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Anandamritvarshini

Swami, Anandgiri · 2009/10

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AMR. ॥ आप शस्कृत पिणी ॥ जिसको श्रीमत् परमहंस परिबाज स्वामी आनन्द- गिरि महाराज ने रचा जिसमें पञ्चदशी वेदान्तसार, तत्त्वानुसन्धान, श्रीमद्भगवद्गीता, आत्म- योधयन्त्र लाडक्य, वृहदारण्य, छन्दोपनिषद और पञ्चीकरण यातिज्ञादि श्रीशङ्करमगराग, साप्यकारले शादिले अनेक आचायों केाचित ग्रन्थों का सारांश विशेष श्रति वेदवाक्य और हरिभक्तोंके ज्ञानभक्ति वैराग्यके रदार्थ श्रीकृष्णचन्द्र परब्रह्मकी महिमा और मुक्तिका उपाय शान्तपूर्वक पालकों के सुख वोध और मित्र अतिसुगम और ललित तातिहमविस्तका सातवा !-ACC, No.- 11 LOON 11 , मुंशी नवलकिशोर (सी, आई, ई दिसम्बर सन १९०७ ई० ।। १८ दुज़ब

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... आनन्दामृतबर्षिणी का सूचीपत्र ।। - . पृष्ठ . - । १ . ४ 4- ... " w " " १ . । । . " 15 अध्याय विषय ६ मंगलाचरण विद्वज्जनों से प्रार्थनाकर क्षमापन. उनमन्धों के नाम जिनका अर्थ लिखागया..... ॥ युद्धिमानको ब्रह्मनिष्ठगुरू से सुंतना.. इसके.सुनने व अनुष्ठान करने में दृष्टान्त. ज्ञानचतुष्टयसाधन........ ................ उपोद्घातकथा, ईश्वर, हिरण्यगर्म.व. विराट् इन तीनों भावों से शुद्धब्रह्म का.निरूपण, ............ प्राज्ञ तैजस व विश्व इन तीनों से जीव का निरूपण, जीवोंको चतुवर्ग के लिये ईश्वरकृत् सृष्टि स्थिति, संहार धादि तीनों में मोक्षकी मुख्यता.... वेदविहित स्वर्गादिकी गौणता. मार्गमृत्तिकाभक्षक वालक के लिये माता.का उपदेशैं.' व्यर्थ भ्रमणका बालकको पिताका उपदेश ... " आत्मस्वरूप का विचारकर एकाग्रचित्त से उपासना ..... जगत्सुखकी गौणता ..... रुपयादिकों से धर्मकर सत्संगति करना , संसार में मोक्षकी मुख्यता." जीबोंको परमेश्वरादि मूर्तियों का पूजना, " वेदादि.जानने में असमर्थ जीवों के लिये श्रीकृष्णजी को अर्जुन से उपदेश करना. कलियुग में ज्ञानकाण्ड-फे लोप होजानेपर शङ्करकी प्रार्थनासे... शङ्कराचार्यका अवतारलेना. है संन्यास लेकर सोलहवर्ष की अवस्था में उनका भाष्यरचना... गीताभाष्यादि विचार में असमर्थ जनोंके लिये आत्मबोधादि बनाना ": चालीस दिवस मण्डन मिश्रसे शालार्धकर विजय करनाव कपाली आदिकों का नाशकरें ३२ वर्षकी अवस्था में कैलॉस पधारना " १६ .. - ५ . (३ " . १११० ६.११ ६ " अध्याय .* ११ १४ + " आनन्दामृतबर्षिणी का सूचीपत्र. विषयः पीछे से उनके भाष्यादि गन्यापर शिष्यों का तिलक करना. इस समय आत्मबोधादि विचार में असमर्थजनों के लिये आनन्दगिरि को आनन्दामृतवर्षिणी वनाना प्रथम ज्ञान के मुख्यंचार साधनों का निरूपण. नित्य, अनित्य का वर्णन - यहां वहांके पदार्थों को अनित्य समझ: सवोंको त्याग़नाmri शमादिषट्सम्पत्तियों का वर्णन मुक्तिके चारसाधन..... अधिकारीआदि अनुवन्धचतुष्टया in प्रत्यक्षादि.षट् प्रमाणों का निरूपण अनुमान के पक्षादि: पांच अङ्गोका वर्णन...... जीवेश्वर का भेद... जीवोंके लिये ब्रह्मका जोधा.........jai अन्नमयादिकोशोंको आत्मा कहना..... साक्षात निर्गुण ब्रह्मका बोध: his वेदोंका कथन सप्रमाण वेदोंका.एकदेश सुन, व उनके तात्पर्याशय को नहीं विचार कर मूर्योको आत्मा बतलाना, .. " पूर्वपक्षकी श्रुतियों से वृथावाद: iii किसी मूर्खरोगी को अच्छे वैद्यके पास जाना व उनको मोहन र भोग बतलाता TRITE: केवल आजीविका के लिये वैष्णवादिकों का उपदेशःte - कलियुगमें गुरुओं को मूर्ख चेलोंके लिये मन्त्र देना शिवको शिवा से गुरु शिष्य का निरूपण वेद भगवान् को युक्तियों से निर्गुण का निरूपण , शारीरकभाष्य में अस्थूलारुन्धती, न्याय " अरुन्धती बोधन में, दान्त.. मुक्तिके मुख्य अन्तरंग साधना 1. आप्तवाक्य प्रमाण. अर्थापत्ति प्रमाण में भेदवादी व कर्मवादियों को उत्तरदेना भेद उपासनामें बहुदूषण. आत्मज्ञाता को तरना " धनपुत्रादिकों से मुक्ति का नहीं होना कर्म से तमोगुणका नाश १८ " १९ -- Aau . -- .. . - .

३. पृष्ठ 4 २२ आनन्दाम्मुतवर्षिणी का सत्तीपञ्च । अध्याय विषय. तमोगुण के कार्य, ".. प्रतादिकों से इन्द्रियों का दमन ........ दानादिकों से पदार्थों में अनासक्ति..... तीर्थादिकों से घरवालों में अप्रीति व सन्तसमागम ! :..:.. सत्संगसे चित्त का उपराम, अन्त:करण की संशुद्धि. .:;... उपासना से रजोगुणका विनाशन, रजोगुण के कार्य. . {" 1 " " ܨܪ । " " सत्त्वगुणं के कार्य, .!'; . .. न २३ " - -: FOR ..... . । -- . है तीनों गुणोंका मायिक कथन: माया के मिथ्या होने पै तीनों गुणों का मिथ्यात्व...... " असंग सच्चिदानन्द निर्मुक्त होने को ज्ञान कहना. " वेदों के परम सिद्धान्त से ज्ञान के विना मुक्ति का नहीं होनाः इति प्रथमाध्यायः ॥ अथ द्वितीयाध्यायः॥ २ अध्यारोप अपवादन्याय से...पुनर्मुक्ति का निरूपण, " रज्जु सर्पका दृष्टान्त महावाक्यार्थ ज्ञान में तीनों तापों व पांचों क्लेशोंका विनाश... वाक्यार्थ ज्ञान में पदार्थ ज्ञान, तत्त्वमसि महावाक्य में तीन पदोंका कथन तत्पदार्थ का लक्षण ब्रह्मक तटस्थ व स्वरूपस्थ का लक्षण, वाच्य व. लक्ष्य भेदसे तत्पद के दो अथों का कहना मायोपहित शुद्ध चैतन्य...को जगत् - का कारणः कहना मायोपहित चैतन्य तत्पद का वाच्यार्थ, in: मायायुक्त चैतन्य तत्पदका लक्ष्यार्थ, शुक्ति में रजतभ्रान्ति.. ::.":. लाल रंग के समीप स्फटिक को सफ़ेदही रहना. ब्रह्मक असंग, शुद्ध व चैतन्य होनेपर मायाका निरूपण चैतन्य पदार्थों में विशेषणों का प्रतिपादन:::::: अज्ञानादि ले स्थूल पर्यन्तों की जड़ता. 15 'गुणों की साम्यावस्था को प्रकृति व मूलाज्ञान: Tips ज्ञाम से अज्ञान का अभाव. "" : " ....- २४ L G " " " . २५ " 16 आनन्दामृतबर्षिणी का सूचीपत्र । ४ अध्याय २६ f . . " H " २७ " . " . " . , २८ है - है विषय '२ न्यायादिकों के पढ़ने से तूलाज्ञान का विनाश ब्रह्मविद्या से मूलाज्ञान का नाश. विद्या व व्यवहारादि से अज्ञान का अभाव, " ज्ञान, माया, शवल ब्रह्म, जीव, शुद्ध ब्रह्मका अनादित्व.. दृष्टान्त के पदार्थों की व्यवस्था, दाटीन्त पदार्थों में शुद्ध ब्रह्मका अनादित्व. माया व अविद्या भेदसे अज्ञान को द्विधा होना. ज्ञान शक्ति, क्रियाशक्ति, आवरणशक्ति और विक्षेपशक्तिः का निरूपण, मायोपहित चैतन्य को ईश्वर कहना तत्पदका वाच्यार्थ, अविद्योपहित 'जीवको प्राज्ञ कहना मायोपहित ईश्वर को माया के वशमें न होनेसे सर्वज्ञ आदि कहना, अविद्या के वश में पड़ने से अवियोपहित जीव का नाना- त्व होना. अविद्योपहित जीव का अल्पज्ञव. : विम्ब व प्रतिविम्ब का भेद. अन्तस्करणकी उपाधि से अनेक प्रमातों की कल्पना, अन्तःकरण विशिष्ट चतन्य को प्रमाता कहना. वनवत् अज्ञानों के समुदाय को समष्टि कहना वृक्षवत् एक अज्ञान को व्यष्टि कहना. .....' चैतन्य, अज्ञान, समष्टि से उपहित को ईश्वर, चैतन्य व्यष्टि अज्ञान से उपहित को जीव, कारण उपाधिवाला ईश्वर. कार्य उपाधिवाला जीव. , ज्ञानशक्ति से उपहित जगत् का निमित्त कारण, विक्षेपशक्ति से उपहित उपादान कारण, मकड़ी का दृष्टान्त. जगत्का परमेश्वरका अभिन्ननिमित्तोपादान, " कुलाल का दृष्टान्त, ईश्वर को आपही उपादान व आपही निमित्त कारण, जगन्मोहन के लिये निरीश्वरवादी पूर्वमीमांसादिका तर्क, परमेश्वर की रचना में तर्क का अनवसर. ईश्वर का जगत्कर्तृत्व जगत् में कारण,सूक्ष्म व स्थूल भेदसे प्रपञ्चताका निरूपण " १ . 1 1 -- -- . . .... . . . . । " "२९ . .... - " " M ३० . " . - आनन्दामृतवर्षिणी का सूचीपत्रा विषय 47 ३० .. . -- अध्याय १२ मायोपहित चैतन्य ईश्वर. से. महत्तत्त्व, महत्तत्त्व से अहंकार (एकोई बहुः स्याम् ) महत्तत्त्वादि समस्त पदार्थों की जड़ता. ईश्वर की चैतन्यता... : १७ लिंगवाले सूक्ष्म शरीर का उत्पादन. " माण्डूक्यादि प्रमाणों से पूर्वोक्त अर्थों का चक्र ११ ३.२८ । १७ लिंगवाले सूक्ष्म शरीर का निरूपण पञ्चज्ञानेन्द्रिय पञ्चकर्मेन्द्रिय "........... .- ३२. ३३ ॐ . .. -" . पञ्चप्राण. आकाशादि के सत्त्वगुण के अंश से ज्ञानेन्द्रियों का होना. भाकाशादि के मिले सत्त्वगुण के अंश से अन्त:करण चतुष्टय . का होना.. " {:" AP 4. -- " 1 आकाशादि के रजोगुणके अंश से कर्मेन्द्रियों का होना. आकाशादि के.मिले, रजोगुणके अंश से वृत्ति, भेद से पञ्च : प्राणों का होना f तथा उपप्राणोका वर्णन ::::ingi अन्नमयादि पांच कोशों का निरूपण कर्ता आदिषट्कारकों का प्रतिपादन :NE. प्रिय, सानन्द व प्रमोदका कहना in जाति, व्यक्ति, सामान्यादि का दृष्टान्त ... " सूक्ष्म शरीरादिकों से पुर्यटक का कहना सञ्चित, आगामि, प्रारब्ध भेदसे तीन कर्मों का वर्णन प्रारब्ध जनित अविद्यादि पञ्च क्लेशों की वर्णन ब्रह्मज्ञान से समस्त क्लेशोंका विमोचन : 'सूक्ष्मशरीर की उत्पत्ति कह स्थूल का उत्पादनः आकाशादिकोंके कार्योंका निरूपण...... पूर्वोक्त अर्थी का चक्रात पञ्च भूतों के लक्षणों का निरूपणः :: अव्याप्ति, अतिव्याप्ति व असंभव का निरूपण. आकाशादिकों में शब्दादिःगुणों का कहना in ऊपर. व नीचे के चौदह लोकों का प्रतिपादनः जरायुजादि भेदों से चारप्रकार के शरीरों का वर्णन मन्वादि शरीरों से मानवीय सृष्टिं का.वर्णन, मरण, मूर्छाको कह जानदादि अवस्थात्रयका निरूपण अन्तःकरण के धर्म दिगादिदेवताओं समेत: पृथक्करण: - १८ " ४० । . - +10 ४३. : :: SATA । .4 " ६. आनन्दमृतवर्षिणी का सूचीपत्राः अध्याय विषय २ अध्यात्म, अधिभूत और अधिदैवका निरूपणं. शब्दादि पश्च विषय बोलना; आदि पञ्चक्रिया व सङ्कल्लादि। चारों काःतिलपण, सधुरादि. षट्रसों का निरूपण अन्तःकरणको सत्त्वादि वृत्तियों का वर्णन अभिमानादि की वृत्तियों का निरूपण ओबादि इन्द्रियों के देवतादिकों का. जक....... ' जाप्रदादि भवस्याओं में, विश्वादिकों का निरूपणा, विराआदि की उपासना से विराट् आदि का होना. प्रणवादिपासना को लेकर पाषाणादि मूर्ति पर्यन्त उपास- नामों का निरूपण भेद उपासना व अभेद-उपासना का स्वरूप, मणिप्रभाते लेकर अनेक उपान्तों का वर्णन ब्रह्मको तटस्थ लक्षण कहकर अपवाद को कहना शुक्ति में रतत का भभाव. ब्रह्मचे व्यतिरेक लाहे-अपञ्च का अभाव निश्चय करना अन्वय व्यतिरेक से ब्रह्ममान का निश्चंच. तीनों अवस्था में अन्वन व व्यतिरेक का ज्ञान युक्तियों से जगवाधन का क्रमव मेलन मृगतृष्णा का निरूपण । महावाक्य के अवणले अपरोक्ष ज्ञानका कहना अध्यासेप, अपवादसे 'तत्त्वमसि पदार्थों का निरूपण, मायासे ले प्रपञ्चजड़, चैतन्य विं अनुपहित चैतन्य का तत:: लोहपिण्डवत् होना तत्तद का वाच्या अखण्ड-चैतन्यसे तत्पदका लक्ष्यार्थ... पदका वाच्यार्य :लक्ष्यार्थ. जहदज्ञहल्लक्षणा से तत्त्वमसि महावाक्य का वोधन सामानाधिकरण्यात विशेषण विशेष्यभावालस्य लक्षणभाव : का निरूपण. : महावाक्यार्थ को युद्धि में न बैठने तथा विरुद्ध प्रतीत होतेपैः लक्षणा; शक्ति व व्यसनादि से निश्चय करना है जहणा, भनदल्लक्षणा त्या व्यचना का सोदाहरण निरूपण .. तत्त्वंपदोंसे ध्रुद्ध चैतन्यका अधिकरण, " तत् स्वपदाका सामानाधिकरण्या १४८ ५९ .. u- ५१.. . ३४ IN.44 ।

