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Jyotishsar

Shukdeva · 2012/08

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श्रीः। अथ ज्योतिषसारस्थविषयानुक्रमणिका। पत्रांक. पत्रांक. । विषय. १] रवि... २| सोम... . " " भौन... ... १८ ... " " विषय. मङ्गलाचरणम् शकप्रकरण... संवत्सरपरिज्ञान संवत्परिज्ञान संघररूरनामानि संवत्सरांके फल संवरउरके स्वामी संवत्सरोकभेद अन्यमतसे स्वामीफल ऋतुप्रकरण... अयन... ... " ... प ... ... ... ... १९ " ... ... " " ... ... .... ... ... बुध गुरु ३ | शुक्र "शनि... ४. वारों के देवताअधिदेवताकृत्य "विचारकरनेका कालपरिमाण दोषादोप कृत्य "तैलाभ्यंगमें शुभाशुभ ५ वस्त्रपरिधान श्मश्रुकर्म ६ विद्यारंभ "यारकोष्ठक " नक्षत्रपारज्ञान " ... ... शुभाशुभ कर्म 17 .... ... ... ... ... २५ " ... .... .... संक्रांत्यनुसारऋतु राशिअनुसारऋतु मासप्रकरण... मासपरिज्ञान चांद्र मास ... " ... .... .... .... .... .... २१ ... .... .... .... .... सौर मास "| कोष्ठक .... .... .... .... ૨૪ २५ ... .... .... " " " ... ... .... .... .... " ... .... .... " .... .... " " .... .... .... ... ... .... . " " ... सावन मास "कायांकार्यविचार नाक्षत्र मास अधोमुखनक्षत्र मासीक नाम व सूर्य देवता " | तिर्यमुख नक्षत्र वारोंके अनुसार मास फल ७] ऊर्ध्वस नक्षत्र पक्ष- ध्रुवनक्षत्र अधिकमास मृदु नक्षत्र... क्षयमास लघु नक्षत्र... संवत्सरफल भधिकमासस्वामी इत्या- तीक्ष्ण नक्षत्र दिक चक्र चरनक्षत्र.... तिथिप्रकरण... १३| उग्र नक्षत्र.... तिथिसंज्ञापरिज्ञान और उनके फर १४ मिश्र नक्षत्र कोष्टक १५ / नष्टवस्तुज्ञान अष्ट दिशाओंके स्वामी ... १६ नक्षत्रानुसार प्रश्न... ग्रहोंके वर्ण वा जाति १७|तिविचारनक्षत्रानुसार प्रश्न घारोंमें कर्तव्य कर्म मद्यारंभमुहूर्त ... ... " ... ... .... .... ... ... ૨૭ ... ... " .... ... .... २८ " ...

(२) ज्योतिपसारकी पत्रांक. पत्रांक.! विषय. ....२९ योगों के नाम "योगांकी वर्जितघटी ३. करणजाननेकी रीति ... ३९ ... " ... नाम ... ... ... ... ... ... ... ४१ ... ... ४३ ५४ ... ... " ... ... ... .... " " " " ... ... ... ४६ " ... ... " ... " .... ४७ विषय. नवीनवस्त्रधारणका मोती सुवर्णआदिका पुंसवनका कर्णवेधका अन्नप्राशनका श्मश्रुकर्मका... दंतबंधनका... श्मश्रुकम आवश्यक श्मश्रुकर्ममें वयं मौजीबंधन विवाहनक्षत्र... भनिदोवके विद्याभ्यासक औषधी लेने के रोगोत्पत्तिमें शुभाशुभ विचार... रोगमुक्तिहोनेका प्रमाण रोगमुक्तिनाननक्षत्र रोगमुक्तिस्नानलग्न लताओषधिलगानेका कृपारंभ ... द्रव्य देनेलनेका हाथी लेनेदनका घोडालेनेका देनेका गवादि पशुलेनेका गोलेने तथा बेचनेका तृणकाष्ठादिसंग्रहका हलधारण करनेका बीज बोनेका रात्खनुसार चंद्रोदयका फल पुण्यनक्षत्रके गुणदोष सर्पदशामें वर्जित गाना सीखनेका राज्याभिषेकका राजदर्शनका द्वतीयाक चंद्रोदयका योगमकरण ... ... .... " ... " .... ... "कोष्टक कल्याणी ३१) संक्रांति 1 कोष्टया वारनक्षत्रानुसार "करणकोप्टक फलश्रुति संक्रांतिमुहूर्त द्वितीयप्रकार धान्यलेनका विचार नक्षवानुसार संक्रांतिपीडा जन्मनक्षत्रोंका फाळ संक्रांतिका स्वरूपू "चंद्रसे संक्रांतिवर्णफल राम्यनुसारचंद्र पुण्यकाळ ग्रहणप्रकार... चंद्रग्रहणकीप्रवृत्ति सूर्यग्रहण रायनुसार शुभाशुभ फल ३५) द्वितीय पक्ष... "ऋतुप्रकरण... मासफल तिथिफल ग्रहण और संक्रांति ३६ वरिफळ नक्षत्रफल योगफल करणफल ३७ राशिफल होराफल स्नफल ग्रहोंका फल ३८ रक्तफल "कालफल " ... ... " ... " ... " ... ... ... .... ... ....४८ " ... " ... १९ १ ... " ... .... ... ... ... ५० ... .... .. " ... " ... " ... .... " " ... ... ..04 " अनुक्रमाणका। पत्राक ६८ " ... ... ... " .. " " ... ... ... ... ... " .. ... " " ... ... ... ... .. ... ..." ... " ... ८० .. " रविकी दशा ... ... विषय. पत्रांक. | विषय. पहिने वस्त्रोका फल ५४ माता पिताके नाशक रजस्वलाधर्म मृत्युकारक गर्भाधानमुहूर्त ५५/ ग्रहांकी दृष्टि ऋतुकी १६ रात्रि ग्रहीका उच्चत्व व नीचत्व तिथिवारमुहूर्त પ૬ जन्मलग्नका फट नक्षत्र स्त्रीजातक गर्भिणीपुंसवन .... ५७ / कोष्ठक वारफल अटोत्तरीकी महादशा सीमन्तोन्नयनविष्णुवली... सख्याका कम पक्षच्छिद्रा तिथि अतर्दशालाने का क्रम ... मासेश्वरज्ञानमाह कोष्ठक ... गर्भिणीधर्म ... ५९ , विंशोत्तरी महादशा और अतर्दशा... ७८ गर्भिणीमश्र दशाओकी भोक्तव भोग्य की रीति.. प्रसूतिस्थानमवेशन विशोत्तरीक्रमकोष्ठक ७९ प्रसूतिकालका प्रश्र ६० महादशा अतर्दशा फल तिथिगंडान्त " लंगगडान्त... .६१ चद्रकी दशा नक्षत्रगंडान्त जातक राहुकी अतर्दशा जन्मकालका शुभाशुभ... ६. गुरुकी अतर्दशा ८१ गडान्तकाल शनिकी अतर्दशा कृष्णचतुर्दशीका फल बुधको अतर्दशा अमावास्याके फल केतुकी भतर्दशा दिनक्षयादितियिफल शुक्रकी अतर्दशा ज्येष्ठानक्षत्रका फल ६३. योगीनीदशाक्रम मूलका फल वर्षसख्या जन्मवालम मूलनक्षत्र कहा है योगिनीदशाका कोष्टक तिसका ज्ञान ६३ | अतर्दशाका फल आश्लेषा नक्षत्रका नराकारचक्र ६४ वर्षदशा... जन्मकालके ग्रहोंका फल सूर्यकी दशाफल पुरुषजातक्कोटक जन्मकालमेबालककैमृत्युकारवग्रह मगलकी जन्मपालंम स्त्रीके मृत्युकारक्यह ६७ | बुधकी. पराक्रमी ग्रह शनिकी अपराक्रमी ग्रह जातिभ्रशकारक .... " भीमकी दशा ... ... " " . " T " १५ .... ८६ ... • ६६ | चद्की दशा ." " ... ... ... ... गुरुकी राहुकी " - ज्योतिषसारकी- पत्रांक. ... ... ... ... ... .... ... ९९ १०० १०१ दूसरा मत .... ... .... " ... .... ... ... ... ... ... ...१०२ " " ... ... ... ... ... .... ... ..१०३ ... ... " ... १०४ " ... " " १०५ ... .... ... ... ... " " ... ... विषय. पत्रांक. | विषय, शुक्रकी ८६ | विवाहसमये प्रश्न ... नित्यानित्यदशाकाप्रत्य० "वर्षप्रमाण ८७ मंगलविचार गोचरप्रकरण... ...८८ भौमपरिहार द्वादशभवनके ज्येष्ठविचार जन्मके चंद्रमामें पांच कन्यालक्षण गोचरचक्र वरलक्षण वैधचक्र... चरदोष जन्मचन्द्रमामें पांच वर्जनीय अस्तोदय...... नेष्टस्थानके अनुसार चन्द्रफळ... नेटस्थानके अनुसार दान... अस्त और उदयकाल अस्तमें वर्जनीयकर्म वारोंक अनुसार दान विवाहे वर्जनीय ग्रहोंके दान और जप मूलादि जन्मनक्षत्रका दोष कोष्ठक. ९६ जन्मनक्षत्रादिवयं ग्रहपीडानिवारणार्थ... वर्षसारणी जातकर्म २३ वर्षप्रमाण नामकर्म गुरुचंद्रबल... नामका अवकहडान्चक्र... गुरुका फल.... कोष्ठक ९४ गुरु अनुकूल करनेका मंचकारोहण " अरमवीक्षानम् पालनका मुहूर्त ... ९५ | वगांदिज्ञान दुग्धपान "योनि तांदूलभक्षण... वन्यावश्य सूर्यावलोकन कर्णवेध "नाडी भूमिमें बैठना ९६ नवपंचक भन्नप्राशनमुहूर्त "मृत्युषडष्टक चौलकर्ममुहूर्त ९७ / प्रीतिषडटक विद्यारंभ द्विादश यज्ञोपवीतका मुहूर्त ९८ चतुर्थसप्तमादि मासादिमुहूर्त "वण्यावश्ययो वर्ष संख्या "ग्रहोंका शत्रुत्वमित्रत्व गुरवल "तागके कोटक ९९ / योनिका कोष्ठक... शद्रादिका संस्कार "ग्रहांका कोष्ठक बिगदमकरण .... गुणोंका कोष्ठक .... .... " ... ... ... १०७ " ... ... " " .. ९६ कोष्ठक १०९ ११० .... ... ... " १ " " ... .... ... .... ... .. गलनद तिथि .... .... " अनुक्रमणिका। (६) विषय. पत्रांक. ... ... ... " ... ... ... " " ... ... ... " ... गणोंका फल ... ... . " " ... ... ... " ... ... " ... ... " . ... ... ... ... ... " ... ... " ... " " ... पत्रांक. 1 विषय. नाडीका कोष्टक. ११४ | उदयास्तलग्नकथन सत्कूटअसत्कूटकोष्ठक. लग्नके उक्त अंशदेनेका क्रम.... कोष्ठक ११५ तात्काल स्पष्ट सूर्य लानका साधन... १२६ वर्णादिकका फल उदाहरण वैरियोनीका फल सूर्यकी गति स्पट रविके उत्तर कूटफळ 'अभुक्तदिवसके उदाहरण नाड़ीफल अयनांशलानका क्रम पार्श्वनाडी लग्नसे इष्टकाल लानेका क्रम... ૧૨૮ असत्कूटविचार भोग्यभुक्तसे इष्टकाल लानका क्रम... दुष्टकूटांका दान उदाहरण १२९ विवाहके उक्तनक्षत्र रविके भोग्यकाल लानेका क्रम एकविंशतिमहादोष लग्नस भुक्तकाल लानेका क्रम कोष्ठकानि... इष्टकालसमयका तत्काल सूर्य इश्काल दोषलक्षण... कर्तरीदोष.... भुक्तभोग इटपटीसेलग्नलानेका वधूवरकी राशिम अष्टमलग्नवऱ्या सूर्य और लग्न एकराशिमें हों तो इष्ट दुष्टमुहूर्त कथन लानेका क्रम ... यमा दिककथन लग्नके शुभाशुभ ग्रह कोष्टक ५२१ षड्वर्गशुद्धि जाननेका कम ... छत्तादोष विशांशादिकथन... ग्रहण तथा उत्पात आदौ ग्रहज्ञानम् । पाप हयुक्त और वेधनक्षत्र एकागळदोष होराकथन चंडायुध .... द्रेष्काणकथन पंचशलाका यंत्र.... सप्तमांश सप्तशलाका यंत्र. लग्नका नवांश क्रांतिसाम्यचक्र द्वादशांश जामित्रदोष ... विषमविशांश चरत्रयदोष समत्रिंशांश तिथि अनुसार वर्जित लग्न दोषनिवारण उक्तांश लममुहूर्त लग्नांशफल राज्युदय लग्नवोत्तमलक्षण लम्की घटिकाओंकी संख्या.... गोधूललग्नकाकथन १४० प्रतिदिवस भुक्तफल वधूप्रवेश.... ... .... " ... " ... ... .... " .... " ... ... " ... ... " " ... ... " ... " " ... " " " ... १२५ | इवर्ग जाननेका .... ... " .... ... " .... ... " " ... ... ...

पत्रांक. ... ५० " " ... .... " ... .... " ... ... ... .... .. .... " ... " " ... " " " " .... " ... " .... " ... .... ... ... ... ... १५४ " .... " " ... (६) ज्योतिपसारकी- विषय. पत्रांक. | विषय. उक्त मासादि १४१ । शेषांके मुख नूतन पल्लवधारण दुष्टयोग गंधर्वविधाहमुहून कूर्मचक्र स्तंभचक्र दूसरेमत अनुसार दत्तक पुवलेनेका मुहूर्त " देहलीका मुहूर्त वास्तुप्रकरण द्वारचक्र १४३ शांतिका अग्निचक्र ग्रामादि अनुकूल गृहके मुखमें आहुति ग्रहवरल.... गृहप्रवेशका मुहूर्त द्वारशुद्धि कलशचक्र ग्राम अनुकूल वामार्कलक्षण जातक जाननेका क्रम... शुभाशुभ ग्रह और लग्न वगाके स्वामी काकिणी गृहारंभम लमशुद्धि अशुभयोगोंका लम चंद्रमाके मुखजाननेकाविचार १४५ आयुष्यप्रमाण मायादिसाधन पृथ्वी शोधनेका प्रकार क्षेत्रफल प्रअक्षरफर भायोंके नाम यात्रामकरण वर्ण अनुसार आय शुभाशुभ फर ... भायोंके फल घातचंद्र नक्षत्र अनुसार व्ययसाधन घातप्रकरणम् ग्रहांकी राशि कालचंद्र ग्रहोंके नाम १४६ तिथिपरत्व वर्जितलग्न.... ग्रहांक नामलानेका प्रकार यात्राके नक्षत्र अंशलानेका प्रकार मध्यनक्षत्र ग्रहोंक भाग वन्यनक्षत्र... प्रदाकेदार प्रयाणमें शुभाशुभ यार ग्रहोंके स्थानोंकी योजनाका प्रकार.... होराकथन वारसहित. अल्पदोष . १४५ उत्तम प्रश्न होय तो प्रहारंभचक्र ग्रहमारभरमास चारानुसार वसधारण... ग्रहारंभक मासोंपा फट नक्षत्र तिथिवार अनुसार मासनासारणी १४८ दिशाशलययं .... दिगानुसार ग्रहावा मु० १४९ शूटदोपनियारणा पदार्थभक्षण नदारंभो. नक्षत्र... पुभमीनक चंद्रमें घर्जित गृपचम ... सन्मुपद्रविचार शिलान्यास निशानुसार सन्मुमचंद्र " ... " १५६ ... " १५७ " " ... .... ... ... ... ... १५८ " .... .... ... ... ... " ... .... ... . ... ... " ... ... ... " ... ... " ... ... ... ... ... ... 1 ... ... " ... ... .... " ... " " ... .... १५ .... ." " ... ... .... " ....

... .... " ... ... .... .... +... ... १६६ चरयोग... .. ... " ... ... " .... .... ... .... .... " .... .... " " .... .... " अनुक्रमणिका। (७) विषय. पत्रांक. | विषय, पत्रांक. कालवलाविचार १६३ शिवदिघटीमुहूर्त योगिनीवास शिवालिखित ... वारानुसार कालराहुका वास... • १६४ गोरखनाथकृत यात्रामुहतारभ क्षुधितराहु गोरक्षमत तिथिचक्र १९२ काल कहा तिसका ज्ञान - १६५ आनंदादि शुभाशुभयोग पंथाराहुचक्र उनोंका कोष्ठक धर्मार्थकाममोक्ष मार्गके फल पंथाराहु कर्म करनेयोग्य १६८ दासदासीलेनेका मुहूर्त गर्गादिकोंका मुहूर्त गवादि पशुलेनेका मु० १९७ अश्व मोललेनेकामुक ... शुभाशुभ वाहन अंकमुहूर्त १६९ हाथीमोल लेनेका मु० १९८ भ्रमणाडल मुहूर्त... ... शिचिकारोहणचक्र मु० हैवरमुहूर्त २७०/ छत्रचक्र.... घबाड मुहूर्त मंचकचक वार अनुसार स्वरशकुन शरसहित धनुश्चक बार अनुसार छापाशकुन रथचम ... २०० काकशब्दशकुन १७१ तिलोंकी धानीकरनेका मु० पिगलशब्दशकुन ऊखोंके रस काढनेका मु. ठिकानुसार पदच्छाया..... कृषिकर्मका मु०... ...२०१ छिकाशकुन हलचक्र .... पल्लीशब्दशाकुन १७२ नौका बनाने व जलमें उतारनेका पल्लीपतन और सरठावरोहण मुहूर्त २०२ अंगस्फुरण १७३ | नौकाचक्र.... स्त्रियोंका अंगस्फुरण १७५ | लग्न और ग्रहबल नेत्रस्फुरण मौका स्थापनेका गृह .२०३ त्रिशूलयंत्र दीपिकाचक्र गमनकाल्न द्वादशस्थानोंके अनुसार ...१७७ / पागलगानेका मुहूर्त गमनलममें ग्रहवल १७९ सिकाचलानेका मुहूर्त... प्रस्थान रखना १८०|प्रश्रप्रकार... प्रस्थान कित्तदिवस तिथ्यादिसंयुक्त प्रश्न ..... प्रस्थानके स्थानके विचार आत्मच्छायाप्रश्र प्रस्थानके दिवसमें पर्यपदार्थ पंधाप्रश्न ... मात्स्योक्तशकुन... कार्याक्रार्यप्रश्न दुष्टशकुनदोषनिवारण गमनकारमें उत्तमशकुन नवग्रहोंका यंत्र " ... .... " .... " ... .... .... ... ... ... " " .... " ... " ... ... ... ... " .... .... ... १७६ / कूपचक्र " .... " .... .... .. " .... ... ... " .... .... .... .... " ... 1 .२०६ १८५ अंकप्रश्न " " "..

(८) ज्योतिषसारकी-अनुक्रमणिका । " " " ” ... " " ... ... " " ... .... .... " " .... " " ... ... ... ... ... .... ... ... ... .... ... ... .... .... विषय. पत्रांक. | विषय. पत्रांक. वारनक्षत्रयुक्त पंथाप्रश्न... २०७/ चन्द्रस्पष्टक्रमः नष्टवस्तुप्रश्न लग्नसाधनम् गर्भिणी प्रश्न मुंथा... .२१८ मुष्टिप्रश्न पंचाधिकारी लनसे मनचिंतित प्रश्न.... ...२०८ / दृष्टिक्रमः संज्ञानुसार लग्ना० २०९ स्पष्टार्थचक्रम् अंकप्रश्न त्रिपताकीचक्र रोगीप्रश्न वेधविचार केवल इनसे प्रश्न २१० मुहादशा... मेघका प्रश्न... मुहादशाचक्रम् जदलग्न माधवनानेका क्रम मेघनक्षत्र २११/ ग्रहचकमकरण ... ३२२ स्त्रीनपुंसक पुरुपन० सूर्यचंद्रभौमकोष्ठक २२३ सूर्य व चंद्रनक्षत्र सं० बुध धान्यमश्र गुरु पशुके विषय में प्रश्न २१२ शुक्र.... राज्यभंगादि योग २१३ कोष्ठक २२४ सूर्य तथा चंद्र परिवेष अर्थात् मंडलका शनि राहु केतु... उत्पातोंका फल... कोष्ठक छायावर यात्रा जन्मनक्षत्र कहां पडाहे तिसका ज्ञान वायुपरीक्षाकथन... २१५ लग्नशुद्धि व पंचकज्ञान... २२६ वर्पनिकालनेका मकार २१५ वारीमें पंचक वर्जित तिथियनानेका क्रम २१६ | दिनमान रात्रिमान नक्षत्र हानेका क्रम दिवस कितना चढाहै ग्रहचालनकम ... रात्रि कितनी गई.. ग्रहस्पष्टीकरण भतरंग बहिरंग नक्षत्र २२८ भपातमभोगवनानेकी रीति २१७ | सूतिकास्नान " ... .... " " .... ... ... ... .... .... .... " ... ... ... ... .... .... ... ... ... .... १ ... ... ... " ... .... ... ... ... " ... .... ... ... .... ... ... ... " ... " " " ... " इति ज्योतिषसारस्थ विषयानुक्रमणिका समाप्ता। पुस्तकमिलनेका ठिकाना- खेमराज श्रीकृष्णदास, "श्रीवेंकटेश्वर" छापाखाना-मुंबई.

श्रीगणेशाय नमः।
अथ ज्योतिषसारः।
भाषाटीकासमेतः।
तत्रादौ मङ्गलाचरणश्लोको।
गणाधीशं नमस्कृत्य शारदा चित्स्वरूपिणीम् ॥
अज्ञानगजगण्डनीं गर्गलल्लादिकान्मुनीन् ॥१॥
नानाग्रंथान्समालोक्य दैवज्ञानां च तुष्टये ॥
कुरुते बालबोधाय ज्योतिःसारमनुत्तमम् ॥२॥
टीका-ग्रंथके निर्विघ्न परिसमानिके लिये प्रथमतः गणेशजीको नम-
स्कार करके और चैतन्यस्वरूपिणी अज्ञानको नाश करनेहारी ऐसी जो
सरस्वतीजी ताको नमस्कार करके और गर्गाचार्य, लल्ल, वसिष्ठ, नारद इत्या-
दिक जो ज्योतिःशास्त्रके प्रवर्तक आचार्य हैं उनको नमस्कार करके और
सूर्यसिद्धांतादिक नानाप्रकारके ग्रन्थ अवलोकन करके ज्योतिर्वितके
संतोपके लिये और बालकोंको थोडेमें मुहूर्तादिकका ज्ञान होय इस कारण
अत्युत्तम ज्योतिपसारनामक ग्रंथको करते भये ॥ १ ॥ २ ॥
शकप्रकरणप्रारंभः।
संवत्सरनामपरिज्ञानम् ।
शकेंद्रकालेऽर्कयुते कृते शून्यरसैहते ॥
शेपाः संवत्सरा ज्ञेयाः प्रभवाद्या वुधैःक्रमात् ॥३॥
टीका-शालिवाहन शकमें जिस संवत्सरका नाम जानना होय उसकी
यह रीतिहै कि, शककी संख्या लिखकर उसमें १२ मिलाये और ६० का
भाग देय, जो शेष बचे वही संवत्सरका नाम जानिये ॥ ३ ॥

(२)
ज्योतिषसार।
संवत्परिज्ञान।
स एव, पञ्चाग्निकुभिर्युक्तः स्यादिक्रमस्य हि ।।
रवाया उत्तरे तीरे संवन्नानाऽतिविश्रुतः॥४॥
टीका-जो शालिवाहनके शकमें १३५ मिलावे तो वही विक्रम
संवत् होजाय. जो रेवानदीके उत्तर तटमें संवत् नामसे प्रसिद्ध है ॥४॥
संवत्सरोंके नाम।
संवत्कालो ग्रहयुतः कृत्वा शून्यरसैद्धतः ॥
शेषाः संवत्सरा ज्ञेयाः प्रभवाया बुधैः क्रमात ॥५॥
टीका-संवत्सरके अंकोंमें ९ युक्त करे और ६० के भाग देनेसे जो
शेप रहे सो प्रायादि संवत्सर जानना-उदाहरण जैसे १९३५ में ९ मिलाय
तो १९४४ हुये--अब इसमें ६० का भाग दिया तो शेप २४ रहे इस
कारण इस संवत्सरका नाम विकृति नाम जानना चाहिये ॥ ५॥
प्रभवो विभवः शुकः प्रमोदोऽथ प्रजापतिः॥
अंगिराः श्रीमुखो भावो युवा धाता तथैव च ॥६॥
ईश्वरो वहुधान्यश्व प्रमाथी विक्रमो वृषः॥
चित्रभानुः सुभानुश्च तारणः पार्थिवो व्ययः॥७॥
सर्वचित्सर्वधारी च विरोधी विकृतिः सरः॥
नंदनो विजयश्चैव जयो मन्मथदुर्मुखौ ॥ ८॥
हेमलंबी विलंबी च विकारी शार्वरी प्लवः ।।
शुभकृच्छोभनः कोधी विश्वावसुपराभवा ॥ ९ ॥
पूर्वगः कीलकः सौम्यः साधारणो विरोधकृत् ॥
परिधावी प्रमादि च आनंदो राक्षसो नलः ॥१०॥
पिंगलः कालयुक्तश्च सिद्धार्थी रौद्रदुर्मती॥
दुंदुभी रुधिरोद्गारी रक्ताक्षी क्रोधनः क्षयः॥ ११ ॥

नाम
३८ कोधी
८ भाव:
९ युवा
भाषाटीकासममेत।
(३)
सिं०
सं० नाम सं० . नाम सं०] नाम सं०
१ प्रभवः
१३/प्रमाथी
२५ खरः
३७ शोभन:
१९ राक्षसः
२ विभवः १४' विक्रमः २६) नंदनः
५० नलः
१५ वृपः २७ विजयः ३९ विश्वावमुः ५१/ पिंगल:
४ । प्रमोद १६ चित्रभानुः २८ जयः ४० पराभवः ५२, कालयुक्तः
५ प्रजापतिः१७ सुभानुः २९ मन्मथः ४१॥ प्लवंगः ५३ सिद्धार्थी
.६ अंगिराः १८ तारण: ३० दुर्मुखः ४२ कीलकः ५४ रौद्रः
७ श्रीमुखः ५९ पावः ३१/ हमलंबी ४३. सौम्यः ५५ दुर्मतिः
२० व्ययः
३२ विलंबी
४४ साधारण:५६ दुंदुभिः
२२ सर्वजित् ३३ विकारी ४५ विरोधकृत् ५७ रुधिरोदारी
१० धाता २२ सर्वचारी ३४) शार्वरी ४६ परिधावी ५८ रक्ताक्षी
(२१ ईश्वरः २३ विरोधी ३५/प्लव: ४७ प्रमादी
५९ कोधनः
१२ बहुधान्यः ।२४। विकृतिः ३६ शुभकृत् ४८ आनंद:
६० क्षयः
संवत्सरोंका फल.
प्रभवाद्विगुणं कृत्वा विभिन्यूनं च कारयेत् ॥ सप्तभिस्तु हरेद्भागं
शेषं ज्ञेयं शुभाशुभम् ॥ एकं चत्वारि दुर्भिक्ष पंचद्वाभ्यां सु-
भिक्षकम् ।। विपष्ठे तु समं ज्ञेयं शून्ये पीडा न संशयः ॥ १२ ॥
टीका-प्रावादि संवत्सरों से चलते हुये संवत्सरको द्विगुणा करे,उसमें-
से तीन घटाके सातका भाग देनेसे जो शेप रहै तिससे शुनाशुभ फल जानि-
ये ॥ १ अथवा ४ शेप हैं तो दुर्भिक्ष और ५ वा २ घ, तो सुभिक्ष, ३
अथवा ६ शेप रहै तो साधारण और जोशून्य आवे तो पीडा जाननी १२
संवत्सरोंके स्वामी.
युगं भवेद्वत्सरपंचकेन युगानि च द्वादश वर्षपष्टया॥ भवंति
तेपामधिदेवताश्च क्रमेण वक्ष्यामि मुनिप्रणीताः॥ विष्णु-
जीवः शक्रो दहनस्त्वष्टा अहिर्बुभ्यःपितरः॥ विश्वेदेवाश्चन्द्र-
ज्वलनौ नासत्यनामानौ च भगः॥ १३॥
टीका-पांच वर्षका एक युग होताहै,इसी प्रमाणसे६०वर्षके १२युग और
क्रमसे उनके १२ स्वामी विष्णु, बृहस्पति, इन्द्र, अमि, ब्रह्मा, शिव,
पितर, विश्वेदेव, चन्द्र, अमि, अश्विनीकुमार, सूर्य ॥ १३ ॥

(४) ज्योतिषसार। भेद. संवत्सरः प्रथमकः परिवत्सरोन्यस्तस्मादिडान्वि- दिति पूर्वपदाद्भवेयुः॥ एवंयुगेषु सकुलेषु तदीय- नाथा वह्नयर्कशीतगुविरंचिशिवाः क्रमेण ॥ १४ ॥ टीका-इष्ट शकमें पांचका भाग दे शेष बचें उनसे संवत्सरोंके नाम कमसे जानिये ॥ पहिले संवत्का स्वामी अग्नि दुसरे परिवत्सरका स्वामी सर्य २ वीसरे इडावत्सरका स्वामी चन्द्रमा, ३ चौथे अनुवत्सरका स्वामी ब्रह्मा, ४ पांचवें इद्वत्सरके स्वामी शिव ५॥ १४ ॥ दूसरामत । आनंदादेर्भवेद्ब्रह्मा भावादेविष्णुरेव च ॥ जयादेःशंकरः प्रोक्तःसृष्टिपालननाशकाः॥१५॥ टीका-आनंदादिक २० संवत्सरोंका स्वामी ब्रह्मा जो सृष्टिकर्ता है और भावादिक २० संवत्सरोंका स्वामी विष्णुहै जो सबका पालन करते, तीसरे जयादिक २० संवत्सरोंका स्वामी रुद्र संहारकरते हैं ॥ १५॥ ऋतुप्रकरणम्। अयन. शिशिरपूर्वमृतुत्रयमुत्तरं यनमाहुरदृश्च तदामरम् ॥ भवति दक्षिणमन्य ऋतुत्रयं निगदिता रजनी मरुतां हि सा ।। १६॥ टीका-शिशिर, वसंत, ग्रीष्म इन तीन ऋतुम सूर्यकी गति उत्तर दिशा- को होतीहै तिसको उत्तरायण कहते हैं, यही देवताओंका दिवसहै और वर्षा शरद् हेमंत इन तीनों क्तुमें सूर्य की गति दक्षिणको होतीहै तिसको दक्षिणायन कहतेहैं यही देवताओंकी रात्रिहै ॥ १६ ॥ अयनोंमें शुभाशुभकर्म। प्रहप्रवेशत्रिदशप्रतिष्ठा विवाहचौलत्रतबंधदीक्षाः ।। सौम्या- यने कर्म शुभं विधेयं यद्गार्हतं तत्खलु दक्षिणे च ॥१७॥ टीका-गृहप्रवेश देवप्रतिष्ठा विवाह मुंडन व्रतधारण मंत्र लेना ये सब शुभ कर्म उत्तरायणमें करावे और सब निंद्य कर्म दक्षिणायन में करने योग्य हैं १७॥

भाषाटीकासमेत। संक्रांति अनुसार ऋतु. मृगादिराशिद्वयभानुभोगात्पड़र्तवः स्युः शिशिरो वसन्तः॥ ग्रीष्मश्चवाश्च शरच तद्वद्धेमंतनामा कथितश्च पष्ठः ॥ १८॥ टीका-मकर आदि लेकर दो राशि सब सूर्य भोगतेहैं तब एक ऋतु होतीहै उसी प्रकार सूर्य १२ राशि भोगतेहैं उससे ६ ऋतु होतेहैं ।। १८ ॥ तथा मतांतर राशि। चैत्रादि द्विद्विमाताभ्यां वसंतातवश्च पट् ॥ दाक्षिणात्याः प्रगृहंति देवे पित्र्ये च कर्मणि ॥१९॥ टोका-चैत्रादिक दोमासमें १ ऋतु इस प्रकारसे १२ मासमें ६ ऋतु होतेहैं सो दक्षिण देशमें देव पितृ कर्ममें प्रसिद्धहै ॥ १९ ॥ कर्क 3 शिशिरकतु । २ कुंभ ८ सिंह वर्षाऋतु ४ .९ कन्या वसंतऋतु २ १० तुला शरतु ५ ५ वृष १२ धन मतांतरराशिअनुसार मासअनुसार. मेपादिक दो राशि सूर्य भोगते हैं चैत्रसे लेकर दो२ मास वसंत इस प्रमाणसे वसंत आदिकदहोती है. आदिक छः६ऋतु होती हैं. तुला। चित्र । (७आधिा वसंत वसंत शरद् वृश्चि. २वृपा वैशा. शरद् कार्ति. मिथुन ९धन ग्रीष्म ९मार्ग. ४आपा ५सिंह वर्षा ११कुंभा शिशिर ५भाव. शिशिर कन्या १२मीन १२फा. १ दक्षिण देशवासी इस महीनमे पिटकम करते हैं। ३ मीन ४ मेप } ११ वृश्चिक हेमंतऋतु ६ ६ मिथुन } पीष्मऋतु । १ मेप ८ ज्येष्ठ ग्रीष्म 20मक हेमंत ४ कर्क पाप.हेमंत ११माघ दाद. वर्मा (१) ज्योतिपसार। भेद. संवत्सरः प्रथमकः परिवत्सरोन्यस्तस्मादिडान्वि- दिति पूर्वपदाद्भवेयुः। एवंयुगेपु सकुलेषु तदीय- नाथा वह्नयर्कशीतगविरंचिशिवाः क्रमेण ॥ १४ ॥ टीका-इष्ट शकमें पांचका भाग दे शेष बचें उनसे संवत्सरोंके नाम कमसे जानिये । पहिले संवतका स्वामी अनि १ दूसरे पार्रवत्सरका स्वामी सूर्य २ तीसरे इडावत्सरका स्वामी चन्द्रमा, ३ चौथे अनुवत्सरका स्वामी ब्रह्मा, ४ पांचवे इद्वत्सरके स्वामी शिव ५॥ १४ ॥ दूसरामत । आनंदादेर्भवेद्ब्रह्मा भावादेविष्णुरेव च ।। जयादेःशंकरः प्रोक्तःसृष्टिपालननाशकाः ॥ १५॥ टीका-आनंदादिक २० संवत्सरोंका स्वामी ब्रह्मा जो सृष्टिकर्ता है और भावादिक २० संवत्सरोंका स्वामी विष्णुहै जो सबका पालन करतेहैं तीसरे जयादिक २० संवत्सरोंका स्वामी रुद्र संहारकरते हैं ॥ १५॥ ऋतुप्रकरणम्। अयन. शिशिरपूर्वमृतुत्रयमुत्तरं यनमाहुरदृश्च तदामरम् ॥ भवति दक्षिणमन्य ऋतुत्रयं निगदिता रजनी मरुतां हि सा ॥१६॥ टीका-शिशिर, वसंत, ग्रीष्म इन तीन ऋतुमें सूर्यकी गति उत्तर दिशा- को होतीहै तिसको उत्तरायण कहते हैं, यही देवताओंका दिवसहै और वर्षा शरद् हेमंत इन तीनों ऋतुमें सूर्य की गति दक्षिणको होतीहै तिसको दक्षिणायन कहतेहैं यही देवताओंकी रात्रिहै ॥ १६ ॥ अयनोंमें शुभाशुभकर्म। ग्रहप्रवेशत्रिदशप्रतिष्ठा विवाहचौलव्रतबंधदीक्षाः ॥ सौम्या- यने कर्म शुभं विधेयं यद्गार्हतं तत्खलु दक्षिणे च ॥१७॥ टीका-गृहप्रवेश देवप्रतिष्ठा.विवाह मुंडन व्रतधारण मंत्र लेना ये सब शुभ कर्म उत्तरायणमें करावे और सब निंद्य कर्म दक्षिणायनमें करने योग्य, १७॥ .

भाषाटीकासमेत । संक्रांति अनुसार ऋतु. मृगादिराशिद्धयभानुभोगात्पड़र्तवः स्युः शिशिरो वसन्तः ॥ ग्रीष्मश्चवाश्च शरच तद्वद्वेमंतनामा कथितश्च पष्टः ।। १८॥ टीका-मकर आदि लेकर दो राशि सब सूर्य भोगतेहैं तब एक ऋतु होतीहै उसी प्रकार सूर्य १२ राशि भोगतेहैं उससे ६ ऋतु होतेहे ॥ १८ ॥ तथा मतांतर राशि। चैत्रादि द्विद्धिमासाभ्यां वसंतायतवश्च पट् ॥ दाक्षिणात्याः प्रगृहंति देवे पित्र्य च कर्मणि ॥ १९॥ टोका-चैत्रादिक दोमासमें १ ऋतु इस प्रकारसे १२ मासमें ६ ऋतु होतेहैं सो दक्षिण देशम देव पितृ कर्ममें प्रसिद्धहै ॥ १९ ॥ १ मकर कर्क } शिशिरऋतु १ २ कुंभ ८ सिंह 3 धक्रितु ४ } वसंतकतु २ १० तुला ५वृष १२ धन मतांतरराशिअनुसार मासअनुसार. मेपादिक दो राशि सूर्य भोगते हैं। चैत्रसे लेकर दो२ मास वसंत इस प्रमाणसे वसंत आदिकदहोतीहै, आदिक छः६ऋतु होती हैं. १ मप र तुला १चत्र [७आधिा वसंत रवृप । वृश्चिक शरद वैशा. कार्ति. शरद् [९धन ज्येष्ठ ९मार्ग. हमंत ग्रीम १०मक आपा) वर्या ११कुंनो शिशिर माया शिशिर कन्या १२मीन १२फा. १ दक्षिण देशवासी इस महीनमें पितृम करत है। ३ मीन ४ मेप ९ कन्या शरऋतु ५ ११ वृश्चिक हेमंतऋतु ६ ८ मिथुन ग्रीष्म ५सिंह प्र दाइ.) धर्म

ज्योतिपसार ।
मासप्रकरण तत्र मासपरिज्ञान ।
पूर्वराशि परित्यज्य उत्तरां याति भास्करः ।।
सा राशिः संक्रमाख्या स्यान्मसत्वयनहायने ॥२०॥
टीका-पूर्व राशिको छोड़के जिस आगेकी राशिमें सूर्य जाताहै उसी सूर्य-
की राशिसे १२संक्रांति मास ऋतु अयन इन सबोंकी गणना होतीहै ॥ २० ॥
दर्शावधि मासमुशंति चांद्र सौरं तथा भास्करराशिभोगात्॥
त्रिंशदिनं सावनसंज्ञमार्या नाक्षत्रमिंदोभंगणाश्रयाश्च ॥२१॥
टीका-मास कई प्रकारके होतेहैं एक चांद्रमास जो शुलपतिपदासे
अमावास्या पर्यन्त होताहै, दूसरा सौर मास जो सूर्यके एकराशि भोगनेसे
होताहै. तीसरा सावनमास जो तीस दिनका होताहै, चौथा नाक्षत्र मास
जो चंद्रमाके गिरद नक्षत्रोंके फिरनेसे होताहै ॥ २१ ॥
मासोंके नाम तथा सूर्य देवता और देवी ।
मधुस्तथा माधवसंज्ञकश्चशुक्रः शुचिश्चाथ नभो नभस्यः।तथेष
ऊर्जश्च सहा-सहस्यस्तपस्तपस्यश्च यथाक्रमेण ॥२२॥ अरुणो
माघमासे तु सूर्यों वै फाल्गुने तथा ।। चैत्रमासे तु वेदांगो भानुर्वै-
शाख एव च ॥२३॥ ज्येष्ठमासे तपेदिंद्र.आपाढे तपते रविः।।ग-
भस्तिः श्रावणे मासे यमो भाद्रपदे तथा ॥२४॥ सुवर्णरेताश्वयु-
जि कार्तिके च दिवाकरः॥ मार्गशीर्षे तपेन्मित्रः पौपे विष्णुःस-
नातनः ॥ इत्येते द्वादशादित्या मासनामान्यनुक्रमात् ॥२५॥
केशवं मार्गशीर्षे तु पोषे नारायणं विदुः ॥ माधवं माघमासे तु
गोविंदमथ फाल्गुने ॥२६॥ चैत्रे विष्णुं तथा विद्याद्वैशाखे मधु-
सूदनं । त्रिविक्रम तथा ज्येष्ठे आपाढे वामनं विदुः॥२७॥श्रावणे
श्रीधरं विद्धि हृषीकेशं तु भाद्रके ॥ आश्विने पद्मनाभं च ऊर्जे
दामोदरं विदुः ॥ २८॥ मार्गशीर्षे विशालाक्षी पौपे लक्ष्मीश्च दे-
वता ॥ माघे तु रुक्मिणी प्रोक्ता फाल्गुने धात्रिनामिका ॥२९॥
चैत्रे मासि रमा देवी वैशाखे मोहिनी तथापनाक्षी ज्येष्ठमासेतु
आपाढे कमलेति च॥३०॥कांतीमती श्रावणेच भाद्रे तु अपरा-
जिता ॥ पद्मावती आश्विने तु राधा देवी तु कार्तिके ॥३१॥

0- - Sar9 भापाटीकासमेत। (७) संख्या नामानि नामानि सूर्य देवी देवता चैत्रमास मधुः वेदांगः रमा विष्णुः २ वैशाखमास माधवः भानुः मोहिनी मधुसूदनः ३ ज्येष्ठमास शुक्रः पमाक्षी त्रिविक्रमः आपाढ मास शुचिः रविः कमला वामनः श्रावणमास ! नमः गास्तिः कांतिमती श्रीधरः भाद्रपदमास नभस्यः यमः अपराजिता हपीकेशः आश्विनमास इपः सुवर्णरताः। पद्मावती पानातः कार्तिकमास ऊर्जः दिवाकरः राधा दामोदरः मार्गशीर्षमा सहाः मित्रः विशालाक्षी केशवः १. पोपमास सहस्यः विष्णुः लक्ष्मी नारायणः ११ माघमारा तपाः अरुणः रुक्मिणी माधवः १२ फाल्गुनमास तपरयः सूर्यः धात्री गोविंदा वार अनुसार मासफल। पंचार्कवासरे रोगाः पंचभौमे महद्भयम् ।। पंचाकिंवारा दुर्भिक्ष शेषा वाराः शुभप्रदाः ॥३२॥ टीका-एक महीने में पांच रविवार पडें तो रोग उत्पन्न होय और ५ भौमवार पडनेसे अधिक भय उपजै और ५ शनिवारसे दुर्भिक्ष होय और शेप वार ५ पडे तो ये शुभदायक होय ॥ ३२ ॥ पक्ष. पूर्वापरं मासदलं हि पक्षी पूर्वापरौ तौ सितनीलसंज्ञौ । पूर्वस्तु देवश्च परश्च पिन्यः केचित्तु कृष्णे सितपंचमीतः॥ आदौ शुक्लः प्रवक्तव्यः केचित्कृष्णेपि मासके ॥३३॥ टीका-शुक्ल प्रतिपदासे पौर्णमासीतक शुक्लपक्ष और वदीपडवासे अमावा- स्यातक कृष्णपक्ष होताहै. शुक्लपक्ष देवताओंका और कृष्णपक्ष पितरोंका ~ -- (८) ज्योतिपसार। होताहै ॥ ३३ ॥ दूसरा भेद-शुदी पंचमीसे लेकर वदी ५ तक शुक्लपक्ष जानिये. पहिले शुक्लपक्ष तदनंतर कृष्ण जो अमावास्याको मास पूरा होता हो तो प्रथम कृष्णपक्ष तिसके पीछे शुक्ल और कदाचित् पूर्णिमाको मासांत हो तो ये दोनों पक्ष देश अनुसार प्रचलितहैं ॥ ३३ ॥ अधिक मास । द्वात्रिंशद्भिर्गतैर्मासैदिनैः पोडशभिस्तथा। पटिकानां चतुष्केण पतत्यधिकमासकः॥३४॥ टीका-३२महीने १६ दिवस ४ घटी बीत जाने पर्यंत अधिकमासका संभव होताहै ॥३४॥ शाके बाणकरांकके विरहिते नन्देन्दुभिजिते शेपा वह्निमधौ च माधवशिवे ज्येष्ठे वरे चाष्टके ॥ आपाढे नृपतौ नभश्च शरके भाद्रे च विश्वांशके नेत्रे चाश्विनकेऽधिमासमुदिते शेषेऽन्यके स्यानहि ॥ ३५ ॥ टीका-वर्तमान शाकके अंकम९२५हीनकरो और शेष अंकमे १९का भागदो, जो शेप ३ हैं तो अधिक चैत्रमास जानना-और ११ शेप हैं तो वैशाख और जो००।०९ बचें तो ज्येष्ठमास अधिक होगा-और जो१६शेप रहैं तो आपाढ अधिक होगा-और जो ५ बचे तो श्रावण अधिक जानना और जो१३शेप हैं तो दो भाद्रपद होंगे-और जोरशेप रहें तो आश्विनमास की वद्धि होगी-और अंक शेप रहनेसे कोई मास अधिक नहीं जानना३५॥ क्षयमास। असंक्रांतिमासोधिमासःस्फुटस्याधिसंक्रांतिमासाक्षयाख्याकदाचित्। क्षयः कार्तिकादित्रयेनान्यतः स्यात्तदा वर्षमध्येऽधिमासद्वयं च ३६॥ टीका-जो दो अमावास्याके बीचमें संक्रांति न होय तो वह अधिकमास होताहै-और जो दो अमावास्याके बीचमें कदाचित् दो संक्रांति होय तो क्षयमास जानना-और कार्तिक आदि३मासही क्षय होतेहैं और जिस संवत क्षयमास होगा उसी संवत् में अधिकमासरहोगा-इन सब श्लोकोंका आशय ग्रहणके सूर्य,चंद्रमाका स्पर्श मोक्ष सहित आगे चक्रोंमें देख लेना चाहिये।

मास २ मो. ३८११८ ३ ४ ५ स.१८०४ जय ४ भापाटीकासमेत। (९) संव नामसंख्या अधि अधिक। सूर्यचंद त्सर / अकोके जा पति ग्रहण प्रजवादिसंवत्सरोंके फल ॥ फल । शेषफलवचे १ १९३५ विष्णुभ | शेष श्रावण १५ विकृति धिपति नास्ति प्रकृतिविकृतियातिविकृतिप्रकृतिस्तथा॥तथा चस्प.५२। सम शा. १८०० वाट १७ मो २१३१ | पिसुखिनो लोकाश्चास्मिन् विकृतिवत्मरे ॥ १९३६ खर ) विष्णुभ आश्विन था.क.३०म मू पौ. श | शे. ५ शाके १८.१ धिपति शेष २/१५ च. स्पर्श३३।५२ खराब्दनिःस्वनालोकाअन्योन्यसमगेत्सुकाः। सुमि. वाष्ट मध्यमा वृष्टिरत्युप्र रोगे यात्प्रकपन ॥ १९३७ श. विष्णुभ चित्रमभज्ये.शु.१५च प्र.प.३ नंदनाब्दे सदापृथ्वी महुसस्यार्घदृष्टयः ।। १८०२ धिपति व शेष मो. मार्ग.शु १५च पीडा नंदन ६ आहेर्षभ्य. अधाश स्प. २०३४ मो.३४ आनदोप्यखलानां च जंतूनांसमहीमुजाम् ॥ स. १९३८ विष्णन नास्ति मार्ग शु १५ च. श.२|श. १८०३ धिपति शेष स्व.३८८ मो. ४१) विजयादे तु राजानः सदाविजयकाक्षिणः महर्ष. विजय अहिर्ष २२ उत्तरआशा मुखिनोजतवः सर्वेष हुसस्यार्घदृष्टयः ।। स. १९३९ वि. अ. पाव ज्येट कृ.३०प. १५॥ जयमंगलघोपायर्धरणीभातिसर्वदा ।। जया अहि. शेप ५/५८ मोक्ष,२३०५७ सभवदृष्टिनास्ति ब्द धरणीनाथाः संग्रामजयकांक्षिणः ॥ ६ स. १९४० वि. अ. नास्ति श. १८०५ अहिए. शेप ६ है, मन्मथान्देजनाःसर्वे तस्करारतिलोलुपाः ॥ सम मन्मथ | शालीक्षयवगोधूमैनयनाभिनवाघरा ॥ स. १९४१ वि. अ. नास्ति वै शु. १५च प्र दृष्टिना अहि. शेर ७ स्तिआ शु १५ च स्प. दुर्मुखाब्देमध्यष्टिरीतिचीराकुलाधरा॥महा. दुर्मि. दुर्मुख ४५।२० मो. ४७४२४] वैरामहीनाथा वीरवारणवाजिभिः ॥ स. १९४२ वि अ. ज्येष्ठ चै शु. १५ च. प. हेमलयेत्तीतिभीतिमध्यसस्यार्घवृष्टयः ॥ भा. श.१८०७ पितर शय ८३४१५० मो. ४२१५८ हेमलय तिर्भूपतिक्षोभाखड्गविद्युलतादिभिः ॥ स. १९४३ । वि. १२ नास्ति माघशुक्ल १५ शे.५श. १८०८ पितर शेष विलंयवरतरेभूपाः परस्परविरोधिनः॥ प्रजा- चद्रग्रहणसभव विलवी दृष्टिनास्ति पीहालनर्धत्वतथापिसुखिनोमनाः ॥ स. १९४४ वि. १३ नास्ति श्राव १५च प.४३.६ विकार्यदेखिटालोका.सरोगाष्टिपीडिता.॥ पितर शेष १०१ भा. ३० प्र. सू पीडा विकारी ९४४८मो. २२१४४ । पूर्वसस्यफलस्वल्प बहुलंचापरफलम् ॥ वि. १४ वैशा शे.२. श. १८१० | सुभि. शर्वरी स. १९४६ वि १५ नास्ति आषाढ शु १५च शे०४श.१८११ पितर शेष १२ प्र, स्थ. ४९११३ सवान्दनिखिलाधास्तीगृष्टिभिःप्रवसतिमारो- दुर्भिक्ष मोक्ष ५६१४० | गाकलात्वीतिभीतिः सपूर्णवत्सरेफलम् ॥ विष्णु भाद्रप.आ.३०सू स्प. २२१४४ शे. ६ शक १८१२, शेष मो.२९१५७का.च.स्प. | शुभद्वत्सरेपृथ्वी राजते विविधोत्सवः ॥ शुभकृत विश्वेदेवा, १३ २६।२५ मो. ३०1४७ भातकचीराभयदाराजान.समरोत्सुकाः ।। स. १९४८/ विष्णु शेष वैशा.१५ च. सोमनेवत्मरेधात्री प्रजानारोगशोकदा ।। त- १४ १६ मो. ५० या.:५ शोभन विश्वेदेवा नास्ति च. स. ५२०५७ थापिसुखिनोलोकापटुसत्यार्घवृष्टयः ।। ७ ८ सम दुर्मि, पितर दोप११ प्रद स १९४७ सम श विश्वेदेवा नास्ति सम १९ चद्रमा नास्ति . १ (१०) ज्योतिपसार। सव शरपरपचे आध मूचद्र त्सर असफेजो पति मास प्रहण प्राचादिसंवत्सरोंके फल ॥ नामसख्या स १९४९ विष्णु शेष श १५ स्प५११४६ नोध्यन्देलसिरालोका क्रोधलाभपरायणा. शप ३ शक १८१४ १५ मा १५ चं स्प मम इति दोषणसततमध्यसस्याच दृष्टय ॥ प्राधी विश्वेदेवा नास्ति ३२ मो ४.४४ स १९५० विष्णु आधादा १५चस्प३ १३१ अब्देविश्वावसो शश्वद्घोररोगाधरासुच। १५ शक १८१५ शेष मा ३५० क ३० सत्यार्थदृष्टगोमध्याभूपाटानातिभूतय ॥ विश्वारमु । विश्वेदेवा १६ सपा२७मो १९ स १९५१ विष्णु | पराभवाब्देराजास्यात् सपरसहशनुभि ।आ शपश१८१६ २० मस्ति | मयक्षुद्रसस्यातिप्रभूता यल्पवृष्टय ।। पाना पराभव ম্বিস शेष फा शु १५ भृ च । प्लवगादेमध्यष्टी रोग्चीराकुलाधरा । अ पशक १८१७ शिव १८ प्र स्प ४१४ मो न्योन्यसमरभूपा शवामहृतभूमय ॥ प्लवग शिप पेष्ठ कीरसाब्दत्वीतिभीति प्रजाक्षोभनपाङ्गया। |शप (श १८१८ अवि ति | तथापिवद्धतैलो समधा यार्घवृष्टिमि ॥ कीला चद्रमा २० शप य गु१५ स्प३६मो सौम्याब्दत्वाखगोरा यहुसस्याष्टिभि । शेप६ शर १८१९ ३ १६मा ३०श स्प वैरिणाधराधाशाविमाश्चाध्यपरपरा ॥ सौम्य चद्रमा नास्ति १३१५१ मा२०१२६ स १९५५ शिव आश्विन आ १५ च स्प५०मो शेष /क १८२० अविप ८२ १५भी साधारणाब्देदृष्टय भयचमारणेमन । मध्य दुर्भि चत्रमा च स्प४८१८मा १५ सपद्धराधीश प्रजा स्यु स्वस्थचेतस ॥ शिव पर ३ज्य १५मृचय स्प३१ विरोधद्ववत्सरेतुपरस्परविरोधिन । सर्वे ३५३.स १८२१ समर मो माग १५श स्प विरोधक च-मा अतम ५३/४०गा ५७ २६ जनापाचवमध्यसस्यादृष्टय ॥ भूप हवामहागेगो मध्यसस्याघवृष्टय । शष ५ शम१८२२ परिधाची आमे खिनोजतव सवत्सरेपरिधाविन.॥ शिव १नहस ३०चे प्रमाधीवत्सरेतत्रमध्यसस्यार्घवृष्टय । प्रजा शेषशर १८२३ श्रावण प ७३० मा पीडा प्रनाथी अनि १२००७ नाजीवा खसम सर्या क्षावरा ॥ २५ स १९५९ शिव १ ग्रह च चैत्र १५ आनान्देखिलालोका सर्वदानदचेतस ।रा शेप२/शा १८२४ भीम स्प ४०१२२ जान सखिन सबबहुसस्थावाप्टभि ।। आद माक्ष ४२१४८ २६ स १९६०वशि २५ चै शु१५ स्प३ स्वस्वकार्यरता सर्वमध्यसस्यार्घवृष्टय रा. पशर १८०५ अग्नि नास्ति'मा २१४५आ सु१५स्प राक्षस ३१।२मो सक्षसान्दखिलालोकाराक्षसाइवनिष्क्रिया ॥ सं १९६१ विशि ८ मा गु १५२ नसादेमध्यसस्यार्घवृष्टिभि प्रवराधरा । नृप पशक'१८२६ अग्नि ज्येष्ठ स.३९मो४॥ सक्षोभसजातामूरितसरभीतयः ।। २८ स १९६२ वि शि ३प्रना या १५रूप शक १८२७, अश्वि नास्ति २०१० मा ३०१ पिंगलादेवी तिभीतिमध्यसस्यार्धवृष्टय (रा- दुर्भि ! पिंगल युमार जानावित्रमात्राताभुजनशठमेदिनीम् ।। २१ २ साधारण . २२ . . सम स १९५८ ७ ८ ६ अग्नि ७ रामना सम नल शप शिव कुमार नास्ति ४०२०मो. ५१॥३० तंत्चसिलालोकामध्यमस्यार्धवृष्टयः ।। भग भापाटीकासमेत। (११) शेपफलवचे आधि अधिक सूर्गचर त्सर | अकॉकेजी पात मास ग्रहण प्रजवादिसंवत्सरोंकेफल॥ नामसया २९ स. १९६३/ वि.शि. १.का.३०सूस्प.९४३६मो और ः १८२८ अधि. नास्ति ९४१२४मा.१५म.स्स. वत्सरे कालमुक्तास्ये सुसिन सर्वजंतवः।म. वाल कुमार २५।१४ मो.३०२४ न्तथापिचसस्यानिप्रबुराणितथागदाः ॥ ३० स. १९६४/ वि.शि. प्रहशनास्ति शेष३ शरः १८२९ आधि वैशख सिद्धार्थवत्परेभूतो ज्ञानवैराग्यथाप्रजाः। स- सिद्धार्थ कुमार कलावसुधामाति बहुसस्पष्टिीमः ॥ स १९६५ वि.शि.अ. १२ प्र.मार्ग शु.३५च. स. सेवाग्देतृपसंभूतक्षोभलेनसभाभिने । सत. शेष शफः १८३. पीडा स. १९६६/ रिशि. १३. म. ज्ये. शु. १५. दुर्भपरदेखिलाटोका भुपादुर्भलय मदा । शेषशकः १८३११ अश्चि भोद. २, ५४३मो.४१४३ तथागिसुखिन सर्व संग्रामा.मतिचेदसि ।। दुर्मति कमार स. १९६५/ वि.शि. १४१ प्र. का शु. १५ यु. सर्वसस्ययुताधात्री पालिताधरणीधरे । प. शेषशक.१८३२ नास्तिस्य. ५३३३७ मोक्ष दुभिक्ष ५६१३७ देश विनाश स्यात्तत्रदुंदुभिवत्सरे ।। ३० स.१९६८ शि.नि. का क.३० स्प.५१ आहवेनिहिता सर्वभूगरोगैस्तथागनाः । यथा शेषशकः १८३३) नास्ति २६ मो. ४५. कचिनीवतिरुधिरोगारिवत्सरे । सम रुधिरोद्वारी भग ३ स. १९६९/ शि.वि.१६ चचे.१५सो रप.५१मो रताक्षिवत्सरेसस्यवृद्धिष्टिरनुत्तमा । प्रेक्षते शेष १) शकः १८३४) आपा. ५६ चै.३०य. सस२९) सदान्योन्यराजानोरक्तलोचन । १७ का. १५ रूप.२२।२० कोधनान्देमध्यवृष्टिः पूर्वदेशेवटमः भर्ग- शेष३)शक.१८३५) नास्तिच.भा. १५ सप.२४१९ मितरत्सर्वे भूपा कोपरापणा. क्रोधन मोक्ष ३२०५९ स. १९७१ शि.वि. १८.भा. ३० भू स्य.३०) कार्पासंगतैिलेखमधुसस्पविनाशन । य- शेष शकः १८३६ २० नास्ति ३८मो३५।२८भा.१५, |माणाथापिनराजीवतिक्षयवत्सरे । क्षा भग ५ भू स२५।१मो३३३६ स.१९७२ वि १ कामयामीतयश्चानिकोपयव्याधयोभावे । शेष५ शकः १८३७ ब्रह्मा ज्येष्ठ नास्ति प्रभवाब्देमबुष्टिस्तथापिसुखिनोजना. । पीडा स.१९७३ ब्रह्मा २ दडनीतिसभा पहुसस्यार्धवृष्टयः विभा- शेपर शकः १८३८ विष्णु २ नास्ति देखिलालोकाः मुखिनास्यविवेरिणः ।। स. १९७४ ग्रह्मा३ । च. आपा. २.१५ शुक्लानिखिलालोकाः सुखिनःस्वजनेसह । शेष शक १.३९ विष्णु भावि. खपासस्पर्श ४९५५५ शुक्ल मो.५९/२९ राजानोगद्धनिरता परस्परमयपिगः ।। प्रमोदान्देप्रमोदतिराजानोनिखिलाजना:बी. शेष४ शकः १८४० विष्णु ४ चैत्र नास्ति प्रमोद तरोगावीतभयाईतिशविनाशकाः॥ २६ स.१९७६ ब्रह्मा ५ नचतिचटारोकाः स्वस्वमार्गाकथंचन । १५शक: १८४१ विष्णु ५ नास्ति पुर्भिक्ष प्रजापति अन्देप्रजापतीन्न बहुमस्यावृष्टयः । भग मो. ३३१३१ म.१९७. ना. भग .. . प्रभव नास्ति, 8 स. १९७५ ब्रह्मा ४ समा संभव ६४ ७ आधि.३० गम् C सुाभ., ४८ (१३) ज्योतिपसार। सब शेषफलबचे । अधि अधिक सूर्यचद्र त्सर भोंकेजो पति मास प्रहण प्रभवादिसंवत्सरोंके फल। नामसाग ४३ स१९७७ नद्या ६ ५ च.म.वै. शु १५च म्प. शेष ५ शक १८४२ वृहस्पति श्रावण १३मो.आ. अन्नाद्यभुज्यतेशश्वननरतिथिभिःसह । अंगि- सम अगिरा ११यु. म.३२१९ राखिलालोकाभूपाचकलहोत्सुकाः ॥ स.१९७८-ब्रह्मा ६ आश्वि, १५.स्प. शेष ५ शक. १८४३ बृहस्पति नास्ति/४९।३१मो १७१४९ श्रीमुखादेखिलाधाभीयहुमस्याघसयुता अ. मुभि७ श्रीमुख धानिस्ताविप्रावीतरोगाविवरिणः ॥ २ चंद्रग्रहण स.१९७९ ब्रह्मा शेष ०शकः १८४४ पृहस्पति नास्ति स्प.५।५मो. १०.११ भावादे प्रचुरागेगा मध्यसम्याघवृष्टयः।रा. पीडा भाव ३० आपा. जानोगुद्धनिरतास्तथापिसुखिनोजना.।। स. १९८०ब्रह्मा माघ, १५ पु. खग्रास शेष २शक. १८४५ गुरु ४ रेष्ट ५/४७ प. २०१८ प्रभूतपयसोगावः मुखिनस्सीजतवः । स. युवा मो. ४११४८ च में कामक्रियायुक्तो युवान्दयुवतीजनः ॥ स. १९८१ ब्रह्मा श्रा १५शु ५०स धातृवर्षखिला मेशा सदायुद्धपरायणामपु- | शेष४ र १८४६ वृहस्पति नास्ति मो.५५ख मा १५२.स्प १० धरणीभाति यहुसस्यार्घवृष्टिभिः ।। धाता १४६।१मो.५११३६च द्र मह्मा त्रा. १५भी दृष्टि ना शेप६ शकः १८४७/ नास्ति माघ३०गु स्प,१२।१७ ईश्वगन्देखिलातुधात्रीधात्रीवसादा । पो- मम११ ईश्वर मो.१५।३३सू प्राण पयत्यतुलेवान्नफलमापस्तुर्मादिभिः ४९.स. १९८३ भमा विशाख राष६/शकः १८४८, अनीतिरतुलावृष्टिपैहुधान्याख्यवासरे। विवि- धैर्धान्यनिचयः सुखपूर्णाखिलाधरा॥ द १२| पहुधान्य स.१९८४ म्हा नमचतिपयोगह कुत्रचित्कुत्रचिनलम् । मध्य शेप३/शक१८४९ नास्ति सम१३ प्रमाथी | मावृष्टिरपश्चनूनमब्दप्रमायिनि ।। स. १९८५ ब्रह्मा त्य शु.१५ र.सभव विक्रमाव्देधराधीशा विक्रमाक्रानभूमयः । शप५शक. १८५० भादपदाटेगा.३० चम्प १६ समिक्ष विक्रम ३७मी. २१०२१च.सू | सर्वत्रसर्वदामेघामुचति प्रचरजलम् ।। ५२ स १९८६ वे ३०गु सभव प्रह वृषाब्देनिखिलाःमेशायुद्धशतिवृषभाइवा वि. शेपशक १८५१) नास्ति ण नास्ति सू याप्रसक्तविन्द्राः पश्यनेसततभुवाम् । वर्ष स.१९८७ वित्ताघवृष्टिसत्याद्यैर्विचित्रानिखिलाधरानि. शेषशक १८५२ नास्ति १६सम चित्रभानु अग्नि राकुलाखिलालोकाश्चित्रभान्वाख्यवत्सरे ॥ स. १९८८ नह्मा १६ वे.१५स्प४४३मा ५३ सुभानुवत्सरेभूमिभूमिपानाचविग्रहः । शेिष ४ शमः १८५३ आषारा १५स्प४.मो. ४९ सुमान भनि मानस भानिभर्मरिसस्याच्या भयंकरभुजगमाः ॥ स १९८९ ब्रह्मा भा ५५ स्प.. कस्यचिनिविलालोकास्तरतिप्रतिपन्नताम् । शेष ६१८५४ १८ नास्ति ४४मो.५३१० ख १७समः तारण नृपाहुवक्ष्यनारोगा भैषज्यस्तारणाब्दके। चद्रग्रहण मह्मा १८ ना ३० सो स्प.७ मा पार्थिवाव्देतुराजानः सुखिनःसुप्रजाभृशम् । शेष शरः१८५५/ भाग्नि ५४॥३४पा.३०मभव पाधिन दृष्टिनास्ति सू२ बहुभिःलपुष्पान्यविविधैश्चपयोधरैः ॥ १ १४ परी १५ ५३ ब्रह्मा अग्नि ३ .

भाषाटीकासमेत।
(१३)
प्राग
००
४३ मा ४४१०
स १९९३ विष्णु
शिष.
सा नामसख्या
(सर- अ केजो
अधि अधिक मर्यचद्र
प्रभवादिसंवत्सरोंके फल.
एति
मास
फल | शेषफलबचे
स १९९१ ब्रह्मा आपा १५स २७मो
शेष ३१ शक १८५६ आम ३५पो १५५२९यो व्यपान्देनिखिलालोका बहुव्ययपराभृशम् ।
ज्येष्ट
व्यय
33 खग स ४१८ पिरमतीहतुरगर तानिर्मादा ॥
स१९९२
विष्णु
पी १५ बुधे स३५ सर्वजित्सरेसी जनास्त्रिदशरात्रिभा ।
शव ५/शक१८५७
त्वाष्ट
युर्भिसाजित
चद्रग्रहण
राजानापिल्ययाति भीमसयामभूमिपा ॥
आप ९॥४८मो
२
सर्वधार्यन्दकेभूपा प्रजापालनतत्परा ।
शक १८५८
१४आ १५स्प४०१८
पाडारधारी
त्याष्ट्र आश्वि
मोक्ष ४३२
प्रशांतवैरा सर्वन बहसस्यार्घवृष्टय ॥
विष्णु ३ যগেনা विरोधीवत्सरेभूपा परस्पराराधिन ।
शेष २ शक १८५९
विरोधी स्वाष्ट्र सभा
३ सम
भूरिभूरियुताभूमि रिकारिसमाकुला. ॥
सिद्धांतशिरोमणौ।
क्षयमासविचारः।
गतोब्ध्यदिनदैमिते शाककाले तिथीशैभविष्यत्यथांगाक्षसूर्यैः ।।
गजाव्यमिभूमिस्तथा प्रायशोयं कुवेदेदुवः क्वचिद्गोकुभिश्च ॥३७॥
टीका-पहिले जिस संवत्में क्षयमास पडे तो उसके १४१ वर्प पीछे
फिर होताहै इसमें आगे १९ वर्षमें या इससे बाहर इसके मध्य में जो
९४७ के संवत्में क्षयमास हो तो फिर आगे १११५ । १२५६ ।
१३७८ में पडेगा और इसके पीछे १४१ और १९ वर्षके अंतरसे क्षय-
मासका संभव जानना योग्य है ॥ ३७ ॥
तिथिप्रकरणम् ।
भासभाचांदभं यावद्णयेत्तावदेव तु ॥
यावंतिगणनादानि तावत्यस्तिथयः क्रमात् ॥ ३८॥
टीका-चैत्रादि बारह मासके नाम और तिन नामोंके नक्षत्रसे मास नक्षत्र
जानिये जैसा चैत्रका चित्रा विशाखा ज्येष्ठा पूर्वापाड़ा श्रवण पूर्वाजाद्रपदा
अश्विनी कत्तिका मृगशिर पुष्य मघा पूर्वाफाल्गुनी इस प्रकार नक्षत्रोंके
क्रमसे जानिये, परंतु पूर्णिमान्त महीनेसे गणित बराबर होताहै ॥ ३८ ॥

(१४)
ज्योतिपसार।
वारसंज्ञापरिज्ञानम्।
प्रतिपत्सिद्धिदाप्रोक्ता द्वितीया कार्यसाधिनी ॥ तृतीयारोग्य-
दात्री च हानिदा च चतुर्थिका ।। ३९॥ शुभा तु पंचमी ज्ञेया
पष्टिका त्वशुभा मता॥सप्तमी तु शुभा ज्ञेया ह्यष्टमी व्याधि-
नाशिनी।। ४०॥मृत्युदात्री तु नवमी द्रव्यदा दशमी तथा ॥
एकादशी तु शुभदा द्वादशी सर्वसिद्धिदा ॥ ११ ॥ त्रयोदशी
सर्वसिद्धा ज्ञेया चोगा चतुर्दशी। पुष्टिदा पूर्णिमा ज्ञेया त्व-
मावस्या शुभा तिथिः॥ ४२ ॥ वृद्धिश्चाथ सुमंगलाथ सबला
प्रोक्ता खला श्रीमती कीर्तिर्मित्रपदातथा बलवतीस्वोनाक्रमा
मिणी ।। नंदाख्या हि यशोवती जयकरी क्रूरा हि सौम्या
तिथि ना तुल्यफला क्रमात्प्रतिपदो दर्शस्त्वमासंज्ञकः ४३
नंदासिते सोमसुते च भद्रा कुजे जया चैव शनी च रिक्ता॥
पूर्णीगुरौताश्चमृताः कुजार्के सितांबुजेज्ञेच गुरौशनिः स्युः४४
॥ इन श्लोकोंकी टीका चक्रमें लिखी है।
स्वामी।
वह्निर्विरिंचो गिरिजा गणेशः फणी विशाखो दिनकृन्महेशः॥
दुर्गातको विष्णुहरी स्मरश्च शर्वःशशी चेति पुराणदृष्टः४५॥
अमायाः पितरः प्रोक्तास्तिथीनामधिपाःक्रमात् ॥
संज्ञा।
नंदा च भद्रा च जयाच रिक्ता पूर्णेति सर्वास्तिथयःक्रमात्स्युः।।
कनिष्ठमध्येष्टफलाश्च शुक्के कृष्णेभवत्युत्तममध्यहीनाः॥४६॥
वजित।
कूष्माण्डं वृहतीफलानि लवणं वयं तिलाम्लं तथा तैलं
चामलकं दिवं प्रवसता शीर्प कपालांत्रकम् ॥ निष्पावांश्च
मसूरिका फलमथो ताकसंझं मधु धूतं स्त्रीगमनं कमा-
त्पतिपदादिष्वेवमापोडश ॥ १७ ॥

. १ वृद्धि भापाटोकासमेत। (१५) टीका शंसा तिथिपाल. ति.नामतिथि तिथि फल स्वामी शुरूपण नाम नकरनसे प्रतिपदा सिद्धि अनि नंदा अशुन शन कृष्णांड २ सुमंगला द्वितीया कार्यमाव, ब्रह्मा भद्रा अशुन/शुभ बंटरीफ. ३सबला तृतीया आरोग्य गोरी जया अशुभ शुभ लक्षण ४ खला चतर्थी हानि गणेश रिक्ता अशुभ शातिल ५ श्रीमती पंचमी शुभा सर्प पूर्णा अशुभ शासटाई ६ कीर्ति पठी अशुमा स्कद नंदा मध्यम मध्यय तल ७ मिनादासप्तमी सूर्य भद्रा मध्यम मध्यम आंवला बलावती अष्टमी व्याधिना. शिव जया मध्यमा मध्यम नारियल ९/उमा दर्गा रिक्ता मध्यम मध्यमाकासीफल १०/धर्मिणी दशमी घनदा यम पूर्णा मध्यमा मध्यमा परल विश्वेदे. नंदा शुभ अशुग दलिया १२ यशोषला हादशी सर्वसिद्धि हरि ना शुभ अशुभ मसर १३ जयकरा त्रयोदशी सर्वसिद्धा मदन जया शुभ अशुज बैंगन ३४रा चतुर्दशी उमा शिव रिक्तता शुभ अशुनधु 54 सौम्या पर्णिमा पुष्टिदा चंद्र / पूर्णा शुज अशुदयूत 'अमा० अशा पितर श्रीसंगम नंदासु चित्रोत्सववास्तुतंत्रक्षेत्रादि कुर्वीत तथैव नृत्यम् ॥ विवा- हभूपाशकटाध्वयाने भद्रासु कार्याण्यपिपौष्टिकानि ॥ ४८ ॥ जयासु संग्रामबलोपयोगिकार्याणि सिध्यन्त्यपि निमितानि। रिक्तासु विद्वधपातसिद्धिर्विपादिशस्त्रादि च यांति सिद्धिम् ॥ ॥४९॥ पूर्णासु मांगल्यविवाहयात्रा सुपोष्टिकं शांतिककर्मका नयमी मृत्यु ११/नंदा एकादशी शुजा १६/दर्श . .

" (१६) ज्योतिषसार। र्यम्॥सदैव दशैं पितृकर्म युक्तंनान्यद्विदध्याच्छुभमंगलानि५०॥ टीका-पडवा,छठि, एकादशीको नंदा तिथि कहते हैं इसमें आनन्दादिक कर्म और देवताओंके उत्साह और गृहसम्बन्धी कार्य गृहस्थल बनाना- वस्तु मोल लेना नृत्य सम्बन्धी गीत वाय इत्यादि कर्म करने चाहिये ॥१॥ द्वितीया सप्तमी द्वादशी इनको अदा कहते हैं इन तिथियों में विवाह, गाडी, संबन्धी काम मार्गसंबन्धी काम पुष्टिक्रिया करनी चाहिये ॥ २ ॥ तीज आठ, त्रयोदशीको जया कहतेहैं इनमें संग्राम और सेनाके उपयोगी अस्त्र शम्न ध्वजा पताका आदि निर्माण करने योग्यहैं ॥ चतुर्थी नवमी चतुर्दशी ये रिक्ता इनमें विद्वानोंका वध, घातकर्मकी सिद्धि विषप्रयोग शस्त्र इत्यादि उग्र कर्म करने योग्यहैं ॥ पंचमी दशमी पौर्णमासी इन तिथियोंको पूर्णा कहते हैं इनमें विवाह इत्यादि कर्म यात्रा शांतिक पौष्टिक कर्म इत्यादि करने चाहिये और अमावास्याको पितृकर्म करने योग्यहें ॥ ५० ॥ अथ बारहमास। आदित्यश्चंद्रमाभौमो बुधश्चाथ बृहस्पतिः। शुक्रःशनैश्चरश्चैव वासराः परिकीर्तिताः ॥५१॥शिवो दुर्गा गुहोविष्णुः कालत्र- झेन्द्रसंज्ञकाः । सूर्यादीनांक्रमादंते स्वामिनः परिकीर्तिताः। ॥२॥गुरुश्चंद्रो बुधः शुक्रः शुभावाराःशुभेस्मृताःक्रूिरास्तु क्रूरकृत्ये स्युः सदा भौमार्कसूर्यजाः ॥ ५३ ॥ सूर्यश्चरः स्थिरश्चंद्रो भौमश्चोरो बुधः समः । लघु वो मृदुःशुक्रःश- निस्तीक्ष्णः समीरितः ॥५४॥ अष्टदिशाओंके स्वामी। रविः शुको महीसूनुः स्वर्भानुर्भानुजो विधुः ॥ बुधोवृहस्पतिश्चैव दिशामीशास्तथा ग्रहाः॥५५॥ टीका-पूर्वका स्वामी रविआगेयका स्वामी शनि २ दक्षिणका स्वामी मंगल ३ नत्यका स्वामी राहुटपश्चिमका स्वामी शनि ५वायव्यका स्वामी

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भाषाटीकासमेत ।
(१७)
चन्द्र ६ उत्तरका स्वामी बुध ७ ईशानका स्वामी गुरु ८ इन दिशाओंके
स्वामी नवग्रहनी जानिये ॥ ५५ ॥
ग्रहोंका वर्ण और जाति।
ब्राह्मणो जीवशुक्रौच क्षत्रियौ भौम भास्करौ ।।
सोमसौम्यो विशौ प्रोक्तौ राहुमंदो तथांत्यनौ ॥५६॥
टीका-गुरु शुक्र ये ब्राह्मण, मंगल रवि ये क्षत्रिय, बुध चंद्र ये वैश्य,
राहु केतु और शनि ये तीन शूद्र हैं ॥ ५६ ॥
ग्रहोंका वर्ण ।
रक्तावंगारकादित्यौ श्वेतौ शुक्रनिशाकरौ ।।
गुरुसौम्यौ पीतवर्णी शनिराहू सितो शुभौ ॥ ५७॥
टीका-मंगल और सूर्य इनका रंग लाल, चंद्रमा और शुक्र इनका वर्ण
श्वेत, गुरु बुध दनका वर्ण पीत, शनि राहु केतु इनका वर्ण कृष्णहै ॥५७॥
वारोंके अनुसार कर्म।
रविवारके कर्म।
राज्याभिषेकोत्सवयानसेवागोवह्निमंत्रौषधशस्त्रकर्म ॥
सुवर्णताम्रौणिकचर्मकाष्ठसंग्रामपण्यादि खौ विदध्यात् ५८॥
टीका-राज्याभिषेक गीत वाद्य यानकर्म राजसेवा गाय बैलका लेना
दना हवन यज्ञादि मंत्र उपदेश लेना देना औपधिका लेना शस्त्रप्रारम्भ
सोना तांबा ऊनवस चर्म काठ लेना युद्धप्रसंग खरीदना बेचना ये कर्म
रविवारके करै ॥ ५८ ॥
सोमवारके कर्म।
शंखान्जमुक्तारजतेक्षुभोज्यस्त्रीवृक्षकक्ष्यांबुविभूषणाद्याः ।।
गीतक्रतुक्षीरविकारशृंगीपुष्पांवरारंभणमिन्दुवारे ॥ ५९॥
टीका-शंख कमल मोती रूपा ऊख भोजन स्त्रीनोग वृक्ष जलादि
कर्म अलंकार गाना यज्ञादि गोरस गाय भैंस पुष्प - वस्त्र इत्यादि भोगने
सोमवारको योग्यहें ॥ ५९ ॥

(१८) ज्योतिषसार। भौमवारके कर्म। भेदानृतस्तेयविषानिशस्त्रवध्याभिघाताहवशाव्यदभान् ।। सेनानिवेशाकरधातुहेमप्रवालरक्तानि कुजे विदध्यात् ॥६॥ टीका-भेद करना अनृत चोरी विष अनि शस्त्र वध नाश संग्राम कपट दंभ सेनाका पाडाव खानि धातु सुवर्ण मूंगा रक्तस्राव ये कर्म करावे ॥ ६०॥ बुधवारके कर्म। नैपुण्यपुण्याध्ययनं कलाश्च शिल्पादिसेवालिपिलेखनानि ॥ धातुक्रिया कांचनयुक्तिसंधिव्यायामवादाश्च बुधे विधेयाः॥६॥ टीका-चातुर्य पुण्य अध्ययन कला शिल्प शास्त्र सेवा लिखना चित्र काढना धातुक्रिया सुवर्ण युक्ति सख्यत्व व्यायाम और वाद करना ये कर्म बुधवारको करावे ॥ ६ ॥ गुरुवारके कर्म। धर्मक्रियापौष्टिकयज्ञविद्यामांगल्यहेमांचरवेश्मयात्राः ॥ स्थाश्वभैपज्यविभूषणादि कार्य विदध्यात्सरमंधिवारे॥६२॥ टीका-धर्म करना नवग्रहादि पूजा यज्ञ विद्याभ्यास सुभग वस्त्र गृहकर्म यात्रा रथ अश्व औषधि विभूपण आदि कत्य गुरुवारको करावे ॥ ६२ ॥ शुक्रवारके कर्म। स्त्रीगीतशय्यामणिरत्नगंधवस्त्रोत्सवालंकरणादिकर्म । भूपण्य- गोकोशकृषिक्रियाश्च सिध्यंति शुक्रस्य दिने समस्ताः ॥६३॥ टीका-स्त्री गायन शघ्या मणि रत्न हीरा गंध वस्त्र उत्साह अलंकार वा- णिज्य पृथ्वी दुकान गाय द्रव्य खेती ये कर्म शक्रवारको करावे ॥ ६३ ॥ शनिवारके कर्म। लोहाइमसीसत्रपुशस्त्रदासपापानृतस्तेयविपार्कविद्याम् ।। ग्रहप्रवेशद्विपधदीक्षा स्थिरं च कर्मार्कसुतेऽह्नि कुर्यात् ॥६॥ टीका-लोहा पत्थर सीसा जस्त शस्त्र दास पाप अनृत भाषण चोरी विप अर्क काढना गृहप्रवेश हाथी बांधना मंत्र लेना और स्थिर कर्म इत्यादि शनिवारको करावे ॥६४ ॥ .

