Shri Jawahar Vidyapith Binasar, Bikaner
Jitkalap Sutram
Front matter
सद्गत मोदी श्रीयुत प्रेमचंद दोलतराम स्मारक-ग्रन्थांक १ --- ---- r - NUA - अमदाबाद निवासी सद्गत श्रावक श्रीयुत प्रेमचंद दोलतराम मोदीना पुण्यस्मरणार्थ, तेमना स्नेही रा. व. श्रीगिरधरलाल उत्तमराम पारेख, बी. ए., एलएल. बी., (पब्लिकमोसीक्युटर-अमदावाद) एमणे अर्पण करेला द्रव्यमाथी आ ग्रन्थ प्रकाशित करवामां आव्यो छे.
जैन साहित्य संशोधक ग्रन्थमाला - + - जीतकल्प-सूत्र संपादक- मुनि जिन विजय
अस्य जीतकल्पसूत्रस्य प्रथमप्रकाशनकर्तृभ्यः
जर्मनि-विषयवास्तव्य-अध्यापक
श्री अन्त लॉयमान
(Ernst Leumann)
नामधेय-पण्डितप्रवरेभ्यः
समर्पितमिदं ग्रन्थरत्नम्
सम्पादकेन
जैन साहित्य संशोधक ग्रन्थमाला ग्रन्थाङ्क ७. श्रीजिनभद्रगणि-क्षमाश्रमण-विरचितं जीतकल्प-सूत्रम् [श्रीचन्द्रसूरिसन्हब्ध-विषमपदव्याख्याविभूषित- श्री सिद्ध से नगणि कृत- बृहचूर्णिसमन्वितम्] संशोधक तथा संपादक मुनि जिन विजय [आचार्य-गूजरात पुरातत्त्व मन्दिर-अमदाबाद] प्रकाशक जैन साहित्य संशोधक समिति (अमदाबाद) से० स० १९२६] [वि० सं० १९८२ [ मूल्यं रूप्यक-त्रयम् ]
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Printed by Ramohandra Yesu Shedge, at the Nirnaya Sagar Press
26-28, Kolbhat Lane, Bombay
Published by
Muni Jina Vijayaji,
(Jaina Sāhitya Sams'odhaka Samiti)
AHMEDABAD.
संपादकीय प्रस्तावना आधारभूत प्रतिओनो परिचय जीतकल्पसूत्रनी प्रस्तुत आवृत्ति नीचे जणावेली हस्तलिखित प्रतिओना आधारे तैयार करवामां आवी छे:- [१] जीतकल्पसूत्र मूलपाठ. A) ताडपत्र ऊपर लखेली बृहचूर्णिसाथेनी,पूनाना भांडारकर ओरिएन्टलरीसर्च इन्स्टीट्युटमांना राजकीय ग्रन्थ संग्रहनी । (B) कागळ ऊपर लखेली केवळ मूलमाननी ३ पानानी, गूजरातपुरातत्त्वमन्दिरमा (अमदाबाद) ना संग्रहनी। (c) तिलकाचार्यकृत वृत्तिसमेतनी श्रीयुत के.प्रे. मोदी मारफत आवेली । (D) जर्मन विद्वान् डॉ.अर्नस्त लॉयमान संपादित अने Sitzungsberichte der Koniglich Preussischen Akademie der Wissensohaften, Berlin, 1892. मां रोमना- क्षरमां मुद्रित । [२] सिद्धसेनसूरिकृत बृहचूर्णि, (A) पूनाना भांडारकर ओरिएन्टल रीसर्च इन्स्टीट्युटमांना संग्रहमांनी ताडपत्रनी नं. २३; १८८०-८१ वाळी प्रति । ए प्रतिने आ आवृत्तिमां पाठान्तर सूचववा माटे A संज्ञा आपवामां आवी छे । ए प्रतिमां लेखनकाल आपेलो नथी पण लीपिनी आकृति ऊपरथी ते विक्रमना १२ मां सैकामां लखाएली होय तेम लागे छ । प्रति बहु शुद्ध नथी । एमां मूळ सूत्र-पाठ पूर्ण आपेलो छ । (B) उक्त संग्रहमांनी ताडपत्रनी नं. २४ ; १८८०-८१ वाळी वीजी प्रति । ए प्रतिना पाठान्तर सूचववा माटे, एने अहि B संज्ञा आपी छे । ए, प्रमाणमां काईक वधारे शुद्ध छे। हांसियाओमां घणी जग्याए ढूंका टिप्पणो पण आपेलांछे। पण एनां अन्तनां केटलांक पांनां नष्ट थई गयां छे तेथी एनो पण लेखनकाल ज्ञात थई शक्यो नथी । वर्णाकृति ऊपरथी अनुमाने ए १३ मा सैकामां लखाएली होय तेम जणाय छ । [३] श्रीचंद्रसूरिरचित चूर्णिविषमपव्याख्या. (A) श्रीयुत के. प्रे. मोदी मारफत मळेली मुनिवर्य श्रीहंसविजयजीना शास्त्रसंग्रहमांनी कागळ ऊपर लखेली नवीन प्रति । (B) आचार्य श्रीविजयनेमी सूरिना संग्रहमांनी ए ज जातनी वीजी प्रति । मा बन्ने प्रतिओ कोई एक ज मूल प्रति ऊपरथी लखाएली नवीन नकलो छ । प्रतिओ सामान्यरीते बहु ज अशुद्धतावाळी छे । जूनी प्रतिनी लीपिना वळणने बराबर नहीं समw जनार एवा कोई सीखाउ लहियाओना हाथे आ नकलो थई छे तेथी एमां, ए लहिया- ओए, एक अक्षरना बदले बीजो अक्षर लखी नांखी, ग्रन्थनी अशुद्धिमा घणो वधारो करी दीघो छ । उदाहरण तरीके-'ए' अक्षरनी जग्याए 'प'; 'थ' नी जग्याए 'घ'; 'द्र' ना बदले 'इ', 'स्त' ना बदले 'सू', 'भ' ना माटे 'त'; अने 'घ' ना माटे 'ब'; एम पंक्तिए पंक्तिए अनेक वर्णोनो विपर्यय करी दीधेलो नजरे पडे छे । आम, जूनी अने शुद्ध प्रतिनी प्राप्तिना अभावे ए व्याख्याना संशोधनमा घणी कठिनता अनुभववी पडी छे अने तेथी कचित्स्थळे तो अशुद्ध,पाठने ज स्थानस्थित राखवो पड्यो छे । जिनभद्रगणि-क्षमाश्रमण आ जीतकल्पसूत्रना कर्ता जिनभद्रगणि क्षमाश्रमण छे, एम चूर्णिकारनो स्पष्ट उल्लेख छ; अने अन्यान्य टीकाकारोए तथा अन्य ग्रंथकारोए पण ए बाबतनो घणा ठेकाणे निर्देश करेलो छ । आवश्यक सूत्रना सामायिकाध्ययन ऊपरनुं लगभग पांच हजार ग्रन्थप्रमाण प्राकृतगाथाबद्ध भाष्य के जे विशेषावश्यक भाष्यना नामे सुप्रसिद्ध छे तेना कर्ता पण आ ज जिनभद्र गणी छे । आ भाष्यग्रन्थ जैन प्रवचनमा एक मुकुटमणि समान लेखाय छे अने तेथी भाष्यकार जिनभद्र- गणी जैनशास्त्रकारोमां अग्रणी मनाय छे । जैन दर्शन प्रतिपादित ज्ञानविषयक विचारने केवळ श्रद्धागम्य-विषयनी कोटिमाथी बुद्धिगम्य-विषयनी कोटिमां उतारवानो सुसंगत प्रयत्न, सौथी प्रथम एमणे ज ए महाभाष्यमां कों होय, एम जैन साहित्यना विकासक्रमनुं सिंहावलोकन करतां जणाई आवे छे । जैन आगमोना संप्रदायगत रहस्य अने अर्थना, पोताना समयमां अद्वितीय ज्ञाता तरीके, ए आचार्य सर्वसम्मत गणाता हता; अने तेथी एमने 'युगप्रधान एवं मह- त्वख्यापक उपपद मळेलं हतुं । जीतकल्पचूर्णिना कर्ताए, प्रारंभमां, ५ थी ११ मा सुधीना पद्यमां आ आचार्यनी जे गंमीरार्थक स्तुति करेली छे ते ऊपरथी एमनी ज्ञानगंभीरता अने सांप्रदायिक प्रतिष्ठिततार्नु कांईक सूचन थाय छे । आ पद्योनो भावार्थ आ प्रमाणे छे:- ५. अनुयोग एटले आगमोना अर्थ ज्ञानना धारक, युग-प्रधान, प्रधानज्ञानियोने बहुमत, सर्व श्रुति अने शास्त्रमा कुशल, अने दर्शन-ज्ञान उपयोगना मार्गस्थ एटले मार्गरक्षक । ६. कमलना सुवासने अधीन थएला भ्रमरो जेम कमलनी उपासना करे छे तेम ज्ञानरूप मक- रन्दना पिपासु मुनियो जेमना मुखरूप निर्झरमांथी नीकळेला ज्ञानरूप अमृतनुं सदा सेवन करे छे । ७. स्व-समय अने पर-समयना आगम, लीपि, गणित, छन्द अने शब्दशास्त्रो ऊपर करेला व्याख्यानोथी निर्मित थएलो जेमनो अनुपम यशःपटह दशे दिशाओमां भमी रहेलो छ । ८. जेमणे पोतानी अनुपम मतिना प्रभावे ज्ञान, ज्ञानी, हेतु, प्रमाण, अने गणधरपृच्छानुं सविशेष विवेचन विशेषावश्यकमां ग्रन्थनिवद्ध कयुं छे । ९. जेमणे छेद सूत्रोना अर्थाधारे, पुरुष विशेषना पृथक्करण प्रमाणे, प्रायश्चित्तना विधिनुं विधान करनार जीतकल्पसूत्रनी रचना करी छ । , ७ . - १०. एवा, परसमयना सिद्धान्तोमां निपुण, संयमशील श्रमणोना मार्गना अनुगामी, अने क्षमा- श्रमणोमां निधानभूत जिनभद्र गणी क्षमाश्रमणने नमस्कार । आमांना ५ मा पद्यना तात्पर्थार्थ ऊपरथी ए जणाय छे के-जिनभद्र गणी आगमोना अद्वितीय व्याख्याता हता; युगप्रधान पदना धारक हता; तत्कालीन प्रधान प्रधान श्रुतधरो पण एमने बहु मानता हता; श्रुति अने अन्य शास्त्रोना पण ए कुशल विद्वान् हता; अने जैन सि- द्धांतोमा जे ज्ञान-दर्शनरूप उपयोगनो विचार करवामां आव्यो छे तेना ए समर्थक हता। ६ हा पद्यना तात्पर्यथी ए जणाय छे के एमनी सेवामा घणा मुनियो ज्ञानाभ्यास करवा माटे सदा उप- स्थित रहेता हता । ७ मा पद्यमां, जुदा जुदा दर्शनोनां शास्त्रो; तथा, लीपि विद्या, गणित शास्त्र, छन्द शास्त्र, अने शब्द (व्याकरण ) शास्त्र आदिमां एमर्नु अनुपम पांडित्य सूचित कर्यु छे । ८ मा पद्यमां विशेषावश्यकभाष्य; अने ९ मामां, जीतकल्पसूत्र विषयक एमनुं कर्तृत्व प्रकट कयु छे । १० मा पद्यमां, एमनी परसमयना आगम विषेनी निपुणता, खाचारपालननी प्रवणता, अने सर्व जैन श्रमणोमा रहेली मुख्यतानुं सूचन कयु छे । आटला संक्षिप्त परिचय सिवाय अन्यत्र क्याए पण ए महान् आचार्यनो कशो पण विशेष उल्लेख दृष्टिगोचर थतो नथी। हरिभद्रसूरि, शीलांकाचार्य, जिनेश्वरसूरि, अभयदेवसूरि, हेमचंद्रसूरि, वादीदेवसूरि, मलय- गिरि अने देवेन्द्रसूरि विगेरे पाछळना प्रसिद्ध प्रन्थकारो अने टीकाकारोए एमनो नामनिर्देश पोतानी कृतिओमां अनेकशः करेलो छे । "भाष्यसुधाम्भोधि; भाष्यपीयूषपाथोधि; भगवान् भाष्यकारदुष्षमान्धकारनिमग्नजिनवचनप्रदीपप्रतिमः दलितकुवादिप्रवाद प्रशस्यभा- ध्यसस्यकाश्यपीकल्प; त्रिभुवनजनप्रथितप्रवचनोपनिषद्वेदी, सन्देहसन्दोहशैलशंगभंगद- म्भोलि;" इत्यादि प्रकारनां विशिष्ट विशेषणोपूर्वक एम, नामस्मरण करवामां आव्युं छे; अने ए रीते एमनी आप्ततानो गौरवपूर्वक खीकार करवामां आव्यो छे। दरेक संप्रदायमा विद्वानोना बे प्रकार नजरे पडे छः एक तो आगमप्रधान अने बीजो तर्क- प्रधान । आगमप्रधान पंडितो हमेशां पोताना परंपरागत आगमोने-सिद्धान्तोने शब्दशः पुष्टरीते पकडी रहेवाना स्वभाववाळा होय छे; त्यारे तर्कप्रधान विद्वानो आगमगत पदार्थव्यवस्थाने तर्क- संगत अने रहस्यानुकूल मानवानी वृत्तिवाळा होय छे । आथी केटलीक वखते आगमप्रधान अने तर्कप्रधान विचारकोनी संप्रदायगत तत्त्वविवेचननी पद्धतिमां विचारमेद पडे छे । ए विचार- भेद जो उग्र प्रकारनो होय छे तो कालक्रमे संप्रदाय मेदना अवतारमा अवसान पामे छ; अने सौम्य प्रकारनो होय छे तो ते मात्र मतमेदना रूपमा ज विरमी जाय छे । जैन संप्रदायना इतिहासमुं अवलोकन करतां तेमां आवा अनेक विचारभेदो, मतभेदो अने संप्रदायमेदो अने तेनां मूलभूत उक्त प्रकारनां कारणो बुद्धि आगळ स्पष्ट तरी आवे छे । ए विचारना एक उदाहरणभूत जिनभद्र गणी क्षमाश्रमण पण छे; अने तेथी जैन प्रवचनना इतिहासमा एमने धणी प्रसिद्धि प्राप्त थई छ । निनभद्रगणी आगम-प्रधान आचार्य छे। जैन आगमानाय जे परंपराथी चाल्यो आवतो हतो .N , - तेने शब्दशः अनुसरी ते ऊपर संगतवार भाष्य रचवानुं प्रधान कार्य एमणे कयु हतुं । ए भाष्यमां आम्नायथी विरुद्ध जनारा दरेक पक्ष ऊपर एमणे यथेष्ट आक्षेप-प्रतिक्षेप कर्या छे अने खसंप्रदायर्नु समर्थन कर्यु छे । ए पोताना समर्थनमा तर्कनो उपयोग करे छे पण ते तर्क आनायानुकूल होय तो ज तेने महत्त्व आपे छे । आम्नायथी आगळ जनार तर्कने ए उपेक्षणीय गणे छ । उदाहरण तरीके एक प्रसंग लईए-सिद्धसेन दिवाकर जिनभद्रना पुरोगामी आचार्य छ । जैनवाड्मयमां अने इतिहासमां तेमनुं स्थान धणु ऊंचुं छे । जैनधर्मना में महान् समर्थक अने प्रभावक आचार्यो थई गया छे तेमां सिद्धसेनसूरि घणा आगळ पडता छ । सम्मतितर्क, न्यायावतार, महावीरस्तुति विगेरे मौलिक-सिद्धान्त-प्रतिपादक अने प्रौढविचार-पूर्ण एमना ग्रन्थो छ । जैन तर्कशास्त्रना ए व्यवस्थापक अने विवेचक छ । एथी ए तर्कप्रधान आचार्य मनाय छे । जैनदर्शनना ए एक अनन्य आधारभूत आप्त पुरुष छ । एमना पाछळना सर्व समर्थ आचार्यो ए एमने आप्तरूपे स्वीकार्या छे। ए आचार्ये पोताना सम्मतितर्क नामना तात्त्वि- कग्रन्थमां, केवलज्ञान अने केवलदर्शनना वरूपनो विचार करतां, ए सिद्धांत प्रतिपादित कर्यो छे के केवलज्ञानीने ज्ञान अने दर्शन बन्ने युगपत् ज होई शके छ; अने तेथी यथार्थमां बन्ने एक खरूप ज छे । आगमोमां जे "जुगवं दो णथि उवओगा" ए विचार प्रतिपादेलो छ तेनाथी सिद्धसेननो सिद्धान्त जराक विरुद्ध देखाय छ । एटले आगमवादी जिनभद्र गणी क्षमाश्रमणे पोताना भाष्यमां सिद्धसेनना विचारनो विगतवार प्रतिक्षेप कर्यो छे अने तात्पर्यमां जणाव्यु छे के तर्कथी गमे ते विचार सिद्ध थतो होय पण आगमथी बहार जता तर्कनो स्वीकार न करी शकाय । आगममां क्याए पण युगपदुपयोगर्नु सूचन नथी अने तेथी ए विचार अग्राह्य छ । आ विषयनो उपसंहार करतां जिनभद्र गणी क्षमाश्रमण जणावे छे के- कस्स व नाणुमयमिणं जिणस्स जइ हुज दोवि उवओगा। नूणं न हुंति जुवगं जओ निसिद्धा सुए बहुसो ॥ न वि अभिनिवेसवुद्धी अम्हं एगंतरोवओगम्मि । तह वि भणिमो न तीरइ जं जिणमयमन्नहा काउं॥ (विशेषावश्यकभाष्य, पृष्ठ १२१३) अर्थात्-जो जिनने-केवलीने युगपद् बन्ने उपयोग होत तो ते कोईने अनभिमत न थात । पण ते छे ज नहीं; कारण के सूत्रमा तेनो घणी जग्याए निषेध करवामां आवेलो छ । तेम ज क्रमोपयोगमां-एक पछी एक थनार ज्ञानमां-अमारी काई अभिनिवेशवुद्धी नथी। पण तथापि कहीए छीए के जिनना मतने अर्थात् आगमनी परंपराने अन्यथा न ज करी शकाय । आम जिनभद्रगणी आगमपरंपराना महान् संरक्षक हता अने तेथी तेओ आगमवादी के सिद्धान्तवादी ना विरुदथी जैन वास्मयमां ओळखाय छे । जिनभद्रगणीनी ग्रन्धकृतिओ जिनभद्रगणीना बनावेला ग्रन्थोनी चोकस माहिती काई मळती नथी । सामान्य रीते नीचे जणावेला पांच ग्रन्थो तेमनी कृति तरीके सुप्रसिद्ध छ ।
९ १. विशेषावश्यक भाष्य मूळ अने टीका. आ-भाष्य बहु प्रसिद्ध अने प्रकाशित छ । आना ऊपर ग्रन्थकारे पोते ज एक संस्कृत टीका लखी हती पण ते अत्यारे दुर्लभ छ । बीजी टीका शीलांकाचार्य जेमनुं वीजुं नाम कोट्याचार्य पण प्रसिद्ध छे तेमणे लखी छे। ए टीकानी ताडपत्र ऊपर लखेली एक अतिजीर्ण प्रति पूनाना राजकीय ग्रन्थसंग्रह्मां सुरक्षित छ । त्रीजी टीका मलधारी हेमचंद्रसूरिनी बनावेली छे अने ते प्रकट थई गई छ । २. वृहत्संग्रहणी. आ लगभग ४०० थी ५०० गाथानो ग्रन्थ छ । एना ऊपर मलयगिरि सूरिए संस्कृत टीका लखी छे । ग्रन्थ सटीक प्रसिद्ध थई चुक्यो छे । ३. बृहत्क्षेत्रसमास. आ पण प्राकृत गाथाबद्ध ग्रन्थ छ । आना ऊपर पण मलयगिरि विगेरे आचार्योए टीकाओ लखी छे । ग्रन्थ प्रसिद्ध छ । ४. विशेषणवती. लगभग ४०० गाथाओनो बनेलो आ एक प्रकरण ग्रन्थ छ, भने अद्यापि अप्रकाशित छे। ५. जीतकल्पसूत्र प्रस्तुत ग्रन्थ । आ सिवाय ध्यानशतक नामनो एक ग्रन्थ जे हरिभद्र- सूरिनी आवश्यक टीकामां समुद्धृत छे तेना कर्ता पण जिनभद्रगणी कहेवाय छे पण ते सन्दिग्ध छ । जिनभद्रगणीनी भाष्यकार तरीकेनी बहु ख्याति छे। तेमा मुख्यतया तो विशेषावश्यक भाष्य ने लईने ज ए प्रसिद्धि प्राप्त थई होय तेम जणाय छे । कारण के ज्या ज्या भाष्यकारना नामे एमनो उल्लेख आवे छे त्यां त्यां घणा भागे विशेषावश्यकना अवतरणो टांकवामां आन्यां होय छे । पण, ए भाष्य सिवाय बीजां पण कोई भाष्यो एमणे रच्यां होय तो ते संभवित छ । एर्नु काईक अस्पष्ट सूचन, कोट्याचार्यनी विशेषावश्यकभाष्यटीकामांना एक उल्लेखथी थाय छ: 'पोग्गल-मोयगदन्ते' ए पदथी शुरुथती विशेषावश्यकभाष्यनी २३४* मी गाथामां जे दृष्टान्तो सूचव्या छे तेमनुं विवरण आ भाष्यमां करवामां आव्युं नथी । पण निशीथसूत्रना भाष्यनी पीठिकामां आ गाथा अने एमां सूचवेलां दृष्टान्तोनुं विवरण विगतपूर्वक आपलं छे । एटलामाटे कोट्याचार्य पोतानी टीकामां आ दृष्टांत-सूचक गाथानी व्याख्या करतां विवरणमाटे लखे छे के-'निशीथे वक्ष्याम:'--निशीथमां आ विवरण करीशुं ।' आ वाक्य कोट्याचा- र्यनु होय एम तो सभवे ज नहीं । कारण के निशीथभाष्य कोट्याचार्यकृत छे एवी प्रसिद्धि के परंपरा विल्कुल संभळाती नथी । तेथी आ वाक्य जिनभद्रगणीनी खोपज्ञटीकामांनुं होवू जोइए। अने जो तेम होय तो ग्रन्थकारे आ गाथार्नु विवरण निशीथ भाष्यमा कर्यु होय एटले विशे- पावश्यकभाष्यमा पुनः ते करवानी आवश्यकता नहीं रहेवाथी अहिं मात्र तेनुं सूचन ज करी दीधुं होय । विशेषावश्यकटीकाकार हेमचंद्रसूरि पण आ गाथानी व्याख्यामा अते एम लखे छे के-'एतान्युदाहरणानि विशेषतो निशीथादवसेयानि ।' मारी पासे केटलांक प्रकीर्ण पाना- ओनो एक सग्रह छे तेमां भाष्यो अने चूर्णिओमांनी केटलीक नोंधो कोई विद्वाने करेली छे * काशीथी प्रकट यएल आवृत्तिमां आ गाथानो क्रमांक २३५ छे, पण पूनानी कोट्याचार्यवाळी टीकानी प्रतिमा ए भक २३४ छे। 2 ए संग्रह आसरे ३०० करतां वधारे वर्षनो जूनो लखेलो छ । एमां एक ठेकाणे निशीथभाष्यनी ३ गाथा लखेली छे, अने ते पछी "इति जिनभद्रक्षमाश्रमणकृतनिशीथभाष्यस्थाष्टमोद्देशके" आवी स्पष्ट नोंध करी छे । अभ्यासिओए आ बाबतमा विशेष शोध करवानी आवश्यकता छ ।* जिनभद्रगणीनो समय जिनभद्र गणीना गण-गच्छादिनो के गुरु-शिष्यादिनो कोई उल्लेख जोवामां आवतो नथी। सोळमा सैका पछी लखाएली पट्टावलिओमां तेमना समयनो निर्देश थएलो जोवामां आवे छे अने ते प्रमाणे महावीर निर्वाण पछी सं० १११५ मां तेमनो स्वर्गवास थयो मानवामां आवे छे । वीरनिर्वाण १११५ ते विक्रम संवत् ६४५ बराबर थाय छे । पट्टावलिओमां उल्ले- खेलो आ समय केटलो असन्दिग्ध छे ते जाणवानां विशेष प्रमाणो अद्यापि दृष्टिगोचर थयां नथी। तपागच्छ, अंचलगच्छ, उपकेशगच्छ, लघुपोशालिक, बृहत्पोशालिक, आदि गच्छोनी जे आधुनिक पट्टावलिओ उपलब्ध छे तेमनी मुख्य परंपरामां तो जिनभद्रनो कोई निर्देश नथी । पण खरतर गच्छीय पट्टावलिओमां कोक ठेकाणे मूल पट्टपरंपरामा जिनभद्रने दाखल करी दीघेला जोवामां आवे छे खरा । पण तेमां परस्पर घणो ज विरोध नजरे पडे छ । उदाहरण तरीके, मारी पासे जे केटलांक आवां पट्टावलिनां पानाओ छे तेमांथी एकमां जिनभद्रने महावीरथी ३५ मी पाटे लख्या छे; वीजा पानामां ३८ मी पाटे लख्या छे; त्यारे वळी त्रीजा पानामा २७ ,मी पाटे लख्या छ । केटलांक पानाओमां जिनभद्रनी पाटे हरिभद्ने वेसार्या छे, तो केटलांकमा जिनभदनी पाटे शीलांकाचार्यने वेसार्या छ । एक पट्टावलिमां हरिभद्रने महावीर निर्वाण पछी ५८५ वर्षे अने जिनभद्रने ९८० वर्षे थएला जणाव्या छे। आम पट्टावलिओनी विगतो वहुज असंबद्ध होवाथी तेमांना कोई पण कथनने अन्यान्य पुरावाओना आधारे निर्णीत कर्या सिवाय सत्य मानी शकाय तेम नथी ए स्पष्ट ज छ । धर्मसागर गणीकृत तपागच्छ पट्टावलि के जे केटलाक ऐतिहासिक ऊहापोह पछी लखवामा आवी छे अने जेनुं संशोधन पण केटलाक विद्वानोनी वनेली खास समितिए कयु छे, तेना उल्लेख प्रमाणे जिनभद्र गणी, हरिभद्र पछी ६०-६५ वर्षे थया हता। पण आ उल्लेख पण एटलो ज मूलभरेलो छ । कारण के प्रथम तो हरिभद्रनो स्वर्ग समय जे ए पट्टावलिमा वीरसंवत् १०५५, विक्रम संवत् ५८५ आप्यो छे ते ज बरावर नथी, ए में हरिभद्रना समय निर्णयमा विस्तृत चर्चा करी सिद्ध कयु छ; अने वीजें, हरिभद्र सूरिए पोतानी आवश्यक टीकामां अनेक ठेकाणे जिनभद्रनुं सरण कर्यु छ अने विशेषावश्यकनो स्पष्ट उल्लेख पण कर्यो छे । एटले हरिभद्र पछी जिनभद्र कोई पण रीते होई शक नहीं ए निश्चित छ । धर्मसागरकृत पट्टावलिनो उल्लेख आ प्रमाणे छे:- श्री वीरात् १०५५ वि० ५८५ वर्षे याकिनीसनुः श्रीहरिभद्रसरिः स्वर्गभाक् । निशीथ-बृहत्कल्प-भाष्यावश्यकादिचूर्णिकाराः श्रीजिनदासगणिमहत्तरादयः पूर्वगत- * पावलिभोना केटलांक पानाओमा तो एमने "सर्व भाग्यकर्ता" पण लखेला छ ।
, , ११ श्रुतधर-श्रीप्रद्युम्नक्षमाश्रमणादिशिष्यत्वेन श्रीहरिभद्रसूरितः प्राचीना एव यथाकालभा- विनो बोध्याः। १११५ श्रीजिनभद्रगणियुगप्रधानः । अयं च जिनभद्रीयध्यानशतक- करणान् भिन्नः संभाव्यते । -इण्डियन एण्टीकेरी, पु. ११, पृ. २५३. खरतर गच्छनी पट्टावलिओ-जेमा छेल्ला सैकामां थई गयेला क्षमाकल्याणमुनिनी बनावेली मुख्य कही शकाय अने जेनो सार डॉ. क्लाटे इण्डियन एण्टिक्वेरीना पु० ११, पृ०२४३-४९ मां आप्यो छे-ते अनुसारे जिनभद्रनो समय वीरनिर्वाणनो दशमो सैको छ। ए पट्टावलिमा लख्या प्रमाणे वीर सं० ९८० मां देवर्द्धिगणी थया। तेज समयमां चतुर्थीनी संवत्सरी स्थापन करनार कालकाचार्य थया (वी. सं. ९९३); ते ज अरसामा विशेषावश्यक भाष्यादिना कर्ता [बीजी प्रतिप्रमाणे सर्व भाष्यकर्ता] जिनभद्रगणी क्षमाश्रमण (वी. स. ९८०), तथा आचारांगादि सूत्रोनी टीका करनार तेमना शिष्य शीलांकाचार्य थया; अने ते ज जमानामां १४४४ ग्रन्थोना रचनार हरिभद्रसूरि थया । आ प्रमाणे आ पट्टावलिलेखकना हिसाब देवर्षिगणी, कालकाचार्य, जिनभद्र, शीलांकाचार्य अने हरिभद्रसूरिः ए बधा समकालीन छ । आ बधामां हरिभद्रसूरि सिवाय बाकीमा आचार्योनो समय हजी प्रमाण-पुरस्सर निर्णीत थयो नथी । पण, सांप्रदायिक इतिहासमुं एकंदर वळण जोतां ए बधा समकालीन होय तेम संभवतुं नथी । हरिभद्रनो समय, लगभग विक्रमना आठमा सैकानो छेल्लो भाग निश्चित थयो छे । देवर्षिगणी अने कालकाचार्य छट्ठा सैकानी शुरुआतमां थएला मनाय छे । एटले एमनी बच्चे ओछामा ओछु २५० वर्ष जेटलं अंतर पडे छ । एमांथी हरिभद्रने बाद करी देवामां आवे-कारण के तेमनो समय निर्णीत छे-अने बाकीना बधाने समकालीन मानी लेवामां आवे तो ते सप्रमाण होई शके के केमा ए प्रश्न विचारणीय रहे छे खरो । पण, आ स्थळे देवर्धिगणी अने कालकाचार्यना समयना विचारने पुरतो अवकाश नथी, तेथी हुँ ए बाबतने वगर चर्चे ज मुंकी देवा मांगु छु । जिनभद्रगणी अने शीलांकाचार्यनी समकालीनता अने गुरु-शिष्य-सम्बन्ध माटे काईक विचार अवश्य कर्तव्य छ । कमनशीवे, शीलांकाचार्य संबंधी जे संवत्नो उल्लेख मळे छे ते पण परस्पर विरोधी छे । आचारांगसूत्रनी टीकानी केटलीक प्रतिओमां टीका बनान्याना समयनो निर्देश बे रीते मळे छः एक निर्देश गद्यमां छे, अने बीजो पद्यमा छे । तेमांए वळी दरेकमां बब्वे पाठभेद छ । (१) A पहेलो गद्य निर्देश आ प्रमाणे:- "शकनृपकालातीतसंवत्सरशतेषु सप्तसु चतुरशीत्यधिकेषु वैशाखपञ्चम्यां आचारटीका व्धेति ।" खंभातना शान्तिनाथना भंडारमा सं० १३२७ मां लखाएली ताडपत्रनी प्रति छे तेमां आ पंक्ति छे. जुओ, पीटर्सन रीपोर्ट ३, पृ. ९०. . , १२ , B. वीजो गद्य निर्देश आ प्रमाणे:- "शकनृपकालातीतसंवत्सरशतेषु सप्तसु अष्टानवत्यधिकेषु वैशाखशुद्धपञ्चम्यां आचारटीका कृतेति ।"---इण्डियन एण्टीकेरी, सन् १८८६, पृ० १८८. (२) वीजो, जे पद्य निर्देश छे ते आ प्रमाणे:- द्वासप्तत्यधिकेषु हि शतेषु सप्तसु गतेषु गुप्तानाम् । संवत्सरेषु मासि च भाद्रपदे शुक्लपञ्चम्याम् ॥ शीलाचार्येण कृता गम्भूतायां स्थितेन टीकपा । सम्यगुपयुज्य शोध्या मात्सर्यविनाकृतैरायः ॥ आगमोदयसमिति प्रकाशित आवृत्ति, पृ. ३१७ ॥ मारी पासेनी एक नोंधमां, गुप्तानां ना बदले शकानां आवो पण पाठ छ । तेम ज केट- लीक प्रतिओमां आमांनो कोई पण उल्लेख सर्वथाए नथी मळतो। आ रीते, आ उल्लेखो, जुदी जुदी ४ सालो बतावे छे । पहेलो, शक संवत् ७८८ नी; बीजो ७९८ नी; त्रीजो, गुप्त संवत् ७७२ नी; अने चोथो शक संवत् ७७२ नी । आमांनी कई साल साची छे ते चोकस कही शकाय तेम नथी । गुप्त संवत्नी जे गणत्री अद्यापि विद्वानो करता * आचारागटीकाना मा संवत्सरविषयक उल्लेखना सबंधमा डॉ० फ्लीटे इण्डियन एण्टीफेरी, पु. १५, पृ. १८८ मां एक टिप्पणी लखी छे ते जाणवा जेवी होवाथी तेनुं भाषान्तर अहिं भापवामां आवे छ । आचार टीकामांधी वे उतारामो. श्रीयुत के. बी. पाठके जैन हरिवंशमाथी एक महत्त्वनो उतारो १४१ मा पान उपर आप्यो छ । एमा गुप्त राजामोना उल्लेख उपरांत महावीरना निर्वाण पछीना वंशोनो नियमित क्रम आपी ए समयनो सर्वध यता. ववा प्रयन को छे। जो के ए संबंध वरावर नथी। हुँ अहिं थोडीधणी एने मळती ज साहित्यविषयक ध्यान खेंचे एवी वावत सापवा इच्छं छु। डॉ. भगवान- लाल एन्द्रजीए १८८३ नी शुरुआतमां, जैनप्रन्थ आचारांग सूत्र ऊपरनी शीलाचार्यनी भाचारटीकानी एक हस्तलिखित प्रति मने वतावी हती । ए लगभग ३०० वर्ष पहेला लखाएली मनाय छ। एमांयी हुं में उतारा आपुंछ । पहेलो पाबद्ध उतारो २०७ B अने २०८ A पान ऊपर छे, अने ते आ प्रमाणे :- द्वासप्तत्यधिकेषु हि शतेषु सप्तसु गतेपु गुप्तानाम् । संवत्सरेषु मासि व भाद्रपदे शुक्लपञ्चम्याम् ॥ शीलाचार्येण कृता गम्भूतायां स्थितेन टीकैपा। सम्यगुपयुज्य शोध्या मात्सर्यविनाकृतैरायः ॥ आ उतारो, शीलाचार्य टीकानो भा भाग गुप्तसंवत् ७७२ ना भादरवा सुदी पांचमने दिवसे गंभूता (संभात) मा पूरो कर्यो एम जणावे छ । बीजो उतारो पुस्खकना मते २५६ B पान ऊपर मावेलो छ । भने ते गधमां होई मा प्रमाणे छ। शकनृपकालातीतसंवत्सरशतेषु सप्तनु अप्टानवत्यधिकेषु चैशाखशुद्ध पञ्चम्यामा- चारटीका कृतेति । २५६ B पान अहिं पुरं थाय छे भने ए पछीनं पार्नु मां आ तिथिर्नु भाकडामा पुनरावर्तन भने लेखकना उपसंहारना पन्दो छे ते नष्ट पई गयु छ । मा उतारो संपूर्ण टीकानी समाप्तिनी तिथि तरीफे शकसंवत् ७९८ नी वैशाख सुदी पोचमने मुंके छे । - १३ , आव्या छे ते प्रमाणे जो गणीए तो गुप्त संवत् ७७२ एटले ११४१ विक्रम संवत् (१०९१ई.स०) थाय । ए समय तो शेषनवांग टीकाकार अभयदेवसूरिनो छ। प्रथमद्वितीयांगटीकाकर्ता शीलां- काचार्य तो ए अगाऊ घणा वर्षा पूर्वे थई गयाना घणा पुरावाओ उपलब्ध छ । तेथी कां तो गुप्त संवत् ७७२ वाळो उल्लेख भ्रमपूर्ण होवो जोईए, अने कां तो गुप्त संवत्नी जे गणत्री आज पर्यंतना बधा शोधको गणता आव्या छे ते खोटी होवी जोईए । पण, मात्र आ अनिश्चित पाठ- भेदना आधारे ज गुप्त संवत्नी गांठने आपणे ऊकेली शकीए तेम नथी; तेथी ज्यां सुधी गुप्त- संवत्नी गणना अन्य प्रमाणोथी खोटी न ठरे त्यां सुधी आ प्रस्तुत उल्लेखने आपणे सत्य न मानी शकीए । हवे रह्या शक संवत्सरवाळा उल्लेखो । एमां जो के ७७२, ७८४ अने ७९८ आम त्रण भिन्न भिन्न संवत्सरो छे, पण ते बधानो अन्तर्भाव एक ज पचीसीमां थाय छे तेथी मा बन्ने उताराओ एम वतावे छे के शीलाचार्ये गुप्त भने शक संवत्ने एक गण्यो छ । एमां स्पष्टीते एक प्रकारनी भूल तो छ ज । अने आ भूल, गुप्त अथवा शक संवत् जेने विषे पर्नु अधुरं ज्ञान हतुं, तेनो निर्देश, कोईपण रीते दाखल करी पोतानी विद्वत्ता बताववाना हेतुने लईने थई छ । ज्यां सुधी, गुप्त संवत् ७७२ थी ७९८ (इ. स. १०९१ थी १११७) अथवा शक संवत् ७७२ थी ७९८ (इ. स. ८५० थी ८७६) ए मांथी कया अरसामा आचारटीका लखाई ए बताववा माटे पुरती थई पडे एवी शीलाचार्यनो खरो समय प्रदर्शित करती माहिती न मळी आवे त्यां सुधी ए भूल दूर थवानी नथी । परंतु आ उताराओ एम वताववा माटे महत्त्वना छे के शीलाचार्यना समयसुधी पण ए वातनुं स्मरण हतुं के ए संवत् (गुप्त संवत्) के जे वल्लभीना राजाभोना वापरने लीधे जाणीतो हतो भने छेचटे काठियावाटमा वल्लभी संवत् तरीके प्रचलित थयो हतो, एनो मूळ अने खास सबंध गुप्त राजाभो साथे हतो जेमणे काठिया- चाड अने बीजा पाडोशना भागोमा एनो फेलावो को हतो।" आ संवत् भने डॉ. फ्लीटनी टिप्पणी ऊपर प्रो. पीटर्सने, हस्तलिखित पुस्तकोनी शोधवाळा, पोताना भीजा रीपोर्टना पृ० ३६-३७ ऊपर जे नोध करी छे ते पण मा बायतमा उपयोगी होवाथी महिं अवतार- वामां आवे छे.. नं. २५५. आचारांगसूत्र ऊपरनी शीलाचार्यनी टीका शीलाचार्य के शीलांक सुप्रसिद्ध नगर अणहिलवाड पाटणना संस्थापक वनराजना धर्मगुरु तरीके मुविदित छ । २४७ मां पान ऊपर जे अवतरण आपलं छे ते ऊपरथी जणाय छे के शीलांकनी आचारांगधृत्तिमा एनो रच. ना-समय श. सं. ७७८ छ । वधारेमा जणाय छे के जे श्लोकमा ए मिति छे ते छेवटना पान ऊपर छे एटले बहु भार मूकवा जेवी नथी । १८८६ ना मार्चना इ. ए. मा फ्लीटनी शीलाचार्यना ग्रंथ ऊपर एक ट्रंकी नोंध छ । एमां भगवानलाल इंद्रजीनी प्रतिना आधारे ए लखे छे के ग्रंथना अदरना भागमां गुप्त संवत् ७७२ भने गतना भागमां श. सं. ७९८ पवामां आव्या छ । हाल तो हुँ, अहिं आपेलो गुप्त अने शक संवत् बच्चेनो गोटाळो टाळी शकुं एम नथी; परंतु संवत् १३२७ अर्थात् इ. स. १२७१ मा लखाएली ए ग्रंथनी खंभातवाळी प्रतिमा ए मूळ ग्रंथ लखायानो जे समय आपेलो छे ते विषे मने नहीं जेवी ज शंका छ । ए ग्रंथ श. सं. ७८५-इ. स. ८६३ मा पूरो करवामां आव्यो हतो। वीजा श्लोकमांनो जे शब्द हुँ वरावर नहोतो समजी शक्यो ते "गंभूता" छे, एम फ्लीटना अवतरणथी समजाय छ । गंभूता एटले खंभात एम फ्लीटनो अभिप्राय देखाय छे । मारावाळा उतारामां ए श्लोकनो अंक वीजो आप्यो छे परंतु पहेला मंकवाळो श्लोक एमां नथी । एनुं स्थान समयनिर्देशक गद्य पक्किए लीधुं छे। शीलाचार्य पोतानी टीका धीरे धीरे पूरी करी हती एटले एमणे ए ये श्लोक अथवा एना जेवू काइक वचे वचे मूकी दीधु होय एम लागे छ ।" - १४ ४ तेमनी सत्यता जो पुरवार थाय तो ते काल संभवनीय बनी शके छे । पण, केटलांक अवान्तर प्रमाणोनो विचार करतां आ समय पण शीलांकाचार्य माटे जरा वधारे अर्वाचीन जणाय छे । शकसंवत् ७७२-७९८ एटले विक्रम संवत् ९०७-९३३ जेटला थाय । परंतु एम छेक विक्रमना दशमा सैकामां शीलांकाचार्य- अस्तित्व खीकार ते कदाचित् भ्रमपूर्ण थशे । प्रमाणो जो के स्पष्ट नथी; छतां शीलांगाचार्य हरिभद्र करतां वधारे अर्वाचीन होय एवँ मानवू शंकाशील लागे छे। परंपरागत किम्वदन्ती प्रमाणे शीलांकाचार्य अणहिल्लपुर संस्थापक वनराज चावडाना गुरु थता हता । ते जो किम्बदन्ती साची होय-खोटी होवा माटे खास प्रमाण मळतुं नथी- तो शीलांकाचार्यनी हयाती विक्रम संवत् ८०० नी आसपास होई शके । कारण के वनराजे सं०८०२ मां पाटणनी संस्थापना करी हती । शीलांकाचार्यना एक विद्या-गुरु जिनभट होय एम तेमनी विशेषावश्यकटीकामांना उल्लेखोथी अनुमान थाय छे । जिनभट ज हरिभद्रना पण धर्माचार्य थता हता एम हारिभद्रीय आवश्यक-वृत्तिना प्रान्तोल्लेखथी ज्ञात थाय छे । हरिभद्रनो समय वनराजना समय साथे एकता धरावे छे, ए तो हरिभद्रना समय निर्णयथी सिद्ध ज छ । एटले जिनभटना शिष्य शीलांक अने हरिभद्र बन्ने समकालीन होय एवा आ पुरावाओ जणाय छे । वळी एक विशेष प्रमाण पण ए कथननी पुष्टि करतुं होय एवं कही शकाय तेम छे । कुवल- यमाला कथा जे दाक्षिण्यचिह्न उद्योतनसूरिए शक संवत् ७०० मां रची छे तेनी प्रशस्तिनी ८ मी ९ मी गाथामां* तत्त्वाचार्य नामना एक आचार्य, वर्णन आवे छे । ए तत्त्वाचार्य शीलांक ज होय एम मारी कल्पना थाय छे । कारण के आचारांगटीकानी प्रांते शीलांकाचा- र्यनुं वीजुं नाम तत्त्वादित्य स्पष्ट पणे लखेलं मळे छ; अने कुवलमालानी ९ मी गाथामां तत्त्वा- चार्यने सीलंगविउलसालो एवा श्लेषात्मक विशेषणद्वारा शीलांक उपपदथी सूचित करवामां आवेला छे, एवो मारो अभिप्राय छ । जो ए अभिप्राय यथार्थ होय तो ए ज तत्त्वाचार्य ऊर्फ शीलांकाचार्य कुवलयमालाकर्ता उद्योतन सूरिना दीक्षा-गुरु सिद्ध थाय छे अने तेम थवाथी उद्यो- तन सूरिना एक विद्या-गुरु हरिभद्रसूरि शीलांकना समकालीन सहजे सावीत थई जाय छ । आ हकीकत ऊपरथी ए विचार स्पष्ट थतो लागे छे के शीलांक हरिभद्रना समकालीन होई, विक्रमना ८ मा सैकाना छेल्ला भागमां ते थएला होवा जोईए; पण आचारांगटीकाना प्रांतोल्लेख प्रमाणे १० मा सैकाना पूर्व भागमां तो नहीं । परंतु, ऊपर जोई गया तेम केटलीक पट्टावलिओमां जे एमने साक्षात् जिनभद्र क्षमाश्रमणना शिष्य जणाव्या छे तनी शी स्थिति छे ए विचार तो वाकी ज रहे छे । एटले हवे जरा ए विचार तरफ पण दृष्टि फेरवी जोईए । विशेषावश्यक भाप्यटीकाकार कोट्याचार्य ए ज शीलांकाचार्य होय-ए टीका अने प्रघोप प्रमाणे ते होय पण खरा-तो ए टीकागत उल्लेखोथी तो शीलांकाचार्य जिनभद्रगणीना शिष्य सिद्ध थई * तस्स य आयारधरो तत्तायरिओ त्ति नाम सारगुणो। आसि तवतेयनिजियपावतमोहो दिणयरो व्य । जो दूसमसलिलपवाहवेगहीरन्तगुणसहस्साण । सीलंगविउलसालो लग्गणथंभो व्च निकांपो॥
१५ , शकता नथी । कमनशीवे, पूनाना ग्रन्थसंग्रहमां ए टीकानी जे प्रति छे तेनां आद्यन्तनां केटलांक पानां खंडित थई गएला छे, तेथी टीकाकारे मंगलाचरणमां के प्रशस्तिमां पोताना विषे के जिनभद्रगणीविषे कांई विशेष सूचन कर्यु छ के नहीं, ते जाणवायूँ कशुं साधन नथी । पण टीकामां वच्चे बच्चे कटलीक जग्याए भाष्यकारनी खोपज्ञ व्याख्याविषे जे केटलाक उल्लेखो करेला छे ते ऊपरथी काईक अनुमान थई शके तेम छे। शीलांक ऊर्फ कोट्याचार्य पोतानी टीकामां जिनभटाचार्य अने जिनभद्रगणि क्षमाश्रमण एम वे आचार्योनो वारंवार मत प्रदर्शित करे छे । दाखला तरीके थोडांक अवतरणो जोईए- (१) उपयोगस्तु छद्मस्थस्य सर्वत्रान्तमौहूर्तिक एव श्रोत्रादिषु प्राय ईहान्वयत्वात् । इति जिनभटाचार्यपूज्यपादाः इति । (२) तत्राप्यपूर्वमिवापूर्वमिति जिनभटाचार्यपूज्यपादाः इति । (३) जिनभद्रगणिक्षमाश्रमणपूज्यपादैस्तु नोक्तम् । (४) अत एव पूज्यपादैः स्वटीकायां प्रायोग्रहणं कृतम् । (५) क्षमाश्रमणटीकात्वियम् । (६) क्षमाश्रमणटीकापीयम् । (७) श्रीमत्क्षमाश्रमणपूज्यपादानामभिप्रायो लक्षणीयः । आमांनां प्रथमनां वे अवतरणोमां जिनभटाचार्यनो उल्लेख छ । जिनभटाचार्यनी कोई कृति जैन साहित्यमां जाण्यामां नथी; तेम ज आ अवतरणो ऊपरथी एम पण नथी भासतुं के आमां जिन- भटना कोई ग्रन्थना आधारे कोट्याचार्य आ अभिप्रायो टांकता होय । आ अभिप्रायो तो एम सूचवता होय तेम लागे छे के, कोट्याचार्ये जिनभटना मुखेथी कांई विचारो सांभळ्या-सीख्या होय अने ते प्रसंगवश आ टीकामां व्याख्यान्तररूपे टांकी देवामां आव्या होय । आथी हुँ एम अनुमानु छ के जिनभट पासे शीलांकाचार्ये शास्त्राभ्यास कर्यो होवो जोईए, अने तेथी तेओ तेमना एक गुरु थवा जोईए । हवे वीजां अवतरणोमां जोईए तो तेमां जिनभद्रगणी अने तेमनी खोपज्ञटीकानो निर्देश स्पष्ट ज करेलो छ । आ निर्देश ऊपरथी, जिनभद्रगणीना शीलांकाचार्य शिष्य थता होय तेवो कशो ध्वनि प्रकट थतो नथी । जो तेओ तेमना साक्षात् शिष्य होत तो केक ठेकाणे ते विषेनो स्पष्ट-अस्पष्ट उल्लेख तेओ अवश्य करत । ए टीकामां एक उल्लेख तो एवो पण नजरे पडे छे, जे, ए वेनो परस्पर कालकृत विशेष मेद सूचवनारो कही शकाय । ए उल्लेख आ प्रमाणे छेः- "भाष्याननुयायि पाठान्तरमिदं अग्रतः, एवमनेनैव वृद्धिक्रमणेत्यादेर्वा न चेदं भूयसीपु प्रतिपु दृश्यते ।" वि० भाष्यनी ६३७ मी गाथानी व्याख्यामां आउल्लेख आवेलो छ । अहिं, कोई जूनी प्रतिओमां शीलांकाचार्यने पाठभेद नजरे पढ्यो छे अने ते पाठभेद भाष्यका- रना अभिप्रायथी जूदो पडतो जणायो छे तेथी ते माटे पोतानी टीकामां एमने उल्लेख करवो पढ्यो छे के आ पाठभेद भाष्यने अनुगत नथी; तेम ज घणी प्रतिओमां आ पाठ मळतो पण नथी । मा उल्लेख स्पष्ट सूचवे छे के शीलांकाचार्यना समयमा विशेषावश्यकमां पाठभेदो थई १६ चूक्या हता अने तेनी घणी जूदी जूदी पाठमेदोवाळी प्रतिओ पण थई चूकी हती। आ वस्तु- स्थिति त्यारे ज बंध वेसती बनी शके ज्यारे शीलांकाचार्य अने जिनभद्रमणी क्षमाश्रमण वच्चे कालकृत विशेष अन्तर होय । जो ए बन्नेनी बच्चे काई अन्तर न होय अने पट्टावलि लेखकना कथन प्रमाणे एमनामां गुरु-शिष्यनो ज संबन्ध रहेलो होय तो विशेषावश्यकभाष्यमां आवा पाठभेदो अने प्रत्यन्तरोनी नोंघ लेवा जेवी स्थिति शीलांकाचार्यनी सन्मुख उपस्थित ज शी रीते थई शके । माटे ज्यां सुधी वीजां कोई स्पष्ट साधक बाधक प्रमाण न मळी आवे त्यां सुधी शीलां- काचार्यने जिनभद्रगणीना शिष्य पण मानी शकाय तेम नथी, तेम ज ते बन्ने समकालीन हता एम पण कही शकाय तेम नथी । जिनभद्रगणी क्षमाश्रमणना समय निर्णय माटे हजी बीजी घणी बाबतो चर्चवा जेवी छे, पण आ स्थळे ते वधीनी चर्चा करवा जेटलो अवकाश न होवाथी हुँ ए बाबतनो कोई स्पष्ट निर्णय आपी शकुं तेम नथी । पण, खास कांई विरोधी प्रमाण नजरे न पडे त्यां सुधी पट्टावलियोमा जे वीर संवत् १११५-विक्रम संवत् ६४५ नी साल एमना माटे लखेली छे तेनो स्वीकार करीए तो तेमां कशी हरकत नथी। जीतकल्पसूत्र आ सूत्र, एना नाम प्रमाणे जैन श्रमणोना आचार विषयक छे अने एमां १० प्रकारना प्रायश्चित्तनुं विधान करवामां आव्युं छे। आ प्रायश्चित्त संबन्धी विषय छेद सूत्रो अने वीजा घणा अन्थोमां चर्चवामां आव्यो छे। तेमां, केटलीक जग्याए ते बहु ज संक्षिप्त रीते चर्चेलो छे, तो केटलीक जग्याए घणी ज विस्तृत रीते वर्णवेलो छ । एटला माटे जिनभद्रगणी क्षमाश्रमणे बहु संक्षिप्त नहीं तेमज बहु विस्तृत नहीं एवी मध्यमरीते ए विषयने समजाववा माटे आ ग्रन्थनी संकलना करी होय तेम संभवे छे। आ प्रायश्चित्तना विषयमा एक वात नोंधवा जेवी छ; अने ते ए छे, के श्वेतांबर संप्रदायना सर्व आगमोमां अने अन्य ग्रन्थोमा आ जीतकल्पसूत्र प्रमाणे ज १० प्रकारनां प्रायश्चित्त वर्णवेलां मळे छे । पण तत्त्वार्थसूत्रना नवमा अध्यायना २१-२२ सूत्रमा प्रायश्चित्तना प्रकार ९ ज गणान्या छे, अने तेमां, आ सूत्रमा वर्णवेला मूल, अनवस्थाप्य अने पारंचिक आ छेल्लां तणनां स्थाने, परिहार अने उपस्थापना नामना वे प्रायश्चित्त कह्यां छे । दिगम्बर संप्रदायना साहित्यमां प्रायः सर्वत्र तत्त्वार्थसूत्र प्रमाणे ९ ज प्रायश्चित्त मळी आवे छे। श्वेतांवर साहित्यमां एक तत्त्वार्थ- सूत्र सिवाय बीजे क्याए आ प्रकार दृष्टि गोचर नथी थतो। जिनभद्रगणी क्षमाश्रमण जीत- कल्पसूत्रनी अंते एम पण कहे छे तप-अनवस्थाप्य अने तप-पारांचिक आ बन्ने प्रायश्चित्त भगवाहुखामी पछी व्युच्छेद पाम्यां छे । दिगम्बर साहित्यमां आ विचार क्याए नथी । तेम ज तत्त्वार्थभाप्यमां पण आ सबंधे काई सूचन नथी । विद्वान् अभ्यासिओ तत्त्वार्थसूत्रना कर्तृत्वना प्रश्ननो उहापोह करे त्यारे आ विषय पण तेमां विचारवा जेवो छे, ए सूचन करवा सारु अहिं आ नोध करवी उचित लागी छे।
जीतकल्पसूत्र-व्याख्या-साहित्य आ सूत्र ऊपर उपलब्ध थता व्याख्या साहित्यमां जूनामां जूनी कृति ते आ आवृत्तिमां प्रकाशित सिद्धसेनकृत चूर्णि छ । आ चूर्णि रचायां पहेलां पण कोई चूर्णि ए सूत्र ऊपर रचाएली हती एम प्रस्तुत चूर्णिमां, पृष्ठ २३, पंक्ति २३ ऊपर, आवेला उल्लेखथी ज्ञात थाय छे, पण ते उपलब्ध नथी । आ मुद्रित चूर्णिना कर्ता सिद्धसेनगणिना समयादि विषेनो निर्णय करवा माटेनां साधनोविषे विशेष शोध खोळ थई शकी नथी, तेथी आ सिद्धसेन कोण अने क्यारे थया-ए प्रश्नने छेड्या वगर ज हाल तो चलावी लेवु प्राप्त छ । आ चूर्णि ऊपर जे टिप्पण आपवामां आव्युं छे तेना कर्ता श्रीचन्द्रसूरिना समयादिनो उल्लेख टिप्पणनी प्रशस्तिमां आपेलो छे; अने ते अनुसारे विक्रम संवत् १२२७ मां अणहिलपुरमा तेमणे आनी रचना करेली छे । आ श्रीचंद्रसूरिए श्रावकप्रतिक्रमणसूत्रवृत्ति ( संवत् १२२२), पंचोपांगवृत्ति (संवत् १२२८), निशीथविंशोद्देशकवृत्ति, विगेरे वीजा पण केटलाक व्याख्याग्रन्थो लख्या छ । प्रस्तुत चूर्णि सिवाय आ सूत्र ऊपर एक प्राकृत गाथाबद्ध भाष्य पण उपलब्ध थाय छे । ए भाष्यना कर्ता कोण छे ते काई ज्ञात थई शक्यु नथी । एनो आदि-अंतनो भाग आ प्रमाणे छे-- आदि-कयपवयणप्पणामो बुच्छे पच्छित्तदाणसंखेवं । जीयव्यवहारगयं जीवस्स विसोहणं परमं ॥ पवयणदुवालसंगं सामाइयमाइविन्दुसारन्तं । अह व चउविहसंघो जत्थेव पइट्ठियं नाणं ॥ अह वा पगयपसत्थं पहाणवयणं व पवयणं तेण । अह व पवत्तयतीई नाणाई पवयणं तेण ।। अन्त-अप्परगन्थमहत्थो इति एसो वण्णिओ समासेणं । पंचमतो ववहारो नामेणं जीयकप्पो त्ति ॥ कप्पन्चवहाराणं उदहिसरिच्छाण तह णिसीहस्स । सुतरतणविन्दुणवणीतभूतसारेस णातव्यो । कप्पादीए विण्णिवि जो सुत्तत्थेहि णाहिती णितुणं । णिगदिस्सति सो एयं सीसपसीसाण णहु अण्णो ॥ ॥ इति श्रीजीतकल्पभाष्यं ॥ ३३००॥ सं० १७२० वर्षे मार्गशीर्ष शुदि १ शुक्रवासरे अयेह श्रीपत्तने लि० श्रीमोढवातिना श्रीकाशीदासात्मजेन अंवादत्तेन । शुभं भवतु । शिवमस्तु । 3 १८ आ भाष्य, प्रस्तुत चूर्णि रचाया बाद लखायु होय तेम जणाय छे, कारण के चूर्णिमां भाष्यनो क्याए उल्लेख थएलो नथी देखातो । चूर्णि पहेलां जो भाण्यनी रचना थई होत तो चूर्णिकार तेनो अवश्य उल्लेख करत । चूर्णि अने भाष्य सिवाय, आ सूत्र ऊपर, एक संस्कृत टीका पण स्वतंत्र रीते लखाएली मळे छे । ए टीका, आवश्यकसूत्रनी लघुवृत्ति रचनार श्रीतिलकाचार्ये रची छे । ए टीकानो आदि अने अन्त भाग आ प्रमाणे छे:- वन्दे वीरं तपोवीरं तपसा दुस्तपेन यः । शुद्धं स्वं विदधे स्वर्ण स्वर्णकार इवाग्निना ।। जिनस्य वचनं नौमि नवं तेजस्विमण्डलम् । यतो ज्योतींषि धावन्ति हर्तुमन्तर्गतं तमः ॥ निःमत्यूह प्रणिधे भवानीतनयानहम् । सर्वानपि गणाध्यक्षानक्षामोदरसङ्गतान् ॥ जिनभद्रगणि स्तौमि क्षमाश्रमणमुत्तमम् । यः श्रुताज्जीतमुद्दधे शौरिः सिन्धोः सुधामिव ।। प्रणमाम्यात्मगुरूंस्तान् घनसारशलाकयेव यद्वाचा । अज्ञानतिमिरपूरितमुद्घाटितं ममान्तरं चक्षुः इति नुतिकृतसुकृतः श्रुतरहस्यकल्पस्य जीतकल्पस्य । विवरणलवं करिष्ये स्वस्मृतिवीजप्रबोधाय।। श्रीमान् चन्द्रप्रभः सूरियुगप्राधान्यभागभूत् । तदासनमलंचकुः श्रीधर्मघोपसरयः ॥ तत्पश्रीभुजोऽभूवन् श्रीचक्रेश्वरसरयः । श्रीशिवप्रभसूरिस्तत्पदृश्रीहीरनायकः ॥ तदीयशिष्यलेशोऽहं सूरिश्रीतिलकाभिधः । अनन्यसमसौरभ्यश्रुताम्भोजमधुव्रतः ॥ इमामीविधां चूर्णेः तस्याश्योपनिवन्धतः । गुरूणां संप्रदायाच विज्ञायार्थ स्वशक्तितः॥ अकार्ष जीतकल्पस्य वृत्तिमत्यल्पधीरपि । सा विशोध्या श्रुतघरैः सर्वैर्मयि कृपापरैः॥ सहस्रमेकं श्लोकानामधिकं सप्तभिः शतैः । प्रत्यक्षरेण संख्याया मानमस्य विनिश्चितम् ।। जीतकल्पसूत्रना अनुकरण-ग्रन्थ आ सूत्रना अनुकरण रूपे, पाछळना आचार्योए यतिजीतकल्प अने श्राद्धजीतकल्प ए नामना वीजा वे त्रण खतंत्र ग्रन्थो पण लख्या छे, अने तेमना ऊपर टीका-टिप्पणी आदि केटलाक व्याख्या ग्रन्थो पण उपलब्ध थाय छे. आ ग्रन्थने, आ रूपमा प्रकट करवा माटे, श्रीयुत मोदी केशवलाल प्रेमचन्द भाईना उत्साह अने आग्रह ज मुख्य कारणभूत थया छे अने तेथी आ प्राचीन ग्रन्थरलना उद्धारनुं मुख्य श्रेय तेमने ज घटे छे। गूजरात पुरातत्त्व मन्दिर अमदावाद -मुनि जिनविजय आधिनमास, संवत् १९८२. , जुमओ, जनग्रन्थावली, पृष्ठ ५६.
