Bhartiya Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikaner
Uchatar Mudra Aur Banking
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उच्चतर मुद्रा तथा बैंकिंग
(माध्यमिक शिक्षा बोड़ राजस्थान की ग्यारहवी कक्षा के लिये)
लेखक
डॉ० हरिश्च द्र शर्मा
एम ए, एम कॉम , पीएच, डी,
कॉलिज ग्राफ कामस
राजस्थान विश्वविद्यालय जयपुर
तथा
गोपाललाल भार्गव
एम कॉम, बी एड
प्रधानाध्यापक,
पोद्दार उ० म० बहुउद्देशीय विद्यालय,
रोगस
प्रकाशक
कल्याणमल एण्ड सन्स
त्रिपोलिया भाजार जयपुर
1965
मूल्य रु0 175 मान
प्रकाशक
प्रकाशन-विभाग
कल्याणमल एण्ड सस
त्रिपोलिया चाजार, जयपुर
मुद्रक
श्री अजमेरा प्रिंटिग वक्स, जयपुर
दो शब्द अाधुनिक वाणिज्य मे बैकिंग का महत्त्व दिन प्रतिदिन बढता जा रहा है। सम्भवत इसी दृष्टि से उच्चतर माध्यमित कक्षानो के वाणिज्य के विद्याथियो के पाठ्यरम में वैकिंग के अध्ययन की भी व्यवस्था की गयी है। प्रस्तुत पुस्तक वाणिज्य की ग्यारहवी पक्षानो के विद्यार्थियो के लिए लिखी गयो है ! इसमे न केवल उनके पाध्यामानुसार सभी समस्याग्री का विवेचन दिया गया है बल्कि इस बात का भी विशेष ध्यान रखा गया है कि इसे पढकर विद्यार्थी देश के वैकिंग विकास की कठिनाइयो तथा सरकार एव अन्य मम्यायो द्वारा किये गये प्रयत्नो का उचित मूल्याक्न कर सके। पुस्तक मे प्रारम्भ मे अत सरल एव प्रचलित भाषा का प्रयोग किया गया है। प्राय प्रत्येक समस्या अथवा महत्वपूण तथ्यो को । उदाहरण देकर स्पष्ट करने की चेष्टा की गई है। सभी अध्यायो के पोछे अभ्यास के प्रश्न दे दिये गये हैं ताकि विद्याथियो को उचित मार्गदर्शन मिल सके। प्रस्तुत पुस्तक विद्यार्थियो में वैकिंग का मान एव सचिवद्धन की प्टि से लिखी गई है । यदि इससे उनको यथेष्ट लाभ हो सफा तो लेपर अपना परिश्रम सफल समभंगे। अध्यापर वधुनो से मवि- नय निवेदन है कि वह पुस्तक की यविश्चित् त्रुटियो की ओर सवेत करने की कृपा करें जिसके लिये हम अग्रिम आभार प्रदर्शन करते हैं। - -लेगा द्वय
अनुक्रमणिका
1
13
31
1 भारतीय मुद्रा बाजार
( Indian Money Market)
2 साहूकार एव देशी बैंकर
(Money Lenders & Indigenous Bankers)
3 सहकारी साख-पादोलन
(Co-operative credit Movement)
4 स्टेट वक प्रॉफ इण्डिया
(State Bank of India)
5 रिजव बक ऑफ इण्डिया
( Reserve Bank of India)
5 भारतीय चलन का इतिहास
(Ilistory of Indian Currency
48
68
90
अध्याय भारतीय मुद्रा बाजार 4 (Indian Money Market) पामार का प्रय एक सामान्य नागरिक बाजार शब्द ये भली प्रकार परिचित होता है । यदि उससे बाजार के बारे में पूछा जाए तो उसका साया रण उत्तर यही होगा कि बाजार विसी स्थान का नाम है जहाँ बहुत सी दुकानें होती हैं जिन पर दनि आवश्यक्ता की वस्तुएं मिलती है । अत बाजार से तात्पय वह स्थान है जहाँ वस्तुओं का क्रय विक्रय होता है। अपशास्त्र की भाषा में बाजार शब्द का अय कुछ विस्तृत रूप में लिया जाता है । इस रूप में बाजार कोई निश्चित म्यान नहीं बल्कि एक क्षेत्र होता है जिसमे विभिन्न वस्तुआ के खरीदन और वैचने वाले रहते हैं तथा उनमे आपसी स्पर्दा होती है । इस सद्धा के पलम्वरुप एक ही प्रकार की वस्तुओं के मूल्य विमिष्ट स्थानों पर समान हाने की मभावना रहती है । इस प्रकार एक मम्पूण या व्यवस्थित पाजार मे पाय ममान वस्तुमा का मर जगह समान मूल्य होता है। यहां केवल इस बात का विशेष महत्व है रि बाजार का सम्बध यानुआ ये परीदने वेचने से होता है। मुद्रा बाजार से पपा तात्पप है ? बाजार का सम्बध वस्तुओं के गरीदने बैचन से है तो क्या मुद्रा बागार म मुद्रा गरीदी और वैची जाती है ? यह एक अनोखा प्ररा है परन्तु इसका उत्तर यही है कि मुदा राजार म मुद्रा पाय विश्य होता है । मुद्रा का क्रय विश्य वस्तुओं के प्रय विक्रय से कुछ मिन होता है क्योंदि वस्तुगो की भौति मुद्रा का सीधा उपभोग (मा, पी या पहन पर नहीं दिया जाना । वह योडे समय के वास्ते ली जाती है और काय 2 निक्लने पर लौटा दी जाती है । इस प्रकार मुद्रा बाजार में मुद्रा उघार ली और दी जाती है । इस दृष्टि से मुद्रा बाजार ऐसे क्षेत्र को कहते हैं जहा मुद्रा उधार लेने तथा उधार देने का व्यवसाय होता है और उधार लने जोर देन बाला में सामाय स्पर्धा रहती है। उधार देने वालो को याज मिलता है जिसे मुद्रा की वीमत (Price of Money) कहत हैं । मुद्रा बाजार म उधार देन कालो म प्राय साहूकार, यापारिप वक, सहकारी बक, बीमा कम्पनियों तथा अय सस्थाएं होती हैं और उधार लेने वालो मे सामा य नागरिव यापारी उद्योगपति तथा अन्य यापारिक एव राजवीय सगटन रहते हैं। मुद्रा याजार और पूजो बाजार मे भेद मुद्रा बाजार और पूजी बाजार दोनाम ही मुद्रा उधार लेन अथवा देन के सोते होत हैं परन्तु प्रचलित परम्परा के अनुसार मुद्रा बाजार वह है जिसमे केवल अल्पकालीन उधार का लेन देन होता है । इसके विपरीत पूजी बाजार मे दीघकालीन ऋण दिये जाते हैं अथवा पूजी विनियोग होता है। कभी कभी उधार दन वाला एक वप का अर्थात् अल्पकालीन ऋण दता है परतु प्रतिवप उसी अवधि में वृद्धि कर दी जाती है । ऐसे ऋण दीपकालीन बन जाते हैं । अत अनक बार दीघकालीन अथवा अल्पकालीन ऋणो म भेद करना कठिन होता है । इसलिए मुटा बाजार और पूजी बाजार में भेद करना भी कठिन हो जाता हैं । इसीलिए प्रनित अथ में पूजी बाजार को भी मुग बाजार का एक अङ्ग ही मान लिया जाता है। भारतीय मुद्रा बाजार के प्रग भारतीय मुद्रा बाजार को दो भागा में विभाजित करने की प्रथा रही है। यूरोपियन माग मारतीय भाग 1 रिजव वक आफ इडिया साहूकार 2 स्टेट बक आफ इडिया 2 दशी बकर 3 विटेगी विनिमय वक 3 भारतीय व्यापारिक धन इन दोनो भागाम तथाकथित यूरोपियन भाग को सरकारी मह्योग तया प्रोत्साहन मिलता रहा है जब कि भारतीय भाग अपने नाप विकसित हुआ है। सरकार ने उसकी यवस्था अथवा विकास के लिए विशेष प्रयल नहीं किये । 1 और महाजा 3 यह वर्गीकरण उचित नहीं है यतमान में समय भारतीय मुद्रा बाजार को यूरोपियन तथा भारलीय वर्गों म बांटना उचित नहीं है क्योकि स्वाधीनता के परमार रिजव बैंक तया स्टट ३ राष्ट्रीय क्याम्प म काम कर रहे हैं और उनके कमचारी भी भारतीय हैं। इसके अतिरिक्त भारत में विदेशी बैंका को जितनी शाखा हैं वे मी व विग वमनी अधिनियम द्वारा 1949 से रिजव वर के नियंत्रण में आगई है । इसलिय भारत के किंग संगठन में अद यूरो पियन भाग अथवा प्रग सा अलग सगठन नहीं है। मगठित तथा प्रसगठित मुट्टा धामार उपरोकर क्यन को ध्यान में रसपर भारतीय मुद्रा बाजार के विभिन्न अङ्गा का अय आधार पर चाटना उचित प्रतात होता है जिनम एव सगटिन भाग है तथा दूसरा असगस्ति । भारतीय मुद्रा बाजार के विभिन्न अङ्गनिम्नलिखित है पnिa... दिन सगति माग 1 रिजव बैंक माफ इहियापार 2 स्टेट वर याफ इपिया 3 भारतीय व्यापारिक बैंक 4 विदेशी विनिमय दर 5 महकारी तथा भूमि पर यक 6 माहूकार अपया महाजन 7 नेगी वैकर असगठितभाग मगठित भाग में सम्मिनित सम्याए प्राय शिसो कानून द्वारा निर्मापन हैं और उसे अपने वापित साते एर निश्चित अवधि तर तयार कर उनसे जाँच करवानी परती है और उहें प्रकाशित करना पड़ता है। इसके अतिरिक्त इनके पाय भी पारम्परिक विचार विमा तया निश्चित परम्पराओं के अनुसार होते हैं । मावार महाजन तक देती बार रिजवानिपत्रा मे मुक्त हैं सपा निराकार अपनी इयर अनुमार होता है। इन पारस्परिक नन तथा आधुनिक प्रकार के प्राध का अभाव है। अत यह भाग असगठित भाग महलाता है। ऋण दाता और ऋण लेने याला भारतीय मुद्रा बाजार मे कार बतलाए गए सातो अङ्ग उधार देन का काम करते हैं। इनमे रिजव वा के अतिरिक्त शेष सभी वर्ग उधार अथवा जमा प्राप्त भी करते हैं। उधार लेने वाले वर्गों में मुख्यत जनता कृपर, व्यापारी उद्योगपति तथा राज्य और केन्द्रीय सरवार है जो आवश्यकतानुसार ऊपर दिये गय वर्गों में ऋण प्रात वरते हैं । भारतीय मुद्रा बाजार के दोष भारतीय मुद्रा बाजार म निम्नलिखित दोष हैं 1 सह्योग की कमी भारत में मुद्रा बाजार के जितने अङ्ग है उनमे पारस्परिक संगठन अथवा सहयोग का सवथा अभाव हैं । व्यापारिप बको का एक संगठन है वि तु उसके कवल 38 वक सदस्य हैं (भारत मे कुल बको की संख्या लगभग 200 है) अत उनकी तमा करने, ऋण देने तथा अ य काय? सम्बन्धी नीतिया में बहुत अतर रहता है । सभी सस्थाए एक दूसरी से प्रति योगिता करती हैं । महाजन और साहूकार, सहकारी वक तथा व्यापारिक बन आपस मे सहयोग से काम करने के स्थान पर स्पर्धा करते हैं। इस प्रतियोगिता के फलस्वरूप कभी-कभी अनुचित नीनिया अपना ली जाती है जिससे बको वे बद होने का भय रहता है। 2 साहूकारों से सम्बघ किसी देश के मुद्रा बाजार को शक्ति शाली तथा कायशीत बनाने के लिये यह आवश्यक है कि दश की साख तथा मुद्रा व्यवस्था पर केंद्रीय ब का पूरा नियत्रण हो तथा मुद्रा बाजार के सभी प्रग सहायता के लिये मुद्रा बाजार पर निभर हा। भारत में यह स्थिति नहीं है क्योकि साहूकार तथा महाजन रिजव व क के नियंत्रण मे नही है । यह लोग भारत के किसानों तथा छोटे कारीगरों को उधार सम्बधी लगभग 70 प्रतिगत आवश्यक्तानो की पूर्ति करते हैं । अत इनवे रिजव व नियंत्रण में न होने दे कारण उसकी साख नीति म सफलता नहीं मित सकती। 3 बकों का यून विकास भारत में वकिंग सुविधाओं का विकास अभी केवल नगरा तथा वस्वो तब सीमित है। देश मे वयो को केवल 5800 साए हैं इनम से अधिकांश शाखाएं सत्ता सम्बई, दिल्ली, मद्राम तथा अन्य बडे नगरा मे है । अत ग्रामीण क्षेत्रा में पूजी निर्माण अथवा जनता की वचतो को प्रोत्साहित करने वाला कोई तत्व नहीं है। अमेरिका जम देश मे जहाँ की जनसंख्या भारत की जनमख्या का सामग 40 प्रतिशत है वका के लगभग 20000 कायालय हैं। इगरडम भी (जो क्षेत्रफल में राजस्थान से छोटा है) बका की लगभग 14000 शाखाएं हैं। 4का की शाखाए' कैरन के कारण उन देशो मे बको में खाता बोलने की प्रथा का विकास हो गया है तथा वका की जमा तथा व्यवसाय बहुत बढ़ गया है जिससे मुद्रा बाजार में लेन-देन म प्रगति हुई है। भारत म बका का विकाम कम होने से मुद्रा बाजार म शिथिलता रहती है। 4 व्याज दरा में मिनता मुद्रा बाजार के विभिा अङ्गा में परस्पर समवय न होने के कारण देश के विभिन्न भागो म ब्याज की दरें सवथा भिन्न रहती हैं। यहां तक कि स्टेट बक तथा अय बड बैंका की ब्याज दरों में भी प्राय अन्तर मिलता है। इसके अतिरिक्त मले बाने के समय ब्याज की दगे म प्राय बहुत वृद्धि हो जाती है और पसन याजार मे थाने पर दरें यहुन गिर जाती हैं । उदाहरणत जनवरी परवरी में जवकि मुद्रा बाजार म पूजी की अत्यधिक मांग रहती है याचना राशि (Call money) पर ब्याज की दर 8 प्रतिशत या उमस भी अधिक हो जाती है जबकि जुलाई, अगस्त में बह गिर पर 2 प्रतिशत या उससे भी कम हो जाती है। म्याजदरा म अत्यधिर उतार चढाव से व्यापारिया तथा सरखार को रहुन पठिनाई का सामना करना पडता है क्योकि उसे समय पर आवश्यक पूजी उपार नहीं मिलती और मिलनी है तो बहुत महगी दरो पर । 5 साधनों की कमी सेवा दे"यून विरास तथा असगटन पे कारण भुदा भावार में मांग के अनुसार धन मिलता प्राय पठिन रहता है । इस यूनता के धारणा म जनता को बम आमदनी तथा महगाई भी उत्तरदायी है जिनके मार लोग हा थोडी खम वा वर वनों में जमा करने म गमय होते है।
b 6 लोच एव स्थायित्व की कमी भारतीय मुद्रा बाजार में कार्य शील सस्थाएं (वक सहकारी वक तथा साहूकार आदि) प्राय रूग्विादी हैं वे समय तथा आवश्यक्ता के अनुसार अपनी नीति में परिवतन नहीं करती अत देशम चक द्वारा भुगतान करन की पद्धति अथवा वकाम नियमिन व्यवहार रखने की क्रियाओ का योचित प्रचार नहीं हुआ है। फ्लत भारतीय मुद्रा बाजार अविकसित एव जड रह गया है। 7 मौसमी भावश्यक्तामा की पूर्ति न होना भारत मे नवम्बर स अन न मास तक का समय व्यस्त काल माना जाता है क्याकि इस बीच बहुत सी महत्त्वपूर्ण फैसला (चावल गन्ना ई) को खरीदन के लिय व्यापारिया और उद्योगपतिया को बहुत रकम की आवश्यकता पड़ती है। फ्लत इस काल म पूजी की माग बहुत बढ जाती है । अनेक बार इस माग को पूरा करने मयको को कटिनाइ का सामना करना पडता है । गत वर्षों म रिजव वक ने इस पटि नाईको दूर बरने म सक्रिय कदम उठाये हैं । 8 बिल बाजार का भाव विदेगा मवक प्राय अपनी पूजी का एव महत्त्वपूर्ण भाग व्यापारिक बिलो म लगाते हैं क्योकि व्यापारिक विलोम पूजी लगाना कई दृष्टिकोणा स लाभदायक है (क) यापारिक विन प्राय तीन महीन के लिय लिख जात है अत बको की रकम लम्बी अवधि के लिय बद नहीं होती। (ख) यापारिक विल क्सिी व्यापारिक लन देन से सम्बंधित होते हैं अत निश्चित तिथि पर उनका भुगतान होने म सदेह नहीं रहता क्योकि बिल स्वीकार करन वाला व्यक्ति भुगतान तिथि आने तक माल बेच कर रकम चुकान की स्थिति म हो जाता है। (ग) व्यापारिक बिला की कद्रीय बक से पुनकटौती कराई जा सकती है। यदि वन एव तीन मास के बिल म रकम लगा दे और उसे एक मास पश्चात् ही धन की मावश्यकता पड जाय तो वक केद्रीय व से उस बिल की जमानत पर रखम ले सकता है या उसकी पुनक्टोती करवा सकता है। (घ) व्यापारिक विलो म सम लगान स देश के व्यापार को प्रोत्साहन मिलता है। भारत म वा व्यापारिक विलों म बहुत रकम नहीं लगाते क्याचि देश म एक मु यवस्थित विल बाजार का विकास नही हो पाया है। उदाहरणत 19 माच 1965 को भारत म कायशील बैकों द्वारा विभिन्न प्रकार के ऋणा म नगभग 2042 करोड रुपये की पूजी लगाई हुई थी जिसम से वेवल 337 करोड रपये अथित् लगभग 17 प्रतिशत रागि व्यापारिक दिलों के बरादन अथवा कटौती करन में लगाई हुई थी। भारत म विल बाजार विकसित न होने के निम्नलिखित कारण (1) सरकारी प्रतिभूतियों मे विनियोग भारत के वक मरवारी प्रति भूतिया म बहुत राशि विनियोग करते है । उनकी पूजी का प्राय 40 प्रतिशत भाग सरकारी प्रतिभूतियों म विनियोजित रहता है । सरकारी प्रति- भूतियां भी ऐमा विनियोजन है जिहें सरलतापूर्वक किमी भी समय बचा जा माता है अथवा रिजर्व ब स उनकी धरोहर पर रखम उधार ली जा सकती है । अन भारत के वनों के पास व्यापारिक विला म विनियोजन करने के लिय ययप्ट पू जो नहीं होती। (2) दिल ही रिस्म भारत म व्यापारिव विला के अतिरिक्त बहुत 7 दिल अनुयह विल (Accommodation Bills) हान हैं जिनका क्मिी व्यापारिक मौदे स मम्बध नहीं होता । वका के लिय येवल व्यापारिख मिला म विनियाग करना ही उचित होता है क्योंकि अनुग्रह विलो वो रकम वे यया समय भुगतान की सम्भावना कम होती है । अत विलों म पूजी इमतिय भी बम लगाई जाती हैं कि यह मात करना कठिन है कि अमुर दिन व्यापारिक है अथवा यनुप्रहित चित है। (3) स्योहत गृहों की कमी इङ्गल ह तया अमेरिका म एमी विशेष सस्या है जो विला की स्वीति का काम करती हैं, वह सम्याएं स्वीकृति (Acceptance Houses) वहलाती हैं । इन सस्या कोडा यात पा पूरा पान रहता है कि अगर दिल व्यापारिक ह अयवा अनुग्रह चिन है । यत इनये दागमोरार दिय गय विसरायो सरोग्न या बटौती करने मयमा पोरिमो 8 प्रकार का संदेह नही रहतां । भारत में स्वीकृति गृह विलुल नहीं है अत बैर बिल सरीदनै म मराच का अनुभव करते हैं। (4) षटौती गृहा का ममाव पाचाय देश में पिला को स्वीकार वरन वाली गस्थाओं के अतिरिक्त प्रेमी सस्थाएँ भा है जो यिलो की नियमित पटोती का पाम करती हैं। य सस्थाएं भी बिन व्यवसाय म विशप पान रखती हैं अत इह धन को प्रावश्यक्ता हान पर वैव इन विला को रख कर महप रपम ६ दते हैं। भारत म इग प्रवार को मस्थाएं नहीं हैं। इसके अति रिक्त भारत का रिजव बर भी विला का पटोनी करने म विशेष उतार नहीं है। (5) दिलों को विविधता भारत म लिखे गय विल प्राय एक प्रयार के नहीं होते । अत एक क्षेत्र के यका द्वारा दूसरे क्षेत्र के बिल खरीदन या उनकी कटौती परने म पठिनाई होती है। (6) बिलो को भाषा भारत म अन्तर्देशीय विन प्राय अपने-अपने क्षेत्र की भाषा में लिखे जाते हैं अत उनके विस्तृत क्षेत्र में लन-दन म अनेक बाधाएं रहती हैं । विदेशी बिन तो सर अग्रेजी भाषा म लिखे जाते है । अत उनमे धन विनियोग पर लिया जाता है कि तु विदगी बिल को आसामियों के सम्बध म सूचना या गार टी सम्बधी कठिनाई भाती है। (7) मकद ऋण भारत में प्राय नकद ऋण देने की प्रथा है क्योंकि दा म च तथा अन्य साख परी का प्रचार अधिक नहीं है। इमरे साथ ही नकद सावरा यह लाभ है कि वह किसी भी मात्रा में प्राप्त की जा सकती है तथा आवश्यकता न हान पर रद्द की जा सकती है जिसस बक तया ग्राहक दोनो को लाभ है। फ्लत विलो का प्रचार बहुत नहीं बढ़ सका है। (8) भारी मुद्राप भारत में सावधि विलो पर काफी टिकट (Stamp) लगाने पड़ते हैं अत लोग बिल लिखना पसद ही करते । गत वों में इस दर म कभी तो हुई है परन्तु फिर भी वह काफी ऊ ची है। (9) लाइसेंस प्राप्त गोदामों को कमी विदेशो म जर व्यापारी एक दूसरे को माल वेचत हैं तो वह उसे लाइसेंस प्राप्त गोगम म रख देते हैं और क्ति के साथ उस गालाम की रमीद लगा देते हैं । इसमें वक का यह विश्वास हो जाता है कि अमुक बिल वास्तव मे क्सिी व्यापारिक सौदे के कारण लिखा गया है और वह उन नि सकोष खरीद लेते हैं । भारत में इस प्रकार के गोदामा का अभाव है मत विला का प्रचार भी विशेप नहीं बढ़ा है। मुद्रा बाजार मे सुधार के सुझाव भारतीय मुद्रा बाजार के दोषा को दूर करने के लिए निम्नलिखित उपाय किये जाने चाहिए (1) शक्तिशाली व सगठन भारत में बका का एक सप है परन्तु उसके केवल बडे बडे बद सदस्य हैं और उसमे उहा बका का प्रभुत्व है । मत वैकों द्वारा जो निणय दिये जाते हैं उह सब धक स्वीकार नहीं करत । बैंका म पारस्परिक सहयोग तथा उनकी नीतिया म समानता लाने की दृष्टि से सब बा को भारतीय बर संघ (Indian Banks Association) का मदस्य बनान की चेष्टा करनी चाहिए। (2) विशेष गुहा की स्थापना भारतीय मुद्रा बाजार को शक्तिशाली बनान के लिए स्वीकृति गृहा तथा कटौती गृहा को स्थापना करनी चाहिए तादि बिला का प्रचार अधिक हो सके। (3) पकिग विकास दाम धका का ग्रामीण क्षेत्रा म विकास विमा जाना चाहिए ताकि जनता का धन वधान एवं विनिमाग वरन की सुविधा मिल सर्व । इसमे मुद्रा बाजार म धन की कमी दूर हो मरती है। (4) रिजव यफ को नोति मुद्रा बाजार म कापणीस सस्थामा का रिजव बर द्वारा उचित रुप म नियमन करना चाहिए तथा व्यस्तकाल म पथष्ट माना म सासन की व्यवस्था करनी चाहिए ताकि व्यापार और उद्योग को आवश्यर वित्त प्राप्त परन म कठिनाई नहीं हो। (5) देशो यकों पर नियत्रण भारतीय मुद्रा बाजार का उचित विरास सब तब रहीं मकना जब तर पि साहवारा तया देशी बररा रिजव थर व नियंत्रण म नहीं लाया जाएगा अत साहारा तया देशी देररा की प्रिया का नियमन करना आवाया है। (6) समागोपन गृहों का विशस समारोपन गृह एसा सस्थाएं हैं जिन माध्यम म वामगर पर प्राप्त समाका गोपा अर्थात भुगतान 10 होता है । भारत मे युल 76 रामगोपन गृह हैं जो देश के विस्तार को देखते हुए कम हैं । प्रत्या व्यापारिक नगर म जहाँ वो की पाच शाखाएं हैं एक समाशोधन गृह को स्थापना करनी चाहिए । इमर अतिरिक्त चा वे समा शोधन की पद्धति म भी ऐस परिवान दिये जाने चाहिए कि जिससे उनका समाशोधन सरलता एव शीघ्रतापूर्वक हो सके । उपरोक्त पाय वरने गे भारतीय मुद्रा बाजार अधिष मायगील एव उपयोगी हो सबगा। विस याजार ये विषास उपाय जसा वि उपर लिया जा नुवा है भारत म एव व्यवस्थित ति बागर का विकाम नहीं हो पाया है। इसके लिए निम्न उपाय परना उचित होगा। (1) बिला में एवरूपता लाई जानी चाहिए। (2) व्यापारियो को आर्थिक स्थिति की पुष्टि करने के लिए स्वीकृति गृहा की स्थापना करनी चाहिए। (3) लाइसेंस प्राप्त गोतामो का विकास दिया जाना चाहिए। (4) विला के भुनाने अथवा कटौती करने वाली सस्थाओ की स्थापना की जानी चाहिए। (5) दगी वको को हुडिया का प्रोत्साह्न दिया जाना चाहिए पर हुडिया का रूप वानून द्वारा निश्चित करना जावश्यक है। (6) मुद्राक पर म रमी की जानी चाहिए। (7) अधिक समाशोधन गृहा को स्थापना की जानी चाहिए। (8) रिजव ब की बितो की पुनवटीती सम्बधी नीति उदार होनी चाहिए। रिजव बक की बिल बाजार योजना भारत के के द्रीय व (जिसका नाम रिजव बर है) ने उपरोक्त सब बातों पर विचार कर जनवरी 1952 म एक विल बाजार योजना लागू की जिसकी विशपनाएँ तिम्नलिखित थी 11 (1) रिजव बैंक ऐम अनुसूचित बकों को विला की जमानत पर ऋण गा जिनकी जमा रकम 10 क्रोड रुपये या अधिक है। यह विल भारत म लिय हुए होने चाहिए। (2) विल व्यापारिक होने चाहिए तथा उन पर दो अच्छे व्यक्तिया या सस्थाको के हस्ताक्षर होने चाहिए। इनम म एक सस्था कोई अनुसूचित चक होनी चाहिए। (3) ऐसे बिला पर दिए गए ऋणो पर वर दर से आधा प्रतिगत कम व्याज लिया जायगा। (4) बिला पर लगन वाल मुद्राव वर का आपा रिजव बक दगा। (5) प्रत्येक बिल कम से कम एक लाख रुपय का होना चाहिए । (6) इम योजना के अन्तगत किमी तक वो 25 लाख में कम उधार नहीं दिया जा सकता था । घोटे वका के लिये समोधन प्रस्तुत योजना का लाभ केवल बडे-बडे बक ही उठा सकते थे क्योकि भारत में उस समय एसे चराको सय्या 15 से अधिक नहीं थी जिनके निक्षेप 10 करोड रपय मे अधिर हो। अत 5 जून 1953 से इस योजना का लाभ एमे दवा को भी दने का निश्चय किया गया जिनको जमा रकम 5 वरोड रपय हो और 1954 म यह याजना सर लाइसेंस प्राप्त अनुसूचित चको के लिए लागू कर दी गई। 1957 से एस बिल को यूनतम राति भी एक लाख रूपय में घगर 50000 रपय तया एक ऋण भी गति 25 लाख रुपय स पाकर 5 साम्ब रुपय कर दी गई। पसत घाट बदाको योजना से लाम उठान का अच्छा अवसर मिल गया। पाय मुविधाए सन् 1962 मे विल याजार याजना को विदगी बिला पर भी लागू कर दिया गया है जिसमे भारत के विलगी व्यापार का वापी प्रोताहन मिल मकेगा। रिजव वरको विल बाजार योजना के द्वारा देश म बिलों का प्रचार बड़ा है परनु 1956 ये व वारा आधा प्रतिशत ब्यान यम लन की लूट समाप्त पर दी गई और वित्ता पर सगन वामा टिसर (Stamp) का प्राधा व्यय व 12 देने की मुविधा का भी अत कर दिया गया। इन दोना सुविधाओ के हटाने सविल बाजार योजना को कुछ धक्सा पहुचा है । मत रिजव बर द्वारा इन सुविधाओ को फिर स लागू करने पर पुनर्विचार करना चाहिए । उपसहार भारतीय मुद्रा बाजार का महत्त्व दिन प्रतिदिन बढ़ रहा है क्यावि योजना अन्तगत व्यापार तथा उद्योग की वित्तीय आवश्यकताएँ बढ़ रही हैं । अत रिजव बर तथा भारतीय वन सघ द्वारा मुद्रा बाजार की कठिनाइयाँ तथा दोष दूर पर उसे अधिक व्यवस्थित एव लोचदार बनाना चाहिए जिसस कि देश की आर्थिक प्रगति प्रबाधित गति से होती रहे । अभ्यास के प्रश्न मुद्रा बाजार से क्या तात्पय है ? मुद्रा और पूजी बाजार म क्या अतर है? 2 भारतीय मुद्रा बाजार के अगा का उचित वर्गीकरण कीजिए तथा कारण दीजिए। 3 भारतीय मुद्रा बाजार में असगठित भाग में कौन-कौन सी सस्थाएँ हैं ? इह असगठित क्यो कहते हैं ? 4 भारतीय मुद्रा बाजार के सगठित भाग म कोन कोन सी सस्याए हैं ? 5 निम्नलिखित म अतर लिखिए मुटा बाजार, बिल बाजार अनाज मण्डी। 6 भारतीय मुद्रा बाजार के क्या दोप है ? सक्षेप में लिखिए। 7 भारत मे बिल बाजार में अविकसित होने के क्या कारण है 8 भारतीय मुद्रा बाजार के विकास के लिये उचित सुझाव प्रस्तुत कीजिए। 9 भारतीय मुद्रा बाजार के विकास के लिए निम्नलिखित ग्रहो की आवश्यक्ता है। गृह गृह [उत्तर (क) स्वीकृति (ख) कटौती (ग) समाशोधन .
