्य गति नहीं है उनके हेतु कृपापूर्वक योगोपr प्रथमपटलः। (३) दश करतेहैं विवादशील लोगोंका मत दुनिका हेतु है यह त्यागनेके योग्य है ॥२॥॥३॥ मूलम्-सत्यं केचित्प्रशंसन्ति तपः शौचं तथापरे॥ क्षमा केचित्प्रशंसंतितथैव श- ममार्जवम्॥४॥ केचिदानं प्रशंसन्ति पि- तृकर्म तथापरे । केचित्कर्म प्रशंसन्ति केचिद्वैराग्यमुत्तमम् ॥५॥ टीका-कोई सत्यकी प्रशंसा करते हैं, कोई तपस्या- की, कोई शौचाचारकी, कोई क्षमाकी प्रशंसा, कोई स- मताकी, कोई सरलताकी, कोई दानकी प्रशंसा, कोई पितृकर्मकी, कोई सकाम उपासनाकी, कोई पुरुप वैराग्यको उत्तम कहतेहैं ॥४॥५॥ मूलम्-केचिगृहस्थकर्माणि प्रशसन्ति विच- क्षणाः ॥ अग्निहोत्रादिकं कर्म तथा केंचि- त्परं विदुः ॥ ६॥ मन्त्रयोगं प्रशंसन्ति केचित्तीर्थानुसेवनम् ॥ एवं बहूनुपायां- स्तु प्रवदन्ति विमुक्तये ॥७॥ टीका-कोई पुरुप गृहस्थकर्मकी प्रशंसा करते हैं, कोई बुद्धिमान पुरुप अग्रिहोत्रादिक कर्मकी प्रशंसा करतेहैं कोई मंत्रादिक कोई तीर्थसेवन करना मुख्य
(१) शिवपंहिता भापाकासमेना।
समझते हैं इसी प्रकार मनुष्य बहुतसे उपाय मुक्तिके
हेतु अपने मतिके अनुसार करते हैं ॥६॥७॥
मूलम्-एवं व्यवसितालोके कृत्याकृत्यवि-
दो जनाः॥ व्यामोहमेव गच्छंति विमु-
क्ताः पापकर्मभिः ॥८॥एतन्मतावलम्बी
यो लब्ध्वा दुरितपुण्यके ॥ भ्रमतीत्यक-
शः सोऽत्र जन्ममृत्युपरम्पराम ॥ ९॥
टीका-इसीतरह विधिनिषेध कर्मके जाननेवाले
लोग पापकर्मसे रहित होके मोहमेंही पड़तेहैं और
जो मनुष्य पुण्यपापका अनुष्ठान पहिले जो मत कहा
है उसके आसरे होके करते हैं उसका फल यह होता
है कि, मनुष्य वारंवार संसारमें जनमता और मरता
है अर्थात् शुभाशुभ कर्म करनेसे कदापि मोक्ष नहीं
होता परन्तु शुभकर्म करनेसे केवल चित्तकी शुद्धि
होतीहै ॥८॥९॥
मूलम्-अन्यैर्मतिमतां श्रेष्ठैगुप्तालोकनतत्प-
रैः॥ आत्मानो वहवःप्रोक्ता नित्याः सर्व-
गतास्तथा ॥ १०॥ यद्यत्प्रत्यक्षविपयं
तदन्यन्नास्ति चक्षते ॥ कुतः स्वर्गादयः
सन्तीत्यन्ये निश्चितमानसाः॥ ११ ॥
प्रथमपटलः । टीका-कोई कोई बुद्धिमान् गुप्तशास्त्रके जाननेमें तत्पर अर्थात् गूढदर्शी बहुत आत्मा नित्य और सर्व- व्यापक कहते हैं बहुत प्रत्यक्षवादी यह कहते हैं कि, जो वस्तु प्रत्यक्ष देखनेमें आताहै वही सत्य है और कुछ नहीं है जिनकी बुद्धि स्वर्गादिकके न माननेमें निश्चित है ॥ १० ॥११॥ मूलं-ज्ञानप्रवाह इत्यन्ये शून्यं केचित्परं वि- दुः॥ दावेव तत्त्वं मन्यन्तेऽपरे प्रकृति- पूरुषौ ॥ १२॥ टीका-कोई मनुष्य कहते हैं कि, सिवाय ज्ञान- धाराके और कुछ नहीं है जो वस्तु संसारमें वर्तमान देखने या भुनने में आती है या किसी प्रकारसे उसका होना निश्चय होताहै वह सब ज्ञानहीं है कोई पुरुप यही जानता है कि, सिवाय शून्यके और कुछ नहीं है इसीतरह कोई मनुष्य प्रकृतिपुरुष दोनोंको तत्त्व मानते हैं ॥१२॥ मूलम्-अत्यन्तभिन्नमतयः परमार्थपराङ्- खाः॥ एवमन्येतु संचिन्त्य यथामतिय- थाश्रुतम् ॥ १३ ॥ निरीश्वरमिदं प्राहुः सेश्वरञ्च तथापरे ॥ वदन्ति विविधैर्भेदैः सुयुक्त्यात स्थिाकातराः ॥ १४॥ " शिवसंहिता भापाटीकासमेता । टीका-बहुतसे परमार्थसे बहिर्मुख जिनकी भिन्न भिन्न मति है अपने मतिके अनुसार कोको मानते और करते हैं कोई कहते हैं कि, ईश्वर नहीं है इसीतरह बहुत लोग कहते हैं कि, यह संसार बिना ईश्वरके नहीं है अर्थात् ईश्वरहीसे है यही निश्चय जानते हैं अपनी युक्तिसे बहुत २ भेद कहते और उसमें स्थिरतासे तत्पर रहते हैं ॥ १३ ॥ १४ ॥ मूलम्-एते चान्ये च मुनिभिः संज्ञाभेदाः पृथग्विधाः ।। शास्त्रेपु कथिता ह्येते लोक- व्यामोहकारकाः॥१५॥एतद्विवादशीला- नां मतं वक्तुं न शक्यते ॥भ्रमन्त्यास्म- अनाः सर्वे मुक्तिमार्गवहिष्कृताः ॥ १६॥ टीका-ऐसे बहुत मुनिलोगोंने नानाप्रकारके मत शास्त्रमें स्थापन किये हैं यह संसारके मोह भ्रममें पड़नेका हेतु है अर्थात् शास्रमें बहुतप्रकारके मत दे- खनेसे मनुष्यके चित्तमें भ्रम उत्पन्न होता है उस भ्रम- का फल यह है कि, अपनी घुद्धिके अनुसार कोई एक मत ग्रहण करके मरणपर्यंत उसमें तत्पर मनुष्य रह- ताहै परंतु अमृत लाभ नहीं होता ऐसे विवादशील लोगोंका मत वर्णन करनेको हम शक्य नहीं हैं ।
प्रथमपटलः । (७) मुक्तिमार्गसे विमुख होके सब मनुष्य संसारमें भ्रमण कर- ते हैं ॥ १५ ॥१६॥ मूलम्-आलोक्य सर्वशास्त्राणि विचार्य च पुनः पुनः ॥ इदमेकं सुनिष्पन्नं योग- शास्त्रं परं मतम् ।। १७॥ टीका-श्रीमहादेवजी कहते हैं कि, सब शास्त्रोको देखके और वारंवार विचारके यह निश्चित हुआ कि, एक यह योगशास्त्र उत्तम परमसंमत है अर्थात् यह सबसे उत्तम है तात्पर्य यह है कि, ऐसे मतको छोड़कर जिसकी प्रशंसा ईश्वर अपने मुखारविन्दसे करते हैं और जिसके ग्रहण करनेसे ब्रह्म करामलकवत् जानपडता है मनुप्य विक्षि- सके तरह इधर उधर चित्तको दौड़ाते हैं और बहुत लोग यह विचारते हैं कि, यह बड़ा कठिन है आश्चर्यकी बात है कि, मनुष्यशरीरसे जब ऐसा उत्तम श्रम न होगा तो जान पडता है कि, रोगादिकसे शरीरके नाश होनेसे पीछे फिर जब पशुका जन्म होगा तब कुछ ईश्वरके जाननेमें श्रम करेंगे ॥१७॥ मूलम्-यस्मिज्ञाते सर्वमिदं ज्ञातं भवति निश्चितम् ॥ तस्मिन्परिश्रमः कार्यः किमन्यच्छात्रभाषितम् ॥ १८ ॥ - (८) शिवसंहिता भाषाएकासमता। टीका-निश्चय जिसके जाननेसे सब संसार जाना जाता है ऐसे योगशास्त्रके जाननेमें परिश्रम करना अवश्य उ. चितहै फिर अन्य शास्त्र जो कहेहैं उनका क्या प्रयोजन है अर्थात् कुछ प्रयोजन नहीं तात्पर्य यह है कि, पंडित लोग वृथा विवाद करके जो लोग सुमार्गमें जानेकी इच्छा करते हैं उनको भी भ्रष्ट कर देते हैं ॥१८॥ मूलम्-योगशास्त्रमिदं गोप्यमस्माभिः परि- भाषितम् ॥ सुभक्ताय प्रदातव्यं त्रैलोक्ये च महात्मने ॥ १९ ॥ . टीका-यह योगशास्त्र जो हमने कहाहै सो परम गोपनीय है यह त्रैलोक्यमें महात्मा और अच्छे भक्त जनोंको दे- ना उचित है तात्पर्य यह है कि, विना ईश्वर- के भक्तिके यह शुभकर्म सिद्ध नहीं होता न उधर चित्तकी वृत्ति जातीहै इस हेतुसे अभक्तजनोंको देना उचित नहींहै ॥ १९॥ मूलम्-कर्मकाण्डं ज्ञानकाण्डमिति वेदो द्वि- धा मतः॥ भवति द्विविधो भेदो ज्ञानका- ण्डस्य कर्मणः ॥ २० ॥ द्विविधः कर्म काण्डः स्यानिपेधविधिपूर्वकः॥निपिद्ध- कर्मकरणे पापं भवति निश्चितम् ॥ विधि- प्रथमपटलः । ना कर्मकरणे पुण्यं भवति निश्चितम्॥२१॥ टीका-कर्मकाण्ड और ज्ञानकाण्ड वेदके दो मत हैं इसमें भी दो दो भेद कर्मकाण्ड और ज्ञानकाण्डमें भये हैं ॥२०॥ उस कर्मकाण्डमें दो प्रकार हैं एक निध दूसरा विधि तहां निषेध कर्म करनेसे निश्चय पाप होता है विहित कर्म करनेसे निश्चय करके पुण्य होताहै ॥२१॥ मूलम्-त्रिविधो विधिकूटःस्यानित्यनैमित्ति- काम्यतः॥नित्ये कृते किल्बिपं स्यात्का- म्ये नैमित्तिके फलम् ॥ २२ ॥ टीका-विधि कर्ममें तीन प्रकारका भेद कहाहै नित्य नैमित्तिक २ सकाम ३ नित्यकर्म संध्या देवार्चन आदि न करनेसे पाप होता है सकाम अर्थात् जो कर्म फलके इच्छासे किया जाताहै और नैमित्तिक जो तीर्थों में पर्वादिकमें स्नानादिक करते हैं इनके न करनेसे पाप नहीं होता परन्तु करनेसे फल होताहै ॥२२॥ मूलं-द्विविधन्तु फलं ज्ञेयं स्वर्गो नरक एव च॥ स्वर्गों नानाविधश्चैव नरकोपि तथा भवेत् ॥२३॥ टीका-फल दो प्रकारका होताहै स्वर्ग और नरक स्वर्ग नानाप्रकारका है ऐसेही नरकभी बहुत प्रकारका
(१०) शिवसंहिता भापाटीकासमेता।
है तात्पर्य यह है कि, जैसा जो मनुप्य शुभाशुभ कर्म
करता है वैसेही नरक वा स्वर्गमें जाताहै ।। २३ ।।
मूलम्-पुण्यकर्मणि वै स्वर्गो नरकः पापक-
मणि ॥ कर्मबंधमयी सृष्टिनीन्यथा भव-
ति ध्रुवम् ॥ २४॥
टीका-पुण्यकर्म करनेसे स्वर्गमें जाताहै और पापक-
मसे नरकमें जाताहै. संसार कर्मसे निश्चय करके बंधाहै
दूसरा हेतु नहीं है तात्पर्य यह है कि, जो ईश्वरको
जानके कर्माकर्मसे अपनेको रहित समझेगा वह इस
बंधसे छूटजायगा ॥२४॥
मूलम्-जन्तुभिश्चानुभूयंते स्वर्गे नानासुखा-
नि च ॥ नानाविधानि दुःखानि नरके दुः-
सहानि वै ॥ २५॥
टीका-प्राणी स्वर्गमें नानाप्रकारके सुखका अनुभव
करता है ऐसही बहुत प्रकारके दुःसह दुःख नरकमें
भी भोगता है ॥२५॥
मूलम्-पापकर्मवशाहुःखंपुण्यकर्मवशात्सुखं
तस्मात्सुखार्थी विविधं पुण्यं प्रकुरुते ध्रुव२६
टीका-पापकर्म करनेसे दुःख होता है और पुण्यकर्म
करनेसे सुख होताहै इस हेतुसे निश्चय करके मुखार्थी
पुरुप नानाप्रकारके पुण्य करते हैं ॥२६॥
प्रथमपटलः। (११) मूलम्-पापभोगावसाने तु पुनर्जन्म भवे- त्खलु ॥ पुण्यभोगावसाने तु नान्यथा भवति ध्रुवम् ॥ २७॥ टीका-पापका फल भोगनेके पीछे अवश्य फिर जन्म होताहै ऐसेही पुण्यफल भोगनेके अंतमें निश्चय फिर जन्म होता है अन्यथा नहीं होता ॥२७॥ मूलम्-स्वर्गेऽपि दुःखसंभोगः परस्त्रीदर्शना- दुवम् ॥ ततो दुःखमिदं सर्व भवेन्नास्त्यत्र संशयः॥२८॥ टीका-स्वर्गमेंभी दुःखहैं इस कारणसे कि, उस स्था- नमें परस्त्रीका दर्शन अवश्य होताहै उसकी अप्राप्तिमें मानसिक व्यथा उत्पन्न होती है अन्य भी राग द्वेपादि बहुतसे कारण हैं कि, प्राणीके चित्तको स्वर्गमें भी स्थिर नहीं रहने देते इस हेतुसे संसारमें सिवाय दुःखके सुख नहीं है ॥२८॥ मूलम्-तत्कर्मकल्पकैः प्रोक्तं पुण्यंपापमि- ति द्विधा ॥ पुण्यपापमयो बन्धो देहिनां भवति क्रमात् ॥ २९॥ टीका-युद्धिमान लोगोंने पुण्य और पाप दोप्रकारक (१२) शिवसंहिता भापाटीकासमेता। कर्म कहाहै इसी पुण्य पापसे शरीर बंधायमान है अर्थात् वारंवार शरीरधारण करनेका कारण है।॥२९॥ मूलम्-इहामुत्र फलद्वेपी सफलं कर्म सं. त्यजेत् ॥ नित्यनैमित्तिके संगं त्यक्त्वका योगे प्रवर्तते ॥३०॥ टीका-इस लोकका भोग वा परलोकके फलकी इच्छा और नित्य नैमित्तिक आदि कर्मीको फलसहित त्यागके योगाभ्यास अर्थात् परब्रह्मके विचारमें महात्मा जनोंके तत्पर रहना उचित है ॥३०॥ मूलं-कर्मकाण्डस्य माहात्म्यं ज्ञात्वा यो- गी त्यजेत्सुधीः ॥ पुण्यपापद्वयं त्यक्का . ज्ञानकाण्डे प्रवर्तते ॥ ३१ ॥ टीका- कर्मकाण्डके माहात्म्यको जानके योगीको उचितहै कि, पुण्य पाप दोनोंको तृणवत् विचारके त्याग दे और ज्ञानकाण्डमें तत्पर होरहे ॥३१॥ मूलम्--आत्मा वारे च श्रोतव्यो मंतव्य इति यच्छुतिः॥ सा सेव्या तत्प्रयत्नेन मुक्तिदा हैतुदायिनी॥ ३२॥ टीका- यह श्रुतिका वाक्य है कि, आत्माको सुनो और आत्माको मनन करो अर्थात् जो कुछ
प्रथमपटलः ।
है सो आत्माही है सो श्रुति मुक्तिकी देनेवाली है
यत्न करके सेवनके योग्य है ॥३२॥
मूलस्-दुरितेपु च पुण्येषु यो धीवृत्तिं प्रचो-
दयात् ॥ सोऽहं प्रवर्तते मत्तो जगत्सर्व
चराचरम् ॥ ३३ ॥ सर्व च दृश्यते
मत्तः सर्वच मयिलीयते ॥न तद्भिन्नोऽ-
हमस्मीह मद्भिन्नो न तु किंचन ॥ ३४ ॥
टीका-पाप पुण्य दोनोंमें समानरूपकी बुद्धिको
जो वृत्ति प्रेरणा करती है तो हम हैं और हमसेही सब
जगत् चराचर उत्पन्न है ॥३३॥और जो देख पड़ताहै
वह सब हम हैं हममेंही सब लीन होताहै न वह
हमसे भिन्न है न हम उससे किंचित्मान भिन्न हैं ता-
त्पर्य यह है कि, वह आत्मा जिससे यह जगत् उत्पन्नहै
हमसे भिन्न नहीं है इस हेतुसे इस संसारके स्थिति
संहार कर्ता हम हैं ऐसी वृत्ति योगीकी रहती है ॥३४॥
मूलम्-जलपूर्णेष्वसंख्येषु शरावेषु यथा-
भवेत्॥ एकस्य भात्यसंख्यत्वं तद्वेदोऽत्र
न दृश्यते ॥ ३५॥ उपाधिषु शरावेषु या
संख्या वर्तते परा ॥ सा संख्या भवति
यथा रखी चात्मनि तत्तथा ॥३६॥
(१४) शिवसंहिता भापाटीकासमेता। टीका-जलसे भरा असंख्य शराव अर्थात् मृत्तिका आदिके पात्रमें एक सूर्यका अनेक प्रतिबिंब देख- पडता है वास्तवमें भेद नहीं है जो भेद देख- पडता है वह शरावके संख्याका भेद है ॥ ३५ ॥ जिस प्रकारसे शरावके संख्यासे सूर्यमें भेद जान पडता है उसी प्रकार मायाकी उपाधिसे संसार भिन्न भिन्न जान पड़ता है वस्तुतः केवल एक ब्रह्म है ॥३६॥ मूलम्-यथैकः कल्पकः स्वप्ने नानावि- धतयेष्यते॥जागरेपि तथाप्येकस्तथैव बहुधा जगत् ॥ ३७॥ टीका-जैसे स्वप्न अवस्थामें एकसे अनेक कल्पना होतीहै निद्राच्युत होजानेपर कुछ नहीं रहता उसी प्रकार मायाके आवरणसे अनेक संसार जान पडता है जब ज्ञानरूपी सनसे मायाका पटल कटजाता है तब सिवाय शुद्धब्रह्मके और कुछ नहीं रहजाता ।। ३७ ।। मूलम्-सर्पबुद्धिर्यथा रनौशुक्तीवारजतभ्र- मः॥३८॥ तदेवमिदं विश्वं विवृतं पर- मात्मनि ॥ रज्जुज्ञानाद्यथा सो मिथ्या रूपो निवर्तते ॥ ३९॥ आत्मज्ञानात्तथा याति मिथ्याभूत्तमिदं जगत् ॥ रौप्यभ्रा- न्तिरियं याति शुक्तिज्ञानाद्यथा खलु ४० प्रथमपटलः । (१५) टीका-रस्सीमें सर्पकी भ्रान्ति और सीपीमें चाँदीकी भ्रान्ति होतीहै ॥३८॥उसी प्रकार शुद्धब्रह्ममें संसारकी झूठीभ्रान्ति होती है रस्सीके ज्ञान होनेसे झूठे सर्पका अभाव होजाता है।॥३९॥ उसी तरह आत्मज्ञान होनेसे यह संसार नहीं रहजाता सीपीकोभी अच्छी तरह निश्चय जानलेनेसे चाँदीकी भ्रांति दूर होती है ॥४०॥ मूलम्-जगद्धान्तिरियं याति चात्मज्ञानाद्य- था तथा ॥ यथा रजूरगभ्रान्तिर्भवे - दवशाज्जगत् ॥ ४१ ॥ तथा जगदिदं भ्रांतिरध्यासकल्पनाज्जगत् ॥आत्मज्ञा- नाद्यथा नास्ति रज्जुज्ञानाद्भुजङ्गमः॥४२॥ टीका-वैसेही आत्मज्ञान होनेसे जगतकी भ्रान्ति दूर होती है जैसे रस्सीमें सर्पकी भ्रांति होतीहै ॥४१॥ उसी तरह आत्मामें अभ्यास कल्पनामात्र जगत्की भ्रांति है रज्जुवत् ज्ञान होनेसे फिर जगतका तीनों कालसे अभाव हो जाताहै ॥४२॥ मूलम्-यथा दोषवशाच्छुक्लःपीतोभवति ना- न्यथा ॥अज्ञानदोपादात्मापिजगद्भवति दुस्त्यजम् ॥४३ ॥ दोपनाशे यथा शुक्लो
(१६) शिवसंहिता भाषार्टीकासमेता ।
गृह्यते रोगिणा स्वयम्॥ शुक्लज्ञानात्तथा:-
ज्ञाननाशादात्मा तथा कृतः॥४४॥
टीका-जैसे मनुष्यको कवलकी व्याधि अर्थात्
पित्तादिकके दोपसे सब वस्तु निश्चय पीतवर्ण देख
पड़ती हैं उसी प्रकार अज्ञानरूपी दोपसे शुद्ध आत्मा
नहीं प्रतीत होताहै परन्तु यह झूठा संसार देख पड़ता
ऐसा अज्ञान बड़े कष्टसे दूर होताहै जैसे पित्तादिक
दोपके नाश होनेसे फिर यथार्थ देखपडता है उसी
प्रकार अज्ञान दूर होनेसे शुद्धब्रह्म निर्विकार जानप-
डता है तात्पर्य यह है कि, मनुष्यके पीछे एक अज्ञान
की व्याधि बहुत बडी लगी है इसकी भोपषि आत्म-
ज्ञान है यह बात निश्चय है कि, व्याधि विना औपधिके
दूर नहीं होती ॥४३॥४४॥
मूलम्-कालत्रयपिन यथा रज्जुःसो भवे.
दिति ॥ तथात्मा न भवेद्विश्वं गुणातीतो
निरञ्जनः॥४५॥
टीका-जिस तरह रस्सी तीनों कालमें सर्प नहीं हो
सकती उसी तरह आत्माभी तोनों कालमें कदापि सं-
सार नहीं हो सक्ता अर्थात् नहीं है इस हेतुसे कि, आ-
त्मा गुणातीत है अर्थात् गुणसे रहित है ॥४५॥
प्रथमपटलः। (१७) मूलम्-आगमाऽपायिनोऽनित्यानाश्यत्वेने- श्वरादयः॥ आत्मवोधेन केनापि शास्त्रा- देतद्विनिश्चितम् ॥ ४६॥ टीका-वह शास्त्र जिसमें आत्मबोधका निरूपण किया है उससे निश्चय है कि, इंद्रादि देवताभी जो ईश्वर कहे जाते हैं नित्यभावसे रहित हैं अर्थात् उनकाभी जनन मरण होताहै ॥ ४६॥ मूलम् यथा वातवशासिन्धावुत्पन्नाः फेन- बुद्बुदाः ॥ तथात्मनि समुद्भूतं संसारं क्षणभंगुरम् ॥४७॥ टीका-जैसे वायुकी उपाधिसे समुद्रमें फेन और बुबुदे उत्पन्न होते हैं क्षणभरमें फिर उसीमें लय हो- जाते हैं तैसेही आत्मासे संसार मायाकी उपाधिसे क्षण- : भंगी उत्पन्न होताहै फिर उसीमें लय होजाताहै ॥४७॥ मूलम्-अभेदो भासते नित्यं वस्तुभेदोन भासते ॥ द्विधात्रिधादिभेदोऽयं भ्रमत्वे पर्यवस्यति ॥४८॥ टीका-परमात्माका संसारसे सदा अभेद है और किसी वस्तुमें भेद नहीं है एक दो तीन ऐसा जो वस्तु का भेद जानपडताहै वह भ्रमका कारण है ।। १८॥
(१८) शिवनंहिता भापाटीकासमेता। मूलम् यद्भूतं यच्च भाव्यं वै मूर्तामूर्त तथैव च ॥ सर्वमेव जगदिदं विवृतं परमा- त्मनि ॥४९॥ टीका- जो भया है और जो होगा मूर्तिमान वा अमूर्तिमान यह सब जगत आत्मासे मिलाहै अर्थात् उससे भिन्न नहीं है ॥४९॥ मूलम्-कल्पकैः कल्पिता विद्या मिथ्या जाता मृपात्मिका ॥ एतन्मूलं जगदिदं कथं सत्यं भविष्यति ।।५।। टीका-यह संसार मिथ्याभूत अविद्या कल्पनासे कल्पित भया है बडे आश्चर्यकी बात है कि, जिसकी जड मिथ्या है वह आप कव सत्य होसक्ता है अर्थात सब झूठ है ॥५०॥ मूलं-चैतन्यात्सर्वमुत्पन्नं जगदेतच्चराच- रम् ।। तस्मात्सर्वं परित्यज्य चैतन्यं त समाश्रयेत् ॥५१॥ टीका केवल एक चैतन्य ब्रह्मसे जरायुज, अंडन, स्वेदज, उद्भिज आदि सकल चराचर संसार उत्पन्न भया है इस हेतुस सबको त्यागिके केवल उसी एक
प्रथमपटलः।
'चतन्य आत्माके आसरे होना उचित है क्यों कि वहीं
चैतन्य सबका कारण है ॥५१॥
मूलम्-घटस्याभ्यंतरे वा यथाकाशं प्रव-
तते ॥ तथात्माभ्यंतरे वाह्ये ब्रह्मांडस्य
प्रवर्तते ॥५२॥
टीका-जैसे घटके भीतर बाहर आकाश व्याप्त है
तैसेही इस ब्रह्माण्डके भीतर बाहर आत्मा परिपूर्ण
व्याप्त है ॥५२॥
मूलम्-सततं सर्वभूतेषु यथाकाशं प्रवर्तते।
तथात्माभ्यंतरे बाह्ये ब्रह्मांडस्य प्रवर्त-
ते॥५३॥ वर्तते सर्वभूतेषु यथाकाशंस-
मंततः॥ तथात्माभ्यंतरे वाह्ये कार्यवर्गेषु
नित्यशः॥५४॥
टीका-जिसप्रकार आकाश सब चराचरमें व्याप्त है
उसीतरह आत्माभी इस जगत्में व्याप्त है अर्थात् आका-
शवत सब वस्तुमें आत्मा परिपूर्ण व्यास है।।५३॥५४॥
मूलम्-असंलग्नं यथाकाशं मिथ्याभूतेषु पं
चसु ॥ असंलग्नस्तथात्मा तु कार्यवर्गेषु
नान्यथा ॥५५॥
(१२) शिवसंहिता नापाटीकासमेता । दुःखका आदि अंत शून्य है इस हेतुसे निश्चय आत्मा सुखस्वरूप है ॥६१॥ मूलम्-यस्मानाशितमज्ञानं ज्ञानेन विश्व- कारणम् ॥ तस्मादात्मा भवेज्ज्ञानं ज्ञानं तस्मात्सनातनम् ॥६२॥ टीका-जिसकरके अज्ञान नाश होताहै और यह जान पडताहै कि अज्ञानही संसारका कारण है सोई आत्मज्ञान है और ज्ञानही नित्य है ।। ६२ ।। मूलम्-कालतो विविधं विश्वं यदा चैव भवे- दिदम् ॥ तदेकोऽस्ति स एवात्मा कल्प- नापथवर्जितः॥६३॥ टीका-काल पायके अनेक प्रकारका संसार उत्पन्न होताहै, सो वह एक आत्मा है वह कल्पनापथवर्जित है अर्थात् कल्पना नहीं होसक्ती ॥ ६३ ॥ मूलम्-चाह्यानि सर्वभूतानि विनाशं यान्ति कालतः॥ यतो वाचो निवर्त्तते आत्मा दैतविवर्जितः॥ ६४॥ टीका-आत्मासे जो अतिरिक्त वस्तु उत्पन्न है वह काल पायके नाश होजाती हैं आत्मा द्वैतरहित है, प्रथमपटलः। (२३) अर्थात् एक है इसका वर्णन नहीं होसका तात्पर्य यह. है कि यावत् वस्तु उत्पन्न होती है उसको काल खाजा- ताहै परन्तु आत्मामें कालकाभी नाश होजाताहै ॥६॥ मूलम्-नं खं वायुन चाग्निश्च न जलं पृथिवी न च ॥ नैतत्कार्य नेश्वरादि पूर्णकात्मा भवेत्खलु ॥६५॥ टीका-पह आकाश नहीं है इस हेतुसे कि उसमें शब्द नहीं है वायु नहीं है क्यों कि उसमें स्पर्श नहीं है अग्नि नहीं है कासे कि उसमें तेजभाव नहीं है जल नहीं है क्यों कि उसमें रस नहीं है वह पृथ्वी नहीं है क्यों कि गन्धरहित है वह कार्य नहीं है क्योंकि उसका कारण नहीं है वह ब्रह्मा इंद्र आदि ईश्वर नहीं है इस हेतुसे कि उसका नाश नहीं होता अर्थात् वह आत्मा न आकाश न वायु न अग्नि न जल न पृथ्वी कुछ नहीं है निश्चय केवल एक परिपूर्णब्रह्म है ॥ ६९ ॥ मूलम्-आत्मानमात्मनो योगी पश्यत्या- त्मनि निश्चितम् ॥ सर्वसंकल्पसंन्यासी त्यक्तमिथ्याभवग्रहः ॥६६॥ टीका-यह मिथ्यासंसाररूपी गृहको त्यागके सर्व (२४) शिवसंहिता नापाटीकासमेता। संकल्पसे रहित होके योगी आत्मासे आत्माको आत्मामें देखता है ।। ६६॥ मूलम्-आत्मनात्मनि चात्मानं दृष्ट्वानन्तं सुखात्मकम्॥विस्मृत्य विश्वं रमते समा- धेस्तीव्रतस्तथा ॥ ६७॥ टीका-संसार विस्मृति करके अर्थात् भुलाके आत्मासे आत्माको आत्मारूप होके देखता और आत्माके आनन्द सुखरूपी तीव्रसमाधिमें योगी रम- ण करता है ।। ६७ ॥ मूलम्-मायैव विश्वजननी नान्यातत्त्वधिया परा ।। यदा नाशंसमायाति विश्वं नास्ति तदा खलु॥६८॥ टीका-माया संसारकी माता है अर्थात् मायासेही संसार उत्पन्न भयाहै यह निश्चय है कि दुसरा हेतु इस जगत्के उत्पत्तिका नहीं है ज्ञान करके इस मायाके नाश होनेसे संसारका अभाव निश्चय जानपडताहै।।६८॥ मूलम्-हेयं सर्वमिदं यस्य मायाविलसितं यतः ॥ ततो न प्रीतिविपयस्तनुवित्तसु- खात्मकः ।।६९॥ 4 . क प्रथमपटलः। (२५). टीका-यह गूंठग मायाका प्रपंच विषयसुख धन. शरीर है इनमें प्रीति करना उचित नहीं है यह सब त्यागनेके योग्य है ॥ ६९॥ मूलम्-अरिमित्रसुदासीनस्त्रिविधं स्यादिदं जगत् ॥ व्यवहारेषु नियतं दृश्यते नान्यथा पुनः॥७०॥ टीका-शत्रु मित्र उदासीनता यही तीन प्रकारके व्यवहारका प्रवाह इस संसारमें निश्चय देखपड़ता है।।७।। मूलम्-प्रियाप्रियादिभेदस्तुवस्तुपु नियतः स्फुटम्॥आत्मोपाधिवशादेवं भवेत्पुत्रा- दि नान्यथा ॥७१॥ मायाविलसितं विश्वं ज्ञात्वैवं श्रुतियुक्तितः ॥ अध्यारोपापवा- दाभ्यां लयं कुर्वन्ति योगिनः॥७२॥ टीका-और प्रिय अप्रिय यही दो भेदसे जगत् बँधा है ॥ आत्माके उपाधिसे पिता पुत्रादि होत, यह जगत् मायासे विलसितहै यह श्रुति प्रमाणसे जानके योगी लोग अध्यारोप अपवादसे आत्मामें लय करतेहैं अ- थीत शुद्धचैतन्यका मनन करते हैं ।। ७१ ॥ ७२ ॥ मूलम्-कर्मजन्यं विश्वमिदं नत्वकर्मणि (२६) शिवसंहिता भापारीकासमेता। वेदना ॥ निखिलोपाधिहीनो वै यदा भवति पूरुपः ॥७३॥ टीका-इस जगत्की स्थिति कमसे हे अर्थात सुख दुःख जन्म मरण आदि केशोंका कारण कर्मही है अकर्म होजानेसे फिर कुछ दुःख नहीं है यावत् मायाके उपाधिको जब पुरुप जीतके उससे रहित होजाताहै ॥ ७३॥ मूलम् तदा विजयतेऽखंडज्ञानरूपी निरं- जनः ॥ स हि कामयते पुरुपः सृजते च प्रजाः स्वयम् ॥ ७४॥ टीका-तब अखंडज्ञानरूपी निरंजनका भान हो- ताहे ॥ आत्मा अपने इच्छासे जगत् सृजता अर्थात उत्पन्न करता है ।। ७४ ॥ मूलम्-अविद्या भासते यस्मात्तस्मान्मि- थ्या स्वभावतः॥ शुद्ध ब्रह्मणि संवदो विद्यया सहजो भवेत् ॥ ७५॥ टीका-यह इच्छा अविद्याका कार्य है अविद्या नाम मिथ्याका है तो जब इच्छाही मिथ्या मायासे उत्पन्न है तो उस इच्छाका कार्य कर सत्य होसक्ताहै तात्पर्य यह है कि, मायाके उपाधिसे आत्माका यह इच्छाभूत
प्रथमपटलः। (२७)
संसार मनोराज्यवत् है. जैसे मनुष्यका मनोराज्य मि-
थ्या है, उसी प्रकार आत्माका इच्छाभूत यह जगतभी
मिथ्याहै शुद्धब्रह्ममें ज्ञानरूपी विद्याका संबन्ध है ॥७॥
मूलम्-ब्रह्मतेजोऽशतो याति तत आभास
ते नमः ॥ तस्मात्प्रकाशते वायुयोर-
निस्ततो जलम् ॥ ७६ ॥ प्रकाशते ततः
पृथ्वी कल्पनेयं स्थिता सति ॥आकाशा-
द्वायुराकाशपवनादग्निसंभवः ॥ ७७ ॥
टीका-उस ब्रह्मके तेजअंशसे आकाश उत्पन्नभयान
आकाशसे वायु उत्पन्न भया, वायुसे अग्नि उत्पन्न भया
अग्निसे जल भया, जलसे पृथ्वी उत्पन्न भई, यह कल्प-
ना है आकाशसे वायु उत्पन्न भया और आकाश
वायुसे तेज उत्पन्न भया ॥७६॥ ७७॥
मूलम्-खवाताग्नर्जलं व्योमवाताग्निवारि
तोमही ॥ खंशब्दलक्षणं वायुश्चंचलः स्प-
शलक्षणः ॥ ७८॥ स्याद्रूपलक्षणं तेजः
सलिलं रसलक्षणम् ॥ गन्धलक्षणिका
पृथ्वी नान्यथा भवति ध्रुवम् ॥ ७९ ॥
(२८) शिवसंहिता भापाटीकासमेता। विशेषगुणाः प्रस्फुरति यतः शास्त्रादि- निर्णयः ॥ शब्दैकगुणमाकाशं द्विगुणो वायुरुच्यते।। ८० ॥तथैव त्रिगुणं तेजोभ- वन्त्यापश्चतुर्गुणाः ॥ शब्दः स्पर्शश्च रूपं च रसो गन्धस्तथैव च ॥८॥ एतत्पंच- गुणा पृथ्वी कल्पकै कल्प्यतेऽधुना॥चक्षु- पा गृह्यते रूपं गन्धोघ्राणेन गृह्यते॥८२॥ टीका-और आकाश वायु अग्निसे जल उत्पन्न भया और इन चारोंसे पृथ्वी उत्पन्न भई, शब्दगुण आकाश- का है और स्पर्श गुण वायुका है, रूपगुण तेजका है, रसगुण जलका है और पृथ्वीका गुण गंध है. इन पांच तत्त्वोंमें यह गुण जो ऊपर कहा है विशेप है यह शास्त्रले निर्णय भयाहै अन्यथा नहीं है निश्चय है कि, आकाशमें एक शब्द गुणहै, वायुमें दो गुण हैं, अग्निमें तीन गुण हैं और जलमें चार गुण हैं, पृथ्वीमें शन्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध, यह पांचों गुण कल्पित हैं नेत्र रूपको ग्रहण करताहै और नासिका गंध ग्रहण करती है ॥ ७८॥७९॥ ८० ॥ ८१ ॥ ८२।। मूलम्-रसो रसनया स्पर्शस्त्वचा संगृह्यते प्रथमपटलः। (२९) परम्॥श्रोत्रेण गृह्यते शब्दो नियतं भाति नान्यथा ॥ ८३॥ टीका-और जिह्वासे रस ग्रहण होताहै और स्पर्श स्वचा अर्थात् शरीरके चर्मसे ग्रहण होताहै वा वोध होताहै और शब्द कर्णसे ग्रहण होता है यह निश्चयहै इसमें अन्यथा नहीं है ॥ ८३॥ मूलम्-चैतन्यात्सर्वमुत्पन्नं जगदेतच्चराच- रम् ॥ अस्तिचेत्कल्पनेयं स्यान्नास्ति चेदस्ति चिन्मयम् ॥ ८४॥ टीका-सब जगत् चराचर उसी एक चैतन्यसे उत्पन्न भयाहै यदि संसार सत्य मानाजाय तो इस प्रका- रसे कल्पना भईहै और जो संसारका अभावहै अर्थात् नहीं है तो वही एक चैतन्य आत्माहै और कुछ नहीं मूलम्-पृथ्वी शीर्णा जले मगाजलं मग्नञ्च तेजसि ॥ लीनं वायौ तथा तेजो व्योम्नि वातो लयं ययौ ॥ ८५॥ टीका-पृथ्वी जलमें मग्न अर्थात् लय होजाती है जला (३०) शिवसंहिता भापाटीकासमंता । अनिमें लयभाषको प्राप्त होताहै और अग्नि वायुमें लय होजाताहै और वायु आकाशमें लीन होजाताहै ॥ ८५॥ मूलम्-अविद्यायां महाकाशोलीयते परमे पदे ॥ विक्षेपावरणाशक्तिर्दुरन्ता दुःख- रूपिणी॥८॥जडरूपा महामाया रजः- सत्त्वतमोगुणा ।।सा मायावरणाशक्त्या- वृताविज्ञानरूपिणी ॥ ८७॥ टीका-और आकाश अविद्या में लयभावको प्राप्त होजाताहै और यह अविद्या मायाभी परमपदको पहुँच जाती है अर्थात् आत्मामें लय होजातीहै. तात्पर्य यह है कि, जो उत्पन्न भयाहै उसका अवश्य नाशहै. ईश्वरकी यह दो शक्ति विक्षेप और आवरण हैं, इनका अंत नहीं, यह महामाया दुःखरूपिणीमें रज, सत्त्व, तम, तीनों गुण हैं समय समयपर इन गुणोंको धारण कर लेतीहै सो माया आवरणशक्ति ज्ञानको आवृत करके अर्थात् छिपाके अज्ञानरूपिणी होजा- तीहै ।। ८६ ।। ८७ ॥ मूलम्-दर्शयेज्जगदाकारं तं विक्षेपस्वभाव- तःतमोगुणाधिकाविद्या या सा दुर्गा भवे- स्वयम्।।८८॥ईश्वरंतदुपहितं चैतन्यं तद-
प्रथमपटलः ।
भृद्धवम्॥सत्त्वाधिकाच या विद्या लक्ष्मीः
स्यादिव्यरूपिणी॥८९॥चैतन्यं तदुपहितं
विष्णुर्भवति नान्यथा ॥ रजोगुणाधिका
विद्या ज्ञेया सा वै सरस्वती ।। यश्चि-
स्वरूपोभवतिब्रह्मातदुपधारकः॥१०॥
टीका-और संसारके आकारको देखातीहै यह विक्षेप
करना उसका स्वभाव है माया जब तमोगुण धारण
करतीहै तब दुर्गारूप होके चैतन्य ईश्वरको उत्पन्न कर-
तीहै और जब सतोगुणको धारण करतीहै तब लक्ष्मी
रूप होके चैतन्य जो विष्णु हैं उनको उत्पन्न करतीहै
जब रजोगुणको धारण करतीहै तब सरस्वतीरूप
होके चैतन्य जो ब्रह्मा हैं उनको उत्पन्न करतीहै अर्थात्
सरके उत्पत्तिका कारण यही जगन्माता महा.