परिशिष्ट शीलांकाचार्य विषे वधारे विगत पाछळनां पानाओमां शीलांकाचार्य विषे केटलीक चर्चा करी छे अने तेमां में एम अमिप्राय दर्शाग्यो छ के शीलांकाचार्य घणुं करीने हरिभद्र सूरिना समकालीन होवा जोईए । आ प्रस्तावना प्रेसमां गया वाद' डॉ. हर्मन याकोवीनी लखेली हरिभद्रकृत समराइचकहानी प्रस्तावना मारा जोवामां आवी । ए प्रस्तावनामां प्रसंगवशात् शीलाकाचार्य विषे एक वे ठेकाणे डॉ. याकोवीए उल्लेख करेलो छ भने एमना मते ए आचार्य हरिभद्र करता एक सैका पछी थया हता तेम लागे छ । प्रमाण जो के कोई नQ ए नथी आपता पण आचारांग टीकानी प्रांते जे शक संवत् ७९८ नी पंक्ति मळी आवे छे तेने ज प्रमाण मानी ए प्रोतानो अभिप्राय व्यक्त करे छ । प्रस्तावनाना पृष्ठ १० नी नोटमां ए जणावे छ के- In the Laghuvrtti [ of Gañadhara Sãrdha S'ataka ] V. 60. According to that source and to the Pattavali of the Kharataragaccha Silānk was the successor of Haribhadra; but that is impossible, since the date of his Achārāngatika is said to be S'aka 798=872 A. D., or more than century later than Haribhadra. ए ज प्रस्तावनाना पृष्ठ १२ ऊपर एक बीजी रीते पण हरिभद्र अने शीलांक बच्चे एक सैकानुं अंतर सूचवतां ए विद्वान् लखे छ के- For according to Prof. Leumann Haribhadra commented on the text in Sanskıit, but retained the Kathānakas and certain other parts of the Cūrni in the original Prakrit; while Silãnk who flourished more than a century later, translates such passages also into Sanskrit. आमाना प्रथम अवतरणमां तो आचारांग टीकाना शक संवत् ७९८ वाला उल्लेखने, ज्यां सुधी ते अन्य प्रमाणोयी असिद्ध न ठरे, प्रमाणभूत मानी, खरतरगच्छ पट्टावलीमा जे शीलांकने हरिभद्रना शिष्य लख्या छे तेने डॉ. याकोयी असभव माने छे, अने हरिभद्रनो जे समय में निर्णीत को छे तेनो संपूर्ण स्वीकार करी, ते ज सम- यना हिसावे, ए बंने आचार्यो वच्चे एक सैका जेटलं अंतर वतावे छ । वीजा अवतरणमा प्रो. लॉयमाने पोताना दशवकालिक सूत्र ऊपरना निबंधमां (Z. D. M.G., vol. 46 p. 581. ff.) जैन आगमो ऊपरना व्याख्या साहित्यना कालक्रम सबंधे जे अभिप्राय जणाव्यो छे तेने अनुसरीने डॉ. याकोवीए हरिभद्र अने शीलाक बच्चे एक सैका जेटलुं व्यवधान सूचव्यु छ । आ प्रस्तावनाना वाचकोनी विशेष समजण खातर प्रो. लॉयमाने दोरेला व्याख्या-साहित्यना कालक्रमनुं स्पष्टी- फरण करचु आवश्यक छ । जैन आगमो ऊपर सौथी प्रथम नियुक्ति नामे प्राकृत गाथावद्ध ढूंकी टिप्पणीभो रचाई; ते पछी प्राकृत गाथामां ज विस्तृत भाष्यो रचायां, ते पछी प्राकृतबहुल अने क्वचित् सस्कृतवाला गद्यमा 'चूर्णिमओ रचाई; ते पछी सस्कृतवहुल अने क्वचित् प्राकृतवाला गद्यमा टीकाओ रचाई; अने ते पछी छेवटे केवल संस्कृतमा ज व्याख्याओनी रचना थई । आ प्रकारना दरेक व्याख्या-निबंधोनो कालक्रम साधारण रीते एक-एक सैका जेटलो समजी लेवानो अभिनाय ए विद्वानोनो थाय छ । उदाहरण तरीके-आवश्यक अने नंदिसूत्रनी चूर्णिना कर्ता जिनदासगणि महत्तर विक्रमना आठमा सैकाना पूर्वार्धमां यया । तेमना पछी एक सैका वाद संस्कृतबहुल एवी टीकामो लखवानी शुरुआत करनार हरिभद्र थया । हरिभद्रे पोतानी टीकाओ माटे जो के संस्कृतमांज लखवानी १ नविसूचनी चूर्णि शक संवत् ५९८-विक्रमसवत् ७३३ मा रचाई एती । - २० -- पद्धतिनो अंगीकार कीधो हतो पण वञ्चे बच्चे प्रमाणरूपे जे कथानको विगेरे आपवानी जरूर पडी ते तेमणे पूर्वनी चूर्णिओमाथी प्राकृतमा ज तद्वत् तारवी लीधां । ए पछी, एक सैका वाद शीलांकाचार्य थया जेमणे पोतानी व्याख्या- भोने परिपूर्णरीते संस्कृतमा ज लखवानी शैलीनो खीकार कीघो। प्रो. लॉयमाने दोरेलो आ कालक्रम जो के सामान्यरीते बंध वेसतो जणाय छे भने जैन आगम-साहित्यना विकासक्रमनो इतिहास जोतां ए विचार घणाभागे खीकारणीय पण जणाय छे । छतां एमां कोक अपवाद पण दृष्टि- गोचर थाय छ । दाखला तरीके इग्यारमा सैकामां शांत्याचार्य उत्तराध्ययनसूत्र ऊपर जे टीका लखी छे ते हरि- भद्रनी पद्धतीए लखी छ । मूळ सूत्र अने नियुक्तिनी व्याख्या ज्यारे ए आचार्य संस्कृतमा लखी छे त्यारे एमा आवतां वधां कथानको प्राकृतमा ज पूर्वनी चूर्णिमांथी तद्वत् उतारी लीधां छ; अने एभी ए टीकार्नु बीजं नाम पाइय (प्राकृत) टीका तरीके वधारे प्रसिद्ध छे । केवल शांत्याचार्य ज नहि पण तेमना पछीना सैकामां थएला ए ज सूत्रना वीजा टीकाकार देवेंद्रगणिए पण ए पद्धतिनं अनुसरण करी पोतानी टीकामां लांबी लांबी कथाओ प्राकृतमा ज गुंथी छ। आ ऊपरथी आपणे जोई शकीए छीए के शीलांकाचार्यना समयमाटे प्रो. लॉयमान-अंकित कालक्रम सर्वथा साधकरूप नथी । तेम ज, आचारांग टीका प्रांत भावेली शक संवत् वाळी पंक्ति पण विविध पाठभेदो धरावती होवाने लीधे, जेम में प्रस्तावना पृष्ठ १४ ऊपर जणाव्यु छ, तेम अभ्रान्त गणी शकाय तेम नथी । पण ए भाचारांग टीकावाली पंक्तिनुं समर्थन करे एबुं जे एक बीजुं प्रमाण हमणा मारी दृष्टिगोचर थयु छे तेनी नोंध हुँ भहिं लऊ छं. जैन साहित्य संशोधकना प्रथम भागना, २ जा अंकमां, बृहटिप्पनिका नामनी एक प्राचीन जैन ग्रंथ सूचि में प्रकट करी छ । ए सूचि लगभग ५०० वर्ष जेटली जूनी छे अने वहु गवेषणा पूर्वक तैयार करवामा आवी होय तेवी तेनी संकलना छ । ए सूचिना २८३ क्रमांक ऊपर शीलाचार्य रचित प्राकृत मुख्य महापुरुष चरि- मनी नोंध छ । जेनी १०००० जेटली श्लोकसंख्या, अने ९२५ वर्षे रचना थएली लखी छे । मूलमंथ अद्यापि मारा जोवामां आव्यो नथी तेथी एना रचना-समयनो उल्लेख केवा प्रकारनो छे ते काई कल्पी शकाय तेम नथी, परंतु जो ए चरित्रकर्ता शीलाचार्य अने आचारांग अने सूत्रकृतांग टीकाकर्ता शीलाचार्य वन्ने एक ज होय तो, आचा- रांग टीकागत शक संवत् ७९८ वालो उल्लेख अवश्य सत्य होई शके छे । कारण के , शक संवत् ७९८ ए विक्रम संवत् ९३३ वरावर थाय छ; अने महापुरुष चरित्रनी रचनानी जे ९२५ नी साल वृहटिप्पनिकाकारे आपेली छे ते विक्रम संवत्नी गणत्री वाली ज होवी जोईए; कारण के, ए सूचिमा प्रायः सर्वत्र एज गणत्रीनो व्यवहार करवामां आन्यो छ। 'तेथी ए वने साल वच्चे मात्र ८ वर्षनो ज तफावत रहेतो होवाथी आ वने कृतिमो-आचाराग टीका अने महापुरुष चरित्र-समकालीन ज ठरे छ । अने तेथी ए वन्नेना कर्ता शीलाचार्य एकज व्यक्ति हता, एम मानवें प्राप्त थाय छ। आ हकीकत ऊपरथी आचारांग टीकाकर्ता शीलाचार्यनो समय निर्णय थई शके छे; पण, विशेषावश्यक भाष्यटीका कर्ता कोट्याचार्य के जेमनुं नाम शीलांक पण कहेवामां आवे छे तेमनो तथा अणहिलपुर संस्थापक वनराजना गुरु तरीके प्रसिद्ध थएला शीलगुण के शीलांक नामना जे आचार्य छे तेमनो निर्णय तो मूल प्रस्तावनामा अणाव्या प्रमाणे अनिश्चित ज रहे छ। . - १ ए सूचिकारे आचारांग टीकानो रचना समय पण विक्रमसवदनी गणत्रीए गणी ९३३ वर्ष नो जाग्यो ठे-जुओ हट्टिप्पनिका, क्रमांक १ (३). ।
- ॥णमो समणस्स भगवओ महावीरस्स ॥ सिरि-जिणभद्द-खमासमण-विरइयं जी य क प्प-सु त्तं कय-पवयण-प्पणामो वोच्छं पच्छित्तदाण-संखेवं । जीयव्ववहार-गयं जीयस्स विसोहणं परमं ॥१॥ संवर-विणिज्जराओ मोक्खस्स पहो, तवो पहो तासि । तवसो य पहाणंगं पच्छित्तं, जं च नाणस्स ॥२॥ सारो चरणं, तस्स वि नेव्वाणं, चरण-सोहणत्थं च । पच्छित्तं, तेण तयं नेयं मोक्खत्थिणाऽवस्सं ।। ३ ।। तं दसविहमालोयण १ -पडिकमणोभय २-३ -विवेग ४ -वोस्सग्गे ५। तव ६ -छेय ७-मूल ८-अणवठ्ठया ९ य पारचिए १० चेव ॥४॥ १. करणिज्जा जे जोगा तेसुवउत्तस्स निरइयारस्स । छउमत्थस्स विसोही जइणो आलोयणा भणिया ॥५॥ आहाराइ-ग्गहणे तह पहिया निग्गमेसुऽणेगेसु । उच्चार-विहारावणि चेइय-जइ-वन्दणाईसु ॥६॥ जं चनं करणिज्जं जइणो हत्थ-सय-वाहिरायरियं । अवियडियम्मि असुद्धो, आलोएन्तो तयं सुद्धो॥७॥ कारण-विणिग्गयस्स य स-गणाओ पर-गणागयस्स वि य । उवसंपया-विहारे आलोयण-निरहयारस्स ॥ ८॥ २. गुत्ती-समिइ-पमाए गुरुणो आसायणा विणय-भंगे। इच्छाईणमकरणे लहुस मुसादिन्न-मुच्छासु ॥९॥ अविहीइ कास-जंभिय -खुय-वायासंकिलिट्ठ-कम्मेसु । कन्दप्प-हास-विगहा-कसाय-विसयाणुसंगेसु ॥ १०॥ खलियस्स य सव्वत्थ वि हिंसमणावजओ जयन्तस्स । सहसाणाभोगेण व मिच्छाकारो पडिकमणं ॥११॥ १० 1 II जिणभद्द-खमासमण-विरइयं [गाथा १२-२६ आभोगेण वि तणुएसु नेह-भय-सोग-बाउसाईसु । कन्दप्प-हास-विगहाईएस नेयं पडिक्कमणं ॥१२॥ ३. संभम-भयाउरावइ-सहसाऽणाभोगणप्प-वसओ वा। सव्व-वयाईयारे तदुभयमासंकिए चेव ॥ १३ ॥ दुचिन्तिय-दुम्भासिय-दुच्चेट्टिय-एवमाइयं बहुसों। उवउत्तो वि न जाणइ जं देवसियाइ-अड्यारं ॥१४॥ सव्वेसु विघीय-पए दंसण-नाण-चरणावराहेसु । आउत्तस्स तदुभयं सहसकाराइणा चेव ।। १५ ॥ ४. पिण्डोवहि-सजाई गहियं कडजोगिणोवउत्तेण । पच्छा नायमसुद्धं सुद्धो विहिणा विगिश्चन्तो ॥१६॥ कालऽद्धाणाइच्छिय-अणुग्गयत्थमिय-गहियमसढो उ । कारण-गहि-उच्वरियं भत्ताइ-विगिञ्चियं सुद्धो॥ १७ ।। ५. गमणागमण-विहारे सुयम्मि सावज-सुविणयाईसु । नावा-नइ-सन्तारे पायच्छित्तं विउस्सग्गो॥१८॥ भत्ते पाणे सयणासणे य अरिहन्त-समण-सेज्जासु । उच्चारे पासवणे पणवीसं होन्ति ऊसासा ॥ १९ ॥ हस्थ-सय-बाहिराओ गमणाऽऽगमणाइएमु पणवीसं । पाणिवहाई-सुविणे सयमट्ठसयं चउत्थम्मि ॥ २०॥ देसिय-राइय-पक्खिय-चाउम्मास-वरिसेसु परिमाणं । सयमद्धं तिन्नि सया पंच-सयऽहुत्तरसहस्सं ।। २१ ।। उद्देस-समुद्देसे सत्तावीसं अणुपणवणियाए । अहेव य ऊसासा पट्ठवण-पडिक्कमणमाई ॥ २२ ॥ ६. (१) उद्देसऽज्झयण-सुयक्खन्धंगेसु कमसो पमाइस्स । कालाइक्कमणाइसु नाणायाराइयारेसु ।। २३ ।। निविगइय-पुरिमडेगभत्त-आयंबिलं चणागाढे । पुरिमाई खमणन्तं आगाठे; एवमत्थे वि ॥ २४ ॥ सामन्नं पुण सुत्ते मयमायाम चउत्थमत्थम्मि । अप्पत्ताऽपत्ताऽवत्त-वायणुदेसणाइसु य ॥ २५ ॥ कालाविसजणाइसु मण्डलि-वसुहाऽपमजणाइसु य । निव्वीइयमकरणे अक्ख-निसेजा अभत्तहो ।॥ २६ ॥ 1 III गाथा २७-४१] जीयकप्प-सुत्तं आगाढाणागादम्मि सव्व-भंगे य देस-भंगे य । जोगे छटु-चउत्थं चउत्थमायम्बिलं कमसो ॥ २७ ॥ (२) संकाइएसु देसे खमणं मिच्छोववूहणाइसु य । पुरिमाई खमणन्तं भिक्खु-प्पभिईण व चउण्हं ॥२८॥ एवं चिय पत्तेयं उवहाईणमकरणे जइणं । आयामन्तं निव्वीगाइ पासत्थ-सड्ढेसु ॥ २९ ॥ परिवाराइ-निमित्तं ममत्त-परिपालणाइ वच्छल्ले । साहम्मिओ त्ति संजम-हेड वा सव्वहिं सुद्धो ॥३०॥ (३) एगिन्दियाण घट्टणमगाढ-गाढ-परियावणुदवणे । निव्वीयं पुरिमटुं आसणमायामगं कमसो ॥ ३१ ॥ पुरिमाई खमणन्तं अणन्त-विगलिन्दियाण पत्तेयं । पश्चिन्दियम्मि एगासणाइ कल्लाणयमहेगं ॥ ३२॥ मोसाइसु मेहुण-वजिएसु दवाइ-वत्थु-भिन्नेसु । हीणे मझुक्कोसे आसणमायाम-खमणाई ॥ ३३॥ लेवाडय-परिवासे अभत्तट्ठो सुक्क-सन्निहीए य। इयराए छट्ठ-भत्तं, अट्ठमगं सेस-निसिभत्ते ॥३४॥ उद्देसिय-चरिम-तिगे कम्मे पासण्ड-स-घर-मीसे य । घायर-पाहुडियाए सपञ्चवायाहडे लोभे ॥ ३५ ॥ अइरं अणन्त-निक्खित्त-पिहिय-साहरिय-मीसयाईसु । संजोग-स-इंगाले दुविह-निमित्ते य खमणं तु ॥ ३६॥ २ कम्मुद्देसिय-मीसे धायाइ-पगासणाइएसुं च । पुर-पच्छ-कम्म-कुच्छिय-संसत्तालित्त-कर-मत्ते ॥ ३७॥ अइरं परित्त-निक्खित्त-पिहिय-साहरिय-मीसयाईसु। अइमाण-धूम-कारण विवजए विहिय मायामं ॥ ३८ ॥ ३ अझोयर-कड-पूहय-मायाऽणन्ते परंपरगए य। मीसाणन्ताणन्तरगया इए चे गमासणयं ॥ ३९ ॥ ओह-विभागुहेसोवगरण-पूईय-ठविय-पागडिए। लोउत्तर-परियट्टिय-पमिच्च-परभावकीए य ॥ ४० ॥ सग्गामाहड-दद्दर जहन्न-मालोहडोझरे पढमे । सुहुम-तिगिच्छा-सन्थव-तिग-मक्खिय-दायगो वहए ।। ४१ ।। १ , ॥
IV
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जिणभद्द-खमासमण-विरइयं [गाथा ४२-५६
पत्तेय-परंपर-ठविय-पिहिय-मीसे अणन्तराईसु ।
पुरिमई संकाए जं संकइ तं समावज्जे ॥४२॥
इत्तर-ठविए सुहमे ससणिद्ध-ससरक्ख-मक्खिए चेव ।
मीस-परंपर-ठवियाइएसु बीएसु याविगई ॥४३॥
सहसाऽणाभोगेणव जेसु पडिक्कमणमभिहियं तेसु ।
आभोगओत्ति बहुसो-अइप्पमाणे य निविगई ॥ ४४ ॥
धावण-डेवण-संघरिस-गमण-किडा-कुहावणाईसु।
उकुहि-गीय-छेलिय-जीवरुयाईसु य चउत्थं ॥ ४५ ॥
तिविहोवहिणो विचुय-विस्तारियऽपेहियानिवेयणए ।
निव्वीय-पुरिममेगासणाइ, सव्वम्मि चायामं ॥४६॥
हारिय-धो-उग्गमियानिवेयणादिन-भोग-दाणेसु।
आसण-आयाम-चउत्थगाइ, सव्वम्मि छटुं तु ॥४७॥
मुहणन्तय-रयहरणे फिडिए निव्वीययं चउत्थं च ।
नासिय-हारविए वा जीएण चउत्थ-छट्ठाई ।। ४८॥
कालऽद्धाणाईए निविइयं खमणमेव परिभोगे।
अविहि-विगिश्चणियाए भत्ताईणं तु पुरिमहूं ॥ ४९ ॥
पाणस्सासंवरणे भूमि-तिगापेहणे य निविगई।
सव्वस्सासंवरणे अगण-भंगे य पुरिमहूं ॥५०॥
एयं चिय सामन्नं तवपडिमाऽभिग्गहाइयाणं पि ।
निव्वीयगाइ पक्खिय-पुरिसाइ-विभागओ नेयं ॥५१॥
फिडिए सयमुस्सारिय-भग्गे वेगाइ वन्दणुस्सग्गे।
निव्वीइय-पुरिमेगासणाह, सव्वेसु चायामं ॥५२॥
अकएम य पुरिमासण-आयाम, सव्वसो चउत्थं तु ।
पुव्वमपेहिय-थण्डिल-निसि-वोसिरणे दिया सुवणे ॥५३ ॥
कोहे बहुदेवसिए आसव-कक्कोलगाइएसुं च ।
लसुणाइसु पुरिमहूं, तन्नाई-बन्ध-मुयणे य ॥५४॥
अझुसिर-तणेसु निव्वीइयं तु, सेस-पणएसु पुरिमहूं ।
अप्पडिलेहिय-पणए आसणयं, तस-वहे जं च ॥५५॥
ठवणमणापुच्छाए निव्विसओ विरिय-गृहणाए य ।
जीएणेकासणयं, सेसय-मायासु खमणं तु ॥ ५६ ॥
V गाथा ५७-७१ ] जीयकप्प-सुन्त दप्पेणं पश्चिन्दिय-वोरमणे संकिलिह-कम्मे य । दीहऽद्धाणासेवी गिलाण-कप्पावसाणे य॥५७ ॥ सचोवहि-कप्पम्मि य पुरिमत्ता पेहणे य चरिमाए। चाउम्मासे वरिसे य सोहणं पश्च-कल्लाणं ॥५८॥ छेयाइमसद्दहओ मिउणो परियाय-गव्वियस्स वि य । छेयाईए वि तवो जीएण गणाहिवइणो य ॥५९ ॥ जंजन भणियमिहई तस्सावत्तीऍ दाण-संखेवं । भिन्नाइया य वोच्छं छम्मासन्ताय जीएणं ॥ ६० ॥ भिन्नो अविसिहो चिय मासो चउरो य छच लहु-गुरुया। निवियगाई अट्टमभत्तन्तं दाणमेएसिं ॥ ६१॥ इय सव्वावत्तीओ तवसो नाउँ जह-कम समए । जीएण देज निव्वीइगाइ-दाणं जहाभिहियं ॥ ६२॥ एयं पुण सव्वं चिय पायं सामन्नओ विणिद्दिढ । दाणं विभागओ पुण व्वाइ-विसेसियं जाण ॥ ६३ ॥ दव्वं १ खेत्तं २ कालं ३ भावं ४ पुरिस ५-पडिसेवणाओ ६ य । नाउमियं चिय देजा तम्मत्तं हीणमहियं वा ॥ ६४॥ (१) आहाराई दव्वं बलियं सुलहं च नाउमहियं पि। देना हि; दुब्बलं दुल्लहं च नाऊण हीणं पि ॥ ६५ ॥ (२) लक्खं सीयल-साहारणं च खेत्तमहियं पि सीयम्मि । लुक्खम्मि हीणतरयं. (३) एवं काले वि तिविम्मि ॥६६॥ गिम्ह-सिसिर-वासासुं देजऽहम-दसम-धारसन्ताई। नाउं विहिणा नवविह-सुयववहारोवएसेणं ॥ ७॥ (४) हद्द-गिलाणा भावम्मि-देज हहस्स, न उ गिलाणस्स। जावइयं वा विसहइ तं देज, सहेज वा कालं ॥ ६८॥ (५) पुरिसा गीयाऽगीया सहाऽसहा तह सढाऽसढा केई । परिणामाऽपरिणामा अइपरिणामा य वत्थूर्ण ॥ ६९॥ तह धिइ-संघयणोभय-संपन्ना तदुभएण हीणा य । आय-परोभय-नोभय-तरगा तह अन्नतरगा य ॥ ७० ॥ कप्पहियादओ वि य चउरो जे सेयरा समक्खाया। सावेक्खेयर-भेयादओ वि जे ताण पुरिसाणं.॥ ७१ ॥ .
VI जिणभद्द-खमासमण-विरइयं [गाथा ७२-८६ जो जह-सत्तो बहुतर-गुणो व तस्सायिं पि देजाहि । हीणस्स हीणतरगं, झोसेज व सब्व-हीणस्स ॥७२॥ . एत्थ पुण बहुतरा भिक्खुणो त्ति अकयकरणाणभिगया य। जन्तण जीयमहमभत्तन्तं निवियाईयं ।। ७३ ।। (६) आउहियाइ दप्प-प्पमाय-कप्पेहि वा निसेवेजा। दव्वं खत्तं कालं भावं वा सेवओ पुरिसो ॥ ७४ ॥ जंजीय-दाणमुत्तं एवं पायं पमायसहियस्स । एत्तो चिय ठाणन्तरमेगं वढेज दप्पवओ ॥ ७ ॥ आउट्टियाइ ठाणन्तरं च, सहाणमेव वा देजा। कप्पेण पडिकमणं तदुभयमहवा विणिद्दिडं ॥ ७६ ॥ आलोयण-कालम्मि वि संकेस-विसोहि-भावओ नाउं । हीणं वा अहियं वा तम्मत्तं वा वि देजाहि ॥ ७७॥ इति व्वाइ-बहु-गुणे गुरु-सेवाए य बहुतरं देजा। हीणतरे हीणतरं, हीणतरे जाव झोस त्ति ॥ ७८ ॥ झोसिज्जइ सुबहुं पि हु जीएणऽन्नं तवारिहं वहओ। वेयावच्चकरस्स य दिजइ साणुग्गहतरं वा ॥ ७९ ॥ तव-गविओ तवस्स य असमत्थो तवमसद्दहन्तो य । तवसा य जो न दम्मइ अइपरिणाम-प्पसंगी य ॥८॥ सुबहुत्तर-गुण-भंसी छेयावत्तिसु पसजमाणो य । पासस्थाई जो वि य जईण पडितप्पिओ बहुसो ॥ ८१॥ उक्कोसं तव-भूमि समईओ सावसेस-चरणो य । छेयं पणगाईयं पावइ जा धरइ परियाओ ।। ८२ ।। ८. आउटियाइ पश्चिन्दिय-घाए, मेहुणे य दुप्पेणं । सेसेसुक्कोसाभिक्ख-सेवणाईसु तीसुं पि ॥ ८३ ॥ तव-गवियाइएसु य मूलुत्तर-दोस-वइयर-गएसु । दसण-चरित्तवन्ते चियत्त-किच्चे य सेहे य ॥ ८४ ॥ अचन्तोसन्नेसु य परलिंग-दुगे य मूलकम्मे य । भिक्खुम्मि य विहिय-तवे ऽणव-पारश्चियं पत्ते ॥ ८५॥ छेएण उ परियाए ऽणवट्ट-पारश्चियावसाणे य। मूलं मृलावत्तिसु बहुसो य पसजओ भणियं ॥८६॥ ७.
, , VII गाथा ८७-१०१] जीयकप्प-सुत्तं. ९. उक्कोसं यहुसो वा पउट्ठ-चित्तो वि तेणियं कुणइ । पहरइ जो य स-पक्खे निरवेक्खो घोर-परिणामो॥ ८७॥ अहिसेओ सव्वेसु वि बहुसो पारश्चियावराहेसु । अणचट्ठप्पावत्तिसु पसज्जमाणो अणेगासु॥८८॥ कीरइ अणवठ्ठप्पो, सो लिंग-क्खेत्तर-कालओ३-तवओ४। (१) लिंगेण व्व-भावे भणिओ पव्वावणाऽणरिहो ।। ८९॥ अप्पडिविरओ-सन्नो न भाव-लिंगारिहोऽणवठ्ठप्पो। (२) जो जत्थ जेण दूसइ पडिसिद्धो तत्थ सो खेत्ते ॥ ९॥ (३) जत्तियमित्तं कालं. (४) तवसा उ जहन्नएण छम्मासा। संवच्छरमुक्कोसं आसायइ जो जिणाईणं ॥९१ ।। वासं बारस वासा पडिसेवी, कारणेण सव्वो वि। थोवं थोवतरं वा वहेज, मुञ्चेज वा सव्वं ॥ ९२ ।। चन्द्रइ न य वन्दिजइ, परिहार-तवं सुदुच्चरं चरह । संवासो से कप्पइ, नालवणाईणि सेसाणि ॥ ९३ ॥ १०. तित्थयर-पवयण-सुयं आयरियं गणहरं महिड्डियं । आसायन्तो बहुसो आभिणिवेसेण पारञ्ची ॥ ९४ ॥ जो य स-लिंगे दुट्ठो कसाय-विसए हिं राय-वहगो य । राय गमहिसि-पडिसेवओ य बहुसो पगासो य ॥ ९५ ॥ धीणद्धि-महादोसो अन्नोऽनासेवणापसत्तो य । चरिमाणावत्तिसु बहुसो य पसज्जए जो उ ॥९६ ॥ सो कीरइ पारश्ची लिंगाओ१-खेत्तर-कालओ३-तवओ-य ४। (१) संपागड-पडिसेवी लिंगाओ थीणगिद्धी य ॥९७ ।। (२) वसहि-निवेसण-वाडग-साहि-निओग-पुर-देस-रज्जाओ। खेत्ताओ पारश्ची कुल-गण-संघालयाओ वा ॥९८॥ जत्युपपन्नो दोसो उपजिस्सह य जत्थ नाऊणं । तत्तो तत्तो कीरइ खेत्ताओ खेत्त-पारश्ची ॥ ९९ ।। (३) जत्तिय-मत्तं कालं. (४) तवसा पारश्चियस्स उ स एव । कालो दु-विगप्पस्स वि अणवठ्ठप्पस्स जोऽभिहिओ ।। १००॥ एगागी खेत्त-यहिं कुणइ तवं सु-विउलं महासत्तो। अवलोयणमायरिओ पह-दिणमेगो कुणइ तस्स ॥१०१॥ , - VIII जिणभद्द-खमासमण-विरड्यं [गाथा १०२-१०३ अणवढप्पो तवसा तव-पारश्ची य दो वि वोच्छिन्ना। चोदस-पुव्वधरम्मी, धरन्ति.सेसा उ जा तित्थं ॥१०२ ॥ इय एस जीयकप्पो समासओ सुविहियाणुकम्पाए। कहिओ, देयोऽयं पुण पत्ते सुपरिच्छिय-गुणम्मि ॥१०३ ॥ ॥ सिरि-जिणभद्द-खमासमण-विरइयं जीयव्ववहार-कप्प-सुत्तं समत्तं ॥ *प्रत्यन्तरे सूत्रपाठे १०६ गाथा लिखिता उपलभ्यते । तत्र वत्तणुवत्तपवत्तो बहुसो आसेविओ महाणेण । एसो उ जीयकप्पो पञ्चमओ होइ नायव्यो । -इयं गाथा प्रथमगाथाऽनन्तरम् , अप्पा मूलगुणेसुं विराहणा अप्प उत्तरगुणेसु । अप्पा पासस्थाइसु दाणग्गहसंपओगाहा । -इयं गाथा अष्टमगाथाऽनन्तरम् , सोलस उग्गमदोसा सोलस उपायणा य दोसाओ। दस एसणाए दोसा संजोयणमाइ पंचे व ॥ -इयं गाथा चतुस्त्रिंशत्तमगाथाऽनन्तरं च लिखिता सन्दृश्यते । एतद् गा- थानितयं मन्थान्तरगतं न तु प्रकृतसूत्रकारकृतं चूादिव्याख्याकृद्भिस्तथैव सूचितत्वात् ।
नमो स्थु णं समणस्स भगवओ महावीरस्स सिद्धसेणसूरिकया जी य क प्प-चु ण्णी 5 15 सिद्धत्थ-सिद्ध-सासण सिद्धत्थ-सुयं सुयं च सिद्धस्थस्स। वीर-चरं वर-वरयं वर-वरएहि महियं नमह जीव-हियं ॥१॥ एक्कारस वि गणहरे दुद्धर-गुण-धारए धराहिव-सारे । जम्वु-प्पभवाईए पणमह सिरसा समत्त-सुत्तत्थ धरे ॥२॥ दस-नव-पुवी अइसेसिणो य अवसेस-नाणिणो य जत्तेणं । सव्वे वि सव्व-कालं तिगरण-सुद्धण नमह जइ-गुण-प्पवरे ॥३॥ एत्तो नेवाणगं नेवाणं गमयतीति निव्वाणंगं । 10 पगयं पसत्थ-वयणं पहाण-वयणं च पवयणं नमह सया॥४॥ नमह य अणुओग-धरं जुग-प्पहाणं पहाण नाणीण मयं । सव्व-सुइ-सत्थ-कुसलं दंसण-नाणोवओग-भग्गम्मि ठियं ॥५॥ जस्स मुह-निज्झरामय-मय-वस-गन्धाहिवासिया इव भमरा । नाण-मयरन्द-तिसिया रत्ति दिया य मुणिवरा सेवन्ति सया ॥ ६॥ स-समय-पर-समयागम-लिवि-गणिय-च्छन्द-सह-निम्माओ। दससु वि दिसासु जस्स य अ णु ओ गो भमइ अणुवमो जस-पडहो ॥ ७॥ नाणाणं नाणीण य हेऊण य पमाण-गणहराण य पुच्छा। अविसेसओ विसेसा विसेसियाऽऽव स्स य म्मि अणुवम-मइणा ॥ ८ ॥ जेण य छे य सु य त्या आवत्तीदाण-विरयणा जत्तेणं । पुरिस-विसेसेण फुडा निजूढा जी य दा ण क प्प म्मि विही ॥९॥ पर-समयागम-निउणं सुसमिय-सु-समण-समाहि-मग्गेण गयं । जि ण भ प स मा स म णं खमासमणाणं निहाणमिव एकं ॥१०॥ तं नमिउ मय-भहणं माणरिहं लोभ-चजियं जिय-रोसं। तेण" य जीय-विरइय-गाहाणं विवरणं भणिहामि जहत्थं ॥ ११ ॥ 25 को वि सीसो विणीओ आवस्सय दसकालिय-उत्तरज्झयणा-ऽऽयार-निसीह-सूयगड-दसा- कप्प ववहार माइयं अंग-पविढं वाहिरं च सुत्तमो अत्थओ य अहिजिऊण गुरुमुवगम्म अणुजाणादेऊण चारसावत्त कय-किइकम्मो पायवडिओ ठिमो कर-यल-जुयलं मत्थए ठवे विनवेइ-'भगवं! कप्प ववहार-कप्पियाकप्पिय-चुल्लकप्प-महाकप्पसुय-निसीहाइपसु छेद-सुत्तेसु अइ-वित्थरेण पच्छित्तं भणियं । पद दिवसं च तेण असमत्थो विसोहि काउं । मइ-चामोहो 30 य मे भवई अन्नन्न गन्थेसु । नाणाइयारेसु आवत्ती का, कम्मि वा कं दाणं दिजा त्ति। 1B वरदं । 2B जत्तण। 3 B पर। 4B निवा GB बहु-मयं । 7 Bरति च। 8 B. ओगे। 9 B हेऊणं य। 10 B विसेसे य। 11 B .समणनि० । 12 B तेणे। 13B भवति । 14 B अप्नोस। 15 B.न्थे मु य । 16 Aणातियारे। 20 5 B सदा।
२ सिद्धसेनसूरिकया [गाथा १. एवं वियाणिऊण, जहा अपरिमूढो अप्पणो परस्स य अइयार-विसोहिं करेमि, तहा पसायं करेह- त्ति । तओ गुरुणा बहु-स्सुय-चिर-पव्वइय-कप्पियाइएहिं गुणेहिं संजुत्तं अप्पत्तापत्त-वत्त-तिन्ति- णिय-चल-चित्तादि-दोस-विरहियं च नाऊण 'जी य व व हा र स्स एस जोगो'त्ति गुरुणा भण्णए' 'सुण भव्व सत्ता! असुह-कम्म-मल-मइलियस्स परम-विसोहणं जी य व व हार' ति। 5 बहु-विग्धाणि सेयाणि; इमं च सत्थं परम-सेयं । तेण कय-मंगलोवयारेहिं सत्थमारमेयव्वं । तं च आरभमाणो गुरू मंगलत्थं भणइ-कयपवयण' इच्चाई। पगय-चयणं ति वा, पहाण-वयणं ति वा, पसत्थ-वयणं ति वा-पवयणं । पच्चन्ति तेण जीवादयो पयत्था इति पवयणं । तहिं वा अहिगरण-भूए । पवदतीति पवयणं-चउविहो संघो। पइट्ट-वयणं ति वातदुवओगाण पण्णत्ताओ संघो त्ति भणिय होइ । जेण तं सुयं, तम्मि पइट्टियं, अणण्णं-तदुवओगाओ ति। 10 तं च सामाइयाइ-विन्दुसार-पवजसाणं अंगाणंगपविट्ठ सव्वं सुय-नाणं पवयणं ति। पणमणं, पणामो, पूया इति एगट्टियं । कओ पवयण-प्पणामो जेण सोहं कय-पवयण-प्पमाणो। वोच्छं-- भणासि । पावं छिन्दन्तीति पायच्छित्तं । चित्तं वा जीवो भण्णइ । पाएण वा वि चित्तं सोहइ अइ- यार-मल-मइलियं, तेण पायच्छित्तं। पायए चकारस्स छकारो लक्खणिओ। तस्स पायच्छित्तस्स दाणं । तस्स संखेवं संगह। जीय ववहारकयं । जीयस्सेत्ति वत्तणुवत्त-पवत्तो बहुसो आसेविओ 15 महाजणेण' जीय-ववहारो भण्णइ । तेण जीय-ववहारेण जं कयं, उदइटुं दिण्णं वा । जीय-ववहार- गयं वा, अणुपविलृ ति भणियं होइ । जीव पाण-धारणे । जम्हा जीविसु जीवन्ति जीविस्सन्ति, तम्हा जीवेत्ति वत्तव्यं सिया । सव्व-कालमुवओग-लक्खणत्तणओ जीवो । तस्स जीवस्स विसे- सेण सोहणं । किं को विसेसो?। अन्ने वि मरुयादीया पायच्छित्तं देन्ति थूल-बुद्धिणो जीव-घा- यम्मि कत्थइ सामनेण; ण पुण संघट्टण-परितावणोदवण-भेएण सव्वेसिमेगिन्दियाईणं तस- 20 पजवसाणाणं दाउं जाणन्ति । उवएसो वा तेसिं समए एरिसो नत्थि । इह पुण सासणे सव्व- मथि त्ति काउं विसेसेण सोहणं भण्णइ । जहा य पलास-खारोद्गाइ वत्थ-मलस्स सोहणं, तहा कम्म-मल-मइलियस्स जीवस्स जीय-ववहार-निद्दि पायच्छित्तं । परम-पहाणयं, पगिट्ठ- मिति वा । न अण्णत्थ एरिसं तिज भणियं होइ । एत्थ सीसो भणइ-'अण्णे वि किमत्थि ववहारा, जेण विसेसिज्जइ-जीयववहार-गयं ति। विसेसणं च सइ संभवे वसिचारे वा कजइ ।' गुरू भणइ-'आमं, अण्णेवि चत्तारि ववहारा अत्थि; तं-जहा [१] आगम-[२] सुय-[३] आणा-[४] धारणा; पुव्वाणु-पुवीए जीयवव- हारो एएसिं पञ्चमो।' सीसो भणइ-'आगम-ववहाराईणं जीयववहार-पजवसाणाणं को पइ विसेसो?' गुरू भणइ- [१] आगम-चवहारिणो छजणा; तं-जहा-केवल-मण-ओहिणाणी चोद्दस-दस-नव-पुची एए । ] सुय-चवहारो पुण अवसेस-पुन्वी एकारसंगिणो आकप्प-ववहारा अवसेस-सुए य अहिगय-सुत्तत्था सुय-चवहारिणो त्ति । [३] आणा-ववहारो-गीयायरिया आसेविय-सत्थत्था खीणजंधा-वला दो वि जणा पगिट्ट- देसन्तर-निवासिणो अन्नोन्न-समीवमसमत्था गन्तुं जया, तया मइ धारणा-कुसलं अगीयस्थ- सीसं गूढत्थेहिं अइयार-पयासेवणेहिं पेसेइ त्ति । जहा- पढमस्स य कजस्स पढमेण पएण सेवियं जं तु । पढमे छक्के अब्भन्तरं तु पढमं भवे ठाणं । पढमस्स य कजस्स पढमेण पएण सेवियं होजा । पढमे छक्के अन्भन्तरं तु सेसेसु वि पपसु ।। 1 A भन्नए। 2 B सज्ज्ञकपुस्तकेऽत्र समग्रा गाथा लिखिताऽस्ति । एवमग्रेऽपि समग्र-प्रन्धे ज्ञेयम् । 3 A एगट्ठ। 4 B५ वच्छि० । 5 A. पाइए। G A सर्वत्र 'जीत' इत्येवं उपलभ्यते। 7 B महा- 8 A.पेसिति। 9 B होना। 25 30 35 णेण।
r - 15 गाथा १. ] जीयकप्प-चुण्णी पढमस्स य कजस्स पढमेण परण सेवियं होजा । विइए छक्के अब्भन्तरं तु पढमं भवे ठाणं ॥ पढमस्स य कजस्स पढमेण पएण सेवियं होजा । विइए छक्के अब्भन्तरं तु सेसेसु विपएसु॥ पढमस्स य कजस्स पढमेण पएण सेवियं होजा। तइए छक्के अब्भन्तरं तु पढमं भवे ठाणं॥ पढमस्स य कजस्स पढमेण पएण सेवियं होजा । तइए छक्के अब्भन्तरं तु सेसेसु वि पपसु॥ एवं पढमममुञ्चन्तेण विइय-तइयमाइ जा दसमं । पुढविक्काइयाईसु पुणो वि उच्चारणियाई ॥ 5 विझ्यस्स य कजस्स पढमेण पएण सेवियं होजा । पढमे छक्के अब्भन्तरं तु पढमंभवे ठाणं ।। एवं विइयस्स वि । एयाए चेव परिवाडीए सव्वाओ गाहाओ भाणियवाओ। पढमं ठाणं दप्पो दप्पो च्चिय तस्स वी भवे पढमं । पढमं छक व्वयाइं पाणॉइवाओ तहिं पढम। एवं तु सुसावाओ अदत्त-मेहुण-परिग्गहो चेव । विइ-छक्के पुढवाई तइ-छक्के होन्ति कप्पाई॥ पवं दप्प-पयम्मी दप्पेणं चारियाई अट्ठरस । एवमकप्पाईसु वि एकेके होन्ति अट्टरस ॥ 10 विइयं कजं कप्पो पढमपयं तत्थ दंसणणिमित्तं । पढमे छकिवयाई तत्थ उ पढमंतु पाणवहो॥ दसणममुयन्तेणं पुवकमेणेव चारणिजाणि । अट्ठारस ठाणाई एवं नाणांइ पक्केके । चउवीसद्वारसया एवं एए भवंति कप्पम्मि। दस होन्ती दप्पम्मी सव्वसमासे य मुण संखं ॥ दुविहा पडिसेवणा-दप्पिया, कप्पिया य । दप्पिया दसविहा । तं-जहा- दप्प अकप्प निरालम्व चियत्ते अप्पसत्थ वीसत्थे । अपरिच्छिय-ऽकडजोगी निरणुतावीय णिस्संको॥ तत्थ दप्पो-धावणडेवणाई। अकप्पो जं अविहीए' सेवइ । निरालम्बो-आलम्वण- रहिओ सेवइ । चियत्तेत्ति-संजमाहिकारियाणि छड्डेऊण सेवइ, स त्यक्तकृत्यः। अप्पसत्थेत्ति" अप्रशस्तेन भावेन सेवइ । वीसत्थो-इहलोग-परलोगस्स न भायइ । अपरिच्छियत्ति-कजा. कजाई अपरिक्खि सेवइ । अकडजोगी-जोगं अकाऊण सेवइ । निरणुतावी-जो अकिञ्च 20 काऊण नाणुतप्पइ; जहा मए दुहु कयं। णिस्संको-जो निस्संकितो सेवइ । एसा दप्पिया । फप्पिया चउवीसविहा; तं-जहा- दसणनाणचरित्ते तवसंजमसमिइगुत्तिहेउं वा । साहम्मियवच्छल्लत्तणेण कुलओ गणस्सेव ॥ संघस्सायरियस्स य असहुस्स गिलाणवालवुदृस्स। उदयग्गिचोरसावयभय कन्तारावई वसणे ॥ एपहि कारणेहिं जो पडिसेवेइ सा कप्पिया पडिसेवणा । 'किं पुण पडिसेवियवं?' 'इमाई अट्ठारस पयाई।' तं-जहा- वयछक-कायछक अक्कप्पो गिहिभायणं । पलियंकनिसेजा या सिणाणं सोभवजणं ॥ सबसमासे य मुणसु संखं १८० दप्पिया, कप्पिया ४३२ ॥ सोऊण तस्स पडिलेवर्णतुआलोयणं कम्म विहिं च।आगमपुरिसजायं परियायवलं च खेत्तं च।। 30 अवधारे सीसो गंतूण य सो तओ गुरुसगासे । तेसि निवेएइ तहा जहाणुपुब्बी तयं सव्वं ॥ सो ववहारविहिन्न अणुमजित्ता सुओवएसेणं । सीसस्स देइ आणं तस्स इमं देइ पच्छित्तं ॥ पदमस्स य कजस्स दसविमालोयणं निसामेत्ता। नक्खत्ते में पीला सुक्के मासे तवं कुणह ॥ पढमस्स य कलस्स दसविहमालोयणं निसामेत्ता नक्खत्ते में पीला चाउम्भासें तचं कुणह ॥ 25 ? 1B पढग। 2B निमित्तं । 3 B पटमेपा। 4 A. मसुय० । 5A एकेके। 6 B एव०। 7 B .पडिच्छि० । 8 A. अकड। 9 B विहीए। 10 A. चित्तयत्त० । 11 A. त्योति । 12 Boऊग । 13 A नीसंको। 14 A. एस। 15 A स्य। 16 B .राडवीय० । 17 A माधिय। 18 B सुणनु । 19 A यणकन्न । 20 A याग व० । 21 B मजिव तं । 22 A गोभेण। 23 B सबस्ता। 24 A. ०६ आ०॥ 25 A. मास। 26A.मा।
30 . 10 15 सिद्धसेनसूरिकया [गाथा १ पढमस्स य कजस्स दसविहमालोयणं निसामेत्ता। नक्खत्ते भे पीला छम्मासतवं कुणह सुक्के ॥ एवं ता उग्धाए' अणुघाए ताणि चेव कण्हम्मि।मास चउमास छ मासियाणि च्छेदं अओवोच्छं। छिन्दन्तु तयं भाणं गच्छन्तु तवस्स साहुणो मूलं। अव्वावडावगच्छे अधीश्या वावि विहरन्तु ॥ छन्भागंगुल पणए दसभाए ति भाग अठ्ठपन्नरसे। वीसाए तिभागूणं छन्भागूणं तु पणवीसें ॥ 5 मास चउमास छक्के अंगुल चउरो तहेव छकं तु । एए छेयविभागा णायवाऽहक्कमेणं तु ॥ विइयस्स य कजस्स तहियं चउवीसयं निसामेत्ता । आउत्त नमोकारा हवंतु एवं भणिजाहि ॥ एवं नाऊण तहिं जहोवएसेण देइ पच्छित्तं । आणाए एस भणिओ ववहारो धीरपुरिसेहिं । एवं सो आयरिओ व्वखेत्तकालभावसंघयणधिइबलाइयं च परिपुच्छिऊण सयं गमणं, सीसं वाऽगीयत्थं पेसेइ; अविजमाणे वा तस्सेव पेसवितस्स निगूढमेव अतिचारविसोहिं पेसेइ । [४] धारणाववहारो-संविग्गेण गीयत्थेणायरिएणं व्ववेत्तकालभावपुरिस"पडिसेव. णासु" अवलोएऊण जम्मि जं अवराहे दिन्नं पच्छित्तं तं पासिऊण अन्नो वि तेसु चेव दवाइएसु तारिसावराहे तं चेव पच्छित्तं देइ एस धारणाववहारो। अहवा वेयावञ्चगरस्स गच्छोवग्ग- हकारिणो फडगपइणो वा संविग्गस्स देसदरिसणसहायस्स वा वहुसो पडितप्पियस्स अवसेस- सुयाणुओगस्ल उचियपायच्छित्तट्ठाणदाणधारणं धारणाववहारो भन्नइ । [५] पंचमो जीयववहारो-सो पुण दव्वखेत्तकालभावपुरिसपडिसेवणाणुवतिं सरीर- संघयणधीवलपरिहाणिवावेक्खिऊण तहा पायच्छित्तदाणं जीयं, जो वा जम्मि गच्छे केणद्र कारणेण सुयाइरित्तो पायच्छित्त-विसेसो पवत्तिओ अन्नेहिं या वह्नहिं अणुवत्तिओ नय पडिसिद्धो । भणियं च-- वत्तणुवत्तपवत्तो वहुसो आसेविओ महाणेण । एसो उ जीयकप्पो पंचमओ होइ ववहारो॥ जीयं ति वा करणिज ति वा आयरणिजं ति वा एगटुं । जीवेइ वा तिविहे वि काले तेण जीयं । सुत्ताओ पुण हीणं समं अइरित्तं वा जीयदाणमिति । पंचसु वि पुण ववहारेसु विजमाणेसु आगमेण ववहारं ववहरेजा, न सेसेहि। एवं सुएणं, आणाए, धारणाए, जाव जीयव- वहारेणं । पुविल्लेहिं ववहारं ववहरेजा न सेलेहि ति । किं कारणं ? आगमववहारी अइसइणो संकिलिस्समाण विसुज्झमाणं अवट्ठियपरिणाम वा पच्चक्खमुक्लभन्ति, तावइयं च से दिन्ति 25 जावइएण विसुज्झइ सुत्तभणियाओ अहियं ऊणं तम्मत्तं वा; न सुयमणुवत्तए। जे पुण सुयववहारी ते सुयमणुवत्तमाणा इंगिआगार-वत्त-णेत्त-वयण-विगाराइएहिं भावमुवलक्खिऊण तिक्खुत्तो अइयारं आलोयावेऊण तं-जहा-सुओवएसेण पलिउश्चियमपलिउञ्चियं वा आलोयणाकाले जं जहा आलोएजा तंतहा सुओवएसेण ववहरन्तीति । एस सुयववहारो।" सुयाभावे आणाए वव- हारं ववहरेजा। आणाववहारो वि सुयववहाराणुसरिसो केवलं निगूढाइयारविसेसेण विसे- 30 सिओ धारणाववहारो वि सुयववहाराणुसरिसो, केवलं सुओवएसेण उचियपयाणं वेयावञ्च- कराईणमणुग्गहत्थो विसेसिओ। सुयववहारेगदेसो धारणाववहारो त्ति। धारणाणन्तरं जीय- ववहारो । सव्वत्थ य जीयववहारोऽणुवत्तए । व्वखेत्तकालभावपुरिसपडिसेवणाधिइसंघयणा- 1 B तावुग्घा० । 2 B छेयं । । 2 B छेयं । 3 B ०इता। 4 Boयंगु०। 5 B ०णगे। 6 A राते । 7 A पणुवी। 8 Bणेज्जा । 9 .णितो। 10 A ०यणइ०। 11 A रिसं। 12 Aणाय। 13 B .करस्स। 14 Bउचित । 15 ०B तहा तहा। 16 B पच्छित्त। 17 A जीतं । 18 B'य'नास्ति। 19 B जीवति । 20 A जीत । 21 A जीत०। 22 B सेस एहिं। 23 B दे। 24 B विका०। 25 B लक्खे० । 26 A सुत्त० । 27 A सुत्ता। 28 A. ०ढावि- 29 A विसेसण। 30 B .सितो । 31 A •णुचिय । 32 A. ०कराणुगहत्थ । B गएसो। 20 28 . 33 या० ।
10 गाथा २-३.] जीयकप्प-चुण्णी वत्तिरूवं परवेऊण पंचविहववहारमझे जीयववहारेण पगयं । जेण सो सावेक्खो चिरं 'चाणुवत्तिस्सतीति । २. 'संवरविणिजराओ' इचाइ । एईसे गाहार सम्बन्धो। सीसो भणइ-'सम्मदंसण- नाणचरणसंवरविणिजरतवपयत्था पहाणा, ते सव्वे वि मोत्तुं तवेगदेसं पायच्छित्तं वक्खा- उमुज्जया किमत्थं तुमे त्ति?' । आयरिओ भणइ-'पारंपरिपण चरणपयत्थस्स विसो- 5 हिकारणं पायच्छित्तं । चरणविसुद्धीए य कसिणकम्मपडलुब्वेल्लणाणन्तरं अव्वाबाहेकंति- यचंतिय-परमसमसुहलक्खणो मोक्खो संपाविजइ त्ति काउं पायच्छित्तमेव भण्णइ ।' संवरणं संवरं ढक्कणं पिहाणं ति एगट्ठा। विसेसेण निजरणं विणिजरणं । विणिजरा सोहणमिति एगटुं। संवरणं नवस्स कम्मरस अणायाणं । णिजराए पुचोवचियसुहासुहकम्मपोग्गलपरिसाडो । अहवा विसेसियं भण्णइ-मिच्छादसणाविरइकसायपमायजोगनिरोहो संवरो । कहं ? | 10 मिच्छत्तावरोहेणं सम्मत्तपडिवत्तीए मिच्छत्तनिमित्तासवनिमित्तकम्मणो संवरणं कयं भवइ एवं विरइपडिवत्तीए अविरइपञ्चयं कम्मं पञ्चक्खायं भवइ । तहा कसायविवजणेण तन्निमित्तयं कम्मं वन्जिय होइ। तहा इन्दिय-विगहा-निद्दा-मज-पमायासव-निरोहदारेण तप्पञ्चयस्स कम्मणो निरोहो कमओ भवइ । धावण वग्गण-डेवण-लंघण-फोडणाइ-असुह-चेट्ठा-निवित्तीए कायजोगास- वलद्धपवेसस्स कम्मुणो निरोहो भवइ। तहा हिंस-फरुसा-लिय-पिसुण असन्भूय डंभ-सढ छलाइ-15 वायानिरोहेण तप्पच्चयं कम्मं पञ्चक्खायं होइ। तहा ईसा-ऽमरिस-भय-सोग-मिच्छाभिसंधाण राग-दोसाकुसल' संकप्पाइनिरोहेण तन्निमित्तं कम्मं वजिय होइ। निजरापुण गुत्ति-समिइ-सम- धम्म-भावणा-मूलगुण-उत्तरगुण-परीसहोवसग्गाहियासणरयस्स भवइ। गुत्ती तिविहा मणाइ। समिइ पंचविहा इरियाइ"। समणधम्मो दसविहो खमाइ। भावणा दुवालसविहा अणिञ्चाइ । मूलगुणा पंचविहा पाणाइवायाइ-निवित्ती" । उत्तरगुणा पिंडविसुद्धिमाश्या" । परीसहा वावीसं 20 छुहाइया । उवसग्गा सोलस । हासा पदोसा वीमंसा पुढोवेमाया दिव्वा एए । हासा पदोसा वीमंसा कुसीलपडिसेवणा एए" माणुसा । भया पदोसा आहारहेऊ अवच्चलेण सारक्खणया एए तेरिच्छा। घट्टणया थंभणया लेसणया पवडणया एए आयसंचयणिया । सो य संवरो दुचिहो-देसे सब्वे य। निजरा वि दुविहा देसे सच्चे य । जोगनिरोहकाले सेलेसि-पडिवनस्स दुचरिमचरिमसमए सव्वसंवरो सव्वनिजरा य । सेसकाले देससंवरो देसनिजरा य । एवं 25 'संवरविणिजराओ' उभयमवि 'मोक्खस्स पहो' सग्गो हेऊ मोक्खकारणं मोक्खमग्गो त्ति। 'तासिं' पुण संवरविणिजराणं 'तवो पहो' हेऊ कारणं ति। तस्स य 'तवस्स पहाणमंगं पच्छित्त', जेण पच्छित्ते दुवालसविहो वि तवो अणुवत्तइ । तवस्स कारणं पहाणं पच्छित्तं । तवो कारणं संवरविणिजराणं । संवरविणिजराओ मोक्खस्स कारणमिति । 'जं च नाणस्से'त्ति उत्तरगाहाए सह संबज्झए । ३. 'सारो चरणमिच्चाई' गाहा । सामाइयाइयस्स विन्दुसारपजवसाणस्स नाणस्स 'सारो चरणं'। चरणस्स पुण णिवाणं सारो। निन्याणस्स अणंतरकारणं चरणं, कारणकारणं नाणं । चरणस्स कारणं नाणमणंतरं । नाणाओ चरणं; चरणाओ निव्वाणं ति । नाणविसुद्धीए चरण- 30 1A. पटिसेवणावत्ति। 2 A वाणु० । 3 A. वत्तहस्सत्ति। 4 B .ज्जुया। 5 A.रितो । GB पिहणं । 7 A दाणं। 8 B कम्ममलपरिसाटो। 9 A .कंमणो। 10 B हवह। A.विकता। 12 Bहलादि। 13 B संधारण । 14 B.कुल। 15 A इयराइ । तीओ। 17 B पिंटमुद्धिमादीया। 18 B छुहातीता । 19 A एते। 20 A हेटं। 21B महेन। 22 A. नास्ति । 23 BOअक्षद। 11 16 A.