भापाटीकासमेत। (१९) वारोंके देवता अधिदेवता और कृत्य । सूर्यादितः शिवशिवाणुहविष्णुकेंद्रकालाः क्रमेण पतयः कथिता ग्रहाणाम् ।।वह्नयंबुभूमिहरिशक्रशचीविरिचिस्ते पांपुनर्मुनिवरैरधिदेवताश्च ॥६५॥ टीका-शिव पार्वती पडानन विष्णु ब्रह्मा इंद्र काल ये ७ क्रमसे सूर्यो दिक वारोंके देवता जानना और अमि जल भूमि हारे इंद्र इंद्राणी ब्रह्मा- ये ७ सूर्यादिक वारोंके अधिदेवता जानना ॥ ६५. ।। विचार करनेका कालपरिमाण । पतंगसूनोर्दिवसाधिपत्यं निशाप्यहश्चैव तु तिग्मभानो॥ रात्रिद्वयंचैकदिनंच सोमे शेपग्रहाणामुदयप्रवृत्तिः ॥६६॥ टीका-शनैश्चरसे कालका प्रमाण दिन रात्रि अर्थात् अष्ट प्रहरका कहना चाहिये-और सूर्यसे दिन अर्थात् चार प्रहरका कहना-और चंद्रमासे दो रात्रि १ दिनका कहना-और शेप ग्रहोंसे उदयप्रवृत्ति भर्थात् उदयसे आठ प्रहरका काल प्रमाण कहना चाहिये ॥ ६६ ॥ दोपादोषमाह । न वारदोपाः प्रभवंति रात्री देवेज्यदैत्येज्यदिवाकराणाम् ।। दिवा शशांकार्कजभूसुतानां सर्वत्र निधो बुधवारदोपः॥६॥ टीका-गुरु शुक्र रवि इन तीन चारोंका रात्रिमें दोप नहींहै और सोम शनि मंगल इन तीन वारोंका दिनको दोष नहीं मानना-और बुधवारको सर्वत्र निंदित जानना ॥६७ ॥ कृत्य। सोमसौम्यशुक्रवासरास्सर्व कर्मसु भवंति सिद्धिदाः ।। भानुभौमशनिवासरेपु च प्रोक्तमेव खलु कर्म सिध्यति ॥२८॥ टीका-चंद्र, बुध, गुरु, शुक्र इन वारोंमें सब कर्मसिद्धि जानना और रवि, भौम, शनि इनमें उक्त कार्यमात्रकी सिद्धि जानना ॥ ६८ ॥ तैलाभ्यंगमें शुभाशुभ। रविस्तापं कांति वितरति शशी भूमितनयो मृतिं लक्ष्मी सौम्यः (२०) ज्योतिषसार। सुरपतिगुरुर्वित्तहरणम् ॥ विपत्तिं दैत्यानां गुरुरखिलभोगा- नुगमनं नृणां तैलाभ्यंगात्सपदि कुरुते सूर्य्यतनयः॥ ६९॥ टीका-रविवारको तैलायंग संतापप्रद है-सोमवारको कांतिपद-मंग- लको मृत्युप्रद-बुधवारको लक्ष्मीप्रद, गुरुवारको वित्तनाशक-शुक्रवारको तेल लगानेसे विपत्ति आतीहै-शनिवारको तेल लगाना संपत्तिका कर्ताहै ६९ वस्त्रपरिधानशुभाशुभ। जीर्ण वी सततमंबुभिरामंदी भौमे शुचे बुधदिने च भवे- द्धनाय ॥ ज्ञानाय मंत्रिणि भृगौ प्रियसंगमाय मंदे मलायच नवांवरधारणं स्यात् ।।७० ।। टीका-रविवारको नूतन वस्त्र परिधान करनेसे शीघ्र जीर्ण होगा--सोम- वारको आशौच निमित्त स्नानके जलसे सदा आईही रहैगा-मंगलके दिन पहरनेसे शोकप्रद होगा-बुधवारको धनमाप्ति-गुरवारको ज्ञानप्राप्ति-शुक्र- बारको मित्रप्राप्ति-शनिवारको पहरनेसे मलिन रहेगा ॥ ७० ॥ श्मश्रुकर्म। भानुर्मासं पयति तथा सप्त मार्तडसूनुभौमश्चाष्टौ वितर- ति शुभं वोधनः पंच मासान् ॥ सप्तवेदुर्दश सुरगुरुः शुक्र एकादशेति प्राहुर्गर्गप्रभृतिमुनयः क्षौरकार्येषु नूनम् ॥७१॥ टीका-रविवारको क्षौर करनेसे १ महीना आयुप्यनाश जानना-सोम- वारको क्षौर करनेसे ७ महीना आयवृद्धि जानना-मंगलको ८ महीना- आयुप्यनाश जानना बुधवारको ५ महीना आयुकी वृद्धि जानना-गुरु- वारको १० महीना आयुकी वृद्धि जानना शुक्रवारको ११ महीन आयुकी वृद्धि जानना-शनिवारको ७ मास आयुका नाश जानना यह गर्ग लल नारदप्रतिमुनियों ने क्षौरकार्यमें लिखाहे ॥ १ ॥ विद्यारम्भः। विद्यारम्भः सुरगुरुसितक्षेप्वभीष्टार्थदायी कर्नश्चायुश्चिर- मपिकरोत्यंशुमान्मध्यमोऽत्र नीहारांशो भवति जडता पंच भाषाटीकासमेत। (२१) ता भूमिपुत्रे छायामूनावपि च मुनयः कीर्तयत्येवमाद्याः ॥७२॥ टीका-गुरु, शुक्र, बुध, इन तीन वारोंमें विद्यारंभ करनेसे उत्तम विद्या शीवही प्राप्त होतीहै-और चिरजीवी होताहै-और रविवार मध्यम है-सोमवारको बुद्धि जड़ होतीहै-मंगल और शनिवारको विद्यारंत करनेसे मृत्यु होताहै-यह नारद गर्गादि मुनियोंने कहा है ॥ ७२ ॥ टीका। वाराकनाम रवि | सोम | मंगल सोम | मंगल | बुध शुक | शनि चारोंकेपति शिव पार्वती स्कंध , विष्णुब्रह्मा देवता अग्नि जल पृथ्वी हरि इंद्र | इंद्राणी ब्रह्मा विचारयो २रात्री ८प्रहर८प्रहर। प्रहर हर महर ग्य समय ४पहर दोपादोप रात्रिदोष दिनदोपदिनदोप दिनदोप रात्रिदो. रात्रिदोषादिनदोप उक्तकम कृत्य सिद्ध | सिद्ध सिदि सिदि तैलाभ्यंग ज्वरप्रद कांतिपद मृत्युद लक्ष्मीप्र. वित्तना. दुःखद संपत्तिम. वस्त्र जीर्ण सदा शोक धन ज्ञान इष्ट मलिन परिधान | होय गीलारहे। प्राप्ति प्राप्ति प्राप्ति सन्मान रहे श्मश्रुकर्म १महीना महीना महीना ५मास १०मासा११मास ७मास आ.न्यून आ.बुदिआ.न्यून आ.वृद्धिआ०वृ. आवृ.आ.न्यू. विद्यारम्भः मध्यम जडत्व मृत्यु आयु.. तथा अर्थसि. तथा मृत्यु नक्षत्रपरिज्ञान। द्विनिनमासस्तिथियुग्विधूनो भोपितः स्यादुडुशेपसंख्या ॥ मासस्तुशुकादितएक्योध्यः कृष्णेद्विहीने मुनयो वदंति॥७३॥ टीका-चत्रसे लेकर गत मास चटते मास सहित दूने करे और उसमें गत तिथि चलते दिवस समेत मिलावे और एक घटावे शेपमें सत्ताईसका नाग उक्तकर्म सर्वकाम उक्तकर्म कर्मसिद्ध कर्मसि. कर्मसि.

(२२) ज्योतिषसार। देनेसे शेष बचे वही नक्षत्रकी संख्या जानिये ॥ ३७ ॥ अश्विनीभरणीचैवकृत्तिका रोहिणी मृगः॥ आर्द्रा पुनर्वसुः पु- ष्यस्ततः श्लेषा मघा ततः ॥७॥पूर्वाफाल्गुनिका तस्मादुत्तरा- फाल्गुनी ततः॥ हस्तश्चित्रा तथा स्वाती विशाखा तदनंतरम् ॥७५ ॥ अनुराधा ततो ज्येष्टा ततो मूलं निगद्यते ॥ पूर्वाषाढो तराषाढअभिजिच्छ्रवणस्ततः ॥ धनिष्ठा शतताराख्यं पूर्वा- भाद्रपदा ततः। उत्तराभाद्रकश्चैव रेवत्येतानि भानिच ॥७६॥ अथ गमनादौ शुभाशुभनक्षत्राणि । अश्विनीतुशुभाप्रोक्ता भरणी नाशकारिणी ॥ कार्यनीकृत्ति का चोक्ता रोहिणी सिद्धिदा बुधैः ॥७७॥ मृगः शुभस्ततश्चार्दा मध्यमस्तु पुनर्वसुः ॥ पुष्यः शुभः सार्पमघापूर्वास्त्र नाशमृत्युदाः ॥ ७८ ॥ उत्तराहस्तचित्रास्तु विद्यालक्ष्मी- शुभप्रदाः ॥ स्वातीविशाखे त्वशुभे मैत्रं सर्वार्थसिद्धिदम् ॥ ।। ७९ ॥ ज्येष्ठा मूलं कमात्तोयक्षय नाशार्थहानिदम् ॥ विश्व ब्रह्मविष्णवश्च बुद्धिवृद्धिसुखप्रदाः ॥८०॥ वासवं वरुणं शैवंशुभं भद्रं मृतिप्रदम् ॥ उत्तराभाद्रकं श्रीदं रेवती कामदायिका।।८॥ नक्षत्रों के स्वामी। भेशादत्रयमानिकेन्दुगिरिशाः प्रोक्ता अदित्यंगिराःसर्पाः काव्यभुजो भगोर्यमरवी त्वष्टा समीरः क्रमात्॥इन्द्राग्नी त्वथ मित्र इंद्रनितिरं च विश्वे विधिवैकुंठो वसुपाश्यक- चरणाहिर्बुध्न्यपूपाभिधाः ॥८२॥ ॥ अधोमुखनक्षत्रम् ॥ मूलाग्नेयमघाद्विदेवभरणीसापाणि पूर्वात्रयं ज्योतिर्विद्भिर- धोमुखं हि नवकं भानामिदं कीर्तितम् ॥ तिर्यमुखन- क्षत्रम् ॥ ज्येष्ठादित्यकराश्विनीमृगशिरपूपानुराधानिलत्वदा ख्यानि वदंति भानि मुनयस्तिर्यड्मुखान्येषुच ॥८३ ।। ऊर्ध्वमुसनक्षत्रम् ।। पुप्याश्रिवणोत्तराशतभिपत्राह्मश्राव- पाह्वयान्यूास्यानि नवोदितानि मुनिभिधिष्ण्यान्यथे- ।

भाषाटीकासमेत। (२३) तेषुतु ॥ ८४॥ ध्रुवस्थिर नक्षत्राणि ॥ रोहिणीसहितमुत्त- . रात्रयकीर्तयति मुनयो धुवाह्वयम् ।। ८५॥ मृदुन०॥ त्वाद- मित्रशशिपूषदैवतान्यामनंति सुन्यो मृदून्यथ ।। ८६ ॥ लघु नक्षत्राणि || अश्विनी गुरुभमर्कदैवतं साभिजिल्लघु चतुष्टयं मतम् ॥ ८७॥ ॥ तीक्ष्णनक्षत्राणि ॥ ॥ मूलशुक्रशिवसाप दैवतान्युल्लपत्यथचतीक्षणसंज्ञया।८८चरनक्षत्राणि ॥ वैष्ण- वश्ययुतः पुनर्वसुर्मारुतं च चरपंचकं त्विदम् ॥ ८९ ॥ उग्रनक्षत्राणि ॥ ॥ पूर्विकात्रितयमंतकं मवात्युग्रपंचकमिदं जगुर्बुधाः ॥९० ॥ मिश्रनक्षत्राणि ॥ हव्यवाहभयुतं द्विदैवतं मित्रसंज्ञमथ मिश्रकर्मसु ॥९॥ चरादिनक्षत्राणि ॥चरं चलें क्रूरमुशंति चोय ध्रुवं स्थिरं दारुणभं च तीक्ष्णम् ॥ क्षिप्रं लघुत्वं मृदुमैत्रसंज्ञं साधारणं मिश्रमिति ब्रुवति ॥ ९२ ।। अंधादिक नक्षत्रसंज्ञा। अंधकं तदनु मंदलोचनं मध्यलोचनमतः सुलोचनम् ॥ रोहिणीप्रभृत्तिभं चतुष्टयं साभिजिच गणयेत्पुनःपुनः ॥९३ ॥ नक्षत्रों के स्वरूप। तुरगमुखसहक्ष योनिरूपं क्षुराभं शकटसममथैणस्योत्त- मांगेनतुल्यम् ॥ मणिगृहशरचक्रभाति शालोपमम्भं शयन- सदृशमन्यच्चात्र पर्यकरूपम्।।९४॥हस्ताकारमतश्चमौक्तिक- समंचान्यत्प्रवालोपमं विष्ण्यं तोरणवस्थितं बलिनिभं सत्कुंडलाभं परम् ॥ क्रुध्यत्केसरिविक्रमेण सदृशं शय्या- समानपरंचान्यदंतिविलासवस्थितमतः शृंगानि व्यक्तिमत् ॥ ९५॥ त्रिविक्रमाभंचमृदंगरूपंवृत्तं ततन्यद्यमलद्वयाभम्। पर्यकरूपं मुरजानुकारि इत्येवमश्वादिकचक्ररूपम् ॥ ९६ ॥ नक्षत्रोंके तारोंकी संख्या। वह्नित्रिऋत्विपुगुणेंदुकृताग्निभूतवाणाश्विनेत्रशर- सख्या सख्या तारोंकी w ८ पुप्य B (२४) ज्योतिपसार । भूक्युगाधिरामाः॥ रुद्राब्धिरामगुणवेदशताद्वयुग्म दंताबुधैर्निगदिताः क्रमशोभताराः॥९७॥ नक्षत्रोंके शुभाशुभ स्वामिकों मुख रूपसंज्ञा लोचन | स्वरूपकी नाम संज्ञा नाम सज्ञा नाम संज्ञा आकृति १ अश्विनी शुभ अश्वि.क. तिर्यमु. लघु : क्रूर | मंदलोच. अश्वरूप ३ २. भरणी नाशक ग्रम अधोमुख | उग्र साधा. | मध्यलो योनिरूप ३ ३ कृत्तिका कार्यनाश आग्नि अधोमुख मिश्र । स्थिर | सुलोचन क्षररूप १ रोहिणी सिद्धि ब्रह्मा ऊर्ध्वमुख र मेत्र अंधलो० | शकट ५ ५ मृगशिर | शुभ चंद्र तिर्यमु. मृद दारुण मंदलोच. मृगसम । ३ ६ आर्द्रा शुभ शिव ऊर्ध्वमुख तीक्ष्ण चल | मध्यलो मणिसम १ ७ पुनर्वस मध्यम अदिति | तिर्यइमु. चर । क्षिप्र | सुलोचन | गृहसम शुभ गुरु ऊर्ध्वमुख रघु दारुण अधलो० शरसम ९ आश्लेपा शोक सर्प अयोमुख तीक्ष्ण क्रूर | मंदलोच. चक्रसम २० मघा नाशक पितर अधोमुख उग्र | क्रूर मध्यलोकशालासम५ १२ पूशका० मृत्यद अधोमुख उग्र स्थिर सुलोचन शय्यासम २ १२ उत्तराफा./ विद्या अर्यमा उर्ध्वमुख व क्षिप्र अंघलो पर्यकसम २ लक्ष्मी तिर्यमु. लघु | भैत्र | भंदलोच.हस्ताकृति ५ शुभद तिर्यइमु. मृदु चल | मध्यलो. मौक्तिक १ १५/स्वाति | अशुभ वाय तिर्य इ. चर साधा. सुलोचन प्रवाल १६ विशा| अशुभ इन्द्राग्नि | अधोमुख मिश्र मैत्र | अधुलो० तोरण १७ अनुराग सर्वसिद्धि मित्र तियइमु. मृद | क्षिप्र मंदलोच. वलिसम | ४ १८ ज्येष्ठा क्षयनाश इन्द्र निर्यइम. तीक्ष्ण दारण मध्यला. कुडल १९. मूल अर्थनाश राक्षस अयोमख तीक्ष्ण दारुण सुलोचन सिहसम १२ २० पूर्वापाता| हानि उदक अधामुर| उग्र अधलो० शय्यासम ४ |२१| उत्तरापा. चुहिदा | विश्वेदेश उमुख धव स्थिर सुलोचन | हस्तीसम ३ २२ आभिजित् वृद्धिदा ब्रह्मा रघ पक्षप्र अघलो त्रिकोण | ३ २३श्रवण उर्ध्वमुख चर चल । मुलोचन व्यक्ताकार ३ २४ धनिष्ठा , शुभदा वसु ऊर्ध्वमुख चर चल | अधरो० वामनसम४ २५ शतभिषा! कल्याण वरुण उर्ध्वमुख चर चल | मदलोच. मृदगसम१०० २६ पूर्वाभाद्र. मृत्युदा अजैक अधोमुख उग्र क्रुर । मध्यलो वर्तलाकार , २५ उत्तराभा. लक्ष्मी अहिर्बुध्न्य ऊर्ध्वमुख व स्थिर सुलोचन यमराकार २ २८ रेवती कामदा । पूपा तिर्य इमुख मृदु | मैत्र | अपलो० मृदंगसम ३२ भग १४ चित्रा स्वष्टा १ ३ . । सुखदा । विष्णु - भाषाटीकासमेत। (२५) कार्याकार्यविचार । अधोमुख। वापीकूपतडागगर्तपरिखा खाता निधेरुद्धृतिक्षेपो द्यूतपिलप्रवेशगणितारंभाः प्रसिध्यंति च ॥ टीका-अधोमुख नक्षत्र ये हैं मूल कत्तिका मघा विशाखा भरणी आश्लेपा पूर्वाफा पूर्वापाढा पूर्वाभाद्रपदा इनमें वापी कूप ताल गर्त और खाई खोदना द्रव्य काढना और रखना जुआ खेलना बिलांतप्रवेश गणि. तारंभ ये कर्म करने योग्य हैं ॥ तिर्यमुख। अश्वेभोष्ट्रलुलायरासभवृषोरभ्रादिदांत्यश्वनौ गंत्रीयंत्रहलप्रवाहगमनारंभाः प्रसिध्यन्तिच ॥ टीका-तीर्यङ्मुख कहिये ज्येष्ठा पुनर्वसु हस्त अश्विनी मृग रेवती अनु- राधा स्वाती चित्रा इन नक्षत्रोंमें घोडा हाथी ऊंट अँस गधा बैल मेंढा सूकर श्वान लेना, नाव पानीमें डालनागंत्री यंत्र हल चलाना धारण गमनादिक करे ऊर्ध्वमुख। प्रसादध्वजधर्मवारणगृहप्राकारसत्तोरणो- च्छ्राया रामविधिहितो नरपतेः पट्टाभिपेकादिच ।। टीका-पुष्य आHश्रवण उत्तराफाल्गुनी उत्तरापाढा उत्तराभादपदा शत- भिषा रोहिणी धनिष्ठा इन नक्षत्रोंको ऊर्ध्वमुख कहते हैं इनमें देवस्थान ध्वना मंडप घर कोट भीति तोरण वाग राज्याभिषेक आदिकर्म करने योग्य हैं। ध्रुवनक्षत्र। बीजहर्म्यनगराभिपेचनारामशांतिषुहितं स्थिरेपुच ।। टीका-रोहिणी उत्तराफाल्गुनी उत्तरापाढा उत्तराभाद्रपदा ये ध्रुव नक्षत्र हैं, इनमें वीज बोना, हर्म्य, तथा नगरमें प्रवेश, राज्याभिषेक, वाग लगाना ये कर्म करने योग्य हैं ।

" (२६) ज्योतिपसार। मृदुनक्षत्र। मित्रकार्यरतिभूषणांबरोद्गीतिमंगलविधानमेषु तु ॥ टीका-मृगशिर चित्रा अनुराधा रेवती इनको मृदु कहते हैं इनमें मित्रकार्य स्त्रीप्रसंग भूपण और वनधारण गाना आदि नाना प्रकारके मंगल कर्म करने योग्य हैं । लघुनक्षत्र। पण्यभूषणकलारतोषधज्ञानशिल्पगमनेषुसिद्धिदम् ॥ टीका-अश्विनी पुष्प हस्त अभिजित् इनको लघु कहते हैं इनमें दुकान खोलना, भूषण धारण करना, क्रीडा करना, औषधी बनाना, कारखाना नानविद्या, शिल्पविद्या प्रस्थान गमनादिक शुभ हैं । तीक्ष्णनक्षत्र। भूतयक्षनिधिमंत्रसाधनं भेदवन्धवधकर्म चावतु ॥ टीका-आर्द्रा आश्लेषा ज्येष्ठा मूल ये तीक्ष्ण नक्षत्र हैं इनमें भूत और यक्षादिकोंकी पीड़ाका निवारण करना, द्रव्य काढना, मंत्रसाधन, मेर बंधन, वध ये कर्म उक्त हैं । चरनक्षत्र। दंतवाजिकरभादिवाहनारामयानविधिषु प्रशस्यते ॥ टीका-पुनर्वसु स्वाती श्रवण धनिष्ठा शततारका ये चर नक्षत्र हैं इनमें हाथी, घोडा, नानाप्रकारके वाहन, बागमें जाना, पालकी रथ गाडी आ- दिकी सवारीमें बैठना योग्य है ॥ उग्रनक्षत्र। शाठ्यनाशविषयातबन्धनोत्साहशस्त्रदहनादिषुस्मृतम् ॥ टीका-भरणी मधा पूर्वाफाल्गुनी पूर्वापाढा पूर्वाभाद्रपदा ये उपनक्षत्र हैं इनमें शठता करना, नाश, विषघात, बंधन, उत्साह, शस्त्र, जलाना आ- दिकर्म करना विहित है ।

भापाटीकासमेत। (२७) मिश्रनक्षत्र। स्वाभिधानसमकर्मसाधने कीर्तितानि सकलानि मूरिभिः॥ टीका-कत्तिका विशाखा भरणी ये मिभहैं इनमें नक्षत्रोंके समान कर्म करने योग्य हैं। नष्टवस्तुकेदेखनेकाप्रकार। (नक्षत्रोंकीलोचनसंज्ञा) अंधके लभतेशीघ्रं मंदके च दिनत्रयम् ॥ मध्यके च चतुम्पटिर्न प्राप्नोति सुलोचने । टीका-अंध नक्षत्र में गई वस्तु शीघ मिलती है और मैदलोचनमें जानेसे ३ दिन पीछे प्राप्त होतीहै, मध्यलोचन नक्षत्रमें वस्तु नष्ट होय तो ६४ दिवस पर्यंत मिलजाय, सुलोचनमें गई वस्तु कभी प्राप्त नहीं होती ॥१॥ नष्टवस्तुदिग्ज्ञान। अंधकेपूर्वतो वस्तु मंदके दक्षिणे तथा ॥ पश्चिमे मध्यनेने च उत्तरे तु सुलोचने ॥ टीका-अंधे नक्षत्रमें नष्टवस्तु पूर्व दिशामें जानिये और मंदलोचनमें नष्ट वस्तु दक्षिणमें और मध्यलोचनकी पश्चिम दिशामें और सुलो- चनमें गत वस्तु उत्तर दिशा में जानिये अंधादिनक्षत्रोंमें नष्टवस्तुको प्राप्तिहोनी वा न होनी । अंधे सद्य प्राप्यते वस्तुनष्टं कष्टात्प्राप्यं मंदनेत्रे च तद्वत् । दूराष्ट्राव्यं मध्यनेत्रे न लभ्यं न श्रोतव्यं नैव लभ्यं सुनेत्रे॥ टीका-अंध नक्षत्रमें नष्टवस्तु शीघ्र प्राप्ति होतीहै, मंदलोचनकी वस्तु परिश्रम और विलंबसे और मध्य लोचनकी गई वस्तु दूर जानिये और मिलनेवालीमी नहीं और सुलोचनमें नष्ट हुई वस्तु न सुननेमें आवे न मिले। नक्षत्रअनुसारप्रश्न। मघादिआर्यमांतं च समीपे वस्तु दृश्यते ॥ हरतादिवसु- --

(२८)
ज्योतिपसार ।
पर्यतमन्यहस्ते च दृश्यते ॥ १ ॥ शतताराधमांतंतु स्वगृहे
वस्तु दृश्यते । अग्यादिसापपर्यंतमदृष्टं दूरगंतथा॥
टीका-मघासे लेकर उत्तराफाल्गुनी पर्यंत जो वस्तु चोरी जाय तो वह
समीप जानिये,हस्तसे धनिष्ठातक दूसरे हाथमें वस्तु जानिये शतभिपासे भरणी
तक अपने घरमें जानिये और कत्तिकासे श्लेषातक गई वस्तु प्राप्त नहीं होती।
तिथिवारं च नक्षत्र प्रहरेण समन्वितम् ॥ दिक्संख्ययाहतं चैव
सप्तभिर्विभजेत्पुनः।एकेनभूतले दुव्यंद्वयंचेगांडसंस्थितम् ॥
तृतीये जलमध्यस्थमंतरीक्षेचतुर्थके ।। तुपस्यं पंचमेतुस्या-
षष्ठेगोमयमध्यगं ॥ सप्तमेभस्ममध्यस्थमित्येतत्प्रश्नलक्षणम् ॥
टीका-प्रश्नसमयकी तिथिवार और गत नक्षत्र इन सबको इकट्ठा कर
और इनमें प्रहर मिलाके आठगुणा करै और सातका भाग देनेसे जो शेष रहे
उस्से फल विचारै ॥ एक शेप रहे तो भूमिमें वस्तु जानिये, और२शेष रहै
तो बर्तन में. ३ शेप रहें तो जलमें ४ बचे तो अंतरिक्षमें जानिये. और ५
बचें तो तुसमें, ६ बचें तो गोबरमें और ७ बचेंतो भस्ममें वस्तु जानिये ॥
दिवारात्रिमुहूतीन्याह।
शिवोहिमित्रपितरौ वस्वंभोविश्ववेधसः॥विधिरिद्रोऽथशकानी
रक्षोब्धीशोर्यमाभगः ॥ मुहूर्तशाइमेप्रोक्ता दिवापंचदशक-
मात् ॥ मुहूर्त्तारजनौ शंभुरजैकचरणाश्रयः ॥ दस्रात्पंचा-
दितेर्जीवो विश्वकौतक्षमारुतैः॥ दिनमानस्य तिथ्यशोरात्रे-
रापि मुहूर्तकाः। नक्षत्रनाथतुल्येस्मिन् स्थितकार्यात् खभो-
दितम् ॥ दिनमध्येऽभिजिन्मध्ये दोषसंघेषु सत्स्वपि ॥ सर्व
कुर्याच्छुभं कर्म याम्यदिग्गमनं विना ।।
अथ रव्यादिवारेत्याज्यमुहूर्ताः।
अर्यगाभानुमद्वारे चंद्रेहि विधिराक्षसौ ॥ पिवानी कुजवारे तु
चंद्रपुत्रे तथाऽभिजित् ॥ पित्राबालीभृगोरे राक्षसाम्बूगुरो
-दिने ॥रोद्रासापौशनेरह्नि इमेत्याज्यामुहूर्त्तकाः॥२॥

मगल बुध वारा: भाषाटीकासमेत । दिवारात्रिचक्रम् । ४ ५ ६ ७ ८ ९ १० ११ १२ १३ १४ १५स शिव सर्प मित्र पितर वसु । अबु विश्वे विधि विधि इद्र इद्राराक्ष.वरुण अर्य. मग मुहू, आश्लेषा अनु. मवा धनि पूषा उत्त ऽभि.रोहि ज्ये. वि. मूल शत उ. पू. नक्ष. रुद्र अजै. अहि पूषा दस्र यम आगे ब्रह्मा चन्द्र अदि गुरु वि. सूर्य | वा. वायुराशि आ० मा उ. रेवती अश्वि भर. कृत्ति रोहि मृग पुन. पुष्य श्रव हस्त चि, स्वा. नक्ष. अथरव्यादिवारे त्याज्यचक्रम् । सूर्य चद्र गुरु शुक्र शनि मुहूर्ताः नक्षत्र दिनरात्रि | रा. ८) रा. ७) रा. | रा.६ । रा. ९ रा. ? मद्यकाटनेकामुहूर्त। रोद्रेपैत्र्येवारुणे पौरुहूते याम्येसाप्पैनैर्ऋते चैवधिष्ण्ये ॥ पूर्वाख्येषु विष्वपि श्रेष्ठ उक्तो मद्यारंभः कालविद्भिःपुराणैः ॥ टीका-आर्दा मघा शतभिषा ज्येष्ठा भरणी आश्लेषा मूल तीनों पूर्वा इन नक्षत्रों में प्रथम मय काढनेका प्रारंभ करे ॥ १ ॥ नवीनवस्त्रधारण। रोहिणीषुकरपंचकेऽश्विभेव्युत्तरोपि च पुनर्वसुद्रये ॥ रेवतीपु वसुदैवते च भे नव्यवस्त्रपरिधानमिष्यते ।। टीका-रोहिणी हस्त चित्रा स्वाती विशाखा अनुराधा अश्विनी उत्त- राफाल्गुनी उत्तरापाढा उत्तराभाद्रपदा पुनर्वसु पुष्य रेवती धनिया इनमें नवीन वस्त्र धारण करे और करावे ॥ मोतीसुवर्णमणिरक्तवस्त्रधारण । नासत्याप्णवसुभे करपञ्चकेच मार्तडभौमगुरुमंत्रिशशांकवारे ॥ मुक्तासुवर्णमणिविद्रुमदंतशंखरक्ताम्बराणि विधृतानि भवन्ति सिद्धौं।

, (३०) ज्योतिपंसार। टीका-अश्विनी रेवती धनिष्ठा हस्त चित्रा स्वाती विशाखा अनुराधा इन नक्षत्रोंमें और भौम रवि गुरु शुक्र सोम इन वारोंमें मोती सुवर्ण मणि मूंगा है- स्सिदंतकाचूडा,नूतन शंख पूजामें लाना,रक्त वस्त्र धारण करनाशुस जानिये॥ पुंसवनकेनक्षत्र। श्रवणःसकर:पुनर्वसुनितेभ च सपुष्यको मृगः ॥ रविभूसुतजीववासराः कथिताः पुंसवनादिकर्मसु ॥ टीका-श्रवण हस्त पुनर्वसु मूल पुष्य मृगशिर और रवि भौम गुरु ये ३ वार पुंसवनादिक कर्ममें उक्त हैं । कर्णवेधन। पोष्णवैष्णवकराश्विनिचित्रापुष्यवासवपुनर्वसुमैत्रैः ।। सेन्दवे श्रवणवेधविधानं निर्दिशन्ति मुनयोहिं शिशूनाम् ।। टीका-रेवती श्रवण हस्त अश्विनी चित्रा पुष्य धनिष्ठा पुनर्वसु अनु- राधा मृगशिर इनमें बालकका कर्णवेध करावै ।। अन्नप्राशन। रेवतीश्रुतिपुनर्वसुहस्तबाहयतः पृथगपिद्वितयेच ।। प्युत्तरेषु गदितं हि नवानप्राशनं तु ऋषिभिः पृथुकानाम् ॥ टीका-रेवती श्रवण पुनर्वसु हस्त रोहिणी मृगशिर आर्दा तीनों उत्तरा इनमें ऋषियोंने आयमें और नया अन्न अक्षण करना कहाहै ॥ औरकर्म। पुष्येपोष्णेचाश्विनीबैंदवेच शाके हस्ताये त्रिके भेष्वदित्याः ॥ क्षौरं कार्य वैष्णवाद्यत्रोच मुक्त्वा भौमादित्यापातंगिवारान् ।। टीका-पुष्य रेवती अश्विनी मृगशिर ज्येष्ठा हस्त चित्रा स्वाती पुन- सु श्रवण धनिष्ठा शतभिपा इन नक्षत्रोंमें श्मश्रुकर्म कराईये और ये वार चर्जित है. भौम रवि शनि इनमें नकरे ॥ .

भापाटीकासमेत। (३१) दंतबंधन। येषुयेषुप्रशंसंति क्षौरकर्ममहर्षयः॥ तेषुतेष्वेव शंसति नखदंतादिलेखनम् ॥ टीका-देतबंधन और वेधना दांत और नख काटना, जो नक्षत्र ऊप- रके श्लोक क्षौरकर्ममें कहे हैं इन्हीमें करना ॥ आज्ञयानरपतद्विजन्मनां दाहकर्ममृतसूतकेषु च ॥ बंधमोक्षमखदीक्षणेषु च क्षौरमिष्टमखिलेषु तुष्टिदम् ।। टीका-राजा अथवा ब्राह्मणोंकी आज्ञा और दाहक्रिया करने में सूतकके अंतदिनमें यज्ञकी दीक्षामें बंधनसे छूटनेमें अवश्य क्षौर कर्म करानेसे पुष्टिका देनेवाला होताहै ॥ ताराशुद्धं क्षौर रविगुरुशुद्धा बतदीक्षा । शुक्रविशुद्धायात्रा सर्वशुद्ध शशांकन ॥ टीका-क्षौरकर्ममें नक्षत्रकी शुद्धि और व्रतके प्रारंभमें दीक्षाके लेनेमें रवि गुरुकी शुद्धि और यात्रामें शुक्रशुद्धि और चंद्रमाकी शुद्धि सबकामोंमें चाहिये। श्मश्रुकर्ममें वर्जनीय। भद्रापक्षांतरिक्ताव्रतदिनवसुभूश्राद्धपष्टीषुरात्री संध्यापातार भास्वच्छनिषुपटधनुःकर्ककन्यागते ॥ जन्मजन्ममासे सुरदिनयजने भूपितो ग्रामयायी भुक्तोभ्यतोभिपिक्तः सम- दिनरजिगःश्मश्रुकार्य न कुर्यात् ।। टीका-भद्रा पूर्णिमा अमावास्या चतुर्थी नवमी चतुर्दशी व्रतदिवस अष्टमी प्रतिपदा श्राद्धदिवस छठेमें रात्रिमें संध्याकाल व्यतिपातादिक दुष्टयोग नौ- मवार रविवार शनिवारमें कुंभ धनु कर्क कन्या इन चार राशियोंके सूर्यमें जन्मनक्षत्र और जन्ममास देवताके पूजन वा हयनादिकर्मदिवस अलंकारा- दिधारण दिवस भोजनके पीछे तेल लगाने और स्नानके पीछे मंगल अभिषेक वथा वीके रजस्वला होने और समदिवस आदिकनें क्षौरकर्म वर्जनीय है ।

(३२) ज्योतिपसार। मौंजीबंधन। सौम्येपोष्णे वैष्णवेवासवाख्ये हस्तेस्वातित्वष्ट्रपुष्याश्विभेषु । ऋदित्यांमेखलावंधमोक्षौ संस्मयते नूनमाचार्यवयः ।। टीका-मृगशिर रेवती श्रवण धनिष्ठा हस्त स्वाती चित्रा पुष्य अश्विनी पुनर्वसु इन नक्षत्रोंमें मौजीबंधन त्यागना ऐसा आचार्योंने श्रेष्ठ कहाहै ॥ विवाहनक्षत्राणि। मूलमैत्रमृगरोहिणीकरैः पौष्णमारुतमपोत्तरान्वितेः॥ निर्विधाभिरुडुभिर्मगीदृशां पाणिपीडनविधिविधीयते ॥ टीका-मूल अनुराधा मृगशिर रोहिणी हस्त रेवती स्वाती मघा तीनों उत्तरा इन सब नक्षत्रोंमें विवाह शुज जानिये ॥ अग्निहोत्रारंभः। प्राजापत्ये पूपभेसद्विदैवे पुष्ये ज्येष्ठास्वैदवे कृत्तिकासु॥ अन्याधानं चोत्तराणां त्रयेपि श्रेष्टं प्रोक्तं प्राक्तनैविप्रमुख्यैः॥ टीका-रोहिणी रेवती विशाखा पुष्य ज्येष्ठा मृगशिर कत्तिका और तीनों उत्तरा इनमें प्रथम निहोत्र प्रारंभ करे ॥ विद्यारंभमुहूर्त। मृगादिपंचस्वपि भेषु मूले हस्तादिकेच त्रितयेश्विनीषु ॥ पूर्वाचये च श्रवणे च तद्विद्यासमारंभमुशंतिसिद्धयै ।। टीका-मृगशिर आर्द्रा पुनर्वसु पुष्य आश्लेपा मूल हस्त चित्रा स्वाती आश्विनी पूर्वापाढा पूर्वाफाल्गुनी पूर्वाभाद्रपदा श्रवण इन नक्षत्रोंमें बाल- कको प्रथम विद्याभ्यास आरंभ करावे ॥ औषधिग्रहण । पोष्णद्वयेचादितिभद्वये च हस्तत्रये च श्रवणत्रये च ॥ मैत्रे च मूले च मृगे च शस्तं भैषज्यकर्म प्रवदंति संतः॥ टीका-रेवती आश्विनी पुनर्वसु पुष्य हस्त चित्रा स्वाती श्रवण धनिष्ठा शतभिषा अनुराधा मूल मृग इन नक्षत्रोमें औषध बनाना खाना शुभहै ।।

भाषाटीकासमेत । रोगोत्पत्तिमें शुभाशुभनक्षत्र । स्वात्याश्लेषारौद्रपूर्वाश्येषु शाकेभौमे सूर्याजे सूर्यवारे । नंदारिक्तास्वेवरोगस्य चाप्तिमृत्यु यः शंकरोरक्षितापि ।। टीका-स्वाती आश्लेषा आर्दा तीनों पूर्वा ज्येष्ठा और भौम शनि रवि ये वार, नंदा तिथी कहिये पडवा पष्टी एकादशी और रिक्ता कहिये चौथ नौमी चतुर्दशी इनमें रोग उत्पन्न होते हैं.उनकी शिवनी रक्षा नहीं कर सकते ।। रोगसे मुक्ति होनेका प्रमाण । व्याभ्युत्पत्तिर्यस्य पौणे समैत्रे प्राणवाणं जायते तस्य कृच्छ्रात् ।। वश्ये सौम्ये रोगमुक्तिस्तु मासाद्विशत्यास्यादासराणांमघासु ॥ टीका-रोग उत्पन्न होनेके दिवस जो रेवती अथवा अनुराधा होय तो रोगीके प्राण अति कठिननासे बचें, उत्तरापाढा अथवा मृगशिर होय तो एकमास पर्यंत और मघा होय तो वीस दिवसतक पीडा रहै ॥ पक्षास्तेवासवे सद्विदेवे मूलाश्विन्योरग्निधिष्ण्येनवाहात् ।। याम्येत्वा वैष्णवे वारुणे च नेरुज्यस्यानूनमेकादशाहात् ।। टीका-हस्त नक्षत्रमें उत्पन्न रोग १५ दिवस रहताहै और धनिष्ठा विशाखा मूल अश्विनी कृत्तिकामें उत्पन्न ९ दिन और भरणी चित्रा श्रवण शततारकामें उत्पन्न हुआ रोग ११ दिवस भोगना होता है । आहिर्बुध्येतिष्यसंज्ञेसभागे प्राजापत्यादित्ययोः सप्तरात्रात् ।। रोगान्मुक्तिर्जायते मानवानां निःसंदिग्धं जल्पितं गर्गमुख्यैः ।। टीका-उत्तराभाद्रपदा पुष्य पूर्वाफाल्गुनी अभिजित् पुनर्वसु इन नक्ष- बॉमें उत्पन्न हुआ रोग सात दिवसतक निश्चय भोगना पडता है यह गर्ग- मुनिका वाक्य है। रोगमुक्तिस्नाननक्षत्र। इंदोवारेभार्गवे च ध्रुवेपसापादित्यस्वातियुक्तेपुभेयु ॥ पित्र्येचात्येचैव कुर्यात्कदाचिनेव स्नानं रोगमुक्तस्य जंतोः॥ - ज्योतिपसार। टीका--सोम शुक्रवार और ध्रुवनक्षत्र रोहिणी तीनों उत्तरा और आश्लेपा पुनर्वसु स्वाती ये शुभ हैं. और मघा रेवती इनमें रोगीका स्नान अयोग्य और दुःखदायक है ॥ रोगमुक्तस्नानलग्न। लग्नेचरे सूर्यकुजेज्यवाररिक्तातिथौचन्द्रवले च हीने ॥ केन्द्रधिकोणार्थगते च पापे स्नानंदितं रोगविमुक्तिकानाम् ॥ टीका--मेष कर्क तुला मकर ये चरलम, रवि भौम गुरु ये वार और रिक्तातिथि ४।८।१४ और चन्द्र होनबल होय, केंद्र तथा त्रिकोणमें पाप ग्रह होय ऐसी लग्नमें स्नान करावे तो आरोग्य होय ॥ ५॥ लता औषधीवावृक्षारोपण। सावित्रतिष्याश्विनवारुणानिमूलं विशाखा च मृदुधुवाणि ॥ लतौपधीपादपरोपणेषु शुभानि भानि प्रतिपादितानि । टीका-हस्त पुष्य अश्विनी शततारका मूल विशाखा और मृदु ध्रुव इन नक्षत्रोंमें लता औषधी और वृक्षांका लगाना शुभहै ॥ कूपारंभकेनक्षत्र । हस्तात्तिस्रो वासवं वारुणं च शैवं पित्र्यं त्रीणि चैवोत्तराणि ।। प्राजापत्यं चापि नक्षत्रमाहुः कूपारंभे श्रेष्टमाद्या मुनींद्राः॥ टीका-हस्त चित्रा स्वाती धनिष्ठा शततारका आर्दा मघा तीनों उत्तरा और रोहिणी इन नक्षत्रों में अगले मुनीश्वरोंने कूपारंग श्रेष्ठ कहाहै ॥ द्रव्यदेनावास्थापितकरना। साधारणोगध्रुवदारुणाख्यैर्धिष्ण्यैर्यत्र द्रविणं प्रयुक्तम् ।। हस्तेन विन्यस्तवसु प्रनष्टं न लभ्यते तन्नियतं कदाचित् ॥ टीका-साधारण उग्र धृव और दारुणसंज्ञक नक्षत्रोंमें जो दूसरेको द्रव्य देवा स्थापित करै तो वह वस्तु फिर माल नहीं होय ॥ हस्तीलेनावादेना। हस्तेपुचित्रासु तथाश्विनीषु स्वातौ च पुष्ये च पुनर्वसौ च ॥

भाषाटीकासमेत। (३५) प्रोक्तानि सर्वाण्यपिकुञ्जराणां कर्माणि गर्गप्रमुखैः शुभानि ।। टीका-हस्त चित्रा अश्विनी स्वाती पुप्य और पुनर्वसु इन नक्षत्रोंमें हाथी लेना और देना और उसके अलंकार शृंगारादिक सकल कर्म करना गर्गादिमुनियोंने शुभ कहेहे ॥ अश्वलेना वा देना। पुण्यश्रविष्ठाश्विनसौम्यभेषु पोष्णानिलादित्यकराह्वयेषु ॥ सवारुणज्ञेषु बुधैःस्मृतानि सर्वाणि कार्याणि तुरंगमाणाम् ॥ टीका-पुप्य धनिष्ठाअश्विनी मृगशिर रेवती स्वाती पुनर्वसु हस्त शतभिपा इन नक्षत्रों में तुरंग ले और दे तथा उसके अलंकार और शंगारआदि कर्म करै गवादिपशुओंकेनगरमैलाने और पहुँचानेमें वयं । चित्रोत्तरावैष्णवरोहिणीषु चतुर्दशीदर्शदिवाष्टमीषु ॥ ग्रामप्रवेशं गमनं विदध्यारोमान्पशूनां न कदाचिदेव ॥ टीका-चित्रा तीनों उत्तरा श्रवण रोहिणी चतुर्दशी अमावास्या अष्टमी इनमें गवादिपशुओंको ग्राममें न लावें और न बाहिर पहुँचावे ॥ गवादिपशुओंकेक्रयविक्रयमेंवर्जित । शुक्रवासवरेपु विशाखापुष्यवारुणपुनर्वसुभेषु ॥ अश्विपूपभयुतेषु विधेयो विक्रयक्रयविधिः सुरभीणाम् ।। टीका-ज्येष्ठा हस्त विशाखा पुष्य शतभिषा पुनर्वसु अश्विनी रेवती इन नक्षत्रोंमें गायका बेचना और मोल लेना दोनों वर्जनीय हैं । तृणकाप्टादिसंग्रहमेंवयं । वासवोत्तरदलादिपंचके याम्यदिग्गमनगेहगोपनम् ॥ प्रेतदाहतृणकाप्ठसंग्रहःशय्यकावितरणं च वर्जयेत् ।। टीका-धनिष्ठाके उत्तराईसे लेकर पांच नक्षत्रोंको पंचक कहते हैं इनमें दक्षिण दिशाका गमन और घर वनाना प्रेतदाह तृण कार्ड संग्रह शप्पा- दिक लिर्माण करना वर्जितहै ।

1 (३६) ; ज्योतिषसार। हलचलानेकानक्षत्र। मृदुधुवक्षिप्रचरेषु मूलमघाविशाखासहितेषुभेषु ॥ हलप्रवाहंप्रथमं विदध्यानीरोगमुष्कान्वितसौरभेयैः ॥ टीका-मृदु ध्रुव क्षिप्र चरसंज्ञक नक्षत्रों में तथा मूल और मघां विशाखा इन नक्षत्रोंमें रोगरहित आंडू बैलोंसे प्रथम हल चलावै ॥ बीजबोना। रौद्राहियाम्यानिलवारुणेंद्राण्याहुर्जघन्यानि तथा बृहंति ।। ध्रुवद्विदेवादितिभानि नूनं समानि शेषाणि पुनर्मुनीद्वैः॥ बृहत्सुधान्यंकुरुतेसमय जघन्यधिष्ण्येभ्युदितो महर्षः॥ समेषुधिष्ण्येषु समंहिमांशुर्वदंति संदिग्धमिदं महातः॥ १ टीका-आर्दा आश्लेषा भरणी स्वाती शतभिषा ज्येष्ठा इन नक्षत्रोंको जघन्य कहतेहैं इनमें मासकी आदिमें जो चंद्रमा उदय होय तो धान्य महँगा होय, ध्रुव कहिये तीनों उत्तरा रोहिणी विशाखा पुनर्वसु इनको बृहत् कहतेहैं इनमें चंद्रमा उदय होय तो अन्न सस्ता होय और शेप नक्षत्र सम जानिये उनमें चंद्रोदय होनेसे अन्नका भाव साधारण रहताहै ॥ राशिपरत्वमें चंद्रोदयकाफल । मीनमेपोदितश्चंद्रः सततंदक्षिणोन्नतः । शेपोन्नतश्चोत्तरायां समतावृपकुंभयोः॥ विरंतुसमे चंद्रदुर्भिक्ष दक्षिणोन्नते ॥ सुभिक्षक्षेममारोग्यमुत्तराश्रितचंद्रमाः॥ टीका-मीन अथवा मेप राशिमें जो शुक्र द्वितीया चंद्रमाका उदय होय तो उससे दक्षिणको उन्नत जानिये और उससे दुर्भिक्षका संभव होताहै और मिथुनसे लेकर मकर पुयंत जो चंद्रोदय होय तो उत्तरको उन्नत जानिये यह चंद्रमा मुभिक्ष भेम और आरोग्यताका कर्ता वृष और कुंभमें चंद्रमाका उदय होय तो सम रहता है इसमें राजाओंके कलह और विडरता होतीहै ॥ पुण्यनक्षत्रकेगुणदोप। परकृतनखिलं निहन्तिपुष्यो न खलु निहंति परंतु पुष्यदोपम॥ ध्रुवममृतकंरोप्टगेपिपुप्ये विहितमपेति सदैव कर्मसिद्धिम् ॥ . 1 '. भापाटीकाससमेत। (३७) टीका-पुष्य दूसरके दोप और अष्टमस्थान स्थित चंद्रके दोपको दूर करता है परंतु उसी नक्षत्रका दोष होय तो वह दूर नहीं होता. और इस नक्षत्रमें किया हुआ कार्य सिद्ध होता है। हस्ताश्विपुष्योत्तररोहिणीपुचित्रानुराधामृगरेवतीषु ।। स्वातौधनिष्ठासु मवासुमूले बीजोतिरुत्कृष्टफलप्रतिष्ठा ॥ टीका-हस्त, अश्विनी, पुष्य,तीनों उत्तरा, रोहिणीचित्रा अनुराधा मृगशिर खेती स्वाती धनिष्ठा मघा मूल इन नक्षत्रोंमें बीज बोनेसे खेत अधिक फलते हैं। सर्पदंशविचार। या कृत्तिकामूलमघाविशाखासापीतकासु भुजंगदप्टः ॥ सवैनतेयेन सुरक्षितोपि प्राप्नोति मृत्योर्वदनं मनुष्यः ॥ '. टीका-कृत्तिका मूल मघा विशाखा आश्लेपा रेवती आर्द्रा इन नक्षत्रों में जो सर्प काटै तो गरुडकोनी रक्षक होनेपर मनुप्य मृत्युको प्राप्त होय ॥ गानारंभविचार। हस्तस्तिष्यो वासवं चानुराधा ज्येष्ठा पौष्णं वारुणं चोत्तरा च ॥ पूर्वाचायः कीर्तितश्चंद्रवर्ती नृत्यारंभे शोभनो ऋक्षवर्गः॥ टीका-हस्त पुष्य धनिष्ठा अनुराश ज्येष्ठा रेवती शततारका तीनों उत्तरा और शुभ चन्द्रमा पाकर गाने और नृत्यकामारंज करना पूर्वाचार्योंने शुज कहाहै। राज्याभिषेकनक्षत्र। मैत्रशाककरपुष्यरोहिणीवैष्णवेषु तिसृपूत्तरासुच ।। रेवतीमृगशिराश्विनीच माभृतां समभिपेकइष्यते ॥ टीका-अनुराधा ज्येष्ठा हस्त पुष्य रोहिणी श्रवण तीनों उत्तरा रेवती मृगशिर अश्विनी इन नक्षत्रों में राज्याभिषेक करना उचित है । राजदर्शन। सौम्याश्वितिष्यश्रवणश्रविष्ठाइस्तधुक्त्वाष्ट्रभपूपभानि ॥ मित्रेणयुक्तानिनरेश्वराणां विलोकनेभानि शुभप्रदानि ॥

(३८)
ज्योतिषसार।
टीका-मृगशिर अश्विनी पुष्य श्रवण धनिष्ठा हस्त ध्रुव चित्रा रेवती
अनुराधा इन नक्षत्रोंमें राजाका प्रथम दर्शन शुभदायक है।
पुष्यकाफल।
सिंहोयथासर्वचतुष्पदानां तथैवपुष्योवलवानुडूनाम् ॥
चन्द्रविरुद्धेप्यथ गोचरेपि सिद्धयंति कार्याणिकृतानिपुष्ये ॥
टीका-जैसे सब चतुष्पद जीवोंमें सिंह बलवान् है वैसेही नक्षत्रोंमें
पुप्य है; पुप्यमें किया कार्य गोचर दोप और कनिष्ठ अर्थात् चौथा आठवां
बारहवां चंद्र होने परभी सिद्ध होताहै ॥
ग्रहेणविद्धोप्यशुभान्वितोपि विरुद्धतारोपि विलोमगोपि ॥
करोत्यवश्यं सकलार्थसिद्धिं विहाय पाणिग्रहणं तु पुष्यः॥
टीका-ग्रह करिके विद्ध वा अशुभ ग्रह करिके युक्त होय अथवा
तारा इससे प्रतिकूल होय तथापि पुष्यमें किया हुआ कार्य सिद्ध होताहै;
परंतु विवाहमें पुप्यनक्षत्र वर्जितहै ॥
योगप्रकरण।
प्रतिदिनके योगजाननेकी रीति ।
वाक्पतेरर्कनक्षत्रं श्रवणाचान्द्रमेवच ॥
गणयेत्तद्युतिं कुर्यायोगः स्यादृक्षशेषतः॥
टीका-पुप्पसे सूर्यनक्षत्रतक चलते नक्षत्रों को गिन और श्रवणसे
दिवसनक्षत्रतक गिनै, दोनों संख्याओंको इकट्ठा करे और सत्ताईसका भाग
देव जो शेप रहे वही योग जानिये ॥
योगोंकेनाम।
विप्कंभः प्रीतिरायुष्मान्सौभाग्यः शोभनस्तथा ॥ अति-
गंड मुकर्माचधृतिः शूलस्तथैवच ॥ गंडोवृद्धिधुवश्चैव व्या-
घातोहर्पणस्तथा ॥ वज्रसिद्धी व्यतीपातो वरीयान् परिधः
शिवः ॥ सिद्धः साध्यः शुभः शुक्को ब्रह्मेद्रो वैधृतिःक्रमात् ॥
सप्तविंशतियोगास्तु कुर्युर्नामसमं फलम् ॥
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भाषाटीकासमेत। (३९) टीका-विष्कं १ प्रीति २ आयुष्मान सौभाग्य ४ शोमन ५ अति- गंड ६ सुकर्मा ७ धृति ८ शूल ९ गंड १० वृद्धि ११ ध्रुव १२ व्याघात १३ हर्षण १४ वज १५सिद्धि १६ व्यतीपात १७ वरीयान १८ परिष १९ शिव २० सिद्ध २१ साध्य २२ शुभ २३ शुक्ल २४ ब्रह्मा २५ऐंद्र २६ वैधृति २७ ये सत्ताईस योग निजनामके तुल्य फल करते हैं अर्थाद जो इनके नामोंका अर्थ है वही फल जानों ।। योगोंमें वर्जनीयघटिका। विरुद्धसंज्ञा इह ये च योगास्तेपामनिष्टः खलु पादःआधः।सवैधृ. तिस्तुव्यतिपातनामासर्वोप्यनिष्टः परिवस्यचार्द्धम् ॥ तित्रस्तु योगे प्रथमे च बजे व्याघातसंज्ञे नवपंचशूले ॥ गंडेतिगंडे च पडेव नात्यः शुभेषु कार्येषु विवर्जनीयाः॥ टीका-और इनमें अशुभ योगोंका आदिका चतुर्थांश वर्जनीयहै, व्यती- पात वैधृती ये सम्पूर्ण और विष्कनकी ३ वजकी ४ व्याघातकी ५ गंडकी ६ अतिगंडकी ६ शूलकी १५ घडी सकलशुनकार्यमें वर्जनीय हैं । करणजाननेकी रीति। गततिथ्योद्विनिनाश्च शुक्लप्रतिपदादितः॥ एकोनाः सप्तहृच्छेपः करणं स्यादवादिकम् ॥ टीका-शुक्लप्रतिपदासे जिस तिथिका करण जानना हो उसकी पूर्वगत ति- थिको द्विगुणी करै तिसमें एक मिलाकर सातका भाग दे जो शेष बचै वहीं उस तिथिका करण जानिये, और प्रत्येक तिथिको दो करण भोगते हैं। नाम। बवाह्वयं बालवकौलवाख्ये ततोभवेत्तैतिलनामधेयम् ।। गराभिधानं वणिजं च विटिरित्याहुराः करणानि सप्तः।। अंतेकृष्णचतुर्दश्यां शकुनिदर्शभागयोः ॥ ज्ञेयंचतुष्पदं नाग किंस्तुघ्नंप्रतिपदले ॥

कृत्य (४०) ज्योतिपसोर। स्वामी। । इन्द्रोब्रह्मामित्रनामार्यमाभूः श्री कीनाशश्चेति तिथ्यर्धनाथाः॥ .. कक्ष्युक्षाख्यौ सर्पवायुस्तथैव ये चत्वारस्ते स्थिराणां चतुर्णाम्॥ कृत्य। पौष्टिकस्थिरशुभानिववाख्येवालवे द्विजहितान्यपि कुर्यात् ॥ कौलवेप्रमदमित्रविधानं तैत्तिलेशुभगताश्रयकर्म ॥ गरेचवी- जाश्रयकर्षणानि वाणिज्यके स्थैर्यवणिकक्रियाश्च ॥ नसि- द्धिमायाति कृतं च विष्टयां विपारिघातादिषुः तंत्रसिद्धिः ॥ मंत्रौपधानिशकुनौ तु सपौष्टिकानि गोविनराज्यपितृकर्मच- तुष्पदेति ॥सौभाग्यदारुणधृतिध्रुवकर्मनांगे किंस्तुघ्ननाग्निनि- खिलं शुभकर्मकार्यम् ॥ शुक्लतिथी६ कृष्णतिथी६०/ नाम स्वामी पूर्वदल उत्तरद पूर्वदल उत्तरद १] स्थिर किंस्तु. वायु समस्त शुभकार्य करै ५/८११५/४/११/७ इन्द्र व्रतउत्साह देवालय आदि शुभकर्म करे । २।९१५ १२०१८४११) वालव ब्रह्मा ब्राह्मणोंसे हितकरै ६ १३२/९/५/१२/१/८ कौलव मित्र !उन्माद और मित्रताकरे ३१०/६/१३/२/९/५/१२ तैतिल सूर्य | विवाहादिक मंगलकार्य करै ||१४|३ (२०६।२३/२/९/गरज भूमि बीजबोना हल चलाना २७/१६३१०१६१३वणिज, लक्ष्मी देवप्रतिष्ठा घर दुकान और व्यापार करावै सकल कर्म वर्जित परंतु विप और घात ७१४/३.२० विष्टि, यम ये क्रूरकर्म वर्जित नही स्थिर. १६शकुनि कलि मित्रोपदेश औषधि ग्रहपूजा करावे गो बाणे राज्य पितृ इनसंबंधी कृत्या स्थिर. 10 • चतुष्प वृषभ करावे सौभाग्यकर्म युद्दमेंजाना धीरज और ३० नाग संर्प - विद्याभ्यास करना ये कर्म करावे कल्याणीतिथिमानम्। कृप्णेनिंदिशयोरूर्व सप्तमीभूतयोरधः । शुक्के वेदेशयोरूर्व भद्रा प्राग्वसुपूर्णयोः ॥ मनुवसुमुनितिथियुगदशशिवगुण ८ . . बव . ६३०० . ....

भापाटीकासमेत। संख्यातिथिषुपूर्वोत्याः ॥ आयातिविष्टिरेपापृष्ठेषुभद्रा पुर- स्त्वशुभा ॥ शास्त्रार्थः ॥ दिवासर्यमुखी भद्रारात्रौभद्रा च वृश्चि- की । सर्पस्य च मुखं त्याज्यं रात्रौ पुच्छंपरित्यजेत् ॥ रात्रिभ- द्रायदाहिस्यादिवाभद्रायदानिशि ॥ नतत्रभद्रादोपः स्यात्स- कार्याणि साधयेत् ॥ शरीरभागः ॥ नाड्यस्तु पंचवदनेथगले तथैकावक्षोदशैकसहितंनियतं चतस्रः।। नाभ्यांकटौपडथ पु- च्छलता च तिस्रोविऐव॒धैरभिहितोंगविभाग एपोस्थानफलम्।। मुखेकार्यध्वस्तिर्भवति मरणं चाथगलके धनाहानिर्वक्षस्यथ कटितटे बुद्धिविलयः ॥ कलिनाभौदेशे विशयमथ पुच्छे च जगदुः शरीरे भद्रायाः पृथगिति फलं पूर्वमुनयः॥ चंद्रः॥ मीने मेपालिकशशिनि निवसति स्वर्गसंस्थापि विष्टिः कन्यायां तौलिसंस्थेधनमिथुनगते नागलोकेनिवासः ॥ कुंभेसिंहेवृषेवा मकरमुपगतेराजतेमृत्युलोके भद्राचंद्रप्रभावा हिमकरतनया नोशुभा लौकिके स्यातास्थानफलम् । स्वर्गभद्राभवेत् सौख्यं पाताले च धनागमः ॥ मृत्युलोके यदाभद्राकार्यसिद्धिस्त- दानहि ॥ वारानुसारनाम ॥ सोमेशुक्रे च कल्याणी शनौ चैवतुवृश्चिकी ॥ गुरौपुण्यवती ज्ञेया चान्यवारेपुभद्रिका ॥ शालार्थ इनतिधियाकी ३० घडी ३) पुच्छ विजय मीन उत्तरार्द्धकीभद्रातिस्काना सौख्य शु कल्याणी २०मवृश्चिकादिवसमहोताहै। कटि बुद्धि वृश्चि रत्तरली३० पतिका पुच्छ वर्जनीय मुख शुभहोय, বৃশ্বিন্ধ १२ उत्तरार्द्ध कहिये रात्रि ३०. पूर्वाद्धयाभद्राकाना मिसपिणारात्रिपआतीहैल गल / मरण मिथु पुण्यवती १४सका घडामुखवजनीयहै विश्वंस करता पाछे पुन्छ मुख विश्वस सिंह शुभहोय पूवाद्धकहिय वृषभ १५ दिवसमे भद्राहोय दैतनैःसमरेऽमरेषु विजितेष्वीश कुधादृष्टवान् स्वंकायात्कि- लनिर्गताखरमुखीलांगूलिनीचक्रपात् ॥ विष्टि सप्तभुजामृगेंद्र- तिथि सस्थान! फल चिद्र स्थान फल वार नाम मेष स्वग नाश कर्क नाभिकरह कन्या- १ कपाल धन तुला नाश धन पाताल धनप्रा तिगुरु किंभ शुक्ल अशुभ भद्रका मकर (४२) ज्योतिपसार। गलकाक्षामोदरीप्रेतगादैत्यानीमुदितैःसुरैस्तुकरणप्रतिनियुक्तातुसा टीका--दैत्य और देवताओंमें बडा घोर युद्ध हुआ तव देवताओंका पराजय हुआ, तिस समय शिवजीके क्रोध करनेसे उनकी देहसे एक स्त्री गर्दभमुखी पुच्छवती पहियेके समान जिसके चरण विष्टिनाम सप्त भुजा मृगकीसी ग्रीवा कश उदर प्रेतपर चढी दैत्योंके वध करनेवाली निकली और देवताओंने प्रसन्न होके करणोंके प्रांतभागमें स्थापितकी । संक्रांतिः। वारानुसारनाम ॥॥ घोरारवौवाक्ष्यमृतद्युतौचसंक्रांतिवारेच महोदरीस्यात् ॥ मंदाकिनीज्ञेचगुरोचनंदामिश्राभृगौराक्षसि चार्कपुत्रे। नक्षत्रोंके अनुसारनाम् ॥॥उग्रक्षिप्रचरैमैत्रध्रुव- मिश्राख्यदारुणैः ॥ ऋःसंक्रांतिरकस्यघोराद्याःक्रमशोभवे- त् ॥॥ फल ॥॥ ध्वांक्षावैश्यान्सुखयति महोदर्यलंचौरसा- र्थान्धोराशूरानथनरपतीनेवमंदाकिनीच ॥नंदाख्याचद्विजव- रंगणान्मिश्रकाख्यापशूश्च चांडालांतांप्रकृतिमखिलाराक्षसी संज्ञिताच ॥॥ कालफल ॥॥ पूर्वाह्नकालेनृपतिद्विजेन्द्रान्म- ध्यदिनेचाथविशोपराहे ॥शूद्रानवावस्तमितोमदोपेपिशाच- कानात्रिचरान्निशीथे। नटादिकांश्चापररात्रिकाले प्रत्यूपका- लेपशुपालकांश्च ॥ संक्रांतिरकस्यसमस्तलिंगा प्रभातसंध्या- समयनिहति ॥॥ दिशाकोमुख ॥ ॥ अशुक्रेमुखपूर्वे सौ- म्येभौमेचदक्षिणे ॥ शनौचंद्रेमुखपश्चादुरौचैवोत्तरामुखी ॥ वार और नक्षत्रोंके अनुसार जाननेकाकोष्ठक। दिशा रवि उग्र घोरा शद्रोंकोसुख पूर्वाह विप्रराजाओं. पूर्वको सोम | क्षिप्र ध्वांक्षी | वेश्योंकोसु० मध्यान्ह वैश्योको पश्चिमको भीम चर महोदरी चोरोंकोसु० अपराण्ह शद्रोंको दक्षिणको बुध मैत्र मंदाकि राजाओंकोस. प्रदीप पिशाचोंको दक्षिणको ध्रुव नंदा द्विजगणको भर्द्धरात्रि राक्षसोंको | उत्तरको शुक्र मिश्र मिश्रा पशुको अपररात्रि नटादिकको | पूर्वको शनि दारुण राक्षसी चाडालोंको०) प्रत्यूषका• पशुपालकोंको पश्चिमको वार नक्षत्र नाम फल काल गुरु भाषाटीकासमेत। (१३) करणअनुसारसंक्रांति। ॥ स्थितिः॥।॥ चतुष्पदेतैतिलनागयोश्च सुप्तोरविःसंक्रमणक- रोति ॥ विद्यादवाख्येचगराह्वयेच सबालवाख्यस्थितएववि- टौ ।। ।। फलम् ॥ ॥ किंस्तुघ्ननानिशकुनेवणिकौलवाख्ये चो- स्थितस्यखलुसंक्रमणरवेस्स्यात् ॥ धान्याप्रविष्टिपुभवेत्क्र- मशस्त्वनिष्टो मध्येष्टतेतिमुनयःप्रवदंतिपूर्वे ॥ वाहनम् ॥ ॥ सिं- होव्याघ्रोवराहश्चगर्दभःकुंजरस्तथा ॥ महिपीघोटकःश्वाचच्छा- गोवृपभकुक्कुटो ॥ गजोवानीवृपोमेप खरोट्रोकेसरीकमात् ॥ शार्दूलमहिषीव्याघवानराश्चववादितः॥ ॥ फलम् ॥ ॥ गजेल- क्ष्मीपेस्थैर्य घोटकेवाहनेतथा ॥ सिंहेव्याभयंप्रोक्तंसुभिक्षंग- दभेशुनौ ॥ वराहे महतीपीडाजायतेमेपवाहने । महिष्यांच भवेत्केशः कुक्कुटेमृत्युरेवच ॥ श्वेतपीतहरितंचपांडुरंरक्तश्याम मसितंबहुवर्णम् ॥ कंबलोविवसनंघनवर्णान्यंशुकानिचववादितः क्रमात् ॥ ॥आयुधम् ॥ भुशुंडीचगदाखगदंडकोदंडतोम- रान् ॥ कुंतपाशांकुशास्त्रंच वाणश्चैवायुधंयवात् ॥ ॥ भोज- नपात्रम् ॥ ॥ सौवर्णराजतंतानं कांस्यंलोहंचखपरम् ॥पत्रंव- स्रंकरोभूमिः काष्ठपात्रंववादितः॥ ॥ भक्ष्यपदार्थ ॥ ॥अ- वचपायसंभक्ष्यं पक्वानंचपयोदधि ॥ चित्रानगुडमध्वाज्यशर्क- रातुववादितः॥ ॥ गन्धम् ॥ ॥ कस्तूरीकुंकुर्मचैव चंदनमृत्ति- कातथा ॥ गोरोचनमलतंच हरिद्राचतांजनम् ॥ सिंदूरमगुरु- श्चैव कर्पूरश्चववादितः॥ ॥ जाति ॥ ॥ देवभूताहिविगप- शवोमृगएवच ॥ ब्रह्मक्षत्रियविछूद्रमिश्रजातिवादितः॥ पुष्पम् ॥ ॥ पुन्नागजातीबकुलाश्चकेतकी विल्वस्तथाकः कम लंचदूर्वा ॥ मल्लीतथापाटलिकाजपाचववादिपुष्पाणिचयो- जयेत्तु ॥ ॥ भूषणम् ॥ ॥ नूपुरकंकणंमुक्ता विद्रुममुकुटमणि म् ॥ गुंजावराटकंनीलंगरुत्मरुक्मकंचवात् ।। ।। कंचुकी॥ ॥

उपवा गज फल भय वस्त्र (४४) ज्योतिपसार। विचित्रपर्णाशुकभूर्जपत्रिका सीतातथापाटलनीलवर्णा ॥ कृष्णा- जिनंचर्मचवल्कपांडुरा बवादितश्चैवतुकंचुकीस्यात् ॥ वय ॥ शिशुःकुमारीचगतालकायुवा प्रौढाप्रगल्भाथततश्चवृद्धा ॥ वंध्यातिवंध्याचसुतार्थिनीच प्रवाजिकाचैवफलंशुभंववात् ॥ |करण | वत्र | बालव कोलवा तैतिल गर गणिज विष्टि |शनि चतुष्प नाग | किस्तु स्थिति | यसली बसली खडी निजली पसली खडी बसली निजली खडी निजली सटी ५ल मध्यमामध्यम महर्ष समर्घ मध्य महर्घ महर्घ महर्घ समर्घ| समघ महर्घ वाहन सिह व्याघ्र वराह गर्दभ हस्ती महिपी घोटक कुत्ता मेंढा | बेल इछुट अश्व बैल मेंढा गर्दभ | ऊट | सिह शार्दू महिप व्याघ्र वानर भय पीडा सुभिक्षा रक्ष्मी क्लेश स्थैर्य सुभिक्ष केश | स्थैर्य मृत्यु वस्त्र श्वेत । पीत हरित पांडुर रक्त श्याम | काला | चित्र | कवल नग्न धनवर्ण भायुधांभुशुडी गदा खड्गा दड | धनुप तोमर कुत पाश अकुश तरपार बाण पात्र सुवर्ण रूपा ताम्र | कास्य लोह तीर पत्र कर भूमि काष्ठ | भक्ष्य भन्न पायस भक्ष्य पक्वान्न पर्योदधि चित्रा गुड | मधु / घृत शर्करा लेपन कस्तूरी कुकुम चदन माटी गोरोच अलक्त दल्द सुरमा सिंदूर अगर कर्पूर वर्ण देव । भूत | सर्प पशु मृग विप्र | क्षत्री वैश्य शूद्र | मिश्र अत्यज पुष्प पुन्नाग जातो बकुल केतकी बेल । अर्क कमल| दूर्वा मल्ली पाटल जपा भूषण नूपुर कण मोती मूगा मुकुट मणि गुना क्रोडी नीलक पुत्रा सुवर्ण कचु विचित्र पर्ण हरित भूर्जपत्र सींत पाढरी नील कृष्ण अजन वल्कल पांडुर षय बाल कुमारी गताल युवा प्रोढी प्रगल्भा वृद्धा वध्या अतिव पुत्रव० सन्या फलश्रुति। वाहनादिबुधै यमथोत्क्रांतिविशेषतः। वाहनादिकवस्तूनांसंक्रमातुविनाशता ॥ टीका-संक्रांति जिस वाहनपर स्थित होय और जो वस्तु धारण करे उन सबका नाश होय ॥ २३ ॥ मुहूर्त । संक्रांतिकितनेमुहूर्त्तहोतीहै उसकेनक्षत्रऔरफल । संक्रांतीमुहूर्तभेदा हरपवनयमे वारुणेसाप्रौद्रे एपापंचेंदुसंज्ञा भाषाटोकासमेत। (४५) गुरुकरपितृभे चानिदरेचसोम्ये ॥ त्वाष्ट्रमैत्रेचमूले श्रुतिवसु- वपुषा त्रीणिपूर्वाखरामे ब्राह्मेदित्येद्विदेवे भवतिशरकृतादु- त्तरात्रीणिऋक्षम् ॥ बाणवेदैःसमर्घ स्यान्मध्यस्थं व्योमराम- योः॥ मूर्तीपंचदशेयाते दुर्भिक्षं च प्रजायते ॥ टीका-आर्दा स्वाती भरणी शतभिषाआश्लेपाज्येष्ठा इनमें जो संका- ति अर्के वह १५ मुहूर्त होती है और दुर्भिक्ष करनेवाली और पुण्य हस्त मघा कृत्तिका अश्विनी मृगशिर चित्रा अनुराधा मूल श्रवण धनिष्ठा रेवती तीनों पूर्वा इन नक्षत्रोंकी संक्रांति ३० मुहूर्त होती है यह साधारण फलदायक है और रोहिणी पुनर्वस विशाखा तीनों उत्तरा इनमें संक्रांति अर्के तो ४५ मुहूर्च होती है यह स्वस्थताका कारण है ।। दूसराप्रकार। पूर्वसंक्रांतिनक्षत्रात्परसंक्रांतिऋशकम् ॥ द्वित्रिसंख्यासमर्पस्याचतुःपंचमहर्षता ॥ टीका-गतमासदिन 'संक्रांति नक्षत्र और प्राप्त संक्रांति दिन नक्षत्र इनका अंतर २ अथवा तीन होयतो सस्ता और ४ वा ५ का नक्षत्रोंमें अंतर आवे तो महर्ष अर्थात् महँगा जानिये ॥ धान्यविचार। संक्रांतिनाड्यातिथिवारऋक्षधान्याक्षरंवहिहरेत्तुभागम् ॥ संक्रांतिनाडीनवमिश्रिताच सप्ताहतापावकभाजिताच ॥ एकेसमद्वितयेचसौम्यं शून्येसमर्घमुनयोवदंति ॥ टीका-संक्रांतिकी घडी और गत तिथि वार नक्षत्र ओर धान्यके नामाक्षर एकत्र करके तीनका भाग दे वह एक मत और दूसरे मतके आज्ञानुसार संक्रांतिकी घडियोंमें ९ मिलाके ७ से गुणकर ३ का भाग देशेपका फल विचारे १ शेप रहे तो धान्यकी स्वस्थता और दो बचें तो साधारणता और निःशेष हो तो महर्षता जानिये ॥

ज्योतिपसार। नक्षत्र अनुसार संक्रांतिपीडा। संक्रांत्यधरनक्षत्राद्गणयेजन्मभावधि ॥ त्रिकंपदं त्रिकंपटुंत्रिकं पदंपुनः पुनः॥ पंथाभोगोव्यथावस्त्रं हानिश्च विपुलं धनम् ॥ टीका-संक्रांतिके अधर नक्षत्रसे अपने नक्षत्रतक गिने और इसरी- तिमें उसका विचार करे प्रथम ३ पंथा चलावे फिर ६ भोग फिर ३ दुःख ६ वस्त्र फिर ३ हानि और ६ धनप्राप्ति कहते हैं । जन्मनक्षत्रोंका फल। यस्यजन्मक्षमासाद्यतिथो संक्रमणं भवेत् ॥ तन्मासाभ्यंतरेतस्यवैरं क्लेश धनक्षयः॥ टीका-जाके जन्म नक्षत्र विपे संक्रांति अर्क उसका किसीसे वैर होय और जिसके जन्ममासमें संक्रांतिका संभव हो उसे क्लेश और जिसके जन्मतिथिमें संक्रांति पडे उसका धनक्षय होता है । संक्रांतिकास्वरूप। पटियोजनविस्तीर्णासंक्रांतिः पुरुपाकृतिः ॥ एकवकानव भुजालंबोष्टीदीर्घनासिका ॥ पृष्ठेलोकाभ्रमत्येव गृहीत्वाखर्प- रंकरे ॥ एवंसंक्रमणे यस्याः फलं प्रोक्तं मनीषिभिः ॥ टीका-शरीर साठ योजन लम्बा और चौडी, पुरुषाकति एक मुँह९ जा ओठ और नासिकालंबे और खपर हाथ में लिये पीछेसे लोक भ्रमण करतेहैं। चंद्रसे संक्रांतिकावर्ण और फल। मेपालिकच तथैवरक्तचापेच मीनेच तुलेचपीतम् ॥ श्वेतं वृपेस्त्रीमिथुनेच चंद्रे कृष्णंचनक्रेथघंटेचं सिंहम् ॥ रक्तेफलं भवेदुःखश्वेतचैवसुखंशुभम् ॥ पीतेश्रीस्तुतथाप्रोक्ताश्यामेमृ- त्युन संशयः॥ टीका-मेप वृश्चिक कर्क इन राशियों के चंद्रमामें जो संक्रांतिका प्रवेश होय तो उसका रक्तवर्ण जानिये वह दुःखदायक है और धनु मीन तुलाके

भाषाटीकासमेत।
(४७)
चंद्रमाकी संक्रांतिका पीतवर्ण ये लक्ष्मीकी प्राप्ति करती है और वृष कन्या
मिथुनकी संक्रांतिका श्वेतवर्ण मुख और शुभप्राप्ति करानेवाली है; मकर
कुंभ और सिंहके चंद्रमाकी संक्रांति कृष्णवर्ण है यह मृत्युदायी है ।।
राशिअनुसार चंद्रमा।
यादृशेनहिमरश्मिमालिना संक्रमोभवतितिग्मरोचिपा ॥
तादृशंफलमवाप्नुयानरः साध्वसाध्वपिवशेनशीतगोः ॥
टोका-जैसे चंद्रमा नष्टस्थानी व उत्तमस्थानी होकर शुभाशुन
फलको देता है उसी भाँति नष्ट अथवा उत्तम चंद्रमाकी अर्की हुई संक्रांति
चन्द्रमाके अनुसार फलदायक होती है ।
पुण्यकाल।
पूर्वतोपिहिरवेश्च संक्रमात्पुण्यकालपटिकास्तु पोडश ॥
अर्धरात्रिसमयादनंतरंसंक्रमेपरदिनहि पुण्यदम् ॥
टोका-सोलह घटिका पुण्यकाल होताहै जो संक्रांति दिनमें पडे पृथ
रात्रि ताई तो पुण्यकाल उसी दिवस जानना चाहिये और जो वृद्धि
रात्रिके पीछे पडे तो दूसरे दिवस पुण्यकाल होगा ।
ग्रहणप्रकार।
चंद्रग्रहणकी प्रवृत्ति।
भानो:पंचदशेऋक्षेचंद्रमायदितिष्ठति ॥
पौर्णमास्यानिशामेपेचंद्रग्रहणमादिशेत् ॥
टीका-सूर्यसे पंद्रहवे नक्षत्रमें जो चंद्रमा स्थित होय तो पूर्णमासीके
निशा शेष अर्थात् प्रतिपदाकी संधिमें चंद्रग्रहण होता है ।
सूर्यग्रहण ।
मघोनंग्रस्तनक्षत्रात्पोडशं यदिसूर्यभम् ।।
अमावास्यादिवाशेपेसूर्यग्रहणमादिशेत् ॥
टीका-संपूर्ण महीनोंकी अमावास्याके दिन सूर्य और चंद्रमा एक

(४८) ज्योतिषसार । राशिके होते हैं परंतु अमावास्याके दिन सूर्यनक्षत्र और दिवसनक्षत्र एक होय तो अमावास्या और प्रतिपदाकी संधिमें सूर्यग्रहण होता है; उस दिन सूर्यनक्षत्रसे चंद्रनक्षत्र देखिये उसमें से ११ दिन काटि शेष १६ वें सूर्य नक्षत्र होय तो वही सूर्यग्रहण होता है ॥ २॥ राशि अनुसार शुभाशुभ ग्रहणफल । त्रिषड्दशायोपगतं नराणां शुभप्रदंस्थाहणंरवीन्द्वोः ॥ द्विसप्तनंदेषु च मध्यमस्याच्छेपेष्वनिष्टंमुनयोवदंति ॥ टीका-सूर्य अथवा चंद्रग्रहण अपनी राशिसे जिस राशिपर होय उसका शुभाशुभ फल विचारिये, तीसरी छठी दशवीं राशि पर होय तो शुभ जानिये और दूसरा सातवाँ नवमां ये मध्यम और पहिला चौथा पाँचवाँ आठवाँ ग्यारहवाँ बारहवाँ ये नेष्ट हैं । दूसरा पक्ष। ग्रासत्तृतोयोष्टमगश्चतुर्थस्तथायसंस्थः शुभगःस्वराशेः ॥ ग्रासादविः पंचनवर्तुमध्यस्ततोधमोक्ताश्चबुधैश्चशेपाः॥ टीका-जिस राशिपर सूर्यग्रहण होय उससे अपनी राशितक गिनें तो ३८१४।११ ये उत्तम और ५।८ाये मध्यम और १।२।७।१०।१२ ये राशि अधम जैसी राशि होय तैसाही फल होता है । ऋतुप्रकरण शुभाशुभ फल । तिथिरेकगुणाप्रोक्ता नक्षत्रं च चतुर्गुणम्।।वार षष्टगुणोज्ञेयो मा सश्चाष्टगुणःस्मृतःगवस्त्रं शतगुणं विद्यादर्शनं च ततोधिकम् ॥ टीका-तिथि एकगुणी नक्षत्र ४ गुणा वार ६ गुणा मास ८ गुणा और वस्त्र १०० गुणा जो अधिक ज्ञान होय तिसका गुण सबसे अधिक परंतु अच्छा दिवस होय तो अच्छा गुण और दुष्ट होय तो बरा जानिये ॥ मासफल। आर्तवेप्रथमेचैत्रेवैधव्यंजायते ध्रुवम् ॥ वैशाखे धनवृद्धिः भापाटीकासमेत। (४९) स्याज्येप्टेरोगान्विता भवेत् ।। आपाटेमृतवत्साच श्रावणेध- नसंयुता ॥ भाद्रे च दुर्भगानारी आश्विनेधनधान्यभाक् ॥का- तिकेनिर्द्धनानारी मार्गशीबहुप्रजा ॥ पोपेचपुंश्चली नारी माघेपुत्रवती भवेत् ॥ फाल्गुनपुत्रसंपन्नाज्ञेयंमासफलंबुधैः ॥ टीका-चैत्रमासमें प्रथम ऋतुदर्शन होयतो विधवा होय, वैशाखमें धन- वृद्धि रोगयुक्त, आपाढमें मृत्यु, श्रावणमें लक्ष्मी, भाद्रपदमें दरिद्र, आश्विनमें धनधान्य, कार्तिकुमें निर्धन, मार्गशीर्पमें बहुप्रजा, पोपमें व्यभिचारिणी, माधमें पुत्रवती और फाल्गुनमें भी ऋतुदर्शन होनेसे पुत्रसंपन्न जानिये ॥ तिथिफलम् । शुचिनारीप्रतिपदि द्वितीयायांतुदु:खिनी ॥ तृतीयायांपुत्रव- तीचतुर्थ्यांविधवा भवेत् ॥पंचम्यांचैवसौभाग्यं पष्ठयांकार्य- विनाशिनी ॥ सप्तम्यांसुप्रजानारीचाटम्यां राक्षसीतथा. ॥ नवम्यां विधवानारी दशम्यांसौख्यभोमिनी ॥ एकादश्यांशु- चिर्नारी द्वादश्यांमरणंध्रुवम् ॥ त्रयोदश्यांशुभाप्रोक्ताचतुर्द- श्योपरान्विता ॥ पौर्णमास्याममावास्यां शुभंचाशुभमेवच ।। टीका-प्रतिपदामें ऋतुदर्शन होय तो शुचि, द्वितीयामें दुःखिनी, तृती- यामें पुत्रवती, चतुर्थीम विधवा, पंचमीमें सौभाग्यवती, पष्ठीमें कार्यनाशिनी सममीम उत्तम संतति, अष्टमीमें राक्षसी, नवमीम विधवा, दशमीमें सौरूप- भोगिनी, एकादशीमें शुचि, द्वादशीमें मरण, त्रयोदशीमें शुम, चतुर्दशीमें व्यभिचारिणी, पूर्णिमा शुभ, अमावास्या अशुज जानिये ॥ ग्रहण और संक्रांतिका फल। संक्रांत्यांग्रहणेचैववैरिणीच गतालका॥ टीका-संक्रांतिमें प्रथम ऋतुदर्शन होय तो वैरिणी और ग्रहणमें होय तो विधवा जानिये ॥ वारफल। आदित्येविधवानारीसोमेचैवमृतप्रजा ॥ मंगलेात्मया- " .

