Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner

Raghuvansmahakavyam-2

Kalidas · 2011/07

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श्रीः
(
महाकविकालिदासप्रणीतम्
रघुवंश-सहाकाव्यम् ।
स्मार्तकर्मानुष्ठाननिष्ट-कश्यपवंशावतंस-स्वधर्मधुरन्धर-पाठकोपाह
जयकृष्णशर्मतनुजनुपा विशुद्धानन्द-महाविद्यालयीय साहि-
त्यप्रधानाध्यापकेन गौरीनाथशमण विरचितया
सुबोधिन्चाल्यया व्याख्यया सरला-
र्थचा प्राकृतभाषया
संक्षिप्तार्थया
च
संवलितम्
-
काशीस्य-शारदा-भवनान्
समुल्लसितम्
eeeee
काश्यां नीलक्ष्मीनारायणमुद्रालये ६० ल. नियोजकर द्वारा
मुदयित्ता प्राकाश्यं नीतन्
वैकमान्दाः १६६० वृ०
======三合会会会会会会会会会会会会

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निवेदना निर्गतासु न वा कस्य कालिदासत्य सूक्तिषु । प्रीतिर्मधुरसान्द्रासु मचरीष्विव जायते ।। (बाणभट्टः) न खलु न विदितं विदितवेदितव्यानां विविधविद्याविद्योतितान्तःकरणानां सन्चविदां विपश्चिता, प्युपिन्सूनामन्तवासिनाज पदापामरप्रसिद्धि गतेषु कविकुल- कमल-दिवाकर कालिदास-लेखनी-विगलितेषु काव्यनाकादिपु पञ्चमहाकाव्य. शिरोरसायमाणेऽस्मिन् रघुवंशमहाकाव्ये साहित्यमधिजिगांसूनां जनानां कीदृशः 'सातिशयोऽभिनिवेश इति । कविकुलपतः कालिदासत्य काव्येन न केवलं भारतमेव भारतीया विभूपयन्ति किन्त्वस्य सुविधासरोऽवगाहनविलक्षणविचक्षणाः सरस्वदुत्तरतीरनिवासिनो गौरामा अप्येतदधीयाना नितान्तं वेचान्तरसम्पर्ककलविकलमानन्दमनुभवन्ति, महाकवयोऽपि मुहुर्नुहु-ककण्ठनैपदेऽस्य कृतेरलौकिकरवं प्रतिज्ञानाना नितरामेनं 'प्रशंसन्ति । तदेवं गुणगगगरीयतो महाकवेत्त्यां तो कविना दिलीपादारभ्य अग्निवर्ण- पर्यन्ता जननिंशभूपाला वर्गिताः । नत्र चाही वीरो रतः । शारकरुणशान्ताद- चचाङ्गानि । इदन्न काव्यं रामायणमहानारतादिवगितामितिहासकथामाप्रित्य प्रणीतम् । सन्यगुपवगिताश्चात्र परमानन्दैकफला धर्मार्थकाममोक्षरूपाश्चत्वारो वर्गाः । विलसन्ति च यथायोगमन्त्र सर्वाग्येव महाकाव्यलक्षणानि । अयज्ञ महाविरिह जगति रघुवंशकुमारसम्भवात्मकमनुत्तमं प्रव्यं महाकाव्यं, अभिज्ञानशाकुन्तलविक्रमोर्वशी-मालविकाग्निमित्रादिल्पमनुपनं : दृश्यं कान्यं, अतुसंहारमेघदूतादिरूपं सर्वोच्छ्ष्टं खण्डकाव्यं, नलोदयादिरूपं यमककाव्यं, अतदोधादिरूपं छन्दःशातं, ज्योतिर्विदाभरणरूपं ज्योतिशास्त्रमन्यांच. यहुविधान् निबन्धान निवप्नजताधारणं स्वीचं वैदुप्यं सर्वतोमुखी प्रतिभाँच स्फुट मस्टयानास। लत्य समयादिव्यतिकरं निर्गतुं चिरं प्रयतमानानां यहूनां भारतीयानों प्रलतत्त्वान्वेपणनिपुणानां विदेशीयानाच नियो विसंवादतया नावावधि कपि कशन सिदान्न नासाचत । नयज्ञ स्वल्पीयानेवांशः परीक्ष्यतया प्रकाश्यत इति मयापि अन्यगौरवभवादन मौनमेवावलम्व्यत इति- विदुपामनुचरस्य 1 गीनाथ ० कथा-संक्षेप मरा-मर्ग राजा दिलीप को नन्दिनी का मानना मायाकंसारिणं प्रदर्श नगगांव निदिना म. धेनुः सूनुमवाप्नुवोनि मुदिना निम्न मारो। सोऽपि प्राप्य मनोरथं मुनिमुपामा जाममन्ती देव्या सार्धमुपाजगाम पयगलतापुरम् ॥ २ ॥ प्रातःकाल होते ही नित्यकर्म से निवृत्त हो, गनी से नन्दिनी का पूजन कराकर राजा दिलीप उसे चराने के लिये जहर सो गया। कार दर जाने पर रानी तथा सिपाहियों को उसने लोटा दिया। भोर मयं, गुरुदेव को आशानुसार सारा दिन नन्दिनो को चराता व उसी सेवा करता और सायंकाल होते ही उसे आश्रम में लाता, गनी सुदक्षिणा आगे बढ़कर उसके पुनीत मस्तक की पूजा करती, इस प्रकार सेवा करते २ उसे २१ दिन व्यतीत हुए । वाइसर्वे दिन नन्दिनी दिलीप की परीक्षा करने के हेतु चरनी चरती गदाजी के किनारे हरी हरी दूबों वाली एक गुफा में चली गई । राजा यह समझ कर कि यह कामधेनु को कन्या है किस पशु की शक्ति है जो उस पर आक्रमण कर सके; उसकी रक्षा से निश्चिन्त हो पहाड़ी सुहावना दृश्य देखने लगा। ज्योंही नन्दिनी के ओट हुआ है कि अकस्मात् एक सिंह उस पर झपटा। नन्दिनी बड़ी जोर से डकराई उसको मर्मभेदी श्रावाज सुन पीछे घूमकर राजा फ्या देखता है कि नन्दिनी के ऊपर सिंह बैठा हुश्रा है और नन्दिनी राजा को ओर अपनो रक्षा के लिये अत्यन्त कातर दृष्टि से देख रही है। इस दृश्य को देखकर राजा के मन में बड़ी दया आई और सिंह पर अत्यन्त क्रुद्ध हो उसे मारने के लिये इधर राजा ( २ ) तरकल से वाण निकालने के हेतु अपना दाहिना हाथ पीठ की ओर किया, पर, उसका हाथ बाण के पास जाकर वहीं चिपक गया। राजा अपनी ऐली अनहोनो दशा देखकर बड़ा असमंजस में पड़ा, क्रोध के मारे सर्वांग से चिनगारियाँ निकलने लगी पर कुछ कर न सका। तय सिंह मनुष्य वाणी में बोला "हे राजन् ! अब तू मेरे मारने के लिये विशेष प्रयत्न न कर, तेरा एक भी शस्त्र मेरा बाल बाँका नहीं कर सकता, में जन्म का पशु नहीं हूँ, तू अपने सामने जो देवदारु का पेड़ देख रहा है. यह पार्वतीजी के हाथ का सींवा दुना है और पुत्र को तरह उन्हें अत्यन्त प्यारा है। एक दिन किसी जगलो हाधी ने खुजलाने के लिये अपनी कनपटो इसी वृक्ष के स्कन्ध में रगड़ दी उससे इसकी छाल छिल गई। पार्वती जी यह देख उतनी ही शोकाकुला हुई जितनी देव और दानवों की लड़ाई में स्वामीकार्तिक के घायल होने से हुई थीं। इसलिये उसी दिन से जङ्गली हाथियों को डराने के लिये मुझे शिवजो ने सिंह बनाकर यहाँ रहने की आज्ञा दी है और यह भी कहा है कि पशु अपने आप तेरे पाल आ जाय उसे खा लेना भक्ष्य ढूँढ़ने कहीं न जाना। इसलिये आज मानों साक्षात् शंकर भगवान की भेजी हुई यह गाय मेरे पास आई है। यह मेरा भक्ष्य है मैं इसे छोड़ नहीं सकता। अब तू अपने गुरु के पास लौट जा । लजो छोड़ दे। मनुष्य जिस वस्तु की रक्षा नहीं कर सकता । उसले उसका यश क्षीण नहीं होता।" इस प्रकार सिंह का वचन सुनकर राजा ने उससे यों कहना शुरू कियाः- "हे सिंह ! देवादिदेव महादेव जैले आपके मान्य हैं उसी तरह वे मेरे भी मान्य हैं और गुरु को यह "गाय" भी पूजनीय है, इस- लिये अपने सामने इसका विनाश होने देना सर्वथा अनुचित है। अत: यदि आपको भोजन करना है तो आप दया करके इसे छोड़ दें और उसको जगह मुझे खाले । सिंह यह सुन बड़ी जोर से हँसता - - - हुआ बोला:- राजन् ! एक पशु के लिये अपने इतने बड़े राज को लात मारना महा मूर्खता है । यदि तू जीता रहेगा, असंख्य प्रजा का पालन करेगा, इस एक गाय के बदले इससे भी अधिक दूध देने वाली प. करोड़ों गायें देकर अपने गुरु को प्रसन्न कर सकेगा। इस पर ।

- ( ३ ) ने कहा, जो कुछ हो अपने सामने गुरु को वस्तु का नाश देख नहीं सकता, इस तरह अपनी बातो से सिंह को हरा कर गाय का छोड़ना और अपना खाना सिंह से उसने स्वीकार करवाया और अपना शस्त्र दूर रख शरीर को मांस पिण्ड की तरह सिंह के सामने मुका दिया, मानो माँस का लोथड़ा किसी ने सिंह को खाने दे दिया हो । दिलीप मन ही मन समझ रहा था कि अव सिंह मेरे ऊपर झपटेगा और विचारी नन्दिनी की जान बचेगी पर इतने ही में ऊपर से विद्याधरों ने फूल बरसाये और नन्दिनी ने अति मधुर वचनों से कहा किः- "हे पुत्र उठो” । राजा उठा और उसने अपने सामने माता की समान नन्दिनी को देखा पर सिंह कहीं दिखाई न दिया । नन्दिनी ने राजा से कहा कि "हे पुन में तुझ पर प्रसन्न हुई, तुझे जो वर माँगना हो माँग ले"। इस पर राजा ने जब सुदक्षिणा में अपने समान पुत्र मांगा तब नन्दिनी ने दोने में अपना दूध दुहकर पीने की आशा दी। परन्तु राजा ने विना गुरु की पाशा के उसे ग्रहण करना उचित न समझ कर आश्रम में आ, गुरु को सम्पूर्ण वृत्तान्त कहकर उनको आशा ले नन्दिनी का दूध पोया। प्रातःकाल गोसेवारूप व्रत को पारणा करने के उपरान्त दिलीप और सुदक्षिणा गुरु, गुरुपत्ती, अग्नि, ओर नन्दिनी को प्रदक्षिणा कर अपनी राजधानी की ओर लौटी और रानी गर्भवती हुई ॥२॥ तीसरा सर्ग। रघु का जन्म और उसका राज्याभिषेक । देवी द्वापसपुचे शुमेऽहनि रघु राजाऽस्य यूनः फ्रमार कृत्योहाहमनीव गृनुग्मयवृद्धोऽश्वमेधान प्रति । द्वे पादश्यमुपं विजित्य रघुणा शकंप्रतापी मां- सन्चकांना ग्घी कुलधुरं कृत्वा सदारांऽसरत् ।। इस प्रकार कुछ दिन के अनन्तर दसवें महीने गनी का पुत्र उत्पन्न सुया राजा ने उसका नाम “ग्घु" रखा। राजकुमार रघु. शुनपन . चन्द्र की नगद दिन प्रतिदिन अपने शरीर को पुष्टि को धारण करने लगा। गजा दिलीप ने बड़े उत्साह और उमंग के साथ ( ४ ) यथा समय उसके चूडाकरण उपनयन आदि संस्कार कराये । विद्वानों को रख कर विद्या पढ़ाई। उसके सम्पूर्ण विद्या में निष्णात होने पर राजा दिलीप ने स्वयं उसे धनुर्वेद की शिक्षा दो अनन्तर उसे युवराज बनाया। दिलीप ने सपना सौवां अश्वमेध यज्ञ श्रारम्भ किया और उस यज्ञिय अश्व को रक्षा करने के लिये अन्यान्य राजकुमारों सहित युवराज रघु को नियुक्त किया। इन्द्र यह समझ कर कि यदि दिलीप का यह यज्ञ पूरा हो जायगा तो वह मेरे पद का अधिकारी होगा। इसलिये इन्द्र ने उत्त अश्व को रघु और उसके अनुयाइयों के सामने से हो चुराया परन्तु उसकी माया से कोई उसे और अश्व को देख न सका । रघु और उसके अनुयायो अत्यन्त चकित हुए। उसी समय परमेश्वर की कृपा से कुलगुरु भगवान् वसिष्ठ मुनि की धेनु वहाँ आई। उसके मून ले ने ज्योहो अपने नेत्र को धोया: पूर्व दिशा में घोड़ा भगाकर ले जाते हुए इन्द्र को देखा और बड़े गम्भीर स्वर से इन्द्र को ललकार फर कहा कि हे देवेन्द्र ! यज्ञ को रक्षा करने वाले आप हो यदि ऐसे नीच कर्म में प्रवृत्त होंगेतो यह सब कर्म सदा के लिये लुप्त हो जायगा । इसलिये श्राप कृपा कर इस अश्व को छोड़ द । रघु के ऐसे वचन सुन इन्द्र बोला-“हे राजकुमार ! तेरा कहना सत्य है परन्तु शतकतु अर्थात् लो यज्ञ करने वाला मेरा ही नाम है दूसरे का नहीं, पर, अब तेरे पिता ने मेरा यह नाम मिटाने के लिये हो यह सौवां अश्वमेध यज्ञ रचा है इसलिये मैंने इस अश्व को चुराया है। तू इसके पीछे मत पड़, नहीं तो सगर राजा को सन्तान की तरह तेरा भी नाश होगा" । इन्द्र के इस यचन को सुन रघु बड़े जोर से ठह ठहा फर हंस पड़ा और इन्द्रले योला, इन्द्र ! मुझे विना जोते तू घोड़ा नहीं ले जा सकता इतना कह तुरन्त इन्द्र की छाती में एक बाण मारा। इन्द्र ने भो रघु को वाण ले घायल किया रघु ने भो एक बाण से उतको धजा काटी और एक वाँण उसको चाह में मारा। इस प्रकार चारो ओर से सिद्ध और सैनिकों से घिरा हुआ उन दोनों में भयंकर युद्ध होने लगा। अन्त में रघु के वाण से इन्द्र को प्रत्यक्षा फट जाने पर इन्द्र ने अति बुद्ध हो रघु के ऊपर वन छोड़ा। राजकुमार रघु के छातो पर उसका प्रहार होते ही वह मूदित हो भूमि पर गिर पड़ा। सारी सेना हाहाकार करती हुई दौड़ी, पर वाहरे राजकुमार, इन्द्र के वन प्रहार को तनिक भी परवाहन ।

- ( ५ ) देखते ही देखते उठ खड़ा हुआ, इतना ही नहीं, उठते हो उस महा- वीर ने इन्द्र को मारने के लिये ज्यों हो धनुष पर बाण चढ़ाना चाहा कि इन्द्र ने रोक कर उसे कहा:- "राजकुमार ! में तेरी वीरताले प्रसन्न हुआ। इस घोड़े को छोड़ कर तू जो चाहे मुझ से वर माँग"। रघु ने उत्तर दिया कि जो यही तेरे मन में है तो ऐसा कर कि बिना घोड़ा छोड़े ही मेरे पिता ६६ यो ते १०० यज्ञ का फल प्राप्त कर सकें और इस वृत्तान्त को वह तेरे ही मुख से सुनें। इन्द्र ने रघु की चतुराई को समझ कर मन हो मन उसे सराहा और उसके वचन को स्वीकार किया। इसके बाद इन्द्र घोड़ा लेकर अपनी पुरी को तिघारा । रघु मी अपने राज्य की ओर लौटा। रघु के आने से पहिले दिलीप ने इन्द्र के दूत से लड़ाई का सारा वृत्तान्त सुन लिया था इसलिए राजकुमार रघु के पाते हो बड़ी खुशी २ उसे गले लगाया और कुछ दिन के उपरान्त रघु को राज देकर वानप्रस्थाश्रम का प्राधय लिया ॥३॥ चौथा सर्ग। रघु की दिग्विजय यात्रा स्थित्वा राज्यपदे रघुः परिवरन् हित्वा प्रमादं द्विजान् गत्वा सैन्यपुरःसर समधिकं जित्वा चतन्नो दिशः। हत्वा विद्विषतां श्रियो मखमहं कृत्वा कृती दक्षिणां। दत्त्वा सर्वधनोश्चयं निजयशः श्रुत्वा दरिदो बभो ।। शरदऋतु के लगते हो रघु को दिग्विजय का उत्साह हुश्रा। लेना लेकर पहले पूर्व दिशा की ओर गया। सुह्मदेश और वन्देश जीता । गङ्गा के टापुत्रों में विजय स्तम्भ गाड़े। कपिशा नदो उतर फर कलिंग देश में गया। वहाँ के राजा को जीता। कपिशा नदी के किनारे २ चल कर कावेरी को पार कर मलयागिरि की तराई में डेरा किया। पाण्डुदेश के राजा से मोती आदि अनेक रत्न भेंट लेकर ..+ तथा दर्दुर पर्वतों पर होता हुआ पश्चिम को ओर चला। वहाँ के राजाओं को जीत उनसे भेट ले त्रिकूट पहाड़ को देखता हुआ पारसोक देश में आकर यवनों को जोता उसके बाद उत्तर दिशा को ओर गया। वहाँहण जाति के क्षत्रियों को जीत कर उनले तया ( ६ ) शाम्बोजा ले भेटतो। हिमालय पर चढ़ कर पहाड़ियों से बहुत धन लिया और कैलाश तक गया। वहाँ से लौट कर लौहित्या नदी के पारमारख्योतिपके राजा को तथा फामरूप के राजा को जीत कर उनसे भेट में हाधी लिये। इस प्रकार चारो दिशाएँ जीत फर रघु अपनी राजधानी में पहुंचा और विश्वजित या कर सारा धन ब्रामणों को दे धर्म-राज करने लगा। पञ्चमः सर्गः। अजका स्वयंवर के लिये प्रयाण करना। विद्यान्ते गुरुदक्षिणां मृगयते कौत्साय यक्षेश्वराव आवाय व्यतरदधुः कनकजाः कोटीश्चतस्रो दश । देव्यामस्य तदाशिपाऽभवदनः सोऽपोन्दुमत्यै प्रयान् अखं शापहर: प्रियंवदमुखात्प्राप्याविशत्कुण्डिनम् ॥५॥ इस प्रकार विश्वजित यज्ञ में अपना सारा ऐश्वर्य देकर रघु मिट्टी के पात्र को अपने कार्य में लाया करता था। किली समय महर्षि वरतन्तु के शिष्य कौत्त अपने गुरु को गुरु- दक्षिणा देने के लिये द्रव्य की कामना ले रघु के पास आये । रघुने अपने यहाँ आये अतिथि कौत्त की यथाविधि पूजा की। कुशल प्रश्न के उपरान्त कौल ने कहा "हे राजन् ! आपके ऐसे धर्मशोल प्रजा- पालक राजा के होते हुए प्रजा क्यों न सुखी होवे, आपके गुण आपके पूर्वजों से भी कहीं उँचे पद पर पहुँचे हुए हैं । मैं इस समय आपके पास अपने स्वार्थ के लिये आया हूँ पर आपकी स्थिति देख कर मालूम होता है कि मुझे आपके पास इससे पहले ही भा जाना चाहिये था । अस्तु । यद्यपि इस समय श्राप केवल नामधारी राजा के सदृश हो रहे हैं पर, फिर भी देवताओं की तृप्ति के लिये स्वयं ज्ञोण चन्द्र की तरह भिनुकों में सर्वस्व दान करने वाले श्राप अनुपम शोमा धारण कर रहे हो । जैसे किसी कवि ने कहा है कि- मणिशाणोलीदः समरविजयी हेतिनिहतो मदक्षीणों नागः शरदि सरितः श्यानपुलिनाः । कताशेषश्चन्द्रः, सुरतमृदिता वालवनिता, तनिन्ना शोभन्ते गलितविभवाश्चार्थिषु नृपाः ॥

( ७ ) अव में गुरुदक्षिणा के लिये और किसी राजा के पास जाता इतना कह कर ज्यों ही कौत्स ने जाना चाहा कि राजा रघु ने उन्हें रोक कर पूछा कि हे विहन् ? कितने धन की आपको आवश्यकता है। इस पर कौत्स ने गुरु महर्षि वरतन्तु के साथ की हुई सारी चातें कह कर उसे चौदह करोड़ की आवश्यकता बतलाई। रघुने यह कह कर कि आज तक मेरे यहाँ से कोई अतिथि अपने मनोरथ को विना पूरा किये लौटा नहीं इस लिये आप मेरे इस पवित्र अग्नि शाला में दो तीन दिन कृपा कर प्रतीक्षा करें में श्रापके कार्य के लिये प्रयत्न करता हूँ। कौत्स ने इसे स्वीकार किया। रघु ने कुबेर पर प्रातःकाल चढ़ाई करने का निश्चय किया। रघु प्रातःकाल ज्योही रथ पर पैर रखता है कि खजाने के पहरेदारों ने आ विनीत होकर निवेदन किया कि “रात्रि में “कोप-गृह" में सुवर्ण की दृष्टि हुई है।" रघु ने जाकर उसे देखा और पर्वत की तरह वह सुवर्ण की सारी राशि विद्वान् कौत्स को दे दी। कौत्स ने उन्हें पुत्र लाम का श्राशीर्वाद देकर गुरु के आश्रम की ओर प्रयाण किया। कुछ दिन के बाद रघु को एक पुत्र हुआ जिसका नाम "अज" रखा गया। क्रमशः समय पाकर शिक्षा आदि पाने के उपरान्त अज युवा अवस्था को प्राप्त हुआ और इन्दुमती के स्वयंवर में प्रस्थान किया। मार्ग में मतङ्ग ऋपि के श्राप से गज शरीर को प्राप्त प्रियंवद गन्धर्व को मार कर उसका उस योनि से उद्धार किया। प्रसन्न होकर उसने उसको सम्मोहन नाम का अस्त्र दिया। इस प्रकार वह राजा भोज के नगर में पहुँचा। भोज ने उसका स्वागत किया और एक सुन्दर सजे सजाए राजभवन में ठहराया। अज ने नानादि किया से निवृत्त हो विधाम किया और दूसरे दिन प्रातकाल स्वयंवरोचित वेष-भूषा को धारण कर स्वयंवरस्थ राज समाज की योर प्रयाग किया।

श्रीरघुवंश-सहाकाव्यम्। द्वितीयः सर्गः अय प्रजानामधिपः प्रभाते जायाप्रतिग्राहितगन्धमाल्याम् । बनाय पीतमतिबद्धवत्सां यशोधनो धेनुमृ पेर्मुमोच ।। १ ।। रखुगां (रघुकुलोद्भवानां भूपतीनां) बंशः, तद्विषयकप्रबन्धः अति अस्मिन् महाकाव्ये तद् रघुवंशं नहाकाव्यन् । सूर्यकुलोपनभूपतिवरितस्यनामक महा- काव्यमित्यर्थः। भत्र कविना दिलीपादारन्य भन्निवर्णपर्यन्ता उनशिपाल वगिताः। ते (1८ सग) (10समें) (1८स) (1८ सगे) (३८ सर्गे) (८ संगै) . (६) कुराः । () दिलीप (७.२,३, सर्गेपु) (५) पारियात्रा (२) रघुः (६,१,५, सने) (१६) शीला (२) अजः (५,६,७,८, सर्गेपु! (13) उसामः (१) दशरथः (९,६१,३२, सर्गेषु) (१८) बननाम: (३०,११,१२,१३, ३१,६५, सयु) (१०) व्युपितारका (१६ सगे) () विधसहः (3) अतिथिः ( सर्ने) (२३) हिरण्यनाम: (0) निमः (१८ सने) (१३) कौशल () बलः । (१८) । (२) मलिः (१८ नमें) (२५) पुनः (1) पुरोका (16) (२६) पाया (1८ सगे) () असन्धिः (१३) देखनीक (१८स) (२८) नवना (८ स) (२९) सन्दिप (८ नगे) (८) (१८ सगे) (1८ स) (८समें) (८)

२
रघुवंश-महाकाव्यम् ।
[द्वितीयः
-
(अन्वयः) अथ, यशोधनः, प्रजानाम्, अधिपः, प्रभाते, जायामति-
माहितगन्धमाल्यां, पीतप्रतिवद्धवत्सा, ऋपेः, धेनु, वनाय, मुमोच !
(टोका) अथ = निशानयनानन्तरं, यशोधनः = कीर्तिधनः
"अतियशस्वी" इत्यर्थः । “यशः कीर्तिः समज्ञा च" इत्यमरः, प्रजानां
=जनानां, "प्रजा स्यात्संततौ जने" इत्यमरः, अधिपः = प्रभुर्दिलीपः
प्रभाते प्रातःकाले, जायाप्रतिग्राहितगन्धमाल्यां- सुदक्षिणास्वीका
रितचन्दनपुष्पमालाम्,
पीतप्रतिवद्धवत्सां =पानानन्तरवद्धवत्सकां
ऋपेः = वसिष्टस्य, धेनुं = नन्दिनीम्, वनाय = वनं गन्तुं, मुमोच
मुक्तवान् ॥ १॥
(समासः ) यशोधनः, यश एव धनं यस्य सः यशोधनः । प्रजानां
प्रजायन्त इति प्रजाः तासाम्। अधिकम्पातीत्यधिपः। प्रभाते
प्रकर्षण भातीति प्रभातं तस्मिन् ।जायाप्रतिग्राहितगन्धमाल्या, गन्धश्च
माल्यञ्च गन्धमाल्ये, जायतेऽस्यामिति जाया, तया प्रतिग्राहिते गन्ध
माल्ये यया सा ताम् । पीतप्रतिबद्धवत्साम्, श्रादौ पोतः पश्चात्प्रति-
बद्धः वत्सो यस्याः सा ताम् ॥ १ ॥
(वाच्यपरिवर्तनम् ) अथ प्रभाते यशोधनेन प्रजानाम् अधिपेन
जायाप्रतिग्राहितगन्धमाल्या पीतप्रतिवद्धवत्सा ऋपेः धेनुः बनाय
मुमुचे ॥१॥
(सरलार्थः ) प्रातः सुदक्षिणा धेनुं गन्धमाल्यादिभिः पूजयामाल
कृतस्तन्यपानं तस्या वत्सञ्च स्वस्थाने चवन्ध, ततश्च कीर्तिधनो
दिलीपः स्वच्छन्दविहारार्थ तां नन्दिनीमुन्मुमोच ॥ १॥
(सरलार्थ भापा) रात्रि व्यतीत होने पर प्रातःकाल प्रजापालक,
यशके धनी राजा दिलीपने, सुदक्षिणासे दिये हुए चन्दन और
पुष्पमालाको धारणकरनेवोली, दूध पोकर बँधे हुए बछड़ेवाली
मुनिवसिष्टजी को गायको जंगलमें घूमने के लिये खोल दिया ॥१॥
तस्याः खुरन्यासपवित्रपांसुमपांसुलानां धुरि कीर्तनीया
मार्ग मनुष्येश्वरधर्मपत्नी श्रुतेरिवार्थं स्मतिरन्वगच्छत् ॥२॥
(अन्वयः) अपांसुलानां, धुरि, कीर्तनीया, मनुष्येश्वरधर्मपतो,
खुरन्यासपवित्रपांसुं, तस्याः, मागं, स्मृतिः, श्रुतेः, अर्थम् , इव, अन्व-
गच्छत् ॥ २॥

सर्गः] सुबोधिनीटीकोपेतम् । ३ (टीका) अपांसुलानां = पापरहितानां पतिव्रतानां, धुरि = अने, कीर्तनीया= परिगणनीया "पतिव्रतात्वेन कामिनीकुलललामभूता' मनुष्येश्वरधर्मपत्नी = दिलीपभार्या सुदक्षिणा, खुरन्यासपवित्रपालुं - शफनिक्षेपपूतरजाकणम्, "शर्फ लोवे खुरः पुमान्" इति तथा "रेणु- योः स्त्रियां धूलि पांसुर्ना न द्वयो रजः" इति चामरः, तत्या- धेनोः = पन्थानं, स्मृतिः = मन्वादिस्मृतिः, श्रुतेः- वेदस्य, अर्थमिव अभिधेयमिव, अन्वगच्छत् = अनुसार ॥ २ ॥ (समासः) अपांसुलानां, पांसवः% दोपाः पापानि वा सन्ति आसाम् इति पांसुलाः “सिध्मादिभ्यश्चेति लच प्रत्ययः" त पांसुला इत्यपांसुलास्तालाम् । कीर्तयितुं योग्या कीर्तनीया। मनुस्ये- श्वरधर्मपत्नी, धर्मस्य पत्नी, धर्मपत्नी, ईशितुं शीलमस्येति ईश्वरः, मनुष्याणामोश्चर इति मनुष्येश्वरस्तस्य धर्मपत्नी । तल्लक्षणं यथाः- "पतिं धर्मरतं पत्नी साध्वी शुश्रूपते तु या। नित्यं त्वनन्यहृदया धर्मपत्नी तु तां विदुः ॥" खुरन्यासपवित्रपासुं. पूयन्ते एसिरिति पवित्राः, खुराणां न्यासाः खुरन्यासाः तैः पवित्राः पांसवो यस्य सः तं । मार्ग = मार्यतेऽन्विष्य- तेऽनेनेति मार्गः तम् । श्रुतेः = श्रूयते धर्मोऽनयेति श्रुतिः तस्याः ॥२॥ (वाच्यपरिवर्तनम् )........"मनुप्येश्वरधर्मपत्न्या खुरन्याल. पवित्रपांसुः तस्याः मार्गः श्रुतेः अर्थः स्मृत्या इव अन्वगम्यत ॥ २ ॥ (सरलार्थः ) यथा स्मृतिः श्रुतिप्रतिपादितमर्थम् अभिदधाना सदा तामेवानुगच्छति तथैव पतिव्रताकुलललामभृता महाराजमहिपी सुदक्षिणाऽपि धेनोः पावनैः खुरक्षेपैः पवित्रपालुं तमेव नन्दिनीमार्ग- मनुजगाम ॥२॥ (सरलार्थ भापा) पतिव्रताओंमें पहले पूजा करने योग्य राजा दिलीपकी पत्नी सुदक्षिणा, नन्दिनीके खुरके रसनेले पवित्र धूलिवाले मार्ग में ध्रुतिके अर्थ के अनुसार स्मृति के नाई चली ॥ २॥ निवर्त्य राजा दयितां दयालुस्तां सौरभेयीं सुरभिर्यशोभिः । पयोधरीभूतचनु समुद्रां जुगोप गोस्पधरामियोवीम् ॥ ३ ॥ (अन्वयः) यशोभिः, सुरभिः, दयालु, राजा, दयितां, निक ट ग्गवंशमामा hi - -- पयोधरोमृतवतुःसमुद्रा, गोमागम्, उनी भी, जुगोप ॥३॥ (टीका) यगोभिः = कीनिमिः, "यकीविन" यमरः, सुरभिः- मनोर"मुभिः वान्मनोग" इति नि:, दयानु:- रुपान्नुः "स्यात्यानुः फागणिक = भूपी दिलीपः, दयितां प्रियां, "गित कर प्रियम्" मर.. निवयं = परावर्त्य, भूमिपने = पयोधगेमवचनुासमुद्राम = ऊयो भूतचतुःसागरां, धेनुपने - बुन्धतिग्मनगमागगम, गोमार्ग गोमूर्तियारिणीम् , उवाम् = बनुन्धमिय. “यसुधा मनुधग इत्यमरः, जुगोप= रमन ॥३॥ (समासः) दयागीलो दयानुः। गजन शोमनेसो राजा पयोधरीभूतचतुःसमुद्रां, भूमिपने-समीचीनाः उद्राः जलजन्तुवि पादयो यत्र, सह मुद्रया बेलया वर्तत इति या समुद्रः, घरन्तीनि धराः, पयसां धराः पयोधराः, अपयोधगः पयोधगः सन्यमानाः पयोधरीभूताः, पयोधरोभूनाश्चत्वारः समुद्रा यस्यान्ताम् । धेनु- पतेः-पयला अनघरा अपराः संपद्यमाना अवरीभूतो अधरीमृता. श्वत्त्वारः समुद्रा यस्यास्ताम् । मुरभेः सपल्यं खो सौरमयी ताम् । गोल्पघरां, घरतीति घरा, गोः रूपं गोलपं, तस्य घर ताम् ॥३॥ (वाच्यपरिवर्तनम् ) यशोभिः सुरभिणा दयालुना रामा दयितां निवर्त्य पयोधरीभृतचतुःतमुद्रा गोत्पधरा उर्वी इव सा सौग्नेयी जुगुपे ॥३॥ (सरलार्थः) परमकारुणिको दिलीपः तपोवनवहिर्गमनाल्लुद- क्षिणां परावर्त्य नन्दिनीनपेण समागतां चतुर्मिः स्तनैरिव चतुर्मिः समुद्रैः संयुक्तां लानाद्वमुन्धरा देवीमिव तां नन्दिनी ररज्ञ ॥ ३ ॥ (भावार्थ) दयावान और यशस्वी राजा दिलीपने रानी मुदक्षिणाको लौटा कर चार समुद्ररूपी चार स्तनोंवाली कामयेन- की कन्याकी गायके रूपमें पूथ्वीके जैसो रक्षा की! ३ ॥ व्रताय तेनाऽनुचरेण धेनोन्यपौष मोऽप्यनुयायिवर्गः । न चान्यतस्तस्य शरीररक्षा स्ववीय गुप्ता हि मनोः प्रमृतिः।।४।।

तर्गः] सुबोधिनोटीकोपेतम् । . (अन्वयः ) व्रताय, धेनोः, अनुचरेण, तेन, शेपोऽपि, अनुयायि- वर्गः, न्यपेधि, तत्स्य, शरीररक्षा, अन्यतः, न च, हि, मनो, प्रतिः, स्ववीर्यगुप्ता (अस्ति) ॥ ४ ॥ (टीकी ) व्रताय = गोपालनरूपं व्रतक, धेनोः = नन्दिन्याः, अनुचरेण - लेवन, तेन -राशा दिलोपेन. शेषोऽपि = अवशिष्टोऽपि, सुदक्षिणापेक्षयेत्यर्थः, अनुयायिवर्ग:अनुचरगणः, स्यपेधि - परा- यतितः, तत्य दिलीपत्य, शरीररक्षा= देहसंरक्षणं, "गानं वपुः संहननं शरीरं वर्म विग्रहः । शायो देहः' इत्यमरः, च, अन्यतः- अन्यत्मा, पुरुषपत्ननास्ति, हि = यतः, मनोः = वैवस्वतमनोः, प्रतिः सन्ततिः, स्ववी~गुप्ता स्वपरामरज्ञिता भवति ॥ ४ ॥ ( समासः ) अनुचरेण. अनु = पश्चाचरतीत्यनुचरस्तेन । अनु. यायिवर्गः, अनु = पश्चाधान्ति तच्छोला शनुयायिनो नुगामिनस्तेषां वर्गः शरीररक्षा ऋणाति शीर्यते वा शरीरं, तस्य रक्षा । प्रसूयत इति प्रसूतिः । स्ववीर्यगुप्ता, स्वत्य वीर्य स्ववीयं, तेन गुप्ता Hell (वाच्यपरिवर्तनम् ) व्रताय धेनोः अनुचरः सः शेपम् अपि अनुयायिवर्ग न्यपेयोत् । अस्य शरीररक्षया व अन्यतः न. हि मनोः प्रसूत्या स्ववोर्चगुप्तया (भूयते ) ॥ ४ ॥ (सरलार्थः) व्रतपरिपालनायैव वने नन्दिनीमनुगच्छन्दितोपः प्राक् सुदक्षिणां ततस्ततोऽवशिष्टानन्यानपि अनुवरान् अनुगमनान्नि- वर्तयोमाल । मनुप्रभवाः कुलधुरन्धरा राजानः स्वयाहुक्तेनैव प्रात्मरक्षणं कुर्वन्ति नात्मरक्षार्थ परानापेक्षन्ते ॥ ४ ॥ (भावार्थ) राजा दिलीपने शेप अनुचरोंका मुण्ड भी लौटा दिया, उसके शरीरको रक्षा दूसरे किलोले नहीं होती थी, क्योंकि मनुको सन्तान अपने ही पतले रक्षित रहती है ॥ ४ ॥ आस्वादवद्भिः कवलेस्तुणानां कपड्यनर्देशनिवारणश्च । अव्याहतैः स्वैरंगतैः स तस्याः सम्राट् समाराधनतत्परोऽभूत्।।५।। (अन्वयः) सन्नाट, सः, आस्वादवलिः, रणानां, कवले, काट- यन, शनिवारले, असाहत, रबैरगतः, च, तस्याः. समाराधन- तत्परः, अभूत् ॥५॥ (टोका ) सना मरलेश्वरः, "येनेष्टं राजनदेन मण्डल स्पेश्वरक्ष यः। शास्ति रक्षारया रानः स सन्माद इत्यमरः, ६ रघुवंश महाकाव्यम् । [द्वितीयः दिलीपः, पास्वादवद्भिः = रसवद्भिः, "सुस्वादुमिरित्यर्थः" तृणानां = घासानां, "शप्पं यालतृणं घासः" इत्यमरः, कवलैः =ग्रासैः, "मासस्तु कवलः पुमान्" इत्यमरः, कण्डयने नम्नादिना गोत्र- स्वर्जन, दंशनिवारणैः, बनमक्षिकादूरीकरणः, “दंशस्तु बनमक्षिका" इत्यमरः, अव्याहतैः = अप्रतिहतैः, स्वैरगतः = स्वेच्छागमनैः “मन्द स्वच्छन्दयोः स्वरः," इत्यमरः, तस्याः धेनोः, समाराधनतत्परः- सेवासकः, “तत्परे प्रसिताऽसतौ” इत्यमरः, अभूत् = श्रासीत् ॥ ८॥ (समासः) सम्यक् राजतेऽसौ सम्राट्। दंशनिवारणैः, दंशानां निवारणानि तैः । श्रास्वादवन्दिः, श्रास्वादो विद्यते येषान्त आस्वाद- वन्तस्तैः। अव्याहतैः, न व्याहतानीत्यच्याहतानि तः । स्वैरगतः, स्वेन (स्वातन्त्र्येण) ईरते इति स्वैराणि, स्वैराणि गतानि स्वैरगतानि तेः'। समाराधनतत्परः = तदेव परं प्रधानं यस्येति तत्परः, श्राराध्यतेऽ नेनेत्याराधनं, सम्यग् अाराधनं समाराधनं, तस्मिन् तत्पर इति समाराधनतत्परः ॥५|| (वाच्यपरिवर्तनम् ) तेन सम्राजा आस्वादबद्भिः "तस्याः समाराधनतत्परेगा श्रमावि ||५|| (सरलार्थः ) राजा दिलीपः कोमलघासग्रासदानेन, गाबनर्जनेन, बनमक्षिकारीकरगेन, अप्रतिमद्धेन तस्याः गमनेन च, धेनोः बारा: धनासक्त श्रासीत् ॥५॥ (भावार्थ ) राजा दिलीप कमी २ हरे हरे चासों के ग्रासों से कमी २ बुजलाने से, कमी २ मत्री और मच्छड़ों के उड़ाने से और इच्छानुसार उसे फिरन देने से, उसकी सेवा में तत्पर रहता था ॥५॥ स्थितः स्थिनामुच्चलितः प्रयातां निपीमासनबन्धधीरः । जलाभिन्नापी जन्तमाददानां चायेव तां भूपतिरन्यगच्छन् ॥ ६॥ (अन्वयः) सः, मृपतिः, स्थितां, तां स्थितः 'सन्', प्रयातां "न"उलितः 'मन' निषेदुषीम,"नां"पासनयन्यधीरः 'सन्' जलम्, श्राददानां "तां" इलामिलापी 'सन' छायब, अन्यगच्छत् ॥ ६ ॥ (टीका) भूपतिः = महीपतिः, मः = दिलीपः, मियतानिवृतगम- नाम, ऊर्चम अवनिष्टमा नामित्यर्थः, नां = नन्दिनी, 'दृष्ट्या स्थितः सन् = तिटन मन, प्रयातां = प्रस्थिना 'हा' उचलितः सन - प्रस्थितः सर्गः] सुबोधिनोटोकोपेतम् । सन्, निपेदुषी = उपविष्टां, 'हवा' पालनयन्यधीरः सन् = उपविष्टः लन्, जलं = सलिलं, आददानां = पिबन्तों"हा""स्वयं"जलाभिलायो सन् - सलिलेच्छुः सन् , स्वयम् अपि जलं 'पियन् सन्नित्यर्थः छायेव-प्रतिविम्बमिव, "छाया सूर्य प्रिया कान्तिः प्रतिविम्बमनातपः" इत्यमरः, अन्वगच्छत् = अनुजगाम ॥ ६॥ (समासः) पातीति पतिः, भुवः पतिः भूपतिः। निषेदुपी, निपलाद् इति निषेदुपी तां । भालनवन्धधीरः श्रास्यते अस्मिन्निति आसनम्, श्रासनस्य बन्धः आसनवन्धः तत्र धीरः। श्राददानां, श्रादत्तेऽसावाददाना ताम् । जलाभिलापी जलमभिलपतेऽसौ जलाभिलापो॥६॥ (वाच्यपरिवर्तनम् ) भूपतिना, स्थिता स्थितेन, प्रयाता उच्चलि- तेन, निषेदुपी पालनबन्धधीरेण जलं श्राददाता जलाभिलापिणा (लता)सा छायया इव अन्वगायत ॥ ६ ॥ (सरलार्थः) यदा नन्दिनी गमनादुपरेमे तदा राजा श्रपि तस्मा- दुपरतो बभूव, यदा चलितुं प्रववृते तदा सोऽपि चचाल, यदा जल- म्पातुमियेप तदायमपि जलाभिलाषो बभूव, किमन्यत् सः तस्या- श्छाया च तामनुजगाम ॥ ६ ॥ (भावार्थः ) राजा दिलीप का चलना, रुकना, बैठना और पानो पीना नन्दिनी की इन २ क्रियाओं पर ही निर्भर रहता था॥ ६ ॥ सन्यस्तचिन्हामपि राजलक्ष्मी तेजोविशेषानुमितां दधानः । आसीदनाविष्कृतदानराजिरन्तर्मदावस्य इव दिपेन्द्रः ॥ ७ ॥ ( अन्वयः ) न्यस्तचिहामपि, तेजोविशेषानुमितां, राजलदमों, दधानः, सः, अनादिहतदानराजिः, अन्तर्मदावस्थः द्विपेन्द्रः, इव, प्रालीत् ॥ ७॥ (टीज्ञा) न्यस्तचिहामपि =त्यनाच्छनचामरामपि, तेजोविशे- पानुनितांप्रतापातिशयततिां "स प्रभावः प्रतारन यत्तेजः कोपदण्डजन्" इत्यमरः, राजलक्ष्मी राजश्रियं दधानः- धारयन् , सः राजा दिलीपः, अनाविष्फतदानराजिः प्रकटितमदरेखा, "गडः टो मदो दानम्" इत्यमरः, अन्तर्मदापत्यः दानशा, द्विपेन्द्रः = गजेन्द्रः, 'द्विरदोऽनेकपो हिपः । , रघुवंश-महाकाव्यम् । [द्वितीयः गजो नागः" इत्यमरः, इत्र - यथा, "व वा यथातथेवैवम्" इत्यमरः, श्रासीत् प्रभूत् ॥ ७॥ (समासः) न्यस्तचितामपि, न्यस्तानि चिन्हानि यस्याः सा ताम् । तेजोविशेषानुमितां, तेजसः विशेषस्तेजोविशेषस्तेनाऽनुमिता ताम् । राजलक्ष्मी, रानः लक्ष्मीः राजलक्ष्मीः तां। बचेऽसौ दधानः। दानस्य राजिः, दानराजिः, न अाविष्कृता अनाविकृता, अनाविकता दानराजिर्यस्यासी अनाविष्कृतदानराजिः। मदस्य अवस्था मदाब- स्था, अन्तः मदावस्था यस्य सोऽन्तर्मदावस्थः। द्वाम्यां शुण्डतुण्डा- भ्यां पिबन्तीति द्विपास्तेपामिन्द्रो द्विपेन्द्रः ॥ ७ ॥ (वाच्यपरिवर्तनम् ) तेन न्यस्तचिह्नाम् अपि "दधानेन (सता) अनाविष्कृतदानराजिना अन्तर्मदावस्येन द्विपेन्द्रेण इव अभूयत ॥ ७॥ (सरलार्थः) यथा कश्चन समदो गजराजः स्वीयां मदावस्था दानोदकधाराभिर्वहिरप्रकटयन्नपि केवलं तेजसः अतिशयेन भन्याकार- तया वाऽन्तर्गतां दानदशां प्रत्याययति, तथैवायमपि श्रङ्गीकृतनन्दिनी- परिचावतो भूमिपश्छत्रचामररत्ननचितशिरोमुकुटालद्वारादिमिः स्वां राजश्रियमप्रदर्शयन्नपि असाधारणमतापातिशयशालिना निज- मूर्तिप्रभावेणैव स्वां राजलक्ष्मीमनुमाययति स्म ॥ ७ ॥ (भावार्थ ) जैसे किसी हाथीके मस्तकसे मदका चूना प्रगट नहीं हुआ है तो भी उसके भव्य श्राकार के देखने से ही भीतर मदका रहना जाना जाता है उसी प्रकार यद्यपि उस समय दिलीप पास राजलक्ष्मीक चिह्न छन्त्र चामर श्रादि नहीं थे तौमी कंवल उनके तेजसे ही गजलक्ष्मी जानी जाती थी ॥ ७ ॥ लताप्रतानोद्ययितः स केऔरधिव्यधन्वा विचचार दावम् । रक्षापदेशान्मुनिहोमपेनोर्वन्यान्विनेष्यन्निव दुष्टसत्वान् ॥ ८ ॥ ( अन्वयः ) लताग्रतानांद्ययितः, कंगः, "उपलनितः" अधि. ज्ययन्या, सः, मुनिहामधेनाः, रक्षापदेशात्, यन्यान , दुष्टसत्यान, विनयन, इव, दावं, विचचार ॥ ८ ॥ ( टीका) लताप्रनानीदनथितः = बल्लीनन्तुमिमन्नमय्य यः, "यही तु प्रततिलता" इत्यमरः, केशः = कः "चिकुरः कुन्तलो सर्गः] सुबोधिनोटीकोपेतम्। & वाला कचः केशः शिरोरुहः" इत्यमरः 'उपलशितः' अधिज्यधन्या - पारोपितकार्मुकः, सः= दिलीपः, मुनिहोमधेनोः = वसिष्ठनन्दिन्याः, रक्षापदेशात् = संरक्षणच्छलात्, वन्यान् = काननोत्पन्नान् , "अटव्य- रण्यं विपिनं गहनं काननं वनम्" इत्यमरः, दुष्टतत्वान् = हिलजन्तून् , "सत्त्वमलो तु जन्तुपु" इत्यमरः, विनेष्यन्निव-शिक्षयिष्यनिव, दावं वनं, दवदावौ वनारण्ये बह्रीं" इत्यमरः विचार: परिवन्नाम ॥3॥ (लमातः ) लतामतानोद्नथितैः, प्रतन्यन्त इति प्रतानाः लतानां प्रतानाः लताप्रतानाः तैः उद्मथितास्तैः। ज्यामधिगतमधिज्यं, अधि- ज्यन्धनुर्चस्य सोऽधिज्यधन्वा । मुनिहोमधेनोः, होमत्य धेनु)मधेनुः मुनोमधेनुत्तत्याः। रक्षोपदेशात्, रक्षाया अपदेशस्तस्मात् । बने भवा वन्यास्तान् । दुष्टतत्वान्, दुष्टाश्च ते तत्वाञ्च दुष्टसत्वान्तान् । वितेप्यन्, विनेयतीति विनेष्यन् ॥ ८ ॥ ( वाच्यपरिवर्तनम् ) लतामतानोद्मथितैः केशः उपलहितेन अधियधन्वना तेन मुनि "दिनेप्यता इव दावःविचेरे॥ ८॥ (सरलार्थः) इतस्ततः परिन्नमन्दिलीपः स्वान् केशान् लता. तन्तुभिः संयम्य आरोपितमौवाकं धनुरादाय वनोत्पन्नान् हिंन्त्र जन्तून् दण्डयन्निव अटति स्म । बलिष्टनन्दिनीलंरक्षणं तु तस्य शेवतं व्याजमेवासीत् ॥ ८ ॥ (भावार्थः) वसिष्टको दानन्दिनीकी रक्षा करनेके बहानेले जगलके दुष्ट प्रालियोंको शिक्षा देता हुघा लताना तन्तुषों से गुंथे हुए केशीवाला राजा दिलीप प्रत्यचा चढ़े हुए धनुपको धारण कर. वन में विचरने लगा॥ - ॥ विसृष्टपारर्वानुचरस्य तस्य पार्यद्रमाः पाशभृता समस्य । उदीरयामा रिवोन्मदानामालोकशब्दं वयसां विरावैः ।। ९ ।। (अन्ययः ) पार्श्वनाः, उन्मदानां. वयसां, विरादः, विन्द पाश्र्वानुचरस्य, पाशभृता. समस्य, तत्य. आलोकस, वीरया. टीमा) पार्वमाः = पापक्षाः, जन्मदानां = मदोन्मत्ताना, यसां = रागानां, "अगदात्यादिनार्दपः" इत्यमरः, विरादै रघुवंश महाकाव्यम् [द्वितीय वरुणेन विसृष्टपार्वानुचरस्य = त्यक्तपार्श्वसेवकस्य, पाशभृता- "प्रचेता वरुणः पाशो" इत्यमरः, समस्य समानस्य, तस्य = दिली पस्य, सालोकशब्द = राजानमालोकयेतिसूचकशब्द, "राजोचित লযহা। मिति भावः" उदीरयामासुरिव = उच्चारयामासुरिव ॥६॥ (समासः) पार्श्वद्रुमाः = दुवति उध्वं गच्छति इति दुः, द्रव शाखाः सन्त्येषामिति द्रुमाः, पार्श्वयोः द्रुमाः, पार्श्वद्रुमाः। उन्मदानां उत् (उत्कटः) मदो येषान्तानि तेषाम् । विसृष्टपाश्र्वानुचरस्य = अनु चरन्तीत्यनुचराः, पार्श्वयोरनुचराः, पाश्र्वानुचराः, विसृष्टाः पाया नुचरा येन तस्य । पाशभृता = पाशं विभीति पाशभृत् तेन झालोकशन्द, भालोकनमित्यालोकस्तस्य शब्दस्तमालोकशब्दम् ॥६। (वाच्यपरिवर्तनम् ) पार्श्वगुमैः उन्मदानां वयसां विरा निगृष्टपार्शानुचरस्य........ आलोकशब्दः उदोरयाञ्चक्रे ॥६॥ (गरलाः ) दिलीपस्य उभयपावस्था वृक्षाः परित्यक्ताऽनुचर गाय तसा "जयति जयति महाराजः" इति विजयशब्दं स्वा स्थितगराशान्तकुलकूजितः प्रोग्चारितवन्तः ॥ ६ ॥ (भानार्थ) घमणको उपमावाले राजा दिलीप का जयशब्द दोन और नान उन्माच पक्षियोंके कलरव द्वारा कराया ॥ ६ ॥ मरमानाथ गरुत्माखाभं तमय॑मारादभिवर्तमानम् । सवाकिग वाललनाः प्रगनैराचारलागैरिव पौरकन्याः ।। १०॥ (समयः) ममत्पगुनाः, बाललता, समरसत्रामम्, आगत् विमानम, आय, नं, प्रः, पौरकन्याः, प्राचारला, इव gurry ||2|| १ ) मध्ययनाः मामतान्दोलिताः, पालना: कोमल 4: "मी न बतानगंना" इत्यमरः, मम्मलागं : आशितुल्य hi, "आगददारमीयाःइत्यमरः, अभिवमान- ... अगं, दिली, अग्न: - पुगः, गुनं फु : 1:14:, पारस्याः .. पुरानामिना, यात्रामा माला- 7, 11, लामाकान: बना, दिलीप परिमागि 1 Hinममन्प्रयासका प्रयुः । वालमायालाय सर्गः] सुबोधिनीटोकोपेतन् । तालतान याललताः । मन्त्सनाभ मरुतः सखा मरुत्लखलस्य प्राभेवाभा यत्स्य सः तम् । अभिवर्तमानं, अभिवर्ततेऽलाव भिवते. मानत्तम् । प्राचारार्था ताजाः आचारलाजास्तैः, पौरकन्याः = पुरे भवाः पौरास्तेषां कन्याः । अचिंतुं योग्यो अचस्तम् ॥१०॥ (वाच्यपरिवर्तनम् ) मरुत्प्रयुक्ताभिः चाललताभिः मरुत्तखामः ম: बाराद् अभिवर्तमानः सः, प्राचारलाजैः पौरकन्याभिः इव, प्रतून नवाकोर्यत ॥ १० ॥ (सरलार्थः) मारुतान्दोलिता अभिनवतताः समोपस्थितत्य वहिलमकान्तः दिलीपत्त्य उपरि नवजातकुलुमानि लमवर्पन् ।। १०॥ (भावार्थ) नयी लतानोने, समोप त्राये हुए आदरणीय अनितुल्य तेजस्वी दिलीपराजा पर, पुरकी कन्या, जैसे अपने देश राजा पर लावा बरसाती हैं, उस तरह फूलोको वर्षा की ॥ १० ॥ धनुर्भूतोऽप्यस्य दयाभावमाख्यातमन्तःकरणैर्विशः । विलोकयन्त्यो वपुरापुरक्ष्णां प्रकामविस्तारफलं हरियः ॥११॥ (अन्वयः) धतुतः, अपि, अत्य, विशङ्क, दयाभावम्, आल्यात, वपुः, विलोकयन्त्यः, हरिप्यः, जदया, प्रकाम- विस्तारफलं श्रापुः ॥१६॥ ( टीका) धनुर्भूतः= धनुर्धारिलः, अपि, अस्य = दिलीपम्प, विशः = निभाक, अन्तःकरलैः = चित्तैः दयाईभावं = दयया स्निग्धी- भूताशपम्. आख्यातं = कथितं 'अस्य वपुः = शरीरं "गानं पः संहननं शरीरं वन विग्रहः" इत्यमर, विलोकयन्त्यः = सादरमातो. चन्त्यः, हरिप्या-मृग्यः प्राण नेत्राला, "लोचनं नयनं मीनर चतुरक्षिणी" इत्यमरः प्रकामविस्तारफत अत्यन्तविशालनाचा फतं. कापुःप्रापुः।१३ (समासः) धनुर्वृतः = धनति रति धनुः, धनुः दिन्तीति धनु- त्तित्य । विशः विगता सहान्यन्तानि तः। विलोकयन्तः दिलोर.यन्तीति दिलोवादन्यः । प्रदानपिस्तारफल प्रज्ञानं विस्तार प्रज्ञामविस्तारत्तस्य पालन् । दवाड़ना = दया आईः नावधिता. भिमायो यस्य सःतन् । ११ अन्तःकरणैः .

१२ रघुवंश-गाजाराम [शिलोगः (वाच्यपरिवर्तनम् ) विलोकयन्तीभिः शरिणीभिः अण प्रकामविस्तारफलम, आप ॥११॥ (सरलार्थः) धृतधन्यनोऽप्यस्य मयया द्रवीभूतमन्नाशगं माया निर्मीका: सत्यो हरियोऽस्य शरीरला विण्यम् प्रारुप का रितनयनैः पश्यन्यो निजनयनविशालताया अशा साफनाम्नानु. वत्यः ॥२२॥ (भावार्थ ) धनुष को धारण करनेपर भी भयरहित हो राजा के शरीर को देखने वाली हरिणियों ने अपनी आँखों के बड़ेपन का फल पाया ॥११॥ से कीच करितपूर्णरन्त्रैः कृमनिरापादितवंशकृत्यम् । शुश्राव कुञ्जपु यशः स्वमुच्चैरुद्गीयमानं वनदेवताभिः।।१२|| (अन्वयः) सः, मारुतपूर्णरन्धैः, कूजन्तिः, कोच, श्रापादित- वंशकृत्यं, कुजेपु, वनदेवताभिः, उच्चः, उदीयमानं, स्वं, यशः, शुश्राव ॥१२॥ (टीका) सः = दिलोपः, मारुतपूर्णरन्त्रैः = वायुपूरितच्छिदैः, "छिद्रं नियंथनं रोक रन्धं श्वनं वपा सुपिः, इत्यमरः, (अत एव ) कूजद्भिः, स्वनन्दिः, कोचकैः वेणुविशेषैः, “वेणवः कोचकारी स्युर्य स्वनन्त्य निलोद्धताः" इत्यमरः, श्रापादितवंशकृत्यं - सम्पादित. सुपिरकार्य; कुलेषु = निकुजेषु, "निकुखकुलो वा लोवे लतादिपि- हितोदरे।" इत्यमरः, वनदेवताभिः = विपिनदेवीभिः, “अटव्यरण्यं विपिनं गहनं काननं वनम्" इत्यमरः, उच्चैः = उच्चस्वरेण, उदीयमा- नं, = स्तूयमानं, स्वं = निजं, यशः - कीर्ति, "यशः कीर्तिः समक्षा च" इत्यमरः, शुश्राव-श्रुतवान् ॥१२॥ (समासः) मारुतेन पूर्णानि रन्ध्राणि येपान्तः। कूजन्ति ते कूजन्तस्तैः। वंशस्य कृत्यं वंशकृत्यं, आपादितं वंशकृत्यं यस्मिन् तत् । वनानां देवताः ताभिः । उद्गोयत इत्युगोयमानम् ॥ १२ ॥ (वाच्यपरिवर्तनम् ) तेन मारुतपूर्णरन्धैः कूजद्भिः कोचकैः आपा- दितवंशकृत्यं कुञ्जपु वनदेवताभिः उच्चैः उदीयमानं स्वं यशः शुध्रुवे ।। १२॥

सर्गः] सुबोधिनीटोकोपेतम् । १ AN (सरलार्थः) बने भ्रमन् सः वनदेवताभिः उपगीतं स्वं यशः श्रुतवान् ॥ १२॥ (भावार्थ) राजा दिलीप ने हिन्द्रों में भरे हुए वायुसे गूंजने वाले याँतो द्वारा लतागृह में वनदेवताओं से ऊँचे स्वरले गाये हुए अपने यश को सुना ॥ १२॥ पृक्तस्तुपारैगिरिनिराणामनोकहाकम्पितपुप्पगन्धी । तमातपलान्तमनातपत्रमाचारपूतं पवनः सिपेत्रे ॥ १३ ॥ (अन्वयः ) निरिनिर्भरणां, तुपारी, पृक्तः, अनोकहारुम्मितपुप्प- गन्धी, पवनः, अनातपत्रं, भातपल्लान्तं, प्राचारपूतं, तं, लिये ॥१३॥ (टीका ) गिरिनिर्भराणां = पर्वतप्रवाहाणां, "प्रवाहो निर्भरी झरः" इत्यमरः, तुपारः = हिमकणैः, “तुपारी हिमसोकरौ' इत्यमरः, पृका-सम्पृक्तः, अनोकहाकम्पितपुष्पगन्धी = वृज्ञाझम्पितकुसुम- सुगन्धिः, पवनः = वातः, “नमत्वद्वातपवन-" इत्यमरः, अनातपत्रं =वरहितं, (अतएव ) प्रातपल्लान्तं = उणम्तानं, प्राचारपूर्ण सदाचारपवित्र, तं = दिलीपं लिपेवे- सेपितवान् ।। १३ ।। (समालः) गिरील निर्भरास्तेषाम् । अनलः (शकटत्य ) (गति ) हन्तीत्यनोकहः, श्रापितानि च तानि पुपाणि श्रा०, अनोकहानाम् प्राकम्पितपुप्पाणि अनो० तेषां गन्धोऽस्यास्तीत्वनी कहाकम्पितपुष्पगन्धी। पुनातोति पवनः । भातपात्लायत इत्यानपत्रं, न विद्यते प्रातपत्रं यस्य सः तम् । प्रातपेन झान्तत्तम्। भावा- रेण पूतः आचारपूतस्तम् ॥ १३ ॥ (वाच्यपरिवर्तनम् ) गिरिनिर्भरण नुपाः पृतन अनोशाक कम्पितपुष्पगन्धिना पवनेन सनातपत्रः प्रातपहान्तः आचारपूतः सः सिये ॥१३॥ ( सरलार्थः) जगत्वावयन, मीतल गन्धो गन्धवो बिना मनन सो दिलीपस्य बापजनितांतान्ति दूरोवार । १३ ! (भावार्य) पहाडी भरनो जलबिन्दुली सहित तथा सन्दर गन्धत पानुने उपरहित जनपद सूर्यवे. किरोसे सन्तत पदिन उस दिलीप राजा पी संवा दी।

रतुवंश-गा। [लोगः - सबला, । शशाम पृष्ट वापि विना दवाणिगासीदिशगाफनापतिः । उनं न सञ्चवधिको वयाध नम्मिन वनं गोगरि गाहमान ||१|| ( अन्ययः) गोवारि, नम्मिन, वन, गाामान, 'मनि' दवानिः, वृष्ट्या, विना, शापि, शशाम, फलपुपतिः, विशंधा, आसोत, सत्वेषु, अधिकः, ऊनं, न, बवाये ॥ २४ ॥ (टीका ) गोप्तरि = रनितरि, तस्मिन् - दिलीपे, धर्म अरण्यं "अटव्यरण्यं विपिनं गहनं काननं बनम्" इत्यमरः, गामाने सति प्रविशति सति, दवाग्निः = वनाग्निः, "दवदावो घनारण्यवती' इत्यमरः, वृष्ट्या = वर्षोन, बिना अपि = वर्षणाभावेऽपि, शशाम = शान्तो वमूब, फलपुष्पवृद्धिः = सम्यकुसुमसमृद्धिः, "वृतादीनाम् फलं लस्यम्” इत्यमरः, विशेषा-अतिशयिता, यासीत् = अभूत्, सत्त्वेषु-जन्तुपु, "सत्वमन्त्री तु जन्नुपु" इत्यमरः, अधिक सिंहादिरित्यर्थः" ऊनं = दुचलं, 'मृगादिकमित्यर्थः' न वबाधेन पीड़यामास ॥ १४ ॥ ( समासः) गोपायतीति गोता तस्मिन् । गाहतेऽसा गाहमा. नस्तस्मिन् । फलानि च पुपाणि च फलपुष्पाणि तेषां वृद्धिः । दव- स्थानिर्दवाग्निः ॥ १४ ॥ (वाच्यपरिवर्तनम् )" "दवाग्निना वृष्ट्या विना अपि शेमे फलपुष्पवृद्ध्या विशेषया (अभूयत) ॥ १४ ॥ (सरलार्थः) तस्य प्राप्तमात्रेणैव तस्मिन् अरण्ये बनाग्निः जलव- पणेन विनैव शान्तिमवाप, वल्लीवृक्षादयोऽपि प्रभूतया फलपुष्पलदस्या चकाशिरे, सवलो वन्यजन्तुः दुर्चलं न बाधते स्म, अहो अली- किकस्तस्य प्रभावः ! ॥ १२ ॥ (भावार्थ ) प्रजा की रक्षा करनेवाले उस राजा के वन में प्रवेश करने पर वृष्टि के बिना हो वनाग्नि शान्त हुश्रा । फल फूल की शोभा क हुई, शत्रुओं में सबल निर्वल को न सताता हुश्रा ॥ १४ ॥ सञ्चारपूतानि दिगन्तराणि कृत्वा दिनान्ते निलयाय गन्तुम् । प्रचक्रमे पल्लवरागताम्रा प्रभा पतङ्गस्य मुनेश्व धेनुः ।। १५ ॥ ...

सर्गः]] सुबोधिनोटोकोपेतम् । . (अन्वयः) पलवरागताना, पतङ्गस्य, प्रभा, मुनेः, धेनुः, च, दिगन्तराणि, सञ्चारपूतानि कृत्वा, दिनान्ते, निलयाय, गन्तुं, प्रचक्रमे ॥ १५॥ (टीका) पलपरागताना = किसलयारतवर्णा "पल्लवोऽस्तो किसलयम्” इत्यमरः, पतङ्गस्य = सूर्य्यस्य, "पतङ्गः पतिर्ययोः" इति विश्वः, प्रभा = कान्तिः, मुनेः = वशिष्ठः, धेनुश्च = नन्दिनो च, दिगन्तराणि, दिगवकाशानि, “अन्तरमवकाशावधिपरिधानान्तधिं. भेदताद\" इत्यमरः, सञ्चारपूतानि = भ्रमणेन पवित्राणि, कृत्वा = विधाय, दिनान्ते - सन्ध्यासमये, निलयाय -स्तमयाय, इति सूर्य- पने, धेनुप-निजाश्रमाय, गन्तुं प्रचक्रमे = उपकान्तवती ॥ १५ ॥ (समासः ) पल्लवस्थ रागः पल्लवरागः स इव ताम्रा । प्रभा = प्रकण भातीति प्रभा। दिशामन्तराणीति दिगन्तराणि । सञ्चारण पूतानि सञ्चारपूतानि । दिनल्यान्तो दिनान्तस्तस्मिन् ॥ १५ ॥ (वाच्यपरिवर्तनम् ) पल्लवरागताम्रया पतङ्गस्य प्रभया मुनेः धेन्वा च दिनन्तराणि प्रचक्रमे ॥ १५ ॥ (सरलार्थः) अभिनवकिललयरागरका सूर्यकान्तिःतथा वसिष्ट- नन्दिनी सर्व दिनं वने निखिलान्दिगन्तभागान् निजसंचरणेन पवि- श्रीकुर्वाणा सायकाले स्वस्वाधमाभिमुखी जाता ॥ १५ ॥ (भावार्थ ) नवीन खिले हुए कोमल पल्लव को समान रंग चाली सूर्यकी प्रभा सायङ्काल भ्रस्ताचलको और नन्दिनो तपोवन को लौटी ॥१५॥ तां देवतापित्रतिथिक्रियामन्दग्ययो मध्यमलोकपालः । बभौ च सा तेन सतां मतेन श्रद्धव साक्षाद्विधिनोएपन्ना ॥ १६ ॥ (अन्वयः) मध्यमलोकपाल: देवतापित्रतिधिनियार्धा. तां. अन्यक, ययो, सता, मतेन, तेन, उपपन्ना, सा, विधिना, सोज्ञात. श्रद्धा, व यमौ ॥ १६ ॥ (टोका ) मध्यमलोकपालः- मर्त्यलोकाधिपः, देवतापित्रतिधि- मियार्थी = चागधाददानादिप्रयोजनोतुषां तां नन्दिनी, भन्दा अनुगं, "सन्मान्वक्षमनुगे" इत्यमरः पयौ = जगान, सतां न सजनसमारतेन, तेन = दिलीपेन, उपपना युती, सा --

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सर्गः] सुबोधिनीटोकोपेतम् । . रषु सन्तीति तानि शाहलानि, मृगैः अध्यासितानि शाहलानि येपु तानि । श्यामानीव भाचरन्तीति श्यामायमानाति, ॥ १७ ॥ ( वाच्य परिवर्तनम् ) तेन......"वनानि पश्यता (सता ) यये । (सरलार्थः) दिलीपः, अल्पजलाशयेभ्यो निर्गच्छतो वनशूकरान्, निवासपादपं गन्तुम्प्रवृत्तान् मयूरान्, तणेषु यथासुखम् उपविष्टान् मृगानवलोकयजगाम ॥ १७ ॥ (भावार्थ) राजा दिलीप छोटे २ सरोवरों में से निकलते हुए जंगली सुअरोंके झण्डवाले, अपने २ वृक्षोंकी ओर आते हुए मोरों वाले, हरे २ घास वाले श्यामवनों को देखता हुआ चला ॥१७॥ आपीनभारोहनप्रयत्नाद्गृष्टिगुरुत्वादपुपो नरेन्द्रः । उभावलञ्चक्रतुरञ्चिताभ्यां तपोवनावृत्तिपथं गताभ्याम् ॥१८॥ (अन्वयः) गृष्टिः, आपीनभारोद्वहनप्रयत्नात, नरेन्द्रः, वपुषः, गुरुत्वान्, उभौ, अञ्चिताभ्यां गताभ्यां, तपोवनावृत्तिपयं, अलञ्चक्रतुः॥१८॥ (टीका) गृष्टिः= सकृत्प्रसूता वसिष्टधेनुः, आपीनभारोद्वहनप्र- ऊधोभारधारणायासात्, "ऊधस्तु क्लीयमापोनम्" इत्यमरः नरेन्द्रः, वपुपः-शरीरस्य, गुरुत्वात् = स्थूलशरीरभारात् , उभौ = नन्दिनीनरेन्द्री, सञ्चिताभ्यां = मनोहराभ्यां गताभ्यां = गमनाभ्यां, तपोवनावृत्तिपधं = तपोवनपरावर्तनमार्गम् , चलञ्चमातुः = भूपया- मासतुः॥१८॥ (समासः) भापीनस्य भारः आपीनभारस्तस्योबहनं तस्मिन् प्रयतस्तस्मादापीनभारोद्वहनप्रयलात् । नराणामिन्द्रो नरेन्द्रः, तपसो वनं तपोवनं; तस्मादावृत्तिस्तपोवनावृत्तिः तस्याः पन्धास्तम् ॥ १८ ॥ (याच्यपरिवर्तनम् ) आपीनभारोदनप्रयलात् , गृष्टया, वपुषः गुरत्यात् नरेन्द्रेण उभाभ्याम् अश्चितान्यां गताम्यां तपोवनवृत्तिपधः कलनमो॥ १८॥ (सरलार्थः) नन्दिनी स्थूलस्य जयसो भारा दिलोपय शरीरस्त गौरवात् उभापप्येतो नन्दिनीदिलीपो मन्दं मन्दं गमन तपोवन- मानमतमातुः॥१८॥ (भावार्थ )पहलो पार दाई गाय ने ऐनका भार । यत्नात्, - २ १८ रघुवंश महाकाव्यम् । [हितीयः के प्रयत्त से, राजा ने अपने देह को स्थूलता से दोनों ने ही अपनी २ मन्दगति से तपोवन के चावागमन मार्ग को सुशोभित किया ।। १ ।। वसिष्ठधेनोरनुयायिनं तमावर्तमानं वनिता बनान्तात् । पपी नियेपालसपक्ष्मपंक्तिरूपापिताभ्यामिव लोचनाभ्याम् ।।१६।। (अन्वयः) वनिता, निमेपालसपत्मपङक्तिः 'सती' वसिष्ठवेनो, अनुयायिनं, वनान्तात् , आवर्तमानं, तम् उपोपिताभ्याम् , इव, लोत्र नाभ्यां, पपी ॥१६॥ (टीका ) वनिता = दिलीपपत्नी मुदक्षिणा, मुदक्षिणा, निमेपालसपदमः पङ्क्तिः = निमीलनमन्दाक्षिलोमपङ्क्तिः, सती, वसिष्ठवेनोः = वसिष्ठ पिनन्दिन्याः, अनुयायिनम् = अनुगामिनं, वनान्तात् = वनप्रान्तमा गात्, आवर्तमानं = परावर्तमान, तं = दिलीपं, उपोषिताभ्यां त्रुभुति ताभ्याम् , इव, लोचनाभ्यां नयनाम्यां, "लोचनं नयनं नेत्रम्" इत्यमरः पपौ-पीतवती, सा सोत्कण्ठंभृशम् अवलोकयामासेति भावः ॥१६॥ (समासः )निमेपालसपदमपतिः, पदमणां पङ्क्तिः पदमपङ्क्तिः निमेपेषु अलसा निमेपालसा, निमेपालसा पक्ष्मपङ्क्तिर्यस्याः सा वसिष्ठस्य धेनुः वसिष्ठधेनुस्तस्याः । अनुयातीत्यनुयायी तम् । वन स्यान्तो वनान्तस्तस्मात् । श्रावर्ततेऽसावावर्तमानस्तम् ।। १६ ।। (वाच्यपरिवर्तनम् ) वनितया निमेपालसपक्ष्मपन्तया सत्य वसिष्टधेनोः अनुयायो वनान्ताद् आवर्तमानः स....... पपे ॥ १६ (सरलार्थः) यथा कश्चन पिपासाकुलितः सरसं जलम्मुहुर्मुह पीत्वाऽपि तृप्ति नाप्नोति तथैव प्राणाधीश्वरस्य चिरमनवलोकनेनाधी रायास्तस्याः प्रियतमवियोगतापितमाकर्णदी, नयनं प्राणप्रियं । पुनः पुनदृष्ट्वाऽपि सन्तोपं न माप ।। १ ।। (भावार्थ ) होमधेनु के पीछे पीछे चलने वाले राजा दिलीप के रानी सुदक्षिणा ने प्यासे हुए को तरह भर आंख देखा ।। १६ ।। पुरस्कृता वर्त्मनि पार्थिवेन प्रत्युद्गता पार्थिवधर्मपत्न्या । तदन्तरे सा विरराज धेनुर्दिनक्षपामध्यगतेव सन्ध्या ॥ २० ॥ (अन्वयः) वर्मनि, पार्थिवेन, पुरस्कृता, पार्थिवधर्मपन्त्या : प्रत्युद्गता, सा, धेनुः, तदन्तरे, दिनक्षपामध्यगता, सन्ध्या, इव विरराज ॥२०॥ ..