६ सिद्धसेनसूरिकया [ गाथा ४-५. । न विसुद्धी, चरणविसुद्धीए निव्वाणफलायत्ती भवइ । चरणविसुद्धी पुण पच्छित्ताहीणा । अओ निव्वाणचरणऽस्थिणा पच्छित्तं 'नेयं' जाणियव्वं अवस्सं भवइ । ४. 'तं दस-विह सिञ्चाइ। तमिति अणन्तरगाहानिद्दिष्टुं पच्छित्तं सव्वनामसद्देण सम्ब- ज्झइ । 'तं' पच्छित्तं 'दसविहं' दसभेयं दसविकप्पं । तं-जहा-आलोयणारिहं, पडिक्कमणारिहं, । तदुभय-विवेगोसग्गारिहं, तवारिहं, छेयारिहं, मूलारिहं, अणवट्टप्पारिहं, पारंचियारिहं चेति । तत्थ य आलोयणारिहं-आ मज्जायाए वट्टइ । का सा मज्जाया ? जह वालो जंपतो कजमकजं च उजुओ भणइ । तं तह आलोएजा माया-मय-विप्पमुक्को उ ॥ एसा मज्जाया। आलोयणं पगासीकरणं समुदायत्थो । गुरुपञ्चक्खीकरणं मजायाए । जं पावं आलोइयमेत्तेणं चेव सुज्झइ, एयं आलोयणारिहं । १। पडिक्कमणारिहं-जं मिच्छादुक्कडमेत्तेण 10 चेव सुज्झइ न आलोइजइ; जहा सहसा अणुवउत्तेणं खेलसिंघाणाइयं परिछवियं नय हिंसाइयं दोसमावन्नो तत्थ मिच्छादुक्कडं भणइ, एयं पडिकमणारिहं ।२। तदुभयारिहं-जं पडिसेविय गुरुणो आलोइजइ, गुरुसंदिट्ठो य पडिक्कमइ त्ति पच्छा मिच्छा' दुक्कडं ति भणइ, एयं तदुभयारिहं । ३ । विवेगारिहं-विगिंचमाणो विहीए तमइयारं सोहेइ जत्थ, एयं विवेगारिहं।।। विउसग्गारिहं-जंकायचेट्ठानिरोहोवओगमेत्तेण चेव सुज्झइ, जहा दुस्सुमणाइयं, एयं विउस. 15 ग्गारिहं ।५। तवारिहं-जम्मि पडिसेविए निव्वीयाइओ छम्मासपजवसाणो तवो दिजइ, एयं तवारिहं।६। छेयारिहं-जम्मिय पडिसेविए संदूसियपुवपरियायदेसावछेयणं' कीरइ, नाणावि- हवाहिसं दूसियंगोवंगछेयणमिवसेससरीरावयवपरिपालणत्थं, तहेहावि सेसपरियायरक्खणत्थं, एयं छेयारिहं ।७। मूलारिहं-जेण पडिसेविएण पुणो महन्वयारोवणं निरवसेसपरियायावणयणा- णन्तरं कीरइ, एयं मूलारिहं । ८। अणवट्टप्पारिहं-जम्मि पडिसेविए उवट्ठावणा अजोगो, कंचि 20 कालं न वएसु ठाविजय; जाव पइविसिट्टतवो न चिण्णो, पच्छा य चिण्णतवो तद्दोसोवरओ वएसु ठाविजइ; एयं अणवठ्ठप्पारिहं । ९ । पारंचियारिहं-अञ्चुगइ-पूयणेसु, पारं अञ्चइ तवाईणं जम्मि पडिसेविए लिंगखेत्तकालविसिट्ठाणं, तं पारंचियारिहं । १० । एस संखेवओ पिण्डत्थो दसण्ह वि पयाणंभणिओ।सट्टाणे सट्टाणे वित्थरेण वि भासियव्वो। एएहिं चेव पएहिं विवरिएहिं जीयववहारो समप्पइ । संपयं जहक्कम-निद्दिवाणं दसण्ह वि पयाणं विवरणं भण्णइ कमेण चेव । ५. तत्थ पढमं पयं 'आलोयण'त्ति । तस्स1 सरूवा निसवणत्थं गाहा 'करणिज्जा जे जोगा' इच्चाइ। 'करणिजा' नाम अवस्स-कायव्वा । 'जे' इति अणिद्दिट्टणिद्देसो । 'जोगा' इति किरियाओ सुओवइट्ठाओ संजमहेउगाओ कम्मनिजरणत्थं । 'तेसु' अणन्तरनिद्दिवसु 'उवउ- तस्स' पवत्तस्स । अहवा जोगा इति मण-वइ-कायजोगा एएहितो किरिया अणण्णा भवतीति तस्सहचरियत्ताओ। जोगो विरियं थामो उच्छाह परकमोतहा चेट्ठा। सत्ती सामत्थं ति" य जोगस्स हवन्ति पजाया॥ कायजोगो कह कायव्चो?। कुम्मो इव "अल्लीणपल्लीणगुत्ते सुप्पणि हियपाणिपाए । अहवा, पायं रीएजा, तिरिच्छं वा कडे पायं रीएजा, साहट्ट पायं रीएज्जा । एवं कायजोगो फरणिजोवइजोगो वि एवं करणिजो- जा यऽसच्चा ण वत्तव्या सच्चामोसा य जा मुसा । जा य युद्धेहिं नाइण्णा न तं भासेज पन्नवं ॥ 1 Bहवति। 2 B नास्ति। 3 B होई। 4 A मिच्छामिदु०॥ 5 B .सिमणा। नास्ति। 7 Bछेदणं । 8 B'स'नास्ति । पूयणासु । 10. B विवर। 11 A.तत्थ। 12 A सलवं। 13 A अणंता। 14 A भवन्ती। 15 B चरित्ताओ। 16 B चि। 17 Bइव ली। 18 A स्तो। 19 A वितिरि०। 20 A नास्ति । 21 B. णीयो। 25 । 30 6 B 9 B 18 गाथा ६-७.] जीयकप्प-चुण्णी मणजोगो वि एवं करणिजो-अकुसलमणनिरोहो कुसलमणउदीरणा य । निरइयारस्लेव संखेवेण मुहपोत्तियाइ-पडिलेहणपमजणाई जा जा संजमसामायारीगया किरिया सा सव्वा करणिजजोगसहवच्चा होइ । अहोरत्तब्भन्तराणुट्टेया। 'निरइयारस्स' अदुट्ठभावस्स । 'छउम- स्थस्से'त्ति परोक्खनाणिणो। सुओवएसाणुसारेण सेसकिरियाकलावाणुट्टाणपरायणस्स । 'विसोही' कम्मवन्धनिवित्ती निसल्लया वा। 'जइणो' जयमाणस्स अप्पमत्तस्स । 'आलोयणा । भणिया' जिणिन्दगणहरेहिं । सीसो भणइ-'निरइयारो नियमा जई चेव होइ तो किमत्थं जग्गहणं? ।' भण्णइ-'हेउ-हेउमभावेणं वक्खाणं कायव्वं । निरइयारलक्खणाओ' चेव हेउओ सो जयमाणो जइ त्ति लब्भइ, तेण दोण्हवि गहणं । अह वा जइ त्ति सामन्नामिहाणं । तं निरइयारत्तणेण विसेसिजइ निरइयारो जइ त्ति । पुणो वि सीसो-'ते' य जया उवउत्तो निरइयारोय करेइ। करणिजा य ते। तो तत्थ का विसोही आलोइए अणालोइए वा?' गुरू 10 भणइ-'तत्थ जा चेट्ठानिमित्ता सुहमा आसवकिरिया, सुहुमपमायनिमित्ता वा अणुवलक्खिया ताओ" सुज्झन्ति आलोयणा मेत्तेण' । सो पुण गुरु-संदिट्ठो असंदिट्ठो वा पुव्वं वा आलोएजा, कजसमत्तीए वा आलोपजा । अहवा पुबि पि पच्छा वि" आलोएजा। ६. 'आहाराइ गहणे'चाइ । अणन्तरगाहाए करणिजजोगनिद्देसमेत्तं भणियं, संपयं पुण नामग्गाहं करणिजा जोगा भण्णंति । के ते करणिजा जोगा?। इमे-आहारो आईए जेसिं 15 गहणाणं ताणि 'आहाराइ गहणाणि'एगवयणेण"णिद्देसो"कओ। आइग्गहणेण सेज्जासंथारवत्थ- पायपुञ्छणपडिग्गहगाइ ओहिय-ओवग्गहिओ य सेसो उवही वेप्पइ। 'तह वहियाणिग्गमेसु गेसु'गिलाणआयरियवालदुबलसेहखवग असहुपाओग्गो सहगहणनिमित्तं णिग्गमणे।गहणं तु गुरुमापुच्छिऊण-गुरुणाणुनाओ, सुओवएसेण उवउत्तो, विहीए गिण्हिऊण; तओ जहाविही गहियमालोएन्तो सुद्धो । सीसो भणइ-'जइ गहणे अविसुद्धी, सुद्धी य आलोइए; एवं गहणमेव 20 मा करेउ' । गुरू भणइ-'जइ गहणं न करेइ तओ आयरिओवज्झायाइ-कुलगणसंघसाहम्मि- यदसणनाणचरित्ततवसंजमाईणं ववच्छेओ-भंगो हवइ । तेणावस्सं गहणं विहीए कायक्वं'। अहवा एयं सव्वं आहाराइ-गहणेण गहियं । इमो पुणो बहियाणिग्गमोऽणेगो भण्णइ । गुरुमूलाओ सेजाओवा कुलगणसंघचेश्यदुविहभेय तव्वविणासनिवारणाई । अहवा पीढ-30 फलगसेजासंधारपाडिहारियगहियप्पणत्थं वा निग्गमं करेजा। अहवा एयाइं निगमका- 25 रणाई । 'उच्चारविहारावणि' त्ति उच्चारभूमि-विहारभूमीओ सण्णा-सज्झायसनियाओं" । चेहयवंदणणिमित्तं भासन्नं दूरं वा गच्छेजा । साहणं पुण अपुवबहुस्सुय संविग्गाणं वन्दण संसयवोच्छेयत्थं वा गच्छेजा। आइसद्देणं सहासन्नायगओसन्नविहारीणं वा सद्धावद्धाव. णत्यं साहम्मियाण वा संजमउच्छाहणिसित्तं गच्छेजा। ७. 'जं चन्नं करणिजमिच्चाइ । 'जं चनं ति पुब्बगाहाभणियाओ वइरित्तं ति; तं सव्वं च 30 सद्देण समुच्चिजा । तं च खेत्तपडिलेहणथंडिलसेहनिक्खमणायरियसंलेहणाई हत्यसयामो परेणं जं आयरियं, तमायरित्ता ससिइगुत्तिविसुद्धि निमित्तं अवस्सं आलोएयव्वं । जं पुण 1B जटिई। 2 A निवत्ती । 3 A नास्ति । 5A .इयारत्तणाओ। 7 A. च। 8B का अविसोही । 9 A.नान्ति । 10B णिमि० । 11 B तातो 13 A •णेन । 14 A भनन्ति। 15 A. नजो०। 16 B .यणे णि० । 18 B गहादि। 19 B दियअवउन्नहि० । 20 B नास्त्रि। 21 A सेत्ता। 23 A याओगो। 21 A. भेद । 25 Bणादी। 26 A पीढग। पिणः। 28 A. मणका। 29 A सज्ज्ञास० । 30A .मुय। 31B पतिरिचए। 13.गादी। 38 A. मिसदि। 4 A जई। । GA. जहा। 12 Bu A गिद्दोगो। 22 Bसमग। 17 27 A 32 ८ सिद्धसेनसूरिकया [ गाथा ८-९. 5 -- हत्थसयन्भन्तरायरियं तत्थ किञ्चि आलोइजइ, किञ्चि नालोइजइ । जहा पासवणखेलसिंघाण- जल्ल'निविसणुट्ठाणवियम्भणाकुञ्चण पसारणोसासणीसासचेट्टाइ किञ्चि कजं नालोइजइ । पासवणं पुण पुवमापुच्छिऊण वोसिरइ । 'अवियडियम्मि' अणालोइयम्मि, असुद्धो साइयारो, आलोएन्तो पुण तं कजं आयरियस्स सुद्धो निरइयारो त्ति भणियं होइ। ८. 'कारणविणिग्गय मिश्चाइ । 'कारणविणिग्गयस्स'त्ति। दुविहो निग्गमो गच्छाओ-कार- णेण, अकारणेण य" । असिवओमरायदुट्ठगिलाणुत्तिमट्ठायरियपेसणाइ कारणिओ । चक्क थूम- पडिमा-महिमा-जम्म-निक्खमण नाण-निन्वाण-भूमि-सनायग-वइग-संखडिपेहाइ निकारणिो । कारणविणिग्गयस्स। 'च' सद्दो आलोयणाइपयं समुच्चिणइ । निरइयारस्स गुत्तिसमिइविसु- द्धस्स कारणेण विणिग्गयस्त आलोयणमेत्ताओ चेव सुद्धी होइ । सा य आलोयणा-ओहो 10 विभागओ य । ओहालोयणा अद्धमासब्भन्तरागयस्स हवइ । तं चागयमेत्तो चेव इरियावहिया- पडिकन्तो समुद्देसवेलाए आलोएइ । आलोइयमेत्ते चेव सुज्झइ निरइयारो। सा य ओहालोयणा इमा- अप्पा मूलगुणेसुं विराहणा अप्प उत्तरगुणेसु । अप्पा पासत्थाइसु दाणग्गहसंपओगोहा॥ एवं विहालोयणेण सुद्धो होइ।अन्नम्मि वेलाए विभागेण अद्धमासपरेणागयस्स । विभागा- 15 लोयणा निरइयारस्स वि । एवं 'सगणाओं' कारणनिग्गयस्स आलोइए सुद्धी; 'परगणागयस्स वि यत्ति । सगणो एगसंभोइया, परगणो अन्नसंभोइया। ते संविग्गा वा असंविग्गा वा। संविग्गाओ आगयस्स निरइयारस्स वि अवस्समेव विभागालोयणा । आलोयणाए" य सुद्धो । 'उवसंपय' त्ति । सा य उवसंपया पंचविहा । तं-जहा-सुओवसंपया, सुहदुक्खोवसंपया, खेत्तोवसंपया, मग्गोवसंपया, विणओवसंपया यत्ति।पंचविहाए वि तप्पढमयाए उवसंपजमाणेण 20 निरइयारेणावि आलोयणा विभागेण दायव्वा । सो य आलोयणाए चेव सुद्धो । 'विहारे' त्ति एगसंभोइया फडगपई गीयत्थायरिया एगाह-पणग-पक्ख-चउम्मास"-संवच्छरिएसु जत्थ वा मिलन्ति तत्थ निरइयारा वि विहारालोयणं देन्ति । अन्नोन्नस्स विहारे वि आलोयणाए सुज्झइ । सव्वत्थ 'निरइयारस्से'त्ति एवं पयं सम्वज्झइ । एवमेयं आलोयणारिहं भणियं ॥ ९. इयाणि पडिकमणारिहं भण्णइ । जेसु ठाणेसु खलियस्स मिच्छादुक्कडारोवणा होइ 25 तट्ठाणसरूव निरूवणत्थं गाहा भण्णइ । 'गुत्तिसमिइपमाय' इञ्चाइ । गुत्ति त्ति तिन्नि गुत्तिओ मण-वइ-कायसन्नाओ। समिईओ इरिया-आसा-एसणा-आयाणनिक्खेवण-उच्चारपासवणाइपरि- ट्रवण-नामाओ पंच। एएसु अट्ठसु ठाणेसु पमाओ को होजा। मणेण दुञ्चिन्तियाई"। वईए दुम्भासियाई, कारण दुच्चेट्टियाई । इरियाए कहंकहेन्तो गच्छेजा, भासाए ढहरगिहत्थ- भासाई, एसणाए मिक्खा-गहणकाले अणुवउत्तो,न पमजइ आयाण-निक्खेवेसु, अप्पडि- 30 लेहिय-थंडिले उच्चाराइ परिट्ठवेजा । 'गुरुणो आसायण' त्ति । गिणाति सत्थमिति गुरू । तस्स आसायणा कया। का? अहिक्खेवो परिभवो वा जच्चाइगुणहीणस्स। आयोनाणाइतियं, तस्स साडणा अवणयणं विणासो आसायणा भण्णइ। आयरियाहिक्खेव-दारेणाहिक्खे- 1 A निवस। 2 B गुंचण । 3A कयं। 4 A. गच्छायो। 5 B नास्ति। 6 A.ज. ममणणिक्ख०। 7 .यणापयं। 8 ०धंतो जइसमु०॥ 9 A अप्पा । 10 B .णेसुं। 11 A. विग्गा अ०। 12 B आलोएइ य। 13 B नास्ति । 14 Bउवंसं० । 15 B .इगा। 16 A पई य, B ०वती। 17 A मास । 18 B विसु०॥ 19 B .मेतं । 20 A स्सरू। 21 A. ०णत्या। 22 A निक्रामण । 23 B होई। 24 A. ०याए । 25 B कहतो। 26 A. ०क्खग० । 27 A उवउत्तो। 28 A रिटा। 29 B ०रुआसा० । 30 B णाइ स०। 31B अवि०॥ 32. A आओ। - 5 जीयकप्प-चुण्णी गाथा १०-१२.] धन्तो आयं अप्पणो साडे तुसिणीय-हुंकार-जाइ-क-म्माइहिं । अहवा तिविहा आसायणा- मणेण पोसाइ, वायाए अन्तरभासाइ, कारण जमलिय-पुरोगमण-संघट्टणाइ । 'विणय- भंगे"त्ति । विणओ अन्भुट्ठाणासणदाणालिपग्गहवन्दणाईओ। तस्स य भंगे। 'इच्छाईणम- फरणे' त्ति। इच्छा मिच्छा तहक्कारो आवस्सिया य निसीहिया आपुच्छणाय पडिपुच्छा छन्दणा य निमन्तणा उवसंपयाओ य गिज्झन्ति । एयासिमकरणे। लहुसगं वा मुसावायं वएजा। जहा- पयला ओल्ले मरुए पञ्चक्खाणे य गमणपरियाए। समुदेससंखडीओ खुड़ग परिहारिय मुहीओ॥ भवसगमणे दिसातुं' एगकुले चेव एक्क दवे वा । एए सच्चे वि पया लहुसमुसाभासणे होन्ति ॥ लहुसाऽदिण्णं पुण सुहुमं जत्थ जत्थ पणगावित्ती । तं-जहा-तण-डगलछार-मल्लग-लेव- इत्तिरि-उग्गहण -चिट्ठणासु"लेव-इत्तिरि उग्गहणट्ठाणेसु सुत्ताएसेण मासलहुं । तहावि इह लहुस. गादिण्णं चेव भण्णह । लष्ठुसमुच्छा पुण ईसीसि ममत्तं जत्थ सुहुमं, जहा-कागाइ-साण-गोण 10 कप्पट्टग"-सारक्खण-ममत्ताईसु दचे लहुसमुच्छा। खेत्ते ओवास संथार-कुल वसहि-गाम-नग- ररजाईसु। काले पुण मालकप्पोवरि निवासाइ । भावेण राग-दोसाइ । एत्थ जे मासलहु- यहाणा ते सधे घेप्पन्ति । १०. 'अविहीइ-कास-जंभिय' इन्चाइ । अविहीए हत्थमदाऊण कासइ मुहपोत्तियं वा। एवं जंभाइय-छीईएसु वि । 'वाय' ति पयं कम्म-सहेण सम्बज्झइ । तं दुविहं-उर्ल्ड उड्डोयाई, अहो 16 कुच्छिय-सहो। उद्योए हत्थो दायचो मुहपोत्तिया वा" । कुच्छिय-सह-निग्गमे पुण" पुयावकट्टण- लम्बणेण । एस विही, एयवदरित्तो अविही । 'असंकिलिट्टकम्म' पुण" छेयण-मेयण-संघसण- पीलण-अभिघाय-सिंचण-कायखाराइ-असुसिर-सुसिराणन्तर-परंपरभेयभिन्नं । 'कन्दप्पो' वाइओ काइओ वा । 'हासं' पसिद्धमेव । 'विगहा इत्थि-भत्त-चोर-जणवयाइया। 'कसाया' कोहाई। 'विसयाणुसंगो' सहफरिस-रस-रुव-गन्धासेवणमिति । ११. 'खलियस्सय' इञ्चाइ। 'खलियस्स' अइयारावनस्स। सोय अइयारो सहसकारकओ" अणाभोगकओ य। 'च' सहोपडिकमणारोवणं समुच्चिणइ । 'सम्वत्थ वि' त्ति सधपए। दसण- नाणचरित्ततवसमिइगुत्तिन्दियाइसु खलियस्स । 'हिंसमणावजओ त्ति अकरेन्तस्स जयणा- जुत्तस्स । सहसकाराणाभोगलक्खणं चेयं- पुवं अपासिऊणं छूढे पाए कुलिंगजं पासे । न य तर नियत्तेउं जोगं सहसाफरणमेयं ॥ 26 अन्नयर-पमाएणं असंपउत्तस्स णोवजुत्तस्स । इरियाइसु भूयत्थेसु वट्टओ हो अणाभोगो।। एवं सहसकाराणाभोगेहिं हिंसमणावजमाणो जयणोवउत्तो अइयारमावन्नो वि मिच्छादुक्कड- परिणओ सुद्धो। १२. 'आभोगेण विचाइ । 'आभोगेणे' ति परिफुडबुद्धीए वि । 'तणुएसु' थोघेसु, 'नेहा- इसु' त्ति सम्बन्धो। नेहो कप्पट्टग-सन्नि-सन्नायगाइसु । भयं इहलोग-परलोग-आयाण-अफम्हा-30 आजीव-भसिलोग-मरण-सन्नियं । सोगो सञ्चित्ताचित्तमीसदघाण संजोगेण विओगेण य फओ होजा। 'वाउसत्तं' सरीरसुस्सूसापरायणत्तं हत्थपायाइघोवणदारेण । 'आई' सहेण कुसील- 1B सादेति। 2A. जाम० । 3 B भंगो। 4B वा। 5 A न्तणोवसं०। 6 A# सतीगाइए। 7A सासु । 8 A एगदव्वे य। 9 Boवत्ती। 10 A डगलग० । 11 A. उग्गचिः। 12 B चिट्टाणाले०। 13 B इतिति । 14 B कप्पटर० । 15A. वासं। 16A 17 B धिपं०। 18 B मुद्दवोत्ति। 19 B वायन्ति । 20 B उयाई। उदोए इत्यो मुहपोतियं पा दिजद । 22 नास्ति । 23 B पुयतावकणं । 24 B एतव्वतिरित्तो । 25 A यमपीलगमेयणपंगण। 26 B विकदा। 2713 महस्स. 1 28 B. भोगभो। 29 A दिसम्पमाणा। 30 Aउत्तत्म। 31 Aणए। 32 Boसायफरणा० ॥ 20 - भये। 21 B १० सिद्धसेनसूरिकया [.गाथा १३-१७ min पासत्थो-सन-संसत्ता घेप्पन्ति । 'कन्दप्पहासविगहा' पुत्ववक्खाणिया । 'आई' सहेण कसा- यविसयाणुसँगा गहिया। सचेसु वि एएसु तणुएसु 'णेयचं' जाणिय । 'पडिक्कमणं' पाय- च्छित्तं ति भणियं होइ । एयं पडिकमणारिहं भणियं ॥२॥ १३. इयाणिं तदुभयारिहं । 'संभमभय'-इच्चाइ । 'संभमो' हत्थी उदग-अगणिमाइओं। 5 'भयं' दस्सु-मिलक्खु-वोहिय-मालवाइ-सगासाओ । 'आउरो' दिगिंछा-पिवासाई हिं। 'आवई' चउचिहा-दवखेत्तकालभावावई। दवावई दवं दुल्लहं। खेत्तावई वोच्छिन्नमडम्बाई । काला चई ओमाई । भावावई गुरुगिलाणाई । 'सहसाणाभोगा' पुवुत्ता । एएसु हिंसाइदोसमाव- जओ वि जयन्तस्स 'अणप्पवसओ' सच्चेहि कारणेहिं, 'सबवयाइयारं' करेजा। पलायमाणो पुढविजलजलणपवणाइवणस्सइदुरूहणं वा करेजा। वि-तिय-चउ-पश्चिन्दियं वा विराहेजा । 10 मुसावायादिन्नादाणमेहुणपरिग्गहराइभोयणअद्धाणकप्पलेवाडाइयं वा आवजेजा। एवं उत्तर- गुणेसु वि। एवमाइ अझ्यारावनस्सावि । 'तदुभयं' आलोयणा गुरुणं । पच्छा गुरुसंदिट्ठो मिच्छादुक्कडं ति भणमाणो सुद्धो। 'आसंकिए चेव' त्ति कयमकयं वा जत्थ परिच्छेयं काउं न तरह तमासंकियं । तत्थ य सवपपसु वि तदुभयपायच्छित्तकारी सुज्झइ । १४. 'दुम्चिन्तिय' इञ्चाइ । 'दु'सद्दो कुच्छाभिहाणे । संजमविराहणाजायं कुच्छियं चिन्तियं 15 दुश्चिन्तियं । एवं 'दुभासियं दुञ्चिट्ठिय'। 'आइ' गहणेण दुप्पडिलेहिय-दुपमज्जियगहणं । 'बहुसो' अणेगसो 'उवउत्तो वि न याणइ' त्ति सम्बज्झइ । उवओगरूवपरिणओं' वि साहू न संमरइ पुचकालकयमइयारहाणं । आलोयणाकाले 'देवसियाइ अध्यारं, आइग्गहणेण राइय-पक्खिय-चाउम्मासिय-संवच्छरियाइयारा घेप्पन्ति । १५. 'साधेसु य' इन्चाइ । 'सच'ग्गहणेणं सच्चाववायट्ठाणा सूइया । पढम उस्सग्गपर्य' 20 विइयं अववायपयं । अवराहेसु अइयारेसु 'दसणणाणचरणावराहेसु'। 'आउत्तस्से'त्ति कारणे जयणाए गीयत्थो आसेवओ आउत्तो भण्णइ । तस्सेवमसेसाववाय"कालाणुट्ठाणपरस्स आउत्तस्स 'तदुभय' पायच्छित्तं" होइ । तहिं चेवाववायकाले 'सहसकारेण' जं कयं, तं आइसइसंगहियाणाभोगेण य तदुभयमिति । एयं च तदुभयारिहं ॥३॥ १६. इयाणि विवेगारिहं भण्णइ। "पिंडोवहिसेन्जा'इञ्चाइ । 'पिंडो' संघाओ असण-पाण-खा- 25 इम-साइम-मेयभिन्नो । 'उवही' ओहिय-उवग्गहिय-मेओ।'सेन्जा' उवस्सओ। आइसद्देण डगलग- छार-मल्लग -ओसहाणि घेप्पन्ति । 'कडजोगी' गीयत्थो भण्णइ । पिंडेसणाचत्थ-पाएसणा" छेय- सुयाईणि" सुत्तत्थओ अहीयाणि जेण सो गीयत्थो । तेणोवउत्तेण गहियं सुओवएसाणुसारोव- ओगपरिणामपरिणएणं ति भणियं होइ । 'पच्छा नायमसुद्धं'। केण दोसेण असुद्धं नायं भण्णइ । उग्गमउप्पायणेसणाहिं संकियमसंकियं वा दोसवत्तेण 'सुद्धो' 'निरइयारो। विहाणेणं' विहिणा सुओवरटेण 'विगिंचमाणो' परिवेन्तो सुद्धो हवइ । १७. 'कालद्धाणाइच्छिय' इच्चाइ। 'कालाइच्छियं' पढमपोरिसीगहियं चउत्थपोरिसिं जाव जं धरिजइ । अद्धजोयणाइरेगाओ.आणीयं नीयं वा। असढयाए सढयाए य। विगहा-किड्डा-इन्दि- यमाईहिं सढो, गिलाण-सापारिय-थंडिल्ल-भयाइकमणेण य" असढो । विहीए, विगिश्चन्तो सुद्धो। अणुग्गएसूरे अत्थमिए वा जं गहियमसणाइ असढेण गिरिराङमेहमहियारयावरिए 30 6 Bषा- 1 A एवं। 2 Bअमणि। 3A मंडवा। 4 B. मादी । 5 B.हित्ति । डाइ। 7 B ०णतो। 8 B. सियाइयारं। 9 A उवस०। 10 B. ० वाद। 11 B पच्छित्तं। 12 A एवं च। 13 B. पाएसणा सेजाय० । 14 A सुयाइयं । 15 A. ण सुद्धं । 16 B पोरसी०। 17 B नास्ति ।
गाथा १८-२१. ] जीयकप्प-चुण्णी सवियरि उग्गयवुद्धीए अणथमियबुद्धीए वा गहियं होजा; पच्छा य अणुग्गए' अत्थमिए वा' नायं तओ विहीए विगिश्चन्तो सुद्धो। 'कारणे' वा गहियं गिलाणायरियवाल पाहुणयदुल्लहस- हस्सदाणाइ-कारणे नाणाविहे जं गहियं विहिभोयणे य कए जइ तं उच्चरियं तो विहीए अणा- वायमसंलोगाइयाए विगिञ्चन्तो । 'भत्ताइ' भत्तग्गहणेण असणं, आइग्गहणेण पाण-खाइम-साइ- 6 माणि वि घेप्पन्ति । सो य एवं करेन्तो सुद्धो हवइ त्ति विवेगारिहं भणियं ॥४॥ १८. इयाणि काउस्सग्गारिहं भण्णइ-गमणागमण'-इच्चाइ । उवस्सयाओ गुरुमूलाओ वा 'गमणं, आगमण' बाहिराओ आयरियसमीवं । 'विहारो' सज्झायनिमित्तं जं अन्नत्थगमणं । एत्थ सबहिं चेव इरियावहिया काउस्सग्गो पायच्छित्तं कीरइ । 'सुयम्मि' उद्देससमुहेसाणुन्ना- पट्ठवणपडिक्कमणसुयक्त्रंधंगपरियट्टणाइएसु सुए काउस्सग्गो कीरइ । 'सावजसुमिणे". पाणा- इवायाइ। आइसद्देण अणवजसुमिणे वि । कम्हेंति । 'च'सहेण दुनिमित्त-दुस्सउण-पडिहणण-10 निमित्तं अट्ठस्सासुस्सग्गकरणं । 'नावा' चउचिहा-समुहनावा, उजाणी, ओयाणी, तिरिष्छ- गामिणी । आइमा समुद्दे । पच्छिल्ला तिन्नि नईए । उजाणी पडिसोत्तगामिणी । ओयाणी पुण अणुसोयगामिणी । तिरिच्छगामिणी दि छिन्दन्ती गच्छइ । 'णईसंतारो'11 चउचिहो। सो पुण पाएहिं संघट्ट लेव-उवरिलेवेहिं तिविहो होइ, वाहा-उडुवाईहिं य। सवत्थ 'पायच्छित्तं' जयणोवउत्तस्स" विहीए 'काउस्सग्गो' पायच्छित्तं होइ । 15 १९. 'भत्ते पाणे' इच्चाइ । 'भत्तपाणाइ' पसिद्धं चेव । 'सयणं' जत्थ सुप्पइ । 'आसणं' जत्थ निविसिजइ । 'अरहन्तसेजा' चेझ्यघरं । 'समणसेजा' पडिस्सओ। सधेसु एएसु भत्ताइस- मणसेज्जापजवसाणेसु हत्थसयाओ परेण गमणे आगमणे वा कए पायच्छित्तं काउस्सग्गो। सो पणुवीसुस्सासो" काययो । उच्चारिजइ त्ति 'उच्चारों'। पस्सवतीति 'पस्सवणं । दोसु वि परिट्टविएसु हत्थसयभन्तरे परेण वा हत्थमेत्ते वि काउस्लग्गो पणुवीसुस्सासो कजइ । २०. 'हत्थ सय' इच्चाइ । अणन्तरगाहा-जुयलेण काउस्सग्गं पच्छित्तमुत्तं तं पुण काउ- स्सगं कि परिमाणं करेन्ति । अभो ऊसास-परिमाण-निरूवणत्थाओ तिनि गाहाओभण्णन्ति। गाहाए पढमद्धं पढियसिद्धं । 'पाणवहाइसुमिणए' त्ति करणकारावणाणुमईहिं सुमिणे पाणा- इचाओ कहो ओजा । तत्थ ऊसाससयपरिमाणं तुल्लं । 'चउत्थमिति मेहुण-सुमिणयदंसणे अट्टसयऊसासपरिमाणं काउस्सगं करेजा। २१. 'देसियराइय' उच्चाइ । जहासंखेण ऊसासपरिमाणकहणमेयं । दिवसावसाण-पडिक्क- मणे पच्छिमकाउस्सग्गतिए पढमे दो उजोया चिन्तिजन्ति। पच्छिमेसु दोसु एक्केको । एवमेए चत्तारि उज्जोया। एसो य उज्जोयदण्डगो पणुवीसूसासपरिमाणेण छिज्जइ । तओ पणुवीसा चउहिं उज्जोएहि गुणिया ऊसाससयं भवति । रयणिपहाय-पडिक्कमणे पुण पञ्चासं ऊसासा सयस अद्धण होन्ति । तत्थ दोहिं उज्जोएहिं पणुवीसा गुणिजइ । पक्खपडिक्कमणे वारस 30 उजोया । तेहिं पणुवीसा गुणिया होन्ति ऊसासाणं तिन्नि य सयाओ । चाउम्मास-पडिकमणे घीसाए उजोएहिं पणुवीसा गुणिजइ, पंचसया होन्ति । चारिसिय पडिक्कमणे चत्तालीसाए उजोएहि पणुवीसा गुणिया सहस्समुस्सासाणं होइ । अन्ने अट्ट ऊसासा नमोकारे कजन्ति । तओ अट्टत्तरं सहस्सं होइ। सो य नमोकारो संवच्छरिप बहुओ कालो निधिग्घेणं गओ त्ति चिन्तिजा मंगलरथं पजन्ते। 1BO गओ। 2 A.मिभो। 3B ततो। 4 B 'बाल'नास्ति । 5 Bच । 7-8 A .मिणो 9 B नदीए। 10 A नदी। 11 A नाद सं.। 12 B जइणो० । 13 B एतेगु। 14 A पच्छितं । 15 A पुण. 4 - 16 A पमः। 17 B करेउ ति । 18A मुमिणोति। 19 A.सासयप० । 20 A मिहुण। 21 B उस्त । 20 25 35 6 B नास्ति ।
सिद्धसेनसूरिकया [गाथा २२-२७. 5 4 २२. 'उद्देस' इच्चाइ । सुत्ते उद्देस-समुद्देस-अणुनासु सत्तावीसं ऊसासा उस्सग्गो कीरइ । सुयक्खन्धनपरियट्टणुत्तरकाले य सत्तावीसुस्सासपरिमाणुस्सग्गकरणं । पट्टवणपडिक्कमणे असासगपरिमाणुस्सग्गकरणं । आइसहेण दुनिमित्तावसउणपडिघायनिमित्तं अट्टसासमु. स्सग्गं करेइ । एयं काउस्सग्गारिहं भणियं ॥५॥ २३. 'उद्देसज्झयणे' इच्चाइ। उस्सग्गामिहाणाणन्तरं तवारिहं भण्णइ । तत्थ नाणायारा- इयारो दुविहो-ओहओ, विभागओ य । तत्थ विभागेण उद्देसग-अज्झयण सुयक्खन्ध-अङ्गाणं कमसो य परिवाडीए कमेण, पमाइस्स कालाइक्कमणाइसु त्ति सम्वज्झइ । पमाइगहणं, काल- विणय-बहुमाण-उवहाण-अनिण्हवण-विवजया अइयारो होइ । वक्षणमेय-अत्थमेय-तदुभयमेया वा कया अइयारो होइ नाणस्स । एएर्सि अट्ठण्हपयाणमन्नयरट्ठाणट्टिओ नाणाइयारे वट्टर । 10 अकाले सज्झायकरणं असज्झाइए वा करणं; एस कालाइयारो। विणयं न पउआइ, जयाइएहिं वा मयावलेवलित्तो विणयभंग करेइ, हीलइ वा; एवमाइ विणयाइआरो। सुए गुरुम्मि य बहुमाण- भत्तीओ न करेइ । भत्ती उवयारमेत्तं । बहुमाणो ओरसो सिणेहसम्बन्धो आयरियाणं उवरि सो वा न कओ। उवहाणं तवचरणं आयंबिलाइयं न करेइ । निण्हवणं अवलवणं । जस्स सगासे अहीयं तदुद्देसेण भणइ 'नाहं तस्स सगासे अहिजिओ' । जुगप्पहाणं वा सूरिं समुहिसइ 16 सयमेव वाहिजियं भणइ । एसा निण्हवणा । वजयइ जेण अत्थो तं वजणं । सुत्तस्स सन्ना। च सुत्तं मत्तऽक्खरविन्दुहिं ऊणमहरित्तं वा करेइ, सक्कयं वा करेइ, अनामिहाणेण वा भणइ । एस वक्षणमेओ। एवमत्थमेय तदुभयसेया वि नेया। २४. 'निविगइय'-इञ्चाइ । उद्देसगाइयारे निविगइयं । अज्झयणाइयारे पुरिमर्छ । सुयक्ख, न्धाइयारे एगासणयं । अंगाइयारे आयंबिलं । अणागाढे एयं । आगाढे पुण एएसु चेव ठाणेसु 20 पुरिमडाइ-अभत्तट्ट-पजवसाणं । अत्थसुणणे वि पुरिमहाइ-खमण-पजन्तमेएसु चेव ठाणेसु। एयं विभागपच्छित्तं भणियं । इयाणि ओहेण भन्नइ । २५. 'सामन्नं पुण' इच्चाइ । सबम्मि चेव सुत्ते ओहेण अविसेसिए आयामं । अत्थे य अविसेसिए अभत्तहो। कमेण अहिजन्तो न ताव पावइ तं सुत्तं अत्थं वा परियाओ वा न पूरइ सो अपत्तो (१); अवरो अपत्तो अजोगो। तितिणिचवलचित्त गाणंगणियाइ-णेगदोस- 25 संजुत्तो (२); अनोवि अपत्तों वयसा सुएण वा (३) एएसिं सवेसिं चेव जो वायणं देइ उद्देस- समुद्देसणुन्ना वा करेइ तस्स वि खमणं । 'च' सहेण जइ पत्तं न वाएइ सुरण, पत्तं वा जोगं न वाएइ, वत्तं वा वयसुएहिं । एएसिं च उद्दसणादि जो न करेइ वा तस्स अभत्तट्ठो। २६. 'कालाविसजण'-इञ्चाइ । कालाविसजणं कालस्स अपडिक्कमणं । 'आइ'सद्देण अणुओगस्स अविसजणं । 'मंडलि-वसुहा' मंडलि-भूमी सा तिविहा' सुत्ते अत्थे भोयणे । 30 एएसिं तिण्हवि अप्पमजणे निवीयं । सुत्ते अत्थे वा निसेजं न करेइ । अक्खे वा न रएति तो खमणं, 'च' सहा वंदण-काउसग्गे ण करेति तहावि खमणं चेव । २७. 'आगाढाणागाढम्मि' इञ्चाइ । जोगो दुविहो-आगाढो अणागाढो य । आगाढे सम्व- भंगो देसभंगो य । अणागाढे वि सवभंगो देसभंगो य। सबभंगो नाम आयंविलं न करेइ, विगईओ सेवइ । देसभंगो नाम विगई भुझेऊण पच्छा काउस्सग्गं करेइ । सयमेव वा काउ- 35 स्सग्गं काऊण भुञ्जइ, विगई वा एगटुं गेण्हइ अभणिओ" वा 'संदिसह काउस्सगं करेमि'त्ति 1B वीईयं । 2 A .यखं०। 3A एकास०॥ 4 Bहाणे० । 5A ओहेणं । 6B तितिणियचलचि० । '7 A अव्वत्तो । 7 A अव्वत्तो । 8 A अणिओ० । 9 A तिहा। 10 B गिहद । 11 A अभिगि० ।
। । १३ गाथा २८-३०.1 जीयकप्प-चुण्णी भणइ । आगाढसवभंगे छटुं, देसभंगे चउत्थं । अणागाढसबभंगे चउत्थं, देसभंगे आय- विलं । एस नाणाइयारो भणिओ। इयाणि दसणाइयारो भन्नइ- २८. 'संकाइयासु देसे' इच्चाइ । संका आइ जेसि पयाणं ताई इमाइं संकाइयाई । तेसु संकाइएसु अट्ठसु पएसु । काणि पुण ताणि? इमाणि भन्नन्ति । [१] संका, [२] कंखा, [३] 5 वितिगिञ्छा', [४] मूढदिट्ठी, [५] अणुववूहा, [६] अथिरीकरणं, [७] अवच्छल्लं, [८] अप्प- भावणया। संसयकारणं संका-देसे य सबे य। तत्थ देसम्मि जह-तुल्ले जीवत्ते किह भविया अभविया', अन्ने एवमाइ संकादेले । सन्चे-पागय भासबद्धत्ता मा होजाऽकुसल- परिकप्पियं । दिद्वन्तो पेजकप्पट्ठो। एत्तो कंखा दुविहा-देसे, सच्चे य बोधवा। देसे कुति- त्थियमयं कंखइ । एत्थवि अहिंसा मोक्खो य दिट्ठो त्ति । सच्चे पुण कंखइ सच्चे कुतिथिमए' । 10 दिटुंतो रायामचा आसायहिया पसत्थमपसत्था । वितिगिञ्छा देसे सधे य । जहा भइमो' परिसो परिकेसो अम्हाण केसलोयाइ कीरए होजा न वा मोक्खो। विदुगुञ्छा वा-विज्ञाने विदः"साधवः । ते दुगुञ्छइ मण्डलि-मोय-जल्लाइएहिं । मूढदिट्ठी परतित्थियपूयाओ" अइसयम- याणि वा सोऊण मइवामोहो होजा । उववूहा दुविहा-पसत्था अप्पसस्था यो पसस्था सासु नाणदसणतवसंजमखमणवेयावच्चाइसु अन्भुजयस्स उच्छाहवडणं उववूहणं । अप्पसत्था 15 मिच्छत्ताइसु । थिरीकरणं पसत्थमप्पसत्थं च । विसीयमाणस्स चरित्ताइसु थिरीकरणं पसत्थं । असंजमे थिरीकरणं अप्पसत्थं । वच्छल्लमवि एवमेव दुविहं-आयरिय-गिलाण-पाहु- ण-असहु बाल-बुहाईणं आहारोवहिमाइणा समाहिकरणं पसत्थं । ओसनाइ"-गिहत्थाणं अप्पसत्थं । पभावणा वि एवमेव । तित्थयर-पवयण-निधाण-मग्गपभावणा पसत्था। मिच्छत्त- अण्णाणाईणं अप्पसत्था।एवं थट्ट वि वित्थरओ परूवेऊण । तत्थ संका देसे सधे य । एवं फंखा 20 वि। एवं वितिगिञ्छा दुगुञ्छा वि। एवं मइ[वा]मोहो वि । अप्पसत्थुववूहा देसे सवे य। एवं वच्छलं पि देसे सखे य । अप्पसत्थप्पभावणा वि देसे सच्चे य । तत्थ चउसु वि संकाइएसु देसे खमणं । मिच्छोववूहणाइसु य देसे खमणं । च सद्देण थिरीकरण-घच्छल्ल-प्पभावणे मिच्छ- ताईणं देसे खमणं । एवं ओहओ। विभागओ' पुण संकाइसु अट्ठसु वि देसे भिक्खुस्स पुरिमई । वसभस्स एकासणगं । उवज्झायस्स आयंविलं । आयरियस्स अब्भत्तहो । 25 २९. 'एवंचिय' इन्चाइ । एवं चेवाणन्तरुद्दिष्टुं पुरिसविभागेण पच्छित्तं पिहं पिहं । जइणं साहूण उववूहणं न करेइ । आइसहेण थिरीकरणं वच्छल्लं पभावणं वा पवयणजइ"माझ्याणंण फरे । भिक्खुस्स पुरिमहं । वसभस्स एक्कासणयं । उवज्झायस्सायंविलं । गुरुस्स अभत्तहो। एयं पढमद्धवक्खाणं । पच्छदं पुण उवरिमगाहाए सम्वज्झइ । सा य एसा गाहा- ३०. 'परिवाराइ' इन्चाइ । 'परिवारनिमित्तं ति सहायनिमित्तं ति जं भणियं होइ । 'आई'-80 सद्देण आहारोवहि-निमित्तं वा। तप्पसाएण आहारोवहि-सेन्जाओ वा लभिस्सन्ति त्ति काउं पासत्थोसम्नकुसीलसंसत्ताहाछन्दणियाणं" उवरि ममत्तं करेइ । सावग-सन्नायगाणं वा सवेसिं 1B विनिंछा। 2 A अण। 3B अप० । 4 B 'य' नास्ति। 5 B• विए। 6 B पागय । 7 B तित्य० । 8 B विइगिच्छा। 9 A हइमो । 10 Bण। 11 B विदवः। 12 A 13 A मिच्छाइसु। 14 B वा। 15 B ०णग समु असहु। 16 B दीणं । 17 A. 18 A एमेव। 19 B तऽला० । 20 B विगिंछा। 21B वृहणा देते। 22 A. पिनागाओ। 21 B एयं । 25 A जइ साहू। 26 B आदि । 27 A 30 B .ज्यति । 31 B च्छंदनीइआणं । पूचाकर। य - 23 Bएगासः। 28 B पराहस्स। 29 Bएगास। पति।
सिद्धसेनसूरिकया [ गाथा ३१-३४. 5 वा परिपालण-सम्भोग-संवास-सुन्तत्थदाणाणि। जइ करेइ वच्छल्लं तो भिक्खुणो णिचीयं । वसभोवज्झायगुरूणं पुरिमेगासणायामाइ जहासंखं । अह पुण इममालम्वणं करेइ । 'साहम्मि- ओ'त्ति एसो संजमं वा करेसइ । 'वा'सहेण कुलगणसंघगिलाणकजाइएसु पडितप्पिस्सइ ति। एवं विहाए बुद्धीए सबहिं सुद्धो। एवं दंसणायारपच्छित्तं भणियं ॥ इयाणि चरित्तायारपच्छित्तं भन्नइ--- ३१. 'एगिदियाण' इच्चाइ । एगिन्दिया पुढवि-आउ-तेउ-वाउ-पत्तेयवणस्सई । एएसि पंचण्ह वि पिहु पिहु संघट्टणे निधीइयं । आउकायस्स संघट्टणे घड-गोलंकय-चारगाइ-ठियस्स, पायहत्थाइचालियस्स ईसिं परियावो, पुण गाढतरचालियस्स उद्दवणं । पिङ परितावणहणणपा- णाईसु । एएसिं च परितावणा दुविहा अणागाढा आगाढा य । तत्थ अणागाढाए पुरिमहूं । 10 आगाढाए एक्कासणयं । उद्दवणे पुण आयाम पंचसु वि । ३२. 'पुरिमाई' इञ्चाइ । अणन्तवणस्सइ-विय-तियचउरिन्दियाण संघट्टण-अणागाढ-आ- गाढ-परिताव-उद्दवणेसु पुरिमाइ-खमणन्तं' जहासंखं। पञ्चिन्दियसंघट्टणे एक्कासणयं । अणा- गाढ-परितावणे आयाम । आगाढपरितावणे खमणं । उहवणे एककल्लाणगं । पमायसहियस्स। ३३. 'मोसाइसु' इश्चाइ । मुलावाय-अदत्त परिग्गहेसु मेहुणवजिएसु । दवाइवत्थुभिन्नेसु 15 त्ति । मुसावाओ चउबिहो-दवखेत्तकालभावेहिं । दवओ जहण्णमज्झिमुक्कोसो। एवं खेत्त- कालभावेसु वि तिविहो । एवं"जहा मुसावाओ चउविहो पुणो य एक्केको तिविहो। तहाऽदत्त- परिग्गहा वि । एत्थ य दवाइमेयभिन्ने चउविहे वि मुसावाए जो जहन्नमेओ तहिं सधत्थ एकासणयं, मज्झिमे सवहिं आयामं, उक्कोसे वि चउधिहे खमणं। एवं अदत्त-परिग्गहेसु वि पच्छित्तं दायचं । ३४. 'लेवाडय' इवाइ । लेवाडय-परिवासे अभत्तहो । सुक्कसन्निहिपसु वि-सुंठिहरडा- घहेडगाइसु अभत्तट्ठो। इयरा गिल्लसन्निही-गुलककयघयतेल्लाई तीए छटुं । सेस निसिभत्ते अट्टमं । ओहसुत्ताओ" जमन्नं तं सेसं। किं चोहसुत्तं ? पढमभंगो। सेसा तिन्नि भंगा सेसनिसि- भत्तसहेण भवन्ति । एवमेयं मूलगुणाइयारे मेहुणवजिए पच्छित्तं भणियं । मेहुणाइयारस्स पुण मूलढाणे भणिहिई। इयाणि उत्तरगुणाइयारपच्छित्तं भन्नइ । ते य उत्तरगुणा पिंडविसोहीयाईया। तत्थ पिं- डविसोही तिसु ठाणेसु हवइ । उग्गमे उप्पायणाए एसणाए य । तहा संजोयणपमाणइंगाल धूमकारणविभागेण य विसुद्धी भव" । एस्थ य उग्गमो सोलसमेओ । ते य इमे सोलस मेया आहाकम्माई"। एत्थ सोलससु दोसेसु जत्थ जत्थ सरिसं पच्छित्तं तं तं दोसं गाहाए संपिडिय कहयइ। तहा उप्पायणाए वि सोलस । तत्थ जे सरिसपच्छित्ता ते समुञ्चिणइ । एवं एसणा- 80 दोसेसु वि दुससु सरिसट्ठाणाई उवसंहरद । एगट्ठी किया। एए सन्ने वि पिंडनिजुत्तिणुसारेण भाणियचा । इह पुण पच्छित्तमेव केवलं विहिजइ । आहाकम्मे खवणं। उहेसियं दुविहं-ओहे विभागे या परिमियमिक्खदाणरूवं ओहो सामन्नमेगपगारं अविसेसियं तत्थ पुरिमहुँ । विभागे तिन्नि मेया उद्देसो, कडं, कम्मं । एए" तिन्नि वि पत्तेयं 1B निव्वीइयं । 22 A वसभोज्झाय । 3 B करिस्सइ । 4 A. तप्पस्सइ। 5A विईयं । 6 A. आउफायसंघहणं । 7 A. ओदवणे। 8 B परियावण । 9 Bखवणं । 10 B परियावे। 11 B एवं जरा। 12 A 'वि' नास्ति । 13 A वासेइ। 14 B ओहमुत्ता० । 15 Bहोइ । 16 B कस्माती। 17 A एएसिं। 18 Aण्ह वि। 20 25 .