(१८) ज्योतिपसार। राशिके होते हैं परंतु अमावास्याके दिन सूर्यनक्षत्र और दिवसनक्षत्र एक होय तो अमावास्या और प्रतिपदाकी संधिमें सूर्यग्रहण होता है; उस दिन सूर्यनक्षत्रसे चंद्रनक्षत्र देखिये उसमें से ११ दिन काटि शेप १६ वें सूर्य नक्षत्र होय तो वही सूर्यग्रहण होता है ॥ २ ॥ राशि अनुसार शुभाशुभ ग्रहणफल । त्रिपदशायोपगतं नराणां शुभप्रदंस्याग्रहणरवीन्द्वोः॥ द्विसप्तनंदेषु च मध्यमस्याच्छेपेष्वनिष्टंमुनयोवदंति ॥ टीका-सूर्य अथवा चंद्रग्रहण अपनी राशिसे जिस राशिपर होय उसका शुभाशुभ फल विचारिये, तीसरी छठी दशवीं राशि पर होय तौ शुभ जानिये और दूसरा सातवाँ नवमां ये मध्यम और पहिला चौथा पाँचवाँ आठवाँ ग्यारहवाँ बारहवाँ ये नेष्ट हैं ॥ दूसरा पक्ष। ग्रासत्तृतोयोटमगश्चतुर्थस्तथायसंस्थः शुभगःस्वराशेः ।। ग्रासाद्रविः पंचनवर्तुमध्यस्ततोधमोक्ताश्चबुधैश्चशेपाः॥ टीका-जिस राशिपर सूर्यग्रहण होय उससे अपनी राशितक गिनें तो ३।८।४।११ ये उनम और ५।८६ये मध्यम और १।२।७।१०।१२ ये राशि अधम जैसी राशि होय तैसाही फल होता है । ऋतुप्रकरण शुभाशुभ फल । तिथिरेकगुणाप्रोक्ता नक्षत्रं च चतुर्गुणम्।।वारःषष्ठगुणोज्ञेयो मा सश्चाष्टगुणःस्मृतःवस्त्रं शतगुणं विद्यादर्शनं च ततोधिकम् ॥ टीका-तिथि एकगुणी नक्षत्र ४ गुणा वार ६ गुणा मास ८ गुणा और वस्त्र १०० गुणा जो अधिक ज्ञान होय तिसका गुण सबसे अधिक परंतु अच्छा दिवस होय तो अच्छा गुण और दुष्ट होय तो बुरा जानिये ॥ मासफल। - आर्तवेप्रथमेचैत्रैवैधव्यंजायते ध्रुवम् ।। वैशाखे धनवृद्धिः भापाटीकासमेत। (४९) स्याज्ज्येष्ठेरोगान्विता भवेत् ॥ आपाठेमृतवत्साच श्रावणेध- नसंयुता ॥ भाद्रेच दुर्भगानारी आश्विनेधनधान्यभाक् ॥का- तिकेनिर्द्धनानारी मार्गशीबहुप्रजा ॥ पौपेचपुंश्चली नारी माघेपुत्रवती भवेत् ॥ फाल्गुनपुत्रसंपन्नाज्ञेयंमासफलंबुधैः ।। टीका-चैत्रमासमें प्रथम ऋतुदर्शन होयतो विधवा होय, वैशाख में धन- वृद्धि रोगयुक्त, आपाढमें मृत्यु, श्रावणमें लक्ष्मी, भाद्रपदमें दरिद्र, आश्विनमें धनधान्य, कार्तिकमें निर्धन, मार्गशीर्पमें बहुप्रजा, पोपमें व्यभिचारिणी, माघमें पुत्रवती और फाल्गुनमें भी ऋतुदर्शन होनेसे पुत्रसंपन्न जानिये ॥ तिथिफलम् । शुचिर्नारीप्रतिपदि द्वितीयायांतुदुःखिनी ॥ तृतीयायांपुत्रव- तीचतुझंविधवा भवेत् ॥पंचम्यांचैवसौभाग्यं पष्ठयांकार्य- विनाशिनी ॥ सप्तम्यांसुप्रजानारीचाष्टम्यां राक्षसीतथा ॥ नवम्यां विधवानारी दशम्यांसौख्यभोमिनी ॥ एकादश्यांशु- चिर्नारी द्वादश्यांमरणंध्रुवम् ॥ त्रयोदश्यांशुभाप्रोक्ताचतुर्द- श्योपरान्विता ॥ पौर्णमास्याममावास्यां शुभंचाशुभमेवच ॥ टीका-प्रतिपदामें ऋतुदर्शन होय तो शुचि, द्वितीयामें दुःखिनी, तृती- याम पुत्रवती, चतुर्थीमें विधवा, पंचमीमें सौभाग्यवती, पष्टीमें कार्यनाशिनी सममीमें उत्तम संतति, अष्टमीमें राक्षसी, नवमीमें विधवा, दशमीमें सौख्य- भोगिनी, एकादशीमें शुचि, द्वादशीमें मरण, त्रयोदशीमें शुन, चतुर्दशीमें व्यभिचारिणी, पूर्णिमामें शुभ, अमावास्या अशुभ जानिये ॥ ग्रहण और संक्रांतिका फल। संक्रांत्यांग्रहणेचैववैरिणी च गतालका ॥ टीका-संक्रांतिमें प्रथम ऋतुदर्शन होय तो वैरिणी और ग्रहणमें होय तो विधवा जानिये ॥. वारफल। आदित्येविधवानारीसोमेचैवमृतप्रजा ॥ मंगलेआत्मघा- , (५०) ज्योतिपसार। तीस्यादुधेकन्याप्रसूःस्मृता ॥ गुरुवारेसुतप्राप्तिःकन्या- पुत्रयुताभृगौ ॥ मदे च पुंश्चलीनारीज्ञेयंवारफलंशुभम् ॥ टीका-रविवारको ऋतुदर्शन होय, तो विधवा होय, सोमवारको मृतप्र- जा, भौमवारको आत्मघातिनी, बुधवारको कन्यासंतति होय, गुरुवारको पुत्रप्रसूति, भृगुवारको कन्या और पुत्रप्रसूति और शनिवारको होय तो स्त्री व्यभिचारिणी होय ॥ नक्षत्रफल। अश्विन्यांसुभगानारीभरण्यांविधवाभवेत् ॥ कृत्तिकायां च वंध्यास्याद्रोहिण्यांचारुभापिणी ॥ मृगेदारिद्रययुक्तोक्ताचा- यांक्रोधकारिणी ॥ पुनर्वसौपुत्रवतीपुष्येपुत्रधनेश्वरी ॥ आश्लेपायांभवेद्वंध्यामपायांचार्थसंयुता। पूर्वायांचार्थयुक्ताहि चोत्तरायांसतीतथा हस्तेपुत्रधनैर्युक्ताचित्रायामनुचारिणी॥ स्वात्यान्यगर्भावयवाविशाखायांतुनिष्ठुरा ॥मैत्रेचदुर्भगाना- रीज्येष्ठायांविधवाभवेत् ॥ मूलेपतिव्रतासाध्वीपूर्वासौभाग्य- भोगिनी ॥ उत्तरार्थवतीप्रोक्ताश्रवेसौभाग्यसंपदः॥ धनिष्ठा- यांशुभानारीशतेभद्रान्विताबुधैः ॥ पुभेचोक्ताकामिनीतु उभे लक्ष्मीयुता शुभा ॥रेवत्यांपतिरिक्तातुज्ञेयं भानांफलंबुधैः॥ • टीका-अश्विनीनक्षत्रमें जो स्त्रीके प्रथम ऋतुस्नात होय तो शुन और भरणीमें विधवा और कृत्तिकामें बंध्या, रोहिणीमें प्रियनापिणी, मृगशिरमें दरिदिणी,आर्द्रामें क्रोधिनी, पुनर्वसुमें पुत्रवती, 'पुष्यमें पुत्र और धनवती, आश्लेगा बाँझ, मघामें धनवती, पूर्वा में अर्थवती, उत्तरामें पतिव्रता, हस्तमें पुत्रवती धनवती, चित्रामें दासी, स्वातीमें अन्यगर्भवती, विशाखामें निष्ठुर, अनुराधामें दुर्भागिनी, ज्येष्ठामें विधवा, मूलमें पतिव्रता, पूर्वा- पाढामें सौभाग्यवती, धनिष्ठामें शुभ, शतभिपामें शुत, पूर्वाभाद्रपदामें उचम- भोगवती, उत्तराभाद्रपदामें लक्ष्मीवती, रेवतीमें पतिरहित जानिये ॥

भाषाटीकासमेत। (६१) योगफल। आद्यौविधवानारी विष्कंभेचरजस्वला ॥ स्नेहाप्रीत्यांतुदंप- त्योरायुष्मांस्तुधनप्रदः ।सौभाग्येपुत्रयुक्ता तु शोभनेमंगला- न्विता ॥ अतिगंडेतुविधवासुकर्मणितुशोभना ॥ धृतौसं- पत्तियुक्ताच शूलेरोगयुताभवेत् ॥ गंडेदुःखान्वितानारी वृद्धौपुत्रान्विताभवेत् ॥ध्रुवेतुशोभनानारीव्याघातेभर्तृवात- की ॥ हर्पणेहर्पयुक्तातुवजेचैवानपत्यता ॥ सिद्धौपुत्रान्वि- तानारी व्यतीपाते विभर्तृका ॥ मृतवत्साचवर्याने परिपेचा- ल्पजीविनी॥ शिवेपुत्रवतीनारी मिद्धेशीघ्रफलान्विता।।साध्ये धर्मपरानारी शुभेशुभगुणान्विता ॥ शुक्लेशुभकरानारीब्रह्म- णिस्वपतौरता ॥ ऐद्रेदेवररक्ता च वैधव्यवैधृतौस्मृतम् ।। टीका-विष्का योगमें जो मथम ऋतुदर्शन होय तौ स्त्री विधवा होय. और प्रीतियोगमें पतिसे स्नेह, आयुष्मान में धनप्राप्ति, सौभाग्यमें पुत्रवती, शोजनमें मंगलदायक, अतिगंडमें विधवा, सुकर्मामें शुन, वृतिमें संपत्तियु- क्त, शूलमें रोगिणी, गंडमें दुःखान्विता, वृद्धिमें पुत्रयुक्ता, ध्रुवमें शुभ, व्या- घातमें पतिघातिनी. हर्पणमें हर्पयुक्ता, वजमें बंध्या, सिद्धियोगमें पुत्र- युक्ता, व्यतीपातमें पतिरहिता, वर्यानमें मृतपुत्रा, परिघमें अल्पजीविनी, शिवमें पुत्रवती, सिद्धिमें शीघफलयुक्ता, साध्ययोगमें अधर्मपरा, शुभयो- गमें शुनगुणयुक्ता, शुक्लयोगमें शुभकर्मपरा, ब्रझयोगमें निजपतिरता, ऐंद्रमें देवररता, वैधतियोगमें विधवा होय ॥ करणफलम्। बवेप्रोक्तातुवंध्यास्त्रीवालवेपुत्रसंपदः ॥ कौलवेप्सुंश्चलीना तैतिले चारुभापिणी गरे च गुणसंपन्नावणिजेपुत्रिणीस्मृता । विश्यां चमृतवत्साच शकुनौकामपीडिता ॥ चतुष्पदे शुभानारीनागे पुत्रवतीभवेत् ॥ किंस्तुनेव्यभिचारीतुकरणानांशुभंफलम् ॥

(५२) ज्योतिषसार। टीका-यव करणमें जो स्त्री प्रथम पुष्पवती होय, तो वह वंध्या होय, बा- लवमें पुत्रकी प्राप्ति, कौलचमें वेश्या, तैतिलमें प्रियनापिणी, गरमें गुणसंपन्ना, वणिजमें पुत्रिणी, विष्टिमें मृतवत्सा, अर्थात् उसके बालक मर जांय शकुनि में कामातुरा, चतुष्पदमें शुभ, नागमें पुत्रवती,किंस्तुग्नमें व्यभिचारिणी जानिये ॥ राशिफलम् । व्यभिचारिणीतुमेपेवृपभेसुखभोगिनी ॥ मिथुनेधनयुक्तोक्ताकर्क टेदुःखिताबुधैः॥ सिंहेपुत्रवतीनारी कन्यायांमानिनीशुभा ॥ तु- लेविचक्षणानारी वृश्चिकेव्यभिचारिणी ॥ धनेपतिव्रताञयामां- सहीनाचनकके ॥ कुंभेधनवतीज्ञेयामीने च चपलाबुधैः॥ टीका-मेपराशिमें जो ऋतुवती होय तौ व्यभिचारिणी, वृषमें सुख- भोगिनी, पिथनमें धनयुक्ता, कर्कमें दुःखी, सिंहमें पुत्रवती, कन्यामें अभि- मानी, तुलामें चतुरा, वृश्चिकमें जारिणी, धनमें पतिव्रता, मकरमें कृ- शा, कुंभमें धनवती, मानमें चपला ऐसे जानिये ॥ होराफल। सूर्ये च व्याधिसंयुक्ता चंद्रेहोरे पतिव्रता ।। कुजेहोरेतुदो - ग्यंबुधेहोरेतुपुत्रिणी ॥ जीवेसर्वसमृद्धिःस्यामृगौसौभाग्यमे- वच ॥ शनौसर्वविनाशायहोरकस्यफलंबुधैः॥ होरा होरा रविकाहोरा. योगिनी गुरुकाहोरा सर्वसिद्धि सोमका होरा पतिव्रता शुक्रकाहोरा सौभाग्य सौमकाहोरा दुर्भगा शनिकाहोरा सर्वविनाशिनी बधकाहोरा पुत्रिणी लग्नफलम्। मेषलग्नेदरिद्राचवृषभेधनसंयुता ।। कामिनीमिथुनेलनेकर्कटेपति- नाशिका ॥ सिंहपुत्रप्रसूताचपतियुक्तास्त्रिलग्नके ॥ तुलेचैवांध- फल भाषाटीकासमेत। तादायीवृश्चिकेदद्रुदुःखिनी ॥धनलमधनैश्वर्यमकरेकर्कशाभ- वेत् ॥ कुंभेवंशद्वयनीच मानेसर्वगुणान्विता ॥ टीका-प्रथम संक्रांति चलती होय सोई प्रथम लग्न जानिये और मेष लग्नमें ऋतुवती होय तौ दरिद्रिणी २ धनयुक्ता ३ कामिनी ४ पतिनाशि- नी ५ पुत्रप्रसूता ६ पतिव्रता ७ अंधतादायक ८ दुःखिता ९ धनैश्वर्य- बती १० कर्कशा ११ उभयवंशनाशिनी १२ मुणयुक्ता ॥ ग्रहोंके फल । लग्नेराहुश्चसौरिश्चरविचंद्रौतथैवतु ॥ तदासाविधवानारी सर्वसौभाग्यवर्जिता ॥ टीका-जिस लग्नमें प्रथम स्त्री रजस्वला होय उसमें राहु शनि रवि चंद्र ये चारि ग्रह स्थित होंय वह स्त्री विधवा होय ॥ रक्तफल। शोणितापिंदुमात्रेण स्वैरिणीचाल्पशोणिता॥ रक्तर- भवेत्पुत्र कृष्णेचैवमृतप्रजा ॥ पिच्छिले च भवेद्वं- ध्याकाकवंध्याचपांडुरे ॥ पीतेदुश्चारिणीज्ञेयासुभगा गुंजसादृशे ॥ सिंदूरवर्णेरक्तेतुकन्यासंतदिवा ॥ टीका-प्रथम ऋतुदर्शनके समय रक्त बिंदुमात्र और अल्पवर्ण होय बिमका फल यह है कि, सी व्यभिचारिणी होय और रक्तवर्ण रूधिर होर तौ पुत्रवती, काला होय तो मृवप्रजा, पिच्छिल अर्थात् गाढा होय तो बांझ, पांडुर वर्णसे वक्ष्या, पीत वर्णसे दुराचारिणी, गुंजा सदृशसे सुभागिनी, सिंदूर वर्णसे कन्याप्रसूता, इस प्रकार फल जानिये ॥ काल फल। पूर्वाह्नसुभगाप्रोक्ता मध्याह्वेचैवनिर्धना ॥ अपराहेशुभाचेव सायाह्वेसर्वभोगिनी ।। संध्ययोरुभयोर्वेश्या निशीथेविधवाभ- वेत् ॥ पूर्वरानेतथावंध्या दुर्भगासर्वसधिषु ॥

(६४) ज्योतिपसार। टीफा-जो स्त्रीके प्रथम ऋतुदर्शन प्रातःकाल होय तो सुभगा जानिये, मध्याह्नमें निर्धना, तीसरे पहर होय तौ शुन, संध्याको होय तौ सर्वभोगिनी, और दोनों संधिमें होय तो वेश्या, आधी रातिमें होय तो विधवा, पूर्व रात्रिमें होय तो वांझ, सब संधिमें दुर्भगा ये फल जानिये ॥ पहिरे हुए वस्त्रोंका फल । सुभगाश्वेतवस्त्राच रोगिणीरक्तवस्त्रका॥ नीलांबरधरानारीवि- धवापुष्पवंतिका|भोगिनीपीतवस्त्राच मिश्रवस्त्रावरप्रिया। मू क्ष्मास्यात्सूक्ष्मवस्त्राचदृढवस्त्रापतिव्रता ॥ दुर्भगाजीर्णवस्त्राच सुभगामध्यवाससाधिौतवस्त्राशुभानारी मलिनीमलिनाभवेत्॥ टीका-प्रथम ऋतुसमय पांडुर वस्त्र पहिरे होय तो शुभ, लाल वस्त्र पहिने स्त्री पुष्पवती होय तो रोगिणी, नीले वस्त्रसे विधवा, पीत बससे भोगिनी, मिश्रवर्णवस्त्रयुता पतिप्रिया, सूक्ष्मवस्त्रयुता कशा,मोटे वस्त्रयुत पतिव्रता,जीर्ण वस्त्र पहिरनेसे स्त्री दुर्भागिनी, मध्यम वस्त्रयुत सुभगा, धुले वस्त्रयता सुभगा, और मलिन वस्त्रपहिने स्त्री प्रथम ऋतुधर्मको प्रातहोय सो मलिन जानिये ॥ रजस्वलाधर्म। आर्तवाभिष्टुतानारी नैकवेश्मनिसंश्रयेत् ॥ नचान्यजातिसं- स्पर्श कुर्यात्पर्श नचक्कचित् ॥ त्रिरात्रस्वमुखनैव दर्शयेद्य- स्यकस्यचित् ।। स्ववाक्यंश्रावयन्नैव नकुर्यादंतधावनम् ॥ नकुर्यादातवेनारी ग्रहणामीक्षणंतथा ॥ अंजनाभ्यंजनंस्नान प्रवासंवर्जयेत्तथा ॥ नखादिकंतनंरज्जुतालपत्रादिबंधनम् ।। नवेशरावे जीत तोयंचांजलिनापिवेत् ॥ टीका-ऋतुमती स्त्रीको एक घरमें रखना,अन्य जातीसे स्पर्श न करना,अ- पनी जातिमें भीस्पर्श न करना,तीन रात्रि अपना मुख किसीकोन दिखावना, अपनी वाणी किसीको न सुनाना, दँतून नहीं करना, नक्षत्रोंका अवलोकन न करना,काजल-तैल-स्नान-रस्ता-चलना-डोराकी स्पर्श-तालपत्रका बंधन, इ- तने कर्म न करै, नवीन मृत्तिका के पात्रमें भोजन करै और अंजलीसे जल पीवै भापाटीकासमेत। (६५) गर्भाधानका मुहूर्त। ऋतौतुप्रथमेकार्य पुनक्षत्रेशुभदिने । मघामूलांत्यपक्षांतमुक्त्वाचंद्रवलेसति ॥ टीका-प्रथम ऋतुदर्शन समय पुरुप नक्षत्र औरशुभदिनमें मघा मूल रेवती अमावास्या पूर्णिमा इनको छोडकर बलवान् चंद्रमामें गर्भाधान करना योग्यहे गर्भाधाने त्याज्यमाह। गंडांतंत्रिविधंत्यजेनिधनजन्मक्षेचमूलांतकं दालंपोप्णमथोप- रागदिवसंपातंतथावैधृतिम् । पित्रो श्राद्धदिनदिवाचपरिचा- बस्वपन्नीगमे भानूपातहतानिमृत्युभवनजन्मतिःपापभ- म्॥ भद्रापष्टीपर्वरिक्ताच संध्याभौमार्काकीनाथराव्यश्चतस्त्रः। टीका-गंडांत-३मकारके अर्थात् तिथिगंडांत-लनगंडांत-नक्षत्रगंडांत-न धतारा-जन्मतारा-मूल-भरणी-अश्विनी-रेवती-ग्रहणदिन-व्यतीपात- वैधृति-श्राद्धदिन-परिघाई-उत्पातनक्षत्र-पापयुक्तनक्षत्र-जन्मलमसे अष्ट- मलन-भद्रा-पष्ठीतिथि-पर्वतिथि अर्थात् चतुर्दशी-अष्टमी-अमावास्या- पूर्णिमा-संक्रांति-रिक्तातिथि अर्थात् चतुर्थी-नवमी-चतुर्दशी संध्याकाल, भौम,रवि-शनि-ये वार और प्रथम रात्रिसे चाररात्रि ये गर्भाधान त्याज्यहैं। ऋतुकीपोडशरात्रियोंकाशुभाशुभनिर्णय। ऋतुःस्वाभाविकःस्त्रीणां रात्रयःपोडशस्मृताः ॥ तासामा- बाश्चतस्रस्तुनिंदितैकादशीचया ॥ त्रयोदशीचशेषाःस्युःप्रश- स्तादशवासराः तस्माधिरावंचांडाली पुष्पितापरिवर्जयेत् ॥ टीका-स्त्रियोंके ऋतुधर्मसंबंधी स्वाभाविक १६ रात्रि होतीहैं, उनमेंसे प्रथम तीन रात्रि में पुष्पवती चांडाली होती है और चौथी ग्यारवी तेर- इवी ये निंदित अर्थात् वर्जनीय और शेष दशरात्रि प्रशस्त हैं । रात्रीचतुर्थ्यांपुत्रास्यादल्यायुर्धनवर्जितः।। पंचम्यांपुत्रिणीना- रीषष्ठयांपुत्रस्तुमध्यमः ॥ सप्तम्यामप्रजा योपिदष्टम्यामी- (५६) ज्योतिपसार। श्वरम्पुमान् ॥ नवम्यांसुभमामारी दशम्यांप्रवरःसुतः ॥ एका- दश्यामधास्त्री द्वादश्यांपुरुपोत्तमः ॥ त्रयोदश्यांसुतापा- पावर्णसंकरकारिणी॥ धर्मज्ञश्चकृतज्ञश्चआत्मवेदीहढवतः॥ प्रजायतेचतुर्दश्यां पंचदश्यांपतिव्रता ॥ आश्रयः सर्वभूता- नांपोडश्यांजायतेपुमान् ॥ टीका-चौथी रात्रिमें स्त्रीसंग करे तो पुत्र अल्पायु और धनवर्जित उत्पन्न होय, पांचवी रात्रिमें पुत्रवती, छठी रात्रिमें मध्यम पुत्र, सातमीमें पुत्र उत्पन्न नहीं होगा, अष्टमी राशिमें ईश्वरभक्त, नवमी रात्रिमें सौभाग्यवृद्धि, दशमीमें मुणवान् पुत्र, ग्यारहवीमें अधर्मी पुत्र; बारहवी रात्रिमें उत्तम पुरुष, तेरहवीमें पापकर्मिणी कन्या, चौदहवीमें धर्मात्मा कृतज्ञ और व्रत करनेहारा पुत्र, पंद्रहवी रात्रिको पतिव्रता, सोलहवी रात्रिको सबजीवोंका आश्रय देनेवाला पुत्र उत्पन्न होताहै ॥ निपेक के तिथि और वार । पष्ठ्यष्टमीपंचदशीचतुर्थीचतुर्दशीमप्युभयत्रहित्वा ॥ शेषाःशुभाःस्युस्तिथयो निषेके वारा शशांकार्यसितेन्दुजाश्च ॥ टीका-पष्ठी अष्टमी पूर्णिमा अमावास्या चतुर्थी चतुर्दशी इन तिथि- योंको छोडकर शेष तिथि और सोम गुरु शुक्र बुध ये वार शुभ जानिये ॥ नक्षत्र। विष्णुप्रजेशरविमित्रसमीरपोष्णमूलोत्तरावरुणभानिनिषेक- कायें ॥ पूज्यानिपुण्यवसुशीतकराविचित्रादित्याश्चमध्यम- फलाविफला स्युरन्ये ।। टीका-श्रवण रोहिणी हस्त अनुराधा स्वाती रेवती मूल तीनों उत्तरा शत- भिपा ये नक्षत्र कहेहैं और पुष्य धनिष्ठा मृगशिर अश्विनी चित्रा पुन- वसु ये मध्यम हैं और शेष नक्षत्र अधम जानिये ॥ मुहूर्तमार्तडमते ॥

भाषाटीकासमेत। वैधृति संक्रांति महापात आदि दुष्ट योग और श्राद्धांत पूर्व दिन जन्म नक्षत्र संधि दिवस रात्रि नक्षत्र इत्यादि वर्जनीय करते हैं और जिस लग्नमें विषमस्थानी नवांशकमें उच्च बृहस्पति अथवा सूर्य चंद्रमा होय तो पुत्रप्राप्ति होय और येही ग्रह समराशिके होय तो कन्यामाप्ति होय ॥ गर्भाधाने लग्नशुद्धिः। केन्द्रत्रिकोणे शुभैश्चपापैरूयायारिगैः पुंग्रहदृष्टलग्ने। ओजां- शकेऽब्जेपिचयुग्मरात्रौ चित्रादितीज्याश्विषुमध्यमस्यात् ॥ टीका-प्रथम चतुर्थ सप्तम दशम ये केन्द्र इसमें शुभग्रह होय त्रिकोण नवम पंचम इसमें शुभग्रह होय ३।११।१०।६ इसमें पापग्रह होय लमको पुरुप ग्रह देखते होंय और विपम नवांशमें चंद्रमा होय तो इसमें गर्भाधान शुभ है और समरात्रि पुनर्वसु, पुष्य, अश्विनी ये नक्षत्र मध्यम होते हैं । प्रथम गर्भिणीके पुंसवनादिकसंस्कार। मूलादित्रितयेकरेश्रवणके भाद्रद्वयात्रिये रेवत्यां मृगपंचकेदिन करेभौमेनरिक्तातिथौ ॥ नेत्रेमास्यथवानिमासिधनुपिस्त्रीमान- योश्चस्थिरे लग्नपुंसवनंतथैवशुभदंसीमंतकर्माष्टमे ॥ टीका-मूल पूर्वापाढा उत्तरापाटाहस्त श्रवण पूर्वाभाद्रपदा उत्तराभाद्रपदा आर्दा पुनर्वसु पुष्य रेवती अश्विनी भरणी कत्तिका रोहिणी मृगशिर और रवि भौमवार लेने और रिक्ता तिथी वर्जनीय हे और गर्भाधानसे दूसरा महीना व तीसरा मास और धन कन्या मीन और स्थिर लनोंमें पुसवनकर्मको करे और इनही नक्षत्र वा लग्नोंमें ये अष्टमासमें सीमंतकर्म करना शुन कहाहै ॥ वारफलम् । मृत्युश्चसौरेस्तनुहानिरिंदोः प्रजामृतिः पुंसवने बुधस्य ॥ काकी च वंध्याभवतीहशुके स्त्रीपुत्रलाभोरविभौमजीवः॥ टीका-शनिवारको पुंसवन कर्म करे तो मृत्यु होय, चंद्रवारको शरी- रका नाश, बुधवारको सताननाश, शुक्रवारको काकवंध्या ( एकवार (५८) ज्योतिपसार । प्रसूति ) और रवि भौम गुरु इन वारोंमें पुत्र प्राप्ति होय, परंतु स्त्रीके चंद्रमा शुभ होय दुष्ट योगादिक वर्जितहैं ॥ उक्त नक्षत्र आदिमें और शुज दिवसमें पुंसवन कहिये गर्भकी पुरुषारुति होना यह कर्म करावै और जिस मुहूर्तमें गर्भकी स्थिरता कहीहै उसीमें अनवलोभननी कर्म उक्तहैं । अन्यमते। चतुर्थपष्टाष्टममासभाजिसौरेणगर्भेप्रथमविधेयम् ॥ सीमंतकर्मद्विजभामिनीनां मासेप्टमेविष्णुवलिं च कुर्यात् ॥ टीका-प्रथम गर्भधारण होनेसे चतुर्थ पष्ठ अष्टम ऐसे समसौर मासोंमें आठ मासपर्यंत ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्योंकी स्त्रियोंका सीमंतकर्म और विष्णुबलि करना उचितहै ॥ सीमंतेतिष्यहस्तादितिहरिशशभृत्पौष्णविद्धयुत्तराख्या ॥ पक्षच्छिद्राचरिक्तापितृतिथिमपहायापरा:स्युःप्रशस्ताः॥ टीका-सीतकर्ममें पुष्य हस्त पुनर्वसु श्रवण मृगशिर रेवती रोहिणी तीनों उत्तरा ये नक्षत्र शुभहैं और पक्ष रंध्रतिमि रिक्तातिथी और अमा- वास्याको छोड शेष तिथि शुज जानिये ॥ पक्षच्छिद्रातिथि। चतुर्दशीचतुर्थी च अष्टमीनवमीतथा ॥ पष्ठी च द्वादशी चैव पक्षछिद्राह्वयाःस्मृताः ॥ कर्मादितासुतिथिषुवर्जनीयाश्चना- डिकाः ॥ भूताटमनुतत्वांकदशशेपास्तुशोभनाः॥ टीका--चतुर्दशीकी प्रथमको ५ घटिका, और चौथकी ८ घटिका, अष्टमीकी १४ घंटिका, पष्ठीकी ८ घटिका, द्वादशीकी १० घटिका वर्जनीयहैं और शेष घटी शुभहैं । मासेश्वरज्ञानमाह। मासेश्वराःसितकुजेज्यरवींदुसौरचन्द्रात्मजास्तनुपचंद्रदिवाकरास्युः १ भाषाटीकासमेत। (६९) मासेश्वरज्ञानार्थमासेशचक्रम् । ४ स्वामी-शुक्र | स्वामी-भौम स्वामी-गुरु स्वामी-रवि- स्वामी-चंद्र ६ स्वामी-शनि स्वामी-युध स्वा.गर्भाधाला स्वामी-चंद्र | स्वामी-सूर्य गर्भिणीधर्म । भूम्यांचैवोच्चनीचायामारोहणेवरोहणे ॥ नदीमतरणंचैवशक टारोहणं तथा ॥ उग्रोप,तथाक्षारं मैथुनंभारवाहनम् ॥ कृते- पुंसवनेचैवगर्भिणीपरिवर्जयेत् ॥ टीका-पुंसवनकर्म होने उपरांत गर्जिणीको ऊंचे नीचे स्थानपर चढना उतरना, भागकर चलना, नदी तरना, गाडीपर बैठकर चलना,तीक्ष्ण अर्थात् गरम औपध नीरस क्षार आदि खाना,मैथुन, भार उठानासर्वकर्म वर्जितहैं ॥ गर्मिणीप्रश्नः। नामाक्षराणित्रिगुणीकृतानि तुरंगदेशे तिथिमिश्रितानि ।। अहौ भाग लभते च शेष समे च कन्या विपमेचपुत्रः।। टीका-गतिणीके नामअक्षर तिगुनें करे तिनमें घोडाके नामाक्षर और देशके अक्षर मिलाके वर्तमान तिथि मिलावे और आठका भागदे शेष अंक सम बचें तो कन्या और विपम बचे तो पुत्र होय ॥ प्रमृतिस्थान प्रवेश नक्षत्र । रोहिण्येन्दवपोष्णेषुस्वातीवारुणयोरपि॥ पुनर्वसौपुष्यहस्त- धनिष्ठाव्युत्तरासुच ॥ मैत्रेत्याऐतथाश्चिन्यां सूतिकागारखे- शनम् ॥ प्रसूतिसम्भवेकाले सद्यएवप्रवेशयेत् ।। टीकारोहिणी मृगशिर रेवती स्वाती शतभिपा पुनर्वसु पुष्य हस्त धनिष्ठा तीनों उत्तरा अनुराधा चित्रा अधिनी ये नक्षत्र प्रसूतिका भवनके प्रवेशमें कहेहैं, प्रसूति समयमें ये नक्षत्रोंमें तत्काल प्रवेश करावे ॥

(६०) ज्योतिपसार। गर्भके लक्षण । कलेलं च घेनंशाखौर्थित्वग्रोमोद्गमःस्मँतिः ॥ भुक्तिरुद्वेगंसंसूतिर्मासेष्वाधानतःक्रमात् ॥ टीका-गर्भाधानसे १० मास तक गर्भका रूप कहतेहैं; प्रथम १ मासमें कलल कहिये शुक्र रुधिर इसके संयोगसे पिंडित होताहै- २ मासमें धन कहिये वह पिंड दृढ होताहै-३मासमें वह पिंडमें शाखा कहिये हस्त और पाद उत्पन्न होतेहैं-४मासमें उसमें अस्थि-हाढ होतेहैं-५मासमें उसपर त्वचा कहिये चमडा, ६ मासमें रोम कहिये केश होतेहैं, ७ मासमें स्मृति अर्थात् ज्ञान होताहै- ८ मासमें क्षुधा ९ नवमें मासमें उद्वेग अर्थात् गर्भस्थल उदरसे निकलनेकी इच्छा करताहै, १० मासमें प्रसव जानना चाहिये । प्रसूतिसमयका प्रश्न। मीनेमेषेस्त्रियोद्धे च चतस्रो वृपकुंभयोः ॥ तुलाकन्यकयोः सप्तवाणाख्या धनकर्कयोः ॥ अन्यलग्नेभवेत्तिस्र एवं ज्ञेयं विचक्षणः ॥ यथाराहुस्तथाशय्या भौमेखट्वांगभंगता ॥ रवि- स्थानेभवेदीपः शनिस्थाने तु नालकम् ।। टीका--मीन अथवा मेप इन लमों में जो वीके प्रसव होय तो उससमय उसके निकट दो स्त्रियाँ और वृष कुंभ होयतो ४, तुला कन्या होयतो ७, धन ओर कर्कौ ५ अन्य लग्नों में तीन स्त्रियां जावनी चाहिये ॥ जन्मकुंड लीके मध्य जिस दिशामें राहु स्थित होय उसी दिशामें शय्या जाननी, जो लपमें मंमल बैठा होय तो खाटका अंगभंग जानिये: जिस स्थानमें रवि होय उसी दिशामें दीपक और जिस दिशामें शनि होय उसमें नालसमझना। तिथिगंडांत। पूर्णानन्दाख्ययोस्तिथ्योः संधिर्नाडीद्वयंतथा ॥ गंडांतंमृत्युदं जन्मयात्रोद्वाहवतादिपु ॥

भाषाटीकासमेत। (६१) टीका-पूर्णातिथि कहिये १५।५।३० और पडदा छठि एकादशी कहिये नंदा इनकी संधिकी दो २ घटी अर्थाद पूर्णिमा पंचमी दशमीके अंतकी एक २ और पडवा छठि एकादशीके आदिकी एक २ घटी गंडां- तहै, यात्रा विवाह यज्ञोपवीतमें वर्जितहैं; करे तो मृत्यु होय ॥ लग्नगंडांत। कुलीरसिंहयोः कीटचापयोर्मीनमेषयोः॥ गंडांतमंतरालेस्यादटिकाईमृतिप्रदम् ॥ टीका-कर्क सिंह इन दोनों लमोंकी घटिकाआधी और इस क्रमसे वृश्चिक और धन मीन मेष इनकी आदिकी घटी गंडांतमें शुभकर्म न करे ये मृत्यु देती नक्षत्रगंडांत। पोष्णाविन्योः सर्पपित्र्ययोश्चयञ्चज्येष्ठामूलयोरंतरालम् ॥ तद्वंडांतस्याच्चतु डिकं हियात्राजन्मोद्वाहकालेष्वनिष्टम् ॥ टीका-रेवती अधिनी इनकी संधिकी २ घटिका इसी क्रमसे श्लेपा मघा ज्येष्ठा मूल इनकी संधिके ४ घटिका वर्जनीय और ऐसेही तिथि लग्न और नक्षत्र येत्रिविध गंडांत जानिये,यह यात्रा जन्मकाल और विवाहमें वर्जितहैं। जातक। जन्मकालमें गंडांतका शुभाशुभफल । अश्विनीमघमूलानां पूर्वार्दैवाध्यतेपिता ॥ पूपादिशाक्रप- श्वाईजननी बाध्यतेशिशुः ॥ सर्वेषांगंडजातानांपरित्या- गोविधीयते ॥ वर्जयेद्दर्शनंशावं तच्चपाण्यासिकंभवेत् ॥ टीका-अश्विनी मघा मूल इन नक्षत्रोंके पूर्वाई में जन्म होयतो पिताको अशुभ और रेवती ज्येष्ठा इन दोनों नक्षत्रोंके उत्तराईमें जन्म होय तो माताको अशुभ और गंडांतमें जन्म होय तो शिशुका त्याग करना योग्यहै अथवा छामासतक पुत्रको नदेखे ॥

(६२) ज्योतिपसार। कृष्णचतुर्दशीकाजन्मफल। कृष्णपक्षेचतुर्दश्यांप्रसूतैः पड्धिंफलम् ॥चतुर्दश्याश्चपड्भा- गान् कुर्यादादौ शुभंस्मृतम् ॥ द्वितीये पितरं हंति तृतीयेमा- तरंतथा|चतुर्थेमातुलंहति पंचमेवंशनाशनम् ॥ पप्ठे च धन- हानिःस्यादात्मनोवंशनाशनम् ॥ टीका-जो कृष्णचतुर्दशीको जन्म होयतो तिथिके छःखंड दश २ घटिकाके करे जो प्रथम खंडमें जन्म होयतो शुभ, द्वितीयमें पिताको अशुभ, तृतीयमें माताको अशुभ, चतुर्थमें मामाको अशुभ, पंचगमें वंश- नाश, छःमें धनहानिकारक और अपने वंशका ना क जानिये ॥ अमावास्याकेजन्मकाफल । सिनीवाल्यां प्रसूताश्चदासीभार्यापशुस्तथा ॥ गजोश्वामहि- पीचैव शक्रस्यापिश्रियंहरेत् ॥ कुहूप्रसूतिरत्यर्थे सर्वदोपक- रीस्मृता॥ यस्यप्रसूतिरेतेषां तस्यायुर्धननाशनम् ॥ सर्वगंड- समस्तत्रदोपस्तुप्रबलोभवेत् ।। टीका-चतुर्दशीयुक्त अमावास्याको दासी अथवा भार्या गाय हस्तिनी घोडी भैंस जो प्रसृता होय तो इंद्रकी भी सम्पत्ति हरलेतेहैं और ठीक अमावा स्याको प्रसूता हो तो बहुतसे दोप लगेंऔर जिसकी इनमें प्रसूति होय उसकी आयुधनका नाश होय और गंडांतमें प्रसूति होयतो बहुतसे दोप जानिये ॥ दिनक्षयादिकफलम् । दिनक्षयेव्यतीपातेव्याघातेविष्टिवैधृतौ ॥ शूटेगंडेतिगंडेच परिधे यमघंटके ॥ कालगडेमृत्युयोगेदग्धयोगेसदारुणे ॥ तस्मिन्गंडदिनेप्राधे प्रसूतिर्यदिजायते॥अतिदोपकरी प्रोक्ता- तत्रपापयुतासती॥ टीका-दिनक्षय व्यतीपात व्याघात भद्रा वैधृति शूल गंड अतिगंड परिघाई यमघंट कालमंड मृत्युयोग दग्धयोग दारुणयोग इनमें जन्म होय तो भारी पाप लगे ऐसी प्रसूति स्त्रीको पापायुक्त जानिये ॥

1 -- N भापाटीकासमेत। (६३) ज्येष्ठानक्षत्रफल। ज्येष्ठादोजननेमाताद्वितीयेजननेपितातृतीयेजननेभ्रातास्वयं माताचतुर्थके |आत्मानं पंचमेहंतिपप्टे गोत्रक्षयोभवेत् ॥सप्त मेचोभयकुलंज्येष्ठभातरमष्टम।।नवमेश्वशुरंचैवसर्वहतिदशांशके। टीका-ज्येष्ठा नक्षत्रमें जो जन्म होयतो उस नक्षत्रकी छायटियोंके दशभाग समान करे तिसका फल, प्रथमभाग माताको अशुभ, दूसरा पिता- को, तीसरा मामाको, चौथा माताको, पांचवा शिशुको, छठा भाग गोत्र- जोको, सातवाँ पिता, नानाके परिवारको, आठवाँ बडे नाताको, नवम श्वशुरको, दशवां सर्व जनोंको बुराहै ॥ मूलनक्षत्रफल । मूलस्तंभंत्वक् च शाकापपुष्पंफलंशिखावेदाश्चमुनयश्चैव दिशश्ववसवस्तथा। नंदावाणरसारुद्रामूलभेदाः प्रकीर्तिताः॥ मूलेमूलविनाशायस्तंभे हानिर्धनक्षयः ॥ त्वचिभ्रातृविनाशाय शाखामातुर्विनाशकृत्।।पत्रेसपरिवार स्यात्पुष्पेपुनृपवल्लभः।। फलेपुलभतेराज्यं शाखायामल्पजीवितम् ।। टीका-मूल नक्षत्रको मूल वृक्ष कल्पना करते हैं निस्की ६० घटीके स्थान इस भाँति हैं, प्रथम ४वदिका वृक्षका मूल, तिनमें जन्म होय तो नाश, दूसरा नाम घटिका स्तंभ तिनमें हानि और धनका नाश, तीसरा भाग३० घटिका वृक्षको त्वचा तिनमें साताको अशुभ होय, चौथा भाग ८ घटिका साखा तिनमें माताको अशुभ, पांचवाँ भाग ९ घटी वृक्षके पत्र तिनमें परि- वारनाश, छठा भाग ५ घटी पुन तिनमें राजमंत्री, सातवाँ भाग ६ घटी फल तिनमें राज्यप्राप्ति, आठवां भाग ११ घटिका वृक्षकी शाखा तिनमें जन्म होयंतो शिशु अल्पायु होय, ऐसे आठ स्थानका फल जानिये ॥ जन्मकालमेंमूलनक्षत्रकिसलोकमेंहैइसकेजाननेकीलग्न। वृपालिसिंहेपुषटे च मूलं दिविस्थितंयुग्मतुलाङ्गनांत्ये॥ - (६४) ज्योतिपसार। पातालगंमेपधनुःकुलीरनक्रेपुमत्येष्वितिसंस्मरंति ॥ टीका-वृप सिंह कुभ वृश्चिक लमोंमें जन्महोय तो उस दिन मूल नक्षत्र स्वर्गमें होताहै तिसका फल राज्यप्राप्ति और मिथुन तुला मीनमें मूल पातालमें जानिये तिसका फल धनप्राप्ति और मेप धन कर्क मकर इनलमोंमें मूल मृत्युलोकमें होताहै इस्का फल कुटुंबनाश यह १२ लमोंका फलहै ॥ आश्लेषानक्षत्रस्यनराकारचक्रम् । मूर्दास्यनेत्रगलकांसयुगं च बाहुजानुगुह्यपदमित्यहिदेह- भागः ॥ वाणाद्रिनेत्रहुतभुक्श्चतिनागरुद्रपण्नंदपंचशिरसः क्रमशस्तुनायः ॥ राज्यंपितृक्षयोमातृनाशः कामक्रियार- तिः पितृभक्तोवली स्वप्नास्त्यागीभोगीधनीक्रमात् ॥ टीका-आश्लेपा नक्षत्रकी घटिकायोंको नराकार चक्र स्थापन कर नेमें प्रथम ६ घटिका मस्तक तिनका फल राज्यप्राप्ति, द्वितीय७ घटी मुख तिनका फल पिताका नाश, तीसरा विभाग दो घडी तिनका फल माताका नाश, चौथे ३ घटिका ग्रीवा तिनका फल परस्त्रीरत,पांचवां भाग ४ घटी दोनों कांधे तिनका फल पितृभक्त, छठा भाग ८ घटी दोनों बाहु तिनका फल बली ७ भाग११ घटी हृदय तिनका फल आत्मघाती आठवाँ भाग ६ घटी दोनों जानु तिनका फल त्यागी, नौवाँ विभाग ९ घटिका गुह्य तिसका फल भोगी, दशयां भाग ५ घटी दोनों पांव तिनका फल धनवान्, जिस विभागमें जन्म होय जिसका फल स्थानानुसार कहना योग्य है ॥ जन्मसमयमेंसूर्यादिग्रहोंकाफल । तनुस्थान ॥ लग्नस्थितोदिनकरःकुरुतेगपीडांपृथ्वीसुतोवि- तनुतेरुधिरप्रकोपम् ॥ छायासुतःप्रकुरुतेबहुदुःखभाजजीवें- दुभार्गवबुधाःसुखकांतिदारस्युः॥धनस्थान ॥ दुःखावहाध- नविनाशकराः प्रदिष्टावित्तस्थितारविशनैश्चरभूमिपुत्राः ॥ चंद्रोबुधःसुरगुरु गुनंदनोवा नानाविधं धनयंकृरुतेधन- " भाषाटीकासमेत । (६५) स्थः॥ सहजस्थान ॥ भानुः करोतिविरुजरजनीकरोपि की- ायुतंक्षितिसुतः प्रचुरप्रकोपम् ॥ ऋद्धिबुधःसुधिपणंसुवि- नीतवेषं स्त्रीणांप्रियं गुरुकवीरविजस्तृतीये ॥ सुहृत्स्थान ॥ आदित्यभौमशनयः सुखवर्जितांगंकुवैति जन्मनिनरंसुचिरंच- तुर्थे । सोमोबुधः सुरगुरु गुनंदनोवासौख्यान्वितं च नृपक-. मरतः प्रधानम् ॥ सुतस्थान ॥ पुत्रविः प्रचुरकोपयुतंबुध- श्वस्वल्पात्मजंशनिधरातनुजावपुत्रम् ।। शुक्रंदुदेवगुरवः सुत- धामसंस्थाः कुवैति पुत्रबहुलंसुखिनं सुरूपम् ॥ रिपुस्थान ॥ मार्तडभूमितनुजौहतशत्रुपक्षपंगुर्नररिपुगृहेष्वतिपूजनियम् ।। काव्येदुजौमतिविहीनमनल्पलोगंजीवः करोतिविकलंमरणं शशांकः ॥ जायास्थान ॥ तिग्मांशुभौमरविजाः किलसप्तम- स्थाजायांकुकर्मनिरतां तनुसंतति च ॥ जीवेंदुभार्गवबुधा बहुपुत्रयुक्तांरूपान्वितांजनमनोहररूपशीलाम्॥मृत्युस्थान। सर्वग्रहादिनकरप्रमुखानितांतमृत्युस्थितावितनुतेकिलदुष्टबु- दिम्॥ शस्त्राभिधातपरिपीडितगात्रयष्टिसौख्यविहीनमतिरो- गगणैरुपेतम् ॥धर्मस्थान ॥धर्मस्थिता रविशनैश्चरभूमिपुत्राः कुर्वतिधर्मरहितं विमतिकुशीलम् ।। चंद्रोबुधोभृगुसुतः सुररा- जमंत्रीधर्मक्रियासु निरतं कुरुतेमनुष्यम्॥कर्मस्थान॥आदि- त्यभौमशनयः किलकर्मसंस्थाकुर्युनरंबहुकुकर्मरतंकुपुत्रम्।। चंद्रासुकीर्तिमुशना बहुवित्तयुक्तरूपान्वितं बुधगुरूशुभकर्म- भाजम् ॥ लाभस्थानालाभस्थितोदिनकरोनृपलाभयुक्ता- रापतिर्बहुधनं क्षितिजः क्षितीशम् ॥ सौम्यो विवेकसुभगं च धनायुपीज्यः शुक्रकरोतिसगुणरविजःसुकीर्तिम्ाव्ययस्थाना सूर्यःकरोतिपुरुपव्ययगोविशीलं काणंशशीक्षितिसुतो बहु- पापभाजम् ॥ चंद्रांगजो गतधनंधिपणाकृशांगशुक्रोबहुव्यय- करं रविजःसुतीव्रम् ॥ राहुकेतुफलंसर्व मंदवत्कथितं बुधैः ।।

शनि राह के . m चंद्र (६६) २ तनु ! अगपीडा . " थक्रफल जाननेके लिये कोष्ठक और राहुकेतुके फल शनिके समानजानिये. टीका-जन्मलमके तनु आदि द्वादशस्थानोंमें जोजो ग्रह पडे होंय तिनके पृ. पुरुषकेजन्मकालमेंजैसेग्रहपडेहोंयतिनकाफल । स्था रवि मंगल बुध वृहस्पति काति और सुख रक्तकोप काति और सुख कांतिऔरसुख कातिऔरसुख अतिदुःखदायक २ धन अतिदुःखबाध सपत्तिकोबहुत दुःखप्राप्तिधन, नानाप्रकारके नानालकारकी नानाप्रकारकी अतिदुःखप्राप्ति नकानाश - प्राप्ति कानाश स. प्राप्ति | सपत्ति प्राप्ति | संपत्तिप्राप्ति धनकानाश ३ सह. निरोगीरहै कीर्तिलाम क्रोधयुक्तरहै | समृद्धि सुबुद्धि नानावेषधारण स्त्रियोंकोप्रियहो ४ सुहृत् शरीरकापीडा सुखभोगी शरीरकोवहुत सुखभोगी सुखभोगी सुखभोग शरीरकोपाडाय बहुतहोय Ari. | पीडा हुतहोय ५ सुत रोगबहुतहोय | बहुतपुत्रहोय सतानरहित अल्पपुत्रसंतानि बहुपुत्रप्राप्ति बहुतपुत्र संतानि नहो ६ रिपु शत्रकानाशकरे मरणपावै शत्रुनाश बुद्धिहीनबहुरोग शरीरविकलरहै बुद्धिहीनवहरो. शत्रग्रहपूज्य जाया स्त्रीदृष्टकर्मी सस्त्रीरूपवतीगुण स्त्रीदुष्टकर्मी व स्त्रीरूपवान् ब औरमनहारण मनहरनेवाली स्त्रोदुष्टकर्मी सं/ तानीअल्पवतीगुणयुक्तपुत्र संततिअल्प हु पुत्रप्राप्ति होयसुखभोगी पुत्रवतीचतुर तानयोडीउत्पन्न मृत्य इसमें सब ग्रहोंकाफल एक समानहोताहै दुष्टबुद्धि शस्त्रघाति शरीरपीडा सुखरहित और रोगीहोय जो ग्रह इस स्थानमें होय ताका ऐसा फल जानिये ९ धर्म अधीदुःष्टमति धार्मिकहोय. अध दुष्टमति धर्मनिरतरकरे धर्मनिरतरकरे धर्मनिरंतरकरै। अधर्मी दुष्टशील दुष्टशील दबुद्धि १० | कर्म अत्यतदुष्टको अत्यतकोतिवा, दुष्टकर्मीकुपुत्र कीर्तिवान् शुभकर्मकरे | सपत्तिवान् अत्यंतदुष्टकमी कुपुत्र न होय मकरे ११ आय राजसीसमाग धनबहुतमिले एथ्वीलाभरा विवेकयुक्तऔर धन और आयु गुणवान् अच्छोकीर्तिपाव जासे सुदर १२ व्यय दुष्टस्वभाव काणाहोय पापकर्म धनहीन कृशमात्र व्याधियुत तीव्रहोय ज्योतिषसार । 14 1 व कुपुत्र की वृद्धि भाषाटीकासमेत । (६७) जन्मलग्नमेंबालककेमृत्युकारकग्रह । चंद्राष्टमं च धरणीसुतसप्तमं च राहुर्नवं च श- निजन्मगुरुस्तृतीये । अर्कस्तुपंचभृगुपष्ट बु- धश्चतुर्थे जातो नजीवतिनरः प्रवदंति संतः॥ टीका-जन्मलमसे चंद्रमा अष्टमस्थानी भौम ७ स्थानमें राहु ९स्थानमें शनि जन्मलममें गुरु तृतीयस्थानमें शुक्र ६ स्थानमें बुध ४ स्थानमें ऐसे ग्रह पडें तो शिशु मृत्युको प्राप्त होप ॥ जन्मलग्नमेंस्त्रीकेमृत्युकारकग्रह । पष्ठे च भवनेभोमोराहुः सप्तमसंभवः॥ अष्टमे च यदा सौरिस्तस्यभार्या नजीवति ।। टीका-जन्मलग्नसे छठे स्थानमें भौम राहु ७ स्थानमें शनि ८ स्थानमें ऐसे ऐसे ग्रह जिसके कुंडलीमें पड़ें होय उस पुरुपकी स्त्री नजीवे ॥ अच्छेपराक्रमीग्रह। मूौशुक्रबुधौयस्य केंद्रे चैव बृहस्पतिः॥ दशमोगारकोयस्यसज्ञेयः कुलदीपकः ॥ टीका-जिसके जन्मलममें शुक्र बुध और केन्द्र अर्थात प्रथम चतुर्थ सप्तम दशम इन स्थानों में बृहस्पति तथा दशमस्थानमें मंगल होय तो उस बालकको कुलदीपक जानिये ।। पराक्रमीग्रह। नैवशुक्रोधोनैवनास्तिकेन्द्रे बृहस्पतिः। दशमोऽगारकोनैवसजातः किंकरिष्यति ॥ टीका-जिस बालकके लममें बुध शुक्र अथवा केन्द्रमें बृहस्पति किंवा दशमस्थानी मंगल ऐसे ग्रह न पड़ें होय तो उसका जन्म होना वृथा जानिये। जातिभ्रंशकारक। धनस्थानेयदासौरिः सैहिकेयोधरात्मजः ॥ शुक्रोगुरुः सप्तमे च (६८) ज्योतिपसार। त्वष्टमौरविचन्द्रको ॥ ब्रह्मपुत्रेपदेवापि वेश्यासु च सदारतिः॥ प्राप्तेविंशतिमेवम्लेच्छोभवतिनान्यथा ॥ टीका-जिसके धनस्थानमें शनि राहु मंगल और सप्तमस्थानमें शुक्र गुरु तथा अष्टमस्थानमें रवि चंद्र ऐसे ग्रह होय सो बालक कदाचित् ब्राह्मण- जातिभी जन्म पावे तथापि वेश्याप्रसंगी होय और वीसवीं वर्षकी अव- स्थामें अवश्य म्लेच्छ होय ॥ मातापिताकेनाशक। पठे च द्वादशेराशौ यदापापग्रहोभवेत् ॥ तदामातृभयं विद्याचतुर्थेदशमेपितुः ॥ टीका--जो छठे अथवा बारहवें स्थानमें पाप ग्रह होय तोमाताकोअशुन किंवा चतुर्थ अथवा दशमस्थानमें पापग्रह होय तो पिताको अशुभ जानिये. मृत्युकारकग्रह। अर्कोराहुः कुजः सौरिर्लग्नेतिष्ठतिपंचमे ।। पितरंमातरंहति भ्रातरस्वशिशून्क्रमात् ॥ टीका-जो सूर्य राहु मंगल शनि ये ग्रह जन्मलग्रसे पांचवे स्थानमें पडे हो तो क्रमसे रवि पिताको, राहु माताको, भौम चाताको और शनि अपने बालकोंके लिये अशुभ जानिये ॥ लग्नस्थानेयदासौरिः पाटोभवतिचंद्रमाः॥ कुजस्तुसप्तमस्थाने पितातस्यनजीवति ॥ टीका-जिसके जन्मलममें शनि और छठे स्थानमें चन्द्रमा सप्त- ममें मंगल ऐसे ग्रह उसका पिता नजीवे ॥ पातालस्थायदाहुश्चेदुःपष्टाष्टमेपिच ।। पापदृष्टोपिशेपेणसद्यःप्राणहर शिशोः॥ टीका-जन्मलनके सप्तमस्थानमें राहू छठे अथवा आठवें स्थानमें चंद्रमा और शेप ग्रहोंकी पापदृष्टि जो ऐसे ग्रह होय तो जन्म होतेही बालककी मृत्यु होय ॥ " भाषाटीकासमेत। (६९) जन्मलग्नेयदाराहुः षष्टोभवतिचंद्रमाः ।। जातोमृत्युमवाप्नोति कुदृष्टयांत्वपमृत्युना ॥ टीका-जन्मलग्नमें राहु पष्ठस्थानमें चंद्रमा ऐसे समय जन्मे तो बाल- ककी मृत्यु और जन्म लंग्नपर किसी ग्रहकी कुदृष्टि होय तोअपमृत्यु जानीये. जन्मलग्नेयदाभौमश्चाप्टमे च वृहस्पतिः ।। वर्षे च द्वादशेमृत्युर्यदिरक्षतिशंकरः॥ टीका-जो जन्मलग्नमें मंगल और अष्टमस्थानी बृहस्पति ऐसे ग्रह होय तो बारहवें वर्ष शंकर रक्षक हो तो भी मृत्यु जानिये ॥ शनिक्षेत्रेयदासूर्यो भानुक्षेत्रेयदाशनिः ॥ वर्षे च द्वादशेमृत्युर्देवो वैरक्षितायदि ॥ टीका-जो शनिके क्षेत्रमें सूर्य होय और सूर्यके ग्रहमें शनि होय तो चारहवें वर्ष देवरक्षितभी शिशु मृत्युको प्राप्त होय ॥ षष्ठोष्टमस्तथामूर्ती जन्मकालेयदायुधः ।। चतुर्थवर्षेमृत्युश्चयदि रक्षतिशंकरः ।। टीका-पाठ अष्टम अथवा जन्म लग्नमें बुध होय तो चौथे वर्ष शंकरजी रक्षा करै तोजी बालक न बचे ॥ भौमक्षेत्रेयदाजीवः पष्ठाष्टसु च चंद्रमाः॥ वटमेपि मृत्युः ईश्वरोरक्षितायदि । टीका-मंगलके घरमें बृहस्पति और पष्ठ अथवा अष्टमस्थानी चन्द्रमा ऐसे यह होय तो ईश्वररक्षितभी बालक आठवें वर्ष मृत्युको प्राप्त होय ॥ दशमोपियदाराहुर्जन्मलग्नेयदाभवेत् ॥ वतुपोडशेज्ञेयो बुधैर्मृत्युनरस्य च ।। टीका-जन्मलनसे दशमस्थानी अथवा जन्मलममें राहु होय तो सोलहवें वर्षमें मृत्यु होय ॥ ग्रहोंकीदृष्टि। पादेकदृष्टिदशमेतृतीये द्विपाददृष्टिनवपंचमेवा ॥ त्रिपाददृष्टिश्च.

(७०) ज्योतिषसार। तुरष्टके च संपूर्णदृष्टिः समसप्तके च ॥ शनेस्त्वेकादशेपूर्णादृष्टि- जीवस्यकोणके । बुधैज्ञेयापूर्णदृष्टिींमस्यचतुरष्टके। टीका-जन्म लमसे दशवें और तीसरे स्थानमें जौनसे ग्रह होय वे एक पाद दृष्टि से जन्म लमको देखतेहैं. इसी क्रमसे नवम पंचम स्थानी ग्रह द्विपाद दृष्टिसे देखते हैं चौथे और आठवें स्थान जो ग्रह पडें होय वे त्रिपाद दृष्टिसे सप्तम स्थानी होय तिसकी पूर्ण सम दृष्टि जानिये जन्म लमसे शनैश्चर एका. दश अथवा तीसरे स्थानमें होय तो पूर्णदृष्टिसे लगको देखता है, पांचवें नवमें गुरु और चतुर्थ अष्टम स्थान में भौम होय तो लनको पूर्ण दृष्टिसे देखता है ।। ग्रहोंकाउच्चत्वव नीचत्व। रविमपेतुलेनीचोवृषेचंद्रस्तुवृश्चिके । भौमश्चनक्रेकर्के च स्त्रियां सौम्यो झषे तथा|गुरु कर्केच नकेच मीनकन्ये सितस्यच ॥ मंद स्तुलायां मेषे च कन्याराहुग्रहस्यच॥राहुर्युग्मे तु चापे च तमो- वत्केतुजं फलम् ॥ प्रोक्तंग्रहाणामुच्चत्वं नीचत्वं च क्रमाबुधैः॥ ग्रह रवि | चंद्र | भीम | बुध | गुरु | शुक्र | शनि | राहु | केतु उच्च .मेष | वृष | मकर कन्या| कर्क | मीन | तुल | मिथुन तुल नीच तुल वृश्चिक कर्क | गीन मकर कन्या मेप धन | मेष जन्मलगकाफल। मेषेदैन्यमुपैति गर्वितवृषो नानामतिर्मन्मथेशूरः कर्कटकेधृतीच वनपे कन्याच मायान्विता।सत्यंचैवतुलेवलौ मलिनता पापा- वितवैधनुर्मूल्यमकरेघटे चतुरतामीनेत्वधीरामतिः॥ टीका-मेष लममें जन्म होय तो दीनता,वृषमें गर्वित, मिथुनमें नाना प्रकारकी बुदियुत, कर्कमें बडाशूर, सिंहमें स्थिरबुद्धि, कन्यामें अत्यंत मानी तुलामें सत्यवादी,वृश्चिकमें मलीन,धनमें पापबुद्धि,मकरमेंमूर्ख,कुंभमें चतुर,मीन लग्नमें जो जन्म पावै सो बडा धीर वीर नहोय ऐसे जन्मलग्नका फल जानिये कन्या

भाषाटीकासमेत। (७१)
स्त्रीजातकमाह।
लग्गेच च सप्तमेपासप्तमेवत्सरेपतिः॥
म्रियतेचाष्टमेवचंद्रः पष्टाष्टमेयदि ॥
टीका-धीके जन्मकालमें लपमें पापग्रह होय तो ७ वर्षमें पतिनाश
जानना और चंद्र पष्ठ वा अष्टम स्थानमें होय तो अष्टमवपमें पतिका नाश ।
जानना ॥
अन्यमते ॥ द्वादशेचाष्टमे भौमेरेतत्रैवसंस्थिते ॥
लग्ने च सिंहिकापुरंडाभवतिकन्यका ॥
टीका-जन्म समयमें १२।८स्थानमें जो मंगल होय और करमहभी१२१८
स्थानमें होय और जो लग्नमें राहु होय, तौ स्त्री विधवा होय ऐसा जानना ॥
अन्यमते ॥ लग्नात्सप्तमगः पापश्चंद्रात्सप्तमगोपिया ।।
सद्योनिहंतिदंपत्योरेकनात्स्यत्रसंशयः ॥
टीका-जो लमसे सप्तमस्थानमें पापग्रह होय और चंद्रमासे सप्तमस्थानमें
पापग्रह होय तो विवाहसे अल्पकालमें खी विधवा होय ॥
रविसुतोयदिकर्कमुपागतो हिमकरोमकरोपगतोभवेत् ॥
किलजलोदरसंजनिता तदानिधनतावनितासुतकीर्तिता॥
टीका-जो शनैश्वर कर्कराशिमें होय और चंद्रमा मकरराशिमें होय
तो जलोदररोगसे स्वीका नारा जानिये ॥
निशाकर पापखगांतरस्थः शस्त्राग्निमृत्युंकुजभेकरोति ॥
पापाःस्मरस्येन्यखगेच धम्मकिलांगना प्रवजितत्वमेति ।।
टीका-जो चंद्रमा पापग्रहके मध्यमें बैठा होय तौ शस्त्रसे मृत्यु कहना
और जो चंद्रमा मंगलकी राशिमें बैठा होय तौ आनिसे जलकर नाश
कहना और जो पापग्रह सप्तमस्थानमें अथवा नवमस्थानमें अन्य शुभ
प्रह होय तो स्त्री कापायवस्त्रधारी वेदांती होतीहै ।
सप्तमेदिनपतोपतिमुक्ताक्षोणिजे च विधवासलुवाल्ये ॥
पापखेचरविलोकनयाते मंदगे च युवतिर्जरतीस्यात् ॥

(७२) ज्योतिपसार। टीका-जो स्त्रीके जन्मलममें सप्तमस्थानमें सूर्य होय तो पति त्यागी कहना और जो मंगल सप्तम होय तो बालअवस्थामें वैधव्य प्राप्ति होय और जो सप्तम पापग्रह देखना होय तो यौवनअवस्थामें विधवा होय और जो सप्तमस्थानमें शनैश्चर होय तो वृद्ध अवस्थामें वैधव्यप्राप्ति ऐसा जानिये ॥ लग्नेसितेंदुचतथाकुजमंदभस्थौकरेक्षितौसान्यरता च वाला ॥ स्मरेकुांशेर्कसुतेनदृष्टविनष्टयोनिश्चशुभाशुभांशे ॥ टीका-जो लममें शुक्र,चंद्रमा होय और मंगल शनि ये दशमस्थानमेंपडे होय और उसको पापयह देखते होंय तो वह स्त्री परपुरुपसे संग करै-और जो सप्तम स्थानमें मंगलका अंश होय और शनैश्चर सप्तम स्थानको देखता होय तौ नष्टयोनी जानना-जो सप्तमस्थानमंशुभग्रहका अंश होय तो शुन कहना ॥ सूर्यारौखजलाश्रितौहिमवतः शैलायपातान्मृति. भीमेंबर्कसुतास्वसप्तजलगाः स्यात्कूपवाप्यादितः॥ सूर्याचंद्रमसौखलेक्षितयुतौकन्यायुतो बंधुना तौचेद्यंगविलगसंस्थितकरौ तोयानमग्नत्वतः॥ टीका-जो सूर्य मंगल ये दशमे वा चौथे स्थानमें होय तो पापाणसे मृत्यु कहना और जो मंगल चंद्र शनि ये अपने स्थानमें सप्तम वा चतुर्थ स्थानमें बैठे होंय तो कूवा-बावडी-तालाय आदिसे मृत्यु कहना-और जो सूर्य-चं- द्रमाको पापग्रह देखते होय वा युक्त होय तो वह घी बंधुयुक्त कना- और जो सूर्य, चंद्र ये द्विस्वभावमें होय तो जलसे मृत्यु कहना चाहिये ॥ समेविलग्नेयदिसंस्थितः स्युबलान्विताः शुक्रबुधेन्दुजीवाः ॥ स्यात्कामिनीब्रह्मविचारचर्चापरागमज्ञानविराजमाना॥ टीका-जो समराशिकी लमहोय और उसमें शुक्र बुध चंद्र गुरु ये बल युक्त होंय तो वह स्त्री ब्रह्मविचार करै और उत्तम प्रकारकी ज्ञानी होय ॥ सप्तमेभार्गवेजाताकुलदोपकराभवेत् ॥ कर्कराशिस्थितेभोमेस्वैराभ्रमतिवेश्मसु ॥

भापाटीकासमेत । (७३) टीका-जिस स्त्रीके लग्नसे सप्तमस्थानमें जो शुक्र होय तो कुलको दपि त करे और जो कर्कराशिमें मंगल होय तो बंध्या आर दूसरेके घरमें वास करे ऐसा जानना ॥ पापयोरंतरेलग्ने चंद्रेवायदिकन्यका ॥ जायते च तदा हंति पितृश्वशुरयोः कुलम् ।। टीका-जो लमके पापग्रहको कर्तरी होय अथवा चंद्रमाके पापग्रहकी कर्तरी होय तो वह स्त्री दोनों वंशकी घात करनेवाली होतीहै ॥ । तनुस्थान ।। मूर्तीकरोतिविधवां दिनकृत्कुजश्चराइर्विनष्ट- तनयांरविजोदरिद्राम् ॥ शुक्रः शशांकतनयश्चगुरुश्चसाध्वी- मायुःक्षयं च कुरुतेऽत्र च शर्वरीशः॥ धनस्थान ॥कुर्वतिभा- स्करशनैश्चरराहुभौमादारिद्रयदुःखमतुलं नियतंद्वितीये।।वि- तेश्वरीमविधवां गुरुशुक्रसौम्याना प्रभूततनयांकुरुतेशशा- कः ॥ सहजस्थान | सूर्येन्दुभीमगुरुशुक्रबुधास्तृतीयेकुर्युः स्त्रियंबहुसुतांधनभागिनी च ॥ सत्यंदिवाकरसुतः कुरुतेध- नाढयां लक्ष्मी ददातिनियतं किलसँहिकेयः ॥ सुहृत्स्थान॥ स्वल्पंपयोभवतिसूर्यसुते चतुर्थेदौर्भाग्यमुष्णकिरण कुरुते शशी च ॥ राहुनिएतनयां क्षितिजोल्पवीजां सौख्यान्वितां भृगुसुरेज्यबुधाश्चकुर्युः ॥ सुतस्थान ॥ नष्टात्मजारविकुजोख- लुपंचमस्थौचंद्रात्मजो बहुसुतांगुरुभार्गवो च ॥ राहुर्ददाति- मरणरविजस्तुरोगकन्याप्रमूतिनिरतां कुरुतेशशांकः ॥ रि- पुस्थान ॥ पष्ठस्थिताःशनिदिवाकरराहुभौमाजीवस्तथाबहु- सुतां धनभागिनों च॥चंद्राकरोति विधवामुशनादरिद्रां वेश्यां शशांकतनयः कलहप्रियां च ॥ जायास्थान।।सोरारजीवबुध- राहुरवीन्दुशुक्रादधुःप्रसामरणंखलुसप्तमस्थाः॥ वैधव्यबंधन भयंक्षयवित्तनाशंच्याधिप्रवासमरणं नियतं क्रमेणामृत्युस्थान स्थानेष्टमेगुरुयुधो नियतंवियोगं मृत्युंशशी भृगुसुतश्च तथैव राहु ॥ सूर्यःकरोतिविधवां धनिनींकुजश्चसूर्यात्मजोरङसुतां (७४) ज्योतिषसार । पतिवल्लभां च ॥ धर्मस्थान ॥ धर्म स्थिताभृगुदिवाकरभूमि- पुत्रजीवाः सुधर्मनिरतांशशिजःसुभोगाम्॥राहुश्चसूर्यतनयश्च करोतिवंध्यांनारीप्रसूतितनयांकुरुतेशशांकः । कर्मस्थान ।। राहुर्नभःस्थलगतो विधवांकरोतिपापेपरां दिनकरश्वशनैश्चर: श्च ॥ मृत्युंकुजोर्थरहितांकुटिलां च चंद्रशेपाग्रहाधनवती बहुवल्लभां च ॥ आयस्थान।आयेरविर्वहुसुतां धनिनींशशां- कः पुत्रान्वितांक्षितिसुतौ रविजोधनान्याम् ॥आयुष्मती सु- रगुरु गुजःसुपुत्रींराहुः करोतिसुभगांसुखिनींबुधश्च ॥ व्य- यस्थान ।। अंत्येधनव्ययवती दिनकृद्दरिद्रांवंध्यांकुजःपररतां कुटिला च राहुः ॥ साध्वीसितेज्यशशिनावहुपुत्रपौत्रयुक्तां विधुः प्रकुरुतेन्ययगोदिनांधान ॥ । राहु केतु स्थान नाम। रवि चंद् मगल बुध गुरु शुक्र | शनि तनु विधा आयुका विधवा पतिव्रता पतिता | पतिव्रता दरिदा पुन्ननाशक नाश २ धन दरिद्रदुःख बहुपुत्रय दारेददु.ख सौभाग्यस | सौभाग्य सौभाग्य दरिद्र दुःख दरिददुःख ती पत्ति सपत्ति सपात्त ३ सहज पुत्रपती पुत्रातीध माती- पुत्रपती । पुत्रपती पनाती लक्ष्मीवती लक्ष्मीवती धनादया। नाध्या धन क्ष्या धनात्य धनाढ्य ४ मुहत् दरेद्रता | दुर्भगा असता अतिसुखि अतिसु अतिस दुधअल्प पुत्रनाश | नी हिनी ५ । सुत शिशुनाश | कन्याअ-शशुनाश बगुफल बदुफल / फल-जमणी मरणप्राणि धिक वती प्राप्ति प्राप्त प्रान्त ६ रिपु धनवती विधया धनम्ती करहरूप धनवती । दारोगी धनवती धनरती धनाढ्य नि मरण ८ मृत्यु विधा सतान ७ जाया | रोगिणी प्रवासिना | पिघवा क्षप भयत्र मृत्यु वैधन्य पित्तनाश मरणांत धनाती स्वजननि सजननि मरणात आतपुत्र मरणांतवि वियोगी योग योग रियोग योग धर्म | धर्मपुष्क पुत्रवती | धर्मकार्य उत्तमभोग धर्मद्ध | धर्मवृद्धिांझ वांश की वती कर्मपापकारि-दरिदच्याभि मृत्यु धनवत धनवतीप- धनीर पापकर्म विधवा णी चारिणी की प्राप्ति प्राप्त " माप अतिपुत्र लक्ष्मीन- बहुपुत्रन मुखिनी आयुष्म ! पुत्रवती धनवती सौभाग्या, ती ती तो ती व्यय खर्चकर- दिनधि | वांझध्य-सुपुत्रा मुशीरा पतिव्रता खर्चक-नै व्यभिचार ती भिचारिणी हारी णीपापिनो १० भाषाटोकासमेत। (७५) अष्टोत्तरीदशाक्रम। आपुनर्वसुःपुष्य आश्लेषातूरवेर्दशामघापूर्वोत्तराचैव चंद्रस्य च दशातथा॥ हस्तोविशाखाचित्राचस्वाती भौमदशास्मृता ॥ ज्येष्ठानुराधामूले च साम्यस्य च दशावुधैः ॥अभिजिच्छ्वणःपूपा उपाचैवशनेर्दशा ॥ धनिष्ठाशतताराचपूर्वाभाद्रपदागुरोः॥ उभा पूषाश्विनीकालेराहोश्चैव दशास्मृता कृत्तिकारोहिणीचोक्तामृगः शुक्रदशाबुधैः ॥ एषांभानांक्रमेणैवज्ञेया सूर्यादिकादशाः ॥ क्रूर- जाअशुभाप्रोक्ताशुभास्यात्सौम्यखेटजा॥ संख्याकाक्रममहादशाकी। सूर्यस्यरसवर्षाणि इन्दो पंचदशैवच॥ भौमस्यवसुवर्षाणिऋ- पिचंद्रबुधस्यच ॥ ६॥ मंदस्यदशवर्षाणि गुरोचकोनविंश- तिः॥राहोर्दादशवाणि शुकस्यैकोनविंशतिः ।। टीका-आसमृगाशेरपर्यंत २८नक्षत्र और सूर्य चंद्रभौम बुधशनिगुरुराहु शुक्र इस क्रमसे आठ ग्रहोंकेपृथक् दोकोष्ठक लिखे, तिनमेंसे महादाकीव संख्या इसप्रकारहै-पापग्रहके नक्षत्र और शुन यहके नक्षत्र जानिये.आ से रविदशागिनिये और दशाकी संख्या नक्षत्रके विभागसे जाने जो विज्ञा- गके अंतमें होय तो इस कमसे भोग्यदशा जाननी और जन्यकालमें जोदशा होय वही प्रथम जाननी॥सूर्यकी दशावर्ष,चंद्रकी १५,मंगलकी ८,बुधकी १५,शनिकी 10,गुरुकी१९,राहुकी१२,शुक्रकी १९वर्ष भोग्यदशा जानिये, अंतर्दशा लानेका क्रम। महादशास्वस्वशाब्दनिभाभक्तास्ववाहूशशिभिःसमायाः ।। अंतर्दशास्युर्गगनेचराणांतदेकभावोहिमहादशास्यात् ॥ ८॥ टीका-जो ग्रहोंकी अंतर्दशा जाननी होय तो जन्मदशाकी वर्षसंख्या- को दूसरी दशाकी वर्पसंख्यासे गुणा करे और १०८ का भागदे जो लब्धि आवे वह वर्षसंख्या जानिये, फिर १२से गुणा करके १०८ का भागदेनेसे जो लब्धि आवे सो मास जानिये, फिर ३० से गुणाकरके दिन और ६० से गुणा करके दिन भौर६० से गुणा करके परि इत्यादि निकाल - ० शुज भौम अशुभ - . ० शुभ ० शुभ शनि शनि. ० ० ० ० . ० . . (७६) ज्योतिषसार । लीजिये, और इसी क्रमसे१२० का भाग विंशोत्तरी दशा में दिया जाताहै ॥ सूर्यकी महादशाके वर्ष,६.चंद्रकी महादशाके वर्ष १५ आर्द्रा पुनर्वसु पुष्य आश्लेषा मघा पूर्वाफा उत्तराफा अंतर्दशाकम अंतर्दशाकम ग्रह व मास दिन घटी फल ग्रह वपमास दिन घटी फलं सूर्य | . ४ ० अशुभ चंद्र | २१ शुज चंद्र . भौम ० अशुभ बुध २/४१. बुध ०११/१० अशुभ अशुभ गुरु शुभ अशुभ राहु . ৩। অথম হাঙ্গ [११ शुभ शुक्र २ ०१० যুগ संख्या, १५० भौमकी महादशाके वर्ष ८ बुधकी महादशाके वर्ष १७ हस्त चित्रा स्वाती विशाखा अनुराधा ज्येष्ठा मूल अंतर्दशा अंतर्दशा यह वर्ष मास दिन घटी फल | ग्रह वर्ष मास दिन घटी फल सोम. ७३२० अशुभ बुध २१८३२० शुभ बुध ३/३/३२० शुभ | शनि ६२६४० अंशुभ शनि ८२६:४० अशुभ गुरु ११/२६४० शुभ गुरु।१४२६४० शुभ राहु ११०२ অথ राहु ०१०२०० अशुभ शुक्र । ३. ३२० शुक्र १६/२०० ०१११ अशुज रवि • अशुभ चंद्र | २.४१ शुभ चंद्र १ • शुम भौम १/३/३ संरन्या ८ संरुपा १७० ० ० शुभ रवि. संख्या ६ . ० . .6 . शुभ रवि . . • অহয় . ० . . . ० ० 0 भाषाटीकासमेत। (७७) शनिकी महादशाके वर्प१० गुरुकी महादशाके वर्ष १९ पूर्वापाटा उत्तरापाढा अभिजित् १० धनिष्ठा शततारका पूर्वाभाद्रपदा अंतर्दशा अंतर्दशा यह वर्षमास दिन घटी फल ग्रह वर्षमास दिन घटी फल शनि ० ११/३/२० अशुन गुरु ३४३२० शुन गुरु राहु २ ११००/ अशुभ ० अशुभ शुक्र शुभ शुक्र १/११/३०० शुभ रवि ० अशुभ रवि ६२० ० अशुभ चंद्र चंद्र ११४२०० शुभ जौम १४ २६/४० अशुभ भीम ८२६४० अशुभ | बुध . २११२६/४० शुभ- बुध. १६२६४० शुभ शनि १९३२० अशुभ संख्या १०० संख्या १९. राहुकीमहादशाके वर्प१२ शुक्रकी महादशाके वर्ष२२ उत्तराभाद्रपदारेवती अश्विनी भरणी रुतिका रोहिणी मृगशिर अंतर्दशा अंतर्दशा ग्रह । वर्षमास दिन घटी फल ग्रह वर्षमास दिन घदी फल ० अशुभ शुक्र शुक्र | অর্থন रवि अशुज चंद्र २ १६२०० अशुभ भीम ०.१०२० ० अशुभ बुम शुज अध शुन शनि १११ খনি ० अशुभ | गुरु शुद्ध . ० . ० शुभ . . २००४ ० o शुन १ शुज भीम . . अशुन १ . मशुत्त संख्या १२० . संख्या २१/० (७८) ज्योतिषसार। विंशोत्तरी महादशा और अंतर्दशा। जन्मनोनजनुर्भमंकहकमशोकदुकुजागुसूरयः॥ शनिचंद्रजकेतुभार्गवा परिशेषात्तुदशाधिपास्तथा ॥ टीका-जन्मनक्षत्रमें २ घटाकर ९ का भागदे शेष १ रहे तो सूर्यकी दशा, २शेप रहे तो चंद्रकी दश ३शेष बचें तो औमकी,४शेष बचें तो राहु की,५शपे रहें तो गुरुकी,६- बचें तोशनिकी, ७ शेष बचें तो बुधकी, ८शेष बचें तो केतुकी, ९ का पूरा भाग लगजाय तो शुक्रकी दशा जानिये ॥ दशाओंके वर्ष भोग्याभोग्य निकालनेकीरीति । ऋतुदिग्गिरयो धृतिर्नुपातिधृतिमैघहयो नखाः समाः।क्रमतो हिमता अथादिमाजनिभस्था घटिकाः समाहताः॥ भभोगेन भक्ताःफलंभुक्तपाकस्तदूना दशा सा भवेद्भोग्यसंज्ञा ॥ टीका-ऋतु कहिये ६, दिक् कहिये १०, गिरि कहिये, धृति कहिये १८ नृप १६ अतिधृति १९ मेघ १७ हय ७ नख २० यह वर्षसंख्या सूर्यसे शुक्रपर्यन्त लिखी है ॥ जन्म समय जिस ग्रहके जितने वर्ष होय तिन वर्षोंसे जन्मके गतनक्षत्रको गुणाकरे फिर भभोगसे भागले जो लब्धि मिले सो वर्ष फिर १२ के नागसे दिवस और शेष घटी पल फिर इनमें शुक्त वर्षमासादि घटावे तो शेप भोग्य वर्षादिक गिकल आते हैं | विंशोत्तरीक्रम कोष्ठक। कृत्तिकादिक्रमेणैवज्ञेया विंशोत्तरीदशा॥ अंतर्दशायुतावर्षमासवासरवर्तिता ॥ टीका-कृत्तिकासे लेकर भरणीपर्यंत २७ नक्षत्र और दशा वा अंत- दशा और उनके पतियोंके नाम और तिनके वर्षादि संख्याका कोष्ठक ॥ अन्यमते। स्वदंशारामगुणितातद्दशागुणितापुनः॥ खगुणेनहरेल्लब्धंवर्पमासदिनभवेत् ॥ टीका-अपनी प्राप्तदशाकों तीनसे गुणा देना जिसकी अंतर्दशा लानी होय उस को वर्षसे गुणा देना अनंतर३०से भाग लेनेसे अंतर्दशावर्षमासदिन प्राप्तहोताहै . ० . भीम . . . 1. 15 . ० . . . . शिकार . . ७ . . ० भाषाटीकासमेत। सूर्यमन्दवर्ष ६ चन्द्रकमन्दवर्ष. भीमक मन्दवप७ कृत्तिका उत्तराफा उत्तरापा. रोहिणा दस्त श्रवण मृगशिर पित्रा धनिष्ठा अन्तर्दशा अन्तर्दशा अन्तर्दशा नाम वर्ष मास दिव! घनाम वर्ष मासादिव घ० नाम वर्ष मास दिव घ० रवि चन्द्र १० भौम . ४७ चिद्र ६ भौम राह| १ ६ राहु। १।। १०२४ शनि १ गुरु शनि १७ | बुध शनि) ० ११ १२ बुध १ ५ केतु ४२७ वृध ०२० ६ कत शक्र १ २ केतु ४६ शुक्र १ रवि ६ रवि. चन्द्र राहगमन्दवप १० गुरुमन्दवर्ष १६ शानो मन्दप आा स्वाती शाततारमा पुनर्वसु पिशाखा पूवाभाद्रपदा उत्तगभाद्रपदा पुष्य अनुराधा अन्तर्दशा अन्तर्दशा अतर्दशा नाम वर्ष मास दि० घनाम वर्ष मास दिव १० नाम वर्ष मास दिव घ० राहु २ ८१२ गुरु २ ३ गुरु)२ शनि २६१२ बुध) २.८ बुध २ ३ केतु १ बुध २ ६१८ वेत ६ शक ३ २ रित १८ डाक ११ (१२ रवि चन्द्र। १ रवि १०२४ सन्द्र भीमा १ चन्द्र ६ राह| २१० ६ भामा ०१८ राहु २४ २४ गुरु। २ । ६ १२ १९ युधकीमन्दवप १७ पेतुरमन्दवप गुनका महागा व.. आक्षपा ज्येष्टा रेवती मघा मूर अश्विनी वाफाल्गुना पूजापान मरणा अन्तदशा अन्तदशा अतर्दगा नाम वर्ष मास दिव घनाम व मास दिव घ. नाम वर्ष मास दिन व. तु.४७ क केतु।०११ २७ शक्रा १ सूर्य १ डाक २२० सूर्य ६ मूर्य १० चन्द्र भाम भीम राह। ३ ०११ २७ । राह १ ०१८ गुरु शनि २ ३ १६ १७ शनि ११।९। बुध २१ शनि२॥ वुध केह।। ४२४ . शनि २ २ . . . 10 . ८ . 0 . c . ९ २८ ७ . . . १ ९ . भीम ० २१ २ बुध २ . . . . ८ . . ७ . . . . ट ८ . .

