Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner

Safar Ki Kunji

Ganga Prasad Agrawal · 2011/02

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4ON xvdo सफरकी कुंजी ORIERaranexam-GENERALAMIRPENTRIEDONITE लेखक- गगाप्रेसाद अग्रवाल ।

ܕ

हरि गोश्म
सफरकी कुंजी
-
गंगाप्रसाद अग्रवाल
सर्वाधिकार सुरक्षित
आवृत्ति
सन् १६२६
मूल्य
1) मात्र

गोपालप्रसाद गोविन्दप्रसाद भनयाल दौड, मिला पूना . मुद्रक- रामानन्दतिवारी, "जगदीश प्रेस" ११२, काटन स्ट्रीट कलकत्ता आत्म-निवेदन सरसे पहिले में उस परमपिता जगदीश्वरको अनेक धन्यवाद देता हूँ, जिसको असीम कृपासे यह पुस्तक लिखनेका सुअवमर प्राप्त हुआ है। प्राणी मात्रके लिये कभी-कभी यात्रा करते रहना भी आवश्यक है। यात्रा करनेसे मनुष्य के हदयमें परिवर्तन होता रहता है, चित्त प्रसन्न होता है। इसके अतिरिक्त यानामे अनेक प्रकारके प्रारतिक स्थल, सुन्दर-सुन्दर नगर और भाति-भातिके मनुष्योंके देखनेका मुअवसर प्राप्त होता है, जिससे मनुष्यका ज्ञान पढता है,चतुराई आती है और अनेक प्रकारके अनुभव प्राप्त होते हैं। जो लोग घर छोडकर बाहर यात्रा करने कभी नहीं जाते उनको लोग "कूपमण्डूक" के समान समझते हैं। उनकी बुद्धि सकुचित रहती है, यानामे नाना प्रकारले अनुभव प्राप्त करनेसे मनुष्यका हृदय विशाल हो जाता है, क्योकि प्रदेशमे अनेक प्रकारके नये-नये स्त्री-पुरुषोंसे परिचय होता है, मनुष्यजातिसे आत्मीयता उत्पन्न होती है और दूसरोंके सुस दु खसे अपने सुख दुखका मिलान फरनेसे परस्पर सहानुभूतिकी वृद्धि होती है। यात्रा कई निमित्तोंसे की जाती है। कोई तीर्थ करने के लिये, कोई नगर और प्राकृतिक स्थलोंके दर्शन करनेके लिये और कोई व्या- पार व्यवसायके लिये यात्रा करते हैं। खैर, किसी भी निमित्तसे यात्रा D ] [ क्यों न की जाय पर वर्षमें कम-से-कम एक घार प्रत्येक गृहस्थको यात्रा करने के लिये समय अवश्य निकालना चाहिये। गृहस्यको वर्षभरके सर्च से यात्रा करनेके लिये भी कुछ द्रव्य अवश्य निकाल रखना चाहिये। यह न्याल न करे कि यात्रा करनेमें जो पैसा सर्च किया जायगा यह व्यर्थ जायेगा। नहीं, चाहे जिस श्रेणीका मनुष्य दो उसको वेशाटनसे कुछ-न-कुछ लाभ अवश्य होगा। यदि धनका कोई प्रत्यक्ष लाभ न होगा तो उमका चित्तही प्रसन्न हो जायगा, उसको आरो- ग्यतामे ही पुछ वृद्धि हो जायगी अथवा अनेक प्रकारका ज्ञान और अनुभव तो अवश्य ही वढेगा । ये सन याते ऐसी हैं कि जो मनुष्यकी हर प्रकारको उन्नतिके लिये बहुत आवश्यक हैं । इसलिये देशाटनमे जो धन सर्च हो उसको व्यर्थ कभी न समझना चाहिये । तीर्थयात्रा करनेकी परिपाटी हमारे यह बहुत प्राचीन कालसे है। जगन्नाथ, रामेश्वर, द्वारका, बद्रीनाथ ये चारों धाम भारतवर्षकी चारों सीमाओंपर अवस्थित है। जो मनुष्य ये चार धाम कर लेता है, वह मानों सम्पूर्ण भारतवर्षकी याना फर लेता है। इन्हीं चारों धामोंके अन्तर्गत हमार अन्य सर तीर्थ भी माजाते हैं। प्राचीन कालमें लोग परलोककी कामना करके वृद्धावस्थामे पैदलयाना किया करते थे और अब भी प्राय ऐसा ही करते हैं, किन्तु आधुनिक समयमें हमारे देशके लोगोंकी आयु कम हो गई है, शरीरको क्षीणता भी अधिक बढ गई है, इसलिये ऐसी दशामें शक्ति रहते (जनानोमें) यदि यात्रा कर लिया करें तो अच्छा है। यात्रा करनेके साधनोमे भाजफल रलगाडीका उपयोग विशेष - [2] फिया जाता है, पर इससे देशाटनका पूरा-पूरा राम नहीं उठाया जा सकता, क्योंकि जिस स्थानमें हम उतरना चाहते हैं, उसी स्थानको देख सकते हैं और बीचमे आनेवाले स्थान देसनेसे चित रह जाते हैं। इसके सिवाय साने, पीने, सोने, स्नानादिमे अनियमितपन या जाता है। इससे स्वास्थ्य कभी-कभी बिगड़ जाता है। पैदल यात्रा करनेको परिपाटो अधिक अच्छी थी, इससे देशभ्रमणका अनु- भव बहुत अच्छा होता था, पर अर रेलका स्वल्प समय-साध्य साधन छोडकर पैदलयाना करनेका साहस किसोको नहीं होता। जो धन हम घरसे बाधकर चलते हैं, उसमेंसे अधिकाश रेलगाडी, इफा, तागा, घोडागाडी और कुली इत्यादि ले आते हैं। जो धनवान पुरप हैं, वह तो काफी धन सर्च करके प्रवामका आनन्द उठा लेते हैं, परन्तु गरीर रोगोंको प्रवासके सुसकी अपेक्षा दुस ही विशेष उठाना पडता है। इनको रेलके तीसरे दरजेमें सफर करनी पड़ती है और बडी-बडी यात्राओंमे तो यह रोग कभी-कभी जानयरोकी तरह धेशुमार मालगाडीके डिब्बों तकमें भर दिये जाते हैं जिनको मार्गमें हवा, पानी, पासाना, पेशागतकका भयफर फष्ट भोगना पडता है और नियमोंकी अनभिज्ञताके कारण रेल मादिके कर्मचारियों द्वारा इतना कप्ट होता है कि जिसका कुछ ठिकाना नहीं । पडी-चडी यात्राओंमें यदि स्त्रिया और बच्चे साथमें रहते है तो दुर्गति और भी अधिक बढ़ जाती है। हरिद्वार और प्रयागके समान धुम्भके मेलों में सैकड़ों स्त्रियां और बच्चे इधर-उधर छूट जाते है, जिनको विधर्मी लोग घोसा देकर बहका ले जाते है । उस समय- [ । ] की उनकी यातनाको सिवाय ईश्वरके और कौन जान सकता है ? इसलिये बडी-बडीयानामोमें स्त्री और बच्चोंको कभी साथ न ले जाना चाहिये। तो क्या स्त्रियों और बच्चोको यात्राके आनन्दसे वंचित हो रखना चाहिये ? नहीं इन लोगोको भी समय-समयपर नगर, पहाड, सोते, नदी, तीर्थस्थान इत्यादिके दर्शन अवश्य कराने चाहिये , क्योंकि स्त्रिया और बच्चे गृहस्थीके मुख्य अंग है, इनका चिच प्रसन्न रहनेसे सम्पूर्ण कुल प्रसन्न रहता है। हा, इस बातका ध्यान अवश्य रसना चाहिये कि जहा मेले-तमाशेमें अधिक भीड़ हो, वहा इनको न ले जाय । जय फोई भारो मेला न हो, तन शातिके समय इनको मानन्द-पूर्वक दर्शन कराना चाहिये । यात्रा करते समय शरीरकी आरोग्यता और अपने नित्य नियमों- का ध्यान रखना परम आवश्यक है अन्यथा यामासे लाभके बदले हानि ही विशेप होनेको सभावना रहती है। वर्षों पहिले जनकि भारतवर्षमें रेलगाड़ीका विकास नहीं हुआ था, उस समय मनुष्य पैदल, बैलगाडी,घोडा, इफा आदि सवारियों- द्वारा आने-जानेका काम निकालकर याना किया करते थे, रेलगाडीका विकास हुआ है, तवसे मनुष्योंकी संख्या यात्रियों में अधिक गिनी जाती है, जिनका जीवन सुसमय व्यतीत न होकर दुख- मय ही व्यतीत होता है, क्योंकि अधिकाश जनसमुदाय यात्राके नियमोंसे अनभिज्ञ हैं। इसलिये वह रोगपीड़ित देखनेमें आता है, चोर, ठगोंसे ठगा जाता है। तात्पर्य यह है कि यात्रा करनेवाले परन्तु जबसे ।

[-] मनुष्यको परदेशमें बड़ी मुसीयतोका सामना करना पडता है। भाज फल मिरला हो पुरुष ऐसा होगा जिसे थोडा-यहुत याना करनेका अवसर न मिलता रहता हो । इसलिये मैं ने "सफरफी कुसी" नामक यह पुस्तक सर्वसाधारणके लाभार्थ लिसनेका साहस किया है। इस पुस्तफमें यात्रासे सम्बन्ध रखनेवाले अनेक विषय विस्तार- पूर्वक लिसे गये हैं, जैसे यात्राको व्याख्या, यात्रीका परदेशमें काव्य, रैलमें मफर करनेके नियम, ठहरनेका स्थान कैसा होना चाहिए। चोर, डा, ठग, प्रपश्ची, धोखेबाजोंसे यचनेका उपाय, स्वास्थ्यवर्धक नियम और चुटफल, अपरिचित मनुष्योके साथ व्यवहार, रेलवेके नियम, अपनी बीवी घटनायें आदि अन्य पहुत-सी बातोंका अपनी तुच्छ बुद्धि अनुसार तया स्वय अनुभवद्वारा भली प्रकार दिग्दर्शन कराया गया है। मैं अपनेको कोई लेसफ या विद्वान न फहकर फेवल यात्री ही कहूगा, क्योकि मुझे अपने जीवनमें याना फरनेफा विशेष अवसर प्राप्त होता रहा है यानी मुझको फलफत्तेसे मद्रास, बम्बईसे फराची, देहली, जगनाथपुरो आदिक बडे-बडे दूरस्थ स्थानोंको याना द्वारा देखनेका मौका मिला है। इसलिये मुझे यात्रा दरम्यान जो कुछ यात्राके दुस-सुसका अनुभव प्राप्त हुआ है और मैंने जो यात्रा करने की शैली निधारित की है उसीका सार पाठकोंके समक्ष इस पुस्तक 'द्वारा भेट किया जाता है जिससे जनसाधारण छाभ उठा सके। यद्यपि यानासे सम्बन्ध रखनेवाली अन्य पुस्तकें भी हिन्दी- संमारमें प्रकाशित हुई हैं जिनमें कि लेखकोंने अपनी यात्राओंका ४१ ४१ ४३ ४९ विषय भारतवर्षक तीर्थस्थान वृजभूमिके तीर्थस्यान उत्तराखडके तीर्थस्थान पूर्वप्रान्तके तीर्थस्थान उक्षिणप्रान्नके तीर्थस्थान पश्चिममान्तके तीर्थस्थान पंजाप्रान्तके तीथस्नान रेलवेक नियम यात्रियोंके प्रति रेलवे कर्मचारियोंका कर्तव्य शरीररक्षाके साधन 'अनुमत प्रयोग 'शिरदर्द नाशक प्रयोग ६१ .. ७९ .... .... ८० कानका रोग ... ८० .. .. .. . नेत्ररोग ज्वरनाशक प्रयोग अतिसार नाशक औषधिया दन्तरोग नाशक चुटेकले खासीकी दवायें पसली दर्द अजीर्ण नाशक बटी और चूर्ण मागसे जल जानेपर ८३ ८३ पृष्ट ८४ बेहोशीकी दवा शूचिका या हैा वालरोग चिकित्सा खाची ८८ ८८ अजीर्णके दस्त अफरा (पेट फूलना) दूध डालना मून रुक जानेपर ८९ ९० ९० नाभोकी सूजनपर ९० नाभो पक जानेपर मुह पकनेपर (छाले मु हमें पड़जानेपर पहुत रोनेपर तालु पक जानेपर दन्तरोग पसली रोगपर पेशावमें चिनग ९१ ६१ ९१ ९१ ९२ मकडी फरना आख दुखना फाच निकलना तृपा निवारफ योग ९ २ सफरको फुजी (१) तीर्थ याता-का अर्थ है कि किसी भीधर्मका मानन बाला मनुष्य अपने धर्मानुकूल पूज्य देवस्थानोंपर पहुचनेके लि- घरसे बाहर निकले, जैसे सनातनी हिन्दू अपने प्राचीन देवस्था बद्रीनाथ, जगन्नाथ, गया, काशी, मथुरा, द्वारका, गमेश्वर, 'अयोध्य मादि तीर्थस्थानोंमे जाकर बहाकी दिव्य मूर्तियोक दर्शनकट अपने जन्मको सफल मानते हैं, और जन्म जन्मान्तरके पापोंस मुक होकर स्वर्गधाममे यास करनेके अधिकारी बनते हैं। जैन- अपने देवता महावीर स्वामी, यौद्ध आदिके तीर्थस्थानोको देखने लिये यात्रा करते हैं । मुसलमान फाना, मका, मदीना आदि तीर्थ- स्थानोंमे जाकर उनकी पूजा करनेके लिये तीर्थयात्रा करते हैं । दक्षिणी मराठी लोग शिवजी, गणपति, विठोवा आदिके पूज्य स्थानोंकी मानता करनेके कारण तीर्थयात्रा करते हैं। वगाली लोग अपने भगवान गोविंददेवकी विशेष भक्ति करनेके कारण उनके दर्शनार्थ वृन्दावनधामकी तीर्थयात्रा करते हैं। तात्पर्य यह है कि प्रत्येक पुरुष जो जिस धर्म व देवताका, माननेवाला होता है, वह उसीकी पूजा करनेके लिये अपने घरसे निकटकर तीर्थयाना करनेके लिये नगह-जगह घूमता है। इसीका नाम तीर्थयात्रा है। (२) व्यापारिक यात्रा जो व्यापारके निमित्त प्रदेश नाया जाय, उसे ही व्यापारिक यात्रा कहते हैं, जैसे एक मडीका व्यापारी अपने मुनीम या गुमान्तको दुसरी मडीकी आढनमे माल- को सरोट या फरोस्त करने के लिये भेजता है तथा बहुतसे मुनीम गुमाइते माता दी यानाको व्याख्या ३ रुपया उगाहनेके लिये घूमा करत हैं अथवा बडी-बडी कम्पनियोके एजेन्ट सैंम्पुलवस्स लेकर अपनी कम्पनीका माल बेचनेकी गरजमे जगह-जगहके दूकानदागेसे आर्डर लेते फिरते हैं। छोटे-छोटे कसों- के व्यापारी अपने नजदीकवाली मडीमे माल सरीदने व बेचनेने लिये जाते-आत रहते हैं। यहुतसे लोग नौकरीकी इच्छासे इधर उधर घूमते रहते हैं। बहुतसे नोकरीपर तैनात मनुष्य बदली हो जाने या छुट्टीपर अपने-अपने निश्चित स्थानपर जाते-आते रहते हैं-इत्यादि । यानी जो याना केवल व्यापार-निमित्त कहीं भी की जाय उसे ही व्यापारिक या कहेंगे। (३) पर्यटन |--का दूसरा अर्थ हे दौरा करना। जो मनुष्य मुल्क-मुल्कमे, प्रान्त-प्रान्तमे विलायतमें अथवा दुनियाभरमे धूमे, उम यानाको पर्यटन कहते हैं। चाहे वह सैर करने के लिये या दशका कार्य करनेके लिये या शेर, सूअरो आदिका शिकार करनेके लिये या गर्मी- में शिमला, मसूरीमे हवासोरी करनेके लिये अथवा अन्य किन्हीं कारणोसे घूमे, जैसे भारतीय नेतागण देश-हितार्थ घूमते रहते हैं, गार्नर, वाइमराय, आदि बड़े-बड़े सरकारी हाकिम शिकार खेलने या सरकारी इन्तजाम करने तथा किसी सस्थाका उद्घाटन करने लिये दौरा करत हैं, कर कर, डिप्टी, तहसीलदार आदि जगह-जगह मुकदमोकी मिसल भरनेके लिये जिरे-जिरेमे दौरा करते रहते हैं। कोई पैदल पृथ्योकी याना करता है, तो कोई माइकिल द्वाग मुल्क- की याना करता है। बहनसे अमेरिकन, जर्मन यानी सामुद्रिक मार्ग .

४ सारको कुजी द्वारा जहाजसे या आकाशमार्गद्वारा हवाई जहाजसे पृथ्वीको मैं करलक लिये आते रहते हैं। (४) साधारण यात्रा उसे कहते हैं, जिसमें मनुष्य अपन इच्छानुसार चाहे जन, चाहे जहा चल देना है। मान रोजिये वि मथुग-धन्दामनके झूलोका मला होता है, तो उमग आनेपर झट वह चल देते हैं। अन्य किसी नगर या तीर्थ-स्थानमें कोई भागै मला या स्नानपर्व हुआ कि वहींको चल दिये। विवाहोत्सर, जन्मोत्सव आदि- मे जानेका अवसर आ जाता है। किसी मित्र आटिस भेट करनेक लिये जाना पड़ जाता है अथवा अकस्मात् कोई घटना घटित हो जानेपर अपने स्थानसे दूमर म्यानको जाना अनिवार्य हो जाता है। बस, इमीको माधारण यात्रा माननी चाहिये। अन्तमे " यात्राको व्याल्या" शीर्पक विषय समाप्त करते हुए फिर दुबारा पाठकोको भली प्रकार समझाये दते हैं कि एक जगह- से दूसरी जगह किसी कार्यवश जानेको यात्रा कहते हैं और जो मनुष्य जावे उमको यानी कहत है और यह भी कि यात्रा निना कारण की नहीं जाती, स्पष्ट ही है। 1 यात्रासे पूर्व जर कोई मनुष्य किसी तीर्थ या अन्य शुभ कार्यके लिये अपने घरसे निकलकर बाहर जाय, तब उसे किसी पण्डितद्वाग अथवा स्वय (यदि ज्ञान हो) शुभ मुहर्न दिसाकर अपने जानेका समय निश्चित कर लेना चाहिये , नाकि मार्ग आदिमे किसी प्रकारकी निन-वाया पडनेकी शका न रहे, क्योकि शुभ कार्य शुभ मुहूर्तमे ही करना अच्छा होता है। इसलिये हम भी यहापर मुहूर्तको कुछ सरल सास पाने तथा शगुन अशकुनके कुछ रिचार सरल भाशमे सर्वसाधारणके लाभार्थ नीचे लिख देते हैं दिशाशूल विचार सोम शनीचर पुन्व न चालू । मङ्गल बुध उत्तर दिशि कालू ॥ रखी शुरु जो पश्चिम जाय । हानि होर पथ सुस नहिं पाय ।। वृहस्पति दक्षिण करे पया। फिर नहिं समझे ताको आना || भावार्थ-सोमवार शनिवारको पूर्वमे न जाय । मङ्गल तथा । बुधवारको उत्तरमे न जाय । आदित्यवार एवं शुक्रवारको पश्चिममे और बृहस्पतिवारको दक्षिणमे न जाय । इन वारोंको इन दिशाओंके विपरीत चलना ठीक होता है।

w
..
सफरकी कुंजी
चन्द्रमा, योगिनी और तिथि विचार
दिशाशूल ले जाने वामे, राहु योगिनी पूछ ।
सम्मुस ले चन्द्रमा, लाये लक्ष्मी लूट ।।
यानामे चन्द्रमा सम्मुम तथा दाहिने, दिशाशूल वायें अथवा पीठ
पीछे और योगिनी गहु पीठ पीछे लाभदायक होती है। १ परिवा,
४ चौथ, १२ द्वादशी, १४ चौदस , ३०, अमावस्या-ये तिथिया
यात्रामे वर्जित है।
छींक-विचार
याा करते समय पीठ या बाई तरफको ठीक अच्छी होती है।
सामनेकी छींक लडाई करानेवाली होती है। दाहिनी ओरकी छींक
धनका नाश कगती है। ऊँची छींक अच्छी और नीची छींक बुर
होती है। अपनी छींक नुकसान देनेवाली होती है अर्थात् पाई
ऊँची पीठकी छींक मुसदाई और नीची, मामनेकी, दाहिनी तथा
अपनी छींक नुकमानदायक होती है।
।
शकुन विचार
सोरठा
दक्षिण पगते श्वान, दक्षिण अग सुजावई ।
नैन कूसकर कान, ऋद्धि सिद्धि जय मुख का ॥
"दोहा
श्वान दाहिने पाव ते, सने खाज निज शीश ।
राज्य लोभ अरु उदर सुस, कठ गुदा धन दीश ।।

17
1 -
यानासे पूर्व
हृदय कंध सादर अधिक, नाक महा सुखकार ।
पीठ सुबाहुन लाभ है, ठोढी सुयश अपार ॥
सोरठा
जो 'इन अङ्गन स्वान, सने साज पग वाम सों।
तो फल अशुभ पसान, काज न फोजे अपशकुन ।
इवान धुने जो अग, अथवा लोटे भूमि पर ।
तो निज कारण भङ्ग, अति हो कुशकुन जानिये ।
चौपाई
नव नारी जो सन्मुस आवे, तो मति चलिये शकुन बतावे ॥
जो फहु नकुल दरश नर पावे, होय काज सम्पति मिल जाये।
सब विधि कुशल आव घर नीके, सबै मनोरथ पूजे भीके ।।
वाम भाग रे चकवा चारो, सत्र शुभ शकुनन ते है मारो॥
दोहा
गमन समयमै दाहिने, देखि परै कहुं काग।
धन गण कीरनि बहु मिले, बढे बहुत सी शाफ ॥
चौपाई
लिये सुहागिन सुवन उछगा । की घट भरे होय जल गगा।
यहि विधि मिले सो मावन आगे । मनहु मनोग्य सोवत जागे॥
कोयल दीसै जो शुभ तरु पै । मानहु काज भयो निज पर।
सम्मुस धेनु पियावे पाछा । यहि ते सगुन कहो का आछा।
वाये तीतर प्रातहि बोले । गमन समय अति सुसद अमोले ।।
दुपहर ते पोले जो दहिने । तो पाणी सुख पावे सहिने ।
-

सफरकी कुंजी
,
कारी चिडिया उल्लू श्वाना । रासभ गीदड काग पखाना ।।
जो पस्ते ये बाये चलही । तो धन लक्ष्मी पाये मनहीं ।।
दोहा
घाये गीदड़ गन्द ते, मन पाछित पारन्त ।
आगे दहिने पीठते, महा अशुभ दरशन्त ।।
भलो न होवे दाहिनो, रोगी रोछ
सुनार ।
चहु दिशि घोले गीदडा, निशिमें अशुभ विचार ।।
जो चायेसे दाहिने, आवत लेकर मच्छ।
भोरहि रूप जु तेलते, धन प्राप्ती रतन्छ।
मृग बाये ते दाहिने, मावे जो तत्काल ।
तो लक्ष्मी प्राप्ती करे, चले प्रात ही फाल !
गमन समय जो अपशकुन,
प्रथमहि होवे शुभ शकुन, ते पैठत सुखदाय ॥
गवन समय पक्षी स्टै, फलित वृक्ष पे ठि।
भरी दिशामे तो भलो, अशकुन नाच ऐठि ॥
श्वास चलनेके अनुसार मुहूर्त विचार
(१) पूर्व और उत्तर दिशाको दाहिना श्वास चलते समय
और पश्चिम और दक्षिण दिशाको याया श्वास चलते समय जाना
चाहिये।
(१) यात्राकालमें दाहिना श्वास चलनेपर दाहिना पैर और
पाया श्वास चलनेसे पाया पैर मागे बढ़ाकर श्वास ग्रहण के समय
घरसे निकलना चाहिये।
है पैठत दुखदाय ।
+