अध्याय 2 साहूकार एव देशी बैंकर (Money lenders and Indigenous Bankers) भारत की अधिकाश जनता गांवा मे रहती है और इसका मुख्य व्यवसाय कृपि है । पि की दशा अत्यन्त गिरी हुई है । ग्रामीण जना की आय बहुत कम है। कृषि सुधारों के लिए धन जुटाना उनके लिए बहुत कठिन समस्या है। हम देखते हैं कि जिस समय भारतीय किसान की फ्मल पर कर तयार होती है उस समय तो उसके पास धन होता है परन्तु उसके पश्चात् प्राय वह निधन सा ही रहता है। उसे अपनी फ्मल की वित्री के पूर्व तया पश्चात् ऋण लेना ही पडता है । बीज हल-बल इत्यादि तथा वृपि-हेतु यत्र खरीदने के लिए, भूमि में सुधार करने के लिए, लगान जमा करने के लिए, मडी तर पसल लजाने के लिए, साने पीने के लिए, शादी विवाह एव अय सामाजिक उत्सव मनाने के लिए तया अय बहुत से कार्यों के लिए किसान को समय-समय पर धन की आवश्यकता होती है । साधारणत' साहूकार एव देशी वकर गांवा म विमानो को तथा छोटे छोटे कारीगरों को ऋण देने का काय करते हैं इहें अधिक ब्याज मी दर पर ऋण दत है। हमारे देश में सहवारी साम समितियों की मस्या बहुत कम है और उनके पास पूजी भी पर्याप्त मात्रा में नहीं है। फ्लस्वरूप किसानो को भारी ब्याज पर भी साहूवारों एव देशी बकरों मे ऋण लेना पहता है। साहूकार (Money Lender) माहूवार भारतवर्ष में प्राचीनकाल से चले आते हैं और भिन्न भिन्न स्थाता पर भिन्न भिन्न नामो से प्रसिद्ध है। यगाल मइहें महाजन वहा जाता है उत्तर प्रदेश में साहूकार पजार म खत्री वम्बई म शर्राफ मारवाडी तथा सैठ गद्रास म चेट्टी आदि । बनिया तथा नानावती भी साहूकार के अप नाम है । प्राय यह लोग ऋण देने के काय के साथ-साप खेती का वाय तथा व्यापार परते हैं । ये लोग ग्रामीणजना को अल्पकाल के लिए विपत उपभोग के लिए ऋण दते हैं और जमा पर घन नहीं पते । आधुनिक युग म सभी प्रकार परिवतन हा जान पर भी दा आर्थिक जीवन म इनवरा बहुत अधिर महत्त्व है। साहूकारों के काय (Functions of Money Lenders) साहूकार प्राय व्यापार करते हैं तथा सेती करते हैं और अपने व्यापार के साथ साथ ग्रामीण जनो को ऋण देते हैं । य ग्रामीणो को थोड़े समय के लिए जय कि रक्म योडी होती है व्यक्तिगत जमानत पर ही ऋण देते हैं । जब ऋण की राशि बडी होती है तब येत मकान, जेवर वधक रखकर अथवा वाण्ड लिखापर ऋण दते हैं। किसानो का उनकी फसल को वित्री कराने मे तथा मडियो तक पहुचान म सहायता करते हैं। इसके अतिरिक्त अनेक साहू कार सट्टे बाजार मे रूई, चानी व सोने का सट्टा भी करते है। ये एक स्थान से दूसरे स्थान की मुद्रा भेजने का मी काय करते हैं। इाका प्रामीण अय व्यवस्था में एक महत्त्वपूर्ण स्थान है । आज भी ये ग्रामीण जीवन के एक अनि वाय तया उपयोगी अग बने हुए हैं। इनकी काय प्रणाली बहुत सरल है। अनपढ़ विसान आसानी से इनसे ऋण प्राप्त कर सकता है। यह “यक्तिगत जमानत पर ही अपवाल अथवा दीघकाल के लिए उत्पादक तथा अनुत्पादक मभी कायों के लिए ऋण देते हैं और किसानों के लिए अनिवार्य बने हुए हैं । ग्रामीण जनता के लिए साहूकारा का इतना महत्त्वपूर्ण स्थान होते हुए भी उनकी काय प्रणाली मे अनेक दोष हैं। ये लोग उत्पादक तथा अनुत्पादक कार्यों के लिए ऋण लेने वाले किसान की आवश्यक्ताआ वो बिना 15 । जाच पडताल क्यि ही ऋण दे देत हैं । खाली कागज पर ही ऋण लने वाले के अगूठे की निशानी बरवा लेते हैं और वास्तविक धन से अधिक राशि लिख देते हैं । ऋणी पर दवाव डाल कर अनेक काय मुफ्न करा लेते हैं, उनकी फसल ऋण के भुगतान में सस्ते भाव पर खरीद लेते हैं तथा ऋण वसूत्री म बहुत सख्ती से काम लेते हैं। 4 लोग बहुत ही क चीर मे ब्याज लगाते हैं और खाता खोलते समय भी भेंट के रूप में स्पये काट लेत हैं । विभिन्न जांच समितियो के अनुसार ये लोग 12 प्रतिशत से 371% तक ब्याज की दर से ऋण देते हैं। देशी बैंकर ( Indigenous Bankers) भारतीय मुद्रा वाजार में साहकार तथा महाजना के साथ साथ दशी वारो का भी महत्त्वपूर्ण स्थान है। देशी बकरा की ठीक ठीक परिभाषा करना कठिन है क्याकि इनको माहूकार व महाजना से पृथक करना कठिन होता है । देगी वकर वह व्यक्ति या निजी पम है जो जनता से जमा पर धन प्राप्त कर हुण्डिया का व्यवसाय करने तथा ऋण देने के काय मे लगा हो । इनके काय तथा काय प्रणाली भिन्न भिन्न प्रातो म भिन्न भिन्न प्रकार की है और ये उत्पादन तथा उपभोग दोनो के लिए ऋण देते हैं । केन्द्रीय व विग जाच समिति के अनुसार देशी बकर, इम्पोरियल वक आफ इण्टिया, विदेशी विनिमय व व्यापारिप बर तया सरकारी वको का छोड कर वे सभी लोग होते हैं जो हुण्डिया का व्यवसाय करते हैं तथा जनता म धन का ऐन-देन वरत हों ।' - डा० एल सी जैन के अनुसार दगी वकर कोई भी व्यक्ति या व्यक्तिगत पम है जो ऋण देने ये माथ-नाय जमा पर धन स्वीकार करत हो या हुण्डिया या व्यवसाय करते हो अथवा दोना वाय परत हो' सोग म देशी पर उही सोगा को पहत हैं जो हुण्डी का व्यवसाय करते हो राण जमा रयत हो तथा ऋण देन हो साधारणत ये लोग वरिंग तया व्यापार दोनों ही काम करते हैं । उनी विग तया यय प्रसार के पवमाप म सकी हुई पूजी में मोई भेद नहीं होता । ये लोग भिन्न भिन नाम ने पुवारे बाजे 16 साहूकार तया देगी यारों में भेद (Difference between Moncylenders and Indigenous Bankers) साहूकार तथा देगी यपरों में कई महत्त्वपूण भेद हैं । मुस्य मुख्य भेद इस प्रकार हैं। देशी वर साहार (Moneylanders) (Indigenous Bankers) (1) यह पेवल ऋण देते हैं धन जमा नहीं करते। (2) यह हुण्डियो का व्यवसाय नहीं करते। (3) यह ऋण देने के साथ-साथ अययापार भी करते हैं जो उनका प्रमुख काय होता है। (1) यह ऋण देने के साथ-साथ प्राय जमा पर धन प्राप्त करते हैं । (2) यह विशेष रूप से हुपियों वा व्यवसाय करते हैं। (3) यह मुख्यत बकिंग व्यवसाय करते हैं और इस काय का इनके लिए विशेष महत्त्व होता है अय व्यापार वा नही। (4) यह ऋण देते समय इस वात की अधिन पूछताछ करते हैं कि ऋण किस काम के लिए लिया जा (4) यह ऋण देते समय ऋण लेने के उद्देश्य का ज्ञान आवश्यक नही समझते अत पूछना बहुत कम करते हैं। (5) यह अपने निजी धन म से ही ऋण देते हैं। (5) यह अपने निजी धन में मे तथा जमा द्वारा प्राप्त पूजी में मे ऋण देते है। (6) यह कृषि के लिए तथा उपभोग के लिय भी ऋण देने हैं। (6) यह मुख्यत व्यापार व उद्योग की अथ-सहायता के लिए ऋण देते हैं।
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(7) इनकी ब्याज की दर देशी (7) इनके द्वारा साहूकार की
वर की तुलना म अधिक होती है। तुलना मे ब्याज की दर कम ली
जाती है।
(8) यह वर की अपेक्षा विना
(8) यह साहूकार की अपेक्षा
बधर के अधिक सीमा तक ऋण दे| बिना बाधक के अधिक सीमा तक ऋण
दते हैं।
नहीं देते।
यह ध्यान रहे वि देशी वकरो तथा साहूकाराम उपरोक्त भेद होते हुए
भी कभी-कभी इन दोना मे भिनता करना कठिन हो जाता है क्योकि भेद की
सीमा बहुत ही सकीण है।
देशी बैंकरो तथा आधुनिक बैंको मे भेद
(Difference between Indigenous Bankers and
Modern Banks)
देगी बरगें तथा आधुनिक वैको म भी अनेक महत्त्वपूण भेद हैं जिनमे
से कुछ मुख्य मुख्य दम प्रकार हैं
देसी बदर
आधुनिक वक
(Indigenous Bankers) (Modern Banks)
(1) यह माधारणतया अपनी, (1) साधारणत य मिश्रित पूजी
अपने परिवार यो तथा अपन रिश्तेदारो | वाली पम्पनी ( Joint stock
मी पूजी म म्यवमाय करते हैं। Companies)वे रूप म होते हैं और
मगो को बचकर धन प्राप्त करते हैं।
(2) दनी शासाएँ नहीं होती। (2) इनकी गासाएं दूर दूर तक
फैली हुई होती है।
18 (3) यह अपनी पायगील पूजी (3) इनका पूण व्यापार मा या एक बहुत छोटा सा भाग ही जमा पूजी पे अतिरिक्त मुख्यन जमा धन थेरप मे प्राप्त करते हैं और प्रा (Deposits) पर निभर रहता है। पूजी रप मे तो कुछ भी धन एप वित नहीं परते। (4) यह वर व्यवसाय के साय (4) इनका काय बकिंग व्यवमाय अपना निजी व्यापार भी करते रहते ही है। अय कोई व्यवसाय नहीं हैं । बभी पभी ये स्टाक एक्सचेन्ज | करते। इनको सट्टै सम्पधी क्रियाओ बाजारों मे सट्टे का भी वाय परत है। पर पूर्ण नियंत्रण रखा जाता है। (5) ये प्राय छोटे-छोटे कृषक (5) ये प्राय बडे बडे व्यवसायियो धारीगरो एव समीपवर्ती व्यक्तियों को | को ऋण देते हैं । निकट अपवादूर या ही ऋण देते हैं। कोई विचार नहीं करते। (6) ये अपने धन का अधिकांश (6) ये पर्याप्त जमानतो के भाग बिना किसी जमानत आदि के माधार पर ही ऋण दते हैं । इनकी ही दे देते हैं । इनके पाय मे जोसम | जोखम कम होती है। बहुत होती है। (7) इनकी ब्याज की दर अधिक (7) इनकी ब्याज दर देशी होती है । बरो की अपेक्षा कम होती हैं। (8) ये अल्पकालीन तथा दीप (8) मुख्यत यह अपवानीन कालीन दोनो प्रकार के ऋण देते हैं। ऋण ही देते हैं और इस सरह यल्प कालीन तया दीर्घकालीन ऋण मे भेट करते हैं। (9) ये चल तथा अचल दोना (9) यह बिना किमी जमानत के प्रकार की सम्पत्ति की प्राड पर ऋण ऋण नहीं देते और प्राय यह जमानत देते हैं और भी अभी किसी व्यक्ति की भी अचल सम्पत्ति के रूप मे नही होती जमानत पर ऋण दे देते हैं। है। ये ऐसी प्रतिभूति (Security) 19 दे देत हैं। के आधार पर ऋण देते हैं जिसे यह किसी भी समय सरलता से बाजार में बेच सकते हैं। (10) यह अचल सम्पत्ति गिरवी (10) यह प्राय अल्पकालीन रस कर लम्बी अवधि के लिए ऋण | ही ऋण देते हैं और अचल सम्पत्ति को जमानत साधारणत स्वीकार ही नहीं करते हैं। (11) इनकी काय-प्रणाली (11) ये पहले भारतीय कपनी नियन्त्रित करने के लिए कोई विधान | विधान अब भारतीय वैकिम कम्पनी नहीं है और वाय प्रणाली बहुत | विधान, 1949 के अतगत काय सरल है। करते हैं। (12) निमी विधान द्वारा निय (12) इनको अपना हिसाव वधा प्रण न होने के कारण य अपने लेसेनिक रूप से रखना पडता है तथा तथा हिमार उचित रीति से नहीं | विरोप योग्यता प्राप्त निरीक्षकों द्वारा रखने । उसकी जांच करा कर अपना पूरा वार्षिक चिट्ठा (Annual Balance Sheet) जनसाधारण की मूचना हेतु प्रकाशित करना पड़ता है। (13) ये विदेशी व्यापार को (13) ये देश के आयात निर्यान आपिक सहायता प्रदान नहीं परते। सम्बपी आवश्यकताओ के लिए भी यव सुलभ वराते हैं। (14) इनमे प्राय नरद पन में (14) वर से घन चर दारा ही लेन देन होता है इनके द्वारा निवाला जाता है। इस प्रकार ये घराया चलन नहीं होता है । अत मास पत्रा में पलन को प्रो साहित मास पत्रों में प्रयोग मोविशप प्रोमा घरखे सास की उत्पत्ति करते है। हन नहीं मिलता।
20 (15) इनका अपने ग्राहको के (15) इनका अपने ग्राहो से साथ वयक्तिर एव घनिष्ट सम्बघ वयक्तिक तथा घनिष्ट सम्बध का होता है। अभाव रहता है। (16) इनका रिजव बर से (16) बक पूणत रिजव वर सम्बध लगभग नहीं के वरापर ने नियत्रण म कार्य करते हैं । होता है। देशी बैफरो के कार्य ( Functions of Indigenous Bankers) देशी करो के वाय हम दो भागा म बाट सकते हैं अर्थात वकिंग व्यवसाय से सम्बंधित काय तया अय प्रकार के वाय । बकिंग कार्यों में मुख्य मुख्य काय इस प्रकार है (1) जनता से जमा पर धन प्राप्त करना (Deposits)—यह लोग जनता से धन ( Deposits ) प्राप्त करते हैं और उस पर याज देत हैं । साधारणतया इनकी ब्याज की दर आधुनिक बवो की दर से ऊँची रहती है । (6% से 12% तक ) यह बव अय लोगो से अधिक मात्रा म जमा राशि स्वीकार नहीं करते हैं क्योकि जमा कराने वाला द्वारा एकाएक धन राशि वापस निकालने पर इनको माथिव सक्ट म पड जाना पडता है । अत यह अपने मित्रा तथा सम्र्या धया से ही धन राशि जमा करते है। बम्बई के देशी वकरा के अतिरिक्त अय वर चक द्वारा रुपया निकालने की सुविधा नहीं दते हैं । (2) ऋणों का देना - ( Lending of Money ) यह देशी बकरों तथा साहूकारा का सबस महत्त्वपूण काय है । य मुख्यत व्यापार उद्योग व कृषि कार्यों के लिए ऋण देते हैं। कभी कभी उपभोग कार्यो के लिए भी ऋण दे देते है। यह व्यक्तिगत जमानत पर ऋण दते हैं पर रकम वान पर तया दीयकालीन भण के लिए यह अच्छे प्रकार की जमानत ही स्वीकार करते हैं। ऋण देते समय यह क्सिी किसी प्रकार का वोड लिपवा लेत हैं । व्यापा रिक कार्यों के लिए ऋण या तो हुण्न्यिो को खरीद कर अथवा इनकी कटौती करके देते हैं। अच्छी प्रतिभूतियो पर व्याज की दर 6% से लेकर 12% तक होती है । अपयाप्त प्रतिभूतिया अथवा रिता पर चुनाय जाने वाले ऋणो 21 पर ब्याज की दर कभी कभी 18% म 44% तर होती है। इनकी ब्याज की दर हमशा भिन्न होती है और यह ऋण लेन वाले व्यक्ति की साख पर तथा जमानत पर निमर रहती है। ये भूमि, जेपर पसल आदि की जमानत पर ऋण देते हैं । ऋण, मात तथा वस्तुओ के रूप म भी दिया जाता है जिन्तु वमूली माल वेप में ही करते हैं । कारीगरोमो यह बच्चा माल देते हैं रोक्डी ऋण देत है और उनमें तैयार किया हुआ माल वापस ले लेत हैं। इस प्रकार देगी वयस कुटीर उद्योगा को भी मधिन सहायता करते हैं । कभी-कभी दो यस बड़े बड़े उद्योग को भी आर्थिक सहायता करते हैं परन्तु गोदामा मे रक्मे हुए माल पर मह ऋण नहीं देते हैं। (3) हुण्डियों का व्यवसाय करना देशी बमस विभिन्न प्रकार की इण्डिया का प्रय विक्रय करते हैं तथा उनके मुनान का वाय परते हैं। दूसरे प्रकार के कार्यों में देगी वारो का प्रमुख काय गैर परिग काय घरना है । आजवस इनकी व्यापारिव काय परने की प्रवृति बढती जा रही है । ये व्यापार अथवा दुकानदारी करते हैं । व्यापार करने की प्रवृत्ति का उद्देश्य, आयुनिय क्या की प्रतियोगिता म समय समय पर जो हानि हुई है, उम शनि की पूर्ति करत का है । कुछ व्यक्ति अनाज, पाम चाँदी तथा सोन का सट्टा परत हैं और कुछ व्यक्ति व्यापारिक क्यों जट (Agents) 2 कप मनाय करते हैं। देशी बैकरो के उधार देने के तरीके ( Methods of Lending ) दमी बबरों को ऋण देन को रोति आधुनिक बको मे बिलुल मिन है। याज पोदर प्राय प्रत्पर ऋण लेने वाले रिए पृथक-पृथप निश्चित वरन है जिसमे अधिर से अधिक ध्यान की रकम पाल पर सरें। इन ऋण देने से तरो निम्न प्रसर है। (1) प्रतिमा पर पर RM (Promisory Notes) -देगी बर দুগ ব সময় স্কুণী বা ৫৭ ধ্য সাপ থর বা লা সি এ TAfगन ने म्याज और भूपधानीगन का राया करता 22 है। इस प्रतिना पत्र पर ऋणी के अतिरिक्त दो और जमानती हस्ताक्षर करा लिए जात हैं और यह गल होती है कि ऋणी द्वारा रुपया न लौटाने पर वह राशि जमानत देन वालो को लौटानी पड़ेगी। (2) रमीद अथवा टोप(Acknowledgement given)--इम रोति म प्रनिता पत्र में स्थान पर ऋणी स मेवल एक रसीद लिखवा ली जाती है । इसम ब्याज की दर भी लिखवाई जाता है और ऋणा हस्ताक्षर करता है। (3) दस्तावेज व तमस्मुष्प (Govt Stamp paper) -ऋणी सरकारी स्वाम्म के कागज पर ऋण का मूलधन, व्याज की दर और निश्चित अवधि जब वह राशि लौटावेगा लिखना है और अपना वचन दता है। इस प्रकार स्टाम्प कागज पर ऋण का ब्योरा लिखने का दस्तावज अथवा तमस्मुख लिखना कहत हैं। (4) विश्न (Fixed instalment)-इस रीति को बनज अथवा रहती भी कहते हैं । इस प्रणाली म ऋण को पितो म चुकान ग वायदा किया जाना है । पहनी किरत ऋण दते समय ही वाट ली जाती है। (5) जाही-यह भी एक प्रकार की क्ति प्रणाली है । ऋण की अदायगी रिश्तो म का जाती है। पहली किश्त ऋण दते समय ल ली जाती है और गप निर्धारित किस्तें जब तक रकम अदा न हो जाव प्रत्येक दिन वमूल का जाती है। (6) टिकट-बही इसम गण की रकम लिख कर टिकट पर ग्रणी के हस्ताक्षर करा लिए जाते हैं । ऋण की अवधि तथा ब्याज की दर नहीं लिखी जाती है। ये जवानी आपसी बातचीत द्वारा तय कर रते हैं। पाया नयों में यह वही स्वीकार की जाती है। (7) हाय उपार -इस प्रकार ऋण लेने पर किसी प्रकार की लिखा पढी नहीं की जाती है। बिना किसी लिखावट के स्पया दे दिया जाता है। कभी कभी इस रीति म ऋणी से पय लिखा ली जाती है । (8) गिरवी -इस प्रणाली म सोना गादी, जेवर व अन्य मूल्यवान वस्तुओं की बाड पर ही ऋण दिया जाता है । इस प्रकार को आड पर वस्तुओ के मूल्य का अधिक से अधिक तीन चौथाई भाग ऋण मे दिया जाता है।
23 (9) रहन (Mortgage) - इस रीति द्वारा सम्पत्ति की आड पर ही ऋण दिया जाता है । रहन तथा गिरवी में केवल यह अतर होता है हि रन म भूमि, मकान आदि अचल सम्पत्ति की आड पर और गिरवी मे चल सम्पत्ति की बाड पर ऋण दिया जाता है। (10) माल के रूप मे ऋण --कृपक को प्राय वस्तुओ के रूप म ऋण दिये जात है। यह ऋण इस शत पर दिया जाता है कि मल तयार हो जान पर सवाये और व्याढ़े करने लौटाया जायेगा । कारीगर वो बच्चे माल क रूप में ऋण दिया जाता है और वह निश्चित कीमत पर तयार माल ऋण दाता को बचने का वायदा करता है। देशी वैकरो के दोष (Evil Practices of Indigenous Bankers) यह बात नि मशय माननी पडेगी विदेशी वक्रा का देश के पाथिर संगठन म विशिष्ट म्यान है। ये बना महत्त्वपूण काय करते हैं पर समाज के द्वारा य वही उपेभित इष्टि म देखे जात है क्यादि इनकी काय प्रणाली म अनक दोप पाए जात है। (1) ये लोग अपढ़ भारतीय ग्रामीणो यो मनमाने टास ठगत हैं। इन पा प्रमुख दाप बईमानी का है। इनमें अवहारों म ऋषी का घोषा देने की प्रवृत्ति अधिकतर पाई जाती हैं । ठीक ढग स हिमाव नहीं रखना ऋण देते ममय ऋणस अधिर सम लिखा लेना साली कागज पर हस्ताक्षर करवा सना और उसके पश्चात् उसम मनमानी रकम लिख रेना, ब्याज भयवा ऋण का भाग मिलने पर ऋणी ना उस रकम की रसोद न देना, तिपाई का पसा अलग लेना, प्राषि अनुचित मागौ स यह साभ उठाते हैं। (2) इनरी व्याज की दर अत्यधिक होती है। (3) माज और ऋण की मूल राम बढ़ जाने पर ही वे ग बात की
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सूचना ऋणों को देते हैं । ऋणी के पास इतनी बड़ी रपम देने के लिए राण
नहीं होती है और माहूकार द्वारा ऋणान व पं स म ा जेवर मसान
भूमि इत्यादि रखा है सरीद लिया जाता है।
(4) योग न तो ऋण का हिसाव रखत हैं और निरोगका
द्वारा पन वही साता की जाच करवात है।
(5) साधारण जनता का पमा जमा नही परत जिसम उनके पास
ऋण देन के लिय बम धन रहता है।
(6) कबर उत्पाद कार्यों के लिए ऋण दना मवया उचित रहता है।
ऐस दिए हुए ऋण का पैसा वापम मिलन की सभावना रहती है । विवाह
जातीय भोज आदि अनुत्पादक कार्यों व लिए जो कण दिया जाता है उमम
किमाना को अनावश्यक सच बरन को पमा मिल जाता है और युगे बादत
पड़ जाती है। देशी वैर ऋण देत ममय उत्पादप तया अनुत्पादक कार्यों म
भेद नही मानना है।
(7) चा से पसा निकालने का प्रणाली का दगी वपर नहीं अपनात
और पुराने तरीका पर ही काय करत हैं।
(8) ये लोग अपन ढग स काय करत हैं इनम आपमी पोई सगठन
नही है। इनके द्वारा लो जान वाली ब्याज की दरा में तथा वाय प्रणाली म
भिन्नता पाई जाती है।
(9) यह प्रण न वाला सबगार लते हैं तथा आज काय उनम
मुफ्त करवाना चाहत हैं।
(10) ऋणों को अपना माल सस्त भाव म देशी चकरो का वचना
पड़ता है तथा आवश्पाता की वस्तुएं च भाग म उनम सरीदनी पड़ती हैं।
देशी बैंकरों की काय प्रणाली में सुधार
तथा इनके विकास के लिए सुझाव
(Suggestions for the improvement of
Indigenous Bankers)
देगी बपरा की काय प्रणाली मे अनेक दोप होते हुए भी लगभग ममी
गि जांच समिनियो न स्वीकार किया है कि इन देश को ग्रामीण अप
25 व्यवस्था म बहुत महत्त्वपूर्ण स्थान है। यह लगभग 70% ग्रामीण मास की पूर्ति करते हैं । इनका सेवाओ का अत कर देना ग्रामीण अथ-व्यवस्था के लिए उचित नहीं होगा। इनका तीन दशाओ मे सुधार हो सकता है --प्रथम इनकी काय विधि म सुधार द्वितीय इनकी आर्थिक स्थिति में सुधार तथा तृतीय इनके अनुचित कार्यों का अ त । इस सम्बध म सुझाव निम्न प्रकार हैं (1) देशी बकरा को बकिंग कार्यों के अतिरिक्त और अन्य व्यवसायिक काय एव सट्टा व्यापार नही करना चाहिए। इनका रिजव वक से प्रत्यक्ष सम्बन्ध स्थापित होना चाहिए और जिा स्थाना पर रिजव बक तथा स्टट बक की शाखाएं नही हैं वहा पर इह उनक एजेट के रुप म नियुक्त करना चाहिए। (2) रिजव वक को अय व्यापारिक बकावी तरह इन पर भी इनकी पूजी, जमा धन, तथा काय विधि के सम्बन्ध में कुछ प्रतिवध लगान चाहिए और इसके बदले मे इहे अग्रिम तथा स्वीकृत-पत्रो की पुन पटौती की सुविधाएँ देनी चाहिए। इस सुविधा को प्राप्त करने के लिए उह रिजव वक के पास अपने जमा धन के अनुपात म कुछ राशि जमा करनी होगी। (3) व्यापारिक को को भी स्वत प्रतापूवक इनकी हुण्डिया की पुन बटौती करनी चाहिए। (4) इनकी काय विधि म आवश्यक सुधार करके रह आधुनिक आधार पर सगठित किया जाव और इनक प्रकरण (Auditing) तथा निरीक्षण की भी समुचित व्यवस्था की जावे। (5) रिजव बक तथा स्टेट वर का इन देशी वक्रो को भी राशि स्थानातर की मुविधा प्रदान करनी चाहिए। इससे इनका मुद्रा बाजार में महत्त्वपूर्ण स्थान हो जावेगा। (6) दशौ चकरा को सरकार से इस काय + लिए लाइमेंस लेना आव यक होना चाहिए । मिफ उही को लाइमेंम दिया जाये जो निम्न पतों का पालन करना स्वीकार करें (1) याज वी तर निश्चित मीमा र अनुमार रम लेना। - 26 (2) प्रत्यप ऋण का हिसाब ठौर तरह रखें तया सरकारी भाडिटर द्वारा जांच करावें। (3) प्रत्यर ऋण का हिसार समय समय पर ऋषी के पास भेजें। (4) ऋण सम्बधी प्रत्यक व्यवहार की रसीद ऋणी के माय भेजें। आशा है कि ऐगे लाइसेंस जारी हो जाने पर देगी परा के अनक दोपा वा मन हो जावगा और इनक द्वारा ली जान वाली ब्याज की दर भी कम हो जावंगी। (5) दगी यारा को अपने व्यवमाय का रूपान्तरण विल्स की दलाली के व्यवसाय में करना चाहिए। (6) अपनी अडचनो वो दूर वरन के लिए इह साठित (Orga used) होना चाहिए। 17) देशी बकरा के सबध में राज्य मरकारो को इस प्रकार में नियम बनाने चाहिए कि उनक अनुचित यवहारा का यन हो जाव तया ब्याज कोदर भी कम हो सके । इस सम्ब ध म बहुत कुछ किया भी जा चुका है। (8) विभिन्न राज्य सरकारा न कृणा की रक्षा के लिए समय समय पर जो नियम बनायें हैं उना काय-वाहन सतोषजनक नहीं है। यह कमी दूर होनी चाहिए। दगी बकरा कहिमाद विवार की जांच की भारी भावश्यक्ता है जिससे उनक अनुचित व्यवहार कम हो जायें (9) इनको आधुनिर वो के समान नवीन तरीके मे किंग व्यवहार रसा चाहिए। देशी वैकर और रिजव बैंक । - (Indigenous Bankers and Reserve Bank) देनी चकरान सदा से ग्रामीण क्षेत्रा को लगभग समस्त मुद्रा को आवश्परता की पूर्ति की है और नार हेमा म भी नवा काफी महत्व है।