माया है ।। ८८॥ ८९॥९०॥
मूलम्-ईशाद्याः सकला देवा दृश्यन्ते पर-
मात्मनि॥शरीरादिजडं सर्व सा विद्या
तत्तथा तथा॥९॥एवंरूपेण कल्पन्ते क-
ल्पका विश्वसम्भवम्।।तत्त्वातत्त्वं भवंती
हकल्पनान्येन नोदिता ॥ ९२॥
(३२) शिवसंहिता भापाटीकासमेता । टीका-हमारे आदि सकल देवता उसी एक परमा- त्मामें देख पड़ते हैं और शरीरआदि सब जड पदार्थ उसी एक विद्या अर्थात् आत्मामें भिन्न भिन्न जान पड़तेहैं इसी तरह बुद्धिमान लोगोंने संसारके स्थितिकी कल्पना किया कि, तत्त्व अतत्त्व दोनों भयाहै अर्थात् आत्मासेही सर सृएिकी उत्पत्ति केवल कल्पनामा- है और कुछ किसीने कहा नहीं है ।।९१ ॥ ९२॥ मूलम्-प्रमेयत्वादिरूपेण सर्व वस्तु प्रका- श्यते॥तथैव वस्तुनास्त्येव भासको वर्त- कः परः ॥९३॥स्वरूपत्वेन रूपेण स्वरूपं वस्तु भाष्यते॥ विशेपशब्दोपादाने भेदो भवति नान्यथा ॥ ९४॥ टीका-प्रमेयरूप अर्थात् यावत् वस्तु संसारमें दृश्यमान हैं वह सबके प्रकाशका कारण वही एक आत्मा है उपाधिभेदसे भिन्न भिन्न स्वरूपदे खपड़ता है विशेप करके नामभेदसे भेद है अर्थात् ज्ञान और ज्ञेय दोनों वहींहै और कुछ नहीं है ॥९३॥९४॥ मूलम्--एकः सत्तापूरितानन्दरूपः पूर्णों व्यापी वर्त्तते नास्ति किञ्चित्॥एतज्ज्ञानं प्रथमपटल यःकरोत्येव नित्यं मुक्तः सस्यान्मृत्युसं. सारदुःखात्।। ९५॥ टीका-एक सत्तामात्र पूरित आनन्दस्वरूप परि- पूर्ण व्यापी सर्वदा वर्तमानहै और दूसरा कुछ नहीं है एसा ज्ञान जिसको है और सर्वदा वह यही मनन कर- ताहै सो मुक्त है अर्थात् संसारके जन्ममरणआदि दुःखसे वह रहित है ॥ ९५ ।। मूलम्-यस्यारोपापवादाभ्यां यत्र सर्वेलयं गताः॥ स एको वर्तते नान्यत्तच्चित्तेना- वधार्यते ॥ ९६॥ टीका-जहां ज्ञानद्वारा संसारके कार्योका लय होजाता है अर्थात् उससे अभेद होजाते हैं उसी एक सर्वदा वर्तमान आत्मामें मनको लय करे अर्थात् आत्माकाही ध्यान धारण करे ॥१६॥ मूलम्-पितुरन्नमयात्कोशाज्जायते पूर्वक- मणः॥शरीरं वैजडं दुःखं स्वप्रारंभोगाय सुन्दरम् ॥ ९७॥ टीका-पूर्वकर्मके अनुसार प्राणी पिताके अन्न- मय कोशसे दुःख भोगनेके कारण जड शरीर सुन्दर भोगरूप उत्पन्न होताहै ॥ ९७॥ A
(३४) शिवसंहिता भापाटीकासमेता ।
मूलम्-मांसास्थिस्नायुमज्जादिनिर्मितंभो.
गमन्दिरम् ॥ केवलं दुःखभोगाय नाडीसं.
ततिगुंफितम् ॥९८॥
टोका-मांस आस्थि स्नायु मज्जा आदि नाडियोंसे
बधाहुआ यह भोगमन्दिर अर्थात शरीर केवल दुःखका
कारण है, तात्पर्य यह है कि, ऐसा शरीर जिसके उत्पत्ति
स्थितिके स्मरण करनेसे घृणा होतो उसमें व्यर्थ मनु-
प्प मायामें फँसके मोह और अभिमान करताहै ॥९८॥
मूलम् --पारमेष्ट्यमिदं गानं पंचभूतविनि-
मितम्॥ब्रह्माण्डसंज्ञकं दुःखसुखभोगाय
कल्पितम् ॥ ९९ ॥
टीका-यह शरीर ब्रह्माके द्वारा पंचभूतसे निर्मित
ब्रह्मांडसंज्ञा सुख दुःख भोगनके हेतु कल्पितहै ॥९९ ॥
मूलम्-विन्दुः शिवो रजः शक्तिरुभयोर्मि-
लनात्स्वयम् ॥ स्वप्नभूतानि जायन्ते
स्वशक्त्या जडरूपया॥१०॥
टीका-शिवरूप विन्दु और शक्तिरूप रज इन दो-
नोंके संबन्धसे ईश्वरकी शक्ति जडरूपा महामाया अ.
पनी प्रभुतास शरीरोंको उत्पन्न करती है ॥ १० ॥
प्रथमपटलः।
(३५)
मूलम्-तत्पञ्चीकरणात्स्थूलान्यसंख्यानि
चराचरम् ॥ ब्रह्मांडस्थानि वस्तूनि यत्र
जीवोऽस्तिकर्मभिः ॥ १०१॥ तद्भूतपञ्च-
कात्सर्व भोगाय जीवसंज्ञिता ॥ १०२॥
टीका-उसी पंचीकरणसे अनेक स्थूल वस्तु इस
संसारमें चराचर उत्पन्न होती हैं यह जीवभी अपने
कर्मके अनुसार भोग भोगनेके हेतु उसी पांच भूतसे
जीवसंज्ञा करके प्रगट होता है ॥ १०१॥ १०२॥
मूलम्-पूर्वकर्मानुरोधेन करोमिघटनामह।।
अजंडः सर्वभूतान्वै जडस्थित्या भुनक्ति
तान् ॥ १०३॥
टीका-ईश्वर कहते हैं कि, प्राणीको पूर्व कर्मके अनु-
सार हम उत्पन्न करतेहैं और सर्व भूतोंसे हम अजड
अर्थात् भिन्न और अविनाशी हैं परंतु जडरूप होके सब-
को हम खाजाते हैं अर्थात् सबका नाश करतेहैं ।।१०३॥
मूलम्-जडात्स्वकर्मभिवंडोजीवाख्यो वि-
विधो भवेत् ॥ भोगायोत्पद्यते कर्म ब्रह्मां-
डाख्ये पुनः पुनः॥जीवश्चलीयते भोगाव-
साने च स्वकर्मणः ॥ १०४॥
(३६) शिवसंहिता नापाकासमेता । टीका-जीव अपने कर्ममें बंधके नाना प्रकारके जड शरीर धारण करता है और अपने कर्मके फल भोगनेके हेतु संसारमें वारंवार उत्पन्न होता है और सब कर्मोंके अवसानमें अर्थात् जब ज्ञानद्वारा सब काँसे रहित होजाता है तब उसी ज्ञानस्वरूप आ. त्मामें लय होजाताहै ॥ १०४॥ इति श्रीशिवसंहितायां हरगौरीसंवादे लयप्रकरणे भापाटीकायां प्रथमः पटलः॥१॥ अथ द्वितीयपटलः। मूलम्-देहेऽस्मिन्वर्तते मेरुःसप्तद्वीपसमन्वि- तः॥सरितःसागराः शैलाक्षेत्राणि क्षेत्रपा- लकाः॥१॥ऋपयो मुनयः सर्वे नक्षत्राणि ग्रहास्तथा ॥ पुण्यतीर्थानि पीठानि वर्त- न्ते पीठदेवताः ॥२॥ टीका-प्राणीके इस शरीरमें सप्तद्वीपसहित सुमेरु है और नदी समुद्रआदि पर्वत और क्षेत्र क्षेत्रपाल ऋषि मुनि और सब नक्षत्र ग्रह पुण्यतीर्थ और पीठ देवता आदि सब इसी शरीरमें वर्तमान हैं । तात्पर्य यह है कि, मनुष्य तीयामें सान दर्शनके हेतु भटकता फिरता है, परंतु इस शरीरस्थ तीर्थ और देवताको नहीं जानता न
.
द्वितीयपटलः। (३७)
मनको शुद्ध करके उनके जाननेमें प्रयास करताहै।।१॥२॥
मूलम्--सृष्टिसंहारकर्तारौ भ्रमन्तौ शशि-
भास्करौ॥नभो वायुश्च वह्निश्च जलं पृथ्वी
तथैव च ॥३॥
टीका-सृष्टिके स्थिति संहारके कर्ता चन्द्रमा और
सूर्य इस शरीरमें भ्रमण करते हैं और आकाश, वायु,
अग्नि, जल, पृथ्वी, अर्थात् पांचों तत्त्व सर्वदा शरीरमें
वर्तमान रहतेहैं. तात्पर्य यह है कि, सब इसी शरीरमें हैं
परंतु विना गुरुकी कृपाके देख नहींपड़ते ॥३॥
मूलम् त्रैलोक्ये यानि भूतानि तानि सर्वा-
णि देहतः॥ मेरुं संवेष्टय सर्वत्र व्यवहारः
प्रवर्तते ॥ जानाति यः सर्वमिदं स योगी
नात्र संशयः॥४॥
टीका-जो त्रैलोक्यमें चराचर वस्तु हैं सो सर इसी
शरीरमें मेरुके आश्रय होके सर्वत्र अपने २ व्यवहार
को वर्तते हैं जो मनुष्य यह सब जानताहै सो योगी है
इसमें संशय नहीं है।॥ ४॥
मूलम्-ब्रह्माण्डसंज्ञके देहे यथादेशं व्यव-
स्थितः॥ मेरुशंगे सुधारश्मिर्वहिरष्टक-
लायुतः॥५॥
(३८) शिवसंहिता भापाटीकासमेता। टीका-यह शरीर ब्रह्माण्डसंज्ञकहै जिप्स तरह संसा- रमें सब देश और सुमेरु पर्वतहै उसी तरह शरीरमें मेरु है उसके ऊपर सुधाकर अर्थात् चन्द्रमा आठ क- लासे स्थितहै॥५॥ मूलम्-वर्ततेऽहर्निशं सोऽपि सुधांवर्पत्य- धोमुखः ॥ ६॥ ततोऽमृतं द्विधाभूतं याति सूक्ष्मं यथा च वै ॥ इडामार्गेण पुष्टयर्थ याति मन्दाकिनीजलम्॥पुष्णाति सकलं देहमिडामार्गेण निश्चितम् ॥ ७॥ टीका-सोई चन्द्रमा रात्रि दिवस अधोमुख होके अमृतकी वर्षा करते हैं वह अमृत सूक्ष्म दो भाग हो- जाता है सो मन्दाकिनीके जलके समान देहके रक्षार्थ इडा जो वामनाडी है उसके रन्ध्रसे सकल शरीरको पोपण करता है ॥ ६॥७॥ मूलम्-एप पीयूपरश्मिर्हि वामपावें व्य- वस्थितः ॥ ८॥ अपरः शुद्धदुग्धाभो ह- ठात्कर्पति मण्डलात् ॥ रन्ध्रमार्गेण सृ- एयथै मेरो संयाति चन्द्रमाः ॥९॥ टीका-वही सुधाकिरण संयुक्त इडा नाडीकी स्थिति वामभागमें है और शुद्ध दूधके समान मेरुमें चन्द्रम
द्वितीयपटलः।
(३९)
प्रसन्नतापूर्वक अपने मण्डलसे इडाके रन्ध्रमागसे आ-
यके देहीका पोषण करते हैं।॥ ८॥९॥
मूलम्-मेरुमूले स्थितः सूर्यः कलाद्वादशसं-
युतः॥ दक्षिणे पथि रश्मिभिर्वहत्यूर्वप्र-
जापतिः॥ १०॥
टीका-मेरुदण्डके मूलमें अर्थात् नीचे चारह कला-
संयुक्त सूर्य स्थित हैं दक्षिणपथ अर्थात् पिङ्गलानाडी
द्वारा प्रजापति स्वरूपकी गति ऊपरको है ॥ १० ॥
मूलम्-पीयूपरश्मिनिर्यासं धातूंश्च ग्रसति
ध्रुवम् ॥ समीरमण्डले सूर्यो भ्रमते सर्व-
विग्रहे ॥ ११ ॥
टीका-सूर्य अमृतधातुको अपने किरण शक्तिसे
ग्रास करजातेहैं और वायुमण्डलके साथ सब शरीरमें
भ्रमण करतेहैं ॥११॥
मूलम्-एपासूर्यपरामूर्तिनिर्वाणं दक्षिणे प-
थि ॥ वहते लग्नयोगेन सृष्टिसंहारका-
रकः॥ १२॥
टीका-यह सूर्यकी अपर निर्वाण मूर्ति है अर्थात्
पिङ्गलानाडी दक्षिणभागमें स्थितहै सूर्य सृष्टिसंहार
करता लग्नयोगसे नाडीद्वारा प्रवाह करतेहैं ॥ १२ ॥
(४०) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता। मूलम्-साधलक्षत्रयं नाड्यः सन्ति देहान्तरे नृणाम् ॥ प्रधानभूता नाड्यस्तु तासुमु- ख्याश्चतुर्दश॥ १३॥ सुपुम्णेडा पिंगला च गांधारी हस्तिजिबिका ॥ कुहूः सरस्व- ती पूपा शंखिनी च पयस्विनी॥१४॥वा- रुणालम्बुसा चैव विश्वोदरी यशस्विनी ॥ एतासु तिम्रो मुख्याः स्युः पिङ्गलेडा सु- पुम्णिका ॥१५॥ टीका-शरीरमें बहुत नाडी हैं परंतु उनमें प्रधान नाडी साडेतीन लक्षहैं उनमेंसे मुख्य यह चौदह ना- डी हैं। सुपुम्णा २ इडा ३पिङ्गला ४ गान्धारी ५ हस्ति- जिह्वा ६ कुहू ७ सरस्वती ८ पूपा ९शंखिनी १० पय- स्विनी११ वारुणा१२ अलंबुसा १३ विश्वोदरी१४ यश- स्विनी इन चौदहमें भी तीन नाडी मुख्यहैं इडा, पिङ्ग- ला. सुषुम्णा ॥ १३ ॥१४॥ १५॥ मूलम्-तिसृष्वेका सुषुम्णैव मुख्या सा योगिवल्लभा॥ अन्यास्तदाश्रयं कृत्वा नाड्यः सन्ति हि देहिनाम् ॥ १६ ॥ टीका-इडा, पिङ्गला, सुषुम्णा इन तीन नाडियों में
द्वितीयपटलः। (४१)
भी एकही सुषुम्णा मुख्य है इस कारणसे कि, परमपदकी
दाताहै योगी लोगोंको हितकारी है अन्य नाडी उसके
आश्रय शरीरमें रहती हैं ॥१६॥
मूलम्-नाड्यस्तु ता अधोवदनाःपद्मतन्तु-
निभाः स्थिताः ॥ पृष्ठवंशं समाश्रित्य
सोमसूर्याग्निरूपिणी ॥ १७॥
टीका-यह तीनों नाडी अधोवदना अर्थात् नीचेको
मुख कमलतन्तुके सहश है और चन्द्र सूर्य अनिके
समान हैं अर्थात इडा चन्द्ररूप और पिङ्गला सूर्यरूप
और सुपुम्णा अग्निरूप है यह तीनों नाडी मेरुदंडके
भाश्रय स्थित हैं।॥ १७॥
मूलम्-तासांमध्ये गता नाडी चित्रा सा
मम वल्लभा ॥ ब्रह्मरन्ध्रञ्च तत्रैव सूक्ष्मा-
त्सूक्ष्मतरं शुभम् ॥ १८॥
टीका-उन तीनों नाडियोंके मध्यमें जो चित्रा नाडी है
वह हमको प्रिय है उसी स्थानमें बहुत सूक्ष्म ब्रह्मरंध्र
शोभायमान है ॥१८॥
मूलम्-पञ्चवर्णोज्ज्वला शुद्धा सुषुम्णा
मध्यचारिणी॥ देहस्योपाधिरूपा सा
सुषुम्णा मध्यरूपिणी ॥ १९ ॥
(४२) शिवसंहिता भापाटीकासमेता । टीका-वह चित्रानाडी पंचवर्ण अतिउज्ज्वल शुद्ध. है और देहके उपाधिका कारणभी वही सुषुम्णान्त- गता अर्थात् चित्रा नाडी है. तात्पर्य यह है कि, आत्म- स्वरूप वही है ॥ १९॥ मूलम्-दिव्यमार्गमिदं प्रोक्तममृतानन्द- कारकम् ॥ ध्यानमात्रेण योगींद्रो दुरि- तौघं विनाशयेत् ॥२०॥ टीका-यह मार्ग बहुत श्रेष्ठ अमृतानन्दकारक मु- क्तिका दाता हमने कहा है जिसके ध्यानमारसे योगी लोगोंके पापका समूह नाश होजाताहै ॥२०॥ . मूलम्-गुदात्तु चंगुलादूर्व मेदात्तु चंगुला- दधः ॥ चतुरंगुलविस्तारमाधारं वर्तते समम् ॥२१॥ टीका-गुदासे दो अंगुल ऊपर और मेसे दो अ. गुल नीचे मध्यमें चार अंगुल विस्तार आधारपद्म है ॥२१॥ मूलम्-तस्मिन्नाधारपने च कर्णिकायां सु- शोभना ॥ त्रिकोणा वर्तते योनिः सर्वत- त्रेषु गोपिता ॥ २२॥ टीका-उस आधारपद्मके कर्णिकामें अर्थात् डंडीमें द्वितीयपटलः। (४३) त्रिकोण योनि है यह योनि सव तंत्रों करके गोपित है अर्थात् इसके प्रकाशकरनेकी आज्ञा किसी शास्त्रमें नहीं है ॥२२॥ मूलम्-तत्र विद्युल्लताकारा कुण्डली परदे- वतासाईत्रिकराकुटिला सुपुम्णा मार्ग संस्थिता ॥२३॥ टीका-उसी स्थानमें कुण्डलिनी देवता साडेतीन हात कुटिला अर्थात् टेढी जिसकी प्रभा विद्युत्के समान है सुघुम्णाके मार्गमें स्थित है ॥२३॥ मूलम्-जगत्संसृष्टिरूपा सा निर्माण सत- तोद्यता ।। वाचामवाच्या वाग्देवी सदा देवर्नमस्कृता ॥२४॥ टीका-सोई कुण्डलिनी जगत्के बहुत प्रकारसे उत्साहपूर्वक रचना करनेकी रूप है और वाग्देवी है अर्थात् उसीसे वाक्यका उच्चारण होताहै इस कुण्डलि- नी देवीको देवतालोग नमस्कार करते हैं ।। २४ ॥ मूलम्-इडानाम्नी तु या नाडी वाममार्गे व्यवस्थिता ॥ सुपुम्णायां समाश्लिष्य दक्षनासापुटे गता।। २५॥ टीका-जो इडा नाम नाडी वामभागमें है वह सु- (४४) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । पुम्पाको आवृत करती हुई अर्थात् उससे मिलीहुई नासिकाके दक्षिणद्वारको गई है ॥ २५ ॥ मूलम्-पिङ्गला नाम या नाडी दक्षमार्गे व्यवस्थिता ॥ सुपुम्णा सा समाश्लिष्य वामनासापुटे गता ॥२६॥ टीका-दक्षिणमार्गमें जो पिङ्गला नाडी है वह सुषु- म्णाके आसरे होके नासिकाके वामद्वारको गई है॥२६॥ मूलम्-इडापिंगलयोर्मध्ये सुपुम्णा या भ- वैत्खलु । पटस्थानेषु च पदशक्तिं षट्- पद्मं योगिनो विदुः ॥२७॥ टीका-इडा पिङ्गलाके मध्यमें सुषुम्णा है इस सुपु. म्णाके छः स्थानमें छः शक्ति हैं इनके नाम यह हेंडा- किनी, हाकिनी, काकिनी, लाकिनी राकिनी, शाकिनी, और इन्हीं छः स्थानों में छः पद्म हैं उनके नाम यह हैं आधार, स्वाधिष्ठान, मणिपूर, अनाहत, विशुद्ध, आज्ञा यह अपने ज्ञानसे योगी लोग जानते हैं॥२७॥ मूलम्-पंचस्थानं सुपुम्णाया नामानि स्युर्वहूनि च ॥प्रयोजनवशात्तानि ज्ञात- निाशास्त्रतः ।। २८॥ .
द्वितीयपटलः । टीका--सुपुम्णाके पांच स्थान हैं उनके नाम बहुत हैं प्रयोजनसे शास्त्रकरके जाना जाताहै ॥२८॥ मूलम्--अन्या याऽस्त्यपरा नाडी मूलाधा- रात्समुत्थिताारसनामेटूनयनं पादांगुष्ठे च श्रोत्रकम् ।। २९ ।। कुक्षिकक्षांगुष्टकर्ण सौगं पायुकुक्षिकम्॥लब्ध्वातां वै निव- र्तन्ते यथादेशसमुद्भवाः ॥ ३०॥ टीका-और अन्य नाडी मूलाधारसे उठीहैं और जिहा, मेद, नेत्र, पादका अङ्गुष्ट, कर्ण, कुक्षि, कक्ष, हस्ताङ्गुष्ट, पायु, उपस्थ, इन सब भङ्गोंमें इनका अन्त भयाहै अर्थात् मूलाधारसे उत्पन्न होके अपने अपने स्थानमें जाके निवृत्त होगई हैं ॥२९॥३०॥ मूलम्-एताभ्य एव नाडीभ्यः शाखोपशा- खतः क्रमात् ।। साधलक्षत्रयं जातं यथा- भागं व्यवस्थितम् ॥३१॥ एता भोगवहा नाड्यो वायुसञ्चारदक्षकाः ॥ओतप्रोताः सुसंव्याप्य तिष्ठन्त्यस्मिन्कलेवरे ॥ ३२॥ टीका-इन्हीं नाडियोंमेंसे शाखोपशाख कमसे साडेतीनलक्ष नाडी उत्पन्न होके अपने अपने स्थानमें स्थित हैं यह सब भोगवहानाडी वायुके संचारमें (४६) शिवसंहिता भापाटीकासमेता। दक्षहे ओतप्रोत अर्थात् संयोग वियोगसे इस शरीरमें व्यात हैं ॥३१॥३२॥ मूलम्-सूर्यमण्डलमध्यस्थः कलाद्वादश- संयुतः।वस्तिदेशे ज्वलद्वह्निर्वर्तते चान्न- पाचकः॥३३॥ वैश्वानराग्निरेपो वै मम तेजोंशसम्भवः ॥ करोति विविधं पाकं प्राणिनां देहमास्थितः॥३४॥ टीका-द्वादशकलासंयुक्त सूर्यमण्डलके मध्यमें प्रज्वलित अग्नि है सो वस्तिदेशमें अन्नका पाचन करती है वह वैश्वानर अग्नि हमारे तेजसे उत्पन्न है प्राणीके शरीरमें स्थित होकर नाना प्रकारका पाक करती है॥३३॥३४॥ मूलम्-आयुःप्रदायको बहिर्बलं पुष्टिं द- दाति सः ॥ शरीरपाटवञ्चापि ध्वस्तरोग समुद्भवः॥ ३५॥ टीका-सो वैश्वानर अग्नि आयु, वल और पुष्टता और शरीरमें कान्तिका देनेवाला है और यावत् रोगोंको नाश करनेवाला है ।। ३५॥ मूलम्-तस्माद्वैश्वानराग्निञ्च प्रज्वाल्य वि- द्वितीयपटलः। धिवत्सुधीः ॥ तस्मिन्नन्न हुनेद्योगी प्रत्य- हं गुरुशिक्षया ॥३६॥ टीका-इस वैश्वानर अग्निको गुरुके शिक्षापूर्वक प्रज्वलित करके नित्य उसमें अन्नका होम करै अर्थात् भोजन करै ॥ ३६॥ मूलम् -ब्रह्माण्डसंज्ञके देहे स्थानानिस्युर्व- हूनि च ॥ मयोक्तानि प्रधानानि ज्ञात- व्यानीह-शास्त्रके ॥३७॥ नानाप्रकारना- मानि स्थानानि विविधानि च ॥ वर्तन्ते विग्रहे तानि कथितुं नैव शक्यते ॥ ३८॥ टीका-यह शरीर ब्रह्माण्डसंज्ञक है इसमें बहुत स्थान हैं हमने प्रधान प्रधान स्थान कहे हैं ये शास्त्रसे जाने जाते हैं बहुत प्रकारके स्थान और नाम उन स्थानोंके हैं जो इस शरीरमें वर्तमानहैं उनके वर्णन करनेको हम शक्य नहीं है अर्थात् बहुत विस्तारहै उसके कहने में व्यर्थ परिश्रम है ॥ ३७॥ ३८॥ मूलम्-इत्थं प्रकल्पिते देहे जीवो वसति सर्वगः ॥ अनादिवासनामालाऽलंकृतः कर्मशृङ्खलः ॥ ३९॥ टीका-इसी तरह शरीर कल्पित है और जीव पूर्व-
(४८) शिवसंहिता भापाटीकासमेता।
वासनारूपी वेडीमें फँसके मालाके तरह घूमा
मूलम्-नानाविधगुणोपेतः सर्वव्यापारका-
रकः ॥ पूर्वार्जितानि कर्माणि भुनक्ति
विविधानि च ॥४०॥
टीका-सोई जीव नानाप्रकारके गुण ग्रहण करताहै
और संसारमें बहुत प्रकारके व्यापार करताहे यह सर
पूर्वीजित शुभाशुभ कर्मके फल भोगताहे ॥४०॥
मूलम्-यद्यत्संदृश्यते लोके सर्वतत्कर्मस-
म्भवम् ॥ सर्वः कर्मानुसारेण जन्तुर्भोगा-
न्भुनक्ति वै॥४१॥
टीका-जो जो शुभाशुभ कर्म संसारमें देखपड-
ताहै वह सबका आदिकारण कर्मही है प्राणीमात्र
अपने कर्मके अनुसार भोग भोगता है ॥ ११॥
मूलम्-ये ये कामादयो दोपाः सुखदुःख-
प्रदायकाःगते ते सर्वे प्रवर्तन्ते जीवकर्मा-
नुसारतः॥४२॥
टीका-जो जो काम क्रोध आदिसे सुख दुःख होताहै
हो सब जीवके कर्महीके अनुसार वर्तताहै ॥ ४२॥
* द्वितीयपटलः। (४९) मूलम्-पुण्योपरक्तचैतन्ये प्राणान्प्रीणाति केवलम् ॥ वाह्ये पुण्यमयं प्राप्य भोज्यव- स्तु स्वयम्भवेत् ॥ ४३॥ टीका-पुण्यकर्मके अनुष्ठान करनेसे प्राणीको सुख होता है और वाह्य वस्तु श्रेष्ठ भोजनआदि नानाप्र- कारकी वस्तु आपही मिल जातीहै ॥ १३ ॥ मूलम्-ततःकर्मवलात्पुंसःसुखवा दुःखमे- वच॥ पापोपरक्तचैतन्यं नैव तिष्ठति नि- श्चितम् ॥४४॥ न तद्भिन्नो भवेत्सोऽपि त- दिन्नो न तु किञ्चन ॥ मायोपहितचैत- न्यात्सर्व वस्तु प्रजायते ॥ ४५ ॥ टीका-यह प्राणी अपने कर्मके बलसे सुख पा दुःख भोगताहै, जीव जब पापमें आसक्त होताहै तब दुःख भोगताहै, फिर उसको सुखलाभ नहीं होता. जीव अपने कर्मके अनुसार सुख वा दुःख भोगताहै इसमें भिन्नता नहीं है अर्थात कती भोक्तामें भेद नहीं चैतन्य आत्मा जब मायोपहित होताहै तब सब वस्तु उत्पन्न होताहै ॥४४॥१५॥ मूलम्-यथाकालेपि भोगाय जन्तूनां विवि- (५०) शिवसंहिता भापाटीकासमेता । धोद्भवः ॥ यथा दोषवशाच्छुक्तौ रजता- रोपणं भवेत् ॥ तथास्वकर्मदोपादै ब्रह्म- ण्यारोप्यते जगत् ॥ ४६॥ टीका-जैसा काल भोगके हेतु निश्चय रहता है उसमें प्राणी नानाप्रकारसे भोग भोगनके लिये उत्पन्न होताहै जैसे नेत्रके विकारके कारणसे सीपीमें चाँदीका आरोप होताहै वैसेही अपने कर्मके दोपसे प्राणी - हममें मिथ्या जगतका आरोप करताहै ॥१६॥ मूलम्-सवासनाभ्रमोत्पन्नोन्मूलनातिस- मर्थनम् ॥ उत्पन्नश्चेदीदृशं स्याज्ज्ञानं मोक्षप्रसाधनम् ॥ ४७॥ टीका-वासनासे भ्रम उत्पन्न होताहै जबतक यासनाकी जड नहीं जाती तबतक कदापि भ्रम दूर नहीं होता इसी तरह जब ज्ञान उत्पन्न होताहै तब कुछ नहीं रह जाता इस हेतुसे ज्ञानही मोक्षका साधन है॥१७॥ मूलम्-साक्षाद्वैशेपदृष्टिस्तु साक्षात्कारिणि विभ्रमे ॥ करणं नान्यथा युक्त्या सत्यं सत्यं मयोदितम् ॥ १८॥ टीका-विशेप करके दृष्टिसे साक्षात् जो देखपड-
.
द्वितीयपटलः । (५१)
ताहै वही साक्षात् भ्रमका कारण है अर्थात् इसी साक्षा-
तमें मनुष्य फँसाहै मायाके आवरणसे बुद्धि आगे
नहीं जाती और दूसरा कारण कुछ नहीं है यह हम
सत्य कहते हैं ॥४८॥
मूलम्-साक्षात्कारिभ्रमे साक्षात्साक्षा-
कारिणि नाशयेत् ॥ सो हि नास्तीति
संसारे भ्रमो नैव निवर्तते ॥ ४९ ॥
टीका-यह साक्षात् घटपट आदिका भ्रम ब्रह्मके
प्रत्यक्ष होनेसे नाश होताहै विना आत्माके प्रत्यक्ष भये
ब्रह्म संसारमें नहीं है यह भ्रम निवृत्त नहीं होता ॥४९॥
मूलम्-मिथ्याज्ञाननिवृत्तिस्तु विशेपदर्शना-
द्भवेत् ॥ अन्यथा न निवृत्तिः स्यादृश्य-
ते रजतभ्रमः ॥ ५० ॥
टीका-यह मिथ्या संसारका ज्ञान आत्माका विशे-
पदर्शन होनेसे निवृत्त होता है और किसीप्रकार इस
अज्ञानकी निवृत्ति नहीं होती. जैसे सीपीमें चाँदीका
भ्रम विना सीपीक निश्चय भये दूर नहीं होता ॥५०॥
मूलम्-यावनोत्पद्यते ज्ञानं साक्षात्कारे
निरञ्जने ॥ तावत्सर्वाणि भूतानि दृश्य-
न्ते विविधानि च ॥५१॥
(५२) शिवसंहिता भापाटीकासमेता । टीका-जयतक आत्माका साक्षात्कार ज्ञान नहीं होता तबतक सब प्राणी संसार आदि नाना प्रकारके देखपडते हैं॥५१॥ मूलम् यदा कर्मार्जितं देहं निर्वाणे साधनं भवेत् ॥ तदा शरीरवहनं सफलं स्यान्न चान्यथा ॥५२॥ टीका-जो यह कर्मार्जित शीर है इससे निर्वाण अर्थात् आत्मज्ञानका साधन होयतब इसका जन्म और स्थिति सुफल है नहीं तो व्यर्थ है. तात्पर्य यह है कि, जिस मनुष्यको आत्मज्ञान नहीं हुआ या इस वि- पयका उसने साधन नहीं किया उसका जन्म केवल माताके दुःख देने और पृथ्वीपर भारके हेतु भया॥५२॥ मूलम्-याशी वासना मूला वर्त्तते जीवसं- गिनी ॥ तादृशं वहतेजन्तुः कृत्याकृत्य- विधीभ्रमम् ॥ ५३॥ टीका-जैसी वासना जीवके संग रहती है पैसेही पाणी शुभाशुभ कर्म भ्रमके वश होके करताहै और उ- सी वासनासे उत्पन्न और नाश होता रहताहै ॥ ५३॥ मूलम्-संसारसागरं तत्र्तुं यदीच्छेद्योगसा- धकः ॥ कृत्वा वर्णाश्रमं कर्म फलवर्ज तदाचरेत् ॥५४॥ .
द्वितीयपटलः।
टीका-योगसाधक यदि संसारसे तरनेकी इच्छा
करे तो यावत् वर्णाश्रमका कर्म फलरहित करना
उचित है ॥५४॥
मूलम्-विषयासक्तपुरुपा विपयेषु सुखेप्स-
वः॥ वाचाभिरुद्धनिर्वाणा वर्लन्ते पापक-
मणि ॥५५॥
टीका-विषयासक्त पुरुप सुख और विषयकी इच्छा
म सर्वदा रहते हैं और पापकर्ममें ऐसे तत्पर रहते
कि, वाक्यभी उनका परमार्थ विषयमें रुद्ध रहता
अर्थात् मोक्षका साधन तो बहुत दूर है परन्तु परमार्थकी
चर्चासेभी उनको ज्वर चढ़ताहै ॥ ५५॥
मूलम्-आत्मानमात्मनापश्यन्न किञ्चिदि-
ह पश्यति॥तदा कर्मपरित्यागेन दोपोऽ-
स्ति मतं मम ॥५६॥
टीका-जच ज्ञानी आत्मासे आत्माको देसे और
सब वस्तुका अभाव जानपडे तब कर्मको त्यागदेनेमें
कुछ दोप नहीं है यह हमारा मतहै ऐसा श्रीशिवजी
जगन्माता पार्वतीजीसे कहते हैं ।। ६६ ॥
मूलम्-कामादयो विलीयन्ते ज्ञानादेव न
चान्यथा ॥ अभावे सर्वतत्त्वानां स्वयंत-
त्वं प्रकाशते ॥ ५७॥
(५४) शिवसंहिता भापाटीकासमेता । टीका-ज्ञानमें काम क्रोधादि सकल पदार्थ लय होजाते हैं इसमें अन्यथा नहीं है, जब स्वयंतत्त्व अ- र्थात् आत्मज्ञान प्रकाश होताहै तब सब तत्वोंका अभाव होजाताहै ॥५॥ इति श्रीशिवसंहितायां हरगौरीसंवादे योगप्रकथने तत्त्वज्ञानोपदेशो नाम द्वितीयः पटलः ॥२॥ अथ तृतीयपटलः । मूलम्-हृद्यस्ति पङ्कजं दिव्यं दिव्यलिङ्गेन भूपितम् ॥ कादिठान्ताक्षरोपेतं द्वादशार्ण विभूषितम् ॥ १॥ टीका-प्राणीके हृदयस्थानमें एक पद्म सुन्दर दि- व्यलिङ्गसे शोभायमानहै यह पद्म क-से-ठ-तक द्वादश वर्ण करके शोभित है अर्थात् क-ख-ग-घ-ङ-च-छ-ज- झ-मन्ट-ठ॥१॥ मूलम्-प्राणो वसति तत्रैव वासनाभिरलंकृ- तः॥ अनादिकर्मसंश्लिष्टः प्राप्याहङ्कार- संयुतः॥२॥ दीका-उसी पझमें प्राणकी स्थिति है और अनादि कर्म अहंकारसंयुक्त वासनासे अलंकृतहै ।। २॥
.
तृतीयपटलः। (५५)
मूलम्-प्राणस्य वृत्तिभेदेन नामानि विवि-
धानि च ।। वर्तन्ते तानि सर्वाणि कथितुं
नैव शक्यते ॥३॥
टीका--प्राणके वृत्तिभेदसे जो इस शरीरमें वायु व-
तमान हैं उनके बहुतप्रकारके नाम हैं जिनके वर्णन
करनेको हम शक्य नहीं हैं अर्थात् यहां उनके वर्णन
का प्रयोजन नहीं है ॥३॥
मूलम्-प्राणोऽपानः समानश्चोदानो व्यान-
श्च पञ्चमः ॥ नागः कूर्मश्चकृकरो देवदत्तो
धनञ्जयः॥ ४॥दशनामानिमुख्यानि म-
योक्तानीह शास्त्रके॥ कुर्वन्तितेऽत्रकार्या-
णि प्रेरितानि स्वकर्मभिः ॥५॥
टीका--प्राणके मुख्य भेदोका नाम प्राण, अपान,
समान, उदान, पांचवां ध्यान और नाग, कूर्म, कृकर,
देवदत्त, धनञ्जय, यह दश वायु मुख्य हैं हम शास्त्रप्र-
माणसे कहते हैं शरीरमें यह वायु अपने कर्मसे प्रेरित
होके कार्य करते हैं ॥ ४॥५॥
मूलम्-अत्रापि वायवः पञ्चमुख्याः स्युर्द-
शतः पुनः ॥ तत्रापि श्रेष्ठकारी प्राणा-
पानौ मयोदितौ ॥६॥
(५६) शिवसंहिता भापाटीकासमेता। टीका-वह दश वायुमें पांच मुख्य हैं फिर उनमेंभी . निश्चय करके श्रेष्ठ करता श्रीमहादेवजी कहते हैं कि हमने प्राण और अपानको कहाँहै ॥६॥ मूलम्-हृदिप्राणोगुदेऽपानःसमानोनाभि- मण्डले ॥ उदानः कण्ठदेशस्थो व्यानः सर्वशरीरगः ॥७॥नागादिवायवः पञ्च कुर्वन्ति ते च विग्रहे । उदारोन्मीलनंक्षु- त्तृड्जृम्भा हिका च पञ्चमः॥ ८॥ टीका-हृदयस्थानमें प्राणकी स्थिति है और गु- दामें अपान और नाभिमण्डलमें समान और कण्ठ- में उदान और व्यान सब शरीरमें व्याप्त है और नाग आदि जो पांच वायु हैं वह शरीरमें डकार, हिचकी, जंभाई, क्षुधा, पिपासा उन्मीलन अर्थात निद्रासे जाग्रत् होनेके समय जो नेत्रके खुलनेका हेतु है यह सब कार्य करतेहैं ॥ ७॥८॥ मूलम्-अनेन विधिनायो वै ब्रह्माण्ड वेत्ति विग्रहम् ॥ सर्वपापविनिर्मुक्तः स याति परमां गतिम् ॥९॥ टीका-इस विधानसे जो पहिले कहा है शरीरको जो मनुष्य ब्रह्माण्ड जानता है वह सर्व पापोंसे मुक्त होके . ,
तृतीयपटलः। (५७)
परमगतिको प्राप्त होताहै अर्थात् मोक्ष होताहै ॥ ९॥
मूलम्-अधुना कथयिष्यामि क्षिप्रं योगस्य
सिद्धये ॥ यज्ज्ञात्वा नावसीदन्ति योगि-
नो योगसाधने ॥ १०॥
टीका-अब जो हम कहते हैं इस विधिसे बहुत
शीघ्र योग सिद्ध होता है और इसके जान लेनेसे
योगीको योगसाधनमें कष्ट नहीं होता ।। १०॥
मूलम-भवेद्वीर्यवती विद्या गुरुवक्रसमुद्भ-
वा॥ अन्यथा फलहीना स्यान्निवीयर्याप्य-
तिदुःखदा ॥११॥
टीका-जो विद्या गुरुके मुखसे सुनी वा जानी
जाती है वह वीर्यवती होतीहै और अन्य प्रकारसे विद्या
फलहीन निर्या और अतिदुःखकी देनेवाली होती है.