यात्रा पूर्व
(३) डा अयात् थायों नासिफासे खास पलले समय मौर
पिंगला भयांत् दाहिनी नासिकासे स्वाम भीतर माते ममय कोई कार्य
करनेसे शीघ्र ही मफलता होती है।
सफरी सामान
मय जो मनुष्य जिस प्रकारफी याना फ्रनेको जाता है उसको
गपने साथ उसी प्रकारका सामान भी ले जाना मावश्यक है, जैसे यदि
कोई मनुष्य तीर्थयात्रा लिये जानेका विचार कर, उसे निम्नलिखित
नस्तुयें अपने मायने रखनी चाहिये
(१) पहनने तथा मोढने-बिठानेके गर्म और ठदे दोनों प्रकारय
कपड़े क्योंकि किसी स्थानपर गर्मी ज्यादा पडती है, किसी स्थान
पर ठडक विशेप पडती है (0) भोजन बनानेय लिये आवश्यक
वन-सवा, लोटा, थाली करछी, पतेली इत्यादि (३) डोर-लोटा
(४) लालटेन (५) इतरी (६) ल्यडी (७) चाह या छुरी
(८) तारा-कुली (6) मोमनत्ती-दियासलाई (१०) हाथमे सोने-
की अगूठी (११) रलकी चानी (१२) फाफी रुपया, जिससे बीच
में ही खतम हो जानेपर मुसीबत न उठानी पडे (१३) कुछ पेटेन्ट
दवाइया-अमृतधारा, अर्फ कपूर, अमृताजन, अजीर्ण नाशक चूर्ण
या बटो आदि।
कोई व्यापारी मुनीम,गुमाश्ता, किसी कम्पनीका एजेन्ट और
टूकानदार आदि परदेश जाय तो उसको निम्नलिखित धम्तुये
अपने पास रसनी जरूरी है

८
सफरकी कुंजी
%3-
कारी मिडिया उल्लू श्वाना । रासम गीदड़ फाग पखाना ॥
जो परते ये पाये चलही । तो धन लक्ष्मी पाये मनहीं ।।
दोहा
पाये गीदड़ शब्द ते, मन याछित पारन्त ।
आगे दहिने पीठते, महा अशुभ दरशन्त ।।
भलो न होवे दाहिनो, रोगी रोछ सुनार ।
चहु दिशियोले गीदडा, निशिमें अशुभ विचार ।।
जो पायेसे दाहिने, आवत लेकर मच्छ ।
भोहि रूप जु तेलते, धन प्राप्तो परतन्छ ।
मृग घाये ते दाहिने, आवे जो तत्काल ।
तो लक्ष्मी, प्राप्ती फरे, चले प्रात ही फाल ।
गमन समय जो अपशकुन, ते पैठन दुखदाय ।
प्रथमहि होवे शुभ शकुन, ते पैठन सुखदाय ॥
गवन समय पक्षी रटे, फलित पृश्न पे मैठि।
भरी दिशामे तो भलो, अशकुन नाखै ऐठि॥
श्वास चलनेके अनुसार मुहूर्त विचार
(१) पूर्व और उत्तर दिशाको दाहिना सास चलते समय
और पश्चिम और दक्षिण दिशाको बाया श्वास चरते समय जाना
चाहिये।
(१) यात्राकालमें दाहिना श्यास चलनेपर दाहिना पैर और
घाया श्वास चलनेसे पाया पर आगे बढाकर श्वास ग्रहणके समय
घरसे निकलना चाहिये।
7
1

। यानाफे पूर्व (३) डा अर्थात् यापों नासिकासे श्वास चल्ने समय भौर पिंगला अर्थात् दाहिनी नासिकासे श्वास भीतर माते समय कोई कार्य करनेसे शीघ्र ही सफलता होती है। सफरी सामान . पर जो मनुष्य जिस प्रकारको यात्रा फरनेको जाता है उसको अपने साय उसी प्रकारका सामान भी ले जाना मावश्यक है, जैसे यदि कोई मनुष्य तीर्थयात्राके लिये जानेका विचार कर, उसे निम्नलिखित बस्तुयें अपने साथमे रसनी चाहिये (१) पहनने तथा ओढने-मिछानके गर्म और ठढे दोनों प्रकारय कपडे क्योंकि किसी स्थानपर गर्मी ज्यादा पडती है, किसी स्थान पर ठडफ विशेप पडती है (२) भोजन बनानेक लिये आवश्यक बर्वन-तवा, लोटा, थाली करछी, पतेली इत्यादि (३) डोर-लोटा (४) लालटेन (५) छतगै (६) लांडी (७) चाक या छुरी (८) ताला-फुली (6) मोमबत्ती-दियामलाई (१०) हाथमे सोन- की अगूठी (११) रेलको चानी (१२) काफी रुपया, जिससे बीच में ही सतम हो जानेपर मुसीवत न उठानी पडे ( १३ ) कुछ पेटेन्ट दवाइया-अमृतधारा, अर्क क्पूर, अमृताजन, अजीर्ण नाशक चूर्ण या वटी आदि। कोई व्यापारी मुनीम,गुमाश्ता, क्मिी कम्पनीका एजेन्ट और दूकानदार आदि परदेश जाय तो उसको निम्नलिखित वस्तुये अपने पास ग्पनी जरूरी है -

सपरकी कुली
,
कागे चिड़िया उल्लू श्वाना । गेसम गीदड काग बसाना ।।
गो पलते ये बाये वलही 1 तो धन लक्ष्मी पावे मनहीं ।
दोहा
घाये गीदड़ शब्द ते, मन पाछित पारन्त ।
आगे दहिने पीठते, महा अशुभ टरशन्त ॥
भलो न होवे दाहिनो, रोगी रीछ सुनार ।
बहु दिशि घोले गीदडा, निशिमें अशुभ विचार ।।
जो पायेसे दाहिने, आवत लेकर मच्छ ।
भोरहि रूप जु तेलने, धन प्राप्तो परतच्छ ।।
मृग याये ते दाहिने, आवे जो तत्काल ।
तो लक्ष्मी प्राप्ती करे, चले प्रात हो फाल ।।
गमन समय जो अपशकुन, ते पैठत दुखदाय ।
प्रथमहि होवे शुभ शकुन, ते पैटन मुखदाय ||
गवन समय पक्षी ग्टे, फलित पृक्ष पै पैठि ।
भरी दिशामे तो भलो, अशकुन नास ऐति ॥
श्वास
चलने के
अनुसार मुहूर्त विचार
(१) पूर्व और उत्तर दिशाफो दाहिना श्वास चलते समय
और पश्चिम और दक्षिण दिशाको बांया श्वास चलते समय जाना
चाहिये।
(१) यानाकालमें दाहिना श्वास चलनेपर दाहिना पैर और
पाया श्वास पलनेसे घाया पर आगे बढाकर श्वास ग्रहणके समय
घरसे निकलना चाहिये।

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सफरफी कु जी
-
' (१) मोढने, विछाने, पहननेके कपडे (गर्मी-जाड़ा मौसमफे
अनुसार) (0) डोर-लोटा (३) छतरी (४) घडी (५) चाकू
(६) हायमें सोनेकी अगूठी (७) हिमानाही (८.) आर्डर पुरु
(९) रसीद बुक (१०) नोटगुरु-पेन्सिल (११) सैंपल एक्स
( १२) मोमबत्ती (१३) दियासलाई (१४) तालाकुशी (१५)
लोकी चाबी (१६) कुछ आवश्यक पेटेंट दवाइया-अमृतमारा,
अर्फ कपूर, अजीर्ण नाशक गोलिया, चूग्न, अमृताञ्जन ।
नोट- रेलको चानी हर जगह सौदागरके यहा मिल सकती है
और इसे पास रखनेमें रेलवे कम्पनीकी तरफसे किसी प्रकारको
कानूनी रुकावट नहीं है।
किमीने लिखा है कि निम्नलिखित पाच चोजे तो प्रत्येक
मनुष्यको हर समय पास रखनी चाहिये
छुरी, छुडी, छसरी, छला, छबडा पाच छकार।
. इन्हें निन्य डिग राखिये, अपने अहो कमार ।।
.
"
।

रेल छूटनेसे पहिले यात्रापथपर आरूढ होनेमे पहिले यात्रीको रेलका टाइम (समय)। स्टेशनपर जाकर स्टेशनमास्टरसे दरयाप्त कर लेना चाहिये, परिक प्रत्येक यात्रीको हिन्दी या अग्रेजीका रल्ये टायम टेबिल मगाफर पास रख लेना चाहिये जिससे मार्गमे भी गाडी ठहरने, पदरने आदि का टायम देग्रनेमें सुविधा रहे। ग्लो टायम टेविल प्रत्येक म्टेशन पर कीमत देकर मोल मिल सकता है। स्टेशनपर यात्रीको रेल छूटने वक्तसे आध घटा पहिले पहुँच जाना चाहिये, ताकि पीठे दर हो जानेसे जल्दमें भागदौड करने में किसी तरहकी हानि न उठानी पडे। स्टेशनपर पहुचकर टिफटघरको सिडकीसे टिकट खरीदना चाहिये मगर टिकट परीटते समय अपनी जेन, अटी वगैरहसे साव. धान रहना चाहिये, क्योकि अक्सर स्टेशनोंपर पाकिटमार, घोर, ठग जाली मनुष्य इसी ताकमें लगे रहते हैं और मौका पानेपर मुसा- फिरकी जेर फाटकर रुपया-पैसा लेकर चम्पत हो जाते हैं और घेचारा मुसाफिर अपनी जेवसे रुपये निकल जानेपर अत्यन्त दुःसी होता है इसलिये टिकट सगेदते समय प्रत्येक मुसाफिरको उक्त यात से अवश्य सावधान रहना चाहिये। टिकट लेकर उसी वक्त देने कि ठीक उसी जगहका टिकट जिस जगहका मागा है क्योंकि भीडमें - AMALA १४ सफरको फुजी वाली है जरा मावधानी करनेसे आप फौरन उसी गाडीमें बैठ जायगे मौर मुफ्तमें इधर-उधर जाने और धक्के सानेसे बच जायगे। आज-कल रेलवेने ऐसी सुविधा कर दी है कि दूर जानेवाले मुसाफिरोंके लिये जिनको गाडी यदलनी पड़ती है उनकी गाडीके सायमें कुछ दिब्बे जोड दिये जाते हैं जो जफशनपर कटफर दुसरी मगद जानेवाली गाडीमें जोड दिये जाते हैं जिससे मुसाफिरोको गाड़ीसे उतरफर दूसरी गाडीमें बैठनेफा फष्ट नहीं होता है और मारामसे बैठे हुए अपने ठिकानेके स्टेशनपर पहुंच जाते हैं जैसे किसी मुसाफिरको यम्यईसे इलाहाबाद जाना है तो उसको इटारसीपर गादी घदलनी चाहिये, लेकिन "दिल्ली इलाहाबाद" एक्सप्रेसमें इलाहा- याद जानेके लिये डिब्बे जोडे हुए होते है जिससे इलाहाबाद जाने- वाले मुसाफिरको इलाहानादवाले डिब्यमें पैंठकर इटारसी बदलनेकी नरूरत नहीं पडेगी परिक वही डिग्या इलाहाबाद जानेवाली गाडोमे इटारमीपर जोड़ दिया जायगा जिससे मुसाफिर नाहककी तकलीफ तथा कुलियोंके झझटसे बच जायगा। लेकिन डिब्बे देखकर पैठना चाहिये। हर डिनापर लिसा रहता है कि वह कहा जानेवाला है , नैसे दिल्ली--पंवई" 'इलाहाबाद-बंबई" आजकल रेलोने यह भी सुनिया कर दी है कि जनशन स्टेशनों- पर "पैसेंजर गाइड" यानी मुसाफिरोको गस्ता बतानेवाले मुकार कर दिये गये हैं जो तीसरे दरजेके मुसाफिरसानेमें रहते है जिनका काम (ड्य दी) मुसाफिरोंको हर बातकी सूचना देने का है। जो भी - भसाफिज सोना ग्ल छूटनेके पहले टायम, टिकटभाडा, सान-पीने, टट्टी-पासाना इत्यादिकी व्यवस्थाकी बाबत विना सकोच पूछ सकते हैं। ये अपने अफसर नहीं है, बल्कि रेलवे कर्मचारी है जो मुसाफिरोकी सुविधाके लिये मुकरर किये गये हैं। गाडीके डिव्वोंकी व्याख्या गाडीमें बैठते समय इस यातका ध्यान रखना जरूरी है कि निस मर्गको टिकट सरीदी हो उसी वर्गके हिनोंमे घेठना चाहिये, किन्तु हमारे बहुतसे भोले भाले भाई अज्ञानता तथा जल्दीके कारण दूसरे- मरे वर्ग के डिब्बोंमे बैठ जाते है और जरासी असावधानीके कारण नाहकको तकलीफ उठाते हैं। इसलिये उनकी जानकारीके वास्त गाडीक दिब्बोंकी वर्गानुसार व्याख्या कर देना पहापर अनुचित न होगा। प्रत्येक पैसेजर गाडीमे कई वर्गक डिब्ये जुड़े होते हैं, जैसे तीसरा वर्ग, इण्टर, सेकड इत्यादि । तीसरा वर्गको डिव्या-यह सनसे नीचे दरजेका दिव्या होता है । इसके दरवाजेके ऊपर "III Class" थर्ड काम अङ्गरजीमें लिया रहता है और किसी-किसी रेलवेमे "तीसरा दरजा" हिन्दीमे मी लिसा रहता है इसके अन्दर बैठने की जगह लकडीके सस्नोको बनी होती है और वे चोके समान बैठा जाता है। इन्टर क्लास अर्थात् ड्योढ़ा या मझोला दरजा इसके दरवाजेपर अगरेजीमें "Inter Class" 4 म सफरकी कुजी क्लाम लिखा रहता है। इसके अन्दर बैठनेकी, जगहपर सेकण्ड शासके माफिक गद्दी लगी होती है किन्तु उससे छोटी होती है। सेकण्ड क्लास-दूसर वर्ग-इसके अन्दर बैठनेकी छायो चौडी गद्दीदार अलग-अलग सीटें होती हैं जिनपर एक आदमी अच्छी तरह सो सकता है और रातमे वह सोट एक मादमीके ही लिये रिर्व यानी मुकर समझी जाती है। उसमें विजलीके पखे सभा गेगनीको अधिक व्यवस्था होती है। फर्स्ट क्लास-पहिला वर्ग-इसके अन्दर भी सेकड शासके ही भाफिक गही वगैरह रहती हैं किन्तु इसमें उमसे भी अधिक व्यवस्था होती है। जनाना डिव्या-हर एक वर्गका जनाना डिव्या अलग- अलग होता है जिसकी भी व्यवस्था ऊपर लिखे भूजन अलग अलग वर्गानुसार होती है जिसमे औरतोके सिवाय मर्द नहीं बैठ सकते हैं। सर्वेट्स कम्पार्टमेन्ट अर्थात् नौकरोंका डिब्बा- इसमे बैठनेको व्यवस्था तीसरे. परजेक डिब्बोंके माफिक हो होती है किन्तु यह मिर्फ पहिले और दूसरे वर्गके यानियोंके नौकरों लिये ही रिजर्व यानी मुकार होता है। यूरोपियन एग्लो-इंडियन कंपार्टमेन्ट अर्थात् यूरोपियन व ईसाइयोंका डिव्या इसमें भी तीमरे वर्गफे डिब्बोंके माफिक ही बैठनेका बन्दो- यस्त होता है परन्तु यह टिब्बा उन्हीं लोगोक वास्ते रिजर्व होता है। - %3D - " - रस ष्टनेक पदले इसके अलावा पोस्ट, गार्ड और कमेनरे हिचे होते हैं, जिनमें नफे सिवाय मुसाफिरोंक येग्नेका हुक्म नहीं होता है। प्रत्येक न्येमें गेशनोका काफी पन्दोरस्त होता है और पेशाय, पैसानेके व्ये एक कोठरी अलग नियत होती है, जिसमें आपदस्त सेनेके लिये नीका नल भी लगा रहता है। प्रत्येक यात्रीको निर्दिष्ट स्थानको कर पेशाव-पारगना दुसरी जगह नहीं करना चाहिये ।

यादा-पथपर रलेगाड़ीमें सावधानी रेलगाडीमें सवार होते ही अपना कुल सामान नंभालकर अपनी आसोफे सामने रस लेना चाहिये। यदि हो सके तो अपनी पेटीको बैठनेकी सीटके नीचेके खमेसे जजीरमें वाधकर ताला लगा देना चाहिये, इससे पेटीके चुराये जानेका अदशा न रहेगा। सामानके छोटे बड़े जितने अदद अपने साथ हों या गाडीके तानेमे दे रखे हों, उन सबकी यादी अपनी नोटबुकमें टीप लेनी चाहिये और अपने पहुचनेके स्टेशनपर उतरते ही सन सामान यादीके माफिक सम्भाल लेना चाहिये।' यदि गाडीसे उतरते समय जत्दीके कारण अथवा गाडीके अधिक न ठहरनेके कारण भूलसे कोई सामान गाडीमे रह जाय, तो उसी समय स्टेशनमास्टरसे बोलकर तार दिलवाना चाहिये और डिब्बेका नम्बर तथा पूरा पता जहापर वह रसा हो और सामानको भी पूरी हुलिया बतलानी चाहिये, ऐसा करनेसे अगले स्टेशनपर तलाशी की जायगी और सामान उतारकर दूसरी गाडीसे आपके स्टेशनपर भेज दिया जायगा। यानीको इस बातका ध्यान रखना चाहिये कि बहुतसे छोटे स्ट- यात्रा-पथपर शनोंपर गाडी बहुत कम ठहरा करती है, इसलिये सामान सम्भालकर जल्दी ही उतरना चाहिये। गाडीके डिब्बेमे पैठ आने तथा अपना सामान सम्भालकर रख लेनेरे बाद चतुराईसे नम्रतापूर्वक पूछकर यह पता लगा लेना चाहिये कि आपके पडोसी यात्री यानी पासमें बैठे हुए कौन-कौन स्टेशनपर उतरेगे। अक्सर ऐसा देखा गया है कि पडोसी यात्री ही चीज, चुरा- कर एक डिब्बेसे उतरकर दूसरे डिब्धमे बैठ जाता है। ऐसी दशामें यदि अपना कोई सामान चुरा ले जाय, तो पता लगाया जा सकता है कि अमुक यात्री अमुक स्टेशनपर उतरनेवाला था। वह पहिले क्यो उतर गया? कदाचित वही चीज चुराकर दूसरे डिब्बेमे जा बैठा होगा। उस स्टेशनपर जहा गाडी ज्यादा देरतक सडी रहती हो, गार्डको रिपोर्टकर उस आदमीको तलाश करानी चाहिये, ऐसा एक दफे मुझसे हो गया है, जो आगे "अपनो बीती" मे आप देखेंग। यात्रीको गाडीमे इस तरह नींद लेनी चाहिये जो हर स्टेशनपर गाडीके ठहरते ही आख सुल जाय । और आस खुलते ही अपना सामान देस लो कि अपना सामान बराबर रखा है, नहीं तो असा- वधानी करनेसे सामान चला जायगा, तो यह भी पता नहीं ला सकेगा कि हमारा सामान कौन-से स्टेशनके बीच चला गया और फिर पुलिस भी नल्दी पता नहीं लगा सकेगी। रास्तेमें सफर करते हुए बारबार हर स्टेशनपर सैलानियोंकी तरह उतरना चढना हानिकर है। रलो बैठे हुए यात्रियोंके साथ किसी प्रकारका नशा, ।

- सफरको कुंजी तम्बाकू, सिगरेट, पान आदि खाना-पीना नहीं चाहिये और न दूसरे- को देना ही चाहिये। प्लैटफार्म, मुसाफिरखाने या गाडीमें किसी भी अनजान मनु- प्यके हाथकी कोई चीज नहीं खानी चाहिये , क्योकि आजकल जहर देकर ठगनेवालोंकी तादादै विशेष पंढ रही है। इसलिये किसी भी अनजान मनुष्यके हाथकी चीज सानेके पहिले अपने पासवाले किसी कर्मचारी या अफमरको दिसाफर खाना चाहिये।' इसी बारेमें रलवेने निम्न प्रकारकी सूचना निकालकर जनताको सावधान किया है।' "मुसाफिरोंको चल्ती गाडीमें जहर देनेवाले ठगोंसे मावधान रहना चाहिये।" हजागे भोले मुसाफिर रात-दिन यात्रा' करते है। हजारों लोग विवाह, रिश्तेदारी आदिमें जाते रहते हैं और अपना सामान बक्स, गठगै आदिमें ले जाते हैं । व्यापारी लोग नोट, नगदी आदि लेकर सफर करते हैं । इन सब लोगोंपर रेलके चोरोंको आख रहती है और इनमेंसे अक्सर लोग ठगे जाते हैं। जहर देकर ठगनेवालोंके तीन-चार आदमियोंके गिरोह रहते हैं। यह लोग धड़े जंकशन स्टेशनोंपर अक्सर रहते है , जहापर गाडिया देरतफ सही रहती हैं। जहर प्राय मिठाई, पान, चीडी, मिगरट आदिमें मिश्रित हो सकता है और इन्हीके द्वारा दिया जाता है। इस जहरकी मामूली मात्रांसे मनुष्य मरता नहीं है, परन्तु बेहोश हो जाता है। ये लोग रातमें सफर करते हैं। जिस गाडीमें मालदार लोग , - ।

यात्रा पथपर घेठे होते हैं उसीमे दो-तीन ठग मुसाफिरके रूपमे मा पैठते हैं और मुसाफिर्गसे यात-चीत करने लगते हैं। गाटीमें जो मनुष्य ज्यादा मालदार दिखाई पडता है, उसीपर इन लोगोंफी खास निगाह रहती है। पोछे ठगोंका एक साथी मिठाई छेकर आता है जो देखनेमें यहुत बढ़िया और माफ होती है। साथी ठग मिठाई खरीदकर खाते हैं और तारीफ करते हैं, जिससे और लोग भी । खरीदें। इस प्रकार मुसाफिरोंको जहर मिली मिठाई दी जाती है। गाड़ी चलती होती है और लोगोंको वेहोशीको नींद आ जाती है। ठग लोग मागेके स्टेशनके करीन मुसाफिरोंका सामान सिडफोसे बाहर डाल देते हैं। स्टेशनके करीव जब गाडीकी रफ्तार कम हो जाती है, ये लोग कूदकर सामान उठा ले जाते हैं। रेलमे पुस्तक या असयार रारीदकर उसके पृष्टोंको थूक लगाकर पलटकर नही पढना चाहिये , क्योंकि अक्मर ऐसा होता है कि बहुतसे दुश्मन पुस्तकोंके पृष्टोंपर कोई ऐसा जहरीला मसाला लगा देते हैं, जिसके यूक लगकर मुहमें पहुचनेसे मनुष्य येहोश हो जाता है। इसलिये प्रत्येक यात्रीको उक्त बातसे विशेष सावधान बहना चाहिये। रातमें गाडीके तख्तोंके नीचे चोर-ठग मो जाते हैं और किसी भी यात्रीके मालको दाव लानेपर झट ले चम्पत हो जाते हैं। इस लिये लम्बी मार करनेवाले मुमाफिरोंको तख्तोंके नीचे सामान रखते -समय इस बावका अवश्य ध्यान रखना चाहिये। । -

