Sanmati Library, Jaipur
Shri Samaya Saar Teeka
Front matter
मुद्रा-
मूलचन्द सिमनदास कापड़िया,
जिनविजय" नि.प्रेस, त्याटियाचकता,
लमीनारायणी वाड़ी-मरन ।
सूचना-ठपया हरएक पाठक अंतमें दिये हुए शुद्धिपत्रही भूलें प्रथन ठीक करके ही
इस ग्रन्यको पढ़ना प्रारंभ करें।
मूलचन्द जिसनदान कापड़िया.
व्यवस्थापक "जनमित्र
चंतापाड़ी-मुरत.
भूमिका। . पाठकोंको विदित हो कि इस जगतमें हरएक मानवको सुख और शांतिकी चाह है। पर ऐमी चाह रखनेपर भी मानवांका प्रयत्न संसारके पदार्थ संग्रहमें और उनके उपभोग करनेमें रहता है। क्योंकि चेतन व अचेतन पदार्थ सब परिणमनशील हैं, इसलिये वे उनकी इच्छानुसार न तो सदा वर्तन करते हैं, न स्थिर रहते हैं। इस कारण वड़ेसे बड़े ऐश्चर्य्यशाली मानवको भी इष्ट वियोग और अनिष्ट संयोगकी आति और, अशांति भोगनी पड़ जाती है। जिन्होंने संसारके विषय भोगोंमें अपनेको रचाया है उन्होंने सुख शांतिको न पाते हुए अपनेको तृष्णा और आकुलताकी अग्निमें बलते हुए अनुभव किया है.|.अनंत प्राणी तृप्णाकी अग्निमें बलने हुए ही उसकी अपूर्तिसे कष्ट भोगते हुए ही अपनी जीवन- यात्रा पूर्ण कर जाते हैं। पर यह यात्रा पूर्ण नहीं होती, क्योंकि चेतना लक्षणके धारी आत्माका कभी मरण नहीं होता, जैसे उसने यहां एक शरीर धारण किया था, वैसा ही उसको अपने वांधे हुए पाप या पुण्यके अनुसार दूसरा कोई देह धारना पड़ता है । वहां भी वह तृप्याकी अग्निमें जलता रहकर फिर नवीन देहको रखता है। महान ऋपियोंने अपने अनुभवसे यही बताया है कि सुख और शांति अपने ही आत्माका स्वभाव है और वह आत्माकी ओर लक्ष्य देनेसे स्वयं अनुभवमें आती है। अर्थात् जब हम अपने आत्माके वास्तव स्वरूपपर दृष्टि डालेंगे हम तुर्त सुख शांतिको प्राप्त करेंगे। यदि हम वर्तमानमें अपने स्वभावमें या शुद्ध दशामें होते तो सुख शांतिके भोक्ता ही हर समय रहते जसे कि परमात्मा सिद्ध महाराज नित्य इस सुख शांतिके विलासी हो रहे हैं। तथा यह हर मनुष्यको अनुभवसिद्ध है कि तृप्णाकी मंदता जब कुछ शांति देती तब उसकी वृद्धि अशांति देती है । विचार करनेसे विदित होगा कि तृष्णाकी उत्पत्ति मोहसे हुई है। मोह एक प्रकारका मद्य है, जिसके आवेशमें इस आत्माको-सत् असत्की यथार्थ प्रतीति नहीं रहती है। परमात्माके मोह नहीं-अपने स्वभावमें तन्मयता है इसीसे सुख शांतिकी पूर्ण विलासता है । जो अंतरात्मा सम्यग्दृष्टी गृहस्थ या मुनि हैं वे मोहके विजयी हैं, अतएव वे भी उस सुख शांतिके स्वादको भलीभांति जानते हैं। क्योंकि जब वे अपने आत्माके यथार्थं स्वरूपको सर्व अन्य द्रव्योंसे भिन्न विचारकर उस ओर उपयोगको थिर करते हैं, सुख शांतिका लाभ कर लेते हैं।
maaamiemamAERA भूमिका। anRSSROORISERI ४ सुख शांति अपना स्वभाव होनेपर भी हमें प्राप्त नहीं है इसमें कारण हमारा अस्वस्थ, अशुद्ध, विकारी और मोही होना है। जैसे किसी रोगीको जब अपने रोग शमन करनेकी इच्छा होती है तब वह किसी वैद्यके पास जाता है। प्रवीण वेद्य उसकी परीक्षा कर उसको गेग होनेका कारण कह उसको प्रतीति दिला फिर रोगका इलाज बताता है । रोगी उस उपायपर विश्वास करके जब स्वयं औषधि सेवन करता है तव धीरे २ अच्छा और स्वस्थ हो जाता है। इसी तरह सुख शांतिका इच्छुक जब श्री गुरुके पास जाता है तब श्री गुरु उसके सुख शांति- में बाधक किन्हीं जड़ कर्मोका बन्धन है ऐसा बताकर उन बन्धनासे मुक्त होनेका उपाय बताते हैं । जैसे वैद्यकी उपकार बुद्धि होनेपर भी विना स्वयं औपधि सेवनके रोगी अच्छा नहीं होता, उसी तरह श्री गुरुके चित्तमें महान उपकार वुद्धि होते हुए भी जब तक शिप्य स्वयं बंधसे मुक्त होनेका उपाय नहीं करता तब तक कभी भी मुक्त नहीं हो सका । जिन्होंने मोह और उसके परिवार-नानाप्रकारके कर्मोको विजय कर लिया है ऐसे जिनके सिद्धान्त या जैनमतमें आत्माको अनादि कालकी परम्परासे लगे हुए इस कर्म रोगको जड़मूलसे खोदे- नेके हेतुसे नीचे लिखे सात तत्वोंका जानना और उन पर प्रतीति लाना बतलाया गया है- जीव, अजीव. आश्रव, बंध, संवर, निर्जरा, और मोक्ष । मूल प्रयोजनभूत तत्त्व हैं । क्योंकि जीवसे आपका, अनीवसे अपने साथ जिन कर्म शरीर आदिका सम्बन्ध है उनका, आश्रवसे फर्मोके आकर्षण होनेके कारणोंका, बंधसे उनके बंध अर्थात् आत्माकी सत्तामें ठहर जानेका, संवरसे आश्रवके कारणोंको रोकनेका, निर्जरासे बंधके शनैः शनैः छेदनेका, तथा मोक्षसे पूर्ण बंधमुक्त होनेका ज्ञान होता है । अर्थात् नीव, अनीवसे मैं कौन हूं, पर कौन हैं इनका; आश्रव, बंधसे अस्वस्थ या रोगी या कर्मबंधन युक्त होनेका; संवर, निर्जरासे रोगका इलाज करनेकाः तथा मोक्षसे निरोग या स्वस्थ अवस्थाका ज्ञान होता है। हरएक सुखके वांछक प्राणीको इन सात तत्त्व अथवा पुण्य, पाप जो कर्मके दो भेद हैं इनको लेकर नौ पदार्थोंका अच्छा ज्ञान करना चाहिये । इन्हींका यथार्थ ज्ञान सो ही जैन सिद्धान्त या निज सिद्धान्तका ज्ञान है। यद्यपि इस महान ग्रंथमें इन्हीं ९ पदार्थोंका व्याख्यान है तथापि वास्तवमें इसमें उस निर्जरा तत्त्वका ही वर्णन है जिसमें हितार्थीको आत्मज्ञान करके उसी आत्माका ध्यानमई तप करना पड़ता है । आत्मा जो जगत्को परोक्ष हो रहा है उसको प्रत्यक्ष करके ऐसा दिखा देना कि मानो वह तुम्हारे हाथपर रक्खा हुआ एक गुलावका पुप्प है जिसको 'तुम प्रत्यक्ष देख देखकर उसकी सुगन्धसे संतोपी हो रहे हो, इस ग्रंथका मुख्य काम है । इसीसे यह कहना ठीक है कि यह ग्रन्थ साक्षात् मुक्ति या सच्चे आनन्दके अनुभवका द्वार है । यह ग्रन्थ ये भूमिका। बहुत उच्चतम कोटिका एक अति गहन और सूक्ष्म मोक्ष मार्गका पथ है । जैसे किसी बहुत ऊंचे पर्वतपर जिसके दोनों ओर गहरी नीचाई हो एक बहुत सकुड़ा चलनेका मार्ग हो ऐसा कि जो चलनेवाला कुछ भी अमावधानी करे तो पर्वतसे गिरकर प्राणान्त करे ऐसे ही इस ग्रंथका विचारपथ है । इसपर वहीं चल सका है जो पहले और बहुनमे उन ग्रंथोंका मनन कर चुका है जिनमें इन सात तत्त्वोंका विस्तारसे व्याख्यान है । इसलिये उचित है कि मुमुक्षु जीव द्रव्य संग्रह, तत्त्वार्थ सूत्र, सवार्थसिरि, गोमहसार जीवकांड कर्मकांडादि सहित,- इनका अवश्य अभ्यास करे । तो भी प्राचीन कालके अनेक रोगी किस तरह ग़ग रहित हुए व भावोंके क्या २ फल होते हैं इनके दृष्टान्तोंको जाननेके लिये श्री रुपमदेव आदि त्रेपट महापुरुप व अन्य महापुरु- पोंके चारित्रको कहनेवाले प्रथमानुयोगका अभ्यास करे; जिस लोकमें यह सब चरित्र हुए उसका विशेष स्वरूप जाननेको त्रिलोकसार आदि करणानुयोगका अभ्यास करे; गृहस्थ और साधुओंको कैसे बाह्य आचरण करना, आहार, विहार व व्यवहार करना इनका विशेष जाननेको रत्नकरंड श्रावकाचार, पुरुषार्थमियुगाय, चारित्रसार, मूला- चार, आदि चरणानुयोगका अभ्यास करे | फिर पीछे सूक्ष्म आत्मतत्वकी ओर लक्ष्य जमानेके लिये परमात्मा प्रकाश, प्रवचनसार, पंचास्तिकायका अभ्यास करे तथा जैन न्यायका स्वरूप परीक्षामुख आदि ग्रंथोंसे जाने । फिर जो कोई इस समयसार ग्रंथका अभ्यास करेगा वह इसके मूक्ष्म और आनंदमय पथ पर स्थिर रहकर अपना हित कर सकेगा। यद्यपि यह गहन है पर इसकी प्रास्त भाषा बहुत सरल व अर्थ भी सरल है। तथा भाषामें इतना मीठापन है कि जिसने और शास्त्रोंको नहीं भी जाना है पर आत्माका कल्या- ण करना चाहता है उसको सुनने ही बड़ा ही प्रिय और रोचक मालूम होता है। इससे हर- एक मुमुक्षुको इसका पाठ तो अवश्य कर जाना चाहिये । पर जो अल्पज्ञानी हैं उनको इसका मर्म समझनेके लिये ऊपर लिखित ग्रंथोंका अभ्यास अवश्य कर जाना चाहिये । इस ग्रंथके कर्ता महाराज श्री १००८ कुंदकुंदाचार्य देव हैं जिनका स्मरण प्रत्येक जनी शास्त्र सभाके पढ़नेके पहले इस नीचेके श्लोकसे करता है:- मंगलं भगवान् वीरो मंगल गौतमो गणी । मंगलं कुंदकुंदाों जैन धर्मोस्तु मंगलं ।। दिगम्बर जैनके मूलसंघ आनायकी नो २ पट्टावलियां कई सौ वर्ष पहलेकी लिखी हुई मिलती हैं उनमें उक्त आचार्यका नाम श्री उमास्वामी के पहले आता है नो तत्वा.
DANSAREnacternet - भूमिका । मैसूत्र था मो. शास्त्र के कर्ता होगए हैं और जिनका समय विक्रम सम्वत् ८१ है। यह स्वामी कुंदुकुंद श्री उमास्वामीके गुरु थे क्योंकि गृडाच्छ जो कि श्री कुं कुंदनीकी एक उपाधि थी वह उपाधि उमास्वामी महाराजके साथ भी थी जैसा कि तत्त्वार्थ मूत्रकी प्रशस्तिके नीचेके श्लोकसे प्रगट है । जो बहुधा प्राचीन लिखित पुस्तकोंमें मिलता है। तत्त्वार्थसूत्र कर्तारं गृहपिच्छापलक्षितं | वंदे गणीन्द्र संजात मुमास्वमि मुनीश्वरं ।। पट्टावलियोंके अनुसार श्री कुंदकुंदाचार्यका काल आचार्य होनेका विक्रम संवत् ४९ है। इस महान आचार्यने वीर भगवान व प्रसिद्ध गणधर गौतमस्वामीके सढग पदार्थका अनुभव किया था इसीस नित्य मंगलाचरणमें उनके साथ ही स्वामी कुंदकुंदको याद किया जाता है । कोई२ वर्तमानमें इन कुंकुंदको श्रुतावतार कथामें आए हुप काँड- कुंडपुर निवासी पननंदि मानकर श्री उमास्वामीक पीछे हुए ऐसा अनुमान लगाने हैं। पर यह अनुमान ठीक नहीं है । स्वामीने अपने पञ्चास्तिकाय, प्रवचनसार, नियममार आदि ग्रन्थोंमें तीर्थंकर, केवली और श्रुनकेबलीको ही नमस्कार किया है तथा यत्र तत्र गाथाओंमें कहा है कि जैसा मर्वज्ञोंने कहा है वैमा कहता है । इससे इनकी बहुत प्राचीनता शलकनी है। श्री उमास्वामीके पीछे भए होते तो यह श्री उमास्वामी से महान आचार्यको जिन्होंने सात तत्त्वों का बहुत सुन्दर और अकाट्य शब्द रचनामें वर्णन किया है अवश्य कहीं न कहीं म्मरण करते। इस ग्रंथकी दो संस्कृत टीकाएं मिलती हैं। एक आत्मख्याति जिसको श्री अमृतचंद्र आचार्यने बहुत ही उत्तम न्यायकी शैलीसे रचा था, दूसरी तात्पर्यवृत्ति जिसकी रचना बहुत विस्तार और भावार्थ के साथ बहुत सरल है। पहली टीकाका हिन्दी अनुवाद जयपुरके प्रसिद्ध पंडित जयचंदनी रत प्रचलित हो रहा है । दूसरी टीकाका हिन्दी अनुवाद कहीं भी प्रसिद्ध न देखकर हमने संस्ससके अनुसार इसलिये लिखनेका साहस किया कि हमारा स्वाध्याय भी सूक्ष्मतामे हो जायगा तथा जो संस्कृतज्ञ नहीं है वे इस भाषा द्वारा समझकर अपना हित करेंगे | इस संस्कृत वृतिको बम्बई चौपाटीके रत्नाकर पैलेसके चैत्यालयमें पुनः२ अभ्यास करनेमे इसकी प्रसिद्धि हो ऐसी गाढ़ रुचि नी हो गई थी जिमने पोरेन किया कि इ की भाषा की जाय । इसका प्रारंभ बम्बईने अपाइ सुदी १४ वृहस्पतिवार वि० सं० १९७० ता. १८ जुलाई १९१३ को किया था । इधर उधर भ्रमण करते रहनेसे धीरे २ उल्था होकर इसकी समाति इदौर, तिी आश्विन रुदी ३ सोमवार वि. सं. १९५ : ता. ११-१०-१५को हुई थी । करीब एक वर्ष तक ऐसा निगल कर लिया गया था कि नव क नित्य कुछ न कुछ उल्था लिख न लिया जायगा, आहार ग्रह्ण नहीं किया जायगा । .
*RARANAS.Rrahmat भूमिका। इस तात्पर्य्यवृत्तिके कत्ती जासेनर भी कहे जाते हैं पर वृतिमें कहीं इनका नाम नहीं है तथा अमृतचंद्रसत श्लोक वृत्तिमें लिये हैं, इससे प्रकट होता है कि तात्पर्य वृत्तिके कर्ता अमृतंचंद्रनीके पीछे हुए हों। अमृतचंद्रनीका समय वि० सं० ९६२ सनातन जेनग्रंथ माला ( छपी निर्णयसागर बम्बई सन् १९०५ ) की भूमिकाके सार है। इस भाषा करने में हमने अति साहस किया है । यह काम न्याय व व्याकरणके वि- द्वानोंका था पर हमारे समान विद्वत्तारहित व्यक्तिका न था । तो भी आत्म प्रेमवश जो यह साहस किया है उसपर विद्वज्जन हास्य न करके कृपादृष्टि द्वारा इसे अवलोकन करेंगे और जहां कोई भूल मालूम पड़े उसे अवश्य सूचित करेंगे, क्योंकि मुझ जैसे अति. अल्पज्ञानी द्वारा भी भूलें हो जाना संभव है । पहले सामान्यार्थ.इमलिये दिया कि गाथाका कुछ भाव झलंक जावे । फिर शब्दार्थ और विशेषार्थ संस्कृत टीकाके अनुसार दिया तथा मध्यमें प्राकत गाथाका अन्वय करके अन्वयके क्रमसे शब्दोंको कौनप्तमें रख दिया जिससे पढ़नेवाले- को शब्दका अर्थ भी अलग २ झलक जावे । तथा यदि कोई प्राकृतके अन्वय व शब्दपर ध्यान देना न चाहे व जो कौन्स छोड़कर पढ़े तो उसे वाक्य रचना सीधी २ समझमें आती जाय तथा अन्तमें भावार्थ जो दिया है वह अपनी ही समझसे लिखा गया है। पाठकगणे इसे पढ़कर आत्मज्ञान प्राप्त कर सच्चे सुखके भोक्ता हों ऐसी भावना करनेवाला- सर्व मुमुक्षुओंका दास- चन्दावाड़ी, सूरत। पैशाख मुदी वीर सं० २४४४ शीतलप्रसाद ब्रह्मचारी। वि.सं.१९७५ ता०११-५-१८ - ।' सूची आवश्यक विषयः। गाथा १ मे ६ २ मे ७ -- ८ . दूसग " पीठिका- पहला स्थल-स्व पर समय आदि..... अभेद और भेद रत्नत्रय तीसरा निश्चय, व्यवहार श्रुतकेवली.... चौथा रत्नत्रय भावना और फल पांचवा निश्चय, व्यवहार नय.... नौ पदार्थोका अधिकार.... २ -१० ११-१२ १३-१४ २-१० ११-१२ १२-१४ . १९ ८ ARGAMESRR .... .... दूसरा ॥ .... .... .... .... .... .... . .... सूची आवश्यक विषय । (१) पहला महा अधिकार जीव- पहला स्थल-शुद्धात्मभावना. १७-१९ रत्नत्रय भावना दृष्टांत सहित १९-२१ १९-२१ तीसरा अज्ञान, वंध, मोक्ष. २२-२४ २१-२३ चौथा अज्ञानीका लक्षण. २५-२७ २४-२५ पांचवा अज्ञानीको उपदेश. २८-३० २६-२८ छठा जीव व देहकी भिन्नता. ३१-३८ २८-३४ सांतवा प्रत्याख्यान स्वरूप. ३९-४२ २४-३८ आठवा निश्चय रत्नत्रयी जीव. ३८-३९ २) दूसरा महा अधिकार अजीव- पहला स्थल-देह व रागादि जीव नहीं. ४४-५३ ३९-४७ दूसरा । शुद्ध जीव पदार्थ उपादेय है. ५४-६५ ४८-९६ तीसरा वर्ण व रागादिके साथ जीवका तादात्म्य सम्बन्ध निषेध ६६-७३ ५७-६३ (३) तीसरा महा अधिकार-कर्त्ता कर्म पहला स्थल-अज्ञानी सज्ञानी जीव -७४से७९ दूसरा सम्यग्ज्ञानीका विशेष ८०-९० ७१- ७९ तीसरा द्विक्रियावादीका खंडन ९१-११५ ८०-१०२ चौथा मिथ्यात्वादि चार आश्रव कर्मोके कर्ता है ११६-१२२ १०३-१०९ पांचवां जीव और पुद्गल कथंचित् परिणामी हैं १२३-१३० १०९-११५ ज्ञानी ज्ञानमई और अज्ञानी अज्ञान मई भावका कर्ता है। १३१-१३९ ११६-१२२ सातवां अज्ञानमई भाव पांच कारणोंसे बंधका १४०-१४४ ११२-१२५ . आठवां जीव और पुद्गल परस्पर उपादान १४५-१४७ १२५-१२७ नवां " शुद्ध समयसार १४८-१९१ १२-१३१ (४) चौथा महा अधिकार पुण्य, पाप पहला स्थल--पुण्य, पाप अभेद कथन १५२-१५७ १३२-१३५ दूसरा । शुहात्माकी भावना विना पुण्य कर्म १५८-१६१ १३६-१३९ ६४- ७० कारण है - कारण निषेध .... ... मोक्षका कारण नहीं है.
Dece:AKANGE दृमरा " .... छठा सूची आवश्यक विषय । तीसरा निश्चय रत्नत्रय जीवके गुण हैं उनमें परिणमनेवाला जीव मोक्षका कारण है १६२-१७० १४०-१४३ (4) पांचवा महा अधिकार-आवेव पहला स्थल भेद ज्ञानसे शुद्धात्माकी प्राप्ति होती है १७१-१७३ १४४-१४६ भेदज्ञानसे किस तरह शुद्धात्माकी प्राप्ति होती है..... १७४-१७९ १४६-१७ तीसरा , शुद्ध भावनास शुद्ध होता है.... १७६ १४७-१४८ चौथा मंवर किस तरह होता है १७७-१७९ १४८-१४९ पांचवां आत्मा परोक्ष है, उसका ध्यान किसतरह किया जाता है। १८०-१८१ १४९-१५१ उदय प्राप्त द्रव्य कमके अभावसे रागद्वपादि भावाश्रयोंका अभाव होता है १८२-१८४ १५१-१५३ (६) छठा महा अधिकार-संवर पहला स्थल वीतराग सम्यग्दृष्टीके रागढप मोह- रूप आश्रव भाव नहीं होते २८५-१ -१८७ १५०-१५८ रागद्वेष मोहरूपी आश्रवांका विशेष. १८८-१९० १५०-१६० तीसरा ज्ञानी जीवके भावाश्रवोंका निषेध....१९१-१९३ १६०-१६३ चौथा , द्रव्य कर्मोको सत्तामें रहते हुए ज्ञानी निराभव कैसे होता है १९४-१९७ १६३-१६६ पांचवां , अज्ञानीक पूर्वबद्ध कर्म नवीन कर्मोको बांधने हैं, सम्यग्दृष्टी ज्ञानीक नहीं.... १९८:२०१ १६६-१७० (७) सातवां महा अधिकार-निर्जरा प्रथम स्थल द्रव्य और भाव निर्जरा, ज्ञान और वराग्य शक्ति.... २०२-२०५ १७१-१७४ ज्ञान और वैराग्यका सामान्य कथन.. २०९-२१० १७४-१७७ तीसरा २११-२२० १७७-१८४ चौथा परमात्मपद प्रकाशक स्वसंवेदन ज्ञान गुणका सामान्य कथन २२१-२२८ १८४-१९० पांचवा ., स्वमवेदन ज्ञान गुणका विशेष २२९-२४२ १९०-१९७ दूमरा " दुसरा " का विशेष SHOCKIS.ine .... .... .... . निश्चयनयसे हिंसा अहिंसाका लक्षण २५-२६८ २०९-२१४ सूची आवश्यक विषय। छठास्थल-सम्यग्दृष्टीके निशंकितादि आठ गुण २४३-२५१ १९८-२०५ (८) आठवा महा अधिकार-बंध. प्रथम स्थल-बंध, अबंधका स्वरूप २५२-२६१. २०६-२०९ दूसरा. ". । तीसरा नि नयसे हिंसाकरनेरूपभावही हिंसाहै २६९-२७४ २१४-२१७ चौथा व्रत और अव्रतका व्याख्यान २७५-२८९ - २१७-२२७ पाचवां निश्चयनयकी अपेक्षा व्यवहारनय निपेध- ने योग्य है २९०-२९५ - २२७-२३१ छठा रागद्वेष रहित ज्ञानियोंको प्राशुक आहार बंधका कारण नहीं है २९६-२९९ २३२-२३४ सातवां कर्मबंधके कारण रागादिक हैं, रागादिकों.. का कारण निश्चयसे कर्मोंका उदय है ३००-३०४ २३४-२३७ आठवां प्रतिक्रमण और प्रव्याख्यानका अभाव बंधका कारण है, ज्ञानी नहीं ३०१-३०७ २३७-२४० (९) नवां महा आधिकार-मोक्ष प्रथम स्थल-मोक्ष पदार्थ.... ३०८-३१४ २४०-२४४ मोक्षका कारण भेद विज्ञान है....... ३१५-३१८, २४४-२४७ तीसरा ,, भेद विज्ञानका विशेष .... ३१९-३२२ -२४७-२५१ चौथा वीतराग चारित्रके होते हुए द्रव्य प्रति- क्रमण आदि विषकुंभ तथा सराग- चारित्रके होते अमृत कुंभ है ३२३-३२७ २५१-२५६ (१०) दशवां महाअधिकार-मोक्षतत्त्व चूलिका वःसर्व विशुद्ध ज्ञान । प्रथम स्थल-निश्चयसे जीव कर्ता नहीं है ३२८-३३१. २५६-२५९ जीवके कर्म बंध अज्ञानसे है.. ३३२-३३५ २६९-२६१ तीसरा ज्ञानी निश्चयसे कर्मफलका भोक्ता नहीं है ३३६-३३९ २६२-२६५ चौथा भेद ज्ञानीके कर्ता भोक्तापना नहीं है ३४.०-३४१ २६९-२६६ औपशमिक आदि ५ भावों से किस भावके द्वारा मोक्ष होता है.... २६७-२६८ (११) ग्यारहवां महा अधिकार-समयमार चूलिका प्रथम स्थल -एकान्तसे आत्मा परद्रव्यका कत्ती नहीं हैं ३४२-३४८ २७०-२५९ .. दूसरा " दूसरा " mons दूसरा " .... उठा .... सूची आवश्यक विषय। ११ आत्मा एकान्तसे क्षणिक नहीं है.... ३४९-३५२ . २७६-२७९ तीसरा जीव या पुद्गल एकान्तसे भाव मिथ्यात्त्व आदिका कर्ता नहीं है.... ३५३-३५७ २७९-२८३ चौथा ;, जीव सुख दुःख आदिका कथंचित् कर्ता है ३५८-३७० २८१-२९१ पांचवां पांचोइन्द्रियोंके वाह्य विषयोंका धात मात्र अज्ञान है.... ३७१-३७७ २९१-२९५ जीव पुद्गल कर्मोंके साथ तन्मई नहीं होता ३७८-३८४ २९९-२९८ सातवां ज्ञान ज्ञेय पदार्थोंसे तन्मई नहीं होता ३८५-३९४ २९९-३०३ आठवां निश्चय प्रतिक्रमण, प्रत्याख्यान, आलोचना चारित्र ३९५-३९८ ३०३-३०६ नवां जीव अपनी बुद्धिके दोषसे पंचेन्द्रिय व मनके विषयों में राग द्वेष करता पदार्थोका दोष नहीं है, ३९९-४०८ ३०६-३१२ दसवां कर्म चेतना और कर्मफल चेतना और इनके सन्यासकी भावना ४०९-४११ । ३१२-३१६ ग्यारहवां ,, द्रव्य श्रुत आदि जीवका स्वरूप नहीं है ४१२-४२६ ३१६-३२१ बारहवां , शुद्ध नयसे आत्मा कर्म और नोकर्मके आहारसे रहित है ४२७-४२९ ३२२-३२३ भाव लिंग विना मात्र द्रव्यलिंग मुक्तिका कारण नहीं है.... ४३०-१३६ ३२३-३३१ ग्रन्थका फल १३७ ३३१-३३७ नोट-यहां ४३७ गाथाओंका मूचीपत्र है जब कि तात्पर्यवृत्तिमें ४३९ गाथाओंकी वृत्ति करनेका उल्लेख पातनिकाकी सूचनामें है। २ गाथाओंका अंतर मोक्ष अधिकारमें पड़ता है। मोक्ष तत्त्वकी सूचनामें २२ गाथाओंके ४ स्थल हैं । इसमें दूरे स्थलमें सूत्र पांच कहे हैं पर जिस रिखित प्रतिसे हमने उल्था किया था जो बम्बई चौपाटीके रत्नाकर पैलेस मंदिरमें है उसमें तथा नो कलकत्तेकी मुद्रित संस्कृत प्रति है दोनोंमें ४ ही सूत्र मिले । तथा चौथे स्थलमें सूत्र ६ बताए हैं हमने भी ६ ही गाथा ली हैं पर नीचे लिखी गाथाको उक्कं चं समझ कर उसपर क्रम नं० नहीं डाला "अपडिक्कमणं अप्पड़िसरण अप्पड़िहारो अधारणा चेव। अणियत्तीय अणिंदा अगुरुहा विसोहिय अमिय कुंभो" (सफा २५४) इसतरह समाधान समझना चाहिये। तेरहवां " .... ....
يع - धन्यवाद e विश्वव्यापी महायुद्धके कारण कागजकी अतीव मंहगीके समयमें भी हम अपने सुप्रसिद्ध साप्ताहिक पत्र " जैन मित्र " के १९वें वर्षके ग्राहकोंको यह वृहद् ग्रन्थ उपहार स्वरूप भेट दे सके हैं जिसका खास कारण यह है कि इस ग्रन्थको प्रकट करनेके लिये हमारे मान्यवर संपादक ब्रह्मचारीजी शीतलप्रसादनीकी प्रेरणानुसार निम्न लिखित सजनों द्वारा ७००)की सहायता प्राप्त हुई है जिससे ही ऐसा शास्त्रीय ग्रन्थ उपहार स्वरूप देनेका सौभाग्य “जैनमित्र को प्राप्त हुआ है- ४००) श्रीमती चमेलीवाई, धर्मपत्नी लाला अजित- प्रसादजी खजांची, देहरादून । १००) श्रीयुत बाबू निर्मलकुमार देवकुमारजी रहेस, आरा। १००) जैनमहिलारत्न श्रीमती मगनबाईजी, संचालि- का, श्राविकाश्रम, बम्बई। १००) लाला बद्रीदासजी वकील, बिजनौर । .. IN ७००) उपरोक्त अध्यात्मप्रेमियोंको हम कोटिशः धन्यवाद देते हुए अन्य श्रीमानोंको भी ऐसा शास्त्रदान समयानुसमय करनेके लिये प्रेरणा करते हैं। प्रकाशक।
नमः सिद्धेभ्यः। aaaay समयसार टीका ह DUDBN अथ श्री समयसारकी तात्पर्यवृत्तिक अनुमार देशभाषा वालबांध वचनिका लिख्यते। सोरठा-समयसार अविकार, बंदा ज्ञानानंद मय ॥ शिवस्वरूप शिवकार, मनवचक्राय सम्हारिक ।। ॥दोहा॥ आतम निधि जाके प्रगट, ताहि भाग करतार । निज सुखके सुन्दर रसिक, वन्दी वृपदातार ॥ रिपभदवसे वीर लो, चौवीसों जिनराय । भरतकाल अवसर्पिणी, वन्दों भवि सुखदाय ॥ सिद्धालयमें राजते, सर्वसिद्ध समुदाय । सत स्वभावके सत धनी, नमू हृदय उमगाय॥ गुरु गणधर गौतम प्रणमि, नमि आवाज़ और । उपाध्यायके चरण जुग, नमू ज्ञानके ठौर ।। साधत जे शिव-मार्गको, आतम रस लवलीन । वन्दों निर्मल भाव करि, कर्म वन्ध हो छीन ॥ जिनवाणी अमृतभई, समाधान करतार । मत विवादके फन्दको, सुलझावत गुणकार ॥ जे पदार्थ हैं अप्रगट, प्रगट दिखावन हार । सत म्वरूप सातामई, वन्दों भवधि तार || समयसार सत अन्यको, मर्म सुवेदन हार । कर्ता गुरु कुंदकुंदको, नमहुं ज्ञान दातार ॥ ताकी वृत्ति संस्कृत-तात्पर्य है नाम । ताके कर्ता निजरमी, बन्दों आठो जाम ।। याकी भाषा बचनिका, नहीं प्रगट यह देख । निज परको हित जानिक, लिखू नागरी लेख ॥ प्रथम ही वृत्तिकार मंगलाचरण करते हैं:- श्लोक-वीतरागं जिनं नत्वा, ज्ञानानंदकसंपदं । वक्ष्ये समयसारस्य, वृत्तिं तात्पर्य्यसंज्ञिकां ।। भावार्थ-ज्ञानानंद रूप एक परम धनके धनी, रागद्वेषादि विकारोंसे रहित और आत्म- घाती का विजेता श्री जिनेन्द्रको नमस्कार करके इस समयसार ग्रंथकी तात्पर्य संनिका नाम टीकाको कहूंगा ॥ अथानंतर शुद्ध परमात्म तत्त्वके विषयमें कहनकी मुख्यता करक विस्तारसे सुनने व जाननकी रुचिको रखनवाले शिष्योंका समझानेके लिये श्री कुंदकुंदाचार्य देव द्वारा संपादित इस समयसार प्राभृत ग्रंथका अधिकार शुद्धि पूर्वक पातनिकाके साथ व्याख्यान किया जाता है। तहां प्रथम ही " वंदितु सव्व सिद्धे " इत्यादि नमस्कार गाथा है इसको आदि लेकर पाठक क्रमस पहले स्थलमें स्वतंत्र गाथाएं छह हैं। इसके आगे दूसरे स्थलमें भेदरत्नत्रय और अभेद रत्नत्रयका वर्णन करते हुए “वबहार णुवदिस्सदि" इत्यादि दो गाथाएं हैं। फिर तीसरे स्थलमें wwerwwwRIERROWAVा २ A PRABHADOLENAR समयसार टीका। निश्चय श्रुतकेवली और व्यवहार श्रुतकेवलीके स्वरूपके व्याख्यानकी मुख्यता करके “जो हि सुदेण" इत्यादि दो सूत्र हैं। इसके आगे चौथे स्थलमें भेद और अभेद रत्नत्रयकी भावनाके लिये तैसे ही इस भावनाके फलको वर्णन करनेके लिये “णाणम्हि भावणा" इत्यादि दो सूत्र हैं। तिसके पश्चात् पंचम स्थलमें निश्चयनय और व्यवहारनयका व्याख्यान करते हुए, "क्वहारोऽ भूदत्यो " इत्यादि दो सूत्र हैं। इस प्रकार पांच स्थलोंमें चौदह (१४) गाथाओंके द्वारा समय- सार ग्रंथकी पीठिकाका न्याख्यान स्वरूप एक समुदायपातनिका है। ( समुदायपातनिकाको अध्यायके नामसे कह सक्ते हैं पीठिका पातनिकाका विस्ताररूप व्याख्यान । अब प्रथम ही पहली गाथाके पूर्वके आधे पदस मंगलाचरणके अर्थ इष्ट देवताको नमस्कार है और उत्तरके आधे पदमे समयसार ग्रंथका व्याख्यान करता है ऐसी प्रतिज्ञा है । ऐसा अभिप्राय मनमें धारण करके श्री कुंदकुंदाचार्य देव यह प्रथम सूत्र कहते हैं ।:- गाथा-बंदित्तु सव्वसिद्धे । धुवममलमणोवमं गदि. पत्ते । वोछामि समय पाहुड़ । मिणमो सुद केवली भणिदं ॥ १ ॥ संस्कृतार्थः-वंदित्वा सर्वसिद्वान् । ध्रुवाममलामनुपमां गतिं प्राप्तान् । वक्ष्यामि समयमाभृत । मिदमहो श्रुत केवलिभणितं ॥ १ ॥ सामान्यार्थः-अविनाशी, निर्मल और उपमारहित गतिमें विराजमान सर्व सिद्धाको नमस्कार करके, हे भन्यजीवो, मैं श्रुतकेवलियोंसे वर्णन करे हुए समयसार ग्रंथको कहूंगा। शब्दार्थ सहित विशेषार्थ-~अब 'वंदित्तु' इत्यादि पदोंको अलग २ करके व्याख्यान किया जाता है । ( 'वंदितु' ) निश्चयनयके द्वारा परमात्मा ही आराधन करने योग्य है और वही आराधनेवाला है ऐसी एक भावरूप जो निर्विकल्प समाधि सो ही है लक्षण जिसका ऐसा जो भावनमस्कार उससे और व्यवहारनयके द्वारा परमात्माकी वचनरूप स्तुति सा ही है द्रव्य नमस्कार उससे नमस्कार करके किनको, ( सव्वसिद्धे) अपने आत्मस्वरूपका लाभ अनुभव ऐसी जो सिद्धि उस लक्षणके धारी सर्व सिद्धोंको, कैसे हैं वे सिद्ध, (पत्ते) प्राप्त कर चुके हैं, किसको ( गदि ) सिद्ध गति अर्थात् सिद्ध परिणति या पर्यायको, कैसी है वह गति, (धुवं ) टंकोत्कीर्ण ज्ञाता दृष्टामई एक स्वभावरूप होनेके कारणसे ध्रुव अर्थात् अविनाशी ( अमलं ) भावकर्म रागद्वेषादि, द्रव्यकर्म ज्ञानावरणादि, नोकर्म शरीरादि, इन तीनोंके मैलसे रहित होनेके कारणसे और शुद्ध स्वभावसे भरे हुए होनेके कारणसे निर्मल है अथवा (अचलं ) [ ऐसा भी पाठ है ] द्रव्य क्षेत्र, काल, भव, भावमई जो पांच प्रकारका संसारमें भ्रमण उससे रहित होनेके कारणसे और अपने स्वरूपमें निश्चल होनेके कारणसे चंचलता सहित । revistarsurmires ३ HARASHEmecar समयसार टीका। अचल है तथा (अणोवमं ) जगतकी सम्पूर्ण उपमाओंसे रहित होनेके कारणसे और उपमा रहित आश्चर्यमई अपने स्वभावमें तन्मय होनेके कारणसे अनुपम है। इस प्रकार पूर्वार्द्ध गाथासे नमस्कार करके उत्तरार्द्ध, गाथाके द्वारा संबंध, अभिधेय और प्रयोजनकी सूचनाके अर्थ आचार्य प्रतिक्षा करते हैं । ( वोछामि ) कहता हूं, किसको ( समय पाहुई ) समय प्राभृतको, कैसा है समय प्राभृत,-सम् , कहिये भले प्रकारसे अयः कहिये ज्ञान जिसके हो उसको समय अर्थात् आत्मा कहते हैं । अथवा समं कहिये एकीभाव रूपसे अयनं कहिये गमन अर्थात् ज्ञानका परिणमन जिसमें हो उसका नाम समय है। प्राभूत नाम सार अर्थात् शुद्ध अवस्थाका है । समय अर्थात् आत्मा उसका जो प्राभूत अर्थात् सार सो समय प्राभृत है अथवा समय है सो ही प्राभृत अर्थात् सार शुद्ध अवस्था स्वरूप है ऐसा यह समय प्राभूत है। (इणं) वह प्रत्यक्ष स्वरूप जो समयसार ग्रंथ उसे, (उ) अहो भव्य जीव ! कैसा है यह ग्रंथ (सुद केवली भणिदं ) ( नोट-प्राकृत लक्षणकं बलसे यहां केवली शब्द दीर्घ है ) श्रुते अर्थात् परमागममें केवलिभिः अर्थात् सर्वज्ञ भगवानके द्वारा भणितं अर्थात् कहा गया है अथवा श्रुत- कैवल्ली जो गणधरदेव उन्होंने कहा है। भावार्थ-यह एक आत्मस्वरूपको झलकानेवाला ग्रन्थ है अतएव आत्मस्वरूपको सिद्ध करनेवाले ऐसे ध्रुव, निर्मल, उपमारहित, पंचमगतिको प्राप्त सर्व सिद्धाको नमस्कार करके श्रुतकेवलियोंके द्वारा कहे हुए समय प्राभृतको कहूंगा ऐसी प्रतिज्ञा श्री कुंदकुंदाचार्यजीन की है। अत्र संबंध, अभिधेय और प्रयोजन कहा जाता है। व्याख्यान और व्याख्येयके सम्बन्धको सम्बन्ध कहते हैं । व्याख्यानरूप यह वृत्ति ग्रंथ अर्थात् टीकारूप शास्त्र है। व्याख्येय उस व्याख्यानको प्रगट करनेवाला सूत्र है। सूत्र और उसकी वृत्ति इन दोनोंका यहां सम्बन्ध है। सूत्रको अभिधान कहते हैं तथा सूत्रार्थ सूत्रके भावको अभिधेय कहते हैं । इन दोनोंक सम्बन्धको अभिधान अभिधेय सम्बन्ध कहते हैं। विकारोंसे दूरवर्ती ऐसे स्वसंवेदन ज्ञानके द्वारा शुद्धात्म स्वरूपका परिज्ञान अथवा उसकी प्राप्ति अर्थात् उपलब्धि सो प्रयोजन है अर्थात् वृत्ति लिम्वनका अभिप्राय है ऐसा मानना ॥ १ ॥ आगे गाथाके पूर्वार्द्ध भागसे स्वसमय और उत्तरार्द्धसे परसमयको कहता हूं ऐसा अभिप्राय मनमें धार करके आगेका सूत्र कहते हैं- गाथा-जीवो चरित्तदसणणाणहिद तं हि ससमयं जाणे । पुग्गल कम्मुवदेसहिदं च तं जाण परसमयं ॥२॥ संस्कृतार्थ:-जीवश्चारित्रदर्शन, शानस्थितस्तं हि स्वसमयं जानीहि । पुद्गलकम्मोपदेशस्थितं च । तं जानी हि परसमयं ॥ २ ॥ 'सामान्यार्थ-जब यह जीव शुद्ध दर्शन ज्ञान चारित्रमें लय होता है तब निश्चय करके SANERame: ४ समयसार टीका। इस जीवको स्वसमयरूप जानो। और जब यह जीव पुद्गल कम्मकी उदयननित अवम्यामि तिष्ठता है अर्थात् उपयोगको लगाता है तब निश्चयसे इस जीवको पर ममयरूप जानी । शब्दार्थ सहित विशेपार्थ-(जीवो) शुद्ध निश्चयसे शुद्ध बुद्ध एक स्वभावमई जो निश्चय प्राण उस करके, वैसे ही अशुद्ध निश्चयस क्षयोपशम रूप अशुद्धभाव प्राणों करके तथा असद्भूत (जो वस्तुकी स्वरूपसत्तामें न हो, केवल बाह्यस सम्बन्ध हो । ) व्यवहारनयस यथा- संभव द्रव्यप्राणों करके जो जी रहा है, आगामी जीवंगा नया पहलेसे जीता आया है सो जीव है। यथासंभवसे प्रयोजन यह है कि पंचन्द्रीक १०, चौन्द्रीक ८, तन्द्रीके ७, केन्द्रीके ६ तथा एकेन्द्रीके ४ प्राण ही होते हैं। ( चरित्तदसणणाण ठिदो तं हि ससमयं जाणे) वही जीव जत्र चारित्र, दर्शन, ज्ञानमें स्थित होता है तब उसको प्रगटपने स्वसमय रूप जानो-विशुद्ध नान- दर्शन स्वभावमई अपने परमात्म स्वरूपमें जो रुचि होना सो सम्यग्दर्शन है, उम ही परमात्म स्वरूपके सम्बन्धमें जो रागादि रहित स्वसंवेदन ज्ञान सो सम्यग्ज्ञान है, नया उन ही परमात्म स्वरूपमें जो निश्चल अनुभव रूप होना सो वीतराग चारित्र है इस प्रकार लक्षण सहिन जो निश्चय रत्नत्रय उसके साथ परिणमन करता जो जीव पदार्थ उसको है शिष्य स्वतमय जानो। (पुग्गल कंमुवदेसहिदं च तं जाण परसमयं ) पुद्गल कर्मके उदयसे अनेक अवस्थाओंको लिये हुए नामोंमें जो जीव तिष्ठता है उसीको ही परसमय स्वरूप जानो। अर्थात् पुरन्टमई जो द्रव्य कर्म उसके उदयसे उत्पन्न हुई जो नर नारक आदि पर्याय स्वरूप मंज्ञाएं इनमें जब यह जीव निश्चय रत्नत्रयके लाभके विना तिष्ठता है अर्थात् इन पर्यायाम ही रमजाना है उस समय इस जीवको परसमय रूप जानो । ऐसा स्वसमय और परसमयका लक्षण जानने योग्य है। आगे अपने आत्मीक गुणोंमें एकत्त्वकं निश्चयको प्राप्त हुआ जो शुद्धात्मा सो ही उपादेय अर्थात् ग्रहण करने योग्य, ध्यान करने योग्य व मनन करने योग्य है तथा कमौके बंधके साथ एकताको प्राप्त हुआ जो अशुद्धात्मा सो हेय अर्थात् त्यागने योग्य है अथवा स्व. समय ही शुद्धात्माका स्वरूप है न कि परसमय ऐमा अभिप्राय मनमें धरकर अथवा पिछले सूत्रके आगे यह अगला सूत्र कहना उचित ही है ऐमा निश्चय करके आगंका सूत्र कहते हैं। इस प्रकारकी पातनिकाका लक्षण इस ग्रंथम सर्व ठिकाने जानने योग्य है। गाथा-एयत्तणिछय गदो समओ। सव्वत्थ सुंदरो लोगे। बंधकहा एयत्ते । तेण विसंवादिणी होदि ॥३॥ ' संस्कृतार्थ-एकत्त्वनिश्चयगतः समयः । सर्वत्र सुन्दरो लोके । बंधकथैकत्वे । तेन विसंवादिनी भवति ॥ ३ ॥ सामान्यार्थ:--अपने अभेद रत्नत्रयकी एकताके निश्चयको प्राप्त हुआ आत्मा इस H Swaravasanarmvirtist समयसार टीका। ELESAKAL लोकमें सर्व ही नर नारकादि अवस्थाओंमें सुन्दर प्रतिभासित होता है। कर्म बंधननित अवस्थाओंमें तनमई होते हुए जो बंधकी कथा प्रवर्तती है सो कथा पूर्वोक्त जीव पदार्थके साथमें विसंवाद युक्त अर्थात् असत्य है। शब्दार्थ सहित विशेपार्थः-(एयत्तणिय गदो ) अपने ही शुद्ध गुण और पर्यायोंमें परणमता हुआ अथवा अभेद रत्नत्रयमें परणमता हुआ अर्थात् अपनी एकताके निश्चयमें प्राप्त हुआ ( समर्ड ) यह आत्मा (समय शब्दसे आत्मा. लेना योग्य है क्योंकि उसकी व्युत्पत्ति इस तरह बनती है कि ' सम्यक् अयते गछति परिणमति कान् स्वकीय गुण पर्यायान् । अर्थात् जो भले प्रकार अपने ही गुण और पर्यायोंको परणमन करै सो समय अर्थात् आत्मा है ।.) ( सव्वत्य सुंदरो ) सर्व ही ठिकाने समीचीन अर्थात सत्यार्थ है । (लोगे) इस लोकमें । अथवा सर्व ही एकेन्द्रिय अवस्थाओंमें शुद्ध निश्चयनय करके सुन्दर अर्थात् उपादेय है । (बंधकहा ) कर्म बंधसे उत्पन्न जो गुणस्थानादि पर्याय (एयत्ते) उनमें तनमई होते संते जो बंधकी कथाएं प्रवर्तती हैं ( तेण ) सो उस पूर्वमें कहे हुए जीव पदार्थके साथ ( विसंवादिणी) विसंवाद करनेवाली (प्राकृतमें पुलिङ्गमें स्त्रीलिंगका निर्देश होसक्ता है) अर्थात् असत्य कथाएं ( होदि ) होती हैं । अर्थात् शुद्ध निश्चयनय करके शुद्ध जीवका स्वरूप नहीं होसकीं इससे यह सिद्ध हुआ कि स्वसमय ही आत्माका निज रूप है । भावार्थ-निश्चय रत्नत्रय स्वरूप ही जीव पदार्थ सर्वथा उपादेय, कार्यकारी और परमानन्द प्रदायक है तथा इसके विरुद्ध जो यह कहना कि यह जीव मिथ्याती है, नारकी है, नर है व व्रती है सो सत्र अशुद्ध जीवका स्वरूप है अतएव हेय, अकार्यकारी और परमानन्द नाशक है इसलिये निन शुद्ध स्वरूपको ही ग्रहण करना कार्यकारी है। आगे कहते है कि अभेद रत्नत्रयकी एकतामें परणमन करता हुआ जो शुद्ध आत्माका स्वरूप उसका पाना सहज नहीं है । गाथा:-सुद परिचिदाणुभूदा । सव्वस्स वि कामभोयबंधकहा । एयत्तस्सुवलम्भो । णवरि ण सुलभो विभत्तस्स ॥ ४ ॥ संस्कृतार्थ-श्रुतपीरचितानुभूता । सर्वस्याऽपिकाम भोग बंध कथा ! एकत्त्वस्योपलभः । किन्तु न सुलभो विभक्तस्य ॥ ४ ॥ . सामान्यार्थः-काम भोग सम्बन्धी कथा तो इस सर्व ही जीवलोकके वारवार सुननेमें आई, जाननमें आई तथा अनुभवमें आई है इससे सुलभ है-सहजमें आजाती है परन्तु अभेद रत्नत्रयमें रागादि भावोंके त्यागसे जो एकताकी प्राप्ति होनी सो इस जीवके सुलभ नहीं है, अर्थात् दुर्लभ है।
६ AAAYEGUNE समयसार टीका। शब्दार्थ सहित विशेषार्थ:-(सव्वस्सवि) सर्व ही जीवलोकके (कामभोयबंध कहा) काम रूप जो भोग अथवा काम शब्दसे स्पर्शनेन्द्रिय और रसनेन्द्रियजनित भोग और भोग शब्दसे घ्राण, चक्षु और कर्ण इन्द्रिय सम्बन्धी भोग इन पंचेन्द्रिय सम्बन्धी भोगोंकी कथा अथवा बंध शब्दसे प्रकृति, स्थिति, अनुभाग और प्रदेशबंध और इस वंधका फल नर नारकादि रूप लेना योग्य है। इस कारण काम, भोग और बंध तीनोंकी कथा सो (सुद परिचिटाणुभूटा) अनंत वार सुनने में आई, जाननेमें आई, तथा अनुभवमें आई है। इसलिये ऐसी कथा व ऐसी अवस्था दुर्लभ नहीं है किन्तु सुलभ ही है । ( नवरि ) किन्तु ( विभत्तस्स) रागद्वेषादि रहित (एयत्तस्स) एकताका अर्थात् सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान और सम्यग्चारित्रमें एक परिणति स्वरूप जो निर्विकल्प समाधि उसके बलसे स्वसंवेदनगम्य जो शुद्धात्म स्वरूप उसका (उबलभो ) प्राप्त होना व लाभ होना (ण सुलभो ) सुलभ नहीं है अर्थात् दुर्लभ है क्योंकि ऐसे आत्म स्वरूपका कथन सुननेमें नहीं आया, यदि सुननेमें भी आया तो परिचयमें नहीं आया, यदि कदाचित् परिचयमें भी आया तो अनुभव करनेमें नहीं आया । भावार्थ--यह है कि लोगोंमें काम भोग सम्बन्धी कथाओंका आना तो बहुत ही सुगम है परन्तु आत्म स्वरूपका अनुभव अतिशय दुर्लभ है । प्रयोजन यह है कि इस दुर्लभ स्वरूपके लाभके लिये दृढ़ प्रयत्न कर्तव्य है। आगे आचार्य कहते हैं कि जब रत्नत्रयकी एकता सुलभ नहीं है तत्र इसका ही कथन प्रयोजन भूत जान किया जाता गाथा:-त एयत्तविभत्तं दाएहं अप्पणो सविहवेण । जइ दाइज पमाणं । चुकिज छलं ण घेत्तव्वं ॥५॥ संस्कृतार्थः-तमेकत्वविभक्तं । दर्शयेऽह मात्मनः स्वविभवेन । यदि दर्शयेयं प्रमाणं । च्युतो भवामि छ न ग्राह्य ॥ ५ ॥ सामान्यार्थ-श्री कुंदकुंदाचार्य कहते हैं कि मैं अपने आत्माकी ही बुद्धिमत्तासे उस अभेद रत्नत्रय वीतराग आत्म स्वरूपको दिखलाता हूं। यदि मैं दिखलाऊतो उसको प्रमाण करना योग्य है । यदि इस उद्योगमें मैं कहीं च्युत हो जाऊं तो दुर्जनके समान छल ग्रहण करना योग्य नहीं है। शब्दार्थ सहित विशेषार्थः- ( अप्पणो सविहवेण ) आत्माकी अपनी ही मतिकी विभवसे अर्थात् आगम, तर्क, परम गुरुका उपदेश और स्वसंवेदन प्रत्यक्षके द्वारा (तं एयत्त- विभत्तं ) तिस पूर्वोक्त एकत्व विभक्तको अर्थात् अभेद रत्नत्रयमई जो एक स्वरूप उनमें परणमन करने वाले तथा मिथ्यात्वरागादि रहित परमात्म स्वरूपको ( दाएहं ) मैं दिखलाता हूं। (जइ दाइज ) यदि मैं दिखलाऊं (पमाणं ) तो स्वसंवेदन ज्ञान द्वारा परीक्षा करके उसे प्रमाण करना योग्य है । ( चुक्विज ) यदि मैं चूक जाऊं (छठं न घेत्तव्वं ) तो दुर्जनके है ...
समयसार टीका। ७ ENRLMes: समान मेरा छल ग्रहण करना योग्य नहीं है। भावार्थ-श्री कुंदकुंदाचार्य कहते हैं कि जब वह स्वसमयरूप परम वीतराग परमात्माका स्वरूप अति दुर्लभ है तब उसको दिखलाना अतिशय आवश्यक है। सो मैंने आगम द्वारा और तर्कसे जानकर तथा परम गुरू द्वारा प्राप्त उपदेशसे मिलानकर तथा अपने स्वयं अनुभवसे विचार कर जो निर्णय किया है सो मैं भव्य जीवोंके हितार्थ कहता हूं । यदि मेरे इस कथनमें मेरे प्रमादके द्वारा कहीं चूक हो जाय तो मेरा छल ग्रहण न किया जाय, किन्तु विशेष ज्ञानी विचारकर ठीक कर लेवें, सज्जनके समान मेरे साथ व्यवहार करें, दुर्जनके सदृश न करें । ऐसी मेरी इच्छा है ।। ५ ।। आगे शिष्यने प्रश्न किया कि यह शुद्धात्मा कौन है। उसके उत्तरमें आचार्य कहते हैं:- गाथाः—णवि होदि अपमत्तो ण पमत्तो जाणगो दु जो भावो । एवं भणति सुंडा णादा जो सोदु सो चेव ॥ ६ ॥ संस्कृतार्थः नापिभवत्यऽप्रमत्तोः न प्रमत्तो ज्ञायकस्तु यो भावः । एवं भणंति शुद्धाः ज्ञाता यः स तु स चैव ॥ ६ ॥ sho सामान्यार्थःजो पदार्थ न अप्रमत्त न प्रमत्त है, परन्तु ज्ञायक है ऐसा शुद्ध नयके ज्ञाता कहते हैं । इसलिये जो ज्ञाता है सो ही शुद्ध आत्म पदार्थ है । शब्दार्थ सहित विशेवार्थः-(णवि होदि अपमत्तो ण पमत्तो) शुद्ध द्रव्यार्थिक नयकी अपेक्षासे इस आत्माके शुभ अशुभ परिणमनका अभाव है इस कारण यह आत्मा न प्रमत्त है न अप्रमत्त है । प्रमत्त शब्दसे मिथ्याष्टिसे लेकर प्रमत्त संयत छठे गुणस्थान तक, व अप्रमत्त शब्दसे अप्रमत्तसे ले अयोगी गुणस्थान तक ऐसे चौदह गुणस्थान जानने उन स्वरूप जो नहीं है । ( जाणगो दु जो भावो ) परंतु जो ज्ञान स्वरूप पदार्थ है सो ही शुद्धात्मा है ( एवं भणंति सुद्धा ) ऐसा शुद्धनयको अवलम्बन करनेवाले महान पुरुष कहते हैं ( णादा जो सो दु सो चेव ) इस कारण जो ज्ञाता शुद्धात्मा कहा जाता है सो ज्ञाता ही है ऐसा अर्थ जानना । भावार्थ-यह है कि वह शुद्धात्मा कषाय सहित है व कषाय रहित विकल्पोंसे दूर है। मिथ्यात्वसे ले अयोगि पर्यंत गुणस्थान इस आत्मामें अशुद्ध नयसे कहे जाते हैं। शुद्ध निश्चयनयसे यह आत्मा स्व और परका ज्ञाता दृष्टा है, रागी व द्वेपी नहीं है। ऐसा शुद्ध जो आत्माका स्वरूप है सो ही उपादेय कहिये मनन करने योग्य व ध्यान करने योग्य है । ऐसे स्वतंत्र छह गाथाओंमें प्रथम स्थल पूर्ण हुआ। इन आगे कहते हैं कि जैसे प्रमत्त आदि चौदे गुणस्थानके भेद इस जीवके व्यवहार नयसे हैं परन्तु शुद्ध द्रव्यार्थिक निश्चयनयकी अपेक्षासे नहीं हैं वैसे दर्शन, ज्ञान, चारित्रके भेद भी नहीं हैं ऐसा उपदेश करते हैं- ANREVAISANNAROVATIUVI ८ EVMAHARMATHLESHAMALAYARI , जो समयसार टीका। गाथा:-ववहारेणुवदिस्सदि णाणिस्स चरित्तदंसणं णाणं । णविणाणं ण चरित्तं ण दंसणं जाणगो सुडो ॥७॥ संस्कृतार्थ:-व्यवहारेणोपदिश्यते ज्ञानिनश्चारित्रं दर्शनं ज्ञानं । नापि ज्ञानं न चारित्रं न दर्शनं ज्ञायकः शुद्धः ॥ ७ ॥ सामान्यार्थ-इस ज्ञानी जीवके दर्शन ज्ञान चारित्र व्यवहारनयकी अपेक्षासे कहे जाते हैं, निश्चयनयसे न इसके ज्ञान है, न चारित्र है, न दर्शन है; परन्तु शुद्ध ज्ञायक स्वरूप है। शब्दार्थ सहित विशेषार्थ:--(ववहारण) सदभूत व्यवहारनय करके ( णाणिस्म ) इम ज्ञानी जीवके (चरित्तदसणं णाणं) सम्यग्र्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यग्चारित्र (उवदिम्सदि) कहे जाते हैं, परन्तु शुद्ध निश्चयनय करके (णविणाणं ण चरित्तं ण दंसणं) न तो ज्ञान है, न चारित्र है, न दर्शन है । तो फिर यह आत्मा कैसा है ? (जाणगो) ज्ञायक शुद्ध चैतन्य स्वभाव है तथा (सुद्धों) शुद्ध ही है-रागद्वेषादि करके रहित है। यहां यह प्रयोजन है कि जैसे निश्चयनय करके अभेद स्वरूप होनेसे अग्नि एक रूप ही है । पीछे भेद रूप व्यवहारनय करके यह कहने में आता है कि नो दहन करती अर्थात् जलाती है सो दाहक है, जो पकाती है सो पात्रक है, प्रकाश करती है सो प्रकाशक है । इस व्युत्पत्तिकी अपेक्षासे-विषय भेदसे तीन प्रकार भेद अग्निके किये जाते हैं । वास्तवमें वही अग्नि दाहक, पाचक तथा प्रकाशक स्वरूप है तैसे ही यह जीव भी निश्चय स्वरूप जो अभेद नय उसकी अपेक्षासे शुद्ध चैतन्य स्वरूप ही है, ऐसा होने पर भी भेद रूप व्यवहारनय करके यह कहनेमें आता है-जो जानता है सो ज्ञान है, जो देखता है व श्रद्धान करता है सो दर्शन है, जो आचरण करता है सो चारित्र है। इस व्युत्पत्ति- कारण विषयके भेदसे तीन प्रकार भेद किये जाते हैं। परमार्थस तो दर्शन ज्ञान चारित्र स्वरूप आत्मा ही है । भावार्थ-ऐसा आत्मा जो शुद्धनिश्चयसे अभेद स्वरूप और सद्भुत 'व्यवहारसे भेद स्वरूप है सो ही ध्यान करने योग्य उपादेय है। आगे कहते हैं कि यदि शुद्ध निश्चयनय करके इस जीवके दर्शन, ज्ञान, चारित्र नहीं है तो एक इसी परमार्थ स्वरूपको ही कहना योग्य है। व्यवहार स्वरूप कहनेकी कोई आवश्यक्ता नहीं है ऐसी शंका किये जानेपर आचार्य कहते हैं- गाथाः-जह णवि सक्कमणज्जो । अणजभासं विणा दुगाहेहूँ । तह ववहारेण विणा । परमत्थुवदेसणमसकं ॥ ८॥ संस्कृतार्थः-यथा न शक्योऽनार्यो । ऽनार्यभाषां विना तु ग्राहयितुं । तथा व्यवहारेण विना । परमार्थोपदेशनमशक्यं ॥ ८ ॥ सामान्यार्थः-जैसे म्लेच्छ म्लेच्छ भाषाके बिना किसी वातके समझनेको असमर्थ है वैसे व्यवहारके विना व्यवहारी जीवोंको परमार्थका उपदेश होना अशक्य है । के SCENEVAVES समयसार टीका। शब्दार्थ सहित विशेषार्थः- (जह) जैसे (अणजो) अनार्य अर्थात् म्लेंच्छ (अणज्न भास विणादु ) अनार्य जो म्लेच्छ भाषा उमके विना (गाहेर्नु) अर्थ ग्रहण करनेको अर्थात् समझाये जानेको (णविसकं ) नहीं शक्तिमान होते । ( तह) तैसे ( ववहारेण विणा) व्यवहार नयके विना (परमत्थुवदमणम्) परमार्थका उपदेश करना ( असक्कं ) असक्य है । यहां यह अभिप्राय है कि जैसे कोई ब्राह्मण अथवा यति म्लेच्छ लोगोंकी पल्ली अर्थात् वस्तीमें गया वहां उसका म्लेच्छन नमस्कार किया । तब उस ब्राह्मण या यतिने उसके उत्तरमें 'स्वस्ति' ऐसा कहा। तब वह लच्छ स्वस्तिक अविनश्चर अर्थको नहीं जानता हुआ कुछ भी नहीं समझा और मेहेक समान उस ब्राह्मण वा यतिको ताकने लगा। तैसे ही यह अज्ञानी मनुष्य भी 'आत्मा' ऐसा कहे जाने पर आत्मा शब्दकं सत्य अर्थको नहीं जानता हुआ भ्रम बुद्धिसे ताकता रहता है अर्थात् आत्मा किसे कहते हैं इस बातका कुछ भी नहीं समझता । परन्तु जैसे वंह म्हेच्छ अपनी म्लच्छ भाषामें जब उस ब्राह्मण द्वारा आशीर्वाद सूत्रक बचनको सुनता है तब बहुत ही हर्पित होता है और 'स्वस्ति' शब्दको भी समझ लेता है तैसे ही जब यह अज्ञानी व्यव- हारी जीव किसी निश्चय और व्यवहारके ज्ञाता पुरुषसे सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यग्चा- रित्र स्वरूप जीव है ऐसा नीव शब्दका अर्थ समझता है तब जीव पदार्थको ठीक २ जान संतुष्ट होता है। भावार्थ-परमार्थ स्वरूपका कयन और नानपना व्यवहारनयक आश्रय विना हो नहीं सक्ता इसलिये व्यवहारनयका आश्रय लिया जाता है। जो परमार्थके ज्ञाता परमार्थ तत्त्वमें आरूढ़ हैं उनके लिये व्यवहार नयका उपदेश कार्यकारी नहीं है। इस प्रकार भेद और अभद रलायक न्याग्न्यानकी मुग्यता करके दो गाथाओंके द्वारादूसरा स्थल पूर्ण हुआ | पहली गाया जो यह कहा है कि व्यवहार करके परमार्थ जाना जाता है उस ही अर्थको फिर कहते हैं:-- गाथा:-जो हि सुदेणभिगच्छदि । अप्पाणमिणं तु केवलं सुद्धं । तं सुदकंवलिमिसिणो । भणंति लोगप्पदीवयरा ॥९॥ जो सुदणाणं सव्वं । जाणदि सुद केवली तमाहु जिणा। सुदणाणमादा सव्वं । जम्हा सुद केवली तम्हा ॥ १० ॥ संस्कृतार्थः-यो हि श्रुतेनाभिगच्छति । आत्मानमिमं तु केवलं शुद्धं । तं श्रुतकेवलिन मृपयो । मणन्ति लोकप्रदपकराः ॥ ९ ॥ यो श्रुतज्ञानं सबै । जानाति श्रुतकेलिनं तमाहु जिनाः । श्रुतज्ञानमात्मा सर्व । यस्माच्छुतकेवली तत्मात् ॥ १० ॥ सामान्यार्थ-जो कोई निश्चयसे भावश्रुतके द्वारा इस आत्माको असहाय और जानता है उसको लोक स्वरूपके प्रकाशक परम ऋपि श्रुतकेवली कहते हैं ॥ ९ ॥ जो कोई शुद्ध PREVENVR७५ IASASIKACharacenera: समयसार टीका। सर्व द्वादशांग श्रुतज्ञानको जानता है उसको जिनेन्द्रदेव श्रुतकेवली कहते हैं, क्योंकि सर्व ही श्रुतज्ञान आत्मा है इसलिये द्वादशांगका ज्ञाता द्रव्य श्रुतंकवली होता है ।। १० ॥ विशेषार्थ:-(जो ) जो कोई ( हि ) स्फुटरूपसे ( सुदेण ) मावश्रुत अर्थात् स्वसं- वेदन ज्ञान व विकल्प रहित समाधिके द्वारा (इणं ) इस प्रत्यक्षीभूत ( अप्पाणं) आत्माको (तु ) पुनः ( केवलं ) सहाय या आलम्बन रहित तथा ( सुद्ध.) रागद्वेषादि रहित शुद्ध ( अभिगच्छति ) ऐसा भले प्रकार जानता है अर्थात् अनुभव करता है व उस स्वरूपका स्वादी होता है (तं । तिस पुरूपको ( लोयप्पदीवयरा ) लोकको प्रदीप या प्रगट करनेवाले ( इसिणो ) परम ऋषि ( सुदकेवली ) श्रुतकेवली ( भणंति ) कहते हैं। भावार्थ-जो केवल स्वरूपी शुद्धात्माको अनुभवै सो ही श्रुतकवली है । इस प्रकार इस गाथास निश्चय श्रुतकेवलीका लक्षण कहा गया ॥९॥ (जो ) जो कोई ( सन्वं ) सर्व परिपूर्ण ( मुदणाणं) द्वादशांग द्रव्य श्रुतको ( जाणदि ) जानता है (जिणा) जिनेन्द्र सर्वज्ञ (तं )उस पुरुषको (मुकेवली) व्यवहार श्रुतकेवली (आह) कहते हैं । (जम्हा) क्योंकि (सम्व) सर्व आत्मज्ञानन रूप व परमार्य जानन रूप (सुदणाणं) द्रव्यश्रुतके आधारसे जानने योग्य जो भाववत ज्ञान (आदा) सो आत्मा है (तम्हा) इसलिये (सुदकेवली) द्रव्य श्रुतकेवली श्रुतकेवली होता है । यहां यह प्रयोजन है कि जो भावभुत रूप स्वसंवेदन ज्ञानके द्वारा शुद्धात्माको जानता है व अनुभवता है वह निश्चयश्रतकेवली है। परंतु जो कोई अपने शुद्ध आत्मस्वरूपको नहीं अनुभव करता है व उसकी भावना नहीं करता है परन्तु वाह्य विषय रूप द्रव्यश्रुतके अर्थको जानता है मो व्यवहार श्रुतक- वली है। भावार्थ-जब कोई मुनि द्वादाशांगक अर्थको जान रहा है परन्तु शुद्धात्म रूपके अनुभवमें उपयोग नहीं लगाए है उस समय वह मुनि निश्चयसे श्रुतकवली नहीं है परन्तु न्य- वहारसे द्रव्य श्रुतकेवली है । क्योंकि इसी श्रुतके अर्थको विचारत हुए शुद्ध आत्माके अनुभवमें चला जाता है । उस अनुभवके लिये यह व्यवहार सहारा रूप है। आधाररूपं होने के कारणसे ही द्रव्यश्रतकेवलीको श्रतकेवली कहते हैं । यहां कोई शंका करता है कि जब आत्मस्वरूपके अनुभवसे अर्थात् स्वसंवेदन ज्ञानके बलसे श्रुतकेवली होते हैं तब इस पंचमकालमें अब भी श्रुत- केवली होने चाहिये क्योंकि स्वरूपका अनुभव तो अब भी.होता है फिर आगममें श्रुतकेवलि- योंका अब अभाव क्यों कहा गया है । इसका समाधान यह है कि पूर्वकालके महात्माओंके जिस तरहका शुक्ल ध्यान स्वरूप स्वसंवेदन ज्ञान व स्वरूपका अनुभव होता था तैसा इस कालमें (शक्तिके अभावसे ) नहीं होता परन्तु इस कालके योग्य अपूर्ण धर्मध्यान ही है । इसलिये द्वादशांगके ज्ञाता श्रुतकेवलियोंका अब अभाव है। इस तरह निश्चय और व्यवहार श्रुतकेवलीका व्याख्यान करते हुए दो गाथाओंके द्वारा तीसरा स्थल पूर्ण हुआ। ..
Kawariseiterarmirmire समयसार टीका। EVRUARRAVINAUGreen ११ आगे आधी गाथामें भेद रत्नत्रयको भावना और उत्तरार्द्ध गाथामें अभेद रत्नत्रयकी भावनाको कहते हैं- गाथा-णाणमि भावणा खलु । काव्वा दसणे चरित्ते य । ते पुणु तिणि वि आदा । तम्हा कुण भावणं आदे॥११॥ संस्कृतार्थः-ज्ञाने हि भावना खलु कर्तव्या दर्शने चारित्रे च । तानि पुनः त्रीण्यपि आत्मा तस्मात् कुरु भावना आत्मनि ॥ ११ ॥ सामान्यार्थ-सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, और सम्यग्चारित्र इन तीन रूप भेद रत्नत्रयमें प्रगटरूपस भावना करनी योग्य है । परन्तु निश्चयसे इन तीन स्वरूप आत्मा ही है इसलिये शुद्धात्म स्वरूपमें हे भव्य ! भावना कर । भावार्थ-व्यवहारनयसे व्यवहार सम्यग्दर्शन जैसे सात तत्त्वोंका व देव गुरु धर्मका श्रद्धान करना, व्यवहार सम्यग्ज्ञान जैसे जिनवाणीका पठन पाठन करना, व्यवहार सम्यग्चारित्र जैसे श्रावक व मुनिका आचरण पालना, इस प्रकार भेद रत्नत्रयमें उपयुक्त होना योग्य है । इस व्यवहार रत्नत्रयके प्रभावसं निश्चय रत्नत्रयका लाभ हो ऐसी भावना करनी योग्य है । तथा अपने शुद्ध आत्मस्वरूपकी भावना करनी सा वास्तवमें निश्चय रत्नत्रयकी भावना है । प्रयोजन यह है कि शुद्धात्माकी भावना ही मोक्षार्थी जीवके लिये उपादेय अर्थात् कार्यकारी है परन्तु शुद्धात्म भावनाके अलाभमें व्यवहार रत्नत्रयकी भावना करनी योग्य है कि जिससे शुद्धात्म भावनाका शीघ्र लाभ हो जावे । आगे भेद और अमेद रत्नत्रयकी भावनाके फलको दिखलाते है:- गाथा--जो आदभावणमिणं णिच्चुवजुत्तो मुणी समाचरदि । सो सव्वदुक्खमोक्खं । पावदि अचिरेण कालेण ॥ १२ ॥ संस्कृतार्थ-यः आत्मभावनामिमां । नित्योद्यतः मुनिः समाचरति । सः सर्वदुःखमोक्षं । प्राप्नोत्य चिरेण कालेन ॥ १२ ॥ सामान्यार्थ:-जो मुनि नित्य उद्यमवन्त होकर इस आत्म भावनाको आचरण करता है सो थोड़े ही कालमें सर्व दुःखोंसे मुक्त हो जाता है। शब्दार्थ सहित विशेषार्थः-(जो) जो (मुणी ) मुनि तपोधन ( णिच्चुवजुत्तो) नित्य उद्यमवन्त होकर (इणं ) इस (आढ़ भावणम् ) आत्म भावनाको ( समाचरदि ) भले प्रकार भावता है ( सो) वह मुनि ( अचिरेण कालेन ) थोड़े ही कालमें ( सव्व दुक्खमोक्खं ) सर्व दुःखोंसे मुक्ति ( पावदि ) पालेता है । भावार्थ--यह है कि यह संसारी जीव चतुर्गति मय संसारमें निज आत्म सुखको नहीं जानता हुआ भ्रमण किया करता है और सुखकी तृष्णा करके इन्द्रिय जनित सुखोंको सुख मान भूना रहता है और कभी भी निराकुल आनन्दको . १३ SEENESS समयसार टीका। MAAROVARSATISEDSee . नहीं पाता। अतः जब यह गृह ममत्त्व त्याग मुनि पदवीको घr त्रयकी भावनामें रत होकर आत्मस्वरूपकी भावना " .रण करता है और निश्चय रत्न- कर्मोंको नाश करके मुक्तिका लाभ करता रता है तब यह मुनि वीतराग हो कर इस प्रकार निश्चय और व्यवहार और सदाक लिये परम सुखी हो जाता है । करते हुए दो गाथाओंमें चौथा हार रत्नत्रयकी भावना और भावनांक फलको व्याख्यान आगे कहते हैं। . स्थल पूर्ण भया। म्लेच्छ भाषा बो क जैसे कोई भी ब्राह्मणादि विशिष्ट जन किसी म्लेच्छको समझाने के समयमें ही अशानी .लता है परन्तु शेष काल अर्थात् और समयों में नहीं बोलता है तसे ही ज्ञानी पुरुय भी का समझानेके समयमें ही व्यवहारका आश्रय लेता है परन्तु और समयमें नहीं क्योंकि व्यवहार नय अभूतार्थ अर्थात् असत्यार्य है। निश्चय रूपके समझानेके प्रयोजनमें ही इस नयका ग्रहण कार्यकारी है- गाथा-ववहारोऽभूदुस्थो भूदत्यो देसिदो दु सुद्धणओ। भूदत्थमस्सिदो खलु । सम्मादिही हवदि जीवो ॥ १३ ॥ संस्कृतार्थ-व्यवहारोऽभूतार्थो भूतार्थी देशिनस्तु शुद्धनयः । भूतार्थमाश्रितः खल्लु । सम्यग्दृष्टिर्भवति जीवः ॥ १३ ॥ सामान्यार्थ-व्यहवार नय असत्यार्थ है और शुद्ध नय सत्यार्थ है इसलिये जो सत्यार्य शुद्ध नयका आश्रय लेता है वही जीव निश्चयसे सम्यग्दृष्टि होता है। शब्दार्थ सहित विशेपार्थ- ( ववहारो ) व्यवहार नय ( अभूदत्यो ) अभूतार्थ अर्थात् असत्यार्थ है अर्थात् वास्तविक स्वरूपको प्रयोजनवश अन्यप्रकारका बतलाती है ( दुसुइणउ ) परन्तु शुद्ध निश्चय नय ( भूदत्यो ) भूतार्थ सत्यार्थ ( देसिदो ) कही गई है। कारण कि जैसा असली वस्तुका स्वरूप है उसीको बतलाती है इसलिये ( भूदत्थम् ) सत्यार्थ निश्चय नयको ( अस्सिदो ) आश्रय करनेवाला (जीवो ) जीव ( खलु ) स्फुटरूपसे अर्थात् निश्चयसे ( सम्मादिट्ठी ) सम्यग्दृष्टि ( हवदि ) होता है । इस गाथाका दूसरा व्याख्यान यह है कि ( ववहारो अभूदत्यो भूदत्यो देसितः ) व्यवहार नयको असत्यार्थ और सत्यार्थ दोनों रूप उपदेश किया गया है । निश्चय नयकी अपेक्षासे व्यवहार नय असत्यार्थ है परन्तु अपने विषयकी अपेक्षासे यह सत्यार्थ है जैसे आत्माको देव कहना यह व्यवहार है । सो आत्मा देव पर्यायमें है इस वातको सूचना करनेकी अपेक्षा देव कहना सत्यार्थ है परन्तु निश्चयसे आत्मा देव पाय आदि रहित शुद्धज्ञानानंद स्वरूप है इस अपक्षासे आत्माको देव कहना असत्यार्थ है । (सुद्धनउ दु ) केवल व्यवहार नय ही दो प्रकार नहीं है किन्तु शुद्धनय भी दो प्रकार हैं एक अशुद्ध निश्चयनय और दूसरा शुद्ध निश्चय नय । इनमें अशुद्ध निश्चय नय जो आत्माको रागीद्वेषी बतलाती है शुद्ध निश्चय नयकी अपेक्षासे असत्यार्थ है । शुद्ध
SANSAR
समयसार टीका।
aantonarsimanama
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१३
निश्चय नय वास्तवमें सत्यार्थ है क्योंकि यह आत्माक शुद्ध स्वरूपको प्रतिपादन करती है।
इस प्रकार नयोंके चार भेद हुए । यहां यह तात्पर्य है कि जैसे कोई ग्रामीण अविवेकी
पुरुष कढमसे मिला हुआ मैला पानी पीता है। परन्तु नगरनिवासी विवेकी पुरुष
उस मैले पानी में कतक फल अथवा फटकरी डालकर निर्मल जलका पान करता है तैसे
ही स्वसंवेदनरूप भेद विज्ञानकी भावनासे शून्य मनुष्य मिथ्यात्त्व व रागद्वेषादि विभाव
परिणाम सहित इस आत्माका अनुभव करता है। परंतु सम्यग्दृष्टी जीव अभेद रत्नत्रय लक्षणको
रखने वाली संकल्पविकल्प रहित समाधिक बलसे कतक फलकी जगहमें निश्चय नयको आश्रय
करके शुद्ध आत्माका ही अनुभव करता है । भावार्थ यह है कि शुद्ध होनकलिये शुद्धस्वरूपका
ही अनुभव करना योग्य है !! १३ ॥
आग पूर्व गाथामें कहा है कि सत्यार्थनयको आश्रय करनेवाला जीव सम्यग्दृष्टि होता है। अब
यहां कहते हैं कि केवल सत्यार्थ निश्चयनय ही विकल्प रहित समाधिमें रत पुरुषोंके लिये प्रयोजनवान
नहीं हैं किन्नु जिनको निर्विकल्प समाधिकी प्राप्ति नहीं है ऐमें प्रथम अवस्थाके धारी पुरुपोंके लिये
किसी काल सविकल्प अवस्था में मिध्याव व विषय कपाय आदि खोटे ध्यानोंको हटाने के लिये व्यव-
हारनय भी प्रयोजन यान होता है जैसे किसीको शुद्ध सोला वानीके सुवर्णका लाभ न हो तो नीचेके ही
नुवर्णका लाभ कायंकारी है ऐसा कहते हैं-
गाथा:-सुद्धो सुम्हादेसी । णाव्यो परमभावदरिसीहि ।
ववहारदेसिदो पुण । जे अपरमे हिदा भावे ॥१४॥
संस्कृतार्थ:-शुद्धः शुद्धादेशो । ज्ञातव्यः परमभावदर्शिभिः ।
व्यवहारदेशितः पुनः । ये त्यपरमे स्थिता भावे ॥ १४ ॥
मामान्यार्थ-शुद्ध नय शुद्ध, द्रव्यको कथन करनेवाली है सो शुद्ध भावक ज्ञाता
पुरुषों के द्वारा अनुभव करने योग्य है । परन्तु जो पुरुष अशुद्ध व नीचेकी अवस्थामें स्थित हैं
उनके लिये व्यवहारनय उपदेश की गई है।
शब्दार्थ सहित विशेषार्थ--(शुद्धो) शुद्ध निश्चय (मुद्धादेसो) शुद्ध द्रव्यका आदेश अर्थात
वर्णन करने वाली है ( परमभाव दरिसीहिं) सो परमभाव अर्थात् शुद्ध आत्मीक भावको देखने
जानने वाले महा पुरुषोंक द्वारा (गाइन्वा) नानन, भावने, व अनुभव करने योग्य है । क्योंकि
जैसे शुद्ध सोला वानीक सुवर्णका लाभ कार्यकारी है तैस यह शुद्ध, नय अभेद रत्नत्रय स्वरूप
समाधिक कालमें प्रयोजनवान होती है। (पुण) तथा पुनः (नंदु) जो कोई पुरुष (अपरमे) अंशुद्ध
भावमें अर्थात् असंयत सम्यग्दृष्टिकी अपेक्षा तथा श्रावक्की अपेक्षासे सराग सम्यग्दृष्टि लक्षणमई
शुभोपभोग रूप व प्रमत्त और अप्रमत्त संयत मुनिकी अपेक्षास भेद रत्नत्रय स्वरूप (भाव) जीव
पदार्थमं (टिदा) स्थित हैं। तिनको (ववहार देसिदो) व्यवहार अर्थात् विकल्प रूप भेदस या पर्याय
रूप दिखलाई हुई जो व्यवहार नय सो नीचक सुवर्णक लाभक समान प्रयोजनवान होती है ॥१४॥
AMSGROVAGHAVALOGUR
समयसार टीका।
भावार्थ-वास्तवमें शुद्ध सुवर्ण जैसा प्रयोजनवान है तैसा अशुद्ध, सुवर्ण नहीं । परन्तु
जिसको शुद्ध सुवर्णका लाभ होना कठिन है तिसको, अशुद्ध सुवर्णका लाभ ही कार्यकारी है, वे
मतलब नहीं है। क्योंकि अशुद्ध सुवर्ण शुद्ध सुवर्णमें बदला जा सक्ता है। तैसे ही वास्तवमें
शुद्ध द्रव्यका विचार जैसा प्रयोजनवान है तैसा भेद रूप अशुद्ध द्रव्यका विचार नहीं परन्तु
जिसको शुद्ध आत्मद्रव्यका अनुभव होना कठिन है तिसके लिये व्यवहारनयस भेद रूप जीव
पदार्थका विचार ही कार्यकारी है क्योंकि यह भेड़ रूप जीवपदार्थका विचार शुद्ध आत्मद्रव्यों
अनुभवमें बदला जासक्ता है । इससे सिद्ध हुआ कि व्यवहार और निश्चयनय दोनों ही इस
साधक मुमुक्षु जीवके लिये प्रयोजनवान हैं ॥ १४ ॥
इस प्रकार निश्चय और व्यवहार नयका व्याख्यान करते हुए दो गाथाओंमें पंचम
स्थल पूर्ण हुआ। यहां तक १४ गाथाओंके द्वारा पांच स्थलोंमें ग्रंथकी पीटिका पूर्ण हुई।
आगे कहते हैं कि कोई निकट भव्य जीव इस समयसारके पीठिका मात्र व्याख्यानसे ही
हेय अर्थात् त्यागने योग्य और उपादेय अर्थात् ग्रहण करने योग्य तत्त्व ज्वरूपको जानकर
विशुद्ध ज्ञानदर्शन स्वभावमई अपने आत्मस्वरूपकी भावना करता है। परन्तु जिस भव्यको
तत्त्वका स्वरूप विस्तारसे जाननेकी रुचि है या जो विस्तारक विना समझ नहीं सक्ता एमा
जीव नव अधिकारोंसे समयसारको जानकर पीछे शुद्ध आत्मस्वरूपकी भावना करता है।
इसी कारण विस्ताररुचिवाले शिष्यके लिये जीव आदि नव अधिकारोंसे समयसारका व्या-
ख्यान किया जाता है। तिनमें पहले ही नव पदाकि अधिकारकी गाथामें यह कहा जाता है
कि आर्त रौद्र ध्यानका त्याग है लक्षण जिसका ऐसी जो संकल्प विकल्प रहित सामायिक उसमें
स्थिर होनेवाले महात्माओंको जो शुद्ध आत्मस्वरूपका दर्शन, अनुभव, अवलोकन, लाभ,
संवेदन, प्रतीतभाव व उस स्वरूपकी ख्याति तथा अनुभूति होती है सो ही अनुभूति या अनुभव
निश्चयनयसे निश्चय चारित्रके साथ अवश्य होनेवाला अर्थात् अविनाभावी निश्चय सम्यक्त या
वीतराग सम्यग्दर्शन कहा जाता है । सो ही वीतराग सम्यक्त गुण और गुणीके अभेदरूप
निश्चयनयकी अपेक्षासे शुद्धात्म स्वरूप है अन्य कोई पदार्थ नहीं है ऐसी एक पातनिका है ।
अथवा जीवादि नव पदार्थ जव सत्यार्थपन जाने जाते हैं तब ये ही अभेद उपचारनयस सम्यक्तके
विषय होनेके कारणसे व्यवहार सम्यक्तके निमित्त होते हैं । निश्चयसे तो अपने ही आत्माका
जो शुद्ध परिणाम है सो ही सम्यक्त है ऐसा कहते हुए दूसरी पातनिका है । इस तरह दोनों
पातनिकाओंको मनमें धरके अगाडीका सूत्र कहते हैं-
गाथा--भूदत्थेणाभिगदा जीवाजीवा य पुण्णपादं च ।
आसव संवर णिज्जर । बंधो मोक्खो य सम्मत्तं ॥१५॥
N IRAAGurmananeKHRELA समयसार टीका। १५ संस्कृतार्थ-भूतार्थेनाऽभिगता जीवाऽजीवा पुण्यपापं च । आश्रयसंवरनिर्जरा । बंधो मोक्षश्च सम्यक्तं ॥ १५ ॥ सामान्यार्थ-जीव, अजीव, पुण्य, पाप, आश्रव, संवर, निर्जरा, बंध और मोक्ष सत्यार्थपने जाने हुए व श्रद्धान किये हुए सम्यक्तरूप होते हैं। शब्दार्थ सहित विशेपार्थ--( जीवाऽनीवाय पुण्ण पावं च आसव संवर णिज्जर बंधो मुक्खा ) जीव, अनीव, पुण्य, पाप, आश्रव, संवर, निर्जरा, बंध और मोक्ष यह नव पदार्थ (भूदत्यणाभिगदा ) सत्यार्थपन निर्णय किये हुए, निश्चय किये हुए व जाने हुए (संमत्त) अभेद उपचारसे सम्यकदर्शनका विषय होनेके कारणसं सम्यक्तरूप होते हैं निश्चयसे तो आत्माका परिणाम ही सम्यग्दर्शन है। भावार्थ-नव पदार्थाका यथार्थ श्रद्धान व्यवहार सम्यग्दर्शन है क्योंकि शुद्ध आत्मतत्त्वका श्रद्धान स्वरूप निश्चय सम्बक्तक लिये यह निमित्त कारण हैं। यहां शिष्यन प्रश्न किया कि जो आपने कहा कि नौ पदार्थ सत्यार्य रूपसे जाने हुए सम्यक्त होते हैं तो कहिये किस प्रकार से उनका सत्यार्थ जानपना होव-इस प्रश्नका टीकाकार यह उत्तर करते हैं कि यद्यपि यह नव पदार्थ धर्मतीर्थकी वर्तनाके निमित्त प्रथम अवस्थाके शिष्यकी अपेक्षासे सत्यार्थ कहेगए हैं तथापि अभेद रत्नत्रय लक्षण निर्विकल्प समाधिके कालमें यह पदार्थ अभूतार्थ अर्थात् असत्यार्थ हैं अर्थात् शुद्ध आत्माका स्वरूप नहीं हैं। उस परम समाधिके कालमें इन नव पदाकि मध्यमें शुद्ध निश्चय नय करके एक शुद्ध आत्मा ही उद्योतित होता है, प्रकाशित होता है, प्रतीतिमें आता है या अनुभव किया जाता है ऐसी जो अनुभूति, प्रतीति या शुद्ध आत्मस्वरूपकी उपलब्धि सोही निश्चय सम्यग्दर्शन है। वही निजस्वरूपकी अनुभूति निश्चय नयसे गुण और गुणीकी अभेद विवक्षासे शुद्ध आत्माका स्वरूप है, अन्य कोई पदार्थ नहीं है यह तात्पर्य है । क्योंकि जो प्रत्यक्षादि प्रमाण, नैगमादि नय व नामादि निक्षेप परमात्मा आदि तत्वाक विचारके समयमं सहकारी कारणरूप हैं वे भी विकल्प सहित प्रथम अवस्था ही सत्यार्थ हैं अर्थात् प्रयोजनवान हैं । परन्तु व सत्र आत्माकी परम समाधिके समयमं असत्यार्य हैं अर्थात् कार्यकारी नहीं हैं। उस समय तो इन नव पदार्थोके मध्यमेंसे सत्यार्थपन एक शुद्ध जीव ही प्रतीतिमें आता है। भावार्थ-नौ पदार्थोका सत्यार्थ जानना जव ही होता है जब व्यवहार अपेक्षा जीव और अजीवके सर्व भेदोंको जानकर आश्रव और बंधको त्यागन योग्य और संवर, निर्जरा तथा मोक्षको ग्रहण करने योग्य मानता है परंतु निश्चयसे एक शुद्ध निन आत्म स्वरूपके ही अनुभवको उपादेय जानता है । जब यही ज्ञानी निनं स्वरूपकी भावनाम तन्मय होता है तब नौ पदार्थीका सर्व विचार गौण हो जाता है। इस प्रकार नव पदार्थोके अधिकारकी गाथा पूर्ण हुई।
. ENAHATIONAHA OSHODHAVARIA रहि । स्वतंत्ररूपसे तीन गाथाएं हैं। इसके पश्चात् ईंधन और अग्निका लक्षण कहनके लिये १६ समयसार आगे इन नव अधिकारोंमेंसे प्रथम ही । यहांले २८ गाथा पर्यंत जीवाधिकारका व्याख्यान करते हैं तिसका विवरण यह है कि र सहन आनंद मई एक स्वभाव रूप शुद्धात्माकी भावनाकी मुख्यता लेकर " जो पस्सदि अ माणम् ” इत्यादि सूत्र पाठके नमसं प्रथम स्थलमं गाथा तीन हैं । तिसके पीछे दृष्टा और दाष्टांतके द्वारस भेद और अभेदरूप रत्नत्रयकी भावनाकी. गाण चरित्ताणि" इत्यादि द्वितीय स्थलमें गाथा तीन हैं। तिसके बाद इस संसारी जीवके । अज्ञानपनेको कहते हुए प्रथम गाथा, तथा बंध और मोक्ष योग्य परिणामोंको कहते हुए दृर रो गाथा और यह जीव अशुद्ध निश्चयसे रागादि परिणामोंका ही कर्ता है ऐसी था इस प्रकार "कम्मे णोकम्मं हिय" इत्यादि तीसरे स्थलमें परम्पर संबंधकी अपेक्षा . मुख्यता करके "दसण तीसरी - "अहमेव' इत्यादि चौथे स्थलमें तीन सूत्र हैं। तत्पश्चात् शुद्धात्म तत्त्वका सम्यक शृद्धान, ज्ञान और अनुभव लक्षण जो अभेद रत्नत्रय उसकी भावनाके विषयमें जो कोई असमझ है उसको. संबोधनेके अर्थ “अण्णाणमोहिदमदी" इत्यादि पांचवें स्थलमें सूत्र तीन हैं। फिर जो कोई निश्चय रत्नत्रय है लक्षण जिसका ऐसे शुद्ध आत्मातत्त्वको न जानता हुआ दह ही आत्मा है ऐसा पूर्व पक्ष करता है उसका स्वरूप कहनेके लिये " जदिजीवो " इत्यादि पूर्व पक्ष रूपसे गाथा एक है पश्चात् व्यवहार नयसे देहकी स्तवन है तथा निश्चय नयसे शुद्ध आन्मतत्त्वकी स्तुति है ऐसा नय विभाग द्वारा प्रतिपादनकी मुख्यता करके " ववहार पर भासदि" इत्यादि उस पूर्व पक्षके खंडनरूप चार सूत्र हैं । फिर परम उपेक्षा स्वरूप जो शुद्धात्माका स्वसंवेदन मई निश्चय स्तुति तिसकी मुख्यता करके " जो इंदिए जिणित्ता इत्यादि सूत्र तीन हैं । इस प्रकार ( गाथाओंमें छठा स्थल है। पश्चात् निर्विकार स्वसंवेदन ज्ञान ही विषय और कपाया- दि पर द्रव्योंका प्रत्याख्यान कहिये त्याग है ऐसा कहते हुए “णाणं सर्व भावा" इत्यादि ७ स्थलमें गाथा चार हैं। तिसके बाद अनंत ज्ञानादि लक्षण स्वरूप जो शुद्धात्माका सम्यक् श्र- द्धान, ज्ञान और अनुभव मई अभेद रत्नत्रय तिस रूप जो स्वसंवेदन सोही भावना किये हुए आत्माका स्वरूप है । इस तरह संकोचकी मुख्यता करके "अहमेको खल सुद्धोः' इत्यादि एक सूत्र है। इस प्रकार दंडकोंके सिवाय २८ सूत्रोंके द्वारा सात अंतर स्थलोंमें जीवाधिकार है तिसकी समुदाय पातनिका पूर्ण हुई । अब इसीका व्याख्यान करते हैं। अब प्रथम गाथामें यह बात कहते हैं कि संसार अवस्थामें भी यह जीव शुद्ध नयसे कमलपत्र पर जलकी तरह काँसे बंधा व स्पर्श हुआ नहीं है, मट्टी और उसके बने हुए घटादिकी तरह अपनी पर्यायोंमें अन्य रूप नहीं अनन्य है, क्षोभ रहित समुद्रकी तरह निश्चल है, सुवर्णका अपने गुणोंमें व्याप्त होनेकी तरह अपने स्वरूपमें विशेष रहित सामान्य है, तथा उष्णता रहित जलकी तरह किसी अन्य द्रव्यसे संयुक्त नहीं है ऐसे पांच विशेषणोंसे विशिष्ट यह शुद्धात्मा है।
सभREVE RPAN समयसार टीका। १७ गाथा:-जो पस्सदि अप्पाणं अवडपुढे अणण्णयं णियदं । अविसेसमसंजुत्तं । तं सुद्धणयं वियाणीहि ॥ १६॥ संस्कृतार्थ-यः पश्यति आत्मानं अवद्धस्पृष्टमनन्यकं नियतं । अविशेषमसंयुक्तं । तं शुद्धनयं विजानीहि ॥ १६ ॥ सामान्यार्थ---जो कोई इस आत्माको अवद्धस्पष्ट, अनन्य, निश्चल, अविशेप और असंयुक्त देखता है उसको शुद्ध नय स्वरूप जानो । शब्दार्थ सहित विशेषार्थः- (जो ) जो कोई ( अप्पाणं ) इस शुद्ध आत्माको ( अवद्धपुढं ) द्रव्यकर्म ज्ञानावरणादि तथा नो कर्म तैनस, औदारिक शरीरादिसे नहीं स्पर्श किया हुआ, अर्थात् जैसे कमलके पत्तेपर पानीकी बूढ है परन्तु उससे स्पर्शित नहीं होती है अलग ही रहती है उस प्रमाण काके बीचमें रहता हुआ भी उनसे स्पर्शित नहीं है ऐसा (अणण्णय) तथा नर नारक देव आदि पर्यायोमं द्रव्य रूपसे कोई अन्य नहीं है, वही है जैसे थाल, गिलास, प्याला, बड़ा आदि पर्यायोंमें वही मिट्टी द्रव्य है कोई दूसरा नहीं है ऐसा तथा (णियद) जैसे समुद्र तरंग नीचे ऊपर उठनकी अवस्थावोंमें भी नियत है वैसा अपने स्वरूपमें ठहरा हुवा है ऐसा तथा (अविसेस) जैसे सुवर्ण अपने भारीपने, चिकनेपने, पीलेपने,आदि स्क्भावोंसे अभिन्न है तैसे अपने ज्ञानदर्शन आदि स्वभावोंसे भेढ़ रहित अभिन्न है ऐसा तथा ( असंजुत्तं) जैसे उष्णता रहित जल अपने स्वभावमें है तैसे रागादि विकल्परूप भाव कोसे रहित अपने स्वभावमें है किसीसे संयोगरूप नहीं है ऐसा ( पस्सदि ) देखता है, जानता है व अनुभव करता है । ( तं) तिस पुरुषको ( सुद्धणयं ) अभेद नयसे शुद्ध नयका विषय होनेके कारणसे व शुद्धात्म स्वरूपका साधक होने के कारणसे व शुद्ध अभिप्रायमें परणमन करनेके कारणसे शुद्ध स्वरूप ( वियाणीहि ) जानो ऐसा भावार्थ है । भावार्थ-जो पुरुप अपने आत्माको परद्रव्य, परभावसे रहित, अपने गुणोंले तन्मय अभेदरूप अनुभव करता है सो ही महात्मा शुद्ध, नय स्वरूप है अर्थात् शुद्ध है क्योंकि शुद्ध अवस्थाका साधन कर रहा है । अतएव अपने आत्माको शुद्ध नयसे शुद्धरूप अनुभव करना ही इस मुमुक्षु जीवका हित है। इस कारण तिस स्वरुपको ही ग्रहणकर आनन्द मग्न होना योग्य है ॥ १६ ॥ आगे दूसरी गाथामें जिस शुद्धात्मानुभूतिका इसके पूर्व वर्णन किया गया है वही विकार रहित स्वसंवेदन ज्ञानकी अनुभूति है ऐसा कहते हैं- गाथा:-जो पस्सदि अप्पाणं । अवहपुढे अणण्णमविसेसं । अपदेसमुत्तमझं । पस्सदि जिणसासणं सव्वं ॥ १७॥ . .. संस्कृतार्थ:-यः पश्यति आत्मानं । अवद्धस्पृष्टमनन्यमविशेपं । अपदेशसूत्रमध्यं । पश्यति जिनशासनं सच ॥ १७ ॥ .. ३ VoesOARDHAAREENAMOROLAR समयसार टीका। सामान्यार्थ-जो अपने आत्माको अवद्ध, अस्पय, अनन्य, और विशेष रहित अनुभव करता है सो द्रव्यश्रुत द्वारा जानने योग्य सर्व ही जिन शासनको जानता है। शब्दार्थ सहित विशेपार्थ-(जो) जो कोई (अप्पाणं) आत्माको अर्थात् अपने शुद्ध आत्म स्वरूपको ( अवद्धपढ़ ) द्रव्यकर्म और नोकर्मसे कमलपत्रपर जलकी तरह नहीं स्पर्श किये हुए । ( यहां बंध शब्दसे सम्बन्धरूप वंध ग्रहण करना तथा पृष्ठ शब्दसं संयोग मात्र लेना) (अणणं) मृत्तिका द्रन्यकी तरह अपने पर्यायोंमें एकरूप ( अविसेसं ) सुवर्णकी तरह अपने स्वभावोंमें एकरूप सामान्य तथा समुद्रकी तरह अक्षोभित निश्चल तथा उष्ण रहित जलकी तरह निश्चयसे परद्रन्यके संयोग रहित इस प्रकार पांच विशेषणों सहित । ( नोट-यहां नियत और असंयुक्त विशेषण सूत्रमें नहीं है परन्तु सामर्थ्यसे ग्रहण किये हैं सो भी इसलिये कि श्रुत विशेषकी सामर्थ्य युक्त ही सूत्रका अर्थ होता है ) ( पस्सदि ) देवता जानता है, वह पुरुष ( सव्वं ) सर्व परिपूर्ण द्वादशांगरूप ( जिण सासणं ) जिनशासन अर्थात् अर्थ आगमरूप जिनमतको ( पस्सदि ) देखता जानता है । वह जिन शासन (अपदेसमुत्तमन्नं) अपदेश सूत्र मध्य कहलाता है । जिसके द्वारा पदार्थोंका उपदेश किया जाय सो अपदेश अर्थात् द्रव्यश्रुत है। जितना द्रव्य श्रुत है तितना सूत्रोंका जाननरूप भावभुत है सोही ज्ञान समय अर्थात् ज्ञान आगम । इस कारण शब्दागम द्वारा कहने योग्य व ज्ञानागमद्वारा जानने योग्य जो हो उसको अपदेश सूत्र मध्य कहते हैं । यहां यह भाव है कि लूणकी डली एक अपने लूणस्वादको ही रखनेवाली है तथापि फल, साग, पत्ता आदि पर द्रव्यके संमोगसे भिन्न २ स्वादरूप अज्ञानी जीवोंको प्रतिभासमान होती है । परंतु ज्ञानी जीवोंको तो एक रस रूप ही मालूम होती है-ज्ञानी जीव भेद विज्ञानसे यह अनुभव करलेते हैं कि मिले हुए स्वादमें कितना अंश लूणका व कितना अंश परद्रन्यका स्वाद है । तैसे ही यह आत्मा भी अखंड ज्ञान स्वभाव है तथापि स्पर्श, रस, गंध, शब्द, नीला, पीला आदि वर्ण रूप ज्ञेय पदार्थोके विपयभेदसे निर्विकल्प समाधिसे भ्रष्ट अज्ञानी जीवोंको खंड २ ज्ञानरूप प्रकट होता है। परंतु ज्ञानी जीर्वोको तो यह आत्मा अखंड केवलज्ञाम स्वरूप ही अनुभवमें आती है क्योंकि भेद ज्ञानसे यही भासता है कि ज्ञेय पदार्थोके आकारोंको झलकाता हुआ भी मह आत्मा अपने गुण गुणीके अभेदपनेसे ज्ञान स्वभावको नहीं त्यागता । इसकारण यह कहा गया है कि जिसने भखंड ज्ञान स्वरूप शुद्धात्माको जाना उसने सर्व जिन आगमको जानलिया । ऐसा मानकर हे भव्य ! तुझे समस्त मिथ्यात्व रागद्वेपादि भावोंको त्याग कर तिस ही शुद्धात्म स्वरूपमें ही भावना करनी योग्य है । यहां मिथ्यात्त्व शब्दसे दर्शन मोह और रागादि शब्दसे चारित्र मोह ग्रहण करना-इन शब्दोंका यही अर्थ इस ग्रंथमें सब ठिकाने जानने योग्य है। भावार्थ-जिसने अपने शुद्धात्माको टंकोत्कीर्ण ज्ञायक स्वरूप जाना उसने सर्व जिनवाणीको जाना क्योंकि विना
mmercei
.
समयसार टीका।
Clastreatment
अपने शुद्ध स्वरूपको जाने जिनवाणीका पाठ कुछ भी कार्यकारी नहीं है। इस लिये शुद्ध
आत्माको भली प्रकार जानकर उसीके अनुभवमें तन्मय हो अपने अशुद्ध आत्माको शुद्ध
स्वरूप करना योग्य है । इसीमें इस जीवका कल्याण है और यही मोक्ष मार्ग है ॥ १७॥
आगे तीसरी गाया कहते हैं कि शुद्धात्म स्वरूपकी भावनाके मध्यमें
ही सर्व सम्यग्ज्ञानादिकका लाम होता है ।
गाथा:-आदा खु मज्झ णाणे । आदा मे देसणे चरित्ते य ।
आदा पचक्खाणे । आदा मे संवरे जोगे ॥१८॥
संस्कृनार्यः-आत्मा स्फुटं मम ज्ञाने। आत्मा मे दर्शने चरित्रे च ।
आत्मा प्रत्याख्याने । आत्मा में संवरे योगे || १८ ॥
सामान्यार्थ—प्रगटन मेरे ज्ञानमें आत्मा है, मेरे दर्शन और चारित्रमें आत्मा है,
प्रत्याख्यानमें आत्मा है तथा मेरे संवर और योगमें आत्मा है ।
शब्दार्थ सहित विशेषार्थ-(आदा) शुद्धात्मा (खु) स्फुटरूपसे (मझ) मेरे ( गाणे )
सम्यग्ज्ञानमें है । (आदा) शुद्धात्मा ( मे ) मेरे ( दसणे ) दर्शन (चरित्ते य) और चारित्रमें है।
(आदा) शुद्धात्मा ( पञ्चक्खाणे ) प्रत्याख्यान अर्थात् त्याग सम्बन्धमें है। तथा ( आदा)
शुद्ध आत्मा ( में ) मेरे (संवरे) आश्रवनिरोधरूप संवर भावमें है (जोगे) तथा योगमें है-
निर्विकल्प समाधि, परम सामायिक और परमध्यानमें एक भाव रूप होजामा इसका नाम योग
है। भाव यह है जब सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यग्चारित्र, प्रत्याख्यान, संवर और योगकी
भावना की जाती है तब वहां आत्मा ही अनुभवमें आता है । इस कारण जो मोगोंकी इच्छा
रूप निदान बंध व माया मिथ्यादि शल्योंसे रहित होकर अपने शुद्धात्माको ध्याता है उसको
यह सम्यग्ज्ञानादि सर्व गुण प्राप्त हो जाते हैं। भावार्थ-और विकल्पोंको छोड़कर जो शुद्ध आत्म
स्वरूपको ध्याता है सो सर्वगुणोंका पात्र हो जाता है । क्योंकि आत्मामें ठहरा तब रत्नत्रयका
लाभ हुआ ही, पर द्रव्योंका त्याग हुआ ही, कर्मोंका संवर हुआ ही और योग साधन हो ही
गया अतएव सर्व उपाय करके एक शुद्धात्माकी ही भावना कर्त्तव्य है। इस तरह शुद्ध नयके
व्याख्यानकी मुख्यता करके प्रथम स्थलमें तीन गाथाएं समाप्त हुई ॥ १८ ॥
आगे मेद और अभेद रत्नत्रयकी मुख्यता करके तीन गाथाएं कहते हैं तिनमें पहली गाथाके
पूर्वार्द्धसे भेदरत्नत्रयकी भावना और उत्तरार्द्धसे अभेद रत्नत्रयकी भावनाको कहते हैं:-
गाथा:-दसणणाणचरित्ताणि । सेविदव्वाणि साहुणा णिचं ।
ताणि पुण जाण तिण्णिवि अप्पाणं चेव णिच्छयदो ॥१९॥
संस्कृतार्थ:-दर्शनशानचारित्राणि । सेवितव्यानि साधुना नित्यं ।
तानि पुनर्जानीहि त्रीण्यपि । आत्मानं चैव निश्चयतः ॥ १९ ॥
समयसार टीका। HARONISATIREONARIES २०. सामान्यार्थ-साधुको नित्य सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रकी सेवा करनी योग्य है परन्तु निश्चयसे इन तीन गुण स्वरूप आत्माको ही जानना योग्य है । शब्दार्थ सहित विशेषार्थ -(साहुणा) साधु करके (दंसणणाणचरित्ताणि ) सम्यग्दर्शन ज्ञान चरित्र (णिचं ) व्यवहारनयस नित्य अर्थात् सर्वकाल (सेविदवाणि) सेवने योग्य अर्थात् ध्यावने योग्य हैं । (पुण) तथा फिर भी ( ताणि) इन (तिण्णिवि ) तीनोंको ही (अप्षाणं चत्र) शुद्धात्मा ही (णिच्छयदो) निश्चयनयसे (जाण) जानो। यहां यह अर्थ है कि पंचन्द्रियके विषयोंको और क्रोधादि कपायोंको त्याग करके निर्विकल्प समाधिके मध्यमें जो तिष्ठते हैं उनको वहां सम्यग्दर्शन ज्ञान चारित्र तीनों प्राप्त हो जाते हैं। क्योंकि शुद्धात्माका श्रद्धान दर्शन है, उसीका ज्ञान सम्यग्ज्ञान है और उसीका अनुभव सम्यग्चारित्र है। भावार्थ -सर्व संसारके विकल्प जालोंसे मन हटाकर जो शुद्ध आत्मा स्वरूपको ध्याता है सो निश्चयसे अभेद रत्नत्रयको पाता है परंतु जब शुद्ध स्वरूपकी समाधिमें ठहरनेको अशक्य हो तब इस मुमुक्षु साधुको व्यवहार रत्नत्रयकी सेवा कभी भी त्यागने योग्य नहीं है। उसे आगमके अनुसार तत्त्व विचार, आगमका अभ्यास तथा महाव्रतादि पालने योग्य हैं क्योंकि इन्हींके सहारेसे ही फिर निश्चय स्वरूपमें चढ़ सक्ता है। अतएव सर्व उपाय बनाकर जिस तरह हो अपने शुद्धआत्म स्वरूपमें रमना योग्य है ॥१९॥ आगे दो गाथाओंसे तिस ही भेदाभेद रत्नत्रयकी भावनाको दृष्टान्त और दान्तिोंसे समर्थन करते हैं- गाथा:-जह णाम कोवि पुरिसों रायाणं जाणिऊण सद्दहदि । तोतं अणुचरदि पुणो । अत्थत्थीओ पयत्तण ॥ २० ॥ एवं हि जीवराया णावो तह य सद्दहे वो। अणुचरिदव्यो य पुणो । सो चेव दु मोक्खकामेण ॥२१॥ संस्कृतार्थ:-यथानाम कोऽपि पुरुपो राजानं ज्ञात्वा श्रद्दधाति । ततस्तमनुचरति पुनरर्थाथिकः प्रयत्नेन ॥ २० ॥ एवं हि जीवराजो ज्ञातव्यस्तथैव श्रद्धातव्यः । अमुचरितव्यश्च पुनः स चैव तु मोक्षकामेन ॥ २१ ॥ सामान्यार्थ:-जैसे कोई भी पुरुष किसीको राजा है ऐसा जानकर श्रद्धान करता है और फिर आजीविकाका अर्थी होकर पुरुषार्थ करके उसकी सेवा करता है। तैसे ही मोक्षार्थी जीव करके यह जीव राजा जानने योग्य है, वही श्रद्धान करने योग्य है तथा वही अनुभव करने योग्य है। शब्दार्थ सहित विशेषार्थः-(जह) जैसे (कोवि) कोई भी पुरुष (रायाणं) राजाको (नाम) स्फुटपने (जाणिऊण) छत्र चमर आदि राज्यके चिन्होंसे जान करके (सदहदि ) श्रद्धान करता है अर्थात् यही राजा है दूसरा नहीं है ऐसा निश्चय करता है (ततो) ज्ञान और श्रद्धान होनेके वाद (तं) तिस राजाको ( अत्यत्थीओ.) अर्थार्थी अर्थात् आजीविकाकी इच्छा करता हुआ - समयसार टीका। २१ ( पयत्तेग ) सर्व तात्पर्यसे अर्थात् सर्व उपायों करके ( अणुचरदि ) अनुचरता है अर्थात् उसका आश्रय लेता है उसकी आराधना करता है । यह दृष्टान्त गाथा हुई । ( एवं ) इसी प्रकार ( मोक्ख कामेण ) मोक्षको चाहनवाले पुरुपके द्वारा (हि) स्फुटरूपसे (जीवराया ) यह शुद्ध जीवरूपी राजा ( णादवो) विकार रहित स्वसंवदन ज्ञानक द्वारा जानने योग्य है। (तहय) तैसे ही (सद्दहेदव्वो) यह आत्मा नित्य आनन्द मई एकसा भाव स्वरूप तथा रागादिसे रहित शुद्ध ही है ऐसा निश्चय करना योग्य है ( पुणो ) तथा ( अणुचरिदव्वोय ) सो ही शुद्धात्मा निर्विकल्प समाधिक द्वारा अनुभव करने योग्य है। यहां यह तात्पर्य है कि भेदाभेद रत्नत्रयकी भावना स्वरूपी परमात्माकी चिन्ता करके ही हमारा कार्य पूर्ण होता है तब फिर विशेष शुभ व अशुभ विकल्प जालोस क्या प्रयोजन ? भावार्थ-ममुक्षु जीवको चाहिये कि निज शुद्ध आत्मस्वरूपका श्रद्धान, ज्ञान तथा अनुभव करे । इस प्रकार भेद और अभेद रत्नत्रयके व्याख्यानकी मुख्यता करके तीन गाथाएं दूसरे स्थलमें पूर्ण हुई ।। २०-२१ ॥ आगे स्वतंत्र व्याख्यानकी मुख्यता करक गाथाएं तीन कही जाती हैं- आगे शिप्यन प्रश्न किया कि जब तक स्वं और परके भेद विज्ञानका अभाव रहता है तब तक यह जीव अज्ञानी रहता है सो तो ठीक है परन्तु कितने काल तक ऐसा रहता है सो मालूम नहीं हुआ, इसका उत्तर प्रथम गाथासे देते हैं- गाथा:-कम्मे णोकम्ममि य अहमिदि अहयं च कम्म णोकम्मं । जा एसा खल धुडी । अप्पडिवुद्धो हवदि ताव ॥ २२ ॥. संस्कृतार्थ:-कर्मणि नोकर्मणि च अहमिति अहकं च कर्म नोकर्म । यावदेवा खलु बुद्धि । रप्रतिबुद्धो भवति तावत् ॥ २२ ॥ सामान्यार्थ-कर्म और नोकर्ममें मैं हूं तथा मैं हूं सो ही कर्म नोकर्म है इस प्रकारकी बुद्धिया प्रतीति जबतक इस जीवक रहती है तब तक यह जीव अज्ञानी वहिरात्मा रहता है । शब्दार्थ सहित विशेपार्थ-(कम्म)ज्ञानावरणादि द्रव्य कर्म व रागादि भाव कर्ममें (णोकम्महिल य)तथा शरीरादि नोकर्ममें ( अहमिदि ) मैं हूं (च) तथा (अहयं) मैं (कम्म नोकम्म) कर्म व नोकर्म हूं । जैसे घटमें वर्णादिक गुण तथा घटाकार परिणत पुद्गलस्कंध हैं व वर्णादिकोंमें घट है इस तरह गुण गुणी व पर्याय पर्यायीक अभेदरूपसे ( जा ) जो (एसा ) यह प्रत्यक्ष- रूप (बुद्धी ) बुद्धि अर्थात् कर्म और नोकर्मक माथ शुद्ध बुद्ध एक स्वभाव अपने परमात्म वस्तुकी एकताकी बुद्धि जब तक इस जीवके रहती है ( ताव ) उस काल पर्यंत यह जीव ( अप्पडिबुद्धो) अप्रति बुद्ध अर्थात् स्वसंवेदन ज्ञानसे शून्य वहिरात्मा ( हवदि ) रहता है । यहां यह प्रयोजन है कि जो पुम्प स्वतः अर्थात् स्वयंवुद्ध होकार व परतः कहिये दूसरेसे -
HEREURRE
समयसार टीका।
YAANARRHOENLACeses
pho
.
-
समझाए जाने पर समझ कर भेद विज्ञान है मूल जिसका ऐसी शुद्धात्माकी अनुभूतिको प्राप्त
करते हैं वे पुरुष शुभ अशुभ बाह्य द्रव्योंके रहते सते भी दर्पणके समान विकार रहित रहते
। भावार्थ-जबतक यह आत्मा द्रव्यकर्म भावकर्म और नोकर्मीको अपना मानता है
व आपको उन रूप मानता है तबतक इसके भेद विज्ञान नहीं होता, इसी लिये वहिरात्मा
रहता है । भेद विज्ञान होते ही शुद्धात्माका अनुभव होता है तब इस जीवको सर्व अन्य
द्रव्योंका शुभ व अशुभ परिणमन एक नाटकले दृश्यके समान प्रति भासता है । जैस दर्पणक
सामने कोई मुंह बनाकर टेढ़ा करे व कोई मुंहको सजाव दोनोंक वैसे ही हृदय दर्पणमें दिख
जायगे कुछ भी विकार दर्पणके द्रव्यमें नहीं होगा तैसे ही ज्ञानीकी आत्मामें जगतका शुभ व
अशुभ परिणमन किसी प्रकारका विकार नहीं पैदा कर सक्ता ॥ २२ ॥
आगे कहते हैं कि शुद्ध जीवमें जब रागादि रहित परिणाम होता है तब मोक्ष होती है और जब
जीवव रहित देहादिक अजीव पदार्थमें रागादि परिणाम होता है तब कमीका बंध होता है:-
गाथा:-जीवेव अजीवे वा संपदि समयलि जत्य उवजुत्तो।
तत्व बंध मोक्खो । होदि समासेण णिहिट्टो ॥ २३ ॥
संस्कृतार्थः--जीवे वा अजीवे वा संप्रतिसमये यत्रोपयुक्तः ।
तत्रैव बंधोमोक्षो। भवति समासेन निर्दिष्टः ।। २३ ।।
सामान्यार्थः-जीवमें या अजीवमें वा देहादिमें जिस ठिकाने वर्तमानकालमें यह
आत्मा अपने उपयोगको लगाता है तहां बंध या मोक्ष होता है ऐसा कथन संक्षेपसे श्री सर्वज्ञ
देवने किया है।
शब्दार्थ सहित विशेषार्थ-(जीवे) अपने शुद्ध आत्मस्वरूपमें (वा) अथवा (अनीव) जीव
रहित धर्मादि द्रव्योमें (वा) अथवा देहादिकोंमें इनमेंसे ( संपदि समयमि) इस वर्तमानकालमें
(जत्थ) जिस किसी ठिकाने ( उवजुत्तो) उपयुक्त होता है अर्थात् जहां कहीं तन्मयी पनेसे
उपादेय बुद्धिसे परिणमन करता है (तत्थेव) तिस ही ठिकने में ही (बंध मोक्खो) बंधमोक्ष अर्थात्
अनीव'वा देहादिसे उपयुक्त होने पर बंध और शुद्ध जीव पदार्थसे तन्मयी होने पर मोक्ष
(होदि) होता है । (समासेण) संक्षेपसे ऐसा ( णिदिहो) सर्वज्ञ देवके द्वारा कथन किया गया
हैं। भावार्थ-यदि यह आत्मा उपादेयबुद्धिसे देहादि परद्रव्योंको ग्रहण करता है और
उनमें अपनेको रंजायमान करता है तो कर्मोंसे बंधता है और जो अपने शुद्धस्वरूपमें तन्मय
होता है तो नवीन बंध रोक प्राचीन काँसे मुक्ति पाता है । यहां यह तात्पर्य है कि ऐसा
जानकर सहन आनंद मई एक स्वभावरूप अपने आत्मामें रति अर्थात् प्रीति करनी योग्य है।
और निजस्वरूपसे विलक्षण, भिन्न जो परद्रव्य उससे विरति अर्थात् विरागता भजनी योग्य
है। जो अपने स्वरूपमें रमते हैं वे ही स्वरूपारूढ़ होकर मोक्ष महलमें जा विराजते हैं ॥ २३ ॥
SHREE - है यह समयसार टीका २३ आगे कहते हैं कि अशुद्ध निश्चय नय करके यह आत्मा रागादि भाव काँका कर्ता है। और अनुपचरित असद्भूत व्यवहारनय करके द्रव्य कौका कर्ता है । उपचार रहित सत्तामें सदाकाल अस्तित्वके विना जो व्यवहारको कहे उसको अनुपचरित असद्भुत व्यवहार नय कहते हैं- गाथा:-जं कुणदि भावमादा कत्ता सो होदि तस्स भावस्स । णिच्छयदो ववहारा पोग्गलकम्माण कत्तारं ॥२४॥ संस्कृतार्थ:--यं करोति भावमात्मा का स भवति तस्य भावस्य । निश्चयतः व्यवहारात् । पुद्गलकर्मणां कर्ता ॥ २४ ॥ सामान्यार्थः-आत्मा जो भाव करता है सो अपने उस भावका कर्ता होता. कथन निश्चयसे है। व्यवहारसे यह आत्मा पुद्गल कर्मोंका कर्ता कहा जाता है। शब्दार्थ सहित विशेषार्थ-(ज) जिस (भाव) रागादिभावको (आदा) आत्मा (कुणदि) करता है (सो) वह आत्मा (तस्स भावस्स) तिस रागादिभावका (कत्ता) कर्ता (होदि) होता है। ( णिच्छ्यदो ) अशुद्ध निश्चयसे अशुद्ध भावोंका और शुद्ध निश्चय नयसे शुद्ध भावोंका कर्ता होता है। यहां आत्माके भावोंका परिणमना ही कर्तापना है । ( विवहारा) अनुपचरित असद् भूत व्यवहार नयसे (पोग्गल कम्माण) पुद्गल मई द्रव्य कर्मोका (कत्तारं ) कर्ता है'ऐसा कहा जाता है (नोट-प्राकृत व्याकरणकी अपेक्षा कारक और लिंगका व्यभिचार होता है इससे कर्मपदको कर्तामें लिया है। यहां यह अभिप्राय है कि जिन रागादि भावोंका कर्ता जीवको कहा गया है वे रागादि भाव संसारके कारण हैं इसलिये संसार भ्रमणसे भयभीत तथा मोक्षार्थी पुरुषको योग्य है कि समस्त रागद्वेषादि विभाव भावोंसे रहित और शुद्ध द्रव्य तथा गुण पर्याय स्वरूप अपने परमात्म स्वभावमें भावना करै । भावार्थ-रागद्वेषादि भावोंका कर्ता जीव अशुद्ध नयसे है । अशुद्ध जीव ही अशुद्ध भावोंका कर्ता है । यह अशुद्धता जीवको हितकारी नहीं है। अतएव व्यक्तिमें भी इस जीवके शुद्ध भावोंका परिणमन रहा करै ऐसी भावना निरंतर करनी चाहिये । भावना करते २ अशुद्धता हटेगी और शुद्धता प्रगट होगी। इस प्रकार स्वतंत्र व्याख्यानकी मुख्यता करके तीसरे स्थलमें गाथा तीन समाप्त हुई ॥२४॥ आगे कहते हैं कि जैसे कोई भी नासमझ अज्ञानी ऐसा कहता है कि अग्नि इंधन होजाती है या इंधन अग्नि हो जाता है, अग्नि इंधन होगई थी व ईंधन भी अमि हो गया था, अमि ईधन हो जायगी या इंधन अमि हो जायगा। तैसे ही जो भूत भविष्यत् वर्तमान तीनों ही कालों में देह और रागद्वेषादि परद्रव्योंको अपनी आत्मामें जोड़ता है अर्थात् ऐसा कहता है कि मैं अमुक था, अमुक हूं व अमुक हो जाऊंगा या मैं रागी व क्रोधी था अब क्रोधी लोभी या मानी हूं या आगामी राग द्वेष लोभ मानादि करूंगा सो जीव अप्रतिबुद्ध बहिरात्मा मिथ्याज्ञानी है ।
CASERVASAVACANTRAVANTS समयसार टीका। HAIRAVEENA २४ गाथा:-अहमेदं एदमहं । अहमेदरसेव होमि मम पदं । अण्णं जं परदव्वं । सचित्ताचित्तमिस्सं वा ॥ २५ ॥ आसि मम पुव्वसेदं अहमेदं चावि पुवकालनि । होहिदि पुणोवि मज्झं । अहमेदं चावि होस्सामि ॥२६॥ एवंतु असंभूदं आदवियव्वं करेदि सम्मूढ़ो। भूदत्थं जाणतो । ण करेदि दुतं असम्मृढो ॥ २७ ॥ संस्कृतार्थ:-अहमिदं इदमहं । अहमेतस्य एव भवामि मम इदम् । अन्यद्यत्परद्रव्यं । सचिताचित्त मिश्र वा ॥ २५ ॥ आसीन्मम पूर्वमेतत् । अहमिदं चैव पूर्वकाले । भविष्यति पुनरपि मम । अहमिदं चैव भविष्यामि ॥ २६ ॥ एवं त्वसद्भूत । मात्म विकल्पं करोति संमृदः । भूतार्थ जानन् । न करोति पुनः तमसमूढः ॥ २७ ॥ सामान्यार्थ-आत्मासे अन्य जो देह व पुत्र व धनादि सचित्त, अचित्त, या सचित्त- अचित्त मिश्र वस्तु हैं उनके वि अज्ञानी यह विकल्प करता है कि मैं इन रूप हूं या यह मेरे रूप हैं, मैं इनका ही हूं या यह मेरे ही हैं, यह चीज़ पहले मेरी थीं, या मैं पहले इन रूप ही था, यह चीज़ मेरी ही हो जायगी या मैं इन रूप ही हो जाउंगा इस प्रकार तीन काल सम्बन्धी अनेक मिथ्या परिणाम अज्ञानी जीव अपने किया करता है। परंतु ज्ञानी सम्यग्दृष्टी सत्यार्थ वस्तुको जानता हुआ इन मिथ्या विकल्पोंको नहीं करता है। शब्दार्थ सहित विशेपार्थ-(अहमेदं एद महं) मैं. इस शरीर रूप परद्रव्यमय हूं जैसे मैं पुरुष हूं या स्त्री हूं, या यह शरीर मुझरूप है जैसे मैं अमुक ज्ञानवान हूं। यहां पर दृष्टि बाह्य शरीर ही पर है ( अहमेदरम्स एव होमि मम एवं ) अथवा में इसका सम्बन्धी हूं या मेरा सम्बन्ध रखनेवाली यह वस्तु है ( वा ) इसी प्रकार (अण्णं जं परदव्वं) शरीरसे भिन्न जो पुत्र स्त्री आदि परद्रव्य ( सचित्ताचित्तमिस्सं) सचित्त, अचित्त या मिश्र रूप है उसमें मी ऐसा भाव करता हैं । यहां गृहस्थकी अपेक्षासे सचित्त पदार्थ स्त्री व पुत्रादि हैं अचित्त पदार्थ सुवर्ण चांदी लोहा आदि हैं, मिश्रद्रव्य आभूपण व वस्त्रादि सहित स्त्री पुत्रादि हैं अथवा तपोधन अर्थात तपस्वीकी अपेक्षा सचित्त द्रव्य शिष्य आदि हैं, अचित्त द्रव्य पीछी, कमंडल, पुस्तकादि हैं और मिश्र पदार्थ उपकरण सहित छात्र आदि हैं। अथवा सचित्त द्रव्य रागद्वेषादि मिश्रद्रव्य द्रव्यकर्म और भावकर्म विषय कषाय · रहित निर्विकल्प समाधिमें स्थित पुरुपकी अपेक्षासे सचित्त द्रव्य सिद्ध परमेष्ठीका स्वरूप है, अचित्त द्रव्य पुद्गल आदि पांच द्रव्योंका रूप हैं, मिश्र द्रव्य दोनोंका सम्बन्ध है अथवा मैं समयसार टीका। २५ गुणस्थान, मीवस्थान, मार्गणास्थान आदिमें परिणमन करता हुआ संसारी नीवका स्वरूप है। वर्तमानकालकी अपेक्षा इन पर वस्तुओंके भीतर अहं व मम बुद्धि करता है । तथा (आसि मम पुत्र मेद ) वह पदार्थ पूर्वकालमें मेरा था ( अहमदं चा वि पुवकालं मि) या पूर्वकालमें इस रूप ही था ( होहिदि पुणोवि मन्द्रं ) या यह वस्तु मेरी हो जायगी ( अहमेदं चावि होसामि ) अथवा मैं इस रूप हो जाऊंगा, इस प्रकार भूत और भावी कालकी अपेक्षासे परमें अहं वा मम बुद्धि करता है । ( एवं तु ) इसी प्रकार ( सम्मूहो) यह अज्ञानी बहिरात्मा मिथ्यादृष्टी (असंभूद) तीनकालके पर द्रव्य सम्बंधी असत्यार्थ मिश्या (आइ वियप्प) आत्मविकल्प अर्थात् अशुद्ध निश्चयप्से जीव सम्बन्धी परिणामोंको (करेदि) करता है। (दु ) परंतु (अस- म्मूढो) सम्यग्दृष्टि अंतरात्मा ज्ञानी भेदाभेद रत्नत्रयकी भावनामें रत (तं ) तीनकालके परद्रव्य सम्बन्धी मिथ्या विकल्पोंको ( भूदत्यं ) भूतार्थ अर्थात् निश्चय नयको अर्थात् निश्चय नयसे जीव पुद्गलादि द्रव्यांक भिन्न २ असली स्वरूपको ( जाणंतो) जानता हुआ (ण करेदि) नहीं करता है । यहां यह प्रयोजन है कि जैसे कोई भी अज्ञानी जीव अग्निको ईंधन और इंधनको अग्नि तीनों भूत भविष्यत् वर्तमानमें निश्चयसे अर्थात् एकांत अभेद रूपसे कहता है। तैसे ही देह व रागादि परद्रव्य स्वरूप इस समय मैं हूं व पूर्व में था व आगामी में हो जाऊंगा ऐसा जो कोई कहता है वह अज्ञानी बहिरात्मा मिथ्यादृष्टी है। परंतु जो इसके विपरीत समझता है अर्थात् तीनों कालोम परद्रव्यका सम्बन्ध होते हुए भी अपने पदार्थको सर्व द्रव्य कर्म, नोकर्म, भाव कर्मर भिन्न ज्ञातादृष्टा आनन्दमय परमवीतराग स्वरूप अनुभव करता है सो ही पुरुष ज्ञानी, सम्यग्दृष्टी और अंतरात्मा है। इस प्रकार अज्ञानी और ज्ञानीजीवका लक्षण जानकर जो महापुरुष निर्विकार स्वसंवेदन लक्षण भेद ज्ञानमें तिष्ठकर भावना करते हैं तिस ही भावनाको दृढ़ किया गया है । जैसे कोई भी राज्यका सेवक पुरुष उस राज्यके शत्रुसे सम्बन्ध रखता हुआ उस राज्यका आराधनवाला नहीं हो सक्ता तैसे ही परमात्माको आराधनेवाला पुस्य परमात्म स्वरूपसे उल्टे जो मिथ्यात्त्व रागद्वेषादि भाव उनमें परणमन करता हुआ परमात्माका आराधक या संवक नहीं होसक्ता यह भावार्थ है । भावार्थ-मुमुक्षु जीवको अपने शुद्ध स्वरूपको प्राप्त करनेके लिये निरंतर अपने शुद्ध स्वरूपकी ही भावना करनी चाहिये। जो ऐसे निजरूपको सत्यार्थपने जानता और भावता है वही प्रतिबुद्ध और ज्ञानी है। और जो परस्वरूपोंमें अहंकार व ममकार करता है वह अज्ञानी है इस लिये कभी भी निज आत्माका आराधक नहीं होसक्ता ॥ २५-२६-२७ ।। इस तरह अप्रतिबुद्धका लक्षण कहते हुए चौथे स्थलमें गाथा तीन समाप्त हुइ ।
PRECAPACIROIN SONACHAR SOUNDRANIPRASADARAMANAVI । २६ समयसार टीका। आगे इसी अप्रतिबुद्ध अज्ञानी जीवको समझाने के लिये उद्यम किया जाता है- गाथा:-अण्णाणमोहिदमदी मज्झमिण भणदि पुग्गलं व्वं । वडमवद्धं च तहा जीवो बहुभावसंजुत्तो ॥ २८ ॥ सव्वण्हुणाणदिठो जीवो उवओगलक्खणो णिचं । किह सो पुग्गलदव्वी भूदो जं भणसि मज्झमिणं ॥ २९ ॥ जदि सो पुग्गलदव्वी भूदो जीवत्तमागदं इदरं । तो सका वुत्तुं जे मज्झमिणं पुग्गलं दव्वं ॥ ३० ॥ संस्कृतार्थः-अंज्ञानमोहितमतिर्ममेदं भणति पुद्गलद्रव्यं । बद्धमबद्धं च तथा जीवो बहुभावसंयुक्तः ॥ २८ ॥ सर्वशज्ञानदृष्टो जीव उपयोगलक्षणो नित्यं | कथं स पुद्गलद्रव्यीभूतो यगणसि ममेदं ॥ २९ ॥ यदि स पुद्गलद्रव्यीभूतो जीवत्वमागतमितरत् । तच्छक्तो वक्तुं यन्ममेदं पुद्गलं द्रव्यं ॥ ३० ॥ सामान्यार्थः-अज्ञानसे जिसकी बुद्धि मोहित हो रही है ऐसा मोही जीव अपने साथ बंधे हुए इस शरीरको और नहीं बंधे हुए पुत्र कलत्रादिकोंके शरीर रूपी पुदलद्रव्यको मेरा है ऐसा कहता है तैसे ही अपने जीव द्रव्यमें मिथ्यात्व रागादि अनेक भाका संयोग करता रहता है ॥ २८ ॥ सर्वज्ञ भगवानने अपने ज्ञानमें देखा है कि यह जीव पदार्थ नित्य ज्ञान दर्शन उपयोग लक्षणवान है तब फिर जीव कैसे पुद्गल द्रव्य होसक्ता है जिससे तू ऐसा कहता है कि यह पुद्गल द्रव्य मेरा है ॥ २९ ॥ यदि ऐसा होता हो कि यह जीव पुद्गल द्रव्य हो जाय और पुद्गल द्रव्य जीवपनको प्राप्त हो जावे तब तो ऐसा कहा जा सकता है कि यह पुद्गल द्रव्य मेरा हैं ॥ ३० ॥ शब्दार्थ सहित विशेपार्थ-(अण्णाणमोहिदमदी) अज्ञान अर्थात् मिथ्या ज्ञानसे मूढ़ हो रही है मति जिसकी ऐसा मोही जीव (वद्धम्) अपने साथमें बंधको प्राप्त तैनस कार्माण औदारिकादि देह रूप (च) और (अवद्धम् ) अपने आत्माके प्रदेशोंसे सम्बन्ध न रखनेवाले अपने शरीरसे भिन्न रूप पुत्र स्त्री आदि सम्बन्धी (पुग्गलं दव्व) पुद्गलद्रव्यको (मझमिण) यह मेरा है ऐसा (भणदि ) कहता है । ( तहा ) तथा ( जीवे ) जीव द्रव्यमें ( वहुभावसंजुत्तो) मिथ्यात्त्व रागद्वेष क्रोध मान माया लोभादि अनेक भावोंसे संयोग करता हुआ रहता है अर्थात् मैं रागी हूं, क्रोधी हूं, मानी हूं,ऐसा मानता है। इस तरह इस गायामें अज्ञानी जीवकी असत्त्य प्रतीतिका वर्णन किया। आगे इस बहिरात्माको संबोधन करते हुए आचार्य कहते हैं-रे दुरात्मन् !
समयसार टीका। २७ ( सचण्ड जाणदिट्ठो) सर्वज्ञ भगवानने अपने ज्ञानमें देखा है कि ( जीवो ) यह जीव पदार्थ ( णिच्च ) सर्व ही कालमें ( उवओगलक्खणो ) केवलज्ञान और केवलदर्शनमई शुद्ध अयोग लक्षणको शुद्ध नयसे रखनेवाला है (किहं ) तब कैसे ( सो ) वह जीव (पुग्गलदवी भूदो) पुद्गल जड़ मई द्रव्य हो सकता है अर्थात् किसी तरह भी नहीं हो सक्ता (जं) जिस कारणसे ( भणसि ) तू ऐसा कहता है कि ( मन्झमिणं ) यह पुद्गलद्रव्य मेरा है । भावार्थ-जत्र सर्वज्ञ देवन पुद्गलसे भिन्न चेतना लक्षणधारी जीव पदार्थको देखा है और ऐसा ही ज्ञानी जीवोंके अनुभवमें आता है तब तेरा यह कहना कि यह शरीरादि मेरा है मैं इसका हूं सो सर्व मिथ्या है । इस प्रकार दूसरी गाथा हुई ॥ २९ ॥ ( जदि ) यदि (सो) वह जीवद्रव्य (पुग्गल ढव्वीमूदो) पुद्गल अर्थात् जड़ स्वरूप द्रव्य हो जाय और (इदरं) जीवसे भिन्न शरीरादि पुद्गल द्रव्य (जीवत्तं ) जीवपनको (आगदं) प्राप्त हो जाय (तो सका वुत्तुं) तत्र यह कहनेको समर्थ हो सके हो (जे) अहो भव्य जीव (मन्झमिणं पोग्गलढब्ब) कि यह पुद्गल द्रव्य मेरा है। सो ऐसा कभी हो नहीं सक्ता । जसे वर्षाकालमें कठोर लूणकी डली पानी रूप हो जाती है व गर्मीकी ऋतुम खाराजल लूणकी डली रूप हो जाता है। इस प्रकार कालके निमित्तसं परस्पर एक दूसरे रूप हो जाते हैं तैसे ही जो कहीं यह जीव द्रव्य अपने चैतन्यपनको छोड़कर पुद्गल द्रव्य स्वरूप परिणमन करता हो तथा पुदल द्रव्य अपने मूर्तीक अचेतन स्वभावको त्याग कर चैतन्य स्वरूप और अमूर्तीक हो जाता हो तब तो हे दुर्युद्धी ! तुम्हारा वचन सत्य हो सकता है। परंतु ऐसा नहीं है क्योंकि यह वात प्रत्यक्षसे ही विरोध रूप है । यह जीव ज्ञान दर्शनवान है सो प्रत्यक्ष अनुभव गोचर है तथा यह शरीर पुद्गलसे बन कर सदा जरूप ही रहता है यह वात भी वाल गोपाल सब जानते हैं। इस कारण न जीव पुद्गल होसक्ता है और न पुद्गल जीव हो सक्ता है। इस लिये यह सिद्ध हुआ कि यह जीव द्रव्य देहसे भिन्न अमूर्तीक शुद्ध बुद्ध, एक स्वभाव है । यहां यह तात्पर्य है कि इस प्रकार देह और आत्माके भंढ़ ज्ञानको जानकर और मोहनी कर्मके उदयसे उत्पन्न होते हुए जो सर्व मोह रूप विकल्प नाल तिनको त्याग कर विकार रहित चैतन्य चमत्कार मात्र जो अपना परम आत्म तत्त्व है उसमें भावना करनी योग्य है । भावार्थ-संसारी जीव यद्यपि व्यवहार में शरीरादि परद्रव्योंको अपने हैं ऐसा कहता है तथापि ज्ञानी सम्यग्दृष्टि आत्मा इन परद्रव्योंको सदा ही अपने स्वरूपसे भिन्न अनुभव करता है । जो कोई भूलसे इन शरीरादिकोंको निश्चयसे भी अपना मान बैठता है और इसी लिये उनमें और उनकी नाना अवस्थाओंमें तन्मय होकर कभी हर्ष और कमी विपाद करता है वह जीव अज्ञानी बहिरात्मा मिथ्याष्टि है । आचार्य्यने इसी अज्ञानी जीवको समझाया है कि प्रगट जुदे २ दीखत, जो परद्रव्य उनमें तूं आत्मबुद्धि RESEARitrarurtarvasna समयसार टीका। RSHAN सदा २८ त्याग । जैसे घटाकाशका व्यवहार होते हुए भी आकाशअमूर्तीक घट रूप नहीं हो सत्ता और न मूर्तीक घट कभी आकाश रूपहो सकता है । इसीतरह जीवमें कभी पुद्गलका व्यवहार होते हुऐ भी न जीव कभी पुद्गल होसक्ता है और न पुद्गल कभी जीव होसक्ता है । अतएव जीव. और. पुगलका भेदज्ञान प्राप्त कर अपने कल्पाणके लिये मुमुक्षु जीवको अपने शुद्ध आत्मतत्त्वकी ही भावना करनी चाहिये-उसीका मननकर आत्माकी अशुद्धताको मेट उसे निरंजन, निर्विकार परम शुद्ध वनादेना चाहिये ॥ ३० ॥ इस तरह अप्रतिबुद्धको समझानेके लिये पांचवें स्थलमें तीन गाथाएं पूर्ण हुई । आगे अज्ञानी जीवके पूर्वपक्षको खंडन करते हुए गाथा आठ कही जाती हैं तिनमें एक गाथामें अज्ञानीका पूर्व पक्ष कथन है, चार गाथाओंमें निश्चय और व्यवहारको समर्थन करते हुए उस पक्षका खंडन है तथा तीन गाथाओंमें निश्चय स्तुति रूपसे पूर्व पक्षका परिहार है इसतरह छठे स्थलकी समुदाय पातनिका है। आगे प्रथम ही अज्ञानी शिष्य अपना पूर्व पक्ष करता है कि यदि जीव और शरीरकी एकता नहीं है तो जो तीर्थंकर और आचार्यकी स्तुति की जाती है सो वृथा, निरर्थक हो जायगी। गाथाः-जदि जीवो ण सरीरं तित्थयरायरियसंथुदी चैव । सव्वावि हवदि मिच्छा तेण दु आदा हपदि देहो ॥३१॥ संस्कृतार्थः---यदि जीवो न शरीरं तीर्थकराचार्यसंस्तुतिश्चैव । सर्वापि भवति मिथ्या तेन तु आत्मा भवति देहः ॥ ३१ ॥ सामान्यार्थः- यदि जीव शरीररूप नहीं हैं तो तीर्थकर और आचार्यकी स्तुति सर्व ही मिथ्या हो जायगी इस कारणसे यह आत्मा देह रूप है ऐसा ही ठीक है । शब्दार्थ सहित विषेशर्थ हे भगवन् (जदि जीवो ण सरीरं.) यदि यह जीव पुद्गल जड़ शरीररूप नहीं होता है तो( तित्थयराइरिय संथुई चैव ) ' द्वौ कुदेन्दु तुषार हार धवलौ' इत्यादि तीर्थंकर भगवानकी स्तुति कि आप कुंदके फूल वचंद्रमा व वर्फके समान सफेद रंग हैं इत्यादि तथा देश कुलजाइ शुद्धा ' इत्यादि आचार्यकी स्तुति कि जिनका देश और कुल शुद्ध हो इत्यादि ( सव्वावि हवदि मिच्छा ) सर्व ही मिथ्या अर्थात् असत्यार्थ हो जायगी ( तेणदु आदा हवदि देहो ) तिसकारणसे तो यह आत्मा देह रूप है ऐसी मेरी एकांत रूप प्रतीति है । ऐसा पूर्व पक्ष शिष्यने किया तिसकी गाथा पूर्ण हुई। इसका परिहार आगे आचार्य कहते हैं कि हे शिष्य ! जो तूने कहा है वन नहीं सक्ता क्योंकि तूं निश्चय और व्यवहार समयसार टीका। २९ नयोंक परस्पर साध्य साधक भावको नहीं जानता है अर्थात् किस प्रकार निश्चय नय साध्य है और व्यवहार नय साधनेवाली है, या कैसे निश्चयको समझनेके लिये व्यवहार नय निमित्त रूप पड़जाती है। गाथा:-यवहारणओ भासदि जीवो देहो य हवदि खलु इको। ण दु णिच्छयस्स जीवो देहो य कदावि एकट्ठो ।। ३२ ।। संस्कृतार्थः-व्यवहारनयो भाषते जीवो देहश्च भवति खल्वेकः । म तु निश्चयस्य जीवो देहश्च कदाप्येकार्थः ॥ ३२ ॥ सामान्यार्थः-व्यवहार नब यह कहता है कि जीव और देह विलकुल एक हैं परंतु निश्चय नयका यह अभिप्राय नहीं है कि जीव और देह किसी भी कालमें एक होते हैं। शब्दार्थ सहित विशपार्थ-(वबहारगओ) व्यवहारनय (भासदि) कहती है (जीवो) यह जीव (देहोय ) और यह देह ( ग्वलु ) बिलकुल ( इको ) एक ( हवदि ) हैं (दु) परंतु (पिच्छ्य- स्स) निश्चय नयके अभिप्रायसे ( जीवा ) यह जीव ( देहो य ) और यह शरीर ( कदावि ) किसी भी नर नारकादि पर्यायोंक कालमें (एकहो ) एक पदार्य रूप (ण) नहीं हैं। जैसे कनकपापाण और खास सुवर्ण इन दोनों एक साथकी अवस्था में रहनेके कारणसे व्यवहारसे दोनोंमें एकता होने पर भी निश्चयस दोनों भिन्नर हैं तैसे ही जीव और शरीरादिमें व्यवहारसे एक साथ रहते हुए एकता होने पर भी निश्चयस दोनों भिन्न २ हैं ऐसा अभिप्राय है। इस कारण व्यवहार नयसे देहकी स्तुति करनेसे आत्माका स्तवन युक्त है इसमें कोई दोष महीं है। इसीको कहते है:- गाथा:-इणमण्णं जीवादी देहं पुरगलमयं थुणित्तु मुणी। मण्णदि हुसंधुदो वंदिदो मए केवली भयवं ॥ ३३ ॥ संस्कृतार्थः-इदमन्यत् जीवादेहं पुद्गलमयं स्तुत्वा मुनिः । मन्यते खनु संस्तुतो वंदितो. मया केवली भगवान् ॥ ३३ ॥ सामान्यार्थ-जीवस अन्य इस पुद्गल मयी देहकी स्तुति करके मुनि महाराज ऐसा मानते हैं कि मैंन कंवली भगवान्की वंदना और स्तुति करी ॥ ३३ ॥ शब्दार्थ सहित विशेषार्थ-(जीवादो) इस जीवसे (अण्णं) अन्य (इणं) इस (पोग्गलमय देह) पुद्गल मयी देहकी (थुणित्तु) स्तुति करके (मुणी) मुनि (मण्णदि हु) पीछे व्यवहारसे ऐसा मानते हैं कि ( मए ) मुझ करके ( केवली भयवं ) कंवली भगवान ( संथदो) स्तुति किये गए व ( वंदिदो ) वंदना किये गए । तात्पर्य यह है कि जैसे सुवर्ण और चांदी मिले हुए हैं इन दोनोंको एकता देखकर व्यवहारसे ऐसा कह दिया जाता है कि यह सफेद सोना है परन्तु 4 समयसार टीका। recurriaNAUKARArcar ३० निश्चयसे सुवर्णको शुक्ल नहीं कहा. जासक्ता । तैसे ही केवली भगवान सफेद या लाल पापाण- मणिके वर्ण रूप हैं इत्यादि देहकी स्तुति करते हुए व्यवहारसे आत्माका स्तवन होता है परन्तु निश्चय नयसे नहीं होसक्ता । क्योंकि निश्चय नय एक पदार्थको अन्य रूप नहीं कह सक्ती ॥ ३३॥ आगे इसी वातको दृढ़ करते हैं कि निश्चयनयसे शरीरकी स्तुति करते हुए केवली महाराजका स्तवन नहीं होसक्ता । गाथा:-तं णिच्छयेण जुजदि ण सरीरगुणा हि हांति केवलिणो। केवलिगुणो थुणदि जो सो तचं केवलि थुणदि ॥ ३४॥ संस्कृतार्थः-तन्निश्चयेन न युज्यते न शरीरगुणा हि भवंति केवलिनः । केवलिगुणान् स्तौति यः स तत्त्वं केवलिन स्तौति ॥ ३४ ॥ सामान्यार्थ -उपर लिखी वात कि देहकी स्तुतिसे केवलीकी स्तुति हो जायगी निश्चयनयसे उचित नहीं है क्योंकि शरीरके पुद्गल मयी गुण वास्तवमें केवली परमात्माके गुण नहीं होसक्ते इस लिये जो केवल ज्ञानीके आत्मीक गुणोंकी स्तुति करता है वही वास्तवमें केवली भगवानकी स्तुति करता है। शब्दार्थ सहित विशेषार्थ-(पिच्छयेण) निश्चयनयसे (तं) पूर्वोक्त देहकी स्तुतिसे केवलीका स्तवन (ण जुज्जदि) योग्य नहीं है क्योंकि (सरीरगुणा) शरीरके शुक्ल, कृष्ण आदिक गुण (हि) निश्चयसे ( केवलिणो ) केवली भगवानके गुण (ण होति ) नहीं होसक्ते । तब फिर केवलीका स्तवन कैसे होता है इसके लिये कहते हैं कि (नो) जो कोई (केवलिगुण) केवली महाराजकी आत्माके अनंत ज्ञान दर्शन आदि गुणोंकी (थुणदि ) स्तुति करता है ( सो ) सो ही (तचं) वास्तवसे वा स्फुट रूपसे ( केवलिं) केवली भगवानकी (थुणदि ) स्तुति करता है। जैसे शुक्ल वर्ण चांदी होती है परंतु कोई शुक्ल या रजत शब्दसे सुवर्णको कहे तो निश्चयसे नहीं कह सक्ता । तैसे ही केवली भगवानका शरीर शुक्ल आदि रूप है ऐसा स्तवन करनेसे चिदानंद मई एक स्वभाव जो केवली भगवान परम पुरुप परमात्मा हैं तिनका स्तवन निश्चयसे नहीं होसक्ता ॥ ३४ ॥ आगे शरीरकी प्रभुता कहने पर भी परमात्माके शरीरका स्तवन करनेसे निश्चयनयसे आत्माका स्तवन नहीं होता है इसीकी दढ़ताके लिये दृष्टान्त कहते है- गाथा:-णयरम्म वण्णिदेजह ण वि रपणो वण्णणा कदा होदि । देहगुणे धुव्वंते ण केवलिगुणा थुदा होति ॥ ३९ ॥ संस्कृतार्थ:-नगरे वर्णिते यथा नापि राज्ञो वर्णना कृता भवति । देहगुणस्तूंयमाने न केवलिगुणाः स्तुता भवंति ॥ ३५ ॥ - - समयसार टीका। ३? सामान्यार्थ-जैसे नगरकी शोभा वर्णन करते हुए निश्चयसे राजाका वर्णन हो ही नहीं सक्ता तैसे शरीरक गुणांकी स्तुति किये जाने पर भी केवलीक आत्म गुणोंका स्तवन नहीं होसका। शब्दार्थ सहित विशेषार्थ-(नह) जैसे (णयरंमि) महल, उपवन, खाई आदि संयुक्त नगरका (वणिद ) वर्णन करते हुए (रम्णो) राजाका (वष्णणा) वर्णन (ण वि) नहीं (होदि ) होता है तैसे (देहगुणे ) शुक्ल कृष्ण आदि देहके गुणों (थुव्वत्ते ) का स्तवन करनेसे (कवलि- गुणा ) केवली भगवानके अनंत ज्ञानादि गुण ( हा ) स्तुति किये हुए (ण) नहीं (होति) होते हैं । भावार्थ-यद्यपि व्यवहारसे नगरकी शोभा व सफाईसे राजाका ही यश होता है। परंतु निश्चयस वनादि व महलादिकी शोभासे राजाके भीतर जो न्यायपना, शूरपना, दयालता, धर्मज्ञता, प्रजावत्सलता आदि गुण हैं तिनका वर्णन नहीं होता। तैसे ही यद्यपि व्यवहारस केवली भगवानकी देहकी शोभा वर्णन करते हुए केवली महाराजकी ही स्तुति होती है तथापि निश्चयसे शरीरके वर्णादिका वर्णन करनेसे सकल परमात्माक अनंत ज्ञानादि गुणोंका वर्णन नहीं होता है ऐसा जानना। इस प्रकार निश्चय व्यवहार रूपसे गाथा चार पूर्ण हुई ॥ ३५ ।। आगे शिष्यने प्रश्न किया कि जो देहके गुणों का त्तवन करनेसे निश्चय स्तुति नहीं होती तो फिर निश्चय स्तुति कैसी होती है सो कहिये । जिसके उत्तरमें आचार्य कहते हैं कि जो कोई द्रव्येन्द्रिय और भावन्द्रिय मई नो पांत्र इन्द्रिय हैं इनके विषयोंको अर्थात् इन्द्रिय सम्बन्धी भोगामिलापोंको स्वसंवेदन लक्षण स्वरूप मेद ज्ञानके द्वारा जीत करके अपने शुद्ध आत्म त्वरूपका अनुभव करता है सो ही लित है अर्थात् जितेन्द्रिय है इस प्रकार करी हुई स्तुति सो निश्चय स्तुति है सो ही दिखलाते है- गाया-जो इंदिए जिणित्ता, णाण सहावाधिअं मुणदि आदं । तं खलु जिदिदियं ते, भणंति जे णिच्छिदा साहू ॥ ३६ ॥ संस्कृतार्थः-यो इंद्रियान् जित्वा । ज्ञानस्वभावाधिकमनुते आत्मानं । तं खलु नितेन्द्रियं ते, मनीत ये निश्चिताः साधवः ॥ ३६ ॥ सामान्यार्थ-जो इन्द्रियोंको जीत कर ज्ञान स्वभावस पूर्ण आत्माको अनुभव करता है उसको जो निश्चयके ज्ञाता साधु हैं वे प्रगटपन जिंतन्द्रिय कहते हैं। शब्दार्थ सहित विशेषार्थ-(जो ) जो पुरुष (इदिए ) द्रव्येन्द्रिय स्वरूप पांचों इन्द्रियोंक विषयोंकी इच्छाओंको ( जिणिता ) जीत करक अर्थात् अपने आधीन करके ( णाण सहावाधिों) शुद्ध, ज्ञान चतना गुणसे परिपूर्ण ( आई ) शुद्धात्माको (मुणदि ) मानता है, जानता है, तथा अनुभवमें लाता है (तं ) तिम पुरुषको ( जा ) जो (णिच्छिदा ) निश्चय नयके ज्ञाता ( साडू ) साधु जन हैं (ते) व (खल ) प्रगटपने (निदिदियं ) जितेन्द्री समयसार टीका। ३२ ( भणंति ) कहते हैं। यहां यह तात्पर्य है कि जानने योग्य ज्ञेय तो स्पर्शादि पंचेन्द्रियके विषय हैं और इनको जानने वाले ज्ञायक स्पर्शन आदि पांच द्रव्येन्द्रिय और भावेन्द्रिय हैं। इन सबका जो इस जीवके साथ संकर अर्थात् संयोग या संबध सोही एकदोप है तिस दोपको परम समाधिके बलसे जो कोई जीतता है सो ही जितेन्द्रिय या जिन है इस प्रकार यह प्रथम निश्चय स्तुति है । भावार्थ-आत्मा जब निज समाधि स्वरूप परम सामायिकमें होता है तब स्वयं ही पांचों इन्द्रियोंकी सर्व चाहनाएं रुक जाती है। इस कारण जितेन्द्रिय कहलाता है। इस तरहकी स्तुति करनेसे आत्माकी तरफ स्तुतिकर्ताका उपयोग जाता है इससे इस प्रकारकी स्तुतिको निश्चय स्तुति कहते हैं ॥ ३६ ॥ आगे तिस ही निश्चय स्तुतिको दूसरे प्रकारसे भाव्य भावक संकर दोपको दूर करते हुए कहते है । अथवा उपशम श्रेणीकी अपेक्षा आत्मा जित विमोह है ऐसा कहते है:-भाव्य- मावक संफर दोष क्या है सो इसी गाथाकी व्याख्या कहंगे । गाथा. जो मोहं तु जिणित्ता । णाण सहावाधियं मुणदि आदं । तं जिद मोहं साहुं । परमहवियाणया वेति ॥ ३७॥ संस्कृतार्थ-यो मोहं तु जित्वा । ज्ञानस्वभावाधिकं मनुते आत्मानं तं जितमोहं साधु । परमार्थविज्ञायका ब्रुवंति ॥ ३७ ॥ सामान्यार्थ-जो मोहको जीतकर ज्ञान स्वभावसे पूर्ण आत्माको अनुभवमें लाते हैं उस साधुको परमार्थके जानने वाले 'जितमोह । ऐसा कहते हैं। शब्दार्थ सहित विशेषार्थ-(जो ) जो पुरुष ( मोहं ) उदयमें प्राप्त मोहको अपने सम्यग्दर्शन ज्ञान चारित्रमें एकाग्रताको रखनेवाली विकल्प रहित समाधिके वलसे ( जिणित्ता) जीत करके ( णाणसहावाधियं ) शुद्ध ज्ञान गुणसे परिपूर्ण ( आदं ) आत्माको ( मुणदि) मानता है, जानता है, तथा भावता है (तं ) तिस ( साहुं ) साधुको ( परमट्ठवियाणया ) परमार्थके ज्ञाता ( जितमोहं ) जितमोह (वेंति) कहते हैं । यह दूसरी निश्चय स्तुति है । यहां शिष्यने प्रश्न किया कि इस स्तुतिमें भाव्य भावक संकर दोपका परिहार कैसे हुआ सो कहिये। इसके उत्तरमें व्यारव्याकार कहते हैं कि भाव्य तो रागादिमें. परणमन करते हुए आत्माको कहते हैं और भावक राग उत्पन्न करनेवाले उदयमें प्राप्त मोहको कहते हैं । इन भाव्य और भावकका शुद्ध जीवके साथ संकर अर्थात् संयोग या संबंधको भाव्यभावक संकर दोप कहते हैं। इस दोषको स्वसंवेदन ज्ञानके बलसे जो त्यागता है सो ही जित मोह है। भावार्थ-3- दय रूप मोह कर्म और राग परिणत आत्मा है इन दोनोंका त्याग जित मोहके हो जाता है क्योंकि उपशांत मोह ग्यारहवे गुणस्थान वर्ती साधुके न तो कोई राग परणति है और न किसी भी मोहकी प्रकृतिका उदय है ॥ ३८ ॥ इसी ही प्रकारसे मोहः पदको पलटकर - समयसार टीका। SAARCastorani राग, द्वेष, क्रोध मान, माया, लोभ, कर्म, नोकर्म, मन, वचन, काय ऐसे ग्यारह शब्द बीचमै मोड़ कर ११ सूत्र कर लेना तथा श्रोत्र, चक्षु, घ्राण, रस, स्पर्शन इन पांचों पदोंको देकर पांच सूत्र और करलेना इसी ही प्रकारसे और भी जो असंख्यातः लोक मात्र विभाव परिणाम हैं तिनको सूत्र में लगा कर पाठ करना और व्याख्यान समझना, जैसे जो रागको जीते वह जित राग, जो द्वेपको जीते वह जित द्वेप, जो कर्माको जीते वह जितं कर्म, जो श्रोत्रइंद्रिय जीते सो जितेन्द्रिय, जो तपका मद जीते सो जित मद इस प्रकार व्याख्यान समझना। भावार्थ-यहां प्रयोजन आत्म स्वरूपका अनुभव करानेका है। अतएव विभाव परिणामोंको स्मरण कर उनसे मैं रहित हूं या परमसाधुका आत्मा रहित है ऐसी भावना करके विभाव भाव हटते और परिणति शुद्ध होती है । इसी लिये इस स्तुतिको निश्चय स्तुति कहते हैं ॥ ३७॥ आगे भाव्यमांवक भावको अभाव रूप कहते हुए तीसरी निश्चय स्तुति कही जाती है अथवा क्षपक श्रेणीकी अपेक्षासे भीण मोह हैं इस प्रकार इस स्तुतिको कहते हैं- गाथा-जिमोहस्स दु जझ्या खीणो मोहो हविज साहुस्से । तइया दुखीणमोहो भणदि सो णिच्छंयविहिं ।। ३८।। संस्कृतार्थ-जितमोहस्य तु यदा भीणोमोहों भवेत्साघोः । तदा स्खलु क्षीणमोहो भण्यते स निश्चयविद्भिः ॥ ३८ ॥ सामान्यार्थ-जितमोह उपशम श्रेणीवाले मुनिके जब मोहका क्षय हो जाता है तब उस साधुको निश्चयके ज्ञाता क्षीण मोह कहते हैं- शब्दार्थ सहित विशेषार्थः- ( जिदमोहस्स साहुस्स ) उपशम श्रेणी प्राप्त नित मोह साधुके (जड्या दु) जिस समय पर अर्थात क्षपक श्रेणीपर निर्विकल्प समाधि कालमें (मोहो) मोहकर्म ( खीणो हविज्ज ) क्षय हो जाता है ( तझ्या दु) तिस समय पर अर्थात् मनवचन कायकी गुप्ति रूप समाधिके समयमें (सो) सो साधु (णिच्छ्यविदूहि) निश्चय अर्थात् परमार्थके ज्ञाता गणधर देवादि महापुरुषों के द्वारा (खीणमोहो) क्षीणमोहँ ( भणदि ) कहे जाते हैं। यहां शिष्यने प्रश्न किया कि भाव्यभावकके अभाव रूप यह स्तवन कैसे हुआ तिसका समाधान व्याख्यानकार कहते हैं कि भाव्य तो रागादिकोंमें परणमता हुआ आत्मा और भावक रोग उत्पन्न करनेवाला उदय प्राप्त मोहकमें इन दोनोंका भाव स्वरूप जो दोष तिसका अभाव क्षय या विनाश जिसने किया सो क्षीणमोह हैं । यह तीसरी स्तुतिका अभिप्राय है। भावार्थः इस मोहकर्मकें उदयसे जो रागादि दोष था तिसको जड़ मूलसे नाश करके क्षीण- मोह हो गए। अव मोह कभी भी अपनी जड़ नहीं पकड़ेगा-अतः क्षीणे मोह ऐसा कहनेस मोह रहित आत्माका अनुभव होता है । इस कारण यह निश्चय स्तुति है। इसी प्रकार मोह HISHUNetoes ३४ समयसार टीका। पदके स्थानमें राग व द्वेष आदि पद जोड़ लेना, जैसे जिसने रागका अभाव किया सो वीतराग, जिसने द्वेषको हटाया सो क्षीण दोष, जिसने क्रोधको नाश किया सो क्षीणक्रोध । इस तरह भावना करनी योग्य है। इस प्रकार प्रथम गाथामें पूर्व पक्ष करके फिर ४ गाथाओंसे निश्चय और व्यवहारको समर्थन करते हुए उस पक्षका उत्तर है फिर तीन गाथाओंसे निश्चय स्तुति करके उसी पक्षका विशेष समाधान है। इस तरह पूर्व पक्षका खंडन करते हुए ८ गाथाओंमें छठा स्थल पूर्ण हुआ ॥ ३८॥ आगे रागद्वेषादि विकल्पोंकी उपाधिसे रहित जो स्वसंवेदन ज्ञान सो ही है लक्षण जिसका ऐसा जो प्रत्याख्यान तिसका व्याख्यान करते हुए चार गाथाओंको कहते हैं, तिनमें स्वसंवेदन ज्ञान ही प्रत्याख्यान है ऐसा कथन करते हुए प्रथम गाथा है, फिर प्रत्याख्यानके सम्बन्धमें दृष्टान्त रूपसे दूसरी गाथा है इस तरह गाथा दो हैं। फिर मोहका त्याग कराने हेतु प्रथम गाथा तथा ज्ञेय पदार्थोंका त्याग कराते हुए दूसरी गाथा इस तरह गाथा दो हैं। ऐसे सातवें स्थलमें समुदाय पातनिका कही गई ॥३८॥ अब शिष्यने जो यह पूर्व पक्ष किया था कि तीर्थंकर व आचार्यकी स्तुति निरर्थक है क्योंकि इससे शरीरको ही आत्मा कहना पड़ेंगा तिसका समाधान सुनकर यह जान गया कि जीव और देहकी कभी भी एकता नहीं की जासकी। अब प्रतिबुद्ध होकर यह प्रश्न करता है कि हे भगवन् ! रागादिकोंका प्रत्याख्यान क्या वस्तु है ? इसका उत्तर आचार्य कहते हैं- गाथा-णाणं सव्वेभावे पञ्चक्खादि य परोत्ति णादूण। तम्हा पञ्चक्खाणं गाणं णियमा मुणेदव्वं ॥ ३९ ॥ संस्कृतार्थ--ज्ञानं सर्वान्भावान् प्रत्याख्याति परानिति ज्ञात्वा । तस्मात् प्रत्याख्यानं ज्ञानं नियमात् मन्तव्यम् ॥ ३९ ॥ सामान्यार्थ-स्वसंवेदन ज्ञान सर्व रागादि भावोंको अपनेसे पर जान करके त्याग देता है तिस कारण जो ज्ञान है सो ही निश्चयसे प्रत्याख्यान है ऐसा जानना योग्य है। शब्दार्थ सहित विशेषार्थः-(गाणं ) जो जानै सो ज्ञान इस व्युत्पत्ति करके स्वसंवेदन ज्ञानको ही आत्मा कहते हैं सो ऐसा स्वसंवेदन ज्ञान स्वरूप आत्मा ( सव्वे भावे) सर्व मिथ्या- त्व रागद्वेषादि भावोंको (परेत्ति णादूण ) पर स्वरूप हैं अपने आत्म स्वरूपसे भिन्न हैं ऐसा जान करके (पञ्चक्खादि य) प्रत्याख्यान करता है, त्यागता है अथवा निराकरण करता है (तम्हा) तिस कारणसे (गाण) निर्विकल्प स्वसंवेदन ज्ञान ही (पञ्चक्खाणं) प्रत्याख्यान है ऐसा (णियमा), नियमसे अर्थात् निश्चयसे (मुणेदव्वं ) मानना चाहिये, जानना चाहिये और अनुभवना चाहिये। .