१६ -सर्गः] , सुबोधिनोटीकोपेतम् । (टीका ) वर्मनि = मार्ग, पार्थिवेन = रामा दिलोपेन, पुरस्कृता- अग्ने कृता, पार्थिवधर्मपत्न्या - दिलीपपल्या सुदक्षिणया. प्रत्युद्गता = आनेतुमभिगता, सा = धेनुः, तदन्तरे - सुदक्षिणादिलीपमध्ये, दिन- क्षपामध्यगता = अहोरात्रान्तर्गता, सन्ध्या इव = सायं समय इव, विरराज-शुशुभे ॥ २०॥ (समासः) पृथिव्या ईश्वरः पार्थिवस्तेन। पुरः कृतेति पुरस्कृता। धर्मस्य पती धर्मपत्नी, पृथिव्या ईश्वरः पार्थिवस्तस्य धर्मपत्ती तया। तयोरन्तरन्तदरन्तस्मिन् । दिनञ्च क्षपा च दिनक्षपे, तयोर्मध्यं गता इति दिनक्षपामध्यगता ।। २० ॥ (सरलार्थः ) सुदक्षिणा पथि धेनोरनतः राजा च तत्पृष्ठतः ययौ यथा दिननिशयोर्मध्ये स्थिता सन्ध्या शोभते तधैव तयोः तुदक्षिणा- 'दिलीपयोर्मध्येऽवस्थिता धेनुरपि शुशुभे ॥ २० ॥ (वाच्यपरिवर्तनम् ) वर्त्मनि पार्थिवेन पुरस्कृतया पार्थिवधर्मप- ल्या च प्रत्युद्गतया तथा धेन्वा तदन्तरे दिनक्षपामध्यगतया सन्ध्यया इव विरेजे ।।२०।। (भावार्थ ) मार्ग में राजो दिलीप से आगे की गई और रानी सुदक्षिणा से भागे ली हुई (अगुवानी की गई ) कामधेनु उन दोनों (राजा रानी) के बीच, दिन और रात के मध्य में लन्ध्या की सी शोभा को प्राप्त हुई ॥२०॥ प्रदक्षिणीकृत्यू पयस्विनी तां मुदक्षिणा साक्षतपात्रहस्ता । प्रणम्य चान विशालमस्याः शृङ्गान्तरं द्वारमिवार्थसिद्धः ॥२१॥ (अन्वयः) साक्षतपात्रहत्ता, सुदक्षिणा, पयस्विनी, तां, प्रद क्षिणीकृत्य, प्रणम्य, च, अस्याः विशालं शृङ्गान्तरं, अर्थसिद्धः, द्वारम इव, भानर्च ॥२॥ (टोका) साक्षतपात्रहत्ता लतण्डुलभाण्डकरा, सुदक्षिणा दिलीपपत्नी, पयस्विनी प्रशस्तदुधां, तां नन्दिनी, प्रदक्षिणीक =परिक्रम्य, प्रणम्य = प्रणामं कृत्वा च, अत्याः धेनोः, विशालं पृथुलं, "विशङ्कटं पृथु वृहद्विशालं पृथुलं महत्" इत्यमरः, शृङ्गान =ऋजमध्यदेशं, ललाटपट्टमिति यावत्, अर्थसिद्धः= कार्यति- द्वारमिव = प्रवेशपथमिव, आनर्च = पूजयामाल ॥२१॥ (समासः)अक्षतानाम्पात्रमातपात्रं, तेन सह घर्तते हस्तोय. सा। पयस्विनी, प्रशस्तं पयो विद्यते यस्याः साताम् ।

२०
रघुवंश-महाकाव्यम् ।
[द्वितीय
अप्रदक्षिणां प्रदक्षिणां कृत्वेति प्रदक्षिणीकृत्य । शृङ्गान्तरं = शृङ्गयो
रन्तरंशृङ्गान्तरम् । अर्थसिद्धः, अर्थस्य सिद्धिरर्थसिद्धिस्तस्याः ॥२१ ।
(वाच्यपरिवर्तनम् ) साक्षतपात्रहस्तया सुदक्षिणया तां पयस्विनी
प्रदक्षिणीकृत्य प्रणम्य च........."श्रानर्चे ॥२१॥
(सरलार्थः ) सतण्डुलभाजनकरा सुदक्षिणा नन्दिनी परिक्रम्य
प्रणस्य च स्वमनोरथसिद्धेः द्वारं मत्वा तस्या भालं पूजयामास ॥२१॥
(भावार्थ ) नन्दिनी की प्रदक्षिणा कर पूजापान हाथ में ली हुई
रानी सुदक्षिणा ने मनोरथ सिद्धि के द्वार को नाई उसके चौड़े मस्तक
की
पूजा
की ॥२१॥
वत्सोत्सुकाऽपि स्तिमिता सपर्या प्रत्यग्रहीत्सेति ननन्दरंतुस्तौ ।
भक्त्योपपन्नेपु हि तद्विधानां प्रसादचिह्नानि पुरः फलानि ॥२२॥
(अन्वयः) सा, 'धेनु' वत्सोत्सुका, अपि स्तिमिता, 'सती'
सपर्सा, प्रत्यग्रहीत्, इति, तौ, ननन्दतुः, हि, भक्त्या, उपपन्नेषु,
तद्विधानां, प्रसादचिह्नानि, पुरस्फलानि, (भवन्ति ) ॥२२॥
(टीका) साधेनुः, वत्सोत्सुकापि = स्ववत्सदर्शनोत्कण्ठिताऽपि,
स्तिमिता= निश्चला सती, सपा = पूजां “पूजा नमस्याऽपचितिः
सपाऽहिणाः समाः इत्यमरः” प्रत्यग्रहीत् = स्वीचकार, इति
हेतोः, "वत्सावलोकनौत्सुक्येऽपि निश्चलभावेन पूजा स्वीकाराद्धेतोरिति
भाव" तौ नन्दिनीनरेन्द्रो, ननन्दतुः= शानदम्प्रापतुः, हि = यस्मात
कारणात्, भत्तया = पूज्यानुरागतया, उपपन्नेपु-युक्तेपु, 'विपये
तद्विधानां - तारशीनां, प्रसादचिह्नानि = प्रसन्नतालक्षणानि, पुर:-
फलानि - प्रत्यासम्नेष्टनिमित्तानि भवन्तीति शेपः ।।२२।।
(समासः) वत्से उत्सुका वत्सोत्तुका । तद्विधानां तस्या विधेव
विधा येषां तेपाम्। प्रसादचिह्नानि, प्रसादस्य चिह्नानि प्रसादचिहानि ।
पुरःफलानि = पुरः फलानि येपान्तानि पुरम्फलानि ॥२२॥
(वाच्यपरिवर्तनम् ) तया वत्सोत्तुकया अपि स्तिमितया सत्या
सपर्या प्रत्यग्राहि इति ताभ्यां ननन्दे, भत्तया उपपनेषु तद्विधानां
प्रसादचिन्द पुरसफलैः (भूयते ) ।।२२।।
(सरलार्थः ) धेनुः यद्यपि तस्मिन् समये स्ववत्सदर्शनाथ भृशम-
धोग वामीत् तथापि खा तस्याः पूजां निश्चलमावेन स्वीचकार,
अतः मुदक्षिणादिलीपी निर्भरमाननन्दतुः। यतः महात्मनां प्रसाद
अचिरगव मनानां मनोरथसाफल्यं प्रकटयति ॥२२॥

सनः] - 3- सुबोधिनोटोकोपेतम् । २१ (भावार्थ ) प्रातःकाल से बिछुड़े हुए अपने बछड़े के लिये पत्यन्त सधीर भो उस नन्दिनो ने स्थिर होकर उसकी पूजा ग्रहण की, इससे वे दोनों अधिक प्रसन्न हुए, भक्त के प्रति मनोरथ के देनेवाले महात्माओं को प्रसन्नता के चिन्ह निःसन्देह फल के हेतु सागे २ मुश्या करते हैं ॥२२॥ गुरोः सदारस्य निपीड्य पादौ समाप्य सान्ध्यं च विधि दिलीपः। दोहावसाने पुनरेव दोन्धी भेजे भुजोच्छिन्नरिपुर्निपण्णाम् ।।२३।। (अन्वयः) भुजोच्छिन्नरिपुः, दिलीपः, तदारस्य, गुरोः, पादो, निपीडच, सान्ध्यं, विधिञ्च, समाप्य, दोहावसाने, निषण्णां, दोनों पुनः, एव, भेजे ॥२३॥ (टीका) भुजोच्चिनरिपुः = बादुविध्वंसितारिः, "भुजबाह प्रवेष्टो दोः" इत्यमरः, दिलीपः = दिलीपनामा भूपः, सदारस्य = सभाय॑स्य, "भाा जायाऽथ 'भूनि दाराः, इत्यमरः, गुरोः- वसिष्ठस्य, पादौ चरणौ, निपीडय = संवाह्य, मूर्ना प्रणम्येति भावः, सान्ध्यं = सायज्ञालिकं, विधिम् = अनुष्ठान, समान्य सम्पाद्य, दोहावलाने = दोहनान्ते, निषण्णां = उपविष्टां, दोन्ध्रों = दोहनशोला नन्दिनी, पुनः भूयः, एव, भेजे सिपेवे ॥२३॥ (समासः) भुजोच्छिन्नरिपुः, भुजाभ्यामुच्छिन्नाः रिपबो येन सः। सदारस्य, दारैः सहितः सदारस्तस्य । सन्ध्यायां भवः सान्ध्यस्तम् । दोहावलाने, दोहत्यावसानं, तस्मिन् ॥२३॥ (वाच्यपरिवर्तनम् ) भुजोच्छिन्नरिपुणा दिलोपेन" निपणा दोग्ध्री पुनः एव भेजे ॥ २३ ।। (सरलार्थः) बनादाश्रममागतो दिलीपः गुरुं गुरुपत्नोच्च प्रण- नाम । तश्च सायकालिकमनुष्टानम्परिसमाप्य दोहनानन्तरं सुखासीनां तां नन्दिनीं पुनः सिपेवे ॥ २३ ॥ (भावार्थ) अरुन्धती के सहित गुरु वशिष्ट के चरणों को प्रणाम कर और सन्ध्या समय के अनुष्ठान को समाप्त कर राजा दिलीप ने दुहने के बाद बैठो हुई उस नन्दिनो को फिर से सेवा श्रारम्भ की ॥ २३॥ तामन्तिकन्यस्तवलिमदीपामन्यास्य गोप्ता गृहिणीसहायः । क्रमेण मुप्तामनु संविवेश सुप्तोत्थितां मातरनूदतिष्ठत् ॥ २४ ॥ 3- ...............

[हिलीयः . ... ૨૨ रघुवंश-गाकाव्यम् । (अन्वयः) गोप्ता, गृहिणीनहाया, 'सन्' अन्तिकन्यस्तयलिप्र- दीपां, ताम्, अन्वास्य, कमेण, सुप्ताम् अनु, संविवेश, प्रातः, सुप्तो. स्थिताम् , ताम् अनु, उदतिष्ठत् ।। २४ ॥ (टीका ) गोप्ता रक्षको दिलीपः, गृहिणीसहायः पत्नीसहितः सन् , अन्तिकन्यस्तवलिप्रदीपां = समीपस्थापितपूजीपकरणदोषां, तां पूर्वोक्ता ठग्नासीनां नन्दिनीम्, अन्वाम्य = अनुपविश्य, फ्रमेण - क्रमशः, सुप्तां = निद्रिताम् , अनु = पश्चात् , संविवेश = मुप्पापा प्रातः = प्रातःकाले, सुप्तोत्यितां = शयनोत्थिताम् , जागरितामित्यर्थः, ताम् अनु, उदतिष्ठत् = उत्थितवान् ॥ २४॥ (समासः ) गोपायतीति गोप्ता । गृहिणीसहायः = सह अयते गच्छतीति सहायः, गृहिणी सहायः यस्यासौ । अन्तिके न्यस्ता अन्तिकन्यस्तः, अन्तिकन्यस्ता वलयःप्रदीपाश्च यस्याः सा तां । सुप्तोत्थितां, आदी सुप्ता पश्चात् उत्थिता ताम् ।।२४॥ (वाच्यपरिवर्तनम् ) गोवा गृहिणीसहायेन सता अनु संविविशे । प्रातः सुप्तोत्थिताम् अनु उदस्थीयत ॥ २४ ॥ ( सरलार्थः ) दिलीपः तस्याः समीपे दीपसहितां पूजासामग्नी, संस्थाप्य सुदक्षिणासहितस्तस्याः समीपे उपविवेश । ततःप्राप्तनिद्रायां तस्यांतावपि निद्रांजग्मतुः,प्रातरुत्थितायां तस्यांतावपि उदतिष्ठताम। (भावार्थ ) नन्दिनी की सेवा करनेवाले स्त्रीसहित राजा. दिलीप उसके सोने के बाद सोये जागनेके अनन्तर जागे ।। २४ ।। इत्थं व्रतं धारयतः प्रजार्थं समं महिण्या महनीयकीर्तेः। सप्त व्यतीयुस्त्रिगुणानि तस्य दिनानि दीनोद्धरणोचितस्य ॥२५॥ (अन्वयः ) इत्यं, प्रजाथ, महिण्या, सम, व्रतं, धारयतः, मह- नीयकीतः, दीनोद्धरणोचितस्य, तस्य, त्रिगुणानि, सप्त, दिनानि, व्यतीयुः॥ २५ ॥ (टोका) इत्थं = अनेन प्रकारेण,प्रजार्थ = सन्ताना), "प्रजास्या. सन्ततो जने" इत्यमरः, महिप्या= पन्या सुदक्षिणया, समं = सह,, := गोसेवारूपं नियम, धारयतः = अनुतिष्ठतः 'पालयत इत्यर्थः,. हनतप्रशस्तयशसः, दोनोद्धरणोचितस्य दीनजनरक्षणनि- रतस्य, तस्य = दिलीपस्य, त्रिगुणानि = निरावृत्तानि, सप्त दिनानिः एकविंशतिवासराणि, व्यतीयुःव्यतिक्रान्तानि ॥२५॥ .

सनः] २ सुबोधिनीटोकोपेतम् । २३ (समासः) प्रजार्थ, प्रजायत इति प्रजा=सन्ततिः, सैवार्थः प्रयोजनं यस्य तत् । धारयतः-धारयतोति धारयन् तस्य । महनीय- कोतः, महनीया कोतिर्यस्य स तस्य । दीनोद्धरणोचितत्य, दोना- नामुद्धरणं दीनोद्धरणं तस्मिनुचितस्तस्य । त्रिगुणानि, त्रयो गुणा आवृत्तयो येषां तानि ।। २५ ।। (वाच्यपरिवर्तनम् ) इत्यंत्रिगुणैः सप्तभिः दिनैः व्यतीये ॥२५॥ (सरलार्थः) एवं सन्तानार्थकवतमाचरतः कीर्तिसम्पन्नत्य तत्यैकविंशतिदिनानि समतीतानि ॥ २५ ॥ (भावार्थः) इस प्रकार सन्तानके लिये स्त्री सहित व्रत करने वाले राजा दिलीपके २२ दिन व्यतीत हुए ।। २५॥ अन्येचुरात्माऽनुचरस्य भावं जिज्ञासमाना मुनिहोमधेनुः । गङ्गाप्रपातान्तविल्दशप्पं गौरीगुरोगव्हरमाविवेश ॥ २६ ॥ (अन्वयः) अन्येचुः, आत्माऽनुचरस्य, भावं, जिज्ञासमाना, 'सती' मुनिहोमधेनुः, गङ्गाप्रपातान्तविल्डशप्पं, गौरीगुरोः, गहरम् , प्राविवेश ॥ २३ ॥ (टीका ) अन्येद्युः अन्यस्मिन् दिने, द्वाविंशे दिने, श्रात्मानुचर- स्य स्वसेवकत्य राज्ञः, भावं - अभिप्रायं, भक्तिमित्यर्थः, जिज्ञा- समाना=ज्ञातुमिच्छन्तो, 'सती' मुनिहोमधेनुः = मुनेः होमार्थवृत- पयोध्यादिसाघकनन्दिनी, गङ्गाप्रपातान्तविन्दशपम् =जान्हवी- पतनप्रदेशलमीपोत्पन्नवालवणम् , “शष्पं वालतलं घातः" इत्यमरः गौरीगुरोः = पार्वतीपितुः, “हिमाचलत्येत्यर्थः” गह्वरं = गुहाम्, प्राविवेश-प्रविवेश ।। २६ ।। (समासः) अन्यस्मिन् अहनि इति अन्येद्युः । आत्मानुचरस्य = अनुचरतीत्यनुचरर, आत्मनोऽनुचर प्रात्मानुचरस्तस्य । जिनालमाना, जिज्ञासतेऽसौ जिलासमाना । गङ्गाप्रपातान्तविहशप्पं, प्रपतत्यत्मि- निति प्रपातः, गङ्गायाः प्रपातो गझाप्रपातस्तस्यान्तस्तस्मिन् विल्दानि शम्पाणि यस्मिस्तत् । गौरीगुरोः, गौर्याःगुरुः गोरीगुलस्तत्य ॥२३॥ (वाच्यपरिवर्तनम् ) अन्येद्युः मुनिहोमधेन्वा आत्नानुचरर भावं जिज्ञासमानया गङ्गाप्रपातान्तविन्दरामः गौरीगुरोः साविविशे।।२६ ॥ , ।

रघुवंश-महाकाव्यम्। [द्वितीय (सरनार्यः) दावि दिने नन्दिनी "किमयं स्वार्थसाधनानुग घाद् उत विगुडमक्तियोगान मामेवं सेवते" इति मायायलेन दितीय स्य भावं मानुमिच्छन्ती हिमालयकन्दरमाविवेश ।। २६ ॥ (भावार्थ ) वाइसवें दिन अपने सेवक को परीक्षा करने की इच्छा से नन्दिनीने गंगाद्वार पर बढ़ी हुई तृणमय गुफा में प्रवेश किया ॥२६॥ सा दुप्पवर्षा मनसाऽपि हिमरित्यदिशोभामहितक्षणेन । अलक्षिताभ्युत्पतनो नृपेण प्रसा सिंहः किल तां चकर्ष ॥२७॥ (अन्ययः ) सा, हिने. मनसा अपि, दुष्प्रवर्मा, 'अस्ति' इति वियोमानहिलक्षणेन, नृपंग, अलक्षिताम्युःपतनः, सिंहः, प्रसाद, तां, नकार्ष, शिल ॥ २७ ॥ (नीका ) मा नन्दिनी, हिंन्नेः = घातुकः, 'व्याघ्रादिमिरित्ययः, मनमापिहानागनाऽपि, दुष्प्रधा = दुर्घषा, 'अनमिमव. नीवार्थः' इति : नीः, अदिशामाप्रहिनशगन = पर्वतगीमावलोकन दलायनग, नगा = गगा दिलीपन, अलजिताम्युत्पननः = अदृष्टाक- माण, गिटः - गृगेन्द्रः, "मिही मृगेन्द्रः पचास्यः" इत्यमरः, हटान, "मा, तु हटायकम्" इत्यमरः, नां नन्दिनी, सरप्रायवान किन ॥२०॥ ( Ram: ) तिः, हिंगतीनि नाम्नः। दुपन प्रवृप्यने. मानि दायां । अद्रियामादिननगन, अदःशामा अदिशामा, मागायन मनन । मानिनाम्यपतनः, न लनितमल- समयाननं एम्गामावलनिवायुपननः । नन, पानीति - - {fair नया मिनपा अपि दुरधर्षया "पने' ... "नन गिन प्रगान किग १२॥ {m: मायाम न कामधन, निदादगी मनगाव दान fhort पर्यनगी मामला ददन टना पनि नामाकानयाद प्रादि दो पर ग्रामी होuttarनी शाra farratहिली सर्गः] २५ . सुबोधिनीटीकोपेतम्। पहाड़ी इश्य देखने लगा इधर मौका पाकर सिंह नन्दिनी पर झपटा।॥ २७॥ तदीयमानन्दितमार्तसाधोहानिवद्धमतिशब्ददीर्घम् । रश्मिष्विवादाय नगेन्द्रसक्तां निवर्तयामास नृपस्य दृष्टिम् ॥२८॥ (अन्वयः) गुहानियद्धप्रतिशब्ददीर्घ, तदीयम् आक्रन्दितं, आर्त- साधोः, नृपस्य, नगेन्द्रसकां, दृष्टि, रश्मिपु, आदाय, इव, निवर्तया- मास ।। २८॥ (टीका ) गुहानियद्धप्रतिशब्ददीर्घ कन्दरप्रतिवद्धप्रतिध्वानायतं "दरी तु फन्दरो वाऽस्त्री देवखातविले गुहा" तथा "दवीयञ्च विष्टञ्च सुदूरं दोधमायतम्" इति चाप्यमरः, तदीयं = धेनुसम्बन्धि, आकन्दितम् = अाफन्दनं, आर्तसाधोः = दीनरक्षणशीलस्य, नृपस्य = राज्ञो दिलीपस्य, नगेन्द्रसत - पर्वतरामणीयकावलोकनप्रसितां, "तत्परे प्रतितासत्तौ" इत्यमरः, दृष्टि = दर्शन, रश्मिपु-अनहेपु, "किरणप्रश्नही रश्मी" इत्यमरः, प्रादाय इव - गृहीत्वेव, निवर्तया- मास = पर्वतात् परावर्तयामात ॥२८॥ (समालः) गुहायां निबद्धः गुहानियद्धः, गुहानिवद्धश्चासौ प्रतिशब्दश्च तेन दीर्घ। तस्या इदं तदीयं । भातसाधोः, सानोति परकार्यमिति साधुः, भातेषु साधुरातलाधुस्तस्य । नगेन्द्रसका नगेपु इन्द्रो नगेन्द्रस्तत्र सक्ता तां । दृष्टिः- दृश्यतेऽनया ताम् ॥२८॥ (वाच्यपरिवर्तनम् ) गुहानिषद्धप्रतिशब्ददीभ्रुण तदीयेन आकन्दि- तेन धार्तसाधोः नृपस्य नगेन्द्रसका दृष्टिः निवर्त्तयाञ्चक्रे॥२८॥ (सरलार्थः) यथा सारथिः धावन्तम् अश्वं रश्मिभिः श्रावस्य निवर्तयति तथैव सिंहाक्रमणेन अतिदीर्घः तस्याः क्रन्दनशब्दः, राशो दिलीपल्य पर्वतसतां दृष्टिं ततः परावर्तयामास ॥२८॥ (भावार्थ ) उसके उकारने की ऊंची श्रावाज ने दुखियों के रक्षक राजा दिलीप को पर्वतमें लगी हुई दृष्टि लगाम के द्वारा घोड़े की -तरह अपनो ओर मुकाई ॥२८॥ स पाटलायां गवि तस्थिवांसं धनुर्धरः केसरिणं ददर्श । अधित्यकायामिव धातुमय्यां लोधद्रुमं सानुमतः प्रफुल्लम् ।

[द्वितीय रघुवंग-नहाकाव्यम् । (अन्ययः ) धनुर्धरः, नः, पालायां, गवि.तस्थिवांस, केसरिर सानुमतः, धातुमयां,अधित्यकायां प्रकृतं, तोधद्रुमम् ,इव, ददशा (टीका) अनुधरः = अनुप्मान, 'बन्धी धनुमान धानुषी निपझ्याली बनुयंग" इत्यमरः, सः दिलीपः, पाटलायां ईपद गद- बयां. "श्ववारचन्नु पाटलः" इत्यमरः, गवि = कामधेनी, तमिय बांनं = मियनं, सरिगं = सिंह, सानुमतः = अद्रेः, धानुमय्यां मेरिकादियानुप्रचुरायाम: अधित्यकायाम् = ऊर्चममी, "मृमिक मधिल्यका” इत्यमरः, प्रफुल = विकसितं, लोध्रदुमं - लोधनामानं वृानिय, ददर्ग = अवलोकयामास ।।२।। (समानः ) धनुरः- धनानि धरः, धनुषा घर इति धनुर्यर: मगि लगः स्कन्धयानाः सन्न्यस्येति कंसर्ग नं । सानुमतः मानि सन्यायनि मानुमान, नस्य । धातुमय्यां, घातोर्विकार भावमयी नभ्याम । प्रां, प्रकग मतीनि प्रफुम्मस्तम् । लोनद्रुम मायानन मुमः, लोत्रम्य दुमा लाद्रुमम्नम् ।।२।। (मान्यपरिवर्तनम् ) धनुर्धरंग नेन पाटलायां गघि तस्थिवान मागे गानमनः धातुमय्यां अधित्यकायां प्रफुलः लोभ्रमः इव दी (सहाय:) दिलीपः रनवणायां गयि म्यितं मिहं, गैरिकादि- पानवायां पर्वतमृमी विमिनं तीध्रपुमय अवलोकया- मामा ) धनुर्धारी गजादिलीप ने फूले हुये लाध ः को माननाद गाय पर पनिह को देना !! सदस्य मृगेन्द्रगामी नयाय वध्यप्य जगायः । निनिहारनपट यापभोदनाः ।। ३० ।। for: .गा:, प्रमादार, नानिः, .: न. म.ग. ट्रम्प, धाग, महान , गरम, + 2' : - १४ारा श्रृंगा-निरगामी, .:::. :::::::::, माता- 2:27. .. :: ART-हाट - " सर्गः] सुबोधिनीटीकोपेतम्। २७. बधाहत्य, मृगेन्द्रस्य =सिंहस्य, वधाय =मारणाय, निषाद तूणीरात्, शरं = वाणम्, उद्धर्तुम् = निष्कासयितुम्, ऐच्च अका- मयत ॥३०॥ (समासः) मृगाणामिन्द्रो मृगेन्द्रः, स इव गच्छतोति मृगेन्द्रगामी । प्रसभं उद्धृता अरयो येन सः। पातीति पतिः, नृणां पतिरिति नृपतिः। जातोऽभिपझे यस्यातौ जाताभिपङ्गः । वध्यस्य = वधं (प्रापदण्डम् ) अर्हतीति वध्यस्तस्य । शरणे साधुः शरण्यः॥३०॥ (वाध्यपरिवर्तनम् ) ततः मृगेन्द्रगामिना शरण्येन जाताभि- गन प्रसभोवृतारिणा नृपतिना वध्यत्य मृगेन्द्रस्य वधाय निपगात् रः उद्धर्तुम् ऐप्यत ॥३०॥ (सरलार्थः) येन राजा दिलीपेन सर्वे स्वशत्रवः समूलमुन्मूलि- स्तथाविधोऽपि स दिलीपः स्वसमक्षं धेनौ सिंहस्याक्रमणं प्टवात्मनः पराभवममन्यत । अतस्तस्य वधं विधातुं निपात् परमुद्धर्तुमैच्चत् ॥३०॥ (भावार्थ) राजा दिलीप ने सिंह को मारने के लिये तरकल से गण निकालने को इच्छा की ॥३०॥ पामेतरस्तत्व करः प्रतुनखप्रभाभूपितकङ्कपत्रे । सत्तालिः सायकपुंख एव चित्रापितारम्भ इवावतस्थे ॥३१॥ (अन्वयः) प्रहर्तुः, तस्य, वामेतरः, करः, नखप्रभाभूपितकङ्क- ग्ने, लायकपुझे, एव सकाङ्गुलिः 'लन् चित्रार्पितारम्भः, इब, अवतस्थे॥३१॥ ( टीका ) महतुः = प्रहार फस्य, तस्य - दिलीपस्य, वामेतरः दक्षिणः, करः हस्तः, “दलिहस्तांशतः कराः" इत्यमरः, नखप्रभाभूपि- तकरूपने नखकान्तिभूपितरूपक्षिविशेषपत्रे, सायकपुरेशर- मूलप्रदेशे, एव, 'शरे खड़े च सायक' इत्यमरः, सत्ताङ्गुलिः - जासत करशाखः सन् “अहुल्यः करशाखाः स्युः" इत्यमरः, चित्रार्पि- तारम्भः = चित्रगतशरॊत्कर्पोद्योग इव, अवतस्थे = स्थितः ॥ ३१ ॥ "क" नानारदपक्षिविदोपस्य पत्रानि मापत्य गतिवेगसाधनार्थ निदेश्यन्ते, तत्तन्वन्यात् भार कापत्र इत्युच्यते ।

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सर्गः] सुबोधिनीटीफोपेतम् । २१ (सरलार्थः) भुजप्रतिरोधप्रवृद्धमन्युदिलीपः लम्मुखस्थितमप- राधिनमाक्रमितुमसमर्थः, मंत्रेण औपध्या वा प्रतिरुद्धपराक्रमः सर्प इव हदि अदात ॥३२॥ (भावार्थ ) हाथ के रुक जाने से बढ़े हुए क्रोधवाला राजा दिलोप सामने खड़े हुए दोपो को स्पर्श करने की शक्ति न रखने वाले तेजले, मंत्रों वा जड़ी बूटियों से स्तम्भित पराक्रम वाले सर्प के समान भीतर ही भीतर जलने लगा ||३२॥ तमार्यगृहां निगृहीतधेनुर्मनुष्यबाचा मनुवंशकेतुम् । विस्मापयन्विस्मितमात्मवृत्तौ सिंहोरुसत्वं निजगाद सिंहः ॥३३॥ (अन्वयः) निगृहीतधेनुः, सिंहः, आर्यगृह्य, मनुवंशकेतुं, सिंहोरुसत्वम् , अात्मवृत्ती, विस्मितं, तं, मनुष्यवाचा विस्मापयन् , निजगाद ॥३३॥ ( टीका ) निगृहीतधेनुः = आक्रान्तधेनुः, सिंहः = मृगेन्द्रः, "सिंहो मृगेन्द्रः पञ्चास्यः" इत्यमरः, आर्यगृह्यं = सत्पक्षपातिनं, मनुवंशकेतुं - मनुकुलकेतुभूतं, सिंहोरुसत्वं = मृगेन्द्रसदृशपराक्रमम् , श्रात्मवृत्तौ = याहुप्रतिष्टम्भव्यापारे, विस्मितम् = आश्चर्ययुक्तं, तं = दिलीपं, मनुष्यवाचा = मनुजवाण्या, विस्मापयन् श्राश्चव्य प्राप. यन्, निजगाद = उवाच ॥ ३३ ॥ (समासः) निगृहीता धेनुर्येन सः निगृहीतधेनुः । अतुं योग्यः आर्यस्तैः गृह्यते श्राश्रयत्वेन सेव्यत इति आर्यगृह्यस्तम् । मनोवंशो मनुवंशस्तस्य केतुस्तं मनुवंशकेतुं । सिंहस्येव उरु लत्त्वं यस्य सः तम् । श्रात्मनो वृत्तिस्तस्मिन्नात्मवृत्तौ। मनुष्याणां वाक् मनुष्य- वाक् तया। विस्मापयतोति विस्मापयन् ॥३३॥ (वाच्यपरिवर्तनम् ) निगृहीतधेनुना सिंहेन भार्यगृहः मनुवंश- केतुः पात्मवृत्तौ विस्मिता सिंहोरसत्वः ला मनुष्यवाचा विल्माययता निजगदे ॥३३॥ (व्या०) वि-स्मि+णिच+श "नित्यं स्मयतेः" इति धात्वं , ६ एतलक्षण रथाः- कर्तब्यमाचरन् कामनकर्तप्यमनादरन् । तिति प्रहजाचारे स तु भायं इति स्मतः ।।

३० रघुवंश महाकाव्यम्। [हितो की पुगागमः । यद्यपि मनुष्यबाचेति करणादेवान स्मयः, अत पार न प्राप्नोति तथापि मनुष्यवाक प्रयोज्यकी विस्मापयते त सिंहो विस्मापयन्निति ण्यन्तात् णिजिति समाधेयम्, विस्मायर्याः त्येव पाठ इति सांप्रदायिकाः ॥ ३३ ॥ (सरलार्थः ) दिलीपः पुरा कदापि न जातं निजं भुजस्तम्भव व्यापारम् अवलोक्य विस्मयमाप | सिंहोऽपि विस्मयमापन्नं दिलीपं मानवीं वाचमवलम्ब्य ततोऽप्यधिकमाश्चर्यमुत्पादयन् सम्बोधयामास ॥ ३३ ॥ (भावार्थ ) नन्दिनी पर आक्रमण किया हुआ सिंह, अपना अवस्था पर चकित और बलवान् उस राजा दिलीप को मनुष्य बोली से और चकित कराता हुआ बोला ॥ ३३ ॥ अलं महीपाल तव श्रमेण प्रयुक्तमप्यत्रमितो वृया स्यात् । न पादपोन्मूलनशक्ति रंहः शिलोचये मूर्च्छति मात्तस्य ॥३४॥ अन्वयः) हे महीपाल, तब, श्रमेण, अलं, इतः, “मयि" प्रयु तम् , अपि, अस्त्रं, वृथा, स्यात् 'हि' पादपोन्मूलनशक्ति, मात्तस्य रंहः; शिलोचये, न, मूर्छति ॥ ३४ ॥ (टीका ) हे महीपाल ! हे राजन् ? तव = ते, श्रमेण = शूटर मोचनप्रयासेन, अलं = साध्यन्नास्ति, 'कुतः' इतः%3 अस्मिन्नथि प्रयुक्तमपि निक्षितमपि, अस्त्रम् - आयुषं, वृथा 3 व्यर्थमेव, त्यात् : भवेत, हि = तथाहि, पादपोन्मूलनशक्ति = वृक्षोत्पाटनसमये, “वृक्ष महीरहः शाखी विटपी पादपस्तरुः" इत्यमरः, मात्तस्य - बायोः रहः- वेगः, शिलोचये = अद्रौ, न मूर्च्छति = न प्रसरति ॥ ३४ ॥ (समासः) मह्यत इति मही ताम्पालयतीति तत्सम्बुद्ध हे महीपाल ! । पादपानामुन्मूलनं पादपोन्मूलनं तत्र शक्तिर्यस्य तत् शिलाभिरुचीयत इति शिलोच्चयस्तस्मिन् ॥ ३४ ॥ (वाच्यपरिवर्तनम् ) हे महीपाल ! तब श्रमेण अलम् इतः प्रयुक्तेन अपि अस्त्रेण वृथा भूयेत । पादपोन्मूलनशक्तिना माल्तस्य रहस शिलोचये न मूर्छ यते ॥ ३४ ॥ (सरलार्थः) हे राजन् ! यथा वायुवेगः वृक्षानेव उन्मूलयितुं शनोति न खलु पर्वतान, तथैव भवानपि इतरान् विनाशयितुं शतोति सर्गः] सुबोधिनीटीकोपेतम् । ३१ . न सलु मादृशान् रुद्रानुचरान्, तो मथ्यलप्रक्षेपणे प्रयासो न विधेयः ॥ ३४॥ (भावार्थ ) राजन् ! रत, बहुत परिश्रम न कर, मेरे ऊपर चलाया हुआ तेरा अस्त्र व्यर्थ ही होगा। केवल पेड़को उखाड़ने में समर्थ वायुका वेग पर्वत को नहीं उखाड़ सकता ॥ ३४ ॥ कैलासगौरं वृपमारुरुक्षोः पादार्पणानुग्रहपूतपृष्ठम् । अवेहि मां किङ्करमष्टमृतः कुम्भोदरं नाम निकुम्भमित्रम् ॥३५॥ (अन्वयः) कैलासगौरं, वृषम्, भारुरुक्षोः, अष्टमूर्तेः, पादार्पणा- नुग्रहपूतपृष्टं, निकुम्भमित्र, कुम्भोदरं, नाम मां, किङ्करम् अवेहि ॥३५॥ (टोका ) कैलासगौरं = कैलालवच्छुभ्रं, वृपं = वृपभं, "ऋषभो वृषभो वृपः" इत्यमरः, प्रारुरुक्षोः = सारोदुमिच्छो, = अष्टमूतः = शिवस्य, पादार्पणानुग्रहपूतपृष्ठं = चरणन्यासपवित्रपृष्ठभागं, "पादः पदनिश्चरणोऽस्त्रियाम्" इत्यमरः, निकुम्भमित्रं = निकुम्भसलं, "श्रय मित्रं सखा सुहत्" इत्यमरः, कुम्भोदरं नाम = कुम्भोदरसंशक, मां, किङ्करं = परिचारक, "नियोकिंकरप्रेन्यभुजियपरिचारकाः" इत्यमरः, अवेहि जानीहि ॥ ३५ ॥ (समासः) कैलाल इव गौर इति तं कैलालगोरम् । श्रारोड- मिच्छुः प्रारुरुनुस्तस्य । भ्रष्टौ मूर्तयो यल्यासौ अष्टमूर्तिस्तस्य । पद्यते श्राभ्यामति पादौ, तयोरपणं तदेव अनुग्रहत्तेन पूतं पृष्टं यस्य सतं । निकुम्भस्य मि निकुम्भमित्रम् ॥ ३५ ॥ (सरला हे दिलीप! मां सामान्यं वन्यं पशुं लिहं न जानीहि किन्तु अहं शङ्करस्य प्रसिद्धगणयोः कुम्भोदरनिकुम्भाभिधयो. रम्यतरः। शकरच यदा वृपभमारोहुमभिलपति तदा प्रथमं नम पृष्ठदेशे निजं पादं न्यस्यति ॥ ३५ ॥ (भावार्थ ) कैलासपर्वत के तुल्य शुन्न बैल पर चढ़ने वाले महादेवजीके चरण रखने की दया से पवित्र पोठवाला में कुम्भादर नाम का शकरजीका सेवक हूँ ऐसा जानो ॥ ३५ ॥ "वृधिो सलिलं तेजो दापुराकाशमेव च । सूर्याचन्दनलो सोन५ वेषमूर्तयः" इति यादवः ।

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૨૪ रघुवंश-महाकाव्यम् । [वि. ..... (समालः) द्वाभ्यां पिरन्तीति द्विपाः, चनानां द्विपास्तेषां । विभीति शुलभृत्तेन । श्रदमागता श्रद्वागताः, ते च ते सत्वा गतसत्वाः, अवागतसत्वा वृत्तियस्मिंस्तववागतसत्ववृत्ति। सिं भावः सिंहत्वं । अट्रेकुक्षिरित्यद्रिकुक्षिस्तस्मिन्नद्रिकुक्षौ ॥ ३८ ॥ (वाच्यपरिवर्तनम् ) तदाप्रभृति अस्मिन् मां व्यापारितवान् ॥ ३८॥ (सरलार्थः ) ततः प्रभृति शिवेन वनवासिगजानां मयप्रदर्शन महमस्मिन् गहरे नियोजितः, अतोऽन मम समीपे ये जीवा छन्ति तान् भक्षयन समयं नयामि ॥ ३८ ॥ (भावार्थ) उसी दिन से जंगली हाथियों को डराने के। मुझे महादेवजीने छ गोद में श्राये हुए पशु की वृत्तिवाली सिंह कर यहाँ नियुक्त किया है ॥ ३८ ॥ तस्यालमेपा क्षुधितस्य तृप्त्यै प्रविष्टकाला परमेश्वरेण । उपस्थिता शोणितपारणा मे मुरद्विपश्चान्द्रमसी मृधेव ।। ३९ । (अन्वयः) परमेश्वरेण, प्रदिएकाला, उपस्थिता, एपा, शो तपारणा, सुरद्विषः, चान्द्रमसी, सुधा, इव, सुधितस्य, तस्य तृप्त्य, अलम्, 'अस्ति' ॥३६॥ (टोका ) परमेश्वरेण, भगवता शररेण, प्रदिष्टकाला-नि समया, उपस्थिताप्राप्ता, एपा - इयं गोरूपा,शोणितपारणा गमयं व्रतान्तमोजनम्, सुरद्विपः = राहोः, चान्द्रमसो चन्द्रस धिनी, मुघा - अमृतं श्य, “पीयूपममृतं मुधा" इत्यमा, तु तस्य - बुमुक्षितस्य, नभ्य = अदागतसत्यवृत्तेः, मे मम शिवा दरम्य फेसरिणा, तृप्त्य - प्रीणनाय, अलं = पर्याता, "श्रलं भूपा पर्यानाशनिवारणवाचकम्" इत्यमरः, अस्नि ॥ ३६॥ (समासः ) ईशितुं शीतमस्यतीश्वरः, परमधासायोश्या परमेश्वरमनन । प्रदिष्टः काली यस्याः सा प्रदिष्ट काला । शोणितर पारणा इति शांगिनपारगा । मुगन, डेप्टोनि मुटि तस्य । चन्द्रमा इयं चान्द्रमसी । सुग्वेन धीयत इति सुधा । लघा साताऽभ्यास विनम्नम्य ॥३॥ गोद में श्रादुपपाकी न में यह कार्य है कि जो पास भारो मक्षा काना ने लिये कही न माना । ।

सर्गः] सुबोधिनोटोकोपेतम् । --- ......... (वाच्यपरिवर्तनम् ) परमेश्वरेण प्रदिष्टकालया उपस्थितया शोणितपारणया एतया, चान्द्रमस्या सुधया सुरद्विपः इव, लं (भूयते ) ॥ ३६॥ (सरलार्थः) कृतोपवासा वतिन प्रान्ते यथा पारणं कुर्वन्ति तथैव चिरम् आहारालाभेन कृतोपवासस्य मम पारणार्थम् अस्म- त्प्रभुणा शङ्करेण्यं धेनुरिह पिता । यथा इन्दुमण्डलसंस्थितम् अमृतमात्वाध राहुः परां तृप्तिम् अधिगच्छति तथैवाहमपि अनया {परां तृप्तिमधिगमिष्यामि ॥ ३६॥ (भावार्थ ) उत्ती मुझ भूखे की तृप्ति के लिये राहु के तृप्ति के निमित्त चान्द्रमसी सुधा के समान यह काल को बाँधो हुई लोह की 'पारणा परमेश्वर ने भेजी है ॥३॥ सत्त्वं निवर्तस्व विहाय लज्जां गुरोर्भवान्दर्शितशिष्यभक्तिः। शस्त्रेण रक्ष्यं यदशक्यरतं न तद्यशः शस्त्रभृतां क्षिणोति ॥४०॥ (अन्वयः) ल, त्वं लजां, विहाय, निवर्तस्व, भवान् , गुरोः, दर्शितशिष्यभक्तिः 'अस्ति यत्, रक्ष्यं शस्त्रेण, अशायरज्ञ, तत्, शस्त्रभृतां, यश, न, नियोति ॥ ४० ॥ ( टीका) सा उपायशून्यः, त्वं, लजांपां, विहाय : त्यक्त्वा, निवर्तत्व = गोरक्षणप्रयासाद् विरतोभिव, भवान् = त्वं, गुरोः= वसिष्ठस्य, दर्शितशिष्यभक्तिः, -प्रकटितच्छात्रभक्तिः, अस्ति विद्यते यत्,रत्यं = रक्षणीयं वस्तु,शस्त्रेण -श्रायुधेन, अशक्यरक्ष रक्षितुमशक्यं, तत् = रक्ष्यं, वस्तु, शस्त्रभृतां श्रायुधधारिणां, यशः-फोर्ति" यशः कीर्तिः समाच इत्यमरः, न क्षिणोति =न हिनस्ति ॥ ४०॥ (वाच्यपरिवर्तनम् ) तेन त्वया लजां विहाय निवृत्त्यताम् । भवता गुरोः दर्शितशिष्यभक्तिना (भूयते) येन रक्ष्येण शस्त्रए अशक्यरक्षण (भूयते) तेन नक्षीयते ॥ १० ॥ (लमासः) गृणात्युपदिरातीति गुरुस्तस्य । दर्शिता शिष्य- भक्तियन सःशस्यतेऽनेनेति शस्त्रं, तेन । न शक्या (असाध्या) रक्षा यस्य तत् । शस्त्राणि विनतोति शस्त्रभृतस्तेषां । रक्षितुम् योन्य रन्यम्।200 - - [द्वितीय ३६ रघुवंश-महाकाव्यम् । (सरलार्थः) हे दिलीप! स्वशक्त्यनुसारं त्वया अस्या रह बहु प्रयतितं, तेन च स्त्रीया गुरुभक्तिरपि सम्यक् प्रदर्शिता । या वस्तु शस्त्रेण रक्षितुं न शक्यते तत्र त्वया न लजितव्यम् । अस्य विनाशो जगदीश्वरेणैव विहित इति मत्वा गृहं गन्तव्यम् ॥ ४० ॥ (भावार्थ ) इसलिये गुरु में भक्ति दिखानेवाला लजा छोड़ के मकान चला जा। जो वस्तु शस्त्रों से रक्षित न हो सके उसके नार होने से शस्त्रधारियों का यश क्षीण नहीं होता है ।। ४० ॥ इति प्रगल्भं पुरुषाधिराजो मृगाधिराजस्य वचो निशम्य । प्रत्याहतास्त्रो गिरिशप्रभावादात्मन्यवज्ञां शिथिलीचकार ॥ ४१ (अन्वयः ) पुरुपाधिराजः, मृगाधिराजत्य, इति, प्रगल्भं, वव निशम्य, "अहं" गिरिशप्रभावात्, प्रत्याहतास्त्रः, (अस्मि, इति मत्व आत्मनि, अवज्ञा, शिथिलीचकार ॥ ४१ ।। (टीका) पुरुषाधिराजः = नराधिपः, मृगाधिराजस्य =सिंहर इति = इत्थं, प्रगल्भं = वृष्टं, वचःवचनं, निशम्य = आकर्ण्य; 'श्र गिरिशप्रभावात् = शिवसामर्थ्यात्, प्रत्याहतास्त्रः कुण्ठितारू "अस्मीति विचार्य" आत्मनि =चित्ते . श्रात्मा कलेवरे य स्वभावे परमात्मनि । चित्ते धृतौ च वुद्धौ च परव्यावर्तनेऽपिन इति धरणिः, अवज्ञा = अपमानं, शिथिलीचकार = तत्याज ॥ ११ ॥ (समासः) अधिराजत इत्यधिराजः, पुरुपाणामधिरा पुरुपाधिराजः । मृगाणामधिराजस्तस्य । प्रगल्भत इति प्रगल गिरिराश्रयत्वेनास्यास्तीति गिरिशस्तस्य प्रभावस्तस्मात् । प्रत्याहर अस्त्रं यस्य सः प्रत्याहतास्त्रः॥ ११ ॥ (वाच्यपरिवर्तनम् ) पुरुपाधिराजेण मृगा... तास्त्रेण (भूयते) श्रात्मनि अवज्ञा शिथिलोचके ॥४१॥ (व्याकरण ) गिरौ शेत इति वाक्ये “ गिरौ डश्चन्दसि डप्रत्ययान्तो गिरिशशब्दश्वान्दस इत्यवगन्तव्यम् ॥ ११ ॥ (सरलार्यः ) यदा दिलीपेनैतत्सर्वं वृत्तं श्रुतं तदा शिवप्रभा देव एवं पराभूतोऽस्मीति निर्वेदं न प्राप। यतः क्षत्रियाणां सम घमिमानो न परमेश्वरम्प्रति ॥ ११॥ ...प्रत्य "

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. ३८ रघुवंश-महाकाव्यम् । [ (वाच्यपरिवर्तनम् )............वितथप्रयतेन तेन एप. च्यत । जड़ीकृतेन वज्रं मुमुक्षता वज्रपाणिना इव तस्थे ॥ ४२ ॥ ( सरलार्थः ) अयं प्रथम एवावसरः, यद् दिलीपो गां पिy उद्यतं शत्रुभूतं सिंहं हन्तुं धनुपि वाणं सन्धातुं नाशकत् । अङ्के स्थितं बालरूपिणं शङ्करं हन्तुं प्रवृत्त इन्द्रो यां दशां नुभूतवान् सैव दशा दिलीपस्यापि तदानीं जाता ॥ ४२ ॥ (भावार्थ ) महादेवजी के देखने से ही रुद्धशक्ति होकर प्रहार करने की इच्छा करने वाले इन्द्र के समान स्थित होकर रा. दिलोप इससे वोला ॥ ४२ ॥ संरुद्धचेष्टस्य मृगेन्द्र ! कामं हास्यं वचस्तद्यदहं विचक्षुः । अन्तर्गतं प्राणभृतां हि वेद सर्व भवान्भावमतोऽभिधास्ये ॥ ४३ . (अन्वयः ) हे मृगेन्द्र ! यत्, 'वचः' अहं विवतुः, 'अस्मि संरुद्धचेप्टस्य, मे, तत्, वचः, काम, हास्य, 'वर्तते' हि, भवान प्राणभृताम्, अन्तर्गतं, सर्व, भावं, वेद, अतः 'कारणात्' । अभिधास्ये ॥ ४३॥ ( टीका ) हे मृगेन्द्र ! = हे सिंह ! "सिंहो मृगेन्द्रः पञ्चास्या इत्यमरः, यत् "वचः" अहं, विवतुः = वक्तमिच्छु', “ अस्मि संगद्धचेष्टस्य = प्रतिरुद्धव्यापारस्य, मेमम तत्- वक्ष्यमाणं पत्र वाक्यं, काम = यथेष्टं, हास्यं = परिहासयोग्यं, हि: णात् , भवान् , प्राणभृतां = प्राणिनाम्, अन्तर्गतं = हृद्गतं, सर्वम् अखिलं, भावम् = अभिप्राय, वेद = जानाति, अतः अस्मात्कारणात अभिधास्ये = वक्ष्यामि ॥ ४३ ॥ (समासः ) इन्दतीतीन्द्रः, मृगाणामिन्द्रो मृगेन्द्रस्तत्सम्वुद्ध हे मृगेन्द्र ! वस्तुमिच्छुर्विवतुः । सम्यक् रुद्धा चेष्टा यस्य तस्य । हसितुं योग्यं हास्यं । प्राणन्ति जीवन्त्येभिरिति प्राणास्तान् । नेपां । अन्तः गतमित्यन्तर्गतम् ॥ १३ ॥ (वाच्यपरिवर्तनम् ) मृगेन्द्र! यत मया विवर भूयते " संकद्धचेष्टस्य, में तेन वचसा कामं हास्येन "भूयते" । भवता प्राणभृतां अन्तर्गनः सः भावः विद्यते अतः अभिधास्यते ॥४३॥ 4.. " " चचः मया सर्गः] सुबोधिनीटीकोपेतम् । ३६ , (सरलार्थः) हे हरे! यः किमपि कर्तुं न प्रभुः तस्य ववलि कस्यापि आदरो न जायते, तथा तद्वचः श्रुत्वा "असमर्थोऽध्ययं वीर इव प्रगल्भते" इति लोका हसन्ति । इदानीमहमपि तथैव जातोऽस्मि परं भवान् महादेवल्य सेवकः अतस्तेषां प्रभावात्प्राणिनामन्तर्गत सर्व भावं जानात्येव ततस्तव समीपे कथने न कश्चिद्दोपः॥ ४३ ॥ (भावार्थ ) हे सिंह, मेरा वचन यद्यपि अत्यन्त हंसी के योग्य तो भी श्राप प्राणियों के हदय के सब भाव जानते ही हैं इसलिये उसे कहता हूँ॥४३॥ मान्यः स मे स्थावरजङ्गमानां सर्गस्थितिप्रत्यवहारहेतुः । गुरोरपीदं धनमाहिताग्ने श्यत्पुरस्तादनुपेक्षणीयम् ॥ ४४ ।। (अन्वयः) स्थावरजङ्गमानां, सर्गस्थितिप्रत्यवहारहेतुः, सः, 'वृषभध्वजः' मे, मान्य:: 'अस्ति' आहिताग्नेः, गुरोः, श्रपि, इदं, 'गोरूपं धनं, पुरस्तात् , नश्यत् , अनुपेक्षणीयम् ॥ ४४ ॥ (टीफा ) स्थावरजंगमानां = तरुशैलमनुप्यादीनां, सनस्थिति- प्रत्यवहारहेतुः = उत्पत्तिस्थितिविनाशकारणं, सः भगवान् भूतेशः,मे मम, मान्यः-पूज्यः, 'अस्ति' "तथापि त्राहितान्ने स्थापितान्तः, गुरोः-वसिप्टस्यापि, इदं गोरूपं, धनं, पुरस्तात् प्रदोरने, नश्यत् = नाशं प्राप्नुवत्, अनुपेक्षणीयं = उपेक्षितुमयोग्यम् ॥ १४ ॥ (समासा) स्थातुं शीलमेपां ते स्थावराः, जइम्यन्तं मृग गच्छन्तीति जङ्गमा, ते च जंगमाश्च स्थावरजंगमास्तेषां । सर्गच स्थितिश्च प्रत्यवहारश्च तेपा हेतुः । आहितोऽग्निर्येन सः तस्य ॥४॥ (वाच्यपरिवर्तनम् ) स्थावरजगमानां सर्गस्थितिप्रत्यवहारहे. तुना तेन में मान्येन "भूयते" आहिताग्नेः अनेन धनेन पुरस्तात् नश्यता अनुपेक्षणीयेन "भूयते" ॥ ४ ॥ (सरलार्थः) अस्य देवदारोः समीपमागताः प्राधिनस्त्वया মাঃ হন হৈ বহি সারার্থে মিবি भगदतः सहरस्य आदेशो मयापि शिरलैव धार्यते परं पुरस्ताव नायट् गोरूपं गुगेर्धनमुपेक्षितुमशदोऽस्मि । ४ । (भावार्थ ) उत्पत्ति, पालन और नाश को करने वाले शिव मेरे -

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तर्गः] सुबोधिनीटोकोपेतम् । ४१ (टोका ) अथ = दिलीपोत्यनन्तरं, भूतेश्वरपार्श्ववर्ती = महा- देवानुचरः, सः=सिंहः, दंष्ट्रामयूखैः-दन्तकिरणैः, गिरिगहराणां वितकन्दराणां, अन्धकार = वान्तं, "अन्धकारोऽस्त्रियां ध्वान्तम्" इत्यमरः, शकलानि = खण्डानि, “भित्तं शकलखण्डे वा" इत्यमरः, कुर्वन् = सम्पादयन्, किञ्चित् = ई पत्, विहस्य = हसित्वा, भूयः - हुन, अर्थपति = धनाधिपं राजानं, चभापे % उक्तवान् ॥ ४६ ॥ (समासः ) ईशितुं शीलमस्येतीश्वरः, भूतानामोश्वरो भूतेश्वर- स्तस्य पार्श्ववर्तीति । दमाण मयूखैः। गिरेगहराणि गिरिगहराणि नेपा । पातीति पतिः; अर्थानाम्पतिरित्यर्थपतिस्तम् ॥ ४६ ॥ (वाच्यपरिवर्तनम् ) अथ अनेन भूतेश्वरपार्श्ववर्तिना दंयामयूखैः कुर्वता अर्थपतिः॥ ४६॥ ( सरलार्थः) ततः सिंहः राज्ञो वचनं श्रुत्वा किञ्चिद् चिजहास, अनन्तरं राजानमुवाच ॥ ४६॥ (भावार्थ) इसके उपरान्त महादेवजी के समीप रहनेवाला वह सिंह अपने डाढ़ों की कान्ति ते पहाड़ की कन्दरा के अन्धकार को टुकड़े २ करता हुआ हँस कर बोला ॥ ४६ ॥ एकातपत्रं जगतः प्रभुत्वं नवं वयः कान्तमिदं वपुश्च ।' अल्पस्य हेतोर्वहु हातुमिच्छन् विचारमूढः प्रतिभासि मे त्वम्।।४७।। (अन्वयः) एकातपत्र, जगतः, प्रभुत्वं, नवं, वयः, इदं, कान्तं, वपुञ्च, बहु, 'एतत्सर्व' अल्पस्य, हेतोः, 'धेन्वर्थ' हातुम् ; इच्छन्, वं, मे, विचारमूढः, प्रतिभासि ॥ १७ ॥ (टोका) एकातपत्रं = एकच्छत्रं, जगतः - भुवनस्य मर्त्यलो- कस्य, प्रभुत्वं = स्वामित्वं, नवं = नूतनं, “प्रत्यग्नोऽभिनवो नव्यो नवीनो नूतनो नवः" इत्यमर, वयः- यौवनम् , इदम् = एतत् : कान्त -सुन्दरं, वपुः शरीरंच, 'पतत्सर्व' यहु = बहुलं, “अदन्नं पटुलं पहु" इत्यमरः, अल्पस्य - तुन्द्रस्य “स्तोकं दुल्लं तुच्छमल्पम्" इत्यभिधानचिन्तामणिः, गोरक्षामावस्येत्यर्थ:, हेतोः = कारणात्, हातुं त्यक्तुं, इच्दन् = कामयमानः, त्वं, मे = मम, विचारमूढः= कायाकार्यविवेकशून्यः, प्रतिभासि = लक्ष्यसे ।। (समासः) पानापावायत इत्यातपनं, एकम्, आतपर्व पस्मि. स्तत् । तोतोच्छन् , विचारे महो विचारमूढः ॥ ४ ॥ ..

કર रघुवंश-महाकाव्यम् । [.. कoयामा (वाच्यपरिवर्तनम् ) एकातपत्र' ..."हातु इच्छता व विचारमूढेन प्रतिभायते ॥ १७ ॥ (सरलार्थः) है राजन् यतस्त्वम् एकच्छचं पृथिवीराज्य, न यौवनं, मनोहरमिदं वपुश्च इति सर्वम् अल्पस्य एकस्य गोहतोस्त्य तमिच्छसि, अतः एतत् सत्यं दृश्यते कित विवेक्तं त्वं न जानासि ॥४७॥ (भावार्थ ) हे राजन् ! चक्रवर्तित्व, जगत की प्रभुताई, .. ३० का आनन्द और सुन्दर शरीर यह सब एक पशु के निमित्त की इच्छा करने वाला तू मुझे मूर्ख मालूम पड़ता है ॥ ४७ ॥ भूतानुकम्पा तव चेदियं गौरेका भवेत्स्वस्तिमती त्वदन्ते । जीवन्पुनः शश्वदुपप्लवेभ्यः प्रजाः प्रजानाथ पितेव पासि ॥४८ ( अन्वयः ) तव, चेत् भूतानुकम्पा, (अस्ति तदा) त्वदन्ते पर (एव) इयं, गौः, स्वस्तिमती, भवेत्, हे प्रजानाथ ! पुनः, (पक्षान्तरे (त्वं) जीवन, (सन्)शश्वत्, पिता, इच, उपप्लवेभ्यः, प्रजा, पासि ॥३८ ( टीका ) तव = भवतः, चेत् = यदि, भूतानुफम्पा = प्राणिदर "तहि" वदन्ते - त्वद्विनाशे, एका एकाकिनी, ' 'एच' इयं =मदा पाता, गीः धेनुः, स्वस्तिमती कल्याणवती, भवेत् = स्या 'किन्तु है प्रजानाथ ! = हे जनपते !, "प्रजा" स्यात्संतती जने इत्यमरः, 'त्वं' पुनः = भूयः, जीवन् 'स' = प्राणान्धारयन् , सन राश्चत् = निरन्तरं, पिता इव-जनक इव, उपप्लवेभ्य: उपद्रवेभ्य RAI लोकान, पामि रक्षासि ॥४८॥ ( समासः ) मृतंषु, शानुकम्पा भूतानुकम्पा । तब श्रान्तस्त्वदन्त गिन । स्वस्ति (ोमम् ) अस्याः अरतीति । प्रकपंग जायन्त प्रजातात नायनयुद्री ॥ १८ ॥ (पाध्यमियतनाग ) नव चेद मृतानुकम्पया "मृयते" त्वदनं. प..गा नया गया म्बग्निमत्या भूगों । प्रजानाश! पुनः जीयत गया राम पिता पधम्या मना पाय॥१८॥ (A) दिलीप ! यन माम मामा अनिद्यापार्नु, मध्य मानः परी मथम अविना नाममा मशिनुम मिला kटप १३, नय विनाश यमेव याला .

सर्गः] सुबोधिनीटीकोपेतम् । एका गौः स्वस्तिमती भवेत् किन्तु यदि त्वं जोविष्यति तदा सुचि- रम् अलक्ष्याः प्रजाः रक्षिष्यसि ॥४८॥ (भावार्थ ) जो तेरी प्राणियों पर दया ही है तो यह समझ रख कि तेरे नाश होने पर केवल यही एक गौ सुखी होगी, और यदि तुं जीता रहा तो पिता के समान चिरकाल तक विप्नों से प्रजा की रक्षा कर सकेगा ॥४॥ अयैकधेनोरपराधचण्डाद् गुरोः कृशानुप्रतिमाद्विभेपि । शक्योऽस्य मन्युभवता विनेतुं गाः कोटिशः पशयताघटोध्नीः ४९ (अन्वयः) अथ, एकधेनोः, अपराधचण्डात्, कृशानुप्रतिमात्, गुरोः, (त्वं ) विभेषि ( तर्हि ) घटोनी, कोटिशः गाः, स्पर्शयता,. भवता, अस्य, (गुरोः ) मन्युः, विनेतुं, शक्यः ॥ ४६॥ (टोका) अथ= यदि, एकधेनोः = केवलं नन्दिन्याः "ते" अपराघचण्डात् = अपराधात्यन्तकोपनात् “चण्डस्त्वत्यन्तकोपना इत्यमरः, कृशानुमतिमात् = अग्निकल्पा, गुरोः= वसिष्टात्, 4 विभेपि = भयं प्राप्नोपि, तर्हि, कोटिशः = बहुकोटिसंख्याक = धेनूर, स्पर्शयता प्रतिपादयता, भवता = त्वया, प्रत गुरोर्वसिष्टस्य, मन्युः = क्रोधः, विनेतुम् = अपनेतुं, नमः पारणीयः॥ ४६॥ (समासः) एकैव धेनुर्यस्य सः तस्य । अपराधन --- राधचण्डस्तस्मात् । कृश्यति = तनूकरोतीति कृशानुः :-- यस्य सः तस्मात् । घटा इव ऊधांति यासान्ताः ॥ ४६ (वाच्यान्तरम् ) अथ एक०............" त्वमा ....स्पर्शयन् भवान् अस्य मन्युं विनेतुं शक्नुष्ट (सरलार्थः) धेनोविनाशेन मे गुरुधिरं - - चेतति भयञ्चेत् तदपि निर्मूलमेव । एकम्मा मना गुणिताः यटुक्षोरा गावः दातुं प्रभवति । अनेसा लश्या प्रसन्नो भविष्यति ॥४८॥ (भावार्थ) यदि इस धेनु के कर नबन्न साज्ञानिस्वरूप गुरु वसिष्ठ से हराया वाली करोडों गायें देकर तू उनका - .....

४ रघुवंश-महाकाव्यम् । तद्रक्ष कल्याणपरम्पराणां भोक्तारमूर्जस्वलपात्मदेहम् । महीतलस्पर्शनमात्रमिन्नमृद्धं हि राज्यं पदमैन्द्रमाहुः ।। ५० ।। (अन्वयः ) तत्, कल्याणपरम्पराणां, मोक्तारम् .. ‘आत्मदेहं, (त्वं ) रक्ष, ऋद्धं, राज्य, महीतलस्पर्शनमात्रमिन्नन ऐन्द्रं, पदम्, आहुः ॥ ५० ॥ (टीका) तत् = तस्मात्कारणात्, कल्याणपरम्पराणां Ha. सन्ततीनां, भोक्तारम् = उपमोक्तारम्, ऊर्जस्वलं = महाबलम्, आरन देह, स्वशरीरं, त्वं, रक्ष = गोपाय, हि = यस्मात्कारणाद, ऋद्ध: समृद्धं, राज्य, महीतलस्पर्शनमात्रमिन्नं = भूतलसम्बन्धमात्रमित ऐन्द्रं - इन्द्रसम्बन्धि, पदं स्थानं "पदं व्यवसितत्राणस्थानलनमा निवस्तुपु” इत्यमरः, आहुः प्राहुः, लोका बदन्तीति शेपः ॥ ५०. समासः ) कल्याणानां परम्परास्तासां। ऊों वलमस्य अस्तीति तथाभूतम् । श्रात्मनो देहमात्मदेहं । महास्तलं महीतलं, महीतल स्पर्शनमेव महीतलस्पर्शनमात्रं तेन भिन्नमिति । इन्द्रस्येदमैन्द्रम् ॥ (वाच्यपरिवर्तनम् ) तत् कल्याणपरस्पराणां मोका अजस्वल आत्मदेहः "त्वया" रक्ष्यताम् , हि... ......"नरैः" उच्यते। (सरलार्थः) अतः हे राजन् ! सुनसन्ततेः उपमोगक्षम स्वा रीरम् अवश्यं त्वया रक्षणीयम् । गोविनाशे स्वर्गहानि शहनीया समृद्धं तव राज्यं इन्द्रपदादन्युनं वर्तते । तत्र च केवलमियाने 'भेदः, यद् इन्द्रः भूतलं न स्पृशति त्वञ्च स्पृशसि ॥ ५० ॥ (भावार्थ) इस हेतु तु अपने बलवान् शरीर की रक्षा कर, समृद्धिशाली तेरा राज्य इन्द्रपद के समान है, केवल पृथ्वी का सम्बन्ध होने के कारण उससे मिन्न है॥ ५० ॥ एतावदुक्त्वा विरते मृगेन्द्र प्रतिस्वनेनास्य गुहागतंन । शिलांचयोऽपि क्षितिपालमुच्चः प्रीत्या तमेवार्थमभापतेव ।।५.१॥ (अन्वयः) पताबद्, उक्त्या, मृगेन्द्र, विरते, (सति) शिलो अयः, अपि, अम्य, (सिंहस्य), गुहागतेन, प्रतिस्वनेन, प्रीत्या नितिपालं तम्, पब, अर्थम् , उच्चः, अमापत, इव ।। ५ ।। (टीका) पतावत् = एतावत्पर्यन्तं, उच्या कथयित्वा, मृगेन्द्र = सिंहे. “सिटी मृगेन्द्रः पञ्चास्यः" इत्यमरः, विरते मौनीमूने सुबोधिनोटोकोपेतम् । ४५ E ति, शिलोच्चयः शैलोऽपि, अस्य =पुरोवर्तिनः सिंहल्य, गुहा- तेन= कन्दरगतेन, प्रतिस्वनेन = प्रतिध्वनिना, उच्चैः = उच्चस्वरेण, जतिपालं = भूमिपं दिलीपं, प्रोत्या प्रेम्णा, तमेव अर्थ = सिंहोक्त- रास्यम्, प्रभाषत इव अवोवतेव ॥ ११ ॥ (समासः) मृगाणामिन्द्रो मृगेन्द्रस्तस्मिन् । गुहां गतो गुहागत- तेन । क्षितिम्पालयतीति तं। शिलाभिरुचोयत इति शिलोचयः ॥५॥ (वाच्यपरिवर्तनम् ) एतावत्......शिलोचयेन अपि......क्षिति. लिः......तम् अर्थम् नभाग्यत इव ॥ ५१ ॥ (सरलार्थः) इत्युक्त्वा सिंहो यदा विरराम तदा स एव तस्य ब्दः पर्वतकन्दरायामपि प्रतिध्वनितो बभूव । पर्वतोऽपि प्रोत्या मिवार्थमन्ववदन्निव ॥ ११ ॥ (भावार्थ ) इतना कह कर मृगेन्द्र के चुप होने पर पर्वत ने भी कन्दरा में उठे हुए प्रतिशब्दसे प्रीतिपूर्वक मानो राजासे यही बात कही ।। ५१ ॥ निशम्य देवानुवरस्य वाचं मनुष्यदेवः पुनरप्युवाच । धेन्वा तदध्यासितकातराच्या निरीक्ष्यमाणः मुतरां दयालुः ॥५२॥ (अन्वयः ) मनुष्यदेवः, देवानुचरस्य, वाचं, निशम्य, तदध्या- सितकातराक्ष्या, धेन्वो, निरीक्ष्यमाणः, ( अतः) सुतरां, दयानुः, पुनः, अपि, उवाच ॥५२॥ (टोका) मनुष्यदेवः = राजा दिलोपः, देवानुचरस्य - शन्भु- किदरस्य सिंहस्य, वाचं = वाणी "गोन्विाणो सरस्वती" इत्यमरः निशम्य = श्रुत्वा, तदध्यासितकात राक्ष्या - सिंहाकमणमयचकितर- घ्या, धेन्वा = नन्दिन्या, निरीक्ष्यमाणः अवलोक्यमानः, दिलीपः, सुतरा अत्यन्त दयालुः = कृपालः 'सन्' पुनरपि = भूयोऽपि, उवाच- जगाद ।। ५२ ।। (समासः) मनुष्याणां देदो मनुष्यदेवः । पनुवरतीत्यनुवर, देवस्थानुचरो देवानुचरलत्य । तेनाध्यासितं तदध्यासितं तेन कातरेसशिलो यस्याः सा तदा । दयाशोतो दयानुः ।। ५२ ॥ (पायपरिवर्तनम् ) मनुपदेवेन.........निरोपमापन..... दयानुना पुनः सपिकचे ।। ५२ ॥ ..