5 10 15 गाथा ३४.] जियकप्प-चुण्णी वरहिं मेएहिं भिजन्ति' । तं जहा--उद्देसुद्देसियं, उहेससमुद्देसियं, उद्देसापसियं, उहेसस- माएसियं । एएसु विमेएसु पुरिमहूं । कडुद्देसं, कडसमुद्देसं, कडाएसं, कडसमाएसं । एएसु वि चउसु विमेएसु एक्कासणयं । तहा कमुद्देस, कम्मसमुहेस, कम्माएसं, कम्मसमाएसं। तत्थ पढमें आयंविलं । सेसेसु तिसु मेएसु अब्भत्तट्ठो। पूइयं दुविहं-सुहुमं बायरं च । सुहुमं धूमाइ। वायरं उवगरणे भत्तपाणे य । तत्थ उव- गरणपूरए पुरिमहं । भत्तपाणपूइए एक्कासणयं । मीसजायं तिविहं-जातियमीसजायं एत्थ आयंबिलं । पासंडमीसजाए, साहुमी- सजाए य खमणं। उवणा दुविहा-इत्तिरिया तत्थ निधीइयं । चिरठवियाए पुरिमहूं । पाहुडिया वि दुविहा-सुदुमाए निबीइयं । वायराए खमणं । पाओकरणं दुविहं-पागडकरणे पुरिमहूं । पगासकरणे आयामं । कीयं दुविहं-दचे भावे य । दवे दुविहं-आयकीयं, परकीयं च । एत्थ दोसु वि आ- यामं । भावे वि आयकीयं परकीयं च। भावायकीए आयामं। भावपरकीए पुरिमहूं। पामिञ्चं दुविहं-लोइयं एत्थ आयाम, लोगुत्तरिए पुण पुरिमहूं । परियट्टियं दुविहं-लोइए आयाम, लोगुत्तरिए पुण पुरिमहं । आहडं दुविह-सग्गामओ, परग्गामओ य । सग्गामाहडे पुरिमर्छ । परग्गामाहढे सपञ्च- वाए चउत्थं । परग्गामाहडे निप्पञ्चवाए आयाम । उम्भिण्णं दुविहदहरउन्भिन्ने पुरिमह, पिहिओभिन्नकवाडे आयामं । मालोहडं दुविहं-जहन्ने पुरिमई, उक्कोसे आयामं । अच्छेज तिविहं~-पहुअच्छेजं, सामिअच्छेजं, तेण अच्छेजं । तिसु वि आयाम । अणिसह तिविहं-साहारणाणिसटुं, चोल्लगाणिसटुं, जहाणिसटुं । तिसु वि आयामं । अझोयरो तिविहो-जावंतिय-पासंडियमीसो, साहुमीसो। एत्थ जावंतिए पुरि- महं, इयरेनु दोसु वि एकासणयं । एवं उग्गमदोसेसु पायच्छित्तं भणियं । इयाणि उप्पायणाए' पायच्छित्तं भन्नइ-धाई पंचविहा, सव्वत्थ आयामं । दुई दुविहा- सग्गाम-परग्गामा, दोसु वि आयामं । निसित्तं तिविहं-तीए आयामं, वहमाणे अणागए य 25 खमणं । आजीवे जाइकुलाइभिन्ने, सम्वत्थ आयामं । घणीमए० वि सम्वत्थ आयामं । तिगिच्छा दुविहा-सुहुमाए पुरिमटुं, बायरार" आयामं । कोहे माणे आयाम, मायाए एका- सणं," लोमे खमणं । संथवो दुविहो-पुचि संथवो, पच्छासंथवो वा । वयण-संथवे पुरिमई, सम्बन्धि-संथवे आयाम । विजाए आयामं । मन्ते आयामं । चुण्णे मायाम । जोगे भायाम। मूलकम्मे मूलं। श्याणि एसणादोसेसु पच्छित्तं भण्णइ-ते य इमे दस संकियमाईया | तत्थ संकिए चउभंगो-संकियगाही संकियभोई 1 चरिमो णिस्संकिओ' दोसविसुद्धो, वीओ वि विसुद्धो चेव । पढमतइप" संकियभोई। जं दोसं संकर तस्स चेव पच्छित्तमावजइ । सच्चित्तमक्खियं तिविई-पुढवि-आउ-चणस्सइ । तत्थ पुढविससरक्खमक्खियहत्येणं निधिगइयं । मीसकद्दमेणं पुरिमहं । निम्मीसकहमे आयाम । मट्टिया-मोस-हरियाल-हिंगुलुय-मणोसिला-संजण-लोण- 35 1 A. मिजद। 2 B परमए। 3B '' नास्ति। 4B माओ। 5 Bअच्छिन । A. साधारण अणिसई। 74 यए। 8 B धाती । 9 A पट्टमा। 10B यणीमगे। 12 B एगारापगं। 13 B oमादीया। 13 Boमादीचा। 14 Bमोती। 13Aनीस। 16 A FE इओ विए। 17 A रातिए। 18 B निरवीगर्ग । 20 . - 30 6 11 Aपाय।
सिद्धसेनसूरिफया [गाथा ३४. -- गेरुय-चन्निय-सेडिय-सोरट्टिय-मक्खिए करमत्ते सत्वत्थ पुरिमटुं। एयं पुढविमक्खियं । इयाणि आउमक्खियं भन्नइ-ससिणिद्धे निविगइयं । उद्उल्ले पुरिमहूं । पुरकम्म-पच्छकम्मे आयामं । एयं आउमक्खियं भणियं। इयाणि वणस्सइमक्खियं भन्नइ-सोय वणस्सई दुविहो-परित्तो,अण- न्तो य । परित्ते तिनि भेया-पिटुं, रोई', कुक्कुसा । उक्कुटुं चिंचाइ । एएहिं मक्खिएहिं तिहिं वि 6 पुरिमर्छ । अणन्ते वि एएहिं चेव तिन्नि मेया । एत्थ एक्कासणयं । एयं सच्चित्तमक्खियं भणियं । इयाणि अचित्तमक्खियं भन्नइ-तं दुविहं-गरहिय-मजायमक्खिए आयामं । अगरहिय-संसत्त- मक्खिए आयाम । एयं मक्खियं भणियं । इयाणि णिक्खित्तं भन्नइ-एत्थ चउभंगो सचित्ते सचित्तं निक्खित्तं । एत्थ तइए पच्छित्तं । तं च सञ्चित्तं छक्काया-पुढवी-आऊ-तेऊ- वाऊ- परित्तवणस्सइकाऊ-तसाणं च । सञ्चित्ताणमणन्तर-निक्खित्ते आयामं । एपसिं चेव सच्चित्ताणं 10 परंपरनिक्खित्ते पुरिमखु । एएसिं चेव मीसाणमणन्तर निक्खित्ते पुरिमहुं । पपसिं चेव मीसाणं परंपरनिक्खित्ते निवीयं । अणन्तवणस्सइ-सच्चित्ताणन्तरे खमणं । एयस्स चेव परंपरेण' एक्का- सणयं । अणन्तवणस्सइ-मीसाणन्तरणिक्खित्ते एक्कासणयं । एयस्स चेव परंपरनिक्खित्ते निद्यीयं । पिहिए चउभंगो। तत्थ तइए पच्छित्तं । अचित्तेण गुरुणा पिहियस्स, सचित्तेण पुढवी-आऊन्तेऊ-वाऊ-परित्तवण-तस-सचित्तेहिं अणन्तर"पिहिए आयामं । एएहिं चेव 16 परंपरपिहिए पुरिमहूं। एएहिं चेव मीसेहि अणन्तर-पिहिए पुरिमहूं। एएहिं चेव परंपरे निधीयं । अणन्तवण-सचित्ताणन्तरपिहिए खमणं । तेण चेव परंपरपिहिए एक्कासणयं । अणन्तव णस्सइ-मीसाणन्तरपिहिए एक्कासणयं । एएण चेव परंपरपिहिए निचीयं । गुरु-अचित्तपिहिए- खमणं । इयाणि साहरियं भन्नइ । एत्थ वि चउभंगो।तत्थ पुढवि-आऊ-तेऊ-वाऊ-परित्तवणस्सइ- तससचित्ताणन्तरसाहरणे आयामं। एएहि परंपरसाहरणे पुरिमर्ल्ड । एएहिं चेव मीसाण अणन्तर- 20 साहरणे पुरिमटुं । एएहि चेव मीसाणं परंपरसाहरणे निविइयं"अणन्तवणस्सइसचित्ताणन्तर- साहरणे खमणं। एएहिं चेव अणन्तवणस्सइपरंपरसाहरणे एकासणयं। अणम्तवणस्सइमीसाण- न्तरसाहरणे एक्कासणयं । एयस्स चेव मीसपरंपरसाहरणे निविइयं । वीयसाहरिए निविगइयं । अधित्ते अचित्तं साहरिए पुरिमहूं । अह गुरुसाहरिए तो खमणं । इयाणि दायारो त्ति भन्नइ- थाले बुढे मत्ते उम्मत्ते चेव णेजरिए अन्धे एएसु दिन्तेसु गहणे आयामं । पगलन्तकुढे खमणं । 26 पाउयारूढे वि खमणं । हत्थे"दुइए नियलवद्धे य हत्थच्छिन्ने य पायच्छिन्ने य नपुंसके गुचिणी- पालवच्छाए भुअन्तीए विरोलन्तीए भजन्तीए कंडन्तीए पीसन्तीए एयासुसवासुआयामं। पिंज- न्तीए रुवन्तीए कत्तन्तीए पमहमाणीए पुरिमडं। छक्कायवग्गहत्था समणट्ठा णिक्खि वित्तुते चेव"। गाहन्ती घट्टन्ती संघट्टन्ती आरभन्ती 1 एयासु सट्टाणे नी० पु० ए० आ० अभ० कल्लाणगं एयं सट्ठाणं। संसत्तेण दवेण लित्तहत्थाय लित्तमत्ता य आयाम, सेसेसु पुरिमहं । ओयत्तन्तीए 30 साहारणं च देन्तीए चोरियगं देन्तीए पाहुडियंठवेन्तीए सपञ्चवायाए परं च उहिस्स आयामं ॥ इयाणि उम्मीसं भन्नइ-परित्तवणस्सइ सचित्तउम्मीसे आयामं । एएण चेव परित्तेण मीसेण उम्मीसे निविश्यं । अणन्तसचित्तउम्मीसे खमणं । एएण चेव अणन्तमीसे निविइयं । यीउम्मीले निधिइयं । अह पुढवाईहिंतो जहा णिक्खित्ते । इयाणिं अपरिणयं भन्नइ-तं दुविहं- ववे भावे य । दवे अपरिणयं-पुढवि-आउ-तेउ-चाउ-परित्तवणस्सइ-अपरिणए आयामं । अण- - 4 1B नास्ति। 2 A. अणंतेहि। 3B एगासणगं । 4 A इदं वाक्यं पतितम् । 5A ततिए। 6 A. भीसाणंतर० । 7 A परंपरे। 8 B एगासणगं । 9 A ततिए। 10 A. अणंतरे। 11 B निव्वीयं । 12 A. एतद्वाक्यं नास्ति । 13 B दायगेत्ति। 14 B हत्थं । 15 A. ०सये। 16 Bांचंताए। 17 Aमेव । 18 A हिंती । 19 A नास्ति। 20 A संघट्टमारभंतीए । 21 A. भोयतंतीए। 22 ठियगं । 23 Aपिउ०॥
16 गाथा ३५-४६.] जीयकप्प-चुण्णी म्तयणस्सइ-अपरिणए खमणं । एत्थ य चउभंगो दवे अपरिणयं, भावे वि अपरिणयं । भावा- परिणयं दोण्हं पि' भुजमाणाणं, पत्थ विपुरिमहं । इयाणि लित्तं भन्ना-संसत्तेण हत्येण वा मत्तेण वा आयामं । इयाणि छड़ियं भन्नर-पुढवि-आउ-तेउ-वाउ-परित्तवणेसु आयाम । अण- न्तषणेसु खमणं । एए एसणा दोसा। संजोयणा सुविहा-बाहिं भायणे, अन्तो वयणे। दोण्ह वि खमणं । परिमाणाइरिते। आयामं । सइंगाले खमणं । धूमे आयामं । अकारणे भुबई आयामं । कारणे अभुञ्जमाणरस आयामं घासेसणा दोसा पर। पयस्मि पच्छित्तपत्थारे- ३५. 'उद्देसियचरिमतिए' इश्चाइ गाहा। एयाओ दोवि गाहाओ जेसु जेतु ठाणेसु ३६. 'अइरं अणन्त' इन्चाइ गाहा । अभत्तटुं तेनु तेस्तु ओयारिजन्ति । 10 ३७. 'कम्मुइसियं' इच्चाइ गाहा। एयाओ दोवि जेसु जेसु ठाणेसु आयामं तेसु तेसु ३८. 'अइरं परित्त०' इवाइ गाहा। ओयारिजन्ति । ३९. 'अज्झोयर' गाहा । एगासणयहाणेसु ओयारिजइ । ४०. 'ओह विभागा' इच्चाइ गाहा । । एयाओ तिणि गाहाओ जे जेसु ठाणेमु पुरिमहं ४१. 'सग्गामाइड' इवाइ गाहा । ४२. 'पत्तेय'मिच्चाइ गाहा। तेसु तेसु ओयारिजन्ति । ४३. 'इत्तरठविय' इच्चाइ गाहा । पसा निम्विईयं जेसु जेसु ठाणेसु तेसु तेसु ओयारिजा। ४४. 'सहसाणाभोगे' इच्चाइ । सहसाणाभोगा पुछुत्ता । तेस्नु सहसाणाभोगेसु वट्टमा- णस्स जेसु जेल कारणेसु पडिक्कमणं भणियं तेच तेसु चेव कारणेसु आमोएणं जाणमाणो जं करेन, अइवहुसो पुणो पुणो अइप्पमाणेण वा करेइ, सव्वत्थ निधिगइयं । ४५. 'धावणदेवण' इन्चाइ । धावणं गइमेदो। डेवणं उल्लंडणं । संघरिसेण गमण-20 को सिग्धगइ त्ति, जमलिओ वा गच्छद । किडा अट्ठावय-चउरंग-याइ । कुहावणं" इन्दजाल- वरखेडाइ । आइसद्देण समास-पहेलिया-कुहेडगा घेप्पंति । उकुटी' पुकारिय-कलकलो। गीयं गीयमेव । छेलियं सेंटियं । जीवनयं-मयूर-तित्तिर-सुग-सारसादिलवियं सधेसतेसु अभत्तहो । आइसहेण अजीवल्ये वि-अरहमडिया-पाउया-सहेसु वि। ४६. 'तिविहोवहिणो विषुय' इञ्चाइ । तिविहोवहिणो-जहन्नो मज्झिमो उक्कोसो। मुहपो-25 त्तिय-पायकेसरिया गोच्छगो पत्तठवणं च एस चउचिहो जहन्नो। मज्झिमो छपिहो-पडलार- यत्ताणं पत्ताधो चोलपट्टो मत्तओ रयहरणं च । उकोसोचउचिहो-पडिग्गहो, तिन्नि पच्छाया। एए ओहियस्स थेरकप्पे चोइसमेया भणिया। इयाणि उवग्गहिओ थेरकप्पो"तिविहो भन्नइ- जहनो मझिमो उकोसो। पीढगं निसिजं उंडगा पमजणी घट्टगा उगलगा पिप्पलग-सूई नहरणी दंत कण्ण सोहणग-दुर्ग; एसो जहन्नो। वासताणाइओ मज्झिमगो। चासताणा पंच 30 इमे-घालो सुत्तो सुंगो" फुडसीसग छत्तए चेव ॥ तेहिं य दोनिओ ओहोवहिम्मि' 1B वाले य सोतिप चेव । सेसतियवासताणे पणयं तह चिलिमिलीण इमं ॥ । 1 A तु। 2 A. हत्ये मते या । 3 A. 'भुई' नास्ति । 4B गतिः। 5 B उमणं । CA फुटा। 7 A उपुष्ट्रिय । SB सिटियं । 9 B पगा। 10B कपो। 11 B 12 A थाले मुते सम्। 13 Bोदोनिहि। ३जी० २०० मा।
सिद्धसेनसूरिकया [गाथा ४५-५० वालमई सुत्तमई वागमई तहय इंडकडगमई। संथारगद्गममुसिरं झुसिरं पिय डंडपणगं च ॥ डंड-विडंडग-लहि-विलट्ठी तह नालिया य पंचमिया । अवलेहणि-मत्त-तिगं पासवणुचारखेले य॥ चम्मतियऽत्थुर पाउरतलिगअहवाविचम्मतिविहमिमं। कत्तीतलियावन्भा पट्टगदुर्गचेव होइन। संथारुत्तरपट्टो अहवा सन्नाहपट्टपल्हत्थी । मझो अजाणं पुण अइरित्तो पारगो होइ ॥ 5 अक्खा संथारो वा दुविहो एगंगिओ य इयरोवा। बिश्यपय पोत्थपणर्गफलगं तह होइ उक्कोसो। एस अजाणं साहूणं चोग्गहिओ भणिओ। इयाणिं अजाणं ओहिओ भन्नइ । जो श्चिय थेरकप्पियाण ओहोवही चोदसविहो सो चेव अजाणं पि । नवरं- अजाणं एस चिय चोलट्ठाणम्मि कमढगं नवरं । अन्नो य देहलग्गो इमोवही होइ तासिं पि॥ ओग्गहणन्तगपट्टो अट्टोरुगचलणिया य वोधधा । अन्भिन्तरवाहि नियंसणीय तह कंचुए चेव ॥ 10 उक्कच्छिय-वेकच्छिय-संघाडी चेव खंधकरणी य। ओहोवहिम्मि एए अजाणं पन्नवीसाओ ॥ एत्थ अजाणं जहन्नो जो चेव साहूणं ओहिओ चउधिहो। उक्कोसो अट्ठविहो-चउरो ते चेव पुधुदिट्ठा जे साहूणं । अन्ने य इसे चउरो अन्भिन्तरवाहि-नियंसणीय संघाडी खंधकरणी एसो उक्कोसओ उ अजाणं । तेरसविहो उ मज्झो इणमो उ समासओ होइ । पत्ता बंधाईया चउरो ते चेव पुष्वनिहिट्ठा । मत्तो य कमढगं वा तह ओग्गहणन्तगं चेव ॥ 16 पट्टो अट्टोरूविय चलणिय तह कंचुगे य उक्कच्छी। वेकच्छी तेरसमा अजाणं होइ णायचा ॥ जहन्नोवहिम्मि 'विचुए' पडिए पुण लद्धे निधिईय। मज्झिमे पुरिमटुं । उक्कोसए एक्कासणयं । 'विस्सरिया पेहिए'त्ति-पडिलेहिउं विस्सरिउ त्ति भणियं होइ । जहन्ने अप्पडिलेहिए निधिईयं ।। मज्झिमे पुरिमहूं । उक्कोसे एक्कासणयं । 'विस्सारियानिवेयणे'त्ति निवेइ' विस्सरियं ति; आयरियाईणं तिविहीं वि । तो एवं चेव पच्छित्तं । अह पुण सबोवही विसुओ 20 पुणरवि लद्धो । पडिलेहिउँ वा विस्सरिओ। निवेइ वा विस्सरिओ सपो चेव, तो आयाम । ४७. 'हारिय धो'इचाइ । हारिए जहन्नोवहिम्मि एक्कासणयं । मज्झिमे आयाम । उक्कोसे चउत्थं । धोए वि एवं चेव पच्छित्तं तिविहं । उग्गमेउं न निवेइए । जाणन्तो वि जहा न वट्टा परिग्गहिर आयरियस्स अणिवेइओ उवही । तस्सानिवेइयस्स तिविहं एयं चेव पच्छित्तं । अदिन्नं वा आयरियाईहिं जहन्नाइ-मेयं उवहिं परिभुञ्जइ एयं चेव तिविहं पच्छित्तं । 25 दिन्नं वा उवहिं जहन्नाइ-मेयं आयरियाईहिं अणणुनाओ अन्नेसिं देइ । एत्थ वि एवं चेव पच्छित्तं तिविहं । अह पुण सचोवहिं हारेजा। सरोवहिं वा उदुवद्धे धोवेजा । सधोवहिं वा उग्गमेउ न निवेएइ। सबोवहिं वा अदिन्नं परिभुबइ । सोवहिमणापुच्छाए अणणुनाओ वा अन्नेसिं देइ । एवं सम्पहारवणाइएसु पपसु जीएण छटुं । ४८. 'मुहणन्तय' इवाइ । मुहणन्तए फिडिए ओग्गहाओ निविईयं । रयहरणे अभत्तहो । 30 एवं ताव अणटे । अह पुण नासियं हारवियं वा पमाएण मुहणन्तयं तो से चउत्थं । रयहरणे छटुं। ४९. 'कालद्धाणाईए' इच्चाइ । विगहाइपमारणं कालाईयं करिन्ति भत्ताइ निविइयं, अह पुण परिभुञ्जन्ते चउत्थं । एवं अद्धाणाइक्कमे वि अपरिभुजन्तस्स निदिईयं; परिभुअन्तस्स अभत्तट्ठो। पारिवावणियं सचमेवाविहीए विगिञ्चिन्तस्स भत्ताइ पुरिमर्छ । ५०. 'पाणस्सासंवरणे' इञ्चाइ । पाणाहारासंवरणे । भूमितिगं ति-उचार-पासवण- 85 कालभूमि। एगतर-अपडिलेहणाए वि" निष्चिईयं । चउचिहाहारासंवरणे, अहवा नमोकार- पोरिसियाइयं पञ्चक्खाणं ण गेण्हइ गहियं वा पश्चक्खाणं भाइ सम्वत्थ पुरिमहं। 1B पुस्तके 'मई स्थाने सर्वत्र 'मती' पाठ। 2 A चिय। 2 A चिय। 3 Bओतरि० । 4 A पिइय। 5 B चेवो। 6 B चोलगट्ठाणमि। 7 A निवेएउ । 8 A तिविहे। 9 A निवे। 10 A. वाइस। 11 A पमाएण। 12 A 'वि' नास्ति । .
गाथा ५१-५६. ] जीयकप्प-चुण्णी १९ ५१. 'एयं चिय' इच्चाइ । एयं चिय पुरिमहूं । सामन्नं अविसेसियं ति भणियं होइ । तवो बारसविहो । पडिमाओ वारस-भासिया, दोमासिया, तिमासिया, चाउमासिया, पञ्चमालिया, छम्मासिया, सत्तमासिया, पढम-सत्तराइन्दिया, दोश्च-सत्तराइन्दिया, तइय-सत्तराइन्दिया, अहोराइया, पगराइया । अभिग्गहा दद्यखेत्तकालभावमेयभिन्ना । एएसि अगेण्हणे भंगे वा पुरिमहूं । गाहा पच्छद्धस्स विभासा इमा। पक्खिए अन्भत्तहमायंविलं वा। जंवा दिवस- 5 पश्चक्खाणं । ताओ जहांसत्तीए तवं न करेइ अइरित्तं, तो खुड्डगस्स निचीईयं, थेरगस्स पुरिमह, भिक्खुस्स एक्कासणयं, उवज्झायस्सायंविलं, आयरियस्स अन्भत्तट्ठो। चाउम्मासे खुडगाइ-आयरियावसाणाणं पंचण्ह वि जहासंखं पुरिमडेगासणायामचउत्थछट्ठाई दिजन्ति । संवच्छरिए एक्कासणायामचउत्थछट्टमाई दिजन्ति महासंखं पंचण्ह वि। ५२. 'फिडिए' इन्चाइ । फिडिओ निदापमाएणं एगस्सुस्सगस्स निधिईयं । दोसु10 पुरिमहं । तिहि वि एगासणयं । काउस्सग्गाणं चैव फिडिओ पच्छाहुन्तओ करेइ ताहे आयाम । सयं वा एस्सारेइ एगाइ काउस्सग्गे तो निधीइयपुरिमद्वेगासणाई जहासंखं । सचे चेव सयमुस्सारेर आयामं । भग्गे वा एगाइसुस्सग्गे अपुण्णे चेव अन्तराले तहा वि निविईय- 'पुरिमद्वेगासणाई । सधेसु भग्गेसु आयामं । एवं वन्दणएसु वि एस चेव गमो । ५३. 'अकएमुं' इञ्चाइ । अहवा उस्सग्गमेव न करेइ । एगाइ ताहे पुरिमेगासणायामाई 116 साधावस्सयं न करे चउत्थं । जहा काउस्सग्गे एवं वन्दणाइएखं पि गाहा पच्छद्रेण सह चउत्थं सम्वज्झइ । दिया अपडिलेहिए थंडिले राओं वोसिरइ, दिया वा सुवइ चउत्थं । ५४. 'कोहे बहु' इवाइ । सगिमुप्पन्नं कोहं पक्खाओ उरि चाउम्मासाओ वा उरि धरेइ तो चउत्थं । आसवो वियर्ड तमाइयंते चउत्थं । ककोलग-लवंग-पूगफल-जाइफल-तं- बोलाइसु सवत्थ चउत्थं । पुधगाहाओ अणुवट्टाविजइ । लसुणे अचित्ते पुरिमहं । आइसहेण 20 पलं घेप्पइ । तण्णगमयूरतित्तिराइ-बंधमुयणे पुरिमहूं। ५५. 'अझुसिर' इवाइ । अझुसिरतणं कुसाइ तेसिं अकारणपरिभोगे निधिईय, सेसप- णएसु पुरिमहं । सेसा पंच पणगा-तणपणगं, दूसपणगं', पोत्ययपणगं, चम्मपणगं । पत्थ य दूस- । पण दुविहं तेण पंचपणगा। तत्थ सालीवीहीकोइवरालगआरनतणं चेति तणपणगं। दूसपणगं दुविहं-दुप्पडिलेहिय दूसपणगं अप्पडिलेहिय-दूसपणगं च । कोयवि पावारग° पूरी दाढियाली 25 विराली, पयं दुप्पडिलेहिय-दूसपणगं । तूली आलिंगणी अंगोवहाणं" गंडोवहाणं मसूरगो या पयं अप्पडिलेहिय-दूसपणगं । गंडीपोत्थओ", कच्छवीपोत्थओ, मुट्ठीपोत्थओ, छिवाडी' संपुडगं, एयं पोत्ययपणगं । गो-माहिस-अय-एला-मिय-चम्मपणनं। पत्थ य तणपणए दुप्प- डिलेहिय-दूसपणए चम्मपणए य पुरिमहं । अप्पडिलेहिय-दूसपणए एकासणयं । पोत्थयप- गाहणे आयामं । बेइन्दियाइ-तसंवहे जंच आवजह तं च दिजा । विश्य-चुनिकारमएण पो.30 स्थयपणगे वि पुरिमहं। ५६. 'ठवणमणापुच्छाए' इचाइ । दाणसहअहाभहसन्निमाईणि ठवणकुलाणि । ताणि आय- रियमणापुच्छिय भत्तार पविसिऊण गेण्हइ जइ तो से एकासणयं । तेसु य कुलेसु पगो चेव संघाडगो णिधिसइ सेसा न पविसन्ति । विरियं परकमो तं निगृहन्तस्स एमासणयं । जीय- पवहारे पयं । सुयववहाराइसु अन्नहा। एमासणयं च माया"निप्फन्नं । सेसमायामो अन्न-35 1 A पुन्तके 'नि भनिय पतितं । 2 A विहाना। 3A ममो। B. गागणं आया। B'राजो नास्ति। GA तमापिरते। 7 B पुस्तके 'समुगिरतणेसु निन्बीय' एनापन्मात्रपाठः। 8 B पोत्यन पपगं, दूसपण। 9 Bअरण्नतिण। 10 B कोयप पायार-1 11 A महंगोवहार्ण। 12 A. गोमडाणी। 13 Bया। 11 A पोत्यगो। 15 Bछेपानी। 16 A.मामा - , . २० सिद्धसेनसूरिकया [गाथा ५७-६२ मायाओ, ता य इमा-जहा-भहगं भोच्चा विवन्नं विरसमाहरे आयरियसगासे । जसत्थी; जहा 'एस महा तवस्सी विरसाहारो रसपरिचागं करेइ'त्ति । एवमाझ्यासु मायासु खमणं । ५७. 'दप्पेणं'इच्चाइ । दप्पो वग्गण-धावण-डेवणाइओं । दप्पे वट्टमाणेण पञ्चिन्दिओ वहिओ होजा । संकिलिट्ठकम्म-अंगादाण-परिमद्दण-सुकपोग्गल-निग्घायणाइ,दीहद्धाण-पडिवनोय । 5 आहाकम्म-द्धाणकप्पाइयं वा बहु अइयारं करेजा। दीगिलाणकप्पस्स वा अवसाणे आहाक- म्मसन्निहिसेवणं वा कयं होजा । एएसु कारणेसु पंचकल्लाणगं पच्छित् । ५८. 'सप्टोवहि'इच्चाइ । पाउसे जयणाए वि सन्चोवहि कप्पे कर पुरिमत्ताए पा चरिमाए पमाएणं । अप्पडिलेहिए चाउम्मासवरिलेसु य विसोहीए पउत्ताए निरइयारस्स वि पंचकल्ला- णगं दिजइ । किं कारणं । जम्हा सुहुमाइयारे कए वि न याणइ न वा संभरइ । जहा पाउसहर- 10 त्तवेरत्तपाभाओगकालाग्गहणे सुत्तत्थपोरिसि-अकरणे अप्पडिलेहियमाई । एएण कारणेण सधेस्तु वि दिजइ त्ति। ५९. 'छेया'इच्चाइ।जो छेयं न सहहइ, किंवा छिजा ने छिजइत्ति एवं भणइ । मिउणो स्ति- जो छिज्जमाणे वि परियाए न संतप्पड जहा 'मे परियाओ छिन्नोति। अहवा.अग्नेसिं ओमराइ- णिओ जाओ त्ति परियायधिओ जो दीहपरियामओ सो परियाए छिन्ने तहावि अभिहित । 15 अष्भहियपरियाओ न ओमराइणिओ होइ । नवा बीहेह परियायछेयस्स । एएसिं जहुट्ठिाणं छेय. मावन्नाण वि तवो दिनइ । आइसण मूलाणवठ्ठपारचियपयावन्नाण वि। जीयववहारमएणग- णाहिवइणो य । गणाहिवई आयरिओ तस्स छेयाइमावनस्सावि तवारिहं दिजइ । मा पुण सेह- दुसुंठाईण अपरिणामगाणं हीलणिनो भविस्सइ त्ति । चसहेण कुलगणसंघाहिवा घेप्पन्ति । ६०. 'जं जमिच्चाइ । इह जीयववहारे जं जं पच्छित्तं न भणियं अवराहमुहिसिऊण 20 तस्सावि आवत्तिविसेलेण दाणसंखेवं भणामि । आवती पायच्छित्तट्ठाणसंपत्ती। सा य निसीहकप्पवघहाराभिहिया । सुत्तओ अस्थओ य । आणा अणवत्थमिच्छत्तविराहणा सवि- स्थरा। तवसो य-सोय तवो पणगादी छम्मासपज्जवसाणो अणेगावत्तिदाणविरयणा लक्षणो तेसु सव्येसु गंथेसु । इह पुण जीयवहारे संखेवणं आवत्तीदाणं निरूविजइ । ६१. 'भिन्नो अविसिट्ट'इश्चाइ । भिन्न इति ससमयसन्ना; पंचवीसं दिवसा भिन्नसदेण 26 घेप्पन्ति। सोय अविसिट्टो एक्को चेव। अविसिद्धगहणाओ य सधपणगाई मेया घेप्पन्ति। पणगं- लष्ठुगं, गुरुगं च; दसगं-लहुगं, गुरुगंच;"पन्नरसर्ग-लहुगं,गुरुगं च वीसगं-लहुगं, गुरुगं च " पंचवीसगं-लहुगं, गुरुगं च । एस भिन्नमासो बहुमेओ वि एक्को चेव घेप्पर । एसो य सुयघ- वहारो जेसु जेसु अवराहेसु भणिओ तेसु चेष अवराहेसु जीएण सधस्थ निविगई। भिन्नो अविसिट्ठो थिय एवं वक्खाणियं । इयाणि मासो ति । सो य लहुमासो गुरुमासो य । एत्थ य 30 लहुमासे पुरिमहूं । गुरुमासे पक्कासणयं । चउरो य छश्च मासा लम्बज्झन्ति । तत्थ लहुचउमासे आयामं । चउगुरुमासे चउत्थं । छलछुमासे छटुं। छगुरुमासे अट्ठमं । एवं सुत्तनिहिट्टापत्ति जहावराहं जाणिऊण जीएण निविझ्याइ-अट्ठमभत्तन्तं तवं देना। ६२. 'इयसघावत्तीओ' इवाइ । इय एवं एएण पगारेण । सघायत्तीओ सघतषट्ठाणाई। जहकम पायच्छित्ताणुलोमेण । समए सिद्धते । जीएण देना । निधिल्याइयं दाणं अह जह 36 भणियं तहा तहा देज त्ति भणियं होह। 1 A मायातो। 2 A ०णादीओ। 3 A निग्याइयणाइ । 4 A पउिपनो। 5 B राइणितो । 6 B परियागो। 7 A विच्छिन्ने। 8 ०णएण। 9 B हारादि अभिहिया । 10 B 'सन्वेसु' नास्ति । 11 A पुस्तके द्वितीयं वाक्यं नोपलभ्यते । 12 अत्र B पुस्तके 'जेट अवराहेसु भणि अवराहेसु' खण्डितः पाठ.। एतादृशः । --- - -- गाथा ६३-६७. ] जीयकप्प-चुण्णी २१ ६३. 'एयं पुण सधमिचाइ । एयं ति जहुदिहं । पुण सद्दो विसेसणे सधं पायच्छित्त- दाणं । पारण वाहुल्लेण । सामन्नमविसेसियं । विसेसेण निद्दिटुं विणिद्दिटुं। देयं विभागेण । दद्याइ-आइसद्देण-खेत्तकालभावपुरिसपडिसेवणाओ य । अविक्खिऊण विसेसियं । ऊणा- इरित्तं तस्स मंवा (?) देज त्ति। ६४. 'दछ खेत्त'मिचाइ । पढम गाहद्धं कण्ठं । नाउम्मि तं चिय-जाणिऊण दद्याइ । विभागम्मि तं चेव परिमाणपरिच्छिन्नं देजा। अहवा, नाउमियं चिय-इदमिति पञ्चक्खी- भावे । इदमेव जीयववहारभणियं देजा। तम्मत्त भणियसमं । दयखेत्तकालभावपुरिसपडिसेव- णादीसु हीणेसु हीणं देजा । अहिएसु अहियं देजा । साहारणेसु साहारणं देजा। ६५. 'आहाराई दर मिचाइ । आहारो आई जेसिं दधाणं ताई दचाई आहाराईणि । जम्मि देसे ताई पलियाई । जहा अणूवपसे सालिकूरो बलिओ। सहावेणं चेव सुलहो य । एयं 10 नाऊण जं जीयभणियं दाणं तस्सन्भहियमवि देजा । जत्थ पुण चणक-निप्फाव-कंजियाइ लुफ्खाहारो; दुल्लहो वा तत्थ जीयदाणं हीणमवि देजा। ६६. 'लुक्ख'सिचाइ । लुक्खं नाम नेहरहियं । खेतं वाय-पित्तलं वा । सीयलं पुण सिणि भन्नइ; अणूचखेत्तं वा । निद्धलुक्खं साहारणं भन्नइ । इह य जीयदाणे णिद्धखेत्ते अहियं देजा। साहारणे जहा भणियं समं वेजा । लुक्खखेत्ते हीणं देजा । एवं काले वि तिविहे' 15 तिविहं देजा। ६७. 'गिम्हसिसिर'इन्चाइ । गिम्हो लुक्खो कालो। साहारणो हेमन्तो । वासारत्तो निद्धो। गिम्हे तिविहो तवो-जहन्नो मझो उकोसो। जहन्नो चउत्थं, मज्झिमो छटुं, उक्कोसो अट्ठमं । हेमन्ते तिविहो-जहन्नमज्झिमुक्कोसो छटुटुमदसममेओ । वासारत्ते वि जहन्नमज्झिमुक्कोसो अहमदसमवारसमेयमिन्नो। एस नवविहो ववहारो। एयं सुद्दु जाणिऊण सुयववहारेण वा 20 नवविहविगप्पेण सुटु जाणिऊण तिविह-काले तिविह-विगप्पियं तवं देजा। सो य इमो- महागुरुआर । एत्थ य मूलिया नवमेया नवमेयपत्थारे दट्ठधा । विभजमाणा सत्तावीसं । आवत्ति-दाण-तवसा कालेण य निओएयधा। एस नवविहो ववहारो वनिओ ति । सोय नव- विहो घवहारो इमो- गुरुओ गुरुयतराओं अहागुरु चेव होर ववहारो। लहुओ लायतराओ अहालह होइ ववहारो॥ लहुसो लहुसतराओ अह लहुसो चेव होइ ववहारो। एएसिं पच्छित्तं वोच्छामि अणाणुपुष्टीए-(सुत्ताणुसारेण )॥ गुरुगो य छोर मासो गुरुयतराओ" य होइ चउमासो। मह गुरुगो छम्मासो" गुरुपस्खे होइ पडिबत्ती ॥ तीसा य पन्नवीसा वीसा विय होइ लहुयपक्सम्मि। पनरस दस पंचे ध य लासय पक्खम्मि पडिवत्ती॥ गुरुगं च अट्टमं खलु गुरुयतरागं च होइ दसमं तु। अह गुरुगं धारसमं गुयपफ्से होर पडिवत्ती॥ 25 30 68 1B मित्तं । 2 A अहिए। 3A अगर। 1B मुलभो । 5 Bातं। नि। 7 Aहे। 8 B गुरुततरा० । लहुगत. 10 B लहू बेच दोद। 11B गुरणपरागों। 12 A. मा। 13 A द्वितीय वीगा' पतिराम् । 1B परगररा। 10B गुरतरा०। 9 B 158 सानप।
२२ [गाथा ६७. 5 10 . 16 सिद्धसेनसूरिया छटुचउत्थायंबिल लहुपक्खे होइ' पडिवत्ती। एगासण-पुरिमडे निधीय लहुससुद्धो वा ॥ ओहेण एस भणिओ, एत्तो वोच्छं पुणो विभागेण-। तिगनवसत्तावीसा एक्कासीतीय भेएहिं ॥ नवविह ववहारेसो संखेवेणं तिहा मुंणेयधो । उक्कोसो मज्झो वा जहन्नगो चेव तिविहो सो॥ उक्कोसो गुरुपक्खो लहुपक्खो मज्झिमो मुणेयधो। लहुसगपक्खो जहन्नो तिविगप्पो एस णायचो ॥ गुरुपक्खो उक्कोसो मज्झ जहन्नो य एस लहुगे वि। एमेवय लहुसेवी एवेसो नवविहो होइ ॥ गुरुपक्खे छम्मासो पणमासो चेव होइ उक्कोसो। मज्झो चउ त्ति मासो दुमासगुरुमासग' जहन्नो ॥ लहुमासभिन्नमासा वीसा विय तिविहमेव लहुपक्खे । पन्नरस दसगं पणगं लहुसुक्कोसाइ तिविहेसो॥ आवत्ति तवो एसो नवमेओ वन्निओ समासेणं । अहुणाउ सत्तवीसो दाणतवो तस्सिमो होह ॥ गुरु लहु लहुसगपक्खे एक्केके नवविहो मुणेयो। उक्कोसुक्कोसो वा उक्कोसो मज्झिम जहन्नो ॥ मझुक्कोसो मज्झिम मज्झो तह होइ मज्झिम जहन्नो। इय णेया जहन्ने वी उक्कोसो मज्झिम मज्झिम जहन्नो । गुरुपक्खे नव एए नव चेव य होन्ति लहुय पक्खे वि। नव चेव लहुसपक्खे सत्तावीसं हवन्तेए ॥ यारसमदसमअट्ठम छप्पणमासेसु तिविह दाणेयं । चउत्तिमासे दस अट्ठ"छ? उक्कोसगा" तिविहा ॥ एमेवुकोसाई" दुमासगुरुमासिए तिहा दाणं । अट्ठम छट्ठ चउत्थं नवविहमेयं तु गुरुपक्खे ॥ दसमं अट्ठम छटुं लहुमासुक्कोसगाइ तिह दाणं । अट्ठम छट्ठ चउत्थं उक्कोसादेत तिह भिन्नं ॥ छ? चउत्थायामं उक्कोसादेय दाणवीसाए । लहुपक्खम्मि नवविहो एसो वीओ" भवे नवगो॥ अट्ठम छ? चउत्थं एसुक्कोसाइ दाणपन्नरसा । छट्ट चउत्थायामं दससू तिविहे य दाणभवे ॥ खमणायामेकासण तिविहुक्कोसाइ दाणपणगेयं । लहुसेस तइयनवगो" सत्तावीसेस वासासु ॥ 20 25 80 पादः। 1 Bहोति । 2 A निव्वीईयं । 3 B भणितो। 3 B भणितो। 4 B एकासी इय। 5A. मज्झिम । 6 A एवं । 7 A मासिग। 8 B मासो। 9 A पुस्तके 'वीस लहुक्कोसमज्झिमजहन्ना' एतादृशो द्वितीयः 10 A दसग। 11 A अठम। 12 B .सगादिति । 13 Boसादी। 14 A एय। 15 Aमिने। 16 A एय। 17 B वितिओ। 18 B सादि । 19 B .रसे । 19 B रसे। 20 B साइयाण । 21 A ततिय ।