२२
सफरको कुजी
NA
+
.
.
चलती हुई गाडीमें खिडकोद्वारा बाहरकी तरफ सिर 'निकारक
कभी नहीं बैठना चाहिये , क्योंकि एक तो हवा जोरसे सिरपर
टोपी, पगडी या साफा गिर जानेका भय रहता है, दूसरे माख
खनका कोयला गिर जानेसे अधिक कष्ट होता है, तीसरे सिगन
और सम्भे आदि दकग जानेका भय रहता है, जिसके कारण बहुत
में लोगोंके प्राणतक' जाते देखे गये हैं। इसलिये 'गाडीमे भीत
हो सिर किये बैठे रहना चाहिये ।
डिब्बेके अन्दर थूकने या कुडा-करकट कर देनेसे यात्रियोंक
'आरोग्यतामें बाधा पड़ती है, इसलिये ऐमा फर्म डिब्बेके बाहर है
“करना उचित है।
स्टेशनपर गाडी सडी हो जानेपर मुसाफिरको गाडीका दरवाज
सोलकर उतरना-चढना चाहिये । चलती गाडीमें उतरने चढने
सतरा रहता है।
लम्बी सफर करनेवाले यात्रियोंको गाडीमे बैठते समय अपने
पैठनेवाले डिब्वेका नम्बर तथा गाडीका नम्बर लिस लेना चाहिये
क्योकि यदि आप किसी कार्यवश स्टेशनपर उतर पडे और इतनेमें
गाड़ी चलें दी और आपका सामान गाडीमे चला जाय ,
उसी समय गाडीके डिब्वेका नम्बर घताकर स्टेशनमास्टरद्वारा
अगले स्टेशनको तार दिलाकर अपना सामान उतरवा सकते हैं और
र फिर दूमरी गाडीसे जाकर अपना सामान समाल सकते हैं।
चलती गाडीमें बहुधा टिकट चेक करनेवाले रेलवे कर्मचारी
टिकट चेक किया करते हैं। उनके पूटिकट छनेपर टिकट 'फौरन
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तो आप

याना-पथपर
२३
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तिला देना चाहिये। किन्तु यह ध्यान रसना चाहिये कि रेलवेने
जन्हें टिकट चेक करनेके लिये मुकर्रर किये हैं उनको विल्ला तथा
रदो दो होती है। विल्लेमे लिया होता है -T TE, T. T
:, T T C,Crewman Ticket checker इत्यादि ।
इस तरह उनकी ड्य टीका नाम लिसा होता है । जो ऐसे बिल्ला
और वग्दोयुक्त ग्लरे कर्मचारी हो , उनको हो टिकट बतलाना
गहिये। दूसर बिना पिल्ला, परदीवालेको नहीं बतलाना चाहिये ।
क्सर ऐसा देसा गया है कि बहुतसे बदमाशलोग कोट-पतलून
हिनकर साहब बहादुरी लिवासमें फिरते हैं और मुसाफिरोको धोखा
नेकी नीयतसे टिकट चेक करते हैं। उनको टिकट नहीं बतलाना
चाहिये। दूसर ऐसे ही टिकट चेकरोके साथ जो कु जी-काटा लेकर
गिन तोलनेके लिये रहते हैं वह भी कभी-कभी टिकट देखते रहते
। उनको भी टिकट नहीं दिखलाना चाहिये। उन्हे टिकट चेक
करनेका अधिकार नहीं है।
लम्बी सफर करनेवाले यात्रियोंको यदि किसी स्टेशनपर
नत्यकर्म, शौच, स्नानादिसे निवृत्त होनेक लिये उतरना होर, तो
पहिले रेलके ठहरनेका टाइम गार्ड या स्टेशनमास्टरसे ठीक-ठीक
एलेना चाहिये कि कितनी देर गाडी खडी होगी। यदि उतने
मयमें आप अपने कर्मसे निवृत्त हो सकें, तब तो उतरे , वरना न
तरे, क्योकि अक्सर देखा गया है कि बहुतसे मुसाफिर
गोमूली कुली वगैरह रेलवे नौकरसे गाडीके ठहरनेका समय
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--

२४ ! सफरकी कुजी पडते हैं और गाडी चली जाती है, तब सदी मुसीवत उठानी पडती है। ऐसा एक दफे मुझसे भी हो चुका है, जो आगे "अपनी बीती मे देखेगे। इसलिये गाडीके ठहरनेका समय गार्ड या स्टेशन मास्टरसे ही पूछना चाहिये। गाडी चलने समय उसका इनचार्ज गार्ड होता है और स्टेशनपर स्टेशनमास्टर गाडी तथा स्टेशनका इनचार्ज होता है। खाने-पीनेक लिये रेलवेने स्टेशनोंपर कुछ लाइसेन्स वेण्डर यानी मिठाई घेधने- वाले मुकर्रर कर दिये हैं, जिनसे आप साने-पीनेका सामान मोल ले सकते हैं। अगर आपको कोई विशेष सानेकी तथा आप समझत हो कि जो चीज स्टेशनपर तैयार नहीं मिल सकेगी, उसके लिये इच्छा हो तो आप पहिले स्टेशनसे गार्ड के जरिये तार दिला सकते हैं। गार्ड फौरन आपके कथनानुसार बिना पैसे तारसे रूबर कर देगा। यदि आपके डिब्बेमे रोगनी, टट्टी, नल वगैरहका कष्ट हो, कुली लोग तग करें, लाइसेन्स वेंडर (सामान बेचनेवाले) फिसी तरहका सराव सामान दें या कम दे या डिब्बेमे नियमित मुसाफिरोंसे अधिक भीड हो जावे तो आप फोर न स्टेशनमास्टरसे शिकायत कर सकते हैं, और वह उसका उचित बन्दोवस्त करेगे। स्टेशन मास्टर, गार्ड या कोई रेलवे सर्वेन्ट (कर्मचारी) अपने अफसर नहीं हैं। वे केवल रेलवे-कर्मचारी हैं, जिन्हे रेलवेने मुसा फिरोंके आने-जानेका बन्दोबस्त करनेके लिये मुकरर किये हैं जिससे रेलवेका काम सुचारू रूपसे चल सके और यात्रियोंको रेलमें किसी अनुचित प्रकारका कष्ट न हो सके।

यात्रा-पथपर AM । m रेलवे-कर्मचारियोंका कर्तव्य (त्य टो) मला स्थानमे लिखा गया है जिससे यह मालूम हो जायगा कि अमुक-अमुक रेलवे-कर्मचारीका यात्रीके प्रति क्या कर्त्तव्य है। रेलवेका मुख्य उद्देश्य है कि उसके कर्मचारी यात्रियों के प्रति नम्रता व सभ्यताका व्यवहार करे जिससे उसको प्रतिष्ठा बढे, कारण कि रेलवेका सारा कारोबार यात्रियोंके ही ऊपर निर्भर है। अपने पहुचनेवाले मुकामके स्टेशन आनेके पहिले हो सब सामान सभाल फर ठीक कर लेना चाहिये और मुकाम आनेपर फौरन गाडीसे उनर जाना चाहिये और अपना कुल सामान सभाल कर उतार लेना चाहिये। यदि किसी मुसाफिरको स्टेशनसे दूर गाव या नगरमें जाना हो, तो स्टेशनपर इका, तागा, मोटर आदि सवारी मिल सकती है। आप उनमे बैठकर जा सकते हैं। मगर धैठते समय इका, तागा या मोटरका नम्बर देस लेना चाहिये तथा यह भी देख लेना जरूरी है कि मवारी- के साथ पूरा सामान है तथा सवारी ठीक है जिससे रास्तेमें किसी तरहका कष्ट न पहुचे। मुमाफिरोंको मोटरमें बैठते समय यह अवश्य ध्यान रखना चाहिये कि मोटरको छतपर न बैठें, क्योकि छतपर बैठे हुए मुसाफिर रास्ते पेड़ोंकी शासा आदिसे झटका खाकर नीचे गिर पड़ते हैं और अत्यन्त दुस उठाते है और कभी-कभी प्राणतक दे बैठते हैं। मोटर- वाले मेले तमाशेरे अवसरपर ज्यादा भीडके कारण पैसा ऐ टनेक लिये भुमाफिगेको अक्सर सामान रखनेको जगह छतपर बैठा देते हैं। 4 में .

BOOKSAMICR cod ठहरनेका स्थान जब कोई यात्री किसी मुकामपर पहुचता है, तब उसको वहापर ठहरनेके लिये स्थान दू ढना आवश्यक है। यदि उस नगरमे आपका कोई परिचित व्यक्ति रहता है , तब तो उसके पास ठहर जाइये और जहाँपर ऐसा कोई परिचित व्यक्ति न हो तर उस नगरको धर्मशालामे ठहरियेगा और उस धर्मशालामें -एक कोठरी लेकर उसमे अपना निजका ताला-लगा दीजिये। वैसे तो प्रत्येक शहरमे धर्मशाला और सराय दोनों ही होती है, परन्तु हिन्दुओको सरायके वनिस्वत धर्मशाला अति अधिक उपयोगी होगी। यहापर हम धर्मशाला तथा सरायोके मम्बन्धमे बुछ आवश्यक बातें लिखना उचित समझते हैं जिनसे पाठकोंको जानकारी हो जाय । अक्सर सरायोंमें देखनेमे आया है कि जो कोई भी मुसाफिर सरायमें ठहरता है उसे सरायको भटियारीद्वारा ठहराया हुआ किराया तो देना ही पड़ता है, परन्तु साथ ही सरायमें रहनेवाली सानगियोको नगैर पान-फूल चढ़ाये उनका टैक्स नहीं चुक पाता और कभी-कभी तो वे भोले-भाले मुसाफिरसे अपनी कामोद्दीपन आकर्षणशक्ति द्वारा जाल फैलाकर उसका सर माल-मत्तातफ झपटनेमें कमर नहीं रखती, जिससे बेचारे मुमाफिरको अपनी बहुमूल्य शक्ति और धन ठहरनेका स्थान नष्ट करने के साथ-साथ इनाममे निर्मलता और गर्मी आतमक्का मेग गलेमे बाधकर उलटे पैमें अपने घरफी गह लेनी पड़ती है । इमलिये यात्रियोंको सगयमे ठहरते समय उस यातमे अवश्य मावधान रहना चाहिये। रही धर्मशालाओंकी यात, मो उनका भी यह हाल है कि यद्यपि दानियोंने अपनी गाढी कमाईका पैसा लगाकर धर्मशाला मनवायी हैं, जिनमे प्रत्येक हिन्दयानी ठहरकर लभ उठारे तथापि कुछ दानियोकी विशेष देस-नय न रहने के कारण उनके मुकर्रर किये हुए प्रबन्धक कर्मचारीलोग कहीं-कहींपर यात्रियोंको कष्ट देकर अनुचित लाभ उठाते हैं , क्योंकि अम्मर देसा गया है कि मेले, तमाशे, पर्व आदिके अवमरपर अधिक भीड होनेसे येचार गरीन मुसाफिगेको धर्मशालाके कर्मचारियोंद्वारा या तो फटकार सानी पड़ती है या 'रुपये-पैसेकी भेंट चढ़ाकर अपने आपको दुमित होना पडता है। इसलिये हम यात्रियोंका ध्यान इम अन्यायकी ओर 'आर्पित करते हैं कि वे इन आपत्तियोको सहकर चुप न बैठ जाय, घल्कि धर्म- शालाओं के संरक्षकोंसे पत्रद्वारा सूचितफर इन आपत्तियोंको दूर कानेका अनुरोध करें, जिसमे भावी यात्रियों को इन कष्टोंका सामना 'न करना पड़े। यात्रियोंको धर्मशालाके नियमोंका पालन जरूर करना चाहिये। तीर्थस्थानोपर तीर्थयात्रियोंके लिये वहाके पोंके मफानात भी 'विशेषकरें यात्रियोके ठहरनेके लिये बने होते हैं, इसलिये तोर्थयात्री पडोंके मकानोंसे भी ठहरनेका काम निकाल सकते हैं। T

२८
सफरको फुजी
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यानियोंको मकानमें उतरते समय निझलिखित बातें अवश्य
ध्यानमे रखनी चाहिये। उनसे सावधान रहना चाहिये-
(१) मकानकी सफाई, पाकशाला, जलकी समीपता स्वतंत्रता,
टट्टी-पैखानेका सुभीता।
(२) जिस मकानमे सूर्यफा प्रकाश न पडना हो तया जिसमें शील,
नमी या सदी रहती हो उसमें कभी न ठहरे ।
(३) यदि याल-बच्चे साथ हों तो अपना निराला मकान लो जिसमे
किसी दूसरेको उपाधि न लगी हो।
(४) उतरनेके पहिले मकानका किराया यदि हो तो तय कर हो,
क्योंकि तीर्थस्थानोंपर प्राय किराया जरूरतसे ज्यादा लिया
जाता है।
(५) अपने मकानको किसी पडोसोफे विश्वासपर छोड़ो। किसी
नये आद्मीको अपने डेरेमे मत आने दो।
(६) अपने बाल बच्चे या स्त्रीजनोंको अकेले गहना पहनाकर
या इनको स्वतन्त्र होकर किसी दूसरेके साथ न घूमने-फिरने दो,
कयोंकि न मालूम कौन किस इच्छासे फिरता है।
(७) गाने-बजानेवाले, सौदा वेचनेवाले या मँगते फफोरोंको अपने
डेरेमें नहीं बैठाना चाहिये।
(८) परदेशमें बिना जान-पहचानवाले आदमीका इतवार कभी न
१ करना तथा उसके हायका दिया हुआ प्रसाद, मिठगा, पान,
तम्या, सुलफा आदि नहीं खाना पीना।
-

ठहरनेका स्थान (९) हेरेके पास खरान मुहबतका चिन्ह मालूम पडे तो विशेष साव- पान होकर रहो या मकान पदल लो। (१०) अचानक कोई आपत्ति मा पडे, तो मकानदारको सूचना देकर पुलिसमें रिपोर्ट कर दो। (११) ठहरनेके स्थान सम्बन्धी रक्षा मर्व प्रकारसे स्वय करनी चाहिये, क्योंकि विशेषकर तीर्थस्थानोंमे अनेक कालवेली, विषयासक्त नाना प्रकारफे रूपधारी फिरा करते है, अतएप हमेशा सावधान रहना चाहिये। - भोजन-व्यवस्था xrkxy.vi यात्रियोंको- जहांतक हो सके अपने स्थानमे कच्ची ही रसोई बनाकर सानी चाहिये और थोडा आहार करना चाहिये। यदि स्वयं इन्तजाम न कर सकें , तो हिन्दूहोटलोंमे भी फच्ची खा सकते हैं, यदि पका ही सामान खान को मिले, तो दूकानदारसे कञ्चा-पका, सडा-धूजा आदि देखकर ताजा और साफ लेना चाहिये, जिसमें आरोग्यतामें बाधा न आने पावे। तेलको सड़ी-गली चाट खाना, कच-पो फल येवक्त साना, येवक्त इधर उधर घूमते रहना और भङ्ग-यूटी, सुलका, अफीम आदि नशीली चीजोंका या दूसरे मादक पदार्थोफा सेवन करना सदा त्याग देना चाहिये, क्योंकि आहार -विहारको उलट-फेर ही रोगका कारण हुआ करती है , जैसा कि लिया है। मिथ्याहार विहाराभ्या,दोपास्यामाशयंश्रय । वाहे निरस्य कोष्ठानि कष्टदा स्यू रसानुगा ॥ पहाडी मार्गद्वारा पैदल या कंडी झापानमे बैठकर जो यात्रा फो जाती है उम यानाफे मार्गमें सान-पानका विशेष ध्यान रखना चाहिये, क्योंकि पहाडी आरहवा विशेष ठण्डी रहनेके कारण उसमें आक्सीजन (Orizan ) कम होती है और ज्यों-ज्यों ऊपरकी चढाई आती जायगी त्यो यो ठण्डक अधिक होसेने

भोजा-व्ययस्था
३१
आरसीजन (Onion) कम होती जायगी । इमलिये ऐसे
स्थान और ममयमें यानियोंको सट्टा, परपरा, गरिष्ट पदार्य न
साफर पुष्टिकारक पदार्थ घी, दुध इत्यादिका सेवन ही विशेष
रामदायक होगा, सट्टी परपरी चीजे सानेसे अतिसार घुसार
आदि रोग हो जाते हैं, सो भी यात्रियोंको पैदल चलनेकी
हालनमें तो वे रोग विशेप फप्ट देते हैं। अत यात्रियोंको मार्गमें
मेवन करते रहने के लिये भी कोई गर्म दवा चन्द्रोदय, कस्तूरी, गो.
लोचन, अभ्रक भस्मादि पाम रखनी चाहिये।
जलवान
शुद्ध जल कूपो, झरनो या यहती नदियोंका ही काममें लाना
चाहिये , क्योंकि तालार या फुगडोंमे कभी-कभी मेटेको भीड होनेपर
यात्रीलोग सानुन लगाफ मैले कपडे धोने लग जाते हैं और सिरमें
दही, तल मलर नहाने लग जाते हैं । इमसे जल खराब हो जाता है
और कभी-कभी भनियोको जैतानीसे भी कूए और नदियोके
किनारेका जल दूपित हो जाना है। जिस कूए फ पास मोरी
निकली हो या जिसमे पेडको पतिया गिरतो हो या जिस कूप का
पानी वालू न हो और नदीक उस जगहका पानो जहा गंदा नाला
निकला हो, कभी न पीना चाहिये । मल-मून त्यागनेके बाद तुरन्त
जल कमी न पीना चाहिये।
M

। पत्र-व्यवहार तब , ज्यादा समयके लिये याना करनेवाले यात्रियोंको पन-व्यवहार करते रहना भी जरूरी है, जिससे अपने घरवाले तथा मालिक कार्म को अपनी राजी-युशी तथा अपने काम काजकी सूचना मिलती रहे। यदि परदेशमे यात्रीका कोई पहिला परिचित मनुष्य मिल जाय तो उसके ठिकानेसे पन-व्यवहार करना चाहिये गानी अपने पत्रका उत्तर उसके ठिकानेपर म गाना चाहिये, या अपने ठहरे हुए स्थान धर्मशालेके पतेसे पत्रोत्तर म गाना चाहिये अथवा जिस नगरमें ठहरे हों उस नगरके पोस्ट-आफिसके पोस्ट- मास्टर द्वारा या स्टेशनके स्टेशनमास्टरकी मारफत भी पत्रका उत्तर मंगवा सकते है । पोस्टमास्टर या स्टेशनमास्टरको मारफत पत्र मंगानेपर आप पोस्टमास्टर या स्टेशनमास्टरके पास अपना नाम बताकर कहिये कि अमुक नामकी चिट्ठी आयी हो, तो मुझे देनेकी कपा करें । इतना ही कहनेपर आपको आपकी चिट्ठी, यदि कोई आयी होगी, तो मिल जायगी। इसी प्रकार आप तार मनीआर्डर वगैरह भी उक्त ठिकानेपर भगवा सकते है । परन्तु मनिआर्डर मगानेसे पूर्व आपको स्टेशनमास्टर या पोस्टमास्टरसे इत्तिला कर देनी चाहिये कि मेर नामका मनिआर्डर आनेवाला है सो मुझे मिल

पत-व्यवहार
जाना चाहिये, में अमृक जगहपर हू ।
पनका उत्तर म गानेके लिये
अपना पता लिखते समय अपने नामके साथ उस शहर या गावका
नाम (जिस शहरके आप निवासी है ) लिखना कभी न
भूलना चाहिये। जैसे गोपालप्रसाद हाथरसपाले। पत्रका ठिकाना
लिखते समय पूरा पता लिखना चाहिये थानी नाम, गाव, पोस्ट
आफिस, जिला इस प्रकार लिखना चाहिये। पोस्ट आफिसका नाम
अंग्रेजीमें लिखना अच्छा होता है।
कुछ पते लिखनेके नमूने
विश्वनाथ कानपुरवाले
C/o पोस्ट मास्टर,
पोस्ट आफिस हरिद्वार,
जि० देहरादून।
गोविन्द प्रसाद हाथरसवाले
C/o स्टेशन मास्टर
वादीकुई
बी० बी०एण्ड०सी० आई०२०
(जैपुर)
(३)
प० रामदत्तशा वैद्य रायेवाले
C/0 मि० सोहनलाल दूबे
न्यूरोड पो. हैदराबाद
PO Hydrabad
Daccan
मोहनलाल गुमा मागरेवाले
C/o सिधीधर्मशाला
जगालीघाट
पो० मथुरा (यू० पी०)
३

सारका कुजा
M
--
बाकेलाल मुनीम दिल्लीवाले
O/o नत्थीमल गयालाल भादतिया
पो० कोसी कला
जि० मथुरा (यू०पी०)
सेठ जीवाभाई बम्बईवाले
C/ सीताराम गगापुरोहित
पो० ऋषीकेश
जि० देहगदून
(७)
ठाकुर बलवत सिंह चौहान
मुकाम सिरसौदा
पो० रूपवास
जि० भरतपुर
arocon
-

यात्रामें स्त्रियोंकी दुर्दशा . . और उसका प्रतिकार भारी पर्व मेला आदिक अवसरपर स्त्रिया तथा बचे भी रल- गाडीमे मनुष्योंक साथ-साथ भेंड-बकरिओंकी तरह भरे चले जाले हैं, जिससे उन स्त्रियोंकी बडी मट्टी पलोत होती है। कोई तो गर्मीमें पसीनेसे तरो-चोर हो जाती हैं तथा किसीका गर्मीके मार जी घुट जाता है। किमीको मनुष्योंक हाथोसे अपना अग मसकना नजर आता है, तो किसी-किसी स्त्रियोके दुधमु हे यचोंके भीडमे दबकर प्राण पसेरू उड जाते हैं और वे बहुत मुशकिलसे राम-राम करतो नियत स्थानपर पहुच पाती हैं। बहुधा स्त्रिया मदिरोंकी बनावट, भीतोंकी रहावट निछौनोकी विछावट, वस्त्रोंको सजावट, झाड-फानूसोंकी झलझलाहट, कोचोंको चमचमाहट, गवैयोंकी गलगलाहट, तन्दुरेकी तुनतुनाहट, सारगीकी सुनसुनाहट, चिनोंकी सुन्दरता, मूर्तियोंको अद्भुतना, छोकरोंफा नाच आदि देखनेके लिये अपनी दुर्दशा करानेको ऐसे स्थानोंमें घुस जाती हैं कि जहापर निम्नलिसित लोलायें प्राय हुमा करती हैं। - १ भीडमे स्त्री-पुरुषोंके परस्पर पीठसे पीठ और छातीसे छाती मिल जाते है। • विचारो गरीब निर्वल अवलायें तो भीड-भाडके धूम-धडाके .