27 अत यह आवश्यक है कि देशी वक्रो का आधुनिक वैकिंग प्रणाली से समुचित सम्बन्ध रह । इस समय रिजव वक का इन पर कुछ भी प्रभाव नहीं है और उसरी किसी नीति का इन पर असर नहीं पड़ता है। केद्रीय वकिंग जांच समिति की सिफारिशो के आधार पर सम् 1937 म रिजव बैंक ने एक ऐसी यागना बनाई थी जिसके अनुसार कुछ निश्चित शर्तों पर देशी वकर रिजव वक की स्वीकृत सूची में मम्मिलित हो सकत हैं और इनका रिजव बक से प्रत्यक्ष सम्बध स्थापित हो सकता है। ये गर्ने निम्न हैं (1) कैवल ऐसे देशी वक्राको रिजव वर की सूची मे सम्मिलित किया जा सकता है जो कम से कम 2 लाख रुपय में व्यवसाय करते हो और 5 वष म अपन व्यापार को 5 लाख रुपय तक बढान को तयार हा । (2) व वकिंग के अतिरिक्त अय (व्यापार आदि ) व्यवसाय छाड दें। (3) वे अपने हिसाब नियमित रूप स रखें और रिजव वर के द्वारा समय समय पर उनकी जांच करवाएँ । (4) अपन हिसाबा को व्यापारिक वा का तरह प्रकाशित करत रह और समय समय पर व आवश्यर विवरण रिजव बर को भजत रहे । (5) जो देशी बंकर उपरोक्त व्यवम्याआ अन्तगत रिजव चक स मुविधाएँ प्रास करने के अधिकारी नहीं है वे भी मपने मघ बनाकर सुविधाएं प्राप्त कर सकते हैं। (6) जो जनता मे जमा धन (Deposits) प्राप्त करने लिए वैयार हा तया अय बैंको की तरह अपने दायित्वा या निश्चित भाग रिजर्व बक में पास जमा कराने के लिए तयार हों। (7) इस निय रण के बदा म उह दृष्टिया को पुन भुनान (Rediscounting of bills) अपना द्रव्य एष स्थान पे दूसरे स्थान को भेजने सपा रिजव यद के पामय जमा (Deposit) रसन की मुविधाएँ मिलनायी।
28 . दगी बकरा ने उक्त सुभाओ एव गतों को अनुपयुक्त बताया तथा इनका बहुन विरोध किया परिणामत भारताय बकिंग के देशी व आधुनिक अङ्गा के बीच आवश्यक मामञ्जस्य स्थापित नही हो पाया है । क्वल 7 सस्थाओ ने ही रिजव धव की मुविधाओं का लाभ उठाने का प्रयत्न किया है। सवस वडी कठिनाई यह है विदेशी बकर अपने लाभदायक व्यापारिक व्यवसाय को छोड़ने को तयार रही हैं । सन् 1949 का किंग विधान देशी बकरा तथा साहूकारो पर लागू नहीं होता है। यदि यह सस्थाएं अपन नाम के माय बक शब्द तथा बकर का प्रयाग नहीं करती है, तो यह विधान इनर कायों म भी कोई हस्तक्षेप नहीं कर सकता। देशी बकरो की वतमान स्थिति (Present Position of Indigenous Bankers ) वतमान काल में देशी वकर स्टट वक तथा अय व्यापारिव' बको से निम्न सुविधाएं प्राप्त करते है। (1) देशी बकर अपने ग्राहका सहुडियां खरीद रते है तथा दहे स्टेट क एव अ य यका से भुना सकते हैं। इस सम्बध म इन बको वे पास की बकरा की एवं सूची रहती है जिसम प्रत्यक बकर के नाम के आग एक रक्म लिखी रहती है जिससे अधिक मूल्य की हुण्डियाँ भुनान की सुविधा देगी बकरा का नहीं दी जाती। (2) प्रतिना-पत्रों की जमानत पर जिन पर कम स कम दा व्यक्तियो व हस्ताक्षर हो, ये नक्द साख (Cash Credit) प्राप्त कर सकते है । (3) देशी वका पर लिखे गए चक अथवा उनके नाम क्यि गए रेसाक्ति चा य व स्वीकार नहीं करते है । (4) दशी बरी को यह वक एक स्थान से दूसरे स्थानो को धन भिज वाने की सुविधाएं प्रदान करते हैं । रिजव बक ने 31 माच सन् 1953 को एक याजना के अतगत पति पय अनुमोदित (Approved) गर सदस्य का अथवा देशी चकरा को एक 29 स्थान से दूसरे स्थान मे अपेक्षाकृत कम मुल्य पर धन के स्थानातरण कराने की सुविधा प्रदान की है। 195758 के ग्रामीण साव सर्वेषण की पुनरावृत्ति (Rural Credit Follow up survey ) से यह निप्पप निक्ला है कि जिन 12 जिलो का सर्वेक्षण किया गया उनमे से अधिवा म साहूकार और दशी वक्रा का प्रामीण साख मे प्रभुत्व है। पाच जिला म तो साहूकार या देशी वकर कुल ग्रामीण सास के 80 प्रतिशत के लिए उत्तरदायी थे जव कि अय चार जिला म इनका योगदान 60-70 प्रतिशत था। केवल तीन जिला ( सोरठ, विचलन तथा जालघर ) मे साहकार तथा देशी वकरा द्वारा बहुत कम कण दिए गए ये । इनम भी सोरठ तथा क्विलन मे क्रमश 16 तथा 20 प्रतिशत और जाल घर में 49 प्रतिशत ग्रामीण साख साहूकार और देशी वरा द्वारा उपल ध कराई गई थी। इससे स्पष्ट है कि साहूकार तथा देगी वरो का महत्त्व मिश्रित क्षेत्रा (दक्षिण भारत) म कम हो रहा है, जबकि अय क्षेत्रा मे इसम कोई कमी नहीं आई है। साहूकार तया देशी बकरों का भविष्य स्वत त्रता के पश्चात विरोपन जब से भारत सरकार ने देश में समाजवादी समाज की स्थापना करने वा निश्चय किया है पचायत राज, सहवारी सगठन तथा मामुदायिक विकाम योजनाओ के त्रिमुगी कायक्रम द्वारा जन-जागति और यार्थिक विकास की प्रगति हुई है। प्रामा म इन कायक्रमों से चेतना की जो लहर उठी है उसरे कारण माहूवार तथा दगी वरो का आसन डोल गया है और वह नये टग के व्यवसाय तथा पधे अपनान के लिए बाध्य हो गए हैं। वका के विकाम के पारण देशी बारो पो हुडिया का महत्त्व दिन प्रतिदिन कम होता जा रहा है और मुद्दती हुडियां तो प्राय समाप्त हो गई हैं। इन बाता को ध्यान म रखते हुए ही कुछ समय पूर्व वमई सर्राफ मप के अध्या बाजूभाई चिनाय (जो लोपसभा के सदस्य भी हैं) ने यह सुभाव दिया था विदेशी ववरा को रिजव घय को पन मान पर रिजव वा व अनुशासन म आ जाना चाहिय । ममय एव परिस्थितियों पी यहा माग है। आन वाले वर्षों म साहारा तथा दगी
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चारों को नियात्रा पर नियंत्रों का जाल का होता जाय अन समय रहते
घेत जाना ही उनके लिये श्रेयस्कर होगा।
अभ्यास के प्रश्न
1 भारतीर साहूकार के कारोबार का वणन कीजिए। आपरे विचार में
इनवा सुधार अधिक उचित है या रमूलन ।
2 भारत म देशी बकरी का महत्त्व समझाइये।
3 देशी बकर और आधुनिर वैर का भेद बतलाइए।
4 देशी वार और साहूकार का भे देताइए। भारतीय वैगि प्रणाली में
देगी बकरा स्थान इनाये।
5 भारतीय देशी दारों के कार्यों का उल्लेख पौजिए । उन दोष समनाय
और उहें दूर करने के उपाय भी लिखिए।
6 अनेक दोषो के हात भी 'साहूकार' आज भी क्यो नोदिन है । इनके पा
दोष है और उनको दूर करने के लिए क्या उपाय किए गए हैं।
7 देशी बरा से आप क्या सममन हैं ' इनका वनमान स्थिति क्या है ?
8 देगी दरों का भविष्य अधिक उम्पल कमे बनाया जा सकता है ?
अध्याय 3 सहकारी साख आन्दोलन (Cooperative Credit Movement ) ससार में दो प्रकार की अय व्यवस्थाओ का विशेष प्रचलन है । पहली व्यवस्था पूजीवादी है जिसमें प्रत्येक व्यक्ति को उद्योग अथवा व्यवसाय करने की छूट होती है और सरकारी हस्तक्षेप नाम मात्र को होता है । पूजीवाद म पूजीपति लोग लाभ कमाने म स्वतत्र होते हैं यत वह धन सग्रह करने मे सफल हो जाते हैं जिससे उनकी आर्थिक और राजनीतिक शक्ति वढ जाती है । दूसरी व्यवस्था समाजवादी क्लाती है जिसम उत्पादन तथा व्यवसाय के अधि का साधना पर राज्य का अधिकार होता है। ऐसी स्थिति मे सरकार को मनमानी करने का अवसर मिल जाता है और अनेक बार मावश्यक्ता की वस्तुएं मिलनी कठिन हो जाती हैं या बहुत महगी मिलती हैं । सहकारिता मध्यम माग पूजीवादी और समाजवादी अर्थ व्यवस्था के वीच का रास्ता सहकारिता है । सहकारिता के अतगत निधन अपरा सामाय वग ये व्यक्ति मिलपर एर सस्या का निर्माण पर लेते हैं। यह सस्या उन व्यत्तियो की आर्थिक आवश्यक्ताओं की पूर्ति करती है और उहें उचित वाय परने की सलाह देती रहत है । इस प्रकार सहकारिता का प्रय प्रापसा सहयोग द्वारा अपनी प्राय यकताएं पूरी करना सया पूजीवाद और सरकारी गोपए से यवाना है। सहकारी सारका उप महकारी आन्तन वा आरम्म इगल में हुआ जहाँ रापट ओवन ने सबसे पहले महतारी मण्ारों की स्थापना की। दन भंडारा म प्रत्यर धस्तु अच्छी किस्म की तया कम मूल्य पर मिलती थी । जमनी मडरित विलपम रेपेजन और हरमन शुल्म हेतिान सहकारी सारा ममितियाँ 32 स्थापित करने पर बल लिया। इन समितिया पा उद्देश्य किसाना तथा नगर पेसामा य व्यक्तियो पो बम ब्याज पर ऋण देना था। इनको जमरा रेउन समिनिया या ग्रामीण सास समितियां और शुल्ज टेलिरा या नागरिव राहारी साप समितियों कहा जाता है। ग्रामीण सारा समितियो पोर नागरिक सहकारी साख इमतियो मे अन्तर प्रामीण सहकारी साप समितियां 1 इनका पाय क्षेत्र एक गांव या दो तीन ग्रामो तर सीमित होता है। मागरिक सहकारी साप समितियां 1 इनका क्षेत्र एक बड़ा नगर तथा पभी भी उसके पास के उपनगर 2 इन एप मा का मूल्य बहुत 12 नागरिष समितियो के मन पुष यम रखा जाता है ताप्रित्यर बडे मूल्य के होते हैं। भारत में ग्रामवासी कम से कम एष प्रश इनके मनों का मूल्य प्राय 10 खरीद सके । भारत रुपये स 100 रपये तक समितियो के मा का मूल्म होता प्राम २ रुपये में पांच रुपमै होता है। 3 ग्रामीण समितिया की सदस्य सस्या तथा पूजी म होती है । 3 गुज रामितियो की सदस्य संख्या तथा पूजी अधिक होती हैं। 4 रेपेजन समितियो के सदस्यो वा दायित्व प्राय असीमित होता है । गत वर्षों में यह समितियां भी सीमित दायित्व रखने लग 4 नागरिक समितिया के सत्स्यो वा दायित्व सीमित होता हैं।
33 5 ग्रामीण समितिया मे प्राय अव तनिक व्यक्ति काम करते हैं । अब एव सचिव को कुछ वेतन या भत्ता देने की व्यवस्था हो गई है। 5 नागरिष समितियां बड़ी होती हैं अत उनके अधिकतर कायकर्ता वैतनिक होते हैं। 6 ग्रामीण समितियां केवल मत्स्यों 6 नागरिक ममितियां गैर सदस्यों को ऋण देती हैं। को भी ऋण देती हैं। 7 रेफेजन समितियों पेवल उत्पादक कार्यों में लिए ऋण देती है तथा ऋण देने के पश्चात् उसकी राशि के उपयोग का ध्यान रखती हैं। 7 नागरिक समितियां उपभोग कार्यों के लिए भी ऋण दे देती है और ऋण देन के पश्चात् वह उसके प्रयोग के सम्बयम विशेष ध्यान नहीं देती। 8 रेपेजन समितियां प्राय अल्प कालीन ऋण देती हैं और ऋण मुख्यत व्यक्तिगत जमानत पर दिये जाते हैं। 8 नागरिव साख ममितियाँ मध्य कालीन तथा पमी-बभी लम्बी अवधि के ऋण भी दे देती हैं। यह ऋण देत समय पूरी धरोहर रेतो हैं। 9 ग्रामीण समितियां साम वितरित 9 नागरिष सास समितियां वेवल नहीं परती, मम्पूण साम, वोप २५ प्रतिशत लाभ दीप निधि म निधि में डाल दिया जाता है। रसती है गेप साभ सदस्यों को सामान के रूप में संट दिया जाना है।
34 भारत में सवारी सास प्रांदोलन भारत म महतारी मात्र आदोलन की नीव सर फ्रेडरिक निबलमन ने रखी। वहाने सन् 1895 में मद्रास में कृपि बक् स्यापित करने का मुझाव दिया था और सरकार पर यह जोर दिया कि भारत म सहमारी साम समितिया की स्थापना की जानी चाहिए। तन्नुमार भारत म सम् 1904 म सहकारी समिति अधिनियम पास किया गया। सहकारी समिति अधिनियम के अतगत वेवल प्राथमिक सास समितियाँ बनाने की व्यवस्था पी। प्रत 1912 म नया सहवारी समिति अधिनियम पास किया गया जिसम दो महत्त्वपूर्ण व्यवस्थाएं की गई। 1 साप समितियों के अतिरिक्त ऋय वित्रय उपभोता तथा अय प्रकार की समितियां स्थापित करना। 2 सहकारी के द्रीय बको तपा प्रातीय सहवारी वको की स्थापना करना। तदनुसार सहकारी साख समितियो तथा अप समितियों का विकास तेजी से होने लगा। 1915 म मेक्लेगन समिति ने देश को सहकारी समितियो का पुनगठन करने का सुझाव दिया । सम् 1919 म प्रान्तीय सरकारों को सहका रिता सम्बधी अलग कानून बनाने का अधिकार मिल गया जिसके फलस्वरूप विभिन्न भातो तथा देशी राज्या मे अलग-अलग सहकारिता कानून बनने आरम्भ हो गये । बम्बई प्रात ने अपना प्रथम सहकारी समिति अधिनियम 1925 में पास क्यिा तत्पश्चात मद्रास ने 1932 बिहार और उडीसा ने 1935 तथा कुग ने 1937 में अपने अपने सहकारी कानून पाम पिए और बगाल में 1940-41 मे सहकारी कानून बनाया गया। प्रतर्राष्ट्रीय मदो और विश्व युद्ध सम् 1929 तर सहकारी आदो लन निरतर प्रगति करता रहा वितु 1930-34 में विश्वव्यापी मन्दी के कारण सभी वस्तुआ के मूल्यो म कमी आ गई जिससे किमानों को बहुत हानि हुई और वह अपन ऋण समय पर न चुका सके जिससे अनेक साख समिनियों को बद होना पड़ा। कुछ समय पश्चात् मूल्या की स्थिति में सुधार हुमा जिससे सहवारी आदोलन मे पुन गति आने लगी।
35 द्वितीय युद्धवाल (1939-45) में भी सहकारी आदोगन निरन्तर गतिशील रहा और उपभोक्ता सहकारी भडारो ने विशेष प्रगति की क्योकि चीनी वस्त्र, अनाज, तेत मादि वितरण के वाय मे सहकारी समितियो को प्राथमिकता दी गई। 1946 में सहकारी आयोजन समिति (Co-operative Plann ing Committee) न यह सुभाव दिया कि सहकारी साख के साथ-साथ कृषि पार्यों के प्रय विक्रय तथा माल सवारने की क्रियाओ का भी समय और सहयोग किया जाना चाहिए। स्यतत्रता प्राप्ति और प्रायोजन स्वतत्रता प्राप्ति के पश्चाद सहकारी आदोलन को अत्यधिक महत्त्व दिया गया है। प्रत्यन राज्य में सहारिता मानून पास पर दिए गए हैं और विभिन्न समितियो (प्रामीण साख सर्वेक्षण समिति, मेहता समिति आदि) की सिफारिश पर राज्य सरकारो ने सहकारी सास समितियो म प्रत्यक्ष पूजी लगाना आरम्भ पर दिया है। सवारी सास का सगटन भारत मे सहकारी साख आदोलन स्तूपावार (Pyramidical) है । इसका अर्थ यह है कि ग्राम तथा नगर स्तर पर प्रापमिर सास समितियां हैं जिनका सम्बप जिलास्तरीय ने द्रीय सहहारी नमो से हैं। केद्रीय सहकारी वर प्रत्येक जिले में एक है। केद्रीय सवारी बको पर राज्य सहकारी वर है। प्रत्या राज्य में एक राज्य सहवागे वर है और सब केद्रीय सहवारी व उसके सदस्य हैं । प्रायमिक सास समितियां (1) स्थापना एस ग्राम अथवा विगी क्षेत्र में कोई दस व्यक्ति मिन पर एर प्रापमिर सहारी माय समिति का निर्माण कर सकते हैं। समिति की रजिस्ट्री परते समय यह ध्यान रखा जाता है कि उसके सरस्य एव जसा ही प्यवसाय परा पाा पस्ति हो तथा सहकारिता के सिद्धान्ता म परिचित हा । (2) सत्र जो रामितियां प्रामा म बनाई जाती है उना क्षेत्र प्राय एप ग्राम पपायत के ममान होता है अर्थात् एर पचायत क्षेत्र म पर 36 प्रायमिन महाारी ममिति निमिा की जाती है । नगरो मे स्थापित होने वाली साख समितियो का क्षेत्र प्राय घडा होता है। (3) पूजी प्राथमिक सास समितिया की पूजी तीन साधनो से प्राप्त की जाती है। (क) मा बैचवर, (ख) केद्रीय सवारी वक से ऋण लेकर तया (ग) जनता से जमा रकम प्राप्त कर । प्रापूजी म यदि समिति के सदस्य 2000 रुपय मग्रह करते हैं तो उतनी ही राशि सरकार लगा देती है। (4) मताधिकार सहकारी समितियो में कोई व्यक्ति कितने ही मगो का मालिक हो उसे एक मत से अधिक देने का अधिकार नहीं होता । (5) प्रवध प्राथमिक समिति का प्रय प एक प्रबधक मण्डल द्वारा किया जाता है । समिति के सारे सदस्य अपनी वार्षिक सभा म प्रबधक मण्डल के सदस्या का चुनाव कर लते हैं । यह मण्डल समिति के मारे काय का सचालन करता है । सहकारी समिति के कार्यालय का भार प्राय एक सचिव(secretary) के आधीन होता है जो अवनिक काम करता है या कुछ भत्ता प्राप्त करता है। नगरो म स्थापित सास समितिया के सचिव तथा अयमचारियो को वेतन देने की व्यवस्था होती है । (6) व्यवसाय प्राथमिर सास समितियां केवल अपने सदस्या को ऋण देती हैं। ऋण की मात्रा प्राय सदस्य की पूजी तथा जमा रक्म पर निभर करती है परतु विशेष परिस्थितियो में अधिक ऋण देने की यवस्था भी हो जाती है । ऋण केवल व्यक्तिगत जमानत पर दिये जाते हैं और एक वप में अधिक के लिए नहीं होते। । साख समितियां वेवल उत्पादक कार्यों के लिये ऋण देनी हैं और उन पर ब्याज की दर 8 से 12 प्रतिशत तक होती है । ऋण देने के पश्चात् उनकी रकम के सदुपयोग का ध्यान रखा जाता है। (7) कोष प्राथमिक साख समितियो लाभ कमाने के उद्देश्य से स्थापित नहीं की जाती अत उनका सच निकालने के पश्चाद जो बचत होती है वह प्राय एक कोप निषि म डाल दी जाती है। नगरों में स्थापित समितिमा 37 दस प्रतिशत तक लाभाश बाट मक्ती हैं परन्तु लाभाश बांटने से पहले वचत का 25 प्रतिशत भाग सोप निधि म डालना अनिवाय है । (8) प्रक्षण सहकारी समितिया के खाता तथा हिसाव की जांच सहकारी विभाग के कमचारिया द्वारा की जाती हैं और यह हिमाव 30 पून तक की तिथि के लिए तयार किये जाते हैं। (9) सदम्यता मुक्ति यदि कोई व्यत्ति साख समिति की सदस्यता का त्याग करना चाह तो वह एक लिखित आवेदन कर देता है और उसकी मश पूजी लौटा दी जाती है । सहवारी सास समितिया के अराधारी अपने मा केवल समिति का अनुमति स ही बच सकते हैं । एसा इसलिए किया जाता है वि साख समितिया की सदस्यता अवाछनीय व्यक्ति प्राप्त न कर सकें। भारत मे प्राथमिक सहकारी साख समितियो को प्रगति (रक्म लाख रुपयों में) 1960-61 1962-63 मद 1950-51 1 सध्या (लाखो में) 115 2 सदस्य (. ) 5154 3 प्रत्त्त पूजी 840 4 कोप 886 5 निक्षेप 448 224 21614 9072 3086 1096 224 27237 12161 3834 - भारत में प्रथम दो पचवर्षीय योजनामा पी अवपि म प्रापमिक सह- कारी सास समितियो की मख्या 1 15 लाख से बढ़ कर 224 लाख हो गई है । इनो सदस्या को सख्या 52 सास से बढ़ कर 216 लाख हो गई है। इस प्रसार समिनिया की सस्या सगभग दुगुनी सपा सदस्था की सध्या लगभग पार गुनी हुई है । इस अवपि म समितिया की चालू पूजा 22 मरोड रपये से यहार 132 रोड परे यदि ८ गुशी हो गई है। - 38 केन्द्रीय सहकारी बैंक भारत म प्रत्येक राय के प्रत्येक जिल म एक एक बद्रीय सहारी बैंक स्थापित किया गया है। 1962 63 म ऐमे वया की कुल संख्या 386 थी। दो प्रकार बद्राय सबारी वक दो प्रकार के होते ह प्रथम एस वक जिननी सदस्यता केवा प्राथमिक महतारी समितियो को प्राप्त है। दूसरे एम बम जिनम व्यक्ति एव ममितियों दोना प्रकार व मत्स्य ह । प्रवथ स्थापना केन्द्रीय वा वी स्थापना भी प्राथमिन समितिया की भांति ही होती है । इनकी साम्यता मुख्यत प्रायमिर सहकारी समितियाँ ही प्राप्त परती है और वह इन पर्वा की पूजी गरीदती है । वैद्रीय सहकारी वका वा एक मचाउन मडल होता है जिसके सदस्या का चुनाव साधारण समा म किया जाता है। यह मडल बर की नीति निर्धारित करता है और उमवा पालन व क मनेजर नया अय क्मचारियों द्वारा किया जाता है । यह मभी क्मचारी वेतन भोगी हाने ह । साधन पूजा के अतिरित इन वका के साधन राय सहकारी बन से प्राप्त कणा तया जनता को जमाया (Deposits) स प्राप्त होने ह । केद्रीय सहगारी व वो का कद्रीय कायालय क्सिी नगर (जिल के मुख्य नगर) म होता है अत उहें जनता स जमा प्राप्त करन का अच्छा अवसर मिल जाता है। व्यवसाय केद्रीय सहकारी वनों का मुख्य पाय ता सदस्या को ऋण देना होता है परन्तु व्यवहार म वह सभी प्रकार का वकिंग व्यवसाय करते ह और सदस्या तया गर सदस्यों को ऋण दते हैं । ऋण दते समय के द्रीय सह कारी वक पूरी जमानत रसने हैं और प्राय एक से तीन वप की अवधि के लिए ऋण देते हैं । कृषि ऋण प्राय व्यापारिक विलों आधार पर दिये जाते हैं किन्तु शेप ऋण रिसी मा प्रकार की धरोहर पर दिये जा सकते हैं। केद्रीय सहकारी बको व ऋथा पर प्राय 6 से 8 प्रतिशत व्याज लिया जाता है।
39 ताम तया कोप प्राथमिक साख ममितियों को भाति हो के द्रोम सहकारी बैंक भी अपनी शुद्ध वचत का 25 प्रतिशत एक कोप मे स्थानातरित करते है तथा शेष लाभारा के रूप म सदस्या को वितरित कर देते हैं। प्रवेक्षण तथा नियंत्रण केंद्रीय सहकारी बैंको के लाम हानि खाते तथा अन्य हिसाब किताब की जांच भी सहकारी विभाग में प्रवेक्षकों द्वारा की जाती है । सवारी विभाग इन वका वीण नीति पर भी नियत्रण परता है । यह नियत्रण रा य सहकारी वर की माफ्त दिया जाता है क्योकि वह वा ही कद्रीय वको भो आवश्यक्ता में समय ऋण दते है । भारत में केन्द्रीय सहकारी बैंको को प्रगति 1951-52 1962-63 1 सख्या 509 2 सदस्य (लाखों म) 231 3 प्रदत्त ऋण (लाख रु म) 105,64 4 पालू पूजी (लाख रु म) 60,11 386 399 292 13 40011 पेत्रीय सहारी बों को प्रगति योजना के ग्यारह वर्षों में केन्द्रीय सहकारी वा को सख्या 509 से घटकर 386 रह गई। (30 जून 1963 को उनकी सम्या 386 थी)। सख्या म कमी का कारण यह है कि जिस जिले में WE से अधिर पन्द्रीय सहकारी वर था वहाँ सो मिला पर एक ही बक स्थापित कर दिया गया । अत पुछ बैंको को बार करना पटा। योजना के ग्यारह वो मेरे द्रीय सहकारी बयो की चालू पू जी की रा6ि0 करोड रपये मे यद वर 400 रोड पर हो गई है और ऋण शेप 106 रोड रपये से बढ़कर 292 करोड रुपय। वम तो विरामील दाम वाणिों की मात्रा बढ़नी स्वामाविन है परन्तु उनके उचित उपयोग या ध्यान रखना आवश्यक है। नागरिष सहकारी र दाये युर नगरों में कुछ व्यक्तियो ने मिल- परसारित झारी को की रचना कर ली है। यह बा विना व्यापा 40 रिक वको की भौति काम करते है, येवल इनकी रजिस्ट्री सहकारी नियम क अतगत हुई है । नागरिक सहकारी बैंको की पूजी, प्रबघ तथा व्यवसाय सवथा ध्यापारिख बको की भांति होता है और यह व्यवसाय तथा सेवाओ म व्यापा रिक वको से स्पर्श करते हैं। राज्य सहकारी बैंक भारत के प्रत्यय राज्य म एक राज्य सहकारी बक की स्थापना की गई है । यह धक राज्य के सभी सहकारो वका का पेद्र बिदु होता है क्योकि यह उनको आवश्यक रागि उधार देता है तथा उनकी नीतिया का निर्देशन करता है। सदस्यता राज्य सहकारी बको की सदस्यता मुख्यत "द्रीय सवारी बक को प्राप्त हानी चाहिये परतु इन बको के प्रव ध म अथशास्त्रिया तथा सहकारी आन्दोलन में रुचि रखने वाले व्यक्तियों को भी स्थान देना उचित समझा गया है ताकि वह समय-समय पर राज्य सहकारी बका की नीति निर्धारण करने म उचित योगदान दे सर्वे। इस कारण से ही सहकारी वकी की सदस्यता केन्द्रीय सहकारी बको तथा विशेष योग्यता वाले कुछ व्यक्तियों को दी गई है। पूजी राज्य सहकारी वको की कुछ पूजो तो प्रश बचकर तथा रकम जमा कर प्राप्त की जाती है तथा प रिजव वक आफ इण्डिया से ऋण के रूप म प्राप्त जाती है। यह ऋण सरकारी प्रतिभूतिया कृषि विलो अथवा अन्य स्वीकृत प्रतिभूतिया की जमानत पर प्राप्त किये जा सकते हैं। व्यवसाय राज्य सहकारी वको द्वारा केंद्रीय सहकारी बका को ऋण दिये जाते हैं । केद्रीय सहकारी बक यह ऋण प्राथमिक समितियो को दते हैं और प्राथमिक साख समितिया इहें कृषि तथा लघु उद्योगो को दे देती हैं। राज्य सहकारी वक अपने ऋणो पर प्राय 4 प्रतिशत से 6 प्रतिशत व्याज लेते हैं। राज्य सहकारी बक का प्रबय एक सचालक मण्डल के य म होता है जिसका चुनाव सूरस्यों की वार्षिक सभा में किया जाता है। यह 41 संचालक माल बंक को ऋण तथा अय नीतिया का निर्धारण करता है। राज्य सहकारी वक के सभो कमचारी वैननभोगी होते है। राज्य सहकारी बा का कार्यालय प्राय राज्य की राजधानी में होता है मत उसे बडे बडे वको से स्पर्धा करनी परती है । इस दृष्टि से यह वैक प्राय व्यापारिक बैंकों के सभी काय करते हैं। सहकारी संस्थानो का प्राय अपने साते राज्य सहकारी वको अथवा केन्द्रीय सहकारी बैंका में रखते पडत हैं क्याकि उनक उपनियमा म ऐमी ही व्यवस्था हानी है। गावाएं राज्य सहारी बक प्राय उन स्थाना पर अपनी गाखाएं साल दत हैं जहाँ केद्रीय सहकारी बैंक नहीं है भारत में यह नीति अपना ली गई है कि जहां पंद्रीय बैंक नहीं है वहाँ कुछ समय राज्य सहवारी वक की गाखा रहेगी किन्तु केद्रीय महकारी वक खुनने पर वहां राज्य वर की शाखा बदार दी जायगी। राज्य सहकारी बैंकों की प्रगति 1951-52 1962-63 1 सख्या 16 21 24 2 सदस्यता (हजार) 23 3 चाल पूजी (नास र म) 3672 55,27 5 ऋणप 2001 281,51 25629 196.51 प्रगति भारत म 1962-63 म21 राज्य सहकारी बस्थे जिनकी प्रदत्त पूजी 21 वरो रुपये जमा हम रोड एसय रुपा लों की मात्रा 214 रोडसम यी 42 भमि बन्धक बैंक ( Land Mortgage Banks ) प्राय पक्ता प्राथमिक सहकारी सास समितियां अपवा के द्रीय और राज्य सहकारी या प्राय अपकालीन तथा कभी-कभी मध्यकालीन ऋण दे देते हैं पर तु विमानो को बहुघा भूमि या बल खरीदने अयया भूमि सुधार परने के लिए लम्बी याधि के ऋणों की आवश्यकता होती है । साप समितिया या सहकारी बैंक एसे ऋणों का प्रवध नहीं कर सकते क्योंकि इन सस्थाओं के पास जो रकम जमा की जाती है वह प्राय थोडे समय के लिए जमा की जाती है। रिजव वा भी अल्पाल के लिये ऋण देता है अत दीघकालीन का देने के लिए विष प्रसार की सस्थाओ का निर्माण करना आवश्यक समझा गया है। भूमि बधक बको की स्थापना का दूसरा कारण यह है कि व्यापारिक या सहकारी बर भूमि की जमानत पर ऋण देना पसन्द नही परते क्योकि भूमि का वास्तविक मूल्य निर्धारित करना कठिन होता है तथा यह निश्चित करने म भी कठिनाई होती है कि जमानत म रखा गई भूमि का असली मालिक कौन है। प्रय तथा विशेषताए ऊपर दिये गय व्यौरे से स्पष्ट है कि भूमि बधर वर क्सिाना कोलम्बी अवधि के ऋण देते हैं तथा इन ऋणो के पीछे कृषि भूमि जमात मे रखी जाती है। भूमि व धक बों के पास भूमि का स्वामित्व तथा उसका मूल्य आपने के लिये विपश होते हैं। बहुत बार वह वकीला अथवा भूमि के बार में जानने वाले व्यक्तियों की सेवाओं का उपयोग भी कर लेते हैं। पए देने को पद्धति सहकारी भूमि वधक वक प्राय दो प्रकार के होते हैं । एक्ल बक जो एक सस्था के रूप में होते हैं और जो ऋणो के लिए प्रायनापत्र स्वय ही प्राप्त करते हैं स्वयं ही ऋण स्वीकृत करते है तथा उनकी वसूली का काम भी उह स्वय ही करना पड़ता है।