रघुवंश माहाकारगम। शुदा इत्यमरः (सरतार्थः) सिंहस्य बननमार्य सा धेनुः "अयं . परित्यज्य गमिप्यति उत मोचयिष्यति" इति कातरनयनाभ्यां सादरम् अवलोकयामासे, सोऽपि निहं पुनरवादोत् ॥ १२॥ (भावार्थ ) राजा दिलोप महादेवजीके संबक का यह वन नुनकर उसके आक्रमण से डरे हुए आखोंवाली नन्दिनी को हुआ फिर भी वोला ॥ १२ ॥ क्षतात्किल त्रायत इत्युदयः क्षत्रस्य शब्दो भुवनेषु रूढः । राज्येन किं तद्विपरीतवृत्तेः प्राणरुपक्रोशमलीमसर्वा ॥५३॥ (अन्वयः) क्षतात्, प्रायते, इति उदन्नः, क्षत्रस्य, भुवनेषु, रूढः, (अस्ति) तद्विपरीतवृत्तः, (क्षत्रस्य मम ) किं, वा, उपक्रोशमलीमसैः, प्राणैः, 'किम्' (अस्ति) किल ॥ ५३ ॥ ( टोका) क्षतात् = नाशात्, त्रायते = रक्षति, इति = व्युत्पत्या. उदनः = उन्नतः, क्षत्रस्य = क्षत्रियवर्णस्य, शब्दः = वाचकः क्षत्रियवर्ग- वाचक क्षत्रशब्द इति यावत् "शास्त्रे शन्दस्तु वाचकः" भुवनेपु = लोकेपु, रूढः प्रसिद्धः, 'अस्ति', तद्विपरीतवृत्तः = ५५ शब्दविरुद्धव्यापारस्य क्षतात् प्राणमकुर्वतः 'क्षत्रस्य मम,' राज्येन, किं, अस्ति = राज्येन मम किमपि प्रयोजनं नास्तीत्यर्थः, वा=अथवा उपक्रोशमलीमसैः- निन्दामलिनैः "उपक्रोशो जुगुप्सा च कुत्से निन्दा च गहणे” इत्यमरः, प्राणैः असुमिः, किम् = निन्दितस् जीवनमपि व्यर्थमेवेत्यर्थः ॥ ५३॥ (समासः) तस्माद् विपरीता तद्विपरीता, तद्विपरोता वृत्तिर्यस्य सः तस्य । उपक्रोशेन मलीमसाः उपक्रोशमलीमसास्तैः॥ ५३ ॥ (वाच्यपरिवर्तनम् ) क्षतात्............... ...इति उदग्रेण क्षत्रस्य शब्देन............रुदेन..... थभूयत ॥ ५३॥ (सरलार्थः) हे सिंह ! स एव पुरुपो लोकप्रशंसाम् अर्हति यः स्वकर्तव्यमाचरन् आत्मानमुत्कर्ष नयति । वयञ्च लोके "क्षत्नाः" इति व्यवहियामहे, क्षताद् नाशात् प्राणिनो रक्षणमेवास्माकं स्वर्क कर्म । तद्यदि प्रत्यक्ष हन्यमानेयं धेनुर्मयेदानी न रक्ष्यते तहि लोको मांकि वदिष्यन्ति, कियती च मे निन्दा लोके भविष्यति तथा च सति मे जीवनं राज्यञ्च व्यर्थमेव भवेत् ॥ ५३ ॥ . ........

सर्गः]
सुबोधिनोटोकोपेतम् ।
४७
(भावार्य ) क्षत्रिय शब्द का शब्दार्थ "आपत्ति से रक्षा करने
वाला" ऐसा संसार में प्रसिद्ध है, इसलिये क्षत्रिय होकर मैं इसके
विरुद्ध आचरण करता हुआ अपने सामने गौ का मारा जाना नही
सह सकता, ऐसा यदि हो जाय तो इस राज्य से अथवा लोकनिन्दा
से मलिन हुए प्राणों से भी कोई लाभ नहीं लमझता ॥ ५३ ॥
कथं न शक्योऽनुनयो महविश्राणनाचान्यपयस्विनीनाम् ।
इमामन्नां मुरभेरवेहि द्रौजसा तु महतं त्वयास्याम् ॥५४॥
{अन्वयः ) सत्यपयस्विनीनां विधाणनात्, च, महर्षेः, अनुनयः,
कथं, नु, शक्यः, (अस्ति ) (हि ) इमां, (धेनुं) सुरमे, अनूनाम् ,
प्रवेहि, त्वया, तु, अस्यां रुद्रौजता, प्रहतम् ॥ ५४॥
(टीका) अन्यपयस्विनोनां अन्यधेनूनां, विश्राणनात् =दानात,
महः = वसिष्ठस्य, अनुनयः क्रोधापनयः, कथं तु = केन प्रकारे
वा, शस्यः = पारणीयः, 'अस्ति' 'यतः 'इमां नन्दिनी, सुरभेः =
कामधेनोः, अनूनां = अन्यूनाम् , अवेहि = विद्धि, त्वया = भवता, “तु"
अस्यां धेनौ, रुद्रौजसा महेश्वरतेजसा, "ओजो दीप्तौ वले नाते
इन्द्रिये निम्नगारये। तेजः प्रभावदोतौ च” इत्यमरः, प्रहतं = प्रहारः
कृतः, न तु स्वतेजसा ॥ ५४॥
(वाच्यपरिवर्तनम् ) अन्य०.... .अनुनयेन कयं शक्येन
"भूयेते" प्रहतेन अभूयत ॥ १४ ॥
(सरलार्थः) यश त्वयोक्तम् "प्रथैकधेनोः" इत्यादि तदपि न
युक्तम् । अन्यातां गवां प्रदानेन महर्पस्तदैव कोपोऽपनेतुं शक्यते यदा
अन्या अपि एतादृश्य एव भवेयुः। इयञ्च न फेवलं दुग्धमेव ददाति
परं पिर्यघद् इच्छति तत्सर्वमेवैषा सततं वितरति । अतो नात्याः
स्थानेऽन्या दातुं शक्यते । त्वया चाल्या उपरि रुद्रप्रभावेणैव प्रहारः
(समालः ) अन्याः पयस्विन्यः अन्यपयस्विन्यस्तासाम् । रुद्रस्य
कोजा रुद्रौजाः तेन ॥ पृष्ट ॥
(भावार्थ) यह नन्दिनी कामधेनु के समान है इसलिये अन्य
गौत्रों के देनेसे मुनि वसिष्ट का मोघ किल प्रज्ञार शान्त हो सका है?
इस पर तेरा आक्रमण शिवजी केही प्रताप ले हुश्रा है ॥ ५ ॥
सेयं वदेहार्पणनिष्क्रयेण न्यायया मया मोचयितुं भदत्तः ।
न पारणा स्याद्विद्दता तवैवं भवेदलपक्ष मुनेः क्रियार्थः ॥५५॥
कृतः॥५॥

ग्राम , (अन्वयः ) मया, महानगरोणा, मा. ग. (गो.) मगर मोचयितुं, गाय्या, (अमित), ना, पणा, नितानमार मुनेः, कियाः, न, आमा, भोत !!}}} ( टीका ) मगा, सामानिमायगा - सागरीरमाणमोर सा= पूर्वोना, इयं = पुगेवातिनी गोः, मान खान: मोनगि: त्याजयितुं, न्याय्या = उचिता, अग्नि, पबम-मया मते तुभ्यमा हारीकृत सति, तव = ते, पारणावतान्नमांजन, विrat = नरा, स्यात् = न भवेत् , मुनः = वसिष्ठम्य, क्रियायः - होमादिप्रयोजनं, न अनुप्तः= अप्रतिहतः, भवेत् ॥ ॥ (समासः) निमीयते = प्रत्याहियतेऽनेनेनि निकायः, म्यस्य देह स्वदेहस्तस्यार्पणं स्वदेहार्पणं, तदेव नियमन । माय न्याय्या । क्रियवार्थः कियार्थः । न तुम इत्यनुनः १५ || (वाच्यपरिवर्तनम् ) ...मया अनया न्याय्यया "भूयते” एवं तव पारणया विहतया न भूयेत मुनेः क्रियान च अनुतेन भूयेत ।।५।। (सरलार्थः) अतः हे सिंह ! एतस्याः गोः स्याने तुभ्यमित शरीरमुपहरामि । स्वप्राणव्ययेनापोयं गौर्मयावश्यं रक्षणीया। पत्र कृते तव व्रतान्तमोजनं विहतं न भवेत् । गुरोर्वसिष्टम्यापि अग्नि होत्रादिक्रिया विहता न स्यात् ।। ५५ ॥ (भावार्थ ) हे सिंह ! अपने शरीर को देकर इस नन्दिनी कं आप से रक्षा करना हमें उचित है ऐसा करने से आपका व्रता भोजन (पारण ) और मुनि वसिष्ठ का अग्निहोत्रादि कर्म ये दोन ही लुप्त नहीं हो सकेंगे ॥ ५५ ॥ भवानपीदं परवानवैति महान् हि यत्नस्तव देवदारी । स्थातुं नियोक्तुर्नहि शक्यमग्रे विनाश्य रक्ष्यं स्वयमक्षनेन ॥५६|| (अन्वयः) परवान् भवान्, अपि, इदम्, अवैति, हि, देवदारी तव महान्, यत्न, रक्ष्य, विनाश्य, स्वयं, अक्षतेन (सता) नियोक्तः, अने, स्थातु, न, शक्यम् ।। ५६ ।। (टीका) परवान् = पराधीनः, “परतन्त्रः पराधीनः परवान्ना- थवानपि” इत्यमरः, भवानपि, इदं वक्ष्यमाणं वचनम्, अवैति = जानाति, हि = यस्मात्कारणात् , देवदारी-देवदारुरक्षणे, तव = ते ..

सर्गः] सुबोधिनोटीकोपेतम्। महान् अधिकः, यत्नःप्रयत्नः, 'अस्मात्कारणात् रक्ष्यं रक्षीयं वस्तु, विनाश्य = विनाशं प्रापच्य, स्वयम् , नक्षतेन अवणेन 'सता नेयोता नियोजकत्य स्वामिनः, अनेसन्मुख, स्यातुं स्थिति तु, नहि शक्यम् = पारणीयं नहि ॥ ५६ ॥ (समालः ) पर अत्य नियोक्त्वेनास्तीति परवान् । रक्षित योग्यं रक्ष्यं । नियोजयतीति नियोका ॥५६॥ (वाच्यपरिवर्तनम् ) महता चलेन "भूयते” परवता भवता अवेयते, स्वयम् सज्ञतः (कश्चिदपि न स्यातु शक्नोति)॥५६॥ (सरलार्थः) किमन्यत्, स्वान्यधीनो भवानयोदं जानात्येव, पत् सेवकः स्वकं शरीरं सम्यगभिरक्ष्य स्वीयां काचन हानिम् असोड्वा स्वामिनो वस्तु नाश्येच्चेत्तर्हि ल लजया दण्डभत च स्वामिनोऽन्ने स्थातुं न शनोति । यद्येवं नोत् नहिं त्वमपि एनत्य देवदारोः रक्षायां पतावान् प्रयत्नवान् नामवियः ॥५६॥ (भावार्य) सेयरु को अपने, शरीर को रक्षाकर मालिक की बन्नु, नष्ट कर मालिक के सामने उपस्थित होना अत्यन्त अनुचित है ५६i किमप्यहिस्पस्तव चन्मतोऽहं यशःशरीर भव मे दयालः । एकान्तविध्वंसिषु महियानां पिण्डेप्चनास्या खलु भौतिकष्ट ।।५।। (अन्वयः) किम्, अपि, अहं, चेत्, तब पदियः, मनः. (अस्मि), (तहि ) (त्वं )मे, यशशरोरे, दयाल, भय, (सुतः) एकान्तविश्वंसियु, भौतियोपु, पिप्डेपु. मानिधानाम्, पनारथा, पर। (टीका ) विमपि किया, आई, चेए पदि, तप, साहित्य: अपयः, मतः - ईप्सितः 'मम्मि' तदि. त्वं, मेसर, रे पातिंम्पदपुषि, दयानुः हपाल, भय, 'पत' पका- जयावविनाशिपु. भौतिशे = एशियाविपक्षमताधिकार वि आरोप. मक्षिधामा मामानाम् , सनाया गया मनु ( मारलः) हिसिहं चोचो कि म किया एच लोकर, नन्मि। या फिलिल - दिखिनाए । - पुस [:. ...... . "भूयते" ":" मे ना गानाम: नायगा भग (मरणार्गः) गदा लगा : तदा त्वं रजोनिदर्भमादार, में 3 ( भागार्ग) दिन म TTAITो को इस शरीर दयार। पक दिन इसीरा नदीनाला, सम्बन्धमाभाषणपूर्नमाहुतः स नी संगतगोनान्ने । तद्भूतनाथानुग ! नासि लं रानगिनो मे प्रणगं निहन्तुम् ॥५८ (अन्ययः) ( जनाः ) आमाण, सम्बन्धम, पार, (सम्बन्धः ) बनान्ने, संगतयोः, नौ, (आवयोः) गृतः, हे भृतनाथानुग, त्वं, सम्पन्धिनः, मे, प्रागं विहन्तुं, न, अहंसि ॥ ( टीका ) (जनाः) सम्बन्ध = सरयं, प्राभाषणपूर्व = . ५44 कारणम्, याहुः कथयामासुः, सः- सम्पन्धः, बनान्तेय सतयोः मिलितयोः, नो = आययोः, मृत्तः सातः, तत् =त. कारणात्, हे भूतनायानुग! है शियानुचर, त्वं, मे = मम, स. धिनः = प्रणयिनः, प्रणयं = याश्चां, विहन्तुं = नाशयितुं, नार्हसि योग्योऽसि ॥५॥ (समासः) आमापणं पूर्व यस्य सः । वनस्य अन्तत्र न्तस्तस्मिन् । भूतनाथमनुगच्छतीति भूतनाथानुगस्तत्सम्बुद्धो ॥५८ (वाच्यपरिवर्तनम् ) आभापणपूर्वः सम्बन्धः जनः उच्यते है वृत्तम्, तत् हे भूतनाथानुग ! त्वया मे सम्बन्धिनः प्रथम विहन्तुं न अद्यते ॥५॥ (सरलार्थः) मैत्रीकरणे प्रथमम् आलाप एव हेतुः, सच श्राला आवयोर्वनमध्ये जात एव, अधुना च धावां सुहृदी भवावः। अद सुहृदो मे प्रार्थना त्वया न विफलीकर्तव्या ॥१८॥ (भावार्थ) सम्बन्ध बातचीत के द्वारा ही हुआ करता है, वह हम दोनों का वन में हो चुका है इसलिए आपको मुझ सम्बन्धी के प्रार्थना उल्लंघन करना उचित नहीं है ।।५८॥ तथेति गामुक्तवते दिलीपः सद्यः प्रतिष्टम्भविमुक्तवाहुः । सन्यस्तशस्त्रो हरये स्वदेहमुपानयत्पिण्डमिवामिपस्य ।।५९।। ......

सर्गः] सुबोधिनोटोकोपेतम् । तथा 11 (अन्वयः ) सद्यः, प्रतिष्टम्भविमुक्तवाहुः, सः दिलीपः, तथा ति, गाम्, उक्तवते, हरये, न्यस्तशलः, (सन् ) आमिपत्य, पेण्डम्, इव, स्वदेहम् , उपानयत् ॥५४॥ (टीका) सद्यः तत्क्षणे, प्रतिष्टम्भविमुक्तवाछुः = प्रतिवन्ध- उक्तभुजः, "भुजयाहू प्रवेटो दोः' इत्यमरः, पूर्वात, दिलीपः-दिलीपनामको भूमिपः, इति एवमस्त्विति अङ्गीकारचिकां" गां-वाणी, उक्तवते, = कथितवते, हरये सिंहाय, न्यस्तशस्त्रः-त्यक्तायुधः, 'सन् आयुधं तु प्रहरवं रास्त्रमस्त्रमथास्त्रियो" इत्यमरः, आमिपत्य-मांसस्य, पिशितं तरतं मांसं पलतं कन्यमामिपम्" इत्यमरः, पिण्डमिव =नासमिच, स्वदेह = निजशरीरम् , उपान्यत् = उपहाररूपेण समर्पितवान् ॥५६॥ (समातः ) प्रतिष्टम्भाद् विमुत्तो वाहुर्यस्य सः। न्यस्तानि शस्त्राणि येन सः । स्वस्यात्मनो देहः स्वदेहत्तम् ॥५॥ (वाच्यपरिवर्तनम् ) सद्यः प्रतिष्टम्भविमुक्तवाहुना तेन दिलीपेन "तथा इति" गाम् उत्तवते हरये न्यस्तशलेष "सता' प्रामिपत्य पिण्डः इव स्वदेहः उपानीयत ॥ ५६ !! (सरतार्थः) दिलीपस्य एतावता वादेन पराजितः सिंहः तथाल्विति दितीपप्रार्थनानगोचकार । तत्क्षण एव तस्य वाहुः प्रति- वन्धरहितो जातः। दितीपोऽपि त्वीयां प्रतिक्षाम् अनुस्मरन् शस्त्रा- दिकमेकतः परित्यज्य स्वीयं शरीरं सिंहत्त्याने न्यपातयद् ॥५॥ (भावार्थ) ऐसाही हो इस प्रकार वचन कहते हुए सिंह के निमित्त, बन्धन से खुली दाँहवाले और शस्त्र त्याने हुए राजा दिलीप ने अपना शरीर उसी समय मांस के पिण्ड के समान अर्पण कर दिया । ५६ ॥ तस्मिन्क्षणे पालयितः प्रजानामुत्तश्यतः सिंहनिपातमुग्रम् । दामुखस्योपरि पुप्पष्टिः पपात विद्याधरहस्तमुक्ता ॥ ६० ॥ (अन्वयः) तल्लिन, क्षले, उ, सिंहनिपातम्, उत्स्यतः, सवाउनुसत्य, प्रजानाम्, पातपितुः, उपरि, विद्याधरहस्तमुता पुष्पवृष्टिः, पपात ॥६॥ (टोहा) तस्मिन् क्ष-सिंहासमरसमले, उनं% a न

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सर्गः] सुबोधिनोटोकोपेतम् । ५३ - (सरलार्थः) अथ राजा दिलीपः "हे पुन! उत्तिष्ठ" इति सुधा- सममधुर वाणीमाकर्ण्य उदतिष्ठत् । अत्याय व पुरतः दुग्धं त्रवती मातरमिव नन्दिनीम् अवलोक्यत् ॥ ६ ॥ (भावार्थः) हे पुत्र उठो ऐला अमृतमय वचन सुनकर उठते ही राजा दिलीप ने नन्दिनी को देखा सिंह को नहीं देखा।। ६१ ॥ तं विस्मितं धेनुरुवाच साचो मायां मयोभाव्य परीक्षितोऽसि । ऋषिप्रभावान्मयि नान्तकोऽपि प्रभुः प्रहत किमुतान्यहिंसाः ॥३२॥ (अन्वयः) धेनुः, विस्मितं, तम्, उवाच, साधो !, मया, मायाम्, उन्नाव्य, (त्वं ) परोक्षितः, अति, ऋषिप्रभावात, मयि, अन्तकः, अपि, प्रहः प्रभुः, न, (अस्ति) अन्यहिनाः, किमुत, (स्युः) ॥२॥ (टोका ) धेनुः - नन्दिनी, विस्मितं श्रावर्यम् अधिगतं, तं दिलोपं, उवाच = उक्तवती, साधो ! मया, मायां शाम्बरी, "कपट- मित्यर्थः" (इन्द्रजाल) "स्यान्माया शायरी, मायाकार प्रति- हारका" इत्यमरः, उन्हाव्य रचयित्वा, “उत्पाद्य' त्वं, परीक्षितो. ऽसि %कृतपरीक्षोऽसि, ऋपिप्रभावात वसिष्टर्पितामात्, मयि% मयोपरि, अन्ततोऽपि = यमराजोऽपि, प्रहलु प्रहारं का, प्रभुः- समर्थः नास्ति, अन्यहिनाः अन्यघातुकाः सिंहादयः, जिमुत- कथं लमर्याः स्युः ॥ २॥ (समासः) ऋयो प्रभावस्तस्मात् । अन्ये च ते हिंनाच ।। ६२ ।। (वाच्यपरिवर्तनम् ) धेन्वा विस्मितः सः अचे, हे साधो! अहं स्वां परीक्षितवती अन्तोनापि प्रभुणा न "भूयते" । (सरतार्थः) लहत्ता देहोपरि पुपवृष्टया, सिंहस्य चानवतोक्नेन परं विस्मयमापन्नं दिलीपं ला धेनुरुवाच । हे परोपकारिन् ! मयैव मायया कपटतिहनुत्पाद्य तब भक्त परीक्षा हता, तव गुरोः प्रभावाद् यमोऽपि मयि प्रहर्तुन समर्थः अन्येषां हिंन्त्रजन्तूनांनु कयैव का।६२॥ (भावार्थः) पाश्वर्य में आये हुये राजा को नन्दिनी ने कहा "हे साधो ! मैंनेही माया रचकर तेरी परीक्षा ली है। मुनि के प्रताप से मुझमें प्रहार करने को यम भी समर्थ नहीं है फिर और हिंसकों की क्या शक्ति है, कि देसासमर करें । १२ ॥

५४ परंश-महाकाया। [हिली "भत्त्या गुरी मय्यनुकम्पया न प्रीतास्मि से पुत्र ! चर प्रणीत न केवलानां पयसां प्रतिमहि गां कागदुषां प्रसन्नाम् ॥६३ (चन्वयः) हे पुत्र ! गुरसे, मनगा, मगि, अनु सम्पया, ' (अहम् ) ते, प्रीता, अस्मि, (त्वम् ) वरं, राणीन, (लम् ) म फेवलानां, पयसां, प्रसूति, न, भवेहि, (किन्तु ) प्रसना ( मां कामदुघां, (अवेहि ) ।। ६३ ।। (टीका ) हे पुन = सुत ? गुरो = गुरुविषये, मात्या - अ. रागेण, मयि = महिपये, अनुकम्पया = शपया, च, "कृपा दया फम्पा स्यात्" इत्यमरः, सहं, ते = तवोपरि, प्रीतास्मि - प्रसन्नाऽसि त्वं, वरं वरणीयमर्थ, "पुनरूपमित्यर्थः" तृणीय = याचर "गोः पयोदाने सामथ्यं न तु वरदान इत्याशायाह" मां, केवलान पयसां - दुग्धानां, प्रसूति = उत्पादयित्रीं, नावेहि न जानीहि, किन प्रसन्नां = सन्तुष्टां, मां, फामदुधां = मनोरथपूरयित्रीम् अवेहो। शेपः॥ ६३॥ (समासः) कामान् दोग्धीति कामदुधा तां कामदुधाम् ॥ १३ ॥ (याच्यपरिवर्तनम् ) हे पुत्र !...."प्रीतया "भूयते" त्वया वरः त्वया" अहं केवलानां पयसां प्रसूतिः न अवेये किन्तु प्रसन्ना अहं कामदुघां अवेयै ॥ ६३ ॥ (सरलार्थः) पुत्र ! गुरौ तव दृढां भक्तिम् अवलोक्य अहं परंप्रीताऽस्मि अतस्त्वं मत्तःवरणीयमर्थ वृणीय, वरं देवा एव ददति नतु गावस्तेषां केवलं पयोदान एव सामर्थ्य मिति न शकनीयम् अहं सन्तुष्टा भक्तानां सकलं मनोरथमपि पूरयितुं शक्नोमि ।। ६३ ।। (भावार्थ) गुरु में भक्ति देखकर और मेरे ऊपर दया करने से में तुझपर प्रसन्न हूँ, इसलिए हे पुत्र ! तू वर माँग, मुझे निरी द्ध देनेवाली न समझ, किन्तु प्रसन्न होने पर मैं मनोरथ को भी पूरा करने वाली हूँ॥ ६३॥ ततः समानीय स मानितार्थी इस्तौ स्वहस्तार्जितवीरशब्दः । वंशस्य कर्तारमनन्तकीर्तिं सुदक्षिणायां तनयं ययाचे ॥ ६४ ॥ (अन्वयः) ततः, मानितार्थी, स्वहस्तार्जितवीरशब्दः, सा, वियतां ॥

सर्गः] सुबोधिनीटीकोपेतम् । ૫૫ " (राजा) हस्तौ, समानीय, वंशस्य, कर्तारम्, अनन्तकीर्ति, तनयं, सुदक्षिणायां ययाचे ॥ ६४ ॥ (टीका ) ततः = "वरं वृणोम्ब” इति वचनानन्तरं, मानितार्थी - सत्कृत्याचकः, स्वहस्तार्जितवीरशब्दः निजभुजवलोपार्जितचीर- ख्यातिः, सा- दिलीपः, हस्तौ करौ, "वलिहस्तांशवः करा' इत्यमरः, समानीय = संयोज्य, "अलि बद्धा", वंशस्य = फुलस्य, "वंशोऽन्ववायः सन्तानः" इत्यमरः, कर्तारम् = प्रवर्तयितारम् , अनन्तकोति = विपुलयशलं, तनयं पुत्रं, सुदक्षिणायां सुदक्षिणा- भिधायां निजागनायां, ययाचे प्रार्थयामास ॥४॥ (समासः) मानिता अर्थिनो येन सः । स्वस्थ हस्ताभ्याम् अर्जितो वीर इति शब्दो येन सः। न अन्तो यस्याः सा अनन्ता, अनन्ता कीर्तिर्यस्य सः तमनन्तकीर्तिम् ॥ ६४ ॥ (वाच्यपरिवर्तनम् ) ततः मानितार्थिना स्वहस्तार्जितवोरशब्देन तेन हस्तौ समानीय वंशस्य कर्ता अनन्तकीर्तिः तनयः सुदक्षिणायां ययावे॥६४॥ (सरलार्थः) ततः नन्दिन्या वरग्रहणथम् अभिप्रेरितो दिलीपः कुलप्रवर्तकं कीर्तिमन्तं पुत्रं वरत्वेन प्रार्थितवान् ॥ ६४ ॥ भावार्थ) तव राजा दिलीप ने वंश चलाने वाला अनन्तकोति पुत्र माँगा ॥ ६४॥ संतानकामाय तथेति कामं राज्ञ प्रतिश्रत्य पयस्विनी सा । दुग्ध्वा पयः पत्रपुटे मदीयं पुत्रोपभुवेति तमादिदेश ॥ ६५ ॥ (अन्वयः) सा, पयस्विनी, (गौः) सन्तानकामाय, राजे, कामं, तथा, इति, प्रतिभ्रत्य, हे पुत्र! मदीयं, पयः, पत्रपुटे, दुग्ग्बा, (त्वम् ) उपभुदव, इति, तं, (दिलीपम् ) आदिदेश ॥ ५ ॥ (टीका ) सापूर्वोक्ता, पयस्विनी = नन्दिनी, सन्तानकामाय - पुत्रकामाय, राक्ष भूपाय दिलोपाय, कामं वरं, तथा इति =एवम- स्विति, प्रतिधुत्य = प्रतिज्ञाय, हे पुत्र ! मदीयं = मत्सम्बन्धि, पयः +यस्य नाम्ना दिलीपस्य वंशः प्रचलिप्यति । अतएव दिलीपुत्रस्य रयोः नाना सक्ल एव सूर्यवंश इति जगति वियते, कान्य इदं रघुवंशम् , -

५६
रघुवंश-महाकाव्यम् ।
[हितीया
दुग्धं, पनपुटे = पलाशनिर्मिते द्रोणे, दया, उपभुश्व - पिच, इति =
एवं, तं-दिलीपं, आदिदेश मानापयामास ॥ ६ ॥
(समासः ) पयो विद्यते यस्याः सा । सन्तानकामयत इति सन्ता
नकामस्तम्मे । काम्यत इति कामस्तं । मम इदं मदोयम् ॥ ६ ॥
(वाच्यपरिवर्तनम् ) तया पयस्विन्या "त्वया उपभुज्यताम्" इनि
सः श्रादिदिशे ॥ ५ ॥
(सरलार्थः) सा नन्दिनी पुत्रामिलापिणे राजे दिलीपाय एवम-
स्त्विति वरं दत्तवती तदुपायभूतं स्वीयं पयः पलाशपुटके दुग्या
पातुम् श्रादिदेश ॥ ५ ॥
(भावार्थ ) पुत्र को चाहने वाले राजा दिलीप को "वरदान"
देकर “ हे पुत्र मेरे दूध को पत्चे के दोने में दुहकर पोलो" ऐसी
आशा उस नन्दिनी ने उसको दी ।। ६५ ॥
वत्सस्य होमार्थविधेश्च शेपमृपेरनुज्ञामधिगम्य मातः ।
औधस्यमिच्छामि तवोपभोक्तुं पष्टांशमुा इव रक्षितायाः ॥६६॥
(अन्वयः ) मातः, वत्सस्य, होमार्थविधेः, च, शेषम्, तव,
औधस्यम्, ऋपेः, अनुशाम्, अधिगम्य, रक्षितायाः, उाः, पष्ठां-
शम्, इव, उपभोक्तम्, इच्छामि ॥ ६६ ॥
(टीका ) हे मातः !, वत्सस्य = वत्सपानस्य, होमार्थविधेः-अग्नि-
होत्रानुष्ठानस्य, च, शेषम् = एतद्द्वयकार्यसम्पादनानन्तरम् अवशिष्टं,
ते, श्रोधस्य, क्षीरं, "दुग्धमिति यावत्" रक्षितायाः - परिपा-
लितायाः, उाः = वसुन्धरायाः, पटांशं = षष्ठभागम्, इव = यथा,
"राजा हि फलमाप्नोति रक्षितायाः क्षितेरपि" इति मनुस्मरणाव,
ऋपेः = वसिष्ठस्य, अनुज्ञाम् = श्राक्षाम् , “श्रादेशमिति यावत्" अधि-
गम्य = प्राप्य, उपभोक्तुं = पातुं, इच्छामि = वाञ्छामि ॥ ६६ ॥
(समासः) होम एवार्थो होमार्थस्तस्य विधिस्तस्य । ऊधसि
भवमोधस्यम् ॥ ६६ ॥
(वाच्यपरिवर्तनम् ) हे मातः “मया"...."इन्यते ॥ ६६ ॥
(सरलार्थः) राजा च ताम्प्रत्यवदत्-हे मातः ! यथाहं
पृथिवीं पालयन् उचितं पष्ठांशमेव करं स्वोपभोगार्थम् श्राददामि
तथैव वत्सपानाद् गुरोरग्निहोत्राच अवशिष्टं तव दुग्धं गुरोराशा
गृहीत्वैव पास्यामि ॥ ६६ ॥

सर्गः] सुबोधिनीटीकोपेतम् । (भावार्थ) हे माँ! मैं रक्षा किये हुए पृथ्वी के छठे भाग के समान बछड़े से और हवनक्रिया से पचे तेरे दूध को ऋषि की आशा लेकर ग्रहण करना चाहता हूँ॥ ६६ ॥ इत्थं क्षितीशेन वसिष्ठधेनुर्विज्ञापिता प्रीततरा बभूव । तदन्विता हैमवताच कुक्षेः प्रत्याययावाश्रममश्रमेण ॥ ६७ ॥ (अन्वयः) क्षितीशेन इत्थं विज्ञापिता, वसिष्टधेनुः, प्रीततरा चभूव, तदन्विता, (सती) हैमवतात्, कुतेः, अश्रमेण, श्राश्रम, च, प्रत्याययौ ॥ ६७॥ (टीका) क्षितीशेन भूमिपालेन, इत्थं = पूर्वोत्तप्रकारेण, विज्ञा. पिता= निवेदिता, वसिष्ठधेनुः = वसिष्ठनन्दिनी, प्रीततरा-अति- सन्तुष्टा, वभव = जाता, तदन्विता = दिलीपयुक्ता, 'सती' हैमवता. त् = हिमवत्सम्बन्धिनः, फुक्षः कन्दात्, प्रश्रमेण = अनायासेन, आश्रम-निवासस्थानं, च प्रत्याययो=श्राजगाम ॥६॥ (समासः) क्षियन्ति (निवसन्ति ) अस्याम् इति क्षितिः, तस्याः ईशः क्षितीशस्तेन । वसिष्ठस्य धेनुरिति वसिष्ठधेनुः । तेन अन्विता तदन्विता । हिमवतोऽयं हैमवतस्तस्मात् । न श्रमोऽश्रमस्तेन ॥१७॥ (वाच्यपरिवर्तनम् ) क्षितीशेन इत्थं विज्ञापितया वसिष्टधेन्वा प्रीतवरया बभूवे, तदन्वितया हैमवतात् कुक्षेः श्रमेण आश्रमः प्रत्यायये ॥६॥ (सरलार्थः) इति राज्ञा दिलीपेन सविनयम् श्रावेदिता नन्दिनी पूर्वापेक्षयाधिकं सन्तुष्टा बभूव । पश्चाच हिमालयफन्दरातः मुखेन तेन साकं निजाश्रममाजगाम ॥६७।। ( भावार्थ ) इस प्रकार राजा की प्रार्थना से अति प्रसन्न मुनि वसिष्ट की धेनु दिलीप के साथ ही हिमालय की कन्दरा से आश्रम के प्रति लौटी ।।६।। तस्याः प्रसन्नेन्दुमुखः प्रसाद गुरुनृपाणां गुरवे निवेद्य । प्रहपंचिन्दानुमितं प्रियायै शशंस वाचा पुनरुक्तयेव ॥६॥ (सन्धयः ) प्रसनन्दुमुखः, नृपाणां, गुरुः, प्रहर्पचिहानुमितं, तस्याः, प्रसाद, पुनरक्तया, इव, वाचा, निवेध, प्रियाय, शशंस ॥६॥ (टोका) प्रसग्नेन्दुमुखः = निर्मलचन्द्राननः, नृपाणांराला, . , unde - [Artha गुनः शासमा दिलोपः, प्राधिन - , तस्याः नन्दिताः, प्रसाद काम पुन: भूयः पवित्यंच, गाना - माया गुरव - TET मिया - विमान्य, "रा प्रिया पनि मनामान 1८!" (समाग्नः ) प्रसत्रमालाविन्दुक प्रयत: स इन मुर्म , सः । प्रायः प्रदान निमानिनिमानि लेग्नुमिनस्तन भीगानीति प्रिया तन्या (बायपरिवर्तनम् ) प्रसग्नेन्युमुगन नृपाणां गुणा शुशंसे ॥६॥ (सरलायंः) स्वमनोरयमामात गुरमन्त्र इन सुलगाना दिलीपः यसिष्टसमीपमागन्य धंनी: मायामात व प्रगम गुरं तत्पश्चात् मुदक्षिणां च कथयामास मुदक्षिणायसिष्टी तु रामः कथनात्माक तस्य प्रसम्ममाननमयलायव मत्रम अनुरोगाम् ॥३-१ (भावार्थ ) राजा दिलीप ने हर्ष के चिन्हों से अनुमान होनेवा. नन्दिनी से प्राप्त बर को गुरु वसिष्ट को निवेदन कर अपनी प्रिया हे कहा॥६॥ स नन्दिनीस्तन्यमनिन्दितात्मा सद्वत्सला बत्सहुनावशेषम् ! पपौ वसिष्टेन कृताभ्यनुज्ञः शुभ्रं यशो मूर्तमिवानितृष्णः ॥६९।। (अन्वयः) अनिन्दितात्मा, सत्सतः, सः (भूपतिः), वनिोन कृताम्यनुगः, अतितृष्णा (इब ) वत्साहुतावशेषम्, नन्दिनीस्तन्यं मूर्त', गुन्, यशः, इव, पपो ६il (टीका) अनिन्दितात्मा अगर्दितात्मा, अतिपरिपूतस्यमा इत्यर्थः, सद्वत्सलः = साधुप्रेमी, वसिष्टेन = गुणा, कृतान्यनुमः विहितासः, सः दिलीपः, अतिवृष्ण एव = अतिपिपास इव, “तृ स्पृहापिपासे द्वे" इत्यमरः, वत्सहुतावशेष = वत्सपानवनावशिष्टं नन्दिनीस्तन्यं = धेनुक्षीरं, मूर्त = मूर्तिमत्, शुनं - धवलं, यश इवः कीतिरिव, पपी = पीतवान् ॥६॥ (समासः) न निन्दितोऽनिन्दितः, अनिन्दितः दोपस्पशून्द श्रात्मा यस्य सः अनिन्दितात्मा। सत्नु वत्सलः सद्वत्सलः। कृत अन्यनुमा यस्मै सः। वत्सश्च हुनञ्च वत्सहुते, तयोः अवशेष वत्स हुतावशेषम् । स्तने मयं स्तन्यं, नन्दिन्याः स्तन्यं नन्दिनीस्तन्यम अतिशयिता तृष्णा- यस्य सः॥६॥ . ३.

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रा [गिलोय प्रत समान करने जान्नर गाना समागायोगा: देकर राजा गोर गनी को मनानीची गा112711 प्रदक्षिणीकृत्य दुत हुनाशमनन्तरं भरगन्मनी न । धेनुं सवता च नृपः प्रनये सन्मालादानरममानः ||७|| (अन्वयः ) नमः, गुनं, दुनाशं, भर्तुः, शानदार, मनोज सवत्सां, धेनुं न, प्रदक्षिणी कृत्य, सन्मालादनतरामान, मन प्रतस्थे ।। ७१ ॥ (टोका ) नृपः = राजा दिलीपः, हुन = बत्नाति, दुतायम् : 'अग्निं, भर्तुः = स्वामिनो मुनेः, अनन्तरम्, अगलती = गुरुपती, सवत्सां वत्ससहिता, धनुध नन्दिनीश, प्रदक्षिणीकृत्य - दक्षिणं परिक्रम्य, सन्मालोदनतरप्रभावः = उत्तममालाचारातिप्रवर्द्धमान तेजाः 'सन्' प्रतस्थे प्रस्थितः ।। १ ।। ( समासः) हुनमभातीति हुताशस्तं । भरतीति मा तस्य । वत्सेन सहवर्तमाना सवत्सा तां। प्रगतो दक्षिणं प्रदक्षिणम् अमदक्षिणं प्रदक्षिणं सम्पद्यमानं कृत्वेति प्रदक्षिणीकृत्य । सन्ति च ता. नि मङ्गलानि सन्मगलानि, तैः उदग्रतरःप्रभावो यस्य तथाभूतः ॥७॥ (वाच्यपरिवर्तनम् ) नृपेण 'सन्मालोदनतरममावेश "सता" प्रतस्थे ।। ७१ ॥ (सरलार्थः) राजादिलीपोऽपि ययाक्रमम् अग्निं, गुरु वसिष्टं तत्पत्नीम् अरुन्धती सवत्सां धेनुञ्च प्रदक्षिणं परिक्रम्य स्वां पुरोम्प्रति प्रस्थानमकरोत् । पूज्यानाम् एतेषां परिक्रमणेन गुरोः स्वस्तिवाचना. दिना च राज्ञ उत्कृष्टं तेजःप्रादुरभूत् ।। ७२ ॥ (भावार्थ ) राजा दिलीप आहुति दिये हुए अग्नि, गुरुवसिष्ठ, तथा उनकी पत्नी अरुन्धती और सवत्सा नन्दिनी को प्रदक्षिणा कर प्रस्थान करता हुआ ।। ७१ ॥ श्रोत्राभिरामध्वनिना रथेन स धर्मपत्नीसहितः सहिष्णुः । ययावनुयातसुखेन मार्ग स्वेनेव पूर्णेन मनोरथेन ॥७॥ (अन्वयः) धर्मपत्नीसहितः, सहिष्णुः, सः, (भूमिपः ) श्रोत्रा भिरामध्वनिना, अनुद्धातसुखेन, रथेन, स्वेन, पूर्णेन, मनोरथेन, इव, "ययौ । ७२॥

सर्गः] सुबोधिनोटोकोपेतम् । ६१ यातः ॥७२॥ (टीका) धर्मपत्नीसहितः सुदक्षिणासमन्वितः, सहिष्णुः सहनशीलः, साम्राजा दिलोपः, श्रोत्राभिरामध्वनिना-श्रवणाहादक- रशब्देन, अनुदातसुखेन = पापाणकण्टकादिप्रतिघातरहितत्वात् सुखकरण, रथेन - स्यन्दनेन, स्वेन = स्वकीयेन, पूर्णेन रथपक्षे मार्गापेक्षितलमस्तवस्तुपरिपूर्णेन, मनोरथपक्षेः-सफलताम् अधि. गतेन ! मनोरधेन इव = श्वभीप्तितेन इव, मार्गम् , - अयोध्यापुरपथं, ययोः (समासः ) धर्मपल्या सहितः धर्मपत्लोसहितः । अभिरस्यते- ऽस्मिन्निति अभिरामः, धोत्रयोरभिरामः, थोत्राभिरामः, ध्वनियस्य सः तेन । उद्हन्यते इत्युद्धातः, न-उद्धातः इत्यनुद्धातः, अनुदाता अत एव सुखयतोति सुखस्तेन ॥७२॥ (वाच्यपरिवर्तनम् ) धर्मपत्नीलहितेन सहिम्णुना तेन. मार्गः यये ॥ ४२ ॥ (तरलार्थः) सुदक्षिणया सह रथमारुह्य अयोध्याम्प्रति प्रस्थित- वतो दिलीपस्य रथः मनोरथश्च समान एवासीत् । गमनमाने मृत्पा. पाणादीनां गर्तादेरभावाद्रथस्य शब्दः श्रोत्रयोः सुखदः, पुत्रप्राप्तिमनो- रथस्यापि श्रवणं धोमनुखद, स रयः महामभावस्य राशो दिलीपस्य इति केनापि न कुत्रचित् प्रतिहन्यतेल्म, मनोरथोऽपि साम्प्रतं वलिष्ठः प्रभावात् प्रतिवन्धरहितो जातः, रयः सामन्यापूर्णः, मनो- रयोऽपि परिपूर्ण एव ॥ ४२ ॥ (भावार्थ ) प्रतादिदुानों को सहन करनेवाला राजा दिलीप रानो सुदक्षिणा के लहित रथ पर पूर्ण मनोरथ प्राप्त किये हुए को तरह चला ॥ ४२ ॥ तमाहितोत्सुक्यमदर्शनेन प्रजाः मजार्थव्रतकर्शिताङ्गम् । नेत्रैः पपुस्तृप्तिमनाप्नुवन्निर्नवोदयं नाथमिचौपधीनाम्॥७॥ (अन्वयः) प्रजाः, अदर्शनेन, आहितौलुक्य, प्रजावतकर्शिताई, नवोदयम् , तं, तृप्तिम् , अनानुवन्निा, नेवैः, सौपधीनां, नाथम्, एव, पपुः ॥ ७३॥ (सोका ) प्रजा:-नागरिकाः जनाः, अदर्शनेन = प्रयासहेतुकान- पलोफनेन, माहितीनुफ्य जनितीत्वध्वं, प्रजावतकार्शिताई सन्तानातपातनेन एशोहतशरोरं, नदोश्यं = नवान्युदयं, " % रघुवंश-महाकाव्यम् । [द्वितीयः नेत्रः औषधीनां = सोमलतादीनां, नार्थ - पतिञ्चन्द्रमिव स्थितं, तं राजानं दिलीपं, तृप्ति = सन्तोपम्, अनाप्नुवद्भिः श्रप्राप्नुवद्भिः, नयन, पपुः पीतवत्यः ॥ ७३ ॥ (समासः) उत्सुकस्य भावः औत्सुक्यं, अाहितमौत्सुक्यं येन सः तम् । प्रजाय इति प्रजार्थ, प्रजार्थं व्रतं प्रजार्थव्रतं तेन, कर्पितमङ्गं यस्य सः तं । न प्राप्नुवन्ति तैः । नव उदयो यस्य सः तम् ॥ ७३ १४ (सरलार्थः) चिराद् राक्षोऽदर्शनेन तं द्रष्टुं नितान्तमुत्कण्ठिताः प्रजाः पुत्रप्राप्तिवराधिगमरूपं नवम् अभ्युदयम् अधिगम्य समागत दिलीपं महता आदरेण ददृशुः। यथा स्वाः कला देवेभ्यः समर्प क्षीणोऽपि द्वितीयाया नवोदितश्चन्द्रः लोकानाम् आनन्दवर्धनो भवति तथैव सन्तानार्थं कृतेन व्रतेन कृशोऽपि दिलीपस्तदानीम् अशोमत एव । (भावार्थ ) चिरकाल के अनन्तर देखने के कारण उत्कण्ठा युक्त प्रजाजनों ने सन्तान के लिये व्रत करने से दुर्वल शरीरवाले राजा दिलीप को नवीन उदय हुए चन्द्रमा की समान बड़े श्रादर से अवलोकन किया ॥७३॥ पुरन्दरश्रीः पुरमुत्पताकं प्रविश्य पौरैरभिनन्यमानः । भुजे भुजद्वेन्द्रसमानसारे भूयः स भूमे(रमाससञ्ज ।।७४|| (अन्वयः) पुरन्दरश्रीः, सः, पौरैः, अभिनन्द्यमानः, "सन्" उत्पताक, पुरं, प्रविश्य, भुजनेन्द्रसमानसारे, भुजे, भूयः, भूमे, धुरं, याससञ्ज ॥७॥ (टीका ) पुरन्दरश्रीः = इन्द्रतुल्यलक्ष्मीका, सः= पौरैः पुरवासिभिलोकः, अभिनन्द्यमानः = क्रियमाणस्वागतः सन् , उत्पता- कम् = उच्छ्रितध्वजं, पुरं = नगरं, प्रविश्य - प्रवेशत्वा, भुजग्नेन्द्र समानसारे सर्पराजतुल्यवले, भुजे = वाही, भूमेः = तितेः,धुरं-मारं, राज्यशासनसूत्रमित्यर्थः, भृयः पुनः, श्राससस - स्थापितवान् ||७|| (समासः) पुराणि दारयतीति पुरन्दरस्तस्य श्रीरिव धीर्यस्य सः। पुरे भवाः पौरास्तः । अभिनन्यतेऽसावभिनन्द्यमानः । उद (अबोमूना) पताका यस्मिन तत् उत्पताकं तत् । भुजाभ्यां गच्छन्तीति अदास्तेपामिन्द्रो भुजनेन्द्रस्तेन समानः सारो यस्य तस्मिन् ॥७ell नृपः, सर्गः] सुबोधिनोटोकोपेतम् । ६३ (सरलार्थः) अथ नगरवासिभिरभिनन्धमानो दिलीपः राष्ट्रिय- पताकातोरणनगादिभिः सुसजितानि पुरवासिनां भवनान्यवलोक- यन् पुरं प्रविवेश तथा मन्त्रिणां हस्ते पूर्व समर्पित राज्यप्रवन्धं पुनः स्वीचकार ।। ७४॥ (भावार्थ) इन्द्र के समान ऐश्वर्यवाला राजा दिलीप नगर. निवासियों से सत्कृत हो नगर में प्रवेश कर सर्पराज के समान बत चाली भुजाओं पर फिर से पृथ्वी का भार धारण करता हुआ ॥७॥ अय नयनसमुत्थं ज्योतिरत्रेरिव चौः सुरसरिदिव तेजो वहिनिष्ठ्यूतमैशम् । नरपतिकुलभूत्यै गर्भमाधत्त राज्ञी गुरुभिरभिनिविष्टं लोकपालानुभावैः ।। ७५ ॥ (अन्वयः ) अथ, अने, नयनसमुत्यं, ज्योतिः, चौः इव, वहि- निध्यतम् , ऐशम्, तेजः, सुरसरित, श्च, राक्षी, नरपतिकुलभूत्यै, गुरुभिः, लोकपालानुभावैः, अभिनिविष्टं, गर्भम्, प्राधत्त ॥ ५५ ॥ (टीका) अध= रामा राज्यभारमहणानन्तरं, अत्रि- पिता सोमस्य भो विप्रा जत्रिभंगवानृषिः । मनगो मानसार्व प्रजा विधिसतः ॥ १ ॥ अनुत्तरं नाम तपो येन तर महरपुरा । प्रीणि वसहलाणि दिच्यानीति हि नः शुनम् ॥ २ ॥ जयमाचनामे रेततः सोमवमीयिवत् । नेवान्यां यारि मुशाय दहाधा द्योतयन्दिाः ॥ ३ ॥ तंग विधिना वादा देव्यो दभुगतः । सय धारयामानुनच गाः समारबम् ॥ १ ॥ पदान धारण गाना गर्माय दिगोदा। नाम्नाभिः नयाा निपार यमुम्बसार ॥ ५॥ पतितोममायापिकाम: समारोपमामलमानों का 11 ६ } गरिमविपरित दया पुन मनः । पण मुलाये निमायाः ।। Trय जसो मारमः । गाय Fan Part 1 -

६१
[मिती
रगुवंश-मााकाव्यम्।
मुनेः, नयनसमुत्य - नेनोपन, योनिः = चन्द्रमित्यर्थः, धीरिव:
आकाशमिब, बनिनिष्ठयुतं = अशिशिन, पेशं - महेशसम्बन्धि, तंत्र
- वोयं स्कन्दरूपं, मुरसरिदिय - मन्दाकिनीय, गनी मुदक्षिणाधि.
नरपतिकुलभूत्यै - दिलीपकुलप्रतिष्ठाय, गुमभिः = महल, लोकपाटा
नुभावैः = इन्द्रयरुग्णयमकुवेरायटलोकपालतेजामिः, मागामिरगयी.
अभिनिविष्टम् = अनुप्रविष्ट, गम्, यावत्त - वृतवती, “इन्द्रात्प्रभुतं
तपनात्प्रतापं प्रोयं यमानैश्रवणाय वित्तम् । आखादकत्व निशादि
नाथादादाय रायः क्रियते शरीरम्" इति स्मरणात् ॥ ४ ॥
(समासः) नयति घटपटादिकं प्रापयनीति नयनं तयोः समुत्यं
वहिना निष्टयतं। ईशस्येदमैशं । नराणाम्पतिरिति नरपतिस्तार
कुलं नरपतिकुलं, तस्य मूल्यै । लोकान् पालयन्तीति लोकपालास्तेग-
मनुभावैरिति ।। ७५ ॥
(सरलार्थः ) यथा अत्रिमहर्षनेत्रोत्पन्नं चन्द्ररूपं तेजः धुलोक-
स तेन स्यमुग्येन सागरान्तां वसुन्धराम् ।
त्रिसप्तकृत्वोऽतियशाश्वकारामिप्रदक्षिणान् ॥ ९॥
तस्य यत्र वितं तेजः पृथिवी समपद्यत ।
ओपध्यस्ताः समुद्भूता यामिः सन्यायंते जगत् ॥ १० ॥
सलब्धतेजा भगवान् संस्तवैस्तैश्च कर्मभिः।
तपस्तेपे महाभागः पद्मानां दवातीदंश ॥ ११ ॥
ततस्तस्मै ददौ राज्यं ब्रह्मा ब्रह्मविदां वरः।
वीजीपधीनां विप्रागामपाश मुनिसत्तमाः ॥ १२ ॥
स तयाप्य महाराज्यं सोमः सौन्यवतां वरः ।
समाजह राजसूयं सहनशतदक्षिणम् ॥ १३ ॥
दक्षिणामददात्सोमखीठोकानिति नः श्रुतन् ।
तेभ्यो ब्रह्मर्पि मुळ्येभ्यः सदस्येभ्यश्च भो द्विनाः १४ ॥
हिरण्यगर्भो ब्रह्माऽग्निर्मंगुश्च ऋविजोऽभवत् ।
सदस्योऽभूटुरिस्तत्र मुनिमिबहुमितः ॥ १५ ॥
सिनीवाली कुहश्चैव तिः पुष्टिः प्रभावमुः ।
कीर्तितिश्च लक्ष्मीश्च नब देव्यः सिपेविरे ॥ १६ ॥
प्राप्यावझयमच्यनः सर्वदेवर्षिपूजितः ।
विरराजाधिराजेन्द्रो दशधा भासयन्दिशः ॥ १० ॥

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सर्गः] सुबोधिनोटोकोपेतम् । ६७ . (सरतार्थः) गर्भधारणानन्तरं सुदक्षिणा स्तन्तुमुन्मुखत्य सूर्यवंशस्य समुद्धारकं दिलीपस्य अभिलापरूपं गर्भचिन्हं दधार। तदानीं तस्याः सख्यः चन्द्रिकान् इव पूर्णगर्मा ताम् अवलोय निर्भरम् भानन्दम् अवापुः ॥१॥ (भावार्थ ) रानी सुदक्षिणा ने इक्ष्वाकुवंश की संतति के लादि कारण गर्भचिह्न को धारण किया ॥ ६ ॥ शरीरसादादसमग्रभूपणा मुखेन साऽलक्ष्यत लोधूपाण्डुना । तनुप्रकाशन वियतारका प्रभातकल्या शशिनेव शर्वरी ॥२॥ (अन्वयः) (जनैः) शरीरसाक्षात् समप्रभूषणा, लोपाप्डना मुखन, " उपललिता सा (उदाक्षिणा) तनुमकान, शशिना, विचेयतारका, प्रभातकल्या, शर्वरी, इव, अलभ्यत ।।२।। (टीका ) शरीरसादात् - देहकार्यात्, असमप्रभूपणा = परि- मितालद्वारा, "अलहाररत्याभरणं परिष्कारो विभूषणम्" पल मरः, लोधपाहुना = लोधासुमन्तमानपाण्डवर्णेन, मुग्वेन . नेन, “वपत्रास्ये वदनं नुण्डमाननं लपनं मुम् उपलक्षिता", सा मुदक्षिणा, तनुप्रयानी मागिना मन्द्रेण, "उपलहिता" चित्रेयनारदा शमा, प्रभातकरपा = समासप्रभाता, शरीर = गरि यत:चरश्यत ॥२॥ (समास:) शानि शीर्यने या शरीरं नरय सागर, सममाप्यसमप्राणि, समन्याणि भूषणानि यरयाः सा ! - लोधपाप्ट, नेन । प्रकाशन प्रकाशन या प्रकार:- सग। दिचेचारतारदाः परयां सा । प्रभात १ . (पास्यपश्चिनगम ) मा." कासमा मियम परम् ॥६ (१३५८ा होत्याद दमी कामात दाल ::

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-सर्गः] सुबोधिनीटीकोपेतम् । ६६ : (अन्वयः) हि, (यस्मात् ) दिगन्तविश्रान्तरयः, तत्तुतः, मरु- न्, दिवम्, इव, भु, भोक्ष्यते अतः, सा, (सुदक्षिणा) अन्य- सान्, विलक्ष्य, प्रथम, तथाविधे, अभिलापे, मनः, यवन्ध ॥ ४॥ (टोका) हि = यस्मात् कारणा, दिगन्तविधान्तरयः सर्व गतरयः, तत्तुतः सुदक्षिणापुनः, मरुत्वान् = इन्द्रः, दिवमिव स्वर्गमिच, भुवं पृथिवी, भोक्ष्यते - उपभोक्ष्यते, अतःस्मात् गरणात्, 'एवं सासुदक्षिणा, अन्यरतान् = मधुराधन्यरस- कभक्ष्याणि, बिलध्य-विहाय, प्रथम नादौ, तथाविधे-मुन्न- रणरूपे, अभिला-इच्छायां, मनः-मानलं, "स्वान्तं हन्मानसं निः" इत्यमरः, ववन्ध - चकार ॥४॥ (समासः) दिशामन्ता दिगन्तास्तेषु विश्रान्तः रयो यस्य सः । स्यिाः सुतस्ततः । मरतो देवताः तन्त्यस्येति तथाभूतः । अन्ये च । रसाश्चान्यरसास्तान् ।।४।। (वाध्यपरिवर्तनम् ) दिगन्तवित्रान्तरथेन तत्सुतेन मरुत्वता चौः व भूः मोक्ष्यते, अतः या ""वन्धे ॥४॥ (लरलार्थः) इन्द्रो यथा स्वर्ग भुनति तथैव ममापि पुनः सर्व- हु दिनु जप्रतिहतरयतिः सन् सकलां भुवं भुनकु इति मनति वैचार्य मुदक्षिणा गर्भावस्थायामेव गर्भस्यजन्तोः भूमिभोगरूपम् अभ्यास कारयितुम् अन्यान उत्तमोचमान् रलान् परित्यज्य मृदभेव अक्षयतिस्म ॥४॥ (तरलार्थ हिन्दी ) जैले न्द्र स्वर्ग को भोगता है वैसे ही तुदक्षिणा का पुत्र भो सम्पूर्ण पृथिवी को भोगेगा इसी कारण मानो रानो मुदतिल और २ रसों को छोड़कर प्रथम महीखाने को दी अभिलापा में मन देती हुई।।४॥ न मे हिया शंसति किञ्चिदीप्सितं स्पृहादती वस्तुपु केप मागधी । इति स्म पृच्छत्यनुवेलमाहत मियासखीरचरकोशलेश्वरः ।। ५ ॥ (अन्वयः) मागधी, दिया, ने, विचिन्, (अपि) सितं. न, संसति, (सा) प.पु. दन्द्पु, सहायती, (अस्ति) पति, उत्तरको गलेश्वर मारतः, (सन् ) अनुवैलं. मियासतो, पृच्छरित्न ॥ ५ ॥ (टोका) मागधीसुदक्षिरा. हिया लजया. मराहकारमा पनिवनेदार एनिधः । ..

७० रघुवंश-महाकाव्यम् । [ - . स -4 ह्रीस्त्रपा बीड़ा लज्जा सापत्र पान्यतः" इत्यमरः, मे-महां, कि दपि = ईपदपि, "किश्चिदीपन्मनागल्" इत्यमरः, ईप्सितं = : न शंसति =न कथयति 'सा' कंपुकिम्भूतेषु, वस्तुयु = पहा स्पृहाचती = इच्छावती, 'अस्ति', इति = इत्यं, उसको = उत्तरकोशलाधिपो दिलोपः, आदतः 'सन् ' = यादरयुक्तः अनुवेलं = प्रतिक्षणं, प्रियासखीः = सुदक्षिणासहचरीः, पृच्छति प्रमच्छ ।। ५॥ (समासः) मगधस्यापत्यं स्त्री मागधी। स्पृहा विद्यते ॥ सा। ईशितुं शोलमत्येतीश्वरः, उत्तरकोशलानामीश्वरः। ये. वेलायामित्यनुलं । मीणातीति प्रिया, तस्याः सख्यः ताः ॥ ५ ॥ (वाच्यपरिवर्तनम् ) मागध्या हया मे किञ्चित् न. "तया” केपु वस्तुपु स्पृहावत्या "भूयते” इति उत्तर श्व' आटतेन "सता" अनुवेलं प्रियासख्यः पृच्छ्यन्तेस्म ॥५॥ (सरलार्थः) गर्मिण्य अधिकं लजन्ते, सुदक्षिणापि साप तथैवासीत् । गर्भावस्थायां त्रियः विविधानि वस्तूनि : लिया इति राजा प्रत्यहम् अनेकवारं तस्या निकटे समागत्य तां त परं सा लज्जया किमपि न कथयति स्मेति दिलीपः प्रतिमुहूत सस्त्रीः तदर्थ तदन्ते प्रेपयतिस्म ॥ ५ ॥ (सरलार्थ हिन्दी) रानी सुदक्षिणा लजा के कारण : कुछ भी नहीं कहती, वह किन वस्तुओं को चाहती है यह जान लिये राजा दिलीप उसके सस्त्रियों को प्रतिक्षण उसके पास करता था।॥ ५॥ उपेत्य सा दोहददुःखशीलतां यदेव वत्रे तदपश्यदाहृतम् । न हीष्टमस्य त्रिदिवेऽपि भूपतेरभूदनासायमधिज्यधन्वनः ॥ (अन्वयः) सा, (सुदक्षिणा ) दोहददुःखशीलताम् , यद् एव, वने, तत्, (एव) श्राहृतम्, अपश्यत्, हि (र अधिज्यधन्वनः, अस्य, भूपतेः, त्रिदिवे, अपि, इष्टं (वस्तु) अनार न, अभूत् ।।६॥ (टीका) सा= सुदक्षिणा, दोहददुःनशीलता = गर्भिणी * दोहदशब्दो इच्छामानवाच्यपि विशेषेण गर्भिणीच्यायां प्रयुज्यते" : गर्मलक्षणे अमिलापे तथा गर्भ" इति हेमः, सर्गः] सुबोधिनोटोकोपेतम् । जर - : रथदुःखस्वभावतां, उपेत्य = प्राप्य, यदेव = यत्किञ्चिदपि, वने 'पाचज्ञाझ तदेव तत्सर्वमपि, आहतं = मानीतं, अपश्यत्वत्तो- कितवती, हि यस्मात्कारणात्, अधियधन्वनः = प्रारोपितलार्नु गर्मियास्ततदिच्छायां विशेषेण प्रयुज्यते, मुश्रुतस्तु गभिप्याः दोहननुद्दिश्य स्वसंहितायानेजमवोच्दः- "इन्द्रियायांस्तु यान् चान सा मौकमिति गमिगी । गर्भाधयान्तिान् भिपगाय दापयेत् ॥ सा प्रातदादा पुग्नं जनयेत गुणान्छितन् । बलम्यादौता गर्ने लभेतामनिया भयम् ।। पु विन्द्रियाय वौदे व विमानना । प्रजायेत सुतस्यातितमिस्तस्मिन्तयेन्द्रियं । राजसन्दर्गने यन्या वारदजायते मियाः । भयन्नं महाभागं वमासा प्रमुयनं ।। दुरुपयोगय भूपगादिपु सीवाद । भारपिणं पुत्रं ललितं सा प्रयनं !! साप्रम संयतामानं धर्मसी प्रमयने । देवशानिमायां गुमरो पापोपमम् ॥ दमें माल जातीनां हिलानी समयां । गोधामावादाने पुपुष्यं धारामम् ।' गर्दा मोदनु परिन सब माया । नापि श्रीवापागोमागुतम् । बानामांमारामालम। मानसमा काम गर ।' मानिसमा स्लोनाकामा । Hit." mzn.t Fire | r: । minister 11

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सर्ग:]] मुबोधिनीटीकोपेतम् । ७३ माना अवयवा अस्याः सा । पुराणानि च तानि पत्राणि पुराणपत्रा. णि तेषामपगमस्तस्मात् । सनद्धानि मनोज्ञानि पल्लवानि यस्याः सा सम्ममनोकपसवा ॥ ७ ॥ (पाच्यपरिवर्तनम् ) तया......."प्रचीयमानावयवया "सत्या" "पालवया लतया व रेजे॥७॥ (सरलार्थः) यथा वसन्तसमये लता पक्वपर्णानि विहाय नव- 'पालवैः शोभते तथैव राती सुदक्षिणाऽपि क्रमशः कष्टकरी तां गर्भा- वस्थामतिकम्य विशिष्टां पुष्टि लभमानैः अवयवैः दिदीपे॥७॥ (सरलार्थ हिन्दी ) पुराने पत्तों के गिर जाने पर नवीन पर्णवाली सुन्दर लता के समान रानी सुदक्षिणा भो गर्भ दुःख को विताकर अपने पुष्ट अहाँ से सुशोभित हुई ॥७॥ दिनेषु गच्छत्स नितान्तपीवरं तदीयमानीलमुखं स्तनद्वयम् । तिरश्चकार भ्रमराभिलीनयोः सुजातयोः पङ्कनकोशयोः श्रियम् ॥८॥ (अन्वयः) दिनेषु गच्छत्सु, नितान्तपीवरम्, पानीलमुखं, तदीयं स्तनद्वयं, भ्रमराभिलीनयोः, सुजातयोः, पङ्कजकोशयोः, श्रियं तिरश्चकार ।। ८॥ (टोका ) दिनेषु = दिवलेपु, गच्छत्सु व्यतिक्रामत्सु, "सत्सु" नितान्तपोवरं = अत्यन्तस्थूलं “वडोरुविपुलं पीनपीनी तु स्थूल- पीवरें" इत्यमरः, आनीलमुखं कृष्णवर्णचूचुकं, "कुचाममित्यर्थः" तदीयं = सुदक्षिणासम्बन्धि, स्तनद्वयं = कुचद्वयं, पिचण्डकुक्षी जठरोदरं तुन्दं स्तनौ कुचौ" इत्यमरः, भ्रमराभिलीनयोः, भृङ्गा- भिव्याप्तयोः, "द्विरेफपुष्पलिड्भृङ्गपटपद्ममरालयाः" इत्यमरः, सुजातयोः मनोहरयोः, पङ्कजकोशयोः = कमलमुकुलयोः, श्रियं = शोभा, तिरश्चकार = तत्याज ।। - ।। (समासः ) नितान्तं पीवरमिति नितान्तपीवरम् । श्रासमन्तानीलं मुखं यस्य तदानीलमुखं । तस्या इदं तदीयम् । स्तनयोः द्वयमिति स्तनद्वयम् । भ्रमरैरभिलीनौ भ्रमराभिलीनौ तयोः भ्रगराभिलोनयोः । पङ्कजस्य कोशौ पङ्कजकोशौ तयोः ।। ८॥ (वाच्यपरिवर्तनम् )...."नितान्तपोवरेणं पानीलमुखेन तदीयेन स्तनद्वयन .."श्रीः तिरश्चक्रे ॥ ८॥ , .

७४
नघुवंशमा
[ोष
(सरलार्थः) मनोहर फालाल समरांगोगाद या
शोभा जायते ताशो प्रवान्याः मुनिगागाः गोनागोमये
कृष्णचनुकोदयादनिर्वचनीया शामाजागान ।। ८ ।।
(सरलाथ हिन्दी ) दिन व्यतीत होने पर
नीले मुगवाले दोनों स्तन, काले काले नीले गौरी से व्यास यमन
कलियों की शोभा को लजित करते हुए ॥ ८॥
निधानगर्भामिव सागराम्बरां शमीमियाभ्यन्तरलीनपावकाम् ।
नदीमिवान्तःसलिलां सरस्वती नृपः ससत्त्वां महिपीममन्यत ।।९।।
(अन्वयः ) नृपः, निधानगमां, मागगम्बराम्, इव, अभ्यन्ताः
लीनपाचकां, शमीम् , इय, अन्तःसतिलां, सरस्वती, नदीम्, व.
महिषी, ससत्त्वाम् , अमन्यत ।। ६॥
(टीका ) नृपः = राजा दिलोपः, निधानगमां = निधिगमी, मा.
गराम्बरां = समुद्रवसनां, इव, “पृथ्वीमियत्यर्थः" अभ्यन्तरलीनग
वका = अन्तःप्रलीनवद्धि, शमीमिय - शमीवृक्षमिय, अन्तःसलिता
- अन्तस्थितजलां सरस्वती = सरस्वतीनाम्नी नदीमिय, महिषों :
कृतामिपेकां सुदक्षिणां, ससत्वां = जीवरतसहितां, अमन्यत = मन्यते
स्म ॥४॥
(समासः) निधान गर्ने यस्याः सा तां। सागर एवाम्बरं
यस्याः सा तां सागराम्बराम् । अभ्यन्तरे लीनः पावको यस्याः सा
ताम् । अन्तः सलिलं यस्याः सा तां। सत्येन सहिता ससत्वा तां
ससत्त्वाम् ॥ ६॥
(वाच्यपरिवर्तनम् ) निधानगर्दा सागराम्बरा इव, अभ्यन्तर
लीनपावका शमी इव, अन्तःसलिला सरस्वती नदी इत्र, महिपी
नृपेण ससत्त्वा अमन्यत ।। ६॥
( सरलार्थः) यथा पृथिव्या गर्भे निधिः तिष्ठति, शमीवृक्षाभ्यन्तरे
निर्वर्तते, सरस्वतीनद्या अभ्यन्तरे जलं वर्तते तथैव अस्याः मुदनि
पाया अपि गर्ने पुत्रो वर्तत इति राजा श्रमन्यत ।। ६ ।।
(सरलार्थ हिन्दी ) गर्भ में रत रखनेवाली पृथ्वीकेसमान, भीतर
अग्नि और जल रखनेवाले शमीवृक्ष एवं सरस्वती नदी के समान:
राजा दिलीप रानी को पुत्ररत गर्भवाली मानता पुश्रा ॥६॥

सर्गः] सुबोधिनोटोकोपेतम् । ७५ %D मियानुरागस्य मनःसमुन्नतेर्भुजार्जितानां च दिगन्तसम्पदाम् । यथाक्रमं पुंसवनादिकाः क्रिया धृतेश्च धीरः सदृशीय॑वत्त सः ॥१०॥ (अन्वयः) धीरः सः, (प्रजेश्वरः) प्रियानुरागस्थ, मनःसमुन्नते, भुजार्जितानी, दिगन्तसम्पदां, च, धृतेः, च, सदृशीः, पुंसवनादिकाः, क्रियाः, यधाक्रमम्, व्यधत्त ॥१०॥ (टीका ) धीर पण्डितः, "धोरो मनोपो ज्ञः प्राज्ञः संख्यावान् पण्डितः कविः" इत्यमरः, लः - राजा दिलीपः, प्रियानुरागस्य सुदक्षिणात्नेहत्त्य, मनासमुन्नतेः = मनल औदार्थस्य, भुजार्जितानां: भुजवललम्पादितानां, दिगन्तसम्पदा - दिगन्तव्याप्पैश्वर्याणां, च, धृतेः = पुत्रो मे भविष्यतीति सन्तोषस्य च, सहशीः = अनुरूपाः, *पुंसवनादिकाः पुंसवनप्रभृतीः, क्रियाः - संस्कारान्, यथाक्रम = अनुक्रमेण, व्यधत्त-कृतवान् ।। १० ।। (समासः) प्रीणातीति प्रिया तस्यामनुरागस्तस्य । समुन्नतिरिति मनासमुनतिस्तस्याः । भुजाभ्याम् अर्जिता भुजार्जिताः तासाम् । दिशामन्ता दिगन्ताः, तेपु ताः सम्पदः दिगन्तलम्प- दस्तासां। पुमान् सूयतेऽनेनेति पुंसवन, तदादिलान्ताः पुंसवना- दिकाः। क्रममनतिकस्येति यथाक्रमम् ।।१०।। (वाच्यपरिवर्तनम् ) घोरेण तेन" व्यधीयन्त ॥१०॥ (सरलार्थः) दिलीपस्य सुदक्षिणायां यावान् स्नेहः, मनलच यावदोदाय, दिग्विजयप्राप्तैश्वर्याणां यावत्माचुर्च्यमियता कालेन पुत्रमुखं पश्यामोत्याशया यावानानन्दच आसीत् तावतैव प्रेम्णा, औदार्येण, विभवेनानन्देन च दिलीपः वित्तशाध्यरहितः सन् तस्याः पुंसवनादिगर्भसंस्कारान् सम्पादयामाल ।। १० ।। (सरलार्थ हिन्दी ) राजा दिलीप का सुदक्षिणा में जितना प्रेम था, उसमें जितनी उदारता थी, अपने याहुबल से जितनी सम्पत्ति प्राप्त की थी, उन सभी के अनुसार बड़े धूमधाम से पुलवनादि संस्कार करता हुया ।।१०।। ...... ..... "सहश्यः "न्यो गर्भ नती तु माले पुंसवनं भवेत् । गया तृतीय चरवर्षे मासिया भवेत्" इति सौना ७६ रघुवंश-महाकाव्यम्। [तृतीयः सुरेन्द्रमात्राश्रितगर्भगौरवात् प्रयत्नमुक्तासनया गृहागतः । तयोपचाराञ्जलिखिन्नहस्तया ननन्द पारिप्लवनेत्रया नृपः ॥११॥ (टीका ) गृहागतः, नृपः, सुरेन्द्रमात्राश्रितगर्भगौरवात्, प्रयत्न मुक्तासनया, उपचाराअलिखिन्नहस्तया, पारिलवनेत्रया, तया, (सुदक्षिणया) ननन्द ॥ ११ ॥ ( टीका) गृहागतः = गेहंप्राप्तः, "गृहं गेहोदवसितं" इत्यमरः नृपः = राजा दिलीपः, सुरेन्द्रमात्राधितगभंगौरवात् = लोकपालां शानुप्रविष्टगर्भभारात्, प्रयतमुक्तासनया -प्रयासत्यक्तासनया, उपचारासलिखिन्नहस्तया: अभिवादनाजलिशिथिलकरया, पारिसव- नेत्रया = चञ्चलनयनया, "चश्चलं तरलं चैव पारिसवपरिलवे" इति चामरः, तया - सुदक्षिया, ननन्द = आनन्दम्माप ॥ ११ ॥ ( समासः ) गृहमागत इति गृहागतः । सुराणामिन्द्राः सुरेन्द्रा तेषां मानाभिराश्रित इति सुरेन्द्रमात्राश्रितः, स चासो गर्भश्च सुरेन्द्र मानाधितगर्भस्तस्य गौरवं तस्मात् । प्रयत्नेन मुक्तं आसनं यया सा सपा । उपचारार्थः योऽसलिस्तस्मिन् खिशी हस्ती यस्याः सा तया। पारिलाये न यस्याः साः ॥ ११ ।। ( वाग्यपरिवर्तनम् ) गृहागतेन नृपेण ...'नगन्दे ॥ ११॥ (समलार्थ) सः तस्या गर्भः शमशस्तथा भारयाजातः, यथा ग्रवागतस्य गगो विणीपरय स्वागतार्थ शय्याता उत्थानेऽपि सा नयमति गठम्मभूय। तत्प्रगामार्थम अलिवन्धनेऽपि तस्या हस्तो शिथिली अन्यतः, ताराशं तस्या गावं दृष्ट्वा दिलीपः परमां- मदं प्राप।। २१ ॥ ( मरणार्थ हिन्दी) गर्ग भार में स्वागत करने के निमित्त या में आमन छोड़ती हुई नया प्रगाम करने के लिये अलि and- Hari पालानां नागार्मन तिमिनो भाति आए। ग गाना शामिलामा मानिनिर्मिना नमः। ". Agait मायगी न बोपाय । गाgणा गर्ममलिन ....