तात्पर्य यह है कि, योगविद्या वा अन्यविद्या भलेप्रकार
गुरुसे जानकरके करना उचित है जो लोक पुस्तकसे वा
किसीको करते देखते योगादिक क्रिया आरम्भ करदे-
ते हैं उनका कल्याण नहीं होता यथार्थ न जाननेसे
कष्टही होताहे ॥११॥
मूलम्-गुरुं सन्तोष्य यत्नेन ये 4 विद्यामु-
पासते ॥ अवलम्बन विद्यायास्तस्याः
फलमवाप्नुयुः॥१२॥
(५८) शिवसंहिता भापाटीकासमेता ।
टीका-गुरुको सब तरहसे प्रसन्न करके जो विद्या
मिलतीहै उस विद्याका फल शीघ्र होताहै अर्थात् थोडे
कालमें सिद्ध होजातीहै ॥ १२॥
मूलम्-गुरुः पितागुरुर्माता गुरुर्देवो नसंश-
यः॥कर्मणा मनसा वाचा तस्मात्सर्वैः
प्रसेव्यते ॥१३॥ गुरुप्रसादतः सर्वं लभ्य-
ते शुभमात्मनः ॥ तस्मात्सेव्यो गुरुनि-
त्यमन्यथा न शुभं भवेत् ॥ १४॥ प्रदक्षि-
णत्रयं कृत्वा स्टवा सव्येन पाणिना॥
अष्टांगेननमस्कुर्याद्गुरुंपादसरोरुहम्।।१५।।
टीका-गुरु पिता और गुरु माता और गुरु देवता है
इसमें संशय नहीं है इस हेतुसे गुरुको कर्मसे मनसे
वाक्यसे सब प्रकारसे सेवा करना उचितहै गुरुके प्र.
सादसे आत्माका सब शुभ होजाता है. इसलिये गुरु-
की नित्य सेवा करना उचित है. दूसरी तरह शुभ नहीं
है गुरुको तीन प्रदक्षिणा करके दक्षिण हाथसे स्पर्श
करके गुरुके चरणकमलमें साष्टांग नमस्कार करना
उचित है ।। १३॥ १४ ॥१५॥
मूलम्-श्रद्धयात्मवतां पुंसां सिद्धिर्भवति
नान्यथा । अन्येषाञ्चन सिद्धिः स्यात-
स्माद्यनन साधयेत् ॥ १६॥
तृतीयपटलः ।
टीका-जिस पुरुपको श्रद्धा है उसको निश्चय कर-
के विद्या सिद्ध होती है दूसरेको नहीं होती. इस हेतुसे
साधकको उचित है कि यत्नसे साधन करे ॥ १६॥
मूलम्-न भवेत्संगयुक्तानां तथाऽविश्वासि-
नामपि ॥ गुरुपूजाविहीनानां तथा च व-
हुसंगिनाम् ॥१७॥ मिथ्यावादरतानां च
तथा निष्ठुरभाषिणाम् ॥ गुरुसन्तोपहीना-
नां न सिद्धिः स्यात्कदाचन ॥ १८॥
टीका-जिस पुरुपका किसी व्यवहारी मनुष्यसे
अतिसङ्ग है उसको योगविद्या सिद्ध नहीं होती ऐसेही
अविश्वासी और जो गुरुपूजासे हीन हैं और जिनका
बहुत लोगोंसे संग है और वह लोग जो झूठ और
कठोर वचन बोला करते हैं और वह लोग जो गुरुको
प्रसन्न नहीं करते इन लोगोंको कदापि सिद्धि नहीं
होती ।। १७॥ १८॥
मूलम्-फलिप्यतीतिविश्वासःसिद्धःप्रथम-
लक्षणम्॥ द्वितीयं श्रद्धया युक्तं तृतीयं गु-
रुपूजनम्॥१९॥चतुर्थसमताभावं पञ्चमे-
न्द्रियनिग्रहम् ॥ पष्टं च प्रमिताहारं सप्त-
मनैव विद्यते ॥२०॥
(६०) शियसंहिता भापाटीकासमेतो ।
टोका-योगसिद्धि होनेका प्रथम लक्षण यह है कि,
उसके सिदिमें विश्वास हो दूसरे श्रद्धायुक्त तीसरे गुरु-
पूजारत हो चौथे प्राणीमात्रमें समताभाव रक्खे पांचवें
इन्द्रियों का निग्रह रहे छठवें परिमित भोजन करै यह छः
लक्षण योनसिद्धिके हैं और सातवाँ नहीं है ॥१९॥२०॥
मूलम्-योगोपदेशं संप्राप्य लब्ध्वा योग
विदं गुरुम् ॥ गुरूपदिष्टविधिना धिया
निश्चित्य साधयेत् ॥२१॥
टीका-योगवेत्ता गुरुसे योग उपदेश लेके जिस
विधिसे गुरु उपदेश करे उस विधिसे बुद्धि निश्चय क
रके साधन करे ॥२१॥
मूलम्-सुशोभने मठे योगी पद्मासनसम-
न्वितः॥आसनोपरि संविश्य पवनाभ्या-
समाचरेत् ॥ २२॥
टीका-उपद्रवरहित सुन्दर स्वच्छ और उसका मू-
क्ष्म रन्ध्र होय उस मठमें पद्मासनसंयुक्त आसनपर
वैठके योगी पवनका अभ्यास करे॥२२॥
मूलम्-समकायः प्राञ्जलिश्च प्रणम्य च
गुरून सुधीः॥दक्षे वामे च विघ्नेशं क्षेत्रपा-
लांबिका पुनः॥ २३ ॥
तृतीयपटलः । (६१).
टीका-समकायः अर्थात सीधा शरीर करके हाथ
जोडके गुरुको प्रणाम करे और दक्षिण वामभागमें
गणेशजीको प्रणाम करे और क्षेत्रपाल और जगन्माता
देवीको प्रणाम करना उचित है ॥२३॥
मूलम्-ततश्च दक्षाङ्गप्टेन निरुद्धय पिंगलां
सुधीः ॥ इडया पूरयेद्वायुं यथाशक्त्या तु
कुम्भयेत् ॥ २४॥ ततस्त्यक्त्वा पिंगलया
शनैरेव न वेगतः ॥ पुनः पिंगलयाऽऽपूर्य
यथाशक्त्यातु कुम्भयेत्॥२५॥इडया रे-
चयेद्वायुं न वेगेन शनैःशनैः।।इदं योगवि-
धानेन कुर्यादिशतिकुम्भकान् ॥ सर्वद-
न्द्रविनिर्मुक्तः प्रत्यहं विगतालसः ॥२६॥
टीका-इसके पश्चात् दहिने हाथ के अंगष्ट्रसे पिंग-
लाको रोककरके इडासे वायुपूरक करे अर्थात् ग्राह्य
करे और यथाशक्ति वायुको रोके फिर पिंगलासे शनैः
शनैः रेचक अर्थात् वायुको बाहरकरे इसीप्रकार फिर
पिंगलासे पूरक करके यथाशक्ति कुम्भक करे फिर इडा
से धीरे धीरे रेचक करे वेगसे कदापि न करे इस योगविधा-
नसे वीस कुम्भक करे और सर्वदन्द्रसे रहित होजाय
अर्थात् एकाकार वृत्ति रक्खे और नित्य आलस्यको
त्याग करके अभ्यास करे ॥२४॥२५॥२६॥
(६२), शिवसंहिता भापाटीकासमेता।
मूलम्-प्रातःकाले च मध्याह्ने सूर्यास्ते
चार्द्धरात्रके॥ कुर्यादेवं चतुर्वारं कालेष्वे-
तेपु कुम्भकान् ॥२७॥
टीका-पूर्वोक्त विधि प्रातःकाल और मध्याह्नमें
और सायंकालमें और अर्द्धरात्रि में इसीतरह चार बार
नित्य कुम्भक करना उचित है ॥२७॥
मूलम्-इत्थं मासत्रयं कुर्यादनालस्योदिने
दिने ॥ ततो नाडीविशुद्धिः स्यादविल-
म्बेन निश्चितम् ॥२८॥
टीका-इसीप्रकार आलस्यको छोडकरके तीन मास
नित्यकरे तो उस पुरुपकी नाडी बहुत शीघ्र शुद्ध
होजाय यह निश्चय है ।। २८॥
मूलम् यदा तु नाडीशुद्धिः स्याद्योगिन-
स्तत्त्वदर्शिनः ॥ तदा विध्वस्तदोपश्च
भवेदारम्भसम्भवः ॥२९॥
टीका-तत्त्वदर्शी योगीकी जब नाडी शुद्ध होगी
तव सर्व दोपका नाश होगा और आरम्भका सम्भव
होगा।॥२९॥
मूलम्-चिह्नानि योगिनो देहे दृश्यन्ते ना-
डिशुद्धितः ॥ कथ्यन्ते तु समस्तान्यगा-
निसंक्षेपतोमया ॥३०॥
तृतीयपठलः। (६३) टीका-नाडी शुद्ध होनेपर जो योगीके शरीरमें चिह्न देखपडतेहैं उन सबको हम संक्षेपसे वर्णन करते हैं ॥३॥ मूलम्-समकायःसुगन्धिश्चसुकान्तिःस्वर- साधकः ॥३१॥ आरम्भघटकश्चैव यथा परिचयस्तदा ॥ निष्पत्तिः सर्वयोगेषु योगावस्था भवन्ति ताः ॥ ३२ ॥ टीका-जब योगीकी नाडी शुद्ध होगी तब समकाय होजायगा अर्थात् न स्थूल न कृश न वक्र रहेगा और शरीरमें सुगंधिसंयुक्त अच्छी कान्ति अर्थात् तेज रहेगा और वायुस्वरका साधन होजायगा और आरम्भका लक्षण जान पडेगा और सब योगका ज्ञान होजायगा इसको योगावस्था कहते हैं ॥३१॥ ३२॥ मूलम्-आरम्भःकथितोऽस्माभिरधुना वा- युसिद्धये ॥ अपरः कथ्यते पश्चात्सर्वदुः- खौधनाशनः ॥३३॥ टीका-अभी जो हमने कहा है सो प्राणवायु सिद्ध होनेके आरम्भमें यह चिह्न होता है और इसके पीछे जो सर्व दुःखका नाश होता है सो कहते हैं ॥ ३३॥ मूलम-प्रौढवह्निःसुभोगी च सुखीसर्वाङ्गसु-
(६४) शिवसंहिता मापाटीकासमेता।
न्दरः ॥ संपूर्णहृदयो योगी सर्वोत्साहव-
लान्वितः ॥ जायते योगिनोऽवश्यमेत-
त्सर्व कलेवरे ॥ ३४॥
टोका-साधकके शरीर में जठराग्नि विशेष प्रज्वलित
होगी और सर्व अङ्ग सुन्दर सुखपूर्वक सुन्दर भोजन
करेगा और बलसंयुक्त सर्व उत्साहसे हृदय योगीका
प्रसन्न रहेगा इतने गुण योगीके शरीरमें अवश्य होगे॥३४
मूलम्-अथ वय प्रवक्ष्यामियोगविधकरं
परम् ॥ येन संसारदुःखाधि तीत्वा या-
स्यन्ति योगिनः ॥ ३५॥
टीका-अब जो योगमें विघ्न हैं उनको हम कहते हैं
जिनको त्यागके यह संसाररूपी जो दुःखका समुद्र है
योगी उसके पार होजाताहे ॥ ३५ ॥
मूलम्-आम्लं रूक्षं तथा तीक्ष्णंलवणंसाप-
पंकटुम्॥बहुलं भ्रमणं प्रातः स्नानं तैल-
विदाहकम्॥३६॥स्तेयं हिंसांजनद्वेपञ्चा-
हङ्कारमनार्जवम्।।उपवासमसत्यञ्चमोह-
श्व प्राणिपीडनम् ॥३७॥ स्त्रीसङ्गमग्निसेवां
च रवालापं प्रियानियमाअतीव भोजनं
योगी त्यजेदेतानि निश्चित ॥३८॥
तृतीयपटलः । (६५)
टीका-सट्टा रूखा तीक्ष्ण लोन सरसों कडुआ
बहुत भ्रमण करना प्रातःकाल स्नान शरीरमें तेल म-
देन करना ॥३६॥ स्वर्णआदिककी चोरी हिंसा म-
नुप्यसे द्वेप व अहंकार अनार्जव अर्थात् मनुष्यसे प्रेम
न रखना उपवास,झूठ,ममता, प्राणीको पीडा देना॥३७॥
स्त्रीका सङ्ग, अग्निसेवन, प्रिय, अप्रिय, बहुत बोलना,
बहुत भोजन करना योगीको उचित है कि, यह सब
अवश्य त्यागदे ॥ ३८॥
मूलम्-उपायं च प्रवक्ष्यामि क्षिप्रं योगस्य
सिद्धये ॥ गोपनीयं साधकानां येन सि-
विभवेत्खलु ॥ ३९ ॥
टीका-अब हम बहुत शीन योग सिद्ध होनेका उपा-
य कहते हैं इसको गोप्य रखनेसे साधकको योग निश्च-
य सिद्ध होजायगा ॥३९॥
मूलम्-घृतं क्षीरं च मिष्टानं ताम्बूलं चूर्णव-
नितम्।।कर्पूर निष्टुरं मिष्टं सुमठं सूक्ष्मव-
स्त्रकम् ॥४०॥ सिद्धान्तश्रवणं नित्यं वैरा-
ग्यगृहसेवनम् ॥नामसङ्कीर्तनं विष्णोः सु-
नादश्रवणं परम् ॥४१॥ धृतिः क्षमा तपः
शौचं ह्रीमतिर्मुरुसेवनम् ॥ सदैतानि परं
योगी नियमेन समाचरेत्॥४२॥
.
(६६) शिवसंहिता भापाटीकासमेता।
टीका-घृत दूध मधुर पदार्थ ताम्बूल कर्पूरवासित
चूर्णरहित, कठोर शब्दरहित मधुर बोलना, सुन्दर सू.
क्ष्मरन्ध्रके स्थानमें रहना, सूक्ष्म वस्त्र अर्थात् महीन और
थोडा वस्त्र धारण करे नित्य सिद्धांत अर्थात् वेदान्त
श्रवण करे और वैराग्यसे गृहमें रहे ईश्वरका स्मरण करे
अच्छा शब्द श्रवण करे धैर्य क्षमा तप शौच लज्जा गुरु-
की सेवा योगी सदेव इसप्रकार नियमसंयुक्त रहे तो
कल्याण होगा॥४०॥४१॥ ४२ ॥
मूलम्-अनिलेऽर्कप्रवेशे च भोक्तव्यं योगि-
भिः सदा॥ वायौ प्रविष्टे शशिनि शयनं
साधकोत्तमैः॥४३॥
टीका-जब सूर्यनाडी अर्थात् पिंगलानाडीका
प्रवाह रहे तब योगी सदैव भोजन करे ओर जब चन्द्र
अर्थात् इडानाडीसे वायुका प्रवाह रहे तब साधकके
प्रति शयन करना उचित है ॥४३॥
मूलम्-सद्यो भुक्तेऽपि क्षुधिते नाभ्यासः
क्रियते बुधैः ॥अभ्यासकाले प्रथमं कुर्या-
क्षीराज्यभोजनम् ॥४४॥
टीका-भोजन करके तुरंत उसी समय अथवा जब
क्षुधित होय तब साधक कदापि अभ्यास न करे और
अभ्यास कालमें प्रथम दूध घृत भोजन करे॥१४॥
तृतीयपटलः। (६७) मूलम्-ततोऽभ्यासे स्थिरीभूते नताड़िय- मग्रहः ॥४५॥ अभ्यासिना विभोक्तव्यं स्तोकं स्तोकमनेकधा॥ पूर्वोक्तकाले कुर्यात्तु कुम्भकान्प्रतिवासरे ॥ ४६॥ टीका-जब अभ्यास स्थिर होजाय तव पूर्वोक्त निय- मका कुछ प्रयोजन नहीं है ॥ ४५ ॥ और अभ्यासीको उचित है कि, थोडा थोडा कईबार भोजनकरे और जिस- प्रकार पहिले कहा है उसीतरह नित्य कुम्भक करे।।४६॥ मूलम्-ततो यथेष्टा शक्तिः स्याद्योगिनोवा- युधारणे ॥ यथेष्टं धारणाद्वायोः कुम्भकः सिद्धयति ध्रुवम् ॥ केवले कुम्भके सि- ढे किं न स्यादिह योगिनः॥४७॥ टीका-योगीको वायु धारण करनेकी शक्ति इच्छा- के अनुसार होजायगी. जब इच्छानुसार धारणशक्ति होजायगी तब कुंभक निश्चय सिद्ध होगा और केवल कुम्भक सिद्ध होनेसे योगी क्या नहीं करसकता अर्थात सर सिद्ध करसकता है॥१७॥ मूलम्-स्वेदःसंजायते देहे योगिनः प्रथमो- द्यमे ॥४८॥ यदा संजायते स्वेदो मर्दनं मूलम्-द्वितीये (६८) शिवसंहिता भापाटीकासमेता । कारयेत्सुधीः ॥ अन्यथा विग्रहे धातुन- टो भवति योगिनः॥४९॥ टीका-योगीके शरीरमें प्रथम स्वेद अर्थात् पसीना उत्पन्न होता है जब स्वेद उत्पन्न होय तो उसको शरी- रमें मर्दन करे अन्यथा अर्थात् मर्दन न करनेसे योगी- के शरीरका धातु नष्ट होजाता है ॥ १८॥१९॥ हि भवेत्कम्पो दार्दुरी मध्यमे मतः ॥ ततोऽधिकतराभ्यासा- द्गगनेचरसाधकः ॥५०॥ टीका-दूसरे भूमिकामें कंप होताहै तीसरेमें दाई- रावृत्ति होती है अर्थात् आसन उठता है फिर भूमिपर आपजाता है उससे अधिक अभ्यास होनेसे योगी गगनमें स्वेच्छाचारी होजाताहै ॥५०॥ मूलम्-योगी पद्मासनस्थोऽपिभुवमुत्सृज्य वर्तते॥ वायुसिद्धिस्तदा ज्ञेया संसारध्वा- न्तनाशिनी ॥५१॥ टीका-योगी पद्मासनस्थ होके पृथ्वीको त्यागके आकाशमें स्थिर रहे तब जाने कि, संसारके अन्धकार नाश करनेवाली वायु सिद्ध होगई ॥५१॥ मूलम्-तावत्कालं प्रकुर्वीत योगोक्तनियम- " तृतीयपटलः। (६९) ग्रहम् ॥ अल्पनिद्रा पुरीपं च स्तोकं मूत्रं च जायते ॥५२॥ टीका-उस कालतक योग हेतु पूर्वोक्त नियम करना उचित है जबतक वायु न सिद्ध होय और यो- गीको थोड़ी निद्रा और थोड़ा मलमूत्र होता है ।। ५२॥ मूलम्-अरोगित्वमदीनत्वं योगिनस्तत्त्वद- शिनः स्वेदो लाला कृमिश्चैव सर्वथैव न जायते ॥ ५३॥ कफपित्तानिलाश्चैव सा- धकस्य कलेवरे॥ तस्मिन्काले साधक- स्य भोज्येष्वनियमग्रहः ॥ ५४॥ टीका-तत्त्वदर्शी योगीको कायिक वा मानसिक व्यथा उत्पन्न नहीं होती और स्वेद लाला कृमिआदि उत्पन्न नहीं होते और साधकके शरीरमें कफ पित्त वातका दोपभी नहीं होता पूर्वोक्त कालतक साधक भोजन आदिका नियम करे ।। ५३ ॥५४॥ मूलम्-अत्यल्पं बहुधा भुक्त्वा योगी न व्यथते हि सः॥अथाभ्यासवशाद्योगी भू- चरी सिद्धिमाप्नुयात् ॥ यथादर्दुरजन्तूनां गतिःस्यात्पाणिताडनात् ।। ५५ ।। टीका-योगीको बहुत थोड़ा या विशेष भोजन क-
(७०) शिवसंहिता जापाटीकासमेता।
रनेसे कट न होगा और योगीको अभ्याससे भूचरी
सिद्धि होजायगी जैसे दर्दुरजन्तु पाणि ताडन करनेसे
पृथ्वीपर उड्डान करता है उसी प्रकार योगीभी पृथ्वीपर
उड्डान करता है ॥ ५५॥
मूलम्-सन्त्यत्र बहवो विघ्ना दारुणा दुर्नि-
वारणाः ॥ तथापि साधयेद्योगी प्राणैः
कंठगतैरपि ॥५६॥
टीका-इस योगसाधनमें बहुत दारुण विन होते
हैं जिसका निवारण बहुत कठिन है. परन्तु साधकको
उचित है कि, यदि कंठगतभी प्राण होजाय तोभी
साधन न छोड़े ॥५६॥
मूलम्-ततो रहस्युपाविष्टः साधकःसंयते-
न्द्रियः॥प्रणवं प्रजपेद्दीविनानां नाशहे-
तवे ॥५७॥
टीका-साधकको चित है कि, विनोंके नाशके हेतु
इन्द्रियोंके संयममें अर्थात् उनके कार्यको रोकके विधि-
पूर्वक एकान्तमें बैठके दीर्घमात्रासे अर्थात् स्पष्ट अक्ष-
रके उच्चारणसे प्रणवका जप करे ॥१७॥
मूलम्-पूर्वार्जितानि कर्माणि प्राणायामेन
निश्चितम् ॥ नाशयेत्साधको धीमानिह
लोकोद्भवानि च ॥ ५८॥
तृतीयपटलः । (७१) टीका-पूर्जित कर्म और जो इस जन्ममें किया है यह दोनोंके फलको बुद्धिमान साधक प्राणायामसे निश्चय है कि, नाश करदेता है ।।५८॥ मूलम्-पूर्वार्जितानि पापानि पुण्यानि विवि- धानि च ॥ नाशयेत्पोडशप्राणायामेन योगिपुंगवः ॥ ५९॥ टीका-श्रेष्ठयोगी पूर्वार्जित नानाप्रकारका पाप और पुण्य केवल सोलह प्राणायामसे नाश देताहै ॥२९॥ मूलम्-पापतूलचयानाहोप्रलयेत्प्रलयाग्नि- ना॥ ततः पापविनिर्मुक्तः पश्चात्पुण्या- नि नाशयेत् ॥६॥ टीका-साधक पाप राशिको तूलके समान प्राणा- यामरूपी आनसे प्रलय करदेताहै अर्थात् जलादेताहै. इसप्रकारसे मुक्तहोके पश्चात् पुण्यकोभी उसी अग्निमें नाश करदेताहै ।। ६०॥ मूलम्-प्राणायामेन योगीन्द्रो लब्ध्वैश्वर्या- ष्टकानि वै॥पापपुण्योदधि तीवो त्रैलो- क्यचरतामियात् ॥६१॥ टीका-योगी प्राणायामके प्रभावसे आठ ऐश्वर्य
.
(७२) शिवसंहिता भापाटीकासमेता ।
जिसको अष्टसिद्धि कहते हैं अर्थात् अणिमा, महिमा,
गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशिता और वशिता
प्राप्त करता है अब इन आठों सिद्धिके लक्षण कहते हैं
योगीका शरीर इच्छामात्रसे परमाणुवत् होजाय उस-
को अणिमा कहते हैं और योगी इच्छापूर्वक प्रकृति-
को अपने में करके आकाशवत् स्थूल होजाय उसको
महिमा कहते हैं और अति हलके शरीरका पर्वतके
समान भारी होजाना उसको गरिमा कहते हैं और
बहुत भारी पर्वतके समानको रुईके सदृश होजाना
इसको लघिमा कहते हैं और सर्व पदार्थ इच्छामात्रसे
योगीके समीप होजाय उसको प्राप्ति कहते हैं और
दृश्यादृश्य अर्थात् कभी देस पडे कभी न देसपडे
इसको प्राकाम्य कहाँहें और भूत भविष्य पदार्थको
जन्म मरणको रचना करनेमें समर्थ होय उसको ईशि-
ता कहते हैं और भूत भविष्य वर्तमान पदार्थको इच्छा
से अपने भाधीन करलेना इसको वशित्वसिद्धि कहते
है और योगी पाप पुण्यके समुद्रको तरके अपनी इच्छा
पूर्वक त्रैलोक्यमें विचरताहै ॥६॥
मूलम्-ततोऽभ्यासक्रमेणैव घटिकात्रितयं
भवेत् ॥येन स्यात्सकलासिद्धिोगिनः
स्वेप्सिता ध्रुवम् ॥६२॥
तूंतीयपटलः। टीका-पूर्वोक्त क्रमस प्राणायाम जब तीन घडीतक स्थिर होजायगा तर योगीको उसके इच्छाके अनुसार सब सिद्ध होजायगा यह निश्चय है ॥ ६२ ॥ मूलम्-वाक्सिद्धिः कामचारित्वं दूरदृष्टि- स्तथैव च ॥ दूरश्रुतिः सूक्ष्मदृष्टिः परका- यप्रवेशनम् ॥६३॥ विण्मूत्रलेपने स्वर्णम- दृश्यकरण तथा ॥ भवन्त्येतानि सर्वा- णि खेचरत्वं च योगिनाम् ॥६४॥ टीका-वाक्यसिद्धी स्वेच्छाचारी दूरदृष्टी दूर शब्द श्रवण अतिसूक्ष्म दर्शन दूसरेके शरीरमें प्रवेश करने- की शक्ति होय और योगी अन्यधातुमें अपने मल मूत्र लेपनमात्रसे स्वर्ण करे और योगीको अदृश्य होजाने की शक्ति और आकाशमें गमन करनेकी सिद्धि यह सब योगीको कुम्भक सिद्ध होजानेसे स्वयं सिद्ध हो- जायगा इसमें संशय नहीं है ॥ १३॥ ६४ ॥ मूलम्-यदा भवेद्धटावस्था पवनाभ्यासने परा ॥ तदा संसारचक्रेऽस्मिस्तन्नास्ति यन्न साधयेत् ॥६५॥ टीका-जब योगीकी घटावस्था होगी अर्थात् उसमें (७४) शिवसंहिताःभाषाटीकासमेता । योगकी घटना होगी तब यह संसारचक्र योगीको कुछ असाध्य न रहैगा ॥ ६॥ मूलम्-प्राणापाननादविदुजीवात्मपरमात्म नः॥ मिलित्वा घटते यस्मात्तस्माद्वै घट उच्यते॥६६॥ टीका-प्राण अपान नाद विन्दु जीव आत्मा और परमात्मा इनको एकत्र घटना होनेसे इसको घटावस्था कहते हैं॥६६॥ मूलम् याममात्रं यदाधर्तुं समर्थः स्यात्त- दाद्भुतः ॥ प्रत्याहारस्तदैव स्यानांतरा भवति ध्रुवम् ॥६७॥ टीका-एक प्रहर मात्र जब वायु धारण करनेकी सामर्थ्य होगी तब अद्भुत प्रत्याहारकी शक्ति होगी और साधनसे न होगी निश्चय है ॥ १७ ॥ मूलम्-यं यं जानातियोगीन्द्रस्तं तमात्म- ति भावयेत् ॥ यैरिन्द्रियैर्यद्विधानस्तदि- न्द्रियजयो भवेत् ॥६॥ टीका-योगी जो जो पदार्थ जाने सो सो पदार्थमें आत्माकाही भावना करे जो इंद्रियसे जिस पदार्थका बोष होगा उस पदार्थमें वही आत्मभावनासे वह इंद्रिय तृतीयपटलः। जय हो जायगी अर्थात् जैसे नेत्रसे रूपका बोध होताहै तो जब रूपमें आत्मभावना होगी तब उस भावनासे चक्षु इन्द्रिय रूपमें कदापि आसक्त न होगी जब वह आसक्त न भई तब वह इन्द्रिय मापही जय होगई ॥६८॥ मूलम्-याममात्रं यदा पूर्ण भवेदभ्यासयो- गतः एकवारं प्रकुर्वीत तदा योगी च कु- म्भकम्॥६९॥दण्डाष्टकं यदा वायुनिश्च- लो योगिनो भवेत् ॥स्वसामर्थ्यात्तदांगु- ष्टेतिष्ठेद्वातुलवत्सुधीः ॥ ७० ॥ टीका-जब एकवारमें पूर्ण एक प्रहरतक योगीका अभ्याससे कुम्भक स्थिर रहेगा अर्थात् आठ घडीतक योगीका वायु निश्चल रहे तब वह अपने सामर्थ्य से अङ्गु- प्रमात्रके बलसे अचल अबोधवत् खडा रहसता है अर्थात् यह सामर्थ्य भी योगीको होगी और अपने सा- मर्थ्यको गोप्य रखनेके हेतु विक्षितकी चेष्टा योगी दिख लावैगा॥ ६९ ॥ ७० ॥ मूलम्-ततःपरिचयावस्थायोगिनोऽभ्यास- तो भवेत् ॥यदा वायुश्चंद्रसूर्य त्यत्का ति- ष्ठति निश्चलम् ॥ ७१ ॥ वायुः परिचितो वायुः सुषुम्ना व्योम्नि संचरेत् ॥
(७६) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता।
टीका-इस अन्तरमें योगीकी अभ्याससे परिचया-
वस्था होगी जब वायु इडा पिङ्गलाको त्यागके निश्चल
स्थिर रहेगा ॥७१ ॥ तब परिचित होके सुपुम्नाके र.
न्ध्रसे प्राणवायु आकाशको गमन करेगा।
मूलम्-क्रियाशक्तिं गृहीत्वैव चक्रान्भित्त्वा
सुनिश्चितम् ॥७२॥ यदा परिचयावस्था
भवेदभ्यासयोगतः ॥ त्रिकूटं कर्मणां
योगी तदा पश्यति निश्चितम् ॥ ७३ ।।
टीका-कियाशक्तिको ग्रहण करके योगी निश्चय सब
चक्रको वेधेगा ॥७२॥ और जब योग अभ्याससे परिचया
वस्था होगी तब त्रिकूट काँको योगी निश्चय देखेगा
तात्पर्य यह है कि, जब योगीका पूर्वोक्त अभ्यास सिद्ध
होजायगा तब त्रिकूट अर्थात् आध्यात्मिक आधिभौ-
तिक आधिदैविक मानसिक दुःखको आध्यात्मिक कह-
ते हैं और भूत पिशाचादिसे जो कष्ट होता है उसको
आधिभौतिक कहते हैं और देवता आदिसे जो कर्मानु-
सार काट होताहै उसको आधिदेविक कहते हैं यह
त्रिकूटकर्मोंका ज्ञान योगीको होजाता है ॥ ७३ ॥
मूलम्-ततश्चकर्मकूटानि प्रणवेन विनाश-
येत् ॥ स योगी कर्मभोगाय कायव्यूह
समाचरेत् ॥ ७४॥
तृतीयपटलः। (७७)
टीका-इस कर्मकूटको योगी प्रणवद्वारा नाश कर-
देताहै और यदि पूर्वकृत कर्मफल भोगनेकी इच्छा
करे तो अपने इच्छानुसार इसी जन्ममें इसी शरीरसे
भोगलेगा ॥७॥
मूलम्-अस्मिन्कालेमहायोगी पंचधा धा-
रणंचरेत् ॥ येन भूरादिसिद्धिः स्यात्ततो
भूतभयापहा॥७॥आधारे घटिकाः पंच-
लिंगस्थाने तथैव च ॥ तदूर्ध्वं घटिकाः
पञ्च नाभिहन्मध्यके तथा ॥७॥ धूम-
ध्योर्ध्व तथा पंच घटिका धारयेत्सुधीः ॥
तथा भूरादिना नष्टो योगीन्द्रो न भवे
त्खलु॥७७॥
टीका-जिसकालमें महायोगी पञ्चधाधारणा सिद्ध
करलेगा तब यह पञ्चभूत सिद्ध होजायेंगे और इनसे
कोई कष्टका भय नहोगा. अब धारणाका निर्णय करतेहैं
कि, आधारचक्रमें पांचषडी वायू धारणकरे इसी क्रमसे
स्वाधिष्ठान मणिपूर अनाहत विशुद्ध आज्ञाचकमें
अर्थात् गुदा लिङ्ग नाभि हृदय कंठ भृकुटीके मध्यमें
ऊपर कहेहुए प्रमाणसे वायु धारणकरेगा तो योगी पञ्च
भूतसे निश्चय नाश न होगा ।। ७५ ॥७६ ॥७७॥
(७८) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । मूलम्-मेधावी सर्वभूतानां धारणायः सम- भ्यसेत् ॥ शतब्रह्ममृतेनापि मृत्युस्त- स्य न विद्यते ॥७॥ टीका बुद्धिमान योगी अभ्याससे पञ्चभूतकी धार- णा करेगा तो यदि एकशत ब्रह्माभी मृत्युको प्राप्त होंगे तबभी उसकी मृत्यु न होगी॥ ७८॥ मूलम्-ततोऽभ्यासक्रमेणैव निष्पत्तियोगि- नो भवेत् ॥ अनादिकर्मवीजानियेन ती- वाऽमृतं पिबेत् ॥७९॥. टीका-इस अभ्यासक्रमसे योगीको ज्ञान होता है और अनादिकर्म चीजको तरके अर्थात् नाश करके योगी अमृतपान करताहै ॥ ७९ ॥ मूलम्-यदा निष्पत्तिर्भवति समाधेः स्वेन कर्मणा ॥जीवन्मुक्तस्य शांतस्य भवेद्वी- रस्य योगिनः॥ ८० ॥ यदा निष्पत्तिसं- पन्नः समाधिःस्वेच्छया भवेत् ॥ ८१ ॥ गृहीत्वा चेतनांवायुः क्रियाशक्तिं च वेग- वान् ॥ सर्वांश्चक्रान्विजित्वा च ज्ञान- शक्तौ विलीयते ॥ ८२॥ +
तृतीयपटला (७९)
टोका-जब अपने अभ्यासकमसे योगीको समाधी-
का ज्ञान होगा तब जविन्मुक्त शान्त होके योगीको
ज्ञानसम्पन्न स्वेच्छासमाधी होगी और मन वायु क्रिया-
शक्तिसहित सर्व चक्रोंको वेधके ज्ञानशक्तीमें लीन हो-
जायगा ।।८०॥८॥ ८२॥
मूलम्-इदानीं क्लेशहान्यर्थ वक्तव्यं वायु-
साधनम् ॥ येन संसारचक्रस्मिन्रोगहा-
निर्भवेद्भुवम् ॥ ८३ ।।
टीका-हे देवि ! अब केशहानीके अर्थ वायुसाधन
कहते हैं जिससे इस संसारचक्रमें निश्चय रोगादिक
नाश होजाय और साधकको कष्ट न हो ॥ ८३ ॥
मूलम्-रसना तालुमूले यः स्थापयित्वा
विचक्षणः॥पिवेत्प्राणानिलं तस्य रोगाणां
संक्षयो भवेत् ॥ ८४॥
टीका-जिह्वाको तालुके मूलमें स्थितकरके बुद्धि-
मान साधक यदि प्राणवायुको पान करे तो उसके सर्व
रोगोंका नाश होजायगा॥८॥
मूलम्-काकचंच्या पिवेद्वायुं शीतलं यो वि-
चक्षणः ॥ प्राणापानविधानज्ञः स भवे-
न्मुक्तिभाजनः ॥ ८॥
(८०) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता। टीका--जो बुद्धिमान साधक प्राण अपानके विधा- नका ज्ञाता काकचञ्चू अर्थात् अधरको काकके चोंचके समान लम्बा करके शीतल वायु पान करता है सो योगी मुक्तिभाजन है अर्थात् मुक्तिपात्र है ।। ८५ ॥ मूलम्-सरसं यः पिवेद्वायुं प्रत्यहं विधिना सुधीः ॥नश्यंति योगिनस्तस्य श्रमदाह- जरामयाः॥८६॥ टीका-जो साधक नित्य विधानपूर्वक रससहित वायुपान करता है उसके सर्व रोग और श्रम दाह जरा अर्थात् वृद्धावस्थादि नाश होजाते हैं अर्थात् यह सब उसके समीप नहीं आते ॥८६॥ मूलम्-रसनामूर्ध्वगांकृत्वा यश्चन्द्रे सलिलं पिवेत् ॥ मासमात्रेण योगीन्द्रो मृत्युंज- यति निश्चितम् ।। ८७॥ टीका-जो योगी जिह्वाको ऊपर करके चंद्रमासे विगलित सुधारसको पान करताहै सो योगी एक मासमें निश्चय मृत्युको जीत लेता है इस जगह जिह्वा उपर करनेसे तात्पर्य खेचरी मुद्रासे है सो खेचरीमुद्रा गुरु मुखसे जानना उचित है ॥ ८७॥ मूलम्-राजदंतविलं गाढं संपीड्य विधिना + तृतीयपटलः। (८१) पिबेत् ॥ध्यात्वा कुण्डलिनी देवीं पण्मा- सेन कविर्भवेत् ॥ ८८॥ टीका-जो साधक राजदन्तको नीचेके दांतसे द- बायके उसके रन्ध्रद्वारा विधिसे वायुपान करे और उस कालमें कुण्डलिनी देवीका ध्यान करेगा तो निश्चय छ: मासमें कवि होगा।। ८८॥ मूलम्-काकचंच्या पिवेद्रायु सन्ध्ययोरुभ- योरपि ॥ कुण्डलिन्या मुखे ध्यात्वा क्षयरोगस्य शान्तये ॥ ८९॥ टीका-पूर्वोक्त काकचञ्चूसे विधिसे दोनों सन्ध्यामें जो कुण्डलनीकी मुखका ध्यान करके वायुपान करे- गा उसका क्षयरोग नाश होजायगा ॥ ८९॥ मूलम्-अहर्निशं पिवेद्योगीकाकचंच्या वि- चक्षणः ॥ पिवेत्प्राणानिलं तस्य रोगाणां संक्षयो भवेत् ॥ दूरश्रुतिर्दूरदृष्टिस्तथा स्यादर्शनं खलु ॥९॥ टीका-जो योगी बुद्धिमान रात्रि दिवस काकच- अचूसे प्राणवायु पान करते हैं उनके रोगोंका नाश हो- जाताहै और दूरका शब्द श्रवण होताहै और दूरकी - स्तु देख पडती है तथा निश्चय सूक्ष्म दर्शन होताहै।।९०॥ है (८२) शिवसंहिता नापाटीकासमेता । मूलम्-दन्तैर्दन्तान्समापीडय पिवेदायु शनैः शनैः॥ ऊर्ध्वजिह्वः सुमेधावी मृत्यु जयति सोचिरात् ॥९१ ॥ टीका-जो बुद्धिमान दांतसे दांतको पीडित करके धीरे धीरे वायुपान करेगा और जिह्वा उपर करके अ- मृतपान करेगा सो शीघ्र मृत्युको जीतलेगा॥९॥ मूलम्-पण्मासमात्रमभ्यासं यः करोति दि- नेदिने ॥ सर्वपापविनिर्मुक्तो रोगान्नाश- यते हि सः॥ ९२॥ संवत्सरकृताभ्या- सान्मृत्युं जयति निश्चितम्॥ तस्मादति- प्रयत्नेन साधयेद्योगसाधकः ॥९३॥ वर्ष- त्रयकृताऽभ्यासाभैरवो भवति ध्रुवम् ।। अणिमादिगुणाल्लब्ध्वा जितभूतगणः स्वयम् ॥१४॥ टीका-जो पहिले कहेहुए अभ्यासको नित्य छः मास करे तो सब रोगोंका नाश होजायगा और सब पापसे मुक्त होजाय और उसी अभ्यासको एकवर्ष करे तो मृत्युको निश्चय जीतले इस हेतुसे साधक इस क्रि- याका यत्न करके अवश्य साधन करे और यदि इसका अभ्यास तीनवष को तो निश्चय भैख होजाय और तृतीयपटलः। (८३) अष्टसिद्धिका लाभ होय और सर्व भूतगण आपही वश में होजाय ।। ९२॥ ९३ ॥ ९४ ॥ मूलम्-रसनामूर्ध्वगां कृत्वा क्षणार्ध यदि तिष्ठति ॥क्षणेन मुच्यते योगी व्याधिमृ- त्युजरादिभिः ॥ ९५॥ टीका-योगीकी जिह्वा यदि क्षणमात्र ऊपर स्थिर होजाय तो उसी क्षणसे सर्वव्याधि और वृद्धावस्था और मृत्युका नाश होजाय. तात्पर्य यह है कि, खेचरीमुद्रासे किञ्चित्मात्र भी अमृतपान करलेगा तो उसकी मृत्यु न होगी॥९५॥ मूलम्-रसनां प्राणसंयुक्ता पीड्यमानां वि- चिंतयेत् ॥ न तस्य जायते मृत्युः सत्यं सत्यं मयोदितम् ॥ ९६॥ टीका-जिह्याको प्राणसहित पीडित करके जो पुरुष ब्रह्मरन्ध्रमें ध्यानसंयुक्त स्थिर करेगा. हेदेवी । हम वारं- वार कहते हैं कि, निश्चय उसकी मृत्यु न होगी। ९६॥ मूलम्-एवमभ्यासयोगेन कामदेवो द्विती- यकः॥न क्षुधा न तृषा निद्रा नैवमूच्छी प्रजायते ॥९७॥ टीका-इस योगअभ्याससे जो पहिले कहा है वह (८४) शिवसंहिता भापाटीकासमता । पुरुप दूसरा कामदेव होजायगा अर्थात् कामदेवके समान शोभितहोगा और उसको क्षुधा तृपा निद्रा मूर्छा कभी न उत्पन्न होगी। ९७॥ मूलम्-अनेनैव विधानेन योगीन्द्रोऽवनिम- ण्डले ॥ भवेत्स्वच्छन्दचारी च सर्वाप- त्परिवर्जितः ॥९८॥ न तस्य पुनरावृत्ति- र्मोदते ससुरैरपि ॥ पुण्यपापैर्न लिप्येत एतदाचरणेन सः ॥ ९९॥ टीका-इस विधानसे योगी संसारमें सर्व दुःखसे रहित होके स्वेच्छाचारी होजायगा और इस आचर- णसे योगी पुण्यपापमें लिप्त नहीं होगा न फिर संसा- रमें उसका जन्म होगा और देवतोंके साथ आनन्दपूर्वक विचरेगा ॥९८॥९९॥ मूलम्-चतुरशीत्यासनानि सन्ति नानावि- धानि च ॥ १०० ॥ तेभ्यश्चतुष्कमादाय मयोक्तानि ब्रवीम्यहम् ॥ सिद्धासनं ततः पद्मासनश्चोग्रं च स्वस्तिकम् ॥ १०१ ॥ टीका बहुत प्रकारके चौयाशी आसनहैं उनमें उत्तम जो चार आसन हैं उनको हम कहतेहैं, सिद्धासन, पद्मासन, उपासन,स्वस्तिकासन.तात्पर्य यह है कि, और . - तृतीयपटलः। (८५) आसन करनेसे नाडी शुद्ध होतीहै परन्तु यह चार आ- सनसे वायु धारण करके बैठनेमें कष्ट नहीं होता और प्रधान नाडी शीघ्र वश होजाती है॥१०॥१०॥ मूलम्-योनि संपीड्य यत्नेन पादमूलेन सा- धकः ॥ मेट्रोपरि पादमूलं विन्यसेद्योग- वित्सदा ॥ १०२॥ ऊर्ध्व निरीक्ष्य भ्रूम- ध्यं निश्चलः संयतेन्द्रियः ॥ विशेषोऽवक कायश्च रहस्युद्वेगवर्जितः ॥ एतत्सिद्धा- सनं ज्ञेयं सिद्धानांसिद्धिदायकम् ॥१०३॥ टीका-योगवेत्ता साधक पादमूल अर्थात् एडीसे योनिस्थानको पीडित करे और दूसरे पादके एंडीको मेद्र अर्थात् लिंगके मूलस्थानपर रखे और ऊपर भृके मध्यमें निश्चल दृष्टि रक्खे जितेन्द्रियपुरुप विशेष सीधा शरीर करके विधानपूर्वक वेगवर्जित सावधान होके बैठे इसको सिद्धासन कहते हैं यह आसन सिद्धों- को सिद्धि देनेवालाहै ॥ १०२॥ १०३ ।। मूलम्-येनाभ्यासवशाच्छीघ्रयोगनिष्पत्ति माप्नुयात् । सिद्धासनं सदा सेव्यं पवना- भ्यासिना परम् ॥ १०४॥ टीका-इस अभ्याससे जो पहिले कहाहै शीघ्र योग-
(८६) शिवसंहिता पापाटीकासमता।
का ज्ञान होताहै इस हेतुसे यह सिद्धासन पवनाभ्या-
सीको सदा सेवनेके योग्यहे ॥ १०४॥
मूलम्-येन संसारमुत्सृज्य लभते परमां
गतिम् ॥१०५॥ नातः परतरं गुह्यमासनं
विद्यते भुवि ॥ येनानुध्यानमात्रेण योगी
पापाद्विमुच्यते ।। १०६॥
दीका-इस सिद्धासनके प्रभावसे साधक संसारको
छोडके परमगतिको पाताहै और इससे उत्तम वा गोप्य
संसारमें दूसरा आसन नहीं है जिसके ध्यानमानसे यो-
गी सर्व पापसे मुक्त होजाताहै ।। १०५॥१०६॥
मूलम्-उत्तानौ चरणौ कृत्वा ऊरुसंस्थौ
प्रयत्नतः ॥ ऊरुमध्ये तथोत्तानौ पाणी
कृत्वा तु तादृशौ ॥ १०७॥ नासाग्रे वि-
न्यसेदृष्टिं दन्तमूलश्च जिह्वया ॥ उत्तोल्य
चिबुकं वक्ष उत्थाप्य पवनं शनैः ॥१०८॥
यथाशक्त्या समाकृष्य पूरयेदुदरं शनैः।।
यथा शक्त्यैव पश्चात्तु रेचयेदविरोधतः
॥१०९ ॥ इदं पद्मासनं प्रोक्तं सर्वव्याधि-
विनाशनम् ॥ दुर्लभं येन केनापि धीमता
लभ्यते परम् ॥ ११०॥
तृतीयपटलः । (८७) टीका-दोनों चरणोंको उत्तान करके यत्नसे उरू अर्थात् जंघापर रक्खे उसीप्रकार दोनों हाथको सीधा करके उरूके मध्य में रक्खे और नासिकाके अग्रभागमें दृष्टि और दांतके मूलमें जिह्वा स्थितकरे और वक्ष अर्था- त हृदयस्थानपर चिबुक अर्थात् ठोडी स्थापन करे और अपानवायुको उठाके प्राणको शनैःशनैः यथाशक्ति पूरक करके धारणाकरे पश्चात् धीरे धीरे रेचक अर्थात् वायुको त्यागदे इसको पद्मासन कहतेहैं यह सर्व व्याधिका ना- शक है यह आसन बहुत दुर्लभहै परंतु कोई बुद्धिमान साधकको प्राप्त होताहै ॥१०७॥१०८॥१०९॥११०॥ मूलम्-अनुष्ठाने कृते प्राणः समश्चलति त- रक्षणात् ॥ भवेदभ्यासने सम्यक्साध- कस्य न संशयः॥ १११ ॥ टीका-पूर्वोक्त अनुष्ठान करनेसे उसी समय प्राण सम होके सुपुम्णामें प्रवेश करेगा अभ्याससे साधक- का वायु सम होजायगा इसमें संशय नहीं ॥ १११॥ मूलम्-पद्मासने स्थितो योगी प्राणापान विधानतः ॥ पूरयेत्स विमुक्तः स्यात्सत्यं सत्यं वदाम्यहम् ॥ ११२॥ टीका-ईश्वर श्रीपार्वतीजी कहते हैं कि पद्मासन-
.