? :::पृष्ठ - है - ..bf M...... .... १६" - आनन्दामृतवार्षिणी' का सूचीपत्र। अध्याय विषयों २ तत् त्वंपदोंका या त्वं, तत् पदों का विशेषणं विशेष्यभावे. ५२ तत्त्वंपदोंका लक्ष्यालक्षणभाव सम्बन्ध तत्, त्वंपदों का वाल्या त्यागकर लिक्ष्यार्थ का ग्रहणः . " तत्त्वमसि महावाक्यार्थ का अखण्डार्थ निश्चय " महावाक्यायों के श्रवणादिकों से परमानन्द प्राप्ति इति द्वितीयाध्यायः ॥ .:: अथ तृतीयाध्यायः ३ कर्मकाण्डी व उपासनावालों के लिये वैकुंपठाद्रि प्राप्ति द्वाराः सालोक्यादि मुक्तियों का निरूपणः , मुक्तियों के अनित्य होनेपर साक्षान्मुक्ति का प्रतिपेध : " जोवन्मुक्ति व विदेह मुक्ति से मुक्ति के दो भेद: i.. श्रेष्ठादि भेदी से जीवन्मुक्ति के तीन भेद...... ज्ञानकी सप्तभूमिकाओं का निरूपण. "५६ वेदान्त शास्त्र में पूर्वपक्ष के तर्कोका खण्डन ...: शंपायें कर उत्तरों से.समाधान करना ... वेदों व शाखों के तात्माशय.को नहीं समझकर शास्त्रों के एकदेश को सुनकर मूों का वाद inite ti, सदा सुखं चाहनेवालों को निस्संग रहना. . हेतु..स्वरूप, कार्य क अवधि से उपरतिका निरूपण मुक्तिकी चाहनावालों में तारतम्यता से वैराग्यादि हेतुओं को रहना." ज्ञानी तथा अज्ञानी का निरूपणः सत्ययुगादिकों में अस्थ्यादिमें प्राणों का रहना ६६ आचार्यवान् पुरुष को ब्रह्मका ज्ञान होना, संशय विपर्ययरहित गुरु वेदान्तमें विश्वस्तजनकी मुक्तिहोनांक इति तृतीयाध्यायः ॥ अथ चतुर्थाध्यायः॥ ४ किसी पापके प्रतिवन्ध से अपरोक्ष ज्ञान के न होनेपर जन को फिर साधन करना पूर्वोक्तं चार साधनों का मुख्यसार. irr !! ६७. “अन्तरंग, बहिरंग भेद से ज्ञानके.२. साधनों का कहना.... ५७ . . - ६२. । । "" " . 4 - पृष्ठ ६० " , करना. रजोगुण, तमोगुण के.स्वल्प होनेपर सत्त्वगुण के बढ़ाने से आनन्दामृतबर्षिणी का सूचीपत्र। अध्याय विषयों स्नान,व सन्ध्यावन्दनादि बहिरंग सांधता कर्मकाण्ड व उपासनाकाण्डः को जानाका साधन कहना मन, में मान को नहीं करना अन्तरंग साधनः M अमानित्वं, अदंभित्व आदिका निरूपण धर्म के विषय में एक इतिहास का कहना देह का निग्रह कर स्नानादि विना बैठे श्रवणादि करना. " शब्दादि विषयों से विसंग करना, " अहंकार से रहित होकर जन्म मरणादि का अनुसंधान अरोगी शरीर के रहने तक पुरुषार्थ करना {" पुत्रादिकों में अनासक्तिकर प्रीतिका त्यागना. इष्टानिष्ट की प्राप्ति में संमचित्त रहना अष्टावक्रजी का उपदेशESrir परमेश्वर के विषय में भक्तिकार सर्वात्मा दृष्टि होना निर्भय, देश में बसना.. in श्री आदिकों में नहीं ठहरना व्यास, शंकर व वशिष्ट का निश्चय दैवी संपदा के छठवीस साधनों का निरूमणः आत्माके विषय पूजा का अभिमान नहीं करना दैवी. संपदावाले पुरुष का निश्चयं मुक्त होना आसुरी संपदा के गुणों को निरूपणः । प्रश्नोत्तरों से ज्ञानी के लक्षणों का निरूपणी सारे आरम्भ के त्यागनेवाले ज्ञानी को स्थितप्रज्ञगुणातीतकहना. प्रारब्ध से सत्त्वादि गुणों के कार्यो की प्रवृत्ति होनेपर हषादि कों को नहीं करना हुई वस्तु की प्रवृत्ति नहीं होनेपर लड़के का दृष्टान्त विषयाकार अन्तःकरण को वृत्ति को सूक्ष्म होनेपर स्वरूपकी प्रतीति.. ज्ञानद्वारा निरतिशयानन्द की प्राप्ति, इति चतुथीऽध्यायः ॥ अथ पञ्चमाध्यायः ।। ज्ञानद्वारा: निजरूपः प्राप्ति " " ७३ ७५.. " . " भाग आनन्दामृतवर्षिणी का सूचीपत्र। (S अध्याय ५ विषय । । ६ ..... . । . " में जाना ":"" : ७९ . ३ ८१ - . . ८२ .. .... " . - र तीनों गुणों के लक्षणों का पनर्निरूपण देहमें सत्त्वादि गुणों के बढ़नेपर- उनका स्वरूप , सत्त्वादिः,गुणों के आविर्भाव होनेपर फलों का निरूपण, अन्त काल में सत्त्वादि गणों की प्रवृत्ति होनेपर स्वर्गादिकों देवपूजन,यज्ञ व दानादि करने पर सत्त्वादिकी परीक्षा ब्रह्मा आदि देवताओं के पूजनेवालों को सत्त्वगुणी यक्षादि के पूजने वालों को रजोगुणी ... .. '. " भूत, प्रेतादि के पूजनेवालों को तमोगुणी सत्त्वादि गुणवालों का भोजनादि . सत्त्वादि गुणोंवाले यज्ञों का निरूपण " सत्त्वादि गुणोंवाले तपका निरूपण मैथुनके आठ अंगों को त्याग ब्रह्मचर्य का कथन वाण्यादिकों से तीन तापों का वर्णन सत्वादि गुणों से तीन तापों का निरूपण.... सत्वादि गुणों से तीन दानों का निरूपण.. , सत्त्वादि गुणों से तीन कर्मों का कथन " सत्त्वादि गुणों से कर्ताओं का निरूपण सत्वादि गुणोंका सुख : गीतादि श्रवण से पूर्वोक्त कर्मादिकों का निश्चय जिसके करने से रज व-तम की बढ़तीहो उसका निषेध. जिसके करने से सतोगुण की बढ़ती हो उसका विधान प्रातःकाल स्नानादिकों से रजस्तमका विनाश या अविनाश M वेदविहित कोंके करने से सुखादिकों का मार्ग " सत्त्वगुण के बढ़ाने से स्वर्गादिकों की प्राप्ति " सत्त्वगुण के बढ़ने से ज्ञानद्वारा मुक्त होना इति पञ्चमाध्यायः ॥ अथ षष्टाध्यायः॥ ज्ञान, में समुच्चय नहीं कर पहले साधना : वस्था पासना का करना. गीताभाष्यादिमें शकराचार्यको समस्त समुच्चयों का खण्डन करना विना ज्ञान व कर्म के उपासना से मुक्तिका नहीं होना राम गीता में रामजी को लक्ष्मणसे पूर्वोक्त अर्थका कहना.... , ८३ - -" . १ " , . . " ५ " मा. " ८५ १० आनन्दामृतवर्षिणी का सूचीपत्र । ॥ . - ८६ अध्याय. 'विषय केवलं ज्ञान से मुक्ति. साधन में दृष्टान्त.... कर्म में भेद उपासना का अन्तर्भाव अपना को कर्ता, भोक्ता मानकर देहादिमें अहंबुद्धि से मैला होरहना ज्ञान से अज्ञान को नष्ट कर आत्मा को निर्मल करना ज्ञान रूप आत्मा में अज्ञान का रहना इस विषय में शका. कर उत्तरों से समाधान देना सत्त्वादि गुणों की नाना उपाधि स आत्मा में जात्यादि की .. ८७. " कल्पना "८८ १. ८९ .. । '९० " " ९१ " विना विवेक मूों को व्यापारीपत् आत्मा की प्रतीति देहादिकों की लड़ता कह आत्मा को 'चैतन्य कहना सत्, चित् व आनन्द इन तीनों का अर्थ जाग्रत अवस्था में आत्मप्रकाश के विना कुछ नहीं प्रतीत होना स्वप्न व सुषुप्ति में केवल आत्माकाही प्रकाश उपनिषद् में याज्ञवल्क्य व मैत्रेयी के संवाद का निरूपण आत्मा की निर्विकारता व बुद्धिकी जड़ताम शकाकर उत्तरों से समाधान करना जीव व ब्रह्म में कुछेक भेद होने पर बड़ी भयको होना जीव व ब्रह्म में भेद होनेपर पूर्ण ब्रह्मकी भसिद्धता. " रामचन्द्रादि मूर्तियों को मायामय होना .. पञ्चपुराणादि में लक्ष्मीनारायण का संवाद सच्चिदानन्द पूर्ण ब्रह्मको मूों का एक देशी :कहना चक्रवर्ती राजा को एक देशी कहना अनर्थ वेदान्त में विचारवानों के लिये परमात्मा की स्तुति कलियुग में ज्ञानके न होनेपर व्यासादिकों को भक्त्यादि की प्रशंसा करना आधे श्लोक से ब्रह्म को सत्य व जगत् को मिथ्या कहकर जीवको ब्रा कहना इसी ज्ञान को मुक्ति होने में कारणं कहना इति पष्टोध्यायः ॥ अथ सप्तमाध्यायः॥ श्रीशंकराचार्य को हस्तामल का चार्य से प्रश्नकर व उनको .. " ९.२ - " " उत्तर देना १ अध्याय . पृष्ठ " ..९५ ॥ 1. " आनन्दामृतवर्षिणी का सूचीपत्रः। विषय उसी अर्थको दृष्टान्तःव युक्तियोंसे सेक्षेप कहना सच्चिदानन्द रूप में, शंकायें कर उत्तर देना , " कूटस्थ जीव के लक्षणों का निरूपण. अभ्राकाशादि में चार दृष्टान्तों का कहना " शुद्ध चैतन्यादि षट् प्रकारोंका निरूपण , बुद्धि में चैतन्यतासे चिदाभास के होनेपर किसी वस्तु का नहीं अलग होना आत्मा को कहकर ध्याता ध्यानादि त्रिपुटियों का वर्णन....... ज्ञानरूप आत्मा को नहीं जानने पर शंकायें कर उत्तरों से समाधान एक पदार्थ का अनुभव कर दूसरे में लगना इन्द्रियों के विना अन्तःकरण विशिष्ट चैतन्यके किसी क्रिया में नहीं लगना मनकी गतिके चंचल होने पर मनको मनोराज्य करना मूों का कहना बुद्धिमान् को जगत् के रूपादिकों में नहीं चिन्तना करना कांटा के लगजाने पर उसके निकालने का उपाय करना.... अविद्या की उपाधि से पुरुष को.आपही वृथा बधाहुआ ९८ युक्त होनेपर " ९९ .. " मानना १०० . " .." १०१ - मैदानमें तोता पकड़ने के लिये चुगा डालने का. दृष्टान्त.... M कूटस्थ चैतन्य को अपने चिदाभास से अध्यास के द्वारा वन्धनवत् होरहना अविद्या की उपाधि से आत्मा को कर्तृत्व भोक्तृत्व की प्रती- ति होना महा वाक्यों से जीव ब्रह्मकी एकता का सदैव चिन्तन करना आध्यात्मिकादि त्रय सापों का पुनर्निरूपण संसार बन्धन से छूटने के लिये शिष्य गुरू का संवाद वाक्यार्थ ज्ञान में पदार्थ ज्ञान के कारण होनेपर तत्त्वं पदों के अथे का सुनाना प्रश्नोत्तरोंसे आत्मा निरूपण करना विकार व देहादिकों के लक्षी त्वंपदका.वाच्या तत्पदका वाच्यार्थ व तत्वं पदों का लक्ष्यार्थ: जबतक ( अहं ब्रहास्मि ) महा वाक्य का अर्थ हद न होजावे तब तक श्रवण, मननादि करना वेद के तीन प्रस्थानों का निरूपण " है १०२ १०३ न । 7 १२ अध्याय FF, पृष्ठ - आनन्दामृतवर्षिणी का सूचीपत्र। विषयः दृष्टान्तों से श्रवणादिकों के लक्षणों का प्रतिपादन' । । महा वाक्यार्थ ज्ञान को, मुक्ति का कारण कहना इति सप्तमोऽध्यायः ॥ अथाष्टमाऽध्यायः॥ शरीर व इन्द्रियादिकों को नाशवान् जानकर नित्यं विचार, -- ३ . - . -- . । करना ३ " करते रहना 11 - " । - , शंकर जी के कथनानुसार निरन्तर अभ्यास करना एकान्त में बैठकर योगशासप्रणीत भोजन का अभ्यास.... ध्यान व योगादिकों को मुख्य समझकर सदैव ध्यानादिकों को १०६ " पहले मूला ज्ञान के नाश होनेपर पीछे देहादिकों का विनाश आत्मा के आविर्भाव होनेपर वर्णाश्रमादिकों की भ्रांति का नाशं १०७ कारण से कार्य को नहीं अलग समझ ब्रह्म को ध्याते २ ब्रह्म' का होजाना भविद्या के नाश होनेपर निर्विशेष ब्रह्म में लय होना ब्रह्म सुख के समान चक्रवर्ती आदिकों के सुखों का' नहींहोनी आत्माको देख परमेश्वर के देखने में अंनिच्छा जिसकी आभा से चन्द्र सूर्यादिकों को प्रकाशना अन्तः करण के मैले होनेपर गुर्वादिकों में श्रद्धा का अभाव " गुरु कृपा के विना त्रिकालमें ज्ञान का नहीं होना अन्तःकरण की शुद्धिमें श्रीकृष्ण को अर्जुन से ज्ञानोपदेश करना ज्ञानाभिलापी जनको निष्काम कर्म करने की मख्ता, ॥ शुद्ध अन्तःकरणवाले को समाधि साधन की मुख्यता " शुद्धान्तः करणवाले की परीक्षा में प्रश्नोत्तरों से समाधान वैराग्यादिकों से सम्पन्न होकर विचार करना " न्याय,मीमांसा व भागवतादि पुराणोंको समझ मुख्य नियोजन का विचारना ११० • शारीरक भाष्यमें अविरुद्ध पदार्थों का निश्चय , पुराण व वेदान्तादिक प्रणीत.मुक्ति के साधनों का निरूपण " वेदान्त, पूर्वमीमांसा, 'सांख्य, पुराण व चार्वाक तथा न्याय शास्त्र प्रणीत मुक्ति साधनों का वर्णन : अनेक मतों में ब्रहालोक व गोलोकादिकी प्राप्तिको मुक्ति कहना । शारीरक भाष्य में "गुक्ति के अर्थ का निश्चय करना " " . 1 .... " । . . . " ४ . :: " ११३ ११४ । " " .. .... ११६ 9 आनन्दामृतवर्षिणी का सूचीपत्र। 'अध्याय विषय : .:, वेदान्तवालों के कथन, का अनुभव में आना समस्त लोकों को कह स्वर्ग व नरक का वर्णन गीताके कथनानुसार सत्त्वगुणवालों को ऊपरके लोकोंको जाना जगत् का मूलकारण अज्ञान का होना वशिष्ठ को रामजी से अनेक ब्रह्माओं को कहना किसी मुनि को परमेश्वरसे माया देखने का वरमांग धीवर की पुत्री होजाना. , विवाह होनेपर.पुत्रादि कों से सम्पन्न उस लड़की का गंगा नहाने से फिर मुनि होजाना. में पूर्व पति के पूछने पर मुनिको सारा वृत्तान्त कहकर माया छूटना एक पदार्थ में अनेक अवस्थाओं का वीतना, से विचार से वेदा नामत. की सत्यता अन्यमतों की असत्यता. " वेदान्त शास्त्र को त्यागकर अन्य अनात्म शास्त्रों में वृथा. माथा मारना चौदह विद्याओं के नामों का निरूपण. अठारह पुराण अठारह उप पुराण व अठारह स्मृतियों का निरूपण. , निष्प्रपञ्च ब्रह्म में भ्रान्ति से संसार की नाना कल्पना ..... " सृष्टि के समय ईश्वर की चाहनासे परमाणुओं को घणुकादि होकर पृथ्वी आदिहोना.. " जगत्में पृथिव्यादि सत्य पदार्थ व चौवीस गुणोंका निरूपण. में जीव व ईश्वर को व्यापक कहनाः " पृथिव्यादि चार द्रव्यों को परमाणु रूप से. नित्य कहना. आकाशादि पांच द्रव्यों को सदैव रहना, शब्द ब्रह्म से लेकर चार्वाक् पर्यन्तं अष्टोदशमतों को कहकर अनेक मतों को कहना ....' , कलियुग में वर्ण; आश्रम व अनुलोमजादि का निरूपण..... जिनका वेद व स्मृतियों में पता न लगे उनको मनुष्य रचित ११७ ११० 1. . - " ११९ १२० १२१ " " १२२ -- समझना. " ' 'वैदिक उपासनाबालों को अन्तर्याम्यादिकों को ईश्वरकहना पुराणवालों को शिव, विष्णु शत्यदिकों को ईश्वर कहना " विष्णुः शिवादि, रामकृष्णादि, राधा. वल्लभादि नानामतों का निरूपण. नाना मतों में बुद्धिमान् को सत्य मत को विचारना, ....... " ': अध्याय पृष्ठ आनन्दामृतवर्षिणी का सूचीपत्र। विषय तत्त्वम् पदोंके लक्ष्यार्थ सच्चिदानन्द को ही परमेश्वर होना. इसी ज्ञान को मुक्ति होने में कारण कहना, इत्यष्टमाध्यायः ॥ - , " " . F . r १२३ 1 .." १२४ " अथ.नवमाध्यायः॥ ९ देहादि के साथ तादात्म्यतासे अहं बुद्धि को अज्ञान कहना, भामा के शुद्ध, परिपूर्ण आदि विशेषणों का निरूपण, आत्मा व देहकी एकता में वड़े अज्ञान को कहना. 2 आसुरी सम्पदावालों के अवगुणों का निरूपण, श्रीभगवान् को अर्जुन से पापकारणों को कहना.. देहादिकों से परे आत्मा का आश्रय ले कामरूप वैरी का मारना. , ऐसेही किसी गुरुको शिष्य से उपदेश देना, स्वर्गादि पदार्थों को भोगने के लिये विदेह मुक्तिको नहीलेना प्रति दिन अपने किये पुण्य के होने पै क्षय दोष कहना. .... श्रीभगवान् को स्त्री आदि भोगों को दुःखोंका कारण कहना, काले कम्बल पर अन्यरंगका नहीं चढ़ना. ज्ञानी के आचारण को कुछेक अन्यथा प्रतीति होने पै मूर्ती " १२५ " . " " १२६ को बकना, १२७ १२८ १२९ ज्ञानीके लक्षणों को मूखों को नहीं जानना. दोष रष्टि से कामनादिकों को त्याग जीवन्मुक्ति का संपादन करना, श्रीभगवान् को मनोराज्य करने में क्षतिको कहना. मनोराज्य को जीतकर ज्ञान द्वारा मुक्ति का होजाना. इति नवमोध्यायः ॥ अथ दशमाध्यायः॥ १० जीवन्मुक्ति के लिये अन्य साधनों के करने से कामादिको को जीतना. " जीवन्मुक्तिके ज्ञान, रक्षादि पांच प्रयोजनों का वर्णन, " शिष्य, भक्त व तटस्थ इन तीन प्रकारों का निरूपण, सन्मांगी, असन्मार्गी भेदसे तटस्थ के २ प्रकार, संसार के व्यवहार में धनादि सञ्चय से अनेक दुःखहोना.. आत्मा में लगाये चित्तवालों को अनन्त सुख. " जीवन्मुक्ति के लिये अष्टांगयोगों का वर्णन. । 4 . " : -- पृष्ठ . .... " " १३६ " " L आनन्दामृतवर्षिणी का सूचीपत्र । १५ 'अध्याय विषय पातंजलि शास्त्र में निश्चित अष्टांग योगोंके अर्थों का नि- श्चय करना.. स विकल्प व निर्विकल्प भेद से समाधि के दो प्रकारों का निरूपण, १३२ समाधि करने के समय लयादि चार विघ्नों का होना, ५ काय तथा रसा स्वाद का निरूपण, " चित्तं विनाशने के लिये वशिष्ठ को ज्ञानादिदो मार्गोकाकहना. १३३ चित्त वृत्ति निरोध करने को चार प्रकारों का निरूपण..... अन्तःकरण के निरोध होने से पराशान्ति की प्राप्ति, १३४ शास्त्र विहित शयनादि करने पर योग सिद्धिका होना. निश्चय कर योगादिकों में अवश्य अभ्यास रखना, १३५ अभ्यास करते योगी को ब्रह्मतत्त्व की प्राप्ति " भगवान् जी के कथनानुसार योगी को सम दृष्टि रखना. योगको असंभव मानते हुये अर्जुन को कृष्ण जीसें कहना, वशिष्ठजी को राम से मनोनिग्रह की कठिनता कहना, १३७ कृष्णको अन्तःकरण की वृत्तियों के सूक्ष्म होजाने को मनो- निग्रह कहना. काँका अनुष्ठान नहीं करने पर स्वर्गादिकोंकी अप्राप्ति..... पूर्वाभ्यास काही योग भ्रष्टको विषयोंसे हटाकर ब्रह्मनिष्ठकरदेना.....१३८ जन्मान्तरों में निष्पापी जन को ब्रह्मानन्द में पहुंचना.. १३९ जीवन्मुक्ति के अन्य साधनों का सुनाना. कान्ता, काञ्चन इन दोनों आवसोंमें तीनों भुवनोंका.घूमना..... सर्वपदार्थों को दोष दृष्टि से देखकर असंग रहना, १४० १४१ शुद्धा, मलिना, लोकवासना आदिकों का निरूपण. ज्ञानी को सदा सन्तुष्ट रह मनको वशकर मौन रहना. १४२ भगवान को अर्जुन से जीवन्मुक्ति के लक्षणोंका कहना. संसार को मिथ्या जान शरीर को क्षणभंगुर समझना, १४३ भागवतों में मुक्ति चाही 'जनको स्त्री संगी का संग त्यांगना. एकान्त में बैठ आलस्य का त्याग स्वरूप का चिन्तनकरना. १४४ नी संगी के संग त्यागने में दृष्टान्तों का निरूपण, १४५ परोक्ष ज्ञान और अपरोक्ष ज्ञान का कीर्तन परोक्ष ज्ञानी के किये पापों को परोक्ष ज्ञान को अग्निवद्ध स्म करदैना. समस्त संसार को दूरकर अपरोक्ष ज्ञानी को जन्मसे हीन होकर परमानन्द को प्राप्त होना, ":