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- सर्गः] सुबोधिनोटोकोपेतम् । - . (अन्वथः) दिशः प्रलेदुः, सुखाः, मरुतः, वयुः, अग्निः, प्रदक्षि- पार्चिः, (सन् ) हविः, श्रादे, (इस्थम् ) लवं, तत्क्षणं, शुभशंलि बभूव, हि ( यतः) तादृशां, भवः, लोकाभ्युदयाय भवति ॥ १४ ॥ (टीका) दिशः, = माशाः, प्रतेदुः प्रसन्ना यभूवुः, सुखाः= सुखकराः, मरुतः वाताः, ववुः = वान्तिस्म, अनिः= वन्दिः, प्रद- क्षिणचिः प्रदक्षिणवालः, "सन्" हविः = हवनीयम्, शाददे स्वोचकार, इत्थम् = अनेन प्रकारेण, सर्वम्-अखिलं, तत्क्षणं तस्मिन् क्षणे "जन्मसमय इत्यर्थः" शुभशंति = शुभसूचकं, बभूव - अभूत, हि = यस्मात्कारणात, ता = रघुसहशानां, भवः = जन्म, लोका- भ्युदयाय = लोकमलाय भवतीति शेषः ॥१४॥ (समासः) सुखयन्तीति सुखाः। प्रदक्षिणा अर्यिस्य सः । : शुभानि शंसत इति शुभशंसि। लोकानामभ्युदयो लोकाभ्युदय- स्तस्मै ॥१४॥ (वाच्यपरिवर्तनम् ) दिग्भिः प्रसेदे, मरुद्भिः सुखैः ववे, अग्निना प्रदक्षिणार्चिपा (लता) हविः आहे, सर्वेण तत्क्षणं शुभशंतिना बभूवे, हि ताइर्शा भवेन लोकाभ्युदयाय "भूयते" । १४ ॥ (सरतार्थः) तदा सर्वा अपि दिशः प्रसन्नाः सजाताः, नानन्द- जनकाः वायवः वः, हवनान्निः प्रदक्षिणज्वालः सन् घृताहुति स्वोचकार, तस्मिन् काले जगन् मङ्गललक्षणलक्षितं प्रयभूव किमन्यद् एवं विधा महापुरुषा जगदानन्दायैव प्रादुर्भवन्ति ।। १४ ॥ (तरलार्थ हिन्दी ) पुत्र प्रलवके लमय लम्पूर्ण दिशायें निर्मल हुई, मन्द २ पवन चलने लगी, उस समय सभी याते शुभट्चक हुई, क्योंकि ऐसोका जन्म जगत के मङ्गल के लिये ही होता है॥१४॥ अरिष्टशय्यां परितो बिसारिणा मुजन्मनस्तस्य निजेन तेजसा । निशीयदीपाः सहसा इतत्विपो वभूवुरालेख्यसमर्पिता इव ।।१।। (अन्वयः) सुजन्मनः, तत्य, (दालकत्य) अरिष्टशयां, परितः, वितारिणा, निजेन, तेजता, लहसा, निशोथदोपाः, हतविपः, (सन्तः) आलेल्यसमर्पिताः, व, बभूवुः ।। १५ ॥ (टीका) सुजन्मनः= शोभनजन्मनः, तस्य =कुमारस्य रयो, अरिएशच्यां = रतिकागृहतल्पं, “अरिष्टं सूतिकागृहन्' इत्यमरण . ८० रघुवंश-महाकाव्यम् । परितः समन्ततः समन्ततस्तु परितः सर्वतो विश्वगित्यपि इत्यमरः, चिसारिणा प्रसारिणा, "विसृत्वरो विद्यमरः प्रसारी च विसारिणि" इत्यमरः, निजेन - स्वीयेन, तेजसा=दोप्त्या, सहसा झटिति, निशीथदीपाः = अर्द्धरात्रप्रदीपाः, "अर्द्धरात्रनिशीथौ द्वौं इत्यमरः, हतविपः नष्टकान्तयः, “सन्तः" आलेख्यसमर्पिता इव: चित्रलिखिता इव, बभूवुः आसन् ॥ १५ ॥ (समासः ) शोभनं जन्म यस्य सः सुजन्मा तस्य । अरिष्टे २८या अरिएशय्या तां । विशेपेण सरतीति विसारि तेन । निशोथे दोपा इति निशीथदीपाः । हता त्विट् येपां ते । आलेख्ये समर्पिताः ॥ १५ ॥ (वाच्यपरिवर्तनम् ) सुजन्मनः...."निशीथदीपैः हतत्विमि "सद्भिः" शालेख्यसमर्पितैः इव, वभूवे ॥ १५ ॥ (सरलार्थः ) तस्मिन् क्षणे उत्पन्नस्य तस्य वालकस्य दीप्तिमता शरीरकान्तिमण्डलेन सूतिकागृहसंस्थिताः प्रदीपाः, निष्प्रभाः सन्तः चित्रलिखिता इव जाताः ॥ १५ ॥ ( सरलार्थ हिन्दी ) उस समय सुन्दर जन्मवाले उस बालक के तेज से सूतिका गृह के चहुँार रक्खे हुए अर्द्धरात्रि के प्रदीप चित्र में रक्खे हुए की समान मन्द प्रकाश हो गये ॥१५॥ जनाय शुद्धान्तचराय शंसते कुमारजन्मामृतसंमिताक्षरम् । अदेयमासीत्त्रयमेव भूपतेः शशिमभं छत्रमुभे च चामरे ॥ १६ ॥ (अन्वयः ) अमृतसंमिताक्षरं, कुमारजन्म, शंसते, शुद्धान्तच राय, जनाय, भूपतेः, प्रयम् , एव, अदेयम् , आसीत्, शशिप्रभं, छत्रं (अदेयमासीत् ) उभे, चामरे, च ॥ १६ ॥ (टीका ) अमृतसम्मिताक्षरं, सुधासमानाक्षरं, कुमारजन्म- कुमारजननं, “जनुर्जननजन्मानि" इत्यमरः, शंसते = कथयते, शुद्धान्त चराय = अन्तःपुरपरिचारकाय, “स्यगारं भूभुजामन्तःपुरं स्याद चरोधनम् । शुद्धान्तश्चावरोधश्च" इत्यमरः। जनाय= मनुष्याय भूपतेः = राक्षो दिलोपस्य, अयं = विसंख्याकमेव वस्तु, अदेयं = दातु मनहम्, आसीत् = अभूत, शशिप्रभ चन्द्रधवलं, छत्रम् = आतपत्रं. "हम छन्त्वातपत्रम्" इत्यमरः, उभे-द्वे,चामरे बालव्यजने च॥१६॥ (समासः) कुमारस्य जन्म इति कुमारजन्म । अमृतेन सम्मि सर्गः] सुबोधिनोटोकोपेतम् । तान्यक्षराणि, यस्मिस्तत् । शुद्धाः कामोपरता रक्षका अन्ते यस्य त शुद्धान्तः, चरतीति चरः, शुद्धान्ते चरः शुद्धान्तचरस्तस्मै। पातीति पतिः, भुवः पतिरिति भूपतिस्तस्य । दातुं योन्यं देयं, न देयमित्यः देयं । शशिनःप्रमेव प्रमा यस्य तत् । छादयतोति च्छत्रम् ॥ १६ ॥ (वाच्यपरिवर्तनम् । कुमारजन्म 'त्रयेण एव अदेयेन अभूयत, शशिप्रभेण छत्रेण उभाभ्यां चामराभ्याञ्च ॥ १६ ॥ (सरलार्थः) यदा अन्तःपुरचारिणा परिजनेन राज्ञः समी- पमागत्य सुधासमानाक्षरा कुमारजन्मवार्ता श्राविता तदा राजा अमृतरसपूरितमिव तद्वचनमाकये अत्युज्वलं चन्द्रप्रभाभानुरं राजन्नं चामरद्वयञ्च वर्जयित्वा तत्कालोपस्थितं वसनभूपणा- दिकं सर्वमेव तस्मै प्रादात् ॥ १६ ॥ (सरलाई हिन्दी ) जिस समय राजा दिलीप के समीप आकर विश्वासपात्र राजदूत ने “कुमारका जन्म हुआ" ऐसे अमृत के अक्षर नुनाये उस समय राजा तीन वस्तुओं को अर्थात् चन्द्रमा की समान कान्तिवाला छत्र (राजच्छत्र) तथा दोनों चामरों तो होड़कर अपने शरीर पर धारण किये हुए सभी आभूषणों को देता हुआ ॥ १६॥ निवातपस्तिमितन चक्षुपा नृपस्य कान्तं पिवतः सुताननम् । महोदधेः पूर इवेन्दुदर्शनाद्गुरुः महर्पः प्रवभूव नात्मनि ।।१७।। (अन्ययः) निवातपस्तिमितेन, चतुपा, पान्तं, सुनाम, पिवतः, नृपस्य, गुराः, प्रहर्पः, इन्दुदर्शनात्, महोदधेः, पूरा, , मात्मनि, न प्रयभूव ॥ १७ ॥ (टीका) निवातपस्तिमितेन-निर्यातरधागस्थितकमतयनितारन, चापा = नयनेन, दान्तं मनोरम, "पान्तं मनोरम इत्यमरः सुताननं = पुत्रमुतं, पिदतः = अपलोमयतः, नपरम = चो दिलीपस्य, गुमः = महान , प्रदः = मानन्दः, न्टना - चन्द्राबलोकनात्, महोदधेः = महासागरस्य, gr: सपा, १२ = यथा, सामनि देते, न प्रयभूमातिम ! १७ ।' (समासा) निर्गतः पातः परमात् सः निवास, निकाले निवालपा, तहस्तिमितं तेन । सुतस्यानमिति एलान कि-

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सर्गः] सुबोधिनोटोकोपेतम् । ८३ इत्यमरः, मणिः= हीरकादिमणिः, इव = यथा, अधिक-अत्यन्तं, पभो शुशुभे ॥ १८॥ (समासः ) दिलीपस्य सूनुरिति दिलीपसूनुः । तपनं तप्यते वा तपः तदस्यारतीति तपस्वी, तेन। पुरोऽन्ने धीयते पूज्यत्वेनेति पुरोधाः तेन । तपसो वनं तपोवनं तस्मात् । जातस्य कर्म इति जातकर्म तस्मिन् । प्रयुक्तः संस्कारो यस्य सः। आकरादुद्भवो यस्य सः॥१८॥ (वाच्यपरिवर्तनम् ) तेन दिलीपसूनुना" 'पाकरोद्भवेन प्रयुक्तसंस्कारेण मणिना इव, अधिकं बभे ॥ १८ ॥ (सरलार्थः) यथा प्राकरात् निम्फासितो हीरकमणिः शाशो- धितः सन् अतितरा कान्ति लभते तथा स्वभावसुन्दरः स राजपुत्रः पुरोहितेन वतिष्ठेन जातकर्मनामसंस्काराभ्यां संस्कृतः सन् सौन्द- गतिशयम् अलमत् ॥ १% (सरतार्थ हिन्दी) जैसे खान से निकाला हुआ मणि (होरा मादि) लान पर चढ़ाकर साफ करने से अधिक शोभा को प्राप्त होता है उसी प्रकार वह राजकुमार भी तपोवन से आये हुए पुरो. हित वसिष्ठजी से संस्कार किये जाने पर अत्यन्त अधिक शोभा (सौन्दर्य) को प्राप्त हुना ॥ १८ ॥ सुखवा मालपूर्वनिस्वनाः प्रमोदनृत्यैः सह वारयोपिताम् । न केवलंसद्मनि मागधीपतेः पथिव्यजम्भन्त दिवौकसामपि ॥१९॥ (अन्वयः) सुखधवाः, मङ्गलसूर्य निस्वनाः, वारयोपितां, प्रमोद- नृत्यैः, सह, फेवलं, मागधीपतेः, (दिलीपस्य) समनि, न (किन्तु) दिवौकताम् अपि, पथि, व्यजम्मन्त ॥ १६ ॥ (टोका) सुखधवाः = श्रवणसुखकराः, मङ्गलसूर्यनित्वनाः मङ्गलवाद्यवनयः, वारयोपितां = गणिकानां, “वारस्त्री गलिका वेश्या रूपाजीवा" इत्यमरः, प्रमोदनृत्यैः = हर्पनर्तनैः, सह, मागधीपतेः = सुदक्षिणाभर्तुः, (दिलीपस्य ) समनि-गृहे, एव, केवलं, न व्यज- म्भन्त = न विस्तारमलभन्त, किन्तु दिवौकसाम् = देवानां, पथि : आकाशेऽपि, व्यजम्भन्त - व्यललन् ॥ १६ ॥ (समासः) सुखावो येपान्ते तुखधवाः । मझलार्थानि र्याणि मङ्गलालि तेषां निस्वनाः। वारस्य योपितः वारयोपितस्तासां।

पशमहामाया। प प्रमोदल्य नृत्यानि (नुमानारम्य अभिनय रहन तेः। मगधस्य रामोऽत्नी मागची रमापतिता येान्ते दिवौकसः तेषाम् गोदादित्वात्मानः ॥ १६ ॥ (वाच्यपरिवर्तनम् ) सुशायःमजलवनिम्वनैः यजमान १ ( सरलार्थः) तस्य जन्ममहोत्सवलमगे न केवलं ... नृत्यगीतवाद्यानि समभूवन किन्तु साकारोऽपि गन्धर्वा यदि पादयन्तिस्म अप्सरसम्म आनन्दातिशयेन नत्यन्तिस्म ॥ १६ ॥ (सरलार्थ हिन्दी) कुमार के जन्ममहोत्सव में केवल ५. दिलीप के राजभवन में ही नाचना गाना बजाना आदि आनन्द स्रोत नहीं उमड़ा हुआ था किन्तु स्वर्ग में भी अप्सराओं का एक अपूर्व श्रानन्दमें मन्न हुआ था ॥ १६ ॥ 'न संयतस्तस्य बभूव रक्षितुर्विसर्जयेयं सुतजन्महर्पितः । ऋणाभिधानात्स्वयमेव केवलं तदा पितृणां मुमुचे स बन्धनात्॥२६. (अन्वयः) रक्षितुः, तस्य (दिलीपस्य) संयतः, न, यं, सुतजन्महर्षितः ( सन् ) (सः) विसर्जयेत्, केवलं, सः, स्वयः एव, पितृणां, ऋणाभिधानात् , बन्धनात्, तदा, मुमुचे ॥ २० ॥ (टीका ) रक्षितुः = पालकस्य, तस्य = दिलीपस्य, संयतःबर कारागारे निरुद्ध इत्यर्थः "कश्चन" न बभूव = नासीत्, सुतजन हर्पितः = पुत्रोत्पत्तिप्रदृष्टः, 'सन्' (सः) य = बन्दीकृतजनं, विसः येत् = मोचयेत्, “किन्तु" केवलं, सः= राजा दिलीपः, स्वयमे पितॄणां = पूर्वपुरुपाणां, ऋणाभिधानात्, = ऋणनामधेयाद् धन नात्, तदा तस्मिन् काले, मुमुचे = मुक्कोबभूव ॥ २० ॥ (समासः) रक्षतीति रक्षिता, तस्य । सुतस्य जन्म सुतजा अभिनयस्य चतुष्प्रकारकत्वं च "आङ्गिको पाचिकश्चैव आहार्यः सास्ति स्तया" इत्यादिनोतम् । "युवराजाभिषेके च परचक्रावमर्दने । पुत्रजन्मनि वा मोक्षो बद्ध हि विधीयते । + "जाते पुत्रे तु जनकः पितृणां मुच्यते ऋणात्" इस्यागमः "एप अनृणो यः पुत्री" इति श्रुतिः ।

पोधिनीकोपेतम् । तथा, युधि, मानिमिधारने नेम इत्यभिधानमभिधानं यन्यनढ़ प्रमियानं, सम्मान २० ॥ ( बाध्यविनम् ) जिनुः तस्य संयतन न यमये (येन) सुनजन्मा.तिन "सना" बिम्ज्येत, नेन....॥ २० ॥ (मला: तने कोनगारान न कधिदपि कारागारे यस साली यमनी वितीयः पुनजन्मना अनिप्रमशः सन् मोचयेत् परन्तु र सामानमेव पितृणाम् अगलपादन्यनामोचयामास ।। २० ॥ (सन्तार्थ हिन्दी राजा के उत्तम प्रवन्ध से राज्य में चोरों के तथा अन्य कुनों के न रहने के कारण कोई कैदी न था, जिसे पुत्र जन्म . के महोत्सव में छोड़ता ऐसी दशा में राजा दिलोप ही स्वयं अपने पितृऋण यो बन्धन से मुक्त हुआ ॥ २० ॥ श्रुतस्य यायादयमन्तम कस्तथा परेषां युधि चेति पार्थिवः । अवेक्ष्य धातोर्गमनार्थमर्यविचकार नान्ना रघुमात्मसंभवम् ।।२१।। (अन्वयः) अयम्, सर्भक, धतस्य, अन्तं, यायात, परेषां च, (अन्तं यायात् ) इति, अर्थवित्, पार्थिवः, धाताः, गम- नार्थम् , अवेश्य, आत्मसम्भवं, नाना, रघु, चकार ॥ २१ ॥ (टीका ) अयम् एषः, अर्भकः शिशुः, "पोतः पाकोऽर्भको 'डिम्भः पृथुज्ञः शावकः शिवः" इत्यमरः, धुतस्य - शास्त्रस्य, अन्तं = पार, याया - गच्छेत्, तथा, युधि = रणे, परेपां-शभूणां, च, "अन्तं यायात्" इति हेतोः अर्थवित् अर्थशः, पार्थिवः भूमिपः, धातोः लधिधातोः, गमनायं = गमनरूपमर्थम्, अवेक्ष्य = अालोच्य, आत्मसंभवं यात्म सुतं, नाना=अभिधया, रघु, चकार%रघु. रिति नान्नाऽऽख्यातवान् ॥ २९॥ (व्याकरण) ककि चकि"रघि लविगत्यर्धा इति लघि धातोरि- दित्त्वान् नुमि "लंधिवंडोनलोपश्च" इति कुप्रत्ययो नलोपश्च यालमूल- लवलमङ्गुलीनां वा लोरत्वमापद्यते" लस्थाने २० ॥ २२ ॥ (समाला) अर्थ वेत्तीत्यर्थावत् । गमनमेवार्थस्तम् । सम्भवतीति सम्भवः धात्मनः लम्भव यात्मलम्भवस्तम् ॥ २१ ॥ (चाच्यपरिवर्तनम् ) श्रनेन अर्भकेण ध्रुतस्य अन्तः यायेत, तथा युधि परेषां च “अन्तः यायेत" इति अर्थविदा पार्थिवेन श्रात्मसम्भवः नान्ना रघुःबके ।। २१ ॥ .........

. (सरलार्थः ) अयं मे पुनः माशाप्रमागरमा पार प्यति सकलसपनसैन्यसमा न विना निर्गमिष्यति । तस्य गमनशीलत्वं निर्गीय गजा दिलीपः तस्य गिनि धेयञ्चकार |॥ २१ ॥ (सरलार्थ हिन्दी ) या. मेरा पुत्र सम्पूर्ण शास्त्र को पार .. (अशेष शारत्र पड़ेगा) और रण में शनुनी के अन्त को प्राप्त (शत्रुओं का नाश फरेगा) ऐसा समझा कर निधातु को - मना जानकर उसका "रघु" ऐसा नामकरण किया ॥ २१ ॥ पितुः प्रयत्नात्स समग्र सम्पदः शुभैः शरीरावयवैदिने दिने । पुपोप वृद्धि हरिदश्वदीधितेरनुप्रवेशादिव बालचन्द्रमाः ।। २२ ॥ (अन्वयः ) सः, (रघुः) समग्रसम्पदः, पितुः, प्रयखात्, श्वदीधितेः, अनुप्रवेशात्, यालचन्द्रमाः, इव, शुभैः शरीरावयते- दिने, दिने, वृद्धि, पुपोप ॥ २२ ॥ (टोका) सः= रघुः, समयसंपदः = पूर्णलक्ष्मीकस्य, पितुः दिलीपस्य, प्रयतात् = पालनादिनियमात्, हरिदश्चदोधितः- किरणस्य "भास्वद्विवस्वत्सप्ताश्वहरिदश्योप्णरश्मयः” इति तप "किरणोसमयूखांशुगमस्तिघृणिरश्मयः । स्त्रीपुंसयोर्दीधितिः स्त्रियाम्” इत्यमरः, अनुप्रवेशात् = अन्तःप्रवेशान 'वालचन्द्रमा इव = वालेन्दुरिव, शुभैः = मनोहरैः, अङ्गोपाइँ, दिने दिने प्रतिदिनम्, "नित्यवीप्सयोः, इति द्विवचनम् वृद्धिं पुपोप = ववृधे ॥ २२ ॥ (समासः) समग्राः सम्पदो यस्य स तस्य । हरिताः अश्व यस्य सः हरिदश्वः, तस्य दीधितिः तस्या हरिदश्वदोधितेः ॥ २२ ॥ (वाच्यपरिवर्तनम् ) तेन........"यालचन्द्रमसा इव, वृद्धिः पुपुपे ॥ २२॥ (सरलार्थः) यथा प्रतिपञ्चन्द्रः शुक्लपक्षे सूर्यस्य किरणसम्पर्क प्रतिदिनं कलामिः वर्द्धते तथैव सः कुमारोऽपि पितुः प्रयत्नेन मन रमैरङ्गै, प्रतिदिनं ववृधे ॥ २२ ॥ सूर्यस्य सुखनाम्नी अमा नाम कला तस्याः प्रवेशात् । चन्द्रम किल सूर्यरश्मिना रश्मिमान् सन् वईते । भानुः करो मरीज शरीरावयवैः .

'सर्गः] ८७ यथा सुचोधिनीटोकोपेतम्। (सरलार्थ हिन्दी) जैसे वालचन्द्र सूर्य की किरण के प्रवेश करने से शुद्ध पक्ष में प्रति दिवस एक एक कला बढ़ता है उसी किार राजकुमार रघु भी पिता के उचित प्रयतों ले प्रतिदिन वृद्धि को प्राप्त करने लगा ॥ २२ ॥ उमापाङ्कौ शरजन्मना यथा यथा जयन्तेन शचीपुरन्दरौ । तथा नृपःसा च सुतेन मागधी ननन्दतस्तत्सदृशेन तत्समौ ॥२३॥ (अन्वयः) यथा, शरजन्मना, उमावृपाको, " ननन्दतुः जयन्तेन, शचीपुरन्दरौ, "ननन्दतुः" तथा, तत्सहशेन सुतेन, तत्लमो, तृपः, मागधो, च, "एतावुभावपि' ननन्दतुः ॥ २३ ॥ (टोका) यथा- येनप्रकारेण, शरजन्मना = कार्तिकेयेन, “का- तकेयो महालेनः शरजन्मा पडाननः" इत्यमरा, उमावृषाली पार्वतीपरमेश्वरी ननन्दतुः यथा - येन प्रकारण, जयन्तेन जयन्तनामकलुतेन, शचीपुरन्दरौ इन्द्राणीन्द्रौ, मन न्दतुः = प्रानन्दम्मापतुः, तथा = तेन प्रकारेण, तत्सहरोन - कार्तिकेयजयन्ततुल्येन, सुतेन - पुत्रेण रघुणा, तत्समौ उमामहे- श्वरशचीपुरन्दरसमानौ, नृपः = राजा दिलीपः, सा मागधी च, "एतौ ऽभावपि" ननन्दतुः ॥ २३ ॥ (समासः)शरेषु जन्मास्येति शरजन्मा, तेन । शची च पुरन्द- रच शचीपुरन्दौ। तयोः लमानो दृश्यते इति तत्सशस्तेन तत्त. रशेन ।तः समाविति तत्समौ ॥ २३ ॥ ( वाच्यपरिवर्तनम् ) यथा शरजन्मना उमावृपादाभ्यां, यथा " E पुरा पार्वत्या साई फेलिभवनमाधितवति भगवति चन्द्रमौलोचरे, नारा मुरेण वित्यासितो देवगणस्तहिनाशनाय सनोपाजगान । बेलिभवने मोदर पति तस्परल्स्य पालक्षेपमसहमाना देवा अनि करोतर प्रापिदा नार पदामानुः । तं तथाविधमवलोक्य करावं कपटस्पोऽसि, गुना में शुममियुस्था भगवान् सहरस्ता दाई दी। सच कसातरमोनिटे पोमादाय यहि निर्गतः । समयतया नादां निषि सापरि परनामद दो समानुपाना भारत निविक्षेप । तलासन पालो पजायत । इति तयारभरचारजन्य भिधानमितिमनुसन्धवम् ।

८८ मनशगतामा [.. जयन्तेन शनीपुरन्धाभ्यां नमन मुनेत : नृपेण तथा मागच्या च (मास्यां नम ) ॥ २३ ॥ ( सरकाशः ) यया कार्तिकेयरमाच्या मागीपरमेशरी न्दम्मापनुः, जयन्नसुनलाभेन इन्द्रागीन्त्री च परमाननन्दतुः । रघु सुतं लच्या सुदक्षिणादिलीपायपि पर माजग्मतुः ॥ २३ ॥ (सरलार्थ हिन्दी ) जैसे स्वामीकानि के जन्म से महादेव पार्वती तथा जयन्त के जन्म से पुलोमजा और इन्द्र प्रसन्न र उसी प्रकार राजा दिलीप और रानी सुदक्षिणा भी उन दोनों पुणे समान पुत्र (खु) को प्राप्त कर अत्यन्त प्रसन्न दुई ॥२३॥ स्थागनाम्नोरिव भाववन्धनं वभूव यत्प्रेम परस्पराश्रयम् । विभक्तमप्येकमुनेन तत्तयोः परस्परस्योपरि पर्यचीयत ॥ २४ ॥ (अन्वयः) तयोः (सुदक्षिणादिलीपयोः ) रथानाम्तोः, इन भाववन्धनं, परस्पराश्रयं, यत्, प्रेम, बभूव, तत्, तयोः विभक्तमपि, परस्परस्य, उपरि, पर्यचीयत ॥ २४ ॥ (टोका) तयोः= सुदक्षिणादिलीपयोः, रथाननाम्नोरिवः चक्रवाकयोरिव, भावबन्धनं = चेतोचिगुम्फनं, परस्पराश्रयः अन्योन्यविपयकं, यत्प्रेम-स्नेहः, "प्रेमा ना प्रियता हादं प्रेमस्नेहोऽ दोहदम्" इत्यमरः, बभूव = आसीत्, तत् = प्रेम, एकेन = अद्वितीय सुतेन = पुत्रेण, विभक्कमपि = कृतविभागमपि, परस्परस्योपरि अन्योन्यस्योपरि, पर्यचीयत = अवर्धत ॥ २४ ॥ (समासः) रथाङ्गनाम्नी च रथाङ्गनामा च रथलनामानं तयो। भावस्य बन्धनं भाववन्धनं । परस्परः प्राथयो यस्य त परस्पराश्रयम् ॥ २४॥ (वाच्यपरिवर्तनम् )........"भाववन्धनेन परस्पराश्रयेण है प्रेम्णा बभूवे, तेन"....."विभकेन अपि ॥ २४ ॥ (सरलार्थः) चक्रवाकपक्षिणोरिव तयोः सुदक्षिणादिलीपर परस्परमखण्डितं यत्प्रेम श्रासीत् तदेकेन पुत्रेण रघुणा कृतविमा मपि न हीयते स्म प्रत्युत परिवर्द्धतेस्म ॥ २४ ॥ (सरलार्थ हिन्दी)चकवा चकई के समान चित्त के व्याप को वाँधने वाला, रानी सुदक्षिणा और राजा दिलीप का जो परस्प

सर्गः]
सुबोधिनीटोकोपेतम् ।
८६
प्रेम था वह एक पुत्र रघु के बँट जाने पर भी परस्पर एक का दूसरे
के ऊपर बढ़ता ही गया ॥ २४ ॥
उवाच धाच्या प्रथमोदितं वचो ययौ तदीयामवलम्व्य चाङ्गुलिम् ।
अभूच नम्रः प्रणिपातशिक्षया पितुर्मुदं तेन ततान सोऽर्भकः||२५||
(अन्वयः ) लः, अर्भकः, धाच्या, प्रथमोदितं, वचः, उवाच,
तदीयाम् , अङ्गुलिं, च, अवलम्ब्य, ययौ, प्रणिपातशिक्षया, च, नम्रः,
अभूत, तेन, पितुः, मुदं, ततान ॥ २५ ॥
(टोका ) सः पूर्वोक्तः, अर्भकः = शिशुः, धान्या = उपमात्रा,
प्रथमोदित = प्रथमोपदिष्टं, वचः- वचनम्, उवाच =जगाद, "तथा"
तदीयां = धात्रोसम्बन्धिनीम् , अलि - करशाखां, अंगुल्यः करशाखाः
स्युः" इत्यमरः, च, अवलम्व्य-धृत्वा, ययौ जगाम, प्रणिपात-
शिक्षया = नमस्कारशिक्षणेन, नम्रः = नमनशीलः, अभूत् = वभूव, तेन
= पूर्वोक्तप्रकारेण, पितुः = जनकस्य, मुदं = हर्प "मुत्मीतिः प्रमदो
हर्पः" इत्यमरः, ततान = विस्तारयति स्म ॥ २५ ॥
(समासः) प्रथमम् उदितमिति प्रथमोदितं । तस्या इयं तदीया
तां । प्रकरण निपातःप्रणिपातस्तस्य शिक्षा तया ॥ २५ ॥
(सरलार्थः) सः कुमारः उपमात्रा उपदिष्टं "पितः" इति वचनम्
अंचोचत् । तस्याः अङ्गुलिम् अवलम्व्य चलितुं प्रारब्धवान् । प्रणाम-
शिक्षणेन च प्रणाममकरोत् इति तस्य सर्वाणि शैशवचेष्टितानि अव-
लोक्य दिलीपो नितरां सुखं समाससाद ॥ २५ ॥
(सरलार्थ हिन्दी) राजकुमार उपमाता से लिखाया हुश्रा
"पिता" ऐसा वचन बोला और उसकी ( उपमाता को) अङ्गुली
पकड़ कर चलने लगा, बड़ों को देख कर नन्न होना प्रणाम करना
आदि शिक्षा से प्रति विनोत वह राजा दिलीप के आनन्द को
बढ़ाता हुआ ॥ २५ ॥
तमङ्कमारोप्य शरीरयोगः मुखैर्निपिञ्चन्तमिवामृतं त्वचि ।
उपान्तसम्मीलितलोचनो नृपश्चिरात्मुतस्पर्शरसज्ञतां ययौ ॥२६॥
(अन्वयः) शरीरयोगः, सुखैः, त्वचि, अमृतं, निषिञ्चन्तम् ,
इव, तं (सुतम् अहम्, आरोग्य, उपान्तसम्मोलितलोचनः नृपः,
विरा, सुतसर्शरतमतां, ययौ ॥ २६ ॥

- H ६० रांश-गकाम् । (टीका ) शरीरयोगः = मनित, "नीको ऽपधनोऽथ कलेवरम् । गानं या मांगनं शरीर गर्म विमाः" मरः, सुनेर मानन्दः, स्वनि गिन्द्रिये, अमृत - सुधा, ममृतं सुधा" इत्यमरः, निपिनामिन - सिालमिय, "वन्तमित र्थः" तं = रघु, अहम् = उत्सम, जागेग = गाविया, उपान्दम म्मीलितलोचनः = प्रान्तप्रमुदितनगमः, नृपः = दिलीपः, निरालय कालात् परं, सुनस्पर्शरसजतां पुत्रस्पर्शग्साभिजवं, ययो-यापन (समासा) शरीरस्य योगः शरीरयोगः, तस्माजातात. उपान्तयोः सम्मीलिते लोचने यस्य सः। सुतस्य स्पर्शः सुनना तस्य रसातं जानातीति सुतस्पर्शरसनः तम्य मावस्तात्ता ताम् ॥२६॥ (वाच्यपरिवर्तनम् )............."उपान्तसम्मीलितलोचनेन नप "सुतस्पर्शरसाता यये ॥ २६ ॥ सरलार्थः) त्यचि सुधासिञ्चनेन यारश अलौकिक आनन्द तिशयो जायते, कुमारं रघु स्वानिधाय दिलीपोऽपि यहुकालानन्तरं समभिन्नापितं तादृशमेव परम् आनन्दम् अलमत् । (सरलार्थ हिन्दी ) राजकुमार के अंग के संग से उत्पन्न अानन्द के द्वारा मानो त्वचा पर अमृत बरसाते हुए उस पुत्र को गोद वैठा आँख बन्द किये राजा दिलीप श्रमिलपित पुत्र के स्पर्श सुखद श्रानन्द बहुत काल के अनन्तर प्राप्त करता हुश्रा ॥ २६ ॥ अंमंस्त चानेन पराय॑जन्मना स्थितेरभेत्ता स्थिनिमन्तमन्वयम् । स्वमूर्तिभेदेन गुणाग्यवर्तिना पतिः प्रजानामिव सर्गमात्मनः ॥२७॥ (अन्वयः) स्थितेः,अभेत्ता, प्रजानां, पतिः, "सः" पराय॑जन्मना, गुणाग्यवर्तिना, स्वमूर्तिमेदेन, अनेन, आत्मनः, सर्गम्, इव, स्थितिमन्तम्, अमंस्त, च ॥ २७ ॥ (टीका ) स्थितेः = मर्यादायाः, “मर्यादा धारणा स्थितिः" इत्यः मरः, अभेत्ता- अविनाशका, “पालक इत्यर्थः" "एतेन स्त्राचारनि- प्टोक्तिः सूचिता" प्रजानां = जनानां, पतिः = स्वामो दिलीपः, ब्रह्माच, पराय॑जन्मना = शोभनोद्भवेन, गुणाग्यवर्तिना = सत्वगुणमयेन स्वमू तिभेदेन = अवतारभेदेन, विष्णुना, "ब्रह्मत्वं सृजते लोकान् विष्णुत्वे · । रुद्रत्वे संहरत्येप तिस्रोऽवस्थाः स्वयंभुवः" आत्मनः- - अन्वयं, - सर्गः] सुबोधिनीटीकोपेतम् । वस्य, सगे-सृष्टिं, इव, अन्वयं = वंशं, “वंशोऽन्ववायः सन्तानः" इत्यमरः, स्थितिमन्तं प्रतिष्ठावन्तं, अमत्त = मन्यतेस्म ॥ २७ ॥ (समासः) तिष्ठन्त्यति स्थितिस्तस्याः। न भेत्तेत्यभेत्ता। रकण जायन्त इति प्रजास्तासां । पराध्यं जन्म यस्य सः तेन । अने भवमन्यं, गुणेवन्यमिति गुणान्यं तेन वर्तत इति गुणान्यवर्ती, तेन । स्वस्य मूर्तिः, स्वमूर्तिः, तस्या भेदत्तेन । सृज्यत इति सर्गस्तम् ॥२७॥ (सरलार्थः) यथा सृष्टिकर्ता ब्रह्मा सत्वगुणमयेन स्वरूपभेदेन आत्मना सृष्टं ब्रह्माण्डे स्थितिमद् अमन्यत तथैवातावपि दिलोपः आत्मनः पुत्रेण रघुणा निजं वंशं स्थितिशीलं मन्यते स्म ॥ २७ ॥ (सरलार्थ हिन्दी ) जैसे सत्त्वगुणी विष्णु के अवतार ब्रह्मदेव अपनो सृष्टि को स्थिर मानते हुए उसो प्रकार मर्यादापालक दिलीप भी अपने पुत्र रघु से वंश को स्थिति वाला मानता हुआ ॥ २७ ॥ स वृत्तचूलञ्चलकाकपक्षकैरमात्यपुत्रैः सवयोपिरन्वितः । लिपेर्यथावग्रहणेन वाङ्मयं नदीमुखेनेव समुद्रमाविशत् ॥२८॥ (अन्वयः ) वृत्तचूलः, चलकाकपक्षकैः, सवयोभिः, अमात्यपुत्रैः, अन्वितः, सः, (रघुः) लिपेः, यथावत् , ग्रहणेन, नदीमुखेन, समुद्र- मिव, वाङ्यम्, लाविशत् ।। २८ ॥ (टोका ) वृत्तचूलः = जातचूडाकर्मा लन्, चलकाकपक्षी, = चञ्चलशिखण्डकः, "काकपतः शिखण्डकः" इति हलायुधः, सवयो- भिः= समानवयस्कैः, विन्धैरिति या, अमात्यपुनः - मन्त्रिसुतः, अन्वितः= युक्तः, सः = रघः, लिपेः = पञ्चाशद्वात्मिकायाः, यधायद. ग्रहणेन लम्बन्दोधेन, नदीमुखेन = सरिद्वारेण, समुद्रमिव उदधि- मिय, वाङ्मयं शब्दशास्त्रजालम्, माविशत् ॥ २८ ॥ (समासः) चं चूलं चूडाल्य फर्म यस्य सः। पायापक्षा पर पाकपक्षपाः, चलाः कायापकाशा देवां ते बलवामापदायाः नानि पांसि पान्त तः। मायानाम्पुषा धमालपुप्रास्तैमा. त्यपुत्रैः। नया मुखं नदोगुन, नेम ! २८ ।। (वामपरिवर्तनम् ) तलेग मन्दिन तेन........ समुद्रापसायं साविश्यत: । (सरतार्थः) या पोतलिजा नदीधार अनन्तसागरं गच्छन्ति । समा.

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रघुवंश-महाकाव्यम्। ह [. - (अन्वयः ) सः (रधुः ) मेध्यां, रोरवी, त्यचं, परिधाय, एव, मन्त्रयत्, अस्त्रम्, अशिक्षात, तद्गुमः, क्षिती, केवलम्, पार्थिवः, न "अभृत्” (किन्तु ) सः, परधनुर्धरः, अपि, अभूत् । (टीका) सः रघुः, मेध्यां - पवित्रां, गैरवी = १७ग धिनी, "कर्महाकृष्णसारः," इति यादवा, त्वचं - चर्म, परि वसित्त्वा, पितुः एव = पितृसकाशादेव, “ दिलोपादित्यर्थः" = समन्त्रकम् , अस्त्रम् - श्रानेयाद्यख्नम्, अशिक्षत-शिक्षित तद्गुरुः, रघुपिता दिलीपः, क्षिती= धरण्यां, क्षोणी| का क्षितिः" इत्यमरः, केवलम् , एकपार्थिवः = अद्धितीयो राजा ए. अभूत् = नासीत् “किन्तु" सः = दिलीपः, एकधनुर्धरः, अद्वि धानुकः, श्रपि आसीत् ॥ ३१॥ (समासः) रुरोरियं रौरवी तां। तस्य गुरुस्तद्गुरुः । क्षिय क्षितिस्तस्यां । पृथिव्या ईश्वरः पार्थिवः एकचासो पार्थिवश्रे पार्थिवः । एकश्चासौ धनुर्धरश्चेत्येकधनुर्धरः ॥ ३१ ॥ (वाच्यपरिवर्तनम् ) तेन."अशिक्ष्यत, तद्गुरुणा क्षिती लम् एकपार्थिवेन न अभूयत, तेन एकधनुर्धरेण अपि अभूयत। (सरलार्थः) सः दिलीपः पृथिव्यां केवलम् असाधारणनृपति नवभूव किन्तु धनुर्वेदेऽपि अद्वितीयः विद्वान् श्रासीद् अतः स्वय निजं सुतं धनुर्वेदमध्यापयामास । रघुरपि सरहस्यं दिव्यानल यथाशास्त्रं तत एव अधीतवान् ॥ ३१ ॥ (सरलार्थ हिन्दी ) दिलीप केवल चक्रवर्ती राजा ही नं था वि पृथ्वी में अद्वितीय धनुर्धारी भी था इसलिये राजपुत्र रघु मृगछाला श्रोढ़कर अपने पिता से ही सरहस्य अस्त्रविद्या पढ़ी ॥३ महोक्षतां वत्सतरः स्पृशन्निव द्विपेन्द्रभावं कलभः श्रयन्निव । रघुः क्रमाद्यौवनभिन्नशैशवः पुपोप गाम्भीर्यमनोहरं वपुः ॥३२ (अन्वयः) रघुः, क्रमाद, यौवनभिन्नशैशवः, "सन्" महोत स्पृशन् , वत्सतरः, इव, द्विपेन्द्रभावं, श्रयन् , कलमः, इत्र, गाम्भी मनोहर, वपुः, पुपोप ॥ ३२ ॥ . . ने धत्ते त्वचं रोरवीमित्येवं समार्थः श्लोकांशः । रुरुश्विनमृगः।

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निरव ६६ रघुवंश-महाकाव्यम्। = केशान्तान्त्यसंस्कारस्य अनन्तरं = पश्चात्, श्रस्य रघोः । हदीक्षां = पालिपीडनक्रियां, विवाहसंस्कारमिति यावद "विवाहोपयनी समौ । तथा " परिणयोहाहोपयामाः पाणिपीड़न इत्यमरः, निरवर्तयत् = संपादितवान्, दक्षसुताः रोहिण्यादा तमोनुदं = चन्द्रमिय, “चन्द्रान्यकस्तिमोनुदः" इत्यमरः, .. कन्याः = राजेन्द्रसुताः, तं = पूर्वोकं, सत्पति - सत्स्वामिनम् , अवार प्रान्य, प्रायभुः शुशुभिरे ॥३३॥ (समालः) गावः = लोमानि, “केशा इत्यर्थः" दीयन्ते: खण्ड्यन्तेऽस्मिन् कर्मणीति गोदानं, तस्य विधिस्तस्य । विवाद दीक्षेति विवाहदीक्षा, तां । दक्षस्य सुता इति दनमुताः। तमो नुः तीति नमोनुत् तं । नगणामिन्द्रो नरेन्द्रस्तेषां कन्या इति नरेन्द्रका सतां पतिरिति सत्पतिः संश्चासौ पतिरिति वा तम् ।। ३३ ॥ (याच्यपरिवर्तनम् ) अथ गुनणा......विवादीक्षा (सरलार्थः ) दिलीपः प्रथम कुमारस्य रघोः केशान्तसंस विधाय अनन्तरं विवाहसंस्कारं कारितवान् । अश्विन्यादयो दहा न्याश्चन्द्र पनि प्राप्य यथाऽनन्दं लेमिरे तथैव रघुपरिणीतार गजकन्या अपितं सत्पति लम्वा श्रमन्दमानन्दमलमन्त ॥ ३३॥ (मरलार्थ हिन्दी) राजा दिलीप ने गान्न संस्कार करने उपगल उमा विवाह संस्कार किया जिस प्रकार चन्द्रमा मात्र कार, दनाकन्याएँ अत्यन्त शोभित उसी प्रकार राजकन्या मी डग रत्तम पनि को प्राप्तकर अधिक शोमा को प्रान हुई ॥ ३३ ॥ युवा युगव्यायनवादग्सलः कपाटवक्षाः परिणद्धकन्यरः । चप्रकदिनपद ग घुम्नथापि नाविनयाददृश्यन ॥ ३४ ॥ { शान्यपः ) युवा, युगव्यायनवायुः, अंमलः, कपाटयशाः, पदफायरः, रघुः, वपुःप्रकपात, गुम्म्, अजयत, नयापि, विनयात नाद: अवगत ॥३॥ ( टाका । युवा = गमगा, गुगठगायनवादः:यानादाविक नदीना, “यानापy युगः पुंगि गुर्ग युग्मं कृतादि" न मनु ने वर्ष minीर। गजर प , ,

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हास्तेषां रक्षणं तस्मिन् । अपगतो विना यस्मात्तदपविघ्नम् ॥३८ १०० रघुवंश-महाकाव्यम् । [. ( सरलार्थः) पवनसाहाय्येन वहिः यथा दुःसहो जायते, धनस्य शरत्कालस्य साहाय्येन सूर्यो यथा दुःसहो जायते : . गजो यथा दुःसहो जायते, तथैव राजा दिलीपोऽपि रघोः साहाय्येन दुःसहतरो जातः ।। ३७ ।। (सरलार्थ हिन्दी) वायुरूप सारथी से अग्नि जिस . असह्य होता है. मेघों के चले जाने से सूर्य जिस प्रकार होता है, मदोन्मत्त हाथी जैसे असह्य होता है, उसी प्रकार दिलीप भी रघु की सहायता से अत्यन्त असह्य हुश्रा ॥३७॥ नियुज्य तं होमतुरङ्गरक्षणे धनुर्धरं राजसतैरनुतम् । अपूर्णमेकेन शतक्रतूपमः शतं क्रतूनामपविघ्नमाप सः ॥३८|| (अन्वयः) शतक्रतूपमः, सः, ( दिलीपः) राजसुतैः, अनुगु धनुर्धरं, तं, (रघुम् ) होमतुरन्गरक्षणे, नियुज्य, एकेन, ऋतूनां, शतम्, अपविघ्नम्, श्राप ॥३८॥ ( टीका ) शतक्रतूपमः= इन्द्रतुल्यः, सा- दिलीपः, राजसु सामन्तराजपुत्रैः, अनद्वतं = अनुगतं, धनुर्धरं = धानुकं, तं: होमतुरङ्गरक्षणे = श्राश्वमेधिकाश्वरक्षणे, “घोटकेऽपीतितुरगतुर तुरङ्गमाः” इत्यमरः. नियुज्य = व्यापार्य, एकेन = एकसड फेन क्रतुना, अपूर्णम् = एकोनं, क्रतूनाम् = अश्वमेधानां, ५ शतसंख्यापरिमाणम्, अपविघ्नं = विगतविघ्नं, "यथा स्यान आप-प्राप ॥३८॥ (समासः) शतं फतवः यागा अस्य इति शतक्रतुः, सः उपमाया सः शतक्रतूपमः । राश सुताः राजसुतास्तैः । धनुषो धर इति धनु रस्तं । तुरेण (त्वरया) गच्छन्तीति तुरङ्गाः, होमार्थाः तुरङ्गा होमतुर (वाच्यपरिवर्तनम् ) शतक्रतूपमेन तेन........."आपे ॥३॥ (सरलार्थः) इन्द्रतुल्यप्रतापो दिलीपः अनुचरभूतैर्माण्डलिकर जकुमारैग्नुगतं रघु श्राश्वमेधिकाश्वरक्षणे नियुज्य क्रमेण एकोना (नवनवतिसंख्याकम्) "" अश्वमेधान निर्विघ्नं समाप्तिमनयत् ॥३८ ( सरलार्थ हिन्दी) इन्द्र के समान प्रतापी राजा दिलीप रा. कुमारों से युक्त धनुर्धारी रघु को अश्वमेध यज्ञ में छोड़े दुप. भार InHARAN पर्गः] सुबोधिनीटीकोपेतम् । १०१ . को रक्षा के लिये नियुक्त कर क्रम ले निन्यानवे यज्ञ निर्विघ्न समाप्त करता हुआ ॥३८॥ ततः परं तेन मखाय यज्वना तुरङ्गमुत्सृष्टमनर्गलं पुनः । धनु तामग्रत एव रक्षिणां जहार शक्रः किल गृढ़विग्रहः ॥३९॥ (अन्वयः) ततः, परं यज्वना, तेन, (दिलीपेन) पुनः, मखाय, उत्सृष्टम्, अनर्गलं, तुरङ्गं, शक्रः, गूढविग्रहः, “सन्" धनुर्धता, क्षिणाम्, अग्नतः, एव, जहार किल ॥३६॥ (टीका) ततः परं एकोनशतयज्ञावाप्त्यनन्तरं, यज्वना= वधिनेष्टवता, "यज्वा तु विधिनेष्टवान्" इत्यमरः, तेन=दिलीपेन, पुनः% भूयः, मखाय = यज्ञाय, "यागकर्तुमित्यर्थः' "यज्ञः सवोऽ बरो यागः सप्ततन्तुर्मखः क्रतुः" इत्यमरः, उत्कृष्टं = विमुक्त, अननलं - अप्रतियन्धं, स्वैरगतिमित्यर्थः, तुरङ्गम् अश्वं, शक्रः इन्द्रः, गूढविग्रहः = गुप्तकायः, “सन्" "अन्तहितशरीर सन्" अर्थादात्मानं निगुह्य" धनुर्भृतां धनुर्धारिणां, रक्षिणां = रक्षकाणाम्, अग्रतः = पुरस्ताद् एव. जहार-अपहृतवान् ॥३६॥ (समासः) नास्त्यर्गला यस्य स तं अनर्गलं । गूढ़ः विन्नहो यस्य धपि चिन्नतीति तेपां ॥३६॥ (वाच्यपरिवर्तनम् ) ततः"""पुनः मखाय उत्सृष्टः अनर्गलः तुरङ्गः शक्रेन गृढ़विग्रहेन (सता)...."जहे ॥३॥ (सरलार्थः । श्रथ एकोनशतयागसमात्यनन्तरं दिलीपः पुन- राश्वमेधिकम् अश्वं मुमोच, तदा पुरन्दरः प्रच्छन्नरूपः सन् धनुर्धा- रिणां रक्षका पुरत एव तमश्वम् अपजहार ॥३६॥ (सरलार्थ हिन्दी) इसके अनन्तर १०० वाँ यज्ञ करने के तिये राजा दिलीप के छोड़े हुए घोड़े को इन्द्र गुप्त शरोर होकर रक्षयों के सामने से हो हरण करता हुगा ॥२६॥ विपादलुप्तपतिपत्ति विस्मितं कुमारसैन्यं सपदि स्थितं च तत् । वसिष्ठधेनुध यदृच्छयागता श्रुतप्रभावा ददृशेऽध नन्दिनी ॥४०॥ (अन्वयः) ततः, पुमारसैन्यं, सपदि, दिपादलतमतिपत्ति, विस्मितं, स्थितं, च अध,तप्रभावा, परच्या, जागता, पसिष्टधेनुः, नन्दिनी, च दो०॥

[
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१०२
रघुवंश-महाकाव्यम् ।
(टीका) ततः = अश्वहरणानन्तरं "अष्टत्रिंशच्छ्लोकोकम्"
रसैन्यं = रघुसेना, सपदि = सद्यः, "सद्यः सपदि तत्क्षणे"
विपादलुप्तप्रतिपत्ति चेतोभङ्गविनष्टेतिकर्तव्यताकज्ञानम्, "श्रत,
विस्मितं = साश्चय्यं “सत्" "निश्चलं" स्थितं, च, अथ = '
श्रुतप्रभावा = विख्यातरघूत्पत्तिवरप्रदानरूपप्रतापा,
त्म्या" इति वा, यदृच्छ्या-स्वेच्छया, "स्वेच्छा यदृच्छा व
स्वैरता चेति ते समाः” इति केशवः, नन्दिनी = नन्दिनीनान्नी वा.
धेनुः, च, ददृशे = दृष्टा, "द्वौ चकारी तुल्यकालापेक्षां गमयतः॥१
(समासः ) सेना एव सैन्यं, कुमारस्य सैन्यमिति दुः।
विपादेन लुप्ता प्रतिपत्तिर्यस्य तद्विपादलुप्तप्रतिपत्ति । श्रुतः
यस्याः सा । घसिष्ठस्य धेनुरिति वसिष्ठधेनुः ॥ ४० ॥
(वाच्यपरिवर्तनम् ) तेन कुमारसैन्येन ।१५५लु
:
(सता) विस्मितेन स्थितम्.........ागतां श्रुतप्रभावां पास
नन्दिनीं जनाः ददृशुः ॥ ४० ॥
( सरलार्थः ) तस्य श्राश्वमेधिकाश्वस्य झटिति तिरोधानाद्
सैनिकाः यदा हतप्रभा ज्ञानशून्याश्च बभूवुः तदैव ५९५ .
वसिष्ठः होमधेनुः निजेच्छया तत्र समाययौ ॥ ४० ॥
(सरलार्थ हिन्दी) कुमार की सेना, सहसा घोड़े के लुप्त . "
अश्वमेध यज्ञ को पूर्तिरूप मनोरथ के भङ्ग होने के कारण ज्योहो
शुन्य हुई (अर्थात् उस समयके उचित कर्तव्यका निश्चय न कर
त्योंही अपनी इच्छा से श्राई हुई चसिप्टनन्दिनी दृष्टिगोचर हुई ।
तदङ्गनिप्यन्दजलेन लोचने प्रमृज्य पुण्येन पुरस्कृतः सताम् ।
अतीन्द्रियेप्यप्युपपन्नदर्शनो बभूव भावेषु दिलीपनन्दनः ॥४१
(अन्वयः) सतां, पुरस्कृतः, दिलीपनन्दनः, पुण्येन,
प्यन्दजलेन, लोचने, प्रमृज्य, अतीन्द्रियेपु, अपि, भावेषु, ७'
दर्शनः, बभूव ॥४१॥
(टीका ) सतां = सज्जनानां "मध्ये" पुरस्कृतः पूजितः, दि
नन्दनः = रघुः, पुण्येन = पवित्रेण, तदङ्गनिष्यन्दजलेन = नन्दिन्य
लितपयमा, लोचनं - नयनं "लोचनं नयनं नेत्रम्" इत्यमरः,
गोधयित्या, अतीन्द्रियेषु परोक्षेपु, अपि, भावेपु% वस्तुपु,
नदर्शनःप्राप्तसाक्षात्कारशक्तिः, बभूव = अभूत् ॥ १॥

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. - रघुवंश-महाशान्यम् । सरलार्थः) यदि नाम कश्चन खतो यमादिधर्मकार्यस्य वि. करोति तदा किल लोकायगासन त्ययो एव सः दण्डनीया किन्तु यदि स्वयं त्वमेव धर्मरनको मृत्वा धम्मिगां सक्तियाः ।। तदा लोके सत्कर्मकयैव अस्तमियान, रक्षको मनको न :: तात्पर्यायः॥५॥ (लग्लार्थ हिन्दी ) श्राप को यम में विघ्न उत्पन्न करने द्रुष्टों का नाश करना चाहिये और यदि श्राप ऐसा न कर स्वत्रं साधु महात्माया पुण्य कर्म में विन्न करोगे तो यज्ञादि ०५ . ही नष्ट हो जायगा कोई इसका नाम भी न लेगा ॥ ४५ ॥ तदङ्गमयं मघवन्महाक्रनोर नुरहं प्रतिमोक्तुमर्हसि । पथः श्रुतदर्शयितार ईश्वरा मलीमसामाददते न पद्धतिम् ॥ अन्वयः ) है मघवन् ! तन्, (नस्मात्कारणात् ) महान श्रयं, अहं, अमुं, तुरनं, प्रतिमोक्तुं, (त्वं ) अर्हलि, श्रुतेः, ५६ दर्शवितारः, ईश्वराः, मलीमसा, पद्धति, न ाददते ॥ ४६॥ (टीका ) है मघवन् ! हे इन्द्र !, "इन्द्रो मरवान्मया" मरः, तत् तम्मात्कारणात्, महाकतो - अश्वमेघस्य, अनयं, भवमन “प्रधानीमूत" इति त्रा, अमुं-पुरोवर्तिन, दुरसं अश्त्र, प्रतिमा उल्नाटुं, "वं अर्हसियान्यो भवति, वेदस्य, पयः गान्, दर्शयितारः अवलोकारितारः, “सर दशंकाः" इति वा, श्वा निग्रहसमर्याः, मवायाः, "मा इत्यर्थः" मलीमन्नामलाना, “मलिना' “निन्दितामिति । "मलीमसं तु मलिनं कमा बलपितम्' इत्यमरः, पद्धति नाददते = न स्वीकुर्वते ॥ ४६ : (समासः) महांश्चासौ क्रतुरिनि महानुजन्य । श्रूयते धनं नयेति श्रुतिः, तस्याः ॥ ४६॥ (वाच्यपरिवर्तनम् ) तन्...... देमधयन..... ...दर्शयमिः ईश्वरः पलीमसा पद्धति श्रादीयते ॥ ४६॥ (सरलार्थः) अस्मात्कारणान हे इन्द्र ! मम पिनुः अश्वत्र स्य प्रधानामृतमिनमायं देहि, धर्ममार्गप्रवर्तकाः मराशाः महा स्वयमेव धर्मकार्यवियातका मयितुं नाईन्ति ॥ ४६॥ अहति ।..............

सर्गः] सुबोधिनीटीकोपेतम् । - ( सरलार्थ हिन्दी) हे इन्द्र ! मेरे पिता के अश्वमेध यज्ञ के प्रधान अङ्ग इस घोड़े को मुझे दे दीजिये। वेद मार्ग को बताने वाले लत्पुरुप पुरे मार्ग पर नहीं जाते ॥ ४६॥ इति प्रगल्भं रघुणा समीरितं वचो निशम्याधिपतिदिवौकसाम् । निवर्तयामास रथं सविस्मयः प्रचक्रमे च प्रतिवक्तुमुत्तरम् ।।४७॥ (अन्वयः) दिवौकसाम्, अधिपतिः, इति, प्रगल्भं, रघुणा, समीरितं, वचः, निशम्य, सविस्मयः (सन् ), रथं, निवर्तयामास, उत्तरं, च प्रतिवक्तुं, प्रचक्रमे ।। ४७ ॥ (टोका) दिवौकसां देवानाम् , “श्रमरा निर्जरा देवास्त्रिदशा विबुधाः सुराः । सुपर्वाणः सुमनसत्रिदिवेशा दिवौकसः' इत्यमरः, अधिपतिः-इन्द्रः, इति = इत्थं, प्रगल्भं - प्रौद, रघुणा- दिलीप- पुत्रेण, समीरितं = उद्धृष्टं, क्वः = वचनं, निशम्य = आकर्ण्य, सविस्मयः- साधर्म्यः, "सन्" रधं = स्यन्दनं, निवर्तयामास = परावर्तयामाल, उत्तरं - रघुवचनोत्तरं च, प्रतिवक्तुं = कथयितुं, प्रचक्रमे प्रारमे ॥४७॥ (समासः) धौरोको पाते तेषां। विस्मयेन सहितः सवि- स्मयः॥४७॥ (वाच्यपरिवर्तनम् ) दिवौक्लाम् अधिपतिना.........सविस्म- येन "सता" रथः निवर्तयाञ्च ॥४७॥ (सरलार्थः) रघोः इत्थं स्पर्धापूर्ण वचनमाकर्ण्य देवेन्द्रः साधय त्यं निवर्तयन् प्रतिवचनं ( उत्तरं ) वक्तुं प्रारंभे ।। ६७ ॥ (सरलार्य हिन्दी ) रघु का ऐसा अहङ्कार युक्त वचन सुनकर अत्यन्त चकित होते हुए देवेन्द्र ने रथ लौटाया और उसको उत्तर देना प्रारम्भ किया ॥४७॥ यदात्य राजन्यकुमार तत्तथा यशस्तु रक्ष्यं परतो यशोधनः । जगत्यकाशं तदशेपमिज्यया भवद्गुरुर्लयितुं ममोद्यतः ॥४८॥ (अन्यया) हे राजन्यकुमार ! (त्वम् ) यत्, बात्य, तत्, तथा, तु, पशोपन, परतः, यशः, रक्ष्यम्, एव, भवद्गुरु, जगत्प्रकाशम, मशेपं, मन, तत्, (पशः, ज्यया, लंघपितुम्, उद्यतः, (अल्लि) ४८

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4 पुन, पुरन्दरं, वमापे, "हे देवेन्द्र," यदि, ते, एपः, सर्गः, (अस्ति "तहि" शस्त्रं गृहाण, भवान्, रघुम्, अनिजित्य, कृती, न, मविया गुवंश [. लगगगयस्य राक, नन्ततः मन्नानन्य, पदव्यांग मार्गे "अयनं वर्गमार्गाध्यायानः पदवी निः" इत्यमरः, गई. चरणं, मानिधाः- न स्यापय ।। १ || ( लगाष्टः ) फपिलम् अनुकरोतीनि कपिलानुकारी, नेन! . अयन्वदीयस्तस्य ॥ ५० ॥ (वाच्यपरिवर्तनम् ) अनः फपिलानुकारी त्वदीयस्य ।। इमम् अश्वं अपहनवान "त्वया"....."मा नियायि ॥ ( सरलार्थ ) यथा पुरा यशियम अश्वमन्वियन्तः, अश्वार अयं इति वदन्तः सगरमुनाः फपिलमहः गोधाग्निना मन, अभूवन तथैव त्वमपि मदीयकोपानलेन भन्नीभूतो भविष्यसि सगरमुतमार्गानुकारी न भव ॥५०॥ (सरलार्थ हिन्दी) पहले किसी समय सगर राजा की सटर यज्ञ में छोड़े हुए. बोड़े को नोजती नोजती कपिल मुनि के श्रा पर पहुँची वहाँ कपिल मुनि के पीछे घोड़े को बंधा देख कर "यहो घोड़े का चुराने वाला है" इस प्रकार कहने वाले थे, महाराज के क्रोधाग्नि से जैसे भस्म किये गये उसी प्रकार तू 'मेरी क्रोधाग्नि से भस्म होगी इसलिये इस मार्ग को छोड़ कर लोट जा ॥ ५० ॥ ततः प्रहस्यापभयः पुरन्दरं पुनर्बभापे तुरगस्य रक्षिता । गृहाण शस्त्रं यदि सर्ग एप ते न खल्वनिर्जित्य रधु कृती भवान्। (अन्वय) ततः, तुरगस्य, रक्षिता, प्रहस्य, अपमयः, “लद . खलु ।। ५१ ॥ (टीका) ततः = इन्द्रप्रतिवचनश्रवणानन्तरं, तुरगत्य-अश्वस्या मायोजिताः। पथि पुरुहृतस्तदश्चमपहृत्य पाताले योगस्थितस्य कपिलमहक पश्चात्संस्थाप्य अपलायितः । रक्षकाच सकलां महीमन्वियन्तः पातालमुपाजग्मुः तत्र कपिलाश्रममागत्य नुरगं रदिमपु संयतमवलोक्य कपिलमेवावापहारकं मला अदाः सन्तस्तम्प्राकृतवचोमिस्तिरस्कृतवन्तः । ततस्तेषां कलकलेन योगमहादतिक पितेन महर्षिणा सर्वे राजकुमारा भस्मीभूना अभूवनिति पौराणिकी कथाऽनुसन्धया।

जर्गः1 सुबोधिनीटोकोपेतम् । . .. । रक्षिता = रक्षक, "रघः" प्रहस्य हसित्वा, "प्रहासं कृत्वा" इति वा, अपभयः = विगतमयः, "सन्" "निर्भयः" इत्यर्थः, पुनः = भूयः, भाषे = उवाच, हे "देवेन्द्र !" यदि चेत्, ते तव, एपः अश्व- सोचनाभावरूपः, सर्गः निश्चयः, “सर्गः स्वभावनिर्मोक्षनिश्चया- न्यायसृष्टिसु" इत्यमरः, (त्वां लगरनुतपदवीं नेप्यामीत्येवंरूपः सर्गः) 'तदा" शस्त्रं = आयुधं, गृहाण = आदत्स्व, भवान् = त्वं, रघु = मां, अनिर्जित्य = अपराभूय, कृती = कृतकृत्यः, न भविष्यति खलु ।। ५१ ।। । (समासः) अपगतं भयं यस्मात् सः। शस्यतेऽनेनेति शस्त्रम् । कृतमनेनेति कृती ।। ५१ ।। (वाच्यपरिवर्तनम् ) अपभयेन तुरगस्य रक्षिता" 'पुरन्दरः वभापे । यदि ते पतेन सर्गेण "भूयते" तहिं त्वया शस्त्रं गृह्यताम् भवता रघुम् अनिर्जित्य कृतिना न भविष्यते ।। ५१ ॥ ( सरलार्थः) ततः निर्भयः कुमारो रघुः उच्चैः अट्टहासं कृत्वा सगर्वम् इदम् अवोचद् यत् हे पुरन्दर! यहं अश्वमोचने प्रयतो भविष्यामि तदा त्वं मां सगरतपदवीं नेप्यसोत्येवं रूपस्तव निधयः स्यात्तदा युद्धाय सजो भव यावन्मां न जेन्यसि तावातात्यो न भविष्यसि ।। ५१॥ (सरलार्थ हिन्दी ) इसके अनन्तर रघु निर्भय हो धृष्टता के साथ बड़ी जोर से कहकहा मारकर हंसा और इन्द्र से बोला " - इन्द्र : यदि आपका यह निश्चय है कि मैं इस अश्व को छोड़ाने में प्रयल करूँ तो श्राप मुभो सगर राजा के पुत्रों के समान यदि अपनी मोधाग्नि से भस्म करोगे तो ठीक है शाप शरत्र प्रहण कान्येि युद्ध के लिये तयार होरये यह याद रखिये कि रघु पो जोते बिना साप तरत्य नहोंगे ।। ५१ ॥ स एवमुक्त्वा मघवन्तमुन्मुखः कारिप्यमाणः सशरं शरासनम् । घनिष्टदालीदविशेषशोभिना वपुःप्रकर्पण विटम्बितेरवरः ॥५॥ (वयः ) सः, मुराः, "स" मययन्तम्, पपम्, स्था, रामायन, नार, पारिप्यमाणः, सालोषियोपशोभिता पापा दिमियः, (सन् ) अनित् ।। ५२ ॥ (टीदा) सरपः, मुराकानिमः, "स" पE =

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अपि सुयोधिनोटोकोपेतम् । (वाच्यपरिवर्तनम् ) स्योः ..."क्षतेन श्रमर्पणेन गोनभिद 'श्रमोघः सायकः समधीयत ॥५३॥ (समासः)न मर्षितुं शीलं यस्य तः।गां (भूमि ) त्रायन्ते इति त्राः, तान् भिनत्तीति गोत्रमित् । अम्बूनि ददतीत्यम्बुवाः, न. श्व तेऽम्बुदाश्च नवान्दुदात्तेपाम् अनीकं तस्य मुहतं यालाच स्मिन् । न मोघ इत्यमोघत्तम् अमोघम् ॥५२॥ (तरतार्थः) ततः प्रथमं रघुः इन्द्रस्य वक्षस्थतं लक्षीकृत्य एकं र निचिक्षेप । तेनातिकृद्ध इन्द्रोऽपि धनुपि अन्यथं तीक्ष्णं शरं ओजयामाल ॥५३॥ ( सरतार्थ हिन्दी ) मजबूत, बड़े और नोकोले रघु के पास से तो में घाव होने के कारण अत्यन्त क्रुद्ध हो इन्द्र ने भो नूतन घों के समूह को थोड़ी देर शोभा धारण करने वाले अपने तुप (इन्द्रधनु) पर सिद्ध बाण चढ़ाया ॥५३॥ दलीपमूनोः स वृद्भुनान्तरं प्रविश्य भीमामुरशोणितोचितः । पावनात्वादितपूर्वमाशुगः कुन्हलेनेव मनुष्यशोणितम् ।।५४॥ (अन्वयः ) भीमासुरशोषितोचितः, सः, बागुगः, दिलीपस्नोः, इन्, भुजान्तरं, प्रविश्य, अनात्वादितपूर्व, मनुष्यशोणितं, कुल्हन , पपी पिटा (टोका ) भीमालुरशोपितोचितः भयङ्करदैत्यरुधिरपरिचितः, = शक्रामुक्तः, मागः = वाणः, दितीपट्नोः = रयोः, पुत् = 'विशाल, भुजान्तरं = भुजमध्यप्रदेश, “चमात्यलम्" इत्यर्थः, प्रविष्य = अन्तर्गत्य, अनास्वादितपूर्व, अननुभूतपूर्व, मनुपशोपितम् = उनुपरधिर, "रधिरेमोहितावरदक्षतजमोलित" मगर, इनरलेन = कौतुकेन, इव, पपौ = पीतवान् ॥ ५५ ॥ (समासः) भीमाच तेऽसुरा इति भीमामुराः, तेषां हरिते चित इति । मातु - हिमं गस्तीत्यागः । दिलीपस्न स्थरिति तीपट मुन्नस्य । मुजफौरन्तरमिति नजान्तरं । पूर्वमास्वादितम् स्वादितपूर्व सापादितपूर्वम् इति पगारवादितपूर्वन , नर । अप्पासोषित मनुष्यतारित तत् ॥ ५४ ।। ..