(८०) ज्योतिषसार। महादशा और अंतर्दशाओंके फल । रविकीदशा। देशांतरंचनिजबंधुवियोगदुःखमुढेगरोगभयचौरभयाचपीडा ॥ पूर्व- स्थितस्य निखिलस्य धनस्यनाशोभानोर्दशाजननकालदशाभवंति टीका-देशांतरवास नाताका वियोगदुःख मनको उद्वेग रोगक्षय चौरपीडा और संचित धनका नाश करै यह रविदशाका फलहै ॥ चन्द्रान्तर्दशा। हेमादिभूतिवरवाहनयानलाभः शत्रुप्रतापवलवृद्धिपरंपराच॥ इष्टान्नदानशयनासनभोजनानिनूनसदाशशिदशागमनेभवंति॥ टीका-सुवर्ण आदिक ऐश्वर्यका और अश्व गज पालकी इत्यादि वाहनोंका लाभ शत्रुका पराजय बलकी वृद्धि और नाना प्रकारके सुरस अन्नदान शयन स्थान उत्तम आसन भोजन ये संब चंद्रमाकी दशामें प्राप्त होतेहैं ॥ भौमकीअंतर्दशा। भूपालचौरभयवह्निकृताचपीडासागरोगभयदुःखसुदुःखिताच ॥ चिंताज्वरश्चबहुकप्रदरिद्रयुक्तःस्यात्सर्वदाकुजदशाजननेभवंति। टीका-राजा और चोरोंसे भय और अमिसे पीडा सर्व अंगरोग सदा दुःखी और नानाप्रकारकी चिंता ज्वर अत्यंतकष्ट ये सब भौमकी दशामें मनुष्य भोगते हैं। राहुकीअंतर्दशा। दीनोनरोभवतिबुद्धिविहीनचिंतासागरोगभयदुःखसुदुःखिताच ॥ पापानिबंधपहुकप्रदरिद्रयुक्तंराहोर्दशाजननकालदशाभवति ॥ टीका-मनुष्य बुद्धिहीन और दीन होय चिंतायुक्त और सर्व शरीरको अत्यत रोगाय रहै और दुःख बंधन क्ट वहत दरिद्रता यह राहुकी अंतर्दशाका फल जानिये ।।

भाषाटोकासमेत। (८१) गुरुकी अंतर्दशा। राज्याधिकारपरिवदितचित्तवृत्तिधर्माधिकार- परिपालनसिद्धिबुद्धिः ॥ सद्विग्रहोपिधनधान्य- समृद्धिताचस्यादेवतागुरुंदशागमने भवंति ॥ टीका-राज्याधिकार और चित्तकी वृत्ति धर्ममें निष्ठा शरीरकी आरो- ग्यता निश्चय करके धन धान्यकी वृद्धि यह गुरुकी दशाका फल जानिये।। शनिकी अंतर्दशा। मिथ्यापवादवबंधनमर्थहानिर्मित्रेचबंधुवचनेषुचयुद्धबुद्धिः ॥ सिद्धचकार्यमपियत्रसदाविनमुस्यात्सर्वदाशनिदशागमनेभवन्ति ।। टीका-मिथ्यापवाद दूसरेका हनन बंधन द्रव्यका नाश मित्र तथा बांधवोंसे कलहकी बुद्धि और कार्यभी नष्ट होजाय यह शनिकी अंतर्द- शाका फल जानिये ॥ बुधकी अंतर्दशा। दिव्यांगनामदनसंगमकेलिसौख्यं नानाविला- समभिरागमनोभिरामम् ।। हेमादिरत्नविभवागम- केशध्यानं स्यात्सर्वदाबुधदशागमनेभवन्ति ।। टीका-सुंदर स्त्री सुख और सर्व प्रकारके भोग विलास सुवर्ण और रत्न आदिकी प्राविधनसंग्रह ईश्वरस्मरण इत्यादि बुधको अंतर्दशामें फल जानिये. केतुकी अंतर्दशा। भार्यावियोजगनितंचशरीरदुःखद्रव्यस्यहानि- रतिकटपरम्पराचे ॥ रोगाश्चधुकलहश्च विदेशता च केतोर्दशाजननकालदशाभवन्ति । टोका-त्रीवियोगसे शरीरको दुःस द्रव्यकी हानि कट रोग और बंधु कलह देशांतरगमन यह केतुकी दशाका अशुभफल है । है .. . (८२) ज्योतिषसार। शुक्रदशाका फल। आरामवृद्धिपरिसर्वशरीरवृद्धिः श्वेतातपत्रध- नधान्यसमाकुलंच ॥ आयु-शरीरसुतपौत्रसु- खनराणांद्रव्यंचभार्गवदशागमनेभवंति ॥ वीका-बाग आदिक स्थानप्राप्ति और शरीर पुष्ट श्वेत छत्रिकी प्राप्ति धन धान्यकी वृद्धि आयुकी और पुत्र पौत्रकी वृद्धि द्रव्यकी प्राप्ति यह शुक्रर- शाका फल जानिये ऐसेही सर्व ग्रहोंकी महादशाओंके फल जानिये ॥ योगिनीदशाके स्वामी। अथासामधीशा क्रमान्मंगलायाः शशीतीक्ष्णभानुमुरुभूमिसूनुः बुधःसूर्यसूनुर्भृगुः सिंहिकाया सुतःसंकटायास्तथांतेचकेतुः ॥ टीका-मंगलादिक दशाके स्वामी चंद्र सूर्य गुरु मंगल बुध शनि, शुक्र राहु केतु संकटा दशाके स्वामी ये मंगलादिक दशाके स्वामी कमसे जानना ॥ योगिनीदशाक्रम । स्वरूपिनाकिनयनै संयोज्यं वसुभिर्भजेत् ।। योगिन्यष्टोसमाख्याताशून्यपातेनसंकटा॥ टीका-जन्म नक्षत्रमें तीन अंक मिलावे और आठका भागदे शेष अंक रहें सो मंगलादिकदशा क्रमसे जानिये इनका क्रम कोष्ठकमें लिखाहै ॥ योगिनीदशाके नाम । मंगला पिंगला धान्या भ्रामरी भद्रिकापि च ॥ उल्कासिद्धासंकटाचयोगिन्यौदशाःस्मृताः॥ टीका-मंगला पिंगला धान्या चामरी भदिका उल्का सिद्धा संकटा ये आठों योगिनीदशाओंको क्रममे जानिये ॥ वर्षसंख्या । एकत्रिीणि वेदाश्च पंचपदसप्तमानिच ॥ अएवाणिहि भवेन्मंगलादावनुक्रमात् ॥

सकटा व भाषाटीकासमेत। (८३) टीका-मंगलादिदशाओंके नाम- पृथक् . २ और वर्ष संख्या दिवस करि तिनमें अन्तर्दशा लानेका क्रम प्रथम दशा चर्प एक तिसके दिवस ३६० दिन तिनमें ३६ का भागदे लब्धिको अन्तर्दशा स्पष्ट जानिये और इसी रीति अनुसार दशा और अन्तर्दशा निकाल लीजिये ॥ अन्तर्दशा। अथान्तर्दशाया प्रकारंप्रवच्मिदशावापिकंस्वस्ववर्पेणगुण्यम् । ततःपत्रिभिलब्धवादिकासासदाखेटविद्भिर्विधेयाफलार्थम् ॥ टीका-प्राप्त दशासे जिस दशाका अंतर करना होय उसके वर्पसंख्यासे प्राप्त दशाको गुण देना उसमें ३६ का भाग देनेसे अंतर्दशा होताहै-आगे चक्रमे स्पष्ट प्रतीत होगा। मिगलाकेयर्प । विगलाके | धान्याक भ्रामरी ( भद्रिका | उल्का सिहा १तिसके वर्ष २ वर्ष ३ वर्ष ४ वर्ष ५ वर्ष वर्ष ७ दिन३६० दि०७२० दि १०८० दि १४४० दि १८०० दि २१६० दि २५२० दि २८८०. मगला। २०६।४धा । ९२ मा १६ मा२५३६० सि ४१० म ६४० पिगला २०धा ६० मा १२० भ२००३०० सि १२० स १६० म धान्या ३० मा ८० म १५० उ२४० सि ३५० स २८० म ७० वि १६ भ्रामरी २० भ_१०० उ_१८० सि २८० स २०० म ६० पि १४०/धा २४० भद्रिका ५०/उ १२० सि २१० स ३२० म ५० मि १२० धा २१० भ्रा ३२० उल्का ६० सि १४० स २४० म ४० पि १०० धा १८० भ्रा २८० भ 200 सिद्धा। ७.स १६ म ३० पि ८०धा १५० भ्रा २४० म ३५० उ ४०० २० पि ६० पा १२० मा २०० भ३००३।२० सि ५६० जोड ३६० ३६ वर्षमें ८ योगिनीकी दशा बीत जातीहै और वारंवार इसी क्रमानुसार जानिये। दशाकाफल। वैरिणान्तुविपदाविनाशिका वाहनादिवसुरत्नलाभदा ॥ कामिनांसुतगृहादिलाभदा मंगला सकलमंगलोया ॥ टीका-शत्रुके उपद्रवका नाश-और घोडा हाथी सुवर्ण रत्न आदिका लाभ और स्त्री पुत्र ग्रहादिकका लान-और मंगलादि कार्यका उदय होना यह मंगला दशामें फल जानना ॥ सकटा ८०म . ७२०० १८०० २६ २५२०० २८८.

(८४) ज्योतिषसार। दुःखशोककुलरोगवर्धिता व्यग्रताचकलहः स्वजनैश्च ॥ अंशभागकथिता फलदासौ पिंगलाचविदुपांसुखदादौ ॥ टीका-दुःख शोक कुलमें रोग वृद्धि-चित्तमें व्याकुलता-बंधुनमें वैरपिं- गला आदिमें सुख देतीहै तिसके अनंतर लिखा फल पिंगलाका जानना ॥ धनधान्यवृद्धिधरानाथमान्यं सदायुद्धभूमौजयधैर्यवंतः॥ कलत्रांगनानांसुखचित्रवस्त्रैर्युतधान्यकाधान्यवृद्धिंकरोति ।। टीका-धनवृद्धि धान्यवृद्धि राजपूजनीय सर्वकाल युद्ध भूमिमें जय धैर्य- युक्त स्त्री पुत्रका सुख और चित्रवस्त्रयुक्त धान्या दशाका यह फल जानना, विदेशेभ्रमंहानियुद्धेगताश्च कलत्रांगपीडासुखैर्जितत्वम् । ऋणंयाधिवृद्धिर्जनानां प्रकोपंदशाभ्रामरीभ्रामयेत्सर्वदेशम् ॥ टीका-विदेशमें चमण, युद्धमें हानि, स्त्रीको पीडा-सुखहीन ऋणयुक्त रोगवृद्धि-जनका प्रकोप-सर्व देशमें भ्रमण यह भामरीदशामें फल जानना. धनानंदवृद्धिर्गुणानांप्रकाशं समीचीनवस्त्रागमंराजमान्यम् । अलंकारदिव्यांगनाभोगसौख्यं सदाभद्रिकाभद्रकार्यकरोति। टीका-धनकी वृद्धि, आनंदकी वृद्धि, गुणका प्रकाश, उत्तम वस्त्रप्राप्ति, राजमान्य भूपणकी प्राप्ति-स्त्रीमोगादिका सौख्य और कल्याण यह भद्विका दशामें फल जानना ॥ भ्रमंव्याधिकष्टज्वराणांप्रकोपंधनादेशदारादिकानांवियोगम्।। स्वगोत्रैर्विवादसुहृदधुवैरं दशाचोल्ककानर्थकारी सदैव ॥ टीका-भ्रमण रोग दुःख जरका कोप धनवियोग देशवियोग स्त्री- वियोग गोत्रमें कलह-मित्र बंध इनसे वैर और नानाप्रकारके अनर्थ यह उल्कादशामें फल जानना ॥ राज्याभिमानस्वजनादिसौख्यं धान्यादिलाभंगुणकीर्तिसिद्धिम्।। राज्यादिलाभंसुतवृद्धिसौख्यं सिद्धंचसिद्धा प्रकरोति पुंसाम् ।। टीका-राज्यप्राप्ति अभिमान-अपने गोत्रमें सुख देखना-धान्य आदिका लान गुणसिद्धि-कीर्तिसिद्धि-राज्य आदिका लाज-पुत्रवृद्धि-सुख और सर्वकार्यकी सिद्धि यह सिद्धादशामें फल जानना ॥

भापाटीकासमेत। (८५) जनानांविवादज्वराणांप्रकोपं कलवादिकष्टंपशूनांहिनाशम् ॥ गृहेस्वल्पवासंप्रवासाभिलापं दशासंकटा संकटं राजपक्षात ।। टीका-जनामें कलह-ज्वरकी पीडा-त्रीआदिकका कष्ट और पशुओं- का नाश घरमें थोडा वास प्रवास अभिलाप राजपक्षसे संकट यह मंकटा दशाका फल जानना चाहिये । मंगलामंगलानंदयशोदविणदायिनी ॥ पिंगलातनुतेव्याधि- म्मनतोदुःखसंभ्रमौ ॥ ४ धान्याधनसुहृदधुरूपसीमन्ति- नीकरी ॥ भ्रामरीजन्मभूमिनी भ्रामयेत्सर्वतोदिशम् ॥ भद्रिकासुखसंपत्तिविलासवशदायिनी ॥ उल्काराज्यधना रोग्यहारिणीदुःखकारिणी । सिद्धा साधयते कार्य नृणांवसु- खदा भवेत् ॥ संकटा संकटव्याधिमरणक्लेशकारिणी ॥ टोका-मंगला दशाका फल शुभ कार्य आनंद यश और द्रव्यप्राप्ति और पिंगलाका शरीरको व्याधि और मनको दुःख तथा श्रम, धान्याको फल धनमित्र बंधमिलाप आरोग्यता और सुंदरता, भामरीका फल स्थान- नाश दिशास्त्रमण, अद्रिकाका सुख संपत्ति विलास यश इत्यादि, उल्काका राजाय धननाश रोगग्रस्तता और पीडा, सिद्धाका कार्यसिद्धि और मुख पानि,संकटाका फल व्याधि मरण क्लेश इति ॥ रविदिननखसंख्याचंद्रमाव्योमबाणः क्षितितनयगजाश्वीचंद्र- जापट्शराश्च ।। शनिरसगुणसंख्या वाक्पति गवाणेर्नयनयु- गकराहुः सप्ततिःशुक्रसंख्या ॥ जन्मना विंशतिःसूर्ये तृतीये दशचंद्रमाः चतुर्थे भौमचाष्टौच षष्ठे बुधचतुर्थकम् ॥ सप्तमं दशौरिःस्यानवमेचाष्टमेगुरोः॥ दशमेराहुविंशत्या तदूर्ध्वतु भृगोर्दश॥॥ फलम् ॥ पंथाभोगोनुतापश्च सौख्यंपीडापन क्रमात ।। नाशःशोकश्चसौख्यंच जन्मसूर्यदशाफलम् ॥ टीका-वर्पदशाका आरंभ ताको क्रम-जा मासमें जाके जन्मराशिके सूर्य होय सो द्वादशस्थान भोगतेहैं और सब दशाका क्रम इस रीतिपरहै।

(८६)
ज्योतिषसार।
२० दिवस सूर्यकी दशा जन्मस्थानसे जानिये तिसका फल
मार्ग चलना, ५० दिवस चंद्रमाकी दशा, तीसरे स्थानके १० दिवस रवि
भोगतेहैं तिसका फल नाना प्रकारके उत्तम भोग ।
२८ दिवस मंगलकी दशा चौथे स्थान आठदिवस रवि भोगते,
तिसका फल रोग और तृप्तता होय ॥
५६ दिवस बुधकी दशा छठे स्थान ४ दिवस रवि भोगते, तिसका
फल सुखकारक होय ॥
३६ दिवस शनिकी दशा सप्तम स्थान १० दिवस रवि भोगते
ताको फल पीडाकारक जानिये ॥
५८ दिवस गुरुकी दशा नवमस्थान ८ दिन रवि भोगते, तिसका
फल धन प्राप्ति ॥
४२ दिवप्त राहुकी दशा दशमस्थान २७दिन रवि भोगतेहे तिसका फल
नाना प्रकारका शोच ॥
७० दिवस शुक्रकी दशा द्वादश स्थानमें रवि संपूर्ण भोगते हैं तिसका
फल सर्व सुखकारक जानिये ॥
ग्रहोंकी नित्यानित्यदशाओंका प्रकार।
तिथिवारंचनक्षत्रं नामाक्षरसमन्वितम्।।नवभिश्चहरेद्भागं शेपं
दिनदशोच्यते ॥ रविचन्द्रौ भौमराहू गुरुमंदज्ञकोसताः ॥
क्रमणकादशाज्ञेया फलंपूर्वोक्तमेवहि ॥
टीका-गतिथि और वार नक्षत्र और अपने नामके अक्षर सबको
इकडे करके ९ का भागदे शेप १ रहे तो रविकी दशा,२ बचे तो चंद्रमा
की, ३ शेप बचें तो भौमकी दशा, ४ शेप रहैं तो राहुकी, ५ बचे तो
गुरुकी, ६ शेप रहें तो शनिकी, ७ शेप बचे तो बुधकी,८ शेप रहें तो
केतुकी, और परा भाग लगिजाय तो शुक्रकी दशा जानिये; इसी प्रकार
नित्यदशा क्रमसे जानिये और फल वर्पदशाके तुल्य जानिये ॥

भाषाटोकासमेत। (८७) दूसरामता जन्मताराचतुर्गुण्यं तिथिवारसमन्वितम् । नवभिस्तुहरेद्भागं शेषदिनदशोच्यते ॥ रविणाशोकसंतापी शशांकेक्षेमलाभ- कौ ॥ भूमिपुत्रेतु मृत्युःस्याद्दधेप्रज्ञाविवर्द्धनम् ॥ गुरोवित्तं भृगोसौख्यं शनौपीडा न संशयः ॥ राहुणाघातपातौच केतो मृत्युर्दशाफलम् ॥ टीका-जन्मनक्षत्रको चतुर्गुण करै उसमें गततिथि और वार मिलाके नव ९ का भागदे १ शेप रहें तो एक दिनकी रविकी दशा जानिये--फल शोक संतापकारक, २शेष रहैं तो चंद्रमाकी दशाफल कल्याण व लाभ- कारक, और३शेष रहें तो मंगलकी दशाफल नृत्युकारक, ४ शेष रहें तो बुधी दशाफल बुद्धिवृद्धि,५शेप रहें तो गुरुकी दशा, फल वित्तप्राप्ति, दबचें तो शुक्रकी दशाफल सुखकारक ७ शेष रहे तो शनिकी दशा, फल पीडाकारक, ८ शेप रहैं तो राहुकी दशा, फल घातक और जो भाग पूरा लगजाय तो केतुकी दशा, फल मृत्यु इस प्रकारसे फल जानिये ॥ गोचरप्रकरण। ग्रह कितने मास एकर राशिको भोगताहै। मासंशुक्रबुधादित्याः सार्द्धमासंतुमंगलः ॥ त्रयोदशगुरुश्चैव सपादद्वेदिनेशशी ।। राहुरष्टादशान्मासान् त्रिशन्मासान्शन- श्वरः॥ राहुवत्केतुरुक्तस्तु राशिभोगाप्रकीर्तिताः॥ फल। सूर्य पंचदिनशशीत्रिपटिका भौमोटवैवासरं सप्ताहंयुशना बुधस्त्रयदिन मासद्वयंवैगुरुः ॥ पण्मासं रविजस्तथैवसततं स्वर्भानुमासद्वये केतोश्चैवतथाफलं परिमितं ज्ञेयंग्रहाणां फलम् ॥ राशिप्रवेशेसूर्यारौ मध्येशुकबृहस्पती ॥ राहुश्चंद्रः शनिश्चांते सौम्यश्चैव सदाशुभः॥ टीका-उनके दिनोंकी संख्याका क्रम अनुकमसे लिखतेहैं ।

(८८) ज्योतिपसार । सूर्य-एकमास एक राशि भोगतेहैं उसमें प्रथम पांच दिन फल देतेहैं । चंद्रमा-सवादोदिन एकराशिभोगतेहैं और अंतकी३घटिकाफलदेते हैं। मंगल-डेढमास एकराशि भोगतेहैं और प्रथम ८ दिवस फल देतेहैं । बुध-एकमास एक राशिको भोगतेहैं और सर्व दिवस फल देतेहैं । गुरु-त्रयोदश १३ मास एक राशि भोगतेहैं तिसका फल मध्यम भागके दोमास जानिये ॥ शुक्र-एक मास एक राशि भोगतेहैं और मध्यम भागमें सात दिवस फलदेतेहैं शनि-तीस ३० मास एक राशि नोगतेहैं और अंतके६महीने फल देतेहैं। राहु और केतु--अठारह मास एक राशि भोगतेहैं और अंतके दोमास द्वादशभवनके स्थानोंके शुभाशुभफल द्वादश स्थानोंके नाम। तत्रादौतनुधनसहजसुहृत्सुतपरिपवश्च ।। जायामृत्युधर्मकायव्ययाख्यानि द्वादशभवनानि । स्थानानुसार फल। सूर्यःस्थानविनाशं भयंश्रियमानहानिमथदैन्यम् ॥विजयमार्गपी- डांसुकृतंहति सिद्धिमायुरथहानिम् ॥ चंद्रोनंचधनसौख्यं रोगं कार्यक्षतिश्रियम् ॥ स्त्रियंमृत्युनृपभयं सुखमायव्ययंक्रमात् ॥ भौमोरिभीति धननाशमर्थ भयंतथार्थक्षतिमर्थलाभम् ॥ धना- त्ययं शत्रुभयंचपीडां शोकंधनहानिमनुक्रमेण ॥ बुधस्तु बंधं धनमन्यभीति धनरुजं स्थानमथोचपीडाम् ॥ अर्थरुज सौख्यमथात्मसौख्यमर्थक्षति जन्मगृहात्करोति ॥ गुरुर्भयं धनकेशं धननाशं सुखंशुचम् ॥ मानरोगं सुखदैन्यं लाभंपी- डांच जन्मभात् ॥ कविःशत्रुनाशं धनसौख्यमर्थ सुताप्ति रिपोः साध्वसंशोकमर्थम् ।। बृहद्वस्त्रलाभं विपत्तिधनाप्ति धनाप्तितनो- D सुख भाषाटीकासमेत। (८९) त्यात्मनोजन्मराशेगाशानिःसर्वनाशं तथावित्तनाशं धनंशवृद्धि सुतादेःप्रवृद्धिम् । श्रियंदोषसंधि रिपुंद्रव्यनाशं तथा दौर्मनस्य दिशद्वनर्थम् ॥ राहुनि तथानःस्वं धनवैरं शुचं श्रियम् ॥ कलिंपसुंचदुरितं वैरसौख्यं शुचंक्रमात्॥केतुः क्रमाद्रुजवैरं सुखं भीति शुचंधनम् ॥ गतिंगदं दुष्कृतंच शोक कीर्तिचशत्रुताम् ॥ टीका-इसका अर्थ आगे चक्रमें स्पष्ट देख लेना ॥ गोचरचक्रम् । नाम । रवि मगल बुध गुरु शुक्र शनि । राहु । केतु तनु नाश अनप्राशत्रमय । यधन भय शत्रुनाश सर्वनाश हानि रोग धन भय धनप्रा० धनना० धनप्रा० धनप्रा०, धनमाणवित्तना धनलाभ, वर सहज धन पनमा० भीनिलेश सौरय धनला धनप्रा० सुख सुहन् । मानहा रोग भय धनप्रा. धनना धनप्राशन वर भय सुत दैन्य शर्यशय अर्यप्रा. रोग सुख पुत्रप्रा० सुतप्रा० शोच शोच रिपु विजय लक्ष्मी लाभ स्थानला शोक रिपुभय! धनप्रा०, लक्ष्मी धनप्रा०) जाया मार्ग रक्ष्मा खर्च पीडा मान शोक } दोप कलह मार्गक्रम मृत्यु पीडा मत्यु शत्रुभय अर्थप्रा. गेग धनप्रा० रिपु धनला, रोग धर्म पुण्यना० राजभय पीटा रोग सुख वस्त्रला धनना० पापम दृष्टकर्म कर्म मिद्धी सुख शोक सौस्य दैन्य विपत्ति अस्वा. वर शोक आय लाभ आय धनप्रा० सीरय लाभ धनप्रा. धनप्रा. सौख्य कीति व्यय हानी ,खर्च हानि (नाश । पीडा धनमा धननाशुचि शत्रुनाशा वेधचक्रमाह। सूर्योरसांत्ये खयुगानिनदे शिवाक्षयोभॊमशनीनभश्च ॥ र. सांकयोलाभशरेगुणान्त्ये चन्द्रोवराब्दौ गुणनंदयोश्च ॥ ला- भाष्टमे चायशरे रसांत्ये नगदयेज्ञोद्विशरेब्धिरामे ॥ रसांक- योनांगविधौखनागे लाभव्यये देवगुरुशराब्धौ ॥ यंत्येनवां शेद्विगुणेशिवाही शुक्राकुनागे द्विनगेग्निरूपे ॥ वेदांवरंपंचनि- धौगजेशौ नदेशयोर्भानुरसे शिवानौ ॥ क्रमाच्छुभौविद्धइति ग्रहःस्यात् पितुम्सुतःस्यान्ननेवधमाहुः ॥ दुष्टोपिखेदो विपरी तवेधाच्छुभोतिकोणे शुभदः सितेन्जे ॥ स्वजन्मराशेरिनवे चंद्रस्य (९०) ज्योतिषसार। धमाहुरन्यग्रहाधिष्ठितराशितःस्युः ॥ हिमाद्रिविंध्यांतरएववेधो नसर्वदेशेष्वितिकाश्यपोक्तिः॥ टीका-जन्म राशिसे और ग्रहके गतिसे गोचरका शुभाशुभ फल लिखे और ध्रुवांकसे ज्ञात करे जैसा सूर्य जन्मस्थानसे पष्ठस्थानमें शुभ जो द्वादश स्थानमें शुभग्रह होय तो शुभ अशुभ और जो अशुभ होय ऐसा सर्व ग्रहवेध जानना-परंतु पिता पुत्र सूर्य शनि चंद्र बुध इनका परस्पर वेध नहीं होय तो जन्मस्थानसे द्वादशस्थानमें सूर्य होय और शनि पष्ठ स्थानमें होय अथ- वा अन्यग्रह होय तो विपरीत वेध शुभ जानना. हिमाद्रि और विंध्य इनके अंतरमें यह वेध है अन्य देशमें नहीं जानना ऐसा कश्यपऋषि कहते हैं । वेधचक्रम्। रवेः म.श.रा. बुधस्य ६/१०३/११/६/११/३/१०/३/११/१६ १२/४९/५९९५१२४९८५/१२/२/५३/९ गुरोः शुक्रस्य १०/११:५ ७/११/१२/३/१/५/८/९/१२/११ 19/८/३२१४ |१२|१०|३|01८७१/१०/९/ ११/६/३ जन्मके चंद्रमामें पांचकर्म वर्जनीय। जन्मस्थः शशांकेतु पंचकर्माणि वर्जयेत् ॥ यात्रां युद्धं विवाहं च क्षौरंच गृहवेशनम् ।। टीका-यात्रा और युद्धका जाना विवाह और क्षौरकर्म करना तथा गृहप्रवेश ये पांच कर्म जन्मके चंद्रमामें वर्जितहैं। नेष्टस्थानके अनुसार चंद्रमाका उक्तवल। द्विपंचनवमेशुक्के श्रेष्ठश्चंद्रोहिउच्यते ॥ अष्टमेद्वादशेकृष्णे चतुर्थे श्रेष्ठ उच्यते । शुक्लपक्षे वलीचंद्रः कृष्णेतारा बलीयसी ॥ टीका-दूसरे पांचवें अथवा नवमें स्थानमें चंद्रमा होय तो शुक्लपक्षमें -- ३ भाषाटोकासमेत । (९१) श्रेष्ठ जानिये, तैसेही कृष्णपक्षमें आठवें बारहवें चौथे स्थानका श्रेष्ठ परंतु शुक्लपक्षमें चंद्रमावल और कृष्णपक्षमें ताराबल ऐसे श्रेष्ठ जानिये ॥ ग्रहोंके नेष्टस्थान। ये खेचरा गोचरतोष्टवर्गादशाक्रमाद्वाप्यशुभाभवंति ॥ दानादिना ते सुतरां प्रसन्नास्तेनाधुना दानविधि प्रवक्ष्ये ॥ टीका-गोचरका अथवा अष्टवर्गका किंवा दशाकमका जो ग्रह नेष्ट स्थानी होय उसके प्रसन्न करनेके लिये दान करावै इस कारण अब दानकी विधि कहतेहैं । वारोंकेअनुसारदान । भानुस्तांबूलदानादपहरतिनृणां वैकृतं वासरोत्थंसोमःश्रीखं- डदानादवनिवरसुतो भोजनात्पुष्पदानात् ॥ सौम्य शास्त्र- स्य मंत्राद्गुरुहरभजनाद्भार्गवःशुभ्रवस्त्रात्तैलस्रानात्प्रभाते दि- नकरतनयोब्रह्मनत्यापरेच ॥ टीका-सूर्य तांबूलदानसे. चंद्रमा चंदनके दानसे, मंगल भोजन और पुष्प दानसे, बुध शास्त्रोक्त मंत्रके जपसे, गुरु शिवके आराधन और गोज- नसे, शुक्र श्वेतवस्त्रसे और शनि प्रातःकाल तैलस्नान और विप्र सन्मानसे अपने अपने अशुभ फलोंको दूर कर शुभ फलदायक होते हैं । गहोंकेदान और जप। रवि ॥ माणिक्यगोधूमसवत्सधेनुः कोसंभवासोगुडहेमताम्र म् ॥ आरक्तचंदनमंधुजंचवदंतिदानहि विरोचनाय ।। चंद्र मा॥ सदंशपात्रस्थिततंदुलांश्च कर्पूरमुक्ताफलशुभ्रवस्त्रम् ॥ युगोपयुक्तं वृपभंचरौप्यं चंद्राय दद्यावघृतपूर्णकुंभम् ॥ भौ- म । प्रवालगोधूममसूरिकाश्च वृपोरुणश्चापिगुडासुवर्णम् ॥ आरक्तवस्त्रं करवीरपुष्पं ताम्रचभौमायवदंतिदानम् ॥बुध ।। वृपंचनीलंकलधौतकांस्यं मुद्राज्यगारुत्मतसर्वपुष्पम्।। दासी - (९२) ज्योतिषसार। चदंतोद्विरदश्चनूनंवदंतिदानंविधुनंदनाय ॥ गुरु ॥ शर्कराच रजनीतुरंगमः पीतधान्यमपिपीतमंवरम् ।। पुष्परागलवणंस- कांचनप्रीतयेसुरगुरोः प्रदीयते ॥ शुक्र ॥ चित्रांवरं शुभ्रतुरं- गमंचधनुश्चवज्ररजतंसुवर्णम् ॥ सतंदुलानुत्तमगंधयुक्तंवदंति दानंभृगुनंदनाय ॥ शनि ॥ मापाश्चतैलं विमलेंद्रनीलंतिला कुलत्थामहिपीचलोहम् ॥ कृष्णाचधेनु प्रवदंतिनूनं तुष्टचेच दानंरविनंदनाय ॥ राहु ॥ गोमेदरत्नंचतुरंगमश्चसुनीलचैला मलकंबलंच ॥ तिलाश्वतैलंखलु लोहमिथस्वर्भानवेदानमि दंवदंति ॥ केतु ॥ वैडूर्यरत्नंसतिलंचतैलंसुकंबलाश्चापि मदो मृगस्य ॥ शस्त्रंचकेतो परितोपहेतोछागस्यदानकथितंमुनी न्द्रैः ॥ ग्रहोंकाजप ॥रवेःसप्तसहस्राणि चंद्रस्यैकादशैवतु ॥ भौमेदशसहस्राणि बुधेचाष्टसहस्रकम् ॥ एकोनविंशति वेशु क्रएकादशैवतु ॥ त्रयोविंशतिमदेचराहोरष्टादशैवतु ॥ केती सप्तसहस्राणि जपसंख्याप्रकीर्तिता। रवि.। चन्द्र । मगल वृध गुरु शुक्र शनि केतु वेणुपान माणिक युक्ततदुल मूगा कालावै, शर्करा चित्रवस्त्र उडद गोमेद गेहूकर्पूर गेह मोना हलद श्वेतअसेल घोटा रत्न मसूर साम्पा घोडा गाय नीलब: तिल रक्तवस्त्र श्वेतवस्त्र तानबेल मूगा पीतअन्न वन तिल कबल | तेल गूलर श्वेतबेल गुड वृत पीतव० रूपा कुलथी तिल कबल सोना रौप्य सोना गारुत्मत, पुष्परा. सोना । भेस तेल । कस्तूरी ताबा रूपा लालवन' सर्वपुप्प नोन ताबूल लोहा । रोहा रक्तचंद घृतकुंभा कनेरपु.) दासी सोना चदन कृष्णगो का पू० नंठा कमल तारा 'हस्तिदत ७.०० ११०००/१०००० ८००० १९०००११०००२३००-१८ ग्रहपीडानिवारणार्थ। देवत्राह्मणवंदनाद्गुरुवचःसम्पादनात्प्रत्यहं साधूनामपिभापणा च्छुतिरवश्रेयःकथाकारणात् ॥ होमादध्वरदर्शनाच्छुचिमनो- भावाजपादानतोनोकुवैतिकदाचिदेवपुरुपस्यैवं ग्रहा-पीडनम् ॥ नाम राहु गोवत्स मोति नील . . १ C जप भाषाटीकासमेत। टीका-देव और बालणको सादर नमस्कार करे और प्रतिदिन गुरु और साधुओंसे भाषण तथा उत्तम २ कथा श्रवण करे. होम तथा यज्ञके दर्शन करे और शुद्ध मनके भावसे जपदान करे, जो ग्रहोंके निमित्त ऐसे उपाय करें तो पीडा निवृत्त होजाय और शुभफल मिले ॥ जातकर्म। जातेपुत्रेपिताकुर्यान्नांदीश्रादंविधानतः ॥ जातकर्मततःकुर्यादन्यैरालंभनात्पुरा ॥ टीका-पुत्र उत्पन्न होनेपर पिता तत्काल नांदिश्राद्ध विधिपूर्वककरे तिसपीछे जबतक कोई अन्यजाति बालकको स्पर्श न करें उससे प्रथम जातकर्म करें। नामकरणम् । पुष्यार्कवयमैत्रभेतुमृगभेज्येष्टाधनिष्टोत्तरादित्याख्येपुचनामक म शुभदंयोगेप्रशस्तेतिथौ ।। अहिदादशकेतथान्यदिवसे शस्ते तथैकादशे गोसिंहालिघटेषुह्यर्कबुधयोर्जीवेशशांकेपिच ॥ टीका-पुष्य हस्त चित्रा स्वाती अनुराधा मृग ज्येष्ठा धनिष्ठा उत्तरात्रय पुनर्वसु ये नक्षत्र शुभ कहिये जन्मसे ११ अथवा १२ दिवस उक्त हैं,और दूसरे मतके अनुसार १६।२० । २२। १००।ये दिवस उक्त हैं. और वृष सिंह कुंभ वृश्चिक ये लग्न शुभहैं और रवि बुध गुरु शुक्र शशांक अर्थात् चंद्रवार शुभहै रिक्ता तिथि और दुष्ट योगादिक नामकरणमें वर्जितहैं ।। नामकाअवकहडाचक। चूचेचोलाऽश्विनीप्रोक्ता लीलूलेलो भरण्यथ ॥ आईऊएकृत्ति कास्यादोवाविवूतु रोहिणी । वेवो काकीमृगशिरः कूघङछा- स्तथाईकाकोहाहीपुनर्वसुहेहोडातुपुष्यभम्॥ डीडूडेडो तुआश्लेपामामीमूमेमपास्मृता ॥ मोटाटीटूपूर्वफल्गुटेटोपा- प्युत्तरातथा ॥ पूषणाढाहस्ततारापेपोरारीतुचित्रिका ॥रूरे- रोतास्मृतास्वाती तीतूततो विशाखिका ॥ नानीनूनेनुराध- (९४) ज्योतिषसार । क्षेज्येष्ठानोयायियूस्मृता ॥ येयोभाभीमूलतारापूर्वाषाढाबु धाफढा ॥भेभोजाज्युत्तराषाढा जूजेजोखाभिजिद्भवेत् ॥खी खूखेखोश्रवणभं गागीगूगेधनिष्ठिका ॥ गोसासीसूशतभिष- क्सेसोदादीतुपूर्वभाव।।दुथाझभयथाज्ञेयो देदोचाचीतुरेवती । अश्विनी हो। पुप्य स्वाती अभिजित ला रो ता ती ली डी खी भरणी आश्लेपा विशाखा श्रवण खे खो डो तो শ गा गी मवा अनुराधा धनिष्ठा ने नो |ग या रोहिणी मी टा टी पूर्वाफा. ज्येष्टा वा सी शततारका यी ये यो सो वो का की मृग उत्तराफा. मामूल दा पूर्वाभाद्रपदा भी दी बू दु आदी पू पा णा हस्त पूर्वापाढा -उत्तराभाद्रपदा डा दे के को चित्रा भो पुनवसु उत्तराषाढा रेवती ही जी) मंचकारोहण। शशितरंगधनिष्ठारेवतीपुष्यचित्रा शतभिपगनुराधान्युत्तरा भाषाटीकाससमेत। (९५) स्वातिहस्ताः॥ बुधगुरुभृगुवारे सौम्यलग्नेर्भकस्य निगदित - मिहपूर्वैर्मचकारोहणंतु ॥ टीका-मृगशिर अश्विनी धनिष्ठा रेवती पुष्य चित्रा शतभिषा अनुराधा तीनों उत्तरा स्वाती हस्त इन नक्षत्रोंमें और बुध शुक्र गुरु ये वार और तुल वृश्चिक कुंभ इन लनोंमें शिशूको पूर्वदिशाको शिर करके प्रथम मंच- कारोहरण करावे तो शुभ होय ॥ पालनेकामुहूर्त। आंदोलायनपुंसोद्वादशेदिवसेशुभम् ॥ त्रयोदशेतु कन्यायाननक्षत्रविचारणा॥ टीका-जन्म होने उपरांत पुत्रको बारहवें और कन्याको तेरहवें दिवस पाल- नेमें शयन करावे और नक्षत्र आदिके विचारकी कुछ आवश्यकता नहीं है. अथ बृहस्पतीकमतानुसारदुग्धपानमुहूर्त । एकविंशदिनेचैव पयःशंखेनपाययेत् ॥ अन्नप्राशननक्षत्रदिवसोदयराशिषु ॥ दीका-जन्म होने के पश्चात् ३३ दिन अब अन्नप्राशन नक्षत्र जो आगे कहे जायगे उनमें शंखमें दूध भरके बालकको पिलावे ॥ ताम्बूलभक्षणम् । साईमासद्वयेदद्यात्ताम्बूलं प्रथमंशिशोः । कर्पूरादिकसंमिश्र विलासायहितायच ॥ मूलेचत्वाष्टकरतिष्यहरीदभेषु पोष्णे तथामृगशिरोदितिवासरेषु ॥ अर्कैदुजीवभृगुवोधनवासरेषु तांबूलभक्षणाविधिमुनिभिःप्रदिष्टः ॥ टीका-जन्मके उपरांत ढाई मासमें कपूर आदि पदार्थ मिश्रित करि तांबूल खवावे और मूल चित्रा हस्त पुष्य श्रवण ज्येष्ठा रेवती मृगशिर पुनर्वसु धनिष्ठा और रवि सोम गुरु शुक्र बुध इन चारोंमें मुनीश्वरोंने तांबूल- पक्षण शुभ कहा है ॥

. (९६) ज्योतिषसार । मर्यावलोकन। हस्तःपुष्यपुनर्वसूहरियुगं मैत्रत्रयंरोहिणी रेवत्युत्तरफाल्गुनीमृग- युत्तापाढोत्तरास्वातिभे॥ मासौतुर्यतृतीयकौशनिकुजोत्यक्त्वाच रिक्तातिथि सिंहादिवयकुम्भराशिसहितं निष्कासनंशस्यते ॥ टीका-हस्त पुष्य पुनर्वसु श्रवण धनिष्ठा अनुराधा ज्येष्ठा मूल रोहिणी रेवती उत्तराफाल्गुनी मृगशिर उत्तराषाढा स्वाती और चौथा व तीसरा मास शुभ शनि भौम रिक्ता तिथि वर्जनीय है और सिंह कन्या तुल कुंभा ये लग्न उत्तम हैं ऐसे शुभदिन विचारके प्रथम बालकको बाहर निकालकर सूर्यावलोकन करावना उत्तम है ॥ कर्णवेध। रोहिण्युत्तरमूलमंत्रमृगभे विष्णुत्रयेचयेरेवत्यांचपुनर्वसुद्वययु गेकर्णस्ववेधःशुभः ॥ मीनेस्त्रीधनुमन्मथेषुचघटेवपेंचयुग्मतिथी सौम्येचेन्दुगुरोरवौचशयनं त्यक्त्वाचविष्णोर्बुधैः ।। टीका-रोहिणी तीनों उत्तरा मूल अनुराधा मृगशिर श्रवण धनिष्ठा शतता- रका हस्त चित्रा शुभ और युग्मतिथि और युग्मवर्प ये शुभ और चंद्र गुरु रवि ये वार विष्णुशयनको छोडकर पंडितोंने कर्णवेध शुज कहा है । शिशुको पृथ्वीमें बैठाना। पंचमेचत्तथामासिभूमौतमुपवेशयेत् ।। तत्रसर्वग्रहाशस्ता भौमोप्यत्रविशेषतः॥ उत्तरात्रितयंसौम्यं पुष्पक्षशकदैवतम्।। प्राजापत्यंचहस्तश्च शतमाश्विनमित्रभम् ।। टीका-पांचवें मासमें रविवार आदि समस्तवार शुभ दिन में भीमवार विशेष करके और तीनों उत्तरा मृगशिर पुष्य ज्येष्ठा रोहिणी हस्त अश्विनी अनु- राधा ये नक्षत्र शुभ ऐसे दिवसमें शिशुको नृमिपर बैठावना शुभ कहा है ॥ अन्नप्राशन । पूर्वाभरणीभुजंगवरुणं त्यक्त्वाकुजार्कीतथानन्दापर्वचसप्तमी * . भापाटीकासमेत। (९७) मपितथा रिक्तामपिद्वादशीम् ॥ पष्टेमास्यथवानभक्षणविधिःस्त्री- गामयुक्पंचमे गोकन्याझपमन्मथे बुधवले पक्षे च योगेशुभे ।। टीका-तीनों पूर्वा आH भरणी आश्लेपा और भौम शनि ये अशुभ वार नंदा पर्व रिक्ता और सप्तमी द्वादशी इन सबको त्यागकर छठे अथवा आठवें महीनेमें लड़केको और कन्याको पांचवे माससे कहाहै और बृप मिथुन मकर कन्या इन लगाका बल पाके शुक्लपक्ष तथा शुभयोगमें बालकको अन्नप्राशन करावे ।। चौलकर्म। रेवत्याधकरत्रयावितिमृगज्येष्ठासुविष्णुवये पुष्येचोत्तरगेर- वौगुरुकवीन्दुज्ञेषुपक्षेसिते ॥ गोस्त्रीमन्मथचापकुंभमकरे हि- त्वाच रिक्तातिथि पष्टीपर्वतथाष्टमीमपिसिनीवालींचचूडाशु- भा॥जन्मतस्तु तृतीयेन्दे श्रेष्टमिच्छंति पंडिताः ॥ पंचमे सप्तमेवापि जन्मतो मध्यमं भवेत् ॥ टीका-रेवती अधिनी हस्त चित्रा स्वाती पुनर्वसु मृगशिर ज्येष्ठा श्रवण धनिष्ठा शतभिषा पुष्प ये नक्षत्र और उत्तरायण शुक गुरु सोम बधवार और शुक्लपक्ष मुंडनमें शुम हैं और वृप कन्या मिथुन धन मकर कुंन इन लमोंको त्यागके शेप शुभ जानिये और रिक्ता छठ आठे अमा- वास्यादिक दुष्ट तिथि वर्जित हैं और जन्म होनेसे तीसरे वर्ष में पंडितोंने श्रष्ठ आर पांचवें सातवें वर्षमें मध्यम कहा है । विद्यारंभका मुहूर्त। रेवत्यांमृगपंचकेहरियुगे पूर्वासुहस्तत्रये मूलेश्वेअभिजिच्चभानुभू- गुजे सौम्येधनुर्जीक्योः ॥ अब्देपंचमकेविहाय निखिलानध्यायप- धीयुतान रिक्ता सौम्यदिने तथैव विबुधैः प्रोक्तोमुहूर्तःशुभः ॥ टोका-रेवती मृगशिर आर्द्रा पुनर्वस पुष्य आन्ठेपा श्रश्ण धनिष्ठा पूर्वा हस्त चिया स्वाती मूल अधिनी अभिजिव और रवि गुरु शुक बुध सोम ये चार और जन्मसे पांचवां वर्ष शुभ कहाहै और अनध्याय पठी (९८) ज्योतिषसार। रिक्ता पर्व आदि दुष्ट योगादिक तिथि वर्जनीय है उत्तरायण शक्लपक्ष और शुभ लग्नोंमें प्रथम विद्याभ्यास करावे ॥ यज्ञोपवीतका मुहूर्त पूर्वापाठहरिव्येश्विमृगभे हस्तत्रयेरेवतीज्येष्ठापुष्यभगेषु चो- त्तरगते भानौचपक्षसित।गोमीनप्रमदाधनुर्वनचरे शुक्रेजी- वेतिथौ पंचम्यांदशमीत्रयेव्रतमहश्चैवादिजन्मद्रये ॥ टीका--पूर्वाषाढा श्रवण धनिष्ठा शतभिषा अश्विनी मृगशिर हस्त चित्रा स्वा- ती रेवती ज्येष्ठा पुष्य पूर्वाफाल्गुनी और उदमयम अर्थाद उत्तरायण शुक्लपक्ष वृष मीन कन्या धन सिंह ये लगे और शुक्ल रविवार सोम ये वार और पंचमी दशमी आदि तीन दिन अर्थात् १०।११।१२ में यज्ञोपवीत करना शुभहै। मासादिमुहूर्त। विप्रं वसते क्षितिपं निदाघे वैश्यं घनांते व्रतिनं विदध्यात् ॥ भाषादिशुक्रांतिकपंचमासाः साधारणा वा सकलाद्विजानाम् ।। टीका-ब्राह्मणोंका वसंतमें, क्षत्रियोंका ग्रीष्ममें, वैश्योंका शिशिर- ऋतुमें यज्ञोपवीत करावे, ऐसे वर्गों के अनुसार व्रतबंध ऋतु कहाहै, मावसे ज्येष्ठ पय्यंत ५ मास समस्त द्विजोंको साधारण कहेहे ॥ वर्षसंख्या। गर्भाप्टमेटमेवान्दे पंचमेसप्तमपिवा ॥ द्विजत्वंप्राप्नुयाद्विप्रो वत्वेकादशेनृपः॥ टीका-गर्भसे अथवा जन्मसे आठवें अथवा ५ । ७ वर्ष ब्राह्मणका और ग्यारहमें क्षत्रियोंका यज्ञोपवीत करना उचितहै ॥ गुरुवलम् । वर्णाधिपेवलोपेते उपनीतिक्रियाहिता॥ सर्वेपांचगुरौसूर्ये चन्द्रेचवलशालिनि । टीका-वर्णके आधिपतिअनुसार बल देखिये और सवोंको गुरु सूर्य चंद्रमाका बल चाहिये ॥

भाषाटीकासमेत। त्रयादश्यादिचत्वारि सप्तम्यादितिथित्रयम् ॥ चतुर्थ्यकाकिनीप्रोक्ता अष्टावेवगलग्रहाः॥ टीका-त्रयोदशीसे प्रतिपदातक चारि तिथि सप्तमी अष्टमी नवमी चतुर्थी ये आठ तिथि गलग्रह वर्जनीय है ।। अथ शूद्रादिकोंकेसंस्कारकामुहूर्त। मृलाश्रवणद्विदैववसुभे पुष्येतथाचाश्चिभे रेवत्यांमृगरोहिणी दितिकरे मैत्रेतथावारुणे ॥ चित्रास्वातिमथोत्तराभृगुसुते भौगे तथा चांदजे शूद्राणांतुषुधैः शुभंहिकथितं संस्कारकर्मोत्तमम् ॥ टीका--मूल आर्दा श्रवण विशाखा धनिष्ठा पुष्य अश्विनी रेवती मृग- शिर रोहिणी पुनर्वसु हस्त अनुराधा शतभिषा चित्रा स्वाती तीनों उत्तरा ये नक्षत्र और शुक्र भौम बुध ये वार शूद्रादिक संकरअंत्य नातिके संस्का- रमें शुभ जानिये ॥ विवाहप्रकरणम्। तबादौदेवज्ञपूजनम् ॥ देवपूजयेदादी फलतांबूलपूर्वकम् । निवेदयेत्सुमनसास्वकन्योराहनादिकम् ॥ टीका-प्रथम ज्योतिपीकी यथाशक्ति फल तांबूलपूर्वक पूजा करना तिसके पीछे कन्याका पिता कन्याके विवाहका शुभाशुभ प्रश्न करै । विवाहसमयेप्रश्नमाह । विषमभांशगतौ शशिभार्गवौ तनुगृहे बलिनौ यदिपश्यतः॥ रचयतोवरलाभमिमौयदा युगलभांशगती युवतिप्रदौ ॥ टीका-जो प्रश्नकालमें चंद्र शुक्र यह विषम राशिमें होय वा अंशमें होय और दोनोंबली होयके लग्नको देखते होंय तो कन्याको पतिप्रानि जानना और समराशिम वा अंशम चंद्रशुक्र होय तो वरको स्त्रीप्राप्ति कहना शुभहै। प्रष्टुंबिलग्नात्प्रवल शशांकः शत्रुस्थितो मृत्युग्रहस्थितोवा । यद्यष्टमान्दात्परतोविवाहात्करोतिमृत्युंवरकन्ययोश्च ।।

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(१००)
ज्योतिपसार।
टीका-जो प्रश्न लग्नसे बलवान - चंद्रमा पष्ठ अथवा अष्टम स्थानमें
बैठा होय तो विवाहसे अष्टम वर्षमें स्त्री पुरुष दोनोंको अरिष्ट जानना ॥
यद्युदयस्थश्चंद्रस्तस्माद्यदिसप्तमोभवेद्भौमः।
समाष्टकंसजीवतिविवाहकालात्परंपुरुषः॥
टीका-जो प्रश्नलनमें चंद्रमा होय और चंद्रमासे सप्तम स्थानमें मंगल
होय तो विवाहसे अष्टम वर्षमें पतिको अरिष्ट जानना ॥
स्वनीचगःशत्रुदृष्टः पापः पंचमगोयदा ॥
मृतपुत्रांकरोत्येव कुलटांवानसंशयः ।।
टीका-जो प्रश्नकालमें पापग्रह अपने नीचस्थानमें होय अथवा शत्रु.
, ग्रह देखते होंय अथवा पापग्रह पंचमस्थानमें बैठा होय तो संतानका
नाश और स्त्री वेश्या होय ऐसा जानना ॥
भिद्यतियधुदकुंभः शयनासनपादुकाशुभंगोवा ।
प्रश्नसमयेपियस्यास्तस्यावधव्यमादेश्यम् ॥
टीका--जो विवाहप्रश्नकालमें अकस्मात् जलकुंभका अंग होय अथवा
निद्रानाश; आसनभंगा पादुकाभंग, ऐसा जिस कन्याके विवाहप्रश्नसमयमें
होय तो उसकों विधवायोग जानना ॥
अज्येष्ठाकन्यकायत्र ज्येष्टपुत्रोवरोयदि ॥
व्यत्ययोवातयोस्तत्र ज्येष्ठोमासः शुभप्रदः।।
टीका-जो कन्या ज्येष्ठ न होय और पुरुष ज्येष्ठ होय ऐसा दोनोंका
भेद होय तो ज्येष्ठमासमें विवाह करना शुभ है ॥
वर्षप्रमाणमाह।
पडब्दमध्येनोद्वाह्याकन्यावर्पद्वयंततः ।।
सोमोभुक्तततस्तद्वद्धर्वश्वतथानलः ॥
ठीका-प्रथम ६ वर्षता कन्याका विवाह नहीं करना कारण यहहै
कि, प्रथम वर्ष चंद्रमा भोग करताहै, अनंतर दोवर्ष गंधर्व भोग करतेहैं,
अनंतर २ वर्प अग्निदेव भोग करता है, तदनंतर विवाहको शुद्ध जानना ॥
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+ 20566 भापाटीकासमेत। (१०१). अटवाभवेद्गौरी नववर्षातुरोहिणी ॥ दशवभवेत्कन्याद्वा- दशेवपलीमता ॥ गौरीदानानागलोकं वैकुंठरोहिणींददत् ॥' कन्यादानाद्रह्मलोक रौरवंतुरजस्वलाम् ॥ टीका-आठ वर्षकी कन्या होय तब उसका नाम गौरी, नव वर्षकी कन्या रोहिणीतंज्ञा, दश वर्षकी होय तो उसका नाम कन्या, जो बारह वर्पकी होय तो उसे शूद्री नाम जानना, इसका फल गौरीदानसे नागलोक- प्राप्ति, रोहिणीदानसे वैकुंठप्राप्ति, कन्यादानसे ब्रह्मलोकतानि, शूद्रीदानसे घोर नरकप्राप्ति होय ॥ विवाहोजन्मतःस्त्रीणां युग्मेऽन्देपुत्रपौत्रदः॥ अयुग्म श्रीप्रदपुंसां विपरीते तु मृत्युदः॥ टीका-त्रीका विवाहकाल जन्मसे सम वर्षमें करना तो पुत्रपौत्रप्राति और पुरुषका जन्मसे विषम वर्षमें विवाह होय तो लक्ष्मीमाति, इससे विपरीत होय तो मृत्युप्राप्ति जानना ॥ कन्याद्वादशवाणि याऽप्रदत्तावसेदुद्दे । ब्रह्महत्यापितुस्तस्याः साकन्यावरयेत्स्वयम् ॥ टीका-कन्या १२ वर्षकी होय और पिताके घरमें रहै तो पिताको ब्रह्मह- त्या माम, होय नंतर कन्या अपनी इच्छासे पति करे ऐसा आचार्य कहतेहैं. मंगलविचार। लग्नेव्ययेचपाताले यामित्रेचाएमेकुजे ॥ पत्नीत्तिस्वभर्तारं भर्ताभायोविनाशयेत् ॥ टीका-स्त्रीको और पुरुपको मंगल रहताहै तिसका प्रकार १३२।४ ७८इतने स्थानोंमें मंगल होय तो स्त्री मंगली कहना और मंगलीसे मंग- लीको विवाह करना अथवा पुरुषके ग्रह बलवान् होय तोभी माता ॥ भौमपरिहार। यामिवेचयदासौरिलंग्नेवाहियुकेथवा ।। नवमेद्वादशेचैव भोमदोपोनविद्यते ।। 2016 SN.........

(१०२)
ज्योतिषसार।
टीका-स्त्रीको अथवा पुरुषको ७१।४।९।१२। जो इतने स्थानोंमें
शनि होय तो मंगलका दोप नहीं जानना ॥
ज्येष्ठविचार ।
द्विज्येष्ठौमध्यमौनोक्तावेकज्येष्ठःशुभावहः॥
ज्येष्ठत्रयंनकुर्वीत विवाहे सर्वसम्मतः॥
टीका-पुरुप ज्येष्ठ अथवा कन्या ज्येष्ठ होय अथवा ज्येष्ठ मास होय ऐसा दो
ज्येष्ठमें करना मध्यम समझतेहैं और एक ज्येष्टमें करना शुभहै, और पुरुष
ज्येष्ठ स्त्री ज्येष्ठ मासमें ज्येष्ठ जो तीनों होय तो विवाह नहीं चाहिये ।
ज्येष्टाया'कन्यकायाश्च ज्येष्टपुत्रस्यवैमिथः ॥
विवाहोंनैवकर्तव्यो यदिस्यानिधनंतयोः॥
टीका-प्रथम गर्नमें ज्येष्ठ जो स्त्री होय उसको कहना, जो पुरुष ज्येष्ठ होय
और कन्यानी ज्येष्ठ होय तो विवाह नहीं करना यह दुःखदायक होताहै ॥
दशवर्पव्यतिक्रांता कन्याशुद्धिविवर्जिता ॥
तस्यास्तारेन्दुलनानां शुद्धौपाणिग्रहोमतः ॥
टीका-दशवर्षके अनंतर कन्या शुद्धिसे रहित होतीहै तो ताराशुद्धि
चंद्रशुद्धि लगशुद्धि देखके विवाह करना शुभ है ॥
कन्यालक्षणमाह।
हमस्वरां मेघवर्णा मधुपिंगललोचनाम् ॥
तादृशींवरयेत्कन्यां गृहस्थासुखमेधते ॥
टीका-खीका लक्षण स्त्रीका मीठा हँसके बोलना ऐसा होय और मेघकासा
वर्ण होय नेत्रका वर्ण शहतके तुल्य हो अथवा पिंगल कहिये कुछ सफेद
कुछ काला होय ऐसी कन्यासे विवाह करे तो गृहस्थ सुख पाताहै ॥
वरलक्षणमाह।
जातिविद्यावयःशीलमारोग्यंबहुपक्षता॥
अथित्ववित्तसंपत्तिरष्टावतेवरेगुणाः ॥

. भापाटीकासमेत। (३०३) टीका-पुरुषका लक्षण-जातिमें उत्तम होय और विद्यायुक्त वयमें वृद्धित्व होय और स्वभाव अच्छा होय और निरोगी-परिवार बहुत होय स्त्रीकी इच्छा होय, धन संपत्ति होय, ऐसे आठ लक्षणसे युक्त वर होय तो कन्या देना चाहिये। वरदोषमाह। दूरस्थानामविद्यानां मोक्षधर्मानुवर्तिनाम् ।। शूराणांनिधनानांच न देया कन्यकावुधैः॥ टीका-पुरुपके दूर रहनेवालेको कन्या देना नहीं, मूर्खको देना नहीं, मोक्षधर्मयोगाभ्यासादिक करे उसको देना नहीं, दरिद्री असमर्थको देना नहीं, ऐसा पंडितजनोंने कहाहे । अस्तोदय। प्रागुद्गतः शिशुरहस्त्रितयं सितःस्यात्पश्चादशाहमिहपंचदि- नानिवृद्धः ॥ प्राक्पक्षमेवगदितोत्र वसिष्ठमुख्य वस्तुप- क्षमपिवृद्धशिशुर्विवद्यः॥ टीका-पूर्वमें शुक्रका उदय होय तो तीन दिन शिशुत्व और अस्त होय तो वृद्धत्व पंद्रह दिन वर्जित और पश्चिमको उदय होय तो पांच दिन शिशु- पन और १० दिन वर्जितह और गुरुके उदय अस्तमें १५ दिन वर्जनीयहैं. अस्त और उदयका लक्षण । यमशरभुजवासरखत्रिणोदिशिद्विसप्तसितास्तमनंतथा ॥ गगनवाणयमर्दिशिपश्चिमेनवदिनास्तमनंतु भृगोर्बुधैः॥ टीका-२५२ दिन शुक्रका अस्त पूर्वदिशामें होताहै, और उसका उदय ७२ चे दिवस पश्चिममें होताहै, और २५० दिवस पश्चिममें अस्त होताहै तिसका उदय ५९ ३ दिन पूर्व में होताहै यह पंडिताने कहाहे ।। अस्तमेवर्जनीयकर्म। वापीकूपतडागयज्ञगमनं शोरं प्रतिष्टावतं विद्यामन्दिरकर्णवेधन- (108) ज्योतिपसार । महादानं गुरोस्सेवनम् ॥ तीर्थस्नानविवाहकाम्यहवन मंत्रोपदेश शुभं दूरेणैवजिजीविषुः परिहरेदस्ते गुरौ भार्गवे ॥ टीका-बावडी कूप तडाग अर्थात् तालाब यज्ञ और यात्रा करना चौल अर्थात् मुण्डन देवप्रतिष्ठा यज्ञोपवीत विद्यारंभ नूतन गृहप्रवेश बालकका कर्णवेध महादान गुरुसेवा तीर्थस्नान विवाह उत्तम कर्म मंत्रोपदेश ये कर्म जीवनेकी इच्छा रखनेवाला पुरुष गुरु शुक्रके अस्तमें दूरही वर्जित करै ॥ विवाहेवर्जनीयम्।. नापाढप्रभृतिचतुष्टये विवाहो नोपौपेनचमधुसंज्ञकविधेयः॥नै- वास्तंगतवति भार्गवेचजीवृद्धत्वेनखलुतयोर्नवालभावे ॥ गी- र्वाणमंत्रिणिमृगेंद्रमधिष्टितेनमासेधिके त्रिदिनसंस्पृशिनामभेच ॥ टीका-आपाढ आदिलेके ४ मास और पौष चैत्र मास और गुरु शुक्रका अस्त और इन दोनोंका वृद्धत्व और बालत्व और सिंहका बृह- स्पति, अधिक मास तथा क्षयमास ये सब विवाहमें वर्जितहैं ॥ मूलादिजन्मनक्षत्रकादोष । मूलजाचगुणं हंति व्यालजाकुलटांगना । विशाखजादेवरनीज्येष्टाजाज्येष्ठनाशिका ॥ टीका-मूल नक्षत्रमें कन्याका जन्म होय तो गुणोंका नाश करे, आश्लेषामें व्यभिचारिणी, विशाखामें देवरका मृत्युकारक, और ज्येष्ठामें ज्येष्ठ बंधुको मृत्युदायक होतीहै ॥ जन्मनक्षत्रादिवय॑म् । जन्मसंजन्मदिवसेजन्ममासे शुभंत्यजेत् ॥ज्येष्ठेमासाद्यगर्भ स्यशुभ्रवस्त्रंस्त्रियायथा ॥ अज्येष्ठाकन्यकायत्रज्येष्ठपुत्रोवरोय- दि । व्यत्ययोवातयोस्तत्रज्येष्ठोमास शुभप्रदः ॥ टीका-जन्मके नक्षत्र दिवस और मासमें बालकोंका शुभ कर्म वर्जिन है जैसे स्त्रियोंको श्वेतवस्त्र धारण करना और जो कन्या कनिष्ठ होय तथा वर ज्येष्ठ होप अथवा इससे विपरीत होय तो ज्येष्ठ मासमें.विवाह शुभहे ॥ . - १ ३ १ . . . १८ वर्ष १७११८ . घटी २३.२९ . ३ 9 . C C तिथि ८१९ . २२ . २ . १ भाषाटीकासमेत। (१०५) अथ वर्पसारणीयम् ॥ वर्ष १२ १०/११/१२/१३१४,१५/१६ चार १२ ६ ३ ४ ५ ६.१ २.३ ३.६ घटी ! १५.३१ ४६. २११७३३/४८४१९ ३५/५०८२१३७५२८ पल ३४ ६/३७९४० १२/४३/१३४६१८४९२१५२/२४ ऽक्ष ३० तिथि ११ २ नक्षत्र ८ १०२०१४ १३१२३ १९/२०/२१/२२/२३/२४/२५ २६ २७ २८ २९ ३०९३२ ३२ बार १ २ ४ ५४ १०/२०२२/५७१२ २८/४८ '५९ २४३०४५१६ १६ पल ५५/२७५८ ३0191३३ ३९, १०,१२,१३४५१८१८ ३ २४ नक्षत्रा १६/२३ २१२२१२२५ १५/२५८ १८१११।३ वर्ष ३३/३४ ३५/३६१३०१ ३०/३९/४०४१/४२१४३ १४४ ४५४६४१८ ६ ५ २ ६ 10 २३४ घटी ३२४७ ३१०३४.४९ ५२१ १९१५१ २२/५/२५/५७,२८ ३७. ३३४ ITI नक्षत्र ५/१६/२७८ १५२५, ६ १५२९१० २१ १४ २१ .१६२६ २ ९. अश ३।१३ १० ४ ७१०१।१ वर्ष २०१० ५१५२१७३ ५५ ५५५६१५७,५८५२।६० ६१६२६३ ६१ वार १ ३ घटी २५ २२.२७ १२ ५८१३/२२ १४.. पर४३.२५ १६.८४.२१५२, २४,५५/३७ ५८३०१ ३३४ ३६ सिर ३० १६७ ११ २२१ १५३६७ १८ ४.१४७ १० सश २० वर्ष ३५EE२७ वार ६ २ घटी ४९ ३१,१११ ५:४५ १६ १०१२ ५१ २२,५५२५५५२८, ५ नक्षत्र ३२ ९ २० ११२२३४ १५ एन १२ १२२२५/२५ . चिपल/३० . . ३० . ६ २ ८ ७ १ . ६ --- . . . . ८ . . . ०२ . ११ ८ २६ 10 ६ . ८ --- ४ ६ पिपर ३० . . . : .

(१०६) ज्योतिषसार। वर्षप्रमाण। जन्मतोगर्भाधानाद्वा पंचमान्दात्परंशुभम् ॥ कुमारीवरणंदानं मेखलाबंधनंतथा ॥ टीका-जन्म होनेसे अथवा गर्भधारणसे पंचम वर्ष उपरांत कन्या का वरना अथवा दान और व्रतबंध उत्तम जानिये ॥ गुरुचंद्रबल। स्त्रीणांगुरुवलं श्रेष्ठं पुरुषाणांरवेलम् ॥ तयोश्चन्द्रबलं श्रेष्ठमिति गर्गेणभाषितम् ॥ टीका-स्त्रियोंको गुरुका बल और पुरुषोंको रविका और दोनोंको चंद्रमाका बल गर्गमुनिने श्रेष्ठ कहाहै ॥ १ ॥ गुरुकाबल। नष्टात्मजाधनवती विधवाकुशीलापुत्रान्विता हतधवा सुभगा विपुत्रा॥ स्वामिप्रियाविगतपुत्रधवाधनाव्या वंध्याभवेत् सुर- गुरोक्रमशोभिजन्म ॥ टीका-जो कन्याके जन्मस्थानमें बृहस्पति होय तो विवाहके अनंतर बालकोंकी मृत्यु होय, द्वितीयमें धनवती, तृतीयमें विधवा, चतुर्थमें व्यभि: चारिणी; पंचममें पुत्रवती; पष्ठमें पतिनाश, सप्तममें सौभाग्यवती, अष्टममें पुत्रहीन, नवममें पतिप्रिया, दशममें बालकनाश और एकादशमें पति धनाढ्य, द्वादशमें बांझ, ऐसे कमसे फल जानिये ॥ गुरुअनुकूलकरनेकाविचार.।। जन्मत्रिदशमारिस्थः पूजयाशुभदोगुरुः॥ विवाहेचं चतुर्थाटद्वादशस्थोमृतिप्रदः॥ टीका-जन्मस्थ तृतीय पष्ठ और दशमस्थानी गुरु नेष्टहै परंतु पूजा करनेसे शुभ फलदायक होताहै और चौथा अष्टम द्वादशस्थ मृत्यु करताहे ये विचार विवाहमें देखना उचित है ॥ अष्टमैत्रीज्ञानम्। वोंवश्यंतथातारा योनिग्रहगणौतथा॥ .