I --- अध्याय ,' पृष्ठ , 3 .... 7 " + । - १६. आनन्दामृतवर्षिणी का सूचीपत्र । विषय गोपी वखापहारी विहारीजी का कीर्तन कर उनको वारम्वार . नमस्कार करना. आनन्दगिरिजीको आनन्दामृतवर्षिणी को समाप्त कर संवत्सर. :. मासादि का निरूपण करना. १४६ इति दशमाध्यायः ॥ शङ्कराचार्यप्रणीत प्रभोत्तरमणिरत्नमाला का निरूपण.. १४६ इत्यानन्दामृतवर्षिण्याः सूचीपत्रं समाप्ति पफाण ॥ पंचदशी॥ ऐहिकामुध्मिकत्रातसिद्धमुक्तैश्चसिद्धये । बहुकृत्यपराभूयत्तत्सर्वमधुनाऋतम् ४० तदेतत्कृतकृत्यत्वं प्रतियोगपुरस्सरम् । अनुसंदधदेवायमेवंतप्यतिनित्यशः ४१ दुःखि नोज्ञास्संस्नरन्तुकामपुत्राद्यपेक्षया । परमानन्दपूर्णोऽहंसंस्मरामिकिमिच्छया ४२ अ मुनिष्ठन्तिकर्माणिपरलोकपियासवः । सर्वलोकात्मकःकर्मत्वनुतिष्ठामिकिंकथम् ४३ वाच्यक्षतान्तशास्त्राणिवेदानध्यापयन्तुवा। येऽत्राधिकारिणोमेतुनाधिकारोक्रियत्वतः ४४;निद्राभिक्षेस्नानशौचनेच्छामिनकरोमिच। , दृष्टारश्चेत्कल्पयतिक्रिमेस्यादनुकल्प नात् ४५ गुंजापुंजादिदह्येतनान्यारोपितवह्निना । नान्यारोपितसंसारधर्मानेवमहंभजे ४६ शृण्वत्वज्ञाततत्त्वास्तेजानन्कस्माच्छृणोम्यहम् । मन्यन्तांसंशयापन्नानमन्येऽह मसंशयः ४७ विपर्यस्लोनिदिध्यासेन् किंध्यानमविपर्यये । देहात्मत्वविपर्यासनकदा चिद्भजाम्यहम् ४८ अहंमनुष्यइत्यादिव्यवहारोविनाध्यमुम् । विपर्यासचिराभ्यस्त वासनातोऽवकल्पते ४६ प्रारब्धकर्मणिक्षीणव्यवहारोनिवर्तते । कक्षियेत्वसौनै वशान्येद्धयानसहस्रत: ५० विरलत्वंव्यवहतेरिष्टंचेद्धथानमस्तुते । अवाधिकाव्यवह तिपश्यन्ध्याचाम्यहंकुतः ५० विक्षेपोनास्तियस्मान्मे नसमाधिस्ततोमम । विक्षेपोवा समाधिर्वा मनसःस्याद्विकारिण: ५२ नित्यात्मभवरूपस्य कोमेवानुभव:पृथक् । कृतं कृत्यप्रापणीयं प्राप्तमित्येवनिश्चयः ५३ व्यवहारोलौकिकोवाशास्त्रीयोवान्यथापिवा । ममकर्तुरलेपस्ययथारब्धंप्रवर्तताम् ५४ अथवाकृतकृत्योऽपिलोकानुग्रहकाम्यया । शास्त्रीयणवमार्गेण वहिकाममक्षतिः ५५. देवार्चनस्नानशौचभिक्षादौवतांवपुः । तारंजपतुवाक़्तद्वत्पठित्वाम्नायमरतकम् ५६ विष्णुंधलायतुधीर्यद्वाब्रह्मानन्देविलीय ताम् । साक्ष्यहकिञ्चिदप्यत्रनकुर्वनापिकारये....५७ कृतकृत्यतयांवृतः प्राप्तप्राप्यतया पुनः । तृप्यन्नवंस्वमनसा मन्यतेऽसौनिरन्तरम् ५८ धन्योऽहंधन्योऽहंनित्यस्वात्मान मंजसावेद्मिधन्योऽहंधन्योऽहंब्रह्मानन्दोविभातिमेस्पष्टम्धन्योऽहंधन्योऽहंदुःखं संसारिकंनवीक्ष्येऽद्य । धन्योऽहंधन्योऽहंस्वस्याज्ञानंपलायितकापि ६. धन्योऽहंधन्यो ऽहंकर्त्तव्यमेनविद्यतेकिञ्चित् । धन्योऽहंधन्योऽहंप्राप्तव्यंसर्वमवसम्पन्नम् ६१ धन्यो .ऽहंधन्योऽहंतप्रेमकोपमाभवेल्लोके । धन्योऽहंधन्योऽहंधन्योधन्यःपुन:पुनर्धन्यः ६२ अहोपुण्यमहोपुण्यफलितफलितंदृढम् । अस्यपुएयस्यसम्पत्तेरहोंवयमहोवयम् ६३ अहाशास्त्रमहाशास्त्रमहोगुरुरहोगुरुः। अहोज्ञानमहोशानमहोसुखमोलुखम्६४।इति।। .

आनन्दावृतबर्षिणी॥
मल॥
।
।
'श्रीसच्चिदानन्द स्वरूप जो इंन्दिरेश्वर ।।
- टानोलक्ष्मी और शोभा और मायाकू कहते हैं
तीनों करके अर्थ लगता है सचिदानन्द लक्षमीपतिशोभा-
शन माया के स्वामी माया करके युक्त परन्तु विशेष यों
है सच्चिदानन्द मायाके स्वामी सचिदानन्द में तीन पद
हैं. सत् चित् श्रानन्द अब यो देखनाचाहिये कितीनपद
क्यों कहे इसका यो कारण है जो केवल सत् कहते तो
न्यायशामवाले आकाशकुंभी सत् कहते हैं सो वह जड़
है इस लिये चित्भी कहा वह दुःखरूप वा श्रानन्दरूप
है इसलिये आनन्दभी कहा और सत्ता दो प्रकार कीहै
व्यावहारिकी पारमार्थिकीव्यावहारिकसत्तावह है जो दे-
हादिमें है और पारमार्थिकीसत्ताजो सच्चिदानन्द ब्रह्ममें
है इस जगह पारमार्थिकीसत्तासे प्रयोजन है इसीप्रकार
चैतन्यता आनन्दताभीव्यावहारिकी पारिमार्थिकी भेदसे
दो प्रकारकी है।
Els rho
.

२.. आनन्दामृतबर्षिणी। सू० इन्दीवर इन्द्रमणी के सदृश जो सुन्दर रमा कर कैलालित्यहँ पादपङ्कज जिन्होंके ऐसे जो॥ टी इन्दीवर इन्द्रमणी दो विशेषण-देवका यो प्रयोजन में भक्तों के लिये तो इन्दीवर की सहशकोमल और दुष्टों के लिये इंद्रमणी की सहश कठिन हैं। सू०। रामेश्वर और वंदी कियेहैं इंद्रके रिपोके वृंद जिन्होंने ऐसे जो सुरेश्वर और आनंद है वीर्य जिन्हों का थे में जो परमेश्वर! और मंद मुसुकान करके आनंद किये हैं लोकों के लंद जिन्होंने ऐसे जो नंदजीके नंदन और आत्मरूप करके चिन्तवन करते हैं जिन्होंकू सन- कुमार सनातन सनक सनन्दन और.चंद्रवंश में भक्तों के लिये अवतार है जिन्होंका ऐसे जो श्रीकृष्णचंद्र वसु- देवजीके नंदन उन्होंको मैं वंदन करताहूं हे अमरवर! आपके गुणोंके अंतका नहीं जाननेवाला ।। टी। परमेश्वरके गुण दो प्रकारके हैं प्रथम में दो भेद हैं ऐसे जैसे अंजअव्यक्त अद्वैत अमरादि जोनि- घेध करके कहे जाते हैं दूसरे सत् चित् आनन्दादि जो प्रतिपादन करके कहे जाते हैं और दूसरे राम कृष्णादि सगुण ब्रह्मा के गुण श्याम शांताकार करुणाकर भक्त- वत्सलादि । जो तर उसकी स्तुति, जो आपके सहशान हो तो क्या आश्चर्य है क्योंकि ब्रह्मादिकी भी स्तुति आपके संदेश नहीं है और जो यों कहो यथामतिस्तुति करनेवाले सव निर्दोष हैं तो हे दीनातिहर! मेराजो इस प्रानन्दामृतवर्षिणीक लिखने में यो परिकर सोभी नि:- प है . *.