- समयसार टीका। ३५ यहां यह तात्पर्य है कि परम समाधि अर्थात् समताभावके समयमै स्वसंवेदन ज्ञानके वलसे जो शुद्धात्माका अनुभव किया जाता है सो ही अनुभव करना निश्चय प्रत्याख्यान है। भावार्यः- प्रत्याख्यान नाम त्यागका है सो व्यवहारसे भोजन त्याग, विषय सेवन त्याग, कषाय त्याग, गमन त्याग आदिको प्रत्याख्यान कहत हैं। परन्तु निश्चयसे जब यह आत्मा अपने शुद्ध आत्म स्वरूपमें आरूढ़ होता है और उसके रससे भीज जाता है तब ही प्रत्याख्यान होता है क्योंकि उस समय आपसे ही सर्व रागद्वेषादि विभाव छूट जाते हैं । इसलिये निश्चय प्रत्याख्यान शुद्धात्म स्वरूपका अनुभव ही है। अतएव सर्व विकल्प त्याग एक निज स्वरूपकी ही भावना करनी योग्य है ॥ ३९ ॥ आगे प्रत्याख्यान विषय सम्बन्धी दृष्टान्त कहते हैं:- गाथा—जह णाम कोवि पुरिसो, परवमिणति जाणिटुं चयदि । तह सव्वे परभावे, णाऊण विमुंचदे णाणी ॥ ४० ॥ संस्कृतार्थ-यथानाम कोऽपि पुरुषः परद्रव्यामिदमिति ज्ञात्वा त्यजति । तथा सर्वान् परभावान् ज्ञात्वा विमुंचति ज्ञानी ॥ ४० ॥ सामान्यार्थ-जैसे कोई भी पुरुष यह पर द्रव्य है ऐसा जान कर उसे छोड़ देता है। तेसे ज्ञानी सर्व ही पर भावोंको अपनसे पररूप हैं ऐसा जानकर त्याग देता है ।। ४० ॥ शब्दार्थ सहित विशेषार्थ (जह ) जैसे ( णाम ) प्रगटपन (कोवि परिसो) कोई भी पुरुष (परदव्वमिणंति) यह वस्त्र आभरणादिक जो मैंने पहन रक्खे हैं मेरे नहीं हैं दूसरेके यह पदार्थ हैं ऐसा ( जाणिदुं ) नानकर (चयदि ) उनको त्यागदेता है । (तह ) तैसे ही (णाणी) स्वसंवेदन ज्ञानी (सव्वं परभाव) सर्व मिथ्यात्व रागादि परभावोंको अर्थात् विभाव रूप पर्यायोंको परस्वरूप अपनेसे भिन्न (णाऊण ) अपने स्वसंवेदन ज्ञानके वलसे जानकर (विमुंचदे) विशेष रूपसे अर्थात् मनवचकायकी शुद्धतासे छोड़ देता है। यहां यह तात्पर्य है कि जैसे कोई देवदत्त नामका पुरुष धोबीके घरसे अपनी चादरकी जगह दूसरे आदमीकी चादरको भूलसे अपनी मानकर लाया और उस ओढ़कर सोगया, पीछे उसी वस्त्रका स्वामी उधर आ निकला, उसने उस चादरको अपनी जान कपड़ेका आंचल पकड़ खींचा। ओढ़नेवाला नग्न होगया और यकायक चौंक कर उठा और उस कपड़ेके लक्षणको देख पहचान लिया कि यह चादर मेरी नहीं है इस दूसरे आदमीकी है। तब फिर तुरत ही विना किसी मोहके उस छोड़ देता है। ऐसे ही यह ज्ञानी जीव भी जिन रागादि भावोंको पहले अज्ञान भावसे अपने मान रहा था ज्ञानी गुरु द्वारा समझाये जानेपर कि यह मिथ्यात्व रागादि तेरे स्वरूप नहीं है, तू तो इनसे भिन्न एक ज्ञान स्वरूप है, इन सर्व परभावोंको पर रूप निश्चय करके छोड़ देता है और शुद्धात्माकी अनुभूतिका अनुभव करने लगता है। भावार्थ-जैसे अपने शरीरसे वस्त्र भिन्न हैं, व आत्मासे HRAVAHARSAMRATANAL । travratranirdererang '३६ समयसार टीका। शरीर मिन्न हैं तैसे शुद्धात्म स्वरूपसे यह सर्व उपाधिननित कर्म सम्बन्धसे पैदा होनेवाले रागादि भाव भिन्न हैं ऐसा जानकर इनको रुचिसे त्याग करके निन आत्मद्रव्य और उसकी अनंत गुणनिधिका ही भोक्ता होना योग्य है । इस प्रकार दो गाथाएं संपूर्ण हुई ॥ ४० ॥ :. . आगे शिष्यने प्रश्न किया कि शुद्धात्माकी अनुभूतिका अनुभव किस प्रकार होता है इसका उत्तर कहते हुए आचार्य मोहादिके त्याग करनेकी विधि बतलाते हैं- गाथा.--णत्थि मम को वि मोहो बुज्झदि उवओग एव अहमिको । तं मोह णिम्ममत्तं समयस्स वियाणया विति ।। ४१ ।। संस्कृतार्थ-नास्ति मम कोपि मोहो बुध्यते उपयोग एवाहमेकः । तं मोहनिर्ममत्वं समयस्य विज्ञायकाः ध्रुवंति ॥ ४१ ॥ सामान्यार्थः-मोह मेरा कोई भी नहीं है। मैं तो एक उपयोग स्वरूप ही आत्मा हूं ऐसा ज्ञानमें झलकता है, इसलिये शुद्धात्माके जानने वाले मुझे मोह ममत्त्वसे रहित कहते हैं। शब्दार्थ सहित विशेषार्थ-( मोहो ) द्रव्यकर्म रूप मोह तथा भावरूप मोह अर्थात् मोहनीकर्म वा मोहभाव (मम ) शुद्ध निश्चयनयस टंकोत्कीर्ण ज्ञाता दृष्टा एक स्वभावको रखनेवाला ऐसा जो मैं सो मेरा (को वि) कोई भी सम्बन्धी (णत्थि) नहीं है। क्योंकि जब मैं शुद्ध ज्ञायक स्वरूप हूं तब यह मोह मुझे रागादि परभावरूप भावना करानके लिये या मुझे रंनित करनेके लिये असमर्थ है । (अहम्) मैं (एको ) एक स्वरूप हूं ऐसा ( उवओग एव) ज्ञानदर्शन उपयोग लक्षणका धारी होनेसे यह आत्मा ही (बुन्झदि) जानता है अथवा विशुद्ध ज्ञानदर्शनोपयोग स्वरूप ही मैं एक अकेला हूं ऐसा जाना जाता है । इसलिये (तं मोह णिम्ममत्तं ) उस द्रव्य या भावरूप मोहके विषय में ममता रहित हूं अथवा मुझे मोह रहित शुद्धात्म भावना स्वरूप ऐसा निर्ममत्त्व ( समयस्स वियाणया) शुद्धात्म स्वरूपके जाननेवाले पुरुष (विति ) कहते हैं। यहां यह विशेप है कि पहले यह कहाथा कि स्वसंवेदन ज्ञान ही प्रत्याख्यान है उसी स्वसंवेदन ज्ञानको ही यहां निर्माह स्वरूप कहा गया है। भावार्थः-मोहादिसे दिल हटानेके लिये ऐसी भावना करनी योग्य है कि मैं तो एक शुद्ध ज्ञानदर्शन उपयोगका धारी अकेला हूं, शुद्ध निश्चय जो सत्यार्थ नय है वह तो यही बतलाती है कि मेरी और सिद्ध भगवानकी जाति एक है । तब जैसे मोहका कोई निजका सम्बन्ध : सिद्ध भगवानसे नहीं है तैसा मुझसे भी नहीं है। मोह तो मेरा बंधु नहीं है सो प्रगट ही है। जब मैं वीतराग भावनाको पाता हूं तव निराकुल सुखी रहता हूं और जैसे ही मोह आकर 'मेरे मनको दवाता है मैं आकुलताके समुद्रमें डूब जाता हूं और महादुःखका अनुभव करता हूं। ऐसा मेरा धन लूटनेवाला मोह मेरा हितू कैसे हो सक्ता है ? इस प्रकार वार २ विचार कर मोहको हटावे । ज्यों २ मोह हटेगा शुद्धात्माकी अनुभूति अपने अनुभवमें आवेगी। -- . . Samiraimes समयसार टीका। ३७ इसी प्रकार मोह पदको पलटकर सूत्रमें राग, द्वेष, क्रोध, मान, माया, लोभ, कर्म, नोकर्म, मन, वचन, काय, श्रोत्र, चक्षु, भ्राण, रसना, स्पर्शन इस तरह सोलह पढ़ रखकर व्याख्यान समझना और भावना करनी । इसी तरह अन्य जो असंख्यात लोक मात्र विभाव परिणाम हैं उनको भी विचार कर भावना करनी योग्य है । जैसे राग भाव मेरा कोई सम्बन्धी नहीं है, क्रोध भाव मेरा कोई नहीं है, द्रव्य कर्म मेरे नहीं हैं, शरीरादि नोकर्म मेरे नहीं हैं यह पांच इन्द्रियां मेरी नहीं हैं, यह वेद मेरे नहीं हैं, यह विक्या मेरी नहीं है, यह धन मेरा नहीं है । इस प्रकार निश्चयसे अपने स्वरूपरूप. धनको अपना मानकर पकड़ले और उसके सिवाय सर्व अन्य भावोंको पर जान ममता छोड़े। इस तरह भेदज्ञानका अभ्यास करते २ मोहादि दूर होते हैं और निज शुद्धस्वरूपका अनुभव प्रगट होता है ॥ ४२ ॥ आगे कहते हैं कि धर्मास्तिकायको आदि लेकर ज्ञेय पदार्थ भी मेरे आत्माका स्वरूप नहीं है- गाथा:-णत्थि मम धम्म आदी बुज्झदि उवओग एव अहमिको। तं धम्म णिम्समत्तं समयस्स वियाणया विति॥४२॥ संस्कृतार्थ:-नास्ति मम धर्मादिर्बुध्यते उपयोग एवाहमेकः । तं धर्मनिममत्वं समयस्य विज्ञायकाः ब्रुवंति ॥ ४२॥ सामान्यार्थ—यह धर्म अधर्म आदि द्रव्य मेरे नहीं हैं. मैं तो एक उपयोग स्वरूप ही हूं ऐसा ज्ञानी जानता है इसलिये मेरा स्वरूप. धर्मा आदि पर द्रव्योंके ममत्त्वसे रहित है ऐसा आत्मस्वरूपके ज्ञाता कहते हैं। शब्दार्थ सहित विशेषार्थ-(धम्मादी) यह धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय, आका- शास्तिकाय, पुदलास्तिकाय तथा कालद्रव्य व अन्य जीव द्रव्यको आदि लेकर जितन ज्ञेय अर्थात् जानने योग्य पदार्थ हैं वे सब ( मम ) मेरे सम्बन्धी. ( णत्थि) नहीं हैं । ( अहं ) मैं (उवओग एव) विशुद्ध ज्ञानदर्शन उपयोग स्वरूप ही हूं क्योंकि आत्माका लक्षण ज्ञानोपयोग दर्शनोपयोग मय है। इन दोनोंको अभेद्रसे उपयोग कहते हैं । अभेदसे जो उपयोग है सो ही आत्मा है क्योंकि आत्माके प्रत्येक प्रदेशमें उपयोग है, मैं आत्मा हूं, अपनेको इस प्रकार जानता हूं कि टंकोल्कीर्ण ज्ञायक एक स्वभाव रूप मैं हूं तथा.(एको) एक अकेला हूं.(बुज्झदि) ऐसा- ज्ञानी जानता है। (तं धम्मणिम्ममत्तं ) इस कारण तिन धर्मादि द्रव्यों प्रति मैं ममत्त्व रहित हूं, यद्यपि दही और शक्करकी शिखरिणीके समान व्यवहार नयसे ज्ञेय ज्ञायक सम्बन्धकी अपेक्षासे परद्रव्योंके साथ मेरी एकता है तौभी शुद्ध निश्चय नयसे: यह पर द्रव्य-- मेरा स्वरूप नहीं है। क्योंकि मैं शुद्धात्म भावना स्वरूप हूं, इस कारण पर द्रव्योंसे ममत्व रहित हूं। (समयस्स वियाणयाः) ऐसा शुद्धात्माके जाननेवाले पुरुष (ति) कहते हैं। यहां यह तात्पर्य है कि पहले स्वसंवेदन ज्ञानको ही प्रत्याख्यान कहा था: उसीका यहां परद्रव्यसे - ស្រករ समयसार टीका। ममत्त्व रहितपना विशेषण वतलाया है। भावार्थ-परद्रव्योंको मैं जानता हूं ऐसा भी जो अहंकार है सो त्यागने योग्य है । सर्व पर द्रव्योंसे भी मोह करना स्वसंवेदन ज्ञानमें वाधक है इस कारण ऐसी ममता भी त्यागने योग्य है। निर्विकल्प होकर निज शुद्धस्वरूपका ध्याना ही कार्यकारी है। यद्यपि आत्माके ज्ञानस्वभावमें ज्ञेयोंका प्रतिभासपना होना उचित ही है तथापि उन ज्ञयों प्रति जो ममत्त्व भाव सो स्वरूप समाधिमें निपंधने योग्य है । मैं ज्ञाता हूं परद्रव्य ज्ञेय. हैं यह विकल्प योग्य नहीं है ॥ ४२ ॥ इस प्रकार दो गाथाएं समाप्त हुई । इस तरह ४ गाथाओंके समुदायसे सातवां स्थल पूर्ण हुआ। .. आगे शुद्धात्मा ही एक उपादेय ग्रहण करने योग्य व अनुभव करने योग्य है ऐसा जो श्रद्धान सो सम्यग्दर्शन है, तिस ही शुद्धात्म स्वरूपमें स्वसंवेदन ज्ञानका होना सम्यग्ज्ञान है, तथा तिस ही अपने शुद्ध आत्म स्वरूपमें वीतरागताके साथ स्वसंवेदन पने निश्चल रूप रहना सो सम्यग्चारित्र है इस तरह निश्चय रत्नत्रयमें परिणमन करनेवाले जीवका कैसा स्वरूप होता है उसको दिखलाते हुए जीवाधिकारको संकोचते हैं- गाथा:-अहमिको खलु सुद्धो, दसणणाणमइओ सयाख्वी । णवि अस्थि मज्झ किंचिव अण्णं परमाणुमित्तं वि ॥४३॥ संस्कृतार्थः-अहमेकः खलु शुद्धो, दर्शनज्ञानमयः सदाऽरूपी । नैवास्ति मम किंचिद, प्यन्यत् परमाणुमात्रमवि ॥ ४३ ॥ सामान्यार्थः-प्रगटपने मैं एक हूं, शुद्ध हूं, दर्शनज्ञान मई हूं और सदा अरूपी हूं। मेरे सिवाय अन्य परमाणु मात्र भर भी कोई चीज़ मेरी नहीं है। शब्दार्थ सहित विशेषार्थः-( खलु) स्फुट रूपसे प्रगटपने ( अहम् ) मैं जो अनादि कालसे देह और आत्माकी एक मानता रूप भ्रमात्मक अज्ञानके कारण अप्रतिवुद्ध अर्थात् वेखवर हो रहाथा । परंतु अब परमगुरुके प्रसादसे जाग्रत हुआ अपने आपको जानकर अपने शुद्ध आत्म स्वरूपमें रत हुआ। ऐसा हूं जैसे किसीकी हथेलीमें सुवर्ण रक्खा हो परंतु वह भूलनाय और सो रहे, पीछे जब निद्रा दूर हो तब स्मरण करे और शीघ्र ही अपने पास सुवर्ण देखकर आनन्दित हो उसे ग्रहण करले। तैसे ही मैं अपने स्वरूपको आप भूला हुआ था, वेखवर हो अज्ञानकी नींदमें सो रहा था। अब ज्यों ही जागा, अपने स्वरूपको पहचाना, त्यों ही आनन्दित हो उसे ग्रहण कर लिया है। ऐसा में वीतराग चैतन्यमात्र ज्योति स्वरूप (एको) यद्यपि व्य- वहार करके नर नारक आदि रूपोंकी अपेक्षा अनेक हूं तथापि विशुद्ध निश्चय नयसे टंकोत्कीर्ण ज्ञायक एक स्वभाव रूप होनेके कारणसे एक हूं। (शुद्धो) व्यवहारमई नव पदार्थोंसे शुद्ध निश्चय नयकी अपेक्षासे भिन्न हूं अथवा रागादि दोषोंसे . भिन्न निर्दोष अर्थात् शुद्ध हूं। (दंसण णाण मइओ) केवलदर्शन केवलज्ञानमयी तथा (सयारूवी) निश्चयनय करके, रूप, - धGUSTO समयसार टीका। रस, गंध, स्पर्शसे रहित होनेके कारणसे सदा ही अमूर्तीक हूं। (किंचिव) कोई भी (अण्णं) दूसरा (परमाणुमित्तं वि) परमाणुमात्र भी पर द्रव्य (मन्झ ) मेरा (णवि अत्यि) नहीं है, अर्थात् कोई पर द्रव्य ऐसा नहीं है जो मेरे साथ एक रूप होकर व मुझे रागी द्वेपी करके मेरेमें मोह उत्पन्न करा देवे और कर्म बंधमें गिरा देव; क्योंकि मैं निश्चयसे परम विशुद्ध ज्ञानमें परणमन करनेवाला हूं। भावार्थ-इस गाथामें अभेद रत्नत्रयकी भावना किस प्रकार करनी उसकी कुंजी बतलाई गई है । यद्यपि भावना करनेवाला पर्याय अपेक्षा शुद्ध नहीं है तथापि निश्चय- नयसे अपनी शक्तिकी भावना ही आत्माकी शक्तिको प्रगट करनेके लिये समर्थवान है, इसलिये जो कोई इस गाथाके अर्थक अनुसार भावना करके सर्व पर द्रव्य, पर माव और पर पर्यायोंसे भिन्न शुद्ध ज्ञाता दृष्टा अमूर्तीक चैतन्यमई आत्म स्वरूपमें लीन होवे । सो अभेद रत्नत्रयका लाभ लेकर निश्चयसे यथार्थ मोक्षमार्गी हो कर्म बंध नसावं, अपनी शुद्धता बढ़ाव, मोहमाल हटावे, निन अनुभूति जगाव, तिस ही रसमें रसिक हो परम अद्भूत स्वाद पाव और निजानंद महलमें राज्य करनेको बढ़ता चला जावे। तात्पर्य यह है कि मुमुश्च जीवको सर्व संकल्प विकल्पोंसे रहित हो अपने शुद्ध ज्ञानानंद स्वरूपमें ही तन्मय होना योग्य है। इस प्रकार समयसार ग्रंथकी शुद्धात्मानुभूतिलक्षणस्वरूप व्याख्याके विषयमें तात्पर्यावृत्ति टीकाके सात स्थलोंसे 'जो पत्सदि अप्पाणं' इत्यादि २७ गाथा और उसके पीछे उपसंहारकी एक गाथा इस तरह समुदायसे २८ गाथाओंके द्वारा जीवाधिकार समाप्त हुआ। इति प्रथम रंगः। (२) अजीकाधिकार। अब इस समयसार नाटककी दूसरी रंगभूमिमें श्रृंगार किये हुए मनुष्यकी तरह जीव और अनीव एकीभूत होकर प्रवेश करते हैं । तहां स्थल तीनमें ३० गाथा पर्यंत अनीवा- धिकारका वर्णन किया जाता है । तिनमें पहले स्थलमें शुद्ध नयकी अपेक्षा देह व रागादि परद्रव्य हैं, जीवका स्वरूप नहीं हैं ऐसे निषेधकी मुख्यता करके अप्पाणमयाणंता" इत्यादि गाथाको आदि करके पाठ क्रमसे १० गाथा तक व्याख्यान करते हैं । इन दस गाथाओंके मध्यमें पर द्रव्य आत्मा है इस पूर्व पक्षकी मुख्यता करके पांच गाथाएं हैं। तिसके बाद इसके खंडनकी मुख्यता करके सूत्र एक है फिर आठ प्रकार कर्म पुद्गलद्रव्य है ऐसे कथनकी मुख्यता करके सूत्र एक है, पश्चात् व्यवहारनयको समर्थन करते हुए तीन गाथाओंका वर्णन है। इस प्रकार समुदाय पातनिका हुई सो ही कहते हैं। देह व रागादि जो पर द्रव्य हैं सो निश्चयसे जीव है ऐसा पूर्व पक्ष कहते है:-
SherwUwUwINMENTARIES
acocARSAURAVACAMAREKAMARNADAYA
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समयसार टीका।
गाथा:-अप्पाणमयाणंता सूदा दु परप्पवादिणो केई ।
जीवं अज्झवसाणं, कम्मं च तहा परूविंति ॥४४॥
अवरे अज्झवसाणे, सुतिव्वमंदाणुभावगं जीवं ।
मण्णंति तहा अवरे, णोकम्मं चावि जीवोत्तिं ॥ ४५ ॥
कम्मस्सुदयं जीवं अवरे कम्माणुभागमिच्छति ।
तिव्वत्तणमंदत्तण, गुणेहिं जो सो हवदि जीवो ॥ ४६॥
जीवो कम्मं उदयं दोण्णिवि खलु केवि जीवमिच्छति ।
अवरे संजोगेण दु कम्माणं जीवमिच्छंति ॥ ४७ ॥
एवं विहा बहुविहा परमप्पाणं वदति दुम्मेहा ।
ते ण'दु परप्पवादी णिच्छयवादीहिं णिदिवा ।। ४८ ॥
संस्कृतार्थ:-आत्मानमजानंतो मूढास्तु परमात्मवादिनः केचित् ।
जीवमध्यवसानं कर्म च तथा प्ररूपयंति ॥ ४४ ॥
अपरेध्यवसानेपु, तीव्रमंदानुभावगं जीवं ।
मन्यन्ते तयाऽपरे, नोकर्म चापि जीवमिति ॥ ४५ ॥
कर्मणउदयं जीवमपरे कानुभागमिच्छन्ति ।
तीव्रत्वमंदत्वगुणाभ्यां यः स भवति जीवः ॥ ४६ ॥
जीवकर्मोभयं द्वे अपि खलु केचिजीवमिच्छन्ति ।
अपरे संयोगनं तु कर्मणां जीवमिच्छन्ति ॥ ४७ ॥
एवं विधा बहुविधाः परमात्मानं वदंति दुर्मेधसः ।
तेन तु परात्मवादिनः निश्चयवादिमिः निर्दिष्टाः ॥४८॥
सामान्यार्थः-आत्माको नहीं जाननेवाले मूढ़ पुरूष परद्रव्यको आत्मा कहते हैं उनमेंसे
कोई तो रागादि.भावको तथा कोई द्रव्य कौंको जीव कहते हैं ॥ ४४ ॥ कोई रागादि
भावोंमें जो तीव्र मंद शक्तिका परिणमन है उसको जीव मानते हैं तथा कोई नोकर्मको ही
जीव जानते हैं ॥ ४५ ॥ कोई कर्मके उदयको जीव गिनते हैं तथा कोई कर्मोंकी रसरूप
शक्तिको ही जो तीव्रपने या मंदपनेसे वर्तन करती है जीव ठहराते हैं ॥ ४६॥ तथा कोई
जीव और कर्मोंके मेल होते हुए दोनोंको ही जीव जानते हैं तथा कोई कर्मोंके संयोगसे जीव'
होता है ऐसी इच्छा करते हैं ॥ ४७ ॥ इस तरह दुर्बुद्धि इस आत्माको नाना प्रकार पररूप
कहते हैं इस लिये निश्चयके ज्ञाता. पुरुषोंके द्वारा ऐसे पुरुष परको आत्मा कथन करनेवाले
ठहराए गए हैं ॥४॥
BSORBIRBAL ४१ - समयसार टीका। शब्दार्थ सह विशेषार्थ:-( अप्पाणं ) शुद्ध आत्माके निश्चय स्वरूपको (अयाणंता) नहीं पहचाननेवाले (मूढा) अज्ञानी पुग्न (दु) तो (पर) परद्रव्यको (अप्पादिणः) आत्मा कहनेवाले हैं । तिनमें (केई ) कोई तो (जीव) इस जीवको ( अन्झवसाण ) रागादि अध्यव- सानरूप अर्थात् जैसे कोय से कालापना मिन्न नहीं है तैसे रागादि भावोंसे आत्मा भिन्न नहीं है ऐसा मानते हुए रागादि अध्यवसायलप (तहा च) तथा (कम्म) द्रव्यकर्मरूप (परूवेति) कहते हैं ॥ ४४ ॥ ( अवरे ) दूसरे कोई एकांतवादी ( अझवसाणेसु) रागादि अध्यवसायोंके भीतर (तिन्त्र मंदाणुभावगं ) जो तीत्र तथा मंद अनुभाव स्वरूप अर्थात् शक्तिकी महिमाको तारत- म्यसे प्राप्त होवे उसे (जीवं ) जीव (मगंति ) मानते हैं अर्थात् राग अंशको बटानेवाला व बढ़ानेवाला जो कोई तीव्र या मंद अनुभाग है वही असलमें जीव है ऐसा श्रद्धान रखते हैं । परंतु इनसे मिन्न रागादि रहित वीतरग निश्चयसे जीवका स्वरूप है सो नहीं प्रतीनिमें- लाते हैं । (तहा ) तथा ( अवरे ) दूसरे कोई चार्वाकादिक जो कर्म और नोक्म रहित परमात्माके मेद विज्ञानसे शून्य हैं वे ( णोकम्मं चा दि) शरीरादि नोकर्मको ही (जीवोत्ति) जीव मानते हैं ॥ ४५ ॥ ( अवरे ) दूसरे कोई ( कम्मस्सुदर्य ) कौके उदयको अर्थात् पाप या पुण्यरूप फलको (जीव) जीवनानते हैं तथा कोई (कम्माणुभाग) कांके अनुभागको अर्थात उता अर्थात् वेलरूप कोमल, दारु अर्थात् काष्टके समान कठोर, अस्थि अर्थात् हड्डीके समान कठोरतर तथा पाषाण अर्थात् पत्थरके समान कठोरतम काँके रसको (जो ) जो (तिव्वत्तण मंदत्तण गुणेहिं ) तीन पन या मंदपनेक गुणोंसे वर्तन करता है अर्थात् कमी तीव्र होता है कमी मंद होता है ( सो जीवो) सो ही जीव ( हबदि ) है ऐसा मानते हैं ॥४६॥ ( केवि ) तथा कोई ( जीवो कम्म उहयं दोण्णिवि ) जीव और कर्म दोनोंको दही और खांडसे मिली शिखरिणीके ममान ही ( खलु ) स्फुट रूपसे ( जीवं ) जीव है (इच्छंति ) ऐमा चाहते हैं । जैसे शिखरिणीका स्वादी दही और खांडके मिलनेसे जो शिखरिणी हुई है उसे ही एक पदार्थरूप जानता है तैसे यह जीव और कर्म दो वस्तुओंके मेलको ही अपने अनुभवमें आनेवाला एक जीव जानता है। कम्मोसे जुदा कोई शुद्ध जीव है जो अपने अनुभवमें आना चाहिये ऐसा नहीं जानता है । ( अवरे ) तथा दूसरे कोई (कम्माण ) आठ कौके ( संजोग दु ) संयोगसे होनेवाले ( जीवम् ) नीवको (इच्छंति ) चाहते हैं जैसे आठ काठके पायोंके मिलने से खाट होती है तैसे आठ कर्मोंके संयोगसे जीव होता है ऐसा मानते हैं। उनका यह श्रद्धान है कि आठ कम्मोके संयोगके सिवाय अन्य किसी शुद्ध जीवकी प्राप्ति नहीं है अर्थात् कर्म रहित कोई शुद्ध जीव देखनेमें नहीं आता ॥ ४७ ।। (एवं विहा) इस तरह बहु विहा ) बहुत प्रकार ( परं) देह व रागादि पर द्रव्यम्वरूप ( अप्पाणं) आत्माको ( दुम्मेहा ) दुर्बुद्धि जन अर्थात् अज्ञानी वहिरात्मा जीव ( वदंति ) कहते हैं। ६ RAMETROPAN sanRCHAELEMSRDAS ४९ समयसार टीका। ( तेण) तिस कारणसे ही ( णिच्यवादीहिं ) निश्चयवादी सर्वश भगवानके द्वारा ऐसे पुरुष (परं) पर द्रव्य देह व रागादि मावोंको ( अपवादी ) आत्मा कहनेवाले अर्थात् पर को आत्मा कहनेका स्वभाव रखनेवाले ( णिदिष्ठा । कहे गए हैं । भावार्थ-इस जगत्में अनेक मत हैं जो आत्माके स्वरूपको अनेक प्रकार मानते हैं। कोई केवल जड़ स्वरूप ही मानते हैं, कोई पृथ्वी आदि पांच भूतोसे उत्पन्न जानते हैं, कोई रागी, द्वेषी, इच्छावान, द्वेषवान, प्रयत्नवान, हो जीवको जानते हैं, कोई जीवको परमात्मा होना न मानकर इतना ही मानते हैं कि यह वैराग्यमें चढ़ने २ ईश्वरके निकट होनायगा परन्तु सर्व रागादि रहित वीतर ग नहीं होसकता। केवल पापरूप या पुण्यरूप जो अवस्था होती है उनहीको जीव जानते हैं इनसे भिन्न भी कोई जीव होता है ऐसा श्रद्धान नहीं करते । इस तरह नाना प्रकारसे जीवके स्वरूपको कहते और मानते हैं ऐसे माननेवालों तथा कहनेवालोंको सर्वज्ञ भगवानने बहिरात्मा. सथा अज्ञानी इसी लिये कहा है कि जब तक यथार्थ जीवका स्वरूप ही नहीं प्रकट होगा तब तक अपना स्वरूप ही नहीं भासंगा और विना यथार्थ निन स्वरूप प्रतिभासक मोक्षमागकी सिद्धि कैसे होगी ॥ ४४-४५-४६-४७-४८ ।। इस तरह पांच गाथाओंके द्वारा पूर्व पक्षका वर्णन किया गया। अब आगे इसका परिहार कहते है। गाथा:-एदे सव्ने भावा पोग्गल इव्वपरिणामणिप्पण्णा। केवलिजिहि भणिया, किह ते जीवो ति उच्चति ॥४९॥ संस्कृतार्थ-स्ते भावाः पुद्गलद्रव्यपरिणामनिप्पन्नाः । केवलिजिनैणिताः कथं ते जीवा इत्युच्यते ॥ ४९ ।। सामान्यार्थ-यह सर्व माव पुगल द्रव्यके परिणमनसे उत्पन्न हुए हैं ऐसा श्री जिनेन्द्र केवलीने कहा है। तब इन भावोंको जीव निश्चयनयसे कैसे कहा जावे । ? शब्दार्थ सहित विशेषार्थ--(एदे ) यह पूर्वमें कहे हुए (सब्वे भावा ) सर्व ही देहादि व रागादिक भाव जो कि कमौके कारण उत्पन्न हुई पर्याये हैं ( पोग्गलदल्वररिणाम ) पुदल द्रव्य जो कर्म तिसके उदयके परिणमनसे उत्पन्न हुई (केवलि निणेहिं ) केवळी जिन सर्वज्ञों द्वारा ( मणिया ) कही गई हैं। तत्र ( किह ) किस कारणसे ( ते ) वे पर्यायें निधयनयसे ( जीवोत्ति ) जीव हैं या जीवकी पर्याय हैं ऐसी ( उच्चंति ) कहने में आसाती हैं । अर्थात् यह पर्यायें जीव हैं या नीवकी हैं ऐसा निश्चय नयसे नहीं कहा जा सका । यदि कोई ऐसा कहे जैसे कालापना कोयलेसे एक रूप हैं भिन्न नहीं है जैसे रागादिकोंसे मित्र कोई जी ही है सो ऐसा कहना ठीक नहीं है। क्योंकि रागादि विमाव मावोंसे मिन्न शुद्ध जीव है यह अनुमानका पक्ष है जिसका हेतु यह है कि परम wwwsareticisesexi समयसार टीका। VEDEO ४३ समाधि में स्थित पुरुपोंके द्वारा शरीर व रागादिकोंसे मित्र चिदानंद एक स्वभाव रूर शुद्ध नीव की उपलब्धि होती है अर्थात समाधिमें स्थित ध्य नी पुरुषोंको वीतराग शुद्ध आत्म स्वरूपका अनुभव होता है। जैसे किट कालिमासे भिन्न सुवर्ण प्राप्त होता है यह दृष्टान्त है। इस कारण अंगार याने कोयलेका दृष्टान्त नहीं घट सक्ता । क्योंकि जैसे सुवर्णका पीलापना तथा अग्निका उष्णपना स्वभाव है तैसे ही अंगारेका कालापना स्वभाव है सो किसी भी तरह यह स्वभाव स्वभाववानसे अलग नहीं किया जा सकता। परंतु रागद्वेषादिक स्वभाव नहीं विभाव परिणाम हैं। जैसे स्फटिक मणिमें लाल व हरे डाककी उपाधिके कारण लालपना बहरापना दीखता है तैसे ही मोहनी कर्मकी उपाधिके कारण आत्मामें रागादिक भावोंका परिणमन दीखता है। सो इन रागादि विभावोंको विकार रहित शुद्धात्माकी अनुभूतिके बलसे आत्मासे पृथक किया जा सका है। तथा पूर्व गाथामें जो यह कहा था कि आठ काठके संयोगसे जैसे खाट होती है ऐसे ही आठ कौके संयोगसे ही जीव होता है सो वात भी उचित नहीं है क्योंकि आठ कम्मौके संयोगसे भिन्न शुद्ध जीव है यह अनुमानका पक्ष है जिसका दृष्टान्त सहित हेतु यह है कि आठ काठकी खाटसे सोनेवाला पुरुष भिन्न है तैसे आठ कमौके संयोगसे पृथक् शुद्ध बुद्ध एक स्वभावरूप इस जीवका अनुभव परम समाधिमें तिष्ठे हुए पुरुषों को होता है। जीव और देह बिलकुल भिन्न है इस बातको साधनेके लिये यह अनुमान करते हैं कि देह और आत्माका अत्यन्त भेद है यह अनुमानका पक्ष है। क्योंकि इन दोनोंका भिन्न २ लक्षण लखनमें आता है यह हेतु है जैसे जलका स्वभाव अग्निसे भिन्न है तैसी इन ::दोनोंमें भिन्नता है यह दृष्टान्त है । भावार्थ-किसी साध्य विषयको अनुमानद्वारा सिद्ध करनेके लिये पक्ष, हेतु और दृष्टान्तकी आवश्यक्ता होती है । जिम वातको सिद्ध करना हो सो पक्ष है। निस साधनसे उसको सिद्ध करे सो हेतु है और इस हेतुका दूसरे किसी पदार्थका 'उदाहरण देकर दृढ़ करना सो दृष्टान्त है । उपर इसी उपायसे रागादिकोंसे भिन्न शुद्ध जीव है व.जड़से मिलकर जीव नहीं होसका इन दो वातोंको सिद्ध किया है। अतएव इस वातका दृढ़ श्रद्धान करना योग्य है कि आत्मा देहादि पुद्गलोंसे सर्वथा भिन्न है, आत्मा चेतन है देह जड़ अचेतन है। आत्मा अपने प्रदेशोंसे अखंड है, देह खंड रूप है तथा क्रोधादि भाव आत्माके निन भाव नहीं हैं। यदि निज भाव हों तो इनके होते हुए आत्मा बलिष्ठ, व विचारवान, र शोमनीक मालुम पड़ें परंतु प्रत्यक्ष देखने व अनुभव करनेमें आता है कि क्रोधादि कशयोंका आवेश न अपनको. और न दूसरोंको रुचता है तथा क्रोधादिसे रहितपना अर्थात् : वीतराग व शांत होना अपनेको भी सुख प्रदान करता है, अपनी आत्माको बलवान बनाता है तथा .दुस- रोंको भी रुचिकर होता है । अतएव रागादि आत्माके स्वाभाविक भाव नहीं है किन्तु उसमें शुद्धता के कुछ हैं। निश्यसे यह आत्मा शुद्ध स्फटिकके समान व खुद सुवर्णक सहार ..
SHREEEEEERStoskaractery समयसार टीका। RAJADESCENASI GreenKA 1 शुद्ध वीतराग ज्ञानानंद स्वरूप है। अतएव निन जीय व्यका ऐसा ही निश्चय, ज्ञान और अनुभव इस स्वहितवांछक जीवके लिये कार्यकारी है। इस कारण सर्व रागादि भावको हेव जान निज वीतराग शुद्ध परिणतिकी ही भावना करनी योग्य है । इस तरह पूर्व पलके खंडनको गाया पूर्ण हुई ॥ ४९॥ आगे शिप्यने प्रश्न किया कि यह रागादि भाव चैतन्य स्वरूपों प्रतिमासमान होते है य चैतन्य रूप है ऐसे मालूम पड़ते हैं तब यह रागादि अध्ययमान पुलो स्वभाव कैसे हो सक्ते है तिसका समाधान आचार्य कहते हैं:- गाथा:-अहविहं पिय कम्म, सव्व पुग्गलमये जिणा विति। जस्स फलं तं युवदि, दुक्खति विपजनाणस्व ॥५०॥ संस्कृतार्थ:-अष्टविधिमपि कर्म, सर्व पुदलमयं जिना युवति । यस्य फलं तदुच्यते, दुःखमिति विपच्चमाणस्य !! ५०॥ सामान्यार्थ---वह आठों प्रकारके ही कर्म सर्व पदलाई हैं ऐसा श्री मिन कहते हैं तथा तिस उदयमें प्राप्त कर्मका फल भी दुःख रूप है एसा कहा गया है। शब्दार्थ सहित विशेपार्थ-(जिणा) श्री जिन वीतराग सर्वज्ञ भगवान (सम्बं) सर्व (अह विहं पिय) आठ प्रकारके ही (कम्म) ज्ञानावरणादि द्रव्य कर्माको (पुगलमयं) पुदल. मय जड़ स्वरूप हैं ऐसा (विति) कहते हैं तथा (जम्स) तिस (पच्चमानस्स) उयमें प्राप्त कर्मोका (फलं) फल (तं) सो जगतप्रसिद्ध (दुक्खंति ) व्याकुलताके स्वभाव रूप होनसे दुःख रूप है ऐसा (बुच्चदि) कहा गया है। यहां यह तात्पर्य है कि आठ प्रकार पुद्गलमई द्रव्य- कर्मका कार्य दुःख उत्पन्न करना है जिसका लक्षण आकुलता रूप है तथा जो परमार्थ निश्चय आत्मिक सुखसे विलक्षण अर्थात् भिन्न है और जो भाकुलताको उत्सम भी करता है । क्यों- कि रागद्वेषादिक भी आकुलताके उत्पन्न करनेवाले हैं इससे दुःख लक्षण स्वरूप हैं इस. कारण युद्गलके कार्य हैं तिसकारण शुद्धनिश्चयनयकी अपेक्षा यह रागादिक पल मई ऐसा जानना । भावार्थ-कारणके अनुसार कार्य होता है इस कारण रागादिक पुद्गल मई हैं क्योंकि आठ प्रकार जो पुदल मई कर्म तिनके उदयमें आकर पकनेसे ही यह आत्मामें :: उत्पन्न होते हैं। शुद्ध मोहकमरहित आत्मामें यह रागादिक कदापि उत्पन्न नहीं होते। इसलिये शुद्ध निश्चय नय जो शुद्ध स्वरूपको कहनेवाली है उसकी अपेक्षा यह रागादिक आत्माके निजस्वाभाविक भाव नहीं हैं पुद्गलकर्म जनित विकार हैं इसलिये शुद्ध निश्चयसे पौद्गलिक कहे जाते हैं । यद्यपि अशुद्ध निश्चय नयसे इन रागादिकोंको अशुद्ध जीवके भाव हैं ऐसा कहते हैं क्योंकि केवल पुद्गलमें जैसे स्पर्श, रस, गंध, वर्णकी अवस्थाएं दीखती हैं तैसे रागादिक नहीं दीखते। ऐसे ही केवल शुद्धात्मामें भी इनका पता नहीं लगता है । जीव और पुदल कर्मका 1 समयसार टीका। ४५ एक क्षेत्रावगाह रूप सम्बन्ध होनेके कारण अशुद्ध आत्मामें ही मोहनीय कर्मके पचनेसे ही यह रागादिक भाव पैदा होते हैं इस कारण यहां आचार्यने पुद्गलमई इनको कहा है। जैसे स्फटिक मणिमें हरे डाकका सम्बन्ध होनेसे ही हरीक्रान्तिकी चमक स्फटिझमें प्रगट होनेसे यह हरा पत्यर है ऐसा कहा जाता है । यह हरापन वास्तवमें देखो तो हरी डाकके निमित्तसे ही पैदा हुआ है। इस लिये शुद्ध निश्चयसे यह हरापन डाकका है और वह फटिक मणि हरापन रहित वेत- क्रान्तियुक्त है । परन्तु अशुद्ध निश्चयसे यह हरेपनका झलकाव अशुद्ध फटिक मणिका ही है क्योंकि फटिकके सिवाय अन्य क्रान्ति रहित श्वेत काठके टुकड़ेके साथमें हरा डाक लगाने पर भी वह श्वेत काठ हरे रूप परिणमन नहीं करता। ऐसा ही रागद्वेपादिकोंका हाल जानना । क्योंकि मुमुक्षु जीवका कार्य शुद्धात्माके स्वरूपकी प्राप्तिका है अतएव आचार्यने यह शिक्षा दी है कि इन रागादिकोंको अपना स्वभाव न समझके पर स्वरूप समझो और अपने शुद्ध आत्म स्वरूपका अनुभव करो। इसी प्रयत्नसे ही यह आत्मा अपनी शुद्धताको प्राप्त कर सक्ता है। इस तरह यह आठ कर्म द्रव्य पुद्गल ही हैं ऐसा कथन करते हुए गाथा समाप्त हुई ॥ ५१ ॥ अब यहां शिष्य प्रश्न करता है कि जब यह गगादिक अध्यक्सान पुद्गलके स्वभाव है तव अन्य अंघोंसे किस प्रकार इस जीवको अपने जीवत्यकी अपेक्षा रागी, द्वेषी या मोही कहा गया है इसका उत्तर आचार्य देते हैं:- गाथा:-यवहारस्त दरीलणमुक्देलो वणिो जिणवरोहिं । जीवा एदे सके अझदसाणादओ भावाः ॥ ५१॥ संस्कृतार्थ:-ज्यवहारस्य दर्शितं उपदेशो वर्णितो जिनवरैः । जीवा एते सर्वेऽवगनादयो भावाः ॥ ५१ ॥ सामान्यार्थ---यह सर्व रागादि अध्यवसानमई भाव जीव हैं ऐसा श्री जिनेन्द्रने जो उपदेश वर्णन किया है सो व्यवहारनयसे स्वरूप दिखाया गया है ! शब्दार्थ सहित विशेषार्थ--(एदे ) यह (सव्वे ) सब ( अन्झवसाणादयो) रागादि अध्यवसानादिक (भावाः) भाव अर्थात् परिणाम ( जीवा ) जीव स्वरून हैं या जीव हैं। यह ( उवदेसो) उपदेश (जिणवरेहिं ) श्री जिनेन्द्र देवोंके द्वारा जो ( वण्णिदो) वर्णन किया गया है सो ( ववहारस्स ) व्यवहारलयका स्वरूप है या व्यवहार रयते ऐसा (दरीसणे) दिखलाया गया है । यद्यपि यह व्यवहारनय बाह्य द्रव्यको आलंबन करनेवाली होनेसे अभूतार्थ है व असत्यार्थ है तथापि रागद्वेषादि बाह्य द्रव्योंके आलंबन रहित विशुद्ध ज्ञान दर्शनमई स्व- भावके आलंबन सहित जो परमार्थ अर्थात् निश्चय स्वरूप तिमको कथन करनेवाली होनेक हेतुसे इसका दिखलाना उचित होता है । क्योंकि जब व्यवहार नय नहीं मानी जाती है तब शुद्ध निश्चय नयसे त्रय और स्शार आदि जीवोंके मेद नहीं होसके तत्र सर्व ही जीव एक स्वर - RANAMAVALURALAKEnerBRUARY ४६ समयसार टीका। शुद्ध अविनाशी एकान्तसे समझे जायंगे ऐमा मानकर जगतके जन शंका रहित होकर उनका मर्दन अर्थात् नाश करने लगे . चाहे जिसका नाश करेंगे कोई भेद नहीं रहेगा। तथा व्यवहार नय न माननेसे पुप्य रूप धर्मका अभाव हो जायगा एक वृपा तो यह होगा । नया इसी प्रकार जब पहले यह कहा गया है कि यह भीर शुद्ध न्यसे राग द्वेप व मोह रहित है इसी वातको एकान्तसे मान लेनपर मोक्षके लिये अनुष्ठान अर्थात् यत्न कोई भी नहीं करेगा। जब मोक्षके लिये पुरुषार्थ ही न रहा तब मोशका ही अभाव हो नायगा । यह दूसरा दूपग हो जायगा । इस लिय व्यवहारनयका व्याख्यान करना उचित ही है ऐसा अभिप्राय समझना। भावार्थः-शुद्ध निश्चय नयस इस आत्माका जब शुद्ध ज्ञान दर्शनगई स्वभाव है तो, इस चातको अपनी श्रद्धामें नहीं रखता है उसको व्यवहार नयके द्वारा शुद्ध व अशुद्ध व स्वरूप व त्रस स्थावरादिक भेद व पुण्य पापादि कर्मोस आश्रव, बंध, संवर, निर्जरा आदिका स्वरूप समझना पड़ता है। तब वह अपने शुद्ध स्वभावकी प्रतीति कर सक्ता है । अतएव कथंचित व्यवहार नयसे यह रागादिक जी के हैं ऐसा कहा जाता है क्योंकि जीवके ही अशुद्ध परि- णाम हैं । ऐमा जानकर मुमुक्षु जीवको यह उचित है कि इस रागादि भावोंका होना अपनमें दोष समझकर व इनका करना अपना ही अपराध समझकर इनके त्यागकी भावना र और शुद्ध स्वरूपके अनुभवमें उपयोग रमावै ।। ५१ ॥ आगे कित्त हटान्तसे यह व्यवहार प्रवर्तन करता है णे खुलासा परते हैं:- गाथा:नाया हु णिगदी तिष, एसो वलसमुदयस्स आदेखो। ववहारेण दु उच्चदि, तत्थेको जिग्गदो राया ॥ ५२ ॥ एमेवं य पवहारी अज्ज्ञ साणादि अण्णभावाणं । जीवोत्तिकदी सुत्ते तत्थेको णिच्छिदो जीवो ॥५३॥ संस्कृतार्थ:-राजा खलु निर्गत हत्येष उलसमुदयत्यादेशः । व्यवहारेण तून्यते तत्रैको निर्गतः राजा ॥ ५२ ।। एवमेव च व्यवहारोऽध्यबसानाद्यन्यधावानां । जीव इति कृतः सूत्र तत्रैको निश्चितो जीयः ।। ५३ ।। सामान्यार्थ-जैसे रामा प्रगटपने बाहर निकला ऐसा जो सेनाके समूहकै विर्षे कहा • जाता है सो व्यवहार नयसे है परन्तु निश्चयते वहा राना अपने अ.प एक ओला ही नि, ला है। इसी प्रकारसे ही रागादि अध्यवसानादिक स्वरूप जो अन्य भाव तिनका कर्ता जीव है ऐसा संवमें व्यक्क्षा मयसे कहा जाता है निश्चय तो वहां एक नीव पदार्थ जुदा ही है। opana ४७ increts समयसार टीका। शब्दार्थ महिन विशेषार्थ-(राया) कोई राजा मस) प्राटपने (णिगोत्तिय) निकल करके गया (एसो ऐ । (वलसनुदय-स) हाथी घोड़े आदिकी सेनाक समुदाय विर्षे (आइस.) आदेश अर्थात् वर्णन सो (वत्र, रणद्व व्यवहार नयस ही कहा जाता है। जैसे मार्गमें नाते हुए सेनाकं समूहको देखकर लोग ऐमा कहते हैं कि अनुक राजा अनी सेनाको पांच योजनमें व्याप्त करके ले गया सो यह कथन व्यवहार नयस कहा जाता है अर्थात् सेनाको राना कहना व्यवहार नयसे है निश्चयस विचार किया जाय तो म्हां राना एक अकेला है। भावार्थ-निश्चयसे राजाके बाहर जानको ही राना बहर निकला ऐना कह मक्ते हैं। (एमेव य) इमी प्रकारसे (ववहारो) यह व्यवहार है कि (अअवमाणादि अण्ण भावाण) गगादि अध्यवसायको लेकर शुद्ध जीवसे भिन्न सर्व पर्यायोंको (जीवात्तिकदी) जीवन किया है मुत्ते) ऐमा परमागममें कहा गया है। (णिच्छिद्रो) शुद्ध निश्चय नसे (तत्थेको तिन राग द्वेगादि भावकि मध्यमें एक अकेला (जीवो) भाव कर्म, द्रव्य कर्म और नो मै रहित शुद्ध.बुद्ध. एक स्वभावका धारी नीव पदार्थ ही है। भावार्थ-नाना और सेनाका परस्पर व्यवहार रहने सेनाको जात देखकर राना जाता है ऐसा कहने में आताहै। निश्चय विजाग जाय तो सेना और राजा भिन्न हैं। रानाको ही राजा रूप कहेंगे । इसी प्रकार जीव और रामादि भावका सम्बन्ध होने के कारण व्यवहारमे यह कहा जाता है कि यह जीव राग द्वेषादि विभव भवाका कर्ता है परन्तु शुद्ध निश्चयसे रागादि भावोंका इस आत्माके साथ सम्बन्ध नहीं है । अतएव उन रागादि भावोंक मध्यमें भी यह शुद्ध जीव पदार्थ मिन्न ही झलकता है जैसे सेनाके समूहमें राना भिन्न ही प्रकट होता है। ऐसा जानकर राग द्वेषादि मावोंको पर रूप मान छोड़ देना चाहिये और एक शुद्ध आत्म स्वरूपको ही परम उपादेय मान गृहण करना चाहिये। इस तरह व्यवहार नयको समर्थन करते हुए ३ गाथाएं पूर्ण हुई। तथा अनीवाधिकारके मध्यमें शुद्ध निश्चयनयसे यह देह व रागादि भाव द अन्य पर द्रव्य इस जीवका स्वरूप नहीं हैं ऐसे कपनकी मुख्यता करके २० गाथाओंने प्रथन अंतराधिकार व्याख्यान किया गया । आगे वर्ण, रस, गंध आदि जो पुलका स्वरूप है उससे रहित अनंत ज्ञानादि गुणोंकि स्वरूपको रखनेवाला यह आना शुद्ध जीव पदार्थ सो ही आदेय. है इस मावनाकी मुख्यता करके १२ गाथाभों तक व्याख्यान करते हैं। तिनमें १२ गाथाओंके मध्य में परम सामायिककी भावनामें परणमन करता हुभा अभेद स्नत्रय लक्षण जो निर्विकार समाधि उनकी तल्लीन. तासे उत्पन्न हुआ जो परमानंद मई मुखमा एक साम्य रसा भाव तिसमें परणमन करता जो शुद्ध जीव सो ही उपादेय है। इस कथनकी नुख्यता करके (अरस मरूव) इत्यादि सूत्र गाया एक है। आगे अंतरंगमें रागादिक भाव और बहिगमें वादिक इन जीवका शुद्ध स्वरूप नहीं है । इस ही गाथा सूत्रका विशेष वर्णन करनेके लिये "जीवस्त णस्थि वयो" इत्यादि समयसार टीका। MesseskAGRAAtatemember . -- सूत्र छः हैं । तिसके पीछे यही रागादिक भाव तया वर्णादिक व्यवहार करके जीवके हैं परंतु शुद्ध निश्चय नय करके नहीं हैं ऐसे परस्पर अपेक्षा सहित दोनों नयोंका विवरण करनेके लिये " ववहारेण दु" इत्यादि सूत्र एक है । तिसके पीछे इन रागादिक भावोंका व्यवहार नयसे ही जीवके साथ दूध और पानीकी भांति संबंध है परन्तु निश्चयनयसे नहीं है ऐसा समर्थन करते हुए "एवं हियसंबंधो" इत्यादि सूत्र एक है । इसके आगे उस ही व्यवहार नयको फिर भी खुलासा,करनेके अर्थ दृष्टान्त दाष्ट्रान्तसे समर्थन करते हुए 'पंथे मुत्संतम् । इत्यादि गाथा तीन हैं । इस तरह द्वितीय स्थलमें समुदाय पातनिका पूर्ण हुई ॥ ५२-५३ ॥ अब इस ही का व्याख्यान करते हैं। आगे शिष्यने प्रश्न किया कि यदि निश्चयसे रागादिक रूप जीव नहीं है तो फिर किस प्रकार शुद्ध जीव उपादेय स्वरूप है अर्थात् ग्रहण करने योग्य है सो कहिये, तिसके उत्तरमें श्री आचार्य कहते हैं:- गाथा:--अरसमयमगंधं अन्दतं चेदणागुणमसाई । जाण अलिंगरगहण, जीवमणिविट्ट संहाणं ॥५४॥ संस्कृतार्थ:--अरसमरूपमगंधमव्यक्तं चेतनागुणमशब्दं । जानीहि अलिंगग्रहणं जीवमंनिर्दिष्टसंस्थान ।। ५४ ।। सामान्यार्थ-इस जीवको ऐसा जानो कि यह जीव रस, रूप, गंध, स्पर्श, शब्दसे रहित सुक्ष्म, चेतना गुणका धारी, किसी चिन्हसे नहीं ग्रहण करने योग्य तथा छ संस्थानोंसे रहित है। शब्दार्थ सहित विशेषार्थ-(अरसमरूवमगंध) निश्चय नय करके पंच प्रकार रस, ५ प्रकार वर्ण, दो प्रकार गंध तया आठ प्रकार स्पर्शसे रहित (नोट-गाया स्पर्शन न कहनेसे भी अर्थसे लेना योग्य है) (असई) तथा सात प्रकार शब्दसे रहित (अन्वत्त) मनमें प्राप्त काम क्रोधादि विकल्पोंका विषय न होने के कारणसे अव्यक्त अर्थात् सूक्ष्म (चेतणागुण) शुद्ध चैत- न्यगुणका धारी (अलिगग्गहणं) निश्चयनयसे स्वसंवेदन ज्ञानका विषय होनेके कारण किसी पुगलीक चिन्हसे नहीं जानने योग्य (अणिदिवसंठाणं, समचतुरस्त्रं संस्थान आदि शरीरके छ: प्रकारके आकारोंसे रहित (जीवम् ) जो शुद्ध जीव पदार्थ है उ-को (जाणम्) उपादेय रूप है ऐसा जानो। यहां यह तात्पर्य है कि शुद्ध निश्चय नयसे सर्व पुदल द्रव्य संबंधी वर्ण आदि गुण व शब्द आदि पर्याय तिनसे रहित व सर्व द्रव्येन्द्रिय और भावेन्द्रिय तथा मनमें रागादि वि. कन्स इनसे नहीं लखने योग्य, तथा धर्म द्रव्य, अधर्म द्रव्य, आकाश द्रव्य, काल द्रव्य व अपने सिवाय शेष सर्व जीव द्रव्य तिनसे भिन्न और अनंत ज्ञान, अनंत दर्शन, अनंत सुख, अनंतवीर्य का स्वामी जो कोई है सो ही शुद्ध आत्मा पदार्थ है जो सर्व पदार्थोमें व सर्व देशमें, कालो .
समयसार टीका। व ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि नाना वर्णके भिन्न २ भेदोंमें व मनुष्योंके सर्व मन, वचन, कायके व्यापारोंमें दुर्लभ है अर्थात् अप्राप्य है सो ही अपूर्व है सो ही उपादेय अर्थात् ग्रहण करने योग्य है ऐसा मान कर विकल्प रहित, मोहसे दूर कमौजनसे मुक्त जो निन शुद्धात्मा तिसकी समाधिमें लीन रहनेसे उत्पन्न जो सुखामृत रसका अनुभव सो ही हैं, लक्षण जिसका ऐमा जो पर्वतकी गुफाका गभारा उसमें तिटकर उपर्युक्त गुण विशुद्ध शुद्धात्मा सर्व तात्पर्यसे अर्थात निस तरह बने ध्यान करने योग्य है। इस प्रकार सूत्र गाथा पूर्ण हुई । भावार्थ-शुद्ध निश्चय नय ही ग्रहण करने योग्य है क्योंकि इस नयके ग्रहणमें बंधका अभाव और स्वरूप- का अनुभव है अतएव अपने ही जीवको शुद्ध निश्चय नयसे पुद्गलके गुण और पर्यायोंमे रहित, मंकल्पविकल्प व विषय कपायके झगड़ोंसे दूर, शुद्ध चैतन्यगुणसमूह तथा अन्य समस्त द्रव्योंसे स्वसत्ताको अपेक्षा भिन्न और अनंत ज्ञानादि गुणोंका समूह ऐसा विचार कर आत्मिक अनुभव करना योग्य है यही अनुभव परम सुखामृतका स्वाद प्रदान करता है और मुमुक्षु जीवको मोक्षके निकट ले जाता है। अतएव अनेक उपाय करके उसी स्वरूपका व्यान, मनन, चिन्तवन कर स्वरूप समाधिमें गुप्त होना योग्य है | व्यवहार नयसे बाह्य पर्वतकी गुफाके मध्य भागमें और निश्चयसे स्वात्मानुभवरूपी गुफाके भीतर तिष्ठकर निज सत्तासे निन शुद्धात्मरूपको निज शक्तिके द्वारा निन प्रकाशके अर्थ निजमें ही ध्याना योग्य है । यही पटकारककी एकता एकानेक स्वरूपको मनन कराकर अनेकान्तकी अनुपम छटाका उद्योत करती है और इस आत्माको परमात्मा वनाती चली जाती है ।। ५१ ॥ आगे कहते है कि बाघमें शरीरके वर्णादि और अभ्यंतरमें रागादिक विभाव भाव पुगल सम्बन्धी शुद्ध नियन्यसे जीवका स्वरूप नहीं है ऐसा प्रतिपाइन करते है- गाथाः-जीवस्त त्यि वण्णो णविगंधो णचि रसोणवि य फासो। णवि रुवं ण सरीरं णवि संठाणं ण संघदणं ॥ ५५ ॥ संस्कृतार्थ:-जीवस्य नास्ति वर्णो नापि गंधो नापि रसो नापि च स्पर्शः। नापि रूप न शरीरं नापि संस्थानं न नहननं ।। ५५ सामान्यार्थ-शुद्ध निश्चय करके इस जीवके न तो वर्ण है न गंध है न कोई रस है और न स्पर्श है न रूप है न शरीर है और न संस्थान न कोई संहनन है। शब्दार्थ सहित विशेषार्थ:-(जीवस्स) शुद्ध निश्चयनयसे इस जीवके (वण्णो) श्वेत रक्त आदि पांच वर्ण (गत्थि) नहीं है (णवि गंधो) न दो गंधों से कोई गंध है (गवि रसो) न खट्टा मीठा चड़पड़ा आदि पांच रस है (णविय फासो) और न ढंडा गरम आदि आठ प्रकार स्पर्श हैं। (णवि रूव) न कोई स्पर्श रस गंध वर्णवाली मूर्ति है (ण मरीरं) न औदारिक, वैक्रियिक. आहारक, तैनम, कार्माणमें से कोई शरीर है (णवि संठाण) न समचतुरम आदि छः मंम्धा- PANCENARROLANAVE . समयसार टीका। नों से कोई संस्थान है (ण संघदणं) और न बंचऋपम नाराच आदि छ: संहननोंमेंसे कोई संहनन है। यह वर्णादिक धर्म स्वभाव सो धर्मी जो शुद्ध निश्चयनयसे यह जीव उसके नहीं हैं यह साध्यधर्म है। धर्म और धर्मीके समुदायको पक्ष कहते हैं व आस्था, संधा व प्रतिज्ञा कहते है । इस वातके साधनके लिये हेतु यह है कि यह सर्व पुदगल द्रव्यके परिणाम हैं तथा शुद्धात्मानुभूतिसे भिन्न हैं। यहां इस व्याख्यानमें पक्ष व हेतु रूपमें दो अंगी अनुमान प्रमाण जानना योग्य है । भावार्थ-वर्ण रस गंध स्पर्श शरीर संस्थान व संहनन यह सर्व पुदूल द्रव्यके परिणाम हैं और शुद्धात्म स्वरूपसे सर्वथा मिन्न हैं अतः ये स्वभावशुद्ध ज्ञान दर्शक स्वभावधारी आत्माके नहीं हो सकते। ऐसा भले प्रकार निश्चय करके आत्माको स्वम्व- रूपमय ही ध्याना योग्य है ॥ ५५ ॥ फिर भी कहते है।- गाथाः-जीवस्त थि रागो वि दोसो णेच विजदे मोहो। णो पञ्चया ण कम्म णोकम्मं चावि से पत्थि ॥५६॥ संस्कृतार्थः-जीवस्य नास्ति रागो नापि देतो नैव विद्यते मोहः । नो प्रत्यया न कर्म नोकर्म चापि तस्य नाति ॥५६॥ सामान्यार्थ-शुद्ध निश्चयनयसे इस जीवके न तो राग है, न दोप है और न मोह, पाया जाता है, न आश्रवके कारण पंच भाव हैं न द्रव्यकर्म है और न इस जीवके कोई नोकर्म हैं शब्दार्थ सहित विशेषार्थ-(जीवस्स) शुद्ध निश्चयसे इस आत्म द्रव्यके (रागों) राग अर्थात् परद्रव्यमें प्रीति सो (णत्थि) नहीं है (णवि) न कोई (दोसों) परद्रव्यमें अप्रीति रूप दोष है (णेव) और न (मोहो) मोह अर्थात् गहलपना (विजदे) विद्यमान है (जो पच्चया) और न मिथ्यात्व, अविरत, प्रमाद, कषाय और योग रूप जो पांच प्रत्यय अर्थात् आश्रवके कारण हैं (ण कम्म) न ज्ञानावरणादि आठ प्रकार कर्मोकी प्रकृतियें व १४८ प्रकार उत्तर प्रकृतियें हैं । (णो कम्मं चावि) और इसी प्रकार औदारिक, वेक्रियिक, आहारक तीन शरीर तथा आहार, शरीर, इन्द्रिय, श्वासोश्वास, भाषा और मन.इन पर्याप्ति रूप जो नोकर्म वर्गणा सो (से) तिस शुद्ध जीवके (गस्थि) नहीं हैं। यह रागद्वेषादि शुद्ध जीवके नही हैं-कारण कि यह सर्व अवस्थाएं पुद्गल द्रव्यके परिणाम हैं और शुद्धात्माके अनुभवसे भिन्न हैं। भावार्थ-द्रव्य कर्म और नोकर्म तो पूर्ण रूपसे पुद्गल स्वरूप हैं ही परन्तु रागद्वेषादिक जो भावकर्म हैं सो भी पुद्गलमई हैं क्योंकि पुद्गलमई जो मोहनी कर्म उसके निमित्तसे ही आत्मामें झलकते हैं। निमित्त छूटने पर शुद्ध आत्माके स्वभावमें इनका रंच मात्र भी उदय नहीं है ऐसा जान सर्व कर्मोंसे रहित आत्माका अनुभव करना योग्य है ।। ५६ ।। आगे इसी जीवके स्वरूपको फिर स्पष्ट कहते हैं:
. SHRAVAR Harismere समयसार टीका। गाथाः जीवस्त पत्थि वग्गो ण वग्गणा गेय फड्ढया केई । णो अज्झप्पहाणा व य अणुभायठाणा वा ।। ५७।। संस्कृतार्थ:-जीवस्य नास्ति वर्गों न वर्गणा नैव स्पर्द्धकानि कानिचित् । नो अध्यवसानानि नैव चानुभागस्थानानि वा॥ ५७ ॥ सामान्यार्थ—इस जीवके न तो वर्ग हैं न वर्गणा हैं और न कोई स्पर्धक है न रागादि अव्यवसान हैं और न अनुभाग स्थान हैं । शब्दार्थ सहित विशेषाय :-(जीवस्स) शुद्ध निश्चयनयसे इस जीवके (वग्गो) वर्ग (गस्थि) नहीं हैं (ण वग्गणा) न वर्गणाएं हैं (णेय केई फड्ढया) और न कोई स्पर्द्धक हैं। परमाणुकी अविभाग परिच्छेदरूप शक्तिके समूह- को वर्ग कहते हैं, वर्गके समूहका नाम वर्गणा है, वर्गणाके समूहको स्पर्द्धक कहते हैं अथवा क्रम शक्तिकी क्रमसे विशेष वृद्धिको स्पर्द्धक कहते हैं। इन तीनोंका लक्षण अन्य शास्त्रमें ऐसा कहा है:-श्लोकः-वर्गः शक्तिसमूहोऽणोवहूनां वर्गणोदिता, वर्गणानां समूहस्तु स्पाईकं स्पर्द्धकाऽप- है। अर्थात् कर्मस्पर्द्धकोंके नाश करनेवालोंने अणुकीशक्ति समूहको वर्ग, वर्गों के समूहको वर्गणा और वर्गणाके समूहको स्पर्द्धक कहा है । (णो अझप्पट्ठाणा) न शुभ व अशुभ रागादि विकल्परूप अध्यवसान हैं ( णेवय अणुभागठाणा वा ) और न अनुभाग स्थान हैं। फल देते हुए कर्मोकी रसरूप शक्तिको अनुभाग कहते हैं लता अर्थात् बेल, दारु अर्थात् काठ, अस्थि अर्थात् हड्डी, और पाषाण समान कठोर इस तरह ज्ञानावर्णीय, दर्शनावर्णीय, मोहनीय और अंतराय इन चार घातिया कर्मोके अनुभाग स्थान कहे गए हैं, अर्थात् प्रत्येकके चार भेद हैं । नाम, गोत्र, आयु, वेदनीय जो चार अघातिया कर्म हैं उनमें शुभ और अशुभ दो भेद हैं । घातिया कर्म तो सव अशुभ अर्थात् पापरूप ही हैं । अघातियामें पुण्य और पाप रूप दो भेद हैं । तिनमें शुभ अघातिया कर्माका अनुभाग स्थान प्रत्येकका गुड़, खांड, शक्कर और अमृतके समान है, तथा अशुभ अघातिया कर्मोका अनुभाग स्थान प्रत्येक कर्मका नीम, कांज़ीर, विष, व हलाहल इस तरह अधिक २ कटुक रूप है । शुद्ध निक्षय नयकी अपेक्षासे विचार किये जानेपर यह कोई भी इस जीवके नहीं हैं, यद्यपि व्यवहारमें इन सर्वका सम्बन्ध इस जीवके है परन्तु निश्चयसे नहीं है क्योंकि यह सर्व पुद्गल द्रव्यका परिणमन है इससे शुद्धात्माकी अनुभूतिसे भिन्न है । भावार्थ-व्यवहारसे कम वर्गणाओंका सम्बन्ध इस जीवके साथ होनेसे यह जीव उनके उदयकालमें उनके नानाप्रकारके अनुभागको भोगता है और मोहनीय कमके निमित्तसे ही इस जीवमें रागद्वेष क्रोधादि विकल्प होते हैं परंतु जो शुद्ध स्वरूपको प्रतिपादन करनेवाली शुद्ध नय है उसकी अपेक्षासे इस जीवके स्वरूपकामनन किया जाय तो इसके साथ किसी भी पुद्गल व पुद्गल सम्बन्धी विकारका सम्बन्ध नहीं है यह तो निरंजन निर्विकार स्फटिकमणि समान परमशुद्ध शुद्ध ज्ञान, दर्शन, सुख और वीर्यका itutCEMiternet समयसार टीका। ARRIALORERNMURDExaran . ६२ धारक एक अद्भुत पदार्थ है । अतएव सर्व विकल्प जालोंसे मुंह मोड़, रागरूप फन्दोंको तोड़. निश्चल होकर निज शुद्ध आत्मतत्त्वका अनुभव ही करना योग्य है । यही अनुभव निज स्व- रूपके दिलासका परम उपाय है ॥ ५८ ॥ आगे इसी विपयको स्पष्ट करते है:- गाथाः-जीवस्स त्यि केई जोगट्टाणा ण बंधठाणा वा। णे वय उदयहाणा णो मग्गण हाणया केई ।। ५८॥ संस्कृतार्थ:-जीवस्य न संति कानिचिद्योगस्थानानि व बंधस्थानानि वा । नैव चोदयस्थानानि न मार्गणास्थानानि कानिचित् ।। ५८ ॥ सामान्यार्थ-इस शुद्ध जीवके न तो कोई योगस्थान हैं और न बंधस्थान हैं, न उदयस्थान हैं और न कोई मार्गणास्थान हैं । शब्दार्थ सहित विशेपार्थः-( जीवसस ) इस शुद्ध जीवके (केई ) कोई (जोगट्ठाणा ) वीर्यातरायके क्षयोपशमसे उत्पन्न तथा मन वचन कायकी वर्गणाके आलंबनसे कर्मोको ग्रहण करनेमें कारणरूप जो आत्माके प्रदेशोंका परिणमने अर्थात् हलन चलन रूप लक्षणको धारनेवाले जो योगस्थान सो (व) तथा (वंधठाणां वा) प्रकृति, स्थिति, अनुभाग, प्रदेशरूप चार प्रकार बंधस्थान (नत्थि) नहीं हैं। (णे वय) और न । (उदयट्ठाणा ) सुख दुःखके फलको अनुभव करानेरूप उदय स्थान हैं (णो) और न (केई) कोई ( मग्गणहाणया ) गति, इन्द्रिय, काय, योग, वेद, कपाय, ज्ञान, संयम, दर्शन, लेश्या, भव्य, सम्यक्त्व, संज्ञी, आहारक ऐसे चौदह मार्गणा स्थान हैं। ये सर्व ही स्थान शुद्ध निश्चय नयसे इस जीवके नहीं हैं क्योंकि ये सर्व पुद्गलद्रव्यके परिणाम रूप हैं. तथा शुद्धात्माकी 'अनुभूतिसे भिन्न हैं। भावार्थ-जब शुद्ध निश्चय नयसे इस आत्माके स्वरूपका अनुभव किया जाता है तो यही अनुभवमें आता है कि योगस्थान, बंधस्थान, उदयस्थान और मार्गणास्थान.. इस जीवमें नहीं हैं । यह सर्व स्थान पुद्गलं कर्मके सम्बन्धसे ही जीवके व्यवहार नयसे कहे जाते हैं ॥ २८॥ आगे फिर भी कहते है।. गाथाः-णो ठिदि बंधवाणा जीवस्स ण संकिलेसठाणा वा। णे विसोहिट्ठाणा णो संजमलविठाणा वा ॥ ५९॥ संस्कृतार्थ:-नो स्थितिबंघस्थानानि जीवस्य न संक्लशस्थानानि वा । मैव विशुद्धिस्थानानि नो संयमलब्धिस्थानानि वा ।। ५९ ॥ सामान्यार्थः---इस शुद्ध जीवके न तो स्थितिबंधके स्थान हैं, न संक्लेश स्थान हैं, न विशुद्धि स्थान हैं और न संयम लब्धि स्थान हैं | शब्दार्थ सहित विशेषार्थः-(नीवस्स) इस :. शुद्ध आत्माके (गो) न तो (ठिदिपंधट्टाणा) जीवके साथ किसी काल तक ठहरनेवालें स्थिति ३ T Siminarener समयसार टीका। बंधके स्थान हैं । जब कर्मोका बंध होता है तब उस कर्म बंधमें स्थिति पड़ती है जिसका कारण कषाय है सो उस बंधके कारण कषाय व स्थितिके स्थान ये सर्व ही इस आत्मामें नहीं हैं (ण वा) और न (संकिलेस ठाणा) कपायोंके तीव्र उदयसे पैदा हुए सक्लेशरूप तीव्र आत्त रौद्र परिणामके स्थान है (णे य) और न (विसोहिठाणा) कषायोंके मंद उदयसे पढ़ा हुए शुभ परिणामरूप विशुद्धि स्थान हैं (गो) तथा न (मंजमलन्हिठाणा) कपायोंकी ऋम क्रमसे हानि होने पर प्राप्त संयम लब्धि स्थान हैं। प्रत्याख्यानावरणी व संज्वलनकी ज्यों २ हानि होती है संयमकी प्राप्ति होने लगती है। इस तरह ये सर्व ही कषायोंके तीव्र व मन्द उदय व हानि सम्बन्धी भाव शुद्ध निश्चय नबसे इस जीवके नहीं है क्योंकि यह सर्व ही भाव पुद्गल द्रव्यके परिणमन खरूप हैं तथा शुद्धात्माके अनुभवसे भिन्न हैं । भावार्थ:-अशुद्ध आत्मामें ही कर्मका बंध होता है, दुःखमई परिणाम अशुभ भाव व सातारूप परिणाम शुभ- भाव व संयमकी प्राप्तिरूप परिणाम वैराग्य मिश्रित रागभाव आदि होते हैं। जव शुद्ध आत्म- स्वरूपका अनुभव किया जाता है तब इन भावोंका कहीं पतानहीं लगता । अत एव सर्व विकल्परूप भावोंको त्याग शुद्ध आत्मस्वरूपका अनुभव करना ही कार्यकारी है ॥ २९ ॥ आगे फिर भी कहते है:- गाथा:-णेव य जीवट्ठाणा ण गुणट्ठाणा य अस्थि जीवस्स। जेण दु एदे सव्वे पुग्गलदव्वस्स परिणामा ॥ ६० ॥ संस्कृतार्थ-नैव च जीवस्थानानि न गुणस्थानानि वा संति जीवस्य । येन तु एते सर्वे पुद्रलद्रव्यत्य परिणामाः ॥ ६ ॥ सामान्यार्थः-इस शुद्ध आत्माके न तो जीव समास हैं और न गुणस्थान हैं-ये सर्व ही पुदगल द्रव्यकी अवस्थाएँ हैं। शब्दार्थ सहित विशेषार्थः-(जीवम्म) शुद्धनिश्चय नयसे इस शुद्धात्माके (णेवय) न तो (जीवट्ठाणा)जीव समास स्थानहेंजीवसमास १४हैं जमा कि इस गाथामें कहा है:-"वादर सुहमे इंद्री विति चरिंदी असण्णिमण्णीणं। पञ्जत्तापजत्ता एवं ते चदमा होति " अर्थात् वादर एकेन्द्री, मूक्ष्म एकेन्द्री, द्वेन्द्री, केन्द्री, चौन्द्री, अमनीपंचेन्द्री, मनी- पंचेन्द्रीयह सातपर्याप्त और अपर्याप्त भेदसे १४ जीव ममास हैं। (णगुणट्ठाणा व अस्थि) और न मिथ्यादृष्टि, सासादन, मिश्र, अविरत सम्यक्त, देशविरत, प्रमत्त, अप्रमत्त, अपूर्वकरण, अनिवृत्तिकरण, मृत्मसापराय, उपशांतमोह, क्षीणमोह, सयोगकेवली, अयोगकेवली, ऐसे १४ गुणस्थान हैं । (जेण दु) कारण यह है कि (एदे सव्वे) यह सर्व वर्णको आदि ले गुणस्थानके अंत तक परिणाम शुद्ध निश्चय नयसे पुद्गल द्रव्यकी पर्याय अर्थात् अवस्थाएं हैं । तथा शुद्धात्माके अनुभवसे भिन्न हैं। यहां यह तात्पर्य है कि सिद्धान्तादि शास्त्रोंके विर्षे यह कहा गया है कि अशुद्ध पर्यायार्थिक नय करके अंतरंगमें होनेवाले रागादि भाव जीव - RDC Sw Rumarur समयसार टीका। ६४ हैं व वाह्यमें शरीरके वर्णकी अपेक्षा वर्णादिरूप भी जीव हैं। यहां अध्यात्म शास्त्र विर्षे शुद्ध निश्चय नय करके यह सर्व ही पर जनित भाव निषेध किये गए हैं। दोनोंही ग्रन्थोंके वि नय विभागकी विवक्षासे कोई विरोध नहीं है। भावार्थ-शुद्ध निश्चय नय वस्तुके असली-शुद्ध स्वरूपको कहनेवाली है जबकि व्यवहार नय अन्यके निमित्तसे होनेवाली अवस्थाओंको कहनेवाली है। जैसे अशुद्ध सुवर्णकी डली शुद्ध निश्चयसे शुद्ध सुवर्ण मई है परन्तु व्यवहारमें अशुद्ध है उसी प्रकार शुद्ध निश्चय करके इस आत्मामें कमजनित सर्व ही भाव नहीं हैं केवल शुद्ध ज्ञाता दृष्टा आनन्दमय सिद्ध भगवानके समान निरंजन .. निर्विकार है । परन्तु अशुद्ध नय करके यह जीव नानाप्रकारकी अवस्थाओंको संसारअवस्थाम धारनेवाला है । प्रयोजन यह है कि मुमुक्षु जीवको इस आत्माक्री शुद्ध अवस्थाका अनुभव करके अपने आत्माको शुद्ध करना चाहिये । इस तरह वर्णादिका आत्मामें अभाव है ऐसा विशेष व्याख्यान करते हुए छ: मूत्र पूर्ण हुए ॥ ६ ॥ आगे पहले जो यह कह चुके हैं कि सिद्धान्त ग्रन्थमें यह बात कही है कि व्यवहारनय करके वर्णादिक इस जीवके हैं तथा यहां समय प्राभृत ग्रंथमें कहा है कि वे ही वर्णादिक निश्य- नयसे निषेधरूप हैं अर्थात् इस जीयके नहीं है। इस ही अर्थको दृढ़ करते है। गाथाः-चवहारेण दु एदे जीवस्स हवंति वण्णमादीया । गुणठाणंताभावा ण दु केई णिच्छयणयस्स ॥११॥ संस्कृतार्थः-व्यवहारेण त्वेते जीवत्य भवति वर्णाद्याः । गुणस्थानांताभावा: न तु केचिनिश्चयनयस्य ॥ ६१ ॥ सामान्यार्थ-वर्णसे ले गुणस्थान पर्यंत ये भाव व्यवहारनय करके जीवके कहे जाते हैं परन्तु निश्चयनय करके इनमेंसे कोई भी इस जीवके नहीं हैं। इस प्रकार निश्चय और व्यवहारको समर्थन करते हुए गाथा पूर्ण हुई ॥ ६१ ।। आगे शिष्यने प्रश्न किया, कि निश्चयनय करके इस जीवके वर्णादिक क्यों नहीं है जिसका उत्तर श्रीगुरु देते हैं । गाथा:-एदे हिय संबंधो जहेव खीरोदयं मुणेदव्यो। णय हुति तस्स ताणि दु उवओग गुणाधिगो जम्हा ॥२॥ संस्कृतार्थः एतैश्च संबंधो यथैव क्षीरोदकं मंतव्यः । न च भवंति तस्य तानि तूपयोगणाधिको यस्मात् ॥ ६२ ।। सामान्यार्थ:---इन वर्णादि अवस्थाओंका सम्बन्ध इस जीवसे दूध और जलके समान माननेयोग्य है इसलिये यह वर्णादि इस जीवके नहीं हो सकते क्योंकि यह आत्मा अपने उपयोगमई गुणोंसे परिपूर्ण है । शब्दार्थ सहित विशेषार्थ:-(एदेहिय) इन वर्णोशो आदि .
समयसार टीका।
८५
लेकर गुणस्थान पर्यंत पूर्वमें कही हुई पर्यायोंके साथ ( सम्बन्धो ) सम्बन्ध (खीरोदयं )
दूध और जलके मिलान (जहेव) के समान (मुणेढ़व्वो) मानने योग्य है। अग्नि और उप्णताका
जैसा तादात्म्य सम्बन्ध है तैसा सम्बन्ध इन वर्णादिक पर्यायोंका इस जीवके साथ नहीं है
कारण कि (ताणिदु) वे वर्णादिसे ले गुणस्थान पर्यंत भाव (तम्स) इस जीवके (ण य होंति )
नहीं हैं । शुद्ध निश्चय करके यह सर्व पर्यायें इस जीवकी नहीं हैं (जम्हा ) क्योंकि ( उव-
ओग गुणाधिगो) जैसे उक्त गुणसे परिपूर्ण अग्नि है उसी तरह केवलज्ञान और केवलदर्शन
गुणोंसे परिपूर्ण यह आत्मा है । भावार्थ-जब आत्म द्रव्यका वास्तविक स्वरूप अनुभवमें
लिया जाता है तो यही प्रगट होता है कि इस आत्माका अभेदरूप सम्बन्ध अपने शुद्ध गु-
णोंसे ही है । रागादि व वर्णादि रूप जीवकी अवस्था पुद्गल कर्मोदयके निमित्तमे होती
है । यहां शिप्यने शंका की कि वर्णादिक आत्माम बाह्य शरीरके देख पड़ने हैं इसलिये व्य-
वहार नय करके जैसे दूध और जलका संयोग सम्बन्ध है वैसा सम्बन्ध इस जीवके साथ होहु परन्तु
अभ्यंतरमें होनेवाले रागादि भावांका ऐसा संयोग सम्बन्ध नहीं हो सक्ता । इन रागादिकोंका
सम्बन्ध इस जीवके साथ अशुद्ध, निश्चय करके होना योग्य है। इसका समाधान आचार्य
करते हैं कि ऐसा नहीं है । द्रव्य कर्मोंका बंध जव इस जीवके साथ असदभूत व्यवहार
नय करके कहा जाता है तब इस अपेक्षासे तारतम्य बतलानेके लिये इन
रागादिकोंके सम्बन्धको अशुद्ध निश्चय कहते हैं। वास्तवमें तो शुद्ध निश्चयकी अपेक्षासे
अशुद्ध निश्चय भी व्यवहार स्वरूप ही है ऐसा भावार्थ जानना । भावार्थ-शुद्धनयकी
अपेक्षासे अशुद्ध सर्व नय व्यवहार नय है। शुद्ध नयका विषयभृन आत्मा पग्म वीतराग
ज्ञानानंद स्वरूप है । इस अपेक्षासे रागढपादि बिलकुल भिन्न हैं। इसीलिये दूध और जल
जैसे भिन्न २ हैं वैसे यह रागादिभाव और आत्मा भिन्न २ हैं ऐसा कहा गया है अतएव अपने
आत्माको परम शुद्ध अनुभव कर निजग्मपानमें तृप्त रहना योग्य है । यह भावार्थ है ॥३२॥
यहां शिष्यने शंका की कि ऐसा वर्णादि रहिन जीवका स्वरूप माननसे यह पुरुष कृष्णवर्ण या
यह धवलवर्ण है ऐसा जो व्यवहार है उसका विरोध प्राप्त होगा। इस प्रमर पूर्व
पक्ष करके व्यवहारका अविरोध दिखलाते है ऐसी यह एक पातनिका है। दूसरी
पातनिका यह है कि इस ही पूर्वोक्त व्यवहारक विरोधको लोकप्रसिद्ध
दृष्टान्तद्वारा परिहार करते है।
गाथाः-पंथे मुस्संतं पस्सिदृण लोगा भणंति ववहारी ।
मुस्सदि एसो पंथो णय पंथो सुस्सदे केई ॥ ६ ॥
तह जीवे कम्माणं णो कम्माणं च पस्सितुं वणं ।
जीवस्स एस वपणो जिणेहि ववहारदो उत्तो ॥ ६४॥
RECEMLAMELGUSTRIANSORENAVNAature . .. समयसार टीका। एवं रसगंधफासा संठाणादीय जे समुदिट्ठा । सव्वे ववहारस्त य णिच्छयदण्हू ववदिसंति ॥६५॥ संस्कृतार्थ:--पथि मुष्यमाणं दृष्ट्वा लोका भणति व्यवहारिणः । मुष्यते एष: पंथा न च पंथा मुप्यते कश्चित् ॥ ६३ ॥ तथा जीव कर्मणां च नोकर्मणां दृष्ट्वा वर्ण । जीवस्यैष वर्णो जिनैर्व्यवहारतः उक्तः ।। ६४ ॥ एवं गंधरसस्पर्श संस्थानादयः ये समुद्दिष्टाः । सर्व व्यवहारस्य च निश्चयदृष्टारो व्युपदिशति ॥ ६५ ॥ सामान्यार्थः-मार्गमें लुटते हुए धनवानको देखकर व्यवहारी लोग ऐसा कहते हैं कि यह मार्ग लुट रहा है, परन्तु वास्तवमें मार्गरूप आकाश लूटा नहीं जा सक्ता | तसे ही इस जीवमें कर्म और नोकर्मक वर्णको देखकर व्यवहार नयसे जिनेन्द्रोंने कहा है कि जीवका यह वर्ण है परन्तु निश्चयसे जीवका वर्ण नहीं हो सक्ता इसी प्रकार इस जीवके जो रस. गंध, स्पर्श, संस्थान, आदिक कहे गए हैं वे सर्व व्यवहार नयके अभिप्रायसे है ऐसा निश्चयके ज्ञाता कहते हैं। शब्दार्थ सहित विशेषार्थ-(पंथे ) रास्ते (मुस्संत ) लुटे जाते हुए धनवानको (पस्सिदूण) देखकरके (ववहारी लोगा) व्यवहारमें प्रवर्तन करनेवाले लोग (भणंति) कहते हैं कि ( एसोपंथो) यह मार्ग ( मुम्सदि) चोरोंके द्वारा लुट रहा है परन्तु (केई पंथो) कोई शुद्ध आकाश लक्षणको रखनेवाला मार्ग (णय मुस्सदे) नहीं लूटा जा सक्ता किन्तु रास्तेका आधार करके उसमें आधेयभूत ठहरनेवाले मनुप्य लूटे जा रहे हैं । (तह ) तैसे ही (जीवे ) जीवमें (कम्माणं णोकम्माणं) अष्ट कर्म और नो कर्मोका ( वण्णं ) शुक्ल आदि वर्ण. देखकर (जीवस्स ) इस जीवका (एसवण्णो) यह शुक्ल आदि वर्ण है ऐसा (ववहारटो) व्य- वहार नयसे (जिणेहि ) जिनेन्द्र भगवानने (उत्तो) कहा है। (एवं) इस ही प्रकार (रस गंध फासा संठाणादीय) पांच रस दो गंध आठ स्पर्श छः संस्थान छःसंहनन रागद्वेपमोहादिक भाव (जे) जो ( समुदिट्ठा) पूर्वमें छ: गाथाओंडारा : कहे गए हैं (सव्वे ) वे सर्व ही (व्यवहारस्सय) व्यवहारनयके अभिप्रायसे हैं ऐसा (णिछयदण्हू) निश्चय स्वरूपके जानने- वाले ( ववदिसंति ) कहते हैं। इस तरह व्यवहारनयसे विरोध नहीं है । भावार्थ-पुद्गल- कर्मके सम्बन्धके निमित्तसे जो वर्णादि व गुणस्थानादि व रागद्वेषादिभाव इस आत्माके होते हैं ऐसा कहना व्यवहार नयसे यथार्थ है परन्तु निश्चयनयं जो वस्तुके असली स्वरूपको बतलाने- वाली है उसकी अपेक्षा विचार किया जाय तो यह सर्व ही भाव इस आत्माके नहीं हैं । यह आत्मा तो वास्तवमें परम शुद्ध वुद्ध ज्ञानानंद मई एक स्वभावका ही धारी है अतएव मुमुक्षु जीवको इसी स्वरूपका अनुभव कर अपने आत्माका कल्याण करना इष्ट है।
CHUNARISRORRos SURAUNDupremeerineetuRONMICA समयसार टीका। इसतरह दृष्टान्त और दृष्टान्त द्वारा व्यवहार नयको समर्थन करते हुए तीन गाथाएँ पूर्ण हुई ।। ६३-६४-६५॥ इस प्रकार शुद्ध जीव उपादेय है ऐसा प्रतिपादन करनेकी मुख्यता करके १२ गाथाओंमें दूसरा अंतर अधिकार व्याख्यान किया गया। इसके पश्चात् इस जीवके साथ निश्चय नयसे वर्णादिकोंका तादात्म्य संबंध अर्थात् एकमेकपनेका नहीं छूटनेवाला जैसा सम्बन्ध नहीं है इस बातको फिर भी दृढ़ करनेके लिये आठ गाथाओंमें व्याख्यान करते हैं। इनमेंमे पहले ही संसारी जीवका व्यवहार नयसे वर्णादिकोंके साथ तादात्म्य संबंध है । मुक्तावस्थामें नहीं है ऐसा बतलानेके अर्थ 'तत्थभवे' इत्यादि सूत्र एक है । इसके आगे यदि जीवका वर्णादिकोंके साथ तादात्म्य सम्बन्ध है ऐसा खोटा अभिप्राय रक्खा जावेगा तो इम जीवका ही अभाव हो जायगा ऐसा दोप प्राप्त होगा। इस बातको कहते हुए 'जीवो चेवहि' इत्यादि गाथाएँ तीन हैं। इसके आगे एकेन्द्रिय आदि १४ जीव समासोंका इस जीवके साथ शुद्ध निश्चय नय करके तादात्म्य सम्बन्ध नहीं है इस वानके कहनेके लिये और वर्णादिकोंके साथ इस जीवका तादात्म्य सबन्ध निषेध करनेके लिये 'एकं च दोण्णि' इत्यादि गाथाएं तीन हैं। इसके आगे मियादृष्टि आदि १४ गुणस्थानों का भी इस जीवके साथ शुद्ध निश्चय करके तादात्म्य सम्बन्ध दूर करनेके लिये और अभ्यंतरमें होनेवाले रागादि मावोंका तादात्म्य सम्बन्ध निषेधकरनेके लिये 'मोहणकम्म' इत्यादि सूत्र एक है। इस तरह आठ गाथाओंके "द्वारा तीसरे स्थलमें समुदाय पातनिका पूर्ण हुई । आगे इसीका खुलासा व्याख्यान करते है:- शिध्यने प्रश्न किया कि इस जीवका वर्णादिकोंके साथ तादात्म्य सम्बन्ध अर्थात् एकरूप नहीं, छूटनेवाला सम्बन्ध किस प्रकारसे नहीं है सो कहिये, इसके उत्तग्में आचार्य कहते हैं। गाथाः-तत्थभवे जीवाणं संसारत्याणं होति वण्णादी। संसारपाकाणं णत्थि दु वण्णादओ केई ॥६६॥ संस्कृतार्थ:-तत्र भवे जीवानां संसारस्थानां भवति वर्णादयः । संसारममुक्तानां न संति खलु वर्णादयः केऽपि ॥ ६६ ॥ सामान्यार्थ:-इस संसारमें संसारी जीवोंके अशुद्ध नयसे वर्णादिक हैं परन्तु संसार रहित मुक्त जीवोंके यह वर्णादिक नहीं हैं। शब्दार्थ सहित विशेषार्थः-(तत्यभवे ) इस संसारके किसी भी विवक्षित अविवक्षित भवमें (संपारत्याणं) चार गतिरूप मेमा भ्रमण कानेगले (जीवाण) जीवोंक (वण्णादी) अशुद्ध नयसे यह वर्णादिक (होति) होते हैं (,) परन्तु (मंगर पमुक्काणं) संपारस रहिर मुक्त जीवोंके (केई) कोई मी (वण्णादओ) वर्णादिक (गरिय) नहीं हैं। क्योंकि जैसा तादात्म्य अर्थात् एकमेक सम्बन्ध ERSIRIGRISABEERUA GENROVINCRUAcreercoseOLAGAVAD समयसार टीका। पुद्गलके साथ वर्णादिकोंका है वैसा सम्वन्ध इस जीवके साथ वर्णादिकोंका नहीं है अथवा जैसे इस जीवका तादात्म्य सम्बन्ध केवल ज्ञानादि गुण और सिद्धत्व आदि पर्यायोंके साथमें है वैसा तादात्म्य सम्बन्ध इस जीवके साथ वर्णादिकोंका नहीं है अर्थात् अशुद्ध नय करके भी वर्णादिकोंके साथ जीवका तादात्म्य सम्बन्ध नहीं है.। भावार्थ-निश्चयसे जब इस आत्माके स्वरूपका अनुभव किया जाता है तब इस आत्माके न तो वर्णादि गुण हैं और न पर्याय हैं। अशुद्ध आत्मा कर्म सम्बन्धसे शरीर आदि पर द्रव्योंको ग्रहण करता है तब इसके वर्णादि हैं ऐसा कहने में आता है, इसलिये जीवका वर्णादिकोंके साथ छूट जानेवाला संयोग सम्बन्ध है परन्तु तादात्म्य सम्बन्ध नहीं है । ऐसा जान वर्णादि रहित शुद्ध आत्मतत्त्व ही अनुभव करने योग्य है । इस तरह वर्णादिकोंके साथ जीवका तादात्म्य सम्बन्ध नहीं है ऐसा निरूपण करते हुए गाथा पूर्ण हुई ॥ ६॥ आगे कहते है कि यदि कोई खोटा हठ करे कि इस जीवके साथ वर्णादिका तादात्म्य सम्बन्ध है तो क्या दोष प्राप्त होगा सो दिखलाते है। गाथाः-जीवो चेव हि एदे सव्वे भावत्ति मण्णसे जदि हि । जीवस्साजीवस्स य णत्थि विसेसो हि दे कोई ॥६७ ॥ संस्कृतार्थः-जीवश्चैव ह्येते सर्वे भावा इति मन्यसे यदि हि । जीवस्याजीवस्य च नास्ति विशेषस्तु ते कोऽपि ॥ ६७ ॥ सामान्यार्थः-यदि इन सर्व ही भावों में जीवको माना जायगा तब इस जीव और अनीवमें कोई भी भेद नहीं रहेगा। शब्दार्थ सहित विशेषार्थ-(जीवो ) यह जीव (चेव हि ) ही निश्चयसे (जदिहि) यदि ( एदे सम्वे भावत्ति ) इन सर्व वर्णादिक भावोंमें ( मण्णसे ) माना जायगा अर्थात् जैसे अनंतज्ञान अव्यावाध सुख आदि गुण ही जीव हैं तथा वर्णादि गुण ही पुद्गल हैं तैसे ही जीव यदि वर्णादिरूप समझ लिया जायगा ( दे ) तब ( जीवस्साजीवस्सय) विशुद्ध ज्ञानदर्शन स्वभावधारी जीव और जड़पना आदि लक्षणोंके धारी अजीवमें (विसेसो हि णत्थि) कोई मी निश्चयसे भेद नहीं रहेगा । और तब जीवका ही अभाव प्राप्त होजायगा-यह दूपण आवेगा । भावार्थ-यह वर्णादिसे ले गुणस्थान पर्यंत सर्व ही भाव निश्चयसे इस जीवके नहीं है । यदि इनका तादात्म्य सम्बन्ध इस जीवके साथ माना जायगा तो जीव और अजीव दोनों एक हो जावेंगे । सो यह बड़ा विरोध प्राप्त होगा। ऐसा हो नहीं सक्ता क्योंकि आत्मा कोत्कीर्ण ज्ञाता दृष्टा स्वभावका धारी है और अजीव जड़पना आदि भावोंका धारी है-जीवमें जड़पना इसीतरह संभव नहीं है जैसे अग्निमें शीतपन चा जलमें उष्णपना-ऐसा जान निन आत्माको परम शुद्ध ज्ञानदर्शनमई ही अनुभव करना योग्य है ॥ ६७ ॥ , ester REASRAEEEEEEE समयसार टीका आगे कहते है कि यदि कोई ऐसा दुराग्रह यानी हठ या खोटा अभिप्राय कर कि संसार अवस्थामें तो अवश्य इस जीवके साथ वर्णादिकोंका तादात्म्य सम्बन्ध है इसके लिये आचार्य कहते है कि यदि ऐसा मानोगे तो भी जीवका अभाव प्राप्त होजायगा। गाथाः-जदि संसारत्थाणं जीवाणं तुज्झ होंति वण्णादी। तम्हा संसारत्था जीवा रुवित्तमावण्णा ॥६८॥ एवं पोग्गलव्वं जीवो तह लक्खणेण मूढमदी। णिव्वाणमुवगदो वि य जीवत्तं पोग्गलो पत्तो ॥ ६९ ।। संस्कृतार्थ:-अथ संसारस्थानां जीवानां तव भवंति वर्णादयः । तस्मात्संसारस्था जीवा रूपित्वमापन्नाः ॥ ६८ ॥ एवं पुदलद्रव्यं जीवस्तथालक्षणेन मूढमते । निर्वाणमुपगतोऽपि च जीवत्वं पुद्गलः प्राप्तः ॥ ६९ ॥ सामान्यार्थ-यदि संसार में तिष्ठनेवाले जीवोंके तेरे मतसे वर्णादिक हैं तो संसारमें स्थित जीव रूपी हो जायेंगे । हे मूढमती ! ऐसा माननेसे तेरे अभिप्रायसे पुद्गल द्रव्य जीव हो गया । तब निर्वाणको प्राप्त होता हुआ भी पुद्गलको जीवपना प्राप्त हो गया। शब्दार्थ सहित भावार्थ:--(जदि ) यदि ( संसारत्याणं ) संसारमें स्थित ( जीवा- गं) जीवोंको ( तुत्झ ) तेरे एकान्त मतसे (वण्णादी ) यह पुगल सम्बन्धी वर्णादिक (होति) होते हैं ( तम्हा ) तब ऐसा माननेसे यह दूषण होगा कि (संसारत्याजीवा) यह संसारी जीव (रुवित्तम्) अमूर्त अनंत ज्ञानादि चतुष्टय स्वभावको त्यागकर सफेद कृष्णादि लक्षणमई रूपीपनेको (आवण्णा ) प्राप्त हो जायेंगे। ( मूढमदी ) हे मूढबुद्धी (एवं) इस तरह पूर्वोक्त प्रकार माननेसे कि यह जीव रूपी है (पोग्गल दवं) पुद्गल द्रव्य (जीवो) ही जीव ( तवलक्खणेण ) तेरे अभिप्रायसे हो जायगा । कोई दूसरा विशुद्ध चैतन्यका चमत्कार मात्र जीवन रहेगा । न केवल संसारअवस्थामें ही पुद्गल जीवपनेको प्राप्त हो जायगा तथा चैतन्य- मई कोई दूसरा जीव न रहेगा किन्तु ( णिन्वाणम् ) निर्वाण अवस्थाको ( उवगदो वि य) प्राप्त होते हुए भी ( पोग्गलो) यह पुदल ही ( जीवत्तं ) नीवरूप (पत्तो) हो जायगा। अन्य कोई चैतन्य स्वरूप जीव न रहेगा। कारण यह कि वर्णादिकोंका तादात्म्य सम्बन्ध पुद्गलद्रव्यके साथ है इस बातका किसी भी प्रकारसे निषेध नहीं किया जा सकता-जव वर्णादि पदलके हुए तब जीवका अभाव हो गया। और तब मोक्षको पानेवाला पुद्गलको कहना पड़ेगा, प्रयोजन यह है कि यदि संसार अवस्थामें एकान्तसे इस जीवके साथ वर्णादिकोंका तादात्म्य सम्बन्ध माना मायगा तो मोक्ष तत्व ही सिद्ध न होगा। क्योंकि मोक्ष उसीका नान है जहां इस आत्माके केवरज्ञानादि अनंत चतुष्टय नो शक्तिरूप थे सो व्यक्त अर्थात् प्रकाशित हो जावें मोक्षको ..
viewsweRANAVRATRIKARAN समयसार टीका। HAIRMANASAMACHA ही कार्य समयसार कहते हैं अर्थात् सिद्ध किया हुआ प्रकट शुद्धात्म स्वरूर कहते हैं। जब इस जीवको पुद्गलपना हो जायगा तब इसके मोक्षका होना संभव नहीं होगा | भावार्थ-संसार अवस्थामें भी वर्णादिकोंके साथ इस जीवका संयोग सम्बन्ध है न कि नादात्म्य सम्बन्ध। यदि पुद्गलके समान इस जीवका वर्णादिकोंके साथ एकरूप सम्बन्ध माना जायगा तब जीव स्वयं पुद्गल हो जायगा, जब जीवका ही अभाव हुआ तब उसको मोक्षका प्राप्त होना असंभव हो जायगा क्योंकि मोक्ष पर सम्बन्धसे छुटी हुई आत्माकी शुद्ध अवस्थाका नाम है । वर्णादि व ज्ञानावर.. णादिके साथ जब जीवका तादात्म्य सम्बन्ध होगा तत्र जी कभी भी इनसे मुक्त नहीं हो सकता। इस कारण यह मानना भूल है कि संसार अवस्थामें भी कभी इस जीवका और वर्गादि- का एकमेक सम्बन्ध है, इसलिये मुमुक्षु जीवको देहादि परद्रव्योंसे मोहत्याग अपने शुद्ध ज्ञा. नादि गुणोंके साथ अपने आस्माका तादात्म्य सम्बन्ध निश्चय कर निन शुद्ध स्वरूपकी ही भावना करनी योग्य है। इस प्रकार जीवके साथ वर्णादिकोंका तादात्म्य सम्बन्ध माननेसे इस जीवका अमान हो जावेगा ऐमा दोष दिखलाते हुए गाथाएं तीन समाप्त हुई ॥ ६८ ॥ ६९ ॥ आगे कहते हैं कि वादर व सूक्ष्म एकेन्द्रियको आदि लेकर संज्ञिपंचेन्द्रिय पर्यंत १४ जीव समास स्थान शुद्ध निश्चय नय करके इस जीवका स्वरूप नहीं है तथा तैसे ही देह सम्बन्धी वर्णादिक भी इस जीवका स्वरूप नहीं है । गाथा:--एकं च दोषिण तिष्णि य चत्तारि य पंच इंदिया जीवा। वादपजत्तिदा पयडीओ णामकम्मस्स ॥ ७० ॥ एदेहिय णिवत्ता जीवट्ठाणा दुकरणभूदाहिं । पयडीहिं पोग्गलमई हिं ताहिं कह भण्णदे जीवो ॥७॥ . संस्कृतार्थः-रकं वा द्वे त्रीणि च चत्वारि च पंचेंद्रियाणि जीवाः । वादरपोतराः प्रकृतयो नामकर्मणः ॥ ७० ॥'. एताभिश्च निवृत्तानि जीवस्थानानि करणभूताभिः । प्रकृतिभिः पुतुलमयीमिस्ताभिः कथं भण्यते जीवः ।। ७१ ॥ सामान्यार्थः-रकेन्द्रिय वादर व सूक्ष्म तथा दो, तीन, चार तथा पंचेन्द्रिय संज्ञी, असंज्ञी जीव पर्याप्त या अपर्याप्त यह सर्व नाम कर्मकी प्रकृतियां हैं। यह जीवोंके स्थान इन्हीं करणरूप पुलगयी प्रकृतियोंसे उत्पन्न हुए हैं तब इनको नीव कैसे कहा जा सका है। शब्दार्थ सहित विशेषार्थः-(एकंच) एकेन्द्रिय वाइर और सूक्ष्म (दोगि) द्वेन्द्रिय , तिण्णिय)तेन्द्रिय (चत्तारिय) चौइन्द्रिय (पंत्र इन्दियाजीवा)तथा पंचेन्द्रिय संज्ञी और असंज्ञी (वादर) बादर, यह सब सात हुए । यह सात (पज्जत्तिदरा) पर्याप्त और इतर यानी अपर्याप्त यह सर्व 200BCHAEntertekUMAALA समयसार टीका। ६१ १४ भेद (णामकम्मास ) नाम कर्म की (पयड़ीओ) प्रकृतियां हैं। (एदाहिय करण भूदाहि) इन्हीं करणरूप (पोग्गल मईहिं पयडीहिं ) वृद्गलाई प्रकृतियों करके जो प्रकृतियां अमूर्तिक और अतीन्द्रिय निरंजन परमात्म तत्वसे विलक्षण अर्थात् भिन्न लक्षणको रखनेवाली हैं (जीवठाणादु ) यह पूर्वोक्त १४ जीवस्यान (णिञ्चत्ता) उत्पन्न हुए हैं (ताहिं) तिन स्थानोंको (कह) किस तरह (जीवो ) जीव रूप हैं ऐसा (भण्णदे) कहा जाये । जैसे करणरूप चांदी धातुसे बनी हुई म्यान चांदी रूप ही रहेगी भीतर तलवारका सम्बन्ध होनेपर भी बदल नहीं सक्ती तैसे ही पुद्गलपई प्रकृतियोंसे यह जीवस्थान उत्पन्न हुए हैं इसलिये यह नीवस्थान भी पुद्गल स्वरूप ही हैं। जीवस्वरूप नहीं हो सक्ते, इसी प्रकार इन संसारी जीवोंके आश्रित वर्णादिक भी पुद्गल स्वरूप ही रहेंगे । कभी भी जीव स्वरूप नहीं हो सक्त यह अभिप्राय है । भावार्थ-निश्चय नय करके यह पुदल सम्बन्धसे होनेवाले सर्व ही भाव व परिणाम इस आत्माके नहीं हैं । आत्मा शुद्ध निश्चयसे शुद्ध ज्ञान दर्शन सुख आदि गुणोंका धारी और उन्हीं शुद्ध भावोंका कर्ता है अतएव सर्व विकल्पोंसे रहित होकर उसी शुद्ध आत्म स्वरूपका ही ध्यान करना योग्य है ॥ ७० ॥ ७१ ॥ आगे शिष्यन प्रश्न किया कि अन्य ग्रन्थमें पर्याप्त अपर्याप्त वादर और सूक्ष्म जीव कहे गए हैं उनकी सिद्धि किस प्रकार है ऐसा पूर्व पक्ष किये जाने पर आचार्य उत्तर करते है:- गायाः-पजत्तापजत्ता जे सुहुमा वादरा य जे चेव । देहस्स जीवसण्णा सुत्ते ववहारदो उत्ता ॥७२॥ संस्कृतार्थः-पर्याप्तापर्यासा ये सूक्ष्मा वादराश्च ये चैव। देहस्य जीवसंज्ञाः सूत्र व्यवहारतः उक्ताः॥ ७२ ॥ सामान्यार्थः-सूत्रमें व्यवहार नयसे जो पर्याप्त अपर्याप्त सूक्ष्म वादर जीव कहलाते हैं उनकी देहको जीव संज्ञा कही गई है। शब्दार्थ सहित विशेषार्थ-(जे) जो जीव (पज्जतापज्जता) पर्याप्त और अपर्याप्त (चेव) तैसे ही (सुहमावादरा य) सूक्ष्म और वादर कहे जाते हैं सो इसमें कोई दोष नहीं है क्योंकि (सुत्ते) सूत्र अर्थात् परमागममें (ववहारदो) व्यवहार नयसे (देहस्स) पर्याप्त तथा अपर्याप्त देहको देखकर पर्याप्त अपर्याप्त तया वादर और सूक्ष्म विलक्षण जो परम चैतन्य स्वरूप ज्योति मई शुद्धात्मा उससे मिन नो देह तिसको (जीवसन्ना) जीव ऐसी संज्ञा (उत्ता) कही गई है। भावार्थ:- वाहमें इन्द्रिय गोचर पुद्गल ही होता है । संसारी जीवोंके साथ द्रव्य कर्मरूप पुद्गलका सम्बन्ध है। उसके निमित्तसे यह जीव आहारक वर्गणाको ग्रहण करता है । ग्रहणके पश्चात कोई अपर्याप्त ही अवस्थामें प्राणान्त हो जाते हैं, अर्थात् अंतर्मतके भीतर ही आहारक वर्गणाओंको शरीर इन्द्रिय आदि रूप - समयसार टीका। - - ६२ परणामवनेकी शक्तिको न पाकर प्राणान्त हो जाते हैं। कोई पर्याप्ति पूर्ण करके पर्याप्त कहलाते हैं। कोई वादर शरीरवाले एकेन्द्रिय आदि वादर व कोई सुक्ष्म शरीरवाले एकेन्द्रिय सूक्ष्म कहलाते हैं । निश्चयसे यह शरीरकी ही अवस्थाएं हैं। जड़ रूप हैं। चतनरूप नहीं हैं। निश्चयक जीवसे भिन्न हैं। इनको जीवकी कहना केवल व्यवहार नयसे. है । अतएव जड़ कृत अवस्था- ओंको अपनी न जान उनसे विरक्त रहना ही कार्यकारी है। इस प्रकार जीवोंके स्थान व जीव स्थानोंके आश्रित जो वर्णादिक सो निश्चयसे इस जीवका स्वरूप नहीं है । ऐसा कथन करते हुए तीन गाथाएं पूर्ण हुई ।। ७२ ॥ आगे न केवल बाह्य प्रकट वर्णादिक ही शुद्ध निश्चयसे इस जीवका स्वरूप नहीं है किन्तु इस संसारी. जीवके: अभ्यंतर होनेवाले मिथ्यात्व आदि गुणस्थानरूप रागद्वेषादि भी इस जीवका स्वरूप नहीं है यह सिद्ध है इसीको कहते हैं:- गाथाः-मोहणकम्मस्सुया दु वण्णिदा जे इमे गुणहाणा। ते कह हवंति जीवा ते णिचमचेदणा उत्ता ॥ ७३ ॥ संस्कृतार्थः-मोहनकर्मण उदयात्तु वर्णितानि यानीमानि गुणस्थानानि । तानि कथं भवंति जीवा यानि नित्यमचेतनान्युक्तानि ॥ ७३ ।। सामान्यार्थः-मोहनीय. कर्भके उदयसे जो यह गुणस्थान कहे गए हैं वे किस प्रकारसे जीव हो सक्ते हैं क्योंकि यह सदा ही अचेतन हैं-शुद्ध चेतनासे भिन्न हैं । शब्दार्थ सहित विशेषार्थः--( मोहणकम्मसुदयादु ) मोह रहित परम चैतन्यके प्रकाशरूप लक्षणको रखने- वाले परमात्मतत्त्वसे प्रतिपक्षरूप अर्थात विरोधरूप अनादि अविद्यारूपी केलेके कंदरूप सन्तान- क्रमसे चला आया जो मोहकर्म उसके उदयके निमित्तसे (जे) जो (इमे. गुणट्ठाणा) ये गु. णस्थान (वण्णिदा) कहे गए हैं। (गुणसन्ना सात्र मोह जोगभवा-अर्थात् मोहकम और यो- गोंके निमित्तसे जो आत्माके भावोंकी अवस्था होती है उसको गुणस्थान कहते हैं। बारह गुणस्थान मोहकर्मकी अपेक्षासे और दो गुणस्थान योगकी अपेक्षासे हैं)। (ते )वे गुणस्थान (किह) कैसे (जीवा) जीवरूप (हवंति ) हो सक्ते हैं क्योंकि (जे) वे गुणस्थान (णिञ्चम्) नित्य ही (अचेदणा) अचेतन (उत्ता) कहे. गए हैं । यद्यपि अशुद्ध निश्चय नय करके यह गु. णस्थान चेतन हैं तथापि शुद्ध निश्चय नय करके यह सर्व ही भाव अचेतन हैं । यद्यपि द्रव्य. कोंकी अपेक्षासे अभ्यंतरमें होनेवाले रागादिकोंको चेतन हैं ऐसा मानते हैं तव उसकी अपे- क्षा अशुद्धः निश्चयको निश्चय नामसे कहते हैं तथापि शुद्ध. निश्चय नयकी अपेक्षासे यह अशुद्ध निश्चय व्यवहार ही है । यह न्याख्यान निश्चय ओर व्यवहानयके विचार कालमें सर्व ठिकाने जानना योग्य है । भावार्थ:--गुणस्थानों में जो जीवके परिणाम हैं उनमें निमित्त कारण पुद्गल कर्म हैं अतएव वे भाव इस आत्माके परम शुद्ध पारणामिक भाव नहीं हैं इस- SAKSEARRRRA समयसार टीका। ६३ लिये वे भाव शुद्ध चैतन्य भावोंसे विलक्षण हैं । ऐसा जान इन अवस्थाओंमें मोह-न कर परम शुद्ध ज्ञानानंदमय आत्मस्वरूपको ही अपना सत्यार्थरूप जान उसीमें ही तन्मय होना योग्य है, इसीसे ही इस जीवका हित है। इस तरह अभ्यंतरमें जैसा मिथ्यादृष्टि आदि गुणस्थान जीवका स्वरूप नहीं है तैसे रागादिक भी शुद्ध जीवका स्वरूप नहीं है ऐमा कथन करते हुए आठ गाथाएं पूर्ण हुई। इस तरह आठ गाथाओंमें तीसरे अंतर अधिकारका व्याख्यान किया गया । यहां शिष्यने शंका की कि रागादिक भाव जीवका स्वरूप नहीं है यह वात जीवाधि. कारमें कही जा चुकी है अब यहां अनीवाधिकारमें भी उपी ही वातका वर्णन है इसलिये पुनरुक्त दोष आता है। इसका आचार्या समाधान करते हैं कि इसमें कोई दोष नहीं है क्योंकि विस्तार रुचिसे जाननेके इच्छुक शिष्यके लिये नव अधिकारोंकेद्वारा समयसार अर्थात् शुद्धा- त्माका ही व्याख्यान किया गया है अन्य नहीं, इससे अपनी की हुई प्रतिज्ञाके वचनसे जीवाधिकारमें भी समयसारका व्याख्यान है और यहां अजीवाधिकारमें भी वही याख्यान है। यदि समयसारको त्यागकर अन्य किसीका व्याख्यान किया जाय तो प्रतिज्ञाका भंग हो इससे पुनरुक्त दोष नहीं है । अथवा यह समयसार ग्रंथ शुद्ध आत्माकी भावनारूप ग्रंथ है। जैसे कि समाधिशतक परमात्मप्रकाशादि ग्रंथ हैं। इन प्रन्थोंमें पुनरुक्तका दोष नहीं होता-जैसे रागी पुरुषोंके लिये श्रृंगार कथा वारवार रुचिकारी है तैसे वैरागी पुरुषोंके लिये शुद्ध वीतराग आत्माकी कथा परम रुचिकारी है । अथवा जीवाधिकारमें जीवकी मुख्यता है और यहां अजीवाधिकारमं अनीवकी मुख्यता है अथवा वहां सामान्य कथन है और यहां विशेष है अथवा वहां तो कहा है कि रागादिकोंसे भिन्न जीव है ऐसा विधिरूप कथन है। यहां कहा है कि रागादिक जीवका स्वरूप नहीं है ऐसा निषेधको मुख्यतासे व्याख्यान है। जैसे एकत्व भावना और अन्यत्त्व भावनामें विधि और निषेध रूप कथन है। इस प्रकार शंकाके पांच समाधान जानना योग्य है । इस प्रकार शुद्धात्मानुभव. रूप लक्षणधारी समयसारकी व्याख्या तात्पर्य वृत्तिके तीन स्थलोंके समुदायसे ३० गाथाओंके द्वारा अनीवाधिकार समाप्त हुआ । इस प्रकार जीव और अजीव, जीव अनीव अधिकार रूप रंगभूमिमें शृंगार किये हुए पात्रके समान व्यवहार नयसे एकीरूप करके प्रवेश हुए थे सो निश्चयसे श्रृंगार रहित पात्रके समान अलग २ होकर चले गए ॥ ७३ ।। कृतीयाधिकार। आगे कहते हैं कि पूर्वोक्त जीवाजीव अधिकारकी रंगभूमिमें जीव और अजीव दोनों ही यथपि शुद्ध निश्चय नय करके कर्ता कर्म भाव रहित है तो भी व्यवहार नयसे कर्ता कर्मके वेपसे शंगार किये - HERSNEHALVETORRHERE समयसार टीका। SIRSAGRAASHARAARReso हुए पांत्रके समान प्रवेश करते है इस प्रकार कथन दंडकोंको छोड़कर ७८ गायाओं पर्यंत नवं अंतर स्थलोंके द्वारा करते हैं इस तरह पुण्य पापकों आदि ले सात पदार्थोकी पीठिका रूपसे तीसरे अधिका. रकी समुदाय पातनिका हुई। आगे 'जो खलु संसारत्यो जीवो' इत्यादि तीन गांधाओंके द्वारा यह कथन है कि पुण्य पाप, आश्रय, बंध, संवर, निर्जरा और मोक्ष यह सात पदार्थ जीव और पुग़लक संयोगके परणमनसे 'उत्पन्न हुए हैं। शुद्ध निश्चय नयसे शुद्ध जीवका स्वरूप नहीं है । अर्थात् जैसा पंचास्तिकाय प्राभृतमें पहले संक्षेपसे व्याख्यान किया गया उसीको यहां प्रकट करनेके लिये पुण्य पाप आदि समस्त पदार्थोकी पीठिकाका समुदाय कथन या अभिप्राय कहा जाता है इस प्रकार दुसर्ग पांतनिका है। अब यहां प्रथम ही "यावण्ण वेदि विसेस तरं" इत्यादि गाथाको आदि करके पाठ क्रमसे छ: गाथा पर्यंत व्याख्यान करते है तिनमें दो गाथा अज्ञानी जीवको मुख्यता करके और गाथा चार सज्ञानी जीवकी मुख्यतासे कही जाती हैं। ऐसो प्रथमस्थलमें समुदाय पातनिका है। सो ही आगे कहते हैं कि क्रोधादि आश्रवोंका और शुद्धात्माका जवंतक भेद विज्ञानका जानपना इस जीवके नहीं है तब तक यह अज्ञानी है। गाथा:-जाव ण वेदि विसेसं तरं तु आदासवाण दोहंपि । अण्णाणी ताव दु सो कोधादिस्सु वदे जीवो ॥ ७४ ।। संस्कृतार्थः-यावन्न वेत्ति विशेषांतरं त्वात्म सवयोर्दयोरपि । अशानी तावत्स क्रोधादिषु वर्त्तते जीवः ॥ ७४ ।। सामान्यार्थ—जब तक यह जीव आत्मा और आश्रव दोनोंके ही विशेष मेदको नहीं जानता है तब तक यह अज्ञानी है और तब ही तक यह क्रोधादि मावों में वर्तन करता है ॥ ७४ ॥ शब्दार्थ सहित विशेषार्थः- (नाव) नत्र तक ( जीवो ) यह जीव ( आदा सवाण ) शुद्ध आत्मा और क्रोधादि स्वरूप इन ( दोहर्षि ) दोनोंका ही (विसेसंतरंतु - विशेष अन्तर यानी भेद विज्ञान ( णवैदि) नहीं जानता है। ( तावदु ) तब तक ( सो) सो जीव ( अण्णाणी ) अज्ञानी बहिरात्मा है तथा अज्ञानी रहकर ( कोधादिर) क्रोधादि भावों) विर्षे ( वदे ) वर्तन करता है । अर्थात् जैसे मैं ज्ञान स्वरूप हूं ऐसे विचारमें ज्ञानके साथ अभेद करके यह जीव वर्तन करता है तैसे ही क्रोधादि आश्रवसे रहित निर्मल आत्मानुभवरूपी "लक्षणको धरनेवाले अपने शुद्ध आत्मिक स्वभावसे भिन्नरूप क्रोधादि भावोंके भीतर भी मैं क्रोधरूप हूं ऐसे विचारमें क्रोध भावके साथ अभेदरूपसे परणमन करता है। भावार्थ-ज्ञान इस आत्माका निजरूप है, ज्ञानगुण है आत्मागुणी है। इन दोनोंकी कभी भिन्नता नहीं हों सकती, ज्ञानी जीव अपनी श्रद्धापूर्वक यही अनुभव करता है कि मैं ज्ञानस्वरूप ई ज्ञान मुझसे भिन्न नहीं है । तथा क्रोधादि मावोंके लिये ऐसी बुद्धि खता है कि वह भाव मेरे शुद्ध ज्ञानस्वरूपसे भिन्न औपाधिक भाव हैं-मुझसे भिन्न लक्षणवाले हैं । अज्ञानी जीवकी यही भूल है कि वह इन क्रोधादि भावोंको भी अपना निजभाव अनुभव करता है । उसको इनकी भिन्नताका श्रद्धान नही होता ॥ ७४ । आगे इस प्रकार क्रोधादिकोंके साथ अभेदरूपसे वर्तनकरते हुए क्या फल होता है सो कहते है :- ANA Swarava व समयसार टीका। ६५ कोधादिसु वदंतस्स तस्स कम्मस्स संचओ होदि । जीवस्वं बंधो भणिदो खलु सव्वदसीहिं ॥ ७९ ॥ -क्रोधादिषु वर्तमानस्य तस्य कर्मणः संचयो मवति । जीवश्यवं बंधो भणितः खलु सर्वदर्शिमिः || ७५ ॥ सामान्यार्थ:-क्रोधादि भावोंके विर्षे वर्तन करनेवाले जीवक काँका संनय होता | इस प्रकार जीवके साथ काँका बंध होता है ऐसा सर्व दर्शी केवली भगवानने कहा ||७६॥ शब्दार्थ महित विशेषार्थः-(कोषादिसु) उत्तम क्षमा आदि स्वरूपवारी परमात्मासे विलक्षण क्रोधादि भावोंके अन्दर (वढतस्प) प्रवर्तन करनेवाले (तस्स) इस जीवके कम्मस्स) परमात्म स्वरूपका आवरण करनेवाले कमौका (संचओ) आश्रत्र अर्थात् आगमन अथवा संत्रय (होदि) होता है । (जीवस्स) इस जीवके (एवं) इस प्रकार (बंधो) कर्म बंध होता है अर्थात् जैसे शरीर पर धूल उड़ करके आती है पीछे शरीर परके मैल आदि व तैलके सम्बन्ध करके शरीर पर जम जाती है तब शरीरके साथ मलका बंध हो जाता है इसी तरह प्रकृति, स्थिति अनुभाग, प्रदेश लक्षणमय बंध होता है जो कि अपने शुद्धात्माकी प्राप्तिस्वरूप मोक्षसे विल- क्षण है । ऐसा (खल) प्रकट रूपसे (पत्र इरिसीहि) सर्व दर्शी केवली भगवानने ( मणिदो) कहा है। भावार्थ-जैसे रास्ते चलनेवाले जीवके नंगे मुखपर धूला आता है और उस पर चिकनईके निमित्तसे जम जाता है । इसी तरह अशुद्ध आत्माकी योगशक्तिके निमित्तसे चहुं ओर भरी कर्मवर्गणाएं आती हैं और . कपायकी चिकनईके कारण आत्माके साथ कितने काल तकके लिये बंध जाती हैं। इसी क्रिया में चारों ही प्रकारका बंध हो जाता है । अर्थात मिन्न २ प्रकारके काँका बंध सो प्रकृति बंध है उनमें स्थिति होना कि अमुक काल तक आत्माकी सत्ता को न त्यागेंगे सो स्थिति बंध है। उनमें तीत्र या मन्द फल देनेकी शक्ति होना सो अनुभाग बंध है, कितनी वर्गणाएं किस २ कर्मरूप आकर बंधी इस विभागको प्रदेश बंध कहते हैं । यह वंध शुद्धात्म स्वरूपकी उपलब्धिका विरोधी है। यहां यह अभिप्राय है जब तक यह जीव क्रोधादि आश्रव भावोंसे भिन्न अपने शुद्ध आत्मस्वरूपको स्वसंवेदन ज्ञानके बलसे नहीं जानता है तब तक यह जीव अज्ञानी रहता है और अज्ञानी रहता हुआ अज्ञानसे प्रवर्तनेवाली जो कर्त्ता कर्मकी प्रवृत्ति उसको नहीं त्यागना है । इस कारण बंधको प्राप्त होता है । वंध होनसे संमार में परिभ्रमण करता है । भावार्थ- मिस बंधसे यह जीव मोक्षके. विरोधी संसारमें ग्लेशित हो नाना प्रकार मंताप सह उस बंधको त्यागने योग्य समझकर उससे व उसके कारणोंसे विरक्त रह अपने शुद्ध आत्मस्वरू रका अनु- • भव करना ही कार्यकारी है। ।
HORROMILTIMA EDIROMA ६६ समयसार टीका। इसतरह अज्ञानी जीवका स्वरूप कहते हुए दो गाथाएं पूर्ण हुई ॥ ७९ ॥ आगे प्रश्न करते है कि इस जीवके कव कर्ता कर्मकी प्रवृत्तिसे छुटकारा होगा। जिसके उत्तरमें आचार्य महाराज कहते है:- गाथाः जइया इमेण जीवेण अप्पणो आसवाण य तहेव । णादं होदि विसेसंतरं तु तया ॥ चंधी से ॥ ७६ ।। संस्कृतार्थः-यदानेन जीवेनात्मनः आस्रवाणां च तथैव । ज्ञातं भवति विशेषांतरं तु तदा न बंधरतस्य || ७६ ॥ सामान्यार्थ-जब इस जीवके द्वारा आत्मा और आश्रवों का भेदज्ञान जाना जाता है तब इस जीवके कर्म बंध नहीं होता । शब्दार्थ सहित विशेषार्थ-(नया) निसवक्त अर्थात् परम धर्मकी प्राप्तिके कालमें ( इमेण जीवेण ) इस प्रत्यक्षी भूत जीव करके (अप्पणो) शुद्ध आत्मस्वरूपका ( तहेव ) तथा ( आसवाणय ) क्रोधादि आश्रव भावोंका ( विसेसंतरंतु ) विशेष अंतर अर्थात् भेदविज्ञान (णादहोदि ) जाना जाता है ( तइया) तिस वक्त यह जीव सम्य- ग्ज्ञानी हो जाता है। सम्यग्ज्ञानी होकर इस कर्ता और कर्मकी प्रवृत्तिको त्यागता है। तत्र कर्ता कर्मकी प्रवृत्तिसे निवृत्त होनेपर और विकल्प रहित समाधिके लाम होनेपर (से) इस जीवके(णबंधो) कर्मका बंध नहीं होता है भावार्थ:-बंध राग व द्वेष सहित मन वचन कायकी प्रवृत्तिसे होता है जहां विकल्प रहित समाधि है वहां वीतरागता है। जहां वीतरागता है वहां कर्मका बंध नहीं है । ७६ ॥ आगे शिष्य यह पूर्व पक्ष करता है कि ज्ञान मात्र हीसे बंधका निरोध कैसे होता है । इसका उत्तर आचार्य इस भांति कहते है। गाथा:-णादूण आसवाणं असुचित्तं च विवरीयभावं च । दुक्खस्स कारणं ति य तदो णियत्तिं कुणदि जीवो ||७७॥ संस्कृतार्थ:-ज्ञात्वा आत्रवाणामशुचित्वं च विपरीतभावं च । दुःखस्य कारणानीति च ततो निवृत्तिं करोति जीवः ॥ ७७ ॥ सामान्यार्थः-क्रोधादि आश्रव भावोंका अशुचिरना, विपरीतपना तथा दुखोंके उत्पन्न करनेके लिये कारणपना जान करके यह सम्यग्ज्ञानी जीव इन सबसे छुटकारा करता है। शब्दार्थ सहित विशेषार्थ :-‘आसवाणं) क्रोधादि आश्रव सम्बन्धी (असुचित्त) कलुपता अर्थात् मलीनपना,(विपरीय भाव) उनका शुद्धआत्माकी चेतनासे विपरीतपना-जडपना(च)और (दुक्खकास कारणंतिया वे आकुलता लक्षण मयदुःखके उत्पन्न करनेवाले हैं (णाद्रूण) ऐसा जान करके तैसे ही अपनी आत्मा सम्बन्धी निर्मल आत्मानुभव रूपी शुचिपना, स्वभावसे ही शुद्ध अखंड केवले. ज्ञान रूप ज्ञातापना, तथा अनाकुलता लक्षणमय अनंत सुखपना पहचान करके ( तदो) फिर स्वसंवेदन ज्ञानके अनंतर सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान और सम्याचारित्र तीनोंकी एकाग्र परिणति - ..
eHimanisrisweainik समयसार टीका। PRSEAN ARVASNECESS ६७ रूप सामायिक भावमें स्थिर होकर (जीवो) यह जीव क्रोधादि आश्रवोंकी निवृत्ति करता है अर्थात् उनको दूर कर देता है । इसतरह ज्ञान मात्र भाव हीसे कर्मबंधका निरोध हो जाता है। ऐसा होनेपर यहां सांख्यादि मतोंका प्रवेश नहीं है । तात्पर्य यह है कि जो आत्मा और आश्रव.सम्बन्धी भेदविज्ञान है वह रागादि आश्रव मावोंसे निवृत्ति रूप है या नहीं । यदि निवृत्ति रूप है तब अवश्य उस भेदज्ञानके मध्यमें पानक यानी सरबतके समान अभेद नयसे वीतराग चारित्र और वीतराग सम्यक्त्व प्राप्त होते हैं। इसतरह सम्यग्ज्ञानसे ही बंधका निरोव होता है यह वात सिद्ध है। यदि कहो कि यह भेदज्ञान रागादि भावोंसे निवृत्त रूप नहीं है तब तो वह भेदज्ञान सम्यग्ज्ञान रूप ही नहीं है ऐसा जानना। भावार्थ-जैसे सरवतमें तीन या चार वस्तु मिली होती हैं तब ही वह सरवत या पानक कहलाता है सीतरह भदविज्ञा- नमें सम्यग्दर्शन और सम्यग्चारित्र गर्मित हैं विना इनके वीतराग भावरूप दृढ़ शृद्धा युक्त यथार्थ ज्ञान अर्थात मेदविज्ञान नहीं हो सक्ता और जब भावोंमें वीतरागता है तब अवश्य काँका बंध नहीं होगा इस अपेक्षासे यह बात कहनी युक्त हो सकी है कि ज्ञान मात्र हीसे बंध रुक जाता है। परंतु अन्य मतोंके समान इसका यह मतलब नहीं है कि केवल जान लेने हीस बंध रुक जायगा-जब तक ज्ञानके साथ राग और द्वेष हैं तब तक बंध अवश्य होय हीगा ऐसा जान रागद्वेषादि भावोंको त्याग निन आत्मज्ञानमें लीन होना योग्य है ॥ ७७ ॥ आगे कहते है कि किस प्रकारकी भावना करके यह आत्मा क्रोधादि भावोसे छूट जाता है। -अहमिको खलु सुद्धो य णिम्ममो णाणदेसणसमग्गो- तमि ठिदो तचित्तो सव्वे एदेवयं णेनि ॥७८ ॥ संस्कृतार्थः-अहमेकः खलु शुद्धश्च तिमतः ज्ञानदर्शनसमग्रः । तस्मिन् सितस्तचित्तः सर्वानतान् क्षयं नयामि ॥ ७८ ॥ सामान्यार्थ-मैं निश्चयसे एक हूं, शुद्ध हूं, ममत्व रहित हूं, ज्ञान दर्शनसे पूर्ण हूं। मैं अग्ने शुद्ध आत्मस्वरूपमें स्थित होता हुआ व उसीमें तन्मयी होता हुआ इन सर्व ही काम क्रोधादि आश्रव मावोंको नाश करता हूं । शब्दार्थ सहित विशेषार्थ-(अहं ) निश्चय नयसे स्वसंवेदन ज्ञानसे प्रत्यक्ष शुद्ध चैतन्य मात्र ज्योति स्वरूप जो मैं सो (एको ) अनादि अनंत टकोत्कीर्ण ज्ञायक एक स्वभाव रूप होनेसे एक हूं। तथा (खछु) स्फुट रूपसे (सुद्धाय) कर्ता, कर्म, करण, संप्रदान, अपादान, अधिकरण इन पटकारकों के विकल्प चक्रपे रहित होने के कारणसें शुद्ध हूं, (णिम्ममो) मोह रहित शुद्ध आत्मतत्वसे विलक्षण मोहके उदयसे उत्पन्न क्रोधादि कषाय चक्रका स्वामीपना न होनेके कारण ममत्व रहित हूं तथा (गाणदसणसमग्गो) प्रत्यक्ष प्रतिभासमय विशुद्ध ज्ञान और दर्शनसे परिपूर्ण हूं। इस प्रकार गुणों से विशिष्ट पदार्थ मैं हूं सो मैं (तमि ) तिस शुद्ध आत्म स्वरूपमें (डिदो) स्थित होता हुआ (तचितो) व गाथा:- - PHASIRSTARANGMAINALSURe សមស្រប ६८ समयसार टीका। 'तिस ही स्वरूपमें सहज आनंद मई एक लक्षणको रखनेवाले सुख मई समतां रसके साथ तन्मयी होता हुआ (एदे सब्ने ) आश्रव रहित परमात्म पदार्थसे भिन्न इन सर्व काम क्रोधादि आश्रा भावोंको ( खयं णेमि) विनाश करता हूं । भावार्थ-इस प्रकार अपने भावार्थ-इस प्रकार अपने शुद्ध स्वरूपकी भाषा करनेसे काम क्रोधादि भावोंका बल घटता है और शुद्ध आत्म भाव प्रकट होता है। अतएव सर्व विकल्पोंसे रहित होकर अपने शुद्ध स्वरूपकी ही भावना दृढ़ मन होकर करती योग्य है ।। ७८ ॥ आगे दिखलाते हैं कि जिस समयमें स्वसंवेदन ज्ञान होता है तिस ही समयमें रागादि आश्रयोले निवृत्ति होती है-इन दोनों कार्याका समान काल है। गाथा:-जीवणिघद्धा एदे अधुव अणिचा तहा असरणा य। दुक्खा दुक्खफलाणि य णादूण णियत्तदे तेसु ॥७९॥ संस्कृतार्थः-जीवनिवद्धा एते अध्रुवा अनित्यास्तथा अशरणाच । दुःखानि दुःखफलानि च ज्ञात्वा निवर्त्तते तेभ्यः ॥ ७९ ॥ सामान्यार्थ-जीवके साथ बंधरूप यह क्रोधादि आश्रवभाव क्षणिक हैं, विनाशीक हैं तथा अशरणरूप हैं तथा दुःखरूप और दुःखमई फलके कारण हैं ऐसा जान करके ज्ञानी जीव इन भावोंसे आनेको हटाता है। शब्दार्थ सहित विशेपार्थः-( एदे ) यह ऊपर कहे हुए क्रोधादि आश्रव (जीव णिबद्धा) इस जीवके साथ सम्बन्धरूप औपाधिक भाव हैं। उपाधि रहित स्फटिकके समान शुद्ध जीवके स्वभाव नहीं है । ( अधुवा ) 'बिजलीके चमत्कारके समान अध्रुव अर्थात् अत्यन्त ही क्षणिक हैं परंतु शुद्ध जीव ध्रुव है तथा यह क्रोधादिभाव (अणिञ्चा) शीतज्वर तथा उष्णज्वरके आवेश अर्थात् प्रकोपके समान अध्रुवपनेकी अपेक्षासे क्रमसे स्थिरताको प्राप्त नहीं होते हैं। अर्थात् जैसे कभी शीतज्वर व कमी उष्णचर होता है क्रम २ से वार २ होसकते हैं ऐसे ही यह भाव अनित्य अर्थात् विनाशिक हैं । परन्तु नित्य चैतन्यका चमत्कार मात्र एक शुद्ध नीव है ( तहा ) तथा ( असरणा य ) यह क्रोधादि भाव अशरण हैं अर्थात् तोत्र काम वेदना प्रकोपको जैसे बचाया नहीं जासकता ऐसे इनके प्रकोपको रोकना कठिन है । शरणरूप अर्थात् परम रक्षाकरनेवाला विकार रहित ज्ञानस्वरूप तो एक शुद्ध जीव ही है। और (दुरका ) यह काम क्रोधादि आश्रव दुःखरूप हैं अर्थात् आकुलताके उत्पन्न करनेवाले हैं परंतु अनाकुलतामय लक्षण स्वरूप होनेके कारण पारमार्थिक सुखरूप एक शुद्ध जीव ही है तथा ( दुक्ख फलाणिय ) आगामी नारकादि दुःखमय फलोंके कारण हैं इसलिये दुःख फेलम्वरूप हैं । वास्तवमें सुख मई फलस्वरूप शुद्ध जीव ही है । ( णादृग-) ऐसा जान करके (तेसु.) तिन आश्रव भावोंसे ज्ञानी जीव (णियत्तदे ) छूटता है । भेद विज्ञान होते ही यह जीव मिस क्षणमें इन मिथ्यात्व रागद्वेषादि आश्रव भावोंको ट्याग करके आश्रवोंसे इसतरह तो S .. समयसार टीका। छूट जाता है जैसे मेव पटल रहित सूर्य मंत्रोंके आच्छादनस छूट जाता है तिस ही क्षणमें 'यह नीव ज्ञानी होता है । इसलिये भेद ज्ञानके होनका और आश्रवस निवृत्त होनेका एक समान कालपना सिद्ध है । भावार्थ-निस समय आप्रवमई भावोंसे आत्माका परिणाम हटता है उसी समय यह जीव वीतरागता सहित सम्यग्ज्ञानका अनुभव करता है। अतएव क्रोधादि मावोंका त्याग करके निज स्वरूपको उपादेय मान उसी में तन्मयी होना कार्यकारी है। यहां शियन शंका की कि आपने पहले प्रतिज्ञा की है कि हम पुण्य पाप आदि सात पदा- योकी पीठिकाका व्याख्यान करेंगे परंतु यहां व्याख्यानमें मन्यग्ज्ञानी और अज्ञानी जीवका स्वरूप मुख्यतासे कहा गया तव यहां सप्त पदार्थोकी पीठिकाका व्याख्यान कैसे सिद्ध होता है। इसका ममाधान आचार्य करते हैं कि यह शंका युक्त नहीं है क्योंकि नीव और अजीव यदि नित्य एकांतपन अपरिणामी होवे तब तो दो ही पढ़ार्य जीव और अनींव रहगे कारण कि किसीका भी परिणमन न होगा तब वे दानों कूटस्य पड़े रहेंगे। यदि एकान्त काके परिणामी हो अर्थात् परस्पर परणमन करते हुए तन्मयी होजावे तब तो एक ही पदार्य रहेगा। सो ऐमा नहीं है। किन्तु कयंचित परिणामी हैं। कथंचित्का यह अर्थ है कि यद्यपि यह जीव शुद्ध निश्चय करके अपने स्वरूपको नहीं छोड़ता है तथापि व्यवहार करके कमाके उदयके वससे रागद्वेषादि उपाधिनई परिणामको ग्रहण करता है। यद्यपि रागद्वैपादि उपाधिमई परिणामको ग्रहण करता है तथापि अपने स्वरूपको नहीं त्यागता है जैसे स्फटिक पत्थर रंगविरंगी डाक आदिसे मिलने पर औपाधिक दीखता है तथापि अपन निर्मल स्वरूपका नहीं त्यागता है । इसप्रकार कयंचित् परिणामी होनेपर अज्ञानी वहिरात्मा मिच्यादृष्टी जीव विषय कपाय रूप अशुभोपयोगमई परिणामको करता है कदाचित् यही अज्ञानी जीव चिदानंद स्वरूप एक शुद्धात्म भावको त्यागकर आगामी भोगोंकी इच्छा स्वरूप निदान भावक मायमें शुभोपयोगलप परिणामको करता है अर्थात् दान पूना आदिके भाव करता है । जिस समय यह अज्ञानी जीव इन शुभ व अशुभ भावोंको करता है उस समय इस नीवमें द्रव्य और मावरूप पुण्य, पाप, आश्रव और बंध पढ़ार्योच्च कर्तापना सिद्ध होता है। इनमें जो भाव स्वरूप पुण्य, पाप आश्रव व पुण्य, पाप वंव हैं व तो इस जीवक परिणाम हैं और जो दन्य कार्मरूप पुण्य, पाप आश्रव और बंध हैं वे अनीव अर्थात् जड़ पुदल कर्म वर्गणाके परिणाम हैं। इस तरह आश्रव और बंध पदार्थकी सिद्धि हुई । तथा नो सम्यग्दृष्टी अन्तरात्मा ज्ञानी जीव है सो मुख्यतासे निश्चय रत्नत्रय स्वरूप शुद्धोपयोगके बलसें निश्चय चारित्रके साथ अविनाभावसे होनेवाला अर्थात् अवश्य होनेवाला जो वीतराग सम्यग्दर्शन तितका धारी होकर विम्यरहित समाविरूप परिणाम अर्थात परिणतिको करता है तब उस उस परिणामके द्वारा द्रव्य और मावरूप मंवर, निर्जरा और मोक्ष पदार्थोका कर्ता होता है । किमी ममय जब उम.मम्यादी ܝܟ .
७० समयसार टीका। जीवको निर्विकल्प समाधि भावकी प्राप्ति नहीं होती है तब विषय कषायोंको हटानेके वास्ते व शुद्धात्मभावनाका साधन करने के लिये त्यागरूप वुद्धि करके अपनी प्रसिद्धि, पूजा व लाम व भोर्गोकी इच्छारूप निदान बंधसे रहित होता हुआ शुद्धात्माके लक्षणको धारनेवाले श्री 'अरहंत और सिद्ध भगवान तथा शुद्धात्माके आगधन करनेवाले तथा शुद्धात्माके प्रतिपादन करने और साधन करनेवाले श्री आचार्य, उपाध्याय और साधुआंका गुण स्मरण आदि शुभोपयोग परिणामको करता है अर्थात् सम्यग्दृष्टी जीव केनल निमात्मानुभवरूप शुद्धात्म- भावनाको ही हृदयसे चाह कर करता है परन्तु जब अपने भाव शुद्धस्वरूपके अनुभवमें स्थिर रखनेको असमर्थ होता है तन लाचारीसे उसी भावनाकी प्राप्तिकी वांछा करके उसी भावनाके ऊपर पहुंचानेवाले अरहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय, और साधुओंकी भक्ति करता है । पंच पर- मेष्टीकी पूना आदि किसी संसारिक विषयवासनाके अर्थ नहीं करता है। इसी अर्थकी सिद्धिके लिये दृष्टान्त कहते हैं कि जैसे कोई देवदत्त नामका पुरुष, अपनी परदेशमें गई हुई स्त्रीके निमित्तसे अपनी स्त्रीके पाससे आए हुए पुरुषोंका सन्मान करता है, उनसे अपनी स्त्रीकी बात पूछता है तथा उनको स्वीकार करता है अर्थात् अपना मानता है उनसे स्नेह करता है तथा उनको दानादिक करता है । तैसे ही सम्यग्दृष्टी जीव भी शुद्धात्मस्वरूपकी प्राप्तिके निमित्त शुद्धात्माके आराधक, प्रतिपादक आचार्य उपाध्याय और साधुओंके गुणोंका स्मरण तथा उनको दानादिक स्वयं ही शुद्ध आत्माकी आराधनासे रहित होकर करता है। इस तरह अज्ञानी और सम्यग्ज्ञानी जीवका स्वरूप व्याख्यान करते हुए पुण्य तथा पाप आदि सात पदार्य जीव और पुद्गलके संयोगरूप परिणामके द्वारा उत्पन्न होते हैं। इस तरह पीठिकाका व्याख्यान सिद्ध होता है कोई विरोध नहीं है। इस तरह सम्यग्ज्ञानी जीवके व्याख्यानकी मुख्यता करके चार सूत्र पूर्ण हुए। इस तरह पुण्य पाप आदि सात पदार्थोके पीठिकाके अधिकारमें छ: गाथाओंसे पहले अंतर अधिकारका व्याख्यान किया गया। इसके पीछे यथाक्रपसे ग्यारह गाथाओं तक फिर भी सम्यग्ज्ञानी जीवका विशेष व्याख्यान करते हैं । तहां इन ११ गाथाओंके मध्यमें कम्मस्सय परिणाम' इत्यादि प्रथम गाथा है जिसमें यह कथन है कि यह जीव जैसे मिट्टी कलशको उपादान रूपसे करती है इस तरह निश्चयसे द्रव्य कर्म तथा नोकर्मको नहीं करता है ऐसा जानता हुआ जो कोई अपने शुद्ध आत्मस्वरूपको स्वसंवेदन ज्ञानके द्वारा अनुभव करता हैं वही ज्ञानी होता है । इसके पीछे यह जीव पुण्य पाप आदि परिणामोंको व्यवहारसे करता है निश्चयसे नहीं करता है इस बातकी मुख्यता करके 'कत्ता आदा' इत्यादि सूत्र एक है। आगे परिणामी स्वरूपपना ही कर्म पना है ऐसा तथा सुख दुःख आदि कोका फल है ऐसा आत्मा जानता हुआ भी उदयमें प्राप्त परद्रव्यको नहीं करता है ऐसा 'प्रतिपादन करते हुए 'गाविपरिणमदि' इत्यादि गाथाएं तीन हैं। तिसके पीछे पुद्गल ही समयसार टीका। ७१ LatestEnteARINEETARA वर्णादिक रूप अपने परिणामका कर्ता है जीवके ज्ञानादिरूप परिणामका कर्ता नहीं है ऐसा कथन करते हुए (गवि परिणमदि) इत्यादि सूत्र एक है । इस पीछे जीव और पद्लमें एक दूसरेके साथ निमित्त कर्त्तापना होते हुए भी परस्पर इन दोनों में उपादान कर्तापना नहीं है इस कथनकी मुल्यता करके 'जीव परिणाम' इत्यादि गाथा तीन हैं। इसके आगे निश्चयसे इस जीवका अपने परिणामों ही के साथ कर्म कर्म तथा भोक्ता भोग्य भाव है ऐमा कहते हुए 'णिय गयस्स' इत्यादि मूत्र एक है । इसके पीछे व्यवहार करके यह जीव पुदल काँका कर्ता तथा भोक्ता है ऐसा कथन करते हुए विवहारम्सदु' इत्यादि सूत्र एक है । इस प्रकार ज्ञानी जीव के विशेष व्याख्यानकी मुख्यता करकं ११ गाथाओंके द्वारा दुमरे स्थलमें समुदाय पातनिका पूर्ण हुई ।। ७९ ॥ अव इसीका व्याख्यान करते है- प्रथम ही इस प्रश्नका उतर देते हैं कि यह आत्मज्ञानी होता हुआ किस प्रकार अपने लक्ष्य में आता है अर्थात् पहचाना जाता है। गाथा:-कम्मरस य परिणाम णोकम्मरमय तहेव परिणामं । ण करेदि एदमादा जो जाणदि सौं हवदि णाणी ।।८०॥ संस्कृतार्थः-कर्मणध परिणाम नोकमणश्च तथैव परिणामं । न करोत्येनगात्मा यो जानाति स भवति ज्ञानी ।। ८ ।। सामान्यार्थ:-यह आत्मा न तो द्रव्य कर्म सम्बन्धी परिणामका और न नोकर्म सम्बन्धी परिणामको करता है। एमा जो जानता है वह ज्ञानी होता है । शब्दार्थ सहित विशेषार्थ:---(आदा) यह आत्मा (कम्मस्सय परिणाम) द्रव्य कर्म अर्थात ज्ञानावरणादिकों के परिणमनको (तहेव) तैसे ही (णोकम्मल्सर परिणाम) नोर्म अर्थात् शरीरादिकोंके परिण- मनको (णकरेदि नहीं करता है जैसे मिट्टी कलशको उपादानरूपसे करती है तैसे पुद्गलके उपादान कारणसे होते हुए द्रव्य कर्म तथा नोकर्मके परिणामको यह आत्मा निश्चयसे नहीं करता है (एदम्) ऐसा (नो) जो कोई (जाणदि) जानता है (सो णाणी) सो ज्ञानी (हवदि) होता है । अर्थात् वह सम्यक्ती जीव अपने शुद्ध आत्मस्वरूपको परमसमाधिके वलसे भावता हुआ ज्ञानी होता है। भावार्थ-ज्ञानी आत्माका यही लक्षण है जो अपने शुद्धआत्मस्वरूपकी भावना करै । द्रव्य कर्म व नोकौके नाना प्रकारके परिणामोंको अपने स्वरूपसे मिन्न अनुभव करै । जिस किसी जीवके अंतरंगकी ऐसा दशा हो जाय वही ज्ञानी है एमा जानना । ऐसे ज्ञानी जीवका लक्षण करते हुए गाथा पूर्ण हुई ॥ ८ ॥ आगे कहते है कि यह आत्मा पुण्य पाप आदि परिणामोंको व्यवहार नयसे करता है:- गाथा:-कत्ता आदा भणिदो णय कत्ता केण सोउवारण । भन्मादी परिणामे जो जाणदि सो हवदिणाणी ।। ८१।।
DIREEREMORIAN समयसार टीका। landsRLDrnmSMAURAVKI ७२ "संस्कृताधका आत्मा भणितः न च की केन स उपायेन । धर्मादीन् परिणामान् यो जानाति स भवति शानी ।। ८१ ॥ भामान्यार्थ-व्यवहार नयसे आत्मा पुण्यपापादि भावोंका को कहा गया है. परन्त सो आत्मा किसी भी उपायसे निश्चयनयसे इनका कर्ता नहीं है परंतु जो धर्म आदि भावाको जाननेवाला है। वही तानी आत्मा है । शब्दार्थ सहित विशेषार्थ:-(आदा) आत्मा (धन्मादी परिणामे) पुण्यपाप आदि कर्मासे होनेवाले औपाधिक भावोंका (कत्ता) करनेवाला (मणिदो) व्यवहार नयसे कहा गया है (सो) परंतु तो आत्मा (वेण उवाएण) किसी भी उपायस (णय कत्ता) निश्चयनयकी अपेक्षा इन रागादि भावोंका कर्ता नहीं है। (जो नागदि) जो. कोई अपनी प्रसिद्धि, पूजा, लाम आदि समस्त रागद्वेप विकरूपमई उपाधिसे रहित निज शुद्धात्माकी समाधिमें तिष्ठकर (माणदि) इनका स्वरूप जानता है (सो गाणी हवदि) सोनानी होता है। भावार्थ-अशुद्ध दशामें यह आत्मा कपायोंमें परिणमन करता हुभा नाना प्रकार शुभ तथा अशुभ कार्योंका करनेवाला होता है सो सर्व व्यवहार है। इस कारण व्यवहार नयसे कर्ता है परंतु यदि निश्चयनयसे इस आत्माका वास्तविक स्वरूप विचारा जाय तो यह आत्मा इन सर्व कपायमई भावोंका कर्ता नहीं है किन्तु ज्ञातादृष्टा ही है। ज्ञानी आत्मा वही है जो इन सर्व भावोंको अपने शुद्ध परिणमनसे भिन्न जानता हुआ उदासीन रहता है परंतु अपने आत्मानुभव- रूपी कार्यमें अति सावधान रहता हैं । इस प्रकार निश्चयनयसे अकर्ता और व्यवहारनयसे कर्ता है ऐसा कहते हुए गाथा पूर्ण हुई ॥ ८१ ॥ आगे कहते है कि पुद्गल कौको जानते हुए इस जीवका पुद्गलके साथ तादात्म्य सम्बन्ध नहीं है। • गाथा:~णवि परिणमदि ण गिण्हदि उप्पजदि ण परदव्यपजाए। णाणी जाणतो वि हु पुग्गलकम्म अणेय विहं ॥ ८२।। संस्कृतार्थः-नापि परिणमति न गृह्णात्युत्पद्यते न परद्रव्यपर्याय । ज्ञानी जानन्नपि खलु पुदलकानेकविधं ॥ ८२ ॥ सामान्यार्थः--ज्ञानी जीव अनेक प्रकार पुद्गल कम्मौको जानता हुआ मी पाद्रव्यकी अवस्थारूप न तो परिणमन करता है। न उसे ग्रहण करता है और न उस रूप उत्पन होता है । शब्दार्थ महित विशेषार्थः-( अणेय विहं ) अनेक प्रकार ( पोग्गल के ) कर्म वर्गणा योग्य पुद्गलमई उपादान कारणोंसे किये हुए नो मूल व उत्तर प्रकृतिरूप पुकर्म उनको (जाणतो विड) भिन्न २ तव तरहसे अपने श्रेष्ठ भेदज्ञानके द्वारा स्फुटरूपसे जानता हुभा. मी ( णाणी स्वामाविक आनंदमई एक स्वभावमय अपना शुद्धात्मा तथा रागद्वेषादि आश्रय इन दोनोंके भेदको अनुभव करनेवाला ज्ञानी जीव ( पर दवपज्जाए ) पर द्रव्यकी पर्यायरूप अर्थात कर्मरूप जैसे मिट्टी कलशरूपसे परणयन करती है इस तरह (णवि परिणमदि) नहीं Satreen समयसार टांका। परिणमन करता है ण पिण्हदिन निसरून तदात्म्य पनेसे में गृ . है (उप्पनदि) और न पडलमई आकार रूप उत्पन्न होता है क्योंकि जर मिट्टीना शके माय तादम्य संबंध है ऐम' बन्धन जीका बल बाँक जय नहा है। इस कारण यह बात सिद्ध हुई कि पहल कर्माको जानते हुए भी इस जीवका पद्दल कमांक माथ निश्च । नयसे कर्नाकर्मभाव नहीं है । भावार्थ-हरएक द्रव्य अपने ही स्वरूप हर परेणनन करता है, व अपनी ही अवस्याको गृहण करता है व अपने मन ही उत्पन्न होता है पतएव जावरणादि दृत्य कर्म का मूल कारण पुद्र ही है। ऐसे ही रागवादि मात्र याँका यद्यपि निमित्त कारण पृटल द्रव्य तथापि मूल कारण कर्म महिन आत्मा है क्योंकि शुद्धात्माके यह भाव नहीं होते । अतएव ज्ञानी जीव इन सर्व प्रकारके पुद्गलके सम्बन्धमे होते हुए भावोंको व पुद्गलकी अनेक अवस्था-'. ओंको भले प्रकार अपने स्वरूपमे भिन्न जानता है | जानकर पुद्गल कर्मोकी अवस्थाओंके साथ अपना निनका सम्बन्ध नहीं मानता हुआ उनसे दासीन रहता है परन्तु अपने स्वभाव मई शुद्ध ज्ञानानंद स्वरूपनें तन्मय रहनेका उद्यम करता हुआ सदा ही म्वाधीन मुम्वरूप तिष्ठकर अपने आत्मानुभवकी मुन्दर विभूतिका विलास करता है ।। ८२ ॥ भागे दिखलाते हैं कि अपने संकल्प विकल्प जालकर परिणामको जानते हुए इस जीवका उन परिणामोश निमित्त उद्यमें आए हुए क्रमांक साय तादात्न्य संबंध नहीं है । गाथाः-णवि परिणमदि ण गिहदि उप्पजदि ण परदव्य पजाये। णाणी जाणंतो विहु सगपरिणाम अणेय विहं ॥ ८३ ॥ संस्कृतार्थः-नार परिणमति न गृहात्युत्पद्यते न परद्रव्यपर्याय । ज्ञानी जानकीप खन्नु स्वकपरिणाममनेकविधन् ॥ ८॥ मामान्यार्थः--ज्ञानी जीव अपने अनेक प्रकारके परिणामोंको स्फुटरूपसे जानता हुआ भी परद्रव्यकी अवस्थारूप न परणमन करता है, न परद्रव्यकी अवस्थाको गृहण करता है और न परद्रव्यकी पर्यायरूप उत्पन्न होता है। शब्दार्थ सहित विशेषार्थः-(गाणी) विकारोंसे रहित स्वसंवेदन ज्ञानी जीव ( अणेय विहं ) अनेक प्रकारके (संग परिणाम) कर्मोंके क्षयोपशमसे उत्पन्न संकल्प विकल्परूप अपने उन परिणामांको जो उसने अपने ही उपादान कारणसे किये हैं (हु जाणतो वि ) अपने परमात्म स्वरूपके विशेष भेदज्ञान के बलसे प्रकटरूप जानता हुआ भी ( णावि परदव्व पञ्चाए परिणमदि ) शुद्ध निश्चय नयमे उस पुद्गल क्रमकी पर्यायरूप नहीं परिणमन करता है जिसके उड्यनें अनके निमित्तसे अपने ही संकल्प विकल्परूप परिणाम हुए हैं। जैसे मिट्टी स्वयं कलशरूप होजाती है । इसतरह यह आत्मा पुगलकी अवस्थारूप नहीं परिणमन करता, (ण गिनदि ) न तन्मई होकर उम पर्यायको गृहण करता है (ण :प्पनदि) और न पुगलकी पर्यायरूप उत्पन्न होता है क्यों- कि जैसे मिट्टीका कलशक साथ उपादान कारणपना ह वैसा उपादान कारण इस आत्माका ७४ EARGEROUNA समयसार टीका। पुद्गल कर्मके साथ परस्पर नहीं है । अर्थात् इस कथनसे यह बतलाया गया कि अपने ही क्षयोपशम सम्बन्धी भावोंके निमित्त कारण यह उदयमें आए हुए पुद्गल कर्म हैं ऐसा जानता हुआ भी इस ज्ञानी जीवका उस पुद्गल कर्मके साथ निश्चयसे कर्ता कर्म भाव नहीं है। न जीव उनका कर्ता है और न वे जीवके कर्म हैं दोनों अत्यन्तही भिन्न पदार्थ हैं। भावार्थ- यद्यपि उदयमें आए हुए नाना प्रकार ज्ञानावरण आदि कर्मोके कारण इस नीवके नाना प्रका- रके संकल्प विकल्प रूप, व रागद्वेष रूप व अहंकार ममकाररूप परिणाम होते हैं तो भी इन परिणामोंका उपादान कर्ता जीव है वैसे ही जो पुद्गल कर्म उदयमें आए हैं उनका भी उपादान कारण पुद्गल है, जीव और पुगलमें अपना २ परिणमन होता है। इनके परिणमनमें एक दूसरेके लिए निमित्त कारण है। जैसे घड़ेका उपादान कारण मिट्टी है वैसे पुद्गलकी अवस्थाका उपादान कारण पुद्गल है जीव नहीं है ऐसा जाननेवाला ज्ञानी जीव पुदल कर्मके साथ शुद्ध निश्चय नयसे अपना कर्ता कर्म भाव नहीं जोड़ता ।। ८३ ॥ आगे कहते है कि पुद्गल कमेंके फलोंको जानते हुए इस जीवका पुद्गल कोंक फलके निमित्तसे द्रव्यकमेंके साथ निश्चयसे कर्ता कर्म भाव नहीं है। गाथाः-वि परिणमदि ण गिदि उप्पजदि ण परदव्वपजाए। णाणी जाणतो विहु पुग्गलकम्मफलमणतं ।। ८४ ॥ संस्कृतार्थ-नापि परिणमति न गृह्णात्युग्द्यते न परद्रव्यपर्याये । ज्ञानी जाननांप खलु पुद्गलकर्मफलमनंतं ॥ ८४ ॥ सामान्यार्थः-ज्ञानी जीव पुद्गल कर्मोके अनंत सुख दुःख रूप फलोंको जानता हुआ भी पुद्गल कर्मकी पर्यायरूप न तो परिणमन करता है, न उसे गृहण करता है और न उसरूप उत्पन्न होता है। शब्दार्थ सहित विशेषार्थः-(गाणी) वीतराग शुद्ध आत्माके ज्ञानसे उत्पन्न जो सुखमई अमृत रस उसमें तृप्त हुआ भेद ज्ञानी आत्मा (पुग्गल कम्मफलं) उदयमें आए हुए द्रव्य कर्मरूप उपादान कारणसे किये हुए सुख दुःख रूप फलको (अणंत) जो कि शक्ति अपेक्षा अनंत हैं (हुनाणंतो वि) अपने निर्मल विवेकरूपी भेद ज्ञानके द्वारा स्पष्टपने जानता हुआ भी (णवि परिणमदि) वर्तमान सुख दुःख रूप शुद्ध निश्चय नयसे नहीं परिणमनकरता है, अर्थात् शक्ति रूपसे उदयमें आई हुई पर पर्याय रूप अर्थात् पुदल कर्म रूप जैसे मिट्टी कलश रूप परणमती है वैसे नहीं परणमता है (णा गिण्ह दि) न तन्मई होकर पुद्गलकी अवस्थाको गृहण करता है और ( उप्पजदिण पर दव्वपजाप) न पर द्रव्यकी पर्याय रूप उत्पन्न होता है। इसका कारण यह है कि जैसे मिट्टीका कलसके साथ तादात्म्य सम्बन्ध है ऐसा सम्बन्ध इस आत्माका स द्रव्य कर्मके साथ नहीं है। इसका विशेष यह है कि यदि पुद्गल कर्म रूपसे यह आत्मा नहीं परिणमन करता है, न उसे ग्रहण s 4A iner समयसार टीका। ७५ करता है और न उस रूप 'त्पन्न होता है तब फिर यह आत्मा करता क्या है ? एसी आशंका होने पर आचार्य करते हैं कि यह ज्ञानी जीव अपने शुद्ध आत्म स्वरूपको ऐसा जान कर ध्यान करता है कि यह शुद्धात्मा मिथ्या दर्शन, पंचेन्द्रियोंके २७ विषय, २५ कपाय, अपनी प्रसिद्धि, व पूजा व लाम व भोगोंकी इच्छा रूप निदान बंध आदि विभाव भावोंके कर्तापने और भोक्तापनेके विकल्पोंसे शून्य है तथा पूर्ण भरे हुए कलशकी तरह अपने चिदा- नन्द मई एक स्वभावसे भले प्रकार भरा हुआ है। ऐसे अपने शुद्ध स्वरूपको ज्ञानी जीव निर्विकल्प अर्थात् संकल्प विकल्पोंसे वर्जित आत्म समाधिमें तिष्ठ कर ध्याता है। भावार्य-ज्ञानी जीव जैसे अपने शुद्ध आत्मस्वरूपको जानता है वैसे पुद्गल द्रव्यसे की गई अनेक अवस्था- ओंको भी जानता है। जो सुख दुःख रूप फल जगतमें होता है उसका कारण उदयमें आया हुआ द्रव्य कर्म है ऐसा जानता है । तथा जैसे द्रव्य कर्म भिन्न हैं वैसे उसके कार्य सुख व दुःखको भी अपनेसे भिन्न जानता है । अपने आत्मिक स्वभावमें भरे हुए अतीन्द्रिय सुखसे इन इन्द्रिय जनित सुखोंका भले प्रकार भेद जानता हुआ इन इन्द्रिय जनित सुखोंमें लवलीन नहीं होता है किन्तु सम्पूर्ण राग द्वेषादि विभाव भावोंसे दूर निरंजन, निर्विकार चिदानन्द स्वरूप अपने शुद्धात्माको ही विकल्प रहित निश्चल आत्मसमाधिरूपी गुफामें तिष्ठकर ध्यान करता है और इस ध्यानके फलसे अपनी शुद्धताको बढ़ाता चला जाता है। ज्ञानी वही है जो जानकर इस प्रमाण आचरण करे। जिसने अपने अमृतमई स्वभावको जाना है वह उसको त्यागकर अन्य रूपमें कैसे रमण कर सक्ता है । इस प्रकार यह आत्मा निश्चय करके द्रव्य कर्मादि पर द्रव्य स्वरूप नहीं परिणमन करता है । इस व्याख्यानकी मुख्यतासे तीन गाथाएं पूर्ण हुई ।। ८४ ॥ आगे कहते हैं कि यह पुद्गल द्रव्य जढ़ स्वभाव रूप होनेके कारणसे न तो जीवके परिणामको, न अपने पुद्गलपई परिणामको और न अपने पुद्गगमई परिणामके फलको जानना है इस कारण इस पुगलका निश्चयसे इस जीवके साथ का कम भाव नहीं है। गाथा:-णवि परिणमदि ण गिण्हदि उपजदि ण परदव्य पजाए। पुग्गलदव्वं.पि तहा परिणमदि सएहिं भावहिं ।। ८५ ॥ संस्कृतार्थः-नापि परिणमति न गृण्हात्युत्पद्यते न परद्रव्यपर्यायेण । पुदलद्रव्यमपि तथा परिणमति स्वर्भावैः ॥ ८५ ॥ सामान्यार्थ-तैसे ही यह पुद्गल द्रव्य भी पर द्रव्यकी पर्याय रूप नहीं परिणमन करता है, न अपने सिवाय परद्रव्यको गृहण करता है और न परव्यकी अवस्थारूप उत्पन्न होता है किन्तु अपने ही पुद्गलमई भावोंमें ही परिणमन करता है । शब्दार्थ सहित विशेषार्थ:-(हा) जैसे जीव द्रव्य निश्चयसे अपने अनंत ज्ञान सुख आदि स्वरूपको Cess. समयसार टीका। PARANASALMAAVADYA -- ७६ छोड़कर पुद्गल द्रव्य रूपसे नहीं परिणमन करता है, न तन्मई होकर पुद्गल द्रव्यको गृहण करता है और न पुद्गलकी अवस्था रूपसे उत्पन्न होता है उसी प्रकारसे ( पोग्गलढव्वंपि ) पुद्गल द्रव्य भी ( परदव्व पज्जाए) जेसे स्वयं अंतर्व्यापक होकर मिट्टी कलश रूपसे परिणमन करती है उस रूपसे चिदानंद एक लक्षणमय जीवके स्वरूप रूप नहीं परिणमन करता है। (ण गिलदि) न जीवके स्वरूपको तन्मई होकर गृहण करता है। (ण उप्पजदि) और न जीवकी अवस्था रूप उत्पन्न होता है। किन्तु (सएहिं भावेहिं) अपने ही वर्णादि स्वभावरूप, परिणामरूप, गुणरूप, अथवा धर्मरूप (परिणमदि) परिणमन करता है क्योंकि जैसे मिट्टीका कलशके साथ तादात्म्य सम्बन्ध है ऐसा तादात्म्य सम्बन्ध इस जीवके साथ पुद्गलका नहीं है । भावार्थ-जैसे जीव निश्चयसे पुद्गलकी किसी अवस्था रूप नहीं होता है वैसे ही पुद्गल भी जीवरूप नहीं होता। क्योंकि हरएक द्रव्यका परिणमन अपने ही, गुणोंमें होता है । एक द्रव्य कभी भी अन्य गुण रूप व अन्य पर्याय रूप नहीं होता-ऐसा जान पुद्गलके परिणामोंसे अपने आत्माके परिणामोंको भिन्न जान अपने शुद्ध आत्म स्वरूपमें ही परिणमन करना योग्य है। इस प्रकार पुद्गल द्रव्य भी जीवके साथ नहीं परिणमन करता है इत्यादि व्याख्यानकी मुख्यता करके गाथा पूर्ण हुई ॥ ८५ ॥ आगे यद्यपि जीव और पुदगलके परिणामोके होनमें हरएक दूसरे को निमित्त कारण है तथापि निश्चय नय करके इन दोनोमे कर्ता कम भाव नहीं है ऐसा तीन गाथाओसे कहते है:- गाथा:--जीवपरिणामहेहूँ कम्मत्तं पुग्गला परिणमंति । पुग्गलकम्मणिमित्तं तहेव जीवो वि परिणमदि ।। ८६ ॥ संस्कृतार्थ:-जीवरिणामहेतुं कर्मत्वं पुद्गलाः परिणमांत । पुद्गलकमनिमित्तं तथैव जीवाऽध परिणमति ॥ ८६ ॥ सामान्यार्थ-जीवके परिणामोंके कारण पुद्गल द्रव्यकर्मरूप परिणमन करते हैं वैसे ही पुद्गलकर्मीका जीव भी परिणमन करता है । शब्दार्थ 'हित विशेणार्थ-(जीव परिणाम हेर्दु) जैसे कुंभकारके निमित्तसे मिट्टी घंटरूपसे परिणमन करती है तैसे ही जीव संबंधी मिथ्यात्व व रागद्वेषादि परिणामोंका निमित्त प्राप्त कर (पोग्गला) कर्मवर्गणा योग्य पुद्गल द्रव्य (कम्मत्त) ज्ञानावरणादि द्रव्य कर्मरूप (परिणमंति) परिणमन करते हैं । (तहेव) तैसे ही (पोग्गलकम्म णिमित्त) जैसे घटका निमित्त पाकर मैं इस तरह घट बनाऊं इस भावरूप कुम्हार परिणमन करता है वैसे उदयमें आए हुए पूर्ववद्ध द्रव्य कर्मोंका निमित्त पाकर (जीवो ) जीव भी अपनी विकार रहित चैतन्यकी चमत्कार परिगतिको न अनुभव करता हुआ मिथ्यात्व व रागद्वेषादि विभाव परिणामरूप परिणमन करता है ॥ ८६॥ निमित्त पाकर ७७ - TERRAASHASRAMINERMIRE rang-តិក समयसार टीका। गाथाः-णवि कुव्वदि कम्मगुणे जीयो कम्मं तहेव जीवगुणे । अण्णोपणणिमित्तेण दु परिणाम जाण दोण्हंपि ।। ८७॥ संस्कृतार्थः--नापि करोति कर्मगुण न् जीवः कर्म तथैव जीवगुणान् । अन्योन्यनिमित्तेन तु परिणाम जानीहि द्वयोरपि ॥ ८७ ॥ सामान्यार्थ:-न तो जीव द्रव्यकर्मके पुद्गलमई गुणोंको करता है और न पुद्गलकर्म जीवके गुणोंको करता है हरएक दूसरेके निमित्तसे ही दोनों के भीतर परिणमन होता है ऐसा जानो । शब्दार्थ सहित विशेषार्थः-(जीवो) यह जीव यद्यपि परस्पर निमित्तरूप करके परिणमन करता है तथापि निश्चयनय करके (कम्म गुणे) वर्णादि स्वरूप पुद्गलकर्मके गुणोंको (णवि- कुम्वदि) नहीं करता है (तहेव) तैसे ही (कम्म) पुद्गल द्रव्यकर्म (जीवगुणे) अनंतज्ञानादि जीव गुणोंको नहीं करता है । यद्यपि उपादानरूपसे एक दूसरेको नहीं करता है तथापि (अग्णोण्ण णिमित्तेण दु) एक दूसरेके लिये निमित्तरूप होनेसे (दोण्हंपि) जीव और पुद्गल दोनोंके ही (परिणाम) परिणाम होते हैं ऐसा (जाण) जानो । जसे घट और कुंभकाग्में परस्पर निमित्त नेमित्तिकपना है तैसा जीव और पुद्गलका जानना योग्य है ।। ८७ ॥ गाथा:-एदेण कारणेण दु कत्ता आदा सएण भावेण । पुग्गलकम्मकदाणं ण दु कत्ता सधभावाणं ॥८॥ संस्कृतार्थः--एतेन कारणेन तु कर्ता आत्मा स्वकेन भावेन । पुद्गलकर्मकृतानां न तु कती सर्वभावानां ॥ ८८ ॥ सामान्यार्थः-इस कारणसे ही यह आत्मा अपने ही भावोंका कर्ता है किन्तु पुद्गल कर्मसे किये हुए सर्व भावोंका कर्ता नहीं है। शब्दार्थ सहित विशेपार्थः- (एदेण कारणेणदु) इस कारणसे ही अर्थात जैसा पहले दो सूत्रोंमें व्याख्यान किया गया है (आदा) यह आत्मा (सएण भावेण) अपने ही भावोंका (कत्ता) करनेवाला है। निर्मल आत्माका अनुभव स्वरूप लक्षणको रखनेवाले परिणामसे अर्थात् शुद्ध उपादान कारणसे यह आत्मा अव्यावाध और अनंत सुख आदि शुद्ध भावोंका कर्ता है और इससे विलक्षण अशुद्ध उपादान कारणमे रागद्वेपा- दि अशुद्ध भावोंका कर्ता है जैसे मिट्टी कलशकी कर्ता है ऐसे जीव अपने अशुद्ध या शुद्ध भावोंका कर्ता है । (पोग्गल कम्मकदाणं) पुद्गल कर्मसे किये हुए (सव्वभावाणं) सर्व भावोंका अर्थात् ज्ञानावरणादि पुद्गल कर्मकी पर्यायोंका (णटुकत्ता) कर्ता नहीं है । भावार्थ-उपादान कारण की अपेक्षा यह आत्मा पुद्गल कर्मकी किसी अवस्थाका कर्ता नहीं हैं क्योंकि यह पुद्गलसे सर्वथा भिन्न है । परंतु यह अपने भावोंका आप करनेवाला है । जब शुद्ध उपादान कारणको लिया जाय तब यह अपने शुद्ध भावोंका कर्ता है और जब अशुद्ध उपादानको .