भाषाटीकासमेत। (१०७) भकूटनाडिमैत्रीचइत्येताश्चात्रमैत्रिकाः॥ टीका-वर्ण वश्य तारा योनि ग्रह गण भकूट नाडी और मैत्री आदि आठनको शुद्ध विवाहमें विचार लेना योग्य है । वर्गादिकोंका ज्ञान। मीनालिकर्कटाविप्रानृपाः सिंहाजधन्विनः ॥ कन्यानकवृपा वैश्याशूद्रायुग्मतुलापटाः ॥ श्योंका ॥ द्वंद्वचापघटकन्य- कातुलामानवाअजवृपोचतुष्पदौ ॥ कर्कमीनमकराजलोद्भ- वाः केसरीवनचरालिकोटका॥ वश्यावश्यज्ञानमाह। हित्वानृगेंद्रनरराशिगते च वश्याः सर्वे तथैपां जलजाश्चभक्ष्याः॥ सर्वेपिसिंहस्यवशोविनालिं ज्ञेयं नराणांव्यवहारतोऽन्यत् ॥ इन तीनों लोकोंकी दीका चक्रसे यथाक्रमसे समझ लेना। ताराबलम् । कन्यादरभंयावत्कन्याभंवरभादपि ।। गणयेनवभिः शेपेत्रिप्वभिमसत्स्मृतम् ॥ टोका-वधूनक्षत्रसे वरनक्षत्रतक जो नक्षत्र संख्यामें होय तामें नवके अंकका भाग देय जो शेप तीन आयें तो अथवा पाँच-सात रहें तो अ- शुप्त और सब शुभ होतेहैं-ऐसेही वरनक्षत्रसे वधूनक्षत्रतक गिनके पूर्ववत प्रमाण लिखे अनुसार जानना । योनि। अश्वोगजश्छागसौसर्पश्वानबिडालकाः ॥ मेपोषिडालकश्चे वमुपकोम्पकश्चगौः ॥ महिपीचततोव्याघ्रोमहिपोव्याकं क्रमात् ।। मृगोमृगस्तथाश्वाचकपिनकुलएच ॥ नकुलोवा- नरस्सिहस्तुरगोमगराष्ट्रपशुः ॥ अघोरेणक्रमेणेव अश्विन्या- दिभयोनयः ॥ वैरयोनि ।। गोव्याघ्रगजसिंहमश्वमाहपं श्वेणंच अधूरगं वरं वानरमेपयोश्च सुमहत्तदाद्रिडालोन्दुरु ॥ लोकानां .(१०८) ज्योतिपसार। व्यवहारतोन्यदपितज्ज्ञात्वाप्रयत्नादिदंदंपत्योपभृत्ययोरपि सदावय॑शुभस्यार्थिभिः॥ राश्यधिप । मेपवृश्चिकयो मः शुक्रोवृषतुलाधिपः॥ कन्यामिथुनयोः सौम्योगुरुस्तुधनमी- नयोः ॥ शनिर्नकस्यकुंभस्यकर्कस्यैवतुचंद्रमाः ॥ सिंहस्या- धिपतिः सूर्यःकथितोगणकै क्रमात् ॥ गण ॥ अनुराधामृगो श्विस्तुश्रवणोदितिपुष्यके ॥ स्वातीहस्तोरेवती च नवदेव- गणाःस्मृताः ॥ पूर्वात्रयंरोहिणी च उत्तरात्रयमेवच ॥ आर्द्रा तुभरणीचैवनवैते मानुपागणाःआश्लेषाशतभिष्मूलविशाखाः कृत्तिकामघा॥ चित्राज्येष्ठाधनिष्ठाचनवैतेराक्षसागणाः॥ अंत्यनाडी। कृत्तिकारोहिणी स्वाती मघाश्लेषाचरेवती ॥ श्रवणश्चोत्तराषाढा विशाखा त्वंत्यनाडिका ॥ मध्यनाडी। पूर्वाफाल्गुनिका चित्रा धनिष्ठाभरणीमृगाः॥ पूर्वापाठानुराधाच पुष्योहिर्बुध्न्यमेवच ।। आद्यनाडी। पूर्वाभाद्रपदामूलं ज्येष्ठाहस्तःपुनर्वसुः ॥ अश्विन्याशतभिः कचोत्तरात्वेकनाडिका ॥ अश्विनीभरणी कृत्तिकापादमे पः॥ कृत्तिकात्रयरोहिणी मृगशिरादैवृपभः॥ मृगशिरार्द्ध मा पुनर्वसुत्रयं मिथुनः॥ पुनर्वसोःपादंपुष्य आश्लेषांतंक- काटकः॥ मघापूर्वी उत्तरापादं सिंहः॥ उत्तरात्रयं हस्तचि- बाई कन्या ॥चित्राईस्वातीविशाखात्रयस्तुला ॥ विशाखा पादअनुराधा ज्येष्ठांतं वृश्चिकः।मूलपूर्वापाढा उत्तरापाठापादं धनुः ॥ उत्तरापाढात्रयं श्रवण धनिष्ठा मकरः॥ धनिष्टादै शततारका पूर्वाभाद्रपदत्रयः कुंभः ॥ पूर्वाभाद्रपदापाद उत्तराभाद्रपदा रेवत्यंतमीनः॥

गज कृत्तिका में आद्य मिठा मध्य भापाटीकासमेत। (१०९) टीका-सवा दो नक्षत्र एक राशि भोगतेहैं इस प्रमाणसे द्वादश राशिके भोगका क्रम और अंत्य-मध्य-आदिनाडीका क्रम चक्रसे प्रतीत होगा । राशिअनुसार घटितमान नक्षत्रअनुसार घटितमान राशि | वर्ण नक्षत्र नाडी वश्य स्वागी योनि विरयोनि| गणः अश्विनी अञ्च भैस देव आद्य गेप भरणी सिंह मनुष्य मध्य क्षत्रिय चतुष्पद भौम वानर राक्षस अंत्य रोहिणी सौ नौला । मनुष्य | अंत्य | वृपा वैश्व चतुष्पद शुक्र मृग नीला देव मध्य आद्री । न्यान_ हरिण मनुष्य आद्य मिथुन | शूद्र | मानव | बुध पुनर्वसु । मारि मूसा देव पुष्य वानर | देव आश्शेपा | माजार मूसा राक्षस । अत्य विष जलचर चंद्र मघा मूसा माजीर राक्षस | अंत्य पूर्वा म्सा मार्जार मनुप्य | मध्य सिंह क्षत्रिय वनचर रपि व्याघ्र | मनुष्य आद्य हस्त देव आद्य चित्रा व्यात्र गाय राक्षस | मध्य कन्या वैश्य | मानव | बुध स्वाती मेस अश्व | देव अंत्य विशाखा | व्याघ्र गाय राक्षस अंत्य शूद्र मानव | शुक्र अनुराधा हरण श्वान | देव ज्येष्ठा मृग श्वान राक्षस आद्य वृश्चिक विप्र कीटक भीम श्वान हरिण राक्षस आद्य पूर्वापाढा वानर मेंदा मनुष्य मध्य उत्तरापा मुगस सर्प मनुष्य अंत्य धन क्षविस मानव अभिजित् नकुल सर्प श्रवण वानर मेंढा देव मकर | वैश्य जलचर शनि धनिष्ठा सिंह शततारका अश्व भस राक्षस आद्य पूर्वाभाद्रप सिंह सिंह मनुष्य उत्त.भाद्र पशु व्याघ्र मनुष्य मध्य मीन ब्राह्मण जलचर गुरु रेवती गज सिह | देव अंस उत्तरा गौ भंस अश्व मध्य तूल मूल मनुष्य अंत्य अत्य गज राक्षप्ता मध्य मानव | शनि

(११०)
ज्योतिषसार।
नवपंचक।
मीनालिभ्यायुतेकोटे कुंभेमिथुनसंयुते ॥
मकरेकन्यकायुक्त नकुन्निवपंचके ।
टीका--मीनसे नवके अंतरपर वृश्चिक राशि है और वृश्चिकसे मीन
पाँचमी, इसी प्रकार कर्क मीनका और वृश्चिकका कुंज मिथुन मकर
कन्या इन दो २ राशियोंके नवपंचक होतेहैं वे वर्जितहैं ।
मृत्युषडष्टका
मेषकन्यकयोरेव तुलामीनकयोस्तथा ॥ युग्माल्योस्तुबुधैज्ञेयो
मृत्यु(नक्रसिंहयोः ॥ कुंभकर्कटयोश्चैव वृपकोदंडयोस्तथा ॥
टीका-मेष और कन्या ये परस्पर छठे और आठमें होंय इसी रीतिसे
तुला और मीन मिथुन वृश्चिक मकर, सिंह कुंभ, कर्क वृषन, इन दो
दो राशियोंको मृत्युपडप्टक कहाता है सो वर्जित है ॥
प्रीतिपडष्टक।
सिंहोमीनयुतश्चैव तुलावृपयुतातथा ॥ धनुःकर्कयुतंचैव कुंभ
कन्यकयोस्तथा ॥ नक्रस्यमिथुनेप्रीतिरजाल्यो प्रीतिरुत्तमा
टीका-सिंह मीन, तुला वप, कुंभ कन्या, मकर मिथुन, मेष वृश्चिक
धनु कर्क, इन दोदो राशियोंका प्रीतिपडष्टक होताहै सो शुभहै ॥
द्विादश।
मेपझपौवृपमिथुनौ कर्कहरीतुलकन्यके ।
अलिधनुपीमकरकुंभावेतौ द्विादशेराशी ।।
टीका-मेप, मीन, वृप, मिथुन, कर्क, सिंह, तुल, कन्या, वृश्चिक, धनु,
मकर कुंज, ये दो २ राशि द्विादशहैं ।।
चतुर्थदशमतृतीयएकादशउभयसप्तम।
चतुर्थदशमश्चैव तृतीयकादशःशुभः।।
उभयः सप्तमः साम्यमेकर्कशुभमुच्यते ॥
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भापाटीकासमेत। (१११) टीका-वधू और वरकी परस्पर राशि चतुर्थ दशम अथवा तृतीय एकादश होयतोशुभ और दोनों सतम सम होय अथवा एकनक्षत्र होयतोशुभ जानिये वश्यावश्ययोजना। सिंहविनानृणांसवश्या भक्ष्याश्वतोयजाः ।। सिंहस्यवश्यास्त्यक्त्वालिं सर्वेणव्यवहारिकः ।। टीका-सिंहके विना समस्त चतुप्पद मनुष्योंके वशमें हैं और जल- जंतु भक्ष्य हैं और वृश्चिकको छोडके सिंहके सब वश होते हैं, शेष राशि- गौम भक्ष्याभक्ष्यको वर्जित करि वश्यावश्य व्यवहारसे जानिये ॥ ग्रहोंकाशत्रुत्वसमत्वमित्रत्व । शत्रूमंदसितो समश्चशशिजो मित्राणिशेपारवेस्तीक्ष्णांशुर्हि- मरश्मिजश्चसुहृदोशेपाः समाःशीतगोः ॥ जीवेंदूप्णकराकु जस्यसुहृदोज्ञोरिः सिताौसमौमित्रसूर्यसितौ बुधस्यहिमगुः शः समाश्चापरे ।गुरोःसौम्यसितावरी रविसुतोमध्योपरत्व न्यथासौम्यार्कीसुहृदो समौकुजगुरूशुक्रस्यशेपावरी ।। शु- कज्ञोसुहर्दासमः सुरगुरुः सौरस्यत्वन्येखेये प्रोक्ताः सुहृद- त्रिकोणभवनात्तेमीमयाकीर्तिताः॥ रवि बुध शुभ शनि शनि बुध सूर्य रवि चंद शुक्र शुमः चन्द्र शुक गुरु शुक्र भीम गुरु पुर शनि सोमश., शनि शनि 'मंगल मिन चंद्र गुरु रविद्र गुरु, सूर्य नर्व चंद्र दुध मंगल राप । शुक्र ! मंगल | शुज नाम चन्द्र। आम . बुध आम चर शक (११२) ज्योतिषसार। मार्तडमतसेगुणोंकामिलाना। ॥ १ . ० . . 0 वर्णकेगुण वश्यकागुण वैरभक्ष्यगुणाभावांद्रयोः सौम्यगुण दोनोका एक वणे अथवा द्वयं ।। वश्यवैरेगुणश्चैको वशभक्ष्ये वरकाच्च होय तो शुभ । गुणादकम् ॥१॥ टी०शत्रु और भक्ष्यमें गुण शून्य० एकजा तिम गुण २ वश्य और वैरमेंगुण, वश्या वरोंकावर्ण और भक्ष्यमें गुणअंई ॥ १ ॥ बा.क्षविश्या शूद्र चतुष्पद |२ २ ब्राह्मण १ मानव २ क्षत्रिय ३१ जलचर २ २ वश्य। ११३ वनचर २ २ कीटक १ १ ताराकेगुण।। एकतोलभ्यते ताराशुभा चैवासुभान्यतः ॥ तदासार्दोगुणश्चैकस्ताराशुद्धौमिथस्त्रयः ॥ उभयो शुभातारातदा शून्यसमादिशेत् ॥ टीका-एककी शुभ और एककी अशुभ तारा होय तो गुणडेढ १ ॥ और दोनोंकी एकतारा अथवा शुभतारा होय तो गुण ३ और जो दोनोंकी अशुभ होय तो गुण शून्य जानिये ।। वधकावण १ . . 0 .

भापाटीकासमेत । (११३) तारा १ २ ६ ८ 3 १ १॥ ३ ३ १॥ ३ ३ २ ३ ३ 411 ३ ३ 9॥ ३ . . . ६ ३ १॥ ३ 4॥ १॥ ३ १॥1. १॥ ३ १॥ ३ ३ १॥ . . ६ ३ १॥ ३ ३ . . 91 ३ ३ १11 ३ ३ ३ ३ ३ ३ ३. ३ ३ १॥ १॥ योगिनीके गुण-महावैरेच वैरेच स्वस्वभावयथाक्रमात् ॥ मैन्ये चैवातिमैन्ये च खेन्दुद्वित्रिचतुर्गुणाः॥ टीका-महावैरका गुण शून्य दोनोंकी शत्रुताका गुण १ स्वज्ञावके गुण २ दोनोंकी मित्रताका गुण ३ अतिमित्रताके गुण ४ जानिये ॥ अ.ग./मे.स.चा. मा. म. मी.म.व्या ह.वा./न. सिं अश्वि४/२/२/३/२/२/२१ ० 00 . . . ० १ १ . मेष २३४२१२१३३/१/२ सर्प श्वान २/२१/२/४/२/१२/२/१ मार्जार २/२/२/२/२/४ मूपक २/२/१ गाय १२३/२/२ २४३ महिषी ३३ २१२२३४१२२ व्याघ १२१ १/११/२ हरिण ३/२/२/२/२/३/२/३/२/१/४/२/२ वानर ३३ २ २३ २२ नकुल २३३ सिंह १ २२/४ ० ० ० २ (११४) ज्योतिपसार। ग्रहोंके गुण। गणोंके गुण। दोनोंका स्वामी १ और मैत्रीके गुण दोनोंका गण होय तिसके गुण ६ वर ५ समशत्रुत्व गुण० ॥ ० सम शत्रुत्व देवगण और वधू मनुष्यगण तिमके मित्रत्व गुण४ शत्रुत्व मित्रत्व गुण १ गुण ६ इससे विपरीत होय तो ५ वर समत्व गुण २ शत्रुत्व गुण ० ॥ ० इस राक्षस गण और वधू देवगण तिसका प्रकार जानिये ॥ गुण १ अन्यथा शून्य जानिये। परके गुण वरके गुण रच बु गु शुश ५ ५ वधूकगुण . . वधूकेगुण; amr देव मनुष्य राक्षस देव ६ ५ मनुष्य ६ ६ राक्षस | 3 नाडीकगुण८ जिन्ननाडीकेगुणदएकनाडीकेगुण. । आदि मध्य अंत्य आदि in वरके गुण . o वचकगुण ०। श० ८ . अंत्य सत्कूटकेगुण। टीका-राशिएक भिन्नचरण वा जिन्न नक्षत्र इनके गुण तृतीय एका- दश इनके भिन्नराशि नक्षत्र एक इनके गुण५ प्रीतिपडष्टक अथवा विदिश वा नव पंचम इनमें वर दूरत्व योनि शत्रता होनेपरमी भकूटके गुणहोतेहैं। असत्कूटकेलक्षण। वर योनि मैत्र व खीदूरत्व होय तो पडष्टक द्विादशक नवपंचमादि दुष्ट कूटोंके गुण ४ जानिये ॥

भाषाटीकासमेत। (११५) योनि मैत्र व स्त्री दूरत्व इनमेंसे एक होय तो दुष्टकूटका एक गुण जानिये और एक नक्षत्र वा एक चरण ॥ मेप वृप मि. क. सि. क. तु..घ.म. कुं. मी. मेप १७ ० ०16भ वृप . ७ ७ ० . . मिथुन कर्क |७ सिंह . ७ . . ७ ०१ . . 6 ० ०6०16160660 169999 ००० ७०११ ०११०१००१०१० ०,०००१० ०19902201200 19222012 10/02000909202 6606/6/० ०6०० 66061G0 . ७ तुला/७ ० . . ७ . वृश्विन. ० ७ . न . . . मकर ७ ० ० . ७ . . ७ ० मीन 10/७/७101010. इस प्रकार गुणोंका मिलना १८ गुण अधिक शुभ, शून्य अशुभ ॥ वर्णके फल। यास्याद्वर्णाधिकाकन्या भातस्या नजीवति ॥ यदिजीवतिभा तुज्येष्ठपुत्रोविनश्यति ॥ टीका-कन्याका वर्ण वरसे श्रेष्ठ होय तो उसका पति अथवा ज्येष्ठ पुत्र का नाशहोय ॥ वैरयोनिकाफल। जैसे अश्व और भैंसकी वैरयोनिहै इसी प्रकार वधू और परकी वैरयोनि विचारनी चाहिये और राजा सेवक इत्यादिनी विचारिये इसमें शुभकी इच्छा वर्जितहै ॥

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(११६) ज्योतिपसार।
गणोंकेफल।
स्वगणेचोत्तमाप्रीतिमध्यमानरदेवयोः॥
कलहो देवदैत्यानां मृत्युर्मानवरक्षसाम् ॥
टीका-दोनोंका एक गण होय तो उत्तम प्रीति मनुष्य और देवमें
मध्यम, देव दैत्यमें कलह, मनुष्य राक्षस गण मृत्यु देताहै ॥
कूटफल ।
पष्टष्टकेऽपमृत्युःपंचमनवमेऽनपत्यताज्ञेया ॥
द्विादशे निधनताशेपेषु मध्यमताज्ञेया॥
टीका-दोनोंका पडष्टक मृत्युकारक और नवपंचम अनपत्यकारक
और द्विादश निर्धनताकारक शेष मध्यम जानिये ॥
नाडीफल ।
अग्रनाडीव्यधेभ मध्यनाडीव्यधेद्वयम् ॥
पृष्ठनाडीव्यधेकन्याम्रियते नात्रसंशयः ॥
टीका-दोनोंकी अग्रनाडी होय तो भर्ताको बुरा मध्यनाडी दोनोंको
अशुभ और अंत्यनाडी कन्याको मृत्युदायक होताहै ॥
मध्यनाडी।
जठरेनिर्द्धनत्वं च गर्भमरणमेवच ॥
पृष्ठेदौर्भाग्यमामोति तस्मात्तापरिवर्जयेत् ॥
टीका-दोनोंकी मध्यनाडी निर्धनताका कारण और गर्भनाश और
अंत्यनाडी दुर्भागकारक जाननी चाहिये ।
ज्योतिःप्रकाशेपार्श्वनाडी।
निधनमध्यनाड्यां तु दंपत्यो व पार्श्वयोः ॥
करग्रहपृष्ठनाड्यो न निघेइतितद्वचः॥
टीका-दोनोंकी मध्यनाडी मृत्युप्रद तसेही पार्श्वनाडी, परंतु विवाहमें
पार्श्वनाडी निदित नहीं, अन्य मतमें क्षत्रियादिकोंको कहीहै ।
असत्कूटविचार।
स्त्री नक्षत्रसे घरनक्षत्र निकट होय तो अशुत और वरनक्षत्रसे स्त्रीनक्षत्र

भाषाटीकासमेत। (११७) दूर होय तो शुज जो नक्षत्र एक अथवा स्वामी एक होय तो शुभ जानिये, राजमार्तडमतसेदुष्टकूटोंकादान । पडएकेगोमिथुनप्रदद्यात्कांस्यं सरूप्यंनवपंचमे च ॥ नाड्यांसुधेन्वन्नसुवर्णवस्त्रं द्विादशेब्राह्मणतर्पणं च ॥ टीका-अति आवश्यक विवाहमें वधू और वरके दुट कूटादिकोंके दान पडष्टकमें दो गौ, नवपंचममें रूपा सहित कांसेका पात्र, एकनाडीमें गो, और द्विादशमें अन्न सुवर्ण वन तथा बाह्मणोंका तर्पण इत्यादि करनेसे दुष्ट कूटादिक दोष दूर होतेहैं। फकिका-यस्यवर्णस्ययोनिज्ञानं नोक्तंतस्यजात- काऽवलोकनप्रकारो वास्तुप्रकरणेउक्तः।। टीका-जिस वर्णकी योनिका जानना उक्त नहींहै तिसके जातक देख- नेका प्रकार वास्तुप्रकरणमें कहाहै । विवाहकेउक्तनक्षत्र । मूलमैत्रकरस्वातीमघापौष्णधुवेदवैः ।। एतैनिदोपभैः स्त्रीणांविवाहः शुभदास्मृतः ॥ टीका-मूल अनुराधा हस्त स्वाती मघा रेवती रोहिणी तीनों उत्तरा मृगशिर ये नक्षत्र स्त्रियों के विवाहमें निर्दोष और शुभहैं । एकविंशतिमहादोषः। पंचांगशुद्धिरहितोदोपस्त्वाचः प्रकीर्तितः॥ उदयास्तशुद्धि- रहितोद्वितीयः सूर्यसंक्रमः॥ तृतीयः पापपड्गोभृगुः पष्ठः कु- जोटमः॥ गंडर्तिकर्तरीरिःफपडदुश्वसंग्रहः ॥ दंपत्योरष्टमं लग्नराशौविषयटीतथा ॥ दुर्मुहूर्तावारदोपः खार्जूरीकंसमां- निगम् ।। ग्रोत्पातभंकरविद्धकिरसंयुत्तम् ॥कुनवांशोमहा पातोवैधृत्तिश्चैकविंशतिः॥ टीका-प्रथम पंचांग शुद्धि रहित दोप३ उदयास्तशुद्धिरहित २संक्रांति दिवस ३ पापग्रहका वर्ग ४ लमसे छठा शुक्र ५लनसे अष्टम मंगल ६ लमसे म भा१ । ॥ मेष मिथन १ (११८) ज्योतिषसार। रामे में वृवृमि |म मिक।ककास सि सिकक ॥ गशि भा नक्ष] अ म ककृ |रो। मृ मृ आ पुन, पुन पुष्य आ| म पूर उह | १३६ ३३ ३२ २४ २१ ३२२७२८१९३||३१॥२८ २७॥२१॥३२१११२ मेष १भ ३४३६ ३४३१ २२॥ १४।१९ ३६ २७३||३||२५||३२||राशि|२१||२० मेष क ३२॥३२ ३६ ३३ १०१६॥२००२१-५२२॥२३||२३ २५॥२६॥ १५॥१५॥ वृषभ ॥ ८॥१॥३६ ३५ ३४ २२॥२॥२५॥२॥२३ २४ २०१८२१॥३१॥२८ २८ वृषभ | रो २२॥२४॥ १३/१४ ३६ ३४॥३५॥३२ -९२५||२८ १२/१० २४२॥३४३४ वृषभ |॥ मृ २४ |११|१॥३॥३६ ३६ ३५ २३ २९ २९ २० २२ १८२५ ,२५ ३१ ३४ मिथुन ॥ मृ २८ २९ २३॥२णा३५ १६ १५३४ ३१/१०||१३||१|२२||१८ २९॥३१॥३२|| आ००१८ ५३ ३३॥३२॥३४ ३३ ३४ ३४२३ २२॥ १५॥ २२।। १९ २१ २४ २४ मिथुन | पुन ३० २७ ॥२३ २७॥३०॥३॥३०॥३४ १५ १४ २३ ॥१५- || 3 112 •ll, ३ २४॥ ।। पुन २३॥२९॥२५॥२२ २५ २६ ३०॥१५ ३३ ४ ३४ ३२॥२२ ०1८11941 ध्या३०॥२४ २७ २४ २०३९ ॥३॥२४ २३ २४ २६ ३४ २५ ३१२० ॥ १ आ २५ २६ २२।। १३ १२ २० ३०|| १||१२॥२२ २४३४ २०॥२१ १४ २१॥२०॥ सिंह म २२ २८॥३३ १७ १०१८ २२॥२०-२ २५ २२||३६ ३६ ३२ २८॥१५॥ सिंह पू.२५ २।२२।।२० २४ १६ १९॥२८ ॥२६॥२१ १३ १९ ३८ ३६ ३४ ३० २३॥ सिह 29 ३२ १२ २० २६ २५ २८ २०॥२०॥२३॥ ५३ ५१ ३२ ३८ ३५ ३३ /१५ कन्या ! ॥ उ १३१२२ १६ ३४ ३४ ३२॥३१॥२३॥ २३॥२० २८ २२।। २३ २१ ३४ ३५ ३५ कन्या १ १३ २० २१॥२८ ३३ ३४ ३३ २२॥२॥२०॥रवा२३॥२०॥२ बा२० ३५ ३६ ॥ चि१४७ २०३१ २८ २०३१२५ ॥२१॥ ३३॥२५॥२९॥२५॥१४॥३०॥३३ तरा ॥चि २३॥१६ १९॥२॥२१ १२२० २० ॥२२ २३ २४ २५ /2011 1911०11३४ तुला १ स्वा३०॥ १९॥ १७||१२||१५||२०३४ ३३ ॥२२॥२८१२५ १२॥२॥२५॥२६॥३४ वि २२||२४||२||१६||११|| ९||३५||३०॥२१ २३||२२||२९|| १|| ३९|| 34100) वधिक । | वि॥२५||१५||२० १५ २३ १३१३॥ १३||२०२० ११||१||२३ /११।१या वृश्चिक अ २४||१९|| ११||२४ा २८॥२०॥ १८ १९ २०॥१७ ११ २१ २४२०२८२५ २० वृश्चिम १ज्ये १२ ॥१९॥२॥२१||२३||१३||१३ ३५॥२१ २६,२३२०||१५||१२ १२ १ म् २८२८३३ २०१४ १४ २१ १३ १३ १०॥ १९॥२६॥३२॥२६॥ ३१॥१३॥ १। पू. १४२६ ३चा १५ २० १२ १९२७ २७ २१॥ १६॥२॥३२॥३ना३२ ३२॥२. उ ३२ ३३ ३४ १६ /११॥१८२४ २५ २५ २४॥रा२ला ॥२३ २२,१२ /१८ मार उR८२वा १५॥२६ ११३ २९||२१|| १३।। २३॥२८२८ १४ १६ २०२०२७२० श्र२८२७२५ २०२१३४ २५ २२|| २३॥२८ २८ १३५ १३ १८९२६२५ ध२१ १२ २६ २७ २८॥२० १८१६||२०१२ २६२६ १५ '१२१॥२. रम ॥३१ १२ २६ ३भा२८२०२९|| १३||१४ १६ २.२५ |3|| 141 १४॥२९ १ १ तरा धन धन धन । मसर १ S1600.00 aslil Gllalala.

भापाटीकासमेत। (११९) ॥ - तु तु तु वृधध धाममा मकु कु कु मामीमी). |" १ १ १ पर चिस्वा विवि अज्येमपूउउ श्र धशए पाउ रे २४२२॥२२ २३॥ १९॥२४ १५२१ ३२३१ ३६ २७ २१ २०११०२२३, ३४१ htapu0013000200.vomsaman . ७ :::.:: १० १२ ३४.३३ २३ ३ ॥२५॥ २५ २६ १२ २२ 9413510२ ॥ २८२ १२ १८ 20102202700020403.10-lavhab.. 201८२२1८२३३८६४२४२२॥२०॥२६ ११ १२ १, २, २५ २४ २३ R२॥१६॥२१॥२१॥३६३६२०२५२५२१॥२५॥१९॥२०॥101111100.८२४ २० २५ २६ २७ ३॥ १२॥२४३४२५३२॥२२॥ २२॥३०॥२७ २00१३||१९२८२५ 1221 १९ २० २१॥३४॥३४ २.३४१४६||११ २३॥९.30 10॥२६ 30 २३॥३२॥३२॥२४ ३६ ३५ २५ ३२ ३३ ॥२॥३॥३२॥२४ ५. ||३१||२३||२० २१ २८१२५३३ २५ ३४३२२ २३.५२ २८ ०१. २२४२० २१ २८२.१.१६३४१५1100|२७ ३९४२३|| २४.२९ ३०॥२७३२.२ 11८३३ २०१४ --- #.. ". . . . .

(१२०)
ज्योतिषसार ।
६।८।१२ चंद्र ७ त्रिविध गंडांत समयसकर्तरी ९ लग्नमें चंद्र और पापग्रह
१० वधू वरकी राशिसे अष्टम लग्न वर्जनीय ११ विषघटिका १२ दुष्ट मुहूर्न
१३ यामाई आदि १४ लत्ता १५ ग्रहण नक्षत्र १६ उत्पात नक्षत्र १७
पापग्रहोंकरि विद्धनक्षत्र १८ पापग्रहयुक्त १९ पापांश २० संक्रांनिसाम्य.
कर्तरीदोषलक्षण ।
लग्नाचंद्राहयद्विस्थौपापखेटौ यदातदा ॥ कर्तरीवर्जनीया-
साविवाहोपनयादिषु ॥ नहिकतरिजोदोषः सौम्ययोर्यदिजा
यते ॥ शुभग्रहयुतंलग्नंक्रूरयोनास्तिकतरी ॥
टीका-लग्न अथवा चंद्रसे बारहवें और दूसरे स्थानोंमें पापग्रह पडे तो
कर्तरी दोष होताहै इसमें विवाह और यज्ञोपवीत वर्जित है, कर्तरीदोपभंग
जो इन्हीं उक्त स्थानों में सौम्य ग्रह होय तो अथवा शुभग्रहयुक्त लम होय
तो शुभ और क्रूर ग्रह होय तो कर्तरीदोप नहीं होता ॥
वधूवरकीराशिसेअष्टमलन।
वरवध्वोर्वटोश्चापि जन्मराशेश्चलग्नतः॥
त्याज्यमष्टमलग्यस्याद्विवाहव्रतवन्धयोः॥
टीका-वर वधू और बटु इनकी सबकी जन्मराशि और लग्रसे आठमी
लम विवाह और यज्ञोपवीतम वर्जित हैं ।
दुष्टमुहूर्त्त ।
तिथ्यंशोदिनमानस्य रात्रिमानस्यचैवहि ।।
मुहूर्तः कथितस्तेषुदुर्मुहूर्तशुभेत्यजेत् ।।
टीका-दिनमान और रात्रिमान इनका पंद्रहवाँ अंश दुर्मुहूर्न होताहै
सो शुभकार्य में वर्जित है ॥
यामा दिकथन ।
सूर्याद्यामदलं दिवैवनिगमाद्यश्वीपुनामानिपटसंख्याकंकुलिकंदिवे-
दरविदिइन्नागर्तुवेदद्विकम्॥द्येतनिशिपोडशांशमपरेतिथ्यंशमु
झंतितः कालंकंटकमैनिघंटममरेज्यज्ञास्फुजिद्यःक्रमात् ।।
टीका-रविवारसे अर्द्धयामाई कोष्टकके अंतक प्रवृति निवृनिके अंक
होते हैं क्रमकरिके जानिये और शुन कर्ममें वर्जित हैं दिनमें दिनमानक

८ ८वा -भाषाटीकासमेत। (१२१) सोलहवां भाग रविवारसे कुलिक कोष्ठकके अंततक अंक होते हैं उनकी कुलिकसंज्ञा है, और शुभकर्ममें वर्जित हैं रात्रिमें एक २ घाइये किसीके मतमें दिनमानका पंचदशांश वर्जित करके गुरुवारसे कालदोष बुधवारसे कंटक और शुक्रवारसे निघंट ये सब यथाक्रम कुलिकाके समान वर्जितहैं। वार * यामाईचटिका कुलिक काल | कंटका ऐनिफ्टी संख्या प्रवृत्ति निवृत्ति २०२० २५० २ १०२ रवि ४था १२ १४ वा ८वा६ वा १०वा। चंद्र ७वा २४ २८ १२ वा ६ वा ४ था ८वा मंगल ४ १०वा ४था। २रावा बुध ५वा १६ ८वा २रा १४ वा ४था गुरु ३२ ६ या १४ या १२ वा २ रा शुक्र १२.४था १२ वा १०वा १४व शनि ६ वा २४ २रा १०वा ८वा १२वा) लत्तादोष-भौमाभ्याकृतिषजिनाष्टनसभहत्यग्रतोलत्तया खेटोऽर्कोऽकमितंशशीमुनिमितं पूर्णोनसन्मालवे ।। टीका-ौम जिस नक्षत्रका होय तिससे तीसरे नक्षत्र में, लत्ता दोप और बुध जिस नक्षत्रका होय तिससे बाईसवें नक्षत्रमें, गुरुसे छठे नक्षत्रमें, शुक्रसे २४ । नक्षत्र में और शनिके नक्षत्रसेटवे नक्षत्र में, राहुके नक्षत्रसे२० नक्षत्रमें रविके नक्षत्र से३२ नक्षत्र में, और चंद्रमा पूर्ण होय तो सातवें नक्षत्रमें लजा- दोष होता है; यह दोप मालवदेशमें अशुभ और अन्य देशोंमें शुभ होता है। महणतथाउत्पातनक्षत्र-यस्मिन्धिष्ण्येमहोत्पातोग्रहणंवाभवेद्यादि । तस्मिन्धिष्ण्येशुभंकर्मपण्मासंवर्जयेद्बुधः॥ टी जिसनक्षत्रमेंउत्सातअथवाग्रहणहोयतिसनक्षत्रपटमासतकशुभकर्मवर्ज है. पापग्रहयुक्त और वेधनक्षत्र । श्रुत्यग्निभेभिजिद्वाहये वेश्चेदर्सेतुरुद्रभे ।। मूलादित्ये च पुष्य- एक दिनका पामाईयुलिका वारानुसार जाने परतु उनमेंखे जिस वारको जो वनित है वह कौटकमें लिखाई (२२२) ज्योतिषसार। मैत्राश्लेपेमपातके ॥ सभागार्यमांत्ये च हस्ताहिबुध्यभेतथा।। चित्राजचरणेस्वातीवारुणे च परस्परम् ॥ वासवेंदाग्निभेतद्वद्वेधः सप्तशलाकजः ।। त्याज्यपापोद्भवोयत्नाद्रतबंधादिकर्मसु ।। टीका-पंच सप्त शलाकाचक्रमें जिस रेखापर जो नक्षत्र होय और उसीमें पापग्रह होय तो वह शुभनक्षत्र विद्धजानिये ॥ नक्षत्रचरणवेध। सप्तपंचशलाकाभ्भां विद्धमेकार्गलेनयत् ॥ लत्तोपग्रहगं धिष्ण्यंपादमात्रशुभेत्यजेत् ॥ वेधमाद्यंतयोरंध्योरन्योन्यं द्वितृतीययोः ॥करैरपित्यजेत्पादकेचिदूचुर्महर्पयः॥ टीका-विद्धनक्षत्र एकार्गल औग लत्ता उत्पात नक्षत्र इनके चरणमें शुभ ग्रह होय तो वह चरण शुभ कर्ममें वर्जित है प्रथम चतुर्थ द्वितीय तृतीय नक्ष- त्रके चरण परस्पर विद्धहोते हैं किसीके मतमें पापग्रह विद्ध नक्षत्रोंके चरण वर्जित हैं-एकार्गल दोपो मार्तडमते-विष्कंभादि दुष्ट योग रहित दिननक्षत्रसे अभिजित् सहित गणनासे विपमनक्षत्रमें सूर्य होय तो एकार्गलदोप होताहै । चंडायुध--शूलगंडांतपापानां साध्यहर्पणयोस्तथा ॥ अंत्यंयच्चंद्रभंतस्मिन्नेतचंडायुधंनसत् ।। टीका-शूल गंड व्यतीपात साध्य वैधृति हर्पण योगोंके अंतमें जो नक्षत्र होय उसे चंडायुध दोष कहते हैं । सप्तशलाकाचका। पंचशलाकाचक्र कृ रो मृ आ पु पु आ कृ रो भृ आ पु पुआ -पू भ अम مر अ. रे- उ - h Sta2 ह चि 4444 वि SABite अऽभि उ मू ज्ये ऽनु क tov तुम सिं भाषाटीकासमेत। (१२३) क्रांतिसाम्य। युम्मेधनुःकर्किरलौ च युक्तेकन्या च मीनेवृषनकयुक्ते ।। मेषे च सिंहे च घटेतुलायांकांते च साम्यंशशिसूर्ययोगे। टीका-धन मिथुन इन लयोंके सूर्य और चंद्रमा होय तोक्रांतिसाम्य होय इसी प्रकारसे कर्क वृश्चिक आदिदो २ राशियोंके क्रांतिसाम्यदोष जानिये ॥ चक्रकाक्रम-ऊर्ध्वरेखात्रयं चैवतिर्यग्रेखात्रयंतथा। क्रांतिसाम्यबुधे यंमध्ये मीनंतुयोजयेत् ॥ टीका-तीन ऊर्ध्व और तीन आडी रेखा खींचे मध्य भागकी रेखाओंमें तीन २ लग्न क्रमसे लिखे द्वादशलमों- मसे दो २ का कांतिसाम्य होता है । यामित्रदोष। लद्वोनास्तगः पापस्तत्तुल्यांशेयदिस्थितः ॥ तदायामित्रदोपः स्यान्नहिन्यूनाधिकांशके ॥ कूरोवायदिवासौम्यो लग्नाचंद्राचखे- चरः ॥ एकोपियदियामित्रे समांशेचतदाभवेत् ॥ यामित्रनप्र- शंसंति गर्गकश्यपदेवलाः। आयपष्टतृतीयेषु धनधान्यप्रदोरविः।। टीका-लम चंद्र मध्य सप्तम स्थानका पापग्रहशून्य करनेसे उसके तुल्यांश आवे तो यामित्रदोप होय, अधिक वा न्यून हो तो दोप नहीं है ॥ दूसरा पक्ष ॥ लमचंद्रसे सप्तमस्थानी शुभग्रह अथवा पापग्रह सम अंश होय तो यामित्र दोप होय, गर्ग कश्यप देवल इन ऋपियोंके मतानुसार यामित्र दोष विवाहमें वर्जित है जो लग्नसे एकादश पष्ठ तृतीय इन स्थानोंमें सूर्य हो तो यामित्र दोष शुभ और सुखदायक जानिये ॥ चरत्रयदोप-कर्कलग्नेथवामेपे घटांशोयदिदीयते ॥ तुलायांमकरेचंद्रे वैधव्यंजायतेध्रुवम् ॥ टीका-कर्क और मेष लग्नमें तुलाका अंश और मकर अथवा तुलाका चंद्रमा ऐसे योगोंका दोप वैधव्य करता है ।

(१२४) ज्योतिषसार । तिथिअनुसारवर्जितलग्न। प्रतिपदितुलामुकरी सिंहुमकरौतृतीयायाम् ॥ कन्यामिथुनेपं- चम्यांसप्तम्यांचैवधनुःकौं ॥ नवम्यांकर्कसिंहौ एकादश्यांतुध- नुर्मानौ ॥ त्रयोदश्यांवृपभमीनौ शून्यलमानितिथियोगात् ।। टीका-प्रतिपदाको तुला और मकर तृतीयाको सिंह मकर पंचमीको कन्या मिथुन सप्तमीको धन कर्क नवमीको कर्क सिंह, एकादशीको धन मीन, त्रयोदशीको वृप मीन इन तिथियों में ये लग्न शून्य वर्जनीय है । दोपनिवारण-यूनंविनाकेंद्रगतोमरेज्यस्त्रिकोणगोवापिहिलक्षमे कम् ॥निहतिदोपत्रिशतंभृगुश्च शतं बुधोवापिहिश्यमूत्तिः ॥ टीका-गुरु शुक्र अथवा बुध ये १ । ४।९।१० ५ इन स्थानोंमें होय तो एक लक्ष गुरु तीनसी शुक्र १ सौ बुध दोपोंको नाश करे हैं ॥ लग्नप्रमाण वा राश्युदय-गजामिदस्रा गिरिपकदस्राव्योमेन्दुरामा रसरामरामा|कुरामरामा गजचंद्ररामा नागेंदुलोकाः कुगुणान लाश्च ॥ पडामरामाःखशशांकरामःसप्तांगपक्षाश्च गजाग्निदस्रा ॥ टीका-राशिउदय कहिये मेपादि बारह राशि तिनकी १२ लम होती हैं जिस राशिके सूर्य होय वही उदयकालकी प्रथम लम जानिये तिसकी पलसंख्याका क्रम कोष्टकमें है ॥ पल २३८२६७३१०३३६/३३१,३१८३१८३३२/३३६/३२०२६७२३८ लग्रकीपटिकाओंकीसंख्या-मीनमेपेयष्टपंच कमानाडयापला- निच।।वृपेकुंभेऽब्धिसप्तद्विपंचदिमिथुनेमृगेHधनु:कर्केशरेपत्रि सिंहाल्योःशरभूत्रयम्॥वाणाटदशतलांगे लग्ननाड्यापलानिच ।। टीका-नेपादि लमोंकी घटी और पलोंका कम ॥ लग्न मेप वृप मिथु कर्क सिंह फ तुला श्चि धन मक कुभ मीन ३ ૬૮૨ ૧૦ ૨૬] ૩૫/૧૮૨૮૩૨ ૨૦૧૭ || प्रतिदिवसभुक्तपलजाननेकाक्रम। मीनाजेसप्तपटूपंच पलानिविपलानितु॥गोकुंभेष्टोयुगशरादि- मे || मि| कासि | क तु वृध म ! कु मी घटी १ १ पल एन म कुम, मी पल भाषाटीकासमेत । (१२५) ग्विशति युङ्मृगे ॥ कर्फेचापेभवाःसूर्यासिंहाल्योरुद्रदृङ्- मिताः॥ तुलांगेदिकचषत्रीणि लगेष्वेकांशसम्मितिः ।। टीका-जो लम उदय कालमें हो तिसकी प्रतिदिन भोग्य पल विपल संख्या. भे| मि | कसिं। कात। वृध ८२७१११११११०/१०.११) ११.१० विपल ५६/५४/२०११२ २ ३६३६/२/१२/२०१५४/५६ उदयास्तलनकथन-यस्मित्राशीयदासूर्यस्तल्लग्नमुदयोभवेत् ॥ तस्मात्सप्तमराशिस्तु अस्तलग्नंतदुच्यते ॥ टीका-जिस राशिके सूर्य होय वही लग्न सूर्योदयमें होतीहै और उससे सप्तम लग सूर्यास्तमें होताहै उसीको अस्तलग्न जानिये ॥ लग्न वृल। मेष मि क क त । धन मीन . D m 9 0 Lor . 0 . O O . . ० -~ ० orD w o wn . स . D ० ० ० o MP - ro m Y ० . ० 0 0 ४० D r ० 2 ० मिथुन कर्क सिंह | 0 0 . ० ० ० fro हो " m-r m O P . 0 12 10 . o . . 0 681280108/08/081008/08/08 कन्याirm ० SEO . 0 . ० ० . foal08|oal. uro ० ० . arro -wo तुला वृश्चिक मन 0m ४०indi D . - 2 0 5 ० V ० roo . ० ~ 10 ~ मकर- . b 210 o 0 a . ० a ० ~ - . ० कुमा ~- मीना a ov . 6 . . 0 wola w Wuyo -~ लग्नकेउक्तअंशदेनैकाक्रम-वृषश्चमिथुनंकन्यातुलाधन्वीझपस्तथा ।। एतेशुभनवांशास्तु ततोन्येकुनवांशकाः ।। टीका-वृप मिथुन कन्या तुला धन मीन ये अंश द्वादश लमोंके शुभ होते हैं शेप अशुभ, मेपादि १२ लग्न चा अंश ७ कोष्ठकमें हैं तिनमें से जिसके अंशकी वर्गशुद्धि होय उनकी कोठकमें लग्न लिखे और उस अंशघडीको अयनांश देकर शुक्त काल लाइये ॥

(१२६) ज्योतिषसार। प्रत्येक कोष्टकमें ४ अंकहैं उनके नाम राशि अंश कला विकला जानिये राशिकी संज्ञा शून्यकानाम मेष और वृपके नाम इसप्रकार १२राशिहोतीहैं तात्कालस्पष्टसूर्यलानेकासाधन । गतगम्यदिनाहनधुभुक्तः खरसप्तांशवियुग्युतोग्रहःस्यात् ॥ टीका-पंचांगस्थ ग्रहोंके कोष्ठकमें पूर्णिमासे अमावास्यापर्यंत और अमां- वास्यासे पूर्णिमा पर्यंत सूर्य स्पष्टहै, परंतु पूर्णिमाके सूर्यसे जिस दिनका सूर्य स्पष्ट करताहो उसदिनको लेकर और दिनोंके अंतरको वर्तमान दिनकी सूर्य गतिसे कोदांतमें गुणै और६०का भाग देनेसे जो अंक आवें वे अंक घडीपर जानिये, परंतु पूर्णिमाके सूर्यसे जो पीछेका स्पष्ट करना हो तो पंचांग सूर्यके अंश घटी पल जो कोठकमें हैं उनमेंसे उन अंकोंको हीन करै जोआगेकालन होय तो उनमें जोडदे इमप्रकारसे तात्कालिक सूर्य स्पष्ट होजाताहै यह जानिये. भुक्त दिवसोंका उदाहरण । शकः १७६९ कार्तिक शुक्ल ९ भौमका स्पष्ट सूर्य कहो। सूर्यकी गति. स्पष्ट रविका उत्तर प. वि. रा. अं. क.वि. ६० पंचांगस्थरवि ७ ६दिन ९ से १५ तक गति ६ ४४२ अंतरकोगुणै ३६० २८२ गुणा शेप संख्या ७ ११७ १५ भाग ६.)२८२(४ अंश यह स्पष्ट सूर्य जानिये. २४० ४२ शेषफल. ३६० ४ ३६४ अं.प.वि. ६४ ४२ भाग ६०) ३६४ (६।४।४२ ४७ गति ४२ मिलावे भाषाटीकासमेत। (१२७) अमुक्त दिवसोंका उदाहरण। शकः १७६५ कार्तिक कृष्णको सूर्य स्पष्ट लानेका क्रम पूर्णिमाका स्पष्ट रवि राशि ७ अंशवटी २१ पल ५७ अनुक्त दिवस ६ सूर्यकी गति ६०।४७ इन अंकोंको ६ से गुणा तो हुए ३६४१४२ इनमें ६० का भाग देसे शेष रहे वे अंश ६ घटी ४ प. ४ इन अंकोंको सूर्यके अंश घटिका और पलों मिलावे तौराशि १३ अंश २६ घटी३९पल इस प्रकार होतेहैं. अयनांशलानेकाक्रम। शाकोवेदाब्धिवेदोनः पष्टिभक्तोऽयनांशकाः ।। देयास्तेतुरवौस्पष्टे चरलग्नादिसिद्धये ॥ टीका-वर्तमान शकमें ४४४ घटानेसे जो शेष बचै उसमें ६० का भागदे ॥ चरस्थिर द्विस्वभाव लग्नोंकी सिद्धिके लिये उन अयनांशोंको स्पष्ट सूर्यके अंश और घटिकाओंमें मिलानेसे सायन सूर्य होजाताहै ॥ उदाहरण । शके १७६९ ना.६० )१३२५(२२अंशा ११७ १५ स्पष्टरवि उनसे ४४४ १२० २२५अयनांशमिलाये. घटाना १२५ ७ २३ २२ १५ १३२५ १२० यह सायनसूर्यजानिये. ६०गुणक भाग६०)३०० (एकला ३०० ००० लग्नसेइष्टकाललानेकाक्रम। स्फुटसायनभागभोग्यांशफलसंमितः॥ सायनांशतनोश्चापि भुक्तांशफलसंयुतामध्यलनोदयैर्युक्तापण्याप्तानाडिकास्तनोः।।

(१२८) ज्योतिषसारं। टीका-सायन सूर्यसे भोग्य और सायन लग्नसे शुक्त बनानेकी रीति ॥ दोनोंका योग करके सूर्य लमके मध्यका उदय लेकर युक्त करे फिर उसमें ६० का भाग देनेसे लग्न परसे सूर्यका भोग्यकाल स्पष्ट होजाताहै ॥ उदा- हरणः-शकः १७६९ कार्तिक शुदी ९ भौमवारको स्पष्ट सूर्यकी राशि आदि ७१।१७। १५ और अयनांश २२।५ को सूर्यके अंश और पडि योंमें मिलावे तो सायन सूर्य राश्यादिश२३।२२।१५ यह वृश्चिक रा- शिका सूर्य २३ अंश २२ घटिका १५ पल हुए इनको३० में घटाया तो भोग्यांश ६॥३७॥४५ सूर्य वृश्चिक राशिका है तो वृश्चिकका उदय कहिये ३३१ से भोग्यांश गुणनेसे हुए अंक २१९४ इनमें ३० का भाग देनेसे आये ७३१८ यह सूर्यका भोग्यकाल जानिये ॥ लग्रसे मुक्त लानेका प्रकार ।। मकर लग्न वृपकी तिसको कोष्ठकमें देखकर वह स्पष्ट लम लेते वे राश्यादि ९/१३।२० कहिये मकर राशिकी लम १३ अंश २० घटिका होतीहै, इस लमके अंश घडीमें अयनांश २१५।५ मिलानेसे सायन लग्न १०१५२५ हुई कुंभराशिके लग्न अंश ५ घडी २५ सायन लग्न होतीहै, लग्नके भुक्तांश ५२।५ कुंभराशिका उदय २६७ इनको गुणनेसे अंक हुए १४४६ इनमें ३० का भाग देनेसे आये ४८।१२ यही अंक लमका शुक्त होताहै ॥ भोग्यभुक्तसे इष्टकाल लानेका प्रकार । भोग्य शुक्त योग १२१०२० सूर्य अथवा लम जिसराशिके मध्यांतर- का उदय २ धन ३१६ मकर ३१० इनका योग६४६ भोग्य शुक्त योग १२१ इसमें मिलाये तो अंक हुए ७६७ इस युक्त अंकमें६० का भाग दिया तो वह इष्ट कालकी घटी १२ पल ४७ हुए इन पलोंमें वृत्तिके ' पल जोडनेसे स्पष्ट इष्टकाल १२१५२ आय जाताहै ।।

(१२९) भापाटीकासमेत। उदाहरण सायन सूर्यसे भोग्यलानेका क्रम घटी अंश ३० २३ ० . २२ ६ ७ ३३१ गुणक १९८६ २३१७१६५५ २०८ १३२४ .२१९४ १२२४७ भाग ६०)१४८९५ (घटिका २४० २४८ भाग ६०) १२४९५ (अं २०८ १२० २४० ४९५ १५ शेप १५ शेपपल रविके भोग्य काल लानेका प्रकार अंश घटी । भागे ३०)२१९४ १५ (७३।८ २१० ९४ ६० गुणक २४० १५ शेपघटि भाग ३०)२५५.(८शेप २४० १५ शेप (१३०) ज्योतिषसार। लग्नसे भुक्तकाल लानेकाक्रम । रा अं क. अक्षतांश. १३ २०मकरलग भाग३०) १४४६ (१४५.१२ ५अयनांरामिलावे १२० २५ सायनलमभुक्त २४६ २६७ लग्नकाउदय २४० १३३५ १३३५. ६० गुणक १११ १५० भाग ३०)३६० (१२ ५० अंश ६०)६६७५(१११ ६ १४४६ इष्टकाल. धन ३३६ मकर ३१० मिलावे ८ भुक्तभोगयोग. १२ भुक्त ७३ भोग्या १२१ २० सूर्य व लग्न इनगशिको मध्यन्तरका उदय. उत्तर इष्टपटिका घ. प. १२१ यह मुक्त मिलावे भाग ६०) ७६७ (१२ न १२० ५प्रवृत्तिकाफल. ५२ उत्तर इष्ट घटी. गुणक भाग६.)२८०० (४७ पल १२ भाषाटीकासमेत। (१३१) इष्टकाल समयका तत्कालसूर्यसाधन। तत्कालभवस्तथाचटिव्याखरसैलब्धकलोनसंयुतःस्यात् ।। टीका-इष्ट घडीमें सूर्य लाना होय तो उसको और उससे सूर्यकी घड़ियों गुणाकर६ ० का भागदे जो लब्धि होय उसमें जो सूर्य गत होय तो हीन करे और भोग होय तो उसमें युक्त करनेसे तत्काल सूर्य आजाताहै ॥ उदाहरण। शकः १७६९ कार्तिक शुदी ९ भीमवारके दिन प्रातःकालका सूर्य ७।३।१७।१५ है तो कहो कि, सायनसूर्य कितना होगा । इष्ट घडीकी गतिका गुणाकार घटीपलोंका भागाकार AN ५२ इष्टघटी ७२० ३६८४ ६०) २४४४ ३१२० ग. ६. ७२० 3 ४७ ५६४ २४४४ ७२० २२२१ इनका भाग )७४२ (१२ ७८२ ૩૭૨૪ ८६२ १२० - १८२ ४ १ १७ १५ प्रातःकालका रवि २ गम्यवटि -- २ ६० गुणक भाग २०) १२० ३२ ५ अयनांश ७ २३ ३५ १७ सायनतत्कालसूर्य इष्टघटीसे लग्न लानेका क्रम। तत्कालाकःसायनोस्योदयन्ना भोग्यांशा खन्युद्धृता भोग्यका- लः॥ एवंयाताशैर्भवेद्यातकालो भोग्यः शोध्योभीटनाडीपले- भ्यः।तदनुजहीहिनगृहोदयांश्चशेपंगगनगुणनमशुद्धहल्लवाद्यम्॥ सहितमजादिगृहेरशुद्धपूर्वैर्भवत्तिविलग्नमदोऽयनांशहीनम् ।। टीका-पीछे सायन सूर्य जिस राशिमें होय उसका उदय लेना चाहिये और सायन सूर्यके अंशादिकोंको ३० अंशोंमें हीन करे ये भोग्यांश जा- (१३२) ज्योतिपसार। निये और उदयको भोग्यांशसे गुणिके ३०का भाग देतो सूर्यका भोग्यकाल निकल आवै । सूर्यका गतकाल लानेका क्रम ॥ सायन सूर्यके उदयमें उसीके अंशादिकोंको गुणिके ३० का भाग दे तो शुक्तकाल आजायगा इष्ट घटियोंके पल करके उसमें भोग्यकाल हीन करे शेप जिस राशिमें सूर्य उदय होगा वह राशि आगे जितनी राशि उदयराशिमें कम होगी उनको घटादे जो उदय न घटे तो अशुद्ध जानिये और शेप अंकोंको३०से गुणाकर अशुद्ध उदयसे भाग दे तो अंशादिक आवेंगे उसमें शेष राशिसे अशुद्ध राशि. को पूर्व राशितक युक्त करना चाहिये और उसमें अयनांश हीन करे तो लग्न स्पष्ट होजाताहै।उदाहरण ॥ पीछे जो सायनसूर्य आयाहै वो७/२३।३५॥ १७ उसका उदय ३३१ सूर्यके अं.२३१३५।१७ये३० अंश में हीन करै शेप बचै वह भोग्यांश ६।२४।४३ इनको उदयसे गुणै वे अंक २१२२ इनमें ३० का भाग दे तो भोग्यकाल निकल आवै ॥उसके हिसाबका क्रम- ३५ १७ सायन सूर्यके अश घटॉवे ४३ शेप भोग्य ३३१ उदय अंश कला विकला १२८६ १२२४ ४३ ६६२ १२९. ३०) २१२२ (७० ७९४४ २१० ૨૨૭ भाग ३.) १४२३३ (२३७ कला ६.)८१८१ ( १३६ अं १२० ६० गुणक. ૨૩ ३०) १३२० (११ ૨૨૮ १२० २४ - १२० F 0 उत्तर ७० पल ४४ विपल इस प्रकार भोग्य काल जानिये. घटीमें १२१५२ इनके पल ७७२ इस अंकमें भोग्यकाल घटाया तो भाषाटीकासमेत। (१३३) शेप अंक७०1१1१६धन राशिका उदय३३६वा मकर राशिका उदय ३१० इन दोनोंका योग६६४शेप अंक में न्यून किया तो रहे ५५॥३६इन अंकोंमें कुंभराशिका उदय २६७ घटा नहीं सकते इसलिये अशुद्ध उदय जानिये॥ इष्ट घटा २ गुणक ५० ७५० भाग्यकाल ७० २२६ धनराशिकाउदय ७०१ ० मकरराशिउदय ६४६ इन अफोमे कुभका उदय नही घट १६ सकता इसलिये अशुद्ध उदय कहते हैं अंशादि५५११६इनको ३० से गुणे वे अंक १६। ५८हुए इनका अ- शुद्ध उदयमें भागदे जितने भाग आवें वे अंश और शेष अंश ५६को ६०से गुणा तो हुए ३३६० फिर इनके उदयमें भाग दिया तौ घटी१२और शेष १५६को६० से गुणा तौ हुये९३६० फिर उनके उदयमें भाग दिया तो पल ३५मेष राशिसे अशुद्धकी पूर्वराशितक राशि १० और पहलीके अंशादिक ६।१२।१५तिनके और राशिके अंशोंके लिखनेसे स्पष्ट सायनलम101 ३६।१२।३५ अयनांश १२१५ सायनलमके अंश घटियों में घटानेसे स्पष्ट लम ९ । १४१७१३५ मकर लम१४अंश ७ घटिका ३५फल जानिये ।। शेषांक १६ १५६ ३० गुणक ६० गुणक ६० गुणक ६०) ४८० (८२६७)३३६० (१२ ५ २६७९५६०३६ २. २६७) १६५८(६. १३५० ५३४ २५६ राशि भेश पटी ६ १२ १२ अयनांश घटाने ८ct इस प्रकार मकर लगका प्रमाण १४ अंश ७ घटी ३५ पल जानिये ।।

(१३४) ज्योतिपसार। सूर्य और लग्न एक राशिके हो तो इष्टलानेका क्रम। यदितनुदिननाथावेकराशीतदंशांतरहतउदयास्यात्खाग्नि- हत्त्विएकालः॥ टीका-सूर्य और लग्न एक राशिके होंतो दोनोंका अंतर निकाले और तिसको राशिके उदयसे गुणे ३०का भागदे जो लब्धि होय सोई इष्टकाल जाने और रात्रिमें लम अथवा इष्टकाल निकालना होय तो सूर्यकी राशि६उसमें मिलावे. लग्नके शुभाशुभ ग्रहोंका विचार । लग्ने चन्द्रखलारिपोशशिसितौसर्वेधुनेखेवुधोऽब्जोंऽत्येगुःसुख- गोष्टमाःकुजशुभा'शुक्रस्तृतीयःशुचे. ॥ लाभेसर्वखगाःशुभा अखिलगाख्यष्टारिगास्युःखलाश्चंद्रख्यंबुधने श्रियेशभटके- दूस्यान्मृत्यवेऽष्टारिगः॥ टीका-लममें चंद्रमा और पापग्रह अथवा लमसे पष्ठस्थानी शुक्र और चंद्र और सप्तमस्थानमें कोईग्रह होय, दशमस्थानमें बुध, द्वादशमें चंद्र, चतुर्थ- स्थानीराहु, अष्टमस्थानी मंगल व शुभग्रह, और तृतीयस्थानमें शुक्र, ऐसे लगके ग्रह होय तो अनिष्ट शोककारक अशुभस्थानी ग्रह जानिये ॥ लग्रसे एकादशस्थानमें संपूर्ण ग्रह और नियस्थान वर्जितके और शेष स्थानमें शुभग्रह होय और तृतीय अष्टम तथा पष्ठस्थानमें सूर्य और २। ३ चतुर्थ स्थानमें चंद्रमा होय तो शुभलक्ष्मीकारक जाने, लग्नका स्वामी अथवा अंशका स्वामी अथवा द्रेष्काणका स्वामी ये पठ वा अष्टमस्थानमें होय तो मृत्युदायक जानिये ॥ पंचभिरिष्टं पुष्टमनिष्टैररिष्टमादेश्यम् ।। स्थानादिफलमृद्धिश्चतुर्भिरपि कथ्यते यवनैः ।। टीका-लमोंके पांचग्रह शुनस्थानी होय तो पुष्टि कारक होतेहैं और अशुभ हो तौ अनिष्टकारक होते हैं और यवनादिमतसे चारग्रहनी इष्टकारकजानिये.

भाषाटीकासमेत। (१३५) षड्वर्गशुद्धि जाननेका क्रम। गृहं होरा च द्रेष्काणो नवांशो द्वादशांशकः ।। त्रिंशांशश्चेति षड्वर्गास्ते सौम्यग्रहजाःशुभाः ।। टीका-प्रथम जाननेमें लग १ होरा २ द्रेष्काण ३ नवांश ४ द्वादशां- श ५ विशांश ये ६ छः वर्ग इनमें शुभग्रहोंके वर्ग शुभ होतेहैं । त्रिशांशादिकथनम् । विशद्भागात्मकंलग्नहोरातस्यार्द्धमुच्यते ॥ लमात्रिभागोद्रेष्का पोनवांशोनवांशकः द्वादशांशोद्वादशांशस्त्रिंशाशस्त्रिंशदशकः। टीका-लपके अंश ३०होते तिनका अर्थ१५अंशहोरा कहताहै और लग्रही का तीसराभाग १० ऐसे३ तीन ट्रेकाण होतेहैं और नवम भाग न- वांश और तिमका बारहवां भाग द्वादशांश और तीसवाँ भाग त्रिशांश इस- रीतिसे एकलगके ३० अंश होतेहैं और उन्हीं तीस अंशोंके छः वर्ग होतेहैं. आदौ गृहज्ञानम् । यस्य ग्रहस्य यो राशिस्तस्य तद्गृहमुच्यते ॥ टीका-जिस ग्रहकी जो राशि होय सो गृह उमीका कहा जाताहै ॥ मोरक बुध चन्द्र। मूर्य बुध शुक्र भीम गुरु शनि शनि शुरु राशि मेष वृप मिथ सिंह क तुल श्चि धन मक कुमामीन होराकथन-सूयेंद्रोविषमे लग्नहोराचन्द्रार्कयोःसमे ॥ टीका-विषमलग्नमें १५ अंशतक सूर्यका होरा तदनंतर चन्द्रमाका होरा जानिये, सम लग्नमें १५ अंशके अन्तलम होय सो चंद्रमाका होरा तिसपीछे सूर्यका जानिये. होरा चंद्रमाका शुभ और सूर्यका अशुभ ॥ मिक बाराम ग्रह कमी 3 में वृ सिक तु २ अश१५ सूच सूच सूचिसू च सूचि सा च म म चं द्रेष्काणकथनम् । द्रेष्काणायोलग्रस्य द्वितीयःपंचमस्यच ॥

ज्योतिषसार। द्रेष्काणश्चतृतीयस्तु लग्नानवमराशिपः ॥ टीका-प्रथम द्रेष्काण कहिये लमके ३० अंश तिनमेंसे १० अंशका एक द्रेष्काण ऐसे २० अंश३० अंश तीन द्रेष्काण होतेहैं प्रथम द्रेष्काण- का स्वामी लमका स्वामी होताहै द्वितीयद्रेष्काणका पंचमस्थानका स्वामी होताहै और तृतीयद्रेष्काणका नवम स्थानका स्वामी होताहै शनि मंगल सूर्यका द्रेष्काण अशुभ जानिये ॥ मेष । वृष मिकिक सिंह। कतुलाश्चधन मकर कुभ मीन ( २१० म० शु० बु० च०२०७० शु०म० गु० श० श० गुरु र बु० श० मा गु० श| शगुमशुबु.५० अ१० गु० ठा० श० गु० में शु०बुच०र०बु शु०म० सप्तांश। मेष वपभ मि० कर्क सिह क० तूळ वृधन मकर कुभ मीन १०/१२ २अ १० ० १ २ ३ ५ १ ३ २ 6 १ १७ ६ ८ ३ २ १ २ ९ ४ ११ ६ १ १२ १ १० २१ ८ ३ २ ९ ४ २ २ ६ . ८ १ लग्नकानवांश । मेपसिंहधनुर्लग्गेनवांशामेपतःस्मृताः। वृपकन्यामृगे लग्ने म- . करानवमांशकः ॥ कर्कालिमीनलग्नेषुनवांशाःकर्कतःस्मृ- ताः॥ नृयुग्मतौलिकुंभेषु तौलितः स्युनवांशकाः ॥ टीका-मेप सिंह धन इन लनोंका नवांशका क्रम मेपसे जानिये और वृप कन्या मकर इनका मकरसे क्रम और मिथुन तुल कुंभका तुलसे कम कर्क वृश्चिक मीन इनलमोंका नवांश कर्कराशि जानना चाहिये. नवांश सूर्य मंगल शनिका अशुभ होताहै ॥

भाषाटीकासमेत। (१३७) KAL में मि का सिक तू ध मकुमी! मशशु म शशु में 10 ६ ४० शशिम र शुश ग बुगु या बुबु गुगुबु १३१२०च म श शुच म ! शशच र शुश मरशुश म र शु श में C म शश क च शशुच मशें शुच मश म म २६४० म र रा . गु बु बु द्वादशांशकथन। लग्रस्य द्वादशांशास्तु स्वराशेरेव कीर्तिताः॥ टीका-लमके अंश ३० तिनके भाग १२ द्वादश कहातेहैं तिनका क्रम चलते लगसे जो पर्यंत लमके अंश हों ताके स्थानसे जो द्वादशांश पति जानिये. तिनमें मंगल शदि रवि इनके अंश अशुभ होतेहैं । मेमिफर्क मि का तु वृ मकुमी बुशुम गुश श गु २ ܘܘ C ( घ मश बु यु शुराम गु श म बु म गुश शगु च र मा गुश शगु म १३ । शु मगुश शगु मा शु/बु च १७ बु मगु श। शगु म शुबु चार म गुश श गु म शुबु EO प र बु .. म ग शश म श २२ E: गु श शुगु म । शुबु शगुमशु शाम गु २७ गुमशुबु बु ग म युच । र बुशुम गु शश विपमत्रिंशांश। कुजार्किगुरुविच्छुकास्त्रिंशांशपतयः क्रमात् ।। पंचपंचाएशैलेषु भागानां विपमेगृहे ।।

(१३८)
ज्योतिषसार।
टीका-विषमलनमें पंचमांश लग्नपर्यंत होय लो भौमके आगे ५ अंश
शनिक ५ गुरु ८ अंश तिसके आगे ७ अंश बुधके और ५ अंश शुक्रके
इसक्रमसे विपम लग्नमें त्रिंशांशपति जानो इनमें मंगल शनि अशुभ जानिये॥
अं. मे | मि| सिं| तु ||
५ मं | मंगमं मामं
५ शशशशशश
८ गु गु गु. गु | गु गु
७Jबुबु बु बु बुबु
५ शु शु शु शु | शुशु
समत्रिंशांश।
शुक्रज्ञेयार्किभूपुत्रास्त्रिंशांशपतयः समे॥
पंचांगेष्वेषु पंचानां भागानां कथिता बुधैः ॥
टीका-सम लग्नमें प्रथम ५ अंश पर्यंत शुक्र तिसके आगे ७ अंश बुध
तिसके आगे ८ अंश गुरु तिसके आगे ५ अंश शनि तिसके आगे ५ अंश
मंगल ये सम लग्नमें त्रिशांशपति जानिये. तिसमें मंगल शनि अशुभहैं ।
अं. ६ | | क|| म | मी
शु शु शु शु शु |शु
७बु | बुबु बु बुबु
८ गु गुगग गुगु
५शशशशश
५ में मं | मं | में मं4
षड्वर्गजाननेकाक्रम।
टी-कार्तिक शुक्ल९मंगलवार लम मकर अंश१४घटिका ३१पल५ स्वामी
शनि सो गृहेश ॥ ये षड्वर्ग तिनमें शनि अशुभ शेष ५ वर्ग शुभ जानिये।।
गृहेश होरा द्रष्का नवमां द्वादशी त्रिंश
शनि चंद्र शुक्र शुक्र | बुध गुरु

भापाटोकासमेत । (१३९)
उक्तांश।
मेपेषष्ठधटोवृषेत्रिगिनाद्वंद्वेदिगोर्काग्नयः कीटेबध्य
गनवाद्रयोर्कभवनेगावाःस्त्रियांव्यर्कपट् ॥ जूकेर्का-
दिखगा अलोगवगपट् चापेत्रिपड्गोद्रयोन।शारूपरु-
णाधटेझपवृषोमीनेद्विगोषट्शुभाः॥
रा.उ मे वृमिक सिक तु वृधमकमी
अश६/३/७१.६६।१२१३३/१२/७
७३/९/६७१२७१५६/१२/२/२
पड्वर्ग पंचवर्ग वा चतुर्वर्गमथापिवा ।।
कैश्चित्रिवर्गसत्प्रोक्तंद्वयेकवर्ग तनुंत्यजेत् ॥
टीका-६ अथवा ५किंवा४वर्ग लमके होंय तो लम बलिष्ठ होय और
किसीरके मतसे३वर्ग शुभ होतेहैं और दो एक होय तो लग्न वर्जनीयहै ॥
लग्नशिफल।
लग्नेचतुर्दशोभागो वृपस्यमकरस्यच ॥
कन्याकर्कटमीनानामष्टमे द्वादशेलिनः ।।
टीका-वृप मकर इनके १४ अंश कन्या कर्क मीनके ८ अंश और
वृश्चिकके १२ अंश ये शुभ फल देते हैं ।
कुंभस्यांशेचपडिशे चतुर्विशे च तौलिनः॥
नृयुकार्मुकयोलेनं शुभंसप्तदशांशके ।।
टोका-कुंके २६ अंश तुलके २४ मिथुनके ७ और धनुके
अंश शुभहें इस प्रकारसे जानिये ॥
एकविंशतिमेभागेमेपस्याटादशेहरेः॥
संपूर्णफलदंचादौ मध्येमध्यफलप्रदम् ।।
टीका-मेपके २१ अंरा सिंहके १८ ऐसे लमों आदिमें मंपूर्ण और
मध्यम फल अंश अनुसार जानिये ॥
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(१४०) ज्योतिषसार। लगवर्गोत्तमलक्षण ॥ अंतेतुच्छफलंलग्नंयदिवर्गोत्तमंनचेत् ॥ लास्यस्वनवांशोयः सवर्गोत्तमउच्यते॥ टीका-लमके अंत भागमें वर्गोत्तम न होय तो लग्न अनिष्ट फल देता है और लग्न अपने नवांशमें होय तो वर्गोत्तम कहिये ॥ गोधूललग्नकाकथन। गोधूलंपदजादिके शुभकरपंचांगशुद्धौरवेरर्धास्तात्परपूर्वतो. र्धघटिकंत-दुमष्टारिगम् ।। सोग्रांगकुजमष्टमंगुरुयमाहःपात- मर्कक्रमजह्याद्विप्रमुखेतिसंकटइदंसद्यौवनाघेक्वचित् ।। टीका-शूद्रादिकोंको पंचांग शुद्ध देख करिके सूर्यके अर्धास्तसमय प्रथम और पश्चात् १५ पल गोधूलीकाल शुभ और गोधूललनसे पष्ठ और अष्टम स्थानी चंद्रमा और पापग्रह भौम अष्टमस्थानी और गुरु शनि ये वार और क्रांति दिन इत्यादिक दुष्टयोग वर्जिके शुभ और किसीके मतमें वि- प्रादिकके अति संकटमें वर और कन्या होय तो गोरज शुभ होय ॥ वधूप्रवेश।विवाहमारभ्यवधूप्रवेशो युग्मेथवाषोडझवासरांतात्॥ तदूर्वमध्येयुजिपंचमांतादतः परस्तानियमोनचास्ति ॥ टीका-विवाहसे सम १६ दिवस पर्यंत वधूप्रवेश कहाहै आगे पांच वर्ष पर्यंत विपममासादिक कहेहें आगे स्वेच्छा ॥ उक्तमासादि ॥ माधफाल्गुनवैशाखेशुक्लपक्षेशुभेदिने । गुर्वाधस्तविशुद्धौस्यान्नित्यंपनीद्विरागमः॥ टीका-माघ फाल्गुन और पैशाख शुक्लपक्षमें शुभदिवसमें गुरु आदि अस्त वर्जिके द्विरागमन उक्त है ॥ नीहारांशुयुगुत्तरादितिगुरुत्रामानुराधाश्विनीशाकोभास्कर- वायुविष्णुवरुणत्वाष्ट्रेप्रशस्तेतिथौ ॥ कुंभाजालिगतेरवाशुभ- करेप्राप्तोदयेभार्गवेजीवज्ञास्फुजितादिने नववधूवेश्मप्रवेशःशुभः॥ टीका-मृग तीनों उत्तरा पुनर्वसु पुप्य रोहीणी अनुराधाअधिनी ज्येष्ठा हस्त स्वाती श्रवण शततारका चित्रा ये नक्षत्र और कुंज मेप वृश्चिक इनराशियोंके सूर्य शूकादिका उदय और गुरु बुध चंद्रये वार ऐसे शुभदिवसमें प्रवेगकरावे भाषाटीकासमेत। (१४१) नूतनपल्लवधारणका मुहूर्त। हस्तादिपंचमृगपूपभदरभेषु विष्णुद्रयेबुधदिने गुरुशुकवारे॥ स्त्रीणांशुभंप्रथमपल्लवधारणस्यात्पाणिग्रहोक्तसमये खलुपीतवस्त्रैः ॥ टीका-हस्तसे पांव और मृगशिर पुनर्वसु अश्विनी श्रवण धनिष्ठा ये न- क्षत्र और बुध गुरु शुक्र ये वार और वे यह होय जो विवाह कार में कथित हैं ऐसे दिवसमें नूतन पीतवस्त्र करिके स्त्रियोंको प्रथम पल्लवधारण करावे ॥ गंधर्वविवाहमुहूर्त। शूद्रात्येपुपुनर्भवापरिणयः प्रोक्तोविवाहोक्तभैर्नालोक्यं तिथिमा- सवेधभृगुजेज्यास्तादि तत्रार्कभात् ॥ विन्यज्ञेषुमृतिर्धनं मृतिमृती पुत्रोमृतिर्दुभंगे श्रीरोन्नत्यमथोधृतीशकृततत्वःत्ययःसाभिजित् ।। टीका-शूद्र आदि और रजक आदिऔर अन्यजाति जिनकी स्त्रियांका पुनर्विवाह होजाता है उनके धरेजेका मुहूर्त विवाहनक्षत्र अवश्य देखे. मास तिथि वार गुरु शुक्र इनके उदय अस्तका कुछ दोप नहीं और सूर्यनक्ष- त्रसे दिवसनक्षत्र पर्यंत नक्षत्र गिने, क्रमसे प्रथम ३ मरण द्वितीय ३ धन तृतीय ३ मरण चतुर्थ ३ मरण पंचम ३ पुत्रा पष्ठ ३ मरण सप्तम ३ दुर्भगा अष्टम ३ लक्ष्मी नवम ३ औन्नत्य और सूर्यनक्षत्रसे चौथे ग्यारहवें पञ्चीस इन चारस्थानोंके नक्षत्र शुभ और शेप नक्षत्र सब अशज होते हैं. दूसरेमतअनुसार। इंद्रादितिशिवाश्लेपा आगेयंवारुणंतथा ।। अश्विनीवसुदैवत्यंपट्टकालेशुभंस्मृतम् ॥ टीका-ज्येठा पुनर्वस, आर्दा आश्लेषा कृत्तिका शततारका अश्विनी धनिष्ठा ये नक्षत्र धरेजा करनेमें शुज जानिये ।। दत्तक पुत्र लेनेका मुहूर्त। हस्तादिपंचकभिपग्वसुपुष्यभेपुसूर्यक्षमाजगुरुभार्गववासरेयु ॥ रिक्ताविवर्जिततिथी अलिकुंभलगेसिंहे वृपेभवतिदत्तपरिग्रहोयम् टोका-हस्त चित्रा स्वाती विशासा अनुराधा अश्विनी धनिष्ठा पुष्प (१४२) ज्योतिषसार। और रविवार मंगलवार गुरुवार शुक्रवार ये उक्तहैं और चतुर्थी नवमी चतु- दशी वृश्चिक कुंभ ये लग्न वर्जित और सिंह वृष ये लग्न शुभहैं । वास्तुप्रकरण। ग्रामादिअनुकूल। ग्रामादेरनुकूलत्वंदिशोभूतग्रहस्यच ॥ मासधिष्ण्यादिशुद्धिंच वीक्ष्यायव्ययभांशकाम् ।। टीका-वाम दिशा और भूतग्रह इनके अनुकूल देखिके माम व नक्षत्र- शुद्धि और आय व्यय व लग्न अंशशुद्धि शुन देखिलीजिये । ग्रहबल। गुरुशुकार्कचंद्रेषु स्वोच्चालिबलशालिषु ॥ गुर्वदुबलंलब्धा गृहारंभ प्रशस्यते॥ टीका-गुरु शुक्र सूर्य चंद्र इनको अपने उच्चादिक स्थानाम बलयुक्त देखिके और सूर्य चंद्र गुरु इनका वल पाके गृहका आरंजकरना शुभहै । ॥ वय॑ ॥ विवाहोक्तान्महादोषानृतेजामित्रशुद्धितः॥ रिक्ताकुजार्कवारौच चरलग्नंचरांशकम् ॥ टीका-जामित्रशुद्धि बचाके विवाहके जो दोष कहेहें वे तब वर्जित और रिकातिथि भौमवार रविवार वा चरलम और लमोंके अंश वर्जितहे ।। त्यक्त्वाकुजार्कयोश्यांशंपृष्ठेचाग्रेस्थितंविधुम् ॥ वुधेज्यराशिगं चाकुर्याद्वहंशुभाप्तये॥ टीका-रवि भौमके अंश और पीछे वा आगे स्थित चंद्र पर्जितहैं । मिथुन कन्या धन और मीन इन राशियोंका सूर्य गृहारंग करनेमें शामहै ॥ द्वारशुद्धि। द्वारशुद्धिनिरीक्ष्यादौभशुद्धिवृपचक्रतः ॥ निष्पंचकेस्थिरेलग्नेयंगेवाऽऽलयमारभेत् ॥ टीका-यथम द्वारशुद्धि और वृपचक्रसे नक्षत्रशुद्धि देसि करी पंच- क रहित स्थित वा विस्वभाव लग्नमें प्रारंभ कीजिये। ..