6 जियकप्प-चुण्णी गाथा ६८-७१.] २३ सिसिरे दसमाईणं चारणमेएण सत्तवीसेण । ठायई पुरिमहम्मी अहोकन्तीय तह चेव ॥ अट्टममाई गिम्हे चारणभेपण सत्तवीसेण । तह चेव य ढोकन्ती ठावइ निधीयए नवरं॥ एपहिं दाणेहिं आवत्तीओ सया सया नियमा । वोधद्या सधाओ असहुस्सेकेकहासणया ॥ जाव ठियं एकेक तं पीहासेज असहुणो ताव । दाउं सट्ठाण तवं परढाणं देज एमेव ॥ एवं ठाणे ठाणे हेटाउत्तो कमेण हासंतो। 10 नेयचं जावठिय नियमा निधीइयं एकं ।। एस नवविहो चवहारो। ६८. 'हट्ठगिलाणा'इच्चाइ । भावं पडुयसममहियमूणं वा देजा। हवस्स नीरोगस्स बलिय- सरीरस्स समहियं वा देजा। गिलाणस्स ऊणं, नवा वि देजा। जावइयं वा वि सकेर तावड्यं वा वि से देजा। कालं वा सहेजा जाव पउणीहोइ । हट्टो सन्तो करेस्सइ त्ति। ६९. 'पुरिसा गीयागीया' इवाइ । पुरिसं पडुच्च सममहियं अणं वा देजा। पुरिसा केइ 15 गीयत्या, केइ अगीयत्था । घिइसंघयणसंपन्नत्ताओ केइ सहा, तविरहियत्ताओ केइ असहा । सढा मायाविणो, असढा उजुभूयप्पाणो। उस्सग्गे उस्सग्गं । अववाए अववायं । जहा भणियं सदहन्ता आयरन्ता य परिणामगा भन्नन्ति, अपरिणामगा पुण जे उस्सग्गमेव सद्दहन्ति आय- रन्ति या अववायं पुण न सदहन्ति नायरन्ति य । अइपरिणामगा जे अववायमेवायरन्ति तम्मि चेय सजन्ति, न उस्तगे। 20 ७०. 'तह धिइ'इञ्चाइ । तहेत्ति आणन्तरिए । धिइ-संघयणे चउभंगो। घिहए संघयणेण य पढमो संपन्नो । इह य पढमपच्छिमा मंगा दुवे संगहिया सुत्रेण, मज्झमिल्ला दुवे भाणियथा । अहवा वितियचुन्निकारा भिप्पाएणचत्तारि विसुत्तेणेव गहिया। कह-घिसंपन्ना,ण संघयणेण १। संघयणेण वा संपन्ना, ण धिईए २। उभयसंपन्ना ३। उभयहीणा य ४ । अहवा इमे पंच चिगप्पा। आयतरे णामेगे नो परतरए ११ परतरए नामेगे, नो आयतरए । एगे आयतरए वि 26 परतरप वि एगेनो आयतरए नो परतरए। एए" चत्तारि भंगा ठाणक्क्रमेण । तहा पंचमो अनतरतरगो नाम विगप्पो। आयतरगो नाम जो उपवासेहि दढो। परतरगो नाम जो वेया- पथकरो गच्छोवग्गहकरो वत्ति । अन्नतरतरगो" नाम जो पकं सकेर काउं, तवं घेयावर्ष वा । न पुण दो वि सके। ७१. 'कप्पट्टिय' द्याइ । कप्पट्ठिया आईए" जेसिं ते कप्पट्टियादो। आइसदेण-30 परिणया, फउजोगी, तरमाण त्ति एए* चत्तारि घेप्पन्ति । "एपसिं चेव पडिवक्सभूया अण्णे वि चत्तारि जणा घेप्पन्ति । अकप्पट्टिया अपरिणया अकडजोगी अतरमाणगा । तत्थ कप्पट्टिया जे आचेलुकुहेसियाइ दसविहे कप्पे टिया । कयरे ते ?-इसे वक्खमाणा- आचेलुफुइसिय सेजायररायपिंडकिइकम्मे । वयजेट्ट पडिकमणे मासं पजोसवणकप्पे ॥ 1B.मागीण। 2 Baयति। 3 Bष अहो । 4 A निम्बीईए। 5A .हाणे । GB ऐहाहन्तो। 7 A .वीइयर्ग। 8 A सस्मिमेव । 9 B पिझ्यचुग्निगारा०1 10 A. एते । 11 A पुस्त बसतरगो'अपपाठः । 12 A पाया। 13 A. .भता । 14 एते। 15 "एएसिं पारभ्य 'भेप्पवि' माप पाट: A पुनके पतितः। 36 २४ सिद्धसेनसूरिकया [गाथा ७२-७३ जे पुण मज्झिमजिणसन्तगा महाविदेहगा य ते अकप्पट्ठिया। कप्पट्टिया दुविहा-सावेक्खा, निरवेक्खा य। सावेक्खा गच्छवासी, निरवेक्खा जिणकप्पियायो । एवमकप्पट्ठिया वि सावेक्खा निरवेक्खा य। परिणया गीयत्था, अपरिणया अगीयत्था। कडजोगिणो चउत्थ- छठुट्ठमाईहिं विविहतवोवहाणेहिं जोगवियसरीरा । अकडजोगिणो अपरिकम्मवियसरीरा। 5 तरमाणगा धिइसंघयण-संपन्ना । अतरमाणगा एएहिं विउत्ता। ७२. 'जो जह' इच्चाइ । एएसिं कप्पट्ठियाझ्याणं सावेक्ख-निरवेक्खमेयाणं जो जह सकेर तवं काउं। बहुतरगुणो नाम घिइसंघयणसंपन्नो परिणयकडजोगी आयपरतरों वा होजा। तस्साहियं पि दिजह । कओहिंतो अहियं ?-जीयववहारभणियाओ। जो पुण हीणो घिइसं- घयणाईहिं तस्स थोवतरयं पि' जीयभणियाओ देजा। जो पुण सबहीणो तस्स सवं झो. 10 सेजा, न किंचि दिजइ त्ति ज भणियं होइ । ७३. 'एत्थ पुण' इच्चाइ । एत्थ एयम्मि जीयववहारे बहुतरया भिक्खुणो त्ति । ते य अकय- करणा अजोगविया अणभिगया अगीयत्था । च सहेण अथिरा विय त्ति । तेण कारणेण जीयववहारे अट्ठमभत्तं अन्तो निधीइयमाईए । एयं मज्झ गहियं जन्तविहीए । एयरसेव फुडी. करणथं जन्तविहाणं भणामि । तिरियाए तेरसघरए काउं हेटाहत्तो य जाव नव घराइं पुण्णाई 15 ताव ठावेयध्वं । पच्छा एएसिं णवण्हं हेट्ठा जाई दाहिणेण अन्तेठियाणि दोन्नि घरयाई ताई मोत्तूणं अहो एगं घरयं घड्ढाविजइ । ताहे तिरियायया" एक्कारस घरया होन्ति । पुणो एएसि एक्कारसहं सचदाहिणा दुवे मोतूणं अहोएगं घरं वहाविजइ । ताहे ते आयताणव घरा होन्ति। एवं दुवे दुये छइन्तेणं घरयाई हेछिल्लदाहिणिल्लाई ता नेयवं, अहो एकेक घरयवड्डीए जाव एकमेव घरयं सवाऽहोजायं । एवमेयस्स घरजन्तयस्स सधुवार" तिरियायया सेढी। तीसे सेढीए उरि 20 सवाईए निरवेक्खं ठावेजा । निरवेक्खस्स या दाहिणेण विद्य-तझ्यघर मज्झनिग्गयरेहो- वरि आयरियं कयकरणं अकयकरणं च ठावेजा। चउत्थपंचमघरयमज्झविणिग्गयरेहोरि कयकरणं उवज्झायं अकयकरणं च ठावेजा" | छट्ठसत्तमअट्ठमनवमघरयमझविणिग्गयरेहो- वरि गीयसिफ्टुं ठावेजा, थिरं अथिरं च । तत्थ जो सो थिरो सो कयकरणो अकयकरणो य। अथिरो वि कयकरणो अकयकरणो य । तओ" पुण दसमएक्कारसवारसतेरसघरयमज्झ- 25 विणिग्गयरेहोरि अगीयमिक्खं ठावेजा, थिरमथिरं च । थिरं कयकरणं अकयकरणं च । अथि- र कयकरणं अकयकरणं च ठावेजा। एवं ठावेऊण णिरवेक्खहेट्ठिमघरए सुन्नं ठावेयचं । जम्हा तहिं पारंचियं पयं होइ । सो य निरवेक्खो सहावेण चेव पारंचिो तम्हा तहिं सुन्नं ठावेयछ । एयस्स दाहिणेण कयकरणायरियहेट्टा पारंचियं। एवं तहिं चेव अवराहे-जहिं कयकरणायरि- यस्स पारंचियं अकयकरणस्सायरियस्स तम्मि चेवावराहे अणवट्ठप्पं । एत्थ चेवावराहे- 30 कयकरणोवज्झायस्स अणवटुं(हप्पं)। एत्थ चेवावराहे अकयकरणोवझायस्स मूलं । एरथ चे" वावराहे गीयभिक्खु-थिरकयकरणस्स मूलं । एत्थ चेवावराहे गीयभिक्खु थिरअकयकरणस्स छेओ। एत्थ चेवावराहे गीयभिक्खु-अधिरकयकरणस्स छेओ। एत्थ चेवावराहे गीयमिक्खु अथिर-अकयकरणस्स छग्गुरू । एत्थ चेवावराहे अगीयभिक्खु-थिरकयकरणस्स छग्गुरू । एत्थ चेवावराहे अगीयभिक्खु थिरअकयकरणस्स छल्लहू । एत्थ चेवावराहे अगीयमिक्ख अथिर- 1 Aवा। 2. A. विहाणेहिं । 3 B ०णगा दोहि विजुया । 4 A पन्ना। 5A आयतरगो। 6 B यातो । 7 A 'पि' नास्ति । 8 A सस्स । 9 A. सोसेजा। 10 B फुडीकरणत्यं । 11 B यायता। 12 B सव्वुप्परि । 13 B .यायता। 14 B सव्वातीए । 15 A 'य' नास्ति । 16 A. ततिय। 17 'कय' आरभ्य 'ठावेज्जा' यावत् पतिः पतिता A आदर्श 1 18 Bगीयंभिः । 19 B ततो । 20 A सभावेण । 21 B एवं । 222 अन्न द्विवाः परयः पतिताः A आदर्श ।
गाथा ७४-७७.] जीयकप्प-चुण्णी - ~~-~- कयकरणस्स छल्लहू । एत्थ चेवावराहे अगीयभिक्खु-अथिर-अकयकरणस्स चउगुरू । एवं एयाए पन्तिए पायच्छित्तट्ठाणरयणा एवं कायचा । सुन्नं । पारश्चियं । अणवट्टप्प । अणवठ्ठप्प । मूल।मूल छेय।छेय । छग्गुरु छिग्गुरु । छल्लह।छल्लहु।अन्ते चउगुरू। एयाए हेटासुण्णं । अणव- टुप्पो । मूलं २।छेदो २ । छन्गुरू २ । छल्लहु २। चउ गुरू २ । अन्ते सवदाहिणे चड लहु । एयाए हेट्ठा मूलं २। छेदो २। छग्गुरू २। छल्लहु २१ चउ गुरू चउ लहु २। सबदाहिणे मासगुरू । 5 एयाए हेट्टा छेदो २। छग्गुरू २। छल्लहु २ चउगुरू २१ चउलहु २। मासगुरू २। सबदाहिणे मासलहु । एयाए हेट्ठा छग्गुरू २ । छल्लहु २ । चउगुरू २ । चउलहु २। मासगुरू २। मासलहु २। सवदाहिणे भिन्नमालो । एयाए हेट्ठा छल्लहु २। चउगुरू २। चउलहु २। मासगुरू २। मास- लहु २। मिन्नमालो २ । सघदाहिणे वीसा । एयाए हेट्ठा चउगुरू २ । चउ लहु २। मासगुरू २ । मासलहु २। भिन्नमासो २। वीसा २। सबदाहिणे पन्नरस । एयाए चेव हेट्टा चउलहु २ । 10 मासगुरू २ । मासलहु २। भिन्नमासो २। वीसा २। पन्नरस २। सवदाहिणे दस । एयाए हेट्टा मासगुरू २। मासलहु २। भिन्नमासो २। वीसा २। पन्नरस २। दस २। सदाहिणे पणगं । एयाए हेटा मासलहु २ । भिन्नमासो २ । वीसा २। पन्नरस २। दस २। सच्चादाहिणे पंच । एयाए हेट्टा भिन्नमासो २ । वीसा २। पण्णरस २ । दस २ । सबदाहिणे पणगं। एयाए हेट्ठा वीसा २। पन्नरस २ । दस २ । सचदाहिणे पणगं । एयाए हेट्ठा पन्नरस २ । दुस २१ सद्यदा 15 हिणे पणगं । एयाए हेट्ठा दस २ । सदाहिणे पणगं । एयाए हेट्ठा पंच। एयासिं च तिरिया ययाणं घरयाणं आईए जं पयं जहिं अवराहे ठावियं तहिं चेवावराहे ताए पन्तीए पुरिसावेक्खाए सधे पच्छित्तपया चारेयचा । एवं विरईए पुरिसविभागेण पणगादी छम्मासावसाणे निधीयाइ अट्टमभत्तंतं पुष भणियमेव । अहुणा पडिसेवणा भन्नइ- ७४. 'आउट्टिय' गाहा । आउट्टिया नाम जं उच्च पाणाइवायं करेइ । दप्पो नाम धावण- ठेवणवगणाइओ, कन्दप्पो वा दप्पो । पमाओ नाम जं रामो दिया वा अप्पडिलेहन्तो अपम- जयन्तो य पाणाइवायाश्यमावजह । कप्पपडिसेवणा नाम कारणे गीयत्थो कडजोगी उवउत्तो जयणाए पडिसेवेजा। एसा पडिसेवणा । पडिसेवओ पडिसेवियवं च दोनि वि पडिलेवणाए सूइयाई। तत्थ पडिसेवओ पुरिसो पडिसेवियत्वं पुण दचाई। दद्यमाहाराइ । खित्तं छिन्नमडं 25 वेयरं वा । कालो ओम-दुभिक्खाइ । भावे हट्ट-गिलाणाइ । एवं एयं पडिसेविया । ७५. [ 'जंजीयदाण' गाहा।] जं जीयववहारेण मए पच्छित्तं भणियं तमणन्तरं सत्वं एयं चउण्डपटिसेवणाण आउट्टियाइयाण कयराए पडिसेवणाए पडिसेविए दिजइ? | सन्देह सम्भवे इमं भन्नर-तड्याए पमायपडिसेवणाए त्ति। दवाइए पडिसेविए सेसपडिसेवणासु पुण कह भन्नइ । एत्तो चिय ठाणन्तरं वद्वेजा। एकं । पत्तो त्ति जहाभणिय-पमाय-ट्टाण-पायच्छित्ताओ 30 एगट्ठाणघुट्ठी कायघा । पमाए निधीयाइ-अट्ठमभत्तन्तं, दप्पेण पुण पुरिमाइ-दसमन्तं होइ । ७६. 'आउट्टिया' इञ्चाइ । आउटिं आसेवमाणस्स एकासणाई दुवालसन्तं दिजह । अहवा सट्टाणं । पाणाइवाए मूलं । सट्टाणं जं जम्मि वा अवराहे सधबहुयं तस्स दिजद तं चेव सट्ठाण होइ । कप्पपडिसेवणाए पडिसेबिए पडिफमणं, मिच्छादुकाडमिति च भणियं होइ । अहया तदुभयं आलोयणमिच्छादुघाडं च। ७७. 'आलोयण' प्रचाइ । आलोयणकाले वि जया गुहइ पलिउञ्चइ वा तया सो संकिलिट्टपरिणामो तस्स अहियं पुण्णं या दिजद । जो पुण आलोयणाकाले संवेगमुवगओ निन्द- ण-गरहणाणा विसुद्धपरिणामो तस्स ऊणमवि देजा। जो पुण मन्मपरिणामो तस्स तम्म- तमेव देखा। 1 एमाए र पतीए। 2B रेरितो। 13 मजिनो। A भास्याए ऐव०। 513 तदा। 20 35 जी.क.मुर २६ सिद्धसेनरिकया [गाथा ७८-८५. । - ७८. 'इति दवाइ'इच्चाइ। इति एवं दवखेत्तकालभावेसु चउसु वि बहुगुणेसु,' गुरुसेवा पहाणसेवा अण्णइ । एएसु बहुतरं देजा । 'हीणतरे हीणतरं' ति। दरखेत्तकालभावा जहा जहा हीणा तहा तहा हीणतरं पच्छित्तं देजा। सबहीणस्स झोसो वा कजइ । ७९. 'झोसिजाइ' इञ्चाइ । झोसिजइ ति मुच्चइ । सुवहुगमवि जाव अनं तवं यहइ ताव जइ 5 अन्नमावजइ तो तं झोसिजइ । जहा छम्मासपट्टविए पश्चहि दिवसेहिं गएहिं अन्नमावन्न- गो होजा । पढमगं वहन्तस्स पच्छिम से झोसिजइ । वेयांवचकरस्स वा थोवतरं दिजद । जावइयं वहन्तो वेयावञ्च काउंसक्केइ तावइयं से दिजा। एयं तवारिहं भणियं ॥ अहुणा छेयारिहं भन्नइ- ८०. 'तवगविय' इन्चाइ । तवगविओ छम्मासखमओ। अन्नो वा जो विगिट्टत्तवकरण 10 समत्थो-किं मम तवेण किज त्ति । तवअसमत्थो पुर्ण गिलाणो असहू वालवुहों वा। तचं वा जो न सइहइ । 'पुणो पुणो वा तवेण दिजमाणेण विण दम्मइ । अइपरिणामगो अइपसंगी वा। पुणो पुणो सेवेइ', सुबहुं वा । एएसु जहुद्दिसु तवारिहावत्तीए वि छेओ चेव दिजइ ति। पुचपरियायस्स देसच्छेओ कजइ । ८१. 'सुबहुत्तर' इन्चाइ । सुबहुगा उत्तरगुणा पिण्डविसोहिमाईया। ते जो भंसेइ विणा- 15 सेइ, पुणो पुणो छेयावत्तीओ करेइ । जो य पासत्थो। आइसहेण ओसण्ण कुसील-संसत्त-नीओ वा । जईण साहूण संविग्गाणं । पडितप्पइ वेयावच्चं करेइ । बहुसो य अणेगसो। उत्तरगाहाए अत्थपरिसमत्ती होही। ८२. 'उक्कोस मिचाइ । उक्कोसा तव भूमी । आइजिणिन्दतित्थे संवच्छरं । मज्झिमजिणाणं अट्ठमासा। वीरवरस्स छम्मासा । एयं उक्कोसं तवभूमी समईओ। जो तस्स छेओ सावसेसं च 20 से चरणं; तस्स छेओ पणगाईओ । आइसदेण दस-पन्नरस-वीसाई जाव छम्मासा। जावं वा धरइ परियाओ। छेयारिहं भणियं ॥ अहुणा मूलारिहं भन्नइ-- ८३. 'आउट्टिया' इन्चाइ । आउट्टियाए पश्चिन्दियं वहेजा। मेहुणं दप्पेण सेवेजा। सेसा मुसावाय-अदिन्नादाण-परिग्गहा ते उक्कोसेणं पडिसेवेइ । आउट्टियाए पुणो पुणो य त्ति। 25 एवं जहुद्दिट्टाणेसु मूलं । ८४. 'तवगचिय' इञ्चाइ । तवधिओ। आइसहेण तवअसमत्थो । तवं असहहन्तो तवेण य जो न दम्मइ । मूलगुणे बहुविहे वहुसो य दूसेइ भाइ वा । एवं उत्तरगुणे वि एस वइयरो। दसणं वा वमइ । दसणे वन्ते नियमा,चरित्तं वन्तं। चरित्तम्मि दंसणे भयणा । दसणे वा चरित्ते वा वन्ते चियत्तकिच्चो । किच्चाई दसणाईणि । तप्परिञ्चाएण चियत्तकिच्चो। सेहेय त्ति 30 सेहो जो अभिणवो सिक्खं गाहिज्जइ । अणुवट्ठविओ । एएसिं जहुदिहाणं मूलं । ८५. 'अञ्चन्तोसन्न' सिचाइ । अञ्चन्तोसन्नो नाम ओसन्न-पव्वाविओ। संविग्गेहि वा पचा- वियमेत्तो चेव ओसन्नयाए विहरिओ जो, सो अञ्चन्तोसन्नो । परलिंगं दुर्ग-घरथलिंगं, अन्न- तित्थियलिंगं च । तं जो आउट्टियाए दप्पेण वा करेइ । मूलकम्मं--इत्थीगम्भादाणसाडणं जो करेइ । भिक्खुम्मि य विहियतवे । विहिमओ तवो जस्स सो विहियतवो। छेयमूले वि अइक्कमिडं। 36 अणवठ्ठतवं वा पारञ्चियतवं वा । अइयारलेवणाए पत्ते एएसिं जहुद्दिट्ठाणं मूलं सवेसि पि । 1 B पुस्तके 'चउ...णेसु एतद्वाक्यं नास्ति । 2-3 'जहा' मारभ्य 'झोसिज्जई' यावत् पाठ. A पुस्तके पतित । 4 B एवं। 5 B करणस्स। 6 A कज्जइ। 7 A. गिलाणअसहुवालवुहा । 8-9'पुणो०' आरभ्य 'सेवेई' पर्यन्तः पाठः A. आदर्श पतितः। 10 Bहोइ। 11 B पणगादीतो। उकोसगे। 13 B अणुठविमओ। - 12B । J माथा ८६-९१.] जीयकप्प-चुण्णी ८६. 'छेएण' इञ्चाइ । छिजमाणे छिजमाणे जया परियाओ निरवसेसो छिन्नो, तदा से मूलं । अणवटुप्पतवावसाणे पारश्चियतवावसाणे य मूलं दिजइ । मूलावत्तीओ वा-पुणो पुणो आवजमाणस्स मूलं । एवं जहुहिङ्ककारणेसु सवत्थमूलं । मूलारिहं भणियं । अहुणा अणवटुप्पारिहं भन्नइ-- ८७. 'उक्कोस'मिच्चाइ । तदो (ओ) अणवठ्ठप्पा पन्नत्ता; तं जहा-साहम्मियाणं तेणं करे-5 माणो १ । अन्नधम्मियाणं तेणं करेमाणो २। हत्थादाणं दलयमाणो ३। उक्कोसं सचित्ताइयं । तेणेह-पुणो पुणो तेणेइ । अईव पउचित्तो संकिलिट्ठचित्तो ति कोहलो होइ । पउट्ठचित्तो तेणेइ । सा य तेणिया दुविहा-साहम्मियतेणिया, परधम्मियतेणिया य । दरओ खेत्तो कालओ भावओ य । सचित्त-अचित्त-मीसया दछ । अन्नसंजओग्गहियखेत्ते अणणुन्नविए अव- स्थाणं खेत्ते । काले जहिं करेइ । भावओरत्तदुट्ठो । अन्नधम्मिया दुविहा-लिंगपविठ्ठा, गिहत्था 10 य । तिविहं तेणमेतेसिं आहारो उवही सचित्तं वाऽवहरइ त्ति । हत्थादालो गहिओ, सो य ति विहो-अत्थादाणो, हत्थालम्बो, हत्थातालो। तत्थ अस्थादाणो नेमित्तिओसन्नागारिया भवगप- डिभग्गवणियपेसणरूयगसउणी। वीइओ उवणओ नउलगमेगो घयगुलमंतो वसतणकट्ठा- वाहिं अन्नो य सउणिगणिसित्तं । हत्थालम्वो असिवपुररोहउवसमणत्थमभिचारगाइ करे । हत्थातालो जट्टिमुट्ठिलउडोपलपहाराई हिंमरणभयगिरवेक्खो अप्पणो परस्स य पहरह। सपक्खे 15 च सद्देण परपक्खे य । घोरपरिणामो निरणुकोसो त्ति । ८८. 'अभिसेओ' इञ्चाइ । अभिसेभो उवज्झाओ।जेसु जेसु अवराहेसु पारश्चियमावजइ । बहुसो अणेगसो । आवन्नो वि अणवटुप्पो कीरइ । किं कारणं । जेण अगवटुप्पपारश्चियमावन्न- स्लावि मूलमेव दिइ भिक्खुणो। जेण तस्स परं भूलवाणं भवति। तहा उवज्झायस्सावि परं अणवठ्ठप्पपयं, अणवठ्ठप्पावत्तीओ य । जया बहुसो आवजइ तया य अणवठ्ठप्पं दिजइ । ८९. 'कीरई' इञ्चाइ । वएसु लिंगेसु वा जम्हा न ठाविजइ तम्हा अणवठ्ठप्पो। सो य अण- वटुप्पो चउचिहो-लिंगओ, खेत्तओ, कालो, तवओ । लिंगं दुविहंदचे भावे य । दवलिंग रोहरणाइ । भावलिंग महधयाइ । एत्ध चउभंगो। अणन्तरगाहासम्वद्धा इमा गाहा- ९०. 'अप्पडिविरय' इच्चाइ । सपक्खपरपक्खपदुट्ठो तेणगाइदोसेहि। अप्पडिविरओ सपक्ख-परपक्ख"पहरणुजुओ। निरवेक्खो अणुवसन्तवेरो जो। सो दच्चभावलिंगेहिं दोहिं वि25 अणवट्ठपो । हत्थालम्बो, अत्थादाणो', ओसण्णाइया य तहोसाणुवसन्ता न भावलिंगारिहा । लिंगमत्थि तेर्सि, भावलिंगेणाऽणवठ्ठप्पा । खेत्तओ अणवलुप्पो जो जम्मि खेत्ते दोसमावन्नो सो तम्मि खेत्ते अणवटुप्पो । जहा अत्थादाणिओ तम्मि चेव खेत्ते देसे वा न उवट्ठाविजइ । किं कारणं पुवघ्भाला लोगो पुच्छेजा । सो वा तं इडिगारवमसमत्थो धारेउं । तेण अन्नत्थ उचट्टाविजइ । उत्तिमट्ठपडिवनस्स वा तत्थेव भावलिंगं दिजइ । ९१. 'जत्तिय'सिञ्चाइ । कालतो" अणवटुप्पो जो जेत्तियं कालं अणुवरतदोसो सोत. त्तियं कालं अणवठ्ठप्पो। तव-अणवटुप्पो दुविहो-आसायणा-अणवटुप्पो, पडिसेवणा-अणवटुप्पो य। तत्थासायणामिमेखि करेजा। तित्थयरपवयण-सुय-आयरिय-गणहराणं महिहियाणं । जहा सम्वोवायकुसलेहि अइकक्खडदेसणा कया।जाणन्ता य किं घरवासे घसन्ति, भोगे य भुजन्ति। तहा इत्थीतित्थं । संघमहिक्खिवइ "पडिणीयताए वा वट्टइ। अहवा भणइ अन्ने वा संघा अस्थि 35 1 पतितमेतद्वाक्यं A आदर्शे। 2 A अणहप्पारिहं । 3 B निमित्तिदोसण्णगायरिया! 4 B वीइदो । 5 A. नउलमेगो। 6 A. चारुगाइ । '7 B हवइ । 8 B लिंगे वा। 9 A भावओ। 10 B रयहर० । 11B पडिपक्ख । 12 B हत्यादा०। 13 B दाणितो। 14 B पुच्छिजा। 15 B कीलओ। 16 A अणवरयदोसो। 17 A 'पडिणी.' आरभ्य 'खिवई' पर्यन्तः पाठो नोपलभ्यते A आदर्श । 20 30 1 10 15 ૨૮ सिद्धसेनसूरिकया . [गाथा ९२-९५. सियालसुणगाणं विगाणं ति । एवं सुयं अहिक्खिवइ-पाययं ति । थाणे थाणे वा काया, पुणो पुणो वा वयाणि, पमाय अप्पमाया वा। मोक्खदेसणाए जोइस-जोणिपाहुड-गणितेण वा किं पओयणं । तहा आयरियं जच्चाई हिं अहिक्खिवइ । तहा गणहरं महिड्डियं । महिड्डियगणेण मूलगणहरा गहिया । जो वा जस्मि जुगे पहाणो तमहिक्खिवइ । इहिरससायगरुया, सुहसाया, 6 परोवएसुजुया मंखा इव, गिहिवच्छलगा न जईणं ति एवमाईहिं आसाएन्तो अणवटुप्पं पावेइ । एस आसायणा-अणवटुप्पो। पडिसेवणा-अणवटुप्पो इमेहिं कारणेहिं-साहम्मिय-अन्न- धम्मिय-तेणियाए हत्थादालणादीहिं य आवजइ। तत्थ आसायणात्तवअणवठ्ठप्पो जहन्नेण छम्मासा, उक्कोसेणं संवच्छरं । पडिसेवणा-अणवठ्ठप्पो जहन्नेणं बारसमासा उफ्कोसेणं बारस संवच्छराणि; इमाए गाहाए भिन्नई - ९२. 'वासं बारस' इञ्चाइ । सो य जइ इमेहिं गुणेहिं जुत्तो तो अणवट्टप्पतवं पडिवजा । संघयणविरियआगमसुत्तत्थविहीए जो समग्गो उ । तवसी निग्गहजुत्तो पवयणसारे अहिगयत्थो ॥ तिलतुसतिभागमेत्तो वि जस्स असुहो ण विजई भावो। निजहणारिहो सो सेसे निजूहणा णस्थि ॥ एय गुणसंपउत्तो पावइ अणवट्टमुत्तमगुणोहो। एय गुण विप्पहूणे तारिसगम्मी भवे मूलं ॥ एयं ता उस्सग्गेणं । अववाएण पुण कुलगणसंघकजाई तेणाधीणाई सिंहणाइय कर्ज पा पसाहियन्ति; तो थोवं थोवतरं वा से देजा। संघोवा से सच मेव मुञ्चेजा" । तस्स पुण अणवट्टप्पतवं पडिवजमाणस्स को विही ? किं वा तवं करेइ ति । एत्थ गाहा ।- ९३. 'वन्दई' इवाइ । गणनिक्खेवमित्तिरियं काउं परगणं पडिवजइ । पसत्थदधखे- त-काल-भावेसु ।पसत्थदधे; उच्छु-वणसंड-पउमसर-चेश्यघराइसु खेत्तेकाले सुहदिवसे;भावओ सम्झागयं रविगयाइयं मोत्तुं आलोयणं पउआइ । काउस्सग्गो कीरइ निरुवसग्गनिमित्तं सेसाणं" भयजणणणिमित्तं च । गच्छेण सहवासो एगखेत्ते, एगउवस्सए, एगपासे, अपरिभोए अच्छइ । सेहमाइए वि वन्दइ । ते पुण तं ण वन्दन्ति । परिहारतवो गिम्ह-सिसिर वासासु जह- 26 नमज्झिमुक्कोसो। गिम्हे चउत्थ-छट्टटमाई । सिसिरे छट्ट-ट्टम-दसमाई ।वासासु अट्ठम-दसम-पार- सन्ताई। पारणए अलेवकडं । संखेवओ अणवट्टप्पारिह भणियं ॥ अहुणा पारश्चियारिहं भन्नइ- ९४. 'तित्थंगर' इवाइ । तित्थगराई जहा अणवटुप्पे तहा इहं पि भाणियधो। गणहरो तित्थगराणन्तरसीसो, सो महिड्डियगहणेण गहिओ जो । जहिं जुगप्पहाणो । आयो-लाभो संपत्ती 30 य एगट्ठा। तस्स साडणा आसायणा । जहा जहा अभिनिवेसेण हीलेई तहा तहा आयस्स साडणं करिन्तो पारश्चियं पावइ । ९५. 'जोय सलिंगे' इञ्चाइ । तओ पारश्चिया पन्नत्ताः तं-जहा-दुट्टे पारचिए, मूढे पार- चिए, अन्नमन्नं करेमाणे पारश्चिए। दुट्ठो दुविहो-कसायदुट्टो, विसयदुट्ठो य । सपक्ख-परपक्खे चउमंगो। सपक्खो समण-समणी। परपक्खो गिहत्था। तत्थ कसायदुढे उदाहरणं-सासवनाले 36 मुहणन्तए य सिहिरिणि उलुगच्छिओ त्ति। विसयदुट्टे वि चउभंगो। तत्थ दुविह-दुट्ठो वि पढम- बिईयभंगे वट्टमाणो लिंगओ पारञ्ची। तईए अइसई देजा । अणइसई न देइ लिंगं । रायवहभो 1B वदेसु०। 2 A.तु। 3 B एवमातीहिं आसादितो । 4 A मिन्नति । 5 A. भसुभो। 6 A. वाए पुण। 7 B तेणहीणाइ 8 A सिंगणा० । 9 A दिज्जेजा। 10 A संघो- 11 A मुचेना। 12 'सेसा...मित्तं च एतद्वाक्यं A. आदर्श नास्ति । 13 A उयाह०। 20 बा सन्च०॥
5 २९ गाथा ९६-१०२.] जीयकप्प-चुण्णी जहा उदाइमारओ अन्नो वा । राइणो वा अग्गमहिसिं पडिसेवेइ । अग्गमहिसिग्गहणेण अन्नावि जा इट्टा । च सहेण जुवराय सेणावइमाईणं वा अग्गमहिसीओ। बहुसो पुणो पुणो य; लोग- पगासो य जो स पारश्चियं पावइ । इयरासु महिलासु पुण किंन पारश्चिओ? भन्नइ-बहु अवाया रायग्गमहिसीए। कुल-गण-संघ-आयरिय-पत्थारनिधिसयाईया दोसा जओ पहवन्ति त्ति । इयरम- हिलासु पुण वयभंगदोसो, एगस्स य अवाओ होजा तेणं मूलं । ९६. 'थीणद्धि'इश्चाइ । श्रीणद्धी दरिसणावरण-कम्ममेओ निहा-पणगस्स । अइसंकिलिट्ठ- परिणामा थीणद्धी। पदुटपुधामिलसिओवरि सुत्तो वावारए केसववलद्धं च आयए। उदाहरणाई- पोग्गलमोयगदन्ते फरुसगवडसालभंजणे चेव । एवमाई उदाहरणा । अन्नोन्नासेवणं अन्नोन्नाहिद्वाणासेवणन्ति भणियं होइ । तत्थ पार-10 श्रियं । बहुसो पुणो पुणो य तेसु पारश्चियावराहेसु पगरिसेण सजए पसजए जो । ९७. 'सो कीरई' [ इच्चाइ ] । सो य पारश्चिओ चउधिहो-लिंगओ, खेत्तओ, कालओ, तवओ' । तत्थ दव-भावलिंगे चउभंगो। थीणद्धिमहादोसो। अन्नोन्नासेवणा-पसत्तो । रायवहओ भगमहिसीपडिसेवणाइएसु अवराहेसु उभयलिंगेणावि पारची। ९८-९९. 'वसहि' इञ्चाइ । 'जत्थुप्पश्नो' इञ्चाइ । खेत्तपारश्चिओ जो जम्मि खेत्ते दूलिओ15 अच्छमाणो वा दोसं पावेजा। वसहीए एवं निवेसण-पाडग-साही-निओग-पुर-देस-रजाओ य जत्थ जत्थ दोसमावन्नो आवजिस्सइ वा ताओ ताओ खेत्तपारञ्चिमो कीरह। १००. 'जत्तियमेत्त' मिचाइ । जो जावईयं कालं अणुवसन्तदोसो, दूसइ वा जावईयं कालं सो कालपारञ्चिओ।तवसा पारश्चिओ दुविहो-आसायणापारञ्चिओ, पडिसेवणापारञ्चिोय। आसायणापारञ्चिो तित्थगराइट्ठाणेसु । विभासा पुधमणिया। पडिसेवणापारञ्चिओतिविहो-20 दुढे पारचिए, पमत्ते पारचिए, अन्नमन्नं करेमाणे पारञ्चिए । दुट्ठो दुविहो-कसायविसएहिं पुषभणिओ । पमत्तो पञ्चविहो-'कसाय-विगहा-वियड-इन्दिय-निद-प्पमाय' इति । एए भाणियधा वित्थरओ। अन्नमन्नं करेमाणो पुष्षभणिओ।आसायणापारश्चिओ जहन्नेण छम्मासा, उकोसेण संवच्छरं । पडिसेवणा-पारश्चिओ जहन्नेण बारसमासे उक्कोसेणं बारसवासा । संघयणाइया गुणा जहा अणवटुप्पे; तवो वि तह चेव । १०१. 'एगागी' इन्चाइ । जिणकप्पियपडिरूविओ खेत्तवाहि ठाइ अद्धजोयणबाहिरओ। जभो विहर आयरिओ तओ तओ सो वि विहरइ । खेत्तओ बाहिरओ ठियस्स आयरिओ परदिवसं अवलोयणं करेइ । सुत्तत्थपोरिसीओ दोनि वि दाउं गच्छइ तस्स समीवं । अहवा अत्थपोरिसिं अदाउं गच्छइ । अहवा दोनिवि अदाऊण गच्छइ । अहवा दुबलो, असमत्थो तरं गंतुं, कुलाइकजेहिं वा वावडो, ताहे गीयत्थं सीसमन्नं वा पेसेइ । भत्तपाणं चायरियस्ल 30 आयरियपेसवियस्स वा जत्थ गओ अन्तराले वा से उवणेन्ति । पारञ्चिओ वि भत्तपाणाईयं पखिलेहणुधत्तणाई वा अगिलाणो सयमेव करेइ । अह गिलाणो तो आयरिओ अन्नो वा से भत्ताइ आहारह उधत्तणाइयं पि से कुणइ । सुत्तत्थेसु आयरिओ अनोवा से पडिपुच्छगं देइ । एवमेयं संखेवपारश्चियारिहं भणियं। १०२. 'अणवटुप्प' इवाइ । तवअणवटुप्पो तवपारचिओयभवा(सामिम्मिचरिमचउद्दस-35 पुषधरे दो वि वोच्छिन्ना । लिंग-खेत्त-कालाणवठ्ठप्प-पारश्चिया ताव अणुसजिजन्ति जाव तित्थं। 1 B जमओ य हवन्ति। 2 A भावओ। 3 B तातो तातो। 4 B वित्थरयेण। 25 सिद्धसेनसूरिकया [गाथा १०३. १०३..'इतिएस' इञ्चाइ । इतिकरणो परिसमत्तिवयणो। एस इति अणन्तरहिटो जीय- क्रप्पो जीयववहारो कप्पो।वण्णणा परुवण त्ति एगट्ठा। समासओ संखेवओ।सोहणं विहियं जेसि नाणाइयं ते सुविहिया साहू। तेसिमणुकंपानिमित्तं । कहिओ अक्खाओ। देओ दायधो अयं पुण। कहिं ? पत्ते । किंविसिटे ? संविग्गवजभीरू, परिणामगकडजोगी, आयरियवनवादी, संगहसीलो, 5 अपरितन्तबहुसुयमेहावी; एवमाइगुणसंपन्ने पत्ते। पुण सहोऽवधारणे । पत्ते चेव दायद्यो, नापत्ते। सुझु परिच्छिया गुणा जस्स। एए चेव संविग्गाई भणिया गुणो । आइमज्झावसाणेसु तावच्छेय-निघसेसु य जच्चसुवन्नमिव अविगारि जं, तं सुपरिच्छियगुणं; तम्मि सुपरिच्छिय- गुणे सुत्तत्थयओ देओयमिति । इति जेण जीयदाणं साहूणऽइयारपंकपरिसुद्धिकरं। गाहाहिं फुडं रइयं महुरपयत्थाहिं पावणं परमहियं ॥ जिणभइखमासमणं निच्छियसुत्तत्थदायगामलचरणं । तमहं वंदे पयओ परमं परमोवगारकारिणमहंग्यं ॥ 10 ॥जीतकल्पचूर्णिः समाप्ता। सिद्धसेनकृतिरेषा ॥ । 1 - श्रीचन्द्रसूरिसंरचिता जीतकल्पबृहचूर्णिविषमपदव्याख्या नत्वा श्रीमन्महावीरं स्वपरोपकृतिहेतवे। जीतकल्पबृहचूर्णाख्या काचित् प्रकाश्यते ॥ अत्रादौ शास्त्रारम्भे विघ्नोपशमनायेष्टदेवता-गणधर-स्थविर-प्रवचनानां यथाक्रमं वर्णनाय रूपकचतुष्टयमाह- १. "सिद्धत्थे' त्यादि । सिद्धा निष्पन्ना अर्था प्रयोजनानि यस्य ज्ञानावाप्तौ सत्यां स सिद्धार्थः; समाप्तकर्तव्य इत्यर्थः। सिद्धं प्रसिद्धं शासनं संघो यस्य स तथा। सिद्धा अनादिप्रवाहतया नित्याः प्रसिद्धा अर्था जीवादयो यत्र श्रुते तत् सिद्धार्थ तच्छ्रुतं यस्य । ततः पदत्रयस्य कर्मधारयः। सिद्धार्थस्य राज्ञ सुतं चापत्यम् । कम् ?-वीरेभ्योऽति- फ्रान्तेभ्यो वरः श्रेष्ठः, उपसर्गादिसहनप्रत्यलत्वाद्वीरवरस्तम् । वरा. श्रेष्ठा वरा ईप्सितार्थलाभरूपास्तान् ददाति यस्तम् । वरा देवादयो यतयश्च तेभ्यो वरकाः प्रधाना शकादयो गणधराव तैर्महितं पूजितम् । नमत प्रणमत हे जना. जीवेभ्यो हितो मोक्षमार्गप्रदर्शकत्वेन स तथा, तम् ।। २. एकादशापि गणधरान् दुर्घरगुणधारकान ; धराधिपो मेरुस्तद्वत्सारा अचललातू, तानू वस्य गम्यमान- त्वात् जम्बुप्रभवादींश्च समस्तसूत्रधरान् सूरीन् प्रणमत ॥ ३. दशपूर्वधरान नवपूर्वधरांश्च; अतिशयिन अवधिमनःपर्यायज्ञानिन· अवशेषज्ञानिनश्च मतिश्रुतज्ञानिन; यनेन सर्वानपि यतिगुणप्रवरान् ; सर्वकालं त्रिकरणशुद्धेन भावेन नमत । ४. इतः स्थविरनमस्कारावूर्व प्रवचनं नमत । निर्वाणाङ्गमित्येतदेव व्याख्यानयति । निर्वाणस्याङ्गं कारणे जीवानां तद्गमकत्वात्-तत्प्रापकत्वादित्यर्थ । निर्वाणं मोक्षं गमयति प्रापयति जन्तून निर्वाणगमिति प्राप्ते-अनु- खारोऽलाक्षणिको निर्वाणशामिति । प्रवचनमित्यस्यार्थमाह-प्रकर्षेण गतं स्थितं जीवादिवस्तुवाचकतयेति प्रगतम् , आगामिफलजननसमर्थ यत्तत् । प्रशस्तं वर्णादिगुणोपेतं कष्टप्राप्यं च यत्तत् । प्रधानं-तथा च दधिर्वादयः प्रशस्ता उच्यन्ते न तु प्रधानानि, प्रधानः पटादिरपि भवति न तु प्रशस्त इति व्यवह्रियते, इत्यनयोर्विशेषः । ततः प्रशस्तानि ससारोत्तारीणि वचनानि यत्र तत्प्रशस्तवचनम् । प्रधानानि द्रव्याणि वचनानि यत्र तत्प्रधानवचनम् । इत्यर्थत्रयोपेतं प्रवचनं नमत ॥ ५. अधुना जीतकल्पसूत्रकर्तुर्जिनभद्रगणेवर्णनाय श्लोकषद्कमयं कुलकमाह-नमहेत्यादि-तं जिन- भद्रक्षमाश्रमणं च नमतेति योगः। शेषाणि तद्विशेषणानि। युगप्रधानमिति-तत्कालीना आगमार्थवेदिनः पुरुषा युगमभिप्रेतं तेषु प्रधानस्तम् । प्रधानज्ञानिनां वहुमतम् । सर्वश्रुतिशास्त्राणि शब्दशास्त्रप्रभृतीनि तेषु कुशलं तदिनम् । दर्शनज्ञानयोर्योऽसावुपयोगमार्गस्तत्र स्थितं तत्परम् ॥ ६. जस्सेत्यादि-यस्य पादपद्मं भ्रमरा इव मुनिवरा यतयो रात्रौ च दिवा च सेवन्ते सदा नित्यं तं नम- तेति योगः । अनन्यसाधारणविशेषणसामर्थ्यादनुक्तमपि विशेष्यं लभ्यते । कीदृशा भ्रमराः?-मकरन्दः किजल्क- स्तन सृषितास्तत्पिपासवः । यतय. कीदृशा..-ज्ञानमेवाझानझादिभेदभिन्नं मकरन्दस्तत्तृषितास्तद्गृहीतुमिच्छव. । पुनः कीदृशा भ्रमरा.!-अमृतमयवशगन्धामिवासिताः-अमृतं जलं तेन निवृत्तममृतमयं पद्मम् , तस्य वशोऽधीनो यो गन्धस्तेनाभिसामस्त्येन वासिता आहूता. शन्दिता इति यावत् । वासूशब्दे-इत्यस्य ख(?)रूपम् । यतयः कीदृशा-मुखमेव निर्झरोऽपां प्रसवस्थानम् , तत्रामृतमिव यन्मतं जिनागमस्तस्य वशोऽधीनो यो गन्धः परिमल. माहात्म्यरूपस्तेनाभिवासिताः-तदाकृष्टमानसा इत्यर्थः ॥ ७. समयशब्द भाचारार्थोऽत्र, ततः खाचार-पराचारयो. प्रतिपादको य आगमः शास्त्रनिवहस्स च । लिपयचाष्टादशभेदाः। गणितं पाटीगणितादि । छन्दांसि च पिङ्गलादीनि । शब्दशास्त्रम् [व्याकरणं] । तैर्निर्मितों जनितो यशःपटहो दशखपि दिक्ष्वनुयोगविषयेऽनुपमो यस्य भ्राम्यति तं नमत ॥
३२
श्रीचन्द्रसूरिसंरचिता
[१-26. 2-29
।
८. तथा, येनानुपममतिनाऽऽवश्यके ज्ञानाना मत्यादीनां विशेषा विशेषिताः कथिता अविशेषतः सामस्त्येन ।
ज्ञानिनां च विशेषाः प्रमाणानां विशेषा विशेषितास्तथा गणघराणां च पृच्छा येन विशेषितास्तं नमत ॥
९. येन छेदसूत्रस्था प्रायश्चित्तानामापत्तियां सविधिनियूंढः । आचार्योपाध्यायादिकं पुरुषविशेषमाश्रित्य
स्फुट:-प्रकटः। केन कृत्वा दानस्य विरचना तया यन्नस्तेन । क जीतेन दानं तस्य कल्पत्तत्र । अन्ये तु येन छेद-
श्रुतार्यान् , कथंभूतान्-आपत्तिदानयोर्विरचनं यत्र; तस्मात् जीतदानकल्पविषययोर्विधिः पुरुषविशेषमाश्रित्य स्फुटो
यत्नेन नियूंढ उद्धृतस्तं नमतेति, व्याचक्षते ॥
१०-११. भूयोपि परसमयवेदित्वं विशेषतस्तस्याह-परेत्यादि-सुसमिता ये सुश्रमणास्तेषां यः समा-
धिमार्गः प्रतिदिनाचरणीयमनुष्ठानं तेन क्षमाप्रधाना ये श्रमणास्तेषां निधानमिवैकम् , अनेनानेकसुशिष्यसंपत्समन्वितस्वं
तस्याह । तं नत्वा । मदमथनम् । मानारिहंति मानारिहस्तम् । शेषं सुगमम् । स्कन्धकं छन्दः सर्वरूपकेषु, आर्या-
गीतिरित्यपरनामकम् ।
पृ० पं० (पृ० पृष्ठम् ; पं०-पंक्तिः)
१-26. कोवीत्यादि-आचारचूलात्वानिशीथस्याचारपदात् परत उपादानम् ।
2-27. ववहारमाइयन्ति-आदिग्रहणादू भगवत्यादिपरिग्रहः ।
-31. [नाणाइयारेसु]-नानाविचारेषु का आपत्तिः । 'आवती पायच्छित्तगणसम्पत्ति' प्रायश्चित्तयो.