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स] लुबोधिनीटीकोपेतम् । ११५ , प्रोत्साहनार्थकताजनेत कठिनाली शकस्य भुजे कार्तिकेयसडशप- राक्रमशाली रघुरपि निजनामाक्षितं वाणं निखातवान् ॥ ५५ ॥ (सरलार्थ हिन्दी ) इन्द्राणो के अति प्रिय इन्द्र की भुजा में रघु ने अपना पाए मारा ॥ ५५ ॥ जहार चान्येन मयूरपत्रिणा शरेण शक्रस्य महाशनिध्वजम् । चुकोप तस्मै स भृशं सुरश्रियः प्रसह्य केशव्यपरोपणादिव ॥५|| (अन्वयः) "रघुः" अन्येन, मयूरपत्रिणा, शरेण, शकस्य महाशनिध्वज, जहार, सः, (इन्द्रः) च, सुरप्रियः, प्रतध, केश- अपरोपणात, इव, तत्मै, भृशं, चुलोप ।। ५६ ॥ (टीका ) "रघुः" अन्येन = इतरेण, मयूरपत्रिणा = मयूरपद्ध- वता, शरण यापेन, शकस्थ%Dपुरन्दस्य, महाशनिब दम्भोलिरूपं फेतुं, “दम्भोतिशनियोः" इत्यमरः, जहार = चिच्छेद, इन्द्रः, च, सुरधियः- देवलदन्याः, प्रसह्य = हात्, "बलात् इति चा, केशव्यपरोपलाद चच्छेदनात्, “कचः केशः शिरोरुहः" त्यमरः, इव, तस्मै = रघवे, भृशम् = अत्यन्तं, चुत्तोप = चुक्रोध॥५६॥ (समासः) मयूरस्य पत्रमस्यास्तीति मयूरपत्री, तेत । महाँचा- लौ भनिरिति महाशनिः, स एव, घजस्तं। तुरा श्रीरिति सुर- प्रोः तस्याः। केशानां परोपणमिति केशव्यपरोपणं, तस्मात् ॥ ५६ ॥ (बाध्यपरिवर्तनम् ) तेन........... ...महाशनिध्वजः स तेन भृशं चुकुपे ॥ ५६॥ (सरलार्थः) ततः रघुः पुनः अन्येन मयूरपहपता पाणेन रथस्य पजाहति वजम् सच्छिनत् । तत् बजकर्तनं लक्ष्म्या मर्तन- निय मत्वा सः रचो उपरि अत्यन्तं चुमोध ॥ ५६ ॥ (सरलार्थ हिन्दी ) उसो घनन्तर रघु ने मोर पंख पाले दुसरे पारसे इन्द्र की बज ला पतामा काटी इससे इन्द्र पए पर अत्यन्त मदइया ।।५६ ॥ तयोरुपान्तस्थितमिनिक गरलदासी विभीमदर्शनः । बभूव एवं हलं. जपैपिणारयोहरध्वन्ध परिभिः ।।७।। (स) अपिलो, लो. (एमो नमः ।

रघुवंशनाशगन्। गोमवर्शनः, अबोनुन्नैः, अनुनैः, उ, पनिमिः, गन्न द्धसैनिक, तुमुलं, युद्ध, यव " ! (टीका) जयैषिः-अन्योन्यं विजयामिनारियो इन्द्रयोः, कमदागीविग्मीमदर्शनःसपासवनयाद "सर्पः पृदाकुर्नुजगो मुजोऽहिर्नुजनमः! सागोविणे चित्र इत्यमरः, अधोमुखः नत्राननैः, ऊर्चमुः कार्यानन, पत्रिम वाशैः, उपान्तत्यितसिद्धसैनिकं = तटस्यदेवसैनिकायुसैनिक, उ = सकुलं, “व्याप्त" इति चा, युद्ध = रलं, बभूव = अभूत् ॥ ५ ॥ (समासः) जयमिच्छत इति जयैषियो, तयोः। आसिनियर विपं येपान्ते श्राशीवियाः, गल्तः सन्ति येते गलमन्तः, ne: ते प्राशीवियाञ्च गरुत्मदाशीविषाः, तेषामिव भीनं दर्शनं ये गान्ट अघो मुखानि येपान्ते तैः। रानि मुन्नानि येषान्ते तैः “वक्त्रास्ते तुण्डमाननं तपनंमुखम्" इत्यमरः, सिद्धाच सैनिकाचतितैनिक, अन्तस्य समीपम् उपान्तम्, उपान्तयोः स्थिता इति उपान्तरिया उपान्तस्थिताः सिद्धसैनिकाः यस्मिन्तत् ।। ५७ ।। (वाच्यपरिवर्तनम् ) उपान्तस्थिततिनिकेन तुनुलेन : वभूवे ।। ५७ ॥ (सरलार्थः) एवं..."विजयममिकाङ्गियो तयोः (युपुरद पक्षवन्तः पन्नगा इव पयुक्तपसाः दाणाः मयं प्रसारयन्तः R. वेगेन इतस्ततः प्रचलन्तिस्म । इत्यनेतयोः परस्परं युद्ध यथा रघुलैनिका इन्द्रतैनिकाच विस्मयेन तटस्था भूत्वा रणम् अवलोकयामासुः॥५७ ।। (लरलार्थ हिन्दी) इस प्रकार विजय को अमितापा र रघु और इन्द्र का युद्ध, पंखवाले सपा की तमान भयङ्कर एक पद से दूसरी पक्ष की ओर जाने वाले वाणों से व्याप्त, देव और रघुते. से घिरा हुआ होता रहा ।। ५७ ॥ अतिप्रवन्धपहितास्त्रदृष्टिभिस्तमाश्रयं दुष्पसहस्य तेजसः । शशाक निर्वापयितुं न वासवःस्वतरच्युतं वन्दिमिवाङ्गिरम्बुदः।।५८ / तालुता दंष्ट्रा दया विटो न जीवति । इति विषविद्या । केवतं.

- न] सुबोधिनोटीकोपेतम्। (अन्वयः) वासवः, अतिप्रबन्धप्रहितास्त्रवृष्टिभिः, दुष्प्रत्तहस्य जितः आश्रयं, स्वतश्च्युतं, तं, रघु.अम्बुदः, अतिः, "स्वतश्युतं" हिम् इव, निर्वापयितुं, न, शशाक ॥५८ ॥ (टीका) वासवः इन्द्रः, अतिप्रवन्धप्रहितात्रवृष्टिभिः - अति- वन्यप्रयुतानवर्पणैः, दुष्प्रलहस्य = दुःखेनापि सोढुमशक्यस्य, जत:=प्रतापत्य, नाश्रयं = आधारं "अत्यन्तदुर्धरप्रतापशालिन त्यर्थः, स्वतश्युतं = स्वतोनिर्गतं, तं, रघु-कुमार, "रघोरपि इन्द्रांशसम्भवत्त्वात्' सम्बुद जलदः, “मेधः" इत्यर्थः, अनिः- जलै, स्वतश्च्युतं = स्वतो निर्गतं, वह्निमिव = वैद्युतान्सिमिव, निर्धापयितुं शमयितुं, न शशाक-शको नाऽभूत् ।। ५८ ॥ (समातः) अन्वूनि ददातीत्यन्बुदः । अत्राणां वृष्टय इति अस्त्र- वृष्टयः, अतिप्रबन्धेन पहिताः अतिप्रवन्धपहिताः, अतिप्रवन्धपहिताः भनवृष्टयः अतिप्रवन्धप्रहिताखवृष्टयः ताभिः। दुःखेन प्रलात इति दुपासहं तस्य ।। ५८॥ (वाच्यपरिवर्तनम् ) सम्बुदेन इव वासवेन ......शेके ॥ ५ ॥ (सरलार्थः) पथा जलदः निरन्तरजलवणेन स्वत एव निर्गत वैद्युताग्नि शमयितुं न शक्नोति तथैव इन्द्रोऽपि प्रात्मनोऽशसम्भवं हुम्तहतेजसः आश्रयभूतं तं रघु निरन्तरशनधारासम्पातैः शमयितुं न समर्थोऽभूत् ।। ५ ॥ (सरतार्थ हिन्दी ) जैसे मेघ अपने से उत्पन्न वन्हि को (वैद्यु- तानि) पृष्टि द्वारा शान्त नहीं कर सकता। इसी प्रकार इन्द्र यरायर अलों को घरता कर अत्यन्त दुःलह तेज के आधार और अपने ही अंश से पैदा हुए उस घुको निवारण करने में समर्थ नहीं हो सकता ।।५८॥ ततः प्रकोष्टे हरिचन्दनाहिन प्रमध्यमानार्णवीरनादिनीम् । रघुः शशाबार्यमुखन पत्रिणा शरासनयामलुनाद्विौजसः ॥५६॥ (अन्ययः) ततः, रघुः, हरिचन्दना प्रमन्यमानावधारनादिनी शरासनल्या 'चलनात् ॥५४॥ जसः, प्रकोप्टे, बेन, पत्रिषा,

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तेजसः, श्राश्रयं, स्वतश्च्युतं, तं, र,अम्बुक्ष,
इत्यर्थः, स्वतन्युतं = स्वतोनिर्गतं, तं, रघु = कुमारं, "रघोरपि
इन्द्रांशसम्भवत्त्वात्' अम्बुद जलदः, "मेघः" इत्यर्थः, सन्द्रिः-
सर्गः]
सुयोधिनीटीकोपेतम्।
(अन्वयः) वासवः, अतिप्रवन्धप्रहितालदृष्टिभिः, दुष्प्रसहस्य
वह्निम् इव, निर्वापयितुं, न, शशाक ।। ५८ ॥
(टीका ) वासवः = इन्द्रः, अतिप्रवन्धपहितालवृष्टिभिः = अति-
निर्वन्धप्रयुक्तास्त्रवर्पणैः,
दुष्प्रलहस्य = दुःखेनापि सोदुमशस्यस्य,
तेजसः प्रतापत्य, लाश्रयं = आधार "त्यन्तदुर्धरप्रतापशालिन"
,
जलैः, स्वतश्च्युतं = स्वतो निर्गतं, वहिमिव = वैद्युतानिमिव,
निर्वापयितुं = शमयितुं, न शशाक - शको नाऽभूत् ।। ५८ ॥
(समासः) अम्यूनि ददातीत्यम्बुदः । प्रस्त्राणां कृष्टय इति अस्त्र-
दृष्टयः, अतिप्रवन्धेन प्रहिताः अतिप्रबन्धप्रहिताः, अतिप्रपन्धपहिताः
अनवृष्टः अतिप्रवन्धप्रहिताखवृष्टयः ताभिः । दुःखेन प्रसवत इति
सहं तस्य ।। ५८॥
(वाच्यपरिवर्तनम् ) अम्बुदेन इव वासदेन......शेके ॥ ५ ॥
(सरलार्थः) यथा जलदः निरन्तरजलवणेन स्वत एव निर्गत
घुताग्निं शमयितुं न शक्नोति तथैव इन्द्रोऽपि चात्मनोऽशलन्भ
सहतेजलः आश्रयभूतं तं रघु निरन्तरशस्त्रधारासम्पातैः शमयितुं
समर्थोऽभूत् ॥ ५ ॥
(सरलार्थ हिन्दी ) जैसे मेघ अपने से उत्पन्न वन्दि को (वे-
से) वृष्टि द्वारा शान्त नहीं कर सकता। इली प्रकार न्द्र दरावर
बों को यरसा कर अत्यन्त दुःसह तेज के आधार चौर सपने
अंश से पैदा हुए उल रघुको निवारण करने में समर्थ नहीं
सका।। ५८॥
प्रकोष्ठे हरिचन्दनाहिने ममध्यमानार्णधीरनादिनीम् ।
शशाङ्कार्धमुखेन पत्रिणा शरासनज्यामलुनाटिौजसः ॥५६॥
अन्वयः ) ततः, रघः, हरिचन्दनाहिते, दिौरतः, प्रोटे,
समानार्णवधीरनादिनी शरासनयां, शादान, पबित
वि॥५६॥

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वति ।। ६५॥
सफल पावै ।। ६५॥
देतोश! (त्वया) तथा, विधीयताम् ॥ ६॥
मुबोधिनोमोसोपेतम् ।
सरतार्थः) देवेन्द्र ! यदि त्वम् अश्वस्य मोचनं न मिल-
कि तहि मे पिता यथा मजयन् विना सपि शताश्वमेधयागान
र फलं लभेत तथा भियतन एवं ने तब व मम च कालिद्धि-
(सरतार्थ हिन्दी ) हे स्वामिन् ! यदि आप घोड़ा छोड़ना उचित
समझते हैं तो यहा-दीक्षा में तत्पर मेरे पिता आपके घोड़ा
होड़ने पर भी विधि पूर्वक ही समाप्त किए हुए अश्वमेध का
सच हत्तान्तमिमं सदोगतत्रिलोचनैकांशतया दुरासदः ।
व सन्देशहरादिशांपतिः शृणोति लोकेशी तथा विधीयताम् ॥३६॥
(जन्वयः ) सदोगतः, त्रिलोचनैकांशतया, दुरासदः, विशांपतिः,
देतोपः ) यथा, तव, सन्देशहरात्, एक. इमं वृत्तान्त, ऋणोति,
(डोका ) सदोगतः = यशसभागतः, रितोवनैकांशतया = शिवार-
वर्तितया, दुरासदा-दुरधिगम,
विपतिः = नरपतिः, "दितीपः
या-येन प्रकारेण, तव = भवतः, सन्देशहरात् = वाचिकहरात
एव "सन्देशबाग्वाधिकं स्यात्" इत्यमरः, इन
वाता, "वार्ता प्रवृत्तिवृत्तान्तः इत्यमरः,
मोति = साकयति, हे लोकेश != हे लोकपात ! त्वया = भवता,
या-तेन प्रकारेण, "येन प्रकारेल, भवतु, तथेत्यर्थः विधीयताम् =
नादित्यः"
वा, वृत्तान्तं
पताम् ।। ६६॥
वि
तमास)बीजि लोचनानि यस्य सः विलोचनः, एकः अंश,
-संशः, त्रिलोचनस्यकांश इति हितोचनेकांशः, तस्य भावः तत्ता
। इखेन मासादयितुं योग्य इति दुरासदः। सन्दिश्यत
सन्देशस्तस्य हरललात्। लोकानामोश इति तोशिस्त-
(वाच्यपरिवर्तनम् ) सदोगतेन..."दुरातदेन पत्या."
-जान्तः श्रूयते हे लोकेश तथा विधेहि ॥ ६६ ॥
(तरलार्थः ) मम पिता दिलीपः त्रितोवनत्य शहरस्य अंगभूतः
उस्तस्य तेजस अतिप्रदीप्तत्वात् साधारण जनतस्य समीपे गर्नु
उन्बुद्धौ ॥६६॥

१२२ रघुवंश महाकाव्यम्। [तृतीयः काञ्चनमृलदीप्त्यनुरक्षितरयुकरशा, इ = बार्ग, प्रनिसंहग्न - प्रतिनिवर्तयन, नरेन्द्रमनुः - दिलीपपुत्रः, "ग्युः" प्रियंवदं = मधुरः मापिणं, सुरेश्वर = पुरन्दन, प्रत्ययोचत ।। ६ ।। ( समासः) सुवर्णस्य पुतः सुवर्णपुतः तस्य श्रुतिमिः जिता श्रद्लयो यस्य सः तं । प्रतिसंहरतीति प्रतिसंहरन । नराणामिन्द्रो नरेन्द्रस्तस्य सुनुरिति नरेन्द्रसूनुः। प्रियं बदनीति प्रियंवदः । ईशितुं शीलमस्येतीश्वरः सुराणामीश्वर इति नरेश्वरस्तम् ॥ ६ ॥ (सरलार्थः ) ततः स्युः इन्द्रस्य पवं सांत्ववचनमाकर्ण्य तुगी. रात् अर्द्धनिष्कासितं शरं पुनः वणारे पत्र संस्थापयन् प्रियमापिर देवेन्द्रं मधुरया गिरा प्रत्युवाच ।। ६ ॥ (सरलार्थ हिन्दी ) गजकुमार रघु इन्द्रका ऐसा वचन सुनकर तरकस से श्रार्थ निकाले हुए याण को फिर तरकस में ही रखकर मधुर वाणी से देवेन्द्र के प्रति बोला ॥ ४॥ अमोच्यमश्वं यदि मन्यसे प्रभो ततः समाप्ते विधिनैव कर्मणि । अजसदीक्षामयतः समद्गुरुः क्रतोरशेपेण फलेन युज्यताम् ॥१५॥ (अन्वयः) हे, प्रमो, यदि, (त्वम् ) अश्वं, अमोच्यं, मन्यते, अजन्नदीक्षाप्रयतः, सः, मद्गुरुः, विविना, एवं कर्मणि, समाते. (लति ) कतो, अशेपेण, फलेन युज्यताम् ।। ६५ ।। (टीका ) हे प्रमो! हे इन्द्र!, यदि चेत्, "त्वं' अश्वं घोटकं, श्रमोच्यं = अत्याज्यं, मन्यसे = विचारयसि, "तर्हि" अज- नदीक्षाप्रयतः अनवरतयदीक्षानिरतः, सः, मद्गुरुः = मे पिता, "दिलीपः" विधिना एव-वेदोकप्रकारेणेव, श्रुत्युतकर्मानुष्ठानानुरूप- रणेत्यर्थः, कर्मणि अवरे, समाते - पूर्णे, "सति" क्रतोः- यशस्य, "यज्ञः सवोऽध्वरो यागः सप्ततन्तुमखः क्रतुः" इत्यमरः, अशेषेण सम्पूर्णेन, फलेन, युज्यताम् = युक्तो मवतु ॥ ६५ ।। (समासः) मोचयितुं योन्यः मोच्यः न मोच्य इत्यमोच्यस्तम् । न शेपो यस्य तदशेपन्तन । अजनं दीक्षा अजन्नदीना, तस्यां प्रयतः इति अजन्नदीक्षाप्रयतः । मम गुरुरिति मद्गुरुः॥ ६५ ॥ (वाच्यपरिवर्तनम् ) हे प्रभो ! त्वया अश्वः श्रमोच्यः मन्यते; अजन्नदीक्षाप्रयतेन मद्गुरुणा ततः, युज्यताम् ।। ६५॥

-भग] भविष्यति ।। ६५ ।। तस्तस्य तेजस अतिप्रदीप्तत्वात् साधारजनस्तस्य समीप गन्तुं सुबोधिनोटोकोपेतम् । १२३ - (सरलार्थः ) हे देवेन्द्र! यदि त्वम् अश्वस्य मोचनं न अभिल- मसि तर्हि मे पिता यथा इमम् अश्वम् विना अपि शताश्वमेधयागानां सकतं फलं लभेत तथा झियताम् एवं कृते तव च मम च कार्यसिद्धि- (सरलार्थ हिन्दी ) हे स्वामिन् ! यदि आप घोड़ा छोड़ना उचित नहीं समझते हैं तो यश-दीक्षा में तत्पर मेरे पिता आपके घोड़ा न होड़ने पर भी विधि पूर्वक ही समाप्त किए हुए अश्वमेध का पूरा फल पावै॥६५॥ यया च वृत्तान्तमिमं सदोगतत्रिलोचनैकांशतया दुरासदः । नवैव सन्देशहराद्विशांपतिः शृणोति लोकेशी तथा विधीयताम् ॥६६॥ (अन्वयः) सदोगतः, त्रिलोचनैकांशतया, दुरासदः, विशांपतिः, (दिलीपः ) यथा, तव, सन्देशहरात, एक, इमं वृत्तान्तं, शृणोति, लोकेश ! (त्वया ) तथा, विधीयताम् ॥ ६६ ।। (टीका ) सदोगतः = यशसभागतः, त्रिलोचनैकांशतया = शिवा. वर्तितया, दुरासदः = दुरधिगमः, विशांपतिः = नरपतिः, "दितीपः" या-येन प्रकारेण, तव = भवतः, सन्देशहरात् = वाचिकहरात् दूतादित्यर्थः" एव "सन्देशवाग्वाचिकं स्यात्' इत्यमरः, इमं 3 वोतं, वृत्तान्तं वाता, "वार्ता प्रवृत्तिवृत्तान्तः" इत्यमरः, योति = साकर्णयति, हे लोकेश ! = हे लोकपाल !, त्वया = भवता, या-तेन प्रकारेण, "येन प्रकारेण, भवतु, तथेत्यर्थः" विधीयताम् = यताम् ॥६६॥ (समास ) त्रीणि लोचनानि यस्य सः त्रिलोचनः, एकः अंश, वंशः, त्रिलोचनस्यैकांश इति त्रिलोचनैकांशः, तस्य भावः तत्ता ग। दुःखेन आसादयितुं योन्य इति दुरासदः। सन्दिश्यत ते सन्देशस्तस्य हरत्तत्मात् । लोकानामोश इति लोशस्त- न्वुद्धौ।। ६६॥ (वाव्यपरिवर्तनम् ) सदोगतेन' 'दुरासदेन पत्या "अयं तान्ता भूयते हे लोकेश तथा विधेहि ।। ६६ ।। (सरलार्थः ) मम पिता दिलीपः त्रिलोचनत्य शङ्करस्य समृतः ......

रघुवंश-महाकाव्यम्। [तृती न समर्थः, अतः हे इन्द्र! तवैव दूतः सफल वृत्तान्तं गत्वा निवेदयतु ॥६६॥ (सरलार्थ हिन्दी ) हे लोकेश! समा में बैठा हुआ राजा वृत्तान्त को जैसे सुने वैसा उपाय भी श्राप ही करें ।। ६६ ।। तथेति कामं प्रतिशुश्रवान् रघोर्यथागतं पातलिसारथियो । नृपस्य नातिप्र मनाः सदोगृहं मुदक्षिणामू नुरपि न्यवर्तत ॥६७ (अन्ययः) मातलिसारथिः, (इन्द्रः) रघोः, काम, तथा, प्रतिशुश्रवान्, यथागतं, ययौ सुदक्षिणासूनुः, अपि, नृपस्य, सदोगृहं, न्यवर्तत ॥ ६७ ॥ (टीफा) मातलिसारथिः = इन्द्रः, रघोः% 0 = मनोरथं, तथा इति = तथास्त्विति. प्रतिशुश्रुवान् : "सन्" यथागतं, ययो - जगाम, "येन मार्गरण मार्गेण गत इत्यर्थः" सुदक्षिणासूनुः = रघुः, अपि नातिप्रसन्नः सन् , नृपस्य = राशो दिलीपस्य, सदोगृह, न्यवर्तत परावर्तत ॥ ६७ ।। ( समासः ) मातलिः सारथिर्यस्य सः। सुदा सुदक्षिणासूनुः । प्रहृष्टं मनः अस्य इति प्रमना, अतिप्रमनाः, न श्रति प्रमनाः नातिप्रमनाः ।। ६७ ॥ (वाच्यपरिवर्तनम् ) मातलिसारथिना सूनुना नातिप्रमनसा सता .....न्यवर्तत ।। (सरलार्थः) " एवमस्तु " इति रघोर येन मार्गेण पायातस्तेनैव पथा इन्द्र गते सन् राशो दिलीपस्य दीक्षामण्डपम् अगच्छत् ।। (सरलार्थ हिन्दी ) इन्द्र रघु की बात को मार्ग से आया था उसी मार्ग से गया। .. घोड़े के न मिलने से विशेष प्रसन्न न होकर राजा ओर लौटा ॥ ६७॥ तमभ्यनन्दत्पथमं प्रबोधितः प्रजेश्वरः : पाणिना तदीयमङ्गं फु। ..... .

L रघुवंश महाकाव्यम् । [तृत न समर्थः, अतः हे इन्द्र! तवैव दूतः सकलं वृत्तान्तं गत्व निवेदयतु ।। ६६॥ (सरलार्थ हिन्दी ) हे लोकेश! समा में बैठा हुआ राजा वृत्तान्त को जैसे सुने वैसा उपाय भी श्राप ही करें ।। ६६ ।। नयति कामं प्रतिशुश्रवान् ग्योर्यथागतं मातलिसारयिर्यया । कृपस्य नानिष मनाः सदोगृह मुदक्षिणामू नुरपि न्यवर्तत ॥६ (अन्वयः) मातलिसारथिः, (इन्द्रः) रघोः, कामं, तथा, प्रतिगुभवान्, यथागतं, ययौ मुदक्षिणासूनुः, अपि, नातिमम नृपस्य, सदोगृहं, न्यवर्तत ॥ १७॥ (टीका) मातलिसारथिः = इन्द्रः, रयोः = दिलीपपुत्रस्य, = मनोरथं, नया इति = नास्त्विति, प्रनिशुश्रुवान = प्रतिवात "मन" यथागनं, ययी - जगाम, "येन मार्गर अायात मार्गग गत इत्यर्थः” सुदक्षिणामृनुः = रघुः, अपि नातिप्रमना नानिसानः सन् , नृपस्य = राही दिलीपस्य, सदोगृह, दीक्षान न्ययर्तन - पगवर्नन ॥६७।। ( समापः ) मानलिः माथिर्यस्य सः। मुदक्षिणाया म मुदक्षिणामू नुः । प्रहष्टं मनः श्रम्य इति प्रमनाः, अत्यन्तं प्रन अनिममनाः, न अति प्रमनाः नातिनमनाः ॥६॥ । वात्र्यपरिवर्तनम ) मातलिसारधिना प्रतिशुश्रुये, मनुना नानिमनमा मना ...........न्यवर्तत ॥६॥ ( मरलायः) परमग्न " इति ग्घीः विज्ञापनाम् अशी येन मागंण पायानम्नेनैव पथा इन्द्रे गर्ने ग्युरपि नातिप्रसन्न चन गती दिलीरम्य दानामण्डपम अगच्छन् ॥ १३॥ (मरलार्थ दिन्दी) इन्द्र रघु की बात को मानता या मार्ग में पाया था उनी माग में गया । मुदशिया का पुत्र ग्यु मोदक. न मिलने से विरप्रसन्न न होकर राजा को ममा स्थान टा दवन्यजन्दमयन प्रबोधित प्रश्वरः सामनहारिणा हो। गन्दन पाणिना नदीयप ऋद्धिमत्राणादिनम् ॥ ६८ मुनि नाः] सुबोधिनोटोकोपेतम् । १२५ (अन्ययः) एने, शासनहारिया, प्रथम, प्रयोधितः, प्रजेश्वरः, पंजतेन, पारिना, पुलिसवणाहितम् , तदीयम् अङ्गम् , पराशन , (रघु) अभ्यनन्दन ॥८॥ (टीका ) हरे इन्द्रस्य, शासनहारिणा-भानापालकेन, प्रथम = पर्व, प्रयोधितः = विशापितः, प्रजेश्वरः = राजा दिलीपः, हर्ष- बड़ेन आनन्दशिशिरेण, "शिशिरो जड़ः" इत्यमरः, पाणिना = स्तन, कुलिशमणाहितं - पञप्रहारचिलितं, तदीयं-रघुस- चन्धि, सङ्गम् शरीरं, पराशन - संस्पृशन् , तं = रघु, अभ्यनन्दत् प्रशशंस ।। ६८॥ (समासः) शासन हरतीति शालनहारी, तेन । प्रकर्षण जायन्त इति प्रजाः तासां ईश्वर इति । जलति घनीभवतीति, जड़: "डलयोरे. कत्वस्मरणानः" हण जड़ इति हर्पजड़ः तेन । कुलिशस्य बणैः अद्धितमिति कुलिशवणादितम् , तत् । तस्य इदं तदीयं, तत् । परामशतीति परामृशन् ॥ ६॥ (सरलार्थः ) कुमारस्य रघोः आगमनात् प्रागेव इन्द्रदूतमुखात् सकलं वृत्तान्तं विदित्वा दिलीपः अधुना निकटमायातं प्रियं पुत्रं रघु आलिङ्गनादिभिरमिनन्ध अशनिक्षतचिहितं पुत्रस्य देहं हस्तेन परा- दृशन्धानन्दनिमन्नो बभूव ।। ६८ ।। (लरलार्थ हिन्दी) रघुके भाने के पूर्व हो इन्द्र के दूत द्वारालम्पर्ण वृतान्त जाने हुए राजा दिलीप ने वन के घावो ले चिन्हित प्रिंय पुत्रके शरीर को हर्ष ले कांपते हुए हाथ से स्पर्श कर उसकी अत्यन्त प्रशंसा की।। ६८॥ इति क्षितीशो नवतिं नवाधिकां महाक्रतूनां महनीयशासनः । सपारुरक्षुदिवमायुपः क्षये ततान सोपानपरम्परामिव ।। ६९ ॥ (अन्वयः) महनीयशालना, क्षितीशः, इति महाक्तूनां, नवा- धिकां, नवतिम्, आयुपः, क्षये, “सति" दिवं, समारुतुः, लोपान- परम्पराम्, इव, ततान॥६६।। (टीका) महनीयशासनः = = पूजनीयाः, क्षितीशः= भूपतिः, इति = इत्यम् , “ अनेन प्रकारेण" महाकतनाम् अश्वमेधानां, नवा- धिकां = नवोच, नवविम् = एकोनशतम्, आयुपः = जीवितकालस्य - M संशय जाये = नारो, “मति" समानता दुगिन्छुः, नोपानपरगम - भागनिन , य, नमान विस्तारयति कम ॥ ६ ॥ (समासः) मनोयं वासनं यासः। विनेगरीश इति निनीय महान्ता ते फतवति महामतगतगी नामिभिगि नयाधि तां। सोपानानां परम्परेति सोगनपरगनाम् ॥६॥ (सरलायः ) माननीयाः दिलीपः शरीगने स्वर्गारोह सोपानपङ्क्तिमित्र एकोनशतसंगयातान, अश्वमेधयागान रोत्या समातिमनयत् ।। ६६ ।। (सरलार्य हिन्दी ) इस प्रकार जीवन के अन्त में स्वर्ग व की एच्छा करनेवाले गजा दिलीप ने सीढ़ियों की पंनि को सन निन्यानवे अश्वमेध या की पंक्ति परी को ।।। श्रय सविपयन्यारत्तात्मा यथाविधि नृनये नृपतिककुदं दत्वा यूने मिनातपवारणम् । मुनिवनतरुच्चायां देव्या तया सह शिश्रिये गलितवयसामिक्ष्वाणामिदं हि कुलवतम् ।। ७० (अन्वयः) अथ, विषयन्यावृत्तात्मा, सः, (दितोपः) यू सूनवे, यथाविधि, नृपतिककुदं, सितातपवारणं, दत्त्या, तया, सह, मुनिवनतरच्छायां, शिश्रिये, हि, (यतः) गलितवयसा इक्ष्वाणाम् , इदं, कुलव्रतम्, "अस्ति" ॥ ७० ॥ (टीका) अथ- अनन्तरं, विपयव्यावृत्तात्मा - परसगन्ध दिविपयनिवृत्तचित्तः, सः दिलीपः, यूने-तरुणाय, स्तरुणो युवा” इत्यमरः, सृनवे = मुताय, यथाविधि - ययाशार नृपतिककुद राजलदम, "चिन्ह मिति यावत्" थेप्टे वृपाले राजलक्ष्मणि" इति विश्वः, सितातपवार-शुद्रच्छ दत्त्वा = अर्पयित्वा, तया देव्या = सुदक्षिणया, मुनिवनतरच्छायां - तपोवनवृक्षच्छायां, “यत्र वने मुनयः निवा तन्मुनिवनं" शिश्रिये - आश्रितवान्, हि = यस्मात्कारणाद, -चयसां = क्षीणावस्थानां, "वृद्धानाम्" इत्यर्थः, इक्ष्वाकूणाम् - . "चयस "ककुद्धत् का %3D गति सर्गः] सुबोधिनोटीकोपेतम् । श्वाकुवंशसमुन्दधानां रामाम्, इदं वनगमनं, कुलबतं-कुलाचार, प्रस्तीति शेपः ॥७॥ (समासः ) विषयेभ्यः व्यावृत्तः आत्मा यस्य सः । नून् पातोनि नृपतिः तस्य फकुदं नृपतिककुदं, तत् । आतपस्य वारणमिति सात- पवारणं, सितञ्च तदातपवारणमिति सितातपवारणं, तत् । मुनीनां बन मुनिवनं तस्य तरब इति मुनिवनतरवः, तेषां छाया तां । गलितानि वयांति येषां तेषां । कुलस्य व्रतम् इति कुलनतम् ॥ ७० ॥ (वाच्यपरिवर्तनम् ) अथ विपयव्यावृत्तात्मना तेन' "अनन कुतव्रतेन भूयते ॥ ७० ॥ (सरतार्थः) अथ वृद्धालः दिलीपः सुयोग्यं तं रघु साना अमिपिच्य स्वयज्ञ सर्वान् सांसारिकविपयान परित्यज्य वानप्रस्थान स्वीकृत्य पारमार्थिकश्रेयोलाभाय सुदक्षिणया सह तपोवनगमनन- करोत् । वृद्धावस्थायाम् इक्ष्वाकुवंशीयानाम् अयमेव कुलाचार (सरलार्थ हिन्दी) अन्त में संसार से विरक्त होकर दिलीप ने प्रिय पुत्र रघु को विधि पूर्वक राजचिह्न, श्वेतत्र, मुकुट आदि देकर इक्ष्वाकुवंशियों को कुलप्रथा के मा अपनी धर्मपत्नी रानी सुदक्षिणा के सहित मुनिवन में ढाया का प्राध्य लिया ।। ७० ।। श्रीकालिदासकविवर्यविनिर्मितेऽस्मिन् कान्ये वर हि रघुवंशमितिम राज्याभिषेकमभिजन्म घोरुदीर्य सर्गः समाप्तिमगमचिन्न :

चतुर्थः सर्गः। स राज्यं गनणा दनं प्रनिमानिक भी । दिनानं निहिनं तेजः मविवेव हुनागनः ।। १ ।। (अन्धयः ) लः, (गः) गुरुना, दनं, गाय, प्रतिपय दिलान्टे. सवित्रा, निहितं, तेजः (प्रनिपत्र) हुनाशनः, न, अधिक यमी ॥ (टीका ) सः ( ग्युः ) गुरुगा (पल्येन पित्रा) दनं (अपित. "वितीर्ण" इति या ) राज्य (मजालनालक गजकर्म, साधिरल्यन इति या ) प्रतिपद्य (प्राय) दिनान्ने (मायाले) सचित्रा (मृय निहितं (निनि) "स्थापितं" या, तेजः (कान्नि) प्रान्य, दुना शनः (सनिः) इव (यथा ) अधिक ( अत्यन्नं ) यमी (ज)? (समाला) दिनस्य अन्त इति दिनान्तन्वनिमन । हुतम् सभा तीति हुताशनः । राम्रो मायः कर्म या गम्यम् ॥ १ ॥ (याच्यपरिवर्तनम् ) नेन""""टुनागनन व अधिक परे ! (सरलार्थः) यथा वहिः सायं सूर्यजः समधिगन्य अविरं प्रदीतो मवति तथैव रघुरपि पितुः सकागाद राज्यं लब्ध्वा परनं तेजोऽलमत॥१॥ (सरलार्थ हिन्दी ) दिन के अन्त में सूर्य से तेज पाकर प्रकार अनि शोमा ग्रास करता है उसी प्रकार पिता का दिया था राज पाकर बद्द रघु अधिक शोभायमान हुआ !? दिलीपानन्तरं राज्ये तं निशम्य प्रतिष्टितम् । पूर्व प्रधृपितो गज्ञां हृदयेऽग्निरिवोत्थितः ॥ २ ॥ (अन्वयः) दिलीपानन्तरं, राज्ये, तं, (रघु) प्रतिष्टितं, निशम्य, पूर्व, रामां, हृदय, मधुमिता, (अग्निः ) "लान्प्रतं" उत्यिता, इव, (अमृत्) ॥२॥ जिस सर्गः] होधिनोटोशेपेतम्। १२६ (टीका ) दिलीपानन्तरं (दिलीपत्य पञ्चात् ) राज्ये (राजकमणि) (यं । प्रतिष्ठित (छतालाई ) "अवस्थित" इति था, निशम्य (अन्या) पूर्व (दितीपसमये) रा ( नृपाणां ) हदये (हदि ) प्रधुमितः (सज्ञानधूमः ) अशिः ( सन्तामतिः) "शिव- स्वानरा बहिः" इत्यमरः. "वानीम्" उत्थितः (प्रज्वतितः) इव, समूत् (यमूब) ॥२॥ (समासः) दिलीपस्य अनन्तरनिति दितीपानन्तरम् । प्रकरण धूमोऽस्य सखात इति प्रमितः ॥ २ ॥ ( सरलार्थः) दिलीपानन्तरं रघु राज्याधिस्तमुपश्रुत्य प्रतिस्प- दिनां राज्ञां हरये पूर्वतोऽप्यधिकसन्ताशेऽभवत् ।। २ ।। (सरलार्थ हिन्दी ) राजासाने हदय में मानों पहलेको धधकती हुई पाग रघुको राज्यपरा सुनकर प्रज्वलित तो हुई ॥२॥ पुस्मृतध्वजस्येव तस्योन्नयनपतयः । नवाभ्युत्यानदर्शिन्यो ननन्दुः समजाः प्रजाः ॥३॥ (अन्वयः) समजाः, प्रजाः, पुरुहूतध्वजस्य, इच, तस्य, (रघो)नवा- भ्युत्थानदर्शिन्यः (श्रत एवं ) उन्नयनपतयः, (सत्यः) ननन्दुः ॥३॥ (टीका ) समजाः (ससन्तानाः) प्रजाः (जनाः) 'पुरहतध्वजस्य (इन्द्रकेतोः ) इव, "इन्द्रमहोत्सवस्य इव, इत्यर्थः, तत्य (रघोः) नवान्युत्यानदर्शिन्यः (नूतनायुदयाऽचलोकिन्यः) "श्रत एवं” उन्न- चनपञ्कयः (ऊर्वावलोकनासकनेत्रमालाः) “जावलोकनतत्परा इत्यर्थः "सत्या" ननन्दुः (भानन्द प्रापुर) ॥३॥ (समाला) प्रकल जायन्त इति प्रजाः तामिः लहिता समजा! पुरु (बहुलं ) हुतं (धाहानं यज्ञेषु) अस्य सः पुरुहतः, पुरणि (पहनि) हतानि (नामानि) सस्य स इति वा पुलहतः, पुरुहतस्य ध्वजा पुरुहूतम्बजः, तस्य । नवञ्च तदन्युत्यानमिति नवान्युत्यानं, नवाभ्यु- त्यानं पश्यन्तीति नवान्युत्यानदर्शिन्यः। उत् नयनानां पड्कयो यासांताः॥३॥ १ गाकरं नुम्स्तन्मपुरद्वारे प्रतिष्टितन् । पौराः कुर्वन्ति शादि पुरसृत महोत्सदन । २ समिपिसोहि राजा गजेन्द्रनारस पदासपुरंप्रदक्षिीकरोतितिनाव!

रघुश-महाकाव्यम् ।
[चतुर्थः
(बालपपरिवर्तनम् ) सप्रजाभिः प्रजाभिः... नयाभ्युत्थान
दर्शनीभिः उजनपक्तिभिः गगन्दे ॥ ३ ॥
(मरलार्थ ) शरदिइन्द्रध्वजमुत्थितं दृष्ट्वा यथा सर्वाः प्रजानन्द
लि, कोब रसोरम्युदयमवलोभ्यताः सर्वाः परमां मुदभवापुः ॥ ३॥
(सरला हिन्दी ) इन्द्रकी पताका फी समान उसके नवीन
माको देगार उसकी प्रजा शानन्दको प्राप्त हुई ॥ ३ ॥
सममेन समाकान्त द्वयं द्विरदगामिना ।
गेन सिंहासनं पिज्यमखिलं चारिमण्डलम् ॥ ४ ॥
यः ) दिसणगामिना, तेग, ( रघुणा) पिय सिंहासना
लिग, परिमण्डल, च, "रतत्" यं, समम्, एष, समा
() हिरदगामिला (गजगामिना ) "दन्ती दग्नागल
et frimit fore। मतो गजो गागः पुनरो धारण
.""TTE, नेन ( शुगणा) पित्र्यं (जनकसम्बन्धि ) सिहामा
नपारानम्" इत्यर्थः, अनित (सकरत
im (निार), "तत्" र्य (हिमागाक) समा
ry (ग) ITI (अधितिम्)॥४॥
( 1 ) हो गी गग सा free, इय गती।
Forrentrन गरदातिन हिरवगामिति लिन
" srferift पाना हा: "गितुरागतं गि
( निम मिाग गति धा।
giri.inferral Kग शामिति माता ॥ ४ ॥
{नाj firmalit"मग माहातगाल
1 ५५५. गमाला माने, शाल शमा
trai?) का मान (गमन
१ . अप न ।
HARYA:
गाना।
Pाम ॥ ५ ॥

ग:] नमुयोकिलाटोकोपेतम् । - (अन्ययः) पक्षा, स्वयम्, अघश्या, (सती) साम्राज्यदीक्षित, दायामण्डललक्ष्येण भेजे किल ॥ ५ ॥ (टीका) पा (लक्ष्मीः) "लक्ष्मीः पशातया पक्षा" इत्यमरः, वयं, अदृश्या (अलक्ष्या) "सती" साम्राज्यदीक्षितं (मण्डलाधि- त्याभिषिक्त)तं (रघु ) छायामण्डललक्ष्येण (कान्तिपुखानुमेयेन ) मातपत्रेण ( फमलच्छत्रेण ) भेजे (सिपेवे)॥५॥ ( समासः) द्रष्टुं योग्या श्या, न दृश्येत्यश्या । दीक्षा आता अस्य सः दीक्षितः, सम्यग्राजते असोसम्राट्, सम्राजः भावः साम्राज्यं तस्मिन्दीक्षितः साम्राज्यदीक्षितस्तम् । छायायाः मण्डलम् डायामण्डलं तेन लक्ष्यमिति ायामण्डललयं, तेन । आतपासायत इत्यातपत्रं पद्ममेवातपत्रमिति पभातपनं तेन ॥ ५ ॥ (वाच्यपरिवर्तनम् ) पन्नया स्वयम् अदृश्यया सत्या साम्रा. ज्यदीक्षितः सःभेजे ॥ ५ ॥ (सरलार्थ) राज्यासनोपविष्टस्य तस्य शिरसि लक्ष्मीरप्रकटरूपा सती स्वयं कमलच्छत्रं धृतवती। "लक्ष्मीहि पद्मातपत्रेण सम्राज सेवते" इत्यागमात् । अन्यथा कथमेताहशी कान्तिसम्पत्तिः सम्भवितुं शक्नोति ॥ ५॥ (सरलार्थ हिन्दी ) राज्यालनपर बैठे हुए उसको मानो लक्ष्मी ने अप्रगटरूप होकर कान्तिमण्डल से अनुमान होनेवाले कमल के छत्र से श्राप ही सेवन किया ॥५॥ परिकल्पितसान्निध्या काले काले च वन्दिपु । स्तुत्यं स्तुतिभिरर्थ्याभिरुपतस्थे सरस्वती ।। ६ ।। (अन्वयः) काले, काले, वन्दिषुः परिकल्पितसान्निध्या, सर. स्वती, च, स्तुत्यं, तं (रघु) भाभिः, स्तुतिभिः, उपतस्थे ॥६॥ (टोका) काले काले (सर्वेष्वपि योग्यकालेषु) यन्दिषु ( स्तुति- पाठकेषु) परिकल्पितसान्निध्या (कृतसन्निधाना) "सती" स्तुत्यं (स्तुतियोग्यं ) तं ( रघु) अर्थ्याभिः (अर्थयुक्ताभिः) "सत्यामिः" इति वा, स्तुतिभिः (स्तोत्रैः) उपतस्थे (भेजे) ॥ ६ ॥ (समासः) परिकल्पितं सानिध्यं यया सा । स्तोतुं योग्यः स्तुत्यः तम् । अर्धाद् अनपेता प्रास्ताभिः॥६॥ -

[चतुर्थः
(वाच्यपरिवर्तनम् ).........यद्यपि राजमिः मुक्तया वसुन्धरया
(सरलार्थ हिन्दी) पृथ्वी यद्यपि मन्यादि पूज्य राजाओं से
१३२
रघुवंश-महाकाव्यम्।
(वाच्यपरिवर्तनम् )......परिकल्पितसान्निध्यया सरस्वत्या न
स्तुत्यः सः"
..."उपतस्थे ॥६॥
(सरलार्थः ) " तथा " उचितावसरे सरस्वती स्तुतिपाठकान
साहाय्यार्थ तेपां समीपवर्तिनी भूत्वा स्तोतुं योग्यं तं यथाथैः स्तुति
वायन्यैः सेवयामाल ॥ ६॥
( सरलार्थ हिन्दी ) "और" समय समय पर सरस्वती; स्तुति
पाठकों की सहायता के लिये उनको निकटवर्तिनी होकर स्तुति करने
योग्य (रघु) को अर्थवान स्तुतियों से विभूपित करती हुई ॥ ६॥
मनुप्रभृतिभिर्मान्यैर्भुक्ता यद्यपि राजभिः ।
तथाप्यनन्यपूर्वेव तस्मिन्नासीद्वसुन्धरा ॥ ७ ॥
(अन्वयः) यद्यपि, वसुन्धरा, मान्यैः, मनुप्रभृतिभिः, राजभिः
भुक्ता, ( वभूव ) तथापि, तस्मिन् , ( रघौ ) अनन्यपूर्वा, इच,
आसीत् ॥ ७ ॥
(टोका ) यद्यपि, वसुन्धरा (पृथिवी) “सर्वसहा वसुमती
वसुधोर्वी वसुन्धरा। गोत्रा कुः पृथिवी पृथ्वी" इत्यमरः, मान्यैः
(माननीयः) मनुप्रभृतिभिः (मन्वादिभिः) राजमिः (नृपैः) भुक्ता
( उपभुक्ता ) (अभूत् ) तथापि, तस्मिन् ( रघौ ) अनन्यपूर्वा ( नेतरो.
पभुक्ता) इव, पासीत् ( अभवत् ) ॥ ७ ॥
(समासः) वसूनि धरतीति वसुन्धरा । मनुः प्रभृतिः ( श्रादिः)
येपान्ते मनुप्रभृतयस्तैः। अन्यः पूर्वो यस्याः सा अन्यपूर्वा न अन्य
पूर्वा भवतीत्यनन्यपूर्वा । मानितुं योग्या मान्यास्तैः ॥ ७ ॥
बभूवे नथापि तस्मिन, अनन्यपूर्वया इव अभूयत ॥ ७ ॥
(सरलार्थः) वसुन्धरा यद्यपि मान्यमन्वादिभिः राजभिरुपभुः
काऽसीत् तथापि सा तस्मिन प्रथमपतिकेवाऽनुरक्ताऽभूत् ॥ ७ ॥
भोगी हुई थी तो मो उसने दूसरे से न भोगी हुई कामिनी की तरह
रघु में विशेष अनुराग को प्रकाश किया ॥ ७ ॥
स हि सर्वस्य लोकम्य युक्तदण्डतया मनः ।
:नितीन नामानित दक्षिणः ॥८॥

सर्गः] सुबोधिनोटीकोपेतम् । १३३ अन्वयः) हि, सः, (रघुः) युक्तदण्डतया, नातिशीतोष्णा, दक्षिणः, नभस्वान् , इव, सर्वत्य, लोकस्य, मनः, श्राददे ॥ ८ ॥ (टोका) हि (निश्चितं ) ला(रघुः)युक्तदण्डतया ( यवापराध- दण्डदानेन ) नातिशीतोष्णः ( समशीतोपणः) दक्षिणः (इक्षिण दिश्त- म्भवः) नभस्वान् (पवनः ) " नभस्वहातपवन" इत्यमरः, "मलया. निलः" इत्यर्थः, इव ( यथा ) लर्वस्य (सकलस्य ) तोकस्य (जनस्य) मनः ( मानसं ) "हन्मानलं मनः" इत्यमरः, घावदे (जहार ) ॥८ (समासः) युक्तो दण्डो यस्य स युक्तदण्डः, तस्य भावः युक्त दण्डता तया । न अतिशोतः, नत्युग्णो वा भवतीति नातिशीतोष्णः।। (वाच्यपरिवर्तनम् ) तेन युक्तदण्डतया, न अतिशीतोष्णन दक्षि- पेन नभस्वता इव........"प्राददे ॥ ८ ॥ (लरलार्थः) अनुष्णाशीतः दक्षिणानिल इव सः, अपराधोचिन- इण्डदानेन सर्वेषां मनांसि अहरत् ॥ ८ ॥ (सरलार्य हिन्दी) न बहुत उपडे और न यदुन गरम इक्षित निल ( वायु ) के तमान अपराध के अनुसार दप्ड देने के कारण उसने सब लोगों को अपने वश में किया ॥ ८ ॥ मन्दोत्कण्ठाः कृतास्तेन गुणाधिकतया गरी । फलेन सहकारस्य पुप्पोन्में इव प्रजाः ।। ९ ।। (अन्वयः) तेन. प्रजाः, गुरौ, सहकारल्य, फलेन, पुष्पोरमेन गुलाधिकतया, मन्दोत्कण्ठाः, हताः ॥ ६ ॥ (टोका ) तेन (घुणा ) प्रजा ( जनाः ) गुरी (दिपाया सहकारस्य ( मानरय ) "मामाचतो रसालोऽसौ सादागिन रमः" इत्यमरः, फलेन, पुप्पोसमे (पुष्पादये ) प (. फतवा (औदार्य प्रमायादिगुणाधिप. ) मन्दोली- समुपयाः) रताः । विहिताः ।। (समासः ) पुररय समति मोहमरनरिणत, गुणाधिदाः, नरय भावः गुधियाना, तया । मन्दा दाय तामादोयाटाः ।। (पायपरिवर्तनम् शामिन्दोवानिएन । (सार्थः) सोकाः नितीरममा पुर: जगलि पान fr.

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सर्गः] सुबोधिनीटोशोपेतम् । १३५ ) (अन्वयः) पञ्चानाम् , भूतानां, गुणाः, अपि उस्कपं, पुपुषुः, तस्मिन् , नवे, महीपालो, सर्व, नवम् इव सभवत् ॥ ११ ॥ (टोका ) पञ्चानां ( पञ्चलल्ल्यकानां ) भूतानां (पृथिव्यप्तेजो. वाय्वाकाशानां) 'गुणाः (गन्धादयः) अपि, उत्कर्ष (आतिशय्यं ) पुपुषुः (प्रापुः) तस्मिन् ( रघौ) नवे (नवीने) महीपाले ( राज्ञि) "सति" सर्व (अशेष) “वस्तु" नवं (नूतनम्) इव (यथा) अभवत्॥११॥ (समासः) महीं पालयतीति महीपालः तस्मिन् ॥ ११ ॥ (वाच्यपरिवर्तनम् ) गुणैः उत्कर्पः पुपुपे...सर्वेण नवेन अभूयत ॥११॥ ( सरलार्थः) तस्य प्रभावात् पृथिव्यप्तेजोवाय्वाकाशानां गुणा अपि अपूर्वा गुण समृद्धि लेभे तदा सर्व वस्तु नवमिव अभवत् ॥ ११ ॥ (सरलार्थ हिन्दी ) पञ्चमहाभूतो के गुणों ने भी उन्नति प्राप्त की नये राजा के राज्य में सभी वस्तु नई लो हुई ॥ ११ ॥ यथा प्रह्लादनाचन्द्रः प्रतापात्तपनो यथा । तथैव सोऽभूदन्वों राजा प्रकृतिरञ्जनात् ॥ १२ ॥ (अन्वयः) यथा, इन्द्रः, प्रलादनाद्, अन्वर्थः, भवति, यथा, तपना, प्रतापाद्, अन्वर्थः ( भवति ) तथा, एव, तः, राजा, प्रकृति- रखनाद्, अन्वर्थः, अभूत् ॥ १२ ॥ (टीका ) यथा (येन प्रकारेण ) चन्द्रः (इन्दुः) प्रहादनात् (श्रा- हादजननात् ) "अन्वर्थो भवति" यथा “च" तपनः (सूर्यः ) प्रतापात् सन्तापजननाद, "अन्वर्थो भवति" तथा तेन प्रकारेण, एव, तः, 'राजा (रघुः) प्रकृतिरञ्जनात् (प्रजानुरागजननाद्) अन्वर्धः (सार्थ- कनामा ) अभूद् (बभूव ) ॥१२॥ (लमालः) चन्दयति पाल्हादयतीति चन्द्रः। तपतीति तपनः । राजते रजयति वा प्रजाः इति राजा । (धातूनामनेकार्थत्यात् राजतेः (७) पृथ्वी पञ्चगुणा तोयं धनुर्गुणमयानलः । मिगुणो द्विगुणो वायुर्वियदेव गुणं भवेत् । (२) वेतन धुमुद्दिश्य विष्णुपुराणे- 'पियापर लितास्तस्य प्रजास्तेनानुरजिताः। अनुरागसतस्तस्प नाम राजेदभापत इति । ( [चतुर्थः है रघुवंश महाकाव्यम्। प्यादिविविधगुणगणविशिष्टं रघु राजानं लब्बा दिलीपं न प्रशसंमः न च संस्मरः ॥8॥ (सरलार्थ हिन्दी ) जैसे थानवृक्ष में जब तक फल नहीं आता उसका बौरही लोगों को प्यारा लगता फल थाने पर बौर में प्यार नहीं रहता उसी प्रकार राज्यासन पर बैठे रघुने गुणों को अधिकटा से अपने उत्पन्न होने के पूर्व पिता (दिलीप ) में अत्यन्त बढ़ा हुआ प्रजा का प्रेम मन्द कर दिया ॥४॥ नयविद्धिनवे राचि सदसच्चोपदर्शितम् । पूर्व एवाभवत् पक्षस्तस्मिन्नाभवदुत्तरः ॥ १० ॥ (अन्वयः ) नयविद्भिः, नवे, राशि, सद्, असत्, च, उपदान तम्, तस्मिन् , (रयो ) पूर्वः, एव, पक्षः, अमवत्, उत्तर, पन्ना, (अमवत् ) ॥ १०॥ (टोका ) नयविद्भिः (नीतिशानः ) नवे (नूतने ) "नवीन नूतनो नवः' इत्यमरः, राशि (नृपे विपये) "रघौ” सत् (धर्म युद्धादिकम् ) असत् (कपटयुद्धादिकं, च) उपदर्शितं (पोळ) तस्मिन (राशि रवी) पूर्वः एव पक्षः ( सत् पनः ) "धर्मः पज्ञः" इति वा अभवत् (आसीत् ) उत्तरः पक्षः असत् पक्षः ) "श्रधर्मः पक्षः" न अमवत् ( नासीत् ) ॥ १०॥ (समासः) नयं विदन्ति ते नयबिदस्तैः ॥ १० ॥ (वाच्यपरिवर्तनम् ) नयविदः नवं राशि लत् असत् च उप- दर्शितवन्तः तस्मिन् पूर्वण एव पक्षेण अमूयत उत्तरेण न ॥ १० ॥ (सरलार्थः) नीतिशास्त्रार्थतत्वमाः धर्मोऽधर्मश्चेति पक्षद्वयः मुपदिदिशुः, परन्तु तेन प्राद्यः धर्मपक्ष एवागीकृतः, द्वितीयोऽधर्म पक्षस्नु न स्वीकृतः॥१०॥ (सरलार्य हिन्दी ) नीति शास्त्र के तत्त्व को जानने वाले विद्वाना ने धर्म अधर्म दोनों पक्ष दिनलाय परन्तु रघु ने पहला ही पन (धर्म पक्ष ) ग्रहण किया दूसरा अधर्म पक्ष नहीं ॥ १० ॥ पञ्चानामपि भूनानामुत्कर्ष पुपपुगुणाः । को तस्मिन्महीपाले म नगिना॥

सर्गः] सुबोधिनीटोकोपेतम् । १३५ (अन्वयः) पञ्चानाम् ; भूतानां, गुणाः, अपि उत्कप, पुपुपुः, तस्मिन् , नवे, महीपाले, सर्व, नवम् इव अभवत् ॥ ११ ॥ (टोका) पञ्चानां ( पञ्चसायकानां ) भूतानां (पृथिव्यप्तेजो- वाय्वाकाशानां ) 'गुणाः (गन्धादयः) अपि, उत्कर्ष (आतिशय्यं) पुपुपुः (प्रापुः) तस्मिन् ( रघो) नवे (नवीने ) महीपाले ( राशि) "सति" सर्व (अशेष) “वस्तु" नवं (नूतनम्) इव (यथा) अभवत्॥११॥ (समासः) महीं पालयतीति महीपालः तस्मिन् ॥ ११ ॥ (वाच्यपरिवर्तनम् ) गुणैः उत्कर्पः पुपुपे...सर्वेण नवेन अभूयत ॥११॥ (सरलार्थः)तस्य प्रभावात् पृथिव्यप्तेजोवाय्वाकाशानां गुणाअपि अपूर्वा गुण समृद्धि लेभे तदा सर्व वस्तु नवमिव अभवत् ॥ ११ ॥ ( सरलार्थ हिन्दी ) पञ्चमहाभूतो के गुणों ने भी उन्नति प्राप्त की नये राजा के राज्य में सभी वस्तु नई सो हुई ॥ ११ ॥ यथा महादनाचन्द्रः प्रतापात्तपनो यथा । तथैव सोऽभूदन्वर्थो राजा प्रकृतिरञ्जनात् ॥ १२ ॥ (अन्वयः) यथा, इन्द्रः, प्रह्लादनाद्, अन्वर्थः, भवति, यथा, तपनः, प्रतापाद्, अन्वर्थः (भवति ) तथा, एव, सः, राजा, प्रकृति- रखनाद्, अन्वर्थः, अभूत् ॥ १२ ॥ (टीका ) यथा (येन प्रकारेण ) चन्द्रः (इन्दुः) प्रह्लादनात् (श्रा. हादजननात् ) "अन्वर्थो भवति" यथा “च" तपनः ( सूर्यः) प्रतापात् सन्तापजननात्, “अन्वर्थो भवति" तथा तेन प्रकारेण, एव, सा, 'राजा (रघुः) प्रकृतिरखनात् (प्रजानुरागजननाद्) अन्वर्थः (सार्थ- कनामा) अभूद् (वभूव ) ॥१२॥ (समासः) चन्दयति पाल्हादयतीति चन्द्रः। तपतीति तपनः । राजते रखयति वा प्रजाः इति राजा । (धातूनामनेकार्थत्वात् राजतेः (6) पृथ्वी पञ्चगुणा तोयं चतुर्गुणमयानलः । त्रिगुणो द्विगुणो वायुर्वियदेकगुणं भवेत् । (२) वेणुतनयं पृधुमुद्दिदय विष्णुपुराणे- 'पिनापरञ्जितास्तस्य प्रजास्तेनानुरञ्जिताः। अनुरागात्सतस्तस्य नाम राजेत्यभापत इति ।

१३६ रघुवंश-महाकाव्यम्। [चतुः कनिन् ) प्रकृतेः रजनम् इति प्रकृतिरञ्जनं, तस्मात् । अर्थमनुगतः इति श्रन्वर्थः ॥१२॥ ( वाच्यपरिवर्तनम् ) यथा प्रह्लादनात् चन्द्रेण (भूयते) प्रतापात् तपनेन, तथैव.........तेन राज्ञा अन्वर्थन अभावि ॥१२॥ ( सरलार्थः) यथा इन्दुः प्रह्लादकरैः करैः सकलान् जनान् आहादयन् स्वनाम सार्थकं करोति यथा च तेजोनिधिः सूर्यः स्वतेज. सा जनान् तापयन् स्वनाम सार्थकं करोति तथैवायं रघुरपि सकला प्रजाः रजयन् राजेति नाम सार्थकञ्चकार ॥१२॥ (सरलार्थ हिन्दी) जैसे प्रानन्द देने से चन्द्रमा, तपाने से तपन (सूर्य ) अपने २ नामको यथार्थनाम करते हुए। उसी प्रकार प्रजा के रंजन करने से वह रघु भी अपने को यथार्थ नाम वाला राजा बनाता हुश्रा ॥१२॥ कामं कर्णान्तविश्रान्ते विशाले तस्य लोचने । चक्षुष्मत्ता तु शास्त्रेण सूक्ष्मकार्यार्थदर्शिना ॥१३॥ (अन्वयः ) तस्य, विशाले, लोचने, काम, कर्णान्तविश्रान्ते, (प्रास्ताम् ) (तस्य) चतुष्मत्ता, तु, सूक्ष्मकार्यार्थदर्शिना, शास्त्रेण, (शासीत् ) ॥१३॥ (टोका) तस्य ( रघोः ) विशाले (विस्तीर्णे) लोचने (नयने) कामं (भृशं) कर्णान्तविश्रान्ते ( श्रोत्रप्रान्तगते ) "श्रास्ताम्" "तस्य" चनुमत्ता (नेववत्त्व) तु, “नयनफलन्त्वित्यर्थः" सूक्ष्मकार्यार्थदर्शिना (दुर्विशेयकर्तव्यार्थप्रकाशिना ) शास्त्रेण (धर्ममार्गादिप्रतिपादकेन वेदादिना) आसीत् ॥१३॥ (समासः) कर्णयोः अन्तः कर्णान्तः तयोः विधान्ते । चतुरस्त्य- स्येति चतुष्मान् तस्य भावः चतुप्मत्ता। कार्यस्य अर्थः कार्यार्थः, सूक्ष्मश्चासी कार्यार्थः सूदमकार्यार्थः, तं पश्यतीति सूक्ष्मकार्यार्थदर्शी तेन ॥१३॥ ( सरलार्थः) यद्यपि तस्य दोघे नेत्रे कर्णपर्यन्ते आस्तां तथापि सः ताभ्यामेव नेत्रशाली न बभूव किन्तु परीक्षार्थदर्शिना शानरूपेण चतुपाचनुमान् श्रमवत् ।।१३।। (सरलार्थ हिन्दी ) यद्यपि उसके नेत्र कान तक फैले हुए थे

वर्गः]
लुबोधिनोटीकोपेतम् ।
परन्तु वह कर्मको सूक्ष्मविधि दिलानेवाले शाललेहो आँसों वाला
अपने को सममता धा ॥१३॥
लब्धप्रशमनस्वस्थमथैनं समुपस्थिता ।
पार्थिवश्रीहितीयेव शरत्पङ्कजलक्षणा ॥१४||
(अन्वयः ) लब्धप्रशमनस्वस्थम्, एनं पशजलक्षणा, शरत,
द्वितीया, पार्थिवधीः इव, समुपस्थिता ॥१४॥
(टोका ) लब्धप्रशमनस्वत्थं (प्राप्तराज्यस्थिरीकरणसमाहितचि-
त्तम् ) एनं (रघु) पाजलक्षणा (फमलचिता) शरत् ( शरहतुः) द्विती.
या अन्या) पार्थिवधीः (राजलक्ष्मीः) इव, समुपस्थिता प्राप्ता)।
(समासः) लब्धस्य प्रशमनमिति लब्धप्रशमनं तेन स्वस्थ इति
लब्धप्रशमनस्वस्था,
तं । पङ्कज लक्षणं यस्याः सा । पृथिव्या ईश्वरः
पार्थिवः, तस्य श्रीः इति पार्थिवधीः ॥१क्षा
(वाच्यपरिवर्तनम् ) लब्धप्रशमनस्वस्थः एषः पङ्कजलक्षणया
शरदा द्वितीयया पार्थिवधिया इव उपतस्थे ॥१॥
(सरलार्थः) शत्रूणामुन्मूलनेन स रघुः राज्ये शान्ति संस्थाप्य
यदा समाहितचित्तः तक्षातः, तदा शरद् विकसितकमलम्पैर्लक्षणे-
रपरा राजलक्ष्मीरिव तंसेवितुंलमागता ॥९॥
(सरलार्थ हिन्दी) स्वराज्यको यथोचित रक्षा करनेले शान्त-
वित्तवाले उसको दूसरो राज्यलक्ष्मीको समान कमलचिह्नवालो
शरद् ऋतु प्राप्त हुई ॥१४॥
निष्टलघुभिर्मेधैर्मुक्तवा सुदुःसहः ।
मतापस्तस्य भानोश्च युगपढ्यानशे दिशः ॥१५॥
(अन्वयः ) निर्वृष्टलघुभिः, मेधैः, मुक्तवा, (श्रतएव ) सुदुः-
सहः, तस्य, (रघोः) प्रतापः, भानो, च, (प्रतापः ) युगपत्, दिशः,
व्यानशे॥ १५ ॥
(टीका ) निवृष्टलघुभिः (जलवर्पणागुरुभिः) मेधैः (धनैः) मुक-
वा (त्यकमार्गः) “श्रतएव" सुदुःसहः (सोदुमशक्यः) तस्य (रघोः)
भानोः (य॑स्य) च, प्रतापः (तेजः)“प्रतापस्तापतेजसोः” इति
मेदिनी । युगपत् (एककालमेव) दिशः (आशाः) व्यानशे (व्याप)॥१५॥

रघुवंश-महाकाव्यम् । [चतुर्य (समासः ) निःशेपं वृष्टाः निर्वृष्टाः "श्रतएव" लघवः तैः। मुर वर्त्म येन सः । सुतरां दुःखेन सोढुं शक्य इति सुदुःसहः ॥ १५ ॥ (वाच्यपरिवर्तनम् )...."मुक्तवर्मना सुदुःसहेन तस्य, मानो प्रतापेत युगपत् दिशः व्यानशिरे ॥ १५ ॥ (सरलार्थः) शरत्समये यदा जलामावतया मेघाः सूर्यमार्गान तिरोदधुः ततः प्रस्त्ररकिरणस्य रवेः तेजोभिः अखिलमाकाशमण्डल मापूरितं, तदा दिशां जेतुमिच्छया प्रस्थितो रघुरपि समस्तमे दिमण्डलं तेजोभिः पूरयामास ॥ १५ ॥ (सरलार्थ हिन्दो ) जल वर्षाकर बादलों ने सूर्य का मार्ग छोड़ (आकाश निर्मेघ हुआ) अतएव सूर्य का तथा मेघों के हट जाने दिग्विजय के लिये निकले हुए रघु का प्रताप एक साथ दिशाओं व्याप्त हुभा ॥ १५ ॥ वार्षिक सञ्जहारेन्द्रो धनुर्जेत्रं रघुर्दधौ । प्रजार्थसाधने तौ हि पर्यायोद्यतकामुकौ ॥ १६ ॥ (अन्वयः ) इन्द्रः, वार्षिकं, धनुः, संजहार, रघुः, जैत्र, (धनुः) धौ, हि, तौ, प्रजार्थसाधने, पर्यायोद्यतकार्मुको, (आस्ताम् ) ॥१६॥ (टीका ) इन्द्रः, (शक्रः) वार्पिकं (वकालोद्भवं) धनुः (चाप) सजहार (संयतवान् ) रघुः, जैत्रं (विजयशोलं) " धनुः" दयौ (धारयामास ) हि (यस्मात् कारणात् ) तौ (इन्द्ररघू ) प्रज्ञार्थ- साधने (वृष्टिधनलक्षणप्रयोजनसाधनविपये ) पायोद्यतकामुको (क्रमश उद्यतचापो ) आस्ताम् ॥ १६ ॥ (समासः ) इन्दतीति इन्द्रः। वर्षासु भवं वार्पिकं । प्रजानाम् अर्थः प्रजार्थस्तेषां साधनं तस्मिन् । पर्यायेण. उद्यते कार्मुके याभ्यां तौ ॥ १६ ॥ (वाच्यपरिवर्तनम् ) इन्द्रेण वार्षिकं धनुः साढे, रघुणा धनुः दधे, हि ताभ्यांपर्यायोद्यतकार्मुकाभ्यां अभूयत ॥ १६ ॥ (सरलार्थः) शरत्काले पुरन्दरः निजं गर्पिकं धनुः सिंहृतवान् तथा रघुः दिग्विजयाय विजयशीलं धनुः दधार । एवं तौ इन्द्ररघ पर्यायेण स्वं स्वं धनुः उद्यम्य प्रजाहिततत्परो आस्ताम् ॥ १६ ॥ (सरलार्थ हिन्दी ) इन्द्र ने वर्षा का धनुप रक्खा, रघु ने विजय जै.