यह शुभ और भाषाटीकासमेत। (१४३) ग्रामअनुकूल। स्वनामराशेर्यद्राशिशिरांकेशदिमितः॥ सग्रामः शुभदुः प्रोक्तस्त्वशुभः स्यात्ततोन्यथा ॥ टीका-अपनी राशिसे २।५।९।११। जिस प्रामकी राशि होय अन्यथा अशुभ जानिये ॥ एकभेसप्तमेव्योम गृहहानिस्त्रिपष्ठगे ।। तुर्याएद्वादशेरोगा शेपस्थानेभवेत्सुखम् ।। टीका-एक राशि अथवा सप्तम होय तो शून्य तीसरी अथवा सप्तम होय तो गृहकी हानि, चौथी आठवीं बारहवीं अथवा जन्मकी होय तो रोगकारक जानिये और शेप स्थान शुभहै ॥ जातकजाननेकाक्रम। अकचटतपयशवर्गाअष्टौक्रमतः स्मृताः॥ एकोनखेषुवर्णानां स्वरशास्त्रविशारदैः ॥ अवगैषोडशज्ञेयाःस्वरा कादिषुपंच- सु ।। पंचपंचैववर्णाःस्युर्यशौतुचतुरक्षरों ॥ टीका-अवर्गादि शवपर्यंत ४९ अक्षरहैं तिनमें अवर्गके स्वर १६ और कवर्गके पवर्ग पर्यंत ५ तिनके अक्षर २५ और यश इन दोनों वर्गोंके अक्षर चार २ होतेहैं यह स्वरशास्त्रके ज्ञाता कहतेहैं ॥ बंगोंकेस्वामी । ताक्ष्यमार्जारसिंहश्वसागजमेषकाः ।। वगैशाक्रमतोज्ञेयास्ववर्गात्पंचमोरिपुः टीका-अवर्गका स्वामी गरुड १ कवर्गका मार्जार २ वर्गका सिंह ३ दवर्गका श्वान ४ तवर्गका सर्प ५ पवर्गका मूषक ६ यवर्गका गज ७ शवर्गका मेप ८ इस क्रमसे वर्गाके स्वामी जानिये और जिस वर्गका अक्षर अपने नामका होय उससे पांचवे वर्गका स्वामी उसका रिपु जानिये और चौथा मित्र और तृतीय उदासीन जानिये ॥ काकिणी। स्ववगैद्विगुणकृत्वापरवर्गेणयोजयेत् ॥

- (१४४) ज्योतिपसार। अष्टभिश्चहरेद्भागंयोधिकासऋणीभवेत् ।। टीका-अपने नामके वर्गको द्विगुणाकरे उसमें यामादिकका वर्ग मिलावे और आठका भागदे पुनि प्रामादिकका वर्ग द्विगुण करके अपने नामका वर्ग मिलावे पूर्ववत् आठका भागदे इन दोनों से जिसके शेप अधिक बचे सो उसका अर्थात् न्यनवालेका ऋणी जानिये ॥ चंद्रमाकेमुखजाननेकाविचार। वाह्नान्मत्रान्नगर्भस्थेचंद्रेयाम्योत्तराननम् ॥ पित्र्यावासवतस्तद्वत्प्राक्परास्याद्दंशुभम् ।। टीका-कृत्तिकासेनक्षत्रोंका चंद्रमा होय तो गृहोंका मुख दक्षिण- को और अनुराधासे ७ नक्षत्रोंका चंद्र होय तो गृहोंका मुख उत्तरको और मघासे ७ नक्षत्रोंका चंद्रमा होय तो गृहोंका मुख पूर्वको और धनि- छासे ७ नक्षत्रोंका चंद्रमा होय तो गृहोंका मुख पश्चिमको शुभ जानिये ॥ आयादिसाधन ॥ गृहेशकरमानेनगृहस्यायादिसाधयेत् ॥ करैश्चेन्नेष्टमायादि साध्यमंगुलितस्तथा ॥ टी-गृहस्वामीकहस्तमानसे अथवाअंगुलीमानकरकेइष्टआयादिसाधनकरे क्षेत्रफल। विस्तारगुणितंदैर्घ्यगृहक्षेत्रफलं लभेत् ॥ तत्पृथग्वसुभिर्भक्तंशेपमायोध्वजादिकः॥ टीका-ध्वज आदि साधनका प्रकार ॥ चौडाई लंबाई अथवा लंबाई चौडाईको आपसमें गुणनेसे क्षेत्रफल जानिये ॥ और उसीमें आठका भागदेनेसे जो शेप पचे सो ध्वजआदि आय जानिये ।। आयोकेनाम ।। ।। ध्वजोधूम्रोथसिंह श्वासौरभेयःसरोगजः ।। ध्यांशश्चैवक्रमेणैतदायाएकमुदीरितम् ॥ टीका-ध्वज १ धूम्र २ सिंह ३वान ४ बल ५ गर्दभ ६ हस्ती ७ काक ८ या कम करिके आयाष्टक जानिये ॥ वर्णानुसारउक्तआय-त्राह्मणस्थध्वजोज्ञेयःसिंहोर्वेक्षत्रियस्यच ।। वृपभश्चैववेश्यस्यसर्वेषांतु गजःस्मृतः।।

भाषाटीकासमेत। (११) टोका-ब्राह्मणको ध्वजा आय, क्षत्रीका सिंह, वैश्यका वृषन और सर्व वर्गों के गज आय उक्तहैं । मतांतरसेआयोंकाफल। ध्वजेकृतार्थों मरणंचधूने सिंहेजयश्चाथशुनिप्रकोपः ॥ वृषे च राज्यं च खरेचदुःखंचाक्षमृतिश्चैवगजेसुखस्यात् ॥ टीका--ध्वजायका फल कृतार्थ, प्रनायका मरण, सिंहायका जप, श्वान आयका कोप, वृषआयका राज्य, खरआयका दुःख, ध्वांक्ष आपका मृत्यु और गजायका फल सुखप्राप्ति होता है । नक्षत्रअनुसारव्ययसाधन ॥ पूर्वद्वारेवृषःश्रेयान्गजः प्राग्य- मदिङ्मुखः ॥ क्षेत्रमष्टाहतंधिष्ण्यविभक्तस्याहस्यभम् ॥ भेष्टभक्तव्ययः शेपमायादल्पोव्ययःशुभः ।। टीका-पूर्वाभिमुख गृहोंका वृपाय और मजार श्रेयस्कर होताहै और पूर्व दक्षिणाभिमुख गृहोंका गजाय कहाहै पूर्वमेंके क्षेत्रफलको आठ से गुणाकर और २७ का भागदे शेप बर्च सो घरके नक्षत्र जाने उन नक्ष- त्रोंमें ८ का भागदे शेषरहै सो उस गृहका व्यय और आयको अपेक्षा व्यय अल्प होय तो शुज ॥ ग्रहोंकीराशि। अश्विन्यादित्रयेमेपो मघादित्रितयेहरिः॥ मूलादित्रितयेधन्वी भयंशेपराशिषु ॥ टीका-गृहोंके अश्विनी भरणी कत्तिका इन नक्षत्रोंकी राशि मेष १ रोहिणी और मृगशिरकी वृष २ आर्दा पुनर्वसुकी मिथुन ३ पुष्य आश्लेपाकी कर्क ४ मघा पूर्वा और उत्तराकी सिंह ५ हस्त चित्राकी कन्या ६ स्वाती विशाखाकी तुला अनुराधा ज्येष्ठाकी वृभिक ८ मूल पूर्वापाढाकी धन ९ श्रवण धनिष्ठाकी मकर १० शतभिपा पूर्वाभाद्रपदाकी कुंभ ११ उत्तराभाद्रपदा रेवतीको मीन १२ इस क्रमसे राशि जानिये ॥

(१४६)
ज्योतिषसार।
गृहोंकेनामलानेकाप्रकार।
गृहस्यपूर्वतोदिक्षुक्रमात्कक्ष्याधिदंतिनः ॥
संस्थाप्यालिंदजानकांस्तन्मित्याषोडशगृहाः॥
टीका-गृहोंके पूर्व दिशा कमसे अंक स्थापित करे वे ऐसे--पूर्वको १
दक्षिणको २ पश्चिमको ४ उत्तरको ८ऐसे चारों दिशाके अंकमें सालाकी
संख्या अधिक एक करके मिलावै जो अंक होय सोई नाम गृहका जानिये
गृहोंकेनाम ॥ध्रुवं धान्यंजयनंदेखरं कांतमनोरमम् ॥
सुमुखंदुर्मुखंक्रूर रिपुदंधनदंक्षयम्॥आक्रंदविपुलंज्ञेयं
विज यचेतिषोडश ॥गृहंध्रुवादिकंज्ञेयनामतुल्यफलप्रदम् ।।
टीका-और इन गृहोंके ध्रुव धान्य जय इत्यादिक सोलह नाम,
इनका शुभाशुभ नामानुसार जानिये ॥
अंशलानेकाप्रकार ॥ व्ययेन संयुतेक्षेत्रगृहनामाक्षरान्विते ॥
त्रिभिर्भक्तांशकास्तेषां द्वितीयांशोनशोभनः॥
टीका-पीछेका जो व्यय होर उसे क्षेत्रफलमें मिलावे और गृहोंको
नामके अक्षर संयुक्त करिके तीनका भागदे शेष दो बचें तो अशुभ और
एक अथवा पूर्ण भाग लगजानेसे शुभ फल होताहै ॥
गृहोंके भाग ॥ नवभागगृहंकुर्यात्पंचभागंतुदक्षिणे ॥
त्रिभागवामतःकुर्याच्छेपंद्वारंप्रकल्पयेत् ॥
टीका-गृह क्षेत्रके नव भाग कर तिसमें से पांच भाग दक्षिणको तीन
भाग उत्तरको और एक भाग मध्यमें तिसमें द्वारकी कल्पना करै ।
गृहोंकेद्वार।। द्वारस्योपरिपद्वारंद्वारस्यान्यच्चसंमुखम् ।।
व्ययदं तु यदातञ्च न कर्त्तव्यंशुभेप्मुभिः ॥
टीका-द्वारके ऊपर द्वार और आमने सामनेके द्वार व्ययदायक होते
हैं शुभाभिलापी पुरुपोंको ऐसे वरजने चाहिये।
गृहोंके स्थानोंके योजनाका प्रकार।
नानागारं दिशिनाच्यामाग्नेय्यां पचनालयम् ॥ याम्यायांशय

भापाटीकासमेत। (११७) नागारं नैर्ऋत्यांशस्त्रमंदिरम् ।। प्रतीच्यांभोजनागारं वायव्यां पशुमंदिरम् ॥ भांडकोशंचोत्तरस्यामीशान्यांदेवमंदिरम् ॥ टोका-पूर्वमें स्नानका घर १ अग्निकोणमें रसोईका स्थान २ दक्षि- गमें सोनेका स्थान ३ नैर्ऋत्यमें शस्त्रालय ४ पश्चिममें भोजनस्थानं ५ वायव्यमें पशुमंदिर ६ उत्तरमें भण्डारकोश ७ ईशान्यमें देवमंदिर ८ इस प्रकारसे स्थानांकी योजना करावे ॥ अल्पदोप ।। अल्पदोपं गुणश्रेष्ठं दोपायनभवद्गृहम् ।। आयव्ययोप्रयत्नेनविरुद्धं भं च वर्जयेत् ॥ टीका-जिस गृहमें दोप तो अल्प होय परंतु वह बहुत गुणों करके श्रेष्ठ होय तो दोप नहीं होता और आय व्यय अथवा नक्षत्र विरुद्ध होय तो यल करके वर्जित करे । गृहारंभचक्र ॥ आरंभे वृपों चक्र स्तंभे ज्ञेयंतुकूर्मकम् ।। प्रवेशे कालशं चक्रवास्तुचक्रबुधेशुभम् ।। टीका-गृहारंभमें वृपाचक और स्तमस्थापनमें कूर्मचक गृहप्रवेगमें कलरा यह वास्तुचक्र में देखिलीजिये। गृहारंभकमास ।। सौम्यफाल्गुनवैशाखभाद्श्रावणकार्तिकाः॥ मासास्युर्गृहनिर्माणेपुत्रारोग्यधनप्रदाः ॥ टीका-पोप १ फाल्गुन २ वैशाख ३ भाद्रपद ४ श्रावण कार्तिक६इन महीनों में गृहारंग और शिलान्यास भीर स्तंभ प्रतिष्ठा शुम जानिये पुत्र सान भारोग्यता और भायुकी वृद्धि और धनकी मामि होय ॥ गृहारंभकेमासोंकाफल। शोकोधान्यं पंचतानि पशत्वंस्वाप्तिनास्वंसंगरंभृत्यनाशम् ॥ राष्ट्रीप्राप्तिपहिभौतिचलक्ष्मीकुर्युश्चवाद्यागृहारंभकाले । टीका-चैत्रमासमें गोक प्राति और पेशासमें पापमाति २ ज्येष्टमें मृत्यु ३ भऔर आपाटमें पशुहीनता ४ भापणमें द्रव्यमानि ५ माइपरसें दरिद ६ और आधिनमें करह और कार्तिक कृत्योंका नाराधमार्गगी- (१४८) ज्योतिषसार । पमें धन प्राप्ति ९ पौपमें लक्ष्मी १० माघमें अग्निभय ११ फाल्गुनमें लक्ष्मी १२ इस प्रकार शुभाशुभ फल जानिये ।। अथमासप्रवेशसारणीयम् ॥ भा NON १० D . U . . vi. V " WA म m . 4D 1-GG ww 8 . - N im M २७.२६२५२५ 14 U K 440 m १७ Mon 14 U F . U . kia - M wU . - है . M WM W a ३७३७३७३७३७३७३८3EBEBE १२६२८२७२८८२९२९30३११३२ 3३3३3133333 CO JA W 4 -- se 210 - X tw diary . - tw २३२२२१२१२० MU व ELEE ६RDमा १६२३3५४० Y W PRERN 15. १४५३ h m ० - AN . ૪ ૧દ ૨૮ ૪૦ ૩ ૩ ૧૬ ર૮ ૪ પર કે ૪ ૧૬ ૨૮ ૪ રઝ ' રદ ૩૬ ૪૭ २१२२२४२५२४२७२८३.३१३२३३ ३४३६१७३८३९४०४२ ४३४४४५'४६ ३२३२२२२२२२२२२२२२२ १०१११२१३१४१५१६/१७/१८१९२०२१/२२/२३ - W0 . W OP . . AA ७ 10 aurti A 0 m UU Y . K०० 2300 WAw wr real . WW 14 Ja WU w D OM ०१३ 5 "590153 s M * 20 D Jw a . - UN WHEN 40 M ان بیان . . mir -क BEEEEEEEEEEEEE माघ30 9 uu OM Wx 4 X WW Joir W 0.0 - Cw U .. m Wia ११५११ 90w Mm W W D Xw An . ON هه M 4. " 13633 1313 J W W . AN .. 056 . w w m m K W ५८१८३८५८१. शाद 10 10- a AAW G4 0U .. m w W m . MAU A WW . WA .. M Silm 6w 6 16 ... 0 W WA W C - 10 . ०७ M. N m Wio inm . . . NW 10 . W . To nw w .m wit . . - 4 M M WU ८० . Jom. U D CAN 10 - . w . - NA D WW AU W Gm ma 0 W DU PRO G0 Mm m . P D sar Mm 1010 W W 40 WW 381323७३७३७घटी १३ पन्त WAJ m ५१५२५३ १२।२।२वार ४५६ घटी २७/२८/२९ M २७/१३५९/४३ पल m ३३ वार PE . ww io m Ull २९घटी -- भाषाटीकासमेत। (११९) दिशानुसारगृहोंकामुख करना। कर्कनकहरिकुंभगतेकैपूर्वपश्चिममुखानिगृहाणि ॥ तौलिमेपवृश्चिकयानेदक्षिणोत्तरमुखानिवदति । टीका-कर्क मकर सिंह कुंज इन राशियोंका सूर्य होय तो घरका द्वार पूर्व अथवा पश्चिमको करे, तुला मेष वृश्चिक इन राशियोंका सूर्य होय तो गृहोंका मुख दक्षिण अथवा उत्तरको करै, इस प्रकार रत्नमालाग्रन्थमें कहाहै. गृहारंभकेनक्षत्र। व्युत्तरामृगरोहिण्यां पुप्यमैत्रकरत्रये ॥ धनिष्ठाद्वितयेपोष्णेगृहा- रंभप्रशस्यते ॥ आदित्य भौमवय॑तुसर्वेवारा शुभावहाः ॥ चं- द्रादित्यवलंलब्ध्वा लगेशुभनिरीक्षिते ॥ स्तंभोच्छ्रायस्तुकर्तव्यो ह्यन्यस्तुपरिवर्जयेत् ॥ प्रासादेष्वेवमेवस्यात्कूपवापीपुवहि ।। टीका-तीनों उत्तरा मृग रोहिणी पुष्य अनुराधा हस्त चित्रा स्वाती धनिष्ठा शतभिषा रेवती ये नक्षत्र शुभ रवि भौमवार वर्जिके शेषधार शुभ और स्थिर लग्नमें शुनग्रहकी दृष्टि देखे और स्तंभारोपण करावे अन्य कर्मोको उक्त नहीं है देवालय कूप तडाग वापी इन कृत्योंको शुभ जानिये। वृषचक्र। त्रिवेदाब्धित्रिवेदाब्धिद्वित्रिभेष्वतःशशी ॥ कुर्यालक्ष्मी समुद्रा- संस्थैर्यलक्ष्मी दरिद्रताधिन हानि क्रमान्मृत्युमारंभेवृपचककम् ।। टीका-सूर्यनक्षत्रसे दिवस नक्षत्रतक जितने नक्षत्र होय तिनमें प्रथम भाग ३ नक्षत्र लक्ष्मीदायक दूसरा भाग ४ उदास तृतीय भाग ४ स्थिरताकारक चतुर्थ भाग ३ लक्ष्मी पंचम भाग४ दारिद्रता पष्ठ ४ धनदायक सप्तम भाग २ नक्षत्र हानिकारक अष्टम ३ नक्षत्र मृत्यु इस क्रमसे जिस दिनका नक्षत्र शुभफलदायक हो उसीमें गृहारंभ करावे ।। शिलान्यास । दक्षिणपूर्वकोणकृत्वा पूजांशिलांन्यसेत्प्रथमाम् ।। शेषाःप्रदक्षिणेनस्तम्भाश्चैवंप्रतिष्ठाप्याः।

(१५) ज्योतिषसार। टीका-पूजन करिके आनेय कोणमें प्रथम शिलास्थापनकरे शेष शिला प्रदक्षिण स्थापित करावे इसी प्रकार स्तंभस्थापनभी करे । शिलान्यासनक्षत्र ॥ शिलान्यासःप्रकर्त्तव्योगृहाणांश्रवणेमृगे ॥ पोष्णेहस्तेचरोहिण्यांपुष्याश्विन्युत्तरात्रये ॥ टीका-श्रवण मृगशिर रेवती हस्त रोहिणी पुष्य अश्विनी तीनों उत्तरा इनमें शिलान्यास कर्त्तव्यहै । शेषकेमुख। कन्यासिंहेतुलायांभुजगपतिमुखं शंभुकोणेनिखातं वायव्ये स्यात्तदास्यत्वलिधनमकरे ईशखातंवदंति ॥ कुंभे मीने च मेषेनितिदिशि मुखंखातवायव्यकोणे चान्ये कोणे मुखं वै वृषमिथुनगते कर्कटे रक्षखातम् ॥ टीका-कन्या तुल सिंह इन लनोंमें शेषके मुख ईशान्यकोणको जानो तो अग्निकोणमें खात करावे ॥ वृश्चिक धन मकर इन लमोंमें शेषके मुख वायव्यको तिनमें ईशानको खात करावे ॥ कुंभ मीन मेष इन लमोंमें शेपके मुख नैर्ऋतको तामें वायव्यकोणमें खात करावे ॥ वृष मिथुन कर्क इनमें शेपके मुख आनेयको तामें नैर्ऋत्यको खात करावे ॥ दुष्टयोग ॥ वज्रव्याघातशूलश्चव्यतीपातश्चगंडकः ॥ विष्कंभपरिपौवयौवारीमंगलभास्करी ॥ टीका-वज व्याघात शूल व्यतीपात गंड विष्का परिघ और भौम रविवार ये वर्जितहैं ॥ कूर्मचक्रम्। तिथिस्तु पंचगुणिता कृत्तिकायूक्षसंयुता ॥ तथाद्वादश- मिश्राचनवभागेनभाजिता॥ ॥ फल ॥ ॥ जले वेदामुनि- चंद्रास्थलेपंचद्वयंवसुः ॥ विपटूनवचाकाशं त्रिविधं कूर्मल- क्षणम् ॥ जलेलाभस्तथाप्रोक्तास्थले हानिस्तथैवच ।। आ काशेमरणप्रोक्तमिदं कूर्मस्यचक्रकम् ॥

भापाटीकासमेत। (१५१) टीका-गृहारंगकी तिथियोंको पांचसे गुणाकरे और कत्तिका नक्षत्रसे लेकर दिवसनक्षत्रतककी नक्षत्रसंख्याको उस गुणनफलमें मिलावे फिर १२ और उसीमें मिलावे नवका भाग दे जो ४।७।१ शेष हैं तो कूर्म जलस्थानमें जानिये ताको फल लाम और ५४२१८१ बचें तो कूर्म स्थलमें जानिये तिसका फल हानि और ३।६।९। शेष बचें तो कूर्म आकाशमें जानिये तिसका फल मरण ये तीनों प्रकारका कुर्म कहाहै ॥ स्तंभचक ॥ सूर्याधिष्ठितभद्वयंप्रथमतो मध्येतथा विंशतिःस्तंभाग्रे रससंख्ययामुनिवरैरुक्तंमुहूर्तशु- भम् ॥ फल ।। स्तंभामरणंभवेद्गृहपतेर्मूले धना- र्थक्षयोमध्येचैवतुसर्वसौख्यमतुलं प्राप्नोतिकत्तसिदा ।। टोका-सूर्यनक्षत्रसे दिवस नक्षत्रपर्यंत लिखनेका कम तिसमें प्रथम दोर नक्षत्र स्तंभमूल तिसका फल धनक्षप और द्वितीय २० नक्षत्र स्तंभके मध्य तिसका फल लक्ष्मी और कीर्ति प्राप्ति और तृतीय ६ नक्षत्र स्तंभ के अयनागमें मृत्यु जानिये ऐसे शुभ फल देखके स्तंभारोपण करावे देहलीकामुहूर्त ॥ मूले मोभेत्रिऋसंगृहपतिमरणं पंचगर्भ सुखस्यान्मध्येदेयाष्टकसंधनसुखसुखदं पुच्छदेशेष्टहानिः ।। पश्चादेयंत्रिऋॉगृहपतिसुखदंभाग्यपुत्रार्थदेयं सूर्यांचंद्र- ऋक्षेप्रतिदिनगणयेन्मोभचक्रविलोक्य ।। टीका-सूर्यनक्षत्रसे दिवसनक्षत्रतककी नक्षत्र संख्या और फल ऐसे क्रमसे जाने प्रथम तीन नक्षत्र मूलमें तिसमें स्तमारोपण करे तो मृत्यु द्वितीय ५ नक्षत्र गर्भ फल सुख तीसरे ८ नक्षत्र मध्यमें फल धनसुत मुख चतुर्थ ८ नक्षत्र पुच्छ भाग फल मित्रहानि पंचम ३ नक्षत्र अग्र भागमें सुख लोग पुत्रलाभ ऐसे शुभफल हैं । द्वारचक्र ॥अर्काच्चत्वारिऋक्षाणिऊबैचैवप्रदापयेत् ॥ द्वौद्वौकोणेषु दद्यादेशाखायां च चतुश्चतुः ॥ अधश्च- त्वारिदेयानिमध्ये त्रीणि प्रदापयेद ॥ ऊर्खेतुलभतेरा- ज्यमुद्रासकोणकेषुच ॥ शाखायांलभतेलक्ष्मीमध्येरा- ज्यप्रदतथा । अधःस्थेमरणं प्रोक्तंद्वारशकप्रकीर्तितम् ॥

(१५२) ज्योतिपसार । टीका-सूर्यनक्षत्रसे दिवसनक्षत्र पर्यंत लिखनेकाक्रम तिसमें प्रथम४नक्ष प्र ऊर्ध्व तिनका फल राज्यप्राप्ति, द्वारकोण चार तिनमें प्रतिकोणमेश्नक्षत्र तिनका फल उद्वसन, बाजू दो तिनमें नक्षत्र चारि तिनका फल लक्ष्मी और नीचे नक्षत्र ४ फल राज्य, मध्यमें नक्षत्र तिनका फल मरण यह जानिये ॥ शांतिका अग्निचक्र। सैकातिथिर्वारयुताकृताप्ताशेषे गुणेभ्रेभुविवह्निवासः॥ सौख्यायहोमे शशियुग्मशेषे प्राणार्थनाशौदिविभूतलेच ॥ टीका-जिस तिथिको शांति करनी होय तिसमें एक मिलावे और जो वार होय सो अंक मिलावष्टका नाग दे शेष रहे तिसका फल तीन अथवा शून्य बचें तो अग्नि मृत्युलोकमें जानिये तिनका फल सुख प्राप्ति और उसमें • शांति करनी भी शुभहे और एक शेष रहे तो स्वर्गमें अग्नि ९ प्राणनाश और दो बचें तो पातालमें तिसका फल धन नाश होय ॥ ग्रहके मुखमें आहुतिका विचार। तरणिविगुभास्करिचंद्रमाकुजसुरेज्यविधुतुदकेतवः॥ रविभतोदिनभंगणयेत्क्रमात्प्रतिखगंत्रितयंत्रितयंन्यसेत् ॥ टीका-पूर्यनक्षत्रसे दिवसनक्षत्रतक जितने नक्षत्र होय तिनका इस क्रमसे फल जानिये ये प्रथम तीन नक्षत्र सूर्य फल अशुभ, द्वितीय भाग ३ न. बुध शु० तृतीय जाग ३ न. शनि फल अशुभ, फिर ३ न. चंद्रके फिर३ न. भौमके फिर ३ न. गुरुके तिस पीछे ३ न. राहुके फिर ३ न. केतुके इसमें शुभ ग्रहके शुभ पाप ग्रहके अशुभ जानिये ॥ गृहप्रवेशका मुहूर्त। अथप्रवेशेनवमंदिरस्ययात्रानिवृत्तावथभूपतीनाम् ॥ सौम्यायने पूर्वदिनविधेयं वास्त्वर्चनंभूतवलिश्चसम्यक् ।। टीका-यात्रा और राजदर्शन मुहूर्तमें उत्तरायण सूर्य होय, और प्रवेशके प्रथम दिवसमें वास्तृपूजा और तबली करके गृहप्रवेश योग्यहै । चित्रानुराधामृगपोष्णपुष्यस्वातीधनिष्ठाश्रवणंचमूलम् ॥

भापाटीकासमेत। वारेवसूर्यक्षितिजेष्वरिक्तातिथोप्रशस्तोभवनप्रवेशः ॥ टीका-चित्रा अनुराधा रेवती पुष्य स्वाती धनिष्ठा श्रवण मूल ये नक्षत्र और रवि नौम ये वार तथा रिक्ता तिथिको त्यागिके गृहप्रवेश कीजिये ॥ कलशचक्र प्रवेशः कलशेकापंचनागाष्टपटुक्रमात् ।। अशुभंचशुभंज्ञेयमशुभंचशुभंतथा॥ टीका-सूर्यनक्षत्रसे दिवसनक्षत्रतक जो नक्षत्र होय उसमें प्रथम ५ नक्षत्र अशुभ और आठ नक्षत्र शुस आगे ८ नक्षत्र अशुभ और शेष ६ नक्षत्र शुम ऐसे कलशचक्र जानिये ॥ वामार्कलक्षण ॥ रंधात्पुत्रादनादायात्पंचस्वकस्थितेक्रमात् ॥ पूर्वाशादिमुखं गेहंविशेदामोभवेदतः ॥ टीका-घरमें प्रवेश करनेके समय सूर्य वामार्क होय तिसका जाननेका क्रम प्रवेश लग्नामें अष्टमस्थानमें पंचमस्थानी सूर्यहोय और घरका द्वार पूर्व तथा दक्षिणकी ओरको होयर तिसका स्थान०या०पंचमस्थान पर्यंत और घरका मुख पश्चिमको होय स्थान०या०पंचमस्थान पयंत ३ अथवा ग्रहोंका मुख उत्तरको होय तो सूर्य ११ स्थान ५ स्थानांतक आवे प्रदेशमें वामार्क युक्त है। शुभाशुभग्रहऔरलमा त्रिकोणकेंद्रगःशुभैत्रिपाठलाभसंस्थितैः॥ असद्हैः स्थिरोदयगृहविशेबलेविधौ ॥ टीका-त्रिकोण और केंद्रस्थानमें शुभग्रह होय ऐसे स्थिर लग्न देखके और तीसरे छठे तथा लामस्थानमें पापग्रह होय तो बली चंद्रमा गृहप्रवेश करना शाजानिये ॥ गृहारंभकीलगशुद्धि ॥ त्रिपडायगतेः पापैरष्टांत्येन्तरगैःशुभैः ।। चंद्रेलग्नेऽरिरंध्रात्यजितेस्थाच्छुभंगृहम् ॥ टीका-३।६।११ स्थानमें पापग्रह शुज और ८ । १२ । स्थानमें इतरस्थानोंमें शुभयह होय तो शुभ जानिये परंतु चंद्रमा लग्न तथा पष्ठ द्वादश अष्टमस्थानमें न होय ।।

(१५४) ज्योतिषसार। अशुभयोगोंकेलन ॥ धनकेंद्रत्रिकोणस्थ क्षीणश्चंद्रोनशोभनः॥ शबोर्नवांशगःखेटःखास्तसंस्थोपिनोशुभः॥ टीका-लग्रविषे २।१।४।७।१०। ५१९ । स्थानों में क्षीण- चंद्र स्थित होय तो अशुभ है और स्वराशिका शत्रु नवांशकमें होय तो भी अशुभ क्षीणचंद्र कृष्णपक्षकी पंचमीसे जानो ॥ आयुष्यप्रमाण ॥ लग्नेजीवःसुखशुक्रोबुधःकर्मण्यरौरविः ॥ रविजःसहजेनूनंशतायुःस्यात्तदागृहम् ॥ टीका-लग्नमें बृहस्पति ४ शुक्र ४ बुध १० सूर्य ३ शनि ऐसी ल- ग्नमें गृहारंभ करनेसे उसगृहकी १०० वर्षकी आयु निश्चय कर जाननी ॥ दूसराप्रकार ॥ भृगुर्लगेबुधोव्योनिलाभेऽर्क केंद्रगोगुरुः ॥ यस्यारंभचतस्यायुर्वत्सराणांशतद्वयम् ॥ टीका-शुक्र और बुध १० दशमस्थानी ११ रवि और । ४।१० गुरु ऐसे लग गृह आरंभ करावे तो २०० वर्षकी आयु कहिये । अन्यच्च ॥ जीवोबुधोभृगुव्योनि लाभगौभानुभूमिजौ ॥ प्रारंभयस्यतस्यायुःसमाशीतिःसहश्रिया ॥ टीका-गुरु बुध शुक्र ये १० स्थानमें ११ रवि भौम होय तो लक्ष्मी युत घरकी ८० वर्षकी आय जाननी स्वोर्तिनिभृगौविलनगदेवमंत्रिणिरसातलेऽथवा ॥ स्वोच्चगेरविसुतेऽथवाऽऽयगेस्यात्स्थितिश्वसुचिरंसहश्रिया । टीका-लग्नमें उच्चका शुक्र होके बैठा होय गुरु४होय उच्चका वा स्वक्षेत्री शनि होके ११ स्थानी हो तो लक्ष्मीयुक्त चिरकाल घरकी आयु कहना ॥ स्वर्भगेहिमगौलाभेसुरेज्यकेन्द्रसंस्थिते ॥ धनधान्यसुतारोग्ययुक्तधामचिरंभवेत् ॥ टीका-कर्कका चंद्रमा ११ वें स्थानमें और गुरु केंद्रग ११ ४ । ७ ॥ १० होय तो वह धनयुक्त और सुत आरोग्य सहित चिरकाल रहे ॥ दूसरे मतसे पृथ्वी शोधनेका प्रकार। कुण्डार्थपृथ्वीपरिशोधहेतवे प्रष्टुर्मुसाद्य प्रथमस्फुटीभवेत् ॥

भापाटीकासमेत। (१५५) वर्गादिवर्ण:किलतदिशिस्मृतंशल्यंमुनींद्रेईपयास्तुमध्यतः ॥ स्मृत्वेष्टदेवतांप्रष्टुर्वचनस्यायमक्षरम् ।। गृहीत्वा तु ततः शल्याशल्यंसम्यग्विचार्यते ॥ टीका-कुंडके निमित्त अर्थात् नूतन गृहके बनानेको प्रथम भूमि शो- धनेका प्रकार पृच्छक इष्टदेवताका स्मरण करके ब्राह्मणसे प्रश्न करे ताके मुखसे आदि अक्षर जिस वर्गका निकले तिसके उत्तर अ क च ट त प यह वर्ग पूर्वादि अष्टदिशाओंमें मध्यभागी ह प य वर्गाके आदि अक्षर जहां होय इस स्थानमें अमुक शल्यहै तिसका प्रकार नीचे लिखाहै जिसमें से उन २ स्थानोंका फल जानिये ।। प्रश्नअक्षरफल। पूर्व ॥पृच्छायांयदिपाच्यानरशल्यंतदाभवेत् ।। सार्धहस्त प्रमाणेनतच्चमानुष्यमृत्युकृत् ॥ आग्नेय ॥ आग्नेय्यांदिशिकः प्रशेखरशल्येकरद्वयम् ॥ राजदंडोभवेत्तत्रभयनैवनिवर्तते ।। दक्षि०॥ याम्यायांदिशिचःप्रश्तदास्यात्कटिसंस्थितम् ॥ नरशल्यंगृहेतस्यमरणचिररोगतः॥ ३० ॥ नम्त्यांदिशिटप सार्धहस्तादधास्थले । शुनोस्थिजायतेतबालानांजायते मृतिः। प० ॥ तः प्रश्पश्चिमायांतुशिशोःशल्यंप्रजायते । सार्द्धहस्तेगृहस्वामीनतिष्ठतिसदायदे ।। वाय० ॥वायव्यादि- शिपाप्रभेतुपांगाराश्चतुष्करे ॥ कुर्वतिमित्रनाशंचदुःस्वमद- र्शनंसदा ॥ उत्ताउदीच्यांदिशियःप्रविप्रशल्यंकरादधः ॥ तच्छोम्रनिर्धनत्वायकुबेरसदृशस्यहि ।। ई०॥ईशान्यायदिशः प्रगोशल्यंसादहस्ततः ॥ तद्दोधास्यनाशायजायतेगृहमे- धिनः । मध्यभाग ॥ हपयामध्यकोप्टेचसोमाभवेदधः ॥ नृकपालमयोभस्मठोहंतत्कुटनाशकृत् ।। टीका-पुरछकके मुसमे आदि अक्षर भवर्गका निकले नो पूर्वको देव (१५६) ज्योतिषसार। हाथ गहरा खोदे तो मनुष्की हड्डी विकले वह मृत्युकारक जानिये। (क) निकले तो २ हाथके गहरावमें गदहेकी निकले उससे राजदंडका भय कभी निवृत्ति न होय ३ (च) अक्षरका उच्चारण होय तो दक्षिणकी ओर कटि बराबर खोदनेसे नरके अस्थि निकले तिसका फल चिरकालके रोगसे मरण ४ (ट) का उच्चार होय तो नैर्ऋत्य दिशामें डेढहाथ ऑडा खोदनेसे कुत्तेके अस्थि निकलें तिसके फल बालक न जीवे ५ (त) का उच्चारण करे तो पश्चिम दिशामें डेढ हाथके गहरायमें बालकके अस्थि निकलें तिस- का फल गृहका स्वामी सदा घरमें न रहै ६ (५ ) होय तो वायव्य दिशामें ४ हाथपर जली हुई धातुकी भूसी वा कोयले निकलें तिसका फल मित्र- नाश दुस्वमदर्शन ७ (य) वर्ग होय तो एक हाथपर उत्तर कोणमें ब्राह्मणके हाड निकलें तिसका फल कुबेर समान भी धनाढ्य दरिद्री होय ७ (श) होय तो ईशान दिशामें डेढ हाथपर गौकी अस्थि निकलें तिसका फल गो- धनका नाश ८ (ह प य ) होय तो मध्य भागमें छाती बराबर ऑडेमें मनुष्यका कपाल वा भस्म वा लोह निकले तिसका फल कुलका नाश ९ जिस वर्गका नाम प्रश्नकर्ताके मुखसे उच्चारण होय उसी दिशाको देखे ॥ यात्राप्रकरणम् । शुक्र संमुख ॥ एकग्रामेपुरेवापिदुर्भिक्षेराष्ट्रविप्लवे ॥ विवाहेतीर्थयात्रायां प्रतिशुक्रोनविद्यते ॥ टीका-गांवके गांवमें अथवा शहरके शहरमें दुर्भिक्षकालमें नथा देशो- 'पद्रवमें विवाह समयमें और तीर्थयात्रामें सम्मुख शुक्र होय तो दोप नहींहै। पोष्णदावाग्निपादांतं यावत्तिष्ठतिचंद्रमाः ॥ तावच्छुकोभवेदंधासन्मुखंगमनंशुभम् ।। टीका-रेवती अश्विनी जरणी कृत्तिका इन नक्षत्रोंके प्रथम चरण चंद्र- मा होनेसे शुक्र अंध होताह उसके सन्मुख गमनमें दोष नहींहै ॥ शुभाशुभफलम् ॥ दक्षिणेदुःखदःशुक्रःसंमुखोहंतिमंगलम् ।। वामपृष्ठेशुभोनित्यंरोधयेदस्तगःशुभः॥

भापाटीकासमेत। ( १९७) टीका-गमन अर्थात् यात्रामें दाहिना शुक्र होय तो दुःखदायक संमुख कार्य नाशक और वामभागमें पीछेकाशुक्र मंगलदायक और पूर्वमें अस्त होय तो पश्चिमको गमन शुभ और पश्चिममें अस्त होय तो पूर्वमें शुभगमन जानिये। घातचन्द्रनिर्णय-प्रयाणकालेयुद्धेचकृपौवाणिज्यसंग्रहे। वादेचेवगृहरिभवजितोपातचंद्रमाः।। टीका--पात्रा युद्ध सेतकर्ममें व्यापार अन्न आदि भरने में विवाद गृहके आरंभमें पात चंद्रमा वर्जितहै ॥ पातप्रकरणम्- पाततिथियातवारंघातनक्षत्रमेवच ॥ यात्रायवर्जयेत्प्राज्ञोहन्यकर्मसुशोभनम् ॥ टीका-पाततिथि घातबार घातनक्षत्र यात्रामें वर्जितहैं और कार्यो शुभजानिये ॥ मेषेरविर्मवाप्रोक्ताषष्ठीप्रथमचंद्रमाः || वृषभेपंचमोहस्तश्च- तुर्थी शनिवच ।। मिथुनेनवमःस्वातीअष्टमीचन्द्रवासरःौक- कैदिनुराधाचबुधाषष्ठीप्रकीर्तिता। सिंहेपाटश्चंद्रमाश्चदश- मीशनिमूलके । कन्यायांदशमञ्चंद्राश्रवणःशनिरष्टमी ।। तु- लेगुरुदादशीस्याच्छतंतृतीयचंद्रमाः॥ वृश्चिकेरेवतीसप्तदश मीभार्गवस्तथा ॥धनेचतुर्थीभरणीद्वितीयाभार्गवस्तथा ॥ मकरेश्मीरोहिणीद्वादशीभौमवासर॥ कुंभेएकादशश्चा चतुर्थीगुरुवासरः ।। मीनेचद्वादशसापद्वितीयाभार्गवस्तथा।। शशि मेष नृप मिथ, कक सिंह क.तलाश्चिा मक. कुभ मीन चद्र २१६१०४३ ८/११/१२ (रशि शनि च ... श.गु.श.शु.म. गु.स. ५ ra ७ १ भार नक्षत्र गधा इस्तस्श.अनु. श्राश.र.भ.रा.भा. आता ६ १०.८1१२१०/२/१२/५२ तिथि मेपादि ११ राशि घातचंद्रशादिचतुष्टय बचाकर पात्रामें शुमनक्षत्रआदि देखले कालचंद्र--मेवेदावृपेऽयोचमिथुनेचतृतीयकःदशककरविः सिंहकन्याअंक:प्रकीर्तितः ॥ पदतुले वृश्चिकेवेंदु,नेरुदाम- कीर्तिताः ॥ मकरेऋपयाप्रोकाकुंभेवाणाउदाहताः॥माने त्वंपिकालचंद्राशोनकश्चेदमत्रवीत् ।।

(१५८) ज्योतिषसार । टीका-मेपराशिको४वृयकोलमिथुनकोश्कर्कको १०सिंहको १२कन्या९ तुलाकोवृश्चिकको ११ धनको ११ मकरकोकुं नको मीनको ४ चौथा चंद्रमा कालचंद्र जानिये ये कालचंद्र शौनकऋषिमोक्तः सर्व कर्मों में वर्जितहैं ॥ तिथिपरत्वसेवर्जितलग्न। नंदायामलियोस्तुतुलामकरयोस्तथा ॥ भद्रायांमीनधनुषोः कालस्तिष्ठतिसर्वदा ॥ जयायांस्त्रीमिथुनयोरिक्तायांमेषक- कयोः॥ पूर्णायांकुंभवृपयोर्मनुष्यमरणंध्रुवम् ।। टीका-नंदातिथिको वृश्चिक सिंह तुला मकर और भद्रातिथिको मीन धन और जया तिथिको कन्या मिथुन और रिक्ता तिथिको मेष कर्क पूर्णातिथिको कुंभ वृष इन तिथियोंमें लग्न वर्जितहै ॥ यात्राकेनक्षत्र । हस्तेंदुमैत्रश्रवणाश्चितिष्यपौष्णश्रविष्ठाचपुनर्वसुश्च ॥ प्रोक्तानिधिष्ण्यानिनवप्रयाणेत्यक्त्वात्रिपंचादिमसप्तताराः॥ टीका-हस्त मृगशीर्ष अनुराधा श्रवण अश्विनी पुप्य रेवती धनिष्ठा पुनर्वसु ये नक्षत्र प्रयाणमें उक्तहैं परंतु ३।५।११७ ये तारा गमनमें वर्जितहैं । मध्यनक्षत्र-रोहिणीउत्तराचित्रामूलमा तथैवच ॥ पाटोत्तराभाद्रविश्वे प्रयाणेमध्यमाःस्मृताः॥ टीका-रोहिणी उत्तरा चित्रा मूल आर्द्रा पूर्वापाढा उत्तराभाद्रपदा उ- त्तरापाढा ये नक्षत्र यात्रामें मध्यमह । वय॑नक्षत्र । त्रीणिपूर्वामघाज्येष्ठाभरणीजन्मकृत्तिका ॥ सार्पस्वातीविशा- खाचनित्यंगमनवर्जिताः॥ कृत्तिकाएकविंशत्या भरण्यास सनाडिकाः॥ एकादशमघायाश्चत्रिपूर्वाणांचपोडश ॥ विशा खासार्पचित्रासुस्वातीरोद्रचतुर्दशी॥ आद्यास्तुघटिकास्त्या- ज्या शेपांगमनंशुभम् ॥

भापाटीकासमेत। (१५९) टीका-इन नक्षत्रोंको प्रयाण कालमें वर्जित करै परंतु जो कुछ आवश्यक काम व संकट आन पड़े तो तीनोंपूर्वाकी ६घटिकामपाकी११ज्येष्ठा संपूर्ण भरणीकी ७ घटिका कृत्तिकाकी २१ जन्मनक्षत्र संपूर्ण आश्लेषा विशाखा चित्रा स्वाती आर्द्रा इन नक्षत्रोंकी आध१४घटिका वर्जिके प्रयाण करै ॥ प्रयाणयेशुभाशुभविचारअक्केशमनर्थकंचगमने सोमेचवं- धुप्रियंचांगारेऽनलतस्करज्वरभयंप्राप्नोतिचार्थबुधे ॥ क्षेमारो ग्यसुखं करोतिचगुरौलाभश्चशुक्रेशुभोमदेवंधनहानिरोगमर- णान्युक्तानिगदिभिः॥ टीका-रविवारको गमनकरे तो मार्ग में क्लेश और अर्थकी हानि होय सोमवारको गमनकर तो बंधु और प्रियदर्शन मंगलमें अग्नि चोर भय और ज्वर प्राप्ति बुधवारमें द्रव्य और सुखप्राप्ति गुरुवारमें आरोग्य और सुख शुक्रवारमें लाभ और शुभ फलप्राप्ति शनिवार में गमनकरै तौ बंधन रोग और मरण प्रामिहोय ॥ होराकथन व शकुन । वारात्पष्ठस्यपष्ठस्य होरासाद्विनाडिका । अर्कशुक्रौत्रुधश्चं दोमंदोजीवोधरासुतः ॥ गुरुर्विवाहेगमनेचशुक्रोबोधेसौम्यः सर्वकार्येषुचंद्रः ॥कुजेचयुद्धरविराजसेवामदेचवित्तवितिहोर योगाः॥ यस्यग्रहस्यवारेपिकमकिंचित्प्रकीर्तितम् ॥ तस्य ग्रहस्यहोरायांसर्वकर्मविधीयते ।। टीका-जिस वारका होरा होय उसी प्रथमपटिका होरा तिसके छठे वारकों दूसरा होरा इस क्रमसे दिवसके वार होरा जानिये रविवारका होरा राजसेवाको शुन द्वितीय शुक्रका गमनको तृतीय बुधका ज्ञानप्रामि चतुर्थ चंद्रका सर्वकार्यको,पंचम शनिका द्रव्यका संग्रह योग्य,छठा गुरुका विवाह को,सातवा मंगलका युद्धको जानिये इस प्रमाण होराका क्रम जानिये और जिस २ ग्रहका जोश्यार तिसमें कथित रुत्य उसके होरामें करवि ॥ सूर्यकाहोरा सूर्यस्यहोरेरजकीसुवस्त्रंकुमारिकाविप्रचतुष्टयंच ।। काकत्रबद्रीनकुलो तथैव चापस्तयेको वृपभश्चगौश्च ।।

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(१६०)
ज्योतिपसार।
टीका-रविके होरामें गमन करे तो आगे जो शकुन होय तिनको
कहतेहैं रजकी, वस्त्र, कुमारी, ४ ब्राह्मण, ३ काक, दो न्योला, दो चाप
एक बैल, और गायके शकुन मिलें ॥
चंद्रकाहोरा।
चंद्रस्यहोरेद्विजयुग्मकाकभेरीमृदंगानकुलाःखरोष्ट्रो ॥
हयश्चगोमेपशुनस्तथैवपुष्पाणिनारीद्वयमेवमार्गे ॥
टीका-चंद्रमाके होरामें गमनकरे तो मार्गमें दो ब्राह्मण और काक
नगारे मृदंग और न्योला गर्दा ऊंट घोडा गाय मेंढा कुत्ता और पुष्प
दो
स्त्रियां ये शकुन मिलै ॥
मंगलकाहोरा।
मार्जारयुद्धंकलह कुटुंबेरजस्वसास्त्री भवनस्यदाहः॥
नपुंसकश्वत्रितयद्विजंश्चनग्नोविमुक्तोधरणीसुतस्य ।
टीका-मंगलके होरामें गमन करे तो मार्जारयुद्ध अथवा स्त्री पुरुषोंका
कलह अथवा रजस्वला स्त्री अथवा जलताहुआ घर किंवा नपुंसक तीन
कुत्ता किंवा नम ब्राह्मण भेटे ॥
बुधकाहोरा।
बुधस्यहोरेशकुनस्यसर्वःस्त्रीपुत्रयुक्ताकलशस्तुपूर्णः ।।
सुचातकश्चापगजौकुमारःपुष्पाणिनारीखलुदर्पणश्च॥
टोका-बुधके होरामें सर्व शकुन स्त्री पुत्रयुत, पानी जराहुआ कलश,
चातक पक्षी वा चापपक्षी,गज किंचा बाल,पुष्प,स्त्री,दर्पण, ये मार्गमें मिले।
गुरुकाहोरा।
गुरोदिजातिर्गणिकाचधेनुःस्त्रीवालयुक्तासजलोघटस्तु ॥
ऊर्णाचकाकोनकुलोबकश्चहंसस्यराजावहवस्तुवेश्याः ॥
टीका-गुरुकेहोरामै ब्राह्मण गणिका अथवा गाय पुत्रसहित स्त्री जलपर्णघट
शाल अर्थात् ऊन वस्त्र काक न्योटा बगला हमकाराजाकिंवा बहुत वश्वमिले

भापाटीकासमेत। (१६१)
शुक्रकाहोरा।
शुक्रस्यहोरेगणिकाद्विजेंद्र काकत्रिपंचायनपुंसकोवा ।।
मद्यहिमांसंगणिकाचधेनुर्धान्यंचशूत्रितयंचवैश्यः ॥
टीका-शुक्रके होरामें ब्राह्मण गणिका ३ अथवा ५ काक नपुंसक
मय मांस ज्योतिषी धान्य तीनशूद्र वैश्य ये मिले।
शनिका होरा।
पतंगसूनोर्यवनश्चननोरजस्वलास्त्रीमृतकस्तथैव ।।
पिशाचगृध्रौविधवाचवह्निनपुंसकश्चाथयुवाप्रचंडः॥
टीका-शनिके होरामें नग्न मुसलमान, रजस्वला स्त्री, प्रेत, पिशाच, गृध्र
पक्षी, विधवा स्त्री, अनि, नपुंसक, तथा प्रचंड तरुणपुरुष, ये शकुन मिलें ॥
उत्तमप्रश्न न होयतो।
मनुकावाक्य॥गमनंप्रतिराजंस्तु सन्मुखादर्शनेनच ॥
प्रशस्तांश्चैवसंभापेत्सर्वानेतांश्चकीर्तयेत् ॥
टीका-राजा प्रति कहते हैं-गमनकालमें पूर्वोक्त शकुनोंका कीर्तन किंवा
उत्तम भापण वा इनका श्रवण दर्शन न होय तो मनमें स्मरण करिके गमन
करे तो शुभ होय ॥
वारानुसारवस्त्रधारण ।
खानोलंयुधे पीतं कृष्णवर्ण शनैश्चरे ॥
श्वेतं गुरौभृगाभौमेरक्तंसोमेतुचित्रकम् ॥
टीका-रविवारको नीलेवस्त्र धारणकरे, बुधवारको पीत, शनिवारको
काले, गुरु व शुकको श्वेत, मंगलको रन, सोमवारमें चित्र, इम प्रकार वन
धारण कारके गनन करे।
नक्षत्रतिथिवार अनुसार दिक्छूल वयं ॥
पूर्वदिशा ।। मूलश्रवणशाकेपुप्रतिपन्नवमीपुच ॥
शनासामेबुधे चैव पूर्वस्यांगमनं त्यजेत् ।।

(१६२)
ज्योतिषसार।
टीका-मूल श्रवण ज्येष्ठा ये नक्षत्र प्रतिपदा नवमी तिथि और शनि
सोम बुधवार इनमें पूर्व दिशाको गमन न कीजिये ।
दक्षिणदिशा ॥ पूर्वाभाद्रपदाविन्यौपंचमीचत्रयोदशी॥
गुरुर्धनिष्ठाचैवयाम्येसप्तविवर्जयेत् ॥
टीका-पूर्वाभाद्रपदा अश्विनी नक्षत्र और पंचमी त्रयोदशी तिथि
गुरुवार धनिष्ठा इनमें दक्षिण दिशाको गमन न कीजिये ॥
पश्चिम ॥ रोहिण्यांचतथापुष्येषष्ठीचैव चतुर्दशी ॥
भौमार्कगुरुवारेषु न गच्छेत्पश्चिमांदिशम् ॥
टीका-रोहिणी पुण्यनक्षत्र षष्ठी चतुर्दशी तिथि रवि गुरुवार इनमें
पश्चिम दिशाको गमन न कीजिये ॥
उत्तर॥ करेचोत्तरफाल्गुन्याद्वितीयांदशमीतथा ।।
बुधेरवौ भौमवारे नगच्छेदुत्तरदिशम् ॥
टीका-हस्त उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र २।१० तिथि बुध रवि भौम
इनमें उत्तर दिशाको गमन न कीजिये ॥
विदिक्शूल॥ ऐशान्यांज्ञेशनौशूल आग्नेय्यांगुरुसोमयोः ॥
वायव्यांभूमिपुत्रेतुनैर्ऋत्यांशुकसूर्ययोः॥
टीका-वारानुसार विदिशाओंका शुलहोताहै तिसमें गमन न कीजिये बुध
और शनिवारमें ईशान्य दिशाको वर्जितहै गुरु और सोमवारमें आने-
यको और मंगलमें वायव्यको शुक्र और रविवारमें नैर्ऋत्यको गमन वर्जितह॥
शूलदोषनिवारणार्थ भक्षण ।
सूर्यवारेघृतंपीत्वा गच्छेत्सोमेपयस्तथा ॥ गुडमंगारवारे
तुबुधवारेतिलानाप ।। गुरुवारेपिज्ञेयं शुक्रवारेयवानपि॥
मापान्भुक्त्वाशनेबारे शूलदोपोपशांतये ॥
टीका-रविवारको घी और सोमवारको दूध पाव मंगलको गुड बुधको
तिल गुरुको दधि शुक्रको भव शनिवारको उडदकी वस्तु खाय, ऐसे लक्षण
करके गमन करे ।

भाषाटीकासमेत। (१६३) कुंभ और मीनके चंद्रमामें वर्जितकर्म । शय्यावितानप्रेताग्निक्रियाकाष्ठतृणाजिनम् ।। याम्यदिग्गमनंकुर्यानचंद्रकुंभमीनगे ॥ टीका-पलंग बुनवाना और प्रेतागिक्रिया और तृणकाष्ठादिसंग्रह और दक्षिणको गमन ये सकल कर्म कुंभ और मीनके चंद्रमा वर्जितहैं । संमुखचंद्रविचार ।। करणभगणदोपंवारसंक्रांतिदोपंकुति- थिकुलिकदोपंवामयामाईदोपम् ॥ कुजशनिरविदोपराहु- केत्वादिदोषहरतिसकलदोपंचंद्रमा-संमुखस्थः ॥ टीका-करण नक्षत्र वार संक्रांति कुतिथि कुलिक यामार्ध मंगल शनि रवि राहु केतु इत्यादि दोपोंको संमुखस्थ चंद्रमा गमन करनेसे समय दूर करताहै. दिशानुसारसंमुखचंद्रमाविचार । मेपेचसिंहेधनपूर्वभागेपेचकन्यामकरेचयाम्ये ॥ तुलेचकुंभे मिथुनेप्रतीच्यांकर्कालिमीनेदिशिचोत्तरस्याम् ॥ फल ॥ सं मुखश्चार्थलाभायदक्षिणेसुखसंपदः ॥ पृष्टतःप्राणनाशायवा- मेचंद्रेधनक्षयः॥ टीका-मेप सिंह धन इन राशियोंका चंद्रमा पूर्वमेंहै और वृप कन्या मक रका दक्षिणमें तुला कुंभ मिथुनका पश्चिममें कर्क वृश्चिक मीनका उत्तरवास करताहै ॥ फल ॥ दिशानुसार संमुख चंद्रमा होते गमन करे तो अर्थलान होय और दाहिना होय तो धनसंपत्तिकी प्राप्ति होय और पृष्ठभागमें चंद्रमा होय तो प्राणनाश और वामभागी होय तो धनक्षय जानिये ॥ कालवेलाविचार ॥ पूर्पालेचोत्तरांगच्छेत्याच्यांमध्याह्नकेतथा॥ दक्षिणेअपराह्नतुपश्चिमेयपरावके ।। टीका-दिवसके प्रथम प्रहरमें उत्तरको दूसरे प्रहरमें तथा मध्याहमें पूर्वको और बीसरेमें दक्षिणको और अर्द्धरात्रिमें पश्चिमको गमन करे । योगिनीवास ।। प्रतिपन्नवमीपूर्वेद्वितीयादिशिचोत्तरे।। तृतीय- कादशीवह्रोचतुर्दादशिनते ॥ पंचत्रयोदशीयाम्येषठभूतं ।

(१६४). ज्योतिषसार। चपश्चिमे॥ सप्तमीपूर्ववायव्येह्यमावास्याष्टमीशिवे ॥ फल ॥ पृष्ठेचशिवदाप्रोक्तावामेचैवविशेषतः ।। योगिनीसाभवन्नित्यं प्रयाणेशुभदानृणाम् ॥ टीका--प्रतिपदा और नवमीको पूर्वमें द्वितीया और दशमीको उत्तरमें तोज और एकादशीको आनेयमें चौथ और द्वादशीको नैर्ऋत्यमें पंचमी और त्रयोदशीको दक्षिणमें पष्ठी और चतुर्दशीको पश्चिममें सप्तमी और पूर्णिमाको वायव्यमें अमावास्या और अष्टमीको ईशान्यमें इस प्रमाणसे योगिनीका वास जानिये ॥ तिसका फल ॥ पृष्टभागी अथवा वामभागी होय तोशुन जानिये ॥ वारानुसार कालराहुका वासअर्कोत्तरेवायुदिशाचसोमेभौमे प्रतीच्यांबुधनैर्ऋतेच ॥ याम्येगुरोवह्निदिशाचशुक्रमंदेचपूर्वे प्रवदंतिकालम्॥ टीका-रविवारको उत्तरमें सोमवारको वायव्यमें मंगलको पश्चिममें बुधवारको नैर्ऋत्यमें गुरुवारको दक्षिणमें शुक्रवारको आगेयमें शनिवार- को पूर्वमें इसप्रमाणसे कालराहु वार अनुसार जानिये ॥ फलकाश्लोक ।। रविदिनगुरुपूर्वेसोमशुकेचयाम्येवरुणदिशितु भौमेचोत्तरेसोरिसंस्थे । प्रतिदिनमितिमत्वाकालराहुर्दिशा- नांसकलगमनकार्येवामपृष्ठेचसिद्धिः॥ टीका-रवि अथवा गुरु इन वारोंमें पूर्वको गमनकरे तो कालराहु वाम पृदमागी जानिये तिसमें गमन करे तो सर्व कार्यकी सिद्धि होय सोम शुक्रमें दक्षिणको गमनकरे नौमवारमें पश्चिमको शनिवारमें उत्तरको गमन- करे तो कार्यसिद्धि होय ॥ क्षुधितराहु ॥ इन्द्रेवायोयमेरुद्रेतोयेनौशशिरक्षसोः॥ यामाई क्षुधितोगहुर्धमत्येवदिगष्टके ॥ नतिथिनंचनक्षत्रनयोगोनच चंद्रमाः ॥ सिद्धयंतिसर्वकार्याणियात्रायां दक्षिणे रग ।। टीका-प्रथम यामाईमें क्षुमितराहु पूर्वको जानिये द्वितीयमें पायव्यको भाषाटीकासमेत। (१६५) तृतीयमें दक्षिणको चतुर्थमें ईशान्यको पंचममें पश्चिमको पष्ठमें आमेयको सतममें उत्तरको अष्टम यामाईमें नैत्यको इसप्रमाणसे अादेशाओंमें भ्रमण करता है परंतु दक्षिण भागमें स्थित रवि विचारके गमन करे तो तिथि नक्षत्रादिकका दोप जाता रहे और समस्त कार्य सिद्धि होय । काल कहाँ तिसकाज्ञान॥कालापलंपातकलोहपातवडवानला खङ्गकचोलिकांतिकाः ॥ नखाश्चतुर्विंशतिषट्तथादिगुद्राधृति- वैदगुणाक्रमेण ॥ तिथ्यायुतवेवसुभाजितंचशेपश्चकालोमुनयो । वदंति ॥ फल ॥ कालंचपृष्ठेफलसंमुखेनपातंचलोहंवडवांचपृष्ठे ॥ खमंचचाग्रेकवचंचवामेकांतिश्चयोज्यादिशिदक्षिणस्याम् ॥ टीका-कालोंकेनाम १ कॉल २ पलं ३ पातक ६ लोहपात ६ वडवानले खड़े कवचटकांति ऐसे आठ नाम तिनके ऊपर अंक लिखेहैं उनमें गमन कालकी जो तिथिहै उनको एक २ अंकमें मिलावे आठका भागदे शेप जो अंकरहे तिस दिशाको काल जानिये, इस प्रकार पूर्वादि आठ दिशा क्रमसे जानिये पृष्टभागी काल शुभ सन्मुखका फल शुभ पृष्ठभागमें पातक लोह और वडवानल ये तीनों शुभ अयभागमें खड्ग शुभ वामभागमें कवच शुभ दक्षिणभागमें कांति शुज ऐसे दिशानुसार शुभ विचारिके उस दिशाको युद्धमें किंवा यात्रामें गमन करे तो शुभहो । पंथाराहुचक्र । स्युर्धर्मंदस्रपुष्योरगवसुजलपद्वीशमैत्राण्यथा- थैयाम्याज्यांनीद्रकर्णादितिपितृपक्नोडून्यथोभानिकामे ॥ वह्नयााबुध्न्यचित्रानिऋतिविधिभगाख्यानिमोक्षोऽथरोहिण्य यम्णाब्जेंदुविश्वांतिमभदिनकराणिपंथादिराहो ॥ अश्विनी पुष्य आलेपा विशाखा अनुराधा । धानष्टा । शततारका भरणी पुनर्वस कृत्तिका आर्द्रा पूर्वा || अभिजित् उत्तगभाद्रपदा रोहिणी उत्तरा । हस्त । पूर्वापाडा उत्तरापा. टीका-नक्षत्र२८तिनके भाग ४ तिनके नाम प्रथम धर्ममार्गके नक्षत्र ७ दूसरे अर्थ मार्गके नक्षत्र तृतीय काम मार्गके नक्षत्र ७ चतुर्थ मोक्षमार्गके धर्म अर्थ मया ज्येष्ठा श्रवण पृवानाद्रपदा रवाती चित्रा काम का.

(१६६) ज्योतिषसार। नक्षत्र ७ इसप्रकार चार मार्गोंके नक्षत्र जानिये तिनमें मार्गके नक्षत्रमें सूर्य होय तो चंद्रमा चार वर्गों के नक्षत्र में फिरताहे तिनके फल कहतेहैं ॥ धर्ममार्गीकेफल ॥धर्ममार्गेगतेसूर्ये अर्थाशेचंद्रमायदि ॥ तदाशत्रुभयंतस्यज्ञेयंतुविबुधैःशुभम् ।। टीका-धर्ममार्गी नक्षत्र में सूर्य और अर्थमार्गी नक्षत्र में चंद्रमा होय तो गमन करनेसे मार्गमें शत्रुनय होय ॥ धर्ममार्गेगतेसूर्येचंद्रेतत्रैवसंस्थिते ॥ संहारश्चभवेत्तत्र भंगोहानिःप्रजायते ॥ टीका-धर्ममार्गी नक्षत्रों के सूर्य और चंद्रमा दोनों होय तो संहार अंगहानि प्राप्ति होय ॥ धर्ममार्गेगतेसूर्येकामांशेचंद्रमायदि ॥ विग्रहोदारुणचैवचौराकुलसमुद्भवम् ॥ टीका-धर्ममार्गी में सूर्य और काममार्गी नक्षत्रोंका चंद्रमा होय तो विग्रह दारुण और चोरभय ॥ धर्ममार्गे गतेसूर्येचंद्रमोक्षगतेयदि ॥ गृहलाभोभवेत्तस्य विज्ञेयो नात्रसंशयः॥ टीका-धर्ममार्गी सूर्य और मोक्षमार्गी चंद्रमा ऐसे योगका फल गृह- लाभ व मार्गसुख होय ॥ अर्थमार्गकेफल। अर्थमार्गेगतेसूर्यचन्द्रे धर्मस्थितेयदि ॥ गजलाभोभवेत्तस्य तत्रश्रीः सर्वतोमुखी ॥ टीका-अर्थमार्गी सूर्य और धर्ममार्गी चंद्रमा ऐसे योगका फल लान और लक्ष्मीप्राप्ति और सर्वदा सुखी होय ॥ अर्थमागेंगतेसूर्येचंद्रेतत्रैवसंस्थिते॥ प्रथमंजायतेकार्यतत्रभंगो भविष्यति ।। टीका-अर्थमार्गी सूर्य और चंद्रमा दोनों होय तो प्रथम कार्यसिद्धि होय और पीछे अंग होजाय । -

भाषाटीकासमेत । (१६७)
अर्थमार्गगतेसूर्य चंद्रेकामांशसंस्थिते ।।
सर्वसिद्धिर्भवेत्तस्य जानीयानात्रसंशयः॥
टीका-अर्थमार्गी सूर्य और काममार्गी चंद्रमा होय तो ऐसे योगका
फल सर्व कार्यसिद्धि होय ॥
अर्थमार्गगतेसूर्यचंद्रमोक्षस्थितेयदि।
भूमिलाभोभवेत्तस्य हर्षयुक्त-सुखी भवेत् ।।
टीका-अर्थमार्गी सूर्य और मोक्षमार्गी चंद्रमा ऐसे योगोंका फल भूमि-
लान व हर्षयुक्त सुख मार्गमें स्थिरपावे ॥
काममार्गीके फल॥ काममागेंगतेसूर्येचंद्रे धर्मेचसंस्थिते ।।
गजाश्वाश्चपिलभ्यंतराजसन्मानसंभवात् ।।
टीका-काममार्गी सूर्य और धर्ममार्गी चंद्रमा होय तो हाथी घोडा
भूमी इनका लाभ और राजसन्नान पावे ॥
काममागेंगतेसूर्येचंद्रेचैवार्थसंस्थिते ।।
सकले जायतेतस्यविघ्नभंगोविनिर्दिशेत् ॥
टीका-काममार्गी सूर्य और अर्थमार्गी चंद्रमा ऐसा योग होय तो सब
विनोंका नाशहोय।
काममार्गेगतेसूर्यचंद्रेतत्रैवसंस्थिते ।।
विग्रहंदारुणचैवकार्यनाशविनिर्दिशेत् ।।
टीका-काममार्गी सूर्य और चंद्रमा होय तो विग्रह और कार्यनारा होय ॥
काममार्गगते सूर्यचंद्रमोक्षगतेपिवा॥
राज्ञोलाभोभवेत्तस्य स्वर्णलाभंविनिर्दिशेत् ॥
टीका काममार्गी सूर्य और मोक्षमार्गी चंद्रमा होय तो राजासे लान
व सुवर्णलामहो ॥
मोक्षमार्गीकेफल ॥ मोक्षमार्गगतेसूर्ये चंद्रेधर्मस्थितेयदि ॥
हेमलाभो भवेत्तस्य सर्वकार्यप्रसिद्धयति ।
टीका-मोक्षमार्गी सूर्य व धर्ममार्गी चंद्रमा होय तो हेमलान और
सर्वसिद्धि होय।

(१६८) ज्योतिषसार । मोक्षमार्गगतेसूर्ये अर्थाशेचंद्रमायदि ॥ विफलंतस्यकार्यचचोरराजरिपोर्भयम् ।। टीका-मोक्षमार्गी सूर्य और अर्थमार्गी चंद्रमा होय तो राजा ओर चोरसे रिपुसे भय होय ॥ मोक्षमार्गेगतेसूर्येचंद्रेकामस्थितेयदि ॥ सर्वसिद्धिमवाप्नोतिकार्यचजयमेवच ॥ टीका-मोक्षमार्गी सूर्य और काममार्गी चंद्रमा होय तो सर्वकार्य- सिदि और जयप्राप्ति होय ॥ मोक्षमार्गेगतसूर्य चंद्रतत्रैवसस्थिते ।। विग्रहंदारुणंचैवविघ्नस्तस्यभविष्यति ॥ टीका-मोक्षमार्गी सूर्य और चंद्रमा होय तो दारुण विग्रह और विघ्न- प्राप्ति होय ॥ पंथाराहुवकर्मकरनेयोग्य ॥ यात्रायुद्धेविवाहेचप्रवेशेनगरादिषु ॥ व्यापारेषुचसर्वेषुपंथाराहुःप्रशस्यते ॥ टीका-यात्रामें युद्धों और विवाहमें और नगरादिप्रवेशमें और व्यापार अर्थात् सर्व वस्तुके लेनदेनमें राहु मार्ग में शुभदायक होताहै ॥ गर्गादिकोंकामुहूर्त ॥ उप-प्रशस्यतेगर्ग:शकुनंचबृहस्पतिः॥ अंगिरामनउत्साहोषिप्रवाक्यंजनार्दनः ॥ टीका-र्गजीके मतसे रात्रिकी पिछली ५ घटी उषःकालमें गमन शुज और बृहस्पतिके मतसे शकुन और अंगिराके मतसे मनका उत्साह शुभ और जनार्दनके मतसे ब्रह्मवाक्य शुन जानिये ॥ शुभाशुभवाहन ॥ आत्मनोजन्मनक्षत्रादिननक्षत्रमेवच ॥ ए- कीकृत्वाहरेद्भागनंदशेपेचवाहनम् ॥ रासभोऽश्वोगजोमेपोज- बुका सिंहसंज्ञकाकाकश्चैवमयूरश्चहंसइत्येववाहनम् ॥ फल॥ रासभेअर्थनाशश्वधनलाभश्वघोटके ॥ लक्ष्मीप्राप्तिर्गजा- ख्येहिमेषेचमरणंध्रुवम् ॥ जंबुकेस्वल्पलाभश्चसर्वसिद्धिश्चसि इके ॥काकेचनिष्फलंकार्यमयूरेचसुखावहम् ॥ हंसेतुसर्वसि- दिस्याद्वाहनानांफलंस्मृतम् ।।

भापाटीकासमेत। (१६९) टीका-अपने जन्मनक्षत्रसे दिवसके नक्षत्रतक गिने नवका भाग दे शेष- बचै सो वाहन जानिये, १ रहे तो गर्दन तिसका फल अर्थनाश २ बचें तो घोडा धनलाभ होयश्वचैं तो हस्ती लक्ष्मीबातो मेंढा मरण५व. तो नंबुक स्पल्पलान ६ बचें तो सिंह सर्व कार्यसिद्धि ७ बचें तो काक निष्फल ८ बचें तो मोर सुखप्राप्ति ९ बचें तो हंस सर्वसिद्धि जानिये ॥ अंकमुहूर्त। तिथयःपक्षगुणितासप्तभिर्भाजिताश्चत्ताः ॥ वारास्यु- वतियुणिता मसुभिश्चैवभाजिताः ॥ चतुर्गुण्यानिभा- न्यंगभाजितानियथाक्रमम् ॥ टीका-जिस तिथिमें गमन करना चाहे उसे १५से गुणाकरके सातका भाग दे और जो वार होय तिसे तीन गुणाकरे आठका भागदे और जो नक्षत्र होय तिस चार गुणाकरके ६ का झाग दे जो शेष बचें उसका फल कहेंगे. फल--पीडास्यात्प्रथमेशून्येमध्यशून्येमहद्भयम् ॥ अंत्यशून्येतुमरणंत्र्यंकेचविजयीभवेत् ॥ टीका-प्रथमतिथिके आगका शून्य बचें तो पीडा और वारके नागमें शून्य बचें तो बहुत भय होय और नक्षत्रके नागमें शून्य हो तो मरण और तीनों जगह अंक बचें तो विजय होय ॥ भ्रमणाडलमुहूर्त। सूर्यभागणयेचांद्रसप्तभिर्भागमाहरेत् ॥ विपटकभ्रमणंचवधिः सप्तमहदाडलम् ॥प्रथमपंचचत्वारिआडलोनास्तिनिश्चितम्।। आडलेताडनंप्रोक्तं भ्रमणकार्यनाशनम् ॥ टीका-सूर्यके नक्षत्रसे चंद्रमाके नक्षताई गिने सातका नागदे३ । ६ प, तो भमण और २१७ व तो महदाइल ये ताटनामें जानिये और ११४।५ पचें तो आडल नहीं होता ये गमनमें उनहै ॥

(१७०) ज्योतिषसार। हैवरमुहूर्त। सूर्यभाद्गणयेच्चांद्रपक्षादितिथिवारयुक् ॥ नवभिस्तु हरेद्भागंसप्तशेषतुहैवरम् ॥ टीका-सूर्यके नक्षत्रसे चंद्रमाके नक्षत्रताईं गिनके पक्ष तिथिवार मिलाके नौका भाग देनेसे ७ शेष बचें तो हैवर योग होताहै सो यात्रामें शुआहै ॥ वबाडमुहूर्त-सूर्यभाद्णयेच्चांत्रिगुणंतिथिमिश्रितम् ॥ नवभिस्तुहरद्भागंत्रीणिशेपंधवाडकम् ॥ टीका-सूर्यके नक्षत्रसे चंद्रमाके नक्षत्रतक गिने तिगुनाकर तिथि मिलाय नवका भागदे तीन शेष बचें तो घबाड मुहूर्त जानिये ॥ वारअनुसारस्वरशकुन। मुरोशनौरवौभौमेशुभोवैदक्षिणःस्वरः ॥ अन्यवारेषुवाम- स्तुस्वरश्चैवशुभ-स्मृतः ॥ निर्गमेवामतःश्रेष्ठःप्रवेशेदक्षिणः शुभः॥ यःस्वरःसचनासाग्रयोगिनांमतमीहशम् ॥ टीका--गुरु शनि रवि भौम इन चारों वारोंमें दक्षिण स्वर चले तो प्रवेश करनेमें शुभ होय और सोम बुध शुक्रवारों में वामस्वर चले तो गमनको श्रेष्ठ ऐसे स्वरविचार योगियोंके मतसे कहाहै ॥ वारानुसार छायाशकुन। अष्टौपादावुधेस्युर्नवधरणिसुतेसप्तजीवेपदानिज्ञेयंचैकादशा कैशनिशशिभृयषुप्रोक्तमर्थेचतुष्कम् ।। तस्मिन्कालेमुहूर्तेस कलगुणयुतेकार्यसिद्धिःशुभोक्ता नास्मिन्पंचांगशुद्धि खलु शशिबलं भापितंगर्गमुख्यैः॥ टीका-आठ पद अपनी छाया होय तो बुधवारमें गमन करे नवपाद होय तो भौमवारको गमनकीजै गुरुको११सूर्यवारको गमनकरे शनि सोम शुक्रमें चारसद हो तो सर्वगुणयुक्त सिद्धि मुहूर्त इसमें चंद्रमाआदि न देखे शुभहै।

भापाटीकासमेत। (१७१) काकशब्दशकुन ॥ काकस्यवचनं श्रुत्वापादच्छायांतुकारयेत् ॥ त्रयोदशयुतांकृत्वापविभागमाहरेत् ।। फल ।। लाभःखेदस्तथा सौख्यभोजनंचतथागमः । अशुभंचक्रमेणैवगर्गस्यवचनंतथा ।। टीका-काकका शब्द सुनके अपने पैसेंकी छाया नापके ३और मिला के ६ का भागदे शेष बचें उसका फलाबचे लानर खेद ३ सुख ४ भोजन ५ धनप्राप्ति पूराभाग लगजाय तो अशुभ ये गर्गमुनिका वचन है ।। पिंगलशब्दशकुन । उहासःकिल्बिलेचैवचिल्पिल्यांभोजनंतथा ॥ बंधनांखिद्दिखिट्टिस्यात्कुकुर्शब्दैर्महद्भयम् ॥ टीका-जो किल्बिल शब्द होयतो उह्वासहोय और चिल्बिल शब्दहोय तो भोजनप्राप्ति खिटखिट शब्द होयतो बंधन कुर्कुर्शब्द होय तो महाभय होय॥ छिक्कानुसारयादच्छायाशकुन । बुधश्छिकारवंश्रुत्वापादच्छायांचकारयेत् ॥ त्रयोदशयुतांक त्वाचाष्टभिर्भागमाहरेत् ॥ फल ॥ लाभःसिद्धिहानिशोकोंभ यंत्रीर्दुःखनिष्फले ॥ क्रमेणैवफलंज्ञेयंगर्गेणचयथोदितम् ॥ टीका-छींकका शब्द सुनके अपने पैरकी छाया मापे १३ मिलाने ८ का भागदे शेप रहे तिसका फल १ रहे तो लाम रसिद्धि ३ हानि शोक ५ भय ६ लक्ष्मी ७ दुःख • निष्फल ऐसे गर्गमुनि कहतेहैं । छींकशकुन । छिकाप्रश्नंप्रवक्ष्यामिपूर्वस्यामशुभंफलम् ॥ आग्नेय्यांशोकदुःख स्यादरिष्टंदक्षिणेतथा ॥ नैर्ऋत्यांचशुभप्रोक्तंपश्चिमेमिष्टभक्षणम्।। वायव्येधनलाभस्तुउत्तरेकलहस्तथा॥ ईशान्यांचशुभंज्ञेयमात्म छिकामहद्भयम्॥उर्वचेवशुभंज्ञेयंमध्येचैवमहद्भयम्। आसनेशय- नेचैवदानेचैवतुभोजने । वामांगपृष्ठतश्चैवपछिकाश्चशुभावहाः।। टीका-दिशानुसार छौंक फल ॥ पूर्वकी डींक अशुभ आमेयकी भोक दुःस करे दक्षिणको आरीष्टकरै नैर्ऋत्यकी पश्रिम शुभकी मिष्टलक्षण वाय- (१७०) ज्योतिषसार। हैवरमुहूर्त। सूर्यभागणयेच्चांद्रपक्षादितिथिवारयुक् ॥ नवभिस्तु हरेद्भागंसप्तशेषतुहैवरम् ॥ टीका-सूर्यके नक्षत्रसे चंद्रमाके नक्षत्रताई गिनके पक्ष तिथिवार मिलाके नौका भाग देनेसे ७ शेष बचें तो हैवर योग होताहै सो यात्रामें शुभहै ॥ धबाडमुहूर्त-सूर्यभाद्गणयेच्चांत्रिगुणेतिथिमिश्रितम् ॥ नवभिस्तुहरेद्भागंत्रीणिशेषंघबाडकम् ॥ टीका-सूर्यके नक्षत्रसे चंद्रमाके नक्षत्रतक गिने तिगुनाकर तिथि मिलाय नवका भागदे तीन शेष बचें तो घबाड मुहूर्त जानिये ॥ वारअनुसारस्वरशकुन । गुरौशनौरवौभौमेशुभोवैदक्षिणःस्वरः ॥ अन्यवारेषुवाम- स्तुस्वरश्चैवशुभस्मृतः ॥ निर्गमेवामतःश्रेष्ठ प्रवेशेदक्षिणः शुभः ॥ यःस्वरःसचनासाग्रयोगिनांमतमीहशम् ॥ टीका--गुरु शनि रवि भौम इन चारों वारोंमें दक्षिण स्वर चले तो प्रवेश करनेमें शुभ होय और सोम बुध शुक्रवारोंमें वामस्वर चले तो गमनको श्रेष्ठ ऐसे स्वरविचार योगियोंके मतसे कहाहै ॥ वारानुसार छायाशकुन। अष्टौपादाबुधेस्युर्नवधरणिसुतेसप्तजीवेपदानिज्ञेयंचैकादशा कॅशनिशशिभृगुषुप्रोक्तमर्थेचतुष्कम् ॥ तस्मिन्कालेमुहूर्तेस कलगुणयुतेकार्यसिद्धिःशुभोक्ता नास्मिन्पंचांगशुद्धिर्नखलु शशिवलं भापितंगर्गमुख्यः॥ टीका-आठ पद अपनी छाया होय तो बुधवारमें गमन करे नवपाद होय तो भौमवारको गमनकाजै शुरुको११सूर्यवारको गमनकरे शनि सोम शुक्रमें चारपद हो तो सर्वगुणयुक्त सिद्धि मुहूर्त इसमें चंद्रमाआदि न देखे शुभहै।।

भाषाटीकासमेत। (१७१) काकशब्दशकुन ॥ काकस्यवचनं श्रुत्वापादच्छायांतुकारयेत् ।। त्रयोदशयुतांकृत्वापड़िभागमाहरेत् ॥ फल । लाभ खेदस्तथा सौख्यंभोजनंचतथागमः । अशुभचक्रमेणेवगर्गस्यवचनंतथा । टीका-काकका शब्द सुनके अपने पैसे की छाया नापके १३और मिला के ६ का भागदे शेष बचें उसका फल बचे लाभ२ खेद ३ सुख ४ भोजन ५ धनप्राप्ति पूराभाग लगजाय तो अशुभ ये गर्गमुनिका वचन है ॥ पिंगलशब्दशकुन । उहास-किल्बिलेचैवचिल्पित्यांभोजनंतथा ॥ बंधनंखिसिखिट्टिस्यात्कुडुब्दैर्महद्भयम् ॥ टीका-जो किल्बिल शब्द होयतो उहासहोय और चिल्बिल शब्दहोय नो भोजनप्राप्ति सिटसिट शब्द होयतो बंधन कुकुर्शब्द होय तो महाभय होय ।। छिक्कानुसारपादच्छायाशकुन । बुधश्छिकारसंश्रुत्वापादच्छायांचकारयेत् ॥ त्रयोदशयुतांक त्वाचाटभिर्भागमाहरेत् ।। फल ।। लाभासिद्धिानिशोकोभ यंश्रीदुःखनिष्फले ।। क्रमेणैवफलंज्ञेयंगगंणचयथोदितम् ।। टीका-ठीकका शब्द सुनके अपने पैरकी छाया मापे १३ मिलावे ८ का भागदे शेष रहे तिसका फल १ रहे तो लाज २सिद्धि ३ हानिट शोक ५ सय ६ लक्ष्मी ७ दुःख • निष्फल ऐसे गर्गमुनि कहतेहैं । छींकशकुन । छिक्काप्रश्नंप्रवक्ष्यामिपूर्वस्यामशुभंफलम् ॥ आमेय्यांशोकदुःखं स्यादरिएंदक्षिणेतथा।। नेत्यांचशुभंप्रोक्तंपश्चिमेमिष्टभक्षणम्।। वायव्येधनलाभस्तुउत्तरेकलहस्तथा।। ईशान्यांचशुभंज्ञेयमात्म छिकामहद्भयम्।।उर्वचैवशुभंज्ञयंमध्येचैवमहद्भयम्।।आसनेशय- नेचैवदानेचैवतुभोजने । वामांगेपृष्ठतश्चैवपछिकाश्चशुभावहाः।। टीका-दिशानुसार छींक फल ।। पूर्वकी छींक अशुज आग्नेयकी गोक दुःख करे दक्षिणको आरिष्टकरै नैत्यको पश्चिम शुभकी मिटलक्षण वाय- (१७२) ज्योतिषसार। व्यकी धनदायक उत्तरकी कलहकत ईशान्यकी शुभदायक और अपनी छींक बहुत अयदे ऊपरकी छींक शुज मध्यकी में भी बड़ा भय आसनमें सोने में दानमें भोजनमें बांई ओर वा पीछे होय तो ये ६ शुभ जानिये ॥ पल्लीशब्दशकुन। वित्तंब्रह्मणिकार्यसिद्धिमतुला शक्रेहुताशेभयंयाम्येमित्रवधः क्षयश्चनिर्ऋतेलाभःसमुद्रालये ॥ वायव्यांवरमिष्ट्रमन्नमशनसों म्येऽर्थलाभस्तथाईशान्यांगृहगोधिकार्यमतुलंसर्वत्रभूमौभयम् ॥ टीका-पूर्वमें शब्द पल्ली करे तो शकुन वित्त ब्रह्मसंबंधी कार्यविशेष धनप्राप्ति आग्नेयमें अग्निका भय होय दक्षिण मित्रवध होय नैर्ऋत्यमें क्षय पश्चिममें शब्द होय तो लान वायव्यमें सुंदर मीठा भोजन उत्तरमें धनप्राप्ति ईशानमें कार्यसिद्धि और जो भूमिमें होय तो भयकरे ॥ पल्लीपतन और सरठकाअवरोहण। राज्यंतुशिरसिज्ञेयं ललाटेवंधुदर्शनम्॥5मध्येराजसन्मानमुत्तरो- टेधनक्षयम्।।अधरोप्टेधनैश्वर्यनासांतेव्याधिपीडनम् ॥ आयुष्यंद- क्षिणेकर्णेबहुलाभस्तुवामके ॥ अक्ष्णोस्तुबंधनंज्ञेयंभुजेभूपतितु ल्यता॥ राजक्षोभंतथावामेकंठेशत्रुविनाशनम्॥ स्तनद्वयेचदुर्भा ग्यमुदरमंडनंशुभम्।।प्रजानाशःपृष्ठदेशेजानुजघशुभावहम् ॥कर द्वयेवस्त्रलाभ स्कंधयोविजयीभवेत् ।। नाभौबहुधनंप्रोक्तमूर्तश्चैव भयादिकम्।।दक्षिणेमणिबंधेचमनस्तापोधनक्षयः॥मणिबंधेतथा वामेकीर्तिवृद्धिधनप्रदम्॥नखेषुधान्यलाभंचवक्रेमिष्टान्नभोजनम्॥ गुल्फयोर्वधनंज्ञेयकेशतिमरणंध्रुवं ॥अध्वातुदक्षिणेपादेवामेवंधवि नाशनम्॥स्त्रीनाशःस्यात्पादमध्येपादांतेमरणंभवेत् ॥पल्या प्रप- तनेज्ञेयंसरठस्याधिरोहणे ॥ यात्रोद्युक्तमनुष्यस्यैतच्छुभाशुभ सूचकम् ॥ तिलमापादिदानंचनात्वादेयं द्विजन्मने ॥ पिनाकिनं नमस्कृत्यजपेन्मत्रपडक्षरम्।।शतंसहस्रमथवासर्वदोपनिवर्हणम्।। शिवालयप्रदद्यादैदीपंदोपोपशांतये ॥