एट EHIMALVIRAVAIRANSarson समयसार टीका। - 4 लिया जाय तब यह अपने रागादि अशुद्ध भावोंका कर्ता है। इस तरहं जीव और पुद्गलमें परस्पर निमित्त कारणपना है इस व्याख्यानकी मुख्यता करके तीन गाथाएँ पूर्ण हुई ॥ ८ ॥ इससे यह सिद्ध हुआ कि निश्चयनय करके इस जीवका अपने ही परिणामोंके साथ कर्ता कम भाव और भोक्ता भोग्यभाष है। सो ही कहते हैं:- गाथा:-णिच्छयणधस्स एवं आदा अपाणमेव हि करेदि । वेदयदि पुणो तं वेव जाण अत्ता दु अत्ताणं ॥ ८९॥ संस्कृतार्थ:-निश्चयनयस्यैवमात्मात्मानमेव हि करोति । वदयते पुनस्तं चैव जानीहि आत्मा स्वात्मानं ॥ ८१ ॥ सामान्यार्थ-निश्चयनवसे यही है कि आत्मा अपने आत्मस्वरूपको करता है तथा अपने ही आत्मस्वरूपको अनुभव करता है ऐसा जानो। शब्दार्थ सहित विशेषार्थ:- जैसे लहरोंके होनेमें यद्यपि पवन निमित्त कारण है तथापि निश्चयनयसे समुद्र ही अपनी कल्लोलोंको करता है अर्थात् लहररूप परिणमन करता है इसी प्रकारसे यद्यपि ज्ञानावरणादि द्रव्य कर्मोंका उदयका होना अशुद्ध भावका और उनके उदयका न होना शुद्ध भावका निमित्त है तथापि ( णिच्छय णयस्स एवं ) निश्चयनयसे यह है कि ( आदा) आत्मा ( अप्पाणमेव हि ) अपने आत्मस्वरूपको ही ( करेदि ) करता है अर्थात् विकार रहित परम स्वसंवेदन ज्ञानमें परिणमन करता हुआ आत्मा अपने केवल- ज्ञानादि शुद्ध भावोंका उपादान रूपसे कर्ता है तैसे ही अशुद्ध ज्ञानमें परणमनेवाला आत्मा सांसारिक सुख और दुःख आदि अशुद्ध भावोंको उपादान रूपसे करता है | यहां अपने परिणाम याने भावोंका परिणमना ही कर्तापना है ऐसा जानना योग्य है | आत्मामें परिणतिका होना ही क्रिया है । तथा (पुणो) पुनः ( अत्ता दु ) आत्मा ही (तंचेव अत्ताणं) तिस ही आत्माको (वेदयदि ) अनुभवता है अर्थात् शुद्ध आत्मस्वरूपकी भावनासे उत्पन्न सुख शुद्ध उपादान उसकी अपेक्षासे अपने शुद्ध आत्मस्वरूपको भोगता है तथा अशुद्ध उपादानके द्वारा अपने अशुद्ध आत्मस्वरूपको अनुभव करता है, भोगता है या उस रूप परिणमन करता है ऐसा ( जाण) जानो । भावार्थ-निश्चयसे यह आत्मा अपने ही भावोंका कर्ता और भोगता है। किसी भी पुद्गलमई परभावका कर्ता व भोक्ता नहीं है। इस तरह निश्चय नयसे कर्ता और भोका पनेका व्याख्यान करते हुए गाथा पूर्ण हुई ॥ ८९॥ आगे लोक व्यवहारको दिखलाते हैं:- गाथाः-ववहारस्स दु आदा पुग्गल कम्मं करेदि अणेयविहं । तं चेव य वेदयदे फुग्गलकम्म अर्णयविहं ॥ ९०।- रुपनो - ne समयसार टीका। संस्कृतार्थ:-व्यवहारल्स वात्मा पुद्गलम करोति नेकविधम् । सच्चैव पुनर्वेदयते पुढलकर्मानेकविधं ॥ ९० ॥ सामान्यार्थः–व्यवहारनयका यह अभिप्राय है कि यह आत्मा अनेक प्रकार पुगल कर्मोको करता है तेसे ही अनेक पुद्गल कर्मीको भोगता है। शब्दार्थ सहित विशेषार्थ:-जैसे लोकमै घटका उपादान कारण मिट्टीका पिंड है तथापि कुम्हार घड़ेको वनाता है तथा वह उस घड़ेका फल जल भरना व मूल्य आदि पाना भोगता है ऐसा कहा जाता है यह लोगोंकी अनादि कालसे रूद्धि है अर्थात व्यवहार है । तेमे ही यद्यपि कम वर्गणा योग्य पुद्गल द्रव्य ज्ञानाव- रणादि कर्मोंका उपादान कारण है तथापि (यवहारम्सदु ) व्यवहारनयके अभिप्रायसे यह कहने में आता है कि (आदा) यह आत्मा ( अणेव विहं ) मूल व उत्तर प्रकतिरूप अनेक प्रकार पुद्गल कर्माको (रेदि ) करना है। तमे ही ( नं वय ) तिम ही ( अणेय विहं पुग्गलकम्म ) अनेक प्रकार पुद्गल कर्मको इष्ट तथा अनिष्ट पंचेन्द्रियोंके विषयरूपमे (वेदयदे) अनुभव करता है-यह अनादिकालकी रूढ़ि अर्थान व्यवहार उन अन्नानी जीवोंका है जिनको विषयोंसे रहित तथा शुद्धात्माके अनुभवमे प्राप्त सुखामृत रसके आस्वादका लाभ नहीं है । भावार्थ:- व्यवहारमें निमित्त कर्ताको भी कर्ता करके पुकारते हैं इसी कारण पुद्गल सम्बन्धी कर्मोंका कर्तापना और भोक्तापना जीवको कहनेमें आता है। निश्चयसे तो यह अपने भावोंका ही कर्ता है । प्रयोजन यह है कि शुद्ध निश्चयनयसे यह आत्मा अपने शुद्ध ज्ञानदर्शन स्वभावका कर्ता और आत्मिक आनन्दका भोक्ता है यही विचार इस आत्माके राग और द्वेषको हटानेवाला है अतएव अन्य विकल्पोंको त्याग एक शुद्ध आत्मस्वरूप की ही भावना कार्यकारी है। इसतरह व्यवहारनयसे इस जीवको सुख और दुःखका कर्तापना और भोक्ता- पना मुख्यतासे कहते हुए गाथा पूर्ण हुई ।। ९० ॥ इस तरह ज्ञानी जीवका विशेष व्याख्यान करते हुए ग्यारह गाधाओके द्वारा दसग अंतर अधिकार व्याख्यान किया गया। इसके पश्चात् २५ गाथा पर्यंत द्विक्रियावादीका वंदन करते हुए व्याख्यान करते हैं:- जो चेतन और अचेतन दोनोंका एक उपादान कर्ता कहते हैं उनको हिक्रियावादी कहते हैं। इसका संक्षेपसे व्याख्यान करते हुए " जदि पुग्गल कम्ममिणं " इत्यादि दो गाथाएं हैं तिनका विवरण १२ गाथाओंमें है जिनमें 'पोग्गल कम्म निमित्तं ' इत्यादि ऋमसे प्रश्रम छः स्वतंत्र गाथाएं हैं तिसके बाद अज्ञानी और ज्ञानी जीवके कर्ता और अपनेकी मुख्यतासे कहते हुए " परमप्पाणं कुव्वदि " इत्यादि दूसरी छ: गाथाएं हैं। इसके पीछे उस ही द्विक्रियावादीका फिर भी विशेष व्याख्यान करनेके लिये संकोच रूपसे ग्यारह गाथाएं हैं । तिन ११ गाथाओंके मध्यमें व्यवहार नयकी मुख्यता करके 'ववहारम्मदु' - समयसार टीका। ERRAAAAAAAAAAARAVeter - + इत्यादि गाथाएं तीन हैं । इसके बाद निश्चय नयकी मुख्यतासे 'जो पुग्गलदल्याणं' इत्यादि सूत्र ४ हैं। इसके पीछे द्रव्य कर्मोंका उपचारसे जीव कर्ता है इस मुख्यतासे "जीवंहिहेदुभूदे इत्यादि सूत्र चार हैं । इस तरह समुदाय करके २५ गाथाओंके द्वारा तीसरे स्थलमें समुदाय पातनिका कही । अब उसीका वर्णन करते हैं। पहले जो पुद्गल कर्मका कपिना और भोक्तापना नय विभाग द्वारा कहा गया है सो अनेकांत नयसे यथार्थ है तो भी द्विप्रियावादी एकान्त नगमे ऐसा मानता है कि यह जीव भावकर्म रागद्वेषादि को जैग करता है वैसे निश्चयसे द्रव्य कर्माको भी करता है। इस तरह चेतन और अचेतन कार्याका एक उपादान कारण है ऐसा द्विक्रियावादीका मानना है। ऐसे द्विक्रियावादियोंको दूषण देते है। गाथाः-जदि पुग्गलकम्ममिणं कुयदि तं चेव वेदयदि आदा । दो किरियावादितं पसजदि सम्मं जिणावमदं ॥९१॥ संस्कृतार्थः-यदि पुद्गलकर्मेदं करोति तच्चैव वेदयते आत्मा । द्विक्रियावादित्त्वं प्रसजति सम्यक् जिनावमतं ॥ ९१ ॥ . सामान्यार्थः-यदि यह आत्मा इस पुद्गल कर्मके उदयको उपादान रूपसे करता है और उसीको उपादान रूपसे अनुभव करता है तब द्विक्रियावादीपना प्राप्त हो जायगा ऐसा भले प्रकार जिनेन्द्रका मत हैं ॥ ९१ ॥ शव्दार्थ सहित विशेपार्थ-(जदि) यदि (आदा) आत्मा (इणं ) इस (पोग्गलकम्मम् ) पुद्गल कर्मके उदयको (कुव्वदि ) उपादान रूपसे करता है (तंचेव ) और तिसको ही ( वेदयदि ) उपादान रूपसे अनुभव करता है तब (दोकिरियावादित्तं ) द्विक्रियावादीपना (पसनदि) प्राप्त हो जायगा अर्थात् चेतनरूप और अचेतनरूप क्रियाका एक ही उपादान कारण सिद्ध हो जायगा अथवा पाठांतरसे (दो किरिया बदिरित्तो पसजदि सो) चेतन और अचेतन दोनोंकी क्रियाओंसे अव्यतिरिक्त अर्थात् अभिन्न याने एक रूप यह पुरुप प्राप्त होजायगा (सम्म) यह बात भले प्रकार (जिणाव- मदं) जिनेन्द्रोंको सम्मत है। जो इस द्विक्रियावादीपनेको मानता है वह मनुष्य निश्चय सम्य- क्तको नहीं प्राप्त करता हुआ मिथ्यादृष्टि रहता है। अपना शुद्ध आत्मा ही उपादेय है ऐसी रुचिको निश्चय सम्यत्व कहते हैं-यह सम्यत्व विकार रहित चैतन्यके चमत्कार मात्र लक्ष- गको रखनेवाला है तथा शुद्ध उपादान कारण जो शुद्ध आत्म स्वरूप उससे उत्पन्न होता है। भावार्थ-एक उपादान कारणसे जो दो भिन्न २ क्रियाओंको मानता है उसे द्विक्रियावादी कहते हैं। जीव और पुद्गल दो भिन्न २. पदार्थ हैं। इस कारण दोनोंकी क्रियाएं भिन्न २ रूप हैं। जैसे मिट्टी मिट्टीके घड़ेकी कर्ता है व सुवर्ण सुवर्णके कुंडलको कर्ता है ऐसे ही जीव अपने चेतन स्वभावका कर्ता है और पुद्गल जड़ अचेतन स्वभावका कर्ता है। क्योंकि उपादान HEARCentsOURAVE RABINPORT - समयसार टीका। ८१ कारणके समान ही कार्य होता है। यथार्थ वात तो यह है। इस वातको जो न मानकर ऐसा मान लेवे कि यह जीव जैसे चेतन भावका कर्ता है वैसे पुद्गलसे होनेवाले नाना प्रकार अचेतन स्वभावोंका भी कर्ता है तब एक जीव उपादानसे दो मिन्न २ उपादान स्वरूप कार्य मान लिये गये यही मानना द्विक्रियावादीपना है सो सर्वथा विरुद्ध है। जो ऐसा मानता है वह अज्ञानी मिथ्यादृष्टि है। आगे शिप्यने पश्न किया कि द्विक्रियावादी मिथ्यादृष्टि कैसे होता है इसका उत्तर देते हुए तिस ही पहले कहे हुए अर्थको अन्य प्रकारसे दृढ़ करते है । गाथाः-जह्मा दु अत्तभावं पोग्गलभावं च दोवि कुव्वंति। तेण दु मिच्छादिट्ठी दोकिरियावादिणो होति ॥ १२ ॥ संस्कृतार्थः-यस्मात्यात्मभावं पुद्गलमावं च द्वावपि कु ते । तेन तु मिथ्याटयो द्विक्रियावादिनो भवंति ॥ ९२ ॥ सामान्यार्थ-क्योंकि यह ऐसा मानते हैं कि ये आत्माएं अत्माके भावोंके साथ २ पुद्गलके भावको भी करते हैं इस कारणसे ही द्विक्रियावादी मिथ्यादृष्टि होते हैं । शब्दार्थ सहित विशेषार्थ जम्हा दु) क्योंकि यह आत्माएं (अत्तभावं) आत्माके चेतनरूप भावको (च) और ( पोग्गलमा ) पुदलके अचेतनमय जड़ स्वरूपको (दो वि ) दोनोंको भी (कव्वंति ) उपदानरूपसे करते हैं ( तेणदु ) इस कारणसे ही (दो किरियावादियो) द्विक्रियावादी अर्थात् चतन और अचेतन दो . क्रियाओंको एक उपादान कारणसे कहनेवाले पुरुप (मिछादिट्ठी · मिथ्यादृष्टी ( होंति ! होते हैं । जैसे कुम्हार अपने ही भावको उपादान रूपसे करता है ऐसे ही यदि बड़ेको भी उपादान रूपसे कर ले तत्र कुम्हारको अचेतनपना यानी घटरूपपना प्राप्त होनायगा अथवा बड़ेको चेतन रूपपना या कुम्हारपना प्राप्त होनायगा-। तैसे ही जीव भी यदि उपादान रूपसे पुद्गल दव्यकर्मोको करने लगे तो जीवको अचेतेनपना या पुद्गलद्रव्यपना प्राप्त हो जायगा अथवा पट्टमई द्रव्यकर्माको चैतन्य रूपपना या जीवपना प्राप्त हो जायगा। प्रयोनन यह है कि शुभ या अशुभ कर्मोको मैं करता हूं ऐसा महा अहंकाररूपी अंधकार मिथ्याज्ञानी जीवोंका कभी नहीं नष्ट होता है। तब किन जीवोंका नष्ट होता है ऐसा पृश्न होने पर आचार्य कहते हैं कि जो जीव पंचेन्द्रियोंके विपयोंसे उत्पन्न सुखानुभवके आनन्दसे रहिन और वीतराग स्वसंवेदनमई निश्चय न्यसे अपने एक स्वरूपमें लव- लीन चिदानंदमई एक स्वभावमय शुद्ध परमान्म द्रव्यों तिष्ठे हुए हैं उन्हीं सम्यग्ज्ञानी जीवोंका ही मिथ्या अज्ञान समान शभाशुभ मावोंसे शुन्य निर्विकल्प समाधि लक्षणको धरनेवाले शुद्धोप्रयोगकी भावनाके सर विल्य अर्थत विनाशको प्राप्त हो जाता है । उस महा अहंकार रूप विकल्प जालके नष्ट हो जानेपर फिर कर्मका बंध नहीं होता है । ऐसा जानकर बाह्य ११ समयसार टीका। RSURPRESEASESS. ८२ द्रव्योंके सम्बन्धमें मैं ऐसा करूं मैं ऐमा न करूं इस तरहके खोटे हठको त्यागकर रागद्वेपादि विकल्प जालोंसे शून्य, पूर्ण भरे हुए कलसकी तरह चिदानंदमई एक स्वभावसे भरपूर अपने परमात्मस्वरूपके भीतर निरन्तर भावना करनी योग्य है। भावार्थ-जो एक जीवकी चेतन- मई और अचेतनमई दो प्रकारका भिन्न २ क्रियाएं उपादान रूपसे मानते हैं वे द्विक्रियावादी मिथ्यादृष्टि हैं । उनके हृदयसे यह अज्ञान कि यह जीव पर पदार्थको तन्मय होकर करता है कभी भी नष्ट नहीं होता है। उनके चित्तमें सदा ही यह अहंकार रहता है कि मैं अमुक्का भला करता हूं व अमुकका बुरा करता हूं । इस अहंकारके आधीन होकर वे कभी भी शुद्धो- पयोगकी भावनाको नहीं प्राप्त कर सक्तं । और इसीलिये स्वस्वरूप समाधिके भीतर नहीं ठहर सक्ते तब बंधसे कभी मुक्त नहीं हो सके । ऐसा जानकर इस मिथ्याज्ञानको छोड़ देना चाहिये और शुद्ध उपादान स्वरूप निश्चयनयके द्वारा यह आत्मा अपने शुद्ध भात्रोंका ही करता है कभी पुद्गलका कर्ता नहीं होता ऐसा अनुभव करके अपने स्वरूपकी ही निरन्तर भावना करनी चाहिये, क्योंकि इसी भावनाके वलसे परम अतीन्द्रिय सुखका लाभ होता है और कर्मबंधका नाश करके यह जीव मुक्तिको प्राप्त कर सत्ता है । इसतरह द्विक्रियावादीका संक्षेपसे ज्या- ख्यानकी मुख्यता करके दो गाथाएं पूर्ण हुई ॥ ९२ ॥ अब द्विक्रिया वादीको समझाते हुए विशेष व्याख्यान करते हैं। गाया:-पोग्गलकम्मणिमित्तं जह आदा कुणदि अप्पणो भावं । पोग्गलकम्मणिमित्तं तह वेददि अप्पणो भावं ॥ ९३ ॥ संस्कृतार्थः-पुद्गलकमनिमित्तं यथात्मा करोति आत्मनः भायं । पुद्गलकमनिमित्तं तथा वेदयति आत्मनो भावं ॥ ९३ ॥ सामान्यार्थ-उदयमें आए हुए द्रव्य पुद्गल काँका निमित्त पाकर जैसे आत्मा अपने सुख दुःख आदि भावोंको करता है वैसे ही उदयमें आए हुए पुदल कर्मका निमित्त पाकर यह आत्मा अपने रागादि भावोंका अनुभव करता है । शव्दार्थ सहित विशेपार्य- (जह) जैसे (पोग्गल कम्मणिमित्तं) उदयमें आए. हुए ज्ञानावरणादि द्रव्यकर्मीका निमित्त पाकर ( आदा) यह आत्मा विकार रहित स्वसंवेदन परिणामसे शून्य होकर (अप्पणो भावं) अपने सुख दुःख आदि भावोंको (कुणदि ) करता है। (तह ) वैसे ही (पोग्गल कम्मणिमित्तं) उदयमें आए हुए द्रव्य कर्मोंका निमित्त पाकर अपने शुद्ध आत्म स्वरूपकी भावनासे उत्पन्न जो वास्तव परम सत्यार्थ सुखका आस्वाद उसका अनुभव न करता हुआ यह आत्मा अप्पणो भावं ) कर्मके उदयसे उत्पन्न अपने ही राग आदि भावोंको ( वेददि) अनुभव करता है, द्रव्य कर्म रूप पुद्गलाई परभावको न करता है न भोगता है यह अभिप्राय है। भावार्थ- जब यह आत्मा अपने शुद्ध परिणामोंका कर्ता या भोक्ता नहीं होता है तब यह अपने ही estion समयसार टीका। ८३ द्वारा पूर्व में बांधे हुए कर्माका निमित्त पाकर कभी मैं सुखी हूं ऐसा भाव करता है कभी मैं दुःखी हूं ऐसा भाव करता है। अपने वीतराग आत्म ज्ञानका अनुभव न करता हुआ कर्मोदय जनित राग व द्वेष आदि भावोंका आस्वाद लिया करता है!। ९३ ॥ आगे कहते हैं कि आत्मा अपने चैतन्यरूप आत्मीक भावोंको करता है वैसे ही आत्मासे अन्य पुद्गल चैतन्य स्वरूपसे विलक्षण द्रव्य कर्म आदि पग्मावोंको करता है गाथा:-मिच्छत्तं पुण दुविहं जीवमजीवं तहेव अण्णाणं । अविरदि जोगो मोहो कोधादीया इभे भावा ॥१४॥ संस्कृतार्थः-मिथ्यात्वं पुनदिविवं जीवोऽजीवस्तथैवाशानं । अविरतियोगो मोहः क्रोधाद्या इमे भावाः ॥ ९४ ॥ सामान्यार्थ:-मिथ्यात्त्व दो प्रकारका है एक नीवरूप मिथ्यात्व दुसरा अजीव रूप मिथ्यात्त्व उसी ही प्रकार अज्ञान, अविरति, योग, मोह, और क्रोधादिक सर्व भाव जीव और अजीव दो प्रकार हैं। शब्दार्थ सहित विशपार्थ-(पुण) तथा मिच्छत्त) मिथ्यात्व (दुविह) दो 'प्रकार है (नीवम् ) एक जीव स्वभाव रूप (अनीवम्) दुसरा अनीव स्वभाव रूप (तहेव) तैसे ही (अण्णाण) अज्ञान (अविरदि) अविरति (जोगो) योग (मोहो) मोह (कोधादीया) क्रोधादिक (इमे भावा) यह सर्व भाव दो प्रकार हैं। पर्याय जीवरूप और अनीवरूप दो प्रकारकी होती हैं। जैसे मोरका दर्पणमें प्रतिविम्ब पड़नसे दो प्रकारकी पर्यायें होती हैं। मयूर अर्थात् मोरके द्वारा अनुभव किये हुए नील पीत आदि आहार विशेष जो मोरके शरीरके आकार परणत हुए हैं मयूररूप हैं अर्थात् चेतन मोररूप ही हैं तैसे निर्मल आत्माके अनुभवसे भृष्ट नीवके द्वारा अनुभव किये हुए सुख दुःख आदि विकल्प जीवरूप ही हैं अर्थात् अशुद्ध निश्चयसे चेतना स्वरूप ही हैं तथा जैसे निर्मल दर्पण द्वारा अनुभव किये हुए दर्पणमें झलकनेवाले मुखका प्रतिबिम्ब आदि विकार दर्पणरूप ही हैं अर्थात् अचंतन जड़रूप ही हैं वैसे कर्मवर्ग- णायोग्य पुद्गल द्रव्य स्वरूप उपादान कारणसे की हुई ज्ञानावरणादि द्रव्य कर्मकी अवस्थाएं सो पुद्गलरूप ही हैं अर्थात् अचेतन रूप ही हैं। भावार्थ-जैसे किसी मोरकी छाया दर्पणमें पड़ी तब वह छायारूप परिणमन दर्पणका ही है मोरका नहीं, मोर केवल निमित्त कारण है। उसी तरह जीवके भाव्के निमित्तसे जो पुद्गलमें परिणमन हुआ सो परिणमन भी पुगलका ही है जीवका नहीं, और जैसे मोरके शरीरमें जो रूप रंग है वह मोरका ही है दर्पणमें दिखनेसे दर्पणका नहीं है उसी तरह कमौके उदयसे जो अशुद्ध आत्माके अशुद्ध भाव होते हैं सो भाव आत्मा ही के हैं पृदल कर्मके उपादान स्वरूप भाव नहीं है। इसी लिये मिथ्यात्व कर्म और मिथ्याभाव क्रमसे पुद्गल और जीवरूप हैं। इसीतरह ज्ञानावरणी कर्मका उदय पुद्गलरूप, अज्ञान भाव नीवरूप है। अप्रत्याख्यानावरणी कपायका उदय पुद्गलरूप असंयम भाव नीवरूप JerusuvERDESHIst ८४ AVAANRITYLLABALAULAtote समयसार टीका। है, पुद्गलोंका आकर्षण अनीवरूप, आत्माकी योग शक्ति जीवरूप है, मोहनीय कर्म पुदलरूप मोह भाव जीवरूा है, क्रोधादिक कपाय पुद्गलरूप, क्रोधादि भाव जीवरूप हैं। ऐसा मानना योग्य है। आगे कितने प्रकारके जीव और अजीव हैं ऐसा शिप्यने प्रश्न किया उसका उत्तर आचार्य कहते हैं:- गाथा:-पोग्गलकम्म मिच्छं जोगो अविरदि अण्णाणमजीवं।. उपओगो अण्णाण अविरदि मिच्छत्त जीवो'दु ।।१५॥ संस्कृतार्थः-पुद्गलकर्भ मिथ्यात्वं योगोऽविरतिरज्ञानमजीवः । उपयोगोऽज्ञानमविरतिमिथ्यात्वं च जीवस्तु ॥ ९५ ॥ सामान्यार्थः-पुद्गल कर्मरूप मिथ्यात्व, योग, अविरति और अज्ञान अजीवरूप हैं जब कि उपयोगरूप अज्ञान, अविरति और मिथ्यात्त्व जीवरूप हैं। शब्दार्थ सहित विशेषार्थः- (घोग्गलकम्म) पुद्गल कर्मरूप (मिच्छं) मिथ्यात्त्वकर्म, (जोगों) द्रव्यल्प योग अर्थात् कर्मोका आकर्षण व द्रव्य मन, बचन, काय, (अविरदि) अपिरतिके कारण कयायका उदय (अण्णाणं) और अज्ञान अर्थात् ज्ञानावरणीयका उदय (भज्जीव) अजीव स्वरूप हैं-जीवमई चैतन्यगुणसे रहित हैं। (दु) किन्तु (उत्रओगो) उपयोगरूप अर्थात जीवक भावरूप (अग्गाणं) अज्ञान अर्थात शुद्धात्मा आदि तत्त्वोंके भीतर विपरीत. ज्ञान होनेसे जीवका विकाररूप परिणाम तथा (अविरदि) अविरति अर्थात् विकार रहित स्वसंवेदन अर्थात् आत्माका अनुभव उनसे विपरीत व्रत रहित परिणाम-जीवका विकाररूप भाव तथा ( मिच्छत्त ) मिथ्यात्व अर्थात् विपरीत अभिप्रायपई उपयोगका विकार स्वरूप भाव जिसके होते शुद्ध जीव आदि पदार्थीम विपरीत श्रद्धान होता है सो ये सब (जीवो) जीवरूप हैं । अर्थात् यह अज्ञान, अविरति और मिथ्यात्त्वमई उपयोग जीवरूप हैं । अर्थात् जीवका भाव है || भावार्थ--जीवके उपयोगरूप अज्ञान, अविरति और मिथ्याभाव जीवरूप चेतन हैं जब कि पुद्गलमई मिथ्यात्व, योग, अविरति और अज्ञान अनी स्वरूप हैं-अचेतन हैं ॥ ९५॥ आगे शिष्यने प्रश्न किया कि जीव तो शुद्ध चैतन्य स्वभावमई है इसके मिथ्यादर्शन आदि विकार कैसे उत्पन हुए । इसका उत्तर आचार्य कहते है। गाथा:-उवओगस्स अणाई परिणामा तिण्णिमोहजुत्तस्स। मिच्छत्तं अण्णाणं अविरदि भावो य णादव्यो॥ २६ ॥ संस्कृताथ:-- उपयोगस्यानादयः परिणामास्त्रयो मोहयुक्तस्य । मिथ्यात्रमज्ञानमविरतिभावश्चेति ज्ञातव्यः ॥ ९६ ॥ सामान्यार्थ-मोह सहित उपयोगवान आत्माके मिथ्यात्व, अज्ञान और अविरति ये तोनों अनादिकालसे होनेवाले परिणाम हैं ऐमा जानना योग्य है ॥ ९६ ॥ शब्दार्थ राहित विशेषार्थः--(मोह जुत्तास) मोहसे युक्त (उवगस्स) उपयोग लक्षणको राखनवाले आत्माके (अणाई) अनादि संतानकी अपेक्षा होनेवाले (मिच्छत) मिथ्यात्व, (गाण) अज्ञान (अविदि) HTRARAMARA - समयसार टीका। अविरति ( भावोय) भाव एस (तिण्णि) तीन (परिणामा) प्रकारक परिणामांकि विकार (णादयो) जानन योग्य हैं । यद्यपि शुद्ध निश्चय नयस यह जीव शुद्ध बुद्ध एक स्वभावको रखनेवाला है तथापि अनादि कालके मोहनीय आदि काके बंध होनेके कारणसे इस जीवके मिथ्याश्रद्धान अज्ञान और असंयम रूप तीन परिणामोंके विकार होने संभव हैं। प्रयोजन यह है कि शुद्ध जीवका स्वरूप उपादेय अर्थात गृहण करन व अनुभव करने योग्य है और मिथ्यात्त्व आदि विकारी परिणाम हेय अर्थात् त्यागने योग्य हैं। भावार्थ:-इम जीयका हित अपने शुद्ध भावों का अनुभव हैं क्योंकि वे शुद्ध भात्र इस आत्माके अमली स्वभाव हैं इसीलिये अपने भावोंका अनुभव करना और कर्मके उदयसे होनेवाले मिथ्यात्व आदि भावोंको त्यागना योग्य है ॥ ९६ ॥ आगे कहते है कि इन मिथ्याइर्शन आदि तीन प्रकारके परिणामोके विकारका कर्ता आत्मा है। गाथा:-एदेख य उवओगो तिविहो सुन्डो णिरंजणो भावो। जंसो करोदि भावं उवओगो तस्स सो कत्ता ॥ २७ ।। संस्कृतार्थ:-एतेषु चोपयोगस्त्रिविधः शुद्धो निरंजनो भावः । यं स करोति भावमुपयोगस्तस्य स की ॥ ९७ ॥ सामान्यार्थ-इन मिथ्यादर्शन आदि कमौके उदय होते हुए आत्माका उपयोग जो शुद्ध निश्चय करके शुद्ध है, द्रव्यकोस रहित निरंजन है तथा एक क्षान स्वभाव है सो तीन प्रकार होकर निस परिणामको काता है उस परिणामका का वही उपयोग स्वरूप आत्मा है । शब्दार्थ सहित विशेषार्थ :-(एदेसुय) इन मिथ्यावर्शन अज्ञान मिथ्याचारित्रक उदय होकर निमित्तकारण होनेपर (सुद्धो) परमार्थसे रागद्वषादि भाव काँसे शुद्ध, (णिरंजना) ज्ञानावरणादि द्रव्य कर्मरूपी अजनसे रहित, तथा (भावो) अखंड एक प्रतिभासरूप होनेवाला ज्ञान स्वभावमय होनेके कारणसे एक तरहका होनेपर भी (उवओगो) यह ज्ञानदर्शन उपयोग लक्षणको धरनेवाला आत्मा (तिविहो) पूर्व में कहे अनुप्सार मिथ्यादर्शन, मिथ्याज्ञान, मिथ्या- चारित्ररूप परिणामक विकारोंसे इस तरह तीन प्रकार होकर जैसे कृष्ण, नील व पीत ऐसी तीन प्रकार उमाधिक सम्बन्धसे परिणमन करता हुआ स्फटिक पाषाण तीन प्रकारका हो जाता है (जंभाव) जिस अपने भावको (करेदि) करता है (तस्म) उस ही मिथ्याभाव आदि ३ प्रकार विकारी परिणामोंका (सो) वही (उत्रओगो) चैतन्य सम्बन्धी परिणामरूप अर्थात् उपयोगरूप आत्मा विकार रहित स्वसंवेदन ज्ञान सम्बन्धी परिणामसे हटा हुआ (कत्ता ) कर्ता होता है किंतु द्रव्य कमका कर्ता नहीं होता यह भाव है (नोट-यहां एक "सो" विशेष मालूम होता है) भावार्थ-जैसे स्फटिकमणि स्वभावसे शुद्ध व अनेक रंगोंके विकारोंसे रहित है परंतु काला नीडा पीला डांक आदिका सम्बन्ध होने पर काला, नीला, व पीला दीखता है iraimiteiwwwinceremiamine समयसार टीका। ८६ अर्थात् उसकी चमक काली नीली व पीली हो जाती है उसी तरह यह आत्मा शुद्धज्ञानदर्शन स्वभावका रखनेवाला परमार्थसे अति शुद्ध निरंजन निर्विकार है परन्तु अनादिसे ही दर्शन- मोह, ज्ञानावरण और चारित्र मोहके कम्मोंके उदय होनेके कारणसे आप ही मिथ्याभाव, अज्ञानभाव, और असंयम भावरूप परिणमन करता है इस कारण वह परिणमनशील आत्मा अपने ही मिथ्यामावोंका कर्ता होता है। उपादानरूपसे द्रव्य कम्मौका कर्ता नहीं हो सका । ऐसा जान अपने शुद्ध स्वभावमें ही परिणमन करनेका यत्न करना आवश्यक है ।। ९७ ॥ आगे कहते हैं कि आत्मा मिथ्यात्व आदि तीन प्रकारके विकारी परिणामोंका कर्ता है ऐसा होते हुए कर्मवर्गणा योग्य पुद्गल द्रव्य अपने आप हीसे उपादान कारणके द्वारा द्रव्य कर्मरूप परिणमन करता है। गाथा:-जं कुणदि भावमादा कत्ता सो होदि तस्स भावस्स । कम्मत्तं परिणमदे तमि सयं पोग्गलं दव्वं ॥ ९८ ॥ संस्कृतार्थः-यं करोति भावमात्मा की स भवति तस्य भावस्य । कर्मत्वं परिणमते तस्मिन् स्वयं पुद्गलद्रव्यं ॥ ९८ ॥ सामान्यार्थ:-जिस भावको आत्मा करता है सो आत्मा अपने उस भावका कर्ता होता है। ऐसा होनेपर पुद्गल द्रव्य अपने आप ही द्रव्यकर्म रूप परिणमन करता है। शब्दार्थ सहित विशेषार्थः-(ज) निस ( भायं ) मिथ्या भाव आदि विकारी परिणामको (आदा) शुद्ध स्वभावसे हटा हुआ आत्मा (कुणादि) करता है (तस्स भावस्स) उसी मिथ्या भाव आदिका (सो) वह आत्मा (कत्ता) कर्ता (होदि) होता है (तम्हि) ऐसा होनेपर अर्थात् जब जीव तीन प्रकार विकारी परिणामोंको करता है तब (पोग्गल दव्व) कर्मवर्गणा योग्य पुद्गल द्रव्य (सयं) अपने आप ही उपादानरूपसे (कम्मत्त) द्रव्यकर्मरूप (परिणमदे) परिणमन करता है । जैसे गारूड़ आदि मंत्रोको जपनेवाले पुरुषके परिणामोंको निमित्त पाकर देशांतर में रहते हुए किसी एकं पुरुपसे कोई व्यापार स्वयं न किये जाने पर भी उस पुरुषका विप उतर जाता है, बंधन टूट जाता है व किसी स्त्रीका चित्त क्षोभित हो जाता है उसी तरह मिथ्यात्व रागद्वेषादि विभाव परिणामोंके विनाशके होते सपय जब यह आत्मा निश्चय रत्नत्रय स्वरूप शुद्धापयोगमें परिणमन करता है तब उस परिणामके निमित्तसे जैसे गारुड़ी मंत्रकी सामर्थ्यसे विष अपनी शक्तिको खोकर दूर हो जाता है उसीतरह पूर्वमें बंधा हुआ द्रव्य कर्म अपने आप ही रस रहित होकर अर्थात् फल देने योग्य न रह कर इस जीवसे अलग होता हुआ झड़ जाता है । भावार्थ-आत्माके भावोंका परिणमन पुद्गल द्रन्यके परिणमन होनेमें : निमित्त है तथा पुद्गल द्रव्यका परिणमन आत्माके भावोंके परिणमनमें निमित्त हो सक्ता है । इस कारण जब आत्मा मिथ्यात्व व रागद्वेष भावोंमें परिणमन करता है तत्र इस निमित्तसे पुद्गल द्रव्य ज्ञानावरणादि कर्मरूप परिणमन करते हैं और जब वही . SEARNA SrNGEROSe220 समयसार टीका। आत्मा शुद्ध भावोंमें परिणमन करता है तब वही द्रव्य कर्म अपनी फलदान शक्तिको व्यक्ति करनेसे रहित होकर आत्मासे स्वयं अलग होनाते हैं। जैसे किसी मंत्रवादीके खोट मंत्रके बलसे दूर देशमें स्थित किसी पुरुषका चित्त स्वयं क्षोमित व व्याकुलित हो जाता है तया किसी मंत्रवादीके शुभ मंत्रके प्रभावसे उसका वही चित्त अपने क्षोभको त्याग भी देता है उसीतरह . मात्माके भावोंसे पदल द्रव्योंमें परिणमन होता है। यहां कोई आशंका करे कि आत्माके भावोंक होने पर जड़ पुदल आने आप क्यों परिणनन करेगा उसके लिये आचार्यने दृष्टान्त दिया है कि जैसे किसीको विप चढ़ा है वह वखबर जड़के समान है-दूमरा चंतन पुरुष अपने भावोंमें ही परिणमन करता है परन्तु उन मामा निमित्त पाका उम अचंतन सहश पुरुषका विप स्वयं उतर जाता है-ऐसा ही कोई निमित्त नैमित्तिा सम्बन्ध है। इसीतरह आत्मा और पुद्गलका सम्बन्ध मानना । इसतरह स्वतंत्र व्याख्यानकी मुख्यता करके छः गाथाएं पूर्ण हुई ॥ ९८॥ भागे निबयसे वीतराग स्वसंवेदन ज्ञानका अभाव होना ही अज्ञान कहाजाता है इस लिये जज्ञानसे ही कर्म बंधते हैं ऐसा दिखलाते हैं:- गाथा:-परमप्पाणं कुव्वदि अप्पाणं पिय परं करंतो सो। अण्णाणमओ जीवों कम्माण कारगो होदि ॥ ५९॥ संस्कृतार्थः-परमात्मानं कुर्वन्नात्मानर्माप च परं कुर्वन् सः । अज्ञानमयो जीवः कर्मणां कारको भवति ॥ ९९ ॥ सामान्यार्थ-अज्ञानमई आत्मापर द्रव्यको आत्मास्वरूप मानता है वैसे ही आत्माको भी परद्रव्य स्वप जान लेता है इंप्तीलिये वह अज्ञानी द्रव्यकोका कता होता है। शब्दार्थ सहित विशेषार्थः-( अण्णाणमओ जीवो) अज्ञान मई जीव (परम्) पर द्रव्यको अर्थात् भावक्रम वा द्रव्यकर्मको (अप्पाणं कुचदि) अपना करले । है अर्थात पा द्रव्य और आत्माके भेद ज्ञानके न होनेके कारणसे आत्मास्वरूप मान लेता है (अप्पाणं पिय) तथा अपने आत्माको मी (परं करतो) पर अर्थात् अपनेसे भिन्न स्वरूप मान लेता है (मो) सो अज्ञानी जीव (कम्माण) द्रव्यकाका (कारगो) करनेवाला अर्थात त्रांधनेवाला (होदि)होता है। जैसे कोई पुरुष शीत या उष्ण पदलोंके परि- णामोंकी अवस्या होनेपर तथा उनका अनेसे सम्बन्ध होते हुए उसी तरह ठंडक या गर्मीका अनुभव करता हुआ उस अनुभवके साथ मेरा एकपना ही है ऐसा अभ्यास होनसे शीतपने व उष्णपने से मेरा क्या भेद है इसको न जानता हुआ मैं शीतरूप हूं या उष्णरूप हूं इस प्रकार मानता हुआ उस शीत व उष्ण परिणतिका कर्ता बन जाता है वैसे ही यह जीव भी अपने शुद्ध आत्माके अनुभवसे भिन्न हों उदयमें प्राप्त पूदल परिणामकी अवस्थाएं उनके निमित्तसे सुख व दुःखका अनुभव करता हुआ तथा इस अनुभवके माथ मेरा एकपना ही है ऐसा अभ्यास होनेसे सर्व राग द्वेषादि विकल्पोंस रहित-स्वसंवेदन ज्ञानके न होनेपर परद्रव्य और आत्माके .
समयसार टीका। GuitmenuinthetectedENSE भेदको न जानता हुआ मैं सुखी हूं या मैं दुःखी हूं इस प्रकार परिणमन करनेसे काँका कर्ता होता है अर्थात् भावं कर्मका कर्ता होकर द्रव्य काँका बांधनेवाला होता है । यह भाव है। भावार्थ-जन जीव भेद विज्ञान रूपी शत्रसे कर्माके उदय रूप परिणामोंके टुकड़े करता रहता हैं तब वह उनका कर्ता नहीं बनता और न बंधनको प्राप्त होता है। परंतु भेदज्ञान न होते. हुए जब यह उदयरूप अवस्थाओंमें तन्गयी हो जाता है और अपने स्वरूपको न नानकर उन रूप ही अपनी खोटी मान कर लेता है तब यह आने ही इस अज्ञान मई अपराधक कारणसे कोका कर्ता होकर द्रव्य कर्माका बांधनेवाला होता है । अतएव इस अज्ञान भावको कर भेदज्ञानको ही अपना मित्र व सहकारी करना उचित है जिससे नवीन कर्मका वध न होवै ॥ ९९ ॥ आगे कहते है कि चीतराग स्वसंवेदन ज्ञानके प्रभायमे काँका बंध नहीं होता। गाथा:-परमप्पाणमकुव्वी अप्पाणं पिय परं अकुव्वंतो। सो णाणमओ जीवो कम्माणमकारगो होदि ॥ १०० ॥ संस्कृतार्थः-परमात्मानमकुर्वन्नात्मानमपि च परमकुर्वन् । स ज्ञानमयो जीवः कर्मणामकारको भवति ॥ १०॥ सामान्यार्थः-पन्द्रव्यको आत्म स्वरूप न करता हुआ और न आत्माको परस्वरूप करता हुआ जो ज्ञानी जीव सो काँका कर्ता नहीं होता। शब्दार्थ सहित विशेषार्थ- (पर) पर द्रव्यको अर्थात् वाह्यमें देहादिकोंको अभ्यन्तरमें रागद्वेषादिक भाव कर्म और ज्ञाना- वरणादि द्रव्य कमको (अप्पाणं) भेद विज्ञानके वटसे आत्म स्वरूप रूप (अकुर्व) नहीं करता हुआ अर्थात् इन पर भावोंसे अपना सम्बन्ध न जोड़ता हुआ ( अप्पाणं पिय ) तथा अपने शुद्ध द्रव्य गुण पाय स्वभावधारी जात्माको भी (परं) पर द्रव्य स्वरूप (न कुचं तो) नहीं करता हुआ (सो णाणमओ जीवो) सो निर्मल आत्माके अनुभवको करनेवाला भेद विज्ञानी जीव (कम्माणं ) भावकर्म व द्रव्य कर्मोका ( अकारगो) अकर्ता (होदि ) होता है अर्थात् उनका कर्ता नहीं होता । जैसे कोई पुरुष शीत या उष्णरूप पुद्गलके परिणामकी अवस्थाका तथा उसी तरह शीत या उष्ण रूप अनुभवका और आत्माका भेद ज्ञान रखनके कारणसे मैं शीतरूप हूं या उष्णरूप हूं इस परिणतिका कर्ता नहीं होता है वैसे ही यह जीव भी अपने शुद्ध आत्माके अनुभवसे भिन्न पुद्गल परिणामकी अवस्थाका तथा उसके निमित्तसे होनेवाले सुख या दुःखके अनुभवका और अपने शुद्ध आत्माकी भावनासे उत्पन्न सुखके अनुभवका भेदज्ञानका अभ्यास रखनेके कारणसे पर और आत्माका भेद ज्ञान होनेपर रागद्वेष मोहरूप परिणामको नहीं करता हुआ कर्मोका कर्ता नहीं होता है। इससे यह सिद्ध हुआ कि स्वसं- वेदन ज्ञानसे कर्माका वंध नहीं होता। भावार्थ-जिस आत्माके अंतरंगमें अपने अतीन्द्रिय समयसार टीका। PromisinutesNEL आत्मननित परम सुखका और इन्द्रिय जनित विषय सुखका भेद भाव ऐमा झक रहा है । कि अतीन्द्रिय सुखको. ही सुख मानता है और इन्द्रिय सुखको दुःखरूप व आकुलतारूप जानता है उसी आत्माके उत्तप मेइज्ञान रहता है। इस भेज्ञानके बलने वह पुदर जनित अवस्याओंको अपनेसे भिन्न नानता हैं और ऐमा ही अनुभव करता है इसी कारण पुद्गलमई पावोंका कर्ता नहीं होता । अतएव सर्व विकल्पोंको छोड़कर एक निर्मल भेदज्ञानका ही अभ्यास करना कार्य- कारी है। ॥१०॥ आग शिप्यने प्रश्न किया कि अज्ञानसे कर्म कैसे बंधते है जिसका उत्तरआचर्यदो गाथाओं में कहते है:- गाथा:-तिविहो एसुवओगो अस्सवियप्पं करेदि कोधोहं । . कित्ता तस्सुवओगस्स होदि सो अत्तभावस्स ॥ १०१ ॥ त्रिविध एप उपयोग असद्विकलं करोति क्रोधोहं । कत्ता तस्योपयोगस्य भवति स आत्मभावस्य ॥ १०१ ॥ सामान्यार्य-इन तीन प्रकार उपयोगका. धारी आत्मा ऐसा असत्य विकल्प करता है कि मैं के धरूप हूं इसलिये वह आत्मा अपने इस आत्म परिणामका का होता है । शब्दार्थ सहित विशेषार्थः-(तिविहो) तीन प्रकार अर्थात् मिथ्यात्व अज्ञान व असंयम रूप (एसुवओगो) उपयोगका धारी यह आत्मा- अपने निज · स्वरूपमें स्थितरूप जो स्वस्थ भाव उसके न होनेके कारण (अस्स) असत् अर्थात् मिथ्या (वियप्पं) विकल्प (करेदि) करता है कि (अहं कोधः ) मैं क्रोधरूप हूं अथवा मानरूप हूं (सो) ऐसा होनेपर वह आत्मा (तस्सुवओगस्स ) उस ही क्रोधादि रूप उपयोगमय (अत्त भावस्स) आत्माके परिणामका (कत्ता) अशुद्ध निश्चयसे कर्ता (होदि) होता है । सामान्यपने यह उपयोग स्वरूप आत्मा अज्ञानरूप होनेके कारण एकतरहका होनेपर भी विशेष करके मिथ्यादर्शन, मिथ्याज्ञान और मिथ्याचारित्ररूपसे तीन प्रकार होकर अपने आत्मस्वरूपका और क्रोधादिक भावोंका भेदज्ञान न होनेके कारण उनके भेदोंको न जानता हुआ अपने निर्विकल्प स्वरूपसे भृष्ट होता हुआ मैं क्रोधरूप हूं, मैं मानरूप हूं इत्यादि विकल्पोंको अपने आत्माके भीतर उत्पन्न करता है तब वह आत्मा अशुद्ध निश्चयसे उस ही क्रोधादि रूप अपने उपयोगमई परिणामका कर्ता होता है। टीकाकारं कहते हैं कि आत्मा और क्रोधादि भावोंमें परस्पर भाव्य भावकपना है । भाव्य उस आत्माको कहते हैं जो क्रोधादि भावोंमें परिणमन करता है | भावक अर्थात् रंजक उस भाव क्रोधको कहते हैं जो अंतरात्माकी भावनासे विलक्षण है। इसीतरह क्रोध पदको. बदलके उसकी जगह मान, माया, लोभ, मोह, राग, द्वेष, कर्म, नोकर्म, मन, वचन, काय, श्रोत्र, चक्षु, घाण, रसना, स्पर्शन पद जोड़कर गाथाओंका व्याख्यान करनेसे १६ सूत्रोंका व्याख्यान हो जायगा । इसी तरह अनेक प्रकारसे क्षोम रहित चित् स्वभावधारी शुद्ध आत्मिक तत्वसे विलक्षण असंख्यात लोक प्रमाण विभाव परिणाम जानने योग्य हैं। ૧૨ EMORROWLEDONATISAGeet ९० OversecuriHRMALLAVAR. - समयसार टीका। भावार्थ-अपनेमें मिथ्याज्ञान होनेके कारण यह अशुद्ध आत्मा नाना प्रकार विकल्प उठा कर यही माना करता है कि मैं क्रोधरूप हूं, या मैं लोमरूप हूं, द्वेषी हूं या मैं कामी हूं। इत्यादि अशुद्ध भावोंका करनेवाला वनकर अपने स्वभावसे भृष्ट रहता है । उस समय यह आत्मा तो भाव्य है और वह क्रोधादिमई विभाव परिणाम भावक है । इन्हीं अशुद्ध विकल्पमई भावोंके. कारण यह परभावका होता कर्ता है । परभावके कर्तापनेसे कर्मोंका बंध करता है । अतएव इन विकल्पभावोंको त्याग कर अपने आत्मस्वभावमें लवलीन होना योग्य है ॥ १०१ ॥ फिर भी इसी भावको पुष्ट करते है:- गाथा:-तिविहो एसुवओगो अस्संवियप्पं करेदि धम्मादी। कत्ता तस्सुवओगस्स होदि सो अत्तभावस्सं ॥ १०२॥ त्रिविध एष उपयोग आत्मविकल्पं करोति धर्मादिकं । की तस्योपयोगस्यं भवति स आत्मभावस्य ॥ १०२ ॥ सामान्यर्थ-मिथ्यादर्शनादि तीन प्रकार उपयोग धारी आत्मा ऐसा मिथ्या विकल्प करता है कि धर्मास्तिकायरूप मैं हूं या अधर्मास्तिकायरूप मैं हूं, तब यह आत्मा अपने उस आत्मभावमई उपयोगका कर्ता होता है। शब्दार्थ सहित विशेपार्थः- ( एसु वओगो ) यह उपयोगवान आत्मा सामान्यपने अज्ञानरूप एक तरहका होने पर भी (तिविहो) विशेष करके मिथ्यादर्शन, मिथ्याज्ञान, और मिथ्या चारित्ररूपसे तीन प्रकारका होता हुआ पर द्रव्य . और आत्माके ज्ञेय ज्ञायक सम्बन्धको एकरूप निश्चय करनेसे, एकरूप जाननेसे व एकरूप परिणमन करनेसे उनके भेद ज्ञानके न होनेके कारण जानने योग्य पदार्थ और जाननेवाला आत्मा इन दोनोंके भेदको न जानता हुआ ( धम्मादी ) धर्मास्तिकाय व अधर्मास्तिकाय रूप मैं हूं इत्यादि ( अस्सं ) अपने आत्माका असत्-मिथ्या (वियप्पं) विकल्परूप अपने परिणामको ( करेदि ) पैदा करता है तब ( सो ) वही आत्मा निर्मल आत्माके अनुभवसे रहित होता हुआ (तस्स उवओगस्स अत्त भावस्स) अपने ही उस मिथ्या विकल्परूप परिणामका (कत्ता) कर्ता अशुद्ध निश्चयसे ( होदि ) होता है । यहां शिप्यने प्रश्न किया कि मैं धर्मास्तिकायरूप हूं, ऐसा कोई नहीं कहता है तब ऐसा कहना कैसे घट सक्ता है उसका समाधान आचार्य करते हैं कि यह धर्मास्तिकाय है ऐसा जो जाननरूप विकल्प मनमें उठता है उसको भी उपचारसे धर्मास्तिकाय कहते हैं जैसे घटके द्वारा घटाकार परिणतरूप ज्ञान कहा जाता है उसीतरह जानना, क्योंकि ज्ञान ज्ञेयके आकार परिणमन करता है। जब यह आत्मा ज्ञेयतत्त्व के विचारके समय ऐसा विकल्प करता है कि धर्मास्तिकाय यह है तब यह अपने शुद्ध आत्मस्वरूपको भूल जाता है । तब इस विकल्पको करते हुए मैं धर्मास्तिकायरूप हूं इत्यादि विकल्प उस जीवके उपचारसे सिद्ध होता है ऐसा प्रयोजन है। इससे यह सिद्ध हुआ कि समयमार टीका। शुद्धात्माके अनुभवके विना जो अज्ञानभाव है वही कौके कर्तापनेका कारण है । भावार्थ- जब शुद्वात्मस्वरूपके अनुभवमें तन्मई उपयोग होता है तब इसके कर्माका करनेवाला अज्ञान भाव नहीं है। जब इसके विपरीत होता है तब इसका उपयोग अज्ञान भावके कारण कर्मोका बांधनेवाला होता है ॥ १०२॥ . इसीको फिर भी कहते है:- गाथाः-एवं पराणिव्वाणि अप्पयं कुणदि मंदबुद्धीओ। अप्पाणं अवि य परं करेदि अण्णाणभावेण ॥ १० ॥ एवं पगणि द्रव्याणि भात्मानं करोति मंदबुद्धिस्तु । आत्मानमपि च परं कांत अज्ञानभावेन || १०३ ॥ सामान्यार्थ—इसीतरह यह मंद बुद्धि आत्मा अपने अज्ञानभावसे पर द्रव्यांको आत्मारूप माना करता है और आत्माको भी पर द्रव्यरूप माना करता है । शब्दार्थ सहित विशेषार्थः-( एवं ) ऊपर दो गाथाओंमें कहे प्रमाण यह ( मंद बुद्धीओ ) मंद वुडी अज्ञानी आत्मा निर्विकल्प लक्षण भेदज्ञानसे रहित होता हुआ ( अण्णाण भावेण ) अपने अज्ञान भावसे ( पराणि दव्याणि ) पर द्रव्योंको अर्थात् पर द्रव्य सम्बन्धी भावोंको कि मैं क्रोधरूप हूं व धर्मास्तिकाय रूप हूं अथवा क्रोधादिरूप अपने अशुद्ध परिणामों व धर्मास्तिकाय आदि ज्ञेय स्वरूप पदार्थोंको ( अप्पयं कुणदि ) आत्मारूप करता है अर्थात् उनको आत्मा है ऐसा मान लेता है तथा (अप्पाणं अवि य) अपने शुद्धबुद्ध एक स्वभावरूप आत्माको भी (परं) पर स्वरूप अर्थात् अपने आत्मस्वरूपसे भिन्न (करेदि ) करता है अर्थात् रागादिकोंमें उसको संयुक्त करता है। इससे यह सिद्ध हुआ कि क्रोधादिकोंको आपरूप भूत लगे हुए पुरुपके समान मान लेनेसे व धर्मादि ज्ञेय पदार्थोको आत्मस्वरूप ध्यानमें तिठे हुए पुरुषके समान जान लेनेसे जो अज्ञान भाव होता है वही अज्ञान भाव शुद्धात्माके स्वसंवेदन ज्ञानसे रहित होता हुआ कर्मोके कर्तापनेमें कारण होता है अर्थात् इसी अज्ञान भावके कारण इस जीवके कर्मोंका बंधन होता है। जैसे कोई भी पुरुष भूत आदि पिशाचोंमे यदि घिरा हुआ हो तो वह भूता- विष्ट पुरुष उम भूत पिशाचके और अपने पुरुषपनेके भेदको नहीं जानता हुआ मनुप्यसे न करने योग्य शिला उठाना, व शिलाको चलाना आदि आश्चर्यजनक व्यापारोंको करता हुआ उन व्यापारोंका आप कर्ता हो जाता है वैसे ही यह जीव भी वीतरागमई परम सामायिकमें परिणत शुद्धोपयोग लक्षण भेद ज्ञानको न पाता हुआ काम क्रोधादि भावों में और शुद्धात्मामें जो भेद है उसको न जानना हुआ मैं क्रोधरूप हूं, मैं कामरूप हूं, इत्यादि विकल्पोंको करता हुआ कर्मोका कर्ता होता है। भावार्थ-जैसे भूत ग्रसित प्राणी अपने आपको भूला हुआ जो कार्य भूत कराता है उस कार्यको करता हुआ ऐसा मानता है कि मैं इस कार्यको कर रहा हूं ऐसे ही आत्मा और परमावोंक भेद ज्ञानका न अनुभव करता ANSKARNALAYLOURSVAMERA . WEREmaati १२ समयसार टीका। हुँआ अंज्ञानी आत्मा क्रोधादि द्रव्य कर्मोके वशसे जो अपनेमें अशुद्ध भाव होते हैं. उनको अपने ही भाव मानता हुआ आप उनका कर्ता होता है । इसतरह क्रोधादि द्रव्य कर्मोके कर्तापनेके माननेमें भूताविष्ट पुरुषका दृष्टान्त है । इसी ही प्रकार जैसे कोई पुरुष महा भैंसा व गरुड़ आदिके ध्यानमें लगा हुआ भैंसा आदिका और आत्माका भेद न जानता हुआ मैं महा महिषा हूं व मैं गरुड़ हूं, कामदेव हूं, व मैं अग्नि हूं व दूधकी धाराके समान अमृतकी राशि हूं इत्यादि अपने आत्माके विकल्पोंको करता हुआ उस विकल्पका कर्ता होता है | वैसे यह नीव भी सांसारिक सुख व दुःखादिकोंमें साम्यभावकी भावनामें परिणत करते हुए शुद्धोपयोग लक्षणमई भेद विज्ञानको न पाकर तथा धर्मास्तिकाय आदि ज्ञेय पदार्थोंका और शुद्धात्माका भेद न जानता हुआ मैं धर्मास्तिकाय हूं इत्यादि अपनेमें विकल्प करता है, तब वह जीव उसी ही विकल्पका कर्ता होता है । इस प्रकार विकल्प करनेसे इस जीवके ज्ञाना- वरणादि द्रव्य कर्मोंका बंध होता है । इसतरह धर्मास्तिकाय आदि ज्ञेय पदार्थोंमें ध्यानका दृष्टान्त समाप्त हुआ । यह बात सुनकर शिप्यने प्रश्न किया, हे भगवान ! यह धर्मास्तिकाय है या यह जीव है इत्यादि ज्ञेय पदार्थोके विचारका विकल्प करते हुए यदि इस आत्माके कर्मोका बंध होता है तब फिर ज्ञेय तत्वोंका विचार करना ही वृथा हुआ, इसलिये ज्ञेय पदार्थोंका विचार करना उचित नहीं है । यह शंका सुनकर आचार्या समाधान करते हैं कि ऐसा नहीं कहना योग्य है यद्यपि मन वचन कायकी गुप्तिमें परिणमन होती हुई विकल्प रहित आत्म समाधिके समय ज्ञेय तत्त्वका विकल्प करना नहीं योग्य है तथापि तीन गुप्तिरूप निश्चल ध्यानके न होनेपर शुद्धात्माके स्वरूपको ही उपादेय मानके व आगम भाषासे मोक्षस्वरूपको उपा- देय जानके वीतरागता रहित सराग सम्यक्त के कालमें पंचेन्द्रियों के विषय और क्रोधादि कपायोंसे हटनेके लिये ज्ञेय पदार्थों का विकल्प करना योग्य है । इस तत्त्व विचारके करनेसे मुख्यतासे पुण्य बंध होता है । परंपरासे निर्वाणका लाभ होता है, इसलिये ऐसे प्रयोजनसे ज्ञेय तत्त्वोंके विचार करनेमें कोई दोष नहीं है। किन्तु तत्त्वोंके विचारके कालमें भी यह जानना योग्य है कि वीतराग स्वसंवेदन ज्ञानमें परिणमन करता हुआ शुद्धात्मा ही साक्षात् उपादेय अर्थात् गृहण करने योग्य है । फिर शिष्यने प्रश्न किया कि वीतराग स्वसंवेदन ज्ञानके विचार कालमें ऐसा जो आपने कहा उसमें वीतराग विशेषण किसलिये लगाया गया, आपने वीतराग विशेषणका प्रयोग प्रचुरताके साथ किया है तो क्या खसंवेदन ज्ञान सराग भी होता है ? इसका समाधान आचार्य करते हैं कि पंचेन्द्रियोंके विषय सम्बन्धी सुखके अनुभवका आनंदरूप खसंवेदन ज्ञान सर्व जनोंमें प्रसिद्ध सराग रूप भी है तथा शुद्ध आत्मिक सुखका अनुभव रूप स्वसंवेदन ज्ञान वीतराग रूप है । वसंवेदन ज्ञानके व्याख्यानके समयमें यह व्याख्यान सर्व ठिकाने जानना योग्य है । भावार्थ-आचार्य यहां पर बतलाते हैं कि अज्ञानभावसे यह आत्मा ?
RARMSSAKASEAN समयसार टीका। अपने अज्ञानमई भावोंको किया करता है और उन भावोंके निमित्तसे कर्मोका बंध करनेवाला होता है | अज्ञानरूप | विकल्प दो प्रकारका है एक तो क्रोधादि भावोंमें तन्मय रूप दूसरे जानने योग्य पदार्थों में तन्मय रूप जैसे भूत ग्रसित प्राणी अपनेको भूलकर भूतके निमित्तसे होनेवाली चेष्टाओंको अपनी माना करता है तैसे यह क्रोधादि कषायोंक उदयके निमित्तसे होनेवाले अशुभ भावोंको अपना मान लेता है | अन्य अजेन ग्रन्थोंमें बहुधा गरुड़ व भैंसा व कामदेव आदिका ध्यान करना कहा है। जब कोई इनका ध्यान करता है तब उस ही रूप अपना विकल्प करता है इसतरह जो कोई धर्मास्तिकाय आदि परद्रव्योंक विचारमें उपयोगको लगाता है वह उस विकल्प रूप होकर अपनेको उस विकल्पका कर्ता मानता है । तब व समाधि रूप शुद्धोपयोग मावसे हटा हुआ अपनेमें शुद्ध भावक अभावसे राग अंशकी अधिकता व हीनताके समान द्रव्य कर्मोका बंध करता है । इस कारण अन्य विकल्पोंको त्याग एक शुद्धात्म स्वरूपमें तन्मय रूप स्वसंवेदन ज्ञानका ही अनुभव करना कार्यकारी है ।।१०।। आगे कहते है कि इस कथनसे यह सिद्ध हुआ कि शुद्धात्माका अनुभव रूप लक्षणको घरनेवाले सम्यग्ज्ञान के प्रतापसे कमका कर्तापना नष्ट होता है। गाथाः-एदेण दु सो कत्ता आदा णिच्छयविदूहिं परिकहिदो। एवं खलु जो जाणदि सो मुंचदि सव्वकत्तित्तं ॥१०४॥ संस्कृतार्थ:-एतेन तु स कर्त्तात्मा, निश्चयविद्भिः परिकथितः । एवं खलु यो जानाति स मुंचति सर्वकर्तृत्वं ॥ १०४ ॥ सामान्यार्थ-इसतरह पूर्वमें कहे हुए गाथा तीनके द्वारा यह कहा गया कि अज्ञान भावसे यह आत्मा पर द्रव्यका कर्ता होता है ऐसा निश्चयके ज्ञाता कहते हैं। यह बात जो कोई ज्ञानी निश्चयसे जानता है वह सर्व कर्मोके कर्तापनेको त्याग देता है । शब्दार्थ सहित विशे- पार्थः-(एदेणदु) इसप्रकार जैसा कि पहले तीन गाथाओंमें व्याख्यान कर चुके हैं अज्ञान भावसे ही (सो आदा) सो अज्ञानी आत्मा (कत्ता) पर द्रव्यका कर्ता होता है ऐसा (णिच्छय- विदूहि) निश्चयके जाननेवाले सर्वज्ञोंके द्वारा (परिकहिदो) कहा गया है । प्रयोजन यह कि जब यह आत्मा उस अज्ञान भावरूप परिणमन करता है जो कि वीनगग पग्म मामायिक रूप संयममें परणमन करते हुए अभेद रत्नत्रयका प्रतिपक्षी है अर्थात् जिसके होते हुए परम स्वरूपमें लयता नहीं प्राप्त होती है, तब यह आत्मा उस ही मिथ्यात्व राग द्वेषादिरूप अज्ञान भावका कर्ता हो जाता है । तब इसके इस अज्ञान भावके कारण ज्ञानावरणादि द्रव्यकर्मोका बंध होता है परंतु जब यह आत्मा चिदानंदमई अपने स्वभावरूप शुद्धात्माके अनुभव स्वरूप परिणाममें परिणमन करता है तब सम्यग्ज्ञानी होकर मिथ्यात्व, गग आदि भावकर्ममई अ- ज्ञान भावका कर्ता नहीं होता है । तब इस कर्तापनेके न होनेपर द्रव्यकोका बंध भी नहीं होता है ( एवं ) इसप्रकार (जो) जो कोई (खलु) निश्चयसे (जाणादि) बस्तुके स्वरूप + Jaitrinawwwtarika समयसार टीका। meenausinemaNAGALAN को जानता है (सो) सो (सव्वकत्तित्तं ) सर्व कर्तापनेको (मुंचदि) त्याग देता है अर्थात् प्रथम सराग सम्यग्दृष्टी होकर अशुभ कम्मौके कर्तापनेको त्यागता है फिर निश्चय चारित्रके साथ नियमसे होनेवाले वीतराग सम्यग्दर्शनको प्राप्तकर वीतराग सम्यग्दृष्टी होकर शुभ और अशुभ दोनों प्रकारके सर्व कर्मोके कर्तापनेको त्याग देता है । भावार्थ:-इस अज्ञानी जीवका अपने शुद्धात्म सम्बन्धी परिणतिको छोड़कर निरंतर पर परणतिमें ही परिणमन होता है । इस कारण जो शुभ या अशुभ भाव होने हैं, उनका मैं करनेवाला है, ऐसा अहंकार करता है इस ही कर्त्तापनके अहंकारके कारण द्रव्यकर्मका बंध इस संसारी जीवके होजाता है । परंतु जो सम्यग्दृष्टि ज्ञानी है वह शुभ या अशुभ भावोंको अपने स्त्र- रूपके रमणेमें बाधाकारी जानकर उनका मैं कर्ता हूं ऐसा अहंकार नहीं करता है । सगग अवस्थामें इन भावोंको हेय निश्चय करते हुए भी इस प्रकारका उद्यम करता है कि अशुभ भावोंसे वचू और शुभमें प्रवर्तन करूं | जब धीरे २ शक्ति बढ़ जाती है। तव वीतरागी होकर कोका नाश कर परम कल्याणमय मोक्ष अवस्थाको प्राप्त होजाता है। इससे यह सिद्ध हुआ कि मिथ्याज्ञान व अज्ञानसे कर्मोका उपार्जन व सम्यग्ज्ञानसे कर्मोका नाश होता है । इसतरह अज्ञानी और सज्ञानी जीवको कथन करनेकी मुख्यतासे द्वितीय स्थलमें ६ गाथाएं पूर्ण हुई । इसतरह द्विक्रियावादीको खंडन करते हुए विशेष व्याख्यानरूप १२ गाथाएं पूर्ण हुई। अब फिर भी संकोचरूप संक्षेपमें ग्यारह गाथाओं तक इस द्विक्रियावादीका खंडन करते हुए विशेष व्याख्यान करते हैं ।। १०४ यद्यपि व्यवहारी लोग ऐसा कहते हैं कि आत्मा परभावोंको कर्ता है परंतु यह कहना व्यवहारी लोगोंका व्यामोह अर्थात् मूढ़पना है ऐसा दिखलाते हैं:- गाथाः--वहारेण दु एवं करेदि घडपडरहादिव्वाणि । करणाणि य कम्माणि य णोकम्माणीह विविहाणि ।। १०५ ।। संस्कृतार्थ व्यवहारेण त्वारमा करोति घटपटरयादि द्रव्याणि । करणानि च कर्माणि च नोकर्माणीह विविधानि ।। १०५ ।। सामान्यार्थः जैसे कोई आत्मा व्यवहारसे एकमेक होकर घट पट रथं आदि द्रव्यों- को इच्छा पूर्वक कर्ता है वैसे इस जगतमें यह आत्मा पांच इन्द्रियोंको, नानाप्रकार द्रव्यकर्मोको तथा · नोकर्मोको करता है । शब्दार्थ सहित विशेपार्थः-( एवंदु) इसी प्रकारसे ही जैसे कोई आत्मा ( ववहारेण ) अनन्य व्यवहारसे अर्थात् व्यवहारके साथ एकमेक होकर (घडपड- रहादि दव्वाणि) घट, पट, रथ आदि बाह्य द्रव्योंको (करेदि) इच्छा पूर्वक करता है तैसे ही (इह) इस लोकमें यह आत्मा अभ्यंतरमें भी (करणाणि) पांच इन्द्रियोंको (य) और (विविहाणि) नाना प्रकारके (कम्माणि ) क्रोधादि व ज्ञानावरणादि द्रव्य कर्मोको (य) और (गोकम्माणि) RSONUSIVERS Free समयसार टीका। औदारिक शरीरादिक नोकर्मोको ईहा पूर्वक अर्थात् इच्छा पूर्वक विशेष रहित करता है। ऐसा मानना व्यवहारी जीवोंका व्यामोह अर्थात् मूढ़ पना है | भावार्थ:-जो कोई ऐसा मानता है कि यह आत्मा एकमेक होकर अपनेसे पर स्वरूप पदार्थोंका करनेवाला है वह पुरुष अज्ञानी है ।। १०५॥ आगे आचार्य कहते हैं कि यह व्यामोह सत्य नहीं है:- गाथा:--जदि सो परदव्वाणि य करिज णियमेण तम्मेओ होज । जमा ण तम्मओ तेण सो ण तेसिं इवदि कत्ता ॥१०॥ संस्कृतार्थः-यदि स परद्रव्याणि च कुर्यान्नियमेन तन्मयो भवेत् । यस्मान्न तन्मयस्तेन स न तेषां भवति का ॥१०॥ सामान्यार्थ:-यदि यह जीव नियमसे पर द्रव्योंको करने लगे तो तन्मई होजावे पर द्रव्योंके साथ एकमेक होजावे । परन्तु यह आत्मा परद्रव्योंके माथ तन्मई नहीं होता है इससे उनका कर्ता नहीं है । शब्दार्य सहित विशेषार्थः-(जदि) यदि (सो ) वह आत्मा ( परदव्याणि) पर द्रव्योंको (णियमेण ) एकान्त रूपसे ( करिज ) करै तो (तम्मओ) तन्मयी ( होज) होजावे। (जम्हा) क्योंकि वह आत्मा स्वभावसे ही शुद्ध अपने स्वभाविक अनंत सुख आदि रूपको त्यागकर ( तम्मओ ण) पर द्रव्यके सोथ तन्मई नहीं होता है अर्थात् अपने चेतन स्वभावको त्याग कर पुद्गलमई जड़ स्वरूप नहीं होता ( तेण ) इसलिये (सो ) वह आत्मा ( तेसिं ) उन पर द्रव्योंका उपादानरूपसे ( कता) करनेवाला (ण) नहीं (हवदि. ) होता है । भावार्थः- यहां उपादान कारणकी अपेक्षा कथन है कि यह आत्मा परद्रव्योंका कर्ता नहीं है जैसे मिट्टी कलशकी कर्ता है इस तरह पुद्गलके साथ जीवका कापना नहीं है | यदि ऐसा कर्तापना मानेंगे तो जीव पुद्गलके साथ तन्मई होजावेगा, सो ऐमा होता नहीं । जो ऐसा मानते हैं उनका मूढपना है ।। १०६ ॥ आगे कहते है कि केवल उपादान रूपसे कर्ता नहीं होता है यह बात नहीं है किन्तु निमित्त रूपसे भी परद्रव्यका कर्ता नहीं होता ऐसा उपदेश करते हैं:- गाथा:-जीचो ण करेदि घडं व पडं व से सगे दवे । जोगुवओगा उप्पादगा य सो तेसिं हवदि कत्ता ॥१०॥ संस्कृतार्थ:-जीवो न करोति घटं नैव पटं नैव चेपकानि द्रव्याणि । योगोपयोगावुत्पादकौ च तयोर्मवति कत्ती ।। १७ ॥ सामान्यार्थः -न तो जीव घटको बनाता है न पटको और न अन्य द्रव्यको-योग और उपयोग ही कार्यके उत्पन्न करनेवाले हैं, वह आत्मा इन योग उपयोगोंका कर्ता होता है शब्दार्थ सहित विशेषार्थ-(जीवो ) यह जीव निमित्त रूपसे भी (घडं ) घड़ेको (णकरेदि) नहीं करता है (णेव पड़) न पटको (णेव) और न (सेसगेदव्वे ) अन्य द्रव्योंको करता है Howevermission समयसार टीका। an AMAN Koes ९६ क्योंकि यदि ऐसा निमित्त रूपसे भी करै तो इस जीवके सर्व काल कमेंका कर्तापना हो जायगा । तब फिर कौन करता है इस प्रश्न पर आचार्य कहते हैं कि (जोगुवओगा) आत्माके विकल्प मई व्यापार रूप विनाशिक योग और उपयोग ( उप्पादगाय) इन पदार्थोंके उत्पन्न करनेवाले हैं। (सो) वह आत्मा जिस समय संसारिक सुख और दुःखमें व जीवन मरण आदि अवस्थाओंमें समताकी भावनामें परिणमन रूप जो अभेद रत्नत्रय लक्षणको धरनेवाला भेदविज्ञान है उसको न पाकर शुद्ध बुद्ध एक स्वभाव मई परमात्म स्वरूपसे भृष्ट होता है तब ही (तेसिं) उन योग और उपयोगोंका कदाचित् (कता) कर्ता (बदि) होता है । सर्वदा नहीं होता है । योग शब्दसे वाह्य हाथ आदिका व्यापार समझना, उपयोग शब्दसे अंतरमें होनेवाला विकल्प समझना | इस तरह परंपरा करके निमित्त रूपसे घटादि पदार्थों में जीवका कर्तापना हो सक्ता है । मुख्यतासे नहीं । यदि मुख्य वृत्तिसे निमित्त रूप कर्तापना होवै तो जीवके सदा ही कर्मका कर्तापना होनेका प्रसंग आ जावे, क्योंकि जीव नित्य है और तब मोक्षका अभाव हो जावे | भावार्थः-यदि यह जीव परद्रव्योंका कर्ता निमित्त रूपसे हो जावे तो सदा ही इसके कर्तापना रहा करे और तब पर द्रव्योंके कतृत्त्वसे मुक्ति नहीं हो सकती । परन्तु ऐसा नहीं है । परद्रव्योंके करनेवाले योग और उपयोग हैं । मन, वचन, कायका हलनरूप व्यापार सो योग है । आत्माके विभाव भाव सो उपयोग हैं । अतः आत्मा जब अपनी स्वसमाधिमें लीन नहीं होता है तब इन योग और उपयोगोंका कर्ता होता है। तब यह योग और उपयोग परद्रव्योंके होनेमें निमित्तकारण होते हैं। ऐसा जानकर यही निश्चय करना योग्य है कि यह आत्मा मुख्यतासे पर द्रव्योंके करनेमें भी निमित्त कारण नहीं है किन्तु परंपराकी अपेक्षासे है । इस कथनसे आत्माको परद्रव्यके कर्तापनेसे निश्चयनयकी अपेक्षा उदासीन जान निश्चय आत्म स्वरूपमें ही तन्मय होना योग्य है। इस तरह व्यवहारके व्याख्यानकी मुख्यता करके तीन गाथाएं पूर्ण हुई ।। १०७ ॥ आगे कहते है कि वीतराग स्वसंदेन ज्ञानी अपने ज्ञान स्वभावका ही कर्ता है परभावका कर्ता नहीं है:- गाथाः-जे पुग्गलवाणं परिणामा होति णाणआवरणा। ण करेदिताणि आदा जो जाणदि सोहवदिणाणी ॥१०८॥ संस्कृतार्थ--ये पुद्गलद्रव्याणां परिगामा भवंति ज्ञानावरणानि । न करोति तान्यात्मा यो जानाति स भवति ज्ञानी ॥ १०८ ।। सामान्यार्थः-जो ज्ञानावरणादि पुद्गलके परिणाम होते हैं उनको यह आत्मा नहीं कर्ता है किन्तु जो उनकी अवस्थाओंको जानता है वह ज्ञानी है । शब्दार्थ सहित विशे- पार्थः-(जो ) जो (पुग्गलदव्वाणं ) कर्मवर्गणायोग्य पुद्गल द्रव्यकी ( परिणामा ) पर्यायें (णाणावरणा) ज्ञानावरणी दर्शनावरणी आदि द्रव्यकर्मरूप (होति ) होती हैं (ते) - Desemomerservernmes समयसार टीका। उन पर्यायोंको (आदा) यह आत्मा व्याप्य व्यापक होकर जैसे मिट्टी कलशको बनाती है ऐसे (ण करेदि ) नहीं करता है। जैसे ग्वाला गोरसका करनेवाला व्याप्य व्यापकरूपसे नहीं है ऐसे आत्मा परद्रव्यकी पर्यायोंका कर्ता नहीं है । (दु) किन्तु (जो) जो कोई ( जाणदि) इन द्रव्यकर्मोको मात्र जानता है. (मो) वही जीव मिथ्यात्त्व, विषय और कयायोंको त्यागकर विकल्प रहित समाधिमें ठहरा हुआ (गाणी) सम्यग्ज्ञानी (हवदि) होता है । प्रयोजन यह है कि केवल जाननेसे ही ज्ञानी नहीं है उसका स्वसमाधिमें लीन रहना ही सम्यग्ज्ञानीपना है। यहां यह तात्पर्य है कि वीतराग स्वसंवेदन ज्ञानी जीव शुद्ध नयसे व शुद्ध उपादान रूपमे शुद्ध ज्ञानका ही कर्ता है । जैसे सुवर्ण अपने पीतपने आदि गुणोंका व अग्नि अपने गर्मपन आदि गुणोंका व सिद्ध परमेष्टी अपने अनंत ज्ञानादि गुणोंके कर्ता है किन्तु यह आत्मा मिथ्यादर्शन व रागडेपादिरूप अज्ञान भावका कर्ता नहीं है शुद्ध उपादान रूपमे यह आत्मा शुद्ध ज्ञान आदि भावोंका कर्ता है अशुद्ध उपादान रूपसे अर्थात् अशुद्ध दशाकी अपेक्षा मिथ्यात्व व रागद्वेषादि भावोंका कर्ता है। जिस रूप आप हो उस रूप ही परिणमन होता है । इस ही परि- णमनको ही कर्तापना और भोक्तापना कहते हैं ऐसा जानना योग्य है। जैसे कुम्हार घटके वनानेमें इच्छापूर्वक हाथके व्यापारादिको करता है उस समान नहीं। भावार्थ-कर्तापना औरभोक्तापना दोनों ही अपने भावोंका परिणमन है । अशुद्ध आत्माके ज्ञानोपयोगका परिणमन अज्ञानरूप होता है इसलिये वह अज्ञानं भावका कर्ता है । अशुद्ध आत्मा पर वस्तुमें मोह करता हुआ अपने उपयोगको राग रूप परणमाता है इससे वह इस राग भावका भोक्ता कहा जाता है। शुद्ध आत्मा शुद्ध भावका ही कर्ता और शुद्ध भावका ही भोक्ता है । ऐसा जान अपने शुद्ध परिणमनमें वर्तना ही कार्यकारी है ऐमी भावना करनी योग्य है। ऊपरकी गाथाके भावके अनुसार गाथामें ज्ञानावरणीयके स्थानमें दर्शनावरणीय, वेदनीय, मोहनीय, आयु. नाम, गोत्र, अंतराय इन सात कके भेदोंको लगाकर वैसे ही मोह, राग, द्वेष, क्रोध, मान, माया, लोभ, व नोकर्म व मनयोग, वननयोग, काययोग व श्रोत्रेन्द्रिय, चक्षुरिन्द्रिय, घाणेन्द्रिय, रसनेन्द्रिय, स्पर्शनेन्द्रिय ऐसे १६ पदोंको जोड़कर सूत्र व्याख्यान करने योग्य हैं। इसीतरह शुद्धात्माके अनुभवसे विलक्षण असंख्यात लोकप्रमाण अन्य मी विभाव परिणाम जानने योग्य हैं। भावार्थ, यह आत्मा निश्चयसे इन सर्व विभाव भावोंका कर्ता और भोक्ता नहीं है ऐसा अनुभव करना योग्य है ॥ १०८॥ आगे कहते है कि अनानी आत्मा भी राग द्वेपादिल्य अज्ञान भावका ही कर्ता है परंतु जानावरणीय आदि पर द्रव्योंका कर्ता नहीं है। गाथा:-जं भावं सुहमसुहं करेदि आदा स तस्स ग्वत्लु कत्ता । तं तस्स होदि कम्म सो तस्स वेदगो अप्पा ॥ १९ ॥ - 4
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९८
समयसार टीका।
संस्कृतार्थः-यं भावं शुभमशुभं करोत्यात्मा स तस्य खलु कता ।
तत्तस्य भवति कर्म स तस्य तु वेदक आत्मा || १०९॥
सामान्यार्थः--जो शुभ व अशुभ भाव यह आत्मा करता है उस भावका कर्ता यह
आत्मा निश्चयसे होता है। और वह भाव उस आत्माका कर्म होता है तथा उस भावका
भोक्ता वही आत्मा होता है । शब्दार्थ सहित विशपार्थ-(आदा) यह आत्मा चिदानंद
मई एक स्वभावकी अपेक्षासे एक रूप होनेपर भी साता तथा असाताकी उदयकी अवस्थामें
तीव्र या मंद स्वादरूप वा सुख दुःखरूप अपने दो भेद करता हुआ (ज सुहं असुहं भावं
करेदि) जो शुभ या अशुभ भाव करता है (तम्स) उस भावका स्वतंत्ररूपसे (खलु कत्ता) स्पष्ट-
पने कर्ता होता है। और (तस्स) उस आत्माका (तं कम्म) वह शुभ व अशुभ परिणाम भाव-.
कर्म (होदि) होता है क्योंकि वह भाव आत्माद्वारा किया गया है। (दु) तथा (सो अप्पा) वह
आत्मा (तस्स) उस शुभ व अशुभ भाव कर्मका (वेदगो) भोगनेवाला होता है क्योंकि यह
आत्मा स्वतंत्ररूपसे उन भावोंको भोक्ता है । द्रव्य कर्मोंको नहीं भोक्ता है। विशेष यह है
कि अज्ञानी जीव अशुद्ध निश्चय खरूप अशुद्ध उपादानकी अपेक्षा मिथ्यात्व, रागद्वेष आदि
भावोंका ही कर्ता होता है ज्ञानावरणादि द्रव्य कर्मोका कर्ता नहीं होता । आत्माको द्रव्य
कर्मका कर्ता असदभूत व्यवहार नयकी अपेक्षासे कहा गया है। इस कारण इस अशुद्ध निश्च-
को निश्चयकी संज्ञा दी गई है । तो भी शुद्ध निश्चयकी अपेक्षासे इस अशुद्ध निश्चयको
व्यवहार ही कहते हैं । यहां शिष्यने प्रश्न किया कि हे भगवन् आपने कहा कि यह आत्मा
अशुद्ध उपादान रूपसे रागादिक भावोंका कर्ता है तब क्या इस उपादानके शुद्ध या अशुद्ध
रूपसे दो भेद होते हैं ? इसका समाधान आचार्य करते हैं कि उपाधिरूप जो उपादान
होता है उसको अशुद्ध उपादान कहते हैं जैसे गर्म लोहेका पिंड अग्निकी उपाधिसे गर्म है
इसी तरह द्रव्य कर्मोंकी उपाधिके वशसे आत्मा अशुद्ध होता है इसीको अशुद्ध उपादान
कहते हैं । उपाधि रहित उपादानको शुद्ध कहते हैं जैसे सुवर्णमें पीतपनाआदि गुण स्वभाव-
से हैं, व अनंतज्ञान आदि गुण सिद्ध भगवानमें स्वभावसे हैं व उप्णत्व आदि गुण अग्निमें हैं।
स्वाभाविक शुद्ध गुणोंके आधारको शुद्ध उपादान कहते हैं । इस तरह शुद्ध या अशुद्ध उपा-
दानका स्वरूप व्याख्यानके समय सब जगह याद रखना योग्य है। भावार्थ-यह
आत्मा उपादान रूपसे अपने ही भावोंका कर्ता और भोक्ता है ऐमा जान यह आत्मा पर
द्रव्योंका कर्ता है. यह भ्रम त्यागने योग्य है ।। १.०९ ॥
आगे कहने है कि कोई भी उपादान कारणसे पर द्रव्य सम्बन्धी भाव नहीं किया जासक्ता है:-
गाथा:-जो जामि गुणो व्ये सो अण्ण दु ण संकमदि दव्वे ।
सो अपणमसंकतो कह तं परिणामए दव्वं ॥ ११० ॥
AmA ९९ ३ - समयसार टीका। संस्कृतार्थ:-यो यस्मिन् गुणो द्रव्ये सोन्यस्मिंस्तु न संक्रामति द्रव्ये । सोन्यद संक्रांतः कथं तत्परिणामयति द्रव्यं ॥ १०१ ॥ सामान्पार्थः-जो गुण जिस द्रव्यमें होता है वह अन्य द्रव्यमें नहीं बदल सकता है जब एक गुण दूसरे गुणरूप नहीं बढ़लता है तब वह कसे अन्य द्रव्यको अन्यरूप परिणमन करा सक्ता । शब्दार्थ महित विशेषायः- -(जा गुणो) जो चेतन या अचेतन गुण (जमि दवें) जिस चेतन या अचेतन द्रव्यमें अनादि सम्बन्धसे स्वभावसे ही वर्तन कर रहा है (सो) वह चेतन या अचेतन गुण (अण्ण दल्ने)अन्य द्रव्यमें (दु ण संकमदि)नहीं बदलता है (मो)वह चेतन या अचेतन गुण (अण्णम्) अपने गुणीसे दूसरे द्रव्यरूप (अमंकतो) नहीं बदलता हुआ (कह) किसतरह (तं दब्ब) उस अन्य द्रव्यको (परिणामए) परिणमन करावेगा अर्थात उपादान कार- णसे किसी भी तरहसे एक द्रव्य दूसरे द्रव्यरूप व एक गुण दूसरे गुणरूप नहीं परिणमन करता है। भावार्थ-हर एक द्रव्य अपने अपने स्वरूपमें ही परिणमन करता है | कोई द्रव्य दूसरे द्रव्यरूप नहीं हो सका न चेतन अचेतन हो मक्ता है और न अचेतन चेतन हो सकता है, इसलिये ऐमा निश्चय करना योग्य है कि आत्मा उपादान रूपसे पर पढ़ार्थीका कभी कर्ता नहीं हो सका। इस गाथासे सिद्ध हुआ कि आत्मा पुद्गल काँका कर्ता नहीं है ।। १११ ।। इसीको फिर भी दृढ़ करते है:- गाथा:-दव्वगुणस्स य आदा ण कुणदि पुग्गलमयमि कम्ममि । तं उभयमकुव्वंतो तम्हि कहं तस्स सो कत्ता ॥ १११ ।। संस्कृतार्थः-द्रव्यगुणस्य च आत्मा न करोति पुद्गलमयकर्मणि । तदुमयमकुर्वन्तस्मिन्कयं तस्य स कर्ता ॥११॥ सामान्यार्थ--यह आत्मा पुद्गलमई कर्ममें न तो पुद्गलमई द्रव्यको करता है और न गुणको । इन दोनोंको नहीं करता हुआ आत्मा किस प्रकार उम पुद्गलमई कम्मका का हो सक्ता है ? शब्दार्थ महित विशेषार्थः--(दव्वगुणम्म व आदा न कुणदि पुग्गलमयमि कम्महि ) जैसे कुम्हार कर्ता मिट्टी के बने हुए कलशनामा कर्मक विषयमें मिट्टी द्रव्यका जो कि जड़ स्वरूप है व मिट्टीके वर्णादि गुणोंका इसतरह करनेवाला नहीं है जैसे मिट्टी कलशको तन्मई होकर बनाती है। ऐसे ही यह आत्मा भी पुद्गलमई द्रव्यकर्मके विषयमें पुद्गलमय द्रव्यकर्म जड़ स्वरूपको व उसकेवर्णादि गुणोंको तन्मयहोकर नहीं करता है (तंउभयमकुन्वंतो तसि कहं तस्स सोकत्ता)जब यह आत्मा पुद्गल द्रव्यकोव उसके वर्णादि गुणोंको इन दोनोंको भी तन्मई होकर नहीं करता है तब पुद्गल कर्मके विषयमें वह जीव कैसे कर्ता हो सकता है। अर्थात् किसी भी तरह नहीं होता है। क्योंकि चेतन अपनेसे भिन्न पर स्वरूप अर्थात् अचेतनरूप नहीं परिणमन करता है। इससे यह कहा गया कि जैसे स्फटिक पत्थर निर्मल है तो भी जपा पुष्प आदि परकी उपाधि - PRANTHROCEROSIS TESUCRKnocret समयसार टीका। लगनेसे उसरूप परिणमन कर जाता है। तेसे कोई भी सदाशिव नामका सदा मुक्त और अमूर्त होने पर भी परकी उपाधिसे परिणमन करके जगतूको बनाता है। इस कथनका निरा- करण किया गया। क्योंकि मूर्तिक पदार्थ स्फटिक है इसीसे उसमें मूर्तिक उपाधिका संबंध घट सक्ता है परन्तु जो सदामुक्त और अमूर्तिक है उसके किस तरह मूर्तिककी उपाधि लग सक्ती है ? अर्थात् किसी भी तरह नहीं लग सक्ती। जैसे सिद्ध जीवमें मुक्त अवस्थामें पुद्गल- मई उपाधि नहीं होसकी । परन्तु अनादि कालसे कर्मबंध प्राप्त जीव द्रव्यके जो कि शक्ति रूप शुद्ध निश्चयसे अमूर्त है।तो भी व्यक्तिरूप व्यवहारमें मूर्तिक है। इस मूर्तिक उपाधिका दृष्टान्त घटता है यह भावार्थ है । भावार्थ-आत्मा शुद्ध निश्चयसे पर द्रव्य या पर.गुणका कर्ता नहीं होता है । अशुद्ध जीवके कर्मोके उदयके वश अशुद्ध भावरूप परिणमन होता है अर्थात् उसके औपाधिक भाव होते हैं परन्तु शुद्ध जीवके साथ पुद्गल द्रव्य कुछ नहीं कर सक्ते । इसी तरह यह भी सिद्ध किया कि सदा मुक्त अमूर्त ईश्वरके कोई औपाधिक भाव नहीं होसकता जिससे वह जगतको बनावे । इसतरह चार गाथाओंके द्वारा निश्चयनयकी मुख्यतासे व्याख्यान किया गया।॥१११।। आगे कहते हैं कि आत्मा द्रव्य कमेंको करता है ऐसा जो कहा जाता है सो केवल उपचार मात्र है- गाथा:-जीवह्मि हेतुभूदे बंधस्त य पस्सिदूण परिणामं । जीवेण कदं कम्म भण्णदि उवयारमत्तेण ॥ ११२॥ संस्कृतार्थ:-जीवे हेतुभूते बंधस्य च दृष्ट्वा परिणाम । जीवेन कृतं कर्म भण्यते उपचारमात्रेण || ११२ ॥ सामान्यार्थ—जीवके निमित्त कारण होने पर कर्मबंधी पर्याय होती है ऐसा देख कर जीवने यह कर्म किया है, ऐसा उपचार मात्र कहा जाता है। शब्दार्थ सहित विशेषार्थ- (जीवह्मि हेदुभूदे बंधस्स य पस्सिदूण परिणाम) परम उपेक्षा संयमकी भावनामें परिणमन होता हुआ अभेद रत्नत्रय लक्षण स्वरूप भेदज्ञानकी प्राप्ति न होनेपर मिथ्यात्त्व व रागद्वेषादि जीवकी परिणतिके निमित्त होते हुए कर्मबर्गणा योग्य पुद्गल ज्ञानावरणादि द्रव्य कर्मवंधरूप इसी तरह परिणमन करते हैं जैसे पुद्गल मेघोंका समूह चन्द्रमा व सूर्यके मंडल आदिके संयुक्त योग्य कालके निमित्त होते हुए इन्द्र धनुष आदि रूप परिणमन कर जाते हैं । इसतरह द्रव्यकर्म बंधके परिणामको अर्थात् द्रव्य कर्म बंधकी पर्यायको देख करके (जीवेण कई कम्म भण्णदि उवयारमत्तेण ) जीवने यह कर्म किया है ऐसा उपचार मात्र कहा जाता हैं। भावार्थ-जैसे संध्याकालमें मेघोंकी घटाओंके रहते हुए तथा चंद्रमा यो सूर्य मंडलंकें रहते हुए आकाशके तिष्ठे हुए पुद्गल इन्द्र धनुषके आकार परिणमन कर जाते हैं इसी तरह जीवके रागद्वेषादि परिणामोंके निमित्त होते हुए - द्रव्यंकर्मवर्गणाएं द्रव्यकर्मरूप परिणमन कर जाती हैं। इसी कारणसे व्यवहारमें जीवको पुद्गलद्रव्य कर्मका कर्ता कहते हैं ॥ ११२ ॥ - 4 समयसार टीका। ..१०१ आगे इसी उपचार मात्र कर्ता कम्मेपनेको दृष्टान्त और दाष्ट्रान्तसे दृढ़ करते है । ::. :- गाथाः-जोधेहिं कदे जुडे राएण कदति पदे लोगो। 'तह ववहारेण कदं णाणावरणादि जीवेण ॥. ११३-1, . - संस्कृतार्थः-योधैः कृते युद्ध राज्ञाकृतमिति जल्पते लोकः । तथा व्यवहारेण कृतं ज्ञानावरणादि जीवन || ११३ ॥ सामान्यार्थ-जैसे योद्धाओंने युद्ध किया हो परन्तु लोग यही कहते हैं कि राजाने : युद्ध किया । ऐसे ही व्यवहार नयसे यह कहनेमें आता है कि जीवने ज्ञानावरणादि कर्म किये हैं। इससे यह सिद्ध हुआ कि यद्यपि शुद्ध निश्चय नयसे शुद्ध बुद्ध एक स्वभाव रूप होनेके कारणसे. यह आत्मा न तो पुद्गल कर्मको उत्पन्न करता है, न करता है, न बांधता है, न परण- माता हैं, और न ग्रहण करता है तथापि व्यवहार नयसे ऐसा करता है ।। ११३ ।। इसी वातको फिर भी कहते हैं:- गाथाः--उप्पादेदि करेदि य बंधदि परिणामएदि गिण्हदि य । आदा पुग्गलदव्वं ववहारणयस्य वत्तव्यं ॥ ११४ ।। संस्कृतार्थः--उत्पादयति करोति च बध्नाति परिणामयति गृह्णाति च । आत्मा. पुद्गलद्रव्यं व्यवहारनयस्य वक्तव्यं ॥ ११४ !! सामान्यार्थः-व्यवहार नयके अभिप्रायसे यह कहना योग्य है कि यह आत्मा पुद्गल द्रव्यको उत्पन्न करता है, व कराता है, बांधता है, परिणमन कराता है व ग्रहण करता है। विशेषार्थ--अनादि कालसे कर्मबंधकी पर्यायं होनेके कारणसे वीतराग स्वसंवेदन लक्षण भेदज्ञानके अभावसे रागद्वेषादि परिणामोंसे स्निग्ध अर्थात् चिकना होता हुआ यह आत्मा कर्म वर्गणा योग्य पुद्गल द्रव्यको जैसे कुम्हार घटको करता है इस तरह द्रव्यकर्मीको उत्पन्न करता है, व करता है, बांधता है, परिणमन कराता है व ग्रहण करता है यह सब व्यवहार नयके अभिप्रायसे कहना योग्य है व व्याख्यान करना योग्य है, अथवा प्रतिबंधको पैदा करता है, स्थितिबंधको करता है, अनुभाग बंधको वांधता है । व प्रदेशबंध रूप परणमन करता है | इसतरह जैसे गर्म तपा हुआ लोहेका पिंड चारों तरफसे जलको खींचकर ग्रहण करता है इसी. तरह रागी आत्मा अपने सर्व आत्माके प्रदेशोंके द्वारा कर्मबंधको ग्रहण करता है यह अभिप्राय है ॥ ११५ ॥ अब इस ही व्याख्यानको दृष्टान्त और दाष्ट्रान्तसि दृढ़ करते है:- गाथाः-जह राया ववहारा दोसगुणुप्पादगोत्ति आलविदा । तह जीवो ववहारा दव्वगुणुप्पादगो भणिदो ॥ ११५ ।। संस्कृतार्थ:--यथा राजा व्यवहारेण दोरगुणोत्पादक इत्यालपितः । तथा जीवो व्यवहाराद्व्यगुणोत्पादको भणितः ॥ ११५ ॥ ...- DECERRACURRAMESSAMRA १०२ समयसार टीका। सामान्यार्थ-जैसे राजा व्यवहार नयसे प्रजाके दोप और गुणोंको पैदा करनेवाला है ऐसा कहा जाता है, तैसे यह जीव व्यवहार नयसे पुद्गल द्रव्यके पुण्य पाप गुणोंको उत्पन्न करनेवाला है ऐसा कहा जाता है। शब्दार्थ सहित विशेपार्थ-(जह ) जैसे (राया) देशका पालक राजा (ववहारा) व्यवहार नयसे (दोस गुणुप्पादगोत्ति) दोष सहित तथा दोष रहित मनुष्योंमें दोप और गुणोंको पैदा करनेवाला है ऐसा (आलविदो ) कहा जाता है (तह ) तैसे (जीवो) यह जीव ( ववहारा) व्यवहार नयसे (दव्यगुणुप्पादगो) पुद्गल द्रव्य सम्बन्धी पुण्य पाप रूपी गुणोंको उत्पन्न करनेवाला है ऐसा ( भणिदो ) कहा जाता है। भावार्थ-पर सम्बन्धसे होती हुई क्रियाको किसी एककी क्रिया कहना व्यवहार है। प्रनामें सजन और दुर्जन व सुआचरणी और दुराचरणी व विद्वान और मूर्ख मनुष्योंको देखकर अन्य राज्यसे आए हुए दर्शकगण यही मानते हैं कि यहाँके राजाके ही सुप्रबन्ध और कुप्रबन्धका यह फल है और यदि सुप्रबन्ध देखते हैं तो यह कहते हैं कि यहांका राजा गुणोंका- पैदा करनेवाला है और यदि कुप्रबन्ध देखते हैं तो कहते हैं कि यहांके रानामें विवेक नहीं, यह दोषोंको ही उत्पन्न करनेवाला है । यद्यपि लोगोंका सुधरना व विगड़ना उनहींके ऊपर है। राजा निमित्तकारण है इसीसे ऐसा कहनेमें आता है। इसी तरह यह पुद्गलमई द्रव्य कर्म ही अपने उपादान कारणसे पुण्य या पापरूप परणमन करता है, परन्तु इस परणमनमें निमित्त- कारण रागी जीवका परिणाम है इसीसे इस जीवको कर्मका कर्ता कहते हैं:- इसतरह व्यवहार नयकी मुख्यतासे ४ सूत्र पूर्ण हुए ॥११॥ इस तरह ढिक्रियावादीका निराकरण करते हुए संक्षेप व्याख्यानकी मुख्यतासे ११ : गाथाएं पूर्ण हुई। यहां शिप्यने शंका की कि आपने इस वातका व्याख्यान वारम्बार किया है कि निश्चय करके यह आत्मा. द्रव्य कर्मोको नहीं करता है इस कथनसे ही द्विक्रियावादीका निरा करण सिद्ध होता है फिर भी इसी अर्थको हद करना तो पिष्टपेपण मात्र है। इसका समाधान आचार्य कहते हैं कि ऐसा नहीं है हेतु भाव और हेतुमद् भावका व्याख्यान बतलानेके लिये ऐसा करनेमें कोई दोष नहीं है, क्योंकि निश्चयसे यह आत्मा द्रव्यकर्मोको नहीं करता है यह तो हेतु है इसी ही हेतुसे द्विक्रियावादीका निराकरण सिद्ध होता है यह हेतुमद् भाव है- ऐसा जानना चाहिये। इस तरह पुण्य पाप आदि सात पदार्थोकी पीठिकारूप महाधिकारके व्याख्यानमें पूर्व में कहे प्रमाण "जदि सो पुग्गल दव्यं करिज्ज" इत्यादि गाथा २ से संक्षेप व्याख्यान किया है फिर १२ गांधाओंसे इसी ही का विशेष व्याख्यान किया है । इसके पीछे ११ गाथाओंमें ईसीका संकोचरूप विशेष वर्णन करके समुदायरूप २५ गाथाओंमें द्विक्रियावादीका निषेध करते हुए तीसरा अंतर अधिकार समाप्त हुआ। i. - JERRORINDAVARIOR - GM23ES समयसार टीका। १०३ कौद्या अंतर अधिकार अथानंतर 'सामण्ण पच्चया' इत्यादि गाथाको आदि लेकर पाठक्रमसे ७ गाथा पर्यंत चार मूल आश्रवके कारणोंके कर्मका कर्तापना मुख्यतासे है ऐसा व्याख्यान करते हैं। इन ७ गाथाओंके मध्यमें जैनमतमें शुद्ध निश्चयसे अर्थात् शुद्ध उपादान रूपसे यह जीव कर्म नहीं करता है प्रत्यय ही कर्म करते हैं ऐसा कहते हुए गाथाएं ४ हैं। अथवा अशुद्ध निश्चयकी विवक्षासे जो लोग जीवके कमका कर्तापना नहीं मानते हैं अर्थात एकान्तसे ऐमा कहते हैं कि जीब कर्ता नहीं होसकता है वे लोग सांग्ख्य मतके अनुसार चलनेवाले हैं उनके ऐसा मानने में कई दोष आते हैं | एक दोप तो यह है कि यदि जड़ प्रत्यय ( कर्मजड़ ) ही क्रमको करेंगे और जीव नहीं करेगा तव जीव उन कर्मोंका वेदक अर्थात् भोगनेवाला नहीं होसक्ता । दृसरा दोष यह है कि उनके मतमें एकांतसे जीव कमको करता ही नहीं है इससे जीव सर्वथा अकर्ता सिद्ध होजायगा। इसके पीछे तीन गाथाओंमें यह कथन है कि शुद्ध निश्चयसे अर्थात शुद्ध उपादान रूपसे जीव और जड़ प्रत्ययोंका एकपना जैन मतके अभिप्राय- से नहीं है । अथवा पूर्व में कही हुई रीतिमे जो नयोंके भेदको नहीं चाहने हैं उनको भी दोष आते हैं। एक दोष तो यह है कि यदि एकांतसे जीव और जड़ प्रत्ययोंकी एकता मानी जायगी तो जीवका अभाव होगा अर्थात् जीव जड़ होनायगा | दूसरा दोष यह है कि यदि एकांतसे जीव और प्रत्ययोंको भिन्नर ही माना जायगा तो मंमारका अभाव होजायगा क्योंकि जीव सदा शुद्ध दशाहीमें रहेंगे। इस तरह चौथे अंतर अधिकारमें समुदाय पातनिका पूर्ण हुई । आगे कहते है कि निश्चय काके मिथ्यात्त्व आदि पुद्गल प्रत्यय ही कर्मको करते हैं-- गाथाः-सामण्णपञ्चया खलु चउरो भण्णंति बंधकत्तारो। मिच्छत्तं अविरमणं कसायजांगा य वोडव्वा ॥ ११६ ॥ संस्कृतार्थ:-सामान्यप्रत्ययाः खलु चत्वारो मण्यंते बंधकत्तारः । मिथ्यात्वमावरमणं क.पाययोगौ च योद्धव्याः ॥ ११६ ॥ सामान्यार्थ:-प्रकटपने सामान्य प्रत्यय बंधके कर्ता चार कहे गए हैं । सो मिथ्यात्व, अविरति, कपाय और योग जानने योग्य हैं | शब्दार्थ सहित विशेषार्थ-निश्चयनयसे अभेद- की अपेक्षामे एक पुद्गल ही बंधका कर्ता है। भेदकी अपेक्षासे (चउरो सामण्ण पञ्चया) चार मूल प्रत्यय (खलु) स्फुटरूपसे (बंधकत्तारो) बंधके करनेवाले हैं (भण्णति) ऐसा सर्वज्ञ भगवान- ने कहा है। उत्तर प्रत्यय तो बहुत हैं । सामान्यका यह अर्थ है कि जिसमें विवक्षाका अभाव हो । यही अर्थ सदा जानना चाहिये (“ विवक्षाया अभाव सामान्यमिति सामान्य शब्दार्थः सर्वत्र सामान्यव्याख्यानकाले ज्ञातव्यः" ) अर्थात् जहां अनेक भेदोंका ख्याल न -- MONDINGULABIRDSUPER समयसार टीका ३ ३ १०४ किया जाय वहीं सामान्यका प्रयोग होता है। (मिछत्तं अविरमण कसाय जोगाय) वे मिथ्यात्व अविरति, कषाय और योग ऐसे चार (वोद्धव्या) जानने योग्य हैं।॥ ११६ ॥ गाथा:-तेसिं पुणोवि य इमो भणिदो भेदो दुतेरसवियप्पो। मिच्छादिहीआदी जाव सजोगिस्स चरमनं. ॥११७॥ संस्कृतार्थ:-तेशं पुनरीप चायं भणितो भेदस्तु त्रयोदशीवत्र ल्यः । मिथ्यादृष्टयादियोवत्सयोगिनश्चरमांतः ॥ ११७ ॥ सामान्पार्थ -उन चारोंके तेरह भेद कहे गए हैं वे मिथ्यादृष्टि गुणस्थानसे लेकर. सयोगि गुणस्थान तक हैं । शब्दार्थ सहित विशेषार्थ-(तसिं) उन ४ प्रत्ययोंके (पुणोवि य) फिर भी ( भेदो दु ) गुणस्थानके भेदसे ( इमो ) यह ( तेरसवियप्पो ) तेरह विकल्प (भ- णिदो ) कहे : गए हैं । वे (मिच्छादिछी ) मिथ्यादृष्टि गुणस्थान ( आदी ) को आदि ले. ( चरमंत ) अंतिम ( सनोगिस्स जाव ) सयोगि गुणस्थान तक हैं। भावार्थ-पूर्व बंधे हुए कर्मोदयकी अपेक्षासे मूल प्रत्यय तो एक ही है उसके भेद किये जाय तो ४ हैं और भी भेद किये जाय तो १३ गुणस्थान हैं । यह गुणस्थान यद्यपि जीवके भाव हैं तथापि, इनकी संज्ञा द्रव्य कर्मोके उदयसे होती है इसीसे इनको पुद्गलमयी प्रत्यय कहते हैं यही आगामी बंधके कारण हैं ॥ ११७ ॥ गाथा:-एदे अचेदणा खलु पुग्गलकम्मुदयसंभवा जमा । ले जदि करति कम्म णवि तेसिं चेदगो आदा ॥ ११८॥ संस्कृतार्थ~एते अचेतनाः खलु पुद्गलकमोदयसंभवा यस्मात् । - ते यदि कुनैति य म नापि ते वेदक आत्मा ॥ ११८ ॥ सामान्यार्थ-यह मिथ्यात्व आदि भाव प्रत्यय शुद्ध निश्चय नयसे प्रकटपने अचे- तन हैं क्योंकि पुद्गलकमेंके उदयके निमित्तसे उत्पन्न हुए हैं। और यदि यह-कर्मोको करते हैं तो उनसे पृथक् यह आत्मा शुद्ध निश्चयसे उनका भोगनेवाला नहीं है। शब्दार्थ सहित विशेषार्थः-(एदे) यह मिथ्यात्व, अविरति, कषाय और योग आदि भावप्रत्यय अर्थात् कर्म- बंधके कारण (खलु) शुद्ध निश्चय नयकी अपेक्षासे स्फुट रूपसे (अचेदणा) अचेतन हैं शुद्ध ज्ञान चेतनासे रहित हैं (जम्हा) क्योंकि ( पुग्गलकंमुदयसंभवा ) यहं भाव पुद्गलकोंके उदयसे उत्पन्न हैं। जैसे स्त्री और पुरुष दोनोंके सम्बन्धसे उत्पन्न हुआ पुत्र है उसको उसकी माताकी अपेक्षासे देवदत्ताका यह पुत्र है ऐसा कोई कहते हैं दूसरें कोई पिताकी अपेक्षासे यह देवदत्तका पुत्र है ऐसा कहते हैं । परन्तु इस कथनमें कोई दोष नहीं है दोनों ही ठीक हैं तैसे ही जीव और पुद्गलके संयोगसे उत्पन्न यह मिथ्यादर्शन व रागद्वेषादिः भावकर्म हैं, सो अशुद्ध निश्चय PERIENDERONMRO समयसार टीका। MEANIANRAILee व अशुद्ध उपादानरूपसे तो चेतन है अर्थात जीय सम्बन्धी हैं। नथा शुड निश्चयनयमेव शुद्ध उपादानरूपमे ये अचेतन हैं, पौगलिक हैं, जड़ है क्योंकि शुद्ध आत्मामें इनका सम्बन्ध नहीं पाया जाता । तथा परमार्थसे विचारा जाय तो यह एकान्तसे न तो जीव रूप है न पुद्गलरूप हैं परंतु जैसे फिटकरी और हलदीके संयोगसे एक जुदा परिणाम उपनता है ऐसे ही जीव और पुद्गलके संयोगसे उत्पन्न हुए विभावभाव हैं । वास्तवमें मूक्ष्म शुद्ध निश्चयनयकी अपेक्षासे यह मिथ्यात्व व रागादिभाव असलमें कुछ भी नहीं हैं। यह अज्ञानसे उत्पन्न कल्पितभाव हैं । इस कथनसे यह कहा गया कि जो कोई एकान्तसे ऐसा कहते हैं कि यह रागादिक भाव जीव सम्बन्धी हैं अथवा कोई कहते हैं कि यह पुट्ठल सम्बन्धी हैं। इन दोनोंके भी वचन मिथ्या हैं क्योंकि पूर्वमें कहे हुए स्त्री और पुरुषके दृष्टांतके समान जीव और पुद्गलके संयोगसे उत्पन्न हुए हैं। यदि कोई प्रश्नकरे कि मूक्ष्म शुद्ध निश्चयनयसे यह भाव किसके हैं तो यही कहा जायगा कि सूक्ष्म शुद्ध निश्चयनयसे इनका अस्तित्व हीनहीं है। यह बात पहले भी कही जा चुकी है (तेजदि कम्मं करंति) यदि वे मिथ्यात्व आदि प्रत्यय कर्मोको करते हैं तो करो' इसमें जीवका क्या हुआ । अर्थात् शुद्ध निश्चय नयसे जीवका कुछ विगाड़ नहीं हुआ क्योंकि शास्त्र इस विषयमें सहमत ही है कि “ सव्वे सुद्धाहु सुद्धणया " अर्थात् 'द्रव्यसंग्रह के अनुसार सर्व ही जीव शुद्ध निश्चयसे शुद्ध हैं । क्योंकि शुद्ध निश्चय नय शुद्ध स्वरूपकी ही अपेक्षा रखती है इसलिये उस अपेक्षासे विचार किया जाय तो यह प्रत्यय इस आत्माका कुछ अहित नहीं कर सक्ते परंतु व्यवहारमें तो करते ही हैं ऐसा कहा जाता है । यहांपर शिप्यने कहा कि यह जीव मिथ्यात्व कमके उदयसे जव मिथ्यादृष्टि होता है तब अपने मिथ्यात्व रागद्वेपादि भावकर्मोको भोगता है जब भोगता है तब यह कर्ता भी होगा, इसका समाधान आचार्य करते हैं कि ऐसा नहीं है (अप्पा तेमिं वेदको णवि) आत्मा शुद्ध निश्चयनयसे उन कर्मोका भोक्ता नहीं है ।.जब भोक्ता नहीं है तव की भी कम होगा? अर्थात् शुद्ध निश्चयनयसे नहीं होगा अथवा जो एकान्त नयसे विना शुद्ध निश्चय नयकी अपेक्षासे आत्मा का नहीं है ऐसा कहते हैं उनके लिये भी दूपण आने हैं । वे दूपण इम प्रकारसे आते हैं कि यदि यह आत्मा एकान्तसे अकर्ता ही माना जायगा तो जसे शुद्ध नि- श्चय नयसे अकर्ता है तैमा व्यवहारसे भी अकता प्राप्त होजायगा, तब सर्वथा प्रकारमे अका होजाने पर इस संसारका ही अभाव होजायगा क्योंकि जब आत्मा अपने भाव नहीं करेगा तव न .वंधेगा, न मुक्त होगा। दूसरा दोष यह आयगा कि उनके ही मतसे वह भोगनेवाला नहीं हो सकेगा। क्योंकि जो कर्ता है वही भोक्ता है ऐसा माननेपर सांख्यमती आत्माको अकती कहते हुए जो उसे भोगनेवाला मानते हैं उनके मतका घात होजायगा । भावार्थ-आत्मा व्यवहारमे भाव कादिकोंका कर्ता है परंतु शुद्ध निश्चय नयसे नहीं है । यह कर्म कत्तापना १४ समयसार टीका। . Sage RRALDORAMAS व कर्म भोक्तापना आदि भाव अशुद्ध जीवकी अपेक्षासे हैं परंतु शुद्ध निश्चय नयकी अपे- क्षासे नहीं हैं ॥ ११८ ॥ गाथाः-गुणसण्णिा दु एदे कम्म कुवंति पञ्चया जमा । तह्मा जीवो कत्ता गुणा य कुव्वति कम्माणि ॥ ११९ ॥ संस्कृतार्थः :-गुणसंशितास्तु एते कर्म कुवति प्रत्यया यस्मात् । तस्मान्जीवो का गुणाभ कुवैति कर्माणि ॥ ११९ ॥ सामान्यार्थ-यह गुणस्थान नामके प्रत्यय कर्मोको करते हैं इसलिये शुद्ध निश्चय नयसे जीव इन कर्मोंका कर्ता नहीं है किन्तु गुणस्थान कर्म करते हैं । शब्दार्थ सहित विशेपार्थः- (जम्हा) क्योंकि (एदे) यह (गुणसण्णिदा) गुणस्थान रूप ( पञ्चया दु ) प्रत्यय (कम्म) कर्मोको (कुव्वंति ) करते हैं। ( तह्मा ) इसलिये ( जीवः ) यह आत्मा ( आत्ता) शुद्ध निश्चयसे उन कर्मोका कर्ता नहीं है किन्तु (गुणा य) यह गुणस्थान ही ( कंमाणि ) कर्मोको (कुव्वंति) करनेवाले हैं । भावार्थः-शुद्ध निश्चय नय जो शुद्ध आत्मस्वरूपको बतलाने वाली है उसकी अपेक्षासे यदि विचार किया जाय तो यह आत्मा कर्मका कर्ता नहीं है । गुणस्थान सम्बन्धी भाव जो इस जीवके मोह और योगके निमित्तसे होते हैं कर्मोको वांधने वाले हैं । गुणस्थान से अतीत शुद्ध जीव भावकर्म, द्रव्यकर्म, और नोकर्मके कर्त्तापनेसे दूर है। इस प्रकार शुद्ध निश्चयसे प्रत्यय ही कर्मोको करते हैं ऐसा व्याख्यान करते हुए चार गाथाएं पूर्ण हुई ॥ ११९॥ आगे कहते है कि एकान्त करके जीव और प्रत्ययों का एकपना नहीं है । इस सम्बन्धमे तीन गाथाएं है:- गाथाः-जह जीवस्स अणण्णुवओगो कोहो वितहं जदि अणण्णो। जीवस्ताजीवस्स य एवमणपणत्तमावणं ॥ १२० ॥ संस्कृतार्थः-यथा जीवस्यानन्य उपयोगः क्रोधोऽपि तथा यद्यनन्यः । जीवस्याजीवस्य चैवमनन्यत्यमापन्नम् ॥ १२० ॥ सामान्यार्थः-जैसे इस जीवके साथ ज्ञानदर्शनोपयोगकी एकता है तैसे यदि क्रोधादि प्रत्ययों ( कर्मबंधकारणों) की भी एकता हो जाय तो जीव और अजीवकी इस- तरह विल्कुल एकता प्राप्त हो जायगी। दोनोंमें भेद न रहेगा ॥ शब्दार्थ सहित विशेषार्थः- (जह) जैसे (जीवस्स) इस आत्माका (उवओगो) ज्ञानदर्शनोपयोग (अणण्णो) जीवके साथ अनन्य है-तन्मयी है क्योंकि इनको किसी भी तरह जीवसे अलग नहीं किया जा सक्ता, जैसे अग्निसे उष्णताको अलग नहीं कर सक्ते (तह) तैसे (जदि) यदि (कोहोवि ) क्रोध भी (अणण्णो) जीवके साथ तन्मई होजावे, एकान्त करके एकमेक हो जावे तो क्या दूषण दु समयसार टीका। १०७ प्राप्त होगा । इसका उत्तर आचार्य कहते हैं कि (एवं) इसनग्ह अभेद मानने पर (जीवम्म) शुद्ध निश्चयसे सहज ही शुद्ध अखंड एक ज्ञानदशनोपयोगमई जीवकी (अनीयम्स) ज्ञानदर्शनोपयोग रहित जड़ पड़ायके माथ (अणण्णत्तम) अनन्यपना अर्थात एकपना (आवण्ण) प्राप्त हो जायगा भावार्थ:-स्वरूपकी अपेक्षाने विचार किया जाय तो यह क्रोधादि भाव हम जीवके निजमाव नहीं हैं। अतएव यदि इनको निजभाव मान लिया जाय तो इस जीवका लक्षण ही भ्रष्ट होजाय तब यह मुद्राकाल इस जीवमें पाये जावे फिर पुगनन्त विकार है ऐसा कहने हीमें न आवे । अर्थान पुलके सम्बन्ध की अपेक्षा न रहे नर शुद्ध जीवका अभाव हो जावे ।। १२० ॥ फिर भी ऋते है- गाथा:-एवमिह जो दु जीवो सो चेव णियमा नहा जीवो। अयमेयत्त दोसो पच्चयणोकम्न कम्माणं ॥ १२१ ॥ संस्कृतार्थ:-एवमिह यस्तु जीवः स चव तु नियमतत्तथाजीवः । अयमेवे दोषः प्रत्यवनोकर्मकर्मणां || १२१ ॥ सामान्यार्थः--इस लोकमें इस प्रकारम जो जीव हैं मो ही नियममे अजीव हैं पसी एकता माननेसे यह दोष होगा कि देहादि नोकम्म और ज्ञानावरणादि द्रव्यकम्म तथा मिथ्या- त्वादिभावक्रमक माथ इस जीवकी एकता हो जायगी । शब्दार्थ सहित विशेषार्थः-(इह) इस लोकमें (एवं) पूर्व सूत्र में व्यायानके अनुमार (जो दु जीवों) जो कोई जीव है (मो चेव दु)मो ही (णियमद्रो) नियमसे अर्थात निश्चयसे ( अनीवो) अजीव है (नह) ऐमा होने पर (अयम् ) यह (दोमा) दोष होगा कि जीवका अभाव हो जायगा, क्योंकि ( पच्चय णोकम्म कमाणं) मिथ्यात्वादि भाव क्रम, शरीरादि नोकम, ज्ञानावरणादि द्रव्यक्रमांक माथ ( एयत्ते ) उस जीवकी एकता होजायगी।जो जीव निश्चयमे कमीजन रहित परमानन्दमई लक्षणको रखनेवाला है || १२१ ॥ इसीको और भी कहते है:- गाथा:-अह पुण अण्णो कोहो अण्णुवओगप्पगो हबदि चेदा। जह कोहो तह पचय कम्मं णोकम्ममवि अण्णं ॥ १२२ ।। संस्कृतार्थ:-अथ पुनः अन्यः क्रोधोऽन्यः उप्रये.गात्मको भवति चयिता । क्या क्रोवस्तथा प्रत्ययाः कम नोकमान्यन्यत् ।। १२२ ॥ मामान्यार्थ—पूर्वोक्त जीवके अभावके दूषणको जानकर यह कहा जाय कि क्रोध अन्य है तथा उपयोगवान आत्मा अन्य है । तो जैसे क्रोध अन्य है वसे द्रव्यक्रम प्रत्यय व नोकम भी अन्य हैं ऐसा होगा । शब्दार्थ महित विशेपार्यः-(अह पुण) अथवा फिर मी पूर्वमें ऋह हुए जीवके अभाव स्वरूप दोपके भवसे यदि आपका यह अभिप्राय हो कि e2 ܆ GISROUND . SamirstDEVENDE समयसार टीका। (कोहो ) यह क्रोध (अण्णं ) जीवसे अन्य है तथा (ओगप्पगों चेदा) विशुद्ध ज्ञानदर्शन मई आत्मा (अण्णुव) क्रोधसे अन्य (वदि) होता है । तब (जह) जैसे (कोहो) जड़ क्रोध 'निर्मल चैतन्य स्वभावमई जीवसे भिन्न है ( तह) तैसे (पञ्चय कम्मं णोकम्म) प्रत्यय कर्म और नोकर्म ( अवि ) भी ( अण्ण ) भिन्न हैं । ऐसा आपका कथन शुद्ध निश्चयसे हमको मान्य ही है परन्तु एकान्त करके नहीं, क्योंकि जब हम ऐमा व्या- ख्यान करेंगे कि शुद्ध निश्चय करके यह जीव न कर्ता है, न भोक्ता है तथा क्रोधादि भावोंसे भिन्न है तब दूसरे पक्षमें यह भी कहना होगा कि व्यवहार नयकी अपेक्षा इस जीवके कर्ता- पना और भोक्तापना तथा क्रोधादिकोंसे अभिन्नपना है क्योंकि निश्चय और व्यवहार नय एक दूसरेकी अपेक्षाको रखनेवाली हैं। अर्थात् जब निश्चय नयसे कथन करेंगे तब व्यवहार कथनं गौण रूपसे और जब व्यवहार नयसे कथन करेंगे तब निश्चय नय गौण रूपसे मानना योग्य है । जैसे यदि कोई कहे कि यह देवदत्त दाहनी आंखसे देखता है तब विना कहे हुए ही यह सिद्ध हो जाता है कि यह चाई आंखसे नहीं देखता है इसी तरह निश्चय और व्य- वहारका सापेक्षपना है। जब यह कहा गया कि निश्चयसे जीव अकर्ता है तब व्यवहारसे कुर्ता है यह स्वतः ही सिद्ध हो गया। परन्तु जो कोई निश्चय व्यवहारके परम्पर अपेक्षा रूप नय विभागोंको नहीं मानते हैं, वे सांख्य सदाशिव मतके अनुसार माननेवाले हैं। उन लोगोंके मतमें जैसे शुद्ध निश्चय नयसे जीव का नहीं है और क्रोधादिकोंसे भिन्न है तसे व्यवहारसे भी अकर्ता व क्रोधादिसे भिन्न है। ऐसा मानने पर जैसे सिद्धोंके कर्मबंध नहीं होता वैसे और जीवोंके क्रोधादि परिणमनके न होनेके कारण कर्मबंध न होगा। जब जीवोंके कर्मबंध नहीं तब संसारका अभाव हो जायगा । संसारका अभाव होने पर इस जीवके सदा मुक्तपना प्राप्त हो जायगा। पस यह बात प्रत्यक्षसे विरोधरूप है, क्योंकि संसार प्रत्यक्ष रूपसे दिख- लाई दे रहा है, अनुभवमें आ रहा है। इससे एकान्त मानना मिथ्या है। इस तरह प्रत्यय और जीवका एकांतसे एकपना निषेधते हुए तीन गाथाएं पूर्ण हुई ।। १२२॥ • अब यहां शिप्यने शंका की कि यह जीव शुद्ध निश्चयसे अकर्ता है जब कि व्यवहारसे कर्ता है यह बात बहुत प्रकारसे आपने वर्णन की है। परन्तु ऐसा मानने पर जैसे इस जीवके व्यवहार नयसे द्रव्य कर्मोका कर्त्तापना है वैसे रागद्वेपादि भावकोका भी है। तब यह द्रव्य कर्म और भाव कर्म दोनों एक हो जावेंगे । इसका समाधान आचार्य करते हैं कि ऐसा नहीं है। रागद्वेषादि भावकर्मोका कपिना इस आत्माके जिस व्यवहार नयसे कहा जाता है उसकी अशुद्ध निश्चय नय संज्ञा है। यह संज्ञा इसीलिये है कि जिससे तुमको रागादि भावकर्म और ज्ञानावरणादि द्रव्यकर्म इन दोनोंका तारतम्य अर्थात् ठीक २ फर्क मालूम पड़े। वह तार- तम्य क्या है? इसके लिये कहते हैं कि द्रव्य कर्म तो अचेतन जड़ हैं जब कि भाव कम चेतन - Sarewerwaseemini समयसार टीका। १०१ RGREENSE हैं तथापि शुद्ध निश्चय नयकी अपेक्षामे इनको अचेतन ही कहते हैं क्योंकि यह अशुद्ध निश्चय भी शुद्ध निश्चयकी अपेक्षा व्यवहार ही है क्योंकि आत्माका असली स्वरूप नहीं है। यहां यह भावार्थ है कि अनुपचरित असद्भूत व्यवहार नयसे इस आत्माके द्रव्य कर्मोका कर्त्तापना और मोक्तापना कहा जाता है तथा अशुद्ध निश्चयनयसे रागद्वेप आदि भाव कर्मोका कर्तापना इस जीवके है परन्तु यह अशुद्ध निश्चयनय शुद्ध निश्चयनयकी अपेक्षा व्यवहार ही है ऐसा जानना। इस तरह पुण्य पाप आदि सात पदार्थोका पीठिकारूप महाअधिकारमं सात गाथा- ओंसे चौथा अन्तराधिकार समाप्त हुआ। इसके आगे 'जीवेण सयं वद्धं' इत्यादि गाथाको आदि लेकर आठ गाया तक सांख्यमतानुसारी शिष्यको समझानेके लिये जीव और पुद्गलका अपरिणामीपनाका निषेध करते हुए उनमें किसी अपेक्षा परिणामीपना है ऐसा स्थापित करते है । इन आठ गायाओंमें पुदगलके परिणामीपनके व्याख्यानकी मुख्यता करके गाथाएं तीन है । इसके बाद जीवके परिणामीपनाकी मुख्यता करने गायाएं पांव है। इस तरह पांचवे स्थलमें समुदाय पातनिका पूर्ण हुई। अव सांख्यमतके अनुकूल माननेवाले शिष्यके वास्ते यह साधन करते है कि किसी अपेक्षासे इस पुगलके परिणमन करनेका स्वभाव है । गाथा:---जीवे ण संयं चद्धं ण सय परिणमदि कम्मभावेण । जदि पुग्गलव्वमिणं अप्परिणामी तदा होदि ॥ १२३ ॥ संस्कृतार्थः -जीवे न स्वयं बद्धं न स्वयं परिणमते कर्मभावन । यदि पुद्गलद्रव्यमिदमपरिणामि तदा भवति ॥ १२३ ॥ सामान्यार्थः-इस जीवमें यह पुद्गलकम अपने आप स्वभावस बंधा हुआ नहीं है और न यह अपने आप ज्ञानावरणादि द्रव्यकर्म रूप परिणमन करता हैयदि पुद्गलद्रव्यको ऐसा माना जायगा तो यह अपरिणामी हो जायगा । शब्दार्थ सहित विशेषार्थः-(जीव) इस आधारभूत संसारी जीवमें ( सयं ) स्वयं स्वभावस (ण बद्धं ) यह पुद्गगलकम बन्धा हुआ नहीं है क्योंकि जीवको तो सर्वदा शुद्ध ही माना जाता है (ण सयं ) और न यह पुद्गल स्वयं स्वभावसे ( कम्म भावेण ) पुद्गल द्रव्यकर्मकी पर्याय रूप (परिणमदि) परिणमन करता है क्योंकि सर्वथा नित्य ही है। अर्थात् परिणमनशील नहीं है । (अदि) यदि (इण) इस प्रकारका (पुग्गलदव्वं ) यह पुद्गलद्रव्य आप मांख्य मतवालोंके मतसे माना जायगा (तदा) तंत्र (अप्परिणामी होदि) यह पुद्गल द्रव्य अपरिणामी ही हो जायगा । भावार्थ:- आचार्य मांख्य मतके ऐसे अद्धानको रखनेवाले व्यक्तिसे कह रहे हैं कि तू जीवको सदा शुद्ध मानता है इससे तो यह कहा नहीं जा सका कि जीवमें पुद्गल कर्मोका बंधन है और पुद्गलको सदा ही नित्य मानता है, इससे यह भी नहीं कहा जा सक्ता कि पुद्रल becedarwonomib समयसार टीका। SURAJREVEALERKAR -- ११० स्वयं कर्मरूप हो गया है अतएव पुद्गलको सदा परिणाम रहित मानना पड़ेगा ।। १२३ ॥ ऐसा एकान्त माननेसे क्या दोप आयगा उसे आचार्य अगली गाथामें कहते है- गाथाः-कम्मइयवग्गणादि य अपरिणमतीहि पाम्मभावेण । संसारस्स अभावो पसजदे संरखसमओ वा ॥ १२४ ॥ संस्कृतार्थः-कामणवर्गणासु चापरिणममाणामु कर्मभावेन । संसारस्थाभावः प्रसजति सांख्यसमयो वा ॥ १२४ ॥ सामान्यार्थ-कार्माण वर्गणाओंके द्रव्य कर्मरूपसे नहीं परिणमन करने हुए सांख्य मतके अनुसार संसारका अभाव हो जायगा । अथवा सांख्यका मत सिद्ध होगा । शब्दार्थ सहित विशेषार्थ-(कम्मइय वग्गणादिय) और कार्माण वर्गणाओंके (कग्मभावण) ज्ञानावरणादि द्रव्य कर्मरूप (अपरिणमतीहि) नहीं परिणमन करते हुए (संसारम्स) इस संसारका अर्थात संसारी जीवोंकी अवस्थाका (अभावो) अभाव (पसजदे) प्राप्त हो जायगा। (संख ममओ वा) सांख्य समयके समान । भावार्थ-जैसे सांख्य मतमें जीवको सर्वथा शुद्ध अकर्ता माना है ऐसा ही जव आत्मा हो जायगा तब सब आत्माएं सदा सिन्द रूप ही रहंगी ऐसा माननेसे संसारका अभाव हो जायगा ॥ १२४ ॥ फिर भी कहते हैं- गाथाः-जीवो परिणामयदे पुग्गलदव्वाणि कम्मभावेण । ते सयमपरिणमंतं कह तु परिणामयदि णाणी ॥ १२५ ॥ संस्कृतार्थः-जीव: परिणामयति पुद्गलद्रव्याणि कर्मभावेन ! तानि स्वयमपरिणममानानि कथं तु परिणामयति चेतायता ॥ १२५ ॥ सामान्यार्थः-यह जीव पुद्गल द्रव्योंको कर्मभाव रूपसे परिणमन कराता है यदि ऐसा कहा जाय तो जो पुद्गल स्वयम् परिणमन नहीं करते उनको यह ज्ञानी आत्मा किस- तरह परिणमन करावेगा । शब्दार्थ सहित विशेपार्थः-(जीवो ) यह जीव क" (पुग्गल दव्वाणि) कर्म वर्गणा योग्य पुद्गल द्रव्योंको (कम्मभावेण) ज्ञानावरणादि कर्म रूपमे अर्थात् द्रव्य कर्मकी पर्यायमें हठसे ( परिणामयदे) परिणमन कराता है। इससे संसारके अभाव होनेका जो दोष दिया है वह नहीं लग सक्ता। यदि ऐसा कहा जाय तो यह भी नहीं बन सक्ता क्योंकि (तं सयम परिणमंतं ) स्वयम् अपने आप नहीं परणमन करनेवाले पुगल द्रव्यको (णाणी) यह ज्ञानी आत्मा (कह तु) किस प्रकारसे (परिणामयदि ) परणमन करावेगा?॥ 'विशेष कहते हैं कि यह आत्मा उस पुद्गल द्रव्यको जो परिणमन कराता है, तो क्या स्वयं - परिणमनेवाले पुद्गल द्रव्यको कराता है कि नहीं परिणमने वाले पुद्गल द्रव्यको कराता है। ? इसका खुलासा इस प्रकार है कि जो परिणमन करनेवाला नहीं है उसे कोई नहीं परिणमन समयसार टीका। करा सक्ता क्योंकि जिस वस्तुमें स्वयं जिस वातके करने या होनेकी शक्ति नहीं होती उस शक्तिको कोई दूसरा नहीं पैदा कर सका । जैसे जपा कुसुमका फूल आदि स्फटिक्रमणिके साथ जिस तरहकी उपाधिको पैदा करते हैं उस तरहकी उपाधि काष्ठके खमे आदिमें नहीं कर सक्ते । क्यों नहीं कर सक्ते इसका कारण यही है कि स्फटिकमें स्वयं जपा कुसुमके रंग रूप परिणमन करनेकी शक्ति है परंतु काष्ठ स्तम्भमं नहीं है। इससे यह सिद्ध हुआ कि जो स्वयं जिस तरहका परिणमनशील नहीं है उसे कोई भी उस तरह परिणमन नहीं करा सक्ता । अब यदि एकान्तमे यह कहा जाय कि जो परिणमन करनेवाला है उसे परिणमन कराता है सो यह कहना भी सिद्ध नहीं होता क्योंकि पदार्थोकी शक्तियोंमें दूसरेकी अपेक्षा नहीं है । तब इस रूपसे माननेपर जीवके निमित्तरूपी कर्ताक विना भी यह पुद्गल स्वयं ही कम रूपसे परिणमन कर जावेगा ऐसा होनेपर यह दूपण आयगा कि घट पट स्तंभ आदि पुद्गलद्रव्य ज्ञानावरणादि कम रूप परिणतिको प्राप्त कर लेंगे, सो यह प्रत्यक्ष विरोध प्राप्त होगा। क्योंकि यह वात संभव नहीं है। आत्माके निमित्तरूप भावोंके कारणसे कर्मवर्गणा- योग्य पुद्गल ज्ञानावरणादि द्रव्य कर्मरूप परिणमन करते हैं। इससे यह बात सिद्ध हुई कि पुद्गलोंमें स्वभावमई कथंचित् परिणमनकी शक्ति है उस परिणमन शक्तिके होते हुए वह पुद्गल निस अपनी संवन्धिनी ज्ञानावरण आदि द्रव्यकर्मकी पर्यायको करता है उस पर्यायका-यही पुद्गल उपादान कारण है। जैसे घड़ेका उपादान कारण मिट्टीका पिंड ही है। जीव नहीं है । जीव तो केवल निमित्त कारण मात्र ही है। यह सर्व कथन हेय तत्व है- अर्थात् ग्रहण करने योग्य वस्तु स्वरूप नहीं है । इस कारण पुद्गलसे भिन्न शुद्ध परमात्माकी भावनामें परिणमन करते हुए भेद रहित रत्नत्रय स्वरूपभेद ज्ञानसे जानने योग्य चिदानंदमई एक स्वभावको रखनेवाला अपना शुद्ध आत्मस्वरूप ही शुद्ध निश्चयसे उपादेय अर्थात् ग्रहण करनेके योग्य है। परन्तु भेदरूप रखत्रय अभेद रत्नत्रयका माधक है इससे व्यवहारनयमे उपा- देय है। भावार्थ:-व्यवहारकी अपेक्षा भेदरूप सम्यग्दर्शन, ज्ञान, चारित्रइनतीनोंको आगमके मार्गके अनुसार आराधन करनेसे परम आत्मज्ञानरूप रत्नत्रयकी एकता प्राप्त होगी इसलिये जवतक ऐसी आत्मानंदी दशा न हो, व्यवहार रत्नत्रयका सेवन कार्यकारी है। ऊपरकी गाथा- ओंमें यह सिद्ध किया गया कि सांख्यमत जो जीवको सदा शुन्छ मानता है उसके मतसे संसार नहीं वनता क्योंकि स्वयं विना निमित्तके पुद्गलकम जीवके साथ लगकर उसे अशुद्ध नहीं कर सक्ते और यदि पुद्गलको सदा नित्य माना जायगा तौ मी कमका सम्बन्ध जीवके नहीं बन सक्ता-क्योंकि ऐसी दशामें पुद्गलके परिणमन नहीं हो सका। निममें स्वयं परि- णमन शक्ति नहीं हो उसे कोई अन्यरूप नहीं कर मक्ता। इसमे यह सिद्ध किया कि जीवके OtwSORRIOROSUmmm PERATURALIATERISPONRNXNico १.१२ समयसार टीका। अशुद्ध भावोंका निमित्त पाकर पुद्गल वर्गणा ज्ञानावरणादि द्रव्यकर्मरूप परिणमन करती है- इससे पुद्गलमें किसी अपेक्षा कर्मरूप होनेकी शक्ति है । यह सर्व कथन व्यवहार नयो है अतः जो शुद्धात्मिक रसका अनुभव करना चाहें उनके लिये हेय है-त्यागने योग्य है, उन्हें तो अभेद रत्नत्रय म्वरूप आत्मज्ञानकी ही शरण लेकर स्वभाव गुप्त रहना योग्य है । इम प्रकार तीन गाथाओंका शब्दार्थ कहा गया। इसमे तो व्याख्यानमें शब्दार्थ हुआ ऐमा जानना, इसीमें व्यवहार और निश्चय. नयमे अर्थ समझाया मो नयाथ जानना । इमीमें मांग्थ्य मनके प्रति यथार्थ मतको कहा मो मनार्थ जानना .तथा आगममें तो यह अर्थ प्रमिन्द स्वयं है ही इससे आगमार्थ हुआ। इस कथनमें हेय और उपादेयका व्याख्यान किया सो भावार्थ जानना । इस तरह शब्द, नय, मत, आगम, और भाव इन पांच अर्थोसे कथन किया। व्याख्यानकालमें मर्व ठिकाने यथासंभव इसीतरह पांच अर्थोसे कथन जानने योग्य है। इसतरह पगलमें परिणमन होता है इसको स्थापित करते हुए तीन गाथाएं पूर्ण हुई ॥ १२५ ।। आगे सारव्य मतके अनुसार चलनेवाले शिष्यको कहते है कि इस जीवमें कंयचित् पर- णमन स्वभाव है। पांच गाथाए हैं। गाथाः--ण सयं वडो कम्मे ण सयं परिणमदि कोहमादीहिं । जदि एस तुझ जीवो अप्परिणामी तदा होदि ॥ १२६ ॥ संस्कृतार्थ:-न स्वयं वद्धः कर्मणि न स्वयं परिणमत क्रोधादिभिः । यद्यपः तव जीवोऽपरिणामी तदा भवति ॥ १२६ ॥ सामान्यार्थ-यदि ऐसा माना जायगा कि यह जीव स्वयं कर्मों में बंधा नहीं है और न स्वयं क्रोधादि भावोंसे परिणमन करता है तब तुम्हारे मतके अनुसार यह जीव अपरिणामी हो जावेगा। ऐसा आचार्य सांख्यमतीसे कहते हैं । विशेषार्थः-(ण सयं बहो कंमे) स्वयं स्व- भावसे एकांत करके यह आत्मा कर्मोंसे बंधा हुआ नहीं है क्योंकि सदा मुक्त है (ण संयं कोहमादीहिं परिणमदि) और न स्वयं द्रव्यकोंके उदयकी अपेक्षा रहित भाव क्रोधादि रूपसे परिणमन करता, है क्योंकि एकान्तसे अपरिणामी है (जदितुज्झजीवो एस) यदि हे सांख्य- मती तुम्हारा जीव ऐसा प्रत्यक्ष रूपसे है (तदा अप्परिणामी होदि) तब यह जीव अपरिणामी ही हो जावेगा। भावार्थ-आचार्य सांख्यमतके समान बुद्धि रखने वाले शिप्यको कहते हैं कि 'यदि कर्मों के बंधनेमें व रागद्वेषादि भावोंके होंनेमें आत्माका कुछ भी दोष व कृत्य नहीं माना जायगा तो यह आत्मा एकान्तसे परिणमन रहित कूटस्थ अपरिणामी ही हो जावेगा ॥१२६ ॥ आगे कहते है कि इस प्रकार अपरिणामी होने पर क्या दुपण होगा:- गाथा:--अपरिणमंते हि सयं जीवे कोहादिएहि भावहिं। संसारस्स अभावो पसजदे संखसमओ वा ॥ १२७ ॥ . - .
RAJASHTRANSARAPROLA . समयसार टीका। संहितार्थः -अपरिणममाने हि स्वरं जीवे क्रोशादिभिः भावः । संसारस्थामाव: प्रमजति सांख्यसमयो वा ॥ १२७ ।। सामन्यार्थ-यदि यह जीव स्वयं क्रोधादि भावरूप नहीं परिणमन करे तो संसारका अभाव सांख्यमतकी तरह हो जायगा । शब्दार्थ सहित विशेषार्थः-(जीवे कोहाधिएहिं भावेहिं सयं हि अप्परिणमंत) इस जीवके स्वयं क्रोधादि भावोंसे नही परिणमन करते हुए (मंसारस्म अभावो पसन्जदे) संसारका अभाव प्राप्त हो जायगा (संख समओवा) सांख्यमताकी तरह । भावार्थ जैसे सांख्यमत जीवको सर्वथा अकर्ता मानता है, क्रोधादि भावरूप परिणमन करता है ऐसा नहीं मानता तथा सदा शुद्ध ही कल्पना करता है तैसे यदि माना जायगा तो सर्व ही जीव शुद्ध रहेंगे, कोई संसारी नहीं रहेगा। ऐसी दशामें संसारका अभाव प्राप्त हो जायगा ।। १२७ ॥ आगे कहते हैं कि यदि ऐसा माना जायगा तो क्या दोष आयगा- गाथा:-पुरगलकम्मं कोहो जीवं परिणामएदि कोहत्तं । तं सयमपरिणमंन कह परिणामएदि कोहत्तं ।। १२८ ॥ संस्कृतार्थ-पगलकर्मक्रोधो जीवं परिणामयति क्रोधत्वेन । तं स्यमपरिणमन्त कथं परिण मयति क्रोधःवम् ॥ १२८ ॥ सामान्यार्थः---पुद्गल कर्म मई · द्रव्य क्रोध इस जीवको क्रोध भावरूप परिणमन कराता है ऐसा माननेसे ठीक न होगा क्योंकि जो जीव स्वयं परिणमनेवाला नहीं है उमे किसतरह क्रोधरूप कोई परिणमा देगा । शब्दार्य सहित विशेपार्थ-(पुग्गलकम्मकोहो) उदयमें आया हुआ पुद्गलमई द्रव्य क्रोध कर्ता बनकर (जीव) इस अपरिणामी जीवको (कोहत्त) भाव क्रोधरूप (परिणामएदि) हठसे अर्थात् वलात्कारसे परिणमन करा देवे । भावार्थ-जीवको ज़बर्दस्ती क्रोधरूप कर देवे । यदि ऐसा माना जायगा तो (तं सयं अपरिणमंत) उस स्वयं न परिणमन करनेवाले जीवको (कह) किसतरह (कोहत) क्रोध भावरूप यह पुद्गल- कर्म (परिणामएदि) परिणमन करा देगा? । यह पुद्गलकर्म क्या स्वयं अपरिणमन करनेवाले को परिणमन कराता है या परिणमन करनेवालेको परिणमन कराता है यह विचार है। इसका समाधान यह है कि जो स्वयं अपरिणामी कूटस्थ है उसे कोई नहीं परिणमन करा सक्ता क्योंकि जिसमें स्वयं जो शक्ति विद्यमान नहीं है उसे अन्य कोई कदापि पैदा नहीं कर सक्ता यह न्याय है । " नहि स्वतोऽसती शक्तिः कर्तुमन्येन पार्यते " जैसे जपाकुसुमके फूल स्फटिक आदि मणियोंमें उपाधि पैदा करते हैं ऐसी उपाधि काष्ठके खंभे आदिकोंमें नहीं कर सक्के क्योंकि स्फटिकमें स्वयं परिणमन शक्ति है जव कि काष्ठमें नहीं है। यदि एकान्तमे ऐसा माना जाय कि जीव स्वयं क्रोधादिरूप परिणमन कर जाता है तो यह दोप होगा कि IBERONOMAURANDYALAMNESDesk - ११४ समयसार टीका। उदयमें प्राप्त द्रव्य क्रोधके निमित्तके विना भी यह जीव भाव क्रोधादिरूप परिणमन कर जावे, क्योंकि वस्तुकी शक्तियां दूसरेकी अपेक्षा नहीं रखतीं । ऐसा होनेपर मुक्तात्मा सिद्ध जीव भी द्रव्य कर्मके उदयका निमित्त न होनेपर भी भाव क्रोधादि रूप प्राप्त होनावगे । यह बात मानी नहीं जासक्ती, आगमसे विरोधरूप है। भावार्थ:-एकान्त करके ऐसा भी नहीं माना जा सक्ता कि यह जीव कूटस्थ रहता है और बलपूर्वक द्रव्यक्रोध आकर जीवको क्रोधवान वना देता है और न यह माना जा सकता है कि यह जीव स्वयं ही क्रोधादि भाव रूप हो जाता है दोनों ही दशाओंमें संसार और मुक्तिका अभाव हो जायगा ॥ १२८ ॥ इसी पातको और भी कहते है:- गाथाः-अह सयमप्पा परिणमदि कोहभावेण एस दे युजी। कोहो परिणामयदे जीवस्स कोहमिदि मिच्छा ॥१२९॥ संस्कृतार्थ:--अथ स्वयमात्मा परिणमते कोधभावेन एपा तव बुद्धिः । क्रोधः परिणामयति जी गोधत्वमिति मिथ्या ॥ १२ ॥ सामान्यार्थ-यदि स्वयम् ही यह आत्मा भाव क्रोधरूप परिणमन कर जाता है यह तुम्हारी बुन्हि होगी तब यह कहना कि द्रव्यक्रोध जीवको भाव क्रोधरूप परिणमन कराता है मिथ्या हो जायेगा। शब्दार्थ सहित विशेषार्थ-(अह) अथ पूर्व दोष आनेके भयसे यदि (एस दे बुद्धी) यह तुम्हारी बुद्धि होगी कि (अप्पा) यह आत्मा (स्वयं) द्रव्यकोक उदयकी अपेक्षा विना (कोह भावेण ) भाव क्रोधरूप (परिणमदि) हो जाता है तो हे शिप्य (कोहो) द्रव्यक्रोध का होकर (जीवस्स) इस जीवके (कोह) क्रोध (परिणामयदे) कर देता है (इदि) ऐसा जो तुमने पूर्व गाथामें कहा है सो (मिच्छा) असत्य हो जावेगा । भावार्थ-सांख्यका मत असत्य ठहर जावेगा ॥ १२९ ॥ इस तरह आचार्य पूर्व पक्ष करके अप उसके उत्तरमें जो यथार्थ बात है उसको समझाते है:- गाथाः-कोहुवजुत्तो कोहो माणुवजुत्तो य माणमेवादा । माउवजुत्तो माया लोहुवजुत्तो हवदि लोहो॥ १३० ॥ संस्कृतार्थ:-क्रोधोपयुक्तः क्रोधो मानोपयुक्तश्च मान एवात्मा । मायोपयुक्तो माया लोभोपयुक्तो भवति लोभः ॥ १३० ॥ सामान्यार्थ-यह ही आत्मा क्रोधसे उपयुक्त होकर क्रोधी, मानसे उपयुक्त होकर मानी, मायासे उपयुक्त होकर मायावी तथा लोभसे उपयुक्त होकर लोभी होजाता है । शब्दार्थ सहित विशेपार्थ-जैसे घड़ेके आकार परिणमे हुए मिट्टीके पिंडके पुद्गल घटरूप ही हो जाने हैं अथवा अग्निरूप परिणमता हुआ लोहेका गोला अग्निरूप हो जाता है तैसे यह (आदा एव) आत्मा ही (कोहवजुत्तो) क्रोधके उपयोग रूप परिणमन - SECHANISGesceseserveter समयसार टीका। करता हुआ (कोहो) क्रोधरूप हो जाता है, (माणुवजुत्तो) मान कपायके उपयोग रूप परि- णमन करता हुआ (माणम् ) मानरूप हो जाता है, (माउवजुत्तो) मायानारके उपयोग रूप परिणमता हुआ (माया) मायारूप हो जाता है तथा (लोहुवजुत्तो) लोभके उपयोगरूप परिणम- ता हुआ (लोहो हवदि) लोमरूप हो जाता है। इस तरह इस जीवके स्वभाव में रहनेवाली परिणमन शक्ति सिद्ध है। इस परिणमन शक्तिके रहते हुए यह जीव अपने जिस परिणामको करता है उस. भावका वही उपादान कर्ता होता है । द्रव्यकर्म पुद्गलोंका उदय तो निमित्त मात्र ही है तैसे ही वही जीव विकार रहित चैतन्यके चमत्कारमई शुद्ध भावसे परिणमता हुआ सिद्धात्मा भी हो जाता है। भावार्थ-जीवमें स्वयं परिणमन करनेका स्वभाव है जब द्रव्यकर्मोका निमित्त होता है तब औपाधिक भावरूप परिणमन करता है और जब द्रव्यक- मौका निमित्त नहीं होता तब अपने शुद्ध भावोंमें परिणमन करता है । जैसे स्फटिकको जपा कुसुमकी उपाधि हो तब तो रक्त वर्ण आदिरूप परिणमता है परन्तु जो उपाधि न हो तो अपने शुद्ध खेत वर्णरूप ही परिणमन करता है। यहां विशेष यह है कि पहले (जावणवेदि विसेसंतरं) इत्यादि छः गाथाओंमें अज्ञानी और ज्ञानी जीवका संक्षेपसे व्याख्यान किया था तथा कहा था कि पुण्य, पाप आदि सात पदार्थ जीव और पुद्गलके संयोग परिणामसे उत्पन्न हुए हैं और यह परिणाम उसी समय घट सक्ते हैं जब कि जीव और पुद्गलोंमें कथंचित् परिणामीपना सिद्ध होवे सो यहां उसी ही कथंचित् परिणमन स्वभावको प्रकट करनेके लिये ही विशेष व्याख्यान किया है । अथवा "सामण्ण पञ्चया खलु चउरो" इत्यादि ७ गाथाओंसे जो पहले कहा था कि शुद्ध निश्चयसे चार सामान्य प्रत्यय ही मिथ्यात्वादि कर्म करते हैं जीव नहीं करता यह जैन मत है, परंतु यदि एकांत करके ऐसा माना जायगा तो जैसे सांख्य- मतको आत्माके अकर्ता माननेसे यह दोष आता है कि संसारका अभाव हो जायगा उससे भी विशेष दोष जैन मतमें आजायगा क्योंकि वहां अर्थात् सांख्यमतमें एकांतसे कर्त्तापनाका अभाव करनेसे संसारका अभाव रूप दोष आयगा और यहां जैन मतमें एकांतसे यदि जीवको अपरिणामी माना जायगा तो संसारका अभाव रूपी दूपण आनायगा । इसलिये यह सिद्ध है कि भाव कर्मरूप परिणमन होना ही इस जीवका कर्तापना और भोक्तापना है ऐसा कहा जाता है। भावार्थ-जीव अपने परिणामोंका कर्ता है, शुद्ध निश्चयनयसे शुद्ध भावोंका और अशुद्ध निश्चय नयसे अशुद्ध भावोंका ऐसा वस्तुस्वरूप यथार्थ जान कर निश्चय करना । इस- तरह यह जीव परिणामी है ऐसे व्याख्यानकी मुख्यतासे पांच गाथाएं पूर्ण हुई ॥ १३० ॥ इस तरह पुण्य पाप आदि सात पदार्थोकी पीठिका रूप महा अधिकारके विर्षे जीव और पुद्गल परिणामी हैं इस व्याख्यानकी मुख्यता करके आठ गाथाओंके द्वारा पांचमा अंतर अधिकार समाप्त हुआ। -
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समयसार टीका।
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११६
जावण वेदि विसेसंतरं तु आदासवाण दुण्डंपि अण्णाणी तावदुः' इत्यादिर गाथाओंसे
अज्ञानी जीवका स्वरूप पहले कथन किया है, वही अज्ञानी जीव जब "विसयकसाओ गाढ़"
इत्यादि विषय कषायोंमें दृढ़ होकर अशुभ उपयोगसे परिणमन करता है तब पाप, आश्रव और
बंध इन तीन पदार्थाका कर्ता होता है । और जब मिथ्यात्त्व व कपायोंके मंद उदय होने पर
भोगोंकी इच्छारूप निदान बंध आदि रूपसे दान पूजा आदिके भावोंसे परिणमता है तब पुण्य
पदार्थका भी कर्ता होता है। यह कथन संक्षेपसे पहले सूचित किया है । तथा इसके बाद 'जइया
इमेण जीवेण आदासवाण दोण्हपि णादं होदि विसेसंतरंतु इत्यादि चार गाथाओंमें ज्ञानी
जीवका स्वरूप संक्षेपसे प्रकट किया है कि वही ज्ञानी जीव शुहोपयोग भावमें परिणमन
होते हुए अभेद रत्नत्रयमई लक्षणको धरनेवाले भेदज्ञान रूप जब परिणमन करता है तव
निश्चय चारित्रके साथ २ होनेवाला अविनाभावी वीतराग सम्यग्दर्शनका धारी होकर
संवर, निर्जरा और मोक्ष इन तीन पदार्थोंका कर्ता होता है। यह भी संक्षेपसे पहले निरूपण
किया है। तथा वही ज्ञानी जीव निश्चयसम्यक्त्वके अभावमें जब सराग सम्यक्त्वरूप परिणमन
करता है तब शुद्धात्मा ही उपादेय है इस श्रद्धाको करते हुए परंपरासे निर्वाणके कारणभृत
तीर्थंकर प्रकृति आदि पुण्य पदार्थका भी कर्ता होता है यह वात भी पहले कथन की है-यह
सर्व कथन जीव और पुद्गलके कथंचित् परिणामी होने ही पर हो सकता है सो यह कथंचित्
परिणामीपना भी पुण्य पाप आदि सात पदार्थोके संक्षेपसे सूचित करनेके लिये पहले ही
संक्षेपसे कहा था फिर भी जीव और पुद्गलके परिणामीपनेके व्याख्यानके कालमें विशेप करके
कथन किया गया। वहां इसतरह कथंचित् परिणामीपना सिद्ध होने पर अज्ञानी और ज्ञानी
जीवके अर्थात् गुणी पदार्थोंके पुण्य पाप आदि सात पदार्थोका खुलासा बतलानेके लिये संखे-
पसे व्याख्यान किया था अब यहां ज्ञानमई और अज्ञानमई गुणोंकी मुख्यता करके व्याख्यान
किया जाता है । जीव और अनीच गुणीकी मुख्यतासे नहीं। यह कथन भी उन्हीं पुण्य
पाप आदि सात पदार्थोकी संक्षेपमें सूचनाके अर्थ करते हैं।--
सो यहां 'जो संगं तु मुइत्ता' इत्यादि गाथाको आदि लेकर पाठ क्रमसे ९ गाथा पर्यंत
व्याख्यान करते हैं तिनमें पहले तीन गाथाओंमें ज्ञान भावकी-मुख्यता है उसके पश्चात् छः
गाथाओंमें कहा है कि ज्ञानी जीवके ज्ञानमई भाव होता है और · अज्ञानी जीवके
अज्ञानमई भाव होता है ऐसा मुख्यतासे कथन है । इस तरह छठे अंतर अधिकारमें
समुदाय पातनिका हुई।
आगे कथंचित् परिणामीपना सिद्ध होनेपर यह ज्ञानी जीव ज्ञानमई भावका का होता है ऐसा
अभिप्राय मनमें धरकर आगेके तीन सूत्र प्रतिपादन करते है:-
गाथाः-जो मंगं तु मुइसा जाणदि उपओगमप्पयं सुद्धं ।
तं हिस्संग साहुं परमपियाणया विति ॥ १३१ ॥
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समयसार टीका।
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संस्कृतार्यः-यः संगै तु मुक्त्वा जानाति उपयोगमात्मानं शुद्धं ।
तं निस्संग साधु परमार्थविज्ञायका विदति ।। १३३ ।।
सामान्यार्थ:-जो परिग्रहको छोड़कर ज्ञानदर्शनमई शुद्ध आत्माको जानता है अर्थात्
अनुभव करता है उसको परमार्थ स्वरूपके ज्ञाता परिग्रहरहित साधु जानते हैं। शब्दार्थ-
सहितविशेषार्थ-(जो) जो कोई परम साधु (संग) बाह्य और अभ्यंतर २४ प्रकारकी परिग्र-
हको (मुइत्ता) छोड़कर (उवओगम् ) शुद्ध ज्ञानदर्शनोपयोगरूप तथा (सुद्ध) भावक्रम रागद्वेपादि,
द्रव्यकर्म ज्ञानावरणादि व नोकर्म शरीरादिसे रहित शुद्ध (अप्पयं) आत्माको (जाणदि) वीत-
राग चारित्रके साथ अवश्य होनेवाले मेदज्ञानके द्वारा जानता है-अनुभव करता है (तंसाहुँ)
उस साधुको (परमट्ठ वियाणया) परमार्थ स्वरूपके ज्ञाता गणधरदेव आदिक (णिस्संग) संग
अर्थात् परिग्रह रहित (विति) जानते हैं-कहते हैं । भावार्थ-जो सर्व परिग्रहको त्याग अपने
शुद्ध ज्ञाता इप्टा आनन्दमय स्वरूपका अनुभव करता है वही परिग्रह रहित निग्रन्थ
साधु है ॥ १३१॥
गाथा:-जो मोहं तु मुइत्ता णाणसहावाधियं मुणदि आदं ।
तं जिमोहं साहूं परमट्ठवियाणया विंति ॥ १३२ ॥
संस्कृतार्थः-य: मोहं तु मुवस्वा ज्ञानस्वभावाधिक मनुने आत्मानम् ।..