. आनन्दामृतबर्षिणी। हे भगवन् ! आपकीमहिमा मनवाणीका तो विषय नहीं है और वेदभी अतयात्तिकरके चकितहुये आप- की महिमाकू कहते हैं सो। दी। अतयारतिका अर्थ यो है. कहेकं, आवत्ति विशेष कहेंकू व्यावृत्ति औं अतत् के बारम्बार कहेकू अतव्यावृत्ति कहते हैं अतत् का अर्थ यो हैनहीं है तत् सो नहीं है तत्ब्रह्म कू कहते हैं तात्पर्य यो है श्रुतिने कहकहकर जो निषेध किया है सो नहीं है इसीकू अत्त- व्यावृत्ति कहते हैं शास्त्र की रीति से अतत् का अतद् बोलाजाता है। मू। महिमा किसके स्तुति करने योग्यहै और आप के कितने गुणहैं यों कौन कहसके फिर आप किसका दिन षय होसते, परंतु अर्वाचीन पदके अर्थात् अवर पदक्के । टी। जिस करके जानाजावे उसको पदकहते हैं ब्रह्मके दोपदहें एक अवर अर्थात् उल्लांसगुण दूसरा पर अर्थात् परलानिर्गुण ॥ म० । विषयमें किसकामन नहीं लगता है भौर किस की बाणी यों नहीं चाहती है कि परमेश्वरका कीर्तनकरना चाहिये परन्तु बिना आत्महत्यारे के संसारमें तीन प्रकार के पुरुषह युक्त १ मुक्तिकी इच्छावाले २. विषयी ३. मुक्त तो शुक सनकादिज्ञानीजन सदा आपके गुणोंकाकीर्तन करते रहते हैं मुक्तजन ब्रह्मानन्द कू अनुभव करते हुये स्मरण करते हैं कि..यों ब्रह्मानन्द परमेश्वरकी कृपा है और मुक्तिकी इच्छावालों कूसंसाररूप रोगकी याही प्रः रमेश्वर का कीर्तन करना परम औषध हैं २ और वि. -- आनन्दामृतवर्षिणी। षयोजनों के आपके चरित्र विहारादि परमप्रिय लगते हैं हेभक्तप्रिय! बृहस्पतिआदिकी जोस्तुति क्या आपके आश्चर्य है. तात्पर्य कुछ आश्चर्य नहीं है क्योंकि समस्त परम अमृत रूप मधुर कोमल कोमल. वाणी सव आपहीकी कहानी हैं और जो यों कही फिर तुम्हारी वाणी क्या आश्चर्य होगी हे परमेश्वर ! मेरी बुद्धिमें तो यो अर्थ निश्चय कियाहै अपनी बाणीकं आपके ग- गोका कथन करके पवित्र करताहू प्रार्थना यों है हे कृष्णचन्द्र ! मेरी यो बालक कीसी हठ जानकर आपने सर्व प्रकार क्षमाकरनी ग्रन्थ के आदि मध्य अन्त में निर्विघ्न समाप्ति के लिये और आस्तिक मार्गप्रतिके लिये शिष्टाचारानुमित्त और श्रुति बोधित जो तीन प्र- कारका मंगल नमस्कार आशीर्वाद वस्तु निदेशहोता है सो यहां तक भंगलाचरण है। विद्वजनों से प्रार्थना यो है जो यो मेरी भाषा में लिखा है.जो श्रुति स्मृति वेदान्त शास्त्र से विरुद्ध हो तो अंगीकार नहीं करना और जो किसी जगह प्रकरण संगति पुनरुक्तिआदि दोष प्रतीत होतेहों तो बनादेने और जो यो भाषा अच्छी न होवें और तात्पर्यवक्ताका भले प्रकार न प्रतीत होताहो तो जैसी विद्वान् पसन्द करें वैसीही लिखदेनी और परमेश्वर के स्वरूपका जो इसके बिचारने में चितवन करने में आता है इस गुण करके अंगीकार करना योग्य है. कुछ वाणी की चतुराई तो इसमेंहै नहीं और जो कहीं बुद्धि के भ्रमसे अन्यथा लिखागया हो उसको येनादेना तत्पर्य सर्वप्रकार आप ६ ५. • - आनन्दामृतबर्षिणी। को भी क्षमा करनी योग्यहै मेरे अभिप्रायकू विचारना चाहिये बक्ताका इसके लिखने में क्या अभिप्राय है सो सुनो मेंहीं लिखे देताहूं श्रीकृष्णचन्द्र ने गीताशास्त्र में कहा है इस गीताशास्त्रकं जो मेरे भक्तोंकू धारण करा- वेगा तो मेरेविषे परम भक्ति करके मुझकू प्राप्तहोवेगा और स्वामी विद्यारण्यभारतीतीर्थजी ने पञ्चदशीमें कहा है किसी उपाय करके ब्रह्माका सदाचिन्तवन करना जो एकान्त में बैठना तो ब्रह्महीका चिन्तवन करना और जो दूसरेसे परस्पर बात करनी तो ब्रह्महीकी करनी और जो किसीकू कथन करना तो ब्रह्महीका करना यों जो एक पर होनाहै इसीकू विद्वान् ब्रह्माभ्यास कहते हैं तो मुझकू यो उपाय ब्रह्मकेचिन्तवन करनेका अच्छा प्रतीत होताहै ।। म० । पञ्चदशी वेदान्तसार तत्वानुसन्धान श्रीभग- वनीताटीका सहित और आत्मबोधादि पोथी समीप रखकर जितनी मेरी बुद्धिं थीं उन्होंकू विचार विचार जो सीधा खुलासा अर्थ बालकों की समझमें आवे औं अर्थ आनन्दामृतवर्षिणी में लिखा है बुद्धिमान् से इस आन- न्दामृतवर्षिणीकू एक बेर श्रद्धा भक्तिकरके और चित्त एकाग्र करके कुतर्क के बिना सद्गुरू से जैसे गुरु वेद गीतामें लिखे हैं तात्पर्य वेदशास्त्र के तात्पर्य जानने वाले और ब्रह्मनिष्ठ उन्हों से सुनना योग्य है जो केवल वेदशास्त्रार्थ के जाननेवाले हैं और ब्रह्मनिष्ठ नहीं वे विज्ञानं अनुभव नहीं कहसकेंगे और जो केवल ब्रह्मनि- छह वे युक्ति दृष्टांत शंका समाधान पूर्वक नहीं कहंसकेंगे इसलिये वेदशालार्थ के जाननेवाले और ब्रह्मनिष्ठं गुरु

आनन्दामृतवर्षिणी।
बोलें सुनना योग्य है जो इसमें अनुष्ठान कहा है उसक
सुननेवाले की इच्छा हो करो का मत करो तात्पर्य यो
है जो सुनेगा तो अपने आनन्दके लिये आपली अनु-
छानकरेगा दृष्टांत कहते हैं एक राजाथा कभी पंडितों के
कुछ न देताथा न कभी कथा सुनताथा किसी विद्वान्ने
सबः पण्डितों से कहा कि तुम राजाले कहो हे राजन!
• आप हमारी कथासुनो धन दो वा न दो पण्डितोंने कहा
महाराज तथा अनधिकारीले कौन माथा मारे प्रयोजन
के बिना तो मन्दभी नहीं प्रवृत्त होताहै विद्वान्ने उन्हों
कूदृष्टांत दिया जो केलीगेह की देहलीमें तरुणत्री दूध
पीहुई किसी प्रकार प्राप्त होजावो फिर मैथुनकी इच्छ
करो वा मत करो अब दृष्टांत और दार्टीत विचारो क्या
ओ सजा पाषाणहै जो पण्डितोंकी कथा सुलकर मुक्तिके
लिये धर्म दानादि नहीं करेगा और क्या वो स्त्री पत्थर
है कि उसक ऐसी जगह अपने आनन्द के लिये कामका
आविर्भाव नहीं होगा ऐसेही या इसग्रंथका सुनने
वाला पाषाण है जो निरतिशय आनन्दके लिये अनु-
ष्ठान न करेगा।
टी है जिससे सिवाय और किसी जगह नहालो
कादि में आनन्द नहीं ।
म। जो अर्थ इस श्रानन्दामृतवर्षिणी में लिखना
उस की संगतिके लिये जहाँ यो लिखेंगे प्रथम ज्ञान
के चार साधन हैं यहां तक उपोद्घाल कथाहै सो सुनो।
टी. वांछित अर्थ के मन में रखकर प्रथम और
प्रसंग कहना।।
+
.
भा
--

आनन्दायतबर्षिणी। ७ भू० । जो एक चैतन्य महानंद शुद्धब्रह्म नित्यमुक्त सोमायोपहित हुआ ईश्वर १ और ओही चैतन्य सम- ष्टि सूक्ष्म उपाधि करके उपहित हिरण्यगर्भ २ और वोही चैतन्य समष्टि स्थूल उपाधि करके उपहित विराट् ३ इन तीन भावोंकू प्राप्त होतो. भया और ओही चैतन्य अविद्योपहित हुआ प्राज्ञ 3 और व्यष्टि सूक्ष्म उपाधि करके उपहित तैजस २ और व्यष्टि स्थूल उपाधि कर के उपहित विश्व ३ इनतीन भावों कू नानाप्रकार का जीव होता भया फिर ईश्वर जीवोंके धर्म अर्थ काम मोक्ष के लिये सृष्टिं स्थिति संहार कू करते भये धर्मादि में मोक्ष मुख्य है और तीनि धर्मादि गौण हैं और धर्मादि तीनके दो दो फलहैं मुख्यफल परम्परा करके तीनोंका 'मोक्षहै और स्वर्गादि गौण हैं धर्मका मुख्य फल मोक्ष है और स्वर्गादि गौण हैं स्वर्गादि फल जो वेदोंमें कहे हैं वे ऐसे हैं जैसे बालककी शोभाके लिये कानछेदन क- राना और मोदकादिको फल कथन करदेना अभिप्राय तो उन्हों का जोहै सो है श्रुति माताके सहश हित । टी । परिणाम अन्तमें सुखहो जिसके । मू। चाहनीवाली है जैसे किलीका पुत्र रास्तेकी मृत्तिका खायाकरताथा उसकी माता ने उसकू बहुत-ब रजा उसने न माना हारकर मातीन कही हे पुत्र! योग- गाजीकी मृत्तिका खायांकर बहुत सुन्दर है विचारों माता का अभिप्राय गङ्गाजीके मृत्तिका के खिलाने में नहीं है रास्तेकी मृत्तिकाके वर्जन में उसका अभिप्राय है ऐसेही वो मूर्ख जीव रास्ते की मृत्तिकाकी नाई शब्दादि विषयोंकू .

८.
आनन्दामटतवार्षिणी।
इष्ट जानता है श्रुति ने यो समझा इन विषयों से तो
स्वर्गादि अच्छे हैं तात्पर्य तो श्रुतिका मुक्ति में है इसी
हेतु से मोक्ष मुख्य है.और उपालना- इसलियेहै किसी
का पुत्र जगह जगहस्था-फिरताथा समेसिर नहीं हाथ
आता था उसके पिता ने विचार कर पुत्रसे कहा कि त
इस मकान पर बैठारहाकर कुछ उसकं लालच देदिया
तात्पर्य जब काम पड़ेगायहांसे बुलालंगा वैसेही यो मन
कहीं यज्ञदानादि के फल स्वर्गादि में कहीं शब्दादि
विषयों में मृगतृष्णावत् भूला भागाभागा फिरताथा
कभी श्रम नहींहोताथा जो अात्मस्वरूप का विचार करे
इसलिये श्रुतिमें एकायचित्त के लिये उपासना कही है।
विचार देखो एकाग्रचित्त के बिना श्रवण मनन निदि
ध्यासन ये जो मुख्यसाधन मुक्तिके हैं सो नहीं हो सकते
हैं.१,इसी प्रकार अर्थ जो अशरफी रुपयादि करके
जगतमें प्रसिद्ध होना और जगत्के सुख सम्पादन करने
गौण हैं और रुपयादि खर्च करके धर्म करना की
श्रवणकरना सन्तोका सङ्गकरना तीर्थों का सेवन करना
मुख्यफल उन्होंका भी परम्परा करके मोक्ष है २ ऐसेही
काम अपने सुखके लिये खानापाना और आनन्दके
लिये स्त्रीका सङ्ग और स्थान बस्त्रादि में जो सुख बुद्धि
सो. गौण और भोजनादि वास्ते धर्म के और श्रवणादि
के लिये शरीर की रक्षा करनी और स्त्री का सङ वास्ते
पुत्रकी उत्पत्तिके वो भी किसी अंशमें मुक्तिका हेतु है
इसका भी परम्परा करके मुख्यफल मोक्षहै ३ तात्पर्य
संसारमें पुरुषार्थ मुख्य मोक्षहै वे जो अविद्योपहित