भाषाटीकासमेत। (१७३) टोका-मनुष्योंके गमनसमयमें अंगपर पल्ली अर्थात् छिपकली गिरे अथवा गिरगिट चढे तो शुभाशुभसूचक फल स्थानानुसार कहाहै ॥ १ शिर राज्यपाति १३ वामबाहु राज्याय २१ ऊरूपर घोडावाहन २ कपाल बंधुदर्शन १२ कंठपर शत्रुनाश २२ दायापहुँचा धनक्षय ३ भुकुटी राजसन्मान १३ स्तनापर दुर्भाग्य २३ वा. मणिबंध कीर्ति ४ उत्तरोष्ठ धनक्षय १४ उदरपर शुभमंडन २४ नख धनलाभ ५अवरोष्ठ धनऐश्वर्य १५ पृष्ठ पर बुद्धिनाश २५ मुखपर मिष्टान्न भोजन नासिकाव्याधिपीडा १६ जानुओंपर शुज २६ टकनोपर बंधन ७ दा. कान आयुष्य १७ जंघाओंपर शुभ २७ केशोंपर मरण ८बायां कान बहुतलान १८ हाथोंपर वस्खलाम २८ दाहोपाव मार्गचलाना ९ नेत्रोंपर बंधन १९ कांधॉपर विजय २९ वामपद बंधुनाश १० बाहु राजासम २० नाभिपर बहुधन ३० मध्यपाद स्वीनाश छिपकली अंगोंपर गिरे अथवा गिरगिटच? तो सचैल स्नानकरके तिल उडद दानदे और ब्राह्मणको दानदे और शिवको नमस्कार करके ११००शिवमंत्र जपै और शिवके मंदिरमें दीपक घृतको प्रज्वलित करे तो दोपनिवृत्ति होजाय. अंगस्फुरण मनुः ।। ब्रूहिमेत्वनिमित्तानिअशुभानिशुभानिच ।। सर्वधर्मभृतांश्रेष्टत्वंहिसर्वविबुद्धयसे । टी मनु मत्स्यप्रति प्रश्नकरते, हेधर्मधारियोंमेंश्रेष्ठ!शुभाशुभफल वर्णनकीजिये. अंगस्यदक्षिणेभागे प्रशस्तस्फुरणंभवेत् ॥ अप्रशस्तंतथावामे पृष्ठस्यहृदयस्यच ॥ टी.अंगस्फुरण दक्षिणभागमें और वामभाग वा पृष्टभाग वा हृदयमें अशुभ. अंगानांस्पंदनचैव शुभाशुभविचेष्टितम् ॥तन्मेविस्तरतोहि येनस्यात्तद्विधोभुवि ॥ ॥ मत्स्यउवाच ॥ ॥ पृथ्वीलाभोभ- वेन्मूनि ललाटेरविनंदन ॥स्थानंवृद्धिसमायाति भूनसो प्रिय- . संगमः ॥ भृत्यलब्धिश्चाक्षिदेशे दृगपत्तिधनागमः । उत्कंठो- (१७४) ज्योतिषसार। पगमेमध्ये दृष्टंराजविचक्षणैः ।। दृग्बंधनेसंगरेच जयंशीघ्रम- वाप्नुयात् ॥ योपिल्लाभोपांगदेशे श्रवणांतप्रियश्रुतिः॥ नासि- कायांप्रीतिसौख्यं प्रियाप्तिरधरोष्ठयोः ॥ कंठेतुभागलाभःस्या द्भोगवृद्रिरथांसयोः ॥ सुहृच्छ्रेष्ठश्चबाहुभ्यां हस्तेचैवधना- गमः ॥ पृष्टेपराजयोत्सेधो जयोवक्षस्थलेभवेत् ॥ कुक्षिभ्यां प्रीतिरुद्दिष्टा स्त्रियाः प्रजननंभगे ॥ स्थानभ्रंशोनाभिदेशे अत्रे चैवधनागमः ॥ जानुसंधौपरैः संधिर्यलवद्भिर्भवेन्नृप ॥एकदेशे भवेत्स्वामीजधाभ्यारविनंदन ॥ उत्तमस्थानमाप्नोति पद्भ्यां प्रत्फुरणेनृप ॥ अलाभंचाध्वगमनं भवेत्पादतलेनुप ॥ टीका-मनु प्रश्नकरतेहैं कि, अंगके स्थान स्फुरणका विचार शुभाशुभ फल विस्तार सहित वर्णन कीजिये । १ मस्तकस्फुरण पृथ्वीलामहो १४ दोनोंबाहु मित्रकामिलाप २ लालटस्फुरण स्थानकीवृद्धि १५ दोनोंहाथ धनप्राप्ति ३ भृकृटीके मध्य में प्रियदर्शन १६ पृष्ठमें दूसरेसेजयहोय ४ नेत्रोंमें अत्यमिले १७ ऊरूमें जयप्राप्ति ५ नेत्रोंकीकोरोंमें धनप्राप्ति १८ कक्षिमें प्राप्तिहोय ६ कंठमध्ये राजमाप्तिहोय १९ शिश्नइंद्रि. स्त्रीप्राप्ति ७ हरबंधन युद्धमेंजानेसेजय २० नाभिमें, स्थानत्रंश ८ अपांगदेशमें स्त्रीलाभहोय २१ आंतॉमें, धनप्राप्ति • ९ कणांतमें प्रियमित्रकी सुधि २२ जानुसंधीमें बलवानशत्रुओंसेसंधि १० नासिकामें प्रीतिसुखहोय २३ जंघाके एकदेश एकदेशकास्वामीहोय ११ अधरोष्ठ प्रियवस्तुको प्राप्ति २४ पादोंमें उत्तमस्थानमें मान्यता. १२ कंठमें ऐश्वर्यप्राप्ति २५ तलुओंमें अलाज और गमन. १३ कंधोंमें भोगवृदिनानि भाषाटीकासमेत। (१७५) स्त्रियोंका अंगस्फुरण । लांछनपीठकंचैव ज्ञेयंस्फुरणवत्तथा ।। विपर्ययेणविहितः सर्व स्त्रीणांविपर्ययः ॥ दक्षिणेपिप्रशस्तेंगे प्रशस्तस्याद्विशेपतः।। टीका-स्त्रियोंका अंगस्फुरण भूमध्यमेंहो तो पुरुषोंहीके समान है परंतु और सब अंग पुरुषोंसे विपरीत अर्थात् वाम अंग स्त्रियोंको शुभ कहाहै ॥ अनन्यथासिद्धिरजन्मनस्य फलस्यास्तस्यनिदितस्य ॥ अनिष्टनिद्रोपगमेद्विजानां कार्यसुवर्णेनतुतर्पणस्यात् ।। टीका-हेराजा ! अनिष्ट फलोंके निवारण हेतु ब्राह्मणोंसे तर्पण करावे, सुवर्ण दान करे तो अंगस्फुरणका दोष जाता रहै ।। नेत्रस्फुरण ॥ नेत्रस्योव हरतिसकलं मानसंदुःखजालं नेत्रो- पाते दिशतिचधनं नासिकतिचमृत्युः ॥ नेत्रस्याधः स्फुरण मसकृत्संगरेभव्हेतुर्वामेचैतत्फलमविफलं दक्षिणेवैपरीत्यम् ।। स्त्रीणांविपर्ययो॥ टीका-नेत्रोंके ऊर्ध्वप्रांत आदिक स्थानोंमें स्फुरण होय तिसका फल कहवेहैं-नेत्रके ऊपरका पलक स्फुरण होय तो मनका दुःख जाय और ध- नकी प्राप्ति होय और नासिकाके निकट स्फुरण होय तो मृत्यु नेत्रके नी- चेकी पलकमें स्फुरण होय तो युद्धमें पराजय होय ये सर्वफल वामनेत्रके त्रियोंको और दक्षिणके पुरुपोंके नेत्रका विचार जानो ॥ "त्रिशूलयंत्र । रोगिणश्चकुजाद्य दिनाद्यक्षचयुद्धतः ॥ कृत्तिकागमनेदद्यादन्यवरविदीयते ।। टीका-रोगीके प्रश्नका त्रिशूल मध्यायमें जिसनक्षत्रका मंगल होय तिसको धरे और चंद्रमा जिस स्थानविणे यंत्रमें होय तो फलदेवे इस प्रमाणसे आगे फल नानो. युद्धमें जाना होय तो दिवसनक्षत्रसे सूर्यनक्षत्रतक गिने और गमन करना होय तो कत्तिकासे दिवस नक्षत्रतक गिने और दूसरे कर्मोंके सर्य नक्षत्रसे चन्द्र नक्षत्रतक इस क्रमसे जाने । - (१७६) ज्योतिषसार। भ कृ रो अमृ प उभा पुनर्व पु उपा हस्त उ पूचि a भा मूस्वा ज्ये अ त्रिशूलाग्रे भवेन्मृत्युमध्यमवहिरप्टकम् ॥ लाभक्षेमं जयारोग्यं चंद्रगर्भेषुसंमतम् ॥ टीका-त्रिशूलके अग्रभागमें दिवस नक्षत्र होय तो मृत्यु और बाहिरी अष्टकमें होय तो मध्यम मध्याष्टकमें होय तो लाभक्षेमजय आरोग्य ये सर्व संमतजानिये ॥ गमनकीलग्न ॥ चरलग्ने प्रयातव्यं दिस्वभावे तथा नरैः॥ लग्नेस्थिरेनगंतव्यं यात्रायांक्षेममीप्सुभिः॥ टीका-चरलम कहिये कर्क तुला मकर ये चार और द्विस्वजाव मि- थुन कन्या धन मीन ये चार इन आठोंमें गमन करना शुभफलदायकहै और वाकी चारलग्न स्थिरहै उनमें गमन न करे ॥ दूसराप्रकारलग्नका । लग्नेकार्मुकमेपतौलिगमने कार्यविलंबान्नृणां पंचत्मकरे तथै- वचघटे तद्वत्फलंवृश्चिके । सिंहकर्कटकेचपेपरिगतः सर्वार्थप्ति- द्धि लभेत्कन्यामीनगतस्तथवमिथुने सौख्यं शुभानंवसु ॥ टीका-धन मेप तुल इन तीन लमोमें गमन करै तो कार्यमें विलंब होय और मकर कुंज वृश्चिक ये तीन लन मृत्युकारक सिंह कर्क वृप इनमें कार्यसिद्धि " भापाटीकासमेत। (१७७) होय कन्या मीन मिथन ये लग्न शुभकारक अन्न और धनदायक जानिये ॥ द्वादशस्थानोंके अनुसार गमनलग्नमें ग्रहवल । प्रथमस्थान।। जन्मस्थंचाएमत्याज्यं लगेद्वादशमेवच ।। ग्रहाणांचवलंवीक्ष्य गच्छेद्दिग्विजयंनृपः॥ टीका-लम, अष्टम और दादशमें पापग्रह वर्जिके ग्रहबल देख गमन करे तो दिग्विजय और कार्यसिदि होय ॥ स्थानेयदास्युर्गुरुसौम्यशुकाःसिद्धचंतिकार्याणिचपंचमेति॥ राज्ञःपदवासुखदेशलाभ मासस्यमध्ये ग्रहभावयुक्तम् ॥ टीका-लग्नमें गुरु अथवा बुध शुक्र होय तो पांचदिवसमें अथवा एक मासमें राज्यपद मुख किंवा देशलाज होय ॥ दूसरेस्थानके फल ।। जीवोबुधोवाभृगुनंदनोवा स्थानेद्वितीयेगम- नस्यकाले ॥ सुवस्त्रला चतुरंगला मासस्यमध्येचचतुर्दशेति ॥ टीका-दूसरे स्थान में गुरु बुध अथवा शुक्र होय तो वस्त्र और तुरंग- लाभ एकमास मध्यमें अथवा चौदहदिवसमें होय ॥ राधनस्था रविराहुभौमा सौरिश्चकेतुस्त्रिभिरेवमासैः॥ वित्तस्यनाशंचददातिमृत्युं सत्यहिवाक्यं मुनयोवदंति ।। टीका-२ रे स्थानमें रवि अथवा राहु मंगल शनि केतु इनमेंसे कोई- भी क्रूरयह होय तो तीनमासमें मृत्यु और वित्तनाश होय यह मुनीश्वरोंने सत्यवाक्य कहाहै ॥ तृतीयस्थानकेफल ॥ स्थानेतृतीये गुरुभार्गवौच सोमस्यसूनुश्च निशापतिश्च ॥ करोतिकार्य सफलंचसर्व पक्षद्वयेनापिदिनत्रयेण ॥ टीका-तृतीयस्थानमें गुरु शुक्र अथवा चंद्र बुध होय तो दो पक्ष अथवा तीन दिवसमें कार्यसिद्धि होय ॥ चतुर्थस्थान ॥ राश्चतुर्थ गमनेयदातुनस्युश्चशेषाःशुभदा हि कार्य॥ तत्रापिदेवेन भवेचसिद्धिर्मासत्रयेणापिदशाहमध्ये ॥ टीका-क्रूरग्रह जो कहहैं उनमें से कोई ग्रह चतुर्थस्थानमें होय उसे वर्जिके शेप ग्रह होंय चे शुभ परंतु दैवयोग करके तीन मास या दश दिवसके अंतमें कार्यसिद्ध होय ॥

(१७८) ज्योतिषसार। पंचमस्थान । गुरु गुश्चंद्रषुधो यदास्याच्छुभेचलनेतु सुतेचयुक्ता ॥ कुवैतिकार्यस्यचसिद्धिमिष्टां मासद्वयेनापि वदंतिसत्यम् ॥ टीका-गुरु शुक्र चंद्र अथवा बुध चारों ग्रह पंचमस्थानमें होय तो शुभहोय और दो मासमें इष्टकार्यसिद्धि होय ॥ पष्ठस्थान। जीवश्वशुकश्च बुधश्चषष्ठे करोतियात्रां सुफलांविलनात् ॥ पक्षद्वयेनापि वदति सत्यं सौम्यसंस्थः सबलश्चचंद्रः ॥ टीका-शुक्र गुरु अथवा बुधमें चारि ग्रह शुभस्थानमें होय तो यात्रा सफल और मृग नक्षत्रका चंद्रमा उस स्थानमें होय तो सकलकार्य एक मासमें सिद्धहोय ॥ सप्तमस्थान। चेत्सप्तमस्थागुरुसोमसौम्याः कुर्वतियात्राविजयंनृपाणाम् ॥ सर्वेनृपास्तस्यभवंतिवश्या मासद्वयेनापिचपंचभिर्दिनः ।। टीका-सप्तमस्थानमें गुरु अथवा सोम बुध होंय नौ यात्रामें विजय होय और सर्व राजा दो मास वा पांचदिवसमें वशीभूत होय ॥ अष्टमस्थान। कूराश्वसर्वेयादिलमकाले मृत्युस्थितामृत्युकराभवंति ॥ सौम्योगुरुभृिगुनंदनश्च दीर्घायुपंमृत्युकरश्चचंद्रः ॥ टीका-क्रूर कहिये शनि रवि भौम राहु केतु ये अष्टमस्थानमें होय तो मृत्युकारक और ये न होय सौम्यग्रह होय तो आयुष्यकी वृद्धि परंतु चंद्र होय तो मृत्युकारक जानिये ॥ नवमस्थान। धर्मस्थितायदिभवंतिहिपापखेटाः प्रयाणकालेचतथैवचंद्रमाः॥ तदाजयसवलेचचंद्रे मासत्रयेणापिदिनैश्चतुर्भिः ॥ टीका-नवम स्थानमें पापग्रह तथा चंद्र होय और चंद्र सबल होय तो नीन मास व चार दिवसमें कार्यसिद्धि होय ॥

भापाटीकासमेत। (१७९) धर्मस्थितौवायदिजीवशुक्रो सोमस्य सूनुर्यदिलनकाले । लगेचरेवायदिवास्थिरेवा कार्यस्यसिद्धिश्चभवेच्चलाभः ।। टीका-धर्मस्थानमें गुरु शुक्र अथवा सोम बुध ये ग्रह चर अथवा स्थिरलममें स्थित होय तो कार्यसिद्धि और लाभ होय ॥ कर्मस्थान। कर्मस्थिताः पापखगास्तुसौम्याः कुर्वतिकार्यशनिवर्जिताश्च ।। लग्नेचरेवायदिवास्थिरेवा मासत्रयेणापिचचैकमासः॥ टीका-दशमस्थानमें शनि आदिके पापग्रहोंको छोडके सौम्यग्रह चर अथवा स्थिर लगमें होय तो उक्त तीन मासमें अथवा एकमासमें कार्यसिद्धि होय॥ लाभस्थान। लाभस्थितौगुरुबुधौभृगुनंदनोवा कूराश्वसर्वेशशिनैवयुक्ताः ॥ सद्यम्फलाप्तिश्चभवद्धियात्रा पक्षकमध्येदिवसत्रयेच ॥ टीका-एकादशस्थानमें रविको आदिले पापग्रह चंद्रसहित अथवा गुरु आदिले सौम्यग्रह होय तो एक पक्ष वा तीनदिवसमें कार्यसिद्धि होय ॥ व्ययस्थान। नर्वेशुभाद्वादशसंस्थिताश्च यावाभवेत्तत्रविचित्रलाभः ।। पापाश्चसर्वव्ययदाभवंति यात्राफलंगर्गमुनिप्रणीतम् ।। टीका-दादशस्थानोंमें सर्वग्रह शुभहोय तो विचित्र लाभहोय और पापग्रह होय तो व्ययकारक जानिये यह यात्राफल गर्गमुनिने कहाहै ॥ प्रस्थानरखना। सुमुहूर्तेस्वयंगमनासंभवेप्रस्थानंकार्यम् ॥ श्लोक ॥ यज्ञो- पूर्णतकंशस्त्रं मधुचस्थापयेत्फलम् ॥ विप्रादिकमतःसर्व स्व र्णधान्यांवरादिकम् ॥ टीका-मुहर्तके समय जो किसीकार्यवशसे आप न जासके तो प्रस्थान करना योग्यहै उसकी विधि ब्राह्मणादिक अनुसार कहते हैं, बामण यज्ञोपवी- तका और क्षत्रिय शस्त्रका, वैश्य मधुका और शूद्र फलका प्रस्थान करे इसक्रमसे जानिये और सुवर्ण वस्त्र धान्य सबोंको युक्त है ।।

(१८०) ज्योतिषसार। प्रस्थानकितनेदिवसतकउपयोगी होय। राजादशाहपंचाहमन्योन्यप्रस्थितोवसेत् ।। अंगप्रस्थानसंपूर्ण वस्तुप्रस्थानकेर्द्धकम् ॥ टीका- राजाओंको प्रस्थान करनेपर दशदिवस औरोंको पांच दिवस- तक मुहूर्त उपयोगी रहताहै परंतु वस्तुप्रस्थानमें आधा फल जानिये और अंगके प्रस्थानमें पूर्णफल जानिये ॥ प्रस्थानके स्थानकाविचार । गेहाद्नेहांतरंगर्गः सीनः सीमांतरंभृगुः ॥ वाणक्षेपंभरद्वाजो व- सिष्ठोनगराद्वाहिः॥प्रस्थानपिकृतेनेयान्महादोषान्वितेदिने । टीका-गर्गजीके मतसे दूसरे घरमें और भृगुजीके मतसे सीमाके बाहर तथा भर द्वाजके मतसे बाणकेपतनस्थानमें अर्थात् जितना तीर जाताहै और वसिष्ठके मतसे नगरके बाहर प्रस्थानकरै तिसपरभी महादोपयुक्त दिवसमें यात्रानकरे. प्रस्थान दिवसमें वयंपदार्थ । क्रोधक्षौररतिश्रमामिपगुडद्यूताश्रुदुग्धासवक्षाराभ्यंगभयासि तांबरवामिस्तैलंकाद्गमे ॥ क्षीरक्षौररतीक्रमात्रिशरसप्ता- हंपरंतदिनरोगंख्यार्तवकसितान्यतिलकं प्रस्थानकेपीतिच ॥ टीका- कोप क्षौर स्त्रीसंग परिश्रम मांस गुड द्यूत रोदन दूध मद्य क्षार अयंग अन्यविषयक भय श्वेतवस्त्र गमन तैल कटुपदार्थ इतनी वस्तु प्र- स्थान दिन वर्जित है तिनमें दूध क्षौर स्त्रीसंग ये कमसे ३।५। ७ दिवस प्र- स्थान दिनसे पहिले वर्जित ॥ शेप और कहीहुई वस्तु केवल प्रस्थान दिनमें वर्जितहै और श्वेतसे भिन्न अर्थात् रक्त कृष्ण वर्ण आदि तिलक और रोगविषयक चिंतानी प्रस्थानके दिन वर्जितहै । मात्स्योक्तदुष्टशकुनकहतेहैं। ओपध्याचनियुक्तोहि धान्यंकृष्णतुयद्भवेत् ॥ कासश्चतृणंशुष्कं शुष्कंगोमयमेवच ॥ टीका-औषधी युक्त मनुष्य, कालाधान्य, कपास, सूखातृण अर्थात भूसाइत्यादि वस्तु उपला ये प्रस्थानसमय आगेसे आवे तो अशुभ जानिये ॥

भापाटीकासमेत। (१८३) इंधनंच तथागारं गुडंसर्पिस्तथाशुभम् ॥ अभ्यतोमलिनोमंदस्तथाननश्चमानवः । टीका-इंधन भस्म गुड पी दुष्टपदार्थ तेल लगानेसे मलिन मंद ननम- नुष्य ये अशुभ जानिये ॥ मुक्तकेशोरुजार्तश्च कापायांवरधारिणः॥ उन्मत्त कथितोसत्वोदीनोवाथनपुंसकः ।। टीका-खुले केशयुक्त मनुष्य रोगी गेरुआवस्त्र पहिने मनुष्य, उन्मत्त कंथायुक्त पुरुप,पापी पुरुप,दीन अथवा नपुंसक येभी अशुभ शकुन जानिये ।। आयपंकस्तथाचर्म केशबंधनमेवच ॥ तथैवोद्धतसाराणि पिण्याकादितथैवच ।। टीका-लोहेके खंडकी चर्म के राजांचता हुआ मनुष्य, जिनके सार- निकाल लिये गयेहैं ऐसे पदार्थ और पिण्याक ये भी अशुज जानिये ॥ चांडालस्यशवचैव राजबंधनपालकाः॥ धकाम्पापकर्माणोगर्भिणीस्त्रीतथैवच ।। टीका-चांडाल प्रेतबंधुओंके रक्षक वधकर्ता पापीपुरुष गर्भिणी घी येशी अशुज जानिये ॥ तुपंभस्मकपालास्थि भिन्नभांडानियानिच ॥ रक्तानिचैवभांडानि मृतसारंगएवच ॥ एक्मादीनिचान्यानिाप्रशस्तानिदर्शने ॥ टीका-तुप भस्म कपाल अस्थि रीते वा फूटे बर्तन, मराहुआ सारंग- पक्षी ये गमनकालमें हानिकारक हैं । क्यासितिष्ठआगच्छ किंतेतत्रगतस्यतु ॥ अन्यशब्दाश्चयेनिष्टास्तेविपत्तिकराअपि ॥ टीका-कहाँ जाते हो ठहरो आओ वहाँ जानेसे तुमको क्या होगा ये तथा औरती अनिष्टशब्द विपत्तिकारक होते हैं । ध्वजादौवायसास्थानं कन्यादानविगर्हितम् ॥ स्खलनंवाहनानांच वस्त्रसंगस्तथैवच ॥ टीका-ध्वजा वा पताकाके ऊपर काक बैठे अथवा मांसका लाना और वाहनोंका गिरना वस्त्र लपेटता हुभा पुरुप येनी अशुभ जानिये ॥

(१८२)
ज्योतिषसार।
दुष्टशकुनदोषनिवारण।
दुष्टेनिमित्तेप्रथमे अमंगल्यविनाशनम् ॥
केशवपूजयेद्विद्वान्स्तवेनमधुसूदनम् ॥
टीका-यात्रासमयमें ऊपर कहेहुए अपशकुनों से जो प्रथम अमंगल
दृष्टि आवे तो नाशकारक होय इसके निवारणके लिये विष्णुकी पूजा और
मधुसूदनके स्तोत्रपाठ करावे ॥
द्वितीयेचततोदृष्टे प्रतीपेप्रविशेद्वहम् ।।
अथेष्टानिप्रवक्ष्यामि मंगलानितथानय ॥
टीका-जो दूसरी वारभी अशुभ शकुन दृष्टि आवे तो घरमें प्रवेशकरे
इसके बाद मंगलकारक शकुन कहतेहैं ।
गमनकालमें उत्तम शकुन ।
प्रशस्तोवाद्यशब्दश्च भिन्नभेरीवास्तथा ॥ पुरतःशब्दएहीति
शस्यतेनतुपृष्टतः ॥ गच्छेतिचैवपश्चाद्यः पुरस्तात्सुविगर्हितः ॥
टीका-गमन कालके शुभ शकुन कहतेहैं.बाजनेके शब्द भेरी अर्थाव
नक्कारोंके शब्द और आओ यह आगेसे होय तो शुभ और पृष्ठ भागमें अशुभ
और जाओ यह शब्द पीठपीछे होयतोशुभ और आगे होयतो अशुभ जानिये॥
श्वेता पुष्टाःसुमनसःपूर्णकुंभस्तथैवच ॥
जलजाःपक्षिणश्चैव मांसंमत्स्यस्यपार्थिव ।।
टीका-बडेबडे श्वेतपुष्प पूर्ण कुंभ जलकेपक्षी मत्स्यका मांस ये शुभ जानिये
गावस्तुरंगमोनागो वृद्धएकापशुस्त्वजा ॥
त्रिदशा सुहृदोविप्रा ज्वलितश्वहुताशनः ।।
टी०-गाय,तुरंग,हस्ती,वृद्ध,एकपशु,बकरी देवता मित्र ब्राह्मण जलताअप्रि.
गणिकाचमहाभाग दूर्वाश्चाश्चागोमयम् ॥
रुक्मरोप्यंचतामंच सर्वरत्नानिचाप्यथ ।
टीका-गणिका हरितदूर्वा गोबर सोना रूपातांया और सर्वरत्न येशुभजानिये.
औपधानिचसर्वज्ञा यवाःसर्वार्थकास्तथा ॥
खड्गपात्रंपताकाच मृत्तिकायुधपीठकम् ॥

भाषाटीकासमेत। (१८३)
टीका-औषधी सर्वज्ञ पुरुष यव श्वेतसरसों खगपात्र पताका
मृत्तिका आयुध आसन ये शुभहैं ।
राजलिंगानिसर्वाणि शरुदितवर्जितम् ॥
घृतंदधिपयश्चैव फलानिविविधानिच ॥
दीका-समस्त राजचिह्न रोदनरहित मृतक घृत दघिदूधनानाप्रकारके फल.
स्वस्तिवृद्धिनिनादश्च नंद्यावर्तःसकौस्तुभः ॥
वादित्राणांशुभःशब्दो गंभीरःसुमनोहरः ॥
टीका-आशीर्वाद शब्द और कौस्तुभमणिके साथ नंद्यवर्तमणि वाद्य
तथा उत्तम मनोहर शब्द विननाशकहै ॥
गांधारषड्जऋषभा येगीतासुस्वराःस्वराः ।।
वायुःसशर्करोत्युष्णः सर्वविघ्नविनाशकृत् ।।
टीका-गांधार पड्ज ऋषभ ये राग और अच्छे गाये स्वर सुंदर
मीठा पवन अथवा उष्ण सर्व विघ्ननाशक जानिये ॥
प्रतिलोमस्तथानीचो विज्ञेयोभयकृचिजः॥
अनुकूलोमृदुःस्निग्धःसुखस्पर्शःसुखावहः ।।
टीका-वर्णसंकर मनुष्य तैसेही नीच मुसलमानादिक ब्राह्मण बडेअयंकर होने
हैं अपने अनुकूल पदार्थ अच्छे और सुखस्पर्श मनुष्यादिक सुखकारीहोतेहैं,
शस्तान्येतानिधर्मज्ञ यत्रस्यान्मनस-प्रियम् ।।
मनसस्तुष्टिरेवान परमंजयलक्षणम् ॥
टीका-हधर्मज्ञ । ऊपर कहेहुये शकुन शुभ जानिये और जो अपने मनको प्या
री वस्तु होय उसका दर्शन उत्तम और तुष्टिकारक तथा जयदायक जानिये.
चित्तोत्सवत्वं मनसम्प्रहर्षः शुभस्यलाभो विजयप्रवादः॥
मांगल्यलब्धिः श्रवणंचराज्ञा ज्ञेयानिनित्यं विजयावहानि ।।
टीका-यात्रासमयमें मनमें हर्ष शुभ तथा लाभकारक विजयवाद और
मंगलपाप्तिका श्रवण शुभजानो।
क्षेमंकरानीलकंठाः श्वोलूकखरजंयुकाः॥
प्रस्थाने वामतःश्रेष्ठाः प्रवेशे दक्षिणाःशुभाः॥

(१८४) ज्योतिषसार। टीका-मयूर कुत्ता उलूकपक्षी गर्दन, जंबुक, प्रस्थान समय वामभागी होय तो गमनमें शुभ और प्रवेश समय दक्षिणभागमें शुभ जानिये ॥ अथ शिवद्विघटीमुहूर्ताः। देव्युवाच॥श्रीशंभोप्राणनाथेश वदमेकरुणानिधे ॥ त्रिपुर- स्यवधेप्रोक्ता मुहूर्तायेशुभप्रदाः ॥ भूतानामुपकारार्थ सर्वका- लेष्टसिद्धिदम् ॥ यातुरर्थप्रदंब्रूहि करुणाकरसुन्दर ॥ ईश्वर उवाच-शृणुदेविप्रवक्ष्यामि ज्ञानत्रैलोक्यदीपकम् ॥ ज्योतिः सारस्ययत्सारं देवानामपिदुर्लभम् ॥ नतिथिर्नचनक्षत्रं नयो- गंकरणंतथा॥ कुलिकंयमयोगच नभद्रानचचंद्रमाः ॥ नशू- लयोगिनीराशिनहोरानतमोगुणः॥व्यतीपातेचसंक्रांतोभद्रा- यामशुभेदिने ॥ शिवालिखितमित्येवं सर्वविघ्नोपशांतये॥क- दाचिच्चलतेमेरुःसागरश्चमहीधरः॥ सूर्यः पततिवाभूमौ वह्निर्वा यात्तिशीतताम् ॥ निश्चलश्चभवेद्वायुर्नान्यथाममभाषितम् ॥ तत्रादोकथयिष्यामि मुहूर्तानिचषोडश ॥ गुणत्रयप्रयोगेण चलन्त्येवमहर्निशम् ॥ अथपोडशमुहूर्तम्।।रौद्रंश्वेतंतथामैत्रं चावटंचचतुर्थकम् ॥ पंचमोजयदेवश्च पाठवैरोचनंतथा ॥ तु- रगादिकंसप्तमंच तथाष्टौचाऽभिजित्तथा ॥ रावणनवमंप्रोक्तं बालवंदशमंतथा विभीषणरुद्रसंज्ञं द्वादशंचसुनंदनम् ॥ या- म्यंत्रयोदशंज्ञेयं सौम्यज्ञेयंचतुर्दशम् ॥ भार्गवंतिथिसंज्ञंच सवितापोडशंभवेत् ।। अथमुहूर्तकार्याणि ॥ रौद्रेरौद्रुतरंकार्य श्वेतकुंजरबंधकः ॥ नानदानादिकमैत्रे चावटेस्तंभनं भवेत् ॥ कार्यजयदेवसंज्ञे सर्वार्थकरमुच्यते ॥ तद्वैरोचनसं- ज्ञकेप्रभवति पट्टाभिषेकंक्रमात् ॥ ज्ञात्वैवंतुरदेवतानिविदिते शस्त्राधिकंसाधयेत् ॥ सत्कार्यमभिजिन्मुहूर्त्तकवरे ग्रामप्रवेश सदा ।। रावणेसाधयेद्वैरं युद्धकार्यचवालवे विभीषणंशुभंका- र्य यंत्रकार्यसुनंदने ॥याम्ये भवेन्मारणकार्यमप्यसौ सौम्येस- भापाटीकासमेत। (१८५) भायानृपवेशनस्यात् ।। स्त्रीसेवनभार्गवकेमुहूर्त सावित्रिना- निप्रपठेत्सुविद्याम् ॥ अथमुहूत्तॊदयंवारपरत्वेन । उदयेरौद्- मादित्येमैत्रंसोमेप्रकीर्तितम् ॥ जयदेवंकुजेवारे तुरदेवंबुधे तथा ।। रावणंचगुरौज्ञेयं भार्गवेचविभीपणम् ।। शनौयाम्यमु हूत्तैच दिवारात्रिप्रयोगतः ॥ अथमुहूत्तोगत्वेनगुणोदयम् ।। गुरुसोमदिनेसत्त्वं रजश्चांगारकेभृगौ ॥ सौमन्देवुधेचैव तमो नाडीचतुएयम् ।। सत्यंगौरंरजश्श्याम तामसंकृष्णमेवच ।। इमंवर्णविजानीयात्सत्वादीनांयथोदित्तम् । अथसत्वादिगु- णानांफलम् ॥ सत्वेनसाधयेत्सिद्धिं रजसाधनसंपदाम् ॥ तम- सासाधयेन्मोक्षं इतिज्ञेयंसदाबुधैः ।। सत्वरजसिसत्कार्यमथवा शुभमेवच ।। तमसाछेदभेदादि साधयेन्मोक्षमार्गकम् ।। अथ मुद्दतोगत्वेनरेखाज्ञानम् ॥ शून्यनमःखादिभिरेववर्णैर्विघ्नंध- नुर्युग्मगणाधिपायैः॥मृत्युंतथापादयमादिवर्गः श्रीविष्णुना- मामृतसंज्ञसिद्धिः।। अमृतश्चोर्द्धरेखैका कालरेखात्रयभवेत् ॥ विनमावर्तकंतत्र शून्येशून्यमितिकमात् ।। अथरेखाफलम् ।। शून्येनैवभवेत्कार्य विभ्रमावर्तकेभवेत् ।। कालरेखामृत्युकरी सर्वसिद्धिस्तथामृते ॥ धनुर्मानेकर्कटानां चातसत्वेविनिर्दि- शेत् ॥ तुलालिपमेषाणां चातोरजसिनिश्चितम् ॥ कन्यामि थुनसिंहानां कुंभल्यमकरस्यच ॥ घातस्तामसवेलायां विप- रीतंशुभावहम् ॥ धनुःकर्कटमीनाख्या गौरवर्णः क्रमोदितः ।। वृपेमेपेतुलायांच वृश्चिकेश्यामवर्णता। मिथुनेमकरकुंभेक- न्यासिंहेचकृष्णता ॥ गौरश्चम्रियतेसत्वे श्यामवर्णेरजोगुणे ।। कृष्णंतामसवेलायां म्रियतेनात्रसंशयः॥ यस्मिन्वभवेन्मा- सो गौणाधिक्यस्तथाक्षयः ॥ मासेनगृह्यतेमासः सर्वकार्यार्थ साधने । माषफाल्गुनचैत्रेषु वैशाखेश्रावणेतथा ॥ नभस्ये मासवाराणां मुहूत्तानियथाक्रमात् ॥ रुद्रप्रोक्तमिदज्ञानं शिवा यैरुद्रयामले गोपनीयंप्रयत्न सद्यप्रत्ययकारकम् ॥

रवीनाः केशवविनराजी गोविन्दनामानम आखुगामी ॥ रात्रौ नृसिंहौयुगलं नभोयवलक्ष्मीशलम्बोदररामसज्ञौ ॥ (१८६) . . . 6 रवि शेमे चाज वात|मरा वा वि| सुया सौभा सा | मै|चा जातु सवावि सुया सौभा सारी। रवि दिने । तत ससररराततससररत तसस ररत त ससरर | तत स स र रत | त राम्रो 6181866 181818166 0|53|8181866 661818 सोमेहरिपिन्नपतिः सुरेशः शून्यं च गौरीसुतविष्णुसझौ ॥ एवंनिशायांखखविष्णुशून्यंयुग्मं च नारायणविघ्ननाथौ सोम मचा जावे तु आरा/वावि | सुया सौभा सारौ श्वे चा| जबेतु मारावावि सुया सौभासा रोखे में | सोम दिने सासरत तस| सरर |तत | ससार र तत ससररत तमास) र रतत स स रानी 810 8181810 668 0181810 66181018066 भीमेयमीमारमणोऽथयुग्मंयुग्महरिश्चैव गजाननश्च ॥ नक्तं च विनंद्विपदोःमुकुंदपदत्रयं श्रीपतिखंनाः श्रीः ॥ भौमे जावतु भारावावि सुया सौभामा राखा में चा वैतु अरावावि सुया 'सौ भा|सारौ | श्वे मै चाज भौम सतीस सार र ततस सरर त त |ससर) र तत ससरर |त | तस। सरर ! रात्री 101018181818166 66181866 166 660888JOINT00318) युधेधनुः रुप्णयमौ च शौरिः सिदिर्धनुः सौरियमौ च सिद्धिः।। रात्रौसुपर्णध्वज एवयुग्मनमोऽथदामोदरकुजरास्यौ। इध तामारावा|विसया सीमा सारी से मै चाज व भारावा वि सुया सौ भासा री || मै चाज वे तु बुध दिने तत|ससरर ततस सरर त त सस र र ततस सररत | त समारत | त रात्री C1BIBIN0BBBCCIRTHISIOBI BB18181816 11B101610 ज्योतिपसार । . . 6 . o गुरोगोपिनाथस्तथाविघ्नराजोनाः केशवःकुंजरास्यस्तथैव ॥ निशायांपदैनंदजः सूर्यसूनुर्नभोमाधवश्वापमेकंहरिश्च ॥३८॥ गुरुरावा। वि।सया सौभा सारौ श्वे मेचा जावै। अ वा विसु या सौभा सारौवे | मै चाजि वै|तु मारा | गुरु दिने ससररत तससरर ततस सरर त तससररतत ससररत त स स रात्री 8181818166166101088166166 1018181 BHIMDMOBIB816618181. शुक्रेकृष्णेस्याधमः खमुरारिगौरीपुत्रः श्रीपतिःशून्यमेकम्॥नक्तंकाल केशहाखंच युग्मंपादद्वन्दोवामनः खंचपादौ ॥३९॥ शुक्र | वि तया,सौभा सा री श्वे | मै चाज वै| तु अरावा सुया सोभा सारौ श्वे मै चा जवै|तुअरा वा वि शुक्र दिने र सतत सस र रतत ससररत त सस र रत त स स र र ततस सरर रात्री 81 8000 81818166 6688. 9081818166008181818 010 शनौपदःश्रीः खनभोनमःख नारायणी नाहरिखंहरिश्च ॥ रात्रौचशून्यं यमयुग्ममाधवौखविघ्नराजौनृहरिश्चपादौ ॥ १० ॥ शनि या सोभा सा रोखे म चा जव! तु मारावा विसु सौभासा रौ श्वे मै चाज वै|तु अ.रावा| वि। सु। या, शनि दिने त तास साररत तससाररत त सस र र ततस साररत त स स र रतत रात्री 0181818181818101001 00018 668181813101. तथाश्विने कार्तिकमार्गपीपे सूर्यादिवारेषु मुहूर्त्तयोगाः ॥ नामाक्षराणां प्रचनं प्रवृत्त्याविचारपूर्वविबुधैर्विचिन्त्यम् ॥ ४१॥ सूर्यनृसिंहोद्विपदं च चापोहरिनमः खेपदमच्युतोऽघिः ॥ रात्रौपदंचापसमच्युतं चयुग्मंयमौ विष्णुखसिद्धिसंज्ञौ ॥ ४२ ॥ रवि रो। श्वे म चाज व तु मारावावि सुया सौभा सा श्वे मै चाज व तु अरावा विसु या सौ भासा रो रवि दिने त त स सररत तस सार र तत सस ररत त ससरर त त ससररत त रात्री • 181818066BB10101081818191 166088186166001818181 भापाटीकासमेत। 66 . (626) .

(226) . . ८८ 66 . सोऽबिचापस्वननो मुकुन्दोनमश्चयुग्मंहरिखंहरिश्च ॥ पदनिशायांखयुगंमुरारिविनायकौविष्णुनाश्चविष्णुः ॥४३॥ सीमामाचा जावात भरावा वि।सुया।सोभा सा माथे| चा|ज'तु अरावा विसु ! यासौभा सारौ श्वे में | सोम दिने सासर रात तसासरतत ससार र तत स स र र त त स स र र त त साम रात्री 1166 1018BIGG Bा 01661018181816616161818101801. भीमेमहेनाग्यननोऽथ विष्णुंनभोयुगंगोपति संगणेशः ॥ नतंगजेंद्रास्य खमच्युतंचयुग्मंचशून्यं नृहरिश्वयुग्मम् ॥ १४ ॥ भीम जर तु।राग विसु. या साभा सा रो। चे में चा वितु अरा वा विसु या सौभासा,रौ श्वे मै चाज भीम दिने रारात तास सारतत ससररातत सासर । रत त। सास । ररतात साम। रर रात्री .88/06/688810161612101666 0181818161610181818166 बुधेधनुःश्रीपतिपादयुग्गनारायणःस्याद्गणनाथसिद्धिः॥रात्रौतुकालौहरि शून्यकालौगोविन्दगौरीसुतसून्यसिद्धिः ॥४५॥ सुध त सरावा वासु या सौभा सारी श्वे। मैं | चा जाव अरावा वि| सु या सी भा सारी थे| मै चा|ज वेतु | बुध दिने त त ससार ततस सरररात तासास ररत तस/सार र तत ससररतत रात्री CCBBB10181818166166 | BINISMBER 10T181818166166 018 गुरौहरिःशून्ययुगंसुरेशः श्रीविघ्नराजोगगनंतथाश्रीः ॥ निशांग्रिदैत्यारिखकार्मुकंच पदेमुरारीखयुगंपुनःश्रीः ॥ ४६ ॥ गुरु रामाविमा या सा.भासारी श्वे मेचा जावेतुम वा वि सुयासिौभा सारी श्वे में चान वैतु अरा गुरु दिने ससररत तसासरत त ससरर तत स स र.रतात ससररत तसस रात्री 81661818BIGG }CC10/018 VIDIO 616008118 6610 ज्योतिपसार! . . .

66 . . शुकेऽमृतंचापमरिन्दमश्चलम्बोदर केशवशून्यपादम् ॥ नक्तंचयुग्मं नृहरिःखयुग्म नृसिंहयुग्मं गगनंच युग्मम् ॥४७॥ शक पिसुया सौभा, सारौ श्धे मै चाज वैतु अ रा वा सु या सौभा सारौ श्खे मै चाज वै|तु अरावा विशुक्र दिने र र ततम सरर तत ससरर त त स सररत तस सररत तसास र र रात्री • 1818181810161661811001 6080 1866 शनौपदंश्री नभोनकृष्णः संश्रीपदंविष्णुनभोहरिःपदं ॥रात्रीपदेखपदनदसूनुगजाननोगोपतिशून्यपादः ॥४८॥ शनि या सौभा सारौ श्खे। मै चाज/वैतु आरा वा वि सु। सौभा सारी से मै चा जावे | तु अरावा वि।सुया शनि दिने |ततस साररतात ससार र तत तस ररत तस सररतात सासाररत त | रात्री B01801010181810 MOBBBBBा 508181818666168181818IN ३ थकं । ज्येष्ठेमासेतथापाढे तथैवचमलिम्लचे ॥ सूर्यादिवारे संशोध्यमुहूर्त निक्रमादिह ॥ १९ ॥ अर्कसूर्यचक्रप्णोयुगपदयुगलंखंहरिर्विष्णुचापं ॥ रात्रौशल्मीशयुग्मंयुगलहरियुगयुग्मकृष्णंत्रिशून्यम् ॥ रवि रोखे मै चाज वै| तुअरावा विसु या सौभासा यो मै । चा जावै । तु अगवा वि स या सौ भासा रौ। रवि दिने तत। स स र र सात ससररतत सस र रात त ससररत त स सररत | त| रात्री 01 018181660106 018181818166 8181816 16 166181816101661812. सोमेचापेद्वयंनो नृहरिखयुगलंपीतवासश्च शून्यंचापदईनिशायामजसपदमजश्वापपझेशपादम् ॥ ५० ॥ सोम | म चा जव अरावा वि| सु या। सौ भा सा गैखे। चा जवे तु अरावा वि सुया। सौ भासा रो श्वे मे सोम दिने ससरर त त ससरर त त । स सर र तत सस र । र त तमास र र त त स स रात्री 64616161010166880010161616891818018616166 I 8/01 भापाटीकासमेत। . . (१८९) o चा (१९०) . 66 616 . मॉमेशून्येचकृष्णोयुगगगनहरिस्त्रीणिचापानिसिद्धि नक्तंयुग्मंद्विशून्ययुगलयुगपदंश्रीखचापहरिश्च ।। भौम जातिसरा/वावि सुया सो| भासा रौशे | मै| तुअरावा विसु | या सौ| भासा रौ खे| मै |चा ज) भौम दिने ररतात स| स र र त त स सर/र/त | त र|तत ससरररात्रौ सासाररत तासास 0.011B101010101666666 || 66 6610180 66 | सौम्ये श्रीविघ्ननाथोथहरिगणपतिःपद्मनाभश्वपादः || दोपायासिद्धियुग्महरिखगजमुखाकृष्णशून्येचकृष्णः ॥ युधे तु अरावा विसु या सौभा सारौ श्वे | मै चाज वै| अरावा विसु या सौ.भा सारौ श्वे मै चाज वै| तु | बुधे दिने त त सासर/रतत | ससार रत त सस |ररत तसस र रत तस साररत | त! रात्री • 161666 666581818181101 81668310161616681310101810 जीवेविष्णुश्चचापोगगनभजितखमंघ्रियुग्मनृसिहः ॥ रात्रौनोखंमुरारिंगगनयुगनजोविष्णुचापोंघ्रियुग्मम् ॥ गुरु रावा|विस या| सौभा सारौवे | मै चा ज| वै| तु/अ| वा|वि|सु | या सौभा सारौ श्वे मै|चा ज वै| तु अ/रा गुरु दिने ससररत तस सररत तसस) र र तत ससरर त त सासररत त स स रात्री 886 0181818100DOINBI 01 01818181060|61618101616 MIN शुक्रेयुग्मुरारिंगेगनपुगलजोविष नोविष्णुचापांघ्रियुग्मम् ॥ तत्रादौयुग्मगोपीपतियुगगगनंश्रीवरः खंपदश्रीः ॥ शुक्र विसवासी भासा री श्वे मै चा|ज वेतु अरावा सुवा सौभा सारा श्वे मै चा ज वे| तु अरावा/वि शुक्र दिने र रत/त/ससररतत/ससर/रतत सस/र/र/तत स स र र त त स स र र रात्री 101010 66 1818166001 6610181818166 08888888 मंदेश्रीयुग्मसिद्धिःखहरिहरिनभःशौरिखसिद्विखंवा ॥ नक्तंश्रीयुग्मसिद्धिःखगयुगलहरियोमगोविन्दशून्यम् ॥ शनि या सो भासारो श्वे मे चाजवे तु अ वा विसु सौभा सा रौ श्वे मै चा, जवे तु अरावा विसु अ शनि दिने ततास सतत मसर र तत सस) र र त त म स र रत तससरर त त रात्री BCCBB10181818181. 31010! 31. BIGG8B. 6613180 18/ ज्योतिषसार। . क . 616 .

अथ चीरहरा मुहूर्त श्रीमुरुंदर गोरसनाथस्तपानानिमिनारम्भः ॥ तृतीया त्रयोदशीका फल १ चौथ चतुर्दशीकाफल १ पंचमी पूर्णिमाका फल १ अमावास्याकेदिन गमन न करे-मूल काम अच्छानकरे । कृष्ण धा शुक्लपक्षकी तिथिको फल १ जिम मासकी तिथिको जायती अपने चिनसे गमनकर-चंद्रमाको बल भरणी भद्रा दिशा शूल योगिनी काल वास तिथिवात नक्षरधान चंद्रमापात व्यतीपात कल्याणी संक्रांतिअनेक कुयोगके दोप नहोंगे यह गोरखनाथने कहा है जो तिथि सारिक यात्रा करेगा वह सुखपूर्वक अपने घर कार्यसिद्ध करिके आवेगा ॥ शुभम् . पाप मापापा! माशाज्य आपाश्राव भाद्र आ. कार्तिी मान २. ३ ४ ७ १ मापाटीकासमेत। 3 ५ ६ १ ३ ६ ७ ४ १ ५ ८ १.११११०। १ २ ९ १० ११ १२ ८ ९/१०/११/१२ १/२ ८ ९ ३ ४ ९१११११११२१ २ ३ ४ २ ३ २. ३ ७ ५ रहरचतुर्थप्रहर तिथि मा पश्चिम मा राजपद - शुभ गमनार्थ गय अतिमुख/२ म विघ्न मध्यम खि पिन्नहा ३ अर्थप्राप्त धनप्राप्ति रह अतिभया :- मगल धनलाभ यि कायति ५ धनागम सुखहोय ख कर्जदेना।६ न मित्रलाभ अर्थगवा घटसर्वसुस। ७ द्रव्यलाभ सुखप्राप्त ख। यमघट क्नेश- सौख्य - आ| सर्वसुख ९ -- कार्यसिद्ध कष्ट रद्ध सुखसेआ१० अथगवन धनप्राप्त नावे सुखप्राप्त ११ :- द्रव्यनाशामृत्यप्रद म कार्यसिद्ध | १२:: अशुभ कएप्रद ८ १ २ ४ ६ ७ ८ ९ १२ २ ३ ४ २।३४ ८ (१९२) ज्योतिपसार । अथगोरक्षकमतेनतिथिचक्रम् । फलश्च। मासेशुक्लादिकेपौषे तिथिः प्रतिपदादितः॥द्वितीयाद्यास्तुमा- घेस्युस्तृतीयाद्यास्तुफाल्गुने ॥ एवंचान्येषुमासेषु तिथ्योद्वा- दशसंज्ञिकाः ॥ लेख्याश्चक्रेत्रयोदश्यां संविहायतिथित्रयम् ॥ तृतीयादित्रयेतत्र त्रयोदश्यादिकेफलम् ॥ यानेप्राच्यादिका- छासु वक्ष्येद्वादशधाक्रमात् ॥ सौख्यंशून्यंधनातिश्च लाभो लाभभयंधनी।कष्टंसौख्यंकलिर्मृत्युःशून्यप्राच्यांफलंक्रमात्।। केशोनःस्वंव्यथासौख्यं द्रव्याप्तिाभपीडन।सौख्यंलाभक- एसिद्धिलाभ-सौख्यंतुदक्षिणे ॥ भयनैःस्वप्रियाप्तिश्च भयद्रव्य मृतिर्धनम् ॥ क्लेशाल्लाभोर्थसिद्धिःस्वं लाभोमृत्युश्चपश्चिमे ॥ धनंमिश्रधनलाभः सौख्यलाभःसुखसुखम् ॥ कष्टद्रव्यत्वशू- न्यत्वं कष्टमुत्तरदिक्फलम् ॥ यथाचक्रम्। पोमा फा) च | वै ज्य आश्रा |भा आकामा | पूर्व दक्षिण पश्चिम | उत्तर १२३४५६७८.९/१०/२१/१२ सौख्य केश भय अर्थात २३४५६७८२२८/१२/२०१२ शुन्य नःस्व नःस्व मिश्र ४५६७८९/२०१२/१२/१२व्यक्ले दुःख प्रिया अर्थ ४/५/६/७/८/९/२०११/१२/१२/३ लाभः सौख्य भयवित्तला लाभः द्रव्यप्राधनमा सौख्य ८९२०११/१२/१|२|३||५ भयभी लाभः मृत्यु अर्थला ९/२०११/१२/२/२ ३/४/५/६ लाभः क्ट द्रव्पला सुख ८/९/२०/२१/२२२२३४५ ६७कट सोस्य केश सुख ९/१०/२१/१०१२३४५६ सौख्य लाभः कार्य कष्ट २०१२/१२/२/२३४५६७८९ क्लेश कष्टांग अर्थसि धन 1२२/१२/२/२/३ १२/२/२३ २२ शून्य सोस्य मृत्यु | कष्ट ३ ५६.७ ८ ९ २०१२/१२/१२ ७ मृत्यु लाभः द्रव्पला शून्य ४५६ ४५६७८ भापाटीकासमेत। (१९३) अथ आनन्दादिशुभाशुभयोगाः। सूर्यश्विभात्तुहिनरोचिपिचंद्रधिष्ण्यात्साच्चिभूमित- नयेथवुधेचहस्तात् ॥ मैत्राद्गुरौभृगुसुतेखलुवैश्वदे- वाच्छायासुतेवरुणभात्क्रमशःस्युरेवम् ॥ आनंदः कालदेडश्च धूम्राख्योथप्रजापतिः ॥ सौम्योध्यांक्षो ध्वजोनाना श्रीवत्सोवनमुद्रः ॥ छत्रमैत्रीमानसश्च पद्माख्योलंबकस्तथा|उत्पातोमृत्युकाणाख्यः सि- द्विश्वशुभोमृतः।मुसलोथगदाख्यश्चमातंगोराक्षस श्चरः ।। स्थिर प्रवर्द्धमानश्च योगाऽटाविंशतिःक्रमा- त् ॥ ॥ फलम्॥ ॥आनंदेलभतेसिद्धिं कालदंडेमृ- तितथा ।। धूम्राख्येनसुखंप्रोक्तंसौभाग्यंचप्रजापतो।। सौम्येचैवमहत्सौख्यं ध्वांक्षेचैवधनक्षयम् ।। धजना- निचसौभाग्यं श्रीवत्सेसौख्यसंपदः वज्रेक्षयोमुद्रेच श्रीनाशस्तुतथैवच छत्रेचराजसन्मानं मैत्रेपुटिनसं शयः ॥मानसेचैवसौभाग्य पद्माख्येच धनागमः॥ लंबकेधनहानिश्च उत्पातेप्राणनाशनम् ॥ मृत्युयोगे भवेन्मृत्युः काणेचक्लेशमादिशेत् ॥ सिद्धियोगेभ- वेत्सिद्धिः शुभेकल्याणमेवच ॥ अमृतेराजसन्मानो मुसलेचधनक्षयः॥गदास्येचाक्षयाविद्यामातंगेकुल- वर्द्धनम् ॥ राक्षसेतुमहत्कष्टं चरेकार्यचसिद्धयति ।। स्थिरयोगेगृहारंभो प्रवृद्धेपाणिपीडनम् ॥

(१९४) ज्योतिपसार। vork वत्र क्षय १० १२ मैत्र पुष्टि योगी नाम | रवि । चंद्र | मंग.। बुध गुरु शुक्र शनि फल.G आनद | अश्वि मृग आश्ले । हस्त । अनु उ.पा./शत सिद्धि २ कालट भरणी आद्री मया चित्रा ज्येष्ठा आभि. पूर्वा । मृत्य Fधन कत्ति पनवेमुः पूर्वा स्वाती मूल श्रव. 'उत समय ४ प्रजापति | रोहि. पप्य उत्तरा विशा। पू. धनि. रेवती, सामान्य द सौम्य । मृग आश्ले हस्त । अनु उ.पा | शत अस्वि अधिकसो. चांक्ष आर्द्रा मवा चित्रा ज्येष्टा अभि पू.भा. भरणी नक्षय चन पुनर्व | पूर्वा स्वाती मुळ-श्रव उ.भा. कृति सौभाग्य ८) श्रीदत्स पुप्य उत्तम, विशा.पा. धनि | रेवती रोहिमोग्य माशे हस्त अनु उ.पा. रात आशा मग मुहर मया चित्रा ज्येष्ठा अभि पृ.भा.भरणा आ लक्ष्मीना. (२२ पी स्वाती | मूळ | श्रव उ.भा.कृति. पुन राजसन्ना उत्तरा विशा पूर्वापा | धनि रिवती रोहि. पप्य १३) मानत हस्त | अनु उत्तरा | शत आश्वि | मृग आश्ल सौभाग्य ११) पद्माख्य चित्रा न्यना अभि. पू.भा. भरणी आदी. मघा धनप्राप्ति १५ लयक स्वाती मूल श्रव..उ.भा कृत्ति पुन । पूर्वा धनहानि १६ उत्पात विशा प.पा. धनि | रेखती रोहि पप्य उत्तर प्राणनाश १७ मृत्यु अनुराउ.पा. शत अश्वि | मृग आले | हस्त मृत्य १८काणारय ज्येष्ठा नाभि भा भर आर्द्रा मघा चित्रा १९) सिद्धि मुरू अब उ.भा कत्ति पुन । पूर्वा.स्वाती कार्यसि. २०] शुभ पू.पा धनि रेवती रोहि ! पुष्य उत्तरा विशा कल्याण, २१) अमृत उ.पा शत अश्वि मृग आश्ले हस्त / अनु. राजसन्मा २२ मुप्तरू भभि पू भा. भर आदी मघा चित्रा ज्येष्ठा नक्षय २३ गदाख्य श्रव. उ.भा | कृत्ति पुन पूर्वा स्वाती मूळ अक्षयवि० २४ मातग धनि. रेवती रोहि पुष्य उत्तरा विशा पू.पा. | कलवृद्धि १२५ राक्षस शत अश्वि मृग आश्ले हस्त ! अनु उ.पा | महाकष्ट पूर्वाभा भर आर्द्रा | मघा चित्रा ज्येष्ठा अभिः कार्यसि. अस्थिर उ.भा. कृत्ति पुन पूर्वा स्वाती मूळ | श्रवण) महारंभ २८ प्रवधमान रेवती रोहिणी पुप्य उत्तरा विशा। पूर्वा. J धनि | लग्न टीका-आनंदादियोग अठाईसह तिनमें-एक १ योगका ७ वार और नक्षत्र तिनका क्रम ऐसे जानिये रविवारको अश्विनी, सोमवारको मृग, मंगलवारको आश्लेपा, बुधवारको हस्त, गुरुवारको अनुराधा, शुक्रवारको उत्तरापाढा, शनिवारको शततारका, इन-वारोंमें नक्षत्रोंका संयोग होय तो -- २६ चर भापाटीकासमेत। (१९६) आनंदादिक योग जानिये ऐसे अहाईस योगोंका कन पीछे लिखाहै ॥ चरयोगः। खोपूषागुरौपुष्यः शनौमूलभृगौमया ॥ सौम्येब्रायं विशा भौमे चंद्राचरयोगकः॥ ॥क्रकचयोगः॥ ॥ खौतुद्वादशी प्रोक्ता भौमेचदशमीतथा॥ चंद्रेचैकादशीप्रोक्ता नवमीबुधवा सरे ॥ शुक्रेचसप्तमीज्ञेया शनीचैवतुपष्ठिका ॥ गुरौचाष्टमि- काशेयो योगस्तुक्रकचोवुधैः॥॥ दग्धयोगः ॥ ॥ बुधेतृतीया कुजपंचमीच पष्ठयांगुरावष्टमीशुक्रवारे ॥ एकादशीसोमश निर्नवम्यां द्वादश्यमर्कामतिदग्धयोगः ॥॥ मृत्युदा ॥ ॥र वौभामभवेन्नंदा भद्राजीवशशांकयोः ॥ जयाशुक्रेवुधेरिक्ता शनौपूर्णाचमृत्युदा ॥ ॥ सिद्धियोगः॥ ॥ शुक्रेनंदावुधेभद्रा जयाभीमेप्रकीर्तिता ॥ शनौरिक्तागरीपूर्णा सिद्धियोगाउदा । हृताः॥॥ उत्पातादियोगाः॥॥ विशाखादिचतुकंतु भा- स्करादिक्रमेणतु ॥ उत्पातमृत्युकालाख्यसिद्धियोगा यकी- र्तिताः॥॥ यमदंष्ट्रयोगः।। ॥ मघाघनिष्टासूर्येतु चंद्रमूलवि शासके ॥ कृत्तिकाभरणीभौमे सौम्येपूपापुनर्वसुः ॥ गुरौपू- पाश्विनीशुके रोहिणीचानुराधिका ॥ शनोविष्णुःशतभिपक् यमदंष्ट्रप्रकीर्तितः॥ ॥ यमघंटः॥ ॥ रवीमघायुधेमूलंगुरोचे वहिकृत्तिका ॥ भोमेचा शनोहस्तः शुक्रेचैवतुरोहिणी ॥चं विशाखायोगोऽयं यमघंट-प्रकीर्तितः॥॥ मुसलवज्रयोगः॥ चंद्रेचित्राभृगौज्येष्टा शौचवतुरेवती ॥ चांदजेतुधनिष्टोक्ता स्वोतुभरणीतथा॥ उपाश्चैवतुभीमेच गुरौचैवोत्तरातथा । अयंमुसलपत्राख्ययोगोवऱ्या शुभेवधैः।।।अमृतसिद्धियोगः।। आदित्यहस्ते गुरुपुप्ययोगे वुधानुराधा शनिरोहिणीच ।। सोमेचविष्णु गुरेवतीच भौमाश्विनीचामृतसिद्धियोगः॥

मघा २ क्रकच १० ૧૨ उत्तरा उत्तरा ९ सिद्धि श्रवण (१९६) ज्योतिपसार। टीका-चरयोगादिक त्रयोदश योग और वार सात कोठकमें लिखेहैं तिनमें जिस वारमें नक्षत्र किंवा तिथे होय सो योग उस दिन जानिये ॥ योगांकनाम रविवार सोमवार मंगळवा. बुधवार । गुरुवार । शुक्रवार शनिवार २ | चरयोग पूर्वापाटा । आद्री विशाखा रोहिणो पुष्य तिथि ११ तिथि १ तिथि ९ तिथि तिथि तिथि ६ तिथि ३ दग्धयोग | १२तिथि ११ तिथि | पतिथि | ३तिथि | ६ तिथि ८ तिथि ९ तिथि ४ मृत्युदा तिथि, अति. तिथि तिथि अतिथि तिथि ५ तिथि १४ ६ सिद्धियो.ति. ति टेतिथि अतिथि प्रतथि तिथि तिथि १३ उत्पात विशाखा पूर्वा धनिष्ठा | रेवती रोहिणी पुष्य ७ मृत्युयोग अनुराधा शततार| अश्विनी मृग आश्लेपा हस्त ज्येष्ठा अन्. पूर्वा भरणी आ । मया चित्रा मूल उत्तरा कृत्तिका पुनर्वसु पूर्वा स्वाती २०, यमदष्ट्र मघा धनि. मूलविशा. कृत्ति.रो. पृ.पा.पुन. उ.पा.अ. रोहि.अ. श्रव.श. ११] यमघटमघा | विशाखा मृग मूल कृत्तिका रोहिणी हस्त १२/मुसलवज्र भरणी चित्रा | उ.पाटा धनिष्ठा ज्येष्ठा रेवती १३ अमृतति। हस्त । श्रवण | अश्विनी अनुराधा पुप्य रेवती रोहिणी दासदासीलेनेका मुहूर्त। दासचक्रम्।निराकारंलिखेच्चक्र सेवार्थमृत्युसंग्रह ।। शीर्षेत्रीण्य र्थलाभःस्यान्मुखेत्रीणिविनाशनम्॥हदिपंचधनधान्यं पादेप टुंदरिद्रता ।। पृष्ठेद्वेप्राणसंदेहो नाभौवेदाःशुभावहम् ॥ गुदे द्वेभयपीडाच दक्षहस्तैकमर्थकम् ।। एकंवामेनाशकरं भृत्य भात्स्वामिभातकम् ॥ टीका-नराकारचक्रके अपयवस्थानोंमें स्थापितकरे शिरपे ३ नक्षत्रधरे विसका फल अर्थलाम,मुखमें ३फल नाश,हृदयमें फल धनधान्यवृद्धि,पावापर ६फल दारीद्र,दृष्टिपर२फल मृत्यु,नाभिमें४फ.शुभ,गुदापर२फल भयपीडा, वाम हाथपरफल अर्थप्राप्ति नवस्थान,दाहिने हाथपरफल नाश होय ॥ दासीचक्रम्।। दासीचक्रप्रवक्ष्यामि दासीभात्स्वामिभांतकम्॥शी उत्तरा .

भाषाटीकासमेत। (१९७) पैत्रीणिमुखेत्रीणि स्कंधयोश्चद्वयंस्मृतम् ॥ हृदयेपंचऋक्षाणि नाभौपंचभगैककम् ।। जानुद्वयेद्वयंज्ञेयं पादयोश्चत्रयंत्रयम् ॥ ॥ फलम् ॥ शिरःस्थानेभवेल्लाभोमुखेहानि प्रजायते ॥ स्कंधे चस्वामिनोमृत्युहृदयेपुष्टिवर्द्धनम् ॥ नाभौहानिप्रदप्रोक्तं भगेचैवपलायनम् जानौसेवालभेन्नित्यं पादयोस्तुधनक्षयः।। टीका-दासीके जन्मनक्षत्रसे स्वामी के जन्मनक्षत्रतक जितने नक्षत्र होय तिनका कम सीसपर३फललाम, मुखमें३फल हानि, कंधापर२फल स्वामीकी मृत्यु,हृदयमें५फल पुष्टिहोय,नाशिफल हानि,भगएर फल पलायन, जानु- 'पररफल सेवाकरे,पदारफल धनक्षयकारक इनमें शाफल देखिके रक्खे। गवादिपशुलेनका मुहूर्त। गोवृपमहिपीचक्रम्।।शीत्रयंमुखेद्वेच पादेष्वप्टोविनिर्दिशेता। हृदयेपंचऋक्षाणि स्तनेप्वष्टौभगेककम् ॥ ॥ फलम्। शिरः- स्थानेभवेल्लाभो मुखेहानिःप्रजायते ॥ पादयोरर्थलाभास्या द्धृदयेसौख्यवर्द्धनम् ॥ स्तनयोस्तुमहालाभो गुह्यस्थानेमह- द्भयम्।।अर्यमादिगांज्ञेयं मदिप्यांसूर्यभान्न्यसेत् । इदमेव- पेज्ञेयंविशेप-पत्सु पोडश॥ टीका-गाय अथवा वृपा लेना होय तो उत्तराफाल्गुनीते दिवसनक्षत्र- तक गिने उसमेंसे मस्तकपर ३ फल लानदायक, मुख में २ फल हानि, पद- परफल अर्थलान, हृदयमें ५ फल सुख, स्तनमें ६ फल महालास, भगपर १ फल प्रजावृद्धि, गुह्यपर ४ फल जय जानिये । और महिषी लेनी होय तो भी इसीक्रमसे शुभाशुभ फल जानिये. परंतु मूर्यनक्षत्रसे दिवसनक्षत्रतक गिने और वृपा लेना होय तो भी यही क्रम जानिये परंतु पदपर १६ नक्ष- व धरे शेपस्थानमें २ घरे और गायके समान शुभाशुन फल जाने ॥ अश्व मोललेनेका मुहूर्त। अश्वेतुसूर्यभाञ्चैव साभिजिद्भानिविन्यसेत् ।। पंचस्कंधेजन्मभांत - (१९८) ज्योतिषसार। पृष्ठेतुदशकंन्यसेत् ॥ पुच्छेज्ञेयंद्वयंप्राज्ञैश्चतुष्पादेचतुष्टयम् ॥ उद रेपंचधिष्ण्यानि मुखद्वेचप्रकीर्तिते ॥ फलम् ॥ सौभाग्यमर्थलाभ श्वस्त्रीनाशोरणभंगता।। नाशश्चह्यर्थलाभश्चफलंप्रोक्तंमनीपिभिः।। टीका-सूर्यनक्षत्रसे अपने जन्मनक्षत्रतक अभिजित् सहित नक्षत्र स्थापित करे इस कमसे स्थानोंका फल कंधेपर ५ फल सौभाग्य, पीठपर १० फल अर्थलाभ, पूंछपर २ फल स्त्रीनाश, पैरोंपर ४ फल रणभंगता, उदरपर ५ फल नाश, मुखमें २ अर्थलाभ, ऐसे फल पंडितोंने कहे हैं ॥ हाथीमोललेनेका मुहूर्त। गजाकारंलिखेच्चक्र जन्मभांतंचसूर्यभात्।।कर्णेशीपेंद्विजेपुच्छे द्वयंसर्वत्रयोजयेत् ॥ शुंडायांतुद्वयंयोज्यं वेदाःपृष्ठोदरेमुखे ॥ पढेचतुर्युपादेषु साभिजिद्वैन्यसेत्कमात्॥ ॥ फलम् ॥ ॥क- णेचैवमहाँल्लाभो मस्तकेलाभएवच ॥ दंतेचैवभवेल्लाभो पु- च्छेहानिःप्रजायते ॥ शुंडायांतुशुभंज्ञेयं पृष्ठेतुसुखसंपदः॥ उदरेरोगसंभृतिर्मुखेतुमध्यमस्मृतम् ॥ पादयोश्चभवेल्लाभो ग- जेचैवंविनिर्दिशेत् ॥ टीका-प्रथम सूर्यनक्षत्रसे जन्मनक्षत्रतक स्थापित करनेका क्रम लिखाहै, परंतु इसके स्थानों और फलों तथा नक्षत्रोंकी संख्या जिन्नहै प्रथम कानोंपर २ फल लान, मस्तकपर २फल लान, दाँतोपर २ फल लाभ, पूँछपर २ हानि, सूंडपर २ शुभ, पीठपर ४ सुखसंपदा, पेटपर ४ रोग, मुखपर ४ मध्यम, पाँवोंपर ६ लाज ऐसे फल जानिये ॥ शिविकारोहणचक्र मुहूर्त। सूर्यभादिनभंयावत्पंचपंचचतुर्दिशि ।। मध्येतुसप्तदेयानिचक्र ज्ञेयंसुखावहम्॥ ॥ फलम् ॥ पूर्वभागेतुचारोग्यंदक्षिणेकष्टका- रकम् ॥ पश्चिमेकृशताचैवद्युत्तरेव्याधिसंभवः।। मध्यमंचशुभं प्रोक्तमायुर्वृद्धिकरंपरं॥पालकारोपणंचैतद्वालकस्यबुर्हित।।

(२००) ज्योतिपसार। प्रथम अग्रपरपहानि, शराप्रपरपलान,शरमूलपर५जय,फिर संधिपरपशूरता, बीचके दंडपर ५ राज्यभंग इनमेंसे शुभफल देखके धनुप धारण करावै ॥ रथचक्र। रथाकारंलिखेच्चक्रं सूर्यभाजनिभंन्यसेत् ॥ रथाषेत्रीणिऋक्षा णि पट्चक्रेषुततोन्यसेत् ॥ ऋक्षत्रयंमध्यदंडे स्थाभनयंत- था ॥ युगेचभत्रयज्ञेयं पडक्षाण्यंतिमेऽध्वनि ॥ शेषमुक्षत्रयं योज्यं चक्रज्ञैःसर्वतोमुखे ॥ ॥ फल ॥ ॥ शृंगेमृत्युर्जयश्चके सिद्धि याचदंडके ॥ रथाग्रेदंडअध्वानं मध्येचैवमुखंशुभम्।। बुधैरेवंफलंज्ञेयं जन्मभांतंक्रमेणच ॥ गर्गेणोक्तानिचक्राणि विज्ञेयानिसदाबुधैः ।। टीका-रथके आकारचक्र खींचके उसके स्थानोंपर सूर्यनक्षत्रसे जन्म- नक्षत्रतक लिखनेका क्रम प्रथम शृंगोंपर ३ मृत्यु, पहियोंपर ६ जय, मध्यदंडोंपर ३ सिद्धि, रथके अग्रपर ३ धनलान, जुआपर ३ अंग, अंतके मार्गपर ६ शुभ और सर्वत्र ३ सुख जानिये ।। तिलोंकीघानीकरनेकामुहूर्त। वाणाचक्रप्रवक्ष्यामि सूर्यभाच्चांद्रमेवच ॥ त्रीणित्रीणित्रयंत्रीणि त्रीणित्रीणित्रयंतथा ॥ त्रीणित्रीणितुभान्यत्र योजयेदाणकेशु- भम् ॥ फल ॥ हानिरैश्वर्यमारोग्यं विनाशोद्रव्यमेवच ॥ स्वा मिघातोनिर्धनता मृत्युरेवसुखंक्रमात् ॥ ऊखोंका रसकाढनेकामुहूर्त । वेदद्विनेत्रभूभूतवाणहस्तरसाक्रमाव ॥ ॥ फल ॥ ॥ प्रथमंचभ- वेल्लक्ष्मीद्वितीयेहानिमेवच॥तृतीयेसर्वलाभंच चतुर्थेचक्षयंतथा ॥ पंचमेचभवेन्मृत्युः पष्ठस्थानेशुभंस्मृतम् ।। सप्तमेचैवपीडास्या- दष्टमेधनधान्यदम् ।। सूर्यभाद्णयेचांद्रमिक्षुयंत्रेनियोजयेत् ॥ टीका-सूर्यनक्षत्रसे चंद्रनक्षत्रतक घानीचक्रके भाग ९ और ऊखोंके रसके भाग पानीके भाग ८ तिनके फल नीचे लिखेहैं ।

(२००) ज्योतिषसार। प्रथम अग्रपरपहानि, शरामपरलान,शरमूलपर५जय,फिर संधिपरपशूरता, बीचके दंडपर ५ राज्यभंग इनमेंसे शुभफल देखके धनुप धारण करावै ॥ रथचक्र। रथाकारंलिखेच्चक्रं सूर्यभाजनिभंन्यसेत् ॥ रथारोत्रीणिऋक्षा णि पट्चक्रेषुततोन्यसेत् ॥ ऋक्षत्रयंमध्यदंडे रथाग्रेभनयंत- था ॥ युगेचभत्रयंज्ञेयं पक्षाण्यंतिमेऽध्वनि ॥ शेषमृक्षत्र्यं योज्यं चक्रज्ञैःसर्वतोमुखे ॥॥ फल ॥ ॥ शृंगेमृत्युर्जयश्चके सिद्धि याचदंडके ॥ रथाओदंडअध्वानं मध्येचैवसुखंशुभम्।। बुधरेवंफलंज्ञेयं जन्मभांतंक्रमेणच ॥ गगणोक्तानिचक्राणि विज्ञेयानिसदायुधैः॥ टीका-रथके आकारचक्र खींचके उसके स्थानोंपर सूर्यनक्षत्रसे जन्म- नक्षत्रतक लिखनेका क्रम प्रथम शंगोंपर ३ मृत्यु, पहियोंपर ६ जय: मध्यदंडोंपर ३ सिद्धि, रथके अग्रपर ३ धनलाभ, जुआपर ३ अंग, अंतके मार्गपर ६ शुभ और सर्वत्र ३ सुख जानिये ॥ तिलोंकीघानीकरनेकामुहूर्त। वाणाचक्रप्रवक्ष्यामि सूर्यभाचांद्रमेवच ॥ त्रीणित्रीणित्रयंत्रीणि त्रीणित्रीणित्रयंतथा ॥ त्रीणिवीणितुभान्यत्र योजयेद्वाणकेशु- भम् ॥ फल ॥ हानिरैश्वर्यमारोग्यं विनाशोद्रव्यमेवच ॥ स्वा मिघातोनिर्धनता मृत्युरेवसुखंक्रमात् ॥ ऊखोंका रसकाढनेकामुहूर्त । वेदद्विनेत्रभूभूतवाणहस्तरसाक्रमाव ॥ ॥ फल ॥ ॥ प्रथमंचभ- वेल्लक्ष्मीद्वितीयेहानिमेवचतृतीयेसर्वलाभंच चतुर्थेचक्षयंतथा ॥ पंचमेचभवेन्मृत्युः पष्ठस्थानेशुभंस्मृतम् ।। सप्तमेचैवपीडास्या- दष्टमेधनधान्यदम् ।। सूर्यभाद्गणयेच्चांदमिक्षुयंत्रेनियोजयेत् ॥ टीका-सूर्यनक्षत्रसे चंद्रनक्षत्रतक घानीचक्र के भाग ९ और ऊसोंके रसके भाग पानीके भाग ८ तिनके फल नीचे लिखेहैं ।

- (२००) ज्योतिषसार। प्रथम अग्रपरपहानि, शराप्रपरएलान,शरमूलपर५जय,फिर संधिपरपशूरता, बीचके दंडपर ५ राज्यभंग इनमेंसे शुभफल देखके धनुष धारण करावै ।। रथचक्र। त स्थाकारंलिखेच्चक्रं सूर्यभाजनिभंन्यसेत् ॥ स्थाषेत्री सहित । णि षट्चकेषुततोन्यसेत् ॥ ऋक्षत्रयंमध्यदंडे रथाग्रेभत्रयंत- था ॥ युगेचभनयज्ञेयं षडक्षाण्यंतिमेऽध्वनि ॥ शेषमृक्षवयं योज्यं चक्रःसर्वतोमुखे ॥॥ फल ॥ ॥ शृंगेमृत्युर्जयश्चके सिद्धिज्ञेयाचदंडके ॥ रथादंडअध्वानं मध्येचैवसुखंशुभम्॥ बुधैरेवंफलंज्ञेयं जन्मभांतंक्रमेणच ॥ गर्गेणोक्तानिचक्राणि विज्ञेयानिसदाबुधैः ॥ टीका-रथके आकारचक खींचके उसके स्थानोंपर सूर्यनक्षत्रसे जन्म- नक्षत्रतक लिखनेका क्रम प्रथम शृंगोंपर ३ मृत्यु, पहियोंपर ६ जय, मध्यदंडोंपर ३ सिद्धि, रथके अग्रपर ३ धनलाभ, जुआपर ३ अंग, अंतके मार्गपर ६ शुभ और सर्वत्र ३ सुख जानिये ॥ तिलोंकीधानीकरनेकामुहूर्त। चाणाचक्रप्रवक्ष्यामि सूर्यभाच्चांद्रमेवच ॥ त्रीणित्रीणित्रयंत्रीणि त्रीणित्रीणित्रयंतथा ॥ त्रीणित्रीणितुभान्यत्र योजयेद्वाणकेशु- भम् ॥ फल ॥ हानिरैश्वर्यमारोग्यं विनाशोद्रव्यमेवच ॥ स्वा मिघातोनिर्धनता मृत्युरेवसुखंक्रमात् ॥ ऊखोंका रसकाढनेकामुहूर्त । वेदद्विनेत्रभूभूतवाणहस्तरसाक्रमाव ।। ।। फल ॥ ॥प्रथमंचभ- वेल्लक्ष्मीद्वितीयेहानिमेवचौतृतीयेसर्वलाभंच चतुर्थेचनयंतथा ।। पंचमेचभवेन्मृत्युः पष्ठस्थानेशुभंस्मृतम् ॥ सप्तमेचैवपीडास्या- दष्टमेधनधान्यदम् ॥ सूर्यभाद्रणयेच्चांद्रमिक्षुयंत्रेनियोजयेत् ।। टीका-सूर्यनक्षत्रसे चंदनक्षत्रतक पानीचक्रके भाग ९ और ऊखोंके रसके भाग पानीके भाग तिनके फल नीचे लिखेह ॥