त जितमाहं साधुं परमार्थविज्ञायका विदंति ॥ १३२ ॥
सामान्यार्थः-जो मोहको छोड़ करके ज्ञान स्वभावसे पूर्ण आत्माको मानता है उसे
परमार्थके ज्ञाता गणधरादिकदेव जितमोह साधु जानते हैं या कहते हैं। शब्दार्थ महित विशेषार्थ-
(नो) जो कोई परम साधु (मोहंतु) सर्व चेतन या अचेतन शुभ व अशुभ पर द्रव्योंमें मोहको
(मुइत्ता) त्यांग करके (गाणसहावाधियं) विकार रहित स्वसंवेदनज्ञानसे परिपूर्ण (आई) आत्माको
(मुणदि) शुभ व अशुभ मन वचन कायके व्यापाररूप तीनों योगोंके त्यागमें परिणमनस्वरूप
अभेद रत्नत्रयके लक्षणके धरनेवाले भेदज्ञानके द्वारा जानता है-अनुभव करता है । (तं साह)
उस साधुको (परमवियाणया) परमार्थ स्वरूपके ज्ञाता तीर्थकर परमदेवादिक (निदमोह) (जेत
मोह अर्थात् मोहको जीतनेवाला (विति) जानते हैं । इस ही प्रकार गाथामें मोहपदको
अलगकर राग, द्वेष, क्रोध, मान, माया, लोभ, कर्म, नोकर्म, मन, वचन, काय, बुद्धि, उदय,
शुभपरिणाम, अशुभपरिणाम, श्रोत्र, चक्षु, घाण, जिह्वा, स्पर्शन, इसतरह २० पद रखकर २०
सूत्रोंका अर्थ अनुभव करना व व्याख्यान करना योग्य है। इस ही प्रकारसे निर्मल परमचैतन्य
ज्योतिमई परिणतिसे विलक्षण अर्थात् विरुद्ध असंख्यात लोकमात्र विभाव परिणाम जानने
योग्य हैं । भावार्थ:---जो रागको जीते वही जितराग साधु है, जो कम्मोको जीते वही जित
कर्म साधु है, जो इन्द्रिय जनित ज्ञानमई बुद्धिको जीते वही जितबुद्धि साधु है, इसतरह
अनुभवकर अपनी आत्माको इन दोषोंसे मुक्त करना योग्य है ॥१३२॥
१११८ . natantrwsairiwearinaamwim समयसार टीका। Comorovivorcu फिर भी कहते हैं:- गाथा:-जो धम्मं तु मुइत्ता जाणदि उपओगमप्पयं सुद्धं । तं धम्मसंगमुकं परमहवियाणया विति ॥ १३३ ॥ संस्कृतार्थः-यः धर्म तु मुनला जानाति उपयोगमात्मानं शुद्ध । तं धर्मसंगमुक्तं परमार्थविज्ञायका विदंति ॥ १३३ ॥ सामान्यार्थ-जो कोई साधु शुभोपयोगरूप धर्मको छोड़ करके शुद्ध व ज्ञानदर्शनो- पयोगरूप आत्माको जानता है उसको परमार्थक ज्ञाता धर्मकी परिग्रहसे रहित जानते हैं। शब्दार्थ सहित विशेपार्थः-(जो) जो कोई परम योगीन्द्र स्वसंवेदन ज्ञानमें तिष्ठकर (धमतु) शुभोपयोग परिणामरूप व्यवहार धर्ममई पुण्यकी संगतिको (मुहत्ता) त्याग करके, अपने शुद्ध आत्मस्वरूपमें परिणमन होते हुए अभेद रत्नत्रय लक्षणको रखनेवाले भेदनानके द्वारा (उवओग) विशुद्ध ज्ञानदर्शनोपयोगमें परिणमन करनेवाले तथा (सुई) शुभ व अशुभ संकल्प विकल्पोंसे रहित शुद्ध (अप्पयं) आत्माको (नाणदि) जानता है या अनुभव करता है । (तं) उस परम तपोधनको (परमवियाणया) परमार्थके जाननेवाले प्रत्यक्ष ज्ञानी (धमसंगमुक्क) विका- ररहित अपनेही शुद्धात्माकी प्राप्तिरूप निश्चय धर्मसे विलक्षण भोगोंकी इच्छास्वरूप व निदान बंध आदि पुण्य परिग्रहरूप व्यवहार धर्मसे रहित (विति) जानते हैं-भावार्थ-शुभोपयोग- रूप व्यवहार धर्म भी मोक्षमार्गका निरोध करनेवाला है अतः जो इस विकल्पको भी त्याग कर शुद्धोपयोगमें लीन होते हैं वे ही परम. साधु हैं । प्रयोजन यह है कि यह जीव कथंचित् परिणामी अर्थात् परिणमन करनेवाला है इसीलिये प्रथम यह जीव शुद्धोपयोग रूपसे परिण- मन करता है पीछे मोक्षको साधता है। यदि जीवके परिणामीपना न माने तो जो बंधा है सो बंधा ही रहेगा उसके शुद्धोपयोगरूप शुभोपयोगसे अन्य परिणामका होना नहीं घटेगा और तब ऐसामाननेसे मोक्षका हीअभाव होजायगा। भावार्थ-यही जीव जब अपने शुभ व अशुभ भावोंको त्याग देता है और शुद्धोपयोगमें परिणमन करता है तब ही मोक्षका साधक हो कर मोक्ष अवस्थाको प्राप्त करलेता है। यदि जीवको अपने परिणामोंकी अपेक्षा परिणामी न मानें तो कूटस्थ होनेसे यह जीव सदा एकसा ही रहेगा अर्थात् कभी भी मोक्षका लाभ नहीं कर सक्ता । परन्तु यह बात कभी मान्य नहीं हो सक्ती। इसतरह शुद्धोपयोगरूप ज्ञानमय परि- णाम गुणके व्याख्यानकी मुख्यता करके तीन गाथाएं पूर्ण हुई ॥ १३३ ॥ आगे कहते है कि यह जीव ज्ञान मई तथा अज्ञानमई दोनों प्रकारके भावोंका कर्ता कसे होता है- 'गाथा:-जं कुणदि भावमादा कत्ता सो होदि तस्स भावस्स । णाणिस्स दुणाणमओ अण्णाणमओ अणाणिस्स॥१३४॥ संस्कृतार्थः-यं करोति भावमात्मा का स भवति तस्य भावस्य । शानिनस्तु शनमयोऽशानमयोऽशानिनः ॥ १३४ ॥ - PRROctseeRADE समयसार टीका। सामान्यार्थ:-जो भाव आत्मा करता है उसी भावका कर्ता वह आत्मा होता है । -इससे ज्ञानी जीवके तो ज्ञानमयी भाव और अज्ञानी जीवके अज्ञानमई भाव होता है। शब्दार्थ सहित विशेषार्थः-(जं भावं) जिस परिणामको (आदा) यह आत्मा (कुणदि) करता है (तस्स भावस्स) उस भावका (कत्ता) करनेवाला (सो) वही (होदि) होता है। (णाणिस्स दु) जो भाव अनंत ज्ञान आदि चतुष्टय लक्षणको धरनेवाले कार्यसमयसारको उत्पन्न करनेवाला है, विकल्प रहित समाधिके परिणाममें परिणमन करते हुए कारण समय- सार लक्षणको रखनेवाला है तथा सर्व प्रकारके आरंभमें नहीं परिणमन किये हुए है ऐसा भेदज्ञान रूपभाव ज्ञानी जीवके शुद्धात्माकी प्रसिद्धि, प्रतीति, संवित्ति, उपलब्धि, व अनुभव- रूप होनेसे (णाणमओ) ज्ञानमयी ही होता है। (अणाणिस्स) परन्तु अज्ञानी जीवके पूर्वोक्त भेद ज्ञानके अभावसे शुद्धात्मानुभव स्वरूपका लाभ न होनेसे (अण्णाणमओ) अज्ञानमयी ही भाव होता है। भावार्थ-ज्ञानी जीव आत्मा और परके भेदको भलीप्रकार जानता हुआ अपने शुद्धात्मानुभवमें तल्लीन होता है इससे उसके ज्ञानमई ही भाव होता है । परंतु भेद- ज्ञान रहित अज्ञानी जीवके पराश्रित औपाधिक अज्ञानमई ही भाव होता है ॥ १३४ ॥ आगे शिष्यने प्रश्न किया कि ज्ञानमई भावसे क्या फल होता है और अज्ञानमई भावसे क्या होता है जिसका उत्तर आचार्य करते हैं:- गाथा:-अण्णाणमओ भावो अणाणिणो कुणदि तेण कम्माणि । णाणमओ णाणिस्स दुणकुणदि तमा दु कम्माणि ॥१३॥ संस्कृतार्थ:-अज्ञानमयो भावोऽज्ञानिन; करोति तेन कर्माणि । ज्ञानमयो शानिनस्तु न करोति तस्मात्तु कर्माणि || १३५ ॥ सामान्यार्थ-अज्ञानी जीवके अज्ञानमई भाव होता है जिससे वह कमाँको वरता है, परन्तु ज्ञानी जीवके ज्ञानमई भाव ही होता है क्योंकि इस भावसे वह कौको नहीं करता है। शब्दार्थ सहित विशेषार्थ:-(अणाणिणो) अज्ञानी जीवके अपने आत्माके अनुभवकी भाव- नासे विलक्षणहोनेके कारण (अण्णाणमओभावों) अज्ञानमई भाव कहा जाता है। क्योंकि (तेण) उस भावसे (कम्माणि) वह कर्मोको (कुणदि) करता है। (टु) परन्तु (गाणिस्स) सम्यग्ज्ञानी जीवके (णाणमओ) विकाररहित चैतन्यके चमत्कारकी भावनाके आधीन होनेके कारणसे ज्ञानमई भाव होता है क्योंकि (तम्हा) उस ज्ञानमई भावसे ज्ञानी जीव (कम्माणि) कर्मोको (न कुणदि) नहीं करता है, प्रयोजन यह है कि जैसे थोड़ी भी अग्नि तृणकाष्ठके बड़े भारी ढेरको भी क्षण मात्रमें जला देती है उसी तरह तीन गुप्तिरूप समाधिके लक्षणको रखनेवाली भेदज्ञानरूपी अग्नि अंतर्महूर्तमें ही बहुत भवोंके एकटे किये हुए कर्मोके ढेरको जला देती है ऐसा जान कर सर्व कथनका तात्पर्य यह है कि उस ही परम समाधिके भीतर भावना करनी योग्य है। - -
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१२०
समयसार टीका।
भावार्थ-ज्ञानमई भाव कर्मबंध छेदक और अज्ञानमई भाव कर्मबंधकारक है इस लिये ज्ञानमई
भावकी प्राप्तिका ही यत्न करना योग्य है । ॥१३५ ॥
आगे कहते है कि किसलिये ज्ञानी जीवके ज्ञानमई ही भाव होता है अशानमई भाव नहीं
होता तैसे ही अज्ञानी जीवके अज्ञानमई ही भाव होता है शानमई भाव नहीं होता।
गाथा:-णाणमया भावाओ णाणमओ चेव जायदे भावो ।
जम्हा तम्हा णाणिस्स सव्वे भावा दुणाणमया ॥१३६॥
संस्कृतार्थः
-ज्ञानमयादावाद्ज्ञानमयश्चैव जायते भावः ।
यस्मात्तत्माज्यानिनः सर्वे भावाः खलु ज्ञानमय': ॥ १३६ ॥
सामान्यार्थ-क्योंकि ज्ञानमई भावसे ज्ञानमई ही भाव पैदा होता है इसलिये ज्ञानी
जीवके सर्व ही भाव ज्ञानमई ही होते हैं। शब्दार्थ सहित विशेषार्थ:-( जम्हा ) क्योंकि
(णाणमया भावादो) ज्ञानमई भावसे अर्थात् निश्चय रत्नत्रयमई जीव पदार्थसे (णाणमओ चेव)
ज्ञानमई ही ( भावो) भाव अर्थात् अपने शुद्धात्माकी प्राप्ति है लक्षण जिसका ऐसी मोक्ष
अवस्था (जायदे) उत्पन्न होती है। (तम्हा) इसलिये (गाणिस्स) स्वसंवेदन लक्षणको धरनेवाले
भेदज्ञानी जीवके (सव्वे भावा) सर्व ही परिणाम (णाणमया) ज्ञानमई अर्थात् ज्ञानसे ही रचे
हुए होते हैं । इसका कारण यह है कि उपादान कारणके समान कार्य होता है ऐसा न्यायका
वचन है उससे विरुद्ध नहीं होसक्ता। जौ बोनेसे कदापि चावलोंकी पैदाइश नहीं होसक्ती है।
भावार्थ-जैसी मूल वस्तु होगी वैसी ही अवस्था उममें प्रकट होगी । आम्रके वीनसे आम्र
व अनारके बीजसे अनार ही पैदा होंगे । सम्यग्ज्ञानी जीवके सम्यग्ज्ञान रूप ही परिणाम
होवेंगे ॥ १३६ ॥
आगे कहते हैं कि अज्ञानी जीवके भज्ञानमहं भाव होयेंगे।
गाथाः-अण्णाणमया भावा अण्णाणो चेव जायदे भावी।
तम्हा सव्वे भावा अण्णाणमया अणाणिस्स ॥ १७ ॥
संस्कृतार्थ:-अज्ञानमयादावादज्ञानमयश्चैव जायते भावः ।
तस्मात्सर्वेभावाअज्ञानमया अज्ञानिनः ॥ १३७ ॥
सामान्यार्थ—अज्ञानमई पदार्थसे अज्ञानमई ही भाव उत्पन्न होता है इसलिये अज्ञानी
जीवके सर्व भाव अज्ञानमई होते हैं । शब्दार्थ सहित विशेपार्थ-(अण्णाणमयाभावा). अज्ञान
मई जीव पदार्थसे ( अण्णाणो) अज्ञानमई (चेव) ही-(भावो) भाव (जायदे) पैदा होता है
(तम्हा) क्योंकि (अणाणिस्स ) अज्ञानी जीवके अर्थात् शुन्डात्माकी प्राप्तिसे शून्य मिथ्यादृष्टि
जीवके (सन्वे भावा ) सर्व भाव अर्थात् परिणाम ( अण्णाणमया) अज्ञानमई अर्थात् राग-
द्वेषादिरूप होते हैं । भागर्थ-जैसा पदार्थ होगा वैसी उसकी पर्याय होगी। इसलिये जो
आत्मा आत्मज्ञानसे रहित है उसके सर्व परिणाम अज्ञानमई अवश्य होंगे ॥ १३७ ॥
Posted -1 समयसार टीका। इसी कथनको दृष्टान्त राष्ट्रान्त द्वारा पुष्ट करते हैं:- गाथा:-कणयमयाभावादो जायते कुंडलाइयो भावा । अयमझ्यादुअयादो जह जायंते दु कडयादि ॥ १३८ । गाथा:--अण्णाणमया भावा अण्णाणिणो बहुविहा वि जायते । गाणिस्स दुणाणमया सव्वे भावा तहा होति ॥ १३९ ।। संस्कृतार्थः-कनकमय द्रावाजायते कुंडलादयो भावाः । अयोमयास्तुअोमयात् यया जायंवे तु कटकादयः ॥ १३८ ॥ संस्कृतार्थः-अज्ञानमयाभावादज्ञानिनो 'बहुविधा अपि जायते । ज्ञानिस्तु ज्ञानमयाः सं मावास्तथा भवंति ॥ १३९ ॥ सामान्यार्थः-जैसे सुवर्णमई पदार्थसे सुवर्णमई ही कुंडलादिक पयायें उत्पन्न होती हैं तथा लोहमई पदार्थसे कड़ी आदि लोहेकी चीजें बनती हैं ऐसे ही अज्ञानमई आत्मासे नाना प्रकारके अज्ञानमई भाव पैदा होते हैं जब कि ज्ञानी आत्माके सर्व ही भाव ज्ञानमई होते हैं । शब्दार्थ सहित विशेषार्थः-(जह ) जैसे (कणकमयाभावादो ) सुवर्ण मई पदार्थसे (कुंडला- दओ भावा) सुवर्ण मई ही कुंडलादिक पाये (जायते) पैदा होती हैं क्योंकि यह नियम है कि जैसा उपादान कारण होता है ऐसा ही कार्य होता है (दु) परंतु (अयादो) लोहरूप पदार्थसे (अयमइया) लोहारूप ( कड़यादी) कड़ी आदि पाये (जायने) होती हैं । (तहा) तैसे ही (अण्णाणमयाभावा) अज्ञानमई जीव पदार्थसे (बहुविहावि) बहुत प्रकार भी मिथ्या- त्वं रागद्वेषादिरूप (अण्णाणिणो ) अज्ञानमयी अवस्थाएं पैदा होती हैं यहां लोहेका दृष्टान्त लगता है । (दु) परंतु सुवर्णके दृष्टान्तसे (णाणिस्स) ज्ञानी जीवके (सव्वे भावा) सर्व भाव (णाणमया) ज्ञानमई (होति) होते हैं । इस कथनका विस्तार यह है कि वीतराग स्वसंवेदन भेदज्ञानी जीव जिस शुद्धात्माके भावनारूप परिणामको करता है वह परिणाम सर्व ही ज्ञान- मई होता है । फिर उस-ज्ञानमई परिणामसे मंसारकी स्थिति अर्थात् कालकी मर्यादाको कम करके स्वर्गों में इन्द्र व लोकांतिक देवको आदि लेकर महा ऋद्धिका धारी देव उत्पन्न होता है वहां दो घड़ीमें ही मति श्रुत अवधि ज्ञानरूप भावको प्राप्त कर लेता है। तत्र अपने सम्यक् विचारसे विमानादि परिवार व विभृतिको जीर्ण नृणक समान गिनता हुआ पंच महाः विदेहोंमें जाता है वहां यह देखता है कि यह समवशरण है, ने वीतराग सर्वज्ञ अरहंत देव विराजमान हैं। ये भेद व अभेद रत्नत्रयकी आराधनामें परणमन करनेवाले गणधरादिक देव तिष्ठे हैं जिनका वर्णन पहले परमागममें सुना था वे प्रत्यक्ष दर्शनमें आए ऐसा जानकर धर्ममें विशेष दृढ़बुद्धि हो जाता है और चौथे गुणस्थानके योग्य शुद्धात्माकी भावनाको नहीं त्यागता हुआ निरंतर धर्मव्यानसे देव लोकमें अपने कालको गमाना है। फिर IAVADHAURASAVACYRANACHA १२२ समयसार टीका। मनुष्यभवमें आकर राजाधिराज, महाराज, अईमंडलीक, मंडलीक, महामंडलीक, बलदेव, कामदेव, चक्रवर्ती, तीर्थकर परमदेवाधिदेवके पदको प्राप्त करता है। तो भी पूर्वभवकी वासनाके कारण अर्थात् शुद्धात्माकी भावनाके बलसे भोग्य पदार्थोंमें मोहको नहीं प्राप्त होता है जैसे रामचंद्र व पांडवादि । तब फिर जिन दीक्षाको लेकर सात ऋद्धि व चार ज्ञान मई पर्यायका. लाम करता है उसके पीछे समस्त पुण्य पाप परिणामका त्याग है जहां ऐसे अभेद रत्नत्रय लक्षणको धरनेवाले दूसरे एकत्ववितर्क वीचार शुक्लध्यान रूप विशेप भेदभावनाके बलसं' अपने आत्माकी भावनासे उत्पन्न सुखामृत रससे तृप्त होकर सर्व अतिशयोंसे परिपूर्ण तीन. लोकसे पूज्य परम अचिंत्य विभूतिविशेपमई केवलज्ञानरूप अवस्थाको प्राप्त करता है यह अभिप्राय है । परन्तु अज्ञानी जीव मिथ्यात्व व रागडेपादिमई अज्ञान भावको प्राप्त होकर नर नारक आदि अज्ञानमई अवस्थाको प्राप्त करता है यह तात्पर्य है । भावार्थ-सम्यग्द- र्शन करके सहित जो आत्मा है वह सम्यग्ज्ञानी है उस ज्ञानी आत्माके जितने परिणाम होते हैं वे सर्व ज्ञानमई होते हैं क्योंकि वह स्वपर भेद विज्ञानको अंतरंगसे भूलता नहीं है। परन्तु मिथ्यादृष्टी जीवके मिथ्या ज्ञान होता है इसलिये उसके सर्व ही भाव भेद विज्ञानसे शून्य विषयकषायोंकी पुष्टि करनेवाले होते हैं जिनसे यह जीव तीव्र कर्मीको बांधता है अतएव अनेक प्रकार उद्यम करके सम्यग्दर्शनकी प्राप्ति करनी योग्य है ॥ १३८-१३९.॥ इस प्रकार ज्ञानमई व अज्ञानमई भावको कहनेकी मुख्यता करके छ: गाथाएं पूर्ण हुई। इसत- रह पूर्वमें कहे हुए प्रकारसे पुण्य पाप आदि सात पदार्थोके पीठिकारूप महा अधिकारमें यह व्याख्यान . किया गया कि कथंचित् परिणामी होनेके कारणसे ज्ञानी जीव ज्ञानमई भावका कर्ता तैसे ही अज्ञानी जीव अज्ञानमई भावका कर्ता होता है इस कथनकी मुख्यतासे नव गाथाओंमें छठा अंतराधिकार समाप्त हुभा। . (सातवां अंतराधिकार।) आगे कहते हैं कि पूर्वमें कहा हुआ ही अज्ञानमई भाव द्रव्य और भावरूपसे पंचकारणोंसे पांच प्रकार होता हैं। वह भाव अज्ञानी जीवके अपने आपके वधका कारण होता है क्योंकि उसके यह रुचि नहीं होती कि शुद्धात्मा ही उपादेय है न वह अपने शुद्ध आत्मस्वरूपको स्वसंवेदन ज्ञानके द्वारा जानता है और न उसी अपने शुद्ध स्वरूपको परम समाधि रूपसे भावना करता है। इस तरह इस सातवें अंतराधिकारमें समुदाय पातनिका पूर्ण हुई। गाथा:-मिच्छत्तस्सदु उदओ जं जीवाणं अतच्चसद्दहणं । असंजमस्स दु उदओ जं जीवाणं अविरदत्तं ॥१४०।। संस्कृतार्थ:-मिथ्यात्वस्यतूदयो यज्जीवानामतवद्धानम् । असंयमस्यतूदयो यज्जीवानामविरतत्वम्॥ १४० ॥ सामान्यार्थ—मिथ्यात्व कर्मके उदयका ही यह अर्थ है कि जीवोंको तत्वकी श्रद्धा न हो तथा असंयमके उदयसे जीवोंके विषय कषायोंसे विरक्तपना नहीं होता। शब्दार्थ सहित jewasiwww समयसार टीका। AARRRRRRRRRRRRRRRA १२३ विशेषार्थ-(ज) जो (जीवाणं) जीवोंको ( अतच्चमद्दहणं ) अनंत ज्ञानदर्शन सुखवीर्यमय शुद्धात्म तत्वही ग्रहण करने योग्य है इस रुचिसे विपरीत नो तत्वरुचि, श्रद्धा व उपादेय- बुद्धि होती है सो (मिच्छत्तम्स दु उदओ) मिथ्यात्व नाम दर्शनमोहनीय कर्मके उदयका कार्य है। तथा (ज) जो (जीवाण) जीवोंके (अविरदत्त) आत्मसुखके अनुभवको न पाकर विषय कषायोंसे छूटना नहीं होता सो (असंजमस्स दु उदओ) असंयम अर्थात् अप्रत्याख्यानवी कषायका उदय है। भावार्थ:-जो मिथ्यात्व और असंयमरूप भाव है वह दर्शनमोहनीय व चारित्र मोह- नीयका कार्य है। इस जीवका निर्मल ज्ञानमई भाव नहीं है इससे वंधका कारण है ॥१४०॥ गाथा:--अण्णाणस्स टु उदओ जं जीवाणं अवचउवलडी। जो दु कप्ताउवोगो सो जीवाणं कसाउदओ॥ १४१ ॥ संस्कृतार्थः-अज्ञानस्यदयो सीवानां या अतत्वोपलाधः यस्तु कपायोपयोगो स जीवानां कपायोदयः ॥ १४ ॥ सामान्यार्थः--जो जीवोंके अतत्त्वका जानना है सो अज्ञानका उदय है और जीवोंके कषायमई उपयोग है सो कपायका उदय है। विशेषार्थः-(जीवाणं) जीवोंके (ज) जो ( अतञ्च उवलद्धी ) भेदज्ञानको छोड़कर विपरीतरूपसे परद्रव्यसे एकतारूप होनेका- ज्ञान है सो (दुअण्णाणस्स उदओ ) तो अज्ञानका उदय है तथा (जोदु ) जो कि (कसाउ वओगो) शांत स्वरूप आत्माकी प्राप्ति है लक्षण निसका ऐसे शुद्धोपयोगको छोड़कर क्रोधादि कषायरूप उपयोग है (सो जीवाणं) मो जीवोंके (कमाउदओ) कषायका उदय है। भावार्थ:-ज्ञानावरणीय कर्मके उदयसे निज आत्मा और पर द्रव्योंका भेद विज्ञान नहीं होता तैसे ही कपायोंके उदयसे उपयोग मलीन रहता है इससे शुद्धोपयोग नहीं होता ॥१४॥ गाथाः-तं जाण जोगउदओ जो जीवाणं तु चिट्ठउच्छाहो। सोहणमसोहणं वा काययो विरदिभावो वा ॥ १४२ ॥ संस्कृतार्थः-तं बानीहि योगोदयं यो जीवानां तु चेष्टोत्साहः । शोभनाऽशोमनो वा कर्तव्यो विरतिभात्रो वा ॥ १४२ ॥ सामान्यार्थः—जीवोंके जो चेप्ठारूप उत्साह है उसे योगोंका उदय जानो । जो शुभ कर्तव्यरूप है वह शुभ योग है और जो हिंसादि पापरूप योग है सो अशुभ है। शब्दार्थ सहित विशेषार्थ:-(जीवाणं) जीवोंके (जंतु) जो (चिट्ठ उच्छाहो) मन, वचन, काय- रूप वर्गणाके आधारसे वीयांतराय कर्मके क्षयोपशमसे उत्पन्न, कर्मोंके ग्रहणमें कारणभृत आत्माके प्रदेशोंका हलन चलनरूप परिम्पंद लक्षणको रखनेवाला प्रयत्नमई व्यापारका उत्साह है (तं) उसको (जोगउदओ) योगोंका उदय (जाण) हे शिप्य तुम जानो । वह योग शुभ व अशुभ रूपसे दो प्रकारका है। (कादचो) जो ब्रतादि करने योग्य आचरणरूप PRACRENERALDHKIReera PERSaxsetaprssetinuedy १२४ समयसार टीका। योग है सो ( सोहणम् ) शुभ है ( अविरदि भावोवा) तथा जो अव्रतादिरूप वर्नने योग्य है सो (असोहणं ) अशुभ योग है भावार्थ:-मन, वचन, कायकी वर्गगाके आधारसे और वीर्यातराय कर्मोके क्षयोपशमसे जो आत्माके प्रदेशोंका परिम्पंद होना उसको योग कहते हैं । आधारके कारण उसके तीन भेद अर्थात् मनयोग, वचनयोग और काययोग कहे जाते हैं। वे तीनों दो रूप हैं जब अहिंमादि व्रतरूप मन, वचन, कायोंका परणमन होता है तब शुभ योग और जब हिमादि पापरूप इनका परणमन होता है तब इन्हें अशुभयोग कहते हैं ॥ १४२ ॥ गाथाः-एदेसु हेदुभूदेसु कम्मइयवरगणागयं जं तु । परिणमदे अठविहं णाणावरणादिभावेहिं ॥ १४३ ॥ संस्कृतार्थः-एतेपु हेतुभूतेषु कार्मणवर्गणागतं यत्तु । परेणमतेऽष्टविधं ज्ञानावरणादिभावः ॥ १४३ ।। सामान्यार्थः-इन ऊपर लिखे कारणोंके होनेपर कार्माणवर्गणा योग्य पुगलद्रव्य ज्ञाना- वरणादि आठ प्रकार कर्मरूप परणमता है । शमार्थ महित विशेपार्थ:--- पदेसु हेदुभूदेसु) इन मिथ्यात्त्व, अविरति, अज्ञान, कपाय और योगोंके उदयरूप कारण होनेपर (कम्मझ्यव- गणागयं जं तु) कामर्माणवर्गणा योग्य परिणमा हुआ नवीन अबंधरूप पुद्गलद्रव्य णाणावग्णादि- भावेहिं अट्ठविहं) जीवके सम्यग्दर्शन ज्ञानचारित्रमें एक परिणतिरूप परम सामायिक भावके न होनेपर ज्ञानावरणीय आदि आठ कर्मरूप (परिणमदे) परिणमन करता है। भावार्थ:-निस समय इस अशुद्ध आत्माके मिथ्यादर्शन, मिथ्याज्ञान व मिथ्याचारित्ररूप भाव होता है उस समय अथवा जब यह निर्विकल्पसमाधि भावमें स्थिर नहीं होता है तब योगोंके परिणमन होनेके कारणसे आठ प्रकार जोकार्माणवर्गणाआती हैं सो आठकमरूप परिणमन करती है।।१४३॥ गाथाः--तं खलु जीवणिवई कम्मइयवग्गणागयं जइया । तइया दु होदि हेदू जीवो परिणामभावाणं ॥ १४४ ॥ संस्कृतार्थः- तत्खलु जीवनिबद्धं कार्मणवर्गणागतं यदा । तदा तु भवति हेतु वः परिण.मभावानां ॥ १४४ ॥ सामान्या:-जिस समय कार्माणवर्गणा योग्य पुद्गल योगोंके द्वारा आकर इस जीवके साथ बंध जाते हैं उस समय यह जीव अपने मिथ्यात्व आदि भावबंधरूप भावोंका कारण होता है। शब्दार्थ सहित विशेषार्थः-(जड्या) जिस समय (खलु) प्रकटपने (तंकम्मइय वग्गणागदं) इस जीवके योगोंके द्वारा कार्माण वर्गणा योग्य पुद्गल द्रव्य आता है और (जीव- णिवई) जीवके साथ बंध जाता है (तइयादु) तिल समय अर्थात् जब पूर्वमें कहे हुए उदयमें प्राप्त पांच द्रव्य प्रत्ययोंका निमित्त होता है तब (जीवो) यह जीव अपनेर यथायोग्य गुण-
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समयसार टीका।
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स्थानोंके अनुसार (परिणामभावाणं) अपने भाव कमरूप भावोंका (हेछ) उपादान कारण (होदि)
होता है अर्थात् उदयमें प्राप्त द्रव्यकर्मके निमित्त होनेपर मिथ्यात्व व रागद्वेषादि रूप भावरूपमे
परिणमन करके यह जीव नवीन कर्मबंधका निमित्तकारण होता है यहां यह भावार्थ है कि
उदयमें प्राप्त द्रव्यकर्मरूप कारणोंके होने पर यदि यह जीव अपने स्वभाव मावको छोड़कर
रागद्वेषादिरूप भावकमसे परिणमन करता है तब ही इसके नवीन कर्मोंका बंध होता है केवल
कर्मोके उदयमात्रसे बंध नहीं होता । जैसे घोर उपसर्गाके आनेपर भी पांडवादि महामुनियोंको
वंध नहीं हुआ । यदि कमौके उदयमात्रसे ही वंध माना जायगा तो सर्व जीवोंके सदा संसार
ही रहेगा । क्योंकि संसारी जीवोंके सदा ही कोकाउदय रहता है। भावार्थ पिछले कर्मोके
उदय होनेपर जब जीव अपने स्वरूपसे च्युत व गाफिल होता है तब इसके रागद्वेषादि
भाव कर्म होते हैं उनके निमित्तसे उसी समय योगोंक द्वारा नवीन पुद्गलकम आकर जीवक
साथ. बंध जाता है। यदि यह सम्यग्ज्ञानी हो आत्मतत्वके अनुभवमें तल्लीन हो तो कर्म उ-
दयमें आते हुए भी इस जीवके आत्मीक दृढ़ताके होनेसे अपना असर जीवमें नहीं कर सक्ते
इससे नए कर्मोंको नहीं बांधते । तंत्र ज्ञानके प्रभावसे कर्मोक उदय होनेपर भी मंद कपाय
रखनेके कारण इसको यदि कभी बंध भी होता है तो बहुत तुच्छ होता है। जब स्वसमाधिमें
लीन होता है तब बंध नहीं होता व दसवें गुणस्थान तक कुछ होता भी है तो वह बहुत ही
निर्वल अबंधके सदृश होता है। ऐसा होने हीसे संसारी आत्मा कर्मोसे मुक्त होसक्ता है, जो
सदाकाल कर्मोके उदयके अनुसार बंध हुआ करे तो यह जीव कभी भी मुक्त न हो-सो यह
बात नहीं है । आत्माका पुरुषार्थ जब बलिष्ठ होता है तो जड़ कम इसका कुछ भी नहीं कर
सक्ते। अतएव सर्व हितेच्छु जीवोंको उचित है कि पुरुषार्थको सम्हाल रागद्वेषादि भावोंक
ज़ोरसे बंचे और शांतरूप भावका अभ्यास कर वर्तमानमें भी सुखी हों और आगामी भी
तीव्रबंधसे रक्षित हों॥ १४४ ॥
इस प्रकार पुण्य पाप आदि सात पदार्थोकी पीठिकारूपसे इस महा अधिकारमें पंच
गाथाओंके द्वारा यह व्याख्यान किया गया कि अज्ञानभाव पांच कारणरूपसे शुद्धात्म स्वरूपसे
भ्रष्ट जीवोंके लिये बंधका कारण होता है इस तरह मातवां अंतर अधिकार पूर्ण हुआ ॥१४॥
आठवां अंतराधिकार।
इसके पीछे यह कहते हैं कि जीव और पुद्गलके परस्पर उपादान कारण नहीं है इस
मुख्यतासे तीन गाथाएँ हैं इसतरह आठवें अंतराधिकारकी समुदाय पातनिका पूर्ण हुई।
अब कहते है कि जीवका परिणाम कर्महर पुगलसे भिन्न ही है।
गाथा:--जीवस्सदु कम्मेण य सह परिणामा दु होति रागादी।
एवं जीवो कम्मं च दोवि रागादिमावणा ॥ १५ ॥
३ ARRArenceNRNAKOLARSR คะ ๒eewarussian १२६ समयसार टीका। संस्कृतार्थ:-जीवस्य तु कर्मणा च सह परिणामाः खलु भवंति रागादयः । एवं जीवः कर्म च द्वे अपि रागादित्वमापन्ने || १४५ ॥ सामान्यार्थ-यदि उपादान कारणभूत जीवके उपादान कारणरूप कर्मोदयके साथ २. रागादिभाव होते हैं ऐसा माना जायगा तो इस प्रकारसे जीव और पुदलकर्म दोनों ही रागादि रूप हो जायेंगे । शब्दार्थ सहित विशेषार्थः-( जीवस्स दु ) इस उपादान कारणरूप जीवके ( कम्मेणय सह ) उपादान कारणरूप कर्मोदयके साथ २ यदि ( रागादी परिणामा) रागादिक भाव होते हैं (एवं) ऐसा मानेंगे तो (जीवो कम्म च दोवि) जीव और कर्म दोनोंके ही उपादान कारण होनेसे जैसे फिटकरी और हल्दीक उपादान कारणमे लाल रंगपना हो जाता है ऐसे (रागादिम्) रागादि भावरूपपना (आवण्णा) प्राप्त हो जायगा। यदि जीवके साथ २ पुगलको भी रागादि भावोंका उपादान कारण माना जायगा तो पुद्गलको चेतनपना हो जायगा यह वात प्रत्यक्षमें विरोधरूप है। भावार्थ:-जम फिटकरी और हल्ली दोनोंका सम्बन्ध लाल रंगको पैदा करता है इस कार्यमें दोनों ही उपादान कारण हैं ऐसा कारणपना जीव और पुद्गलोंका रागादिभावोंके साथ नहीं है । और यदि दोनोंको उपादान कारण माना जायगा तो पुद्गलमें चेतनपना मानना पड़ेगा यह बात हो नहीं सकती ॥ १४५ फिर रागादिभावोंका उपादान कर्ता कौन है उसी पर आगे भी विचार करते है- गाथाः-एकस्त दु परिणामा जायदि जीवस्स रागमादीहिं। ता कम्मोदय हेदू हि विणा जीवस्त परिणामो ॥ १४६ ॥ संस्कृतार्थ:-एकस्य तु परिणामो जायते जीवस्य रागादिभिः । तकर्मोदयोतुभिविना जीवस्य परिणामः || १४६ ॥ सामान्यार्थः-यदि एक मात्र इस जीवके ही रागादि भाव होते हैं ऐसा मानेंगे तो यह दोप आवेगा कि कर्मोदयके हेतुके विना भी जीवके रागभाव प्राप्त हो जायगा। शब्दार्थ सहित विशेषार्थः यदि पूर्वमें आते हुए दोपसे वचनेके भयसे यह आपका अभि- प्रायहो कि (एक्कस्स) एकले (जीवस्स)जीवके उपादान कारण होनेसे (रागमादीहिं) रागादिक भाव कर्म पैदा होते हैं (ता) तौयह दोष आयगा कि(कम्मोदय हेदृहिंविणा) कर्मोंके उदयका निमित्तपना न होनेपर भी (जीवस्स) शुद्ध जीवके (परिणामो) रागादिक भाव प्राप्त हो जायगा । यह प्रत्यक्ष विरोधरूप बात है क्योंकि मुक्तात्माके कभी भी रागादि भावोंसे छुटकारा नहीं होसकता तथा आगमसे भी विरोध आयगा । दूसरा व्याख्यान यदि इस गाथाका इस प्रकार किया जाय कि एक जीवके अशुद्ध उपादान कारणरूप होनेसे कर्मोदयके उपादान कारणके विना रागादिक परिणाम होते हैं तो ठीक ही है । यहां संस्ठत टीकामें उपादानका विशेषण अशुद्ध नहीं किया है परंतु हमारी समझमें होना चाहिये इस लिये लिखा है। तात्पर्य यह है कि DESCENOnces समयसार टीका। यह संसारी जीव अनुपचरित असद्भूतव्यवहार नयने ज्ञानावरणीय आदि द्रव्य कर्मोका कर्ता है तथा अशुद्ध निश्चय नयसे रागादि भावोंका कर्ता है । यद्यपि द्रव्यकोंके कर्त्तापनेको कहते हुए जब अनुपचरित असद्भूतव्यवहार नयका प्रयोग करते हैं तब इस अपेक्षासे अशुद्ध निश्चयको निश्चय संज्ञा देते हैं तो भी शुद्ध आत्मद्रव्यको विषय करनेवाली शुद्ध निश्चय नय की अपेक्षासे इस अशुद्ध निश्चयको व्यवहार ही कहते हैं । भावार्थ:-द्रव्यकर्म जहरूप है इससे आत्माके स्वभावस मिन्न इससे असदमृत हैं व आत्मामें बंधरूप हैं केवल उपचार मात्र नहीं हैं इससे अनुपचरित हैं इसीसे अनुपचरित असदभृत नयका प्रयोग किया है । रागादि भाव आत्माके ही हैं पर अशुद्ध आत्माके हैं इसीसे इनके लिये अशुद्ध निश्चय नयका व्यव- हार किया है । शुद्ध आत्माके यह रागादि भाव नहीं हो सक्ते इससे जीवके रागादि भाव हैं यह कहना भी व्यवहार मात्र है ॥ १४६ ॥ आगे कहते हैं कि निश्चयसे इस जीवसे भिन्न ही पुद्गल कर्मका परिणाम होता है:- गाथा:-एकस्स दु परिणामो पुग्गलदव्वस्स कम्मभावेण। ता जीवभावहेदूहि विणा कम्मस्स परिणामो ॥ १४७ ॥ -संस्कृतार्थ-एकस्य तु परिणामः पुदलद्रव्यस्य कर्मभावेन । तज्जीवभावहेतुभिर्विना कर्मणः परिणामः ॥ १४७ ॥ सामान्यार्थः--निश्चयसे एक पुद्गल द्रव्यका द्रव्यकर्म रूपसे परिणाम होता है इससे जीवके मिथ्यात्व आदि भावोंके उपादान हेतुके विना द्रव्यकर्मका परिणाम होता है। शब्दार्थ सहित विशेषार्थः-(एक्कस्स पोग्गलमदव्यम्स) एक उपादान कारणरूप कर्म वर्गणा योग्य पुद्गल द्रव्यका (कम्मभावेण) द्रव्यकर्म रूपसे (परिणामो) परिणमन होता है (ता) तिस कारणसे ( जीवभावहेदूहिं विणा ) जीव सम्बन्धी मिथ्यात्त्व रागादि परिणामोंके उपादान कारणके विना भी ( कम्मस्स परिणामो ) द्रव्यकर्मका परिणमन होता है । भावार्थ:-द्रव्य कर्मोंका उपादान कारण पुद्गलद्रव्य ही है जीवके भाव नहीं । यद्यपि निमित्त कारण अवश्य जीव सम्बन्धी भाव है । उपादान कारण वही होता है जो स्वयं कालान्तरमें उमरूप परिणमन कर जावे अतएव पुद्गलके परिणामोंका उपादान कारण पुद्गल और जीवके भावोंका उपादान कारण जीव है ।।.१४७ ॥ इस प्रकार पुण्य पापादि सात पदार्थोके पीठिकारूप महा अधिकारमें नीव और पुद्गलमें परम्पर उपादान कारणका निषेध है इस मुख्यतासे तीन गाथाओंके द्वारा आठवां अंतर अधि- कार समाप्त हुआ। नवां अंतराधिकार। अथानंतर व्यवहारसे यह जीव कोसे बंधा है निश्चयसे बंधा नहीं है इत्यादि विकल्प RANDMONSure समयसार टीका। ERRRRRRRRRRRORAN १२८ रूप नयके पक्षपातसे रहित शुद्ध पारिणामिक परम भावको ग्रहण करनेवाले शुद्ध द्रव्यार्थिक नयसे पुण्य पाप आदि सात पदार्थोंसे भिन्न शुद्ध समयसारको चार गाथाओंसे कहते हैं। यह नवमें अंतर अधिकारकी समुदाय पातनिका है। आगे अब शिष्यने प्रश्न किया कि आत्मामें कर्मोंका पंधन ध स्पर्शन है कि नहीं इसका समाधान आचार्य नय विभाग द्वारा कहते है। गाथाः-जीवे कम्म वडं पुढे चेदि ववहारणयभणिदं । सुद्धणयस्स दु जीवे अवडपुट्ट हवइ कम्मं ॥ १४८ ॥ संस्कृतार्थ:-जीव कर्मबद्धं स्पृष्टं चेति व्यहारनयेन णतं । शुद्धनयस्य तु जीव अवद्धस्पृष्टं भवति वम ॥ १४८॥ सामान्यार्थः-इस जीवके साथ कर्म बंधे हैं व इसे स्पर्श करते हैं यह व्यवहार नयसे कहा गया है । शुद्ध निश्चय नयसे इस जीवमें न तो कर्मीका बंध है और न स्पर्श है। शब्दार्थ सहित विशेषार्थः-(जीवे) इस अधिकरण स्वरूप संसारी जीवमें (कंम) द्रव्यकर्म (बई) दूध पानीकी तरह बंधे हुए एकमेक हो रहे हैं (च) व (पुट्ठ) संयोगमात्रसे लगे हुए हैं (इदि) यह (ववहारणय भणिय) व्यवहार नयके अभिप्रायसे कहा गया है। (दु) परंतु (सुद्ध- णयस्स) शुद्ध नयके अभिप्रायसे (जीवे) इस अधिकरण रूप जीवमें (कंम) द्रव्यकर्म (अवन्द- पुढेहवदि) न बंधे हैं न स्पर्शित हैं। तात्पर्य यह है कि निश्चय और व्यवहार दोनों नयोंका विकल्परूप शुद्धात्माका स्वरूप नहीं है। भावार्थ-यह जीव कर्मोसे बंधा है व नहीं बंधा है आदि कथन नयोंका विकल्प है वास्तवमें यह आत्मा इन विकल्पोंसे परे है। आगे कहते हैं कि यह जीव पंधा है व बंधा नहीं है इत्यादि विकल्परूप नयका स्वरूपतो कहा परन्तु पारिणामिक परमभावको गृहण करनेवाले शुद्ध द्रव्यार्थिक नयसे इस जीवमें यह नयका विकल्प नहीं होता कि यह जीव बंधा है व बंधा नहीं हैं। गाथा:-कम्मं वहमवडं जीवे एदं तु जाण णयपक्वं । पक्खादिकतो पुण भण्णदि जो सो समयसारों ॥ १४९ ॥ संस्कृतार्थ:-कर्म बद्धमबद्धं जीवे एवं तु जानीहि नयपझं । पश्चातिकांत: पुनर्मण्यते यः स समयसारः ॥ १४९ ॥ सामान्यार्थ-जीवमें कर्म बंधे है व नहीं बंधे हैं यह कहना नयोंका पक्ष है। परन्तु नय पक्षको छोड़कर जो कोई कथन किया जाता हैं वही समयसार है।शमार्थ सहित विशेषार्थः- (जीवे) इस अधिकरणस्वरूप जीवमें (कर्म) यह कर्म (वद्धं) बंधे हैं व (अबई) नहीं बंधे हैं (एदंतु) इस विकल्पको तो (णय पक्वं) नयोंका पक्ष (जाण) जानो अर्थात् बद्ध व अबद्ध कहना नयोंकी अपेक्षासे स्वीकार किया जाता है (पुणः) परन्तु (पक्खादिक्कत्तो) नय पक्षोंको SUNGNUseos RSA समयसार टीका। छोड़कर (जो) जो (भग्णदि) कथन किया जाता है (सो) मो (समयसारो) समयसार अर्थात् शुद्धात्मा है । व्यवहारनयसे यह जीव बंधा है ऐमा कहना नयका विकल्प है शुद्ध जीवका स्वरूप नहीं है तथा निश्चय नयसे यह जीव बंधा नहीं है ऐमा भी कहनानयका विकल्प है शुद्ध जीवका स्वरूप नहीं है। निश्चय व्यवहार दोनों नयोंसे यह जीव बंधा हैव नहींबंधा है यह मय नयोंका विकल्प है शुद्धनीवका स्वरूप नहीं है क्योंकि "श्रुत विकल्पाः नयाः" अर्थात् श्रुतज्ञानक भीतर जो भेद व विकल्प हैं सो नय हैं ऐमा सिद्धान्तका वचन है तथा श्रुनज्ञान क्षायिक ज्ञान नहीं है किन्तु क्षयोपशमिक है जो क्षयोपशमिक ज्ञान है वहज्ञानावरणीय कर्मके क्षयोप- शमसे प्रकट होता है । यद्यपि व्यवहार नयसे छमस्थ अर्थात् अन् ज्ञकी अपेक्षासे इस प्रकार जीवका स्वरूप कहा जाता है तथापि केवलज्ञानकी अपेक्षासे यह शुद्ध जीवका स्वरूप नहीं हो सका । तव शिप्यने पूछा कि जीवका स्वरूप किस प्रकारका होता है इसका समाधान आचार्य करते हैं कि जो कोई नयोंके पक्षपातसे रहित स्वमवेदन ज्ञानी है उसके अभिप्रायमे आत्मामें यह नयोंका विकल्प नहीं होता कि यह जीव बंधा हैव नहीं बंधा है. मृढ़ है वमृढ़ नहीं है इत्यादि । भोचिदानंदमई एक स्वभाव रूप है सो ही जीवका स्वरूप है | जमा कि कहा है कि जो नय पक्षपातोंको त्याग कर नित्य अपने स्वरूपमें गुत हो जाने हैं वे सर्व विकल्पोंमे रहित शांतचित हो साक्षात् अमृतका ही पान करते हैं। एक नयसे बंधा है एकमे नहीं यह दोनों ही विकल्प दोनों नयोंका पक्षपात । जो तत्त्वज्ञानी है और पक्षपातसे रहित है उसके लिये एक चतन्य सदा निश्चयसे एक चैतन्यरूप ही अनुभवमें आता है। आगमके ध्यान व विचारके समयमें जो दो नयरूप दुन्डि है वह बुद्धि बुद्धतत्व अर्थात तत्वज्ञानीके अपने आत्मस्वरूपमें स्थिर होते होते हुए चली जाती है। वहा भी है कि दोनों नयोंसे हेय और उपादेय तत्वका निश्चय करके त्यागने योग्य तत्वको छोड़कर ग्रहण करने योग्य आत्मतत्वमें स्थिर होना ही साधुओंकी सम्मतिमें ठीक है । भावार्थ---नय एक देश वस्तुको ग्रहण करती है इससे नयद्वारा विचार सर्वांग ग्रहण कग्नेको असमर्थ है इसमे जो सर्व नयोंका विकल्प छोड़कर अपने शुद्ध आत्मस्वरूपमें तन्मय होने हैं अर्थात् अपने आन्माके अनुभवमें मग्न हो जाते हैं। उन अनुभवमें विराजमान होनेवाले माधुओंके ही ऐमी म्वरूपमें तृप्तता रहती है कि वहां उनके यह विकल्प नहीं होता किहम निश्चयसे अनुभव करने हैं या व्यवहारसे | वहां तो केवल मात्र परम स्वस्थता है जिससे परमामृत रम झड़ता है जिसका वे पान करते हुए परमानंदित होते हैं । हां जब म्वरूपानुभवमे छूटने हैं तब विकल्पोंमें अवश्य आजाते हैं ॥ १४८ ॥ आगे शिप्यने प्रश्न किया कि नय पक्षोंको उल्धन का शुद्ध जीवया क्या म्वाए है मो विशेष ऋडिये इम इनग्में आचार्य कहते है। sho समयसार टीका। 3GREENAVEODES गाथाः--दोण्हवि णयाण भणिदं जाणइ णवरितु समयपडिवडी । ण दुणयपक्वंगिण्हदि किंचिविणयपक्खपरिहीणो॥१५० संस्कृतार्थः-द्वयोरपि नययोर्भणितं जानाति केवलं तु समयप्रतिबद्धः । न तु नयपक्षं गृह्णाति किंचिदीप नयपक्षपारहीनः ॥ १५ ॥ सामान्यार्थः-दोनों ही नयोंसे जो आत्माका स्वरूप कहा गया है उसको ज्ञानी केवल जानता है । किन्तु शुद्ध आत्मस्वभावके आधीन होकर नयकी पक्षोंसे छुटा हुआ कुछ भी नय पक्षको नहीं ग्रहण करता है ॥ शब्दार्थमहित विशेषार्थः-जो कोई नयोंकी पक्षपातसे दूर स्वसंवेदन ज्ञानी है सो बद्ध अबद्ध मूढ़ अमूढ़ आदि नयके विकल्पोंसे रहित चिदानंदमई एक स्वभावको (दोण्हविणयाण भणिदं) जैसे भगवान केवली निश्चय व्यवहार दोनों नयोंसे कहे हुए द्रव्यपर्याय रूप पदार्थको जानते हैं ऐसा (जाणादि) जानता है । भावार्थ-जैसे केवली महाराज जानते हैं ऐसे गणधर देव आदि छमस्थ मनुष्य भी दोनों नयोंसे कहे हुए वस्तुके स्वरूपको जानते हैं । ( णवरिंतु ) तथापि • केवलमात्र ( समय पडिवद्धो ) सहज परमानंदमई एक स्वभावके आधीन होता हुआ (णय पक्खपरिहीणो ) श्रुतज्ञानावरणीय कर्मके क्षयोपशमसे उत्पन्न विकल्पोंका जालरूप जो दोनों नयोंका पक्षपात उससे शुद्ध निश्चयसे दूर होकर ( णय पक्खं ) नयके पक्षपातरूप विकल्पको (गदु गिण्हदि) विकल्प रहित समाधिके कालमें अपने आत्मस्वरूप रूपसे नहीं ग्रहण करता है । भावार्थ-जब ज्ञानी जीव अपने शुद्ध आत्मस्वभावमें तल्लीन होता है तब नयोंका विकल्प नहीं करता है-स्वरूप तन्मयतामें केवल मात्र स्वरूपसे उत्पन्न आत्मीक रसका पान मात्र है ॥ १५० ॥ आगे कहते हैं कि पारिणामिक परम भावको करनेवाली शुद्ध द्रव्यार्थिक नयकी अपेक्षासे नयोके विकल्पस्वरूप सर्व ही पक्षपातसे अति दूर जो समयसार सो ही अनुभवमें विराजता है। गाथा:-सम्मइंसणणाणं एवं लहदित्ति णवरि ववदेसं । सव्वणयपक्खरहिदो भणिदो जो सो समयसारो ॥१५॥ संस्कृतार्थ:--सम्यग्दर्शनज्ञानमेतल्लभत इति केवलं व्यपदेशं । • सर्वनयपक्षरहितो भणितो यः स समयसारः ।। १५१ ॥ सामान्यार्थ-सर्व नयोंके पक्षपातसे रहित जो शुद्धात्मा है सो ही यथार्थरूपसे कहा गया है उसीको ही निर्मल दर्शन ज्ञानस्वरूपधारी इस नामसे कहते हैं । शब्दार्थ सहित विशेषार्थ:-( सव्वणय पक्ख रहिदो ) सर्व नयोंकी पक्षोंसे रहित अर्थात् पांच इन्द्रिय और मनसे उत्पन्न नो बाह्य इंद्रियों के विषयरूप पदार्थोंमें विकल्प उनसे दूरवर्ती होता हुआ बद्ध अबद्ध आदि सर्व विकल्परूप नयोंकी पक्षसे रहित (जो सो समयसारो) जो कोई समयसार अर्थात् शुद्धात्मा है उसको अनुभव करते हुए ही निर्विकल्प समाधिमें ठहरे हुए शुद्ध ग्रहण . . r १३१ समयसार टीका। पुरुषोंके द्वारा यह आत्मा देखा-जाना जाता है ऐसा ( भणिदो ) कहा गया है। इस कारणसे (णवरि ) केवल मात्र ( सम्मदंसण णाणं ) सर्व प्रकारसे निर्मल केवलदर्शन और केवलज्ञान मई.( ववदेस ) नामको ( एदं लहदित्ति ) यह शुद्धात्मा प्राप्त होता है परन्तु वह अबद्ध नामको नहीं । भावार्थ-शुदात्मानुभवमें शुद्धात्माका स्वरूप केवल दर्शन केवल ज्ञानमई तो कहा जा सकता है परन्तु बद्ध अवद्ध विकल्प नहीं होसका क्योंकि बंधना व खुलना अशुद्ध- ताकी अपेक्षासे है-तथा शुद्ध दर्शन और ज्ञान तो आत्माका निज स्वभाव ही है । इस- तरह निश्चय व्यवहार दोनों नयों के पक्षपातसे रहित जो शुद्ध समयसार उसके व्याख्यानकी मुख्यतासे चार गाथाओंके द्वारा नवमां अंतराधिकार समाप्त हुआ ॥१५१ इस प्रकार "जावणवेदविसेसंतरं" इत्यादि गाथाको आदि लेकर पाठके क्रमसे अज्ञानी व सम्यग्ज्ञानी जीवकी संक्षेप सूचनाके अर्थ छ: गाथाएँ कहीं, उसके बाद अज्ञानी सज्ञानी जीवका विशेष व्याख्यान करते हुए ११ गाथाएं कहीं, फिर चेतन अचेतन कार्योका एक उपादान कर्ता है इस प्रकारलक्षणको रखनेवाले द्विक्रियावादीको निराकरण करनेकी मुख्यतामे २५ गाथाएं कहीं। उसके बाद आश्रवके कारण प्रत्यय ही कर्माको करते हैं इसको समर्थन करते हुए सात सूत्र कहे। उसके पश्चात् जीव और पुद्गल दोनों कथंचित् परिणामी हैं इसको स्थापनेकी मुख्यतासे आठ सूत्र कहे। इसके बाद ज्ञानमई और अज्ञानमई परिणामको कहते हुए ९ गाथाएं कहीं। उसके बाद अज्ञानमई भावके मिथ्यात्व अविरति आदि पांच प्रत्ययोंके भेद हैं ऐसा प्रतिपादन करते हुए गाथाएं पांच हैं । इसके पीछे जीव और पुद्गलके परस्पर उपादान कर्ता- पना नहीं है इस मुख्यतासे तीन गाथाएं कहीं। फिर नयोंके पक्षपातसे रहित शुद्ध समयसारको कहते हुए चार गाथाएं कहीं इसतरह ७८ गाथाओंसे और ९ अंतर अधिकारोंसे इस शुद्धात्माकी अनुभूति लक्षणको रखनेवाली तात्पर्य्यवृत्ति नामकी समयसारकी व्याख्या में पुण्य पाप आदि सात पदार्थोका पीठिकारूप तीसरा महा अधिकार समाप्त हुआ। इसतरह ऐसा होनेपर जीवानीवाधिकार रंग भूमिमें नृत्य करनेके पीछे जैसे श्रृंगार किये हुए मनुष्य अपना श्रृंगार छोड़कर अलग होजाते हैं इसतरह शुद्ध निश्चयसे जीव और अजीव दोनों अपना कर्माको करनेवाला बेप छोड़कर चले गए। .. अथ चौका महा अधिकार । (४) अथानंतर निश्चयसे पुद्गल द्रव्य कर्म एक ही प्रकार है तथापि व्यवहार नयस दो पात्र वनकर अर्थात् एक पुण्य दूसरा पापकारूप करके रंग भूमिमें प्रवेश करता है। 'कंम मसुहंकु सील' इत्यादि गाथाको आदि लेकर क्रमसे १९ सूत्र तक पुण्यं पापका व्याख्यान करते हैं।
. MEReseamATTERY समयसार टीका। RELAANUASVALMEReciesARS इनमेंसे यद्यपि व्यवहारसे पुण्य और पापके भेद है तथापि निश्चयमे भेद नहीं हैं ऐसा व्या- ख्यान करते हुए छः सूत्र हैं इसके बाद वह कथन है कि अध्यात्मीक भाषाकी अपेक्षा शुद्धात्माकी भावनाके विना तथा आगम भाषामे वीतराग सम्यग्दर्शनके विना व्रत व दानादिक करना केवल पुण्य बंधका कारण ही है, मुक्तिका कारण नहीं है। परन्तु सम्यक्त्व सहित यदि बत दानादिक किया जाय तो परंपरासे मुक्तिका कारण होता है। ऐसा कहते हुए ' परमट्ठोखलु ' इत्यादि चार सूत्र हैं। इसके बाद निश्चय और व्यवहार मोक्षमार्गकी मुख्यतासे 'जीवादिसदहण' इत्यादि गाथाएं नव हैं । इस तरह पुण्य पाप पदार्थोक अधिकारमें समुदाय पाननिका पूर्ण हुई। आगे कहते है कि जैसे एक ब्राह्मणीके दो पुत्र जन्मे उनमें एक उपनय अान् यज्ञोपवीत सन्कार किये जानेसे ब्राह्मण महलाया दुसरा उपनय संस्कारके विना गृह ही रहा तन ही निश्चयनयस पुल कर्म एक ही है तौभी शुभ व अशुभ जीवके परिणामोके निमित्तसे व्यवहारसे से प्रकारका होता है। गाथा:-कम्ममसुहं कुसीलं सुहकम्मं चावि जाण सुहसीलं । कह तं होदि सुसीलं जं संसारं पर्वसंदि॥ १५२ ।। संस्कृतार्थ:-कर्माशुभं कुशलं शुभत्र में नापि जानीहि सुशीलं । वयं गद्भवति सुश.लं यत्सं सारं प्रवेशयति ॥ १५२ ।। सामान्याय-अशुभ कर्म कुशील है शुभ कर्म सुशील है ऐसा जानो. यद्यपि यह कथन व्यवहारसे है परन्तु निश्चयसे यह शुभ कर्म सुशील कैमे हो सकता है ? क्योंकि यह इसजीवको संसारमें प्रवेश कराता है । शब्दार्थ सहित विशेपार्थ-(असुहं) अशुभ (कंम) कर्म अर्थात् हिंसा झुठ चोरी आदि पापरूप क्रियाएं (कुमीलं) कुशीलरूप, त्यागने योग्य खोटी हैं। (चावि) ऐमे ही (सुहकंम) शुभ क्रियाएं दान पूजा परोपकारादि कर्म (सुसीलं) सुशील, शोभनीक और उपादेय हैं (जाण ऐसा जानो यह पक्ष व्यवहारी जीवोंका व्यवहार नयसे है परन्तु इसका विरोधी निश्चय नय करके इस कथनमें वाधा आती है। निश्चयवादी कहता है (कह) किसतरह (त) वह पुण्य कर्म (सुसीलं, सुशील व शोभनीक व उपादेय (होदि ) हो सक्ता है ? (ज) जो इस जीवको (संसारं पवेसेदि) संमारमं प्रवेश कराता है । भावार्थ-निश्चयनयमे पुण्य कर्म भी त्यागने योग्य है क्योंकि बंधरूप और आत्मस्वभावका निरोधक है । निश्चयन- यसे हेतु, स्वभाव, अनुभव और आश्नयरूप चारोंका पुण्य और पापमें अभेद है इसलिये इन दोनोमें द्रव्य कर्मकी अपेक्षा भेद नहीं है। इन्हीं चारोंको समझाते हैं कि पुण्य पाप दोनोंका हेतु शुभ और अशुभ जीवका परिणाम है सो परिणाम शुद्ध निश्चयनयकी अपेक्षा अशुभ रूप ही है इसलिये दोनोंका हेतु अशुभ है । प्रत्येक ही द्रव्य पुण्य व द्रव्य पापकर्म पुद्गल द्रव्य है इसलिये निश्चयसे दोनोंका स्वभाव पुद्गल द्रव्यरूप है । पुण्य कर्मका फल सुखरूप पाप कर्मका दुःखरूप है इन दोनोंका फलरूप अनुभव आत्मासे VACARRADEE समयसार टीका। उत्पन्न विकार रहित आनंदकी अपेक्षा दुःखरूप है इस ही से एकसा ही है | पुण्यका आश्रय शुभ बंध रूप और पापका अशुभ बंध रूप है सो दोनों ही बंधकी अपेक्षा एक ही हैं, इसलिये हेतु, स्वभाव, अनुभव,आश्रयोंमें व्यवहारनयसे यद्यपि पुण्य और पाप कर्मक भेद है तथापि निश्चयसे इनमें कोई भेद नहीं है इसतरह व्यवहार वादियोंका पक्ष बाधाको प्राप्त होता है। भावार्थ-शुद्ध निश्चय नयकी अपेक्षा शुभ व अशुभ दोनों ही हेय व त्यागने योग्य हैं। १५२॥ आगे साधते हैं कि पुण्य और पाय दोनों ही कर्म विशेषकरके बंधके कारण है। गाथाः-सोवणियमि णियलं बंधदि कालायसंच जह पुरिसं । वंधदि एवं जीवं सुहमसुई वा कई कम्मं ॥ १५३ ॥ संस्कृतार्थः- सावणिकर्माप निगलं वनाति कालायतमपि च यथा पुरुष । बन संत्रं जीचं शुभमशुभं वा कृतं कर्म ॥ १५३ ॥ सामान्यार्थ---जैसे लोहेकी वेड़ी पुरुषको बांधती है ऐसे ही मुवर्णकी बड़ी बांधनी है इसी प्रकार शुभ वअशुभ किया हुआ कर्म इस जीवको बांधता है। शब्दार्थ सहित विशेषार्थ- (ह) जैसे (पुरिम) पुरुषको (मोवण्हियम्मि णियलं) सुवर्णकी बेड़ी (च) तथा (कालायम) लोहेकी बेड़ी (बंधदि) बांधती है (एवं) इसी प्रकार (सुहम्) शुभरूप (असुंह) वा अशुभ- - रूप (कदं) किया हुआ (कंम) कर्म (जीव) इस संसारी जीवको (बंधदि) बांधता है। दोनों ही प्रकारके कर्म आत्माको बांधनेवाले हैं। तात्पर्य यह है कि भोगोंकी इच्छारूप निदान करके रूप, सुन्दरता, सौभाग्य, कामदेवपना,. इंद्रपना, अहमिंद्रपना,, प्रसिद्धि, पूजा, लाभ आदिके. निमित्त जो कोई.व्रत तपश्चरण दान पूजादिक करता है वह पुरुप दहीके वास्ते मानों रत्न बचता है, व भस्मके लिये रत्नके ढेरको जलाता है व मृतके वास्ते हारको चूरता है व कोदवका खेत वोनेके लिये अगरके. वनको काटता है अर्थात् अपने व्रतादिक परिश्रमको वृथा ही नष्ट करता है। परन्तु जो कोई शुद्धात्माकी भावनाके साधनके लिये वाह्य व्रत तपश्चग्ण दान पूजादिक करता है वह परम्परासे मोक्षको प्राप्त करता है। भावार्थ-भोगोंकी इच्छामे किये हुए शुभ कर्म भी संसार भ्रमण हीके कारण है। इसलिये महावंधरूप हैं, कुशील हैं, त्यांगने योग्य हैं। परन्तु जो शुद्धात्माकी भावनाके अर्थ शुम कम किये जाते हैं वे यद्यपि मंद रागकी अपेक्षा बंधके कारण हैं तथापि अंतरंगमें शुद्ध भावनाकी भूमिका होने इस आत्माके मोक्षपढ़के ही प्रेरक हैं इसलिये उपादेय हैं ।।१५३॥ आगे कहते है कि मोक्षमार्गमें शुभ व अशुभ दोनों ही प्रकारके कम्म निषधने योग्य है- गायाः तमाङ कुसीलेयि रायं माकाहि माव संसाग । साहीणो हि विणासो कुसीलसंसरगरायेहिं ॥ १५४ ॥ A .
RAHARANANADLORANGERel समयसार टीका। संस्कृतार्थः-तस्मात्तुं कुशीलैः रागं मा कुरु मा वा संवर्ग । स्वाधीनो हि विनाशः कुशीलसंसर्गरागाभ्याम् ॥ १५४ ।। सामान्यार्थ:-इसलिये शुभ अशुभ कर्मरूप कुत्सितभावोंसे न तो राग कर और न संसर्ग कर क्योंकि कुशीलकी संगति व रागसे अवश्य स्वाधीन सुखका नाश होवेगा। शब्दार्थसहित विशेषार्थ:-(तम्हादु) ऊपर लिखित कारणसे (कुमीलेहिय) आत्मस्वभावसे विलक्षण शुभ व अशुभ कर्मों के साथ (राग) मन सम्बन्धी प्रीति (माकाहि) मत कर | (वमा संसग्गं) और न वचन तथा कायसे संगति कर कारण यह है कि (कुसील संसग्गराएहिं) शुभाशुभ कर्मरूप कुशील भावोंके साथ राग व संगति करनेसे (हि) नियनसे ( साहीणो) निर्विकल्प समाधि अथवा स्वाधीन आत्मीक सुखका (विणासो) नाश है। भावार्थ-आत्म- समाधि शुद्धोपयोगरूप है अतएव आचार्य शिप्यको कहते हैं कि यदि तू निजाधीन अती- न्द्रिय सुखको चाहता है तो शुभ व अशुभ दोनों कर्मोको त्याग कर, मन वचन कायसे इनकी संगति न कर । क्योंकि शुद्ध आत्मसमाधि रूप भाव ही मोक्षका साक्षात् मार्ग है। जिसकी शक्ति स्वसमाधिमें ठहरनेकी नहीं है वह उसीकी प्राप्तिके लिये उस शुद्ध स्वरूपकी भावना भगवद्भक्ति, स्वाध्याय, तत्व विचारादिसे करता है। उस समय उसके कर्म यद्यपि शुभ हैं पर शुद्धभावमें लेजानेको सहायक हैं ॥१५४॥ आगे श्री कुंदकुंदाचार्य देव दोनों ही शुभ व अशुभ कर्मोका निषेध दृष्टान्त व दाष्ट्रान्तसे कहते हैं: गाथा:-जहणाम कोवि पुरिसो कुच्छियसीलं जणं वियाणित्ता। वजेदि तेण समयं संसग्गं रायकरणं च ॥ १५९ ॥ एमेव कम्मपयड़ी सीलसहावं हि कुच्छिदं णाहूं। वजंति परिहरंति य तं संसग्गं सहावरदा ॥ १५६ ॥ संस्कृतार्थ- --यथा नाम कश्चित्पुरुषः कुत्सितशीलं जनं विज्ञाय । वर्जयति तेन समकं संसर्ग रागकरणं च ॥ १५५ ॥ एवमेव कर्मप्रकृतिशीलस्वभावं हि कुत्सितं ज्ञात्वा । वर्जयन्ति परिहरति च तसंसर्ग स्वभावरताः ॥ १५६ ॥ सामान्यार्थ-जैसे कोई पुरुप किसी मनुष्यको खोटा, कुशीला व अपने स्वभावसे भिन्न जानकर उस जनके साथ न तो राग करता है और न उसकी संगति करता है। उसी ही तरह शुभ व अशुभ कर्मोकी प्रकृति, शील व स्वभावको खोटा जानकर अपने आत्मस्वभावमें लवलीन पुरुष उनकी संगतिको छोड़ते हैं तथा मना करते हैं । शब्दार्थ सहित विशेषार्थ- (जह) जैसे (कोपि) कोई भी (पुरिसो) पुरुष (कुछिय सील) कुत्सित स्वभाववाले (जणं) मनु- ज्यको (नाम) प्रकटपने (वियाणित्ता) जान करके (तेण) उसके (समय) साथ (संसर्ग) वचन है -
SAGERREnemsexi
समयसार टीका।
और काय सम्बन्धी मेल (च) और (रायकरण) मनसे राग करनेको (वनेदि) मना करता है
अर्थात् खोटे आदमीको बुरा जानकर उससे मन वचन काय द्वारा प्रेम नहीं करता है । यह
दृष्टान्त कहा-(एमेव) इसी ही तरह (कंम पयडी) कर्म प्रकृति (मीलसहाव) व उसके शील
या स्वभावको (कुच्छिदं) कुत्सित अर्थात् त्यागने योग्य खोटा (णार्दु) जानकर (तं संसग्गं)
उस समम्त शुभाशुभ कर्मोसे मन सम्बन्धी राग व वचन और कायसे संगतिको (महावरदा)
सर्व द्रव्य व भाव पुण्य पाप परिणामोंको त्यागनेसे उत्पन्न हुई जो. अभेद रत्नत्रय लक्षणको
रखनेवाली विकल्प रहित समाधि उस मई अपने स्वभावमें लीन साधुजन इस जगतमें (वनंति)
वर्जन करते हैं (परिहरंति) व त्याग देते हैं । यह दाप्ट्रान्त है। भावार्थ-माधुपुरुष पुण्य ·
और पाप दोनों ही कम्मोको त्यागने योग्य समझकर अपनी निर्विकल्प समाधिमें तल्लीनता
पानेके लिये उन्हें त्याग देने हैं। क्योंकि बंधके कारण भावोंसे राग व मेल ही आत्माके
स्वभावका घातक है ॥ १५५-१५६ ॥
आगे दोनों ही कर्म शुद्ध निश्चयनयसे न केवल बंधके ही कारण हैं परन्तु निषेधने
योग्य है ऐसा आगम द्वारा साधन करते हैं ।
गाथा:-रत्तो वंधदि कम्मं मुंचदि जीवो चिरागसंपण्णो ।
एसा जिणोवदेसो तमा कम्मेसु मारन ॥ १५७ ॥
संस्कृतार्थ-रक्तो बध्नाति कर्म मुच्यते जीवो विरागसम्पन्नः ।
एषो जिनोपदेशः तस्मात् कर्मसु मारज्यत्व ॥ १५७ ॥
सामान्यार्थ-रागी पुरुष कर्मोको वांधता है परन्तु विरागी जीव कीसे मुक्त होता
है। ऐसा जिनेन्द्र भगवानका उपदेश है इसलिये शुभाशुभ कर्मोमें रंजायमान मत हो ।
शब्दार्थ सहित विशेषार्थ-(रत्तो) रागी द्वेपी (जीवो जीव (कंम) कमेंको (बंधदि)
बांधता है (विरागसंपण्णो) परंतु कसे उत्पन्न होनेवाले भावोंमें वैराग्यको धरनेवाला आत्मा
(मुंचदि)कमेंसे छूटता है ( एसो ) यह प्रत्यक्ष रूपसे (जिणोवदेसो) जिनेन्द्र देवका उपदेश
है। भगवानने कहा है कि पुण्य और पाप दोनों ही प्रकारके कर्म बंधके कारण हैं न केवल
बंध ही के कारण हैं परंतु त्यागने योग्य हैं। (तम्हा) इसलिये शुभ व अशुभ संकल्प व
विकल्पोंसे रहित होकर अपने ही शुद्धात्माकी भावनासे उत्पन्न होनेवाला जो विकार रहित
सुखामृत रसका स्वाद उमसे तृप्त हो (कंमेसु) शुभ व अशुभ कॉमें (मारज) मत रागद्वेष
कर | भावार्थ-रागी द्वेपी आत्मा कोको बांधता है परन्तु वीतरागी नये काँको नहीं
बांधता है किन्तु पुराने बंधे हुए कोंकी निर्जरा करता है इसलिये मुमुक्षु पुरुषको योग्य है
कि इन शुम व अशुभ कर्मोमें राग व द्वेष न करके अपने शुद्ध आत्मस्वरूपका ही
अनुभव करे ॥ १५७ ॥
. - HEMEMETERMINARIES समयसार टीका। "इस प्रकार यद्यपि अनुपचरित असद्भूत व्यवहार नयसे द्रव्यपुण्य और पापमें भेद है तथा अशुद्ध निश्चय नयसे द्रव्यपुण्य और पापसे उत्पन्न इन्द्रिय सुख और दुःखमें भेद है तथापि शुद्ध निश्चयसे भेद नहीं है इस व्याख्यानकी मुख्यतासे छः गोथाएं पूर्ण हुई।- आगे विशुद्ध ज्ञानशब्दका वाच्य जो परमात्मा है वही मोक्षका कारण है ऐसा कहते हैं।-- गाथा:-परमट्टो खलु समओ सुडो जो केवली मुणी जाणी। तमिठिदा सम्भावे मुणिणो पावंति णिव्वाणं ॥ १५८ ॥ संस्कृतार्थ:-परमार्थः खलु समयः शुद्धो य: केवली मुनिर्शानी । तस्मिन् स्थिताः स्वभावे मुनिनः प्राप्नुवंति निर्वाणं ॥ १५८ ॥ सामान्यार्थ--परम पदार्थ आत्मा निश्चयमे शुद्ध, केवली, मुनि और ज्ञानी है। इस आत्माके स्वभाव ठहरनेवाले मुनिजन निर्वाणको प्राप्त करते हैं । शब्दार्थ सहित विशेषार्थ- (खलु) निश्चयसे (परमट्ठो) परमार्थरूप उत्कृष्ट पदार्थ जो परमात्मा है अथवा धर्म, अर्थ, काम और मोक्षरूप चारों पुरुषार्थोंमें सर्वसे महानपुरुषार्थ मोक्ष है अथवा मति, श्रुत, अवधि, मनःपर्यय और केवलज्ञानके भेदोंसे रहित जो निश्चय एकस्वरूप परमार्थ है सो ही परमात्मा है। वही है। अर्थात् जो भले प्रकार अपने शुद्धगुण और पर्यायोंमें परिणमन करे वह समय है (सम्यक् अयति गच्छति शुद्धगुणपर्यायान् परिणमति) । अथवा भलेप्रकार संशय आदिसे रहित जो ज्ञान है सो ही समय है (सम्यक् अयः संशयादिरहितो बोधो ज्ञानं यस्यस)। अथवा अपने एक परम समरसी भावसे अपने ही शुद्ध स्वरूपमें परिणमन करे सो समय है (सम् इति एकत्वेन परमसमरसीभावेन स्वकीयशुद्धस्वरूपे अयनं गमनं परिणमनं समयः) वही (सुद्धो) शुद्ध रागादि भावकर्मोसे रहित है, वही (केवली) परद्रव्यसे रहित होनेके कारणसे किसीके सहाय रहित केवली है, सो ही (मुणी) मुनि प्रत्यक्षज्ञानी है तथा सो ही (गाणी) विशुद्धज्ञानमई है ऐसा ही परमात्मा उत्कृष्ट आत्मा है। (तझिसमावे) इस परम आत्मस्वरूपमें (ठिदा) ठहरनेवाले वीतराग स्वसंवेदनज्ञानमें लवलीन (मुणिणो) मुनिजन अर्थात् तपोधन (णिव्वाणं) निर्वाण अर्थात् मुक्ति (पावंति) पाते हैं। भावार्थ-जो मुनि रागादि भावरहित शुद्धज्ञान दर्शन सुखादिगुणोंका पुंज. उत्कृष्ट आत्मस्वभावमें अपनी स्वसंवेदन ज्ञान परिण- तिके द्वारा लीन होते हैं वे अवश्य कर्मबंधोसे छूटकर परमकल्याणमय मोक्षको प्राप्त करते हैं ।। १५८ ॥ आगे कहते हैं कि उस ही शुद्ध उत्कृष्ट आत्मस्वरूपमें न ठहरनेवाले तथा जिनको स्वसंवेदन ज्ञान नहीं ह उन जीवोंके द्वारा किया हुआ व्रत व तपश्चरण आदि सो सर्व पुण्य बंधका ही कारण हैं । गाथा:- परमम्मिय अठिदो जो कुणदि तवं वदं च धारयदि । तं सव्वं वालतवं वालवदं विति सव्वल ॥ १६९ ॥ समय - . 9 - समयसार टीका। १७ परममा चास्थितः करतियः तपोव्रतं च धारयति । तस वालतमा वालवत विदंत सर्वज्ञाः || १५९ ।। सामान्यार्थ-जो परमार्थ स्वरूपमें नहीं लीन होते हुए तप करते व व्रत धारण करते हैं वह सब अज्ञान तप और अज्ञानव्रत है, ऐमा सर्वज्ञभगवान कहते हैं। शब्दार्थ सहित विशेषार्थ-(जो) जो कोई आत्मज्ञान रहित प्राणी (परमट्टम्मिय) परमार्थ लक्षणमई परमात्माके स्वरूपमें (अठिदो) नहीं स्थिर होते हुए अर्थात् परमात्म स्वरूपका अनुभव नहीं करते हुए. (तवं कुणदि) अनशन आदि १२ प्रकारका तप करता है .च) तथा (वह धारयदि) अणुव्रत व महाव्रतादिक धारण करता है (तं नम्बं) यह सर्व (वालतवं चालकोंकासा अज्ञान तप व (वा- लवदं) वालकोंकामा अज्ञानत्रत है ऐसा मन्चल) सर्वज्ञ भगवान (विति) कहते हैं। क्योंकि यह पुण्य व पापके उद्यनिन भावोंमें विशेष भेदज्ञानको नहीं धारण किये हुए है । भावार्थ-निन शुदात्माको उपादेय मानके जो व्रत व तपादिक किया जावे मो ही यथार्थ मोक्षका कारण है, अन्यथा केवल पुग्य बंधका कारण होके मंसारका ही बहानेवाला है ॥१५९॥ आगे कहते है कि स्वसंवेदन ज्ञान मोक्षका और अज्ञान पंधका हेतु है। -वणियमाणिधरंता सीलाणि तहा तवं च कुव्वंता। परमवाहिरा जेण तेण ते होति अण्णाणी ॥ १६० ॥ ब्रानियमान् घ.रयत: शीनानि तां तश्च वाणः । परमाथवाडा येन तेन ते भवन्त्यज्ञानिनः ।। १६० ॥ सामानार्थ-व्रत नियमोंको धारण करते हुए तथा शील व तपश्चरणको पालते हुए जो जीव परमार्थ स्वरूपसे बाहर हैं ये अज्ञानी हैं । जन्दार्थ सहित विशेषार्थ-(वदणियमाणि) महाव्रत अणुव्रत व अन्य नियम प्रतिज्ञाओंको (धरंता, धारण करते हुए (तहा) तथा (सीलाणि) शीलोंको अर्थात् क्रोधादि रहित स्वभावोंको व शीलवतको व सात प्रकार शीलोंको और (तवं) तपको (कुव्वंता) करते हुए (च) भी जो मन, वचन, कायकी गुप्तिमें गुप्तरूप समाधिलक्षणको रखनेवाले भेदज्ञानसे बाहर हैं वे ( परमडु वाहिरा) परमार्थसे बाहर हैं (जेण तेण) इस कारणले (अग्णाणी) अज्ञानी (भवंति) हैं। अज्ञानी पुरुषोंको किसतरह मोक्षका लाभ होसक्ता है ! जो कोई परमसमाधि लक्षणको रखनेवाले भेदज्ञान संयुक्त हैं वे यदि वाह्यरूप व्रत नियमोंको व शील व ताको नहीं प्रकटरूप प्रवृति रूपसे आचरण कर रहे हैं तो भी मोक्षको प्राप्त कर-. सक्ते हैं क्योंकि वहां भेदज्ञानका सद्भाव है। क्योंकि वे परमार्थये बाहर नहीं है इसलिये वे ज्ञानी है। ज्ञानियों को नो नोक्ष होता ही है। -जो पुनि अवस्था थार कर भी जब- तक द्रव्यरूप बाह्य व्रतान्दि पालने ही उपयुक्त हैं नव तक उनके परम तन्मयरूप भेदज्ञान नहीं हैं जब उस ओरसे उपयोगको हटाकर अपने स्वरूपमें तन्मय होने हैं तब ही वे मोक्षको .
१३८
समयसार टीका।
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प्राप्त कर सक्त हैं-इसीका विस्तारसे कथन यह है कि शिप्यने प्रश्न किया कि यदि व्रत
नियम शील व बाह्य तपश्चरणके विना भी मोक्ष होती है तो संकल्प विकल्प रहित जीवोंक
विषयोंके व्यापार होते हुए भी.पाप नहीं होगा तथा तपश्चरण न करते हुए भी मोक्ष हो
जावेगी फिर तो जैसा सांख्य व शैवके अनुसार कहनेवाले हैं उन्हींका मत सिद्ध हो जावेगा।
आचार्य इस वातका उत्तर कहते हैं कि यह बात ठीक नहीं है जो विकल्प रहित और
मन,
वचन कायकी, गुप्तिमई समाधिलक्षण भेदज्ञानके रखनेवाले हैं उन्हीं जीवोंके मोक्ष होती है यह
बात पहले बहुतवार विशेष करके कही गई है। जिससमय परम समाधि लक्षण भेदज्ञान अंत-
रंगमें विराजता है उस समय वे शुभ मन, वचन, कायके व्यापार भी नहीं है जो परंपरासे
मुक्तिके कारण हैं तो फिर अशुभ विषय कपायरूप व्यापार तो हो ही नहीं सके। चित्तमें
विराजनेवाले रागभावके नष्ट होते हुए वाह्य विषयोंमें व्यापार नहीं दिखलाई पड़ता है जैसे
चावलके भीतरका छिलका उतरने पर बाहरका तुप नहीं प्रकट हो सक्ता। इसमें कारण यह है
कि विकल्प रहित समाधि लक्षण स्वरूप भेदज्ञान और विषय कपायरूप व्यापार इन दोनोंमें
परस्पर विरोध है जैसे शीत और उप्णका परस्पर विरोध है। भावार्थ-जहां परम अनुभव
स्वरूप ध्यानमें तन्मयपना है वहां शुभ व अशुभ दोनों प्रकारके व्यापार नहीं हैं इसीसे कहा
है कि उस कालमें वाह्य प्रवृत्तिरूप महाव्रत व नियमादि सर्व विकल्पोंका अभाव है । जबतक
निजानंद भावका लाभ नहीं है तव तक कदापि मोक्षका साक्षात् उपाय नहीं हो सका।
इसीसे इस आत्मज्ञानके विना मुनिपना मोक्षका कारण नहीं है।
इसका यह प्रयोजन नहीं है कि विना मुनिपना धारण किये हुए भी ऐसे भाव हो जायेंगे
जो साक्षात् मोक्षके कारण हैं । मुनिलिंग वाह्य निमित्त है जबतक यह निमित्त न होगा
तब तक परिग्रह सम्बन्धी तीव्र रागभाव दूर नहीं हो सकता और विना उस रागभावके त्यागे
हुए यह प्राणी उस वीतरागमई आत्मज्ञानको नहीं पासकता जो सातवें गुणस्थानमें होता है।
छठे गुणस्थान सम्बन्धी परिणाम भी उस जातिके रागभावके त्याग विना नहीं हो सकते ।
जो केवल मुनिव्रत धार वाह्य व्रतादि आचरण करे और अंतरंगमें आत्मज्ञानकी ज्योतिको न-
जगावे उसके लिये आचार्य्यने मोक्षमार्ग निषेध किया है । अतएव जिसतरह हो उपाय करके
आत्मज्ञानका यत्न करना योग्य है । इसीके होते हुए ही चौथा व पांचवा गुणस्थान भी
संभव है विना इसके कुछ नहीं ॥ १६० ॥
आगे जो वीतराग सम्यग्दर्शन रूप शुद्धात्माकी भावनाको छोड़कर एकान्तसे पुण्यकमको ही
मुक्तिका कारण कहते हैं उनको समझानेके लिये आचार्य फिर भी उसको दूषण बताते हैं-
गाथा:-परमगहिरा जे ते अण्णाणेण पुग्णमिच्छति ।
संसारगमणहेतुं विमोक्खहेर्नु अयाणंता ॥ १६१॥
Recemes समयसार टीका। संस्कृतार्थः-परमार्यवाह्या ये ते अशानेन पुष्याम्च्छति । संसारगमनहेतुं विमोक्षहेतुमजानतः ॥ १६१ ॥ सामान्यार्थ-जो परमार्थसे बाहर हैं और मोक्षके कारणको नहीं जानते हैं वे संसारमें गमनका कारण जो पुण्य है उसकी इच्छा करते हैं। शब्दार्थ महित विशेषार्थ-(परमट्ठ बाहिरा ) जो इस संसारमें कोई जन सकल कर्मोके क्षयरूप मोक्षको चाहते हुए भी अपनी परमात्म भावनामें परिणमन करनेवाले अभेद सम्यग्दर्शन ज्ञानचारित्र लक्षणमई परम सामा- यिकको पहले दीक्षाकालमें करनेकी प्रतिज्ञा करके भी चिदानंदमई एक स्वभावरूप शुद्ध आत्माके यथार्थ अंदान, ज्ञान और चारित्रमें ठहरनेकी शक्ति न होनेके कारणसे पूर्वमें कही हुई परम सामायिकको नहीं अनुभव करते हुए परमार्थ स्वरूपसे बाहर ठहरे हुए (विमोक्ख- हेढुं) अभेद रत्नत्रय स्वरूप मोक्षके कारणको (अयाणता) नहीं जानते हैं। (ते) वे (अण्णा- ण) अपने अज्ञानमावसे (संसार गमणहे,) संसारमें भ्रमणका कारण होनेसे बंधका कारण स्वरूप (पुण्ण) पुण्यकर्मको (इछंति) चाहते हैं अथवा बंधका कारण स्वरूप जो पुण्य है उसे मोक्षका कारण भी मान लेते हैं क्योंकि वे पूर्वमें कहे हुए परम सामायिक रूप मोक्षके कारण को नहीं जानते हैं । प्रयोजन यह है कि विकल्प रहित समाधिके कालमें स्वयं ही व्रतोंका व अव्रतोंका प्रस्ताव नहीं हो सक्ता अर्थात् बाह्य व्यवहाररूप व्रत वहां नहीं हैं अथवा जो निर्विकल्प समाधि है वही निश्चयव्रत है ऐसा अभिप्राय समझना । भावार्थ-बाह्यमें क्रिया रूप महाव्रतादि धारणेका प्रयोजन विकल्प रहित समाधि भावका लाभ है फिर जब वह प्राप्त हो गई तव अन्य विकल्पोंसे कुछ प्रयोजन नहीं रहा। निजात्मानुभवरूप समाधिमें स्वरूप गुप्तता और स्वरूपानंद है सो ही मोक्षका मार्ग है । इस प्रकार शुद्धात्मा ही उपादेय है ऐसी वीतराग सम्यत्त्वरूप भावनाके विना व्रत तपश्चरण आदिक पुण्यके कारण ही हैं और जो शुद्धात्माकी भावना सहित हों तो यह व्रतादि वाह्य साधनरूप होनेसे परंपरासे मोक्षके कारण हैं ॥ १६१ ॥ इस व्याख्यानको मुख्य लेकर ४ गाथाएं कहीं। इस प्रकार १० गाथाओंमें पुण्या- धिकार समाप्त हुआ। आगे विकल्पसहितपना होनेके कारणसे तथा परका आश्रय रखनेके हेतुसे, निश्चयसे, पाप अधि. कारके कहनेकी मुख्यतासे अथवा निश्चय व्यबहार मोक्ष मार्गकी मुख्यतासे 'जीवादीसद्दहणम्' इत्यादि दो सूत्र कहेंगे । उसके बाद मोक्षके कारणरूप जो यह सम्यक्त्व आदि जीयके गुण है उनके आवरणके कहनेकी मुख्यतासे 'वछस्स सेद भावो' इसतरह तीन गाथाएं है । इसके पीछे पाप और पुण्य दोनो ही बंधके कारण है इस घातके कहनेकी मुख्यतासे 'सो सम्वणाण' इत्यादि सूत्र एक है । इसके पीछे जो मोक्षका कारणभूत यह जीव गुणी है उसके आवरणकी मुख्यतासे 'सम्मत्त' इत्यादि गाथाएं तीन हैं इस प्रकार समुदायसे नय सूत्र तक तीसरे स्थलमें व्याख्यान करते है। आगे उन अज्ञानी जीवोंके लिये निदय मोक्षका हेतु दिखलाते है:- .
२४० ARRANSRASHAYASAni. PrimarNire समयसार टीका। गाथा:-जीवादी साणं सम्मत्तं तमिमधिगमां जाणं । रागांदी परिहरणं चरण पसा दु मारवपही ॥ १६२ ॥ संस्कृतार्थ:-जीवादिश्रद्धानं सम्यग्दर्शनं तेपामधिगमो ज्ञानं । रागादिपरिहरणं चरणं एप तु मोक्षपथः || १६२ ।। सामान्यार्थः--जीवादिक पदार्थोंका श्रदान करना सम्यग्दर्शन है, उनका जानना ज्ञान है तथा रागादिक भावोंका त्यागना सो चारित्र है, यही मोक्षमार्ग है। शम्दार्थ सहित विशेषार्थ:- (जीवादी) जीव आदि ९ पदार्थोका (सदहणं) विपरीत अभिप्राय रहित अहान करना सो (सम्मत्त) सम्यग्दर्शन है ( तेसिम् ) उन्हींका (अधिगमो) संशत्र, विपर्यय, अनव्यवसाय रहित निश्चय रूप ज्ञान सो सम्यग्ज्ञान है तथा ( रागादी) रागादि भावोंका ( परिहरणं) (दूरकरना (चरणं ) चारित्र है (दु एसो ) ऐसा ही व्यवहार नयने ( मोक्ख पहो ) मोक्षका मार्ग है अथवा उनही सत्यार्थ रूपसे जाने हुए पदार्टीका शुद्धात्मासे भिन्नरूपसे भले प्रकार अवलोकन करना अर्थात् श्रदान करना सो निश्चय सम्यग्दर्शन है, उनहींका भले प्रकार ज्ञान करके शुद्धात्मासे भिन्न जानना लो निश्चय सम्यग्ज्ञान है, उन्हीं पर पदार्थोका शुद्धात्मासे मिन्न रूपसे निश्चय करके रागादि विकल्पोंका त्याग करके अपने ही शुद्ध आत्म स्वरूपमें स्थिति प्राप्त करना सो निश्चय चारित्र है, यही निश्रय मोक्षका मार्ग है। भावार्थ:-- सम्यग्दर्शन ज्ञान चारित्ररूप ही मोक्षका मार्ग है व्यवहार नयसे भेदरूप है निश्चय नयसे अभेदरूप एक शुद्धात्माका एकतासे श्रद्धान ज्ञान आचरण है ॥१६२।। आगे कहते है कि निश्चय मोक्षका मार्ग जो शुद्धात्माका स्वरूप है उससे अन्य शुभ प. अशुभरूप मन, वचन, कायका व्यापाररूप जो कर्म है वह मोक्ष मार्ग नहीं है:- गाथा:-मोतूण णिच्छय ववहारे ण विसा पवट्ठति । परमठमस्सिदाणं दु जदीण कम्मक्खओ होदि ॥ १६३ ॥ संस्कृतार्थ:-मुक्त्वा निश्चयार्थ व्यवहारे, न विद्वांसः प्रवर्तते । परमार्थमाश्रितानां तु यतीनां कर्मक्षयो भवति ॥ १६३ ॥ सामान्यार्थ:--निश्चय आत्म पदार्थको छोड़कर व्यवहारमें विद्वान् साधु गण नहीं प्रवर्तन करते हैं क्योंकि परमार्थका आश्रय करनेवाले यतियोंके ही कोका क्षय होता है। शब्दार्थ सहित विशेपार्थ:--(णिच्छयट्ट) निश्चय स्वरूप आत्म पदार्थको (मुण) छोड़कर (विदुसा) ज्ञानीजीव (ववहारे) व्यवहारमें (ण) नहीं (पवलृति ) आचरण करते हैं क्योंकि (परमट्ठम्) सम्यग्दर्शन ज्ञान चारित्रकी एकाग्रपरिणति लक्षणको रखनेवाले अपने शुद्धात्माकी भावनारूप परमार्थको (अस्सिदाण) आश्रय करनेवाले (जदीण) यतियोंके (दु) ही (कंमक्खओ) कर्मोका क्षय (होदि) होता है। भावार्थ:--जब यतिगण व्यवहार प्रवृत्तिका झगड़ा व विचार ८ समयसार टीका। १४१ त्यागकर निश्चय स्वरूप आत्मपदार्थमें तन्मय होते हैं तब ही यथार्थ निश्चय मोक्ष मार्गकी प्राप्ति करते हैं और इसीके प्रतापसे काँका नाश कर सक्ते हैं ॥ १६३ ॥ इसतरह मोक्ष मार्गका कथन करते हुए दो गाथाएं पूर्ण हुई। आगे मोक्षके कारणभूत सम्यग्दर्शन जान चारित्र जो जीवके गुण हैं उनका मियादर्शन आदि प्रतिपक्षी कमासे प्रच्छादनपना इसतरह हो रहा है जैसे खेत कपड़ा मलसे ढक जाता है ऐसा दिखलाते हैं: गाथाः-वत्थस्स सेदभावो जह णादि मलघिमेलणाच्छपणो। मिच्छत्तमलोच्छण्णं तह सम्मत्तं खु णादव्वं ॥ १६४ ॥ वत्थस्म सेदभावो जह णादि मलविमेलणाच्छयणो । अण्णाणमलोच्छपणं तह णाणं होदि णादव्वं ॥ १६५ ॥ वस्थस्स नेदभावो जह णासेदि मलविमेलणाच्छण्णो ! तह दुकसायाच्छण्णं चारित्तं होदि णादव्वं ।। १६६ ॥ संस्कृतार्थः-वस्त्रस्य श्वेतभावो यथा नश्यति मलविमेलनाच्छन्नः । मिथ्यात्वमलाक्छन्नं तथा च मम्यवत्वं खलु ज्ञातव्यं ॥ १६४ ॥ वन्त्रस्य श्वेतभावो यथा नश्यति मलविमेलनाच्छन्नः । अज्ञानमलावच्छन्नं तया ज्ञानं भवति ज्ञातव्यं ॥ १६५ ।। वस्त्रस्य श्वेतमायो यथा नश्यति मलविमेलनाच्छन्नः। तथानुपायांच्छन्नं चारित्रं भवति ज्ञातव्यं ॥ १६६ ॥ सामान्यार्थ-जैसे वस्त्रका सफेदपना मलके सम्बन्धसे ढका हुआ नाशको प्राप्त हो जाता है ऐसे ही जीवका सम्यग्दर्शन नामा गुण मिथ्यात्वरूपी मलसे ढका हुआ नाश होता है ऐसा जानना ॥ १६४ ॥ जैसे वस्त्रका सफेदपना मलके सम्बन्धसे ढका हुआ नाश हो जाता है उसीतरह जीवका सम्यग्ज्ञानरूपी गुण अज्ञानरूपी मैलसे ढका हुआ नाश हो जाता है ऐसा जानना ॥ १६५ ॥ जैसे वस्त्रका सफेदपना मलके सम्बन्धसे ढका हुआ नाश हो जाता है उसीतरह इस जीवका चारित्र नामा गुण कपायोंसे विपरीत हुआ नाशको प्राप्त हो जाता है ऐसा जानना । शब्दार्थ सुगम है । भावार्थ-सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, और सम्यक्चारित्र ये तीनों ही इस जीवके गुण हैं स्वाभाविक हैं परंतु अनादि कालसे मिथ्यादर्शन, अज्ञान और कषायोंके कारण ढक रहे हैं, गुप्त हो रहे हैं । ज्ञानी जीवको उचित है कि इन कर्मोके सम्बन्धको दूर करै जिससे निज गुणोंका विकाश हो। इसतरह मोक्षके कारणभूत सम्यत्त्व आदि गुणोंका उनके प्रतिपक्षी मिथ्यात्व, अज्ञान कपायोंसे प्रच्छन्नपना याने ढकाजाना हो रहा है ऐसा कहते हुए तीन गाथाएँ पूर्ण हुई ॥ १६४-१६६-१६६ ॥
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CHSAATURGERMERAYACHA
MSerecautresrwearineer
१४२
समयसार टीका।
• आगे शुभाशुभ कर्म जव स्वयमेव ही बंधरप है तब वह किसतरह मोक्षका कारण हो सकता है
ऐसा कहते है-
गाथा:-सो सव्वणाणदरसी कम्मरयेण णियएण उच्छण्णो।
संसारसमावणो णवि जाणदि सव्वदो सव्वं ॥ १६७ ॥
संस्कृतार्थ: -स सर्वज्ञानदी कर्मरजसा निजेनावच्छिन्नः।
संसारसमापन्नो नापिजानाति सर्वतः सर्व ॥ १६७ ॥
सामन्यार्थः-वह शुद्धात्मा निश्चयसे सर्वको देखने-जाननेवाला है तो भी अनादि-
कालसे अपनी ही कर्मकी धूलसे ढका हुआ संसारमें गिरा हुआ सर्व प्रकारसे सर्व वस्तुओंको
नहीं जानता है। शब्दार्थ सहित विशेषार्थ:-(सो) वह शुद्वात्मा निश्चयसे ( सव्व णाण
दंसी)समस्त प्रकार परिपूर्ण ज्ञान दर्शन स्वभावको रखनेवाला है तो भी (णियएण) अपनी ही
बांधी हुई (कंमरयेण)ज्ञानावरणीय आदि कर्मरूपी रजसे (उंच्छन्नो) ढका हुआ (संसारसमावण्णो)
व इस संसारमें पड़ा हुआ (सव्वदो) सर्व प्रकारसे ( सव्वं ) सर्व वस्तुओंको (णवि ) नहीं
(जाणदि) जानता है। इससे जानपड़ता है कि कर्म स्वयमेव इस जीवके लिये बंधरूप है
इससे यह कर्म मोक्षका कारण कैसे हो सकता है ? भावार्थ-शुभ या अशुभ भावोंसे किया
हुआ पाप या पुण्य कर्म बंध हीका कारण है मोक्षका कारण नहीं है क्योंकि यह कर्म आत्माके
स्वाभाविक गुणोंको प्रकट नहीं होने देते । इसप्रकार जैसे पाप बंधका कारण है वेसे पुण्य भी
बंधका कारण है ऐसा कहते हुए गाथा पूर्ण हुई ॥ १६७ ।।
आगे पहले कहा था कि मोक्षके कारणरूप सम्यग्दर्शन आदि जो जीवके गुणहै उनका मिथ्यात्व
आदि कमेसेि ढकना होता है अब यह पात कहते हैं कि उन गुणोंको रखनेवाला आधार.
भूत गुणी जीव मिथ्यादर्शन आदि कर्मोसे टकर्ता है
गाथाः-सम्मत्तपडिणिवई मिच्छत्तं जिणवरे हि परिकहिदं ।
तस्सोदयेण जीवो मिच्छादिवित्ति, णादव्वो ॥ १६८ ॥
णाणस्स पडिणिवद्धं अण्णाणं जिणवरे हि परिकहिदं ।
तस्सोदयेण जीवो अण्णाणी होदि णादवो ॥ १६९ ॥
चारित्तपडिणिवळ कसायं जिणवरे हि परिकहिदं ।
तस्सोयेण जीवो अचरिदो होदि णादव्वो ॥ १७ ॥
संस्कृतार्थ:-सभ्यस्त्वप्रतिनियद्धं मिथ्यात्वं जिनवरैः परिकथितं ।
तस्योदयन जीवो मिथ्यादृष्टिरिति ज्ञातव्यः ॥ १६८ ॥
ज्ञानस्य प्रतिनिबद्धं अज्ञानं जिनवरैः परिकथितं ।
तस्योदयेन जीवोऽज्ञानी भवति ज्ञातव्यः ॥ १६९ ॥
चारित्रप्रतिनिबद्धं हिकषायो जिनवरैः परिकथितः ।
तस्योदयेन जीवोऽचारित्रो भरति ज्ञातव्यः ॥ १७ ॥
NARAPRASEAre समयसार टीका। सामान्यार्थ-सम्यक्त्वको रोकनेवाला मिथ्यात्व है ऐसा जिनेन्द्र भगवानने कहा है उसी मिथ्यादर्शन कर्मके उदयसे यह जीव मिथ्यादृष्टि होता है ऐसा जानना । ज्ञानको रोकनेवाला उसका विरोधि अज्ञान है ऐमा निनवरोंने कहा है उमी अज्ञान व ज्ञानावरणीयके उदयसे यह जीव अज्ञानी होता है ऐसा जानना, तथा चारित्रको रोकनेवाला उसका विरोधी क्रोधादि कपाय है ऐसा जिनेन्द्रोंने कहा है उसी कपायके उदयसे यह जीव चारित्र विही- न होता है ऐसा जानना । शब्दार्थ सुगम है। प्रतिनिबद्ध नाम प्रतिकूल व विरोधीका है। भावार्थ-जीवके मुख्यगुण स्वाभाविक सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यकचारित्र है इनका प्रकटपना, मिथ्यादर्शन, अज्ञान और कपायोंके कारणसे नहीं हो रहा है इसीमे इस जीवको मिध्यात्वीं, अज्ञानी व कुचारित्रवान कहते हैं ऐसा जानना ।। १६८-१६९-१७०॥ इसप्रकार मोक्षका कारण भृत जो यह जीव गुणी है उसके आवरणके कथनकी मुख्यतासे तीन गाथाएं पूर्ण हुई। सम्यक्त्व आदि जीवके गुण हैं सो ही मुक्तिके कारण हैं | तसे ही इन गुणोंमें परिणमन करनेवाला जीव मोक्षका कारण है। इससे शुद्ध जीवसे भिन्न शुभ व अशुभ मन, वचन, कायके व्यापार व उस व्यापारसे उत्पन्न किये हुए शुभव अशुभ कर्म सों मोक्षके कारणं नहीं हैं ऐसा जानकर यह शुभ व अशुभ पुण्य व पापरूप कर्म त्यागने योग्य हैं इसप्रकार व्याख्यानकी मुख्यता करके ९ गाथाएं पूर्ण हुईं। दूसरी पातनिकाके अभि- प्रायसे पापाधिकारके व्याख्यानकी मुख्यतासे कथन पूर्ण हुआ। यहां शिप्यने प्रश्नं किया कि यहां "जीवादीसदहणं" इत्यादि व्यवहार रत्नत्रयका व्याख्यान किया है सो इसको पापाधिकार कैसे कह सक्ते हैं ? इसका समाधान आचार्य करते हैं । यद्यपि व्यवहार मोक्ष मार्ग निश्चय रत्नत्रय जो उपादेयभूत है उसका कारण होनेसे उपादेय है, ग्रहण करने योग्य है तथा परंपरासे जीवकी पवित्रताका कारण है, इससे पवित्र भी है तथापि वाह्यद्रव्यका आलंबन होनेके कारणसे पराधीन है इससे नाशको प्राप्त होता है यह एक कारण है जिससे व्यवहारको पापमें गर्भित किया है। तथा विकल्प रहित समाधिमें लवलीन जीवोंका अपने स्वरूपसे पतन व्यवहार विकल्पोंके आलंबनसे होजाता है यह दूसरा कारण है, जिससे व्यवहार मोक्ष मार्गको पापाधिकारमें गर्भित करते हैं। इससे निश्चय नयकी अपेक्षासे व्यवहार मोक्ष मार्ग पाप है अथवा इस अधिकारमें सम्यक्त्व आदि जीवके गुणोंसे प्रतिपक्षी मिथ्यात्व आदि भावोंका व्याख्यान किया गया है इससे भी यह पापाधिकार है। इस तरह समयसार ग्रंथकी शुद्धात्माकी अनुभूति लक्षणको रखनेवाली तात्पर्यवृत्ति नामकी टीकामें तीन स्थलके समुदायसे २१ गाथासे चौथा पापाधिकार समाप्त हुआ। इनमें ऐसा होनेपर व्यवहार नयसे पुण्य पापरूप दो प्रकार कर्म हैं तौभी निश्चयसे कर्म एक प्रकार है । ऐसा यह कर्म अंगारसे रहित पात्रके समान पुद्गलरूंपसे एक रूप होकर रंग भृमिसे निकल गया । अब आश्रव प्रवेश करता है ।
समयसार टीका। Aurrent - १४४ पांचवा महा अधिकार । (५) आशव तत्व। जहां भले प्रकार भेद भावनामें परिणमन होता हुआ कारण समयसाररूप संवर नहीं है वहां आश्रव होता है इसप्रकार संवरका विपक्षी होनेके कारणसे १४ गाथाओं तकआश्रवका व्याख्यान करते हैं । उनमेंसे पहले ही भेदज्ञानसे शुद्धात्माकी प्राप्ति होती है ऐसा संक्षेपसे व्याख्यान करनेकी मुख्यतासे "उवओगो" इत्यादि गाथाएं तीन हैं, उसके बाद भेदज्ञानसे कैसे शुद्धात्माकी प्राप्ति होती है ऐसा प्रश्न होनेपर उसका समाधान करते हुए “जहकणयमग्गि" इत्यादि सूत्र दो हैं। उसके बाद शुद्ध भावनासे शुद्ध होता है इस कथनकी मुख्यतासे "सुद्धंतु वियाणतो" इत्यादि सूत्र एक है। उसकेवाद किस प्रकारसे संबर होता है ऐसा पूर्वपक्ष किये जानेपर उसके समाधानकी मुख्यतासे 'अप्पाणमप्पणो' इत्यादि ‘गाथाएं तीन हैं। आगे आत्मा परोक्ष है उसका ध्यान कैसे किया जाय इस प्रश्नके होनेपर देवतारूपके दृष्टान्तसे परोक्ष होनेपर भी विदित होता है । ऐसा समाधान करते हुए उवदेसेण ' इत्यादि गाथाएं दो हैं। उसके बाद उदयमें आए हुए आश्रवमई रागादि अध्यवसानोंके अभाव होनेपर जीवके रागादि भावाश्रवोंका अभाव होता है इत्यादि संवरके क्रमको कहनेकी मुख्यतासे 'तेसिंहेदु इत्यादि गाथाएं तीन हैं-इसतरह संवरके विपक्षी आश्रवके व्याख्यानमें समुदाय पातनिका पूर्ण हुई। पहले ही शुभ कर्म और अशुभकर्मोके रोकनेका सबसे बड़ा उपाय विकार रहित स्वसंवेदनशान लक्षणमई भेद ज्ञान है उसको कहते हैं ।- गाथा:-उवओगे उवओगो कोहादिसु णस्थि कोवि उवयोगो। कोहे कोहो चेव हि उवओगे णथि खलु कोहो ॥ १७१ ॥ संस्कृतार्थः-उपयोगे उपयोग: क्रोधादिषु नास्ति कोप्युपयोगः । क्रोधे, क्रोधश्चैव हि उपयोग नास्ति खलु क्रोधः ॥ १७१ ॥ सामान्यार्थः-ज्ञानदर्शनोपयोग स्वरूप आत्मा आत्मामें है क्रोधादिक भावोंमें निश्चय करके कोई भी उपयोग नहीं है, क्रोध क्रोधमें ही है, निश्चयसे आत्मामें कोई भी क्रोध नहीं है । शब्दार्थ सहित विशेषार्थ ( उवओगे ) ज्ञान दर्शनोपयोग लक्षण रखनेके कारणसे अभेदनयसे आत्माको ही उपयोग कहते हैं इस उपयोग स्वरूप शुद्धात्मामें (उवओगो ) उपयोग मई आत्मा ठहरता है ( कोधादिसु) शुद्ध निश्चयनयसे क्रोधादिक परिणामोंमें (कोवि) कोई भी ( उवओगो ) उपयोगमई आत्मा ( णत्थि )नहीं है । ( कोहे ) क्रोधमें ( कोहो चे वहि ) क्रोध ही निश्चयसे ठहरता है ( खलु ) स्फुट रूपसे-निश्चयसे ( उवओगे ) शुद्धात्मामें ( कोहो) क्रोध ( णत्थि ) नहीं है। भावार्थः क्रोधादिक भाव- STURALDREARRIAS समयसार टीका। चारित्र मोहनीय कमके निमित्तसे होनेवाले औपाधिक भाव हैं । शुद्ध शांत ज्ञानानंदमयं आत्माके स्वाभाविक भाव नहीं हैं इस कारणसे भेदज्ञान यही बतलाता है कि शुन्द्वात्मा शुद्धज्ञान दर्शनोपयोगमई है उसमें यह विभाव भाव नहीं हैं तथा यह विकारी भाव विकार स्वरूप क्रोध कषाय विशिष्ट अशुद्ध आन्मा में हैं ॥ ११ ॥ आगे फिर भी भेद ज्ञानको दिखाते है:- गाथा:-अछवियप्पे कम्मे णोकम्मे चावि णत्थि उवओगो उवओगह्मिय कम्ने णोकम्मे चावि णो अस्थि ।। १७२ ।। संस्कृतार्थः-अष्ठविकल्ये कर्मणि नोकर्मणि चापि नास्त्युपयोगः । उपयोगेऽरि च कर्म नोकर्म चापि नो अस्ति ॥ १७२ ।। सामान्यार्थ-आठ प्रकार कर्म और नोकर्ममें भी यह आत्मा नहीं है और न उपयोगमई आत्मामें कम और नोकर्म हैं। शब्दार्थसहित विशेष/-(अट्ट वियप्पे) आठ भेदरूप ज्ञाना- वरणीय दर्शनावरणीय आदि द्रव्यको तथा (णोकंमे) औदारिक,वैक्रियिक, आहारक, शरीरा- दि नोकर्मों में (चावि) भी (स्वओगों) शुद्ध बुद्ध एक स्वभावरूप परमात्मा (पत्थि) नहीं है। तसे ही (उवओगम्हिय) उपयोगमई शुद्धात्मामें शुद्ध निश्चयमे (कम्मंणोकम्म) द्रव्य कर्म और नोकर्म (चाचि) भी णो अत्थि) नहीं हैं । य-भेदज्ञान ऐसा ही अनुभव करता है कि जैसे भाव कम मेरे शुद्धस्वरूपसे जुंदे हैं तैसे ही द्रव्य कम और नोकर्म भी मेरे शुद्धस्वरूपमे भिन्न हैं।॥ १७२ ॥ आगे कहते हैं कि ऐसा भेद ज्ञानी जीव कोई भी पर भावको नहीं करता है। गाथाः—एवं तु अविवरीदं गाणं जड्याहु होदि जीवस्स । तइया ण किंचि कुव्वदि भावं उवओगसुद्धप्पा ॥ १७३ ॥ संस्कृतार्थः-एतत्वविपरीतं ज्ञानं यदा भवति जीवस्य । तदा न किंचित्करेति भावमुपयोगशुद्धात्मा ॥ १७३ ॥ सामान्यार्थः-जब इस जीवके विपरीत अभिप्रायसे रहित यह भेदज्ञान होता है तब यह उपयोगवान शुन्दात्मा कोई भी अन्य औपाधिक भावको नहीं करता है । शब्दार्थ सहित विशेषार्थः-(जयादु) जिस समय (जीवस्स) इस जीवके (एदंतु) यह चिदानंदमई एक शुद्धात्माका स्वसंवदेनरूप (णाणं) भेदविज्ञान (अविवरीदं) विपरीत अर्थात् मिथ्या अभिप्राय रहित (होदि) होता है (तइया) तब उस भेद विज्ञानसे शुद्धात्माकी प्राप्ति होती है, शुद्धा- त्माकी प्राप्ति होनेपर (रोग) विकाररहितचिदानंदमई एक लक्षणको रखनेवाले शुद्धोपयोगका धारी (सुद्धप्पा) यह शुनवभारी आत्मा (किंचिण) किसी भी मिथ्यात्त्व व रागद्वेषादि भावको नहीं (कुव्वदि] करता है। यहां ऐसा अभिप्राय है कि जिस जीवके ऊपर कहे अनुमार 4- - MMERRIERFORMISHWom समयसार टीका। ISAURPRESSURest संवर नहीं है उसमें आश्रव होता है। इस अधिकारमें यह कथन सब ठिकाने जानना योग्य है । भावार्थ-जब यह आत्मा रागद्वेषादि भावोंका त्याग कर अपने शुद्ध स्वभावमें तन्मय होता है तब इसके संबर होता है । और जब अपने स्वरूपकी तन्मयतासे बाहर होता है तब इसके शुभ व अशुभ कर्मोका आश्रव होता है- इस तरह पूर्वमें कहे अनुसार भेदज्ञानसे शुद्धात्माकी प्राप्ति होती है। शुद्धात्माकी प्राप्ति होनेपर यह जीव मिथ्यात्व रागद्वेपादि भावको नहीं करता है तब इसके नए कर्मोका आंधव नहीं होता अर्थात् संवर होता है इसतरह संक्षेपसे व्याख्यानकी मुख्यतासे तीन गाथाएं पूर्ण हुई ॥ १७३ ॥ आगे .शिष्यने पूछा कि भेदज्ञानसे ही किसतरह शुद्धात्माका लाभ होता है जिसका समाधान आचार्य करते हैं। गाथाः -जह कणय मन्गितवियं कणयसहावं ण त परिचयदि । तहकम्मोदयतविदो ण चयदि णाणीदुणाणित्तं ॥ १७४ ॥ संस्कृतार्थ-यथा कनकमग्नितप्तमपि कनकस्वभावं न तत्परित्यजति । तथा कर्मोदयतप्तो न त्यजति ज्ञानी तु ज्ञानित्वं ॥ १७४ ।। सामान्यार्थ—जैसे अग्निसे तपाया हुआ सोना अपने सुवर्णके स्वभावको नहीं छोड़ता है तैसे कर्मोके उदयसे तप्तायमान ज्ञानी जीव अपने ज्ञानपनेको नहीं त्यागता है। शब्दार्थ- सहित विशेषार्थ-(जह) जैसे (कणयं) सुवर्ण (अग्गितवियं) अग्निसे तपा हुआ भी (तं कणय सहावं) अपने उस सुवर्णपनेके स्वभावको (ण परिचयदि) नहीं त्यागता है (तह) तैसे (कमो- दय तविदो) कर्मोके उदयसे गर्म हुआ भी (पाणी) राग द्वेष मोह सम्बन्धी परिणामोंके त्यागमें परिणमन करनेवाले अभेद रत्नत्रय लक्षणको रखनेवाले भेदज्ञानका धारी ज्ञानी आत्मा (णा- णित) शुद्धात्माका अनुभवरूप ज्ञानीपनेको (ण चयदि) नहीं त्यागता है । जैसे पांडवादिकों ने नहीं त्यागा। भावार्थ-जैसे युधिष्ठिर भीमसेन अर्जुन ऐसे तीन पांडवोंको जब सेजय पर्वत पर उपसर्ग किया गया तब उन्होंने ध्यानमें अपनी तल्लीनता ऐसी रक्खी कि उससे चलाय- मान न हुए और परमधामके अधिकारी हुए । इसीतरह जो आत्मज्ञानी अनुभवी दृढ़ महात्मा हैं वे अनेक कर्मोके उदयसे होनेवाले उपसर्गौके पड़ने पर भी अपने स्वरूपसे चलायमान नहीं होते । सुवर्णको कितना भी गर्म किया ज य तो भी वह अपने स्वभावको नहीं त्यागता उसी तरह ज्ञानी जीव अपने स्वभावको नहीं छोड़ते । यह सम्पूर्ण आत्मज्ञानकी महिमा है ॥ १७४ ॥ आगे अज्ञानी जीवका कर्तव्य कहते हैं- गाथा:-एवं जाणदि णाणी अण्णाणी मुणदि रागमेवादं.। अण्णाणतमोच्छण्णो आदराहावं अयाणंतो॥ २७५ ॥ - JArtidwaRMER समयसार टीका। १४७ संस्कृतार्थः-एवं जानाति शनी अज्ञानी मनुते संगमेवात्मान ! अशानतमोऽवच्छन्नमात्मस्वभावमनानन् ॥ १७५ ।। सामान्यार्थ-ऊपर लिखे प्रकारसं ज्ञानी जानता है परंतु अज्ञानी जीव आत्माको रागरूप ही मानता है क्योंकि वह अज्ञानरूपी अंधकारसे ढका हुआ आत्मस्वभावको नहीं पहचानता है | शब्दार्थ महित विशपार्थ-(णाणी) वीतराग स्वसंवेदन भेदज्ञानी महात्मा (एवं) उपर कहे प्रमाण अपने शुद्धात्माको (नाणदि) जानता है परंतु अग्णाणी) भेदज्ञानमे रहित अज्ञानी आत्मा (अण्णाणतमोच्छण्णो अज्ञानरूपी अंधकारसे ढका हुआ तथा (आद- सहावं) विकार रहित परम चैतन्यरूप चिन् चमत्कारको रखनेवादे शुद्धात्माके स्वभावको निर्विकल्प समाधिके अभाव होनेपर नहीं जानता हुआ नहीं अनुभव करता हुआ, (आई) अपने आत्माको (राग) मिथ्यात्व व रागद्वेषरूप (एव) ही (मुणदि) मानता है । भावार्थ- अज्ञानीको अपने आत्माके वास्तविक स्वरूपका तथा रागांदि भावोंका व शरीरादिकोंका भिन्न २ जानपना नहीं है इससे शुभ राग व अशुभ राग रूप ही रहता है और उस रूप ही अपने आत्माको मानता है। इससे भिन्न किसी शुद्ध बुद्ध ज्ञान स्वभाव आत्माका अनुभव नहीं करता है इससे संसारका नाश नहीं कर सक्ता । जब कि भेद ज्ञानी पर भावोंमे भिन्न अपने स्वरूपका अनुभव करता हुआ कर्मकलंकोंसे मुक्त होता है । ॥ १७९ ॥ इसतरह शिप्यका यह प्रश्न होने पर कि भेद्रज्ञानसे कैसें शुद्धान्माकी प्राप्ति होती है इसका समाधान करते हुए दो गाथाएं कहीं। आगे फिर शिष्यने प्रश्न किया कि शुद्धात्माकी प्राप्तिम ही संबर किसतरह होता है इसका उत्तर भाचार्य कहते है- गाथा:-सुद्धं तु वियाणंतो सुद्धमेवप्पयं लहंदि जीवो। जाणतो दु असुद्धं असुद्धमेवप्पयं लहदि ॥ १७६ ।। संस्कृतार्थः-शुद्धं तु विजानन् शुद्धमेवात्मानं लभते जीवः । जानस्त्वशुद्धमशुद्धमेव.त्मानं लभते ॥ १७६ ॥ सामान्यार्थ—यह जीव अपने आत्माको शुद्ध रूप अनुभव करता हुआ शुद्ध स्वरूप ही आत्माको प्राप्त करता है परंतु अशुद्ध रूप अनुभव करता हुआ अशुद्ध टप ही आत्माको प्राप्त करता है । शब्दार्थ सहिन विशेपार्थ--( जीवो) ज्ञानी जीव (सुद्ध) भावकर्म रागादि, द्रव्यकर्म ज्ञानावरणादि, नाकर्म शरीगदि इन तीन प्रकार कौन रहित अनाज्ञान, अनं. तदर्शन, अनंतमुख, अनंतवीर्य आदि गुण स्वरूप शुद्ध आत्माको (वियाणतो) विकार रहिन सुखका अनुभव लक्षणमई भेद ज्ञानके प्रतापसे जानता हुआ व अनुभव करता हुआ (मुद्धम् ) शुद्ध (एव) ही ( अप्पयं ) आत्माको (लहदि) प्राप्त करता है। क्योंकि जैसे गुणोंसे विशिष्ट शुद्ध आत्माको जो कोई ध्याता है व उसकी भावना करता है वह जीव उसी ही प्रकार उतने MREPERMERITUREMErrias समयसार टीका। ONGC-SHAURAHASREEMALSH . १४८ ही गुण विशिष्ट शुद्ध आत्माको प्राप्त करता है । इसका कारण यह है कि जैसा आदान अर्थात् मूल कारण होता है वैसा ही कार्य होता है यह नियम है। (द) पांतु अज्ञानी जीत (अशुद्ध) मिथ्यादर्शन व रागद्वेषादि भावरूप परिणमनेवाला आत्माको (नाणतो) अनुभव करते हुए (असुद्धं) अशुद्ध अर्थात् मनुष्य व नरकादिरूप (एव) ही (अप्पयं) आत्माको (लहदि) प्राप्त करता है । भावार्थ-जिस स्वरूसमें तन्मय हुआ जायना वैसा ही स्वरूप प्राप्त होगा। जो कोई ज्ञानी शुद्धोपयोगकी भावना करेगा वह शुद्ध होगा और जो अशुद्धोपयो- गकी भावना करेगा वह अशुद्ध होगा ऐसा जानना ॥ १७६ ॥ आगे शिप्यने प्रश्न किया कि किस प्रकारसे संवर होता है इसका विशेष करके उत्तर कहते है:- गाथा:-अप्पाणमप्पणोरुभिदूण दो पुण्णपावजोगेसु । दसणणाणमिठिदो इच्छाविरदो य अण्णमि ॥ १७७ ॥ जो सव्वसंगमुक्को झायदि अप्पाणमप्पणो अप्पा । णवि कम्म णाकम्मं चेदा चिंतेदि एयत्तं ॥ १७८ ॥ संस्कृतार्थः-आत्मानमात्मना सन्ध्वा द्विपुण्यपायोगयोः । दर्शनज्ञान स्थितः इच्छाविरतश्चान्यस्मिन् ॥ १७७ ॥ यः सर्वसंगमुक्तो ध्यायत्यात्मानमात्मनात्मा । नापि कर्म नोकर्म चेतयिता चिंतयत्यक्त्वं ॥ १७८ ॥ सामान्यार्थ-जो कोई अपने अत्माको अपने आत्माके द्वारा पुण्य और पाप दोनोंसे रोककर अन्य रागादि पर द्रव्योंकी इच्छासे विरक्त होता हुआ अपने दर्शनज्ञान -स्वभावमें ठह- राता है तथा जो सर्व परिग्रहको त्यागकर अपने आत्माके द्वारा अपने आत्माको ध्याता है, द्रव्यकर्म व नोकर्मको नहीं ध्याता है सो ज्ञानी आत्मा अपने एक स्वभावको चितवन करता है ॥ शब्दार्थ सहित विशेषार्थ-(अप्पाग) अपने आत्माको (अप्पणा) अपने आ- माके द्वारा (दोसु पुष्ण पाव जोगेसु) दोनों पुण्य और पाप योगोंसे अर्थात् अपनेमें वर्तमान स्वसंवेदनज्ञानके बलसे शुभ और अशुभं मन, वचन, कायके योगोंकी निकटतासे (रंभिदूण) रोककरके अर्थात् हटा करके (य) और ( अण्णम्हि) अपने आत्मासे दूसरे देह व रागद्वेपादि परद्रव्योंमें इच्छाविरदो) सर्व तरहसे इच्छा न करके (दसण णाणमि) अपने दर्शनज्ञान स्वभावमें (ठिहो) जो स्थित अर्थात् कायम होता है। तया (जो) जो आत्मा (सव्वसंगमुक्को) परिग्रह रहित आत्मिक तत्वसे विलक्षण वाहर और अंतरंगकी २४ प्रकारकी परिग्रहसे छुटा हुआ (अप्पणो) अपने शुद्ध आत्मस्वरूपके द्वारा (अप्पाणं) अपने- शुद्ध आत्माको (झायदि) ध्याता है (कम्मं णोकम्म) परंतु द्रव्यकर्म ज्ञानावरणादि और नोकर्म शरीरादि इनको wwwirin समयसार टीका। १४२ (णवि) नहीं ध्याता है सो (चेदा) चना गुणधारी आत्मा ( एयत्ते) अपने एक स्वभावका (त्रितेदि) चितवन करता है । किसतरह चितवन करता है इसके लिये श्लोक कहते हैं- श्लोकः-एकोऽहं निर्ममः शुद्धो, ज्ञानी योगीन्द्र गोचरः । वाह्या संयोगजाभावाः मत्तः सर्वेपि सर्वथा ॥ अर्थ-मैं एक हूं, मेरा कोई पार्थ नहीं है, मैं शुद्ध हूँ, ज्ञानी हूं, तथा मुनीश्वरोंके द्वारा जानने योग्य हूं। परके संयोगसे उत्पन्न जितने भाव हैं वे सर्व ही सर्वया मुझसे वाह्य हैं । भावार्थ-ज्ञाता आत्मा अपने स्वरूपको परम उपादेय निश्चय करके उसीका ही चितवन करता है और सम्पूर्ण परिग्रह आदिसे विरक्त हो जाता है ।। १७७-१७८ ।। आगे कहते हैं कि आत्माके ध्यानसे किस फलकी प्राप्ति होती है : गाथा:-अप्पाणं झायंतो दसणणाणमइओ अणण्णमणो। लहदि अचिरेण अप्पाणमेव सो कम्मणिम्मुकं ।। १७२ ।। संस्कृतार्थः-आत्मानं ध्यायन् दर्शनज्ञानमयोऽनन्यमनाः । लभतेऽचिरेणात्मानमेव स कर्मनिमुक्तं ॥ १७९ ॥ सामान्यार्थः-फर कहे प्रमाण ज्ञानी आत्मा दर्शन ज्ञान मई तथा एकाग्रमन होकर अपने आत्माको ध्याता हुआ कर्म कलंकसे मुक्त आत्माको ही थोड़े कालमें प्राप्त करता है। शब्दार्थ सहित विशार्थः-(सो) कार दोनों सूत्रोंमें कहे . प्रमाण ज्ञानी आत्मा (अनाणं) आत्माको पूर्वमें कहे अनुसार (झायंतो) चिन्तवन करता हुआ तथा निर्विकल्प रूपसे ध्याता हुआ (दंसणणाणमइओ) दर्शनज्ञानमई होकर अर्थात् आत्माका संदेह रहित निश्चय और ज्ञान करके (अगग्णमगो) तथा अपने आत्मामें एक चित्त होकर (कम्मणि- मुक्कं) भाव कर्म रागद्वेषादि, द्रव्य कर्म ज्ञानावरणादि, नोकर्म शरीरादि इनसे मुक्त अर्थात् बिल्कुल छुटे हुए (अप्पागमैत्र) आत्माको ही (अचिरेण ) थोड़े ही कालमें (लहदि) प्राप्त करता है । भावार्थ:-जो कोई भेद ज्ञानी शुद्धामाको विकल्पोंको त्याग करके ध्याता है वह शीघ्र ही शुद्ध स्वरूपको प्राप्त होता है। ॥१७९॥ इसतरह शिष्यका यह प्रश्न हुआ कि संवर किसतरह होता है इसका विशेष रूपसे समाधान करते हुए तीन गाथाएं पूर्ण हुई। आगे परोक्ष आमाका ध्यान किस तरह किया जाता है इस प्रश्नका उत्तर भाचार्य करते है:- गाथा:---उवदेसेण परोक्खं स्वं जह पस्सिदूण णादेदि । भण्णदि तहेव धिप्पदि जीवो दिहोय णादोय ॥ १०॥ संस्कृतार्थ:-~-उपदेशेन परोक्षरू क्या दृष्टः जानाति । मण्यते तथैव प्रियते जीवो दृष्टश्च ज्ञातश्च ।। १८० ॥ सामान्यार्थः-जैसे किसीका परोलरूप उपदेशद्वारा लिखा देखकर वह नाना आता है - DARSHAYAROLUSLRRORON WERauniyies १५० समयसार टीका। वैसे यहाजीव वचनोंके द्वारा कहा जाता है तथा मनके द्वारा ग्रहण किया जाता है । मानों प्रत्यक्ष देखा गया व जाना गया । शब्दार्थ सहित विशेषार्थ:-(जह) जैसे इस लोकमें ( परोक्ख रूवं ) परोक्ष रूप हुआ भी देवदत्त नामके किसी मनुष्यका रूप ( उवदेसेग) दूसरोंके उपदेशसे लिखा हुआ ( पस्सिदूण ) देखकर (गादेदि) जाना जाता है कि यह देवदत्त है (तहेव) वैसे ही ( जीवो) यह जीव ( भण्यते ) वचनोंक द्वारा कहा जाता हैं तथा (दिछोय) यह जीव मेरे द्वारा देखा गया (गादोय) और जाना गया ऐसा (धिप्पदि) मनके द्वारा ग्रहण किया जाता है अर्थात् मनमें धारण किया जाता है। ऐसा ही अन्य ग्रन्थमें कहा गया है "गुरूपदेशाभ्यासात् संवित्तेः स्वपरांतरं-जानातियः स जानाति मोक्ष. सौख्यं निरंतरं ॥" अर्थात् गुरूके उपदेशसे, अभ्यासके बलसे व स्वसंवेदन ज्ञानसे जो कोई अपने आत्मा और पर पदार्थका भेद जानता है वह मुक्ति सुखको निरंतर जानता है अर्थात् अनुभव करता है। भावार्थ:-जैसे किसीने देवदत्तका रूप देखकर उसका चित्र खींचा-उस चित्रको किसी अन्य मनुष्यने देखकर दूसरेके उपदेशसे यह जान लिया कि देवदत्तका इसताहका रूप है। यद्यपि उसने देवदत्तको प्रत्यक्ष नहीं देखा है तथापि परोक्ष चित्रके देखनेसे ही उसको ज्ञान हो गया कि देवदत्तका स्वरूप ऐसा है। उसी तरह प्रत्यक्ष ज्ञानीने आत्माको प्रत्यक्ष देखकर उनका स्वरूप वर्णन किया-सुननेवाला परोक्षज्ञानी हैं प्रत्यक्ष आत्माको : देख नहीं सक्ता । तौभी परके उपदेशसे आत्माकी पहचान करके उसका अनुभव इसी प्रमाण कर सकता है कि मानों मैंने साक्षात् आत्माको देख ही लिया । इस तरह स्वसंवेदन ज्ञानके द्वारा अनुभव करते हुए यह आत्मा मुक्तिका परमसुख प्राप्त कर सकता है ऐसा, जानना ।.॥ १८०॥ आगे फिर भी इसी वातको कहते है:-- गाथा:-कोविदिदिच्छो साहू संपडिकाले भणिज स्वामिण। पञ्चक्खमेव दिलु परोक्खणाणे पवईतं ॥ १८१ ॥ संस्कृतार्थः- कोविदितार्थः साधुः संप्रतिकाले भणेत् रूपामेदं । प्रत्यक्षमेव दृष्टं परोक्षशाने प्रवर्तमानं ॥ १८१ ॥ सामान्यार्थः--इस वर्तमान पंचमकालमें कौन ऐमा आत्म पदार्थका ज्ञाता साधु है जो यह कहे कि मैंने इस प्रकार परोक्ष श्रुतज्ञानमें प्रवर्तनेवाले आत्माके स्वरूपको प्रत्यक्ष ही देख लिया है ? अर्थात् कोई नहीं है । शब्दार्थ सहित विशेषार्थ:--(को) कौन ( विविदिछो) पदार्थोंका ज्ञाता (साहू) साधु (संपड़िकाले) इस वर्तमान पंचमकालमें (भणिज्ज) यह कह सक्ता- है कि मेरे द्वारा ( परोवखणाणे ) केवल ज्ञानकी अपेक्षा परोक्षश्रुत ज्ञानमें (पवहत) प्रवर्तनेवाला (इण) इस प्रकारका (रूव) आत्माका स्वरूप (पञ्चक्खमेव) प्रत्यक्षमें ही (दिई) देखा गया है जैसा SRGES -जन समयसार टीका। १५१ चौयकालम केवग्ज्ञानीने प्रत्यक्ष आत्माको देखा था। इस कयनका विस्तार यह है कि यद्यपि केवलज्ञानकी अपेक्षासे रागद्वेषादि विकल्पोंसे रहित स्वसंवेदन रूप माव शुनजान शुद्ध निश्चय. नयमे परोक्ष है ऐमा कहा जाता है क्योंकि श्रुत ज्ञानावरणीय कर्मके क्षयोपशम उत्पन्न है नथापि -इन्द्रिय और मनके द्वाग उत्पन्न विकश्पसहित ज्ञानकी अपेक्षासे प्रत्यक्ष है। इस कारण यह आत्मा स्वसंवेदन ज्ञानकी अपेक्षा प्रत्यक्ष होता है क्योंकि अनुभवगन्य है तथापि केवलज्ञानकी अपेक्षासे परोक्षही है । सर्वथा परोक्षही है ऐसा नहीं कहा जा सकता है। किंतु ऋतुर्थकालमें भी केवली भगवान क्या आत्माको हायमें लेकर दिखलात हैं ? नहीं; वे भी अपनी दिव्यश्वनिके द्वारा ही कहते हैं तौमी ध्वनिक सुननके कालमें भी सुननेवालों के लिये आन्माका स्वरूप परोक्ष ही है। पीछे नत्र परम समाधि जागृत की जाती है तब अत्मा प्रत्यक्ष होता है। जैसा चौथ कालमें था वैसा इस पंचम कालमें भी है ऐमा ताप्तर्य है। भावार्थः-यह आत्मा केवल नानकी अपेक्षाप्ते परोक्ष है परन्तु मावश्रुत ज्ञानरूप ससंवेदन ज्ञानके द्वारा यह प्रत्यक्ष अनुभवगम्य है । वचनोंके द्वारा इसका स्वरूप नहीं दिखाया जा सक्ता-चाहे केवलज्ञानकी ध्वनि हो चाहे श्रुतज्ञानीक शब्द हों-केवल वचनोंसे कहा जाता है तंत्र परोक्ष रूप ही मालुम होता है- वह श्रोता विकल्प त्याग निन समाविन तल्लीन होता है तबही आत्माको प्रत्यक्ष अनुभवकर परमानन्दका लाम करता है ॥ १८१ ॥ इस प्रकार परोक्ष आत्माका किस तरह ध्यान किया जाता है इसका समाधान करते हुए दो गाथाएं समाप्त हुई। आगे कहते हैं कि जब उदयमें आए हुए द्रव्य कर्म म्प राग द्वेपादि अध्यबसानाका अभाव होता है तब जीवमें होनेवाले रागद्वेयादि भाव कर्म स्य अध्यवसानोंका भी अभाव होता है इत्यादि रूपसे नंबरका क्रमने वर्णन करते है। गाथा:-तेसिं हेदू भणिदा अज्झवसाणाणि सव्वदरसीहिं । मिच्छतं अण्णाणं अविरदिभावोय जोगोय ॥ १८२।। संस्कृतार्थ:-तेषां हेतवः मणिताः अध्यव पानानि दार्शभिः । मिथ्यात्वमज्ञानमविरतिभावश्च योमश्र ॥ १८२ ॥ सामान्यार्थः-उन रागादि मावकि कारण उदय प्राप्त मिथ्यादर्शन, अनान, असंयम, तथा योग ऐसे चार अध्यवसान हैं यह बात सर्व दर्शी भगवान सर्वज्ञोंने कही है। शब्दार्थ सहित विशेपार्थः- (तसिं ) उन प्रसिद्ध जीव सम्बन्धी रागद्वेषादि विमाव कमांक अर्थात् भावाश्रवोंके (हेदू ) कारण ( अन्झवसाणाणि) उदयमें आए हुए द्रव्य कर्मरूप रागादिक हैं ऐसा ( सम्बइरसीहिं ) सर्व दर्शी मर्वज्ञोंने ( भणिदा ) कहा है। यहां शिष्यने शंकाकी कि अध्यवसान तो भावकमरूप होते हैं इसलिये उनको जीव सम्बन्धी ही होना चाहिये । उदयमें प्राप्त द्रव्यकर्म रूपी कारणांको भाव प्रत्यय - SATHERNA . समयसार टीका। रूप अध्यवान कैसे कह सक्ते है ? इसका समाधान आचार्य करते हैं कि यह बात नहीं है क्योंकि भावकर्म दो तरहके होते हैं एक जीव सम्बन्धी दूसरे पुद्गल सम्बन्धी-क्रोध मान माया लोम आदि प्रगट रूप भावोंको जीव सम्बन्धी भाव कर्म तथा पुद्गलपिंड जो उदयमें आते हैं उनमें 'नो शक्ति है उनको पुदल द्रव्य रूप भावकर्म कहते हैं-ऐसा ही कहा है:-" पुग्गल- पिंडो दव्वं कोहादी भावकम्मंतु । पुग्गल पिंटो दन्वं तस्सत्ती भावकम्मंतु" || यहां दृष्टांत द्वारा समझाते हैं कि मीठी या कड़वी आदि स्वादवाली चीज़ जन भक्षण की जाती है तब उस खानेवाले जीवके मीठा या कड़वा आदि स्वादका प्रगट विकल्परूप जीव सम्बन्धी भाव होता है उस भावकी व्यक्तता अर्थात् प्रगट होनेका कारण मीठी या कड़वी आदि द्रव्यके भीतर रह. नेवाली मीठे या कड़वेपनेकी शक्ति है जो कि पुद्गल द्रव्य सम्बन्धी है इस शक्तिको पदलका भावकर्म कहते हैं। इस तरह भावकर्मका स्वरूप जीव सम्बन्धी और पुद्गल सम्बन्धी दो तरहका जानना-जहां कही मावकर्मका व्याख्यान हो वहां ऐसा ही मतलब समझना योग्य है। वे अध्यवसान चार हैं (मिच्छत्तं अण्णाणं अविरदि मावोय जोगोय) मिथ्यादर्शन कर्म जिसके उदयसे विपरीत श्रद्धान होता है, अज्ञान जिसके उदयसे ज्ञानकी मंदता रहती है, अविरति भाव अर्थात् कषायोंका उदय जिसके कारण अपने आत्मामें चारित्रका यथार्थ अनुभव नहीं कर सक्ता तथा योग अर्थात शरीरादि नाम कर्मके उदयके कारण आत्माके प्रदेशोंका हलनचलन व्यापार होता है अथवा आत्माकी योग शक्तिका परिणमन होता है भावार्थः-मिथ्यादर्शन, मिथ्याज्ञान, मिथ्या चारित्रके कारण मिथ्यादर्शन कपायादि कमौका उदय है-पुरल पिंडमें जो फलहान शक्ति होती है उसे भी भाकर्म कहते हैं और जो जीवके उसके उदयसे मात्र होता है उसे भी भावकर्म कहते हैं । इसलिये दोनोंको अध्यवसानके नामसे वर्णन करते हैं। यह अध्यवसान संसारके कारण हैं अतएव भेद ज्ञानी अत्मा इनका त्यागकर अपने आत्मीक आनन्दका अनुभव करै । आगे संवर कसे होता है-सो कहते हैं:- गाथा:-हेटु अभावे णियमा जायदि णाणिस्स आसवणिरोहो । आसषभावेण विणा जायदि कम्मरस दुणिरोहो ॥१८३॥ कम्मस्साभावेण य णोकम्माणं च जायदि णिरोहो। णो कम्मणिरोहेण य संसारणिरोहणं होदि ॥ १८४ ॥ . संस्कृतार्थ:-हत्वभावे नियाजायते ज्ञानिनः आस्रवनिरोधः । आसवभावेन विना जायते कर्मणोऽपि निरोधः ॥ १८३ ॥ कर्मणोऽभावेन च नाकर्मणामपि जायते निरोधः । नोकर्मनिरोधेन तु संसारनिरोधनं भवति ।। १८४ ॥
ATRIKSHARAATESee '. ममयसार टीका। १५३ मामला: कारणों के अभावसे नियम करके इस ज्ञानी जीवके आश्रवका रुकना होता है । आश्रय भावले विना कर्मोका निरोव होता है । द्रव्यकोंके अभावसे नोकर्मोका निरोध होता है । नोकर्मोके निरोधसे संसारका अभाव होता है | शब्दार्थ सहित विशेषार्थः --(हेदु) पूक्ति कहे हुए उदयमें प्राप्त द्रव्यकका जो जीवके भावानवोंके अर्थात् रागद्वे- पादि भावोंके कारण हैं (अभावे) अभाव होनेपर अर्थात् उदय न होनेपर (णाणिस्स) वीतराग स्वसंदेन ज्ञानी जीवके (णियमा) निश्चयसे (आसवणिरोहो) राउपादि भाव रूप आश्रवोंका रुकना है लक्षण जिसका ऐसा संवर (जायदि) उत्पन्न होता है । (आसव भावेण) आश्रवसे रहित परमात्मतत्यके स्वरूपसे भिन्न लक्षणको रखनेवाले जीव सम्बन्धी भावाश्रव- भावके विणा) विना (कम्मम्सद गिरोहो, परमात्मतत्वके रोकनेवाले नवीन द्रव्यकोका रुकना (जायदे) होता है। (च) और (कमस्साभावेण य) फिर नवीन द्रव्यकर्मोके अभाव होनेसे अर्थात् रुकनेसे (गोकम्माण निरोहो) शरीरादि नोकर्मोका निरोध (जायदि) होता है (णोकं- मणिरोहेण य) और नोकम्मौके रुकनेसे (संसारणिरोहण होदि.) संसारसे रहित शुद्ध आत्मीक तत्वके विरोधी द्रव्य, क्षेत्र, काल, भव, और भावमई पांच प्रकार संसारका रुकना होता है। भावार्थ:-शरीरादि नोकर्मीका जबतक ग्रहण है तवत्तक संसार है-यह शरीर द्रव्यकोके उदयसे होता है । द्रव्यमोका बंध भावकर्मोसे होता है | भावकोका होना प्राचीन उदय प्राप्त द्रव्यकोंके उदयसे होता है इसलिये जिसके रागद्वेषादि भावोंके कारणभूत द्रव्यकर्मीका अभाव हो गया वह संसारसे नियमसे छूट गया । इस सम्यग्ज्ञानी जीवको अपने तत्वज्ञानके द्वारा व निज आत्मसमाधिमें तल्लीन होनेके कारणसे जब द्रव्यकर्मोकी निजरा होती है तब उस भावको ही संवर भार कहते हैं क्योंकि वह नवीन द्रव्यकर्मीका रोकनेवाला है। अतएव अनेक उपाय करके इस संवरभावकी प्राप्तिका यत्न करना ज़रूरी है। इसतरह तीसरी गाथा पूर्ण हुई । इस तरह संवरके क्रमका वर्णन करते हुए तीन गाथाएं पूर्ण हुई ॥१८३-१८४॥ इस तरह समयसारकी व्याख्याको करती हुई शुद्धात्मानुभवलक्षण ताप्तय॑वृत्ति नामकी टीकामें १४ गाथाओंसे व ६ स्थलोंसे संवरका विपक्षी आश्रव नामा पांचवां अधिकार समाप्त हुआ। इस तरह जैसे नाटकमें नाट्यरूपी पात्र अपना खेल दिखा चला जाता है ऐसे ही संवरका विरोधी आश्रव नाट्यशालासे निकल गया ।
भURATIMERIESMI समयसार टीका। insthanneKhort - १५४ छया महा अधिकार । (६) संवस्तत्व । आगे मेघर त प्रवेश करता है:- संवरके अधिकार ना जहां मिथ्यादर्शन तथा गगहेपादिमें परणमन होता हुआ बहिरात्मापने अर्थात् मिथ्यादर्शनपनेकी भावनारूप आश्रव भाव नहीं है वहां मंवर होता है इस तरह आश्रवका विरोध करते हुए वीतराग सम्यक्त रूप संवरका व्याग्यान १७ गाथा- ओंमें करते हैं- पहले ही वीतराग सम्यग्दृष्टी जीवने रागप गोहरूप आश्रवभाव नहीं होने इसका संक्षेपसे वर्णन करते हुए मिच्छतं अविरमण' इत्यादि गाथाणं तीन हैं। उसके बाद रागद्वेष मोहरूप आश्रवभागोंका फिर भी विशेष वर्णनकी मुल्यतामे 'भावो रागादि जद्रो' इत्यादि स्वतंत्र गाथाएं ३ हैं । उसके पीछे केवलज्ञान आदि गुणोंकी प्रगटतारूप कार्य समयसारके कारणभृत निश्चय रत्नत्रय स्वरूपमें परिणमन करनेवाले सम्यग्ज्ञानी जीवके रागहेपादि भाव कर्मोंका निषेध है इस कथनकी मुग्यतासे 'चउविह' इत्यादि गाथाएं तीन हैं। उसके पीछे उस ही सम्यग्ज्ञानी जीवके मिथ्यादर्शन व कषायादि.द्रव्य कर्म सत्तामें रहने हुए भी वीतराग चारित्रकी भावनाके वलसे रागद्वेपादि भाव कोका निषेध है, इस कथनकी मुग्न्यता करके सम्वेपुन्वणिवहा' इत्यादि चार सूत्र हैं। उसके पीछे नवीन द्रव्यको आश्रयके लिये उदय, आए हुए द्रव्यकर्म कारण होते हैं उन उद्यमें आग हुए द्रव्यकमौके कारण जीव मन्बन्धी रागद्वेषादि भाव कर्म होते हैं । इस तरह कारणका कारण इस वातके व्याख्यानकी मुख्यता करके चार सूत्र हैं । इस प्रकार १७ गाथाओंके पांचस्थलोंमें संवरके अधिकारसी समुदाय पातनिका पूर्ण हुई। आगे द्रव्य और भाय आप्रवमा स्पा कहने । गाथाः--मिच्छत्तं अविरमणं कसाय जोगाय लण्ण सण्णादु । वहुविहभेदा जीवे तस्व अणण्णपरिणामा ॥ १८५ ॥ संस्कृतार्थ:-मिथ्यात्वमविरमणं कपाययं गौ च संज्ञामंशास्तु । बहुविधभेदा ये तस्यैवानन्यपरिणाम: । १८५ ॥ सामान्दार्थ:-गिथ्यादर्शन, अविरति, कपाय और योग यह चेतन और अचेतन रूपसे दो प्रकार हैं तथा इनके उत्तर भेद बत प्रकार हैं ये स जीवमें होते हैं इसलिये इस जीवके ही अभिन्न अर्थान अपने भाव है। बार्ग निवार-(मिछ) मिथ्यादर्शन (अविरमण) अविरति अर्थात अलंयम (साय) सोधादि कपाय (जोगाय) मन, वचन कायके योग (सण्णसण्णादु) ये चार भावप्रत्यरः और द्रव्यप्रत्यय रूपले संज्ञा अर्थात् चेतनरूप और असंज्ञा अर्थात् अचेतनरूप हैं। भावार्थ:-जीव सम्बन्धी विभाव भाव तो चेतन हैं और पुद्गल- Easiesveere: समयसार टीका। मई द्रव्यक्रम सम्बन्धी प्रति अचेतन जड़ है- असत श्रद्धान रूप भाव भावमिथ्यात्व है और दर्शनमोहनीय कर्मप्रति द्रव्य मिथ्यान्च है; संयम न पालने रूप भाव भाव असंयम है, अप्रत्याख्यानावरणी आदि चारित्र मोहनीय कम द्रव्य असंयम है, क्रोध मानादि अशुद्ध भाव भावक्रयाय हैं, क्रोध मानादि चारित्र मोहनीय कर्म द्रव्य कपाय है, आत्माकी योगशक्तिका परि- णमन अथवा आत्माके प्रदेशोंका हलनचलन भावयोग है, शरीर अंगोपांग स्वर आदि नाम- कर्म द्रव्ययोग हैं। अथवा (दूसरा अर्थ यह है कि) मिथ्यात्व, असंयम, कषाय, और योग इनके सिवाय आहार, भय, मेथुन, और परिग्रहरूप चार संज्ञाएं अर्थात कामनाएं तथा असंज्ञा तीन, यहां असंज्ञाके इंपत् संज्ञा अर्थात् संज्ञाकी अपेक्षा कुछ कम कामना ऐसा अर्थ लेना-यह असंज्ञा तीन प्रकार है-इस लोककी इच्छा, परलोककी इच्छा, तथा कुधर्म अर्थात् जो धर्म नहीं है उसकी इच्छा यह सर्व (बहुविह भेदा) भाव उत्तरभेदम अनेक प्रकारके (जीवे) इस अधिकरणभूत जीवमें होते हैं। और ये सर्व विभाव परिणाम (तस्सव) इस ही जीवके ( अणण्ण परिणामा ) अभिन्न परिणाम अशुद्ध निश्चय नयसे हैं। भावार्थः-पुद्गलके संयोग सम्बन्धके कारण इस आत्मामें अनेक विभाव परिणाम होते हैं | यह सर्व विभाव अशुद्ध निश्चय नयस इस अशुद्ध जीवके भाव हैं | इससे इसके ही भाव कहे जाने हैं परन्तु शुद्ध निश्चय नयकी अपेक्षा यह सर्व इस जीवके भाव नहीं है परन्तु पुद्गल द्रव्यकत विकार हैं। अतएव भेद विज्ञानी आत्मा इन सर्व आश्रवके कारणभावोंको अपनेस भिन्न अनुभव कर अपने शुद्धस्वरूपमें तन्मय रहता है । यही शुद्ध भावसंबर रूप भाव है ॥ १८५ ॥ आगे आपत्र भावोंको फिर भी वर्णन करते गाथा:-णाणावरणादीयस्त ते दु कम्मरस कारणं होति । तेसिपि होदि जीवो रागदोसादिभावकरो ॥ १८ ॥ संस्कृतार्थ:-ज्ञानावरणाद्यस्य ते तु कर्मणः कारणं भवति । तेषामपि भवति जीवः रागद्वपादिभावकरः १८६ ।। सामान्यायः-वे उदयमें आए हुए द्रव्यकर्म नवीन ज्ञानावरण आदि आठ प्रकार कम- बंधके कारण होते हैं। उन द्रव्य प्रत्ययोंका भी कारण रागद्वेषादि भावोंका करनेवाला जीव है। शब्दार्थ सहित विशेषार्थ:-( तेदु ) वे पूर्वमें कहे हुए बंध प्राप्त द्रव्यकर्म उदयमें आने हुए (णाणावरणादीयम्स कम्मम्स) निश्चय चारित्रके साथ अवश्य होनेवाले वीतराग सम्यग्दर्शनके अभावमें शुद्धात्मीक स्वरूपसे भ्रष्ट जीवोंके लिये ज्ञानावरण आदि आठ प्रकार द्रव्यकर्माश्रवके ( कारण होंति ) कारण होते हैं । भावार्थ:-जब द्रव्यम उदयमें आकर आत्मा उनसे विचलित होता है तब इसके नदीन द्रव्यक्रमौका आश्रव होता है । (न मिपि) उन द्रव्यकर्मोंका भी कारण ( रागदोसादि भावको जीवो ) रागडेपादि भावोंमें परिणमन - ដែរបលនយំ समयसार टीका। AVARACHAKRENCHAKOR १५६ होनेवाला जीव है। यहां यह तात्पर्य है कि पूर्व में बांधे हुए द्रव्यकर्मोका उदय होने पर जब यह आत्मा अपने शुद्ध आत्मस्वरूपकी भावनाको छोड़के रागद्वेषादि विगाव परिणामरूपसे परिणमन करता है तब इसके नवीन द्रव्यकर्मोंका वंध होता है। केवल कमौके उदय मात्र होनेहीसे नवीन द्रव्यकर्मीका बंध नहीं होता । यदि यह माना जाय कि पूर्वमें बांधे हुए द्रव्यकर्मोंके उदय मात्रसे अवश्य नए कर्मोका बंध होगा तो सदा प्रत्येक जीवको संसार ही रहेगा क्योंकि संसारी जीवोंके सदा ही कर्मोका उदय रहता है। परन्तु यह वात नहीं है, केवल कर्मोंका उदय वंधका कारण नहीं है । जो विकल्प रहित समाधिसे नष्ट जीव हैं उनको यह मोह सहित कर्मोका उदय व्यवहारसे नवीन बंधके लिये निमित्त कारण होता है निश्चयसे कर्म बंधके लिये अशुद्ध उपादान कारण इस जीवका अपना ही रागद्वेषादि अज्ञानभाव है। भावार्थ:-जब यह अपनी आत्म समाधिमें लीन रहता है तब कर्म उदयमं आकर योही झड़ जाते हैं इससे नए कर्मोका बंध नहीं होता । परन्तु जब स्वस्वरूपमें तन्मय नहीं है, तब मोहनीय आदि कर्मोका उदय होने पर यह आत्मा अपने भाव रागद्वेष मोहरूपकर लेता है तब वे विभाव भाव नवीन द्रव्यकर्मोके आनेमें कारणभृत होते हैं। ऐसा जानना । अतएव बल- पूर्वक उद्यम करके अपने आत्मस्वरूपमें तन्मय रहनेका यत्न करना योग्य है ॥ १८६ ॥ आगे वीतराग स्वसंवेदन ज्ञानी जीवके रागद्वप मोह रूप भावात्रों का अभाव है ऐसा दिखलाते है:- गाथा:---णस्थि दु आसववंधो सम्मादिहिस्स आमवणिरोहो । संते पुव्वणिवढे जाणदि सोते अबंधंतो ॥ १८७ ॥ संस्कृतार्थः-नस्तत्त्वात्रवबंधौः सम्यग्दृष्टेरालयनिरोधः । संति पूर्वनिबद्धानि जानाति स तान्यवनन् ॥ १८७ ।। सामान्याः-सम्यग्दृष्टी जीवके तो आश्रय और वंध दोनों नहीं हैं किन्तु आश्रवको रोकनेवाला संवर भाव है तथा पूर्वमें बांधे हुए द्रव्यकर्म हैं परंतु वह उनको केवल जानता और अपने भेद ज्ञानके बलसे नवीन कर्मोको नहीं बांधता है । शब्दार्थ सहित विशेपार्थः- (सग्मा दिहिस्स) सम्यग्दृष्टी भेदविज्ञानी अंतरात्माके (दुआसवबंधो) तो आश्रव और बंध दोनों (णत्थि) नहीं हैं (यहां गाथामें समाहार द्वन्दसमासकी अपेक्षासे द्विवचनंको भी एक बचन किया गया है) परंतु (आसंवणिरोहो) आश्रवको रोकना है लक्षण जिसका ऐसा संवर भाव है । (सो) वह सम्यग्दृष्टी (पुन्वणिवद्धे) पूर्वमें बांधे हुए ज्ञानावरणादि द्रव्यकोको (सते) विद्यमान रहते हुए (ते) नवीन कर्मोको (अबंधतो) अपर विशिष्ट भेद ज्ञानके ब- लसे नहीं बांधता हुआ (जाणदि) केवलमात्र कर्मोके स्वरूपको वट स्वरूपसे जानता है। यहां, यह तात्पर्य है कि सम्यग्दृष्टीके दो भेद हैं एक सराग और दूसरा पीतराग इनमें से जो सराग -- . है । ma FINoverRIEND समयसार टीका। enetteANDEE १५७ सम्यादृष्टी है सो "सोला पणवीसणमदत चउ छक्केकरोछिन्ना। दुगतीस चदुर पुव्वेपण मोलस जोगिणो इक्लो" इत्यादि बंध त्रिभंगीमें कही हुई गाथाके अनुसार क्रममे जो जो गुणस्थान चढ़ता है अधिक अधिक प्रतियोंकी बंध व्युच्छित्ति करता है अर्थात कम कम प्रतियोंके बांधता है। इस गाथाका भावार्थ यह है कि प्रथम मिथ्यादृष्टि गुणस्थानमें १६ प्रतियांकी बंध व्युच्छित्ति है अर्थात् इन १६ का वंध मिथ्यात्वमें ही है आगे नहीं है । वे प्रति यह हैं:-मिथ्यात्व, हुंडकसंस्थान, पंडवेद, असं० संहनन. एकेन्द्रि, स्थावर, आताप, सूक्ष्म, साधारण, अपर्याप्त, द्वेन्द्रिय, तेन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय, नरकगति, नरकगत्व०, नरकायुइसी तरह सासादनमें २५ काबंध हैं आगे नहीं हैं वे २५ प्रकृति यह है:-४ अनंता० क; १ स्त्यानगृन्हि, प्रचलाप्रचला, निद्रानिद्रा, दुर्भग, दुस्वर, अनादेय, न्यग्रोधादि ४ संस्थान, वजनाराचादि ४ संहनन, १ अप्र० विहायोगति, १ स्त्रीवेद, १नीचगोत्र, १तियचगति, १ति. गत्यानुपूर्वी १ उद्योत, तिथंचायु, मिश्र ३रे गुणस्थानमें बंधकी व्युच्छित्ति नहीं है। चौथे असंयत गुणस्थानमें १० प्रकृतियोंकी बंध व्युच्छित्ति है अर्थात् इन १० का बंध चौथेसे आगे नहीं होता-वे १० ग्रह हैं "अप्र- ख्याना.४, वनवृपभना० १, औदारिक शरीर अंगोपांग २ मनुप्यगत्यानुपूर्वी १ मनुष्यग़ति १, मनुष्यायु १" पंचमगुणस्थानमें प्रत्याख्यानावरणी कपायचारका ही वंध है इसके आगे नहीं। छठे प्रमत्त में अथिर, अशुभ, अयश, अरति, शोक, असाता इन छः का बंध है आगे नहीं। अप्रमत्तमें देवायु बंधे, आगे नहीं । अपूर्वकरणके प्रथम भागमें निद्रा, प्रचलाका छठे भागमें तीर्थंकर, निर्माण, प्र०विहायोगति,पंचेन्द्रिय, तैनस, कार्माण, आहारक, आहारक अंगोपांग, सम- चतुरस्त्र संस्थान, देवगति, देवगत्यानुपूर्वी, वैक्रियिक, वैक्रियिकअंगो; वर्णादि ४, अगुरुलघु, उपघात, परघात, उवास, त्रस, वादर, पर्याप्त, प्रत्येक, स्थिर, शुभ, सुभग,सुस्वर, आदेय इन ३० का, तथा ७ वें भागमें हास्य, रति, भय,जुगुप्सा इन ४ का इस तरह ३६ का बंधयहीं तक आगे नहीं । अनिवृत्तिकरणमें पुरुषवेद, संज्वलनक्रोध, संज० मान, संज्व० माया, स्वंज्वलन लोभ इन पांचका वैध है आगेनहीं। दसवें सूक्ष्म साम्परायमें ५ ज्ञानावरणी, अंतराय ५, दर्शन० ४, यश १, उच्चगोत्र १ ऐसे १० का वंध है 'आगे नहीं । ११, १२, १३ गुणस्थानोंमें एक समय स्थितिवाला सातावेदनीयका बंध होता है, चौदहवमें नहीं। इस कथनके अनुसार सराग सम्यग्दृष्टि चौथे गुणस्थानवाला आत्मा मिथ्यादृष्टि व सासादनकी अपेक्षासे ४३ अर्थात् (१६+२९२ आहारक) प्रकृतियोंका बंध नहीं करता है केवल ७७ प्रतियोंको थोड़ी स्थिति व अनुभागको किये हुए बंध करता है तो भी संसारकी स्थितिको छेदनेवाला होता है इस कारणसे इस त कहते हैं। इसी तरह अदिरति सम्यदृष्टि गुणस्थानके ऊपर यथासंभव जहां तक लगातानोन है वहां तक नीचेक गुणस्थानकी अपेक्षासे तारतम्यसे अवन्ध है । परन्तु उससे ऊपरफ गुणस्थानकी अपेक्षासे बंधक है। इस तरह R FERREE समरसार टीका। . - १५८ जव इसके वीतराग सम्यग्दर्शन होता है तब यह साक्षात् बंधसे रहित हो जाता है ऐसा मानकर हम सम्यग्दृष्टि हैं सर्वथा हमें बंध नहीं होगा ऐसा नहीं कहना योग्य है। भावार्थ- यहां गाथामें कहा है कि समयग्दृष्टीके न तो कर्मोंका आश्रव है न बंध है। इसका अभि- प्राय यह है कि वीतराग सम्यग्दर्शनके होते हुए कर्मोका सांपरायिक आश्रव अर्थात् संसारका कारण कर्माश्रव नहीं होता और न कर्मोकी स्थिति पड़ती है न अनुभाग बंध होताहै, ग्यारहवें, बारहवं, तेरहवें, गुणस्थानमें यद्यपि योगोंके परिणमनसे सातावेदनीय कर्मका आश्रव होता है तथापि कषायोंके न होनेसे केवल ईर्यापथ आश्रव व प्रकति वप्रदेशबंध एक समयमात्र स्थितिका होता है। इसलिये सम्यग्दृष्टीको अवंधक कहा है। जिसको सम्यक्त्व होजाता है उसका संसार थोड़े कालके लिये रहजाताहै। यहांपर कोई ऐसा माने कि हम सम्यग्दृष्टी हैं हमें कर्मका बंध नहीं होगा। तो उसका मानना मिथ्या है। यद्यपि उसको गुणस्थानकी अपेक्षा अपने योग्य कितनी प्रकृति- योंका बंध नहीं होगा तथापि जिनके बंधनेका अभाव आगेके गुणस्थानमें है उनका नीचे के गुणस्थानमें अवश्य बंध होगा ॥ १८७ ॥ इसतरह आश्रवका विपक्षी जो संवर उसकी संक्षेपसे सूचनाके व्याख्यानकी मुख्यतासे तीन गाथाएं पूर्ण हुई। आगे रागद्वेप मोह रूपी भार्बोके आश्रवपना है ऐसा निश्चय करते है:- गाथा:-भावो रागादिजुदो जीवेण कदो बंधगो होदि। रागादिविप्पमुको अवंधगो जाणगा णवरि ॥ १८८ ॥ संस्कृतार्थ:-मावो रागादियुतः जग्वेन कृतस्तु बंधको भवति । रागादिविप्रमुक्तोऽबंधको ज्ञायको नवर ॥ १८८ ॥ सामान्यार्थ-इस जीवसे किया हुआ रागद्वेषादि भाव तो कर्मोका बांधनेवाला होताहै किन्तु रागद्वेषादिसे रहितभाव भावक्रर्मोका बांधनेवाला नहीं है ऐसा जानो । शब्दार्थ सहित विशेषार्थ:-जैसे लोहा और चुम्बक पत्थरका सम्बन्धजनित भाव अर्थात् परिणति विशेष लोहेकी सुईको अपनी ओर आकर्षण करनेमें प्रेरणा करती है तैसे ही (जीवेणकदो) इस अशुद्ध संसारी जीवसे किया हुआ (रागादि जुदो भावो) रागद्वेषादि रूप अज्ञानमई भाव अर्थात् परिणति विशेष शुद्ध स्वभावकी अपेक्षा (दु) तो आनन्दरूप, अविनाशी, अनादि और अनंत शक्तिको रखनेवाला, प्रकाशमान, कर्मादि पर पदार्थोके लेप रहित, निर्मलगुणके धारी आत्माको भी शुद्धस्वभावसे हटाकर (बंधगो होदि) कर्मवंध करनेके लिये प्रेरणा करती है (णवरि) किन्तु (रागादि विप्पमुक्को) रागद्वेषादि अज्ञान भावोंसे छुटा हुआ निर्मल शुद्धोप- योग रूप भाव (अबंधगो) अवधक होता हुआ इस जीवको कर्मबंध करनेके लिये प्रेरणा नहीं करता है, परन्तु इस आत्माको पूर्वमें कहे हुए शुद्ध स्वभाव रूपसे ही स्थिर रखता है समयसार टीका। १०९ (जाणगो) अर्थात् ज्ञाता हटा रखता है इस कथनसे वह जाना जाता है नि रागादि रहित चैतन्यके चमत्कार मात्र परमात्म पदार्थसे भिन्न जो रागद्वेप मोह हैं वे ही बंधके कारण हैं भावार्थ:-जैसे चुम्बक पत्थर और लोहेका सम्बन्ध लोहेको आकर्षण कर लेता है। ऐसा ही रागद्वेष मोह भावोंसे लित आत्मा कर्मोको आकर्षण करके बांध लेता है और जैसे चुम्बक पत्थर लोहेके सम्बन्धसे अलग पड़ा हुआ लोहेको नहीं घसीटता-इसीतरह रागडेप मोह भावोंसे रहित शुद्धोपयोगी वीतरागी आत्मा द्रव्य कर्मोको नहीं वांधता है-इससे रागद्वेष मोह ही भावाश्रव हैं इससे जिस तरह बने इनको रोककर संवरभाव रखनेका उद्यम करना योग्य है ॥ १८८ ॥ आगे रागद्वेषादि भावोंसे रहित शुद्ध भावका संभवपना दिखलाते है:- गाया:-पके प.लम्मि पडिदे जह ण फलं वझं पुणो विंटे। जीवस्स कम्मभावे पडिदे ण पुणोदयसुवेहि ॥ १८९ ॥ संस्कृतार्थ:-पक्के फले पतिते यथा न फलं बध्यते पुनचे। जीवस्य कर्मभावे पतिते न पुनरुदयमुपति || १८९ ॥ अर्थः-जैसे पका फल वृक्षसे गिर जाने पर फिर वही फल अपनी टहनीमें नहीं लग सक्ता है तैसे ही तत्त्वज्ञानी जीवके साता व असाताके उदयजनित सुख दुःखरूप कर्म भाव अर्थात् कर्म पर्यायके गलनेपर फिर वह कम बंधको प्राप्त नहीं होता है। शब्दार्थ सहित विशेषा:-(जह ) जैसे ( पके फलंमि ) पक्के फलके ( पड़िदे ) गिरते हुए (पुणो) फिर (वेटे ) उस टहनीमें ( फलं ) वह फल ( ण वज्झदे ) नहीं बंधता है तैसे (जीवस्स) तत्त्वज्ञानी जीवके ( कम भावे पड़िदे ) साता व असाताके उदय जनित सुख दुःखरूप कर्मोकी अवस्थाके फल देकर झड़ जाने पर (ण पुणो उदयमुवेदि) फिर वह कम नहीं बंधको प्राप्त होता है क्योंकि वहां रागढेप मोहका अभाव है और न वह फिर उदयको प्राप्त होना है। इससे जब रागद्वेपादि भावोंका अभाव होता है तब शुद्ध भाव उत्पन्न होता है इसीसे ही उस सम्यग्दृष्टी जीवके विकार रहित स्वसंवेदन ज्ञानके वलसे संवर पूर्वक निर्जरा होती है । भावार्थ:-जो आत्मा अपने शुद्ध आत्मस्वरूपमें तल्लीन है उसके कर्म उदयमें आकर झड़ जाते हैं और फिर वे कर्म न बंधते हैं और न फिर उदयमें आसक्ते हैं-प्राचीन कर्म अपना फल देकर झड़ जाते हैं। तव जो रागद्वेष न करके वीतराग भावमें तन्मय रहता है उसके न नए कर्म बंधते हैं और न वे उदयमें आसक्ते हैं। अतएव जब सर्व कर्म झड़ जाते हैं, तब शुद्ध आत्मीकभाव परिपूर्ण रूपसे प्रकाशित होजाता है । इसलिए जिस तरह होसके रागद्वेषादि भावोंको दूर कर वीतराग भावरूप ही रहना योग्य है ॥ १८९ ।। आगे ज्ञानी जीवके नवीन द्रव्याश्रवोंका अभाव है ऐसा दिखलाते हैं।
RRORSnhintanSinRNAKArti १६० समयसार टीका। गाथा:-पुढवीपिंडनमाणा पुव्वणिवाडा दु पचया नरप्त । कम्मलरीरेण दुते बड़ा सव्वेवि गाणिस्म ॥ १२० ॥ संस्कृतार्थः- पृथ्वीपिंडसमानाः पूर्वानवद्धान्तु प्रत्ययास्तस्य । कर्मशरीरेण तु ते बद्धाः रऽपि शानिनः ॥ १९० ॥ सामान्यार्थः- उस वीतराग सम्यग्दृष्टी जीवके वे पूर्वमें बांधे हुए द्रव्यकर्म पृथ्वीपिंडके समान हैं, कार्यकारी नहीं हैं। वे सर्व ही कर्म कार्माण शरीररूपसे बंधे हुए ज्ञानी जीवके रहते हैं। शब्दार्थ सहित विशेपार्थः -- तस्स) उस वीतराग सम्यग्डप्टी जीवके (पुव्वनिवडा) पूर्वकाल में बांधे हुए (पच्चया) मिथ्यात्व, अविरति, कपाय आदि द्रव्याश्रवरूपी कर्म (द) तो (पुढवीपिंड- ममाणा) मिट्टीके ढेरके समान अकार्यकारी होते हैं, अर्थात् रागद्वेपादि भावोंको नहीं पैदा करनेके कारणसे आगामी बंधके लिये कुछ कार्यकारी नहीं होते, अर्थात् उसके नवीन द्रव्य कर्मोका बंध नहीं होता (ते सव्वे वि) वे सर्व ही (बहा) पूर्वमें बांबे हुए द्रव्यकर्म (गाणिस्स) निर्मल आत्माका अनुभवरूपी लक्षणको रखनेवाले भेदज्ञानी जीवके (कंमसरीरेण दु) कार्माण शरीर रूपसे ही रहते हैं। रागद्वेपादि भावोंमें जीवको परिणमन नहीं कराते हैं। यद्यपि द्रव्या- श्रवरूपी कर्म मुट्ठीमें रक्खे हुए विषके समान कार्माण शरीररूपसे पड़े रहते हैं तथापि उदयमें आए विना अर्थात् विना रसोदयके सुख दुःखरूपी विकारमई वाधाको नहीं करते हैं। इसी कारणसे ज्ञानी जीवके नवीन कर्मोंका आश्रव नहीं होता। भानार्थः--जब यह वीतराग सम्यग्दृष्टी ज्ञानी आत्मा उद्यम करके अपने खरूपमें तिटता है तन पुगने रागपादि द्रव्य कर्म रागादि भावोंको पैदा न करके मिट्टीके ढेलेके समान पड़े रहते हैं कुछ भी काम न करके अपने समयपर झड़ जाते हैं जैसे मुट्ठीमें रक्खा हुआ विप शरीरंगें ज़हर नहीं चढ़ा सक्ता ऐसे ही वे द्रव्यकर्म यों ही पड़े रहते हैं ॥ १९० ॥ इस तरह रागद्वेष मोहरूपी आश्रवोंका विशेषरूपसे विवरण करते हुए स्वतंत्र तीन गाथाएं पूर्ण हुई। आगे कहते हैं कि ज्ञानी आअव रहित होता है । गाया:--चहुविह अणेयभेयं बंधते णाणदंतणगुणेहिं । समये सलये जहा तेण अपंथुत्ति णाणी ॥ १९१ ॥ संस्कृतार्थ:-चतुर्विधा अनेकभेदं बघ्नंति ज्ञानदर्शनगुणाभ्यां । समये समये यस्मात् तेनाबंध इति ज्ञानी तु॥ १९१ ॥ सापान्यार्थ—चार प्रकार मिथ्यात्व, अविरति, कपाय और योग ऐसे द्रव्याश्रव कर्म विके ज्ञानदर्शन गुणों के द्वाराअनेक प्रकार ज्ञानावरणीय आदि द्रव्यकोको प्रति समयमें बांधते हैं, इस कारणसे जो भेदज्ञानी है वह अबंधक है । शब्दार्थ सहित विशेषार्थ-(चउविह) चा . CHRISARSAGENDAMOM 15 समयसार टीका। प्रकार मूल प्रत्यय अर्थात् कारण जैले मिथ्यादर्शन, अविरति, कपाय और योग उदयनें आकर (गाणदमणगुणेहिं। नीवके ज्ञान दर्शनगुणोंके हारा (अणेयमेव) अनेक प्रकार ज्ञाना- वरणादि द्रव्यकर्मोको (समये समये) प्रत्येक समयं समवमें (बंधने बांधने हैं। यहां यह भाव है कि द्रव्याश्रवरूपी: कर्म उदयमें आते हुए जीवके ज्ञानदर्शन. गुणोंको रागढेपादि अज्ञान भावमें परणमन कसदेते हैं, तब वेरागडेपादि अज्ञान भाव में परिणमन होनेवाले ज्ञान दर्शन गुण बंधक कारण होते हैं। वास्तवमें तो राग द्वेषादि अज्ञान भावों में परणमन होनेवाले ज्ञान और दर्शन दोनोंको अज्ञान ही कहते हैं (कहीं २ "अण्णाणदसण" गुणहिं, ऐसा पाठ है ) (जम्हा) क्योंकि ज्ञान दर्शन गुण रागादि अज्ञान भावमें परिणमन होकर नवीन कर्माको बांधने हैं (तेण) इसलिये (गाणी दु) भेदज्ञानी (अबंधुत्ति) कर्मबंध करनेवाला नहीं होता, किन्तु ज्ञानदर्शन गुण रागद्वेषरूप होनेके कारण वे उदयमें आए हुए द्रव्यकर्म बंध करनेवाले हैं । इसतरह ज्ञानी, जीवके आश्रवपनेका अभाव है ऐसा सिद्ध हुआ । भावाश्रः-जब इस जीवक द्रव्य कर्मोका उदय होता है तब इस. भैदज्ञान रहित आत्माके रागद्वेपादि रूप परिणति होती है अर्थात् इसकी ज्ञान दर्शन परिणति रागद्वेषरूप हो जाती है तब नवीन कर्मोका बंध होता है । परन्तु जो यह ज्ञानी आत्मा अपने स्वरूपमें लीन रहे, रागद्वेष न करे तो यह कर्मोको बंध नहीं करता इससे जिसतरह बने भेदज्ञानरूप रहना योग्य है ।। १९१ ॥ आगे फिर भी प्रश्न करते हैं कि ज्ञान गुणका परिणाम बंधका कारण कैसे होता है ? गाथाः-जमा दु जहण्णादो णाणगुणादो पुणोवि परिणमदि । अण्णत्तं गाणगुणो तेण दु सोपंधगो भणिदो ॥१९२॥ संस्कृतार्थः यस्मातु जघन्यात् ज्ञानगुणात्पुनरपि परिणमते । अन्यत्वं ज्ञानगुणः तेन तु स बंधको भणितः ॥ - ११२ ॥ सामान्पार्थः :-यथाख्यात चारित्रसेपहले जवन्य ज्ञान गुणसे फिर भी अन्य अवस्थाको परिणमन करता है। इस कारणसे वह ज्ञानगुण बंध करनेवाला कहा गया है। शब्दार्थ सहित विशपार्थः-(जम्हा दु) क्योंकि यथाख्यात चारित्रसे पूर्व जघन्य अर्थात् हीन अर्थात् कपाय सहित ज्ञान गुण होता है (जहण्णादो णाण गुणादो) इसलिये उस जघन्य ज्ञान गुणके कार- णसे अंतर्महुर्तके पीछे विकल्प रहित समाधिमें ठहर नहीं सक्ता है। इसकारणसे (णाण गुणो) वह ज्ञानं गुण (पुणोवि अण्णत्तं परिणमदि) फिर भी अन्य अवस्थाको अर्थात् विकल्पमा हित पर्यायमें परिणमन करता है। (तणंदु) उस विकल्पमहित कपाय भावके कारण (मो) वह ज्ञान गुण (पंधगो) कर्मबंध करनेवाला (भणिडो) कहागया है। भावार्थ-यथाव्यात चारित्र ११ ३ व १२ वें गुणस्थानमें होता है, उस समय विकलरहित समाधि है उसके पहले कहा- योका उदय है। अप्रमत्तमें अव्यक्त परन्तु प्रमत्तमे व्यक्त है । चौथे अविरति गुणम्यानमे लेकर PATTEREDirevieistirinetis समयेसारीका। evenRMERMINAYAikes कषायके उदय सहित गुणस्थानों में ज्ञान गुणकी स्थिरतां कम होती है इससे वह अंतमहत्तसे अधिक ध्यानमें व आत्मानुभवमें नहीं ठहर सक्तां है। उसके पीछे उसको गिरकर विकल्प सहित अवस्थामें आना पड़ता है तब वह ज्ञान गुण कषायोंके उद्वेगके कारण अपने २ गुणास्थानों के अनुसार यथासंभव व्यकर्मों का वांधनेवाला होता है । १२वें गुणस्थानसे पतन नहीं होता जब कि ११ वेसे होजाता है अतएव ११ में अबंधक था सो नीचे आकर बंधक होजाता है अथवा इस ही गाथाका दूसरा व्याख्यान करते हैं:-(जहण्णादो) जघन्य अर्थात् मिथ्याष्टिं गुणस्थान सम्बन्धी (गाणगुणादो) ज्ञान-गुणसे (पुणोवि) काललंब्धिके वश सम्यक्त्वकी प्राप्ति होनेपर (गाणगुणों) वह ज्ञानगुण मिथ्यात्त्व अवस्थाको त्यागकर (अण्णत्तं परिणमदि) दूसरे रूप अर्थात् सम्यग्ज्ञानीपनेको परिणमन करता है अर्थात् मिथ्याज्ञानीसे सम्यग्ज्ञानी होजाता है (तेणदुसोऽबंधगो भणिदो ) इसकारणसे वह ज्ञानगुणं या ज्ञानगुणमें परिणमन करनेवाला नीव अबंधक कहा गया है। भावार्थ:-मिथ्याज्ञान संसारके भ्रमणके कारण कर्म बंधोंको करानेवाला है । जव कि सम्यग्ज्ञान संसारका कारण कर्मबंध नहीं कराता है। जो कुछ कर्मबंध' होता है उसमें स्थिति बहुत कम पड़ती है । अतएव जिस तरह वने कर्मोको निवारण करनेके लिये सम्यक्त्वका ग्रहण कार्यकारी है ।। १९२॥ यथाख्यातचारित्र होनेके पहले यह जीव अतर्महूर्त्तसे अधिकं निर्विकल्प समाधिमें ' ठहरनेको असमर्थ है ऐसा जो पहले कहा गया है । तब ऐसा मानने पर ज्ञानी आश्रव रहित कैसे हो सकता हैं:- सो कहते है:- १' गाथाः--दसणणाणचरितं जं परिणमदे:जहण्णभावेण । णाणी तेण दु वज्झदि पुग्गलकम्मेण विवहेण ॥ १९३ ॥ संस्कृतार्थ:-दर्शनशानचारित्रं यत्परिणमते जघन्यभावेनं । : ज्ञानी तेन तुः बध्यते पुद्गलकर्मणा विविधन || - १९३ ॥ ..सामान्यार्थ:-जब ज्ञानीका दर्शन, ज्ञान और चारित्र-जघन्यरूपसे परिणमन करता है तब उस जघन्य परिणमनके कारण वह नाना प्रकार पुद्गल कर्मोंसें बंधता है। शब्दार्थ सहित विशेषार्थ:-यद्यपि ज्ञानी. आत्माले रागद्वेषादि विकल्प कारणोंका अभाव है इससे उसके आश्रव नहीं होता अर्थात्वह निराश्रव ही है किन्तु वह भी जितनी देर तक परम समाधिकी प्राप्तिके .अभावमें शुद्ध आत्मस्वरूपको देखने, जानने व अनुभव करनेके लिये असमर्थ होता है उतनी देर तक उस जघन्यज्ञानीके (जंदसण णाणचरितं) जो दर्शनज्ञान और चारित्र है सो (जहण्णभावेण) जघन्य भावसे अर्थात् सकषाय भावसे अनीहितवृत्तिसे अर्थात् अपने कषाय करनेकी इच्छा न होते हुए भी (परिणमदे) परिणमन करता है । (तेणदु) तिस कारणसे ही (गाणी) वह भेदज्ञानी त्मिा (विवहेण पुग्गल कमेण) : अपने २ गुणस्थानों के अनुसार नाना प्रकार तीर्थकर नाम कर्म .
RSARI ARMATHASE - - समयसार टीका। प्रतिको आदि लेकर पुण्य कर्मोसे (वज्झदि) बंधता है। भावार्थ:-जन तक निर्विकल्प परम समाधि भावमें यह आत्मा ठहरता है तब तक इसके काँका बंध नहीं होता परंतु नीचेके गुणस्थानवाले बहुंत काल स्वरूपका अनुभव नहीं कर सक्ते हैं इससे किसी प्रकटरूप व किसीके अप्रकटरूप कषाय अंश जग उठता है-जितना २ कपाय अंग होता है उतना र द्रव्यकर्मोका बंध होता है । ऐसा जानकर अपनी ख्याति अर्थात् वड़ाई, पूना, लाभ व भोगोंकी इच्छारूप निदान बंधे आदि विभाव परिणामोंको त्यागकर व निर्विकल्प समाविमें ठहरकर उस समय तक शुद्ध आत्म स्वरूपको देखना व अडान करना चाहिये, जानना चाहिये तथा अनुभव करना चाहिये जिस समय तक शुद्धात्मस्वरूपका परिपूर्ण केवलज्ञानरूपी भाव देखने, जानने व अनुभव करनमें नहीं आवे ॥१९३|| इस तरह ज्ञानी जीवके भावाश्रवके निषेधकी मुख्यताकरके तीन गाथाएं पृण हुई। आगे शिप्यने प्रश्न किया कि द्रव्यकमीको सत्ताम विद्यमान रहने हुए जानी निगपत्र कैसे होता है। उसका समाधान चार गाथाओमें करते है:- गाथाः-सव्वे पुव्वणिवद्धा दु पच्चया संति सम्मदिहिस्स। उवओगप्पाओगं बंधते कम्मभावेण ॥ १९४ ॥ संस्कृतार्थ-सर्व पुर्वनिबद्धास्तु प्रत्ययाः संति सम्पग्दृष्टेः । उपयोगप्रयोग्यं वनात कर्म भावेन ॥ १९ ॥ सामान्यार्थ-उस सम्यग्दृष्टी जीवके वे सर्व पूर्वमें बांधे हुप द्रव्य - कर्म विद्यमान है तथापि केवल अपने उपयोगक योग्य कर्म रागादि भावके कारणसे बंध होते हैं । शब्दार्थ सहित विशेपार्थः-(सम्मदिहिस्सा उस सम्यग्दृष्टी अंतरात्माक ( सव्वे पुल्च निबद्धा- .पञ्चया) सर्व ही पूर्व समयोंमें बांधे हुए द्रव्य कर्म (दु संति) तो सत्तामें विद्यमान हैं तो भी (उवओगप्पाओगं) उसके उपयोगके योग्य अर्थात् उदयमं आए हुए क्राँके कारणसे जैमा आत्माका उपयोग होता है उसके योग्य (कम्म) नवीन ,द्रव्य कर्म ( भावण ) उसके रागद्वेषादि परिणामके द्वारा (बंधते) बंधते हैं । केवल पूर्व द्रव्य कर्मोकी मत्तामात्रसे नवीन बंध नहीं होता। भावार्थ-जिस समय किसी अनादि मिथ्यादृष्टि जीवके काल लब्धि आदि कारणोंके होनेपर मिथ्यात्व व अनंतानुबन्धी कपायके उपशम होनेसे सम्यक्त्वकी प्राप्ति होती है उस समय उस सम्यक्त्वीकी सत्तामें द्रव्य कर्म बंधे हुए रहते हैं। जब वह सम्यन्वी आत्मा उपाय करके स्वसंवेदन ज्ञानरूप आत्मानुभवमें तल्लीन होता है और कर्मोक उद्यक अनुसार अपने उपयोगको नहीं होने देता है तब उसके नवीन कर्म बंध ऐमा नहीं होता जिसकी कोई गणना की जावे, परंतु जब उसीका उपयोग कोक उदयक अनुसार परिणमन कर जाता है तब से भाव होने हैं. और उसमें जैसी कुछ कषायकी कालिमा होती है उसीक VAILEVNCERAMAN Eaiwwwmasatestre १६४ समयसार टीका। अनुसार नए कर्मोका बंध होता है। यदि वह अपने स्वरूपमें लवलीन रहे तो केवलमात्र कर्मोकी सत्ता होनेसे नवीन काँका बंध नहीं होता, इससे ज्ञानीको अपने खरूपानुभवको सदा प्रयत्न करना योग्य है । उसी हीके प्रतापसे आश्रव रहित रह सक्ता है ॥१९॥ इसीको और भी कहते है। गाथाः-संतीव निश्वभोजा वाला इच्छी जब पुरुसस्स । बंधदि ते उवभोजे तरुणी इच्छी जह णरस्ल ।। १९५ ॥ संस्कृतार्थः-संति तु निष्पभोग्यानि वाला स्त्री यथैव पुरुषस्य । बध्नाति तानि उपभोग्यानि तरुणी स्त्री यथा पुरुषस्य ॥ १९५ ॥ सामान्यार्थ:-जैसे किसी पुरुषकी स्त्री वालिका है अर्थात् नवयुवतिपनेको प्राप्त नहीं तो वह पुरुषके भोगने योग्य नहीं होती ऐसे ही कर्म आत्माकी सत्तामें बंधे हुए जबतक उदयमें नहीं आते तबतक उपभोगने योग्य नहीं होते। और जसे युवा स्त्री पुरुपके भोगने योग्य होती है तैसे ही वे बंधे हुए कर्म उदयमें आकर भोगने योग्य होते हैं और तब यह जीव नवीन कर्मोको बांधता है। शब्दार्थ सहित विशेषार्थः-(जहेव) जैसे वाला इच्छी) अज्ञान अर्थात् युवा- पनेको अप्राप्त कोई वधू (पुरुसम्स) अपने पतिके भोगने योग्य नहीं होती तैसे ही वे कर्म (संतीव) आत्माकी सत्तामें मौजूद रहते हुए भी (णिरुव भोज्जा) अपने उदय कालके पहले उपभोग करने योग्य नहीं होते और (जह) जैसे (गरस्स) किसी पुरुषकी (तरुणी इच्छी, जवान स्त्री उसके द्वारा भोगने योग्य होती है तैसे यह जीव कर्मोके उदयकालमें (ते उवभोज्जे) उन कर्मोका भोगने- वाला होता है तथा (बंधदि) अपने रागद्वेषादि भावोंके कारणसे नवीन कौका बांधनेवाला. होता है । भावार्थः-पूर्वक कर्म केवल आत्माकी सत्तामें पड़े हुए जबतक उदयमें नहीं आते तवतक न तो वे भोगे जाते हैं और न यह उनके कारणसे रागी वेपी होकर नए कर्मोको बांधता है। परन्तु जब. वे ही कर्म उदयमें आकर रस देते हैं तब यह उनके फलको भोगता है और उस समय यदि रागद्वेपादि भाव करे तो फिर और नए कर्मोको बांधता है ।। १९५॥ इस ही अर्थको और भी मजबूत करते है:- गाथाः-होदूण णिरुखभोजा तह बंधदि जह हवंति उवभोजा। सत्तविहा भूदा णाणावरणादिभावहिं॥ १९६ ॥ संस्कृतार्थ:-भूत्वा निरुपभोग्यानि तथा नाति, यथा' भवन्त्युभोग्यानि । सप्ताष्टविधानि भूतानि ज्ञानावरणादिभावैः ॥ १९.६ ॥ सामान्यार्थ-जो सत्तामें बंधे हुए द्रव्यकर्म उदयके पहले दिना भोगे हुए रहते वे कर्म उदयमें आकर जब भोगे जाते हैं तब जैसे भाव होते हैं उनके अनुसार यह नीवं हर . समय ज्ञानावरणको आदि ले सात प्रकार काँको तथा आयुवंधके कालमें आठ प्रकार फर्मोको + GdaistoRRA २ . समयसार टीका। बांधता है । शब्दार्थ सहित विशेषार्थ-(णिरुवभोज्जा होदूण) उदय होने के पहले कर्म चिना भोगे हुए होते हैं वे कर्म अपने २ गुणस्थानके अनुमार उठ्यकालको प्राप्त होकर (जह उवभोजा हवंति) जिस तरह भोगने योग्य होते हैं (तह) उसी तरह (सत्तद्वविहा ज्ञानावरणादि भा।हिं) यह जीव अपने रागादि भावोंके अनुसार आयुबंधक कालमें ( प्रकार शेष कालमें ७ प्रकार ज्ञानोवरणीय आदि नवीन द्रव्यकोसे (बंधदि) बंधको प्राप्त होता है, केवल सत्तामें कमांक होनेसे यह जीव बंधता नहीं है। भावार्थ:-जब द्रव्यकम जिनको इस जीवने पहले बांधा था गुणस्थानोंके अनुसार उदयमें आते हैं तब इस जीवके जैसे रागादि भाव होते हैं -उन रागादि भावोंके निमित्तसे फिर भी कोको बांधता है। यदि तत्वज्ञानमें लीन रहे और रागादिरूप न परिणमें तो वे कर्म उठ्यमें आकर भी यही चले जायें नवीन बंधमें कारण न हों, अतएव जिस तरह बने रागडेप भावोंसे अपने आत्माको बचाना योग्य है:-।। १९६॥ इसी निराश्रवपतको फिर भी करते हैं:- '. . . गाथाः-एदेण कारणेण दु सम्मादिडी अवंधगो होदि। आलवभावाभावेण पचया बंधगा भणिदा॥ १५७ ॥ संस्कृतार्थ:-एतेन कारणेन तु सम्यग्दृष्टिरबंधको भवति । मालवभावाभावेन प्रत्यया बंधना भाणताः ॥ १९७ ॥ सामान्यार्थ-आश्रवरूपी भावोंके अभावमें केवल द्रव्यक्रम जो सत्तामें हैं वे नवीन बंधके कारण नहीं कहे गए हैं इस कारणसे सम्यग्दृष्टी कर्मोका वांधनेवाला नहीं होता है। शब्दार्थ सहित विशेषार्थ:-( आसवभावाभावे.) रागद्वेष मोह आदि . आश्रवको करनेवाले भावोंके विना ( पचया ) पूर्वमें बांधे हुए द्रव्यकर्म (ण बंधगा ) केवल मत्ता मात्रसे नवीन द्रव्यकर्मों के बांधनेवाले नहीं ( भणिदा ) कहे गए है ( एदेणकारणेणदु ) इसी कारणले ही ( सम्मादिट्ठी) सम्यग्दृष्टी तत्वज्ञानी ( अवंधगो) बंधसे रहित (होदि) होता है। यहां यह विस्तार है कि मिथ्यादृष्टि गुणस्थानकी अपेक्षा चौथे गुणस्थानमें सराग सम्यग्दष्टी आत्मा ४३ प्रकृतियोंका बंधक नहीं है केवल ७७ प्रतियोंको ही थोड़ी स्थिति व अनुभागको लिये बांधता है। यद्यपि ऐसा बंध होता है तथापि वह बंधन संसारका बढ़ानेवाला नहीं किन्तु मंसा- रकी स्थितिको छेदनवाला होता है। ऐसा ही सिद्धान्तमें कहा है " द्वादशांगावगमस्त तीव्रभक्तिरनिवृत्तिपरिणामः केवलिसमुद्भातश्चेति संसारस्थिति घातकारणनि भवनि , 'अर्थात्-१२ अंग श्रुतका ज्ञान, उसमें तीव्रभक्ति, विरक्तभाव तथा केवलि समुद्भात- यह चारों ही संसारकी मर्यादाक बात करने के कारण होते हैं । इमका विस्तार यह है कि द्वादमां- गश्श्रुतका ज्ञान सो व्यवहार नयसे ज्ञान है क्योंकि वाह्य पदार्थ उसका विषय है परंतु निश्चयसे .