वर्गः] - सुबोधिनीटोकोपेतम् । १३६ (धनु) उठाया इस तरह के दोनों प्रजाही के कार्यसाधन में री बारी से धनुषधारी हुए ॥ १६॥ पुण्डरीकातपत्रस्तं विकसत्काशवामरः । ऋतुर्विडम्बयामास न पुनः प्राप तच्छियम् ॥ १७ ॥ (अन्वयः) पुण्डरीकातपत्रः, विकलत्काशचामरः, (शरत् ) तुः, तं, (रघु) विडम्बयामास, पुनः, तड्रियं, न, प्राप ॥ १७ ॥ (टीका ) पुण्डरीकातपत्रः (सिताम्भोजच्छत्रः) " पुण्डरोक संताम्भोज" इत्यमरः, विकसत्काशचामरः (प्रफुल्लितकाशव्यजनः) ऋतुः (शरतुः) तं (रघु) विडम्बयामाल (अनुचकार ) पुनः (किन्तु) च्चियं ( रघुशोभी) "रघुरामणीयक" न प्राप ॥ १७ ॥ (समासः) भातपात्रायत इति श्रातपत्र, पुण्डरीकमेव श्रात- त्वं यस्य लः। विकसन्ति काशान्येव चामराणि यत्य सः। तस्य मीस्तच्चीस्ता तच्छियम् ॥ १७ ॥ (वाच्य०) पुण्डरीकात "प्रेण"चामरेण ऋतुना सः विडम्बया. बके तच्छ्रीन प्रापे ॥१७॥ (सरलार्थः) महाराजो रघुर्यथा छत्रचामरादिराजचिदमी थैव शरत्समयोऽपि श्वेतकमलरूपराजच्छत्रेण प्रफुल्लितकाशरूपेला समरेण च भाति स्म । इत्यं शरद् रघोः राजचिहान्यनुचकार पर स्य लोकोत्तर राजशोभा लधुं न शशाक ॥ १७ ॥ (सरलार्थ हिन्दी) फमलच्छववालो और खिले हुए काशरूप एक प्रकार का पड़ा २ कुशा ) चँवरवाली शरद ऋतु ने सपना मनुकरण किया परन्तु उसकी शोभा प्राप्त न कर सको ॥१७॥ प्रसादमुमुखे तस्मिंश्चन्द्रे च विशवप्रभे । तदा चक्षुष्मतां प्रीतिरासीत्समरसाइयोः ॥१८॥ (यन्वयः ) तदा, प्रसादसमुखे, तस्मिन् . (घी) दिसामने. न्द्र, च यो, चाप्मता, प्रीतिः, समरसा, भातीत् ।।१८।। ( टोका) तदा [तस्मिन् समये] प्रसादहमुग [प्रसस्तया दरानने ] “मनोहरमु" रति पा, "प्रसाद साना" : स्मिन् [न्धी विशदप्रभे[धवलपाती चन्द्र मोदी उभयोरपि दिपये] पाप्मतां [मेवदतां] " जनामा नीति: [प्रेम समरसा [मुल्यमादा आलोद . १८.५ , १२० गागमा [मर्गः (समालः ) मादेन गमन ग मी Ameमः सम्मिन् । प्रयाग मातलि प्राEिT : नियम नरिमन । पम्पने (आमाले)नि रमः, नमः (समानः ) म यस्याः सा समरमानसिलिन नमान: पान १८१ ( बायपरिवर्तनम (नदा अभूयः ॥ १८॥ ( सुरक्षार्थः । निर्मवाका चन्द्र गोया दानां चिनेषु यथा विगंगानन्दः सजायने नया संयंतामुपरि सदा प्रसाद नं धुंड प्रजानां मनानु परमानन्दो जानः ॥ १८ ॥ (सरलार्थ हिन्दी ) उस समय प्रसतगुम राजा रघु में भी स्वच्छ कान्तिवाले चन्द्रमा में प्रजा का प्रेम समान करको धारण फरता हुघा ॥२८॥ हंसश्रेणीपु ताराम कुमुदत्य च वारिपु । विभूनयस्तदीयानां पर्यन्ता यशमामिव ।। ११ ॥ (अन्वयः ) तदीयानां, यगुसां, विमृतयः, सश्रेणीषु, तारा कुमुदत्म, वारिपु, च पर्यन्ता इव, (आसन) || 28 ।। (टोका ) तदीयानां [रघुसन्बन्धिनां] यशला [कोना] “यणः कीर्तिः समझा घ" इत्यमरः, विभूतयः । पश्चर्याणि] "युनत्वलनमा नि" हंसश्रेणीषु [राजहंसपंतिपु] तारानु । ननत्र पु] “नक्षत्रनं में तारा" इत्यमरः, कुमुदत्सु [कुमुदयुक्त वारिपु [पानीयेषु ] व पर्यस्ताः [प्रसारिता] इव [किम् ] इति उत्प्रेज्ञा ॥ २६॥ ( समासः) तस्य इमानि तदीयानि नेपां। हंसानां श्रेयः हंस. श्रेण्यः, तासु । कुमुदानि पपु सन्ति इति कुमुदन्ति तेषु ॥ १६ ॥ (वाच्यपरिवर्तनम् ) तदीयानां यशसां विभूतिमिः पर्यस्तामिः इव अभूयत ॥ १६ ॥ (सरलार्थः ) दिग्विजयप्रवृत्तस्य रयोक्ल्बलाः कोतिरायः हंससलिलतारकाकुमुद्देषु अमृता इव विराजन्ते स्म ॥ १६ ॥ (सरलार्थ हिन्दी ) हंसों की पंक्तियों में, ताराओं में, और कमल वाले जलों में मानो रघुको हो शुन्न यश विभूति फैली हुई थी ॥ १६ ॥ इच्छायानिपादिन्यस्तस्य गोप्नुगुणोदयम् । श्राकुमारकयोद्धातं शालिगोप्यो जगुर्यशः ॥ २० ॥ -

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। dramameramara.ru +r - । . चिह तद्युक्त सन् यात्रायां कारिनुरगादियुरामियातेन सरिट गम" HEET Te" ri म) : t...: HTTE rantetram: ( मामा) मनमा माये !! ( गाना ) : गादि पित समान निमंलानि जानाति, जाप लिने अग्भूिपालानाम बनinik ॥ २१ ॥ (सरलादी) प्रमाणे अगामे मा मोर गुदा मेगना को म. कार दय मलिन दुधा॥२१॥ मदोदनाः कान्नः मरिन हलमटनाः । तीलाखेलमनुवापुमंदीशास्तम्य विक्रमम् ॥ २२ ॥ (अन्ययः ) मदीदनाः, ककुभन्तः, सरिता, समुजाः, महोदा- तस्य, (रचोः) सोलापेल, विममम, अनुमापुः ॥ २२ ॥ (टीका) मदोदप्राः (मदोन्मत्ताः) मन्तः (सयलम्कन्या सरितां (नदीनां) फूलमुगुजाः (तीरभेदकाः) महोवाः (महाकाय चलोवर्दाः) तस्य (रघोः) लीलाग्देलं (बिलासामगं) विक्र (पराममं) अनुप्रापुः (अनुचः) "रघोविक्रमम् अनुगदा इत्यर्थः, वृपपक्ष विक्रमःगतिविशेषः, न्युविक्रमोऽपि महोदयः करुद्रा कूलभेदको भवतीति भावः ॥ २२ ॥ (समासः ) मदेन उदना इति मदोदग्राः । ककुद एषां सन्तोटि ककुद्मन्तः। कूलानि उशान्ति इति कलमुद्ररूजाः । महान्त उताणश्च इति महोताः । खेलतीति खेलः, लीलया अनायासेन खेतः लीलाखेलः तं लोलाखेलम् ॥ २२ ॥ २. अगस्त्योदये जलानि प्रसीदन्तीरयागमः, कारटतो आत्यनक्षत्रोदयानन्तरं मेघा अपगटन्ति जलानि च निर्मलानि भवन्तीति ज्योतिर्विदन ।

सर्गः] मुसोधिनोटोकोपेतम् । १४३ ( वाव्यपरिवर्तनम् ) मदोकोः ककुजाशिः "मुझुनैः महो स्प लोलाखेलःविशमा अन्मापे ॥ २२ ॥ (सरलार्थः ) मदोन्मत्तामांसला बलोवः तोलया नदीतटानि उत्पाटयन्तः रघोविफममनुचमाः ॥ २२ ॥ ( सरलार्थ हिन्दी) मद से उन्मत्त और नदियों के तट जोड़ने वाले बड़े बड़े बैतों ने उसके खेल के पराक्रम का अनुकरण किया ।२२॥ प्रसवैः सप्तपर्णानां मदगन्धिभिराहवाः । अन्ययेव तन्नागाः सप्तथैव मसुत्रुवुः ॥ २३ ॥ (अन्वयः ) मदनन्धिभिः सप्तपर्णनां प्रसवैः, पाहताः, तनागाः, अद्यया, इव सप्तधा, एव, प्रसुनुवुः ॥ २३ ॥ (टोका ) मदगन्धिभिः ( मदतशगन्धैः) सप्तपर्णानां ( सप्तपर्ण- वृक्षाणां) “सप्तपर्णो विशालत्वक्शारदो विषमच्छदः" इत्यमरः, असवैः (पुष्पैः) “स्यादुत्पादे फले पुप्पे प्रसवो गर्भमोचने" इत्यमरः, माहताः (ताडिताः) तन्नागाः (रघुगजाः) “मतजो गजो नागः इजरो वारणः करो" इत्यमर, अत्यया (भाहतिजनितेन्ययेव) सप्तधा (सप्तप्रकारेण) एव, प्रसुन्नुवुः (मदतरणं चः) ॥२३॥ (समासः) भदत्य गन्ध इव गन्धो येषां ते मदगन्धयस्तैः। तस्य नागा इति तनागाः ॥२३॥ (वाच्यपरिवर्तनम् ) 'प्रातः तनागैः प्रसुनुवे ॥२३॥ (सरलार्थः) रघोः करिणः प्रफुल्लितानां सप्तपर्णपुप्पाणां उत्कटं गन्धमाघ्राय तदेव अरण्यकरिणां मद्जलगन्धम् ननुमन्यमानाः स्पर्द्ध- येव सप्तभ्योऽभ्यःमदधारामशरन् ॥२३॥ (सरतार्थ हिन्दो) सप्तपर्ण नामक वृक्षके फूलों के मद्गन्ध को जंगली हाथी का मद समझ कर ही मानों उसके हाथियों ने ईर्षा से अपने सातों अगों से मद यहाया ॥२३॥ तालुक्षकपोलेन्या राहकानको तथा रोमकुन्मकाटिन्यव दानं प्रारति द्विजः। कराकयन्यां नेत्रश्च नेत्रान्यान्च मदतुतिः । इति हस्तिशिक्षा । A १४४ रघुवंश महाकाव्यम् । [चतुर्थः . सरितः कुर्वती गाधाः पथश्वाश्यानकर्दमान् । यात्रायै चोदयामास तं शक्तेः प्रथमं शरत् ॥२४॥ (अन्वयः ) सरितः, गाधाः, पथः, च, अश्योनकर्दमान कुर्वती, (सती ) शरत् , शक्ते, प्रथम, तं, (रघु ) यात्राये,चोदयामास ॥२४॥ (टोका) सरितः (नदी) गावाः ( स्वल्पजलाः) कुर्वती (चिद- धतो) पथः ( मार्गान् ) च अश्यानकर्दमान् (शुष्कपकान ) "कुर्वती” (सतो ) शरत्, शक्तः, प्रथम, तं, (रघु) यात्राये, चोदयामास ॥२४ (टीका ) सरितः (नदी) गाधाः (स्वल्पजलाः) कुर्वती (विद धती) पथः (मार्गान्) च अश्यानकर्दमान (शुष्कपकान ) "कुर्वती" सती, शरत् ( शरहतुः ) शक्तः (उत्साहशतः) प्रथमं (प्राक् ) यात्रायै (दण्डयात्रायै ) दिग्विजयायेत्यर्थः, तं (रघु) चोदयामास (प्रेरया- मास)॥२४॥ (समासः) अश्यानाः कर्दमा येषां ते अश्यानकर्दमास्तान् । (वाच्या०)...."कुर्वत्या शरदा शक्तप्रथमं सःचोदयाञ्चक्रे ॥२४॥ ( सरलार्थः ) प्रखरैः सूर्यकिरणैः शुष्कसलिलतया सरितस्तरण शक्या जाताः, मार्गाश्च सुखेन गन्तुं योग्याः सजाताः, एवम्भूतो रमणीयः समयस्तस्य मन्त्रप्रभावयुक्तस्य रघोः मनसि दिग्विजयाय उत्साहशक्तिमुद्दोपयामास ||२४|| (सरलार्थ हिन्दी ) नदियोको थाहवालो और मार्गको सूत्रा करनेवाली शरदऋतुने मानो उसे मनको उत्साहशक्ति से पहलेही याना निमित्त प्रेरणाकी ॥ २४ ॥ तस्मै सम्यग्घुतो वह्निर्वाजिनीराजनाविधौ । प्रदक्षिणार्व्यािजेन हस्तेनेव जयं ददौ ॥ २५ ॥ (अन्वयः) वाजिनीराजनाविधी, सम्यक्, हुतः, वह्निः, प्रदक्षि- णार्चिाजेन, हस्तेन, इव, तस्मै, जयं. ददौ ॥ २५ ॥ (टोका) 'वाजिनीराजनाविधी (अश्वनीराजनाख्यशान्तिः कर्मणि ) सम्यक ( यथाशास्त्रं ) "विधिवत्" इत्यर्थः, हुतः (तर्पितः) १ द्वादश्यामष्टम्यां कार्तिकशुभस्य पञ्चदश्यां वा अस्वस्य गजस्य हि कुर्याश्री राजनसंजिता शान्तिम् । इति वृहत्संहिता। गजाश्वमालाय राजानः प्रयाणसमये नीराजनाविधि कुर्वन्तीति व्यवहारोऽपीनि। .

सर्गः। ] लुदोधिनोटोफोपेतम्। होमसमिद्ध इत्यर्थः, वहिः (अग्निः) प्रदक्षिणार्विाजेन (प्रददि- एपरिक्रमणवालाचलेन ) "श्रत एव" हस्तेन ( करेण ) इव, 4 (रघवे) जयं (विजय) ददौ (दत्तवान् ) ॥ २५ ॥ (समालः)वाजीनां नीराजना वाजिनीराजना, तस्या विधिः जिनोराजनाविधिः तस्मिन् । प्रगतादक्षिणा (दिन) यया सा प्रददि प्रदक्षिणा च चलो अर्चिश्च प्रदक्षिणार्षिः सैव व्याजः तेन :: (वाच्यपरिवर्तनम् ) ..."हुतेन वहिना दद्दे ॥२५॥ (सरतार्थः) यदा रघुः विधिवद् आहुर्ति वही मन्दिर तुरणादीनां नोराजनात्यं कर्म अकरोत् तदा होमान्निति हत्य निजं वालारूपं करं प्रसार्य तस्मै रघवे विजयं ददः । (सरतार्थ हिन्दी ) अश्व-पूजन की विधि में उतर : हवन की हुई अग्नि ने दक्षिण ओर उठी हुई बाला - मानों उसको हाधों से विजय दिया ॥ २५ ॥ स गुप्तमूलमत्यन्तः शुद्धपाणिरयान्वित्तः । पविधं दलमादाय प्रतस्थे दिग्जिगीपया !! (अन्वयः ) गुप्तमूलप्रत्यन्तः, युद्धपाणिः, :- विध, बलम्, भादाय, दिजिगीपया, प्रतस्थे ।

[चतुर्यः विधा । उद्धृता मन्दरोघृतास्तः । क्षीरस्य ऊर्मय इति क्षीरोमयः। (सरलार्थ हिन्दी) समुद्रमथन के समय क्षीरसागर की लहर रघुवंश-महाकाव्यम् । जेतुमिच्छा जिगोपा, दिशां जिगोपा दिग्जिगोपा, तया। पड् यस्य तत् पडूविधं तत् ॥ २६ ॥ (वाच्यपरिवर्तनम् ) गुप्तमूलप्रत्यन्तेन शुद्धपाणिना अयान्वितेन तेन......"प्रतस्थे ॥२६॥ ( सरलार्थः ) सः रघुः प्रथमं निजराष्ट्रदुर्गाणां सर्वतोभावेन रक्षणे रक्षकान् नियुज्य यात्राकालयोग्यमखिलं मङ्गलञ्च विधाय "मौत भृत्यः सुहृच्छेणी द्विपदाटविकं वलम्” इति पड्विधं बलमादाय दिग्जिगीपया प्रस्थानमकरोत् ।। २६ ।। ( सरलार्थ हिन्दी ) विजययात्रा के पूर्व उसने अपने महलों और गढ़ों की रक्षा का प्रवन्ध किया और पीछे एक भी वैरी न छोड़ा जो कि उपद्रव करता। यात्रा समय उसने मंगलाचरण कर, और छ प्रकार का बल लेकर दिग्विजय के लिये प्रस्थान किया ॥ २६ ॥ अवाकिरन्वयोद्धास्त लाजैः पौरयोपितः । पृपतैर्मन्दरोधृतैः क्षीरोमय इवाच्युतम् ॥ २७ ॥ (अन्वयः) वयोवृद्धाः, पौरयोपितः, लाजैः, मन्दरोद्धृतैः, पृपतेः, क्षीरोमयः, अच्युतम्, इच, तम् , अवाकिरन् ॥ २७ (टीकाः ) वयोवृद्धाः (जरठाः, अधिकवयस्का इत्यर्थः) पौरयो पितः (नागरिकस्त्रियः) लाजैः (आचारलाजैः) पृपतेः ( बिन्दुभिः क्षीरोर्मयः (क्षीरसमुद्रतरङ्गाः) "भङ्गस्तरङ्ग ऊर्मिळ स्त्रियां वीविर थोर्मिपु" इत्यमरः, अच्युतम् इव (नारायणमिव ) तं ( रघु) अवा किरन् (वपुः ) ॥ २७ ॥ (समासः ) वयसा वृद्धाः। पुरे भवाः पौराः, पौराणां योषितः मन्दरेण नास्ति च्युतं स्वस्वभावात् स्खलनं यस्य सः तम् । “यस्मान च्युतपूर्वोऽहमच्युतस्तेन कर्मणा" (इति भागवतम् ) ॥ २७ ॥ ( सरलार्थः) समुद्रमन्थनसमये क्षीरोदधेस्तरङ्गपङ्कयः मन्दर चलमथनोत्यापितैर्जलविन्दुमिः विष्णुं यथा व्याप्नुवत्यः तथैव रयो विजयप्रयाएसमयेऽपि वृद्धाः नागरिकस्त्रियः मालार्थकलाजाः तस्यो परि घर्षन्तिस्म ॥ २७॥ ने मन्दराचल पर्वत के टकर खाने से उठे हुए छोटों से जैसे विष

सर्गः]
सुबोधिनीटीकोपेतम् ।
को छा दिया उसी प्रकार नगर की वृद्ध नारियों ने भी मङ्गल लाभ के
लिये उसके ऊपर लाजा से वर्षा को ॥ २७ ॥
स ययौ प्रथमं माची तुल्यः प्राचीनवहिपा ।
अहिताननिलोद्धृतस्तर्जयन्निव केतुभिः ॥ २८ ।।
रजोभिः स्यन्दनोतर्गजैश्च घनसन्निभैः ।
भुवस्तलमिव व्योम कुर्वन् व्योमेव भूतलम् ॥ २९ ॥
(अन्वयः) प्राचीनयहिपा, तुल्यः, सः, अनिलोधृतः, केतुभिः,
अहितान् , तर्जयन्, श्व, स्यन्दनोधूतैः, रजोभिः, व्योम, भुवः, तलम्,
इव, धनसन्निभैः, गजैः, च, भूतलं, व्योम, इच, कुर्वन् , “सन्
प्रथम, माची, "दिशं" ययौ ।। २८ ।। २६ ।।
(टोका ) प्राचीनयहिपा (इन्द्रेण,) “पर्जन्यो मघवा वृपा हरि-
हयःप्राचीनवर्हिः स्मृतः" इति हलायुधः, तुल्यः (समानः) सः (रघुः)
अनितोद्धृतः (चातकम्पितैः) केतुभिः (पताकामिः) अहितान् (शत्रून्)
तर्जयन् ( भलैयन् ) इच, "अन्योऽपि यथा अगुल्यादिना तर्जवति"
स्पन्दनोद्धृतैः ( रथोत्यापितैः ) "स्यन्दनो रथः" इत्यमरः, रजोभिः
(परागैः) "लिभिः" इति वा, "परागः सुमनो रज" इत्यमरः,
व्योम ( श्राकाशं ) भुवः (भूमेः ) तलम् इव, “पृथ्वीतलमिवेत्यर्थः"
घनसन्निभैः (मेघतुल्यैः) “वर्णतः क्रियातः परिमाणतश्च मेघसघशै"
इत्यर्थः, गजै ( हस्तिभिः) च भूतलं (भूमितलं) व्योम इव (जाकाश.
निव) कुर्वन् (सम्पादयन् ) "लन्" प्रथम (प्रा) प्राची (पूर्व दिश)
स्यौ (जगाम ) ॥ २८ ॥ २६ ॥
(समासः ) अनिलेन उद्धृता इति अनिलोद्धृताः, तैः । स्पन्द-
नेनोद्धृतानि स्यन्दनोद्धृतानि तैः। संनिभान्तीति ललिभाः, बनाव
सन्निभा धनसन्निभाः,॥ २८ ॥ २६ ॥
(पाच्यपरिवर्तनम् ) प्राचीनदर्हिपा तृल्येन तेन अन्लिोद्धृतः
शेतुभिः अहितान् तर्जयता इव 'कुर्वता सता प्रथम प्रायो
दिए यये ।। २८ ॥ २६ ॥
(सरतार्थः) शतमातुतुल्यपरामानशाली स रघुः दायुना कम्प-
मानानां पतासानां एलेन नन् तर्जपन् र माया पूर्वा दि जेतुं
अगाम॥२८॥

१४८ रघुवंश-महाकाव्यम् । [चतुर्थ सैन्यादिपादोत्यापिता धूलिः नभोमण्डलं तथा आच्छादितवतो यथा लोकाः भूतलमिव तदनुमेनिरे। तस्य करिघटा घना धनघटेर भूतलं तथा व्याप्नुवती यथा तत् पृथ्वोतल मेघाच्छन नभोमण्डलमिव हरयतेस्म ॥ २६॥ ( सरलार्थ हिन्दी ) पवन से फहराती हुई पताकाओं से मान शों को ताड़ना देता हुआ इन्द्रसरश पराक्रम वाला रघु पहले पूर्व दिशा की ओर गया ॥ २८ ॥ रासो में रथों से इतनी धूल उड़ी कि आकाश धरती के समान दिगाई दिया और मेघ के समान बड़े पड़े हाथी इतने थे कि घरतो बादलों से भरे भाकाश के समान जान पड़ी ।। २६ ॥ प्रतापोऽग्रे ततः शब्दः परागस्तदनन्तरम् । ययो पयाद्रथादीति चतुस्कन्धेव सा चमूः ॥३०॥ (गया) ग्रे, प्रतापः, ततः, शब्दः, तदनन्तरं, परागः, पयाद रयादि, इनि, सा, नमः, चतुःस्कन्धा, इव, ( ययो) ॥ ३० ॥ (टीका ) अग्ने (पुरः ) प्रतापः (प्रगावः ) "शत्रूणां भयोत्पादक पानापनकप" " प्रगानः प्रतापश्च गत्तेजः कोपदण्डजम्" इत्यमा माः वदनन्तर) शादः (मेनाकलफलः) तदनन्तरं (नत्पश्चात) गण { ferrণাগানিলিঃ) ঃ ( গন) মোৰ ( गावादियं. ) इति । अनेन प्रकारेगा ) "पूर्वाना" मा चमः (सेन मनमा ( चतुर्युगा ) हव, यया ( जगाम ) ॥ ३० ॥ {) 1आदियम्य ता। चत्वारः स्कन्धा यम (A) अयं मनापन कर गदेन तदनन्त माद दिना गये इति नगा चम्या चतु:स्पान्य माः। २४६ एम. ना. नि प्रकार या लेना अनुहमीरमान जान पत्री ॥२०॥ मम्पान्युवम्मालिनाध्याः सुमनरा नदीः । विपिनानि प्रकामानि शानिमत्याच्चकारमः ॥३१॥ (अन्वयः )मः ( सजिमन्यान, मस्पृष्टानि, उदाभांसि, नाव्याः, नदीः, सुप्रनगः, विपिनानि. प्रकाशालि, कार ॥ ३१ ॥ टीका ) नः (न्युः ) शनिमन्यात् (सनयान ) मन्पृष्टानि (निनन्यानागि) पदमांति (अतालतान) नव्या (नौकया नतुं शत्याः) नदोः ( सरिना ) प्रताः (संयन्धादिना सुमंत नार्याः ) “वरएतार्याः प्रताः" इत्यर्थः, विपिनानि ( चनानि ) "नव्यरपयं विपिन गहनं काननं बनम्" इत्यमरः, "वेदादिना" प्रकाशानि (आलोकयन्ति ) "नियज्ञागि" इत्यर्थः, चकार ( कृतवान् ) ॥३१॥ (समासः) शत्तिबिंधने यस्थासौ शक्तिमान् , शक्तिमतो भावः शक्तिमत्वं, तस्मात् । नियन्ते भूनानि अस्मिन्निति मरुः, मरुः पृष्ठं येपान्तानि । अत् अव॑मागतानि अभांति यस्मिस्तानि उदम्भांसि । नौभित्तार्याः नाव्या। सुखेन प्रततुं शक्याः सुप्रतराः ॥ ३१ ॥ (वाच्यपरिवर्तनम् ) तेनः ."नद्यः..."चक्रिरे ॥ ३१ ॥ (सरलार्थः) सःशक्तिशालित्वात् जलरहितां भूमि ( मरुभूमि) सजलां, नावा तरणयोग्यां नर्दी चरणतरण्योन्यां, वृक्षवाहुल्यात् दुर्गमाणि वनानि, निवृक्षकरणेन सुगमानि चकार ॥ ३२ ॥ (लरलार्थ हिन्दी ) वह रघु प्रतापी होनेले निर्जल भूमि को जल- चती और नावों से पार करने योग्य नदियों को पैर से पार करने योग्य और वन को स्टोले वृक्ष सादि कटवा देने से सुगम कराता हुआ॥३१॥ स सेनां महती कर्षन्पूर्वसागरगामिनीम् । वभौ हरजटाभ्रष्टां गङ्गामिव भगीरयः ॥३२ ।। (अन्वयः) सः (रघुः) पूर्वसागरगामिनीम्, महती, सेना, कर्पन्, हरजटानष्टां, गाम् “कर्पन" भगीरथा, व बभो ॥ ३२ ॥ (टोका) सः (रघुः) पूर्वसागरणामिनी (पूर्वसमुद्रगमनशोला) महती ( सहयातोता ) "विशाला" इत्यर्थः, सेनां (च) कर्षन्

[ऋतु
१५०
रघुवंश-महाकाव्यम् ।
(धारयन् ) हरजटाम्रष्टां (रजटाऽध:पतितां) गङ्गां, कर्पन्" भगोर
इव (भगोरथामिधेयः भूपतिरिव ) यमौ (शुशुमे)॥ ३२ ॥
(समासः) पूर्वश्च असौ सागरः पूर्वसागरः, तं गन्तुं गोल
यस्याः सा पूर्वसागरगामिनी तां । हरस्य जटा हरजटाः, तान्यो
भ्रष्टा ताम् ॥ ३२॥
(वाच्यपरिवर्तनम् ) तेन पूर्वसागरगामिनी महतीं सेना कपटा
हरजटाम्रष्टां गङ्गां भगीरथेन इय यमे ॥ ३२ ॥
(सरलार्थः ) भगीरथो यथा पूर्वपुरुषाणामुद्धारणार्थ शङ्करता
जूटगलितां गङ्गाम् अनुगच्छन् अशोमत तवायमपि रघुः दिवित
याय सेनां नयन शुशुमे ॥ ३२ ॥
(सरलार्थ हिन्दी ) प्रतापी राजा भगीरथ, महादेवजी की उट
से निकली हुई गंगा को लिये जाते हुए जैसो शोमा को प्राप्त
उसो प्रकार राजा रघु भी अपनी बड़ी सेना को पूर्व समुद्र
हो जाने से अपूर्व शोमा को प्राप्त हुए ।। ३२ ।।
त्याजितः फलमुत्खातर्भग्नश्च बहुधा नृपः ।
तम्यासीदुल्वणो मार्गः पादपरिव दन्तिनः ॥ ३३ ॥
(अन्ययः ) फलं, त्याजितः, उत्सातैः, बहुधा, भग्नः, नृपः, च.
पादपः, दन्निनः इय, तस्य, (रघोः ) मार्गः, उल्यगाः, आसीत् ॥३३॥
( टीका ) फलं (लामं ) त्याजितः (परित्याजितः) उस्मान
( म्यपदाटः) बहुधा (प्रायः) गग्नः ( संग्रामे जितः )
। भूपालः ) पादः (नृतः ) दन्निनः (हस्तिनः ) इय, तस्य (एपी
मार्गः ( पन्या ) इल्यगणः (प्रकाशः ) "प्रकाशं प्रकटं स्पष्ट मुल्यण विक
गुटम" इति यादयः, आसीत ( अमृत ) ।। ३३ ।।
कीओ
न
वृत पत्र-
फलं ( Pालं ) "फलं को घने योजनिष्पत्ती मोगलामयी
त्यमा, व्या िहदी, दयान: ( पाटिनः ) मग्नः ( मागः) पार
मृतः । कगः ) यथा गाय मार्गः निम्पयो मर्यान न र
पीदियोजना ॥१३॥
(मायापान पुगेन (पि. जलं पियनीति पर
। दन्लोविनेयम्य यः दादी, नम्य ॥ ३ ॥

मन: मनोमोटोपेतम् । १५१ ( वाग्यपनियांगा) ..."मार्ग स्वगन अभूयत ॥ ३३ ॥ (सन्ताः ) मा.लोयगजः गमनसमचे पथि स्थितान् पादपान, स्वरधानायुन्म लिलाम, इतस्ततश्चिन्न भिन्नाच कृत्या वर्त्म यथा सर्वतः पाण्डकातिन करोति तथैव रघुरपि शत्रून् स्वपदपरि- अान् पहुशः मनांच हत्या गिज मान लर्वधा फण्टफरहितम् अकरोत् ॥ ३३ ॥ (सरतार्थ हिन्दी ) अत्यन्त यतवान् अंगती हाथी जैसे चलने के समय मार्ग के वृक्षों को और फोटो को तोड़ता मरोड़ता और चलता एया अपना आने जाने का मार्ग फण्टक रहित करता उसो प्रकार राजा रघुने कण्टक रूप अपने शत्रुओं को पराजित कर अपना मार्ग शत्रुरहित किया ॥ ३३ ॥ पौरस्त्यानेवमाक्रामस्तांस्ताअनपदाञ्जयी । माप तालीवनश्याममुपकण्ठं महोदधेः ॥ ३४ ॥ (अन्वयः) जयो, एवं, तान्, तान्, पौरस्त्यान, जनपदान् , आझामन् (सन्) तालीवनश्याम, महोदधेः, उपकण्ठं, प्राप ॥ ३४ ॥ (टीका ) जयो (विजयी) "सः रघुः" एवं तान् तान् "सर्वान" पौरस्त्यान् (प्राच्यान ) जनपदान् (देशान् ) आक्रामन् , ( तेजसा अधिकुर्वन् ) “सन्" तालोवनश्याम (तालीवनकणं) “कृष्णे नीला- ऽसितश्याम" इत्यमरः, महोदधेः (महासागरस्य) उपकण्ठं (समीपं ) प्राप ॥ ३४ ॥ (समासः) जयोऽस्यास्तोति जयो । तालीनां वनानि ताली- वनानि तैः श्यामस्तं तालीवनश्यामम् । उदकानि धोयन्तेऽस्मिन्नित्यु- दधिः, महाँश्वासावुद्धिश्च, महोदधिः, तस्य । पुरः भवाः पौरस्त्या- स्तान् । उपगतः कण्ठम् उपकण्ठ- तम् ॥ ३४॥ (वाच्यपरिवर्तनम् ) जयिना"""आक्रामता संता"प्रापे ॥३४॥ (सरलार्थः) इत्थं प्रवलप्रतापः सः रघुः पूर्व दिग्भवान्देशान् स्वायत्तीकुर्वन् तालवृक्षसमूहैः श्यामवणां महासागरस्य सीमा माप॥३४॥ (सरलार्थ हिन्दी ) इस प्रकार जयशील रघु पूर्व के सम्पूर्ण

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से
(सरलार्थः) ससैन्यः सः निजगजपरम्पराभिः सेतुं निर्माय
१५४
रघुवंश-महाकाव्यम् ।
[चतुर्थः
(सरलार्थः ) यथा धान्यविशेषाः, कृपकेण स्वस्थानादुत्पाय
अन्यन रोपिताः सन्तः फलभारेण तं पूरयन्ति, तथैव वनदेशीया अपि
राजानः राज्ञा रघुणा प्राक् स्वपदाद्मष्टा भूयोऽपि स्वपदे स्थापिताः
सन्तश्चरणपर्यन्तं रघोः प्रणतमस्तका भूत्वा धनादिमिस्तं संवर्द्ध-
यामासुः ॥ ३७॥
( सरलार्थ हिन्दी ) जैसे किसी धान विशेष को किसान एक
जगह से उखाड़ कर दूसरी जगह जमाता है और वह फल फूल
लदकर झुक जाता है उसी प्रकार रघु ने वदेशी राजाओं को राज्या-
सन से उखाड़ कर पुनः उसी पद में उन्हें चैठाया। उन्होंने भी प्रणत-
होकर धनादि से रघु की सेवा की ।। ३७ ।।
स तीर्ता कपिशां सैन्यैर्वद्धद्विरदसेतुभिः ।
उत्कलादर्शितपथः कलिङ्गाभिमुखो ययौ ॥ ३८ ॥
(अन्वयः ) सः, (रघुः ) बद्धद्विरदसेतुभिः, सैन्यः, कपिशां,
(नदी) तीवा, उत्कलादर्शितपथः, (सन्) कलिगाभिमुखः, ययौ ॥३८॥
(टोकाः ) सः (रघुः) पद्धद्विरदसेतुमिः (रचितगजसेतुभिः
सैन्यैः (सैनिकैः) कपिशां (कपिशानाम नदी) ती( उत्तीर्य) उत्क-
लादर्शितपथः (उत्कलदेशीयभूपतिसन्दर्शितमार्गः) कलिङ्गाभिमुखः
( कलिङ्गदेशोन्मुखः) “सन्" ययौ (जगाम ) ॥३॥
(समासः) द्वौ रदी येपान्ते द्विरदाः, त एव सेतब इति द्विरद
सेतवः, बद्धाः द्विरदसेतवो यैस्ते तैः। उत्कलैः श्रादर्शितः पन्या
यस्याऽसौ उत्कलादर्शितपथः। कलिङ्गस्य अभिमुख इति कलिमा
भिमुखः॥३८॥
(वाच्यपरिवर्तनम् ) उत्कलादर्शितपथेन तेन....."कलिङ्गाभि-
मुखेन सता यये ॥ ३॥
कपिशां नदीमुत्तीर्य उत्कलदेशीयैर्नृपैः प्रदर्शितमार्गः सन् कलिङ्गदेश
तुलगाम ॥ ३८॥
(सरलार्थ हिन्दी) सेना सहित वह अपने हाथियों की पंक्ति का
पुल बाँधकर कपिशा नदी को पार कर उत्कल देशीय राजाओं से
मार्ग दिखाया हुआ कलिङ्ग देश को जीतने के लिये चला ॥३॥

सर्गः] सुबोधिनोटोकोपेनम् । १५५ . ) स प्रतापं महेन्द्रस्य मूनि तीक्ष्णं न्यवेशयत् । अनुशं द्विरदस्येव यन्ता गम्भीरवेदिनः ।। ३९ ॥ (अन्वयः ) सः ( रघुः) महेन्द्रस्य, मूटिं, तीक्ष्णं, प्रतापं, यन्ता, गम्भीरवेदिनः द्विरदत्य, (मुनि) तीक्ष्णम् , अंकुशम्, इव, न्यवेशयत् ॥ ३४ ॥ (दोका ) सः (रघुः) महेन्द्रस्य (कुलपर्वतविशेषस्य ) मूर्ति (मस्तके ) तीक्ष्णं (तोत्रं ) दुःसहमित्यर्थः, प्रतापं (पराक्रमं ) यन्ता (सारथिः) 'गम्भीरवेदिनः (विलम्बज्ञानिनः) द्विरदत्य (गजविशेषस्य) मुनि, तोदणं (निशित) अङ्कुशम्, इव,न्यवेशयत् (स्थापितवान् )॥३६॥ (समासः) गम्भीरं मन्दं वेत्तीति गम्भीरवेदी तस्य ॥३६।। (वाच्यपरिवर्तनम् ) तेन..."तीक्ष्णः प्रतापः, यन्त्रा"."तीक्ष्णः मशः इव न्यवेश्यत॥३॥ (सरलार्थः) हस्तिपको यथा मदोन्मत्तस्य दुष्टगजस्य शिरति तोडणं अङ्कुशं गाढं निवेशयन् तं दमयति तथैव रघुरपि स्वकीयं प्रबलं प्रतापं महेन्द्रस्य मुनि न्यवेशयत् ॥३६॥ (सरलार्थ हिन्दी ) जैसे महावत उन्मत्त हाथी के मस्तक पर तेज अङ्कश रख उसे अपने वश में करता है उसी प्रकार राजा प्यु ने भी अपना प्रवल प्रताप महेन्द्र के मस्तक पर रक्खा ॥३६॥ प्रतिजग्राह कालिङ्गस्तमस्त्रैर्गजसाधनः । पक्षच्छेदोचतं शक्रं शिलावर्षीव पर्वतः ॥४०॥ ()महेन्द्रो मलयः सपः शक्तिमान्क्षपर्वतः। विन्ध्यश्च पारिवानश्च सप्तैते कुलपर्वताः । विष्णुपुरागन् । (२) त्वम्मेदाटुधिरतावान्नांसत्य ऋयनादपि । संज्ञान लभते यस्तु दिद्याद्गम्भीरवेदिनम् ॥ इति राजपुत्राये। "चिरकालेन यो वेत्ति शिक्षा परिचितानपि। गम्भीरवेदी विशेषः स गजो गजवेदिनिः" । इति मुगधर्मीये। -म

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सर्गः] सुमोधिनोटोकोपेतम् । १५७. (टोका) फाकल्यः, (रघुः) तर (महेन्द्रपर्वते ) द्विपां (राजा) नाराचदुदिनं, (लोहशरवर्पणम्) विषहा ( सहित्या) सत् ( यथाशास्त्रं ) महालस्नातः (मल्लाभिषिक्तः) "यत्तु सर्वोषधिस्नान तन्माइल्यमुदीरितम्" इति यादवः। इव, जयश्रियं (विजयलक्ष्मी) प्रतिपेदे (प्राप) "वैरिवाणवणसहनाऽनन्तरं रघुररीन् व्यजेष्ट" इत्यर्थः ॥४॥ (समासः) नराणां समूहः नारम् , नारम् प्राचामति इति नारावः, नाराचानां दुन्निमिति नाराचदुर्दिनम् । मङ्गलार्थ स्नातः महलस्नातः । जयस्य श्री जयधीः ताम् ।।४१॥ (वाच्यपरिवर्तनम् ) तत्र काकुत्स्थेन" 'मङ्गलस्नान इव, जयश्रीः प्रतिपदे॥४॥ (सरलार्थः) यथा कश्चन नृपतिः प्रथमं पुण्यतीर्थसलिलैः अभिपित्तो भूत्वा पञ्चाद्राज्यलक्ष्मी प्राप्नोति तथैव श्रयमपि प्रथम सपतालधाराभिः अभिपिको भूत्वा अनन्तरं विजयलक्ष्मी प्राप ॥४॥ (सरलार्थ हिन्दी) जैले कोई राजा पहले पवित्र मङ्गलस्तान कर राज्यालन को प्राप्त करता है उसी प्रकार यह भी शत्रु की. शरधारा से स्नान कर जयलक्ष्मी को प्राप्त करता हुश्रा ।। ४१ ॥ ताम्बूलीनां दलैस्तत्र रचिताऽऽपानभूमयः । नारिकेलासवं योधाः शात्रवं च पपुर्यशः॥४२॥ (अन्वयः) तन, योधाः, रचितापानभूमयः, "सन्तः" ताम्बू लीनां, दलैः, नारिकोलासवं, शात्रवं, यशः, च, पपुः ॥४२॥ (टीका ) तत्र ( महेन्द्रपर्वते) योधाः (भटाः) रचिताऽऽपान- भूमयः (कल्पितपानयोग्यप्रदेशाः,) ताम्बूलोनां (नाग वल्लोनां), “ताम्बूलवल्ली ताम्बूलो नोगवल्ल्यप्यथ द्विजा" “तान्बूली नागवल्ल्यां स्त्रो" इत्यमरमेदिन्यौ, दलैः (पर्णेः ) नारिकेतासवं ( नारिकेलमा)शात्रवं (शत्रुसम्बन्धि ) यशः (कोति) च, पपुः पीतवन्तः ॥४२॥ (समासः) युध्यन्त इति योधाः। भापीयते सम्भूय सुरा पीयते अत्र इति श्रापानम् , आपानस्य भूमय आपानभूमयः, रचिता नापान- १५८ रघुवंश-महाकाव्यम् । [चतुर्थः भूमयो यैस्ते । नारिकेलस्य आसव इति नारिकेलासवस्तम् । शत्रो. रिदं शानवम् ॥ ४२॥ (वाच्यपरिवर्तनम् ) तत्र रचितापानभूमिभिः योधैः नारिकेलासवः ."पपे।। ४२॥ (सरलार्थः) शूरा योधाः महेन्द्राद्रो पानयोग्यं स्थानं संविधाय ताम्बूलपत्ररचितैः पात्रैः अच्छं नारिकेलासवं, स्वच्छं शत्रुयशव पीतवन्तः॥४२॥ (सरलार्थ हिन्दी ) उस महेन्द्र पर्वत पर मदिरापानके लिये नया मण्डप बना कर सर्दारों ने ताम्बूल के पत्तों से नारियल की मदिरा और शत्रुओं का यश पान किया ।। ४२ ।। गृहीतपतिमुक्तस्य स धर्मविजयी नृपः । श्रियं महेन्द्रनाथस्य जहार न तु मेदिनीम् ॥ ४३ ।। (अन्वयः) धर्मविजयी, सः, नृपः, गृहीतप्रतिमुक्तस्य, महेन्द्र- नाथस्य, श्रियं जहार, मेदिनी, तु, न, (जहार )॥ ४३ ।। (टीका) 'धर्मविजयी ( धर्मार्थ विजयशोलः ) सः नृपः ( राजा रघुः) गृहीतप्रतिमुक्तस्य ( पराजयानन्तरं परित्यक्तस्य ) महेन्द्रनाथ- स्य (महेन्द्राद्रिभूपस्य ) "कलिङ्गदेशाधिपस्येत्यर्थः" श्रियं ( लक्ष्मी) जहार (हृतवान् ) मेदिनी (भुवं)तु (किन्तु) “शरणागतवात्सल्यात् न जहार॥४३॥ (समासः) आदौ गृहीतः पश्चात्प्रतिमुक्त इति गृहीतप्रति मुक्तस्तस्य । महेन्द्रस्य नाथ इति महेन्द्रनाथस्तस्य । नृन पातीति नृपः॥४३॥ - (वाच्यपरिवर्तनम् ) धर्मविजयिना तेन नृपेण · श्रीः जहे, मेदिनी तु न जहे ॥४३॥ १. धर्मविजयी लोभविजयी असुरविजयी चेति विविधो राजा। यश निर्जित्य तदीयां नृपभियं नीत्या तं शत्रु तस्मिन्नेव स्थाने स्थापयति स धर्म विजयी । यः शयं निर्मित्य तदीयां नृपश्चियं मेदिनी च गृहीत्या प्राणैन विकुरुते स लोनविजयी । यः बाबु हत्वा तदीयां धियं मेदिनी च गृह्णाति स असुरविशयी।

सर्गः]] सुबोधिनोटोशोपेतम्। १५४ (सरलार्थः ) धर्मविजयी रघुः प्राग् उन्मत्तभावेन आगतं संग्रामोद्यतं कलिङ्गनाथं निर्जित्य (बन्दोकृत्य ) पश्चात्तं मोच- यित्वा केवलं तत्य श्रियमेवाऽपहरत् न तु शरणागतस्य तस्य राज्याधिकारम् ।। ४३ ॥ (सरलार्थ हिन्दी ) धर्म विजयी राजा रघु ने महेन्द्रनाथ को युद्ध में परास्त कर केवल उसको लक्ष्मी हरण की और उसे छोड़ दिया शरण में आये हुए उसका राज्य नहीं लिया ॥ ४३ ॥ ततो वेलातटेनैव फलवत्पूगमालिना । अगस्त्याचरितामाशामनाशास्यजयो ययौ ॥ ४४ ॥ (अन्वयः) ततः, अनाशास्यजयः, (रघुः) फलवत्पूगमालिना, चेलातटेन, पब, अगस्त्याचरिताम्, आशां, ययौ ॥ ४४ ॥ (टीका ) ततः (पूर्व दिग्विजयानन्तरं) अनाशास्यजयः ( पुरुषान्त- राजेयः, ) "रघुः” फलवत्पूगमालिना (फलितपूगतरुश्रेणीमता) वेलातटेन (अब्धिकूलेन ) “समुद्रतटेन” इति वा, “अध्यम्बुविकृतौ वेला" इत्यमरः, एव, अगस्त्याचरितां ('अगस्त्यसेवितां ) आशां (दक्षिण दिशं) ययौ (जगाम) ॥ ४४॥ (समासः) न अन्यैः पुरुपैः आशास्यते जयो विजयश्रीर्यस्य तः। फलवतां पूगानां मालाः सन्त्यस्मिन्निति फलवत्पूगमालि तेन । वेलायाः तटमिति वेलात, तेन । अगस्त्येन नाचरितेत्यगस्त्या- वरिता ताम् ॥४४॥ ( वाच्यपरिवर्तनम् ) अनाशास्यजयेन 'अगस्त्यावरिता आशा यये ॥४४॥ (सरलार्थः) प्रबलप्रतापः स एवं पूर्व दिशं निर्जित्य फल- ररिपूर्णपूगतरुपक्तिभिः सुशोभितेन समुद्रतटेन दक्षिण दिशं जगाम ॥४४॥ (सरलार्थ हिन्दी) विजयी राजा रघु पूर्व दिशा जोत कर (1) अगत्यो दक्षिणामाशामानित्य नभसि स्थितः । परणस्यात्मनो योगी विनयवातापिमर्दनः ।

२६० रघुवंश-महाकाव्यम् । [चतुर्थ सुपारी के वृक्षों से शोभायमान समुद्रतट से दक्षिण दिशा की ओर चता ॥४॥ स सैन्यपरिभोगेण गजदानमुगन्धिना । कावेरी सरितां पत्युः शङ्कनीयामिवाकरोत् ॥ ४५ ॥ (अन्वयः) सः, गजदानसुगन्धिना, सैन्यपरिमोगेण, कावेरी, सरितां, पत्युः, (समुद्रस्य ) शङ्कनीयाम्, इव, अकरोत् ॥ ४५ ॥ (टीका ) सः (रघुः ) गजदानसुगन्धिना (करिमसुरमिला) लैन्यपरिमोगेण (सैनिकादेर्जलक्रीडाद्यपभोगेन) “सेनायां समेवटा ये सैन्यास्ते सैनिकाच ते" इत्यमरः, कावेरी (कावेरी नाम सरितं । सरितां (नदीनां ) पत्युः ( सागरस्य ) शङ्कनीयाम् (अविश्वसनीयाम इव) "व्यभिचारिणोमिवेत्यर्थः, अकरोत् (चकार )॥ ४५ ॥ (समासः) मुष्ठ गन्धोऽस्यासौ सुगन्धिः, गजानां दानेन सुग. न्धिः गजदानसुगन्धिः, तेन । गजदानमेव सुगन्धिः यस्मिरतेनेति वा । सेनायां समवेताः सैन्याः, तेषां परिमोगः तेन । शङ्कितुं योग्या शव नीया ताम् ॥ ४५ ॥ (चाच्यपरिवर्तनम् ) तेन'""शङ्कनोया इच अक्रियत ॥ ४५ ॥ (सरलार्थः) यथा काचन कामिनी परपुरुषसम्मोगलिदैनन्न- तादिमिः स्वकान्तस्य मनसि पुरुषैतरोपभोगशामुत्पादयति तथैव रघुमैनिकानां जलमोडादिमिः तुन्धसलिला एवं ग्चुगजानां दानजलैः सुगन्धीझता सती सा कारी स्वमर्तुः समुद्रस्य सम्मोगलिङ्गदर्शनात् अविश्वसनीया जाता ॥५॥ (सरलार्थ हिन्दी) जैसे कुलटा स्त्री नखक्षतादि चिह्नों से अपने विषय में पति का अविश्वास उत्पन्न कराती है उसी प्रकार रघु राजा के सैनिकों तथा हाथियों के स्नान करने से उनके मद से मुगन्धित उस कावेरी नदी ने अपने पति समुद्र को अपने विषय में सराङ्ग बनाया ॥४५॥ बलरध्युपिताम्नम्य विजिगीपोर्गताचनः । पारीचांदभ्रान्नद्दारीता मलयादेपत्यकाः ॥ १६ ॥ (अन्वयः ) विजिगोपीः, गताचनः, तस्य (रयोः) बलः, मारी- चोदालद्दारीताः, मलयाद्रः, उपत्यकाः, अध्युपिताः ।। ४६ ।।

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मोमिनोदीपकम् । ६६३ " पाण्ड्या: पलपटने में जप गये हैं, उनमें झाले हुण रस्से बड़े बड़े यो में भी नही मायनये ॥४८॥ दिशि मन्दाय नेजी दक्षिणन्यां खेरपि । तस्यामेव रयो पाण्याः प्रतापं न विपहिरे ॥ ४६ ।। अन्ययः । दक्षिणत्या, विशि, (तु)रवः, सपि, तेजः, मन्दायते, न) पाण्डवाः, तन्याम् , (६क्षिणस्यां दिशि ) एव, राघोः, ,न, विहिरे ॥ ४ ॥ दोका )दक्षिणस्यां (सवाच्यां ) दिशि, रवेः ( सूर्यस्य ) अपि, (प्रतापः) मन्दायते ('मन्दं भवति ) परन्तु देशोन्नयाः क्षत्रियाः) तस्यां (दक्षिणस्याम् एव) "दिशि" रघोः तीपसुतस्य राजः) प्रतापं ( तेजः) “स प्रभावः प्रतापश्च यत्तेजः ण्डजम्" इत्यमरः, न ( नहि ) विहिरे) सोढवन्तः ॥ ४६॥ समासः) मन्द इव पाचरतोति मन्दायते । पाण्डूनां जनपदानां पाण्ड्यः तस्मिन् साधर इति पाण्डयाः ॥ ४६ ।। चाच्यपरिवर्तनम् ) तेजसा भन्दाच्यते, पाण्डवैः ..."रघोः नविपेहे ॥ ४६॥ व्या०) पापल्या इत्यत्र पाण्डूनां जनपदानां राज्ञान इति वाक्ये जस्य बहुषु तेनैवास्त्रियाम्" इति तद्राजस्य लुकि पाण्डव इति न्यात् ॥ ४६॥ सरलार्थ) प्रखरप्रतापस्यापि सूर्यस्य तेजः दक्षिणस्यान्दिशि भवति परन्तु तस्यामेव दिशि तद्देशीया एव राजानः रघोः सोहुं समर्था न बभूवुः, एतदतीवाश्चर्यकरं यत् सूरविज- ऽपि ससौ विजितवानिति रघोर्महानुत्को गम्यते ॥ ४६॥ सरलार्थ हिन्दी) दक्षिण दिशा में खं का भी तेज मन्द परन्तु उली दिशा में पाण्डु देश के राजाधों से रघु का तेज सहा गया ॥४॥ है १) दक्षिणायने सूर्यः सिथिलमरो भवतीति भावः ।

निविंश्य, दूरात्, उदन्वता, मुकं, स्त्रस्तांशुकं, मेदिन्या, नितम्ब (तीरेषु) आलीनचन्दनौ (चन्दनाचिंतो) तस्याः (दक्षिणमा १६९ रघुवंश-महाकाव्यम् । [चतुर ताम्रपणीसमेतस्य प्रक्तासारं महोदयः । ते निपत्य ददुस्तस्मै यशः स्वमित्र सश्चितम् ।। ५० ॥ (अन्वयः) ते, निपत्य, तस्मै, सञ्चितं, स्वं यशः, इव, ता. पाणीसमेतस्य, महोदधेः मुक्तासारं ददुः ॥ ५० ॥ (टीका ) ते (पाण्ड्याः) निपत्य (प्रणिपत्य ) तस्मै (रघवे सञ्चितं ( एकत्रीकृतं ) स्वं (निजं ) यशः (कीर्तिम् ) इव, ताम्रपा समेतस्य (ताम्रपर्णीसरित्सङ्गतस्य) महोदधेः (महासागरस्थ " सम्बन्धि " मुक्तासारं (मौक्तिकवरं) " सर्वोत्तम मुकामणिनिक मित्यर्थः " ददुः ( दत्तवन्तः) ॥ ५० ॥ (समासः ) ताम्रपा समेतः ताम्रपणींसमेतस्तस्य । मुला- सारः मुक्तासारस्तम् । उदकानि धीयन्तेऽस्मिन्नित्युदधिः, महाँबाट वुदधिश्चेति महोदधिस्तस्य ॥ ५० ॥ (वाच्यपरिवर्तनम् ) तैः निपत्य... ( सरलार्थः) ते पाण्डुदेशीया राजानः ताम्रपर्णीनदीमिलिक समुद्रस्य “सम्बन्धि" सञ्चितं मुक्तासारं, स्वकीय सञ्चितं ३ इव तस्मै रघवे प्रणामपूर्वकमुपायनोकृतवन्तः ॥ ५० ॥ (सरलार्थ हिन्दी) वे पाण्डु देशवासी राजे विनय के स- प्रणाम कर इकट्ठा किये हुए अपने यश की समान ताम्रपर्णी नदी संयुक्त महासमुद्र के पड़े २ मोती उसे देते हुए ॥ ५० ॥ स निर्विश्य यथाकामं तटेष्वालीनचन्दनौ । स्वनाविव दिशस्तस्याः शैलौ मलयद१रौ ॥ ५१ ।। असह्यविक्रमः सह्यं दूरान्मुक्तमुदन्वता । नितम्बमिव मेदिन्याः स्रस्तांशुकमलङ्घयत् ॥ ५२ ।। (अन्वयः) असह्यविक्रमः, सः, (रघुः) तटेयु, अालीनचन्द तस्याः, दिशः, स्तनौ, इव, (स्थितौ ) मलयदर्दुरो, शैलो, यथाका इव, साम्,थलबन्यत् ॥ ५१ ॥ १२॥ (टीका ) असह्यविक्रमः ( असह्यपराक्रमः ) सः (रघुः) - 'मुकासारः ददे ॥ ५०

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लग्नेन इव अभूयन। (टोका) तेन (रघुणा ) भयोत्स्ष्टविमूपाणां (भीतिपरिद गारंगमहासागमा ( टीका ) अपगतायोजन: (कोनादेशविजयो:) नाम्नु पायात्रादेशविरः" "नास्तु पासायाः' इति यादव, विसर्पतिः (अमरण गोलः) "गन्तिरित्ययः" नस्य ! रयोः ) अनी कैः (नेन्यः) "सैन्यञ्चानी कमन्त्रियाम्" इत्यमरः, अभ्यः ( सागर रामास्त्रोन्सारितः (जामदग्यात्रापसारितोऽपि ) सहानमः (समा न्यपर्वतसंलग्नः ) श्व, आसीद (अभूत्र) || (समासः) अपरम्या अन्ना इनि अपरान्नास्तेषां जयलस्मिन्न द्यतानीत्यपगन्तजयोग्रतानि नः । रामस्य शम्नं रामा, नेन म रितः। सही लग्न इति सायलनः । ५३॥ (वाच्यपरिवर्तनम् )...रामास्नीमारिन अपि अर्णवेन मा (सरलार्थः) दक्षिण दिग्विजयायं समुद्रतटेन प्रवलिठया र सेनया, परशुरामान्त्रेण सहापर्वतात् पृयकृतोऽपि समुद्रः पर्वतसँलग्न झ्यासीत् ( अनेन तस्य सैन्याधिक्यमुनम् ) ॥५३॥ (सरलार्थ हिन्दी ) पश्चिम की ओर विजयके लिये जानेवाले उस सेनासे परशुराम के अस्त्र से हटाया हुआ भी समुद्र सताने नि हुआ सा जान पड़ता था, अर्थात् समुद्र और पहाड़ के बीच को मात्र भूमि सेना मरी दीन्न पड़ती थी ॥५३॥ भयोत्सृष्टविभूपाणां तेन केरलयोपिताम् । अलकेषु चमूरेणुश्चूर्णप्रतिनिधीकृतः ॥५४॥ (अन्वयः) तेन, (रघुणा ) मयोत्कृष्टविभूपाणां, केरलयोपिटा अलकेपु, चमूरेणुः, चूर्णप्रतिनिधीहतः ॥५॥ लद्वाराणां भूपा तु स्यादकिया (केरलदेशोद्भवागनानां) अलकेषु (कुन्तलेपु) "अलकाश्चूर्णकुन्तत इत्यमरः, चमूरेणुः ( सेनाधूलिः) चूर्णप्रतिनिधीकृतः (कुदमादि जास्थानापन्नीरुतः)पटा (समासः) भयेन उत्सृष्टाः विभूपाः यामिन्ताः भयोत्तरविन तासां। चम्बा रेणुरिति चमूरेणुः । प्रतिनिधीयते इति प्रतिनि चूर्णस्य प्रतिनिधिः चूर्णप्रतिनिधिः न चूर्णप्रतिनिधिः थचूर्णप्रतिनि . इत्यमरः, केरलयोनि

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रघुवंश-महाकाव्यम् । [चतुर रघुसैनिकानां कचुकेषु निपत्य प्रयासेन विनैव वसनवासनाका विदयों ॥ ५ ॥ (सरलार्य हिन्दी ) मुग्ला नदी की पवन ले उठा हुआ केतक पुष्प का पराग बिना प्रयल के ही उसके योवानों के कवचों व सुगन्ध चूर्ण बन गया ॥ ५५ ॥ अभ्यभूयत वाहानां चरतां गात्रशिञ्जितः । वर्मभिः पवनोबूतराजतालीवनध्वनिः ।। ५६ ।। (अन्वयः) चरतां, वाहानां, गावशिखिवैः वर्ममिः, पवनोद तराजतालीवनचनिः, अभ्यभूयत ॥ ५६ ॥ (टीका ) चरतां (गच्छतां ) वाहानां (अश्वानां) गात्रगिति (सत्वरगमनवशाद् प्रैयादिभूपणयोगेन शब्दायमानः ) वन्ननि (कवचैः) पचनोवृतराजतालीवनध्वनिः (वायुकम्पिततालवृनपत्र ध्वनिः) अभ्यभूयत (तिरस्कृतः ) ॥ ५६ ॥ (समासः ) गात्रेयु शिखितानि गात्रशिजितानि तैः । वृष्वनि देहमिति वर्माणि तेः। तालीन राजानः राजवाल्यः, राजठालीन वनानि राजताली बनानि, पवनेन उद्धृतानि पवनोवृतानि पवतोबूतानि च तानि राजवालीवनानि च इति पवनोद्युतराज तालीवनानि तेषां ध्वनिः ॥५६॥ (वाच्यपरिवर्तनम् )............गात्रशिक्षितानि वम्मावि पदनो धूतराजतालीवनध्वनिम् अन्यमवन् ॥ ५६ ॥ (सरलार्थः) अतिवेगेन रघुसैनिकाश्वानां सञ्चालनात् अश्या कढ़ानां शरीरस्थलोहमयकवचेम्यः समुद्भूतो महान् “ मन मन इति शब्दः पवनसञ्चालिततालपत्रम्बनिमपि तिरस्कृतवान् ॥ ५६ ॥ (सरलार्थ हिन्दी ) घोड़ों को शोध गति के कारण शब्द उनके सवारों के कवनों ने वायु वेग से उत्पन्न तालपत्र की बनि को भी दवा दिया ॥ ६॥ खरीस्कन्धनद्वानां पदाद्वारनुगन्धिषु । कटेषु करिणां पेतुः पुन्नागेभ्यः शिलीमुखाः ।। ५७ ।।

सर्गः] सुयोधिनीटीकोपेतम् । १६३ (अन्वयः) शिलीमुसाः, पुन्नागेभ्यः, खजूरीस्कन्धनसानां, करिणां, मदोद्दारसुगन्धिपु, कडेपु, पेतुः ॥ ५७ ॥ (टोका ) शिलीमुखाः (नलयः) "अलिबाणौ शिलीमुखौ " इत्य मरः, पुन्नागेभ्यः (नागकेशरम्यः) " पुन्नागः केशरेऽशोकः" इत्यभि- धानचिन्तामणिः, सरोस्कन्धनद्धानां, (तृणगुमप्रकाण्डयद्धानां खरः केतकी ताली सर्जूरी च तद्रुमः" इति तथा इति तथा “अस्त्री प्रकाण्डः स्कन्धः स्यान्मूलाच्छाखावधेस्तरोः" इति चामरः, करिणां (गजानां ) मदोद्गारसुगन्धिपु ( मदनावतुगन्धिषु ) कटेषु (गण्डेषु) "गण्डः कटो मदो दानम्” इत्यमरः, पेतुः ( पतिताः) ॥७॥ (समासः ) शिलो ( शल्यं ) मुखे एपान्ते शिलीमुखाः। सर्जूरीणां स्कन्धेषु नद्धास्तेपाम् । मदस्य उन्नारो मदोद्गारस्तेन सुगन्धय इति मदोद्गारसुगन्धयस्तेषु ॥ ५७ ॥ (वाच्यपरिवर्तनम् ) शिलीमुखैः 'पेते ॥ ७॥ (सरलार्थः) भ्रमराः खजूरोवृक्षेषु बद्धानां रघुगजान मदजल- मुग्धाः सन्तः पुन्नागकुसुमानि विहाय हस्तिनां गण्डस्थतेषु भपतन् ।। ५७ ॥ (सरलार्य हिन्दी ) खजूर के स्कन्धों में (पेड़ों में ) बंधे हाधियों के मद के सुगन्ध से मुग्ध हुए भ्रमर नागकेसरों से उड़कर उनके कनपटियों में आ बैठे ॥ १७ ॥ अवकाशं किलोदवान् रामायाभ्यर्थितो ददौ । अपरान्तमहीपालव्याजेन रघवे करम् ।। ५८ ।। ( अन्वयः ) उदन्वान्, अभ्यर्थितः, "सन्" रामाय, अवकाश, दौ, किल, रघवे, “तु" अपरान्तमहोपालव्याजेन, फरं. ददौ ॥५८॥ (टोका ) उदन्वान् ( उदधिः “समुद्रः" "उदन्वानुदधिः सिन्धुः" इत्यमरः, अभ्यर्थितः (प्रार्थितः) “याचितः" इति पा. "सन्" रामाय (परशुरामाय ) अवकाशं (स्थान) ददौ किल (दत्तपानिति प्रसिद्धिर्वर्तते ) रघवे (राक्षे दिलीपरनवे ) "तु" अपरान्तमहीपालन्या जेन (पाश्चात्यभूपदाना ) पर (पलि ) “पलिहस्तांशयः पराः" त्यमरः, ददा (दत्तवान्)॥ ५८ ॥ गन्धेन .

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सर्गः] सुबोधिनोटोकोपेतम्। १७१ जो राजा जहाँ विजय पाता है वहाँ वह अपना एक विजयस्तम्भ खड़ा करता है और उसमें उत्तके पराक्रम लिखे जाते हैं परन्तु यहाँ उसने वैसा न लिखकर उस पर्वत में अपने हाधियों के दाँतो से खुदे हुए गड्डों ही को पराक्रम का चिन्ह माना ॥ १६ ॥ पारंसीकांस्ततो जेतुं प्रतस्थे स्थलवर्त्मना । इन्द्रियाख्यानिक रिप॑स्तत्वज्ञानेन संयमी ॥६०॥ (अन्वयः) ततः, संयमी, सः, तत्वज्ञानेन, इन्द्रियावान्, रिपून्, व पारसीकान्, जेतुं, स्थलवमना, प्रतस्थे ।६०॥ (टोका ) ततः (त्रिकूट पर्वतरुपजयस्तम्भस्थापनानन्तरं) संयमी, योगी) सः ( रघुः) तत्वज्ञानेन ( परमतत्वावबोधेन) इन्द्रियाख्यान इन्द्रियाभिधान् ) रिपून ( शत्रून् ) इव, पारसोकान् (पारलदेश- मिपान ) "सिन्धुतटवासिनो म्लेच्छभूपतीन्" इति वा, जेतुं (बशी- तुं) स्थलवमना (स्थलमार्गेण ) “नयनं वर्त्म मार्गाव" इत्य. र:, प्रतस्थे (चलितः) ॥६०॥ (समासः ) संचमोऽस्यातीति संयमी। स्थलञ्च तहन स्थलबम न। इन्द्रियाणि पाल्या चेपां ते तान् । तत्वस्य पानं तवानं नि ॥६०॥ (वाच्यपरिवर्तनम् ) ततः तेन संयमिना......॥६०॥ (सरलार्थः) यचा किल कश्चन योगो परमतत्त्वावबोधेन दुर्लया. पि इन्द्रियर. न् महाशत्रून् जयति तथैव अलौ रघरपि लिन- वासिनो म्लेच्दनृपतीखेतुं स्थलमार्गेण जगाम ॥ ६०॥ (सरलार्थ हिन्दी । इसके बाद जिस प्रकार योगो इन्दिरा हाशत्रुओं को जीतने के लिये तस्यान के मान का लन्दन करने , उसी प्रकार रघु ने पारतोस.देशों को जीतने के लिये रपट मार्ग अवलम्बन रिया ॥६॥ यवनीमुखपमानां सहे. मधुमदं न सः । वालानपपिवानानामकालजलदोदरः ॥६॥ समुहपानाय धर्मर दिनविश्वनाम।

रघुवंश-महाकाल [चतुर्थः (अन्वयः )सः (रघुः) जलजलदोत्या, अजानां, गालात. पम्, इव यवनीमुनपानां, गगन, न, सो ॥२॥ (टोका ) सः ( रघुः ) शकालजलदोदयः (असमयमेयोदयः) अजानां ( कमलानां ) " सम्बन्धिनं " गालारा ( कोमलातपं) इव, यवनीमुखपणानां (यवनदेशीयकामिनीमुगकमलाना) मजुमदं (मदिरा- पानजनितां धीवता) न सेहे (न चामे ) ॥२॥ (समासः ) जलानि ददतीति जलदास्तेषाम् उदय इति जलदो दयः, न कालः अकाला, अकाले जलदोदयः अकालजलदोदयः। अप्सु जातानि अन्जानि, तेषाम् । मुखानि पमानि श्वेति मुखपमानि, यवः नीनां मुखपमानि, तेषाम् । मधुनः ( मद्यस्य ) मदस्तम् ॥६॥ (पाच्यपरिवर्तनम् ) तेन......"मधुमदः न सेहे ॥६॥ (सरलार्थः ) यथा अनवसरे घनघटाडम्बरःविकसितकमलसम्ब. "न्धि स्वल्पमपि सौरातपं न सहते तथैव रघुरपि पारसदेशीययवनस्त्री- मुखकमलानां मदिरापानजनितां क्षीयतां न सोढवान् ॥६१॥ (सरलार्थ हिन्दी ) असमय में आक्रमण करने वाले रघु मधुमद के द्वारा यवनी स्त्रियों के मुखपद्मों को विकसित नहीं होने दिया। जिस प्रकार असमय में उठा हुआ मेघ वालातप के द्वारा कमलों को विकसित नहीं होने देता ॥६१॥ सनामस्तुमुलस्तस्य पाश्चात्त्यैरवसाधनैः । शाकूजितविज्ञेयमतियोघे रजस्यभूत् ।। ६२ ।। (अन्वयः) तस्य, अश्वसाधनैः, पाश्चात्त्यैः, " सह " शाईजि- -तविज्ञेयप्रतियोधे, रजसि, तुमुलः, सङ्ग्रामः, अभूत् ॥६२॥ (टोका ) तस्य (रघोः) अश्वसाधनैः (तुरङ्गसाधनः ) पाश्चा- त्यैः (यवनः) सह (साधं) शाकूजितविशेयप्रतियोधे (चापटङ्कारानु मेयप्रतिभटे ) रजसि (धूलो ) तुमुलः ( सङ्कुलः) “तुमुलं रणसङ्कुले" इत्यमरः, सङ्ग्रामः (युद्धं ) अभूत् ( बभूव ) ॥६॥ (समासः) अश्वाः साधनं सेनाएं येपान्ते अश्वसाधनास्तैः। शृङ्गाणां विकाराः शाणि तेषां जितैः, विज्ञेयाः (विज्ञातुं योग्याः) ने सर्गः] सुबोधिनोटोकोपेतम् । प्रतियोधाः (प्रतियुध्यन्त इति प्रतियोधाः ) यस्मिन् तत् तस्मिन् । पधाद्भवाः पाश्चात्त्यात्तः ॥६२|| (वाच्यपरिवर्तनम् ) तल्य" तुमुलेन सडझामेण अभावि ॥ ६२॥ - (सरलार्थः) तस्य रघोः, अश्वलाधनसम्परैः यवनदेशीयन्तेच्छा नरपतिभिः सह भयङ्करः संन्नामः बभूव यत्र व स्वपक्षस्य परपक्षस्य वा परिचयः केवलं प्रत्यञ्चानिघोपेलैव जायतेम ॥ ६२॥ (सरतार्थ हिन्दो) घोड़ों पर चढ़ कर तड़ने वाले परिश्रम देश वासियों के साथ रघु का भयङ्कर युद्ध हुआ जिसमें आताश में उड़ी हुई युद्ध की धूल के नन्धेरे में शत्रु पक्ष और अपने पक्ष के सर केयत धनुप को रक्षार से जाने जाते थे ।। ६२ ॥ भल्लापवर्जितैस्तेषां शिरोभिः श्मश्रुलैर्महीम् । तस्तार सरयाच्याप्तः स क्षौद्रपटलैरिव ।। ६६ ।। (अन्वयः) सः, ( रघुः ) सरथान्यातः, जौपटतः, इ. (लक्ष्यमाणैः) भल्लापयर्जितः शमलैः तेषां शिरोभिः, नहीं, तस्तार।। ६३ ॥ (टोका ) सः (रघुः) सरधान्यातैः (मधुमक्षिकावेशितः) भरमा मधुमक्षिका" इत्यमरः, शौद्पटलैः (मधुसमूहः) व "लयमा मलापवर्जितः (अर्धचन्द्राकृतियाणविशेषतः) मलः (मा. व्याप्तः) तेप (पाश्चात्यदेशवासिनां ) गिरोभिः (मन) (पृथ्वीं) तस्तार (माधादयामास)॥ ६३ ॥ (समासः) सरदाभिः च्याप्तानि रति सम्मान ! मणि विचन्ते तानि ममतानिः। मभिः Ar: हतानि शौद्रागिनेषां पटलानितः। भास्पदजिला ि :: । (पाच्यपरिपतनम् ) ग.."मी मरे । ६६ ।' समताः ) रघुः महिलालानि तप सहितानि यदनस्पतिमिलि भालदार है: मान्दादमागम । वाया मानना नरेशाचारोतिः ।। .