३६
सफर कुंजी
मौर धका-धुफीके कारण पृथ्वीसे एक-एक हाथ ऊंची उठ जाती हैं
और उस भारी भीडमें मनुष्योंकी रेल-पेलके कारण ऐसो मिच जाती हैं
फि उनकी श्वास अपरको ऊपर और नीचेकी नीचे रह जाती है।
यदि कहीं नोचे पैरोमें गिर पड़ी तो मर ही जाती हैं, यदि न मरी तो
अधमरी अवस्था अवश्य हो जाती है।
३ अच्छे-अच्छे बलवान मनुष्यतक भी उस भीडमें इको-बक्के
रह जाते हैं
४ पर हा, चोर, जार, बदमाश लोगोको खूर घन आती है,
वह चाहे जिसका अधर ऊपरको उठा लेते हैं, चाहे जिसे धका देकर
पीछे हटा देते हैं, चाहे जिसका हाथ सोंच आगे धर लेते हैं, चाहे
जिसकी इज्जत बिगाड़ देते हैं और चाहे निसका वस्त्र, आभूपण
झपट लेते हैं।
५ बहुधा कितने ही मन्दिरोंमे स्वर्गकी भूसी और धर्मकी
प्यासी हिन्दू-स्त्रियों को मुसलमान द्वारपालोंके कोडोका भी स्वाद लेना
पडता है, हरएफ किस्मके बदमाशोंकी बदमाशीका मजा-जायका
चखना पड़ता है, और अतमें धर्म-धको सहने पड़ते हैं।
६ होलीके दिनोंमे बहुधा पुजारीलोग नवयौवनाओंके कुच,
कपोल और नेत्रादि अंगोंको ताक-ताकार रंग-भरी पिचकारी
तान-तानकर मारते हैं, और बहाना करते हैं कि श्री ठाकुरजी होली
सेलते हैं।
ऊपर बतलाई हुई दुर्दशाओसे पवनेके लिये कुछ उपाय नीचे
लिखे जाते हैं
-

यात्रामें स्त्रियोंकी दुर्दशा और उसका प्रतिकार १ स्त्री तथा योंको भारी भीडयाले मेलेमें हरगिज न जाने दो। २ स्त्री तथा पर्योफो फिसी हल्प मेले या उडोरपर रे जाफर प्राचीन रमगीक देवस्थानोने दी फगना तथा नवीन नवीन पातोंका शान कगना चाहिये, फि गुण्ड और यदमाश लेगों-द्वारा गाये मानेवाले अश्लील रसिया, गजल, नाच-यूद आदि दिसानेकी चेष्टा को जाय या उन्हे म्वतन्त्र फर दिया जाय। ३ स्त्रियोंको भीडये ममय रेलगाडीके जनाने डिब्बेमें पैठाना पाहिये, तथा शिक्षित मनुष्योका फर्त्तव्य है कि यह रेल्वेसे भारी मेरेफे प्रयमरपर स्त्रियोंस लिये एक दिव्येसे अधिक रिजर्व रखने के लिये अनुगेप करें, ताक अहिन, येटी और यहुओंफी दुर्दशान होने पाये। स्त्रियोंके जनाने डिनमे घटाकर किसी फुजातिफी फुटनी स्त्रोके फंदेमें सनेसे होशियार रहना चाहिये। ५ यघोंकी मा अपने बच्चोंको रलमे खिडकीके बाहर मुह करके कभी न वैठन दे और न फभी सिडको वगैरह खोलने आदि हरकतें ६ मसवानको अपनी निगाइके सामने रखना चाहिये। ७ स्त्रियोंमें यह स्वाभाविक मादत पायी जाती है कि चाहे जितनी पूर या पासफो और जाति या कुजातिकी स्त्री क्यो न हों, आपसमें बोल चाल करके झट प्रेम पैदा कर लेती हैं। इसलिये ऐसा करते समय यह सदा ध्यान रहे कि सफरमे किसी गैर जान-पहचानवाली स्त्रीके हायफा पान, पस्तु, जल आदि कभी न खावें।

स्नान-पर्वके यात्रियोंको चेतावनी जो सजन गंगा-यमुना या किसी नदीके तीर्थ-स्थानोंपर स्नान फग्नेके हेतु जाते हैं, उनको स्नान करते समय नीचे लिखी बाते ध्यान रखनी चाहिये - (१) यात्रियोंको पतला कपडा पहनकर स्नान नहीं करना चाहिये , जिसमे कि अंग दिखायी देता हो। इससे धर्मके बदले पाप लगता है। (0) आप जिस समय स्नान करे, आपको चाहिये कि अपना असवान व रुपये-पैसे और कीमती वस्तुयें अपने सहकारी आदमीके या उस घाटियेके हाथ सपुर्द करके, जिसके पास तीर्थ-पुरोहितोंकी पचायती निशानी हो, स्नान करें, क्योंकि ऐसे स्थानोंपर स्नान- ध्यानके बहानेसे अनेक माया-रूपी चालाक लगे रहते हैं और मागनेके पहानेसे, मंगते बदमाश जिनके आसरेसे नकली घाटिये भो बैठते हैं, आपको हानि पहुचा दें, तो कोई सन्देह नहीं हर किस्मके विश्वासघाती मनुष्य फिरते पहचान सकती। तीर्थ-स्थानोंमे तीर्थ-पुढे स्नान-पर्वके यात्रियोको चेतावनी ३९ . . (३)जो मनुष्य अपने असवाव या रुपये-पैसे, कीमती द्रव्यको घाटपर रखकर स्नान करगा या जो स्रो हाथ-कानमें गहना चमकाती हुई स्नान करेगी या कोई आदमी अपना नौली, बटुआ, जाकिट या कपडोंमें डिपा रसकर स्नान करेगा, वह अवश्य सतरा खायेगा , क्योंकि बहुतसे घाटिये भी इमी आसरपर बैठते हैं जिनके ठग, बद- माश और उचक लगे रहते हैं। कोई मागनेक बहाने, कोई स्नानके बहाने, कोई जेण्टिलमैन बनकर , काई जलमें घुसक, कोई घाटमे, कोई साधुका वेप बनाके अपनी मुहब्बतका असर जमाता हुआ गस्तेमे हो साथ लग जाता है , या अपनेको तीर्थ-पडा बताकर भी अनेक धोसा देत हैं, अतएव इनसे सानधान रहना चाहिये । (४) आजकल बहुतसे प्रपची, घोसेनान, गोशाला, पाठशाला, मनाथालय, धर्मशालादिके नामपर चदा मागकर धन-उपार्जन करते हैं, जो बहुधा किसी भी सस्थासे सम्बन्ध नहीं रखते और अधि- काश स्वय ही डकार जाते हैं। इसलिये ऐसे याचकोंसे सावधान रहना चाहिये और दान देते समय सस्थाका स्वय निरीक्षणकर या पूरा पता लगाकर देना चाहिये। (५) एकाएक बिना पहचाने किमीके साथ स्नान करने या मन्दिरोंके दर्शन करने चले जाना ठीक नहीं। ऐसे काममे किसी विश्वासी मनुष्यको साथ ले जाना चाहिये और आम रास्ता छोडकर इधर-उधर नहीं जाना चाहिये (६) गंगा, यमुना तथा अन्य नदियोंमें घाटोंके नीचे बेमालूम गड्ढे वगैरह वने रहते हैं, जिनमें कोई-कोई अनजान परदेशी यानी

सफाकी कुली
स्नान करते समय डूबकर प्राण दे बैठते है। इसलिये हमेशा स्नान
करते समय सिर्फ सोढियोपर. ही वैठकर नहानेका ध्यान रखना
चाहिये , क्योकि गहरे पानी में स्नान करनेसे जल-जीव-मगर, भोट
अथवा गोतेखोर आदिके घसीट ले जानेका भय रहता है।
(७) नदोके किनारे रसोई इत्यादि बनाना हो तो डेरा दूर
डालना चाहिये, क्योकि अक्सर नदियों में एकाएफ बाढ आ जानेकी
आशंका रहती है।
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- भारतवर्षके तीर्थ-स्थान - श्रावण वृजभूमिक तीर्थ-स्थान १. मथुरा-स्टेशन मथुरा [Muttra] G I P वया B.M. R । द्वारकाधीशका मदिर, यमुनाजी स्नान । महीनेमे झूलोका विशाल उत्सव तथा कार्तिकमे यम- द्वितीयाका भारी मेरा होता है। विश्रामघाट तथा अनेक घाटोकी शोभा विचित्र है। २ वृन्दावन-मथुगसे ६ मील उत्तरकी ओर। [ मथुरासे रेल भी जाती है ] यमुनामीका स्नान तथा चैत्र वदी ९ को ग्गजीका रथोत्सव । असतीजको विहारीजीके चरणदर्शनका भारी मेला तथा श्रावणमे झूलोका भारी मेला होता है । कालोदह आदि अनेक घाटोंकी शोभा विचित्र है। गोकुल-मथुरासे ४ मील पूर्वकी ओर, तागा मोटरका रास्ता श्रीकृष्ण जन्मभूमि, जन्माष्टमी और गोपाष्टमीका अपूर्व मेला, यमुनाजीका स्नान यहा घाटोकी शोभा विचित्र है। 1 ४२ मफरफी फुखो ४ महावन-मथुरासे ६ मील पूर्वकी ओर, यमुनाजीका स्नान, प्रधाडघाट । यहा एक प्राचीन इमारत जिसमें ८४ खंभ लगे हुए हैं जो गिने नहीं जा सकते। ५ बल्देव-मथुगसे १० मील पूर्वकी ओर-श्रीदाऊजीको विशाल (दाऊजी) मूर्तिके दर्शन, भादोंमें देवउटका मेला तथा मार्गशीर्षकी पूर्णिमाको भारी मेला और चैत्र वदी २ को हुरगाका भारी मेला होता है। ६ मानसरोवर-मथुराके पास राया स्टेशन RM. R. से ६ मोल तथा घृन्दावनसे फेशीघाट द्वारा ४ मील। प्रति पूर्णिमाको मेला तथा श्रीराधानीका मदिर। ७ गोवरधन-मथुरासे १२ मीलपर । श्री गिरोज पर्वत है, आपाढको मूढ़ियापूनमका मेला, दीपमालिकोत्सव तथा गिरीज- को परिक्रमा लगती है। ८ राधाकु ड-गोवरधनसे १ मील्पर, यहा जलक २ कुड हैं। कार्तिक बदी ८ को सतान-कामनार्थ रात्रिको स्नानका भारी मेला होता है। १ नंदगाव-स्टेशन कोसीकला G. I R. P से १६ मील श्री- कृष्णजीका निनासस्थान है, पहाडीपर विशाल मदिर है और चैतवदो ८ को होलीका मेला लगता है। वरसाना-नदगावके पास श्रीराधाजीका जन्मस्थान है यहाका होलीका उत्सव भारी होता है। एक स्थानोंके अतिरिक्त वृजमे कामनन, लोहवन, मधुवन, भद्र- 0 उतराखण्डके तीर्थस्थान वन, निधिवन, कुवेरवन, कोकिलावन, पहुलापन आदि पहुतसे वन उपचन हैं, जो पुजके चोगसी फोमकी परिक्रमा मार्गमें पड़ते हैं। यह परिक्रमा आपाढसे शुरू होकर कार्तिकमे ममाप्त होती है । " -- T उत्तराखंडके तीर्थस्थान १ गढ़मुक्तपर-स्टेशन सास : I R कात्तिक-स्नानका भारी मेला, शिवजीका प्रसिद्वस्थान, गंगाजीका किनारा । २ हरद्वार---स्टेशन सास OR R गगाजीका स्नान, हरिको पेडी, यारह वर्णमे कुम्भका मेला। ३ प्रपिकेश-हरद्वारसे १२ मील। सडकका रास्ता व रेलवेस्टेशन भी है। प्रापियोकी तपोभूमि यहापर बाना काली फमलीनालेका क्षेत्र और धर्मशाला है, जिसका बंदोबस्त बदरीनाथके रास्तेमे भी है। ४ लछमनमुला-मापिक्शसे • मीलपर है। यहान बदरीनाथकी यात्रा शुरू होती है। लछमनझूला गंगाजी पार करनेके लिये एक साधारण लकडीका पुल है, जो कि गगाजीके दोनो किनारोहीके खभोंके ऊपर स्थित है और इतना हलका है कि एक आदमीक ही चढकर चलनेमे डगमगाने लगता है। ५ बदरीनाथ-लक्षमनझूलासे १६४ मील है । यहासे पैदल या झपान- फडोमे घेठकर यात्री जाते हैं और इसी रास्तेमें - .

सफरकी कुली W.R , केदारनाथको रुद्रप्रयागसे जानेका रास्ता है। देव- प्रयागसे गंगोत्री और जमुनोत्री जानेका गस्ता है और इसके मार्गमें कर्णप्रयाग, सोनप्रयाग, नन्दप्रयाग, गुस- काशी आदि तीर्थस्थान हैं। बदरीनायसे वापिस लौटकर काठ-गोदाम आते हैं। यहा रेलवेस्टेशन है। ६ मुक्तिनाथ नेपालराज्य, स्टेशन भिकनायोरी B N. से उत्तरमें काठमाडू ४४ मील दूर, पैदल जानेका रास्ता है। नेपाल-स्टेशन रकसौल BN W R. जहासे ६२ मील फाठमाडू है और फाठमाडूसे नेपाल जाना होता है। शिव चतुर्दशीको पशुपतिनाथ महादेवके दर्शनका मेला होता है। मेलेके समय जानेपर राज्यके पास लेनेकी आवश्यकता नहीं होती। पास ही लेकर जाना होता है और यहापर बागमती नदी, पुजेश्वरी देवी, महेन्द्रनायका मदिर, माली- पूजा मदिर, चौद्ध मंदिर, मुच्छन्द्रनाथका मदिर, लाल दरवार इत्यादि दर्शनीय स्थान हैं। अन्यथा पूर्वप्रान्तके तीर्थस्थान १ नैमिपारण्य स्टेशन बघोली E.I R. लखनऊसे गाड़ी जाती है यहापर सनकादिक ऋपियोंकी तपोभूमि है।

पूर्वक तीर्थ स्थान २ अयोध्याजी-स्टेशन सास E I.R. सनऊसे सीधी गाडी जाती है। यहापर सरयूका स्नान, रामचद्रजीकी जन्म- भूमि तथा रामनवमीका मेला । ३ विटूर--कानपुरसे ३ मील दूरीपर शिवमीका मेला तथा जेठमे दशहगको गंगाजीका पर्व-स्नान । ४ चिनकूट-स्टेशन सास G. I P कानपुरसे झासी-मानिकपुर लाइनमें। यहापर चनको रामनवमी और कार्तिककी दिवालीपर भारी मेला होता है । फोरितीर्थ, देवागना, हनु- मानधारा, स्फटिकशिला, अनुसूया, गुप्तगोदावरी, भरतकूप, राम शय्या, सीतारसोइया और तुलसीदासजीका स्थान आदि देसने योग्य है। रो स्टेशन B N R मानिकपुरसे करनी होकर गाडी जाती है। स्टेशनसे १४ मील पहाडके ऊपर, पैदल रास्ता, नवदा नदीका निकास, नर्मदानीका मदिर w ४४ सफरकी कुजी । । केदारनाथको रुद्रप्रयागसे। जानेका रास्ता है। देव- प्रयागसे गंगोत्री और जमुनोत्री जानेका रास्ता है और इसके मार्गमे कर्णप्रयाग, सोनप्रयाग, नन्दप्रयाग, गुस- काशी आदि तीर्थस्थान हैं। वदरोनायसे वापिस लौटकर काठ-गोदाम आते हैं। यहा रेलवेस्टेशन है। ६ मुचिनाय-नेपालराज्य, स्टेशन भिकनाथोरी B N W.R. से उत्तरमें फाठमाडू ४४ मील दूर, पैदल जानेका रास्ता है। ७ नेपाल-स्टेशन रकसौल B N W R. जहासे- ६२ मील काठमाडू है और काठमाडूसे नेपाल आना होता है । शिव चतुर्दशोको पशुपतिनाथ महादेवके दर्शनका मेला होता है। मेलेके समय आनेपर राज्यके पास लेनेको आवश्यकता नहीं होती । अन्यया पास ही लेकर जाना होता है और यहापर वागमती नदी, पुजेश्वरी देवी, महेन्द्रनाथका मदिर, भाली- कूजा मदिर, बौद्ध मंदिर, मुच्छन्द्रनाथका मदिर, लाल दरवार इत्यादि दर्शनीय स्थान हैं। पूर्वप्रान्तके तीर्थस्थान १ नैमिपारण्य-स्टेशन वयोली.ET R. लखनऊसे गाढ़ी जाती है यहापर सनकादिक ऋपियोंकी तपोभूमि है।

पूर्वके तीर्थ स्थान २मयोन्याजी-स्टेशन सास E I R लसनऊसे सीधो गाड़ी जाती है। यहापर सरयूका स्नान, रामचद्रजीकी जन्म- भूमि तथा रामनवमीका मेला। ३ विटूर-कानपुरसे ३ मील दूरीपर शिवभीका मेला तथा जेठमें दशहगको गंगाजीका पर्व-स्नान । ४ चित्रकूट-स्टेशन सास GI P कानपुरसे झासी-मानिकपुर लाइनमें। यहापर चत्रकी रामनवमी और कार्तिककी दिवालीपर भारी मेला होता है । कोरितीर्थ, देवागना, हनु- मानधारा, स्फटिकशिला, अनुसूया, गुप्तगोदावरी, भरतकूप, राम शय्या, सीतारसोइया और तुलसीदासजीका स्थान मादि देसने योग्य है। ५ ममरफटक-पींडरारोड स्टेशन B N R मानिकपुरसे करनी होकर गाडी जाती है। स्टेशनसे १४ मील पहाडके ऊपर, पैदल रास्ता, नवदा नदीका निकास, नर्मदाजीका मदिर और रमणीक स्थान। ६ चौसठ योगनी भिड्डा घाट–स्टेशन मीरगंज G 1. P कटनीसे जबलपुर होकर गाडी जाती है। यहापर गौरीशकरके दर्शन, नर्मदा नदीका धुआधार व सहस्रधाराका दृश्य, कार्तिक पूर्णिमाका मेला। ७ प्रयाग-स्टेशन इलाहानाद FIR जबलपुरसे सीधी गाडी जाती है। निवेणीसगम, अक्षयवट, वेणीमाधवका स्थान, माघमे मेला, घारहवें वर्ष कुम्भ-स्नान !

AWomen सफरकी कुखी ८ विन्ध्याचल-स्टशन सास E.I. R. इलाहाबाद-मुगलसराय लेनमे पडता है। विन्धवासनीका स्थान, नवरानमें मेला। ९ काशी-स्टेशन बनारस : 1.R. मुगलसरायसे गाडी जाती है। श्रीविश्वनाथजी व अन्नपूर्णाका मन्दिर है। गंगाजीके किनारेपर अनेक रमणीक घाट तथा अन्य प्राचीन- अर्वाचीन स्थान देखने योग्य हैं । जैसे--माधोजीका धरहरा, हिन्दू-विश्व-विद्यालय आदि । १० सारनाथ-काशीसे पाच मील है। यहीं चौद्ध-साहित्यका प्रसिद्ध मृगदाव है । गौतम बुद्धने बौद्ध-मतका प्रचार यहींसे शुरू किया था। ११ गौतमकुण्ड-स्टेशन कमतौल B.N W_R (दरभङ्गा) नरकटियागंज लाइन, गोतमापिका स्थान । १२ जनकपुर-स्टेशन जनकपुर रोड B. N W. R. दरभगा। नरकटियागंज लाइन, रामनवमीका मेला, श्रीसीताजीकी जन्मभूमि । १३ देवीपाटन--स्टेशन तुलसीपुर B_N W. R. गोडा, गोरस्पुर, लूप लाइन । पटेश्वरी देवीका मन्दिर । १४ हरिहर क्षेत्र स्टेशन सोनपुर B N. W_R. मुफामाघाट, मुजफ्फरपुर लाइन । हरिनाथ महादेवका मन्दिर, कार्तिक पूर्णिमाका मेला। १५ घरमपुर-स्टेशन रघुनाथपुर E. I. R. मुगलसराय-हवडा लाइन, ब्रह्मसरनाथ महादेव, शिवरात्रिका मेला। 1 - - पूर्वके तीर्थस्थान १६ गया-स्टेशन सास IR विष्णुपद मन्दिर, फल्गूनदी, अनेक कुण्ड इत्यादि प्रसिद्ध तीर्थस्थान । १७ चौद्धगया-गयासे सात मील दूर निरखना नदीके तटपर अव- स्थित है। बौद्धगयामे प्राचीन मन्दिर है। यहींपर बुद्ध- देवने सन्यास लिया था। १८ पारसनाथ–स्टेशन ईसरी I R. जैनियोका तीर्थ-स्थान पहाडके उपर। १९ राजगृह-स्टेशन राजगीरकुण्ड घसत्यारपुर : 1 स्टे- शनसे छोटी लाइन जाती है। सरस्वती नदी, गर्म और ठडे पानी के सोते, अन्य ५२ कुण्ड, लोंद मासमें स्नानका पर्न। इसका पुराना नाम कुण्डिनपुर भी है। २० वैद्यनाथधाम-स्टेशन सास EIR मेल लाइनमे जसिडी जमशनसे गाडी बदलती है। यहापर शोवज्योतिर्लिंग है जो द्वादश ज्योतिर्लिगोंमेसे एक है। २१ नाडकेश्वर-स्टेशन सास FIR शिरडाफूली स्टेशनसे गाडी चदरती है और हवडा स्टेशनसे भी सीधी गाडी जाती है। महादेवजीका स्थान है । -स्टेशन हावडा FIR का मुख्य स्टशन है, जो हुगली नदीके एक किनारेपर है और दूसरे किनारेपर फलकत्ता शहर बमा हुआ है । यह शहर जन-संख्याको दृष्टिसे भारत वर्षका पहला नम्बर और टिग राज्यका दुसरे नम्बरका शहर है। यह व्यापारका बडा केन्द्रस्थान है और जहाजोंका ०० कलमत्ता- . सफरको कुसी बन्दरगाह भी है। यहापर बडी-बडी इमारते , चौडी-चौडी सडकें, बडे वाजार तथा अन्य अनेक वस्तुयें देसनेयोग्य हैं, जैसे कि कालीजी आदिका मन्दिर, चिडियाघर, अजायबघर, विकोरिया मेमोरियल, मल्लिककी कोठी, होगमार्केट (इगलीस बाजार ) इत्यादि । २३ गङ्गासागर-कलकरोसे जहाजद्वारा जात हैं। यहापर प्रतिवर्ष मकरको सक्रान्तिपर स्नानका मेला होता है । कपिल- मुनिकी मूर्ति है, यहापर वर्ष भरमे एक ही दफे दर्शन होते हैं। २४ कामानीदेवी-स्टेशन गोहाटी A, B.R.। कलकत्तेके स्याल्दह स्टेशनसे गाडी जाती है। वहासे दो मील पहाडीके ऊपर कामाभी देवीका मन्दिर है, जिसमे अष्टधातुकी दश- मुजी मूर्ति विराजमान हैं। २५ सीताकुण्ड-स्टेशन सास A, B.R कलकत्तेसे चटगाव होकर गाडो जाती है। यहापर ऊची पहाडीके ऊपर चन्द्रनाथजीका मन्दिर है और अग्निकुण्डके दृश्य देखने योग्य है , जिनमें सदा आग निकलती रहती है। यहीपर महाराजा गौतमबुद्धको अन्त्येष्टि क्रिया हुई थी। २६ वैतरणी-स्टेशन वैतरणी रोड B. N. R कलकसे जगन्नाथ- जी जानेके रास्तेमें पडता है, यहापर वैतरणी नदीका मुख्य तीर्थ-स्थान है T .