(८८) शिवसंहिता भापाटीकासमेता ।
स्थित योगी प्राण अपानके विधानसे वायु पूरण करेगा
सो संसारबन्धसे मुक्तहोनायगा इसमें संशय नहीं है
हम सत्य कहते हैं ।। ११२॥
मूलम् -प्रसार्य चरणद्वन्द्वं परस्परमसंयुत।
स्वपाणिभ्यां दृढं धृत्वा जानपरि शिरो
न्यसेत् ॥ ११३ ॥ आसनोग्रमिदं प्रोक्तं
भवेदनिलदीपनम् ॥ देहावसानहरणं प-
श्चिमोत्तानसंज्ञकम् ॥११४॥ यएतदासनं
श्रेष्ठं प्रत्यहं साधयेत्सुधीः ॥ वायुः पश्चि-
ममार्गेण तस्य सञ्चरति ध्रुवम् ॥ ११५॥
टीका-दोनों चरणों को संग परस्पर लम्बाकरके
दोनो हाथोंसे बलसे धरे और जानुपर शिरको स्थिनकरे
उसको उग्रासन कहते हैं, और पश्चिमतान भी संज्ञा है
इससे वायुदीपन होताहै और मृत्युका नाशकरता है
यह सब आसनोंमें श्रेष्ठ है और बुद्धिमान इसको नित्य
साधन करे तो उसका वायु पश्चिम मार्गसे अवश्य
सञ्चार करेगा ॥ ११३॥११४॥ ११५॥
मूलम्-एतदभ्यासशीलानां सर्वसिद्धिःप्र-
जायते ॥ तस्माद्योगी प्रयत्नेन साथ-
त्सिद्धमात्मनः ॥ ११६॥
(८५) तृतीयपटलः। टीका-ऐसे पूर्वोक्त अभ्यासमें जो लोग तत्पर हैं उन- को सर्व सिद्धि उत्पन्न होती है. इस हेतुसे यत्न करके योगी आत्माके सिद्धहोनेकी साधना करे ॥ ११६॥ मूलम्-गोपनीयं प्रयत्नेन न देयं यस्यकस्य चित् ॥ येन शीघ्र मरुत्सिद्धिर्भवेदुःखौ- घनाशिनी ॥११७॥ टीका-यह आसन जो पहिले कहा है यलसे गोप- नीयहै सबको देना उचित नहीं है परंतु अधिकारीको देना योग्यहै इससे बहुत शीम वायु सिद्ध होनाताहै और यह सिद्धि दुःखके समूहको नाश करने- वाली है।। ११७॥ मूलम्-जानोरन्तरे सम्यग्धृत्वा पादतले उभे ।। समकायः सुखासीनः स्वस्तिकं तत्प्रचक्षते ॥ ११८॥ अनेन विधिना यो- गी मारुतं साधयेत्सुधीः ॥ देहे न क्रमते व्याधिस्तस्य वायुश्च सिध्यति ॥ ११९ ॥ सुखासनमिदं प्रोक्तं सर्वदुःखप्रणाशनम् ॥ स्वस्तिकं योगिभिर्गोप्यं स्वस्तीकरण- मुत्तमम् ॥ १२०॥ टीका-जानु और उसके मध्यमें बराबर पादको (९०) शिवसंहिता नापाटीकासमेता। उपर नीचे धरे और समकाय अर्थात् बराबर शरीर करके सुखपूर्वक बैठे उसको स्वस्तिकासन कहतेहैं. इस विधानसे बुद्धिमान् योगी वायुका साधनकरे तो उसके शरीरमें व्याधी प्रवेश नहीं करती और उसको वायु सिद्धहोजातीहै इसको सुखासन कहतेहैं यह सर्वदुःखका नाशक है यह स्वस्तिकासन योगी लोगोंको गोप्य रख- ना उचितहै इसकारणसे की उत्तम कल्याणका का- रक है ।। ११८॥ ११९॥ १२०॥ इति श्रीशिवसंहितायां हरगौरीसंवादे योगाभ्यासतत्त्व- कथनं नाम तृतीयः पटलः समाप्तः॥३॥ अथ चतुर्थपटलः। मूलम्-आदौ पूरकयोगेन स्वाधारे पूरये- न्मनः॥ गुदमेदान्तरे योनिस्तामाकुंच्य प्रवर्तते ॥ १॥ टीका-पहिले पूरक योगविधानसे आधारपद्ममें वायुको मन सहित पूरक करके स्थित करे और गुदामे- ढके मध्यमें जो योनिस्थान है उसको यत्नसे आकुञ्चन करने में प्रवृत्तहोय ॥१॥ मूलम्-ब्रह्मयोनिगतंध्यात्वाकामंकन्दुक- सन्निभम्।सूर्यकोटिप्रतीकाशचन्द्रकोटि- 'चतुर्यपटलः। (९१) सुशीतलम् ॥२॥तस्यो+तु शिखामूक्ष्मा चिद्रूपा परमाकला॥तया सहितमात्मा- नमेकीभूतं विचिन्तयेत् ॥३॥ टीका-ब्रह्मयोनिके मध्यमें कामपुष्प अर्थात् काम- वाणके समान कोटिसूर्यके सदृश प्रकाश और कोटि चन्द्रमाके समान शीतल कामदेवका ध्यान करे और उसके ऊर्ध्व भागमें सूक्ष्म ज्योति शिखा चैतन्यस्वरू- पा परमाशक्तिसहित एक परमात्माका चिन्तन करै ।।२॥३॥ मूलम्-गच्छतिब्रह्ममार्गेण लिंगत्रयक्रमेण वै।। सूर्यकोटिप्रतीकाशं चन्द्रकोटिसुशी- तलम्॥४॥अमृतं तरि स्वर्गस्थं परमान- न्दलक्षणम्॥श्वेतरक्तंतेजसाढयं सुधाधा- राप्रवर्षिणम् ॥५॥ पीत्वा कुलामृतं दि- व्यं पुनरेव विशेत्कुलम् ॥ टीका-उसी ब्रह्मयोनिसे जीव सुषुम्णा रघद्वारा कमसे तीन लिङ्ग अर्थात् स्थूल सूक्ष्म कारणस्वरूपसे प्रस्थान करताहै और स्वर्गस्थ अमृत परम आनन्द- का लक्षण श्वेत रक्त वर्ण कोटि सूर्यके सदृश तेज प्रकाश और कोटि चन्द्रमाके समान शीतल (९२) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता। वर्षी दिव्यकुलामृतको पान करके फिर योनिमंडल- में स्थित होजाताहै ॥४॥५॥ मूलम्-पुनरेव कुलं गच्छेन्मात्रायोगेन ना- न्यथा ॥ सा चप्राणसमाख्यातायस्मि- स्तन्त्रेमयोदिता ॥६॥ टीका-फिर ब्रह्मयोनिसे प्राणायामयोग करके प्राण कुलमंडलमें जाताहै इस तंत्रमें जो हमने कहाहै हे देवी! उस ब्रह्मयोनिको प्राणके समान कहते हैं ॥६॥ मूलम्-पुनःप्रलीयते तस्यां कालाग्न्यादि- शिवात्मकम् ॥ ७॥योनिमुद्रा पराह्येषा बन्धस्तस्याः प्रकीर्तितः ॥ तस्यास्तु बन्धमात्रेण तन्नास्ति यन्न साधयेत् ॥ ८॥ टीका-फिर तीसरे बार काल अग्नि आदि शिवा- त्मक जीव प्रस्थानपूर्वक चंद्रमण्डलमें दिव्य अमृत- पान करके फिर ब्रह्मयोनिमें लय होजाता है हे देवी! इस बन्धको योनिमुद्रा कहते हैं केवल वन्धमावसे संसारमें असाध्य कोई वस्तु नहीं है अर्थात् सब सिद्ध होसक्ताहै ॥७॥८॥ मूलम्-छिन्नरूपास्तु ये मन्त्राः कीलिताः स्तंभिताश्चये॥ दग्धा मन्त्राः शिरोहीना .. चतुर्थपटलः। मलिनास्तु तिरस्कृताः॥९॥ मन्दाबा- लास्तथा वृद्धाः प्रौढा यौवनगर्विताः ॥में- दिनो भ्रमसंयुक्ताः सप्ताहं मूच्छिताचं ये॥१०॥ अरिपक्षे स्थिता ये च निर्वी- याः सत्ववर्जिताः। तथा सत्त्वेन हीनाश्च खण्डिताः शतधाकृताः ॥ ११ ॥ विधानेन च संयुक्ताः प्रभवन्त्यचिरेण तु ॥ सिद्धिमोक्षप्रदाः सर्वे गुरुणा वि- नियोजिताः ॥ १२॥ यद्यदुच्चरते योगी मंत्ररूपं शुभाशुभम्॥तत्सिद्धिं समवानो- ति योनिमुद्रानिवन्धनात् ॥ १३॥ दीक्ष- यित्वा विधानेन अभिषिच्य सहस्रधा ॥ ततो मंत्राधिकारार्थमेपा मुद्रा प्रकी- तिता ।। १४ ॥ टीका-जो मन्त्र छिन्नरूप हैं और कोलित हैं स्तम्भि- त हैं और जो मन्त्र दग्ध हैं शिरहीन हैं मलीन हैं और जिनका अनादर है और मन्द हैं बाल हैं वृद्ध, प्रौढहैं और जो यौवनगर्वित हैं और भेदितहैं भ्रमसंयुक्त हैं सप्ताइसे मूञ्छित हैं और जो शत्रुके पक्षमें हैं निवार्य हैं
(१४) शिवसंहिता चापाटीकासमेता।
सत्वरहित हैं खण्डितहैं सौ खण्ड होगएहैं इस विधिसे
युक्त होके साधन करनेसे शीघ्र प्रकर्ष करके सिद्ध
होजायगा गुरुशिक्षासे सब सिद्ध और मोक्षपद
होजाताहै योगीसे जो मन्त्र शुभ वा अशुभरूप उच्चा-
रण होताहै सो सब योनिमुद्राके बन्धनमात्रसे सिद्ध
होजाताहै विधानपूर्वक मंत्रके अधिकारार्थ गुरुको उचि-
तहै कि इस योनिमुद्राके दीक्षाका अभिषेक सहस्रधा
शिष्यको करे ॥९॥१०॥9॥ १२॥ १३॥ १४॥
मूलम् ब्रह्महत्यासहस्राणि त्रैलोक्यमपि
घातयेत्॥नासौ लिप्यति पापेन योनि-
मुद्रानिवन्धनात् ॥ १५॥
टीका-यदि एक सहस्र ब्रह्महत्याकरके और त्रैलो-
क्यकाभी घात करदे अर्थात् प्राणिमात्रका नाश करदे
तो भी वह इस योनिमुद्राके बन्धमात्रसे पापमें लिप्त न
होगा अर्थात् उसको पाप नलगेगा ॥१५॥
मूलम्-गुरुहा च सुरापी चस्तेयीच गुरुत-
ल्पगः॥ एतैः पापैर्न बध्येत योनिमुद्रा-
निवन्धनात् ॥ १६॥
टीका-गुरुघातक मद्यपाई चोर गुरुकी शय्यामें
रमण करनेवाला ऐसे अनेक पातकोभी, माधक यो-
निमुद्राके वन्धप्रभावले वन्वायमान नहोगा ॥ १६॥
चतुर्थपटलः। (९५)
मूलम्-तस्मादभ्यसनं नित्यं कर्तव्यं मोक्ष-
कांक्षिभिः॥ अभ्यासाज्जायते सिद्धिर-
भ्यासान्मोक्षमाप्नुयात् ।। १७ ॥
टीका-इस हेतुसे मोक्षकांक्षीको उचित है कि, नित्य
अभ्यास करे अभ्याससे सिद्धि होती है और अभ्यासही-
से मुक्ति प्राप्त होती है ॥ १७॥
मूलम्-संविदंलभतेऽभ्यासाद्योगोभ्यासात्प्र-
वर्तते ॥ मुद्राणां सिद्विरभ्यासादभ्यासा-
द्वायुसाधनम् ॥१८॥ कालवञ्चनमभ्या-
सात्तथा मृत्युञ्जयो भवेत् ॥ वाक्सिद्धिः
कामचारित्वं भवेदभ्यासयोगतः ॥१९॥
टीका-अभ्याससे ज्ञान प्राप्त होताहै और अभ्याससे
योगमें प्रवृत्ति होती है और अभ्याससे मुद्रा सिद्ध
होती हैं और अभ्याससे वायुका साधन होताहै और
अभ्याससे मनुष्य कालते बचताहै और अभ्याससे
जय होजाताहै और अभ्यासयोगसे वाक्यसिद्धि
और मनुष्य इच्छाचारी होजाताहै. तात्पर्य यह है कि,
सब वस्तुके सिद्धिका कारण अभ्यास है. इस हेतुसे आ-
लस्यको छोडके जिस वस्तुमें मनुष्य अभ्यासकरेगा
वह अवश्य सिद्ध होजायगा ॥१८॥१९॥
(१६) शिवसंहिता भापाटीकासमेता। . मूलम्--योनिमुद्रा परं गोप्या न देया यस्य कस्यचित् ॥ सर्वथा नैव दातव्या प्राणैः कण्ठगतैरपि ॥ २० ॥ टीका-यह योनिमुद्रा परमगोपनीय है अनधिका- रीको कदापि न दे वह सर्वथा देनेके योग्य नहीं है यदि कण्ठगत प्राण होजाय तो भी देना उचित नहीं है ॥२०॥ मूलम्-अधुना कथयिष्यामि योगसिद्धि- करं परम् ॥ गोपनीयं सुसिद्धानां योगं परमदुर्लभम् ॥ २१ ॥ टीका-हे देवी अब जो योग कहेंगे वह परमप्तिद्धिका देनेवाला है सिद्ध लोगोंको इस परम दुर्लभ योगको गोप्य रखना उचित ॥२१॥ मूलम्-सुप्ता गुरुप्रसादेन यदा जागर्ति कु- ण्डली ॥ तदा सर्वाणि पद्मानि भिद्यन्ते ग्रन्थयोपि च ॥ २२॥ टीका-गुरूके प्रसादसे निद्रिता कुण्डलिनी देवी जब जागृत होती है तब सर्व पद्म और सर्व ग्रंथी वेधित हो जाती हैं अर्थात् सुपुम्णा रन्धद्वारा प्राणवायु ब्रह्मरन्ध्र पर्यंत संचार करने लगजाताहै ॥२२॥ मूलम्-तस्मात्सर्वप्रयत्नेन प्रबोधयितुमीश्व- .
चतुर्थपटलः । रीम् ॥ ब्रह्मरन्ध्रमुखे सुप्तां मुद्राभ्यासं स माचरेत् ॥ २३ ॥ टीका-इसकारणसे यत्नपूर्वक ब्रह्मरन्ध्रके मुखमें जो ईश्वरी कुण्डलिनी देवी शयन करती हैं उनको उठानेके अर्थ मुद्राका अभ्यास उचित है ।। २३ ।। मूलम्-महामुद्रा महावन्धो महावेधश्च खे- चरी॥ जालंधरो मूलबंधो विपरीतकृति-. स्तथा ॥२४॥ उड्डानं चैव वज्रोली दशमे शक्तिचालनम् ॥ इदं हि मुद्रादशकं मुद्रा णामुत्तमोत्तमम् ॥ २५॥ टीका-अब उत्तम मुद्रावन्ध वेध कहते हैं महामुद्रा, महाबन्ध, महावेध, खेचरीमुद्रा, जालन्धरबन्ध, मूल- बन्ध, विपरीतकरणीमुद्रा, उड्डानबन्ध, वज्रोलीमुद्रा और दशवी शक्तिचालनमुद्रा, यह दशों मुद्रा सबमें अतिउत्तम हैं ।। २४ ॥२५॥ अथ महामुद्राकथनम् । मूलम्-महामुद्रा प्रवक्ष्यामितन्त्रेऽस्मिन्म- मवल्लभे॥ यां प्राप्य सिद्धाः सिद्धिं च कपिलायाः पुरा गताः ॥ २६ ॥ - (९८); शिवसंहिता नापारीकासमेता। टीका हे प्रिये पार्वती! इस तन्त्रमें महामुद्रा जो हम कहतेहैं इसको लाभ करके पूर्व कपिलआदिक सिद्ध- वरको सिद्धि प्राप्त भई ॥ २६॥ मूलम्-अपसव्येन संपीड्य पादमूलेन सा- दरम् ॥ गुरूपदेशतो योनि गुदमेद्रान्तरा- लगाम् ॥२७॥सव्यं प्रसारितं पादं धृत्वा पाणियुगेन वै ॥ नवद्वाराणि संयम्य चि- बुकं हृदयोपरि ॥ २८ ॥ चित्तं चित्तपथे दत्त्वा प्रभवेद्वायुसाधनम् ॥ महामुद्राभ- वेदेषा सर्वतन्त्रेषु गोपिता॥ २९ ॥वामाणे- नसमभ्यस्य दक्षाङ्गेनाभ्यसेत्पुनः ॥ प्रा- णायामं समं कृत्वा योगी नियतमा- नसः॥३०॥ टीका-चामपादके एडीसे गुदा और मेद्रके मध्यमें जो योनि है उसको आदरसहित गुरुके उपदेशपूर्वक पीडितकरे अर्थात् दवावे और दक्षिणपाद प्रसारके अ- र्थात् लम्बा करके दोनों हाथोंसे धरे और नवद्वारोंकोरोक करके चिबुक अर्थात् ठोडीको हृदयपर स्थित करे और चित्तवृत्तिको चैतन्यमें स्थिर करके वायुका साधन कर- ना उचित है यह महामुद्रा सर्वतन्त्रों के प्रमाणसे गो- चतुर्थपटलः । (९९), प्यहै पहिले वामांगसे अभ्यास करके फिर दक्षिण अं- गसे अभ्यास करे योगी स्थिखुद्धिको उचित है कि, इस प्रकारसे प्राणायामको समकरे ॥२७॥२८॥२९॥३०॥ मूलम्-अनेन विधिना योगी मन्दभाग्यो- पिसिध्यति॥ सर्वासामेव नाडीनां चालनं बिन्दुमारणम् ॥३१॥जीवनन्तु कषायस्य पातकानां विनाशनम् ॥ कुण्डलीतापनं वायोर्ब्रह्मरन्ध्रप्रवेशनम् ॥ ३२ ॥ सर्वरो- गोपशमनं जठराग्निविवर्धनम् ॥ वपुषा कान्तिममलांजरामृत्युविनाशनम्॥३३॥ वांछितार्थफलं सौख्यमिन्द्रियाणाञ्चमा- रणम्।।एतदुक्तानि सर्वाणि योगारूढस्य योगिनः ॥ ३४ ॥ भवेदभ्यासतोऽवश्यं नात्र कार्या विचारणा॥ टीका-इस विधानसे मन्दभाग्य योगीभी सिद्ध होजा- यगा और इस महामुद्राके प्रभावते सर्व नाडीका च- लन सिद्ध होजायगा और बिन्दु स्थिर होगा और जी- वनको आकर्पित रक्खेगा और सर्व पातकका नाश हो- जायगा और कुण्डलिनीको हठात् उठाय वायुको ब्रह्मर- न्ध्रमें प्रवेश करेगा और जठराग्नि प्रज्वलित होके सर्वरो- .
(१००) शिवसंहिता भापाटीकासमेता। गोंका नाश करदेगा और शरीरमें सुन्दर कान्ति होगी और वृद्धावस्थासहित मृत्युका नाश होजायगा और मुखसहित वाछित फल लाभ होगा और इन्द्रियोंका निग्रह रहेगा यह सब जो कहा है सो योगारूढ यो- गीको अभ्याससे वश होजाताहै इसमें संशय नहीं है निश्चय है ॥३१॥३२॥३३॥ ३४॥ मूलम्-गोपनीया प्रयत्नेन मुद्रेयं सुरपूजि- ते ॥ यांतुप्राप्य भवाम्भोधेः पारं गच्छ- न्ति योगिनः॥ ३५॥ टीका-हेसुरपूजिते देवी । यह मुद्रा यत्न करके गो- पनीय है योगीलोग इसको लाभ करके संसाररूपी स- मुद्रके पार होजाते हैं ॥३५॥ मूलम्-मुद्रा कामदुघा ोपा साधकानों म- योदिता ॥ गुप्ताचारेण कर्त्तव्या न देया यस्य कस्यचित् ॥ ३६॥ टीका-हेदेवी ! यह मुद्रा जो हमने कही है साधकोंको कामधेनुरूप है अर्थात् वाञ्छितफलकी दाता है इसको गुप्त करके अभ्यास करना उचित है और सबको अर्थात् अनधिकारीको देना उचित नहीं है ॥ ३६॥ अथ महाबन्धकथनम् । मूलम्-ततःप्रसारितः पादोविन्यस्यतमुरू- चतुर्थपटलः । (१०१) परि ॥३७॥ गुदयोनि समाकुंच्य कृत्वा चापानमूर्ध्वगम् ॥ योजयित्वा समानेन कृत्वा प्राणमधोमुखम् ॥३८॥ वन्धयेदू- वंगत्यर्थ प्राणापानेन यः सुधीः॥ कथि- तोऽयं महावन्धः सिद्धिमार्गप्रदायकः ॥ ॥ ३९ ॥ नाडीजालाद्रसव्यूहो मूर्धानं याति योगिनः ॥ उभाभ्यां साधयेत्प- यामेकैकं सुप्रयत्नतः॥४०॥ टीका-तदनन्तर पादको प्रसारके अर्थात् फैलाके दक्षिणचरणको वाम उरूपर स्थित करके और गुदा और योनिको आकुञ्चन करके अपानको उर्व करके समानवायुके साथ सम्बन्ध करके औरप्राणवायुको अधोमुख करे यह बन्ध प्राण अपानके उर्द्धगतिके हेतु बुद्धिमान साधकके प्रति कहाहै और यह महावन्ध सिद्धिमार्गका दाता है और योगीलोगोंके नाडियोंका रससमूह इस बन्धसे ऊपरको गमन करताहै यह दोनों मुद्रा और बन्ध एक एकको दोनों अगसे यत्न करके करना उचित है ।। ३७॥३८॥३९॥४०॥ मूलम्-भवेदभ्यासतो वायुः सुपुम्नामध्य सङ्गतः॥अनेन वपुषः पुष्टिईटबन्धोऽसि BHA SN
(१०२) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता ।
पञ्जरे ॥ ४१ ॥ संपूर्णहृदयो योगी भव-
न्त्येतानि योगिनः ।। बन्धनानेन योगी-
न्द्रः साधयेत्सर्वमीप्सितम् ॥ ४२॥
टीका-अभ्याससे प्राणवायु सुषुम्णाके मध्यमें
स्थित होगा और इस महाबंधके प्रभावसे शरीर पुष्ट
रहेगा और आस्थिपंजर और शरीरका सब बन्ध दृढ
अर्थात बलिष्ट होजायगा और योगीका हृदय सन्तोपसे
पूर्ण और आनन्दित रहेगा. यह सब योगीको इस महा-
बन्धक प्रभावसे स्वयं लाभ होजायगा और इसी
बन्धके साधनसे योगी अपनी इच्छाके अनुसार सब
सिद्ध करलेगा ॥४१॥४२॥
अथ महावेधकथनम् ।
मूलम्-अपानप्राणयोरैक्यं कृत्वा त्रिभुवने-
श्वधिमहावेधस्थितो योगी कुक्षिमापूर्य
वायुना॥ स्फिचौ संताडयेहीमान्वेधो-
ऽयं कीर्तितो भया ॥४३॥
टीका-हे त्रिभुवनेश्वरी अपान और प्राणको एक
करके महावेधस्थित योगी उदरको वायुसे पूर्ण करके
बुद्धिमान् दोनों स्फिच अर्थात् पार्थको ताडन करे
इसको हमने वेध कहा है ॥ ४३॥
चतुर्थपटलः। (१०३) मूलम्-वेधनानेन संविध्य वायुनायोगिपुंग- वः॥ ग्रंथिं सुपुम्णामार्गेण ब्रह्मग्रंथि भि- नत्त्यसौ ॥४४॥ टीका बुद्धिमान् योगी इस वेधद्वारा वायुसे सर्व ग्रन्थीको वेधन करके सुषुम्णारन्ध्रद्वारा ब्रह्मग्रंथीको भेदन करताहै ॥४४॥ मूलम्-याकरोतिसदाभ्यासं महावेधं सुगो- पितम् ॥ वायुसिद्धिर्भवेत्तस्य जरामरण नाशिनी ॥४५॥ टीका-जो मनुष्य इस उत्तम महावेधको गोपित करके सर्वदा अभ्यास करेगा उसकी जरामरण नाशि- नी वायुसिद्धि होजायगी ॥४५॥ मूलम्-चक्रमध्ये स्थिता देवाः कम्पन्ति वायुताडनात् ॥ कुण्डल्यपि महामाया कैलासे सा विलीयते ॥ ४६॥ टीका-शरीरस्थ चक्रमें जो देवता हैं वह वायुके ताडनसे कम्पायमान होते हैं और महामाया कुण्डलि- नी देवी कैलास अर्थात् ब्रह्मस्थानमें लय होती है तात्प- र्य यह है कि, चक्रस्थित देवता अर्थात् गणेशजी, ब्रह्मा, विष्णु, महादेवजी, मायाधीश ज्योतिस्वरूप ईश्वर क्रमसे
( १०४) शिवसंहिता मापाटीकासमेता।
आधारस्वाधिष्ठान, मणिपूर, अनाहत, विशुद्ध,आज्ञाच-
में जो स्थित हैं वायुके वेगसे चक्ररन्ध्रको छोडदेते हैं
तब वायुका प्रवेश होताहै इसहेतुसे यह महावेध अवश्य
करना उचित है ॥ ४६॥
मूलम्-महामुद्रामहावन्धी निष्फलौ वेधव-
जितौ॥ तस्माद्योगी प्रयत्नेन करोति
त्रितयं क्रमात् ॥४७॥
टीका-महामुद्रा और महावन्ध विना वेधके निष्फ-
ल हैं अर्थात् वेध न करनेसे मुद्रा और बन्धका कुछ फल
नहोगा इसहेतुसे योगीको उचित है कि, यत्नपूर्वक कम-
से मुद्रा, बन्ध, वेध तीनोंका अभ्यास करे ॥१७॥
मूलम्-एतत्त्रयं प्रयत्नेन चतुर्वारं करोति
यः ॥ पण्मासाभ्यन्तरं मृत्युं जयत्येव
न संशयः॥४८॥
टीका-जो यह मुद्रा वन्ध वेध तीनोंका अभ्यास
यत्न करके रात्रि दिवसमें चारवार करेगा सो छामास-
में निश्चय मृत्युको जीतलेगा इसमें संशय नहीं है ॥१८॥
मूलम्-एतत्रयस्य माहात्म्यं सिद्धो जाना-
तिनेतरः ॥ यज्ज्ञात्वा साधकाः सर्वे
सिद्धिं सम्यग्लभान्ति वै ॥ ४९॥
चतुर्थपटलः । (१०५) टीका-यह तीनोंके माहात्म्यको सिद्धलोक जानते हैं इतरलोग अर्थात् सांसारिक मनुष्य नहीं जानते इसके जानलेनेसे साधकलोगोंको सर्वसिद्धिलाभ होती है ॥४९॥ मूलम्-गोपनीया प्रयत्नेन साधकैः सिद्धि- मीप्सुभिः ॥ अन्यथा च न सिद्धिः स्यान्मुद्राणामेष निश्चयः॥५०॥ टीका-सिद्धिकांक्षी साधकको उचित है कि, यह सब मुद्राको यत्नपूर्वक गोप्य रक्खे इनको प्रकाश करनेसे कदापि सिद्धि नहोगी यह निश्चय है ॥ ५० ॥ अथ खेचरीमुद्राकथनम् । मूलम्-ध्रुवोरन्तर्गतां दृष्टिं विधाय सुदृढां सुधीः॥५१॥ उपविश्यासने वज्रे नानो- पद्रववर्जितः ॥ लम्बिकोल स्थिते गर्ने रसनां विपरीतगाम् ॥ ५२ ॥ संयोजये- त्प्रयत्नेन सुधाकूपे विचक्षणः ॥ मुद्वैपा खेचरी प्रोक्ता भक्तानामनुरोधतः॥५३॥ टीका-घुद्धिमान साधक दोनों भ्रू अर्थात् भृकुटी- के मध्यमें दृढ करके दृष्टिको स्थिर करके और नाना उपद्रवरहित होके वज्रासन अर्थात् सिद्धासनसे स्थित होयके जिह्वाको विपरीत अर्थात् ऊपर सुधाकूप स्वरूप
(१०६) शिवसंहिता भापाटीकासमेता ।
तालूविवरमें यत्नसे बुद्धिमान साधक संयोजित करे
अर्थात् संबन्धकरे हेपार्वती ! भक्तोंके प्रति हमने प्रकाश
करके यह खेचरीमुद्रा कही है ॥५१॥५२॥५३॥
मूलम्-सिद्धीनां जननी ोपा मम प्राणा-
धिकप्रिया ॥ निरन्तरकृताभ्यासात्पी.