२७४ मा [ननु : " इत्यर्थ (सरता हिन्दी ) सुने fil से गरे दुग मन के लचों समान, भाती से काटे हुए शत्रुओं वालोनाले मिग से पर हाँकदी ।। १३ ॥ अपनीतशिरखाणाः शेवास्तं शरणं गयुः । मणिपातमतीकारः रम्भी हि महात्मनाम् ॥ ६४ ॥ (अन्वयः) शेषाः, ( यवनाः) अपनीतशिरस्त्राणाः, (सन्तः तं, (रघु) शरणं, ययुः, दि, (यतः) महात्मनां, संरम्भः, प्रणिप तप्रतीकारः, (भवति ) ॥ ४ ॥ ( टोका) शेषाः (इतावशेषाः) “पाश्चात्या यवनाः अपनीतशिरस्त्राणाः (अपसारितशीर्षण्याः ) " सन्तः तं ( रघु शरणं ( रक्षक, ) ययुः ( प्रापुः ) "रघुम् यात्मनः रक्षक मत्वा तनिक समागताः" हि ( यतः ) महात्मनां (महानुभावाना ) संरम्म (कोपः, प्रणिपातप्रतीकारः (प्रणत्यपनेयः) भवति ।। ६३ ।। (समासः) शिरः प्रायतेऽनेनेति शिरस्त्राणं, अपनीतं शिरस्त्रा यैस्ते । महान् आत्मा येषां ते महात्मानस्तेपाम् । प्रणिपात एवं प्रत कारो यस्य सः॥ ६४॥ (वाच्यपरिवर्तनम् ) शेपैः अपनीतशिरस्त्राणैः (सद्भिः) सः शर 'यये। हि"संरम्भेण प्रणिपातप्रतीकारेण भूयते ॥ ६ ॥ (सरलार्थः) महानुभावानां क्रोधः प्रणत्या पव दूरीभवती सम्यग्विचार्य हतावशिष्टा यवनाः उपणीपरहितमस्तकाः सन्तः प्राण संरक्षणार्थ रघु शरणमागताः ॥ ६४ ॥ (सरलार्थ हिन्दी ) युद्ध से वाकी बचे यवन, पगड़ी उतार क रघु के शरण गये। क्योंकि महात्माओं का क्रोध शरण जाने से ह .. दूर होता है । ६४॥ विनयन्ते स्म तद्योधा मधुभिर्विजयश्रमम् । आस्तीर्णाजिनरत्नासु द्राक्षावलयभूमिपु ॥ ६५ ।। (अन्धयः) तद्योधाः, श्रास्तोर्णाजिनरत्तासुः द्राक्षावलयभूमि मधुभिः विजयश्रम, विनयन्ते स्म ।। ६५ ।।

सर्गः] सुबोधिनोटोकोपेतम् । १७५ (टोका ) तयोधाः ( रघुमटाः ) वास्तीर्णाजिनरतासु (प्रलारि- तचर्मश्रेष्ठासु ) द्राक्षावलयभूमिः (द्राक्षावेष्टितमण्डपेषु) ( मधुभिः ) (द्राक्षाफलप्रकृतिकः, ) "मोः” इत्यर्थः, विजयनमं (विजयखेदं ) “संग्रामखेदं" इत्यर्थः विनयन्ते स्म (दूरोकुर्वन्ति स्म ) ॥ ६५ ॥ (समासः ) तस्य योधाः तद्योधाः । अजिनेषु रत्नानि प्रजिनर- बानि आस्तीर्णानि अजिनरत्नानि यासु ताः तासु। द्राक्षाणां वल- यानि दातावलयानि, द्राक्षावलयानां भूमयो द्राक्षावल्यभूमयस्तासु । विजयस्य श्रमो विजयश्रमस्तम् ॥ ६५ ।। (वाच्यपरिवर्तनम् ) तद्योधैः..... विजयश्रमः विनीयतेस्म ॥६५॥ (सरलार्थः) युद्धधान्ताः रघोः सैनिकाः प्रजिनासनानि भास्तीर्य तत्र सुखोपविष्टाः सन्तः सरलाऽसवपानेन श्रममपनीतवन्तः ॥६५॥ (सरलार्थ हिन्दी) उसके सैनिकों ने विजयश्रम की थकावट अच्छे चमड़े बिछी हुई भूमि में, मदिरा के पान से मिटाई ॥ ५ ॥ ततः प्रतस्थे कौवेरी भास्वानिव रघुर्दिशम् । शरैलरिवोदीच्यानुचरिष्यन् रसानिव ।। ६६ ।। (अन्वयः) ततः, भास्वान् , इव, रघुः, उन्नैः, इव, शरैः रलान् , दव, उदीच्यान, उद्धरिष्यन् कोयरी, दिश, प्रतस्थे ॥ ६६ ॥ (टोका ) ततः= पाश्चात्यविजयानन्तरं, भास्वान् = सूर्यः, इच, रघुः, उन्नः (किरणैः)इव, शरैः (बाणैः) रसान् (उदकान् ) इव, उदी. ध्यान् (उदगिम्भवान् ) "नृपान्' उद्धरिप्यन् (उन्मूलयिन्यन् ) सूर्यपः-(संशोपयिष्यन् ) कौवेरों (कुबेरसम्बन्धिी) दिशं (काष्टां) *दिशस्तु ककुमः काष्टाः" इत्यमरः, प्रतस्थे (चलितः)॥ ६६ ॥ (समासः ) उदीच्यां भवास्तान् । कुबेरस्य यं कौरो ताम्॥६६॥ (वाच्यपरिवर्तनम् ) भास्वता रघुणा..."रिम्यता फौबेरी दिक् प्रतस्ये ।। ६६ ॥ (सरलार्थः ) यथा सूर्यः प्रखरकिरलैः जलानि जोपयति तथैव अलावपि उत्तरदिग्भवानां भूपानां निजतेजोरश्मिभिः शोपलाय उदीची दिशं प्रस्थितः ॥ ६६ ॥ (सरलार्थ हिन्दी ) फिर जैले सूर्य, जल को अपनी प्रसर किरण [चतुर्थः १७६ रघुवंश-महाकाव्यम्। से खींचता है उसी प्रकार रघु उत्तर देशवासियों को अपनी ओर खींचता दुथा उत्तर की ओर चला ।। ६६ ।। विनीताध्वश्रमास्तस्य सिन्धुतीरविचेष्टनैः । दुधव॒र्वाजिनः स्कन्धल्लिनकुङ्कमफेसरान् ॥ ६७॥ ( अन्वयः ) सिन्धुतीरविचेष्टनैः, विनीताध्ययमाः, तस्य, वाजिनः, लग्नकुमकेसरान् , स्कन्धान , दुधुवुः ॥ ६७ ॥ ( टीका) सिन्धुतीरविचेप्टनैः (सिन्धुनद्तटाङ्गपरिवर्तनः) विनीताध्ययमाः (अपनीतमार्गखेदाः ) तस्य (रघोः) थाजिनः (अश्वाः ) लग्नकुटुमकेसरान् (संलग्नकुटुमकिअल्कान् , ) स्कन्धान (कायान् ) "स्कन्धः प्रकाण्डे कार्यऽसे विज्ञानादिपु पञ्चमु" इति हैमः, दुशवः ( कम्पयन्ति स्म ) ॥ १७ ॥ (समासः ) सिन्धोस्तीरं सिन्धुतीरंतत्र विचेष्टनानि तैः । अध्यनः श्रमोऽसश्रमः, विनीतः अध्यश्रमो यस्ते । कुङ्कुमानां केसराः कुकुमकेस- गः, लग्नाः कुशुमकेसरा येषु तान् ॥ ६७ ॥ (वाच्यपरिवर्तनम् ) तस्य' "लग्नकुटुमसराः दुविर ॥१०॥ ( सरलार्थः) सिन्धुनदस्य नीरे अपरिवर्ननः अपनीतश्रमा सन्नः रघोरश्वाः गुदमकमारसंलग्नान् स्कन्धान पुनः पुनः घु: मन ॥१७॥ ( मारता हिन्दी ) मिन्धुनद के तट पर लोटने से रघु के घोड़ों न मार्ग की शकापट मिटाकार कसर लगे हुए कन्धे भाडे ॥ ६७ }} नत्र दृणावरोधानां पतंग व्यक्तविक्रमम् । स.पानपाटलागि वमृय ग्घुष्टितम् ।। ६८ ॥ (अन्वयः । नत्र, मनेर, यायिक, गति, गावधाना, लगाटलागि, म || || (हाथ (माया) मा (म्यामि) fact ( प्रकटपणाम ) पनि (ग्नुल्या) gणाघाना सर्गः] १७७ सुबोधिनोटोकोपेतम्। (हसान्तःपुरस्त्रीणां ) "अवरोधस्तिरोधाने राजदारेषु तद्गृहे" इति मेदिनी, कपोलपाटलादेशि (कपोलरक्तवर्णस्वकं ) बभूव (आसीत् ) ॥ ६८॥ (समासः ) व्यक्तः विक्रमो यस्य तत् । रघोः चेष्टितमिति रघु- चेष्टितम् । हणानां (हणाभिधेयदेशनिवासिक्षत्रियाणाम् ) अवरोधा- स्तासाम् । कपोलयोः पाटलः कपोलपाटलः, तम् आदिशतीति कपोलपाटलादेशि ॥ ६ ॥ (वाच्यपरिवर्तनम् ) तत्र......व्यक्तविकमेण रघुचेष्टितेन...... कपोलपाटादेशि बभूवे ॥६॥ (सरलार्थः) रघुः तस्यान्दिशि हणदेशाधिपान्तःपुरस्त्रीणां स्वामिनो निर्जित्य निजप्रचण्ड पराक्रमं प्रकटयन् तासां कपोलान् रक्तद्युतीन् चकार अर्थात् हण्योषितः फुचकपोलतानपूर्वकम् अरुदन् ॥६॥ (सरलार्थ हिन्दी ) उस दिशा में राजाओं को मारकर रघु ने से भयङ्कर पौरूप दिखलाया इससे उस देश (तुर्क इहलेण्डादि म्लेच्छ देश ) की ललनानों के पतिवियोग के कारण अधिक गेन से उनके कपोल लाल २ हो गये ॥८॥ काम्बोजाः समरे सोडें तस्य वीर्यमनीश्वराः । गजालानपरिलिष्टरक्षोटेः सार्धमानताः ॥६९॥ (अन्ययः) काम्बोजाः, समरे, तस्य, (मघोर) रिकाम, गरम, अनीश्वराः, (सन्तः) गजालानपरिशिष्टः, पक्षो माग (बभूवुः) ॥६॥ (टोदा) फाग्दोजाः (पाग्योजावासिलो ! + (संभामे) नरय (REE ) किम (पास) सोदर, ! : सनीयता (समर्धाः) " : " गजाता ... तिः) (द) सार्थ (साद ! - कम (ना जाना) (Ear) treenaw REE नजामाला प!ि , --

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सर्गः] सुबोधिनीटीफोपेतम् । १७६ (सरलार्थ हिन्दी ) कारबोज देश के नरपतियों ने अच्छे २ घोड़े तथा सुवर्ण की राशियाँ रघु को नजर की परन्तु इतना प्राप्त करने पर भी उसको गर्व नहीं हुधा ।। ७० ।। ततो गौरीगुरुं शैलमारुरोहाश्वसाधनः । वर्धयन्निव तत्वानुद्भूतैर्धातुरेणुभिः॥ ७१ ॥ (अन्वयः ) ततः, चाश्वसाधना, ( सः, रघुः ) गौरीगुरुं, शैलम् , उद्धृतैः, धातुरेणुभिः, तत्कटान्, वर्धयन, इव, मारुरोह ॥१॥ (टीकाः ) ततः (तदनन्तरम् ) अश्वसाधनः (तुरमात्रसहायः) 'सन्” “सः रघुः" गौरीगुरुम् (उसापितरं ) शैलं (हिमाचलं ) उद्धृतैः ( अश्वखुरोत्थापितैः) धातुरेणुभिः (गौरिकादिधातुधूलिभिः) तत्कूटान (हिमाद्रिाणि ) "कूटोऽस्त्री शिखरं शृङ्गम्" इत्यमरः, वर्धयन् ( संवर्धयन् ) इव, आरुरोह (अध्यासढवान् ) ॥७१॥ (समासः) अश्वः साधनं सेनाङ्गम् यस्याऽसौ प्रश्वसाधतः। गौर्या गुरुः गौरीगुरुः तं । धातूनां रेणवो धातुरेणवस्तैः धातुरेणुभिः । तल्य रुदास्तत्कूटास्तान् । वर्धयतीति वर्धयन् ।।७।। (सरलार्थः) ततोऽश्वसहायो रघुः पर्वतीयान् कोलमिल्लाजेतुं यदा हिमाचलमारोह तदा अश्वखुरन्यालोत्थापितप्रभूतरिकादि- धातुधूलिदर्शनात हिमाचलशिखरस्य वृद्धिनमो जातः ।। ७१ ।। ( सरलार्थ हिन्दो ) उसके उपरान्त घुड़सवारों के साथ यह रघु हिमालयपर चढ़ा। उस समय इतनी धूल उड़ो कि जिसले पर्वत का शिखर ऊँचा होता ता मालूम होने लगा ॥ ७१ ॥ शशंस तुल्यसत्वानां सैन्यघोपेऽप्यसम्भ्रमम् । गुहाशयानां सिंहानां परित्यावलोकितम् ॥७२।। (अन्वयः ) तुल्यसत्वानां, गुहाशयानां, सिंहानां, परिश्त्य, अर. लोकितम् , सैन्यघोपे, अपि, असन्द्रमम् , शशंस ॥ ७२ ।। (टीका) तुल्यसत्वानां ( सैन्यसमानदलाना ) गुहाशयानां (कन्द रानिद्रितानां) सिंहाना (मृगेन्द्राणां) "सिंहो मृगेन्द्रः पञ्चायो हर्वक्षः केसरी हरिः" इत्यमरः, परिवृत्य (प्रीयां मोहत्य ) सटोरित

रघुवंश-महाकाव्यम् ।
[चतुर्थः
(अवलोकनं ) "शयित्वैवावलोकन" सैन्यघोपे (सैन्यगर्जने ) अपि,
"सम्मकारणे सत्यपि” असम्नमं (अन्तःक्षोभशून्यत्वं ) शुशंस
(कथयामास) ॥२॥
(समासः ) तुल्यं सत्यं येपान्ते तुल्यसत्वास्तेपां! गुहासु शेरत
इति गुहाशयास्तेपाम् । सेनायां समवेताः सैन्यास्तेषां घोपः तस्मिन् ।
न लस्नमोऽसम्नमस्तम् ।।७२।।
(वाच्यपरिवर्तनम् )...अवलोकितेन...असम्भ्रमः शशंसे ।
( सरलार्थः ) महावला गुहाशयाः सिंहाः भयोत्पादकं रघुसना.
कलकलं श्रुत्वाऽपि निर्भयाः सन्तः स्वस्थानादेव ग्रोवां वक्रीकृत्य
निजान्तःक्षोभशुन्यत्वं प्रकटयामासुः ॥७२॥
(सरलार्थ हिन्दी ) गुफा में रहनेवाले समान बलवाले सिंहाँ
को सेना के कसफल में भी लापरवाहो के साथ गरदन टेढ़ीकर
देखना उनके निर्भयपना को जनाता हुश्रा ||७||
भूपु मर्मरीभूताः कीचकध्वनिहेतवः ।
गगाशीकरिणो मार्गे मरुतस्तं सिपेविरे ।। ७३ ।।
(अन्वयः) भूजपु, मर्मरीभूताः, फीचकध्वनिहेतयः, गंगाशी-
कारिणः, मगनः, मार्ग, तं ( रघु ) निपेचिरे ॥ ७३ ।।
( टीका ) मृजेंषु ( भूर्जपत्रेषु ) ममंगभूनाः ( मर्मरशब्दकारिणः)
कीचकव्यनिहतवः (घेणुविशंपशुब्दकारणीभूताः ) गंगाशीकरिणः
( गंगाम्युकावादिनः ) मरुतः (बाययः) मार्ग ( पथि ) नं (j)
विविर ( सविनयन्तः ) ॥ ७३ ।।
(ममायः ) घनेहनव इनि बनिनयः, कोचकानां ध्वनिलय
निकीचयनिरंतवः। गीकाः सन्यपाल शीकरिगः, गहायाः
गीगा इति गदायोकारिगाः । न मर्मग अमर्मराः, अमर्मगः
मग मरयमाना इनि मम्मंगमृताः ॥३०॥
। प्राच्यविनम ) ममंग कीचकवनिमः गंगाशी-
मिनिमनिमामि ॥ ॥

सर्गः] - .. सुबोधिनोत्रोकोपेतम् । (सरलार्थः) पथि शुष्फभूर्जपनेषु मर्मरशब्दं कुर्वन्तः, वंशविव- रेषु मधुरध्वनिम् उत्पादयन्तः, जान्हवोजलकणांव सञ्चारयन्तो मान्यशैत्यसौगन्ध्यविशिष्टा वायवः रघाः मार्गखेदम् अपानयन् ॥३७॥ (सरलार्थ हिन्दी ) मन्द २ और शीतल तथा सुगन्धित वायु रघु को सेवा करती हुई ॥७३॥ विशश्रमुर्नमेरूणां छायास्वध्यास्य सैनिकाः । दृपदो वासितोत्सना निपण्णमृगनाभिभिः ।। ७४ ॥ (अन्वयः ) सैनिकाः, नमेरुणां, छायासु, निपण्णमृगनाभिभिः, वासितोत्सङ्गाः, पदः, अध्यास्य, विशश्रमुः ॥ ७४ ।। (सरोका ) सैनिकाः ( सैन्याः) नमेरुणा ( देवनागोलरवृक्षाणां) दायासु (अनातपेषु) "वृक्षपत्रावृतप्रदेशेषु' इति वा, निपण्णमृगनाभि- भिः ( पापाणोपविष्टकस्तूरी मृगनाभिभिः) "उपविष्टकस्तूरीमृगमदैः', इति वा, वासितोत्तगाः (सुगन्धिततलाः) पदः (पाषाणान् ), अध्यास्य (अधिष्ठाय ) विशश्रमुः (श्रममपनोतवन्तः) ॥७॥ (समासः) निषण्णाश्च ते मृगाच इति निषण्णमृगाः, तेषां नाम- यस्तैः । सेनायां समवेता सैनिकाः । वासिता उत्सझा येषां ते ॥७॥ (वाच्यपरिवर्तनम् ) सैनिकैः...."विशश्रमे ॥७॥ सरलार्थः) रघुसैनिकाः नागकेसरवृक्षाणं छाया मृगना- भिसुवासितानि पाषाणतलानि (चहान इति भाषा) मार्गधमापन- यनार्थम् अधिष्ठितवन्तः ॥७॥ (सरलार्थ हिन्दी) योधात्रों ने नागकेसर को छाया में हरिण को नाभि से लुगन्धित चट्टानों पर विधाम किया ॥७॥ सरलासक्तमातगवेयस्फ़रितत्विपः । आसन्नोपधयो नेतुनक्तमस्नेहदीपिकाः ।।७।। (अन्वयः) सरलासत्तमातवेयस्फुरितत्विपः, सोपधयः, नेतुः, (रयोः ) नक्तम्, अस्नेटदीपियाः, आसन् !!!! (टोका ) सरलासतानातवेयस्कुरितत्यिप (देवदारसंसा- करिकण्ठलारफुरितभासः ) योषधयः (ज्वलज्योतिर्तताविशेषाः) [चतु रघुवंश-महाकाव्यम्। नेतुः (रघोः ) नक्तं (राचौ) अस्नेहदीपिकाः (तैलरहितप्रदीपा- आसन् (अभूवन् ) ॥७५॥ (समासः ) श्रीवासु भवानि वेयाणि, मातङ्गानां नैवेयानि माता याणि, सरलेषु पासतानि च तानि मातङ्गनैवेयाणि इf लरलासक्तमातङ्गनैवेयाणि तेपु स्फुरिताः विपो यासान्ताः। ओषा (दीप्तयः) धीयन्तेऽत्योषधयः । दीपा एव दीपिकाः, न स्नेह इत्यस्नेहा अस्नेहाश्च ता दीपिकाश्चेत्यस्नेहदीपिकाः ॥७॥ (वाच्यपरिवर्तनम् ) सरलासक्तमातङ्गवेयस्फुरितविभि ओपधिभिः..."अस्नेहदीपिकाभिः अभूयत ॥५॥ (सरलार्थः) तत्र निशायां देदीप्यमाना वनौषधयः देवदारुत रसम्बद्धगजानां फण्ठवन्धनेपुरंखलादिपु प्रतिस्फुरितकान्तयः सत्यः रघोर्दीपावलीकार्यमकुर्वन् ॥५॥ (सरलार्थ हिन्दी) देवदारु के वृक्षों से बँधे हुए हाथियों के गले की सिघाड़ों में चमकती हुई जङ्गल की बूटियाँ रात में उस रघु की बिना तेल की दीपिका (दीयों की कतार) बनी ॥७५|| तस्योत्सप्पनियासेपु कण्ठरज्जुक्षतत्वचः। गजवर्ण किरातेभ्यः शशंसुर्देवदारवः ।।७।। ( अन्ययः) तस्य ( रघोः) उत्सृष्टनिवासेपु, कण्ठरज्जुक्षतत्वत्रः, देवदारयः, किरातेभ्यः, गजवर्म, शशंसुः, १७६॥ ( टीका ) तभ्य ( गघोः ) उत्कृष्ट निवासेषु (त्यक्तसेनानियेशेषु) कण्टगानुसातत्वचः (अंग्रलाक्षतोपरिमागाः) देवदारयः (सरलवृक्षाः) किगतेभ्यः (पुलिन्देभ्यः ) “मेदाः किरातशवरपुलिन्दा ग्लेच्छ जातः यः” इत्यमरः, गजवर्म (गजदेहप्रमाणं) “वर्म देहप्रमागायो" इत्यमरः, शत: (कथयामासुः ) ॥६॥ ( ममामा ) उटामा निवामान बरामनियासारतेषु । कण्ठान गजब: फण्टा नवरना बानाः स्यची येषां ने। गम्य बर्म गजवदा ( याच्याग्विदनम) 'कानुनमः देवदामिः "181 ।

सर्गः] योगिनतीनोग १८३ ( मरतायः) मा पनिया सेनानियोपु तत्य देव- दारकन्धे गमलामानि मराजानी देवोनत्यम् अप्रकारायन ।। ७६॥ (सरलार्ध हिन्दी ) पाशों के छोड़ने पर रघु के हाथियों को स्वाई गले के सिपाही से छिती हुई छाल वाले देवदारु वृक्षों ने ही किरातों को बताई ॥ ७६ ॥ तत्र जन्यं रघो? पर्वतीयगणैरभूत् । नाराचक्षेपणीयारमनिप्पेपोत्पतितानलम् ॥ ७७ ॥ (अन्वयः) तम, रघोः, पर्वतीयः, गणैः, (सह ) नाराचक्षेप- सोयाश्मनिप्पेपोत्पतितानलम्, घोरं, जन्यम्, अभूत् ॥ ७ ॥ (टीका ) तत्र (हिमाचले) रघोः, पर्वतीयैः (पर्वतनिवासिभिः) गणैः ( उत्सवसङ्केताल्यैः सप्तभिः) "सह" नाराचक्षेपणीयाश्मनिष्पे- त्पतितानलम् ( लोहयाणपापाणशकलसङ्घर्षोत्थितवहिं ) “पापाण- स्तरमावो पलाश्मानः शिला दृषत्" इत्यमरः, घोरं ( भयङ्करं ) युद्धमायोधनं जन्यम् इत्यमरः, अभूत बभूव ) ॥ ७॥ (समासः) पर्वते भवाः पर्वतीयास्तैः । नारावाश्च क्षेपणीया रश्मानश्च नाराचक्षेपणीयाश्मानः तेषां निप्पेपेण उत्पतिता अनला स्मिस्तत् ॥ ७॥ ( वाच्यपरिवर्तनम् )"नाराचक्षेपणीयाश्मनिप्पेपोत्पतितानलेन रेश जन्येन अभावि ॥ ७ ॥ (सरलार्थः) तत्र पर्वतीयैः भिल्लादिभिः सह रघोोरं युद्ध भूव रघुक्षिप्तानां घाणानां भिल्लादिनिक्षिप्तानां पाषाणानां च अन्योन्य- घर्पणात वह्नयः प्रादुरासन् ॥ ७ ॥ (सरलार्थ हिन्दो) रघु का पहाड़ो लोगों से घाण और गोफनों के पत्थरों को रगड़ ले उठो हुई अग्निवाला भयङ्कर युद्ध हुआ Ish न्यं (युद्ध) 1 गानुत्तवसटकेतानजयत्तप्त पाण्डवः । महाभारतम् ।

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[चतुर्थः रघुवंश-महाकाव्यम् । ( सरलार्थः) सः अनेन प्रकारेण हिमाद्रौ यशोराशि संस्थाप्य, कैलासमगत्वा तस्य लजां समुत्पादयन्निव अवततार ॥२०॥ (सरलार्थ हिन्दी ) वहाँ अपने यश की राशिस्थापन कर वह रावण के उठाये हुए कैलास की ओर न जाकर उसे लजित सा करता हुआ उतरा ॥८॥ चकम्पे तीर्णलौहित्ये तस्मिन्माग्ज्यौतिपेश्वरः । तद्गजालानतां प्राप्तैः सह कालागुरुद्रमैः ।।८१॥ (अन्वयः) तस्मिन्, तोर्णलौहित्ये, "सति" प्राग्ज्यौतिपेश्वर। तद्गजालानता, प्राप्तः, कालागुरुद्रुमैः, सह, चकम्पे ॥१॥ (टीका) तस्मिन् ( रघौ) तीर्णलौहित्य (अतिक्रान्तब्रह्मपुत्रे “सति” “लौहित्यं लोहितत्वे च क्लीवं पुंसि वदान्तरे" इति मेदिनी, प्राग्ज्यौतिपेश्वरः ( कामरूपजनपदेश्वरः ) तद्गजालानता (रघुकरिवन्धनस्तम्भतां ) प्राप्तः ( सम्प्राप्तः ) कालागुरुद्रुमैः ( कृष्णा गुरुपादपैः) सह (सार्क) चकम्पे ( कम्पितवान् ) ॥८॥ (समासः) तीर्णो लौहित्यः (ब्रह्मपुत्रो नाम नदः) येन असो तीर्णलौहित्यस्तस्मिन् । ईशितुं शोलम् अस्य असावीश्वरः, प्राग्ज्योति पाणामीश्वर इति प्राग्ज्यौतिपेश्वरः । श्रालानस्य भावः आलानता तस्य गजा इति तद्गजाः, तेषाम् पालानता ताम् । कालागुरूणां द्रुमा इति कालागुरुगुमास्तैः ।।८१॥ ( सरलार्थः) यदा रघुः ब्रह्मपुत्रनदमुत्तीर्य प्राग्ज्यौतिषं देश ( कामरूपं ) सम्प्राप्तः तदा कालागुरुतस्यद्धानां रघुगजानां साला कर्षणधर्पणादिभिः यथा वृक्षाः कम्पितवन्तः तथैव तद्देशाधिपोऽपि चकम्पे ॥८॥ ( सरलार्थ हिन्दी ) उसके लोहित्या नदी के पार उतरने पर प्राग्ज्योतिष देश ( कामरूप ) का राजा, रघु के हाथी बाँधने के स्तम्मरूप हुए कातागुम्वृतों के साथ ही थरथराया ॥८॥ मात्र महाभाग शान्तनो कुलनन्दन ! अमावाग सम्भून पाप लोहिय में हर ॥ इति पुराणम् ।

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গাঙ্গানে। {} {:} মন্টি (গলবিললি? ৫ মিনি:"লিয়ন, বিলিন (খ্রিষমে। ৭। } “ঘণঃ নাবা: মে, মা { } • {:} গান (নাম) হয় (যথা) বা (নমন} :: { } বিনাবি লাগা )মনি। । { গান:} বিহ তথনীদি বিডি নমু। শ কৃষি ৭ । গাল মুনি মৃণা। ৫ । নননন ননন: লিলি : শাৰ ? n: ) সান মাস গণকামু tr? । নাবি ধনাগার্ন পাংশ * - ( q নিহানিপ্লাম মাগন *7 ?? : ?? ;? ; রাজ্য লাল, E}} ????? : ? গণ তাণান্ত ৭ {s.??? ????? ? ? ? ? ? ? কি ? 77 7fri- } {{: {{{{{াণ। fিfer! *{{{{{{:} {{} * * * * } : ১৫:, 7, 8, “" for -r...: •1) ft: গ. ৫, ৭৫৮rণা * - . - - *** ' * * *: {{ , এই { ??? ? * ::.: । ' • ?? : ?? :: : * '৫. | "" .. . !, পণ্য * , **..... }

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१६२ रघुवंश-महाकाव्यम् । [चतुर्थः पुपरसपरागगौरवणं ) “मकरन्दः पुष्परसः” इत्यमरः, चक्रः (कृत. (समासः) भातपात्वायत इत्यातपत्त्रं,रेखा एव ध्वजश्च कुलिरात्र शातपत्तोति रेखाध्वजकुलिशातपत्राणि, तानि चिहानि यस्मिन् तत् । लन्धुं योग्यं लभ्यं प्रसादेन लभ्यमिति प्रसादलभ्यम् । सम्यक राजतेऽसो सम्राट् तस्य । प्रस्थाने प्रणतयः प्रस्थानप्रणतयस्ताभिः । मकरन्दस्य रेणयः मकरन्दरेणवः, मौलिपु सजो मौलिम्मजः, ताभ्यः तो एच्युता मकरन्दरेणवश्चेति मोलित्रक्च्युतमफरन्दरेणया, गौरम् ॥ ८८ ॥ (वाच्यपरिवर्तनम् ) तः चके ॥ ८८॥ ( सरलार्थः) ततः प्रस्थानसमये सर्व एव ते राजानः प्रणिपात. गोवरगणद्वन् प्रणेमुः, तदा तेषां मुकुटमाल्यगलितमधुपरागः रसुवरणयुगलामुखीरलश्चाः ॥ ८८ ॥ (गरतार्थ हिन्दी ) चे राजे रेणा हो से ध्वज, वन और छत्र विजयाले चावर्ति लक्षणसे युक्त उम्म रघु के चरणों को चलते समय को दाइयत् कर मिर की माला से गिरे हुए सुगन्धित परागों से जाकी चरणालियों को श्वेत करते हुए ||८|| श्रीकालिदागकविवर्यविनिर्मितस्मिन् काव्यं वर दि गावंशमिति मसिन्ढे । : নাণিহিন্দিসগকাগ- नामा गमाविमगमदचिरतरीयः ।।८९॥ ৮ পাতাবাহারনামগ-গহণাগুণ धीद्रयायतनुतनमा धीगीनाथशर्मगार विपिनया मुमकिन नमाम्यया यामाया मरतार्थ या मारत. मारमाना पाक श्रीकालिदार जी गोमाकय गया. कि नाम :

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द रघुवंशकाव्यम् । [पकमः निवर्त्यते यनियमाभिषेको येभ्यो निवापाजलयापितॄणाम् । तान्युन्छपष्ठाङ्कितसैकतानि शिवानि वस्तीर्थजलानि कचित् ॥८॥ (अन्वयः) यैः, नियमाभिषेकः, निर्वय॑ते, येभ्यः, पितृणां, निवापाजलयः, निर्वय॑न्ते, उन्छयष्ठाङ्कितसैकतानि, वः, तानि, तीर्थजलानि शिवानि, कञ्चित् ॥ ८ ॥ ( टीका ) यैः तीर्थजलैः, नियमाभिषेकः =नित्यस्नानादिः, निर्व- य॑ते निष्पाद्यते, येभ्यः =जलेभ्यः, पितॄणां =अग्निध्यात्तादिपितॄणं निवापाजलयः-तर्पणासलयः,, 'पितृदान निवापः स्यात् " इत्यमरः, निर्वयन्ते-निष्पाद्यन्ते, उ'छपष्ठाङ्गितसैकतानि-प्रकीर्णोद्धृत- पठभागचिन्हितपुलिनानि, “ राजपाद्यपष्ठभागलक्षितपुलिनानि " इति वा, तीर्थजलानि-तीर्थपयांसि, शिवानियाधरहितानि, कश्चित् - वर्तन्ते किमु ॥८॥ ( समासः) नियमस्याभिषेक इति नियमाभिषेकः। निवापस्याज लय इति निवापाअलयः। उञ्छानां पष्ठः अङ्कितानि सैकतानि येषां तानि ॥८॥ (सरलार्थः) येषु तीर्थपु भवन्तो नित्यस्नानादिक्रिया सम्पाद यन्ति येभ्यश्च पितृणां तर्पणालया निष्पाद्यन्ते एवम्भूतानि तटेगु राजदयपड्भागशोभमानानि तीर्थजलानि शुभानि सन्ति किम् ॥ ८ ॥ (गरलार्थ हिन्दी ) जिन तीर्थो में नित्यस्नान किया जाता है जिनमे पिलगं का तर्पण किया जाता है ये उञ्छके छठे भाग से चिन्हित तटवाले तीर्थजल कल्याण युक्त तो है ॥ - ॥ नीवारपाकादि कहहरीयामृश्यते जानपदैन कचित् । कालोपपन्नातिथिकलयमागं वन्यं शरीरस्थितिमाधनं : ॥६॥ (अन्ययः ) कालापपनातिथिकलयमागं, वन्यं, यः, शरस्थित दिमायन, नीवारपाकादि, जानपदः, न शाश्यो, कगित ॥६॥ 1. मनियादि गामान देय 18 भार्ग नार प्रशिनि, नगा श्रुतिः समादायका अगामा नियति । गोममान पाण्यात नामावतिष्नान "fan लागा पाfire: नाना जा लिन अंषा- मानानिमाय m प्रथनेसाधनं जीवितसाधनोपायभूतं. । दागतरल्पनीयांशं. "उचितावसरप्राप्तातिथिलेवासम्पादक" इति इनमय वन्यं । शीर्यत इति शरीरं, तस्य स्थितिरिति शरीरस्थितिः न्य साधनमिति शरीरस्थितिसाधनं । पच्यत इति पाकः, नीवाराणां सुबोधिनीसमेतम् । (दीका ) कालोपपन्नातिथिकल्ल्यभागं वैश्वदेवावतानागता- पन्य =धारण्यं, "वनोत्पन" इत्यर्थः, वः-युष्माकं, शरीर- नीवारपाकादि देशान्यं, जानपदैः ग्रामादागतः कडङ्गरीयैः "गोमहिपा- निः" इत्यर्थः, न बामृश्यते न भव्यते, कञ्चित् = किम् ॥ ६ ॥ समासः ) काले उपपन्नाः इति कालोपपन्नाः, कालोपपन्नाश्च अतिथयश्चेति कालोपपन्नातिथयः, तेषां कल्प्या भागा यस्य तत् । ना: नीवारपाकः, सादिर्यस्य तत् । जनाः पद्यन्ते गच्छन्ति यत्र जनपदः तेभ्यः भागतः । कडङ्गरं अर्हन्तीति कडहरीयास्तैः ॥६॥ (लरलार्थः ) उचितावसरप्राप्तानां प्रतिधीनां सेवासम्पादन- न्यं भवतां च जीवन निर्वाहकारणं वनोत्पन्नं नीवारज्यामका- धान्यं गोमहिपादयो न भक्षयन्ति कञ्चित् ॥ ६ ॥ (सरलार्थ हिन्दी ) उचित समय पर पाये हुए अतिथियों के कार करने योग्य और श्राप के जीवन रक्षा के कारणीभूत अनादि, तृण खानेवाले पशुत्रों से नाश तो नहीं किये जाते हैं ॥ है। अपि प्रसन्नेन महर्षिणा त्वं सम्यग्विनीयानुमतो गृहाय । कालोधयं संक्रमितुं द्वितीयं सर्वोपकारक्षममाश्रमं ते ॥१०॥ (अन्वयः ) "किञ्च" त्वं प्रसन्नेन, "सता" मार्पिया, माया. विनीय, गृहाय, अनुमतः, अपि:. हि. ने. सर्वोपकारक्षम शिला प्राधम, सज्ञामितुं अयं, कालः, "वर्तने" ॥ १० ॥ (टीका ) किच, त्वं, प्रसन्नन, "सता" मारिया-मामुमिना परतन्तुना, सम्यक् = यथाशात. दिनोय - शियाधिचा " इति या, विद्यामुपदिश्य" इत्यर्थः. साय - साधा मनुमतः =अनुपात:. " प्रामाः" इत्यर्थः, दिदि...- पस्मातुकारणात् . नय, यो पगार- प्रकार मानामाभिम: RS. ! परिवानामाशिना ? भिकार ।

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सर्गः इयोधिनजितम् । (सरलार्थ हिन्दो ! पूज्यों में भक्ति करना यह तेरे कुल का नियम है। इस नियम के पालन करने में सर्वा सावधान रहने के कारण तू अपने पूर्वजों से भी बड़ा हुआ है और मैं तेरे पास चारना करने के लिये कुसमय में पाया यही मुझे खेद है ॥ १४ ॥ शरीरमात्रेण नरेन्द्र तिलाभारि तीर्थप्रतिपादितद्धिः । आरण्यकोपात्तफलमन्नतिः स्तम्लेन नीवार इवावशिष्टः ॥ १५ ॥ (अन्वयः ) है नरेन्द्र !, तीर्थप्रतिपादितदिः, शरीरमानेण, तिष्टन् , “त्वं लारण्यकोपातफलप्रसूतिः, स्तम्येन, अवशिष्टः, नोवारः, इव, आभासि ॥ १५ ॥ (टोका ) हे नरेन्द्र ! हे राजन् !, तीर्थप्रतिपादितद्धिः सत्पादत्तसम्पत्तिः, शरीरमाण-केवलेन वपुपा, तिष्ठन् =वर्त- मानः, "त्वं" श्रारण्यकोपात्तफलप्रतिः = मुनिप्रमुखगृहीततस्यः, स्तम्बेन फाण्डेन, अवशिष्टः =उर्वरितः, नीवार:=धान्यविशेषः, रव, प्राभालिशोभसे ॥ १५ ॥ (समासः) तीर्थपु प्रतिपादिता ऋद्धिर्येन सः । शीर्यत इति शरीरं शरीरमेव शरीरमा तेन । तिष्ठतीति तिष्ठन् । अरण्ये भवा भारण्यकाः, तैः उपात्ता फलमेव प्रसुतिर्यस्य तः ॥ १५ ॥ (सरलार्थः) यथा वनवालिभिः गृहीतफलाः नीवारगुल्माः स्तस्वमात्रावशेषेण शोभन्ते तथैव हे राजन् ! त्वमपि सत्पात्रप्रयुक्त सकलार्थदानेन केवलं शरीरेणैव तिष्ठन् शोभते ॥ १५ ॥ (सरलार्थ हिन्दी ) हे राजन् ! वनवासियों के फल तोड़नेसे केवल शाखा रूप में बचे हुए नीवार धानके वृक्ष की समान, सत्पात्रों में सम्पूर्ण धन दानकर केवल शरीरमात्र से सुशोभित हो रहा है १५ प्पाने भवानेकनराधिपः सन्नचिनत्व मख व्यनक्ति । पर्यायपीतस्य मुरैहिमांशोः कलाशयः श्लाध्यतरो हि दृद्धः ॥ १६॥ (अन्वयः) भवान् , एकनराधिपः, "सन् ” मखजं, अकिञ्च- नवं, व्यनक्ति, "तत् स्थाने। हि, तुरी, पर्यायपोतत्य, हिमांशाः, कलाक्षयः, वृद्ध, श्लाघ्यतर, भवति ॥ १६ ॥ (टोका ) भवान् , एकनराधिपः सार्वभौमः "त' मखज= खजन्यं, "यह सोऽधरो रागः सनतन्तुर्मखः क्रतुः" इत्यमा, । ..

सुबोधिनीसमेतम्। २३ % 30 (टोका) तत्तत्मात्कारणात्, तावत्, अनन्यकार्य: कार्यान्तररहितः, ग्रह, अन्यतःअन्यस्मात् वदान्यात, गुर्वर्थ गुरुधन, पाहतुजयितुं, यतिप्ये =उद्योदये, ते तुभ्यं, स्वस्ति= शुभं, अस्तु भवतु,' चातकासारतः, “अथ सारङ्गश्चातकः स्तो- ककः समाः" इत्यमरः, अपि, निगलिताम्बुगर्भचारिशून्य, शरद्- धनं शरत्कालीनमेघं, न अदतिः =न याचते ॥ १७ ॥ (समासः ) नास्ति गुल्दाक्षिणामन्तरेण अन्यत्कार्य यस्य सः । ! गुरवे अर्थमिति गुर्वधं । निर्गलितः अम्बु एव गर्भो यस्मात् तं । शरदो नमिति शरद्घनं ॥ १७ ॥ ( सरलार्थः) भवतो निधनत्वाद् अहं अन्यस्मात् दातुः सकाशात रुदक्षिणार्थ श्रयं श्रादातुं उयुक्तो भवामि चातकोऽपि निर्जलं लधर नैव याचते पुनः का कथा मनुष्याणाम् ॥ १७ ॥ (सरलार्थ हिन्दो ) इस कारण केवल गुरुदक्षिणा ही के लिये या हुत्रा में गुरु के लिये धन की याचना अन्य किसी दानी । करूंगा और तुम्हारा कल्याण होवे. जल रहित मेघ की पपीहा तो भी प्रार्थना नहीं करता ॥ १७ ॥ तावदुक्त्वा प्रतियातुकामं शिष्यं महर्नृपतिनिषिध्य । वस्तु विद्वन्गुरवे प्रदेयं त्वया फियवति तमन्वयुक्त ॥१८॥ (अन्वयः) एतावद्, उक्त्वा, प्रतियातुकामं. महर्षेः, शिष्य, पतिः, निपिध्य, हे विद्वन् !, त्वया, गुरवे, प्रदेयं, वस्तु, किं. व्यत्, वा, "अस्ति" इति तं, अन्वयुज ॥ १८ ॥ (टीका ) एतावत् =एतावन्मात्र, उत्त्वा = कथयित्वा, प्रति- तुकामं गन्तुकामं "प्रस्थानोद्यतं " महर्पः= वरन्ततोः, शिप्यं = रावं, "कौत्सं" नृपतिः = रघुः, निषिध्य = निवार्य, हे विद्वन् != हे ण्डित !, त्वया भवता, गुरवे = उपाध्यायाय महर्षिणे वरतन्तवे, वस्तु, किं किमात्मकं, कियद्-वा-किम्परिमाणं अस्ति, इति= इत्थं, तं-कौत्सं, अन्वयुङ्कअपृच्छत् ॥१॥ (समासः) प्रतियातुं गन्तुं कामोऽभिलायो यस्य सः ।। दातुं योग्य प्रदेयम् ॥ १८ ॥ * अपिशवश्चातकस्य जलदैकशरणत्वसूचनार्थः । क . देयं -दानयोग्य, रतुवंशकाज्यम् । - - प्रकिञ्चनत्वं निधनत्य, व्यक्ति प्रकटयति, " इति यत् तत् " स्थाने =युक्त, "गुक्त के साम्प्रतं स्याने गुक्त हे साम्प्रतं स्याने " इत्यमरः, हि-यस्मात् कारणात् , मुरेः = देवः, पायपीतस्य = क्रमपीतस्य, हिमांयो:- चन्द्रस्य, 'कलाक्षायः कलाहासः, " करावं" इति वा, नुः उपचयात् , श्लाध्यतरःवरः, भवतीति शेषः ॥ १६ ॥ ( समासः ) अधिपातीत्यधिपः, नराणामधिग इति नराधिपः, एकचासो नराधिप संत एकनराधिपः । मसाज्ञातमिति मसज । न विद्यते किञ्चन यस्य सः अकिञ्चनः तस्य भावस्तत्वम् । पर्यायेण पीतस्तस्य । हिमा अंशवो यस्य तस्य । कलानां क्षय इति कला- क्षयः। अतिशयेन श्लाघ्य इति श्लाध्यतरः॥ १६ ॥ ( सरलार्थः ) देवेः कमशः पीतस्य चन्द्रमसः क्षीणत्वं गौरवमेव श्रावहति तथैव यागदानजनितं भवतां निर्धनत्वं अपि गौरवमेवा- वहति ॥ १६॥ ( सरलार्थ हिन्दी ) जैसे देवताओं करके वारी बारी से पीये हुए चन्द्रमा की कला का घटना अधिक शोभायमान होता उस तरह यज्ञ से उत्पन्न हुया आपका निर्धनत्व भी अधिक शोभा यमान है ॥ १६ ॥ तदन्यतस्तावदनन्यकार्यो गुर्वर्थमाहर्तुमहं यतिष्ये । स्वस्त्यस्तु ते निर्गलिताम्बुगर्भ शरयनं नार्दति चातकोऽपि॥१५ (अन्वयः ) तत्. तावत्, अनन्यकार्यः, अहं, अन्यतः, गुर्वथ पाहतु, यांतष्ये, ते, स्वस्ति, अस्तु, चातकः, अपि, निर्गलिताम्य गर्भ, शरद्घनं, न श्रीत ॥ १७ ॥ तथाचोक्तं "प्रथमां पिबते वन्हिद्वितीयां पिवते रविः । विश्वेदेवास्तृतीयां चतुर्थी सलिलाधिपः । पञ्चमी तु वपद्कारः पष्ठी पियति वासवः । सप्तमीमुष दिव्या अष्टमीमज एकपात् । नवमी कृष्णपक्षस्य यमः प्राश्नाति वै कला पिवते वायुः पिबत्येकादशीमुमा । द्वादशी पितरः सर्वे समं प्राश्न । त्रयोदशी धनाध्यक्षः कुबेर पियते कलाम् । चतुर्दशी पशुपतिः पञ्च प्रजापतिः" इति, “ धमाथं क्षीणकोशस्य क्षीणत्वमपि शोभते । सुरैः पीतावशेष कृष्णपने विधोरिव " इति कामन्दकाये। शुक्लप्रतिपदि सर्वे क्षीणमपि चन्द्रं कुर्वन्ति, यदुर्क किराते-“ प्रणमन्त्यनपायमुत्थितं प्रतिपचन्द्रमिय । १ . नपम्" इति॥

-- । . । नाका नग... अनन्यसाय:- करताना, बना, बदान्यात. गुवयं- गुम्या, साजन यायनेनुभ्य, स्वस्ति- पं. अन्नु भवन,' ::." अयनारश्चानक म्ना- कमा रमा"या, प. मागायुगनं याग्निन्य, शरद- धनं गन्याला यानने ॥१॥ ( यमानः ) नाम नाम अन्यत्कार्य यस्य सः । गुग्य अभिान गुन अन्य गय गर्दा यन्मात् तं । शरदा पनामनि शरदयने ।। (मरलार्थः । भवना निधनवाद् अ अन्यन्मात् दातुः सकाशात रुदक्षिणार्थ असामान उद्युक्ता भवामि चातकोऽपि निर्जलं लिधर नेय याचने पुनः का कया मनुष्याणाम् ॥ १७ ॥ (सरला हिन्दा ) इन कारण कंवल गुरुदक्षिणा ही के लिये या पुत्रा में गुरु के लिये धन की याचना अन्य किसी दानी करूंगा और तुम्हारा कल्याण होवं. जल रहित मेघ की पपीहा तो भी प्रार्थना नहीं करता ॥ १७ ॥ तावदुक्त्या प्रतियातुकामं शिष्यं महर्नुपातिनिपिध्य । वस्तु विद्वन्गुरवे प्रदेयं त्वगा फियद्वति तमन्वयुक्त ॥१८॥ (अन्वयः ) एतावद्, उक्त्वा, प्रतियातुकाम, महर्षेः, शिष्यं, तिः, निपिध्य, हे विद्वन् !, त्वया, गुरवे, प्रदेयं, वस्तु, किं, पत्, पा, "अस्ति" इति तं, अन्वयुक्त ॥ १८॥ (टीका ) एतावत् = एतावन्मानं, उवा कथयित्वा, प्रति. कामं =गन्तुकामं " प्रस्थानोद्यतं " महर्षेः= वरन्तताः, शिष्यं = में, "कौत्स" नृपतिः रघुः, निपिध्य = निवार्य, हे विद्वन् ! हे डत !, त्वया भवता, गुरवे =उपाध्यायाय महर्पिणे वरतन्तवे, रंदानयोग्य, वस्तु, किं-किमात्मक, कियद्-वा-किम्परिमाणं अस्ति, इति = इत्थं, तं-कौत्तं, अन्वयुक्त अपृच्छत् ॥१॥ (समासः) प्रतियातुंगन्तुं कामोऽभिलापो यस्य सः । तुं योग्यं प्रदेयम् ॥ १०॥ * अपिशचातकस्य जलदैकारणत्वसूचनार्यः।

रघुवंशकाव्यम्।।
( सरलार्थः ) एवं कथयित्वा प्रस्थानाभिलापिणं कौत्सं रघुः
निवार्य सविनयमुवाच "अयि वेदविदां वर ? तव गुरुदक्षिणायाः
कियती संख्या किंवा तस्याः मानं वर्तते इति तं पप्रच्छ॥ १८ ॥
(सरलार्थ हिन्दी) इस प्रकार कह सफल मनोरथ न होने के
कारण महर्षि के चेले कौत्स को रोककर राजा ने यह पूछा कि "हे
विद्वन् ! गुरु के निमित्त आपको क्या वस्तु और कितनी देनी है॥१८॥
ततो यथावद्विहिताध्वराय तस्मै स्मयावेशविवर्जिताय ।
वर्णाश्रमाणां गुरवे स वर्णी विचक्षणः प्रस्तुतमाचचक्षे ॥ १६ ॥
(अन्वयः) ततः, यथावत्, विहिताध्वराय, स्मयावेशविव- .
र्जिताय, वर्णाश्रमाणां, गुरवे, तस्मै, विचक्षणः, वर्णी, सः, प्रस्तुतं,
आचचक्षे ॥ १६॥
(टीका) ततः तदनन्तरं, यथावत् = यथाविधि, विहिताध्व-
रोय-कृतयज्ञाय, “यज्ञः सोऽध्वरो यागः
इत्यमरः, स्मयावेशवि-
वर्जिताय गर्वावेशशन्याय, वर्णाश्रमाणां ब्राह्मणादिब्रह्मचर्यादीनां,
गुरवे नियामकाय, "तद्धर्मप्रतिष्ठापकत्वात्" "वर्णाः स्युर्ब्राह्मणा-
दयः" इति तथा ब्रह्मचारी गृही वानप्रस्थीभिक्षुश्चतुष्टये” इति
चामरः, तस्मै रघवे,
विचक्षणः-विद्वान्, वर्ण-ब्रह्मचारी,
" वर्णिना ब्रह्मचारिणः
इत्यमरः, सः कौत्सः, प्रस्तुतं-प्रकृतं,
"गुरुदक्षिणारूपं वस्तु" प्राचचले पाख्यातवान् ॥ १६ ॥
(समासः) विहितः अध्यरो येन सः तस्मै । स्मयस्य गर्वस्य
संरम्भस्य च श्रावेशः तेन विवर्जितः तस्मै। वर्णाश्च श्राश्रमाश्चेति
वर्णाश्रमाः, तेषां । विचष्ट इति विचक्षणः ॥ १६ ॥
(सरलार्थः ) तदनन्तरं ब्रह्मचारी कौत्सः यथाशास्त्रं कृतयशा-
नुष्ठानं निरभिमानिनं तं रघु प्रकृतविषयं कथयामास ॥ १६ ॥
( सरलार्थ हिन्दी) अनन्तर निरभिमानी, यथाविधि यज्ञ करने
वाले, रघुको विद्वान् ब्रह्मचारी ने अपना प्रयोजन कहा ॥ १६ ॥
समाप्तविंधन मया महर्षिविज्ञापितोऽभूद्गुरुदक्षिणायै ।
स मे चिरायास्खलितोपचारां तां भक्तिमेवागणयत्पुरस्तात् ॥२०॥
(अन्वयः ) समाप्तविद्येन, मया, महर्पिः, गुरुदक्षिणायै, विक्षा-
पितः, अभृत्, सा, "च" चिराय, अस्खलितोपचारां, तां, मे,
भक्ति, एव, पुरस्तात् , श्रगणयत् ॥ २० ॥

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२६ रघुवंशकाव्यम् । [पञ्चमः ( सरलार्थ हिन्दी) फिर बार बार पूछने के कारण गुरुजी ने क्रोध में आकर मेरे धनाभाव को न सोचते विद्या को संख्या के अनुसार चौदह करोड़ धन लाने के लिये कहा ॥ २१ ॥ सोऽ सपर्याविधिभाजनेन मत्वा भवन्तं प्रभुशब्दशेपम् । अशुत्न सम्मति नोपरोद्धुमल्पेतरत्वाच्छृतनिष्क्रयस्य ॥ २२ ॥ ( अन्वयः ) सः. सह, सपर्याविधिभाजनेन, भवन्त, प्रभुशब्द- रोग, मला, श्रुतनिष्क्रयस्य, अलोतरत्वात् , सम्प्रति, उपरोदुथु, न, 'प्रगुत्साहे ॥ २२ ॥ (बीका ) सः, प्राई - कोत्सः, सपर्याविधिभाजनेन = पूजा- नानपारेगा, भात खां, प्रभुशवशेष राजशब्दाऽवशिष्टं, मत्या- विचार्ग, भानिमायस्य - शास्त्रमुल्यस्य, " श्रुतं शास्त्रावतयाः य, अतरवा अत्यधिकत्वात् , सम्पति - अशुना, उप. my firg, अगुत्मा - नेत्र अभिलपामि ॥ २२ ॥ (ममा ) पर्याया विधिरिति मर्पयाविधिः, तस्य, भाजन नग.: इति शय पर शेयस्य स तं । श्रतस्य निकायस्तस्य । अदिता sit miler, HEA वालातरत्वं तस्मात् ॥ २२ ॥ ( माता) मामिदानी गजरायमानावशेषश्वयं भवन्त fi...गाxि it fणा ना वर्तते, भवना, पानागा च, हान nilamअनानालाई ॥ २२ ॥ { सहित ) मा. इस गान के दायन हा flok : ६.१ मा tilt श्री विद्या का मूल्य अधिक होने fotoना नहीं पाता ॥ २२ ॥ ५.finitifffaiदिता दादा परेण । निनाद गा नगद मानः ॥ २३ ॥ thiii, fri, प्रायदिता, नि.. नानिनन्द्रय इति:, दिनाया, नि, नया, ६. ifi " " पहन, 6. It'' 4Hr, itin- 1. nirmit .

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१८ रघुवंशकाव्यम् । [ पश्चमः % 3D (सरलार्थ हिन्दी ) " गुरुदक्षिणाके अर्थ कौत्स रघुके पाससे असफल मनोरथ होकर दूसरे दाता के पास गया" यह निन्दा का नया अवतार मेरे लिये न हो ॥ २४ ॥ सत्वं प्रशस्ते महिते मदीये वसँश्चतुर्थोऽग्निरिवारन्यगारे । द्विवाययहान्यईसि सोढुमर्हन्यावद्यते साधयितुं त्वदर्थम् ॥ २५ ॥ (अन्वयः ) सः, त्वं, महिते, प्रशस्ते, मदीये, अग्न्यगारे, चतुर्थः, अग्निः, इय, वसन्, द्वित्राणि, अहानि, सोढुं, अर्हसि, यावत्, त्वदर्थ, साधयितुं, यतिष्ये ॥ २५ ॥ ( टीका) सः, त्वं, महिते-पूजिते, प्रशस्ते-मनोहरे मदीये, अग्न्यगारे-त्रेताग्निशालायां, चतुर्थः, अग्निः-वन्हिः, इच, चसन् निवसन्, द्वित्राणि =द्वित्रिसङ्ख्यकानि, अहानि-दिनानि, सोढुं, अर्हसि योग्योऽसि, हे अर्हन् ! हे भान्य ! “अर्हतो जिनस- न्मान्यो' इति यादवः, यावत् =यावत्कालपर्यन्तं, त्वदर्थ त्वत्प्र- योजनं, साधयितुं निष्पादयितुं, यतिध्येयलं करिष्ये ॥ २५ ॥ (समासः) मम इदं मदीयं, तस्मिन् । अग्नेः अगारमिति अन्य- गारं तस्मिन् । वसतीति वसन् । हे त्रीणि वा द्विवाणि । अईतीति तत्सम्बुद्धौ हे अर्हन् ! तव अर्थमिति त्वदर्थम् ॥ २५ ॥ (सरलार्थः) अतस्त्वं मदीये होमाग्नित्रयशोभितेऽग्निमन्दिरे चतुर्थः अग्निरिव निवसन् हे त्रीणि वा दिनानि प्रतीक्षस्व, यावदह ते गुरुदक्षिणार्थ धनानयनाय यत्नं करोमि ॥ २५ ॥ (सरलार्थ हिन्दी) “सो हे पूज्य ! श्राप मेरे पवित्र अग्नि- होत्र स्थान में चौथे अग्नि के समान दो तीन दिन रहें तब तक मैं श्रापके अर्थ की सिद्धि का उपाय करता हूँ" ॥ २५ ॥ तथेति तस्यावितथं प्रतीतः प्रत्यग्रहीत्सङ्गरमग्रजन्मा। गामाचसारां रघुरप्यवेक्ष्य निष्क्रष्टुमर्थ चकमे कुबेरात् ॥ २६ ॥ (अन्वयः) 1, प्रतीतः, "सन्" तस्य, अवितथं, सगर, - रघुः, अपि, गां, प्रात्तसारां, अवेक्ष्य, कुवेरात्, चकमे ॥ २६ ॥ (. -ब्राह्मणः "कोत्स अमोघं, सङ्गरं तथा, इति, तस्य-

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२० रघुवंशकाव्यम् । [पक्रम - (सरलार्थ हिन्दी) वसिष्ठ के अभिमश्रित जल के छिड़कने से ही उसके रथकी गति वादल के समान समुद्र-आकाश-और पर्व में कहीं भी रुकने वाली न धी ॥ २७ ॥ अथाधिशिष्ये प्रयतः प्रदोपे रथं रघुः कल्पितशस्त्रगर्भम् । सामन्तसम्भावनयैव धीरः कैलासनाथ तरसा जिगीषुः ॥ २८ ॥ (अन्वयः) अथ प्रदोपे प्रयतः, रघुः, सामन्तसम्भावनया एच, कैलासनाथ, तरसा, जिगीषुः, " सन् " कल्पितशस्नगर्भ, रयं अधिशिप्ये ॥ २॥ (टीका) बथ-अनन्तरं, प्रदीप रजनीमुखे, प्रयतः-धीरः,रघुः सामन्तसम्भावनया=कतिपयग्रामपतिबुध्या, एव, कैलासनाथं = कुवेर, तरसावलेन, जिगीपुः= विजिगीपुः, “ सन् " कल्पितशस्त्र- गर्भ-सजितशस्त्रमध्यं, रथं स्यन्दनं, अधिशिष्ये अधिष्ठितः ॥२८॥ (समासः) समन्तात् भवः सामन्तः तस्य सम्भावना इति सामन्तसम्भावना तया। केजले लासो लसनमस्येति कैलासः- स्फटिकः तस्य अयमिति कैलासः, तस्य नाथस्तं । कैलासनाथं । जेतुमिच्छुः जिगोपुः। कल्पितं शस्त्रं गर्भे यस्य सः तं ॥ २ ॥ ( सरलार्थः ) यथा रघुः सामान्यान् भूपतीन् अनायासेन स्वा- यत्तीकृतवान् तथैव कुवेरमपि स्वाधीनीकर्तुं विचार्य रथं शस्त्रादिभिः, सजीकृत्य तत्र निशां व्यतीयाय ॥ २८ ॥ ( सरलार्थ हिन्दी)फिर रघु कुबेर को साधारण राजा की तरह जीतने की इच्छा से सांझको शस्त्रों से सजे हुए रथ में सोया ॥२-] प्रातः प्रयाणाभिमुखाय तस्मै सविस्मयाः कोपगृहे नियुक्ताः । हिरण्मयीं कोपगृहस्य मध्ये दृष्टिं शशंसुः पतिता नभस्तः ॥ २६ ॥ (अन्वयः ) प्रातः प्रयाणाभिमुखाय, तस्मै, कोपगृहे, नियुक्ताः लविस्मयाः, कोपगृहस्य, मध्ये, नमस्तः, पतितां, हिरण्मयीं वृष्टिं, शशंसुः ॥ २६ ॥ ( टीका ) प्रातः-प्रभाते, प्रयाणाभिमुखाय-प्रस्थानोन्मुखाय, तस्मै रघवे, कोपगृहे =भाण्डारागारे, नियुक्ताः स्थापिताः, १' मुफाकनकरनान्यः पितृपैतामहाचितः । धाजितोऽव्ययसहः कोपः कोपन- बम्मितः । धर्महतोस्तथार्थाय नृत्यानाम्मरणाय च। आपदर्वच संरक्ष्यः कोपः जनाः" सन्तः"

(समासः) अभियास्यतेऽलो थभियास्यमानः तस्मात् । वजण
(सरलार्थः) कुवेरः रघोः धनार्थं अाक्रमणं तात्वा रानावेव
तस्य कोषागारे सुवर्णमयी वृष्टि ववर्ष रघुरपि नुवर्णाचलस्य भिन्न
खएडमिव तं तकलं नुवर्णराशि कौत्साय दी ॥ ३०॥
(सरलार्थ हिन्दी) राजा रघु ने चढ़ाई किये हुए कुवेर से
वन.से काटे सुमेरु के टुकड़े के समान पाई हुई कान्तिमान
सम्पूर्ण सोने की राशी कौत्तको देदी ॥ ३०॥
.
सुवाधिनीसमेतम् ।
२१
अधिरताः
" जनाः" सविस्मयाःसाधाः, सन्तः
रगृहस्य:
=भागडारागारस्य, मध्ये, नमस्तः= अाकाशात्, पतितां
स्खलितां, हिरगमयाँ - सुर्वणमयों, वृष्टिं =वर्पण, शशंनुः कथया-
(समासः ) विस्मयन सहिताः सविस्मयाः। हिरण्यस्य विकारो
यस्याः सा ताम् । प्रयाणस्य अभिमुख इति प्रयाणाभिमुखस्तस्मै ।
कापस्य गृहमिति कारगृहं तत्मिन् ॥ २१ ॥
(सरलार्थः ) नुवर्णमयीं वृष्टिमवलोक्य साधःभाण्डागारिकाः
प्रातः प्रस्थानाधतं रघु नुवर्णवर्पणं निवेदयामासुः ॥ २४ ॥
( सरलार्थ हिन्दी ) प्रातःकाल सुवर्ण वृष्टि देख चकित हुए
कोषाध्यक्ष ने श्राकर कोपगृह में आकाश से सुवर्ण की दृष्टिका होना
सुनाया ॥२६॥
तं भूपति मुरहेमराशि लब्धं कुवेरादभियास्यमानान् ।
दिदेश कौत्साय नमस्तमेव पादं सुमेरोरिव वज्रभिन्नम् ॥ ३० ॥
(अन्वयः ) भूपतिः, अभियास्यमानात, कुवेरात्, लब्धं, वन-
निन, सुमेरोः, पादं, इव, लं, भानुरहेमराशि, समस्तं, एव, कौत्ताय,
(टीका ) भूपतिः रघुः, अभियात्यमानात् =अभिगमिष्य-
माणात्, कुवेरात् =धनदात् . लब्धप्राप्त, वज्रभिन्नं कुलिशभिन्न,
मुमेरोः = हेमाद्रः पादमिव-प्रत्यन्तपर्वतमिव, वं, भानुरहेमरासिं
देदीप्यमानसुवर्णसमूह, समत्तं सम्पूर्ण, एव, कौत्साय
कोत्सनामाह्मणाय. दिदेश-ददौ ॥ ३० ॥
भिन्न इति वज्रभिनस्तम् । हेम्नः राशिरिति हेमराशिः भानुरश्चाती
हमराशिरिति भानुरहेमराशिः तं ॥ ३० ॥
वह
विदेश ॥ ३०॥

रपु-शकायम् । - जनस्य मातनिवासिनस्तो द्वाप्यभूतामभिनगमली। गुरुपदेगापिकनिःस्पृहोगी नगोशिकामादविदा ॥ ३१ ॥ ( अन्वयः ) गुरुपदेगापिकनिःपक्षा, , अधिकामात्, 'म कादा, नगः, , "तो" सा, हो, अपि, साकेतनिवासिना, जनर अभिनन्यसती, अभूताम् ॥ २१ ॥ ( टीका ) गुरुपदयाशिजनिःशुः गुरुदक्षिणातोऽधिक निरभिलाषः, अयाचकः, अर्थिकामात् यातामनारशात अधिकप्रदः--विशेषप्रदः, नुपः राजारः, च, साकेतनिवासिनः = अगाण्यावासिनः "सातः स्यादयोध्यायां" इति यादवः, जनस्य: अभिनन्यसला-स्तुत्यव्यवसागो, 'न्यासुज्यवसायेषु सलमत्रो जन्तुयु'' इत्यमरः, अभूताम् प्रास्ताम् ॥ ३१ ॥ (समासः) 'पर्यः प्रयोजनमस्यास्तीति प्रय। 'प्रथिनः काम इति अर्थिफामः तस्मात् । अधिक प्रवदातीत्यधिकप्रदः। सात निवसतीति तस्य साकेतनिवासिनः। अभिनन्धं सत्यं ययोस्तो निर्गता विषयेभ्यः स्पृहा तृष्णा यस्यासी निस्पृहः, प्रदातुं योग्य प्रदेयम् गुरवे प्रदेयं गुरुपदेयं तस्मादधिके निस्पृह इति गुरुप्रदे- याधिकनिःस्पृहः ॥ ३१ ॥ ( सरलार्यः ) देयचतुर्दशकोटिरूपदाक्षिणातः अधिकधनेषु निस्पृहः कौत्सा, याचकप्रार्थनाऽपेक्षया विशेषप्रदः रघुश्च द्वावपि स्वं स्वं निःस्वार्थभावम् औदार्यञ्च प्रकटयन्ता सन्तो अयोध्या- वासिनः जनस्य साधुवादं प्राप्नुवन्तौ ॥ ३१ ।। सरलार्थ हिन्दी) गुरुकी दक्षिणासे अधिक न चाहने वाला भिक्षुक कौत्स और मांगने वाले के मनोरथ से अधिक देनेवाला राजा रघु ये दोनों ही अयोध्यावासियों के सराहने योग्य हुए ॥३१॥ अथोष्ट्रवामीशतवाहितार्थं मजेश्वरं प्रीतमना महर्षिः । स्पृशन्करेणानतर्पूवकायं सम्मस्थितोवाचमुवाच कौत्सः ॥ ३२ ॥ (अन्वयः ) अथ, प्रीतमना, महर्षिः, कौत्सः, सम्प्रस्थितः, "सन्" उष्ट्रवामीशतवाहितार्थ, भानतपूर्वकार्य, प्रजेश्वर, करेण, स्पृशन्, वाचं, उवाच ॥ ३२॥ (टीका) अथ, प्रीतमना-प्रसनमानसः, महर्षिः महामुनिः, को समस्थितः-प्रस्थास्यमानः, सन" उप्रवामीशतवाहि- प्रवर्तन हितानाज्ञ तत्सर्व वृत्तमुच्यते। मग जेवर :::::::::. :मान, वार्च = या MIL : महार: . मानसमा । 3 यान्या इति धान्यः न यार करना नं। पूर्व कायो यस्य प्रायः पनामा मामा नं। शितुं शालमत्यति 17:प्रजानामा: नं। सानाति स्पृशन् ॥ ३२ ॥ । सानाः ननः मा कामः सफलमनाग्योभून्या गुरोः धिमानि गन अगावाट्ययागिः प्रेषितधनं (प्रातः यंगति तानिः पयामास ) प्रणामप्रगतशी इंदनेन मानदं वचनम उवाच ॥ ३२ ॥ ( मग्लामिया ) हो, ऊटी और मशरों पर लादकर धन ने याने, अगना अंग काय गुण प्रजानाथ ग्घु को चलती समय माए महर्षि कात्म ने यह कहा ॥ ३२ ॥ किया चित्रं यदि काममूत्ते स्थितस्याधिपतेः प्रजानाम् । अचिन्तनीयस्तु तव प्रभावो मीपितं ठोरपि येन दुग्धा ॥ ३३॥ -जनानां. अधिपतेः-रासः, भूः=भूमिः, कामःमनोरथप्रसूः, यदि चेत् . अन% भूमेः मनोरथप्रसवने, किं= चित्रं नकिमपि मनीपितं-अभिलपित, स्वेच्छानुरूप, वा, दुग्धा ॥३३॥ (समासः) अधिपातीत्यधिपतिः तस्य। कामान् सूत इति कामस्ः। चिन्तयितुं शक्य इति चिन्तनीयः न चिन्तनीय इति श्रचि- १ न्यायेनार्जनमधल्य रक्षगं वर्धन तया। सत्पात्रप्रतिपचिश्व राजवृत्तं चतु- विधन् ॥ इतिझामन्दकः ॥ अपर गुरोः पूजा गा शोचं सत्यमिन्द्रियनिग्रहः । .::.::: यंकाया, मान ग्यः . - (अन्ययः ) गुत्ते, स्थितत्य, प्रजानां, अधिपतेः, भूः, कामस्ः, यदि, श्रम किं, चित्रं, तु, तव, प्रभावः, अचिन्तनीयः, येन, "त्या, धोः, अपि, मनीपितं, दुग्धा, ॥ ३३ ॥ (टीका ) वृत्ते-चतुर्विधराजवृत्ते, स्थितस्य =तिष्ठतः, प्रजानां - प्रभावः=प्रतापः, अचिन्तनीयः तु =किन्तु, तव-ते, प्राश्चर्य, -चिन्तयितुमशफ्यः, येन=प्रभावेण “ त्वया ” द्यौः दिवं, प्राप, न्तनीयः ॥ ३३॥ e रघुवंशकाव्यम् । [पञ्चम % 3D - (सरलार्थः) नीतिमार्गानुगामी नृपः भूमिसकांशात् स्वाभि लपितं वस्तु यलभते नैतदाश्चर्यकरं किन्तु भवान् यत् स्वर्गादपि स्वाभीप्सितं प्राप्तवान् एतदेव अत्यन्तं पाश्चर्यकरम् ॥ ३३ ॥ (सरलार्थ हिन्दी) इसमें क्या श्राश्चर्य है जो धर्मशीलराजा की भूमि कामना पूरी करने वाली हो परन्तु तुम्हारा प्रभाव तो विशेष श्राश्चर्य कराता है जिसने कि स्वर्ग भी मनमाना दुहा ॥ ३३ ॥ श्राशास्यमन्यत्पुनरुक्तभूतं श्रयांसि सर्वाण्यधिजग्मुषस्ते । पुत्रं लभस्वात्मगुणानुरूपं भवन्तमीड्यं भवतः पितेव ॥ ३४॥ (अन्वयः) सर्वाणि, श्रेयांसि, अधिजग्मुपः, ते, अन्यत्, आशास्यं, पुनरुक्तभूतं, " किन्तु " ईडयं, भवन्तं, भवतः, पिता, इव, " त्वमपि " अात्मगुणानुरूपं, पुत्रं, लभस्व ॥ ३४ ॥ (टीका) सर्वाणि-सकलानि, श्रेयांसि-कल्याणानि, " यः श्रेयसं शिवं भद्रं कल्याणं मङ्गलं शुभम् " इत्यमरः, अधिजग्मुषः अधिगतवतः, ते-तव, अन्यत्-मुतातिरिक्तं, ग्राशास्यंयाशीः- साध्यं, पुनरुक्तभूतं-पुनरुक्तमिव, इंडयं स्तुत्यं, भवन्तं त्वां, भवतः-तव, पिता-दिलीपः, इब, श्रात्मगुणानुरूपं श्रात्मगुणतुल्यं, पुत्रं-मुलं, लभस्व-प्राप्नुहि ॥ समासः) इंडितुं योग्यः ईडयस्तं । अनुगतः रूपमिति अनुरूपं, श्रात्मनः गुणमिति प्रात्मगुणं तस्य अनुरूपमिति अात्मगुणानुरूपं ।। (सरलार्थः ) चक्रवर्तिनः तव स्वर्गेऽपि अप्राप्यं किमपि नास्ति श्रत पाशीर्वादाऽपि व्यर्थ एव तथापि इदमेव केवलं अस्तु यद् यथा तब पिता दिलीपः त्वां लेभे तथैव त्वमपि आत्मसदृशं पुत्र प्राप्नुहि३४ ( सरलार्थ हिन्दी) तुझे सभी अच्छी वस्तु प्राप्त है इसलिये प्रय पाशीर्वाद देना व्यर्थ है किन्तु जैसे दिलीप को तुम प्राप्त हुए उसी प्रकार तुम्हारे ही ऐसे गुण वाला पुत्र तुम्हें भी प्राप्त हो ॥ ३४ ॥ इत्यं प्रयुज्याशिपमग्रजन्मा राज्ञे प्रतीयाय गुरोः सकाशम् । राजापि लेभे सुतमाशु तस्मादालोकमर्कादिव जीवलोकः ।। (अन्वयः) अग्रजन्मा, इत्यं, राश, पाशिर्ष, प्रयुज्य, गुरोः, सकाशं, प्रतीयाय, राजा, अपि, जीवलोकः, श्रात्, पालो, इव, तस्मात्, श्राशु, मुतं, लेभे ॥ ३५ ॥ किन्तु" " त्वमपि " प्रास्त। अतः तस्य पिता रघुःब्रह्मलः एव नाम्ना तस्व 3C कुमारकल्पं स्कन्दत्सदृशं, कुमारं वालं, सुपुवे प्रास्त किल, नाम्ना, तं, श्रात्मजन्मानं आत्मद्विं "पुत्रं" अजं=अजनामकं, (समासः) ईपदसमाप्तः कुमारः कुमारकल्पस्तम्। प्रात्मनः सकाशात् जन्म यस्य सः तम् ॥ ३६॥ (सरलार्थः) रयोः महिपो ब्राह्ममुहर्ते कार्तिकेयतुल्यं नुतं सनः सुवाधिनीलमंतम् । ( टोका ) अनजन्मा=वालयः, इत्यं = पूर्वोक्तप्रकारेण, राशे रघवे, अाशिष =याशीर्वाद, प्रयुज्य -दत्या. गुरोः = बरतन्ताः, सकाश-समीपं, प्रतीयाय प्राप, राजा रघुः, अपि, जीवलोका जीवसमूहः, अर्कात् = सूर्यात् , झालाकंप्रकाशं इव, तस्मात् = मुनेः प्रोशिपः प्रयोगात्. "कौत्साशीर्वादात्" आशु-शीघ्र, सुतं-पुत्रं, लेभेप्राप ।। ३५ ।। (समासः ) पाने जन्म यस्य सः ॥ ३५ ॥ ( सरलार्थः) वेदवित् कौत्सः राजानं रघु आशिपं दत्वा गुरोः प्राधममाजगाम यथा जनाः सूर्यात् प्रकाशं प्राप्नुवन्ति तथैव त राजाऽपि कौत्साशीर्वादप्रभावात् शीघ्रमेव स्वलदृशं पुत्रं प्राप ॥ ३५ ॥ (सरलार्थ हिन्दी ) इस प्रकार राजा रघुको आशीर्वाददे कौत्स अपने गुरु के पास पहुँचा राजा ने भी, उस ब्राह्मण के आशीर्वाद से पुत्र पाया ॥ ३५ ॥ ब्राह्म मुहूर्ते किल तस्य देवी कुमारकल्पं सुपुवे कुमारम् । अतः पिता ब्रह्मण एव नाम्ना तमात्मजन्मानमजञ्चकार३६॥ मुहूर्त, कुमारकल्पं, कुमार, सुषुवे, किल । अतः, पिता, ब्रह्मणः, एव, नाम्ना, तं, अात्मजन्मानं अजं, चकार ॥ ३६॥ ( टीका ) तस्य = रघोः, देवो = कृताभिषेका राशी प्रभावती, देवी कृताभिषेकायाम् ” इत्यमरः, ब्राह्मे =अभिजिनामके, मुहूर्ते, ब्राह्ममुहूर्तात्पन्नत्वात्, पिता - रघुः, ब्रह्मणः = विधैः, एव, चकार: (अन्वयः) तत्य, देवी, ब्राह्म प्रतः- कृतवान् ॥ ३६॥ . अजं इति नाम चकार ।। ३६ ॥