दक्षिण प्रातीय तीर्थ-स्थान ४९ २७ मुवनेश्वर स्टेशन सास BN. R यहापर भुवनेश्वर महादेव- का विशाल मन्दिर तथा अनेको अनगिनत मन्दिर हैं। २८ तप्तकुण्ड-स्टेशन सुरोड B_N_R. से ६ मील, मकर संगतिका मेला, कूपमे सौलता हुआ जल । २९ साक्षीगोपाल स्टेशन सास B NR जगन्नाथजीके दर्शन करनेके पश्चात् इनके ही दर्शन किये जाते हैं, इसलिये इनका नाम साक्षीगोपाल है। ३० जगन्नाथजी-स्टेशन पुरी B_N_R फलकत्तेसे सीधी गार्ड जाती है, जगन्नाथस्वामीका विशाल मन्दिर है। - दक्षिण प्रांतीय तीर्थस्थान । १ सेमाचलम्-स्टेशन सास B_N_R जगन्नाथजीसे रामेश्वरर्ज जानेके रास्तेमें पड़ता है। स्टेशनसे ३ मील पहाडके ऊप- नृसिहदेवका मन्दिर है। • गोदावरी-स्टेशन खास M S. M_R. गोदावरी नदीका वीर्य स्थान। ३ वालाजीतृप्ति-स्टेशन तिरूपति MS MR. गोदावरी, स्टेशन गुडूरतक बडी लाइन और गुडूरसे उतरकर छोटी लाइन तिरूपति जाना होता है, वहांसे सात मील पहाडके ऊपर विशाल मन्दिर है, जिसमे श्रीबालाजीकी अद् मुत 'अपूर्व तेजोमय मूर्ति विराजमान है। यह पहाड नीलगिरिपर्वतर्क - सफर को कुलो श्रेणीमें है और शेषाचलके नामसे पुकारा जाता है। यहा- पर अनेक तीर्थ स्थान और रमणीक व दर्शनीय स्थान हैं, जैसे-पापनाशिनी, आकाशगंगा, पाहुतीर्य, चक्र तीर्थ, झापाली हनुमान, कुमारघारा आदि । कार दशहरापर प्रायउत्सव व रथका भारी मेला होता है, तिरूपति सासमें भी गोविन्ददेवजी सीतारामजीके मन्दिर दर्शनीय हैं, यहा से डेढ़ मीलपर कपिलधारा कुण्ड है, जिसमे पहाडके ऊपर- से धारा गिरती है और यहापर फपिलेश्वर महादेव तथा फपिलमुनिका स्थान है। चैन रामनवमीको सीताराम- जीका रथ निकलता है। तिरूपतिसे तीन मील दूर चिन्तानूरमें श्रीपद्मावतीको मन्दिर है। ४ शिकाची, विष्णुकाची-स्टेशन फसीवरम् S. I R.तिरूपति- से रनीगुण्टापर गाडी बदलकर आरफोनमको गाडी जाती है। यहासे रामेश्वरफे रास्तेमें कलीवरम् स्टेशन पडता है, यहापर बडे-बडे मन्दिर हैं। ५ पक्षीतीर्थ-स्टेशन चिगलपेठ s I R. यहासे ४ मील समुद्र- के किनारे पक्षियोंका जोडा आता है जिसका दर्शन किया जाता है। ६.चिदाम्वरम्-स्देशन साम SIR शकरजीका मन्दिर । ५श्रोग्गजी-स्ट्रेशन श्रीराम-S I.R.चिदाम्वरम्से त्रिचनापली- पर गाडी चटनी पड़ती है, यहापर, कावेरी नदी और वैया का प्राचीन प्रसिद्ध और विशाल मन्दिर है।

दक्षिण भातक ताथस्थान
AAVA
~
ܒܪ
- मदूरा-स्टेशन मदूरा S.I R. श्री रङ्गम्से विचनापलीपर गाडी
पदलकर रामेश्वर रास्तमें मदुरा आना पड़ता है। यहापर
मीनाक्षी देवीका ११ मंजिला मन्दिर प्रसिद्ध है।
२ रामेश्वर-स्टेशन रामेश्वरम् s I R. मरासे चलकर पामपन
जंकशन स्टेशनपर गाड़ी बदलकर रामेश्वर जाना होता है,
यहापर सेतुरन्ध रामेसरजी महादेवका विशाल मन्दिर
है , जिसन अन्दर २४ अन्य तीर्थस्थान है।
१० धनुषकोटि'-रामेश्वरसे पामपन जंकशनपर यदलकर यहा माना
पडता है, यहा श्रीरामचन्द्रजीका प्राचीन मन्दिर है और
यहापर ही मर्यादापुरपोत्तमने सेतु याधा था।
११ मदरास--धनुषकोटिसे सीधी गाड़ी मदरासफो जाती है । मदरास'
दक्षिण प्रान्तका व्यापारिक केन्द्र तया जहाजी धन्दरगाह है।
यहापर समुद्रके फिनारका दृश्य बडा हो रमणीक सौर देखने
योग्य है, मच्छी हाउस,लाइट हाउस मादि अनेक स्थान
भी देखने योग्य हैं।
१२ मल्लिकार्जुन-स्टेशन विनूकडा M. & M_R मदराससे
गुन्तिफल होकर आना होता है, ज्योतिर्लिङ्गका स्थान,
जगली रास्ता और शिवरानिका मेला !
१३ पन्नानसिह–स्टेशन मङ्गलगिरि M_S ALR विनूकण्डासे
यानी मल्लिकार्जुनसे सीधी गाडी जाती है। स्टेशनसे
कुछ दूरपर पहाड़के ऊपर नृसिह भगवानका मन्दिर है ।
यहापर गुडके शरयतका भोग लगता है। यहापर विशेषता

५२
सफरको कुंजी
यह है कि चाहे लोटेमे चाहे घडेमें पूरा भरा हुआ शरा
ले जानेसे उसके आधेमें ठाकुरजीका मुख भर जाता है
और इतना चिपकनास्थान होनेपर भी चिउटा चिटो
तथा मक्खियोंका नाम मात्र भी नहीं है ।
१४ कार्तिकस्वामी स्टेशन गदिगानूरू M_s_M. R. स्टेशन
मंगलगिरिसे गुन्तीकल होकर आना होता है। स्टेशनते
१६ मील दूर श्रीकार्तिकस्वामीका मन्दिर है।
१५ फिष्किन्धा-स्टेशन होसपेटसे ९ मील HI S. M. R कार्तिक
स्वामीसे सीधी गाडी जाती है। यहापर बालि और
सुप्रीवकी' राजधानी थी। पम्पासरोवर व फटिक शिला
है, जहा रामचन्द्रजीने मण सहित रहकर वर्षाऋतु
व्यतीत की थी।
१६ पंडरपुर-स्टेशन B. I R होसपेटसे गदग होकर सोलापुर
यदलकर कुडूपाडी और कुडूंबाडोमें उतरकर पण्डरपुर
सीधी गाडी जाती है। यहापर चन्द्रभागाका स्नान पन्डरी-
नाय ( विट्ठोवा) का मन्दिर, दक्षिण महाराष्ट्रका प्रसिद्ध
तीर्थ-स्थान है। यहापर असाढमें रथ और कार्तिक मासमें
भारी यात्रा होती है।
१७ मनमाड-स्टेशन GI P_R. पण्ढरपुरसे कुडू धाडी बदलकर
दौड जङ्कशन आना पडता है, जहापर चन्द्रभागा नदीका
स्नान तथा विट्ठलनाथका मन्दिर है। दौडसे मनमाड सीधी
गाड़ी जाती है। मनमाडसे ५ मील दूर पहाडके ऊपर
-

दक्षिण प्रातीय सीर्थस्थान
अगस्त मुनिका आश्रम है तथा कुन्ड और गुफायें हैं।
८ अजंटा-स्टेशन पाहुर G I. P. R. मनमाड़से पाचोरा
जङ्कशन स्टेशनपर गाडी यदलकर पाहुर छोटी लाइनमें
जाना होता है। पाहुरसे अजण्ट ७ मील दूर है। यहा-
पर अनेक प्राचीन गुफायें हैं, जो भारतीय शिलातक्षण
और चित्रकलाफे अपूर्व नमूने हैं। इन्हीं गुफाओंमें घुद्ध
भगवानका मन्दिर भी है।
। मलोरा-स्टेशन दौलताबाद N.GS R अमटासे लौटकर
मनमाड आना होता है। मनमाड़से दौलतानादको सीधी
गाडो जाती है। दौलतागद स्टेशनसे अलोरा ७ मील
दूर है। यहा पर भी बहुत सी विचित्र गुफाये है जिनमें
यहुतसे हिन्दू और जैन तथा यौद्ध-मन्दिर हैं।
- नासिक-स्टेशन स्वास1 P R. दौलतायादसे मनमाड
आकरके मनमाडसे नासिकको सीधी गाडी जाती है।
स्टेशनसे नासिक तीर्थस्थान ५ मील दूर है। यहापर
गोदावरीका म्नान होता है जिसमें रामकुण्ड, सीताकुण्ड,
आदि कई कुण्ड हैं। पश्चयटी, तपोवन, पाण्डवगुफा,
सीतागुफा तथा अनेक मन्दिर दर्शनीय हैं। बारह वर्षमें
कुम्भका मेला होता है।
यम्वकेश्वर-नासिकसे १८ मील, पक्की सड़क, मोटर आया सागा-
का रास्ता है। यहापर त्र्यम्बकेश्वर महादेवका प्राचीन

२४
!
सफरको कुखी
मन्दिर पहाडके ऊपर अवस्थित है। यहाँस गोदावरी नर
निकलती है।
२२ "पूना-स्टेशन सास GI P. R. नासिकसे केल्यान गार्ड
। बदलकर पूना जाना होता है तथा नासिकसे मोटर म
जाती है। यह महाराष्ट्र-प्रान्तका प्राचीन और सबसे बड
पाहर है; जो पहले शिवाजीको मशहूर गैजधानी थी-
यहासे ५० मील दूर, मोटरका रास्ता भीमाशङ्कर पहा
है । वहापर भीमाशकर महादेवका विशाल मन्दिर है। तय
वहींसे चन्द्रभागा नदी निकली है। इमको भीमा नदी में
कहते हैं।
-
--
पश्चिमीय प्रान्तक तीर्थस्थान
१ महाबळेश्वर-पूनासे ९० मील मोटरका, रास्ता है तथा तम्बई
भी मोटर जाती है। यहापर महादेवजीका मन्दिर है
फाल्गुन शिवरात्रिको मेला होता है। यहापर बम्ब
धनी पुरुषोंके बड़े-बड़े आलीशान बङ्गले हैं तथा बम्बई
सरकारकी हवा खानेकी जगह है।,
२ बम्बई-पूनासे रेलका रास्ता सथा महाबलेश्वरसे मोटरका रास्त
है । यम्यई भारतवर्षमे जनसरन्याकी दृष्टिसे दूसर नम्बर
-17 - था व्यापारको दृष्टिसे पहले नम्बरका शहर है । वहाप
अनेक मन्दिर तथा अन्य कितनी ही वस्तुये देखनेयोग्य

-
पश्चिमीय प्रातर्फे तीर्थस्थान
हैं, जैसे- यम्यादेवी, पालश्वर, महालक्ष्मी, भोलेश्वर
आदिफ मन्दिर, कोफोडगाजार, मोतीपाजार, अजाययघर,
पिंजडापोल, चौपाटो आदि ।
३ द्वारका-काठियांवोर्ड प्रान्तमें जामागेर, द्वारको-रैलफा एक
स्टेशन है। यम्बईमें थी यी० एण्ड सी० रेलवे द्वारा
विरमगावतक यडी लाइनमे रिमगारसे पंडवान छोटी
लाइन वया घडयानसे राजकोट और राजकोटसे सीधा
द्वारका जाना होता है। बम्यईमे द्वारिकाको जहाज भी
जाता है। यह श्रीकृष्णचन्द्रजीकी रमणीक नगरौं है,
यहापर येरेसीमान, शंकराचार्य, सत्यभामादेवी, लक्ष्मी-
नारायण आदिके मन्दिर दर्शन करने योग्य हैं।
४ वेटद्वारकाद्वारफासे कोस दूर है। 'रामम तक बैलगाडी तथा
आगे ४ मोल नौकामे जाना होता है। यहा भेटजी,
रणछोर, मीराबाईफा कृष्णमन्दिर, रक्मणीदेवी इत्यादि
देखने योग्य हैं।
५सुदामापुरी-यह पुरी श्रीकृष्णचन्द्रके परम मित्र सुदामाजीके
नामसे प्रसिद्ध है। पोरबन्दरसे शामीलपर सुदामाजीका
मन्दिर है।
६ गिरनार-स्टेशन जूनागढ-द्वारिकास राजकोट और राजकोटसे
जटलसर जंकशनपर बदलकर- जूनागढ जाना होता है।
यदासे ७ मील दूर पहाडके ऊपर गन्नारदेवी, निभाईनाय
गोरक्षनाथ मादिक मन्दिर दर्शनीय है। यह राजा बलिको

wwww N सफरकी फुलो राजधानी बतलाई जाती है। यहापर सम्राट अशोकका शिल्पलेस अभीतक मौजूद है। यह स्थान जैनियोंका भी तीर्थस्थान है। ॐ सोमनाथ- स्टेशन घेराबल जूनागढ़से गाडी सीधी जाती है। स्टेशनसे सोमनाथ करीब २ मील है। यहापर सोमनाय महादेवका विशाल मन्दिर उसमे चमत्कार मूर्ति है। यहापर सरस्वती नदी है और दैत्यसुदन शशिभूषण- महादेव आदि स्थान देखने योग्य हैं। ८ डाकोरजी-स्टेशन बी० बी० एण्ड सी० आई० आर० बेरावल यानी सोमनायसे राजकोट और राजकोटसे वठवान होकर विरमगावतक छोटी लाइन और विरमगावसे मानन्द स्टेशनपर बदलकर बडी लाइन द्वारा डाकोरजी जाते हैं। स्टेशनसे नगर ॥ मील है। यहापर रणछोरजीका मन्दिर प्रसिद्ध है। ९ पुष्कर--स्टेशन अजमेर B BC.I. R डाकोरजीसे चलकर आनन्दमें गाडी बदलकर अहमदाबाद और अहमदाबादसे छोटी लाइन सीधी अजमेर आती है, अजमेरसे ७ मील मोटर तागाका रास्ता है । पहाडफे ऊपर पुष्कर तीर्थस्थान है। यहापर पुष्कर तालाब है। प्रमाजीका प्रधान मन्दिर है। यहापर कार्तिक सुदी ११ को मेला होता है। १० अजमेर-पुष्फरसे अजमेर यह रामपूतानेके मध्यभागमें वृटिश पशिम प्रातीय तीर्थस्थान -- --~ राज्यका मुख्य शहर है। यह यदुत प्राचीन शहर है। यहां- पर अनासागर झील सया त्यागाकी दरगाह प्रसिद्ध है। ११ चित्तौर-स्टेशन पास P _R.अजमेरसे सीपी गाडी माती है। यहापर मेवाड़राज्यका तथा राजपूतानेका नामो और प्राचीन फिला देसनेयोग्य है । फिला पहाडीक ऊपर है और उसमे यड़े सुन्दर अनेक तालान है। गोपालगण तथा कालीमाईका मन्दिर है । पदमायतीका महल है और यहा- पर कीर्तक तया जयस्तम्भके दो नामी पुरज हैं। १२ श्रीनाय द्वारा स्टेशन मास । यहा चित्तौरसे गाढी जाती है। स्टेशनसे १४ मील मोटरका रास्ता है। यहापर पनास नदीके फिनार पल्लम सम्प्रदाय वैष्णनोंका प्रधान तीर्थ स्थान है। यहापर दिवालोके दूसर दिन मनफूटका भारी मेला होता है। यहापर ठाकुरजीफे भोगका वडा जयरदस्त काम है। फाफरोलीमें भी घलम सम्प्रदायफा विशाल मन्दिर है। २३ इफलिंगजी-श्रीनाथद्वारासे मोटर या पैलगाडीका रास्ता है। यहापर चारमुखी महादेवका प्रसिद्ध मन्दिर है। १४ पेमरियाजो-इफलिगजीसे उदयपुर होकर जाते हैं। यह जैनियोंका प्रसिद्ध तीर्थस्थान है। १५ मोंकारनाथ-स्टेशन मोरटका PM R उदयपुरसे चित्तौर यदलकर गाडी सोधी आती है। यहासे ७ मोल मोटर तथा बैलगाडीका रास्ता नर्मदा नदीके दाहिने किनारेपर ओंकार- नाथका प्राचीन प्रसिद्ध मन्दिर हैं। इसकी परिक्रमामें

सफरको कुली
'तिलमोडेसर, गणेमुक्तेश्वर, गौरी मोमनाय भादिक
'प्राचीन मन्दिर दर्शन करने योग्य है।
१६ इन्दौर-मोग्टपास इन्दौर गाडी सीधी जाती है। होल्करराज्य
की मुख्य तया नामी शहर और व्यापारका भी अच्छा
स्थान है। यहापर राजमहलोंके अलावा सेठ हुकुमचन्द
का जैन मन्दिर, गीशमहल, इन्द्रभवन आदि स्थान देखने
योग्य हैं।
१७ उज्जैन-इन्दौग्में उन्ननको फतिहापाद होकर गाडी जाती है।
यह R. M. R. तथा GI PR का जशन स्टे-
शन है। यहापर शिप्रा नंदीका स्नान होता है । महाकाले
श्वर महादेवका प्राचीन मन्दिर है। यहापर फुम्भका
मेली भी होता है। यहापर महाकाल, फेंदारेश्वर, हर्षद्वीप
मौदिकै मन्दिर और रुद्रसागर, गोवर्धन सागर, पुष्कर
सौगर आदि देराने योग्य हैं। ज्योतिपगृह जयसिंहजीका
बनाया हुआ तथा गोपीचन्द भरथरीकी गुफा देखने
योग्य हैं। वीर विक्रमादित्यकी पुरानी राजधानी थी।
१८ दिस्ती-स्टेशन खास जी आई० पी० पी० बी० एण्ड०
आई० एन० डब्ल्यू. ई० आई० मार० का जङ्कशन है।
उनसे नागदा होकर सीधी दिली गाडी माती है। यई
प्राचीनकालसे भारतवर्षको राजधानी होती चली आयी है
और अभी वृटिश भारतको राजधानी है। यहापर
बहुत-सी सुन्दर और प्राचीन जगह
देखने
सौ.
न
लायक

~~ A 1 - पनाम पासीय तीर्थस्थान ५९ हैं, जैसे-रानीगाग, चादनीचौक, फ्लीक टीवर, र्जुमामसजिद, सफदरजैग (भूलमुलैया ), मानमन्दिर, अलाउद्दीनका फिलों, फीरोजशाहको लाठ, इन्द्रप्रस्य, रीजसूययभूमि (हस्तिनापुर ), फुतुरमीनार (जमना- स्तम्भ) आदि। यहाँपर भी वेधशाला ज्योतिपगृह देखने योग्य है। अंगरेजोंने नई दिल्ली बनवाई है, वई भी देखने योग्य है। यह नगरं यमुना नदीफे किनारेपर धेसी है। यह व्यापारको भी यडा केन्द्र स्थान है। - - - पंजाब प्रान्तीय तीर्थस्थान १ कुरुक्षेत्र-स्टेशन सास अथवा थानेश्वर N W R देहलीसे नरवाना जकशन बदलकर जाना होता है। यहापर एक घडी झोल है जिसक फिनारेपर बहुतसे मन्दिर बने हुए हैं। यहापर सूर्यग्रहणका भारो मेला होता है । यहापर ३६० तीर्थस्थान हैं। शिवजीका मन्दिर द्वैपायनतीर्थ, पाचो पाडवोंकी मार्तया, भीष्मको शरशय्या, अर्जुनकी वाणगगा, सरस्वती इत्यादि दर्शन करने योग्य हैं। २ ज्वालामुखी-स्टेशन होशियारपुर N W R. थानेश्वरसे नरवाना, नरवानासे फीरोजपुरकेण्ट, वहासे जालधर होकर होशि- यारपुर जाना होता है । यहापर पहाडके ऊपर ज्वालामुखी देवीका मन्दिर है । इस पहाडमेंसे हमेशा आग निकलती रहती है। #HAPA

सफरको कुओ
३ अमृतसर-स्टेशन N. W.K. होशियापुरसे जालन्धर और
जालन्धरसे सीधी गाड़ी जाती है। यहापर सिक्सोंका
पहा गुरुद्वारा तथा स्वर्णमय मन्दिर है। यह वाठारके
बीचमें बना हुआ है। यहापर ही जलियानवाला बाग है।
दीवालीपर बड़ा मेला लगता है।
४ अमरनाय-अमृतसरसे रावलपिंडी रेलगाडी द्वारा जाते हैं। आगे
श्रीनगरतक जो काश्मीरकी राजधानी है नाव या
मोटरद्वारा जाते हैं, फिर वहासे पैदल पहाडको पढ़ाई
है । यह कैलासपर्यंतहीकी श्रोणियोंके पास है । यहापर
अमरनाथ महादेवका मन्दिर है।
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रेलवेके नियम
-
१-तीन वर्पतफके बच्चे का महसूल माफ, उसके बाद बारह वर्ष
तफकी उम्रवाले बच्चे का आधा और बारह वर्षसे ऊपरका
पूरा महसूल लगता है।
२-जाने-आनेका वापिसी टिकट ६ महीने तकका मिलता है,
इसका लेनेवाला यदि मियादके अन्दर लौट न सफता हो,
तो आधी मियाद ही पर, जहासे यह लौटनेवाला हो उस
स्टेशनपर टिकट वापिस करे और स्टेशनमास्टरसे रसीड़
लेकर चीफ ट्रेफिक मैनेजरको लिखे, तो एक बारका पूरा
महसूल लेकर पाकोमेंसे १० फी सदी काटकर उसे वापिस
मिल सकेगा, कोई टिकट एक मुसाफिर दूसरेके हाथ
नहीं बेच सकता।
३-पहिले दर्जेका मुसाफिर डेढ़ मन, दूसरे दर्जेका तीस सेर,
च्योढे दर्जेका बीस सेर और तीसरे दर्जेका पन्द्रह सेर
बोझा अपने साथ ले जा सकता है। ओढने बिछानेक
कपडे, सानेके सामान, हैण्डबेग, छाता व छडीकी तौल
नहीं की जाती। आधी टिकटवाले बच्चे के लिये आधा
बोझा माफ है। अधिक बोझा होनेसे लगेजके डरसे महसल

W~ सफरकी कुखी देकर रसीद लेना होगा। पन्द्रह सेरसे ज्यादा घोझ ले जाने वाले तीसरे दर्जेक मुसाफिर यदि लगेज न करावेंगे, तो गस्तेमे टिकिट चेका द्वारा चेक किये जानेपर पन्द्रह सेर घोझा माफ न करके उसका भी महसूल देना होगा । लगेजका वोझा गाईके पास भी रसा जा सकता है, किन्तु उतरनेवाले स्टेशनपर मुसाफिर उसे ४० घटेतक न छुड़ा ले तो हरजाना फी बोझा दो आना रोज देना पड़ेगा। ४-सौ मीलसे अधिक सफर करनेवाले मुमाफिरको अधिकार है कि सौ मील सफ़रकर चुकनेके वाद् प्रति सौ मोल या उसके अ शपर एक दिन इस हिसानसे एक या अधिक स्टेशनपर ठहरता हुआ देग्से पहुंचे यानी फो सौ मोल सकर कर चुनेके वाद चौबीस घण्टे उतरकर माराम कर सकता है, मगर स्टेशनपर उतरने के बाद, शनके स्टेशनमास्टरसे टिकिटपर सदी करा लेनी चाहिये। जैसे फलकोसे देहुलीका नौ सौ मीलकी सफर, है, तो फी मील चौबीस घण्टा ठहरता हुआ मुसाफिर नौ दिन- में कलकत्तेसे देहली उसी टिकिटसे पहुंच सकता है। क्से, चौबीस घण्टे की सफर है। स्त्रियोंके डिब्येपर "स्त्रियों के लिये" लिखा रहता है। इनमें धारह वर्पतको पञ्चे भी बैठ सकते हैं। किन्तु इनमें पुरपके पैठनेका अधिकार नहीं है। इनमेंकी टिकट चलती गाडीमें जाचनेका पुरुषको अधिकार नहीं है। , उस १ HWAN . . रेलोक नियम कोई गाड़ी निश्चित समयसे पहिले नहीं छूट सकती, स्टेशन- मास्टरसे गाडी पहुंचते ही उस स्टेशनका नाम व गाड़ी फितनी देर ठइरगी जोरसे कहलवाना चाहिये । ७ टिकट लेनके याद मुसाफिर गाटीमे न चढ सके, तो तीन घण्टेके अन्दर टिफटका दाम वापिस ले सकता है। -८ यनि जगह न रहनेसे किसीको कम दर्जेको गाडीमे धैठना पड़े, तो बैठते वक्त गार्डसे कह देने और उससे सर्टिफिकट ले लेनेपर पाकी महसूल उस रलयेके हेड आफिसको लिखापढ़ी फरनेसे वापिस मिल सकता है। ९ यदि कोई यात्री बिना गार्डको कहे या उससे निता सार्टिफिकेट लिये हुए अपने टिकटसे ऊचे दर्जे के डिब्बेमे बैठे या जहाका टिकट लिया हो उससे अधिक सफर करे तो उसे प्रचलित नियमानुसार अधिक महसूल व जुर्माना देना पड़ेगा। इसलिये गार्डसे फहफर धैठना चाहिये । २०-यात्रीका सामान गाडीमे छूट गनेसे स्टेशनमास्टरको कहकर अगले स्टेशनपर तार भिजवाना चाहिये, लावारसी सामान स्टेशनपर दो दिन रसा जाकर उसके बाद बड़े स्टेशन- पर भेज दिया जाता है और फिर नीलाम कर दिया जाता है। ११-यदि यात्री विशेष कारणसे अपने सामानको अदद कुछ काल- तक स्टेशनमास्टरके पास रसना चाहे, तो प्रति अदद पहिले चौबीस घण्टे या अशका दो आने और उसके