यूपं प्रत्यहं-पिवेत् ॥ तेन विग्रहसिद्धिः
स्यान्मृत्युमातङ्गकेसरी॥५४॥
टीका-यह खेचरीमुद्रा सर्वसिद्धिकी माता है और
- हेदेवी ! हमको प्राणसभी अधिक प्रिय है जो निरंतर इ-
सके अभ्यासते नित्य अमृतपान करताहे उस कारणसे
शरीर सिद्ध होजाताहै अर्थात् नाश नहीं होता और
मृत्युरूप हस्तीको यह खेचरीरूपी सिंह हन्ताहै ॥५४॥
मूलम्-अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्था
गतोऽपि वा ॥ खेचरी यस्य शुद्धातु स
शुद्धो नात्र संशयः॥ ५५॥
टीका-अपवित्र होय वा पवित्र होय अथवा किसी
अवस्थामें होय जिसको यह खेचरीमुद्रा सिद्ध है वह
सर्वदा शुद्ध है इसमें संशय नहीं है ॥५५॥
मूलम्-क्षणार्धं कुरुते यस्तु तीत्वा पापम-
शर्णवास ॥ दिग्यमात्ममुत्ता च
सत्कुले स प्रजायते ॥५६॥
चतुर्थपटलः। (१०७) टीका-जो इस खेचरीमुद्राको क्षणार्धभी करेगा वह महापापसागरके पार होके सुखपूर्वक स्वर्गका भोग भोगेगा पश्चात् उत्तमकुलमें उसका जन्म होगा ॥५६॥ मूलम्-सुट्टैषा खेचरी यस्तु स्वस्थचित्तो ह्यतन्द्रितः ॥ शतब्रह्मगतेनापि क्षणार्ध मन्यते हि सः ॥७॥ टीका-जो मनुष्य इस खेचरीमुद्राको स्वस्थचित्त ब्रह्मपरायणहोके करेगा उसको यदि शतब्रह्माभी गत भावको प्राप्तहों क्षणार्थ प्रतीत होगा ॥१७॥ मूलम्-गुरूपदेशतोमुद्रां यो वेत्ति खेचरी- मिमाम् ॥ नानापापरतो धीमान्सयाति परमां गतिम् ॥५८॥ टीका-गुरूपदेशसे जिसको यह खेचरीमुद्रा लाभ होगी वह यदि नानापापरत होगा तो भी बुद्धिमान साधक परमगतिको प्राप्तहोगा अर्थात् मोक्ष होजा- यगा॥१८॥ मूलम्-सा प्राणसदृशी मुद्रा यस्मिन्क- स्मिन्न दीयते ॥ प्रच्छाद्यते प्रयत्नेन मुद्रेयं सुरपूजिते ।। ५९ ।। टीका-हे सुरपूजिते पार्वती ! यह खचरीमुद्रा प्राणके २ (१०८) शिवसंहिता भापाटीकासमेता। बराबर है सामान्य मनुष्यको देना उचित नहीं है इस मुद्राको यत्न करके गोपित रखनेमें कल्याण है ।। ६९ ॥ अथ जालन्धरवन्ध। मूलम्-बड़ागलशिराजालं हृदये चिबुकं न्यसेत्॥बन्धोजालन्धरःप्रोक्तो देवाना- मपि दुर्लभः।।६०॥नाभिस्थवह्निर्जन्तूनां सहस्रकमलच्युतम् ॥पिवेत्पीयूपविस्तार तदर्थ बन्धयेदिमम् ॥६१ ॥ टीका-गुरूपदेशद्वारा गलशिराजालको बांधके चिबुक अर्थात् ठोडीको हृदयमें स्थित करे इसको जा- लन्धरवन्ध कहते हैं यह देवतोंकोभी दुर्लभ है नाभी- स्थित जीव जठरानल सहस्रदल कमलसे जो अमृत स्रवताहै उसको पान करजाताहै इस हेतुसे यह जाल- न्धरबन्ध करना उचित है तात्पर्य यह है कि, नाभिस्थित सूर्य अमृतको पान करजाते हैं इसीकारणसे मृत्यु हो- तीहै इस जालन्धरवन्धके करनेसे चंद्रमण्डलच्युत अमृत सूर्यमण्डलमें नहीं जाता योगी आपही पान करके चिर- जीव रहताहै ॥६॥६॥ मूलम्-बन्धेनानेन पीयूपं स्वयं पिबति बु- द्विमान् ॥ अमरत्वञ्च सम्प्राप्य मोदते भुवनत्रये ॥६२॥ " चतुर्थपटलः । (१०९) टीका-इस जालन्धरवन्धके प्रभावसे बुद्धिमान योगी स्वयं अमृत पान करताहै और अमरत्वको पाय- के तीनोलोकमें आनन्दपूर्वक विचरता है ।। ६२ ।। मूलम्-जालन्धरो बन्धएष सिद्धानां सि- द्विदायकः।। अभ्यासः क्रियते नित्यं यो- गिना सिद्धिमिच्छता ॥६३॥ टीका-यह जालन्धरबन्ध सिद्धोंको सिद्धिदेनेवाला है इस कारणसे सिद्धिकांक्षी योगीको इसका नित्य अ- भ्यास करना उचित है ।। ।। ६३ ।। अथ मूलबन्धः। मूलम्-पादमूलेन संपीड्य गुदमार्गेषु य- न्त्रितम् ॥६४॥बलादपानमाकृष्य क्रमा- दूर्ध्व सुचारयेत्॥ कल्पितोऽयं मूलबन्धो जरामरणनाशनः ॥६५॥ टीका पादमूल अर्थात् एडीसे गुदामार्गको आकु- ञ्चन करके पीडितकरे और बलसे अपानवायुको आक- पण करके ऊर्ध्वको लेजाय अर्थात प्राणके साथ सम्बन्धकरे इसको मूलबन्ध कहतेई यहबन्ध जरा मरणका नाश करनेवालाह ॥६४॥६५॥ मूलम्-अपानप्राणयोरैक्यं प्रकरोत्यधि- (११०) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । कल्पितम् ॥ बन्धनानेन सुतरां योनिमुद्रा प्रसिद्धयति ॥६६॥ टीका-इस कल्पितबन्धसे अपान और प्राणको एक करे और इसी मूलबन्धके प्रभावसे योनिमुद्रा आपही सिद्ध होजायगी ॥६६॥ मूलम्-सिद्धार्या योनिमुद्रायां किं न सिध्य- ति भूतले ॥ वन्धस्यास्य प्रसादेन गगने विजितानिलः ॥ पद्मासने स्थितो योगी भुवमुत्सृज्य वर्तते ॥६७॥ टीका-योनिमुद्राके सिद्ध होनेसे सिद्धलोगोंको इस संसारमें सब सिद्ध होसक्ताहै इस मूलबन्धके प्रसा- दसे वायुको योगी जीतके पद्मासनस्थित होके भूमिके त्याग देगा और आकाशमें गमन करेगा ॥६७ ॥ मूलम्-सुगुप्ते निर्जने देशे बन्धमेनं सम- भ्यसेत् ॥ संसारसागरं तर्तुं यदीच्छेद्यो- गिपुंगवः ॥६८॥ टीका-पवित्र योगी यदि संसारसागरसे पार होने- की इच्छा करे तो निर्जनदेश और गुप्तस्थानमें इस मूलबन्धका अभ्यास करना उचित है ॥ ६८॥ अथ विपरीतकरणी मुद्रा। मूलम्-भूतले स्वशिरोदत्त्वाखे नयेच्चरणद्र ।" चतुर्थपटलः। (१११) यम् ॥ विपरीतकृतिश्चैषा सर्वतन्त्रेषु गो- पिता ॥६९॥ टीका-साधक अपने शिरको भूमिपर घरे और दोनों चरणोंको ऊपर आकाशमें निरालम्ब स्थिर करे यह विपरीतकरणी मुद्रा सर्वतन्त्रोंकरके गोपित है अर्थात् प्रकाश करने योग्य नहीं है ।। ६९॥ मूलम्-एतद्यः कुरुते नित्यमभ्यासं याम- मात्रतः॥ मृत्यु जयति योगीशः प्रलये नापि सीदति ॥ ७॥ टीका-इसप्रकारसे इस मुद्राका अभ्यास नित्य एक प्रहर करे तो योगी निश्चय मृत्युको जीतलेगा और प्रलयमेंभी उसको कुछ कष्ट न होगा ॥७०॥ मूलम्-कुरुतेऽमृतपानं यः सिद्धानां सम- तामियात्॥स सेव्यः सर्वलोकानांवन्ध- मेनं करोति यः॥७१ ॥ टीका-जो पुरुष शरीरस्थअमृतपान करता है उस-' को सिद्धोंकी समता प्राप्त होती है और इस मुद्रावन्ध- को जो करताहै वह सर्वलोकमें पूजनीय है ॥ ७ ॥ मूलम्-नाभेरूर्वमधश्चापि तानं पश्चिम- माचरेत् ॥ उड्डयानबंध एष स्यात्सर्वदुः- (121) शिवसंहिता जापाटीकासमेता। पानः ॥ ७२ ॥ उदरे ,पश्चिमं तानं नामेव तु कारयेत् ॥ उड्डयानाख्यो- ऽत्र बन्धोयं मृत्युमातङ्गकेसरी॥७३॥ टीका-नाभिसे ऊपर और नीचेको आकुञ्चन करे इसको उड्डयानबन्ध कहते हैं यह दुःखके समूहको नाशकरनेवाला है उदरको पीछे आकर्पण करे और नाभिसे उपर भागमें आकुञ्चन करे यह उड्डयानबन्ध है और मृत्युरूपी मातङ्गका नाशकरनेवाला यह वंय- रूपी सिंह है ।। ७२ ।। ७३॥ मूलम्-नित्यं यः कुरुते योगी चतुर्वार दिने दिने॥ तस्यनाभेस्तुशुद्धिःस्यायेन सिद्धो भवेन्मरुत् ।। ७४ ॥ टीका-जो योगी नित्य इस वंधको चारवार अ- भ्यास करेगा उसका नाभिचक्र शुद्ध होके वायु सिद्ध होजायगा ।। ७४॥ मूलम्-पण्मासमभ्यसन्योगी मृत्युंजयति निश्चितम् ॥ तस्योदराग्निज्वलति रसव- द्धिःप्रजायते ॥७५॥ टीका-योगी यदि छः मास इस बंधका अभ्यास करे तो निश्चय मृत्युको जीतलेगा और उसका जठरा- तुचर्थपरलः। (११३) नल विशेष प्रज्वलित होगा और रसकी वृद्धि उत्पन्न होगी॥७॥ मूलम्-अनेन सुतरां सिद्धिर्विग्रहस्य प्रजा- यते । रोगाणां संक्षयश्चापि योगिनो भव- तिध्रुवम् ॥ ७६॥ टीका-इस उड्डयानबंधके प्रभावसे योगीका शरीर आपही सिद्ध हो जायगा अर्थात् अमर होजाया और सर्व रोगोंका निश्चय क्षय होजायगा॥ ७६ ॥ मूलम्-गुरोलब्ध्वा प्रयत्नेन साधयेत्तु विच- क्षणः ॥ निर्जने सुस्थिते देशे बन्धं परम- दुर्लभम् ॥ ७७॥ टीका-गुरुसे यत्नपूर्वक इस परमदुर्लभ बन्धको लाभ करके बुद्धिमान साधक एकांतस्थानमें स्वस्थ- चित्त होके साधन करे॥७७॥ अथ वज्रोलीमुद्रा। मूलम्-वज्रोली कथयिष्यामि संसारध्या- न्तनाशिनीम् ॥ स्वभक्तेभ्यः समासेन गृह्याद्रुतमामपि ॥ ७८॥ टीका-हे देवी ! संसारतमनाशिनी परमगोपनीय वज्रोली मुद्रा भक्तलोगोंके प्रति हम कहते हैं ।। ७८ ॥
(११६) शिवसंहिता भापाटीकासमेता।
मूलम्-विन्दुर्विधुमयो ज्ञेयो रजः सूर्यमय-
स्तथा ॥ उभयोर्मेलनं कार्य स्वशरीरे प्र-
वेशयेत्॥८६॥
टीका-बिन्दुरूपी चन्द्र और रजरूपी सूर्य यह
जानकर दोनोंका सम्बन्ध करके अपने शरीरमें प्रवेश
करना उचित है ॥८६॥
मूलम्-अहं विन्दू रजः शक्तिरुभयोर्मेलनं
यदा ॥ योगिनां साधनावस्था भवेदिव्यं
वपुस्तदा ॥ ८७॥"
टीका-यदि शिवरूपी बिन्दु और रजरूपी शक्ति
यह दोनोंका सम्बन्ध होगा तब योगीका साधनसे
दिव्य शरीर अर्थात् देवतोंके समान शरीर होगा तात्पर्य
यह है कि शिवशक्ति अर्थात् माया ईश्वरके सम्बन्ध वा
मायाको ईश्वरमें लय करनेसे जिप्सको अध्यारोप अप-
वाद कहते हैं योगी मोक्ष होता है अभिप्राय यह है कि,
रजविन्दुका सम्बन्ध जिस साधकको सिद्ध होजाताहै
वह मुक्त है ।। ८७॥
मूलम्-मरणं विन्दुपातेन जीवनं विन्दुधा-
रणे तस्मादतिप्रयत्नेन कुरुते विन्दुधा-
रणम् ॥८८॥
चतुर्थपटलः। (११७) टीका-विन्दुपात होनेसे मृत्यु होती है और बिन्दु- के धारणसे प्राणी जीवताहै इस कारणसे यत्नसे विन्दु- को धारण रखना उचित है ।। ८८ ॥ मूलम्-जायते म्रियते लोके बिन्दुना नात्र संशयः॥ एतज्ज्ञात्वा सदा योगी बिन्दु- धारणमाचरेत् ।। ८९॥ टीका-प्राणीका जन्म मरण विन्दुसे होताहै इसमें संशय नहीं है. इस हेतुसे इसको विचारके योगीको उ- चित है कि, बिन्दुको सर्वदा धारण रक्खे ॥ ८९ ।।' मूलम्-सिद्धे विन्दौ महायने किंन सिध्य- ति भूतले ॥ यस्य प्रसादान्महिमाममा- प्येतादृशो भवेत् ॥९॥ टीका-हे पार्वती ! यत्नपूर्वक बिन्दुके सिद्ध होनेसे संसारमें क्या नहीं सिद्ध होसक्ता अर्थात् सब सिद्ध हो सक्ताहै इसीके प्रसादसे हमारी ऐसी महिमा है ।। ९० ॥ मूलम्-विन्दुः करोति सर्वेपां सुखं दुःखञ्च संस्थितः॥ संसारिणां विमूढानांजरामर- णशालिनाम् ॥ ९१ ॥ अयंच शांकरो योगो योगिनामुत्तमोत्तमः ॥ ९२ ।। टीका-विन्दु संसारी मनुष्योंके मुख और दुःखका
(११८) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता ।
कारण है और मूढलोगोंके मूढताका और जरामरण
शील लोगोंका अर्थात् सबका यही बिन्दु हेतु है योगी
लोगों के प्रति यह हमारा उत्तम योग है ॥९१ ॥ ९२॥
मूलम्-अभ्यासात्सिद्धिमाप्नोति भोगयु-
क्तोऽपि मानवः॥ सकलः साधितार्थोपि
सिद्धो भवति भूतले ॥ ९३ ॥
टीका-भोगयुक्त मनुष्योंकोभी अभ्याससे सिद्धि
प्राप्त होतीहै और सकल वाछितफल संसारमें सिद्ध
होजाते हैं ॥९३॥
मूलम्-भुक्त्वा भोगानशेपान् वै योगेनानेन
निश्चितम् ॥अनेन सकला सिद्धिर्योगिनां
भवति ध्रुवम् ॥सुखभोगेन महता तस्मा-
देनं समभ्यसेत् ॥ ९४॥
- A चतुर्थपटलः। (११९) टीका-बोलीके भेदसे सहजोली और अमरोली मुद्राकी संज्ञा है योगीको उचित है कि सवप्रकारसे विन्दुको धारण करे ॥ ९५ ॥ मूलम्-दैवाञ्चलति चेद्वेगे मेलनं चन्द्रसूर्य- योः॥ अमरोलिरियं प्रोक्ता लिंगनालेन शोपयेत् ।। ९६॥ टीका-यदि हठात् वेगवश बिन्दु चले औररजबिन्दु- का सम्बन्ध होजाय तो इसको अमरोली कहते हैं परंतु लिङ्गनालद्वारा रजविन्दु दोनोंको शोपण करे ॥ ९६॥ मूलम्--गतं बिन्दुस्वकं योगी बन्धयेद्योनिमु- या ॥ सहजोलिरियं प्रोक्ता सर्वतन्त्रेषु गोपिता॥९७॥ टीका-निजविन्दु चलायमान होय तो योगी योनि- मुद्राके बन्धसे अवरोध करे इसको सहजोली कहते हैं यह सर्वतन्त्रों करके गोपनीय है ॥ ९७ ॥ मूलम्-संज्ञाभेदाद्भवेद्भेदः कार्य तुल्यग- तियदि ॥ तस्मात्सर्वप्रयत्नेन साध्यते योगिभिः सदा ॥९८॥ टीका-यदि कार्य एक समान है परन्तु संज्ञासे अमरोली और सहनोली दो भेद भया.है इस हेतुसे
(१२०) शिवसंहिता जापाटीकासमेता ।
योगीको उचित है कि, यह दोनों अमरोली और सहजो
लोका यत्नपूर्वक सर्वदा साधन करे ॥ ९८ ।।
मूलम्-अयं योगो मया प्रोक्तो भक्तानां
स्नेहतः प्रिये ॥ गोपनीयः प्रयत्नेन न
देयो यस्य कस्यचित् ॥ ९९ ॥
टीका-हेप्रिये पार्वती! हम भक्तोंपर प्रेम करके यह
योग जो कहा है यत्नपूर्वक गोपनीय है सामान्य मनुष्य-
को कदापि देना उचित नहीं है ॥ ९९ ॥
मूलम्- एतद्ब्रह्यतमं गुह्यं न भृतं न भविष्य
ति ॥ तस्मादेतत्प्रयत्नेन गोपनीयं सदा
बुधैः॥ १०० ॥
टोका-इस बोलीमुद्रासे अधिक गोपनीय न कुछ
भया है न होगा. इसकारणसे बुद्धिमान साधकको
यत्नपूर्वक इसको गोप्य रखना उचित है ।। १००॥
मूलम्-स्वमूत्रोत्सर्गकाले यो वलांदाकृ-
प्य वायुना ॥ स्तोकं स्तोकं त्यजेन्मूत्रमू-
र्द्धमाकृष्य तत्पुनः॥१०१॥ गुरूपदिष्टमा-
गैण प्रत्यहं यः समाचरेत् ॥ बिन्दुसिद्धि
भवेत्तस्य महासिद्धिप्रदायिका॥ १०२ ॥
चतुर्थपटलः । (१२१) टीका-गुरुके उपदेशपूर्वक सर्वदा मूत्रत्यागनेके समय वलकरके वायुसे आकर्षणपूर्वक थोडा थोडा मूत्र त्यागकरे फिर ऊपरको आकर्षण करे तो उसका बिन्दु सिद्ध होजायगा यह विन्दुकी सिद्धी महासिद्धीकी दाता है अर्थात् परमपदको प्राप्त करती है ॥ १०१॥१०२॥ मूलम्-षण्मासमभ्यसेद्यो वै प्रत्यहं गुरु- शिक्षया ॥ शतांगनेपि भोगेपि तस्य बि- न्दुर्न नश्यति ॥ १०३॥ टीका-गुरूके शिक्षापूर्वक योगी यदि छ: मास नि- त्य इसका अभ्यासकरे तो शत स्त्रीसे भोगकरेगा तो भी उसका बिन्दुपात नहोगा ॥ १०३ ।। मूलम्-सिद्ध विन्दौमहायत्ने किंन सिद्धय- ति पार्वति ॥ ईशत्वं यत्प्रसादेन ममापि दुर्लभं भवेत् ॥ १०४॥ टीका-हेपार्वती ! जब महायनसे विन्दु सिद्ध होजा- यगा तब क्या नहीं सिद्धहोगा अर्थात् सब सिद्ध हो- जायगा इसके प्रसादसे यह दुर्लभ ईशत्व हमको प्राप्त भयाहै ।। १०४॥ अथ शक्तिचालनमुद्रा। मूलम्-आधारकमले सुप्तां चालयेत्कुण्ड-
(१२२) शिवसंहिता भापाटीकासमेता।
ली दृढाम्॥ अपानवायुमारुह्य बलादाकृ-
प्य बुद्धिमान् ॥ १०५॥शक्तिचालनमु-
द्रेयं सर्वशक्तिप्रदायिनी ॥ १०६॥
टीका-आधारकमलमें घोर निद्रित कुण्डलिनीको
बुद्धिमान् अपानवायुपर आरूढहोके आकर्षणपूर्वक
हठात् चलावे अर्थात् भ्रमावे यह शक्तिचालनमुद्रा
सर्वशक्तिकी दाता है ॥ १०५॥१०६॥
मूलम्-शक्तिचालनमेवं हि प्रत्यहं यः स-
माचरेत् ॥ आयुर्वृद्धिर्भवेत्तस्य रोगाणां .
च विनाशनम् ॥१०७॥
टीका-यह शक्तिचालनमुद्रा जो प्रतिदिन करे तो
उसके मायुकी वृद्धी होगी और सर्वरोगोंका इस मुद्राके
प्रभावसे नाश होजायगा। १०७॥
मूलम्-विहाय निद्रां भुजगी स्वयमूर्वे
भवेत्खलु ॥तस्मादभ्यासनं कार्य योगि-
ना सिद्धिमिच्छता ॥ १०८॥
टीका-इस शक्तिचालनके साधनसे कुण्डलिनी नि-
द्राको त्यागके आपही उर्ध्वगामी होजायगी यह नि-
श्चय है. इस हेतुसे सिद्धिकी इच्छा करनेवाले योगीको
उचित है कि, इसका अभ्यास करे ॥ १०८॥
चतुर्थपटलः । (१२३) मूलम्-यः करोति सदाभ्यासं शक्तिचाल- नमुत्तमम् ।। येन विग्रहसिद्धिः स्यादणि- मादिगुणप्रदा ॥ गुरूपदेशविधिना तस्य मृत्युभयं कुतः ॥१०९ ॥ टीका-यदि इस उत्तमशक्तिचालनमुद्राका सदा अभ्यासकरे तो उसका शरीर सिद्ध अर्थात् अमर हो- जायगा और यह मुद्रा अणिमादिक सिद्धिकी दाता है, गुरूके उपदेशपूर्वक विधानसे जो इसका अभ्यास करे तो उसको मृत्युका भय नहीं है। १०९॥ मूलम्-मुहूर्तद्रयपर्यन्तं विधिना शक्ति- चालनम् ॥११०॥यः करोति प्रयत्नेन त- स्य सिद्धिरदूरतः ॥ युक्तासनेन कर्तव्यं योगिभिःशक्तिचालनम् ॥ १११ ।। टीका-जो विधानपूर्वक यत्नसे यदि दोमुहूर्तपर्यंत शक्तिचालन करे तो उसको सर्वसिद्धिकी प्राप्ति होगी. योगीको उचित है कि, गुरूके उपदेशानुसार योगासनसे युक्त होके शक्तिचालनका अभ्यास करे।।११०॥११॥ मूलम्-एतत्सुमुद्रादशकं न भूतंन भविष्य- ति ॥ एकैकाभ्यासने सिद्धिः सिद्धो भव- ति नान्यथा ॥ ११२ ॥
(१२४) शिवसंहिता भाषार्टीकासमेता। टीका-हे पार्वती! यह दशमुद्रा जो हमने कहा है इसके समान न कुछ भया है न होगा इसके एक एकके अ- भ्यास सिद्ध होनेसे साधक सिद्ध होजायगा ॥ ११२॥ इति श्रीशिवसंहितायां हरगौरीसंवादे मुद्राकथन नाम चतुर्थपटलः समाप्तः॥४॥ अथ पञ्चमः पटलः। मूलम्-श्रीदेव्युवाच ॥ ब्रूहि मे वाक्यमी- शान परमार्थधियं प्रति॥ ये विघ्नाःसन्ति लोकानां वद मे प्रिय शङ्कर ॥१॥ टीका-श्रीपार्वतीजी कहती है कि, हे ईश्वर! हे प्रिय शङ्कर ! योगाभ्यासी लोगोंके प्रति जो विघ्न संसारमें हैं सो भक्तोंपर कृपा करके हमको कहो ॥१॥ मूलम्-ईश्वर उवाच ॥ शृणु देवि प्रवक्ष्या मि यथा विघ्नाः स्थिताः सदा ॥मुक्तिं प्र- ति नराणाञ्च भोगः परमवन्धनः ॥२॥ टीका-श्रीईश्वर कहते हैं कि, हे देवी! योगसाधनमें जो विघ्न हैं सो हम कहते हैं सुनो मनुष्योंके मुक्तिके प्रति भोग परमबन्धन है ॥२॥ अथ भोगरूपयोगविघ्नविद्याकथनम् ॥ मूलम्-नारी शय्यासनं वस्त्रं धनमस्य विड- - पंचमपटलः। (१२५) म्बनम्॥ ताम्बूलभक्षयानानि राज्यैश्वर्य- विभूतयः ॥३॥हैमरौप्यं तथा तानं रत्न- ञ्चागुरुधेनवः॥पाण्डित्यं वेदशास्त्राणि नृ- त्यं गीतं विभूषणम् ॥४॥ वंशी वीणा मृद- ङ्गाश्च गजेंद्रश्वाश्ववाहनम् ॥ दारापत्यानि विषया विघ्ना एते प्रकीर्तिताः॥ भोगरूपा इमे विना धर्मरूपानिमाञ्छृणु ॥५॥ टीका-नारीसंसर्ग शय्या उत्तमआसन वस्त्र धन यह सब मोक्षके प्रति विडम्बना हैं ताम्बूलसेवन रथ शिविका आदि सवारी राजऐश्वर्य भोग स्वर्ण रजत ताम्र अनेकप्रकारके रत्न गोधन आदिका संग्रह पा- ण्डित्य करना वेदशास्त्रमें तर्क करना नृत्य गीत भूषण वंशी वीणा मृदङ्गादिक वाद्य बजाना गज अश्व आदि वाहन स्त्री पुत्र केवल गुरूकी सेवा छोडके हे पार्वती यह जो कहा है सो भोगरूप विघ्न है अब धर्मरूप विन कहतेहैं श्रवण करो ॥३॥४॥५॥ अथ धर्मरूपयोगविनकथनम् । मूलम्-स्नानं पूजाविधिहामं तथा मोक्ष- मयी स्थितिः ॥ व्रतोपवासनियममी- (१२६) शिवसंहिता भाषादीकासमेता। नमिन्द्रियनिग्रहः॥६॥ध्येयो ध्यानं तथा मन्त्रोदानंख्यातिर्दिशासुच ॥ वापीकूप- तडागादिप्रासादारामकल्पना ॥७॥ यज्ञ चान्द्रायणं कृच्छं तीर्थानि विविधानिच॥ दृश्यन्ते च इमे विघ्ना धर्मरूपेण सं- स्थिताः॥८॥ टीका-स्नानविधि पूजा होम और सुखपूर्वक स्थिति व्रत उपवास नियम मौन इन्द्रियनिग्रह ध्येय किसीका ध्यान करना मन्त्र जप दान सर्वत्र प्रसिद्धहोना वावडी कूप तालाव मंदिर बगीचाआदिक बनवाना यज्ञ करना पापक्षयके हेतु चांद्रायण कृच्छू व्रत करना तीर्थों में भ्रमण करना यह सब धर्मरूप विघ्न हैं॥६॥७॥८॥ अथ ज्ञानरूपविघ्नकथनम् । मूलम्-यत्तु विघ्नंभवेज्ज्ञानं कथयामि वरा- नने ॥ ९॥ गोमुखं स्वासनं कृत्वा धौति- प्रक्षालनं च तत् ॥ नाडीसञ्चारविज्ञानं प्रत्याहारनिरोधनम्॥१०॥कुक्षिसंचालनं क्षिप्रं प्रवेश इन्द्रियाध्वना ॥ नाडीकर्मा- णि कल्याणि भोजनं श्रूयतांमम् ॥११॥ टीका-हे देवी! हे वरानने! अवज्ञानरूप विन कहते हैं पंचमपटलः। (१२७) सुनो-अन्तःशुद्धिके अर्थ गोमुखके सदृश वस्त्र भक्षण करके तब धौति प्रक्षालन करना अर्थात् धौतियोग करना नाडीचालनका ज्ञान वायुका प्रत्याहार निरोध करना कुण्डलिनीके बोधार्थ उदरको भ्रमावना इन्द्रिय- द्वारा शीघ्र प्रवेश नाडीकर्म अर्थात् नाडीशुद्धिके हेतु आहारीय विचार यह सब ज्ञानरूप विघ्न हैं हेदेवी क- ल्याणी ! नाडीशुद्धिके अर्थ जो भोजनविधि है सो हम कहतेहैं सुनो।॥ ९॥ १०॥ ११॥ मूलम्-नवधातुरसं छिन्धि शुण्ठिकास्ता- डयेत्पुनः॥ एककालं समाधिः स्यालिं- गभूतमिदं शृणु ॥ १२॥ टीका-नवीन रससहित भोजन वस्तु और शुण्ठी- चूर्ण भोजनकरे इससे शीघ्र समाधि होजायगी. हे देवी। अब उसका चिह्न कहतेहैं सुनो ॥ १२॥ मूलम्-सङ्गमं गच्छ साधूनां सङ्कोचं भज दुर्जनात् ॥ प्रवेशनिर्गमे वायोर्गुरुलक्षं विलोकयेत् ॥ १३ ॥ टीका-साधुके सङ्गकी अभिलापा और दुर्जनसे अ- लग रहनेका विचार रखना और वायुके प्रवेश निर्गममें और वायुके निरोध समय मात्रासे गुरुलघुके विचा- रार्थ संख्या करना ।। १३॥
(१२८) शिवसंहिता भापाटीकासमेता ।
मूलम्-पिण्डस्थं रूपसंस्थञ्चरूपस्थं रूप-
वर्जितम् ॥ब्रह्मैतस्मिन्मतावस्था हृदयञ्च
प्रशाम्यति ॥ इत्येते कथिता विघ्ना ज्ञान-
रूपे व्यवस्थिताः॥ १४ ॥
टीका-शरीरस्थरूपका विचार रखना और रूप कु-
रूपका निर्णय करना और यह जगत् ब्रह्म है ऐसे वि-
चारसे हृदयमें स्थिरता रखना. हेपार्वती ! यह जो कहा
है सो सब ज्ञानरूप विघ्न हैं ॥ १४ ॥
अथ चतुर्विधयोगकथनम्।
मूलम्-मन्त्रयोगोहठश्चैवलययोगस्तृतीय-
कः ॥ चतुर्थों राजयोगः स्यात्स द्विधा
भाववर्जितः ॥१५॥
टीका-योग चार प्रकारका है-मन्त्रयोग, हठयोग,
और तीसरा लययोग और चौथा राजयोग है. यह राज-
योग द्वैतभावसे रहित है अर्थात् राजयोग सिद्धहो
जानेसे जीव ईश्वरमें लयहोजाता है और कुछ बोध नहीं
होता ॥ १२॥
मूलम्-चतुर्धा साधको ज्ञेयो मृदुमध्याधि-
मात्रकाः ॥ अधिमात्रतमः श्रेष्ठो भवा-
ब्धौ लंघनक्षमः ॥ १६॥
पंचमपटलः । ( १२९) टीका-यह योगचतुष्टयके साधकभी चार प्रकारके होते हैं अर्थात् मृदु मध्यम अधिमात्र और आधिमात्र- तम यह अधिमानतम साधक सबमें श्रेष्ठ है एही सा- धक संसाररूपी समुद्रके पार होनेमें समर्थ होताहै।॥१६॥ अथ मृदुसाधकलक्षणम् । मूलम्-मन्दोत्साही सुसंमूढोव्याधिस्थोगु- रुदूपकः॥ लोभी पापमतिश्चैव बह्वाशी वनिताश्रयः ॥ १७॥ चपला कातरो रोगी पराधीनोऽतिनिष्ठुरः ॥ मन्दाचारो मन्द- वीर्यो ज्ञातव्यो मृदुमानवः ॥ १८॥ द्वाद- शाब्दे भवेत्सिद्धिरेतस्य यत्नतः परम् ॥ मन्त्रयोगाधिकारी स ज्ञातव्यो गुरुणा ध्रुवम् ॥ १९॥ टीका-अब मृदुसाधकलक्षण कहते हैं मन्द उत्सा- ही मूढचित्त व्याधिग्रसित गुरुनिन्दक लोभी जिसकी सर्वदा पापबुद्धि रहै बहुत भोजन करनेवाला स्त्रीके वझमें हो चञ्चल हो कातर हो रोगी हो पराधीन हो कठोर बोलनेवालाहो जिसके मन्द कर्म हो मंदवीर्यवाला हो ऐसे पुरुषको मृदु मानव कहते हैं यह मन्त्रयोगका अधिकारी है यत्नकरनेसे और गुरुकी कृपासे इसकोभी (१३०) शिवसंहिता भापाटीकासमेता। बारह वर्ष सिद्धि प्राप्त होगी ॥ १७ ॥ १८॥ १९॥ मूलम्-समबुद्धिः क्षमायुक्तः पुण्यकांक्षी प्रियव्वदः॥ मध्यस्थः सर्वकार्येषु सामा- न्यः स्यान्न संशयः॥ २०॥ एतज्ज्ञात्वैव गुरुभिर्दीयते मुक्तितो लयः॥२१॥ टीका-अब मध्यसाधकलक्षण कहते हैं-सामान्य बुद्धि हो क्षमावानहो पुण्यकर्म करनेमें इच्छा रखताहो प्रिय बोलताहो सर्वकार्यमें मध्यस्थ रहताहो अर्थात् म हर्ष न विपाद इसको मध्यसाधक कहतेहैं यह निश्च. य है गुरु इसको विचारके मुक्तिमार्ग जो लययोग है उसका उपदेश करे ।। २० ॥२१॥ अथ अधिमात्रसाधकलक्षणम् । मूलम्-स्थिरबुद्धिलये युक्तः स्वाधीनो वी. युवानपि ॥ महाशयो दयायुक्तः क्षमावा- न् सत्यवानपि ॥२२॥ शूरो वयःस्थः श्र- डावान् गुरुपादाब्जपूजकः ॥ योगाभ्या- सरतश्चैव ज्ञातव्यश्चाधिमात्रकः ॥ २३॥ एतस्य सिद्धिः पड्वभवेदभ्यासयोग- तः ॥ एतस्मै दीयते धीरो हठयोगश्च साङ्गतः ॥२४॥ टीका-अब अधिमात्र साधक लक्षण कहतेहैं स्थिर पंचमपटलः। (१३१) बुद्धि हो लययोगमें समर्थ हो स्वतन्त्र हो अर्थात् किसीके आधीन न हो वीर्यवान हो महाशय हो दयावान हो क्षमा- वान हो सत्यवादी हो शूर हो समाधियोगमें श्रद्धा हो गुरुपादपद्मपूजक हो योगाभ्यासरत हो ऐसे गुणवाले पुरुपको अधिमात्र कहतेहैं योगाभ्याससे ऐसे पुरुप- को छःवर्ष में सिद्धि प्राप्त होगी. गुरुको उचित है कि, ऐसे धीर पुरुपको अङ्गसहित हठयोगका उपदेश करे॥२२॥ २३ ॥२४॥ अथ अधिमात्रतमसाधकलक्षणम् । मूलम्-महावीर्यान्वितोत्साही मनोज्ञः शौ- र्यवानपि॥शास्त्रज्ञोऽभ्यासशीलश्च निर्मो- हश्च निराकुलः॥२५॥नवयौवनसम्पन्नो मिताहारी जितेंद्रियः ॥ निर्भयश्च शुचि- दक्षो दाता सर्वजनाश्रयः ॥२६॥ अधि- कारी स्थिरो धीमान् यथेच्छावस्थितः क्षमी। सुशीलोधर्मचारी च गुप्तचेष्टः प्रि- यव्वदः ॥ २७ ॥ शास्त्रविश्वाससम्पन्नो देवतागुरुपूजकः ॥ जनसंगविरक्तश्च म- हाव्याधिविवर्जितः ॥ २८॥ अधिमात्र- तमो ज्ञेयःसर्वयोगस्य साधकः ॥ त्रिभिः (१३२) शिवसंहिता भापाटीकासमेता। सँव्वत्सरैः सिद्धिरेतस्य नात्र संशयः॥ सर्वयोगाधिकारी स नात्र कार्या विचा- रणा ॥२९॥ टीका-महावीर्यवान् उत्साहयुक्त स्वरूपवान् शूर- तासम्पन्न शास्त्रज्ञ अभ्यासशील अर्थात् श्रुतिधर मो. हुसे हीन आकुलतारहित अर्थात् सावधान नवीन यौवनसम्पन्न अर्थात् तरुण प्रमाणभोजी जितेन्द्रिय निर्भय पवित्रआचार सर्वकर्ममें निपुण दानशील शरणागतपालक स्थिरचित्त बुद्धिमान् सन्तोपयुक्त क्षमावान् शीलवान् धार्मिक काँको गोप्य रखनेवाला प्रियसत्यवादी शास्त्रमें विश्वास देवता और गुरुपूजक जनसङ्गरहित महाव्याधिरहित ऐसे गुण जिसमें हो वह अधिमानतम है और सर्व योगका साधक है इसको तीनवर्ष में सिद्धि प्राप्त होगी इसमें संशय नहीं है. यह सर्वयोगका अधिकारी है ऐसे पुरुपको गुरु समस्त 'योगका उपदेश करदें इसमें विचारका कुछ प्रयोजन नहीं है ॥ २५ ॥२६॥२७॥२८॥२९॥ अथ प्रतीकोपासनम् । मूलम्-प्रतीकोपासना कार्या दृष्टादृष्टफल- प्रदा॥ पुनाति दर्शनादत्र नात्र कार्या विचारणा ॥३०॥ , पंचमपटलः। टीका-अब प्रतीकउपासना कहतेहैं प्रतीकउपास- नासे दृष्टादृष्टफल लाभ होताहै और उसके दर्शनसे मनुष्य पवित्र होताहै इसमें संशय नहीं है ॥३०॥ मूलम्-गाढातपे स्वप्रतिविम्बितेश्वरं निरी- क्ष्य विस्फारितलोचनद्वयम् ॥ यदा नमः पश्यति स्वप्रतीकं नभोङ्गणे तत्क्षणमेव पश्यति ॥ ३१ ॥ टीका-गाढआतपमें अर्थात् गहरेधूपमें स्वईश्वरका प्रतिविम्ब नेत्रस्थिरकरके देखे जब अपने छायाका प्रतिविम्ब शून्यमें देखपडे तब ऊपर आकाशमें अपना प्रतिविम्ब अवश्य देखेगा ॥३१॥ मूलम्-प्रत्यहं पश्यते यो वै स्वप्रतीकं नमो- गणे।आयुर्वृद्धिर्भवेत्तस्य न मृत्युः स्या- त्कदाचन ॥३२॥ टीका-जो नित्य आकाशमें स्वप्रतीक अर्थात् अपना प्रतिबिम्ब देखेगा उसके आयुकी वृद्धि होगी और उसकी मृत्यु कभी न होगी अर्थात् चिरंजीवी हो जायगा॥३२॥ मूलम्-यदापश्यतिसम्पूर्णस्वप्रतीकंनभो- .