अानन्दामृतबर्षिणी जीव उम्ही मैसे श्रतिस्मृति जो परमेश्वर की आज्ञा है उन्होंकू जो करते भये उन्हों की उपासनाके लिये जैसी उन्होंक मृत्ति परमेश्वर की वॉछित हुई वेही मायोपहित ईश्वर ब्रह्मा विष्णु महेशसूर्य शक्ति गणेशादि मर्तिक धारण करतेभये सो मत्ति कैलास वैकुण्ठादिमें और भक्तों के हृदय में सदा बास करती रहती है वे जो विष्णु भग वान् हैं सों भक्तोंके उद्धारकै लिये जो ऐसे भक्त है कि सदा जो परमेश्वर की आज्ञा उसकें करके शुद्ध किया है अन्तःकरण जिन्होंने और शम द्रमादि साधनों करके युद्ध मोक्षकी इच्छावाले परन्तु बहुत गम्भीर जो ऋग् यजुस्लाम अथर्वण वेद उनके विचारने में असमर्थ और बिना विचार के ज्ञान नहीं होताह जैसे पदार्थका भानु बिना प्रकाशके इसलिये उनकं ब्रह्मतत्त्व विचारनेके लिये श्री कृष्णचन्द्र अवतार लेकर चारों वेदोंका अर्थ जोकि मुख्य मोक्षका साधन है अर्जुन के निमित्त करके गीता शास्त्र रचतेभये और वेही विष्णुव्यासदेव अवतार लेकर भाग- वतादि पुराण भारतादि इतिहास रचतेभये जिन्होंमें कः म उपासना ज्ञान तीनों हैं प्रसंगसे गीताकभी महाभारत के बीचमें लिखा और जोवेदान्त वेदोंको सिद्धान्त जिस वेदोंका मस्तक कहते हैं उसे सिद्धान्तकं फिर सत्रों में कथन करतेभये तात्पर्य कई कई श्रुतियोंका अर्थ एक एक सूत्र में संक्षेपकरके कहा वेंजोसूत्र और गीता शाश्च उन को जो अर्थ सोनी बहुत गम्भीर और परमेश्वर का अ- भिप्राय परमेश्वरजानया जिसपर उनकी कृपाहो वोजाने पीछेड़नके कलियुगकेंजीवननेहठकरके पण्डिताईनल ४ आनन्दामृतवर्षिणी। से अपने अपने मतमें व्याससूत्र और गीताजीका अर्थ वनालिया जोअभिप्राय श्रीकृष्णचन्द्र और व्यासदेवजी का था वह सिद्ध नहुमा ज्ञानकाण्ड जो साक्षात्मुक्तिका हेतुथा लोपहोगया तब सब देवता विष्णु ब्रह्मादि जुर कर श्रीमहादेवजी के पास गये सारी ब्यवस्था कही महादेवजीने कहा हम वेदमार्गकी प्रवृत्ति के लिये अ. वतारलेंगे आप भी सब ब्रह्मा इन्द्रादि अवतारलो फेर महादेवजी महाराज तो श्रीशंकराचार्य नाम करके और विष्णुजी सनन्दन नाम करके और ब्रह्माजी मण्डनमिश्र नाम करके सरस्वतीजी के सहित और इन्द्र सुधन्वा राजा नाम करके तात्पर्य इसी प्रकार बहुत देवता अ वतार लेतेभये क्योंकि जब ज्ञानकाण्ड का लोप हो. ताहै. तब महादेवजी अवतार लिया करते हैं और सब मतवालों से शास्त्रार्थ करके सब झूठे मतों का ख- एडन करके जो सार सिद्धान्त वेद भगवान् का है उसकुँ स्थापन किया करते हैं राजाका अवतार इसलिये, हुआ जो शास्त्रार्थमें झूठी कुतर्क और हठ करेगा और शास्त्रार्थ-होकर उसका मत खण्डनहोजावे फिर दुराग्रह सेनमाने अथवा बहुत जुरकरसामना करेंतोराजा उनकं दण्ड देंगे पीछे अवतारसेवा ६वर्षकी अवस्था में श्रीशंक- राचार्यजी ने संन्यास लेकर १६ वर्ष की अवस्था में १६ भाष्य रचे १० उपनिषद्पर ११ भाष्य व्याससूत्रों पर एक शारीरक भाष्य विष्णुसहस्रनामभाष्य गीता सनत सुजात भाष्य नृसिंहतापिनी भाष्यतात्पर्य उप- निषद् मीतादिका अर्थ भलेप्रकार श्रुति स्मृति युक्ति 1 आनन्दामृतवर्षिणी। .११ दृष्टांत प्रमाण देदेकर सिद्ध किया और जोगीताभाष्या दि के विचारनेमें असमर्थ देखें उनके लिये प्रात्मबोधा- दि छोटे छोटे प्रकरणों में वोही अर्थ संक्षेपकरके लिखते भये फिर सब धादियों, कू शास्त्रार्थ में जयकरक दिग्वि- जय करतेभये जो वेदोंकासारसिद्धांत तथा उसकू प्रकट प्रचार करते भये ऐसा ऐसा शास्त्रार्थ हुत्रा.वालीस दिनतक मण्डनमिश्र से चरचा रही मण्डनमिश्र की स्त्री सरस्वतीजीका अवतार साक्षीथीं उसने पुष्पों की माला दोनों के गलेमें डालदीथी कह दिया था जिसकी माला सूखेगी वोही हारेगा चालीस दिन के पीछे मण्डन मिश्रकी माला सखगई इसीप्रकार बहुत जगह शास्त्रा- थ हुश्रा और चारोदिशा में महाराज गये उनके अब- तक ज्योयशी आदि मठ चारोंदिशा में विद्यमान हैं और कपालीआदि ने जो सामनाकिया वे कुछ महारा- जने मंत्रों से मारे कुछ राजा ने मारे, विस्तार इस'कथा का तीन दिग्विजय ग्रन्थ हैं उनमें बहुत है तात्पर्य गों है जो अच्छे बुद्धिमान हैं उनके लिये तो शारीरक मा- प्यादि बड़े २ ग्रन्थ रचे और जो मन्दबुद्धि हैं उनके लिये आत्मबोधादि छोटे २ प्रकरण रचकर ३२ वर्षकी अवस्था में महाराज तो कैलास के जाते भये फिर जो पद्मपदादि महाराज के मुख्य शिष्य थे उन्होंने भी बहु- त ग्रन्थ रचे स्वामी आनन्दगिरिजीने तो सब भाष्यादि ग्रन्थोंपर टकाकरी और सुरेश्वराचार्य महाराजने बा- तिक बनाया पीछेउनके स्वामी शंकरानन्द भगवान और . विद्यारण्यादिजी ने आत्मपुराण और पंचदशी वेदान्त १२ आनन्दामृतबर्षिणी। सारादि-बहुत सहस्त्राणि ग्रन्थ रचे वे ग्रन्थ अवतक तो परमेश्वरकी कृपासे सूर्यवत् इसलोक में प्रकाश रहेहैं ।। ...अब इस समय में ऐसे जो परमेश्वरके भक्त कि जिन की गुरु परमेश्वरले श्रद्धा भक्ति और उनकी यथाशक्ति आज्ञा करनी परंतु आत्मबोधादिप्रकरणों के विचारने में भी असमर्थ उनकू सुखपूर्वक ब्रह्मतत्त्व विचारने के लिये और मुख्य सुशीबंशीधरजी, कायस्थ भटनागर रहनेवाले श्रीगंगा यमुनाजीके मध्य में इन्द्रप्रस्थसे २२ कोश पूर्वदिशा में श्रीकन्दरापुरी प्रसिद्ध सिकन्दराबादके लिये कैसे हैं. वे मुंशीसाहब कि जिन्हों के रूपलक्ष्मी वि- या.तेज हुक्म और साम दाम क्षमा औदार्यादि बहत्त गुण करके युक्त पतिव्रता स्त्री फिरयो आश्चर्य कि ऐसे समय में सत्संगी परमेश्वरमें भक्ति गंभीरादि गुणकर- के युक्त तात्पर्य ऐसे सज्जन बुद्धिमान इस समय में होने कठिन हैं जिनक व्यवहार में राज और परमार्थ में विद्वान् सराहना करते हैं उनकी श्रद्धा भक्तिपूर्वक प्रार्थ- ना से उनके उपवन अन्तर्गत मकान कोठी में ठहरकर और श्रीस्वामी आत्मागिरिजी महाराज रहनेवाले प्रथम जरातके जिनक वेदान्तशास्त्र का अर्थ करामलकवत् उनके सहायसे श्रीमत्परमहंस परिव्राजस्वामी सलू कगिरिजी महाराजका अनुचर शिष्य स्वामीजी के. च. रणकमलोंका पूजनेवाला मैं आनंदगिरि इस आनन्दा- मृतबर्षिणीका बनानेवाला स्वामीजी और श्रीकृष्णचन्द्र महाराज की कृपासें आत्मबोधादि छोटे छोटे प्रकरणों में जो मैंने अर्थ सुना है उसमें से भी स्वल्प यथामति '. - -- . आनन्दामृतवर्षिणी। और श्रीमद्गीताका भी अर्थ किसी किसी जगह इस आ- नन्दामृतवर्षिणी में लिखूगा ॥ प्रथम ज्ञानके मुख्य चार साधन हैं उनकूलिखतेहैं ।। . विवेक १ वैराग्य २ शमादि षट्सम्पत्तिः३ मुमुक्षुः ता. ४. अर्थ इनका यों है। - इस संसारमें नित्य अनित्य क्याहै.और विचार करते करते यो निश्चय करना कि आत्मा नित्य और आत्मासे एथक्-सब अनित्यहै । यहांके देखें सुने जो पदार्थ स्त्री चन्दनमालादि परलोकके जो सुने अमृत नन्दनवन दें- वांगनादि सब• अनित्य- दुःखदायी जानकर मनकी इच्छापूर्वक संवकू त्यागदेना फिर उनमें दीनता न होनी ब्रह्मलोक • तृणवत् जानना २ तीसरे में ६ भेद है शम १ दम २ उपरति.३ तितिक्षा ४श्रद्धा समाधान इनका अर्थ यों है मनादि अन्तःकरणकी संकल्पादि वृत्तियों करोकना वेदान्तशास्त्र के श्रवण मनन निदिध्या- सन के बिना ३.श्रोत्रादि इन्द्रियों कंशब्दादि विषयों से रोकना देहयात्रा और श्रवणादि के बिना २ यम निय- मादि साधनों से अन्तःकरण कं निरोध करके ॥ टी । अहिंसा १ चोरी न करनी २सत्य बोलना ३ ब्रह्मचर्य अपरिग्रह अर्थात् शरीरयात्रा से सिवाय स- ग्रह न करना ५ इन पांचका नाम यमहे ।। और शौच संतोष रतप ३. स्वाध्याय अर्थात प्रणवका जप ईश्वर प्रणिधान अर्थात परमेश्वर में भक्ति ५-इ- पांच का नाम नियमहै। म० । सब लौकिक नैतिक कर्मों से उपराम होना ब्र- आनन्दामृतबर्षिणी ह्मतत्त्व विचारने के लिये देहयात्रामात्र क्रिया करनी और जागत् अवस्थासुषुप्तिवत् रहनी इसीका नाम उप- रतिहै ३ श्रवणादिमें जो जो दुःखसुख पड़े सबकू सह- जाना ४.जो वेदान्तशास्त्र और गुरुज्ञान के देनेवाले क- हते हैं उन में विश्वास करना कि इसी प्रकार है ५ श्र- वणादि के समय भलेप्रकार चित्तकं समाधान करना । तीसरे साधनके भेद होचुके चौथे साधनका यों अर्थ है मुक्तिको मुख्य पुरुषार्थ समझकर मुक्तिको नित्य इच्छा- रखनी ।। मुक्तिके ये चार साधन मुख्य हैं और सब साधनोंका इनमें अन्तर्भावहै जो इनका भलेप्रकार अनुष्ठानकरे तो और किस साधनकी अपेक्षा नहीं है सब साधनोंका यों तन्त है। ग्रंथ में जो चार अनुबन्ध होते हैं उनकें लिखते हैं । अधिकारी १ विषय र सम्बन्ध ३.प्रयोजन ४ इनहीं चार साधनों करके जो सम्पन्न सोइस ग्रंथके पढ़ने सुनने का अधिकारी जीवन ब्रह्मकी एकता इसमें विषय है। यो ग्रंथयोधक और ग्रंथबोध्य इन दोनों का बोध बोध्यक भाव इसमें सम्बन्ध है ३ संबं शोक दुःखों की नित्ति और परमानन्द की प्राप्ति जिसकं मोक्ष कहतेहैं यों इस का प्रयोजन है ४ इसमें दृष्टांत यों है जैसे रसोई में अ- नका भूखा तो अधिकारी , और जो अन्न में मधुरादि स्वादुहें सो विषय २ और अन्न वर्तनादि का संयोग स- म्बन्ध ३ भूखका दूर होजाना प्रयोजन ४ जो कोई कहे तुम ब्रह्म २ कहतेहो दिखाओ आपका नाम कहां और १५ १ प्रानन्दातबर्षिणी। कैसाहै जैसे नास्तिक केवल प्रत्यक्षप्रमाण मानता है यों बात मूर्खताकी है सोई सुनो जैसे किसी वस्तुके सनाव में एक प्रत्यक्षप्रमाण है ऐसे और भी अनुमानादि प्रमा पाहैं प्रथम तो प्रत्यक्षप्रमाणः दो प्रकारका है बाहर १ भीतर २ बाहर ज्ञानेन्द्रियों करके शब्दादि विषयों का और पंचभूतों का ज्ञान होताहै परन्तु नेत्रंकरके तो रूप और एथ्वी जत तेजकाही ज्ञान होता है और रूपके बिना शब्दादि चार विषयों का और वायु आकाश का नेत्रसें ज्ञान नहीं होताहै १ और भीतर दुःख सुख भख शोका- दिका ज्ञान अन्तःकरण करके होताहै और सुषुप्ति में जो अज्ञान उसका ज्ञान साक्षी चैतन्यकरके होताहै उस पूर्व पक्षी से बूझना चाहिये कि दुःखसुखादि जिसकू होते हैं क्या वो नेत्रसे दिखासक्ताहै और जो कहे कि दुःखादिकं नेत्रसे कौन दिखासके तो हम कहते हैं ब्रह्मक नेत्रसे कौन दिखासके और श्रीकृष्णचन्द्रादि.जो मति हैं वे माया- मय मूर्ति हैं क्योंकि यो वेदशास्त्रों का सिद्धांत है किजो दृश्य है.सो अनित्य है (गोगोचर जहॅलगि मन जाई॥ सो सब माया जानो भाई) जो उन मर्तियों कूकोई पर- मार्थ से सच्ची कहे तो वे मतिः अनित्य हैं परमेश्वर कुं वेदशास्त्र नित्य कहते हैं तात्पर्य :परमेश्वर वास्तव अमू- तेहैं जैसे. दुःखादि अंतःकरण करके जानेजाते हैं ऐसे सूक्ष्मदर्शी पुरुषों कू सूक्ष्मबुद्धिकरके अंतर्मुखर्ति करके और प्रत्यक्षादिप्रमाणकरके प्रमेयः चैतन्यका अपरोक्ष होसलाह वेदांतशास्त्र में प्रमाण हैं प्रत्यक्ष अनुमान र उपमान शाब्दः ४. अर्थापत्ति ५ अनुपलब्धि ६ इन M १६. अनिन्दामृतवर्षिणी। का अर्थ भाषामें भलेप्रकार लिखने से बहुत विस्तार हो ताहै इसलिये नाममात्र रास्ता दिखाते हैं प्रत्यक्षका अ थे तो पीछे लिखाण्या अनुमान से इस प्रकार ॥ टी। अनुमानके पांच अंगहें पक्ष्य १ साध्यार है तु ३ व्याप्ति ४ दृष्टांत इसलिये पाच वायवी अनुमान कहा जाता है जैसे पुक्ष्य कियो पर्वत साध्य. अग्नि वालाहेतु ३ धूम होने से व्याप्ति ४ जहां जहां धूम होत है वहीं वहांनिश्चय अग्नि होती है दृष्टांत जैसे रसोई के मकान में मा ज्ञान होता है कोई मनुष्य जंगल में चला जाता अग्निकी इच्छा हुई देखा पर्वत में धूम उठरहा है वो अनुमान करता है वो पर्वत अग्निवाला है धम होने से जहाँजहां धम होताहै वहां वहां निश्चय अग्नि होती है जैसे रसोई के मकान में विचार देखो अग्नि प्रत्यक्ष नहीं है परंतु पर्वत मै अग्निश होना प्रमाण है र उपमा करके इसप्रकार ज्ञान होताहै गवय एक पशु होता है एक पुरुषने उसकें कभी नहीं देखाथा नाम सुनाथा उसने किसी जंगली आदमी से पूछा कि गवय कैसा होता है जंगलीने उत्तर दिया कि मौकी सहश होताहै कुछ एक अन्तर होता है वो पुरुष एक दिन जंगल में गया उसने गवय देखा उस गवयकं देखकर उस बालकों स्मरण किया कि गौ की सहश होता है निश्चय योही गवयहै विचारादेखो गयका जानलेना प्रमाण है।३. शाब्दप्र- माणदो प्रकारका है वैदिक १ लौकिक र वेदोंने जो कहा सो वैदिकप्रमाणहै जो यो शङ्काकरे कि वेदोंने तो १७ अनिन्दामृतवर्षिणी। जीव ईश्वरका भेदभी कहा है और अनेक श्रुति कर्म उपासनादि करके मोक्षका होना कहती हैं और बहुत श्रुति अन्नमयकोशकूआत्मा कहती हैं तो योवेदों का कहाहुआ आपके प्रमाण है या नहीं इसका उत्तर यों है जो श्रुति अन्नमयादि कोशकू आत्मा कहती हैं और जो कर्म उपा सनादि करके मुक्तिका होना कहती हैं सबका अभिप्राय युक्तिसे अद्वैतब्रह्मके बोधन करनेकाहै देहादिकं परमार्थ से आत्मा कहना और जीव ईश्वरका भेद कहनी और केवल कर्म उपासनादिसे मुक्ति का होजानायोश्रुतिका तात्पर्य नहीं है क्योंकि फिर श्रुतिने निषेधभी किया है कि यो नहींहै २ इस वाक्यकरके और बहुत सहस्राणि ऐसी ऐसी अर्थवाली श्रुतिहैं और जो यो शङ्का करे कि प्रथम श्रुतिने देहादिकू श्रात्मा कहा और जीव ईश्वर का भेद कहा फिर उसकू निषेध किया प्रथमही एक निगुण ब्रह्मका उपदेश क्यों ना किया इसका उत्तर यों है जो श्रुति प्रथम ही ब्रह्म को बोध न करती तो ब्रह्मकू अति सूक्ष्म होने से इस जीवकू ब्रह्मका कभी बोध न होता इसलिये श्रुतिनै क्रमसे अर्थात् प्रथम कर्म करना कहा फिर उपासना कहीं और प्रथम अन्नमयादित आत्मा कहाफिरआनन्दमय कोशकूआत्मा कहाजबजिज्ञासुकी बुद्धि आनंदमयादिकं विचारते विचारते अतिसूक्ष्म हुई तबानिर्गुणब्रह्मका उपदेश किया अब विचारो कि श्रुति का अन्नमयकोशादिङ जो आत्माकहना है और कर्म उप- सना से मुक्तिका होना यों परमार्थ में तो सञ्चा नहीं परन्तु निर्गुणब्रह्मळू साक्षात् बोधन करनेवाली जो ब- ३