६४
सफरको कुखी
बाद एक माना प्रति चौबीस घण्टे या अशके लिये देना
पडेगा । स्टेशनमास्टरसे इसकी रसीद ले लेनी चाहिये।
१२-जकशन स्टेशनपर किसी यात्रीको भूल्से किसी दूसरी गाडीम
न बैठने देना टिकट फलझरका काम है।
१३--जिस डिब्बेमे जितनी सख्या लिपी हो, उससे अधिक मुसा
फिर बैठानेका रेलवेको अधिकार नहीं है।
१४-यदि कोई रेलवेकर्मचारी यात्रीसे असभ्य व्यवहार करे. या
यात्रीको पानी, रोशनी, सफाई, डिब्बेमें जगहका अभाव
आदिसे तकलीफ उठानी पडे तो रेलवे स्टेशनमास्टरसे-
योना चाहिये। यदि वह उचित वन्दोवस्त न करे तो
ट्राफिक सुपरिन्टेन्डेन्टके पास खबर करनी चाहिये।
१५-यात्री भूलसे जहातकका टिकट लिया हो, वहासे आगे घर
जाय, किन्तु उस आगेके स्टेशनपर पहुचनेपर स्टेशनको
सरहदके बाहर गये विना पहली ही गाडीसे लौटे तो उसे
अधिक यात्राका किराया दण्ड न देकर सिर्फ वापिस
जानका ही किराया देना होगा ।
१६ यदि किमी सजनको स्टेशनपर जाकर अपनी सारी पहुंचाने
या• " उतारनेके लिये प्लेटफार्म पर जाना हो, तो
प्लेटफार्म टिकट खरीदकर जाना चाहिये ।
। रेल ठहानेको जंजीर तय सीवन
जन कि अपनी कोई कीमती चीज ग्लसे
या कोई स्तरको विरुद्ध
रत्वे एक्ट के अनुसार ५०) जुर्माना देना पड़ेगा
4

रलोक नियम
ma
--
१८-मुसाफिरोंको अपना योझा ग्लोस उतारने या चढ़ानका महसूळ
रल्क कुलियोको फो हलफ थोझेका एक आना और को
भारी वोझेस दो आने देना चाहिये । इससे ज्यादा मागने-
पर स्टेशनमास्टरसे रिपोट कर दनी चाहिए।
१९- सीजन यानी वापिसी अथना मियादी टिकटवालोंको प्लेटफार्म
पर या गाडोमें किसी प्रकारको पाने-पीनेको या अन्य
चीजें बेचनेका या गौशाला के लिये अथवा अन्य-दानादि-
का पैसा यात्रियोंसे वसूल करनेका हुकुम नहीं है। इसके
विरुद्ध करनेपर रलवे ऐक्टक अनुसार टिकट जन्त हो
जायगा।
-
२०. कोई मुसाफिर रलमे निना टिकट सफर नहीं कर सकता।
। अगर बिना टिकट सफर करता हुआ पाया जायगा, तो
उस वर्गानुसार टिकटका दाम 4 जुरमाना उस जगहसे
जहासे गाडी शुरू होती हो अथवा उस जफशनस्टेशनसे
जहापर गाडी चेक की गई हो देना पडेगा।
। रेलवे कर्मचारीके पूछनेपर उसको टिकट दिखा देना
चाहिये और अपने मुकाम स्टेशनपर टिकटरावूको

हो, या कोई खतरेको शका हो। इसके विरुद्ध खींचनेसे
६४
सफरको कुखी
याद एक आना प्रति चौवीस घण्टे या अशके लिये दना
पडेगा । स्टेशनमास्टरसे इसकी रसीद ले लेनी चाहिये ।
१२–जकशन स्टेशनपर किसी यात्रीको भूलसे किसी दूसरी गाडीमें
न बैठने देना टिकट कलकरका काम है।
१३-जिस डिब्बेमें जितनी सख्या लिसी हो, उससे अधिक मुमा
फिर बैठानेका रेलवेको अधिकार नहीं है।
१४–यदि कोई -रेलवेकर्मचारी यात्रीसे अमभ्य व्यवहार करे या
यात्रीको पानी, रोशनी, सफाई, डिब्बेमे जगहका अभाव
मादिसे तकलीफ उठानी पड़े तो रेलवे स्टेशनमास्टरमे
बोलना चाहिये। यदि वह उचित बन्दोवस्त न करे तो
ट्राफिक सुपरिन्टेन्डेन्टके पास खनर करनी चाहिये।
१५-यात्री भूलसे नहातकका टिकट लिया हो, वहासे आगे चला
जाय, किन्तु उस आगेके स्टेशनपर पहुचनेपर स्टेशनकी
सरहदके बाहर गये विना पहली ही गाडीसे लौटे तो उसे
अधिक यानाका किराया दण्ड न देफर सिर्फ वापिस
जानेका ही किराया देना होगा।
१६-यदि किसी सजनको स्टेशनपर जाकर अपनी सवारी पहुंचाने
या गाडीमेसे उतारनेके लिये प्लेटफार्मपर जाना हो, ती
एक आनेका प्लेटफार्म टिकट सरीदकर जाना चाहिये ।
१७–चेलमें बैठे हुए यात्रीको रेल ठहरानेको जजोर तप सींचनो
चाहिये जन कि अपनी कोई कीमती चीज रेलसे गिर पड़ी
J
रेलवे एक्ट के अनुसार ५०) जुर्माना देना पडेगा।

रलयेफ नियम
१८-मुसाफिरोको अपना योझा रसमेत उतारने या चढ़ानेका महसूळ
रलरु फुलियोको फोहरके पाझेका एक आना और फी
भारी मोझेका दो आने दना चाहिये । इससे ज्यादा मागने-
पर स्टेशनमास्टरसे रिपोर्ट कर देनी चाहिये।
१९--सीजन यानी वापिसी अथवा मियादी टिकटवालोंको प्लेटफार्म
पर या गाड़ीमें किसी प्रकारको साने-पीनेको या अन्य
चीजें यचनेका या गौशाला के लिये अथवा अन्य-दानादि-
का पैसा यात्रियोसे वसूल करनेका हुकुम नहीं है। इसके
विरुद्ध करनेपर रलवे ऐस्टके अनुसार टिकट जब्त हो
जायगा।
२०.कोई मुसाफिर रलमे रिना टिकट सफर नहीं कर सकता।
अगर बिना टिकट सफर करता हुआ पाया जायगा, तो
उस वर्गानुमार टिकटका दाम व जुरमाना उस जगहसे
जहासे गाडी शुरू होती हो अथवा उस जकशनस्देशनसे
जहापर गाडो चेक की गई हो देना पड़ेगा।
२१---उचित रलवे फर्मचारीके पूरनेपर उसको टिकट दिखा देना
चाहिये और अपने मुकामके स्टेशनपर टिकटवाबूको
टिकट देकर जाना चाहिये।
१२-अगर कोई मुसाफिर उस रास्तको छोडकर जिसका कि उसने
टिकट लिया हो, दसर रास्तेसे जाना चाहे और वह रास्ता
बडा हो तो उसको उतनी ज्यादा रास्तेक वास्ते अलग
महसल दना पडेगा। अगर वह रास्ता छोटा और जल्दी

३६
सफरको कुस्ती
ww
पहुचनेवाला हो, तो उसी टिकटसे रिना दुसरा महसूल
दिये जा जफता है।
२३-मेल गाडीका टिकट लिये हुए इन्टर और थर्ड क्लासके मुसा-
फिरोंको किसी कारणसे पैसेन्जर गाडीमे सफर करना पडे,
तो गार्ड का सार्टीफिकेट लेकर उच्च अधिकारियोको
लिसनेपर उनको मेल ओर पैसिजर गाडीके महसूलक
फरकका पैसा वापिस मिल जायगा ।।
२४-फस्ट और सेकण्ड क्लास पैसिजरको जहापर उनग्ना है, उस
जगहके लिये गार्ड को सूचना देनेसे जगानेका गार्ड का
काम है। अगर कदाचित इसमे गलती हो जाय तो
ग्लो जमानदार नहीं है।
२५--अगर कोई मुसाफिर ऐसे अछूत रोगसे पीड़ित हो जिससे
। दूसर पासवाले मुसाफिरोंको रोग लग जानेका भय हो
और वह और उसका साथी रिना स्टेशन मास्टरको सान
इजाजतके मफर करते हो तो उनको गाडीमेसे किसी भी
स्टेशनपर उतारा जा सकता है। उनका टिकट व पास
जन किया जा सकता है ओर २०) तक जुरमानेको सजा
हो सकती है। ऐसा रोगपोडित मुमाफिर डिना रिजर्म
फरा कर जा सकता है।
२६- अगर कोई मुनाफिर अपने किसी भी पड़ोसी मुसाफिरकी
मगजी सिा निगट-तम्बाकू आदि पीना हो उसफो २०)
-
-

-- w - -- रेलवेके नियम ६७ तक जुरमानेकी सजा हो सकती है और गाडीसे उतारा जा सकता है। २७-अगर कोई मुसाफिर नशेकी हालतमे कोई घृणित काम करे, अश्लील भापा घोले, रोशनी बन्द कर या दूसरे मुसा- फिरोंको किसी प्रकारको बाधा डाले तो उसको ५०) तक जुरमानेकी सजा, टिकट व पास जब्त और गाडीसे उताग जा सकता है। २८-अगर कोई मुसाफिर किसी रेलवे-कर्मचारीकी ड्य टो (कर्तव्य) में जानकर बाधा डाले, तो उसको १००) तक जुरमानेकी सजा हो सकती है। २९-अगर कोई मुसाफिर उस डिब्बेमेंसे उतरनेसे इन्कार करे जो रिजन किया हुआ हो या जिसमे वादादके मुताबिक काफी मुसाफिर बैठे हा या उस डिब्बेमें दूसर मुसाफिरोंको आनेसे रोके जो न रिजर्व किया हुआ हो और न जिसमें काफी तादादमे मुसाफिर बैठे हो, ऐसा करनेवालेको २०) तक जुर्मानेकी सजा हो सकती है। ३०-र वे किसो मुसाफिरके लगेज व मालकी टूट-फूट या नुकसानीको जिम्मेदार नहीं है जबतक रो-कर्मचारियोंने उस मालकी रसीद न दी हो और वह लगेज रेलपेके ताव- में न दिया हो। ३१-रेलद्वारा दो प्रकारसे माल भेजा जाता है (१) पार्सल (सवारी गाडीसे) जिसका महसूल ज्यादा लगता है,

३८
सफरफी कुखी
मोर सबसे पहलेको गाड़ीमें भेजा जाता है । यह पानेवाले-
को शीघ्र मिलता है। (२) गुड्स (मालगाडीसे)
जिसमें प्रत्येक वस्तुपर अलग अलग महसूल लगती है।
यह मालगाडीसे जाता है व देरसे पहुंचता है। गुड्सका
महसू ल पर्सलसे कम लगता है।
३२-पासल या गुड्सका महसूल भेजनेवाला चाहे तो पहले दे
सकता है और पीछे भी। परन्तु शीघ्र बिगडनेवालो
वस्तुओंफा महमूल पहले ही दिया जाता है। रेलद्वारा
जो निल्टी मिलती है उसमें भेजने व पानेवालेका नाम,
मालका वजन, महसूल और महसूल पाने या न पानेका
व्यौरा लिखा होता है। विल्टो लानेवाला ही वस्तु छुड़ा
सकता है। बिल्टी खो जाय तो।।) के स्टाम्पकागजपर
इकरारनामा छुडानेवालेको लिसना पडेगा।
३३ किसी प्रकारका ज्यादा दिया हुआ महसूल वापिस लेना हो तो
महीने दिनकै अन्दर ट्रैफिक मैनेजर और एजण्टको
लिखना चाहिये। टिकट व लगेजमें अधिक महसुल लिया
गया हो, तो तुरन्त स्टेशनमास्टरको कहना चाहिये।
३४ लगेज, पार्सल या गुड्मको वस्तु यदि गुम हो जाय, नुकसान
हो जाय या किसी दूसरको गलतीसे दे दी जाय, तो माल
रवानगीको तारीखमे एक महीनेके अन्दर उन रेलवेके
उचित अधिकारियोंको जातैसे नोटिस देनी चाहिये
जिस रेलसे वह माल रवाना हुआ हो और जिस रेलवेमें
पहुंचनेपाला हो।

रलवेफे निपम
३५ लगेज, पार्सल या गुड्समें सोना, चादी, रेजकारी, रशमी,
जरदोजी या ऊनी कपड़ा दुशाला, मोती, जवाहरात, घड़ी,
चत्र या नक्शे आदि कीमती माल हो तो वह साफ
(सीदपर लिसवाना चाहिये । उसका महसूल अधिक देना
होगा। यह सामान रेलवेसे थोमा फराफर जायगा।

.
., यात्रियोंके प्रति रेलवेकर्मचारियोंका
कर्तव्य (Duty)
-
नोट-यहापर कुछ शब्द रेलयेकी पालिसी अर्थात् नीतिक विषयमें
लिख देना अनावश्यक न होगा कि रेलवेका कितना उच्च
उद्देश है और यात्रियोंके प्रति कितना आदरभाव है, जो
पाठकोंको उनके बनाये हुए नीचेके नियमोंसे विदित हो
जायगा । यदि यात्रियों को रलवेयात्राद्वारा किसी प्रकारका
कष्ट पहुंचता है , तो वास्तविक इसमें रेलवेका कुछ
दोष नहीं है। यह केवल उसके कर्मचारियोंकी धृष्टता है,
जो अपने कर्तव्योंका पालन भली प्रकार नहीं करते हैं,
जिनके कारण यात्रियोंको फष्ट होता है और रेलवेका
नाम पदनाम होता है।
रेलवेकर्मचारियोंका बर्ताव
नमूता व सभ्यता
(१) नम्रता व सभ्यतासे हानिकी अपेक्षा लाभ कई गुना है । इससे सद
नाम कार्य को वृद्धि होती है और बडी-से-बडी भूलें भी
इसके प्रयोगसे छुप्त सी हो जाती हैं अर्थात होती हुई भी
दिखा नहीं देती हैं। वास्तविक अथ इस शब्दका दूसरेके

यात्रियोके प्रति रलवेकर्मचारियोका कर्तव्य हृदयपर अपने भावों और कर्मों द्वारा अपना प्रभाव जमाना और दोपोंका लोप करना है। गिना इसके या जरासी कमीके ही कारण मेवामे भयकर भूलें जान पडती हैं और दूमरी करी-कराई सेवाओपर पानी फिर जाता है। जैसे रेलवेमे चाहे कितने ही अच्छे-अच्छे इ जिन हो कितनी ही अधिक गाडिया हो, कितना ही बैठनेका सुपास हो और दूसरी अनेक सुविधायें हो किन्तु यह सन ग्लवेकर्मचारियोकी मभ्यता विना फीका जान पड़ता है। यह व्यवसायको स्वाभाविक सहायक है, इसके ही कारण ट्रैफिक यानी व्यवसायको वृद्धि होती है। व्यवसायमें सफलता नम्रता या सभ्यताका ही फल है। यात्रि- योंको प्रसन्नता ही रेलवेका सबसे भारी विज्ञापन और अभेद कवच है, जिमकी ओर सब कर्मचारियोंका पूर्ण लक्ष होना चाहिये । रेलको नम्रता या सभ्यतामे पूर्ण विश्वास है और वह अपने प्रत्येक कर्मचारीको वाध्य करती है कि वह नम्रता या सभ्यताका व्यक्तिगत रूपसे रेल्वेको प्रतिष्ठा बढाने के लिये पूर्ण उपयोग कर । २-रेलवे कर्मचारियोंका वर्ताव यात्रियोंके प्रति दृढता नम्रता सभ्यतापूर्ण होना चाहिये। ३-प्रत्येक रलवेकर्मचारीको यात्रियोंको हर प्रकारकी सुविधा हर समय देनेके लिये तैयार रहना चाहिये और उनको ठीक-ठीक सूचना देनेका ध्यान रखना चाहिये । . -

सफरकी कुजो
vv
-~-
स्टेशनमास्टरका कर्तव्य ( Duty )
स्टेशन मास्टरकाकर्तव्य है
१---कि उसके स्टेशनके कर्मचारी जनता और यात्रियोंके प्र
बिना उनके वर्गकी उपेक्षा किये नम्रता व सभ्यताकाक्त
करते हैं।
२-कि उसके स्टेशनका हरएक कर्मचारी अपनी ब्यूटी व गार
के आने और छूटनेके समयसे परिचित हैं, जिससे जन
को समयपर ठीक सुचना दे सकें।
३-कि उसके फर्मचारी जनता व यात्रियोंकी मदद चाहनेके इशारे
तत्काल ध्यान देते हैं।
४-कि उसके स्टेशनपर मानेवाली गाडीके हर डिब्बेके सामने स्त
शनका नाम व गाड़ीके ठहरनेका समय शुद्ध और स्प
भाषामें पुकारा जाता है।
५-फि पीनेके खच्छ और ठडे पानीका भिश्ती और कहारद्ध
स्टेशनपर पूरा-पूरा धन्दोनस्त है।
६-फि यात्री रेलकी लाईन पुलद्वारा पार करते हैं
कि प्लेटफार्म और मुसाफिरखानेमें बिना अन्धेरी या उजे
गतका ध्यान किये सब वत्तिया जलाई जाती हैं।
८ फि रिमोशमेन्टरूम (होटल ) में पहिले और दूसरे वर्गके यात्रिय
को उनको गाडीके छूटनेका समय और यह कि गा
उक समयके बाद उनके लिये नहीं ठहरेगी, बताया जा
-
,

यानियों के प्रति रलवेफर्मचारियोंका फरव्य गार्डकी ड्यूटी [ कर्तव्य ] १-गाडीमे ३ जिन लगने के बाद गार्ड उस गाडीका रास्तेभर जवाब- देह रहेगा। २-गार्ड का कर्तव्य है कि गाडी टूटनेसे पहिले देखले कि गाडीके दिब्बोंमे सर सामान दुरुस्त और साफ हैं, टाकियोंमें पानी भरा हुआ है, वत्ती और पखेका गैस पा विजलीका फिटिंग बराबर है और रातमे बत्तिया बराबर जलती हैं। ३-गार्डका कर्तव्य है कि मुसाफिरोंको गाडीपर चढने और उतरनेमें नमूता व सभ्यतापूर्वक मदद दे और गाडीके डिब्बोंमें भीड होनेसे रोके अर्थात् डिब्बोंमे पैठनेकी नियमित संख्यासे अधिक न बैठने दे। यदि गाडी पूरी भर जाय तो स्टेशनमास्टरको इत्तला कर देवे जिससे वह आगेके स्टेशनोंको तार या कट्रोलर द्वारा सूचना कर दे कि टिकट पाटना बद फिया जाय। ४सन वर्गों के मुमाफिरोंकी जरूरतकी तरफ ध्यान देना गार्डको व्य टीका मुख्य अग ५-किसी भी यात्रीक पहिली और दूसरी श्रेणीका भोजन चाहनेपर किसी मुख्य स्टेशनपर अड़ा यात्री बाहे

+
सफरकी कुली
और जहापर आहारगृह हो रेलवे तार द्वारा बंदोवस्त करना
गार्डका काम है
६ जनानी डिब्बेमें किसी मर्दको न ठने देनेका काम
गार्ड का है।
७-दिनमें वोगदाओंमेंसे गाडी निकलते समय सन डिर्नामें
बत्ती जला देनेका काम गार्ड का है।
-

-
-
-
शरीर-रक्षाके साधन
शास्र
१-जंगलकी ताजो हवा लाभकारी होती है इसलिये नित्य
मैदानमें कम-से-कम एक मील टहलना चाहिये। सदैव
सुली साफ हवामें रहना चाहिये। नीदमें भी मु इसे श्वास
न लेना चाहिये। सोते समय नाकपर वन आदि न
रसना चाहिये।
२-जिस कुए या तालानमें मोरी मिली हो, पेड़की पत्तिया
गिरती हों, जल सरार हो उसमेंका पानी न पीना चाहिये।
पहते दर्याव या पके कुए का पानी उत्तम है। पानी छानकर
पीना लाभकारी है। मल-मूत्र त्यागनेके बाद तुरत जल
कभी न पीये।
३-भूस न रहते साना या वृथा भूखा रहना हानिकारक है।
भोजनमें जल्दबाजी न कर, खूब चबा चबा कर भोजन करे
और अन्तमें थोडा जल पीये। भोजनके पश्चात् तुरत
पेशान करनेसे मसाने या बवासीरका रोग नहीं होता।
भोजन हलका फरना चाहिये। मक्सी आदिको भोजन
पर न बैठने दे। भोजन नियत समयपर दोपहरमें करना
चाहिये। दूध दही खाना योग्य है, किन्तु उसके उपर
।
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सफरकी कुजी
कदापि न पीये। चूल्हेपरफे अत्यन्त गर्म पदार्थ न खाने
चाहिये।
४-निद्रा नित्य ७ घंटे आवश्यक है। रानिमें ९ बजे सोना
और सुनह ४ बजे जागना चित्तको प्रसन्न रखता है।
ययोंको गाढ़ी नींदसे कभी न जगाना चाहिये ।
५-वर सदैव समयानुकूल होना चाहिये। गर्मीमें आया हुआ
पसीना पोंछकर तन हवामें निकल सकते हैं। चलती एके
दिनों में मोटा सदर पहनकर रहना लाभदायक है।
६ फसरत-मुगदर उठाना, दण्ड करना, 'गेंद खेलना इत्यादि
शरीरको पुष्ट करता है । इसलिये कसरत करना आवश्यक
है, लेकिन समय और परिमाणमें करना चाहिये ।
७-पढ़ना, सोचना और दिमागी मिहनत आख व दिमागी
शक्तिके अनुसार करे। यच्चोंको जबतक ताकत अच्छी तरह
न आये पढनेमें न लगावे। महीन अक्षर पढ़ना और तेज
रोशनी देखना नेत्रको ज्योतिको खरान करता है।
८-स्नान प्रतिदिन आवश्यक है। गुनगुने या ठंडे जलसे
जैसा अभ्यास हो करे, किन्तु गर्म पानी स्नानपर हवा
न लगने देना चाहिये । सर्वदा साफ नदीमें या कुंएके
वाजा पानीसे नहाना बेहतर है। विदेशमें तेल मळकर
'नहाना चाहिये।
९-सुबह और शाम पाखाने जानेको आदत रखनी चाहिये
क
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म
1

शरार रक्षाक साधन * - मगर शौच क्रिया एकान्त स्थानमें करे । मल-मूत्र, भूख प्यास और नींद रोकना नहीं चाहिये । १०-रहनेका स्थान साफ हो । ससाहमे दो बार लीपे और सुबह-शाम घरकी खिडकिया शुद्ध वायुके लिये खोल रखनी चाहिये । ११-किसी प्रकारका नशा न कर, अधिक जल पीने, भोजन और सोनेके अनियम, ईर्ष्या, चिन्ता, भय, क्रोध, और शोफ आदिसे अजीण होता है, जो सब रोगोंका मूल है। १२-मनुष्य स्त्रोप्रसंग नियमित करे, ज्यादा होनेसे शक्ति क्षीण होती है। १३ –प्रकृतिको सदा शात रखना चाहिये, अधिक क्रोध शरीरको दुर्वल रखता तथा हि सा व पाप कराता है। १४-सुती, अफीम, शरान या भाग आरम्भमें मनके लुभाने- वाले मालूम होनेपर भी परिणाममे हानिकारक हैं। इनका मेवन करनेवाला अपनी शरीरक्रिया विगाड लेता है और फिर उसके इतना अधीन हो जाता है कि नुकसान देखते हुए भी उनसे छुटकाग नहीं पा सकता। १५–निर्व्यसनी मनुष्य बीमार नहीं पड़ता। यदि कभी बीमार हुआ तो थोडी-सी दवासे आराम होता है, किन्तु व्य- सनाधीन मनुष्य प्राय वीमार ही रहता है और कोई दवा जल्दी गुण नहीं कर सकती।