२६ रघुवंशकाव्यम् । • (सरलार्थ हिन्दी ) ब्राह्म (अभिजित) मुहूर्तमें उसकी रानी ने स्वामी कार्तिक के समान पुत्र जना । इसलिये उसके पिता रघुने ब्रह्मा ही के नाम पर उस पुत्र का "अज" नाम रक्खा ॥ ३६ ।। रूपं तदोजस्वि तदेव वीर्यं तदेव नैसर्गिकमुन्नतत्वम् । न कारणात्स्वादिभिदे कुमारः प्रवर्तितो दीप इव प्रदीपात् ॥३७॥ (अन्ववः) ओजस्वि, रूपं, तदेव, वीर्य, तदेव, नैसर्गिक, उन्नतत्वं, “च " तदेव । कुमारः, प्रवर्तितः, दीपः, प्रदीपात्, इव स्वात्, कारणात् न, विभिदे ॥ ३७॥ (टोका) ओजस्वि-दीप्तिमत्, भोजो वले च दीप्तौ च" इति विश्वः, रूपं स्वरूप, तदेव=पितृसम्बन्धि-एव, वीयं-शौर्य, नैसर्गिक स्वाभाविकं, उन्नतत्वं उच्चस्तरत्वं, तदेव तादृशमेव, कुमारः-शिशुः, प्रवर्तितः= उत्पादितः, दीपः, प्रदीपात् =स्वोत्पादक- दीपात् , इव, स्वात्= स्वकीयात्, कारणात् जनकात् , न विभिदे - भिन्नोनाऽभूत् , सर्वतस्तादृश एव जात इत्यर्थः ॥ ३७ ॥ ( सरलार्थः ) यथा एकस्मात् दीपात् प्रज्वालितोऽन्यः प्रदीपः जनकभूतात् पूर्वदीपात् किञ्चिदपि विजातीयरूपो न भवति तथैव श्रयमपि कुमारः रूपप्रतापादिगुणैः जनक रघु सर्वतोऽनुचके ॥ ३७ ॥ ( सरलार्थ हिन्दी ) जैसे एक दीपक से दूसरा दीपक जलाने पर रूप और तेज आदि में उत्पन्न करने वाले दीपक के समान ही रहता है उसी प्रकार कुमार आज भी रूप बल और पराकम से अपने पिता रघु के समान ही हुश्रा ॥ ३७ ॥ उपात्तविद्यं विधिवद्गुरुभ्यस्तं यौवनोद्भेदविशेषकान्तम् । श्रीः साभिलापाऽपि गुरोरनुज्ञां धीरेव कन्या पितुराचकाङ्क्ष ॥३८॥ (अन्वयः ) गुरुभ्यः, विधिवत्, उपात्तविद्यु, यौवनोझेदविशेष- कान्तं, तं, साभिलापा, अपि, श्रीः, धीरा, कन्या, पितुः, इव, गुरोः, अनुमा, आचकास ॥३॥ (टीका) गुरुभ्यःअध्यापकेभ्यः, 'यहफ्त्या नाना विद्यावाप्तिः' विधिवत् =यथाशास्त्र, उपात्तविद्य प्रातचतुर्दशविद्यु, यौवनोदभेद- विशेषकान्तं =ताखण्याविर्भावमुन्दरं, तं-अजं, साभिलापा-

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२८ रघुवंशकाव्यम् । [ पत्रमः . - तं श्लाध्यसम्बन्धमसौ विचिन्त्य दारक्रियायोग्यदशञ्च पुत्रम् । प्रस्थापयामास ससैन्यमेनमृद्धा विदर्भाधिपराजधानीम् ॥ ४० ॥ (अन्वयः) असी, तं, श्लाध्यसम्बन्ध, विचिन्त्य, पुत्र, च, दारक्रियायोग्यदर्श, “विचिन्त्य" ससैन्यं, एनं, ऋद्धां विदर्भाधि- पराजधानी, प्रस्थापयामास ॥ ४०॥ (टीका ) असो-रघुः, तंभोज, "शुद्धवंशोत्पन्नत्वेन" श्ला- ध्यसम्बन्ध स्तुत्यसम्बन्ध, विचिन्य विचार्य, . पुत्रं-सुतं, "अर्ज दारक्रियायोग्यदशं विवाहसंस्कारोचितवयसं, "विचिन्त्य" ससैन्यं = चमूसहितं, एनं, ऋद्धांसमृद्धां, विदर्भाधिपराजधानी भोजपुरी, "प्रति'' प्रस्थापयामास-प्रस्थापितवान् ॥ ४० ॥ ( समासः ) श्लाध्यः सम्बन्धी यस्य सः तम् । दारक्रियायाः योग्या दशा यस्य सः तं । सैन्येन सहितः ससैन्यस्तं । विदर्भाधिपस्य राजधानी ताम् ।। ४० ॥ (सरलार्थः) रघुः, भोजवंशेन साकं स्वकुलस्य वैवाहिकः सम्बन्धः प्रशंसनीयो भविष्यतीति विचार्य, कुमारं अजश विवाहाचितवयस्कं ज्ञात्वा सेनासमवेतं तं भोजनगरी प्रति प्रेपयामास ॥४०॥ ( सरलार्थ हिन्दी ) राजा भोज के वंश से अपना सम्बन्ध उचित समझ रघु ने पुत्र अजको सेनासहित विदर्भनाथ की राजधानी की ओर भेजा ॥ ४० ॥ तस्योपकार्यारचितोपचारा वन्येतरा जानपदोपदाभिः । मार्गे निवासा मनुजेन्द्रसुनोभूवुरुद्यानविहारकल्पाः ॥ ४१ ॥ (अन्वयः ) उपकार्यारचितोपचाराः, जानपदोपदाभिः, वन्येतराः, तस्य, मनुजेन्द्रसूताः, मार्ग, निवासाः, उद्यानविहारकल्पाः, वभूवुः॥४१॥ (टीका ) उपकार्यारचितोयवारा: = पटभवनरचितनकचन्दना द्यपचाराः, जानपदोपदाभिः =ग्रामागतजनोपायन, वन्येतरा:- अवन्याः, तस्य पूर्वोक्तस्य, मनुजेन्द्रसूनाः- अजस्य, मार्गपयि, निवासाः-वासनिकाः, उद्यानविहारकल्पा:-उद्यानविहारस्थान- सदृशाः, बभूवुःशासन् ॥१२॥ . ,

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रघुवंशकाव्यम् । - अथोपरिष्टाभ्रमरैभ्रमद्भिः प्राक्सूचितान्तःसलिलप्रवेशः । निधौतदानामलगण्डभित्तिर्वन्यः सरित्तो गज उन्ममज्ज ॥ ४३ ( अन्वयः ) अथ, उपरिष्यात् , भ्रमद्भिः, भ्रमरैः, प्राक्सूचितान्त:- सलिलप्रवेशः, नितदानामलगण्डभित्तिः, वन्यः, गजः, सरित्तः उन्ममज्ज ॥४३॥ (टीका ) अथ-अनन्तरं, उपरियात् ऊर्च, भ्रमद्भिःभ्रमण. शोलैः, भ्रमरैः, द्विरेफैः, प्राक्सूचितान्तःसलिलप्रवेशः प्राग्विक्षा- पितजलप्रवेशः, निधैतदानाऽमलगण्डभित्तिःक्षालितमदनिर्मलक- पोलभित्तिः, वन्यः प्रारण्यकः, गजः मतङ्गजा, सरित्तः नर्म- दायाः सकाशात् , उन्ममज-उत्थितः ॥ ४३ ॥ (समासः ) प्राक्सुचितः अन्तः सलिले प्रवेशो यस्य सः । निर्धा- तदाने अतएव अमले गण्डभित्ती यस्य सः ॥ ४३ ।। ( सरलार्थः ) अनन्तरं कश्चन वन्यो गजः, नदीजलाभ्यन्त- रात्, उत्थितः, तस्य च उन्मजनात्प्रागेव तन्मदजलगन्धाकृष्टाः सलिलोपरि गुञ्जन्तः भ्रमराः तस्य निमजनं प्रायोधयामासुः ॥ ४३ ॥ ( सरलार्थ हिन्दी ) जलके ऊपर गंजते हुए भौरों से पानी में प्रवेश किया अनुमान होने वाला मदजलधुलजाने से उजली कनपटीचाला जंगली हाथी नदी से निकला ॥४३॥ निःशेपविक्षालितधातुनापि वप्रक्रियामृतवतस्तटेषु । नीलो रेखाशवलेन शंसन्दन्तद्वयेनाश्मविकुण्ठितेन ॥ ४४ ॥ संहारविक्षेपलघुक्रियेण हस्तेन तीराभिमुखः सशब्दम् । बभौ स भिन्दन्वृहतस्तरङ्गान्वायर्गलाभङ्ग इस प्रवृत्तः ॥युग्मम्।। ४५ (अन्वयः ) निःशेषविक्षालितधातुना, अपि, नीलार्ध्वरेखाशवलेन, अश्मविकुरिटतेन, दन्तद्वयन, ऋक्षवतः तटेपु, वप्रक्रियां, शंसन् , संहारविक्षेपलघुक्रियेण, हस्तेन, सशब्द, वृहतः, तरशान् , भिन्दन, ताराभिमुखः, सः, वार्यर्गलामझे, प्रवृत्तः, इव, कभी ॥ ४४ ॥ (टीका ) निशेपवितालितधातुनाशेषनिधीतगरिकादिधा. तुना, अपि, नीलाम्बरेघाशवलेन -श्यामाचरेखाकयुरेण, अश्म. . .

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३० रघुवंशकाव्यम् । [ पत्रम अथोपरिष्टाभ्रमरैभ्रमद्भिः प्राक्सूचितान्तःसलिलप्रवेशः । निधौतदानामलगण्डभित्तिर्वन्यः सरित्तो गज उन्ममज्ज ॥ ४३ (अन्वयः ) अथ, उपरिष्टात् , भ्रमद्भिः, भ्रमरैः, प्राक्सूचितान्तः सलिलप्रवेशः, निर्धातदानामलगण्डभित्तिः, वन्यः, गजः, सरित्तः उन्ममज ॥४३॥ (टीका ) श्रथ अनन्तरं, उपरिष्टात् = ऊध्वं, भ्रमद्भिःभ्रमण शोलेः, भ्रमरैः, द्विरेफैः, प्राक्सूचितान्तःसलिलप्रवेशःप्राग्विशा पितजलप्रवेशः, निधैतिदानाऽमलगण्डभित्तिःक्षालितमदनिर्मलक पोलभित्तिः, वन्यः प्रारण्यकः, गजः मतङ्गजः; सरित्तःनर्म दायाः सकाशात् , उन्ममजउत्थितः॥४३॥ ( समासः ) प्राक्सुचितः अन्तः सलिले प्रवेशो यस्य सः । नि/- तदाने अतएव अमले गण्डभित्ती यस्य सः ॥ ४३ ।। (सरलार्थः ) अनन्तरं कश्चन वन्यो गजः, नदीजलाभ्यन्त- रात्, उत्थितः, तस्य च उन्मजनात्प्रागेव तन्मदजलगन्धाकृष्टाः सलिलोपरि गुञ्जन्तः भ्रमराः तस्य निमजनं प्रावोधयामासुः ॥ ४३ ॥ (सरलार्थ हिन्दी ) जलके ऊपर गूंजते हुए भौरों से पानी में प्रवेश किया अनुमान होने वाला मदजलधुलजाने से उजली कनपटीवाला जंगली हाथी नदी से निकला ॥ ४३ ॥ निःशेपविक्षालितधातुनापि वप्रक्रियामृक्षवतस्तटेषु । नीलोवरेखाशवलेन शंसन्दन्तद्वयेनाश्मविकुण्ठितेन ॥ ४४ ॥ संहारविक्षेपलघुक्रियेण हस्तेन तीराभिमुखः सशब्दम् । वभौ स भिन्दन्वृहतस्तरङ्गान्वायर्गलाभङ्ग इव प्रवृत्तः ॥युग्मम्॥ ४५ (अन्वयः) निःशेषविक्षालितधातुना, अपि, नीलार्ध्वरेखाशवलेन, अश्मविकुण्ठितेन, दन्तद्वयेन, ऋक्षवतः तटेषु, वप्रक्रियां, शंसन् , संहारवितेपलघुक्रियेण, हस्तेन, सशब्द, बृहतः, तरङ्गान् , भिन्दन, तीराभिमुखः, सः, वार्यर्गलाभङ्गे, प्रवृत्तः, इव, वभा ॥ ४४ ॥ (टीका ) निःशेषविक्षालितधातुना-अशेषनिधैतिगरिकादिधा. तुना, अपि, नीलोयरेखाशवलेन -श्यामाचरेखाकवुरेण, अश्म: .

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३२ रघुवंशकाव्यम् । [पत्रमा - . (अन्वयः ) शैलेोपमः, सः, शैवलमजरोणां जालानि, उरसा, कर्षन् , पश्चात् , तट, उत्ससर्प, पूर्व, तदुत्पीड़ितवारिराशिः, सरित्प्र- वाहः, " तट, उत्ससर्प ।' ॥ ४६ ॥ ( टीका) शेलोपमः गिरितुल्यः, सः गजः, शेवलमजरीणां =जललीनवल्लोनां, जालानि =वृन्दानि, उरसा वक्षस्थलेन, कर्पन =आकर्षन् , पश्चात् = अनन्तरं, तटं तीरं, उत्ससर्प-श्राजगाम, पूर्व-प्राक् , तदुत्पीड़ितवारिराशिः =गजोत्पीडितजलसमूहः, सरि. प्रवाहानदीचेगः, " तट ', उन्ससर्प ॥ ४६॥ (समासः ) शैल उपमा यस्यसः । शैवलानां मार्यः शैवलमार्यः तासां। वारणा राशिरिति वारिराशिः, तेन उत्पीडितः वारिराशि- र्यस्यः सः। सरितः प्रवाह इति सरित्मवाहः ॥ ४६ ॥ ( सरलार्थ: ) पर्वतसद्दशाकारः सः गजः उरस्थलेन शैवलल. तानां जालानि श्राकर्पन नदोतीरं पाररोह, तेन क्षुभितं नदीजलं तु तत्प्रागेव कूलं प्लापयामास ॥ ३ ॥ ( सरलार्थ हिन्दी ) पहाड़की उपमावाला हाथी शिवाल की लताओं को छातोसे खीचता हुआ अपने हिलाए नदी जलके प्रवाहके बाद तट पर पहुँचा ॥ ४६॥ तस्यैकनागस्य कपोलभित्योर्जलावगाहक्षणमात्रशान्ता । बन्येतरानेकपदर्शनेन पुनर्दिदीपे मददुर्दिनधीः ॥ ४७ ॥ (अन्वयः ) तस्य, एकनागस्य, कपालभित्याः, जलावगाहक्षण- मात्रशान्ता, मददुर्दिनधीः, वन्यतानेकपदर्शनेन, पुनः, दिदीप ॥ १७ ॥ ( टीका ) तस्य - पूर्वोक्तस्य, एकनागस्य = एकाकिनागजस्य, कपालभित्याः = गगप्रदेशयाः जलावगाहक्षणमात्रशान्तानीमा नमुर्तनिवृत्ता, मददुर्दिनधीः-मदवर्षलकमी, चन्यतरानेकादर्श- नेन-ग्राम्यवहुमजावलोकगेन = पुनः भूयः, दिदीप = वटा ५७ ॥ समासः) पकचासो नाग इति एक नागः तस्य एकनागत्य । कोलवाः मिन्तिः कपालभित्तिस्तयाः। जल प्रवाह जलाया म्तेन नगामा शाला । मदय दुर्दिनामति मदददिन समय श्री ।

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रघुवंशकाव्यम् । (अन्वयः ) सः, छिनबन्धमृतयुग्यशून्यं, भग्नावपर्यस्तरयं, रामापरित्राणविहस्तयाधं, सेनानिवेशं, क्षणेन, तुमुलं, चकार ॥ ४६ ॥ (टीका ) सा-हस्ती, छिन्नवन्धद्रुतयुग्यशून्यं भग्नटखला- पलायिताश्वोष्ट्रवृषभशून्यं, भग्नाक्षपर्यस्तरथं छिनरयावयय- पतितरथं, रामापरित्राणविहस्तयाधं-स्त्रीसंरक्षणव्याकुलवीर, सेना- निवेशंसैन्यशिविरं, क्षणेन-क्षणमात्रेण, तुमुलं-संकुल, चकार कृतवान् ॥ ४६॥ ( समासः ) गुगं वहन्तीति युग्याः। छिन्नाः बन्धा यैस्ते छिन्न- बन्धाः श्रतएव द्रुताः इति छिन्नवन्धद्वताः ते च ते युग्याश्चेति छिन्नबन्धद्रुतगुग्याः तेः शून्यस्तम् । भग्ना अक्षा येषान्ते भग्नाक्षा अतएव पर्यस्ता रथा यस्मिन् सः तम् । रामाणां परित्राणे विहस्ता याचा यस्मिन् सः तम् । सेनायाः निवेश इति सेनानिवेशस्तम् ॥४६॥ (सरलायः) बन्यगजस्य भयात् सर्वेऽपि अश्वाः सकलं सैन्यसमुहं क्षोभयामामुः ॥ ४६॥ ( सरलार्थ हिन्दी ) लगाम तोड़ाकर भागे हुए घोड़े से शुन्य, धूरा टूट जानेसे पड़े हुए रथों वाले तथा त्रियों की रक्षामें धाड़ाए हुए योद्धानों वाले सैन्यको उस हाथीने क्षणमात्र में व्याकुल कर दिया ॥४॥ नमापतन्तं नृपतेस्वथ्यो वन्यः करीति श्रुतवान्मारः । निवरिष्यन्विशिखन कुम्मे जघान नात्यायतकशायः ॥ ५० ॥ (अन्वयः ) बन्यः, करी, नपतेः, अवथ्यः, इति श्रुतवान् , कुमार, प्रापतन्त, त, नियतयिष्यन् , विशिवन, नात्यायतकृयशा, सन." कुम्मे, अधान ॥ ५० ॥ (टोका) बन्यः-पारगया, करी गजा, नगतराशा, अवयः अमारणीयः, इति, श्रुनयानातवान, 'कुमा:An, प्राततिप्राममन्तं अभिधावन्तं इति था, तंग, नियन- वियन परावर्तयियन "नतु मारयिष्यन्" अतापत, नात्यापतयः शानादिदीसमायवाणः, " म" विशिनवागन, मे गहस्य, वानप्रदतवान, frit

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सुबोधिनीसमेतम् । गपितः, "इदानीं" भवतः=तव, प्रतिप्रियंप्रत्युपकारं, न कुर्या, वेत् =तर्हि, मेमम, स्वपदोपलब्धिः स्वस्थानप्राप्तिः, वृथा स्यात् त्यमेव भविष्यति ।। ५६॥ (समासः) चिरं प्रार्थितं दर्शनं यस्य सः तेन । सत्त्वं विद्यते यस्या- जो सत्त्ववान् तेन । स्वपदस्य उपलब्धिरिति स्वपदोपलब्धिः ॥ ५ ॥ (सरलार्थः) तदारभ्य चिरप्रार्थितं भवदागमनं प्रतीक्षमाणोऽ- इमत्र तिष्ठामि । अद्य महता भाग्येन भवदागमनखातं येनाहं शापमुक्तो जातः। एवं उपकृतोऽहं यदि भवतः प्रत्युपकारं न कुर्या तदा मे स्वस्थानप्राप्तिरपि व्यर्धेव स्यात् ॥ ५६ ॥ (सरलार्थ हिन्दी ) तब से आपके दर्शन की इच्छा से मैं यहां रहता हूं आज बड़े भाग्य से आपके दर्शन होने से मैं शाप से मुक्त हुआ, अब यदि आपका उपकार न किया तो मेरा "गन्धर्व स्थान, पाना ही व्यर्थ होगा।॥ ५६ ।। समोहनं नाम सखे ममात्र प्रयोगसंहारविभक्तमन्त्रम् । गान्धर्वमादत्स्व यतः प्रयोक्तुर्न चारिहिंसा विजयश्च इस्ते॥ ५७ ॥ (अन्वयः) हेलखे ? प्रयोगसंहारविभक्तमन्त्रं, गान्धवं, संमो. हन, नाम, मम, अखं, पादत्त्व, यतः, प्रयोक्तुः, अरिहिंसा, न, (टीका ) हेलखे ? हेप्राणसम ? प्रयोगसंहारविभक्तमन्य- पन, नाम = प्रसिद्ध, मम-मे, अलं-श्रायुध, प्रादत्त्व = गृहाण, विजयः च, हल्ते, स्थास्यतीतिशेषः ।। ५७।। प्रक्षेपणसंक्षेपमितमन्त्रं, गान्धर्वगन्धर्वदेवताकं, संमोहनं, प्रस्था- यतः यस्मात् अस्त्रात्, प्रया:-प्रक्षेपयितुः, अरिहिसा=शत्रुमा- जयः-शत्रुजयोऽपि, हस्ते करे, हस्तगतविजयोभविष्यसीत्यर्थः॥५॥ (समासः) प्रयोगे:प्रेरणे, संहार% उपसंहारे च विनता- मिन्नौ मन्त्रों यस्य तत् । समाधतेऽनेनेति सम्मोहनम् । (सरलार्थः) हेसखे प्रयोगे संहारे च भिनमन्त्रं संमोहनं नाम मेगान्धर्वास्त्रं गृहाए येन त्वं शनुक्धं विनैव जयधियं प्राप्त्यति॥५॥ (सरलार्थ हिन्दी) हे मित्र ? आए छोड़ने और लोटाने में भिन्न २ मन्त्र वाले गन्धर्वसम्बन्धी सम्मोहन नामकेमरे अस्त्रले उत्तर-पतिस्तमस्य जीवितान्नवस्न् । ३६ वर्गः: हिंस्यात्सर्वभूतानोतिश्रुतिदर्शनात् " वि. रणं, न = नभविष्यति, “मा है ४० रघुवंशकाव्यम् । ग्रहण करो जिससे प्रयोग करनेवाले को वैरियों की हिंसा भी नहीं होंगी और विजय हाथों में रहेगा ॥ ५७ ॥ अलं हया मा प्रति यन्मुहर्त दयापरोऽभूः प्रहरन्नपि त्वम् । तस्मादुपच्छन्दयति प्रयोज्यं मयि त्वया न प्रतिषेधरौक्ष्यम् ॥५८॥ (अन्वयः) “किञ्च" मां, प्रति, हया, अलं, यत् , त्वं, "मां" प्रहरन् , अपि, मुहृतं, दयापरः, अभूः, तस्मात्, उपच्छन्दयति, मयि, त्वया, प्रतिषेधरीक्ष्यं, न, प्रयोज्यम् ॥ ५ ॥ (टीका ) "किञ्च" मां, प्रति, हृया शरमहारनिमित्तया लजया अलं%3 विरतोभव प्रहारलजितचित्तं दूरीकुरु यत्-यस्मात् त्वं मां, प्रहरन्नपि विध्यन्नपि, मुहृतं = क्षणमात्र, दयापरः = कृपा. परः, अभूः आसीः, तस्मात् , कारणात्" उपच्छन्दयति-प्रार्थ- यमाने, मयि, त्वया भवता, प्रतिषेधरीक्ष्यं = परिहारपारुष्यं, नन- योज्यं नविधेयम् ॥ ॥ ( समासः ) प्रतिषेध एव रौक्ष्यमिति प्रतिषेधरीक्ष्यम् ॥ ५ ॥ (सरलार्थ; ) यञ्च, त्वं मयि वाणप्रहारं कृतवान् तेन मा लजितो भव, यतः, भवत्प्रक्षितः वाण एव मां पुनः एताद्वगवस्थाया अनुभवं कारितवान् अतोऽहं कृतोपकारं, त्वां, संमोहनात्राङ्गीका- राय प्रार्थये तत्र निषेधरूपं पारुप्यं त्वया न करणीयम् ॥ ५ ॥ (सरलार्थ हिन्दी) लजामतकरी, क्योंकि प्रहार करते हुये भी जव तूं क्षणमात्र दयावान हुआ तो अब मुझ प्रार्थी पर निषेधरूप रूखापन करना तुझे उचित नहीं है ।। ५ ॥ तथेत्युपस्पृश्य पयः पवित्रं सोमोद्भवायाः सरितो नृसोमः । उदङ्मुखः सोऽस्त्रविदस्त्रमन्त्र जग्राह तस्मानिगृहीतशापात् ॥५६॥ (अन्वयः) नृसोमः, अस्त्रवित्, सः, तथेति, सोमोद्भवायाः, सरितः, पवित्रं, पयः, उपस्पृश्य, उदङ्मुखः, सन् " निगृहीत- शापात् , तस्मात् , अस्त्रमन्त्रं, जग्राह ॥५४॥ (टीका) नृसोमःचन्द्रतुल्या, पुरुषश्रेष्ठः” अस्त्रवित् अस्त्रज्ञः, सःअजः तथा इति=तथास्तु इति, अङ्गीकृत्य" सोमोद्भवायाः सरितः नर्मदायाः, पवित्रं पुण्यं, पयःजलं, उपस्पृश्य%ाचम्य, उदङ्मुखः उत्तरास्यः, “सन्" निगृहीत.

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रघुवंशकाव्यम् । । पत्रमा (सरलार्थ हिन्दी ) इस भांति मार्गमें देवयोगसे अकस्मात् मित्र होने वाले उन दोनो में से एक गन्धर्व, कुवेरके उद्यानभूमि की ओर गया दूसरा (अज ) सुराजसे शोभित विदर्भ देशको गया तं तस्थिवांसं नगरोपकण्ठे तदागमारूढगुरुपदपः । प्रत्युज्जगाम क्रयकैशिकेन्द्रश्चन्द्र मद्धोमिरिवोर्पिमाली ॥ ६१ ॥ (अन्वयः) नगरोपकण्ठे, तस्थिवांसं, तं, तदागमारूढगुम प्रहर्पः, क्रयकैशिकेन्द्रः, प्रवृद्धोमिः, ऊर्मिमाली, चन्द्र, इव प्रत्युजगाम ॥ ६१ ॥ (टीका ) नगरोपकराठे - नगरसमीपे, तस्थिवांसं = स्थितं, तं- अजं, तदागमारूढगुरुमहर्पः = अजागमनसमातमहानन्दः, क्रयकै- शिकेन्द्रः। विर्भभूपः "इन्दूदये" प्रवृद्धोमिः = प्रवृद्धतरङ्गः, ऊम्मि. माली-समुद्रः, चन्द्र चन्द्रमसं इच, प्रत्युजगाम प्रत्युद्गतवान् । (समासः ) नगरस्योपकण्ठमिति नगरोपकराटं तस्मिन् । तस्य श्रागमनेन प्रारूढः गुरुः ग्रहों यस्य सः । कथकैशिकानां इन्द्र इति कथकैशिकेन्द्रः। प्रवृद्धाः ऊर्मयो यस्मिन् सः। अम्भिरेव माला अस्त्यस्येति ऊम्मिलाली ॥ ११ ॥ (सरलार्थः ) यथा इन्दो उदिते समुद्रः तं श्रालिंगनाय उच्चलितो भवति तथैव अजोऽपि यदा नगरसमीपमागतः तदा प्रसन्नानना भोजराजः सम्मानयितुं स्वयं प्रत्युजगाम ॥ ६१ ॥ (सरलार्थ हिन्दी ) जैसे चन्द्रोदय होनेसे समुद्र मानन्दित हो उससे मिलता है उसी प्रकार नगर के समीप ठहरे हुये अजको विदर्भनाथ अत्यन्त प्रसन्न होकर मिला ॥ ११ ॥ प्रवेश्य चैन पुरमग्रयायी नीचैस्तथोपाचरदर्पितश्रीः । मेने यथा तत्र जनः समेतो वैदर्भमागन्तुमजं गृहेशम् ।। ६२ ॥ (अन्वयः ) एनं, अग्रयायी, नीचैः, पुरं, प्रवेश्य, अर्पितनीः, तथा, उपाचरत् , यथा, तत्र, समेतः, जनः वैदर्भ, आगन्तुं "मेने' अर्ज, गृहेश, मेने ॥ ६॥ :: (टीका ) एने-अजं, अग्नयायी-सेवया अग्ने गच्छन् , नीचैः नम्रः" सन् , पुरं नगरं, प्रवेश्य प्रवेशयित्वा, अर्पितश्री:- दत्त. स्छयचामरादिशामः, तथा तेन प्रकारेण, उपाचरत्- उपचरितवान्, :

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रघुवंशकाव्यम् ।
[पञ्चमः
पुरुषास्तैः। प्रागद्वारस्य वेद्यां विनिवेशिता पूर्णकुम्भौ यस्यास्तां ।
नवा चासो उपकायेति नवोपकार्या तां ॥३॥
(सरलार्थः) यथा मदनः मनोरम नवयौवनं स्वाधिष्ठानेन सुशो-
भितं करोति तथैव भोजराजस्य] सुचतुराः अधिकारपुरुषाः
तमजं
द्वारवेद्यां प्रतिष्ठापितमाङ्गलिककलशैः सुशोभितं मनोरमं राजभवनं
प्रापितवन्तः ॥ १३॥
( सरलार्थ हिन्दी) द्वारकी वेदी पर भरे हुए कलशोंवाली,
मनोहर विश्रामशाला में बाल्यावस्था से युवावस्थाको प्राप्त हुए
कामदेव के समान रघुके प्रतिनिधि युवराज अजने वास किया ॥३॥
• तत्र स्वयंवरसमाहृतराजलोक
कन्याललाम कमनीयमजस्य लिप्सोः ।
भावावयोधकलुपा दयितेव रात्रौ
निद्रा चिरेण नयनाभिमुखी बभूव ॥६४ ॥
(अन्वयः) तत्र, स्वयंवरसमाहृतराजलेोक, कमनीयं, कन्या..
ललाम, लिप्सः, अजस्य, भावाववोधकलुषा, दयिता, इव, निद्रा,
रात्री, चिरेण, नयनाभिमुखी, बभूव ॥ १४ ॥
(टीका) तत्र वस्त्रनिर्मितराजभवने, स्वयंवरसमाहतराज-
लोकं स्वयंवरसंमेलितभूपमण्डलं, कमनीयं-स्पृहणीयं, कन्याल-
लाम- कन्यारत्नं, लिप्सा:= लब्धुमिच्छोः, अजस्य, भावावयोधक-
लुपा-अभिप्रायवेदनाप्रसन्ना, दयिता=प्रिया, इव, निद्रा- शयनं
स्यान्निद्रा शयनं स्वापः' इत्यमरः, रात्री-निशायां, चिरेण
चिरकालानन्तरं, नयनाभिमुखी =नयनसंमुखी, बभूव - अभूत् ॥६॥
(समासः) स्वयंवरार्थ समाहृतः राजलोको येन तत् । कन्यासु
ललाम इति कन्याललाम । मावस्य श्रवोध इति भावाववोधः तेन
कलुपा । नयनयाः अभिमुखीति नयनाभिमुखी ॥ ६४ ।।
(सरलार्थः ) स्वयंवरे असाधारणरूपसम्पन्नस्य यस्य कन्या-
रत्नस्य प्रानये असंख्या राजानः समागताः, तस्य प्राप्तये अजोऽपि
प्रत्युत्सुक श्रासीत् ॥ ६ ॥
(सरलार्थ हिन्दी ) वहां स्वयंवर में राजकन्याको पाने के लिये
ग्रजकी आँखों में निद्रा रातमें अपने पतिक अभिप्रायको न जानने
वाली मुग्धानायिका के समान बहुन समयके पीछे भाई ॥ ३४ ॥

सर्पणाखाङ्कितं जातं. शय्यापाः उपयास्तरणवखस्य च घर्प- वर्ष से कुछ दरले गये थे। सोकर उटनेका समय होगया था इसलिये मधुरकरउ वाले सत पुषों ने प्रातःकाल स्तुतियां तथा मांगलिक गीत एवं वायों के द्वारा उसे जगाया ।। ६५ ।। सुललितगातन हि प्रनमा पानि तथाहि भाज:- गृहनिर्मदनैः पदे, सोतन्यजनप्तमा । नाकामरगाननिदातोमरतः (टीका) सुचामनासमेतम् । तं कर्षभूपणनिपीडितपीपरांनं शव्योत्तरदाविमर्दकशाङ्गरागम् । मतात्मजाः सवयमः प्रायतों पाबोधयन्नुपमि वाग्भिरुदारवाचः ॥ ३५॥ (अन्वयः ) कर्णभूपलनिपोडितपोवरांतं, शव्योत्तरध्यदविम- याङ्गरागं, प्रथितयोध, तं, तवयत्तः, उदारवावः, स्तात्मजा. उपसि, वान्भिः, प्रायोधयन् ॥ १५ ॥ कर्णभूपणनिपोडितपोवरांतं कर्णकुण्डलमहितो. नतस्कन्धं, शय्योत्तरच्दविनर्दकशारागंशय्याप्रच्छदवासवर्ष- गनिष्टकत्रिकाद्यङ्गराग, प्रथितयोधं - प्रकृष्टयोधत्तम्पन्नं, ते अलं, सवयतःसनानवयस्काः, उदारवाद प्रोडगिरः, स्ता- मजाःम्बन्दिपुत्राः, उपसि-प्रातःकाले, वाग्भिः:ललितवन्धैः प्रावधियन् -प्रवोधयामानुः ॥ ६५ ।। (समासः ) कर्णयाभूपणमिति कर्णभूषणे ताभ्यां निपीडितो पावरी अंसौ यस्य सः । शय्यायाः उत्तरच्छदस्य दिनदेन कशः अङ्गरागो यस्य सः तं । प्रथितः प्रयोधो यस्य सः तं। समानानि ययाति येपान्ते । उदारा वाचा येषां ते । सूतानां श्रात्मजा सूतात्मजाः ॥ ६५ ॥ (सरलार्थः) अथ प्रसुप्तस्य अजत्य विशाल सदयं कर्णभूषण- ऐन कस्तुरिकायरागः धातो बभूव । समतीतायां च निशाया मधुरकराठाः यन्दिनः मनोहरोः स्तुतिगोतिमलैः तं प्रबोधया- मासुः१६५॥ (सरलार्थ हिन्दी ) सोये हुए अजयो सन्न कर्मभूपल के स्तुतिपाठः, इति - राम् । 24 - सविता मतिनामुल गया मानिनु गो किका | वाने ततामिति गुना नया मनानगर गदाललगी ॥३६॥ ( अ ) हे मतिमता र गतिः, ता, शमां, म. माना जागा,, बिना Rs frerat, it, पात, प, पिता, विनिता, "मन मिति, भान, ता, आरणलो. भात ॥ ३६ (दोका ) हे मतिमता पर! हे गिर! हानि : निशा, गता गतीता, शुता - मोर, मुजाहिदि, यात्रा प्राणा, जगता-सारस्य, भू-मानाम:, हिबिकारिका, पय, Prar-विभज्य स्थागिता, त-पुर, बाटो, तसा भयतः, पिता-गुमः, "ry: " विनिः निरलसः" सन्, विभर्ति धारयति, भयानपि " गुसराजत्यात " तस्याः जगत्पालनकापुर, ময়না अन्यन्द्राराक्षाहनस्थानावलम्बी, भय ॥१६॥ (समासः) मतिरस्यास्तीति मतिमान । बिगता निद्रा यस्मात् सः। धुरं वहतीति चुर्यः, तस्य पदमिति पुर्यपद अपरञ्च तद्धयंपदमिति अपरधुर्यपदं तस्य अबलम्बी ॥ ६ ॥ ( सरलार्थः) है कुशाग्रबुद्ध ! रात्रिः गता, प्रातःकाला जाता, शयनादुत्तिष्ठ, बहादेवः पृथ्वोसंरक्षणरूपं कार्यभारं द्विधा विभज्य त्वयि बत्पितरि च समर्पितवान्, भवतः पिता तु निद्रा परित्यज्य स्वकार्य करीत्येव भवानपि तां विहाय प्रजापालनरूपं कायं साधय ॥६६॥ ( सरलार्थ हिन्दी ) हे सूक्ष्मवुद्धिवाले : रात बीत गई, सरा हो पाया, शय्या.छोड़ो। विधाताने संसार के भार को दो हिस्से में बांटा है, जिसके एक हिस्से का भार तेरा पिता निरलस हो उठा रहा है तूभी निद्राछोड़ दूसरी ओर के भार को उठा ॥ ६६ ।। निद्रावशेन भवताप्यनवेक्षमाणा पर्युत्सुकत्वमवला निशि खरिडतेव । लक्ष्मीविनोदयति येन दिगन्तलम्बी मोऽपि त्वदाननरुचि विजहाति चन्दः ।। ६७ ॥

- ( सरलार्थः ) निशायां त्वयि निद्रिते सति मन्ये तव चिरप्रिय- ना लक्ष्मीः त्वां निद्रारूपायां अन्यस्यां कस्याञ्चिन्नायिकायां सिकं दृष्ट्वा कुपिता भूत्वा स्वमनःसन्तोषार्थं त्वदाननसदृशं चन्द्र माधयते सोऽपि चन्द्रः इदानीं अस्ताचलावलम्बी क्षीणप्रभः सन् जा लल्मीः निराश्रया जाता तत्त्वं तस्या विनोदार्थ तां गृहाण ॥६॥ (सरलार्थ हिन्दी) सोए हुए तुमको मानो निद्रारूपी किसी कान्तिवाले चन्द्रका प्राश्रयकरती है वह चन्द्रभी प्रभात के समय अस्त होजाता है इसलिये निराधित उस लक्ष्मी को तूं ग्रहण करा.६७ तदल्गुना युगपदुन्मिापतन ताव- त्सयः परस्परतुलामधिरोहतां द्वे। शतुस्तव प्रचलितभ्रमरं च पदमम् ॥ ६८ ।। (अन्वयः) तत् अन्तः, प्रस्पन्दमानपरुपेतरतारं, तव, चक्षुः, चलितन्त्रमर, पद्म, च, "इति" दे, वल्गुना, युगपत्, तावत् : न्मिपितेन, सया: दे, अपि, परस्परतुलां, अधिरोहताम् ॥ ६॥ सुधाभिनीसमेतम् । ४३ अन्ययः ) निद्रावशेग, नवता, पर्युनुकत्वं, अपि, निशि, खण्डि- क्यला. इव, अनयासाला "सती" लक्ष्मीः, येन, " चन्द्रेण "विनोदयति, सः, चन्द्रः, पि, दिगन्तलम्बी, " सन् । त्वदा- चिं विजहाति ।।१॥ (टीका ) निद्रायशेग-निद्रायत्तेन, भवतात्वया, पर्युत्सुकत्व- प्रत्युत्कण्ठितत्वमपि, निशि-निशायां, खण्डिता=अन्याऽ- शानकलुपिता, प्रयला=नायिका, इव, अनवेक्षमाणा-वि- त्यन्ती, सती, लन्मोः-श्रीः. येन-चन्द्रेण सह, विनोदयति = नादं करोति, सः, चन्द्रोऽपि. दिगन्तलम्बी = पश्चिमाशाङ्गतः, न्" त्वदाननरुचि-त्वन्मुखतादृश्य, विजहाति-त्यजति ॥ ६७ ।। ( समासः ) निद्रायाः वश इति निद्रावशः तेन । दिशामन्त इति गन्तः तं लम्बत इति दिगन्तलम्बी । तव अाननं त्वदाननं, तस्य चस्ताम् ।। ६७ ।। बन्मुखसादृश्यं जहाति अतस्त्वन्मुखतादृश्यस्य अन्यत्याभावात् इसरो स्त्री प्रासक्त जान कुपित हुई लक्ष्मी तेरे मुखके समान मस्पन्दमानपरुषेतरतारमन्त- रघुवंशमास्यम् । [पत्रमः % 3D (टीका ) तत् तस्मात्कारणात् , अन्तः गणे, प्रसान्दमान- पोतरतार-चलन्मनाहरकनीनिक, तब-ते, चक्षुः नेत्र, प्रच. लितभ्रमरं चल पा कमल च, "इति" में "अपि" वल्गुना = मनोग, युगपत् = एककालमेव, तावद् उन्मिपितेन = उन्मीलितेन; "समकालमेव विकसितन" सः तत्क्षणे, परसरतुलां अन्यान्य- सादृश्यं, अधिराहतां प्राप्नुताम् ॥ ८ ॥ ( समासः ) प्रस्पन्दमाना गमपेतरा तारा यस्य तत् । प्रचलिताः भ्रमराः यस्मिन् तत् प्रचलितभ्रमरम् ॥ ६८ ॥ ( सरलार्थः ) इदानी वालातपसंयोगात् कमलानि विकासं प्राप्नु- चन्ति, अतस्त्वमपि यदि अस्मिन्नेव समये निजं नेगहन्दं उन्मीलयसि तदा एककाले एवं विकसितं चञ्चलनीलतारकायुतं त्वदीयं नेत्रं, नीलनमरशोभितं पद्म च पतदुभयमपि परस्परं सादृश्यं प्राप्नुयाताम् ॥६॥ ( सरलार्थ हिन्दी ) चञ्चल और मनोहर पुतलीयाले तेरे नेत्र और भीतर फिरते हुए भैरवाले कमल ये दोनों अपदे २ सुन्दर विकाशसे परस्पर समानता प्रात कर अर्थात् कमल खिल रहा श्रापभी अपनी शाखें खोल ॥ ६ ॥ वृन्ताच्छ्लथं हरति पुष्पमनोकदानां संसृज्यते सरसिजैररुणांशुभिन्नैः । स्वाभाविकं परगुणेन विभातवायुः सौरभ्यमीप्सुरिव ते मुखमारुतस्य ॥ ६ ॥ (अन्वयः) विभातवायुः, ते, मुखमारुतस्य, स्वाभाविक, सौरभ्यं, परगुणेन, ईसुः, इव शनोकहानां, श्लथं, पुप्पं, वृन्तात्, हरति, श्ररुणांशुभिः, सरसिजैः, संसृज्यते ॥६६॥ (टीका) विभातवायुः-प्रभातयायुः, ते-तव, मुखमारुतस्य- निश्वासवायोः, स्वाभाविक नैसर्गिक, सौरभ्यं सौगन्ध्यं, परगुणेन -अन्यदीयगुरणेण, ईप्युःप्राप्तुमिच्छुः, इच, अनाकहानां-वृक्षाणां, श्लथ शिथिलं, पुप्पं कुसुमं, वृन्तात् = प्रसवबन्धनात्, हरति- अपहरति, " श्रादत्ते" रुणांशुभिन्नैः= सूर्याशुविकसितैः, सरसिजैः कमलैः, संसृज्यते संगच्छते ॥ ६॥ ... D

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५० रघुवंशकाव्यम् । | पञ्चमः . सरलार्थ हिन्दी ) नीचंके होंठपर शोभापाकर दांतोकी कान्ति सहित तुम्हारी साधारण हंसी (मुस्कुराहट) के समान वृक्षों के लालपत्तों में पड़ीहुई हारके स्वेत मोतियोंकीसी स्वच्छतावाली प्रोसकी बूंद अत्यन्त शोभाको प्राप्त हो रही है ॥ ७० ॥ यावत्प्रतापनिधिराक्रमते न भानु- रन्हाय तावदरुणेन तमो निरस्तम् । आयोधनाग्रसरतां त्वयि वीर ? याते किं वा रिस्तव गुरुः स्वयमुच्छिनत्ति ॥ ७१ ॥ (अन्वयः ) प्रतापनिधिः, भानुः, यावत् , न, आक्रमते, तावत्, अन्हाय, अरुणेन, तमः, निरस्तं, हे वीर !, त्वयि, आयोधनाग्रसरता, याते, सति, तव, गुरुः, किं, रिपून , स्वयं, उच्छिनत्ति, ॥ ७१ ॥ (टीका) प्रतापनिधिः =सूर्यः, यावत् न आक्रमतेनोच्चिनत्ति, तावत् , अन्हाय झटिति, "द्राम्झटित्यससान्हाय” इत्यमरः, अरु- णेन -सूर्यसारथिना, तमः तमिस्त्रं, निरस्तंदूरीकृतं, हे वीर!- हे शुर ! त्वयि भवति, प्रायोधनाग्रसरता संग्रामाग्रगामित्वं यातेप्राप्ते सति " तव भवतः, गुरुः रघुः, किं, रिपून् =शत्रून्, स्वयं, उच्छिनत्ति-उन्मूलयति, अपि तु नाच्छिनत्येव ॥ ७ ॥ (समासः) प्रतापस्य निधिरिति प्रतापनिधिः, अग्रेसरतीत्यग्रेसरः तस्यभावोऽग्रसरता। आयोधनेषु अग्रसरतेत्यायोधनाग्रसरता तां॥७॥ ( सरलार्थः) यथा सूर्यसारथिः अरुणः" सूर्योदयात्प्रागेव तदीयसाहाय्यं विनैव अन्धकारनिमग्नं समस्तमेव जगत् अन्धकार- नाशनेन प्रकाशयति तथैव त्वमपि उत्थितः सन् पितृसाहाय्यं विनैव सकलं अरिमण्डलं उन्मूलय ॥ ७१ ॥ (सरलार्थ हिन्दी ) जब तक तेजका समुद्र सूर्य उदित नहीं हुआ उसके पहलेही उसके सारथी अरुणने अन्धेरा मिटा दिया, हे वीर ? संग्राम में तुम्हारे अग्रगामी होते हुए भी क्या अब तेरा पिता आप वैरियों को मारेगा ॥ ७१ ।। शय्यां जहन्युभयपक्षविनीतनिद्राः स्तम्बेरमा मुखरशृङ्खलकर्पिणस्ते । .

स
नां"झन् झन् इति" महान् शब्दः समुत्पन्नो भवति तेषां दन्ताश्च
हुए तुम्हारे हाधी दोनों श्रार (दाहिनी ओर बाई थोर) लोटपोटकर
निद्रादूर करते हैं। जिनके दांतोंके जोड़े नई धूपके लयोगसे पहाड़के
गेरुए टुकड़ों के खोदनेसे लगी हुई लाली की नाइ चमकते हैं ॥ ७२॥
वक्त्रोमणा मलिनयन्ति पुरोगतानि
सुबोधिनीसमेतम् ।
येपां विभान्ति तरुणारुणरागयोगा
निनादिगरिकतटा इव दन्तकोशाः ॥ ७२ ॥
(अन्वयः ) मुखग्लापिणः, उभयपक्षविनीतनिद्राः, ते,
स्तम्बेरमाः, शय्यां. जहति, येषां दन्तकोशाः, तरुणारुणरागयोगात्,
भिन्नाद्रिगैरिकतटाः, इव, विभान्ति, ॥ ७२ ॥
( टीका ) उभयपक्षविनीतनिद्राः वामदक्षिणपार्श्वपरिवर्तना-
पगतनिद्राः, मुखरयालकर्पिणः = " अगसञ्चालनात् '' शब्दायमा-
ननिगड़ाकर्पिणः, ते तव, स्तम्बरमाः= इभाः, हस्तिनः, शच्या
-शयनं, जहति-त्यजन्ति, येषां स्तम्बेरमाणां दन्तकोशाः=
दन्तकुङ्गलाः, तरुणारुणरागयोगात्वालार्करागसंयोगात्, भिन्ना-
द्विगैरिकतटाः- छिन्नाद्रिधातुखण्डाः, इव,
विभान्ति-शोभन्ते ॥७२॥
(समासः ) उभाभ्यां पक्षाभ्यां विनीता निद्रा येषान्ते। मुखर-
थासो गृहलो मुखरङ्गलः, तं कर्पन्ति तच्छीलाः मुखरलकर्षिणः ।
स्तम्वे रमन्त इति स्तम्बेरमाः। दन्ताः कोशाः इव दन्तकोशाः ।
तरुणश्चासावरुण इति तरुणारुणः तस्य रागः तस्य योगात् ।
अः गैरिकतटा अद्रिगैरिकतटाः, भिन्ना अद्विगैरिकतटा इति
भिन्नाद्विगैरिकतटाः ॥ ७२ ॥
(सरलार्थः) तव सेनागजेन्द्राः वामदक्षिणपार्श्वद्वयागपरिव-
तनपुरःसरं निद्रां विहाय उत्तिष्ठन्ति तेषां अगसञ्चालनात् शाला-
वालारुणसंयोगेन
पर्वतोत्खातफेलिसंलग्नगैरिकरागरक्ता
शोभन्ते ॥७२॥
(सरलार्थ हिन्दी ) शब्द करती हुई साकलोंका (सिकड़) खंचते
निद्रां विहाय वनजाक्ष ! वनायुदेश्याः ।
दीर्घप्वमी नियमिताः पटमण्डपेषु
लेखानि सैन्धवशिलाशकलानि बाहाः ॥ ७३ ॥

પૂર रघुवंशकाम्यम् । [ पत्रमः (अन्वयः ) हेवनजात ? दीर्धेषु, पटमण्डपेघु, नियमिताः, वना- युदेश्याः, अमी, वाहाः, निद्रां विहाय, वक्त्रोप्मणा, पुरोगतानि, लेह्यानि, सैन्धवशिलाशकलानि, मलिनयन्ति ॥ ७३ ॥ (टीका) हेवनजाक्ष ? हेकमलाक्ष, दीर्घघु =महत्सु, पटम- एडपेषु-वस्त्रगृहेषु, नियमिताःबद्धाः, वनायुदेश्याः-पारसीका:, वनायुजाः पारसीकाः' इति विश्वः, अमी-एते, वाहा:-अश्वाः, निद्रां, विहाय त्यक्त्वा,. पुरोगतानि-अग्रस्थापितानि, लेह्यानि =आस्वाद्यानि, सैन्धवशिलाशकलानि=सैन्धवशिलाखण्डानि, वक्त्रोष्मणा: मुखवाष्पेण, मलिनयन्ति -मलिनानि कुर्वन्ति ॥ ७३ ।। (समासः ) वनजे इव अक्षिणी यस्यासो वनजाक्षः, तत्सम्वुद्धौ पटानां मण्डपानि पटमण्डपानि तेषु । वनायुदेशे भवा वनायुदेश्याः । सैन्धवशिलानां शकलानीति सैन्धवशिलाशकलानि ॥ ७३ ॥ (सरलार्थः ) हे कमलनयन ? वस्त्रनिर्मितवृहन्मण्डपेषु बद्धाः वनायुदेशोत्पन्नाः अश्वाः निद्रां विहाय सम्मुखस्थितानि सैन्धव- शिलाखण्डानि श्रास्वादयन्तः सन्तः निजनिश्वासवायुभिः तानि मलिनानि कुर्वन्ति ॥ ७३ ॥ (सरलार्थ हिन्दी ) हे कमलनेत्र ! बड़े २ कनातके घेरोंमें बन्धे हुए पारसी देशके ये धाड़े निद्रा छोड़ भागे रक्खे हुए सेन्धा नोनके टुकड़े को चाटते हुए मुखकी भांपसे उन्हें मैला कर रहे हैं॥७३॥ भवति विरलभक्तिमानपुष्पोपहारः स्वकिरणपरिवेपोद्भेदशून्याः प्रदीपाः । अयमपि च गिरं नस्त्वत्प्रवोधप्रयुक्ता- मनुवदति शुकस्ते मजुवाक्पजरस्थः ॥ ७४ ॥ (अन्वयः) म्लानपुष्पोपहारः, विरलभक्तिः, भवति, प्रदीपा, स्वकिरणपरिवेपोन्दशन्याः, "वर्तन्ते " मञ्जुवाक् , पसरस्था, ते, शुकः, त्वत्प्रयोधप्रयुक्तां, नः, गिरं, अनुवदति ।। ४ ।। सैन्धवलवणमचानां श्लेष्मनिवारणार्थ दीयते । तथा च पुर्वाण्डकाले चाश्वानां प्रायशो स्वर्ण हितम् । शूलमोहविवन्धनं लवणं सैन्धवं वरम् । इति धनन्जयः। अयं, १ , (टीकर ) मानसोपा गुम्सवाप्पम्तानपुप्पपूजा, विरत. भार: विरलग्नान, दाया:दीपाः, स्वकिरणपरिवेषो. दन्याः - निलगन्याः, " वर्तन्ते " मञ्जुवाक = मधुरबचनः, पारम्य शिरस्थितः अयं = एपः, ते-तव, शुकः- गुरुनामापता, अपि, न्यायप्रयुनां त्वत्प्रबोधार्थमुच्चारितां, नः = अस्माकं, गिरंबानी, अनुवदति ।। ७२ ।। (समासः ) पुष्पालानुपहार इति पुप्पोपहारः, म्लानचासो पुष्पोपहार इति नागपुप्पोपहारः, बिरला भक्तिरिति विरलभक्तिः । स्वकिरणानां परिवंश इति स्वकिरणपरिवेशः, तत्य उन्नेदेन शून्याः। मनुः वार यन्यालाविति मञ्जबार । पजरे तिष्ठतीति पजरस्थः तव प्रबोधस्त्वत्प्रयाधस्तत्र प्रयुक्ता ताम् ॥ ७२ ॥ (सरलार्थः ) उपायनार्थ श्रानीतानि पुष्पाणि मुखबाप्पादिना मलिनानि जातानि । प्रदीपा अपि निजकिरणमण्डलैः वहिः द्योतितुं असमर्थाः ससाताः । प्रयञ्च पिचरस्थापितः तव शुकः अपि त्वत्प्रयोधार्य उच्चारितां अस्माकं वाणीं अनुबदति ॥ ४ ॥ (सरलार्थ हिन्दी ) भेटकेफुल कुह्मलाजानेसे सजावट मलिन होरही है, दीपक अपने किरण मण्डलसे बाहर चमकने में असमर्थ हो रहा है, और पिंजड़ेमे रक्खा हुश्रा यह तुह्मारा सुग्गाभी अपनी मीठी वाणी में तुझारे जगाने के लिये हमलोगों की कही हुई वाणीका इति विरचितवाग्भिवन्दिपुत्रः कुमारः सुरगज इस गाङ्गं सेकतं सुप्रतीकः ॥ ७५ । अन्वयः) इति, विरचितवाग्भिः, वन्दिपुत्रैः, सपदि, विगत- निद्रः, कुमारः मदपटु. निनदद्भिः, राजहंसः, योधितः, सुप्रतीकः सुरगजा, गाङ्ग, सक्त, इव, वल्पं, उम्झाञ्चकार ॥ ५ ॥ बन्दिपुत्रैः-वैतालिकैः, सपदि तत्क्षणे, "शीघ्रमेव' "लयः सपदि तत्क्षणे, इत्यमरः, विगतनिद्रः-अपगतनिदः, कुमार-प्रजः, मदपर १३ विरचितवाग्भिः रचितस्तुतिपाठः, अनुवाद कर रहा है । ७४ ॥ सपदि विगतनिद्रस्तल्पमुज्झाञ्चकार । मदपटुनिनदद्भिवोधितो राजहंसः (टीका) इति=इत्थं, D ५४ रघुवंशकाव्यम् । [ पश्चम मदमधुरं, यथा स्यात्तथा" निनदभिः-निनादं कुर्वद्भिः राजहंसैः, बोधितःजागरितः, मुप्रतीकः-सुप्रतीकाभिधेयः, मुर- -दिग्गजा, गाई गङ्गासम्बन्धि, सैकतं-सिकतामयं पुलिनं " इच, तल्पं शय्यां, उज्झाञ्चकार तत्याज ॥ ७ ॥ (समासः ) विरचिता वाचा येस्तैः । वन्दिनः पुत्रा इति तैः विगता निद्रा यस्यासौ। मदेन पटु इति मदपटु । गङ्गाया इदं गाङ्गम् ॥ ५॥ । सरलार्थः ) मधुरभापिभिः राजहंसैः जागरितः सुप्रतीकनामा दिग्गजः गङ्गायाः वालुकामयप्रदेशं यथा त्यजति तथैव उक्तप्रकारेण वचनरचनाचतुरैः स्तुतिपाठकैः जागरितः कुमारोऽपि शय्यां तत्त्याज ॥५॥ ( सरलार्थ हिन्दी ) जैसे मधुरभाषी राजहंसों के जगाए हुए सुप्रतीक नाम सुरगजने गङ्गाका रेतीला तट छोड़ा उसी प्रकार ऊपर कहे हुए वचनोंकी रचना करने वाले सूतपुत्रों से जगाए हुए कुमार अजने भी शय्या (सेज ) तुरंत छोड़ो । ७५ ।। अथ विधिमवसाय्य शास्त्रदृष्ट दिवसमुखोचितमञ्चिताक्षिपदमा । कुशलविरचितानुकूलवेपः क्षितिपसमाजमगात्स्वयंवरस्थम् ॥७६।। (अन्वयः) अथ, अञ्चिताक्षिपदमा, “ सः '' शास्त्रदृष्टं, दिवस- मुखाचितं, विधि, अवसाय्य, कुशलावरचितानुकूलवपः, स्वयंवरस्थं, क्षितिपसमाज, अंगात् ।। ७६ ॥ (टीका) अथ-शय्यात्यागानन्तरं, अञ्चितातिपक्षमा चारुनेत्रलोमा, सः-अजः, शास्त्रदृष्टं शास्त्रावगतं, दिवसमुखो- चितं-प्रभातोचितं, विधिअनुष्ठान, अवसाय्य-समाप्य कुशलविरचितानुकूलवेषः = प्रसाधनचतुररचितस्वयंवरोचितवेषः स्वयंवरस्थं स्वयंवरस्थितं, क्षितिपसमाज भूपसमूह अंगात् जगाम ।। ७६ ॥ (समासः ) अञ्चितानि अक्षिपदमाणि यस्य सः । शास्त्रे दृष्टमिति शास्त्रदृशं । दिवसस्य मुखे उचितामेति दिवसमुखाचितम् । कुशल विरचितः अनुकूलवेश यस्य सः। स्वयंवर तिष्ठतीति स्वयंवरस्थ तं । क्षितिपानां समाजः तितिपसमाजातं ॥ ७६ ॥ सन्" - % 3D सन्" .

रघुवंशस्य द्वितीयादिसर्गचतुष्टये प्रश्नाः। सन् १९१२ अधकधनौरपराधकालागुरोः समानुपतिमा विमपि । सम्योन्य मन्युभवता विनः कोटिशः सरयता घटोनीः ॥ १ ॥ अमंल चानेन परायजन्मना स्थितेरभेत्ता स्थितिमन्तमन्वयम् । स्वतिभेदेन गुणाम्रगतिना पतिः प्रजानानिय सर्गमात्मनः ॥ २ ॥ आपादपसरणताः .लना इयत रघुन् । फलैः संवर्धचामानुरु सातप्रतिरोपिताः ॥ ३ ॥ खजूरीसन्धनद्वानां मदोद्वारसुगन्धिषु । कटेपु करिणां पेतुः पुनागेन्यः शिलीमुखाः ॥ ४ ॥ भक्तिः प्रतीक्ष्येषु फुलोचिता ते पूर्वान् महाभाग तयातिशेपे । प्यतीतकालस्त्वहमन्युपेतल्यामधिभावादिति ने विपादः ॥ ५॥ तस्यैफनागस्य कपोलभित्त्योर्जलावगाहक्षणमात्रशान्ता । वन्येतरानेकपदर्शनेन पुनर्दिदीपे मदुर्दिनधीः ॥ ६ ॥ तं तस्थिवांसं नगरोपकण्ठे तदागमाल्डगुल्महर्पः । प्रत्युजगान क्रयकैशिजेन्द्रश्चन्द्र प्रवृदोनिरिवोनिमाली ॥ ७ ॥ एषां दण्डान्वयं सण्डान्वयं वावलम्व्य व्याख्या कार्या। सन् १९१२ (१) निवर्त्य राजा दचितां दयालुः (२) पुरन्दरत्री-पुरमुत्पताकन् । (३) ततो निपलादसमग्रमुद्धतं (७) इक्षुच्छायानिपादिन्यः। (५) तनीशः कामरूपागाम् (६) तं वायसन्बन्धमतौ विचिन्त्य । दण्डान्वयं खण्डान्वयं वावलव्यैपां व्याख्या कार्या। सन् १९९३ (१) धनुर्नृतोऽप्यस्य दयाईनावं (२) तदमयं मघवन्महारतोः (३)स सैन्यपरिभोगेण (५) अपनीतशिरवागाः (५) तमर्चवित्वा विधिवद्दिधिज्ञः (६) अथ प्रभावोपनतेः कुनारं। एपानन्वयमुखेन व्याख्या कार्या।

५६ रघुवंशकान्यम् । [ पञ्चमः मालूम होता है कि मुझे आपके पास इससे पहले ही आजाना चाहिये था। अस्तु । यद्यपि इस समय आप केवल नामधारी राजा के सदृश होरहे हैं पर, फिरभी देवताओं की तृप्ति के लिये स्वयं क्षीण चन्द्रकी तरह भिक्षुकों में सर्वस्व दान किये आप अनुपम सुपमाका विकास कर रहे हो । जैसे किसी कवि ने कहा है कि- मणिः शाणोल्लोढः समरविजयी हेतिनिहतो मदक्षीणो नागः शरदि सरितः श्यानपुलिनाः । कलाशेपश्चन्द्रः, सरतम्मृदिता बालवनिता, तनिम्ना शोभन्ते गलितविभवाश्चार्थिपु नृपाः ॥ अब मैं गुरुदक्षिणा के लिये और किसी राजा के पास जाता हूं" इतना कह कर ज्योंही कौत्स ने जाना चाहा कि राजा रघुने उन्हें रोक कर पूछा कि के विद्वन् कितनी धनकी आपको आवश्यकता है इसपर कौत्स ने गुरु महर्षि वरतन्तु के साथ की हुई सारी बातें कहकर उसे चौदहकरोड़ की आवश्यकता बतलाई । रघुने यह कहकर कि आजतक मेरे यहां से कोई अतिथि अपने मनोरथ को बिना पूरा कि लोटा नहीं इस लिये आप मेरे इस पवित्र अग्निशाला में दो तीन दिन कृपा कर प्रतीक्षा करें मैं आपके कार्य के लिये प्रयत्न करता हूं। कौत्सने इसे स्वीकार किया। रघुने कुबेर पर प्रातःकाल चढ़ाई करने का निश्चय किया। रघु प्रातःकाल ज्योंही रथ पर पैर रखता है कि सजाने के पहरेदारों ने आ विनीत होकर निवेदन किया कि “रात्रि में " कोप-गृह " में एवर्ण की दृष्टि हुई है। रघु ने जाकर उसे देखा और पर्वत की तरह यह एवणं की सारी राशि विधान कौत्स को देदी कौत्स ने उन्हें पुत्र लाभ का आशीर्वाद देकर गुरु के आश्रम की और प्रयाग किया। कुछ दिन के बाद रघु को एक पुत्र हुआ जिसका नाम "अ" रक्खा गया। क्रमाः समय पाकर शिक्षा आदि पाने के उपरान्त अज युवा अवस्था को प्राप्त दुआ और इन्दुमती के स्वयंवर में प्रस्थान किया, मार्ग में मतम अपि के धागार को प्रात प्रियंवद गन्धर्वको मार कर उसका उस योनित उदार किया। प्रसनदार उसने उनको सम्मोहन नामका अनादिया। इस प्रकार Kा मन नार में पहुंचा। भोज ने उसका स्वागत हिया और एक इन्दा संत मनाए नयन में हराया जानादिरिया से निको विधान घिया और दूसरे दिन प्रातःकाल स्वयनित या-नुषा को पा र स्यस्य मा.कोमा प्रयापति

(1) मन्दरा (२)मंत मानेनारामना।
(३) मान्यता (2) नातु पतितं तलाह।
:) इन्द्रमान माना।
सन् १९२२
(१) सवारमानिनिर्मान या दिनान्ते निल्याप गन्तुन् ।
समाजात्रामा पाल मुनेश धेनुः ॥
(क) सोलापानिनन्याया नया नोचचिर्नु नपत्तः ।
नशाना स्वामिनात नलता नुनेः रिचार्यःu
() सपरिवार स्वनिक्षतानं पिनुरेव नन्नवत् ।
न केवलं नारेशानिया शिताग्देधनुर्धरोऽपि तः ॥
(८) कामचलस्य निधिदेवतान् ।
सनदुप्पोपहारेननासानान, पादयोः ।
(५) एवं तयोरधनि देवयोगादादुपोः सल्यचिन्त्यहेतु ।
एको यो चैत्यदेवान सौराज्यन्यानपरो विदर्भान् ॥
एते सोका दमान्यमनसेन नामविप्रदर्शनलकं व्याख्येयाः।
सिंहदिलीरयोः संवादः संस्कृतनापया संपतो लेख्यः॥
सन् १९२३
(1) विष्टपायांनुचरत्व तत्य पादुनाः पाशता सनत्य ।
उदारमानानुरिदोन्नदानानालोशन्दं वयतां विरावैः॥ ॥
न संपतलस्य दभूब रक्षिबुर्वितये तुतजन्नहतिः।
अगानिधानात्स्वपने वलं तदा पितृनां नुमुचे त बन्धनात् ॥ २ ॥
दिशि नन्दायते नो दक्षिनवां वरपि।
तत्याने स्योः पाण्ड्याःप्रतापं न विपहिरे ॥३॥
शरैल्सयस तान अलास दिरतोतवान् ।
अयोदाहरणे बाहोरियानात शिवरान् ॥ !
संमोचितः तत्वता लयाहं शासशिरमातिदर्शनेन ।
प्रतिप्रियं चेङ्गवतो न च्यां वृथाहि ने स्यास्वपदोपलभिः ॥ ५ ॥
(क) एते सोश दन्डान्वयन तनातविग्रहमदर्शन न्याया।
(ग) नन्तिनलोशन शकेन चनोचितः।
(२) कौत्तत्य खोज संवादः बहन लेयः ॥ २० ॥

. ( ८ ) (क) यदात्य राजन्यकुमार तत्तया यशस्तु रक्ष्यं परतो यशोधनैः। जगत्प्रकाशं तदशेपमिज्पया भवद्गुरुर्लयितुं ममोद्यतः ॥ (च) ततः प्रतस्थे कौवेरी भास्यानिव रघुर्दिशम् । वारैरसौरिवोदीच्यानुदरियन रसानिव ॥ (२) संस्कृतभाषया संक्षेपेण पञ्चमसर्गीयकथा लिख्यताम् । (३) द्वितीयचतुर्थ लोकयोर्वर्तमानयोश्छन्दसोलक्षणे लिख । (५) विद्युन्माला, मालिनी, प्रहर्षिणी, शिखरिणी, स्रग्धराणां लक्षणान्यु दाहरणानि च प्रदर्शय। सन् १९३३ (१) दण्डान्वयमवलम्व्य व्याख्यायन्ताम् । (क) तं वेधा विदधे नूनं महाभूतसमाधिना । तथा हि सर्वे तस्यासन पराबैंकफला गुणाः ॥ (ख) क्षताकिल नायत इत्युदनः क्षत्रस्य शब्दो भुवनेषु रूढः । राज्येन किं तद्विपरीतवृत्तेः प्राणैरुपक्रोशमलीमसैर्वा ॥ (ग) शतेस्तमक्ष्यामनिपत्तिमिहीर विदित्वा हरिभिश्च वाजिभिः । भवोचदेनं गगनस्पृशा रघुः स्वरेण धीरेण निवर्तयन्निव ॥ (घ) स प्रतापं महेन्द्रस्य मूर्ति तीक्ष्णं न्यवेशयत् । अकुशं द्विरदस्येव यन्ता गम्भीरवेदिनः ।। (क) शरीरमानेण नरेन्द्र तिष्ठनाभासि तीर्थप्रतिपादितर्द्धिः । आरण्यकोपातफलप्रसूतिः स्तम्वेन नीवार इवावशिष्टः ॥ (२)प्रथमश्लोके महाभूतपदेन केपां ग्रहणम् ! तृतीयश्लोके एनमिति कथं सिध्यति ? चतुर्थश्लोके च गम्भीरवेदिनः किं लक्षणमेतत्सवं लिख- (३) हिन्दीभाषया एतेषां वाक्यानां विशदार्थ लिख- (क) त्याज्यो दुष्टः प्रियोऽप्यासीदङ्गुलीवोरगक्षता । (ख) चित्रार्पितारम्भ इवावतस्थे । (ग) प्रणिपातप्रतीकारः संरम्भो हि महात्मनाम् । (घ) आदानं हि विसर्गाय सतां वारिमुचामिव । (४) दोधक-तोटक-पृथ्वीच्छन्दसा सोदाहरणानि लक्षणानि प्रदर्शय (५) “सन्ततानां त्वमसि शरणं तत्पयोद प्रियायाः" कस्यच्छन्दसोऽयं पादः? सलक्षणं तच्छन्दोऽभिधीयताम् । - -

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Raghuvansmahakavyam-2

Author
Kalidas
Title
Raghuvansmahakavyam-2
File name
Raghuvansmahakavyam-2
Text
OCR done
Citation
1945
Published
2011/07
Publisher
Mumbay.steem Press
Language
Sanskrit
Pages
263
Library
Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
DLI number
311184
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99999990310916.00
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