43 दूसरी प्रकार के वक संघीय वकाहोत हैं। इस प्रकार की व्यवस्था में राज्य म एक केद्रीय भूमि वधक बक की स्थापना की जाती है और प्रत्येक जिले में एक एक प्राथमिक या प्राइमरी भूमि व चव वक स्थापित कर दिया जाता है। प्राथमिक बक अपने जिले के किसानो से ऋण के लिए प्राथना पत्र प्राप्त करता है और उनकी पूरी तरह जाच करता है। वह जमानत के रूप म प्रस्तुत की गई भूमि का मूल्य तथा उसके मालिक के बारे म भी निश्चय कर लता है । तत्पश्चात् प्राथमिक व अपनी राय के साथ ऋण सम्बधी प्राथना पत्र बद्रीय भूमि व धर बर के मुख्य कार्यालय को भेज देता है। वहाँ प्रत्येक ऋण प्राथना पत्र पर फिर विचार किया जाता है। यह विचार एक केद्रीय ऋण समिति द्वारा होता है जिसम भूमि ब धन व व सुन हुए विओपन सदस्य होते हैं । यह समिति प्रत्यक प्राथना पत्र पर विचार कर अपना निणय दे देती है । तत्पश्चात् प्रत्येक कण की स्वीकृति या अस्वीकृति की सूचना प्राथमिक भूमि व घव बका को भेज दी जाती है। जिन व्यक्तिया को केद्रीय भूमिव घर द्वारा ऋण दने की स्वीकृति की जाती है प्राथमिक व उह इस बात की सूचना दे देते हैं और उनकी भूमि व धन रखने सम्बधी कागजा की अदालत से रजिस्ट्री करवा लेते हैं। तत्प चात् उन किसानों को प्रायमिय' बैंक द्वारा ऋण की रकम दे दी जाती है। ऋण की रपम देन के पश्चात् उस पर छ माही व्याज तया अवधि बीतने पर उधार की रकम की वसूली भी प्राथमिक बक ही करते हैं । अवधि तथा व्याज भूमिव घ वर प्राय' 7 से 20 वर्ष तक के लिए ऋण दते हैं तथा उनकी व्याज की दर 8 से 10 प्रतिगन तन होती है । व्याज प्राय छ मास या एक वप घे पश्चात् वमूल किया जाता है। घासू पूजी के खोत भूमि व घर वको की बुध पूजी तोपरा वध कर प्राप्त की जाती है पर तु उनको अधिकार रक्म ऋण पत्र (Debentures) बेच कर प्राप्त की जाती है। यह ऋण पत्र 15-20 थप के लिए होत है मौर प्न पर 6-7 प्रतिशत वापिर ब्याज दिया जाता है। भारत मे प्रत्येप भूमिय पर यर द्वारा बच गय ऋण पत्रों की गारटी गज्य सरकार द्वारा की जाती है। यह ऋण पत्र व्यापारिक र सहकारी अध्याय 4 स्टेट बैंक आफ इन्डिया ( State Bank of India) स्टेट बर आफ इंडिया का निर्माण इम्पीरियल बक के राष्ट्रीयकरण के द्वारा हुमा मत पहले इम्पीरियल वक का सक्षिप्त व्यौरा देना उचित होगा। इम्पीरियल धक माफ इडिया सम् 1913 में भारत सरकार ने भारत की मुद्रा और वक व्यवस्था सम्बध मे सुभाव देने के लिए एक आयोग की नियुक्ति की थी जिसे चेम्बरलेन आयोग कहा जाता है । इस यायोग के एक सदस्य प्रसिद्ध प्रथशास्त्री प्रोफसर की स थे। पीस महोदय ने देश के तीन प्रेसी डेंसी वको (बम्बई, कलकत्ता तथा मद्रास प्रेसीडेंसी बक) को मिलाकर एक भक्ति- गाली वर की स्थापना का सुभाव दिया जो भारत के के द्रीय बक का काय कर सके और देश की मुद्रा और वक व्यवस्था का उचित संचालन कर सके । प्रथम युद्ध काल (1914-18) मे देश के 95 बर बद हो गए क्योंकि उनकी व्यवस्था ठीक नहीं थी और न ही उन पर उचित नियत्रण पा। अत भारत सरकार ने तीनो प्रेसीडेंसी बको को मिला कर इम्पीरियल बक आफ इडिया बनाने का निश्चय किया जिसने 27 जनवरी 1921 को काय आरम्भ कर दिया। उद्देश्य इम्पीरियल वक के तीन मुख्य उद्देश्य थे। 1 भारत की बक व्यवस्था को शक्तिशाली बनाना तथा उस पर उचित नियत्रण रखना।
2 विदेशी वनों मे पर्दा कर भारत के विदेशी व्यापार म वृद्धि करना। 3 ब्रिटिश वनों से सीधा सम्पर स्थापित पर भारतीय लन देन को सरल बनाना। 49 - इन तीनों कार्यों म सफलता प्राप्त करने के लिए एक साधन सम्पन्न तथा पक्तिशाली सस्था को पावश्यकता थी जो देश के वको को सहायता प्रदान कर सके तथा विदसों से सीधा सम्पर स्थापित कर भारत के विदेशी व्यापार को बढ़ाने में मदद कर सरे। पूजी तया प्रवध स्थापित होने के समय इम्पीरियल वर की अधि कृत पूजी 11 25 वरोड रुपये और प्रदत्त पूजी 5625 करोड रपय थी। यह निम्न प्ररार विभाजित थी। 7,500 प्रा जिन पर 500 रुपये प्रति भरा धुकता या। 125000 मा जिन पर केवल 125 रुपये प्रति माधुरता था। प्रदत पूजी के अतिरिक्त वर की कोप-निधि लगभग 414 रोड रूपये तथा जमा रकम 6 रोड रुपय थी। केंद्रीय बक क्यों नहीं? आरम्भ से ही इम्पीरियल बैंक वो 12 परोड रुपय वार्षिक तर मुद्रा बाजार म डालने का अधिकार था और यह मुदा भारत सरकार से प्राप्त की जा सकती थी पितु वर को न तो स्वय नोट निकालने का अधिकार लिया गया और न ही उस वकों पर नियत्रण के कोई अधिकार दिप गय। सन 1925 म हिल्टन यग मुद्रा आयोग ने इस बात पर विचार पिया बिइम्पोरियर बर को ही देश का रेन्द्रीय बर बनाया जाय या रिमी नप वर की स्थापना की जाय । यायोअधिकतर सदम्या का यह मत था गि इम्पीरियत वा कोद्रीय वर नहीं बनाना चाहिए । रेत्रीय पान बनने वारण आयोग न इमीरियन बफ मो केटीप यान बनाने में निम्नलिमित पारण दिए 500 1 व्यापारिक व इम्पीरियल यव एवं व्यापारिप वर था जिसकी उस समय 300 के लगभग गासाएं थी। ये द्रीय धवा के माय सिद्धान्तों के अनुसार केन्द्रीय वक को व्यापारिक वर का पाप नही परना चाहिए अत इम्पीरियल धक वो यह गासाए वद करनी पडती जिसमे भारत की वक व्यवस्था को हानि पहुचती । इस बात का ध्यान रसत हुए यही उचित समभा गया कि इम्पीरियल बम को वेद्रीय व नही बनाना चाहिए। 2 r का मविश्वास केद्रीय वक एमी सस्या होनी चाहिए जिसमे देश के व्यापारिक वनों का पूण विश्वास हो किन्तु इम्पीरियल बद सदा से भारतीय बैंका से सौतेला व्ययहार करता था और विटेगी वको को विशेष सुविधाएं देता था अत भारतीय वर इम्पीरियल वक को बहुत सदेह की निगाह से देखते थे। ऐसी स्थिति में उस बद्रीय वक वनाना सवथा अनुचित होता । 3 विदेशियों का प्रभुत्व इम्पीरियल बर वा प्रयघ पूणत विदे शिया के हाथ म था फ्याकि इसके अधिकारी अशधारी विदेशी थे। यह भारतीयो को महत्त्वपूर्ण पदों पर नियुक्त करने की दिशा म कोई ध्यान नहीं देता था। इस प्रकार इम्पीरियल बैंक राष्ट्रीय भावनाओ के सवथा विरुद्ध था अन उमे केद्रीयक का दर्जा नहीं दिया गया। 4 उद्देश्य साम-यमाना एक व्यावहारिक क होने नाते इस r का मुख्य उद्देश्य लाभ क्माना था और नैंक के अधिवारी इस उद्देश्य का त्याग करने के लिए तयार नहीं थे। 1935 के पश्चात ऊपर बतलाये गए कारणों से इम्पीरियल की केन्द्रीय बनाने के स्थान पर रिजवक माफ इडिया की स्थापना की गई जिसने 1 अप्रैल 1935 से अपना काय आरम्भ कर दिया। रिजव बैंक की स्थापना होते ही इम्पीरियल को रिजव बैंक का एजेंट नियुक्त कर दिया गया और उस पर से निम्नलिखित प्रतिवप हटा लिए गए 1 अव वह इच्छानुसार नई शाखाएं खोल सकता था। 2 उसे देशी तथा विदेशी विल खरीदने तथा बेचने की छूट मिल गई पी 51 किन्तु यह पिल 6 मास से लम्बी अवधि के नहीं हो मुक्त ये । दृषि विलों की अवधि 9 मास तर हो सकती थी। 3 इम्पीरियन वक को 1935 के पश्चात् विदेशों से उधार लेने तथा जमा प्राप्त करने की अनुमति मिल गई । 4 उमे अच्छे प्रशों तथा प्रतिभूतिया की जमानत पर ऋण देने का अधिकार प्राप्त हो गया। इस प्रकार इम्पीरियन बैंक एक पूणत व्यापारिख नैंक बन गया परन्तु उसे सरकार का मयोग और सरक्षण प्राप्त या । वह न केवल रिजवता वा एक मात्र एजेट था बलि वर अब भी विरोप अधिनियम के अन्तगत (Imperial Bank of India Act) काय कर रहा था जिसमे भारतीय व्यापारी बैंक बटुत अप्रसन्न थे। इम्पीरियल बैंक का राष्ट्रीयकरण (Nationalisation of Imperial Bank of India) राष्ट्रीयररण को माग इम्पीरियल र यो सरकारी अधिकार में लेने के लिए रिजवप वी स्थापना के तकात वाद ही आठोलन आरम्भ कर दिया गया था। भारत के व्यापारिक मैं इस पान के कट्टर विरोधी थे कि इम्पीरियल मैं वो ही रिजव में का एक मात्र प्रतिनिधि क्यों बनाया गया इम विरुद्ध भय कई आरोप भी लगाए गए जो निम्नलिखित है (1) विदेगी या भारतीय कावा वपन या वि इम्पीरिया में एक सवथा विदेशी गैर था और वह भारतीय नागरिकों को नौकरी नहीं देता या जिससे भारतवामियों को उमत मेकिंग पद्धतियों में प्रशि नहीं मिल पातापा। (2) पमपान इम्पोरिपन में भारत न्यित विली गैंग तया म्यापारियों, जहाची तया बीमा पम्मनियों को अपिर मुविधाए दता था और उहें मान यादि सम्म प म भी रिवायत दता था। इमर विपरीत वह भारतीय मैंकों, व्यापारिक सस्थाओं तथा व्यापारिया यो ऋण देन मकडी ते लगाता या मपा टामे वपिन पान वमून परता था।
52 (3) खीरा इम्पीरिया मेंस के तीन मुख्य कार्यालय थे जिन पर बहुत अधिक राशि खच की जाती थी। (4) ऋण तया विनियोग नीति इम्पीरियल व प्राय नवद साख देता था जिससे व्यापारिद बिला को प्रोत्साहन नहीं मिलता था। इसके अति रिक्त वह मामीण क्षेत्रा तथा छोटे क्स्वा से धन प्राप्त कर नगरों मे विनियोग परता था जिससे ग्रामीण क्षेत्रो का विकास नहीं होने पाता था। स्वतनना के पश्चात् स्वत त्रता प्राप्त करने के पश्चात् भारत सरकार ने 1948 में रिजव और वा राष्ट्रीयकरण कर लिया । उसी समय पुन यह माग की गई कि इम्पीरियल भैक का राष्ट्रीयकरण कर लिया जाय । बैंक के सचालक मडल ने सरवार को एक स्मरण पत्र दिया जिसम राष्ट्रीयकरण का विरोध करते हुए निम्नलिखित तक प्रस्तुत दिये गये । (1) कुशलता को हानि राष्ट्रीयकरण के विरुद्ध यह तक दिया गया कि इम्पीरियल बैंक जो इतनी कुशलतापूर्वक काम कर रहा था सरकारी अधिकार में आने से उसमे लालफीतागाही तथा अकुशलता उत्पन्न हो जायगी जिससे जनता को बहुत हानि होगी। (2) सरकारी एजेंट यह कहा गया कि इम्पीरियल बैंक के सरकारी (रिजर्व बैंक का) एजेंट होने से उसको विरोप लाभ नही है और वह इस काय का त्याग करने को तयार है। (3) बंकिंग व्यवस्था को हानि संचालक मडल का यह मत था कि इम्पीरियल बैंक को सरकारी अधिकार मे लेने से 91 विदेशी नासाओ को बद करना पडेगा जिससे देश के विदेशी व्यापार में हानि होगी। (4) भारतीयों को नियुक्ति स्मरण पत्र म यह मत व्यक्त किया गया कि बैंक द्वारा अधिकाधिक भारतीय नागरिको की नियुक्ति का कायक्रम आरम्भ कर दिया गया था और इम पर विदेशियों के प्रभुत्व का आरोप निमूल बतलाया गया। प्रामीण बगि जाच समिति का मत 1949 में ग्रामीण नैकिंग जाच समिति के सामने पुन इम्पीरियल बैंक के राष्ट्रीयकरण का प्रश्न उठाया . गया । समिति ने यह मत व्यक्त किया कि इस गैंक का राष्ट्रीयकरण करना तो उचित नहीं होगा परन्तु इस पर अधिक नियत्रण रखना बहुत आवश्यक है। समिति ने दूसरा सुझाव यह दिया कि इम्पीरियर द्वारा दरा मे उन 274 स्थानो पर जल्दी से जल्दी शाखाएं खोलनी चाहिए जहां कि मरकारी कोपागार (treasury) काम कर रह है । समिति का तीसरा सुझाव यह था कि इस में म भारतीयों की नियुक्ति का क्रम तेजी से बढाया जाना चाहिए । राष्ट्रीयकरण का सुझाव और पालन अगस्त 1951 मे रिजव बैंक आफ इण्डिया न भारत में ग्रामीण साख की समस्यात्रा पर विचार कर उनके सम्बध में उचित मुभाव देने के लिए एक ग्रामीण साम सर्वेषण समिति (Rural Credit Survey Committee) नियुक्ति की जिसने 1954 म अपनी रिपोट प्रस्तुत कर दी। समिति ने अपनी रिपाट म यह सुमाव दिया कि इम्पीरियल में को सरकारी अधिकार मे ले लेना चाहिए तथा उमे शक्तिशाली बनाने के लिए दस ऐमे कों को उसके साथ मिला दना चाहिए जो पुरान देगी राज्यों में राजामा अपदा महाराजाआ के प्रयत्नों से स्थापित हुए य । उन मेंको के नाम निम्नलिखित ये 1 3ाफ बडौदा 2 बैंक जाफ बीकानेर 7 याफ पटियाला 3 * ऑफ हैदरावाद 8 3 ऑफ राजस्थान 4 अंक याफ इंदौर 9 3 याफ सौराष्ट्र 10 मेंक ऑफ टावनगर भारत सरकार न समिति की सिफारिश को स्वीकार कर लिया और 1 जुलाई 1955 मे इम्पीरियल का नाम स्टट क ऑफ इण्डिया रस दिया गया। स्टेट बैंक ऑफ इण्डिया - 6 ३ ऑफ ममूर 5 में ऑफ जयपुर 1 पूजी और प्रवप स्टेट में की यधिकृत पूजा 20 करोड़ सये है और यह 100-100 पर ये प्रों म वटी हुई है । इम्पीरिकन को 54 स्टेट मेंक म परिवतित करते ही रिजव बैंक द्वारा पुराने इम्पीरियल में को 5625 वराड रपये की कुल पूजी खरीद ली गई । स्टेट को प्रत्त पूजी उतनी ही रखी गई है। इस बाकर 125 करोड रुपय किया जा सरता है किन्तु ऐसा करन म पूर्व भारत सरखार की अनुमति ना आवश्यक है। स्टेट र आफ इण्डिया अधिनियम म यह व्यवस्था की गई है कि उसकी पूजीमा वम स कम 55 प्रतिशत भाग रिजवप के पास रहेगा और शप पूजी इम्पीरियल के जो माघारी लेना चाहेंगे उहें बची जा सकेगी। तदनुसार रिजव क न 1955 मही इम्पीरियल रि की सम्पूर्ण पूजा का खरीद लिया और इम्पीरियल जो अपारी म्टेट में मप्रा रखना चाहत थे उह आवश्यर प्रग दने की व्यवस्था कर दी गई । भिन्तु इसीरियल मेंक के क्वल 8 प्रतिशत प्राधारिया न स्टेट व मे मा खरीदने की इच्छा प्रकट वी जो उहे दे दिए गए । रोप 92 प्रतिशत अदा रिजवके अधिकार में हैं । इस प्रकार स्टट कि एक पूणत सरकारी सस्या नही है क्यानि इसम निजी व्यक्तियो क अ भी है। क्षति पूति इम्पीरियल ज क ग खरीदने पर रिजव मैंक ने उसक मापारियो को निम्नलिखित क्षति पूति देने का निणय किया पूण प्रदत्त मग (500 रुपय) 1765 रुपय 10 आने प्रति मा अगत प्रत्त (125 रुपय) 431 रपय 12 आन 4 पाई प्रति अप इम्मीरियल ये व धारिया को उनके मना के म य म से 10000 रु. प्रति व्यक्ति तक नक्द देने की व्यवस्था की गइ और गपक बले मे 35 प्रतिशत व्याज वाले मरकारी ऋण पत्र दे दिय गए जिनरा भुगतान 1965 म करने पी व्यवस्था है। प्रश सीमा स्टट मैक म रिजव जैव तथा बीमा कम्पनिया, निगमा धार्मिक ट्रस्टा तया अय सावजनिक सस्याओ को छोड कर कोई व्यक्ति 200 से अधिक मानहा खरीद सकता। इसके अतिरिक्त क्सिी व्यक्ति अथवा सस्था को भले ही उसक पास कितने ही प्रा हो एवं प्रतिशत से अधिक मत देने का अधिकार नहीं है । इस प्रकार स्टेट मेंक की व्यवस्था अत्यन्त प्रजातान्त्रिक है।
55 प्रवध स्टेट बैंक का प्रबंध एक केद्रीय संचालक मण्डल के हाथ म है जिसमें 20 सदस्य होते हैं। इनकी नियुक्ति निम्न प्रकार की जाती है 1 अध्यक्ष 1 उपाध्यक्ष सरकारद्वारा --- 2 व्यवस्थापक-सचालक मडल द्वारा किन्तु सरकार के अनुमोदन पर 8 सचालक सरकार द्वारा। यह व्यक्ति दश के विभिन्न क्षेत्रो के प्रतिनिधियो के रूप मे लिये जाते हैं तथा इनकी नियुक्ति रिजव वर की सलाह से की जाती है। 6 सचालक-निजी माघारिया द्वारा 1 सचालक-केद्रीय सरकार द्वारा [ सचालक-रिजव वरद्वारा केद्रीय सचालक मण्डल के सभी सदस्य 5 वप के लिए नियुक्त किय जात हैं किन्तु निजी प्राधारियो द्वारा चुने गये सचालको को नियुक्ति केवत 4 वप के लिए होती है। स्थानीय सचालक मण्डल स्टट वक का केंद्रीय पायालय बम्बई में है और केद्रीय सपाता मण्डल वही से नीति निर्धारण तथा निर्देशन करता है । वेद्रीय सचालक मण्डल के अतिरिक्त फलपत्ता, बम्बई, मद्रास, नई दिल्ली, पानपुर तथा अहमदागद म छह स्थानीय मचालक मण्डल हैं जिनम निम्न लिखित सदस्य होते हैं (4) पेद्रीय मण्डल वह सदस्य जो सम्बधित स्थानीय मण्डल के क्षेत्र म रहत हैं। (स) एक सदस्य सम्बधित क्षेत्र के माधारियों द्वारा पुना जाता है। (ग) तान सदस्य रिजव और भी सलाह से भारत सरकार नियुक्त करती है।
56 2 स्टेट बक के उद्देश्य तया सफलता स्टेट बैंक के मुख्य उद्देश्य निम्नलिसित रखे गये हैं (क) एक क्तिगाली यफ की स्थापना स्टेट वक का मुख्य उद्देश्य यह था कि दा मे एक गक्तिगाली एव समय भै की स्थापना की जाय जो भारत स्थित विदगी को से स्पर्धा कर सके और देश के व्यापारियो के लिए उचित मात्रा में विदेशी विनियम का प्रवध पर सके । इससे भारत के विदेशी व्यापार म उन्नति की आग की गई। स्टेट क अब 20 महत्त्वपूण विटेगी मुद्राओ म लेन देन करता है और प्राय सभी देशो में स्टेट के प्रतिनिधि हैं जिनके माध्यम स विदेशी भुग तान क्यि जा सकते हैं। (ख) यकिग सुविधाओं का प्रामों में विस्तार स्टेट की स्थापना का दूसरा उद्दश्य यह था कि देश के विभिन्न भागा-विशेषकर ग्रामा मे-बैकिंग मुविधाओ का विस्तार किया जाय । तदनुसार यह निश्चित किया गया कि स्टेट बैंक पहले पांच वर्षों म अर्थात् 30 जून 1960 तक देश के विभिन भागो में कम से कम 400 गाखाएं खोलेगा जिनमे से अधिकतर शाखाएं ग्रामीण क्षेत्रो मे खोली जाएंगी। स्टेट कम 400 नई शाखाओं में लक्ष्य को निर्धारित तिथि के एक मास पूर्व ही पूरा कर लिया और एक जून 1960 वो वेराना (उत्तर प्रदा) नामी स्थान पर स्टेट बैंक की 400 वी नई गाता खोल दी गई। शाखा प्रगति नई गालाएं 1955 20 1956 46 1957 91 1958 105 1959 97 एक जून 1960 तक 41 वष 57 प्रगति मे कठिनाइया ऊपर की तालिका में स्पष्ट है कि मैंक द्वारा प्रारम्भिक काल मे धीरे धीरे शाखाएं खोली गई । यह कोई विशेष बात नहीं है क्यापि प्रत्येक नय काम के प्रारम्भ मे अनेक कठिनाइयो लाती हैं। स्टेट सेंक द्वारा यह योजना बनानी आवश्यक थी कि जिन दिन स्थानों पर शाखाएँ खोली जायें, नई शाखाआ के लिए प्रशिक्षित तथा योग्म क्मचारियो की व्यवस्था करनी पटिन पी तथा कई स्याना पर सह आदि न होने पर फर्नीचर तथा अन्य सामान भेजने में कठिनाई आई। इन कठिनाइया के अतिरिक्त अनर स्थानो पर शासा सोलन के लिये उचित भवन मिलना भी पटिन था। अत 2-3 वर्षों में इन मच समस्याओं पर कार पाया गया और समय मे प्रव लक्ष्य की प्राप्ति की गई। यह अत्यन्त सतीप की बात है। प्रधिका नासाएं प्रामों मे स्टेट बैंक की शाखाओं के विस्तार की एक महत्त्वपूण विपता यह है कि उसवी अधिकार शाखाए प्रामों अथवा छोट पस्यों म खोली गई हैं । उदाहरण रूप म उमकी 400 नई शासाओ में से 77 ऐमे स्थानो पर खोली गई है जिनकी जनसख्या 10000 स कम हैं । तया 209 एम स्यानो पर जिनकी जनमस्या 25000 मे कम हैं। इस प्रकार कुन शासामो यो सगभग 72 प्रतिशत शाखा प्रामीण क्षेत्रा म सोली गई हैं। इनम भी 64 स्थान एमे य जिनम स्टट व पोशासा दुलन में पूर्व कोई भैर नहीं था। गाखा विस्तार की नवीन योजना जून 1960 में स्टेट का 400 नई पासाओं का लक्ष्य पूरा हो गया अत मविप्य वापरमार सम्बप में सलाह दन की दृष्टि से प्रो० कर्वे (DGharve) की अध्यक्षता में एप समिति नियुक्त की गई जिसन यह सलाह दी कि आगामी पाँच वर्षों म ऐट मैं द्वारा 300 नइ नापाए सोलनी चाहिए । इनम से 145 पसाएँ पटवारा नया 155 गाणाएं स्टेट के सहायर द्वारा बोलवे की पवम्या की गई है।
58
प्ररितमान पिति: मातारा र रा 1960
पामार भी गागा शिगार सार पा रगा | malो
सामोगनिम्नपिनि
पार्यातयों पी सत्या
871
न 1960
31 गिर 1964
1147
276
गप्रसार 14 म गैरन 2761 कार्गी
ग्पा पिपिरही पोरना है।
बिना साना, ए मेरो vिi भी 7गारइनमें
मनपा कोरा (भीमा) भोर पार पाला पाकि
TAITHk | TET (जमी) या म्यूपार (समरिता) भी
गागात गोने मारिरिया ताकिभार ीि प्यागार गुम्यापी
मेन दन म मुविधा होगा।
(ग) पामोगा मोरोप्रोगाहा गा पा म पपवर्षीय योजनाओं
तपा गागुणानि पिसाग वापरमार पमरम्प राष्ट्रीर आप पा र महास्य
पूर्ण भाग पामों की ओर जा मारमा पामीर क्षेत्रों की मार को
मेरों ने भाग्यम से पह पाप या पा तारि देशम पूजी निर्मारपी
मात्रा म नृद्धि हो गर । रेट परको स्थापनाएर यह पारिवह
ग्रामीण क्षत्रों रोपनिरिण प्राय 7 सहरले म सहायता गरे।
प्रपम पांच वर्षों में पेट गैर न जो पागा शोती उनसरी समा रसम
गभग 37 परोय पी। मग मष्ट होता है रिभैर द्वारा प्रामीण परतों
को मोष्ट मोरगाहा दिरा गया है। मैट मैक पी यहत मोपासाए पपया
पासाय प्रामीण क्षेत्रो म गिनम पामी जागा को पानी वपत जमा करणे