. (१३२) शिवसंहिता भापाटीकासमेता । सँव्वत्सरैः सिद्धिरेतस्य नात्र संशयः॥ सर्वयोगाधिकारी स नात्र कार्या विचा- रणा ॥२९॥ टीका-महावीर्यवान् उत्साहयुक्त स्वरूपवान शूर- तासम्पन्न शास्त्रज्ञ अभ्यासशील अर्थात् श्रुतिघर मो- इसे हीन आकुलतारहित अर्थात् सावधान नवीन यौवनसम्पन्न अर्थात् तरुण प्रमाणभोजी जितेन्द्रिय निर्भय पवित्रआचार सर्वकर्ममें निपुण दानशील शरणागतपालक स्थिरचित्त बुद्धिमान् सन्तोपयुक्त क्षमावान् शीलवान् धार्मिक काँको गोप्य रखनेवाला प्रियसत्यवादी शास्त्रमें विश्वास देवता और गुरुपूजक जनसङ्गरहित महाव्याधिरहित ऐसे गुण जिसमें हो वह अधिमानतम है और सर्व योगका साधक है इसको तीनवर्ष में सिद्धि प्राप्त होगी इसमें संशय नहीं है. यह सर्वयोगका अधिकारी है ऐसे पुरुपको गुरु समस्त 'योगका उपदेश करदें इसमें विचारका कुछ प्रयोजन नहीं है ॥२५ ॥२६॥२७॥२८॥२९॥ अथ प्रतीकोपासनम् । मूलम्-प्रतीकोपासना कार्या दृष्टादृष्टफल- प्रदा ॥ पुनाति दर्शनादत्र नात्र कार्या विचारणा ॥३०॥ - पंचमपटलः।- टीका-अब प्रतीकउपासना कहतेहैं प्रतीकउपास- नासे दृष्टादृष्टफल लाभ होताहै और उसके दर्शनसे मनुष्य पवित्र होताहै इसमें संशय नहीं है ।। ३०॥ मूलम्-गाढातपे स्वप्रतिबिम्बितेश्वरं निरी- क्ष्य विस्फारितलोचनद्वयम् ॥ यदा नमः पश्यति स्वप्रतीकं नभोङ्गणे तत्क्षणमेव पश्यति ।। ३१ ॥ टीका-गाढआतपमें अर्थात् गहरेधूपमें स्वईश्वरका प्रतिविम्ब नेत्रस्थिरकरके देखे जब अपने छायाका प्रतिविम्ब शून्यमें देखपडे तब ऊपर आकाशमें अपना प्रतिविम्ब अवश्य देखेगा ॥३१॥ मूलम्-प्रत्यहं पश्यते यो वै स्वप्रतीकं नमो- ङ्गणआयुर्वृद्धिर्भवेत्तस्य न मृत्युः स्या- कदाचन ॥ ३२॥ टीका-जो नित्य आकाशमें स्वप्रतीक अर्थात् अपना प्रतिविम्ब देखेगा उसके आयुकी वृद्धि होगी और उसकी मृत्यु कभी न होगी अर्थात् चिरंजीवी हो जायगा ॥३२॥ मूलम् यदापश्यतिसम्पूर्णस्वप्रतीकंनभो-
(१३४) शिवसंहिता भापाटीकासमेता ।
गणे॥ तदा जयं सभायाञ्च युद्धे निर्जित्य
सञ्चरेत् ॥३३॥
टीका-जब सम्पूर्ण अपना प्रतिविम्म आकाशमें
देखे तब सभामें उसकी जय होय और युद्ध में शत्रुको
जीतलेगा।॥ ३३॥
मूलम् यः करोति सदाभ्यासं चात्मानं
वन्दते परम् ॥ पूर्णानन्दकपुरुपं स्वप्रती-
कप्रसादतः॥३४॥
टीका-जो सर्वदा स्वप्रतीक उपासनाका अभ्यास
करे तो उसको आत्माकी प्राप्ति होगी और उसी स्वप्र-
तीकके प्रसादसे पूर्णानन्द स्वरूप अर्थात् आत्माका
दर्शन होगा. तात्पर्य यह है कि, जब हृदयाकाशमें
अपने स्वरूपका अनुभव होगा तब आत्माकी परम
ज्योतिका प्रकाश होगा ॥३४॥
मूलम्-यात्राकाले विवाहे च शुभे कर्मणि
सङ्कटे ॥ पापक्षये पुण्यवृद्धौ प्रतीकोपा-.
सनश्चरेत् ॥ ३५॥
टीका-यात्राकालमें और विवाहके समयमें और
शुभकर्ममें और पापक्षयों और पुण्यवृद्धिके अर्थ स्वप्र-
भीक अर्थात अपने प्रतिबिम्बका दर्शन करे, तो सर्वदा
कल्याण होगा॥३५॥
पंचमपटलः।
मूलम्-निरन्तरकृताभ्यासादन्तरे पश्यति
ध्रुवम् ॥ तदा मुक्तिमवाप्नोति योगी नि-
यतमानसः ॥ ३६॥
टीका-सर्वदा प्रतीकोपासनाके अभ्यास करनेसे
निश्चय हृदयाकाशमें अपना प्रतिबिंब भान होगा तब
निश्चयआत्मा योगीको मुक्ति प्राप्त होगी ॥ ३६॥
मूलम्-अंगुष्ठाभ्यामुभे श्रोत्रे तर्जनीभ्यां
द्विलोचने ।। नासारन्धे च मध्याभ्याम-
नामाभ्यां मुखं दृढम् ॥ ३७ ॥ निरुध्य
मारुतं योगी यदैव कुरुते भृशम् ॥ तदा
तत्क्षणमात्मानं ज्योतीरूपं स पश्यति३८
टीका-दोनों अंगुष्ठसे दोनों कर्ण बंदु करे और दो-
नों तर्जनीसे दोनों नेत्रोंको बंद करे और दोनों मध्य-
मा अंगुलीसे दोनों नासारंध्रको बंद करे और दोनों
अनामिका अंगुली और कनिष्ठासे मुखको बंद करे
यदि इसप्रकार योगी वायुको निरोध करके इसका
वारंवार अभ्यास करे तो आत्मा ज्योतिस्वरूपका
हृदयाकाशमें भान होगा ॥३७॥३८॥
मूलम्-तत्तेजो दृश्यते येन क्षणमा निरा-
कुलम् ॥ सर्वपापविनिर्मुक्तः स याति
परमां गतिम् ॥ ३९॥
(१३६) शिवसंहिता भाषादीकासमेता। टीका-आत्माका यह परमतेज जो पुरुष स्थिर- चित्त होके क्षणमावभी देखेगा वह सर्वपापसे मुक्त होके परमगतिको प्राप्तहोगा॥३९॥ मूलम्--निरन्तरकृताभ्यासाद्योगीविगतक- ल्मपः ॥ सर्वदेहादि विस्मृत्य तदभिन्नः स्वयं गतः॥४०॥ टीका-निरंतर जो योगी शुद्धचित्त होके यह प्र- तीकोपासनाका अभ्यास करेगा वह सर्व देहादिक- मसे रहित होके आत्मासे अभिन्न होजायगा अर्थात् आत्मास्वरूप होजायगा ॥४०॥ मूलम् यः करोति सदाभ्यासं गुप्ताचारेण मानवः।।सवै ब्रह्मविलीनः स्यात्पापकर्म- रतो यदि ।। ४१ ॥ टीका-जो मनुप्य गुप्ताचारसे इसका सर्वदा अभ्या- स करताहे सो यदि पापकर्मरतभी हो तथापि उसका मोक्ष होगा ॥४१॥ मूलम्-गोपनीयः प्रयत्नेन सद्यः प्रत्यय- कारकः ॥ निर्वाणदायको लोके योगोयं मम वल्लभः॥ नादःसंजायते तस्यक्रम- णाभ्यासतश्च यः॥४२॥ -
पंचमपटलः। (१३७)
टीका-जो इसका अभ्यास करेगा उसको क्रमसे
नाद उत्पन्न होगा. हेदेवी-। यह प्रतीकोपासना निर्वाण
योगका दाता है इसहेतुसे हमको अतिप्रिय है यह
शीघ्र फलदाता है इसको यत्नसे गोप्य रखना उचि-
त है.॥ ४२॥
मूलम्-मत्तभृङ्गवेणुवीणासदृशः प्रथमोध्व-
निः॥४३॥ एवमभ्यासतः पश्चात् संसा-
रध्वान्तनाशनम्॥घण्टानादसमापश्चात्
ध्वनिमघरवोपमः ।। ४४ ॥ ध्वनौ तस्मि-
न्मनो दत्त्वा यदा तिष्ठति निर्भरः॥ तदा
संजायते तस्य लयस्य मम वल्लभे ॥४५॥
टीका-योगअभ्यासद्वारा प्रथम
मत्त भ्रमरकी
नाई शब्द और वेणु और वीणाके समान शब्द उत्पन्न
होगा इसी तरह संसारतम नाशक योगअभ्याससे फिर
घंटानाद समान शब्द होगा. फिर मेघ गर्जनके समान
ध्वनि होगी. हे प्रिये पार्वती ! उस ध्वनिमें यदि मन
निश्चल स्थित हो जाय तब मोक्षका दाता लय उत्पन्न
'होगा।॥४३॥४४॥४५॥
मूलम्-तत्र नादे यदा चित्तं रमते योगिनो
भृशम् ॥ विस्मृत्य सकलं बाह्यं नादेन
सह शाम्यति ॥ ४६॥
(१३८) शिवसंहिता नापाटीकासमेता। टीका-जब योगीका चित्त उस नादमें निरंतर रम- णकरेगा तब सकल विपयसे स्मरणरहित होके चित्त समाधिमें लय होजायगा।॥ ४६॥ मूलम्-एतदभ्यासयोगेन जित्वा सम्य- ग्गुणान्वहून् ॥सर्वारम्भपरित्यागी चिदा- काशे विलीयते ॥४७॥ टीका-इसीप्रकार योगअभ्यासद्वारा सर्व गुणोंको जीतके और सब कार्योके आरंभको त्यागके योगी आनंदपूर्वक चैतन्यस्वरूप हृदयाकाशमें लय होजायगा ॥४७॥. मूलम्-नासनं सिद्धसदृशं न कुम्भसदृशं वलम् ॥ न खेचरीसमा मुद्रान नादसह- शो लयः॥४८॥ टीका-हेदेषी ! सिद्धासनके समान कोई और आस- न नहीं है और न कुम्भकके समान कोई बल है और न खेचरीके समान कोई मुद्रा है और न नादके समान कोई दूसरा लय है ॥४८॥ अथ मूलाधारपद्मविवरणम् । मूलम्-इदानीं कथयिष्यामि मुक्तस्यानुभवं
.
पंचमपटलः।
(१३९)
प्रिये ॥ यज्ज्ञाला लभते मुक्तिं पापयुक्तो-
पिसाधकः॥४९॥
टीका-हेप्रिये पार्वती ! अब मुक्तिका अनुभव तुमसे
कहते हैं जिसके ज्ञानसे पापयुक्त साधकभी मुक्तिलाभ
करताहै ॥ १९॥
मूलम्-समभ्यच्यॆश्वरं सम्यकृत्वा च.
योगमुत्तमम् ॥ गृह्णीयात्सुस्थितो भूत्वा
गुरुं सन्तोष्य बुद्धिमान् ॥ ५० ॥
टीका-योगाकांक्षी साधक सम्यक्प्रकारसे ईश्वरकी
पूजा करके स्वस्थचित्तसे योगासनपर बैठके बुद्धिमान
गुरुको सर्वप्रकारसे प्रसन्न करके यह उत्तम योग ग्रह
णकरे॥५०॥
मूलम्-जीवादि सकलं वस्तु दत्त्वा योग:
विदं गुरुम्।। सन्तोप्यादिप्रयत्नेन योगोयं
गृह्यते बुधैः ॥ ५१ ॥
टीका-बुद्धिमान साधक जीवादि सकल पदार्थ
योगविद गुरुके अर्पण करके उनके प्रसन्नतापूर्वक
यत्न करके यह योग ग्रहण करते हैं ॥५१॥
मूलम्-विप्रान्सन्तोष्य मेधावी नानाम-
गलसंयुतः ॥ ममालये शुचिर्भूत्वा गृही-
याच्छुभमात्मनः॥५२॥
(१४०) शिवसंहिता मापाटीकासमेता ।
टीका-योगग्रहणके समय बुद्धिमान् साधक ब्राह्म-
णको सन्तोप करके अर्थात् द्रव्यादिक प्रदानपूर्वक
प्रसन्न करके अनेक आशीर्वाद श्रवण करके पवित्रता
से शिवमंदिरमें बैठके आत्माके अर्थ जो यह शुभयोग
है इसको ग्रहणकरे ॥५२॥
मूलम्-संन्यस्यानेन विधिना प्राक्तनं
विग्रहादिकम् ॥ भूत्वा दिव्यवपुर्योगी
गृह्णीयाद्वक्ष्यमाणकम् ॥ ५३॥
टीका-साधक इस विधानसे पूर्व शरीर गुरुको कृ.
पासे त्यागके दिव्य शरीर होके जो आगे कहेंगे वह
योग ग्रहण करे. तात्पर्य यह है कि, योगग्रहणके समयसे
साधकका शरीर दिव्य होजाताहै व्याधि और अज्ञान-
का शरीर नहीं रहजाता इस हेतुसे योगग्रहणके समय
साधक यह चिंतन करे कि, पूर्व शरीरको हमने त्यागके
दिव्यशरीर धारण किया॥५३॥
मूलम्-पद्मासनस्थितो योगी जनसंगविष-
र्जितः ॥ विज्ञाननाडीद्वितयमड्डलीभ्यां
निरोधयेत् ॥ ५४॥
टीका-योगी संगरहित पद्मासनमें स्थित होके दो.
नों विज्ञाननाडी अर्थात् इडा और पिंगलाको दो अंगु-
लीसे निरोध करे ॥५४॥
पंचमपटलः । (१४१) मूलम्-सिद्धेस्तदाविर्भवति सुखरूपी निर- अनः॥ तस्मिन्परिश्रमः कार्यों येन सि- दो भवेत्खलु ॥ ५५॥ टीका-यह योग सिद्ध होनेसे साधकके हृदयमें सुखरूपी निरंजन परब्रह्म चैतन्यस्वरूपका प्रकाशहोगा इस हेतुसे यह योगमें साधकको परिश्रम कर्तव्य है, इससे निश्चय यह योग सिद्ध होजायगा ॥५५॥ मूलम्-यःकरोति सदाभ्यासंतस्य सिद्धि- नं दूरतः ॥ वायुसिद्धिर्भवेत्तस्य क्रमादेव न संशयः॥५६॥ टीका-जोमनुष्य इस योगका सर्वदा अभ्यास करे- गा उसको सर्वसिद्धि प्राप्त होगी और निश्चय आपही क्रमसे वायु सिद्ध होजायगा ॥५६॥ मूलम्-सकृद्यः कुरुते योगी पापौघं नाशये- दुवम् ॥ तस्य स्यान्मध्यमे वायोः प्रवेशो नात्र संशयः ॥१७॥ टीका-जो योगी प्रतिदिन एकवार यह अभ्यास करे तो उसके सर्व पापोंका नाश होजायगा और उसका प्राणवायु निश्चय सुपुम्णामें प्रवेश करेगा ।। ६७ ॥ मूलम्-एतदभ्यासशीलो यः स योगी देव-
(१४२) शिवसंहिता भापाटाकासमता।
पूजितः ॥ अणिमादिगुणाल्लब्ध्वा विचरे-
8वनत्रये ॥५८॥
टीका-पह अभ्यासशील योगी देवतोंसे पूजित है
और अणिमादिक सिद्धि लाभ करके तीनों लोकमें
इच्छापूर्वक विचरेगा ॥२८॥
मूलम्-यो यथास्यानिलाभ्यासात्तद्भवेत्त-
स्य विग्रहः॥तिष्ठेदात्मनि मेधावी संयुतः
क्रीडते. भृशम् ॥ ५९॥
टीका-जिस प्रकार वायुका अभ्यास करेगा उसी
तरह साधकका शरीर सिद्ध हो जायगा और बुद्धिमान
पुरुप आत्मामें स्थितहोके सर्वदा क्रीडा करेगा॥२९॥
मूलम्-एतद्योगं परं गोप्यं न देयं यस्य
कस्यचित् ॥ यःप्रमाणैः समायुक्तस्तमेव
कथ्यते ध्रुवम् ॥६०॥
टीका-यह योग परमगोपनीयहे अनधिकारीको
कदापि देनेके योग्य नहीं है परन्तु प्रमाणयुक्त अर्थात्
पूर्वोक्त लक्षणयुक्त साधकको अवश्य देना उचितहै।६०॥
मूलम्-योगी पद्मासने तिष्ठेत्कण्ठकूपे य-
दा स्मरन्।जिह्वां कृत्वा तालुमूले क्षुत्पि-
पांसा निवर्तते ॥६॥
पंचमपटलः।
(१४३)
टीका-पद्मासनस्थित योगी जब कण्ठकूपका
स्मरण अर्थात् उस स्थानमें मनको लय करके जिह्वा-
को तालुमूलमें स्थित करेगा तब क्षुधा और पिपासा-
से रहित हो जायगा॥ ६१॥
मूलम्-कण्ठकूपाधः स्थाने कूर्मनाड्य-
स्ति शोभना।। तस्मिन् योगी मनो दत्त्वा
चित्तस्थैर्य लभेदृशम् ॥६२॥
टीका--कंठकूपके नीचे कूर्मनाडी शोभित है उस
नाडीमें योगी मनको स्थिर करके अत्यंत चित्तकी
स्थिरता पायेगा ।। ६२॥
मूलम्-शिरःकपाले रुद्राक्षं विवरं चिन्तये-
धदातदा ज्योति प्रकाशः स्याद्विद्युत्पु-
असमप्रभः ॥६३॥ एतच्चिन्तनमात्रेण पा-
पानां संक्षयो भवेत् ॥ दुराचारोऽपि पुरुपो
लभते परमं पदम् ॥६४॥
टीका-शिर कपालमें जो रुद्राक्ष विवर है उसमें
यदि चिंतना करे तो विद्युत्पुञ्जके समान आत्मज्यो-
तिका प्रकाश होगा और इसके चिन्तनमावसे योगीका
सर्व पाप नष्ट होजायगा. यदि दुराचार भी जो पुरुप
आसक्त है वहभी परमगतिको प्राप्त होगा ॥६३॥ ६४॥
• (१४६) शिवसंहिता भापारीकासमेता। टीका-युद्धिमान् योगी भूमिमें उत्तानशयन करके निरन्तर ध्यान करे तो तत्काल आपही श्रमका नाश होजायगा और शिरके पृष्ठभागका ध्यान करनेसे योगी मृत्युका जीतनेवाला होजायगा और भूके मध्यमें जो दृष्टिमात्रसे फल होताहै सो हेदेवि ! हम पहले कह- चुके हैं ।।७१॥७२॥ मूलम्-चतुर्विधस्य चान्नस्य रसस्त्रेधा वि- भज्यते ॥तत्र सारतमो लिंगदेहस्य परि- पोपकः ॥ ७३ ॥ सप्तधातुमयं पिण्डमे- ति पुष्णाति मध्यगः ॥ याति विण्मूत्र- रूपेण तृतीयः सप्ततो वहिः ॥७४॥ आ- द्यभागद्वयं नाड्यः प्रोक्तास्ताः सकला अपि ॥ पोपयन्ति वपुर्वायुमापादतल- मस्तकम् ॥७५॥ टीका-चार विधि अन्नभोजन करनेसे तीनप्रकार- का रस उत्पन्न होताहै उसमें जो प्रथम सारभूत रस है वह लिङ्गशरीरको पोषण करता है और जो दूसरा रस है वह सप्तधातुमय पिण्डको पोपण करता है और तीसरा रस सस्थातुके बाहर मल मूत्ररूप है पहिले जो दोभाग रस कहाहै वही सकल नाडीरूप है और पंचमपटलः। (१४७) पादसे लेकर मस्तकपर्यंत शरीरके वायुका पोपणक- रते हैं ।। ७३ ॥ ७० ॥ ७५ ॥ मूलम्-नाडीभिराभिः सर्वाभिर्वायुः सञ्चर- ते यदा ॥ तदैवान्नरसो देहे साम्यनेह प्रव- तते ॥ ७६॥ टीका-जब सब नाडीके साथ वायु चलताहै तब भन्नका ग्स शरीरमें समभावसे प्रवृत्त होता है ।। ७६ ॥ मूलम्-चतुर्दशानां तत्रैह व्यापारे मुख्य- भागतः ॥ ता अनुग्रत्वहीनाश्च प्राणस- ञ्चारनाडिकाः।। ७७॥ टीका-सर्व नाडियोंमें पूर्वोक्त चौदह नाडी शरीर- के मुख्य व्यापारको करती हैं यह प्राण सञ्चार करने- वाली चौदह नाडौंमें परस्पर कोई किसीसे न्यून अधिक नहीं है ।। ७७॥ मूलम्-गुदाद्द्यंगुलतश्चोव मैदैकांगुलत- स्त्वधः। एवञ्चास्ति समं कन्दं समता चतुरंगुलम् ॥७८॥ टीका-गुदासे दो अडल ऊपर और मेढ़ अर्थात् लिङ्गमूलसे एक अंगुल नीचे चार अंगुल विस्तारक- न्दका.प्रमाण है।। ७८॥
(१४८) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । मूलम्-पश्चिमाभिमुखी योनिर्गुदमेदान्त- रालगा॥ तत्र कन्दं समाख्यातं तत्रास्ति कुण्डली सदा ॥ ७९ ॥ संवेष्टय सकला नाडीः साईत्रिकुटिलाकृतिः॥मुखे निवे- श्य सा पुच्छं सुपुम्णाविवरे स्थिता।।८०॥ टीका-गुदा और मेढ़के मध्यमें जो योनि है वह पश्चिमाभिमुखी अर्थात् पीछेको मुख है उसी स्थानमें कन्देहै और उसी स्थानमें सर्वदा कुण्डलनीकी स्थिति है यह कुण्डलनी सकल नाडीको घेरके साढे तीन फेरा कुटिल आकृतिसे अपने मुखमें पुच्छको लेके सुषुम्णा विवरमें स्थित है ॥ ७९ ॥८॥ मूलम्-सुप्ता नागोपमा ह्येपा स्फुरन्ती प्रभया वया ॥ अहिवत्सन्धिसंस्थाना वाग्देवी वीजसंज्ञिका ॥ ८१ ॥ टीका-यह कुण्डलिनी सर्पके समान निद्रिता प्रभासे प्रकाशमान है और सर्पके सदृश संधि- स्थित है और वाग्देवी है अर्थात् कुण्डलिनीहीसे उच्चारण होताहै और वीज संज्ञक है अर्थात् सं- वीज है ।। ८१॥ मूलम्-ज्ञेयाशक्तिरियं विष्णोर्निर्मलास्वर्ण . M ( १४९) पंचमपटलः। भास्वरा॥सत्त्वं रजस्तमश्चेति गुणत्रयप्र- मूतिका ॥ ८२॥ टीका-यह कुण्डलिनी देवी ईश्वरको शक्तिमें तप्त स्वर्णके समान निर्मल तेजप्रभा है और सत्व, रज, तमा यह तीनों गुणकी माता है ॥ ८२ ॥ मूलम्-तत्रबन्धूकपुष्पाभ कामवीज प्रकी- र्तितम् ॥ कलहेमसमं योगेप्रयुक्ताक्षररू- पिणम् ॥ ८३॥ टीका-जिस स्थानमें कुण्डलिनी है उसी स्थानमें बन्धूकपुष्पके समान रक्तवर्ण कामबीजकी स्थिति कहीगई है वह कामवीज तप्तस्वर्णके समान स्वरूप- योगयुक्तद्वारा चिंतनीय है ॥ ८३ ॥ मूलम्-सुषुम्णापि च संश्लिष्टा वीजंतत्रवरं स्थितम्॥शरच्चंद्रनिर्भतेजस्वयमेतत्स्फु- रस्थितम्।।८४ ॥सूर्यकोटिप्रतीकाशं च- न्द्रकोटिसुशीतलम् ॥ एतत्रयं मिलित्वैव देवी त्रिपुरभैरवी वीजसंज्ञं परंतेजस्तदे- व परिकीर्तितम् ॥ ८५॥ टीका-जिस स्थानमें कुण्डलिनी स्थित है सुषुम्णा उसी स्थानमें कामयीनके साथ स्थित है और वह बीज (१५० १५०) शिवसंहिता भापाटीकासमेवा । शरच्चन्द्रके समान प्रकाशमान तेज है और वह आप- ही कोटि सूर्यके समान प्रकाश और कोटिचंद्रके समान शीतल है यह तीनों मिलकेअर्थात् कुण्डलिनीसुषुम्णा, बीजकुण्डलिनीका नाम त्रिपुरभैरवी देवी है यह कुण्ड- लिनी परमतेजमानहै और उसकी बीजसंज्ञाहै।।८४॥८५|| मूलम्-क्रियाविज्ञानशक्तिभ्यां युतं यत्प- रितो भ्रमत्॥८६॥ उत्तिष्टद्विशतस्त्वम्भः सूक्ष्मंशोणशिखायुतम्॥योनिस्थं तत्परं तेजः स्वयंभूलिंगसंज्ञितम् ॥ ८७॥ टीका-वह बीज क्रियाशक्ति और ज्ञानशक्तिसे युक्त होके शरीरमें भ्रमण करताहै और कभी उर्ध्वगामी हो- ताहै और कभी जलमें प्रवेश करताहै और सूक्ष्म प्रज्व- लित अनिके समान शिखायुत परमतेजवीर्यकी स्थिति योनिस्थानमें है और स्वयम्भू लिङ्गसंज्ञा है।।८६॥८॥ मूलम्-आधारपद्ममेतद्धि योनिर्यस्यास्ति कन्दतः ॥ परिस्फुरद्वादिसान्तचतुर्वर्ण चतुर्दलम् ॥ ८८॥ टीका-यह जो कहाहै इसको आधारपद्म कहते हैं और इस पद्मके मूलमें योनिकी स्थिति यह पद्म परम प्रकाशमान-व-से स-तक अर्थात् व-श-प-स चारवर्ण और चारदल करके शोभित है ।। ८८ ॥
. पंचमपटलः। (१५१) मूलम्-कुलाभिधं सुवर्णाभं स्वयम्भूलि- ङ्गसंगतम् ॥ द्विरण्डो यत्र सिद्धोस्ति डाकिनी यत्र देवता ॥८९॥ तत्पद्ममध्य- गा योनिस्तत्र कुण्डलिनी स्थिता ॥ त- स्याऊर्च स्फुरत्तेजः कामवीजंभ्रमन्मत- म् ॥९०॥ यः करोति सदा ध्यानं मूला- धारे विचक्षणः ॥ तस्य स्यादाईरी सिद्धि- (मित्यागक्रमेण वै ॥ ९१॥ टीका-वह कमल कुलाभिध है अर्थात् कुलनाम है और स्वर्णके समान कांतिहै और स्वयंभूलिङ्गसे युक्त है और उस पद्ममें द्विरण्डनामक सिद्ध और डाकिनी देवता अधिष्ठात्री है और गणेश देवता है और उस पद्मके मध्यमें योनि है उस योनिमें कुण्डलिनीकी स्थि- तिहै और उस कुण्डलिनीके उपर दीप्तिमान तेजस्व- रूप कामबीज भ्रमण करताहै जो बुद्धिमान् पुरुप इस मूलाधार पद्मका सर्वदा ध्यान करते हैं उनको दार्दुरी वृत्ति सिद्ध होती है और क्रमसे भूमिको त्यागके आ- काशगमन करते हैं ।। ८९ ॥ ९० ॥११॥ मूलम्-वपुपःकान्तिरुत्कृष्टा जठराग्निविव- (१५२) शिवसंहिता भापाटीकासमेता। र्धनम् ॥ आरोग्यञ्च पटुत्वञ्च सर्वज्ञत्वञ्च जायते ॥९२॥ टीका-यह ध्यान करनेसे शरीरमें उत्तम कांति होती है और जठराग्नि वर्धित होताहै और शरीर आरोग्य रहताहै और पटुता और सर्वज्ञता अर्थात् सर्व वस्तुका ज्ञान उत्पन्न होता है ॥ ९२ ।। मूलम-भूतं भव्यं भविष्यच्च वेत्ति सर्व सका- रणम् ॥ अश्रुतान्यपि शास्त्राणि सरहस्य वदेहुवम् ॥ ९३ ॥ टीका-फिर भूत, भविष्य, वर्तमान तीनोंकाल और सर्व वस्तुके कारणका ज्ञान होताहै और जो शास्त्र कभी श्रवण नहीं कियाहे उसको रहस्यसहित व्या- ख्या करनेकी शक्ति निश्चय उत्पन्न होती है ॥ ९३ ॥ मूलम्-वक्रेसरस्वती देवी सदानृत्यति नि- भरम् ॥ मन्त्रसिद्धिर्भवेत्तस्य जपादेव न संशयः ॥ ९४॥ टीका-योगीके मुखमें सर्वदा निरंतर सरस्वती दे- थी नृत्य करती है और योगीकी जपमात्रसे मन्त्रादिकी सिद्धि होती है इसमें संशय नहीं है ।। ९ ॥ मूलम्-जरामरणदुःखौघान्नाशयति गुरोर्व- पंचमपटलः। ( १५३) चः॥इदं ध्यानं सदा कार्य पवनाभ्यासि- ना परम् ॥ध्यानमात्रेण योगीन्द्रो मु- च्यते सर्वकिल्लिपात् ॥ ९५॥ टीका-गुरुका वचन जरा मृत्यु आदि जो दुःखका समूह है उसको नाश करदेताहै पवनाभ्यासी साधकको यह परमध्यान सर्वदा करनेके योग्य है ध्यानमात्रसे योगीन्द्र सर्वपापसे मुक्त होजाताहै ॥ ९॥ मूलम्-मूलपमं यदा ध्यायेद्योगी स्वायं- म्भुलिङ्गकम् ॥ तदा तत्क्षणमात्रेण पापौ- घं नाशयेदुवम् ॥ ९६॥ टीका-योगी जब मूलाधार पद्म स्वयम्भूलिङ्गसंयु- तका ध्यानकरे तो उसीक्षण निश्चय पापके. समूहका नाश करदेगा ॥ ९६॥ मूलम्-यंयंकामयते चित्ते तंतं फलमवा- प्नुयात्॥ निरन्तरकृताभ्यासात्तं पश्यति विमुक्तिदम् ॥९७॥ बहिरभ्यन्तरे श्रेष्ठं पू- जनीयं प्रयत्नतः ॥ ततः श्रेष्ठतमं ह्येतना- न्यदस्ति मतं मम ।। ९८॥ टीका--जो साधक मूलाधार पद्मका ध्यान करते हैं वह अपने चित्तमें जोजो वस्तुकी इच्छा करते हैं सो सो (१५४) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता। सर्व वस्तु उनको प्राप्त होती हैं और सर्वदा यत्नपूर्वक यह अभ्यास करनेसे बाहर भीतर श्रेष्ठ पूजनीय मुक्ति- दायी परमात्माको देखते हैं हे पार्वति । इससे श्रेष्ठतम दूसरा योग नहीं है यह हमारा मतहै ॥ ९७॥ ९८॥ मूलम्-आत्मसंस्थं शिवं त्यक्त्वा वहिःस्थं यः समर्चयेत् ॥ हस्तस्थं पिण्डमुत्सृज्य भ्रमते जीविताशया ॥९९॥ टीका-मनुष्य शरीरस्थ शिवको त्यागके वाहरके देवताको पूजते हैं जैसे हाथके पिंडको त्यागके जीवके रक्षार्थ अन्य पिंडके हेतु लोग भ्रमण करतेहैं ॥ ९९ ॥ मूलम्-आत्मलिंगार्चनं कुर्यादनालस्यं दि- ने दिने ॥ तस्य स्यात्सकलासिद्धिनांत्र कार्या विचारणा ॥१००॥ निरन्तरकृता- भ्यासात्पण्मासैः सिद्धिमाप्नुयात्॥तस्य वायुप्रवेशोपि सुपुम्णायाम्भवेद्भुवम् ॥ ॥१०१॥ मनोजयञ्च लभते वायुविन्दु- विधारणात् ॥ ऐहिकामुष्मिकीसिद्धिर्भ- वेन्नैवात्र संशयः॥ १०२॥ टीका-जो आलस्पको त्यागके शरीरस्थ परमा- त्माका नित्य पूजन करेगा उसको सकलसिद्धि प्राप्त-
पंचमपटलः। (१५५)
होगी इसमें संशय नहीं है यदि इसका अभ्यास निर-
न्तर करे तो छामासमें सिद्धि प्राप्तहोगी और उसके
सुषुम्णानाडीमें निश्चय वायु प्रवेश करेगा और मनको
जीतलेगा और वायु विन्दुका धारण सिद्धहोगा
और इसलोक और परलोककी सिद्धि प्राप्त होगी इसमें.