समयसार टीका। deanLORE वीतराग स्वसंवेदन लक्षणको रखनेवाला ज्ञान ही सम्यग्ज्ञान है । भक्तिको ही सम्यक्त्व कहते हैं क्योंकि जहां रुचि होती है वहां भक्ति व प्रेम वास्तवसे होता है । व्यवहार नयसे संराग सम्यग्डप्टी जीवोंकी भक्ति पंच परमेष्ठीकी आराधनारूप है अर्थात् अर्हत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय व सर्व साधुकी पूजा व भक्ति व गुणानुवाद करन रूप है, निश्चयसे वीतराग सम्यदृष्टी जीवोंके शुद्धात्मतत्त्वकी भावनारूप निश्चय भक्ति है। निवृत्ति न करना सोअनिवृत्ति है अर्थात् शुद्धात्मिक स्वरूपसे न चलायमान होना उसीमें एकतासे परिणति रखनी सो अनिवृत्ति है। ऐसा अर्थ किये जानेपर द्वादशांगका ज्ञान तो निश्चय व व्यवहार ज्ञान-भया; और भक्ति निश्चय व व्यवहार सम्यत्तब हुआ, तथा अनिवृत्ति परिणाम सराग चारित्रके पीछे होनेवाला वीतराग चारित्र हुआ, इसतरह यह सम्यग्दर्शन, ज्ञान, चारित्र, भेद रत्नत्रय रूपसे या अभेद रत्नत्रयरूपसे संसारकी स्थितिके छेद करनेके कारण होते हैं। जिनके केवल ज्ञान नहीं हुआ अर्थात् छमस्थ हैं उनके लिये यह कारण हैं । परन्तु केवली भगवानोंके जिनकी आयु कम व नाम, गोत्र, वेदनीकर्म स्थितिमें अधिक हैं दंड, कपाट, प्रनर, लोकपृर्णरूप चार प्रकार केवलि समुद्धात संसारके छेदके कारण हैं ऐसा तात्पर्य है । भावार्थः यद्यपि गुणस्थानोंकी अपेक्षा १३ वें सयोग गुणस्थान पर्यंत कर्म बंध होता है परन्तु सम्यत्त्वकी अपेक्षा जिसके केवलमात्रं सम्यक्त्व होगया है उसके भी कर्म बंधपना नहीं है क्योंकि संसार छेदके कारण सम्यग्दर्शन, ज्ञान, चारित्र उसकी आत्मामें विद्यमान हैं। इससे थोड़ी स्थिति सहित जो कर्म बंध कुछ प्रकृतियोंका गुणस्थानके अनुसार होता भी है वह संसारको बढ़ानेवाला नहीं होता इसीसे समक्त्वीको अबंधक कहा हैं ।॥ १९७ ॥ इसतरह पूर्वमें बांधे हुए द्रव्य कर्म सत्तामें मौजूद हों भी, परंतु राग द्वेषादि भावा- श्रवोंके अभावमें वे बंधके कारण नहीं होते हैं । इस व्याख्यानकी मुख्यतासे चार गाथाएं 'पूर्ण हुई आगे कहते हैं कि ज्ञानी आत्माके कर्मबंधके कारण राग द्वेष मोह नहीं होते इसीसे ही ..उस ज्ञानीके नवीन कोका बंध नहीं होता:- गाथा:--रागो'दोसो मोहो य आसवा णत्थि सम्मदिहिस्स। तमा आसवभावेण विणा हेदू ण पञ्चया होति ॥ १९८ ॥ :- संस्कृतार्थ:--रागो द्वेषो मोहश्च आलवा न सन्ति सम्यग्दृष्टेः । तस्मदात्रवभावेन विना हेतवो न प्रत्यया भवति ॥ १९८ ।। सामान्यार्थः-सम्यग्दृष्टी जीवके कर्म बंधके कारण रागद्वेप मोहरूपी भावाश्रव नहीं होते इसीसे केवल पूर्वमें वांधे हुए. द्रव्य कर्म आश्रव भावके विना नवीन कर्म बंधके 'कारण नहीं होते हैं । शब्दार्थ सहित विशेषार्थ:---(सम्मदिहिस्स) सम्यग्दृष्टी जीवके ( रागो ForenARREARSNELONE समयसार टीका। दोसों मोहोय आसवा) राग, द्वेष, मोह आश्रयभाव (णत्थि) नहीं होते हैं। क्योंकि अन्यथा सम्यग्दर्शनकी उत्पत्ति नहीं हो सक्ती अर्थात जिसके राग-द्वेष मोह हैं उसके मिथ्या भाव है सम्यत्तव भाव नहीं है । इसीका विस्तार यह है कि अनंतानुबंधी सम्बन्धी क्रोध, मान, माया, लोभ और मिथ्यात्वके उदयसे पैदा होनेवाले जो राग, हेप, मोह हैं वे सम्बम्दृष्टीके नहीं होते हैं यह पक्ष है । इसका हेतु यह है कि केवलज्ञान आदि अनंत गुणोंका धारी जो परमात्मा है वही उपादेय है उसको उपादेय माननेवाले सम्यन्दृष्टीके वीतराग सर्वज्ञ भगवानके कहे हुए छः द्रव्य, पांच अस्तिकाय, सान तत्त्व, ९ पदार्थोकी रुचि होती है तथा तीन मृद्ता, आठ मद, ( दोप, व ६ अनायतन ऐसे २६ दोष नहीं होने, तथा इस माथाके अंनुसार ( लक्षण प्रकट होते हैं-" संवओ, णिव्वेआ, -णिंदा गल्हय, उबसमो, भत्ती बच्छदं अणुकम्पा, गुणटु सम्मत्त जुत्तम्स" अर्थात् धर्मसे प्रेम, संसार शरीर भोगोंसे वैराग्य, अपनी निन्दा, अपनी गर्दा, शांत भाव, जिनेन्द्रमें भक्ति, धर्मात्माओंसे वात्सल्य भाव तथा जीवदया यह आठ गुण सम्यग्दृष्टीके होते हैं । जब तक इतनी सामग्री नहीं होगी तब तक चौथा गुणस्थानवी नो सराग सम्यक्त्व है उसकी प्राप्ति नहीं हो सकी अर्थात् जिसके २५ दोप रहित व आठ लक्षण सहित सप्त तत्त्व रुचि व आत्म प्रतीति होती है उसीके ही अविरत । सम्यग्दर्शन संभव है। इसी तरह जो पंचमगुणस्थान वर्ती मग़गमम्यग्दृष्टी है उसके अनंतानुबंधी और अप्रत्याः ख्यानावरण सम्बन्धी क्रोध, मान, माया, लोभ कपायोंके उदयसे उत्पन्न जो रागद्वैप मोह हैं वे नहीं होते यह पक्ष है उसका हेतु यह है कि उस सम्यग्दृष्टीके यह श्रद्धान है कि विकार रहित परमानंदमई एक सुखं लक्षणको रखनेवाला परमात्मा ही उपादेय-गृहण करने, मनन करने, ध्यान करने व आराधने योग्य है तथा उसे भी द्रव्य ५ अस्तिकाय ७ तत्व ९ पदार्थोकी रुचि होती है व ३ मृढ़ताको आदि लेकर २५ दोष नहीं होने तथा उसीके अनुकूल उसके यह लक्षण भी प्रकट होने हैं कि उसमें प्रशम अर्थात् शांति, संवेग अर्थात धर्मसे प्रेम व संसारसे वैराग्य, अनुकंपा अर्थात् जीवदया तथा सत्यार्थदेव व धर्म आदिमें आस्तिक्यता अर्थात् नास्तिकताका अभाव हो, जब यह लक्षण होने हैं तब ही उसके पंचन गुणस्थानके योग्य देशचारित्रके साथ अवश्य होनेवाला अविनामावी सराग सम्यक्त्व होमक्ता है अन्यथा, नहीं। अथवा छठे गुणस्थानवर्ती प्रमत्त मुनिके अनंनानुबंधी, अप्रत्याग्न्यानावरण, प्रत्याख्याना वरण क्रोध, मान, माया, लोभके उदयसे उत्पन्न. राग, हंप, मोह नहीं होते हैं क्योंकि उस मुनिके यह रुचि है कि चिदानंदमई एक स्वभाव रूप शुद्धात्मा ही उपादेय, मनन करने योग्य, ध्यान करने योग्य व आराधने योग्य है । तथा उस मुनिके छः द्रव्य, पांच अन्तिकाय, ७ तत्व, ९ पदार्थोकी रुचि होती है व उसके २५ दोप समयसार टीका। BALRAMANAGERAVASANSARAR १६८ नहीं होते और उसीके अनुकूल प्रशम, संवेग, अनुकंपा, व देवधर्म आदिके, विषय आस्तिक्यता यह ४ लक्षण प्रकट होते हैं । जबतक यह लक्षण नहीं होते तबतक उसके छठे गुणस्थान सम्बन्धी सराग चारित्रके साथ अविनाभात्री अवश्य होनेवालासराग सम्यक्त्व नहीं हो सक्ता । अथवा अप्रमत्त मुनिके अनंतानुवंधी, अप्रत्याख्यान, प्रत्याख्यान, व संज्वलन सम्बन्धी क्रोध, मान, माया, लोभके तीव्र उदयसे उत्पन्न तथा प्रमादसे होनेवाले रागद्वेष मोह नहीं होते यह पक्ष है इसका हेतु यह है कि उसके यह श्रद्वान है कि शुद्धबुद्ध परमात्मा उपादेय है इसीसे उसके योग्य अपनी ही शुद्धात्माकी समाधिसे उत्पन्न स्वाभाविक आनंदमई एक लक्षणको रखनेवाली सुखकी अनुभूति होती है । उसी स्वरूप अप्रमत्वादि गुण- स्थानों में वीतराग चारित्रके साथ अविनाभावी बीतराग सम्यक्त्व होता है। ऐमा ही कहा है श्लोक । आद्यः सम्यक्त्व चारित्रे, द्वितीयानंत्यणुव्रतं, तृतीयाः संयमं तुर्या यथाख्यातं धादयः । अर्थात्-आदिके अनुतानुबंधी क्रोधादिक कपाय इस आत्माके सम्यग्दर्शन और चारित्र गुणको घातक हैं। अप्रत्याख्यानावरणीय श्रावकके अणुव्रतोंको, प्रत्याख्यानावरणीय मुनिक महाव्रत रूप संयमको, तथा संज्वलन यथाख्यातचारित्रको घातते हैं । ज्यों २ गुणस्थान चढ़ता जाता त्यों २ रागद्वेष मोह घटते जाते हैं । (तझा) इसलिये (आसव भावेण विणा) रागादिरूप भावा- श्रवोंके विना (पच्चया) केवल पूर्वबद्ध द्रव्य कर्म अस्तित्व स्वरूप रहें या उदय रूप रहें (हेदु) कमबंधके कारण (णहोंति) नहीं होते हैं। भावार्थ-रागद्वेष मोह ही बंधके कारण हैं तिस पर भी जो अनंतानुवन्धी हैं वे ही अति प्रबल हैं, उन्हीके कारणंसे यह जीव भव २ में भ्रमता हुआ कभी भी अंत नहीं पाता । जब यह चले जाने हैं अप्रत्याख्यानादि · मोहकर्म अति निर्वल अवस्थामें रहके कुछ भी बिगाड़ नहीं कर सकने इसी अपेक्षासे ही चतुर्थ गुण- स्थानवर्ती सम्यग्दृष्टीको भी निराश्रव कहा है ॥१९८॥ आगे पंधके कारण वताते है:- गाथाः-हेदू चदुवियप्पो अढवियप्पस्स कारणं होदि । तेति पिय रागादी तेसिमभावेण वज्झति ॥ १९९ ॥. संस्कृतार्थ:-हेतुश्चतुर्विकल्पः, अष्टविकलस्य कारणं भवति । नेपामपि च -रागादयस्तेशमभावे न बध्यते ।। १९९ ॥ सामान्यार्थ:-मिथ्यात्त्वादि चार कारण आठ प्रकार कर्मबंधके कारण होते हैं-उन . 'मिथ्यात्त्वादि कारणोंके कारण रागादि भाव हैं उनके अभाव होने पर जीव कोसे नहीं बंधते हैं। शब्दार्थ सहित विशेषार्थ-(चदु वियप्पो) चार प्रकार ( हेदू ) कारण अर्थात् मिथ्याद- शन, अविरति, कषाय और योग ( अट्ठवियप्पस्स ) ज्ञानावरणादिरूप - प्रकार नवीन द्रव्य म AIMURERAIRureshmuwire समयसार टीका। ARPATRIKARRRRPr १६९ काँके ( कारणं ) बंबके कारण (होदि ) होते हैं । ( तेसिपिय ) तथा उन मिथ्यादर्शनं आदि पूर्व वह क्रम के उदयने भी ( रागादि ) जीव सम्बन्धी रागढ़पादि भाव कारण होते हैं क्योंकि ( तेसिम भावे ) इन जीव सम्बन्धी रागादि भावोंके अभाव होने पर केवल द्रव्य कर्मोंके उदयमें आए हुएहोने पर भी वीतराग परम समाधिकी भावनामें परणमनकरनेवाले अभेद रत्नत्रय लक्षणको रखनेवाले भेद ज्ञानके होते हुए ( ण वझंति ) जीव नवीन द्रव्यकर्मोसे नहीं बंधते हैं । इससे यह सिद्ध हुआ कि नवीन द्रव्यकर्मोके आश्रवके कारण उदयमें आए. हुए पूर्व बद्ध द्रव्यकर्म हैं उन उदयमें आए हुए द्रव्यकर्मोंके भी कारण जीव सम्बन्धी रागादि भाव हैं । इसतरह कारणके कारणका व्याख्यान जानना योग्य है । भावार्थ--जर पूर्व बन्ह द्रव्य कर्म उदयमें आयें और ज्ञानी जीव भेदज्ञानमें रत रहे तो वे यों ही झड़ जायेंगे, नवीन द्रव्य कर्मोके वंधमें कारण नहीं होंगे । परन्तु जो उम्के भेदनान न होगा और रागादि भाव होंगे तो जीव बंधको प्राप्त करेंगे । पूर्व वद्ध द्रव्यकर्म उदयकालमै जीवके रागादि भावोंके होनेमें निमित कारण हैं तथा रागादि भाव नवीन द्रव्यकर्मोंके बंधमें निमित्त कारण हैं ऐसा जानना ॥ १९९ ॥ आगे जो पहले कहा गया है कि रागद्वेपादि विकल्पोंकी उपाधिसे रहित परम चैतन्यके चमत्कार- मई लक्षणको रखनेवाले अपने परमात्मपदार्थकी भावनासे रहित जो आत्मासे बाहर दृष्टि रखनेवाले जीव है उनके पूर्व में बांधे हुए द्रव्यम नवीन क्रमाको बांधते है इसी ही अर्थको दृष्टान्त व ढाष्टन्तोसे मजबूत करते है । गाथा:-जह पुरिमेणाहारो गहिदो परिणदि सो अणेयविहं । मंसवसासहिरादी भावे उदरग्गिसंजुत्तो ॥ २०० ।। तह णाणिस्स दु पुवं जे बडा पश वरियप्पं । वज्झंते कम्मं ते णयपरिहाणा दु ते जीवा ॥ २०१॥ संस्कृतार्थ-- --यथा पुरंपणाहारा गृहीतः पारणमांत साऽनेकविधं । मांमवमानांधगदान् भावान्, उदराग्नसंयुक्तः ॥ २००, तथा ज्ञानिनन्तु पूर्व बडा ये प्रत्यया वहुविकलं । वनंति कर्म ते नयरितीनान्तु ते जीवाः ॥ २०१ ॥ सामान्यार्थ---जैसे पुरुपमे लिया हुआ आहार अनेक प्रकार मांस, चरबी, रुधिर आदि अवस्थाको उदरानिके संयोगसे परिणमन करता है तमे अज्ञानी जीवके जो पूर्वमें बांधे हुए कर्म हैं वे नानाप्रकार नवीन द्रव्य कमाको गांधते हैं। जो जीव ग काँको बांधते हैं शुद्ध नयमे हीन हैं। मगाई नदिन यापन:-(जह) जस (पुरिमण) पुरुपके द्वारा (ग- हिंदो) लिया हुआ (आहारो) भोजन (सो) मो (उदरग्गिमंजुत्तो) उदरकी अग्निका प्रयोग ૨૨ TRUIRERNIMAR SRUARYAHULHe नयसे भृष्ट हैं १७० समयसार टीका। पाफर (अणेयविहं) अनेक प्रकार (मंसवसां रुहिरादी भावे) मांस, चरबी, रुधिर आदि अव-. स्थाओंमें (परिणमदि) परिणमन करता है (तह) तैसे (गाणिस्स) चेतन्य लक्षण जीवके अज्ञान अवस्थामें न कि विवेकी भेद विज्ञानीके (जे पच्चया दु पुव्वं बद्धा) जो मिथ्यादर्शन आदि द्रव्यकर्म पूर्व कालमें बंधे हुए हैं-ति)वे द्रव्यकर्म उदयमें आकर जीव सम्बन्धी रागादि परि- णामरूप उदराग्निका संबंध पाकर (वहु वियप्पं कम वज्झते) नाना प्रकार ज्ञानावरणादि द्रव्य कर्मोको बांधते हैं । जिन जीवोंके ऐसे कर्म बंधते हैं (ते जीवादु) वे जीव (णय परिहीणा) परम समाधि लक्षणको रखनेवाले भेदज्ञानरूप शुद्ध च्युत अथवा दूसरा व्याख्यान यह है कि वे द्रव्यकर्म अशुद्ध निश्चय नयकी अपेक्षा इस जीवस भिन्न नहीं होते हैं (नच परिहीणा भवंति)। भावार्थ-पूर्वमें बंधे हुए द्रव्यकर्म उदयमें जब आते हैं उस समय यदि यह जीव रागी द्वेषी होता है तो नवीन कर्मों को बांधता है अन्यथा नहीं । तात्पर्य यह है कि अपना शुद्धात्मा ध्यान करने योग्य है इस कारण विवेकी ज्ञानी पुरुषों के द्वारा सर्व कर्मोके नाश करनेमें समर्थ जो शुद्धनय है उसे नहीं त्यागना चाहिये । शुद्ध नयका विषय शुद्धात्मा है अतएव उसमें उपयुक्त जीव कोको न बांधकर पूर्ववह कोका नाश करता है ॥२००-२०१॥ इसतरह कारणके व्याख्यानकी मुख्यतासे ४ गाथाएं पूर्ण हुईं। इस समयसारकी शुद्धात्मानुभूति लक्षणको रखनेवाली तात्पर्य वृति नामकी व्याख्या १७ गाथाओंके द्वारा पांच स्थलोंसे आश्रवका विपक्षी संवर नामका छठा अधिकार समाप्त हुआ। इस तरह रंगभूमिमेंसे अंगारको छोड़े हुए मनुप्यकी तरह शुद्ध जीव स्वरूप होकर संवर चला गया- - , . सातका महा अधिकार (७) निर्जरातत्व अब वीतराग निर्विकल्प समाधि रूप शुद्धोपयोग लक्षणको रखनेवाली संवरपूर्वक निर्जरा प्रवेश करती है । 'उपभोन मिंदिएहिय ' इत्यादि गाथाको आदि लेकर. दंडकोंको छोड़ पाठ-क्रमसे पचास गाथा पर्यंत छः स्थलोंसे निर्जराका व्याख्यान करते हैं। उनमेंसे प्रथम द्रव्य निर्जरा, भावनिर्जरा, ज्ञानशक्ति, वैराग्यशक्ति इन चारका क्रमसे वर्णन है इस तरह पीठिका रूपसे प्रथम स्थलमें चार गाथाएं हैं। उसके बाद ज्ञान वैराग्य शक्तिका सामान्य व्याख्यान करनेके लिये “सेवंतो वि ण सेवदि" इत्यादि दूसरे स्थलमें पांच गाथाएँ हैं। उसके बाद उन ही ज्ञान वैराग्य शक्तियोंका विशेष वर्णन करनेके लिये : परमाणु मित्तयंपि" इत्यादि तीसरे स्थलमें सूत्र १० हैं।
समयसार टीका। १७१ उसके बाद मति, श्रुत, अवधि, मनःपर्यय, केवलज्ञानमई अभेदरूप परमार्थव- रूप, मुक्तका कारणभूत जो कोई परमात्माका पद है सो जिस स्वसंवेदन ज्ञान गुणके द्वारा प्राप्त होता है उसीका सामान्य व्याख्यान करनेके लिये “णाण गुणेहिं विहीणा " इत्यादि चौथे स्थलमें सूत्र ( हैं। इसके बाद उसीही ज्ञान गुणका विशेष वर्णनके लिये "गाणा गग- प्पनहो इत्यादि १४ गाथाएं पांचवे स्थलमें हैं। उसके बाद शुद्ध नयका आश्रय लेकर चि. दानंदमई एक स्वभाव रूप शुद्ध आत्माकी भावनाका आश्रय करनेवाले जीवोंके निश्चय निः- शंकितादि आठ गुण होते हैं, उनका कथन ९ मूत्रोंसे छठे स्थलमें करते हैं । इसतरह छः अंतर अधिकारोंसे निजग अधिकारमें ममुद्राय पातनिका पूर्ण हुई । आगे द्रव्य निर्जराका स्वरूप कहते हैं:- गाथा:-उवभोजमिंदियेहि व्वाणमचेदणाणमिदराणं । जं कुणदि सम्मदिही तं सव्वं णिजरणिमित्तं ।। २०२।। संस्कृतार्थः-उपभोगमिंद्रियः द्रव्याणामचेतनानामितरेषां । यत्करोति सम्यग्दृष्टिः, तत्सर्व निर्जरानिमित्तं ।। २०२ ।। सामान्यार्थ-सम्यग्दृष्टि आत्मा जो अपनी पांचों इन्द्रियोंक द्वारा अचेतन और चेतन द्रव्योंका उपभोग करता है सो सर्व कर्मोकी निर्जराके निमित्त होता है । शब्दार्थ सहित विशेषार्थः-(सम्मदिट्ठी) सम्यग्दृष्टी में विज्ञानी आत्मा (इंदियहिय)अपनी पांचों इन्द्रियों के हाग (अचेदणाण) अचेतन (इराण) और चेतन (ढव्वाणम्) द्रव्योंका (ज) जो (उवभोजम्) उपभोग (कुणदि) करता है (तसव्व) वह सब (णिज्जर णिमित्त) कर्मोकी निजराके निमित्त होता है। स्त्री पुत्रादि चेतन व धन धान्यादि अचेतन पदार्थोंका उपभोग सम्यग्दृष्टि व मिथ्यादृष्टि दोनों करते हैं। मिथ्यात्वी जीवके वेही पदार्थ राग द्वेष मोहके रहनेके कारणसे बंधके कारण हो जाते हैं तो भी सम्यक्त्ती जीवके रागद्वेष मोहके न होने पर वे सर्व ही वस्तु पूर्वबद्ध कर्मोंकी निजराके निमित्त होती है। भावार्थ-मम्यक्त्वी अंतरंगमें रागादि भावोंके बिना जो भोग करता है इससे उसके बंध नहीं होता परन्तु मिथ्यात्वीके अंतरंगमें रागादि भावोंकी तीव्रता रहती है इससे महान् काँका बंध होता है । यहां शिप्यने प्रश्न किया कि राग द्वप मोह आदि विभाव भावांका अभाव होनेपर जो परिणाम होता है वह निजराका कारण कहा गया है परंतु सम्यग्दृष्टीक तो रागादिक भाव होते हैं इससे उसके कर्मकी निर्जरा कैसे हो सक्ती है ? इसका समाधान आचार्य करते हैं कि इस ग्रंथमें मुख्यतासे वीतराग सम्यग्दृष्टीका ग्रहण है और जो चौथा गुणस्थान बग्नी मगग सम्यग्दृष्टि है उसका गौणतासे ग्रहण है इससे इस प्रश्नका समाधान पहले ही किया गया है अर्थात् मिथ्यादर्शनके जानेसे सम्यग्दृष्टीके अनंतानुबंधी क्रोध, मान, माया, लोभ व मिथ्यात्त्व EARSaareartmech समयसार टीका। EKANARDANAKYAKAIResh दुःख उत्पन्न उदयसे होनेवाले व श्रावकके अप्रत्याख्यानावरण सम्बन्धी व्रोक्ष. मान. माया, लोमके भी उदयसे होनेवाले रागद्वेप मोह नहीं होते हैं इत्यादि सम्यग्दृष्टी जीवके अपने । गुणस्थानों के अनुसार संबर पूर्वक निर्जरा होती है। मिथ्यादृष्टी जीबवे. गजलानकी तरह बंधपूर्वक निर्जरा होती है। भावार्थ-जैसे हाथी एक ओरसे नहाता है दूसरी ओरसे धृला अपने ऊपर डाल लेता है इसी- तरह मिथ्यादृष्टी जीवके प्राचीन कर्मोकी निजरा होते हुए रागडेप माहक कारणसे नवीन -कर्मोका बंध होता है। इसकारणसे मिथ्यादृष्टीकी अपेक्षाने सम्यग्दृष्टी बंधा करनेवाला नहीं है। इसतरह द्रव्य निर्जराका व्याख्यान करने हुए गाथा पूर्ण हुई ॥ २०२ ।। आगे भाव निर्जराको कहते हैं- गाथा:-दव्वे उपभुजते णियमा जायदि सुहं च दुग्वं च । तं सुहदुःखमुदिण्णं वेददि अह णिजरं जादि ॥ २० ॥ संस्कृतार्थ:--द्रव्ये उपभुज्यमाने नियमाजायते सुखं च दुःवं च । तं सुखदुःखमुदाणं वेदयते अथ निजगं याति ॥ २०३ ।। सामान्यार्थ-द्रव्यकर्मोको उदयमें आकर भागते हुए नियम मुख और होता है उस सुख वा दुःखको उदीर्णारूप होता हुआ सम्यग्दृष्टी भोगता है और फिर उन द्रव्यकों की निर्जरा हो जाती है। शब्दार्थ महित विशेपार्थ-(दव्य) उदयमें आए हुए द्रव्य- कर्म (उवभुजंते) इस जीवके द्वारा जब भोगे जाते हैं तब (णियमा) नियमसे (सुहंच दुपखं च) साता और असाता वेदनीय कर्मके उदयके वशसे सुख और दुःख अपने वस्तुके स्वभावसे ही उत्पन्न होते हैं। (तं सुह दुःख) रागादि रहित स्वसंवेदनकी भावनासे उत्पन्न जो पारमार्थिक व अध्यात्मिक सुख है उससे भिन्न जो साता असाताके उदयसे होनेवाला सुख दुःख है उसको (उदिण्ण) उदीर्णारूप होता हुआ (वेददि) सम्यग्दृष्टी जीव उनमें रागद्वेष न करता हुआ हेयबुद्धिसे अर्थात् त्याग रूप बुद्धि करके भोगता है उनमें तन्मई होकर नहीं भोगता है । मैं सुखी हूं या मैं दूःखी हूँ ऐसी प्रतीतिसे नहीं अनुभव करता है । (अह) अथ अर्थात् फिर (णिजरं जादि) उन ककी निर्जरा हो जाती है अर्थात् आत्मामें तल्ली- नरूप भावके द्वारा वे उदयमें प्राप्त द्रव्य कर्म निर्जराके निमित्त हो जाते हैं। मिथ्याढष्टिके वे ही उदय प्राप्ते द्रव्य कर्म बंधके कारण होते हैं क्योंकि वह उनको उपादेय बुद्धिसे इस प्रतीतिसे भोगता है कि मैं सुखी हूं या दुःखी हूं-इसका तात्पर्य यह है जैसे कोई भी चोर यद्यपि अपना मरण नहीं चाहता है तो भी कोतवालसे पकड़ा हुआ मरणको अनुभव करता है तैसे सम्यग्दृष्टी जीव यद्यपि आत्मननित मुखको उपादेय जानता है और पंचेन्द्रियों के विषयोंसे उत्पन्न सुखको त्यागने योग्य समझता है तथापि चारित्र मोहके उदय- रूपी कोतवालसे पकड़ा हुआ उस सुखको अनुभव करता है इस कारणसे वह कर्म निनराके พระเหย सम्यवारका। निमित्त होता है । भार-मिथ्यावीक अंतरंगनें सांसारिक सुख उपादेय बुद्धिरूपी रुचि है किन्तु सम्यग्दृष्टीके हेय बुद्धिरूपी लचि है। सम्यक्तीको आत्मिक मुख ही रुचिकारी भासता है। अतएव चारित्रमोहकी बरनारीसे मडके बंगकी तरह जो साता व अमाताके उद्यम सुख व दुःख होता है उसमें सन्यग्दृष्टी तन्मयी न होकर रागीढेपी नहीं होता है इससे नवीन कर्मोका बंध नहीं करता है इसमें उसके पूर्व कर्मोकी निर्जरा हो जाती है। अंतरंग आत्मसुखकी रुचि तथा सांसारिक सुखकी अरुचि ही भाव निर्जरा है इसीके प्रतापसे कम झड़ जाते हैं, बंध नहीं करते । इस तरह भाव निर्जराका व्याख्यान पूर्ण हुआ ॥२०३|| आगे वीतराग स्वसंवेदन ज्ञानकी सामन्यं दिखलात है- गाथाः-जह विशनुवनंता विजा पुरिसा ण मरणमुक्यंति । पोग्गलकामसुदा तह झुंजदि णेव वज्झदेणाणी ॥२०४॥ संस्कृतार्थः-यथा विषमुपभु नानाः विद्यापुरता न मरणमुपयांति । पुदलकरण उदयं तथा भुक्ने नंद वचते ज्ञानी ॥ २०४ ॥ सामान्यार्थ:-जसे गारुड़ी विद्याके ज्ञाता पुरुष विपको खाते हुए भी मरणको नहीं प्राप्त होते हैं तैसे तत्वज्ञानी पुद्गल कमाके उदयको भोगते हुए भी कर्मोंसे बंधको नहीं प्राप्त होते हैं । शब्दार्थ नहित विशेषार्थः- (जह ) जैसे ( विजा पुरिसा ) गाड़ी विद्याकं ज्ञाता पुरुष (विसमुव भुजंता ) विषको भोगते हुए ( मरणम् ) अमोघ मंत्रकी सामयंसे मरणको (ण) नहीं (स्वयंति ) प्रांत होते हैं ( तह ) तैसे (णाणी) परम तत्त्वज्ञानी (पोग्गल कम्मस्सुदयं) शुभ व अशुभ पुगल कर्मोके उदयको अर्थात् फलको (भुजंदि) भोगता है तथापि (णेव वज्झदे ) विकल्प रहित समाधि लक्षणवाले भेदज्ञानरूप अमोघ मंत्रक बल के प्रभावसे कर्मोके द्वारा बंधको नहीं प्राप्त होता है । भावार्थ-सम्यग्दृष्टी तत्त्वज्ञानी पुरुषके अंतरंगमें इस प्रकारका भेदविज्ञान रहता है जिससे उसका हृदय वैराग्यसे भरा रहता है । ऐसी हालतमें जो शुभ व अशुभ कर्म उदयमें आकर रस देते हैं उनको साम्य भावसे भोगता है । अतएव नवीन कर्मोको नहीं बांधता है। यह ज्ञानशक्तिकी ही महिमा है ऐसा व्यान्यान समाप्त हुआ ॥ २० ॥ आगे संसार, शरीर व भोगांके विपयन जो पराग्यकी सामर्थ्य है इसको दिलाते हैं:- गाथा:-जह मनं पिवमाणो अरदिभावेण मन्नदे पुरिसो। दबुद्धभोगे अरदा णाणीवि झदि तहेव ॥ २० ॥ संस्कृतार्थः-पया मद्य विवन् अरतिभावेन न मानीत पुनरः । द्रव्योपभोगे अरतो शान्यपि - अध्यते तव ॥ २०५ ॥ सामान्यार्थ-जैसे कोई पुरुष अरतिभायने मद्यको पीता हुआ मी नशेको नहीं प्राप्त समयसार टीका। SHRARASHNORAKAR २७४ होता है तैसे ही भेद विज्ञानी अरुचि भावसे द्रव्यकर्मोको भोगते हा भी कर्मोसे बंधको नहीं प्राप्त होता है। शब्दार्थ सहित विशेषार्थः-(जह) जसे (पुरिसो) कोई पुरुप अपने रोगके इलाज करनेके लिये (मजं) किसी औषधिमें पड़ी हुई मादक द्रव्यको (पिवमाणो) पीता हुआ भी (अरदि भावे) रति व प्रीतिका अभाव होनेपर (ण मजदे) मादकपनेको नहीं प्राप्त होता है (तहेव) तसे ही (णाणी) परमात्मतत्वका ज्ञाता पुरुष (दबुवभोगे) द्रव्यकर्मोके उदय रसको भोगता हुआ (वि) भी (अरदो) जितने अंशसे विकार रहित स्वसंवेदन ज्ञानसे शून्य वहि- रात्म जीवकी अपेक्षासे रागभावको नहीं करता है उतने अंशसे (णवझदि) कर्मोसे नहीं बंधता है । जव हर्पविषाद आदि रूप समस्त विकल्पजालोंसे रहित परम योग लक्षणको रखनेवाले भेदज्ञानके वलसे सर्वथा वीतराग होता है तव सर्वथा काँसे नहीं बंधता है। भावार्थ-अंतरंगमें जैसे अरुचि होनेपर किंचित् मादक वस्तु पीनेवालेको नशेमें गाफिल नहीं करती उसी तरह भेद विज्ञानको रहते हुए कर्मोको भोगते हुए भी ज्ञानी जीव कर्माको नहीं वांधता है । यह ज्ञानी जीवकी वैराग्य शक्तिकी महिमा है । इसतरह यह व्याख्यान समाप्त हुआ। २०५ ॥ इसतरह यथाक्रमसे द्रव्यकर्मकी निर्जरा व भावनिर्जरा तथा ज्ञानशक्ति और वैराग्य शक्तिको कहते हुए निर्जरा अधिकारमें तात्पर्य व्याख्यानकी मुख्यतामे ४ गाथाएं पूर्ण हुई। आगे उस ही वैराग्य शक्तिके स्वरूपको विशेषपने कहते है:- गाथाः-सेवंतोविण सेवदि असेवमाणोवि सेवगो कोवि । पगरणचेट्टा कस्सवि णयपायरणोत्ति सी होदि ॥२०६॥ संस्कृतार्थ:-सेवमानोऽपि न सेवते, असेवमानोऽपि सेवकः कश्चित् । प्रकरणचेष्टा कस्यापि न च प्राकर्णिक इति सा भवति ॥ २०६ ।। सामन्यार्थ:--कोई भोगोंको सेवता हुआ भी नहीं सेवन करता है दूसरा कोई नहीं सेवन करता हुआ भी सेवक होता है, किसीके तो विवाहादि प्रकरणकी चेष्टा है परन्तु उस प्रकरणमें रागी नहीं है दूसरा जो उस प्रकरणका स्वामी है वह उसमें रागी है। शब्दार्थ सहित विशेषार्थ-(सेतो वि) विकार रहित स्वसंवेदन ज्ञानी जीव अपने २ गुणस्थानके योग्य भोजन पानादि पंचेन्द्रियोंके भोगोंको भोगता हुआ भी रण सेवदि) नहीं सेवनेवाला रहता है क्योंकि उसके अंतरंगसे रुचि नहीं है (कोवि असेवमाणो वि) दूसरा कोई अज्ञानी जीव अपने अंत- रंगमें पंचेन्द्रिय सम्बन्धी भोगोंका राग रखता हुआ भोगोंको न पाकर नहीं सेवन करता हुआ भी (सेवगो) उनका सेवनेवाला हो जाता है। (कस्सवि) जैसे किसीके (पगरणचेट्ठा) अपने घरसे परघरमें आकर जहां विवाहका प्रकरण रचा हुआ है उस प्रकरणमें आप ही बिना अंत- ।
ARRRRRRRRemocter22 समयसार टीका। १७५ रंग प्रेमके भी लग जाता है तथापि (णय पायरणोत्ति) विवाहादि प्रकरणोंका स्वामी न होनेक कारणसे वह उस प्रकरणका अधिकारी नहीं है (सो भवति दूसरा कोई प्रकरणका स्वामी विवा- हादि करनेका अधिकारी नृत्य, गीत आदि विवाहके प्रकरण सम्बन्धी व्यापारोंको नहीं करता हुआ भी अंतरंगमें उसकामके साथ राग होनेसे उस सर्व गीतादि प्रकरणका स्वामी होता है इसी तरह परमतत्वज्ञानी भोगोंको सेवते हुए भी असेवक है परन्तु अज्ञानी भोगोंको न मेवते हुए भी सेवक होते हैं। भावार्थः-राग रहिततासे की हुई क्रिया अबंधक व गगका मदभाव क्रियाके विना भी बंधक है ।। २०६॥ भागे कहते हैं कि सम्यग्दृष्टि अपने और परके स्वरूपको विशेष पन जानता है:- गाथा:-पुग्गलकम्म कोहो तस्स विवागोदओ इवदि एसी। ण हु एस मज्झभावो जाणगभावो दु अहमिको ॥२०७॥ संस्कृतार्थः-पुद्गलकर्म क्रोधस्तस्य विषाकोदयो भवति एपः । नत्वेष मम भावः ज्ञायकमावः खल्वहमकः ॥ २२७ ।। सामान्यार्थ---पुद्गल कर्मरूप द्रव्य क्रोध है इसीका फलरूप उदय सो ही भाव क्रोध है- यह मेरा भाव नहीं है । मैं तो निश्चयसे एक ज्ञाता दृष्टा भावरूप हूँ | शब्दार्थ सहित- विशपार्थ:-( पुग्गल कम ) पुद्गल कमरूप ( कोहो ) जो कोई द्रव्य क्रोध है और जो इस जीवमें पहलेसे ही बंधा हुआ मौजूद है (तस्स विवागोदओ) उसीका विशेष पक करके जो फलरूप उदय होता है सो ही (एमो हवदि) यह शांत स्वरूप आत्म तत्त्वसे भिन्न क्षमाका अभावरूप भाव क्रोध है । (एमो) यह भाव क्रोध ( मझभावो) मेरा निजस्वाभाविक भाव (ण) नहीं है, क्योंकि निश्चयसे (अहम् दु) मैं तो (इको) एक (जाणग भावो ) टंकोत्कीर्ण परमानंदमई ज्ञाता दृष्टा स्वभावका धारी है। पुद्गल कर्मरूपी द्रव्य क्रोध है उसीके उदयसे उत्पन्न जो क्षमाका अभावरूप भाव सो भाव क्रोध है यह व्याख्यान पहले भी किया गया है अर्थात् पुगलपिंड सो तो द्रव्य कम है और उसमें जो शक्ति है सो भाव कम है इत्यादि भावार्थ:-भाव कर्म भी वास्तवमें पुद्गलमई द्रव्य कमरूप शक्तिको कहते हैं परन्तु इम शक्तिका प्रकटपना जीव सम्बन्धसे होता है इससे इसको जीवका विभाव भाव भी कहते हैं क्योंकि द्रव्य क्रोधके उदयके बिना भाव क्रोध जीवमें हो नहीं सक्ता इससे यह शुद्ध जीवके खभावसे भिन्न है । मैं इससे भिन्न ज्ञाता इप्टा स्वभावका धारी एक चैतन्य खरूप आत्मा हूं ऐसा अनुभव करना कार्यकारी है। इस ही प्रकार क्रोधपदको बदलके मान, माया, लोभ, राग, द्वेप. मोह. कम, नोकम, मन, वचन, काय, श्रोत्र, चक्षु, घ्राण, रसना, म्पर्शन इस तरह १६ पद जोड़के व्याख्यान करना योग्य है जैसे मान पुद्गलमय है मेरा भाव नहीं है, मैं तो एक ज्ञायक म्वभावरूप - SenaramALSAVE • • ADALA 12 समयसार टीका। हूँ। इत्यादि-इस ही तरह विचार कर असंख्यात लोक प्रमाण विभाव परिणामोंके स्थान वर्जन करने योग्य हैं ॥ २०७ ॥ आगे शिष्य प्रश्न करता है कि यह विभाव भाव तुम्हार स्वरूप क्यों नहीं है इसका उत्तर भेद भावना रूपसे करते है:- गाथा:-कहं एस तुझ ण हदि विविहीं कन्नरोदयफलविवागो। परदव्याणुवओगो णदु देहो हवदि अण्णाजी ॥ २०८ ॥ संस्कृतार्थ:---कथमेष तव न नवति विविधः कर्मोदयफलविपाकः । परद्रव्याणामुपयोगो न तु देहो भवति अशानी ॥ २०८ ।। ) सामान्यार्थ-किस तरह यह विविध काँका उदय रूप फलका विपाक तुम्हारा स्व- रूप नहीं होसक्ता है इस प्रश्नका उत्तर करते हैं कि यह पर द्रव्योंका उदय है तथा यह देह भी मेरा स्वरूप नहीं है क्योंकि यह अज्ञानी है । शब्दार्थ महित विशेषार्थ:-(कह) किस- तरह ( एस ) यह (विविहो कम्मोदय फल विवागो ) नाना प्रकार कर्मोंके उदयरूप फलका विपाक (तुज्झ ण हवदि ) तेरा स्वरूप नहीं होता है ऐसा किसीने पूछा उसका उत्तर आ- चार्य कहते हैं कि ( परदव्वाणु वओगो ) विकार रहित परमानन्दमई एक लक्षणके धारी शुद्धात्म द्रव्यसे जुदे जो पर द्रव्यरूप द्रव्यकर्म इस संस्गरी जीवमें बंधे हुए मौजूद हैं उन्हींका उपयोग अर्थात् उदय है इससे यह विभाव भाव औपाधिक भाव हैं आत्माके निज भाव नहीं हैं जैसे स्फटिकमणि पाषाणमें पर वस्तुकी उपाधिसे नाना प्रकार रंग आदि दीखते हैं वैसे यह परभाव हैं । केवलमात्र भाव क्रोध मान, माया, लोभादिक भाव ही मेरे इस शुद्धात्माका निश्चयसे स्वरूप नहीं हैं (णदु देहो हवदि ) किन्तु यह स्थूल शरीर भी मेरे शुद्धात्माका स्वरूप नहीं है यह बात स्फुट है क्योंकि यह देह ( अण्णाणी ) अज्ञानी जड़ स्वरूप है और मैं निश्चयसे अनंत ज्ञानादि गुण स्वरूपका धारी हूं। भावार्थ:-ज्ञानी जीवको शुद्धात्मानुभवनकी प्राप्तिके लिये देहमई नोकर्म, ज्ञानावरणादि द्रव्यकर्म और रागादि भाव कर्मसे ममत्त्व हटा कर अपने निश्चय स्वरूपमें तन्मय रहना योग्य है ॥ २०८ ॥ आगे कहते है कि सम्यग्दष्टी अपने खास स्वभावको जानता हुआ तथा रागद्वेपादि भावोंको छोड़ता हुआ नियमसे ज्ञान और वैराग्यसे भरा हुआ होता है:- गाथा:-एवं सम्म इही अप्पाणं गुणादि सामानहाएं। उदयं कम्मविवागं च मुमति तवं विषाणतो!! ...!! संस्कृतार्थ-एवं सम्यग्दृष्टि: आत्मानं जानाति ज्ञाएकस्वभावं । उदयं कर्मविपाक च मुंचति त विजानन् । २०९ ॥
BIRVANAMEDICIRRORA
।
सपयसार टीका।
सामान्यार्थ:--मप्रकार सम्यादृष्टी नी आने आत्मतत्वको अनुभवता हुआ आत्माको
माता दृष्टा स्वभावमई जानता है और का उदयको कर्म का फल नान तर छोड़ता है ।।
शब्दार्य सहित विशेषार्थ--(एवं) जैसे पहले कहा गया है उस प्रमाणे (मम्माइट्टी) सम्य-
ग्दृष्टी नीव (अप्पाणं) अपने आत्माको (जाणगसहाव) परमानंदमई टकोत्कीर्ण ज्ञाता दृष्टा
-एक स्वभाव रूप (मुगदि ) अनुभव करता है (त्र) तथा ( तत्रं ) नित्य आनंदमई एक बमात्र
रूा परमात्मनस्वको तीन गुप्तिमई समाधिमें तिल कर ( विनानन ) विशेष रूपसे जानता हुआ
(उदयकम्म विवाग ) शुभाशुम कौक उदयको काँका फल मानकर कि यह मंग स्वरूप
नहीं है (मुंचदि) त्याग देना है। भावार्थ-तन्वज्ञानी कमति उदयमें हर्ष विशाल नहीं करना हुआ
अपने आत्मीक तत्वको परमानन्दरूप अनुभव करता है ।। २०९॥
आगे कहने है कि सन्यग्दृष्टी सामान्यपने अपने और परके
स्वभावको अनेक प्रकारसे जानता है:-
गाथाः-उदयविधागो विविहो कम्माणं वण्णिदो जिणवरेहिं ।
ण दु ते मज्ज्ञ सहावा जाणगमावो दु अहमिको ॥२१०॥
संस्कृतार्थः-'उदयविषाको विविध: कर्मणां वर्णितो जिनवरैः ।
न तु ते मम स्वभावाः शायकमावस्वहमकः ॥ २१० ॥
सामान्याय--नाना प्रकार जो कमों के उदयक प्रकार हैं, अर्थात् भेद हैं जिनका कि वर्णन
श्री जिनेन्द्र भगवान ने किया है व सर्व भेद मेरे स्वभावका नहीं है क्योंकि मैं एक ज्ञाता
दृष्टा स्वभावका धरनेवाला हूं | शमा महिला विशेगार्थः-(कंमाण) द्रव्य कमाका (विविहो)
नाना प्रकार (उदय विदागो) उश्यका फल (मिणवरे हि) जिनेन्द्रौन (वण्गिदो) कहा है (त)
वे कोदयरूप नाना प्रकार के फल ( मन्अपात्रा ; मेरे स्वभाव भाव ( गहु ) नहीं हैं क्योंकि
(अहम) मैं (दु) तो (इको) एक अकेला ( जागगम वो ) टंकोत्कोर्ण परमानंदमई नाना दृष्टा
‘स्वभाववाला हूं भावार्थ -गर्व ही विभाव व कर्मके फल शुद्ध निश्चय नय से इस आत्माकं वास्त-
विक स्त्रमावसे विगीन हैं-मम्याटि नीर मामान्य काके आने और परको इमीतरह जानता
हैं । सामान्य का प्रयोजन यह है कि उसमें यह विक्षा नहीं है कि मैं क्रोवरूप हूं या
मानरूप हूं, इत्यादि क्यों के जिसमें विवक्षाका अभाव हो उसे सामान्य कहते हैं ।। २१० ॥
इमनरह भेदभावना पार जान और वैगम्य दानीका सामान्य व्याख्यानकी मुख्य वाम
पांच गाथाएं पूर्ण हुई। इसके आगे १० गाथाओं तक किर भी नान वैराग्य शक्तिका विशेष
वर्णन करते हैं।
आग कहते है कि मी सम्यही नहीं होता है:-
गाथा:--परमाणुमिति विहुरागादीणं तु विजई जस्त।
णदि सो जगदि अप्पा गयं तु सध्यागमधरावि ॥२१॥
१७८ HALEGAORNER - समयसार टीका। संस्कृतार्थः-परमाणुमात्रमपि खलु रागादीनां तु विद्यते यस्य । नापि स जानात्यात्मानं सर्वांगमधरोऽपि ॥ २११॥ सामान्यार्थ रागद्वेपादिकोंका परमाणु मात्र भी जिसके चित्तमें मौजूद है सो सर्व आगमका जाननेवाला होने पर भी आत्माको नहीं जानता है। शब्दार्थ सहित विशेषार्थ:- (जस्स) जिसके हृदय में (ह) प्रकटपने (गगादी) रागद्वेषादिकोंका (परमाणुमित्तयवि हु) परं- माणुमात्र भी विजदे) मौजूद है (सो) वह जीव (सव्वागमधरोवि) सर्व आगमको जानता हुआ है अर्थात् सिद्धान्तरूप समुद्रके पार पहुंचा है तो भी ( अप्पाणयं ) परमात्म तत्त्वके ज्ञानके न होनेके कारण शुद्ध बुद्ध एक स्वभावमई परमात्माको (णवि) नहीं (जाणदि) जानता है। अर्थात् नहीं अनुभव करता है। भावार्थ-जो अनेक ग्रंथोंको जाने और संसारके विषय कषा. योंमें रागभावको न छोड़े, वह आत्माका अनुभव नहीं कर सत्ता इसीमे वह सम्यग्दृष्टी नहीं है। जिसके सम्यग्दर्शन जग उटता है उसका भीतरसे राग छूट जाता है। अंतरंगमें उसके / एक आत्मानुभवसे ही प्रेम होता है । कपायकी वरनोरीसे वह चाहे संयम लेश भी न धार सकै परन्तु परिणामोंमें तत्त्वरुचि ऐसी अगाध है कि आत्मसुखके स्वादको कभी भूलता नहीं है ॥ २११ ॥ इसी वातको और भी कहते हैं:- गाथा:-अप्पाणमयाणंतो अणप्पयं चेव सो अयाणंतो। कह होदि सम्मदिट्टी जीवाजीवे अयाणतो ।। २१२॥ :: संस्कृतार्थः-आत्मानमजानन् अनात्मानमपि सोऽजानन् । कथं भवति सम्यग्दृष्टिीवाजी वावजानन् ॥ २१२॥ सामान्यार्थ-जो कोई आत्माको नहीं जानता है तथा अनात्माको नहीं जानता है वह जीव और अनीव दोनोंको नहीं जानता हुआ कैसे सम्यग्दृष्टी हो सक्ता है ? शब्दार्थ सहित विशेषार्थ-(अ-पाण) स्वसंवेदन ज्ञानके वलसे सहाही आनंदरूप एक स्वभावमई शुद्धा. 'त्माको (अयाणंतो) नहीं जानता तथा नहीं अनुभवता हुआ-(चेव) तैसे ही (अणप्पयं) शुद्धा- त्मासे भिन्न रागद्वेषादिरून अनात्माको ( अयाणतो ) नहीं जानता हुआ (सो) ऐसा जो पुरुष हैं सो ( जीवाजीवे अयाणतो ) जीव और अजीवके स्वरूको नहीं जानता हुआ (कह सम्मदिट्ठी होदि) किसप्रकार सम्यग्दृष्टी हो सक्ता है ? भावार्थ-जबतक स्वपरको भिन्नताका यथार्थ भेद ज्ञान नही होता तब तक वह सम्यादृष्टी व यथार्थ श्रद्धानी नहीं हो सका। यहां शिष्यने प्रश्न किया कि आपने कहा है कि रागी जीव सम्यग्दृष्टी नहीं होता है तब क्या चौथे, पांचवे गुणस्थानवर्ती तीर्थर कुपार, भरत व सगर चक्री, रामचंद्र व पांडवादि महापुरुष सम्यग्दृष्टी न थे ? इसका समाधान आचार्य करते हैं कि यह वात नहीं है । वे . ?
SHBAGALAKARExcas ३ समयसार टीका। सराग सम्यग्दृष्टी थे क्योंकि चौथ गुणस्थानवी जीव मिथ्यादृष्टी गुणस्थानकी अपेक्षा ४३ कर्मप्रकृतियोंको नहीं बांधते हैं । इसलिये उनके अनंतानुबंधी क्रोध, मान, माया, लोभ व मिथ्यादर्शनके उदयसे होनेवाले पत्थरकी रेखाके समान रागदेगादि भावोंका अभाव है तया पंचम गुणस्थानवी जीवोंके अप्रत्याख्यानावरण क्रोव, मान, माया, लोभक उदयस गदा होनेवाले भूमिमें हल की रेखाके समान रागद्वेषादि भावोंका अभावपना है यह त्रान पहले भी समझा चुके हैं । इस ग्रंथमैं तो मुख्यतासे पांचवे गुणास्थानसे अरके गुणन्यानवी वीतराग सम्यादृष्टियोंका ग्रहण है तथा गौणतासे सराग सम्यग्दृष्टिमा ग्रहण है ऐसा व्याख्यान सम्यग्दर्शनके व्याख्यानक समयमें सर्व ठिकाने जानना ॥ २१२ ॥ आगे कहते है कि सम्यग्ज्ञानी भोगोंकी इच्छा नहीं करता है:- जो वेददि वेदिजदि समए समए विणस्सदे उहयं । तं जाणगो दुणाणी उभयमवि ण कंखदि कयावि ॥२१३॥ संस्कृतार्थ:--यो वेदयते वेद्यते समये समर विनश्यत्युभयं । तद् ज्ञायकस्तु ज्ञानी, उभयमपि न कांक्षति कदाचित् ॥ २१३ ॥ सामान्यार्थ—जो भाव अनुभव करनेवाला है व जो भाव अनुभव किया जाता है यह दोनों ही समयर विनाश हो जाते हैं इसलिये ज्ञानी दोनोंकी ही इच्छा नहीं करता है किन्तु केवल उसका जाननेवाला रहता है । शब्दार्थ सहित विशेपार्थ-(जो) जो कोई रागद्वेप दि विकल्परूप भाव कर्ता होकर (वेददि) वहता है-अनुभव करता है (वैदिनदि) और जो साताक उदयसे होनेवाला कर्मरूप भाव रागादि विकल्पसे अनुभव किया जाता है (उहय) वे दोनो ही माव (समए समए).अर्थपर्याय होनेकी अपेक्षाप्से प्रत्येक समयमें (विणस्सई) नाशको प्राप्त होजाते हैं अतएव (णाणी) तत्वज्ञानी (तं जागणोदु ) उनको अर्थात् वर्तमान व भावी हो- नेवाले भावोंको विनश्वर जानकर (उभयंपि) दोनोंको ही (कयावि) कदापि (ण कंखदि ) नहीं चाहता है। भावार्थ-जिस समय इस जीवके किसी पदार्थक भोगनेकी इच्छा होती है उसी समय उसका भोग नहीं होकर उसके पीछे होता है, इससे जिस भावने अनुभव करनकी इच्छाकी थी वह माव तो विना अनुभव किये हुए ही नाश हो गया और जब यह अनुभव करता है तत्र पूर्वकी इच्छा न रही अर्थत् वेदनकी इच्छा करनेवाला भाव और जिस भावसे वंदन किया जाता है ये दोनों भाव एक समय वर्ती नहीं हैं मिन्न २ समय वर्ती हैं। इससे तत्त्वज्ञानी यह अनुभव करता है कि नो इच्छा की जाती है वह तो भोगनेमें आती नहीं इससे इच्छा काना ठीक नहीं है। ऐसा ही भाव श्री अमृतचंद्र आचार्यने कलसमें प्राट किया है:-धोदक विभाव बलत्वात्-वेद्यतेन खलु कांक्षितमेव, ते। कांक्षति न किचन विद्वान, सर्वतो प्यति दिरक्तिमुपैति ।
SSPorntcoimero समयसार टीका। AvepesAGheroennoval - - १८. वेद्यभाव अर्थात् भोगनेकी इच्छारूपी भाव तथा बदकभाव अर्थान् भोगनवाला भाव दोनों ही चलायमान हैं इस लिये निश्चयसे जो इच्छाकी जाती है वही भाव भोगनेमें नहीं आता है। इस कारणसे इच्छा करना वृथा जानकर ज्ञानी भोगोंकी इच्छा नहीं करता हुआ सर्व प्रकारसे अतिविरक्तपनेको प्राप्त होता है अर्थात् पूर्वमें भोगोंकी इच्छासे वैराग्य युक्त रहता है। जो कोई भोग जिस समय प्राप्त होनाय उसको उदासीनपने रोगके इलागवत् भोग लेता है। व्यर्थ इच्छाएं करके कर्मोंसे लिप्त नहीं होता है ॥ २१३ ॥ आगे कहते है कि इसी तरह वे मतलब कर्म बंधके निमित्त कारण जो अपध्यान है । शरीर सम्बन्धी या भोगोके निमित्त जो रागद्वेपादि अध्यवसान है उनको पग्मान्मतन्यका ज्ञाता ज्ञानी जीव नहीं चाहना है । गाथाः--बंधुवभोगणिमित्तं अज्ज्ञवलाणोदएर पाणिस्त । संसारदेहविसएसुणेव उपजदे रागो ॥ २१४ ।। संस्कृतार्थः-~-बंधोपभोगनिमित्तेपु, अध्यवसानोदयेषु शानिनः । संसारदेहविषयेषु नैवोत्पद्यते रागः ॥ २५४ ॥ सामान्यार्थः -ज्ञानी जीवके बंधके निमित्त व भोगके निमित्त ऐसे संसार व देह सम्बन्धी विषयोंमें व रागादि अध्यवसानोंमें राग नहीं पैदा होता है । शब्दा महित विशेषार्थः- (गाणिस्स) स्वसंवेदन ज्ञानी जीवके (संसार देह विसएस) संसार सम्बन्धी व देह सम्बन्धी विषयोंमें ( अन्झवसाणोदएसु ) व रागद्वेपादि उदयरूप अध्यवसानोंमें (बंधु व भोग निमित्त) नंध व भोग के निमित्त ( रागो णेव उपन्जदे ) राग नहीं पैदा है । यहां यह तात्पर्य है कि यह जीव भोग निमित्त तो थोड़ासा पाप करता है परन्तु वे मतलब अपध्यानसे बहुत अधिक पाप वांधता है जैसा कि तंदुलमच्छ वांधता है-स्वयंभ्रमण महासमुंद्रमें महामच्छके मुखमेंसे प्रवेश होकर बहुतसे पशु निकल जाते हैं। तंदुलमच्छ उनको देख २ कर यह अपध्यान करता है कि यदि मैं इतना बड़ा पशु होता तो इन सर्वको न छोड़ता। इस अपध्यानके योगसे वह सातवें नर्कका पाप बांध लेता है। अपध्यानका लक्षण शालमें ऐसा कहा है- वयबंधन छेदादेद्वेषाद्रागाचपर कलनादेः-आतभ्यान मपयानं ग्रामति जिनशासने विशदा:- अर्थात्-परकी स्त्री, पुत्र, मित्र आदिका वध, बंधन, छेदन आदिका द्वेपसे व रागसे चिन्तवन करना सो अपध्यान है ऐसा जिन शासनमें निर्मल बुद्धिवान पुरुषोंने कहा है। अप- ध्यानसे कर्मोका बंब होता है सो भी कहा है- संकल्प कल्पतरु सेश्रयणात त्वदीयं, चेतो निमति मनोरथ सागरऽस्मिन् । तत्रार्थतस्तत्र चकास्ति न किचनापि पक्षः परं भवसि कल्मपसंश्रयस्य । सामन्या-संकल्प विकरम रूपी वृक्षका आश्रय करनेसे तेरा चित इस मनोरथके awraamanam- समयसार टीका। १८१ CRORREARRIER समुद्र में गोत खा रहा है । सो इसमें वास्तवसे तेरा कुछ भी भला नहीं है किन्तु उसके सिवाय तू पापोंका आश्रय हो जावंगा । और भी कहा है- दौविध्यदग्ध मनसतिरुपात्तमुक्ते, श्चित्तवथोलसतिते स्फुरितातग्गं । धान्नि स्फुरबदि तया पानात्म संज्ञे, कौतुम्कुती तय भवेद्विफला प्रमतिः । भावार्थ-दुर्भाग्यस जिसका मन दग्ध है व जो अंतरंगमं भोगोंका भोग किया करता है ऐसा मोतू सो तेरा चित्त नाना प्रकार विकल्पकी तरंगोंस जैसे स्कुरायमान है एमा ही यदि पामात्मा रूपी तन तेरे चित्तम स्कुरायमान हो तो फिर तुम्हारा जन्म निष्फल कैसे रह सक्ता है ? भावार्थ-अपध्यानोंसे केवल पापका बंध है पर परमात्मध्यानसे आत्माकी मुक्ति है। आचार शास्त्रमें कहा है:- कंम्बिदकलुखिदभुदो दुकाम भोगहि मुछिदो संतो। णय भुंजतो भोग बंधदि भावण कंमाणि ॥ भावार्थ-इच्छाओंके द्वारा कलुपित.चित हुआ यह प्राणी काम भोगोंस मूर्छित हो- जाता है तब भोगोंको नहीं भोगता हुआ भी अपने अशुभ भावसि कर्माको बांधना है-- एसा जानकर अपध्यानको छोड़कर शुद्ध आत्मस्वरूपमें ठहरना योग्य है । भावार्थ-तत्वज्ञानी भोगोंकी इच्छा करके अपध्यान नहीं करता और न भोगते हुए भी अंतरंगसे राग करता है- उसके संसार देहसम्बन्धी कार्योंमें भीतरसे रुचिरूप उपादेय स्वरूप राग बुद्धि नहीं होती-अ- पध्यानको तो वह बहुत ही हानिकारक जानता है क्योंकि चाहकी दाहसे व खोटा विचार करनेसे कार्य तो कुछ होता नहीं, परंतु वे मतलब काँका बंध होता है। केवल भोग कानकी अपेक्षा उसकी चिंता करनेसे भारी पापका बंध होता है अतएव ज्ञानी आत्मा संसारके विपयोंमें रागद्वेष न करके उदास रहता हैं। फिर भी दिखलाते हैं कि सम्यग्दृष्टिक भेद ज्ञान शक्ति । वैराग्य गक्तिकी ऐसी महिमा है। गाथाः-मज्झं परिग्गहो जदि तदो अहमजीविदं तु गच्छेज्ज । णादेव अहं जमा तह्मा ण परिग्गहो मज्झं ॥ २१ ॥ संस्कृतार्थः-मम परिग्रहो यदि ततोऽहमजीवत्वं नु गच्छेयं । शातवाहं यस्मात्तस्मान्न परिग्रहो मम || २१५ ॥ सामान्यार्थ:-यदि बाह्य परद्रव्य निश्चयसे मेरी परिग्रह हो तो मैं अभीवपनको प्राप्त हो जाऊं, परन्तु क्योंकि मैं ज्ञाता ही हूं इससे यह परिग्रह मेरी नहीं है । शब्दार्थ महिन विशेपार्थः-(जदि) यदि (परिगहो) मिथ्यात्व व रागद्वेषादिक परद्रय रूपी परिग्रह (मन्झ) सहन शुद्ध, केवल ज्ञान केवल दर्शन स्वभावरूप निश्चयसे जो मैं हुं सो मेरी हो जावे ( नदो) तत्र (अहम् )मैं (अनीविदं तु गरेज) अनीवपनको प्राप्त हो जाउंगा अर्गत् जड़ हो जाउंगा समयसार टीका। InmenAAAAAmerentinenex १४२ परंतु मैं अजीव नहीं हो सकता (जम्हा) क्योंकि (अहं) मैं (णादेव) परमात्मपद स्वरूप शुद्ध ज्ञानमई हूं (तम्हा) इस लिये (परिग्गहो) यह परद्रव्यादि परिग्रह (मन्झंग) मेरी परिग्रह निश्चय नयसे नहीं हो सक्ती । भावार्थ --भेदज्ञानी आत्मा एसा अनुभव करता है कि मैं शुद्ध निश्चयनयसे परमात्मपढ़ स्वरूप शुद्ध ज्ञानानंदमई हूं इसलिये यह रागद्वेपादि व स्त्री पुत्रादि परिग्रह मेरी नहीं हो सकती ॥ २१५ ॥ आगे शिष्यने प्रश्न किया कि वह परमात्मपद क्या है इसका समाधान आचार्य करते हैं:- गाथाः-आदमि व्वमावे अथिरे मोत्तूण गिण्ह तव णियदं। थिरमेकमिदं सावं उवलंम्भंतं सहावेण ॥ २१६ ॥ संस्कृतार्थः- आत्मनि द्रव्यभावान्यस्थिराणि मुक्त्वा गृहाण व नियतं । स्थिरमेकमिदं भावं उपलभ्यमानं स्वभावेन ॥ २१६ ॥ सामान्यार्थः--आत्मामें जो द्रव्य और भाव कर्म हैं उनको अथिर जान करके छोड़ दे और हे भव्य ! अपनेही निश्चित, स्थिर, एक, स्वभावसे अनुभव योग्य इस प्रत्यक्षीभूत आत्म पदार्थको गृहण कर । शब्दार्थ सहिन विशेपार्थ:-(आदम्हि) इस आत्म द्रव्यरूपी आधारमें जो (दत्व भावे) द्रव्य कर्म ज्ञानावरणादि और भावकर्भ रागद्वेपादि तिष्ठे हुए हैं उनको (अथिरे) विनाश होनेवाले अथिर जानके (मोत्तूग) जोड़दे अर्थात् उनसे प्रेम हटाले और हे भव्य ! (तव) अपना ही सम्बन्धी अर्थात् अपने ही (णियई) निश्चितरूप (थिर) अविनाशी, (सहावेण उवलभतं) स्वभावसे अनुभव करने योग्य अर्थात् परमात्म सुखकी संवित्तिरूप स्वसं- वेदन ज्ञान स्वभावसे अनुभवने योग्य (एग) एक (इदं) इस प्रत्यक्ष (भाव) आत्म पदार्थको (गिणह) ग्रहण कर, स्वीकार कर । भावार्थ:-जो स्वभावसे एकरूप, अविनाशी स्वसंवेदनज्ञान गम्य आत्मा है वही परमात्मपद है उसका अनुभव करना जरूरी है ।। २१६ ।। भागे ज्ञानी पररव्यको नहीं ग्रहण करता हैं इस भेद भावनाको पतलाते है:- गाथा:-को णाम भणिज वुहो परव्वं ममामिदं वदि दव्वं । अप्पाणमप्पणो परिग्गहं तु णियदं वियाणतो ॥ २१७ ॥ संस्कृतार्थ:-को नाम भणेद् बुधः परद्रव्यं ममेदं भयात द्रव्यं । आत्मानमात्मनः परिग्रह नु नियतं विजानन् ।। २१७ ॥ सामान्यार्थः-कौन बुद्धिमान जो इस बातको निश्चय रूपसे जानता है कि आत्माकी परि ग्रह आत्मा ही है ऐसा कहेगा कि परद्रव्य मेरा द्रव्य है ? शब्दार्थ सहित विशेषार्थ:-(को बुहो) कौन बुद्धिमान (णाम) अहो (अप्पणो परिग्गह) अपने आत्माकी परिग्रहको (अप्पाणम् तु) चिदानंद एक स्वभाव रूप शुद्धात्माको ही (णिय) निश्चय रूपसे (वियाणतो) जानता हुआ व अनुभव करता हुआ (भणिज्ज) ऐमा कहेगा कि (इदं) यह (परदब्ब) आत्मासे भिन्न सर्व पर ?
समयसार टीका। १८३ द्रव्य (ममत्व) मेरा द्रव्य (हवदि) होता है ? भावार्थ:-ज्ञानी जीव यह बात कभी नहीं मानेगा और न कहेगा कि यह परदन्य स्त्री पुत्रादि शरीर व रागद्वेषादि भाव मेरा आत्मा सम्बन्धी द्रव्य या भाव है क्योंकि उसको इसका ठीक २ अनुभव है कि अपने आत्माकी परिग्रह अपने ही आत्माका शुद्ध स्वरूप है ।। २१७ ॥ आगे ज्ञानीके इस भेदज्ञानका वर्णन करते हैं जिससे वह यह विचारता है कि मेरा दृढ़ निश्य है कि यह देह व रागपादि पाद्रव्य मेग परिग्रह नहीं होसक्ती । गाथा:-छिन्ज वा भिजनु वा णिजदु वा अहव जानु विप्पलयं । जह्मा तह्मा गच्छदु तहावि ण परिग्गहो मज्झ ॥ २१८ ।। संस्कृतार्थ:-छिद्यत वा भिद्यतां या नीयतां अथवा यानु विप्रलयं । यस्मात्तस्माद् गच्छतु तथापि न परिग्रहो मम || २१८ ॥ सामान्यार्थः-ज्ञानीके यह भेद भावना होती है कि यह शरीर दिनाहु, भिजाइ, वा कोई कहीं लेजाहु वा प्रलय हो जाहु अथवा चाहे जिस कारणसे चला जाहु तथापि यह शरीर मेरा परिग्रह नहीं है । शब्दार्थ सहित विशेषार्थ:-यह बाह्य शरीर (छिजदु वा) चाहे छिद जाओ दो टुकड़े इसके हो जावे (मिद्यतां) चाहे यह भिद जावे अर्थात् छंद रहित हो जावे (णिज्जदुवा) वा इसे कोई कहीं ले जावे (अहव विप्पलयं जाद) अथवा प्रलयको प्राप्त हो 'जावे (जम्हा तम्हा गच्छदु) वा चाहे जिा कारणसे छूट जाव (तहावि) तौभी यह देह (मन्द्र) मेरा (परिग्गहो) परिग्रह (ण) नहीं हो सक्ता । क्योंकि ज्ञानी विचारता है कि मुझे यह दृढ़ निश्चय है कि मैं टंकोत्कीर्ण परमानंदमई ज्ञाता दृष्टा एक स्वभावरूप हूं। भावार्थ:-ज्ञानी जीव :. अपनेको शुद्ध ज्ञानानंदमई अनुभव कर देहके बिगाइसे अपना विगाड़ नहीं मानता है ॥ २१८ ॥ आगे आत्मिक सुखमें सन्तोय है ऐसा दिखलाते हैं: गाथाः--एमि रदो णिचं संतुहो होहि णिचमेदनि । एदेण होहि तित्तो तो होहदि उत्तमं सोक्त्रं ॥ २१ ॥ संस्कृतार्थः-एतस्मिन् ‘रतो नित्यं संतुष्टो भव नित्यमेतस्मिन् । एनेन भव तृप्तो तईि भविष्यति तवोत्तमं सौख्यं ॥ २१९ ॥ सामान्यार्थ—इसी ही आत्मस्वरूपमें नित्य रत हो, नित्य इसी संतोषी हो, इसी ही से तृप्त हो तो तुझे उत्तम सुख हो जायगा । शब्दार्थ महित विशपार्थः-(एदम्हि) हे भन्य! पंचेन्द्रियके क्षणिक सुखोंसे निवृत्ति करके इसी ही स्वभाविक परमात्म मुखमें (णिच) नित्य (रदो) विकल्प रहित योगके वलसे रत हो तथा (एदक्षि) इसी ही स्वरूपमें (णिञ्च) नित्य (संतुट्टो हो हि) संतुष्ट हो तथा (एदेण) इसी ही अत्म सुखके द्वारा (तित्तो हो हि) नृप्त हो (लो) AMBRIME समयसार टीका। VIRRIERMERDUXURIORSMARA । तब इस आत्माका सुखके अनुभव करनेसे (उत्तम सोख) उत्तम अविनाशी मोक्षका सुख (होहदि) तुझे भविष्यमें प्राप्त होगा। भावार्थः--आत्माके शुद्ध स्वरूपमें जो लीन हो कर संतोपी होता है सो आत्म सुखको अनुभव करता हुआ क्रमसे मोक्ष सुखको प्राप्त कर लेता है ॥ २१९ ॥ आगे कहते हैं कि जिस परमार्थरूप मोक्षके कारणभृत पदमें मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान, मनःपर्ययज्ञान, और केवलज्ञानका भेद नहीं है ऐसा जो परमात्म पद है सो सर्व ही हर्ष विषाद भादिके विकल्पके जालोसे दूर है उस पदको परम योगाभ्यासके बलसे ही यह आत्मा अनुभव करता है। गाथा:-आभिणिसुदोहिमणकेवलं च तं होदि एकमेव पदं । सो एसो परमट्ठो जं लहिहुँ णिचुदि जादि ।। २२० ॥ संस्कृतार्थः-आमिनियोधिकश्रुतावधिमनः पर्ययकेवलं च तद्भवत्येकमेव पदं । स एवं परमार्थः, यं लब्ध्वा निवृत्तिं याति ॥ २२० । सामान्यार्थः-मति, श्रुत, अवधि, मनःपर्यय और केवलज्ञानरूप सो एक ही पद है, वही परमार्थरूप है जिसको पाकर यह जीव निर्वाणको प्राप्त होता है। शब्दार्थ माहित विशेषार्थः-जैसे सूर्यके मेघोंके आवरणके कमती बढ़ती हो जाने के कारण सूर्यके प्रका. शमें कमती बढ़तीपनेके भेद हो जाते हैं तैसे मतिज्ञानावरण, श्रुतज्ञानावरण आदि प्रकृतियोंके क्षयोपशमके अनुसार मतिज्ञान, श्रुतनान आदि भेद होते हैं (आभिणिमुदोहि मणकेवलं) यह मति श्रुत, अवधि, मनः पर्यय, केवलज्ञान (तं चहोदि एक्कमेव पद) सो अभेदरूप निश्चयसे एकरूप ही है (सो एसो परमट्ठों) यही लोकमें प्रसिद्ध पंच ज्ञानका अभेदरूप परमार्थ है (ज) जिस परमार्थ स्वरूपको (लहिंदु) पाकर यह जीव (णिधुदि जादि) निर्वाणको प्राप्त हो जाता है। भावार्थ:- वह आत्मा जब अभेदरूप ज्ञानानंदमई परमात्म स्वरूपका अनुभव करता है तो उसके प्रतापसे इसके कर्म धीरे २ शांत हो जाते हैं और यह नीव अंतमें निर्वाणकी प्राप्ति करता है॥२२०॥ इस तरह ज्ञानशक्ति और वैराग्य शक्तिका विशेष विवरण करते हुए 10 सूत्र समाप्त हुए इसके आगे आठ गाथाओं तक उस ही परमात्मपदका प्रकाश करनेवाला जो कोई ज्ञान गुण उसका सामान्य वर्णन करते है-प्रथम ही कहते हैं कि जहां मति ज्ञान प्रतज्ञान आदि ज्ञानोंका भेद नहीं है ऐसा अभेदरूप साक्षात मोक्षका कारणभृत जों कोई परमात्मपद हैं सो शुद्धात्माके अनुभवसे शून्य प्रत, तपश्चरण काय केश करते हुए भी स्वसंवेदन ज्ञान गुणके विना नहीं प्राप्त हो सकता है:- गाथाः-णाणगुणेहि विहीणा एदं तु पदं वहवि ण लहंति । तं गिण्ह सुपदई जदि इच्छसि कम्मपरिमोक्वं ॥ २२१॥ संस्कृतार्थः-ज्ञानगुणैर्विहीना ए तु पदं वहवोऽपि न लभते । त्ग्रहाण सुपदमिदं यदीच्छसि कर्मपरिमोक्षं ॥ २२१ ॥ है .
समयसार टीका। १८५ सामान्यार्थः- बहुत मी जीव ज्ञान गुणसे रहित होने हुए इस परमात्मपनको नहीं प्राप्त करते हैं। इसलिये हे भव्य ! यदि तू कर्मोंसे मुक्त होना चाहता है तो इस पदको गृहण कर । शब्दार्थ सहित विशेषार्थः-( गाणगुणेहि विहीणा.) विकार रहित परमात्मतत्त्व के अनुभवरूपी लक्षणको धरनेवाले ज्ञानगुणसे रहित (बहूवि) बहुतमे पुरुष शुद्धात्मा ही उपादेय है. गृहण करने योग्य है इस स्वसंवेदन ज्ञानसे रहित दुर्धर काय केश आदि तपश्चरणको करते हुएभी (एदंतुपदं)इस मति ज्ञानादिसेअभेदरूप, साक्षात् मोक्षका कारण स्वसंवेदनके योग्य शुद्धात्माके अनुभवरूपी लक्षणको रखनेवाले परमात्मपदको (ण लहंति) नहीं प्राप्त करते हैं। इसलिये हे भव्य ! (जदि) यदि (कंम परिमुक्क) द्रव्यकर्म, भावकम, नोकोसे मुक्ति (इछसि) चाहता है तो (तं पद 'मेद) उस परमात्म पदको ही (गिण्हस) ग्रहणकर | भावार्थ-जब तक स्वमवेदन ज्ञान नहीं है तब तक व्रत, तप आदि क्रियाएं परमात्म पदकी प्राप्तिमें सहायक नहीं हो सक्तीं। इसलिये जो हितार्थी भव्यजीव है उसको उचित है कि आत्मज्ञानको प्राप्त कर आत्मानुभवमें प्रवृत्त करे इसी ही आत्माके अनुभवसे परमात्मपदका लाभ होता है जिसके लाभ होनेमे यह जीव काँसे मुक्त हो जाता है | २२१ ॥ आगे विशेष परिग्रहके त्याग करानके अभिप्रायसे उस ही ज्ञान गुणका विशेष वर्णन करते है:- गाथा:-अपरिग्गहो अणिच्छो भणिदो गाणीय णिच्छदे धम्म । अपरिग्गहो दु धम्मस्स जाणगो तेण सो होदि ।। २२२ ।। संस्कृतार्थः-अपरिग्रहोऽनिच्छो भणितो ज्ञानी च नेच्छति धर्म । अपरिग्रहस्तु धर्मस्य ज्ञायकस्तेन स भवति ॥ २२२ ।। सामान्यार्थः-जो परिग्रहसे दूर है वह इच्छासे रहित कहा गया है इससे ज्ञानी पुण्यरूप धर्मको नहीं चाहता है, इसकारणसे वह उस पुण्य मई धर्मको नहीं ग्रहण करता हुआ केवल उसका ज्ञाता रहता है। शब्दार्थ सहित विशेपार्थः-(अपरिग्गहों) उसके किसी प्रकारकी परिग्रह नहीं हैं (अणिच्छों) जिसके अपने आत्मासे वाह्य द्रव्योंमें किसी प्रकारकी वांछा या. मोह नहीं है। इससे (गाणीय) स्वसंवेदन ज्ञानी जीव (धर्म) शुढोपयोग रूप निश्चय धर्मको छोड़ कर शुभोपयोग रूप धर्म अर्थात् पुण्यको (णिच्छदे) नहीं चाहता है। (लेण) इसी कारणसे (सो) वह सम्यग्ज्ञानी जीव (धमम्मदु अपरिग्गहो) उस पुण्य धर्मको नहीं ग्रहण करता हुआ अर्थात् यह पुण्यमई धर्म मेरा स्वरूप नहीं है ऐसा जानकर उस रूपसे नहीं परिणमन करता हुआ अर्थात उस पुण्यमें तन्मई न होता हुआ (जाणगो होदि) जसे दर्पण अपने भीतर पड़ती हुई परछाइयोंका केवलमात्र प्रकाशक है ऐसे ही केवल ज्ञायक अर्थात जाननेवाला ही रहताहै। भावार्थः-परिग्रहसे वही दूर वापरिग्रहका वहीत्यागी कहा जाता है जिसके केवल आत्मन्द- रूपसे तो अनुराग है. परन्तु आत्मामे बाहर नितने पदार्थ हैं उनमे राग नहीं है और न पर २४ UPurnews समयसार टीका। VAAAAAABIRATRAIRSetos . १८६ द्रव्योंकी चाहना है-पुण्य रूप धर्मको जो परद्रव्योंके समागम मिलानेका कारण है वही चाहेगा जिसके स्वर्गादि सुखोंकी वांछा होगी। तत्वज्ञानी जो आत्मीक अतीन्द्रिय आनन्द्रका ही अनुरागी है इस पुण्यमई धर्मकी इच्छा नहीं करता है केवल शुद्धोपयोगकी ही भावना माता 'है। इससे ज्ञानी जीव पर द्रव्य और उस्की अवस्थाओंका केवल जाननेवाला रहता है राग व द्वेष करनेवाला नहीं । तात्पर्य यह है कि ज्ञानीको परकी चाह मेट शुभोपयोगको भी उपादेय नहीं मानना चाहिये ।। २२२ ॥ आगे फिरभी इनीको काईने है:- गाथा:-अपरिग्गहो अणिच्छो भणिदो णाणीय णिच्छदि अहम्मं । अपरिग्गही अधम्मस्स जाणगो तेण सो होदि ॥ २२३ ॥ संस्कृतार्थः-अपरिग्रहोऽनिच्छो भणितो ज्ञानी च नच्छत्यधर्म । अपरिग्रहोऽधर्मस्य ज्ञ'यकस्तन स भवांत ॥ २२३ ॥ सायान्यार्थः--जिसके इच्छा नहीं है वहीं परिग्रहसे रहित कहा गया है इससे ज्ञानी विषयकपायरूप अधर्मकी भी इच्छा नहीं करता इसकारण अधर्मको नहीं ग्रहण करता हुआ केवल उसका ज्ञाता ही रहता है। इन्दार्थ सहिन विशेपार्थ- अणिच्छो) जिसके बाह्य द्रव्योंमें वांछा नहीं है वह (अपरिग्गहो) परिग्रह रहित (भणिदो) कहागया हैइससे (णाणीय)तत्वज्ञानी (अहम्म) पंचेन्द्रियके विषयोंको सेवने रूप व क्रोधादिक कपाय रूप अधर्मको (पिछदि) नहीं चाहता है । (तेण) इसी ही कारणसे (सो) वह सम्यग्ज्ञानी (अधमस्स) विषय कपायरूप अधर्मको (अपरिग्गहो) नहीं ग्रहण करता हुआ अर्थात् यह जान करके कि यह पाप मेरा स्वरूप नहीं पाप रूपसे नहीं परिणमन करता हुआ (जाणगोहोदि दर्पणमें जैसे विंव पड़ता है उस तरह केवल. उसका ज्ञाता ढष्टा ही रहता है। भावार्थ--जैसे तत्वज्ञानी पुण्यरूप धर्मकी इच्छा नहीं करता ऐसे पापरूप धर्मको भी नहीं . चाहता है परन्तु इन दोनोंसे भिन्न शाता दृष्टारूप अपने आत्माको अनुभव करता हुआ अपने स्वभाव में रहता है। इसी ही तरह अधर्म पदको पलटके राग, द्वेप, मोह, क्रोध, मान, माया, लोभ, कर्म, नोकर्म, मन, वचन, काय, श्रोत्र, चक्षु, घाण, रसना, स्पर्शन ऐसे १७ पढ़ गाथाओंके मध्यमें देकर १७ सूत्र कहने योग्य हैं इसी ही तरह शुभ व अशुभ संकल्प विकल्पोंसे रहित व अनंत ज्ञान दर्शन आदि गुणोंकाधारीओ शुद्धात्मा है उससे प्रतिपक्ष भूत अर्थात् विरोधी शेप और भी असंख्यात लोक प्रमाण विभाव परिणामोंके स्थान त्यागने योग्य हैं ॥ २२३ ।। इसी ही विषयको और भी कहते है गाथा:-धम्मच्छि अधम्मच्छी आयासं सुत्तमंगपुव्वेसु । संगं च तहा णेयं देवमणुअतिरियणेरइयं ।। २२४ ॥ है Assuestreet. - . समयसार टीका। १८७ संस्कृत छायाः-धर्मायी अधर्मार्थी आकामं श्रुतमंग पूर्वेषु । संगं च तया जयं देव मनुष्य तिर्यग नरवादिकम् ॥ २२४ ॥ सामान्यार्थः---परमतत्वज्ञानी धर्म द्रव्य, अधर्म द्रव्य, आकाश द्रव्य, अंग व पूर्वका श्रुत ज्ञान व अन्य परिग्रह व देव मनुप्य तिर्यंच नरक आदि अवस्थाओंको नहीं चाहता है। शब्दार्थ सहित विशेषार्थ:-जो इच्छा रहित है वही परिग्रह रहित है उसके बाह्य द्रव्योंमें इच्छाका अभाव है अतएव परमतत्वज्ञानी चिदानंदमई एक स्वभावरूप शुद्धात्माको छोड़करके धर्म, अधर्म, आकाशादि द्रव्य व अंगोका या पूर्वाका श्रुतज्ञान व बाह्य और अंतरंगकी २४ प्रकार परिग्रह या देव, मनुप्य, तिथचं और नरकं आदि विभाव पर्यायोंको नहीं चाहता है यह सर्व जानने योग्य है ऐसा जानता है। इस कारणसे इस विषयमें परिग्रह रहित होता हुआ उस रूपसे नहीं परिणमन करता हुआ जैसे दर्पणमें विम्व झलकता है परन्तु दर्पण उस रूप नहीं होता इसी तरह केवलमात्र ज्ञाता सृष्टा ही रहता है-रागद्वेष नहीं करता । भावार्थ ज्ञानी निज आत्म स्वरूपको छोड़कर अन्य अवस्थाओंको ज्ञेत रूप जानता है उनका केवल ज्ञाता इप्टा रहता है।।२२४॥ तथा इसी विषयको और भी कहते हैं:-- गाथा:-अपरिग्गही अणिच्छो मणिदो असणं चणिच्छदे णाणी। अपरिग्गहो दु असणस्त जाणगो तेण सो होदि ॥ २२५ ।। संस्कृतार्थः-अपरिग्रहोऽनिच्छो भणितोऽशनं च नेच्छति ज्ञानी । : अपरिग्रहस्त्वशनत्य शायकस्तेन स भवति ॥ २२५ ॥ सामान्यार्थः-जो परिग्रह रहित है वह इच्छा रहित कहा गया है इससे ज्ञानी भोजनकी इच्छा नहीं करता है । इस कारणसे भोजनको रागभावसे नहीं ग्रहण करता हुआ केवलमा ज्ञाता रहता है । शब्दार्थ सहित विशेषार्थ-(अणिच्छो) जिसके बाह्य द्रव्योंमें इच्छा, मूर्छा व ममता भाव नहीं है सो (अपरिग्गहो) परिग्रह रहित (भणिदो) कहा गया है क्योंकि इच्छा अज्ञानमई भाव है इससे इसका होना ज्ञानीके संभव नहीं है अर्थात् (गाणी) सम्यग्ज्ञानी (असणंचं) भोजन व तत्सम्बन्धी पदार्थोको (णिच्छदे) नहीं चाहता है। (ण) इस कारणसे (सो) वह सम्यग्ज्ञानी (असणस्स) भोजनको (अपरिग्गहो) नहीं चाहता हुआ (जाणगो होदि) केवल उसका ज्ञाता दृष्टा रहता है। अर्थात् ज्ञानी आत्मीक सुखमें नृप्त होता हुआ भोजनके मनोज्ञ पदार्थोकी नहीं कामना करता हुआ जैसे दर्पणमें बिंब जेमाका तमा अकलता है। दर्पण उसमें राग व द्वेष नहीं करता है इसी तरह ज्ञानी भोजनादि पदार्थाका वस्तुखरूपसे केवल ज्ञाता ही रहता है उनको राग रूपमे ग्रहण नहीं करता है । भावार्थ:- जैसे दर्पणमें सुरूप व कुरूप पदार्थ प्रकट होते हैं, दर्पण उनमें रागडेय नहीं करता ऐसे SARVANANGERDHONGER - . . १८८ समयसार टीका। ज्ञानीके ज्ञानमें भोजनादि पदार्थ जैसेके तैसे झलकते हैं। ज्ञानी उनमें रागद्वेप नहीं करता है ।।२२६॥ फिर भी कहते हैं:- गाथा:-अपरिग्गही अणिच्छो भणिदो पाणं च णिच्छदे णाणी। अपरिगहो दु पाणस्स जाणगो तेण सो होदि ॥ २२६ ॥ संस्कृतार्थः-अपरिग्रहो अनिच्छो भणितः पानं च नेच्छति ज्ञानी । अपरिग्रहस्तु पानस्य ज्ञायकस्तेन स भवति ॥ २२६ ॥ अर्थ-जो इच्छा रहित है अर्थात् जिसकी आत्मासे बाहरके द्रव्योंमें इच्छा-आकांक्षा, तृष्णा, मोह नहीं है वही परिग्रह रहित है ऐसा कहागया है, क्योंकि इच्छा अज्ञानमई भाव है इससे ज्ञानी पीने योग्य वस्तुओंकी चाह नहीं करता है यही हेतु है जिससे वह स्वाभाविक परमानंदरूप सुखमें तृप्त रहता हुआ नाना प्रकारकी पीने योग्य वस्तुओंमें मूर्छा न करता हुआ दर्पणमें विंवके समान ही वस्तुको वस्तुम्वरूपसे जानता हुआ रहता है उसको रागरूप भावसे ग्रहण नहीं करता है ॥ २२६ ।। ऐसा ही कहा है। उक्तं च | गाथा:-णबलाउसादु अटुं ण सरीरस्सय वयट्टतेजटुं| णाणटुं संजमठं झाणहूँ चेव भुजंति ।। अक्खा भक्ख णिमित्तं, रिसिणो भुजति पाण धारण निमित्तं । पाणा धम्म णिमित्तं, धम्मं हि चरंति मोक्खी। भावार्थ:-साधु महाराज जो भोजनपान करते हैं सो शरीरके बलकी व आयुकी व शरीरके अंगोंके तेजकी वृद्धिके लिये नहीं किन्तु ज्ञान, संयम और ध्यानकी. वृद्धिके लिये करते हैं। ऋषिगण इंद्रियोंके विषयोंके निमित्त नहीं भोगते हैं किन्तु अपने प्राणोंकी रक्षा निमित्त भोगते हैं, उन प्राणोंकी रक्षा धर्म पालनेके लिये करते हैं और धर्मका पालन मोक्ष प्राप्तिके लिये करते हैं । इसी कारण साधु महाराजके भोजनपान करते हुए उनके भीतर स्वादननित इच्छा नहीं होती केवल शरीरको धर्मके साधनमें उपकारी जानके उसकी रक्षाके हेतु ही भोजन करते हैं। आगे परिग्रह त्यागके व्याख्यानको संकोच करते है:- गाथाः-इचादि एदु विविहे सव्वे भावय णिच्छदे णाणी। जाणगभावो णियदो णीरालंवोय सधस्थ ॥ २२७ ॥ संस्कृतार्थः-इत्यादिकांस्तु विविधान् सर्वान् भावानेच्छति ज्ञानी । ज्ञायकभावो नियतो निरालंबश्च सर्वत्र ॥ २२७ ॥ सामान्यार्थ:-सम्यग्ज्ञानी ऊपर लिखित नाना प्रकारके सर्व भावोंको नहीं चाहता. है-वह ज्ञानी सर्व अवस्थाओंमें नियमरूपसे ज्ञाता दृष्टा स्वभाव व परालंब रहित खाधीन ASASAREER समयसार टीका। ૧૮૬ रहता है। शब्दार्थ-(गाणी) परमात्मतत्वका ज्ञानी (दृच्चादि एदुविविहे सव्वे भावेय) उपर कहे प्रमाण पुण्य व पापोंको व मोजन पानादि बाह्य पदार्थोंको (णिच्छदे) नहीं चाहता है क्योंकि वह (सव्वत्थ) सर्व ठिकानों व अवस्थाओंम (जाणगभावा) टंकोत्कीर्ण परमानंदमई ज्ञाता दृष्टा एक स्वभावरूप (णियदा) निश्चित किया हुआ (णीगलंबोय) और तीन जगत व तीन कालोंमें भी मन, वचन, कायसे व लत, कारित, अनुमोदनामे बाह्य और भीतरकी परिग्रह रूप वेतन और अचेतन परद्रव्यमें आलंबन रहित होता हुआ भी अनंतज्ञान आदि गुण खरूप अपने स्वभावमें पूर्ण कलश की तरह निश्चल अवलंबन सहित ठहरता है । भावार्थ:- जिसने शुद्धात्मतत्वका निश्चय व ज्ञान प्राप्त कर लिया है उसके केवल निन रूपके प्रकाशित करनेकी ही भावना है, विषय कपायोंकी पुष्टताकी भावना नहींहोती है। अतएव वह किसी भी अवस्थामें भोजन पानादि पर वस्तुओंकी इच्छा नहीं करता है । केवल धर्म साधनकै निमित्त शरीरकी रक्षा करता है ॥ २२७ ॥ आगे कहते हैं कि ज्ञानी न तो वर्तमान भोगोंमें इच्छा करता है न भविथके गोगोंको चाहता है। गाथा:---उप्पण्णोदयभोगे विओगबुद्धीय तस्स सो णिचं । कंखामणागदस्सय उदयस्त ण कुचदे णाणी ॥ २२८ ॥ संस्कृतार्थः-उत्पन्नोदय भोगे वियोगबुद्धिश्च तस्य स नित्यं । कांक्षामनागतस्य चोदयस्य न करोति ज्ञानी ॥ ॥ २२८ ॥ सामान्यार्थः---उत्पन्न भए उदयमें प्राप्त इन भोगोंमें जिस ज्ञानी जीवकी हेय बुन्डि होती है वह ज्ञानी नित्य हीन उदयमें आए हुए और न भविप्यमें उदय आने योग्य भागोंकी इच्छा करता है। शब्दार्थ सहित विशपार्थः-(तस्स उप्पण्णोदय भोगे) उत्पन्न भए उदय प्राप्त इन भोगोंमें (विओग वुद्धीय) जिसके वियोग वुद्धि है अर्थात् जो विषयभोगोंकी त्याग देनेकी रुचि रखता है (मो णाणी) सोस्वसंवेदन ज्ञानी (णिञ्च) नित्य ही (उदयम्स अणामहम्म) उदयमें आए हुए व अगामी उद्यमें आने योग्य भोगोंकी (कंखाम् ) इच्छा (णकुल्वदे) नहीं करता है। इसका विशेष यह है कि जो कोई भोग्य और उपभोग्य आदि चेतन और अचंतन समस्त पर वस्तुओंमें आलंबन रहित परिणाम है वह ही स्वमवेदन ज्ञान गुण कहा जाता है। इस ज्ञान गुणका अवलम्बन लेकर जो कोई पुरुष अपनी प्रसिद्धि, पूना, लाभ व भोगांकी इच्छा रूप निदानबंध आदि विभावभावांसे रहित होकर तीन जगत और तीनों कालों में भी मन, वचन काय और स्तं कारित अनुमोदनासे विषयों सुखमें आनंदकी वासनासे वासित चित्तको छोड़ कर अर्थात् अपने मनसे पंचेन्द्रियके भोगोंकी इच्छाकी वासनाको हटाकर शुद्धआत्मीक भावनासे उत्पन्न होनेवाले वीतराग परमानंद सुखसे वासित व रंजायमान, व मूर्छित व परणमन करने हुए, व तन्मय होते हुए व तृप्त करते हुए, रन, व मंतुष्ट होते हुए अपने चित्तको करके PA... - समयसार टीका। R-500AAVAloenOVERMAASE है १६० वर्तन करता है वह ही ज्ञानी तत्वज्ञ मति, श्रुत, अवधि, मनःपर्यय और केवल ज्ञानोंमें अभेद रूप परमार्थ शब्दसे कहने योग्य साक्षात् मोक्षका कारणभूत शुद्धात्माके अनुभव रूपी लक्ष- णको रखनेवाले परमागमकी भापासे वीतराग धर्मध्यान और शुक्लध्यान स्वरूपको व अपने ही द्वारा जानने योग्य शुद्धात्मीक पदको परमसमतारससे भीजे हुए भावके द्वारा अनुभव करता है। अन्य कोई नहीं । जिसतरहके परमात्म पदका अनुभव करता है उसी तरहके परमात्म पद स्वरूप मोक्षको प्राप्त करता है । क्योंकि जैसा उपादान कारण होता है वैसा कार्य बनता है। भावार्थ-जिस ज्ञान गुणमें आत्मा सिवाय अन्य सर्व पर भावोंका आलंबन व आश्रय नहीं है उसीको स्वसंवेदन ज्ञानगुण कहते हैं । उसीके द्वारा शुद्धात्म स्वरूपका अनुभव होता तब विषय सुखोंकी वासना चित्तमें नहीं होती है किन्तु आत्मासे उत्पन्न परमानन्दमें ही सुख संतोष व तृप्तिका लाभ होता है। यही वीतराग धर्म व शुक्ल ध्यान है व यही मोक्षका साक्षात् कारण है। इसतरह स्वसंवेदन ज्ञान गुणके विना मति आदि पांच ज्ञानके विकल्पोंस रहित अखंड परमात्मपदका लाभ नहीं होता है ऐसा संक्षेपसे व्याख्यान करते हुए आठ सूत्र हुए ॥ २२८ ॥ अथानंतर इसी ही ज्ञान गुणका फिर भी विशेष व्याख्यान १४ गाथाओंमें करते हैं। प्रथमही वर्णन करते हैं कि ज्ञानी सर्व द्रव्योंमें वीतरागी होता है इससे कर्मोसे नहीं लिपता है परन्तु सरागपना रखनेके कारण अज्ञानी कोसे लिप जाता है:- गाथा:-णाणी रागप्पजहो सब्बब्बेसु कम्ममज्झगदो । णो लिप्पदि कम्मरएण दु कद्दनमज्झे जहा कणयं ॥२२९॥ अण्णाणी पुण रत्तो सव्वदव्वेसु कम्ममज्झगदो। लिप्पदि कम्मरएण दु कद्दममज्झे जहा लोहं ॥ २३० ॥ संस्कृतार्थ:-ज्ञानी रागप्रहायः सर्वद्रव्येषु कर्ममध्यगतः । नो लिप्यते कर्मरजसा तु कर्दममध्ये यथा कनकं ॥ २२९ ॥ अज्ञानी पुनःरक्तः सर्वद्रव्येषु कर्ममध्यगतः । लिप्यते कर्मरजसा तु कर्दममध्ये यथा लोहं ॥ २३०॥ सामान्यार्थ-ज्ञानी आत्मा कर्मोंके मध्य पड़ा हुआ भी सर्व परद्रव्योंमें राग भावको त्याग करता हुआ उसी तरह कर्मरूपी रजसे नहीं लिप्त होता है जिसतरह कीचड़में पड़ा हुआ सोना नहीं विगड़ता है । परन्तु अज्ञानी कर्मोके मध्य पड़ा हुआ सर्व परद्रव्योंमें राग भाव करता हुआ कर्मरूपी रजसे लिप जाता है उसी तरहसे जैसे लोहा कीचड़में पड़ा हुआ बिगड़ जाता है ।शब्दार्थ सहित विशेषार्थः-( णाणी ) स्वसंवेदन ज्ञानी (रागप्पजहो) सर्व परद्रव्योंमें रागद्वेषादि नहीं करनेका स्वभाव रखता हुआ (कम्ममज्झगदो) कार्माण वर्गणाओंके - .
RsurSMINARER समयसार टीका। १९१ मध्यमें पड़ा हुआ (कंमरयेण) कामर्माण वर्गणाकी रजसे ( णो लिप्पदि ) नहीं लिप्त होता है (जहा) जसे (कणय) सुवर्ण (कद्दममझे कीचड़के बीचमें पड़ा हुआ रजसे लिप्त नहीं होता है (पुणदु) परन्तु (अण्णाणी) अज्ञानी स्वसंवेदन ज्ञानके अमावस (सव्वदृट्वेमुरत्तो) सर्व पंचेन्द्रियोंक विषयों में, व परद्रव्योंमें रागीद्वेषी होता हुआ व उनकी इच्छा करता हुभा. उनमें मूछित होता हुआवमोहित होता हुआ कम्ममझगदो) द्रव्य कार्माण वर्गणाओं के मध्यमें पड़ा हुआ (कम्म रयेण) कर्मरूपी रजसे (लिप्पदि) बंध जाता है (जहा) जसे (लोह) लोहा (कद्दममझे) कईमके बीचमें पड़ा हुआ बिगड़ जाता है। भाव.र्थ:-जैसे मुर्वण कीचड़में पड़ा हुआ नहीं बिगड़ता है तसे ज्ञानी जीव कौके मध्यमें पड़ा हुआ रागादि भावोंक अभावमें कर्मोंसे नहीं बंधता है । व जैसे लोहा कीचड़में पड़ा हुआ बिगड़ जाता है तसे अज्ञानी रागादि भावोंके कारण कर्मोंसे बंध जाता है ॥ २२९-२३० ॥ आगे शिष्य कहता है कि सर्व कर्मकी निरा नहीं होनसे किस प्रकार मान हो सकेगी इसका समाधान आचार्य करते हैं:- गाथाः-णागफणीए मृलं णाइणितोएण गम्भणागेण । णागं होइ सुवण्णं धम्मंतं भच्छवाएण ।। २६१ ॥ संस्कृतार्यः-नागफण्या मूलं नागिनीतीयेन गर्भनागेन । नागं भवति नुवर्ण वन्यमानं मत्रावायुना ।। २११ ॥ सामान्याथै-जैसे नागफणि नाम औषधिकी जड़ हथिनीक मृत्र. सिंदूर द्रव्य और सीसाके साथ वायुकी भट्टीस धोके जानेपर सुवर्ण हो जाता है। शब्दार्थ महित विशेषार्थ:- (णाग: फणीए मूलं) नागफणी नाम औषधिकी जड़से (गाइणि तायेण) नागिनी अर्थात हथि- नीके तोयं अर्थात् मूत्रसे तथा (गम्भणागेण) सिंदृर द्रव्यसे (नाग) सीमा (भच्छ वागण धम्मत्तं) भट्टीसे धौके नानेपर (सुवण्णं होइ) मुवर्ण वन जाता है। भावार्य-शिष्यक हम प्रश्नका • 'उत्तर करते हुए कि अशुद्धात्मा कैमे शुद्ध हो जाता है आचार्य दृष्टान्त देते हैं कि जम नागफणी नाम औपधिकी जड़, हथिनीका मूत्र, मेंदूर और मीसा यह चार चीज़ भट्टी मंधक जानेपर सुवर्णरूप हो जाती हैं ।। २३१ ।। आगे दाष्ट्रांत बतलाने है- गाथा:-कम्मं हवेइ किटं रागादी कालिया अह विभाओ। सम्मत्तणाणचरणं परमोसहमिदि वियाणाहि ॥२३॥ झाणं हवेड अग्गी तवयरणं भत्तली समक्वादो। जीवो हवेइ लोहं धमियचो परमजोईहिं ।। २३३ ॥ संस्कृतार्थ:-कर्म भवति किट्ट रागादयः कालिमा अथ विभावाः । सम्यक्त्वज्ञानाचरणं परमापमिति विजानादि ॥ २३२ ॥ .
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१९२
समयसार टीका।
SONOMURARGUNAKARMERA
ध्यानं भवत्यग्निः तपश्चरणं भस्त्रा समाख्यातं ।
जीवो भवति लोई धमितव्यः परमयोगिभिः ॥ २३३ ॥
सामान्यार्थः-द्रव्य कर्म इस सुवर्ण मई जीवके किट्ट हैं, रागादिक भाव कालस है,
सम्यग्दर्शन ज्ञान चारित्र इनके दूर करनेके लिये परम औषधि, मसाला है ऐसा जानना, ध्यान
अग्नि है, तपश्चरण हवादेनेकी भस्त्री कही गई है, यह जीव लोहेके समान है इसको परमयोगी
धमन करते हैं । शब्दार्थ सहित विशेषार्थ:-(कम्म) यह ज्ञानोवरणादि द्रव्य कर्म जो जीवके
बंधे हुऐ हैं वे (किडे हवेइ) सुवर्णमय कीचडके समान होते हैं, (अह रागादी विभाओ) और
राग द्वेषादिक विभाव परिणाम (कालिया हवे) सुवर्णमें कालमके सदृश होते हैं, (मम्मत णाण-
चरणं)सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्रइन तीनभेदरूपव निश्चयनयसे एक अभेदरूपमोक्ष
मार्ग परमोसहम्) परम औषधि है (इदिवियाणाहि) ऐसा जानो। तथा(झाणं)वीतराग और विकल्प
रहितध्यान(अग्गी हवेइ)अग्निके समान है (तवयरणं) अनशन आदि बारह प्रकार तपश्चरण (भत्तली
समक्खादो) पवन देनेकी व धौकनेकी धौकनीकही गई है, (जीवो) यह निकट भव्य संसारीजीव
(लोहं हवेइ) लोहा है (परम जोईहि) परम योगियोंके द्वारा पूर्वमें कही हुई रत्नत्रयरूपी औषधि
ध्यानकी अग्निकेअभ्याससे १२ तरहके तप रूपी धौंकनीसे यह जीवरूपी लोहा (धमियन्वो)
धौंकनेके योग्य है। भावार्थ:-जैसे लोहा या सीसा नागफणीकी जड़, हथनीका मूत्र, सिंदूर
इन द्रव्योंके निमित्तसे अग्निमें धौकनी द्वारा धौके जानेसे सुवर्ण होजाता है। इसी तरह जब
परमयोगी इस जीव रूपी लोहेको रत्नत्रय रूपी औषधिके साथ ध्यानकी अग्नि जलाकर १२
प्रकारकी तप रूपी धौंकनीसे धौंकते हैं अर्थात वारंवार एक मन हो आत्मध्यान करते हैं तो
इस प्रयोगसे संसारी निकट भव्य आत्माके अंदर लगी हुई रागादिक भावोंकी कालिमा व
उसके साथ एकमेक होके बैठे हुए ज्ञानावरणादि द्रव्यकर्म दूर होजाते हैं और जैसे अशुद्ध
सोना शुद्ध होजाता है इसी तरह कर्मकलंक सहित जीव कर्मोसे मुक्त होजाता है । इस तरह
भट्ट चार्वाक मतधारियोंको आचार्य कहते हैं कि जैसे सुवर्ण शुद्ध होजाता है ऐसे ही आत्मा
शुद्ध होसक्ता है। इसमें किसी तरहका संदेह नहीं करना चाहिये ॥ २३२-२३३ ॥
आगे आचार्य जानी जीवके शंखका दृष्टान्त देकर बंधका अभाव बतलाते है:--
गाथाः-भुजंतस्सवि दव्वे सच्चित्ताचित्तमिस्सिये विविहे ।
संखस्स सेदभावो णवि सक्कदि किण्हगो काढुं ॥ २३४ ॥
तह णाणिस्स दु विविहे सचित्ताचित्तमिस्सिए दव्वे ।
भुजंत्तस्सवि णाणं णवि सक्कदि रागदो गेहूँ ॥ २३९ ॥
संस्कृतार्थ:-मुंजानस्यापि विविधानि सचित्ताचित्तमिश्रितानि द्रव्याणि ।
शंखस्य श्वेतभावो नापि शम्यते कृष्णकः कर्तुं ॥ २३४ ॥
समयसार टीका। RURRERNARDArexxeusa तथा शानिनोऽपि विविधानि सचित्ताचित्तमिभिवानि द्रव्याणि । भुनानस्यापि ज्ञानं नापि शक्यते रागवां नेतुं ॥ २३५ ॥ सामान्यार्थ-सचित्त, अचित्त, मिश्र नाना प्रकारकी द्रव्योंको खाते हुए भी शंखका सफेदपना कालापन नहीं हो सकता है। तेसे नाना प्रकार सचित्त अचित्त और मिश्र पदायाँको भोगते हुए भी ज्ञानी जीवका ज्ञान रागभावको नहीं प्राप्त हो सका है। शब्दार्थ सहित विशपार्थ-जैसे (सचित्ताचित्त मिस्सिए विविहेदव्ने) मचित्त व अचित्त व मिश्र नाना प्रकारक पदार्थीको (भुजंतम्सवि) भोगते हुए भी (संखम्स) सजीव शंखका (संदमावो ) सफेदपना (किण्हदो काटुं) कृष्णरूप करनेके लिये (णविसक्कदि) नहीं शक्तिमान होता है (तह) तैसे (विविहे) नाना प्रकारके (सचित्ताचित्त मिस्सिएदव्वे भुजंतस्सवि) सचित्त, अचित्त, व मिश्र द्रव्योंको अपने गुणस्थानके अनुसार भोगते हुए भी (गाणिस्स) ज्ञानी जीवका (गाणं) वीतरागं स्वसंवेदन लक्षण भेद ज्ञान (रागदो गेहूँ) राग द्वेषरूप अर्थात अज्ञान भावरूप करनेके लिये (णविसक्कदि) नहीं शक्तिमान होता है, क्योंकि स्वभावको और तरह किया नहीं जा सक्ता । यही कारण है कि स्वसंवेदन ज्ञानी जीवके चिरकालके वांधे हुए कर्मोकी निर्जरा ही होती है और नवीन कर्मोंका संवर होता है । भावार्थ-जैसे कोई सफेद नातिका शंख मिन्नर पदार्थोको खाता हुआ भी अपने सफेदपनेको दूर नहीं करता ऐसे स्वसंवेदन ज्ञानी आत्मा उदासीन भावसे काम पड़नेपर पदार्थोंका उपभोग करते हुए भी अपना भेदज्ञान गमा नहीं बेटता है किन्तु भेदज्ञानको स्थिर करता हुआ अज्ञान भावरूप नहीं होता है इमसे पूर्वबन्धकर्मोंकी निर्जग व नवीन कर्मोका संवर करता है । ऐसा जानना ।। २३४, २१५ ॥ आगे इसी विपयको अन्यरूपसे कहते है:-- गाथा:-जझ्या स एव संखो सेदसहावं सयं पजहिण । गच्छेन्ज किण्हभावं तझ्या सुक्कत्तणं पजहे ॥ २३६ ॥ जह संखो पोग्गलदो जइया सुक्कत्तणं पजहिण । गच्छेज किण्हभावं तइया सुकत्तणं पजहे ॥ २३७ ।। तह णाणी विय जइया णाणसहावत्तयं पजहिण । अण्णाणेण परिणदो तझ्या अण्णाणदं गच्छे ॥ २३८ ॥ संस्कृतार्थः-यदा स एव शंखः श्वेतस्वभावं स्वयं प्रहाय । गच्छेत् कृण्णभावं तदा शलवं प्रजयात् ॥ २३६ ॥ यथा शंखः पौगलिकः यदा लत्वं प्रहाय । गच्छेत् कृष्णभावं तदा शुक्लत्वं प्रजह्मात् ॥ २३७ ॥ तथा जान्यपि यदि ज्ञानस्वभावं स्वयं महाय। अज्ञानेन परिणतस्तदा अज्ञानतां गन्छेत् ॥ २८ ॥ ..
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IcessorCSAGERROAVAEROESR
समयसार टीका।
सामान्यार्थः-जैसे जब वही सजीव शंख कृष्ण रंगके परद्रव्यके लेपके वशसे अंत-
रंगमें अपने ही उपादान कारणरूप परिणामके आधीन होकर अपने श्वेत भावको छोड़कर
कृष्ण भावको प्राप्त होता है तब अपने शुल्कपनेको छोड़ देता है। यह अन्वय दृष्टान्त है और
जैसे कोई जीव रहित शंख पुद्गलरूप होता हुआ जब काले परद्रव्यके लेप किये जानेके
कारणसे अपने अंतरंग उपादान परिणामके आधीन होकर अपने सफेद स्वभावको छोड़कर
कालेपनेको प्राप्त हो जाता है तब वह निर्जीव शंख अपने शुक्लपनेको छोड़ बैठता है। यह
दूसरा अन्वय दृष्टान्त है। इसी ही प्रकारसे ज्ञानी जीव भी प्रकटपने जब अपनी ही बुद्धिके
अपराधसे वीतरागरूप ज्ञान स्वभावपनेको छोड़कर मिथ्यात्त्व व राग द्वेषादि अज्ञान भावसे
परिणमन करता हुआ होता है तब अपने आत्मतल्लीन भावसे छुटा हुआ अज्ञानपनेको प्राप्त
हो जाता है तब उसके संवरपूर्वक निर्जरा नहीं होती है यह तात्पर्य है। शब्दार्थ सुगम है
भावार्थ:-ज्ञानी जीव अपने ही दृढ़ भावोंमें जब नहीं ठहर सक्ता और शिथिल होकर राग
द्वेषरूप परिणमन कर जाता है तब इसके न संवर है और न बंध रहित निर्जरा है । अतएव
ज्ञानीको अपने स्वरूपमें निश्चलता रखनेका अभ्यास दृढ़ मन होकर करना योग्य है ।
॥ २३६-२३७-२३८ ॥
आगे इस वातको दृष्टान्त और दाष्ट्रान्तोसे समर्थन करते है कि सराग परिणामसे बंध
और वीतराग परिणामसे मोक्ष होता है:-
गाथाः-पुरिसो जह कोवि इहं वित्तिणिमित्तं तु सेवदे रायं ।
तो सोवि देदि राया विविहे भोगे सुहुप्पादे ॥ २३९ ॥
संस्कृतार्थः-पुरुषो यथा कोपीह वृत्तिनिमित्तं तु सेवत राजानं ।
तत्सोऽपि ददाति राजा विविधान् भोगान् सुखोत्पादकान् || २३९ ॥
सामान्यार्थः--जैसे कोई पुरुष इस लोकमें आजीविकाके वास्ते राजाकी सेवा करता है
तब ही राजा उसको नाना प्रकार सुख उत्पन्न करनेवाले भोग देता है। शब्दार्थ सहित
विशेषार्थः-(इह) इस लोकमें (जह) जैसे (कोविपुरुसो) कोई भी पुरुष (वित्तिणिमित्तंतु)
अपनी आजीविका पानेके निमित्तसे (रायं सेवदे) किसी राजाकी सेवा चाकरी करता है (तो)
इससे (सो वि राया) वही राजा (सुहुप्पादे विविहे भोगे) उस सेवकको सांसारिक सुखोंको पैदा-
करनेवाले नाना प्रकारके भोगोंको (देदि) देता है। यह अज्ञानी जीवके कर्त्तव्यको दिखाते हुए
अन्वय दृष्टान्त गाथा पूर्ण हुई ॥ २३९ ॥
अव दाष्ट्रान्त कहते हैं:-
गाथाः-एमेव जीवपुरिसो कम्मरयं सेवदे सुहणिमित्तं ।
तो सोवि कम्मरायो देदि सुहुप्पादगे भोगे ॥ २४० ॥
SAMASKARositor
समयसार टीका।
संस्कृतार्थ:-एवमेव जीवपुरुषः कमरजः सेवत सुन्ननिमित्तं ।
तत्सापि कर्मराजा दास मुखोत्स. कन् मोगान् ॥ २४० ॥
मामान्यार्थः-इसी ही तरह यह जीक पुरुष कर्मरूपी रजको मुखके वास्ते मेवन
करता है तब वही कर्मरूपी राजा सुखको उत्पन्न करनेवाले भोग देता है ।शब्दार्य सहित
विशवार्थः-(एमेव) ऊपरके दृष्टान्तके सदृश ही (जीव पुरिसो) कोई अज्ञानी जीव पुरुष शुद्धा-
त्माके अनुभवसे उत्पन्न होनेवाले अतीन्द्रिय सुखसे छुटा हुआ (कंमरय) उदयमें आप
हुए कर्मरूपी रजको (सुहणिमित). पंचेन्द्रियोंके विषय जनित सुख के निमित्त
(सेवदे) सेवता है अर्थात् विषयसुखकी अभिलापासे पूर्वमें बांधे हुए कर्माको भोगना
है (तो) तब (सोवि) वही पूर्वमें बांधा हुआ (कंमराया) पुण्यकम्मरूपी राना (मुहु-
प्पादगे भोगे देदे) विषयोंके सुखको पैदा करनेवाले भोगोंकी इच्छारूप तथा शुद्धात्मीक
भावोंको नाश करनेवाले रागादि परिणामोंको देता है। भावार्थ:-अज्ञानी जीवके निरंतर विष-
योंके सुखकी इच्छा रहती है इसीलिये पूर्वका पुण्यकर्म जब उदय आता है जिससे धनादि
सम्पदा होती है तब उसके रागादि भाव ही होते हैं कि मैं नाना प्रकारके भोगोंको भोगें।
इससे वह अज्ञानी शुद्ध भावोंका लाभ नहीं कर सकता | अंतरंग बंधको प्राप्त होता है । इसी
गाथाका दूसरा अर्थ करते हैं कि कोई भी जीव नवीन पुण्यकर्म वांधनेकी इच्छासे भोगोंकी
इच्छामई निदान. भावसे शुभकर्म दान पूजा जप तपादिका अनुष्ठान करता है इसलिये वह
पाप भावके साथर रहनेवाला पुण्यरूपी राजा शुभकाँको बांधकर भविष्यकालमें भोगोंको देता
है परन्तु वे निदान बंधसे प्राप्त हुए भोग रावण आदिके समान नरकादिके दुःखांकी परंपराको
प्राप्त कराते हैं । अर्थात् जो कोई शुभकर्म आगामी विषयोंकी इच्छा रखता हुआ करता है
तो वह पुण्यको तो बांध लेता है और उस कर्मके फलने पर भोग सामग्री मी पाता है।
परंतु वह भोग सामग्री उसके मनको उलझाकर रागादि भावोंमें विशेष फंसा देती है निससे
वह पापोंको बांध नरकादि गतियोंका पात्र होजाता है जैसे रावण, लक्ष्मण-कृष्ण आदि महा-
पुरुष नर्कको प्राप्त हुए हैं । इसतरह अज्ञानी जीवका अन्वय हॅप्टांत पूर्ण हुआ ॥२४०॥
आगे ज्ञानी जीवका वर्णन करते है-
गाथा:-जह पुण सो चेव गरो वित्तिणिमित्तं ण सेवदे रायं ।
तो सो ण देदि राया विविहमुहुप्पादगे भोगे ॥ २४१ ॥
एमेव सम्मदिही विसरत्तं सेवदे ण कम्मरयं ।
तो सो ण देदि कम्मं विविहे भोगे सुहप्पादे ॥ २४२ ॥
संस्कृतार्थ:-यया पुनः सए नगे दृचिनिमित्तं न सेवते राजानं ।
तत्वोऽपि न ददाति राजा विविधान् सुखात्यादवान् भोगान् ॥ २१ ॥
समयसार टीका। PSIGNROENDELIVLOT एवमेव सम्यग्दृष्टिः विपयार्थ सेवते न कर्मरजः । तत्तन्न ददाति कम विविधान् भोगान् सुखोत्गदकान् || २४२ ॥ सामान्यार्थः । जेसे वही मनुष्य किसी खास आजीविकाके वास्ते राजाकी सेवा नहीं करता है तो वह राजा उसे नाना प्रकार सुखके उत्पन्न करनेवाले भोग नहीं देता है इसी ही तरह सम्यग्दृष्टी जीव विषय सुखके लिये कर्मरूपी रजकी सेवा नहीं करता है इससे वह कर्मरूपी रज नाना प्रकार सुखके पैदा करनेवाले भोगोंको नहीं देता है । शब्दार्थ सहि- त विशेषार्थः-(पुण) फिर (जह) जैसे (सोचेव णरो) वही पूर्वोक्त मनुष्य (वित्तिणिमित्तं) किसी आजीविकाके मतलबसे (राय) राजाकी (ण सेवदे) सेवा नहीं करता है (तो) तब (सो राया) वह राजा (विविह सुहुप्पादगे भोगे) नाना प्रकार सुखके उत्पन्न करनेवाले भोग (ण देदि ) नहीं देता है। यह ज्ञानी जीवके सम्बन्धमें व्यतिरेक दृष्टान्त पूर्ण हुआ। ( एमेव ) इस ही प्रकारसे ( सम्मविट्ठी) सम्यग्दृष्टी भेद विज्ञानी जीव ( विसयत्थं ) विषय सुखोंके भोगनेके लिये (कंमरय) पूर्वमें बांधे हुए द्रव्य कर्मोको (णसेवदे) शुद्ध आत्मा- की भावनासे उत्पन्न वीतराग सुखानंदसे गिर करके उन विषयोंको उपादेयपनेकी बुद्धिसे नहीं सेवता है (तो) इससे (सो कम्म) वह पूर्ववद्ध कर्म भी उदयमें आता हुआ (विविहे सुहु 'पादगे भोगे) नाना प्रकार सुखके पैदा करने वाले भोगोंकी इच्छारूप तथा शुद्धात्मीक भा- वोंके घात करनेवाले रागद्वेषादि परिणामोंको (ण देदि) नहीं देता है। भावार्थ:-जैसे वेगरज़ आदमी किसी राजाकी सभामें विना किसी आजीविकाके प्रयोजनके जाता है तब वह रांजा भी उसे खास कोई द्रव्य उसकी रोजीके लिये नहीं देता है उसी तरह सम्यग्दृष्टी जीव पांच इन्द्रियोंके भोगोंकी भीतरसे रुचि नहीं रखता हुआ किन्तु अंतरंगसे आत्मीक रसके स्वादकी ही तीव्र रुचि रखता हुआ जो पूर्व वद्ध शुभवं अशुभकर्म उद्यमें आकर रस देते हैं उनको उदासीन भावसे भोग लेता है इसी कारणसे उसके भोगोंकी इच्छारूप रागादि परि- णाम नहीं होते हैं जिनसे शुद्धात्मीक भावोंका घात हो जावे अर्थात् उनकी वासना अंतरंगसे मिट जावे । दृष्टांतरूपी दूसरी गाथाका दूसरा व्याख्यान यह है कि कोई भी सम्यग्दृष्टी जीव विकल्प रहित समाधिको न पाकर उस समाधिमें ठहरनेको असमर्थ होकर अपना चित्त विषय व कषायोंमें नहीं उलझ जावे इसलिये यद्यपि पांच अहिंसादि व्रत, दिग्वतादि सात शील व आहार, औषधि, अभय, व विद्यादान व अर्हत, गुरु व शास्त्रकी पूना, व तीर्थयात्रा आदि शुभ कर्मोको करता है तौभी इन पुण्य कर्मोको भोगोंकी इच्छारूप निदान बंधके साथ नहीं आच- रण करता है इससे वह पुण्यानुबंधी पुण्य कर्म बांधता है। पापानुबंधी पुण्य कर्म नहीं बांधता है । जिस पुण्य कर्मके उदय होनेपर जीवा प्रवृत्ति फिर पुण्य कर्ममें व अपने हिनमें रहे उसे पुण्यानुबंधी पुण्य कर्म व जिसके उदय होनेसे जीवकी प्रवृत्ति पाप कर्ममें समयसार टीका। १०७ BOLLORANDEmirement हो सके उसे पापानुबंधी पुण्य कर्म कहते हैं । सम्यग्दृष्टी पुण्यानुबंधी पुण्यकर्मको ही बांधना है जिसके फलसे आगेके भवमें वह पुण्यकर्म तीर्थकर, चक्रवर्ती, बलदेव आदिकेअभ्युदयरुपसे उदयमें आता हुआ भी पूर्वभवमें भाए हुए भेदविज्ञानकी वासनाके बलसे शुढात्माकी भावनाके नाश करनेवाले व विपयोंके सुखोंको उत्पन्न करनेवाले भोगोंकी इच्छारूप निदान यंधमई रांगादि परिणामोंको नहीं देता है-अर्थात् नहीं पैदा करता है जैसे भरतचक्रवर्ती, आदि महात्माओंके नहीं हुआ। भावार्थः-जो कोई व्यवहार तप, व्रत, संयम, पूना, यात्रा, दानादि शुभ कर्मोको किसी सांसारिक सुखके लोभसे न करके शुद्धात्मीक भावके अनुभवको तलाश करते हुए जब तक अनुभवमें लीनपना नहीं पाता तब तक विषय कपायोंमें मेरा मन न फंस नावे इस प्रयोजनसे करता है। उसको जो पुण्य वंध होता है उसके प्रतापसे वह तीर्थंकरादि 'महान् पदवीधारक होता हुआ व नाना प्रकार भोगोंकी सामग्रीको प्राप्त करता हुआ भी अपने भेदविज्ञानको नहीं छोड़ बैठता है। अतएव सम्यग्दृष्टी जीवको नित्य शुद्धात्माकी भावना ही करनी योग्य है। जब लाचारीसे अपना उपयोग निजानंदमय स्वरूपमें न ठहर सके तब शुभोपयोगरूप आचरणको करे परन्तु रुचि व खोज शुद्धात्मानुभवकी ही रक्खे । इसतरह सम्यग्ज्ञानी जीवका व्यतिरेक कथन दृष्टान्त दाष्ट्रान्तमें पूर्ण हुआ ॥ २४१-२४२ ॥ इसतरह मति, श्रुत, अवधि, मनःपर्यय और केवलज्ञानका अभेदरूप जो परमात्मपद है, जिसको परमार्थ शब्दसे कहते हैं, व जो साक्षात् मोक्षका कारणभूत है, शुद्धात्माके अनुभवरूपी लक्षणको रखनेवाला है तथा संवर पूर्वक निनराका उपादान कारण है व जिसका वर्णन पहले करचुके हैं सो परमात्मपद जिस विकार रहित स्वसंवेदन लक्षणरूप भेदज्ञानसे प्राप्त होता है उसीका विशेष व्याख्यान करते हुए १४ सूत्र पूर्ण हुए। इसके आगे निःशंकादि आठ गुणोंको कहते हुए नौ गाथा पर्यंत व्याख्यान करते हैं। इनमेंसे पहली गाथामें यह कहते हैं कि जो सम्यक्त्वी जीव अपने परमात्म पदार्थकी भावनासे उत्पन्न सुखामृत रसके आस्वादको लेते हुए तृप्त रहते हैं वे घोर उपमर्ग पड़ने पर भी इस लोक, परलोक, मरण, वेदना, अंगुप्ति, अनरक्षा व आकस्मिक ऐसे सात भयोंसे रहित होते • " हुए विकार रहित स्वानुभव स्वरूप अपने आत्मामें तल्लीन पनेक भावको नहीं छोड़ने हैं। -सम्मादिट्टी जीवा णिस्संका हांति णिन्भया तेण । सत्तभयविप्पमुक्का जह्मा तह्मा दु णिस्संका ॥ २४३ ।। संस्कृतार्थः- सम्यग्दृष्टयो जीवा निःशंकाः भवंति निर्भयास्तेन । सप्तमयविषमुक्ता यस्मात्तस्मात्तु निशंकाः ॥ २३ ॥ सामान्यार्थः-- सम्यग्दृष्टी जीव शंका रहित रहते हैं इसीसे निर्भय होते हैं । क्योंकि वे सात भय नहीं रखते हमीसे निःशंक रहते हैं । शब्दार्थ सहिन विशेषार्थ:-(मम्मादिट्टा- गाथा:- स्थर SUNAVARANSI - ANUARMIRRIER १९८ समयसार टीका। जीवां) सम्यग्दृष्टीजीव शुद्ध बुद्ध एक स्वभावरूप निर्दोष परमात्माकी आराधनाको करते हुए (णिस्संका हौति) निःशंक होते हैं ( तेण णिच्भया) इसीसे वे भय रहित होते हैं। ( जम्हा) क्योंकि वे ( सत्तभय विप्पमुक्का) इस लोक, पर लोक, अनरक्षा, अगुप्ति, मरण, वेदना और आकस्मिक इन सातों भयोंसे रहित होते हैं ( तम्हादु) तिस कारणसे (णिस्संका) निःशंक रहते हैं । अर्थात् घोर परीपह व उपसर्ग आजाने पर भी अपने शुद्ध आत्मीक स्वरूपमें निश्चल रहते हुए व शुद्धआत्माकी भावनासे उत्पन्न जो वीत- राग परमानंद सुख उसमें तृप्त रहते हुए अपने परमात्मरूपसे नहीं गिरते हैं। जैसे पांडवोंको जब गर्म लोहेके गहने पहनाए गए तो भी वे अपने ध्यानसे न डिगे इससे वे युधिष्टिर, भीम और अर्जुन उसी ध्यानसे केवली हो मुक्त पधारे । इसी तरह अनेक महात्माओंने शरीरपर केशोंका वादल आने पर भी अपने स्वरूपको नहीं त्यागा। भावार्थ:-जिन वीतराग सम्यग्दृष्टी जीवोंके श्रद्धान ज्ञान व मननमें अपने आत्माका शुद्ध बुद्ध अविनाशीपना रहता है वे बाह्य शरीरपर अनेक देव, मनुष्य, पशु, व अचेतन कृत उपसर्ग पड़े व क्षुधादि २२ परीपह हों तौ भी शरीरको विनश्वर जान उसके बिगाइसे अपना बिगाड़ नहीं मानते आप आत्मानंदमें लवलीन रहते हैं और स्वात्मीक रसका पान करते हैं ॥ २४३ ॥ आगे कहते हैं कि वीतराग सम्यग्दृष्टी जीवके निःशंक आदि आठ गुण नवीन बंधको दूर करते हैं इससे यंध होता नहीं किंतु पूर्ववद्रकोंकी संवर पूर्वक निर्जराही होती है । गाथाः-जो चत्तारिवि पाए छिंददि ते कम्ममोहवाधकरे । सो णिस्संको चेदा सम्मादिट्ठी मुणेदव्वो ॥ २४४ ॥ संस्कृतार्थ-यश्चतुरोपि पादान् छिनत्ति तान् कर्ममोहवाधाकरान् । स निश्शंकश्वेतायता सम्यग्दृष्टिमतपः ॥ २४४ ॥ सामान्यार्थ:-जो कोई कर्मबंध करनेवाले व मोह व बाधाको पैदाकरनेवाले मिथ्या- त्वादि चारों बंधके पायोंको नाश करता है वह सम्यग्दृष्टी आत्मा शंका रहित है ऐसा जानना चाहिये । शब्दार्थ सहित विशेषार्थः-(जो) जो कोई ज्ञानी (कम्ममोह बाधकरे) कर्मोंसे रहित आत्मीक तत्त्वसे विलक्षण जो ज्ञानावरणीय आदि कम हैं उनको बांधनेवाले, व मोह रहित . आत्मद्रव्यसे जुदानो मोह है उसको पैदाकरनेवाले,व बाधारहित सुख आदि गुणोंकाधारीजोपरमात्मा पदार्थ है उससे भिन्न होनेके कारणसेबाधा पहुँचानेवाले ऐसे (ते)उन आगममें प्रसिद्ध (चत्तारिविपाए) चारों ही मिथ्यात्व, अविरति, कषाय और योगरूप संसारके मूलभूत बंधके कारणोंको (छिंददि) अपने शुद्ध आत्माकी भावनामें शंका रहित निश्चल होकर स्वसंवेदन ज्ञानरूपी खड़से नाश करता है । ( सो चेदा ) वह आत्मा ( णिस्संको सम्मादिट्ठी) शंका रहित सम्यग्दृष्टी है ऐसा (मुणेयव्नो) मानना योग्य है। उसके अपने शुद्ध आत्म स्वरूपकी भावनामें किसी प्रकार की शंका R Demese समयसार टीका। १५९ नहीं है इसलिये शंका रहनेसे जो कर्मोंका बंध हो सकता था सो नहीं होता है किन्तु पूर्वमें वांधे हुए कर्मोकी निश्चयसे निर्जरा ही होती है। भावार्थ-जो कोई ज्ञानी अपने शुद्ध आ- त्मीक स्वरूपका दृढ़तासे निश्चलतासे श्रद्धान रखता है और उसमें तन्मय रहना है उसके रागद्वेपादिका अमाव होनेके कारणसे बंध नहीं होता किन्तु पूर्वबन्द कर्मोकी निजंग ही होती है इस कारण संसारका विच्छेद करनेके लिये ज्ञानी जीवको अपने शुद्ध स्वरूपका अनुभव करना योग्य है ।। २४४ ॥ आगे निकांक्षित भावको कहते हैं- गाथाः-जो ण करेदि दुकंवं कम्मफले तहय सव्वधम्मसु । सो णिकखो चेदा सम्मादिट्टी मुणेदव्वी ॥ २४५ ॥ संस्कृतार्थ:-यो न करोति तु कांक्षा कर्मफलेषु तथा च सर्वधर्मेषु । स निष्काशश्वेतायता तम्याहाष्टमन्तव्यः ॥ २४५ ॥ सामान्यार्थ जो कोई सम्यग्दृष्टी कौके फलोंमें व सर्व व्यवहार धामें इच्छा नहीं करता है वही सम्यग्दृष्टी आत्मा इच्छा रहित है ऐसा जानना योग्य है। शब्दार्थ महिन विशेषार्थ:-(जो) जोकोई ज्ञानी (कम्मफले) शुद्ध आत्माकी भावनासे उत्पन्न होनेवाले परमानंद सुखमें तृप्त होकर पंचेन्द्रियके विषय सुखरूप कर्मोके फलोंमें (तहय) तसे ही (सव्वधम्मेस) सर्व वस्तुओं के स्वभावोंमें अथवा विषय सुखके कारणभूत नाना प्रकार पुण्यरूप धर्मोमें अथवा इसलोक व परलोक सम्बधी इच्छाओंके कारणरूप समस्त पर आगममें कहे हुए कुधर्मों में (कंख) इच्छा (णकरेदि) नहीं करता है (सो चेदा) वह आत्मा (सम्मादिट्टी) सम्यग्दृष्टी (णिकंखो) इच्छा व कांक्षा रहित है ऐसा (मुणेयव्यो) जानना योग्य है । इस ज्ञानी जीवक विषयोंके सुखोंकी इच्छा नहीं होती इसलिये इच्छा करनेसे जो कर्मोंका बंध होता सो नहीं होता है किन्तु पूर्वमें संचय किये हुए कर्मोंकी निर्जराही होती है । भावार्थ-सम्यग्दृष्टी जीव परमान- न्दमें तृप्त होकर न संसारके सुखोंमें न उनके कारण पुण्यक्रमों में और न पुण्यक्रमके लोभके दिखानेवाले धर्मोमें चाह करता है परम साम्य भावमें तन्मय रहकर अपने पूर्वकर्माको नाम करता है ॥ २४५ ॥ आगे निविचिकित्सितभाषका वर्णन करते हैं- गाथाः—जो ण करेदि दुगुठं चेदा सव्वेसिमेव धम्माणं । मो खलु णिचिदिगिंछो समादिट्टी मुणेदव्यो ॥ २४६ ॥ संस्कृतार्थ-यो न रोति जुगुप्सां चेतयिता संपामेव धर्माणां । स खलु निर्विचिकित्सः सम्यग्दृष्टिन्तव्यः ॥ २४६ ॥ सामान्यार्थः-जो कोई ज्ञानी सर्व ही वस्तुके स्वभावोंमें घृणा नहीं करता है वह निश्चयसे जुगुप्सासे रहित सम्यग्दृष्टी है ऐसा मानना चाहिये । शब्दार्थ सहित विशेषार्थ- ---
CACANCYCAMS
-
Siwwwmummiumawmumm
२००
समयसार टीका।
(जो चेदा) जो कोई चेतनेवाला ज्ञानी जीव अपने परम आत्मीक तत्वकी भावनाके बलसे
(सव्वेसिमेवधम्माणं) सर्व ही वस्तुके स्वभावोंमें वा दुगंध आदिके विषयोंमें (दुगुंछं ण करेदि)
जुगुप्सा, निंदा, द्वेष, व घृणा नहीं करता है (सो) वह (खलु) प्रकट रूपसे (णिविदि-
गिंछो) जुगप्सा नामादोपसे रहित (सम्मादिट्ठी) सम्यग्दृष्टी (मुणेदवो) जानना योग्य है-
इस ज्ञानीके परद्रव्योंमें द्वेष नहीं है इससे द्वेष करनेके निमित्तसं जो कर्मबंध होता मो
नहीं होता है किन्तु भेदविज्ञानके बलसे पूर्वमें एकत्र किये हुए कर्मोंकी निर्जरा ही होती है।
भावार्थः-जो ज्ञानी अपने आत्माका यथार्थ निश्चय रखता हुआ रहता है उसको किमी
पदार्थसे घृणा नहीं होती, वह वस्तुके स्वरूपको विचार मध्यस्थ रहता है। इसलिये वह
निर्विचिकित्सित अंगका धारी है ॥ २४६ ॥
आगे निर्मूढता अंगको कहते हैं-
गाथाः-जो हवदि असम्मूढो चेदा सव्वेसु कम्मभावसु ।
सो खलु अमूददिट्ठी सम्मादिट्ठी मुणेदव्यो । २४७ ॥
संस्कृतार्थः-यो भवति, असंमूढचैतयिता सवा कर्मभावेगु ।
स खलु अमृददृष्टिः सम्यग्दृष्टिमन्तव्यः ॥ २४७ ॥
सामान्यार्थ—जो कोइ ज्ञानी सर्व कर्मोके उदयरूप भावोंमें मृदत्ता रहित होता है वह
प्रकटपने अमूढ़ दृष्टि अंगकाधारी सम्यग्दृष्टि है ऐसाजानना योग्य है। शब्द सहित विशेषार्थ-
(जो चेदा) जो ज्ञानी आत्मा (सव्वेसु कम्मभावेसु) सर्व ही शुभ व अशुभ कर्मोसे उदय होने-
वाले परिणामोंमें व बाह्य पदार्थोंमें (असंमूढो) अपने ही शुद्ध आत्मामें दृढ़ श्रदान, ज्ञान,
आचरणरूप निश्चय रत्नत्रय लक्षणको रखनेवाली भावनाके वलसे सर्व मूढ़ता रहित (हवदि)
होता है अर्थात् कर्मोके उदयसे जो दुःखरूप व वाह्य सातारूप पदार्थोकी अवस्थाएँ होती
हैं उनमें शोकित व हर्पित न होकर उनका यथार्थ स्वरूप जानता हुआ उनके मोहमें पड़के
आप मूर्ख नहीं बन जाता है (सो) वह (खलु) प्रकटपने (अमृढ़ दिट्ठी सम्मादिट्ठी) अमूढ़ दृष्टि
अंगका धारी सम्यग्दृष्टी है ऐसा (मुणेदव्यो) मानना योग्य है । इस ज्ञानी जीवके भीतर
वाह्य पदार्थोंमें मूढ़ताका भाव नहीं होता है इससे मूढ़ताके होनेसे जो कर्म बंध हो सकता था
वह नहीं होता है अथवा खसमय अर्थात् अपना शुद्धात्मा व उसका वर्णन करनेवाला यथार्थ
आगमको छोड़कर पर समय अर्थात् शुद्ध स्वरूपसे वाह्य रागी द्वेषी आत्मा व धर्मादिक
ज्ञेय पदार्थ व संसारका मूलसे जो छेदक नहीं है ऐसा एकान्त आगमका श्रद्धान, ज्ञान कर-
नेसे जो कर्म बंध होता वह नहीं होता है किन्तु पूर्व में बांधे हुए कर्मोंकी निश्चयसे निर्जरा ही
होती है । भावार्थ:-सम्यग्दृष्टी वस्तुके यथार्थ स्वरूपका अनुभव करता हुआ वस्तुकी
अवस्थाओंको देख व मनको वहका कर मूढ़ नहीं बनता। किन्तु ज्ञानी रहकर पूर्व वद्धकर्मोकी
निर्जरा ही करता है ॥ २४७ ॥
समयसार टीका। JanRCORRRRRRRes माग उपग्रहन अगागा वगैन काम है। गाथा:-जो सिडभत्तिजुत्तो उवगृहणगोदु सव्वधम्माणं । सो उवगृहणगारी सम्मादिट्टी मुणेदव्यो ॥ २४८ ॥ संस्कृतार्थः-तः सिद्वभनियुक: उपगृहनकम्नु सबमीणां । से 'उगृहकारी सम्पदृष्टिान्तः॥ २८ ॥ सामान्धार्थः----जो मिढ भक्तिमें लवलीन पुम्प पर्व विभाव धर्मोका ढकनेवाला है वह उपगृहन अंगका धारी सम्यग्दृष्टी है ऐसा मानना योग्य है। शब्दार्थ सहित विशेपार्थः-(गो) जो कोई ज्ञानी (सिद्ध भत्ति जुत्तो) शुद्ध आत्माकी भावनामई परमार्थ स्वरूप निश्चय सिद्ध भगवानकी भक्तिमें तल्लीन है और (सव्वधम्माणं उवगृहणगोदु) मिथ्यादर्शन रागहेप आदि सर्व विभाव भावोंका उपगृहनकरनेवाला है. आच्छादन करनेवाला है अथवा नाश करनेवाला है (सो) सो (उवगृहणगारी सम्मादिट्टी) उवगृहन अंगका धारी मम्यग्दृष्टि है ऐमा (मुणेदव्यो) जानना योग्य है । उस ज्ञानी जीवके वह कर्मबंध जो उपगृहुन अंगके न पालनेवालेक होता नहीं होता है किंतु पूर्वमें बांधे हुए कर्मोकी निश्चयसे निर्जरा ही होती है भावार्थः-दोषोंको आच्छादन करनेका नाम उपगृहन अंग है यहां अपने ही आत्मापर घटाके कहने हैं कि जो कोई नानी अपनेमें विभाव भाव नहीं होने देता अथवा उनका नाग करके अपने मिड म्ब- रूपमें तल्लीन रहता है वही वास्तबमें उपगृहन अंगका पालक सम्यग्दृष्टी है ऐमा जानो॥२४८॥ आग थिनीकरण अंगको कहत है:- गाथा:- उम्गं गच्छं मिवमन्गे जो ठवदि अप्पाणं। सोठिदिकरणेण जुदा सम्मादिट्टी मुणेदबा ॥ २४ ॥ संस्कृतार्थ:-उन्मार्ग गच्छंत शिवमार्ग यः स्थापयत्वात्मानं ! स स्थिनिकरणेन. युनः माथिमन्तः ॥ २४ ॥ सामन्यार्थः--जो कुमार्गमें जाने हा आत्माको रोककर मोक्ष मागमें स्थापित करना है सो स्थितिकरण अंगका धारी सम्यग्दृष्टि है ऐमा मानना योग्य है ।-शुदाय महिल- विशेषार्थ:-(जो) कोई ज्ञानी (उम्मग्गं गच्छत) मोक्ष मार्गसे विपरीत मंमारक कुमार्गमें जाने हुए (अप्पाण) अपने आत्माको (मित्रमग्गे) शिव मार्गमें अर्थात अपने शुद्ध आन्माकी भावना स्वरूप निश्चय मोक्ष मार्गमें (ठवेदि) परम योगाभ्यामके वलसे निश्चल म्यापित करना है (सो) वह ज्ञानी (ठिदिकरणेणजुदो) स्थितिकरण अंग सहित (मम्मादिट्ठी) मम्यग्दृष्टी है गमा (मुणेदव्वो) जानना योग्य है । उस जीवके स्थितिकरण न करनेमे जो कोकायच होता मा नहीं होता है किंतु पूर्व बांधे हुए काँकी निश्चयसे निर्जरा ही होती है भावार्थ-जो यो ज्ञानी आत्मा योगाभ्यासके वलस अपने आत्माके उपयोगको संमारके गगडेपरूप माग गेम PMRUNASIRMIREMI- समयसार टीका। iseseERINKSHAKRcNext Ja । २०२ कर शुद्धात्माकी भावना स्वरूप मोक्ष मार्गमें स्थापित करता है वह स्थितिकग्ण अंगका पाल- नेवाला सम्यग्दृष्टी है ऐसा जानना योग्य है ।। २४९ ॥ आगे वात्सल्य भावका वर्णन करते है- गाथा:-जो कुणदि वच्छलत्तं तिण्टे साधूण मोक्खमग्गम्मि । सो वच्छलभावजुदो सम्मादिही मुणेदव्यो ॥ २५० ॥ संस्कृतार्य:- यः करोति वत्सलत्वं त्रयाणां साधूनां मोक्षमागें। सः वात्सल्यभावयुक्तः सम्यग्दृष्टिमन्तव्यः ॥ २५० ॥ सामान्यार्थ-जो कोई सम्यग्दर्शन, ज्ञान चारित्र रूप तीन मोक्ष मागके साधक भावोंकी भक्ति करता है सो वात्सल्य भावका धारी सम्यग्दृष्टी है ऐसा मानना चाहिये । शब्दार्थ सहित विशेपार्थः-(जो) जो कोई ज्ञानी मोक्ष मार्गमें ठहरकर (मोक्ख मग्ग- म्मि) मोक्ष मार्गके (साधूण) साधन करनेवाले (तिण्हे) इन तीन सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान और सन्यक्चारित्र रूप अपने ही भावोंकी (वच्छलत्तं कुणदि) भक्ति करता है अथवा व्यवहार नयसे इन- रत्नत्रयोंके धरनेवाले साधुओंकी भक्ति करता है (सो) वह (वच्छलभाव जुदो सम्मादिट्टी) वात्सल्य भावका धारी सम्यग्दृष्टी है ऐसा (मुणेदव्वो) मानना चाहिये । उस ज्ञानी जीवके वह कर्मबंध नहीं होता जो वात्सल्यभाव न धरनेवालेके होता है किंतु इस वात्सल्य भावके धारी सम्यग्दृष्टी जीवके पूर्वमें संचय किये हुए कर्मोकी निर्जरा ही होती है ।। भावार्थ:-निश्चय नयसे प्रीति और भक्ति करने योग्य अपने ही अभेद रत्नत्रय हैं अर्थात् परम भक्तिके साथ अपने ही शुद्धात्माकी प्रताति, ज्ञान व अनुभव साक्षात् मोक्ष मार्ग है। यही निर्विकल्प समाधिको उत्पन्न करता है जो कर्मोके विध्वंस करनेके लिये अति तीव्र अग्नि है, यही निश्चय वात्सल्य है । व्यवहार नयसे व्यवहार सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यकचारित्र तथा उनके पालनेवाले साधु महात्मा अंतरात्मा ही भक्ति करने व वात्सल्य करनेके योग्य हैं । जो निश्चय वात्सल्यमें स्थिर होता है उसके पूर्व बद्ध कमोकी अवश्य निर्जरा होती है ॥ २५० ।। आगे प्रभावना अंगका स्वरूप कहते है:- गाथाः-विज्बारहमारुढो मणोरहरएसु हणदि जो चेदा । सो जिणणाणपहावी सम्मादिट्ठी मुणेदवो ॥ २५१ ॥ संस्कृतार्थः-विद्यारथमारूढः मनोरथरयान् इति यश्चेतयिना । स जिनशानप्रभावी सम्यग्दृष्टिमन्तव्यः ॥ २५१ ॥ सामान्यार्थ:--- जो कोई ज्ञानी विद्यारूपी रथमें चढ़ करके मनरूपी रथके वेगोंको नाश करता है सो जिनेन्द्रके ज्ञानका प्रभावना करनेवाला सम्यग्दृष्टी है ऐसा जानना शब्दार्थ सहित विशेषार्थः- (जो चेदा) जो कोई ज्ञानी (विजारहमारूडो) अपने " १ -- -- सपयसार टीका। शुद्ध आत्मीक तत्वकी प्राप्तिरूप विद्यामई रथपर चढ़कर (मनोरहरयेम) मनरूपी रथके वेगोंको अर्थात् नगत्में प्रसिद्धि, पूजा, लाभ व भोगोंकी इच्छाको आदि लेकर निदानबंध आदि विभाव परिणामरूंप तथा द्रव्य, क्षेत्र, काल, भव, और भाव रूप पांच प्रकार सांसारिक दुःखकि कारण चित्तकी कल्लोलरूप आत्माके शत्रुओंको (हणदि) आत्मामें स्थिति भावरूप मारथीके बरसे अति हद व्यानरूपी खड्गके द्वारा मारता है । (सो) मों (निणणांण पहावी सम्मादिही) जिन ज्ञानक्री प्रभावना करनेवाला सम्यग्दृष्टि है ऐसा (मुणेदव्यो) मानना चाहिये । उम जीवके वह कर्मका बंध नहीं होगा जो अप्रभावना करनेवालोंके होता है किन्तु पूर्वम मंचय किये हुए कर्मोकी निश्चयसे निनरा ही होगी । भावार्य-जैसे कोई योद्धा रथमें चढ़ा हुआ प्रवीण सारथीके बलसे अपनी खड्गको चलाकर शत्रुओंके रथको हटोता है और संहार करता है ऐसे ही ज्ञानी सम्यग्दृष्टी वीर आत्मा शुद्धोपयोगरूपी रथमें चंदकर मनरूपी रथापर चढ़े हुए अनेक विभाव परिणाम रूपी शत्रुओंको ‘आत्मानुभवरूप सारथीके द्वारा ध्यानरूपी खड्ग चलाकर मारता है अर्थात् जो अपने रागद्वेष अज्ञान भावोंको हटाकर वीतरागमय शुहआत्मीक भावोंमें परिणमन करता है वही सच्ची प्रभावना करनेवाला प्रभावना अंगका धारक सम्यग्दृष्टी है ऐसा जानना । ऐसे ज्ञानीके अवश्य पूर्व कर्मोकी निनरा होती है। इसतरह संवर पूर्वक भाव 'निर्जराके उपादान कारण, शुद्धात्माकी भावनारूप शुद्ध नयके आधीन निःशंकित आदि आठ गुणोंका व्याख्यान करते हुए नव गाथामे पूर्ण हुई। यह निःशंकितादि आठ गुणोंका व्याख्यान निश्चय नयकी मुख्यतासें किया गया। निश्चय रत्नत्रयका साधन करनेवाला नो व्यवहार रत्नत्रयं है उसमें भी ठहरे हुए. सराग सम्यग्दृष्टीके भी अंजन चोर आदिकी कथारूपसे व्यवहार नयसें इनका व्याख्यान यथासंभव जान लेना। :. यहां शिष्यने प्रश्न किया कि निश्चय नयका व्याख्यान करके फिर भीव्यवहार नयका व्याख्यान किस लिये किया गया. इसका उत्तर आचाग्य करते हैं कि व्यवहार नय भी कायं-- कारी है। व्यवहार नय साधक है। निश्चय नये साध्य है। जैसे सुवर्णपाषाणकेशुद्ध करनेके लिये अग्नि साधक है। निश्चय और व्यवहारनयमें परस्पर साध्य और साधक भाव है इस बातको दिखलानेके लिये व्यवहार नयका व्याख्यान किया गया है जैसे कि किसी ग्रंथमें कहा गया है- गाथा--जइ निणसमइ पहुंजह ता माववहार णिच्छर मुवह । एक्केण विणा छिजह, तित्यं अण्णेण पुण नच्च ॥ भावार्थ-यदि जिन मतको पालना है तो व्यवहार और निश्चय दोनोंको मत छोड़ो। व्यवहारके विना धर्म तीर्थ नाश होगा तथा निश्चयके विनातत्वकालाम नहोगा। प्रयोजन. यह है कि व्यवहार नयके द्वारा प्रवर्तन करनेहीमे निश्चयवासका लाभ होगा क्योंकि नो साधन - .. AN NHRSIGURGAORAGARHKAVRAN wwwerHTRAMAREE २०४ समयसार टीका। करनेवाला है वह व्यवहारमें ही उलझा हुआ है, तथा जो व्यवहारमात्रको तो करे पर निश्चय नयको न जाने उसे आत्मीक तत्वका अनुभव नहीं होगा। इसलिये जबतक अपने शुद्धान्म स्वरूपका अवलम्बन न प्राप्त हो तबतक व्यवहारनयका ग्रहण व व्यवहार धर्म सेवन कार्यकारी है। यहां पर जो संवर पूर्वक निजरा वर्णन की गई है मो सम्यग्डप्टी जीवके उस समय होती है । जब उसके शुद्धात्माके सम्यक् श्रद्वान और ज्ञानके साथ शुभ और अशुभ समस्त आत्माके बाहर द्रव्योंका आलंबन छोड़ने पर वीतराग धर्मध्यान व शुक्लध्यान रूप निर्विकल्प.समाधि भाव पैदा होता है। यह समाधि भाव वास्तवमें बहुत ही दुर्लभ है क्योंकि इस संसारी जीवके निगोदसे निकलकर एकेन्द्रिय स्थावर होना, फिर विकलेन्द्रिय त्रस होना, विकलेन्द्रियसे पंचेन्द्रिय होना, पंचेन्द्रियों में भी सेनी. होना, सेनीमें भी पर्याप्त होना, पर्याप्त होकर भी उत्तम देश, कुल,रूप,इन्द्रियोंकी निपुणता, वाधा रहित बड़ी आयु व श्रेष्ठ बुद्धिपाना, बुन्हिपाकर-भी.सच्चे धर्मका सुनना, समझना, धारण करना कठिन है। धारण हो करके भी अहान होना, श्रद्धान होकर भी संयमका लाभ होना, संयम पालते हुए विषयोंके मुखोंसे विराग होना तथा क्रोधा- दिः कयायोंसे वचना, व तपकी भावना और अंतमें मुगानिमरणका होना यह उत्तरोत्तर वाते एक दूसरेसे दुर्लभ हैं क्योंकि इनके विरोधी मिथ्यात्व, पंचेन्द्रियोंके विषय, कपाय, अपनी प्रसिन्हि, पूजा, लाभ, भोगोंकी इच्छा रूप निंदानबंध आदि विभाव परिणामोंकी इस संसारी के अतिप्रबलता है। इसलिये “समाभि भावको व रत्नत्रयकी एकतारूप आत्मीक भावको एक दूसरेकी अपेक्षा, सर्वसे कठिन जानकर समाधि लाभका अवसर हो तो उसमें प्रमाद नहीं करना योग्य है । जैसा कि अन्यत्र कहा है- श्लोक-इत्ययि दुर्लभरूपां बोधि लम्चा यदि प्रमादी स्यात् । संस्मृति भीमारण्ये भ्रमति वराको नरः सुचिरं ॥ भावार्थ:-जब इतनी कठिनतासे रत्नत्रयका लाभ होता है तब ऐसे लाभको पाकर भी जो प्रमादी हो जायगा विषयादिके वशमें पड़ रत्नत्रयरूपी आत्मीक धर्मका लाभ नहीं करेगा वह विचारा भोला आदमी इस भयानक संसाररूपी वनमें बहुत काल भ्रमण करेगा-भावार्थ- इस अनादि कालीन संसारमें उत्तम देश कुलका धारी, सुविचारी, निरोगी. दीर्घायु, बुद्धिवान होना अतिशय कठिन है। बड़े भारी पुण्यके योगसे ऐमी अवस्था इस जीवके प्राप्त होती है। तिसपर भी जो अपनेको विपय कपायोंमें लगा देते हैं वे इस अगृल्य अवारको वृथा गंमा वै- ठते हैं। इसलिये श्रीगुरुका यह उपदेश है कि उसको अपने आत्माकी शुद्धिके यत्नमें उप- युक्त होना योग्य है । मोक्ष मार्गका स्वरूप श्री जिनवाणीके अभ्याससे भले प्रकार मानकर निश्चय रत्नत्रयकी भावना करते हुए व्यवहार रत्नत्रयमें प्रवर्तन करना योग्य है। नव-निश्चय राननक्की पीताकी निकटता आती है तत्र व्यवहारका बालंबनं स्वयं छूटता है और यह . समयसार टीका। जीव शुद्ध पारणामिक भावका धारी परमात्मा हो जाता है। इसी रत्नत्रयक ही प्रतापमे निर्चि- कल्पः समाधिका लाभ होता है, जिसके प्रतापसे यह आत्मा भव समुद्रक पार पहुंच जाना है। इसलिये बुद्धिमान जीवकों अपने आत्माके स्वरूपके अनुभवमें किसी भी तरह प्रमादरूप होना योग्य नहीं है । अवसर चूकने पर फिर पछताना पड़ेगा ॥ २२ ॥ इसतरह समयसारकी शुद्धात्मानुभव लक्षणको रखनेवाली तात्पथ्यवृत्ति नामकी व्या- म्याम ४ गाथाएं पीठिकारूपसे व ५ गाथाएं ज्ञान वैराग्य शक्तिका मामान्य विवरणरूपसे, व १० गाथाएं उनहींका-विशेष विवरण करते हुए व ८ गाथाएं ज्ञानगुणा सामान्य विवरण रूपसे व १.४ गाथाएं उस ही ज्ञान गुणका विशेष विवरणरूपसे व नव गाथागं निःशंक आदि आठ गुणोंको कथन करते हुए इसतरह समुदायम् ५० गाथामि दाग छः अनर अधिकारोंस सातवां निर्जराः नामाअधिकार समाप्त , हुआ ! अव अंगारको छोड़े हुए नाटक पात्रकी तरह शांत रस रूपसे निजरा नत्व रंगभृमिस चला गया। आर्टका महा अधिकार (6) वंधतत्व । अत्र.बंध प्रवेदा करता है। यहां जहः नामकोवि पुरिसी इत्यादि गाथाको आदि लेकर 'पाठ क्रममे १६ गाथा- ओमें बंधाधिकारका व्याख्यान करते हैं इन ५६ गाथाओंमें पहले ही बंधक स्वरूपकी मृत्रना की मुख्यतासे गाथाएं १ ० हैं फिर निश्चय नयसे हिंसा, अहिंसा व्रत व अवनका लक्षण कहने हुए “जो मण्णदि हिंसामिय", इत्यादि गाथाएं सात हैं, फिर बाह्यमें द्रव्यंहिंसा हो बा मन हो निश्चय नयसे हिंसा अव्यवसायही अर्थात हिंसा करने रूप भाव ही हिंसा है इस बातको प्रतिपादन करते हुए 'जो मरदि इत्यादि गाथाएं छः हैं। इसके अनंतर निश्चय गन्नत्रय लक्षण स्वरूप जो भेदनानं है उससे विलक्षण जो व्रत और अन्वत हैं उनके व्याख्यानकी मुख्यतासे 'एवमलिए' इत्यादि गाथा मंत्र दो हैं । फिर उस ही भाव पुण्य व भाव पापमप व्रत अव्रत-जो शुभ व अशुभ थके कारण हैं उनके परिणामांक त्र्याच्यानको मुन्त्यनासे 'वच्छं पडुच्च' इत्यादि गाथाग: १३ हैं । इस तरह समुद्रायसे व्रत अवतकी ११ गाथाएं हैं। फिर निश्चयमें जो स्थिर होता है उसके व्यवहारका निषेध है ऐसा कयन करते हुए 'वत्र- हारणओ' इत्यादि मुन्न ६ हैं। इसके बाद ग़गडे परहिन को ज्ञानी जीव हैं उनको प्राशुक अन्न पानादि आहार बंधका कारण नहीं होता है । इस तरह सिंह शुटित व्यायान जाने हुए-'आधाकम्मादीया' इत्यादि मूत्र ४ हैं । उमश:वाइ क्रोधादि कसाय बंधक निमित्त सथान ऊपाय भावोंके वेतन और अचेतन बाह्य द्रव्य निमित्त होते हैं मानिन्दन समयसार टीका। GARAVAONTERNALEEONARAA । - . २०६ करते हुए जहफलिह मणिविसुद्दो" इत्यादि सूत्र पांच हैं। उसके बाद प्रतिक्रमण और प्रत्याख्यानका अभाव बंधका कारण है किन्तु शुद्धात्मा बंधका कारण नहीं है ऐसे व्याख्यानकी मुख्यतासे अप्पडिकमणं इत्यादि गाथाएं ३ हैं। इस तरह समुदायमे ५६ गाथाओंके द्वारा ८ अंतर अधिकारों से बंध नामके अधिकारमें समुदाय पातनिका पूर्ण हुई आगे वहिरात्मा मिथ्यादृष्टि जीवके कर्मवधवा कारणभूत श्रृंगारको किये हुए मनुष्यकी तरह मिथ्या ज्ञान नाटकके रूपसे प्रवेश करता है उसको शांतरसमे परिणमन करता हुआ घीतरागसम्यग्दर्शन से अविनाभावी जो भेद विज्ञान है सो निषेध करता है। गाथाः---जह णाम कोवि पुरिसोणेहभत्तोदु रेणुवहुलम्मि । ठाणम्लि ठाइदूणय करेदि सत्थेहि वायामं ॥ २५२ ॥ छिंददि भिंददि य तहा तालीतलकदलिवंसपिडीओ। सञ्चित्ताचित्ताणं करेदि दवाणमुवघादं ॥ २६३ ।। उवधादं कुव्वतस्स तस्स णाणाविहेहि करणेहिं । गिच्छयदो चिंतिजदु किं पञ्चयगोदु तस्स रयवंधी ॥२५४॥ जो सो दुणेहभावो तसि गरे तेण तस्स रयवंधो। णिच्छयदो विष्णेयं ण कायद्याहिं सेसाहिं ॥ २५५ ॥ एवं मिच्छादिही वदंतो वहुविहासु चेट्टासु । रागादी उवओगे कुव्वतो लिप्पदि रयेण ॥ २५६ ॥ संस्कृतार्थ:-यथा नाम कोऽपि पुरुषः स्नेहाभ्यक्तस्तु रेणुबहुले । स्थाने स्थित्वा करोति शस्त्रैायाम ॥ २५२ ॥ छिनत्ति भिनत्ति च तसा तालीतलकदलीवंशपिडीः । सचित्ताचित्तानां करोति द्रव्याणामुपघातं ॥ २५३ ॥ ‘उपघातं कुर्वतस्तस्य नानाविधैः करणैः । निश्चयतश्चित्यता किं. प्रत्ययकस्तु तस्त्र रजोबंधः ॥२५४॥ यः स तु स्नेहभावस्तीस्सनरे तेन तस्य रजोवेधः 'निश्चयतो विशेयं न कार्यचष्ठाभिः शेषाभिः ।। २५५ ॥ एवं मिथ्याष्टिवर्तमानो बहुविधासु चेष्ठासु। रागादीनुपयोगे कुर्वाणों लिप्यते रजसा ॥ २५६ ।। सामान्यार्थः- जैसे कोई पुरुष तैल लगाकर बहुत- मिट्टीके स्थान अर्थात् ' अखाड़ेमें जाकर 'अनेक शस्त्रोंसे । व्यायाम अर्थात् कसरत करता है, तथा ताल, तमाल, केला, वांस, अशोक आदिके वृक्षोंको छेदता, भेदता है तथा उन वृक्षोंके सचित्त व अचित्त द्रव्योंका धात करता है इस तरह नाना प्रेकारके शस्त्रोंसे उपघात करते हुए उस पुरुषके रज व मिट्टीके बंध, होजानेका क्या कारण है ? सो विचार करो । जो उस नरमें तैलपना है उसीसे ही उसके रजका -- N 1 . . . - -, २.9 GRASIREOsmuskanRaaamrem समयसार टीका। सम्बन्ध है निश्चयसे ऐसा जानना। अन्य शरीरकी क्रियाओस बंध नहीं है, इसी तरह मिथ्या- दृष्टी नानाप्रकारकी चेष्टाओंमें वर्तन करता हुआ अपने रागादि भावोनो करता है इमीमे ही कम रूपी रनसे लिप्त होता है । शब्दार्थ शहित विशेषार्थ:-(जह) नसे (नामको वि पुरिमो) कोई भी. पुरुष (णेहभत्तोदु) तेल अपने शरीग्में लगाए हुए (रेणुवलंमि) बहुत रनसे भग्गुण (ठाणमि) स्थानमें अर्थात् कसरतशालामें (ठाइदृणय) ठहर करके (सच्छेहि) मुग्दर अदि शस्त्रोंसे ( वायाम करेदि ) व्यायाम-कसरत करता है ( सहा ) तथा ( तालीतलकदलियंस पिंडीओ) ताल, तमाल, केला, वांस, अशोकादि वृक्षोंको (छिन्ददि भिदिय) छेदता और भेदता है (सचित्ता चित्ताणं दव्वाणं) और उन वृक्षों के सम्बन्धी सचित्त और अचित्त द्रव्योंका अर्थात् हरी शाख पत्र पुप्पादि व मृखे पत्ते फलादिका (उवघादं करेइ) उपघात करता है। (गाणा विहेहि करणेहिँ) नानाप्रकारके वैशाख स्थान आदि विशेष शस्त्रोंसे (उवघादं कुलतम्म तस्स) उपधात करते हुए उस मनुप्यके (तम्स .यबंधो) धूल मिट्टी आदिका बंधन (नोट-यहां एक तस्स अधिक विदित होता है ।) (किं पच्चयगोदु) किस कारणसे होता है ऐसा (णिच्छयदे) निश्चय नयसे (चिंत्तिजदु) विचार करो। इस पूर्व पक्षका उत्तर करते हैं कि (तम्हि) उस (रे) तैल मले हुए मनुप्यमें (जो सोदु णेह भावो) जो कोई तलका भाव है अर्थात् तल सम्बन्धी चिकनई है (तेण) उसीसे (तम्स) उस नरके ( स्यवंधो ) रजका बंध हुआ है (णिच्छयदो) निश्चय नयसे (विण्णेय) ऐसा जानना योग्य है। (ण मेसाहिं कायचेट्टाहिं) और अन्य वाकी शरीर आदिकी चेष्ठाओंसे उसके रजकावंध नहीं हुआ है। यहां नक दृष्टांत कहा, अब दाप्ट्रांत कहते हैं कि (एवं ) पूर्वमें कहे प्रमाण (मिच्छादिट्टी) मिच्छादृष्टी जीव ( बहु बिहासु चेट्ठासु) नाना प्रकारके काय आदिके व्यापाररूप चेष्टाओंमें (बटुंनो) प्रवर्तन करता है तब वह बहिरात्मा ( रागादी उवओगे कुब्वंनो ) शुद्ध आन्मीक तत्त्वका सम्यक् श्रद्धान, ज्ञान और चारित्ररूप रत्नत्रयभावको न पाकर मिथ्यात्त्व. गगडेपमई परिणामोंको करता हुआ (रएण) कर्मरूपी धूलसे (लिप्पदि) लिप्त हो जाता है अर्थात काँको बांध लेता है। इन पांच सूत्रोंके कथनका तात्पर्य यह है कि जैसे तैल मले हुए पुरुषके मिट्टी धूलेका बंध होता है ऐसे ही मिथ्यादर्शन व राग द्वेष आदि परिणामों में परिणमन करनेवाले जीवोंके द्रव्य कर्मोका बंध होता है। यह वंघका वास्तव कारण कहा गया । भावार्थ-जो कोई अखाड़ेमें शरीरमें तैल लगाकर कसरत करेगा उसके शरीरमें अवश्य धूला चिपट नायगा । इसी तरह जो कोई अज्ञानी वहिरात्मा संसार, शरीर, भोगोंमें तीव्र रागी होकर, सांसारिक सुखको ही सुख मान करके, नाना प्रकारके पदार्थों के लिये गरीर आदिक नाना प्रकार के व्यापार करेगा वह अपने रागद्वेष मोहके कारण ज्ञानावरणादि आठ कोये अवश्य बंधेगा । इससे सिद्ध किया गया कि बंधका कारण निश्चयसे राग, द्वेष, मोह ही है इसमे ये त्यागने योग्य हैं ।। २६३.. २५३-२५४-२५५-२५६॥
NustaweNUMER PRERNARRATARAINIORAN . . २०८ समयसार टीका। ,, . अब पांव. गाथाओं से वीतगग सम्यग्दृष्टीके बंधका अभाव है. ऐसा .दिसलाते है- गाथाजह पूण सोंचेव णरो हे सव्वह्मि अवणिये संते रेणुवहुलम्भिं ठाणे करेदि सत्येहि वायामं ॥ २७ ॥ छिंददि भिंदादि यातहा तालीतलकलिक्सपिंडीओ। सचित्ताचित्ताणं करेदि दवाणमुबघाद ॥ २९८ ॥ .. उवधादं कुव्वंतस्स तस्स णाणाविहेहिं करणेहिं । णिच्छयदों चिंतिजहु किपंञ्चयगों ण तस्स रयबंधो ॥२०॥ जो सोणेहभावो तमि णरे तेण तस्स रयवंधो। णिञ्छयदो विण्णेयं ण कायचेट्टाहिं सेसाहिं ॥ २६० ॥ एवं सम्मादिट्ठी वहतो वहुविहेसु जोगेसु। अकरतो उचओगे रांगादी व वज्झदि रयेण ॥ २६१ ॥ संस्कृतार्थः-यथा पुनः स चैव नरः स्नेहें सर्वस्मिन्नपनौते सति । रेणुबहुले स्थाने करोति शस्त्रैायाम ॥ २५७ ॥ छिनत्ति भिनत्ति च तथा तालीतलकदलीवंशपिंडीः । सचित्ताचित्तानां करोति द्रव्याणामुपघातं ॥ २५८ ॥ S उपघातं कुर्वतस्तस्य नानाविधे; करणः ' निश्चयतो विशेयं किंप्रत्ययको. न रजोबंधः ॥ २५९ ॥ यः स, स्नेहभावस्तस्मिन्नरे तेन तस्य रजोबंधः । .. निश्चयतो विज्ञेयं न कायुचेष्ठाभिः शेषाभिः ॥ २६० ।। एवं सम्यग्दृष्टिवर्तमानो बहुविधेषु योगेपु । ...... अकुर्वन्नुपयोगे. रागादीन्नैव वध्यते. रजसा ॥ २६१ ॥ .. सामान्यार्थ विशेषार्य सहित:--जैसे वही पुरुषअपने शरीरसे सर्व तेलको छुड़ाकर बहुत धूलसे भरे हुए स्थानमें अर्थात् अखाड़ेमें जाकर शस्त्रोंसे. व्यायाम, अभ्यास, या परिश्रम करता और ताल, तमाल, बंस, पिंडि आदि नामके वृक्षोंको छेदता भेदता है । तथा उन वृक्षोंके सचित्त पत्रादि व अचित्त शुष्क -पत्र, शाखादिकोंका घात करता है । नाना प्रकार वैशाख स्थानादि. शस्त्रोंसे, उपघात करते हुए उस मनुष्यके धूलका चिपकना क्यों नहीं होता इसके. कारणको-निश्चय नयसे विचार करो । इस प्रश्नका उत्तर करते हैं कि निश्चयसे यही जानना चाहिये कि उस तैल मले हुए पुरुषके जो तैलका सम्बन्ध था उसीसे ही उसके धूलका चिपकना था। इसके सिवाय अन्य शरीरकी चेष्ठाओंसे नहीं अब इस मनुप्यके क्योंकि तैलका सम्बन्ध नहीं है इससे इसके धूलं व रेंजका बंध नहीं होता है । अव. दाष्ट्रान्त कहते हैं कि इसीतरह सम्यग्दृष्टी जीव नाना प्रकार मन, वचन, कायके योगरूप व्यापारोंमें वर्तन करता ! 7 - - -- ... है rande ------ ReceSLSAR + समयसार टीका। हुआ निर्मल आत्मीक तत्त्वका यथार्थश्रद्धान, ज्ञान और अनुष्ठान रूप निश्चय मम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान. सम्यकचारित्र होने के कारणसे रागद्वेषादि परिणायों नहीं करता हुआ कर्मरूपी धूलसे नहीं बंधता है। इस तरह जैसे तैलंके लेके अभाव में उस पुरुषक रन नहीं विपटती इसी तरह राग द्वेष रूपी तैलसे रहित वीतराग सम्यग्दृष्टी जीवके रागादि माकि अमावस द्रन्यकर्मीका बंध नहीं होता है । इसतरह बंधक अभावका कारण कहा । पमा तात्पर्य है। भावार्थ- जो कोई सुख शरीरसे अवार्डमें कसरत करता है उसे शरीरमें वहांका धूठानिए- टता नहीं, आर ही ऊपरसे झड़ जाता है । इसी तरह जो वीतरागी सम्यग्दृष्टी आत्मा उदा- सीन मावस काय वं वचन व मनकी क्रियाएं करते हैं उनके गर्गद्वपके न होनेसे कमीका बंध नहीं होता । इससे रागद्वेष भावोंको त्यागकर वीतराग मात्र रूप रहना योग्य है । जैसा यहां पातनिकामें कहा गया है कि सम्यग्ज्ञानी जीवका शांतरसमें स्वामीपना है । अज्ञानी जीव अंगार आदि रमाका स्वामीपना है उसी तरह अध्यात्म विषयमें नाटकके अवतारके सम्बन्ध नव रसोंका स्वामीपना है ऐसा जानना चाहिये २५७-२५८-२५९-२६०-२६१ ॥ इस तरह १० सुत्रोंके समुदायसे प्रथम स्थल पूर्ण हुआ। आगे कहते है कि वीतरागमई आत्मामें स्थितिरूप भावको त्याग करके जो हिस्प हिंसक भाष रूपमे परिणमन है तो अज्ञानी जीयका लक्षण है उसमे विसरीत सम्यग्ज्ञानी जीवका लक्षण है ॥ गाथा:-जो मण्णदि हिंसामिय हिंसिन्जामिय परेहि सत्तेहिं । सो मृदो अण्णाणी गाणी एत्तोदु विवरीदो ॥२६२॥ संस्कृतार्थः यो मन्यते हिनस्मि हिले च परैः सत्वैः । स मूढोऽजानी शान्यतस्तु विपरीतः ॥ २६२ ।। सामान्यार्थः-जो ऐसा मानता है कि मैं पर जीवोंकी हिंसा करता हूं व पर प्राणि. यांसे में मारा गया हूं वह मूर्ख अनानी है। ज्ञानी इससे विपरीत है । शब्दार्थ सहिन विशेषार्थ:-(नो) जो कोई अज्ञानी (मण्णदि) ऐसा मानता है कि (हिंसामिय) में जीवोंकी हिंसा करता हूं वा(परेहिं) दुसरे (सत्तेहिं) प्राणियोंसे (हिंसिज्जामिय) में मारा जाता हूं अर्यात. उसका जो यह परिणाम है कि मैं मारता हूं या मैं मारा जाता हूं वही परिणाम निश्चयसे अज्ञानमई मात्र है और वही वर्मबंधका कारण है नित नीवके पेला परिणाम होता है (मो मूढो अण्णाणी) सो मुख अज्ञनी है। परंतु (गाणी) तत्त्वज्ञानी आमा (एतो विवरीदो) इस परिणामसे विपरीत है। उसके दिमाम व हिंस्यका भाव नहीं होते । जो कोई जीवन, मरण, लाभ, अलाभ, दुःख, शत्रु मित्र, निन्दा, प्रशंसा आदि विल्लोंमें राग और द्वेषको नहीं करता हुआं शुद्ध आत्मीक भावनाले पैदा होनेवाले परमानंद सुखके आस्वादमें वा भेदज्ञानमें . .