59 का अवसर मिला है । इस प्रकार स्टेट बैंक द्वारा ग्रामीण वचतो को संग्रह करने के लिय महवपूण सुविधाएं दी गई हैं। (घ) प्रामीण साख (Rural Credit) स्टेट बैंक की स्थापना का एक महत्त्वपूण उद्देश्य यह था कि देश की सहकारी सस्थामा को उदारता पूर्वक ऋण दिया जाय ताकि वह पि, ग्रामोद्योग तथा अन्य लघु काप उद्यागा को आर्थिक सहायता दे सकें। इस प्रकार देश के गामीण क्षेत्रों म कृषि तथा उद्योग के लिए स्टेट बैंक द्वारा धन देन का लक्ष्य रखा गया था। स्टेट बैंक ने इस उद्देश्य की पूर्ति में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। स्टट बैंक द्वारा ग्रामीण साख के लिय दी जाने वाली सहायता यो चार वर्षों में विभाजित किया जा सकता है (1) सामान्य सहायता इसके अतगत स्टट 3 राज्य सहारी को वो सप्ताह में एक बार एक स्थान से दूसरे स्थान पर रखम भेजन की सुविधा देता था और इस सेवा के लिए कुछ भी शुल्क नही लेता था। अब यह गुविधा सप्ताह म तीन बार नी जान लगी है । इसके अतिरिक्त के द्रीय सहकारी मेंको को सप्ताह में एर बार रक्म एक स्थान मे दूसरे स्थान पर भेजने की मुविधा दी जाने लगी है । इस सहायता का अनुमान स वान मे लगता है कि मम् 1964 में स्टेट द्वारा सहकारी बैंको की लगभग 445 करोड रपये की राशि एक स्थान से दूसरे स्थान पर भेजी गयी। प्राण रकम एक म्यान मे दूसरे स्थान पर भेजन को निशुल्क सुविधा के अतिरिक्त स्टेट र कद्रीय महारी को को सरकारी प्रतिभूतिया की जमानत पर न देता है और इन पर सामाय दर म बाधा प्रतिशत कम ध्यान देता है। मैं द्वारा मान की धरोहर तथा भरवारी गारटी पर भी मुण दिए जाते हैं। 1964 बत तर स्टेट और पो महतारी नैको म जगभग 10 परोड़ रुपयेशी ऋण रागिबाकी थी। (2) जय विश्य तया माल सवारने के लिए सास स्टेट बैंक क्य वित्रय तथा मास समारने वाली सबारी समिनियो को मात भी परोहर पर ऋण दता है। वभी-कभी इस प्रकार की समितिया यो विना जमानन के ऋण भी गिर जाते हैं । 1964 5 बात म म्टेर वारा कर विक्रय तथा मान ne 61 और दीघकालीन ऋण देने के लिए वह राज्य वित्त निगमा के प्रतिनिधि का काम करता है। यदि ऋण लेने वाली सम्या कोई सहकारी ममिति हो तो ऋण सवारी बैंक के माध्यम से ही दिए जाता है । मध्यरालीन ऋण सन् 1957 मे पूत्र स्टेट बैंक केवल अल्पकालीन ऋण ही दे सकता था कि तु उमरे वाद वह सात वप तक के ऋण दने का अधिकारी बन गया 1 यह ऋण उद्योगो को सम्पत्ति को धरोहर पर दिए जाते हैं। लघु उद्योग निगम का एजेंट सन् 1958 से स्टेट मेंक राष्ट्रीय लघु उद्योग निगम का प्रतिनिधि बन गया है और वह उन औद्योगिक इकाइयों को माल बनाने के लिए ऋण देता है जो लघु उद्योग निगम के आदेश पर माल बना पर सरकार को बेचती हैं। विदेशी ऋण की गारन्टी स्टेट मैं सीमेट, रमायन कागज आदि 13 उद्योगो के उन ऋणा की गारटी करता है जो वह विदेशो से प्राप्त करते हैं। स्टेट बैंक की गारटी पर इन उद्योगा को विदेश से मगीने तथा औजार आदि उधार मिल जाते हैं और उहें उत्पादन वढाने म सहायता मिलती है । इस योजना के अन्तर्गत 1964 के अन्त म 66 लाम रुपये के ऋण स्वीकृत किये जा चुके थे। पेन्द्रीय साय गारटो योजना भारत ससार ने 1 जुलाई 1960 मे एक योजना या घोषणा की जिसका उद्देश्य लघु उद्योगों का उदारतापूवर ऋण दिलाना है । इस योजना का विवरण रिजद में नामी अध्याय म दिया गया है। स्टेट 3 ने इस योजना का सर्वाधिक लाभ उठाया है और वह सके अतर्गत लघु उद्योगो को 158 रोड साये मे अपिर के ऋण दे चुका है। गहन र सामा य ऋण मोजनाओं के अतिरिक्त स्टेट व नधु उघोगों को ऋण देन के लिय समय ममय पर कुछ गहन बद्र स्यापिन करता है । इन के दाम (जो को गासाा में स्थापित होते हैं) विशेष अधिकारी नियुक्त किये जाते हैं जो उम क्षेत्र क लघु उद्योगों की समस्यामा वा शिप अध्यपन परत है और लघु इकाइया को ऋण देने मी अवस्या करत है । पतमान में इस प्रारदा की सस्था 60 है।
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63 सचालन नीति ममान हो जायगी, इनमें सहयोग स्थापित होगा और दाम मेंरिंग सुविधाओं का विकास हो मोगा। (4) हानि की पूर्ति इन आठों कों द्वारा को भी नई नाबारा देश के विभिन्न भागा मे मुलेगी उ7 पर जो हानि होती उमरी पूर्ति स्टकम निर्मित अनुकूलन एव विकास कोप (Integration and Development Fund) से हो सकेगी। दोष कुछ लोगो को यह भय या विट के महायक बनन मे इन नँगी में भी निम्नलिखित दोष आ जाए 1 इन मेंका म सत्ताही की मावना का उदय हो जायगा और व्यक्ति- गत मम्पन की परम्परा समाप्त हो जायगी। 2 इन गैंकों में लालफीताशाही के कारण अनुशलता आने का भय 3 इन का म दूर दूर के क्षेत्रों से कमचारी नियुक्त होगे जो स्थानीय समस्याओ से परिचित नहीं होंगे मत विभिन्न क्षेत्रों के औद्यागिक विवाम तथा व्यापारिव उन्नति म बाधा उत्पन्न होगी। सहायकों का प्रबंध स्टेट व दे सहायक को नाम के साय स्टेट जोड़ दिया गया है। इनके सचालन मण्डल में सदस्य निम्न प्रकार मनोनीत होते है 5 सदस्य-टेट मैंद ऑफ इण्डिया -रिजर्व व ऑफ इण्डिया 1 वैद्रीय सरकार 2 -निजी प्राधारियों द्वारा स्ट #र रा अध्यार और सचार मल्ल या अध्या है। मत प्रत्यये मचालन महल में दस साम्य है। पूणे सेट करे महायरों की पूजी या दुनगटन किया गया है और उन म स कम 55 प्रतिगाव मध स्टटर से अधिकार म है और और पनता को वैध रिप गर है ! 1 " " 64 स्टेट यफ के एजेंट महायव बैंक, सन स्थाना पर जहां स्टेट में की शाखाएं नहीं है स्टेट के प्रतिनिधि का काय करते हैं। यह स्टेट बैंक की गाखा विस्तार नीति में सत्रिय सहयोग दे रहे हैं। इन वों को प्रत्यक नई पासा खोलने पर होने वाली हानि की पूर्ति के लिए स्टेट 3 वे अनुकूलन एय विकास कोष मे पहले वप कुल हानि का 100 प्रतिशत, दूसरे वप 80 प्रतिशत, तीसरे वप 60 प्रतिशत, चौथे वप 40 प्रतिशत और पाचवें वप 20 प्रतिशत प्राप्त हो सकेगा। स्टेट यक की प्रगति एव वतमान स्थिति सेट माफ इण्डिया ने अपने चायकाल के लगभग 9 वाँ म निम्नलिखित प्रगति की है 1 जुलाई 1955 31 दिसम्बर 1964 कार्यालय 471 1147 निक्षेप (जमा रक्म) 211 करोड 659 करोड १० मण 116 393 विनियोग 101 263 " , " . - . . . उपरोक्त प्राकडो से स्पष्ट है कि स्टेट मैं ने अपनी स्थापना के पश्चात् बहुमुम्बी उन्नति की है । उसकी शाखाओ को सख्या दुगने में अधिक जमा रकम तिगुनी से अधिक, ऋण लगमग तिगुना तथा विनियोग भी लगभग तिगुने हो गये हैं। इससे जनता का स्टेट बैंक म विश्वास स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है । स्टेट यक के प्राय काय स्टेट बैंक द्वारा सामाय चैंकिंग वार्यों के अतिरित कई प्रकार के अन्य काप दिये जाते हैं जो निम्नलिखित हैं (1) प्रशिक्षण व्यवस्था स्टेट ने अपने उच्च पदाधिकारियों को प्रशिक्षित करने के लिए हैदराबाद मे एवं प्रशिक्षण विद्यालय (Training College) खोला है जहाँ प्रतिवप 40 अधिकारियों को प्रशिक्षण दिया जाता है । कालिज के अतिरिक्त कुछ बडी शाखाओ म अन्य कमचारियो के प्रशिक्षण की व्यवस्था है।
65 (2) विदेशी विनिमय व्यवसाय स्टेट नैक विदेशो में भुगतान के लिए ड्राफ्ट, साख पत्र आदि लिखता है तथा अपने ग्राहको के लिए विदेशी मुद्रा की व्यवस्था करता है । स्टेट बैंक ससार की 20 मुख्य मुद्राओ मे नियमित लेन हेन करता है। (3) रिजव मा का एजेन्ट स्टेट और भारत तथा विदेशो में रिजव बैंक के एजेंट का काय करता है। यह केद्रीय तथा राज्य सरकारो की सम्पूण आय जमा करता है तथा व्यय का भुगतान करता है । इस काय के लिए स्टेट को रिजर्व बैंक से निश्चित दर पर कमीशन मिलता है। अनुकूलन एवं विकास कोप स्टेट मैंक की स्थापना करते समय यह व्यवस्था की गई थी कि इसमे रिजव बैंक के 55 प्रतिशत मगा पर जो लामारा मिलेगा वह एक विशेष कोप मे डाल दिया जायगा जिसका नाम अनु पूलन एवं विकास कोप होगा । स्टेट गैव तथा उसके सहायक का द्वारा सोली जाने वाली नई शाखाओ पर जो हानि होती है पहले पाच वप तर उम एक भाग की पूर्ति (जैसा कि पहले लिखा जा चुका है) इस कोष से परने की व्यवस्था है । इस प्रकार स्टेट बैंक द्वारा शाखा विस्तार के काप मे पोई कठिनाई नहीं है। स्टेट बैंकदेवगित काय स्टेट ऑफ इण्डिया द्वारा निम्नलिखित काप करने पर प्रतिवप है 1 वह अपने मगो (Shares) अयवा अचल सम्पत्ति जैसे भूमि, मवान आदि की जमानत पर ऋण नहीं दे सकता। 2, सामायत 6 मास से अधिक के ऋण नहीं दे सस्ता विन्तु उपोगो का सात वप तक के ऋण दिये जा मरते हैं। 3 सामापतः 6 माम से अधिर के बिलों का क्या नहीं पर सकता और न ही उहें भुना सकता है किन्तु कृषि विला की अवधि 15 मास तर भी हो सकती है और विदेगी (यापार से सम्बपिन निर्यात) बिल भी अधिर अवधि हो मरते हैं।
66 पण 4 वह वेवात प्रथम श्रेणी के व्यापारिक विला मे लेन देन पर सस्ता है जिन पर कम से कम दो प्रतिष्टित हस्ताक्षर हों। सहायक बैंकों की स्थिति 1960 म जब कुछ का को स्टदक का समयक मौर बनाया गया था तो उनकी सस्या 8 थी किंतु एक जनवरी 1963 मे स्टेट 3 ऑफ बीकानेर तया स्लेट व क ऑफ जयपुर को मिला कर स्ने बैंक ऑफ बीकारेर एण्ड जमपुर बना दिया गया है । अत अब सहायर ओं को सख्या सात है। इन सालो को की स्थिति निम्नलिपित है (31 दिसम्बर 1964) शासाओ की सस्या 612 जमा रकम 183 रो-रु. 95 विनियोग 62 स्टेट ब एक शक्तिशाली सगठन उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि यर स्टेट T एक गतिगाली गठन बन गया है क्योकि उसकी तथा उसके सहायक भैरो की शाम्बाओ की सख्या 1759, जमा रकम 842 करोड रु०, 488 रोड सम तया विनियोग रानि 325 करोड १० है । इस प्रकार स्टेट कि सगटन की शक्ति मारतीय विंग प्रणाली की लगभग 30 प्रतिशत हो गई है । वास्तव में यह सगठन भारतीय किंग प्रणाली में अपना गौरवपूण स्थान रखता है और भविष्य में भी रखता रहगा, ऐसी बाशा है। अभ्यास के प्रश्न 1 इम्पीरियल कम या दोष थे उसे केद्रीय बैंक का पद क्यो नहीं दिया गया विस्तारपूर्वक लिखिये। 2 इम्पीरियल में के राष्ट्रीयकरण के लिए कौनसी समिति ने मत प्रकट दिया था (क) ग्रामीण किंग जांच समिति 67 (२) सहकारी आयोजन समिति (ग) गोरवाला समिति (ग्रामीण साख सर्वेक्षण समिति के अध्यक्ष श्री गोरवाला ये) 3 स्टेट आफ इण्डिया के सचालन तथा प्रवध पर विवेचनात्मक टिप्पणी लिखिए। 4 स्टेट बैंक के साथ कौन-कौन से दम गैंग को विलीन करने का सुभाव १ दिया गया था और उहें विलीन क्यो नहीं किया गया 5 स्टेट मैंक में राजस्थान के कौन-कौन से मैंको को सहयोगी बनाया गया। (1) मैंक ऑफ राजस्थान (स) 3 ऑफ जोधपुर (1) बैंक ऑफ जयपुर (घ) बक ऑफ शाहपुरा (5) बक ऑफ बीकानेर (शुद्ध पर चिह अस्नि कीजिए) 6 (1) स्टेट बैंक के मुख्य उद्देश्य बतलाइए । उनमें से एक की सफलता पर टिप्पणी लिखिए। 7 (1) स्टेट बैंक के सहयोगीका की सम्या (ख) राजस्थान में स्टेट गैंक के सहयोगी मेंक पे और मद हैं। (ग) स्टेट मैर का केद्रीय कार्यालय म है और स्थानीय मुख्य कार्यालय (2) (3) (5) (6) म हैं। 8 स्टेट र लघु उद्योगो के लिए वित्त व्यवस्या पसे करता है स्पष्ट लिखिए। 9 स्टेट में रे सहापर में बनने से देश के विभिन्न वर्गों को मा नाम 10 निम्ननिसित पर टिप्पणियां लिसिए । अनुकूलन एव विशागोप, गहन : तपा सहाक्का अध्याय 5 रिजर्व बैंक आफ इडिया (Reserve Bank of India) यतमान युग में प्रत्येव देश मकिंग व्यवस्था का नियमन करने के लिए एक केद्रीय में की आवश्यकता का अनुभव किया गया है और प्राय सभी देगों मे एक-एक पदीय स्थापित कर दिया गया है । यह वैद देशको मुद्रा बक्गि तथा सास व्यवस्था को ठीक ढग से संचालित करने म सहयोग देना है। रिगव वक को स्थापना भारत म एक केंद्रीय मैंर स्थापित करने पा विचार 1773 ई० में वारेन हेस्टिग्स के मस्तिष्क में आया और उहाने जन रल व आप बगाल एड बिहार को केन्द्रीय क का रूप देने का विचार प्रकट दिया । इसके पश्चात् जब 1809 में प्रसीडेंसी कि आप वगाल की स्थापना हुई तो लोगो ने यह समभा नि आखिर म वह में देश का केन्द्रीय मैंक बन जायगा परन्तु 1840 में प्रेसीडेंसी में माफ बम्बई तथा 1843 में प्रेसीडेंसी T आप मद्रास की स्थापना से यह विचार समाप्त हो गया। 1913 में चम्बरलन आयोग के एक सगम्य ने भारत में एक बेटीम बैंक की स्थापना का प्रश्न उठाया और 1921 म इम्पीरियल गैंक की स्थापना की गई। इम्पीरियल में को भारत सरकार द्वारा न तो मुद्रा निकारने का भधिकार दिया गया पौर न ही उसे मैंकिंग व्यवस्था पर नियंत्रण करने का दायित्व सौंपा गया। सन 1926 में हिल्टन यग आयोग ने रिजव में बाफ इडिया स्थापित करन की सिफारिश की। 1927 म भारत तत्कालीन वित्त सदस्य श्री वेसिल केट ने भार तीय विधायिका समा म रिजव र विर प्रस्तुत किया। किन्तु रिजव की 69 पूंजी सरकारी हो या इसका कुछ भाग निजी अाधारियो को भी वैचा जाय इस प्रश्न पर अत्यधिक मतभेद उत्पन्न हो गया और इसका परिणाम यह हुआ वि सरकार ने बिल पर विचार स्थगित कर दिया। 1933 में जब भारत को स्वायत्त शासन के अधिकार देने का प्रश्न उठा तो प्रिटिश सरकार ने एक श्वेत पत्र प्रकाशित दिया और उसमे यह शत लगाई गई कि भारत को स्वायत्त शासन तभी दिया जा सकेगा जब वह देश म एक ऐमा केन्द्रीय बैंक स्थापित कर ले जो सब प्रकार के राजनतिक प्रभाव से मुक्त हो । अन सितम्बर 1933 में भारत की विधापिका समा म दोबारा एक विधे यव (विल) रखा गया और उस 6 माच 1934 को गवनर जनरल की स्वीकृति मिल गई । तनुसार 1 अप्रैल 1935 से रिजर्व मेंक न अपना काय आरम कर दिया। प्रारम्भिक स्थिति ससार के अय केद्रीय बैंको की भांति रिजव नैक भी एक मापारियों व क के रूप में स्थापित किया गया। इसकी पूजी 5 परोड रुपये रखी गई ओ 100-100 रुपये के 5 लाख मशों में विभाजित थी। इसमें से वेवल 22 लाख रुपये के मा सरकार के पाम थे, बाकी सारी पूजी निजी प्रचारियों के अधिकार म थी। राचालन मडस म भी सरकार क्वल गवनर तपा दो उप-गवनर नियुक्त पर सक्ती थी, रोप सचालय निजी प्रशधारियों द्वारा नियुक्त किये जाते थे। रितु सरपार न अपन पास यह अधिकार सुरक्षित रखा था कि यदि सरकार केप मचाला मडल की नीति से सहमत नहीं हा तो सरकार अपनी नीति सागूपर सरनी थी। रिग वपना राष्ट्रीपारण रिजव की स्थापना के समय से ही इस बात की मांग की जाने लगी थी दिइस मरारी अधिकार में ले लिया जाप पर तु द्वितीय पुर पचात् इम माग म विशेष तेजी आ गई। इसी बीच 1945 में प्रोम सपा आस्ट्रनिया रे वेद्रीय रामा राष्ट्रीयकरण कर लिया गया। 1946 मयारु हमले हो भी सरकारी अधिकार में से लिया गया।
70 भारत के स्वतंत्र होते ही रिजव क के राष्ट्रीयकरण का प्रश्न बार बार उठाया गया और इगलड के केद्रीय। मैंक के राष्ट्रीयकरण से इस विधार को बहुत बल मिला। पक्ष मे सर रिजर अंक के राष्ट्रीयकरण के पक्षपातियो न निम्न लिखित तक प्रस्तुत किये। (1) भाषिक विकास देश के स्वतत्र होने कारण सरकार को तीव्रगति से आर्थिक विकास करना पड़ेगा। इसमें सफलता प्राप्त करने के लिये रिजवर तथा सरकारी नीति म पूरा सहयोग होना आवश्यक था। रिजव र को सरकारी अधिकार म लन से इस समस्या का अपने आप समाधान हो सकता था। (2) नमावना भारत की जनता सभी ऐस सत्वो को सवारी स्वामित्व म लाना चाहती थी जिनम भग्रेजो का प्रभुत्व था। रिजव क में प्राय भोज गवनर होता था और इसम विदेगी अधिवारिया की सख्या बहुत थी। (3) इगलड का उदाहरण तीसरा तक यह था कि जब इगल ड जसे देश म जहाँ नैंकिंग परम्परा बहुत दृढ़ और सुन्दर है केद्रीय या राष्ट्रीय करण कर लिया गया है तो भारत जस देश म तो राष्ट्रीयकरण अत्यत आव श्यक है क्यापि यहाँ तो मेकिंग का विकास तेजी स करना है। इन तों के कारण सरकार, 1948 म रिजवक के राष्ट्रीयकरण सम्बधी विल पास कर दिया और 1 जनवरी 1949 स यह बैंक पूणत सर कारी अधिकार में ले लिया गया। सरकारने गैंक के सभी प्राधारिया को 100 रपयेथे मा के बदले में 118 स्पय 10 माने देने का निश्चय किया। प्रबंध रिजव मैक का प्रबध एक केन्द्रीय सचालक मडल के हाय म हैं जिसम 15 सदस्य होते हैं। इनकी नियुक्ति निम्न प्रकार होती है 1 गवर्नर केन्द्रीय सरकार 3 उप गवनर 11 4 सचालक-प्रत्येक स्थानीय मंडल से एक मनोनीत होता है। 6 सचालक भारत सरकार मनोनीत करती है। 1 अधिकारी छ संचालक व्यापार, उद्योग, सहकारिता बादि क्षेत्रों 15 के विशेषम होते हैं, फायकाल गवनर तथा उप-गवनर 5 वप के लिए नियुक्त किये जाते हैं किन्तु उहें दोबारा नियुक्त किया जा सकता है। 6 सचालको (जो विभिन्न क्षेत्रा के प्रतिनिधि होने हैं) का कायवाल 4 वप होता है। स्थानीय मडला द्वारा मनोनीत सचालक तव तक केद्रीय मंडल के सदस्य बन रहते हैं जब तक वह स्थानीय मडल के सदस्य रहत हैं । सरकार द्वारा नियुक्त अधिकारी सरकार की इच्छानुमार के द्रीय मडल का सदस्य रह सकता है। परम्परा के अनुसार भारत सरकार का वित्त सचिव ही इस पद पर नियुक्त किया जाता है। घेतन रिजव बैंक के मचालक मण्डल म गवनर तथा उपगवनर ही वेतन भोगी अधिकारी होते हैं । दोप सचालका म स सरकार द्वारा नियुक्त अधिकारी सरकार से वतन प्राप्त करता है । वास्तव मे प्रथम चार के अतिरिक्त शेप 11 क्वल परालीन (Part time) होते हैं और उह केवल मभाओ म भाग लेन पर यात्रा व्यम तया भत्ता आदि दिया जाता है। स्थानीय मण्डल पेन्द्रीय मचालक मण्डल के अतिरिक्त रिजवक न बम्बई, फलवत्ता, मद्रास तथा नई दिल्ली म चार स्थानीय मण्डल हैं । इनमे 5-5 सदस्य होते हैं जिनको नियुक्ति सरकार करती है। ये सवाल अपने अपन क्षेत्र के निवासी होते हैं । इनका पायकाल 4 वप का होता है रिन्तु इह दावारा नियुक्त किया जा सकता है। प्रत्येक स्पानीय मण्डल से एक-एक सदस्य धुन पर पेद्राय मण्डल में भेजा जाता है। स्थानीय मण्डल के सदस्य वपन में से एक व्यक्ति को यध्या चुन ऐते है जो सभाओं का सपालन करता है। स्थानीय माडलो का बाय केद्रीय मण्डल को अपर अपा क्षेत्र की समस्याओं से परिचित कराना है। समय समय पर वह मात्र को ममस्वाभाचे समाधान के सम्बध में मुभाय भी देन हैं।
12 रिजर्व बैंक के कार्य (Functions of the Reserve Bank of India) 1 नोट निकालना अय देगों के केद्रीय मैंको की भौति रिजव प को पत्र मुद्रा (नोट) निकालने का एकाधिकार है । यह 2 5 10 50, 100, 500, 1000 5000 तया 10000 रुपये के मूल्य के नाट निकाल सकता है। एक रपय का नोट भारत सरकार निकालती है क्योकि यह नोट द्वितीय 'युद्ध काल मे एक रुपये के सिक्के के स्थान पर निकाला गया था। नोट निकालने की दृष्टि से रिजव कि म दो विभाग है निगमन विभाग तथा मैकिंग विभाग। देश म जब मुद्रा की मांग होती है तो व्यापारिक क रिजव बैंक से उधार मागते हैं। यह माग किंग विभाग के पास आती है और किंग विभाग आवश्यक जमानत (प्रतिभूतियाँ विल आदि ) जो कों से प्राप्त होती हैं नोट निगमन विभाग को दे देता है। इन प्रतिभूतियो के माधार पर निगमन विभाग द्वारा आवश्यक मात्रा म नोट व्यापारिक मैंकों को उधार दिये जाते हैं और इस प्रकार वह चलन में आ जाते हैं। नोटों के पीछे कोष रिजव जितने नोट निगमन करता है उनके पीछे कुछ स्वण अथवा अन्य मूल्यवान सम्पत्ति कोष मे रखी जाती है। रिजव T को स्थापना के समय यह यवस्था की गई थी कि यह जितन नोट निकालेगा उनका कम से कम 40 प्रतिशत स्वण या विदेशी प्रतिभूतियों कोप म रखेगा। यह व्यवस्था भी की गई थी कि स्वण मात्रा 40 करोड रपय के मूल्य से कम नहीं होगी। इस व्यवस्था म समय समय पर परिवतन होते रहे हैं। वतमान में रिजव "न्यूनतम कोप प्रणाली" (Minimum Reserve System) के आधार पर नाट निगमित करता है। स्थरए का मूल्य 5 अक्तूबर 1956 से पूर्व रिजव क मे जो स्वर्ण कोप रखा जाता था उसका मूल्य 21 रुपये 24 पसे प्रति तोला के हिसाब से 13 लगाया जाता था जब कि सोने का अतर्राष्ट्रीय मूल्य 62 रुपये 50 पसे प्रति तोला था मत 6 अक्तूबर 1956 मे रिजव 3 के स्वण कोष का मूल्य भी 62 50 रुपये प्रति तोला के हिसाब से लगा लिया गया। इसस रिजव बैंक में जमा 4002 करोड रुपये के स्वरण का नया मूल्यल गभग 11776 करोड रुपये हो गया। अत उसे 115 करोड रुपये के मूल्य का यूनतम स्वण कोष मे रखने म कोई कठिनाई नही हुई। फरवरी 1965 मे विदेशी प्रतिभूतिया की मात्रा कम होने के कारण स्वण कोप की मात्रा वढा कर 13376 करोड रुपय के मूल्य की कर दी गई है। 2 सरकार का बकर तया सलाहकार भारत सरकार तथा राज्य सरकारो को प्रतिवप लगभग 60 अरब रुपये वा लेन देन करना पड़ता है। इस राशि वो धमूल करना या भुगतान करना सरल काम नहीं है। रिजव Trम सरकार की सारी माय जमा होती है और उसम से यह सरकार के आदगानुमार नियमित रूप म भुगतान करता रहता है । रिजव बैंक के कार्या- लय वल सात स्थानों पर ही हैं अत रिजव बैंक ने स्टेट क को इस काय ये लिय अपना एजेंट नियुक्त कर दिया है। सरकार की ओर से रकम वसूली तथा भुगतान की सवाओं के बदल रिजव गैर सरकार से कोई शुल्क नहीं देता। इसके विपरीत वह स्टेट गैंक को इरा काय के लिए निर्धारित दर पर शुल्क देता है। यह बात स्मरण रखने लायक है कि भारत अथवा राज्य सरवारो को जो वम रिजव क म जमा होती है उस पर रिजव क कोई ध्यान नहीं देता। ऋण व्यवस्था सरकार की ओर से लेन देन परने के अतिरिक्त रिजवr भारत सरकार तया राज्य मरवारा को अल्पकालीन ऋण देता है। सरकार जितने ऋण जनता से मती है उनकी वसूली तथा भुगतान की व्यवस्था भा रिजवर द्वारा की जाती है। भारत सरकार का वतमान ऋण लगभग 77 अरब रुपये है। इससे स्पष्ट है कि ऋण व्यवस्था का पाप ही एक गम्भीर पाप है। रिजव को मरवारी ऋण व्यवस्था के लिए 2000 रुपय प्रति परोह मी दर पर शुन्य मिला है।