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आनन्दामृतवर्षिणी।
हुत श्रुति हैं उन्हों की यह सब श्रुति उपयोगी हैं इसलिये
वेदका कहाहुआ सब प्रमाण है कोई श्रुति साक्षात और
कोई कर्म उपासनादिद्वारा परम्परा करके बोधन करती
हैं मूर्खलोग वेदों के तात्पर्य नहीं विचार के एकएकदे-
शावेदोंका सुनकर कोई देह कोई इंद्रिय कोई विज्ञानमय
कोशादिबू आत्मा बताते हैं कोई केवल कर्म से कोई केव-:
ल.उपासनादि से मुक्तिका होना कहते हैंसमस्त वेदों का
तात्पर्य नहीं विचारते पूर्व पक्षकी श्रुतियों कंप्रमाण दे-
दे स्थावाद करते हैं जैसे कोई मूर्ख अच्छे वैद्यके समीप
बैठाथा उस समय एक पुरुष पाया उसकू बहुत चलने
से हारपन का ज्वरथा वैद्यने नाड़ी देखकर कहा कि मो-
हनभोग खाओ ज्वर जातारहेगा उसफू हारपनसे ज्वर
था मोहनभोग के खाने से जातारहाउस मूर्ख ने समझा
कि विशेष करके धनवाले बीमार होते हैं उनके लिये यो
औषध बहुत सुन्दर है ऐसा निश्चय करके सब रोगियोंकू
मोहन भोग बताने लगा जिसकू हारपन का ज्वर होवे तो
अच्छा होजावेशेष मरजावें ऐसेही बहुत मूर्ख एक एक
दो दो औषध वैद्यसे सुनकर वैद्यक करने लगे न वैद्यके
तात्पर्य' विचारान रोगीके रोगकू विचारा सबकून एकही
औषध बताने लगे दैवयोग से कोई कोई अच्छा भी हो-
जावे इसी प्रकार मूर्खने वेदके तात्पर्यफून अधिकारीकू
विचारते हैं केवल आजीविकाकेलिये वैष्णवं शैवं शाक्ता-
दि अपने अपने मतका उपदेश करके कह देते हैं कि
योही परमतत्व है औरों की असूया करदेते हैं विचारो
कि जो सबकू एक देवताका उपदेश करते हैं तो क्या सा-

आनन्दामृतवर्षिणी १९ री अवस्थामें सबके एकही गुण सदारहता है इस दृष्टां तकू भले प्रकार विचारो वैद्य तो सद्गुरुं की जगह कि जैसे प्रथम अध्याय में लिखे हैं और वैद्यककी पोथी वे- द और शास्त्रों की जगह और रोंगी मुमुक्षु की जगह क्योंकि तीन प्रकार का रोगहै कफवायु पित्त औरतीनहीं रोग इस जीवकू हैं सत्त्वरजतमोगुण तमोगुणी के लिये कर्म रजोगुणी के लिये उपासना सत्त्वगुणीके लिये ज्ञान वेदोंने कहाहै और उस मुर्खकी जगह इस कलियुग के ऐसे गुरु कि जो विना वेदान्तशास्त्र के पदेहये और वि. ना वेदशास्त्रोंको तात्पर्य जानेहुएं सूर्योदू चेला करते हैं उनक केवल अपनी क्षमाहीसे प्रयोजन है शिष्य दुःख भोगोयानरकभोगोसो शिवजीने पार्वतीजी से कहा है।। श्लोक । गुरवोवहवःसन्ति शिष्यवित्तापहारकाः ॥3 दुर्लभःसगुरुदेवि शिष्यसन्तापहारक. १: "" तात्पर्य वेदं भगवान्का यों है जैसे व्यवहार में मनु- प्य सूक्ष्मवास… युक्ति करके कहते हैं ऐसे वेद भगवान् भी निर्गुणब्रह्मकू युक्ति करके बोधन करते हैं इस बात के स्फुट होने में मनुष्यों की युक्ति लिखते हैं शारीर- कभाष्य में अस्थूलारुंधत्ती न्याय नाम करके यो युक्ति लिखी है कुमारी लड़कीकू सौभाग्य के अर्थ अरुंधती का दर्शन कराया करते हैं प्रथम उससे कहते हैं कि यो चन्द्र अरुंधती है जब घों चन्द्रक जानजाती है फिर कहते हैं कि यों अरुंधती नहीं है यह साततारे अरु: धती है फिर वैसेही निषेध करके कहते हैं कि यह तीन तारे हैं फिर उन तीन तारों में से वशिष्ठजीक अरुंधती - आनन्दामृतबर्षिणी। बताते हैं जब वो लड़की वशिष्ठजीक भलेप्रकार जानजा- ती है पीछे उसकू भी निषेध करके कहते हैं कि उस तारे के समीप जो बहुत सक्षम ताराहै सो अरुंधती है जिस के भाग्य अच्छे होते हैं उसको अरुंधती का दर्शन हो- जाता है अब विचारना चाहिये कि प्रथम. चन्द्रादिङ अरुंधती कहना है उनका अरुंधतीके बताने में सब वा- क्य उपकारी हैं इसलिये सब प्रमाण हैं जिस काल में वो लड़की अरुंधती को जानजातीहै पीछे उनकू यो नि- श्चय होजाती है कि मेरेमाता पिताने जो प्रथम चन्द्रा- दिकं बताया था तात्पर्य उन का अरुंधती के चोधन कर ने में था दान्तिमें फिर भलेप्रकार विचारना चाहिये योतो वैदिकंप्रमाणं कहां और लौकिक व्यास वशिष्ठ आ प्तकामादि पुरुषों का जो कहा है सो प्रमाण है लौकिक प्रमाणमें भी चोही अरुंधती न्याय है इस समयमें भी आप्तकाम ब्रह्मवादी परमहंस संन्यासी विशेष करके हैं और जो इसलोक में अच्छे गुण कहेजाते हैं कि जिनकू सब मतवाले अङ्गीकार करते हैं और वेद वशिष्ठादि का परम सिद्धान्त हैं और मुक्ति के मुख्य अंतरङ्ग साधन हैं। निसकोंक्ष शान्ति निरहंकार सन्तोष कोमलता विवेक वैराग्य निर्वैरता अमान परोपकार क्षमा शम दुमादि ऐसे ऐसे गुण और विद्या और विज्ञान विशेष करके ब्रह्मवा. दी संन्यासी परमहंसोंही में पाते हैं इसलिये उनकू आ- प्तकाम होनेसे उनके वाक्य प्रमाण हैं किसीसे बझा कहोजी भोजन करआये उन्होंने कहा हम भोजन दिन में नहीं करते हैं और हृष्टपुष्ट देखते हैं अर्थसे यो ज्ञान अानन्दामतबर्षिणी २१ न हुआ कि रात्रिका तो इन्होंने निषेध नहीं कियाहै रा- त्रिक भोजन करते हैं विचारो यो ज्ञान सच्चा है या नहीं इसका नाम अर्थापत्तिप्रमाणहै ५ किसीने कहा तुम कह- तेहो इस स्थानमें घट नहींहै इसमें क्या प्रमाणहै. उस- ने उत्तर दिया घटका लाभ न होनेसे अनुपलब्धिप्रमाण है ६ तात्पर्य इन प्रमाणों के लिखने का यो है कि ब्र- मके सिद्धकरने में ऐसे ऐसे प्रमाण और अनेक युक्ति दृष्टान्त हैं प्रत्यक्षवादि आदि। तो ऐसे ऐसे उत्तर देने योग्य हैं कि हे वादी! विचार देख ब्रह्म ऐसे ऐसे प्रमाणों से देखने में आताहै। .: और भेदवादी उपासनावालों और कर्मवादी आदि यो उत्तर देना योग्य है जैसे वेदकी दृष्टिसे तुम सत की आदि और परमेश्वरका दास मानतेहो ऐसेही वेदने नी कहा है त ब्रह्म है जो यो कहो हम अभी इस योग्य नहीं हैं ऐसा कहैं मैं ब्रह्महूं हम बूझते हैं किसी प्रतिबन्ध से तुमकू महावाच्यार्थ अर्थात् मैं ब्रह्महूं यो अपरोक्ष न होती यो कहो वेदांतशास्त्रका श्रवणादि और मैं ब्रह्म हूं ऐसी अनेक उपासना करनी कहां निषेधहै और वि- चारो अभ्यास अनजान वस्तुका करते हैं और अमद उ- पासना करनेमें छान्दोग्यउपनिषदादि गीता भाष्यादि बहुतः प्रथं हैं उनमें ऐसी ऐसी उपासना करने में ब्रह्म- हूँ मैं ईश्वर हिरण्यगर्भ विराट् ह भले प्रकार ब्रह्मलोका- दि फलके सहित लिखी हैं और भेदउपासना में बहुत जगह दोष कहे हैं और भलेप्रकार विचारों परिपूर्ण परिच्छिन्न कहना कितनावड़ाअनर्थ हे वेदों में प्रकट लिखा २२ श्रानन्दामृतवर्षिणी। शोककू आत्माका जाननेवाला.तरताहै। उसीआत्मा के जानकरके मृत्युकं उलंघेगा और कोई रस्ता मुक्ति का नहीं है। कर्म धन पुत्रा करके मुक्त नहीं होताः सवका त्याग ही करके मुक्तहोताहै ३ ज्ञान के बिना मुक्ति नहीं होती है । ऐसी ऐसी अर्थवाली बहुत श्रुति हैं फिर तुम कू में ब्रह्महूं इसअर्थ ग्रहण करने में क्या वाद कर- ना योग्य है वेदोका तात्पर्य सुनो कर्स करके तमोगुण- का नाशहोताहै निद्रा, आलस्य, प्रमादादि तमोगुण का कार्य है प्रातःकालके स्नानादि कर्म करनेसे उन का ना- श होता है व्रतादिक करनेसे इन्द्रियादि का दमन होता है दानादि करनेसे पदार्थों में से आसक्ति दूर होजाती है तीर्थादि करने से घरके लोगोंसे प्रीति कमहोती है प- रदेश में जाकर बुद्धि बढ़ती है तीर्था में महत्पुरुषों का समागम होता है उनके सत्संग करनेसे संसारसे चित्त उपराम होता है और भी बहुत इसप्रकार के कर्म कार्य हैं चित्तसे विचारने योग्य है अन्तःकरण का विषयों से उपरामहोना इसीकं अन्तःकरण की शुद्धिकहतेहैं उपा- रातासे रजोगुणकानाश होताहै विक्षेप तृष्णा लोभादि रजोगुण का कार्य है ध्यानादि करके उनका नाश हो- ताहै ऐसे ऐसें साधनों से बड़ा जो सत्त्वगुण उसकू प्र- काशमय शान्तरूप होने से कार्य उसका विवेक, वैराग्य शम दमादि हैं इन साधन सम्पन्न होकर जगत् ब्रह्म, बन्ध मोक्ष, नित्यानित्यादि का विचार किया विचार के- रने से यो ज्ञान हुँआ कि ये सत्त्वादि तीनों गुण माया के हैं माया कू मिथ्या होने से इन गुणों का जितनी का- आनन्दामृतबंर्षिणी। २३ र्य स्थूल सूक्ष्म है सब मिथ्या है और मैं असंग सचि दानन्द नित्य मुक्तहूं इसी कू ज्ञान कहतेहैं योंही ज्ञान मुक्ति का हेतु है और परमसिद्धांत तो वेदोंको यो है कि यो जगत जीव ईश्वर प्रतिबिम्ब के सहित न कभी हुआ है न होगा न है एक मन वाणी करके अगोचर प्रत्य- गात्मा नित्यानन्दरूप नित्य मुक्तहै न किसीका नाश न उत्पत्ति न देहके साथ सम्बन्ध है न कोई सुख दुःख धर्मवाला न श्रवण करनेवाला साधक न मुक्तिकी इच्छा वाला न मुक्तहै तात्पर्य जोजोहै सोहै यो श्रुतिका अर्थ है॥ इति प्रथमोऽध्यायःसमाप्तः ॥ ३ ॥ अथ द्वितीयोऽध्यायः॥ . ., अब अध्यारोप अपवाद न्याया करके निष्प्रपञ्चब्र- म जगत् का प्रपंच करके फिर मुक्ति सिद्ध करते हैं। मुक्ति महावाक्यार्थ के ज्ञानसे होतीहै जैसे किसी कू र- ज्जु में सर्पकी भ्रान्तिहै उसका दुखि कम्पादि लौकिक वाक्यार्थ के ज्ञानसे नाश होता है यहां के स्री चन्दन मालादि और परलोक के अमृत नन्दनवन देवाङ्गनादि की प्राप्तिसे उसका दुःख नाश नहीं होता है ऐसे इस जीवकेतीन ताप पञ्च क्लेश यहां के और स्वादि के.पदार्थोकी प्राप्तिसे नाश नहीं होते हैं और न कम होते हैं महावाक्यार्थ के ज्ञान से नाश होते हैं महावा- क्याथ का ज्ञान जब होताहै प्रथम पदार्थ का ज्ञान हो- जावे के पदों का नाम वाक्य होता है महावाक्यमें तीन पद हैं तत् त्वम् असि इसलिये तत् पदका अर्थ अभी आगे लिखेंगे उससे प्रथम तत्पंपदार्थका लक्षण लिखते २४ अानन्दामृतवर्षिणी। हैं तत्पदार्थका अर्थात् ब्रह्मका लक्षण दोप्रकारका है त- टस्थ स्वरूप २ सृष्टिस्थितिः ३ लयका जो कारण अर्थात् जिससे यो जगत् हुआहै जिसमें ठहर रहाहै प्र- लयसमय जिसमें लय होजाताहै सो ब्रह्मका तटस्थ लक्षण है और सत् चित् आनंदादि स्वरूप लक्षण है जैसे किसी पुरुष का लक्षण श्यामगौर रंग इतनी अ. वस्था ऐसे नेत्रादियोउसका स्वरूप लक्षण है और जि संके बाहर कुंवा ऐसी उसकी हवेली ऐसे वस्त्र पहिर रहाहै यो उसकी तटस्था लक्षण है तत्पदका अर्थ दो प्रकारकाहै वाच्य लक्ष्य मायोपहित जो चैतन्य सो तत्पदका वाच्यार्थहै मायोपहित का अर्थ यो है मा- या उपहित यो दो पद हैं योदोनों मिलके व्याकरणकी रीतिसे मायोपहित यो एकशब्द बोलाजाताहै मायोप: हित अर्थात् मायाकरके युक्त जैसे बिम्ब घटगत जल करके युक्त अथवा जैसे स्फटिकलालरंग की सन्निधिसे लालही प्रतीतहोताहै ऐसेही शुद्धब्रह्म मायाकी सन्निधि से ईश्वर प्रतीतहोते हैं जैसे स्फटिक लालरंग करके उप हित लाल स्फटिक कहा जाताहै और बिम्ब घटगत जल करके उपहित प्रतिबिम्ब कहा जाता है. ऐसेही मान योपहित शुद्ध चैतन्य जगत् कारण ईश्वर कहेजाते हैं उपहितका अर्थ यहां भले प्रकार यादकरलेनाभले प्रकार बुद्धि में निश्चय करलेना आंगे बहुत जगह कामपड़ेगा प्रसंगयोंथामायोपहित चैतन्य तत्पदका वाच्यार्थ और मायासे युक्त चैतन्य तत्पदका लक्ष्यार्थ है जैसे प्रतिबिम्ब से बिम्ब नित्यमुक्त, है और शक्ति भ्रांति कालमें भी -- अनिन्दामृतवर्षिणी। २५. रजत नहीं हुई और जैसे स्फटिक लालरंग की स- निधिकाल में भी श्वेतही रहता है ऐसेही शुद्धब्रह्म मा- योपहित और अविद्योपहित कालमें भी। टी। अविद्या उपहित ये दोनों पद मिलकर व्या- करणकी रीतिसे एक अविद्योपहित बोलाजाताहै अर्थ यो.हुआ अविद्या करके उपहित । मूग चैतन्य असंग शुद्धही है माया किसक कहते हैं सुनो जैसे शुक्तिमें रजत की भ्रांति ऐसे चैतन्यमें कारण- सूक्ष्मस्थूल-प्रपंच जड़की जो भ्रांति इसीका नाम माया है यो सब ब्रह्महै । यो सब वासुदेव हैं । ऐसी ऐसी अर्थवाली बहुत श्रुति स्मृति चैतन्य का भाव और जड़- का अभाव कहती हैं चैतन्य पदार्थ क्या है सुनो सत् । चित् । आनन्द्राशुद्धा बुद्धगएका स्वयंप्रकाश अनन्त । नित्यमुक्ता शान्त । अखण्ड । अजे। अमर ी परिपूर्ण । निरंजन । निरवयवप्रसंगाअद्वय। अव्यक्त । अचिन्त्य। सर्वगता अचल सनातना नित्य। अात्मा। परमात्मा। परमेश्वर । ब्रह्म।प्रत्यगात्मा ये चैतन्य पदार्थ के वि- शेषण हैं औरभी चितिज्ञान स्वरूपादि विशेषण हैं और जड़ अज्ञानसे आदि लेकर जो स्थूल पर्यन्त हैं सो सब जड़ हैं अज्ञानकं प्रकृति और गुणों की साम्यावस्था और मूल अज्ञानभी. कहते सो अज्ञान सत्त्व, रज, तम इन तीन गुणोंवाला है स्वरूप उसका अनिर्वाच्य सत् असतं करके कुछ नहीं कहाजाता है जो सत्कहैं तो कुछ पदार्थ नहीं है और असत् कहें तो प्रतीत होता है जैसे भ्रांति समय शंक्ति में रससे अनिर्वाच्य है परन्तु - -