Dagaanemararernaepsitent 1 . १ :::: न ? २१० समयसार टीका। रता है, लमलीन है। तन्मय है,वही ज्ञानी है यह अर्थ है । भावार्थ:---जिसके आत्मस्वरूपमें तन्मयरूपीभाव नहीं है, वहीं इस प्रकारका देवपरिणाम कर सकता है कि मैं दूसरोंको मा । व.दूसरोंसे मारा जाता हूं। शरीरकी ममता होने हीका; यह कार्य है। इसीसें ऐसा पुरुष अज्ञानी है और कमौका बांधनेवाला है:। भेदज्ञानी : आत्मामें यह भाव नहीं होता इसीसे वह हिंसाजनित कर्मको नहीं बांधता है:॥ २६२ ॥ आगे. कहते है कि यह रागादि. अध्यवसाय -कैसे अज्ञानरूप हैं। 5: गाथाः- आजक्खयेण मरण जीवाणं जिणवरेहिं पण्णत्तः। Fils, आउंण हरेसि तुम कह ते मरणं कद तेसि ॥ २६३ ॥ संस्कृतार्थी, आयुःक्षयेण मरणं जीवानां : जिनवरैः प्रशतं । THE FIRS : आयुन हरसि त्वं कथं त्वया मरणं कृतं तेषां-॥ २६३ ॥ Fa,सामान्यार्थः जीवोंका मरण निश्चयसे आयु. कर्मके क्षयसे होता है, ऐसा श्री जिनेन्द्रः भगवानोंने कहा है। जव- तुम ..आयु.. कर्मको हर नहीं सकते तो कैसे तुम्हारे द्वारा उनका मरण किया गया ? शब्दार्थ सहित विशेषार्थ:-( जीवाणं ) जीवोंका ( मरणं.) प्राण क्षय ( आउक्खयेण ) आयु कर्मके झड़ जानेसे होता है ऐमा.( निणवरेहिं ) जिनेन्द्र भगवानोंने (, पण्णत:) प्रकट किया है । ( तुम ).तुम (.आउ) उनके आयु कर्मको (ण) नहीं ( हरेसि ) हरते हो । क्योंकि उनका आयुकर्म उनके ही उपयोगसे क्षय होता है फिर (कह) कैसे (ते) तुम्हारे द्वारा ( तेसिं मरणं ) उन' प्राणियोंका मरण ('कदं) किया गया ? भावार्थः कोई भी प्राणी अपने आयु कर्मके क्षय विना मरण नहीं करता है जो कोई किसीको मारता है उस वक्त भी उस जीवका मरण अपने ही आयुकर्मके क्षयसे ही भया। तर यह मारनेवाला स्यों दोषी हुआ। इसका उत्तर यह है कि इसने अपना द्वेपरूप परिणाम किया कि मैं मारूं-इस कारण यह अपने उस परिणामका दोपी है . इसीसे हिंसक है इसीसे अज्ञानी है और बंधका करनेवाला है ॥ २६३ ॥ : आगे जो कोई कहता हैं, कि मैंने इसकी रक्षा की हैं : उस सम्बन्धमें कहते हैं:- गाथा:-आउउदयेण:जीवदि जीवोः एवं भणंतिःसवण्हूं Imes PREM आउं च णः दोसि तुम्नं कहं तए जीविदं कदंतेसिंः॥ २६४॥ संस्कृतार्थः-- आयुरुदयन जीवति जीव एवं भणति सर्वज्ञाः। ::: Pी आयुश्च नः ददासि तं कथं त्वया जीवितं कृतं तेषां ॥ २६४ . WE सामान्यार्थः- यह जीव आयु: कर्मके उदयसे जीता है ऐसा सर्वज्ञ भगवान कहते हैं। आयु कर्मको तुम नहीं देते तो फिर तुम्हारे द्वारा उनका जीवन कैसे किया गया शब्दार्थ हित विशेषार्थ जीवो) यह आत्मा (आउउदयेण) आयु. कर्मके उदयके वशसे: (जीवदि) .
esexeemuired - समयसारंटीका। २११ नीता है. (एवं ) इस प्रकार (सञ्चण्हू ). सर्वज्ञ भावोन (भगति ) कहते हैं (च) और तुम ) तुम (आउं ) आयुकर्मको (न देसि ) नहीं देने हो क्योंकि उन जीवोंका आयु कर्म उन्हींके शुभ और अशुभ परिणामोंके द्वारा आनन किया हुआ अर्थात् बांधा हुआ है। पम (कह.) किम्ताह ( दर ) तुम्हारे द्वारा (लसिं) उन जीवोंका (जीविद) जीवन (क) किया गया। अर्थात् किसी भी तरह नहीं किया गया। भावार्थ:-जो कोई इस बातका मान करे कि मैंने इसकों जिला दिया या मैं इसको पालता हूं उसके लिये आचार्य कहते हैं कि इसका ऐसा मानना मिथ्या है क्योंकि जब तक किसीको आयुकर्म नहीं होता वह जी नहीं सक्ता है और आयुकर्मको हरएक जीव अपने भावोंके अनुसार बांधता है । इसलिये एमा अमिमानरूपी भाव भी कर्म बंधका कारण है। यहां पर यह तात्पर्य है कि ज्ञानो पुरुषको सासवेदन लक्षगको रवनवाली, सम्यग्दर्शनशान चारित्ररूप तथा मन, वचन, कायकी गुप्तिरूप समाधिमें तिष्ठना चाहिये। उसी समावि भावमें नत्र तक ठहरा नायगा तब तक उसके कर्मबंधका अभ न है. क्योंकि उसके भावोंमें वीतरागता है। परंतु जब वह स्वसमाधिौ ठहर. नहीं सत्ता तत्र.. अशक्य पनेसे या प्रमादसे जब कभी उस ज्ञानीके यह विकल्प हो उठता है कि मैं इसका.मरण करता हूं व इसको निलाता हूं तब वह मनमें चिन्तवन करता है, कि इस प्राणीके मरणमें, इसके अशुभ कर्मका और जीवनमें शुभ कर्मका उदय हैं मैं तो केवल निमित मात्र ही हूँ। ऐसा मानकर मनमें रागद्वेषरूपी अहंकार नहीं करना योग्य है । भावार्थः-नानीके नर कभी विकला निलाने व मारनेका होता है वह वस्तु स्वरूपको विच रस्ता हुआ रहकर अहंकार नहीं करता है किन्तु अज्ञानी अहंकार करके पुण्यं या पापको तीन बंध करता है ।। २६४ ॥ आगे कहते है कि मुख और दुःख भी निश्चयनयसे अपने ही कर्मोके उदयम होते. है।.. जो अपपणादु मण्णदि दुःहिदसहिदे करोमि सत्तेति सो मूढो अण्णाणी णाणी.एत्तो? विवरीदो. ॥ २६ ॥ संस्कृतार्थ:-य-आत्मना तु मन्यते दुःखिताखेतान् करोमि. सत्यानिति । स मूदोऽशानी शान्यतलु विपरीतः ॥ २६५ ।। i. सामान्यार्थः:--जो अपने तई ऐसा मानता है कि मैं प्राणियोंको दुःखी व मुग्वी करता, ९ सो मूर्ख और अज्ञानी है ज्ञानी इस विचारसे अलग है । शब्दार्य महित विशेषार्थ- (जो) जो कोई (अप्पणादु) अपने आत्माके विर्षे (मष्यदि) मानता है (इति) .शि. (सत्ता) प्राणियोंको (दुखिद सुहिदे करेमि) मैं दुःखी या सुखी करता हूं । अर्थात् निसरी इस जातिका परिणाम है कि मैं पर जीवोंको सुखी या दुःखी करता हूं वह परिमार. अनानगई मार है सोई कर्मबन्धका कारण है जया निसके ऐमा परिणाम पाया जाना है । (मो महो .. म .
REWAREverimiti समयसार टीका। . . M तू काँको २ २१२ अण्णाणी) वह अज्ञानी वहिरात्मा मिथ्यादृष्ठि है जो (एत्तो विवरीदो) इससे विपरीत परम उपेक्षा संयमकी भावनामें परिणत होता हुआ भेदरहित निश्चय रत्नत्रय लक्षणको रखनेवाले भेदज्ञानमें ठहरा हुआ है वह (गाणी) ज्ञानी है। भावार्थ:-जो परके भीतर करतापना मानता है वह अज्ञानी है। जो कर्तापना नहीं मानता सो ज्ञानी है ॥ २६६ ॥ आगे शिष्यने प्रश्न किया कि जो ऐसा अभ्यवसाय अर्थात् रागादि रूप परिणाम करता है . कि मैं परस्पर सुख या दुःख करता हूं वह किसतरह अज्ञानी है। इसके समाधान तीन गाथाएं कहते है:- गाथा:-कम्मणिमित्तं सव्वे दुक्खिदसुहिदा हवंति जदि सत्ता। कम्मं च ण देसि तुम दुक्खिदसुहिदा कहं कदा ते ॥२६॥ संस्कृतार्थः-कर्मनिमित्तं संधै दुःखितसुखिता भवति यदि सत्वाः । कर्म च न ददासि त्वं दुःखितसुखिताः कथं कृताते ॥ २२६ ॥ मामान्यार्थः---जो सर्व, प्राणी कमाके उदयसे दुःखी व मुखी होते हैं और देता नहीं तव तेरे द्वारा वे प्राणी कैसे दुःखी या सुखी किये गए ? शब्दार्थ सहित विशेषार्थ:- (जदि) जो (सवे सत्ता) सर्व प्राणी (कम्मणिमित्त) अपने २ कर्माके उदयके निमित्तसे (दुखिद सुहिदा) दुःखी या सुखी (हति) होते हैं (च) और (तुम) तुम (कम्म) शुभ या अशुभ काँको (नदेसि) नहीं देतेहो फिर (कह) किसतरह (ते) वे जीव तेरे द्वारा (दुखिद मुहिदा कदा) दुःखी या सुखी किये गए ? अर्थात् निश्चयसे नहीं किये गए ॥ २६६ ॥ इसी सम्बन्धकी दूसरी गाथा कहते है:- गाथा:-कम्मणिमित्तं सव्वे दुक्खिदसुहिदा हवंदि जदि सत्ता। कम्मं च ण देसि तुमं कह तं सुहिदो कदो तेहिं ॥२६॥ संस्कृतार्थः-कर्मनिमित्तं सर्वे दुःखितसुखिता भवंति यदि सत्वाः । कर्म च न ददास वं कथं वं सुखितः कृतस्तैः ॥ २६७ ॥ सामान्यार्थ:-यदि सर्व जीव कमौके निमित्तसें दुःखी और सुखी होते हैं और कमौको तुम देते नहीं हो तब उनके द्वारा तुम कैसे सुखी किये गए ? शब्दार्थ सहित विशेषार्थ:- (अदि) जो (कम्मणिमित्त) आने २ कौके उदयके निमित्तसे (सर्वसत्ता) सर्व प्राणी (दुःखिद मुहिदा हवंति) दुःखी और सुखी होते हैं (च) और )तुम) तुम (कम्म) शुभ या अशुभ कर्मको (नदेसि) नहीं दे सकते हो तो (कह) किस तरह (तं) तुम (तहिं) उनके द्वारा (मुहिदोकदो) सुखी किये गए ! अर्थात किसी भी तरह नहीं किये गए ॥ २६७ ॥ इसी सम्बन्धकी तीसरी गाथा कहते हैं:- गाथा:, कम्मोदयेण जीदा क्खिदसुहिता हमि जदि सव्वे । कम्मं च ण देसि तुम कह तं दुहिदो कदो तेहिं ॥१८॥ ? -- vesiAR समयसार-टीका। संस्कृतार्यः कर्मोदयेन जीवा दुःखितमुग्विता मवंति यदि सवें। : - कर्मच न ददासि त्वं कथं त्वं दुखितः कृतस्तैः ।। २६८ ॥ सामान्यार्थ-यदि सत्र जीव अपने २ शुभ व अशुभ कमाँके उदयसे सुखी व दुःखी होते है और कर्मको तुम देतें नहीं हो तब किसतरह तुम उनके द्वारा दुःखी किये गये-तात्पर्य यह है कि तत्वज्ञानी जीव अपने चित्तम यह विकल्प नहीं करता है कि मैं पर जीवोंको मुख और दुःख देता हूं-जंत्र कभी विकल्प रहित समाधि भात्रके न होनेपर प्रमादके कारण उसके यह विकल्प हो उठता है कि मैं किसीको सुखी.या दुःखी करता हूं तब मनमें ऐसा. विचार करता है कि इस जीवके अंतरंग पुण्य या पापका उदय हो आया है मैं तो केवल निमित्तमात्र ही हूं। ऐसा जानकर मनमें हर्ष और विपाद परिणामोंके द्वारा किसी तरहका अहंकार नहीं करता है-भावार्थ:-ज्ञानी जीव जब शुद्धोपयोगमें लीन होता है तत्र विकल्प रहित रहता है उस समय अंशुभ या शुभ भाव नहीं होते परंतु वीर्यकी कमीसे जब स्यरूपमें टहरनका अशक्त होता है तब उसके शुभ या अशुभ दोनों विकरूप होना संभव है। अशुभ भावोंसे बचनेके लिये वह ज्ञानी शुभ भावोंके होनेका यत्न करता है और तत्र पर नीयोंकी रक्षा, उनके कष्ट निवारणमें, परोपकारमें, : चार : प्रकार दानमें आदि शुभ कायम प्रवर्तना है उस समय इसके निमित्तसे बहुतसे जीव , वचते हैं, साता पाते हैं, कटीका मिटाते हैं ऐसा देख कर वह ज्ञानी आत्मा यह अहंकार नहीं करता है कि मैंने इन जीवोंके प्राण बचाए, व इनकी रक्षा की, इनको सुखी किया किन्तु ऐसा विचारता है कि जिन जीवोंकी रक्षा हुई व जिन्होंने सांता पाई उनके लिये मुख्य कारण उनके अंतरंग पुण्यकर्मको उदय है । मैं तो केवल निमित्त मात्र हूं-यदि उनके पुण्य कर्मका उदय न होता तो मेरे चाहने और उद्यम करने पर भी वे नहीं बच सक्ते और न सुखी होसकते । इसमें मेरा कोई कर्तव्य नहीं है । ऐसा मानकर जरा मी अहंकार नहीं करता कि मैं दूसरोंका रक्षक हूँ या सुखी करता हूं। इस बुद्धिसें वह काँले बहुत ही कम बंधता है। यदि कदाचित् प्रमादक कारण किसी आरंभमें प्रवर्तते हुए उससे अन्य जीवोंका घात होता है तब भी यही वास्तविक बात विचारता है कि इन जीवोंको जो कष्ट हुआ व यह मेरे इस कार्यमें अवश्य इन ही नीवांका अशुभ कर्म मुख्य निमित्त कारण है यदि इनके पापका उदय न होता तो यह दुःखी नहीं होसकते थे परन्तु मेरा इनको निमित्त होगया। यही मेरा एक अपराध है। मैंने अपने अशुभ भावोंसे अपने आत्माका घात किया। इससे बहुत विरीत किया-ऐसा विचार कर अपने ऐसे अशुभ भावोंके दूर करनेका तो उद्यम करता है। उसका पछतावा मानता है। परन्तु यह महंकार नहीं करता है कि मैंने-पर जीवोंको घाता व दुःखी किया इससे मैं बड़ा वीर व चतुर ई व हेमा क्लेशित भाव नहीं करता है कि जिससे आर्त परिणाम में इस तरह जानी जीत माग्ने misamanarass समयसार-दीका। HOUSERITRARA २४ मंद रागसे बहुत कम कर्मका वध करता है। तत्वज्ञानके प्रभावसे यह ज्ञानी वास्तुके यथार्य स्वरूपको विचारता हुआ, रागद्वेपको मिटाता हुआ, वीतरागंताको · वढ़ाता हुआ, अपना हित करता है, संवर और-निर्जगका उद्यम करता है, बंधको, मेटता है ॥ २६८-11 इस तरह पर जीवोंको मैं जिलाता हूं-या मारता हूं, या सुखी; या दुःखी; काता इस प्रकारके व्याख्यानकी मुख्यतासे सात गाथाओंमें दूसरा स्थल पूर्ण हुआ । म आगे कहते हैं कि जो ऐसा मानता हैं कि पर जीव अपनेसे भिन्न पर प्राणीको निश्चयसेजिलाता है, मारतीहै, सुखी या दुःखी करता है वह वहिरात्मा मिथ्यादृष्टि है । इसकी दो गाथाएं " गाथाः । जो मरदि जोय दुहिदो जायदि कम्मोदयेण सो सम्वो।" तह्मा दु मारिंदोदे दुहाविदो चेदि णहु मिच्छा ॥२६९॥ "संस्कृतार्थः---यो म्रियते यश्च दुःखितो जायते कमोदयेन स सर्वः। तस्मात्तु मारितस्ते दुःखितो वेति न खलु मिथ्या || २६९ ॥ सामान्यार्थ जो कोई मरता है वजो कोई दुःखी होता है सो. सर्व ही अपनेर कमौके उदयसे होता है इस लिये मैंने मारा या दुःखी किया ऐसा जो तेरा अभिप्राय है वह क्या झूठा नहीं है ? अवश्य झूटा हैं । शब्दार्थ सहित विशेषार्थः-(जो) जो कोई (मरदि) मरता है (य) और (जो) जो कोई (दुहिदो) दुःखी होता है (सो सम्बे) सो सर्वही (कमो. दएणं) अपने ही ककि उदयसे (जायदि) होता है (तम्हादु) इसलिये (मारिदो) मेरे द्वारा यह मारा गया ( चदुहाविदो) और दुःखी किया गया (इदि) यह (दे) तेरा अभिप्राय (मि- च्छा गहु,) क्या मिथ्या नहीं है? अवश्य, मिथ्या है। भावार्थ: प्रत्येक : जीव जब अपने आयुकर्मोके क्षय विना मर नहीं सक्ता व अपने असाता वेदनीयकर्मके. उदय विना दुःखी नहीं, हो, सक्ता यह बात निश्चय है तब इस अज्ञानीका ऐसा मानना कि मैंने मारा या दुःखीं किया केवल अहंकार मात्र है और मिथ्या है ।।.२६९ ॥ था:-- जो मरदि णय दुहिदो सोविय कम्मोदयेण खलुजीवो। तहमा ण मारिदोदे दुहाविदो चेदि गहु मिच्छा,॥ २७०.॥ संस्कृतार्थ-यो न म्रियते न च दुःखितो भवति सोपि च कर्मोदयेन खलु जीवः ।। 2 तस्मान मारितस्ते दुखितों बैंति न खलु मिथ्या । २७० ।। सामान्यार्थः--जो कोई जीव नहीं मरता कोई जीव नहीं मरती हैं व दुःखी नहीं होता है सो ही निश्चय करके अपन, ककि 'उदयसे इससे, मैंने इसको नहीं मारा व. नहीं दुःखी किया यह अभिप्राय क्या असलमें मिथ्या नहीं है ? अवश्य ही मिथ्या है। शब्दार्थ सहित विशेषार्थः (जो जीवो ) जो कोई नीव (णमरदि) नहीं मरता है. (णय दुहिंदा) और नहीं दुःखी होता है (सोविय) सो मी खलु) असल में (कस्मोदयेणं) अपने ही कमौके उदय से न मरता हैं और न दुःखी होता है (तमा) इसलिये रणमारिंदों) यह मुझसे नहीं मारा गया (दुहाविदो) व नहीं दुःखी किया गया (दे चेदि गहु मिच्छा) यह -- - . सपयसार टीका। तुम्हारा अभिप्राय क्या असटमें मिथ्या नहीं है। अन्य मिथ्या ही है न्योंकि इस प्राध्या. नसे अपने स्वस्थ आत्मीक मावसे गिरकर यह नीव काँको ही बांधना है भावार्य-नत्वज्ञानी जीव वस्तुका यथार्य स्वरूप विचारता रहता है और अपने आत्मात्रमाव की भक्तिमें लीन रहता है इसलिये मैंन मोरा या नहीं मारा मैंने दुस्खी किया या नहीं किया यह सर्व त्रिका ज्ञानीक नहीं होता। निम किसीके यह मर विकल्प होते हैं वह नीव नागद्वेषी होकर कोसा बांधनेवाला होता है ।। २७० ।। आगे कहते है कि पूर्वके दो मूत्र में कहा हुआ मिथ्यामानापी भाव मिथ्याटील व कारण होता है:- गाथा:-~एसा दुजा मदी दे दुःखिदसुहिदे करेमि मत्तेनि। एसा दे मूढमदी सुहासुहं बंधदे कम्मं ।। २७१ ॥ . संस्कृतार्थ-एषा नु या मतिते दुःखितमुखितान् करोमि सत्वानिति । एपा ते मूदमतिः शुभाशुमं बनाति कर्म. ॥ २७१ ॥ मामान्यार्य:-यह जो तेरी बुद्धि है कि मैं जीवोंको दुःखी या मुखी करना हूं यही तेरी मति हे मूवुद्धि ! शुभ या अशुभ कर्माको बांधनेवाली है। शब्दार्थ सहित विशेपार्थ:-(एमा दु) यह (ना) नो (द) तरी (सदी) मति है कि (सत्तेति) प्राणियोंको (दुखिद मुहिदे करेमि) में दुःखी या मुवी करता हूं (एमा दे) यही तरी बुद्धि (मूदमदी) हे मूढबुद्धि ! (मुहासुहकम) शुभ या अशुभ कर्मोंको (वंबद) बांधनेवाली है। नो अपने शुद्ध आत्मीक मावसे भृष्ट है उस जीके यह रागद्वेष विकर कि मैं पर प्रागि- योंको दुःखी या सुखी करता हूं शुभ या अशुभ कपोको बांधनेवाला है और कोई भी कार्य इस बुद्धिसे नहीं होता ॥ २७१ ॥ भागे फिर भी दृढ़ करते है कि निव्वयसे गगडेप नादि अध्ययमान अर्थात विसर भाव ही बंगका कारण होता है- गाथा:-दुक्खिदमुहिदे सत्ते करेमि जं एस मज्वसिदं ते। तं पाववंधगं वा पुण्णस्स य बंधगं होदि ॥ २७२ ।। दुःखितमुखितान् सत्वान् करोमि यदेवमव्यवमितं ते । तत्पापबंधकं वा पुण्यत्य च बंधकं या भवति ।। २७२ ॥ सामान्यायः- मैं जीवोंको दुःखी या मुखी करता हूं ऐसा जो तेरा रागद्वपाप- अन्य वसान है मो ही पार या पुण्यका बांधनेवाला है। शमा महित विशपार्थ- मते) प्राणियोंको (दुःखिद मुहिदै) दुःखी या मुखी (करेमि ) मैं करता हूं (जं एवम् ) जो ऐसा (a) तेरा (अन्झवमिदं) गादि रूप अध्यवमान है । यह गग.दि माव नेरे उसी ममय होता है नत्र तु शुद्धात्माकी भावनासे गिरा हुआ है इसीलिये (त) सो रामादिभाव (पावत्र गंदा पुनस्सययंदा १ . - - --- YNAMAVASER-AURSEHRAVIVR समयसार टीका। होदि) पापका या पुण्यका ही बांधनेका कारण होता है और वह कुछ भी दुखः मुखादिक किसीको कर नहीं सका क्योंकि हरएक जीवके सुख रूप या दुःख रूप परिणाम होना उसाही जीवकें बांधे हुऐ शुभ या अशुभ कर्मोके आधीन है । भावार्थ प्रत्येक जीव आनेही बांधे हुए कर्माका फल भोगता है कोई ऐसा संकल्प करें कि मैं इस प्राणीको दुःखी कर दे तो जब तक उस : जीवके पापका उदय नहीं होगा तब तक वह दुःखी नहीं हो सका। इसी तरह कोई विचारे विचारे कि मैं अमुक जीवको सुखी कर दूं सो जब तक उस जीवके पुण्यका उदय नहीं होता तबतक वह सुखी नहीं हो सका । जब यह बात निश्चयसे यथार्थ है तब इस अज्ञानी जीवका यह अहंकार करना कि मैं अमुकको दुःखी करता हूं या सुखी करता हूं केवल उस ही को विगाड़ करनेवाला है अर्थात् उसको आत्मीक परमशांत स्वानुभवरूप समाधि भावसे गिराकर अशुभ भावोंके अनुसार पाप और शुभ भावोंके अनुसार पुण्यकर्मका बांधनेवाला है। इस लिये ज्ञानी ऐसा अहंकार नहीं करता ॥२२॥ आगे फिर भी इसी बातको कहते है-. गाथाः-मारेमि जीवावेमिय सत्ते जे एव मज्झवसिंदंते। तं पाववंधगं वा पुण्णस्स य वंधगं होदि ॥ २७३ ॥ मारयामि जीवयामि चं सत्वान् यदेवमध्यवसितं ते । तत्पापबंधकं वा पुण्यस्य च बंधकं वा भवति ।। २७३ ॥ सामान्यार्थ-- मैं जीवोंको मारता हूं या जिलाता हूं ऐसा जो तेरा रागादि अध्यव- सान है वही पाप-या पुण्यका बांधनेवाला होता है ॥ शब्दार्थ सहित विशेषार्थः-सत्ते) प्राणियोंको (मारेमि) “मैं मारता हूं (जीवावेमिया) या जिलाता हूं (जएवम् ) जो ऐसा: (ते) तेरा (अज्झवसिद) अध्यवसान है व रागादि भाव है सो तेरे. उसी समय होता है जब तू शुद्धात्माके श्रद्धान ज्ञान और आचरणसे शून्य होता है (त) सो यह रागादि भाव ( पावबंधगं वा पुण्णस्सय बंधगं होदि) पाप या पुण्यका बांधनेवाला होता है इसके सिवाय और कुछ मी काम नहीं करता क्योंकि हरएक जीवका जीवन और मरण आदि सर्व उसीके ही बांधे हुए कोके उदयके आधीन है। भावार्थ-निश्चयसे यही बात है कि जब तक किसी जीवका आयु कर्म नहीं होता वह जी नहीं सक्ता, वं जिसका आयु कर्म झड़ जाता है वह अवश्य मरता है । दूसरा कितना भी चाहे कि मैं उसको मरने न दूं सदा जीवित रक्खू पर उसके इस चाह- नेसे यदि उसका आयुकर्म वाकी नहीं है तो वह नी नहीं सक्ता इसी तरह कोई यह चाहे कि मैं इसको मार डालूं पर जो उपका आयुकर्म वाकी है तो इसके चहुनेसे यह मर नहीं सक्ता जब यह यथार्थ बात है तब इस अज्ञानी नीवका यह अहंकार कि मैं जिलाता हूं या मारता हूं केवल इसीकाही बिगाड़ करनेवाला है अर्थात् इसको स्वात्मीक आनन्दके विलासंसे हटाकर रांगी द्वेषी करके पाप यां: पुण्यका-बंध करानेवाला है। २७३ ।।
KAROKesarimeterKRA . समयसार टीका। आगे कहते हैं कि निश्चय नवम विचार किया जाए तो वहीं हिंगा कानाप जोपार अध्यवसान है सो ही हिंमा है:- गाथा:-~अउझवसिदेण बंधो सत्ते मारे हि माव मारे हिं। एसो वंधसमासो जीवाणं णिच्छयणयस्स ॥ २७४ ॥ -संस्कृतार्थ:-अध्यवसितेन बंधः सत्वान् मारयतु मा वा मारयतु । एष बंधसमासा जीवानां निश्चयनयस्य ।। २७४ ॥ सामान्यार्थः-जीवोंको मारो या न मारो जो हिमादिरूप अध्यवसान है उसीसे ही कर्मोका बंध होता है । निश्चयनयस जीवोंके लिये यही बंधतत्त्वका संक्षेप है। शब्दार्थ सहित विशेषार्थ:-( सत्ते ) प्राणियोंको ( मारेहि ) मारो (व) अथया (मा मारे हि.) न मारो - ( अन्झवसिदेण) अध्यवसायरूप परिणामसे (बंधो ) कर्मोका बंध होना है। ( जीवाणां) जीवोंके लिये ( णिच्छय णयस्म) निश्चय नयसे (मो बंध ममामो) यही प्रत्यक्षरूप बंध तत्त्वका संक्षेप है इससे विपरीत उपाधि रहित चिदानंदमई एक लक्षणको रखनेवाली विकल्प रहित समाधिसे मोक्ष होता है, यह मोक्षतत्त्वका संक्षेप है। भावार्थ:-जब यह आत्मा स्व- समाधिमें उपयुक्त है तब इसके बंधका अभाव है तथा पूर्व बांधे हुए कर्मोसे मुक्ति है परन्तु जब यह स्वसमाधिसे छुटा हुआ रागद्वेपादिरूप भावामें परिणमन करता है तब अपने परिणामोंसे ही पाप और पुण्यको बांधता है दूसरेके परिणमनसे अपना परिणमन नहीं होता। इसतरह यह सिद्ध हुआ कि मैं पर प्राणियोंको जीवन देता हूं व मारता हूं व सुखी करता है व दुःखी करता हूं ऐसा जो अव्यवसात्र रूप रागद्वेषका अहंकार है सो ही बंधका है। प्राणोंके व्यपरोपण अथी. घात आदिका व्यापार हो वा मत हो। इसतरह इस सर्व कथनको जान कर रागडेप आदि खोटा ध्यान त्यागने योग्य है ऐसा जानना ॥२७॥ इस प्रकारका व्याख्यान करते हुए छः सूत्रोंसे तीसरा स्थल पूर्ण हुआ। आगे हिंसा अध्यवसानको पहले कह चुके हैं अब कहते हैं कि असत्य स्तेय आदि अगतका गादि अध्यवसानोंसे पापका बंध होता है तथा सत्य अस्तेय आदि अध्यवसानोंसे पुण्यका बंध होता है। गाथाः--एवमलिये अदत्ते अवह्मचेरे परिग्गहे चेव । कीरदि अझवसाणं जं तेण दु वज्झदे पावं ॥ २७ ॥ तहय अचोजे सच्चे में अपरिग्गहत्तणे चव। कीरदि अज्झवसाणं जं तेण दु वझदे पुण्णं ॥ २७६ ।। संस्कृतार्थ:-एवमलोकेऽदत्तेऽनाव परिग्रहे चैव । क्रियतेऽवसानं यत्तेन तु बध्यते पारं ।। २७५ ॥ तथापि चाचौथै सत्य ब्रह्मणे, अपरिग्रहत्ते चैव । क्रियतेऽध्ययमाने यत्तन तु वध्यते पुण्यं ॥ २७६ ॥ कारण -- ReesURNHIGYASAROVERAGYA स +- २१८ समयसार टीका। सामान्यार्थः-इसी तरह झूठ बोलनेमें, चोरी करनेमें, ब्रह्मचर्य न पालनेमें, तथा परिग्रहमें जो रागादि भावरूप अध्यवसान है उसीसे ही पापका बंध होता है तेसे ही चोरी न करनेमें, सत्यमें, ब्रह्मचर्य पालनमें, व परिग्रहके त्याग भावमें जो रागादि अध्यवसान है उससे पुण्यका बंध होता है । शशक्षार्थ सहित विशेषार्थः-( एवम् ) ऊपर लिखे प्रमाण ( अलिए ) असत्य भापणमें ( अदत्ते ) विना दी हुई वस्तुके लेनेमें, ( अवह्मचेरे ) कुशील भावमें, ( परिग्गहे चेव ) तैसे ही धन धान्यादि परिग्रहमें (ज) जो ( अज्झवसाणं) रागादि ! अर्यवसान (कीरदि ) किया जाता है (तेणदु ) उस ही रागभावसे (पात्र) पापका (वज्झदे) बंध होता है । ( तहय ) तैसे ही ( अचुज्जे ) अचीयमें, (सच्चे ) सत्यमें, (बी) ब्रह्मचर्यमें ( अपरिगहत्तणे चेव ) तथा परिग्रहके त्यागमें (जं) जो ( अझवसाणं) रागादि अध्यवसान ( कीरदि) किया जाता है ( तेणदु ) रगी ही रागादि भावसे ( पुण्यं ) पुण्यका ( वज्झदे) बंध होता है। भावार्थ:-जसे विना अपने भार्यो में हिंसा करनेके भावके हुए केवल पर प्राणियोंका नो घात व पीड़ा होना सो हिंसा नहीं है इसी तरह पर वस्तुके ग्रहणमें, व असत्य बोलनेमें, व कुशील सेवनेमें, व परिग्रहणके इकट्ठा करनेमें जो रागादि भाव है वही पापका बंध करनेवाला है इमसे त्यागने योग्य है तथा सत्य बोलनेमें, अचौर्य भावमें, ब्रह्मचर्यमें, अपरिग्रहमें जो राग भाव है अर्थात् सत्यादिव्रतोंके पालनेमें जो राग है वही राग पुण्यका बंध करनेवाला है ॥ २७५-२७६ ॥ इस तरह पांच व्रत और पांच. अव्रतोंके सम्बन्धमें पुण्य तथा पापका बंध कैसे होता है इसको कहते हुए सूत्र रूप दो गाथाएं पूर्ण हुई। इसके बाद इन्ही दोनो सूत्रोंका विशेष वर्णन परिणामोंकी मुख्यतासे १३ गाथाओमें करते हैं। प्रथम ही कहते है कि बाह्य पदार्थ रागादि परिणामके कारण है और वे रागादि परिणाम कर्म बंधके कारण है- ' गायाः-वत्थु पड्डुच तं पुण अज्झवसाणं तु होदि जीवाणं । '.. ण हि वत्युको दुबंधो अज्झवसाणेण वंधोत्ति ॥ २७७ ॥ संस्कृतार्थ:-वन्तु प्रतीत्य यत्पुनरध्यवसानं तु भवति जीवानां । न हि वस्तुतस्तु बंधोऽध्यवसानेन बंधोस्ति ॥ २७७ ॥ सामान्यार्थ:-बाहरी वस्तुओंका आश्रय लेकर जीवोंक रागादि भाव होता है। कर्मोंका बंध वस्तुओंसे नहीं होता किन्तु रागादि अध्यवसानसे होता है । शब्दार्थ सहित- विशेषार्थ (वत्यु) चेतन और अचेतन पाचों इन्द्रियोंके ग्रहणमें आने योग्य पदार्थोंकों (पडुच्च) प्रतीतिमें लेकर व उनका आश्रय करके (जीवाणं) संसारी जीवोंके (तं पुण अज्झवसाणंतु) यह प्रसिद्ध रागद्वेष भावरूप अध्यवसान (होदि) होता है। (वाथुद्रो दु) बाहरी वस्तुओंकी निक्टता -
समयसार टीका।
होनेसे (यो णहि) कर्मीका वंध नहीं होता है किन्तु (अन्झबमाणण) बीतराग परमाननात्यमे
भिन्न रागादिरूप अध्यवसानसे (बंधोति) वंध होता है । यहां निष्यने प्रश्न किया कि चनन
पदार्थ स्त्री पुत्र मित्रादि व अचेतन पदार्थ धनधान्यादि इनकी निकटता होनमें कमीका बंध
क्यों नहीं होता है ? इसका समाधान आचार्य करने है:-कि बाहरी वस्नुका और काँक
बंधका परस्पर अन्वय व्यतिरेक सिद्ध नहीं होता किन्नु व्यभिचार आता है। क्योंकि यह नियम
नहीं है कि बाहरी वस्तुओंक होते हुए नियममे कर्मोकाबंधहोयही होइसलिये अन्वयपना नहीं है
इस तरह यहभी नियम नहीं है कि बाहरी वस्नुके मंबन्ध नहोनेपर काँका बंध न हो इससे व्यनिरक-
पना भी नहीं है-फिर शिप्यने प्रश्न किया कि जब यह बात है तब क्रिम लिये बाहरी बन्नुओंका
त्याग करां या कराया जाता है इसका ममाधान आचार्य करने हैं कि गगादि भावकि त्याग
करनेके लिये बाहरी पदार्थोका त्याग किया जाता है। यहां यह तात्पर्य है कि वाह पांचों
इन्द्रियों के विषयरूप पदार्थोके होते हुए अज्ञान भावसे रागादिक अव्यवसान होता है और
उस रागादि भावसे काँका बंध होता है इस लिये परंपरासे चेतन व अचेतन वाघ वन्नु
वंधका कारण होती है । साक्षान् बंश्रका कारण नहीं है परन्तु गगादि अध्यवमान है यो
निश्चयसे बंधको साक्षात कारण है। ऐसा जानना। भावार्थ-जसे पट्टोमीके पास धन धान्यादि
परिग्रह रहे हम उसको देखते जानते हैं परन्तु उसमें राग द्वेष व मोह नहीं करते हैं नो हमको
कुछ भी कर्मका बंधन होगा-और यदि उसी पड़ोसीकी परिग्रहमें हम राग, ईप, मोह करेंगे
तो हमें विना म पग्ग्रिहके होते हुए भी गर्मीका बंध हो नायगा । इसी तरह यदि हमध्यानमें
लीन हैं और किसीने हमारे ऊपर कपड़ा डाल दिया-यदि हमने उससे राग न किया तो
उससे कर्मोका चंच नहीं होगा-पर जब हम व्यानसे हटे हैं तत्र भी हम उस कपड़को अपने
ऊपर रक्खे रहें तो अवश्य हमें राग भाव हो आवेगा, इसलिये हम कमाको बांध लेवंगे
केवली भगवानके न अज्ञान भाव है न राग है अपने स्वात्मानुभवरूप ध्यानमें तल्लीन हैं
तब यदि समवशरण आदि विभूतिकी निकटता होती भी है तो भी उनके बंधका करण नहीं
होती क्योंकि केवली भगवान उससे कुछ भी रागी नहीं होते । जो कोई परवस्तुको उठावे.
रक्खे, व उमसे बुद्धिपूर्वक काम लेगा तो उससे रागथोड़ाया बहुत अवश्य होगा । बम बद गग
है सो ही बंधका कारण है । इसलिये वस्तु हो व मत हो राग भावसे बंध होना जान उसको
छोड़नेका यत्न करना जरूरी है। क्योंकि परवस्तु स्त्री पुत्रादि व धन धान्यादिका सम्बन्ध
अवश्य ही उपयोगमें रागादि भाव पैदा कर देता है इसलिये इन वाद्य वस्तुओंकी उपचारस
परिग्रह कहा है व इनको त्याग करना जरूरी है। निश्चयसे रागादिभावही कर्म पंघका कारण
है ऐसा जानना ॥२७॥
RecRUARANASIYAmri । " - upsamvaasireewatatee २२०. समयसार टीका। इस तरह यह निश्चय किया गया कि रागादि अध्यवसान बंधका हेतु है परन्तु यह रांगादि: भाष अपने प्रयोजनको न कर सकनेके कारण अर्थात् उसमें अर्थ क्रियाकारीपना न होनेके कारण बिलकुल मिथ्या है-झूठ है ऐसा दिखलाते है:- गाथाः-दुक्खिदसुहिदे जीवे करेमि वंधेमि तह विमोचेमि-! जा एसा तुज्झ मदी णिरच्छया साहु दे मिच्छा ॥२७८॥ संस्कृतार्थः-हुःखितसुखितान् जीवान् करोमि बध्नामि तथा विमोचयामि । या एषा तव मतिः निरर्थिका सा खलु अहो मिथ्या ॥२७८ ।। सामान्यार्थ-मैं जीवोंको दुःखी या सुखी करता हूं, उनको बांधता हूं तथा छोड़ता हूं, जो ऐसी तेरी बुद्धि है सो वे मतलव है तथा वह प्रकटपने मिथ्या है-झूठ है । शब्दार्थ सहित विशेषार्थः-(जीवे) प्राणियोंको (दुःक्खिद सुहिदे) दुःखी व सुखी (करेमि) करता हूं (वधेमि) बांधता हूं (तह विमोचेमि) तथा छोडता हूं (जाएसा) जो यह (तुज्झ) तेरी (मदी) बुद्धि है (सा) वह बुद्धि (हु) प्रगटपने (निरच्छया) निरर्थक अर्थात् वे मतलव है (दे)अहो इसी कारणसे मिच्छा) मिथ्या है-झूठ है क्योंकि तुम्हारा पर जीवोंकोदुःखी यासुखी करने रूप भाव जो रागद्वेषमई अध्यवसान है उसके होनेपर भी अन्य जीवों के साता व असाताकर्मके उदयके अमावसे परजीवोंको सुख या दुःख हो नहीं सक्ता तथा उनके अपने अशुद्ध भाव व शुद्ध भाव .. होनेके अभावसे उनको बंध और मोक्ष भी नहीं हो सकता । भावार्थ:-जब किसी भी जीवको सुख या दुःख उसके पूर्वकतकर्मोके उदयसे होता है और जो उसके पूर्वरूत कर्मोका उदय नहो- तो होता नहीं चाहे दूसरा कितना भी चाहे कि मैं परको सुखी या दुःखी करूं इस लिये आचार्य कहते हैं कि तेरा जो यह अध्यवसान है अर्थात् रागादि भाव है कि मैं पर ज़ी- वोंको सुखी या दुःखी. करूं या मैं परजीवोंको वांधता हूं या छोड़ता हूं, सो:यह निरर्थक है अर्थात् -मिथ्या है। कार्यकारी नहीं है ॥ २७८ ।। आगे कहते है कि रागादि अध्यवसान क्यों अपने कार्यको करनेवाले नहीं होते है- गाथा:-अज्झवसाणणिमित्तं जीवा वज्झति कम्मणा ज़दि हि। . मुचंति मोक्खमग्गे ठिदा य ते किंकरोसि तुमं ॥ २७९॥ संस्कृतार्थः-अध्यवसाननिमित्तं जीवा बध्यन्ते कर्मणा यदि हि । मुच्यते मोक्षमार्गे स्थिताश्चतर्हि किंकरोसि त्वं ॥ २७९ ।। सामान्यार्थः-रागद्वेपादि अध्यवसानके निमित्त यह जीव यदि कर्मोसे बंधते हैं और जो मोक्ष मार्गमें रहते हैं वे कर्मोंसे छूटते हैं तब तुम क्यों रागादि भाव करते हो । शब्दार्थ सहित विशेषार्थ:--- (जदि) यदि (जीवा) यह जीव (हि) निश्चयसे (अज्झवसाण णिमित्तं) अपने ही मिथ्यात्व व रागद्वेष आदि अध्यवसानके निमित्तसे (कम्मणा) ज्ञानावरणादि काँसे - - - ANSERVARKARI समयसार टीका। (पति) वांधे जाते हैं (य) तथा (मोक्खमग्ग) शुद्ध आत्माक यथार्थ अन्डान, ज्ञान और आंचरणरूप निश्चय रत्नत्रय स्वरूप मोक्ष मागमें (टिदा) ठहरे हुए. (मुञ्चनि) कमाने छूटने हैं (ने) तब हे दुरान्मा (तुमं) तुम (किंकरोमि) क्यों गगादि अध्यवमान करने हो! यह भाव तुम्हारा कुछ भी कार्य नहीं कर सके इम लिये यह तुम्हारा अव्यवमान अपने प्रयोजनको सिद्ध करनेवाला नहीं होता है ऐसा जानना| भावार्थ-परको दुःखी या मुन्नी करने रूप जो रागादि भाव है वह अपने आत्माका हितकारी नहीं क्योंकि उन भावसि आ- त्मा कर्मोसे वंधता है तथा वे भाव दृमरेका बिगाड़ सुधार भी नियमसे नहीं कर मन तथा नो हुन मावोंको छोड़कर अभेद रत्नत्रय स्वरूप निजानंदरूप समाधि भावमें ठहरने हैं वे नहीं बंधते किन्तु पूर्वबद्ध कर्मोकी निर्जरा करके मोल प्राप्त करते हैं इसलिये रागादि अव्यवसान करना निरर्थक ही है ।। २७९ ॥ आगे फिर भी कहते है कि जो जीव दुःखी होते हैं वे अपने ही पापोंके उदयगे होते है तुम्हारे परिणामोंसे नहीं होने । गाथा:-कायेण दुक्खवेमिय सत्ते एवं तु जं मदि कुणसि । सव्वावि एस मिच्छा बुहिदा कम्मेण जदि सत्ता ।।२८०॥ वाचाए दुक्खवेमिय सत्ते एवं तुजं मदि कुणसि । सव्वावि एस मिच्छा दुहिदा कम्मेण जदि सत्ता ॥२८२।। मणसाए दुक्खवेमिय सत्ते एवं तुजं मदि कुणसि । सव्वावि एस मिच्छा दुहिदा कम्मेण जदि सत्ता ।।२८२।। सच्छेण दुक्खवेमिय सत्ते एवं तु जं मदिं कृणसि । सव्वावि एस मिच्छा दुहिदा कम्मेण जदि सत्ता ॥२८३॥ संस्कृतार्थः--कायेन दुःखयामि सत्वान् एवं तु यन्गति करोषि । सर्वपि एपा मिथ्या दुःखिताः फर्मणा यदि सत्यः ।। २८० ॥ वाचा. दुःखयामि सत्वान् एवं तु यन्मति करोपि । सर्वापि एपा मिथ्या दुःखिता कर्मणा यदि सत्वाः ॥ २८१ ।। मनमा दुःखियामि सत्वान् एवं तु यन्मतिं करोषि । सापि एपा मिथ्या दुःखिताः कर्मणा यदि सत्वाः ॥ २८२ ।। शत्रः दुःखियामि सत्वान एवं तु यन्मति करोषि । सर्वापि एपा मिथ्या दु:खिताः कर्मणा यदि स्वाः ।। २८३ ॥ सामान्यार्थः-मैं शरीरसे प्राणियोंको दुःखी करता है ऐसी जो तृ वृद्धि करता है मो सवे ही यह बुद्धि मिथ्या है यदि प्राणी अपने २ कर्मोक उदयसे दुःखी होने हैं। मैं बन. नसे प्राणियोंको दुःखी करता हूं एमी जो तू बुद्धि करता है सो सर्व ही अपत्य है गदि नीय EMPORAR समयसार टीका। -SANGLISHNUEEGRANARAN . अपने पापकर्मोके निमित्तसे दुःखी होते हैं। मनसे मैं जीवोंको दुःखी करता हूं ऐसी जो तेरी बुद्धि है सो सर्व ही मिथ्या है यदि प्राणी. अपने कर्मोके उदयसे दुःखी होते हैं। शस्त्रोंसे. मैं प्राणियोंको दुःखी करता हूं ऐसी जो तेरी. बुद्धि है सो सर्व ही मिथ्या है यदि जगतके : प्राणी अपने . २. कर्मोके उदयंसे दुःखी होते हैं। विशेषार्थः--इन गाथाओंका शब्दार्थ सुगम है। विशेषार्थ यह है कि यदि जीव अपने ही पापके उदयसे दुःखी होते हैं. तौ यदि उन जीवोंके अपने ही पापकर्मका उदयका अभाव है तो तुम उनका कुछ भी नहीं कर सक्त इस हेतुसे हे. दुरात्मा. तुम्हारी यह बुन्द्रि कि मैं मनसे, वचनसे, कायसे, तथा शस्त्रोंसे जीवोंको दुःखी करता हूं बिलकुल मिथ्याहै। केवल मिथ्या हीनहीं है किंतु इस बुद्धिके कारणतुम स्वस्थ अर्थात् आत्मामें. तन्मयी पनेने भावसे गिर: कर पापकर्मको ही बांधते हो। भावार्थ:-यह अज्ञानी प्राणी निरंतर यह अहंकार किया करता है कि मैं अपने मन, वचन, काय, व लाठी, चाबुक आदि शस्त्रोंसे दूसः रोंको दुःखी करता हूं इससे इस अहंकारको वृथा बतलाते हुए आचार्य कहते हैं कि जबतक प्राणियोंके अपने ही पापकर्मोका उदय नहीं होता है तबतक वे कभी भी दुःखी नहीं हो सक्ते चाहे कोई किसीको कितना भी दुःखी करनेको विचार किया करें। इस कारण अज्ञानी की यह अहंकार बुद्धि केवल मिथ्या ही नहीं है किन्तु उसको अपने रागादि अध्यवसानके कारण पापकर्मोसे बांधने वाली हैं। इसलिये ज्ञानीको परको दुःख देनेका विचार करना निश्चय नर्यसे मिथ्या है। यद्यपि व्यवहारी जीव अपने प्रयोजन वश परको दुःख पहुंचानेका उद्यम करता है और यदि उस पर मनुष्यके पापकर्मका उदय होता है तो वह दुःखी भी होनाता है तथापि येहा आचार्य मोक्ष मार्ग प्रकरणमें बंध तत्वको समझाते हुए असल वातको वत- लाते हैं कि चाहे कोई इस अज्ञानीकी हिंसारूप बुन्हिसे या प्रयत्नसे दुःखी न होवे परन्तु यह प्राणी अवश्य पापकर्मोको बोध लेता है इससे मोक्षके इच्छुक जीवकोउचित है कि इन हिंसारूप भावोंसे बचकर अपने आत्माके शुद्ध भावमें तिष्ठनेका प्रयत्न करे॥२८०-२८१-२८२-२.१२॥ आगे कहते हैं कि निश्चयसे अपने ही शुभकर्माके' उदय होने पर प्राणी सुखी होते हैं:-- गाथा:-कायेण च वायाइवं मणेण सुहिदे करेमि सत्तेति । एवंपि हेवंदि मिच्छा सुंहिदा कम्मेण जदि सत्ता ॥२८४॥ संस्कृतार्थः-कायेन च वाचा वा मनसा सुखितान्. करोमि सत्वानिति । एवमपि भवति मिथ्या सुखिनः कर्मणा यदि सत्वाः ।। २८४ ॥ सामान्यार्थः यदि प्राणी अपने २. कर्मोके उदयसे सुखी होते हैं तब तुम्हारी यह बुद्धि कि मैं मन, वचन, कायसे प्राणियोंको सुखी करता हूं मिथ्या है। शब्दार्थ सहित विशेषार्थ- (जदि) जो (सत्ताः) जगतके प्राणी (कमेण ): अपने २.शुभ कर्मोंके उदय होनेपर (सुहिदा).. सुखी होते हैं तुम्हारे परिणाम या भावसे नहीं होते तत्र (सत्ता). प्राणियोंको (कायेण) कायसे .
-- समयसार टीका। (4) अथवा (वाया) वचनसे (ब) अथवा (मणेण ) मनसे (मुहिदे कोमि) मुखी करता • ( इति ) यहं तेरी बुद्धि ( एवंपि ) उनी प्रकार ही (मिच्छा ) अठी है अर्थात तेग यह रागरूप अव्यवसान अपने कार्यको करनेवाय नहीं हो सका। किन्तु जब त म शुभ परि- गाममें अहंकार कर लेता है तब तू रागादि. भाव रहिन परमननन्य ज्योति स्वरूप स्वभावमद अपने शुद्ध आत्मीक तत्त्वको नहीं श्रन्हान करता हुआ, उसको भले प्रकार नहीं जानता हुआ व उसकी सम्यक् रूपसे भावना नहीं करता हुआ रहता हैं इससे उस शुभ परिणामके कारण तू पुण्यको ही बांधता है यह तात्पर्य है । भावार्थ-जब यह अज्ञानी प्राणी पको मुनी करनेंरूप भावों में तन्मई होता है और इस बातको भूल जाना है कि मंगार्ग जीव अपने शुभ कर्मोके उदय विना मुखी नहीं होसकते तब यह मिथ्यां अहान ज्ञान चारित्ररूप होता हुआ शुभ भावोंसे पापानुबंध ( पापका परंपरारूप ) रूप पुण्यकर्मको बांधता है और जय इम प्राणीके परका हित करनेरूप भाव होता है पर उसमें अहंकार नहीं होता अर्थात यह इस वातको जानता है कि मैं केवल निमित्त मात्र हूं, जब तक इस जीवके पुण्यकर्मका उदय नहीं होता मेरे निमित्तसे कोई सुखी नहीं होमक्ता तब इमके यद्यपि उम समय आत्माने स्थितिरूप स्वस्थ भाव नहीं है किन्तु शुभ भाव है परन्तु सम्यक अन्डा सहित शुभ भावगे यह प्राणी पुण्यानुबंध ( पुण्यकी परम्पराम्प) रूप पुण्य कमको यांचता है। यहां पर बंधनत्त्व से विमुख कराकर मोक्ष तत्वमें शिप्यको प्रेरित करना है इसमे आचार्य कहते हैं कि निश्चयस परको सुखी करनेरूप जो रागादि अव्यवसान है वह पुण्यकमको बांधनेवाला है इससे त्यागने 'योग्य है तथा मिथ्या भी हैं क्योंकि केवल इसकी ऐसी बुन्हिसे पर जीव सुखी नहीं होगा। जब तक उम पर जीवके पुण्य कर्मका उदय न हो, ऐमा जाने स्वसमाधि भाव में लीन रहना ही इस जीवको परम हित है ॥ २८४ ।। आगे उपदेश करते है कि अपने शात्मामे म्धितिक्ष्य स्वम्य गावर विरोधी गाप आदि अध्यवसानसे मोहित होता हुआ यह जीव सर्व ही पाद्रव्यको अपना मानने लगता है। गाथा-सव्वे. करेदि जीवो अज्झवसाणण तिरियणेरहए । देवमणुवेपि सव्वे पुण्णं पावं अणेयविहं ।। २८५ ।। संस्कृतार्थ:-सर्वान् करोति जीवामध्यवसानेन तियनरयिकान् । देवमनुजांश्च 'सर्वान् पुण्यं पापं च नकविध : २८५ ॥ सामान्यार्थः--यह जीव रागादि अव्यवमानके कारण मर्व ही नियंच, नरक, देव, मनुप्य सम्बन्धी अनेक प्रकार पुण्य व पापरूप भावोंको अपना कर लेता है | दार्थ महिन विशपार्थः- (जीवों) यह आत्मा (अझबसाणेण) राग भूप अव्यवसान के निमित्तम (मध्य) सर्व ही उदयमें प्राप्त नरक गति आदि ककि उदयके वगने (तिरिय गेग्टये देव मणुनि) URNEARNarewar VASRANA ... N समयसार टीका। तिर्यंच, नरक, मनुष्य, देवरूप (अणेय विहं) नाना.प्रकार-(पुण्णं पावं सव्वे) पुण्य व पापरूप 'सर्व भावोंको (करेदि) अपना कर लेता है। अर्थात् विकार रहित परमात्म तत्वके ज्ञानसे भृष्ट होकर .मैं नारकी हूं मैं तिर्यंच हूं इत्यादि उदयमें प्राप्त कर्मोंके द्वारा होनेवाले विभाव परिणा- मोंको अपने आत्मामें जोड़ लेता है। भावार्थ:--मोह रागद्वेपके कारणः-कर्म जनित नर नारकादि अवस्थाओंको अपनी मान लेता है ॥ २८५ ॥ आगें: फिर भी इसी वातको कहते है:- गाथा:-धम्माधम्मच तहा जीवाजीवे अलोगलोगःच । सव्वे करेदि जीवो अज्झवसाणेण अप्पाणं ॥ २८६-11: संस्कृतार्थः-धर्माधर्म: च तथा जीवाजीवौ अलोकलाक- च। सर्वान् करोति, जीवः अध्यवसानेन आत्मानं || २८६ ॥ सामान्यार्थः- यह जीव: अध्यवसानके द्वारा धर्म, अधर्म, जीव, अजीव, लोक, अलोक आदि सर्व ही ज्ञेय पदार्थोंको अपना मान लेता है शब्दार्थ सहित विशेषार्थ:- : (जीवों) यह जीव (अज्झवसाणेण) जाननेरूप विकल्पके द्वारा (धम्माधम्म) धर्मास्तिकाय और अधर्मास्तिकायको (च तहा) और ( जीवानीवे ) जीव और अजीवको (च अलोग लोग) और अलोकाकाश व लोकाकाश (सव्वे) आदि सर्व ही ज्ञेय पदार्थोंको (अप्पाणं करेदि) अपना कर लेता है अर्थात् अपने आत्मासे उनका संबन्ध कर लेता है.। तात्पर्य यह है कि जैसे घटके आकार- परिणमन करनेवाले ज्ञानको उपचारसे. घट कहते हैं । तैसे ही धर्मास्तिकाय आदिजानने योग्य पदार्थोके विषयमें यह धर्म है यह अधर्म है इत्यादिजो जाननरूप विकल्प है उसको भीउपचा- रसे धर्मास्तिकायआदि कहते हैं। क्यों ऐसा कहते हैं इसका उत्तर यह है कि उस जाननरूप विकल्पका विषय धर्मास्तिकाय आदिक है। जब यह आत्माखस्थ भाव अर्थात् अपने आत्मांमें तिष्ठनेरूप समाधि भावसे गिर करके यह विकल्प करता है कि यह धर्मास्तिकाय हैव यह अधर्मास्तिकाय है इत्यादि तब इस तरहके विकल्पके करते हुए धर्मास्तिकाय आदि ही उपचारसे किये गए. ऐसा कहने में आता है । अर्थात् उस समय आत्माका सम्बन्ध ज्ञेय पदार्थोंसे. होरहा है। भावार्थः--जब यह आत्मा अपनी आत्मीक परिणतिमें तल्लीन रहता है तब आत्माका ही अनुभव करता हुआ निर्विकल्प रहता है पर जब आत्मासे भिन्न धर्म, अधर्म, आकाश, काल व पुद्गल इन, पदार्थोंके नानने में अपना विकल्पका संबंध करता है तब स्वस्थ भावसे गिर करके उस जानन- रूप विकल्पके अध्यवसायमें परिणमन करता है जिससे ऐसा कहा जाता है कि उसने पर ज्ञेय पदार्थोसे अपना सम्बन्ध कर लिया । अर्थात् यह आत्मा. पर रूप हो गया ॥ २८६ ॥ आगे. प्रकाश करते हैं. कि निश्चयसे यद्यपि, यह आत्मा पर द्रव्योंसे भिन्न है तो भी जिस मोहके प्रभावसे यह अपने आत्माको पर द्रव्यमें जोड़ता है वह मोह जिनके नहीं ही तपोधन अर्थात् साधु महात्मा तपस्वी है."
'ममयमार टीका। गाथा:-महाजि गतिथ में अज्झनाणाणि एबमादीणि । ते अहेण सुहेण य कम्प्रेण मुणी लिपति ॥२८७ ॥ संस्कृतार्थ:- एतानि न मति गपामध्यवसामान्य नमाटोनि तऽशुभन शुभंन वा कर्मणा मुनयो न लिप्यति ॥ २८७ ॥ सामान्यार्थ-इस प्रकार ऊपर. कहे हुए यह सर्व रागादि अध्यवसान जिनके नहीं हैं के ही मुनि हैं. और ने शुभ व अशुभ कर्मबंधसे नहीं लिपते हैं । शब्दार्थ सहितविशेपार्थ- .(एवमादीणि एदाणि) इसप्रकार ऊपर कहे हुए यह सर्व (अज्झवसाणाणि) शुभ या अशुभ ... कर्मबंधके निमित्त कारण रागादि अध्यवसान (जेसिं णत्थि) जिनके नहीं होते हैं (ते मुणी) वे ही मुनि हैं और वे. (सुहेण य असुहेण कम्मेण) शुभ और अशुभ अशुभ कर्मोंसे (न लिप्पंति) नहीं लिप्त होते हैं । इस कथनका विस्तार यह है कि जिस समय शुद्धात्माका सम्यक श्रद्धान, ज्ञान और आचरणरूप निश्चव रत्नत्रयमई भेदविज्ञान इस जीवके नहीं होता है तब-यह कभी हिंसा सम्बन्धी अध्यवसान करता है कि मैं जीवोंकी हिंसा करता हूं, कभी कर्मके उदयरूप अवस्थाका अध्यबसान करता है कि मैं बाकी हूं, कभी ज्ञेय पदार्थमें जाननरूप अध्यवसाय करता है कि यह धर्गनिजाम इत्यादि है इन अध्यवसानोंको विकल्प रहित शुद्धा- मासे भिन्न नहीं जानता है। इसतरह इन अव्यवप्तानोंको शुद्धात्मासे भिन्न अनुभव नहीं करता हुआ हिंसा आदिके अध्यनसान सन्मन्धी विकल्पके साथ अपने आत्माका अभेदरूपसे श्रद्धान करता है, जानता है तथा अनुभव करता है तब मिथ्यादृष्टी, मिथ्याज्ञानी और मिथ्याचारित्री हो जाता है इससे उसके कौका बंध होना है । भावार्थ:-जब यह आत्मा सर्व पर विकल्पोंसे रहित हो अपने ही शुद्धात्माका यथार्थ श्रद्धान, ज्ञान व अनुभव करता है तवं इसके भेदविज्ञान होता है जिसके प्रतापसे नवीन कौका बंध नहीं करता। परंतु जब निर्विकल्प भाचसे गिरा हुआ होता है और नाना प्रकार शुभ या अशुभ संकल्प विकल्प करता है और उन ही विकल्पोंमें तन्मई हो जाता है तब मिथ्यात्वी होता हुआ महान् कमेंका बंध करता है। परंतु जो सभ्यग्दृष्टी नीचली अवस्थामें है उसके भी समाधिसे हटा हुआ शुभं या अशुभ भाव होना संभव है और इस भावसे यह सम्यग्दृष्टी भी पाप या पुण्य कर्मोका वंध करता है तो भी इसके श्रद्धानमें व अनुभवमें यह झलकता है कि यह शुभ या अशुभ विक- ल्प मेरे शुद्ध स्वभावसे भिन्न हैं । इस कारण मिथ्यादृष्टीकी अपेक्षा इसके अल्प कर्मका बंध होता है ॥ २८७ ॥ भागे शिष्यने प्रश्न किया कि कितने काल तक यह आत्मा पर भावोंको अपनेमें जोड़े रखता है जिसका समाधान आचार्य करते है:- गाथा:- पक्षिया कर शुभाइ अनुदा हलणयं । अप्पतरूपा रिडी जाय ण हियए परिप्फुरई ॥ २८८ ॥ . - समयसार टीका। coveserARH . २२३ संस्कृतार्थः-यावसंकल्पविकल्पी तावत्कर्म करोत्यशुभशुभजनकं । आत्मस्वरूपा ऋद्धिः यावत् न हृदये परिस्फुरति ॥ २८८ ॥ सामान्यार्थः-जबतक इस जीवके संकल्प विकल्प उठते हैं और आत्मस्वरूपकी रिद्धि हृदयमें नहीं प्रकट होती है तबतक यह शुभ या अशुभ कर्मोको करता है। शब्दार्थ. सहित विशेषार्थः-ना) जबतक यह जीव (संकप्प वियप्पो) वाह्य पदार्थ जैसे देह, पुत्र, स्त्री आदिमें यह मेरे हैं ऐसा संकल्प करता है तथा अपने मनमें कभी हर्ष और कभी रंज इत्यादि विकल्प करता है (जाय) और जवतक (अप्पसरूवा रिडी) अनंत ज्ञान दर्शन मुख वीर्य आदि आत्मस्वरूपकी रिद्धि (हियए) हृदयमें (ण) नहीं (परिष्फुरई) प्रकट होती है (ता) उसवक्त तक (असुह सुह जणय कंम) पाप और पुण्यको पैदा करनेवाले कर्मोको (कुणइ) बांधता है। भावार्थः-शुभ या अशुभ कर्मोंका बंधन उस वक्त तक इस जीवके होता है जबतक इसके अंतरंगमें संकल्प और विकल्प उठा करते हैं और यह संकल्प विकल्प उस वक्त तक रहते हैं जवतक इसके अंतरंगमें आत्म ज्योतिका अनुभव नहीं होता ॥ २८८ ॥ आगे अध्यवसानके पर्यायवाची नामोंके संग्रहको कहते है:- - गाथाः-वुद्धी ववसाओविय अज्झवसाणं मदीय विण्णाणं । इकटमेव सव्व चित्तं भावोय परिणामो॥ २८९ ॥ संस्कृतार्थ:-बुद्धिर्व्यवसायोऽपि च अध्यवसानं मानश्च विज्ञानं । एकार्थमेव सर्व चित्तं भावश्च परिणामः ॥ २८९ ॥ सामान्यार्थः-बुन्डि, व्यवसाय, अध्यवसान, मति, विज्ञान, चित्त, भाव, परिणाम सर्व एकार्थवाची हैं। शब्दार्थ सहित विशेषार्थः-(बुद्दी) बुद्धि अर्थात् समझ ( ववसाओ) व्यवसाय अर्थात जाननरूप व्यापार, ( विय ) और भी ( अज्झवसाणं ) अध्यवसाय अर्थात् जाननरूप विकल्प, ( मदीय ) और मति अर्थात् मनन या पर्यालोचन, (विण्णाणं ) जिससे जाना जाय सो विज्ञान, (चित्तं ) चितवनरूप व्यापार चित्त, ( भावो ) होनेरूप सो भाव ( परिणामो ) परिणमनरूप सो परिणाम ( सव्वं इकट्ठमेव ) यह सर्व एक अर्थवाची हैं, इनमें शब्दभेद होने पर भी अर्थका भेद नहीं है किन्तु समभिरूढ़ नयकी अपेक्षासे सर्व ही अध्यवसानके ही अर्थको कहते हैं। जैसे इन्द्र शक्र और पुरन्दर इन शब्दोंमें व इनके कार्यरूप अर्थोंमें भेद होने पर भी यह सर्व समभिरूढ़ नयसे इन्द्र हीके नाम हैं तैसे बुद्धि, व्यवसाय, अध्यवसान, मति, विज्ञान, चित्त, भाव, परिणाममें शब्द और क्रियाका भेद होते हुए भी सर्व ही सममिरूढ़ नगसे अध्यवसायके ही वाचक हैं । भावार्थः-रागद्वेषरूप अध्यवसानको हम रागद्वेपरूप बुद्धि, रागद्वेवरूप व्यवसाय, रागद्वेषरूपमति, रागद्वेषरूप विज्ञान, रागद्वेषरूप चित्त, रागद्वेषरूप भाव व रागद्वेपरूप परिणाम सर्व कह सक्ते हैं । यह सर्व ही आत्माके अशुद्ध भावको प्रकट करनेवाले हैं । ॥ २८९ ।।
Inves ? समयसार टीका। इस प्रकार पहले ही दो सूत्रोंमें यह व्यायान किया गया कि अहिंसा मत्यादि प्रताकि द्वारा पुण्य और हिंसा असत्य आदि अव्रतोंके द्वारा पापका बंध होता है। उन ही दोनों मूत्रोंका विशेष वर्णन करनेके लिये यह कहा कि बाह्य चेतन और अनेनन पदार्थ रागादि अव्यवसानके निमित्त कारण हैं तथा रागादि अव्यवसान नवीन कर्मञ्चका कारण है । इस कथनकी मुख्यतासे १३ गाथाएं पूर्ण हुई । इसतरह समुदायसे १५ मूत्रकि द्वारा चौथा स्थल समाप्त हुआ। इसके पीछे कहते हैं कि अभेद स्नत्रय स्वरूप निर्विकल्य समाधि स्वाप निभय नयी अपेक्षा विकल्प मई व्यवहार भयको वावा आती है। इस कानकी मुग्यतारो ६ गावाश्री तक नर्णन है- गाथाः-एवं ववहारणओ पडिसिन्ही जाण णिच्छपणयेण । णिच्छयणयसहीणा मुणिणो पावंति शिव्याण ॥ २९० ॥ संस्कृतार्थ:-एवं व्यवहारनयः प्रतिपिद्धो जानीहि निधयनयेन । निश्चयनबसलीना मुनिनः प्राप्नुवंति निर्वाणं ॥ २९० ॥ सामान्यार्थः-उपर कहे प्रकारसे ऐसा जानो कि निश्चय नयी अपेक्षा व्यवहार नय निषेधने योग्य है क्योंकि निश्चय नयमें लवलीन मुनि निर्माणका लाभ करते हैं। शब्दार्थ सहित विशेषार्थ-(एवं) पूर्वमें कहे प्रकारसे (बबहार णओ) परद्रव्यंक आश्रयको लेनेवाली व्यवहार नय (णिच्छयणएण) शुद्ध आत्मीक द्रव्यको आश्रय करनेवाली निश्चय नयकी अप- क्षासे (पडिसिद्धो) निपेधने योग्य है (जाण) ऐसा जानो क्योंकि (णिच्छयणयसल्लीणा) निश्चय लीन, आश्रयीभूत व ठहरे हुए (मुणिणों) मुनि व तपोधन (णिव्वाणं पावंति) मुक्तिका लाभ करते हैं । तात्पर्य यह है कि प्राथमिक शिष्यकी अपेक्षास प्रारंभकी अवस्थामें अर्थात् विकल्प सहित दशामें अर्थात् श्रावक व मुनिके बाह्य आचरणोंका अभ्यास करते हुए यह व्यवहार नय निश्चयको सिद्ध करनेवाली है इससे प्रयोजनवान है-कार्यकारी है तथापि जो विशुद्ध ज्ञान, दर्शन लक्षणको रखनेवाले शुद्ध आत्माके स्वरूपमें ठहरे हुए मुनि, ध्यानी व तपस्वी हैं, उनके लिये यह व्यवहार नय प्रयोजनवान नहीं है । यहां शिप्यने प्रश्न किया कि तत्र अप्रयोजनीय क्यों है ? इसका समाधान आचार्य करते हैं कि इसका आभय वह अभव्य भी लेता है जो कर्मोसे मुक्त नहीं होता, अर्थात् यह नय आत्माको कोसे छुड़ाने में कारणरुप. नहीं है । भावार्थ:-वास्तवमें विचार किया जाय तो शुद्ध स्वरूपकी प्राप्तिका उपाय अवल शुद्ध आत्माका अभेदरूपसे अहान, ज्ञान व अनुभव है यह निश्चय मोक्ष मार्ग है, जो इस मार्गमें ठहर जाते हैं उनके लिये फिर भेदरूप रत्नत्रय अर्थात्, व्यवहार धर्म कुछ विशेप कार्यको सिद्ध नहीं कर सका इसीसे आचार्यने कहा है कि शुद्धामाको आश्रय करनेवाली निश्चय नयके मुकावलेमें व्यवहार नय तुच्छ है क्योंकि जो मुनि व्यवहारके आश्रय ही रहते हैं वे कभी मोक्ष नहीं पाते । किन्तु जो व्यवहार रत्नत्रयके द्वारा निश्चय रत्नत्रयको पाकर अभेद और समयमार टीका। र गाथा:- निर्विकल्प आत्मसमाधिमें लीन होकर परम धर्मध्यान व शुध्यान करते हैं वे ही तपस्वी संसार सागरसे पार हो जाते हैं । अभव्य जीव निश्चय स्वरूपका अनुभव न कर केवल व्यवहारके ही आलम्बनमें रहते हैं । इसलिये वे कभी भी मुक्तिको नहीं पाने । तो भी जबतक व्यवहारमें परिणमन हो रहा है तबतक यह व्यवहार नय कार्यकारी है अमान् निश्चय नयका माधक मानकर जो इसका सेवन करते हैं वे निश्चयकी प्राप्ति करके फिर इमले उदासीन हो जाते हैं ऐसा जानना ॥ २९० ॥ आगे कहते हैं कि यह व्यवहारनय अप्रयोजनमन क्यो है:- -वदसमिदी गुत्तीओ लीलतवं शिवहिं पणतं ! कुव्वतोवि अभविओ अण्णाणी शियि २९१ ।। संस्कृतार्थः-व्रतसमिटिगुप्तयः शीलतपो जिनवरः शतं । कुर्वन्नध्यमव्यो ज्ञानी मिथ्याष्टिस्तु ।। २९ ॥ सामान्यार्थः-पांच महाव्रत, पांच समिति, तीन गुति. शील, तप आदि व्यवहार धर्म जिनेन्द्र देवोंने कहा है । अभव्य जीव इनको करता हुआ भी अज्ञानी और मिथ्यादृष्टी रहता है । शब्दार्थ सहित विशेषार्थ:-(निणवरेहिं) कमीको जीतनेवाले निनन्द्र देवाने (बदसमिदी गुत्तीओ सीलतवं) व्रत, समिति, गुप्ति, शील, तपश्चरण आदिको (प्रज्ञतं) व्यव- हारधर्म कहा है। (अभविओ) अभव्यजीव (कुम्चन्तोवि) नंद मिथ्यात्व और गंद कपायके उद- यसे इन व्रतादिकोंको पालता हुआ भी (अण्णाणी) अज्ञानी (य' और (मिच्छादिट्ठी मिथ्यादृष्टी ही रहता है क्योंकि उसके मिथ्यात्व, सम्यक मिथ्यात्व और सम्यक् प्रति मिथ्यात्व और चार अनन्तानुबंधी कषाय इन सात प्रतियोंका उपशम, क्षयोपशम या क्षय नहीं होता इससे उसके यह श्रद्धान नहीं होता कि शुद्धात्मा ही उपादेय अर्थात् ग्रहण करने योग्य है अर्थात् निश्चय सम्यक्त्वके अभावमें उसके यथार्थ मोक्ष मार्ग नहीं होता। इससे सिद्ध हुआ कि निश्चय सम्यक्त्वके विना व्यवहार मोक्षमार्ग निर्माणका कारण नहीं है । भावार्थ-अभव्य जीव व्यवहार रत्नत्रयको शास्त्रके अनुसार यथार्थ पालता है तो भी मोक्षमार्गी नहीं होता अर्थात् मिथ्यादृष्टी ही बना रहता है क्योंकि उसके निश्चयनयसे जो रत्नत्रयका स्वरूप है वह नहीं पाया जाता है। अतएव महा कठिन तप व ध्यान करता हुआ भी संसारी ही रहता है, इससे यह सिद्ध किया गया कि व्यवहारनय निश्चयनयकी अपेक्षा विना तो कुंछ भी कार्यकारी नहीं है परन्तु निश्चयनयकी अपेक्षाको लिये हुए साधक अवस्थामें कार्यकारी हैं पर जब निश्चय स्वरूपका लाभ है तब यह व्यवहारनय कुछ कर नहीं सक्ती ॥ २९१ ॥ आगे शिष्यने प्रश्न किया कि उस अभव्यके ग्यारह अंग ताला शाततान रहता है यह अज्ञानी कसे हो सकता है ? इसका समाधान आचार्य करते है:- wissieriaamiriamwiNAM समयसार टीका। गाथा:-मोकलं असतो अभविषसत्तो दु जो अधीएन। पाठो ण करेदि गुणं असहतस्स णाणं तु ॥ २९२ ॥ संस्कृतार्थ:-मोकानोऽभव्यसलन्तु नोऽमीनीत ! पाठो न करोति गुणमानस शानं ॥ २९२ ।। सामान्धार्थ:-सोक्षका नहीं श्रदान करता हुआ अभव्य जीव जो कुछ अध्ययन करता है सो कगे परन्तु उसका शास्त्र पाट यथा गुणको नहीं करता क्योंकि उसको शुद्धामाके ज्ञानका श्रन्दान नहीं होता । शनार्थ पनि विशेषार्थः-(मोक्त्र) मोक्ष तत्त्वको ( असइहतो) नहीं श्रदान करता हुआ :अभविय सत्तो) अभव्य जीव (दुनो अधीएन) यद्यपि अपनी प्रमिडि. पूना व लाभके वास्ते श्रुतका अध्ययन करता है मो करो तथापि ( गाणंतु असइईनम्म) शुद्धात्माक सम्यक् श्रद्धान, ज्ञान और अनुष्टानरूप निर्विकल्य समाधिके द्वारा अनुभवने योग्य शुद्धात्माके स्वरूपको नहीं श्रद्धानमें रखनेवाले अर्थात् निजात्मीक तत्त्वकी रुचि न करनेवाल जीवके ( पाठो) शाखाका पाट (गुणं ण कोदि ) शुद्धात्माका अनुभवरूप गुणको नहीं करता है । यह अभव्य जीव दर्शन और चारित्र मोहनीयक उपशम, क्षयोपशम तथा क्षयक विना शुद्वात्मस्वरूपका श्रद्धान नहीं कर पाता है । निश्चय सम्यक्त्वक निवारक प्रतियांका उपशम इस अभव्य जीके नहीं होता. क्योंकि इस जीवके अभव्यनामा पारिणागिक भावका सद्भाव है। भावार्थ-इस अभव्यः जीवका कुछ ऐसा ही विलक्षण स्वभाव है कि नियम इसके तत्त्वकी रुचि नहीं होती, इसीलिये उसका ११ अंग १० पूर्व तकका ज्ञान केवल शब्द ज्ञान मात्र है। शुद्धात्माके श्रद्धानके विना वह ज्ञान मिथ्या ज्ञान नाम पाना है ।। २९२ ॥ आगे कहते है कि अभव्य जीवके पुण्यरूप धर्ममा श्रद्धान तो है- गाथा:-सहादिय पत्तपदिय रोचेदिय तह पुणोवि फासंदि। धरमं भोगणिमित्तं णहु सो कम्मक्खयणिमित्तं ।। २९३ ।। संस्कृतार्थः-श्रदधाति प्रत्येति च रोचयति तथा पुना स्पृशति । धर्म भोगनिमित्तं न खलु स कर्मचयनिमित्तं ॥ २१३ ॥ सामान्यार्थ: --अभव्य जीव भोगोंके निमित्त धर्मका नन्दान करता है. मानना है तथा उसकी रुति:करता व उसका आचरण करना है किन्तु निश्चयाने निश्रय धर्मका अन्दान ज्ञान, आचरण कमोक नाशके लिये नहीं करता है । शन्दा महिन विशफार्म: - ‘नीत (भोगणिमित्तः अहमिन्द्र, इन्त्र, चक्रपती, यलमद, नारायण आदि भागांक वारले अर्थात अगर सेवनसे ऐसे २ उत्तमपद प्राप्त हो जायगे ऐसा मान करके (धम्म) पुण्यरूप शुभोपयोग धर्मको (सदहदिय) अडानमें लेता है (पत्त्वदियो उसको ज्ञानरूपसे समझता है (रोदिय विशेष अन्दान करके उसकी रुचि करता है (तह पुणोषि फासेदि) तथा उस धर्मका आचरण भी करत १ นัยขอนและสนทนา २३० समयसार टीका। है (गहु सो कम्मक्खयणिमित्त) परन्तु शुद्धात्माका अनुभवरूप निश्चय धर्मको न श्रदान करता न जानता न आचरण करता है जिससे संसारके कारण कर्मोका क्षय हो । भावार्थ:-अभव्यजीवको निश्चय आत्मीक धर्मका श्रद्धान नहीं होता इसलिये केवल व्यवहार धर्मको सेवन करता है जिससे पुण्य बांधकर संसारमें भ्रमणका पात्र बना रहता है इस कारण निश्चय धर्म ही मोक्ष मार्ग है ॥ २९३ ॥ आगे शिष्यने प्रश्न किया कि व्यवहार नय किसतरह निपधने योग्य है तथा निश्चय नय कैसे व्यवहारको निध करता है इसका समाधान आचार्य करते है. गाशाः-आयारादीणाणं जीवादीदसणं च पिण्णेयं । छन्जीवाणं रक्खा भणदि चरितं तु ववहारो॥ २९४ ॥ आदा खु मज्झणाणे आदा मे दसणे चरित्ते य। आदा पञ्चक्खाणे आदा मे संवरे जोगे ॥ २९५ ॥ संस्कृतार्थः-आचारादिज्ञानं जीवादिदर्शनं च विज्ञेयं । पट्जीवानां रक्षा भण्यते चरित्रं तु व्यवहारः ॥ २९४ ॥ आत्मा खलु मम ज्ञानमात्मा में दर्शनं चरित्रं च । आत्मा प्रत्याण्यानं आतमा में संवरो योगः ॥ २९५ ॥ सामान्यार्थः---आचारांग आदि शास्त्रोंका ज्ञान सो ज्ञान है, जीवादि तत्वोंका श्रद्धान है सो दर्शन है, छः प्रकार जीवोंकी रक्षा सो चारित्र है ऐसा व्यवहार नय कहती है ऐसा जानो । परन्तु निश्चय नय वतलाती है कि मेरा ज्ञान निश्चयसे आत्मा है, मेरा श्रद्धान और चारित्र निश्चयसे आत्मा है तथा मेरा प्रत्याख्यान अर्थात् त्याग आत्मा है और संवर तथा योग भी आत्मा है । शब्दार्थ सहित विशेपार्थः-(आयारादी) आचार सूत्र आदि ग्यारह अंगका शब्दशास्त्र, ज्ञानका आश्रय होनेके कारणसे (णाणं) ज्ञान है (च) और ( जीवादी) जीव, अजीव, आश्रव, बंध, संवर, निर्जरा, मोक्ष, पुण्य और पाप ऐसे नव पदार्थ श्रद्धानके विषयीभूत हैं तथा निश्चय सम्यत्त्वके आश्रय रूप व निमित्तरूप हैं इससे (दंमणं) व्यवहारसे सम्यक्त्व हैं (छज्जीवाणं) पृथ्वी, अप, तेज, वायु, वनस्पति, त्रस इसतरहं षट् कायके जीवोंकी (रक्खा) दया पालना चारित्रके आश्रयरूप व निमित्त कारण होनेसे व्यवहारसे (चरित्र) चारित्र है ऐसा (तु ववहारो) कथन तो व्यवहार नयका है अर्थात् शास्त्रपाठ, जीवादि तत्वकानद्धान और षट् कायोंकी रक्षा सो व्यवहार मोक्ष मार्ग कहा गया है। (आदा खु) अपना शुद्धात्मा ही ज्ञानका आश्रय व निमित्त होनेमें (मज्झणाणे ) निश्चय नयसे मेरा सम्यग्ज्ञान है ( आदामे दंसणे ) अपना शुद्ध आत्मा ही सम्यग्दर्शनका आश्रय व कारण होनेसे निश्चयसे सम्यग्दर्शन है (चरित्तेय ) तथा अपना शुद्ध आत्मा ही चारित्रका , समयसार टीका। आश्रय व हेतु होनेके कारणमे निश्चयसे सम्यकचाग्नि है। (भादा पसरवाण) शुद्ध आना ही राग रेप आदि विभाव भावोंका परित्यागरूप लक्षणमई प्रत्याख्यानत आश्रय नया कारण होनेसे निश्चयसे प्रत्याभ्यान है । (आदामे संवरे) अपना शुखात्मा ही अपने शुद्ध आन्गम्यमापकी प्राप्ति केवलसे हर्ष विषाद आदि कुभावोंक रोकनेरूप लक्षणको ग्वनेवाले मंबरका आशय होने निश्चयसे संवर है तथा शुभ अशुभ चिंताका रुकनारूप लक्षणको धरनेवाले परम ध्यानमई योगका आश्रय होनेसे निश्चयसे यह आत्मा ही परम योग है। इसतरह शुद्ध आमा आश्रय लेकर निश्चय मोक्षमार्गका स्वरूप जानना योग्य है इसतरह व्यवहार और निश्चय मोक्षमार्गमा स्वरूप कथन किया गया। यहां निश्चयनय प्रतिषेधने अर्थात मना करनेवाला है और व्यवहार प्रतिपेध योग्य अर्थात् मना करनेके योग्य है क्योंकि निश्चय मोक्षमार्गमें निटनेवाले नागरि नियमसे मोक्ष होता है परन्तु व्यवहार मोक्षमार्गमें तिटनेयाले जीवोंक होय वा न होय क्योंकि यदि वह व्यवहार मोक्षमार्गी भव्य मिथ्यात्व आदि मात प्ररुतियोंक उपशम, क्षय, व क्षयों- : - पशमसे शुद्धात्माको उपादेय मान कर वर्तन करता है तब उसे अवश्य मोक्ष होता है और यदि वह सात प्रकृतियोंका उपशम, क्षयोपशम व क्ष्य नहीं कर सक्ता और शुद्वात्मा ही उपादेय है इस रूप नहीं वर्तन करता है तब उसे कदापि मोक्ष नहीं होता है । इसका भी यही कारण है कि सात प्रतियोंके उपशम आदिक अभाव होनेपर अनंत ज्ञानादि स्वरुप आत्मा ही उपादेय है ऐसा जान कर नहीं वर्तन करता है और श्रद्वान करता है क्योंकि यह अवश्य है कि जो कोई अनंत ज्ञानादि स्वरूप आत्माको उपादेय मानके अन्द्वान करता है उसके मात प्रतियों- का उपशम, क्षय या क्षयोपशम अवश्यमेव विद्यमान है और वह अवश्य भव्य है। जिसके पर्वमें कहे प्रमाण शुद्धात्मा ही उपादेय है ऐसा श्रन्दान नहीं है उसके सात प्रतियोंका उपशमादिक भी नहीं होता ऐसा जानना योग्य है। इसलिये वह गिध्यादृष्टी ही है। इसकारण अभव्य जीवके मिध्या- त्त्व आदि सात प्रकृतियोंका उपशम आदिका होना कदाचित भी संभव नहीं है यह तात्पर्य है। प्रयोजन यह है कि निर्विकल्प समाधिरूप निश्रय धर्मम टहर कर व्यवहारको त्यागना योग्य है किन्तु यदि विचार किया जाय तो उस व्यानीकी मन, वचन, कायकी गुप्तिरूपी अवस्था में व्यवहार स्वयमेव ही नहीं है । भावार्थ:-निश्चय मोक्ष मार्ग ही साक्षात् मोक्ष मार्ग है। जब कोई निश्चय मोक्ष मार्गरूप निर्विकल्प समाधिरूप भावमं लवलीन होता है तब वहां व्यवहार मोक्षमार्ग स्वयं ही छूट जाता है । व्यवहारका साधन निश्चयकी प्राप्तिके लिये ही है । अतः जब निश्चयका लाभ हो गया तव व्यवहार अकार्यकारी है ऐसा जान व्यवहारके हाग़ निश्चय धर्मकी प्राप्तिका यत्न करना जरूरी है ।। २९४-२९५ ।। इसतरह निश्चय नयके द्वारा व्यवहारका निषध किया गया ऐसा कहने हुए सूत्रोंसे पांचवा स्थल पूर्ण हुआ। .
समयसार टीका। HorasARRRRRRHEORGame . 1 २१२ आगे कहते है कि आहार लेनेके विपरमे मान, अपमान, गरस, नीरस आदिकी चिंता रूप 'गम द्वेष न करनेके कारणसे आहारको लेते हा ज्ञानी जीयके आहारकृत-बंध नहीं होता है:-- गाथाः-~-आधाकम्मादीया पुग्गलदव्यस्स जे इने दोसा। कह ते कुव्वदि णाणी परदव्यगुणा दुजे णिचं ॥ २९६ ॥ आधाकम्मादीया पुग्गलव्वस्त जे इमे दोसा । कहमणुमण्णदि अपणेण कीरमाणा परस्स गुणा ॥ २९७ ॥ संस्कृतार्थ:-~आघाकामा पुदलद्रव्यस्य ये इमे दोपाः । कथं तान् करोनि ज्ञानी परद्रव्यगुणाः ग्वलु यं निम्नं ॥ २१.६ ॥ आधाकर्माद्याः पुद्गलद्रव्यस्य ये इमे दोपः। कथमनुमन्यते अन्येन क्रियमाणाः परस्य गुण: ॥ २९७ ॥ सामान्यार्थः-स्वयंपाक अर्थात् रसोईके द्वारा उत्पन्न आहारको आधा कर्म कहते हैं। आधा कर्म आदि जो यह पुद्गल द्रव्यके दोप हैं वे नित्य ही पुदल द्रव्यके गुण हैं उनको ज्ञानी कैसे कर सक्ता है और यह आधा कर्म आदि दोप दूसरेके द्वारा किये गए हैं, ऐमा होनेपर ज्ञानी उनकी अनुमोदना कैसे कर सकता है ? शनाथ हित विपरी:-(आधा कम्मादीया) आधाकर्म आदिक (जेइमे ) जो यह (पुग्गल व्वस्स दोसा) शुद्धात्मासे भिन्न पर भोजनरूप पुद्गल द्रव्यके पचन पाचन आदि क्रियारूपी दोष है तथा (जे) जो (णिच्चं) नित्य (परदव्वगुणाहु ) परद्रव्य आहाररूप पुद्गल द्रव्यके गुण हैं ( णाणी) सम्यग्ज्ञानी अनु- भवी (ते) उन आधाकर्म आदि दोषोंको (कह कुव्वदि) किस तरह करेगा अर्थात नहीं करेगा । (आधा कम्मादीया जे इसे पोग्गल दव्यास दोसा) आधाकर्म आदि जो यह पुद्गल द्रव्यके दोप हैं सो (अण्णेण) अपनेसे अन्य किसी गृहस्थके द्वारा (कीरमाणा) किये गए हैं तथा (परस्सगुणा) आत्मासे भिन्न पर पुद्गलके गुण हैं (कह) ज्ञानी किमतरह (अणुम- एणदि) उनकी अनुमोदना करेगा अर्थात् नहीं करेगा क्योंकि विकल्प रहित समाधि नावक होते हुए उसके मन, वचन, काय व कृत कारित अनुमोदनासे आहार विपयके विचारका अभाव है। भावार्थः-यहां साधुकी अपेक्षा कथन है कि भोजन सम्बन्धी व्यवस्थाको न तो वह करता है न कराता है और न उसकी अनुमोदना करता है । गृहस्थ अपने लिये जो भोजन बनाता है उसीमेंसे मुनि महाराज भक्तिपूर्वक दिये जानेपर उदर गर्तके पूरनेके निमित्त भोजन करने हैं। श्री मुनिके यह विकल्प नहीं है कि गृहस्थ भोजन इस प्रकार वनावे व बनाया तो अच्छा किया इसलिये रसोईकी क्रियामें जो कुछ पाप हुआ है उसके दोषी साधु नहीं है वे इस प्रकार विकल्पसे दूर हैं । साधु महाराज केवल हाथ पर सखे हुए ग्रासको विना स्वाद देखे खालेते हैं इसलिये आहारमें राग व द्वेष न करनेके कारण ज्ञानी मुनिके आहारको करते हुए समयसार टीका। आहार सम्बन्धी आरंभक्षा दोष नहीं है । साधुनन परम उदासीन भावसे क्षुधा वेदना शान्त्यर्थ जो गृहस्थने शुद्धाहार दिया उसे ले अपने समाधि भावसे डिगने नहीं, इससे बंधी प्राप्त नहीं होते ।। २९६-९९७ ॥ आहार मुनिसे लेनेके पहले उस पात्रक निमित्त जो भोजन पान आदि बनाया जाता है उस भोजनको औपदेशिक कहते हैं इस औपदेशिक सहित जो आधाकर्म है उसका वर्णन आगेके दो गाथाओंमें कहते हैं:- गाथा:-आधाकम्म उद्देसियं च पोग्गलमय इमं दच्वं । कह तं सम होदि कंद जं णिचमचेदणं वुत्तं ॥ २९८ ॥ आधाकम्नं उदेसियं च पोरगलमयं इन दव्यं । कह तं भम कारविदं जं णिचम वदेगं कुत्तं ॥ २० ॥ संस्कृतार्थः-आधाकीपदशिकं च युदरगयमेतद्रव्यं । कथं तन्मम भवति वृतं यसियमचेतनमुक्तं ॥२८॥ आधारमापदेशिकं च पुलायमेतदव्यं । कथं तन्मम कारतं यन्नित्यमचेतनमुन्न ।। २९ ॥ .सामान्यार्थः-परके उद्देश्यसे किया हुआ यह आधार्म पुगलमयी द्रव्य है नथ नित्य ही अचेतन है ऐसा कहा गया है तो यह मेरी की हुई केले होसक्ती है अयया मेरी कराई हुई को होसक्ती है ? जदार्थ सहित दिपाय(उद्देसियं आधाकम्मच) दूसरेक अभि- प्रायसे अर्थात् पात्रके निमित किया हुआ भोजन (इमं पोग्गलमयं दत्र) जो यह पहलमई द्रव्य है (ज गिच्च अदण) व जिसको नित्य ही शुद्ध आत्म द्रव्यले जुदा होनेके कारण अचेतन (बुत्त) कहा गया है (तं मम कई कह हादि) मो द्रव्य ज्ञानी विचारता है कि मेरी की हुई कैसे होसक्ती तथा (तं मम कारविद कह वह द्रव्य मेरी कराई हुई कैसे होसक्ती है। अर्थात् ज्ञानीके द्वारा न बह आहार कराया जाता है और न किया जाना है इसका हैन यह है कि निश्चय रत्नत्रयन्वरूप भेदज्ञानके होते हुए आहारके सम्बन्धमें मन, वचन. कायसे, छत कारित अनुमोदना का अभाव है। भावार्थ:-कोई दानार पात्रको दानदेनके लिये ऐसी कल्पना करे कि मैं पात्रके लिये अमुक २ भोजन वनाऊं, तो उस भोजनको औभिक आधाकर्म कहते हैं । इस आधामके होते हुए भी यदि मुनि शंतभावसे उम भोगनको करले तो मुनिके उस भोजन बन बंधका अभाव है जब कि कानी कल्पना करनेके कारण दातार अवश्य उस दोपका भागी है । मुनि महाराजकी अपने गलनयनं ही रुचि है इससे वह आहार विषयक रस नीरसपने आदिका विचार नहीं करने। इस तरह पदेशिक व्याया- नकी मुख्यतासे दो गाथाएँ पूर्ण हुई । यहां यह अभिप्राय है कि भोजनके पीछे, पहले. या UEALENONYAKANIAL RAVAIL.mahalacest , २३४ समयगार दीका। भोजन करते समय मुनिके लिये आहार आदिके विषयमें मन, वचन, कायसे कृतकारित अनुमोदनारूप नौ विकल्पोंसे रहित शुद्ध आहार होता है अर्थात मुनि अमुक आहारके होनेके विषय मन, वचन, कायसे स्वयं करना, कराना व उसकी अनुमोदना कुछ भी विकल्प नहीं करते, इसीसे उन मुनियोंके दूसरे गृहस्थीके द्वारा किये हुए आहार आदिके सम्बन्धमें कर्मोका बंध नहीं होता क्योंकि वंध परिणामोंके आधीन है। गृहस्थी उसके बनाने आदिके विकल्प करता है इससे बंधता है, मुनि महाराज ऐसे विकल्प नहीं करते इससे नहीं बंधते यदि ऐसे माने कि दूसरेके द्वारा किये गए हुए परिणामसे दूसरेके बंध हो जाय तो कहीं भी, किसीको भी निर्वाणका लाभ नहोवे, क्योंकि वस्तुएं सर्व परिणमनशील हैं ॥ २९८-२९९ ॥ ऐसा ही अन्य ग्रंथमें कहा है: णवकोटि कम्म सुद्धो पन्छ। पुरढोय संपदिय काले । पर सुह दु.रत णिमित्त वज्झदि जदि णन्धि णिव्याप ॥ अर्थात् तीन कालमें नवकोटि शुद्ध भोजनको जो मुनि लेता है सो पीछे, पहले व वर्तमानमें नव कोटि शुद्ध है और यदि वह दूसरोंके सुख व दुःखका निमित्त हो और इस निमित्त होनेके कारण वह शुद्ध भोजी मुनि कर्म बंधको प्राप्त करे तो उसको निर्वाणका लाभ नहीं हो सक्ता-भावार्थः-यदि मुनि शुद्ध आहार करते हों और उस समय कोई इर्पा व ग्लानिसे दुःखी होता होय व कोई वह वस्तु देखकर सुखी होवे तो उससे श्री मुनिको पाप पुण्यका बंध नहीं होगा। वह विकल्प करनेवाला स्वयं वंधको प्राप्त होगा। मुनि यद्यपि निमित्त हैं पर मुनिके परिणाम उसको सुखी या दुःखी करनेके नहीं है इसलिये मुनिके बंध न होगा। जो विकल्प करता है वही बंधता है इस तरह ज्ञानी जीवोंके आहार लेते हुए आहार कृत कर्मबंध नहीं होगा ऐसे कहते हुए ४ गाथाओंसे छठा स्थल पूर्ण हुआ- आगे कहते है कि रागद्वेषादिक भाव निश्चयसे कर्म चंधके कारण कहे गए हैं उन रागादि भावोंका कारण क्या है ऐसा पूछनेपर आचार्य उत्तर करते है- गाथा:-जह फलियमणि विसुन्डो ण लयं परिणमदिरागमादीहिं। राइजदि अण्णेहिं दुलो रत्तादियहिं देव्वेहिं ॥ ३०० ॥ एवं णाणी सुडो ण लयं परिणमदि रागमादीहि । राइजदि अण्णेहिं दु सो रागादीहिं दोसेहिं ।। ३०१ ॥ संस्कृतार्थः-यथा स्फटिकमणिः शुद्धो न स्वयं परिणमते रागाद्यैः । रज्यतेऽन्यैस्तु स रक्तादिभिर्द्रव्यैः ॥ ३०० ॥ एव-ज्ञानी शुद्धो न स्वयं परिणमते रागाद्यः। रज्यतेऽन्यन्तु स रागादिभिर्दोषैः ॥ ३०१॥ सामान्यार्थः---जैसे. स्फटिकमणि निर्मल होती है सो स्वयं लाल रंग आदि अवस्थासे या समयमार टीका। नहीं परिणमन करती है परंतु अन्य जपाकुसुम आदि लालरंग पीलगंगके द्रव्योंकि निर्मिन लाल पीली दिखलाई पड़ती है। इसीतरह ज्ञानी शुद्ध निर्विकार है वह स्वयं गगडप आदि भाव रूप नहीं परिणमन करता है किन्तु उससे अन्य पुद्धलमय मोदनीय आदि कम पुद्गलोक उदयक निमित्तसे राग द्वयरूप हो जाता है। शब्दार्थ सहिन विशेषार्थ:-(जह से (फलियमणि) स्फटिकमणि (विसुद्दों) निर्मल बाह्यकी उपाधिसे रहित हो सो (संयं) अपने आप ही (गगमा- दीहिं) लाल रंग आदि अवस्थारूप (न परिणमदि) नहीं परिणमन करती है (द) परंतु (सो) सो मणि (अण्णेहिं रत्तादीहिं दव्वेहिं) अन्य जपा पुप्प आदि बाह्य द्रव्योंकि निमित्तसे (राइ- जदि) रक्तवर्णको परिणमन कर जाती है (एव) इसीतरह (गाणी) सम्यग्ज्ञानी पुरुष (मुडो) शुद्ध होता हुआ (सयं) स्वयं अपने उपाधि रहित चतन्यके चमत्कारमई स्वभावसे जपापुष्पके स्थानमें कर्मोंके उदयरूप परकी उपाधिके विना (गगमादीहि) रागादि विभाष परिणामरूप (न परिणदि)नहीं परिणमन करता है (दु) परंतु पश्चात् (सो)वही ज्ञानी अपने स्वाभाविक आत्मीक स्वभा- वसेच्युत होकर (अण्णेहिं रागादीहिं दोसेहिं) अन्य काँक उदयरूप ग़गादि दोपो निमित्तसे (राइजदि) राग द्वेषरूप परिणमन करता है इससे यह सिद्ध हुआ कि यह रागादि भाव ककि उदयसे उत्पन्न हुए हैं। ज्ञानी जीवके पैदा किये कार्य नहीं हैं। भावार्थ:-जैसे निर्मल स्फटिक मणिम उपाधि विना स्वच्छता झलकती है ऐसे ही इस निर्मल ज्ञानी आत्मस्य आन्मामें वीतरागता झलकती है परन्तु जैसे रंगकी उपाधि लगनेसे वह मणि लाल पीली माटम होती है ऐसे ही राग द्वेप मोह कर्मोके उदयके निमित्तसे इस ज्ञानी जीवका आत्मस्य रहना होता नहीं और यह गिरकर रागडेप दोषरूप परिणमन कर जाता है इसमे यह बनलाया कि यह रागादि इस ज्ञानी आत्माके निज भाव नहीं है ।। ३००-३० ॥ ; इसतरह चिंदानदमई एक लक्षण स्वरूप आत्मामें स्थितिमई भावको जागता हुप्रोमानी जीर रागद्वेपादि भावोंको नहीं करता है इससे रागादिके उत्पत्तिके कारण नवीन द्रव्यको कल नहीं होता है इसी यातको कहते है:- णवि रागदोसमोहं कुञ्चदिणाणी कसायभावं था। सयमपणो ण सो तेण झारगो तेसि भावाणं ॥ ३६२॥ संस्कृतार्थः--नापि रागद्वेषमहिं करोति ज्ञानी कपायमा ।। स्वयमेवात्मनो न स तन कारकस्तपां भावान ३०२ ॥ सामान्धार्थः-ज्ञानी रागद्वेष मोह व झपाय भाव स्वयं अपने आयांक नदी पदा करता है इसमे वह ज्ञानी इन रागादि भावों का सत्ता नहीं होता है । पनार्थ महिला सिपाय (णाणी) सम्यग्ज्ञानी आत्मा राग दोस मोह) रागळेगादि विमावों गहन शुद्ध भाभीज़ स्वभावसे एथक् अर्थात् मिन्न रागद्वेष मोहको (वा कमायभावे) अथला क्रोधादि ममाम भादगी anSTARAKARIVARAK . समयसार टीका। ( सयं) स्वयं कर्मोके उदय रूप सहकारी कारणके बिना शुद्ध आत्मीक भावके द्वारा ( अप्पणो ) अपने आत्माके सम्बन्धमें ( णविकुव्यदि) नहीं करता है। ( तेण ) इस कारणसे (सो) वह ज्ञानी (तेसिं भावाणं ) उन रागद्वेषादि भावांका ( कारगोण ) कर्ता नहीं होता है। धवा-तत्वज्ञानी रागादि परिणतिको अपनेसे भिन्न अनुभव करके शुद्ध आत्मीक स्वभावमें तल्लीन रहता है इससे स्वयं अपनेमें रागद्वेषादि परिणतिको नहीं करता है इससे रागादि भावोंका कर्ता नहीं होता है ॥ ३०२ ॥ आगे कहते है कि अज्ञानी जीव शुद्र स्वभावरूप आत्माको नहीं अनुभव करता हुआ रागद्वे. पादि भावोको करता है इससे आगामी कालमें रागद्वेपादि भायोको उत्पन्न करनेवाले नवीन काँका कर्ता होता है ऐसा उपदेश करते है:- गाथाः-रागलिय दोसलिय कसायास्तु चेन जे भावा। तेहिंदु परिणममाणो रायादी बंधदि पुणोवि ॥ ३०३ ॥ संस्कृतार्थ:-रागे दोषे च कपायकर्मसु चैव ये भावाः । तैस्तु परिणममानो रागादीन् बध्नाति पुनरपि ॥ ३०३ ॥ सामान्यार्थः-राग, द्वेष व कपायरूप द्रव्य कमौके उदयसे जो रागादि विभाव परि- णाम होते हैं उनसे परिणमन करता हुआ यह जीब फिर भी रागादिरूप द्रव्यकोको बांधता है। शान्दार्थ शहित विशेषार्थः-(गगझिय) रागरूप द्रव्यकर्मके उदय होने पर (दोसमिय) द्वेपरूप द्रव्यकमके उदय होनेपर (चेव कसायकम्मेसु) व कषायरूप द्रव्यकर्मोक उदय होने पर (जे भावा) आत्मस्वभावसे भृष्ट जीवके जो जीव सम्बन्धी रागादि भाव या परिणाम होते हैं (तहिं दु परिणममाणो) उन्हीं रागादिकोंके द्वारा मैं रागादिरूप हूं, इस अभेद प्रतीति करके परिणमन करते हुए (पुणोवि) फिर भी वह रागी द्वेषी जीव (रायादी) आगामी कालमें रागादि परिणागोंको उत्पन्न करनेवाले द्रव्यकोंको (बंधदि) बांधता है इससे यह सिद्ध हुआ कि रागादि भावोंका कर्ता अज्ञानी जीव है। भावार्थ:-अज्ञानी जीव अपने ज्ञान स्वभावमें स्थिर न रह करके जैसे चारित्र मोहका तीव्र उदय होता है वैसे रागद्वेषरूप परिणामोंको कर लेता है। उन भावोंके निमित्तसे मैं रागी, मैं वेपी इत्यादि प्रतीति करता है इससे फिर भी ऐसे द्रव्यकर्मीको बांधता है जिनका आगामी कालमें फल रागादिका उत्पन्न करना होगा । ३०३ ॥ आगे इसी अर्थको और भी बढ़ करते है- गाथा:-नागझिय दोसहिाय करारकम्प्रेस चव जे भावा । ते मम परिणनंतो रागादी बड़े चदा ॥ ३०४ ॥ संस्कृतार्थ:--रागे च दपि च कषायव मनु चैव ये भावाः । ते सा तु परिणामानो रागारीन् बध्नाति चेतयिता ।। ३०४ ।। - समयसार टीका। 'सामन्पार्थः-गग, द्वेप व कपाय कमि जो भाव होते हैं, वे भाव में है मा परिणमन करता हुआ आत्मा रागादिकांना बंध करता है । शब्दार्थ महित विशपाय:---- (रागझियः रागरूप द्रव्यकमके दोसलिय) द्वेपहप द्रव्यकर्मक (चैत्र) ऐसे ही (कमायकमनु) कपावरूप द्रव्य कौके उदय होनेपर (जे भाषा: जो रागद्वेपादि भाव होने हैं (न) वे भाव (मम) मेरे आत्माके हैं (परिणमंतों) ऐसा परिणमन करनेवाला या माननेवान्या (चंद्रा) आमा (गगादि) शुहात्माकी भावनास रहित होने के कारणसे आगामी गगादि भावीको उत्पन्न कराने- वाले नवीन द्रव्यकर्मोको (वंधदे) बांधता है । भावार्थ:-यह रागढए कयाय मेर ही भाव है ऐसी बुद्धि रखनेसे वह अज्ञानी नवीन द्रव्यमोह कर्मको बांधता है जिसके फलमे फिर भी रागादि भावका होना संभव है । इस प्रथमें बहुत स्थानोंपर रागढेप मोहका व्यायान किया गया है सो मोह शब्दले दर्शन मोहको लेना जो कि मिथ्यात्व आदि भावको पैदा करनेवाला है। राग द्वेष शब्दोंसे क्रोधादिक कपायांको उत्पन्न करनेवाले चारित्र मोहको ग्रहण करना योग्य है। यहां शिप्यने प्रश्न किया कि मोह शब्दसे मिथ्यात्य आदि भावांका पढ़ा करनेवाला दर्शन मोह लिया जाय इसमें कोई दोप नहीं है किन्तु हेय शब्दसे चारित्र मोह को कहा जा सक्ता है। इस पूर्व पक्षका उत्तर करते हैं:-कपाय वेदनीय नामके चारित्र मोहके मध्यमें क्रोध और मान देषक.अंग हैं क्योंकि यह द्वेषको पैदा करनेवाले हैं।माया और लोभ राग अंग हैं। क्योंकि गगको पैदा करनेवाले हैं। नोकपाय वेदनीय नामक चारित्र मोहमें स्त्री, पुरुष, नपुंसक वेद तथा हास्य, रति यह पांच नोकपाय राग़के अंग हैं क्योंकि राग भावको पैदा करनेवाले हैं।शेष ४ नोकपाय भय, अरति, जुगुप्सा और शोक द्वेपरूप है इस कारण मोह शब्दले दर्शन मोह कहा जाता है और रागढपसे शब्दोंसे चारित्र मोह कहा जाता है। ऐसा ठिकाने जानना योग्य है । इस तरह कर्म बंधके कारण रागादिक हैं और रागादिनोंका कारण निश्चयसे कमौका उदय है परन्तु ज्ञानी जीव नहीं है। ऐसे व्याख्यानकी मुख्यतासे सातवें स्थलमें पांच गाधाएं पूर्ण हुदै ॥३०॥ आगे शिष्यने प्रश्न किया कि सन्यजानी जीय रागादि भावका भतां किस प्रकारस है। उसके उत्तरमें आचार्य कहते हैं- : गाथा:-अपडिझमणं दुविहं अपञ्चक्खाणं तहेव विग्णय । एदेणुवदेनेण दु अकारगो वणिदो चेदा ॥ ३०६ ॥ अपडिकमणं दुविहं दच्चे भाचे अपचखाणंपि। पदेणुवदेखण बु अकारगो बपिणदो चेदा ॥ ३० ॥ जायण पचखाणं अपडिकलणं च दव्यभावाणं। कुन्वदि आदा ताब कत्ता सो होदि गादन्यं ॥३०७ ..
SALARINARENERALNIRON swwwingwwwwwwins २३० समयसार टीका। संस्कृतार्थः-अप्रतिक्रमणं द्विविधमप्रत्याख्यानं तथैव विज्ञयं । एतेनोपदेशेनाकारको वर्णितश्चेतयिता ॥ ३०५ ॥ अप्रतिक्रमणं द्विविधं द्रव्ये भावे तथैवाप्रत्याख्यानम् । एतेनोपदेशेनाकारको वर्णितश्चेतयिता || ३०६ ॥ यावन्न प्रत्याख्यानमप्रतिक्रमणं च द्रव्यभावयोः। करोत्यात्मा तावत्तु कत्ता स भवति ज्ञातव्यः ।। ३०७ ।। शब्दार्थ सहित विशेपार्थः-(अपडिक्कमणं दुविहं) प्रतिक्रमणका न करना सो अप्रति- क्रमण है । पूर्वमें अनुभव किये हुए विपयोंका अनुभव व रागादिरूप भाव सो अप्रतिक्रमण है। पूर्व अनुभूत रागभावोंको स्मरणकर उनको मिथ्या होहु ऐसी भावना करनी सो प्रतिक- मण है। मेरे पाप मिथ्या हों ऐसी भावना न करके उन पापोंको व रागादि रूप होनेवाली पूर्वकी स्थितिको याद कर उसमें तन्मय होना सो अप्रतिक्रमण है, यह दो प्रकारका है-एक द्रव्य रूप एकभाव रूप | मन सम्बन्धी विचार भाव रूप, वचन व कायसे उसका प्रकाश सो द्रव्य रूप है। (तहेव) तैसे ही (अपचक्वाण विण्णेयं) अप्रत्याख्यानको जानना योग्य है । आगामी कालमें रागद्वेपादि पंचेन्द्रियोके विपयोंकी इच्छा करनी सो अप्रत्याख्यान है। आगामी कालमें विषयों के त्यागके भावको प्रत्याख्यान कहते हैं इससे उल्टा अप्रत्याख्यान है सो भी द्रव्य और भाव रूपसे दो प्रकार है (एदेणुवदेसेण दु) इसी रूप परमागमके उपदेशसे ही (चेदा) तत्त्वज्ञानी आत्मा (अकारगो) इन दो प्रकार अप्रतिक्रमण और अप्रत्याख्यानोंसे रहित होनेके कारण द्रव्य कर्मीका कर्ता नहीं है ऐसा (वण्णिदो) कहा गया है। (अपडिक्कमणं दुविहं दव्वे भावे अपच्चखाणंवि) क्योंकि अप्रतिक्रमण और अप्रत्याख्यान दोनों ही द्रव्य और भाव रूपसे दो २ प्रकार हैं (एदेणुवदेसणेदु) इसी ही परमागमके उपदेशसे यह बंधके कारण हैं इसीसे ज्ञात होता है कि (चेदा) द्रव्य और भाव रूप अप्रतिक्रमण और अप्रत्याख्यानसे परिणमन होता हुआ अज्ञानी जीव शुद्धात्माकी भावनासे गिर करके (कारगो) द्रव्यकोका करनेवाला है ऐसा (बण्णिदो) कहा गया है । तथा इससे विपरीत ज्ञानी आत्मा कोका कर्ता नहीं है। (जाव) जिस समयतक (दव्वभावाणं ण पञ्चक्खाणं अप्पडिकमणं) द्रव्य और भावरूप विकार रहित स्वसंवेदन लक्षणस्वरूप प्रत्याख्यान और प्रतिक्रमण नहीं है (ताव दु) उसही समय तक ही (आदा कुव्वदि) परम समाधिमई भावको न पाकर यह अज्ञानी जीव कर्मोको करता है (सो कत्ता होदि णादव्वो) इस कारणसे वह कर्मोंका कर्ता होता है ऐसा जानना चाहिये। यहां यह तात्पर्य है कि अप्रतिक्रमण व अप्रत्याख्यानरूप भाय ही कर्मोके करनेवाले हैं। ज्ञानी जीव कर्मोका कर्ता नहीं है। यदि आत्मज्ञानी अनुभवी आत्मा भी कर्मोंका कर्ता हुआ करे तो इस जीवके कर्मों का कर्त्तापना सदा ही बना रहे क्योंकि जीवकी सत्ता सदा ही .52-Resunnxnked ममयमार टीका। रहती है तथा अप्रतिकमण और अप्रत्याच्यानरूप भाव रागादि विकल्य भाव है और अगि. त्य हैं ये भाव आत्मामें स्थितिरूप जो वीतराग भाव उसमे भृष्ट जीयाक होते हैं सदा ही नहीं होते हैं । इससे. यह सिद्ध किया गया कि जब यह जीव स्वस्थ अर्थात मान्मानुभव रूपी भावसे गिर जाता है तब अप्रतिक्रमण और अप्रत्याभ्यानरूपी भायोंमे परिणमन कन्ता है तब कर्मोंका करनेवाला होता है तथा जबतक स्वस्थ भाव में लीन रहता है नबतर काँका कर्ता नहीं होता-भाव :-यहां पर अत्मामें लीनरूप सम्यग्ज्ञानी व तत्वज्ञानीकी अपेक्षाम मुख्यतासे कथन है कि जब वह निश्चय प्रतिक्रमण और प्रत्याग्यानसे बाहर होता है नत्र रागादि रूप परिणमन करता है इसमे काँका कर्ता होता है इससे ज्ञानी जीवको पूर्व भांग हुए भोगोंकी व आगामी भोगोंकी इच्छाको दूर करके निर्मल ज्ञानमई भावोंमें परिणमन करना योग्य है जिससे कर्मका बंध नहो । जो अज्ञानी पूर्वमें भोगे भोगोंको याद किया करता है । आगामी विषयोंकी इच्छा क्रिया करता है वह निरंतर काम बंधता है उसके अप्रनिक्रमण और अप्रत्याख्यानरूप भाव विद्यमान है-॥ ३०५-३०६-१०७ ॥ इस तरह अज्ञानी जीवमें परिणमन करते हुए अप्रतिक्रमण और अप्रत्याख्यान बंधक कारण हैं किन्तु ज्ञानी जीव बंधका कारण नहीं है इस प्रकारके व्यायानकी मन्न्यताने आठ स्थलमें गाथाएं तीन पूर्ण हुई। यहां विकल्प रहित समाधिरूप निश्चय प्रतिक्रमण और निश्रय प्रत्याव्यानर नष्ट जीवकि लिये जो कर्मोका बंध बताया गया है वह त्यागने योग्य सम्पूर्ण नरक आदिक दुःखीका कारण है इससे यह बंध भी त्यागने योग्य है । आचार्य इस बंधके नाश करने के लिये विशेष भावनाका वर्णन करते हैं:-भावनाः-मैं सहन गुण्ड ज्ञानानंदमई एक स्वभाववाला है, मंकल्प विकल्प रहित हूं, उदासीन हूं. कर्मरूपी अंजन रहिन अपने शुद्वात्माका सभ्य अहान, ज्ञान और चारित्ररूप निश्चयरत्नत्रयमई निर्विकल्प ममाथिमे उत्पन्न होनेवाले वीतराग सहन आनंदरूप सुखका अनुभव मात्र लक्षणके धारी स्वसंवेदन ज्ञान डाग अनुभवने योग्य, जानने योग्य, व प्राप्त करने योग्य व उससे पूर्ण अवस्थाकाधारी है, गगडेप मोह, क्रोध, मान, माया, लोभ, पंचेन्द्रियोंके विपयोंके व्यापार, मन, वचन, कायके व्यापार भाव कर्म, द्रव्यकर्म, नोकर्म, प्रसिद्धि, पूजा, लाभ व देखे, मुने, व अनुभव किये हुए भोगांकी इच्छारूपनिदान शल्य, मायाशल्य, मिथ्याशल्य आदि सर्व विभाव परिणामोंसे रहित शून्य हैं। ऐसा मैं तीनजगत व तीन कालमें भी मन वचन काय व रुत कारित अनुमोदनाने शुद्ध निश्चय करके हूं तैसे ही शुद्ध निश्चयसे सर्व ही नीव हैं ऐसी भावना निरंतर करनी योग्य है । इस तरह शुद्धात्माके अनुभवरूप लक्षणको रखनेवाली समयसारकी तात्ययं वृत्ति नामकी व्याख्यान पूर्वमें कहे हुए क्रमसे 'नहणामको विपुरिसो' इत्यादि १० गाथाओंमें सम्यग्दृष्टि और मिथ्या- JeHTRUWEADLINES २४० लमयसार टीका। दृष्टिका व्याख्यान, निश्चय हिंसाको कहते हुए गाथाएं सात, निश्चयसे रागद्वेषादि विकल्प ही हिंसा है ऐसा कहते हुए सूत्र छः, अव्रत पापबंध व व्रत पुण्य बंधके कारण हैं ऐसा कहते हुए १५ गाथाएँ । निश्चय नयमें ठहर करके व्यवहार त्यागने योग्य है इस मुख्यतासे गाथाएं ६, पिंडकी शुद्धिकी मुख्यतासे सूत्र ४, निश्चय नयसे रागादि भाव कर्मोके उदयसे उत्पन्न हैं ऐसा कहते हुए सूत्र पांच, निश्चयसे अप्रतिक्रमण और अप्रत्याख्यान बंधके कारण हैं ऐसा कहते हुए गाथाएं तीन इस तरह समुदायसे ५६ गाथाओंके द्वारा आठ अंतर अधिकारोंसे आठवां बंध तत्वका अधिकार समाप्त हुआ । ऐमा होनेपर नाटकके पात्रकी तरह शुडात्मासे जुदा होकर श्रृंगार करके आया हुआ बंध रंगभूमिसे निकल गया | बका महाधिकार (९) मोक्ष तत्व । अब मोक्ष प्रवेश करता है "जहणामकोविपुरिसो" इत्यादि गाथाको आदि लेकर यथा- क्रमसे २२ गाथाओं तक मोक्ष पदार्थका व्याख्यान करते हैं । सो पहले ही मोक्ष पदार्थका संक्षेप वर्णन करते हुए गाथाएं सात हैं। उसके बाद मोक्षका कारणभूत भेदविज्ञानकी संक्षेपसे सूचनाके लिये 'बंधाणं च सहावं' इत्यादि सूत्र ४ हैं फिर उस ही भेदज्ञानका विशेष वर्णन करनेके लिये पण्णाए येत्तव्वो इत्यादि सूत्र पांच हैं उसके पीछे वीतराग चारित्र सहित द्रव्य प्रतिक्रमण आदिका करना विप कुंभके ग्रहण समान है परंतु सराग चारित्र सहित अमृत कुंभके समान है इस युक्तिमई कथनकी मुख्यतासे "ते यादी अवरोहे" इत्यादि सूत्र ६ हैं । इस तरह २२ गाथाओंसे चार अंतर स्थलों में मोम अधिकारकी समुदाय पातनिका पूर्ण हुई। आगे कहते है कि विशेष भेदज्ञानकी स्थिरतासे कर्म बंध और आ.माका जुदा करना सो मोक्ष है गायाः-जह णाम कोवि पुरिलो बंधणियमि चिरकालपड़िवहो । तिव्वं मंदसहावं कालं च बियाणदे तस्स ।। ३०८ ॥ जइ णवि कुव्यदि छेदं ण सुचदि तेण कम्मवंधेण ! कालेण वहुएणवि ण लो जरो पावदि विमोक्खं ॥३०९।- संस्कृतार्थ:-~-यथा नाम कश्चित्पुरुपो बंधनके चिरकालप्रतिबद्धः । तीनं मंदस्वभावं कालं च विजानाति तस्य ।। ३०८ ॥ यदि नापि कति छेदं न मुच्यते तेन कर्मबंधेन । कालेन बहुकेनापि न स नरः प्रप्नोति विमोक्षम् ॥ ३०९ ॥ सामान्यार्थ:-जैसे कोई भी पुरुष बंधन में बहुत कालसे पड़ा हुआ बंधनके तीव्र या मंद 40 AsanRitwarmta सागमारीका। २४१ स्वभावको और उसके कालो जानना है। जानने हुए यदि वह बंधना छेद नहीं करता है तो वह मनुष्य बहुत कालमें भी उन बंधा नहीं छू सका और न वह उससे मोक्षका लाभ करता है। साथै मदिर विशेगा:-(मह) जैसे कोवि पुरिसो णाम) कोई भी अमुक नामका पुरुष (बंधणहिा) बंधनके अंदर (चिरकाल पडिबहो) चिकालम पड़ा हुआ है तथा वह (तम्म) उस बंधनके (तिव्वं मंद सहाय) तीव्र या मंद स्वभावको (काल) और उसके दिन, महीना. वर्ष आदि कालंको (विवागदे) जानता है। अर्थात् मुझे बंधनकी कैसी वेदना है व मुझे कितना काल बंधे हुआ सो सब जानता है परन्तु जानता हुआ भी (नई) नो (छेदं णवि कुवदि) पुरुषार्थ से बंधनका छेद नहीं करता है तो (तेण कम्म बंधेण) उस कमके बंधन (ण मुंचदि) नहीं छूटता है और (सो गरो) वह बंधसे नहीं छूटनेवाला मनुप्य (मुवहुगे णविकालेण) बहुत अधिक काल बीत जाने पर भी (विमुक्ख) मोक्ष या स्वतंत्रताको (ण पावदि) नहीं पाता है। भावार्थः-जैसे कोई रस्सी, श्रृंखला आदि व अन्य रीतिसे बंधनमें पड़ा हुआ पराधीन व पर- तंत्र हो रहा है और वह मुर्ख भी नहीं है किन्तु यह जानता है कि में पराधीन है परन्तु उस पराधीनतासे छूटनेका कोई भी यत्न नहीं करता है तो वह केवलमात्र जाननेमे छूट नहीं सक्ता चाहे जितना काल बीत जावे। जब वह उद्यम करेगा तब ही पराधीनताने व बंधनसे मुक्त होकर स्वाधीन और मुक्त हो सकता है ॥ ३०८-३०९ ।। इस तरह दो गांधाभमि दृशान्त दिया अब दाष्ट्रान्त कहते है:-- गाथा:-इय कम्मरणागं पयेलपयाडहिदीयअणु मागं । जाणं वि.ण मुंचदि मुंचदि सव्वेज जदिविसुन्डो ।३१०॥ संस्कृतार्थः-एवं कर्मवंचनां प्रदेश कानांस्यस्यनुभाग । जाननपे न मुंचति मुंचति स्वान् यदिविशुदः ॥ ३१० ।। सामान्यार्थः-इसी तरह कर्मबंधनोंके प्रदेश, प्रकृति, स्थिति और अनुभागको जानते हुए भी नहीं मुक्त होता है। यदि उनसे विशुद्ध हो तो सर्व कमसे मुक्त हो जाता है। शब्दार्थ सहित विशेष:-(इय) इसतरह (कम्म वंधणाणं) ज्ञानावरण, आदि मूल वे उनकी १४८ उत्तर प्रतियोंके बंधनोंके (पयेमपयडिहिदीय अणुभाग) प्रकति, प्रदेश और स्थिति तथा अनुभाग इन चार भेदोंक म्वरूपोंको (जाणतोचि) अच्छी तरह मानते हुए भी (ण मुंचदि) कर्मबंधनोंसे नहीं छूटता क्योंकि वह जानता हुआ भी मिथ्यात्व व रागद्वेषादिरूप परिणतिको नहीं त्यागता है। (जदिविनुरो) परंतु जब यह मिथ्याच व रांगडेपादि भावोंसे रहित होता है तब (मव्वे मुचंदि) अनंत ज्ञानादि गुणल्याए परमान्न- स्वगांवमें स्थित होता हुआ सर्व कर्मोसे छूट जाता है अथवा दूसग पाट यह है कि 'मुचंदि सव्वे जदितिबंधे अर्थात् जब सब बंधको नाश करता है तब मुक्त हो जाता है । इस व्या- CORRUSTANCESARLAURRESERRIA २४२ समयसार टीका। ख्यानसे उन लोगोंको मुख्यतासे समझाया है जो प्रकृति आदि कर्म बंधनोंके ज्ञान मात्र ही से संतुष्ट हैं पर अपने कर्मों के नाशका कोई यत्न नहीं करते हैं, क्योंकि जो बंधके स्व- रूपको.तो जानते हैं पर अपने आत्म स्वरूपकी प्राप्तिरूप वीतराग चारित्रको नहीं पाए हुए हैं उनको स्वर्गादि सुखोंका कारण पुण्यवंध तो होता है परंतु कर्मोंसे मुक्ति नहीं हो सकी। इस तरह दाष्ट्रातरूप गाथा वर्णन की इस व्याख्यानसे उन लोगोंका निराकरण किया है नो केवल मात्र कर्मबंधके प्रपंचकी रचनाके भीतर चिंता मात्र ज्ञान रखते हुए ही संतोषी हो रहे हैं । 'मुंचति सव्वे जदिविसुहो' के स्थानपर ऐसा भी पाट है 'मुंचदिसव्वे नदि सबंधे'- अर्थात् कर्मोंसे छूट जाता है यदि सर्वबंधोको नाश करता है। भावार्थः-शास्त्र द्वारा कर्मवंधका प्रपंचका जानना व उसकी चिंता करना सो केवल शुभोपयोग है पुण्यवंधका कारण है अतएव वंधको बढ़ानेवाला है मुक्तिका साक्षात् उपाय नहीं है । जब वह शाराज्ञाता उपाय करके उन कर्मोके नाशके लिये रागद्वेष त्याग वीतराग चारित्रमें व आत्मानुभवमें तल्लीन होता है तब ही कर्मोंका नाश करता हुआ मुक्त हो जाता है खाली जाननेसे कार्यकी सिद्धि नहीं हो सकती जब हम पुरुषार्थ करेंगे तब ही सफल होंगे ॥ ३१० ।। आगे इसी भावको और भी दिखलाते है। गाथा:-जह बंधे चिन्तंतो वंधणवद्धो ण पावदि विमोक्छ । तह बंधे चिंतंतो जीवोवि ण पावदि विमोक्खं ॥ ३११॥ संस्कृतार्थः-यथा वंधं चिंतयन् बंधनबद्धो न प्राप्नोति विमोक्षं । तथा बंधं चिंतयन् जीवोऽपि न प्राप्नोति विमोक्ष.॥ ३११ ॥ सामान्यार्थः-जैसे कोई बंधनसे बंधा हुआ पुरुष ऐमा चितवन किया करे कि मैं बंधा हूं तो मोक्षको नहीं पा सक्ता तैसे ही यह संसारी जीव भी अपने बंधको विचारता हुआ मोक्ष नहीं पा सक्ता । शब्दार्थ सहित विशेपार्थः-(जह) जैसे (बंधनवरों) कोई रस्सी आदिके बंधनोंसे बंधा हुआ पुरुष (वधं चिन्तंतो) मैं बंधां हूं ऐसी चिंता करता हुआ (ण विमुक्ख पाव- दि) नहीं छुटनेकी दशाको प्राप्त हो सकता है (तह) तैसे (जीवोवि) यह संसारी जीव भी (वंधे चिंतंतो) प्रकृति, स्थिति, अनुभाग, प्रदेश बंधके स्वरूपोंको चिन्तवन करता हुआ (विमोक्खें) अपने शुद्धआत्मस्वरूपका लाभ मई लक्षणको रखनेवा • मोक्षको (ण पावदि) नहीं पाता है। तात्पर्य यह है कि सर्व शुभ और अशुभ बाहरी द्रव्योंके आलंबनसे रहित चिदानंदमई एक शुद्धात्माका आलंबन स्वरूप वीतराग धर्मध्यान और शुक्लध्यानसे रहित जीव बंधके प्रपंचकी रचना की चिंतारूप सराग धर्मध्यान स्वरूप शुभोपयोगसे स्वर्गादि सुखका कारण पुण्यबंध प्राप्त करता है परंतु मोक्ष नहीं पाता है । भावार्थ-जो केवल मात्र यही चितवन किया करे कि मैं बंधा हूं पर उस बंधनसे छूटनेका कुछ भी यत्न नहीं करे तो वह पुरुष बंधनसे छूट - समयसार टीका। नहीं सक्ता। इसी तरह जो जीव केवल कर्मकांडके स्वाध्यायमें लीन हुआ गार प्रकार का नानाप्रकार स्वरूपोंको ही विचार करता है परंतु वातगगभावने निठनका यन्न नहीं माना वह केवल मात्र पुण्य वांधके स्वर्गादि मुखको पाना है कर्नाको नागकर मोक्ष नहीं पा सस्ता क्योंकि वीतराग मावके विना मोक्षका मार्ग ही नहीं हो सक्ता ! १९॥ आगे शिष्यने प्रश्न किया कि मोक्षका कारण क्या है इसका उना आचार्य गहन:- गाथा:-जह बंधे छिनृणय बंधणरहो दुपारदि विमोक्म्य । तह बंधे छित्तणय जीवो संपावदि विमानत्रं ॥ ३१ ॥ जह बंधे भित्तणय बंधणवहो पावदि विमाक्ग्वं । तह बंधे भित्तणय जीवो संपावदि विमोग्वं ।। ३१ ॥ जह बंधे मुत्तणय वंधण बडो दु पावदि विमारवं। तह वंधे मुत्तुणय जीवो संपावदि विमोरवं ॥ १४॥ संस्कृन छायाः यथा संघमिकत्या च बंधन बस्तु प्रामाति विभो । तथा बछिया च जीवः प्राप्नोति विनोकं ॥ ३१२. यथा बंध नित्या च बंधनग्रहस्तु प्राप्नति विमोधे । तथा चंध मित्या व जीवः प्राप्नोति विमोशे ॥ ३१३ ॥ यथा बंधमुक्त्वा च बंधनवस्तु प्राप्नोति विमोक्षं । तथा बंधमुक्या च जीवः प्रामाति विमोक्षं ॥१४॥ इसका शब्दार्थ सुगम है अतः विशेपार्थ ही लिखा जाता है:-जमे बंधन में बंधा हुआ कोई भी पुरुष रम्सीके बंधको, जंजीरके बंधको, व काठ की वेड़ियोंको वा अन्य किसी भी प्रकारके बंधनको अपने ही विज्ञान और पुरुषार्थक बलसे किमीको छेद कर, किमीको भेदकर, किसीको छोड़कर, उस बंधनसे छुटकारा पाता है तो यह जीव मी बीनगग निर्विकल्प म्वन- 'वेदन ज्ञानरूपी हथियार से कमवंधनोंको छेदकर, भेदकर व उनको छुड़ाकर अपने शुहान्नीक स्वरूपकी प्राप्तिमई मोक्षका लाम करता है। भावार्थ-जो कोई ज्ञानी पुरुष अपने पीसको सम्हाल वीतराग स्वमवेदन ज्ञानरूप आन्मीक अनुभवके द्वारा पूर्व बद्ध कर्माली निनंग करना है वह अवश्य मोक्षको प्राप्त करता है। यहां शियनं प्रश्न किया कि प्रामृत ग्रंथमें निम निर्विकल्प स्वसंवेदन ज्ञानका वर्णन किया गया है मो नहीं मिह होता है इसका क्या हेनु है। सो कहते हैं कि सत्ता मात्र सामान्य अवलोकनरूप चच अनु आदि दानका नेन मनमें निर्विकल्प कहा गया है वसे ही वौद्ध मतमें ज्ञानको निर्विकल्प कहा गया है किंतु पद निर्विकल्प भीविकल्पको पैदा करनेवाला होता है और जैन मनमें जो ज्ञान है वह विकल्पोंका पदासग्नेवाला है इतना ही नहीं किंतु स्वरूपसे भी सविकल्प है तसे ही स्व और परका प्रकामा करनेवाला .
२४४ ROO समयसार टीका। है। इसका समाधान आचार्य कहते हैं:-कि ज्ञान किनी अपेक्षास सविकल्प और किसी अपे- क्षासे निर्विकल्प है। जैसे पंचेन्द्रियोंके बिनयोंमें आनंदरूप गो रागसहित स्वसंवेदन ज्ञान सराग भावके ज्ञानके विकल्पकी अपेक्षा विकल्प सहित है तो भी उसके सिवाय विना चाह हुए अन्य सूक्ष्म विकल्पोंके होते हुए भी उन सूक्ष्म विकल्पोंकी मुग्ल्यता नहीं ली इसी कारणम उसे निर्विकल्प भी कहते हैं। इसीतरह अपने शुद्धात्माकास्वसंवेदनाप वीतराग स्वसंवेदन ज्ञान भी अपने अनुभवके आकार रूप एकविकल्पके साथहोनेसे सविकल्प है तो भी अपनेले बाहरके विषयों सम्बन्धी विना चाहे हुए सूक्ष्म विकल्पोंके होने पर भी उनकी मुग्न्यता नहीं ली गई इसी कारणसे उस ज्ञानको निर्विकल्प भी कहते हैं तथा इच्छा पूर्वक आत्म संवेदनकी तरफ अंतर्मुख होकर प्रतिभास करते हुए भी ज्ञानमें वाह्य विपयोंके बिना चाहे सूक्ष्म विकल्प भी होते हैं इसी ही कारणसे ज्ञानको स्व पर प्रकाशक भी सिद्ध किया गया है । इमी ही सविंकल्प निर्विकल्प और स्वपर प्रकाशक ज्ञानका विशेष व्याख्यान यदि आगम, अध्यात्म और तर्क शास्त्रके अनुसार किया जावे तो महान् विस्तार हो जावे सो उमान व्याख्यान इस लिये यहां पर नही किया गया कि यह अध्यात्म शास्त्र है ॥३१२-३१३-३१४॥ इस तरह मोक्ष पदार्थकी संक्षेप सूचनाके लिये प्रथम स्थलमें गाथाएं सात पूर्ण हुई । आगे शिष्यने प्रश्न किया कि क्या यही मोक्षका मार्ग है इसका समाधान आचार्य करते है। गाथा:-बंधाणं च सहावं पियाणि, अप्पणा सहायं च । बंधे सुजोण रजदि सो कम्मपिटुक्खणं कुणदि ।। ३१५ ।। संस्कृतार्थ:-बंधानां च स्वभावं विज्ञायात्मनः स्वभावं च । बंधेषु यो न रज्यते स कर्मविमोक्षणं करोति ॥ ३१९ ॥ सामान्यार्थ:-कर्मबंधोंका स्वभाव और आत्माके स्वभावको जान करके जो कर्मवं- धोंमें नहीं लीन होता है सो कर्मोसे मुक्ति करता है । शब्दाय साप्त विशेषा:-(बंधाणं च सहावं) मिथ्यात्व रागद्वेषादि भाव बंधोंके स्वभावको इस तरह जान करके कि त्यागने योग्य और ग्रहण करने योग्य तत्वोंके विषयमें जो विपरीत अभिप्राय है सो मिथ्यात्वका स्व- भाव कहा गया है तथा रागादिकोंका स्वभाव पंचन्द्रियोंके विपयोंमें इष्ट तथा अनिष्ट परिणाम है अर्थात् यह भाव कि इष्ट विषय ग्रहण करने व अनिष्ट विषय त्यागने योग्य है (च अप्पणो सहावं वियाणिदुं) तथा अनंत ज्ञानदर्शन सुख आदि गुणमई शुद्ध आत्माके स्वभावको जान करके अर्थात् कर्मबंध और बंधरहित आत्माका यथार्थ स्वभाव अनुभव करके (जो) जो कोई विवेकी भव्य जीव (बंधेसु) द्रव्यबंधके कारणरूप मिथ्यात्व व रागद्वेग आदि भाव-बंधोंमें (ण रजदि) निर्विकल्य समाधिके वलसे नहीं प्रीति करता है (सो) सो भन्यनीव (कमविमु- वखणं) द्रव्यक्रम से आत्माको विमुक्त करता है । भावार्थ:-इस संसारी आत्माके द्रव्यकर्म समयसार टीका। और आत्माका अनादि सम्बन्ध इसी कारण है कि यह आत्मा दोनोंक भावों एक अन्यतरहसे विपरीतरुप अडान कियेहुए है जब यह आत्मा दोनों भिन्न स्वरुपको अच्छी तरह जान करके विकल्प रहित समाधिक चलने द्रव्यमांक बंधक कारण मिथ्याय व गग- द्वेपादि भावोंमें नहीं लीन रहता है परंतु अपने शुद्ध स्वभावमें नन्मय रहता है तब वही महापुरुष कामें अपनी मुक्ति कर सक्ता है ।। ३१५ ।। आगे कहते है कि अमा और बंधको अलगर किय उपायस किया जाय। गाथा:---जीवो बंधोय तहा छिजंति सलक्खणेहिं णियाहिं। एण्णाछेदणएणदु छिण्णा णाणत्तमावण्णा ।। ३१६ ।। संस्कृतार्थ:-जीवो यचा तया विद्यते त्वलक्षणाभ्यां निकाय । प्रशाछेदन तु छिन्नी नानात्वमापनी ॥ ३६॥ सामान्यार्थः-अपने २ लक्षणको रखनेवाले जीव और कमबंध दोनों प्रारूपी छनीम भिन्न किये हुए छिद जाते हैं और अनेकपनेको प्राप्त हो जाते हैं । शब्दार्थ महिन विशे- पार्थ:-(जीवो) यह जीव (तहा) तथा (बंधीय) यह कर्मबंध दोनों ही (गियादि) अपने २ (सलक्षणेहिं) लक्षणोंको रखते हैं इसकारण (पण्णा छेद गयेणटु) मंदविज्ञान रूपी छेनीक हाग (छिण्णा)छेदे हुए. (छिन्नति) छिद जाते हैं और (णाणत्तम् आवण्णा) भिन्नर पनेको प्राप्त हो जाते हैं । तात्पर्य यह है कि जीवका लक्षण शुद्ध चतन्यमई कहा गया है और बंधका लक्षण मिथ्यात्व रागडेपादि रूप है, जब शुद्धात्माके अनुभव स्वरूप लक्षणको रखनेवाली भेदवितान रूपी छुरी या छेनी बीचमें पड़ती है तो यह दोनों अपने स्वरुपको लिये हुए छिटक कर अलगर हो जाते हैं भावार्थः-अनादिकालसे भी प्रवाहरूप जिस बंधका इस जीवके साथ सम्बन्ध है वह भी शुढात्माके अनुभव स्वरूप छेनीके बारबार घातसे अलगर हो जाते हैं । अतएव ज्ञानीको उचित है कि भेदविज्ञानरूपी छेनीको लेकर जड़ और चेतनको भिन्न कर देवे ।। ३१६॥ आगे कहते हैं कि आत्मा और बंधक भिनर करनेपर किस कार्यकी मिटती।। गाथा:--जीदो बंधोय तहा छिजंति सलक्खणेहि णियाहि । पंधो छेदेदव्यो मुन्डो अप्पाय चित्तव्यो ।। ३१७ ॥ संस्कृतार्थ:-जीवो बंधश्च तथा छिद्यते त्वलक्षणाभ्यां निकायां । वंधश्छेत्तव्यः शुरु. आत्मा रीतयः ॥ ३१॥ मामान्यार्थ:-जीव और बंध दोनों अपने ९ लक्षणांमे अलग होनाते हैं. इससे बंधको छेदकर अलग कर देना चाहिये परंतु शुद्ध आत्माको ग्रहण करना चाहिये ।। गन्नाथ सहित विशेषार्थ:---जीयो) गइ जीव (तहा बंधोयो तथा यह ही मंत्र दोनो शिवमी G Ovariaawarismirtime HTRAVARENA मैं - २४६ समयसार टीका। सलक्खणेहिं ) अपने २ भिन्न लक्षणोंके द्वारा (छिजति) छिदकर अलग २ होजाते हैं इससे क्या करना चाहिये उसके लिये आचार्य कहते हैं कि (वंधो छेदे दव्वो) विशुद्ध ज्ञान दर्शन स्वभाव धारी परमात्म तत्वका यथार्थ श्रद्वान ज्ञान और आचरणरूप जो निश्चय रत्नत्रयमई भेदज्ञान छुरी है उससे मिथ्यात्व व राग द्वेषांदि भाव रूप बंधको शुद्धात्माकी निकटतासे अलग कर देना चाहिये (सुद्धो अप्पा चित्तव्यो) और शुद्ध आत्माको वीतराग सहज परमा- नंदमई लक्षणको रखनेवाले सुखरूप समता रसमई भावसे ग्रहण करना चाहिये । भावार्थ:- शुद्ध सहजानंद मई आत्मस्वभावरूप हूं रागादि भाव मेरे नहीं है ऐसा श्रद्धान कर भेद- विज्ञानमई भावका जो अभ्यास करता है उसका मोह पर वस्तुसे हट जाता है तब श्रद्धानमें तो उसने बंध और आत्माको भिन्न २ अनुभव किया है तथा वंधको त्यागकर शुद्धस्वरूपके ग्रहणकी रुचि की है । चारित्रमें जितना२ अभ्यास करता है मोह हटता है और निजस्वरूप प्रकट होता है इससे रागादि भावोंको छोड़कर शुद्धस्वरूपका ग्रहण कार्यकारी है ॥३१॥ आगे उपदेश करते है कि इस आत्मा और बंधको अलग २ करनेमें प्रयोजन यह है कि बंधको त्यागकर शुद्धात्मा ग्रहण करने योग्य है:- गाथा:-कह सो धिप्पदि अप्पा पण्णाए सो दु धिप्पदे अप्पा । जह पण्णाए विभत्तो तह पण्णा एव चित्तव्यो । ३१८ ॥ संस्कृतार्थ:---कथं स गृह्यते आत्मा प्रज्ञया स तु गृह्यते आत्मा । यथा प्रज्ञया विभक्तस्तथा प्रज्ञयेव गृहीतव्यः ॥ ३१८ ॥ सामान्यार्थः-वह आत्मा कैसे ग्रहण किया जाता है इस प्रश्नका उत्तर यही है कि वह प्रज्ञा अर्थात् भेद विज्ञानसे ग्रहण किया जाता है तथा जैसे भेद विज्ञानके द्वारा उसको भाव कर्म बंधसे भिन्न किया ऐसे ही प्रज्ञाके ही द्वारा उसको ग्रहण करना व उसमें तन्मय होना योग्य है। शब्दार्थ सहितःविशेषार्थः-(कह) किसतरह ( सो अप्पा) वह आत्मा जो अपनी दृष्टि का विषय नहीं है क्योंकि वह स्पर्श रस गंध वर्णमई मूर्तसे रहित है (घिप्पदि) ग्रहण किया जा सक्ता है इस प्रश्नका उत्तर आचार्य करते हैं कि ( सोआदा दु) वह आत्मा तो (पण्णाए) प्रज्ञासे (घिप्पदे) ग्रहण किया जाता है क्योंकि (जह जैसे (पंण्णाए विभत्तो) पूर्व सूत्र में कहे प्रमाण भेद विज्ञान रूपी प्रज्ञाके द्वारा कर्मबंधके कारण रागादिक भावोंसे जुदा किया गया (तह) तैसे (पण्णाएव पित्तव्यों) उसी भेदविज्ञानमई प्रज्ञाके द्वारा ही उसे ग्रहण करना योग्य है । तात्पर्य यह है कि इस शुद्धात्माका अनुभव भेदज्ञानसे ही किया जाता है यह शुद्ध आत्मा स्वयं अपने शुद्ध आत्म स्वरूपको ग्रहण करता है तथा उसे रागादि पर भावोंसे हटाता है इसमें करण सहाई एक प्रज्ञा ही है इसलिये कहा गया है कि जैसे प्रज्ञाके द्वारा अलग किया गया ऐसे प्रज्ञा ही के द्वारा उसे ग्रहण व मनन करना योग्य समयसार टीका। है । भावार्थ:-आत्मा और परका यथार्थ ज्ञान होकर आत्माचा अवलम्ब फिय डा. भावको भेद विज्ञान कहते हैं । इसीके प्रतापमे गगादि भाव मिटने और शुद्वात्माका ग्राहकः मनन, अनुभव होता है व परमानंदकी प्राप्ति होती है |॥३१॥ आगे फिर कहत है कि इस आनाको प्रमाके द्वारा की पहल किया जाये। गाथा:-पण्णाए चित्तव्यो जो चेदा सो अहं तु णिच्छयदो। अवसेसा जे भावा ते मज्झपरित्त णादवा ॥ ३१९ ॥ संस्कृतार्थः-प्रशया गृहीतच्या यश्चेनयिता सोऽहं नु निश्चयः । अवशेषः ये भावाः ते मम पग इति ज्ञातव्याः ।। ३.९॥ सामान्यार्थ:-जो आत्मा भेद विज्ञानके द्वारा गृहण करने योग्य है वह निश्रयमे में ही हूं । मेरेसे अन्य जो भाव है वह सर्व मुझमे जुड़े हैं ऐमा जानना चाहिये | शब्दार्थ सहित विशेषार्थ:-(जो चेदा) जो कोई ज्ञाता दृष्टा आत्मा (पण्णाय) निश्रलताम आन्मांक लक्षणको अवलंबन करनेवाली प्रज्ञा व भेद विज्ञानतामे (चित्तव्यो) गृहण करने योग्य है (णि. च्छदा) निश्चयसे (सो अहंत) वह मैं ही ज्ञाता दृष्टा स्वरूप हं (जे अबममा भाषा) तथा नी यह अन्य आत्माके लक्षणमें न व्यवहार किये जाने वाले भाव हैं (नेम परित्ति) वे सर्व भाय मुद्दा व्यापकमें व्याप्य पनेको नहीं प्राप्त होते हुए मेरे स्वभावने अन्य हैं गंगा (णादया) जानना योग्य है इसलिये में ही मेरे द्वारा मेरे लिये ही मेरेमे ही मेरी ही मरेको निश्रय गृहण करना हूं. जो कुछ मैं गृहण करता हूं इसमे अन्य किसीको गृहण नहीं करना है. मैं चेतन ई मेरी क्रिया भी चेतनरूप है । मैं चेतनेवाला ही हूं. चेतनवालके ही हाग चेनता है चेतनवालही के लिये चेतता हूं, चेतनेवालेमें ही चेनता हूं. चेतनेवालमें ही चेतना है। चेतनेवालेको ही चेनता है यह सर्व षटकारकका विकल्प भेद नयने है अभेद नयमे न मैं चेनता हूं ऐसा विकल्प करना हूं, न चेतनेवालके द्वारा चेनता हूं. न चेतनेवाले के लिये चेतता हूं, न चेननेवालम चेनता हूं.न चेतनेवालेमें चेतता हूं, न चेतनवालको चेतता है, किन्तु सर्व प्रकारम विशुद्ध चैतन्य मात्र भावरूप में हूं यहांपर समयसार कलशाका १ श्लोक है:- भित्या सर्वमपि स्वलक्षणवलाहेत्तुं हि यच्छक्यने । चिन्मुद्रांक्तिनिर्विभागमहिमा शुधिकारम् । भियंते यदि कारकाणि यदि वा धर्मा गुणा या यदि : गिंधनां न मिदान्ति कायन विमा भार शिट मिनि ॥ भावार्थः -अपने लक्षणके यलमे. जो कुछ अपने आत्माने जुदा करना है उसे जुदा करके मैं चैतन्यके चिन्हसे चिन्हित भेद रहित महिमाको रखनेवाला शुद्ध चैतन्य मात्र पहा ई। यदि पटकारकका व स्वभावोंका व गुणोंका भेद हो तो हो परंतु मेरे शुद्ध चतन्य मात्र महान भावमें किसी प्रकारका भेद नहीं है । भावार्थ:-जो कोई अनुभव करनेवाला है यह में ही हूं मेरसे अन्य जो भाव है वे मेरे कदापि नहीं होमक्ते क्योंकि प्रत्येक द्रव्य अपने ही मन -- 4 REETrtuRESTMERNMBER upsamreworks 2 . , २४८ समयसारं टीका। और पर्यायोंमें व्यापक हैं। जीव जीवत्त्वमें है पुद्गल पुद्गलत्वमें है | एक द्रव्यका दूसरेके साथ व्याप्य व्यापक सम्बन्ध नहीं है। इसी लिये ज्ञानी अनुभव करता है कि मेरा स्वभाव मेरेमें है पर खभाव मेरेमें नहीं है । यदि भेद अपेक्षा विकल्प किये जावे तो कर्ता, आदि पट कारकका विचार होता है परंतु जो अभेद दृष्टि से अनुभव किया जाय तो वहां यह षट् का- रकका भी विकल्प नहीं है किन्तु मेरा खभाव विशुद्ध चैतन्य मात्र ही है ॥ ३१९ ॥ इसीको फिर भी कहते है:- गाथाः---पण्णाए चित्तब्वो जो दट्ठा सो अहं तु णिच्छयदो। अवसेसा जे भावा ते मज्झ परेत्तिं णावा ॥ ३२० ॥ पण्णाए चित्तव्यो जो णादा सो अहं तु णिच्छयदो। अवसेसा जे भावा ते मज्झ परेत्ति णादव्या ॥ ३२१ ।।. संस्कृतार्थः-प्रज्ञया. गृहीतव्यो यो दृष्टा सोऽहं तु निश्चयतः । अवशेषा ये भावास्ते मम परा इति ज्ञातव्याः ॥ ३२० ॥ प्रज्ञया गृहीतव्यो यो ज्ञाता सोऽहं तु निश्चयतः । अवशेषा ये भावास्ते मम परा इति ज्ञातव्याः ।। ३२१ ।। सामान्यार्थः-और विशेषार्थ, शब्दार्थ सुगम है। जो कोई देखनेवाला भेदं विज्ञानके द्वारा गृहण करने योग्य है सो निश्चयसे मैं ही हूं। मेरे सिवाय शेप जितने भाव हैं सो सब मुझसे पर हैं ऐसा जानना योग्य है । जो कोई जाननेवाला भेद विज्ञानके द्वारा गृहण करने योग्य है वह निश्चयसे मैं ही हूं मेरे सिवाय शेष जितने भाव हैं वे मुझसे पर हैं ऐसा जानना योग्य है। चेतनाके दर्शन ज्ञान विकल्प होते हैं इनसे,रहित चेतना नहींहोसक्ती चेतनाही दर्शनपना और ज्ञातापना है और यही आत्माका लक्षण है इससे मैं देखनेवाले आत्माको गृहण करता हूँ जो कुछ मैं ग्रहण करता हूं, और उसीको ही देखता हूं।-देखता हुआ ही देखता हूं, देख- नेवालेके द्वारा ही देखताहूं, देखनेवालेके लिये ही देखताहूं, देखनेवालेसे ही देखताहूं, देखनेवा- लेमें ही देखताहूं, देखनेवालेको ही देखता हूं यह भेद नयसे कथन है । अथवा मैं नहीं देखता हूं, न देखता हुआ देखता हूं, न देखनेवालेके द्वारा देखता हूं, न देखनेवालेके लिये देखता हूं, न देखनेवालेसे देखता हूं, न देखनेवालेमें देखता हूं, न देखनेवालेको देखता हूं.। किन्तु सर्वसे.. विशुद्ध दर्शन मात्रं भाव मैं हूँ यह विकल्प रहित चिन्तवन है। तथा इसी तरहसे जो कुछ मैं ग्रहण करता हूं, सो जाननेवाले ज्ञाता आत्माको ग्रहण करताहूं। उसको ही जानता हूं, जान- नेवालेके द्वारा ही जानता हूं, जाननेवालेके लिये ही जानता हूँ , जाननेवालेसे ही जानता हूं जाननेवालेमें ही जानता हूं, जाननेवालेको ही जानता हूं । यह विकल्प रूप विचार है। अथवा मैं नहीं जानता हूं, न जानता हुआ जानता हूं, न जाननेवालेके द्वारा जानता हूं। न जानने- .
समयमार टाका. चालेके लिये जानता हूं. न जाननेवालेने जानता है. न माननेवाले में जानता है. न माननेवालेको जानता है, किन्तु मैं मंत्र प्रभारसे विशुद्ध माला गात्र भावरूप है । यह विकल्प रहित अनुभव है। आगे शिप्य प्रश्न करता है. कि क्यों चेतना दर्शन ज्ञान विकल्पोंकी नहीं त्यागती निमम ग्रह चेतनेवाला ज्ञाता, दृष्टा रहता है? इमान मगाशान यह कहा जाता है कि चेतनाभाव पनि भाषरूप है गो गर्व ही वस्तुकि सामान्य और विशेषरूप दोनों ग्यमानि बनाना है. क्योंकि वस्तुओका स्वभाव ही सामान्य व विशेयर है. इसीन बह चेतना नगन और जान रूप है इसने वह चेतना इनको नहीं उलंघन कर मन्ती । यदि इन दोनाको उदय नाव तो सामान्य और: विशेषरूपके त्याग देनेस यह चेतना ही न रहे । ऐसा मानने दो दोष मा जावेंगे, एक तो यह कि अपने गुणके नाशम चेतना गुण अचेत्तन हो जायगा तब व्यापक अभावमें व्याप्यःजो वेतन उसका भी अभाव हो जावेगा यह दोष आना उचित नहीं है, पेने ही चेतना गुण और गुणी दोनोंका नाश हो जायगा । इसलिये दर्शन ज्ञानरूप ही चेतना है ऐसा नानना योग्य है। ऐसा ही श्री.अमृतचंद्र आचार्यरत कलशामें कहा है। अद्वैतापिहि चेतना जगति चेहग्नप्तिरूपं त्यजेत् । तत्सामान्यविशेषरूपविरहात्सास्तित्वमेव यजेत् । तत्त्यागे जड़ता चितोपि भवति व्याप्यो विना व्यापका- दात्मा चांतमुपति तेन नियतं दृग्ज्ञप्ति रूपास्नु चिन् । तथा---एकश्चितश्चिन्मयएव भावो भावाः परे ये किल ने परेपाम् । ग्राह्यस्ततश्चिन्मयएव भावो भावाः परे सर्वत एव हेयाः ॥ अर्थ:-निश्चयसे चेतना अहतरूप ही है तो भी अपने दर्शन ज्ञानरूपको नहीं छोड़ती है। यदि वह अपने दर्शन ज्ञानरूपको त्याग देवे तो अपने सामान्य और विशेष रूपके त्याग देनेसे वह चेतना अपने अस्तित्वको भी छोड़ देवे । अपना अस्तित्व छोड़ देनेगे यह चेतना भी जरूप होना तथा व्याप्य विना व्यापकके नहीं रह सक्ता इससे चेतना के विना-आत्माका भी अंत हो जाचे सो ऐसा हो नहीं सका इसने वह चेतना दर्शन ज्ञानरूप है, चैतन्यात्माका एक चैतन्य मात्र भाव ही है उसके सिवाय गर्व ही अन्य मात्र नियने पर द्रव्योंके हैं। इस कारण चैतन्यमात्र भाव ही ग्रहण करने योग्य है और उसके रियाय अन्य सर्व मात्र सर्व तरहने छोड़ने योग्य ही हैं। यहां सा जानना योग्य है कि में चिदानंदमई एक चैतन्य भावक सिवाय शेष सब ही गगहय आदि विभाव परिणाम पर। यहां शिप्यने ऋहा कि चेतनाके ज्ञान दर्शन भेद नहीं हैं. एक चेतना ही है, गला मानने यह आत्मा-ज्ञाता दृष्टा है.गेमे दो प्रकार के सिन्ह होता है। इसका समाधान करने में शिवार सामान्य स्वभावको ग्रहण करनेवाला- दर्शन है तथा विशेषको ग्रहण करनेवाला मान है। तथा HrwwwUIRE ORSEOURIAARRuceGUARAVACN १५० समयसार टीका। हरएक वस्तु सामान्य और विशेषरूप है इसलिये सामान्य व विशेषरूप दोनों रूप चेतना है, यदि दो रूप चेतनाको न माने तो चेतनाका अभाव हो जावे । चेतनाका अभाव होनेपर आत्मा जड़पनेको प्राप्त हो जावे तथा आत्माका विशेष व असाधारण गुण चेतना है इसको न मानने पर आत्माका अभाव ही हो जावे, परन्तु यह दोनों बाते नहीं हो सकी क्योंकि नतो आत्मा जरूप दिखलाई पड़ता है और न उसका अभाव है क्योंकि प्रत्यक्षसे विरोध हो जायगा। क्योंकि आत्माका देखना जानना कार्य प्रत्यक्ष प्रकट है, स्व संवेदन गोचर है। इससे सिद्ध हुआ कि यद्यपि अभेद नयसे चेतना एकरूप है, तो भी सामान्य और विशेष जानने योग्य विषयके भेदसे दर्शन और ज्ञान दो रूप चेतना है ऐसा भेद नयसे है ऐसा अभिप्राय जानना । भावार्थ:-चेतनाके दर्शन और ज्ञान दो भेद हैं । तथा जगतमें पदार्थोंका स्वरूप भी सामान्य और विशेषरूप है । इसलिये वह चेतना मात्र दर्शनरूप व मात्र ज्ञानरूप नहीं हो सक्ती, इमीसे यह आत्मा चैतन्यरूप व ज्ञाता दृष्टारूप कहा जाता है, ज्ञानी विचारता है कि जो कोई देखनेवाला है वह मैं ही हूं व जो जाननेवाला है वह मैं ही हूं. इसके सिवाय अन्य रागद्वेषादि विभाव परिणाम मेरे नहीं हैं ॥ ३२०-३२१ ॥ आगे कहते है कि शुद्ध बुद्ध एक स्वभावरूप परमात्माके शुद्ध चैतन्यरूप ही एक भाव है। राग- द्वेषादिक मात्र नहीं हैं ॥ गाथा:-को णाम भणिज वुहो णा, सव्वे परोदये भावे । मज्झमिणं तिय वयणं जाणंती अप्पयं सुडं ॥ ३२२ ॥ संस्कृतार्थः-को नाम भणेद बुधः ज्ञात्वा सर्वान् परोदयान् भावान् । ममेदमिति वचनं जाननात्मानं शुद्धं ॥ ३२२ ॥ 'सामान्यार्थ:-सर्व ही रागादिभावोंको कर्मोके उदयसे उत्पन्न जानकर और शुद्ध आत्माको अनुभव करता हुआ कौन ऐसा बुद्धिमान प्राणी है जो यह कहे कि यह परमाव मेरे हैं ? अर्थात् परभावोंको अपने कोई भी नहीं मानेगा ॥ शब्दार्थ सहित विशेषार्थः-(सव्वे- भावे) सर्व ही मिथ्यादर्शन व रागद्वेष आदि विभाव परिणामोंको (परोदये) शुद्ध आत्मासे भिन्न द्रव्यकोंके उदयसे उत्पन्न हुए हैं ऐसा (गाईं) निर्मल आत्माका अनुभवरूपी लक्षणको रखनेवाले भेद ज्ञानके बलसे जान करके तथा (सुई) भावकर्म रागद्वेषादि, द्रव्यकर्म ज्ञानाव- रणादि, नोकर्म बाह्य शरीरादि इनसे रहित शुद्ध (अप्पयं) आत्माको (जाणतो) शुद्ध आत्माकी 'भावनामें परणमन करनेवाले अभेद रत्नत्रय लक्षणको रखनेवाले भेद ज्ञानके द्वारा परम समता रसकी भावनासे अनुभव करता हुआ (को णामवुहो) कौन ऐसा बुद्धिमान ज्ञानी, विवेकी (इणतिय मझं वयणं) इन पर भावोंको मेरे हैं ऐसा वचन (भणिज्ज) कह सक्ता है ? अर्थात् कोई भी नहीं कह सक्ता । भावार्थ:-ज्ञानी व विवेकी प्रथम आगमके द्वारा फिर युक्ति के द्वारा समयसार टीका। फिर स्वानुभवके द्वारा समस्त मिथ्यात्व च गगईयादि विभाव परिणामोंने अपनी मृद आत्मीक परिणतिसे भिन्न अनुभव करता हुआ निश्चयले न कभी मामान मला है कि यह पर. भाव मे हैं और न वचनोंके हारा कह सत्ता है क्योंकि यह दीन ज्ञान चाग्निमई अभेद रत्नत्रयकी भावनारूप निन समाधिन लीन है, उसीता रमिक है। समी परिणनिको अपनी वस्तु समझता है। इसतरह विशेष भेद भावनाके व्याख्यानी मुग्न्यतासे तीसरे स्थलमं पांच मत्र समाप्त हुए ॥ ३२२ ॥ आगे प्रकाश करते है कि मिथ्यादर्शन व राग द्वेपादि परमावीको अपना मानने यह जोन समांस बंधता है तथा वीतराग परम चैतन्यगई लक्षणको रखनेवाले अपने आत्मीक स्वभावको अपना माननसे यह जीव कासे मुक्त होता है। गाथा:-तेयादी अबराहे कुव्यदि जो सो ससंकिदो होदि। मा वझेऽहं केंणवि चोरोत्ति जणम्मि विचरंतो ॥३२॥ जो ण कुणदि अबराहे लो हिस्संको दुजणवदे भमदि । णवि तस्स वज्झिहुँ जे चिन्ता उप्पनदि कयावि ॥३२॥ एवं हि सावराहो वज्झामि अहं तु संकिदो चंदा । जो पुण णिरावराहो णिस्संकोहण वज्झामि ॥३२५ ॥ संस्कृतार्थः-स्तेयादीनपराधान् करोति यः स शंकितो भवति । मा बध्ये केनापि चौर इति जने विचरन् ॥ ३२३ ॥ यो न करोत्यपराधान् स निःशंकस्तु जनपदे भ्रमात । नापि तस्य पढे अहो चिंतोत्सवते कदाचित् ।। ३२४ ॥ एवं हि सापराधी वध्धेऽहं तु शक्तिक्षेतयिता । यः पुननिरपराधो नियंकोऽहं न बाये ॥ ३२५ ॥ सामान्या:--जो कोई चोरी आदि अपराधोंको करता है वह मनमें शंका करता है कि लोगोंमें घूमते हुए मैं किसी कोतवाल आदिसे बांध न लिया जाऊंगा। तथा नो अपगीको नहीं करता है वह निःशंफ रहता हुआ लोगोंमें घूमता है उसके कदापि या चिन्ता नहीं पड़ा होती है कि मैं कभी किसीसे बांधा जाउंगा। इसीतरह जो अपराधी है वही आत्मा या शंका करता है. कि. मैं कमोसे बंधूंगा परंतु जो अपराध रहित है यह यह शंका नी मला कि मैं बंधूंगा इससे निःशंक रहता है। शब्दार्थ सहित विशेषार्थ:-जो) जोक लगा- दी अबराहे) चोरी परस्त्री रमण आदि अपराधांशो (कुन्यदि) कन्ना है। मो) यह पुराण (सकिदोहोदि) इस शंका सहित होता है कि (जहि विचरती) जनसमूहके मध्य दिन. रने हुए (अई) मैं (चोरोनि) बोर हूं ऐमा मानरूर (केमावि मिली भी मोलार जारिने ।
TERMERNERBERGREE समयसार टीका। BPARERASAIRAHASYAria २५२ (मावझे) न बांध लिया जाऊं । यह अन्वय दृष्टांत गाथा हुई । परन्तु जो जो कोई पुरुष (अवराहे) चोरी परस्त्री आदि अपराधोंको (ण कुणदि) नहीं करता है (सो) वह पुरुष जणवंदे) लोगोंके बीचमें (णिस्सकोदु भमदि) विना किसी शंकाके किये हुए निडर घूमता है (तस्त) उस पुरुपके (चिंता) यह चिन्ता (क्रयावि) कभी भी (णविउत्पन्नदि) नहीं पदा होती है (जे बन्झि१) कि अहो मैं किसीसे भी चोर मानकर बांध लिया जाउंगा। यह व्यतिरेक दृष्टांतकी गाथा पूर्ण हुई । (एवं हि) इसी प्रकारसे ही (सावराहो) वह मनुष्य जो रागपादि परद्रव्यका ग्रहण या स्वीकार करता है मो अपने आत्मामें स्थितिरूप भावसे गिरा हुआ अपराधी होता है, वही अपराधी (चेदा) चेतन स्वरूप आत्मा (अहं वज्झामि) में ज्ञानावरण आदि कर्मोंसे बंधूंगा ऐसा मानकर (संकिदो तु) शंका महित होता है इसीलिये कर्मबंधसे डरा हुआ अपनेको प्रायश्चित्त व प्रतिक्रमणरूप दंड देता है । (पुण ) परंतु (जो गिरावराहो) नो कोई रागादि भावरूप अपराधोंसे रहित है अर्थात् निरपराधी है वह (अहं ण वज्झामि) में नहीं कर्मोंसे बंधूंगा ऐसा मानकर (णिसंक्रः) शंका रहित रहता है। वह बाह्य प्रतिक्रमण आदि दंडके लिये विना भी अनंत ज्ञान दर्शन सुख वीर्यादिरूप निर्दोष परमात्माकी भावनाम ही शुद्ध हो जाता है । यह अन्वयं व्यतिरेक दाष्ट्रान्तकी गाथाएं पूर्ण हुई। भावार्थः-आत्माके शुद्ध स्वभावकी अपेक्षा ज्ञानावरणादि द्रव्यकर्म, रागद्वेषादि भावकम, व शरीरादि नोकर्म सर्व पर वस्तु हैं । जो परकी चीजको ग्रहण करता है वह चोर और अपराधी है उसके यह अवश्य शंका होती है कि कोई मुझे पकड़ न ले । तथा जो किसीकी चोरी नहीं करता उसे पकड़े जानेकी शंका नहीं होती । इसीतरह जो कोई अपने शुद्धात्मीक भावके सिवाय अन्य रागादि भावोंको ग्रहण करता है वह अपराधी है और कर्मोंसे बंधता है, इसी शंकासे वह प्रायश्चित्ता- दि दंड ग्रहण करता है। परंतु जो पर भावको न ग्रहण कर अपने शुद्ध स्वरूपमे लीन रहता है वह विना प्रतिक्रमण आदिके किये हुए ही परमात्माकी भावनासे ही शुद्ध हो जाता है । अतएव रागादि विकल्पोंको त्यागकर शुद्ध आत्मीक अनुभवमें लवलीन होनायोग्य है जिससे पर ग्रहण रूप अपराध न हो ॥ ३२३-३२४-३२५ ॥ आगे शिष्यने प्रश्न किया कि अपराध क्या है: उसका उत्तर भारत है- 5. 7 : गाथा:--संसिद्धिराधसिद्धी साधिदसाराधिदं च एयहो । अवगदराघो जो खलु चेदा सो होदि अवराहो ॥ ३२६ ॥ संस्कृतार्थ:-संसिद्धिराधसिद्धिः साधितमाराधितं चैकार्थे । • अपगतराधो यः खलु चेतयिता स भवत्यपराधः-|| ३२६ ॥ । सामान्यार्थी-संसिद्धि, राध, सिद्धि, साधित, आराधित यह सर्व एक अर्थ वाची है, जो कोई निश्चयसे इस राधसे रहित है सो चेतनेवाला आत्मा अपराधी है।
" समयसार टीका। समाध गहित विशणार्थ:--- मंमिद्धिराम गिद्धा साथिदमागघिदन पा) नीन कालवी सबै मिथ्यान्व: व विषय पायानि विमाव परिणामांमे रहित होनेने विलय रहित ममाधि ठहरकर अपने शुन्दागाकी आराधना का नया' छन्ना उसको गा कहते हैं। संसिन्हि, सिद्धि, साधिन, व आगधित यह सर्व उम ही ग़ध गन्दक पर्याय बानी नाम हैं। (नो चेदा ) जो कोई तनम्वरूप आत्मा ( बन्नु ) निश्चयस (अवगदगयो ) शुद्धामासी आराधनाको नष्ट करनेवाला है अर्थात् 'गगडेपादि विभाव परिणामान दानवाला है (सो अवराहो होदि ) वही अपराधरूप होता है। जो आत्मा अपनध गहिन है बाद सापराधी है परन्तु जो इससे विपर्गत मन, वचन, कायकी गुप्तिरुप समाधि, निष्टनवाला है वह निरपराधी है । भावार्थ:-अपने शुद्धात्माकी सेवाको राध कहने हैं-शुद्ध स्वरूपी सिद्धिको संसिद्धि व सिन्दि, शुद्ध स्वन्टपक साधनको साधित व उसकी आगवना आराधिन कहते हैं, इसलिये यह मव शन्न एक अर्थक वाचक है। जो कोई आत्मा निश्रय दर गया सेवक है वह तो निरपराधी है परन्तु जो इस संवासे भ्रष्ट है और रागडेपादि परिणामोंमें बनन करनेवाला है वह अपराधी है। जो अपराधी है वह कर्मबंधसे लिन होता है। • ग्रहां शिष्यने प्रश्न किया कि हे भगवन् ! शुद्ध आत्माकी आगवनाक परिश्रमी वया "सिद्ध होगा ? क्योंकि. यह आत्मा प्रतिक्रमण आदि अनुष्ठानोंसे ही अपगध रहित होनाना है। 'क्योंकि जो अपराध संहित है उसके अप्रतिक्रण अर्थात प्रतिक्रमणका न करना आदि दोष होते हैं उस दोपरूप अपराधक न विनाशक होनेके कारण उसे विप अर्थात जहरका कुंभ करने हैं। और प्रतिक्रमण आदिक द्रोप या अपराधके विनाश करनेवाले है इसलिये इनकी अमृत कुंभ कहते हैं, जैसा कि चिरंतन प्रायश्चित ग्रंथमें कहा है। उक्तं च गाथा:-अपडिकमणं अपड़िसरणं अपड़िहागे अधारणा चेव अणियतीय अजिंदा अगल्हा सोहीय विमकुंभो। पड़िकमणं पड़िसरणं पड़िारण धारणा णिवत्तीय जिंदा गाहा सोही अट्ठविहो अमय कुभी दु॥ भावार्थ:-प्रतिक्रमणं, प्रतिमरण, प्रनिहार, धारणा, निवृनि, निदा, गही शुद्धि इनका न करना सो विषका कुंभ है तथा इन आठों भेदोंका करना सो अमृत कुंभ है ॥३६॥ अब इस पूर्व पक्षका परिहार करने है:- गाथा:--पड़िकमर्ण पड़िसरणं परिहरणं धारणा णियीय । जिंदा गाहा सोहिय अहविहो होदि विसभी ।।३२७॥ संस्कृतार्थः-प्रतिममणं प्रतिस्थ परिवारों धारणा निलिय। दिदा गहा दिः अनिको भEm.. .