74 सलाहकार रिजव न वेद्र तथा राज्य सरखारो का आर्थिक सलाह कार है । मैंक में विभिन्न विषया के विरोपन नियुक्त क्यि जाते हैं । अत सरवार को जब भी मुद्रा किंग, ग्रामीण सास, न्यापार उद्योग, मूल्य अथवा अय किसी भी वाय से सर्वा धत सलाह लेनी होती है तो रिजव क उसके वारे म उचित सलाह देता है । समय समय पर रिजव बैंक के विशेषन सरकार के आदेशानुसार विभिन्न विभागा म काम करने के लिये जाते रहते हैं । 3 एक व्यवस्था का नियमन किसी भी देश के व्यापारिव को म प्राय जनता एव व्यापारिया को रक्म जमा होती रहती है। अनेक मध्यम वग ने परिवार अपनी सम्पूण वचत “ौँको म जमा करवाते रहते हैं । अत यदि मैं दोप पूण आर्थिक नीति अपनाते हैं तो उह हानि हो सकती है और परिणामस्वरूप को म रकम जमा कराने वाला को हानि होती है । इसलिये यह आवश्यक है कि सरकार या देश का पेद्रीय जैव व्यापारिक मेंका की ऋण नीति तथा अय क्रियाओ पर उचित नियत्रण रख ताकि जमा करने वालो को हानि न सके। भारत का रिजव . अनेन प्रकार से भारतीय गैंकों की कायवाही पर नियंत्रण रखता है जिसका सक्षित यौरा नीचे दिया जा रहा है। (क) लाईसेंस भारत म स्थापित होने वाले प्रत्यव' के लिय रिजय * को लाइसेंस के लिये प्रायना पत्र देना पडता है। रिजव व प्रत्यक व्यापारिक मैंक का निरीक्षण करवाता है। यदि र के धन का उचित प्रयोग हो रहा है और भैन की ऋण तथा विनियोग नीति उचित है तो रिजव क लाइसेंस दे देता है अयथा जनुचित काय करन वाले को को चेतावनी दे दी जाती है और यदि वह अपनी नीति में सुधार नहीं करते तो उह लाइसेंस देने से मनाही कर दी जाती है । इस पर गलती करने वाले बैंक को अपना काम वद कर देना पडता है। उपरोक्त दृष्टि से यह स्पष्ट है कि यदि किसी बैंक को लाइसेंस मिल गया है तो वह इस बात की गारटी है कि उसकी याथिक स्थिति तथा नीति ठीक है । यदि कोई लाइसेंस प्राप्त बैंक वाद म गलत नीति अपनाय तो चेता वनी देवर उसका लाइसेंस रद्द किया जा सकता है।
75 (ख) प्रवध रिजव गैर इस बात का ध्यान रखता है कि किसी बैंक का व्यवस्थापक, मचालक या अ य काई अधिकारी बैंक के कोपो का दुरुप याग ता नही पर रहा है। यदि ऐसा हो ता रिजव बैंक उम अधिकारी को अपने पद से अलग कर सकता है। उस व्यक्ति को पद से अलग करन के पूर्व रिजव बैंक उसे कारण सह्नि लिखित सूचना देता है । ऐसा व्यक्ति 1 वप तक किमी भी गैंक का कोई पद ग्रहण नहीं कर सकता। (ग) नकद कोष भारत के प्रत्येक यनुसूचिन को रिजव बैंक म अपना खाता रखना पड़ता है और उस साते मे अपनी कुल जमा रकम का कम से कम 3 प्रतिशत रखना पडता है । रिजव बैंक का यह यधिकार है कि यदि वह यावश्यक समझे तो जमा रकम को 3 प्रतिशत से बढा दे किन्तु यह वृद्धि 15 प्रतिशत से अधिक नहीं की जा सकती। (प) गाया विस्तार देश मा की शासाआ का विवाम उचित प्रकार से होना चाहिए ताकि कुछ थोड से स्थाना पर हो अधिकार को भी शासाएं पेद्रित न हो जाए और बय स्थान मेकिंग सुविधामा म वचित रह जाए । इस दृष्टि मे यह नियम बनाया गया है कि जो भी भैर किसी स्थान पर नई गाला खोलना चाहता है उसे रितवं गैर से अनुमति रनी पड़ती है। रिजव क यह दस लेता है कि अमुव स्थान पर मैं की गासा की आवश्यकता है या नहीं तया वह गासा मैक तथा जनता के लिए लाभदायक होगी या नहीं। इस प्रकार दा मे मैकिंग सुविधा का विस्तार उचित रूप म हा सरता है। (१) निरीक्षण रिजवर को अधिकार है कि वह किसी भी बैंक का वाह जर निरीक्षण करणे । तदनुसार रिजव में के अधिकारी प्रति वर्ष बारी-बारी कुछ में की जांच करत हैं । जिन मैंका में ऋण विनियोग अपवा जमानतों सम्बपी दोप पाए जाते हैं उनकी रिपोट रिजव बर या दे दी जाती है। रिजव में उन मेंगों को चेतावनी दता है दपा दोषा में सुधार करने के लिए पुष्ट समय दे देता है। दोष पूण नीति अपनान वानरों को अपना प्रगति + बारे में रिवर्व 16 मैंक को समय समय पर सूचना भेजनी पडती है। (च) अवसायन तमा विलोमन जो 3 रिजव बैंक की चतावनी पर भी कोई ध्यान नहीं देते रिजव क उनके विरुद्ध उच्च यायालय म प्राथना पत्र देवर उहें बादपरने का आदेश प्राप्त कर लता है। यदि रिजव 3। यह समझे कि अमुक की आर्थिक स्थिति कमजोर है तो रिजव मैंक उस मैं को किसी बड़े 3 से मिलाने की व्यवस्था कर सकता है। इस सम्बघ म वितीयन की योजना दोना सेंक मिल कर बना लते हैं या रिजव कि योजना बना कर दे देता है जिसका दोनो मैंक पालन करते हैं । (छ) खाते भेजना प्रत्येक अनुसूचित (Scheduled) क को अपने कार्यों का साप्ताहिक विवरण (Weekly Statement) रिजव और को भेजना पडता है । भारतीय किंग कम्पनी अधिनियम के अनुसार भारत म काम करने वाले प्रत्येक बैंक को अपना लाभ हानि खाता तथा आवडा (या चिटठा) 31 दिसम्बर की तिथि तक का बनाना पडता है और 31 माच तक उसकी तीन प्रतियां रिजव क का भजनी पडती हैं । इससे रिजवीर को देश की किंग सम्बधी प्रगति का ज्ञान होता रहता है। उपरोक्त बाता से यह स्पष्ट है कि भारतीय रिजव बक को देश के मैंकिंग सगठन पर नियत्रण रखन के व्यापक अधिकार हैं अत यदि वह इन अधिकारा का उचित रूप मे प्रयोग कर तो देश मे किसी भी बैंक के बाद होने की आशका नहीं होगी। 4 समाशोधन व्यवस्था गों के पास प्राय एक दूसरे पर लिखे हुए चक आते रहते हैं । प्रत्येक गैंक के प्रतिनिधि अपने पास आये चक एक स्थान पर ले जाते हैं जहाँ प्राप्ति तथा देनदारी अलग लिख कर शेप निकाल लिए जाता है। एक उदाहरण से यह बात समझ मे आ जायगी। मान लीजिए एक नगर मे दो बैंक क और ख है। क को स से 5000 रु लेने हैं और 4000 रु दने हैं ऐसी स्थिति म क क को कुल 1000 रु लेने रहे । इस प्रकार 9000 रुपये (5,000+4000) का भुगतान केवल 1000 रुपय मे ही सम्भव हो सकता है । यह 1,000 रुपया भी नकद देने की आवश्यकता नही क्योदि रिजद क म सब मैंको के खाते हैं बत रिजर्व कप के खाते मे 1,000 रपया नाम लिखा देगा और क बैंक के खाते में उतनी ही रकम जमा कर देगा। रिजव क भारत में समाशोधन गृहो वो व्यवस्था करता है । जहाँ रिजव मेंक की शाखाएं नहीं है वहाँ स्टेटौंक द्वारा इनकी व्यवस्था की जाती है। भारत में कुल 76 समासोपन गृह हैं जिनमें से 7 की व्यवस्था रिजर्व बोक परता है और मेष की व्यवस्था रिजव बैंक की ओर से स्टेट बँक द्वाग की पाती है। । 1935 म जव रिजवक की स्थापना हुई तब देश भर में केवल 4 समाशोधन गृह थे जिनको मस्या 1964 176 हो गई । समायोधन गृहों में 1951-52 मे कुल 28 करोड चको का ममोगोधन हुआ था जिनकी रकम लगमग 79 अरब रुपये थी। 1963-64 में चयो को सख्या 67 करोड हो गई और रकम बढकर 168 अरब रुपये हो गई। इससे समायोधन गृहो की प्रगति का अनुमान हो सकता है । 5 यकों का यक रिजर्व र मभी अनुसूचित नैरों की रकम जमा रमता है उनकी बावश्यातानुसार उधार देता है तथा उनसे प्रास बिलों की पटौती भरता है । रिजव मैं द्वारा राज्य सहकारी गैंको को भी ऋण दिए जाते हैं तथा 12 मास नर के कृषि विलों की कटौती की जाती है (इसे 15 मास तर की अवधि के दृषि बितो की टोली परन का अधिकार है)। इस प्रबार रिजव मैं देश के सभी वर्गों को की धन सम्बधी आवश्यकताओं पी पूर्ति परता है। 6 विदेगी विनिमय ध्ययस्पा केन्द्रीय सरकार तथा राज्य सरखारें भनेय प्रकार की वस्तुएं विदेश से आयात करती हैं । रिजव मैं इनवे लिए विदेशी मुद्रा का प्रय पपरता है । इसके अतिरिक्त भारत के प्राय ममी देशो म दूनायास हैं जिनके लिए रिजव मेंक विदशी मुद्रा की व्यवस्था परता है। रिजव में एक अलग विनिमय नियंत्रण विभाग (Exchange control department) है जो भारत की विलो विनिमय समाधी मार तथा सप पर नियण राता है यह विभा देश को विदेशी मुद्रा 78 सम्बधी आवश्यक्ताओं की पूर्ति करने के अतिरिक्त रपये की विदेशी विनिमय दर भी बनाये रखने की चेष्टा करता है। 7 सास नियंत्रण रिजव वक एक ओर तो यह ध्यान रखता है कि देश म रद्रा की मात्रा में आवश्यक्ता से अधिक वृद्धि न हो और दूसरी ओर यह साख की मात्रा का भी उचित रूप म नियमन करने की चेष्टा करता है। सास की मात्रा का नियमन करने के लिए वह निम्नलिखित रीतियां काम म लेता है (1) बक दर वर दर वह दर होती है जिस पर किमी देश का केन्द्रीय बक व्यापारिक बको को ऋण देता है अथवा उनके बिलों की पुन कटौती करता है। जब केद्रीय बद देसता है कि वि बहुत तेजी से उधार दे रहे हैं और इससे मूल्यो पर बुरा प्रभाव पड़ने का डर है तो यह बक दर बढ़ा देता है । इससे बैंकों को रिजव बैंक से ऊंची दर पर उधार मिलने लगता है अत वह भी अपन ऋणो पर ब्याज की दर बढा देते हैं। इससे ऋण महगे हो जाते हैं और लोग कम उधार लेने लगते हैं । जिन लोगो ने पहले ऋण ले रखे हैं वह भी ब्याज की दर बढ जाने से ऋण का कुछ भाग लौटाने लगते हैं। इस प्रकारक दर बताने से साख की मात्रा कम हो जाती है। जव रिजव क यह देखता है कि बाजार में उधार बहुत कम लिया जा रहा है और व्यापार तथा उद्योगो को तेजी से विकसित करना आवश्यक है ता वह अपनी बैंक दर कम कर देता है । इसका अर्थ यह है कि यापारिक बैंको को रिजव बैंक से ऋण सस्ते मिलने लगते हैं । अत व्यापारिक क भी अपनी उधार देने की दर गिरा देते हैं जिससे जनता व्यापारी तथा उद्यागपति अधिक रकम उधार लेने लगते हैं । अत देश म साख का प्रसार होने लगता है। इससे स्पष्ट है कि जेक दर वढाने से साख में कमी तथा क दर घटाने से साख की मात्रा में वृद्धि हो जाती है।) रिजव धक द्वारा प्रयोग भारत म रिजव क ने अब तक साख नियमन के लिये मैंक दर का पाच वार प्रयोग किया है और पाचो बार ही "क दर मे दृद्धि की गई है जो निम्न है 79 15 नवम्बर 1951 3 प्रतिगत से 35 प्रतिशत 16 मई 1957 35 प्रतिशत से 40 प्रतिशत 3 जनवरी 1963 40 प्रतिशत से 45 प्रतिशत 25 सितम्बर 1964 45 प्रतिशत से 50 प्रतिशत 17 फरवरी 1965 50 प्रतिशत मे 60 प्रतिशत कदर म इन पाचो वृद्धियो के मुख्य कारण दो रहे हैं (1) योजनाओ के व्यय के कारण देश म मुदा तथा माख प्रसार होना-इसे रोक्न के लिये मैं दर वाई गई। (2) बाजार में प्याज की दरा मे अत्यधिक वृद्धि होना-त्याजार तथा अधिकृत दर म निकटता लाने लिये दर बढ़ाई गई। (1) पुले यागार को क्रियाएँ कभी कभी रिजवी साख की मात्रा में कमी या वृद्धि करने के लिए एक और रीति मा प्रयोग करता है। जब उसे सास की मात्रा म कमी करनी हो तो वह बाजार में प्रतिभूतिया बेचना शुरू कर देता है गिहें मेंर सरीवरेत हैं। इससे राके पास नकद राशि कम हो जाती है क्यानि प्रतिभूतिया खरीदने पर वह रिजव को नगद भुगतान करत हैं। बत मैकामी सास प्रसार की शक्ति कम हो जाती हैं और बाजार में सास की मात्रा गिरने लग जाती है। जब रिजव क बाजार म साम की मात्रा म बदि करना चाहता है तो वह प्रतिभूनिया परीदना गुरुवर दता है । मैंव यपने पाम से प्रतिभूतियां अपने सगते हैं और उनके नाम मोपो में वृद्धि हो जाती है वावि प्रतिभूतिया येचने पर रहें धन राशि प्राप्त होती है । आ वह पाहतो तया व्यापारियों आदिको अपिर ऋण देने साद हैं । इस प्रकार सारा की मात्रा में वृद्धि हाने लगती है। भारत म रिजव मैर को प्रतिभूतिया सरीप्ने तया वैचन का अधिकार है मोर व्यापारिस में वो अपनी सम्मति पाएर मा अनिवास म्प में हर- जारी प्रतितिया - मगाना पड़ता है। मा गत वर्षों में रिजर्व कराने 80 पाजार की प्रियाओं का सपल प्रयोग हुआ है। रिजव व स्वय हर ममय लग मग 200 करोड़ रुपये की राशि प्रतिभूतिया म लगाये रखना है। पिछले 2 3 वर्षों मे पुले बाजार की क्रियाए मुछ गियिल हो गई है क्योंकि रिजन व अमरीतियों का प्रयोग अधिर वरन लगा है। (ii) परिपतनशील दोष भारत के प्रत्येर अनुसूचिन कि अपनी कुल जमा रकम का कम से कम तीन नि भाग रिजव कम रखना पडता है। रिजव बैंक इस अनुपात को 3 से 4 अथवा अपित प्रतिशत बद सकता है और यह यदि 15 प्रतिशत तक हो सकती है। पदि रिजव साख की मात्रा कम करना चाहे तो वह व्यापारिष को को आदेश दे सकता है कि वह अमुक लिपि में उसके पास अपने बोपो का 3 के स्थान पर 4 5 या 6 प्रतिशत जमा कराए। इस वृद्धि से मैंको के रिजव मे अधिक नकद राशि रखनी पडगी जिसमें उनके नगद कोषों में कमी हो जापनी और उनकी सास निर्माण की दाक्ति भी कम हो जायगी। इसके विपरीत यदि रिजव सास की मात्रा में वद्धि करना चाहे तो वह परिवतनशील पोषानुपात कम (5 से 4 या 3 आदि) र सकता है। इससे का के नक्द कोपों मे अधिक राशि रहेगी और पे अधिष साख का प्रसार पर सरेंगे। पद्यपि रिजवर को व्यापारिक बैंको से अधिक नवद कोष मांगने का अधिकार है परन्तु उमो अभी तक इस अधिकार का प्रयोग नहीं किया है। (av) चुने हुए साल निपत्रण कभी कभी रिजव क व्यापारिक का का यह आदेश दे देना है कि वह अमुक रस्तु की जमानत पर कम उधार दें या उधार देने से बिल्कुल मना कर देता है। ऐसी स्थिति म बाजार म साक्ष की मात्रा कम हो जाती है। गत पदह वर्षों में रिजव ने समय समय पर खाधाम चीनी, मूगफली, रुई, पटसन आदि वस्तुओ की जमानत पर उधार देने में अनेक प्रकार के प्रनिबध लगाये हैं जिनके कारण साद की मात्रा वदि पर रोक रही है।
81 (v) नतिक अनुनय रिजव बैंक के गवनर द्वारा 1956, 1958, 1960 तथा गत वर्षों में कई बार भारतीय बैंका को पत्र लिखकर इस बात की इच्छा प्रकट की गई कि वह साख की मात्रा में कम प्रसार करें। कई बार पत्रकार सम्मेलनो, बैंका के सम्मेलनो तथा गोष्ठियो में भी साख की मात्रा मे कमी का अनुरोध किया गया। इन अनुरोधो का यथेष्ट अच्छा परिणाम निकला है। (vi) प्रचार केद्रीय बक पत्र पत्रिकाओं अथवा समाचार पत्रो मे प्रचार द्वारा भी बका की नीतियो पर प्रभाव डालते हैं। कभी कभी वेद्रीय बन के उच्च अधिकारी कुछ लेख या वक्तव्य प्रकाशित कर दते हैं जिनसे बको को केन्द्रीय वन' की नीति का पता चल जाता है। रिजव बक इस प्रकार के प्रचार के लिये एक मासिक पत्रिवा ( Reserve Bank of India Bulletin) निकालता है किन्तु दुर्भाग्य से उमका मूल्य बहुत ऊचा है मत उसका प्रचार बहुत नहीं है। (vi) सोधी कायवाही रिजव वर को यह अधिकार है कि यह विसी भी बन को कोई भी आग दे सकता है और उस आदेश का पालन न होने पर उस वक को बन्द किया जा सकता है या उस पर जमा लेने से रोक लगाई जा सस्ती है। रिजव बर को इस प्रकार कायवाही क्सिी वक के विष्ट करने की आवश्यक्ता नहीं पडा है क्योंकि सभी वक रिजव वर की सास नीति का पालन करते रहे हैं । (vi) साखा रानिग कभी भी केद्रीय वर ऐसा नियम बना देता है वि चालू थप में प्रत्येक वर यो गत वप की 60, 70 या 80 प्रतिशत रकम ही उयार मिल सरेगी। यह व्यवम्या राशनिंग व्यवस्था कह सानी है। रिजव वर द्वारा इस रीनि वा प्रयोग 1960 के पश्चात् अनेर वार दिया गया है परन्तु उसमें विशेषता यह रही है कि उसने प्रत्यक वक के वोटा (अम्पस) निर्धारित कर ये और अपने कार से अधिक ऋण मागने वाले को अधिर म्याज देने पर वाघ्य दिया गया । गिव बा और प्रामीण साप भारत एक पृपि प्रधान देश है और पिकी गरम गम्भीर गमस्या यह है कि किसान को रेती में सुधार करने के 82 लिए समय पर उचित मात्रा में पूजी नहीं मिलती। भारत मरकार इस कठिनाई प्रति जागरुक थी अन 1935 मजद रिजव बक की स्थापना वी गई तभी से उसके द्वारा वृपि अथवा ग्रामीण अथ व्यवस्था के लिए सस्ती साख मुलभ कराने की व्यवस्था की गई थी। रिजव बक मे एक कृषि सास विभाग है जिसका काम कृषि साख की समस्याओ वा अध्ययन करना है । इस विभाग में वृषि साख के जानकार विरोषना की नियुक्ति की जाती है जो कृषि साख के बारे में मरकार तथा अय सस्थाओ को सलाह देने का काय करते हैं। रिजव वक' अनेक प्रकार से ग्रामीण सास की सुविधाएं देता है । (1) कृषि बिल रिजव बक द्वारा कृषि के लिए समस्त साख राज्य सहकारी वका के माध्यम से दी जाती है। राज्य महकारी वक कृषि के लिए 15 मास तक के विलो पर उधार ले सकते हैं पर तु व्यवहार म यह विल 12 मास के लिए ही लिख जाते हैं। इस सुविधा के अतगत कृषि समितियो को माल बचने अथवा सवारने के लिए भी ऋण दिये जा सकते हैं। यह ऋण बक दर से आधा प्रतिशत कम पर दने की “यवस्था है। (2) कुटीर उद्योगों को ऋण रिजव वन अनुमोदित लघु तथा कुटीर उद्योगो को माल उत्पादन करने तथा बेचने के लिए लिखे गये विला की कटौती करता है। यह बिल भी 12 मास तक के हो सकते है। इस प्रकार के ऋणो का अभी तक मीमित लाभ उठाया गया है क्योकि इसके अतगत अभी तक केवल हाथकर्घा उद्योग ही ऋण देन के लिए स्वीकृत है । (3) कृषि ऋण कोप सम् 1956 म कृषि साख की यवस्था लिए रिर्जा बक द्वारा दो कोप निर्मित किये गय जा निम्नलिखित हैं (क) राष्ट्रीय कृषि साख (दीघकालीन) वोप-इस कोप म प्रारम्भ मे 10 करोट रुपये डाले गय और बाद में प्रति वप 5 करोड डालने की व्यवस्था वी गई । इस कोप का प्रयोग निम्नलिखित कार्यों के लिए दिया जाता है। (I) महारी सस्थाना की पूजी सरीदने के लिए राज्य सरकारो को 20 वष तक की अवधि के ऋण देना।
83 (1) पि सास के लिए राज्य सहवारी बैंकों को 15 माम से 5 वप तक की अवधि के ऋण देना। इन ऋणो के मूलधन तथा व्यास के भुग- नान की राज्य सरवारा द्वारा गारटी शवया है। (1) वैद्रीय भूमि वधक बका को 20 वप तक के ऋण देना। (11) केद्रीय भूमि वधक वकों के ऋण पत्र खरीदना । इम कोष मे 26 माच 1965 तक 86 रोड रुपये जमा किये जा सुके हैं तथा उसम से निम्नलिमित रासिया उधार दी जा नुकी हैं। (1) राज्य सरकारों को ऋण 2808 करोड़ रुपये (2) राज्य सहकारी बैंक 1043 (3) भूमि पर वका दे ऋण पत्र 416 " " " " योग 4267 (स) राष्ट्रीय पि सास (स्थिरीररण)ोप इस पोप में प्रारम्भ में एक करोड रुपये डाले गये थे। इसका उद्देश्य सहकारी बका को संक्टवान म आर्थिक सहापना देना है। जब बाद मूखा मयवा अय पारणा से कृषि पगल नष्ट हो जाती हैं तो महारी वका द्वारा पूपि के लिय दिए गए ऋण वमूल नही हा सरस । अत रिजप व इम कोष म म सहकारी बैरों यो यथेष्ट रागि उधार दे देता है। इस कोप म १ वरो रुपये जमा हैं विन्तु अमी तर उनका कोई प्रयोग नहीं दिया गया है। (4) पामोल ऋण पत्र मम् 1948 मे ही रिजव बैंड द्वारा भूमि वायद यों ये ऋश पर सरीदे जा रह है रितु 1957-58 म रिजव वंदन ग्रामीण प पत्रा की एक योजना बारम्भ की हो यहुत महत्त्वपूर्ण है। इस योनगा रे ग भूमिद पर बर7 ऋण पर भी निकाल सरत हैं। इन ऋण पत्रों को य िजनता या पवाय गरोदर तो उनम कुछ अधिक राति रिजवस गरीर लेता है। इन प्रशाररित्रद बापामीण बनवा द्वारा पामीण सारा में महयोग देने के लिए प्रामाह्न देना है।
84 पुल साख रिजव वक द्वारा कृषि साख के लिए 1963-64 तक 302 वरोड रपय उधार दिए गए थे जिनमें से वप के अत में 135 करोड रपये की रकम गेप थी। प्रौद्योगिक वित्त परोक्ष व्यवस्था गत वर्षों में उद्योगो को ऋण देने वाली अनेक सस्थाओ की स्थापना हुई है जिनमे औद्योगिक वित्त निगम, औद्योगिक साख एव विनियोग निगम तथा राज्य वित्त निगम प्रमुख हैं । मभी कुछ समय पूर्व ही औद्योगिक विकास बक की स्थापना हुई है। इन सब निगमो म रिजव यक ने लगभग 4 वरोड रुपये की पूजी खरीद रखी है। औद्योगिक विकास बक मे तो प्रारम्भिक 10 करोड रुपये की पूरी पूजी ही रिजव बर द्वारा लगाई गई है। इस प्रकार बडे उद्योगो के विकास म रिजव बर अप्रत्यक्ष रूप में ही सहयोग देता है। लघु उद्योगों के लिए भारत की अर्थ व्यवस्था मे लघु उद्योगा का अत्यधिक महत्त्व है क्योकि लघु उद्योग कम पूजी से अधिक व्यक्तियो को रोजगार दे सकते हैं। लघु उद्योगा को सस्ती पूजी सुलभ कराने के लिए एक जुलाई 1960 को रिजव पर ने एक योजना का श्रीगणे क्यिा जो सास गारी योजना कहलाती है। इस योजना के मतगत 94 वकों तथा वित्त सस्थाओ को यह अधिकार दिया गया है कि वह लघु उद्योगो को ऋण दें। इन ऋणो की गारटी भारत सरकार की ओर से रिजव वर का गारटी सगठन करता है । इसकी व्यवस्था इस प्रकार है जब क्सिी लघु इकाई को ऋण की आवश्यकता होती है तो वह । क्सिी अनुमोदित बक या वित्त संस्था को ऋण के लिए प्राथना पत्र दे देती है। वक इस प्राथना पत्र पर विचार कर अपनी सिफारिश के साथ गारटी सगठन (जो रिजव बक के आधीन काय कर रहा है ) को भेज देता है। गारटी सगठन की स्वीकृति आने पर ऋण दे दिया जाता है। यदि इस ऋण पर कोई हानि 85 हो तो उसका आधा भाग ऋण देने वाला वै तया पेप माषा माग गारटी संगठन सहन करता है। गारटी योजना आरम्भ में केवल 22 जिलो मे आरम्भ की गई थी किन्तु 1961 मे 30 और जिलो में लागू कर दिया गया। एक जनवरी 1963 मे इस सार देशम लागू कर दिया गया है। इस योजना के अतगन 7 अप तक की अवधि के प्रण दिये जा सकते हैं । प्रगति सास गारटी योजना के अतगत अब तक लगभग 16 करोड रपये पे ऋण दिये गये हैं। इन ऋणो पर सरकार को विशेष हानि नहीं उठानी पड़ी है। रिजर्व बैंक के विभाग वाप सचालन की दृष्टि से रिजव यक का वाय बनेर विभागो म बटा हुआ है जिनका पार्य भार विसी उप-गवनर क हाथ में है । इसके मुख्य विभाग निम्नलिखित हैं (1) नोट निगमन विमाग रिजर्व दक द्वारा जिननी राशि के नोट निवार जाते हैं यह सब नोट निगमन विभाग द्वारा निकाले जाते हैं। इनका गोरा प्रति सप्ताह प्रगित वर दिया जाता है। (2) दाग दिमाग यह विभाग को सपा सरकार की वरिंग याद पानाआ पाममाधान करने की चेष्टा परता है। हम विभाग के बगलोर, सम्बई लात्ता, कानपुर महास नागपुर तथा नई दिल्ली में सात कायालय है जिनका प्राय एष एवं व्यवस्थापन पे अधीन है। इस विभाग के पार उपविभाग है जो निम्नलिखित हैं (1) सार्वजनिर लेगा विभाग को सरकारी एन देन का हिसाव रसता है। (1) सापजानिए कण विभाग जो ससार ऋणो दोध्ययस्था सपा वामौकीलाई।
86 (11) जमा खाता विभाग जो रिजव बक के सातो को देख रेख करता है। (iv) प्रतिभूति विभाग जो रिजव बक म जमा की गई प्रतिभूतिया की सम्हाल तथा प्रय विक्रय की व्यवस्था करता है। (3) विनिमय नियत्रण विभाग यह विदेशी विनिमय की आय तपा व्यय पर नियत्रण करता है। विदेशो को भेजी जाने वाली प्रत्येक राशि की अनुमति इस विभाग से प्राप्त करना आवश्यक है। इसके कार्यालय बम्बई, क्लत्ता कानपुर मद्रास तथा नई दिल्ली म है । (4) वकिंग विकास विभाग यह विभाग दा म बकिंग सुविधामा के विस्तार ( शाखा आदि ) घन प्रेषण, अल्प बचत योजना प्रशिक्षण तथा बको की दनिक समस्याआ क समाधान की चष्टा करता है। (5) प्रौद्योगिक वित्त विभाग यह विभाग देगकी औद्योगिक वित्त सम्बधी सभी समस्याओ का समाधान करने की चेष्टा करता है। यह राज्य वित्त निगमा तथा अय सस्थाओ का निरीक्षण करता है तथा उह सहायता करने के लिय सुझाव देता है। (6) कृषि साख विभाग यह कृषि साख सम्बधी अनुसंधान करता है तथा उसके परिणाम प्रकाशित करता है । गत वर्षों स इसन कृषि तथा ग्रामोद्योगो और माल गोदामा के विकास का काय भी अपने हाथ में ल लिया है। (7) बकिंग सचालन विभाग इस विभाग का काय बका का समय समय पर निरीक्षण करना है। निरीक्षण के द्वारा ही भारत के व्यापारिक बैका का नियंत्रण होता है । (8) प्रायिक विभाग यह विभाग भारत की आर्थिक समस्याओ पर गोध काय करता है तथा सरकार को उचित सलाह देता रहता है। (9) गोष एव साख्यिकी विभाग यह विभाग मुद्रा, अतर्राष्ट्रीय वित्त, बक, ग्रामीण अथव्यवस्था तथा उद्योग एव व्यापार से सम्बधित 87 समस्याओं पर अनुसंधान करता है और उमरे परिणाम रिजव वक् को मासिक चुलैटिन म प्रकाशित करता है। इन सभा क्षेत्रों से सम्बधित विस्तृत प्राकडे भी सग्रह किये जाते हैं और दुटिन म प्रकाशित होते हैं । रिजव बफ के वजित काय रितद बर द्वारा निम्नलिखित काय नही क्यि जा सकते 1 जनता से रकम जमा नहीं कर सकता। 2 सरकार अथवा वनों से प्राप्त जमा पर ध्यान नहीं दे सकता। 3 अचल समत्ति की जमानत पर ऋण नहीं दे सकता। 4 व्यापार अयवा व्यवसाय म भाग नहीं ले सकता। 5 कम्पनिया क मायादि नहीं खरीद सकता। एक राष्ट्रीय सस्था हाने में नात रिजव बक का दायित्व वहन गम्भीर है अत यह सब व धन उचित एव स्वाभाविक है। रिजय बर को सफ्तताए रिजव बर को निम्नलिखित दिशामा म यपष्ट सफ्नता मिली है 1 पृपि मास की मुविधाएं बहुत बडाई गई है जिसमे वृपि तपा प्रामाधागा तया लघु उद्योगों को बहुत लाम हुआ है। 2 औद्यागिक विकास में बहुत सहायता मिली है। 3 यरिंग सुविधामों का विकास हुआ है। 4 समाधोपन गृहों को स्थापना से चर्चा का प्रयाा वडा है । 5 गत यौ म अकिंग प्रणाली हट हुई है। प्रसफलताएँ रिजव वैर कई दिशाओं में विशेष सफल नहीं हुआ । यह गिा निम्नलिखित है 1 स्पयरे मूर मरािवट को नहीं रोक सका है। गत कुछ वर्षों में पर दो दिगो विनिमय दर म बल गिरावट आई है।