2016 (२०१) घाना. भाषाटीकासमेत। ऊखोंका रस. ६प्रथमभाग हानि ४प्रथमभाग लक्ष्मी ऐश्वर्य हानि आरोग्य २ भाग सर्वलान ३ भाग नाश क्षय ३भाग द्रव्य मृत्य ३ भाग स्वामिघात ५ भाग निर्धन २ आग पीडा मृत्यु धनक्षय ३आग सुख.इनमें जिस दिन शुभफल आवे उस दिन काटे, कृषिकर्मका मुहूर्त। स्वातीबाहयमृगोत्तरादितियुगे राधाचतुष्कंमधारेवत्युत्तरवि ष्णुभंकृपिविधौ क्षेत्रादिवाविधौ ॥ गोकन्याझपमन्मथाश्च शुभदा वाराः कुजाकतिरे पष्ठीद्वादशिरिक्तपर्वसु तथा वयं द्वितीयाइयम् ॥ टीका-स्वाती रोहिणी मृग उनरा पुनर्वसु पुष्य अनुराधा ज्येष्ठा मूल पूर्वापाटा मघा उत्तराफाल्गुनी श्रवण ये नक्षत्र और वृप कन्या मकर मि- थुन ये लग्न शुभहें मंगल शनि और पठी द्वादशी तथा रित्ता दोनों पर्वणी अर्थात् १५३० और दोनों द्वितीया इनको छोडके कृपिकर्मका आरंभ और बीजादिकोंका वपन करावे ॥ त्रिकंत्रिकंत्रिकंपंच त्रिकंपंचत्रिकंत्रिकम् ।। सूर्यभाद्रणयेचांद्रमशुभंचशुभंकमात् ।। टीका-प्रथम हल धारण करनेका मुहूर्त सूर्यनक्षत्रसे दिवसनक्षत्र पर्यत गिने तिनके भाग ८ तिनका क्रम प्रयम ३ फल अशुम, विपिनाग (२०२) ज्योतिषसार। ३ शुभ, तृतीय भाग३अशुभ, चतुर्थ५ शुभ, पंचम ३ अशुभ, पष्ठ ५ शुम, सप्तम ३ अशुभ, अष्टम २ नक्षत्र शुभ, जिस नक्षत्रके भागमें दिवसनक्षत्र आवे उस दिन धारण करे॥ नौकाबनाने वा जलमें उतारनेका मुहूर्त । पौष्णादितिस्तुरगवारुणमित्रचित्रशीतोष्णरश्मिवसुजीवक भान्यमूनि ॥पारेचजीवभृगुनंदनकौप्रशस्ती नौकादिसंघट- नवाहनमेषुकुर्यात् ॥ टीका-रेवती पुनर्वसु अश्विनी आश्लेषा शततारका अनुराधा चित्रा मृग हस्त धनिष्ठा पुष्य ये नक्षत्र और गुरु.शुक्र ये वार शुभहैं इनमें नौका बनवाना वा जलमें उतारना उत्तमहै ।. नौकाचक्रम्। रविभुक्तक्षमारभ्य कुर्यात्रोण्युदयेचषट् ॥ नाल्यांचीणिहृदित्री- णिपृष्ठभूःपार्श्वगंत्रयम् ॥ शुकाणेत्रीणिषण्मध्ये नौकाचक्रेभसं- स्थितिः॥ उपरिस्थंचमध्यस्थं पटश्रेष्ठंचपरंनसत् ॥ टीका-सूर्यनक्षत्रसे तीन ३ नक्षत्र लिखनेका क्रम ऊपरके नागमें ६ नालीमें ३ हृदयपर ३ पीठपर १ पार्थ ३ शुक्क्षणमे ३ नौकाके मध्यभागमें ६. दीजिये तिन तिनमेंसे ऊपर और मध्यके नक्षत्र शुभ और अन्यस्थानों- के अशुभ जानिये ॥ लग्न और ग्रहबल। विषडायगत-सूर्यश्चंद्रोद्विन्यायगःशुभः ॥ कुजार्कीत्रिपडाय- स्थौ त्रिपट्खेतरगोगुरुः ॥ द्विसुतास्ताप्टरिःफायरिपुसंस्थोबु धःस्मृतः॥ सुखांत्यारीन्विनायत्र नौयानेशुभदासितः॥ टीका-नौकामें माल भरने अथवा चलानेकी लग्नका ग्रहवलज्ञान तृतीय पष्ठ एकादश इन स्थानोंमें सूर्य अथवा चंद्रमा मंगल शनि ये होय तो शुभ और ३६।१० इन स्थानोंको छोडकर अन्यस्थानों में गुरु शुन 44 भाषाटीकासमेत । (२०३) २। ५। ७।८।१२।६ इनस्थानोंमें बुध होय तो शुभ ७ ॥ १२॥ ६। इनस्थानों में छोड अन्यस्थानका बुध शुज जानिये ॥ नौकास्थानकेग्रह। नाल्यांपापखगाःसौम्याः शुकाणेशुभकारकाः ॥ व्यस्तामृत्यु- कराराः पृष्टेकूचभीतिकृत् ॥ अंतेवा स्थितास्तेचाला- भायस्मृतावुधैः ॥ एवंविचार्यदेवज्ञो नौयानसमयंवदेत् ॥ टीका-लग्नकुंडली लिख तिसमें जोरग्रह जिसरस्थानमें पडाहोय तिसका तैसा फल,नालीमें पापग्रह,शुज शुक्लाणपर शुभग्रह शुभ ये विपरीति होय तो अशुभ और क्रूरग्रह पीठपर अथवा कूपर आवे तो अयदायक और इन ग्रहोममे बाहर आये तो लान होय यह विचारकरिके ज्योतिपी बनावे. दीपिकाचक्र। दीपिकायांमुखेपंच राजसन्मानलाभदः ॥ कंठेनवधनप्राप्तिमध्ये. टोस्वामिमृत्युदाः ॥ दंडेपंचभवेदाज्यमग्निऋक्षाचदीपिकाम् ॥ टोका-कत्तिका नक्षत्रसे दिवसनक्षत्र पर्यंत लिखनेका कम मुखपर ५ लान राजसन्मान; कंठपर ९ धनप्राप्ति, मध्यमें ८ स्वामिमृत्यु, दंडपर ५ राज्यप्राप्ति, इसरीतिसे नक्षत्रक्रम जानिये ॥ कूपचक्र। कूपवाप्योस्तुचक्रवैविज्ञेयंविबुधैःशुभम् ॥ रोहिणीगर्भमेतस्यत्रि- त्रिऋक्षाणिचंद्रभम् ॥ मध्येपूर्वेतथाग्नेये याम्येचैवतुनैर्ऋते।पश्चि- मेचैववायव्यां सौम्येशूलिदिशिक्रमात् ॥ ॥ फल ॥ ॥ शीघ्र जलंनजलंमध्यमजलमजलंबहुजलंच ॥ अमृतजलंबहुक्षारं सज- लंमध्यजलंक्रमाज्ज्ञेयम् ।। मत्स्येकुलोरेमकरे बहुजलंतथैवचार्य वृपभकुंभयोश्च ॥ अलौचतौलौचजलाल्पतामताशेपाश्चसर्वेऽज लदा प्रकीर्तिता॥

(२०४) ज्योतिषसार। टीका-नवीनकूप और वापी खोदनेका मुहूर्त रोहिणीसे वर्तमानदिवस- के नक्षत्र पर्वतका क्रम मीन कर्क मकर इन तीन राशियोंका चंद्रमा होय तो बहुत जल निकले,वृष कुंभ इनका पद होय तो उसका आधाजल रहे, वृश्चिक तुल इनका चंद्रमा होय तो अल्पजल रहे शेपराशियोंके चंद्रमामें खोदे तो जल नहीं निकले यह बात सिद्धहै ॥ पूर्व ३ नक्षत्र द्वितीयस्थान नजलम् आग्नेय ३ नक्षत्रतृतीयस्थान मध्यमजलम् ईशान्य ३नक्षत्र नवमस्थान मध्यमजलम् उत्तर ३नक्षत्रअष्टम सजलग मध्यम रोहिणी३नक्षत्र प्रथमशीघ जललाज अजलम् ३ नक्षत्रचतुर्थस्थान दक्षिण क बहुतक्षार He Litle Elbab वायव्य नक्षत्रसप्तमस्थान प With HERS طاطط बागलगानेकामुहूर्त। गोसिंहालिगतेषुचांतरगते भानौबुधादित्रये चंद्राचशुभाजुधैर- भिहितारामप्रतिष्ठाक्रिया ॥ आश्लेपाभरणीद्वयं शतभिषक्त्य- क्त्वाविशाखांकुहूं रिक्तापक्षतिमष्टमीपरिहरेत्पष्ठीमपिद्वादशीम् ॥ टीका-उत्तरायणमें वृप अथवा सिंह वृश्चिक इनराशियोंका सूर्य और बुध गुरु शुक्र चंद्र रवि इनमें कोई वार होय ऐसा शुभदिन देखिकर नवीन बाग लगावे और आश्लेषा भरणी कत्तिका शततारका विशाखा और अमावस्या रिक्तातिथि द्वितीया अष्टमी पष्ठी द्वादशी इन सबोंको छोडकर अन्यदिनोंमें बाग लगावे ॥

भाषाटीकासमेत । (२०५) सिक्काटालनेकामुहूर्त मृदुधुवक्षिप्रचरेषुभेषु योगप्रशस्तेशनिचंद्रवर्ण्यम् ॥ वारेतथापूर्णजलाह्वयेचमुद्राप्रशस्ताशुभदाहिराज्ञाम् ॥ टीका-मृदुध्रुव क्षिप्र चर इननक्षत्रोंमें शुम और शनि चंद्रये वार वर्जित हैं. अथ प्रश्नप्रकरण। तिथ्यादिप्रयुक्तप्रभ । तिथि प्रहरसंयुक्ता तारकावारामिश्रिता ॥ अग्निभिस्तुहरेद्भागं शेपंसत्वरजस्तमः॥ ॥ फल ।। सिद्धिस्तात्कालिके सत्वे रजसातुविलंबिता । तमसानिष्फलंकार्य ज्ञातव्यंप्रश्नकोविदैः।। टीका-जिस तिथि वार नक्षत्र और प्रहरमें प्रश्न करे तिसका उत्तर ना- चे लिखते हैं। उदाहरण-तिथि ५ वार ३ नक्षत्र प्रहर २ इन सबको जो- डातो हुए १७ इसमें ३ का भागदिया तो भोग्य १५ शेप २ जिसका नाम दूसरा रज तिसका फल कार्यमें विलंब इस प्रमाणेसे ३ ब. तो तम निष्फल, १ बचें तो सत्व फल कार्यसिद्धि होय ॥ अपनीछायासेप्रश्न। आत्मच्छायात्रिगुणितात्रयोदशसमन्विता॥ वसुभिश्चहरेद्भागं शेपंचैक्शुभाशुभम् ॥ ॥ फल ॥ ॥ लाभश्चकेत्रिकेसिद्धिर्व- द्विपंचमसप्तके। द्वयोहानिश्चतुःशीकं पठाप्टेमरणंध्रुवम् ॥ टीका-आपनी छायाको तिगुनी करके उसमें १३ मिलाये फिर आठ- का भागदे शेप बचै वह फल जानिये ॥ शेप १ शेप शेप ३/शेष ४ाशेप ५/शेष ६ शेप शेप लाज- हानि | सिद्धि | शोक | वृद्धि | मरण | वृद्धि | मरणा अथपंथाप्रश्न । तिथि प्रहरसंयुक्ता तारकावारमिश्रिता ॥ सप्तभिश्चहरेद्भागं शेष तुफलमादिशेत् ॥ वर्तमानंचनक्षत्रं गणयेत्कृत्तिकादितमा सप्त (२०६) ज्योतिपसार। भिश्चहरेद्भागं शेषप्रश्नस्यलक्षणम् ॥प्रश्नाक्षरंरुद्रयुक्तं सतभिर्भा जिततंथा। फलमेवंक्रमाज्ज्ञेयं सर्वेषांहिशुभाशुभम् ॥ टीका-तिथि प्रहर वार नक्षत्र इन सबको इकट्ठा करिके सातका जा- गदे शेपबचें वह फल जानिये ॥दूसराप्रकार-कृत्तिकासे वर्तमान नक्षत्रतक गिनके सातका भागदे ॥ तीसराप्रकार--प्रश्नके अक्षरोंमें ११ मिलाके सा- तका भागदे शेपबचें वह फल जानिये ॥ फल-एकशेपेतथास्थाने द्वितीयेपथिवर्तते ॥ तृतीयेप्यर्द्धमा- गैतु चतुथैयाममादिशेत् ॥ पंचमेपुनरावृत्तिः पष्ठेव्याधियुतं वदेत् ॥ शून्यज्ञेयंसप्तमेवै चैतत्प्रश्नस्यलक्षणम् ॥ टीका-१शेप रहे तो स्थानहीमें जानिये, २ रहै तो मार्गमें, ३ बचे तो अर्थमार्गमें, ४ बचें तो माममें आया जानिये, ५ बचें तो मार्गसे लौट गया कहिये, ६ बचें तो रोगग्रस्त, ७ बचें तो शून्य अर्थात् मरणं जानिये ॥ दूसराप्रकार। धनसहजगतौसितामरेज्योकथयतआगमनंप्रवासिपुंसाम् ।। तनुहिबुकगताविमोचतद्वन्झटितिनृणांकुरुतोगृहप्रवेशम् ॥ टीका-द्वितीयस्थानी शुक्र तृतीयस्थानी गुरु अथवा प्रश्नलममें शुक्र चतुर्थ स्थानी गुरु ऐसा योग होय तो परदेशी घरमें शीघ्र ही आया जानिये. अथकार्याकार्यप्रश्न। दिशाप्रहरसंयुक्ता तारकावारमिश्रिता ॥ अष्टभिस्तुहरेद्भागं शेषप्रश्नस्यलक्षणम् ॥॥॥फल।। ॥ पंचैकेत्वरितासिद्धिःपट् तुर्यचदिनत्रयम् ॥ त्रिसप्तकेविलंबश्च द्वौचाष्टौनचसिद्धिदौ ॥ टीका-पृच्छकका मुख जिसदिशाको होय वहदिशा और पहर बार नक्षत्र इन सबको एकत्र करिके आठका नागदे शेप व. तिनमें शुभाशुन फल जानिये.१अथवा५शेषवचे तो शीघ्र कार्यसिद्धि जानिये,६।४ बचें तो तीन दिनमें कार्यसिद्धि,३३७वचें तो विलंबसे, १८ वतो कार्यनहीं होय ॥

॥ १ भाषाटीकासमेत। अंकप्रश्न-अकंद्विगुणितंकृत्वा फलनामाक्षरैर्युतम्।त्रयोदशयु तंकृत्वा नवभिर्भागमाहरेत् ॥ ॥ फल ।। । एकेहिधनवृद्धिश्च द्वितीयेचधनक्षयः॥ तृतीयक्षेममारोग्यं चतुर्थेव्याधिरेवहि ॥ स्त्रीलाभ-पंचशेपेस्यात्पष्ठे बंधुविनाशनम् ।। सप्तमेईप्सितासि दिरष्टमेमरणंध्रुवम् ॥ नवमेराज्यसंप्राप्तिर्गस्यवचनंतथा ॥ टीका-जितने अंकका नाम होय उनको दूनाकरके फल और नामके अक्ष- रोंको मिलावे फिर १३जोडकरी नवका भागदेशेपवचे तिसकाफल कहिये- एकसे धनवृद्धि,२से धनक्षय, उसे आरोग्य,४से व्याधि,५से स्त्रीलान,६से गंध- नाश,७से कार्यसिद्धि, ८से मरण, ९से राज्यप्राप्ति,यह गर्गमुनिका वचनहै। नवग्रहात्मकंयंत्रं कृत्वाप्रश्ननिरीक्षयेत् ॥ ४३ फलंपूर्वोक्तमेवाच द्रष्टव्यंप्रश्नकोविदैः ।। टीका--नवग्रहात्मकयंत्र बनाके उसमें अवलोकनकरै जो अंक आचै उसका फल पूर्वोक्त प्रकारसे जानिये ॥ दूसरामत-सप्तत्रयांककथयतिवार्ता नवैकपंचत्वरितंवदंति ॥ अष्टौद्वितीये नहिकार्यसिद्धी रसाश्ववेदा घटिकावयंच ॥ टीका-पूर्व जो अंक कहेंहें तिनके प्रमाणसे कृत्य परंतु फल भिन्न है शेप ७ वा उरहैं तो वार्ता करना जानिये और जो ९ । १।५ वचे तो शीघ्र कार्य होय २१८यचे तो कार्य नहीं होय६१४बचें तो तीनवडीमें कार्यहो. वारनक्षत्रयुक्तपंथाप्रश्न। बुधेचंद्रेतथामार्गे समीपेगुरुशुकयोः ॥ खौभौमेतथादूरे श- नौचपरिपीड्यते ॥निर्जीव सप्तडक्षाणि सजीवोद्वादशेभवेत्॥ व्याधितोनवऋक्षाणि सूर्यधिष्ण्यात्तुचान्द्रभम् ॥ टीका-युध अथवा सोमवारको प्रश्नकरे तो मार्गमें चलनाहुआ जानिये और जो गुरु तथा शुक्रको प्रश्नकरैतो समीप आया जानिये रवि तथा नौमके दृरजानिये और शनिको पीडायुक्त जानिये.मूर्यनक्षत्रसे चंदनक्षत्र पर्यंत लि- ६ N (२०६) ज्योतिषसार। भिश्चहरेद्भागं शेषप्रश्नस्यलक्षणम् ॥प्रश्नाक्षरंरुद्रयुक्तं सतभिर्भा जिततथा ॥ फलमेवंक्रमाज्ज्ञेयं सर्वेषांहिशुभाशुभम् ॥ टीका-तिथि प्रहर वार नक्षत्र इन सबको इकट्ठा करिके सातका मा- गदे शेषव. वह फल जानिये ॥दूसराप्रकार-कृत्तिकासे वर्तमान नक्षत्रतक गिनके सातका भागदे ॥ तीसराप्रकार--प्रश्नके अक्षरों में ११ मिलाके सा- तका भागदे शेषबचें वह फल जानिये ॥ फल-एकशेषेतथास्थाने द्वितीयेपथिवर्तते ॥ तृतीयेप्यर्द्धमा- गेंतु चतुथैयाममादिशेत् ॥ पंचमेपुनरावृत्तिः षष्ठेव्याधियुतं वदेत् ॥ शून्यज्ञेयंसप्तमेवै चैतत्प्रश्नस्यलक्षणम् ॥ टीका-शेप रहे तो स्थानहीमें जानिये, २ रहै तो मार्गमें, ३ बचे तो अर्थमार्गमें, ४ बचें तो माममें आया जानिये, ५ बचें तो मार्गसे लौट गया कहिये, ६ बचें तो रोगग्रस्त, '७ बचें तो शून्य अर्थाद मरणं जानिये ॥ दूसराप्रकार। धनसहजगतौसितामरेज्योकथयतआगमनप्रवासिपुंसाम् ।। तनुहिबुकगताविमोचतज्झटितिनृणांकुरुतोगृहप्रवेशम् ॥ टीका-द्वितीयस्थानी शुक्र तृतीयस्थानी गुरु अथवा प्रश्नलममें शुक चतुर्थ स्थानी गुरु ऐसा योग होय तो परदेशी घरमें शीघ्र ही आया जानिये. अथकार्याकार्यप्रश्न । दिशाप्रहरसंयुक्ता तारकावारमिश्रिता ॥ अष्टभिस्तुहरेद्भाग शेषप्रश्नस्यलक्षणम् ॥ ॥ फल॥ ॥ पंचैकेत्वरितासिद्धिःपट् तुर्येचदिनत्रयम् ॥ त्रिसप्तकेविलंबश्च द्वौचाष्टौनचसिद्धिदौ॥ टीका-पृच्छकका मुख जिसदिशाको होय वदिशा और प्रहर वार नक्षत्र इन सबको एकत्र करिके आठका भागदे शेष बचें तिनमें शुभाशुन फल जानिये.१अथवा५शेपवचें तो शीघ्र कार्यसिद्धि जानिये,६।४ बचें तो तीन दिनमें कार्यसिद्धि, बचें तो विलंबसे, ११८ बचें तो कार्यनहीं होय ॥ .

. ४ 19 भाषाटीकासमेत। (२०७) अंकप्रश्न-अकंद्विगुणितंकृत्वा फलनामाक्षरैर्युतम्॥त्रयोदशयु तंकृत्वा नवभिर्भागमाहरेत् ।। ।। फल ॥ ॥ एकेहिधनवृद्धिश्च द्वितीयेचधनक्षयः ॥ तृतीयेक्षेममारोग्यं चतुर्थेव्याधिरेवहि ॥ स्त्रीलाभ-पंचशेपेस्यात्पष्टे बंधुविनाशनम् ।। सप्तमेईप्सितासि द्विरष्टमेमरणंध्रुवम् ॥ नवमेराज्यसंप्राप्तिगर्गस्यवचनंतथा । टीका-जितने अंकका नाम होय उनको दूनाकरके फल और नामके अक्ष- रोंको मिलावे फिर १३जोडकरी नवका भागदेशेपवचै तिसकाफल कहिये- एकसे धनवृद्धि,२से धनक्षय,उसे आरोग्य,४से व्याधि,५से स्त्रीलाज,६से पंधु- नाश, से कार्यसिद्धि, ८से मरण, ९से राज्यप्राप्ति,यह गर्गमुनिका वचनहै। नवग्रहात्मकंयंत्रं कृत्वाप्रश्नंनिरीक्षयेत् ।। फलंपूर्वोक्तमेवात्र द्रष्टव्यंप्रश्नकोविदैः ॥ टीका-नवग्रहात्मकयंत्र बनाके उसमें अवलोकनकरै जो अंक आवै उसका फल पूर्वोक्न प्रकारसे जानिये ॥ दूसरामत-सप्तत्रयांककथयतिवार्ता नवैकपंचत्वरितंवदंति ।। अष्टौद्वितीये नहिकार्यसिद्धी रसाश्ववेदा घटिकावयंच ॥ टीका-पूर्व जो अंक कहे, तिनके प्रमाणसे कृत्य परंतु फल भिन्नहै शेष ७ वा ३हैं तो वार्ता करना जानिये और जो ९ । । । ५ व. तो भीत्र कार्य होय २२८यचे तो कार्य नहीं होय६।४ ब. तो तीनवडीमें कार्यहो. वारनक्षत्रयुक्तपंथाप्रश्न। वुधेचंद्रेतथामार्गे समीपेगुरुशुक्रयोः ॥ वोभीमेतथादूरे श- नौचपरिपीच्यते ॥ निर्जीव सप्तऋक्षाणि सजीवोद्वादशेभवेत्॥ व्याधितोनवक्षाणि सूर्यधिष्ण्यात्तुचान्द्रभम् । टोका-उध अथवा सोमयारको प्रश्नकरे तो मार्गमें चलताहुआ जानिये और जो गुरु तथा शुक्रको प्रश्नकरै तो समीप आया जानिये रवि तथा नौमके दृरजानिये और शनिको पीडायुक्त जानिये.सूर्यनक्षत्रसे चंद्रनक्षत्र पर्यंत लि- (२०८) ज्योतिपसार । सनेका क्रम प्रथम नक्षत्र पर्यंत चंद्रमा आवे तो निर्जीव, द्वितीय १२ नक्ष-- ऋतक चंद्रमा आवे तो जीवता जानिये, तृतीय नवनक्षत्र पर्यंत चंद्र आवे तो रोगकी उत्पत्ति जानिये इस भाँति पंथाप्रश्न समुझि लीजिये । नष्टवस्तुप्रश्न। तिथिवारंचनक्षत्रं लग्नंवह्निविमिश्रितम् ॥ पंचभिस्तुहरेद्भागशेष तत्वं विनिर्दिशेत् ॥ ॥ फल ॥ ॥ पृथिव्यांतुस्थिरंज्ञेयमप्सुव्यो- निनलभ्यते ॥ तेजस्तुराजसंज्ञेयं वायौशोकविनिर्दिशेत् ॥ टीका-प्रश्न तिथिवार नक्षत्र लम इनमें तीन मिलाके५का भागदे शेष बचें तो पृथ्वी में,२व. जलमें,पर मिले नहीं३वतो आकाशमें यहभी मिले नहीं, ४बचें तो तेजमें नह राजमें वई जानिये,"बचें तो वायु इसमें शोक जानिये. गर्भिणीप्रश्न। तत्पृच्छलग्नेरविजीवभौमे तृतीयसप्तेनवपंचमेच ॥ गर्भ: पुमान्दै ऋषिभिः प्रणीतश्चान्यग्रहेस्त्रीविबुधैःप्रणीता ॥ टीका-गर्भिणी जिस लममें प्रश्नकहै उस लग्नमें प्रश्नकहैं. लमके तृतीय अथवा सप्तम नवम पंचम स्थानमें रवि सोम गुरु ये ग्रह स्थितहोंय तो पुत्र होय और इन्ही स्थानोंमें अन्यग्रह पडे होय तो कन्याहोय ॥ मुष्ठिप्रश्न ॥ मेपेरक्तवपपीतं मिथुनेनीलवर्णकम्।।कर्केचपांडुरं ज्ञेयं सहेधूम्रप्रकीर्तितम् ॥ कन्यायांनीलमिश्रंतु तुलायांपी तमिश्रितम् ॥ वृश्चिकेताम्रमिश्रंच चापपीतविनिश्चितम् ॥ नकुंभेकृष्णवर्ण मीनपीतंवदेसुधीः ॥ टीका-प्रश्नकर्ताको मुष्टि में किसरंगकी वस्तुहै तिसके बतानेकेरीति जो मेप लम होय तो लाल रंगकी वस्तु मुष्टि में है, और वृपहोय तो पीत, मिथन होय . तो मील,कर्क पांडुर, सिंह धूमिली, कन्या नीलमिभित, वृश्चिक ताम्रमिश्रित, धन पीतमिश्रित, मकर और कुंभ लोहमय अर्थात् काली, मान पीतवर्ण ॥ लग्नसेमनचिन्तितप्रश्नकहना । मेषचंद्विपदांचिंता वृषेचिंताचतुष्पदः ॥ मिथुनेगर्भचिंताच . भापाटोकासमेत। (२०९) व्यवसायस्यकर्कटे ॥ सिंहेच जीवचिंतास्यात्कन्यायांचस्त्रि- यास्तथा ॥ तुलेचधनचिंताच व्याधिचिताचवृश्चिके ॥ चा- पेचधनचिंतास्यान्मकरे शत्रुचिंतनम् ॥ कुंभेस्थानस्यचिंता स्यान्मीनचिताचदैविकी॥ टीका-लगसे प्रश्नका उत्तर मेपलममें प्रश्नकरे तो मनुष्यकी चिंता क- हिये,वृषमें गाय भैंसकी,मिथुनमें गर्भकी, कर्कमें व्यापारकी,सिंहमें जीवकी, कन्या स्त्रीकी, तुलामें धनकी, वृश्चिक रोगकी, धनमें धनकी, मकरमें श- जुकी, कुंभमें स्थानकी, मीनमें जूतपिशाचादि बाहरी बाधाकी चिंताहै । संज्ञाके अनुसारलग्नोंके नाम। धातुर्मूलंचजीवश्चचराधास्युःक्रमादिह ॥ मेषादयाक्रमेणेवज्ञातव्या प्रश्नकोविदैः ॥ टीका-मेषादिक्रमसे बारहलने तिनके नामकी दो दो संज्ञा कहतेहैं-धा- तुचरसे मेपलमकी संज्ञा, मूलस्थिर वृपकी, जीव द्विस्वभाव मिथुनकी, धातु चर कर्ककी,मूल स्थिर सिंहकी,जीव द्विस्वभाव कन्याकी, धातुचर तुलाकी, मूलस्थिर वृश्चिककी, जीव द्विस्वभाव धनकी, धातुचर मकरकी, मृलस्थिर कुंकी, जीवद्विस्वभाव मीनकी, इस प्रकारसे बारह लग्नोंकी संज्ञाजानिये। अंकप्रश्नः। अष्टोत्तरशतांकेषु प्राश्रिकोन्यूनमाचरेत् ॥ शेपंद्वादशभिर्भक्त शेपंचैवशुभाशुभफलाएकंदुर्गासप्तकेवेविलंबश्चांगेतुदिक्षुभूते पुनाशरुद्रेसिद्धिर्युगुलेवृद्धिक्ताशीघ्रकार्यस्यात्रिपद्वादशेष। टीका-पृच्छकके कहे एकसौ आठ अंकों से एक अंकका नाम लि- खाये और उसमें बारहका भागदे शेष बचें जिससे फल कहिये, ११७ १५ बचें तो देरमें कामहो । ८१४१०।५ बचें तो नाश ११ सिदि २ वृद्धि ६० पचें तो शीघ्र प्रश्नकार्य होय ऐसा जानिये ॥ रोगीप्रश्नः। तिथिवारंचनक्षत्रं लग्नंप्रहरएवच ॥भएभिस्तुहरेन्द्भागं शेपंतु १४ (२१०) ज्योतिषसार। फलमादिशेत् ॥ ॥ फलम् ॥ ॥ हयानौदेवताबाधा पैत्रीवेनेत्र दंतिषु ॥ षट्चतुर्युभूतबाधा नवाधाएकपंचके । टीका-तिथिवार नक्षत्र और प्रहर लग्न इन सबको एकत्र करकेट का भागदे शेष बचें तिससे फल कहिये ७ अथवा ३ बचे तो देवताको बाधा २१८ पितरोंकी ६४ रुतकी ११५ बचें तो बाधा नहीं जानिये ॥ केवललग्नसे प्रश्न। मेषेचदेवी दोषःस्याषेदोषश्चपैतृकः ॥ मिथुनेशाकिनीदोषः कर्कटेभूतदोषकःसिंहेसहोदराणांव कन्यायांकुलमातृजः ॥ तुलेदोषश्चंडिकाया नाडीदोषोहिवृश्चिक।चापेचयक्षिणीपीडा मकरेग्रामदेवतात्॥अपुत्रादृष्टिज कुंभेमीनेआकाशगामिनः ॥ टीका--जिस लग्नमें रोगी प्रश्नकरे तिसका उत्तर मेष लग्नमें देवीका दोप वृपमें पितृदोप, मिथुनमें शाकिनी, कर्कमें भूत, सिंहमें भाइयोंका, कन्यामें कुलदेवताका, तुलामें चंडिकाका, वृश्चिकमें नाडीदोप, धनमें यक्षिणी, मक- रमें ग्रामदेवता, कुनमें अपुत्रास्त्रीकी दृष्टिका, मीनमें आकाशगामियोंका दोप, ऐसे प्रश्न बतावे ॥ मेघका प्रश्न। आषाढस्यासितेपक्षे दशम्यादिदिनत्रये ॥ रोहिणीकालमा- ख्यातिसुखदुर्भिक्षलक्षणमारावावेवनिरभ्रंस्यात्प्रभाते मेघडं बरम् ।। मध्याह्वजलविंदुःस्यात्तदादुर्भिक्षकारणम् ॥ टीका-आषाढ कृष्णपक्षकी दशमी किंवा एकादशी द्वादशी इन तीनों दिवसोंमें रोहिणी नक्षत्र आवे तो सुभिक्ष मध्यम दुर्मिक्ष ये तीन फल तिथि- कमसे जानिये और रात्रि मेघरहित होय प्रातःकाल मेघगर्ने मध्याह्नमें बूंदें पडें ऐसे लक्षण जिस संवत्सरके होंय उसमें महर्षता जानिये ॥ जललग्नम् । कुंभकर्कवृमीनमकरोवृश्चिकस्तुला ॥ जललग्नानिचोक्तानि लगेष्वेते सूर्यभम् ।। लभत्येवसदावृष्टिातव्यागणकोत्तमैः ।।

भाषाटीकासमेत । (२११) टीका-कुंभ कर्क दृष मीन मकर वृश्चिक तुला येण्जल लग्ने हैं इनमें जो सूर्य नक्षत्र मिले तो वर्षा जानिये ॥ मेघनक्षत्रम् । अश्विनीमृगपुष्येषु पूषविष्णुमपासुच ॥ स्वात्यांप्रविशतेभानुर्वर्पतेनात्रसंशयः॥ टीका-अश्विनी मृगशिर पुष्य रेवती श्रवण मघा स्वाति इन नक्षत्रोंमें सूर्य प्रवेश करे तो वृष्टि अधिक होय ॥ स्त्रीनपुंसकपुरुषनक्षत्रम् । आदिदशकंस्त्रीणां विशाखात्रिनपुंसकम् ॥ मूलाचतुर्दशं पुंसां नक्षत्राणिक्रमाबुधैः ॥ वायुर्नपुंसकेभेच स्त्रीणांभेचान दर्शनम् ॥ स्त्रीणांपुरुपसंयोगे वृष्टिर्भवतिनिश्चितम् ॥ टीका-आर्दा आदि स्वातिपयंत १० नक्षत्र स्त्रीसंज्ञकहैं और विशा- खादि ज्येष्ठांत ३ नपुंसक मूल आदि मृगपर्यंत १४ पुरुप नक्षत्रहै. नपुंसक नक्षत्रमें स्त्रीनक्षत्र आवे तो वायु चले और दोनों स्त्रीनक्षत्र आवे तो मेघ- दर्शन होय जो स्त्री पुरुपनक्षत्रोंका योग होय तो निश्चयकरके वर्षा होय ॥ सूर्य तथा चंद्रनक्षत्रकी संज्ञा । अश्विन्यादिवयंचैव आर्द्रादेः पंचकंतथा ॥ पूर्वापाढादिचत्वारि चोत्तरारेवतीद्वयम्।।उक्तानिशशिभान्यत्र प्रोच्यतेसूर्यभान्यथ ।। रोहिणीचमृगश्चैव पूर्वाफाल्गुनिकातथा ॥ सूर्येसूर्येभवेद्वायुर्थ देचंद्रेनवर्पति ॥ चांद्रसूर्योभवेद्योगस्तदावर्पतिमेपराट् ॥ टीका-अश्विनी भरणी रुनिका मार्ग पुनर्वसु पुण्य आश्ठेपा मया पूर्वापाटा उत्तरापादा श्रवण पनिठा उचरा रेवती ये चंद्रनक्षत्र और शेप सूर्य नक्षत्र जानिये ॥ फल ॥ दिवसनक्षत्र और महानक्षत्र ये दोनों जो सूर्यके हॉप तो वायु चले और जो दोनों चंद्रके हॉप तो मेय नहीं वर्प जो चंद्र भीर सूर्य नक्षत्रका योग होप तो या अच्छी होर ।

(२१२) ज्योतिषसार । धान्यप्रश्नः। कापायेजयशर्मलाभकुगिरौ मित्राणिसर्वशुभं गोरायेप्रियभुग्धना- निलपरे लाभारिनाशादिकम् ।। रय्याङ्गेकलह श्रियश्चवलगे स्था- नानिमित्रागमौ रोरोरांविपदःपरांगकलहाखालेयशोकावहः॥ टीका-सत्ताईस दाने धान्यके लेकर एक राशिकरे उसी राशिमसे एक चुटकी भर निकालकर रक्खे ऐसे तीन राशिकरे उसमें से तीन २दानें जूदे जूदे करता जाय जो तीन राशियों से एक रवचे तो जय और लाग होय १ का कहिये । पा कहिये १ ये कहिये ऐसी तीन राशियोंसे पृथक् २ एक २ बचे उसका फल जय और लान ॥ २कु १ गीक० ३ रौ क० २ मितादिसर्वसिद्धि ३गो क० ३ रा २ ये १ मियभोग धनप्राप्ति ३६ लाभ और पुत्रका नाश २प १ ग ३ ६ब ३ ल ३ ग ३ लक्ष्मी और मित्रलास ७ रो २ रो २ रा २ विपत्तिप्राप्ति १ र २ ग ३ कलह २ ला ३ य १ शोकप्राप्ति--ऐसे ३ वारकरनेसे बुरा भला फल जानिये और राशिकी गणनाके समय तीन २ दानें गिने ॥ पशुके विषयमें प्रश्न । धुमणिभानवभेषुक्नेपशुस्तदनुपसुचकर्णपथेस्थितम् ॥ अचलभेपुगतं गृहमागतं द्वयगतंगतमेव मृतंत्रिषु ।। टीका-जो सूर्यनक्षत्रसे वर्तमान नक्षत्र नवम होय तो पशु बनमें जानिये और जोनक्षत्रांत आवे तो मार्गमें जानिये तिसके आगे नक्षत्रांत भावे तो घरमें आया जानिये तिस पाछे २ नक्षत्रांत आवे तो आवनहार नहीं तिसके आगे ३ नक्षत्रांत आवे तो मृत्यु पावे ऐसा जानिये ॥ मश कलह होय भाषाटीकासमेत। (२१३) राज्यभंगादियोगः। यदिभवतिकदाचिच्चाश्विनीनष्टचंद्रा शशिरविकुजवारे स्वा- तिरायुष्मयोगोगगनचरपशूनां जंगमस्थावराणां नृपतिजन- विनाशो राज्यभंगस्तुचोक्तः॥ टीका-कदाचित् शनि रवि भौम इनमें किसी वारकार युक्त अमावा- स्याको अश्विनी किंवा स्वातिनक्षत्र और आयुष्मान योग होय जो ऐसा योग पडे तो पक्षी पशु जंगम स्थावर व राजा व जन इनका नाश और राज्यभंग होय ॥ सूर्यतथाचंद्रकेपरिवेषअर्थात्मंडलका फल । रविशशिपरिवेपे पूर्वयामेचपीडा रविशशिपरिवेपे मध्ययामे चवृष्टिः ॥ रविशशिपरिवेपे धान्यनाशस्तृतीये रविशशिपरि वेपे राज्यभंगश्चतुर्थे ॥ टीका-रविका अथवा चंद्रका मंडल जो प्रथम प्रहरमें होय तो जनों- को पीडा होय, दूसरे प्रहरमें होय तो मेघ वर्ष, तीसरे पहरमें धान्यका नाश, चौथे प्रहरमें राज्यसंग होय ॥ उत्पातोंका फल। रात्रीधनुर्दिनेउल्का ताराचैवदिनेतथा ॥ राबौतुधूमकेतुश्च भूकंपश्चतथैवहि ॥ एतानिदुष्टचिह्नानि देशक्षयकराणिच ॥ टीका-रात्रिमें धनुप दिनमें उल्का तथा नक्षत्रपात और रात्रिमें धूमकेतुका उदय तथा नामिकंप ऐसे दुष्टचिह्न लक्षित होय तो देशभयकारक जानिये। अथ छायावलयात्रा। शनासप्तपादः कोपोडशस्यू रवाभौमके रुद्रसंख्याविधेया॥ निशेशेवधेटेशसंख्याविधेया गुरावाग्निभूसंख्यछायाविधेया ॥ नलत्तानंपातं व्यतीपातपातं नभद्रानसंक्रांतिशूलंतथाच ।। नरोयातिसंशोध्य छायायदाहि तदाकार्यसिद्धिस्त्ववश्यंभ , (२१४) ज्योतिषसार। वेत्र ॥ स्वच्छायात्रिगुणाविश्वयुताभाज्याष्टभिःफलम् ॥ला- भोऽर्थरहानीश्रुग्वृद्धिदर्भयंदसिद्धितिः ८क्रमात् ।। टीका-शनिवारको ७ पाँवकी छाया शुक्रवारको १६ पांवकी छाया रविवार तथा मंगलमें ११ पांवकी छाया विधान करीहै, चंद्रवारको और बुधवारको ११ संख्या विधान करी है-गुरुको १३ संख्या विधान करी है-इस छाया बलमें जो यात्रा करते हैं उनको लत्तापात व्यतीपात भद्राघात संक्रांति दिशाशूल नहीं फल देता अपनी छायाके साधन करने में मनुष्यको कार्यसिद्धि अवश्य होतीहै, पुनः अपनी छायाको तीन गुणा कर फिर १३ युक्त करे, ८ का भाग देय जो १ बचे तो लान, २ बचें तो लक्ष्मीप्राप्ति. ३ बचें तो हानि, ४बँचे तो रोग, ५ बचें तो वृद्धि, ६ बचें तो भय, ७ बचें तो सिद्धि ८ बचें तो मृत्यु इस क्रम करनेसे यथावत फल देती है सो यात्रामें विचार लेना चाहिये । अथ वायुपरीक्षाकथनम् । आषाढमासस्यचपौर्णमास्यां सूर्यास्तकालेयदिवातिवातः॥ पूर्वस्तदासस्ययुताचमेदिनी नन्दतिलोकाजलदायिनोपनाः॥ टीका-जो आषाढमासमें पूर्णिमाके दिन सूर्यास्त कालमें पवन पूर्व दिशा- की होय तो पृथ्वी धान्य युक्त लोक सुखी मेघकी वृष्टि करे ऐसा फल जानना। कृशानुवातेमरणप्रजानामन्नस्यनाशःखलुवृष्टिनाशः ।। याम्येमहीसस्यविवर्जितास्यात्परस्परंयांतिनृपाविनाशम् ॥ टीका-अमिकोणकी वायु चाले तो प्रजाका मरण अन्नका नाश और वर्षाका नाश होय, और दक्षिणदिशाकी पवन होय तो पृथ्वी धान्य करके वर्जित होय और परस्पर राजोंमें विरुद्ध होय यह फल दक्षिणदिशाका जानना. नैशाचरोवारियदात्रवातो नवारिदोपक्षतिकारिभूरि ॥ तदामहीसस्यविवर्जितास्यात्तदंतिलोकाःक्षुधयापपीडिताः ॥ टीका-नैर्ऋत्य कोणकी जो पवन होय तो थोडी वर्षा होय और पृथ्वी धान्य करके वर्जित क्षुधा करिके रोगी और पीडित लोग रुदन करें ।

भाषाटीकासमेत। (२१५) आपाढमासेयदिपौर्णमास्यां सूर्यास्तकालयदिवारुणेऽनिलः ॥ प्रवातिनित्यंसुखिनःप्रजाःस्युर्जलान्नयुक्तावसुधातदास्यात् टीका-आपाढ मासमें पूर्णिमाके दिन जो सूर्यास्त कालमें पश्चिम दि- शाकी पवन होय तो प्रजा सुखी रहे और पृथ्वी जल अन्न करके पूरित होय ऐसा पश्चिमकी दिशाका फल जानना ॥ वायव्यवातेजलदागमःस्यादन्नस्यनाश-पवनोद्धतायोः । सौम्येनिलेधान्यजलाकुलाधरानंदतिलोकाभयदुःखवर्जिताः॥ टीका-जो वायव्य कोणकी पवन होय तो जलका आगमन अन्नका नाश और पृथ्वी प्रचंडपवन करके युक्त और उत्तर दिशाकी पवन होय तो श्रेष्ठ वर्षा और धनधान्य करके पृथ्वी युक्त लोक सुखी जय दुःख करके चर्जित ऐसा कहना चाहिये ॥ ईशानवृद्धिर्बहुवारिपूरिता धराचगावोबहुदुग्धसंयुताः॥ भवंतिवृक्षाःफलपुष्पदायिनोवातेभिनंदतिनृपा-परस्परम् ॥ टीका-जो ईशान कोणकी पवन चले तो पृथ्वी जलसे पूरित होय और गौदुग्ध करिके पूरित और वृक्ष फल पुप्पोंसे युक्त भऔर राजाभोंकी परस्पर मैत्री ऐसा जानना चाहिये ।। वर्पनिकालनेका प्रकार। गतान्दबृदै विखाभचंद्रेनिमेनभोव्योमगजै सुभक्ता ॥ विधाफलंबारघटीपलानि स्वजन्मवारादियुत्तानिइष्टम् ॥ टीका-वर्तमान संवत में जन्म संवत् हीन करे तो गताब्द संज्ञा होगी गतान्दोंको भुवि १ ख०० चंद्र १ अर्थात् १ ० ० से गुणा किया, ना. व्योमगन ८ अर्थात् ८०० का नाग देय ३ इसमें स्थापना करे जो फल पान होय सो वार इष्ट होगा इसमें जन्मका वार इष्ट जोड देय और अध्या- को ७ का भाग देय तो पर्पका पार इस सिद्ध होगा. उदाहरण-वर्तमान संवत् १९३६ जन्म संवत् १९३४ इन्होंका अंतर२इसको १०० मे गुणा तो २०१४ हये और इसमें८००का भाग दिया तो सानि हुये और (२१६) ज्योतिषसार। शेप४१४रहे इनको६०से गुणा तो२४८४०ये हुये फिर इनमें ८००काभाग दिया तो३१मिले और शेष ४० रहे इनको ६० से गुणा तो २४०० हुये तो इनमें८००का भाग दिया तो ३ मिले इस कारण०२वार३१घटी. ३ पल सिद्ध हुये इनमें जन्मवारादि ६।४५०५ जोडे० ९।१६।०८ ऊद्धांक ९ में ७ के भागसे शेषांक ०२।१६।०५ यह वर्षका इट हुआ ॥ अथ तिथिबनानका क्रम। याताब्दवृंदोगुणवेदरामै३४३निनःकुरामै३१विहृतोदिनाद्यम् ॥ यौःसहोत्थैःसहितंखरामै३०भक्तंचशेषातिथिरत्रवर्षे ॥ टीका-गब वर्षाको ३४ ३से गुणा करे पुनः ३१ का भाग देय जो अंक प्राप्ति होय सो तिथि जानना इसमें जन्मकी तिथि युक्त करे फिर३०से जो शेप रहे सो वर्षकी तिथि होगी परंतु तिथिमें१ऊनाधिक कहीं होजाती है । अथ नक्षत्रलानेकाक्रम। व्योमेन्दु १०भिःसंगुणितागताब्दाःखशून्यवेदावि२४०लवैर्वि- हीनाःजन्मक्षयोगैःसहिताप्रवस्था नक्षत्रयोगो भवतोभ२७तष्टौ ॥ टीका-गत वर्पोको ३० गुणा करे फिर दो जगह रक्खे और एक जगहमें २४ का भाग देय जो बल प्राप्ति हो वह दूसरे में घटादे और जन्मः या योग जोड दे उस नक्षत्रमें २७का भाग से शेष नक्षत्र होगा ॥ अथ ग्रहचालनकथनम् । स्वेष्टकालोयदास्यात्पंक्तिंचशोधयेद्धनम् ॥ पंक्तिश्चैवयदास्यादिष्टंचशोधयेदृणम् ॥ टीका-इष्टकाल पंचांगस्थ पंक्तिसे आगे होय तो पंक्ति में कालशोधन करना तो चालनधन करना होताहै और जो पंक्ति इष्टकालसे आगे होय तो इष्टमें पंक्ति शोधन करना तो चालन ऋण होता है । अथ ग्रहस्पष्टीकरणम् । गतेष्यदिवसायेन गतिनिनीखपट्टता ।। लब्धमंशाधिकंशोध्यं योज्यस्पटोभवैद्ग्रहः ।

भाषाटीकासमेत। (२१७) टीका-गत दिनसे अथवा आगत दिनसे सूर्यादि ग्रहोंकी गतिको गुण देना और ६० से नाग देना लब्धि अंशादि जो आवे सो गत दिनका होय तो ग्रहमें कम करना और आगत दिनका होय तो युक्त करना इससे यह स्पष्ट होता है। अथ भयातभभोगवनानेकी रीति। गतर्वानाज्यः खरसेषुशुद्धाः सूर्योदयादिष्टपटीषुयुक्ताः ॥ भभुक्तमेतच्चनिजर्शनाडिका शुद्धाःसुयुक्ताश्चभभोगसंज्ञकाः ।। टीका-गत नक्षत्रकी घडीको ६० में शुद्ध करना और वर्षमें सूर्योदय से जो इष्ट घटी होय सो युक्त करना तो जयात होताहै.और६० में शुद्ध कि- या जो नक्षत्र उसमें वर्तमान नक्षत्रकी घटी मुक्त करना तो भलोग होताहै। अथ चंद्रस्पष्टक्रममाह । सप भयावंभभोगोघृतंतत्सतर्कनधिष्ण्येपुयुक्तद्विनिघ्नम् ।। नवाप्तंशशीभागपूर्वस्तुभुक्तिः खखाभ्राएवेदाभभोगेनभुक्ताः॥ टीका-बीते हुये नक्षत्रका पिंड बांधके ६० से गुणे और मनोगका पिंड' बांधके तीनवार भाग देय गत नक्षत्रको ६. से गुणे और जो भभो- गके भागसे प्राप्त हुआ जो भयातहै उसे इसमें जोड देय फिर इसे दुगुणा करे और ९ का नाग देय तीनधार तो चंद्रमा अंशपूर्वक होताह और अंशोंमें ३० का नागसे राशि करे और ४८००० में मनोगका नागदेय दोवार तो चंद्रमाकी मुक्ति स्पष्ट हो जायगी । अथ लग्नसाधनम्। समागणश्चंद्रकृशानुनिनः खचंद्रभक्तोजनिलमयुक्तः ॥ तटोदिनेशे किलवर्पलग्नं सामान्यतोमान्यतरनिरुक्तम् ॥ टीका-गताब्दको ३१ से गुण देना १० मे भाग लेना उसमें जन्म लम युक्त करना १२ से उसे वटित करना जो रोप बचे तो सामान्यगति से पर्पलम जानना चाहिये ।।

(२१८) ज्योतिषसार। अथ मुंथा। सैकागताब्दाविरताःपतंगैस्तच्छेषभावे मुथहाजनुर्भात ॥ टीका-गताब्दमें १ युक्त करना १२ से भागदेना जो शेष रहे सो जन्मलग्नसे मुंथाका स्थान जानना चाहिये । अथ पंचाधिकारि। मुंथेशो वर्षलग्रेशस्तत्रैराशिकनायकः । दिवार्कराशिनाथश्च रात्रीचंद्रक्षनायकः ॥ जन्मलग्नेश्वरश्चैव वर्षपंचाधिकारिणः ॥ टीका-वर्षमें पंचाधिकारी बनानेका क्रम-मुंथेश १ वर्षलग्रेश २ त्रिराशीश ३ दिनमें वर्षप्रवेश होय तो सूर्यके राशिका स्वामी रात्रिमें वर्ष- प्रवेश होय तो और चंद्रके राशिका स्वामी ४ जन्मलग्नेश्वर ५ वर्षमें यह पंचाधिकारी शुभाशुभ फलके लिये ग्रह अधिकार देखना जिसके दो तीन अधिकार आवें सो बलवान् जानना चाहिये त्रिराशिपासूर्यसितार्कशुका दिनेनिशीज्येन्दुबुधक्षमाजाः ॥ मेपाचतुर्णाहरिभादिलोमं नित्यं परेष्वार्किंकुजेज्यचंद्राः ॥ टीका-विराशिपति होते सूर्य शुक्र और शनि शुक्र दिनमें मेषसे आदि लेकर कर्क राशितक चक्र से प्रतीत होगा । राशयः दिवास्वामी सू. शु. श.शु. श..बु. श. शु. स. सू. श. शु त्रिस्वामी वृ.चं.बु. चं. वृ. चं. बु. में.बु. चं. बु. में हास्वामी श. म.यू.म.श.चं. बृ. मे. शं. मै .. मं .। दृष्टिक्रममाह। 'पादंबिरुद्रे १५सदलंस्वतुर्ये३० पादत्रयस्यानवपंचमेपि ॥ पश्यंतिपूर्णसमसप्तकेच ग्रहानचान्यत्रविलोकयति ॥ 4 भापाटीकासमेत। (२१९) स्पष्टार्थचक्रविलोकयंति। ४०५०४] भाव लग्नस्थमुंथाप्रकारोतिसौख्यंनृप- प्रसादं विजयंरिपूणाम् । होदयं ३५/३०/४५६० कलादृष्टि बाहुबलप्रतापं वृद्धिविलासं धन- लाभमुग्रम् ॥ सुंथाधनस्थानगेलामसुमं करोतिमिष्टानस- मागमंच ॥ सर्वार्थसिदिनिजवाहुवीर्यात्सुखोदयंमित्र- सुतोदयंच ॥ लोकाजयनिजजनाचमहोत्थसौख्यं देहात्ति- कीर्तिशुभकार्यसमृद्धिदात्री ॥ सत्संगतिश्चसबलातनुतेह मंत्री मुंथाचप्राक्क्रमगतानृपतिप्रसादम्॥ वित्तक्षयंरिपुज- नादयशस्यवृद्धिं वैरोदयस्वजनराजकुलेषुकुर्यात् ॥ गुप्ताति- कृब्दरुजस्यविवर्तिदात्री तूर्येन्थिहाविविधरोगभयानिपुं- साम्॥ प्रतापमाहात्म्यसुरार्चनंच सुबुद्धिवृद्धिर्यशसम्प्रवृद्धिः॥ वित्तमलाभो जनताप्रसादः पुत्रातिसौख्यं मुथनेंथिहायाम् ॥ नृपाद्यं चौरभयं कृशत्वं निरुद्यमत्व रिपुजभयंच ॥ कार्या- हानि कुमतीप्वैरं पष्ठेथिहादुष्टरुजविदध्यात् ।। सौख्यार्थ नाशोवनितादिक चिंतामनोमोहमनल्परोगम् ॥ केशो- दयं स्वेटजनेपुवेरं यशोविनाशो मुथगेंथिहायाम् ॥ दुष्टंभया- ति धनधान्यनाशो विपक्षभीतिर्व्यसनानिमोहाः॥ कांतेवि- नाशं स्वजनेषुपीडा नृपाद्यंचाएमगेंथिहायाम्॥ धर्मार्थला. भं स्वजनेषुमैत्रीनपोत्तम प्रीतियशःप्रवृद्धिः। प्रमोदभाग्यो- दयकार्यसिद्धिः पुण्योपगेंथा प्रकरोतिसोख्यम् ॥ मनोरथा- तिस्वजनपुसौख्यं निजेष्टमंत्री स्वजनोपकारकः ॥ भूपात्म- सादो दशमेथिहायां पुण्योदयास्याद्विपुलंयशश्च ॥ सुखार्थ- लाभं शुभबुद्धिवृद्धिमनोरथाप्ति नृपतिप्रसादम् ॥ निजेएसो स्यं मनसिप्रहपं करोतिमुंथा भवगेवशित्वम् ॥ निरुद्यमत (२२०) ज्योतिषसार। निजमित्रकष्टं दुष्टातिरुवन्नृपतेर्भयंच ॥ धर्मार्थनाशो रिषु चौरभीतिः स्वाभीष्टपीडा व्ययगेथिहायाम् ॥ अथ त्रिपताकीचक्रकाप्रकार। रेखात्रयं तिर्यगधोध्वसंस्थमन्योन्यविद्धायकमीशकोणात् ॥ स्मृतंबुधैस्तत्रिपताकचक्र प्राङ्मध्यरेखा ग्रहवर्षलग्नात् ॥ टीका-रेखा ३ टेढी ३ सीधी करे और परस्पर ईशान कोणसे रेखा का वेध करे इसको पंडितजन त्रिपताकी चक्र कहते हैं इसमें पूर्वकी मध्य रेखापर वर्ष लगका न्यास करना ॥ तत्र ग्रहन्यासमाह । न्यसेद्भचक्रच विलग्नकार्या ताराब्द संख्या विभजेनभोगः ॥ शेपोन्मिते १० जन्मगचारराशेस्तुल्येचराशौ वि- लिखेच्छशांके ॥ परेचतुर्भाजितशे- पतुल्येस्थानेखरांशेखचरास्तुलेख्याः॥ टीका-त्रिपताकी चक्रपर १२ राशि कन्या करना और ग्रहन्यासका प्रकार गतवर्षमें १ युक्त करना ८ भाग लेना जो शेष रहे सो जन्मकालमें चंद्रराशिसे शेपस्थानमें चंद्रमा लिखना और ग्रहको ४ से भाग देकर. जो शेष बचे उसे वहां अपने स्थानसे लिखना. और राहु केतु अपने स्थानसे पीछे लिखना तो त्रिपताका चक्र स्पष्ट होताहै ॥ वेधविचार। स्वर्भानुविद्धे हिमगौत्वरिष्टं तापोर्कविहे रुगिनोविद्ध ॥ महीजविहेतु शरीरपीडा शुभेश्वविद्ध जयसौख्यलाभाः॥ शुभाशुभाव्योमगवीर्यगोत्रफलंतुवेधस्य वदेत्सुधीमान् ॥ टीका-विपताकी चक्रमें वेध देखनेका प्रकार सर्वग्रहोंका वेध चंद्र- भाषाटीकासमेत। (२२१) मासे देखना और राहुसे चंद्रसे वेध होय तो अरिष्ट जानना, सूर्यसे वेध होय तो ताप जानना,शनिसे वेध हेय तो रोग जानना, मंगलसे वेध होय तो शरी- रकी पीडा जानना, और शुभ ग्रहसे वेध होय तो जयपाप्ति सौख्य लान और शुभग्रहका वीर्य देखकर वेथमें फल कहना ॥ मुद्दादशा। जन्मक्षसंख्या सहितागताब्दा दृगूनितानंदहतावशेषात् ॥ आचंकुराजीशवुकेषुपूर्व भवंतिमुद्दादशिकाक्रमोयम् ॥ टीका-जन्म नक्षत्र की जो संख्या उसमें गताब्दकी संख्या मिलावना और दोनोंकी जो संख्या होय उसमेंसे दो दो कमती करना और९से नाग देना जो अंक शेप रहें सो दशा जानना, १शेष रहे तो सूर्यकी दशा, २शेष रहे तो चंद्रमाकी दशा, ३शेष रहे वो मंगलकी दशा, ४.शेष रहें तो राहुकी दशा ५ शेष रहैं तो गुरुकी दशा, ६ शेष रहै तो शनिकी दशा,७ शेप रहें तो बुधकी दशा, ८ शेष रहे तो केतुकी दशा, ' शेष रहे तो शुक्रकी दशा जानना, यह दशाका क्रम ज्योतिपशाखके आचार्योंने कहाहै ॥ मुद्दादशाचक्रम्। सू. चं. म. रा. वृ. श. बु. के. शु. ग्रहाः १ मास २१/२४/१८/२७/२१/२१ ० दिन मासबनानेका क्रम। मासार्कस्यतदासनपत्यकणसहांतरम् ॥ कलिकृत्याग- त्याप्तदिनाघेनयुतोनितम् ॥ तत्पंक्तिस्थयातपूर्व मासार्केधि कहीनके।। तद्वाराधमासवेशोधुप्रवेश कलासमः ।। - १ , १ ० १८ (२२२) ज्योतिषसार। टीका-वर्ष सूर्य मासको जो सूर्य सो वर्षके सूर्यसे अंशोंमें निकट होय हीन वा अधिक तो उसका अंतर करे राशि छोड फिर उसका पिंड बांधि कर सूर्य पंक्तिके गतिका पिंड बांधिके भाग दे तीन दफे तो उससे वार आदि प्राप्त होयँगे, फिर जिस पंक्तिके सूर्यका अंतर किया है उसे उसी मिश्र- मान में घटा दे अथवा जोडदे, जो सूर्य वर्षकी पंक्तिके सूर्य से अधिक होय तो जोडदे और हीन होय तो घटा देय तब मास पारादि स्पष्ट होगा ॥ अथ ग्रहचक्रप्रकरणम्। सूर्य ऋक्षसंक्रमणयत्र द्वेवक्रेविनियोजयेत् ॥ चत्वारिदक्षिणे बाहौ त्रीणित्रीणिचपादयोः॥ चत्वारिवामबाहोच हृदयेपंच निर्दिशेत् ।। अक्षणोद्रयंद्वयंयोज्यं मूनिचैकैककंगुदेशफलम् ॥ रोगोलाभस्तथाध्वाच बंधनलाभएवच ॥ ऐश्वर्यराजपूजाच अपमृत्युरितिक्रमात् ॥॥चंद्र॥ चंद्रचक्रप्रवक्ष्यामि नराकारं सुशोभनम् ॥शीर्षेपट्कमुखत्वेकं त्रीणिदक्षिणहस्तकेहिदि पट्कंप्रदातव्यं वामहस्ते त्रयंतथा ॥ कुक्ष्योः षट्कंचदातव्यं पार्दैकैकं विनिर्दिशेत्॥ ॥फलम्॥ ॥ शीलाभकरज्ञेयं मुखेतु द्रव्यहारकम् ॥ हानिदंदक्षिणेहस्ते हृदयेच सुखावहम् ।। वा- महस्तेतुरोगाश्च कुक्ष्योः शोकस्तथैवचारीपादयोहानिरोगौच जन्मधिष्ण्यादि चंद्रभम् ॥ ॥ भौम--भौमचक्र प्रवक्ष्यामि जन्मधिष्ण्यादिभौमभम्॥शी षट्कं मुखेत्रीणि त्रीणि वै द- क्षिणेकरे ॥ पादयोः षट्प्रदातव्यं वामहस्ते त्रयंतथा॥ गुह्ये चैकं नेत्रयोर्दै हृदये त्रयमेवच ॥॥ फलम् ॥ ॥ विजयश्चैवरो गश्च लक्ष्मीः पंथा भयंतथा ॥ मृत्युलाभः सुखंचापि फलंज्ञेयं विचक्षणः॥

भापाटीकासमेत। (२२३) - मंगल सूर्य संक्राति जिस नक्षत्र-जन्म नक्षत्रसे जिस नक्ष-जन्मनक्षत्रसे जिस नक्ष- में होय उससे जन्म नक्षत्रात्रमें चंद्रहोय तिस पर्वतात्रमें मंगल होय तिनको पर्यंत गणनेसे जितने न-गिने जितने नक्षत्र आ गिननेसे जितने नक्षत्र क्षत्र आये वे फल जानियेावि फल जानिये ।। आई ये फल जानिये स्थान नक्ष फल | स्थान नक्ष फल स्थान नक्ष फल | स्थान नक्ष फल मुखमै ३ रोगमाप्ति मस्तकमें ६ लान शिरपर ६ विजय दाहिनेहा ४ लाम मुखमें द्रव्यहरण मुखमें ३ रोगप्राप्ति पायोंमें ६ मार्गचलन दाहिनेहा ३ हानिकर दायाहोथ ३ लक्ष्मीप्रा. चाईबाहु. ४ बंधन हृदयमें सुसंप्रति पायोंमें ६ मार्गचल. हृदयम ५ लामवायेहा. रोगप्राप्ति वायां हाथ य नेत्रों में लक्ष्मीमा कुक्षि ६शोक गुदामें मृत्यु. मस्तकम १ राजसेपूजा दाहिनेपा. १ हानि । नेत्रोंमें मृत्यु गुदामें अपमृत्यु वायापाय..१ रोगमाति हृदयमें ३ सुस ॥ बुध ॥ बुधचक्र प्रवक्ष्यामि जन्मऋक्षादि सोम्यभम् ।। शिरसित्रीणिराज्यंल्याकंधनधान्यदम् ॥ नेढे प्री- तिलाभोच नाभीश्रीः पंचकंतथा ॥ पादयोः पदप्रवासश्च वामेवेदा धनंतथा॥चत्वारि दक्षिणेहस्ते धनलाभस्तथैवच ।। गुह्मस्थाने भवयंच बंधनमरणंफलम् ।। 1। गुरुगुरुचक्रमव- क्ष्यामि गुरुभाजन्मऋशकम् ॥ दद्याच्छिरसिचत्वारि चत्वा- रि दक्षिणेकरे ॥ एक कंठे मुसे पंच पादयोः पादापयेत् ॥ करेवामे च चत्वारि नीणि दद्याचनेत्रयोः।।। फलम् ॥ राज्यं लक्ष्मीर्धनप्राप्तिः पीडामृत्युस्तयेवच ॥ सुखचैव क्रमेणेवं फ- लोयं विचक्षणः॥ ॥ शुक्र।। शुक्रचक्र प्रवक्ष्यामि शुकधि- पण्यात्तुजन्मभम्।।मुखेत्रीणि महालाभःशीच शुभाषदामा विकंतु दक्षिणेपादे केशहानिकरं सदा ॥ तथैववामपादेच (२२४) ज्योतिषसार। त्रीणिभानितुयोजयेत् ॥ हृदयेद्धे धनसौख्यं भाष्टकंहस्तयो- ईयोः ॥ मित्रसौख्यं धनप्राप्तिगुह्येत्रीणि तथैवच स्त्रीलाभश्च फलंप्रोक्तं भृगुपुत्रस्यसूरिभिः॥ मुखमें बुध ॥ गुरु॥ शुक्र॥ जन्म नक्षत्रसे बुध जिस जिननक्षत्रमें होयउससे शुक्रजिसनक्षत्रमहोय उस- नक्षत्रमें होय तिस पयंताजन्मनक्षत्रतक गिन्नेसे जिसिजन्मनक्षत्रपर्यंत गणनेसे गिनै जिस स्थान बुध पीसस्थानमें पडाहोय उसका जिसस्थानमें पडाहोय उस उसका फलजानिये ॥ फलजानिये स्थानका फलजानिये- स्थान नक्ष फल स्थान नक्ष फल स्थान नक्ष, फल मस्तक ३ राज्यपाना मस्तक ४ राज्यप्राप्त मुसमें । ३ उत्तमला' धन दाहिनेहा ४ लक्ष्मीपान मस्तकमें ५ नेत्रोंमें २ प्रीतला कंठमें १ धनलाभ दाहिनेपा.३ केशहानि नाभि ५ लक्ष्मी ! मुखमै ५ पीडा यामेंपादमें २ क्लेशहानि पायोम ६ प्रवास | पायोंमें ६ मृत्यु हृदयमें . २ धनसोग्य वायेहाथ ४ धनलान वायेहाथ ४ सुखमाप्ति हाथोंमें |८/मित्रसुख दाहिनेहा ४ धनलाभ नेत्रोंमें ३ सुखप्राप्त गुह्यमें ३ स्त्रीलान गुदामें |२|पंधवमर .. ॥ शनिः॥ सौरिचक्र प्रवक्ष्यामि सौरिभाजन्मऋक्षभम् ॥ मूर्येकंच तथावके करेचत्वारि दक्षिणे ॥ विन्यसेत्पादयुग्मे पट् वामवाही चतुष्टयम् ॥ हृदये पंचऋक्षाणि क्रमाचत्वारि नेत्रयोइस्तेद्वयं गुदे चैकं मंदस्य पुरुषाकृतेः। ॥फलम् ॥ मूवक्रस्थभेरोगो लाभो वै दक्षिणेकरे॥स्यादध्वा चरणद्वंद्वे बंधो वामकरे नृणाम् ॥ हृदये पंचलाभेवै नेत्रेप्रीतिरुदाहृता॥ पूजामस्ते'परानूनं गदेमृत्यु विनिर्दिशेत् ॥ ॥ राहुनाराहुचक्र प्रवक्ष्यामि जन्मभादाहुऋक्षभम् ।।मूत्रिीणि तथाप्रोक्तं करे . ० ० भापाटीकासमेत। (२२८) चत्वारिदक्षिणे|पादयोः पट्चऋक्षाणि वामहस्ते चतुष्टयम्।। हृदयेत्रीणि कंठेकं मुखद्वौ नेत्रयोदयम् ॥ गुह्येद्वयं क्रमेणैव राहुचक्र स्वभादतः ॥ फलम्॥ राज्यं रिपुक्षयः पंथामृत्युा- भोऽथरोगकः ॥ जयः सौख्यं तथा कष्ट क्रमाज्ज्ञेयं फलं बु- धैः॥ ॥ केतुः ॥ केतुचक्र प्रवक्ष्यामि जन्मभात्केतुऋक्षभम्।। मुर्भिपंचजयश्चैव मुखेपंच महद्भयम् ॥ हस्तयो निचत्वारि विजयश्चजयस्तथा।पादयोः पट्चसौख्यंस्यादिदेशोकका रके ।। कंठेचत्वारिचव्याधियुकिंच महद्भयम् ॥ शनि । राहु. केतु. शनि जिसनक्षत्रमें हाय- जन्मनक्षत्रसे राहुनक्षत्र जन्मक्षत्रसे केतु जिसन- ससे जन्मनक्षत्र पर्यंत गिनापर्यंत गिने जहां नक्षत्र क्षत्रमें होय उसतक गिने जिसस्थलमें नक्षत्रपडाहो-पडाहोय वह फल जा-जितने नशन पढे वे फल जानिये ।। स्थान न० फल स्थान न० फल स्थान न० फल मस्तक १५ रोग मस्तक | ३. राज्यपान मस्तक ५ जय मुख रोगदायांहा.४ रिपुक्षय | मुखमें ५ वडाजय दक्षिणहा. ला पायोंमें ६ मार्गचलन हाथोंमें विजय पायोंमें | ६ मार्गचलन यायेहाथ ४ मृत्यू पायोपर ६ सुख वायांहाथ, ४ बंधन हृदयमें ],३ लाम हृदयमें २ शोक हृदयमें ५ लान कंठमें रोग कठमें ध्याधि नेत्रों में प्रीतिला. मुखमें २जय गुह्यपर १ बडाभय मस्तक, १ पूजा नेत्रोंमें | ३ सौख्य गुदामें नृत्यु गुदामेंट जन्मनक्षत्रकहाँपडाहै तिसका ज्ञान । शीत्रीणि मुखेवयं च विभादकैकम स्कंधयोरेकैकं मुनयो- स्तथा करतले धिष्ण्यानि पंचोदरे।। नाभी गुह्यतलेच जान- प वह फल जानिये निये॥ . .

(२२६) ज्योतिपसार। युगले चैकैकमृक्षं क्षिपेजतोः केचिदितिवंतिगणकाः शेषा- णिपादद्वये ॥ अल्पायुश्चरणस्थितेचगमनं देशांतरंजानुभे गुह्येस्यात्परदारलंभनमथो नाभौचसौख्यप्रदम् ॥ ऐश्वर्यहदि चौर्यमस्य करयोहोर्षलं वेमुखे मिष्टानंचलभेच्च मानवगणो राज्यं स्थिरंमूनि ॥ टीका-केवल मनुष्यचक सूर्यनक्षत्रसे जन्मनक्षत्रतक देखनेका क्रम प्रथम ३ नक्षत्र मस्तकपर फल राज्यप्राप्ति, मुखपर ३ नक्षत्र फल मिष्टान्न- भोजन, स्कंधपर २ नक्षत्र फल बलवान्, भुजापर २ नक्षत्र फल बल, हा. थके तलवेपर २ नक्षत्र फल चोर, हृदयपर ५ नक्षत्र फल ऐश्वर्य, नाभिपर १ नक्षत्र फल सुख, गुह्मपर १ नक्षत्र फल स्त्रीसे लंपट, जानुपर २ नक्षत्र फल देशवास, पादपर ६ नक्षत्र फल थोडा आयुष्य, ऐसा जन्मनक्षत्रसे स्थानविचार करना ॥ लग्नशुद्धिपंचकदेखना। गततिथियुतलग्नं नंदहृच्छेपकंच वसुयमयुगपट्टे क्षोणिसं- ख्या क्रमेण ॥ रुगनलनृपचौरं मृत्युदंपंचकंस्याद्रतगृहनृप मार्गोद्वाहके वर्जनीयम् ।। टीका-गततिथिको लेकर उसमें लय मिलावे और नवका भागदे शेष चचें तिसका फल जानिये, ८ बचें तो रोगपंचक वे यज्ञोपवीतमें वर्जित, २ बचें तो आमिपंचक वे गृहारंभमें वर्जित, ४ बचें तो राज्यपंचक ये और ६ बचें चौरपंचक ये दोनों पंचक गमनलममें वर्जित हैं, १ बचें तो मृत्युपंचक ये विवाहमें वर्जित, इनसे आधिक जो शेषांक बचे तो नि- पंचक जाने ये सर्वकार्य में उक्तहैं । वारोंमें पंचकवर्जित । रवोरोग कुजेवहिं सोमेतुनृपपंचकम् ॥ बुधेचौरं शनौमृत्यु पंचकानितुवर्जयेत् ।।

भापाटीकासमेत। (२२७) टीका-रविवारमें रोगपंचक, मंगलमें अमिपंचक, सोमवारमें राजपंचक बुधवारको चौरपंचक, शनिवार को मृत्युपंचक, ऐसे ये पंचक इनवारोंमें वर्जित जानिये ॥ दिनमान रात्रिमान। अयनादिकवासररामहता गगनानलवाणशशांकयुताः॥ परिभाजितशून्यरसेपटिका कर्कादिनिशा मकरादिदिनम् ॥ टीका-अपन कहिये कर्क संक्रांतिसे मकरसंक्रांतिवक ६ महीने तैसेही मकरसे कर्कतक ६ महीने जिस दिवसका दिनमान जानना होय तिम पर्यंत कर्क संक्रांतिसे दिन गिनके उसको ३ से गुणा करे जो अंक आवे उनमें १५३० मिलावे और • का भागदे जो बचे यह रात्रिमान और जो मकरसंक्रांतिसे गणना करे तो दिनमान आवे यह जानिये ॥ दिन कितना चढाहै यह जाननेकी रीति। पादप्रभा नगयुता रहिताचमेपात्पद्रविन्दुनात्रियुगवाणश- राधिरामैः ॥ स्याद्राजको दिनदलस्य नगाहतस्य पूर्वं गताः स्युरपरे दिनशेपनायः॥ टीका-अपनी छायाको पाँवसे नांप जितने पाँव आवे उनमें ७ मिलावे और मेषसंक्रांतिसे कन्या संक्रांतिपर्यंत इन्दु कहिये एक उसमें घटावे तिसके आगे तुलासे मीनपर्यंत जो संक्रांति होय उसका क्षेपक तोष एसे तुला ३ वृश्चिक ४ धन ५ मकर ५ कुंभ ४ मीन ३ इसप्रमाणसे घटावे जुदे लिखे विस पीछे दिनदल कहिये १५ इसको ७ से गुणाकि तो हुए तुला१०५इनमें पीछे लिखेहुए अंकको भागदे जो भागांक आवै ५ घटि जानिये परंतु दिनके पूर्वाई में दिवसकी घटी आवें और उत्तराईमें दिन शेष आवे यह जानिये ॥ रात्रि कितनीगई यह जाननेकी रीति। सूर्यभान्मध्यनक्षत्रं सप्तसंख्याविशोधितम् ।।

(२२८)
ज्योतिपसार।
विंशतिनंनवहृतं गतारात्रिःस्फुटाभवेत् ॥
टीका-रात्रिमें जो नक्षत्र होय तिसपर्यन्त सूर्यनक्षत्रसे गिनके ७
घटादे शेष रहे उसको २० से गुणा करे और ८ का भागदे जो अंक
शेप रहे उतनी ही गतरात्रि कहिये ॥
अंतरंगबहिरंगनक्षत्र ।
सूर्यभादुडुगणंपुनः पुनर्गण्यतामितिचतुष्टयंत्रयम् ॥
अंतरंगवहिरंगसंज्ञक तत्रकर्मविदधीततादृशम् ॥
टीका--सूर्यनक्षत्रसे चार नक्षत्र फिर तीन नक्षत्र इसप्रकार वर्तमान
नक्षत्र तक वारंवार गिने तो वे क्रमसे अंतरंग बहिरंगसंज्ञक होते हैं इनमें
लाना और पठवाना आदि कर्म करे ॥
सूतिकास्नान।
करेंद्रभाग्यांनिलवासवांत्ये मैदवाश्विध्रुवभेऽह्निपुंसाम् ॥ तिथा-
परिक्तशुभमामनंति प्रसूतिकास्नानविधिमुनींद्राः ॥ इति श्रीशुक
देवविरचिते ज्योतिपसारे संवत्सरादिप्रकरणं समाप्तम् ॥
टीका-हस्त ज्येष्ठा पूर्वाफाल्गुनी स्वाति घनिष्ठा रेवती अनुराधा मृग
अश्विनी और ध्रुवनक्षत्र इनमेंसे कोई नक्षत्र जिसदिन होय उस दिन सूति-
कालान शुभ कहाहै, परंतु रिक्तातिथि वर्जित है यह मुनींद्रोंने कहाहै ॥
इति पंकेशवप्रसादविरचितज्योतिपसारभापा समाता ॥
पुस्तक मिलनेका ठिकाना-
खेमराज श्रीकृष्णदास,
"श्रीवेंकटेश्वर" छापाखाना-मुंबई,

विक्रव्यग्रन्थ. नाम. रु० आ० ... ... ... ... ... ... ... १ ... ... लीलावती सान्वय भाषाटीका अत्युत्तम बृहजातकसटीक भट्टोत्पलीटीकासमेत जिल्द... बृहज्जातकमहीधरकतनापाटीका अत्युत्तम वर्षदीपकपत्रीमार्ग (वर्षजन्मपत्र बनानेका)... मुहूर्त्तचिंतामणि प्रमिताक्षरा रफ रु० १ ग्लेज मुहूर्तचिंतामणि पीयूषधारा टीका ताजिकनीलकंठीसटीक तंत्रत्रयायात्मक ताजिकनीलकण्ठी तंत्रत्रयात्मक महीधरकत भापाटीका अत्युत्तम टैपकी छपी ज्योतिपसार भापाटीकासहित मुहर्नचिंतामणिभापाटीका महीधरकत मानसागरपिद्धति (जन्मपत्रबनाने में परमोपयोगी)... बालबोधज्योतिप ग्रहलाघव सान्वय सोदाहरण भापादीकासमेत स्पष्ट उदाहरण गणिताश्यासियोंको परमोपयोगी जातकसंग्रह (फलादेश परमोपयोगी ) चमत्कारचिंतामणि भापाटीका जातकालंकार भापाटीका जातकालंकारसटीक जातकाभरण प्रश्नचंडेश्वर भापारीका पंचपक्षी सटीक पंचपक्षी सपरिहार सापाटीकासमेत लघुपाराशरी भापाटीका अन्वयसहित मुहगणपति ... ... ०-४ ०-१२ ६०भा० - ०-४ -६ ... ... ... ०-१२ (२३०) जाहिरात. मुहूर्त्तमार्तड संस्कृतटीका भाषाटीकासहित शीघ्रवोध नापाटीका पदपंचाशिका भापाटीका भुवनदीपक सटीक ४ आ. भापाटीका जैमिनिसुत्र सटीक चार अध्यायका रमलनवरत्न बृहत्पाराशरी (होरा) सर्वार्थचिंतामणि लघुजातकसटीक लघुजातक भापाटीका सामुद्रिकापाटीका सामुद्रिकशास्त्र बड़ा सान्वय भाषाटीका यवनजातक पंचांग तिथिपत्र संवत् १९५७ का पंचांग सं० १९५७ ५०महीधरकत पंचांग १० वर्षका (ज्योतिर्विदोंको लाभदायक) हायनरत्न अर्घप्रकाश ज्योतिष भापाटीका इसमें तेजी मंदी वस्तु देखनेका विचार है ज्योतिषकी लावणी ... शकुनवसन्तराज भापाटीकासहित इसमें नानाप्रकारके शकुन वर्णित हैं ऐसा पूर्ण शकुनका ग्रन्थ और नहीं छपा है रत्नद्योतक्षापाटीका लग्नचंद्रिका मूल ४ आने और भापाटीका क १-४ ०-२ . iri ०-१० जाहिरात. (२३१) नाम, रु० आग ... मकरंदसारिणी उदाहरणसहित भावकुतूहलजापाटीका (फलादेशउत्तमोत्तमहै) प्रश्नपयोनिधि वर्षबोध (ज्योतिष)... सिद्धांतदैवज्ञविनोद ज्योतिष भाषा-जिसमें भूगोल और खगोल विद्या सूर्यसिद्धांतका उदाहरण और पंचांग बनानेकी पद्धति आदि महर्घ्य समय॑ चमत्कारी योगों सहित और धर्मशास्त्रसहित संकेतनिधि सटीक पं रामदचजीकत इसमें संस्कृत काव्यरचना बहुत सुंदरहै और जन्मपत्र देखने के चमत्कारी योग बढे विलक्षण और अनुभवसिद्धविद्या करके विज्ञपित हैं मुकन्दविजय चक्रों समेत पनकोप भापाटीका (ज्योतिष)... स्वमप्रकाशिका भापाटीका स्वमाध्याय नापाटीका परमसिद्धान्त ज्योतिष (यह ग्रन्थ ज्योतिश्चक के ज्ञानमें अत्यंत उपयोगी है विश्वकर्मप्रकाश नापाटीका विश्वकर्मवियाप्रकाश [ घर बनानेकी सम्पूर्ण क्रिया वर्णित हैं। सूर्यसिद्धान्त संस्कृतटीका और नापाटीका समेत (ज्योतिष) 4 ... + ... ०-३ १-८ ... ... ...

(२३२) जाहिरात. नाम, रु.आ. ०-१२ मानसप्रश्नदीपिका भाषा विवाहवृन्दावन सटीक राजमार्तण्ड ( भोजराजप्रणीत) वाजिकषण भापाटीका(अत्युत्तम स्पष्टार्थ स.) नजन्माङ्गदीपिका और पंचांगदीपिका पाय- टीका समेत - ( ऐसी उपयोगी कुंजीहैं जो हजारों रु. खर्चसेभी अलस्य ज्योतिषी इससे अमूल्य लान पायेंगे प्रभवैष्णवभाषाटीका (अनेकप्रभाका भली- भांति वर्णनहै ) प्रहगोचर ( ज्योतिष) भुवनदीपक सं० टी० भा० टी० पुस्तक मिलनेका ठिकाना- खेमराज श्रीकृष्णदास, " श्रीवेंकटेश्वर " छापाखाना (मुंबई)

Jyotishsar

Author
Shukdeva
Title
Jyotishsar
File name
Jyotishsar
Text
OCR done
Citation
1953
Published
2012/08
Publisher
Mumbai.,venkateshwar Mudralay
Language
Sanskrit
Pages
249
Library
Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
DLI number
312635
Barcode
99999990321403.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
Xmcue1z4qJ3
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