समयसार टीका। sorner-ARNARY । सामान्यार्थः–प्रतिक्रमण, प्रतिसरण, परिहार व प्रतिहरण, धारणा, निवृत्ति, निन्दा, गहीं, शुद्धि यह आठ प्रकारका विष कुंभ है। शब्दार्थ सहित विशेषार्थः-(पड़िकमणं) पूर्वमें किये हुए दोषका निराकरण करना सो प्रतिक्रमण है । ( पड़िसरण ) सम्यक्त्व. आदि गुणोंमें प्रेरणा करना सो प्रतिसरण है । (परिहरणं) मिथ्यात्त्व व रागद्धेपादि दोपोंका निवारण करना सो प्रतिहरण है। (धारणा) पंच नमस्कार आदि मंत्रोंके व प्रतिमा आदि बाहरी द्रव्यके आलंबनके द्वारा चित्तका स्थिर करना सो धारणा है | वाह्यके पंचेन्द्रियोंके विषय और कपार्योंमें इच्छा- पूर्वक जाते हुए चित्तका हटाना सो. निवृत्ति है | अपने आत्माको साक्षी करके स्वयं अपने दोषोंका प्रकट करना व विचार करना सो निंदा है । गुरुकी साक्षीमें उनके सामने अपने दोपोंका प्रकट करना सो गर्दा है। दोष हो जाने पर उसका प्रायश्चित्त लेकर अपनी विशुद्धता करनी सो शुद्धि है । यह आठ भेदरूप शुभोपयोग है सो यद्यपि मिथ्यात्त्व आदि विषय कषायोंमें परिणतरूप अशुभोपयोगकी अपेक्षासे यह विकल्परूप सरागचारित्र हैइससे इस अवस्थामें इन आठ भेदोंको अमृतका कुंभ कहते हैं तथापि रागद्वेष- मोह, अपनी प्रसिद्धि, पूजा, लाभ; देखे, सुने, अनुभवे भोगोंकी इच्छारूप निदानबंध आदि सर्व परद्रव्यके आलंबन- रूप विभाव परिणामोंसे शून्य चिदानंदमई एक स्वभावरूप विशुद्ध आत्माके आलंबनसे भरपूर विकल्प रहित शुद्धोपयोग लक्षणको रखनेवाले निश्चय प्रतिक्रमणकी अपेक्षासे वीतराग चारित्रमें ठहरे हुए पुरुषोंके लिये . विपका कुंभ है। क्योंकि. निश्चय प्रतिक्रमण आदि भावोंका रखनेवाला ज्ञानी जीव है उसके निश्चय प्रतिक्रमण आदि भाव होते हैं और वे शुद्ध आत्मीक भावः अमृतके कुंभके समान है। ... जैसा कि अपड़िकमणं अप्पड़िसरण अप्पड़िहारो अधारणा चेव । अणियत्तीय अणिंदा अगुरुहा. विसोहिय अमिय कुंभो ॥ यह निश्चय प्रतिक्रमण आदि रूपभाव अमृतमई हैं। यह तीसरी भूमि है इसकी अपे- क्षासे व्यवहार प्रतिक्रमण प्रायश्चित्त आदिरूप जो दूसरी भूमि है वह विषमई है । परन्तु शुभोपयोगमई प्रतिक्रमण आदि रूप दूसरी भूमिको छोड़कर जो इस प्रतिक्रमणका भी अभाव- रूप अशुभोपयोगमई पहली भूमि है उसकी अपेक्षा यह दूसरी भूमि अमृत कुंभ है ॥ इस कथनका विशेष खुलासा आचार्य करते हैं कि-अप्रतिक्रमण दो प्रकारका होता है। एक अज्ञानी जनोंके आश्रित दूसरा ज्ञानी जनोंके आश्रित । अज्ञानी जनोंमें जो अपतिक्रमण आदि होते है वे विषय व कषायोंमें, परिणमनरूप अशुभोपयोगरूप होते हैं । परन्तु आत्म- ज्ञानी जीवोंमें जो अप्रतिक्रमण होता है वह शुद्धात्माका ग्रंथार्थ श्रद्धान, ज्ञान और चारित्र लक्षणको रखनेवाला मन वचन कायकी गुप्तिरूप होता है। तत्वज्ञानी ..जनोंके आश्रितरूप- इस गाथा कहा है ।
समयसार टीका। जो अप्रतिक्रमण है वह सराग चारित्र लक्षणको रखनेवाले शुभोपयांगको अपेक्षा नापि अप्रतिक्रमण कहा जाता है तो भी वीतराग चारित्रकी अपेक्षासे वही अप्रतिमा निकाय प्रतिक्रमण है। व्यवहार प्रतिक्रमणकी अपेक्षासे इसको अतिक्रमण करने हैं नया यही भार ज्ञानी मनुप्यके मोक्षका कारण होता है। व्यवहार प्रतिक्रमणका ऐसा फल है कि यदि कोई अपने शुद्ध आत्मस्वरूपको उपादेय अर्थात ग्रहणे योग्य मानके निश्चय पनिकमणके लिये निमित्त साधक है ऐसा जान विपय व कपायोंने हटने के लिये इस व्यवहार प्रतिक्रमणने करता है उसके लिये यह व्यवहार प्रतिक्रमण भी परम्परासे मोक्षका कारण होता है । और यदि शुद्धात्माकी भावनाके अभिप्रायसे नहीं किया जाता है तो यही व्यवहार प्रतिक्रमणरूप शुभो- पयोग स्वर्गादि सुखंकि निमित्तभृत पुण्य कर्म बंधका ही कारण है। नथा अनानी जनाम होनेवाला मिथ्यात्व व विषय कपाय आदिरूप जो अतिक्रमण है वह नो नरक भादिक दुःखोंका ही कारण है । इस तरह यह कहा कि यह प्रतिक्रमणरूप आठ प्रकारका विकल्प रूप शुभोपयोग यद्यपि विकल्प सहित अवस्थामें अमृतका कुंम है तो भी मुन्न दुःख आदिमें समतामई लक्षणको धारनेवाले परम उपक्षा संयमकी अपेक्षासे बिपका कुंभ ही है । इसप्रकार व्याख्यानकी मुख्यतासे ४ गाथाएं पूर्ण हुई। भावार्थः--प्रति- क्रमण आदि करना कि मेरे पिछले दोप मिथ्या हो इस कारण तो अमृतका कुंग है कि यह अशुभोपयोगको मिटाकर शुभोपयोगको रखनेवाला है तथा इस कारण यह विषका कुंम है कि यह बंधका कारण है। और शुढोपयोगमें तल्लीनतारूप निश्चय प्रतिक्रमण अमृतका कुंभ है। अतएव ज्ञानी जीवोंको अशुभ उपयोगके टालनेके निमित्त निश्चय प्रनिक्रमणकी प्रानिक दृश्यमे व्यवहारप्रतिक्रमण करना योग्य है। परंतु जब निश्रयम्वरूपमें स्थितिरूप निकाय मनिझमणका माग हो तब यह व्यवहार प्रतिक्रमण त्यागने योग्य है क्योंकि यह पुण्यवंधका कारण है । प्रनिक मणका विल्कुल न करना उसे भी अतिक्रमण कहते हैं तथा शुहात्मामें लीन होकर व्यय हार प्रतिक्रमणको न करने हुए निश्चय प्रतिक्रमणके करनेको भी अप्रतिक्रमण कहते हैं। अज्ञा- नी जीवोंका पहला अप्रतिक्रमण अशुभ उपयोगरूप और नारकादि दुःखोंका कारण पापनका बंध करनेवाला है तथा तत्वज्ञानी जीवोंका अप्रतिक्रमण बंधका नायक और मोक्षका माधक तथा परम उपादेय अमृतरूप है | व्यवहार प्रतिक्रमण शुभोपयोगरूप है सो अशुभोपयोगी अपेक्षा अमृत कुंभ है पर शुद्धोपयोगकी अपेक्षा विपकुंभ है । इस अभिप्राय भले प्रसार समझकर तत्वज्ञानीको रागद्वेप त्याग वीतराग चारित्रमई न्यारूपमें वर्तन करना गाम्य है। इसप्रकार समयसारकी शुद्धात्मानुभूतिमई लक्षणको गानेवाली नान्पनिक समयसारकी व्याख्या २२ गाथाओं में चार अंतर अधिकारोंमे नया मोधका अधिकार समाप्त हुआ।
समयसार टीका। ASSISEASURGETRIKRICELEGRAENMAGES तहां ऐसा होनेपर श्रृंगार रहित नाटकके पात्रकी तरह रागहेमादिने रहिन नया शांन रसमें परिणमन करता हुआ शुद्ध आत्मीकरूपमे मोक्ष तन्त्र रंगभूमि चला गया। M है दशकां महाधिकार (१०) मोक्षतत चूलिका। सर्व विशुद्ध ज्ञान। अब सर्व विशुद्धनान प्रवेश करता है। यद्यपि यह जीव संसार पर्यायको आश्रय करके अशुद्ध उपादानरूपसे व अशुद्ध निश्चय नमसे कोपना, भोक्तापना तथा बंध मोक्ष आदि परिणामोंसे युक्त तथापि सर्व प्रकारसे विशुद्ध पारिणामिक परमभावको ग्रहण करनेवाली शुद्ध उपादानरूप शुद्ध द्रव्यार्थिक नयस यह जीव कोपना भोकापना व बंध नोक्ष आदि करणरूप परिणा- मोसे शून्य ही है इसतरह "दवियं जे उप्पनदि" इत्यादि गाथाको आदि लेकर १४ गाथाओं पर्यन्त मोक्ष पदार्थकी चूलिकाका व्याख्यान करते हैं। उनमें आदिके ? चार सूत्रोंमें यह वर्णन है कि निश्चयसे यह जीव कर्मका कती नहीं है उसके पीछ शुद्ध उपयोगधारीके.मो ज्ञानावरण आदि प्रकृतियांका वंध होता है सो अचानकी महिमा है इसके कहने के लिये चेदाओ पयड़ि अटुं' इत्यादि प्रान्तके श्लोक चार हैं । इसके पीछे निश्रायने यह जीव भोक्ता नहीं है इस वातको प्रकट करने के लिये "अण्णाणी कम्मफलं" इत्यादि मृत्र चार हैं। उसके बाद मोक्ष चूलिका अधिकारको संकोच करते हुए " विकुणदि " इत्यादि दो सूत्र कहने हैं। इसतरह मोक्ष पदार्थकी चूलिकामें समुदाय पातनिका पूर्ण हुई ।। , अव कहते है कि निश्चयसे यह जीव फर्मोका कना नही होता है:- गाथाः-दवियं जं उपजादि गुणेहिं तं तेहिं जाण अणणं । जह कड़यादीहिंदु पज एहिं कणयं अणण्णमिह ॥ ३२८ ॥ संस्कृतार्थ:-द्रव्यं यदुत्पद्यते गुणैस्तत्तैीनोयनान्यत् । यथा कटकादिभिस्तु पर्यायः कनकमन यदिह ॥ ३२८ ॥ सामान्यार्थः-जैसे सुवर्ण अपनी कड़ी आदि पर्यायोंमे एक है भिन्न नहीं है तसे जो द्रव्य परिणमन करता है सो अपने गुणोंसे अभिन्न होता है। शब्दार्थ साहिन विशेषार्थ:- (जह ) जैसे (कणयं) कनक व सुवर्ण ,(इह। इस जगतमें (कड़यादीहिं पजपहिं दु) अपनी कड़ी, कड़े, वाली, भुजवन्द आदि पर्यायोंसे (अणण्णम् ) दूमरा नहीं है अर्थात् वे समयसार टीका। कड़े आदि जी नुवर्णकी अपत्यार है और यह नुवर्ग उनले मिल नहीं है, तेले ही जेवियं उपनदि . जो द्रव्य अग्नी पर्यायाने उत्पन्न होता अर्थात् परिणतन करता है । तं । सो द्रव्य नेहिं गुणेहिं ) अपने ही गुणोकि साथ (अगण) अनन्य अर्थात् एक है उनमे जुना नहीं है ऐसा (नागन) नानो । माराय:-द्रव्य गुण नित्य रहते हैं कभी गुण द्रव्यको छोड़ने नहीं हैं। द्रव्यमी जी २ अवम्याग होनी वे ही गुणोंकी अवस्थाएं हैं-ये अवधाएं उच्य व गुणवे भिन्न नहीं होगी-प्रत्येक प्रत्य अपने ही गुणों में परिणमन करता है कोई द्रव्य अन्य द्रव्यरूप नहीं होता. जमे गुवर्णको चाहे जितनी चीजें बना वे सर्व सुवर्णसे भिन्न नहीं होती। उसीतरह द्रव्य अपनी पयांगोंगे मिन्न नहीं होता, कोई द्रव्य पर द्रव्यका कर्ता नहीं होमक्ता । यह कयन उपादानकी अपेक्षा किया है ।। ३२८ ॥ - अव जीव अजीव द्रव्यके सम्बन्धमें कहते है:- गाथा:-जीवस्सा जीवस्लय जे परिणामा दु देसिदा सुसे। तं जीवमनी वा तेहि मणपणं वियाणाहि ॥ ३२९ ॥ संस्कृतार्थ:-जीवस्यानीवस्य तु ये परिणामास्तु दर्शिताः सूत्रे ते जीवमजीवं वा तरनन्धं विजानीहि ।। ३२९ ॥ मामान्या:--मूत्रमें व परमागममें जो जीव व अजीवके परिणाम धनलाए हैं, वे परिणाम क्रमसे जीव व अनीव रूप हैं उनमे भिन्न नहीं है। शब्दार्थ सहित विशेषार्थ:-(नुत्ते) सूत्ररूप परमागममें जे) जो (जीवरम जीवत्सय) जीव या अनीय सम्बन्धी (परिणामा)अवस्या (देसिदादु) कही गई हैं :तेहिमणण्णं) उन ही पर्यायोंसे अभिन्न ( जीवं वा अनीव) उस जीव वा अनीव द्रव्यकों (वियाणाहि) जानो। भावार्थ:-जने सुवर्ण अपनी कुंडलादि पर्यायाने अभिन्न अर्थात एक रूप है, इसीतरह जीव द्रव्य आनी चेतनाके ज्ञान दर्शनादि परिणामोंमे व पुद्गल अपनी नाना प्रकार पर्यन से अमिन अनि का है। जीव अपनी पर्याय नीर- रूप व पुदलकी पुट्ठलरूप हैं ।। ३२९।। आगे कहते हैं कि शुद्ध निया नयने यह जीप नर नारकादि पायो मदापि नही उत्पन्न होता है:- गायाः- कुमोवि विउप्पण्णो जत्या कर्ज तेण सो आदा। उमा शनिबारगावि लेण सो होरि ॥३०॥ संसा:-न मनन म आमा ! उत्सादनांत नारन र भदि ॥ २६ सामान्याय .. मह आत्मा मिली भी निखारे पैदा नहीं हुआ है. इस कारण या फिसीका कार्य नहीं है और न यह किसीको निश्चयस पैदा करता है मग या भारमा रानी १ MP समयमारीका। २५८ नहीं है। शब्दार्थ दिन विशवार्थ:-जाहा) क्योंकि (सोआदा)वह आत्मा (कुदोषि)शुद्ध निश्रय नयकी अपेक्षा किसी भी काके द्वारा कमी भी (णबिउप्पण्णों) नर नारक आदि विभाव पर्याय- रूपसे नहीं पैदा हुआ है (लेण) इस कारणसे (ण कन्न) कर्म और नोकर्मकी अपेक्षासे यह उनका कार्य नहीं है (ण हिंविवि) और यह आत्मा न किसी द्रव्यकर्म या नोकर्मको उपादान रूपसे (उप्पादेदि) पैदा करता है (तेण) इसकारणसे (सो कारणमवि) यह आत्मा कर्म और नोकर्मका कारण भी (गहोदि) नहीं होता है इसलिये यह अपनेसे पर कर्मो न तो करने- वाला है और न उनको छोड़नेवाला है इससे गुन्द्ध निश्चय नयकी अपेक्षा यह पंध और मोक्षका कर्ता नहीं होता है । भावार्थ:-शुद्ध निश्चय नय शुद्ध स्वरूपको ही ग्रहण करनेवाली है उसकी अपेक्षा यदि विचार किया जाता है तो यह आत्मा केवल अपने शुद्धभावांका ही फर्ता और भोक्ता है, न यह ज्ञानावरणादि कम व शरीरादि नोकर्मीको करता है और न इसके नर नारक आदि पर्याएँ हैं, इसमे न वह द्रव्यकोके उदयका कार्य है और न वह द्रव्यकमौके करनेमें उनका कारण होता है। उपादान गृल पदा को ही कहते हैं उसकी अपेक्षा कोई वस्तु परकी करनेवाली व पररो की हुई नहीं हो सकी। इस कारण न तो आत्गा अपनेने मिन्न पर पुहला- दिकोंका कर्ता है और न उनसे किया जाता है इसले कारण और कार्य नहीं है । शुद्ध निश्रय- नयसे अपने शुद्ध स्वरूपमें ही रहता है ॥ ३३० ॥ आगे कर्ताकर्मका उपचार है ऐसा कहते है:- गाथाः-फल्म पड्डन कता कत्तारं तह पडुन कम्माणि । उपनि: णियमा सिद्धी दुण दिस्सदे अण्णा ॥३३॥ संस्कृतार्थ:-कर्म प्रतीत्य पर्वा कर तथा शीत्य कर्माणि । उत्पद्यते नियमास्मिादलु न उदयोऽना ॥ ३३१ ॥ सामान्यार्थः-कर्मकी प्रतीति करके उपचारसे जीव कर्ता है तथा जीव कर्ताको प्रतीति करके उपचारसे उसके कर्म उत्पन्न होते हैं ऐसा नियमसे कहते हैं इसके सिवाय अन्य प्रकारसे कर्ताकर्मकी सिद्धि नहीं हो सकी । शब्दार्थ सहितविशपार्थ--पहले कहा है कि जैसे सुवर्ण द्रव्यका अपने कुंडल रूप परिणामके साथ एकता व अभिन्नता है ऐसे ही जीवका अपने जीव सम्बन्धी परिणामोंके साथ और पुललका गुगल सम्बन्धी परिणामोंके माथ एकत्व है तथा फिर कहा है कि कर्म और नो कोसे नीव नहीं पैदा होता और न जीव उपादान रूपसे कर्म और नोतर्मोको पेदा करता है इसने नीचे प्रमाण जाना जाता है।- कि ( कम्म पडुच्च कत्ता) कर्म अर्थात् नाव कर्म व द्रव्यमशे जानकर यह कहनेमें आता है कि यह जीव उपचारसे व व्यवहार नगगे उन कर्मान कर्ता है (तह कम्माणि कतारं पडुच्च उप्पजतिय) तथा द्रव्य व भावक्रर्मोको उपचारसे जीव का है ऐसा मानकर ये कर्म उत्पन्न होते हैं . CACcxxc समयमार टीका। (णियमा) यह बात नियमसे हैं इसमें कोई संदेहको जन्न नहीं है, अर्थात् एक दुसरया निमित्त नैमित्तिक संबन्ध है, द्रव्य कोंक उदयके निमितसे भी भाव होने व मारोग निमित्तसे नवीन द्रव्य कर्मोका आश्रव होता है। (अग्णा मिली दुना दिसदी इस परम्पक निमित्त भावको छोड़कर अन्य प्रकारसे अर्थात शुन्ध उपादान रूपसे व शुद्ध निश्चय नय जीवके सम्बन्धमें कर्ता कर्मपनेकी सिद्धि नहीं देखी जा सक्ती अर्थात शुद्ध नियन- यसे जीव कम वर्गणा योग्य पुद्गलोंका का नहीं है । इसमें यह मिड हुआ कि शुद्ध निकास. नयसे यह जीव पुद्गलमई कोका कत्ती नहीं है । इस प्रमाण चौथी गाथा दुई । भावार्थ:-- जीव और कर्मोके साथ केवल निमित्त नमित्तिक संबन्ध है । उपादान दोनगि मिस हैं। शुक्र निश्चय नयसे न यह द्रव्यकर्मादि जीवके कर्म है और न जीव इनका कर्ता है, व्यवहार उपचारसे कर्मोकी अपेक्षा जीवको की और उन कर्माको जीवका कर्म कहते हैं शुद्ध निकाय में नहीं । ऐसा जानकर आत्माको शुद्धरूप कत्वमें ठहराने का यत्न करना जरूरी ॥२६॥ इस प्रमाण निश्चयनयसे जीव कोका की नहीं होता है इस व्यायानको मुन्यतारने पहले स्थलमें चार गाथाएं पूर्ण हुई। आगे निययसे शुद्ध आमाका भानावरण आदि प्रतियोकि सारा नो यमौका पंध होता है यह अशानकी महिमा है ऐमा प्रकट करने श्लोक-चेदादु पयडिरटं उपनदि विणस्सदि । पयडीवि चेदयटें उपजदि विणल्मदि ।। ३३२ ।। एवं चंचो दुण्हषि अण्गोषणपत्रमाण हो । अप्पणो पयडि एय समारो तेण जाप ॥३॥ संस्कृतार्य:-चेतयिता तु प्रत्यय नछरे धिनत्यति । प्रविपि चेतार्थमुरायो विनश्यति ॥ ३३२ ॥ एवं अंधो योपि-प्रत्यययोमकेत् । आत्मनः प्रकृतेश्च संसारस्तेन जायते ।। ३३३॥ :-यह अज्ञानी आत्मा तो कर्मकी प्रकृतिका उदयका निमित्त पारर अपने विभाव परिणामोंसे उत्पन्न होता है व नष्ट होता है । इसीतरह कर्म मनति भी आत्मा के परिणामीफा निमित पाकर उत्पन्न होती है और नट होती है। यो प्रयास संसारी आत्माका और ज्ञानावरणीय आदि का वगंगागीच परस्पर संघ होता है। नीदने इस नीवके संसार उत्पन्न होता है । शन गहिन शिवार्थ:-चिदा दुः बद शात्मा नो अपने आत्मामें तल्लीनतारूप स्वस्थ भावले गिरा हुआ (पडियाटुं कर्म प्रतियोंके उदयक निमित्त पातर (उपनदि) गमादि विनाय परिणाम उप होना है सामान्यार्थः ..
DRONALDESTRORDER २६० समयसार टीका। ( विणस्सदि ) नष्ट होता है। अर्थात् पूर्वमें वांधे हुए कमौका निमित्त पाकर जब यह अपने स्वरूपमें लीन नहीं रहता तव रागादि परिणामों को करता रहता है और वे परिणाम हो होकर नष्ट हो जाते हैं । (पयडीवि) कर्मोकी प्रकृति भी ( चेदयटुं) चेतनेवाला जो जीव उसके रागद्वेषादि परिणामोंका निमित्त पाकर (उप्पजदि) ज्ञानावरणीय आदि कर्मोकी अवस्थारूप उत्पन्न होती है अर्थात् जीवके रागादि भावोंके निमित्तसे नवीन कर्मवर्गणाएं। आकर आत्मासे सम्बन्ध करती हैं तथा (विणन्मदि) अपना काल पाकर कर्मरूप अवस्थासे नष्ट होती हैं अर्थात् आत्मासे सम्बन्ध छोड़ देती हैं । (एवं) पूर्वमें कहे हुए प्रमाण अपने स्वस्थभावसे भ्रष्ट आत्माके (दुण्हंपि अप्पणोपयड़िएय) आत्मा और कम वर्गणा योग्य पुतुल पिंडरूप ज्ञानावरणादि प्रकृतियोंका (बंधो, एक क्षेत्रवगाहरूप बंध (अण्णोण्णपञ्चयाण) परस्पर निमित्त कारणरूप होते हुए (हवे) होता है अर्थात् रागद्वेषादि अज्ञान भावसे इन कर्मोका बंध होता है (तेण) उसी बंधके कारणसे (संसारो जायदे) संसार उत्पन्न होता है। आत्माके स्वभावमई निज स्वरूपसे कर्मोंका बंध नहीं होता और न संसार होता है । भावार्थः-पूर्ववद्ध कर्म जव उदयमें आता है तब यदि यह आत्मा स्व स्वरूपमें नहीं है तब उस उदय जनित द्रव्यकर्मोंका निमित्त पाकर इसके रागद्वेषादि परिणाम होते हैं । और जब इसके रागद्वेपादि परिणाम होते हैं तब ही नवीन कर्मवर्गणाएँ आकर्पित होकर उन भावोंका निमित्त पाकर कर्म- बंधरूप परिणमती हैं ऐसा कर्मबंध और आत्मामें परस्पर निमित नैमित्तिक सम्बन्ध है | मूल कारण राग द्वेष अज्ञान भाव है । यदि यह पुरुषार्थी होकर विभाव भावोंके मेटनेका यत्न करे तो जितना राग द्वेष हटायेगा उतना बंध कम होगा, कर्मबंध जब तक है तब ही तक संसार है क्योंकि पाप व पुण्यरूप बंधके निमित्तसे यह आत्मा चारों गतियोंमें भ्रमण करता है । भव- भ्रमणसे छूटता नहीं। ऐसा जान मुमुक्षु आत्माको रागद्वेषादि विभाव भावोंके हटानेका यत्न करना आवश्यक है ॥ ३३२-३३३ ॥ आगे उपदेश करते हैं कि जब तक यह जीव शुद्धात्माके अनुभवसे गिग हुआ उझ्यल्प प्रकृतिका निमित्त पाकर रागादिक भाष करता है उनको छोड़ता नहीं है उस समय तक यह अज्ञानी रहता है। जब रागादि भावोको त्यागता है तव ज्ञानी होता है। -इलोक-जाएसो पयडिय चेदगो ण विहुंचदि। अयाणओ हवे ता मिच्छादिट्टी असंजदो ॥ ३३४ ॥ जदा विमुंचदे चेदा कम्मफलमणतयं । तदा विमुत्तो हवदि जाणगो पस्सगो मुणी ॥ ३३९ ॥ संस्कृतार्थ:- यावदेष प्रकृत्यर्थं चेतयिता नैव विमुचात । अज्ञानको भवेतापनिमध्याइटिरसंयशः ।। ३१४, ranteawapeprces - समपसार टीका। पदा विभुति चयिता कर्मपालमत। तदा विमुनो भवति श.यो दो मुनिः ॥ ३३५ ।। सामान्यार्थ:-जब तक यह आत्मा कर्नादयरूपमें तन्नईपनेको नहीं छोड़ता है, तब तक मिथ्यादृष्टी, अज्ञानी और असंयमी है और जब यह आत्मा अनंत शक्तिरूप कर्मक फलको अर्थात् उसमें तन्मई होनेके भावको छोड़ देता है तब यह सम्यग्दृष्टी, ज्ञानी और संयमी होता है। शब्दार्थ सहित विशेगार्थः-(नाए) जब तक एसो) यह (लंदगा) चनने- वाला जीव परमात्म स्वरूपके सम्यानाहान, उसीका सम्यग्ज्ञान व उसमें अनुभव बाप अभेद रत्नत्रयमई भावके अभावले पयडियट्ट) द्रव्यकर्मोके उदयरुप गगादिक भावांश (णवि मुचंदि) नहीं छोड़ता है (ताब) उस समय तक रागद्वेपादि विभाव परिणाम स्वरूप ही आत्मा है ऐसी श्रद्धा रखता है, ऐसा जानता है व ऐसा ही अनुभव करता है इस कारण (मिच्छादिट्ठी) मिथ्यादृष्टी व (अयाणओ) मिथ्यानानी व (असंजदो) अमंयमी (हवे) हाना है। एसा होता हुआ मोक्षका लाभ नहीं कर सका, तथा (जदा) जब (चेदा) यह आत्मा (अणं. तय) शक्तिरूपसे अनंत (कम्मफलं) ऐसे मिथ्यात्व व रागडेपादिरूप कर्म फलको (विमुनदे) छोड़ देता है (तदा) तब शुद्ध बुद्ध एक स्वभावरूप आत्मतत्वको भन्ने प्रकार श्रद्धान, ज्ञान, व अनुभव स्वरूप सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यकचारित्रके मदभावगे अर्थान लाभ करलेनेसे मिथ्यात्त्व रागादिक भावोंसे भिन्न आत्माको श्रदान करता है, नानना है य उसका अनुभव करता है तब (पस्सगो) सम्यग्दृष्टी, (जाणगो) सम्यग्ज्ञानी और (मुणी) सम्यक चारित्री संयनी मुनि होता है और ऐसा होता हुआ विशेषकरके भाव कर्मोको व मूल में उत्तर प्रतिरूप द्रव्य कोको नाश करके विमुक्तो) मुक्त (हवदि) हो जाता है | भावार्थ:-गोंकि उदयके निमित्तसे जो २ औपाधिक भाव होते हैं उनको जो अपना मानकर उनमें तन्मई हो जाता है वही मिथ्यात्वी, अज्ञानी और असंयमी है परंतु जो अपने शुद्ध आत्मम्वरूपमें यथा- र्थ श्रद्धा रखता हुआ उसके विशेष ज्ञान व स्वात्मानुभवमें तीन रहता है वह अभेद गन. जयको पाकर कमोंके फलमें रागहेपादि भाव नहीं करता है और सम्यग्दृष्टी, ज्ञानी और गंय. मी रहता हुआ अपने दृढ़ अभ्यासके बलसे सर्व भाव और द्रव्य कमोमे छूटकर मुक हो जाता है ।। ३३४-३३५ ॥ इसतरह यद्यपि यह आत्मा शुद्ध निश्चय नयसे कत्ती नहीं है तो भी जनादि मय कारणले मिथ्यात्व राग द्वेपादि सज्ञानभाव रूपसे परिणमन करता हुआ कलाको पता है, ऐसी अज्ञानकी सामर्थ्यको वतलानेके लिये दूसरे स्थलमें चार सूत्र पूर्ण हुए। आगे रहते हैं कि शुद्ध नियपसे कर्मकि को भोगना जीपा ममान ना योदि भोकाना माना।
Sewa समयसार टीका। reOfre REASYA २६२ गाथाः-अण्णाणी कम्मफलं पयड़िसहावहिदो दु वेदेदि । णाणी पुण कम्मफलं जाणदि उदिदं ण वेदेति ॥ ३३६ ।। संस्कृतार्थः-अज्ञानी कर्मफलं प्रकृतिस्वभावस्थितस्तु वेदयते । ज्ञानी पुनः 'कर्मफलं जानाति उदितं न वेदयते ॥ ३३६ ॥ सामान्यार्थ:-अज्ञानी आत्मा कर्मोकी प्रकृतियोंके स्वभावमें ठहरा हुआ कोक फलको अनुभव करता है तथा ज्ञानी कौके फलको जानता मात्र है, उदयरूप अवस्थाको भोगता नहीं है। शब्दार्थ महित विशेषार्थ:-विशुद्ध ज्ञान, दर्शन स्वभावमई आत्मतत्त्वका यथार्थ श्रद्धान, ज्ञान और चारित्ररूप अभेद रत्नत्रयमई भेदज्ञानके अभावसे ( अण्णाणी) अज्ञानी जीव (प- यड़िसहावट्टिदो) उदयमें आए हुए कर्मोकी प्रकृतिके स्वभावमई सुख दुःखरूप अवस्थाम ठहरकर हर्ष और विषादसे तन्मई होकर (कम्मफलं दु वेदेदि) कर्मोके फलको अनुभव करता है (पुण) परंतु (गाणी) ज्ञानी पहले कहे हुए भेद ज्ञानके रखनेके कारण वीतराग स्वभाव हीसे परमानंदरूप सुख रसके आस्वादसे अर्थात् परम समता रसमई भावसे परिणमन करता हुआ (उदिदं कम्मफलं) उदयमें आए हुए कर्मोके फलको (जाणदि) जैसा उस वस्तुका स्वभाव उसीके स्वभावरूपसे उसी तरह ज्ञाता दृष्टा रहता हुआ जानता ही है तथा (णवेदेदि) हर्ष और विषादसे तन्मई होकर नहीं अनुभव करता है। भावार्थ:-अज्ञानी जीव अपने शुद्ध आत्मीक स्वभावके अनुभवसे बाहर है इसलिये पापके उदयमें तन्मई होकर दुःखी होता है व पुण्यके उदयमें तन्मई होकर क्षणभरके लिये सुख कल्पना करलेता है कभी हर्ष कभी शोक इस परिणतिमें फंसा रहता है अर्थात् कर्मोके उदयमें तन्मई रहता है । परंतु ज्ञानी आपा प- रका भेद जानता है इससे जब शुभ कर्मोका उदय आता है और जब जो सातारूप अवस्था होती है उसमें हर्ष न करके यह पुण्योदयका क्षणिक कार्य है ऐसा मानता है और जब पाप कर्मोंका उदय आता असातारूप अवस्था होती है उसमें शोक व विषाद न करके यह पापोदयका क्षणिक कार्य है ऐसा मानता है । ज्ञानी सदा वस्तुके स्वरूपका विचार रखता है इससे कर्मोदयोंमें तन्मई नहीं होता, अपने शुद्ध आत्मीक स्वरूप ही में लवलीनता हीको अपना मुख्य कर्तव्य समझता है ॥३३६॥ अज्ञानी जीव अपराधी होता है इसीसे शंकारूप रहता है निःशंक नहीं होता तथा ऐसा होता हुआ कर्मोके फलको तन्मई होकर भोगता है परंतु ज्ञानी अपराधी नहीं होता ऐसे ज्ञानीको जब कोका उदय होता है तब क्या करता है सो कहते है:- ..' गाथाः जो पुण णिरावराही चेदा णिस्संकिदो दुयो होदि । आराहणाय णिचं यदि अहमिाद वियाणतो ॥ ३३७ ॥ संस्कृतार्थ:- यः पुनर्निरपराधश्वेतयिता निःशंकितस्तु स भवति याराधनया नित्यं वर्चले अइमिति विजागत् ॥ ३३७ ॥ 2 तब जो -- R समयमार टीका। सामान्यार्य:--परन्तु जो कोई चेतनेत्राला आमा अपगप रहित है मा निमक रहता है तथा अपने स्वरूपको अनुभव करता हुआ नित्य आगधना महित बरीन करना है। शब्दार्थ महिन विशवार्य:-(पुण) परन्तु (जो चेहा) जो कोई बान, दान स्वभावधारी आमा (णिरावराहो) परको अपना नहीं मानता हुआ अपराध र हत है (सो वह (मिमकिदो दुटोदि परमात्माकी आराधना व सेवा व अनुभवमें शंका रहित होता है, निःशंक रहकर (अहमिदि वियाणंतो) मैं अनंत ज्ञानदर्शन सुखादिरूप ऐसा विकल्प रहित ममाधिमें टनकर भने प्रकार जानता हुआ अर्थात् शुद्ध आत्मान परम समता रसके भावसे अनुभव करता हुआ (णिच्चः सर्वकालमें (आराहणार वट्टदि। निर्दोष परमात्माकी आराधनारूप निश्चय आगध- नासे वर्तन करता है। भार्थ:-निसने रागढपादि भाव दूर किये हैं और परको अपनाना छोड़ा है वह निरपराधी है इमोसे किसी प्रकारकी शंका नहीं रखता है न किसी तरह का भय करता है । वह निरन्तर स्वात्मानुभवमें ही लीन रहता हुआ स्वात्मरसका रमिक रहता है। तथा अपने स्वरूपको शुद्ध निश्चयसे अनंत ज्ञानादिरूप जानता है ।। ३३७ ।। आगे कहते हैं कि अनानी नियममे कौका भोक्ता हो जाता है: गाया:-ण मुयदि पयडिमभव्यो तुझुवि अज्झाइदण सच्छाणि । गुडदुद्धपि पिवंता ण पण्णया णिबिना होति ॥ १८ ॥ संस्कृतार्थ:- :- मुंबशि प्रकृतिमनन्यः मुढोप-अघीय सत्राणि । गुइदुग्धमपि पितो न पनगा निर्षिा भवति ।। ३८ ॥ सामान्यायः-जमे माप दूध और गुड़को पीते हुए भी अपने विपको नहीं छोड़ने ऐसे ही अभव्यजीव भलेप्रकार शास्त्रोंको पढ़ कर भी कर्म प्रतिके उदयके स्वभावको नहीं छोड़ते हैं। शब्दार्थ सहिन विशेषार्थ:-जसे (पग्णया) सर्प (गुद्दपि पिवंता) सरकार महिन दूधको पीते हुए भी (णिन्विसा) विप रहित (जहोंति) नहीं होते हैं तो (अमव्या) अनानी अभव्यजीव सच्छाणि) शास्त्रोंको (मुवि) भलेप्रकार (अन्झाइमृणा पद करके भी (पदिन) मिथ्यात्व रागद्वेपादिरूप कर्म प्रकृतिके स्वभावको(णमुयदि) नहीं छोड़ता है। क्योंकि इस वीतराग स्वसंवेदन ज्ञानका अभाव है इसका भी कारण यह है कि मिथ्याव गगहेगादि भावोंमें तन्मई होता है । भावार्थ:-जिस वस्तुका जो स्वभाव होता है यह उम न्यभारको नहीं त्याग सक्ता, जैसे सपाके अन्दर विष होता है उनको चाहे दूध और मिश्री कितनी ही पिलाई जावे परंतु वे अपने विषपनको छोड़ विपरहित नहीं होने हैं उनका विष नहीं उतरता है। उसीतरह समव्य अज्ञानी जीव चाहे जितना ही शास्त्रोंको पढ़े मिथ्यात्व व रागादि भावोंने तन्नईपना धरना स्वभाव नहीं होता, क्योंकि उसके अन्दरमें अपने शुद्ध आत्मतत्वका ऐसा निश्रय नहीं होता निमसे संपनि ... पERASRANAYANATARATI गाथा:- -- २६४ समयसार टीका। तमें वीतराग स्वसंवेदन ज्ञानका अनुभव रहा करे । इसी कारण अज्ञानी जीव अशुभक्राँके उदयमें मैं दुःखी हूं इस भावसे तन्मई होकर घबड़ाता है और जब शुभ कर्मोका उदय होता है तब मैं सुखी हूं इस भावमें तन्मई होकर अहंकार कर लेता है। इसीसे कर्माका भोक्ता हो जाता है-मात्र ज्ञाता हटा नहीं रहता ॥ ३३८ ।। आगे कहते हैं कि ज्ञानी नियमसे कमेंका भोत्ता नहीं होता-.. "णिव्वेदसमावण्णो णाणी कम्मफलं विधाणादि। महुरं. कडुवं वविहलवेदको तेण पण्णत्तो ॥ ३३९ ॥ संस्कृतार्थ:-निवेदसमापन्नो ज्ञानी कर्मफलं विजानाति । मधुरं कटुकं बहुविधमवेदको तेन प्रशतः ॥ ३३९ ॥ सामान्यार्थ-बैराग्यको धारनेवाला ज्ञानी जीव कर्मों के फलोंको मधुर, कटुकादि नाना प्रकाररूप मात्र जानता है इसीसे उसको अभोक्ता कहा है । शब्दार्थ सहिन विशपार्थः (णिव्वेद समावण्णो) संसार, शरीर, भोग इन तीनोंसे वैराग्य भावको रखता हुआ (पाणी) परम तत्त्वज्ञानी जीव (कम्मफलं) उदयमें आए हुए शुभ या अशुभ कर्मोके फलको वस्तु स्व- रूपसे तथा विशेषपने (वियाणादि) विकार रहित अपने शुद्ध आत्म स्वरूपसे भिन्न जानता है, अर्थात् ( महुर कडुवं बहुविहम् ) उन कर्मों से अशुभ कर्मोंके फलको नीम, कांनीर, विप व हलाहलके समान कड़वा जानता है तथा शुभ कर्मोके फलको नाना. प्रकार गुड़, खांड़, सक्कर और अमृतरूपसे मीठा जानता है। अघातिया कर्मोमें जब अशुभ नाम, गोत्र, आयु तथा वेदनीयका उदय होता है तब उनके स्वरूपको विच र लेता है कि वह नीम कांनीर आदिके समान कटुक फलदायी है और नव शुभ नाम, गोत्र, आयुव वेदनीयका उदय होता है तब उसके फलको गुड़ खांड़ आदिरूप मधुर है ऐसा जानता है, इस कारण वह तत्वज्ञानी शुद्ध आत्माके ध्यानसे उत्पन्न जो स्वाभाविक परमानंदरूप अतीन्द्रिय सुख है उसको छोड़- कर पांचों इन्द्रियोंके सुंखोंमें नहीं परिणमन करता है (तण) इसी कारणसे (अवेदकोपण्णत्तो) वह ज्ञानी भोक्ता नहीं होता है ऐसा कहा गया है यह नियम है । भावार्थः---तत्त्वज्ञानी उसे ही कहते हैं जो. वस्तुके स्वरूपको जैसाका तैसा जाने-आत्माका निश्चयसे जो शुद्धज्ञान दर्शन आनंदमई स्वरूप है व उससे भिन्न ज्ञानावरणादि कर्मोंका जो स्वरूप है व जब वे उदयमें आते हैं तब किस प्रकारके . फलको. प्रकट करते हैं यह सब भले प्रकार जानता है। जब अशुभ कमेंके उदयमें अशुभ संयोग प्राप्त होते हैं तब तो उनमें द्वेष नहीं मानता हैं उनके स्वरूपका ऐसा ही परिणमन है ऐसा जान संतोषी रहता है । और जब शुभकोका उदय होता है और उससे साताकरी संयोग प्राप्त होते हैं तब उनके उदयके यथार्थ स्वरूपको जानता हुआ उनमें अहंकार बुद्धि नहीं -- ।
समयसार टाका। करता है। क्योंकि वह ज्ञानी दोनों ही अवस्थाको अपनेसे भिन्न अनुभव करता। इमीने वह इन कमेंके फलोंमें -आसक्त नहीं होता है। और यही कारण है निससे वर भोक्ता नहीं बनता है। इसीलिये आचार्यने कहा है कि जब ज्ञानी अपने स्वाभाविक अतीन्द्रिय आनन्दका भोक्ता और उसीका रसिक है तब वह इन कर्मजनित अवस्थाओको नियम नहीं भोक्ता है केवल उनके स्वरूपका ज्ञाता दृष्टा रहता है ऐसा जानना ॥ १३९॥ इसतरह ज्ञानी शुद्ध निश्चयनयमे शुभ व अशुभ कर्म कि फलका भोक्ता नहीं होना है इस व्याख्यानकी मुख्यतासे तीसरे स्थलमें ४ सूत्र पूर्ण हुए। आगे कहते हैं कि गगादि रहित शुद्रात्माके अनुभवरूप लक्षणको भग्नेवाले मैदशानमे युक्त झानी पुरुप न तो शुभाशुभ कर्माका कर्ता है और न भोक्ता है- गाथा:--णवि कुव्वदि णवि वेददि णाणी कम्माइ वट्ट पयारा । जाणदि पुर्ण कम्मफलं बंधं पुण्णं च पावं च ॥ ३४० ।। संस्कृतार्थ:-नापि करोति नापि वेदयते ज्ञानी कर्माणि यहुपकाराणि । जानाति पुनः कर्मफलं वंधं पुण्यं च पापं च ॥ ३४० ।। सामान्यार्थः-ज्ञानी नाना प्रकार कर्मोको न तो करता है। और न भोगता है किन्तु पुण्य व पापको व बंधको और कर्मोके फलको केवल जानता ही है । शब्दार्थ महिन विशेषार्थ:--(णाणी) मन, वचन, कायकी गुप्तिके बलमे, व अपनी प्रसिन्हि, पूना, लामः व देखे, सुने अनुभव किये हुए भोगोंकी इच्छारूप निदानबंध आदिको लेकर महीपा द्रव्योंकि आलम्बनसे शून्य होनेके कारणसे व अनंतज्ञान दर्शन सुखवीर्य स्वरूप आनंबननं भरपर होन- के कारणसे विकल्प रहित समाधिमें ठहरा हुआ ज्ञानी जीव (बहुपयाराई कामाई) नानाप्रकार ज्ञानावरणीय आदि मूल आठकर्म व उनके उत्तर १४८ भेदरूप कर्मोको (गवि कुव्यदि) नदी करता है (णवि वेददि) तथा तन्मय होकर नहीं अनुभव करता है, तो फिर क्या करता है इसके उत्तरमें आचार्य कहते हैं कि (कंमकलं) सुखदुःखरूप कर्मोक फलको. (बंध) प्रनि बंध आदि चार प्रकार बंधको व (पुणे) सातावेदनीय, शुभ आयु. शुभ नाम, शुभगोत्ररूप पुण्यकर्मोको (च पावं) तथा असातावेदनीय अशुभ आयु, अशुभ नाम व अशुभ गोर कप तथा ४ घातियारूप पाप कर्मोको (जाणदि) परमात्माकी भावनासे उत्पन्न सुख में नृत होकर वस्तुको यस्तु स्वरूपके समानः जानता ही है । भावार्थ--ज्ञानी नीव अपने शुद्ध आत्मस्वरूपका अनुभव करता हुआ आत्मननित-सुखमें तृप्त रहता है । अतएव शुभ अशुभ कौंको न तो करता है और न कर्माके उदयको तन्मय होकर भोगता है इसन्यि पद केवल ज्ञाता, दृष्टा ही रहता है ।। ३४० ।। ३४ समयसार टीका। HIGNOUs २६६ आगे इसी वातका समर्थन करते हैं कि ज्ञानी जीवमें कपिने और भोक्तापनेका अभाव है- गाथाः-दिही सयंपि णाणं अकारयं तह अवेदयं चेव । जाणदिय बंधमोक्खं कम्मुदयं णिज्जरं चेव ॥ ३४१ ॥ संस्कृतार्थः-दृष्टिः स्वयमपि ज्ञानमकारक तथाऽवेदकं चैव । जानाति च बंधमोक्षं कमांदयं निर्जरां चैव ॥ ३४१ ।। मामान्यार्थः--जैसे दृष्टि अग्निको देखती हुई न तो अग्निको करती है और न उसका अनुभव करती है तैसे विशुद्धज्ञान भी स्वयं न तो की है और न भोक्ता है केवल वंध, मोक्ष, कर्मोका उदय और निर्जराके स्वरूपको जानतामात्र है। शब्दार्थ सहित विशेपार्थ:- (दिट्ठी) जैसे दृष्टि अर्थात् नज़र देखने योग्य अग्निको न तो उस अग्निको धौंकनेवाले पुरुषकी तरह करती है, जैसे अनिको जलानेवाला पुरुष अनिको जलाता है ऐसे वह दृष्टि नहीं जलाती है, और न वह गरम लोहेके पिंडकी तरह उसका अनुभव करती है । अग्निसे लोहा जल रहा है परंतु दृष्टि नहीं जलती है तसे ही (गाणं) शुद्ध ज्ञान (सयंपि) अपने आप ही अथवा अभेद नयसे शुद्धज्ञानमें परिणमन करनेवाला जीव शुद्ध उपादानरूपसे (अकारक तथा अवेदकं चेव) न तो परभाव व पर वस्तुका कर्ता होता है और न उसका अनुभव करता है अथवा केवलदर्शन व क्षायिकज्ञान निश्चयसे न तो कर्मोंके कर्ता हैं और न भोक्ता हैं किन्तु यह शुद्धज्ञान (बंधमोक्खं कंमुदयं णिजरंचेव जाणदि) कर्मबंध व मोक्षके स्वभावको तथा शुभ व अशुभरूप कर्मोके उदयको व सविपाक अविपाकरूपसे वा सकाम तथा अकामरूपसे दो प्रकारकी निर्जराको (जाणदि) जानता ही है । भावार्थः-जैसे दृष्टि केवल देखने मात्र काम करती है तेसे ज्ञान केवल जानता ही है। ज्ञानी पुरुष अपने आत्मज्ञानमें तन्मय रहता हुआ हरएक वस्तुके खभावको जैसाका तैसा जानता है । कर्मोंके स्वभावको, मोक्षके स्वभावको, कर्मोके उदयको, और निर्जराके स्वरूपको आगम व श्रन्डाके अनुसार यथार्थपने जानता है; इसीलिये कर्मजनित कार्योंसे अहं बुद्धि न करता हुआ उन कार्योंका कर्ता और भोक्ता नहीं होता है ॥ ३४१ ॥ इंसतरह सर्व प्रकार विशुद्ध पारणामिक परम भावको ग्रहणकरनेवाले शुद्ध उपादान स्वरूप शुद्ध द्रव्यार्थिक नयके द्वारा यदि विचार किया जाय तो यह जीव कर्त्तापनेके, भोक्तापनेके, बंधके तथा मोक्षके कारण जो परिणाम हैं उनसे शून्य है, इस प्रकार समुदाय पातनिकामें कहा गया है । फिर पीछे चार गाथाओंमें जीवमें अक गुण है इस व्याख्यानकी मुख्यतासे सामान्य वर्णन किया गया । फिर ४ गाथाओंमें यह कहा कि निश्चयसे शुद्ध जीवके जो प्रकृति बंध होता है सो अज्ञानकी महिमा है इसतरह अज्ञानकी सामर्थ्यको कहते हुए विशेष वर्णन किया गया फिर चार गाथाओंमें यह कहा कि जीव भोक्ता समयसारीका। नहीं है । इसके बाद ऊपर कही हुई १२ गाथाओंका संक्षेपरुप दो गाथाओंमें यह माला कि शुद्ध निश्चय नयसे इस जीवके फापना, भोक्तापना व यंध मोक्ष आदिक कारा परिणार्माका अभाव है। इसतरह इस तात्पर्य वृत्ति नामकी शुदात्मानुभव लक्षपाको रखनपाली समयसारको म्यामला मी अधिकार सम्बन्धी १४ गाथाओये २४ अंतर अधिकारोंसे नलिका वर्णन माता- दुसरे रूपसे कहा जाय तो यहां मोक्षाधिकार सनाम हुआ ! अन्न.यहां विचारते हैं कि औपशमिक आदि पांच भावामसे किस भावके बारामोक्ष होता है। सो यहां औपशमिक, क्षयोपशमिक, क्षायिक तथा औदविकास ४ भाव पर्यायरूप हैं परन्तु शुद्ध पारिणामिक भाव द्रव्य रूप है। यह द्रव्यपर्याय परम्पर अपेक्षा महिन हैं। यह आत्मा पदार्थ द्रव्यपर्याय दोनों रूप कहा जाता है । जीवन, भव्यत्व, अभव्यन्य ये तीन पारिणामिक भाव हैं इन तीनोंक वीचमें शुद्ध जीवपना जो शक्ति रूप लक्षणको गन. नेवाला पारिणामिकपना है सो शुद्ध द्रव्यार्थिक नयके आश्रय है इससे बह आवरण रहित शुद्ध पारिणामिक भाव कहा जाता है ऐसा जानना योग्य है सो भाव नो बंध और मोक्ष- पर्यायकी परिणतिसे रहित है । तथा जो आयु स्वासोधास आदि. १० बाह्य प्राणरूप नीवपना है तथा भव्य व अभव्य भाव है मो पर्यायार्थिक नयके आश्रय होनेसे अशुद्ध, पारिशानिक भाव कहे जाते हैं । इन भव्य अभव्य व १० प्राणरूप जीवन्यको अशुद्ध क्यों कहते हैं इसका समाधान यह है कि शुद्ध निश्चय नयसे संसारी जीवोंक और सिद्ध महारानकि सर्वथा ही इन १० प्राणरूप जीवत्व व भव्यत्व अभव्यत्वका अभाव है। इन तीनोमन भव्यन्य लक्षणको रखनेवाला जो पारिणामिक भाव है उसको पर्यायार्थिक नयसे ढकनयाने माया, दर्शन आदि जीवके गुणोंक घातक देशघाति व सर्व घाति नामके मोहादिक कर्म मामान्य हैं अर्थात् जो दर्शनमोह व चारित्र मोह जीवके सम्यत्तव व चारित्र गुणक घातक हैं वे ही कर्म सामान्य भव्यत्व गुणके भी प्रच्छादक हो रहे हैं। यहां जब काल आदि लब्धियों के नाम भव्यत्व शक्तिकी व्यक्ति, अर्थात् प्रकटता होती है, तब यह जीव महन ही शुद्ध पारिणानिक भावरूपी लक्षणको रखनेवाले अपने ही परमात्म व्यके सम्यक श्रन्हान, ज्ञान व नारित्रमई पर्यायसे परिणमन करता है उसी ही परिणमनको आगमकी भाषा औपशामिक. गोपगामिक, व क्षायिक भाव कहते हैं । अध्यात्मीक भाषाकी अपेक्षा इमी भावको शुमान्मांक मन्मुख्य परिणाम व शुद्धोपयोग इत्यादि पर्यायरूप नामसे कहते हैं । यह पर्याय शुद्ध पारिवामिक भावमई लक्षणको रखनेवाले शुद्ध आत्मीक द्रव्यम किसी अपेक्षा भिन्न है क्योंकि यह परिणति भावनारूप है परन्तु शुद्ध पारिणामिक भाव भावनारूप नहीं है । यदि पनि नयी या परिणति शुद्ध पारिणामिक भावसे अभिन्न मान ली जाय तब यह दोष आगा विनय या परिणति भावनारूप है तथा मोक्षकी कारणभूत है नब मोहक प्रग्नाव (कारणादि के नाम होने हुए शुद्ध पारिणामिक भावका भी विनाश हो जायगा गोंकि यह शुक्र परिणामिन भाय र समयसार टीका। BLAVAGENDERENAKER २६८ भावनारूप परिणतिसे सर्वथा एक ही मान लिया गया, मो ऐसा नहीं हो सक्ता क्योंकि शुद्ध पारिणामिक भाव द्रव्यरूप सदा अविनाशी रहता है । इससे यह सिद्ध हुआ कि शुद्ध पारि- णामिक भावके सम्बन्धमें जो भावना है उसी रूप औपशमिक, क्षयोपशमिक व क्षायिक ऐम तीन भाव हैं । यही भाव सर्व रागद्वेपादि भावोंसे रहित होनेके कारणसे तथा शुद्ध उपादान रूप कारण होनेसे मोक्षका कारण होता है। शुद्ध पारिणामिक भाव मोक्षका कारण नहीं है। तथा जो शक्तिरूपी मोक्ष है वह शुद्ध पारिणामिक भावरूप है सो पहलेसे ही विद्यमान है यहां पर तो व्यक्तिरूप मोक्षका ही विचार है। ऐसा ही सिद्धान्तमें कहा है "निष्क्रिय शुद्ध पारिणामिकं निष्क्रियइति" अर्थात् क्रिया रहित शुद्ध पारिणामिक है इसीसे निष्क्रिय है अर्थात् बंधके कारणभूत जो क्रिया है वह रागद्वेषादिकी परिणतिरूप है इस रूप भी शुद्ध पारिणामिक नहीं है तथा मोक्षकी कारणभूत जो क्रिया शुद्ध स्वरूपकी भावनारूप परिणति है उस रूप भी नहीं है, इससे जाना जाता है कि शुद्ध पारिणामिक भाव ध्येयरूप है अर्थात ध्यान किये जाने योग्य है परन्तु ध्यानरूप नहीं है क्योंकि ध्यान विनाश होनेवाला है। ऐसा ही श्री योगेन्द्रदेवने श्री परमात्मप्रकाशमें कहा है। "णवि उप्पज्जइ णवि मरइ बंधु ण मुक्ग्बुकरेइ. जिउ परमत्थे जोइया निणवर एउभणेइ" अर्थात् जिनेन्द्र भगवानने ऐसा कहा है कि जो परमार्थ दृष्टिले देखा नावे तो यह आत्मा न पैदा होता है न मरता है न बंध और मोक्ष करता है । तात्पर्य यह है कि विवक्षामें ली हुई एक देश शुद्ध नयके आश्रित नो भावना विकार रहित स्वसंवेदन लक्षणरूप है वह क्षयोपशमिक ज्ञानरूप होनेके कारणसे यद्यपि एक देश व्यक्तिरूप है अर्थात् केवलज्ञानी (क्षायिक ज्ञानी) की तरह सर्वथा सर्व देश व्यक्त अर्थात् प्रकट नहीं है, तो भी ध्यान करनेवाला पुरुष यही भावना करता है कि जो कोई सम्पूर्ण आवरणोंसे रहित अखंड एक प्रत्यक्ष झलकनेवाला अविनाशी शुद्ध पारि- णामिक भाव स्वरूप परममावमई लक्षणको रखनेवाला अपना परमात्म द्रव्य है सो ही मैं हूं, मैं खंड ज्ञानरूप नहीं है, यह व्याख्यान परस्पर अपेक्षा महित आगम व अध्यात्म व निश्चय व्यवहार नयके अभिप्रायसे कोई विरोध नहीं आवे इसी तरहसे कहा है। ऐसा हीविवेकी ज्ञानियोंको जानना चाहिये । भावार्थः-पांच भावोंमें शुद्ध पारिणामिक भाव तो ध्येयरूप है अर्थात् मोक्षरूप है परन्तु उपशम, क्षयोपशम, व क्षायिक भाव ध्यान रूप है । जब काल लब्धि आदिके निमित्तसे भव्यत्व शक्तिकी प्रकटता होती है तब शुद्धात्माके सम्मुख जो परिणाम है वही भावना रूप है, वही मोक्षका उपाय है, वही रत्नत्रय स्वरूप है, वही आत्माका अनुभव रूप है, अतएव मोक्षके कारण भावोंमें उपयोग स्थिर कर स्वस्वरूपका अनुभव करके आत्मसुखका लाभ करना योग्य है।
EZERMERUKRARS समयसार टीका। ग्यारहो महाधिकार (११) समयसारचूलिका। इसके आगे जीव आदि ९ अधिकारामं जो जीवका कापना और भीकापना आदि स्वरूप अपनेर स्थानपर निश्चय नय और व्यवहार नयके विभागमे मामान्यपने नो पूर्वी ऋहा गया है उसीका ही विशेष वर्णन करनेके लिये "लोगम्म कुणदि. विण्ह" इत्यादि गाथाको आदि लेकर पाठ क्रमसे ९६ गाथाओंमें चूलिकाका व्याख्यान करते हैं। चूलिका शब्दके अर्थ तीन प्रकार हैं-कहे हुए व्याप्त्यानका विशेष कहना, कटे हुए और विना कहे हुए व्याख्यानको मिलाकर कहना, तथा कहे हुण और बिना कंड. हुए व्याख्यानको संक्षेपमें कहना। अंब यहां ९६ गाथाओंमें विष्णुदेव आदि पर्यायोंका कर्ता है इस बात का खंडन करने हुए. “लोगस्सकुणादिविण्हू" इत्यादि गाथाएं सात हैं। इसके पीछ अन्य कता है अन्य भोक्ता इस एकांतको निषेध करते हुए बोन्द्र मतके अनुसार चलनेवाले शिप्यके समझाने के लिये "हिंदुपज्जएहि" इत्यादि ४ सूत्र हैं। इसके बाद सांख्य मतके अनुसार चलनेवाले शिष्यक लिये एकान्तसे जीवके भाव मिथ्यात्त्व आदिका कपिना नहीं है इसका निगकरण करने लिये "मिच्छत्ता जदि पयड़ी" इत्यादि सूत्र पांच हैं। इसके बाद ज्ञान अज्ञान मुम्ब दुःन आदि भावोंको एकान्तसे कम ही कर्ता है आत्मा नहीं, इस प्रकार सांख्यमतके अनुमार माननेवालेको खंडन करनेके लिये "कम्मेहिं अण्णाणी" इत्यादि १३ मूत्र हैं। इसके बाद कोई भी प्रथम अवस्थाका अज्ञानी शिप्य शब्द आदि पांचों इन्द्रियोंक विषयांका विनाश करना चाहता है, किन्तु मैं मनमें तिष्ठे हुए विपर्योके अनुरागका घात करूं ऐसे विशेष विवेकको नहीं जानता है उसको समझानेके लिये "दसण णाण चरित' इत्यादि मूत्र ५ हैं। उसके बाद कहते हैं कि जैसे सुनार आदि कारीगर कुंडल आदि सोनेकी चीजोंको अपने हाथ व कट्टर या हथौड़ा आदि उपकरणोंसे करता है तथा उसका फल उसकी कीमत बगरहको भाना है तो भी उस कार्यमें तन्मयी अर्थात् एकमेक नहीं होता है तैसे ही यह जीव भी ज्ञानावरणात द्रव्य कर्माको कर्ता है और उनके फलोंको भोगता है तो भी तन्मई नहीं होता है इत्यादिलों प्रतिपादन करते हुए "जह मिप्पियो दु" इत्यादि गाथाएं हैं। इसके पीछे जपे यापि खड़िया व्यवहार नयसे दीवालको सफेद करती है तो भी उससे तन्मयों नहीं होती की यह जीव भी व्यवहार नयसे जानने योग्य द्रव्यको नैसी वह है उस तरह मानना देना है, छोड़ता है व श्रद्धान करता है तो भी निश्रायसे उसमें तन्मयी नहीं होता, ऐमा करने : बझ अद्वैत मतके अनुसार चलनेवाले शिव्यको समझाने के लिये ' मेडिय' इत्यादि का .
समयसार टीका।
PARRRRRRS
२७०
१० हैं। उसके बाद शुद्धात्माकी भावना रूप निश्चय प्रतिक्रमण निश्चय प्रत्याख्यान और
निश्चय आलोचना निश्चय चारित्रके व्याख्यानकी मुख्यतासे "कमं जं पुव्वक्रयं" इत्यादि सूत्र
४ हैं। उसके बाद राग द्वेषोंकी पैदाइशके सम्बन्धमें ज्ञानस्वरूप अपनी बुद्धिका दोष ही कारण
है अचेतन शब्द आदि विषय नहीं है ऐसा कहनेके लिये "णिदिद संयुद वयणाणि" इत्यादि
गाथाएं १० हैं । इसके बाद उदयमें आए हुए कर्मोको भोगते हुए यह मेरा है यह मुझसे किया
गया है ऐसा जो मानता है वह अपने आत्मामें लवलीनतारूप भावसे शून्य होता हुआ
सुखी और दुःखी होता है वह फिर भी दुःखोंके वीजरूप आठ तरहके कर्मोको बांधता है
ऐसा कहनेकी मुख्यतासे "वेदंतो कंमफलं" इत्यादि गाथाएं तीन हैं। इसके बाद आचारांग
सूत्र कृतांग आदि द्रव्य श्रुत व इन्द्रियोंके विषय व द्रव्यकर्म, व धर्म, अधर्म, आकाश, काल,
व रागद्वेप आदि भाव भी शुद्ध निश्चयसे शुद्ध जीवका स्वरूप नहीं है इस व्याख्यानकी
मुख्यतासे "सच्छं णाणं ण हवदि" इत्यादि १५ मूत्र हैं । इसके बाद जिस शुद्ध नयके अभि-
प्रायसे आत्मा मूर्ति रहित है उसी अभिप्रायस यह कर्म और नोकमक आहारसे भी रहित है
इस व्याख्यान रूपसे "अप्पा जस्स अमुत्तो,' इत्यादि गाथाएँ तीन हैं। इसके बाद देहके आश्रित
जो द्रव्य लिंग है वह विकल्प रहित समाधिमई लक्षणको रखनेवाले भावलिंगसे रहित यती-
म्वरोंके लिये मुक्तिका कारण नहीं है । तथा भावलिंगके धारी हैं उनके लिये द्रव्यलिंग केवल
सहकारी कारण है । इस व्याख्यानकी मुख्यतासे "पाखंडी लिंगाणिय" इत्यादि सूत्र ७ हैं।
इसके बाद इस समय प्राभृत ग्रंथके पढ़नेके फलको कहते हुए ग्रंथकी समाप्तिके लिये
"जो समय पाहुड़ मिणं" इत्यादि सूत्र एक है इसतरह १३ अंतरके अधिकारोंसे समयसारकी
चूलिकाके अधिकारमें समुदाय पातानिका पूर्ण हुई ॥
आगे १३ अधिकारोंका क्रमसे विशेष व्याख्यान किया जाता है।
आगे कहते है जो एकान्तसे आत्माको कर्ता मानते है उन जीधोके अज्ञानी मनुष्यकी
तरह मोक्ष नहीं होता।
गाथाः--लोगस्स कुणदि विह्न सुरणारयतिरियमाणुसे सत्ते।
समणाणंपिय अप्पा जदि कुव्वदि छविहे काए ॥३४२॥
लोगसमणाणमेवं सिद्धतं पडि ण दिस्सदि विसेसो ।
लोगस्स कुणदि विण्ह समणाणं अप्पओ कुणदि ॥३४३||
एवं ण कोवि मुक्खो दीसइ दुण्हंपि समण लोयाणं ।
णिचं कुव्वंताणं सदेव मणुआसुरे लोगे ॥ ३४४ ॥
संस्कृतार्थ:-लोकस्य कति विष्णुः सुरनारकतिर्यङ्मानुषान् सत्वान् ।
अमणानामप्यात्मा यदि करोति घड्डिधान् कायान् ॥ ३४२ ॥
. .. समयसार टीका। लोकश्रमणानामेवं सिद्धांत प्रति न दृश्यते विशेष लोकस्य कराति विष्णुः श्रमणानामप्यामा करोति ।। ३४३ ॥ एवं न कोऽपि मोशी दृश्यते लोफरमणानां येषां ! निलं कुर्वतां संदेवमनुनामुरसीहते लेडे ॥ ३४४|| सामान्यायः-लोगोंके मतसे यदि कोई विष्णु देव. नक, नियंच, भनुन्य गनि सम्बन्धी जीवोंको करता है । तथा श्रमण व मुनियोंक मतपे यदि कोई आनाक प्रकार कायोंको करता है। ऐसा मानने पर लोगोंक और मु नयाँक मतमें कोई फर्क नहीं दिखना है। लोगोंके मतसे विष्णु करता है मुनियोंकि मतमे भी आत्मा करना है । दयनगद मदा ही मनुष्य व देव व असुर सहित इस लोकका कपिना मानते हुँग. लोगोंको और मुनियाँको दोनोंमेंसे किसीको भी किसी प्रकार भी मोक्षका होना संभव नहीं है। शब्दार्थ सहित विशपार्थः-लोगम्म) लोगोंक मतमे ऐमा मानना है कि (विण्ह) कोई विष्णु भगवान (सुरणरय तिरियमाणुसे सत्ते) देव, नारकी, तिथंच व मनुष्यमई जीवोंको (कुणदि) करता है या बनाता है इसी तरहस (जदि) जो ऐसा रहा जाय कि (ममगा- पिय ) श्रमण, अर्थात् मुनियोंके मनसे भी (अप्पा । यह आत्मा (छबिहकाण. ) छः प्रका- रकी कायोंको अर्थात पृथ्वी, अप, तेज, वायु व वनस्पति व सकायोंको (कुवदि ) करना है। तो (लोगसमणाणं ) लोगोंका और मुनियोंका ( एवं मिहत्तं पडि इम उपर कटे हा सिद्धांतकी तरफ (विसेमो) कोई भी फर्क या विशेष (ण दिन्मदि) नहीं दिखलाई पड़ना है क्योंकि (लोगम्स ) लोगोंक मनमे (विण्ह कुणदि) कोई उनके द्वारा माना हुआ विष्णु नामका पुरुष विशेष कर्ता होता है तथा ( ममणाणं) श्रमणोंक मतमे (अप्पओ) यह आना (कुणदि) करता है। अर्थात अर्थमें कोई फर्क नहीं है लोगोंकि मन मा विष्णु है, यही मुनियों के मनसे अत्मा है । (एवं) इसतरह ( मणुआमरे लोगे) मनुष्य, मुर य अनुगमे एक (लोगे) इस लोकमें (सदेव णिच्च) मदा ही नित्य (कुवन्नाणं) कर्मको करते हुग. या सापना मानते हुए (समणलोयाण दुग्हपि ) मुनि व लोग दोनोंक ही चिचाग्में (कोऽवि मुस्लीम दीसदि) किसी प्रकार भी मोक्षका होना नहीं दीन्यता है । यहां नात्पर्य यह है कि गगर द्वेष रूप परिणमन करनेको ही कीपना कहते हैं। लोग य मुनि दोनांक मनन गग. हर मोहका परिणमन होते हुए अपने शुद्ध स्वभावके धारी आत्मीक तत्वका या अन्नान व उसीका यथार्थज्ञान व उसीमें आचरणरूप निश्रय रत्नत्रयमई मोक्षमार्गमे पतन हो जाता इसी लिये ही मोक्ष नहीं होता है ।। भावार्थ:-कुछ लोगों का ऐसा मानना है कि कोई विगुभगवान है जो इस नगरको र उसके जीवोंको बनाना है। आचार्य कहते हैं कि इनतरह बनानफे कामकाही गमग मोरया और २७२ समयसार टीका। परिणाम कहते हैं । जब लोगोंके मतसे वह बनानेवाला हुआ तो अवश्य रागद्वेष मोहसहित हो गया, ऐसा होनेपर वह विष्णु मोक्षरूप है व उसे मोक्ष होगा यह मानना कभी भी ठीक नहीं हो सक्ता, इसीतरह जो कोई मुनि एकान्तनयसे इस आत्माको ही स्थावर व त्रस सम्ब- न्धी छः काय मई जीवोंका करनेवाला मानते हैं उनके मतसे आत्मा रागी व द्वेषी हुआ इसीसे वह मोक्ष नहीं पा सक्ता-क्योंकि जहां रागद्वेप मोह है वहां मोक्ष मार्गसे पतन हे अर्थात् यदि आत्माको सर्वकाल पर द्रव्य व परभावका कर्ता माना जायगा तो उसमेंसे रागद्वेप कभी जा नहीं सक्ता, रागद्वेप न जानेसे वह कभी मोक्ष नहीं पासक्ता ॥ ३४२-३४३-३४४ ॥ इस तरह पूर्व पक्ष रूपसे तीन गाथाएं पूर्ण हुईं ।। अव इसका उत्तर कहते हैं निश्चयसे आत्माके पुद्गल द्रव्यके साथ कर्ता व कर्मका संबंध नहीं है किस तरह यह आत्मा कर्ता हो जायगा ।- गाथाः-ववहारभासिदेण दु परदव्वं मम भणंति विदिदत्था । जाणंतिणिच्छयेण दुणय इह परमाणुमित्तमम किंचि।।४५॥ जह कोवि णरो जपदि अह्माणं गामविसयपुररहुँ । णय होति ताणि तस्सदु भणदिय मोहेण सो अप्पा ॥३४६॥ एमेव मिच्छदिट्ठी णाणी णिस्संसयं हवदि एसो। जो परदव्यं मप्र इदि जाणतो अप्पयं कुणदि ॥ ३४७ ॥ तमा ण मेति णचा दोहं एदाण कत्ति ववसाओ। परदव्वे जाणतो जाणे जो दिहिरहिदाणं ॥ ३४८ ॥ संस्कृतार्थः-व्यवहारभाषितेन तु परद्रव्यं मम भणंत्यविदितार्थाः । जानंति निश्चयेन तु नचेह परमाणुमात्रमपि किंचित् ॥ ३४५ ॥ यथा कोऽपि नरो जल्पति अस्माकं प्रामविषयपुरराष्ट्र । न च भवंति तस्य तानि तु भणति च मोहेन स आत्मा ॥ ३४६ ॥ एवमेव मिथ्यादृष्टिज्ञानी निस्संशयं भवत्येषः । यः परद्रव्यं ममेति जाननात्मानं करोति ॥ ३४७ ॥ तस्मान्न मे इति ज्ञात्वा द्वयेषामप्येतेषां कर्तृव्यवसायं । परद्रव्ये जानन् जानीयादृष्टिरहितानां ॥ ३४८ ॥ सामान्यार्थः-तत्त्वज्ञानी जीव व्यवहार नयसे ही पर द्रव्य मेरा है ऐसा कहते हैं परन्तु निश्चयसे यह जानते हैं कि इस लोकमें परमाणु मात्र भी मेरा नहीं है । जैसे कोई पुरुष कहे कि यह मेरा ग्राम है, देश है, नगर है, राज्य है इतना कहनेसे वे सब उसके नहीं होनाते वह तो केवल मोहका प्रेरा हुआ ऐसा कहता है ऐसे ही जो ज्ञानी व्यवहारमें मूढ़ होकर ऐसा माने व कहे कि यह पर द्रव्य मेरा है, वह निश्चयसे मिथ्यादृष्टी होजाता है इसकारणसे यह :
समयसार टीका। नाना जाता है कि पर द्रव्य मेग़ नहीं होता ऐसा मानकर भी जो लोग वजन मुनि पर द्रव्यका कर्ता आत्मा है ऐमा जो निश्चय रखते हैं वह निश्चय दृष्टिमे छूटे हम जीवाशा ही निश्चय है ऐमा तीसरा निकट वी पुरुष जानता है। शब्दार्थसहित विशेपार्थ:-(विदिदत्था) पदायाँके ज्ञाता नत्ववेदी पुरस (वबदार भासिदेणदु) व्यवहारनयके द्वारा ही (पग्दव्वं मम ) परद्रव्य मेग है ऐसा ( भनि ) काले है। (णिच्छएणदु) परन्तु निश्चयनयसे ( जाणन्ति ) जानते हैं कि (इहां दस लोकम (किं.- च परमाणुमित्तं) कोई परमाणु मात्र भी (मम ) मेरा (णय) नहीं है । अथन (जद ) जैसे (कोविं गरो) कोई भी मामान्य मनुप्य (नंपदि) कहे कि (अम्हाण) यह हमारे (गाम) ग्राम हैं अर्थात् बाइसे वेढ़े हुए गाम है (विषय ) देश हैं. (पुर) नगर हैं (ग्द) व गाय है (दु)। परंतु (ताणि) वे सर्व ग्राम नगरादिक (तमस) उम पुनपके (णयहंनि ) नहीं होते हैं तो भी (सो अप्पा) सो अन्नानी आत्मा (मोहेण भणदिय) मोह करके ऐसा रहता है कि यह मेरे ग्रामादिक हैं, यह दृष्टान्त कहा। आगे दाष्ट्रान्त कहने हैं । कि (एमब ) इसी ही तरह (एमो गाणी) वह ज्ञानी जीव व्यवहारमें मृद्र होकर (नो परदव्वं मम) यदि परद्रव्यं मेरा है (इदि जाणंतों) ऐसा जानता हुआ (अप्पय कुणदि. ) उमं अपना करना है अर्थात् परद्रव्य मेग है ऐसा कहता है तो (णिम्सयं) इसमें कोई शंका नहीं है कि यह (मिच्छादिट्ठी) मिथ्यादृष्टी (बदि) हो जाता है । (तम्हा) जैसा कि अभी अभी कहा है कि जैसे कोई मृख दूसरेके ग्राम आदिको अपना कहे गेम नो कोई अपने शुद्ध आमम्बा- पकी भावनासे गिरा हुआ परद्रव्यको अपना करता है, वह मिथ्याप्ती होना है. इस कायम यह जाना जाता है कि (मम इतिणचा) पूर्वमें विकार रहित म्व और परको जाननेवाले झन द्वारा परद्रव्य मेरा नहीं हो सका ऐसा जान करके भी जो (दोण्हं पढ़ाण कत्तित्रयमानी) दोनोंका अर्थात लोगोंका और जैन मुनियोंका परद्रव्यको आत्मा करता है. इस कापण पाद्रव्यम आत्माके कर्त्तापनेका निश्चय है इसको (जाणतो) जानता हुआ कोई भी तीमग पुरम (नामिनो) यही जानेगा कि येह (दिहि रहिंद्राण) वीतराग सम्यग्दर्शनमई निश्चय दृष्टिम रहिन पुग्यो व्यवसाय है। भावार्थः-ज्ञानी जीवं तत्वज्ञानका रसिक होकर रहना है इसमें वद पन्द्रव्य अपना कदापि नहीं मानता यद्यपि व्यवहारमें वह कभी पर वस्नुको अपना कर भी देनी भी निश्श्यमें वह इस वातका गाई श्रद्धानी है कि पर द्रव्य रंच मात्र भी भेग नहीं है. मी यथार्थ बात है। तो भी यदि कोई नानी होकरके भी पर वस्तु मोहित होकर उसे अपनी मानेर कहे नौ वह मिध्यादृष्टी है क्योंकि उसने उम समय यही निश्रय कर लिया फि. पर इस कर्ता आत्मा है। जैसे कोई साधारण नामवासी अपने जन्मझ मोहम किमी देन. नयाद ग्रामको अपना मानले तो वह उसका कभी हो नहीं मक्ता बद नो किमी मामा गमा ३५ Hanumunaminine समयसार टीका। इसीतरह पर द्रव्यको कर्ता आत्मा है ऐसा - माननेसे आत्मा कभी भी कर्ता नहीं होसक्ती, जो निश्चय स्वरूपके व्यवहार नयसे विरोध नहीं आवे इसतरह जाननेवाले हैं वे ही ज्ञानी वं अनुभवी हैं। यहां टीकाकार कहते हैं कि ज्ञानी होकर व्यवहारसे. परद्रव्यको अपना कहते हुए कैसे अज्ञानी हो जायगा ? इसका समाधान यह है कि जैम म्लेच्छ लोगोंको समझानेके लिये ही म्लेंच्छ भाषा बोली जाती है. हर समय नहीं, तैमे ही प्रथम अवस्थाके मनुप्यको समझानेके लिये उसी समझानेके कालमें ही व्यवहार नयका आश्रय लेना योग्य है. हर समय नहीं। यदि कोई ज्ञानी प्राथमिक जनके समझानेके समयके सिवाय भी कतकफल जैसे जलको शुद्ध करनेवाली ऐसे आत्माको शुद्ध करनेवाली शुद्ध नयमे गिरकर पर द्रव्यको अपना कर लेता है । तब वह मिथ्यादृष्टि होजाता है। इसका विशेष. यह है कि लोगोंके मतमें विष्णु करता है ऐसा जो पहले कहा गया है वह लोक व्यवहारकी अपेक्षासे कहा गया है यह बात नहीं है कि इस अनादि कालमे चले आए हुए देव मनुप्यादिसे भरे हुए लोकका कोई विष्णु, ब्रह्मा या महादेव का है। क्योंकि सर्व ही यह लोक एकेन्द्रिय आदि जीवोंसे भरा हुआ मौजूद है, उन सर्व ही जीवोंके निश्चय नयसे, विष्णु पर्याय रूपसे, ब्रह्मापर्याय रूपसे व महादेवकी पर्याय रूपसे तथा निने- न्द्रकी पर्याय रूपसे परिणमन होनेकी शक्ति है इस कारणसे यह आत्मा ही विष्णु है, आत्मा ही ब्रह्मा है, आत्मा ही महादेव है अथवा यह आत्मा ही निन है। सो भी किस कारणस है इसके लिये टीकाकार कहते हैं कि कोई भी.जीव पहले मनुप्य भवमें मुनिका रूप लेकर भोगोंकी इच्छारूप निदान बंधसे परम्परा पापका कारण ऐसे पुण्यको बांधके स्वर्गमें जन्मलेकर वहांसे आकर मनुष्य भवमें भरतक्षेत्रके तीन खंडका . अधिपति-अई चक्रवर्ती या नारायण होता है । उस · जीवका विष्णु या नारायण नाम है। इसके सिवाय और कोई भी लोकका कर्ता विष्णु नहीं है । ऐसे ही कोई भी दूसरा जीव जिन. दीक्षा लेकर रत्नत्रयकी आराधनासे पापानुबंध: (पापका परम्पराय कारण) पुण्यका बंध. करके विद्यानुवाद नाम दसवें पूर्व तक पढ़के चारित्र मोहनीयकर्मके उदयसे तपश्चरणसे भृष्ट होकर हुंडावसर्पिणी कालके प्रभावसे विद्याके चलके द्वारा लोगोंमें यह चमत्कार दिखाता है कि मैं इस लोकका. कर्ता हूं, इसतरह मूर्ख लोगोंमें आश्चर्य: पैदा करके महेश्वर या महादेव होता है। इसतरहके महेश्वर सर्व अवसर्पिणी कालोंमें नहीं होते . किन्तु हुंडावसर्पिणी कालमें ही होते हैं। यह. हुंडावसर्पिणी संख्यातीत अर्थात् असंख्यात अंवसर्पिणी व उत्सर्पिणी कालोंके जाने पर आती है। ऐसा ही कहा है:- गाथाः-संख्यातीद वसप्पिणि गया सु.हुंडावसप्पिणी एइ । पर समयह उप्पत्ती, तहिं जिणवर एव पमणेइ ॥
TRUIRS समयसार टीका। २७ अर्थात संख्यातीत अवमर्पिणी कालके बीत जाने पर हुंडावसपिणी काल आना है। उमी समय परसमय अर्थात बाह्यमें मिथ्या धमकी उत्पत्ति होती है-ोमा मिनेन्द्र भावाने ऋहा है। इसके सिवाय और कोई भी जगतका कर्ता महेश्वर नाम पुरुष विशेष नहीं है। तेसे ही कोई भी पुरुष विशेष तपस्या करके पीछे तपके प्रभावसे स्त्रीक विषयके निमित्त नार मुखरूप होता है उसीका नाम ब्रह्मा है और कोई भी जगतका कर्ता लोकमें व्यापी एक- रूप ब्रह्मा नहीं है। तैसे ही कोई भी पुरुष दर्शन विशुद्धि, विनयसंपन्नता आदि १६ कारण भावनाको भाकर इंद्रादिक देवोंक द्वारा रची हुई गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, मोक्ष कल्याणकली पगार, योग्य तीर्थकर नाम पुण्य कर्मको बांधके जिनेश्वर अर्थात्-चीनगग सर्वज्ञ होता है गंगा वालुका स्वरूप जानना योग्य है। भावार्थः यहां पर प्रयोजन यह है कि यह आत्मा पर द्रव्यमा पत्ता निश्चयसे नहीं है। जो आत्माको पर द्रव्यका कर्ता मानते हैं वे यथार्थ वातक जाननेवाले नहीं है। जेसे.वे लोग जो ब्रह्मा, विष्णु, महेशको जगतका कर्ता आदि मानने हैं ये यथार्थ ज्ञानी नहीं । क्योंकि जैसा मूल उपादान कारण होता है ऐसा ही कार्य होता है । निगकार ब्रह्मा आदिम साकार जगत..नहीं बन सक्ता। ऐसे ही निराकार आत्मासे साकार पर द्रव्य नहीं किया जामता यह जगत अनादि अनंत जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश, काल ऐसे छः द्रव्योंका समुदाय । यह सदासे हैं, सदा रहेंगे इसीके समुदायको जगत कहते हैं-यह सर्व ही द्रव्य परिणामी हैं। आत्मा और पुद्गलका प्रवाहरूपसे अनादि ऐसा कोई सम्बन्ध है जिससे एक दुसरेके लिये निमित्त कारण हो रहे हैं अर्थात् कर्मोंके उद्यरूप परिणामसे आत्मामें परिणनि और आत्माकी परिणतिसे पुद्गलका कर्मरूप परिणमना ऐम ही विचारोंको यथार्थपन जानना हुआ ज्ञानी जीव भूलसे भी परद्रव्यका कत्ती अपनेको नहीं मानता। व्यवहार में भी मदा मावधान रहता है। अपने स्वरूपका यथार्थ श्रदान, ज्ञान व अनुभव करता हुआ निनात्मविनारमें परम संतोषी रहता है। तथा यहां यह भी बतलाया कि ब्रह्मा, विष्णु, महेश व मिन आमाकी अवस्था विशेष है जिनको अपने २ कर्मानुसार यह जीव पासता है ॥३४:- ३४६-३४७-३४८॥ इस प्रकार कहा गया कि यदि एकांतसे यह आत्मा परदन्यका शादी नाग ना मोक्षका ही अभाव हो जाय । इस तरह विष्णुक दृष्टान्तम नीन गाथामेकि हाग पूर्व पर करके चार गाथाओस उसका ममाधानका व्याख्यान किया इमम प्रथम मात्र समाप्त हुए। आगे कहते है कि व्यर्थिक नपसे जो ही कर्म करता है सो ही दम ल भोगना पर्यायार्थिक नयसे अन्य ही करता है तथा अन्य ही मांगता है। हमार जोब माग्न है सो सम्बन्धी होता है ऐना है।
भRTEREONAVINORE २७६ समयसार टीका। गाथा:-केहिं चिदु पन्जयहिं विणस्सदे णेव केहिं चिदु जीवो। जह्मा तमा कुव्वदि सो वा अण्णो व यंतो ॥ ३४९ ॥ केहि चिटु पजयेहिं विणस्सदे णेव केहिंचिदु जीवो। जह्मा तह्मा वेददि सोवा अण्णो व यंतो ॥ ३५० ॥ संस्कृतार्थः-कैश्चिपर्यायविनश्यति नैव कैश्चित्तु जीवः । यस्मात्तस्म करोति स वा अन्यो वा नैकांतः ॥ ३४९ ॥ कैश्चित्पर्णयः-विनश्यति नैव कैश्चित्तु जीवः । यस्मात्तस्माद्वेदयति स वा अन्योवा नैकांतः ॥ ३५० ॥ सामान्यार्थः-यह जीव पर्यायार्थिक नयके द्वारा कई देव मनुप्यादि पर्यायोंसे नाश होता है परन्तु द्रव्यार्थिक नयसे वही जीव नाश नहीं होता है। इस कारणसे ऐसा नित्य या अनित्यरूप जीवका स्वभाव है इसी लिये वह जीव द्रव्यार्थिक नयसे तो कर्ता है परन्तु पर्यायार्थिक नयसे अन्यही कर्ता है इसमें एकान्त नहीं है तथा इसी कारणसे यही जीव द्रव्या- र्थिक नयसे भोक्ता है परन्तु पर्यायार्थिक नयसे अन्य ही भोक्ता है इसमें एकान्त नहीं है। शब्दार्थ सहित विशेषार्थः--(जीवो ) यह जीव (केहिंचिदु पन्जयेहिं) पर्यायार्थिक नयसे कितनी ही देव, मनुष्य आदि पर्यायोंसे (विणस्सदे) नाश होता है (केहिंचिदु) तथा द्रव्यार्थिक नयसे (णेव) नहीं नाश होता है (जम्हा) इस कारणसे कि इस जीवका रूप नित्य तथा अनित्य स्वभावरूप है । भावार्थः-द्रव्यकी अपेक्षा नित्य है और पर्यायकी अपेक्षा अनित्य है । (तम्हा) तिस कारणसे (सो वाकुव्वदि) द्रव्यार्थिक नयसे वही जीव कोका कर्ता है जो उसके फलको भोक्ता है ( अण्णोवा) परन्तु पर्यायार्थिक नयसे दूसरा ही कर्ता है (एयंतो ण) इसमें एकान्त नहीं है । ऐसे कर्त्तापनेकी मुख्यता करके प्रथम गाथा कही । तथा (जीवो केहिं चिदु पज्जयेहिं विणस्सदे) यह जीव पर्यायार्थिक नयसे कितनी ही देव, मनुष्य आदि पर्यायोंसे नष्ट होता है (केहिंचदु णेव) परन्तु द्रव्यार्थिक नयके द्वारा नहीं नष्ट होता है (जम्हा) इस कारणसे इस जीवका रूप नित्य और अनित्य स्वभाव है (तम्हा) तिस कारणसे (वेददि सोवा) निज शुद्ध आत्माकी भावनासे उत्पन्न जो सुखरूपी अमृत रसका आस्वाद उसको न अनुभव करता हुआ वही जीव कर्मोके फलको भोक्ता है नि- सने पहले कर्म किये थे ( वा अण्णो) अथवा पर्यायार्थिक नयसे अन्य ही भोक्ता है जिसने कर्म वांधे थे वह मनुष्य था जब उसका फल भोग रहा है तब वह देव है। (एयंतोण) इसमें एकान्त नहीं है। इसतरह भोक्तापनेकी मुख्यतासे दूसरी गाथा कही। इसका तात्पर्य यह है कि जिस जीवने मनुष्यभवमें शुभ या अशुभ कर्म किये हैं वही जीव द्रव्यार्थिक नयसे इसी लोसमें या नरकानि, गतियोंमें उसके फलको भोगता है । पर्यायार्थिक नयसे व पर्यायकी समयसार टीका। २७७ RRRRVERMARARN मुख्यतासे विचार किया जाय तो एक ही भवकी अपेक्षा जो कम बाल्यावम्मामें किये गए हैं उनका फल यौवन व वृद्धावस्था आदि पर्यायाम यह नीव भोगता है नया प्रति संक्षेपमा विकार किया जाय तो कर्म बांधनेके अंतमुहर्त पीछे यह जीव उमका फल भोगता है तथा अन्य भवको अपेक्षामे मनुष्य पर्यायसे किये हुए कर्मोका फल देव आदि पयायाम भोगता है। भावार्थ:-द्रव्य मदा नित्य रहता है, पर्याय सदा अनित्य क्षणिक होती है-मिट्टीक घट्ट, प्यारे, सकोरे बनाये नानेपर भी मिट्टी नित्य है पर वे सब क्षणिक हैं. ममयर पुगने पड़ने जाते हैं. अवाको बदलते हैं तो भी मिट्टीपना उनकी हराएक अवस्थामें मौजूद है । इमीतरह यह आत्मा द्रव्य नित्य है परन्तु पयाय जो अवस्थाएं इसमें होती हैं वे अनित्य है। द्रव्यार्थिक नय द्रश्यकी ओर देखनेवाली व पर्यायार्थिक नय पर्यायको जाननेवाली है। इस कारण यदि इत्यार्थिक नयसे देखा जाय तो यही अनुभव होता है कि जो आत्मा क्रमांको बांधना है. यही काका फल भोक्ता है कालमें अन्तर पड़नेपर भी कर्ता पर्याय में वही आत्मा था जो कि भोक्ता पर्यायमें है परन्तु पर्यायार्थिक नयमे विचारा जाय तो जिस अवस्थामें एक जीयने का किये थे उस अवस्थावाले जीवसे वह अवस्थावाला जीव भिन्न है जो उसके फलको भोग रहा है। मनुप्य भवमें कम बांधनेवालेको मनुष्य और देव पर्यायमें उसके फलको भोगनेवालेको देव पचन हैं पर्याय भिन्न २ हैं तो भी द्रव्य अपेक्षा जो जीव मनुष्य था वहीं देव हुआ है। इस लिये वस्तुका खभाव ही ऐसा है, इसमें जो एकान्तसे एक ही माने तो वस्तुके स्वरूपी न पावे क्योंकि पदार्थ नित्य और अनित्य स्वरूप एक ही कालमें है ॥ ३४९-६५० ॥ इस तरह दो गाथाओंके द्वारा अनेकान्तकी व्यवस्थापना करते हुए अपन पकी सिद्धि की गई। 'आगे कहते हैं कि एकांतसे जो कोई ऐसा कह कि जो ही कर्म काताई गोही भोगलः अथवा कत्ता अन्य है व भोक्ता अन्य है वह मिथ्यादृष्टी है .उसने पातुर स्वरुपको यथार्थ नहीं निश्चित किया है। गाथाः-जो चेव कुणदि सोचेव वेदको जस्स पस सिन्हतो । सो जीवो णादव्यो मिच्छादिट्ठी अणारिदो ॥३५॥ अपणो करेदि अपणो परिभुजदि जस्स एस मिली। सों जीवो णादच्चो मिच्छादिट्टी अणारिहदा ॥२२॥ संस्कृतार्थ:-य एवं करोति स एव वेदको यस्मैव सिदतः । सजीवो ज्ञातव्यो मिध्यादधिरनास्तः ॥ ३२॥ भन्यः करोत्यन्यः परिभुत्ने पस एप नि। 6 जीबो हातम्रो मायानाः ३६।
SAXY करता २७८ समयसार टीका। सामान्यार्थ:-जो जीव करता है सो ही भोगता है जिमका एकान्त नयम ऐसा सिद्धान्त है सो जीव अर्हत् मतके बाहर मिथ्यादृष्टी है ऐसा जानना योग्य है। तथा दूसरा ही है तथा उससे दूसरा ही कोई कर्म फलोंको भोगता है जिसका यह सिद्धांत है वह जीव भी अर्हत मतसे विरुद्ध मिथ्यादृष्टी है ऐसा जानना योग्य है। शब्दार्थसहित विशपाय:- (जो चेव) जो कोई जीव (कुणदि) शुभ या अशुभ कर्म करता है (सो चेव) वही जीव एकान्तनयसे भोगता है दूसरा कोई नहीं भोगता है (जम्स) जिस जीवका (एम मिद्धांतो) ऐसा सिद्धान्त च आगम है (सो जीवो) वह जीव (अणारिहदो) अहंतके मतस बाह्य (मिच्छा- दिट्ठी) मिथ्यादृष्टी है ऐसा (णादव्यो) जानना योग्य है। इस प्रकार माननेवालेको इसीलिये मिथ्यादृष्टी कहते हैं कि यदि उसके मतमें एकांतनयसे यह जीव कृटस्थ नित्य परिणमन स्वभावसे रहित टंकोत्कीर्ण सांख्य मतकी तरह होवे अर्थात् जमे सांख्य पुरुष अर्थात आत्माको अपरिणामी, कत्तापनेसे रहित नित्य कृटस्थ मानता है ऐसा ही वह भी माने तो जिस मनुष्य भवमें, नरक गतिमें जानेके लायक पाप कर्म किये गणव स्वर्गगतिमें जानेके लायक पुण्यकर्म किया गया उस जीवका नरक या स्वर्गमें गमन नहीं मानना पड़ेगा तथा उसके मतमें शुद्धात्माके अनुभवसे मोक्ष भी केसे सिद्ध होगी क्योंकि उमने तो जीवको एकांतमे नित्य मान लिया है। भावार्थ:-गति बदलने पर जीवकी अवस्था व पर्याय पलटती है मो यह बात तब ही संभव हो सक्ती है जब इसको परिणमन स्वभाव मानकर द्रव्य अपेक्षा नित्य और पर्याय अपेक्षा अनित्य माना जाय । तथा इसीतरहसे (अण्णो करेदि) दूसरा ही कोई कर्म करता है (अण्णो परिभुजदि) तथा दूसरा ही कोई उस कर्मके फलको भोगता है (एस मिद्धता) ऐसा सिद्धांत एकान्तनयसे (जस्स) जिस किसीका हो (सो जीवो) वह जीव भी (अणारिहदों) अहंतके मतसे बाहर मिथ्यादृष्टी है ऐसा (णादब्बों) जानना योग्य है। यदि जिस किसीके द्वारा मनुप्य भवमें पुण्यकर्म किया गया व पाप कर्म किया गया व मोक्षके लिये शुद्धात्माका अनु- भव किया गया तथा उस पुण्य कर्मसे देवलोकमें अन्य ही कोई भोगता है वह जीव भोगता नहीं है तसे ही नरकमें भी दूसरा कोई भोक्ता है, वैसे ही केवलज्ञान आदि गुणोंकी प्रकट- ताको रखनेवाली मोक्षको भी कोई अन्य ही प्राप्त करता है तब उस पुण्य या पाप तथा मोक्षके लिये अनुष्ठान व क्रिया करना वृथा हो जायगा। इसतरह जो बौद्ध मतके समान आत्माको क्षणिक मानते हैं, कर्ता और भोक्ता भिन्नर कल्पना करते हैं उनको दृषण दिया गया। भावार्थः- इस आत्माका स्वभाव नित्य अनित्यरूप है। द्रव्यार्थिकनयमे विचारा जाय तो अपनी सम्पूर्ण पर्यायोंमें एक आत्मा ही है पर्यायार्थिक नयसे विचारा जाय तो प्रत्येय पर्यायमें भिन्न २ रूप है.। क्योंकि जैसा एक पर्यायमें था वैसा दूसरी पर्यायमें नहीं है । एक मनुष्य बाल्यावस्थामेंसे युवावस्थामें आया । द्रव्यकी अपेक्षा तो यह वही युवान है समयसार टीका। २७९ जो बालकको अवस्थामें था. परंतु पर्यायकी अपेक्षा वह वालक बालक ही था यह युवान युवान ही है। इसीतरह यह जीव अपने शुभ या अशुभ भावोंसे जो कर्म बांधता है उसका जब उदय आता है तब मनुष्यभवसे देवगति या नर्क गतिमें जाता है वहां वही जीव अपने काँके सुख या दुःखरूप फलको अनुभव करता है अथवा कोई जीव इस मनुप्यं भवमें शुद्धात्माका अनुभव स्वरूप ध्यानका अभ्यास करता है वही जीव कर्मोको नाशकर मुक्त हो जाता है और सिद्धालयमें जाता है तब उसे सिद्ध कहते हैं। इन तीनों ही. विपयोंमें जिम जीवने कर्म किया था: या मोक्षका उपाय किया था वही जीव कौके फलको व मोक्षक आनन्दको भोग रहा है, द्रव्यकी अपेक्षासे वही जीव है । पर्यायकी अपेक्षासे विचार किया जाय तो मनुप्यभवमें तो वह मनुप्य था अब देव व नक गतिमें वह देव या नारकी हुआ | याँ, सिद्धलोकमें सिद्ध हुआ.। इससे न तो सांख्यमतकी तरह जीव कूटस्थ नित्य है और न बौद्ध मतकी तरह अनित्य व क्षणिक है। कथंचित् अनित्य हैं ऐमा जानना योग्य है। इसतरह दो गाथाओंसे नित्य एकान्त.व क्षणिक एकांतःमतका निराकरण किया गया। १५१-३५२॥ .:: : इस तरह दूसरे स्थलमें गाथाएं ४ पूर्ण हुई। आगे कहते है. कि, यद्यपि. शुद्ध, नयसे शुद्ध बुद्ध - एक .स्वभावरूप होनेके कारणले. यह जीव कर्मोंका कर्ता नहीं है तो भी अशुद्ध नयसे रागद्वेषादि भावकोंका यह ही कर्ता हैं पुग़ल नहीं है यहां पांच गाथाएं हैं इनमें प्रत्येक गाथाके पूर्वाद्रमें सांख्यमतके अनुसार चलने वाले शिष्यका पूर्व पक्ष है तथा उत्तरार्द्धसे उसीका परिहार या उत्तर है ऐसा जानना योग्य है। :- गाथाः ‘मिच्छत्ता जदि पपड़ी मिच्छादिट्ठी करेदि अप्पाणं । । तह्मा अचेदणा दे पपड़ी जणुं कारगो पत्ता ॥ ३५३ ॥ संस्कृतार्थ:-मिथ्यात्वं यदि कृतिमियादृष्टि करोत्यात्मानं । तस्मादचतना ते प्रकृतेननुः कारकः प्राप्तः ।। ३५३ ॥ सामान्यार्थः यदि मिथ्यात्वं नामा कमकी प्रकृति इस आत्माको मिथ्यादृष्टी करदे तो तेरें मतसे अचेतन प्रकृति भाव मिथ्यात्त्वकी कर्ता होजायगी । शब्दार्थ सहित विशेपार्थ:- (नंदि) यदि (मिछत्ता पयडी) द्रव्य मिथ्यात्त्व नामा कर्मकी प्रकृति (अप्पाण) स्वयं नहीं परि- गमन करनेवाले आत्माको (मिच्छादिट्ठीं करेदि) हठसे मिथ्यादृष्टी कर देवे अर्थात् बल पूर्वक उमे श्रद्धान रहित कर देवे (तम्हा) तो इस कारणसे (दे) तेरे. मतसें (णणु) बड़े आश्चर्यकी बात है कि (अचेदणा पयडी) चेतना रहित जड़ मिथ्यात्त्व कम प्रकृति (कांग्गोपत्ता) भाव मिथ्या- वकी करनेवाली होगई। और यह जीव एकांतसे अकती होगया। जव यह जीव का नहीं हुआ तब इसके कौका बंध भी नहीं हुआ। कर्मबंधके न होनेसे उसके संसारका ही अभाव होगया परन्तु यह बात हो नहीं सक्ती क्योंकि प्रत्यक्षमें ही विरोधरूप है। भावार्थ:-सांग्थ्य- "- समयसार टीका। RERRIERT २८० मतके अनुसार जो आत्माको अपरिणामी व अकर्ता मानते हैं और रागद्वेष आदि भावोंमें मूलकारण जड़ प्रकृतिको ही मानते हैं उनके मतको दोप देते हुए आचार्य कहते हैं कि फिर आत्मा तो कर्मोंसे निर्लेप होगया। निर्लेप होनेसे उसके संसार ही न रहा। परन्तु यह बात गलत है क्योंकि प्रत्यक्षसे ही विरोध रूप है॥ ३६३ ॥ इस पातको और भी कहने हैं: गाथाः-सम्मत्ता जदि पयड़ी सम्मादिट्ठी करेदि अप्पाणं । तमा अचेदणा दे पयड़ी णणु कारगो पत्तां ॥ ३५४ ॥ संस्कृतार्थः सम्यक्त्वं यदि प्रकृतिः सम्यग्दृष्टं करोत्यात्मानं । तस्मादचेतना ते- प्रकृतिर्ननु कारकः प्राप्तः ।। ३५४ ।। सामान्यार्थः-यदि सम्यक्त्व प्रकृति इस आत्माको मम्यग्दृष्टी करे तो नेरे मतमें अचे- तन प्रकृति सम्यक्त भावकी करनेवाली होगई। शब्दार्थ सहित विशेषार्थः-(जदि) जो (सम्मत्ता पयड़ी) सम्यक्त्व प्रकृति दर्शन मोहनीयकर्मकी तीसरी प्रकृति (अप्पाणं) स्वयं नहीं परिणमनेवाले आत्माको (सम्मादिट्ठी करेदि) क्षयोपशम या वेदक सम्यग्दृष्टी कर देवे (तमा) तो (दे) तेरे मतसे (गणु) अहो बड़े अश्चर्यकी बात है कि (अचेदणा पयड़ी) अचेतन जड़ सम्यक्त्व प्रकृति (कारगो पत्ता) सम्यक्त्व भावकी करनेवाली होगई तथा जीव एकान्तमे सम्यक्त्व परिणामका अकर्ता होगया। ऐसा मानने पर जीवके वेदक सम्यत्तवका अभाव हो जायगा, वेदक सम्यत्त्वके अभाव होनेसे क्षायिक सम्यक्त्वका अभाव हो जायगा । तब मोक्षका भी अभाव हो जायगा, परंतु ऐसा नहीं हो सक्ता क्योंकि इस बातमें प्रत्यक्षसे भी विरोध होगा और आगमसे भी विरोध आ जायगा । भावार्थः-जो आत्मा स्वयं परिणमन स्वभाव न हो उसके भीतर परिणाम नहीं हो सक्ते, कूटस्थ नित्यको जड़कर्म निमित्त होनेपर भी उसका कुछ नहीं कर सक्ते । यहां शिष्यने प्रश्न किया कि सम्यक्त्व प्रकृति दर्शन मोहनीयके मिथ्यात्तव सम्यक् मिथ्यात्त्व और सम्यक्त्व प्रकति इन तीन भेदों से एक भेद है-कर्म विशेष है । यह सम्यग्दर्शन रूप कैसे हो सक्ती है, क्योंकि सम्यक्त्व तो भव्य नीवका परिणाम है और वह परिणाम विकार रहित सदा आनंदमई एक लक्षणको रखनेवाले परमात्मतत्त्व आदिके श्रद्धानरूप है तथा मोक्षका वीज कारण है । इसका समाधान आचार्य कहते हैं कि ठीक है सम्यक्त्व प्रकृति तो कर्मका ही भेद है तो भी जैसे जिस विषका विष मर जाता है, अर्थात् फूका हुआ संखिया आदि किसीका मरण नहीं करता है तैसे ही शुद्धात्माके सन्मुख परिणामोंसे प्राप्त जो मंत्रके समान विशेष भावकी शुद्धि सो उस मिथ्यात्व कर्ममें, मिथ्याभाव करनेकी शक्तिको नष्ट कर देती है तब उस कर्मसमूहको जिसमें से मिथ्यात्व भाव नष्ट होगया है सम्यक्त्व प्रकृति कहते हैं क्योंकि यह सम्यक्त्व कर्म प्रकृति विशेष क्षयोपशम, विशुद्धि
mputsASNARRON
-
समयसार राकां।
२८१
देशना, प्रायोग्य और करण लब्धिसे उत्पन्न प्रथम औपरमिक सम्यक्त्वके पीछे होनेवाले वेदक
सम्यक्त्वके स्वभावरूप तत्त्वार्थ श्रद्धानरूप जीवके परिणामको नहीं मार सक्ता है इस कार-
णसे उपचार नयके द्वारा सम्यक्त्वका कारण है इसी हेतुसे उस कर्म विशेषको मी सम्यक्त्व
कहते हैं। जैसे तीर्थकर नाम कर्म परम्परामे मोक्षका कारण है तैसे यह प्रति भी परम्परासे
मुक्तिकी कारण है इससे कोई दोष नहीं है । भावार्थ:-जैसे मारा हुआ विष खानेपर जहर
नहीं चढ़ता तैसे शुद्धात्माके अनुभवके द्वारा मिथ्यात्त्वका विष ऐसा मार डाला जाता है जिसमे
वह प्रकृति सम्यक्त्व प्रकृति कहलाती है क्योंकि उसमें सम्यक्त्वको विराधनेकी शक्ति नहीं है
उसके उदय होनेपर ही वेदक सम्यक्त्वरूप जीवका परिणाम होता है और यह परिणाम
परम्परासे मुक्तिका कारण है । ऐसा जानना ।। ३५४ ॥
आगे फिर भी इसीको कहते है:-
गाथा:-अहवा एसो जीवो पोग्गलदच्चस्स कुणदि मिच्छत्तं ।
तमा पोग्गलदव्वं मिच्छादिट्ठी ण पुण जीवो ॥ ३५५ ।।
संस्कृतार्थः-अथवैषः जीवः पुद्गलद्रव्यस्य करोति मिथ्यात्वं ।
तस्मात्पुद्गलद्रव्यं मिथ्यादृष्टिर्न पुनर्जीवः ॥ ३५५ ।।
सामान्यार्थः-अथवा यदि कोई ऐसा माने कि यह जीव पुद्गलद्रव्यके भाव मिथ्या-
त्व कर देता है तो ऐसा माननेसे पुद्गल द्रव्य मिथ्यादृष्टी हो जायगा, जीव नहीं । शव्दार्थ
सहित विशेषार्थः-- (अहवा) अथवा पूर्वमें कहे हुए दोपके भयसे कोई ऐसा माने कि
(एसो जीवो) यह प्रत्यक्ष प्रकट जीव (पोग्गल दव्वस्त ) द्रव्यकर्मरूप पुदल द्रव्यके (मि-
च्छतं) शुद्धात्मीक तत्व आदिमें विपरीत अभिप्रायको पैदा करनेवाले भाव मिथ्यात्वको
(कुणदि) कर देता है तथा स्वयं यह जीव भाव मिथ्यात्व रूपमे नहीं परिणमन करता
(तम्हा) तो ऐसा एक्रांतसे माननेसे (पुग्गल दव्यं) जड़ पुद्गल द्रव्य (मिछादिट्टी) मिथ्यादृष्टी हो
जायगा। (ण पुण जीवो) परंतु जीव मिथ्यादृष्टी न होगा | तब कर्मोका बंध भी उसी ही
जड़के होगा, संसार भी उसीको ही होगा, जीवको न बंध होगा न संसार, ऐसा होनेमे
प्रत्यक्षमें ही विरोध आ जायगा । भावार्थ-यहां पर कोई शिप्य ऐसा मानने लगे कि यह
जीव पुद्गल द्रव्यंको भाव मिथ्यात्वरूप कर देता है । तथा स्वयं यह जीव भाव मिथ्यात्वरूप
नहीं परिणमन करता है तो ऐसा मानना भी ठीक नहीं है क्योंकि भाव मिथ्यात्व आत्माका
ही अशुद्ध परिणाम है यदि जीवके यह भाव न माना जायगा तो यह जीव बंध व संमाग्से
रहित हो जायगा सो: यह वात सरासर विरोधरूप है ॥ ३५५ ।।
आगे इसी यातको और भी कहते है-
गाथा:-- अह जीयो पपडी विय पोग्गलावं कुणंति मिच्छत्तं ।
तमा दोहिकदत्तं दोझिवि मुंजंति तस्स फलं ॥१६॥
समयसार टीका PoranRRORSCALAALEnterAMIRRORSRDER २८२ संस्कृतार्थ:-अथ जीवः प्रकृतिरीप पुद्गलद्रव्यं कुरुते मिथ्यात्वं । तस्माद्वानां कृतं द्वावप मुंजाते तस्य फलं ॥ ३५६ ॥ सामान्यार्थः-अथवा पूर्व दूषणके भयसे कोई ऐसा माने कि जीव और प्रकृति दोनों ही पुद्गल द्रव्यको मिथ्यात्वरूप कर देते हैं तब दोनों करके जो कर्म किया गया उस कर्मके फलको दोनों ही भोगेंगे ऐसा हो जायगा । शब्दार्थ सहित विशेपार्थः-(अह) अथवा पूर्वके दूषणके भयसे यदि कोई ऐसा माने कि (जीवों) यह जीव (पय विय) तथा प्रति द्रव्य कर्म भी दोनों मिलकर (पोग्गलदव्वं) पुद्गलद्रव्यको (मिच्छत्त) भाव मिथ्यात्वरूप (कुणंति) कर देते हैं (तम्हा) तो ऐसा माननेसे (दोहिकदत्त) नीव और पुद्गल दोनोंके उपादान कारणसे किया हुआ यह भाव मिथ्यात्त्व जब हुआ तब (दोहिवि) जीव और पुद्गल दोनों ही (तम्म फलं) उस भाव मिथ्यात्त्वके फलको (भुजति) भोगेंगे-तब अचेतन पुग़लकी प्रतिके भी भोक्तापना प्राप्त होनायगा। सो ऐसा हो नहीं सक्ता यह प्रत्यक्ष विरोधरूप बात है। भावार्थ:- उपरकी बातको खंडित हुई देखकर कोई ऐसा माने कि भाव कमके कर्ता नीव और पुद्गल दोनों हैं अर्थात् रागद्वेपादिक भावोंके ज़िम्मेदार दोनों हैं तब दोनोंके ही कर्मबंध होना और दोनोंके ही उसके सुख व दुःख रूप फलका भोगना होनायगा । - यह बात प्रत्यक्ष विरोध रूप है ॥ ३५६ ॥ अब इसी विषयको संकोचते हुए गाथा. कहते हैं;-- गाथा:-अहण पयडी ण जीवो पोग्गलदव्यं करेदि मिच्छत्तं । तमा पोग्गलदव्वं मिच्छत्तं तंतु णहु मिच्छा ।। ३६७ ॥ संस्कृतार्थः- अथ न प्रकृतिर्न च जीवः पुद्गलद्रव्यं करोति मिथ्यात्वं । तस्मात्पुद्गलद्रव्यं मिथ्यात्वं तत्तु न खलु मिथ्ण ॥ ३५७ ॥ सामान्यार्थः-अब कहते हैं कि न तो पुद्गल कर्मकी प्रकृति और न यह जीव एकान्तसे पुद्गल द्रव्यको भाव मिथ्यात्त्वरूप करते हैं इससे जो इस गाथाके पहले तीसरे सूत्र में कहा था कि 'अहवा एसो जीवो पोग्गल दव्वस्स कुणदि मिच्छत्तं' यह जीव पुद्गलद्रव्यको मिथ्यात्त्वमय कर देता है क्या प्रगटपने मिथ्या नहीं है ? अवश्य मिथ्या है । यहां प्रयोजन यह है कि शुद्ध निश्चय नयसे यद्यपि यह जीव शुद्ध है तो भी पर्यायार्थिक नयसे कथंचित् अर्थात् किसी अपेक्षासे परिणामी होनेके कारणसे अनादि कर्मके उदयके वशसे रागद्वेपादि उपाधि परिणामको स्फटिकमणिकी तरह ग्रहण करता है। यदि एकांतसे अपरिणामी होवे तो इसमें उपाधि भाव नहीं सिद्ध हो सकता है । जपा फूलद्वारा उपाधिरूप परिणमनकी शक्ति होनेपर ही स्फटिकमें जपा पुष्प अपनी उपाधिको उत्पन्न करता है । काठा- दिमें.. नहीं कर सकता क्योंकि काष्ठादिमें उणधिरूप परिणमनकी शक्तिका अभाव 0 समयसार टीका। है। इस प्रकार यदि द्रव्य - मिथ्यात्वरूपी कर्मकी प्रकृति एकांतसे भाव मिथ्यात्वको पैदा करदे तो जीव भाव मिथ्यात्त्वका का न रहे । भाव मिथ्यात्त्व न होने पर उसके कर्म बंधका अभाव हो जावे । कर्म बंध न होनेपर संसारका अभाव हो जावे । परंतु ऐसा असंभव है क्योंकि प्रत्यक्षसे विरोध आता है इत्यादि व्याख्यानरूपमे नीसरे म्थलमै ५ गाथाएं पूर्ण हुई। भावार्थः-पुद्गल कर्ममय वर्गणाका परिणमन पुद्गल द्रव्यकर्मरूप और जीवके परिणामका परिणमन जीवके भावरूप होता है। जबतक यह जीव संमारी है तब तक एक दूसरेको निमित्त कारण है जैसे स्फटिक मणिमें स्वयं अपनी चमक किसी दूसरे रंगकी चीज़के लगनेसे उस रंगरूप परिणमनकी शक्ति है तोही नपा पुण्य आदि कोई भी वस्तुका सम्बन्ध होनेसे वह स्फटिक लाल या हरा हो जाता है। यदि काठके टुकड़ेके उस रंगवाली चीज़का सम्बन्ध करें तो उमका परिणमन उम रूप नहीं होगा क्योंकि काठमें परिणमन शक्तिका अभाव है। ऐसे ही द्रव्य मिथ्यात्त्वनाम पुद्गलकर्मकी प्रकृतिका उदय होने पर जीव स्वयं भाव मिथ्यात्त्वरूप परिणमन करता है। यदि द्रव्य मिथ्यात्व न होता तो जीव भावमिथ्यात्त्वरूप कभी भी परिणमन नहीं करता। इसी तरह भाव मिथ्यात्व मय जीवके परिणाम होनेके निमित्तसे द्रव्य कम वर्गणाएं. द्रव्य मिथ्यात्वरूप परिणमन करती हैं। जीव हठसे पुद्गलको मिथ्यात्वरूप नहीं करता--ऐसा जानना । अशुद्ध भावोंका कार्य जीवका ही परिणमन है।न तो जीव और पुद्गल दोनोंका है न पुद्गलका है और न शुद्ध जीवका है। द्रव्य कर्मों के उदय आनेपर जीवका ही अशुद्धभावरूप परिण- मन है ।। ३६७॥ आगे ज्ञान, अज्ञान, सुख, दुःख आदि कर्म एकांतसे कर्म ही करता है आत्मा नहीं करता ऐसा सांख्य मतके अनुसार चलनेवाले शिप्य कहते हैं। उन्हीं की तरफ इशारा करके फिर भी नयं विभागसे यह सिद्ध करते हैं कि यह जीव कथंचित कर्ता है। इसकी १३ गाथाएं हैं इनमें कम ही एकांतसे कर्त्ता होता है इस कथनकी मुख्यतासे ' कम्महिंदु अण्णाणी' इत्यादि सूत्र ४ हैं । उसके बाद सांख्यमतमें भी ऐसा कहा गया है इस संवादको दिखलानेके लिये ब्रह्मचर्यके स्थापनकी मुख्यतासे "पुरिमिच्छियाहिलासी " इत्यादि गाथाएं २ हैं । अहिंसा स्थापनकी मुख्यतासे जम्हा घादेदि परं" इत्यादि गाथागं २ हैं। प्रतिक ही कर्त्तापना है आत्माके नहीं। इस एकांतको दूर करनेके लिये इसी ही ४ गाथाओंका ही दिखाया हुआ दूषणका संकोचरूप " एवं संखुबदेस" इत्यादि एक गाथा है। ऐसे पांच सूत्रोंके समुदायसे दूसरा अंतरं स्थल हुआ । उसके बाद आत्मा कर्म व कर्म ननिन भाव नहीं करता है किन्तु अपने आपको करता है इसको कहते हुए एक गाथामें पूर्व पक्ष करके तीन गाथाओंमें उसका समाधान है इस तरह समुदायसे 'अहवा मण्णगि मझे इत्यादि मूत्र ४ हैं- २ NCESTAURANGERSNES २८४ समयसार टीका। ऐसे ४ थे अंतर अधिकारमें तीन स्थलके द्वारा समुदाय पातनिका हुई सो ही कहते है- गाथाः--कम्नेहिंदु अण्णाणी किजदि णाणी नहेब कम्महि । कम्मेहिं सुवाविजदि जग्गाविजदि तहेब कम्मेहिं ॥३५८॥ कम्मेहिं सुहाविजदि दुक्खाविजदि तहेव कम्महिं। कम्महिंय मिच्छत्तं णिजदिय असंजयं चेव ॥ ३५९ ॥ कम्मेहिं भमाडिजदि उड्ढमहं चावि तिरियलोयम्मि । कम्मेहिं चेव किजदि सुहासुहं जेत्तियं किंचि ॥ ३६० ॥ जमा कम्म कुव्वदि कम्मं देदित्ति हरदि जं किंचि। तमा सव्वे जीवा अकारया हुंति आवण्णा ॥ ३६१ ॥ संस्कृतार्थः-कर्ममिस्तु अज्ञानी क्रियते ज्ञानी तथैव कर्मभिः । कर्मभिः स्वाप्यते जागर्यते तथैव कर्मभिः ॥ ३५८ ॥ कर्मभिः सुखीक्रियते दुःखी क्रियते च कर्मभिः । कर्मभिश्च मिध्यात्वं नीयते नीयतेऽयमं चैव ॥ ३५९ ॥ कर्मभिधीम्यते अवमघश्चापि तिर्यगलोकं च । कर्मभिश्चैव क्रियते शुभाशुभं यावकिचित् ॥ ३६० ॥ यस्मात् कर्म करोति कर्म ददाति कर्म हरतीति किंचित् । तस्मात्तु सर्वे जीवा अकारका मवंत्यापन्नः ॥ ३६१ ॥ सामान्यार्थः-द्रव्य कर्मोके द्वारा यह जीव एकांतसे अज्ञानी व ज्ञानी किया जाता है, कर्मोके द्वारा सुलाया जाता व जगाया जाता है, कर्मोके द्वारा सुखी या दुःखी किया जाता है तैसे ही कर्मोके द्वारा मिथ्यात्त्वमें लाया जाता है व कर्मोंके द्वारा एकान्तसे असंयमी किया जाता है। कर्मों ही के द्वारा ऊपर, नीचे व मध्यलोकमें घुमाया जाता है जो कुछ शुभ या अशुभ है सो-सर्व कर्मोके द्वारा किया जाता है क्योंकि कर्म ही जो कुछ करता है सो करता है, कर्म ही जो कुछ देता है सो देता है व कर्म ही जो कुछ हरता है सो हरता है, एकांत नयसे यदि कर्म ही सव कुछ करता है तो सर्व जीव अकर्ता होगए, जीवका कुछ भी कर्तव्य न रहा। शब्दार्थ सहित विशेषार्थः-कम्मेहिं दु) कर्मोंके द्वारा तो (अण्णाणी). अज्ञानी (किन्जदि) किया जाता है (म्हेव) तैसे ही (कम्मेहिं) कर्मोके द्वारा (णाणी) ज्ञानी क्रिया जाता है। (कम्मेहिं) कर्मोके द्वारा (सुवाविजदि) एकांतसे सुलाया जाता है (तहेव) तैसे ही (कम्मेहि) कर्मोके द्वारा (जग्गाविजदि) जगाया जाता है कम्मेहिं) कोके द्वारा (सुहाविजदि सुखी किया जाता है (तहेव) तैसे ही (कम्मेहिं कर्मोके द्वारा (दुःखा विजदि) एकांतसे दुःखी किया जाता है। (कम्मेहिं) कोकेंद्रारा (मिच्छत्तं णिजदि) एकांतसे मिथ्यात्त्वमें डाला जाता है तथा RRRRRRRRRRRRRRERes समयसार टीका। २८५ (य) और (चेव) वैसे ही असंयम (असंयमी) होता है। (कम्मेहि)कर्मकि द्वारा ही (उढम्) उपर स्वर्गलोकमें (अहं)-अधो नकलोकमें (चावि) तसे ही (तिरियलोयम्मि) इस तिर्यक् मव्यलोकमें (भमाडिजदि) भ्रमाया जाता है (चेव) तेसे ही (जेत्तिय किं च) जो कुछ यहां (मुहामुह) शुभ या अशुभ है सो सब (कम्मेहि) कर्मों के द्वारा (किनदि) किया जाता है। (जमा) इसकारण जब यह कहा गया कि (कम्मं कुम्वदि) कर्म ही सब कुछ करता है (कम्मं देदित्ति) कर्म ही सब कुछ देता है, (नंकिंचिहरदि) जो कुछ हरता है सो कम ही हरता है ,तह्मा) तो एकांत नयसे (सव्वे जीवा) सर्व ही जीव (अकारया आवण्णा हुँति) कर्त्तापनेसे रहित प्राप्त हो जावेंगे। जब.सर्व जीव अकर्ता होजायंग तब उनकेकर्म बंधका अभाव होजायगा, कर्म बंधके अभावमें संसारका अभाव होनायगा यह वात हो नहीं सक्ती क्योंकि प्रत्यक्षसे ही विरोध रूप होजायगी ।। ३५८-३५९-३६०-३६१ ॥ इस तरहसे कम एकांतसे कर्ता है ऐसा मानने पर जो दोष आता है उसको दिखाते हुए चार. सूत्र समाप्त हुए। आगे फिर इसीको कहते हैं:- गाथा:-पुरुसिच्छियाहिलासी इच्छी कम्मं च पुरिसमहिलसदि। एसा आयरियपरंपरागदा एरिसी दु सुदी ॥ ३६२ ।। तमा ण कोवि जीवो अवह्मयारी दु तुम मुवदेसे । जह्मा कम्मं चेवहि कम्म अहिलसदि जं भणियं ॥३६३ ॥ संस्कृतार्थः-पुरुषःस्पमिलापी स्त्रीकर्म च पुरुषमभिलपति । एषाचार्यपरंपरागतेदृशी अतिः ॥ ३६२ ॥ तस्मान्न कोऽपि जीवोऽब्रह्मचारी युष्माकमुपदेश । यरमात्मैव हि कर्माभिलपतीति यद्भणितं ।। ३६३ ॥ सामान्यार्थ:--पुरुष नामा कर्म स्त्री की इच्छा करता है व स्त्रीकम पुरुषकी इच्छा करता है ऐसे आचार्य परंपरासे चली आई श्रुति है। ऐसा माननेसे तब तुम्हारे उपदेशमें कोई भी जीव अब्रह्मचारी नहीं है। शब्दार्थ सहित विशेपार्थ:--पहले कहाथा कि जो कम ही एकांतसे सब कुछ करता है ऐसा माननेसे क्या दोप आता है आगे फिर भी उसीएकांतभावको श्री कुंदकुंदा- 'चार्य देव साख्यमतके साथ संवाद या वार्तालाप दिखला करके समर्थन करते हुए दोष देते हैं प्रथम ही आचार्य सांख्यमतानुमारी शिप्यसे कहते हैं कि हम द्वेषसे कहते हैं यह बात नहीं है। आपकमतम ही यह बात कही गई है कि एकांतसे (पुरुसिच्छी अहिलासी) पुरुषवेद नामा कर्म स्त्री वेद रूपी कर्मकी इच्छा करता है तथा (इच्छी कम्मंच पुरिस महिलसदि) स्त्री वेद नामाकर्म पुम्पवेद नाम -कर्मकी अभिलाषा करता है, किन्तु जीव इच्छा नहीं करता है । (एमा) इस तरहमे (आयरिय परंपरा गढ़ा एरिमीदु सुदी) आचार्योकी परिपाटी द्वारा चली आई हुई श्रुति है। ।
RRARMARKAset २८६ समयसार टीका। साख्योंके आगमको श्रुति कहते हैं। यदि ऐसा वाक्य माना जाय तो क्या दोष आयगा सो आचार्य कहते हैं । (तह्मा) ऐसा माननेपर (कोवि जीवो) कोई भी जीव (तुह्म उवदेसे) तुम्हारे मतमें (अवझयारीणदु) अब्रह्मचारी न रहेगा। जैसे शुद्ध निश्चय नयसे मर्व जीव ब्रह्मचारी हैं तैसे एकान्तसे अशुद्ध निश्चय नयके द्वारा भी मर्व ही ब्रह्मचारी हो जायेंगे (जरा ) क्योंकि (कंमंचेव हि कम्मं अहिलसदि.) पुंवेद नामा व स्त्रीवेद नामाकर्म ही क्रममे स्त्री व पुरुषकर्मकी इच्छा करता है जीव नहीं (जं भणिद) ऐसा जो कहा गया है सो प्रत्य- क्षसे विरोधरूप है । भावार्थ:-यदि एकान्तसे जीवको अकर्ता और प्रकृतिको ही कर्ता माना जायगा तो फिर यदि कोई पुरुष स्त्रीकी इच्छा करता है तो उसे कोई भी दोप न होगा क्योंकि इच्छा करनेवाला पुरुष वेदनामा कर्म है, जीवका भाव नहीं। तब वह पुरुष भी ब्रह्म- चारी ही रहेगा, अब्रह्मचारी नहीं । सो यह बात ठीक नहीं है। यद्यपि जैन मतमें भी पुरुष वेद नामाकर्म है पर वह नहीं परिणमनेवाले जीवको परे रखकर आप स्वयं स्त्रीकी इच्छा नहीं करता, क्योंकि वह स्वयं तो जड़ है जड़के इच्छा नहीं किन्तु जब उस कर्मका उद्भव होता है तब जीव स्वयं ही परिणमन करके अपना भाव रागी व डेपी बना लेता है । ऐमा जानना एकांतसे कर्म कर्ता नहीं है ॥ ३६२-३६३ ॥ इसतरह अब्रह्मका कथन करते हुए दो गाथाएं पूर्ण हुई- आगे हिसाका भाव बताते हुए कहते है:- गाथाः-जमा घादेदि परं परेण घादिनदेदि सापयडी। एदेणच्छेणदु किर भण्णदि परघादणामेत्ति ॥ ३६४ ।। तमा ण कोवि जीवो उवघादगो अत्थि तुम उवदेसे । जमा कम्मं चेवहि कम्मं घादेदि जंभणियं ॥ ३६५ ।। संस्कृतार्थः-यस्माद्धंति परं परेण हन्यते च सा प्रकृतिः । एतेनार्थेन भण्यते परघात नामेति ॥ ३६४ ॥ तस्मान्न कोऽपि जीव उपघातको युप्माकमुपदेशे । यस्माकमेव हि कर्म इंतीति भणितं ॥ ३६५ ॥ सामान्यार्थः-जिससे दूसरे कर्मका घात किया जाय व जो कर्म दूसरी प्रकृतिसे घाता जाय वह प्रकृति परघात इसी अर्थमें कही गई है। यदि एकांतसे परघात द्वारा ही हिंसा हो, जीवका सम्बन्ध नहो तो तुम्हारे उपदेशमें कोई भी जीव घातक नहीं हो सक्ता क्योंकि कर्म ही कर्मकी हिंसा करता है ऐसा कहा गया है । शब्दार्थ सहित विशेषार्थः- (जमा) इस कारणसे कि (परं) दूसरे कर्म स्वरूपको (सा पयड़ी) वह कर्म प्रकृति (घादेदि) हनती है (य) और (परेण) दूसरी कर्मप्रकृतिसे (घादिजदे) वही प्रकति घात की जाती है न तो समयसार टीका। २८७ जीवको वह प्रकृति धात करती है और न जीव उसको घात करता है इस अर्थको बतानेवाली जन मतमें भी परघात नामकी एक प्रकृति कही है। परन्तु वह प्रकृति स्वयं किमीको नहीं मारती जब जीव हिंसाके भावसे परिणमन करता है तब यह परघात नामाकर्म केवल सहकारी कारण है इससे कोई विरोध नहीं आसक्ता । इस पर सांख्यानुसारी शिप्य कहता है कि शुद्ध परिणामिक परमं भावको ग्रहण करनेवाली शुद्ध द्रव्यार्थिक नयसे जैनागममें भी इस जीवको अंपरिणामी अर्थात् हिंसा परिणामसे रहित कहा गया है । इसका समाधान यह है कि जैन मतमें यह वचन है “सव्वे सुद्धा हु सुद्धणया कि शुद्ध निश्चय नयसे सर्व जीव शुद्ध है परन्तु व्यवहार नयसे परिणामी हैं। ऐसा तुम्हारे मतमें नहीं है ( जम्हा) क्योंकि (कम्मंचे- वहि कंमंघादेदि) कर्म ही कर्मको घात करता है आत्मा नहीं (इदि भणिदं एसा तुम्हारे यहां कहा गया है (तम्हा) इसी लिये (तुम्ह उवदेसे ) तुम्हारे उपदेशमें (कोवि जीवो) कोई भी जीव (उवघादगो) उपघात करनेवाला (ण अत्यि) नहीं है । भावार्थ:-मांग्थ्य मतमें सर्वथा कर्म प्रकृतिको ही प्रधान माना गया है और आत्माको अकर्ता कहा गया है तब सब ही कामोंकी करनेवाली प्रकृति जड़ है वही हिंसा करनेवाली है उसीकी ही हिंसा हुई। जीवका कुछ सम्बन्ध नहीं रहा इससे जीव हिंसक नहीं रहा । तब वह फलका भागी मी कमे होगा। जैन मतमें जीवको परभावका अकर्ता व कर्ता नय विभागसे कहा गया है । शुद्ध निश्चय नयसे परभावका अकर्ता है परंतु अशुद्ध निश्चयनयसे अपने अशुद्ध भावोंका की है परघातनामा नाम कर्म केवल निमित्त मात्र है। प्रति जीव अपने परिणामोंसे ही दूसरेकी हिंसा करता है तब ही वह जीव हिंसक या हिंसाके फलका भागी होता है ।। ३६४-३६५ ॥ इसतरह हिंसाके विचारकी मुख्यता करके दो गाथाएं पूर्ण हुई। आगे इसीको फिर कहते है- गाथा:-एवं संखुवदेसं जेनु परविंति एरिसं समणा । तेसि पयडी कुददि अप्पा य अकारया सव्वे ॥ ३६६ ॥ संस्कृतार्थ:-एवं सांख्य.पदेश य तु प्ररूपयंत दृशं श्रमणाः । तेषां प्रकृतिः करोत्यात्मानश्चाकारकाः सर्वे ॥ ३६६ ॥ सामान्यार्थः-इस प्रकार सांख्यमतकासा उपदेश जो कोई द्रव्यलिंगी मुनि श्रमण कहने हैं उनके मतमें जड़ प्रकति कर्ता हो जायगी तथा आत्मा सब अकर्ता हो जायेंगे | शब्दार्थ सहित विशेषार्थः-(एवं) इस प्रकार पूर्वमें कहे हुए एरिम) इसतरह एकांत नयसे (संग्वुवदेमं) सांख्य मतके से उपदेशको (जेदु समणा) जो कोई श्रमणाभास द्रव्य लिंगी मुनि (परूर्विति) कहते हैं (तेसिं) उन्होंके मतसे एकांतसे (पयडी कुन्वदि) जड़ कम प्रकति कर्ता हो जाती है (य) और (सव्बे) सब (अप्पा) आत्मा अकारया) अकर्ता हो जाते हैं। जब आन्मामें कत्ता पना न रहेगा तो उसमें कोके बंधका अभाव हो जायगा। कर्मबंधका अभाव होनेसे संसारका ARRRRENCERRORANGERA २८८ समयसार टीका। अभाव हो जायगा । संसार-न होनेसे आत्माको सदा मोक्ष होनेका प्रसंग आ जायगा। यह बीतः प्रत्यक्षसे विरोधरूप है । जैन मतमें परस्पर अपेक्षाको लिये हुए निश्चय और 'व्यवहार दोनों नयोंके द्वारा यह सर्व घटता है कोई दोष नहीं है । भावार्थ:-व्यवहार नयसे नीच ही परभावका कर्ता है। शुद्ध निश्चयनयकी दृष्टिसे देखा जाय तो यह जीव परभावका का नहीं है अर्थात् व्यवहारनय कर्मननित अवस्थाओंको देखनेवाली है इससे उसके द्वारा जीव ही अपने परिणमन खभावसे द्रव्यकर्मका निमित्त पाकर मिथ्यात्वभावरूप परिणमन करता है परंतु जब शुद्ध निश्चयनयसे इस जीवके स्वभावको देखते हैं तब यह जीव अपने स्वभावके सिंबाय अन्य पर स्वभावका कर्त्ता नहीं होता है ।। ३६६ ॥ इस तरह सांख्यमतके संवादको दिखाकरके जीव एकांतसे अकर्ता है ऐसा दूपण देते हुए पांच सूत्र पूर्ण हुए। फिर उसी सांख्यके अनुसार बुद्धि रखनेवाले शिष्यको कहते है- गाथाः-अहवा मण्णसि मज्झं अप्पा अप्पाण मप्पणो कुणदि । एसो मिच्छसहावो तुझं एवं भणंतस्स ॥ ३६७ ॥ संस्कृतार्थः-अथवा मन्यसे ममात्मात्मानमात्मनः करोति । एप मिथ्यास्वभावस्तबैतन्मन्यमानस्य ॥ ३६७ ।। सामान्यार्थ-अथवा यदि तु ऐसा माने कि मेरा आत्मा आत्माको ही अपनेसे की है। उसके लिये आचार्य कहते हैं कि ऐसा माननेवालेके तुम्हारे यह वात भी मिथ्यास्वभाव रूप है। शब्दार्थ सहित विशेषार्थः-यहां फिर सांख्यको कहते हैं। हे सांख्य (अहवा) अथवा (मण्णसि) तू पूर्वमें कहे हुए दोषके आनेके भयसे ऐसा माने कि (मज्झ) मेरे मतमें तो जीव ज्ञानी है । ज्ञानी होनेपर उसके कर्मका कर्त्तापना नहीं घट सक्ता है क्योंकि कर्मोका बंध अज्ञानी जीगेंके होता है किन्तु (अप्पा) आत्मा कर्ता होकर (अप्पाणं) आत्माको कर्मरूप करके (अप्पणो) आत्माको कग्णरूप करके (कुणदि) करता है इस कारणसे अकर्तापनेका दोष नहीं आ सक्ता । उसको आचार्य कहते हैं कि एवं) इसतरह (मुणंतस्स) मानते हुए (तुम्ह) तुझे (एसो मिछसहावो) यह भी मिथ्या स्वभावरूप है ॥ ३६७ ॥ यह पूर्व पक्षकी गाथा कही आगे तीन सूत्रोंमें इसीका उत्तर कहते है- गाथा:-अप्पा णिचो असंखिजपदेसो देसिदो दु समयम्मि । 'णवि सो सक्कदि तत्तो हीणो अहियोव काहुँ जे ॥ ३६८ ॥ संस्कृतार्थः-आत्मा नित्योऽमंख्येयप्रदेशो दर्शितस्तु समये । नोपि स शम्यते ततो हीनोऽधिकश्च कर्तुं यत् ॥ ३६८ ॥ सामान्यार्थः-क्योंकि आत्मा नित्य है, असंख्यात प्रदेशी है, ऐसा आगममें कहा गया है उससे हीन व अधिक करनेको कोई भी समर्थ नहीं हो सक्ता । शब्दार्थ-सहित - . .
समयसारीका। विशेषार्थ:-(जे) जिस कारणमे अर्थात् क्योंकि (अप्पा) आत्मा (णिञ्चो) द्रव्यार्थिक नयने नित्य अविनाशी है, (असंखिज पदेसो) और असंख्यात प्रदेशोंका धरनेवाला है (समयम्मि) ऐसा परमागममें देमिदोद) कहा गया है। तत्तो उसके शुद्ध चैतन्यमई अन्वय लक्षणको व द्रव्यपनेको व उसके प्रदेशपनेको उस प्रमाणसे (अहियो) अधिक (व) या (हीणों) कम (काद) करनेको (सो णवि सका कोई नहीं समर्थ हो सकता है इससे यह आत्मा आत्माको करता है यह वचन मिथ्या होता है ।। ३६८ ॥ : इसपर शिष्यने कहा कि अमंख्यातका प्रमाण जघन्य, मध्यम व उत्कृष्ट भेदभे अनेक प्रकार है इससे जघन्य मध्यम उर. भेइसे असंख्यात प्रदेशीपना जीय करता आचार्य ! कहते है सो भी नहीं हो सक्ता क्योंकि जैसा कहा है - गाथा:-जीवस्स जीवस्वं बिछरिदो जाण लोगमित्तं हि । तत्तो सो हीणो अहियोव कई भणसि दव्वं ॥३६९॥ संस्कृतार्थ:-जीवस्य जीवस्वरूपं विस्तरतो जानीहि लोकमा हि । ततः स किं हीमोऽधिको वा कयं करोति द्रव्यं ॥ ३६९ ॥ सामान्यार्थः --जीवका स्वरूप प्रदेशोंकी अपेक्षासे विस्तार करें तो भी निश्चयसे लोक मात्र जानो, उस पाणसे वह जीव क्या हीन या अधिक किया गया जिससे तुम कहते हो कि आत्म द्रव्य किया त्या ? अर्थात् नहीं किया गया-शब्दार्थ सहित विशेषार्थ:-(जीव- स्स) इस जीवंका (जीवरूवं प्रदेशोंकी अपेक्षा स्वरूप या आकार (विच्छरिदो) शरीरमें विस्तारकी अपेक्षासे उत्कृष्ट महामच्छ देहमें व केवल समुद्धातके समयमें अथवा जघन्यकी अपेक्षासे मृहम निगोदके शरीरमें व नाना कार मध्यम अवगाह धारी शरीर ग्रहगो कालमें प्रदीपके समान संकोच विस्तार होनेके वंशसे ( लोकमत्त ) लोकमात्र असंख्यात प्रदेश रूप ही (हि) निश्चयसे रहता है जाण ऐला जानो :तत्तो) उस लोक मात्र प्रदेशॉक प्रमाणसे (सो) वह जीव (किं) क्या हीणो) हीन (व, या (अहियों) अधिक (कई किया गया जिससे (दव्वं कदं भणसि; तुम कहते हो कि आत्म द्रव्य किया गया ? अर्थात् यह आत्मा छोटे या बड़े से भी शरीरमें जावे यद्यपि संकोच या विस्तार होता है परन्तु अपने असंध्यान प्रदेश मात्र प्रमा- णको कभी त्यागता नहीं है ।। ३६९ ॥ इससे यह जीय किसी किया गया ऐसा नहीं है:- इमीको भोर भी कहा है:- गापा:-जह जाणगोदु भावो णाणसहावण अत्यि देदि मदें। तमा णवि अप्पा अप्पयं तु सयमप्पणो कुणदि।। ३७० ।। संस्कृतार्थः-अथ शायफस्तु भावो ज्ञानस्वभावेन मतं । तस्मानाप्यारमात्मानं स्वयमात्मनः करोति ॥ ७॥ सामान्या:--यह ज्ञाता आत्मा ज्ञान स्वभाव रूपसे पहले हीमे है ऐसा माना गया - PRARANASURExex समयसार टीका। है। इसलिये यह आत्मा अपनेको अपनेसे नहीं करता है। शब्दार्थ सहित विशेषार्थः-(अह) अव हे शिष्य ! और भी जानो कि (जाणगोदु भावो) ज्ञाता अर्थात जाननेवाला आत्मा पदार्थ (गाण सहावेण) ज्ञान स्वभाव रूपसे तो (अत्थिदेदि मद) पहलेसे ही मौजूद है यह सम्मत है ही। (तमा) इसकारणसे कि निर्मल आनंदमई एक ज्ञान स्वभाव रूप शुद्ध आत्मा पहलेसे ही है इसलिये (अप्पा) यह आत्मा का होकर (अप्पयं) अपने आत्माको कर्म रूप करके (सयम्) अपने आप ही (अप्पणो) अपने ही द्वारा (णवि) नहीं ही (कुणदि) करता है। एक दूषण तो यह है दूसरे यह कि जो विकार रहित परमतत्त्व ज्ञानी है वह तो की होता ही नहीं। यह पहले ही कहा जा चुका है। भावार्थ:-सांख्य पुरुपको सर्वथा अकती मानते हैं उसके अनुसार बुद्धि रखनेवाले शिष्यको पहले तो आचार्यने समझाया कि यदि तुम आत्माको बिलकुल अकर्ता मानोगे तो हिंसा, कुशील आदि कार्योंका कर्ता एकांनसे पुद्गल कर्म जो जड़ है सो ठहर जायगा तब आत्मा कर्मबंध न करके संसारी ही न होगा न दुःखी होगा न दुःख भोगेगा यह बात नहीं बन सकती है क्योंकि प्रत्यक्षसे विरोध है। तब फिर उस शिप्यने कहा कि आत्मा अपनेको अपने द्वारा करता है इससे वह कर्ता है-इसीका भी खंडन आचार्यने किया कि यह आत्मा तो स्वरूपसे ज्ञान खभाव व असंख्यात प्रदेशी पहलेसे ही है इसने अपने ताई किया ही क्या ? इससे इस तरह का मानना मी मिथ्या है। इस तरह पूर्व पक्षको खंडन करते हुये तीसरे अंतरस्थलमें चार गाथाएं पूर्ण हुई। यहां किसीने प्रश्न किया कि इस जीवसे प्राण भिन्न हैं कि अभिन्न यदि अभिन्न कहें तो जैसे जीवका नाश नहीं है वैसे प्राणोंका भी विनाश नहीं होगा तो फिर हिंसा क्या होगी। यदि जीवसे प्राणोंको मिन्न माने तो फिर जीवके प्राणोंका घात करने पर जीवका क्या विगड़ा? कुछ नहीं, इससे इस तरह भी हिंसा न हुई। इसका आचार्य समाधान करते हैं कि काय आदि प्राणों के साथ किसी अपेक्षासे भेद और कथंचित् अभेद है। किस कारणसे है कि जैसे गरम लोहेके पिडमेंसे उस वर्तमान कालमें अग्नि अलगनहीं की जासक्ती इसी तरह शरीरमें जब 'आत्मातिष्ठाहै तब उस वर्तमानकालमें उसे अलग नहीं करसक्ते। इसकारण व्यवहार नयसे प्राणों के साथ जीवका अभेद है निश्चयसे भेद है क्योंकि मरणके समय काय प्राण आदि जीवके साथ नहीं जाते हैं। यदि एकांतसे जीव और प्राणोंका सर्वथा भेद माना जायतो जैसे दूसरेके शरीरको छेदते भेदते हुए भी अपनेको दुःख नहीं होता तैसे अपनी कायको भी छिदते भेदते हुए दुःख नहीं होना चाहिये सो बात नहीं है क्योंकि प्रत्यक्षसे विरोधरूप है। तब फिर शङ्का- कार कहते हैं कि तो फिर व्यवहारसे ही हिंसा हुई निश्चयसे नहीं हुई। इस पर आचार्य कहते हैं कि यह बात तुमने सत्य ही कही जैसे व्यवहारसे हिंसा है वैसे पाप भी व्यवहारसे है तथा नरक आदिके दुःख भी व्यवहारसे हैं यह बात हमको सम्मत है ही। यदि नरक आदिके समयसार टीका। दुःखोंसे तुम्हें प्रीति है तो हिंसा करो यदि भन है जो हिंसानी छोड़ा । इससे यह मिन्ह किया कि एकांतसे सांख्यमतकं ममान यह नीव अती नहीं है। नो फिर जिन नह है इसके लिये आचार्य कहते हैं कि रागडेपादि विकलाप रहिन ममाधि लक्षणको सम्बनेवाले भेदज्ञान समयमें यह जीव काँका कत्ती नहीं है शेष सर्वकालने की है ॥ ३५ ॥ दम व्याख्यानकी मुख्यतास अंतर स्थल तीनके द्वारा चौथ स्थलमै १३ मूत्र पृण हुए। आगे कहते है कि जब तक अपने शुद्ध आमाको आमादा काम नहीं जानता है और पांची इन्द्रि- योंके विषय आदिक पर द्रव्यको अपनसे भिन्न पररूप नहीं जानता है तब तक यह जीव पगडेपी परिणमन करता है। अथवा बाहरके पांचों इलियोंके विपय त्यागकी सहायनासे झोग रहित वित्तकी भावनासे पैदा हुआ जो विकार रहिन मुम्ब नह अमृत सहा वाद उमर पलंग में इन्द्रियोंके विषय, कर्म, और शारीरका घात इन बातको न जानता हुआ मानमान व स्वसंवेदन ज्ञान रहित कार्यवाद्वारा जो अमना दमन करता है उन जीत्रको भदज्ञानकी प्राप्ति होनक लिये शिक्षा देने है-- गाथा:-दसणणाणचरित्तं किंचिवि पि बु अचंदणे विमः । तमा किं घायदे चेदविदा तेसु विसरम् ॥ ३७२ ।। दसणणाणचरितं किंचिति णविद अचेदण कम्म। तमा किं घायदे चेदयिदा तेसु कसम्म ॥ ३७२ ।। दसणणाणचरितं किंचिति जत्थि दु अचर्ण काये। तह्मा किं घादय चेदयिदा तेलु कायेसु ।। ३७३ ॥ संस्कृतार्थः-दर्शनज्ञानचरित्रं किंचिदपि नास्ति त्वचंतने विषये तस्मारिक घातयति चेतयिता तेषु कायेषु ।। ३७७ ॥ दर्शन नचरित्रं किंचिदपि नास्ति त्वचेतने कर्मनि। तस्मारिक घातयति चेतयिता तेषु कर्मम् ॥ ३७२ : दर्शनशानचरित्रं किंचिदपि नास्ति त्वचेतने काये। तस्मात् घातयति चतपिता तेषु कायेनु ॥ ३३॥ साम.न्यार्थ-विशेपके साथ ही लिखा जाता है-अचंद विसए का कार्याचे नता रहित शब्द आदि पांचों इन्द्रियोंक विषयोंमें व ज्ञानावरण आदि आठ प्रकार द्रव्यमान व औदारिक आदि पांच प्रकार कायोंमें (किंत्रिवि) कुछ भी ( इंसण नामन्तिं ) दर्गनजान चारित्र नहीं है (तमा) इम कारणसे (वेदयिदा) चेननेवाला आमा (नेनु बिमा कम्मेन्द्र कायेसु) उन विषय. द्रव्यकर्म, वा शरीरोंमें (किं; क्या (प्रावयद) घान करता है ? अर्थान कुछ भी नहीं । तात्पर्य यह है कि शब्द आदि पांचों इन्द्रियाकी अभिलापारूप, यशाना- वरण आदि द्रव्य काँका कारणरूप तथा शरीन्स ममतारूप जो कोई निक्षत्त य गगगादि २९२ समयसार टीका। परिणाम मनमें बिराज रहा है उसका घात करना चाहिये तथा वे शब्दादिक रागादि भावोंक बाहरी कारण हैं इस लिये इनको भी छोड़ना चाहिये । भावार्थः-कोई ऐसा माने व कहे कि इन्द्रियोंके विषयरूप पदार्थोको छोड़ दूं व अचेतन कर्मोका नाश करडावं व शरीरको कायक्लेश आदि तपोंसे सुखा दूं तो मुझे रत्नत्रयका लाभ हो जायगा उराको आचार्य कहते हैं कि मात्र वाहरी अचेतन पदार्थोको छोड़नेसे कुछ लाभ न होगा जब तक कि मिथ्याभाव व रागद्वेष भावोंको न त्यागा नाय क्योंकि इन्हीं भायोंके कारण इस आत्माके रत्नत्रयरूप परिणाम नहीं हो रहे हैं-अतएव इन भावोंको दूर करना चाहिये और इस कारणसे कि वाहरी पदार्थ अंतरंग भावोंके बिगाड़नेके निमित्त कारण हैं इमन उनका भी त्याग करना चाहिये । मुख्यतासे मिथ्यात्व रागद्वेषादि भावोंका त्याग हो उपादेय है ॥ ३७१- ३७२-३७३ ॥ अब इस ही भावको और भी दिखलाते है:- गाथाः-णाणस्स दसणस्स य भणिदो घादोहा चरित्तस्त । णवि तमि कोऽवि पुग्गलब्वे धादो णिद्दिट्टो ॥३७४॥ जीवस्स जे गुणा केई पत्थि ते खलु रेसु दव्वेसु । तह्मा सम्मादिहिस्म णत्थि रागो दुसएसु ॥३७५ ॥ रागो दोसो मोहो जीवस्सेदु अणपण परिणामा । एदेण कारणेण दु सद्दादिसु णत्थि राादि ॥ ३७६ ।। संस्कृतार्थः-छानस्य दर्शनस्य भणितो घा स्तथा चरित्रस्य । नापि तत्र योऽ। पुद्गलद्रव्यस्य धातो निर्दिष्टः ॥ ३७४ ॥ जीवस्य ये गुण: कचिन्न संति खलु ते परे द्र भु। तस्मात्सम्यादृष्टेनोरित रागस्तु विषयंषु ॥ ३७५ ॥ रागो द्वषो मोही जीवस्येव चानन्यपरिणामाः । एतेन कारणेन तु शन्दादिपु न संति रागादयः ।। ३७६ ॥ सामान्यार्थः-मिथ्याज्ञान, मिथ्यादर्शन तथा मिथ्याचारित्रका घात कहा गया है। पुद्गल द्रव्यका घात तो वहां (सिद्धांतमें) कहीं भी नहीं कहा गया है । जो जीव सम्बन्धी गुण हैं वे कोई भी निश्चयसे जीवके सिवाय पर द्रव्योम नहीं हैं इसीलिये सम्यग्डप्टीका राग पंचेन्द्रि- योंके विषयोंमें नहीं होता । रागद्वेष मोह नीवके ही निज भाव हैं इस कारणसे शब्द आदिके विय रागादिक भाव नहीं हैं । शब्दार्थ सहित विशेषाय:-(णाणिस्स) शब्द आदि पंचेन्द्रि- योंकी इच्छा रूपसे वा कायका ममत्व रूपसे जो ज्ञानावरणीय आदि कर्मबंधके निमित्त कारण अनंतानुबन्धी आदि रागद्वेपरूप मिथ्या ज्ञानरूपी भाव जो मनमें तिष्ठ रहा है उस मिथ्या- समयसार टीका। ज्ञानका, (ये) और (दसणस्स ) मिथ्यादर्शनका (तहा) तथा (चरितम्स) मिथ्याचारित्रका (धांदो) घात या विनाश निर्विकल्प ममाधिरूपी आयुधके द्वारा करना चाहिये ऐसा (भणिदी) सर्वज्ञ भगवानने कहा है । (दु) परन्तु (तमि) उस अचेतन (पुग्गल दन्वे) शब्द आदि विषयरूप, व द्रव्यकर्मरूप व शरीररूप पुद्गल द्रव्यमें (कोवि घादी) कोई प्रकारका धान भी (णवि) नहीं (णिट्ठिो) कहा गया है। प्रयोजन यह है कि जसे घटके आधारभूत जो पृथ्वी आदि उसको घातनेसे व चोट देनेसे घट नहीं फोड़ा जाता है तसे ही रागडेप आदि. भावोंका निमित्त कारण शब्द आदि पंचेन्द्रियोंके विषयोंको नाश करनेसे मनके भीतर मौजूद गगद्वेषादि रूप भाव घाते नहीं जा सक्ते। दृसरेके घात करनेपर दूसरेका बात नहीं होता है क्योंकि ऐसा होनेसे अतिप्रसंग आजावे अर्थात् चोट किसी दुसरेको दी जाय और हानि दुसरेकी हो । (खलु) निश्चयसे (जे केई ) जो कोई सम्यग्दर्शन आदि (जीवम्स गुणा) जी- बके गुण हैं (ते) वे गुण (परेसु दव्वेनु) शब्द आदि पंचेन्द्रियोंकि विषयरूप परद्रव्यों में (णत्थि ) नहीं हैं (तम्हा) इस कारणसे (सम्मादिटिम्स) पंचेद्रियोंके विषय रहिन अपने शुद्ध आत्माकी भावनासे पैदा होनेवाले सुखमें तृप्त सम्यग्दृष्टी जीवका (रागो) राग (दु) तो (विसयेमु) पंचेन्द्रियके विषयोंमें (गत्थि) नहीं हैं । (दु) किन्तु (जे रागो दामो मोही) जो राग, द्वेष, और मोह हैं वे (जीवम्स) अज्ञानी जीवके (अणण्ण परिणामा, अशुह निश्चय नयसे अभिन्न परिणाम हैं अर्थात् अज्ञानी जीव ही इन रागादि भावोंका उपादान कारण है। (एदेण कारणेण दु) इसी कारणसे ही (सद्दादिसु) शब्द आदि सुन्दर या असुन्दर पंचेन्द्रि योंके विषयरूप : अचेतन पदार्थोंमें (रागादि णत्यि) यद्यपि अज्ञानी जीव अपने भ्रम रूप मिथ्याज्ञानसे गंगादिकोंको कल्पना.या आरोपण करता है तथापि उनमें रागडेपादि भाव नहीं हैं। क्योंकि शब्द आदि अचेतन हैं, जड़ है। इससे यह सिद्ध हुआ कि वहिरामा भित्र्या- डप्टी जीवके उसी वक्त तक ही राग और टेप दोनों भाव उदय होते या उठने हैं जब तक कि मनमें मन, वचन, कायकी गुप्ति रूप म्बसंवेदन ज्ञान नहीं है। भावार्थ:-यहां आचार्य कहते हैं कि जो कोई अज्ञानी बाहरी पदार्थीको रागढपका मूल कारण मान उनके त्यागनेसेः रागद्वेष न होगा ऐसा ही माने अर्थात उन अचंतन इंद्रियोंक विषय . रूप' पदार्थोंमें ही रागद्वेषकी कल्पना करे परन्तु अपनेंमें मिथ्याभावसे नो मिथ्या दर्शन, मिथ्या ज्ञान और मिथ्या चारित्र हैं और जिनके कारण अपने गनमें गग- द्वेषादि भाव होते हैं उनको त्यागनेका श्रद्धान, ज्ञान व आचरण न करे. अर्थात इन गगादि भावोंको न त्यागे किंतु बाहरी पदार्थोंको ही त्यागे तो वह अज्ञानी अहिंगन्मा ही है। जानी जीव इन रागादि भावोंके होनेमें अपने ही अज्ञानको कारण जान उम अनानकी और उमस उत्पा रागहेषादि भावोंको मिटाने के लिये अपने मन वचन ऋायको गेट म्यमंटन ज्ञान, - १९४ समयसार टीका। तन्मय रहता है। तथा क्योंकि बाहरी पदार्थ रागादि भावोंके निमित्त कारण हैं अतएव उनका भी संसर्ग नहीं करता है पर मुख्यतासे अपने भावोंको ही सुलझाता है ऐसा जान मुमुक्षु जीवको उचित है कि रागादि मावोंको मेट आत्म ज्ञानमें तन्मय रहनेका यत्न करे ।। ३७४-३७५-३७६ ॥ इस तरह छः गाथाएं कहीं। , इन गाथाओसे यह सिद्ध हुआ कि चेतन या अचतन शव आदि इन्द्रियोंके विषय रागद्वेपादि भावोके उत्पन्न करनेमें निश्चय नयो कारण नहीं है, इसीको कहते हैं:- गाथा:-अण्णदवियेण अण्णदवियस्स णो कीरदे गुणविघादो। तमा दु-सव्वव्या उप्पज्जंते सहावेण ॥ ३७७ ॥ संस्कृतार्थ:--अन्यद्रव्येणान्यद्रव्यस्य न कियते गुणविघातः । तस्मात्तु सर्वद्रव्याण्पुत्पाते स्वभावेन || ३७७ ॥ सामान्यार्थः---अन्य द्रव्यसे अन्य द्रव्यके गुणोंका पात नहीं किया जा सक्ता है इस- लिये सर्व द्रव्य अपने २ स्वभावसे उत्पन्न होते हैं । शब्दार्थ सहित विशेपार्थः-(अण्णदवि- येण) अन्य द्रव्य अर्थात् बाहरमें निमित कारण रूप कुमार आदि पर द्रव्योंके द्वारा (अण्ण दवियस्स) घड़ेके लिये उपादान कारणरूप मिट्टी आदि कुम्हारसे अन्य द्रव्योंके (गुण (विघादो) गुणोंका नाश (णो कीरदे) नहीं किया जाता है अर्थात् कोई अचेतन द्रव्य किसी चेतनके चैत- न्यमय गुणोंका नाश करके उस चेतनको अचेतन, नहीं कर सक्ता ऐसे ही कोई भी चेतन द्रव्य किसी भी अचेतन द्रव्यके अचेतनमय गुणोंका नाश करके उस अचेतनको चेतनरूप नहीं कर सका (तह्मादु) इसकारणसे ही(सव्वदव्वा) मिट्टी,आदि सर्व द्रव्य (सहावेण उप्पजते) अपने अपने खभावसे उत्पन्न होते हैं अर्थात् मिट्टी अपने खभाव रूप घट आदि रूपसे ही उत्पन्न होती है क्योंकि घटका उपादान कारण मिट्टी है यद्यपि मिट्टीको घट बननेमें वाह्य निमित्तकारण-कुम्हार व- चाक आदि पर द्रव्य हैं तो भी वह मिट्टी कुम्हार व चाक आदि रूप नहीं होती है घट अव- स्थामें भी अपने स्वभावमें रहती है क्योंकि जैसा उपादान यानी मूल कारण होता है वैसा ही कार्य होता है । इस कथनसे यह सिद्ध किया गया कि यद्यपि पांचों इन्द्रियोंके विषयरूप शब्द आदिके बाह्य निमित्तके होने पर अज्ञानी जीवके रागद्वेषादि भाव पैदा होते हैं तथापि वे रागादि भाव जीव स्वरूप रूप ही हैं, चेतन हैं। जैसे शब्द आदि अचेतन हैं वैसे अचेतन नहीं हैं। भावार्थः-चेतन अचेतनकाघात व अचेतनचेतनकाघात नहीं कर सकता। यद्यपिएकदूसरेको निमित्त कारण हैं तथापि परिणमन अचेतनका अचेतनरूप और चेतनका चेतनरूप होता है। अचेतनके घातसे चेतन, वचेतनके घातसे अचेतन अपनेर स्वभावको त्याग कर अन्यरूप नहीं होजाते। इसतरह जो कोई भी प्रथम अवस्थाका शिष्य अपने चित्तमें ठहरे हुए रागद्वेषादि , ANANMARWAAAAM समयसार टीका। भावोंको नहीं जानता है और यह जानकर कि रागादि करनेवाले बाहरी सब्द आदि पंचेन्द्रि- योंके विषयरूप पदार्थ हैं जो कि वास्तवमें केवल गगढप आदि भावकि निमित्त कारण है वह शिप्य विकल्प रहित समाधि लक्षणको रखनेवाले भेद ज्ञानके अभाव मेमा चिन्तवन करता है कि मैं बाहरी शब्द आदि पदार्थोंका घात करडा तो भला होगा। उसको ममझाने के लिये पूर्वमें गाथा छ के साथ मूत्र मात ममाप्त हुए। इससे यह समझाया गया चित्तम म्हरे हुए रागद्वेषादि भावोंको दूर करनेका प्रयत्न करना आवश्यक है। विना इनके त्यागे भेदज्ञानकी स्थिरता नहीं रह सक्ती ॥ ३७७ ॥ आगे कहने है कि व्यवहार करके कर्ता और कर्मका भेद है परन्तु नियने जो बी कत्तां है सो ही कर्म है ऐसा उपदेश करते है:- गाश्राः-जह सिप्पिओ दु कम्मं कुबदि णय सोनु तम्मओ होदि। तह जीवोत्रिय कम्मं कुव्वदि णय तम्मओ होदि ॥३७॥ जह सिप्पिभोदु करणेहिं कुव्वदि णय सोदु तम्मओ होदि। तह जीवो करणेहिं कुब्वदि णय तम्मओ होदि ॥३७९॥ जह सिप्पिोकरणाणि गिहदि णय लो दुनम्मओ होदि। तह जीवो करणाणिय गिहदि णय तम्मओ होदि ।।३८ ॥ जह सिप्पिओ कम्मफलं भुजदि णय सोड नम्मओ होदि। तह जीवो कम्मफलं भुजदि णय सोवितम्मओहोदि ॥८॥ संस्कृतार्थ:-यथा शिल्पिकन्तु कर्म करोति नच स तु तन्मयो भवति । तथा जीवोऽपि च कर्म करोति न च तन्मयो भवति ॥१८॥ यथा शिलिएक: करणः करोति न स तु तन्मयो भवति । तथा जीव: वोः गति नच तन्मयो भवति ॥ ३७१ ।। यथा शिलकतु यमन हाति न स तु तन्मयो भवति । तथा जीप: कारणानि च गृहति नच तन्मयो भवति ।। ३८० ॥ यथा शिल्पकः कर्मफलं भुंके नच म नु तन्मयो भवति । तथा जीवः कर्मफलं भुक्त नन तन्मयो भवति ॥ ३८१ ।। सामान्यार्थः-जसे सुनार अपना गहना बनानेरूप कर्म करता है परंतु वह उस कर्म तन्मयी नहीं हो जाता है । तैसे जीव भी द्रव्य कर्म करता है पर उसमे तन्मयी नहीं होता। जैसे शिल्पी हथियारोंसे करता है परंतु वह तन्मई नहीं होना एमे ही जीव मन, वचन, कायके व्यापाररूप करणोंसे द्रव्य कर्म करता है पर उन करणांस तन्मई नहीं होना । शिल्पी आयुधोंको ग्रहण करता है पर उनसे तन्मई नहीं होता ऐसे ही जीव अनेक सहकार्ग उपकरणोंको ग्रहण करता है पर उनमे तन्मई नहीं होता। जैसे शिल्पी अपने फमक पलो .
समयसार टीका। भोगता है परंतु उससे तन्मई नहीं होता तैसे ही जीव कर्मोके फलको भोगता है परंतु तन्मई नहीं होता | शब्दार्थ सहित विशेषार्थ:- (जह) जैसे लोकमें (सिप्पिओ) सुनार आदि कारीगर (कम्म दु) सुवर्णके कुंडल आदिकोंके बनानेरूप कर्मको तो (कुव्वदि) करता है अर्थात् कुंडल आदि चीजोंको बनाता है (दुसो) परन्तु वह ( तम्मओ णयहोदि ) उस कुंडल आदि आभूषणसे तन्मई याने एकमेक नहीं हो जाता है (तह) तसे (जीवो विय) यह अज्ञानी जीव भी वीतराग स्वसंवेदन ज्ञानसे गिरा हुआ (कम्म कुबदि) ज्ञानावग्ण आदि द्रव्य कर्मोको करता है अर्थात् कर्मोको बांधता है। (णय तम्मओ होदि) परन्तु उन द्रव्य कर्मोक साथ तन्मयी याने एकमेकनहीं होनाता है।तथा (जह) जमे (सिप्पिओ) वहीं कारीगर (करणेहिंदु) हथौड़े आदि हथियारोंमे तो (कुन्वदि) उन कुंडलादिकोंको करता है याने बनाता है (द) परन्तु (सो तम्मओ णय होदि) वह उन हथियारोंसे तन्मयी याने एकमेक नहीं होजाना है (तह) तमे (जीवो) यह अज्ञानी जीव (करणेहिं कुम्वदि, मन, वचन, कायके व्यापार रूप द्रव्य- कर्मीको बांधनेवाले सहायक कारणोंसे द्रव्यकर्मको बांधता है (तम्मओ णय होदि) परन्तु उन करणोंके साथ तन्मयी नहीं होता है तथा (जह) जैसे (सिप्पी ) वही कारीगर (करणाणिय) उन हथौड़े आदि उपकरणोंको हाथसे पकड़ता है (टु) परन्तु (सो तम्मओ णय होदि) वह उस क्रियासे तन्मयी नहीं होता (तह) तसे (जीवो करणाणिय गिण्हदि ) जीव भी कौके उद- यके वशसे उन मन, वचन, कायके व्यापाररूप कर्मोके वांधनेवाले उपकरणोंको व्यवहार नयने ग्रहण करता है ( तम्मओ णयहोदि ) परन्तु वह जीव उनके साथ तन्मयी नहीं हो जाता है क्योंकि यह जीवतो सदा टंकोक्तीर्ण ज्ञाता दृष्टा स्वभाव रूप है। तथा (जह) जमे (मिप्पओ क्रम्म फलं भुनंदि) वह कारीगर अपने सुवर्णके कुंडलादि बनाकर उसकी मज़री पाकर उसके निमित्तसे भोजन पानादि खाता पीता है (दु सोवितम्मऊ णयहोदि) परन्तु वह उनमें भी तन्मई नहीं होता है (तह) तैसे (जीवो कम्मफलं भुनंदि) यह जीव भी अपनी शुद्धात्माकी भावनासे उत्पन्न मनोहर आनंद मई सुखके खादको नहीं पाता हुआ शुभ व अशुभ द्रव्यक- ौके फल रूप बाह्यमें मनोहर या अमनोज्ञ भोजन पानादि रूप फलको भोगता है (सोवित- म्मओ णय होदि) परन्तु वह उन फलोंसे तन्मयी नहीं होता है। भावार्थ:--यहां यह अभिप्राय है कि जैसे शिल्पी किसी शिल्पको हथियार आदि- कोंसे बनाता है और उसकी मजूरी पाकर उसके फलको भी भोगता है परन्तु वह शिल्पी वास्तवमें उस शिल्पसे, हथियारोंसे, व उसके फलसे जुदाही है-सत्ता शिल्पकी उनसे भिन्न है। शिल्पी केवल उनका निमित्त कारण है। ऐसे ही यह जीव भी अपने मन वचन कायके व्यापारोंसे द्रव्यकर्मको बांधता है पर वास्तवमें जीव इन सबसे भिन्न ही है जीव केवल निमित्त का है। निश्रय नयसे तो जीव इन सर्वसे भिन्न ही है। इसलिये निश्चय नयसे कर्ता कर्म .
BarakARRUAGORAKena
मपगमार दी।
भिन्न नहीं होसक्ते। दोनों एक ही वस्तु है ।। ३७८-३७९--३८०-३८६ ॥
आत्मा अपने भावोंका आप कर्ता है इसलिये उसके भाव ही उसके कर्म है। नीयो
और भी कहते है:-
गाथा:-एवं यवहारस्सश्त्तम दमणं समासेण ।
सुणु णिच्छयस्स बयणं परिणामकदं तुजं होदि ॥३८॥
संस्कृतार्थः-श्वं व्यवहाररय तु वक्तव्यं ददानं समान ।
शृणु निश्चयस्य नचन परिणामकृतं तु यन्द्रवति || ३८२ ।।
सामान्यार्थः
-इसतरह व्यवहार नयका सिद्धान्त संक्षेपसे कहा गया। अब है शिप्य:
निश्चय नवकी बात सुनो जो कि परिणाम हारा किया हुआ भाव होता है। शब्दार्य सहित
विशेषार्थ:-(एव) ऊपर लिखे प्रमाण ४ गाथाओं के द्वारा हे शिप्य ! (ववहारम्प दंसणं) द्रव्य-
काँका कर्ता व भोक्तारूप व्यवहार नयका सिद्धान्त (समामेण) संक्षेपमे वतन्यं) व्याख्यान
करना योग्य है । (णिञ्छ्यस्त वयण सुणु) अब निश्चय नयका वचन मुनो (जंतु परिणाम कद-
होदि).जो रागद्वेषादि विकल्प निमित्तसे उत्पन्न होता है । ३८२ ॥
गाथा:-जह सिपिओ चिटं कुचदि हदिय तहा अणपणी सो।
तह जीवोवि य कम्मं कुव्वदि हवदियअणण्णां सो ॥३८३।।
संस्कृतार्थ: :- यथा. शिलालु चेष्टां करोति भवति च तथानन्यस्तस्याः ।
तथा जीवोऽपि च कर्म करोति भवति चानन्यन्तन्मन् ॥ ३८३ ।।
सामान्यार्थः-जमे कारीगर चेष्टा करता है और उम चेष्टामे एकमेक होता है तो
जीव भी भाव कर्मको करता है और उससे एकमेक होजाता है । शब्दार्थ महित विशेषाधः-..