ग्यता इत्यर्थः । कम्मिवत्ति-कस्यामापत्ती अपरिमूढः सन् ।
२-2. कप्पियाइएहिन्ति-पिण्डैषणा-वस्लेषणादिकल्पा येनार्थतः सूत्रतश्चाभ्यस्ताः स कल्पादिगुणोपेत
उच्यते । [अपत्तापत्त]-अपात्रमयोग्यः; अप्राप्तः श्रुतेन वयसा च । येन नाधीतं श्रुतं सोऽप्राप्तश्रुतः।
[अवत्त]-अन्यक्तो वयसा षोडशवर्षाणि यावत् , तदूर्व व्यक्तः पञ्चकूर्चश्व यः। [तिन्तिणिय]-
तिन्तिणिको सिगिझिगिणस (ख) भावः। [चलचित्त]- सम्यक्त्वादिषु योऽस्थिरः स चलचित्तः । तथा
बायोग्य उक्तो यथा-
विन्तिणिए चलचित्ते गाणंगणिए य दुब्बलचरित्ते । आयरिय पारिभासी वामाव? य पिसुणे य ॥
1-6. [कयपवयण]-प्रोच्यन्ते तेनेति प्रवचनम् । वक्तीति प्रवदतीति वा प्रवचनम् । प्रतिष्ठावचनं
वा प्रवचनम् । प्रवचने योगानन्यत्वात् सङ्घस्य सर्वपक्षेष्वपि सङ्घ एव प्रवचनशब्दवाच्यः। यतः-प्रवचनं
श्रुतमुच्यते। तच भावश्रुतमुपयोगरूपम् । श्रुतोपयोगश्च न निराश्रय इति प्रवचनाश्रयत्वासङ्घ प्रवचनमभिधीयते।
अत एवाह जेण तं सुयमित्यादि तद्-सङ्घोपयोगात् ।
1-14. वत्तणुवत्तेत्यादि-वृत्तः पात्रवन्धप्रन्थिदानादिकः । एकदा नवो जातः । ततोऽनुवृत्तः एकपुरुष
यावत् । ततः प्रवृत्तः पुरुषप्रवाहेण । अत एव वहुश आसेवितो महाजनेन । भाष्यकृता उक्तम्-
वत्तो नाम एक्कस्सि अणुवत्तो जो पुणो बिइयवारे । तईयवारपवत्तो, परिग्गहीओ महाणेणंति ॥१॥
18. सोहणन्ति-शोधकम् । मरुयाई-घिग्जातयः । कत्थइ चि-द्विजातिवधे ।
-21. [पलास-खारोदगाइ]-पलासक्षारं च उदकं च । आदिग्रहणादरिष्टकादिप्रहः, तद् यथा
वस्त्रमलं शोधयति ।
1-25. विसेसणं च सइसंभवे-यथा विद्यावान् धनवान् गोमानयं वर इत्यादिषु प्रशस्तातिप्रचुराड-
नन्यसाधारणविद्याधनगवादिवस्तुसद्धावेन यथाविशेष्यं विशिष्यते विद्यादिभिस्तदा तत्तत्र सम्भनि विशेषणं
ज्ञेयम् । व्यभिचारे नीलोत्पलमित्यत्र नीलविशेषणं रक्तोत्पलादेरपि सम्भवाद् द्रव्यव्यवच्छेदाय नीलपदम् ।
एवमिहापि शेषागमादिन्यवहारसम्भवात्तदवच्छेदाय जीतपदम् ।
-29. [केवल-मण-ओहिणाणीति]-केवल-मण-ओहिणाणीत्यत्र अवधिर्द्विधा--भवप्रत्ययः क्षायो-
पशमिकश्च । तत्राद्यो देवनारकाणाम् । तत्रायं विशेषः-
उप्पलमत्तेण उ खलु भवपचईओ हि जत्तिओ विसओ। सन्वं तं ओभासई न य वुट्ठी नव य हाणी हिं] ॥१॥
गुणपश्चइमो ओही गम्भनतिरिमणुयसंपमोत्तूणं । कम्माण खओवसमे तदवरणिनाण उप्पने ॥ २ ॥
- २-30. ३-10] जीतकल्पचूर्णि-विषमपदव्याख्या सख्यातायुष्कगर्भजतिर्यमनुष्यान् मुकवा न शेषाणा क्षायोपशमिकावधिसम्भवो युगलधर्मिकाणाम् । अवधिमू- तिमद्यविषय. । अत्र यदा केवली प्राप्यते तदा तदप्रतो दीयते । तदभावे मनःपर्यायज्ञानिनः समीपे । तस्याप्य- भावे अवधिज्ञानिन इत्यादि यथाक्रमं वाच्यम् । २-30. अवसेस पुब्धीत्ति-अवशेषपूर्विणः-अष्ट-सप्ताद्येक-तद‘न्तं यावत् । २-31. निशीथ-कल्प-व्यवहार-दशाश्रुतस्कन्ध-पञ्चकल्प-प्रभृतिकं शेषं श्रुतं सर्वमपि श्रुतव्यवहारः । तदुक्तम्-‘आयारपकप्पाई सेस सव्वं सुयं विणिहिट' मिति । चतुर्दशादिपूर्वाणां श्रुतत्वाविशेषेऽप्यतीन्द्रियार्थेषु विशिष्टज्ञानहेतुत्वेन सातिशयत्वात् केवलादिवदागमत्वेनैव तानि व्यपदिष्टानि । यत आगम्यन्ते परिच्छिद्यन्ते अतीन्द्रिया. पदार्था अनेनेत्यागम उच्यते। २-32. तथा आज्ञायत आदिश्यत इत्याज्ञा । तद्रूपव्यवहारस्तु केनापि शिष्येण निजातिचारालोचकेन आलो- चनाचार्यः सन्निहितोऽप्राप्तः, दूरे त्वसौ तिष्ठति । तत केनचित्कारणेन स्वयं तावत्तत्र गन्तुं न शक्नोति । अगीतार्थस्तु कश्चित्तत्र गन्ता विद्यते । तस्य हस्ते आगमभाषया गूढानि अपराधपदानि लिखित्वा यदा शिष्यं प्रस्थापयति; गुरुरपि तथैव गूढपदौ(दै )प्रायश्चित्तं लिखित्वा प्रेषयति तदासौ आज्ञालक्षणस्तृतीयो व्यवहारः । तद यु(दु)क्तं 'देसन्तरठियाणं गूढपयालोयणा आणा ।' गूढपदानि च दर्शयिष्यति चूर्णिकृत् । जहा-पढमस्स य कन्नस्सेत्यादिना ॥ आसेवि- यसत्थत्थ त्ति-अभ्यस्तशास्त्रार्थो । २-33. दूरदेशान्तरनिवासिनौ । मइधारणा-कुसलं ति-सन्दिष्टवस्तुनयनसमर्थम् । २-34. गूढायैर्वाक्यैः । दर्पासेवनापदमेकम् , अपरं च कल्पासेवनरूपम् । ततः कल्पासेवनद्वितीयपदा- पेक्षया दर्पासेवनलक्षणं प्रथमं पदम् । तत्रापि दर्पासेवने दशपदानि दर्पाकल्पनिरालम्बनादीनि । तेषु मध्ये प्रथमपदेन दर्पलक्षणेन षट्कानि च त्रीणि । ततः प्रथमषज्ञ व्रतषट्कलक्षणम् । अभ्यन्तरतन्मध्यवर्ति तत्र पठितमित्यर्थः । तत्रापि च प्राणातिपातादीनि षट् स्थानानि । तेषु मध्ये प्रथम स्थान प्राणातिपातरूपम् , आपनमित्येवं गूढपदेन प्राणाति- पातातिचारं निर्दिष्टवान् । प्रथमषके द्वितीयादिस्थानेष्वतिदिशन्नाह- २-35. पढमेत्यादि । सेसेसु वित्ति-द्वितीयादिषु मृपावादादिषु स्थानेषु इत्थं वाच्यम् । द्वितीयं षवं कायषट्कलक्षणम् । तत्र प्रथमं च स्थानं पृथिवीकायविषयम् , शेपाणि च पदानि अप्कायादीनि । तेषु तृतीयं षवं अकल्पगृहभाजनादि-शोभावर्जनपर्यन्तलक्षणम् । तत्र पिण्ड-उपाश्रय-वस्त्र-पात्ररूपं चतुष्टयं यदनेषणीयं तदकल्प्यम् । करोटककंशपाच्यादिकं च गृहभाजनम् । आसदकमंचिकादि पल्यवरूपम् । मिक्षा गतेन सयतेन गृहे नोपवेष्टव्यमित्येवं निषद्यावर्जनमुच्यते । मानवर्जनं पश्चमम् । शोभावर्जनं षष्ठमिति । खस्थाने न्यक्षेण व्याख्यास्यते गाथेयम् । तत्र प्रथमस्थानमकल्पलक्षणम् । २---36. सेसेसु वि परसुत्ति-शेपाणि पदानि गृहभाजनादीनि तेषु । इदानीमतिदेशमाह-प्रथमपदं दर्पलक्षणममुष्चता तत्रैव यानि अकल्पनिरालम्वनादीनि द्वितीयतृतीयादीनि पदानि नि.शङ्कपर्यन्तानि तेषु वाच्यम् । यथा पढमस्स य कजस्सा विइएण पएण सेवियं जं च । शेषं पूर्ववत् । तत. तइएण पएण सेवियं जं चेत्यादि । यावद् दसमेण पएण सेवियं जं च त्ति । इत्येवं प्रथमषट्कमाश्रित्य चारणीयम् । भूयोऽपि द्वितीयषहमाश्रित्य तृतीयपई चाश्रित्येत्थमेव चारणीयं यावद्दशमपदमिति । अत एवाह- ३-5. पुढविकायाइसु त्ति । भपिशब्दोऽत्र दृश्यस्तत. पृथिवीकायादिष्वपीति दृश्यम् । द्वितीयं च कार्य कल्पासेवनरूपम् । तत्र चतुर्विशति पदानि भवन्ति । तेषु मध्ये प्रथमं पदं दर्शनलक्षणं तदर्थमासेवितमित्यर्थः ।। प्रयमादिपदव्याख्यामाह-पढमं ठाणमित्यादि-दर्प-कल्पासेवनेऽधिकृत्य प्रथमं स्थानं दर्पः, दर्पकल्पासेवना- श्रयणेन एतत्साध्यत्वादाकुटेरेतयोरेवान्तर्भावः । प्रमादस्य दर्प एवेति न तयो पृथक् प्रायश्चित्तनिरूपणम् । ३-9. परिग्गहो चेव त्ति -च शब्दादात्रिभोजनग्रहः । इत्येवं प्रथमषकविषयः । ३-10, एवमकप्पाईसु वित्ति-नवसु पदेषु । . - ५ जी. क. चु० श्रीचन्द्रसूरिसरचिता [३-11. ३-23 - ३-11. द्वितीयं कार्य कल्पः, कल्पासेवनामाश्रित्य । ३-12. तत्र ज्ञानादीनि त्रयोविंशति पदानि तेषु मध्ये एकैकस्मिन् पदे, एवमष्टादशसु चतुर्विशत्या गुणितेषु कल्पासेवनायामेतावन्तो भेदा:-४३२ । उभयासेवनयोर्भेदमीलने ६१२ गाथानां भवन्ति । ३-14. दुविहा पडिसेवणा-दप्पिया कप्पियेत्यादि दप्पाईणि दसपयाणि वक्खाणेह- ३--17. तत्थ दप्पो-धावणडेवणाई. इत्यादि । अमीषामयमर्थ.. धावण ति नि कारणेण सत्यप्पयाणं धावणं । डेवणं गत्तवरंडाईफडणं । आदिशब्दात् मल्लवत् बाहुजुद्धकरणं, लगुडिभमाढणं ॥१॥ अकप्पो नाम पुढवाइकायाणं अपरिणयाणं गहणं करेइ । अहवा उदउल्ल-ससणिद्ध-ससरक्खाइएहिं हत्थमत्तेहिं गिण्हइ । जं वा अगीयत्थेणं आहारोवहि उप्पाइयं तं परिभुजंतस्स अकप्पो। पञ्चकादिप्रायश्चित्तशुद्धियोग्यमपवाद- सेवनविधि त्यक्त्वा गुरुतरदोषसेवनं वा अकप्पो ॥२॥ निरालम्बो ज्ञानाद्यालम्वनं विना नाणाईणि अवलंबिउं अकप्पियं पढिसेवइ सालम्बा; नाणाइ अवलम्बनं त्यक्त्वा अकारणेण पडिसेवइ जं सा निरालम्वा ॥ ३ ॥ ३-18. चियत्त त्ति-त्यक्तं कृत्यं करणीयं येन स त्यक्तकृत्वः, त्यक्तचारित्रः । अयमर्थः-जं अववायेण निसेवियं गिलाणाइकारणे असंथरे वा, पुणो ते चेव हट्ठसमत्थो वि होउ (उ) निसेवंतो चियत्तकिच्चो भवइ ॥ ४ ॥ अप्पसत्थे त्ति-वलवर्णायथं प्रासुकभोज्यपि जं पडिसेवइ सा अप्रशस्तपडिसेवणा, किं पुण अविसुद्धं आहाकम्माइं ॥५॥ ३-19. वीसत्थे त्ति-अकिच्छ पाणाइवायाइ सेवंतो लोय-लोउत्तरविरुद्धं सपक्ख-परपक्खाट अलग्जिरो वीसत्थो । सपक्खो सावगाइ; परपक्खो मिथ्यादृष्टयः ॥ ६ ॥ अपरिच्छिय त्ति-आयव्ययमपरीक्ष्य यः प्रवर्ततेऽपवाद। आयो लाभो, व्ययो लब्धस्य प्रणाशः; एसा अपरिच्छियपडिसेवणा ॥ ७ ॥ ३-20. अकडजोगि त्ति । जोगमकाऊण त्ति-ग्लानादौ कार्ये गृहेषु वारत्रयपर्यटनमकृत्वा सेवते । यद्वा सथाराइसु तिन्नि वारा एसणीयं अनिसिउं जया तइयवाराए वि न लब्भइ तया चठत्थपरिवाढीए अणेसणीयं घेत्तव्वं । एवं तिगुणं व्यापारमक्ष(कृ)त्वैव जा वियवाराए चेव अणेसणीयं गिण्हइ सोऽकडजोगी ॥ ८ ॥ निरणुतावित्ति-जो साहू अववाएणावि पुढवाईणं संघट्टण-परियावण-उद्दवणं वा काउं पच्छा नाणुतप्पइ- 'हा दुहु कयं' सो अणणुतावी होइ-अपच्छायावीत्यर्थ, । जो दप्पेणं पडिसेवेन्तो नानुतप्येत्तस्य विशेषः ३-21. णिस्संको त्ति-निरपेक्षः। अकार्य कुर्वन् कस्याप्याचार्यादेन शकते, नेहलोकस्यापि विभेति ॥१०॥ ३-23. दसणाईणि चउवीसपयाणि, एएसिं इमं वक्खाणं-दसण त्ति-दंसणपभावगाणि सत्याणि सिद्धि- विणिच्छय-सम्मत्यादि गिण्हन्तोऽसथरमाणो जं अकप्पियं पडिसेवइ जयणाए तत्थ, सो सुद्धोऽप्रायश्चित्त इत्यर्थः ॥ नाण त्ति-नाणनिमित्तं सुत्त अत्थं वा गेण्हमाणो तत्थ वि असथरे अकप्पियं पडिसेवंतो सुद्धो ॥ चरित्ते त्ति-जत्थ क्खेत्ते एसणदोसो, ताओ खेत्ताओ चारित्रार्थिना निर्गन्तव्यम् । तमो निग्गच्छमाणो में भकप्पियं सेवइ तत्थ सुद्धो ॥ तव त्ति-तवं काहामि त्ति घयाइ नेहंऽतिपिवेज, कए वा विगिहतवे पारणे लायातरणाई पियेज्जा । लाया नाम वीहिया भुजिया भट्टे ताण तंदुलेसु पेया कन्जइ तं लायातरणं भन्नइ तं, विगिट्ठतवपारणए अहवा आहाकम्मं पि देना । मा अन्नेण दोसीणाइणा रोगो हवेजा। पारणगे आमलगसर्करादयो वा दीयन्ते । जयणाए सुद्धो । अतोऽप्रे संजमेति पदं दृश्यते चूर्णिपुस्तकेयु परं तदशुद्धम् । तस्य स्थाने पवयण त्ति पदं पठनीयम् । निशीथे एतदीय- भाष्ये च इत्थमेव पठितत्वात् , चारित्रपदेनैव संयमार्थस्योक्तत्वाच्च । अतः पवयण त्ति व्याख्यायते- पवयणठ्याए किचि पडिसेवंतो सुद्धो। जहा कोई रायाइ भणेन्ना 'मम विसयाओ नीह [ र ]'। एत्य पवयणट्ठया सेवंतो सुद्धो । जह विद्वअणगारो । तेण रुसिएण लक्खजोयणपमाणं रूवं विगुरुम्वियं लवणो चलणेणालोडिओ ति ॥ समिय त्ति-इरियं न सोहेइस्सामि त्ति चक्षुनिमित्तं वैद्योपदेशादोषधपानं कुर्यात् । इरियासमिइनिमित्तं । ९॥ -- - ३-25. ३-30] जीतकरुपचूर्णि-विषमपदव्याख्या खेत्तचित्ताईओ होउं मा भासासमिएऽसमिओ होमि त्ति तप्पसमणठ्या ओसहपाणं कुर्यात् । तइयाए समिईए अणेसणियं पि कयाइ गिण्हेजा। एसणदोसेसु वा दससु सकाइएसु गिण्हेना । अद्धाणपडिवनो वा अद्धाणकप्पं पढिसेवेजा। आयाणनिक्खेवणसमिईए चलहत्थो होउं कंपणवाउणा गहिओ सो अनओ पमन्जइ अण्णओ निक्नेवं करेइ, तप्पसमणठ्ठया वा ओसहं करेजा । पारिद्वावणियसमिईए कायभूमीए वा किचि विराहेजा। मणोगुत्तीए वियडं कारणओ पडिसेवियं तव्वसा मणसाऽगुत्तो कारणागुत्तो खेत्तचित्ताइ हवेजा। 'साहम्मियवच्छल्लाइ-चालवुडपजवसाणाण' नवण्हं पयाणं व्याख्या । साहम्मियवच्छल्लं पडष किंचि अकप्पं पडिसेवेज । जहा अजवयरेहिं असिवगमुंडो नित्थरिओ। तत्थ कि अकप्पं ? भन्नइ- तहे वा संजयं धीरो आसएहिं करेहिं वा । सयं चिट्ठ वयाहि त्ति नेवं भासिज्ज पनवं-इति ॥ सिलोगो कण्ठ्यः । कुल-गण-सघकज्जेसु समुप्पन्नेसु वसीकरण-उच्चाटण-होमाइ रायाइयमुद्दिस्स पउंजेयध्वं । निमित्त-चुन्न-जोगा कायन्वा । आचार्यस्य असहिष्णोगिलाणस्स चालवुढाण य जेण समाही तं कायव्वं । को य असह! तत्प राया जुवराया सेट्ठि-अमच्च-पुरोहिया य एए असहू पुरिसा भन्नति । एए अन्तपन्ताइएहिं अभाविया । वालवुड्डा य कारणे दिक्खिया होजा; जहा वयरसामी, अजरक्खिय-पिया य । एएसिं पणगाइयाए जयणाए घेत्तुं समाहिहेउं दायव्व । जयणाए अलब्भमाणे पच्छा जाव आहाकम्मेणावि समाहाणं कायव्वं । ३-25. इयाणिं उदयाइ-चसणपजवसाणाणं अट्ठण्डं पयाणं व्याख्या उच्यते । तत्थ उदय त्ति- वाहो पानीयप्लव इत्यर्थः । अग्गि त्ति-दवाग्निरागच्छति । [चोर त्ति-चोरा दुविहा उवगरणसरीराणं । सावय त्ति-गय-सप्प-सीह-वग्याइ । भय त्ति-एयसयासाओ भयं । एएसिं अन्नयरकारणे उप्पन्ने थंभणिविजं मंतेऊण थंभेजा । विजाभावे पलायइ । पलाइउं असमत्थो श्रान्तो वा सचित्तरुक्खं दुरुहेजा, न दोसो। [कंता- र त्ति-कन्तारमध्वानं जत्य भत्तपाणं न लब्भइ तत्थ जयणाए कयलगाई फलं वा उदगाई वा फासुयं गिण्हेना। अडवी ४; दव्व-खेत्त-काल-भावावई चउहा । दवओ फासुयं दव्वं न लहइ । खेत्तओ अद्धाणपडिवनयाण आवई । कालओ दुभिक्खाइसु । भावओ गिलाणस्स आवई । तत्थ किंचि अकप्पियं पडिसेवेजा। तत्थ विसुद्धो । गीयाइ- अभासो व[स]णं । कोई चारणाइदिक्खिओ वसणत्तो गीओच्चार करेन्ज । पुव्वभाविओ पक्कताम्बूलपत्ताइ मुहे पक्खिवेज । एसा दंसणाइया कप्पिया । एत्थ पडिसेवओ साहू, दप्पिया-कप्पियाइ पहिसेवणा, पडिसेवियव्वं च वयछकाईणि अट्ठारसठ्ठाणाणि । तत्थ य- ३-~28. वयछक्क कायछकं० गाहा । व्याख्याः-व्रतषत प्राणातिपातादिपञ्चकरात्रीभोजनविरतिषट्कम् । पृथिव्यादय षड्जीवनिकायाः। षट्कद्वयेन मूलगुणा उक्ताः । अथैतद्वृत्तिकल्पा अकल्प्यादयः षडुत्तरगुणा अभि- धीयन्ते । तत्राकल्पो द्विविध -शिक्षकस्थापनाकल्प., अकल्प्यस्थापनाकल्पश्च । तत्राद्यः-अनधीतपिण्डनियुक्त्यादि- शास्त्रसाधुना आनीतमाहारादि साधुभ्यो न कल्पते । उक्तं च- अणहीया खल जेणं, पिंडेसण १ सेज २ वत्थ ३ पाएसा ४ । तेणाणिआणि जइणो कप्पंति न पिंडमाईणि ॥१॥ उउवद्धम्मि न अनला, वासावासे उ दोवि नो सेहा । दिक्खिजंती सेहवणा कप्पो इमो नवरं ॥२॥ 'दोवि त्ति'-नपुंसकाऽनपुंसकाख्यं द्वयं वर्षासु न दीक्ष्यते । शीतोष्णाख्यशेषमासाष्टके अनला नपुंसका न सरीक्षार्हाः इति । [अकप्पो-] शिक्षकस्थापनाकल्पोऽकल्प्य.। अन्यश्च पिण्डशय्यावस्त्रपानानेषणीयचतुष्टयगोच- रोऽकल्प्यः । उद्गमोत्पादनादिदोपरहितं च चतुष्कं कल्प्यम् । [गिहिभायणं-] गृहभाजनं गृहस्थसम्बन्धि- काश्यकरोटकतलिकामृन्मयकुण्डिकादिकमकल्प्यम् । पलियंक ति-आसन्दकशय्यामश्चकादिके उपवेशनशय- नीयरूपे सुषिरदोषान्न कल्पते उपवेष्टुं स्वप्तुं वा । निसेज त्ति-भिक्षार्थ गृहे प्रविष्टस्य साधोस्तत्र निषदनं कर्तुं न फल्पते उत्सर्गत ; अपवादतस्तु साधुत्रयमध्ये अन्यतरस्य कल्पते जराभिभूतस्य व्याधिमतो विकृष्टक्षपकस्य च तपखिन इति । एते च मिक्षाटनं न कार्यन्त एव । परमात्मलब्धिकाद्यपेक्षया सूत्रे त्रयस्योपवेशनं योज्यम् । [सिणाणं ति-] मानमङ्गप्रक्षालनं देशसर्वभेदभिन्नम् । [सोभवजणं-शोभावर्जनं विभूपापरित्यागः । इत्यष्टादश- स्थानगण. प्रतिपेवयितव्य आलोचनागोचरः । ३-30. सोरूण गाहा । तस्य गुरोः प्रतिसेवकस्य । स शिष्यः गूढपदावधारकः । - ..
श्रीचन्द्रसूरिसंरचिता [३-31. ४-2 - सोऊण ति-श्रुत्वा प्रतिसेवनां आलोचनां च श्रुत्वा, क्रमविधिं च श्रुत्वा मूलोत्तरगुणविषयाम् । आगमं ज्ञात्वा, पुरुषजातं च आचार्यादि ज्ञात्वा । तदीयं पर्यायं व्रतवयोविषयम् , बलं च शरीरसामर्थ्यम् , क्षेत्रं च कर्कश- साधारणादिरूपं ज्ञात्वा । यस्मादागतस्तत्रैव गत । अमुमेवार्थ प्रकटयति अवधारेउमित्यादिना । ३-31. सो तर त्तिस तक गूढपदालोचनाकथकः। सो० गाहा । स आलोचना-दाता स्वयं गन्तुम- समर्थः स्वशिष्यं प्रेषयति, तदभावे आगतशिष्यस्यैव कथयतीति तात्पर्यम् । ३-32. अणुमजिय त्ति-निरूप्य विशोध्येत्यर्थ । तं ति-गूढपदालोचितमतिचारम् । तस्य गुरोः । पच्छित्तं ति-तपोदानरूपं ददाति, गूढपदैरेषां कथयति । तान्येव दर्शयति पढमस्स येत्यादिना- ३-33. प्रथमस्येति दर्पासेवनारूपस्य । [दसविहमालोयणं ति-] दशविधालोचना दर्प-अकल्पादि- दशपदात्मिका, ता विमृश्य, गूढपदौ प्रायश्चित्तं पाठयति । नक्खत्तेसे पील त्ति-अस्यार्थः-भे भवतां पीडा विराधना; नक्षत्रे कोऽर्थः-चन्द्रादित्यग्रहनक्षत्रतारकभेदतः पञ्चविधज्योतिश्चक्रमध्ये नक्षत्रभेदश्चतुर्थस्थानी । अतस्तेन चतुर्थव्रतगोचरा पीडा सूच्यते-इत्येके व्याचक्षते । अत्रैव-नक्खत्तमेगे मूलं भणंति, अन्ने हत्थं निद्दिसंति; अवरे मूलत्तरगुणविराहण त्ति । तत्थ चउत्थ ( ०त्थतं b) इयव्वय विराहणाइयारे हत्थं ति हत्थकम्मं कयं । हत्थेण भदिन्नं वा गहियं । यद्वा व्रतषट्कादय सप्ताविंशतिसंख्या अनगारगुणा मूलोत्तरगुणरूपा नक्षत्रशब्देनात्राभिप्रेता', नक्षत्राणामप्येतत्संख्याव्यवहारात् । तथा च अनगारगुणानाश्रित्य पठ्यते-'सत्तावीसाए अनगारगुणेहिं ति'। तत्र- वयछक्कमिदियाणं च निग्गहो भावकरणसचं च । खमया विरागया वि य मणसाईणं निरोहो य ॥ कायाण छक्कजोगम्मि जुत्तया वेयणाहियासणया। तह मारणंतियाहियासणा एए अणगारगुणा ।। इह व्रतषवं मूलगुणाः । कायषट्क चेति द्वादश शेषाः (१) । तत्र मूलगुणे चतुर्थव्रतविषये पढमे छक्के चउत्थं भवेढाणमिति गाथापाठो द्रष्टव्य.। उत्तरगुणविराधनामाश्रित्य सुक्के मासे तवं कुणह त्ति भणितं, चउमास छमासं च तवं कुणह सुक इत्यप्यग्रतो भणितम् । परं शुक्लमासादिदानपक्षे उत्तरगुणानाश्रित्य द्रष्टव्यम् । कृष्णमासादि दानपक्षे मूलगुणविराधनामाश्रित्येति । नवरं उग्घाओ सुक्कमासो सद्धसत्तावीसं दिवसनिष्पन्नो । अणुरघाओ पडिपुनो तीसअहोरत्तनिष्पन्नो ॥ ४-2. एवं ता उग्धाए[s]त्यादि-तत्र उद्घातो भागपातस्तेन निर्वृत्तं उद्घातिमं लम्वित्यर्थ. । एतनिषेधा- दनुघातिमं गुर्वित्यर्थः । तत्र प्रथमं पञ्चकं, दशकं, पञ्चदशकं, विंशतिमं, पञ्चविंशतिमं, इत्येतत्सर्व भिन्नमासशब्द- वाच्यं ज्ञेयम् । मासलघु, मासगुरु, चउलघु, चउगुरु, छलहु, छगुरु । अन्यच्च द्विमासगुरु, त्रिमासगुरु, चउमासगुरु, पञ्चमासगुरु, छमासगुरु-एते सम्पूर्ण-निजनिजपरिमाणाः कृष्णमासशब्दवाच्या , अनुद्धाताश्चोच्यन्ते । तत्र लघुगुरुदानेऽयं क्रम अद्धेण च्छिन्नसेस पुव्वद्धणं तु सजुयं काउं । देनाहि लहुयदाणं, गुरुदाणं तत्तियं चेव ॥ यथा-मासस्यार्द्धच्छिन्नस्य शेषदिन १५ । एतन् मासापेक्षया पूर्वस्य पञ्चविंशतिकस्या? सार्घद्वादशकेन संयुतं. कृतं मासाई सार्धसप्तविंशतिर्भवति । इत्येवं दिनसंख्या निष्पन्न. शुक्लमासः, उत्तरगुणविराधनामाश्रित्य वाच्यः । शुक्लचतु- मासः प्राचीनप्रक्रियया कृत । एतावान् ११० भवति । शुक्लषण्मासिकं तपः १६५ । अणुघाए ताणि त्ति-तानि मासिकादीनि षण्मासान्तानि तपासि अणुग्घाए त्ति सम्पूर्णानि कृष्णशब्द- वाच्यादीनि द्रष्टव्यानि । तत्र गुरुमासिकं गुरुद्विमासत्रिमासचातुर्मासिकं पञ्चमासिकं षण्मासिकम् । । गु० मा० ३० गु० द्विमा०६० गु० त्रि००० गु० चा० ००० गु०प० ०००० गु०प० ल० मा० २७॥ १०५ १३५ ल. १६५. " अन्यच्चोच्यते किञ्चित्-अट्ठमाइणा तवेण जं बुज्झइ तं तवगुरुयं, निव्वीयाइणा छटुंतेण बुज्झमाणं तवलहुगं, कालो जं गिम्हे वुज्झइ तं काललहुयं । अन्यच्च- जंतु निरंतरदाणं जस्स व तस्स व तवस्स तं गुरुयं । जं पुण संतरदाणं गरुयं पि हु सं लहुं होइ । तवकाले आसन्न व गुरू वि होइ लहू लहू गुरूओ। कालो गिम्हो गुरु अट्ठाइतवो लहू सेसो ॥ , ४-3. ४-10 ] जीतकल्पचूर्णि-विषमपदव्याख्या ३७ इह तीर्थ उत्कृष्टतोऽपि षण्मासान्तमेवातिचारशुद्ध्यर्थं तपो भवति । अत उक्तं-मास चउमास-छमासियाणि । इत ऊर्ध्व च षण्मासिकेनाप्यशुद्धौ छेदमूलानवस्थाप्यपाराश्चिकानि तत्तत्कालापेक्षया सूरिभिर्दीयन्ते । अतथूर्णि- कदाज्ञाव्यवहारे कृते गूढपदैरेव तानि वक्तुकाम इदमाह-छेअं अओ वोछति । अओ त्ति-षण्मासीए तपस ऊर्ध्व छेदादिप्रायश्चित्तं गूढपदैराज्ञाव्यवहारत्वाद्वक्ष्ये । अन्यत्राप्युक्तम्- 'उस्सग्गेण विसुज्झइ अइयारो कोइ, कोइ उ तवेण । तेण उ असुज्झमाणे छेय विसेसा विसोहिंति त्ति' ॥ तत्र- ४-3. छिंदं तु तयं भाणं ति० गाहा । अस्यायमर्थ.-तयं तु तकत् , भाणं ति पूर्ववतपर्यायरूपं भाजनम्, छिन्दन्तु अपनयन्तु उत्सारयन्तु । पर्यायच्छेदं तु अतिचारानाश्रित्य 'छन्भागंगुलपणए' इत्यादिना वक्ष्यति । पूर्वपर्यायच्छेदेनाशुद्ध्यमाने साधवो व्रतस्य पर्यायस्य मूलं व्रजन्तु । अष्टमप्रायश्चित्तभाजो भवन्तु । तस्याप्ययोग्यतायां 'अन्वावडावगच्छे'-व्रजेयुरव्यावृता., अव्यापाराः संतिष्ठन्तु, अनवस्थाप्याही भवन्तु । तेनाप्यशुद्धौ तदयोग्यतायां 'अबिइया वावि' विहरन्तु । अद्वितीया एकाकिनः सन्तो वक्ष्यमाणपाराश्चिकप्रायश्चित्तासे विनो भवन्तु । प्रागुपात्तं छेदं दर्शयति- ४-4. छब्भागंगुलेत्यादिना। छेदो हि पञ्चकदशकादिरूपतया तत्तदतिचारापेक्षया तपोभूमिमपनान्तस्य यावत्पर्यायधरणं तावद्भवति । यदाह- 'उकोसं तवभूमि समईओ सावसेस-चरणो य । छेयं पणगाईयं पावइ जा धरइ परियाओ ॥' गाथाद्वयस्यार्थः कथ्यते-छब्भागंगुलपणगेत्ति-सो आलोयणायरिओ, तस्स सीसस्स एयाए सम्मा- गूढं छेयपायच्छित्तं देह। तं जहा-मास दुमास तिमास चउम्मास पंचमास छम्मासाणं पत्तेयं पत्तेयं अंगुलववएस करेइ । तहा कए य जस्स मासमेत्तो परियाओ तस्स, पंचगे त्ति पंचसु दिवसेसु छिंदियव्वेसु, अंगुल त्ति मासस्स छन्भागो छिंदियव्वो त्ति भणियं होइ । दसभाए ति भाग त्ति-तस्सेव य अगुलसन्नियस्स मासस्स दससु दिणेसु छिदियव्वेसु अगुलस्स तिभागो छिंदियव्वो त्ति भणइ । मासपन्नायस्स दसदिवसा छिंदियव्व त्ति भणियं होइ । अद्ध-पन्नरसे त्ति-तस्सेवागुलसनियस्स मासस्स पन्नरसे त्ति पन्नरससु दिवसेसु छिदियव्वेसु अद्धमंगुलस्स किंदियध्वं ति निद्दिसइ । पन्नरस दिवसाणि छिंदियव्वाणि त्ति सम्भावो। वीसाए तिभागूणं ति-तस्सेव मासस्स वीसाए दिवसाणं छिदियव्वाए तमेवंगुलं ति-भागूणं ति तइयभागेण ऊणं छिंदियव्वं ति भण्णइ । मासस्स दोन्नि भागा अवरा यत्ति भणियं होइ । छब्भागूणं तु पणवीसे त्ति-तस्सेव मासस्स पंचवीसाए दिवसाणं छिंदियव्वाए छन्भागूणं ति तमेवागुलं छब्भागेण ऊणं छिंदियध्वं ति भणइ । मासस्स पंचवीस दिवसा छिदियध्वं ति । मासे छिदियव्वे अगुलं छिंदियव्वं ति भणइ ॥ १॥ विहि मासेहि छिदियव्वेहि अगुलदुर्ग छिंदियध्वं ति भणइ ॥ २ ॥ ति मासे छिंदियव्वे अंगुलतिगं छिंदियध्वं ति भणइ ॥३॥ चउमासे छिंदियव्वे चउरो अगुलाइ छिंदियन्वाई भणइ ॥४॥ पंचहि मासेहि छिंदियव्वेहिं अंगुलपंचगं छिंदियव्वं ति सन्दिसइ ॥ ५ ॥ छम्मासपरियाए छिन्दियव्वे छअगुलाई ववइसइ ॥ ६ ॥ ४-5. एए छेयविभाग त्ति-एए त्ति पुव्वनिद्दिट्ठा, छेय त्ति छेयं सत्तमपायच्छित्तं तस्स विभागा विसेसा नायव्वा-जाणियध्वा । अहक्कमेणं तु त्ति जे जहा निहिट्ठा । आशाव्यवहारे दर्पिकीमासेवाममिधायाधुना कल्पिकीमाह- ४-6. विश्अस्स कजस्सेत्यादिना । द्वितीयस्य कल्पासेवनारूपस्य ज्ञानदर्शनादिचतुर्विंशतिपदरूपस्य तद्गो- चरामासेवना श्रुत्वा शिष्येण कथ्यमानां सूरि—ते-आउत्तनमोकार त्ति । आयुफा. संयमोद्यमविधायिन. पञ्चपर- मेष्ठिस्मरणपरा भवंतु सूरयोऽप्रायश्चित्तिन इति भावः। नवरं कारणपडिसेवा वि हु सावज्जा निच्छये अकरणिज्जा, किं सर्वथा नेत्याह-बहुसो वियाइत्ता। कर्तव्यमिति शेषः। अधारणिज्जेसु-अत्यागाढकारणेष्वित्यर्थ.। "जइ वि य सम- गुमाया-सावधप्रतिषेवेति प्रक्रमः-तहवि य दोसो न वनणे दिह्रो । दढधम्मया हु एवं नामिक्खनिसेव-निद्दयया ॥" ४-8. एवं सो इत्यादि । द्रव्यादिकं ज्ञात्वा परिभाव्य वेति शेषः । परिपृच्छय स्वकीयगणं खयमात्मगमनं विधत्ते, शोधिदाता सूरि गीतार्थशिष्यं वा प्रेपयति । अविजमाणे व त्ति निजगमन-स्खशिष्याभावे । तस्सेव त्ति भालोचनातिचारकथकप्रेषितशिष्यस्यैव हस्ते गूढपदैरक्षत(?)लिखित्वा वा विशोधि प्रेषयति । ४-10. धारणाव्यवहारस्तु- । - ३८ श्रीचन्द्रसुरिसंरचिता [४-13. ५-20' - -- 'गीयत्थेणं दिण्णं सुद्धि अवधारिऊण तह चेव । दितत्स धारणा सा उट्ठियए य धरणरूवा जा ॥' सुगमा । ४--13. बहुसो पडितप्पियस्स त्ति-अनेकश कृतकार्यस्य । अवसेस त्ति-किञ्चिच्छेषाकर्णितागमस्य । अयमर्थः-वैयावृत्त्यकरणादिना गच्छोपकारी कश्चित्साधुरबाप्यशेषच्छेदश्रुतयोग्यो न भवति ततस्तस्यानुग्रहं कृत्वा यदा गुरुरुद्धृतान्येव कानिचित् प्रायश्चित्पदानि कथयति तदा तस्य तेषा पदाना धरणं धारणा अभिधीयते । ४-15. जीतव्यवहारस्तु येष्वपराधेषु पूर्वमहर्पयो बहुना तप प्रकारेण शुद्धिं कृतवन्तस्तेष्वपराधेषु साम्प्रतं द्रव्यक्षेत्रकालभावान् विचिन्य सहननादीनां च हानिमासाद्य समुचितेन केनचित्तप प्रकारेण या गीतार्थाः शुद्धि निर्दिशन्ति तत्समयपरिभाषया जीतमित्युच्यते । अथवा यद्यत्र गच्छे सूत्रातिरिक्त कारणतः प्रायश्चित्तं वर्तितमन्यैश्व बहुभिरनुवर्तितं तत्तत्र रूढं जीतमुच्यते । ४-19. वत्तणु० गाहा - वत्तो नाम एक्कसि अणुवत्तो जो पुणो विइयवारे । तइयवारं पवत्तो सुपरिग्गहिओ महाणेणं ॥ वहुसो वहुस्सुएहिं जो वत्तो न य निवारिओ होइ । वत्तणुवत्तपमाणं जीएण कयं हवइ एयं ।। सथा च-सो जह काईएणं अपडिकंतस्म निविगइयं तु । मुहणंतफिडियपाणग-असवरे ए[व]माईसु ॥ एग दिणं च वजे घट्टणतावेण गाढगाढे य । णिव्विगईमाईयं जा आयामंतमोहवणे ॥ विगलिंदणंतघट्टणपरियावणगाढगाढउद्दवणे । पुरिमड्ढाइ कमेण उ नेयन्वं जाव खमणं तु ॥ पंचिंदि-घट्टतावण-अणगाढगाढ-तहेव उद्दवणे । एगासणमायामं खमणं तह पंचकल्लाणं ॥ एमाईओ एसो नायवो होइ जीयववहारो । अणवज्जविसोहीकरो संविग्गणगारविन्नो त्ति ॥ ४-25. आगमव्यवहार(रा) न श्रुतमनुवर्तयन्ति । जे पुणोत्यादि- 'आकारैरिजितैर्गत्या चेष्टया भाषितेन च । नेत्रवक्त्रविकारैश्च गृह्यतेऽन्तर्गतं मन. ॥' इत्यन्यत्रापि पठ्यते । नवरम्-इजितं निपुणमतिगम्यं प्रवृत्तिनिवृत्तिसूचकमीषद्भूशिर कम्पादि । आकार. स्थूलधीसंवेद्य. प्रस्थानादिभाव- सूचको दिगवलोकनादिः। ४-26. वत्ति त्ति-वक्त्रम् । [णेत्तं]-नेत्रं लोचनम् । वयण त्ति-वचनम् । एतदीय विकारादिमिः । तिक्खुत्तो त्ति विकृत्वो वेलात्रय संवादार्थम् । पलिउंचियं समायं, अपलिउंचियं अमायं । ४--28. सुयाभावे त्ति-श्रुतवत्सन्निधानाभावे । ४-29. सुयववहाराणुसरिसो त्ति-यत श्रुतोक्तप्रायश्चित्तमेवानापि दीयते । ४-31. विसेसिउ त्ति आज्ञाव्यवहार श्रुतोपदेशोचितप्रदानम् । ४-32. सव्वत्थय त्ति-निषु कालेषु, जीतस्य चिरानुवर्तनं यावत्तीर्थ तावत् । ५-4. तवेगदेसं तिद्वादशभेदस्य तपसः प्रायश्चित्तं तदेकदेश एव । ५-5. पारंपरिएण-परम्परया । उन्बेल्लणाए-परमसमसुह-सम्यक्सुखलक्षणः । ५-9. अनादानं अग्रहणं नूतनकर्मणः । ५-10. अहव त्ति-यद्वा संवरनिर्जरे एते सप्रभेदे कथ्येते-विशिष्टं लक्षणमेतयोर्मण्यत इति भाव. मिथ्या स्वाविरतिकषायप्रमादयोगानां निरोध [सवर ] । ५-11. अवरोधेन अपगमेन । ५-13. इन्द्रियाणि पञ्च, तेपा विषया शब्दरूपरसस्पर्शगन्धाख्यास्तेषु इष्टानिष्टेषु रागद्वेषाकरणम् । विकथा. स्त्रीकथाद्याश्चतस्रः । निद्रा पञ्चविधा । मद्यं विकटम् । प्रमादोऽज्ञानसंशयादिक । योगा मन प्रभृतयः। ५-14. धावनादिकं प्राग व्याख्यातम् । स्फोटनं वाह्वाधास्फोटनं घटादिभेदनं वा । ५-15. असम्भूय त्ति-असद्भूतोद्भावनम्-अगुष्ठपर्वमानादिर्जीव , नवकम्बलो देवदत्त इत्यादिकः । ५-16. ईसामरिस त्ति-परसम्पदामसहनमीा, अमर्प. क्रोधः, एते मनोव्यापाराः। ५-20. [उत्तरगुण]- पिंडस्स जा विसोही, समिईओ भावणा तवो दुविहो । पडिमा अमिग्गहा वि य, उत्तरगुणमो वियाणाहि ॥ ५-20. [परीसह ]-- छुहा पिवासा सीउन्हें, दंसाचेलारइत्थिउ । बरिया निसीहिया सिज्जा, अझोसवहजायणा ॥
३९ ५-21..७-9] जीतकल्पचूर्णि-विपमपदव्याख्या अलाभरोगतणफासा, मलसकार परीसहा । पन्नानाण-समत्त इइ चावी परीसहा ।। ५-21. [उवसग्ग- उपसर्गाः १६-- दिव्वा ४ माणुसगा चेव ४, वियाहिया तिरिच्छा य ४ । आयसचेयणीया य ४ व्यसन्गा चउबिहा ॥ तत्र [पुढोवेमाया] पृथग् विमात्रा हास्येन प्रारव्वा. प्रद्वेषेण निष्टाजता इति । ५-22. कुसीलपडिसेवण त्ति-चतुर्थवतलोपनम् । विपयाभिध्वङ्गिणा ख्यादिना । [घट्टणया] घटन रजसश्चक्षु स्थस्य । [थंभणया] स्तम्भनता पादाद्यनस्य । [लसणया] टेपनताशाना वातादिना । [पवडणया] प्रपतनं भूमौ देहस्य । *चरणसोहणत्थं चेति-चकारात् ज्ञानदर्शनशुद्ध्यर्थं च प्रायश्चित्तं ज्ञेयम्, त्रयस्यापि मोक्षकारणत्वात् । चरणशुद्धिधारित्र श्रेष्ठता। ६--13. विगिंचमाणो विहीयद त्तियद् द्रव्यमधिकमकल्प्यं वा गृहीतं तद्विगिम्चयन् त्यजन् विधिना तमतिचारं शोधयति । ६-20. जाव० तवो चिण्णो त्ति-ततो महाव्रतेपु नावस्थाप्यते नाधिक्रियते इत्यनवस्थाप्यः । ६-21. पारं तीरंतपसा अपराधस्य अध्नति गच्छति ततो दीक्ष्यते य स पाराची, स एव पाराश्चिकस्तस्य यदनुष्ठा नम् । तच्च पाराम्बिकं लिङ्गक्षेत्रकालतपोभिर्वहिष्करणम् । लिङ्गाईहिं पारंचिओ रहितः क्रियते इत्यर्थः॥ दस पायच्छित्त- पयाणि । तत्थ साहवो पुलाग-वउस-कुसील-नियंठा-तिणाय-भेया पंच। एएसिं जं जस्स भवति तमियाणि भन्ना- आलोयण-पडिक्कमणे मीसविवेगे तहा विउस्सग्गे । ततो तवे य च्ढे पच्छित्तपुलाके छप्पेए । वउस-पढिसेवगाणं पायच्छित्ता भवंति सव्वेवि । थेराण भवे कप्पे जिणकप्पे अट्टहा होइ ॥ आलोयणा विवेगो वा नियंठस्स उ दुवे भवे । विवेगो य सिणायस्स एमेया पडिवत्तिओ ॥ समायिक साध्वादीना च पश्चानां यद्यस्य तत्कथ्यते- सामाइसंजयाणं पच्छित्ता छेयमूलरहियह । धेराण जिणाणं पुण तवमंत छविह होइ । छेओवट्ठावणिए पायच्छिता वंति सव्वे वि । थेराण जिणाणं पुण मूलं तं अट्टहा होइ ॥ परिहारविसुद्धीए मूलं ता अट्ट हुंति पच्छित्ता । थेराण जिणाणं पुण छबिहमेयं वि य तवंतं ।। आलोयणा विवेगो य तइयं तु न विजइ । सुहमम्मि संपरागे अहक्खाए तहेव य ॥ अन्यच जा संजमया जीवेसु ताव मूला य उत्तरगुणा य । इत्तिरियच्छेयसंजमनियंठवउसा य पहिसेवी ॥ मा तित्थं ताव एए नेया । कृतं प्रसङ्गेन । प्रकृतमुच्यते-तत्र 'करणिज्जा जे जोगा' गाथायां (गाथाङ्क ५) योगा प्रत्युपेक्षणादिका क्रियारूपा । ६-31. आलीण-आ इपल्लीन. । बहुतरं लीनः प्रलीन । भाष्ये तु-"आलीणा नाणाइस: पहलीणा, कोहाईया पलयं जेसिं गया ते पलीणा उ” इत्युतम् । ६-32. पादमुत्य अघर्षयन्- रीयेत-गच्छेत् । तिरिच्छे ति तिर्यकृत्वा कीटिकाद्याकुले देशे। साहटु-सहत्य संकोच्य अप्रेतनफणादिना । ६-34. जा य सञ्चेत्यादि-पदार्थतत्त्वमङ्गीकृत्य या भापा सत्या, परमवकव्या सावद्यत्वेन, अमुत्रस्थिता पालीति कौशिकभाषावत् ॥१॥ तथा सत्यामृपा न वक्तव्या । यथास्मिनगरे दश दारका जाता इत्यादि तन्यूनाधि- कभावे, व्यवहारतोऽस्या सत्यमृपात्वात् ॥ २॥ या च मृपा, यथा-क्रोधाभिभूतो जनक. पुत्रमाह-न त्वं मम पुत्रः । मानाध्मातोऽल्पधनोऽपि पृष्ट आह-महाधनोऽहमित्यादि ॥ ३ ॥ या च बुधैर्जिनादिभिरनाचीर्णा असत्यामृपा आम- त्रणि-प्रज्ञापनादिलक्षणा अविधिपूर्वक खरादिप्रकारेण।न ता भापेत् प्रज्ञावान्-बुद्धिमान्-साबुरिति गाथार्थः ॥४॥ ७-1. एवं वक्ष्यमाणन्यायेन शिष्यो भणतीति शेषः । ७-9. तेय ति–तान् योगान् । * इद पद चूर्या नोपलभ्यते। + - + . २ - . ४० श्रीचन्द्रसूरिसंरचिता [७-10. ८-14 - ७--10. का अविसोही-किन्तु विशुद्धिरेव तत्र विद्यते । ७-11. सुहुमपमाय-ययोक्तविधिहासोऽलक्ष्यो यः गुरुसंदिष्टो यथा आलोचयति । ७~-12. पुव्वं व त्ति-कार्यकरणकालात् । ७-14. गहणे त्ति-प्राकृतत्वात् ग्रहणानीति दृश्यम् । ७--16. सेज त्ति-वसतिः । पायपुंछणं-रजोहरणं उपवेशनरूपं च । ७--17. ओहिय इति--'मोघेण जस्स गहणं भोगो पुण कारणा स ओहोही' । ओघोपधिः सः । 'जस्स य दुर्ग पि नियमा कारणाओ सो उवग्गहिओ ॥' ७-18. गहणं तु त्ति-गणं कथनमित्यर्थ. । -21. कुलगणे त्ति-कुलं नागेन्द्रादिः, गण- कोटिकादिः । ७-23. बहियाणिग्गमो त्ति-किमपेक्ष्य वहिरित्याह ।- गुरुमूलाओ ति । किमर्थ यातीत्याह- कुलेत्यादि । ७-24. चेइय दुविहमेयतहव्वेत्यादि-चैत्यं पञ्चधा-साधर्मिकचैत्यं, यथा वा रक्तकसाध्वादीनां प्रतिकृतिरूपम् १ । मङ्गलचैवं गृहद्वारदेशादिनिकुहितप्रतिमारूपम् २ । शाश्वतचैत्यं नन्दीश्वरादिव्यवस्थितम् ३ । भकिचैत्यं भक्त्या क्रियमाणं जिनायतनम् , तच द्विधा-साधुनिश्रया क्रियमाणं निश्राकृतम् ४.। तदनिश्रया तु विधीय- मानमनिश्राकृतम् ५। तस्य सामान्येन जिनायतनाख्यचैत्यस्य द्रव्यं हिरण्यसुवर्णादिरूपम् , तस्य विनाशे जायमाने; तथा तद्रव्यविनाशने तस्य चैत्यस्य द्रव्यं उपकारकं दारूपलेष्टकादिवस्तु तस्य विनाशने सम्पद्यमाने द्विविधमेदे, त्त(१)त नलग्नोत्पाटितभेदतो द्विप्रकारभेदे-मूलोत्तरभेदाद्वा द्विविधभेदे । तत्र मूलं स्तम्भकुम्भकादि, उत्तरं तु छादनादि । खपक्षपरपक्षजनितविनाशाद्वैविध्याद्विविधभेदे । इह चैत्यतव्यविनाशमुपेक्षमाणः साधुरनन्तसासारिको भवती- त्युक्तम् । द्रम्मादिद्रव्यं काष्ठादिदलं चेत्यादिना द्विविधभेदं यत्तद्रव्यं चैत्यद्रव्यं तस्य विनाशस्य निवारणादीनि कर्तु निर्गतो भवतीति चूर्ण्यक्षरार्थः । ७-25. पाडिहारियं-याचितकम् । अप्पणत्थं-समर्पणाय । ७-28. सन्नायग त्ति-खजनाः । ८-1. पासवण त्ति-मूत्रं भूमौ व्युत्सृष्टं वोसिरइ ति मात्रके। ८-6. असिवं व्यन्तरादिकृतोपद्रवम् । ओमं ति दुर्भिक्षम् । राजदुष्टः प्रत्यनीकपतिः। ग्लानो मन्दः । उत्तमार्थ पर्यन्तक्रियाराधनविपयः । ८-7. चक्कथूभ त्ति-ऋषभजिनपदस्थाने वाहुवलिविनिर्मितं तक्षशिलानगर्या रत्नमयधर्मचक्रं तद्दर्शनाय व्रजति । स्तूपो मथुरायाम् । प्रतिमा जीवन्तखामिसम्वन्धिनी पुरिकायाम् । यत्र सौरिकपुरादौ अर्हतो जन्म, निष्क्र- मणभुवं उज्नयंतादि द्रष्टुम् , ज्ञानं तत्रैवोत्पन्नम् । निर्वाणभूमि-दर्शनार्थं च प्रयाति । [वइग] वजिक-गोकुलम् । सहडिप्रेक्षा विवाहादिप्रेक्षणम् , आदिशब्दात् शोभनाहार शोभनोपधिर्यत्र लभ्यते । रम्यदेशदर्शनार्थ च व्रजतीति गृह्यते । ८-13. अप्पा० गाहा । अल्पशब्दोऽभाववाची सर्वपदेषु । तेन मूलगुणविपया विराधना अल्पा न का- चित् । पार्श्वस्थाऽवसन्नादिषु दाने ग्रहणे च न काचित् । सम्प्रयोग. सम्पर्कः । स पावस्थादिभिः सह न आसीत् । ओह त्ति-इयमोघत. सक्षेपत आलोचना । ८-14. अन्नम्मि वेलाए त्ति-अर्वमासाभ्यन्तरेऽपि, अन्यस्मिन् सातिचारे, समुद्देशवेलायां भन्यस्यां वेलायां विभागतो विशेषत आलोचनीयम् । - . -- - ८-16. ९-5] जीतकल्पचूर्णि-विपमपदव्याख्या ८-16. संविग्ग त्ति-संविनाः प्रियदृढधर्माणः । ८-18. श्रुतग्रहणायान्याचार्यमुपसम्पद्यमानस्य श्रुतोपसम्पत् । सुखं वा दुःखं वा समं सोढव्यमिति सुखदुःखो- पसम्पत् । यथा क्षेत्रे वसतः मार्गे व्रजतश्च मम भवदीया निति सा तथाविधोपसम्पत् । विनयकरणार्थमुपसम्पद्यते यत्र गच्छान्तरे सा तथेति । तदुक्तं भाष्यकृता- उवसंपय पंचविहं सुयसुदुक्खे य खेत्तमग्गे य । विणयोवसंपया वि य पंचविहा होइ नायव्वा ।। ८-20. विभागेण-विशेषेण । ८-25. तद्वाण ति-वेषा मिथ्यादुष्कृतकरणस्थानानां वरूपनिरूपणाय । ८-32. अहिक्खेवो त्ति-किं भवान् जानाति; जात्याद्युद्धटनादि वा । तथा च वक्ति- डहरो अकुलीणो त्ति य दुम्मेहो दमगमंदबुद्धि त्ति । अवि अप्पलाभवु(ल)द्धी सिस्सो परिभवइ आयरियं ॥ ९-1. जाइकम्माईहिं ति–अहो सन्तापिता वयमनेन रे वालिकेनेति । ९-2. जमलिय त्ति-समश्रेण्या गच्छति । पुरोऽप्रतः स्थितो ब्रजति । गुरुं प्रतीत्याभ्युत्थानकरणादिको यो विनयः कायिकस्तस्य भङ्गोऽकरणम् । • इच्छा० गाहा । उवसंपया० गाहा-व्याख्या-इच्छया बलाभियोगमन्तरेण करणं इच्छाकार:- इच्छाक्रिया । तथा चेच्छाकारेण ममेदं कुरु । इच्छाक्रियया न वलाभियोगपूर्विकयेति भावः ॥ १॥ तथा मिथ्या- वितथानृतमिति पर्याय.। मिथ्याकरणं मिथ्याकारः मिथ्याक्रियेत्यर्थः । तथा च संयमयोगवितथाचरणे विदितजिनवच- नसाराः साधवस्तक्रियाया वैतथ्यप्रदर्शनाय मिथ्याकारं कुर्वते मिथ्याक्रियेयमिति हृदयम् ॥२॥ तथाकरणं तथाकार, स च सूत्रप्रश्नगोचरो यथा भवद्भिरुकं तथेदमित्येवंरूप.॥३॥ अवश्यकर्तव्यैर्योगैर्निष्पन्ना आवशि(श्य)की वसतेर्निर्ग- च्छद्भिर्या क्रियते ॥ ४ ॥ निषेधेन निर्वृत्ता नैपिधिकी, वसती प्रविशद्भिर्या विधीयते ॥ ५॥ आपृच्छनमापृच्छा, सा विहारभूमिगमनादिषु प्रयोजनेषु गुरो. कार्या ॥ ६ ॥ तथा प्रतिपृच्छा, सा च प्रामियुक्तेनापि कार्यकरणकाले कार्या, निषिद्धेन वा प्रयोजनत. कर्तुकामेनेति ॥ ७॥ तथा छन्दना च, प्राग् गृहीतेनाशनादिना कार्या, भवन्तो गृह्णन्तु ॥ ८॥ तथा निमन्त्रणा, अगृहीतेनैवाशनादिना अहं भवदर्थमशनाद्यानयामीत्येवंभूता ॥ ९ ॥ तथा चाभिहितम्- आपुच्छणा उ कजे, पुन्वनिसिद्धेन होइ पडिपुच्छा । पुन्वगहिएण छंदण-निमंतणा होइ अगहिएण ॥ ९-5. [उवसंपयाओ]-ज्ञानदर्शनचारित्रार्थमुपसम्पच्च विधेया ॥ १०॥ इत्यादि शब्देन गृप्यते । लहु- सगं-सूक्ष्मम् , तत्खरूपं गाथाद्वयेन दर्शयति-पयलेत्यादिना । व्याख्या-पयल त्ति-दिवा कोइ साहू पय- लंतोऽनेण साहुणा भन्नइ-'कि दिवा पयलायसि ?' । तेण भणियं-'न पयला मि' । एवमवलवन्तस्स मासलहुयोगो लहु मुसावाओ । एवं जत्य जत्य मासलहु तत्थ तत्थ सुहमो य मुसावाओ ॥ १ ॥ ओल्ले त्ति-ओलं, वासं । कोइ साहू वासे पडमाणे अन्नयरपओयणे पडि(हि)ओ। अन्नेण साहुणा भन्नइ-'अज्जो कि वञ्चसि ? वासते । पडि(ठि)य साहुणा तओ भन्नइ-'वासते हं न गच्छे ।' एवं भणिऊण वासते चेव पडि(ट्ठि)ओ। तेण साहुणा भणियं-'नणु अलियं ।' इयरो पच्चाह-न । कथं? । उच्यते-नणु वासविंदवो एए । वास पाणियं तस्स एए बिंदवो थिवुगा। वृष्टिरिह आर्द्रत्वेचतुः (१) सा नेयं ॥ २॥ मरुय त्ति-कोइ साहू कारणविणि[ग्ग]ओ उवस्सयमागंतूण भणइ-निग्गह, मरुया द्विजा भुजते, अम्हे वि तत्थ गच्छामो ।' ते साहू जाव संपट्टिया-कहिं ते भुञ्जन्ति ? मिक्षाटने न दृष्टाः। तेण भन्नइनणु सव्वगेहेसु-आत्मीयगृहेष्विति ॥ ३ ॥ पञ्चक्खाणे त्ति-कोह साहू केणइ साहुणा उदग्गभोयणमण्डलिवेलाकाले भणिमओ-एहि भुजसु' । तेण भणियं-'भुजह तुम्भे; पचक्खायं ममेति ।' एवं भणिऊण मंडि]लीए तक्खणा चेव अँजिओ। तेण साहुणा वुत्तो-'अज्जो तुम भणसि मम पञ्चक्खाय' । सो भणइ-कहं न, नणु पाणाइवायाइया अविरइ सा मए पचक्खाया ।' अवयं प्रत्या- ख्यातमिति भावः ॥ ४ ॥ गमणे त्ति-केणइ साहुणा चेइयवंदणाइपओयणे वश्चमाणेण अन्नो साहू भणिो --'वच्चसि ?' । सो भणइ–'नाहं वच्चे, वच्च तुमं ।' सो साहू पयाओ । इयरो वि तस्स मग्गओ तक्खणादेव पयाओ। तओ साहुणा पुच्छिओ-'कहं न वच्चामि त्ति भणिऊण वचसि ?' सो भणइ-'सिद्धन्तं न जाणसि । 7 म -- - -- ६ जी० क० चु० - । ४२ श्रीचन्द्रसूरिसंरचिता [९-8. ९-11 कहं ? । उच्यते-नणु गम्मइ गम्ममाणं, न अगम्ममाणं । जम्मि समएऽहं तुमे पुट्ठो, तम्मि समए न चेवाहं गच्छो ॥ ५॥ परियाए त्ति-कोइ साहू केणइ साहुणा वंदिउँ कामेण पुच्छिओ-'कइ वरिसाणि ते परि- याओ? ।' सो एवं पुच्छिओ भणइ-'एयस्स साहुस्स मज्झ य दसवरिसाणि' परियाओ ।' छलवादमझीकृत्य ब्रवीति । सो पुच्छंतगसाहू भणइ–'मम नववरिसाणि परियाओ।' एयस्स य वे पंचगा दसओ, इति मा पादपतनं कुरु ॥ ६ ॥ समुद्देस त्ति-कोइ साहू कारणनिग्गओ रविं परिवेसपरिवियतं दद्दूण ते साहवो सत्थे अस्थमाणे तुरियं भणइ-'भोजनवेला वर्तते, उढेह ।' साहू गहियभायणा उठ्ठिया भिक्षाटनाय । पुच्छंति- 'कत्थ समुद्देसः ?' छलवादी प्राह-नणु एस गमणमग्गम्मि। आदिच्चे गहणं राहुणा क्रियमाणं दर्शयति ॥ ७ ॥ संखडे त्ति-कोइ साहू पढमालिय पाणगाइ विणिग्गओ पञ्चायाओ भणइ-इह अज्ज निवेशे पठराओ संख- डीओ।' ते य साहवो मिक्षाटने गन्तुकामा इच्छंति [अत्र कियान् पाठः खण्डितः प्रतिभाति ॥ खुड्डग त्ति-] 'कोइ साहू उवस्सयसमीवे मयं सुणही दळूण खुडगं भणइ-'क्षुल्लक ! तव माता मृता।' ताहे सो खुडओ परुण्णो । तं स्यंत दळूण साहू भणइ--'मा रुय, जियइ त्ति' । एवं भणिए खुडो अन्ने य साहुं भणंति-'किं तुमं भणासि जहा मया ?' । सो मुसावायसाहू भणइ-'एसा साणी जा मया, सा तुज्झ माया भवति' । 'कहं माया भवइ ?' अतीयकाले भविंसु । जओ भगवओ भणइ-एगमेगस्स णं जीवस्स सव्वजीवा माइत्ताए भज्जपुत्तधूयत्ताए भूयपुव्वा । तेण साणी [माया] भवति ॥९॥ परिहारिय त्ति-कोइ साहू उजाणाइसु ओसन्नाइ दटुं भागंतूण भणइ-'मए दिट्ठा परिहारिया' । सो छलेण कहइ, इयरे साहवो जाणंति-जहा परि- हारतवावन्ना अणेण दिठ्ठा उज्जतविहारिणः । तदनु तद्दर्शनाय गमनादौ कृते यावद् दृष्टा' पार्श्वस्थाः। तदसौ छल- वादी उत्तरयति-'नन्वेतेऽपि परिहारिका अभक्षादिपरिहरणात् । परिहरन्तीति परिहारिका इति कृत्वा' ॥ १० ॥ मुहीओ त्ति-एगो साहू विहा(या b)रभूमिं गो-'उन्नाणदेसे इत्थी घोडमुही दिट्ठत्ति साहूणं कहेइ । अश्वमुखी स्त्री इत्यर्थः । जनगमने घोटिकां कथयति ॥११॥ अवसगमणं ति-कोइ साहू केणइ साहुणा पुच्छिओ-'अज्जो गच्छसि भिक्खायरियाए ' सो भणइ–'अवस्सं गच्छामि । तेण साहुणा पगिहियभायणोवगरणेण भन्नइ-~-'एहि बच्चामो' । सो पच्चाह-'अवस्सगंतव्वे न ताव गच्छामि' । 'किं न जासि ?' पुच्छिओ भणइ-वेला न ताव वट्टइ' परलोगगमणवेला मोक्खगमणवेला वा न ताव जायइ । तो न ताव गच्छामि । परं अवस्स परलोगं मोक्खं वा गमिष्यामीत्यर्थः ॥ १२ ॥ दिस त्तिएगो साहू एगेण साहुणा पुच्छिओ-'अज्जो कयरं दिसं भिक्खायरियाए गमिस्ससि ? । सो भणइ-'पुव्वं ।' सो पुच्छंतगसाहू अग्गाहेऊण गओ अवर दिस । इयरो वि पुष्वदिसगमणवाई अवरं गओ। 'अज्जो ! तुमे भणियं "अहं पुन्वं गमिस्सामि।" कीस अवरदिसमागओ ?' एवं पुट्ठो भणइ-'अन्नस्स अवार]गामस्स इमा पुव्वा किं न भवइ ?। भवइ चेव ॥ १३ ॥ एगकुले त्ति-कुलं गृहं भिक्खनिमित्तुट्ठिएण साहुणा भन्नइ-'अजो। एहि वयामो भिक्खाए' । सो भणइ-'अहमेगकुलं गच्छं, एगकुले एव मया अटितव्यं । वच्चह तुभे । गया साहवो। सो वि य पच्छा वहुकुलायं पविसइ । तेहिं साहूहिं भणिओ-'अज्ज ! तुमे भणियं-एग- कुले पविस्सिसं ।' बहुकुलपवेसे पुट्ठो भणइ-कहं एगसरीरेण दोनि कुले पविस्सिस्सं । एगं चेव कुलं पविसे ॥१४॥ एगदम्वे त्ति-साहुणा एगेण एगो साहू भन्नइ-'वयामो भिक्खाए।' सो भणइ-'वञ्चह तुम्मे । एकमेव मया द्रव्यं ग्रहीतव्यं । तओ ओयणदोव्वगाइ बहुदव्वे गिण्हंतो तेसिं (हिं) साहहिं दिह्रो भणिओ य-'मज्जो ! तुमे भणियं-एगं दव्वं घेच्छं, कहं अणेगाणि गिण्हसि ?' । अत्थो-धम्मत्थिकायाईणि दव्वाणि छ तेसिं धम्माइयाणं मज्झे गहणलक्खणो पुगलत्थिकाओ एगो चेव । अन्नेसिं गहणलक्खणं नत्थि । तम्हा अहं एग दव्वं गिण्हामि बहुग्गहणेऽपि सति समस्तान्यपि द्रव्यमेकमेव ॥ १५॥ ९-8. लहुसादिण्णं पुणेत्यादि-सूक्ष्मादत्तं उपलादिप्रहणविषयम् । ९-9. इत्तिरियं-अल्पकामं वृक्षादिच्छायावमहादौ विश्रमणाय । ९-10. लहुसमुच्छा द्रव्यक्षेत्रकालभावभेदाच्चतुर्धा तां क्रमेणाह-लहुसमुच्छा इत्यादि । कागाइसा' णेत्ति शय्यातरगृहादौ काकादिपातं निवारयति, बलीवर्दकल्पष्ठकं लघुपुत्रादि रक्षति ॥ १॥ ९-11. खेत्ते ओवास त्ति-अवकाशः प्रतिक्रमणादिस्थानप्रवेशः । ।
९-12. ११-14 ] जीतकल्पचूर्णि-विषमपदव्याख्या ९-12. रागदोसाइ मासमध्येपि ॥ एत्थ त्ति-काकादौ । ठाणा-आपत्तिस्थान; घेप्पन्ति~-प्रतिक. मणाईमध्ये । ९-17. असंकिलिट्टकम्मं ति-कुष्ठादौ शरीरक्रियायाम् । छेदनं दुष्टामस्य । पीलनं रुधिरादिकर्मणः । भेदनं पक्कादिगडस्य । संघर्षण दवादे.। अभिघातसेचनं लगुडादिप्रहारस्योष्णजलादिना । कायखाराइ प्रसूत्यादिषु । असुसिरं पुतादिः, सुसिरं उदरादि । अणन्तरं अव्यवहितम् । परम्परं वनादिना व्यवहितमाम् ; इत्यादिकं असंक्लिष्टकर्म । कन्दर्प'-वाचिको नर्मादिभाषणम् ; कायिकश्च धावनादिक. । ९-22. सव्वपदाणि-दसणाईणि २४ । ९-25. छूढे--उत्क्षिप्ते । पमादो अज्ञा[ना]दिकस्तेन । असंपउत्तस्स-असंयुकस्य पञ्चविधप्रमादर- हितस्य । णोवजुत्तस्स-विस्मृतिरहितस्तस्य । ९-30. सन्नित्ति-संज्ञानं सज्ञा-देवगुरुधर्मपरिज्ञानं, तद्यस्यास्ति स संज्ञी श्रावकः । सन्नायगा-संज्ञा- तकाः खजना मातापित्रादिका. । भयं--सप्तप्रकारं प्रसिद्धं । सोगो-अनिष्टानां द्रव्याणां सयोगेन शोकः । इष्टानां वियोगेन । ९-32. बाउसत्तं-बकुशत्वं कश्मलचारित्रत्वम् । वउस सबलं कव्युरमेगटुं तमिह जस्प चारित्तं । अइयारपंकभावा सो बउसो होइ नायवो ॥ १०-4. संभमो-संभ्रम. संक्षोभः । भयं-दस्युविषयं । दस्यवश्चौराः । मिलक्खुम्लेच्छाः। वो- हिय त्ति-बन्दिकाः । मालवा-उज्जयनीतस्कराः । आतुरः-पीडितः । दिगिंछा-बुभुक्षा तृष्णादिभिः । १०-6. [वोच्छिन्नमडंबाइ]-वोच्छिना जस्स सव्वासु वि दिसासु नस्थि कोइ अन्नो गामो नगरं वा तं, पार्श्वग्रामादिरहितं मडम्वं । तथा च-महम्वं सबओ च्छिन्नमिति पठ्यते । १०-8. अणप्पवसओ-हस्त्यादिपरवशस्य । कारणेहि-संभ्रमादिमिः प्रदर्शितैः । पवणाय विराधये- दिति शेष.। १०-10. मृषावादः कूटसाक्षित्वेन । मैथुनं अतिक्रमादिना । रात्रिभोजनं दियाग हियाइभेदतः । दीर्घमार्गे मजता घृतमिश्रकेल कादिरूपोऽध्वानकस. । लेवाडइय त्ति-झीरानादि उत्सर्गतो न प्राह्यम् तदप्यापयेत । १०-15. दुच्चिन्तियं-कुंकणार्यकवत् वनदवदानचिन्तनादि । दुर्भाषितं अभूभृतोद्भावनादि । दुश्चेष्टितं धावनादि। १०-25. उवहि त्ति-ओहेण जस्स गहणं, भोगो पुण कारणा स ओहोही। जस्स दुगं पि नियमा, कारणओ सो उवग्गहिओ ॥ १०-29. अशङ्कितं निर्णीत दोषवदेवेदमिति, दोषवत्त्वेन। विहिण त्ति-अणावायमसंलोए इत्यादिकया। १०-31. [कालाइच्छियं-] प्रथमप्रहरगृहीतं तृतीयप्रहरान्तं यावद् ध्रियते अशनपानादि तत्कालाति- झान्तम् । [अद्धाणाइच्छियं-] यद्दव्यूतद्वयात्परेणानीतं नीतं वा परिभुज्यते तदध्वानातिक्रान्तम् । १०-32. इंदियमाइहिं ति-इन्द्रियमाया-इन्द्रजालादिभिः । चक्षुरादि-इन्द्रियाणां विक्रिया आसाढभू. तिवत् । गिलाणेत्यादि-ग्लानादिव्यावृतत्वेन । सागारिका वा परिष्ठाप्यस्थाने सन्ति । स्थण्डिलस्य वाऽभावः। चोरादि भयं वा तत्रेयशनादि परिष्ठाप्यातिक्रमेऽपि विधिना परिठापयन् शुद्धः । दुर्लभद्रव्यप्राप्ती सहसात् लाभो ११-7. गमणं-- अन्नत्य हत्थसयवाहि । ११-9. पट्ठवण चि-अनुयोगप्रारम्भादिविषया । पडिक्कमण न्ति अनुयोगस्य । परियट्टणा गुणनम् । ११-10. अणवजसुमिणं दु स्वप्न । दुर्निमित्तं अपश्रुतिगोचरम् । दुःशकुनादेः प्रतिघातार्थम् । अष्टोच्छा- सोत्सर्गकृतिरिति युक्तम् । तत्र वक्ष्यमाणगाथोक्तादिशब्दसूचितोऽयमर्थ. । ११--12. उज्जाणी-परकुयट । णईसंतारो-नद्युत्तरणम् । ११-14. संघट्ट-१ संघट्ट २ लेव ३ उपरिलेपैत्रिरूपो नदीसन्तारस्वत्र जार्घः संघटः । १ । नाभि यावतू लेपः । २। परेण लेवुवरि-नाभेरुपरि । ३ । बाहु उडुपसुप्पाकादिश्चतुर्थः । ४ । वा जातः।
४४ श्रीचन्द्रसूरिसरचिता [११-16. १३-13 . ११-16. सयणासणाणं जायणत्थं गओ । ते य दाया घरे अस्थि । वाउलो वा । तो इरियं पडिक्क मिलण जं किंचि कालं सज्झायं करेइ । ११-20. हत्थमेत्ते विति-रेल्लए जाते इति शेषः । ११-28. छिजा त्ति-विभज्यते । पडिक्कमणं च अनुयोगस्य ज्ञेयम् । १२-1. आदिशब्दात् कालप्रतिक्रमणे चेति च ग्राह्यम् , कालादिविपर्ययात् । ज्ञानाचारातिचारो भवति । व्यजनादिभेदाद्वाकृतात् । १२-5. हीलयति -वा यो गुरुम् । १२-12. ओरसो त्ति-आन्तरः। १२-15. वञ्जयति-व्यज्यते । सन्न त्ति-संज्ञाभिधानम् । १२-16. अन्नाभिहाणेण वा भणइ त्ति-यथा 'धम्मो मंगल'मित्यादिपरित्यागेन 'पुग्नं कल्लाणमुत्तम, दयासंवरनिज्जरा' इत्यादि नामान्तरेण । अर्थभेदस्तैरेव व्यञ्जनैर्यत्र विकल्प्यते, यथा आचारसूत्रे आवन्त्यध्ययनमध्ये 'आवंती के आवन्ती लोगसि विप्परामसन्ती ति-अन्योऽर्थः कल्प्यते-'आवन्ति होइ देसो तत्थ उ अरहकूवना केया । सा पडिया हेढे ऊ तं लोगो विप्परामसइ ।' यन सूत्रार्थों द्वावपि विनश्येते स तदुभयातिचारः । यथा- धम्मो मंगलमुक्कत्थो अहिंसा पव्वयमत्थए । देवावि तस्स नस्सति जस्स धम्मे सया मसी ॥ अहागडेसु रंचंति कडेसु रहकारिओ । रणो भत्तंसि णो जत्थ गद्दभो जत्थ दीसह ॥ अत्र सूत्रं अर्थश्च द्वावपि विनश्यते । उभयविनाशे चरणनाशस्तदभावे मोक्षाभावस्वदभावाद्दीक्षानरर्थक्यम् । १२-19. अणागाढे सुए-दसवैकालिकादिके उद्देशकस्यातिचारेऽकालातिपाठे निर्वि० । आगाढे उत्तराध्य- यनभगवत्यादिके श्रुते उद्देशकादिस्थानेषु पुरिमार्धादि क्षमणान्तम् । अर्थेऽप्येवम् । १२-22. ओहेण-आगाढाणागाढादिभेदतोऽविशेषे । १२-23. कमेण अहिजंतो त्ति-क्रमश्चायं- ति वरिसपरियागस्स उ आयापकप्पनाममज्झयणं । चउवरिसस्स सम्मं सूयगडं नाम अंग ति ॥ १ ॥ दसकप्पव्ववहारा संवत्सरपणगदिक्खियस्सेव । ठाणं समवाओ विय अंगेए अट्ठवासस्स ॥ २ ॥ दसवासस्स वियाहा एकारस वासयस्स इमे उ । खुहियविमाणमाई अज्झयणा पंच नायव्वा ॥ ३ ॥ वारसवासस्स तहा अरुणुववायाइ पंच अज्झयणा । तेरसवासस्स तहा उठाणसुयाइया चउरो ॥ ४ ॥ एगूणवीसगस्स ओ दिट्ठीवाओ दुवालसममंगं । संपुन्नवीसव रिसो अणुवाई सव्वसुत्तस्स ॥ ५॥ जं केवलिणा भणियं केवलनाणेण तत्तओ नाउं । तस्सन्नहा विहाणे आणाभंगो महापावो ॥ ६ ॥ १२-24. [अपत्तो]-तत्सूत्रमर्थ वा विवक्षितशास्त्रसत्कं क्रमेणाधीयानो न प्राप्नोति; पठनविषये व्रतादि पर्यायो वा यस्य न पूर्यते सोऽप्राप्तः । अन्यश्चायोग्यो य. सो अपत्तो त्ति-अपात्रं । स च तिन्तिणिकादिक । तितिणिओ स्तोकोक्तऽपि यत्किञ्चनभापी । चलचित्त -अस्थिरचित्तः । गणाद्गणान्तरं संक्रमणशीलो वाऽपात्रम् । अन्यश्चाव्यक्त.-अपात्रम् । अव्यक्तता च वयसाऽतिलघुः । वयश्च प्राणिनां कालकृता शारीरावस्था । श्रुतेन चात्य- ल्पश्रुतोऽव्यकः । एतेषा सर्वेषामप्राप्तादीना वाचना-श्रुतपाठनम् । १२-26. जइ पत्तं प्राप्तं । सुएण श्रुतिक्रमेण । पत्तं वा पात्रं-योग्यम् । १२-30. निसेज ति-आचार्ययोग्याम् । च शब्दात् वन्दनकायोत्सर्गों अनुयोगप्रारम्भे उत्सर्गत आयंबिलम् । १२-34. विगई भुजेऊण त्ति-जोगसमत्तीए तां भुक्त्वा पश्चात्कायोत्सर्ग विधत्ते । एगटुं ति एकत्र विकृतिमाचाम्लप्रायोग्यं च गृह्णाति । १३-5. संकादयोऽष्टा ८ । १३-11. [भइमो]~भजामः सेवयामः कुर्म इत्यर्थः । १३-13. मंडलि त्ति-तस्यां सर्वे संसृष्टभोज[जि]नः । मोय त्ति-योगः । जल्ल त्ति-सर्वे मलग्रस्ताः । पूजा राजादिभिः क्रियमाणा कुतीर्थिनाम् । अतिशयाद्वा मन्त्रादिकाः, मतानि वा तदागमान श्रुत्वा । - un - १३-16. १५-11] जीतकल्पचूर्णि-विपमपदव्याख्या १३--16. सिच्छत्ताइसु-मिथ्यादृष्टिचरकादीनाम् । उववूहा-उपहा अप्रशस्ता । १३-19. एवं शङ्कादीन् प्ररूप्य प्रायश्चित्तं चिन्त्यम्-मिच्छत्ताईणं ति। स्थिरीकरणादीनामादिशब्दा- गृहीतानाम् । १३-23. च शब्देन देशे क्षमणमिति योगः । १३-24. ओहो त्ति--पुरुषानपेक्षया । असु वि त्ति मिथ्यात्वविपयेषु च सर्वतोऽष्टाखपि देशरूपासु मिक्षुवृषभउपाध्यायाचार्याणां चतुर्णा यथासंख्यं पुरिमर्दादि यथोपदिष्टम् । तच देसे भिक्खुस्सेत्यादिना दर्शितम् । मिथ्यात्वविषयेषु च सर्वतोऽष्टाखपि मूलमिति वक्ष्यति । १३-26. प्रशस्तेषूपवृंहणादिषु यत्यादिविषयेषु इदमाह-एवं चिय इत्यादि । यतिविषयाणां उपहादीनाम- विधाने । अणन्तरुदिटुं ति-पुरिमाई खमणंतमित्येतत् । १३-31. तप्पसाएणं ति-पार्श्वस्थादिप्रसादतस्तदवशात् । पार्श्वस्थादीनां परिपालनादिकं वाच्छल्यं कुर्वतां भिक्षुप्रमृतीना यथोपदिष्टं प्रायश्चित्तम् । १४-6. ननु पृथिव्यादीनां चतुर्णा भवतु संघट्टनं अप्कार्य प्रति कथं संघटनादि संभवति, द्रवरूपत्वेन स्पर्शऽपि मरणं संभवादित्याह-आउक्काएत्यादि । १४-7. इसिं मनाक् । घटादिस्थस्य चालने पादादिना संघटः । परितापो गाढतरचालना । उद्दवणं च वहिना परितापनं । हननं दण्डादिना । पानेन चरणादिक्षालनादिना च उद्दवणं अप्कायस्य । १४-9. अणागाढा अनिर्भराम् । पञ्चेन्द्रियसंघट्टश्च तदईजातमूषिकागिरोलिकादिसर्व विषयो दृश्यः । १४-13. पमाय०-प्रमादतोऽपद्रापणे । एककल्लाणगं । नि० । पु० । ए० । आ० । उ० । इत्येककल्या- णकादिविषयः। १४-15. तत्र मृषावादो धर्मास्तिकायादिसर्वद्रव्यविषयः । अदत्तादानं प्रहणधारणीयवस्तुविषयम् । परिप्रहस्तु सचित्ताचित्तमिश्रसर्वद्रव्यविषयः । क्षेत्रतो लोकालोकविषयौ मृषावादपरिग्रही । अदत्तादानं च प्रामाद्याश्रयम् । कालतच दिवारात्रौ वा । भावतो रागतो देसतो वा । त्रितयमपि जघन्यादिवस्तुविपयं मृपावादाद्यपि जघन्यायुच्यते । १४-20. लेवाडयपरिवासे पात्रतुम्बकपात्रावन्धखरण्टितपर्युषितत्वे अभत्तहो । सुंठ्यादौ च । १४-22. पढमभंगो त्ति-दिवा गृहीतं दिवा भुक्तं पर रात्र्युषितं द्रष्टव्यमित्याद्यो भागः ।। दिवा गृहीतं रजन्यां भुक्तमिति द्वितीयः ।२। रजन्या गृहीतं दिवा भुक्तमिति तृतीयः ।३। रजन्यां गृहीतं तस्यामेव भुक्तमिति चतुर्थः ।४। द्वित्रिचतुर्थेष्वष्टमम् । १४-33. मोहुइसियं जमप्पणोढाए रद्धं तम्मज्झाओ भिक्खाओ कइ विकप्पइ, दानार्थ य एष्यति तस्मै दत्ते १ । उद्देसकडे कम्मे एकेके चउन्विहो मेओ-जावंतियमुद्देसं, पासडीणं भवे समुद्देसं, समणाणं आएसं, निरगंथाणं समाएसमिति चत्वारो मेदाः । तत्राये जाव इइ उक्कोइएयस्सइ पासंडीणं दायन्वं न गिहत्याणं २ । निर्मन्थशाक्यादिमेदतः पञ्चधा श्रमणास्तेषाम् ३ । निग्गन्थाण साहूणमेव नऽनेसि ४ । तत्थ संखडिभुत्तुन्वरियं चउन्हमुद्दिसइ जं तमुदिडं । वंजणमीसाइकडं करंवादिकं । तमग्गितवियाइ पुण कम्मं गुलं विग्धारेऊण मोयए वंघिज्जा-इति कर्मोद्देसिकं । १५-7. यावदर्थिकमिश्रपासंडमिश्र[ साधुमिश्र भेदतस्त्रिधा मिश्रम् । यत्र खगृहयोग्यजलकणादीनां मध्ये अधिकतरजलकणादीन् मिश्रितान् कृत्वा यदशनादि प्रथमतोऽग्निज्वालनाद्रहणदानादिप्रस्ताव एव राखुमारभते । यावदर्थिकाद्यर्थ तत्रिधा। १५-9. संघाडगस्स एगो भिक्खग्गाही । वीओ दिसुवओगं देइ । तइए गिहे निप्फेडिया । इत्तरद्ववियं । तो परेण सर्वमेव चिरहवियं । १५-10.सुहुमा-कप्पट्ठगस्स भत्तं न देइ, भणद साहुस्स अट्ठाए उठ्ठिया तुज्झ वि दाहं ति । वायरा- कप्पट्ठिए विवाह काउकामो रहमईसु साहुसमागमं जाणिऊण ओसकणं करेजा। १५-11. आहारसेज्जाइयं साहुणो भुंजिस्संति, रंधिउं अन्नो सव्वमेवाहारं वहिं नीणेइ साहुअट्ठाए । एयं पागडकरणं । रयणप्पईवजोईवायायणकुछेहाइएहिं उज्जोयकरणं साहुभट्टाए [एयं पगा-] सकरणं ।
श्रीचन्द्रसूरिसंरचिता [१५-16. १५-29 १५-16. आहडं ति-सग्गामाहडे निप्पचवायाए ।४। आहडं चिय आइन्नमणाइन्नं च, तिघरंतरमाइन्न । १५-18. दईरक जतुग्रंथ्यादिरूपः । पिहितं च छगणादिना ओलित्तं । १५-19. मालं सीककप्रासादोपरितलादिकमभिप्रेतम् । तस्मादाहृतं करग्राह्यं यदन्नादि दात्री ददाति तन्मा- लापहृतम् । नवरं त्रिधा एतज्जघन्यमध्यमोत्कृष्टभेदतः । जघन्योत्कृष्टयोरन्तरे मध्यमो गम्यत एवेति नोक्तम् । पाण्ड(गुं)त्पाटनमात्रस्तोकक्रियागृहीतत्वाजघन्यं लघु । मञ्चकाद्यधो दत्वा यद्ददाति शिक्ककादेस्तन्मध्यमं माला. पद्दतम् । यदा च उच्चत्तरशिक्ककादेलाकादिग्रहणाय मूडकनिश्रेण्याधुदूखलं वा अधो दत्वा तस्मात् ददाति तदोत्कृष्टं भवति । अत्राप्यायामम् । १५-20. अच्छेजं ति-प्रभुहादिनायकः, अन्येषां दरिद्रकौटुम्बिकानां बलादातुमनीप्सितामपि यद्देयं ददाति तत्प्रभुआच्छेद्यम् । खामी प्रामादिनायकः, स यदा साधून दृष्ट्वा कलहेनेतरथा वा कौटुम्बिकेभ्योऽश- नायुदाल्य ददाति तदा खाम्याच्छेद्यम् । स्तेनाश्चौरास्ते सार्थकेभ्यो वलादाच्छेद्य यत्पाथेयादि साधुभ्यो दास्तव स्तेन विषयाच्छेद्यम् । १५-21. अणिसटुं ति-बहुभिः साधारणं बहुजनसाहिकं यदशनादि संखज्यादौ खाम्यमनुज्ञातं यदेको दद्यात्तत्साधारणानिसृष्टम् । चोछको भोजनम् । यथा किल कश्चित्कीटम्बिको भक्ताहारकहस्तेन गृहात क्षेत्रे हालिकाना भोजनाय चोष्ठकं प्रस्थापयति । तत्र कौटुम्बिकेन साधूनां दानाय मुत्कलितचोल्लकमध्यात् यदि हालिकः किच्चि- साधव ददाति तदा चोल्लका निसृष्टम् । तथा जहस्य हस्तिनः सम्बन्धि पिण्डरूपं वस्तु राज्ञा गजेन' वाननुज्ञात- त्वादनिसृष्टं जष्टानिसृष्टम् । १५-22. यावदर्थिकाः समस्तार्थिनः । पाषण्डिकावरकादयः । साधवश्व निर्ग्रन्थाः। अत्र गृहिणः खार्थमग्नि- ज्वालनाद्याद्रहणदानान्ते आरंभे कृते सति पश्चात्स्वार्थकल्पितं तन्दुलमध्ये कर्पटिकार्थ तन्दुलादीनां माणकं संकल्पितं प्रक्षिप्य रानोति यदा, तदध्यवपूरकः । स च विधा-खगृहयावदर्थिकमिश्र , खगृहपाषण्डमिश्रः, स्वगृहसाधुमिश्र इति । इह आहाकम्म उद्देसियचरिमतियं, भत्तपाणपूइयं, पासंडसाहुमीस, बायरपाहुडिया दुविहा, अज्झोयर- चरिमदुगं एए छठग्गम दोसा भविसोही कोडी; विसोहिकोडीए अवयवेणाविच्छिकं सव्वमभोज्जं विष्ठादि(ति?) दुषेणेव भकं । विसोहिकोडीए पुण संथरणे परिढवेइ । अलंमे अन्नस्स असंथरंतो वा तम्मत्तमेव परिहवेइ । जइवि य अवयवा तहा विसुद्धो । १५-24. धाई पंचहा-खीरधाई मजण-मंडण-कीलावण-अकधाई वालपालिका स्त्री धात्रीत्वकरणमिति तत्त्वम् । एवं यथासंभवमन्यत्रापि । दूती परस्परसन्दिष्टार्थकथिका स्त्री~दूतीत्वकरणमित्यर्थः । तत्कथयति- खग्रामे परप्रामे वा । खनिवासप्रामस्यैव सत्केऽन्यस्मिन् पाटकादौ, परप्रामे वा संदेशक नीत्वायं पिण्डं लभते स दूतीपिण्डः । १५-25. अतीताद्यर्थसूचकं निमित्तं जातिकुलगणकर्मशिल्पानां कथनादिना आजीवनम् । १५-26. वनीपकत्वं पिंडट्ठा समणा-तिहि-माहण-किविण-सुणगाइ-मत्ताणं अप्पाणं तब्मत्तं दंसह जो सो वणीवमो त्ति । उउ(१)वर्णयति पिण्डार्थमात्मानं दायकाभिमतेषु श्रमणादिषु संमकं दर्शयतीति भकवशाद्वनीपकः । यद्वा वनी लब्धार्थरूपां पाति पालयतीति वनीपः, स एव वनीपकः । १५-27. चिकित्सा रोगप्रतीकारः। तत्र नाहं वेद्यो, अप्पणो वा अमुगो वाही अमुगदन्वेण फिटोत्ति, एमा सुहुमतिगिच्छा । वायरा वाय-सिंभ-सनिवाय-समुत्थाणं रोगाणं ओसहमाइयं साहइ । सयमे[व]से किरियं करेइ । वाहिवियारं किरियं वा से साहेइ ॥-क्रोधादयः प्रतीताः। १५-28. वयण-संथवो-पुल्विं गुणथुई काऊण पच्छा मग्गइ । पच्छासंथवो-नाम दिन्ने पच्छा संथवं करेइ 'अमुगत्र २ यूयं दृष्टाः' इत्यादि च । १५-29. सम्बन्धि-संथवो-नात्रकयोजनम् । मायापियाइओ पुव्वसंवन्धि संथवो; सासूससुराइयो पच्छासम्बन्धि-संथयो । विज्जा ससाहणा । असाहणो मंतो । इत्थी-पुरिस-विसेसो वा । चुण्णो अजणाइओ। पायपले- वाइओ जोगो । गर्भादानपरिसाडो मूलकम्मं ।
१५-31. १६-13] जीतकल्पचूर्णि-विषमपदव्याख्या ४७ १५-31. शक्षितं संभाविताधाकर्मादिदोष भक्तादि । चतूरूपो भगवतुर्भमः-प्रणे भोजने शक्षितः । भका- देहणकाले भोजनकाले च यदि पुनरमुकदोपवदिदमिति शानान् ।१। ग्रहणे शक्षितो न भोजने ॥२॥ भोजने शक्षितो न ग्रहणे ।३। न ग्रहणे न भोजने शङ्कितः ।४। इति । एतेषां संभवो यथा-गृहस्थेन प्रचुरां भिक्षा मिक्षाच- रेभ्यः खस्सै वा दीयमानं दृष्ट्वा चिन्तयति किं खगृहोपस्करतया साधुभिक्षाचरादिनिमित्तराद्धतया वा चेतसि शशितः। ततो लज्जा-सक्षोभादिना एनमर्थ गृहिणं प्रश्नयितुमशक्नुवन् शक्तिो गृह्णाति; शक्तिस्तथैव भुते ।। द्वितीयस्तथैव चेतसि शङ्कित तथैव गृहस्थं प्रश्नयितुमशक्नुवन् गृहीत्वा खोपाश्रये समागतस्ततो भोजनसमये तं दोलायमानचेतसं दृष्ट्वा अपरसाधुस्त शिक्षानि.शङ्कीकृतग्राही तदभिप्रायं ज्ञात्वा वदति यथा-साधोस्तद्गृहे प्रकरणं लाहणं वा समा- यातमिति-तद्वचः श्रुत्वा शुद्धमेतदिति निश्चित्य विगतशक्षापरिणामस्तद्भुढे इति द्वितीयः । गुरो. पुरतः खभिक्षा- तुल्यभिक्षामालोचयतः साधून श्रुत्वा सजातशङ्कश्चिन्तयति यथा-यत्वरूपा वही मया भिक्षा लब्धा अमुकगृहे; अन्यैरपि तत्र तत्स्वरूपैव वही लब्धा । ततो मा कदाचिदियमशुद्धा भविष्यतीति । तथा चासौ शक्तिचित्तत्तां भुत इति तृतीयः । चतुर्थस्तु सभवं प्रतीत्य सुगम एव । अत्र द्वितीयभोऽपि ग्रहणापेक्षयैव सदोष । परमार्थतस्तु शक्षितग्रहणदोषस्य निवर्तितत्वाच्छुद्ध एव । तृतीयो बहुतरमदोष. । उभयत्रापि भोजनशक्षितत्वेनाशुद्धत्वात् । अत. प्रथमतृतीयावाश्रित्य यत्प्रायश्चित्तं निरूपयति । य कञ्चन दोषमाधाकर्मादिक शकते, संभावयति अमुकदोपमिति तत्सत्कं प्राप्नोति । संम्रक्षितमारूषितम् । निक्षिप्तं न्यस्तम् । पिहितं स्थगितम् । संहृतमन्यत्र क्षिप्तम् । दायग त्ति दायकदोषदुष्टम् । उन्मिभं पुष्पादिमिलितम् । अपरिणतं अनासुकीभूतादि । लिप्तं दुग्धादिखरंटितम् । छर्दितं परिशाटितम् । एते दश शङ्कितादय एपणादोषाः। १५-33. अधुना म्रक्षितादीनाह-सच्चित्तेत्यादि । पृथिव्यवनस्पतिभिः सचित्तैम्रक्षितयोगात् । करमानं देयमपि सचित्तम् । अचित्तयोगादचित्तम् । तेन पृथिव्यादिभिः सचित्तैर्मक्षितं पृथ्विकायम्रक्षितमित्यादीनि तत्त्वम् । १५-34. हत्थेणं ति । मत्ते वि एवं चेव । निर्मिश्रकईम अपरिणतं सचेतनम् । १६-2. ससिणिद्धे-तत्र स्निग्धमीपलक्ष्यमाणखरण्टनजलम् । हस्तादिउदकाई जलतीमितं तदेव । १६-6. गरहियमजायमक्खिए त्ति-मांसवशाशोणितसुरामूत्रोचारादिभिः शिष्टजनस्याभक्ष्यापेयैः साक्षा- न्म्रक्षितं सत् । एतैर्मक्षिताभ्यां करमात्राभ्यां दीयमानं सत् यतीनामकल्प्यं उडाहादि दोपात् । संसक्तिमद्व्य- व्यादिभिर्लेपकृन्मध्वादिभिश्च हस्तमात्राभ्यां म्रक्षिताभ्या देयं यदेतैर्दीयमानं म्रक्षितं तदकल्प्य मेकेन्द्रियादिवध- दोषात् । मानादिलममक्षिकाकीटिकापतझादिसत्त्ववधदोषाम्चेति । गर्हितेऽगहिंते च म्रक्षिते आयामम् । १६-7. निक्षिप्तश्चतुर्भङ्गः-सचित्तं पृथिव्यादि सचित्ते पृथिव्यादौ निक्षिप्तं न्यस्तम् १. सचित्तं अचित्ते २. अचित्तं सचित्ते ३. अचित्तं अचित्ते ४. निक्षिप्तम् । अत्र प्रथमद्वितीयभायोग्रहणप्रायोग्यद्रव्याभावान प्रायश्चित्त. चिन्ता । चरमस्तु शुद्ध एव । अतस्तृतीयप्रायश्चित्तं निरूपयति-एत्थेत्यादिना-पृथ्वीकायो मृत्तिकालवणोषतूवरिका वर्णिकादिरूपः । अप्कायो जलावश्यायहिमकरकादि । तेजस्कायो मुर्मुराङ्गारादि । वायुर्मुजावातादिरूपो दृतिस्थश्च । प्रत्येकवनस्पतिकायो धान्यव्रीहिकाहरिताम्रादिफलरूपः । अनंतः साधारणः सूरणगर्जरादिकन्दरूपः । नसाः कीटिकामत्कोटकन्थ्वादिरूपाः। एते च सर्वेऽपि पृथिव्यादयः सचित्ता मिश्राश्चात्र प्रायाः। ततः पृथिव्यादिषु त्रसान्तेषु निक्षिप्तं देयं वस्तु यदचेतनम् । अनन्तरमव्यवधानम् । परम्परं स्थगनिकादिना सव्यवधानम् । सान्तरं पृथिव्युपरि स्थगनिकादौ कृत्वा देयं मुक्तम् । १६-12. अणन्तवणस्सइ त्ति-उत्यादिरूपो। वीयनिक्खित्त इति प्रत्येकवीजेपु अणंतकायवीजेषु च अनन्तरपरम्परनिक्खित्ते देये नि० । १६-13. पिहिए चउभंगोत्ति-यथा-सचित्तं सचित्तण १. सचित्तं अचित्तेण २. अचित्तं [ सचित्तेण ३. अचित्तं] अचित्तेण ४. पिहियं । अत्राप्यनन्तरपिहितपरम्परपिहितता वाच्या । तथा चतुर्भश-अत्रापि गुरुलहु- पदाभ्यां चतुर्भगः स्यात् , यथा-गुरुकं गुरुकेण, लघुकं लघुकेन, लघुकं गुरुकेण, लघुकं लघुकेन पिहितम् । गुरुकं भारिकं महद्देयभाजनम् । गुरुणा भारिकेण प्रहेडकादिना पिहितम् ; गुरुकं लघुकेनाल्पभारेण छगनकादिना; लघुकं देयभाजनं गुरुकेण प्रहेडकादिना; लघुकं लघुकेन छगनकादिना पिहितं । - ४८ श्रीचन्द्रसूरिसंरचिता [१६-13. १७-१ अयोग्यं सहत्य १६-13. सचित्तेण पुढवीत्यादिना तृतीयमनस्य अचित्तं सचित्तेण पिहितमित्यस्य व्याख्या कृता । मण्डकादिकं सचित्तमृदावष्टब्धमनन्तरपिहितम् । तउआ मृत्तिका गर्भच्छजिका । भवष्टब्धं मण्डकादिपरम्परपिहितम् । एवमप्कायादिशेषैरपि भावना कार्या । अस्मद्विरचितपिण्डविशुद्धिवृत्तौ दर्शितत्वाच । १६-18. संहृतम्-येन मानकेण दात्री दास्यति साधोरशनादिकं-तत्र पृथिव्यादिकं तुषादिकं वा यत्स्या- तदन्यत्र सचित्ते अचित्ते वा क्षिप्त्वा तेन रितीकृतेन यदि साधोर्ददाति तत्सहृतमशनाथुच्यते । अत्र मनचतुष्टयं- सचित्ते सचित्तं-सचित्ते पृथिव्यादौ, सचित्त पृथिव्यादि सहतम् १. अचित्तं तुषादि सहृतं २. अचित्ते सचितं ३. अचित्ते अचित्तं ४. संहृतं । अन्नाप्यनन्तरपरम्परता वाच्या । परित्तवनस्पतिः पनशाकादिः । पृथिव्यादिपु प्रसान्तेपु सचित्तस्थानेषु संहरणे साध्वर्थ कृते मात्रकान्तेन गृहीतेऽशनादौ आ० । एकस्मादन्यत्र संहृत्य भूयोऽपि ततोऽपि तेन ददतः परम्परसहरणम् । १६-22. वीयसाहरिए तिलादिगोचरे । १६-23. दायग(यारो)त्ति-मत्तो मदिरापानोत्थमदविकलः । उन्मत्तो महासङ्घामादिजयापीमातो प्रहगृहीतश्च । १६-27. पमहमाणी पृथिव्यादीन् । सेसेसु त्ति भनेषु । १६-29. ओयत्तन्तीए-द्रव्येण द्रव्यान्तरं गृह्णन्त्याः । १६-30. परं च उहिस्स त्ति-परकीयमिदमित्युक्त्वा ददाति । यद्वा यत्र दात्री परेण निर्भर्त्यते । १६-31. उम्मीसं ति-मिश्रणस्योभयाश्रितत्वात् , उत्प्राबल्येन मिश्रितं दाडिमगुलिकादिना, पुष्पादिना वा सह यन्मिलितं तदुन्मिभं भण्यते। ते द्वे अपि वस्तुनी यत्रोन्मिध्य ददाति साधवे तदशनादिन्मिभ्रम् । तत्र परित्तवनस्पतिपत्रपुष्पशाकादिना सचित्तेन उन्मिने आ० । १६-31. अपरिणतं अप्रासूकीभूतादि । तच द्रव्यभावमेदात् द्विधा । पुनर्भावापरिणतं दातृगृहीतृयोगात् द्वि- धा वा । तत्र परिणतद्रव्ये सचेतने दायकेन साधोर्दीयमाने द्रव्यापरिणतम् ; दातृविषयभावापरिणतं तु द्वयोधी- त्रोखिामिनोर्मध्यात् यत्राशने साधारणे एकेन दीयमाने द्वितीयस्य यत्र भावो अपरिणतो अभवनशीलस्तद्दा. तृभावापरिणतम् । १७-1. द्रव्यभावपदाभ्यां चतुर्भङ्गोऽत्र अनिसृष्टभावापरिणतयोश्वासमक्षकृतो विशेषः । गृहि विषयभावा- परिणतं तु यत्र द्वयोः साध्वोर्भिक्षार्थ गतयोरेकस्य मनसि तदशुद्धं परिणतम् , अन्यस्य तदेव शुद्धं मनसि परिणतम् । तदपि भावापरिणतम् । १७-~2. [संसत्त]-संसक्तेन दध्यादिना करमात्रकखरण्टकेनाशनादिग्रहणे लिप्तदोषाः । १७-3. पृथिव्यादिषु दीयमाने छर्दिते परिशाटितम् । १७-5. संयोजणा-वाहिं भायणे त्ति । रसहेतुकद्रव्यं मिक्षाटने शाल्यादिकूर क्षीरं वा प्राप्तवान् । तानि वहिरेव पृथक् भाजनेषु गृहातीति । वसते हिर्द्रव्यसंयोजनायां चेतसा फ्रियमाणाया वाह्या द्रव्यसयोजना । वसतावागतेन रसहेतोव्यसंयोजना अभ्यन्तरा । सयोजना विधा-पात्रकविषया, कवलविषया, मुखविषया च । यथेन सह युज्यते तत्तेन सह भक्षयतीति भाव इत्यन्तर्वदनाश्रया। 'वत्तीसकवलमाणे रागदोसाहिं धूमइंगालं । वेयावच्चाइया कारणमवहिमि अइयारो ॥' कारणं वेदनावैयावृत्यादिधो(१)ऽनिर्वहति । भोजनाभावे आ० । १७~१. सूत्रगाथा ३५-३६. एतध्याख्या कमौद्देशिकचरिमत्रिके। पापण्डि श्रमणनिर्ग्रन्थाख्ये पाषण्डिकर्मादिके कम्मे । माधाकम्मं । पाषण्डमिश्रे स्वसाधुमिश्रे च । वादरप्रामृतिका विवाहुस्सकण-ओसफणरूवा । सप्रत्यपायपरमामा- भ्याहृतम् । यत्रात्मविराधना । लोभपिण्डः। अइरं अणंत त्ति-तिरोऽन्तर्धाने, न तिरमतिर अन्तर्धानं विना -निरन्तरमित्यर्थः । अयं भावार्थ:-अणन्तकाये पूयलियाई निक्खित्तं साहरियं मीसियं वा । अणंतकायेण वा पिहियं । आदिग्रहणादनन्तापरिणितेऽनन्तछदिते च क्षमणम् । अनन्तकायाव्यवहितनिक्षिप्तपिहितसंहृतोन्मिश्राऽपरिणतछर्दि- - तेषु क्षमणम् । रसहेतुसंयोजना-रागान्वितभोजने च, वर्तमानभविष्यनिमित्ते च क्षमणम् ॥ जावंतिकाख्यकर्मोद्देशिका उमेदः । मिनप्रथमभेदः । धात्रीत्वम् । दूतीत्वम् । अतीतनिमित्तम्। भाजीवनापिण्डः । वनीपकत्वम् । चादरचिकिच्छा- । १७-13. १७-24] जीतकल्पचूर्णि-विषमपदव्याख्या करणम् । क्रोधमानपिण्डौ । सम्वन्धिसंस्तवकरणम् । विद्यामन्त्रयोगचूर्णपिण्डा । प्रकाशकरणं द्विविधम् । द्रव्यकीतम् ; आत्मभावक्रीतम् । लौकिकवामित्यपरावर्तने । निःप्रत्यपायपरग्रामाभ्याहृतम् । पिहितोद्भिनकपाटोद्भिन्ने । उत्कृष्टमाला- पहृतम् । सर्वमाच्छेद्यम् । सर्वमनिसृष्टम् । पुर. कर्म । पश्चात्कर्म । गर्हिते द्रव्यम्रक्षितम् । प्रत्येकाव्यवहितनिक्षिप्तपिहित- संहतोन्मिश्राऽपरिणतछर्दितानि । प्रमाणोल्लङ्घनम् । सधूममकारणभोजने चेति । अत्रेदं (अथे. b) सूत्रपदम्- कारणविवजिए त्ति-कारणविवज्जओ नाम अकारणे भुते, कारणे न समुद्दिसइ । एतेषु आचाम्लं दीयते । १७-13. अज्झोयर [गाहा ३९] अध्यवपूरकान्यभेदद्वयम् । कडे त्ति कृतौदेशिकभेदचतुष्टयम् । भक्त- पानपूतिकम् । मायापिण्डः । अनन्तकायव्यवहितनिक्षिप्तपिहितादीनि । मिश्रानन्तकायाव्यवहितनिक्षिप्तानि चैत्येषु एकभक्तम् । तथा ओघौदेशिकमुद्दिष्टमेदचतुष्टयम् । उपकरणपूतिकम् । चिरस्थापितं प्रकटकरणम् । लोकोत्तर]- परावर्तिकम् । लोकोत्तरअप्रामित्यं च । मंखमाइ परभावक्रीतम् । निःप्रत्यपायसप्रत्यपायखप्रामाभ्याहृतम् । दईरो- द्भिन्नम् । जघन्यमालापहृतम् । उझरे पढमे त्ति-यावदर्थिकाध्वपूरक. सूक्ष्मचिगिच्छागुणसंस्तवकरणम् । तिगमक्खिय त्ति-मिश्रकर्दमेन लवणसेटिकादिना च पृथिवीम्रक्षितम् । आउ उदल्लं । उकुट्ठरोद्दे परित्तो- एयं तिगमक्खियं । दायगो वहए त्ति-किंचिद्दायकदुष्टम् । यत उक्तम्- वाले मूढे मत्ते उम्मत्ते वेविए य जरिए य । एए विसेसवज्जा एएसिं दायगो वयं ॥ १७-15. पत्तेय० [गाहा ४२] पत्तेयवणस्सइकाए सचित्तपरंपरहविए । तेण चेव पिहीए साहरिए मीसे परंपरनिक्खित्ते अणंतरनिक्खिते-प्रत्येकपरम्परनिक्षिप्तादीनि मिश्रानन्तरनिक्षिप्तसंहृतादीनि च । सर्वेषु पुरिमार्धम् । संकाए त्ति-जं दोस आसकह तस्सेव दोसस्स जं पायच्छितं तं आवज्जइ । १७-16. इत्तरठविए० [गाहा ४३] करमात्रस्थं इत्वरस्थापितम्। सूक्ष्मप्राभृतिका सनिग्धसरजस्कम्रक्षितम्। पृथ्वीअपवनस्पतिम्रक्षितम् । पृथिव्यादिषु मिश्रेषु परम्परनिक्षिप्ते नि० । वनस्पति मिश्रे परम्परनिक्षिप्ते नि । प्रत्येकवीजेष्वनन्तकायवीजेषु वानन्तरपरम्परनिक्षिप्ते । एवमेतेषु स्थापितेऽपि देये नि० । अविगई-निर्विकृतिकम् । ठवियगाईसुत्ति-आदिग्रहणान्मिश्रपरम्परपिहिते नि० । एवं संहृतेऽपि । परित्तवणस्सइओमीसे नि० । वीउम्मीसे नि०। १७-19. अतिप्पमाणे व त्ति-तेष्वेवातृप्यमानस्तदेवातिमानं पुष्टतया कुर्वन् । १७-20. संघरिसेण-होठ्या । १७-21. जमलिओ-जमलतया स्थितः । १७-22. वट्टा गोलया । समास त्ति समस्या । १७-24. मरहट्टादिसक भाजीवे रुतेऽपि क्रियमाणे खमणं । [गाथा ४६] अन्यच्चोच्यते-जिणकप्पिया थेरकप्पिया य दुविहा साहुणो । ओहीय-ओवग्गहीय-मेया दुहा उवही । तत्थ- ओहेण जस्स गहणं भोगो पुण कारणा स ओहोही (ओघोपधिः)। जस्स य दुर्गपि नियमा कारणओ सो उवग्गहिओ॥ -जिणकप्पिया उपध्यपेक्षया । अष्टविधोपधयः- विय त्ति चउक्क पणगं नव दस एकारसेव वारसगं । एए अट्ट विअप्पा उवहिमि उ होति जिणकप्पे ॥ रयहरणं मुहपोत्ती दुविहो कप्पेकजुत्त तिविहो उ । रयहरणं मुहपोत्ती दुकप्प एसो चउद्धा ओ ॥ तिनेव य पच्छागा रयहरणं चेव होइ मुहपोत्ती । पाणिपडिग्गहियाणं एसो उवहीओ पंचविहो । पत्तगधारीण पुण तवाइमेया हवंति नायव्वा । पुव्वुत्तोवहिजोगा जिणाण जा वारसुक्कोसो ॥ पत्तं पत्तावंधो पायढवणं च पायकेसरिया । पडलाइ रयत्ताणं च गोच्छओ पायनिज्जोगो ॥ तिनेव' य पच्छागा रयहरणं चेव होइ मुहपत्ती । एसो उ दुवालसविहो उवही जिणकप्पियाणं तु ॥ एए चेव दुवालस मत्तय अइरेगचोलपट्टो य । एसो उ चउद्दसविहो उवही पुण थेरकप्पंमि ॥ उकोसो अट्टविहो मज्झिममओ होइ तेरसविहो य । जहन्नो चउव्विहो चिय अजाणं एस तिविहुवही ॥ कप्पत्तिय पडिग्गहगो आमितर वाहिरा नियंसणिया । संघाडी खंधकरणी उक्कोसो एस अहविहो । ७ जी० क. चु० - -- ५० श्रीचन्द्रसूरिसंरचिता [१८-9. १९-1 मध्यमस्त्रयोदशविधः- पत्तावधो पडला रयहरणं मत्तकमढ रयताणं । उग्गहपट्टोरुचलणिया ओक्कच्छि कंचु वेकच्छी । गोच्छगपत्तढवणं मुहणंतगकेसरि जहन्नो । जघन्योपग्रहिकः स्थविराणां एसो। तत्थ पीढगं ति काष्ठच्छगणमयं पीठं निसेज पाउंछणं । दंडगा-पमजणी दंडापुंछणी। घट्टगा पात्रघर्षणोपलाः । वर्षावृष्टिसु त्राणाय रक्षणाय । वाल त्ति कम्वल । सूत्रमयम् । सूई-तालप प्रसूच्यादिखुम्पक। कुडसीसगं पलासपत्रमय खुम्पकम् । पत्रकं वंशमयम् । सेसतिगं वालसौत्रिकादन्यत् । वासत्ताणे त्ति- वर्षाकालोपयोगिसंस्तारो अझुसिरो काष्ठफलकादि । झुसिरस्तृणादिमयः । डंडेत्यादि लट्ठी आयपमाणा, विलट्ठी चउरंगुलेण परिहीणा । दण्डो वाहुपमाणो, विदण्डो कक्खमेत्तो उ ॥ सिरसो उवरि चउरङ्गुलदीहा नालिया। अवलेहणी वटादिकाष्ठमयी पादलेहणी-'वडउंबरे पिलक्खू तस्स मलाभमि चिंचिणीया।' चर्मत्रिकम् । अस्थुर त्ति भूमावास्तीर्यते अग्न्यादिभये प्रलंवादिविकरणाय च । पाउर त्ति पद पदि]कादिभये यत् प्राप्रियते । तलिगा उपानहः । यद्वा कृत्ति. तलिगा वना (वधा: b) यद्वा विहारे उपकर- णस्य शरीरेण सह वन्धनार्थ. पट्ट. । पल्हत्थी योगपट्ट । मध्यम औपग्रहिकः । वारगो त्ति-ससागारिके उद- गनिमित्तं, नित्य जनमध्य एव तासा वासात् । उत्कृष्टौपप्रहिकस्तूच्यते- अक्खा० गाहा [१८-5.]-सथारको द्विविधः-एकाझस्तिनिसकाष्ठपट्टरूपः, तदितरः कम्विकादि- मयः। उत्सर्गपदापेक्षया द्वितीयपदमपवादसूत्रोत्कृष्टौपग्रहिकः कथ्यते । पुस्तकपञ्चक-'गंडी, कच्छवी, मुट्ठी, संपु- डफलए तहा छिवाडीय स्ति'- एतत्वयमप्रे कथयिष्यते । फलगं ति पट्टिका, समवसरणफलकं वा । कमढगं निजोदरमा तत् प्रतिसंयतिनीनाम् , अन्यथा एकभोजनभोजने गुरुकवलोत्पाटने एकया अन्यस्या अप्रीतिसंभवः स्यात् । १८-9. ओग्गणंतर्ग-तौ सदृशम् । पट्टस्तद्वन्धनम् । १८-11. साहूणं ओहिओ त्ति-मुहपोत्तीयपायकेसरियाइओ चउरो ते चेव त्ति । पडिग्गहो प्रच्छा- दनत्रयम् । अन्ने य ति-अभितर नियंसणी १, वाहिनि० २, संघाडी ३, खंधकरणी ४; पत्ताबंधो, पडला, रयत्ताणं, रयहरणं च ४; जघन्यमध्यमोत्कृष्टभेदत. प्रागुक्तत्रिविधोपधिर्मध्याजघन्यविच्युतलब्धत्वे नि० । मध्यमस्य विच्युतलब्धत्वे पु० । उत्कृष्टस्य विच्युतलब्धत्वे ए० । जघन्याप्रत्युपेक्षितत्वे नि० । एवं मध्यमाप्रत्यु० पु० । उत्कृष्टाप्रत्यु० ए० । न पडिलेहिओ त्ति-निवेदयितुं गुरुभ्यो विस्मृतत्वे जघन्यस्य नि० । मज्झिमे पु० । उत्कृष्टस्य ए० । प्रकारप्रयेण सर्वस्योपधे. सपन्नत्वे आ० । १८-21. हारिय० [गाहा ४७]-हारितत्वे जघन्यस्य ए० । मध्यमस्य हारितत्वे आ० । उत्कृष्टस्य हारितत्वे खमणम् । जघन्यधौतत्वे ए० । मध्यधौतत्वे आ० । उत्कृष्टस्य धौतत्वे उ० । उपधेर्जघन्यादिभेदस्योगमं कर्तुं न निवेदयते तत्रापि ए० । आ० । च० । आचार्यैरदत्तं परिभुते । त्रिविधमुपधि आचार्यानुज्ञा विनाप्यन्यस्मै ददाति । ए० । आ० । च० । सम्वमि छटुं तु त्ति-जघन्यादिभेदतस्त्रिविधस्य हारणे......त्र द्वेऽपि काले वनप्रक्षालनावी षष्ठं स्यात् । १८--30. मुहणंतय० [गाहा ४८] एवं तावेत्यादि । तिविहोवहिणो विभु(च)येत्यादि [गाहा ४६] रजोहरणमुखवस्त्रिका विहाय अन्योपधौ द्रष्टव्यम् । अम्रप्रति अम्रया उक्तं (2)। तत्र मुहपोत्तियाए पडियाए लद्धाए य निम्वियं । एवं रयहरणे वि । यदि पुनतियमपि पतितमथ च न लब्धं तत्राह-अह पुणेत्यादि । नवर नासियं परचक्रादिसम्पातेन । हारियं आलस्यादिना प्रमादेन । १८-31. काल० [गाहा ४९] पारिट्ठावणियं अविहीए त्ति-33. स्थन्दिलाद्यशुद्धया । १८-34. विकालवेलाया पानकाहारस्याप्रत्याख्यानत्वे भोजनोमुत्सर्गतश्चतुर्विधाहारस्यापि प्रत्याख्यानत्वं युकम् । तदकरणे-अत एव साधवनिविधाहारं खाध्यायकरणसमये तृतीयपौरुष्याः समये प्रत्याख्यान्ति । विकालवेलाया च पानकाहारमिति । १९-1. एयं चिय० [गाहा ५१ ] द्वादशविधतपो यथा- अनशनमूनौदरिता, वृत्तेः सक्षेपणं रसत्यागः । कायक्लेशः संलीनतेति घायं तपः प्रोकम् ॥