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२६ श्रानन्दामृतबर्षिणी।
ज्ञालसे उस अज्ञानका अभाव होने से वो अंज्ञान भा.
वरूपहै जैसे लौकिक व्यवहार में प्रथम कुछ भूल जावे
फिर याद आजाये और जैसे बालक अवस्थामै तलाज्ञान
का भाव होताहै।
टी। तूलाज्ञान यो है जैसे किसी पदार्थ भूल
जावे उसमें जो कारण और बालक अवस्था में जो अ.
ज्ञानले तलाऽज्ञान उसका न्यायशास्त्र और प्राकृतविद्या
के पढ़नेसे और लौकिकव्यवहार से नाश होजाता है
और मूलाऽज्ञानका तो केवल ब्रह्मविद्यासे नाश होता है।
मू०। विद्या पढ़करके औरव्यवहारादिसे अज्ञानका
अभाव होजाता है ऐसे अज्ञान कालमें कहता है कि मैं
ब्रह्मकुं नहीं जानताहूं ज्ञानकाल में कहता है कि मैं ब्रह्म
कू जानताहूं ऐसा ऐसा अनुभव व्यवहार होनेसे नि-
स्सन्देह प्रतीत होताहै कि एक अज्ञान पदार्थ अनिर्वाच्य
है भाव और अभाव उसके दोनों प्रतीत होते हैं श्रा
ज्ञान. १ माया अविद्याका भेदार मायोपहिताबलब्रह्म
जीव ४जीव ईश्वरका भेद ५ शुद्धब्रह्म ६ ये सब अनादि
हैं इन यो नहीं कहाजाता है ये कबसे हैं कबसे इनका
भेदहुआ है. और शुद्धब्रह्म कबसे मायोपहित अविद्यो
पहित हुये जैसे यो नहीं है
कहाजाता है शरीर प्रथमहुआ
या कर्म दृष्टांत त्योहै बीज प्रथम हुआया रक्ष और जैसे
स्वप्न में जो उपवन, मन्दिर, मृग, मित्र शत्रु आदि दी
खते हैं विचारो कि उपवन मन्दिरकी कौनसे संवत मु.
हूर्त में नींव रखी गईहै और मित्रादि का कौनसे सं
बत मुहूर्त में जन्माहुआहे योही निश्चय करो जैसे ह
.

प्रानन्दात्तवार्षिणी। २७ ष्टान्त के पदात्यों की व्यवस्था है वैसेही दाष्टति के - दायों में शुद्धब्रह्म अनादिभी और अनित्यभी हैं और सब अनित्य हैं ज्ञानकालमें शुद्धब्रह्म के बिना सब नष्ट होजाते हैं वो अज्ञान माया अविद्या भेदसें दो प्रकार "काहै शुद्ध सत्व प्रधान हुआँ माया मंलिनसत्त्व प्रधान हुआ अविद्या कहाजाता है रजोगुण तमोगुणे करके जो सत्त्वगुण नहीं तिरोभाव होता है सो शुद्धसत्त्व और र- जतमोगुण करके जो सत्त्वगुण तिरोभाव होजाता है तो मलिनसत्त्व कहाजाताहै माया अविद्या का भेद ऐसे स- ममों जैसे एक पुरुष क्रियाके निमित्तसे पाठक याचक कहलाताही और जैसे एक स्त्री पिताकी अपेक्षा करके कन्या पति की अपेक्षा करके पत्नी है ऐसे वो अज्ञान ईश्वर की अपेक्षा करके माया और जीवकी अपेक्षा करके अविद्या कहा जाताहै ऐसा भेद नहीं समझना कि अज्ञानके दो टूक होगये, अथवा उस अज्ञानकी शक्ति दो प्रकारकी है ज्ञानशक्ति १ क्रिया शक्ति २ रजोगुण तमोगुणसे नहीं दबा जो सत्वगुणसो ज्ञानशक्ति क्रिया शक्ति दो प्रकारकी है आवरणशक्ति १ विक्षेपशक्ति र रजसत्वगुणसे नहीं दबा जो तमोगुणं सो आवरणशक्ति और तमसत्त्वगुण से नहीं दवा जो रजोगुण सो विक्ष- पशक्ति चोही अज्ञान आवरणशक्ति प्रधान हुना - विद्या और विक्षेप शक्ति और ज्ञानशक्तिपधान हुभा माया मायोपहित चैतन्य ईश्वर कहाजाता है कोही तत्पदका वाच्यार्थ है और वोही चैतन्य अविद्योहित जीव प्राज्ञ कहाजाता है मायोपहित ईश्वर तो माया

4.
२८
अनिन्दामृतवर्षिणी।
के वश नहींहुये इसलिये सर्वज्ञ ईश्वरादि नामकर के
कहे गये और अविद्योपहित जीव अविद्या के वश हो.
गया उस अविद्याकी विचितन्नासेनानायकारका होगया
इसलिये अल्पज्ञ कहागया जैसे कोई पुरुष शीशेके
मकान में बैठाहुआ आप कू और औरोंकू भी देखताहै
स्मृत्तिकाके मन्दिर में बैठाहुआ.आपही कूदेखता है कभी
बहुत अँधेरे में अपना आपा भी नहीं देखता है माया
शुद्ध सत्व प्रधान होनेसे माया शीशेके मन्दिरकी सहर
है और अविद्या में मलिन सत्त्व प्रधानहोनेसे अविद
मृत्तिकाके मन्दिरके सदृश है माया में प्रतिबिम्ब जो चैतन
का सो ईश्वर अविद्या में प्रतिबिम्ब जो उसी चैतन्य के
सो जीव यहां निम्न प्रतिबिम्ब का भेद सर्य बिम्ब औ
घटगत जल प्रतिबिम्बवत नहीं समझता ऐसे समझ
जैसे आकाशका पतिबिम्ब जल में प्रथम दृष्टान्तमें।
कुछ दोष नहीं है परन्तु परिच्छिन्नभेदसा प्रतीत होता
सो कुछदोष नहीं है दृष्टान्त एकदेश में होताहै आकाश
दृष्टान्तसे बिम्बका भेद और परिच्छिन्नता नहीं प्रती
होती है इसपक्षमें जी तो एकही है परंतु अन्ताकरणकी
-पाधिस बहुत-प्रमाता कल्प रक्खे हैं अन्तःकरणविशिष
चैतन्यकुंप्रमाता कहते हैं कोई ऐसा कहते हैं अनेक
ज्ञान हैं वनवत् जो अज्ञानोंका समुदाय सो समष्टि औ
शक्षवत् जो एक अज्ञान सोव्याष्टिवोही चैतन्याअज्ञान
समष्टि। करके उपहित ईश्वर और वोही चैतन्य व्यति
अज्ञानकरके उपहित जीव कोई ऐसा कहते हैं करणीमा
जोप्रज्ञान उससे उपहित चैतन्यईश्वर और अन्त
...

. अनिन्दामृतवर्षिणी। २९ करके उपहित वेही चैतन्यजीव तात्पर्य कारण उपाधि- वाले ईश्वर और कार्य उपाधिवाला जीव सबका सि- द्धांतयो है.मायोपहित चैतन्यईश्वर अविद्योपहित चै- तन्य जीव सो ईश्वर ज्ञानशक्ति करके उपहित जगतुके निमित्तकारण विक्षेप शक्तिकरके उपहित उपादानकारण जैसे मकड़ीजालेके प्रति चैतन्य प्रधानता करकेतो नि, मित्तकारण और शरीरप्रधानता करके उपादानकारण यो मकड़ीका दृष्टीत श्रुतिने कहा है कि जिस प्रकार में कड़ी जालेक. रचती है फिर अपने में लय करलेती है तात्पर्य परमेश्वर जगत के कर्ता अभिन्न निमित्तोपादान कारण हैं. अर्थात् नहीं हैं भिन्न निमित्त और उपादान कारण जिन्होंसे सो अभिननिमित्तोपादानकारण इसप्र- कार जगत् के कारणं ईश्वर हैं. ऐसे नहीं हैं जैसे घटके बनाने में कुलाल भिन्नानिमित्तोपादानकारण है अर्थात् भिन्न है निमित्त और उपादानकारण जिससे सो भिन्न- निमित्तोपादान कारण कुलाल तात्पर्य घटके बनाने में स्मृत्तिका उपादान और कुलाल दण्ड चनादि निमित्त है ईश्वर तो आपही उपादान और आपही निमित्तकारण है पूर्वरीतिसे भले प्रकार विचारना योग्य है निरीश्वर- वादी पूर्व मीमांसकादिकू जो यो तर्क जमत् के मोह के लिये वाचाल करावे हैं उस तर्क सुनीवी लोग यों कहते हे ईश्वर जो त्रिभुवनकू रचते हैं सो-त्रिभुवन के रचने में क्या क्या चेष्टा करते हैं और रचनेके समय किस प्रकार की काया है जिनकी अर्थात् किसरूप हुये हुये और क्या है। उपाय और आधार जिनका और क्या उ:

: होजाता PU 'यो दो दृष्टान्त गामीमात्रा आनन्दामृतबर्षिणी यो मन्त्र मात्रयवहदारण्य छान्दोग्य उपनिषद और पंचीकरण आवाथ्याँक ग्रन्थ हैं उन्हों के मतसें बनाया गया है विस्तार एकबोही चैतन्य मायोपहित और समसमष्टि करके उपोहत स्थूल समरि करके वोही चैतत्य समष्टि स्थूल उमाधि का अभिमान छोड़कर मायोपहित और सूक्ष्म स. सूत्रात्मा प्राण कहा जाता है फिर वोही चैतन्य समष्टि स्थूल और समाधिसूक्ष्म उपाधि का जगत्कारण अत्यात अन्तर्यामी शवल-बल कहा जाताहै और वोही चैतन्य तीनों ॥ एक चोही. अविद्योपहित चैतन्य जीव नामा जाग्रत् जाग्रत् अव चैतन्य स्वप्न अवस्थाम सूक्ष्मकारण शसरी का अभिमानी हुश्री तेजस कहाजीताह जाताहै फिर वोहोचैतन्य तीनों शरीरों को और तीनो अवस्थाका अभिमान छोड़ जयका जो कारण सो ईश्वर+ साराजगत् जिसके गर्भ में है. सो हिरण्यगर्भ+ नाना करणमें सामान्य करके बिकलताकरके जो पदार्थोंको जानताहै सो तेजल + विशेष योजो शुद्ध ब्रहा सचिदानन्द नियमुक्त लोई प्रशान जीव.कहाजाताहै यो अज्ञानअनादि अनिर्वाय सत्त्व 'प्रकार काह लो शान शुद्ध तत्वप्रधान झुमा माया समस्तवेदों ईश्वर भविद्या में प्रतिबिम्घजो उसी चैतन्यका सोजीय 5 कासार सेवा में जैसें पृथ्वी में तत्त्वमसि महावाक्य +जैसे किसी ने कहा सो अर्थात् रुपये तुम यज्ञदत्त ४ प्रथम चारोपदों का अर्थ जानाजावे पीछे वाक्यार्थ सच्चिदानन्द गुमबहीनि- निजि : उपाधि अभिभ अज्ञान त्यमुक्त अशानकार- ण उपाधिसे घट्टितं प्रथम छिपा वीग शुद्ध संत श्वर गन्त- यामी अन्या में माझाअंविधा इनारंगचा वाली प्रधान हुआ रणरावल प्रकारका रोका बझ ढका जावे पदार्थ जिस कारण सूक्ष्मउपाधि लांछित उस अंकुर. 'समर्मि हिरण्यगर्भ सासमष्टिव्य में निहकरदवाली" सून सूत्र का और दोने उसी का नाम सन्त्रात्मामा ष्टिकभेदीस ने जैसे प्रथम प्रतीत होता है. जिस कारण दोप्रकारका चुनरीम ही शुद्ध ब्रह्म जिस कारण से समाधि जित रक्ता फल फूलके समष्टि विराष्ट्र विराष्ट्र वैः ईश्वर हिरण्यगर्भ विराटे वि. साँसमान्य दिगदना हित वृक्ष स्थलग वानर उन्हीं का नाम उपाधि है। ऐकदमंदी वाली । स्वस्वैतरद्विती प्रकारको ग चारभवः चारअत- स्था . , RU के भेदसे दो बलवाफटुंफै- गाया' इतजगत्वा । १ . - . ... प्रभपुनः । मापा श्री श्री वाचा यांचा बाते जावा 4harma तेते.ते ते भा.तेज से:

2 श्रानन्दासतबर्षिणी। चार्तिकादि जो जो श्रीशंकरभगवान भाष्यकारसेआदिलेकर +इसका आनन्दामृतवर्षिणीके दूसरे अध्यायमें है। उपहित तात्पर्य तीनों उपाधियोंका अभिमानी हुआ विराट् वैश्वानर फहाजासाहै फिर मष्टि करके उपहित तात्पर्य सूक्ष्म समष्टि और मायाका अभिमानी आहिरण्यगर्भ अभिमान छोड़कर केवल मायोपदित हुआ तात्पर्य्य मायाका अभिमानी हुशा ईश्वर उपाधियों से रहित तात्पर्य शीनों उपाधियों का अभिमान छोड़कर शुद्धब्रह्मवैसाही स्था में स्थूल सूक्ष्म कारण'शरीरों का अभिमानी हुआ विश्व कहाजाता है फिर वोही फिर वोही. चैतन्य सुपुति अंवस्था में कारण शरीरका अभिमानी हुआ मार कहा कर वैसाही शुद्ध परमात्मा कहा जाता है इसीकू तुर्यावस्था कहते हैं। सृष्टिं स्थिति आप जो होरहा है सोविराट् + जो पदार्थीको कुछ भी नहीं जाने सो.प्राश अन्त:- फरके जो पदार्थों को जानताहै सो विश्वा+ फरके उपहित मध्यसोप में मुनिकी इच्छावाले पुरुषो समझाने के लिये ईश्वर रज तम इनतीन गुणोंवालाहै इनतीन गुणोंमें जो सत्वगुण सो शुद्धमलिन भेद से दो मलिनसत्व प्रधान हुभा अविद्या कहा जाताहै माया प्रतिविश्य जो चैतन्य का लो फहाजाताहै॥ का अर्थ तात्पर्य तत्यपदोका लक्ष्यार्थ एक शुद्ध ब्रह्म चैतन्य देदो इस वाक्य कहते हैं इस पारयम चारपद हैं सो १ तुम २ यमदत्तनं ३. देदों जानाजाताहै ऐसेही महावाक्यम तत्.१ त्वम् २ अलि ३ तीन पट्टहैं उपाधि अभिमानी अवस्था शरीर मात्राम .. । सरवारजतम । . + .. 47 " - 4. habang मलिन सत्त्य प्रधान हुआ 'प्राश सुपुति कारण अविद्या करके तात्पर्य पदार्थ और उपाधिद जैसे शुक्ति में रजत. करके सोई उपाधि है ऐसे व्यष्टि तैजस स्वम : सूक्ष्म तात्पर्य जिन्ह उपाधियों से सूक्ष्म व तेजल माशं कहाँजाताहै धाविधाय चैकैक चतुर्दा व्यष्टि विश्व जाग्रत् स्थूल पांशेयोजिनापंचपंचते॥ . . . ܩܰܝܰܕ:܂ - k . . M ना H ज़ पृ 4 . .. , tips .. प • जजज आवाज पू.ज . आवातजा . शावाने पृपा । - . ३२ आनन्दान्तबर्षिणी पादान है घों तक उनकी अतक्य ईश्वर के विषय दुर्व- लहै परमेश्वर की रचना तक का अवसर नहीं क्य कि परमेश्वरकी माया नहीं घटने के योग्य पदार्थ घटासक्ती है और मनुष्य की रचना इन्द्रजालादि में बुद्धि काम नहीं करती है परमेश्वर की रचनामें तो नष्ट बुद्धि तर्क करते हैं तो भी उस तर्कके खण्डन के लिये कहा है जो ऊपर अभिन्ननिमित्तोपादान कारण प्रकार वो वज उनके मुख में मारना योग्य है || Myster 2: इस रीतिसे जगत् का कर्ताः ईश्वर-क सिद्धकिया और कारण प्रपंचका यहाँ तक निरूपण किया. जगन, में तीनप्रपंच है. कारण १ सक्ष्म २ स्थल ३ अब सूक्ष्म अपंचका निरूपण करते हैं पूर्व सिद्ध कियेहुये जो मायो पहित चैतन्य ईश्वर उनसे प्रथम महत्तस्व-अहकार की सूक्ष्म अवस्था-फिर महत्तत्त्व से अहंकार अर्थात् में ए. कहूं बहुत होजाऊं फिर अहंकार से आकाश आकाश से वायु वायु से तेज तेजसे जल जलसे एथ्वी अर्थ इन सबका ऐसा करना महत्तत्व करके उपहित जो ईश्वर उनसे अहंकार हुआ तात्पर्य यो है महत्तत्त्वादि सब जड़ पदार्थ हैं विना चैतन्य रचना नहीं होसक्ती है नि- इचय इसी आत्मा से आकाश हुआना है योगश्रुतिका अर्थ है माया के तीन गुणोंवाली होनेसे कार्यभी उसका आकाशादि पञ्च तीनगुणोंवाले उनकं. अपंचीकृत सूक्ष्मभूत और तन्मात्रा भी कहते हैं इन्हीं सूक्ष्मभूतों से पञ्चीकृत स्थूलभत उत्पन्नहुये, और सूक्ष्मशरीर १७लिंगवाला उत्पन्न हुआ:१७ लिंग ये हैं। -- Flic dic