8 2 रिजर्व बक वस्तुओं के मूल्या मे वृद्धि नहीं रोक सका है । गत 10 पर्षों में वस्तुओ मे के मूल्या म लगभग 50 प्रतिशत वृद्धि हो गई है जिसस जनता को बहुत कष्ट हुआ है। 3 विदेशी विनियम या नियत्रण करने म रिजव बक को यथेष्ट सफलता नहीं मिली है क्योकि विदेशी मुद्रा को अत्यधिक चोरी होती है और लोग यनुचित दवाव दारा विदेशी मुद्रा के परमिट प्राप्त कर रेते हैं। इसके विपरीत कभी कभी उचित कामा के लिए भी विरेशी मुद्रा प्राप्त करने म कठिनाई होती है। उपसहार प्रस्तुत विवरण मे रिजव वक के कार्यों का महत्त्व स्पष्ट होता है । वास्तव म रिजव वक ने दा की मुद्रा तथा बकिंग व्यवस्था को काफी चतुराई से संचालित किया है। अनुभव के अभाव में कुछ कमिया रह जाना स्वामाविक है अत कुल मिलाकर यह कहना सवथा उचित है कि रिजव कर अपने काय म यथेष्ट सजग एव सफल रहा है । अभ्यास के प्रश्न 7 1 रिजव बक के सगठन पर सक्षिप्त टिप्पणी लिखिय । 2 रिजव वक के राष्ट्रीयकरण के क्या कारण थ? क्या आप उन कारणों से सहमत हैं? 3 सही उत्तर को चिहावित कीजिय (क) रिजद ब के संचालक मंडल में क्तिन सदस्य हैं ? 16/20/15 (स) उनमे से क्तिन डिप्टी गवनर हैं 2/5/3/4 (ग) गवनर का कायकाल क्तिना है 4 व 5 वष (घ) अय सचालकों का कायकाल कितना है 5 वष 3 वर्ष,4वष (ङ) रिजव वक को पूजी कितनी है ? 5 करोड रु, 10 करोड रु 4 रिजर्व दा के क्या काय हैं ? उनमे से दो पर विस्तृत नोट लिखिये। 5 रिजव बक को भारतीय बक व्यवस्था पर नियन्त्रण के क्या अधि कार है तया वह उनका किस प्रकार प्रयोग करता है 7 6 रिजर्व बैंक तथा सरकार के सम्बध पर एक नाट लिखिये। 7 रिजव वन द्वारा साख नियत्रण के लिये क्या साधन अपनाये जाते हैं, स्पष्ट विवेचन कीजिये । 8 रिजव बक का ग्रामीण साख मे क्या योगदान है, विवेचन कीजिए। 9 औद्योगिक सस्थाओं के लिए धन की व्यवस्था करने में रिजव वक ने क्या किया है, स्पष्ट लिखिए। 10 रिजव बक अपने उद्देश्यो मे यहां तक सफल हुआ है स्पष्ट कीजिए। 11 उत्तर लिखिये। (क) बैंको के निरीक्षण का भार रिजव ब क के विभाग पर है। (स) फुल नोट निगमन के पीछे रिजव वक प्रतिभूति जमा रखता है जिसमे स्वण तथा विदेशी विनिमय होना आवश्यक है। (ग) रिजव बर फेवल वको को शरण दता है। (प) रिजर्व पर एक पत्रिका प्रकाशित करता है । (३) कृषि सास की सहायता के लिए रिजव व मे (1) (2) नामी दो बोप बनाये गये हैं।
अध्याय । भारतीय चलन का इतिहास (History of Indian currency) भारत में प्राचीन काल से ही स्वण मुद्रा चलन में थी कि तु मुगलो तथा अग्र जा क शासन पान म चादी की मुद्राओं का विशेष प्रचार हुआ। ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने सन 1835 म सारे देश में 180 ग्रन वजन ( एक तोला ) वा चादी का रपया प्रचारित कर दिया। 1892 ई. में चादी रुपये की ढलाई वद करनी पड़ी क्योकि चादी के अतर्राष्ट्रीय मूल्यों में गिरा वट आ गई। ढलाई बद करने स मा रपय की स्थिति पुन ठीक हो गई और सप 1902 के पश्चात् चादी की स्वतत्र मुद्रा ढलाई आरम्भ कर दी गई । इस समय रुपय को विनिमय दर 1 मिलिग 4 पस चल रही थी किंतु प्रथम युद्धकाल म भारत के निर्याता म अत्यधिक वृद्धि होन के कारण विनिमय दर 2 शिलिंग 102 पस तक पहुच गइ। फ्लत विगटन स्मिथ समिति ने ( 1920 म ) स्पय की विनिमय दर 2 गिलिंग स्वण ( अर्थात् 2 शिलिंग 103 पस स्टलिंग ) निश्चित करने का सुझाव दिया। सरकार ने इस सुभाव को मान लिया। कितु ऊची दर निश्चित करने से दश के नियातो को बहुत हानि पहुची जिससे विनिमय दर गिर कर 1 शिलिंग 4 पस से भी नीच आ गई। 1925 म इगलड ने स्वणमान अपना लिया। इन परिस्थितियो म भारत के सामने तीन मुख्य समस्याए थी 1 भारतीय रुपये की विनिमय दर क्या हो? 2 भारत किस प्रकार का मुद्रा मान अपनाय 3 भारत मे मुद्रा यवस्था का सचालन करने के लिए एक केद्रीय की आवश्यक्ता है या नहीं। तथा 91 इन सब समस्याओ के सम्बध सुभाव दने के लिए भारत सरकार न अगस्त 1925 म एडवह हिल्टन यग की अध्यक्षता में एक आयोग नियुक्त दिया। हिल्टन यग प्रायोग के सुझाव हिल्टन यग आयोग ने 1926 में अपना रिपोट प्रस्तुत की जिसमे निम्नलिखित सिफारिगें की गई थी। (1) स्यए धातु मान (Gold Bullion Standard) हिल्टन आयोग के सामने यह समस्या थी कि देश में स्वण विनिमय मान, स्टलिङ्ग विनिमय मान स्वण मुद्रा मान तथा स्वण धातु मान म म कौन मी मुद्रा व्यवस्था अपनाई जाय। आयोग । पहली तीन व्यवस्थाओं को अस्वीकार कर शिया और देश में स्वण धातु मान अपनान की सिफारिश की। स्वरा विनिमय मान के दोप जहाँ तक स्वण विनिमय मान और स्टलिङ्ग विनिमय मान वा प्रश्न पा, यह दोना व्यवस्थाएं समान थी क्योकि स्टलिङ्ग स्वण पर आधारित था। स्वण विनिमय मान सस्ता तपा सोचदार था परन्तु आयाग ने उसे निम्नलिखित वारणा में उचित नही बताया (4) यह सरल नही था क्यापि इसका संचालन लिङ्ग तथा स्पर ड्रापटी दारा दिया जाता था। (स) इस चलान के लिए दो कोष रसन पडत थे । (ग) यह व्यवस्था स्वय सचालित नहीं थी। (प) इसम जनता का विश्वास नहीं पा क्यापि मुद्रा के बदले स्वण पवल विदेशी भुगता के लिए मिलता था। () इसके अन्तर्गत रुपय का गठय पन सलिङ्ग से या अन स्टलिग म हो पाले परिवतना या रुपये पर प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता पा। पल मुद्रा मान मो अनुपयुक्त हिल्टन आयोग ने स्वभ मुदा मान को भी भारत के लिए अनुपयुक्त राममा पोषि 92 (अ) इसम सोन के सिक्के चलन में रहत थे अत वह बहुत खर्चीला था। (ब) यह बहुत बेलोचदार था और मुद्रा को मात्रा आवश्यक्तानुसार बढाई नहीं जा सकती थी। उपरोक्त कारणा से यायोग ने स्वण धातु मान (Gold Bullion Standard) को ही श्रेष्ठ माना । वास्तव में इङ्गलड ने स्वण धातु मान अपनाया था अत आयोग ने भारत के लिये भी यही मान अपनाने की सिफा रिश की । सरकार ने इसे स्वीकार कर लिया। स्वण धातु मान के अन्तगत स्वण का मूल्य 21 5० 3 आने 10 पाई (21 24 रुपय) प्रति तोला घोषित कर दिया गया और ससार इस मूल्य पर स्वण खरीदने और बेचने के लिये बाध्य थी कि तु शत यह थी कि 400 औंस (1065 तोने) से बम स्वण खरीदा या वैचा नहीं जा सकता था । यह मात्रा भी स्वण के 40-40 औंस के टुकडो में दी जा सकती थी। साम इस प्रकार देश में एक ऐसी मुद्रा व्यवस्था स्थापित की गई जिसम स्वण मुद्रा के सब गुण वितु एक भी अवगुण नही था । यह बात स्वण धातु मान का निम्नलिखित विशेषताओ से स्प हो जाती है (1) इसम मुद्रा स्वण मे परिवतनशील थी अत जनता को इसम पूरा विश्वास था। (1) मुद्रा प्रसार का भय नही था। (11) मुद्रा स्टलिंग पर निभर नहीं थी। (iv) मुद्रा के मूल्य मे उतार चढाव आने की आशका नहीं थी। (v) स्वण मुद्रा चलन में नहीं रहती थी अत स्वण घिस कर नष्ट होने की आशका नहीं थी। (vi) स्वण कोष म जमा रहता था अत भविष्य मे स्वण घातु मान अपनाया जा सकता था। घ्यवहार में स्थरण धातु मान यद्यपि सरकार ने यह घापणा की थी कि वह जनता द्वारा मागे जाने पर 21 रु. 3 थाने 10 पाई प्रति नोला की 93 दर से स्वण देगी परन्तु व्यवहार म वह सदा टलिग ही देनी थी अत वास्तव म स्वण पातु मान के स्थान पर स्टलिंग विनिमय मान की स्थापना हो गई थी। (2) विनिमय दर आयोग के सामने दूसरी ममस्या यह थी कि रुपये की विनिमय दर क्या निश्चित की जाय । इस सम्बध में आयोग के सदस्यो मे ही दो माथे । एक वग का यह क्यन या कि रुपये की विनिमय दर 1 गिलिंग 6पस रखी जाय जबकि दूसरा पक्ष 1 शिलिंग 4 पैस की दर का उचित सममता था। दोनों पक्षो ने रुपये की विनिमय दर के सम्बन्ध में अपने अपने तर्क प्रस्तुत किये जो निम्नलिम्वित थे 1 शि6.के पक्ष मे तक | 1 4 प के पक्ष मे तक (1) स्वामाविक यह दर 2-3 (1) 1 T 6 प की दर पप से स्थाई हो गई थी अत यह | स्वाभाविप नहीं है क्योंकि इसे सरकार स्वाभाविक दर है। इसी दर पर मूल्य द्वारा जोड-तोड पर बनाने की चेष्टा तथा मजदूरी आदि स्थिर हो चुके हैं की गई है। इसके विपरीत 16 पस अत यदि इसम परिवतन किया गया | की दर 30-40 वर्षों तक स्थिर रही तो बहुत गहवर होने की आशका है। है । मन स्वामाविक दर वही है । (2) मूल्यों में समानता (2) 164म की दर के समर्थक पर वस्तुओं के मूल्य अन्तर्राष्ट्रीय स्तर | सर पुरषोतम दास ठाकुरदास ने मावडे परमा गये हैं और इसमें परिवतन देकर यह सिद्ध करन की चेष्टा की परने पर यह साम्यता नष्ट हो जायगी भारतीय र अन्तर्राष्ट्रीय मूल्पा के बत 18 पस यो दर म कमी नहीं को समान नहीं पाए हैं यत उनका गिरना जानी चाढेि। इसरे माय यह भय स्वाभाविक है। इसलिए 16 पंस की भी प्रकट दिया गया पिर मरमी दर हो अपनाई जानी चाहिय । ने पर देशम पापात होने वाली बगुमाकर 125 प्रतिशत पद 94 (3) विदेशी विनिमय 18 (3) 16 पस की दर के समथकों पसकी दर के पचपातियो का क्थन न यह मत प्रकट किया कि ऊ ची दर था निकची दर रसने से भारत ! रखने स देश के निर्याता को बहुत सरकार ब्रिटिश सरकार को जो गृह | हानि होगी और आयात बढेंगे अन शुल्व' (Home charges) देती है | विदेशी विनिमय की समस्या बहुत वह रपयो म कम देना पडेगा । इसस जटिल होने की आशका है । देश की विदेशी विनिमय की स्थिति में सुधार होगा। (4) ठेके तथा ऋण के सौदे (4) 16 पस के समथको का आयोग के अधिकतर सदस्यो का मत। यह मत था कि 18 पम की दर पर था विगत 2 3 वष म माल आयात | बहुत अधिक सौदे नही हुए हैं। इसके तथा ऋण के जो सौदे हुए हैं यह 18 | विपरीत देश के निर्यात कम होने से पस की दर पर हुए हैं अत दर 16 भारत से स्वण निर्यात की मात्रा बढ पस कर देने से भारत के आयात करने जायगी और दश को हानि होगी। वाना को अधिक रुपये चुकाने पडेंगे। (5) चांदी को मुद्रा सुरक्षा (5) 16 पस के समथकों का 18 पस के ममथकों का मत था कि कहना था कि विनिमय दर वो सरकारी यदि विनिमय दर 16 पस कर दी। दवाव तथा नीति द्वारा ऊँचा रखा जा जाय तो चादी का भाव 43 पस प्रति / रहा है यत इसम गिरावट गाना स्वा औंस से अधिक होते ही लोग स्पय की | भाविद है । यदि दर 16 पस ही रखी मुद्रा गना कर चादी बेचने लगेंगे। जाय तो उसमे कोई गिरावट नहीं इसके विपरीत विनिमय दर 18 पैस आएगी और रुपये के गनाने का प्रश्न रहने से चाटी का भाव 40 पस प्रति ही नही उठेगा। आँस होने तक रुपया सुरक्षित रहेगा। सरकार ने इन तों के आधार पर आयोग के बहुमत की मिपारित को स्वीकार कर लिया और रुपये की विनिमय दर 1गि 6पम निश्चित कर दी गई।
95 3 रिजव यक आफ इण्डिया हिल्टन यग आयोग की तीसरी महत्वपूर्ण सिफारिग यह थी कि भारत म मुद्रा तया वकिंग व्यवस्था का ठोक प्रकार संचालन करने के लिये एक वेद्रीय ब की स्थापना करनी चाहिये जिसका नाम रिजव व आफ इण्डिया रपा जाय । इस बर को नोट निकालने वा एकाधिकार मिलना चाहिये तथा इस पर वको नियमन का दायित्व भी होना चाहिये । सरकार ने इस विचार का भी स्वीकार कर लिया और भारत को विधायिका ममा म रिजव व विल प्रस्तुत किया। दुर्भाग्य से इस विल का भारी विरोध हुआ और यह पास नहीं हो सका । 1934 म यह बिल फिर विधायिका समा म रखा गया और पास हो गया । इसके पलस्वरूप 1 अप्रैल 1935 से रिजव धक ऑफ इण्डिया को स्थापना हो गई। स्टलिग विनिमय मान को स्थापना यद्यपि हिल्टन-यग आयोग ने दरम स्वण धातु मान को स्थापना का मुभाव दिया था और सरकार ने उसे स्वीकार भी कर लिया था परन्तु व्यवहार में सरकार सदा स्वण के स्थान पर टलिंग ही देती पी। इस प्रकार वास्तव स्वण धातु मान के स्थान पर देग में टलिंग विनिमय मान स्थापित हो गया था। जब तक इङ्गलहम स्वण मान या स्टलिग विनिमय मान तथा स्वण धातु मार म कोई असर नही था परन्तु 21 सितम्बर 1931 को इंगलड ने स्वण धातु मान का त्याग कर दिया भारत के इगल मे बहुत गहरे व्यापारिक सम्बध ५ यत भारत सरकार ने रुपये या सम्बध मलिंग से बनाय रखनका निश्चय दिया। इस प्रकार भारत म सम्पूण स्टलिग विनिमय मान पो स्थापना हो गई। कोका निर्यात पप पा सम्मघ मीषा स्टशि से जोड़ने के कुछ ममप पचाव ही इगलड म स्वण मूल्या म वृद्धि होनी आरम्भ हो गई अतः भारत से भारी मात्रा में सोना विदेशी यो निर्यात हाता आरम्भ हो गया। भारत की जनता न सरकार में स्पण निर्यात गेक्न का अनुरोप दिया नयोति स्वण निर्यात मे भारत को कई हानियां हो रही थी जिसमें मुम्प निम्नसिमित है 1 स्वण निर्यात में भारत में स्वण मानदेदापारा म्पापितभरने की भाा विीन होती जा रही यो । 2 मीकि 96 3 स्वण के बदले स्टलिंग मिल रहा था जिसका मूल निरतर गिर रहा था। सरखार ने उपरोक्त विसी तक को स्वीकार नहीं दिया बल्कि स्वण निर्यात के पक्ष मे बहुत से तक प्रस्तुत क्येि जो निम्नलिखित थे । 1 स्वण प्राय आर्थिक सकट से छुटवारा प्राप्त करने के लिये जमा दिया जाता है अत यदि जनता आर्थिक सस्ट ने समय उसका उपयोग करे तो यह उचित ही है। 2 स्वण निर्यात से भारत का विदेशी भुगतान सतुलित हो रहा है जिसस रुपये की विनिमय दर स्थिर रहने की आशा है । 3 व्यथ म भूमि के नीचे पड़ा हुआ स्वण उपयोगी कामा म लगने के लिये बाहर आ रहा है यह सवथा उचित ही है। 4 स्वण निर्यात से भारत को अपने विदेशी ऋण पुवाने में सहायता मिल रही है। इस प्रकार भारत से स्वण का निर्यात निरन्तर होता रहा । सम् 1931 से लेकर सम् 1938 तक लगभग 31 करोड रुपये का स्वण विदेशो को निर्यात पर दिया गया और इससे भारत म स्वण मान स्थापित होने की प्राय सभी सम्भावनाए नष्ट हो गई। द्वितीय युद्ध काल युद्धकाल मे प्राय लोगो का देश की पत्र मुद्रा से विश्वास हट जाता है और वह धातु मुद्रा जमा करने लगते हैं। कभी कभी लोग बको से अपनी रकम निकालने लगते हैं। सरकार को नोटो के बदले धातु मुद्रा देने के लिये भी बाध्य विमा जाता है । इसी प्रकार युद्धकाल म वस्तुओ का उत्पादन बहुत बढ़ जाता है क्योकि उनकी माग अधिक होती है अत मुद्रा की माग म भी बहुत वृद्धि हो जाती है भारतीय मुद्रा पर प्रभाष 3 सितम्बर 1939 को द्वितीय महायुद्ध प्रारम्भ हो गया और भारत से विभिन्न प्रकार का उपभोक्ता माल युद्ध की / 97 सीमामा पर निर्यात होना आरम्भ हो गया जिससे न केवल देश के व्यापार तथा उत्पादन में वद्धि हुई बल्कि मुद्रा को माग तीव्र गति से बढ़ने लगी। इसकी पूर्ति के लिये सरकार ने कई कदम उठाये । इसका पल यह हुआ कि देश में मुद्रा स्पीति होनी थारम्भ हो गई जिस पर नियन्त्रण करना आवश्यक हो गया । देश का निर्यात व्यापार बढ़ने से भारत इगलह से करोडो रुपये का लेनदार हो गया । इस प्रकार युद्ध का भारतीय अय व्यवस्था पर व्यापक प्रभाव पड़ा।नीचे सभी प्रभावों तथा उहें दूर करने के उपायों का वर्णन किया जा रहा है। 1 मुद्रा की मांग युद्ध प्रारम्भ होने के कुछ समय पश्चाद ही जनता ने कागज ये नोटो को पातु मुद्रा में परिवर्तित करने की माग आरम्भ कर दी। सामा यत यह माग 1 परोह रुपये प्रति सप्ताह थी परन्तु फास का पतन होने के पश्चात् मई 1940 से यह माग लगभग 45 करोड रुपये प्रति सप्ताह तर पहुंच गई । इस प्रकार चादी के रुपये की माग में अत्यधिक वद्धि हो गई। रेजगारी को भी बहुत अधिक कमी आगई और अनेक स्थानो पर रेजगारी के स्थान पर डारखाने के टिक्ट, पोस्टकाड तथा लिफाफे आदि काम में लाये जाने मगे। सरकार ने मुद्रा की इस बढ़ती हुई माग को पूरा करने के लिये निम्न काय किये। (क) जमा करने पर दण्ड 25 पून 1940 को सरकार ने एक अध्यादेश निराला जिसके अनुसार एक रपये की मुद्रा को आवश्यक्ता से अधिक जमा रपना अपराध पोपित कर दिया गया। इसमे रुपये की मुद्रा की मांग कुछ कम हो गई। (स) म बांदोरीमता सरकार ने दूसरा कार्य यह विया नि26 जुलाई 1940 तथा 23 मिम्बर 1940 के आदेशों द्वारा रुपये तथा अठन्नी पी शुद्धता कम कर दी। पहले रपये की मुद्रा में 165 प्रेन शुद्ध पानी होती थी उमरी मात्रा पटा कर 80 प्रेन पर दी गई । इस प्रकार देश मदो प्रार ये पपरे पनन म आगये। इस परिस्थिति में मुषार परने के लिये विपगेरिया एडयां तया जार पचम तथा परम् की मोहर वाले रपय सपा मनिया यापम रे लिय गय । इन मुगानों में पुर पारीबी मामा अपिर पी।
98 प्रथम यह 1943 के पश्चात् सरवार ने रुपये तथा अठन्नी वी 50 प्रतिशत शुद्धता भी समाप्त कर दी और नये रुपये तथा अठन्निया चालू किय गये जिनमें चादी की मात्रा नाम मात्र को रखी गई। यह काम दो वारणो से किया गया कि मुद्राए बनाने में कम चादी का प्रयोग हो दूसरे यह कि लोग अधिक चादी के लोभ में सिक्को को गलाए नहीं। (ग) छोटे नोटों का चलन रुपये की मुद्रा की माग की पूर्ति करन के लिए सरकार ने 1940 में एक रुपये का नोट चालू किया। फरवरी 1943 मे रिजव बब आफ इडिया द्वारा 2 रपये का नोट भी चालू किया गया। एक रुपये के नोट को रुपये की मुद्रा के समान ही माना गया और बड़े नोटों के बदले अव रुपये की मुद्रा के बजाय एक रुपये का नोट ही दिया जाने लगा। (घ) नई रेजगारी का चलन रुपये तथा अठनी की मुद्रा के अति रिक्त देश मे छोटी रेजगारी की भी बहुत कमी आ गई और कागज के नोट बट्टे पर चलने लगे। इस स्थिति का सामना करने के लिये सरकार ने दोहरी काय वाही की । पहली के अनुसार रेजगारी जमा करना अपराध घोपित कर दिया गया। दूसरे, सस्ती तथा हल्की मुद्राए निकाली गई । जनवरी 1942 में निकल और पीतल के मिले हुए धातु का अधन्ना निकाला गया । बम्बई की टक्साल से इस नी तथा दवनौ के नए सिरके ढालने आरम्भ किये गये । इधर ताव का पैसा चलन से गायब हो गया था क्योकि लोगों ने इसे गला कर तावे वे भाव वेचना आरम्भ कर दिया। इसलिये फरवरी 1943 में ताबे का छेद वाला हल्का पसा निकाला गया परन्तु लोगो ने इसे वार के रूप में काम में लेना शुरू कर दिया अत कुछ समय पश्चात् हो बिना छेद वाला छोटा पैसा निकालना पडा। उपरोक्त सब उपाय रेजगारी की कमी दूर करने लिये किये गये । 2 मुद्रा प्रसार युद्धकाल म मुद्रा की माग बढने से उसम तीव्र गति से वृद्धि हुई । इसका अनुमान इस तथ्य से लगता है कि सम् 1939 में देश म कुल 179 करोड रुपये की पत्र मुद्रा चलन म थी जो बढ़कर जून सन 1945 मे 1152 करोड रपये तक पहुंच गई।
99 इस मुद्रास्फीति के कई कारण थे क उद्योग तथा व्यापार मे विकास के कारण मुद्रा की माग मे वृद्धि हुई जिसकी पूर्ति करना आवश्यक था, (ख) सनामा को भेजने के लिये वस्त्र, अन तया चीनी आदि उप भोक्ता पदार्थों को खरीदने के लिये नई मुद्रा चलन में डाली गई है। (ग) भारत सरकार के रक्षा-व्यय मे भी वृद्धि हो गई थी जिसे नोट निकाल कर पूरा करना पड़ा। (घ) भारत सरकार ने विटिश सरकार को युद सचालन के लिये माल उधार बचा । इस माल का भुगतान भारतीय व्यापारियों को सरकार द्वारा नोट निकाल कर दिया गया अत मुद्रा की मात्रा में वृद्धि हो गई। मुद्रा प्रसार के प्रमाव 'मुद्रा प्रसार होने से देश मे प्रायः सभी वस्तुमा के मूल्या में वृद्धि होनी आरम्भ हो गई और यह वृद्धि निरन्तर होती पली गई । इसका एक कारण तो यह था कि व्यापारियो ने आवश्यक माल संग्रह करना आरम्भ कर दिया और उसे काले बाजार में बेचकर लाम माने लगे। दूसरे उपभोक्ता माल का एक निश्चित माग सनिक आवश्यक्ताओं के लिये भेजा जाने लगा जिससे माल की पूर्ति में बहुत कमी आ गई। उपचार मुद्रा प्रमार के कारण जो महगाई उत्पन्न हुई उसका प्रभाव दूर करने के लिए निम्नलिखित उपचार दिये गये () मूल्य निय रण और रापन व्यवस्था सभी आवश्यक यस्तुओं रे मूल्यों पर निय नरा लगाये गये और उनका राशन दिया गया। इन वस्तुओं म साधान चीनी, वस्त्र, तल सीमेट आदि मुस्य थीं। इन वस्तुआ का वित रण करने के लिए सस्ती दुवाने सोलने की व्यवस्था की गई। (स) महगाई भत्ता मूल्यो में वृद्धि का प्रभाव कुछ कम करने के लिए सरकारी तया अप कमचारियों को महगाई भत्त देने की व्यवस्था लागू की गई। (1) नपे पर जनता से अतिरिक्त मुद्रा राशि पचने के लिए नए पर लगाए गए दापि उनने पास राव परने के लिए अपिर खम न रह और वानुमों की अधिर माग न हो।