संशय नहीं है ॥१००॥ १०१॥ १०२॥
अथ स्वाधिष्ठानचक्रविवरणम् ।
मूलम्-द्वितीयन्तु सरोजञ्च लिंगमूले व्य-
वस्थितम्॥वादिलान्तं च षड्वर्ण परिभा-
स्वरपड्दलम् ॥१०३॥ स्वाधिष्ठानाभिधं
तत्तु पंकज शोणरूपकम्॥ वाणाख्योय-
प्रसिद्धोऽस्ति देवी यत्रास्ति राकिणी १०४
टीका-दूसरा पद्म जो लिङ्गमूलमें स्थितहै वह-व से
लतक- अर्थात्-व-भ-म-य-र-ल-यह-छःवर्णों करके युक्त
है और छ: दलसे शोभितहै.यह रक्तवर्णपद्मका नाम स्वा-
धिष्ठानहै और इस स्थानमें वाणनामक सिद्ध और राकि-
णी देवी अधिष्ठानोहै और ब्रह्मा देवता हैं।।१०३॥१०॥
मूलम्-यो ध्यायति सदा दिव्यं स्वाधिष्ठा-
नारविन्दकम् ॥ तस्य कामाङ्गनाः सर्वा
-भजन्ते काममोहिताः ॥ १०५॥
(१५६) शिवसंहिता भापाटीकासमेता। टीका-जो पुरुप यह दिव्य स्वाधिष्ठानपनका सर्वदा ध्यान करते हैं उनको कामरूपिणी स्त्री कामसे मोहित होके भजतोअर्थात् सेवा करती हैं ।। १०५॥ मूलम्-विविधञ्चाश्रुतं शास्त्रं निःशङ्को वैव- देडुवम् ॥ सर्वरोगविनिर्मुक्तो लोके चरति निर्भयः ॥ १०६॥ टीका-विविधशास्त्र जो कभी श्रवण नहीं किय हो उसकोभी इस पद्मके ध्यानके प्रभावसे निःशंक कहेगा और सर्वरोगसे मुक्तहोके आनन्दपूर्वक संसारमें विचरेगा॥१०६॥ मूलम्-मरणं खाद्यतेतेन स केनापिनखा- द्यते॥ तस्य स्यात्परमा सिद्धिराणिमादि- गुणप्रदा ॥१०७॥ वायुः सञ्चरते देहे रस- वृद्धिर्भवेद्धवम् ॥आकाशपङ्कजगलत्पीयू- पमपि वईते ॥ १०८॥ टोका-यह साधक मृत्युको नाश करदेताहै और वह किसीसे नष्ट नहीं होता और उस साधकको गुण देनेवाली अणिमादि सिद्धि प्राप्त होती हैं और उसके शरीरमें वायु संचार करताहै अर्थात् सुपुम्णामें प्रवेश करताहै और निश्चय रसकी वृद्धि होतीहै और सह- पंचमपंटल। .(१५७) स्रदलकमलसे जो अमृत स्रवताहे उसकी वृद्धि होती है ।। १०७॥ १०८॥ अथ मणिपूरचक्रविवरणम् । मूलम्-तृतीयं पङ्कजं नाभौ मणिपूरकसंज्ञ- कम्॥दशारंडादिफान्तार्ण शोभितं हेमवर्ण कम् ।। १०९॥ रुद्राख्यो. यत्रसिद्धोऽस्ति सर्वमङ्गलदायकः ॥ तत्रस्था लाकिनी- नाम्नी देवी परमधार्मिका ।। ११० ॥ टीका-मणिपूरनामक तीसरा पद्म जो नाभिस्थलमें है वह हेमवर्ण दशदलकरके शोभितहै और-ड-से फ-तक अर्थात् ड-ढ-ण-त-थ-द-ध-न-प-फ-यह दश- वर्णसे युक्त है और उस स्थानमें सर्वमंगलदाता रु- नामक सिद्ध और लाकिनी देवी अधिष्ठात्री और विष्णुदेवता हैं॥१०९॥ ११ ॥ मूलम्-तस्मिन् ध्यानं सदा योगी करोति मणिपूरके।। तस्य पातालसिद्धिःस्यान्नि- रन्तरसुखावहा ॥१११॥ ईप्सितञ्च भवे- लोके दुःखरोगविनाशनम् ।। कालस्य व- ञ्चनञ्चापि परदेहप्रवेशनम् ।। ११२ ॥ टीका-जो साधक इस मणिपूरचक्रको सर्वदा ध्या- - (१५८) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता। न करतेहैं सो सर्वसिद्धिदात्री जो पातालसिद्धि है उसको लाभ करते हैं और उनका दुःख रोगविनाश होके सकल मनोरथ सिद्ध होते हैं और कालको नि- रादर कर देतेहैं और परदेहमें प्रवेश करनेकी शक्ति उत्पन्न होती है ॥ १११ ॥ ११२॥ मूलम्-जाम्बूनदादिकरणं सिद्धानां दर्शनं भवेत् ॥ओपधीदर्शनश्चापि निधीनांद- शनं भवेत् ॥ ११३॥ टीका-यह साधकको स्वर्णआदि रचना करनेकी शक्ति होतीहै और देवतोंका दर्शन और निधि और ओपधीका दर्शन होताहै ॥ ११३॥ मूलम्-हृदयेऽनाहतंनाम चतुर्थ पङ्कजं भ- वेत् ॥११४॥कादिठान्तार्णसंस्थान द्वाद- शारसमन्वितम् ॥ अतिशोणं वायुवीज प्रसादस्थानमीरितम् ॥ ११५॥ टीका-हृदयस्थानमें जो अनाहतनामक चतुर्थ पद्मा है वह-क-से-ठ-तक अर्थात् क-ख-ग-घ-उ-चछ- ज-झ-न-ट-ठ-यह बारह वर्ण और वारहदलसे युक्त है और अति उज्ज्वल रक्तवर्णसे शोभायमान है और
पंचमपटलः ।
(१५९)
वह प्रसन्नस्थान वायुका बीज अर्थात प्राणवायुका
आधार है॥११४॥ ११५॥
मूलम्-पद्मस्थं तत्परं तेजो वाणर्लिंग
प्रकीर्तितम् ॥ यस्य स्मरणमात्रेण दृष्टा-
दृष्टफलं लभेत् ॥ ११६॥
टीका-उस हृदयकमलमें जो परमतेज है उसीको
वाणलिङ्ग कहते हैं जिसके ध्यानमात्रसे साधक इस
लोक और परलोकक! उत्तमफल आनंदपूर्वक लाभ
करते हैं ।। ११६॥
मूलम्-सिद्धः पिनाकी यत्रास्ते काकिनी
यत्र देवता ॥ एतस्मिन्सततं ध्यानं ह-
पाथोजे करोति यः ॥ क्षुभ्यन्ते तस्य
कान्तावै कामार्ता दिव्ययोपितः ॥११७॥
टीका-जिस पद्म पिनाकी सिद्ध और काकिनी
देवी अधिष्ठात्री हैं उस हृदयस्थपद्ममें जो साधक
सर्वदा ध्यान करताहै उसके समीप कामाता सुन्दर
स्त्री अप्सरा आदि मोहित होजाती हैं ।। ३१७ ॥
मूलम्-ज्ञानञ्चाप्रतिमं तस्य त्रिकालवि-
पयम्भवेत् ।। दूरश्रुतिर्दूरदृष्टिः स्वेच्छया
खगतां ब्रजेत् ॥ ११८॥
(१६२) शिवसंहिता भापाटीकासमेता । वशो भवेत् ॥तदा समस्तं त्रैलोक्यं कम्प- ते नात्र संशयः॥ १२५॥ टीका-यह विशुद्धपद्ममें जब योगी मन और प्रा- णको स्थित करके यदि क्रोध करे तो अवश्य चराचर त्रैलोक्य कम्पायमान होजाय इसमें सन्देह नहीं ॥१२॥ मूलम्-इह स्थाने मनो यस्य दैवाद्याति लयं यदा ॥ तदा वाह्यं परित्यज्य स्वा- न्तरे रमते ध्रुवम् ॥ १२६॥ टीका-यह कमलमें साधकका मन दैवात् जब लय होताहै तब सकल बाह्यविपयको त्यागके योगी- का मन मोर प्राण शरीरके अंतरहीमें निश्चय रमण करता ॥ १२६॥ मूलम्-तस्य न क्षतिमायाति स्वशरीरस्य शक्तितः॥ संवत्सरसहनेऽपि वज्रातिक- ठिनस्य वै ॥ १२७॥ यदा त्यजति त- यानं योगींद्रोऽवनिमण्डले ॥ तदा वर्ष- सहस्राणिमन्यते तत्क्षणं कृती ॥१२८॥ टीका-उस योगीका शरीर वनसेभी कठोर होना- ताह और उसको स्वशरीरकी शक्तिप्ते फिसीप्रकारको हानि नहीं होतीहै और सहस्रवर्ष समाधिके पीछे जब पंचमपटलः। उस ध्यानको छोडके योगीकी चित्तवृत्ति संसारमें आ- वेगी तब उस सहस्रवर्षके योगी एकक्षण व्यतीत भया मानेगा।। १२७ ॥ १२८॥ अथ आज्ञाचक्र विवरणम् । मूलम्-आज्ञापनंभ्रुवोर्मध्ये हक्षोपेतं द्विप- त्रकम्।।शुक्लाभंतन्महाकालः सिद्धो दे- व्यत्र हाकिनी ॥ १२९॥ . टीका-भके मध्यमें जो आज्ञापद्म है उसमें ह- दो चीज हैं और सुंदर श्वेतवर्ण दो पत्र हैं और उस स्था- नमें महाकाल सिद्ध है और हाकिनीदेवी आधिष्ठात्री और परमात्मा देवता है ॥ १२९ ।। मूलम्-शरच्चंद्रनिभंतत्राक्षरबीजं विभित।। पुमान् परमहंसोऽयं यज्ज्ञात्वा नावसी- दति ॥ १३०॥तत्र देवः परन्तेजः सर्वत- न्त्रेषु मन्त्रिणः ॥ चिन्तयित्वा परां सिद्धि लभते नात्र संशयः॥ १३३ ॥ टीका-उस आज्ञापनके मध्यमें शरच्चंद्रके समा- न परमतेज चंद्रबीज अर्थात 3 बीज विराजमान है इसके ज्ञान होनेसे परमहंस पुरुपको कभी कर नहीं होता यह परमतेजका प्रकाश सर्वतंत्रोंकरके गो- " (१६४) शिवसंहिता भाषाटोकासमेता । पित है इसके चितनमात्रसे अवश्य परम सिद्धिलाभ होताहै ॥ १३०॥ १३१॥ मूलम्-तुरीयं त्रितयं लिंगं तदाहं मुक्तिदा- यकः ॥ ध्यानमात्रेण योगीन्द्रो मत्समो भवति ध्रुवम् ॥ १३२॥ टीका हे पार्वती ! उस स्थानमें तुरीया तृतीयलिंग हमी मुक्तिके दाता हैं इसके ध्यानमानसे योगीन्द्र निश्चय हमारे तुल्य होजायगा ॥ १३२॥ मूलम्-इडाहि पिंगलाख्याता वरणासीति होच्यते ॥ वाराणसी तयोर्मध्ये विश्वना- थोत्र भापितः ॥ १३३॥ टीका-इस शरीरमें जो दो इडा और पिंगला ना- डी हैं उनको वरणा और असी कहते हैं यह वरणा और असीके मध्यमें स्वयं विश्वनाथजी विराजमान हैं. ता- त्पर्य यह है कि, यह इडा और पिंगलाके मध्यमें जो स्थानहै उसीको शिवजीने वाराणसी कहाहै ॥ १३३ ॥ मूलम्-एतत्क्षेत्रस्य माहात्म्यमृपिभिस्त- त्वदर्शिभिः ॥शास्त्रेषु बहुधा प्रोक्तं परं तत्त्वं सुभापितम् ॥ १३४ ॥ टीका-यह वाराणसी क्षेत्रके माहात्म्यको तत्त्वद- पंचमपटलः । - (१६५) शी ऋपिलोगोंने अनेक शास्त्रोंमें बहुत प्रकारसे परम- तत्त्व कहाहै ।। १३४॥ मूलम्-सुषुम्णा मेरुणा याता ब्रह्मरन्ध्र य- तोऽस्ति वै॥ ततश्चैपा परावृत्त्य तदाज्ञा- पझदक्षिणे ॥ १३५॥ वामनासापुटं या- ति गंगेति परिगीयते ॥ १३६॥ टीका-सुपुम्णानाडी मेरुदंडद्वारा जहां ब्रह्मरन्ध्र है उप्त स्थानमें गई है और इडानाडी मेरुतक जायके लौटीहै और आज्ञाचक्रके दक्षिणभाग होके वामनासापु- टको गई है इसको गङ्गा कहतेहैं ।। १३५॥ १३६॥ मूलम्--ब्रह्मरन्ध्रे हि यत्पनं सहस्रारं व्यव- स्थितम्॥तत्र कन्देहि या योनिस्तस्यांच- न्द्रो व्यवस्थितः ।।१३७।। त्रिकोणाकार- तस्तस्याः सुधाक्षरति सन्ततम्।।इडाया- ममृतं तत्र समं स्रवति चन्द्रमाः।।१३८॥ अमृतं वहति द्वारा धारारूपं निरन्तरम् ॥ वामनासापुटं याति गंगेत्युक्ता हि यो- गिभिः ॥ १३९॥ टीका-ब्रह्मरन्ध्रमें जो सहस्रदल पद्म है उस पद्मके कन्दमें योनि है उस योनिमें चन्द्रमा विराजमान है
(१६६) शिवसहिता भाषाटीकासमेता।
और वही त्रिकोणाकार योनीसे चन्द्रविगलित अमृत
सर्वदा स्रवता है सो अमृत चंद्रमासे इडानाडीद्वारा
समभावसे निरन्तर धारारूप गमन करता है और
उस इडानाडीकी गति वामनासापुटमें है उस हेतुसे योगी
लोग इस नाडीको गंगा कहतेहैं ॥१३७॥१३८॥१३९॥
मूलम्-आज्ञापङ्कजदक्षांसादामनासापुटंग-
ता। उदग्वहेति तत्रेडा गंगेति समुदा-
हता॥१४॥
टीका-वह इडानाडी आज्ञापनके दक्षिणभागसे
वामनासापुटको गमन करती है इसीको उदग्वाहिनी
गंगा कहते हैं ॥ १४॥
मूलम्-ततो द्वयोहि मध्येतु वाराणसी वि-
चिन्तयेत् । तदाकारा पिंगलापि तदाज्ञा-
कमलोत्तरे ॥ दक्षनासापुटे याति प्रोक्ता-
स्माभिरसीति वै ॥ १४१ ॥
टीका-यह इडा और पिङ्गलाके मध्यस्थानको
वाराणसी चिन्तनाकरे और इडानाडीके समान पि-
ङ्गलाभी उस आज्ञाकमलके वामभागले दक्ष नासा-
पुटको गई है इस हेतुसे हेदेवी ! इस पिङ्गलाको हमने
असी कहाहे ॥ १४१॥
पंचमपटलः । (१६७) मूलम्-मूलाधारे हि यत्पनं चतुष्पत्रं व्यव- स्थितमातत्र कन्दस्ति या योनिस्तस्यां मूर्यो व्यवस्थितः ॥ १४२ ॥ टीका-जो मूलाधारपद्म चारदलसे युक्त है उस कमल- के कन्दमें जो योनिहै इस योनिमें सूर्य स्थितहै ।।१४२॥ मूलम्-तत्सूर्यमण्डलद्वाराद्विपं क्षरति सन्ततम्॥१४३॥पिंगलायां विपं तत्रसम- पंयति तापनः ॥ विपं तत्र वहन्ती या धा- रारूपं निरन्तरम् ॥ दक्षनासापुटे याति कल्पितेयन्तु पूर्ववत् ॥ १४४ ॥ टीका-यही सूर्यमण्डलसे निरन्तर विप स्रवतादे और पिङ्गलाद्वारा गमन करताहै और वह विप सर्वदा धारारूप पिङ्गलानाडीसे प्रवाहित रहताहै और यह पिङ्गलानाडी दक्षिणनासापुटमें गई है ॥ १४३ ॥१४४ ॥ मूलम्-आज्ञापङ्कजवामास्यावक्षनासापुटं गता ॥ उदग्वहाँपिंगलापि पुरासीति प्रकीर्तिता ॥ १४५॥ टीका-यद नाडी आज्ञाकमलके वामभागसे दक्षिण नासिकापुटको गई है इस हेतुसे यह पिङ्गलानाडीको असी कहते हैं । १४५॥
.. " (१६८) शिवसंहिता आपाटीकासमेता। मूलम्-आज्ञापनमिदं प्रोक्तं यत्र देवो महे- श्वरः॥१४६॥ पीठत्रयं ततश्चोर्ध्व निरु- क्तं योगचिन्तकैः ॥ तद्विन्दुनादशत्त्या- ख्यं भालपद्मे व्यवस्थितम् ॥ १४७ ॥ टोका-इस स्थानमें महेश्वर देवताहै इसको आज्ञापन कहते हैं और योगचिन्तक लोग कहते हैं कि, इस पद्मके ऊपर पीठत्रयकी स्थिति है अर्थात् नाद, बिंदु, शक्ति, यह तीनों इस भालपद्ममें विराज- मान हैं ॥ १४६॥ १४७॥ मूलम्-यः करोति सदाध्यानमाज्ञापनस्य गोपितम् ॥ पूर्वजन्मकृतं कर्म विनश्येद- विरोधतः ॥ १४८॥॥ टीका-जो पुरुप सर्वदा गोपित करके इस आज्ञा- कमलका ध्यान करते हैं उनका पूर्वजन्मकृत कर्मफल सकल निर्विघ्न नाश होजाताहै ॥ १४८॥. मूलम्-इह स्थितः सदा योगीध्यानं कुर्या- निरन्तरम् ॥ तदा करोति प्रतिमा प्रति- जापमनर्थवत् ॥१४९॥ टीका-जब योगी यह ध्यान सर्वदा निरन्तर करे पंचमपटलः। तो उसका प्रतिमापूजन करना वा जप करना सर्वथा अनर्थवत् है ।। १४९॥ मूलम्-यक्षराक्षसगन्धर्वा अप्सरोगणकिन्न- राः॥सेवन्ते चरणौ तस्य सर्वे तस्य व- शानुगाः॥ १५० ॥ टीका-यक्ष और गक्षस और गन्धर्व और अप्सरा और किन्नर आदि सब इस ध्यानयुक्त योगीके वशमें होजाते हैं और उसके चरणकी सेवा करते हैं ॥१५॥ मूलम्-करोति रसनां.योगीप्रविष्टां विपरी- तगाम्॥ लम्बिकोर्वेषु गर्तेषु धृत्वा ध्या- नं भयापहम् ।। १५१ ॥ अस्मिन् स्था- ने मनो यस्य क्षणार्धं वर्ततेऽचलम् ॥ तस्य सर्वाणि पापानि संक्षयं यान्ति तत्क्ष- णात् ।।१५२॥ टीका-जो योगी विपरीतगामी जिह्वाको ऊपर तालुमूलमें प्रवेश करके यह भयनाशक आज्ञाकमल- का ध्यान अर्धक्षणभी मन अचल स्थिरतापूर्वक करते हैं उनका सकल पातक उसीक्षण नाश होजाताहै।॥ १५॥ १५२॥ मूलम्-यानि यानि हि प्रोक्तानि पंचप फ- . ८
(१७०) शिवसंहिता नापाटीकासमेता ।
लानि वै ॥ तानि सर्वाणि सुतरामेतज्ज्ञा-
नाद्भवन्ति हि ॥ १५३॥
टीका-पंच पद्मका जो जो फल पहिले कहा सो
सबका समस्त फल आपही इस आज्ञाकमलके ध्यान-
सेही प्राप्त होजायगा ॥ १५३ ॥
मूलम्-यः करोति सदाभ्यासमाज्ञापझे वि-
चक्षणः॥ वासनाया महावन्धं तिरस्कृ-
त्य प्रमोदते ।। १५४॥
टीका-जो बुद्धिमान् सर्वदा मन स्थिर करके यह
आज्ञापनका अभ्यास करते हैं वह वासनारूपी महा-
बन्धको निरादर करके आनन्द लाभ करते हैं ॥१५॥
मूलम्-प्राणप्रयाणसमये तत्पनं यः स्मर-
न्सुधीः।। त्यजेत्प्राणं स धर्मात्मा परमा-
त्मनि लीयते ।। १५५॥
टीका-जो बुद्धिमान् मृत्युके समय उस आज्ञापन-
का ध्यान करेगा सो धर्मात्मा प्राणको त्यागके परमा-
त्मामें लय होजायगा ॥१५॥
मूलम्-तिष्ठन् गच्छन् स्वपन् जाग्रत् यो-
ध्यानं कुरुते नरः॥ पापकर्म विकुर्वाणो
नहि मज्जति किल्विषे ॥ १५६ ॥
पंचमपटलः। (१७१) टीका-जो मनुष्य बैठे चलते जाग्रतमें स्वपमें सर्वदा इस कमलका ध्यान करते हैं सो यदि पापकर्म रतभी हों तोभी मोसको प्राप्त होते हैं ।। १५६ ॥ मूलम-राजयोगाधिकारी स्यादेतच्चिन्तन- तो ध्रुवम्॥योगी बन्धाद्विनिर्मुक्तः स्वीयया प्रभया स्वयम् ॥१५७॥ द्विदलध्यानमा- हात्म्यं कथितुं नैव शक्यते॥ ब्रह्मादिदे- वताश्चैव किञ्चिन्मत्तो विदन्ति ते ॥१५८॥ टीका-जो इस कमलका ध्यान करता है वह निश्चय राजयोगका अधिकारी है योगी स्वयं अपने प्रभासे सकलबन्धसे मुक्त होजाता है हे देवि ! इस द्विदलपयके माहात्म्यको कोई कहनेमें समर्थ नहीं है ब्रह्मा आदि देवता इस पद्मके माहात्म्यको किञ्चित् हमारे द्वारा जानते हैं ।। १६७ ॥ १५८॥ मूलम्-अत ऊर्व तालुमूले सहस्रारं सरोरु- हम् ॥अस्ति यत्र सुपुम्णाया मूलं सविव- रंस्थितम् ।। १५९॥ टीका-इस आज्ञाप के ऊपर तालुमूलमें सहस्त्र- दल कमल शोभायमान है उसी स्थानमें ब्रह्मरन्ध्रके विवरमूलमें सुषुम्णा स्थित है।। १६९ ।।
(१७२) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । मूलम्-तालुमूले सुपुम्णास्य अधोवका प्रव- तते ॥ मूलाधारण योन्यस्ताः सर्वनाडयः समाश्रिताः ॥ ता वीजभूतास्तत्त्वस्य त्र- ममार्गप्रदायिकाः ॥ १६० ॥ टीका-वह सुषुम्णाका मुख तालुमूल अर्थात् त्र- मरन्ध्रमें नीचेको वर्तमान है और मूलाधारसे योनि पर्यत जो सकल नाडी हैं वह इस तत्त्वज्ञानवीजस्वरूप ब्रह्ममार्गकी दाता सुषुम्णाके अधोवदनके अवलम्बसे स्थित हैं ॥१६॥ मूलम्-तालुस्थाने च यत्पमं सहस्रारं पुरो- दितम्॥तत्कन्दे योनिरेकास्ति पश्चिमा- भिमुखी मता॥१६॥ तस्य मध्ये सुपु- म्णाया मूलं सविवरं स्थितम् ॥ ब्रह्मरन्ध्र तदेवोक्तमामूलाधारपङ्कजम् ॥ १६२ ॥ टीका-तालुस्थान में जो सहस्रदल कमल कहाग- या है उसके कन्दमें एक योनि पश्चिमाभिमुखी है अर्थात् पीछेको मुख है उस योनिके मध्यमें जो मूलविवर है उसमें सुषुम्णा ज्ञाननाडीस्थित है हे देवी! इसको ब्रह्मरन्ध और इसीको मूलाधारपद्मभी कहते हैं ।। १६३ ।। १६२ ।। मूलम्-तत्रांतरन्ध्रे चिच्छक्तिः सुपुम्णा कु- पंचमपटल। (१७३) ण्डली सदा ॥१६३॥ सुषुम्णायां स्थिता नाडीचित्रास्यान्मम वल्लभे ॥ तस्यां म- म मते कार्या ब्रह्मरन्ध्रादिकल्पना॥१६॥ टीका-यह सुषुम्णानाडीके रनमें कुण्डलिनी शक्ति सर्वदा विराजमान है वह सुषुम्णा अन्तर्गता शक्तिको चित्रानाडी कहते हैं हे प्रिये पार्वति ! हमारे मतमें इसी चित्रासे ब्रह्मरन्ध्र आदि कल्पना भई हैं ॥१६३॥१६॥ मूलम्-यस्याः स्मरणमात्रेण ब्रह्मज्ञत्वं प्र- जायते ॥ पापक्षयश्च भवतिन भूयः पुरु- पो भवेत् ॥ १६५॥ टीका-यह चित्रानाडीके ध्यानमानसे ब्रह्मज्ञान उत्पन्न होता है और पाप क्षय होजाता है और फिर संसाररूपी वन्धमें योगी नहीं पड़ता अर्थात् मोक्ष होजाता है ।। १६५ ॥ मूलम्-प्रवेशितं चलाडष्टं मुखे स्वस्य निवे- शयेत् ॥ तेनात्र न वहत्येव देहचारी स- मीरणः ॥ १६६॥ टीका--दक्षिणहाथके अङ्गुष्टको मुखमें प्रवेश कर- के मुखको बन्द करलेनेसे देहचारी जो प्राणवायु है वह निश्चय स्थिर होजाता है। १६६ ॥
.(१७४) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता। मूलम्-तेन संसारचक्रेस्मिन्न भ्रमन्ते चस- वंदातदर्थं ये प्रवर्तन्ते योगिनःप्राणधार- णे॥१६७॥तत एवाखिला नाडी निरुद्धा चाष्टवेष्टनम्॥ इयं कुण्डलिनी शक्ती रन्ध्र त्यजति नान्यथा ॥ १६८॥ टीका-यह प्राणवायुके स्थिर होजानेसे इस संसार चक्रमें सर्वदा भ्रमण करना छूटजाता है अर्थाद मोक्ष होजाता है इसहेतुसे योगी प्राणवायुके धारण करने में प्रवृत्त होते हैं और इसधारणसे सकलनाडी जो मल और काम क्रोधादि आठप्रकारसे वन्धनमें हैं वह सुल जाती हैं तब यह कुण्डलिनीशक्ति ब्रह्मरन्ध्रको निश्चय त्याग देती है इसके त्यागदेनेसे जीव ब्रह्मका सम्बन्ध होजाता है ॥ १६७॥ १६८॥ मूलम्-यदा पूर्णासु नाडीपु सन्निरुद्धानिला- स्तदा ॥ चन्धत्यागेन कुण्डल्या मुखं र- न्ध्राद्वहिर्भवेत् ॥ सुपुम्णायां सदैवायं व- हेत्प्राणसमीरणः ॥ १६९॥ टीका-जब वायु निरोध होके सकलनाडीमें पूर्ण होजायगा तब कुण्डलिनी अपने बन्धको त्याग- के ब्रह्मरन्ध्रके मुखको त्यागदेगी तब प्राणवायुका पंचमपटल। (१७५) प्रवाह सदेव सुषुम्णामें होजायगा ॥ १६९ ॥ मूलम्-मूलपद्मस्थिता योनिर्वामदक्षिण- कोणतः।इडापिंगलयोर्मध्ये सुपुम्णा यो- निमध्यगा।। १७० ॥ ब्रह्मरध्रन्तु तत्रैव सुपुम्णाधारमण्डले ॥ यो जानाति स मुक्तः स्यात्कर्मबन्धाद्विचक्षणः ॥१७१॥ टीका-मूलाधारपद्मस्थित जो योनि है उस योनिके वाम दक्षिण भागमें इडा और पिंगला नाडी स्थित हैं और दोनों नाडीके बीचमें अर्थात् योनिके मध्य में सुपुम्णाकी स्थिति है उसी सुषुम्णाके आधारमंडल में अर्थात् उसके मध्यमें ब्रह्मरन्ध है जो इसको जानता है सो बुद्धिमान् कर्मबन्धसे मुक्त है ॥ १७० ॥ १७ ॥ मूलम-ब्रह्मरन्ध्रमुखे तासां संगमः स्याद- संशयः॥ तस्मिन्स्नाने स्नातकानां मुक्तिः स्यादविरोधतः ॥ १७२॥ टीका-ब्रह्मरन्धके मुखमें इन तीनों नाडीका नि- श्य सम्बन्ध है इसमें स्नान करनेसे ज्ञानीलोगोंको मुक्तिलाभ होगी॥ १७२॥ मूलम्-गंगायमुनयोर्मध्ये वहत्येपा सरस्व- ती॥तासां तुसंगमे स्नात्वा धन्यो याति . परांगतिम् ।। १७३ ॥
(१७६) शिवसंहिता भापाटीकासमेता । टीका-गंगा यमुनाके मध्यमें सरस्वतीका प्रवाह है यह त्रिवेणीसंगममें स्नान करनेसे मनुष्य परमगतिको प्राप्त होता है ॥ १७३॥ मूलम् इडा गंगा पुरा प्रोक्ता पिंगला चार्कपु- त्रिका ॥ मध्या सरस्वती प्रोक्ता तासां संगोऽतिदुर्लभः॥ १७॥ टीका-इडा गंगा है और पिंगला यमुना है और मध्यमें सुषुम्णा सरस्वती है यह त्रिवेणी संगम कहा गया है इसका स्नान अतिदुर्लभ है ॥ १७४ ॥ मूलम्-सितासिते संगमे यो मनसा स्ना- नमाचरेत् ॥ सर्वपापविनिर्मुक्तो याति ब्रह्मसनातनम् ॥ १७५॥ टीका-यह इडा और पिंगलाके संगममें मानसिक सान करनेसे साधक सर्व पापसे मुक्त होके सनातन ब्रह्ममें लय होजाताहै ॥ १७ ॥ मूलम्-त्रिवेण्यां संगमे यो वैपितृकर्म स- माचरेत्॥ तारयित्वा पितॄन्सर्वान्स याति परमां गतिम् ॥ १७६॥ टीका-जो पुरुष इस त्रिवेणीसंगममें पितृकर्मका पंचमपटलः। (१७७) अनुष्ठान करते हैं वह सर्व पितृकुलको तारके परम गतिको लाभ करते हैं ।। १७६ ॥ मूलम्-नित्यं नैमित्तिकं काम्यं प्रत्यहं यः समाचरेत्॥मनसा चिन्तयित्वा तु सोऽक्ष- यं फलमाप्नुयात् ॥ १७७॥ टीका-उसी संगमस्थानमें जो साधक नित्य और नै. मित्तिक और काम्य कर्मका अनुष्ठान सर्वदा मनसे चिन्त- नपूर्वक करते हैं सो अक्षय फललाभ करते हैं ।। ३७७॥ मूलम्-सकृद्यः कुरुते स्नानस्वर्गे सौख्यंभु- नक्ति सः॥ दग्ध्वा पापानशेपान्वै योगी शुद्धमतिः स्वयम्॥१७८॥अपवित्रः पवि- त्रो वा सर्वावस्थां गतोपि वास्नानाचर- णमात्रेण पूतो भवति नान्यथा ॥ १७९ ॥ टीका-जो पवित्रमति योगी एकवार इस संगममें नान करते हैं वह सर्व पापको दम्पकरके स्वर्गका दिव्य भोग भोगते हैं और यह साधक पवित्र हो वा अपवित्र हो वा किसी अवस्थामें हो यह संगमके ध्यानरूपी नानमानसे निश्चय पवित्र होजायगा ॥ १७८॥१७९।। मूलम्-मृत्युकाले प्लुतं देहं त्रिवेण्या:सलि-
(१७८) शिवसंहिता जापाटीकासमेता।
ले यदा॥ विचिन्त्य यस्त्यजेत्प्राणान्स
तदा मोक्षमाप्नुयात् ॥ १८०॥
टीका-मृत्युके समयमें साधक जो यह चिंतन करे
कि हमारा शरीर त्रिवेणीके सलिलमें मग्न है तो उसी
क्षण प्राणको त्यागके मोक्षगतिको प्राप्त होगा ॥१८०॥
मूलस-नातः परतरं गुह्यं त्रिपुलोकेषु विद्य-
ते॥ गोप्तव्यं तत्प्रयत्नेन न व्याख्येयं
कदाचन ॥ १८१॥
टीका-इस तीर्थसे परे त्रिभुवनमें दूसरा गुप्त तीर्थ
नहीं है इसको यत्नसे गोपित रखना उचित है यह कदा-
पि प्रकाश करनेके योग्य नहीं है ।। १८१ ॥
मूलम्-ब्रह्मरन्ध्रे मनो दत्त्वा क्षणार्धं यदि
तिष्ठति ॥ सर्वपापविनिमुक्तः सयाति
परमां गतिम् ॥ १८२॥
टीका-ब्रह्मरन्ध्रमें मन देकरके यदि क्षणार्धभी स्थिर
रक्खे तो सर्वपापसे मुक्त होके साधक परमगतिको
अर्थात मोक्षको प्राप्त होजाय ॥ १८२ ।।
मूलम्-अस्मिन् लीनं मनो यस्य स योगी
मयिलीयते॥ अणिमादिगुणान्भुक्तास्ते-
च्छया पुरुपोत्तमः ॥ १८३॥
पंचमपटलः। टीका-हे पार्वती ! इस ब्रह्मरन्ध्रमें जिसका मन लोन होय सो पुरुषोत्तम योगी अणिमादिगुणोंको भोगके इच्छापूर्वक हमारेमें लय होजायगा ।। १८३ ॥ मूलम् एतद्न्ध्रध्यानमात्रेण मर्त्यः संसारे स्मिन्वल्लभो मे भवेत्सः ॥ पापान जि- त्वा मुक्तिमार्गधिकारी ज्ञानं दत्त्वा तार- यत्यद्भुतं वै ॥ १८४॥ टीका है देवी ! इस ब्रह्मरन्ध्रके ध्यानमात्रसे यह सं- सारमें प्राणी हमको प्रिय होजाता है और पापराशिको जीतके यह साधक मुक्तिमार्गका अधिकारी होजाता है और अनेक मनुष्योंको ज्ञान उपदेश करके संसार- से परित्राण करदेता है ।। १८४ ॥ मूलम्-चतुर्मुखादित्रिदशैरगम्यं योगिवल्ल- भम् ॥ प्रयत्नेन सुगोप्यं तद्ब्रह्मरन्धं म- योदितम् ॥ १८५॥ टीका-हे देवी! यह ब्रह्मरन्धका ध्यान जो हमने कहा है इसको यत्न करके गोपित रखना उचित है यह ज्ञान योगीलोगोंको अतिप्रिय है इसका मार्ग ब्रह्मा आदि देवताओंकोभी अगम्य है ।। १८५ ॥ मूलम्-पुरा मयोक्ता या योनिः सहस्रारेस- + ( १८०) शिवसहिता भापाटीकासमेता । रोरुहे ॥ तस्याऽधो वर्तते चन्द्रस्तद्वयानं क्रियते बुधैः ।। १८६॥ टीका-हे देवि ! पहिले जो सहस्रदलकमलके मध्यमें योनिमण्डल हमने कहा है उस योनिके अधोभागमें चन्द्रमा स्थित हैं यह चन्द्रमण्डलका बुद्धिमान लोग सर्वदा ध्यान करते हैं ॥ १८६॥ मूलम्-यस्य स्मरणमात्रेण योगीन्द्रोऽव- निमण्डले।पूज्यो भवति देवानां सिद्धानां सम्मतो भवेत् ॥ १८७॥. टीका-इस चन्द्रमंडलके ध्यानमानसे योगीन्द्र संसारमें पूजनीय होजाता है और देवता और सिद्ध- लोगोंके तुल्य होजाता है ॥ १८७॥ मूलम्-शिरःकपालविवरे ध्यायेदुग्धमहो- दधिम् ॥ तत्र स्थित्वा सहस्रारे पद्मे चन्द्र विचिन्तयेत् ॥ १८८॥ टीका-शिरस्थित जो कपालविवर है उसमें क्षीर समुद्रका ध्यान करे उसी स्थानमें स्थितिपूर्वक सहस्र- दलकमलमें चन्द्रमाका चिन्तन करे ॥ १८८ ॥ मूलम्-शिर कपालविवरे द्विरष्टकलयायु- तः॥ पीयूपभानुहंसाख्यं भावयेत्तं निरं- (१८१) पंचमपटलः जनम् ॥ १८९॥ निरन्तरकृताभ्यासात्रि- दिने पश्यति ध्रुवम्।। दृष्टिमात्रेण पापौघं दहत्येव स साधकः ॥१९॥ टीका-वह शिरःस्थित कपालविवरमें सोलह कलासं. युक्त अमृतकिरणसे युक्त हंससंज्ञक निरंजनका चिन्तन करे निरन्तर तीन दिन यह अभ्यास करनेसे निरञ्जनका साक्षात् साधकको अवश्य प्रकाश होगा सोसाधकहष्टिमा- से सर्व पातकोंको दहन करडालेगा ॥ १८९ ॥१९॥ मूलम्-अनागतञ्च स्फुरति चित्तशुद्धिर्भवे- त्खलु ॥ सद्यः कृत्वापि दहति महापात- कपञ्चकम् ॥ १९१॥ टीका-यह ध्यान करनेसे अनागतविपयकी स्फू- ति होगी अर्थात जो विपय कभी उत्पन्न नहीं भया है उसकी स्फूर्ति होगी और चित्तकी शुद्धि होगी और सा- धक ध्यानमात्रसे उसी क्षण पञ्चमहापातक दहन कर- डालेगा ॥१९॥ मूलम्-आनुकूल्यं ग्रहा यान्ति सर्वे नश्य- न्त्युपद्रवाः ॥ उपसर्गाःशमं यान्ति युद्धे जयमवाप्नुयात् ॥ १९२॥खेचरीभूचरी- सिद्धिर्भवेत्क्षीरेन्दुदशनात् ॥ ध्यानादेव
(१८२) शिवसंहिता भापाटीकासमेता।
भवेत्सर्व नात्र कार्या विचारणा ॥ १९३ ॥
सन्तताभ्यासयोगेन सिद्धो भवति मा-
नवः॥ सत्यं सत्यं पुनः सत्यं मम तुल्यो
भवेद्भुवम् ॥ योगशास्त्रं च परमं योगिनां
सिद्धिदायकम् ॥ १९४॥
टीका-शिरःस्थचन्द्रमाका ध्यान करनेसे सर्व ग्रह
अनुकूल होजाते हैं और समस्त उपद्रवका नाश होजा-
ताहै और उपसर्ग प्रशमित्त होते हैं और युद्ध में जय
लाभ होता है और खेचरी भूचरीकी सिद्धि प्राप्त होती है
इसमें सन्देह नहीं है और निरन्तर यह योगाभ्यास
करनेसे अवश्य साधक सिद्ध होजाता है हे पार्वती! हम
सत्य सत्य वारंवार कहते हैं कि हमारे तुल्य होजाय.