१९-10. २०-7] जीतकल्पचूर्णि-विपमपदव्याख्या प्रायश्चित्तध्याने वैयावृत्त्य विनयावथोत्सर्गः। खाध्याय इति तपः पदप्रकारमाभ्यन्तरं भवति ।। मासाई सत्तं ता पढमा विइतइयसत्तराइदिणा। अह राइ एगराई, भिक्खू पडिमाण वारसगं ॥ इह प्रतिमादिविषयेऽश्रद्धाने विपरीतप्ररूपणायां वा प्रायश्चित्तं ज्ञेयम् । एतेन तपोतिचारप्रायश्चित्तसूचा द्रव्यायभिग्रहेषु च वीर्यातिचारप्रायश्चित्तसूचनं ज्ञेयम् । पाक्षिके पुरुषादिविभागतो ज्ञातव्यम् । पुरुषाः क्षुल्लक स्थविर भिक्षु उपाध्याय आचार्यभेदतः पञ्चधास्तान् प्रति चूर्णिकृता दर्शितमेव । १९---10. फिडिए० [गाहा ५२] निद्राप्रमादवशतो गुरुभिः सह प्रतिक्रमणे फिडिओति न मिलितः। सयं वा उस्सारेइ गुरुणा अपारिते कायोत्सर्गे स्वयमात्मैव पारयति । अपूर्णे वा चिन्तनीयतयान्तराले पारयति । १९-15. अकए० [गाहा ५३] एवं वंदणाइपसुं पित्ति-एकद्विनिसर्वा अदानतो वन्दनेषु यथाक्रम नि० । पु० । ए० । सर्वाकरणे आयामं । राओ वोसिरइ ति निसिसज्ञोत्सर्ग कुरुते । १९-17. कोहे० [गाहा ५४ ] सगि त्ति-सकृत् , एकदा । तन्नगाइ ति तर्नको वत्सकः, आदि- शब्दात् मयूरादिग्रह। १९-~-22. अज्झुसिर० [गाहा ५५] दुःप्रत्युपेक्षितं चक्षुषा सम्यगनवलोकनम् । अप्रत्युपेक्षितं सर्वथा चक्षुषाऽनिरीक्षितम् । कोयवि-रूतपूरितः पटः पुरओट्ठीति यदुच्यते । पावारगो वृहत्कम्वलः परियच्छिी । पूरी-पल्हवी हस्त्यास्तरणम् । दढगालिधौतपोतिः । दुसर सूत्री पटी, दोयडी यावत् । विराली नवओ जीणोत्ति भन्नइ । गडोवहाणी गल्लमसूरिका । पुस्तकपंचके गंडी पुस्तकखरूपम्- वाहालपुहत्तहिं गंडीपोत्यो उ तुम्लगो दीहो । १ । कच्छवि अते तणुओ, मज्झे पिहुलो मुणेयव्यो । २ । चउरंगुलदीहो वा, वागी मुट्टिपुत्थगो अहवा । चउरंगुलदीहो चिय, चतरंसो होइ विनेओ।३। तणुपत्तूसियरूवो होइ छिवाडी य पोत्थगा नाम । दीहो बाहुस्सो (लो) वा जो पिहलो होइ अप्पवाहुल्यो । तं मुणियसमयसारा छिवाडि पोत्थी भणंतीह । ४ । संपुडगो दुगमाई फलगा। ५। अपरमपि~-धर्मपञ्चकं यथा-तलिगा खल्लग वन्मे (वद्धे ) कोसग कत्ती य वीयंतु । तलिगा-उपानत्, वन्म -वध्र , कोसगो-लेहोधारं वर्म, कृत्ति. प्रलम्वकरणाय । १९-32. ठवण [गाहा ५६] सन्नी-अविरत श्राद्धः । वीर्याचारातिचारो निजवीर्यगृहनम् । १९-35. सुयववहाराइसु अन्नह त्ति-मायानिष्पन्नं तदेव दीयते इति विशेषः । आसणद्वयं देयमिति भावः । अन्नमायाओ त्ति-"लूहवित्ती महाभोगो, एस साहू जिइंदिओ। रसच्चागं करेइ ति, अंततेहिं वाढए ॥" इत्यात्मनि व्यापयति । २०-3. दप्पेण [गाहा ५७] चलानं-उल्ललनम् । खडयप्पयाणं धावणम् । खड्डावरंडाईण फडणम् । मल्लवद्वाहास्फोटनं च दर्प । तं कुर्वतो कदाचित्पञ्चेन्द्रियस्य [व्य]परोपणं-विघात कृत. स्यात् । २०-4. अनादानं-मेहनं तस्य परिमर्दनेन शुक्रपुद्गलनिर्घातनं-निष्काशनं इत्येतत्संक्लिष्टकर्मोच्यते । आदि- प्रणालिहस्य स्नेहादि[ना] म्रक्षणादि करोति । दीर्घाध्वनि यत्सेवनम् । आधाकर्म, अध्वानकल्पादिकं वा शुष्ककदलीफलादिधरणतः। दीर्घग्लानेन वा सता यदाधाकर्मरसादि- कारणतः । सन्निधिसेवनं वाचरितम् । तत्रैतेषु पञ्चकल्याणकमिति वक्ष्यमाणगाथान्तोकं ज्ञेयं योज्यम् । २०-7. पुरिमत्ता०-भिक्षापात्रं तत्काले न प्रतिलेखयति । चरिमभागोनायां पौरुष्यां प्रथमाया पादौनप्रहरे इत्यर्थः । यद्वा चरिमपौरुष्यामुपोषितः कश्चित् । ततोऽसौ तस्या पात्रं न पडिलेहेइ । तत्र कल्याणकं प्रायश्चित्तं ज्ञेयम् । चातुर्मासे सावत्सरिके च शुद्धौ पचकल्याणकं ज्ञेयम् । यस्मात्सूक्ष्मातिचारान् कृतान न जानाति न च सरति । कथमित्याह-जहा पाउसे इत्यादि । - । - - . ५२ श्रीचन्द्रसूरिसंरचिता [२०-12. २३-1 २०-12. छेयाइ० [गाहा ५९] किं वा छिजा त्ति-भो भो जना निरीक्षत निरीक्षत । छिद्यते न छिद्यते चेति भवति अश्रद्धानपर.। मिउणो त्ति-मृदोर्निरभिमानस्य । अभिमानाभावं दर्शयति-जो इत्यादिना । छेदाऽश्रद्धानपरस्य मृदोः, पर्यायगर्वितस्य च इत्येतेषाम् । २०-18. दुसुण्ठाः-उल्लण्ठाः खिताः । इह शिष्या अनेकविधा भवन्ति-परिणामगा, अपरिणामगा, अइपरिणा- मगा। तत्थ उस्सग्गे उस्सरगं, अववाए अववायं, जहा भणियं सद्दहंता आयरंता य परिणामगा भण्णन्ति । अपरिणामगा पुण जे उस्सग्गमेव सद्दहति आयरंति य; अववायं पुण न सद्दहंति नायरंति य । अइपरिणामगा जे अववायमेवा- यरति, तम्मि चेव सज्जति न उस्सग्गे । अतो अपरिणामकानां उत्सर्गदृष्टीनां मा निन्द्यो भविष्यति । चशब्दसूचित- कुलगणसहाधिपानामपि छेद्यापनाना जीतेन तप एव दीयते न छेदादयः । २०-19. जं जं० [गाहा ६०] अत्थपय त्ति-अर्थ. सूत्रव्याख्यानं भाष्यचूर्णिनियुक्त्यादिकम् । भाज्ञाभङ्गादिदोषतः प्रायश्चित्तापत्तिः सविस्तरा तपस उक्ता। २१-5. दवं खित्वं० [गाहा ६४] आहाराई दव्वं खेत्तं लुक्खाइ काल गिम्हाई। हवाई भाव ती पुरिसं गीयाइ जाणित्ता ॥ आउहि-पमाय-दप्प-कप्परूवा चउन्विहा पडिसेवणा नायव्वा । साहारणेषु द्रव्यादिषु साधारणं भणिय समं देजा। २१---13. लुक्खं० [गाहा ६६] वायं ति-वातलम् । अनूपक्षेत्रं सजलक्षेत्रम् । एवं कालेवि तिविहे ति-वर्षाहेमन्तग्रीष्मरूपः कालः सामान्येन स्निग्धरूक्षश्च भवति । तत्र निग्ध:-शीत., रूक्ष -उष्णः । अयं स्निग्धो-- ऽप्युत्कृष्टमध्यमजघन्यभेदात्रिधा; रुक्षोऽपि च त्रिधा । तत्र उत्कृष्टस्निग्धोऽतिशीतः, मध्यमस्निग्धो नातिशीत , जघन्यशीतः स्तोकशीत. । जघन्यरूक्ष किंचिदुष्ण , [ मध्यमरूक्षो नात्युष्ण', ] उत्कृष्टरूक्षोऽत्युष्णः । एवं च- गिम्हासु चउत्थं देना छठं च हिमागमे । वासासु अट्ठमं देज्जा तवो एस जहन्नओ॥ गिम्हासु छठें देना अट्ठमं च हिमागमे । वासासु दसमं देना एस मज्झिमओ तवो ॥ गिम्हासु भट्ठमं देना दसमं च हिमागमे । वासासु दुवालसमं एस उक्कोसओ तवो ॥ एस नवविहो ववहारो। २१-21. सो य इमो त्ति सुयववहारो। आपत्ति प्रायश्चित्तयोग्यता विषया । तपसा द्वादशादिना, कालेण वर्षादिना । अहागुरू-गुरुतम इत्यर्थ । अहालहू-लघुतमः । २१-28. अहाणुपुधीए-इत्यस्य व्याख्येयम्-सुत्ताणुसारेणेति । २१--29. चउमासगहणेण लहु चउमासो वि दहब्बो। 30 छम्मासो-छम्मासग्रहणात् लघुषण्मासोऽपि ज्ञेयः । प्रतिपत्तिः आपत्ति । 31 तीसा य त्ति-स्थूलतया उक्तम्, अन्यथा सार्घसप्तविंशतिर्वक्तुमुचिता । 33 प्रागुद्दिष्टानि गुरुकादीनि व्याचष्टे गुरुगं चेत्यादिना । २२-2. एतदशक्तः मिथ्यादुष्कृतेन शुध्यति । अत एवोक्तम्-सुद्धोव त्ति । २२-4. सामान्य एव श्रुतव्यवहार उक्को विस्तरेणाधुना प्राह-तिगनवेत्यादिना । २२-9. गुरुपक्खो उक्कोसोत्ति-यथा गुरुपदादिवाच्यः गुरु[:] गुरुतरो गुरुतम । एव(स)लहुगे वि- उत्कृष्टादिभेदत्रयम्--उक्कोस-उकोसे, उक्कोस-मज्झिमो, उकोस-जहन्नोत्ति] उत्कृष्टे भेदत्रयम् । मध्यमेऽपि भेद- त्रयम्-उकोमो, मज्झिम जहण्णो त्ति । जहनुक्कोसे, जहन्न मज्झ, जहन्न जहन्न इति जघन्ये मेदत्रयम् । २२-~25. एमेवुक्कोसाइ त्ति-लघुतरमध्यमपञ्चविंशतौ नवविधापत्तिदानपञ्चमगृहनिवेशितायां अट्ठम- छट्ठ-चउत्थ-उकोसा देय तिह भिन्नं । मध्यमे उत्कृष्टम् , मध्यममध्यमम् , मध्यमजघन्यमिति योज्यम् । तृतीय नवकलहुस सत्कसप्तमगृहनिवेशितपञ्चदशा गोचरपलौ अट्ठम छह-चउत्य-योज्यम् । लहुसतरमध्यमदशके अष्टमगृह- निवेशिते । २ । भा० । यथा लघुसजघन्यपञ्चकसत्के नवगृहे । उ० १; आ० १, ए० । खमणायामेकासणे ति 33 गाथोक्तं योज्यम् । सप्तविंशतिभेदेषु वर्षासु दानमुक्तम् । २३-1. अधुना शीतकालानितं दानमाह-सिसिर इत्यादिना । दसम उववासचतुष्टयम् । आदौ धृत्वा ।
- ५३ २३-2. २४-14] जीतकल्पचूर्णि-विषमपदव्याख्या २३-2. अड्डोकंतीय तह चेव त्ति-तत्रार्घस्यासमप्रविभागलपस्य एकदेशस्य वा एकादिपदात्मकस्य-अप- क्रमणमवस्थानम् । शेषस्य बुद्ध्यादिपदसङ्घातरूपस्यैकदेशस्योर्ध्व गमनं यस्यां रचनायां सा समयपरिभाषयार्धापका- तिरुच्यते । यथा सिसिरे जघन्यत: पष्ठम् , मध्यमतोऽटमम् , उत्कृष्टतो दशमम् । २।३। ४ । एषां मध्यादेक- देश. षष्ठलक्षणोऽपक्रामति अवतिष्ठते । अष्टम-दशमे ऊर्ध्व वर्पासु गच्छतः । तृतीयं तु अग्रेतन द्वाद]शं मील्यते । ततश्च जघन्यतोऽष्टमम् , मध्यमस्तु दशमम् , उत्कृष्टस्तु द्वादशं तपो वर्षासु कुर्वन्ति । २३-3. अट्टममाइ गिम्हे इत्यादि-अष्टमं उपवासनयमादौ धृत्वा निव्वीयं पर्यन्ते यथा-लघुस पञ्चकसत्के नवमगृहे । सयासय त्ति-खकीयाः सदा ज्ञेया आपत्तयः । असहोरेकैकहासस्तावत्कार्यः यावत् स्थितमेकैकम् । उ० । आ० । ए० । निः। २३-8. परहाणं देज त्ति-आधाकर्माद्यासेवाप्राप्तम् । इह नवविधश्रुतव्यवहारे वर्षा-शिशिर-प्रीष्मरूप- कालतया सप्तविंशतिभेदेषु आपत्तिदानं दर्शितम् अर्धापकान्तिरपि तथा वाच्या। २३-14. कालं वा सहेज त्ति-प्रतीक्षेत । २३-16. अणहीय निसीहो अग्गीयत्थो । इतरो गीतार्थः । २३-21. धिइ धृतिश्चेतसोऽवष्टंभः। संहननं वर्षभनाराचादि। धीईए संघयणेण य संपन्नो पढमो न धिईए न संघयणेण य अन्य.; मध्यवर्ति द्वयम्-धुत्या न संहननेन, नहसो(न धृत्या)संहननेन सम्पन्न इति द्वयमतो वाच्यम्। २३-25. विकल्पपञ्चकमपि व्याचष्टे आयतरगो इत्यादिना-जो जं तवोकम्मं आढवेइ तन्नित्थरह स आयतरगः । दृढोऽपि वैयावृत्त्ये तप एव करोति न वैयाकृत्यम्-इत्यायतरगः। परतरस्तपस्यपि शक्तः परं न करोति, किन्तु वैयावृत्यमेव विधत्ते । पञ्चमभङ्गव्याख्यामाह-अनतरतरग(27)इत्यादिना । २३-30. कल्पस्थितादय सर्वेऽष्टौ ८ । कल्पोऽवस्थितसमाचारः । तत्र स्थितास्तत्परिपालनोद्यताः। २३-33. कयरे ते दशभेदा 2-इमे वक्खमाणा-(१)अविद्यमानं चेलं वस्त्रं यस्यासावचेलकस्तद्भाव आचेलक्यम् । सचेलत्वेऽप्यचेलव्यपदेश । दृश्यते च विवक्षितवस्त्राभावे सचेलत्वेप्यचेलव्यवहारः । यदाह- 'जल(ह)जलमवगाहंतो वहुचेलो वि सिरिवेढियकडिलो । भन्नइ नरो अचेलो तह मुणओ संतचेलावि ।। तह थोवजुनकुच्छियचेलेहिं वि भन्नए अचेलो त्ति । जह तर सालिय लहुं देयो त्ति नग्गि यामो त्ति ॥' (२)उद्देसेन साधुसंकल्पेन निवृत्तमौद्देशिकं आधाकर्म । (३-४) सय्यया असत्या तरति संसारसागरमिति शय्यातरः । स च राजा नृपश्चक्रवादिस्तयो. पिण्डः समुदानमिति शय्यातरराजपिण्डः। (५) कृतिकर्म वन्दनकम् । (६) तथा व्रतानि महाप्रतानि । (७) ज्येष्ठो रत्नाधिकः । (८) प्रतिक्रमणं आवश्यककरणम् । (९) मासः मास- कल्पः । (१०) परि-सर्वथा वसनमेकत्रनिवास स निरुतविधिना पर्युषणम् । इति दश विधः कल्पो भेदः। तमि ठिया पकप्पट्ठिया-दश विधकल्पे स्थिता इत्यर्थः । अत्र च प्रथमचरमजिनसाधवो दशस्खपि स्थिता एव । द्वाविंश- तिमध्यमजिनसाधवो विदेहजाश्च दशकमध्यात् शय्यातरपिण्ड चातुर्यामपुरुषज्येष्ठवन्दनकरणाख्यचतुर्पु स्थिताः, षदसु चास्थिता । यथा आचेलक्यौदेशिकप्रतिक्रमणराजपिण्डमासपर्युषणाकल्पे च वर्षाकालसमाचारा मध्यमजिना २२ विदेहजाश्चास्थिताः, सततसेवनीयतया । दशानां मध्यात् कानिचित् स्थानानि कदाचिदेव पालयन्तीत्य- नियतव्यवस्थास्वभावा]स्ते, अतो मध्यमजिनसाधवो महाविदेहजाश्चाकल्पस्थिताः। यतोऽनवस्थितसमाचारोऽकल्पो. ऽभिधीयते। २४-4. जोगवियसरीर त्ति-परिकर्मितदेहाः। २४-11. बहुतरया भिक्खुणो त्ति-बहवः वहुभेदा, इति भावः । अत्र आचार्यकृतकरणादि-पुरुष- विभागेन श्रुतव्यवहारतो जीतकल्पयन्त्रं विलेख्यम्। 'एयं मज्झं गहियंति अनया गाथया यन्त्रकमध्यवर्ति पंचम- पंकितपोगृहीतपंचमपंतावेवास्या गाथाया अर्थो निपततीत्यर्थः । २४-14. तिरियायए-तिर्यग्दीर्घाणि त्रयोदशगृहाणि कृत्वा अहो एगं घरयं च-वामपार्श्वे एकं पकिमि- त्यर्थः । अहो एकेकघरयवुडीए वामपार्वतः सव्वाईए निरवेक्खं जिनकल्पिकं विनस्येत् । द्वितीयपंकेरुपरि 7 -- ५४ श्रीचन्द्रसूरिसंरचिता [२५-11. २७-5 आचार्यः कृतकरणः । तृतीयपंक्तरुपरि आचार्योऽकृतकरणः । चतुर्थ्या उपाध्यायः कृतकरणः । पञ्चम्या उपाध्यायो- ऽकृतकरणः [षष्ठ्या गीतार्थस्थिरकृतकरण ] भिक्षु. । सप्तम्या गीतार्थस्थिराकृतकरणभिक्षुः। अष्टम्या गीतार्था- स्थिरकृतकरणभिक्षुः [ नवम्या गीतार्थास्थिराकृतकरणभिक्षुः । दशम्या अगीतार्थस्थिरकृतकरणभिक्षु । एकादश्या अगीतार्थस्थिराकृतकरणभिक्षुः । द्वादश्या अगीतार्थास्थिरकृतकरणभिक्षुः] त्रयोदश्या अगीतार्थीस्थिराकृतकरण- भिक्षुः। एवं स्थापितदाहिणट्ठियपणुवीसइ सरुव भिन्नमास निव्वीयसनियाओ, वामपार्श्ववर्ति अट्ठमभत्तं तत्थ छग्गुरु- सनियं जीतदाणं नेयं । पंचमपंतीए । २५-11, तहिं चेव अवराहे त्ति कोऽर्थः ? तदेवापराधमाश्रित्येत्यर्थः । पुरुषाः-आचार्योपाध्यायवृष- भभिक्षुक्षुल्लकभेदतः पञ्च विधास्तानाश्रित्येति भावः । २५-25. खित्तं छिन्नमडवं ति-भट्ठाइयजोयणभ्यन्तरे जत्थ वसिम अन्नं नत्थितं छिन्नमडम्बं । सर्वतोऽ. नासनसन्निवेशान्तरं मडंवमित्यन्ये । ओमं परिपूर्ण यत्र भकादि न लभ्यते । दुर्भिक्षं यत्र सर्वथा न लभ्यते । २५-27. तमणंतरं ति निकटवर्ति । २५-36. आलोचनाकाले जया गृहइत्ति-सर्वथैव न प्रकाशयति। पलिउंचइ वत्ति-अर्धकथितं करोति। २६-1. बहुगुणेसु त्ति-समर्थेषु । गुरुसेवा-अशुभं प्रति प्रधानसेवा । २६--8. छेदाह प्रोच्यते-तवगविउ० गाहा ।[८०] २६-11. अइपरिणामगो-अपवादरुचि. । २६-12. उत्कृष्टां तपोभूमि समईओ त्ति-अधिकतपोदानयोग्यो जातः । सवि (साव० ) शेषं च यस्य प्वरणं तस्यातिचारदूषितव्रतपर्यायस्य च्छेदः क्रियते । २६-~-23. आकुहिरुपेत्यकरणम् , तया पश्चेन्द्रियवधः कृतः। दर्पण मैथुनसेवनं च । सतीवादमस्या नाशयामीति बुद्धया स्त्रीसेवनायाम् । मृषावादे कूटसाक्षित्वादिदानतः । अदत्ते निधानाद्यपहरति । सचित्ताचित्तगोचरं परिग्गहं च गृह्णाति। २६-27. मूलगुणान् द्विवादिभेदेन वहुविधानं वहुशो अनेकशः शोधयति । सर्वशंकादीन् करोति । इति दर्शनवमकः। २६-32. गृहस्थलिंग-कच्छावन्धनं तल्लकट्टशिरसि विधानादि कौतुकेन कुरुते । अन्यतीर्थिकाः-शाक्यतापसा- दयस्तेषां लिङ्गं तद्वेषकरणं नटादिवेषकरणतः । स्त्रीणां गर्भस्याधानं शाटनं च औषधादिकरणतो मूलकरण- तोऽमी (?)। २६-34. विहियतवे त्ति-विहितं दत्तं गुरुणा तपो यस्य सविहिततपास्तदूर्ध्व छेदमूलानवस्थाप्य पाराश्चिकानि प्राप्तस्यापि भिक्षोर्मूलमेवेत्यर्थः । तथा आचार्योपाध्याययोः पाराश्चिकप्राप्तावप्यनवस्थाप्यमेव भवति । यदुक्तं भाष्ये- 'इत्थ य जह नवदसमे आवनस्सावि भिक्खुणो मूलं । दिन्नइ तहामिसेगे परं पयं होइ नवमं तु ॥' २७-~-5. अनवस्थाप्याख्यं । अनवस्थाप्ये उक्कोसं० गाहा । [८७] आसेवितातिचारसन्नविशेषः । सन्न अनाचरिततपोविशेषस्तदोषोपरतोऽपि महाव्रतेषु नावस्थाप्यते नाधिक्रियत इत्यनवस्थाप्यः। तदतिचारजातं तच्छुद्धिरपि वा अनवस्थाप्यमुच्यते । नवमं प्रायश्चित्तम् । तत्र स्तैन्यकरणे किं सूत्रेऽ- नवस्थाप्यमुक्तम् ? उत्तमेवेत्यादि । तमोत्यादि-गाथापूर्वार्द्धन साधर्मिकस्तैन्ये प्रायश्चित्तमुक्तम् । तत्र सूत्रपदस्यायमर्थः-साधर्मिकाः साध- वस्तेषां सत्कस्योत्कृष्टोपधे. शिष्यादेर्वा । वहुशो वा प्रद्विष्टचित्तो वा । तेन्नं ति-स्त्रेयं-चौर्य कुर्वन् अनवस्थाप्यः । अन्यधार्मिकाः-शाक्यादयो गृहस्था वा। तेषां सत्कस्योपध्यादेः स्तेयं कुर्वन् । अयमर्थोऽन्यधार्मिकयो- लिनिगृहस्थरूपयोः सत्कं स्तेयमाहारोपधिशिष्यादिगोचरं त्रिघातत्कुर्वन् । अथोत्तरार्धन-हत्थायालो गहिओ- स च त्रिधा अत्यायाणं दलमाणे, हत्यालंबं दलमाणे, हत्थायालं दलमाणे त्ति । क्रमेण व्याख्या- अत्थायाणं-अर्धादानं द्रव्योपादानकरणं अष्टामानिमित्तं तद्ददत्प्रयुजान इत्यर्थः । अन कथानकमानम्- -- - जीतकल्पचूर्णि-विषमपदव्याख्या ५५ २७-14. २८-17 ] उजेणी उस्सन्नं दो वणिया पुच्छिऊण आयरियं । ववहारं ववहरंती ताहे सो तेसि साहेइ ॥ १॥ तस्स य भगिणीपुत्तो भोगभिलासीओ मुंचए लिंगं। तो अणुकंपा भणई-किं काहिसि तं विणत्येण ॥ २॥ ता वच ते वणिए, भणाहि-अत्थं पयच्छह मज्झम । तेण य गंतु भणिया तो तेसिं वेइ अह एको॥३॥ कत्तो अत्थो अम्हं कि सउणी रूवए इहं हगई। बीओ चंगेरि भरेवि निग्गउ नउलयाणं तु ॥ ४ ॥ गिहिसु जावईएहिं कज्जत्ती गहिय तेण जावट्ठो । विइयं मि हायणंमी कि गिण्हामो त्ति ते विति ॥५॥ भणिओ सउणी इत्तो तणकटुं वत्थरूयकप्पासे । नेहगुलधनमाई अन्तो नयरस्स हावेहि ॥ ६ ॥ विइड य तेहिं भणिओ सव्वदाणेण गिण्ह तणकटुं । नगरवहि ठावावय गहिएणुवरिं च वासासु ॥ ७ ॥ छइएसुं गेहेसुं पलित्ते दहूं तओ उ तं नगरं । तणकट्ठाणं पुंजो अइव महग्यो उ सो जाओ ॥ ८ ॥ दहमियरस्स सव्वं ताहे सो गंतु भणइ आयरियं । उच्छाहिओ अहोहं कि तु न नायं इमं तुम्मे ॥ ९॥ किं सउणी य निमित्तं हगं ति अम्हं ति भणइ नेमित्ती । होइ कयावि तहन्नय रूठं नाउं तओ खामे ॥१०॥ चूर्णी भव्यग त्ति भागिनेय. । प्रतिभन्नो व्रतपालनात् । चंगोडगो च्छघडयं रूबई भरिय नउलाणं घेत्तूण उव- टिओ। तदनु घृतगुडादिपण्यस्य पत्तनान्तर्मध्ये सङ्ग्रहोपदेशं दत्तवान् । द्वितीयस्य रूपकदातुर्वशतॄणकाष्टादीनां संग्रह पत्तनात् वहिष्टादुपदिष्टवान् । पत्तनान्तर्दग्धपण्यस्य सम्मुखं ब्रवीति किं शकुनिका निमित्तं हदंते । एवं विधार्थोपा- दानकारिण. पुरुषस्याभ्युत्थितस्य व्रतग्रहणाय तत्र क्षेने प्रायश्चित्तं दातुं न कल्पते । २७-14. हत्थालम्बोत्ति-हत्थालंव इव हत्थालंबस्तं ददत् । अशिवपुररोहा(धा)दौ तत्पशमनार्थमभिचारु- कमंत्रविद्यादि प्रयुञ्जान इत्यर्थः । हत्थायालो त्ति-हस्तेन आताडनं हस्तातालस्तं दलमाणे ददत् । यष्टिमुष्टिल. गुडादिभिर्मरणादिनिरपेक्ष आत्मनः परस्य वा प्रहरग्निति भावः। तत्र आयरियस्स विणासे गच्छे अहवावि कुलगणे संघे। पंचें दियवोरमणं पि काउं नित्थारणं कुज्जा ॥ एवं खु करेंतेणं अव्वोच्छित्ती कया उ तित्थंमि । जयवि सरीरावाओ तहवि य आराहओ सो उ ॥ अन्यस्तु सामर्थ्य सति आगाढेऽपि प्रयोजने न प्रयुते यः स विराधकः । २७-21. कीरइ० गाहा [८९] सो य आचार्यादि. । एत्थ चउभंगो त्ति-दवलिंग-भावलिंगपदद्वयेन भङ्गचतुष्टयं यथा-दव्वलिंगेन रजोहरणादिना अणवठ्ठप्पो महाव्रतादिना भावलिजेन च । १। दवलिंगेणाऽण०, भावलिंगेनेति शून्य.।२। भावलिनेन अनवहप्पो न दवलिंगेण । ३ । भावलिंगेण अणवठ्ठप्पो; असंभवि भंगोऽयं ।।। २७-24. सपक्खपरपक्खे प्रदुष्टस्तैन्यादिदोषै. स्तैन्यद्वय सूचितम् । १। स्वपक्षपरपक्षघातनोद्यतो निरपेक्षतया अनेन हस्तातालो गृहीत. । हत्थालंवो अत्थादाणो य इत्यनेन तृतीयभङ्गमाह । द्वितीयचतुर्थभनौ असंभविनौ । २७-28. जहा अत्थादाणिओ त्ति-योऽर्थमुत्पादयति निमित्ता स। उत्तमद्वेत्यादि । तत्थेव त्ति- वस्थाने । भोसन्नाइ अन्नयरस्स खस्थानत्यागे सति भावलिङ्गं दीयते । २७-35. संघाधिक्षेपो जात्यादिना झेयः। २८-4. सुहसाय त्ति सुखखापाः । २८-2. न जईणं ति-वच्छला इति योज्यम् । २८-7. आशातनया तपोऽनवस्थाप्य कियता कालेन स्यादित्याह-जहन्नेणेत्यादि । एतावत्कालादूर्व असौ व्रतेषु स्थाप्यते । २८-12. तवस्सी यत्ति-तपोऽन्वितः। २८-14. नितहणारिहो त्ति-गच्छात्पृथक्करणार्हः स.। सूत्रे सव्वो वि त्ति पदम् । २८-17. आशातना-प्रतिसेवानवस्थाप्यो द्विप्रकारोऽपि मूलाई उक्त उत्सर्गत । अववाएण कुलादि-कार्य- कारी । तदधीनानि कार्याणि । उत्तम कार्य बहुजनसाध्यं शृङ्गनादितकार्यमुच्यते । तत्प्रसाधितं येन भवति । संवासो से कप्पइ त्ति-[ मूलसूत्रस्थं वाक्यमिदं ]-एकत्र निवसनं गच्छमध्ये तस्य कल्पते । नालपणसभाषणादीनि । अयमत्र भावार्थ -गाथोकवन्दनादिक्रियाकरणसभाषणादिक्रियापरिहारेण च एकत्र संव- सनमानं मुक्त्वा तपस अनवस्थाप्यलक्षणस्य विधिना प्रतिपत्तिः स्वीकारोऽनवस्थाप्यतपःप्रतिपत्तिः ।
। श्रीचन्द्रसूरिसंरचिता [२८-20. २८-34 २८-20. तत्प्रतिपत्तौ विधिमाह-पसत्थदध्वेत्यादिना-परिहारतवं पडिवजंतो दवाइ अपसत्थे वज्जित्ता पसत्थेसु दवाइसु काउस्सग्गो कीरइ। तत्थ व्वओ वडमाइखीररुक्खे। खेत्तभो इक्षुशालिक्षेत्रकुसुमितवनखंड- प्रदक्षिणावर्तजलपद्मसरश्चैत्यजिनगृहादिषु । कालो पुबसूरे पसत्थाइदिणेसु य । भावओ चंदतारावलेसु । तत्रापि सन्ध्यागतादिदिनवर्ज आलोचनां प्रयुक्ते । यत उक्तम्- 'संझागयं रविगयं विलेर सग्गह विलंबिं च । राहुहयं गहभिन्नं च वजए सत्तनक्खत्ते ॥' अत्र लोकश्रीटीकाकारव्याख्या-सूर्ययुक्तादनन्तरनक्षत्रं सग्रहणम् । सूर्यास्तगमनकाले यनक्षत्रमुदय- मुपयाति तद्विलम्वितम् । राहुणा मुखेनाकान्तं पुच्छेन वा तदाहुहतम् । अन्ये त्वाहु यस्मिन् नक्षत्रे ग्रहणमा- सीत्तद्यावद् रविणा न युक्तं तावत्तदाहुहतमिति । ग्रहभिन्नं यन्मध्ये ग्रहो विभिद्य निर्गच्छति । केचिच्छकटमेदमेव प्रहमेद इत्युदाहरन्ति । अन्ये त्वत्रैवं ब्रुवते यथा- 'जम्मि रविनक्खत्ते ततो संझागयं तु चउदसमं । विहेरं तु विइज होइ चउत्थं विलंविं च ॥' अन्यस्त्वाह-'सर्वविरुद्ध दिवसे यद्येको भवत्यमृतयोगस्तु । हिमवद्दिनकरकिरणः सर्वे दोषाः प्रलीयते ॥' कालतः प्रतिपत्तिश्चास्य तपसो जहनेण मासो उक्कोसेणं छम्मासा । तसि परिहारतवं पडिवज्जतो आयरिओ भणइ-अणवठ्ठप्पतवस्स निरुवसग्ग निमित्तं ठामि काउस्सग्गं । 'अन्नत्थूससीएण'मित्यादि कायोत्सर्गदण्डको वाच्यो जाव वोसिरामि । 'लोगस्सुज्जोयर' अणुपेहित्ता, 'नमो भरहताणं'ति पारित्ता, 'लोगस्पुज्जोयर' कत्तिा आयरिओ भणाइ- 'एस तवं पडिवजह न किंचि आलवइ, मा य आलवह । अन्नस्स(ह)चिंतगस्स उ वाघाओभे न कायव्वो ॥' अस्यार्थः-एस अप्पविसुद्धिकारओ परिहारतवं पडिवज्जइ । एस तुब्भे न कि चि आलवइ । तुन्भे वि एवं मा आलवह । एस तुब्भे सुत्तत्थेसु सरीरवद्धमाणी वा न पुच्छइ । तुम्भे वि एयं मा पुच्छह । एवं च आत्मार्थचिन्त- कस्य ध्यानपरिहार क्रियाव्याघातो न कर्तव्यः । वन्दनं कुरुते भवताम्, न चासो भवद्भिर्वन्द्य. । खेलकाइयसनामत्तगं पा न सो देइ । तस्सतिओ वा न घेप्पइ । उवगरणं परोप्पर न पडिलेहति । संघाडगा परोप्परं न भवंति । भत्तपाणं परोप्पर न करेंति । एगमंडलीए न भुंजंति । यच्चान्यत् किंचित्करणीयं तत्तेन साधं न कुर्वन्ति । गीयत्था परिहारिया तस्स गच्छंतस्स सव्वत्थ अणुगच्छंति । पारणकदिने अलेवकडं पारेइ । सयमाणीयं निद्दिट्टअनेण वा । इत्यन- वस्थाप(प्य)विधिरुता॥ २८-27. अधुना पाराञ्चिकमभिधीयते-तत्र पारं तीर तपसोऽपराधस्थाञ्चति गच्छति । ततो वीक्ष्यते य. स एव पाराश्चिकस्तस्य यदनुष्ठानं तच्च पाराधिकमिति । दशमं प्रायश्चित्तम् । लिङ्गक्षेत्रकालतपोभिर्वहि.करणमिति भावः । तत्र पाराधिकेत्यादि-इह सूत्रे प्रतिषेधकपाराश्चिक एव त्रिविध उक्तः । तदुक्तम्- 'पडिसेवणा पारंची तिविहो सो होइ आणुपुबीए । दुढे य १, पमत्ते य २, नायव्वे अनमने य ३ ॥ सत्र दुष्टो दोषवान् कषायतो विषयतश्च । पुनरेकैको द्विधा स्वपक्षपरपक्षभेदात् । उक्तं च-- 'दुविहो य होइ दुट्टो-कसायदुट्ठो य विसयदुट्टो य। दुविहो कसायदुट्ठो सपक्खपरपक्ख-चउभंगो ।' खपक्षकषायदुष्टः परपक्षकषायदुष्टः । १ । स्वपक्षक०, न परपक्षक०।२। न खपक्षदुष्ट , परपक्षदुष्ट.। ३ । न खप०, न परपक्षदुष्टः । ४ । चतुर्थ शून्यः । कोहं करेंतो कसायदुट्ठो। तत्थ सपक्षे कषायदुहस्स इमे सासवनालाई चत्तारि उदाहरणा । २८-34. तत्थ सासवनालेत्ति--सा[स]वा भजिया। एगेण साहुणा भिक्खागएण सासवनालसेलय सुसंमृतं लद्धं । तत्थ से अईव गिद्धी । तेण तं गुरुणो उवणीयं । तच्च गुरुणा सव्वं भुत्तं । इयरस्स कोवो जाओ, भंडियं च । गुरुणा सो खामिमो तहा नोवसंतो । भणाइ य-भंजामि ते दंता । गुरुणा चिंतियं मा एस मं असमाहीए मारि- स्सइ त्ति गणे अन्नं आयरियं ठवित्ता अन्नं गणं गंतुं अणसणं पडिवनं । पुच्छइ ते साहू कत्थ मे गुरवो । पुच्छति कहिं गओ गुरू । न कहिंति साह्वो । सो अन्नओ सोचा गओ जत्थ गुरवो । तेहिं कहियं-अज्ज चेव कालगओ परिठ- विओ य । ताहे पुच्छइ-कत्थ से सरीरयं गुरुणो। पुन्यकहिमो भंजतो भणाइ-सासवनालं खाइसि त्ति । एयं करेंतो दिह्रो ।।१।। ।
-- । २९-9.] जीतकल्पचूर्णि-विषमपदव्याख्या मुहणंतए यत्ति-एगेण साहुणा लद्धं मुहणंतगं । आणियं तं गुरुणा गहियं । इत्थ वि सव्वं पुव्वखाणगस- रिसं । नवरं तं मुहणंतग पञ्चप्पिणंतस्स न गहियं जीवंते गओ राओ। साहुविरह लभित्ता, गेण्हसि भणंतो, गाढं गले गिण्हइ । संमूढेण गुरुणा वि सो गहिओ । दोवि मया ॥ २ ॥ सिहरिणि त्ति-एगेण साहुणा उक्कोसा मज्झिया सिहरिणी लद्धा । गुरुणो आलोइया निमंतिया । गुरुणा सव्वं आवीया । से साहू पत्थर उग्गिरित्ता आगओ । अन्नेहिं वारिओ । तहावि अणुवसतो । गुरुणा सगणे चेव भत्तं पश्चक्खाणं, नो अनं गच्छं गओ ॥ ३ ॥ उलुयच्छिओ त्ति-एगो साहू अत्थं गए सूरिए सीवंतो गुरुणा भणिओ-पेच्छसि उलुगच्छी । सो रुटो भणइ-एवं भणंतस्स दोवि अच्छीणि ते उद्धरामि । एत्थ वि गुरुणा खामिओ नोवसंतो भणइ-ते अच्छीणि उद्धरामि । तो सो रओहरणाओ अयोमयं किलयं कहिऊण दोवि अच्छी णि उद्धरित्तु ढोवेइ ॥ ४ ॥ एए चउरो वि लिंगपारंची। विसयदुढे वि चउमंगो त्ति-यथा सलिंगी सलिंगसाध्वी सेवते । १ । सलिंगी गिहिलिंगीस्त्रीं । २ । सलिंगी अन्नलिंगे परिवाजिकां । ३ । अन्नलिंगी अन्नलिंगे। ४ । शून्योऽयं । परपक्षकषाय- दुष्टस्तु राजवधक-उदायिनृपमारकवत् । सपक्ष विषयदुष्टस्तु साध्वीकामुकः । स च- पावाणं पावयरो दिहिन्भासो वि सो न कापइ हु । जो जिणमुदं समणिं नमिऊण तमेव धरिसेइ ॥ परपक्षविषयदुष्टस्तु-राजग्गमहिष्यधिगन्ता, अमात्ययुवराजसेनापत्याद्यप्रमहिषीसेवकश्च । दुढे पारंचिए त्ति व्याख्यातम् । सम्प्रति मूढे पारंचिए त्ति व्याख्यायते [गाथा ९६]-स्त्यानर्द्धिनिद्राप्रमादवान् प्रमत्तः मूढोऽपि च एवात्र व्याख्येय.-पञ्चमनिद्रापरो य अतिसंक्लिष्टपरिणामात् स्त्यानर्द्धिनिद्रोपगतो दिनदृष्टमर्थमुत्थाय प्रसाधयति । वावारए त्ति-व्यापारयति । तदुदये च केसवार्धवलसदृशी शक्तिर्भवति प्रथमसंहननिनः । चूर्णिकृप्यने पारां- चिकविधौ पमत्तपारंचिए इति पाठं दर्शयिष्यति । २९-9. पोग्गलेत्यादि-पोग्गलं-मंसं १. मोदगा-लया २. दन्ता-हत्थिदंता ३. फरुसगो-कुम्भकारो ४. वडसाला-डाली ५. एते थीणद्धीए उदाहरणा। तस्थ पोग्गले जहा-एगंमि गामे एगो कुटुंबी। पछाणि य तेलियाणि य तिमण्णेसु य अणेगसो मंसप्पगारा भक्खेइ । सो य तहारूवाणं थेराणं अतिए धम्मं सोऊण पन्वइओ । विहरइ गामाइसु । तेण य एगत्थगामे मंसत्थि- एहिं महिसो विगिंचमाणो दिट्ठो। तस्स मंसे अभिलासो जाओ। सो तेण अभिलासेण अव्वोच्छिन्नेण भुत्तो। एवं अव- वच्छिन्नेण वियारभूमि गओ। चरिमा सुत्तपोरुसी कया। पाउसीयावस्सया कया । तदभिलासी चेव सुत्तो । सुत्तस्से- व थीणद्धी जाया । सो उठ्ठिओ गओ महिसमंडलं । अन्नं हेतुं भक्खियं सेसं आगंतुं उवस्सयस्सोवरि ठवियं । पच्चसे गुरूण आलोएइ-एरिसो सुविणो दिट्ठो । साहूहिं दिसावलोयं करितेहिं दिलु कुणिमं । जहा एस थीणद्धी । थीणद्धिस्स लिंगपारंचियं पायच्छित्तं । तं से दिन्नं ॥१॥ मोयगेत्तिएको साहू भिक्खं हिंडतो मोयगभत्तं पासइ । सुचिरं उविक्खियं न लद्धं । गओ जाव तद- ज्झवसिओ सुत्तो । उप्पन्ना थीणद्धी। राओ तं गिहं गंतुं भंतूण तं कवाडं मोयगे भक्खयति । सेसे पडिग्गहे घेत्तुमागमो । वियडणं । चरिमाए भायणाणि पडिलेहंतेण दिठ्ठा । एयस्स लिंगपारश्चियं ॥२॥ दंते त्ति-एगो साहू गोपुरनिग्गओ हत्थिणा पक्खित्तो कहवि पलाओ । रुसिओ चेव पमुत्तो । उदिना थीणद्धी । उठ्ठिलं गओ, पुरकवाडे मंतूण गजो वावाइओ। दंतमुसले गहेऊणमुवागओ। उवस्सयवाहि - ठवित्ता पुणरवि पासुत्तो। पभाए उठिओ सुविणं आलोएइ । साहूणं गयदंतदरिसणं नायं । तहेव विसज्जिओ ॥ ३ ॥ फरसग त्ति-एगंमि महंते गच्छे कुम्भकारो पव्वइओ। तस्स राओ सुत्तस्स थीणद्धी उन्ना । सो य मट्टी- यच्छेयभासा समीवत्थाण साहूण शिराणि छिदिठमारद्धो। ताणि सिराणि कलेवराणि य एगंते पडइ । सेसा ओस. रीया । पुणरवि पासुत्तो। सुविणमालोयणं । पभाए साहुसंभारणं नायं । दिनं च से लिंगपारचियं ॥ ४ ॥ - ८ जी. क. चु० ५८ श्रीचन्द्रसूरिसंरचिता [२९-13. ३०-1 - घडसालभंजणं ति-एगो साहू भिक्खायरिउं गओ। तत्थ पहे वडसाला रुक्खो । तस्स साला पहं निभेण लंघेऊं गओ। सो य साहू उम्हामिहयभालो भरियभायणो तिसयभुखंतो इरियोवउत्तो वेगेण आगच्छमाणो ताए सालखंधाए सिरेण फिडिओ। रुसिओ जाव पासुत्तो। थीणद्धी उदिना । उठ्ठिओ गमओ । गतूण त सालं गहे. फणमागओ । उपस्सयदुवारे ठविया । वियडणा । नायं थीणद्धी । लिंगपारंची कओ ॥ ५॥ केह आयरिया भणंति-सो पुव्व वणहस्ती आसी । तओ मणुयभवमागयस्स थीणद्धी जाया । पुठवडभासा गंतूण वडसाला भंजणाणयं । सेसं तहेव । इह स्त्यानध्या प्रथमसंहननिनः केसवार्द्धवलसदृशी शक्तिर्भवति । तदन्यत्र साममवला दुगुणं तिगुणं चउगुणं वा भणति । अन्नमन्नं करेमाणे ति-सूत्रपदस्य व्याख्या-अन्योऽन्यं परस्परं मुखपायुप्रयोगतो मैथुनं कुर्वन् पुरुष- युगमिति विशेषः । अभ्य (भण्य ? ) ते च-'आसयपोसयसेवी केवि मणूसा दुवेयगा हुँति ।' तेसिं लिंगविवेगो त्ति-तीर्थकरायासातनापरा आसातनापारंची भवति । चरिमट्ठाणावत्तिसु ति [गाथा९६]-चरिमट्ठाणं पारंचियमेव । तस्यापत्तयस्तदतिचारसेवनानि तेषु प्रसज्यते, स च पाराश्चिकाहः । २९-13. दघभावलिंगे चउभंगो त्ति-द्रव्यलिङ्गं रजोहरणादि, भावलिंगं महाव्रतादि । दवलिंगेण पारंचिओ, भावलिंगेण य १. दवलिंगेण पारं०, न भावलिंगेण य २. भावलिंगेण पारं०, न दवलिंगेण ३. न दध्वलिंगेण पारं० न भावलिंगेण य ४. इति । चतुर्थ. शून्यः। अग्रमहिष्यादिसेवनादौ संप्रकटसेवी । २९-14. उभयलिंगेणावित्ति-व्यलिंगेन भावलिंगेन च पाराश्चिको भवति । २९-15. जत्थु० गाहा [९९] दोसो व्रतलोपादिकः ॥ क्षेत्राण्येवाह-वसहीएत्यादि-वसही-वसतिः निवेसनं एकनिष्क्रमणप्रवेशानि ध्याधीनि गृहाणि । पाटको प्रामादेर्व्यवच्छिन्न सन्निवेश. । साही ग्रामगृहाणामेकपाटी। नियोगो राजकृतपुरदेशः, राज्यादिक. प्रवेशः, इत्येवंप्रकारक्षेत्रे यस्य यो दोषः सम्पन्नस्तस्मात् क्षेत्रात् स पारा. चिकः क्रियेत् । २९-23. अन्नमन्नं ति-अन्योन्याधिष्ठानसेवनम् । २९-28. सूत्रार्थपौरुषी द्वे अपि शिष्येभ्यो दत्त्वा गुरुस्वस्य समीपे गच्छति । २९-31. आचार्यप्रेषितस्य चागीतार्थस्य जत्थ गओ त्ति गव्यूतद्वयस्थितपाराधिकान्तिके । अंतरालेव त्ति तत्सकाशादागच्छतः। से त्ति सूरिशिष्यस्य वा भकं पानं च उपनयन्ति साधवः । २९-35. अणवटुप्पो० गाहा [१०२] परिहारतवो गिम्हसि सिरवासासु जहन्नमज्झिमुक्कोसो-गिझे चउ- स्थछट्टमाई, सिसिरे छहमदसमाई, वासासु अहमदसमवारसंताइ; पारणए अलेवकड । एव तपःपाराश्चिकोऽपि । भतो अभिहितं-अणवट्ठप्पो तवसा तवपारंचिया दोवि वोच्छिन्न त्ति। लिंगक्षेत्रकालैरनवस्थाप्य-पारा. चिकास्तीर्थ यावदनुज्ञाताः। 'उद्देसऽज्झयणसुयखधंगेसु' इत्यादि [ २३ गाथात भारव्म 'झोसिजइ सुवहुं पिहु' इति इति [ ७९ ] पर्यन्तगाथां यावत् सप्तपञ्चाशत्गाथामिर्ज्ञानातिचार [दर्शनातिचार] चारित्रातिचारवस्तुत्रयगोचर तवारिहं पायच्छित्तं भणियं । तदूर्ध्व गाथात्रयेण च्छेदाई । तदनु गाथाचतुष्टयेन मूलाई । तदनु गाथासप्तकेनाऽनव- स्थाप्याई । तदनु गाथानवकेन पाराचिकमुक्तमिति शास्त्रसमुदायार्थः । ३०-1. अथ शास्त्रसमाप्त्यर्थमुपसंहारगाथामाह-इय एस० गाहा [१०३] क्रियते अभिधीयतेऽर्थोऽ- नेनेति करणः शब्दः। जीयकप्पो दि-जीतमाचरितव्यं सर्वकालधरणा वा जीतं, तस्य कल्पः । कल्पशब्दो वर्णनायामत्र । यतः पठ्यते- 'सामर्थे वर्णनायां च च्छेदने करणे तथा । औपम्ये चाधिवासे च कल्पशन्दै विदुषाः॥'
३०-4. ३०-20] जीतकल्पचूर्णि-विषमपदव्याख्या सामर्थेऽतो वर्धते कल्पशब्दस्तदर्थधातुनिष्पनत्वात् । वर्णनायां यथात्र । यद्वा कल्पितो वर्णितः बाधितः। छेदने कल्पितं छेदितं वस्त्रम् । करणे ब्राह्मणार्थ कल्पिताः कृताः पूपाः। औपम्ये यथा-समुद्रकल्पमिदं तडागम् । भधिवासे यथा-कल्पिता अधिवासिता मानाय सन्जिता प्रतिमा । एतेष्वर्थेषु कल्पशब्दः । ३०-4. परिणामगा उत्सर्गापवादवेदिनः । कडजोगिणो-चउत्थाइ तवे कयजोगा। संग्गह- सीला-बसपात्रशिष्यादिसङ्ग्रहपराः । अपरित्रान्ताः अखेद्वन्त अझोपाशादिश्रुतार्थवेदिनः । बुद्धिवन्तो-मे- धाविनः । एवमादीनि-आदिशब्दात्परिणताः श्रुतेन वयसा च । तत्र सोलवरिसारेण वयसाऽव्वत्तो, परेण वत्तो। श्रुतेन च अधीतनिषीथो व्यक्तः, शेषस्तदन्यः । तथा तरमाणगा-जे जं तवोकम्मं आठवेति तं नित्यरंति तदन्ये तरमाणा इत्यादि प्रायम् । ३०-20. पावणं ति-पवित्रम् । निश्चितसूत्रार्थदायकश्चासौ अमलचरणच, तम् । ॥ इति जीतकल्पचूर्णिविषया [विषमपद-] व्याख्या समाप्ता॥ जीतकल्पवृहभूर्णी व्याख्या शास्त्रानुसारतः। श्रीचन्द्रसूरिमिईब्धा स्वपरोपकृति हेतवे ॥१॥ मुनि-नयन-तरणि (१२२७ ) वर्षे श्रीवीरजिनस्य जन्मकल्याणे। प्रकृतग्रन्थकृतिरियं निष्पत्तिमवाप रविवारे ॥२॥ संघचैत्यगुरूणां च सर्वार्थप्रविधायिनः। वशा (विशो?)ऽभयकुमारस्य वसतौ हन्धा सुबोधकृत् ॥ ३॥ एकादशशतविंशत्यधिकश्लोकप्रमाण (१९२०) ग्रंथा। ग्रंथकृतिः प्रविवाच्या मुनिपुंगवसूरिभिः सततम् ॥ ४॥ यदिहोत्सूत्रं किञ्चिदू डब्धं छमस्थबुद्धिभावनया। तन्मयि कृपानुकलितैः शोध्यं गीतार्थविद्वद्भिः॥५॥ ॥ समाप्ता चेयं श्रीशीलभद्रप्रभुश्रीधनेश्वरसूरिपादपनचंचरीक श्री श्री चंद्रसूरिसंरचिता जीतबृहचूर्णि-दुर्गपदविषया निशीथादिशास्त्रानुसारतः संप्रदायाच सुगमा व्याख्येति ॥ यावल्लवणोदन्वान् यावन्नक्षत्रमंडितो मेरुः । खे यावश्चन्द्रार्को तावदियं वाच्यतां भव्यैः॥
परिशिष्टम् । पृष्ठ ५३ उपरि सूचितं (२४-14) जीतकल्पयत्रम् । आचा. निरपेक्ष आचा०कृत उपा० गी० स्थि० गी० स्थि० अकृत कृत अकृत अगी. उपा० कृत गी. अस्थिर कृत गी० अस्थि० अकृत अगी० स्थि. अकृत अगी. अस्थि० कृत अगी. अस्थि० अकृत स्थि० कृत अकृत छेद. छेदः ६ ६. ६ ४। छेदः ६० ६ ६ ४। मूल छेद ६॥ ६ ६. ६ ४ मूल पाराचिक अनवस्था० अनवस्था० अनवस्था० मूल मूल मूल छेदः छेद. ६. ६। ६॥ ६ ६ ४॥ ६ा ६ ४॥ ४ ४। . . . ६। ४ ४ . ० ० ६ ४॥ o २५ २० o . . २५ २५ ४॥ . . २५ २० १५ . . ० २५ २० २० २५ २० २० १५ १० १५ . . २५ २० १५ २५ २० १५ १० . . २५ २० २५ २० १५ १० १० ५ २० २५ २० १५ १५ १० २५ २० ५ १० १० १५ १० १० १५ १० ५ १० ។ .. 1
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मुनि जिनविजय सम्पादित ग्रन्थावली
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१ जैनतत्त्वसार-हिन्दी भाषांतर.
२ विज्ञप्तित्रिवेणि-संस्कृत हिंदी.
३ कृपारसकोष-संस्कृत हिंदी.
४ शत्रुजयतीर्थोद्धार प्रबंध-संस्कृत हिंदी.
५ द्रौपदीस्वयंवर नाटक-संस्कृत हिंदी.
६ प्राचीन जैनलेखसंग्रह भाग १. संस्कृत गूजराती.
भाग २.
८ जैन ऐतिहासिक गूर्जरकाव्य संचय-गूजराती.
९ हरिभद्राचार्यस्य समयनिर्णयः-( संस्कृतनिबन्धः)
१० कुमारपालप्रतिबोधः-(गायकवाडसू ओरिएन्टल सीरीज.)
११ प्राकृतकथासंग्रहः-( गूजरात पुरातत्त्व मन्दिर ग्रंथावली.)
१२ पालीपाठावली.
१३ अभिधानप्पदीपिका-पालीशब्दकोष.
१४ जनसाहित्यसंशोधक त्रैमासिक पत्र. खंड १-२.
छपाता ग्रन्थो
१५ प्राचीन गूजराती गद्यसन्दर्भ,
१६ पट्टावलीसंग्रहः
१७ विजयदेवमाहात्म्य.
१८ गूजरातनां इतिहासनां साधनो.
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