100 (घ) ऋण तथा बचत योजनाएं सरकार ने जनता से ऋण लेने भी भारम्भ कर दिये ताकि जनता को अतिरिक्त पूजी का कुछ भाग सरकार के पास आ जाय और मुद्रा प्रसार कम हो सके। वचत योजनाओ के अतगत राष्ट्रीय बचत सर्टिफिकेट तथा रक्षा बचत सर्टिफिकेट निकाले गये जिनमे लगभग 850 करोड रुपये जमा हो गये। (७) शुल्कों में वृद्धि सरकार ने रेल के किराये, डाक तार की दरें तया अय सभी प्रकार के शुल्कों मे वृद्धि कर दी। इन सब कार्यों से मुद्रा प्रसार के प्रभाव को कम करने की चेष्टा की गई। (१) विनिमय नियंत्रण युद्ध आरम्म होते ही सरकार ने भारत रक्षा नियम लागू कर दिये और उन नियमों के अन्तगत समस्त विदेशी मुद्राओं के लेन देन पर प्रतिव घ लगा दिये गये । रिजव बक ऑफ इण्डिया मे एक नया विभाग विनिमय नियत्रण विभाग के नाम से स्थापित किया गया। जो बक विदेशी मुद्राओं मे लेन देन करना चाहते थे उहें इस काम के लिए रिजव बक से लाइसेंस प्राप्त करना आवश्यक कर दिया गया। व्यापार पर रोक भारत सरकार ने आयात निर्यात पर करे प्रतिवध लगा दिये और निर्यातों से जो भी आय होती थी वह लाइसेंस प्राप्त बैको मे जमा करवानी आवश्यक कर दी गई । खातों पर रोक विदेशी विनिमय का उपयोग उचित रूप में करने के लिये भारत मे जितनी जापानी सस्थाएँ थी उनके खाते रोक लिये गये अर्थात उनके द्वारा विदेशी भुगतान बद कर दिये गये। इसके अतिरिक्त जापान के अधिकार क्षेत्रों (मलाया, हागकाग, पूर्वी द्वीप समूह आदि) के भुगतान भी बद करने का निश्चय किया गया। विदेश यात्रा पर रोक विदेशी विनिमय मे बचत करने के लिये विदेश यात्रा पर रोक लगा दी गई और रिजव बक से अनुमति लिये बिना कोई यक्ति विदेश मात्रा को नहीं जा सकता था। इस सम्बध मे ईरान अरब, 101 पूर्वी अमौका तया इलेट जाने वाले व्यक्तियो को सरलतापूर्वक अनुपति मिल जाती थी। (4) साम्राज्य गातर दोष (Empire Dollor Pool ) युदरात में अमेरिका ही एक एसा देश या जो युद्ध में लगे हुए देशा यो विभिन्न प्रकार का माल काफी मात्रा में दे सकता था इसलिये जो देश अमेरिका से सामान खरीदते थे उहें भुगतान करन के लिए डालर की भाव पक्ता पहतो पी । यद डालर भी माग बहुत बढ़ गई और डालर एक दुलम मुद्रा (Hard Currency) हो गई। डालर की माग इ गलब म सबसे अधिक पी क्यादि गाद को युद्ध मा सामान अत्यधिक मात्रा में खरीदना था। इसलिए गलह ने बिटिश साम्राज्य के सभी दलों (भारत, आस्ट्रेलिया, यूजोर र दक्षिण अफ्रीका, घाना, आति) से यह समझोता दिया कि वह अमेरिका मो माल आदि वैचवर जितने झालर कमाएंगे वह सब एक सम्मिलित मोप म जमा हो जाएंगे। इस पोष का नाम सामाग्य हासरकोप रमा गया। कोपाप्रपोग सामाग्य डालर कोप भी रखम वक ऑफ इगलर में की जाती पी और जब भी गिसो देध को डालर की आवश्पण परती वह बॉफ गले से उसरे लिए प्राथना करता था। दोपदे सब सदस्य इस बात का पान रमते यदि डालरो का प्रयोग रेवल अनिवाय आवश्यता के समय ही दिया जाय। पुरुपात में भारत ने गला कोप में कुन 453 परोड रपये के सुल्य विसी मुद्रा जमा यो नियम सगभग 405 Aur एपप रे तुल्य सलर थे। इस राशिम से भारत ने सगभग 339 40 की मुद्रा प्पम पर दो,गेप गलर कोर में जमा की गई। गत वर्षों में भारत को बहुत अधिक विदेशी मुग पी आपपाता रही है । इस आव पाता को रामर पोप पूरा करने म धमर्प नहीं है मन भारत को इस रोप का सदस्य बन रहने में कोई माम नहीं है। (5) पौ. पाइने (Sterling Balantes) पुर कान में शिटिर मरारोमा में सामान रे निरिक्त मनावि , दास 1 102 चीनी तथा अनेक अय पदार्थों की आवश्यकता थी। भारत में प्रग्रेजी शासने था अत ब्रिटिश सरकार को युद्ध प्रयलो में सहायता देना स्वाभाविक था। यह सहायता कई प्रकार से दी जा सकती थी परन्तु ब्रिटिश सरकार ने भारत से माल खरीदना उचित समझा। भारत सरकार यह माल अपने देश के व्यापा रियो अथवा उद्योगपतिया स सरीद लेती थी और ब्रिटिश सरकार के आदेशा नुसार भेज देती थी। इस माल का भुगतान भारतीय व्यापारिया को नोट निकाल कर तत्काल कर दिया जाता था और ब्रिटिश सरखार उतनी राशि की हुडिया भारत सरकार को भेजती रहती थी। इस प्रकार युद्धकाल मे भारत इगलेंड को निरन्तर ऋण देता रहा और बदले मे हुडियो अथवा प्रतिभूतियाँ प्राप्त करता रहा । यह रकम पौंड पावने कहलाती है। राशि पौंड पावनो की राशि म निम्न प्रकार वृद्धि हुई वय पौंड पावने (करोड स्पयो में) 1939 64 1940 91 1941 169 1942 211 1943 394 1944 725 1945 1,182 युद्ध आरम्भ होने से पूर्व भारत ब्रिटिश सरकार का लगभग 500 करोड रुपये से कजदार था परन्तु युद्धकाल में वह साहूकार बन गया । युद्ध समाप्त होन के पश्चात् भी पौंड पावनो की राशि म नियमित वद्धि होती गई और 1947 म वह 1662 करोड रुपय तक पहुंच गई। भुगतान युद्ध समाप्त होते ही पौंड पादने के भुगतान की चर्चा प्रारम्भ हो गई । इस सम्बध मे इगलड के तत्कालीन प्रधान मत्री श्री चचिल ने यह विचार प्रकट किया कि पौड पावनो की राशि मे कमी की जानी चाहिय 103 वाकि गलैंड ने युद्ध केवल अपने लिये ही नही है। दूसरा कारण यह दिया गया कि इगलेह का युद्धकाल में जो माल दिया गया है ऊचे भाव पर दिया गया है मत उमकी रखम पटाना सवया उचित है। चचिल महोदय के इन विचारावा भारत तथा अन्य देशो में भी यत्यधिन विरोध किया गया। इसी बीच इगल म मजदूर दल को सरकार बन गई जिसने भारत को स्वतत्रता प्रदान की और उसके पौड पापनों को पूर्ण रूप में चुकाने की घोषणा की। समझौते भारतीय पौंड पावनों का पाने के लिय 1947 1948 1949 तथा 1951 म चार समझौते दिये गये। इन समझौतोम भारत को पौंड पाश्नों की रकम में से प्रति वप कुछ रकम निवारने की अनुमति दी गई थी। इन सब समझौतों में सम् 1948 का सममीता सबसे अधिक महत्वपूण था क्याकि 1947 में भारत स्वतन्त्र हो गया था और पाकिस्तान की स्थापना भी हो गई थी। इसके अतिरिक्त मग्रेजों ने भारत में बहुत अधिक सैनिक सामान घोडा पा ससका हिसार भी परना था। भारत के स्वतत्र होने पर अनेक भून দুৰ প্ৰিণি সময় ই মাকে চাঙ্গা মাই দ ম নাহি দিয়া সব उनकी पेंगा आदि के सम्बध में भी कुछ समझौता करना आवश्यक पा । इन सम काता का ध्यान रमते हुए पाह पावनो की कुल राशि जो इस समय 1550 मर सपे के तुल्य थी निम्न प्रकार से भुगतान करने का निश्चय किया गया । । पोजी सामान का मूल्प 133 राजपये 2 ब्रिटिश अधिकारियों की गन 224 3 पाकिस्तान वा भाग 126 4 भारत का शेप देना रहा 1067 . " . " पोग 1550 भारत ने 1951 के पश्चात् इस राशि में से बहुत सारी रकम लेनी है बमोदि पवार योजनामा बार भारत को विदा मे मोन तमा अय मामान सराना पर है। 5 माच 1965 को यह राशि सगभग 6946 पच रह गई थी।
104 पोह पायने भारतीय जनता को कष्टों की कहानी है यत यदि उनको प्रयोग जनता के कष्ट निवारण के लिए किया गया है तो उसे अनुचित नहीं कहा जा सकता है। प्रारम्भिक वर्षों में इनका प्रयोग विदेशा से खाद्यान्न आयात करने के लिए दिया गया था जो अत्यन्त आवश्यक था | माद के वर्षों में भी पीड पावनो का प्रयोग सस्ट की स्थिति से छुटकारा पाने के लिए हुआ है। युद्धोत्तर काल द्वितीय युद्ध के समाप्त होते ही सरकार ने देश की अथ-व्यवस्था को युद्ध से पहले की स्थिति में लाने के प्रयल आरम्भ कर दिये । युद्धकाल म दे। को जनता को बहुत वष्ट उठाने पडे ५ क्याकि उहे प्राय सभी मावश्यक वस्तुओं के उपभोग की मात्रा कम कर देनी पड़ी थी। इसी प्रकार मुद्रा सम्ब घी लेन देन तथा महगाई की समस्याओ का सामना करना पड़ा था। इस समस्याओ को हल करने के लिए सरकार ने कई महत्त्वपूर्ण काय किये । (1) बडे नोटों को बन्द करना युद्धकाल में आवश्यकता को प्राय सभी वस्तुआ में चोर बाजार भ्रष्टाचार तथा घूसखोरी बढ़ गई थी और अघि कारी लोग अनेक अनुचित रीतियों द्वारा धन कमाने लगे थे । व्यापारियो तथा उद्योगपतियो ने भी मुनाफाखोरी तथा सग्रह द्वारा अत्यधिक धन जमा कर लिया। सरकार की यह इच्छा थी कि इस प्रकार के राष्ट्रविरोधी तत्वा या पता लगा कर उहें दहित किया जाय । सरकार का यह अनुमान था कि अनुचित धन कमाने वाले व्यक्तियो न अपनी रकम बडे नोटो म ही सुरक्षित रखी होगी अत यदि वहे नोटो का चलन चन्द कर दिया जाय तो ऐस व्यक्तियों का पता चलाना सरल होगा। अत' सरकार ने यह आदेश दिया कि 13 जनवरी 1946 से 100 रुपये से ऊपर की राशि के नोटो का चलन बद हो जायगा। जिन व्यक्तियो के पास 100 रुपये से ऊपर की राशि के नोट थे वह उहे बदलवाने के लिए दस दिन के भीतर एक आवेदन दे सकते थे। इस आवेदन पत्र म यह भरना पडता था कि वह नोट कब, क्सि व्यक्ति से तथा क्सि काम के बदले प्राप्त हुए। उस बयान पर विसी अनुसूचित बक या मजिस्ट्रेट के हस्ताक्षर भी करवाने आवश्यक 105 ये। झूठा बयान देने वाले व्यक्ति को तीन वर्ष का कारावास या जुर्माना या दोनों दड दिये जा सकते थे। योजना प्रसफल बड़े नोट बद कर सरकार चोर बाजार करने वालो पूसखोरों तथा अनुचित कमाई करने वालों को पकडना चाहती थी परन्तु कुछ व्यापारियो को इस योजना का पता चल गया और उहोंने अपने बैंको के माध्यम से सब बड़े नोट गायब कर दिए। यहां तक कि बहुत मे व्यक्तियो ने रडे नोट ब पर खरीद कर लाभ भी कमाया। इस प्रकार बडे नोट बन्द करन का उद्देश्य ही समाप्त हो गया। (2) रुपये का अवमूल्यन जब कोई देना अपनी मुना का मूल्य दूसरे किसी देश की मुद्रा की तुलना में कम कर देता है तो अवमूल्यन रहते हैं। दिनीय मुद्धकाल में जो मुद्रा प्रसार का म आरम्भ हुआ था वह युद्ध के पश्चात् भी चालू रहा अत इगलह तथा पश्चिमी यूरोप के अनेक देशों म व्यापार की स्थिति बहुत हावाहोल हो गई । इगल्ड में मूल्य निरन्तर बढते जा रहे ए और उसका भुगतान संतुलन अत्यधिक विपक्ष में हो गया था। अत 18 सितम्बर 1949 को इगलड ने अपन पौंड का 30 5 प्रतिशत अवमूल्यन पर दिया। इसका तात्पय यह है कि एक पौंड जो पहले 403 डालर के समान था अब केवल 280 डालर ये तुल्य रह गया । इगलह द्वारा पोड का अवमूल्यन परते ही 29 अप देश ने अपनी मुद्रा का अवमूल्यन पर दिया। इन देशो के कुल विदणी व्यापार का लगभग 65 प्रतिशत भाग इगड से होना था। मत इनके लिए अपनी मुाओं के अवमूल्यन के सिवाय और कोई माग नहीं था। भारत के सामने भी यह समस्या उत्पन्न हुई कि वह रपए का अवमूल्यन परेशा उसे पहनी दर पर बनाए रसे। भारत म सर याता पर विचार कर अन्न म अवयन मरने रानिमय दिया और रूपये का मूम 302250 मॅट रे स्थान पर 21 सेंट cent) सुन्य घोषित कर दिया। इस प्रकार जो डामर पहले सगमग 3 रुपये के तुप था वह अब लाग 476 रुपये के बराबर हो गया ।
106 भारत द्वारा अवमूल्यन के कारण भारत द्वारा रुपये का अवमूल्यन करने के निम्नलिखित कारण ५ (क) रुपये का वर्षों से स्टलिङ्ग से गठव धन चला आ रहा था, भारत स्टलिङ्ग क्षेत्र का सदम्य था और भारत का अधिकाश विदशी व्यापार ब्रिटेन से था । इसलिए भारत द्वारा अवमूल्यन करना हो उचित था। (ख) भारत को इ गलह से लगभग 1100 करोड़ रुपये के पौड पावने वसूल करने थे। यदि भारत रुपये का अवमूल्यन नहीं करता तो पोंड पावनों की राशि रुपया में कम हो जाती । (ग) भारत द्वारा अवमूल्यन नहीं किया जाता तो देश के निर्यातो म कमी तथा आयातो मे वृद्धि हो जाती जिससे देश की आभिन स्थिति बिगड सरती थी। तुल्य अवमूल्यन के प्रभाव रुपये के अवमूल्यन का भारत पर व्यापक प्रभाव पड़ा। इस सम्बघ मे उल्लेखनीय बातें निम्नलिखित हैं (क) भारत के निर्याता में वृद्धि हुई। इसका अनुमान इस बात से लगता है कि 1949 म भारत के निर्यात 480 करोड रपये के थे जो बढकर 1950 में 611 करोड पम के तुल्य हो गये। यदि डालर क्षेत्र के निर्याता को अलग भी लिया जाय तो उनकी राति भी, 115 करोड रुपये से बढकर 151 करोड रु० हो गई। (ख) भारत को अमेरिका से किये गये अन्न क आयात का बहुत अधिक मूल्य चुकाना पडा। (ग) पाकिस्तान ने अपने रुपये का अवमूल्यन नहीं किया था अत भारत का पाकिस्तान से व्यापार लगभग ठप्प हो गया वास्तव में भारतीय रुपये था जिस मात्रा मे अवमूल्यन किया गया वह आवश्यक्ता से अधिक थी। अत भारत को अपने औद्योगिक विकास तथा व्यापार मे बहुत हानि उठानी पड़ी।
- 107 (3) होनाय प्रवचन ( Deficit financing ) सरकार प्राय यह निश्चित कर लेती है कि उसे क्सिी वष कुल कितनी रक्म सच करनी है। उसके पश्चात् वह उतनी आमदनी प्राप्त करने की चेष्टा करती है । इस प्रकार कभी कभी सच आमदनी से अधिक हो जाता है । इस कमी की पूर्ति यदि नोट छाप कर करली जाय तो इसे होनाय प्रव धन कहते हैं । उदाहरण स्वरूप यदि किमी वप भारत सरकार की कुल आमदनी 20 अरव रुपये हो और सच 21 अरव रुपये हो और एक अरब रुपये की कमी पूर्ति नोट छाप कर करली जाय तो इमे होनाथ प्रवचन कहा जायगा। भारत सरकार योजना काल म हीनाय प्रबधन की नीति अपनाती रही है। प्रथम योजना काल (1951-56) म भारत सरकार द्वारा 415 करोड रुपय की राशि का होनाय प्रवचन दिया गया। दूसरी योजना म यह राशि 948 करोड़ रुपये के तुल्य थी जबकि तीसरी योजना काल मे 550 करोड रुपये की रकम नोट निकाल पर प्रास करने आशा है। प्रभाव हीनाय प्रवचन का एक प्रभाव यह होता है कि मुद्रा प्रसार हो जाता है। गत 13 वर्षों में मुद्रा तथा मास की मात्रा म लगभग 2000 परोड रपये की वृद्धि हुई । यह राशि हीनाय प्रवधन की राशि से कुछ अपित है। गत वर्षों में भारत मे मुद्रा प्रमार के कारण यस्तुओ के मूल्या म वृद्धि हो रही है जिससे सामाय जनता को यहुन मष्ट उठाना पड़ रहा है। इस स्थिति पर काबू पाने के लिए मुद्रास्फीति को रोकना यावश्यर हैं। अत भारत में होनाप प्रवचन की नीति अपनाना उचित नहीं है । इमीलिए सरकार ने पतुप पप वर्षीय योजना काल म हीनाय प्रबधन न भरने का निश्चय किया है। (4) विदेशी विनिमय सफ्ट जब पिसी देश निर्यात कम और पायात अपिर होत है तो उस विदेशी भुगतान करने म बहुन पटिनाई होती है। जब यह स्थिति बहुत कठिन हो जाती है बयान विदगी मुगनाना उत्तर दायिरय रहन यह जाता है तो इसे विदेशी विनिमय सस्ट की स्थिति रहते हैं।
110 भारत में भी दामलव मुद्रा अपनाने से हमारी मुद्रा का इन देशों की मुद्रा से अधिक निकट सम्बध स्थापित हो गया है और एक मुगा का मूय दूसरी मे निकालने में कोई मठिनाई नहीं होती। (ul) नाप होल मे सरलता भारत में अनेक प्रकार के नाप तोल प्रचलित रहे हैं। यहां तक कि देश के किसी भाग म 40 तोग का सैर तो कहीं 100 तोले तथा कुछ भागो मे 120 तोने तक का सेर माना जाता था। इससे किसानो को बहुत हानि उठानी पड़ती थी । अन सारे देश मे नाप तौल वे एक सरीखे उपकरण चालू करने आवश्यक थे। विन्तु दामिक मुद्रा के विना मीटर, लिटर या किलोग्राम के मूल्य निकालने म यधिक पठिनाई का सामना करना पड़ता । अन यह कठिनाई समाप्त हो गई है। वास्तव म दामिक मुद्रा प्रणाली एक घज्ञानिक प्रणाली है । यूजीलड ने इस प्रणाली को अपनाने का कानून पास कर दिया है तथा इगल ड ने यह प्रणाली लागू करना निश्चित कर लिया है । आशा है दिगोन ही ससार के शेष देश भी दामलव मुद्रा प्रणाली अपना लेंगे। पत्र मुद्रा प्रणाली भारत म सम् 1860 तक तीन प्रेसीडेंसी बक नोट निकालने का काम करते थे परन्तु उसके बाद यह काय भारत सरकार ने सम्भाल लिया। सरकार द्वारा नोट निकालने का काय 31 माच 1935 तव किया गया परतु 1 अप्रेल 1935 से पत्र मुद्रा निकालने का भार रिजव बक को सौंप दिया गया। नोटों का स्वरूप भारत में 1 2 5 10 50 100 500 1000, 5000 तथा 10000 रुपये के नोट निकाले जा सकते हैं। इनमें से 50, 500 तथा 5000 रु० के नोट प्रचलित नहीं हैं शेष नोट चलन में हैं। इन नोटो मे भी एक रुपये का नोट भारत सरकार निकालती है। यह नोट द्वितीय युद्धकाल मै एक रुपये के सिपके वो क्मी की पूर्ति के लिए लागू किया गया था। आज भी 1 रुपये के नोट का हिसाब 1 रुपये के सिक्के के साथ ही लिखा जाता है और वैधानिक दृष्टि से इसका 1 रपये के सिको के समान दो दर्जा है। स्नवम 111 1 रुपये के नोट के अतिरिक्त गेप नोट रिजव वक द्वारा निकाले जाते हैं और उन पर रिजव बद के गवनर के हस्ताभर होते हैं। भारत के सब नोट रिजव वक के आदेश पर भारत सरकार के नासिक स्थित प्रेस में छापे जाते हैं। नोटों के पीछे कोष रिजर्व ब जितने नोट निवारता है उनके पीछे कुछ पाप रखा जाता है 15 अक्टूबर 1956 तक यह नियम या दि रिजव बस जितन पोट निवाले उनका कम से कम 40 प्रतिशत भाग स्वण या विदेगी प्रतिभूतिया के रूप में कोप म रखे। इसम भी कम से कम 40 करोड रुपये के मूय वा स्वण होना आवश्यक था। उस समय स्वण का मूल्य 21 24 रुपये प्रति तोला आना जाना था। 1956 का वप प्रयम योजना का अन्तिम वप या जवकि देश म व्यापार तथा उद्योगो को उनति के कारण मुद्रा की माग की पूर्ति करने मे 40 प्रतिति कोप रमना कठिन था मत 6 अक्टूबर 1956 से नोटों के पीछे पोप रखने सम्बधी नियम बदल दिया गया। इसके अनुसार नोटा के पीछे रखे जाने वाले कोप की कुल मात्रा 115 रोड रुपये के मूय का स्वण तथा 400 करोड रुपये की विदेशी प्रतिभूतियां निश्चित की गई । इतना काप रसकर किसी भी मात्रा मे नोट निकाले जा सकते थे और विशेष परिस्थियो में प्रतिभूनिया की माना 300 करोड़ रुपये तव गिरने दी जा सकती थी । इसे यूनतम कोप प्रणाली (Minimum Deposit System) कहते हैं । 31 अक्तूबर 1957 के परिवतन के पश्चात् अब बुल पर मुद्रा के पोधे कम से कम 200 करोड रपये के मूप के बाप रसन अनिवाय हैं । रिमी भी समय इस पोप में रम से बम 115 करोड रपये या मोना या सोन के सिवा होना भाव पर है। इस प्रसार इम पोप म अधिक से अपिर 85 परार रुपये की विती प्रतिभूनियां (Securities) हो सकती हैं। भारत सरसार की अनुमति रो रिजय वै विपनी प्रतिभूतियों को मषा ममाप्न भी पर करता है । फरवरी मास में जब विदेशी प्रतिभूतियों की मात्रा 85 करो' मे गिरनी आरम्म हुई तो भारत सरकार ने सीन पार में रिजद बेर 116 पर सपा सोना देवा । इस प्ररार 5 माघ 1965 को कोष म विदेशी 112 प्रतिभूतियो की मात्रा 6946 करोड रपये और स्वण कोर की मात्रा 13376 वरोड रपये थी। यूनतम कोप प्रणालो ऊपर दिये गये व्यौरे से स्पष्ट है कि भारत में नोट निवानो की यूनतम कोष प्रणाली प्रचलित है । इमे यूनतम दोष प्रणाली इसलिए कहा जाता है कि इसमें एक निश्चित मात्रा में कोप रख कर क्तिनी ही राशि के नोट निकाले जा सकते हैं। भारतीय मुद्रा प्रणाली के गुरण दोप गुण (1) यह प्रणाली सस्ती और सरल है। (2) यह लोचदार है क्योंकि अतिरिक्त नोट इच्छानुसार निकाले जा सकते हैं। (3) यह भारत की विकास योजनाओ के लिये बहुत उपोपगी है। घोष इस प्रणाली में मुद्रा प्रसार का भय है । उपसहार भारत की मुद्रा तया चलन के इतिहास से यह स्पष्ट है कि देश में मुद्रा का विकास देश को परिवतनशील आवश्यकताओं के अनुसार हो रहा है । यह सम्भव है कि आने वाले युग मे मुद्रा व्यवस्या को अधिक लोचदार अथवा सरल बनाना पड़े ताकि देश की आवश्यकतानुसार मुद्रा निकालने म लेशमात्र भी बाधा न हो । समय की माग पूरी करने मे उदार नीति का प्रयोग कभी हानिकारक नहीं हो सकता यह सर्वमाय सत्य है। मतमान मारतीय मुद्रामान भारत उन 120 देशों म से एक है जो अतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोप के सदस्य हैं। मुद्राकोष के सब सदस्यो की मुद्राए डालर पर आधारित हैं अर्थात् उनको विनिमय दरें डालर में निश्चित की गई हैं विन्तु इन सब देशो की मुद्राए एक दूसरे पर भी आधारित है। इस प्रकार येन (जापान), लिरा (इटली) मार (जमनी) पंसो (फिलिपीन) पाँड (गलड, आस्ट्रेलिया यूजीलैंड दभिगी अफोका तया सयुक्त अरव गणराज्य) थ अय मुद्राओं की समना दरें (parity rates ) निश्चित हैं अर्थात यह 113 एक दूमरे में निश्चित दरा पर परिवर्तित की जा सकती हैं। संक्षेप म बहा जा सकता है कि (क) भारतीय रुपया डालर पर आधारित है, (स) भारतीय रुपया 101 अय देशों की मुदाआ पर आधारित है। (ग) भारतीय रुपये की दर मुद्रा काप के सदस्य देशो की मुद्रामा म निश्चित है। एक अय महत्वपूर्ण बात यह है कि मुद्राकोप के अन्य सदस्य देगो की भाति ही भारतीय पये का मूल्य स्वण में भी निर्धारित है। उदाहरण के तौर पर भारतीय रपया 0 186621 ग्राम युद्ध स्वण ये तुल्य है अर्थात् एक औंस स्वण का मूल्य 166 667 रुपये ( डालरों मे 35 डालर प्रनिओंम ) है । मुद्रा पोप म सभी सदस्य देशो के स्वण कोप मौजूद हैं । अत वैधानिक रूप में सदस्य देशो की मुद्रामा के मूल्य स्वण म निश्चित हैं तथा उनके पीछे मुद्रा थोष म स्वर्ण कोष भी रसा हुमा है। यत इस व्यवस्था को अन्तर्राष्ट्रीय स्वण विनिमय मान ( International Gold Exchange Stan dard ) अतर्राष्ट्रीय विदेशी विनिमय मान ( International Foreign Exchange Standard ), अथवा अतरराष्ट्रीय समता मान ( International Parity Standard ) पहा जाता है । इस दृष्टि से वतमान भारतीय मुद्रामान को भी बतर्राष्ट्रीय स्वण विनिमय मार विदगी विनिमय मान या समता मान रहा जा सकता है। यह मान स्वणमान (जिसम अपने देश म स्वण कोप म रसना पडता है ) सवई दृष्टिकोणा से थेष्ठ है (५) यह सस्ता है क्याकि भारत को अलग स्वर्णकोष में रखने की आय यस्ता नहीं है (भारत स्वेच्छा से कोष रसता है यह बतग बात है ) (स) यह घरत है गोंरि बावश्यकता पड़ने पर अन्तर्राष्ट्रीय मुगकोष में कोई भी विदेशी मुद्रा धार मी जा सकती है। पुरान स्वर्ण मान म यह पाप स्वप में भुगतान कर दिया जाना था।
114 (ग) यह सही यय मे अन्तर्राष्ट्रीय है क्योंकि भारतीय रुपये का ससार के 101 महत्त्वपूर्ण देशा से मौद्रिक सम्बध है। उपयुक्त तथ्यो से ग स्पष्ट हाता है कि वतमान भारतीय मुद्रामान में स्वणमान को सब विशपताए मौजूद हैं और उसके दोष नहीं है। यह स्थिति अत्यन्त सतोषजनक कही जा सकती है। अभ्यास के प्रश्न । भारतीय चलन के विकास पर प्रकाश डालिये। हिल्टन यग आयोग की नियुक्ति से पूव रुपये में कितनी गुद्ध बौदी थी तथा रपये की विनिमय दर क्या थी? मान 2 हिल्टन यग आयोग ने विनिमय दर तथा अपनाने का सुभाव दिया। 3 हिल्टन यग आयोग की मुख्य मिफारिशो पर सक्षेप मे टिप्पणी लिसिय । 4 रुपये की 18 पस दर अपनाना कहाँ तक उचित था उदाहरण सहित लिखिये। 5 स्वण धातु मान का क्या अर्थ है भारत सरकार ने जो स्वण धातु मान अपनाया उसम क्या कमियाँ थी? 6 भारत से स्वण निर्यात (1930-38) के कारणो पर प्रकाश डालिए। 7 द्वितीय युद्धकाल का भारतीय मुद्रा पर क्या प्रभाव पड़ा, लिलिये। 8 द्वितीय युद्ध वाल मे मुद्रा की कमी दूर करने के लिये सरकार ने जा उपाय किए उनका सक्षिप्त विवेचन कीजिये। 9 खाली स्थाना की पूर्ति कीजिये (क) द्वितीय युद्ध काल मे भारत के कारण कजदार से हो गया। (ख) भारत ने अपनी सम्पूण डालर आप कोष में जमा करवाई।
115 हुआ। (ग) युद्धकाल में तेजी से मुद्रा (घ) मुद काल में तथा पर नियत्रण लगाये गये। 10 द्वितीय युद्धकाल म मुद्रा प्रसार वे क्या कारण थे तथा उसका प्रभाव कम करने के लिए क्या कायवाहिमा की गई। 11 भारतीय पोड पावनों पर एक टिप्पणी लिखिये। 12 भारतीय रुपये का अवमूल्यन क्या दिया गया? उसके परिणामो पर प्रकाश डालिये। 13 भारत को वतमान मुद्रा प्रणाली का विवचन कीजिय । 14 निम्नलिखित पर टिप्पणियां लिखिये विदेशी विनिमय सक्ट, हीनाय प्रबधन विनिमय नियत्रण, तथा दामलव मुद्रा प्रणाली। 15 योजना बास म भारतीय मुद्रा भी समस्यामा पर प्रकार डालिये।
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