सफरकी कुंजी ।
१६-मिताचारी रहने, उचित रीतिसे सारे शरीरको व्यायाम
देने व नियमित विश्राम लेनेवाला मनुष्य सदा नीरोग
तथा दीर्घजीवी, उत्साही व सततियुक्त रहता है।
१७-खासी रोकनेसे अरुचि, हृदयरोग, हिचकी आदिको वृद्धि
होती है।
५८---मुा रोकनेसे पथरी, पिलहो, वायुगोला इत्यादि रोग हो
जाते हैं।
१९-धमका वाम रोकनेसे वायुगोला, हृदयरोग, मोह, प्रमेह
आदि रोग हो जाते हैं।
२०-भूखा रोकनेसे सन अ गमें दर्द, अरुचि, ग्लानि, तथा
शरीर कृष होता है।
२१-अनियमित आहार-विहारसे गेग होता है।
२२-छींक रोकनेसे मृगी अपरमारादि रोग उत्पन्न होनेका भय
-
.
रहता है।

अकस्मात् उत्पन्न होनेवाले साधारण रोगोंको दूरकरनेवाले अनुभूत प्रयाग । उपर शरीररक्षाके साधन लिस्नेके बाद अन हम पाठकों के टाभार्थ स्वय अनुभवमें आये हुए चन्द रोगोंके नुस्से नीचे लिखते है। क्योकि कोई भी मनुष्य कितनी भी सावधानीसे क्यों न रहे, बरन्तु फिर भी कुछ-न-कुछ और कभी-न-कभी रोग शरीरमें अपना र कर ही लेता है। इसलिये उस यमरूपी गेगको शरीररूपी धरसे नकालने के लिये कुछ उपाय अवश्य होने चाहिये। यों तो हजारो केस्मके रोग और उनके नुस्से भी हजारो ही होते हैं, मगर हमने नहा सिर्फ जरूगे और अकस्मात् हो उठनेपाले रोगोंके ही प्रयोगोका जाला देना उचित समझा है। क्योंकि हम कोई वैद्य या डाकर ही है और यदि कुल रोगो प्रयोग इस पुस्तकमे लिये जाय, तब जो यह पुस्तक वैकका एक नारी पोथा धन जायगी। इसलिये हमने इन चन्द जरूरी नुस्सोंको हो इतनी सरल सापामे ओर निय- से लिखा है कि जिससे रोगीको दवा बनाने वा सेवन करनेमे केसी प्रकारकी कठिनाई न मालूम हो। साथ ही यह भी निवेदन कर देना उचित समझते हैं कि प्रत्येक यात्रीको अपनी आवश्यकता मनुसार नीचे लिखे नुस्खे बनाकर अपने पास सफरमे अवश्य रखने बाहिये, ताकि उनको फौरन फायदा उठानेमे विलम्ब न हो।

सफरकी कुजी wwwwwwwwwim शिर-दर्दनाशक प्रयोग १-यदि किसीके सिरमें गमी में दर्द होता हो, तो चन्दन और कपूर खूब महीन घिसकर लगानेसे-फौरन फायदा होगा। २–यदि किसीके शिरमें सर्दी या जु कामके कारण दर्द होता हो, तो जरा-सा जायफल को दूधमें घिसकर लगाइये । ३-चच और पीपल महीन पीस-छानकर सु घनेसे आधाशीशी और सिर-दर्द आराम होता है। कानके रोग १–अगर कानमें कीडा घुप जाय तो मकोयके पत्तेका रस कानमें टपकाओ। कानक दर्दपर हुक का पानी और कौडीकी राख मिलाकर कानमें डालना। 1 ३-कानके बहनेपर नीमकी पञ्चीके रसमें शहत मिलाकर डालना । ४-कानदर्दपर सुदर्शनके पचेका रस गर्मकर कानमे डालना । ५-कानम से आवाज निकलनी हो तो कपूरका पानी डालना ! ६-अगर कानमें पानी भर जाय तो छींकने और सासनेसे पानी निकल जायगा। नेत्ररोग १- गुलाब जलमें गुलाबी फिटकरी मिलाकर दिनमे दो-तीन बार दुखतो मासोंमे डाल देनेसे गर्मी, सदी, बच्चे, बूढ़े, ज्वान, स्त्री, पुरुष सनकी आखों अच्छी हो जायगी ।

m ww नेत्ररोग २शहदमे केमर घोटकर आखमे आजनेसे आसकी फूली कट जाती है तथा ज्वाला, धुन्ध, परवाल, दु सना आदि नेत्ररोग दूर होते हैं। 3-पातको सोते ममय गर्मी की आखपर मलाईके फाये और सर्दीको आसपर तेल या गुडके फाये बाधनेसे आस्वकी सुग्यो, दुखना तथा कर्कराना बन्द हो जाता है। ज्वरनाशक प्रयोग २-तुलसीपत्रका रस १ तोला काली मिर्च का चूर्ण ३ माशे मिला- कर गर्मकर सेवन करनेसे हर प्रकारके ज्वर दूर होते हैं। मगर खान- मानमें परहेज तथा पेट हलका रखना चाहिये । --दो तोले नीमकी छालके काढेमे धनिया, और सोंठ तीन-तीन माशे पोसकर लगातार तीन-चार पारी पोनेसे शीतज्वर बहुत जल्द आराम हो जाता है। -तिजारी बुखार आनेवालोंको कुनैन, घुसार आनेसे चार घण्टे पहिले दो बार दो-दो घटेके फेरसे साकर ऊपरसे दूध पी लेना चाहिये और कुछ न खाय। इस तरह दो-तीन रोज कुनैन खानेसे तिजारीज्वर चला जायगा । --एक वर्षसे ऊपरफे पुराने धीमें हींग घोटकर सघनेसे चौथइया- ज्वर जडसे उड जाता है। अतिसार नाशक औषधियां -यदि किसीके ज्यादा दम्न होने के कारण आव जाता हो और ६

सफरको कुलो
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पेटमे मरोडे चलते हो. तो लाल चूरा और राल पीस मिलाकर
रातको सोते समय दो-दो घण्टके मागे पीछे दो-तीन फकी
लेकर ऊपरसे गुनगुना पानी पी जाओ फौरन माराम होगा।
---दहीमें ईसनगोल मिलाकर खानेसे भी दस्त बद हो जाती है।
2-घेलका मुरब्बा खाना भी दस्त चन्द करनेमें लाभप्रद है।
दन्तरोगनाशक चुटकले
गर्म जल मुखमें रसनेमे यदि दातोंका दर्द कम हो जाय, तो दर्द
सोसे है और ठढा जल मुसमें रसनेसे दातका दर्द कम हो जाय तो
दातोंमें दर्द गर्मी से समझना चाहिये।
१-दात य डाढके तले कपूर रसनेसे दातका दर्द आराम होता और
कीड़े मर जाते हैं।
---अगर सर्दी से दातोंमे दर्द हो, तो अदरसपर नमक लगाकर दातों-
के नीचे रखे।
३-मसूडे फूल जानेपर गर्म जलमे सफेद फिटकरी डालकर फुला
करना चाहिये या गर्म रोटीका टुकड़ा फूले हुए मसह के नीचे
दनाकर खानेसे भी फायदा होगा।
४--पीपर, जीरा और सेन्धानोन पीसकर दातोंमें मरनेसे दातका दर्द,
और उनका हिलना तथा मस्डोका फूलना आराम होता है।
खांसीकी दवायें
1-अनारका छिलका मुहम रखना (0) बहेढ का
१
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अजीर्ण नाशक पटी और पूर्ण
नीमको माय मुहमे डालकर उसका रम घूमो (३) मुल्छनी-
का सत्त मु हमें रसना या बहेडा और मिश्री मु हमे रखना।
पसलीका दर्द
अगर किमीको पसलीमें दर्द हो, तो जरा-सा सिन्दूरमे गदद
मिलाकर एक साफ कपडेपर लगा लो। पोछे उसे दर्द होनेकी
जगहपर चिपका दो और सुलगते हुए कंडोंको आगसे सेफ दो,
मगर मागको शरीरमे अलग रखना चाहिये ताकि बदन जल
जानेका डर न रहे।
अजीर्णनाशक बटी और चूर्ण
१-हरं, गोरा, आमला, काला नमक, सनाय, मकई इन सबको परा-
पर-अगर लेकर कूट-पीस छानकर चूर्ण बना लो। पोछे पत्यरके
खरलमें नोचूके रसमें २४ घण्टेतफ घोटकर २-३ माशेकी गोलिया
पना लो। जर दस्त फन्न हो या भूख कमती लाती हो, तब
एक-एक या दो-दो गोली खाफर, आध पाव गर्म जल पी लें।
इससे दस्त माफ होकर भूख खुल जायगी। जबतक दस्त साफ
न हो और भूख नखुले तबतक २-४ दिन सेवन न कगे, मगर
हमेशा साना ठीक नहीं।
2-सूखे कटारे, अम्लवेत चीता, हर्ड, सोंठ, कालीमिर्च, पीपर, सेन्या
नोन, काला नोन, मनिहारी नोन, वायविडंग, स्याह जीरा, मफेद
जीरा, अजमोद और अजवायन इन सबको घराबर-बराबर लेकर
ट-पीम छानकर चूर्ण बना लो, इसकी माना १ माशेसे ४
.
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-

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सफरको कुखी
माशेवक है। इसे फायकर थोडा ताजा या गर्म जल पीना
चाहिये। भोजन करनेके बाद दोनों वक्त खानेसे भोजन भलो
भाति पच जाता है और भूख खुलकर लगती है। अगर यह
चूर्ण अजीर्णमें साया जाय, तो - पत्थर समान अजीर्णको भी
भस्म कर देता है।
३-शुद्ध गंधक, सोंठ, काली मिर्च, सेंधा नोन, इन्द्रजौ, वायविडग
इनको वराबर-बराबर लेकर कूट पीस छानकर नोबूके रसमें मिला
कर चना वगनर गोली बनाकर सानेसे अग्नि प्रतीप्त होती है और
अजीर्ण दूर होता है।
श्रागसे जल जानेपर
१-आगसे जली हुई जगह पर तत्काल अलसीका तेल ओर चूनेका
नितरा पानी लगानेसे बहुत लाभ होता है ।
२-इमलीको छाल जलाकर गायके योमे मिलाकर लगाने ।
3-जले हुए अंगपर फौग्न वूग मल देनेसे छाला नहीं पड़ता।
४-यदि घाव हो गया हो, तो कडया (सरसोका ) तेल चुपडकर
ऊपरसे पत्थरका कोयला खूब बारीक पीसकर कपडछानकर
।
पुरक दे।
।
बेहोशीकी दवा
खानेका बुझा हुआ चूना और नौमादर दोनों चीजें वराबर-बराबर
लेकर हथेलीपर रगड़ लो या मिलाकर शीशीमें भरकर रख लो। अगर

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1
हैजेके लक्षण
विशाचिका हेमा
'कोई आदमी किसी कारणसे बेहोश हो गया हो या शीतसे दाती मिच
गई हो, तो यह दवाई सुधानेसे फौरन होशमे आ जायगा और दाती
सुल जायगी। अगर दात या सिरमे जोरसे दर्द हो तो भी इसको
सुधानेसे बहुत लाभ होगा। अगर कोई मनुष्य डरकर पागल हो
गया हो या किसी स्त्रीको भूत-घुडैल लग गयो हो, तो इसे सुंधाते ही
फौरन अकार जायगी और व्याधा भाग आयगी।
विशूचिका या हैजा
-हैजेकी प्रथम अवस्थामे रोगीका जी मिचलता
है । फिर वारम्वार वमन और पतले दस्त होते हैं। दूसरी अवस्था में
जीभमे काटे पड़ जाते है, प्यासका जोर बढता है, नाडीको चाल मंद
पड़ जाती है, कुछ-कुछ बेहोशी आने लगती है। तीसरी अवस्थामे
एक दम होश-हवास नहीं रहता, सज्ञा नाश हो जाती है। हाथ-पैर
रडे पड जाते हैं, हिचकिया चलने लगती हैं तथा पेशान धन्द हो जाता
है। चावलके माडकी माफिक पतला और वैसा ही रंगदार दस्त
होता है इंजेका पका लक्षण है।
१- अफीम, जायफल, केसर, लौंग, कपूर इन पाच चीजोंको छ
छ छ माशे लेकर परलमे डालकर खूब धोटो फिर दो-दो रतीको
गोलिया बना लो। जयतफ दस्त और बमन बन्द न हो तबतक
एक-एक घण्टेपर एक-एक गोली गर्म जल के साथ रोगीको
निगलवाओ। कम उम्रबालेको आधी गोली दो।
२-अगर फिसीको हैजा हो जाय ओर कोई दवा या हकीम, वैद्य न
.
।
.

M VN wwv- सफरको कुसी मिले, तो प्याज कूटकर उमका रस निकाल लो और हैजेवालेको छ-छ माशे धण्टे घण्टेमे उस वक्तनक पिलाओ जयतक कि वह आराम न हो जाय। 3-अगर प्यासका जोर न घटे तो अके सोफ आय पाव,अर्क गुलाब एक छटाक,अर्क पोदीना एक छटाफ और पानीका धर्फ आध पाव इन चारोंका या इनमे से जो वक्तपर मिल सके । एक मिट्टोके वर्तनमे मिलाकर रस लो। जब रोगी पानी मागे तर रुपया- रुपयाभर यही अर्थ पिलाओ। -अगर ऊपरकी दवाओसे यमन या उल्टी होना बन्द न हो, तो चौकोर पतले कागजपर राई पोसकर लपेट दो और इस कागजको पेटपर चुपका दो, जब जलन होने लगे तब उसे उतार लो इस तरकोनसे बमन वन्द हो जाती है। . । ट--१]उपरोक्त दवायें स्त्री तथा पुरुषों के लिये इस्तेमाल की जानी चाहिये । [२] छोटे छोटे बच्चोंके रोगोंकी दवाएं प्रागे लिखी जायगी।' गर्भवती स्त्रीको किसी रोग वगर किसी डाक्टर था हकीमकी राय लिये किसी तरहकी दवा न देनी चाहिये। [४]थनाही वैद्यकी दवा हानिकारक होती है। दवा जाच कर चाहिये। [५] पथ्य लेनेपर भोजाफर दिनको न सौर। EE] जिस दयाका कहीं वजन न दिया हो वह बराबर-बरावर समझ । [७] चूरन बडेको छ मासे एक सोलातक और यच्चाको दो माशेसे तीन मारोतक देना चाहिये। .

AammnAMMov--- । विशूचिका या दैजा ५- अगर हाय-पावमे घायटे आते हो,शरीर शीतल हो गया हो मौर नाडीको बाल मन्द पड गई हो, तो हार्थोको कलाई और पैरोंकी एडियोपर राईका पलस्तर रस दो। ६- अगर दस्त या प्यास कम हो जाय या बिल्कुल बन्द हो जाय लेकिन रोगीका पेशान न सुला हो, तो गफलत छोडकर फौरन पेशाब सोलनेका उपाय करना चाहिये। ७- कलमीशोरा, ढाकफे फूल, सेल खडी, गुलावजल चारोंको पोस- कर पेट और पेड्पर लेपकर देनेसे फौरन ही पेशान उतरेगा। ८-राईका पलस्तर कमरपर रक्खो या जरा-सा कपूर मूत्रन्द्रियपर रक्खो, फौरन पेशान होगा। .

वाल-रोग-चिकित्सा खांसी १-काकडासिंगी ६ माशे, अतीस ६ माशे छोटो पीपल ६ माशे,सरको फूट-छानकर बारीक चूरन बना लो ।दो रत्तो चूर्ण थोडीसी शाहदमे मिलाकर दिनमें तीन बार चटाये । यह ज्वर, खासी और घमनमे लाभदायक है। २-फाकडासिगी, अतीस, छोटी पीपर, छिली हुई मुलहटी ओर वर्लफा गोंद पाचों दवाओंको समान भाग फूट कपडछानकर चूरन वनावे और एक माशा चूर्ण दो माशे शहदमें मिलाकर प्रान काल दो वार चटाये। कफको खासीमें यह विशेष लाभ- कारी है। ३-छोटी पीपल दो तोले, अतीस ६माशे, घोटकर चूर्ण बनाने दो-तीन रत्ती चूर्ण शहद मिलाकर चटारे। प्रात दोपहर, सार्य, दिनमें तीन बार चटानेसे सर्दी, जुकाम और सासीमें लाभ होता है। अजीर्णके दस्त ५-सुहागा भूनकर छोटी हर्ने, काला नीमक और भूनी हींग इन चारो चीजोंको घोलकर माके दूधमें देना। - पार रोग चिकित्सा यदि गांके दस्त हों तो यमलोचन, छोटी इलायची, मिश्री पीसकर माता दूधमे पिला दो। ३-दस्तके साथ आन जाती हो, तो वायविडंग, अजमोद, और पीपर महीन पीसकर चापरफे धोक्नमें दे। यदि दस्तोंमें सून जाता हो, तो पाषाणभेद और मोंठ पानीमें घिसकर पिलाये। ज्वर . गगरमोथा, पीपल, अतीम और काफडासिंगी इन चारोंको फूट-पीसकर छान लो, इस चूर्णके शहतमें मिलाकर चटानेसे कोंफे ज्वरातिसार, सामी, वमन और वास यह सत्र रोग म होत है। असलमें यह "बार-चतुर्मी" चूर्ण ज्वरातिसार करनेवाला है। अगर ज्वरातिसारको साथ खासी, श्वास और 7 उपद्रव भी हों, तो वह भी इसीसे नाश हो जाते हैं। -अगर सासोहीका जोर ज्यादा हो, तो इसीमें जयासी मिला नी चाहिये और दस्तोंका जोर ज्यादा हो, तो नागरमोया नकालकर धनिया: मला देना चाहिये। अफरा (पेट फूलना) ग पानीमै घोलकर नामो ढूढी) के आस-पास लेप कर दो। घा नमक, मोंठ, इलायची, मुनी होंग और भारगीके चूर्णको में मिलाकर चटा दे और उपरसे गर्म पानी पिलावे तो बालक- 7 अफरा और पेटके यात शूल आदि आराम हो जाते हैं।

९०
सफरकी कुजी
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दूध डालना
५-पीपल, पीपलामूल, चन्य, चित्रा और सोंठको चूर्णकर शहद
भौर धीमे मिलाकर चटानेसे वो का दूध डालना बन्द हो जाता
२---ऊपर लिखी बालचतुर्सी शहदमे मिलाकर चटानेसे भी
फायदा होता है।
मूत्र रुक जानेपर
.
पीपर, काली मिर्च, छोटी इलायची, सेंधा नमक, इनका चूर्ण
शहतमे मिलाकर घटानेसे घालकोंका रुका हुआ मूत्र सुल जाना है।
नाभीकी सूजनपर
पीली मिट्टीके गोलेको पहिले आगमे तपाकर लाल कर ले, फिर
दूध भिजाकर कपड़े में लपेटफर नाभीपर से क करो।
नाभी पक जानेपर
वकरीकी मेगनीकी रास पको हुई नाभीपर लगानेसे आराम
होता है।
मुंह पकनेपर (छाले मुंहमें पड़ जानेपर )
• पीपलको छाल और पत्तेको चूर्ण करके शहद मिलाकर चोंक
मुहमें लेप कर दे, इससे पका हुआ मुह तथा छारे सब दूर हो

बाल रोग चिकित्सा A बहुत रोनेपर पीपर और त्रिफलाके पूर्णफो घी और गारमें मिलाफर घटानेसे पालकका रोना यन्द हो जाता है। तालु पक जानेपर जवाखारको शहदमें मिलाकर सार में लगाने और मालिम करनेसे गम होता है। दंत रोग शाइतमें मिलाकर दातोकी जडोंमे एगानेसे दारा सुख- माते हैं। भूना हुआ चौकिया सुरागा शहदमें मिला- लगाना और साचा जस्ताके तार एक साथ कपडेमें पमें बाघ दे। + करना चाहिये। रहतमें मिलाकर ६ होता है। फिया आय पीसकर रोगन

सफरकी कुजी
दूध डालना
१-पोपल, पीपलामूल, चन्य, चित्र और सोंठको चूर्णकर शहद
और घीमें मिलाकर चटानेसे बफा दूध डालना धन्द हो जाता
है।
२-ऊपर लिखी बालचतुर्सी शहद में मिलाकर चटानेसे भी
फायदा होता है।
मूत्र रुक जानेपर
पीपर, काली मिर्च, छोटी इलायची, सेंधा नमक, इनका चूर्ण
शहतमे मिलाकर घटानेसे बालकोंका रुका हुआ मूत्र खुल जाता है ।
नाभीकी सूजनपर
पीली मिट्टोके गोलेको पहिले आगमे तपाकर लाल कर ले, फिर
दूध भिजाकर कपड़े में लपेटकर नाभीपर मे क करो।
नाभी पक जानेपर
वकरीकी मेगनीकी रास पकी हुई नाभीपर लगानेसे आराम
होता है।
मुंह पकनेपर (छाले मुंहमें पड़ जानेपर )
। पीपलको छाल और पत्तेको चूर्ण करके शहद मिलाकर बच्चोंक
मुंहमें लेप कर दे, इससे पका हुआ मुह तथा छाले सब दूर हो
जाते हैं।

बालरोग चिकित्सा - बहुत रोनेपर पीपर मोर त्रिफला चूर्णको घी और शहद में मिलाकर चटानेसे लकका रोना बन्द हो जाता है । तालु पक जानेपर अवासारको शहद मिलाकर तालुमें लगाने और मालिम करनेसे बाराम होता है। दंत रोग चूनेफो शहतमें मिलाकर दातोंकी जडोंमे लगानेसे दात सुख- क निकल आते हैं। भूना हुआ चौकिया सुहागा शहदमें मिला- मसूडोंपर लगाना और तामा जस्ताने तार एक साथ कपमें पकर बच्चेफे गलेमें बाघ दे। पसली रोगपर -प्याजके अमे अलुआ पीसकर पसलीपर लेप करना चाहिये। -चावल भर असली कस्तूरी ६ माशे बढिया शहतमें मिलाकर चेको चटावे । -पसलीके रोगमें दस्त करा देनेसे भी जल्दी आराम होता है। -पालक पैदा होनेके समय जब उसका नाल छेदन किया जाय उसी समय चावलभर कस्तूरी थोड़ेसे कोयलेमे महीन पीसकर बालकके कटे हुए नालपर लगा दे तो फिर यह रोग न होगा।

सफरकी कुश्वी,
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पेशावमें चिनग
बबुलके गोंदको ४-५ डलो कपडे में बाधकर पानी में भिगो दे गि
उस पानामे मिश्री मिलाकर दिनमें चार-पाच बार पिलाये ।
मकड़ी फरना
नीबूके रसमें चूना पीसकर लगाये या अमचूर पीसकर लगावे
आंख दुखना
-
१-कडुआ तेल बालकके सिरमें लगावे और कानमें डाले । रसोतक
पानी आखोंमें डाले। वकरीके दूधका फाया षाधे। रसौत और
फिटकिरी घराबर-बराबर और उमसे आधी अफीम पानी में पीस
फर गुनगुना करक आखोंके ऊपर नीचे पलकोंपर लेप करे।
कांच निकलना
बालकके हो मूत्रसे उमको शौच करावे या कडुवा तेल लगाकर
उपरसे जला हुआ सोडा पीसकर लगावे ।
तृपा निवारक योग
नेत्रवाला और साडको शहतमें मिलाकर चटानेसे बच्चेकी प्यास
दूर हो जाती है।
चुना
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रोग बाय
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पतले कोड़े निकलते हैं। गुदामें फहुआ तेल लगाकर उपरसे
रोलोएगादे।
-कदा तेल लगाकर पिलमकी जली हुई तमासूफा गुल लगा दे।
नोट-विशेषकर इस रोगमें यच्चे नाफ भी खुजलाते हैं।
सूखारोगपर
छ माशेसे १ तोलेनक गदहीका दूध सुबह-शाम यच्चेको पिलाने-
रोर पुष्ट होता है। इस रोगको दवा करनेसे पूर्व बच्चेको
का जुलार देनी चाहिये। फिर सेंधा नमक, त्रिकुटा, लवा-
ज, दाठा, कदम्य, वरायम्-वरावर लेफर कूट-पीस छानकर शहदमें
कर बालकको माराम होनेतक निरा सरेर चटारे।
वच्चोक लिये जुलाव
रेवत चीनी, हरड, सौंफ, तुरजचीन, इनमेंसे कोई भी वस्तु
अलमें पिसकर देनेसे पालकमा कोठा साफ हो जाता है।
डा-सा अडीका तेल भी पिलानेसे कोठा साफ होता है।
५