(जह) जैसे (सिप्पिओ दु) सुवर्णकार आदि कारीगर (चिट्ठ कुव्वदि) मैं कुंडल आदिकांको इस
तरह बनाउं, इसतरह बनाऊं ऐसी मनमें चेष्टा याने उत्साह करता है (तहाय) तथा (सो
अंणण्णो हवदि) उस चेष्टा या उत्साह के साथ बह एकनेक व तन्मय होजाता है तह) नसे
(जीवो विय) यह अज्ञानी जीव भी कम कुम्वदि) केवलज्ञान आदि स्वभावकी प्रकटता
रूप जो कार्य समयसार उसको सिद्ध करनेवाला जो विकल्परहित समाधिभाव नप कारण
समयसार है उसको न पाकर अशुद्ध निश्चय नयमेव अशुद्ध उपादान रूपसे मिथ्यात्त्व व राग-
द्वेष आदि रूप भावकमको करता है (सो अणग्णो हदिय) और उस भाव कर्मफे माध अनन्य
याने एकमेक तन्मय हो जाता है ।। ३८३ ॥
इस तरह भाष मे कापना गा अमे मीनापना रहने
गाया:-जह नि कुटतोओ पिच वृश्विदो होदि।
तत्तोलय अणपणी ता बनो ही जीवो ॥ ३८ ॥
ROVERNMEGHACHNANGERO २९८ समयसार टीका। संस्कृतार्थ:-यथा चष्टां कुर्वाणस्तु शिल्लिको नित्यदुःखता भवति । रस्साच्च स्यादनन्यस्तया चेष्टमानो दुःखी जीवः ॥ ३८४ ॥ सामान्यार्थ:-जैसे शिल्पी कुंडलादि वनानेकी चेष्टा करता हुआ नित्य दुःखित होता है और उस चेष्टासे अनन्य याने एकमेक होनाता है तेसे ही यह जीव अपने भाव काँसे एकमेक होकर दुःखी होता है। शब्दार्थ महित विशेपार्थः-(जह) जैसे (सिप्पिओ) वही सुवर्णकार कारीगर (चेहूँ कुव्वंतो दु) कुंडल आदिको इस तरह करूं, इसतरह करूं ऐसी मनमें चेष्टा या उद्यम करता हुआ णिच नित्य ही (दुक्खिदो होदि) चित्तके खेदसे दुःखी होता है। केवल दुःखी ही नहीं होता. (अणण्णो सेय) उस दुःख विकल्पके अनुभवरूप भावसे तन्मय होजाता है (तह) तसे (चेटुंतो) विशुद्ध ज्ञान, दर्शन आदिकी प्रकटतारूप कार्य समयागारका साधक नो निश्रय रत्नत्रय स्वरूप कारण समयसार है उसको न पाकर सुख दुःख भोगनेक वक्तमें हर्ष या विपाद- रूप चेष्टाको करता हुआ (जीवो) यह अज्ञानी जीव (दुही) मनमें दुःखी होता है और उम हर्ष व विपादरूप अपने भावोंके परिणमनरूप चेष्टासे अशुद्ध निश्चय व अशुद्ध उपादान रूपसे एकमेक होजाता है। भावार्थ:-जैसे शिल्पी कुंडलादिको हथौड़े आदि उपकरणोंसे बनाता है और उसके द्रव्य व भोजन पान प्राप्तिरूप फल को भोगता है तो भी वह कुंडल, व उसके बनानेके उपकरण व द्रव्य व भोजनादि यह सब परद्रव्य हैं. इनसे शिल्पीका खरूप एकमेक नहीं होता । परंतु जो वह कुंडल वनानेरूप भावोंको अपनेमें करता है उनभावोंसे तो वह अवश्य तन्मय होजाता है । तैसे ही अज्ञानी जीव व्यवहार नयसे जो द्रव्य कर्म, नोकर्म व अन्य घट पटादि पादार्थोका कर्ता कहनेमें आता है सो यह जीव इन पदार्थोसे अन्य है, उनमें तन्मई नहीं होता परंतु जो वह रागद्वेषरूप व सुख व दुःखके अनुभवरूप भावको करता है उससे अवश्य तन्मई हो जाता है । अर्थात् जीवका परिणमन जीवमें और पुद्गलका पुद्गलमें होता है । इसतरह पूर्वकी गाथाओंमें कहे प्रमाण अज्ञानी जीव विकल्प रहित स्वसंवेदनज्ञानसे गिरा हुआ सुवर्णकार आदिके दृष्टान्तसे व्यवहार नय करके द्रव्यकर्मीको करता है और भोगता है तैसे ही अशुद्ध निश्चय नयसे रागद्वेषादिभाव कोका करता और भोगता है ॥ ३८४ ॥ आगे कहते है कि ज्ञान ज्ञेय पदार्थोंको जानता है तौभी जैसे सफेद दीवालमें सफेद चूना निश्चयसे दीवालसे एकमेक नही होता ऐसे ही ज्ञान ज्ञेयोंके साथ तन्मय नही होता है। इसतरह निधय नयकी मुख्यतासे पांच गाथाएं हैं तथा जैसे स्वेत मिट्टी.या खड़िया या चूना दीवालको राफेल करता है ऐसा व्यवहार किया जाता है तैसे ही जान ज्ञय तुओंको मात्र जाता ही है ऐसा व्यवहार है इसतरह व्यवहारकी मुख्यतासे । पांच गाथाएं है। इस तरह समुदायसे १० गाथाएं हैं।
समयसार टाकां। गाथा:-जह सेटिया दुण परस्स सेटिया सेटिया य सा होदि। तह जाणगोदु ण परस्स जाणगो जाणगो लोदु ॥३८॥ जह सेटियाण परस्त सेटिया सेदिया य सा होदि । तह पस्सगोदुण परस्स पस्लगो परसगो सोनु ॥३८॥ जह सेटिया दु ण परस्स सेटिया सेटिया दु मा होदि। तह संजदो दु ण परस्स संजदो संजदो सोतु ॥३८॥ जह सेटिया दु ण परस्स सेटिया सेटिया दुसा होदि । तह दसणं दुण परस्स दंसणं दसणं तंतु ॥ ३८८॥ संस्कृतार्थः-यथा सेटिका तु न परस्य सेटिका सेटिका च सा भवति । तथा ज्ञायकानु न परस्य ज्ञायको नायकः स तु ॥ ३८५ ॥ यथा सेटिका तु न परस्य सेटिका सटिका च स भवति । तथा दर्शकस्तु न परस्य दर्शको दर्शक: स तु ॥ ३८६ ॥ यथा सेटिकातु न परस्य सेटिका सेटिका च सा भवति । तथा संयतस्तु न परस्य संयतः संयतः स नु || ३८७ ॥ यथा सेटिका तु न परस्य सटिका च सा भवति । तथा दर्शनं तु न परस्य दर्शन दर्शनं तत्तु ॥ ३८८ ॥ विशेष व सामान्यार्थः-(जह) इस लोकमें (सेटिया) खड़िया मट्टी (परम्म) भीन आदि परद्रव्य के साथ निश्चयसे तन्मयी (णदु) नहीं होती, बाहरके ही भागमें रहती है अर्थात् (सा सेटिया) वह खड़िया मिट्टी (सेटिया दु होदि ) खड़िया मिट्टी ही रहती अपने स्वरूपको नहीं छोड़ती (तह) तैसे ही (जाणगो) जाननेवाला ज्ञाता, दृष्टा (दु) भी (परस्स ण) पर जो घटपट आदि ज्ञेय पदार्थ उनका अर्थात् उनरूप निश्चय नहीं होता अर्थात् तन्मई नहीं होता (जाणगो सोदु जाणगो) जो जाननेवाला है मो ही जाननवाला होता है अर्थात् ज्ञाता अपने . स्वरूपमें ही ठहरता है (आगना दादा सुगम है ।) इस गाथामें यह कहा गया कि ब्रह्म अद्वैतवादी कहते हैं कि ज्ञान जयसागसे परिणमन कर जाता है उस तरह यह ज्ञायक आत्मा जय जो पर है उसरूप परिपालन नहीं करता। इसी ही खेत मृत्तिकाके दृष्टान्तमे देखनेवाला आत्मा उदय- देखने योग्य जी घट, पट आदि पदार्थ उनका निश्चयसे देखनेवाला नहीं है अति ननावी नाही होता है। अर्थात् जो दर्शक है, सो दर्शक ही रहता है, अपने म्याप ही कलामा अर्थ है । इसतरह दर्शकका सत्ता मात्र अवलोकनरूप दर्शन गुण दृश्य को देखने योग्य पदार्थ उस रूपसे नहीं परिणमन करता है। इसी प्रकार इमी ही वेन मूनिकांक दृष्टान्त संजद अर्थात् संयम रूप आत्मा त्यागने योग्य जो परिग्रह आदि पर द्रव्य उनशा निश्रय समयसार का। 50: AMRATAPER - त्यागनेवाला नहीं होता अर्थात् त्याग करने वि तन्मयी नहीं होता तो फिर क्यों होता है। संयमी संयमी ही रहता है। अर्थात् विकार रहित अपने आत्माके मनोहर आनंदमई स्वरूप रूप लक्षणको रखनेवाले अपने स्वभावमें ही ठहरता है। इसतरह वीतराग चारित्रकी मुख्य- तासे कहा। उसी ही प्रकारसे इसी ही श्वेत मृत्तिकाके दृष्टान्तसे (परस्सदसणं गदु) परका अर्थात् जीवादि पदार्थोंका श्रद्धानरूप सम्यग्दर्शन नहीं होता अर्थात् निश्चय नयसे उनका श्रद्धान करनेवाला नहीं होता अर्थात् पर पदार्थोके अम्बानमें तन्मई नहीं होता तो फिर क्या होता है कि सम्यग्दर्शन स्वरूप आत्मा सम्यग्दर्शन खरूप ही रहता है, अपने ही स्वरूपमें ठहरता है। इस तरह तत्त्वार्थ श्रद्धान लक्षण सम्यग्दर्शनकी मुख्यतासे गाथा हुई। भावार्थः-निश्चय नयसे आत्मा स्वयं ज्ञाता, दृष्टा, संयमरूप, व श्रद्धान रूप है क्योंकि यह सर्व ही आत्माका परिणाम है॥३८५-३८६-३८७-३८८ ॥ आगे फिर भी यही कहत है: गाथाः--एवं तु णिच्छयणयस्त भासिदं णाणदसणचरित्ते। सुणु ववहारणयस्सय वत्तव्वं से समासेण ।। ३८२ ॥ संस्कृतार्थ:-एवं तु निश्चयनयस्य भाषितं शानदर्शनचरित्रे। शृणु व्यवहारनवस्य च वक्तव्यं तस्य समासेन ॥३८९॥ सामान्यार्थः-इस प्रकार निश्चय नयसे सम्यग्दर्शन ज्ञान और चारित्रको कहा गया। अब व्यवहार नयका कथन सुनो जो कि संक्षेपसे कहा जाता है ।। शब्दार्थ महित विशेषार्थ:- (एवंतु) ऊपर कही हुई चार गाथाओंसे) (गाण दंसण चरिते) सम्यग्दर्शन, ज्ञान, चारित्रके सम्ब- न्धमें (णिच्छय णयस्स) निश्चय नयके द्वारा (भासिदं) कथन किया गया। (च) अब हे शिष्य ! (से) उस रत्नत्रयका (समासेण) संक्षेपसे (वत्तव्ब) कथन (ववहारणयस्स) व्यवहार नयके द्वारा- (सुणु) सुनो ॥ ३८९ ॥ इसतरह निश्चय नयके द्वारा ५ गाथाएं कही गई। अब व्यवहार नयका वर्णन करते है - गाथा:-जह परदव्वं सेटदि हु सेटिया अप्पणी सहावेण । तह परव्वं जाणदि णादावि सएण भावेण ॥ ३९० ॥ संस्कृतार्थ:- -~यथा परदव्यं सेटयति खलु सेटिकात्मनः स्वभावेन । तगा परद्रव्यं जानाति ज्ञातापि रूकेन भवेन ॥ ३९० ।। विशेष सहित सामान्यार्थ:-(जह) जैसे व जिस प्रकारसे इस लोकमें सेटिया) श्वेत (मिट्टी) (अप्पणो सहावेण अपने ही श्वेत भावसे (परदव्वं भीत आदि पर द्रव्यको (सेटदिहु) व्यवहार नयसे सफेद करदेती है परन्तु मीत आदि पर द्रव्योके साथ तन्मयी याने एकमेक नहीं होती (तह) तैसे इसी श्वेत मिट्टीके इष्टान्तसे णादा वि) जाननेवाला आना भी ( सयेण .
. समयसार टीका 'भावेण) अपने ही ज्ञान मांवमे परदव्यं) घट आदि ज्ञेयरूप पर द्रव्योंको (जागदि) व्यवहार नयसे जानता है परन्तु उनके साथ तन्मयी नहीं होता। भावार्थ:-जम पहले कहा था कि निश्चय नयसे ज्ञाता अपने स्वरूपमें ही रहता है वसे यहां भी कहा कि यद्यपि व्यवहार नयसे हम कहते हैं कि आत्मा पर वस्तुओंको जानता है तो भी वह उनके माथ नन्मई न होकर अपने स्वरूपमें ही रहता ह ॥ ३९० ॥ गाथा:-जह परदव्य सेटदि हु सेटिया अप्पणी सहावेण । तह परदव्वं पस्सदि जीवोवि सएण भावेण ! ३९१ ॥ संस्कृतार्य-यया परद्रव्यं रोटयति खलु मेटिकात्मनः स्वभावेन । तथा परद्रव्य पश्यांत जीवोऽपि स्वकेन मावेन ॥ ३९१ ॥ सामान्यार्थ. विशेष माहितः-(नह) तमे (सटिया) खड़िया मिट्टी (परदव्यं) भान आदि पर द्रव्यको (अप्पणो सहावेण) अपने स्वभावमे (मेटदिहु) व्यवहार नयस मफेद करती है (तह) तसे (जीवोवि) यह जीव भी (सएण भावेण) अपने ही दृष्टामई स्वभावमे (परदव्व) घर पट आदि पर द्रव्योंको (पम्सदि) व्यवहार नयमे देखता है परन्तु उनमें तन्मयी नहीं होता। :-भावार्थ:-जैसे पहले कहा था कि निश्चय नयसे दृष्टा अपने स्वरूपमें ही रहता है. बस यहां भी कहा है कि यद्यपि व्यवहार नयसे हम कहते हैं कि आत्मा पर वस्तुओंको देखता है तो भी वह उनके साथ तन्मई न होकर अपने स्वरूपमें ही रहता है । ॥ ३९ ॥ गाथा:-जह परदव्वं संसदि हुसेटिया अपणो सहावेण । तह परदव्यं विरमदिणादावि सएण भावेण ॥ ३९२ ।। संस्कृतार्थः-यथा परद्रव्यं सेटयति सेटिकामनः स्वणवेन । तथा परद्रव्यं विजदाति ज्ञातापि स्वकेन मावेन ॥ ३९२ ॥ शब्दार्थ सहित अर्थः- (जह) जसे (मेटिया) मफेद मिट्टी (अप्पणो महावण) अपने ही स्वभावसे ( परदव्यं सेटदिहु.) भीत आदि परद्रव्यको मफंड करती है ( तह ) इमी नाह ( णादा वि ) ज्ञाता आत्मा भी (सएण भावेण ) अपने ही विकल्प हिन समाधि परिणाम (पर दव्यं विरमति) परग्रहादिक परद्रव्यांको त्यागता है ऐसा व्यवहार नयसे कहा जाता है। वास्तवमें ज्ञाता परद्रव्यक साथ तन्मई नहीं होता । ।। ३९२ ।। गाया:-जह परदवं सेवादि हुसेठिया अपणो सहावेण । तह परदव्यं सहदि सम्मादिट्टी सहावेण ३९ ॥ संस्कृतार्थ:--यथा पद्रिव्य सेट ते मनः भायन । तथा पर अपने विभाग |॥ ३९३ शब्दार्थ नाम:~-जा) मजे (लेठिया: संकंद मिट्टी भयो नहायण) भने ही सफेद स्वभावसे (परदम) आदि पव्ययो सियनिह) पोड करना है न ARRIANRNRNORLD १०१ समयसार टीका। (सम्मादिट्ठी) सम्यग्दृष्टि जीव (सहावेन) अपने ही श्रद्धानरूप परिणामसे (परदव्वं सद्दहदि) जीवादि परद्रव्योंका श्रद्धान करता है ऐसा व्यवहार नयसे कहा जाता है पर वास्तवमें वह परद्रव्योंके साथ तन्मई नहीं होता ॥ ३९३ ॥ गायाः-एसो ववहारस्स दु विणिच्छओ णाणदसणचरित्ते । भणिदो अण्णेसु वि पज्जएतु एमेव णादवो ॥ ३१४ ॥ संस्कृतार्थः एषः व्यवहारस्य तु विनिश्चयो ज्ञानदर्शनचरित्रे । भणितोऽन्येष्वपि पर्यायेषु एवमेव ज्ञातव्यः ॥ ३९४ ॥ सामान्यार्थ:-इसतरह व्यवहार नयसे सम्यग्दर्शन ज्ञानचारित्रका निश्चय कहा गया । इसी तरह और पर्यायोंमें भी समझना चाहिये । शब्दार्थ सहित विशेपार्थ:--(एमो) इस प्रकार पूर्वमें कही हुई चार गाथाओंके द्वारा (ववहारस्स) व्यवहार नयस (णाण दंसण चरिते) सम्यग्दर्शन, ज्ञान,चारित्रका (विणिच्छओ) व्यवहारका अनुयायी व व्यवहार सम्बन्धी निश्चयरूप (मणिदो) कथन कहा गया (अण्णेसु पज्जएसु वि) और पर्यायोंमें भी ( एमेव ) इसी तरह णादव्वो) जानना चाहिये । यह लाडू आदि मेरे द्वारा खाया गया, यह विष कंटक आदि मेरे द्वारा छोड़ा गया, यह घर आदि मेरेसे वनवाया गया यह सव व्यवहार नयसे कहा जाता है । निश्चयसे तो केवल अपना रागडेपरूप परिणाम ही किया गया और वही भोगा गया, इसी तरह और पर्यायोंमें भी निश्चय व्यवहार नयका विभाग जानना चाहिये । यहां पर कोई वादी पूर्व पक्ष करता है कि जो सर्वज्ञ व्यवहार नयसे परद्रव्यको जानते हैं तो निश्चयसे सर्वज्ञ नहीं हैं, इसका समाधान आचार्य करते हैं कि जैसे अपने आत्मीक सुख आदिको तन्मय होकरके जानते हैं तैसे वाह्य द्रव्यको नहीं जानते इस कारणसे कहा जाता है कि व्यवहार नयसे सर्वज्ञ जानते हैं, यदि दूसरोंके सुख आदिको अपने आत्मीक सुखके समान तन्मय होकर जानें तो जैसे अपने आत्मीक सुखके अनुभवमें सुखी होते हैं तैसे दूसरेके सुख दुःखके अनुभवके कालमें सुखी और दुःखी हो जावें सो ऐसा हो नहीं सक्ता, यद्यपि अपने आत्मीक सुखके अनुभवकी अपेक्षा निश्चय और परके सुख अनुभवकी अपेक्षा व्यवहार है तो भी छद्मस्थ जनकी अपेक्षा सो ही निश्चय है, क्योंकि छमस्थ सर्वज्ञ नहीं और केवली सर्वज्ञ हैं) यहां फिर शिष्यने कहा कि सौगत अर्थात् चौद्ध भी कहता है कि व्यवहारसे सर्वज्ञ है उसको दूषण क्यों दिया जाता है। इसका समाधान आचार्य करते हैं कि बौद्ध आदिकोंके मतमें जैसे निश्चयकी अपेक्षा व्यवहार मिथ्या है वैसे व्यवहाररूपसे भी व्यवहार सत्य नहीं है । परन्तु जैनमतमें व्यवहारनय यद्यपि निश्चय नयकी अपेक्षासे मिथ्या है तो भी व्यवहाररूपसे सत्त्य है। यदि लोक व्यवहार व्यवहाररूपसे भी सत्य न होय तो सर्व ही लोक व्यवहार मिथ्या हो जावे ऐसा होनेपर अति प्रसंग हो जाय, अर्थात प्रसंगसे बाहर हो जाय इससे यह समयसार टीका। ERNMENEUResexcixcex मुझे लाडू, सुख भया सो ३०३ कहना ठीक है कि यह आत्मा व्यवहार नयसे परद्रव्योंको देखता जानता है. परन्तु निश्श्रयम तो अपने ही आत्म द्रव्यको ही देखता और जानता है । इससे यह सिद्ध हुआ कि नो ब्रह्म अद्वैतवादी ऐसा कहते हैं कि ग्राम बाग आदि सर्व यह ब्रह्मरूप ज्ञेय पदार्थ कुछ भी नहीं है उनका निषेध है। तथा जो सौगत याने बौद्ध कहते हैं कि ज्ञान ही घट, पट आदि ज्ञेयके आकाररूपसे परिणमता है ज्ञानसे भिन्न कोई भी ज्ञेय पदार्थ नहीं है उनका कथन भी निषेधा गया, क्योंकि यदि ज्ञान ज्ञेयरूपसे परिणमन करे तो ज्ञानका अभाव हां नाय, और यदि ज्ञेय पदार्थ ज्ञानरूपसे परिणमन करे तो ज्ञेयका अभाव हो जाय ऐसा होनेपर दोनोंको शुन्यपना आजायगा यह प्रत्यक्षसे विरोध है । इसतरह निश्चय व्यबहारकी मुन्यताम समुदायसे सातवें स्थलमें १० सूत्र पूर्ण हुए। भावार्थ:: -ऊपरके कथनका खुलासा यह है कि निश्चय नयसे प्रत्येक द्रव्य अपने ही द्रव्यत्वमें परिणमन करता है परन्द्रव्यके विर्ष परद्रव्य केवल निमित्त कारण है-उस निमित्तकी अपेक्षा एकको दूसरेका कत्ती कहा जाता है । सो ही कहा गया कि आत्मा शुद्ध दशामें अपने शुद्ध भावोंका कत्ती और भोक्ता है तथा अशुद्ध दशामें अपने अशुद्ध राग आदि भावोंका कर्ता और भोक्ता है। किमीने कहा कि खानेसे सुख तो उसके उस राग भावके अनुभवसे हुआ जो उसने राग परिणति उस लाड़के खानेमें की, इसी तरह सर्वज्ञ भी निश्चयसे अपने स्त्र स्वरूपके ज्ञाता है उसीमें तन्मय हैं, उनका स्वभाव म्व पर ज्ञायक स्वरूप है इससे उनके ज्ञानमें मवही ज्ञेय स्वयं झलकते हैं वह जगतको जानते हैं यह कहना व्यवहार है। इसीसे वह बात कहीगई कि निश्चयमे आत्मा स्वयं सम्यग्दर्शन ज्ञान चरित्ररूप है ।। ३९४ ।। आगे उपदेश करते है कि निश्चय प्रतिक्रमण निश्चय प्रत्याग्न्यान निश्चय आलोचनामें परिणमन करनेवाला तपोधन अर्थात् मुनि अभेद निश्चय नयमे निदनय वाग्विार होता है। गाथा:-कम्मं जं पुवकयं सुहासुहमणेयरित्यरविसेमं । तत्तो णियत्तदे अप्पयं तु जो सो पडिक्षमणं ॥ ३१॥ संस्कृतार्थ:-कर्म यत्यूवंकृतं शमाशुभमनेकविस्तर विशेष । तस्मानिवर्तयत्यात्मानं नु यः स प्रतिक्रमणं ।। ३९५ ॥ सामान्यार्थ:-जो पहले शुभ या अशुभ अनेक विस्ताररूप भेदको लिये हुए कर्म किये हों उससे जो अपने आत्माको हटाता है वह प्रतिक्रमणरूप है । इन्द्राय सहिन विशेषार्थ:-(नं पुन्य कयं) जो पहले बांधे गए या किये गा (मुह अनुहं) शुभ या अशुभ (अणेयवित्थर विसेस मूल प्रकृति और उत्तर प्रगति भेदोंसे अनेक विस्तारको रखनेवाले ( कर्म हैं (तत्तो) उन कर्मोम (जो दु) जो कोई इस लोक व परलोककी इन्कारप अपनी प्रमिन्दि. पुना. लाभ व देखे, सुने, अनुभव किये हुए भोगोंकी इच्छारूप निदान कर भादिम पर - ameswwwxMORMERMAmers समयसार रीका। PRORRRRRRULGHAALORSAPAN ३०४ द्रव्योंके आलम्बनमे पैदा होनेवाले शुभ और अशुभ विकल्पोंसे रहित अर्थात् शून्य और विशुद्ध-ज्ञान दर्शन स्वभावमई आत्मीक तत्त्वका यथार्थ श्रद्धान, ज्ञान और अनुभवरूप अभेद अर्थात् निश्चय रत्नत्रयमई निर्विकल्प परम समाधिसे पैदा होनेवाले वीतराग और सहज परमा- नंद स्वभावका.सुख रसका आस्वाद रूप जो समरसी भाव अर्थात समता भावसे पूर्ण भरे हुए ऐसे केवल ज्ञान आदि अनन्त चतुष्टयको प्रकाश करनेवाले कार्य समयमारके उत्पन्न करनेवाले कारण समयसार अर्थात् कारणरूप शुद्धात्माके अनुभवमें ठहरकर (अप्पयं) अपने आत्माको (णिय- तदे) हटाता है (सो पडिक्कमणं) सो पुरुष अभेद नयसे निश्चय प्रतिक्रमण रूप होता है। भावार्थ:--जो पुरुष सर्व पर द्रव्योंके आलम्बनसे रहित होकर व सर्व प्रकारकी इच्छाओंको रोक कर व्यवहार रत्नत्रयमें सावधान होता हुआ निश्चय रत्नत्रय जो कि वास्तवमें शुद्वात्माका श्रद्धान, ज्ञान, चारित्ररूप है और साक्षात् आत्मानुभव स्वरूप है उसमें ठहरे कर अपने शुद्ध आत्माको ध्याता है वह वास्तवमें निश्चय प्रतिक्रमणरूप है क्योंकि वह पूर्वमें वांधे हुए सम- स्त कर्मोसे अपने रागको छोड़ देता है। निश्चय प्रतिक्रमणका यही स्वरूप है। व्यवहार प्रति- क्रमण गत दोषोंके दूर करनेके लिये उनका मननरूप व अपनी निंदारूप है पर निश्चय निज स्वभावमें तन्मय रूप है ॥ ३९५ ॥ आगे निश्चय प्रत्याख्यानका स्वरूप कहते हैं:- गाथा:-कम्मं जं सुहमसुहं जलिय भावेण वज्झदि भविस्स। तत्तो णियत्तदे जो सो पञ्चक्खाणं हवे चेदा ॥ ३०६ ।। संस्कृतार्थ:-कर्म रच्छुभमशुभं यस्मिंश्च भावे वध्यते भविष्यत् । तस्मानिवर्तते यः स प्रत्याख्यानं भवति चयिता || ३९६ ॥ सामान्यार्थः-जो शुभ या अशुभ कर्म भविप्यमें जिस भावसे बंध होगा उससे जो कोई अपनेको हटाता है वह आत्मा प्रत्याख्यानरूप होता है। शब्दार्थ सहित विशेषार्थ:- (जं सुहम्) जो शुभ तथा (असुहं) अशुभ (कंम) कर्म अनेक प्रकार (भविस्स) आगामी कालमें (जह्मिय भावे) जिस मिथ्यात्त्व व रागद्वेष आदि परिणामोंके होते हुए (वज्झदि) बंध होता है (तत्तो) उस शुभ या अशुभ कर्मसे (जो जो कोई अनंत ज्ञान अनंत दर्शन अनंत सुख, अनंत वीर्य आदि स्वरूपमई आत्मद्रव्यके यथार्थ अहान, ज्ञान, और अनुभवमई अभेद रत्नत्रय लक्षणको रखनेवाले परमसामायिक भावमें ठहरकर (णियत्तदे)अपनेको निर्वत करता है याने हटाता है (सो चेदा) वह चेतनेवाला तपोधन आत्मा ही (पञ्चक्खाणं) अभेद नयसे निश्चय प्रत्याख्यान रूप (हवे) होता है। भावार्थः-यद्यपि व्यवहार नयमे आगामी दोपोंके न करनेकी प्रतिज्ञा ही व दृढ़ संकल्प ही प्रत्याख्यान है परन्तु निश्चयसे अपने शुद्ध आत्म स्वरूपका श्रद्धान. ज्ञान, तथा अनुभव जो अभेद रत्नत्रय स्वरूप है वही प्रत्याख्यान है तथा जो पुरुप अर्थात् तपस्वी इस निश्चय प्रत्या- areer सपयसार टीका। म्यानमें तन्मय होता है वह स्वयं ग्रन्यान्यानरूप है। क्योंकि भाव और भाववान में एकता है। ऐसा जानना ॥ ३९६ ॥ आगे निदवय आलोचनायी कहते है:- गाथाः--जं सुहमराहमुदिण्णं संपडिय अणेयवित्यरविसेस । तं दोसं जो चेदादि स खलु आलोयणं चदा ॥ ३९७ ।। संस्कृतार्थ:- यच्छुभमशुभमुद्री संगीत चाने कविन्तरविवार । तं दोपं यश्चतयते स खल्वालंच तयिता ॥ ३९७ ॥ मामान्यार्थ:-~-जो शुभ या अशुभ अनेक प्रकारके उद्भयमें आए हुए वर्तमानक कोको अर्थात इस वर्तमानके अपने दोपको जो कोई वेदता है, भन्ने प्रकार जानता है या अनुभव करता है वह आत्मा वास्तवमें आलोचना म्वरूप है। शब्दार्थ सहित विशेषार्थ:- (ज) जो (संपड़ि, वर्तमानमें (उदिण्णं) उदयमें आए हुए. (अणेय वित्थरविसेम) अनेक विस्तारको लिये हुए मूल और उत्तर प्रकृतिरूपी (सुहं असुई) शुभ और अशुभ कर्मोका (लं दाम) यह मेरा दोष है, मेरा निज स्वरूप नहीं है ऐमा (जो) जो (चेदा) कोई आत्मा नित्य आनंदमई एक स्वभावरूप शुद्ध आत्माका यथार्थ श्रद्धान, ज्ञान और अनुभव स्वरूप अभेद, रत्नत्रयमें, अर्थात् सुख, दुःख, जीना, मरना आदिक सन्बन्धमें सब तरहमे उपेक्षा करनेवाले संयममें ठहरकर (वेददि अनुभव करता है तथा जानता है (सो. वह ज्ञानी पुरुष ही (ख) निश्चयसे (आलोयण) अभेद नयके द्वारा विचारनेपर निश्चय आलोचना स्वरूप होता है प्रमा जानना योग्य है । भारी-जो कोई वर्तमान में उदय आप हा कोको अपने शुद्ध आत्म- स्वरूपसे भिन्न अनुभव करता है तथा अपने अभेद रत्नत्रयमें तन्मय होता है उमीक नित्रय आलोचना होती है तथा भाव और भाववान प्रदेशांकी कंपना एक ही हैं इससे वह आलोचना करनेवाला मुनि स्वयं आलोचना स्वरूप है ।। १०.७ ॥ आगे समुदायहर माया कहते हैं- गाथा:-णिचं पथक्खागं यदि णिपि जो पडिकमदि। णि आलोचेदिनी रिनं यदि चेदा ॥८॥ संस्कृतार्थ:-नित्यं प्रत्याख्यानं करोति नियपि यस्तु प्रतिन मति । नियमालोचति स बटु वान्ध भयत चनाय । ॥ ३१८ ॥ सामान्याधः-जो कोई नित्य प्रत्याख्यान करता है, जो नई निन्य ही प्रतिक्रमण करता है, व नित्य ही आलोचना करता है, वहीं निश्चयन आन्ना नारिवलय है। मान्दार्थ सहित विशेष::-- मोदु जो कोई निशय रत्नत्रय लमको व्यपाले शुद्ध आमा स्वरूपमें ठहरकर (णिच्च) नित्य ही पञ्चकन्याण ) निश्चय प्रत्याभ्यानको (कदि) करना समयसार टीका। R-50SAGENTLE: ३०६ है व (णिच्वंपि) सर्व कालमें ही पडिक्कमदि) निश्चय प्रतिक्रमण करता है तथा ( णिच्च ) नित्य ही (आलोचेयदि निश्चय आलोचना करता है (सोचेदा हु वह चेतनेवाला आत्मा ही (चरित्रं हवदि) अभेद नयसे निश्चय चारित्ररूप होता है, क्योंकि शुद्ध आत्मीक स्वरूपमें चलना सो चारित्र है ऐसा आगमका वचन है। भावार्थ:--शुद्ध आत्मस्वरूपका श्रद्धान ज्ञान करके जो अपने शुद्ध स्वरूपमें लीन होता है। उसके निश्चयसे प्रतिक्रमण प्रत्याख्यान और आलोचना व चारित्र सर्व है । ॥ ३९८ ॥ इस तरह निश्चय प्रतिक्रमण प्रत्याख्यान और आलोचना तथा चारित्रको व्याख्यान करते हुए आठवें स्थलमें ४ गाथाएं पूर्ण हुई। आगे कहते है कि मिथ्याज्ञानमें परिणमन करता हुआ ही जीव पांच इन्द्रिय और मनके विषयों में गग और द्वेप करता है। गाथा:--णिदिदसंधुदद्वयणाणि पोग्गला परिणमंति पहुगाणि । ताणि सुणिऊण रूसदि तृसदिय अहं पुणो भणिदो ॥३९९॥ संस्कृतार्थः-निंदितसंस्तुतवचनानि पुद्गला: परिणमंति बहुकानि | तानि श्रुत्वा रुष्यति तुष्यति च पुनरई भणित: ॥ ३९९ ॥ सामान्यार्थः--निन्दा व स्तुतिके वचनरूप बहुत प्रकारके पुद्गल परिणमन करते हैं। उनको सुनकर अज्ञानी जीव यह समझता है कि वे वचन मुझे कहे गए ऐसा जान क्रोध करता है, तथाखुश होता है। शब्दार्थ सहित विशेषार्थ:-(पोग्गला) पुद्गल द्रव्य अर्थात् भाषावर्ग- णारूप पुद्गलद्रव्य (बहुगाणि) नाना प्रकारके (णिदिद संयुद वयणाणि) निन्दा और स्तुतिके वचनरूप (परिणमंति) परिणमन करते हैं । (ताणि सुणिऊण) उनको सुन करके (पुणो अहं भणिदो) फिर वे वचन मुझे कहे गए ऐसा समझ (रूसदि य तुसदि) अज्ञानी जीव रोष करता है और हर्षित होता है । वह अज्ञानी जीव वस्तुस्वरूपको नहीं पहचानता है । क्योंकि उसको निश्चय कारण समयसारका लाभ नहीं हुआ है। एकेन्द्रिय, विकलेन्द्रिय आदिका भव ही पाना परंपरासे बहुत ही दुर्लभ है अर्थात् एकेन्द्रियसे त्रस होना अति कठिन है तो भी वह अज्ञानी जीव इन भवोंमें भ्रमण करता हुआ बीते हुए अनंतकालमें देखे, सुने, अनु- भए मिथ्यात्त्व व विषय कषाय आदि विभाव परिणामोंके आधीन रहता है। इससे बड़ी कठिनतासे पाने योग्य काल आदि लब्धिके वशसे अर्थात् क्षयोपशम आदि लब्धियोंके क्शसे मिथ्यात्व आदि सात प्रकृतियोंके तैसे ही चारित्र मोहनीयके उपशम, क्षयोपशम व क्षय होनेसे छः द्रव्य, पंचा- स्तिकाय, सात तत्त्व, ९ पदार्थ आदिकोंका श्रद्धान ज्ञान व रागहेषके त्यागरूप ऐसा भेदरूप सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक् चारित्रमई व्यवहार मोक्ष मार्ग नामके व्यवहार कारण सम- यसारको पाता है। फिर उसके द्वारा साधन योग्य विशुद्ध ज्ञान, दर्शन, स्वभावरूप शुद्ध आ- समयसार टीका। DEEMBERARKEnima त्मीक तत्वका यथार्थ अहान, ज्ञान और आचरणरूप अभेद गलत्रय मई निर्विकल समाधि. मई निश्चय कारण समयमारको पाता है जो कि केवलज्ञान, दर्शन, मुख, चीझ भन्न चतुष्टयकी प्रकटतामई कार्य समयमारका पैदा करनेवाला है ।। भावार्थ:-अज्ञानी जीव व्यवहार व निश्चय गन्नत्रयमई मोक्षमागको न पाता हुआ शब्दादिकोंको मुनके ऐसा समझता है कि यह मेरेको लग गए और उनमे कमी काय करना है व कमी हर्षित होता है। ज्ञानी जीव व्यवहार और निश्चय मोक्ष मार्ग स्यपदा प्रश्न कारण. समयमारको जान करके बाह्यके इष्ट और अनिष्ट पदायाम गर और हेप नहीं करता है। शब्दोंको भी पुद्गलमई भाषा वगंणाका कार्य ममझना है । ज्ञानी नीव निज शुढ आम स्वरूपका यथार्थ श्रद्धानी रहता है इससे बाह्य इष्ट नया अनिष्ट पदार्थोक यथाध स्वरूपी विचार समभाव रखता है।।।३९९ ॥ आगे अज्ञानी जीपको फिर भी नमनात है। गाया:-पोग्गलदव्वं सदुत्तह परिणदं तस्म जदि गुणा अण्णा । तमा ण तुमं भणिदो किंचिवि किं रूससे अबुहा ॥१०॥ संस्कृतार्थ:-पुदलद्रव्यं शब्दत्वपरिणतं तत्य यदि गुणोऽन्यः । तस्मान्न त्वां भणितः किंचिदीय कि सत्यस्यबुदः ॥ ४.० ॥ सामान्यार्थः-पुद्गल द्रव्य शब्दरूप परिणमन होता है यदि उसका गुण शुद्ध आ- मासे भिन्न है तब वह शब्द तुम्हें कुछ भी नहीं कहा गया । यह अन्नानी जीव क्यों क्रोध करता है ? शब्दार्थ सहित विशेषार्थः-'पुग्गल दव्वं) भाषा वर्गणा योग्य पुगन्नद्रव्य (मदुनह परिणद) 'तृमर' 'तृनी इस तरहके निन्द्रारूप व स्तुति रूप शब्दोंकी अवस्था परिणमन होते हैं। (जदि) यदि (तमस गुणो) उस पुगल द्रव्यका गुण (अण्णा) शुद्ध आन्मांक वापस भिन्न जरूप है तो फिर इस जीवका क्या बिगड़ा ! कुछ भी नहीं विगंडा। यहां पर आचार्य उस अज्ञानी जीवको सम्बोधन करके कहते हैं, जो एवंने कहे हुए प्रमाण व्यवहार कारण समयसार और निश्चय कारण समयसाग्मे रहित है । कि है (अनुहो) अदुह दिनमः जीव : क्योंकि निन्द्रा और नुतिके वचनरूप पुगलांका परिणमन हुआ है (नया) इसका (तुम) तुमको (किंचिवि) कुछ भी (ण मणिदो) नहीं कहा गया है किंकम) कचों कोश करता है। भावार्थ:-अज्ञानी वहिगत्मा जीव क्रोधादिक व निन्दार, बचन सुन चिन बुरा मानता है तथा क्रोध करता है उसको आचार्य समझाने हैं कि हे भानी नीव ने निश्चयसे निन्दा व स्तुतिके शब्दोंक वरूपको विचार कर! ना प्रकट होगा कि टन शब्दोंकी पर्यायमें भाषावर्गणा योग्य पुद्गलद्रव्यने परिगमन किया है और यह मनिला जड़रूप है नेरे शुद्ध आत्मस्वरूपसे भिन्न हैं। इनकी अपने सामान मौसम hunarinararamaRTO) समयमा टीका। sa-muaa on ३०८ करता है और कषायरूप परिणमन करता । यदि त उन शब्दोंको ग्रहणकर ऐमा न माने कि मेरी आत्माके लगे तो तुझे कषाय नहीं पता होगी ॥ ४०० ॥ फिर भी कहते हैं: गाथा:-असुहो सुहोव सदो ण त भणदि सुणसु मंति तो चव । णय एदि विणिग्यहिंदु सोनु विसयमागदं सई ।। ४०१ ॥ असुहं सुहं च स्वं ण तं भणदि पेच्छ मति सो चेव । णय एदि विणिग्गहिर्बु चक्खुविसथमागदं स्वं ॥ ४०२॥ असुहो सुहोय गंधो ण तं मणदि जिम्ध मंति सो चेव । णय एदि विणिग्गहिदुं घाणविसयमागदं गंधं ॥ ४० ॥ असुहो सुहोय रसो ण तं भणदि रलय मंति सो चेव । णय एदि विणिग्गहिडें रसणविभयमागदं तु रसं ॥४०४॥ असुहो सुहोय फालो ण तं मणदि फासमंति सो चव । गय एदि विणग्गहिडं काथविसंयमागदं फासं ॥ ४०५ ॥ संस्कृतार्थः :-अशुभः शुभो वा दादः न त्वां भणति शृणु मामिति स एव । नचैति विनिर्गहीतुं श्रेत्रविषयमागतं शब्दं ॥ ४०१ ॥ अशुभ शुभं.वा रूपं न त्वां भणति पश्य मामिति स एव । नचैति विनिहीतुं चक्षुर्विषयमागतं रूपं ॥ ४०२ ॥ अशुभः शुभोवा गंधो न त्वां भणीत जिघ्र मामिति स एव । नचेति विनिहीतुं प्राणविषयमागतं गंधं ॥ ४०३ ॥ अशुभः शुभो वा, रसो न वां भणति रस्य शामिति स एव । नचैति विनिहीतुं रसनविषयमागतं तु रसं ॥ ४०४ ।। अशुभः शुभोवा पर्यो न त्वां भणति हपृश मामिति स ए। । नचैति विनिहीतुं कायविषयमागतं तु स्पर्श ॥ ४०५ ॥ सामान्यार्थ:--हे अज्ञानी जीव ! शुभ या अशुभ शब्द तुमको यह नहीं कहता है कि तुम मुझे सुनो, और न वह शब्द तेरे द्वारा ग्रहण किये जानेके लिये आता है। शब्द श्रोत्र इन्द्रियका केवल विषयरूपहोनेसे श्रोत्रमें आता है। शुभ या अशुभ रूप तुझको यह नहीं कहता कि तू मुझे देख और न वह रूप तेरेसे गृहण किये जानेके लिये आता है, रूप चक्षु इन्द्रियका विषय होनेसे चक्षुमें झलकता है । शुभ या अशुभ गंध तुझको यह नहीं कहती कि तू मुझे सूघ और न वह गंध तेरे द्वारा ग्रहण किये जानेके लिये आती है। किन्तु गंध घ्राण इन्द्रियका विषय है इससे नासिका द्वारा मालूम होती है। अशुभ या शुभ रस तुझको यह नहीं कहता कि तू मेरा स्वाद ले और न वह रस तेरेसे ग्रहण किये जानेको आता है रस .
AMAARI
समयसार टीका।
रमना इन्द्रियका विषय है इसमें रमनाने मालूम होता है | अशुभ या शुभ म्पर्श तुझको यह
नहीं कहता कि तु मुझे स्पर्शन कर और न वह नेरेसे ग्रहण किये जाने के लिये आता है।
स्पर्श शरीरका विषय है इससे काया द्वारा मालूम होता है । शनाथं सहिन विंशपार्थः-
(असुहो) अशुभ (व) या (सुहो) शुभ (सद्दो) शन्न (त) उम अज्ञानी जीवको (ण भाद) नहीं
कहता है कि (मंतिसुणसु मुझे सुनो (मोचे वो और वह शब्द (विणिग्गहिद्ण पदि । नो
द्वारा ग्रहण किये जानेके लिये नहीं आता है (सई) शन्द (सोदु विमयम) श्रोत्र इन्द्रियका
विषय रूप (आगदं) आता है । जैसा शब्दार्थ एकका वैसा अन्योंका भी जानना । विशेषार्थ
सर्वका यह है--- वही अज्ञानी जीव व्यवहार और निश्चय कारण समयमाम रहित है. इस
में उसको और भी समझाने हैं-हे अज्ञानी शब्दः रूप, गंध, ग्स, और पगे मई मनोन
या अमनोज्ञ पांचों इन्द्रियोंके विषय तुझे यह कुछ भी नहीं कहते हैं कि हे देवदत्त गुझे मन,
मुझे देख, मुझे मूंघ, मेरा स्वाद ले, या मुझे स्पर्शन कर। यह बात सुनकर अज्ञानी फिर क-
हता है कि यह शब्द आदिक कर्ता होकर मुझे कुछ भी नहीं कहते हैं किन्नु मेरे कर्ण आदि
इन्द्रियोंके विषयके ग्रहण करने योग्य स्थानों में आ जाते हैं। आचार्य उत्तर कहने हैं कि हे
मृदु, यह शन आदि पंचेन्द्रियोंके विपय तेरेस पकड़े जाने के लिये नहीं आते हैं, किन्तु यह
विषय श्रोत्र आदि इन्द्रियोंके अपने विषय भावको प्राप्त होते हैं क्यों कि यह
वस्तुका स्वभाव है । अर्थात् श्रोत्र इन्द्रियका स्वभाव शब्द ग्रहण, चक्षुका रूप निरन्यन आदि
इन्द्रियोंका जातीय स्वभाव है। इससे ये इन्द्रियां इन विपयोंको जानती हैं। अज्ञानी जीव इन्द्रियोम
इनको ग्रहण करके इष्ट विषयों में राग और अनिष्ट विषयोंमें डंप करता है इसीसे काम बंध
जाता है । परंतु जो परम तत्त्वज्ञानी जीव है वह पूर्वमें कहे हुए व्यवहार और निश्चय
कारण स्वरूप बाह्य और अभ्यंतर रत्नत्रयमे भरा हुआ इष्ट या अनिष्टशब्द आदि विषयोंक
इन्द्रियों के द्वारा ग्रहण हो जाने पर उनमें राग और टेप नहीं करता है किन्तु अपन बापमं ठहर
हुए भावसे शुद्ध आत्माके स्वरूपका अनुभव करता है. यह नात्पर्य है । भावार्थ:-अज्ञानी
जीव इष्ट विषयोंको अपने जान उनमे रागहेप करना है किन्तु ज्ञानी विषयोंको इन्द्रियोंकि
द्वारा जानते हुए भी वस्नुके स्वरूपका विचार करता है. उनमें गगडेप नहीं करना है।
४०१-४०२-४०३-४०४-१०॥
जैसे अज्ञानी जीव पांचों इन्द्रियोंके सन्न्ध इट या अनिष्ट संकायांक आधीन होकर गग भी यही
करता है तैसे ही पर द्रव्योंके जानने योग्य गुणों व जानने योग्य पद्रव्योम भी अचांद मन मम्मी
विषयों में भी राग और हय करता है उस अशानी जीवको फिर भी मानाय संगंधन पनि।
गाथा:---असुहो महोव गुणों ण तं भणदि बुज्य मंतिम चर।
णय एदि चिणिग्गहिंदुं बुद्धिविसयमागदं नु रणं ॥ १०६॥
समयसार टीका। असुहं सुहं च दव्वं ण तं भणदि वुज्झमति मो चेव । णय एदि विणग्गहिर्बु बुद्धिविसयमागदं व्वं ॥ ४०७ ॥ संस्कृतार्थ:-अशुभः शुभो वा गुणो न त्वां भणति बुध्यत्व मामिति स एव । नति विनिम्हीतुं बुद्धिविश्यमागतं तु गुणं ॥ ४०६ ॥ अशुभं शुभं वा द्रव्यं न त्वां भणति बुध्यस्व मामिति स एव । नति विनिहन्तुं बुद्धिविषयमागतं तु द्रव्यं ॥ ४०७ ॥ सामान्या:-पर वस्तुओंके शुभ या अशुभ गुण है अज्ञानी जीव ! तुझको नहीं कहने हैं कि तू मुझे जान और न वह गुण तेरे द्वारा ग्रहण किये जानेके लिये आता है। वह गुण अपनी बुद्धिके विषयमें मात्र ग्रहण होता है। ऐसे ही अशुभ या शुभ द्रव्य तुझको नहीं कहने कि तु मुझे जान और न वह द्रव्य तेरे द्वारा ग्रहण किये जानेके लिये आता है किंतु वह द्रव्य अपनी बुद्धिके विषयमें मात्र ग्रहण होता है । शब्दार्थ सहित विशेषार्थ:-हे अज्ञानी जीव ' दूसरेके शुभ या अशुभ गुण वा दूसरेके चेतन या अचेतन द्रव्य तुझको यह नहीं कहते हैं कि हे मन ! या बुद्धि या हे अज्ञानी जनका चित्त तु मुझे जान । तर अज्ञानी जीव कहता है कि वे इसतरह नहीं कहते हैं परन्तु मेरे मनमें पर द्रव्योंके गुण व पर द्रव्य नानने मात्रके संकल्परूपमे स्फुरायमान होते हैं अर्थात् झलकते हैं। इसका उत्तर आचार्य कहते हैं कि पर द्रव्यका गुण व परका द्रव्य मनकी बुद्धिमें प्राप्त हुआ तेरे द्वारा ग्रहण किये जानेके लिये नहीं आता है किंतु मन हाग़ जाना जाता है क्योंकि ज्ञेय और ज्ञायकका सम्बन्ध कोई मेट नहीं सत्ता । इस हेतुसे जो रागद्वेष करना है सो अज्ञान है। परन्तु जो ज्ञानी है मो पूर्वमें कहे प्रमाण व्यवहार और निश्चय कारण-समयसारको जानता हुआ हर्ष और विषाद नहीं करता है। यह तात्पर्य है। भावार्थः-अज्ञानी जीव परके द्रव्योंको व गुणको जानता हुआ रागद्वेष करता है किंतु ज्ञानी अपने ज्ञानन स्वभावमे जानता तो है पर उनमें रागहेष नहीं करता है ॥४०६-४०७|| फिर भी कहते है:-- गाथा:-एवं तु जाणि दव्वस्स उवसमेणेव गच्छदे मूढो । णिग्गहमणा परस्सय सयंच युद्धि सिवमपत्तो॥ ४०८ ।। संस्कृतार्थः--एवं तु ज्ञातद्रव्यस्य उपशमेनैव गच्छति मूदः । विनिर्गहमनाः परस्य तु स्वयं च बुद्धिं शिवामप्रातः ॥ ४०८ ॥ सामान्यार्थः--मूढ़ मिथ्यादृष्टी इसप्रकार पर द्रव्योंको जानकर भी शांत भावको नहीं प्राप्त होता है क्योंकि उसका मन पर वस्तुसे हटता नहीं है तथा उसको स्वयं भेदज्ञान रूप परमानंदकी प्राप्ति नहीं है । शब्दार्थ सहित विशेषार्थः—(एवंतु) इसतरह पूर्वमें कहे प्रमाण (नाणिदव्यम्स) मनोज्ञ और अमनोज्ञ शब्द आदि पंचेन्द्रियोंके विषयरूप पर द्रव्यों के गुणोंको MARRARKARM समयसार टीका। व परके द्रव्योंको जो मनके द्वारा जानने योग्य हैं जानता हुआ अर्थात उनका जैसा कुछ बरूप है उसको जान करके भी (मृद्रो) मूर्ख बहिरात्मा (परम्म णिग्गह मणा) उन पर रूप पंचन्द्रिय और मनके विषयरूप गन्दादिकोंमे अपने गग महित मनको नहीं रोकता हुआ (य) तथा (सयं त्रुहिं) अपने शुद्धात्माके अनुभव रूप स्वसंवेदन ज्ञानको (च) और (मिव वीनगग सहन परमानंदरूप सुखको (अपत्तो) नहीं पाताहुआ (उवममे) उनमें उपशम या उदासीन या शांत भावको (णेव गच्छदें) निश्चयमे नहीं पाता है । नात्पर्य यह है जमे चुम्बक पत्थर खींची हुई सुई अपने स्थानसे हटकर चुम्बक पत्थरके पास जाती है ऐसे यह शब्द आदि चित्तमें क्षोभ रूप विकार पैदा करनेके लिये जीवक पाम नहीं जाने हैं, तथा जीव भी निकायने उनके पास नहीं जाता है. परन्तु अपने ही स्थानमें अपने स्वरूपम ही रहता है । इस प्रकार वस्तुका स्वभाव होने पर भी अज्ञानी जीव अपने उदामीन भावको छोड़ कर जो गग और द्वेष करता है सो केवल उसका अज्ञान है । भावार्थ:-जमे चुम्बक पत्थर लोहको बीनता है और वह खिंच जाता है इस तरह न तो पांचों इन्द्रियोंक विपत्र शबादि नीवम ग्वींचं जाने और न जीव खिंच करके जाता है । अर्थात जैसे बलपूर्वक चुम्बक मुईको ग्वींनना है प्रेम शद्वादि जीवको नहीं खींचते, इन्द्रियोंका स्वभाव जाननेका है मो वे अपने २ विषयको जानती हैं । ज्ञानी जानता हुआ मात्र ज्ञाता दृष्टा रहता है रागहेप नहीं करना है किन्तु अज्ञानी जीव मोह और अज्ञानके वशमे इष्ट विषयामें गग और अनिष्ट विपयाम हप करना है। यहां पर शिप्यने प्रश्न किया कि पहले बंधके अधिकार, आपने यह गाथा "गणाणी सुद्दो णसयं परिणमदि रायमादीहिं" गहनदि अण्णेहिंदु मो रत्तादीहिं भावहिं" कहकर गमा बताया कि रागादि भावोंका ज्ञानी की नहीं है किन्तु यह परद्रव्याने पैदा होनेवाले भाव है तथा यहां आपने कहा कि अपनी ही बुन्डिके दोपसे रागादि भाव पैदा होते हैं दुसर्गका कोई दोष नहीं है सो इसतरह कथन करनेमे तो पूर्वापर विरोध नाम दोप आता है क्योक्ति पाने कथनसे अवका कथन विरुद्ध है। इसका समाधान आचार्य करते हैं कि वहां बंधक अधिकारक व्याख्यानमें ज्ञानी जीवकी मुख्यता है । ज्ञानी जीव गगादि भावाम नहीं परिणमन करना है इस लिये वहां इन भावोंको परद्रव्यमे पैदा होते हैं ऐमा कहा गया है--यहां अज्ञानी जीवनी मुख्यता है, अज्ञानी जीव अपनी ही बुद्धिके दोयमे परद्रव्यका निमित्त मात्र पाकर गणादि भावरूप परिणमन करता है इस कारण यह कहा गया है कि गन्द आदि जो पंचन्द्रियाक विषयरूप पदार्थ है वे पर हैं उनका क्या दोष है । इम नरह अपेक्षाका विचार करने पूर्वापर विरोध नहीं आमता । ॥ ४०८ ॥ इस प्रकार निश्चय और व्यवहार मोक्ष मार्ग स्वरुप निकाय कारण माना और व्यवहार काग्ण समयमार दोनोंको ही नहीं जानना हुआ अमानी जीव अपनी ही अज्ञान दिने समयसार टीका। PenstrenTARKIRAHEADESna दोषसे रागादिरूप परिणमन करता है इसमें शब्द आदि पर पदार्थोंका कोई दोष नहीं है इस तरहके व्याख्यानकी मुख्यतासे नवमें स्थलमें १० गाथाएं पूर्ण हुई । आगे कहते है कि मिथ्यात्व व राग द्वेष आदि भावोंम परिणमन करनेवाले जीवके अज्ञान चेतना होती है सो ही केवल ज्ञान आदि गुणोको आवरण करनेवाले कर्म बंधको पैदा करती है ।- गाथा:-वेदंतो कम्मफलं अप्पाणं जो दु कुणदि कम्मफलं । सो तं पुणोवि वंधदि बीयं दुकावस्त अट्टविहं ॥ ४० ॥ वेदंतो कम्मफलं मयेकदं जो मुणदि कम्मफलं । सो तं पुणोवि वंधदि वीयं दुक्खस्त अट्ट विहं ॥ ४१० ॥ चेदंतो कम्मफलं सुहिदो दुहिदो दु यदि जो चेदा । सो तं पुणोवि बंधदि वीयं दुक्खस्स अविहं ॥४११ ॥ संस्कृतार्थः-वेदयमानः कर्मफलमात्मानं यस्तु करोति कर्मफलं । स तत्पुनरपि बध्नाति बीजं दुःखस्याटविधं ॥ ४०९ ॥ चेदयमानः कर्मफलं मया कृतं यस्तु जानाति कर्मफलं । स तत्सुनरपि बध्नाति बीजं दुःखस्याष्टविधं ॥ ४१० ॥ वेदयमानः कर्मफलं सुखितो दुःखतश्च भवति चेतयिता । स तत्पुनरपि बध्नाति बीजं दुःखस्यारविधं ॥ ४११ ॥ सामान्यार्थः-कर्मके फलको भोगता हुआ जो कोई उस कर्म फलको अपना कर लेता है अर्थात् तन्मय हो जाता है सो फिर भी दुःखके वीज ऐसे आठ तरहके कर्मोको बांधता है। कर्मोंके फलको भोगता हुआ जो ऐसा जानता है कि यह कर्मका फल मेरे द्वारा किया गया मो फिर भी दुःखके चीन ऐसे ८ प्रकार कर्मीको बांधता है। जो कोई आत्मा कर्मके फलको भोगता हुआ सुखी और दुःखी होता है सो फिर भी दुःखके वीज ऐसे ( प्रकार कर्मोको बांध लेता है । शब्दार्थ सहित विशेषार्थ:-ज्ञान और अज्ञानके भेदसे चेतना दो प्रकारकी होती है एक ज्ञान चेतना दूसरी अज्ञान चेतना यहां पहले अज्ञान चेतनाका वर्णन करते हैं। (जो) जो कोई अज्ञानी जीव (कम्मफलं वेदंतो) उदयमें आए हुए शुभ या अशुभ कर्मका फल भोगता हुआ खस्थ भावसे भ्रष्ट होकर (कम्मफलं) उस कर्मके फलको (अप्पाणं मुणदि) मेरा ही कर्म फल है ऐमा मानता है अर्थात् उस कर्म फलके साथ तन्मय हो जाता है सो जीव (पुणोवि) फिर भी (दुक्खस्स वीय) आगामी दुःख पैदा करनेका वीजभूत (तं अट्ठविहं) ज्ञानावरणीय आदि । प्रकार कर्मोंको (वंधदि) बांधता है । तथा जोदु) जो कोई अज्ञानी जीव (क्रमफलं वेदंतो) कर्मोके फलको भोगता हुआ (कंमफलं) उस कर्मके फलको (मएकदं) मेरे द्वारा किया गया ऐसा (मुणदि) मानता है (सो पुणोवि) सो फिर भी (६६६ रिह . ६४ दि 331stpoarenesCARSin . समयसार टाका। दुःखोंका बीजरूप आठ प्रकार कर्म बांधता है | इन दो गाथाओग्ये अन्नान चेतना स्वरूप कर्म चेतनाका व्याञ्यान किया गया कम चेतनाका क्या अर्थ है इसका उत्तर कहते हैं कि मेरा ही कर्म है या मेरे द्वारा किया गया कम है, इसतरहके अज्ञान भायम नो इच्छा पूर्व इप्ट या अनिप्टरूपसे मन, वचन, कायका व्यापार रागडेप रहित शुढात्माके अनुभवसे गिर करके करना सो नवीन कर्म बंधको करनेव ली कर्म चेतना कही जाती है। तथा (जो चंद्रा जो कोई आत्मा शुद्ध आत्मम्वरूपको नहीं अनुभव करता हुआ (कम्नफलं. वेदनो) उदयमें आए हुए कर्मोक फलको भोगता हुआ (सुहिदो दुहिदो दु हबदि) इष्ट और अनिष्ट इन्द्रि- योंके विषयोंका निमित्त पाकर सुखी और दुःखी होता है (सो) वह जीव (पुगोवि) फिर भी (दुक्खम्स वीयं अट्ठविहं तं बंधदि) आगामी दुःम्वका कारणरूप आठ प्रकार कर्मोको बांधता है। इस एक गाथामें कर्मफल चतनाका वर्णन किया गया । कर्मफल चतनाका क्या अर्थ है इसके उत्तग्में कहते हैं कि आत्मामें तल्झीनपनेके भावमे रहित हो अज्ञान भावसे यथासंभव प्रकट या अप्रकट स्वभावसे इच्छापूर्वक इष्ट या अनिष्ट विकल्प करते हुए हर्ष या विषादरूप मुख और दुःखका अनुभव करना सो बंधकी कारणभृत कर्मफल चेतना कही जाती है । यह कर्मचेतना या कर्मफल चेतना दोनों ही स्वरूप अज्ञान चेतना छोड़ने लायक है, क्योंकि कर्मबंधकी कारण है। भावार्थ:-अज्ञान चेतनाके दो भेद हैं जो रागडेष महित कर्मों के उदयमें तन्मय होकर उस कर्मको अपना समझकर उसमें नो मन, वचन, कायका व्यापार है सो कर्म- चेतना है नथा दुःखको और सुखको अनुभव करना मो कर्मफल चेतना है । इस कर्मफल चेतनाका अव्यक्त याने अनकट अनुभव अर्थात जो हमको यकायक वाहरसे प्रकट नहीं होता मो एकेन्द्रिय जीवोंको होता है। शेप मर्वको दोनों चेतनाएं अज्ञान अवस्था में होती हैं। क्योंकि यह विकल्प नवीन कर्म बंधका कारण है इससे छोड़ने लायक है ।।४०९-४६०-४१३॥ आगे टीकाकार कहने हैं कि भेद विज्ञानी आत्मा इन दोनों कर्म चेतना और कर्म फल चेतनामेंसे पहले निश्चय प्रतिक्रमण, निश्श्य प्रत्यारत्र्यान, निश्रय आलोचनाका जो स्वरूप पूर्वमें कह चुके हैं उसमें लवलीन होकर शुद्ध ज्ञानकी चेतनाक बलमे कमेनतनाक सन्यास अर्थात त्यागकी भावनाको अपने में नचाता है अर्थात कम चेतनाक त्यागी भाव नाको कर्मोके बंधको विनाश करनेके लिये इसतरह करना है कि जो मैंने किया हो, जो मन कराया हो, जो मैंने दुसरे पाणी डाग किये जाने हुए को अन्छा समझा हो मनमे, बननमें और कायसे वह मेरा दुप्न अर्थात् अशुभ कर्म मिथ्या होहु यह भंग हुआ (7 तथा जो मैंने किया हो. जो मैंने कराया हो, जो मैंने दूसरे प्राणीमे किये जाने हुए की अनु- मोदना की हो मनसे और वचनने वह मंग दुष्कर्म मिथ्या होहु. यह पानक संयोगले मन, बचन कायोमेंसे एक २ बदलनसे पांच नीन भंग होंगे (इसनरह पाने ४ भग दो समयसार टीका। OGYAVACen.deneHAURCESSORS Bahan जायँगे, अथवा उन्हींको ही सुखसे जाननेके लिये कहते हैं-कि करना, कराना, अनुमोदना इन तीनोंके अलग २ तीन भंग तो ये भए, करना और कराना, करना और अनुमोदना, कराना और अनुमोदना ऐसे दो दोके मिलाके ३ भंग ये भए; करना, कराना और अनुमो- दना इन तीनोंके संयोगसे एक भंग यह हुआ ऐसे ७ हुए इसीतरह मन, वचन और काय इन तीनोंके अलग २ तीन भंग, मन और वचन, मन और काय, वचन और काय ऐसे दोके मंयोगसे तीन भंग ये हुए, तथा मन, वचन और काय तीनोंके संयोगका भंग १ हुआ ऐसे ७ भंग हुए, इन सातोंसे किया हो, कराया हो, करतेकी अनुमोदना की हो, तथा एक साथ करा और कराया हो, व एक साथ करा और अनुमति की हो, व एक साथ कराया और अनुमो- दना की हो, तथा एक साथ करा हो, कराया हो व अनुमोदना की हो, इसतरह सांतोंसे सात जगह किये जानेसे ४९ भंग केवल प्रतिक्रमणके हुए । भावार्थ:-इस तरह ४९ तरहसे पाप होता है इसीसे ४९ तरहसे किये हुए दोषकी शुद्धिके लिये जो मनन करना सो प्रतिक्रमण इसतरह मनन करनेसे भावों में निर्मलता होती है-कपाय मंद होती है जिससे पिछले बांधे हुए अशुभ कर्मोंमें स्थिति व अनुभाग घट नाता है तथा उस समय बंध भी बहुत हलका होता है। इसतरह प्रतिक्रमण कल्प कहा गया। अब प्रत्याख्यान कल्प कहते हैं। जो मैं करूंगा, जो मैं कराऊंगा, जो मैं दूसरे प्राणीको करते हुएको अनुमोदन करूंगा, अपने मन, वचन और कायसे वह मेरा दुष्कर्म मिथ्या हो इस तरह छः के संयोगसे १ भंग हुआ (६) तथा जो मैं करूंगा, जो मैं कराऊंगा, जो मैं दूसरेको करते हुए अच्छा समझूगा. मन और वचनसे वह मेरा दुष्कर्म मिथ्या हो इसतरह पहिलेकी तरह एक २ घटानेसे पांच संयोगसे तीन भंग होंगे (g) इसी तरह पहले कहे प्रमाण ४९ भंग जानने चाहिये । ऐसा प्रत्याख्यान कल्प समाप्त हुआ। अब आलोचना कल्पको कहते हैं कि जो मैं कर रहा हूं, जो मैं करा रहाहूं, जो मैं दूसरे प्राणीको करते हुए अच्छा समझ रहा हूं मन, वचन और कायसे वह मेरा दुष्कर्म मिथ्या हो, इसतरह छः का १ (६) हुआ-तथा जो मैं करता हूं, जो मैं कराता इं, तथा जो मैं दूसरे प्राणीको करते हुए अच्छा समझ रहा हूं, मन और वचनसे वह मेरा दुष्कर्म मिथ्या होहु इसतरह एक २ कम करनेसे ५ संयोगके भंग तीन होंगे-इसी तरह करनेसे ४९ भंग हो जायँगे ऐसे ४९ प्रकार आलोचना कल्प पूर्ण हुआ । भावार्थ:--ज्ञानी जीवको प्रतिक्रमण प्रत्याख्यान और आलोचनाको उनचास उनचास भंगोंसे हरएककी भावना करनी चाहिये। कल्प, पर्व, परिच्छेद्य, अधिकार, अध्याय, प्रकरण इन शब्दोंके एक ही अर्थ हैं ऐसा जानना चाहिये। इसतरह निश्चय प्रतिक्रमण, निश्चय प्रत्याख्यान, निश्चय आलोचना रूपसे शुद्ध ज्ञान चेतनाकी भावनाको कहते हुए. दो गाथाओंके व्याख्यानसे कर्म चेतनाके त्यागकी , , Reendexowaiver समयसार टीका। भावनाको पूर्ण किया, अत्र शुद्ध ज्ञान चेतनाको भावनाके बलसे नानी नीव कर्मफल चेतनाके त्यागकी भावनाको नचाला हे अर्थात् कर्मफल चेतनाको त्यागता हुआ ज्ञान चेतनाको धारण करता है-सो किस तरह भावना करे सो ही कहते हैं:-न में मनिज्ञानावरणीय कर्मका फल भोगता है तो फिर क्या करता हूं-शुद्ध चैतन्य स्वभावरूप आत्माको ही भले प्रकार अनुभव करता है । न मैं श्रुत ज्ञानावरणीय कर्मका फल भोगता है तो फिर करता हूं-शुद्ध चैतन्य *स्वभावरूप आत्माको ही भले प्रकार अनुभव करता है । न मैं अवधिज्ञानारन्यीय कर्मका फल भोगता हूं तो मैं क्या करता हूं-शुद्ध चैतन्य स्वभावरूप आत्माको ही अनुभव करना हूं। न मैं मन, पर्यय ज्ञानावरणीय कर्मका फल भोगता है तो फिर क्या करता हूं-में शुर चैतन्य स्वभावरूप आत्माको ही अनुभव करता हूं । न मैं केवल ज्ञानावरणीय कर्मका फल भोगता हूं तो मैं क्या करता हूं-शुद्ध चैतन्य स्वभावरूप आत्माको ही अनुभव करना है। इस प्रकार पांच तरहके ज्ञानावरणीय कर्मके फलके त्यागकी भावना नहीं । न मैं नदर्शना- वरणीय कर्मके फलको भोगता हूं तो मैं क्या करता हूं, मैं शुद्ध चतन्य स्वभावरूप आत्माको ही अनुभव करता है। इसतरहके क्रमसे इस नीचे लिखी गाथामें कहे प्रमाण १४८ उत्तर प्रकृतियोंके कर्मफलके त्यागकी भावनाको अपने भीतर नचाना चाहिये | गाथा--"पणाणवन्दु अट्ठवीसा, चर तिय उदीय दोण्णिते पंचेव । वावण्ण हीण विमया पयडि विणासेण होन्नि सिद्धा' यह किसी अन्य ग्रंथकी गाथा है अर्थात् ज्ञानावरणीयकी १,दर्शनावरणीयकी ९ वेदनीयकी २, मोहनीयकी २८, आयुकी ४, नामकी ९३, गोत्रकी २ वअंतरायकी । ऐसे २००में १२ कम याने १४८ कम प्रतियोंके नाश होनेसे जो होते हैं, उनको सिद्ध कहते हैं । तात्पर्य यह है कि तीनजगत व तीन काल सम्बन्धी मन, वचन, काय, व कुत. कारित, अनुमोदनामे किये और अपनी प्रसिन्हि, पूजा, लाभ, व देव, मुने, अनुभए हुए भोगोंकी इच्छारूप निदानबंध आदि समस्त परद्रव्योंके आलंबनसे होनेवाले ऐसे शुभ और अशुभ मंकल्प और विकल्पोंसे रहित तथा चिदानंदमई एक स्वभावरूप शुद्ध आत्मीक तत्त्वक यथार्थ अहान, ज्ञान, और अनुभवरूप अभेद रत्नत्रयमई निर्विकल्प ममाधि भावसे पैदा होनेवाला वीनगग और स्वभाविक परमानंदरूप सुख रसका आस्वाद सो ही है परम ममरसी भाव उमय अन- भवके आलंबनसे पूर्ण भरा हुआ और केवल ज्ञान आदि अनंत चतुष्टयरूप प्रयागमान माक्षान ग्रहण करने योग्य जो कार्य समयसार उसको उत्पन्न करनेवाला मा जो निनाय काय समयसार उसरूप शुद्ध ज्ञान चेतनाको भावनामें ठहर कर मोक्षार्थी पुरुषको उनिन है कि का चेतना और कर्मफल चेतनाके त्यागको भावनाको करे । मावार्थ:--यह गार्ग नीय संसार अवस्थामें कम चेतना व कर्मफल चेतनाके अनुभवमें पड़ा हुआ अज्ञान भावका निरन्तर अनुभव किया करता है निससे कर्म धोंसे लित होना हुआ अपने मुन्न रसके बाद समयसार टीका। RASHIANRELARAKstoero नहीं पाता है। उस जीवको आचार्य शिक्षा करते हैं कि हे भन्य जीव तृ अभेद रत्नत्रय स्वरूप जो कारण समयसाररूप मोक्षका मार्ग उसमें ठहर कर निरन्तर ज्ञान चेननाकी भावना कर । निज ज्ञान चेतनाकी भावनाका करना ही कर्मफल और कर्म चेतनाक त्यागकी भावना है। अतएव परमानंदमई मुखको अपने हीमें भोगनेके इच्छुक पुरुषको प्रमाद त्याग निज ज्ञानानंदमय स्वभावका अनुभव करना परम उपादेय है यही एक मार वस्तु इसतरह गाथा दो कर्म चेतनाके सन्यासकी भावनाकी मुल्यतासे और गाथा एक कर्मफल चेतनाके सन्यासकी भावनाकी मुख्यतामे वर्णन की इस १० यलमें ३ गाथा समाप्त हुई। अब यहां आगे उस परमात्म तत्वका प्रकाश करते है जो व्यवहार नयन कहे हा जीव आदि नय पदार्थोके प्रपंचसे भिन्न है तो भी टंकोत्कीर्ण नाता दृष्टा एक पारमार्थिक पदार्थ है तथा गद्य पय आदि विचित्र रचनासे रचे हुऐ शास्त्रोंसे व शब्द आदि पांचो इन्द्रियोने विषयमई पदार्थीको आदि लेकर समस्त पर द्रव्योसे शून्य है तो भी रागद्वेषादि विकल्योकी अधिने रहित सदा आनंदमई एक लक्षणको रसनेवाले मुग्वामृत ग्मो आम्यादमे भगा हुआ है। गाथा:-सत्यं गाणं ण हवदि जामा सत्यं ण याणदे किंचि । तस्मा अण्णं णाणं आणं सत्थं जिणा चिंति ॥ ४१२ ॥ महो णाणं ण हवदि जन्मा सद्दो ण याणदे किंचि । तमा अण्णं णाणं अण्णं सई जिणा विंति ॥ ४१३ ॥ ख्वं गाणं ण हवदि जमा रुवं ण याणदें किंचि । तमा अण्णं णाणं अण्णं स्वं जिणा विति ॥ ४१४॥ वष्णो णाणं ण हवदि जमा वणो ण पाणदे किंचि । तमा अपणं णाणं अण्णं वणं जिणा विति ॥ ४१५ ॥ गंधो णाणं ण इवदि जह्मा गंधी ण याणद किंचि । तह्माणाणं अपणं अण्णं गंधं जिणा विति ॥ ४१६ ॥ ण रसो होदि णाणं जला दु रमो अचेदणो णिचं । तमा अण्णं णाणं रसं च अण्णं जिणा विति ॥ ४१७ ॥ फासो णाणं ण हवदि जमा फासो ण याणदे किंचि । तमा अण्णं णाणं अण्णं फासं जिणा चिंति ॥ ४१८ ॥ कम्मं णाणं ण हवदि जमा कम्मं ण याणदे किंचि । तमा अण्णं णाणं अण्णं कस्मं जिणा विति ॥ ४१९ ।। धम्मच्छिओ ण णाणं जमा धम्मो ण याणदे किंचि। तमा अण्णं णाणं अण्णं धम्मं जिणा विति ॥ ४२० ॥ ण हरदि णाणमधम्मच्छिओ जंण गाणदे किंत्रि।
12225Actrekssesses समयसार टीका तह्मा अण्णं णाणं अण्णमधम्म जिणा विति ॥ ४२१ ॥ कालोवि णत्थि णाणं जमा कालो ण याणदे किंचि । तमा ण होदिणाणं जमा कालो अचंदणों णिचं ॥४२॥ आयासंपि य गाणं ण हवादि जमा ण याणदे किंचि । तमा अण्णायासं अण्णं णाणं जिणा विनि ॥ १२३ ।। अज्वझसाणं णाणं ण हवादि जन्मा अचेदणं णिचं । तमा अण्णं णाणं अज्झवसाणं तहा अण्णं ॥ ४२४ ।। जला जाणदि णिचं तन्मा जीवो दुजाणगो णाणी । णाणं च जाणयादो अन्वदिरित्तं मुणेयध्वं ।। ४२९ ।। णाणं सम्मादिहि संजम सुत्तमंगपुव्वगयं । धम्माधम्मं च तहा पव्वळ अज्झवंति वुहा ॥ ४२६ ॥ संस्कृतार्थः-शास्त्रं ज्ञानं न भवति यस्माच्छान न जानाति किंचित् । तस्मादन्यज्ञानमन्यच्छास्त्रं जिना वदीत ॥ ४१२ ॥ शब्दो ज्ञानं न भवति यमाच्छन्दो न जानाति विचिन् । तस्मादन्यज्ञानमन्यं शब्दं जिना वदति ॥ ४ ॥ रूपं ज्ञानं न भवति यस्मादृपं न जानाति किंचिन् । तस्मादन्यजज्ञानमन्य जिना वदति ॥ ४१४ ॥ वो ज्ञानं न भवति यस्माद्वों न जानाति विचित् । तस्मादन्यज्जानमन्यं वर्ण जिना वदति ॥ ४१५ ॥ गंधी ज्ञानं न भवति यत्मायो न जानाति विचित् । तत्माज्ञानमन्यदन्यं गंधं जिना वदति ॥ ४१६ ॥ न रसस्तु भवति शानं यस्मात्तु रसो अचेतनो नि । तस्मादन्यमानं रां चान्यं बिना वदति ॥ ४॥७॥ सशी जाने न भवनि यस्मात्सशों न जानाति मिचिन् । तस्मादन्यज्ञानमन्यं पा जिना वदति ॥ १८ ॥ कर्म ज्ञानं न भवति यस्माकम न जानाति निन् । तस्मादन्यज्ञानमयाकम जिना वदन ॥५॥ धर्मास्तिकायो न जाने यामादमों न जानाति कनिन् । तस्मादन्यज्ञामन्यं धजिना पति । १२०॥ न भवति ज्ञानमधर्मास्तिकायो यस्मान जानाति चिन् । तस्मादन्यज्ञानमयमधर्म बिना दैनि: MES कालेऽपि नाति न FREE! गनिम ।
समयसार टीका। RASRemouToRAREREBRARHI .. --- stic ३१८ तस्मान्न भवति ज्ञानं यरमाकालोऽचेतनो नित्यं ॥ ४२२ ॥ आकाशमपि ज्ञानं न भति यस्मान जानर्गत किंचित् । तस्मादन्याकाशमन्यज्ज्ञानं जिना वदंति ॥ ४२३ ॥ अध्यवसानं ज्ञान न भवति यस्मादचेतनं नित्यं । तस्मादन्यज्ञानमध्यवसानं तथान्यत् ॥ ४२४ ॥ यस्माजानाति नित्यं तस्माजीवस्तु जयको ज्ञानी । ज्ञानं च ज्ञायकादव्यतिरिक्तं ज्ञातव्यं ॥ ४२५ ।। ज्ञानं सम्यग्दृष्टि स्तु संयम सूत्रमंगपूर्वगतं । धर्मानम च तथा प्रवृज्यामभ्युश्यंति बुधाः ॥ ४२६ ॥ भावार्थ सहित सामान्यार्थः----(सत्थं) शास्त्र अर्थात् द्रव्य शास्त्र (णाणं) ज्ञान अर्थात्, आत्माका ज्ञानोपयोग (ण हवदि) नहीं है (ब्रह्मा) क्योंकि (सत्थं) शास्त्र (किंचि) कुछ भी (ण याणदे) नहीं जानता है। (तमा) इसलिये (णाण) ज्ञान (अण्ण) अन्य है (सत्थ) शास्त्र (अ- ण) अन्य है (निणावेंति) ऐसा जिनेन्द्र कहते हैं। आगेके शब्दार्थ इसीके समान हैं, इससे न लिखके केवल उनका अर्थ ही लिखा जाता है: शब्द ज्ञान नहीं है क्योंकि शब्द कुछ नहीं जानता है इस लिये ज्ञान अन्य शब्द अन्य है ऐसा जिनेन्द्र कहते हैं । रूपज्ञान नहीं है क्योंकि रूप कुछ नहीं जानता है इसलिये ज्ञान अन्य है, रूप अन्य है ऐसा जिनेन्द्र क- हते हैं। वर्ण ज्ञान नहीं है क्योंकि वर्ण कुछ नहीं जानता है इसलिये ज्ञान अन्य है, वर्ण अन्य है ऐसा जिनेन्द्र कहते हैं । गंध ज्ञान नहीं है क्योंकि गंध कुछ नहीं जानता है। इस लिये ज्ञान अन्य है, गंध अन्य है ऐसा मिनेन्द्र कहते हैं । रस भी ज्ञान नहीं है, क्योंकि रस कुछ नहीं जानता है। इसलिये ज्ञान अन्य है, रस अन्य है ऐसा जिनेन्द्र कहते हैं। स्पर्श ज्ञान नहीं है क्योंकि स्पर्श कुछ नहीं जानता है, इसलिये ज्ञान अन्य है, स्पर्श अन्य है ऐसा जिनेन्द्र भगवान कहते हैं। कर्म ज्ञान नहीं है क्योंकि कर्म कुछ नहीं जानता है इसलिये ज्ञान अन्य है, कर्म अन्य है ऐसा जिनेन्द्र भगवान कहते हैं । धर्मास्तिकाय ज्ञान नहीं है क्योंकि धर्म द्रव्य कुछ जानता नहीं है इसलिये ज्ञान अन्य है, धर्म द्रव्य अन्य है ऐसा जिनेन्द्र कहते हैं । अधर्मास्तिकाय भी ज्ञान नहीं हैं क्योंकि अधर्म द्रव्य कुछ नहीं जानता है। इसलिये ज्ञान अन्य है, अधर्म अन्य है ऐसा जिनेन्द्र भगवान कहते हैं। काल द्रव्य ज्ञान नहीं है क्योंकि काल कुछ नहीं जानता है, इससे ज्ञान अन्य है, काल अन्य है ऐसा जि- नेन्द्र कहते हैं । आकाश द्रव्य भी ज्ञान नहीं है क्योंकि आकाश कुछ नहीं जानता है इससे आकाश अन्य है, ज्ञान अन्य है ऐसा जिनेन्द्र कहते हैं। रागादि अध्यवसान ज्ञान नहीं है क्योंकि वह अचेतन है इसलिये (शुद्ध निश्चय नयसे) ज्ञान अन्य है और रागादि भाव अन्य है। क्योंकि नित्य ही जाननेवाला है इसलिये जीव ही ज्ञायक है, यही ज्ञानी है ज्ञान ज्ञायक xxseRRRRRRRRRRESER समयसार टीका। या जाननेवालेसे जुदा नहीं है ऐमा जानना चाहिये । ज्ञान ही वास्तव में सम्यग्दर्शन है. ज्ञान ही संयम है, ज्ञान ही द्वादशाक्ष व १४ पूर्वरूप मत्र है, ज्ञान ही धर्म या अधर्म (पुण्य या पाप) हो जाता है तथा ज्ञान ही मुनि दीक्षा है, ऐमा बुद्धिमान पुरुष मानने हैं। इन गाथा- ओंमें भेद विज्ञान की भावनाका वर्णन है । इसीके लिये टीकाकार फिर भी कहते हैं कि द्र- व्य शास्त्र ज्ञान नहीं है क्योंकि अचेतन है इमलिये ज्ञान और श्रुतकी भिन्नता है। शब्द ज्ञान नहीं है क्योंकि अचेतन है इससे ज्ञान और शब्दकी भिन्नता है। रूपज्ञान नहीं है क्योंकि अचेतन है, इमसे रूप और ज्ञानकी भिन्नता है, वर्ण ज्ञान नहीं है क्योंकि अचंतन है, इससे ज्ञान और वर्णकी भिन्नता है। गंध ज्ञान नहीं है क्योंकि अचेतन है. इसमें ज्ञान और गंधकी भिन्नता है । रस ज्ञान नहीं है क्योंकि अचेतन है इसमें राम और ज्ञान भिन्न है। स्पर्श ज्ञान नहीं है क्योंकि अचेतन है इसमें ज्ञान और स्पर्श भिन्न है, द्रव्य कर्म ज्ञानाव:- णादि ज्ञान नहीं हैं क्योंकि अचेतन हैं. इससे ज्ञानस कर्मीकी भिन्नता है। धर्म द्रव्य ज्ञान नहीं है क्योंकि अचेतन है, इससे ज्ञान और धर्म भिन्न २ हैं। अधर्म द्रव्य ज्ञान नहीं है क्योंकि अचेतन है, इससे अधर्म और ज्ञानमें भिन्नता है । काल भी ज्ञान नहीं है क्योंकि अचेनन है हमसे ज्ञान और कालमें मिन्नता है। आकाश ज्ञान नहीं है क्योंकि अचेतन है हमसे ज्ञान और आकाशकी भिन्नताहै। गगादि अध्यवसान शुद्ध निश्चय नयने ज्ञान नहीं है क्योंकि अचेतन है इसमें ज्ञान (शुद्ध ज्ञान) अध्यवसानसे भिन्न है। इसीतरह ज्ञानका सर्व ही परद्रव्यांक माथ व्यनिक पना है यह निश्चयसे साधने योग्य है । वस्तुकी सिद्धि अन्यय व्यतिरेको यथार्थ होती है । सो जहां २ अनीवत्व है वहां र ज्ञानपना नहीं है यह मिह है एम ही जीव ही एक ज्ञान रूप है क्योंकि चेतन है, इसमे जीव और ज्ञानमं अव्यनिरकपना अचान अभिनन्ना याने एकपना है अर्थात् जीवके साथ ज्ञानका अन्वयपना है । जीवका वभाव ही ज्ञानमय हैं, इससे जीव और ज्ञानकी अभिन्नता किसी भी नरहम शंका करने योग्य नहीं है । हीनद ज्ञान जीवकी भिन्न २ अवस्थाओंमे भी अभिन्न है इस बातके दिखलानेको कहा है कि ज्ञान सम्यग्दर्शन है, ज्ञान ही गंयम है, ज्ञान ही अंग पूर्व मंत्र है. ज्ञान टी वर्ग या अधर्म रूप है, ज्ञान ही दीक्षा है इमीतरई ज्ञानका जीवी पर्यायीक माय भी अव्यतिरेकपना याने अभिनपना है। अर्थात कोई भी जीवको पांय मी नहीं है. जहां ज्ञान न हो ऐमा निशयस साधने योग्य है। इस प्रकार जीवा न्यभाव मयं सहयोग रहित होनेके कारणमे व सर्व दर्शन ज्ञान आदि जीवक निग म्वभावान्द अनिता याने होनेके कारणसे अव्याप्ति और अनिव्यानि दोपको दूर करता हुआ नया अनादि विध जो धर्म और अधर्मरूप पर ममय अपने शुद्ध आन्मान गिल है उसमें नहीं गया मोभके मार्गको अपने आत्मामें ही परिणमन करता हुआ मम्पूर्ण शिक्षा मन्ट रूप भावली - CSS Her- RRORVANCERRRORS ३२० समयसार टीका। पाकर त्याग और ग्रहणसे शून्य जो साक्षात् समयसार रूप परमार्थ शुद्ध ज्ञान है उसी एकको ही अपनेमें ठहरा हुआ देखना चाहिये । ऐसा ही श्री अमृतचंद सूरिने कहा है:- अन्येभ्यो व्यतिरिक्तमात्मनियतं विभ्रत पृथ, वस्तुता- मादानोज्यनशून्यमेतदमलं ज्ञानं तथावस्थितम। मभ्याद्यन्तविभागमुक्तसहजरफारप्रभाभासुरः। शुद्धज्ञानघनो यथाऽस्य महिमा नित्योदितस्तिष्ठति ॥ ४२ ॥ उनमुक्तमुन्मोन्यमशेषतस्तत्तथात्तमादेयमशेषतस्तत् । यदात्मनः संहृत सर्वशक्तेः पूर्णस्य संधारणमात्मनीह ॥ ४३ ॥ भावार्थ:---जो अन्योंसे अलग है, आत्मामें निश्चल है. अपने वस्तु स्वभावको अलग रखनेवाला है, त्याग और ग्रहणसे शून्य है ऐसा जो निर्मल ज्ञान है वह उसी रूपसे आत्मामें ठहर गया, तथा जो मध्य, आदि और अन्तके विभागसे रहित स्वभावमें स्फुरायमान होती हुई प्रभासे चमकनेवाला शुद्ध ज्ञानका समूह ऐसी जिसकी महिमा है वह आत्मा नित्य उदय- रूप स्थिर होजाता है। जो अपनी सर्व शक्तिको संकोचे हुए पूर्ण आत्मा है उसका अपने आत्मस्वरूपमें जो धारण करना है इसीसे इस जगतमें मानो जो कुछ त्यागने योग्य था वह तो सर्वथा छोड़ दिया गया और जो ग्रहण करने योग्य था वह सब तरहसे ग्रहण कर लिया गया, तपश्चरण करता हुआ वह कौनसी नय है जिसमे उस सर्व दर्शन, संयम आदिको ज्ञान कहा है अन्य नहीं, इसका समाधान करते हैं कि मिथ्यादृष्टीसे लेकर क्षीण कषाय बारहवें गुणस्थान तक अपने २ गुणस्थानमें उस उसके योग्य अशुभ, शुभ, व शुद्ध उपयोग होता है उसीके साथ कहेजाने वाली अर्थात् उससे अविनाभूत प्रसिद्ध अशुद्ध निश्चय नय या अशुद्ध उपादानरूपसे नीच अवस्थाओंको भी ज्ञान कहा है इसीसे यह सिद्ध है कि शुद्ध परिणामिक परम भावको ग्रहण करनेवाली शुद्ध द्रव्यार्थिक नयसे व शुद्ध उपादान रूपसे जीव आदि व्यवहारमें कहे हुये नव पदार्थोसे भिन्न आदि मध्य अंतसे रहित एक अखंड प्रकाशमयी अपना ही निरंजन सहज ही शुद्ध परम समयसाररूप व सर्व तरहसे उपादेयभूत जो शुद्ध ज्ञान स्वभाव शुद्ध आत्माका तत्त्व है, वही निश्चयसे श्रदान करने, जानने व ध्यावने योग्य है। ऐसा तात्पर्य है। भावार्थ:-ज्ञान आत्माका असाधारण लक्षण है। यह जीव जाति सर्वमें पाया जाता है इससे अव्याप्ति नामा दोष नहीं है क्योंकि जो गुण एक जातिमें कुछमें पाया जावे कुछमें नहीं वहां अव्याप्ति दोष आता है। जीवका असाधारण लक्षण ज्ञान है क्योंकि यह जीव द्रव्यके सिवाय अन्य किसी भी द्रव्यमें नहीं पाया जाता इससे इस लक्षणमें अतिव्याप्ति दोष नहीं है यदि यह ज्ञान किसी भी जड़ द्रव्यमें पाया जाता तो यह दोष दूर नहीं होता-यह जीवमें है ऐसा स्वसंवेदन रूप अनुभव भी है इससे ज्ञान लक्षण विपरीत भी नहीं है इससे 40 समयसार का। तीनों दोषोंसे रहित ज्ञान जीवका असाधारण गुण है, यह ज्ञान शुद्ध निश्चय नयन्ती अपेक्षा वीतरागरूप हैं। यही शुन्द वीतराग वसंवेदन ज्ञानका अनुभव करनेसे आत्माके संयमादि सर्व गुणोंका होना कहा जाता है। ऐसा जान सर्वसे भिन्न पर आप, आपरुष को जाना- नंदमय परम वीतरागरूप है उसका अहान व ज्ञान करके उमीका मनन हितकारी है हम- तरह व्यवहार नयसे जाने हुए नव पदार्थोके मध्यमें सत्यार्थ जो शुद्ध निश्चय उसके हाग शुद्ध जीव ही एक वास्तवमें स्वरूपमें स्थिर होता है इस व्याग्न्यानको मुख्यतामे स्थलमें १५ गाथाएं पूर्ण हुई। आगे कहते हैं कि मति आदि पांच ज्ञान तो पर्यायरूप हैं तथा शुद्ध पारिणामिक भाव द्रव्यरूप है । जीव पदार्थ न तो केवल द्रव्य है न पर्याय है किन्तु परम्पर अपेक्षासे द्रव्य और पार्यो दोनों धर्मोंका आधारभूत धर्मी है । तब यहां यह विचारा जाता है कि पांच ज्ञानों से किस ज्ञानके द्वारा मोक्ष होती है। केवलज्ञान तो केवल फलरूप है नोकि उत्पन्न होनेवाला है अवधि और मनःपर्यय ज्ञान दोनोरूपी मूर्तिक पदार्थको जानते हैं जैसा कि श्री तत्यार्थ मूत्र में कहा है "रूपिण्वत्रधेः तदनंतभागेमनः पर्ययस्य' इससे यह दोनों भी मोक्षके कारण नहीं हैं तब इस कथ- नकेवलसे ही यह सिद्ध है कि बाह्य विपयोंके ज्ञानमें उलझे हुऐ मतिज्ञान भूतज्ञानके विकलयोंसे- रहित अपने शुद्ध आत्माके सन्मुख होकर जानने रूपी लक्षणको रखनेवाले निश्चय निर्वि- कल्पभावरूप मन सम्बन्धी मति ज्ञान और श्रुतज्ञान सो ही मोक्षके कारण ज्ञान है। यह ज्ञान पंचेन्द्रियोंके विषयों परे रहनेसे अतीन्द्रिय हैं तथा शुद्ध पारिणामिक भावके सम्ब- न्धमें जो भावना उस रूप हैं व इनको विकार रहित खसंवेदन भी कहते हैं। संसारी जीयोर विना तेरहवें गुणस्थानक क्षाविकज्ञान नहीं होता यद्यपि क्षायोपशमिक ज्ञान है तो भी विशेष भेद ज्ञानरूप है और यह मोशका कारण इसलिये है कि समस्त मिथ्यात्व व गगडंग विकल्पोंकी उपाधिसे रहित अपने शुद्धात्माकी भावनास पदाहोनेवाले परम आदमदं एक लक्षणको रखनेवाले मुखामृत रसके आखादरूप एक आकार परम समता रममई भाव या परिणामके द्वारा कार्यभृन जो अनंत ज्ञान अनंत मुन्न आदि मोक्षका फल, उमा एक देश शुद्ध निश्चय नयसे शुद्ध उपादान कारण है जहा कि श्री अमृतचंद ने कहा है। " भेद विज्ञानतः सिद्धाः सिहा ये फिल केचन | तस्येवाभायनो अडा बहाये किल चन " अर्थात् भेदनानसे ही जितने सिद्ध होने हैं. ये होने हैं तथा उम भेद विज्ञानक अभाव नितने संसारमें बद्ध हैं वे बंधे पड़े हुग हैं। भाव:-आन्नानुभवमें मनरे हाग आमाका गृहण व मनन होता है और यही मेद विज्ञान है तथा यही नोजक मापनही इस महान होनेवाले मनिज्ञान और श्रुनज्ञानको मोक्षका साधन कदा है ऐसा जानना नाम: Yi
समयसार टीका।
आगे कहते है जब यह आत्मा ज्ञान स्वभाव है तब इसके शुद्ध बुन्द्र एक स्वभाव रूप
परमात्म तत्त्वके देह ही नहीं हो सक्ती जिससे यह आहारक होवे ।
गाथा:-अत्ता जस्स अमुत्तो णहु सो आहारओ हवदि एवं ।
आहारो खलु मुत्तो जमा सो पुग्गलमओ दु॥ ४२७ ।।
संस्कृतार्थः-अत्मा यस्यामूर्ती न खलु स आहारको भवत्येवं ।
आहारः खलु मूत्ता यस्मात्स पुद्गलमयस्तु ॥ ४२७ ॥
सामान्यार्थ:-जिस शुद्ध नयसे आत्मा वास्तवमें अमूर्तिक है । तब ऐसा होनेपर
वह आहारक नहीं है | आहार वास्तवमें मूर्तिक है क्योंकि वह असलमें पुद्गलमई है।
शब्दार्थ सहित विशेषार्थः-( जस्स ) जिस शुद्ध निश्चयनयके अभिप्रायसे ( अत्ता ) आत्मा
(अमुत्तो) अमूर्तिक है (एवं) इसप्रकार रूप, रस, गंध, वर्णादिसे रहित होनेपर (सो) वह आ-
त्मा (हु) वास्तवमें (आहारओ) आहारक अर्थात् पुद्गल कर्म वर्गण ओंको ग्रहण करनेवाला
(ण हवदि) नहीं होसक्का (आहारो ) आहार अर्थात् पुद्गलकर्म वर्गणाका ग्रहण ( खलु)
वास्तवमें (मुत्तो) मूर्तीक है (जह्मा) क्योंकि (सो) वह नोकर्म आदिका आहार (टु) असलमें
(पोग्गलमओ) पुद्गलमयी है-जड़रूप है ॥ ४२७ ॥
और भी कहते है।
गाथाः--णवि सक्कदि घिन्तुं जे ण मुंचदे चेव जं परं दव्वं ।
सो कोवि य तस्स गुणो पाउग्गिय विस्ससोवापि ॥४२८॥
संस्कृतार्थः-नापि शक्यते गृहीतुं यन्न मुंचति चैव यत्परं द्रव्यं ।
स कोऽपि च तस्य गुणो प्रायोगिको वैलसो वापि ॥ ४२८ ॥
सामान्यार्थः-ऐसा कोई भी उस आत्माका प्रायोगिक या स्वाभाविक गुण नहीं है
जो कि पर द्रव्यको ग्रहण करनेमें व उसे त्यागनेमें समर्थ हो । शब्दार्थ सहित विशेषार्थः--
(सोकोविय ) सो कोई भी (पाउग्गिय) प्रायोगिक याने कर्मोके संयोगसे उत्पन्न होनेवाला व
(विस्ससो) स्वभावसे होनेवाला (तस्सगुणो) उस आत्माका गुण है ( वापि) क्या? अर्थात्
शुद्ध निश्चयनयसे आत्मामें कोई ऐसा गुण नहीं है जिससे वह आहारक है इसीसे
कहते हैं कि (जे) जो कोई भी गुण (जं परदव्व) उस परद्रव्य आहार आदिकको (णविधित्तुंणचेव
मुंचिदं सक्दि ग्रहण करनेको व छोड़नेको रमर्थवान नहीं होता है । इस पर शिप्यने कहा
कि. अहो भगवन् । कर्मोके द्वारा प्रेरित होकर अर्थात् शरीर नामा नाम कर्मके उदयसे अपनी
योगशक्तिमें परिणमन होनेसे यह संसारी आत्मा नोकर्म वर्गणदिको लेता हुआ कैसे अनाहा-
रक हो सका है?.। इसका समाधान आचार्य कहते हैं कि हे शिष्य, तुमने बहुत ठीक कहा
परन्तु यह आ ना निश्चय नयसे उस पुद्गलाई आहारमें तन्मयी नहीं होता है वह कथन
व्यवहार नयसे है यहां पर शुद्ध निश्चय नयसे व्याख्यान किया गया है ॥ ४२८ ॥
asutariamamatmi समयसारीका। और भी मन:- गाथा:-तह्मा जो विसुडो चेदा सो व गिलंद किंचि । व विमुंचदि किंचिदि जीवाजीवाणदव्यागं ।। ४२० ॥ संस्कृतार्थ:-तस्मात्तु यो विशुदश्चतविता ग नैव गृहति किचिन । नैव विमुंचति किंचिदपि जीवाजीवर द्रव्ययोः ।। ४२९ ॥ सामान्यार्य-इमलिये जो विशुद्ध आत्मा है सो पर जीव या अनाव द्रव्याने कुछ भी नहीं ग्रहण करता है और न कुछ भी छोड़ता है । शब्दार्थ महिन विशेपार्थ:-निमा दु) इसी कारणसे ही अर्थात् क्योंकि निश्चय नयसे आहारक नहीं है इससे ( जो विमुढोचंदा) जो रागद्धेपादिसे रहित आत्मा है (मो) सो (जीवानीव दळवाणं) जीव और अजीव द्रव्योमने (किंचि) कोई भी आहार को (णेव गिद) नहीं ही गृहण करता है अर्थात् आहार छः प्रकारका है १ कर्मोंका आहार, २ नोकमोंका आहार, १ कवलाहार याने ग्रामरूपमे भानन. ४ लेप आहार याने स्पर्श मात्रसे आहार जैसे वृक्षोंके, ५ उन्नाहार, गर्मीका आहार जने अंडकि, ६ मनसे आहार, याने मानसिक आहार, जैसे देवोंक, इच्छा होने ही मन द्वारा नृप्ति हो जानी है इन छः प्रकारों से किसी भी सचित्त या अचित्त आहारको नहीं लेता है (ब) और न (किंचिवि) किसीको भी (विमुंचदि) छोड़ता है । इसीसे यह कहा गया है कि नोकर्म वर्ग- णाओंके ग्रहणसे बननेवाला शरीर जीवका स्वरूप नहीं है । शरीरका ही अभाव अमन्ट में होनेपर शरीर सम्बन्धी जो द्रव्यलिंग मात्र है सो भी जीवका स्वरूप नहीं है। दमप्रकार निश्चयसे जीवके आहार नहीं है इस व्याख्यानकी मुख्यतासे व स्थलमें तीन गाथाएं कहीं। आगे कहते है कि विशुद्ध ज्ञानदर्शन स्वभावधारी परमानाके कर्म आदि आहा न होते हुए आहारमई देह नहीं हैं । देहके अभावमें देहाई च्यानिंग अर्थात् भरीएका भए है सो निश्चयसे मोक्षका कारण नहीं है। गाथा:-पाखंडियलिंगाणि य गिहलिंगाणिय वहुप्पयाराणी । चित्तुं वदंति मूढा लिंगमिणं मोक्खमरगांत्ति ॥१०॥ संस्कृतार्थः-पासडिलिंगानि च गृइलिंगानि च बहुकाराणि । गृहीत्या वदति मूढा लिंगमिदं मोक्षमार्ग इति !! ४३० ॥ सामान्यार्थः-पाखंडी माधुके बाह्य चिन्ह या भेष नथा नाना मजाक गृहस्यक भर धारण करके मूह पुरुष एमा कहते हैं कि यह लिंग या भेप की नोकका माग है । दार्थ सहित विशेपार्थ:--पाखंडी लिंगाणि) पाखंडी साधुओके मेप (अनुप्पयागणि) और गन तरहो (च गिह लिंगाणि) गृहस्थियोंकि मैप (धित्तुं ) गृहण करके ( मृदा : गगग आदि विकल्पोंकी उपाधिसे रहित परम ममाधिरूप भाव लिंगको नहीं मानने र नहीं आना करने हुए मूद मिथ्यादृष्टी (लिंग) यह द्रव्य लिंग ही (मावलमग्नोति निमा 1 InHRAMSROOMSENTENCEROE समयसार टीका। है ऐसा कहते हैं । भावार्थ—जैन मुनिका वाह्य नग्न भेष व अन्य पाखंडी साधुके नाना प्रकारक भेष तथा गृहस्थोंके क्षुल्लक ऐलक आदिकाके भेष मात्र केवल मुक्तिके साधक नहीं हैं, जब तक भावलिंग अर्थात् आत्मानुभव न हो तब तक यह भेष कार्यकारी नहीं हैं तथापि कोई २ मूढ आग्रह करके एकान्तसे इन बाह्य चिन्होंको ही मोक्ष मार्ग मान बैठने हैं ।। ४३० ।। उन्हीके लिये आचार्य फिर कहते है:- गाथा:-~णय होदि मोक्खमग्गो लिंगं जं देहणिम्ममा अरिहा । लिंगं मुइत्तु दंसणणाणचरित्ताणि संवति ॥ ४६१ ॥ संस्कृतार्थः-न तु भवति मोक्षमार्गो लिंग यद्देनैर्भमका अईसः । लिंगं मुक्त्वा दर्शनशानचारित्राणि सेवते ॥ ४३१ ॥ सामान्यार्थः-लिंगमात्र मोक्षका मार्ग नहीं है क्योंकि देहके ममत्त्व रहित अर्हत लिंगका ममत्त्व छोड़ करके सम्यग्दर्शन, ज्ञान और चारित्रकी सेवा करते हैं । शब्दार्थ सहित विशेषार्थः-(लिंग) भाव लिंगसे रहित केवल द्रव्यलिंग (मोक्खमग्गों) मोक्षका मार्ग (गय - होदि) नहीं हो सकता है (जं) क्योंकि (देहणिम्ममा) देहके म त्त्वसे रहित (अरिहा) अहंत भगवान (लिंग) लिंगका आधार जो शरीर उस शरीरसे जो ममत्त्व उसको (मुइत्त) मन, वचन, कायसे छोड़ करके फिर (दसणणाण चरित्ताणि) सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्रकी सेवा या भावना करते हैं। भावार्थः-निश्चय रत्नत्रयमई आत्मीक भावना या आत्मानुभव या आत्मामें तल्लीनता जिस परिणाममें होती है वह परिणाम अवश्य देह आदि पर वस्तुओंके ममत्त्वसे रहित होता है यदि देहसे ममत्त्व रहे तो आत्माधीन ध्यान हो नहीं सकता क्योंकि वास्तवमें यही निश्चय रत्नत्रय मोक्षका साधन है, अतएन वाह्य देह व उसका भेष केवल निमित्त कारण मात्र है। निश्चय उपादान कारण आत्माका परिणाम ही है सो ही यहां दिखलाया है ॥ ४३१ ॥ आगे इसी व्याख्यानको और भी हद करते हैं- गाथा:--णवि एस मोक्खमग्गो पाखंडी गिहमयाणि लिंगाणि । दंसणणाणचरित्ताणि मोक्खमग्गं जिणा विति ॥ ४३२ ॥ संस्कृतार्थ:-नाप्येष मोक्षमार्गः पाखंडिगृहमयानि लिंगानि । दर्शनज्ञानचरित्राणि मोक्षमार्ग जिना वति ॥ ४६२ ।। सामान्यार्थः-पाखंडी लिंग व गृहस्थीके लिंग मात्र होना यह मोक्षका मार्ग नहीं है। सम्यग्दर्शन, ज्ञान, चरित्र इन तीनोंकी एकता ही मोक्षका मार्ग है, ऐसा जिनेन्द्र भगवान कहते हैं । शब्दार्थ सहित विशेषार्थः-(पाखंडि गिहमयाणि लिंगाणि) निर्विकल्प समाधिरूप भाव लिंगसे निरपेक्ष अर्थात् रहित जो पाखंडी साधुओंके व गृहस्थियोंके भेष हैं जैसे निर्यन्थ समयमार टीका। नम्न दिगम्बररूप व कोपीन मात्र एलक श्रावकका लिंग यह सर्व ही भंप (एम मोरवमय णवि) वास्तविक मोक्ष मार्ग नहीं हैं (निना) जिनेन्द्र भगवान (हंसगणाणचरिनाशि) शुद्ध बुद्ध एक स्वभावरूप ही जो परमात्म तत्त्व है उसका यथार्थ अन्हान ज्ञान और अनुभव रूप जो अभेद्र निश्चय रत्नत्रय म्वरूप सम्यग्दर्शन, ज्ञान. चारित्र है उसको (मोचवमर्ग) मोक्षका मार्ग (विति) कहते हैं। भावार्थः-निश्चयसे शुद्धात्मतत्त्वका अभेद गन्नत्रय स्वरूप अनुभव ही मोक्षका मार्ग है। केवल मुनि या श्रावक लिंग मात्र नहीं। यह बाह्य लिंग ना झवन निमित्त मात्र है ॥ १३२ ॥ आगे इसी मोक्ष मार्गकी सेवाका उपदेश का है:-- गाथा:-जह्मा जहित्तु लिंगे सागारणगारि एहि वा गहिदें । दमणणाणचरित्ते अप्पाणं जुज मोक्वपहें ॥ ४३३ ॥ संस्कृतार्थ:--तस्मात्त दिवा लिंगानि सागरिरनगारिका गृहीतानि । दर्शनशानचारित्र आत्मानं युंश्व मोअपये ॥ ४३३ ।। सामान्यार्थः-इसलिये गृहस्थ व यती जनोंके द्वारा ग्रहण किये हुए द्रव्य लिंगोंका अर्थात् उनके ममत्त्वका त्याग करके मम्यग्दर्शन ज्ञानचारित्र म्वरूप निश्रय न्नत्रयमई मोक्ष मार्ग अपनेको लगाओ | शब्दार्थ सहित विशेपार्थः-(तमा) इमलिये (मागारणगारि पहिचा) विकार रहित बसवेदन रूप भाव लिंगक विना मागार अर्थात गृहम्धी श्रावकों द्वाग वा अनगार अर्थात् मुनियोंके द्वारा गृहण किये हुए (लिंगो) बाहरी आकाररुप द्रव्य लिंगांत अर्थान् उनके मोहको ( जइत्तु ) त्याग करके ( दमण णाण चरित मोरग्य पहे) केवलज्ञान आदि अनंत चतुष्टय स्वरूप शुद्धात्माका यथार्थ अण्डान, उसका यथार्थज्ञान व उसका यथार्थ अनुभवन व चारित्ररूप अभेद रत्नत्रय म्वरूप मोक्षके मार्गमें ( अप्पाणं जंग) भव्य ! तु अपने आत्माको योजन कर अर्थात अपने आपको तन्मय कर। भावार्थ:-- उपादान स्वरूप अभेद रत्नत्रय मई मोक्ष मार्गमं तन्मयता करना ही भव्य जीवका यथार्थ मोक्षमार्ग है । बाह्य मोह छोड़ उममें तल्लीनता ही कामे जीवको छुट्टानेवाली है ।।११६|| आगे कहते है कि निधय रत्नत्रयमई गुदात्माका अनुभत्र लक्षण मधमार्ग मोक्षक प्रया पुरुषों द्वारा अपने योग्य गाथा:--मुखपहे अप्पाणं ठवेहि वेदयहि मायहि नं चत्र । नत्व विहर णिचं माविहरसु अण्णदव्यम् ॥ ४३४॥ संस्कृतार्थ:-मोक्षपये आमान स्थाश्य वेदप ध्यायहि बैन तव मदर नित्यं मा विहारकाव्येयु || ३ } सामान्यार्थ:-मोक्षक मागमें आमाको म्यानिकर उसीका अनुभव कर नया उमाशा हो ध्यानकर तथा उगीमें ही निन्य विहारला, अन्य वन्य विर सदा महिन Presents: समयसार टीका। विशेषार्थ हे भव्य ! (अप्पाणं) अपने आत्माको (मुक्खपहे) विशुद्ध ज्ञान-दर्शन स्वभाव रूप आत्मतत्वका यथार्थ श्रद्धान, ज्ञान, और आचरणरूप अभेद रत्नत्रय स्वरूप मोक्षके मार्गमें (ठवेहि ) स्थापितकर अर्थात् औरोंसे हटाकर निज स्वरूपमें आपको धारणकर, (वेद- यहि) उसी ही मोक्षके मार्गको चेत अर्थात अपने परम समता रसमई भावसे अनुभवकर (तं चैव झायहि ) तथा उसीका ही ध्यानकर अर्थात् बिकल्परहित समाधिमें ठहरकर उसीकी भावनाकर (तत्थेव ) तथा उसी ही स्वरूपमें ही (णिच्च) सर्वकाल (विहर) विहारकर या वर्तनकर या निज स्वरूपमई परिणति कर । (अण्णदव्वेसु) अपने शुद्धात्मासे भिन्न देखे, सुने, अनुभए हुए भोगोंकी इच्छारूप निदानबंध आदि पर द्रव्योंके आलम्बनसे होनेवाले शुभ और अशुभ संकल्प और विकल्पोमें (मा विहरसु मत विहार कर, मत जा, मत परिणति कर ।। भावार्थ:-आचार्य शिप्यको प्रेरणा करके कहते हैं कि तृ यदि मोक्षका इच्छुक है तो अभेद रत्नत्रय स्वरूप मोक्षमार्गमें ठहरकर उसीका ध्यानकर उसीका अनुभव कर। जिसको ध्यावेगा वैसा हो जायगा ॥ ४३४॥ आगे कहते हैं जो स्वभावसे शुद्ध परमात्माके अनुभव रूपी लक्षणको रखनेवाले भावलिंगसे रहित होकर द्रव्यलिंगमें ममता करते हैं वे अभी समयसारको नहीं जानते है । गाथा:-पाखंडियलिंगेसु व गिहालिंगेसुव बहुप्पयारेसु। कुव्वंति जे ममत्तिं तेहिं ण णादं समयसारं ॥ ४३५ ॥ . संस्कृतार्थः -पाखंडिलिंगेषु वा गृहिलिगेषु वा बहुपकारेषु । कुवैति ये ममतां तैर्न ज्ञातः समयसारः ॥ ४३५ ॥ सामान्यार्थः- जो साधुओंके बाह्य भेषोंमें व नानाप्रकार गृहस्थीके भेषोंमें ममता करते हैं उन्होंसे समयसार याने शुद्धात्मा नहीं जाना गया। शब्दार्थ सहित विशेषार्थ:-- (जे) जो कोई वीतराग स्वसंवेदन ज्ञान लक्षणमई भावलिंगसे रहित (पाखंडि लिगेसु व बहु प्पयारेसु गिहलिंगेसु) निग्रन्थ रूप पाखंडी द्रव्यलिगोंमें वनानाप्रकारके कोपीन आदि चिन्होंको रखनेवाले गृहस्थके लिंगोंमें (ममत्तिं कुव्वंति) ममता करते हैं (तेहिं ) उन जीवोंसे (सम-. यसारं) तीन जगत व तीन कालसम्बन्धी अपनी प्रसिद्धि, पूजा, लाभ, व मिथ्यात्त्व, काम, क्रोध आदि समस्त परद्रव्योंके आलम्बनसे उत्पन्न होनेवाले शुभ और अशुभ संकल्प विकल्पोंसे रहित या शून्य, तथा चिदानंदमई एक स्वभावरूप शुद्धात्मतत्वका यथार्थ श्रद्धान ज्ञान और आचरणरूप अभेद रत्नत्रयमई विकल्परहित समाधिसे उत्पन्न वीतराग सहज अपूर्व परमा-ल्हादरूप सुखरसका अनुभवमई परम समतारेसके भाव सम्बन्धी परिणामसे उसीके आलम्बन सहित पूर्ण कलशकी तरह भरा हुआ और केवलज्ञान आदि अनंत चतुष्टयकी प्रकटतारूप साक्षात् उपादेय भूत कार्य समयसारका -- समयसार टीका। उत्पन्न करनेवाला जो कोई निश्चय कारण ममयमार है मो ( गाई ) नहीं जाना गया । भावार्थ:-जो अज्ञानी केवल माधु व गृहस्थक वाद्य भेषोंने मोद करते हैं और : अपने शुद्ध आत्मस्वरूपको यथार्थ नहीं जानकर उसका अनुभव नहीं करने हैं वे ममयमा ग्रंथको पढ़ते हुए भी अज्ञानी हैं-उन्होंने शुहात्मतत्त्वके मारको नहीं पहचाना है. ॥१३॥ आगे कहते हैं कि व्यवहारनय शुदामाका अनुमत्रमई रक्षणको रखनपाले भावन्निंग माग २ निग्रन्य यतिका नग्न परिग्रह रहित भेष व कोपीन धरना आदि नानाशकार गायी. लिंगको अथांत, भाव लिंग और द्रव्यलिंग दोनोंको ही मोक्षमार्ग मानते है पर निश्चय नय सर्व ही द्रव्य लिंगोंको नहीं मानती है:- गाथा:-ववहारिओ पुणणओदोण्णिवि लिंगाणि भणदि मोक्वपह णिच्छयणओदुणिच्छदिमोशवपहे सधलिंगाणि ||४३३॥ संस्कृतार्थः-- व्यवहारिकः पुनर्नयो द्वे अपि लिंगे भणति मोक्षयर्थ । निश्रयनयस्तु नेच्छति मोअपये मलिंगानि ॥ ४३६ ॥ सामान्यार्थः-व्यवहार नय मोक्षमार्गमें द्रव्य और भात्र दोनों ही लिंगोंको कहना है परंतु निश्चय नय मोक्ष मार्ग में सर्व लिंगोंको नहीं चाहती है। (पुण) तथा (ववहारिओणओ) यह व्यवहार नय (दोण्णिवि लिंगाणि) दोनों ही द्रव्य और भावरूप लिंगोंको ( मोकन्वयाः) मोक्षका मार्ग (भणदि) कहती है क्योंकि निर्विकार स्वसंवेदन लक्षणमई भावलिंगका व्यलिंग बाहरी सहकारी कारण है । (णिच्छय णोद) परंतु निशाय नय या निशयमें आकर जानी (मोक्खपहे) मोक्ष मार्गमें (सव्वलिंगाणि णिच्छदि) निर्विकल्प समाधिरूप मन, बनन, मायकी गुप्तिके बलसे मैं निग्रन्थ लिंगी है या कोपीनधारक हूं इन्यादि सर्व लिंग सम्बन्धी विकल्याको उसी तरह नहीं चाहता जैसे रागद्वेष आदि विकल्यांको नहीं चाहता। क्योंकि वह स्वयं निर्विकल्प समाधिमई स्वभावको रखनेवाला है। यहां आचार्य शिष्यको बुनामा का कहन हैं कि अहो शिप्य ! "पापंडी लिंगाणिय" इत्यादि सात गाथाकि हाग व्यलिंग मर्वक्षा निषेध ही किया गया है ऐसा तुम मत जानो । किन्तु इन गाथाओंके द्वारा उन माधुलोको खास तौरसे कहा गया है जो निश्चय रत्नत्रयमई निर्विकलर समाधिरूप भावनिगमे दिन है। इसतरहीं कहा गया कि हे तपोधन ! द्रव्यलिंग मात्र ही मन्तोष गत मंगे जिनु हम द्रला. लिंगके आधारसे निश्चय रत्नत्रयमई निर्विकल्प समाधिरूप भावना कगे। यहां पर नुमफिर यह शंका कर मक्ते हो कि ऐना जो आपने कहा कि द्रव्यलिंगका निगम नहीं लिलामो आपकी कल्पना है, इस ग्रंथमैं तो यह लिन्दा ही है कि मयदोदि नाममगो नि लिंग मोक्षका मार्ग नहीं है इत्यादि । इसका समाधान आचार्य करने में कि ऐसा नहीं है, यहीदि मुक्वमग्गो लिंग इत्यादि वचनने भावलिंगमे रहित व्यलिंगका निषध लिया गया है जिन्द समयसार टीका। ParnamaATERatna भावलिंग सहित द्रव्यलिंगका निषेध नहीं। क्योंकि द्रव्यलिंगका आधारभूत जो यह देह है उसकी ममताका निषेध किया गया है द्रव्यलिंगका निषेध नहीं किया गया है। क्योंकि पहले मुनि दीक्षाके समयमें सर्व परिग्रहका ही त्याग किया गया है परंतु देहका नहीं किया गया, क्योंकि देहके आधारसे ध्यान, ज्ञान और चारित्र होता है तथा जैसे और परिग्रहको अपनेसे अलग कर सकते हैं इस तरह देहको अलग नहीं कर सकते तथा वीतराग स्वरूप ध्यानके समयमें तो मेरी देह है मैं लिंग धारीहूँ इत्यादि विकल्प व्यवहार नयसे भी नहीं करने चाहिये । यदि कहोगे कि देहसे ममता त्याग करानेका ही अभिप्राय है ऐसा कैसे जाना गया तो उसके लिये यह कहना है कि "नंदेह णिम्ममा अरिहा दंसणणाण चरित्ताणि सेवंते " अर्थात् क्योंकि देहकी ममतासे रहित अहंत सम्यग्दर्शन, ज्ञान, चारित्रकी सेवा करते हैं इत्यादि पूर्वमें कहे हुए वचनसे प्रकट है । जैसे धान्यके बाहरका छिलका रहते हुए अंतरंगके तुप या छिलकेका त्याग नहीं किया जासकता । परन्तु जो अंतरंगका तुष छुड़ाया जायगा तो नियमसे बाहरका छिलका हटाना ही होगा इसी ही तरह सर्व परिग्रहका त्यागरूप बाहरी लिंग या भेष होते हुए भाव लिंग हो वा न हो नियम नहीं है परंतु अभ्यंतर भाव लिंग होते हुए सर्व संगका त्यागरूप द्रव्यलिंगहोना ही चाहिये। शिष्यने कहा कि हे भगवन् ! भावलिंग होते हुए बाहरी द्रव्यलिंग हो वा न हो नियम नहीं है क्योंकि ऐसा कहा भी है कि “साहारणा साहारणे" (यह वाक्य कहांका है सो समझमें नहीं आया) इसका आचार्य समाधान करते हैं कि इसका भाव यह है कि कोई तपस्वी ध्यानमें आरूढ़ बैठा हो या खड़ा होउस समय कोई भी दुष्ट अपने भावोंसे वस्त्र लपेट देवे व आभरण आदि पहना देवे तो भी वह साधु निग्रंथ ही है क्योंकि उसने वस्त्र या आभूषणोंमें बुद्धिपूर्वक ममत्त्व नहीं किया है जैसे कि पांडवादिने तथा जो दो घड़ीमें ही मोक्ष गए ऐसे भरत चक्रवर्ती आदि हो गए हैं वे भी निग्रंथ रूपसे ही मोक्ष गए हैं। यद्यपि थोड़ा काल होने पर उनके परिग्रहके त्यागकी बात लोग नहीं जानते हैं । इस तरह भावलिंगसे रहित साधुओंके लिये केवल द्रव्यलिंग-बाहरी भेष मोक्षका कारण नहीं होसकता तौ भी जो भावलिंग सहित हैं उनके लिये यह द्रव्यलिंग सहकारी कारण है इसतरह व्या- ख्यानकी मुख्यतासे १३वें स्थलमें सात गाथाएं पूर्ण हुई । भावार्थ-बाह्य मुनिका दिगम्बर भेष मुनिके चारित्रका व कोपीन चद्दर आदिका ऐलक व क्षुल्लकका भेष श्रावकके चारित्रका बाह्य सहकारी कारण है विना निमित्तके उपादान शक्ति होने पर भी वस्तु अपने फलको नहीं दिखला सकती । भावलिंग अर्थात् शुद्धात्माका अनुभव तो मोक्षका उपादान साधन है। और द्रव्यलिंग निमित्त कारण है । जैसे अशुद्ध सुवर्णमें शुद्ध होनेकी शक्ति होने पर भी बाह्य निमित्त अग्नि व मसाला आदिका निमित्त न मिलाया जाय तो वह शुद्ध नहीं होसक्ता इसीतरह जव - समयसार टीका। उत्पन्न करनेवाला जो कोई निश्चय कारण समयसार है सो (ण णाई) नहीं जाना गया। भावार्थ:-जो अज्ञानी केवल साधु व गृहस्थके बाह्य भेषोंमें मोह करते हैं और अपने शुद्ध आत्मस्वरूपको यथार्थ नहीं जानकर उसका अनुभव नहीं करते हैं वे ममयसार ग्रंथको पढ़ते हुए भी अज्ञानी हैं-उन्होंने शुद्धात्मतत्त्वके सारको नहीं पहचाना है ॥४३९॥ आगे कहते हैं कि व्यवहारनय शुद्रामाका अनुभवमई टक्षणको रखनेवाले भावलिंगके साथ २ निग्रन्थ यतिका नग्न परिग्रह रहित भेष व कोपीन धरना आदि नानाप्रकार गृहन्यीक लिंगको अर्थात् भाव लिंग और द्रव्यलिंग दोनोंको ही मोक्षमार्ग मानते हैं परंतु निश्चय नव सर्व ही द्रव्य लिंगोंको नहीं मानती है:- गाथा:-ववहारिओ पुणणओदोषिणविलिंगाणि भणदि मोक्खपहे णिच्छयणओदुणिच्छदिमोक्खपहे सव्वलिंगाणि ॥ ४३६॥ संस्कृतार्थः - व्यवहारिकः पुनर्नयो द्वे अपि लिंगे भणति मोक्षपथे । निश्चयनयस्तु नेच्छति भोक्षपणे सर्वलिंगानि ॥ ४३६ ॥ सामान्यार्थः-व्यवहार नय मोक्षमार्गमें द्रव्य और भाव दोनोंही लिंगोंको कहती है परंतु निश्चय नय मोक्ष मार्गमें सर्व लिंगोंको नहीं चाहती है। (पुण) तथा (ववहारिओणओ) यह व्यवहार नय (दोण्णिवि लिंगाणि) दोनों ही द्रव्य और भावरूप लिंगोंको ( मोक्खपहे) मोक्षका मार्ग (भणदि) कहती है क्योंकि निर्विकार स्वसंवेदन लक्षणमई भावलिंगका द्रव्यलिंग बाहरी सहकारी कारण है । (णिच्छय णओटु) परंतु निश्चय नय या निश्चयमें आरूढ़ ज्ञानी (मोक्खपहे) मोक्ष मार्गमें (सव्वलिंगाणि णिच्छदि) निर्विकल्प समाधिरूप मन, वचन, कायकी गुप्तिके बलसे मैं निग्रन्थ लिंगी हूं या कोपीनधारक हूं इत्यादि सर्व लिंग सम्बन्धी विकल्पोको उसी तरह नहीं चाहता जैसे रागद्वेष आदि विकल्पोंको नहीं चाहता। क्योंकि वह स्वयं निर्विकल्प समाधिमई स्वभावको रखनेवाला है। यहां आचार्य शिप्यको खुलासा करके कहते हैं कि अहो शिप्य ! "पापंडी लिंगाणिय" इत्यादि सात गाथाओंके द्वारा द्रव्यलिंग सर्वथा निषेध ही किया गया है. ऐसा तुम मत जानो । किन्तु इन गाथाओंके द्वारा उन साधुओंको खास तौरसे कहा गया है जो निश्चय रत्नत्रयमई निर्विकल समाधिरूप भावलिंगसे रहित हैं। . इसतरहसे कहा गया कि हे तपोधन ! द्रव्यलिंग मात्र हीसे सन्तोष मत करो किंतु इस द्रव्य- लिंगके आधारसे निश्चय रत्नत्रयमई निर्विकल्प समाधिरूप भावना करो। यहां पर तुम फिर यह शंका कर सक्ते हो कि ऐसा जो आपने कहा कि द्रव्यलिंगका निषेध नहीं किया सो आपकी कल्पना है, इस ग्रंथमें तो यह लिखा ही है कि 'णयहोदि मुक्खमग्गो लिंगम्' लिंग मोक्षका मार्ग नहीं है इत्यादि । इसका समाधान आचार्य करते हैं कि ऐसा नहीं है 'णयहोदि मुक्खमग्गो लिंग' इत्यादि वचनसे भावलिंगसे रहित द्रव्यलिंगका निषेध किया गया है किन्तु - - HEROVINDIANRANA समयसार टीका। जीव दर्शन मोह और चारित्र मोहके उपशम, क्षयोपशम, या क्षयका लाभ करता है और वीतराग सम्यग्दर्शन, ज्ञान, चारित्र इन तीन रूपसे परिणमन करता है तब इसके शुद्धता होती है सोही शुद्धता औपशमिक, क्षयोपशमिक, व क्षायिक तीन भाव सम्बन्धी मुख्यतासे और परिणामिक भाव सम्बन्धी गौणतामे होती है। तथा शुद्ध पारिणामिक भावके बंध और मोक्षके कारणका रहितपना है सो पंचास्तिकायकी व्याख्यामें इस श्लोकसे कहा गया है । मोक्षं कुर्वन्ति मिश्रौपशमिक क्षायिकाविधाः बंधमौदयिको भायो निष्क्रियः पारिणमिकः अर्थात् औपशमिक, क्षयोपशमिक व क्षायिक भाव मोक्षको करते हैं, औदयिक भाव बंधको करता है तथा परिणामिक भाव क्रिया रहित है न बंधका कारण है न मोक्षका । इससे सिद्ध हुआ कि विकल्प रहित शुद्धात्माके अनुभव लक्षणको रखनेवाले वीतराग सम्यक्त्व और चारित्रसे अविनामृत अर्थात् वीतराग सम्यक्त्वचारित्रकी जहां अवश्य प्राप्ति होती है ऐसा जो भाव है सो ही अभेदनयसे शुद्धात्मा शब्दसे कहा जाता है उसीको ही क्षयो- पशमिक भाव तथा भाव श्रुत ज्ञान भी कहते हैं सो ही मोक्षका कारण है । शुद्ध पारिणामिक भाव जो है सो एक देश व्यक्ति लक्षणरूप ऐसी कथंचित् भेद और अभेदरूप द्रव्यपर्याय स्वरूप जीव पदार्थकी शुद्धभावनाकी अवस्थामें ध्येयभृत द्रव्यरूपसे रहता है अर्थात् भाव- नाके समय शुद्ध पारिणामिक भाव ध्यान करने योग्य है ध्येय है, ध्यान पर्यायरूप नहीं है क्योंकि ध्यान की पर्याय विनाशनीय है और शुद्ध पारिणामिक भाव अविनाशी जीवका स्वभाव है । भावार्थः-यहां प्रयोजन कहनेका यह है कि वीतरागताका अंश कर्मोकी निजरा और सरागताका अंश बंधका कारण है । ऐसा श्री अमृतचंद्र आचार्य्य कहते हैं "येनांशेन चरित्रं तेनांशेनास्य बन्धनं नास्ति । येनांशेन तु रागस्तेनांशेनास्य बंधनं भवति ।" ( पुरुषार्थ सि० २१४.) अर्थात् जितने अंशसे चारित्र अर्थात् वीतराग चारित्र होता है उतने अंशसे इस जीवके कर्मका बंध नहीं होता और जितने अंशसे रागभाव है उतने अंशसे कर्मोका बंधन होता है । तथा मोक्षका कारण निर्जरा है इससे वह भाव भी जिससे कर्मकी निर्जरा हो.मोक्षका कारण है । क्षायिक केवलज्ञान होनेके पहले क्षयोपशमिक ज्ञान होता है, यह क्षयोपशमिक श्रुतज्ञान सम्यग्दर्शन सहित होनेसे वीतरागताके अंश सहित होता है तथा जब वही ज्ञान स्वात्माके अनुभवमें लीन होता है तब विशेष वीतरागता प्रकट होती है। उसी वीतरागतामें तन्मयता प्रवल अत्रिपाक निर्जराका कारण है जिससे अनेक समय प्रबद्ध एक कालमें झड़ जाते हैं । और ज्यों १.अभ्यास बढ़ता है अधिक २ शुद्धता भावोंकी होती है अर्थात् वीतरागताके अंश बढ़ते जाते हैं और सरांगताके घटने जाते हैं-इसी ही तरह मोहका सर्वथाक्षय करके बारहवें गुणस्थानमें जाता हैवहांपर भी क्षयोपशमिक भाव श्रुतज्ञानकी परिणति ARRRRRRRRERESER समयसार टीका। हैपरम एकाग्र है, उसके वलसे तीन घातिया क्रमांका नाश कर केवल ज्ञान प्रान होता है, तत्र क्षायिक शुद्ध ज्ञान होता है, तथा यह ज्ञान आत्माका निन स्वभाव है और मिडीके भी होता है इसीसे इसको शुद्ध पारिणामिक भाव भी कह सक्त हैं तथा नो अन्मानुभय स्वभावरूप भाव पहले था वह भी अपने ही पाग्णिामिक मायके सन्मुन्न याइसमे उसका एक देश शुद्ध पारिणामिक भाव कहते हैं । चारित्रकी अपेक्षासे उसी भावको बारहवं गुणम्यानसे पहले क्षयोपशम चारित्र, उपशम चारित्र व क्षपकरेणीकी अपेक्षा एक देश क्षायिक नाग्नि और फिर क्षायिक या यथाख्यात चारित्र कहने हैं । सम्यक्त्वकी अपेक्षासे उमी आत्मानुमवरूपी भावको उपशमसम्यक्त्वमें उपशम, क्षयोपशम सम्यक्त्वमें श्योपशम और क्षायिक मप्यत्तयमें क्षा- यिक भाव कहते हैं। ऐसा जानना ॥ ४२६॥ आगे उपदेश करते हैं कि इस शुद्ध आत्मतत्वको निर्विकार स्वसंवेदन प्रत्यक्ष अथान रखवा में तन्मयतारूा आत्मानुभवके द्वारा भाता हुआ यह आत्मा परम अविनाशी आनन्मको पाना गाथा:-जो समयपाहुड़मिणं पठिणय अच्छतबदो णाटुं । अच्छे ठाहिदि चेदा सो पावदि उत्तमं सुक्खं ॥ १३ ॥ संस्कृतार्थः-यः समयप्राभृतमिदं पठित्वा चार्यतच्यतो ज्ञात्वा । अर्थ स्थास्यति चेतयिता प्राप्नोत्युत्तमं सौख्यं ।। ४३७ ॥ सामान्यार्थ:-जो इस समवप्राभूत नामा शास्त्रको पढ़ करके और ग्रन्धके अर्थ और भावोंसे इसको जान करके शुद्ध आत्मीक पदार्थमें ठहरेगा सो अनुभवी आम्मा उत्तम मुखको पावेगा | शब्दार्य सहित विशेषार्थ:-यहां इस गावामें श्री कुंदकुंद्राचार्य देव ममयमार ग्रंयकी समाप्ति करते हुए उसके फलको दिखलाते हैं-(गो) जो कोई भव्य नीव (दृणं समय पाहुडम्)इस समय प्राभूत नामके शास्त्रको (पटिदृण) पढ़ करके (य) और (अच्छतचदा) इस ग्रंयक अर्थ याने माने और उनका भाव इन दोनों प्रकारसे (माटुं) जानकरके (अन्छ) शिर उपादेय- रूप शुहात्मा रूपी लक्षणको धारनेवाले पदार्थमें अर्थात् निर्विकल्प समानि भाव दिदि ठहरेगा-अर्यात शुद्धात्मांक अनुभवमें लीन होगा (मोचदा) यह चननेवाला अनुभवी आमा (उत्तम सुक्ख) अतीन्द्रिय वीतराग म्वाभाविक परमादरूप परमानन्द्रको मा कि नीचं छोकमें कहा है (पादि) भविष्यकान्हमें पायेगा । श्लोकः आत्मोपादानमिडं, न्ययमतिशयवहीतवार्थ विशाल, वृद्धिद्वासव्यपेतं विषयविरहितं निःप्रति इंद्रना। अन्यद्रव्यानपेक्षं निम्पमममित गान गवंशा उत्तयानंतयार पगामुम्बमा मिडग नाना 1 ore-SAAHALAVAGen. erent Surina समयसार टीका अर्थ-जो सुख आत्माके ही उपादानकारणसे सिद्ध होता है, स्वयं अतिशयरूप है, बाधा रहित है, महान है, बड़ने घटनेसे रहित है, पंचेन्द्रियोंके व मनके विषयोंसे दूर है, प्रतिद्वंद्व अर्थात् पर पदार्थ सम्बन्धी औपाधिक व रागादिक भावोंसे रहित है, अपने शुद्ध आत्मद्रव्यके सिवाय अन्य द्रव्योंकी अपेक्षा रहित है, जिसकी कोई उपमा नहीं होसक्ती, . जो मर्यादा रहित है, अविनाशी है, सर्वकालमें उत्कृष्ट, अनंत और सार है, ऐसा परमसुख श्री सिद्ध भगवानके उत्पन्न होता है। अब यहांपर शिष्यने प्रश्न किया-हे भगवन् । आपने अतीन्द्रिय सुखका निरंतर व्याख्यान किया है पर ह. सुख कैसा है ऐसा लोग नहीं जानते सो कहिये कैसा है ? तब भगवान आचार्य कहो हैं कि कोई भी. देवदत्त नामका पुरुष स्त्री सेवनको आदि लेकर पंचेन्द्रियोंके विषयोंके व्यापारसे हटा. हुआ आकुलता रहित चित्त होकर बेफिकर बैठा है उसको किसीने भी पूछा ? भो देवदत्त ! क्या तू सुखी है ? तब वह कहता है कि मैं सुखी हूं । इस समय उसके चित्तमें किसी इन्द्रियके विषय सेवनकी आकुलतानहीं है, मन सावधान है, तो वह अपनेको सुखी कहता है-यही अतीन्द्रिय सुखका एक सामान्य दृष्टान्त है क्योंकि सांसारिक सुख पंचेन्द्रियोंके विपयोंके सेवनसे पैदा होता है और यहां विषयसेवन न होते हुए भी देवदत्तके मनमें सुख झलक रहा है क्योंकि उसके मनमें आकुलता नहीं है । तथा जो अतीन्द्रिय सुख है सो पंचेन्द्रियोंमें व्यापारका अभाव होने पर ही अनुभव होता है जैसे इस दृष्टान्तमें कहा गया। यहां तो सामान्यरूपसे अतीन्द्रिय सुखका लाभ है, पर जो पंचेन्द्रिय और मनसे होनेवाले सर्व विकल्पनालोंसे रहित, आत्माकी समाधिमें तल्लीन परमयोगी या ध्यानी साधु हैं उनको स्वसंवेदन गम्य अर्थात् अपने ही अनुभवसे प्रकट होने योग्य अतीन्द्रिय सुख विशेषरूपसे प्राप्त होता है। तथा इसी अनुमानसे परम जिन योगीश्वर मुक्त प्राप्त आत्माओंके अर्थात् सिन्होंके यह अतीन्द्रिय सुख सिहहोता है तथा यह अनुमान गम्य है, :हम लोगोंको 'अपेक्षा प्रत्यक्षके समान अगम्य है । यहां अनुमानका प्रयोग बतलाते हैं अनुमानमें साधन और साध्यकी आवश्यक्ता 'साधनात्साध्य विज्ञानमनुमान' (परीक्षामुख) सो इस अनुमानके प्रयोगमें मुक्तात्माओंके इन्द्रियोंके विषयका ध्यापारका अभाव होनेपर भी अतीन्द्रिय सुख है यह पक्ष है क्योंकि इस समय उसी इन्द्रिय विषयके व्यापारके अभावसे इन्द्रिय विषयों के व्यापारसे दूरवर्ती निर्विकल्प समाधिमें रत परम मुनीन्द्रोंके स्वसंवेदनरूप आत्मीक सुखकी प्राप्ति होती है, यह हेतु या साधन है । इस तरह पक्ष और हेतु रूपसे दो अंगी मधुमान ज़ानना योग्य है। तथा आगममें आत्मो- पादान सिद्धम् इत्यादि श्लोकन कहे असार तीन्द्रिय सुख प्रसिद्ध ही है । इस कारणसे अतीन्द्रिय सुखमैं भन्देह नहीं भरना योग्य है । ऐसा ही अन्य ग्रन्थमें कहा है- AARISTORomantMOTRARS समयमार टाकां। यदेवमनुनाः मा माग्यमक्षार्थमंभवं । निर्विशन्ति निराधाचं मोक्षप्रीणनक्षम :12 ॥ मर्वणातीनकालेन यन्त्र भुक्तं महडिंक । भाविनो ये च भोल्यति स्वादिष्टं म्यांतरंजक ॥२॥ अनंतगुणिनं तम्मादत्यक्ष स्त्र म्वभाव । एकस्मिन समये भुक्तं तत्सुखं परमेश्वरः ।। सामान्यार्थ:-जो सर्व देव और मनुष्य बाधा रहिन और सर्च इन्द्रियोंको भाव- मान करनेको समर्थ ऐसे इन्द्रियों के विषयांसे पंदा होनेवाले मुम्बको अब भागते हैं । वग महाऋद्धि सहित स्वादिष्ट और अपने अंतःकरणको रंजायमान करनेवाले मुगको पनि अतीत कालमें जो भोगा हो, और भावीकालमें भोगग उससे अनंतगुणा अनीन्द्रिय और अपने स्वभावसे पैदा होनेवाले मुखको एक ही समयमें परमेश्वर भोगते हैं। भावार्थ:-यहां भी जी इन्द्रियों के विषयोंसे उपयोगको हटाकर आत्मानुभवमें लीन हो जाते हैं उनको उसी जानिया अतीन्द्रय सुख प्राप्त होता है जमा कि मिडाक हैं इसीसे मिद मुन्धकी महिमा अगार है. और वह गृहण करने योग्य है ॥ ११७ ॥ इसतरह पूर्वमें कहे प्रकारसे विष्णुके कत्तापनेक निराकरणकी मुख्यताने मात गाथा हुई। उसके बाद अन्य जीव करता है। अन्य जीव भोगता है इस चौह मनो एकांतको निराकरणकी मुख्यतासे चार गाथाएं पूर्ण हुई । उसके बाद आत्मा गगहेंपादि भाव कमीको नहीं करना है इस मांग्थ्यमतके एकांतको निराकरण करते हुए मृत्र पांच कहै । उसके बाद कर्म ही सुग्व आदिक करता है आत्मा नहीं करना इस सांग्यमतके एकांतको हटाने हा फिर भी १३ गाथाएं. कहीं उसके पीछे अपने मनमें होनेवाले गग भावका घान करना चाहिये ऐसा जो नहीं जानता हुआ बाह्य शब्द आदि इन्द्रियांक विषयोंका में धान क. प्रेमा गोना करता है उसके सम्बोधनके लिये सात गाथाएं पूर्ण हुई। उसके बाद आगा द्रव्य कर्माको व्यवहार नयम और भावक्रर्मोको निश्चय नयम करता है इस कथनी मुख्यनाम : गावा पूर्ण हुई। इसके पीले ज्ञान जानने लायक ज्ञेयक रुपये नहीं गणिमन कला र कहते हुए १० मृत्र कहे । उसके पीछे शुद्वामाकी प्राप्ति मो ही निश्रय प्रतिक्रमणा, प्रन्या- स्यान, आन्ोचना और चारित्र है इस व्याख्यानकी मुयनाने मूत्र नार पंई । उसों बाद पांच इन्द्रिय और मनके विषयोंका रोकना इस कथनमे मूत्र करे. उमर पाद का ननना और कर्मफल चेतनाके विनाशके कथनी गुन्यनाम गाथागं लान हुई उसके पास जान इन्द्रियकि विषय आदिक ज्ञान नहीं है ऐमा ऋहने हुए माया हुई । म मा शुडाल्या निश्चय कर और नोकमान आहा काबिल नहीं पाया ४ originaKANORTE समयसार टीका। SEAROVARASHILOSROIROER ARA की मुख्यतासे गाथाएं तीन हैं । उसके बाद शुद्धात्माकी भावनारूप भावलिंगकी अपेक्षा विना द्रव्यलिंग मोक्षका कारण नहीं होता ऐसा प्रतिपादन करनेकी मुख्यतासे गाथाएं सात कहीं। उसके बाद मोक्षरूप फलको दिखलानेकी मुख्यतासे सूत्र एक है। ऐसे शुद्धात्माकी अनुभूतिमई लक्षणस्वरूप समयसारकी तात्पर्यवृत्ति व्याख्यामें समुदायसे ९६ गाथाओंसे १३ अधिकारोंके द्वारा समयसार चूलिकां नामा दशमां अधिकार ममाप्त हुआ। ( भाषाटीकामें यह ११वां अधिकार समझना) अब यहां टीकाकार कुछ विशेष लिखते हैं कि यहां स्याद्वादकी शुद्धि अर्थात् निश्चयके लिये वस्तुतत्त्वकी व्यवस्था या व्याख्या तथा उपाय और उपेयभाव कुछ यहां विचार किया जाता है । उपाय मोक्षका मार्ग है । उपेय मोक्ष है। अब यहां स्याद्वाद शब्दका अर्थ क्या है इस प्रश्नपर आचार्य कहते हैं कि स्यात् अर्थात् कथंचित् , किसी अपेक्षासे या किसी विशेष प्रकारसे व अनेकांतरूपसे बाद अर्थात् कहना, जल्पना व प्रतिपादन करना सो स्याहाद है यही स्यावाद श्री अहंत भगवानका शासन है । यह भगवानका शासन.सर्व वस्तुओंको अनेकांत रूप बतलाता है । अनेकांतका क्या अर्थ है सो कहते हैं। कि एक वस्तुमें वस्तुपनेको सिद्ध करनेवाली अस्तित्त्व, नास्तित्त्व आदि खरूप परम्पर विरुद्ध अपनी २ अपेक्षाको लिये जो दो शक्तियां हैं उनके कहनेके लिये कथंचित् अनेकांत कहा जाता है। वह अनेकांत क्या करता है ? इसपर कहते हैं कि ज्ञानमात्र जो कोई भाव या जीवपदार्थ या शुद्धात्मा है सो ततरूप है, अततरूप हैं, एकरूप है, अनेकरूप है; सत् रूप है, असत रूप है; नित्यरूप है, अनित्यरूप है इत्यादि स्वभावरूप आत्मा है ऐसा वह अनेकांत कहता है । जैसे ज्ञानरूपसे ततरूप है अर्थात् उसी स्वभावरूप है; ज्ञेय अर्थात् जानने योग्य पदार्थ की अपेक्षासे यह जीव अततरूप है अर्थात् ज्ञानज्ञेय पदार्थ रूप नहीं है। द्रव्यार्थिक नयसे एक है, पर्यायार्थिक नयसे व पर्यायोंकी अपेक्षासे अनेक है। अपने द्रव्य,क्षेत्र, काल, भावकी अपेक्षासे सतरूप है; पर द्रव्यक्षेत्र कालभावकी अपेक्षासे असत् रूप है। द्रव्यार्थिक नयसे नित्य है, पर्या- यार्थिकनयसे अनित्य है । पर्यायर्थिकनयस भेदरूप है, द्रव्यार्थिकनयसे अभेदरूप है, इस तरह अनेक धर्म या स्वभावरूप यह ज्ञान स्वरूप जीव है । इस स्याद्वादका स्वरूप श्री समन्त भद्राचार्य देवने भी कहा है:- सदेकनित्यवक्तव्यास्तद्विपक्षाश्च ये नयाः । सर्वथेति प्रदुष्यंति पुप्यंति स्यादितीह ते ॥१॥ सर्वथा नियमत्यागी यदादृप्टमपेक्षकः । स्याच्छब्दस्तावके न्याये नान्यैपामात्मविद्विपाम् ॥२॥ अनेकांतोप्यनेकांतः प्रमाणनयसाधनः । , .
DRUARKescencestraine समयसार टीका। अनेकांतः प्रमाणात तदेकांतोऽपिनान्नयात ॥२|| धर्मिणोऽनंतरूपत्त्वं धर्माणां न कथंचन । अनेकांतोप्यनेकान्त इति जनमनं ततः ॥१॥ भावार्थ:-सत, एक, नित्य, वक्तव्य और इनके विपक्षी जो अमन . अनेक भनित्य और अवक्तव्य नय हैं वे पदार्थ सर्वथा ही मन रुप ही है या अमत रूप ही है, इत्यादि सर्वथा भावको दापित करते हैं और म्यातपनको पुष्ट करने हैं । मथाके नियमका त्याग करनेवाला व अपेक्षाको करनेवाला ऐसा जो स्यात शद मो आपके ही न्याय देवा गगा है। अन्य जो आत्माके यथार्थ स्वरूपके नहीं माननेवाले हैं उनके यहां यह नहीं देखा गया । अनेकांत भी अनेकान्त हे प्रमाणनयसे साधा जाता है प्रमाण नो अनेकान्न है. है और नयकी अपेक्षासे एकांत है। धर्मी नो स्वभाववान वस्तु मी अनंत स्वभावमई है परन्तु स्वभावोंके अर्थात प्रत्येक धर्मके अनंत म्वभाव किमी तरह नहीं हो सके इसलिये अनेकांत भी अनेकांत रूप है-इस कारण यह जन मत भी अनेकांतरूप है। इस प्रकार कथ. चित् शब्दका वाचक व अनेक धर्मरूप बम्नुका प्रतिपादन करनेवाला स्यात् गन्न है गेसा इसका अर्थ संक्षेपसे जानना योग्य है । तहां इस तरह अनेकांतक व्याख्यानमे ज्ञानमात्र भाव मई जीव पदार्थ एक और अनेकरूप सिद्ध हुआ है। यह एक या अनेकरूप ज्ञानमात्र जीव पदार्थ नयकी अपेक्षासे भेद और अभेद रत्नत्रय म्वरूप निश्चय और व्यवहार मोक्षमार्ग रूप मोक्षका उपाय या साधनेवाला होता, तथा मोक्ष रूपम यही जीव पदार्थ उपेयभूत है माध्य रूप है ऐसा जानना योग्य है । अर्थात् यह अनेक धर्मरूप जीव पदार्थ नित्रयक माधनको अपेक्षासे उपाय या साधन और रत्नत्रयका फल स्वरूप मुक्त अवस्थाका भाका होनमे उपय. रूप या साध्यरूप है। भावार्थः आत्मा ही साधक है आत्मा ही माध्य है। जब म आत्मा अपने शुहम्वरूपका अनुभव करता है अर्थात अभेद रत्नत्रय म्याप शुद्धान्मांक अनु. भवमें तल्लीन है तब यह माधक है और इमीकी आगंकी शुद्ध अवस्था माथ्य है। आगे प्राभूत और अध्यात्म शब्दका अर्थ कहते हैं: जमे कोई भी देवदत्त गमा दर्शनके लिये जाता है तब कोई भी मारवम्त गनाको भेट करना है बद गार बम्न प्रामुन ऋही जाती है । तसे ही परमात्माके आराधक पुरुषके लिये दोपहन पग्गामाप गनारे दर्शन या अनुभव करनेके प्रयोजनसे यह शास्त्र भी प्राभून है वर्गकि मार नलगा है। यह प्राभृतका अर्थ है। भावार्थ-मगयप्राभृतको समयमार कहते हैं। गांडेय आदि परद्रत आले. बनसे रहित होकर अपने शुद्ध आत्मामें अर्थात विशुद्ध आधार कार पदाभ अनुदान करना. आचरण करना सो अध्यात्म है । इस पाभून शास्त्रको मानकर क्या करना मोकने:- कि इस शास्त्रको जानकर, अच्छीनाह अनुभव कर नीने सिंध प्रगान मानापन our- .
reOne समयसार टीका। Jaxin REARRA योग्य है । कि मैं सहन शुद्ध ज्ञानानंदमई एक स्वभाव रूपं हूं, मैं संकल्प विकल्परहित निर्विकल्प हूं, मैं उदासीन हूं, अपना ही निरंजन शुद्ध आत्माका सम्यक श्रद्धान, उसीका स- म्यग्ज्ञान और उसीका अनुष्ठान या सम्यक्चारित्र या तन्मयपना इस रूप जो निश्चय रत्न- त्रयमई निर्विकल्प समाधिभाव उससे उत्पन्न जो वीतराग सहन आनंदरूप सुखका अनुभव उतना ही है लक्षण जिसका ऐसा जो स्वसंवेदन ज्ञान उसीके द्वारा में अनुभवने योग्य है, जानने योग्य हूं, प्राप्त होने योग्य हूं या मैं उसी अनुभव रूपी रससे पूर्ण कलशकी तरह भरा हूं। मैं राग, द्वेप, मोह, क्रोध, मान, माया, लोभ, पंचेन्द्रियोंके विषयोंमें व्यापार, मन, वचन, कायका व्यापार, भावकम द्रव्यक्रम और नोकर्म, अपनी प्रसिद्धि, पूजा, लाभ, देखे, सुने अनुभवे हुए भोगोंकी इच्छारूप निदानशल्य, मायाशल्य, मिथ्याशल्य इत्यादि सर्व विभाव परिणामोंसे रहित व शून्य हूं तीन जगतमें भी व तीन काल में भी मन, वचन, काय और कत कारित अनुमोदना इन नवप्रकारसे भी शुद्ध निश्चयनयंसे शुद्ध हैं ऐसे ही और भी मर्व जीव हैं जैसा मैं हूं ऐसी भावना करनी योग्य है । ऐसा इस ग्रंथका तात्पर्य है । इस ग्रंथमें टीकाकार कहते हैं कि इसमें ज्यादातर पदोंकी संधि नहीं की गई व वाक्य भी भिन्न २ रखे गए इसी लिये किं पाठकोंको सुख पूर्वक ज्ञान हो इस कारणसे लिंग, वचनं, क्रिया, कारक, संधि, समास, विशेष, विशेषण, वाक्यसमाप्ति आदि दोप विवक्यिोंको गृहण नहीं करना चाहिये तथा शुद्धात्मा आदि तत्त्वके व्याख्यान करनेमें जो कुछ अज्ञानसे कहीं भूल गया हूं सो भी क्षमा करने योग्य है । अव टीकाकार अन्तिम मंगलाचरणकहते हैं। . जयउ रिसि पउमणदी जेण महातच पाहुणम्सेलो. बुद्धिसिरेणुद्धरिओ, समप्पिओ, भव्यलोयम्स ॥ १ ॥ जंसेलीणा जीवा तरंति संसार सायर मणंतं. तं मव्वं जीव सरणं णंदर जिण सासणं सुइरं ॥ २ ॥ इसका भावार्थ यह है कि " श्रीपद्मनंदि ऋषि " अर्थात् श्री कुंद कुंदाचार्य देव जबवन्त हों जिन्होंने महातत्त्वका लाभ लेकर अपनी बुद्धिके विभवसे उद्धार किया अर्थात् यह ग्रंथ रचा और भव्य जीवोंको समर्पण किया । जो भव्यं जीव इस महातत्त्वमें लीन होते हैं वे इस अनंत संसार समुद्रको तिर जाते हैं । यह महा तत्त्वको बतानेवाला जिन शासन • सदोंकाल आनंदरूप रहो जो सर्व जीव मात्रका शरण है व संसारके क्लेशोंसे रक्षा करनेवाला है। इति श्री कुदकुंददेव व आचार्य विरचित समय प्रामृत नाम ग्रंथ सम्बन्धी तात्पर्य वृत्ति नामकी व्याख्या दंश ( यहाँ ११ ) अधिकारोंके द्वारा कहे हुए ४३९ चार सौ उनतालीस गाथाओं की पूर्ण की । यहाँ वृत्तिकार आशीर्वाद सूचक मंगलाचरणका श्लोक कहते हैं:- यश्चाभ्यस्यति, संश्रणोति पठति प्रख्याफ्यात्यादरात् । , सपरसार टीका। तात्पर्ययान्यमिद म्वरुपरमिकः संवर्णितं प्राभूनं । मश्वट्टपमलं विचित्रसक्तं ज्ञानात्मकं केचनं । मंप्राप्याग्रपदेऽपि मुक्तिललनारक्तः मदा यत्तते ।। भावार्थ यह है कि जो कोई इस ग्रंथकी तात्पर्य वृत्ति नामकी व्याख्याको अभ्यास करता है. सुनता है, पढ़ता है. व अति आदरसे इसकी प्रसिद्धि करता है मो पुरुषवरूपक रमिक महात्माओं द्वारा वर्णन किये हुए इस सार, अविनाशी न्वरूपमय, नाना प्रकारका विचित्रनाको सम्पनेवाले ज्ञान स्वरूप केवल भावको पाकर मुग्न्य अग्र जो मिन्ह पद उसमें रहता हुआ भी मदाही मुक्तिरूपी ललनामें लवलीन रहता है । इति तात्पर्य वृत्निसहित समयमार ग्रंथ समाम हुमा। ग्रंथका भावार्थ:-इस समयसार ग्रंथको रचकर श्री कुंदुकुंद्राचार्यदेवनं बहुत बड़ा उपचार किया है जिस उपायसे उपेयकी प्राप्ति होती है वह वास्तविक उपाय व साक्षात साधन निमको कि साधकतम कहते हैं कि निससे साध्यकी अवक्ष्य सिद्धि हो व जो सात्यकी मिहिका मुख्य उपादान कारण है सो इस ग्रंथमें वर्णन किया गया है। जो भव्य जीव श्री उमास्वामिस्त तत्वार्थसूत्रके अर्थका ज्ञाता व गुणस्थानोंका स्वरूप व उनमें काँका बंध, उदय, सत्ता व कसे २ भाव संभव हैं इन बातोंका भले प्रकार मर्मी है सो ही इस ग्रंथके वास्तविक म्वरूपको मगलकर अपना हित कर सकता है। मोक्षका स्वरूप अपने शुद्ध परम पारिणामिक भावका लाग जहां आत्माके अनंतगुण अपने खास स्वरूपमें झलक जाते हैं, निर्मल हो जाते हैं. ऐसे शुद्ध हो जाते हैं कि वे फिर कभी भी मले नहीं हो सकते उन गुणोममे जो कुछ गुण आगममें कड़े गए हैं उनमें स्वाधीन आनन्द भी एक गुण है । यह आनन्द्रगुण अपने पूर्ण प्रकाशके माथ निरंतर वना रहता है । इस उत्तम मुखमई अवस्थाके प्राप्त करलेनेका उपाय मम्यग्दर्शन, ज्ञान नाग्त्रिकी एकतारूप है ऐसा ही श्री "कुंकुंदाचार्य देवका और ऐसा ही उनके "मिष्य श्री उगास्वानाका वाक्य है जैसे 'दसणाण चरित्ताणि मोक्न्न मगं' (स-मार ११२) और सम्यग्दीन जाननारि. त्राणि मोक्षमार्गः (तन्वा मृ०१ १०१ उमा०)श्री उमास्वामी महागनं दगीका बाप व्यवहार नयकी मुग्न्यतामे और श्री कुंदकंदाचार्य देवने निश्चयकी मुज्यनामे कहा है । दोनोंदीने सम्यग्दर्शनके विपयभृत नव पदार्थ या सात तत्त्वांका न्वरूप व्यवहार और निश्रय नयम इसतरह दिग्वलाया है कि निमन दोनों नयोंका विरोष मिट जाना है। दोनोकाम्बामा झलक जाता है और दोनोंकी उपयोगिता प्रकट होती है। नियनवा मोटा आदान माधन है। और व्यवहार नयरूप मोसमाग उसीकी प्रकटना. यि र मगर निमित्तकारण है । हर एक कार्य उपादान और निगिन दोनों मामाली जनन पटना है। ज्यों २ उपादान कारण कागलप होने लगता है निगिन कारणली गोमता होती है।
समयसार टीका। NERARIODERARAM पर जबतक पूरा कार्य नहीं होलेता है निमित्त कारणका संयोग सहकारी रहता है। इस ग्रंथमें आचार्यका यही उपदेश है कि जबतक स्वरूपका लाभ नहीं उससे नीची अवस्थामें व्यवहार हस्तावलम्बनरूप है-परन्तु परका आश्रय जहां तक है वहां तक आत्मामें निर्बलता है अतएव पुरुषार्थी आत्मा यही भावना करे कि मैं परके आश्रयमे छूट कर स्वाधीन कार्य करनेवाला अनंतबली हो जाऊँ यद्यपि इस भावनामें वह पराश्रित व्यवहारको उपादेय न मान कर हेय ही समझता है परन्तु जब तक निश्चय स्वरूपकी स्वाधीनताको नहीं पालेता है व्यवहारके आश्रयको छोड़ता नहीं है क्योंकि इसीका आश्रय उमके परिणामको और भी नीची अशुभोपयोगकी दशामें जानेसे मना करता है । ज्ञानी- अनुभवी उपादान व निश्चयरूप साधनको ही साक्षात् मोक्षका मार्ग और व्यवहारको केवल मात्र सहकारी परम्परा रूपसे मोक्षका मार्ग जानता है। इस ग्रंथमें नव पदार्थोके असल तत्त्वको दिखलाते हुए आचार्यने बड़ा बड़ा ही अपूर्व काम किया है कि उनके भीतरसे जगह २ शुद्धात्माको छांटकर अलग अनुभव करा दिया है । जीव पदार्थका यद्यपि संसार अवस्थामें कर्मोंके सम्बन्धसे विचित्रपना है; देव, नारक, मनुष्य, तिर्यच अवस्थामें अनेक प्रकार विभावोंमें परिणमन है तो भी जैसे अनेक नमकीन बने हुए भोजनके पदार्थोंमें जो कुछ मनोहरता है व स्वादिष्टपना है वह नमकके कारणसे है। यदि नमक न हो तो स्वादिष्ट नहीं. लगते, उस नमकने ही सब व्यंजनोंमें प्रवेश कर उनको स्वादिष्ट कर दिया है तो भी वह नमक अपने स्वरूपसे छूट नहीं गया है वह नमक अपने गुण और पर्यायोंका धारी आप स्वयं है जैसाका तैसा ही बना है, यद्यपि व्यंजनोंमें प्रवेश कर उन्हीमें तन्मय दीखता है सौ भी उस नमककी नमकीनता हरएक व्यंजनमें झलक रही है-ज्ञानी उन व्यंजनोंके अंदर उस नमकंके असल स्वरूपका अनुभव करता है और प्रयोगका ज्ञाता प्रयोग करके नमकको अलग भी कर सक्ता है। इसी तरह यह जीव भी अपनी अनेक पर्यायोंमें अपने ज्ञान स्वभावसे झलक रहा है- उसका ज्ञानादि खस्वभाव संसारके भ्रमणमें खोया नहीं गया उसीका उसीमें है। ज्ञानी जीव अनेक पुद्गलकी संयोग रूप अवस्थाओंमें भी जीवको जैसाका तैसा बुद्ध निर्विकार ज्ञानानंद- मय अनुभव करता है और ध्यानादि प्रयोगोंसे उसको पुद्गलकी संगतिसे छुड़ा सक्ता है। इस तरहका कथन हरएक सुखके इच्छुक आत्माको अपने ही अन्दर अपने आत्माकी स्वाभाविक शुद्ध शक्तिका अनुभव करा कर परमानंद भोग करानेका कारण होजाता है। अजीवसे यह जीव शुद्ध निश्चय नयसे सर्वथा भिन्न है यद्यपि अजीवकी संगतिके कारण जीवको मनुष्य, नारकी, गोरा, काला, नीला, रागी, द्वेषी, मोही आदि कहते हैं परंतु यह सब कल्पना व जीवके लिये दुष्नाम पुद्गलकी संगतिसे हैं। पुद्गलके ही कारण जीव संसार- नाटक बनाता है । जब प्रत्येकका भिन्न२ लक्षण विचारा जाता है तो यह जीव अपने शुद्ध emamacesareesxe.28 समयसार टीका। चैतन्यमई लक्षणको लिये हुए प्रकट सर्व पुद्गलन्त विकारोंसे जुदा ही अनुभवमें आता है। मुमुक्षु व अतीन्द्रिय निराकुल सुखका अर्थी ज्ञानी जीव ज्ञाता, दृष्टा आत्मपदार्थको अभीयाने भिन्न देख उसीकी भावनामें तन्मय हो अपूर्व रसको वेदता हुआ अपनी महिमामें निःशंकपने प्रकाशित रहता है । यद्यपि व्यवहारमें इस जीवको परभावोंका कर्ता कहते हैं पर जब शुन्ह निश्चय दृष्टिसे विचारते हैं तो यह आत्मा ज्ञान स्वरूप है, परमशांत है, आनन्दमय है अन- एव अपनी ज्ञान परिणतिके सिवाय अन्य पर परिणतिका कर्ता नहीं है। हां अपने अनानसे यह आत्मा अपनेको परभावका करनेवाला भले ही मानले तथापि शुद्ध ज्ञानदृष्टिमे यह आत्मा अपने गुण पर्यायोंमें व्यापक रहता हुआ उन्हींकी शुद्ध परिणतिका करनेवाला है। यद्यपि प्रथम साधक अवस्थामें यह आत्मा बंध और मोक्षका करता है अर्थात में बंधा हूं, या वंधता हूं, बंधा था, व मैं कर्मोको छोड़ता हूं, छोडूंगा और मोक्ष पाऊंगा इत्यादि विकल्योंका की होजाता है पर निर्विकल्परूप ऊंची अवस्थामें केवल अपनी शुद्ध परिणतिका बिना किसी संकल्प विकल्पके कर्ता है। वास्तवमें ज्ञानी स्व समाधिमें लीन हो ऐसा ही अनुभव करता है कि मैं क्रोधादि भावोंको लेकर अनेक अशुद्ध भावोंका कदापि कर्ता नहीं, मैं तो शुद्ध. ज्ञायक स्वरूप परम गंभीर अपनी ज्ञानानंदमई परम शांत चंद्र समान ज्योतिसे परिपूर्ण सदा ही प्रकाश- रूप हूं । यद्यपि जगतमें कोई जीव पुण्यात्मा, कोई जीव पापी पुण्यकर्म और पाप कर्मके संयोगसे व्यवहार दृष्टिमें नमर आता है और यह भी झलकता है कि जगत्के जीव अपने शुद्ध जीवत्वको. भूल व्यवहार धर्म और अधर्ममें लवलीन रहते हुए परद्रव्यके मोहके कारण पर पुद्गलमय पुण्य या पाप कर्मको बांधते हैं तथा उनके उदय होने पर उसी मोहके कारण सुखी.या दुःखी होते और महा आकुलतामें लीन हो फिर नवीन पुण्य या पाप कर्मको वांधते हैं तथापि शुद्ध निश्चय दृष्टि से देखनेवाला ज्ञानी इस पाप और पुण्य दोनोंको पुद्गलमई अपनेसे भिन्न अनुभव करता है और अपने अनंत गुणों के विलासमें विरोधी व संसारका कारण जान इनको व इनके कारणरूप अशुद्ध भावों तकको त्याग देता है और स्वात्माको पूर्ण ज्ञाता दृष्टा आनन्दमय अनुभव करता हुआ अपने स्वरूपमें तल्लीन रहता है। केवल जानकर ही आलसी की तरह नहीं बैठ रहता है किन्तु पुरुषार्थी हो परसे हट निनमें ठहरनेका अभ्यास करता है। ज्ञानी भव्य जीव यद्यपि व्यवहार दृष्टिसे जब देखता है तो मिथ्यात्त्व, अविरति, प्रमाद, कपाय और योगोंको आश्रवका कारण जानता है उनमें भी मुख्यतास योगोंको प्रकृति प्रदेशका और कषायोंको स्थिति और अनुभागका कारण जान उनके हटानेको संवर करना चाहता है । तथापि जब वह ज्ञानी नीव, जीव और अजीवके भेद विज्ञानको ध्यानमें ले अपने स्वसंवेदन आत्मा- नुभवमें लीन होता है तब तुरत ही शुहात्माका लाम कर आश्रवोंसे दूर हो संबर भूमिमें ठहर जाता है तथा पिछले बांधे हुए कर्मोको छुड़ानेके लिये यद्यपि व्यवहार में सर्व परिग्रहको त्याग mamimr.RROR समयसार टीका। PRORowevereAnurasai ३४० मुंनि हो द्रव्यलिंगका आश्रय लेता है तथापि भावलिंगके बिना स्वमाधनकी साक्षात सिद्धि न जान शुद्ध ज्ञान और वैराग्यके पुंज आत्म स्वभावमं लीन हो जाता है । यद्यपि इस उद्यममें लगे हुए कोई पूर्वबद्ध कर्म अपना फल दिखलाते हैं तो भी वह ज्ञानी उनमें हर्ष व विपाद नहीं करता है, परम निर्भय होस्व स्वरूपमें उपसर्ग पीड़ित पांडवोंकीतरह लीन रहता है। जब वह कर्मोसे मोह छोड़ देता है तब वह कर्म अपने आप कुछ फल दे कुछ विना फल दे आत्माको छोड़ने चले जाते हैं । वह ज्ञानी भाव निर्जरारूपी भूमिमें दृढ़ खड़ा रहता है और यह भी विकता नहीं करता कि मैं कर्म शत्रुओंको हटाता हूं किन्तु निश्चल व निष्कम्प स्व अनुभूतिके विलाममें लीन हुआ आनन्दामृतका स्वाद लिया करता है। ज्ञानी भलेप्रकार जानता है कि, कर्म, नोकम. आदि अचेतन व चेतन पदार्थ जो मुझसे बाह्य हैं मुझे कर्मबंधों की नहीं है। किन्तु मेरेमें उन पदार्थोंके निमित्तसे व उनकी इच्छासे नाना प्रकारके गगढपादिक जो भाव होते हैं वे भाव ही कर्मबंधके निमित्त हैं । इसीलिये ज्ञानी इन भावोंको न करके परम उदामीन व समता भावमें लीन रहता है और रागादि भावोंके होनेमें मूल कारण अपना ही मोह भाव है ऐसा जान तथा सर्व जगतके पदार्थोंका यथार्थ स्वरूप अनुभव कर क्रोके उदयमें भी समभाव रखता हुआ स्वरूपमें तन्मई रहता है । इससे नवीनबंधको न करना हुआ पुरातनबंधको नाश करता है । परम तत्त्वज्ञानी व्यवहार प्रतिक्रमण प्रत्याख्यान आलोचनाको विषका कुंभ जान छोड़ता है और अभेदरत्नत्रयरूप निश्चय प्रतिक्रमण आदिको अमृतका कुंभ जान गृहण करता है-परके गृहणका अभावकर निरपराधी होता है तथा ऐसा स्वरूपमें लवलीन रहता है कि जिससे चार घातिया कर्मोंका नाश कर भाव मोक्षका स्वामी हो जाता है । भोर सदाके लिये अनंत सुखका लाभ कर लेता है। इसतरह नव पदार्थोकी कल्पना व्यवहार नयसे है इस कल्पनाको त्याग निर्विकल्प दशामें जब लीन रहता है तब केवल शुद्धात्माका परम अनुभव प्राप्त करता है । तथा उसी समय परम शुद्ध पारणामिक भावको भाता हुआ अथवा कारण समयसारको ध्याता हुआ उपादान वीर्यकी प्रकटतासे कार्य समयसार हो जाता है। अतएव प्रत्येक मुमुक्षु जीवको उचित है कि जो वह परम आत्मीक आनन्दको प्राप्त करना चाहे और साक्षात् ख स्वरूपको वर्तमानमें ही अनुभव करना चाहे तो वह या तो सर्वपरिग्रहका त्यागकर साधु हो विकल्परहित निश्चय चारित्रमें लीन होवे या श्रावक अवस्थामें रहता हुआ व्यवहार धर्मको साधन करे परंतु अंतरंगमें निश्चय रत्नत्रयरूपकोही उपादान जाने व्यवहारको हेय जाने और निस तिस प्रकारसे हो परमात्मानुभवमें लीन रहे दोहा- श्री जिनचरण प्रसादते, भाषा हुई प्रकाश । जे भवि धार कंठमें, होवै स्व पर प्रकाश ॥ १ ॥ ..
womenrARRRRArma सपयसार टीका। निज अनुभूति अमृन्यता, परमानंद दातार । ने पात्र हो सुम्बी, भव संकंदा निवार ॥ २ ॥ अल्पमती गुणश्रुत रहित, मैं निवृद्धि अपार अर्थ भावमं भूल कछु, निर्मल बुद्धि विचार ॥ ३ ॥ क्षम्य शम्य मम दोपको मूल ग्रन्थको पच । इसे मुधारों गुणभंवि, आनम तत्त्व गवेख ॥ ४ ॥ इति श्री समयमारकी नात्पर्यवृत्ति व्याख्याकी भाषा वचनिका मिनी आधिन मुट्टी ३ सोमबार वीर में० २४४१ व विक्रम मं० १९७२ तारीख : अबवर १५.५ दिन इन्दौरमें पूर्ण की । अत्र में भव्य जीवोंको धर्मग्रीतिको वृद्धिके अर्थ अपना मंठेप परिचय देता हूं । मेरे आत्माको इस मनुष्य भवके पर्यायका सम्बन्ध लमणपुर-सवनड. निन्दा अवधनिवामी अग्रवाल वंश गोयल गोत्रन धर्मात्मा तत्त्वन लाला मंगलमनके मुपत्र लान्दा मक्खनलाल स्वपिता और परम सुशील मार्दव गुण विभूपित पुरुषार्थी पर दुःखहरण कुमना नारायण देई स्वमाताके द्वारा विक्रम सं० १९३६ मिती कार्तिक मुदी १२ को प्रातःकाल हुआ । बाल्यावस्था हीसे श्री जिनेन्द्र के दर्शनका नियम आजन्म प्राप्त किया निसर्ग मिन- वाणी श्रवणका लाभ विद्यलाभ करने हा होता रहा। प्रथम माधारण देशी गणित व मंदिरनाम भक्तामर सूत्र पूनादि पाट पढे । फिर संम्मत सहित इंनी विद्या प्रवेशिका तक प्राप्त की। कलकतेकी धर्मात्मा मंडलीक सम्बन्धमे शास्त्रस्वाध्यायकी मचि हुई । जयमे वाव्याय करते २ व जैन समाचार पत्र पढ़ते २ च धर्मक व्याख्यान मुनते २ धर्मकी रात्रि व मंका ज्ञान बदना गया कलकत्तम जोहरीका व्यापार व लखनऊ में सकारी नौकरी की। महामार्ग प्रापमचमाता,म्बनी स्व लघु भ्राताका वियोग अष्ट दिवसक मध्यमें देख व शास्त्र के अमोलक तत्त्वता विनार कर ज्ञानव्यानको विशेष बढ़ानेकी रुचि हुई और गृहननालमें फिर फंसनेमे अगानि हुई । बम्बई के मेठ दानवीर जैन कुल भूपण माणिकचंद्र हीगचंद जे. पी. के मन ई १६० के अनुमान महारनपुरमें श्रम कार्यमें सहायता प्राप्तिकी अभिन्लापा गान नवस यम्बई रहना बीजार लिग। धर्मात्मा परोपकारी संठने मित्रवत साथमकि ममान व्यवहार किया । आध्यात्मिक व मंत शास्त्रकि स्वाध्यायकी विशेष रुचि हुई। अधिक कान, स्वाध्याय में चीना । अचानर में गुम्माना लाला अनंतलालका मरण युवावस्था देव अधिक अनि प्राप्त कर उनी व यार में. : ११ श्रीमान ऐलक पन्नालालमी महागनके निकट गोलापुर मिनी गगग्सर मुदी : हो . चयं व्रतके नियम धारण शिय व मानवी प्रनिगा सम्मली क्रियात्रीको अभ्यास शुरू किया।
RCANESH २४२ . समयसार टीका। बारम्बार श्री समयसार ग्रंथकी तात्पर्य संज्ञिका टीका बांचनेसे व इसकी देशभाषा न देखके अपने कल्याण व अन्य भाषा प्रेमी जीवोंके हितार्थ इसकी भाषा प्रारंभ की। आज शुभ दिवस व घड़ी है कि यह वचनिका श्री गुरुके प्रसादसे इन्दौर नगरमें माधर्मी उदासीन श्रावक अमरचंदजी और पन्नालालजी गोधाके मंगतिमें पूर्ण की । ता० ११-१०-१५ } सर्व धर्मात्माओंका रूपापात्र- शीतलप्रसाद ब्रह्मचारी, इति शुभं भवतु, कल्याणं भवतु, सजीवानां उपकारो भयतु । 88888888888888888 ब्रह्मचारी शीतलप्रसादजी कृत पुस्तकें- जिनेन्द्रमत दर्पण प्रथम भाग द्वितीय , (तस्वामाला) (ग्रहस्थधर्म) १) -) तृतीय " नियमसार दीपमालिका विधान &&&&&&&& सामायिक पाठ 3) छाढाला (सार्थ) समयसार टीका मिलनेका पता--- मैनेजर, दिगम्बरजैन पुस्तकालय-सूरत । SSSSSSSSSSESS शुद्धिपत्र । अशुद्ध त ण्यत्तविभत्तं तं यत्तविभत्त पृ. लाइन १७ २८ च्छुत केवी ६ च्छुत केवली श्रत केवली अत कंपनी भावनां व्यवहार १० ११ भावना १६ .६ १६ १२ दाप्दान्तों १२ २० २२ १३ २६ ३० ववहाग दृढ़ता जिद मोहं. उहयं माण दान १२ ४ २५ ४८ ८ व्यहवार द्राष्ट्रान्तों हृदय विवहारा दृढ़ता नितमोहं उदयं जाणम दर्शक उक्त निश्रयक याख्यान णाविपरिणमंदि सम्यत्व शुद्धोपयोग धोग्गल. जो मकवस्त ६. ५५... ६२ ३. निश्चय करक व्याख्यान णविपरिणमदि सयनव शुद्धोपयोग पागल १३ ३० ६३ ८० ८१ २८ १० जे ३० १९ मकुर्वतात करता है अयंनि मांथ्यमन ar १७ कराना है कुवति 20 १०१ १०६ ११३ ६ सांग्यमता परिणमयति सम्मनं परिणामयनि सम्मत १५ १४ मिन्न ११० ११ २८ १४३ .(२) लाइन पृ. १४५ १५६ १५७ १९ अशुद्ध कम्मे णोकम्मे बंधौः प्ररूतियोंके १० भावकों कम्मणोकम्म बंधी प्रकृतियोंको १६ को mm २३ २१ १५८ १५९ वह नि यह कि १ ३० २७ १६० १६५ १६९ १८२ १८४ २० १५ ३१ २०९ २ २९७ चा घातकारणनि पं........प्पं जोड़ दे एत्तु तद्द परिणामों जीवरस कंमकलं कुणादि अत्मा द्रव्यर्थिक पुराय अपना शब्दार्थ सहित विशेषार्थ १८ २२ ११ २१ २८ २६५ २६९ २७१ २७५ २८३ २९१ चार घातकारणानि पञ्चयावहुवियप्पं छोड़ दे एतत्तु तद परिणामोंको जीवम्मा कंमफलं कुणदि आत्मा द्रव्यार्थिक पुण्य अपना विशेपार्थ दुक्खम्सवीयं अट्ट- विहं तं बंधदि मनःपनम अज्झवसाणं. १ سر ११ ११ ३१ ३१२ दु........वंददि ८ मन,पर्यय ६ ३१५ ३१७ ३२१ ३२३ ३२ वहा ये २६ .२९ २१ अज्वझसाण बहाये धित्तुं लिगेसु व पित्त लिंगेसु
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