गा इसमें सन्देह नहीं है यह परमयोग योगीलोगोंके
सिद्धिका दाता है ।। १९२ ॥ १९३ ॥ १९४॥
अथ राजयोगकथनम्।
मूलम्-अत ऊर्ध्व दिव्यरूपंसहस्रारं सरोरु-
हम् ॥ ब्रह्माण्डाख्यस्य देहस्य वाह्ये
तिष्ठति मुक्तिदम् ॥१९५॥ कैलासो नाम
तस्यैव महेशो यत्र तिष्ठति।अकुलाख्योऽ-
विनाशी च क्षयवृद्धिविवर्जितः ॥ १९६ ॥
पचमपटल।
(१८३)
टोका-तालुके ऊपरभागमें दिव्य सहस्रदल कमल
है यह कमल मुक्तिदाता ब्रह्माण्डरूपी शरीरके बाहर
स्थित है अर्थात शरीरके उपर अंतमें है इसी कमल-
को कैलास कहते हैं इसी स्थानमें महेश्वरकी स्थिति है
यह ईश्वर निराकुल अविनाशी और क्षय द्धिरहित
है ॥ १९५ ।। १९६ ॥
मूलम्-स्थानस्यास्य ज्ञानमात्रेण नृणां सं-
सारेऽस्मिन्सम्भवो नैव भूयः ॥ भूतग्रा-
मं सन्तताभ्यासयोगात्कर्तुं हर्तुं स्याच
शक्तिः समग्रा ॥ १९७॥
टीका-इस स्थानके ज्ञानमात्रसे जीवका यह सं-
सारमें फिर जन्म नहीं होता और सर्वदा यह ज्ञानयोग
अभ्यास करनेसे जीवमात्रके स्थिति संहार करनेकी
शक्ति उत्पन्न होती है ।। १९७॥
मूलम्-स्थाने परे हंसनिवासभूते कैलासना-
म्नीह निविष्टचेताः॥योगी हतव्याधिरधः
कृताधिर्वायुश्चिरंजीवति मृत्युमुक्तः१९८॥
टीका-यह कैलासनामक स्थानमें परमहंसका
निवास है सो सहस्रदलकमलमें जो साधक मनको
स्थिर करता है उसकी सकल व्याधि नाश होजाती है
और मृत्युसे छूटके अमर होजाताहै ॥ १९८॥
(१८४) शिवसंहिता पापाटीकासमेता। मूलम्-चित्तवृत्तिर्यदा लीना कुलाख्ये पर- मेश्वरेतदा समाधिसाम्येन योगी निश्च- लतां व्रजेत् ॥१९९॥ टीका-जब साधक यह कुलनामक ईश्वर में चित्त- कोलीन करदेगा तब योगीकी समाधि निश्चल सम होजायमी ॥ १९९ ॥. मूलम्-निरन्तरकृते ध्याने जगदिस्मरणं भवेत् ॥ तदा विचित्रसामर्थ्य योगिनो भवति ध्रुवम् ॥ २००॥ टीका-यह निरन्तर ध्यान करनेसे जगत् विस्मरण होजायगा तब योगीको अवश्य विचित्र सामर्थ्य हो. जायगी ॥ २०॥ मूलम्-तस्मादलितपीयूपं पिवेद्योगी निर- न्तरम्॥ मृत्योर्मृत्युं विधायाशु कुलं जि- त्वा सूरोरुहे ॥२०१॥ अत्र कुण्डलिनी, शक्तिलयं याति कुलाभिधा ॥ तदा चतु- विधा सृष्टिीयते परमात्मनि ॥ २०२॥ टीका-सहस्रदलकमलसे जो अमृत स्रवता है उ- सको योगी निरन्तर पान करता है सो योगी अपने मृ- त्युका मृत्युविधानपूर्वक कुलसहित जय करके चिरं- पंचमपटलः। (१८५) जीवी होजाता है और यही सहस्रदलकमलमें कुलरूपा कुण्डलिनी शक्तिका लय होजाता है तब यह चतुर्विध सृष्टिभी परमात्मामें लय होजाती है ॥२०१॥ २०२॥ मूलम् यज्ज्ञात्वा प्राप्य विपयं चित्तवृत्ति- विलीयते॥ तस्मिन्परिश्रमं योगी करो- ति निरपेक्षकः ॥२०३॥ टीका-यह सहस्रदलकमलके ज्ञान होनेसे अर्थात् इस विषयको प्राप्त करनेसे चित्तवृत्तिका लय होजाता है इस हेतुसे इसके ज्ञानार्थ निरपेक्षरूपसे योगी परिथ. म करे।।२०३॥ मूलम्-चित्तवृत्तिर्यदा लीना तस्मिन्योगी भवेद्धवम्॥ तदा विज्ञायतेऽखण्डज्ञानरूपो निरञ्जनः॥२०४॥ टीका-जब योगीकी चित्तवृत्ति इसमें निश्चय लय होजायगी तब अखण्ड ज्ञानरूपी निरजनका प्रकाश होगा अर्थात् ज्ञान होगा ॥२०४।। मूलम्-ब्रह्मांडवाह्ये संचिंत्य स्वप्रतीकं य- थोदितम् ॥ तमावेश्य महच्छून्यं चिन्त. येदविरोधतः ।। २०५॥ टीका-ब्रह्माण्डके बाहर अर्थात् ब्रह्मांडरूप शरीरके .(१८४) शिवसंहिता नापाटीकासमेता। मूलम्-चित्तवृत्तियंदा लीना कुलाख्ये पर- मेश्वरे॥तंदा समाधिसाम्येन योगी निश्च- लतां व्रजेत् ॥१९९॥ टीका-जब साधक यह कुलनामक ईश्वरमें चित्त- को लीन करदेगा तब योगीकी समाधि निश्चल सम होजायमी ॥ १९९ ॥. मूलम्-निरन्तरकृते ध्याने जगद्विस्मरणं भवेत् ॥ तदा विचित्रसामर्थ्य योगिनो भवति ध्रुवम् ॥२०॥ टीका-यह निरन्तर ध्यान करनेसे जगत् विस्मरण होजायगा तब योगीको अवश्य विचित्र सामर्थ्य हो- जायगी ॥ २०॥ मूलम्-तस्माद्गलितपीयूषं पिवेद्योगी निर- न्तरम्॥ मृत्योर्मृत्यु विधायाशु कुलं जि- त्वा सरोरुहे ॥२०१॥ अन कुण्डलिनी शक्तिलयं याति कुलाभिधा ॥ तदा चतु- विधा सृष्टिीयते परमात्मनि ॥ २०२॥ टीका-सहस्रदलकमलसे जो अमृत स्रवता है उ- सको योगी निरन्तर पान करता है सो योगी अपने मृ- त्युका मृत्युविधानपूर्वक कुलसहित जय करके चिरं- पंचमपटलः। (१८५) जीवी होजाता है और यही सहस्रदलकमलमें कुलरूपा कुण्डलिनी शक्तिका लय होजाता है तब यह चतुर्विध सृष्टिभी परमात्मामें लय होजाती है ।।२०१॥२०२॥ मूलम्-यज्ज्ञात्वा प्राप्य विपयं चित्तवृत्ति- विलीयते ॥ तस्मिन्परिश्रमं योगी करो- ति निरपेक्षकः ॥ २०३॥ टीका-यह सहस्रदलकमलके ज्ञान होनेसे अर्थात् इस विपयको प्राप्त करनेसे चित्तवृत्तिका लय होजाता है इस हेतुसे इसके ज्ञानार्थ निरपेक्षरूपसे योगी पस्थित म करे ।। २०३॥ मूलम्-चित्तवृत्तिर्यदा लीना तस्मिन्योगी भवेद्धवम्॥ तदा विज्ञायतेऽखण्डज्ञानरूपो निरञ्जनः॥२०४॥ टीका-जब योगीकी चित्तवृत्ति इसमें निश्चय लय होजायगी तब अखण्ड ज्ञानरूपी निरअनका प्रकाश होगा अर्थात ज्ञान होगा ॥२०॥ मूलम् ब्रह्मांडवाह्ये संचित्य स्वप्रतीकं य- थोदितम् ॥ तमावेश्य महच्छून्यं चिन्त- येदविरोधतः ॥ २०५॥ टीका-ब्रह्माण्डके बाहर अर्थात् ब्रह्मांडरूप शरीरके (१८६) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । बाहर पूर्वोक्त स्वप्रतीकका चिन्तन करे उससे चित्तको स्थिर करके महत् शून्यका शुद्धवृत्तिसे चिन्तन करे२०५ मूलम्--आद्यन्तमध्यशून्यं तत्कोटिसूर्यस- मप्रभम् ॥ चन्द्रकोटिप्रतीकाशमभ्यस्य सिद्धिमाप्नुयात् ॥ २०६॥ टीका-आदि अंत मध्य शुन्य यह सर्वत्र शून्यमें कोटि सूर्यके समान प्रभा और कोटिचन्द्रके समान शीतलप्रकाशके देखनेका अभ्यास करनेसे साधकको परमसिद्धि लाभ होगी। २०६॥ मूलम्-एतद्वयानं सदा कुर्यादनालस्यं दिने दिने ॥ तस्य स्यात्सकला सिद्धिर्व- त्सरान्नात्र संशयः॥२०७॥ टीका-जो पुरुप आलस्यको त्यागके सर्वदा प्रति- दिन इस शुन्यका ध्यान करेगा उसको निश्चय एकवर्ष में सकल सिद्धि लाभ होगी ॥२०७॥ मूलम्-क्षणार्धं निश्चलं तत्र मनो यस्य भ- वेद्धवम्॥स एव योगी सद्भक्तः सर्वलोकेपु पूजितः ॥ तस्य कल्मषसातस्तत्क्षणा- देव नश्यति ॥ २०८॥ टीका-जो साधक इस शून्यमें अर्थक्षणभी मनको
। पंचमपटलः।
(१८७)
निश्चल स्थिर रक्खेगा वही निश्चय यथार्थ भक्त योगी
है और वह सर्वलोकमें पूजित होता है और उसके पाप-
का समूह उसी क्षण नष्ट होजाता है ॥२०८॥
मूलम्-यं दृष्ट्वा न प्रवर्तते मृत्युसंसारव-
मनि॥अभ्यसेत्तं प्रयत्नेन स्वाधिष्टानेन
वमना ॥ २०९॥
टीका-इसके अवलोकन करनेसे मृत्युरूप जो सं-
सारपथ है इसमें भ्रमण करना छूट जायगा अर्थात
जन्ममरणसे रहित होजायगा इसका अभ्यास स्वाधि-
प्ठानमार्ग से यत्न करके करना उचित है ॥२०९॥
मूलम्-एतध्यानस्य माहात्म्यं मया वक्तुं
न शक्यते ॥ यः साधयति जानाति
सोस्माकमपि सम्मतः ॥ २१० ॥
टीका-हे देवी ! इस शून्यके ध्यानके माहात्म्यको
हम नहीं कहसकते अर्थात् बहुत विशेष है जो योगी
इसका अभ्यास करते हैं सो जानते हैं और वह हमारे
बराबर हैं ॥ २१०॥
मूलम्-ध्यानादेव विजानाति विचित्रफल-
सम्भवम् ॥अणिमादिगुणोपेतो भवत्ये-
वन संशयः॥ २११॥
(१९०) शिवसंहिता भापाटीकासमेता। रता है सो मुक्त है इसमें संशय नहीं है और निश्चय वही योगी सद्भक्त है और सर्वलोकमें पूजनीय है २१७॥२१८॥ मूलम्-अहमस्मीति यन्मत्वा जीवात्मपर- मात्मनोः॥अहं त्वमेतदुभयं त्यक्त्वाखण्डं विचिन्तयेत्॥२१९॥ अध्यारोपापवादा- भ्यां यत्र सर्व विलीयते ॥ तद्वीजमाश्रये- द्योगी सर्वसंगविवर्जितः ॥ २२० ॥ टीका-योगी अपनेको और जीवात्मा और परमा- त्माको तुल्य माने अर्थात् भेदरहित होजाय और हम और तुम यह दोनों भावको त्यागके एक अखण्ड ब्रह्मका चिन्तन करे अध्यारोपअपवादद्वारा जिसमें सर्व वस्तुका लय होजाता है योगी सर्वसनसे रहित होके उसी बीजके आश्रय होजाय अर्थात् चित्तवृत्ति- को आत्मामें लय करदे ॥२१९ ॥२२०॥ मूलम्-अपरोक्षं चिदानन्दं पूर्ण त्यक्त्वाभ्र- माकुलाः ॥ परोक्षं चापरोक्षं च कृत्वा मूढा भ्रमन्ति वै ॥ २२१॥ टीका-मूट्युद्धिके मनुष्य अपरोक्ष अर्थात् प्रत्यक्ष परि- पूर्णब्रह्मको छोड करके 'नममें पडके परोक्ष और अप- रोक्षका रात्रि दिवस निर्णय करते फिरते हैं ।। २२१ ।।
पंचमपटलः। (१९१)
मूलम्-चराचरमिदं विश्व परोक्षं यः करो-
ति च ।। अपरोक्षं परं ब्रह्म त्यक्तं तस्मिन्
प्रलीयते ॥ २२२॥
टीका-जो मनुष्य यह चराचरसंसारको शास्त्रसे
विवाद करके परोक्ष करते हैं और अपरोक्ष परब्रह्मको
त्यागदेते हैं अर्थात् ब्रह्मभी प्राप्त नहीं होता वह
अज्ञानी संसारमें लय होते हैं अर्थात् उनका मोक्ष
नहीं होता हे ॥ २२२॥
मूलम-ज्ञानकारणमज्ञानं यथा नोत्पद्यते
भृशम् ॥ अभ्यासं कुरुते योगी सदा
सङ्गविवर्जितम् ॥ २२३॥
टीका-जिससे ज्ञान उत्पन्न होता है और अज्ञान-
का नाश होता है इसी योगअभ्यासको योगी सर्वदा
सङ्गरहित होके अभ्यास करे ।। २२३ ॥
मूलम्-सर्वेन्द्रियाणि संयम्य विपयेभ्यो
विचक्षणः॥ विपयेभ्यः सुषुप्त्यैव तिष्ठत्संग-
विवर्जितः ॥ २२४॥
टीका-युद्धिमान् योगी विषयोंसे इंद्रियोंको रोकके
सङ्गरहित होके विषयके त्यागमें सुषुप्तिके समान
स्थिर रहते हैं ॥२२॥
(१९२) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता ।
मूलम्-एवमभ्यासतो नित्यं स्वप्रकाशंप्र-
काशते ॥ श्रोतुं बुद्धिसमर्थार्थ निवर्तन्ते
गुरोर्गिरः॥ तदभ्यासवशादेकं स्वतो ज्ञा-
नं प्रवर्तते ॥ २२५॥
टीका-इसी प्रकार नित्य अभ्यास करनेसे साधक-
को आपही ज्ञानका प्रकाश होगा तब गुरुके वचनकी
निवृत्ति होगी अर्थात् गुरुके उपदेशका अंत हो जा-
यगा जर इतरवाक्य श्रवण करनेकी इच्छा निवृत्त
होजायगी तब यह योगअभ्यासद्वारा आपही एक
अद्वैतज्ञानमें प्रवृत्ति होगी ।। २२५ ।।
मूलम्-यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मन-
सा सह॥ साधनादमलं ज्ञानं स्वयं स्फुरति
तद्भुवम् ॥ २२६॥
टीका-यह ब्रह्म किसी प्रकार प्राप्त नहीं होता मन
वाक्यकाभी गमन नहीं है परन्तु यह योगसाधनसे
पही निर्मल ज्ञान प्रकाश होता है ॥२२६॥
मूलम्-हठं विना राजयोगो राजयोग विना
हठः ।। तस्मात्प्रवर्तते योगी हठे सद्गुरु
मार्गतः ॥ २२७॥
पंचमपटलः। टीका-हठयोग विना राजयोग और राजयोगके विना हठयोग सिद्ध नहीं होता इस हेतुसे योगीको उचित है कि, योगवेत्ता सद्गुरुद्वारा हठयोगमें प्रवृत्त हो ॥ २२७॥ मूलम्-स्थिते देहे जीवति च योगं न श्रि- यते भृशम् ॥ इन्द्रियार्थोपभोगेषु सजी- पति न संशयः ॥ २२८॥ टीका-जो मनुष्य इस शरीरसे योगका आसग नहीं ग्रहण करते हैं वह केवल इंद्रियोंके भोग भोगनेके अर्थ संसारमें जीते हैं इसमें संशय नहीं है ॥२२८॥ मूलम्-अभ्यासपाकपर्यन्तं मितान्नं स्मर- णं भवेत् ॥ अन्यथा साधनं धीमान्कर्तु पारयतीह न ॥ २२९ ॥ टीका-बुद्धिमान साधक योग अभ्यासके आरंभसे अभ्याससिद्धिपर्यंत मिताहारी रहे अर्थात् प्रमाणका भोजन करे अन्यथाअर्थात् अप्रमाण भोजन करनेसे योग अभ्यासके पारन होगा अर्थात सिद्ध न होगा ॥ २२९ ।। मूलम्-अतीवसाधुसंलापं साधुसम्मति- बुद्धिमानाकरोति पिण्डरक्षार्थ बह्वालाप- (१९४) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । विवर्जितः॥२३०॥ त्याज्यते त्यज्यतेस- झं सर्वथा त्यज्यतेभृशम्॥अन्यथा नल- भेन्मुक्तिं सत्यं सत्यं मयोदितम् ॥२३॥ टीका-बुद्धिमान साधक सभामें साधुके समान थोडा और प्रमाण वाक्य बोले और शरीरके रक्षार्थ थोडा भोजन करे और संगको सर्व प्रकारसे तजदे कदापि किसीके संगमें लिप्त न होय हे पार्वति और दूसरे प्रकार कदापि मुक्ति नहीं पावेगा यह हम सर्वथा सत्य कहते हैं इसमें संशय नहीं है ॥२३० ॥ २३१॥ मूलम्-गुप्त्यैव क्रियतेऽभ्यासः संगं.त्यका तदन्तरे ॥ व्यवहाराय कर्तव्यो वाह्यसं- गो न रागतः ॥ २३२ ॥ स्खे स्वे कर्मणि वर्तन्ते सर्वे ते कर्मसम्भवाःमानिमित्तमात्रं करणे न दोपोस्ति कदाचन ॥ २३३ ॥ टीका-साधक संगरहित होके एकान्त स्थानमें योगसाधन करे यदि संसारी मनुष्योंसे व्यवहार वर्त- नेकी इच्छा करे तो अन्तरप्रीतिरहित होके वाह्यसंग करे और अपना आश्रम धर्म कर्मभी इसी प्रकार कर- ता रहै इस हेतुसे कि, ज्ञानादि यावत् कर्म हैं सब कर्मा- नुसार होते हैं फटइच्छारहित होके केवल निमित्त पंचमपटलः । (१९५) मात्र कर्म करनेसे कदापि दोष नहीं है ॥२३२॥२३३॥ मूलम्-एवं निश्चित्य सुधिया गृहस्थोपि यदाचरेत् ॥ तदा सिद्धिमवाप्नोति नात्र कार्या विचारणा ॥ २३४ ॥ टीका-इसी प्रकार निश्चयबुद्धिसे यदि गृहस्थभी योगअभ्यास करे तो वह अवश्य सिद्धि लाभ कोगा इसमें संशय नहीं है ॥ २३४ मूलम्-पापपुण्यविनिर्मुक्तः परित्यक्ताङ्गसा- धकः ॥यो भवेत्स विमुक्तः स्याद्हे ति- टन्सदागृही ॥ २३५ ॥न पापपुण्यैर्लि- प्येत योगयुक्तो यदा गृही॥ कुर्वन्नपि तदा पापान्स्वकार्ये लोकसंग्रहे ॥२३६ ॥ टीका-जो साधक पाप पुण्यसे निर्लिप्त इन्द्रियसं- गत्यागी है सोई गृही साधक गृहमें रहके मुक्त है योग- युक्त गृही पाप पुण्यमें बद्ध नहीं होता यदि संसारके संग्रहमें पापभी करेगा तो वह पाप उसको स्पर्श न करेगा ।।२३५ ।। २३६॥ मूलम्-अधुना संप्रवक्ष्यामि मन्त्रसाधन- मुत्तमम् ॥ ऐहिकामुष्मिकसुखं येन स्या- दविरोधतः ॥२३७ ।।
(१९६) शिवसंहिता भापाटीकासमेता। टीका-हे देवि ! अब उत्तम मन्त्रसाधन हम कहते हैं जिससे इस लोक और परलोक दोनों स्थानमें साधक आनन्दपूर्वक सुख भोगेगा ॥ २३७ ।। मूलम्-यस्मिन्मन्त्रेवरे ज्ञाते योगसिद्धिर्भ- वेत्खलु ॥ योगेन साधकेन्द्रस्य सर्वैश्वर्य- सुखप्रदा॥२३८॥ टीका-यह उत्तम मन्त्रके ज्ञान होनेसे निश्चय योग सिद्ध होता है साधकेन्द्रको यह योग सर्व ऐश्वर्य सुखका दाता है ॥ २३८॥ मूलम्-मूलाधारेस्ति यत्पमं चतुर्दलसम- न्वितम् ।। तन्मध्ये वाग्भवं बीजं विस्फु- रन्तं तडित्प्रभम् ॥२३९॥ हृदये कामबी- जंतु बन्धूककुसुमप्रभम् ॥ आज्ञारविन्दे शक्त्याख्यं चन्द्रकोटिसमप्रभम्॥२४०॥ वीजनयमिदं गोप्यं भुक्तिमुक्तिफलप्र- दम् ॥ एतन्मन्त्रत्रयं योगी साधयेत्सि- द्विसाधकः ॥ २४१ ॥ टीका-जो मूलाधार चतुर्दलसंयुक्त पद्म है उसमें विद्युत्के समान प्रभायुक्त वाग्बीजकी स्थिति है और हृदयकमलमें बन्धूकपुष्पके समान प्रभायुक्त कामवी- पंचमपटलः। ( १९७) जकी स्थिति है और आज्ञाकमलमें कोटिचन्द्रके समान प्रभायुक्त शक्तिबीजकी स्थिति है यह बोजत्रय परम गोपनीय भोग और मुक्ति के दाता हैं यह तीनों मन्त्रका. साधक योगी अवश्यसाधन करे।।२३९॥२४०॥२४॥ मूलम्-एतन्मन्त्रं गुरोर्लब्ध्वा न द्वतंन वि- लम्बितम्।। अक्षराक्षरसन्धानं निःसन्दि- ग्धमना जपेत् ॥ २४२॥ टीका-साधक गुरुसे यह मन्त्रका उपदेश लेके धी- रे धीरे अक्षर अक्षर स्पष्ट उच्चारणपूर्वक स्थिर मन हो- के जप करे ॥२४२॥ मूलम्-तद्गतश्चैकचित्तश्च शास्त्रोक्तविधिना सुधीः॥ देव्यास्तु पुरतो लक्षं हुत्वा लक्ष- त्रयं जपेत् ॥ २४३॥ टीका-बुद्धिमान साधक एकाग्रचित्तसे शास्त्रवि- धिअनुसार देवी के समीपमें एक लक्ष होम करके ती- नलक्ष जप करे॥२४३॥ मूलम्-करवीरप्रसूनन्तु गुडक्षीराज्यसंयु- तम् ॥ कुण्डे योन्याकृते धीमाञ्जपान्ते जुहुयात्सुधीः ।। २४४॥ टीका बुद्धिमान साधक जपके पीछे योन्याकार- (१९८) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता। कुण्ड बनायके कनेरपुष्पके साथ गुड़ और दूध और घृत मिलायके होम करे ॥२४४ ॥ . मूलम्-अनुष्ठाने कृते धीमान्पूर्वसेवा कृता भवेत् ॥ ततो ददाति कामान् देवी त्रिपु- रभैरवी ॥ २४५॥ टीका-बुद्धिमान साधक इसीप्रकार अनुष्ठानपूर्वक आराधना करके त्रिपुरभैरवी देवीको सन्तुष्ट करे तो उसको इच्छापूर्वक देवी फल देती है ॥२४५ ॥ मूलम्-गुरुं सन्तोप्य विधिवल्लब्ध्वा म- न्त्रवरोत्तमम् ॥ अनेन विधिना युक्तो म- न्दभाग्योऽपि सिद्धयति ॥ २४६ ॥ टीका-साधक विधिपूर्वक गुरुको संतोप करके यह उत्तम मन्त्र ग्रहण करे इस विधानसंयुक्त ग्रहण कर- नेसे मन्दभाग्य साधकभी सिद्धि लाभ करते हैं ॥२४६॥ मूलम्-लक्षमेकंजपेद्यस्तु साधको विजिते- न्द्रियः॥ २४७ ॥ दर्शनात्तस्य शुभ्यन्ते योपितो मदनातुराः ॥ पतन्ति साधक- स्याग्रे निर्लज्जा भयवर्जिताः।। २४८ ॥ टीका-योगी इन्द्रियनिग्रहपूर्वक एक लक्ष जप करे तो उसके दर्शनमात्रसे कामातुर त्रिय मोहित पंचमपटलः । ( १९९) होयके साधकके आगे निर्लज और भयरहित होके गिरती हैं ॥ २४७ ॥२४८॥ मूलम्-जप्तेन च द्विलक्षेण ये यस्मिन्विपये स्थिताः॥आगच्छन्ति यथातीर्थ विमुक्त- कुलविग्रहाः ॥ ददति तस्य सर्वस्वं तस्यै- वच वशे स्थिताः ॥ २४९॥ टीका-यह मन्त्र दो लक्ष जप करनेसे कामिनी स्त्रिये साधकके समीप इसप्रकार आतीहैं कि, जैसे कुलीना तीथों में भय लज्जा रहित होके जाती हैं और साधकके वशमें होके अपना सर्वस्व उसको देती हैं।२४९॥ मूलम्-त्रिभिर्लक्षैस्तथाजप्तमण्डलीका स- मण्डलाः॥ २५० ॥ वशमायान्ति ते सर्वे नात्र कार्या विचारणा। पडिलक्षैर्महीपालं सभृत्यबलवाहनम् ॥ २५॥ टीका-तीन लक्ष जप करनेसे मंडलसहित मंडल- पती राजा साधकके वशमें होजायगे इसमें संशय नहीं है और छः लक्ष जप करनेसे बल वाहन संयुक्त राजा साधकके वश होजायगा ।। २५० ॥२५॥ मूलम्-लक्षीदशभिर्जप्तैर्यक्षरक्षोरगेश्व- (१९८) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता। कुण्ड बनायके कनेरपुष्पके साथ गुड़ और दूध और घृत मिलायके होम करे ॥२४४ ॥ मूलम्-अनुष्ठाने कृते धीमान्पूर्वसेवा कृता भवेत् ॥ ततो ददाति कामान्वै देवी त्रिपु- रभैरवी ॥ २४५॥ टीका-बुद्धिमान साधक इसीप्रकार अनुष्ठानपूर्वक आराधना करके त्रिपुरभैरवी देवीको सन्तुष्ट करे तो उसको इच्छापूर्वक देवी फल देती है ॥ २४५॥ मूलम्-गुरुं सन्तोप्य विधिवल्लब्ध्वा म- न्त्रवरोत्तमम् ॥ अनेन विधिना युक्तो म- न्दभाग्योऽपि सिद्धयति ॥ २४६ ॥ टीका-साधक विधिपूर्वक गुरुको संतोप करके यह उत्तम मन्त्र ग्रहण करे इस विधानसंयुक्त ग्रहण कर- नेसे मन्दभाग्य साधकभी सिद्धि लाभ करते हैं ॥२४६।। मूलम्-लक्षमेकंजपेद्यस्तु साधको विजिते- न्द्रियः॥ २४७॥ दर्शनात्तस्य क्षुभ्यन्ते योपितो मदनातुराः ॥ पतन्ति साधक- स्याग्रे निर्लज्जा भयवर्जिताः॥ २४८ ॥ टीका-योगी इन्द्रियनिग्रहपूर्वक एक लक्ष जप करे तो उसके दर्शनमात्रसे कामातुर स्त्रिये मोहित पंचमपटलः । होयके साधकके आगे निर्लज और भयरहित होफे गिरती हैं।। २४७॥२४८॥ मूलम् जप्तेन च द्विलक्षेण ये यस्मिन्विपये स्थिताः॥आगच्छन्ति यथातीर्थ विमुक्त- कुलविग्रहाः ॥ ददति तस्य सर्वस्खं तस्यै- वच वशे स्थिताः ॥ २४९॥ टीका-यह मन्त्र दो लक्ष जप करनेसे कामिनी स्त्रिये साधकके समीप इसप्रकार भातीहैं कि, जैसे कुलीना तीथों में भय लज्जा रहित होके जाती हैं और साधकके वशमें होके अपना सर्वस्व उसको देती हैं ॥ २४९॥ मूलम्-त्रिमिलक्षैस्तथाजप्तमण्डलीका स- मण्डलाः॥ २५० ॥ वशमायान्ति ते सर्वे नात्र कार्या विचारणा। पडिलक्षमहीपालं सभृत्यबलवाहनम् ॥ २५१ ॥ टीका-तीन लक्ष जप करनेसे मंडलसहित मंडल- पती राजा साधकके वशमें होजायगे इसमें संशय नहीं है और छः लक्ष जप करनेसे वल वाहन संयुक्त राजा साधकके वश होजायगा ।। २५० ॥२५॥ मूलम्-लीदशभिर्जप्तैर्यक्षरक्षोरगेश्व- (२००) शिवसंहिता भापाटीकासमेता । राः॥वशमायान्ति ते सव आज्ञां कुर्वन्ति नित्यशः ॥ २५२॥ टीका-यह मन्त्र वारह लक्ष जप करनेसे यक्ष और राक्षस और पन्नग यह सब वशमें होके साधककी नि. त्य आज्ञा पालन करतेहैं ।। २५२॥ मूलम्-त्रिपञ्चलक्षजप्तैस्तु साधकेन्द्रस्य धीमतः॥सिद्धविद्याधराश्चैव गन्धर्वाप्सर- सांगणाः ॥ २५३ ॥ वशमायान्ति ते सर्वे नात्र कार्या विचारणा ॥ हठाच्छ्रवणवि- ज्ञानं सर्वज्ञत्वं प्रजायते ॥ २५४ ॥ टीका-पन्द्रहलक्ष जप करनेसे सिद्ध और विद्याधर और गंधर्व और अप्सरा यह सब बुद्धिमान साधकके वशर्मे होजाते हैं इसमें संदेह नहीं है और साधकको हठसे विशेष श्रवणशक्ति होगी और सर्ववस्तुका ज्ञान उत्पन्न होगा।। २५३ ॥२५॥ मूलम्-तथाष्टादशभिलादेहेनानेन साध- कः ॥ उत्तिष्ठेन्मेदिनीं त्यक्त्वा दिव्यदेह- स्तु जायते ॥भ्रमतेस्वेच्छया लोकें छि- द्रां पश्यति मदिनीम् ।। २५५ ।। टीका-जो साधक अठारह लक्ष जप करेगा वह भू- पंचमपटलः। मिको त्यागके दिव्य देह होके आकाशमार्गसे संसारमें इच्छापूर्वक भ्रमण करेगा और पृथ्वीके छिद्रोंको देखे- गा अर्थात् पृथ्वीमें प्रवेश करनेके मार्ग देखेगा॥२५॥ मूलम्-अष्टाविंशतिभिलक्षैर्विद्याधरपतिम- वेत् ॥साधकस्तु भवेद्धीमान्कामरूपोम- हाबलः ॥ २५६ ॥ त्रिंशलक्षैस्तथाजप्तैत्र- हाविष्णुसमो भवेत् ॥ रुद्रत्वं पष्टिभिलक्ष- रमरत्वमशीतिभिः ॥२५७॥ कोटयैकया महायोगी लीयते परमे पदे ॥ साधकस्तु भवद्यागी त्रैलोक्ये सोऽतिदुर्लभः॥२५८॥ टीका-जो बुद्धिमान साधक अट्ठाईस लक्ष जप करे- गा वह महावल कामरूपी और विद्याधरपति होजायगा और तीस लक्ष जप करनेसे साधक ब्रह्मा विष्णुके समान होजायगा और साठ लक्ष जप करनेसे रुद्रके समान हो- जायगा और अस्सी लक्ष जप करनेसे साधक सर्व भूतोंको प्रिय देव होजायगा और एककोटि जप करनेसे साधक महायोगी होयके परमपदमें लीन होजाताहै हे पार्वति ! इसप्रकार योगी त्रिभुवनमें दुर्लभहै।।२५६१२६७।२५८॥ मूलम्-त्रिपुरे त्रिपुरन्त्वेकं शिवं परमकार- णम् ॥ २५९ ॥ अक्षयं तत्पदं शान्तमप्र- (२०२) शिवसंहिता भापाटीकासमेता। मेयमनामयम् ।। लभतेऽसौ नसन्देहीधी- मान्सर्वमभीप्सितम् ॥ २६० ॥ टीका-हे पार्वति! त्रिपुरस्थानमें एक शिवही परमका- पर स्वरूप हैं उनका चरणकमल अक्षय शान्त अप्रमेय अर्थात्प्रमाणरहित अनामय अर्थात् रोगरहित है उनका पद बुद्धिमान् योगीलोगही इच्छापूर्वक लाभ करहते हैं इसमें संदेह नहीं है ।। २५९ ॥ २६०॥ मूलम्-शिवविद्यामहाविद्या गुप्ताचाग्रेमहे- श्वरी॥मद्भाषितमिदंशास्त्रं गोपनीयमतो बुधैः ॥ २६१॥ टीका-हे महादेवि ! यह हमारी कहीहुई महाविद्या. कोही शिवविद्या कहते हैं यह विद्या सर्वप्रकार गोपनीय है इस योगशास्त्रको बुद्धिमान लोग कदापि प्रकाश नहीं करते हैं ॥२६१॥ मूलम्-हठविद्या परंगोप्या योगिना सिद्धि- मिच्छता ॥ भवेद्वीर्यवती गुप्ता निर्वीर्या च प्रकाशिता ॥ २६२॥ टीका-सिद्धिकांक्षी योगीलोग इस हठविद्याको अतिगोपित रक्खें यह गोप्य रखनेसे वीर्यवती रहतीहै और प्रकाश करनेसे निर्वीर्या होजातीहै ॥२६२ ।।
पंचमपटलः। (२०३) मूलम्-य इदं पठते नित्यमाद्योपान्तं विच- क्षणः॥ योगसिद्धिर्भवेत्तस्य क्रमेणैव न संशयः ॥ स मोक्षं लभते धीमान्य इदं नित्यमर्चयेत् ॥ २६३॥ टीका-जो विद्वान् यह शिवसंहिताका नित्य आ द्योपान्त पाठ करेगा उसको क्रमसे अवश्य योगसिद्धि होगी और जो बुद्धिमान् इस ग्रन्थका नित्य पूजन क- रेगा उसको मुक्ति लाभ होगी ॥२६३ ॥ मूलम्-मोक्षार्थिभ्यश्च सर्वेभ्यः साधुभ्यः श्रावयेदपि।।२६४॥क्रियायुक्तस्य सिद्धिः स्यादक्रियस्य कथम्भवेत्॥ तस्माक्रिया विधानेन कर्तव्या योगिपुंगवैः ॥ २६५।। यहच्छालाभसन्तुष्टः सन्त्यक्तान्तरसंग- कः।। गृहस्थश्चाप्यनासक्तः स मुक्तो यो- गसाधनात् ।। २६६॥ टीका-मोक्षार्थी और सर्व साधु मनुष्य उनको यह शिवसंहिताग्रंथ सुनाना. जो क्रियासे युक्त होगा उसको सिद्धि प्राप्त होगी कियाहीन मनुष्यको क्या होसक्ताहै अर्थात सिद्धि लाभ नहीं होसकती विधानपूर्वक क्रियाका अनुष्ठान करे तो इच्छापूर्वक लाभसे सन्तुष्ट होगा और (२०४) शिवसंहिता भापाटीकासमेता । जो गृहस्थ होगाऔर इन्द्रियोंमें आसक्त न होगा सो मनु- ष्य योगसाधनसे मुक्तहोगा॥२६४॥२६५ ॥२६६॥ मूलम्-गृहस्थानां भवेत्सिद्धिरीश्वराणां जपेन वै ॥ योगक्रियाभियुक्तानां तस्मा- संयतते गृही ॥२६७॥ टीका-योगक्रियावान गृहस्थ लोगोंको जप करनेसे सिद्धि प्राप्तहोगी इस हेतुसे योगसाधनमें गृहस्थ मनु- प्यको यत्न करना उचित है ॥२६७ ॥ मूलम्-गेहे स्थित्वा पुत्रदारादिपूर्णः सङ्ग त्यत्का चान्तरे योगमार्ग। सिद्धेश्चिह्न वी- क्ष्य पश्चाद् गृहस्थः क्रीडेत्सो वै सम्मतं साधयित्वा ॥ २६८॥ टीका-जो गृहस्थ गृहमें रहके स्त्रीपुत्रादिसे पूर्ण होके अंतरीय सबसे त्यागपूर्वक योगसाधनसे प्रवृत्त होय सो सिद्धिचिह्न अवलोकनपूर्वक साधना करके सर्वदा आनन्दमें कीडा करेगा ।।२६८॥ इति श्रीशिवसंहितायां हरगौरीसंवादे योगशास्त्रे पंचमः पटलः समाप्तः ॥५॥शुभम् ॥ समाप्तोऽयं ग्रन्थः। पुस्तक मिटनेका टिकाना- खेमराज श्रीकृष्णदास, "श्रीवेङ्कटेश्वर" छापाखाना, खेतवाड़ी-बई.
श्री। उमामहेश्वरमाहात्म्यम् । उमा भगवतीयेयं ब्रह्मविद्यति कीर्तिता ।। रूपयौवनसम्पन्ना वधूर्भूत्वात्र सा स्थि- ता॥१॥ नानाजातिवधूनां हि विवभूताम- हेश्वरी ॥२॥ यस्याः प्रसादतः सर्वः स्वर्ग मोक्षंच गच्छति॥इहलोके सुखं तद्वज्ज- तुर्देवादिकोपि वा ॥ ३॥ ब्रह्मा विष्णुस्त- था रुद्रःशक्रायाःसर्वदेवताः ॥ कटाक्षपा- ततो यस्याभवंति न भवंति च॥४॥पीनो- नतस्तनी प्रौढजघना च कृशोदरी॥चंद्रा- नना मीननेत्रा केशभ्रमरमंडिता ॥५॥ सर्वांगसुंदरी देवी धैर्यपुंजविनाशिनी ।। कांचीगुणेन चित्रेण वलयांगदनपुरैः॥६॥ हारैर्मुक्तादिसंजातैः कंठाद्याभरणैरपि ।। मुकुटेनापि चित्रण कुंडलाद्यैः सहस्र- शः॥७॥विराजिता घनौपम्यरूपा भूप- णभृपणा ॥ जननी सर्वजगतो घटव- पी चिरंतनी ॥८॥ तया समेतं पुरुष तत्प- (२०६) शिवसंहिता भापाटीकासमेता। रितद्गुणाधिकम् ॥ ब्रह्मादीनां प्रभु नाना- सर्वभूपणभूपितम् ॥ ९॥ दीपिचर्मावृतं शश्वदथवापि दिगंवरम्॥भस्मोद्धूलितस- वांगं ब्रह्ममूौषमालिनम् ॥१०॥तथैव चं- द्रखंडेन विराजितजटातटम् ॥ गंगाधर स्मरमुखं गोक्षीरधवलोज्ज्वलम् ।। ११ ।। कंदर्पकोटिसदृशं सूर्यकोटिसमप्रभम् ॥ सृष्टिस्थित्यंतकरणं सृष्टिस्थित्यंतवर्जि- तम् ॥ १२ ॥ पूर्णेन्दुवदनांभोज मूर्यसो- माग्निवर्चसम् ॥सर्वांगसुंदरं कंधुग्रीवं चा- तिमनोहरम् ।। १३ ।। आजानुबाहुं पुरुपं नागयज्ञोपवीतिनम् ॥ पद्मासनसमासी- नं नासाग्रन्यस्तलोचनम् ॥ १४ ॥ वाम- देवं महादेवं गुरूणांप्रथमंगुरुम् ॥ स्वयं- ज्योतिःस्वरूपं तमानंदात्मानमद्वयम् ॥ ५५॥ यतो हिरण्यगर्भीयं विराजो जनकः पुमान् ॥ जातः समस्तदेवानाम- न्येषां च नियामकः ॥१६॥ नीलकंठम- मुं देवं विश्वेशं पापनाशनम् ॥ हदि पझे उमामहेश्वरमाहात्म्यम् । (२०७) थवा सूर्ये वह्नौ वा चंद्रमंडले ॥१७॥कैला सादिगिरौ वापि चिंतयेद्योगमाश्रितः ।। एवं चिंतयतस्तस्य योगिनो मानसं स्थि- रम्।।१८॥ यदा जातं तदा सर्वप्रपंचरहितं शिवम् ॥ प्रपंचकरणं देवमवाङ्मनसगो- चरम् ॥१९॥ प्रयाति स्वात्मना योगी पु- रुपं दिव्यमद्धतम्॥तमसः स्वात्ममोहस्य परंतेन विवर्जितम्॥२०॥साक्षिणं सर्वत्रु- द्वीनां बुद्धयादिपरिवर्जितम् ॥ उमासहा- यो भगवान्सगुणः परिकीर्तितः॥२१॥नि- गुणश्च स एवायं न यतोन्योस्ति कश्चन ॥ ब्रह्मा विष्णुस्तथा रुद्रः शक्रो देवसमन्वि तः॥२२॥ अग्निः सूर्यस्तथा चंद्रः कालः मृष्ट्यादिकारणम्॥ एकादर्शद्रियाण्यंतः करणं च चतुर्विधम्॥२३॥प्राणाः पंचम- हाभूतपंचकेन समन्विताः ।। दिशश्च प्र- दिशस्तद्वदुपरिष्ट्रादधोपि च ॥२४ ॥स्वे- दजादीनि भूतानि ब्रह्मांडं च विराड़पुः।।
(२०८) शिवसंहिता जापाटीकासमेता । विराहिरण्यगर्भश्च जीव ईश्वर एव च ॥२५॥ मायातत्कार्यमखिलं वर्तते स. दसच्च यत् ॥ यच्च भूतं यच्च भव्यं तत्सर्व स महेश्वरः॥२६॥ इति श्रीमदुमामहेश्वरमाहात्म्यं संपूर्णम् । पुस्तक मिलनेका ठिकाना. खेमराज श्रीकृष्णदास, श्रीवेङ्कटेश्वर छापखाना (मुंबई.)
ऋय्यपुस्तकें-(योगशास्त्रग्रंथाः ।) ... ... ... ... की. रु. आ. पातंजलयोगदर्शन-अत्युत्तम भाषानुवाद सहित १-० सांख्यदर्शन अत्युत्तम भाषानुवाद सहित वैशेषिकदर्शन सुबोध भाषानुवाद समेत ०-१२ हठयोगप्रदीपिका उत्तम भाषाटीका सहित शिवस्वरोदय भाषाटीका. शिवसंहिता भापाटीका सह ( योगशास्त्र). गोरखपद्धति भापाटीका ( योगसाधनविधि) ०-१२ स्वरोदयसार चरणदासकृत ०-२ योगतत्वप्रकाशभाषा ( योगाभ्यासकी प्रणाली परमोपयोगी है) स्वरदर्पण सटीक १ स्वर प्रश्नवर्णित हैं वेदान्तग्रन्थाः। ब्रह्मसूत्र ( शारीरक) वेदान्ततत्त्वप्रकाश भाषा- भाष्य समेत श्रीप्रभुदयालुविरचित पहुत सरल सुबोध है ब्रह्ममूत्र ( शारीरक ) भाषाटीका वेदान्तपरिभाषा शिखामणि टीका और मणि- प्रभा टीकासमेत वेदान्तपरिभाषा अर्थदीपिका टीकासमेत वेदान्तपरिभाषा अत्युत्तम मापाटीका समेन १-४ वेदान्तसार संस्कृत मूल और संस्कृतटीका तथा भाषाटीकासहित.. पंचदशीसटीक (संस्कृत टीका) .... ... .... ... .4 ... ... ... ... ... ... जाहिरात. पंचदशी पं० मिहिरचंद्रकृत अत्युत्तम भाषाटीका सहित पंचदशी भाषा-आत्मस्वरूपजीकृत... ३-० शारीरक ब्रह्मसूत्रम्-मध्वमाप्यसमेतं तत्त्वप्रका- शिका टीकोपेतं च ५-० गीता चिदघनानंदस्वामिकृत गूढार्थदीपिका मूल अन्वय पदच्छेदके सहित भाषाटीका गीता आनंदागरिकृतभाषाटीका श्रीमद्भगवद्गीता सान्वय ब्रजभाषा दोहा सहित १-४ गीतामृततरंगिणी भापाटीका ( रघुनाथप्रसा. दकृत) अक्षरबड़ा १-० गीतामृततरंगिणीभापाटीका पाकिटवर ०-१२ श्रीरामगीता भूल... ०-२ श्रीरामगीता भापाटीका पदप्रकाशिका अनुवा- दसमुच्चय और विषमपीकं सहित श्रीमद्भगवद्गीतापंचरत्न अक्षर मोटा गुटका रेशमी १-० " पंचरत्न अक्षरबड़ा खुलापत्रा छोटीसंची "पंचरल अक्षरबड़ा लंबीसंची गुला "पंचरत्न भाषाटीका गीता श्रीधरीटीका सहित... १-० गीता बड़े अक्षरकी १६ पेजी गुटका ०-१२ गीता बड़े अक्षरकी खुली १२ पेजी. गीता गुटका विष्णुसहस्रनाम सहित गीता पंचरत्न और एकादशरत्न ०-१२ "पंचरल द्वादशरत्न ... ... ... ... २-० ... ... ०-८ ....
३ ... ०-७ ... ... ... ... जाहिरात. गीतापंचरल नवरत्न पाकिटबुक गीता गुटका पाकिट बुक अष्टावक्रगीता अत्युत्तम सान्वय भाषाटीका... १-२ शिवगाता भाषाटीकासहित ०-१२ गणेशगीता भाषाटीकासहित गीतापंचदश भाषाटीका [काश्यपगीता, शान- कगीता, अष्टावक्रगीता, नहुपगीता, सरस्व- तीगीता, युधिष्ठिरगीता, बकगीता, धर्मव्या. धगीता, श्रीकृष्णगीतादि] पाण्डवगीता भाषाटीका सह तथा मूल ४ रन बड़ा अक्षर देवीगीता भाषाटीका अपरोक्षानुभूति संस्कृत टीका भाषाटीका सहित ०-१० आत्मबोध भाषाटीका तत्वबोध भाषाटीका वेदांतमंथपंचकम् (वाक्यप्रदीपः वाक्यसुधारसः, हस्तामलका, निर्वाणपंचक,मनीपापंचकं स० ०-८ वेदस्तुति भाषाटीका सह गीता रामानुजभाष्य भगवद्गीता भावप्रकाशटीकायाः वैराग्यमास्कर भापाटीका सिद्धांतचंद्रिका सटीक (वेदांत) द्वादशमहावाक्यविवरण वेदांतरामायण भाषाटीका सह वेदान्तसंज्ञा भाषाटीका प्रश्नोत्तरमुक्तावली भाषाटीका ( वेदान्त) ...,०-८ ... ... ... ... ... .. .. ... ...०-८ . ... ... ... ... ... ...
-१ ... ... ....२००० ... ... ... ... ...१२-० ... जाहिरात. जीवन्मुक्तगीता भाषाटीका भक्तिमीमांसा शांडिल्यऋषिप्रणीता आचार्य स्वमेश्वरविरचितेन भाप्येण संयुता योगवासिष्ठ सटीक संस्कृत कंपिलगीता भाषाटीका अवधूतगीता गुटका रेशमी.. नारदगीता मूल प्रभोत्तरीभापाटीका वेदान्त भाषा। आत्मपुराण भाषा [चिद्धनानन्द स्वामिकृत] १२-० योगवासिष्ठभाषा वड़ा संपूर्ण योगवासिष्ठगुटका वैराग्य मुमुक्षु प्रकरण वेदान्त उत्तम कागज अक्षर बड़ा... वासिष्ठसार भाषा वेदान्त ६प्रकरण... मोक्षगीता (सवालक्ष ) रामनाम ... वृत्तिप्रभाकर स्वामी निश्चलदासकृतं (वेदान्तका ग्रंथ शुद्धकर नया छपा है) . विचारसागर सटीक निश्चलदासजीकृत एकादशस्कंध भाषा चतुरदासकृत अमृतधारा वेदान्त संतोषसुरतरु वेदांत संतप्रभाव वेदांत विचारमालासटीकश्रीगोविन्ददासजीकीटीकास. ०-१२ भाषा (वेदांत) संपूर्ण पुस्तकोंका “वड़ासूचीपत्र" अलगहै मॅगालीजिये । खेमराज श्रीकृष्णदास "श्रीवेङ्कटेश्वर" स्टीम प्रेस-चंबई. ... .... ... ... .... ... ०-१२ .... .... ... ... .... ...