शारीरिक योग द्वारा इलाज अांखकी गुहेरीपर १-जब किसी छोटे-बड़े स्त्री-पुरुष तथा बच्चे की आखमें गुहेर हो जाय तो सुबह-शाम हथेलीपर अंगुली घिसकर कुछ गर्म- । मी होनेपर गुहेरीपर लगावे । इस तरह तीन बार सुबह-शा दोनों वक्त दो-तीन दिन लगानेसे गुहेरी अच्छी हो जायगी 1; प्यास लगनेचर (१२) यात्राके दरम्यान ऐसा अवसर आ जाय कि पानी बहुत दूर- तक नहीं मिल सके और प्यास जोरसे लग रही हो, ऐसे समयमें बिना पानीके प्यास बुझानेका प्राकृतिक उपाय यह कि जीभको तालुमे कुछ देरतक लगा रखना चाहिये ऐसा फरनेसे कुछ समयके लिये प्यास आसानीसे बुझ सकती है और पानी न मिलनेकी तकलीफसे बच सकते हैं और जी नहीं घबदायगा जैसा बहुधा पानी न मिलनेसे होता है। चोट लगनेपर, (१) यदि हाथ-पावमें अकस्मात् चोट लग जावे, तो उस स्थानपर पेसाब करनेसे बहुत फायदा होता है। और पता नहीं है, या है navran शारिरीक योग द्वारा इलाज ९५ ऐसा उपाय न किया जा सके, तो चोट लगे हुए अगको पानीमे डुबोकर फपडा वाध देना चाहिये। यदि सून न निफला होवे तो मुहम रसनेसे भी आराम होता है। ज्वर तथा सिरदर्द इत्यादिपर (२)जन फिसीको कोई भी रोग (ज्यर, हफ्नी, दर्द इत्यादि) फ्यो न हुआ हो, उस समय जो स्वास चलता है, उससे विपरीत स्वास चलाना चाहिये अर्थात् यदि दाहिना स्वास वल्ता हो तो पाया और यदि धाया चलता हो, तो दाहिना स्वास चलाना चाहिये । इसका उपाय यह है कि यदि दाहिना स्वास चलते ममय ज्वर आता हो, तो दाहिनी नाकको बन्दकर दाहिनी कर- वट मो जानेसे याया स्वास चलने लगेगा। इस प्रकार करनेसे हो दर्द इत्यादि रोग उसी समय कम हो जायगे और ज्वर इत्यादि जो १० दिन भुगतनेवाला हो वह २ दिनमें ही छूट जायगा, परन्तु इस समय मुससे स्वास नहीं लेनी चाहिये। दाद छाजन रोगपर ५-यदि किसीके दाद या छाजन हो गया हो, तो प्रात काल सोतेसे उठकर विना मुह धोये अपने मुहका लव लगानेसे मी गाराम हो भाता है।

विषनाशक उपाय
सांप विष
१-जिस ममय मर्प फाटे तुरन्त मरीजको आध मेर, तीन पार धी
पिला दो, तो के होकर विपका असर निकल जायगा।
२--एक उटाक पीनेमें तमाकृ घोलकर पिलावे ।
३-साठोकी जड छ माशे फाली मिर्च ११ दाने दोनोंको पानीमें
ग्मू घोलकर पिला दे। यदि एक पारमे आराम न हो तो आध
घटे पीछे फिर पिला दे। चार-पाच धार पिलानेसे मूर्दा भी जी
उठेगा।
बिच्छू-विष
१-चूना और , खटाई देश स्थानपर रसे दर्द मिट जायगा।
२-विच्छ काटनेको जगह छ मागे नौसादर रखे और ऊपरसे मोटा
कपडा लपेटकर ठंडे पानीको धार पाच मिनटतक ढालना रहे
विष उतर जायगा।
३-जमालगोटा पानीमें घिसकर लगा दे। ४-शहद ओर धी
भरावर-गवर मिलाकर लगा दे।

घपा इलाज
पापानी र पारेर
H
1
-नोगादर मोर ना मिल गई।
गोपनीमा
कुत्ता काटने का इलाज
1-मिरमा २-TI पर कराये
मौर पर सो मात दिनाक मेल कर रोने
भाग दो मोपी को लेकर घगपर-परापर तीन
टुमदे पर matam मा मात्र मारु परप ) -
कलीमा 5-7 पी गिगा।
सीगियाका विप
- पिना जाना है।
अफीमका चिप
दोगको पानीम पौलस्त पिला द|२-प्याजका रस सुपारे ।
३-भोमिया मुरागा पीमें पीमर पिलाप। ४-अपीमप नशे-
बालेनो सोन देकर टहलाता है।
संखियाका विप
१--गवर पोंका रम अथा गलरका दुध पिलारे ।
-पच्या पोरका पिगढ । ३ .पूर शिराफर धी दूध
.

सफरकी कुक्षी ह धतूरेका विष १- अनभयका ग्म पिलाये। २-यंगनके फर, फोया ज- पानी में घोलकर पिला । 3-गोगे अथवा उमको मिर्ग पानी में घोल्कर पिला दे। ४-कपामके फर, पूल, पने, माको पानी में घोलकर पिला दे। भंगका विष ईमलीका पत्ता पिला दे या अरदरकी दाल यालकर म पानी पिला दे। दही पानीमे मिलाकर पीनेसे भी भगा विष जाता है। मेढकका विष यूहरके दूधमे मम्मो पीसकर लेप करनेसे मटकका विष 1 होता है। मकड़ीके जहरपर हल्दी, दारू हल्दी, मजीठ, पतग और नागपार उडे पानी पीमकर रेप करनेसे मकडोका जहर उतर जाता है। 11 यात्रा-रोगी-भित्र वैसे तो हमने यात्रियोंको मुविधाफे लिये पिडले पृष्टामें कुछ जसरी रोगोंकी दवायें लिख दो हैं, जिनको व्यवहारमें सफर म्बय लाम प्राप्त करके विशेष पैमा सर्च करनेसे भी यच जाय । जो मन्जन परदेशमें कोई गेग उठ सडा होनेपर हमारी अपर लिखी गई दवा- प्योको तत्काल यनानेमें आगम्य समझें या असमर्थ हों, तो उनको निम्न-लिसित बनी हई दवाइयोको हमेशा अपने साथ रखनी चाहिय इनसे भी विशेष सुविधा रहेगी (१)पं०ठाकुरदत्त शर्मा बैश लाहोरको यनी हई "अमृतधाग” ममन्न रोगोंको दवा (२) डा० एम० के० वर्मन कलकत्ताका यना हआ "अर्थ कपूर' हेजकी दवा 1 (३) के० सी० डोगर गिग्गार सम्बईका पालामृत' बोंक गेगोको दवा। (४) प्रस्ताजन डिपो गिरगार बम्बईका "अमताजन" सिर दडकी दवा। (५) कार्णिक गिरगाव बम्बईका कार्णिक एग्युमिकञ्चर बुसारकी टवा । (६) बाबू हरीदास वैद्य कर कत्ताका "अकवरी पूर्ण' तथा रवण- भास्कर पूर्ण। (७) प क्षेत्रपालामा मथुगका बना हुआ "सुधासि धु" सर गे'

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अपनी बतिी और प्रत्यक्ष देखी
ยาว
(१) एक समय हम गंगाजो स्नान करने के लिये सोरो (एटा) गये थे।
सोरो स्टेशनसे बैलगाडोमें सवार होकर गंगाघाटको जा रहे
थे और अन्य बहुतसे यानो थैलगाडो, इमा, मोटरद्वारा गगाघाट
जा रहे थे । रास्ते में एक मोटर जिसमें ऊपर नोचे बेशुमार
सवारी लदो हुई थी सडकको दूसरी पटरीपर पेडको छायामें
भो-भों करती चली जा रही थी कि एकलने पेड़को लटकी हुई
शाखासे लपेटा खाकर मोटरकी छतपर ठे हुये यात्रियोमेसे
एफ नौजवान लड़का झटसे मोटरकी छतपरसे नीचे गिर गया
और सिर फटने के कारण उसके प्राण उसी वक्त निकल गये।
तर उसकी माता जो उसके साथ थी चीख मार-मारकर शेती
हुई गंगाजीको धाय देने लगी कि मै भली गंगा नहाने आई जो
अपने एक लडकेको भी गंगाकी भेट दे चली। इस आखों
देखी दुर्घटनासे हमारा हृदय एक दम दु खसे विहल हो उठा
। “मो रसे इसी प्रकार अनेकों दुर्घटनायें देखने और सुननेमें आती
हैं इस लिये न्यात्रियोको मोटरकी छतपर भूलकर भी न बैठना
चाहिये।
(२) अभी थो दिनकी बात है कि एक व्यापारी सजन डद हमार
रुपयेके नोट लेकर किसी दिशावरको जा रहे थे । राम्तेमें गगा-

अपनी योती और प्रत्यक्ष देखो
।
स्नान करनेके लिये कानपुर उतर पड़े, वहापर गंगाके किनारे
ठनेवाले घटवारियोफे पास उन्होंने अपने कपड़े वगैर उतारकर
रख दिये और आप गगामें स्नान करने के लिये आगे बढ़ गये।
मगर अपने कपडोंफी तरफ निगाह करते ही रहे। गोता लगाती
समय आपकी निगाह कपडोंकी तरफ देखनेसे चूक गई कि
इतने में ही आपके नोट जिस पडेकी जेबमे रखे थे वह कपडा
गायन हो गया, जब आप स्नान करके आये, तो देसनेपर अपने
नोट नदारत पाये। यद्यपि आपने पाटचालेसे कह दिया था
कि हमारे कपडोंकी निगाह रखना तथापि घाटयाले यह कहकर
"अपनी स्कम म्पया पैसा अपने पास रसना" परी हो जाते हैं,
चाहे फिर वही हडप कर जाय, मगर फिर उनसे कौन करनेवाला
है कि तुमने रकम चुगई ? अब बेचारे लालाजीके होश
फाका हो गये और बडे परेशान हुए। इसलिये गगास्नान
फरते समय यात्रियोंको किसीका विश्वास न कर अपनी रकम
जोरिसमको स्त्रय हिफाजत रखनी चाहिये।
३-एक समय में देवली छावनीसे नसोगाद मोटरद्वारा आ रहा
था। रास्तेमें जन कि मुकाम १२ मील रह गया था एकायक
मोटरका पहिया खगब हो गया । जब ड्राइदरको दुरुस्त करनेको
कहा गया, तो मालूम हुआ कि मके पास दूसरा पहिया तय्यार
नहीं था और न उनके पास व्यय टायर ही था। रातके १०
बज गये थे, अधेरी रात यो और जगलका गस्ता था) वापर
पानी भी नहीं मिल सकता था। बड़ी आफतमे फंस गये। अब

मफरकी कुम्भी क्या करना चाहिये? फिर ड्राटवासे कह कि हमको तुम्हे मुकामपर पहुचाना चाहिये । यह तुम्हारा काम हे, तुमने हमसे किराया लेकर इस बातका कण्ट्राक (टेका) किया है फिर मोटरके टायरमे नीम- की पत्ती तथा घास भरवाकर जैसे-तैसे मुकामपर पहुंचे । वहापर पहुचते ही हमने पुल्मिमें ड्राइवरकी रिपोर्ट कर दो कि इसके पाम मफरका काफी मामान नहीं था, जिसके कारण हमको गस्तमें बहुत तकलीफ हुई। पुलिमने ड्राइवरका चालान किया और उसके ऊपर जुर्माना हुआ। इमलिये मोटरमें मवार होनेसे पहिरे यह दख लेना चाहिये कि उसके पास मफर ते करनेक लिये ट्य व, टायर तथा पेट्रोर आदि काफी सामान है या नहीं। ४-एक बार मैं अजमेग्मे खंडवा आ रहा था गस्तेमे जमान स्टेशन पड़ता है, जहापर गाडी आधा घंटेसे अधिक खडी रहती है । गाडी । स्टेशनपर आनेपर मैंने भोजन इत्यादि किया और एक रेल पोर्टर- से पूछा कि गाडी अभी कितनी देर खडी रहेगी। उसने जवाब दिया-अभी बाधा घटा और गडी होगी। इतनेमे मेरे साथ जो आदमी था, उसने कहा कि मुसाफिरसानेमे जाकर कुछ फल लाओ, मैं मुमाफिरखानेमे चला गया। वहापर गाडीका फ्रोस होता है। इसलिये हमागे गाडो प्लेटफार्म छोडकर खड़ी हुई थी, जो । मुसाफिरखानेसे नहीं दिखाई पडती यो और दूर थी, ज्योंही मैं मुसाफिरखानेमें पहुंचा, गाठी छूट गई, मुझसे टिकट फ्लस्टरने कहा तुम कहा जाओगे ? तुम्हारी गाडी तो टूट गयी। उस समय में बहुत दुखित हुआ । मेरे शरीरपर १ फतूरी (कवजा कोपरी)

अपनी योती और ग्राम देवी
तथा मलमलका दार्गक गुती और एक भगोडा था। अत्रमे पाच
मात यो पैसे थे मोर सरमामान तथा टिकट वगैरह सब
कोटकी देवी था, जो गाडीमें रह गया था। थोरी देरतक मैं
नव्यविमूहरी भाति मोचौ पर्न गया, फिर मैंने सोचा ओर
न्टेशनमास्टर पास जाकर मम हाल कक्षा तो उसने फौरन
नससे डिपका नम्बर तथा मेर माधोका नाम पूछकर अगो
स्टेशनको टेलीफोन द्वारा कहा। मरा मानी गाडीमें था और
मामान मय जजीरसे गाडीको पटरीय सम्मेस याधर
ताला लगा रखा था। उसकी चायो मेर पास ही थी। इस कारण
मरा साथी मामान उतार नहीं सकता था, तो मैंने सिर्फ अपनी
दिष्ट अगर स्टेशामास्टरको देनेको कहा, मो उसन दे दी।
फिर मै रानकी दूनरी गाडीसे गया और अगले स्टशनमास्टरसे
टिकट लेकर पटवा पहुंचा।
उस समय मुझे मेरी नादानीपर
बहुत खेद हुआ और रिना कपडे-सामानक बहुत तकलीफ उठानी
पड़ी। उसी समय मैंने यह निश्चय किया कि गाडी ठहरनेका
टाइम (समय) एना हो तो गाड या स्टेशनमास्टरहीसे पूछना
चाहिये। दूसरे किसी आदमीसे नहीं पूछना चाहिये , क्योंकि
टूमर लोग अदाजिया पोल दते हैं, जिनम यह तकलीफ उठानी
पड़ी। दूमग निश्चय किया कि म्पया-पैमा और टिकट हमेशा
पहने हुए उम फपर की जेवमे ग्यना चाहिये, जो हमेशा अपने
शरीरपर रहता होये, जैसे फतूरी,नयान,वाम्कट (जाकेट) कमीज
मा कुता वगैरह । क्योंकि पासमे पैसा रहनेसे तकलीफ कम माल्म

१०४
सफरको कुलो
~--
।
होती है, दूसरे अगर मेरा साथी सगमे न हुआ होता और किसा
मापनेवालेने कोटकी जेवमेंसे रुपया पैमा निकाल लिया होता,
तो यह दुदरी चोट बैठती और उसी समय मेर मनमें यह भी
विचार उत्पन्न हुआ था कि अपने विचार पुस्तकके रूपमें रखू,
जिससे सर्व साधारणको लाम हो सके, क्योंकि ऐसे मौके
यात्रियोंको अक्सर आते रहते हैं और कर्तव्यविमूढ़ होकर चुप
बैठ जाते हैं और तकलीफ उठाते है । इमलिये ऐसे समय परडाना
नहीं चाहिये और धैर्यके साथ बुद्विसे काम लेना चाहिये ।
(५) एक समय मैं दौड (पूना) से खेडवा जा रहा था। शामको ७
वजे गाडी रवाना होती है। मेरे साथमे एक मित्र थे । दोनों
अने दात-चीत करते जा रहे थे। रातको फरीन ११ बजेका
समय हुमा और यकायक आग्ब लग गयो। दूसरे स्टेशनपर
आस सुलते ही सामानकी तरफ ध्यान किया जैमाकि नियमा-
नुसार करना चाहिये, तो अपने जूते नदारत पाये। मैने गौरसे
डिब्बेमें देखा कि इसमेसे फोन सवारी उतरी है। सिर्फ एक
सवारी उतरो मालूम हुई, जो मनमाड जानेवाली थी, मगर वह
वीचहीमें क्यो उतर गई ! मैंने अपने निश्चित नियमानुसार पता
लगा लिया था कि इसमें कौन-कौन मुसाफिर कहा-कहा जाने-
वाले हैं,तो मैंने सोचा कि वही मुसाफिर मेरा नूता ले गया होगा
ओर दूसरे किसी डिब्बेमें बैठ गया होगा। आगे दो-तीन स्टेशन
छोडका पुराना स्टेशन आगा, जहा गाडी ज्यादा देर सडी
होती है। वहा उस आदमोका पता लगायेंगे ऐमा सोचकर चुप
।
-

बैठ गये। अपनी वोतो और प्रत्यक्ष देखी १०५ पुतम्या स्टेशन आनेपर मैंने अपने मित्रको गाडी तलाश करनेके लिये एक तरफ भेजा और मैं दूसरी तरफ गया, तो मेरे मित्रने तलाश करते करते उसी आदमीको इंजिनके पासक डिब्बेमे बैठा पाया जिसने जूते पाक्मे पहन लिये थे और वह जूते उसके पावमे ठीक वैट थ। मेरे मित्रने गाईसे कहकर उम आदमीको उतरवा लिया और पूछा कि जूते क्यों चुराये । इतनेमें में भी पहुच गया और मैने अपने जूतोंकी शिनाख्त की,तो गार्ट और स्टेशन मास्टरने मुझे मेरे ज ते वापिस दिलवा दिये। (६) एक समय मै हायरससे बाल-बय समेत र डया पारसल ट्रेनसे आ रहा था, भुपाल स्टेशनपर पहुचते ही गाडीकी बत्ती घराबर नहीं जल्ने लगी। मैंने ट्रेन इक्जामिनरको पत्तो ठीक करवानेको कहा, तो उसने सुनी अनसुनी कर दी, फिर मैं असिस्टैंट स्टेशन मास्टरके पास गया, जो ड्यूटीपर था और उसकी शिकायत की। वह फौरन उठकर आया और ट्रेन इक्जामिनर (गाडी दुरुस्त करनेवालो) को बत्ती ठीक करनेकी ताकीद की, तब उसने पत्तो सुधारना शुरू किया, लेकिन जबतक गाडी चलनेको तैयार हुई बत्ती ठीक नहीं की गयी। हालाकि गाडी उस जगह एक घटेसे ज्यादा खडी हुई थो, आखिर गाडी चल दी। जन गाडी चल्ने लगी तभी मैंने जजीर ( एलार्म चेन) खोंच दी। गाडी खडी हो गई और गार्ड स्टशन मास्टर वगैरह मेरे डिब्बेके पास आये और मुझसे नजीर सींचनेका मात्र पूरा ! मैंने फौरन घयान कर पिया कि इस डिब्बेमे बत्ती नहीं जली है अधेरेमें -

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अपनी पोती आर प्रत्यक्ष देखी
१०७
M
ऐसी अनेका घटना मेरी यात्रा-जोवनमे हुई है, किन्तु में
स्व महापर लिपनेमे पुस्तक बढ़ जाने का भय और लिखनेका
पिर भी नहीं है। ऊपर लिसी हुइ बातोका तात्पर्य यह है कि
यानाने अनेक प्रकारको आफने आया करती है, किन्तु उन
सबसे बपनेरे लिय थोडी सागनी और बुद्धिमे काम ऐन को
जलग्न है।
.

सतोपदेश
(१) सृष्टिकर्ताको सदैव निम्ट देखो, उसकी सहायक प्रतिपर
विश्वास रखो।
(२) धर्मका आडम्बर न रखो।
(३) स्युशामदसे दूर रहो, स्पष्ट सत्य बोलो व सत्य-संकल्प
फरो।
।
(४) धैयवान व जितेन्द्रिय बनो और अपने देश व जातिक अर्थ
उचित त्याग करो
(५) जातिगत ऊच-नीचफा भाव दिलमें न लामो, अर्थात
माणीमानसे प्रेम करो।
(६) निर्व्यसनी, निरोग पुरुष सिंह बनकर अपना व अपने
आत्मीयोंका संरक्षण आप ही करने योग्य बनो।
(७) धन होनेपर अपने दुःसी भाइयोंको कभी मत भूलो।
(८) अपने शौकके लिये किसी जीवको केश न दो।
(९) परमात्माके द्वारपर फिसीको न रोको ।
(१०) स्वयं धर्मान्धतामें फंसकर दूसरोंके सच्चे धार्मिक भावोंको
न कुचलो।
(११) पगवलम्बी जीवन सबसे निकृष्ट जानो।
(१२) सर्वदा आत्ममंशोधन करते रहो।

सतोपदेश
१०९
(१३) तुम्हारी सद्भावना द्वारा तुम्हारे शरीरका ही नहीं, परन्
सारे संसारका परिवर्तन हो सकता है।
(१४) धूर्त मनुष्योंकी धूर्तातायें दूसरोंकी अपेक्षा उनके ही
मस्तिष्कको हानि पहुंचाती हैं।
(१५) सदैव सुखी जीवन व्यतीत करो।
या तो स्वय संसारके लिये
उपयोगी बन जामो या ससारको अपने लिये उपयोमी
बना लो।
(१३)धनो बननेकी लालसा पाप-पुण्य नहीं देखती ।
(१७) अपनी आवश्यकताओंके लिये दूसरों के अधीन होना पाप है।
(१८) दु खमे मृत्युको कल्पना नडी मीठी लगती है ।
(१९) कष्ट पड़नेपर मनुष्य अधिक विवेकी बन जाता है।
२०) पल निर्गलोंके रक्षणके लिये है, भक्षण के लिये नहीं ?
२१) बुद्धिमान होनेके लिये इससे सरल उपाय और क्या हो सकता है
कि जो तुम ओगेको बतलाते हो, उसे स्वय करो।
(५०) अपने कर्तव्यको स्वाधीनतापूर्वक करना और उस फलको
ईश्वरपर छोड देना ही दुखोंको उत्तम औषधि है।
(२३) पापी पापोंसे नहीं, वरन् पापोको पोल खुलनेसे डरता है।
(२४)विलास धनीके लिये रोग और निर्धनके लिये मृत्यु है।
(२५) मिल्लीको अपने साथ सुलाकर उसके पजोको शिकायत करना
उचित नहीं।
(२६) मूलका इट्य मु हमे और बुद्धिमाका मुह हृदयमें होता है।

११०
मफर की कुखी
-AA
+
(२७) कल्पनाको प्रोढताका हो दूसग नाम कविता है।
(२८) गम्भीर चित्ताका दूसरा नाम तन्मयता है ।
(२९) मातृ-मंदिरके पुनागके लिये माकी सनी गोद ही की है।
(३०) म्वतन्त्रता अपने अधिकागेको एक प्रतिज्ञा है।
ओ३म् शाति शाति प्राति

सूचना
पुस्तक छपते-छपन यह मालूम हुआ है कि दिसन्यर सर
२९६० से सरकारने यह घोषित पिया है कि पी (एलको छोटकर)
ल्यमे तीसर दर्नेक मुमाफिर यात्रा करने ममय अपने साथ १५
मेरके अनाय २५ से और ड्योढे दनक २० मत पजाय ३० मेर
तथा दुसर के ३० सो प्रजाय ४. मेर योझा मनो।
पुस्तक मिलनका पता
गोपालप्रसाद गोपिदप्रसाद अग्रवाल
दौड मिलरा ग

शाद समातम्

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Safar Ki Kunji

Author
Ganga Prasad Agrawal
Title
Safar Ki Kunji
File name
Safar Ki Kunji
Text
OCR done
Citation
1960
Published
2011/02
Publisher
Gopal Prasad Agrawal Puna
Language
Sanskrit
Pages
132
Library
Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Classification
Literature
DLI number
548682
Barcode
4990010028726.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
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