:
JNA.
श्रीनन्दामृतवर्षिणी। ३३
टी गसूक्ष्म शरीर कू कोई १६ लिंग कोई १७ कोई १९
लिंगवाला कहते हैं लिंगही कू तत्त्व कहते हैं इन्द्रियदश
प्राण पंच अन्तःकरण एक इस प्रकार १६और इन्द्रिय
प्राण १५ मन बुद्धि इस प्रकार १७और इन्द्रिय प्राण
१५ मनःबुद्धि चित्त अहंकार ४ इस प्रकार १९ परन्तु
बहुत ७ तत्ववाला कहते हैं।
माशब्दादिका ज्ञान होताहै जिन इन्द्रियों से सो
ज्ञानेन्द्रिय पंच और कम किया जाता है जिन इन्द्रियों से
सो कर्मेन्द्रिय पंचप्राणादिपंचमनवुद्धि र आकाशीदिके
सत्व गुण के अंशसे एथक् एथक् पंच ज्ञानेन्द्रियहुये सोई
लिखते हैं आकाश से श्रोत्र वायु से त्वक् तेजसे चक्षु-
जलसे रसना पृथ्वी से घ्राण और आंकांशादि के मिले
हुये सत्त्वगुण के अंश से अंतःकरण सोवृति भेदसे चार
प्रकारका है संकल्प विकल्प वाला मन निश्चयवाली
बुद्धि अभिमानवाला अहंकार अनुसंधान चाला चित्त
और आकाशादि के रजोगुण के अंश से एथक एंथक
पञ्च कर्मेन्द्रिय हुये हैं आकाशसे चाक वायु से पाणि
तेज से पाद जलसे उपस्थ पृथ्वी से वायु और आका-
शादि के मिले हुये रजोगुण के अंश से प्राण सो कृति
भेद से पांच प्रकार का है, बाहर निकलनेवालों ना-
सिका मुखमें रहनेवाला प्राण नीचक जानेवाला वायु
आदि में रहनेवाला अपान र सर्व शरीर में फिरनेवाला
-सब शरीर में रहनेवाला व्यान खाये पिये कसब ना-
ड़ियों में पहुँचानेवाला सारे शरीर में रहनेवाला समान:
ऊपरकू जानेवाला कण्ठ में रहने वाला उदान । और

प्रानन्दामृतबर्षिणी। पञ्च उपप्राण हैं उनका भी इन्हीं पांच में अंतर्भाव है, उन्नार में जो हेतु सोनाग १ नेत्रों के खोलने मीचने में जो हेतु सो कूर्म: २ मूकका जो हेतु सो कृकल जम्माई लेते में जो हेतु सो देवदत्त ४ सब जगह रहनेवाला धः नञ्जय नोमुरदेकू फुलादेताहै आकाशसे दोइन्द्रिय श्रोन और वाक् हेतु यों है श्रोत्र करके जो आकाशका सद् गुण सो ग्रहण किया जाता है और वाक से बोलाजाता है वायु से दो इन्द्रिय स्वक् और पाणि हेतु यो है त्वक् करके तो चायुका जो स्पर्श गुण उसका ज्ञान होता है और पाणि से त्वक् की रक्षा होती है तेजसे दो इन्द्रिय चक्षु और पाद हेतु यो है चक्षुकरके तोत्तेजको जो गुण रूप उसका ज्ञान होताहै और पैरके मलने से चक्षुकी परमी दूर होती है जलसे दो इन्द्रिय रसना उपस्थ हेतु यो है रसना करके तो जलका जोगुण रस उसका ज्ञान होता है और तरहरहता है औरउपस्थ करके जलकात्याग होता है पृथ्वी से दो इन्द्रिय प्राण और वायु हेतु यो है प्राणी करके तो पृथ्वी का जो गुण गंध उसका ग्रहण होताहै और वायुसे गंधका त्याग होता है, और अन्तः करण समष्टि-पांचोंभूतों के सत्त्वगुणके अशंसे उत्पन्न हुआ है हेतु यो है पांचोंज्ञानेंद्रियों के विषोंक अनुभव करताहै अन्नमयः प्राणमया मनोमय, विज्ञानमय, ओ. नन्दमय ये पंचकोश कारण सूक्ष्मा स्थूलशरीरोंके अंत भाव है भागे जो कहेंलो स्थूल शरीर सोतो अन्नमयको- श हैं सक्ष्म शरीरमे तीन कोश हैं। पंच कर्मेंद्रिय करके सहित जो पंचप्राण सो पापमयकोश और पञ्चज्ञान- है AI अनिन्दामृतबर्षिणीय ३५ न्द्रिय करके सहित जो मन सो मनोमयकोश और पर उच ज्ञानेन्द्रिय करके सहित जो बुद्धि सो विज्ञानमय कोश है मनोमय विज्ञानमय कोशमै यो भेद है मनो. मय कोश तो करण और विज्ञानमय कोश कर्ता है क्रिया में कादिन्ये षट्कारक होते हैं । क कर्मचकरणच संप्रदानंतथैवचा अपादानाधिकरणमित्याःकारकाणि षट् ॥ और कारण शरीरमें कारण शरीरभता अविद्या में जो मलिन सच सो प्रियमोद प्रमोद ति करके स- हित मानन्दमय कोश है कोई अज्ञानकूर आनंदमय कोश कहते हैं जो वस्तु प्राप्त न हो और अच्छी प्रती- ताहों उस समय की इत्तिकू प्रिय कहते हैं. फिर वोही वस्तु जब अपनी होजावे उस समय में जो प्रानंद सो मोदर उसके भोगने में जो आनंद वो प्रमोद ३. यो. सूक्ष्म शरीर समष्टि व्यष्टि भेदसे दो प्रकारका है वनः वत् सक्ष्म शरीरों का समुदाय समष्टि रक्षवत् ष्टथक् ए- थक् एक एक सूक्ष्म शरीर व्यष्टि जैसे उपवन समष्टि और उसी उपवनका एक एक रक्षव्यष्टि सूक्ष्म समष्टि करके उपहित घोही मायोपहित चैतन्य हिरण्यगर्भ कहा जाता है और सक्षम व्यष्टि करके उपहितवोही अविद्यो: पहित चैतन्य तेजस कहाजाता है समष्टि व्यष्टिकू तादा स्या होनेसे उनकर के उपहित हिरण्यगर्भ तैजस की भी तादालयता है जैसे वन और रक्ष करके उपहित श्रा- काशमें कुछ भेदानहीं ऐसे हिरण्यगर्भ तैजसमें भेद नहीं और भी दृष्टोती हैं जाति व्यक्ति सामान्य विशेष नगर मोहल्ला इन का विना विचारके भेद है वास्तव भेद नहीं, ३६ श्रीनन्दामृतबर्षिणीय यो सूक्ष्म शरीर अविद्या कामकर्म करके सहित पुर्यष्टक कहाता है सोई लिखते हैं, ज्ञानेन्द्रिय पंच । कमेन्द्रिय पंच.२ चाराअंतःकरण ३ पंच प्राण ४ पंच सक्षमभूत ५ अविद्या ६ काम ७ कर्मः अविद्या का कार्य चार प्रकारका है ब्रह्मलोक पर्यंत जो पदार्थहैं उनमें नित्यबु विहोनी । दुःखों में और दुःखोंके साधनों में जो सुख बुद्धि २ देहादि अनात्मा पदार्थों में आत्मा बुद्धि ३ अ- पवित्र जो अपने और पुत्रादि के शरीर उनमें पवित्र बुद्धिं ४ काम रोग कहते हैं कर्म तीन प्रकारका है स- चितः१ आगामी २ प्रारब्ध ३ अपना कियाहुआ कर्म फलकू नहीं देकर जो अदृष्टरूप करके ठहर रहा है सो संचित इस शरीर में जो किया जाता है सो आगा- मी २ स्थूल शरीरके जन्म स्थितिका जो हेतु सो प्रार- ब्ध ३ संचिता आगामी काके फलका भोग करके वा उसका विरोध कर्म करके वा ब्रह्मज्ञान करके नाश हो- जाता है। और प्रारब्ध कर्मका भोगने से नाश होता है प्रारब्ध से एथक अविद्यादि पंच क्लेश हैं उनका ब्रह्मज्ञानसे नाश होताहै अविद्या अस्मिता रागद्वेष अभिनिवेश ५कारण कार्यकरके अविद्या तो दो प्रकारको ऊपर लिख आये हैं अहंकार की सूक्ष्म अवस्थाकू अस्मिता और म हत्तत्त्व और सामान्य अहंकार भी कहते हैं.राग काम कहते हैं द्वेष क्रोधकू कहते हैं अपने आप ग्रहण करके फिर उसके त्यागकून सहना इस अभिनिवेश कहते हैं। ब्रह्मक जानकरके सारे क्लेशों से छूट जाता है या श्रुतिका - 12 .. श्रानन्दामृतबर्षिणी। ३७ अर्थ हैयहांतक सूक्ष्म शरीरकी उत्पति लिखी अबस्थूल शरीरकी उत्पत्ति लिखते हैं, पञ्चीकृतफचस्थूल भूत आकाशादिके तामसं अंशकू लेकर अर्थात् बुद्धि में के ल्पनाकरकेप्रथम एक एकके दो दो टूककरे दोमें से एककू एथक् रकावे उस दूसरेके चारचार भागकरे फिर उनचासें भागोंकंअपने अपने भागकू छोड़कर औरों में मिलादेना यो पञ्चीकरण कहलाता है जिसका भाग जिसमें सिवाय हैं वोही कहने में आता है जैसे मनुष्य शरीरकं पार्थिव कहते हैं पञ्चीकृत स्थूल भूतों का जो रचाहुआस्थूल शरीर उसमें पञ्चीकृत स्थूल भत हैं और अपञ्चीकृत भूतोंके तामस अंशका कार्य इस प्रकार है, पञ्चीकृत जो पृथ्वी उसकी पृथ्वी का कार्य अस्थिं क्योंकि कठिन है जलका कार्य मांस कुतः बहजाता है और शिथिल है तेजका कार्य नाड़ी कुतः ज्वरकी परीक्षा करती है वायु का कार्य त्वकः कुतःस्पर्श करती है आकाश का कार्य रोमकुतः काटने से दुःख नहीं होताहै पञ्चीकृत जो जल उसकी पृथ्वी का कार्य शोणित कुतः पृथ्वी की सदृश रक्त है जलका कार्य शुक्र कुंतः श्वेत है और उससे गर्भ होताहै जैसे जल से सब वस्तु की उत्पत्ति है तेजी कार्य मंत्र कुतःउष्ण है वायु का कार्य स्वेद कुतः ब- हुत दम चलने से प्राजाता है और वायु से संखजाताहै श्राकाशका कार्य राल कुतः ऊपरक जाती है और श्रा- काशभी ऊंचाहै और पञ्चीकृत जो तेज़ उसकी एंथ्वी का कार्य आलस्य कुता आलस्यमें जड़ता है जलका कार्य क्रांति कुतः जल के स्पर्शस्नानादिसे सुन्दरता होतीहै तेज़

३६
निन्दामतवर्षिणी।
का कार्य क्षुधा कुतः अन्नकंपचाती है वायुका कार्य तृषा
कुताोष्ठ कण्ठ सूख जाताहै आकाश का कार्य निद्रा
कुंत निन्द्र में निर्विकल्प होजाता है और पंचीकृताजो वायु
उसकी पृथ्वीका कार्य सङ्कोचन कुतःजिस समय मनुष्य
सुरुड़कर बैठे तो मारी और जड़सा होजाती है जलका
कार्य चलना कुंत जलभी चलता है तेजका कार्य उठना,
उछलना कुत उठने उछलने में ऊंचा होताहै और अग्नि
भी जारकू जाता है वायुका कार्य दौड़ना कुतःदौड़ने में
बल होता है और वायु में भी बल और वेगहै आकाशका
कार्य पसरना कुतः आकाशभी व्यापक है और पसारने
में भी व्यापक होता है अर्थात् फैलता है और पंचीकृत
जो प्रकाश उसकी पृथ्वी का कार्य कटि जहां मिल
रहता है कुतःगंधस्थान है जल का कार्य उदर कुतः
जलका स्थान है तेजका कार्य हृदयः कुतः उष्ण रहता
है वायुका कार्य कण्ठ कुतः चायुका स्थान है आकाश
काकार्यशिर कुतःशब्दस्थान है, और अनहद शब्द
होतारहता है और पञ्चीकृत आकाशका भेद दूसरे
प्रकार ऐले हैं। उसकी एश्वी का कार्य भय कुतः भयं
से अंतःकरण में तम प्रधान होजाता है और तम पृथ्वी
काभाग है.जलका कार्य मोह कुत जल के स्पर्श से उत्पन्न
होती है जो सुंदरता उपक देखकररामोह होती है तेजका
कार्य क्रोध कुत कोधके समय हदय भस्म होताहै वायु
का कार्य कामकुता वायुभी चंचल है और कामभी चंचल
हे आकाशका कार्य लाभ आकाशकी भी अवधि
नहीं लोमकी भी अवधि नहीं

अोनन्दामृतबर्षिणी। ३९ पृथिधी "जल तेज 'वायु श्राकाश पृथिवी अस्थि मांसं. नाड़ी त्वचा रोममा वीर्य. मुत्र "स्वेद 11 PAAN तेज श्रावस्थ क्रान्ति भूख प्यास निद्रा । घायु संकोचना चलना. .. उठना उ. छलना: दोड़ना फहलाना । भाकोशः मरी पेटमेंहदंयमें शिरमें दुसरीप्रकार आकाश मोह कोध काम लोम .. शब्द गुण जिसमें रहताहै सो आकाश सावकाश रूप रूपरहितस्पर्शवाला वायु गर्म स्पर्शवाला तेजसो चारप्रकार काहै अग्नि आदि स्वर्णादि विद्युदादि जठ- राग्निःशीत स्पर्श वाला जल गन्धवाली टर्थिवी पंच- भूतों के जो लक्षण कहे सो तीनों दोषों से रहितहैं जिस लक्षश में अव्याप्ति अतिव्याप्ति असम्भक ये तीन दोष पाये जावें वो प्रमाण नहीं जैसे किसीने कहा गो कपिला होतीहै इसमें अव्याप्ति दोष है कुतः बहुत गौ कपिला नहीं होती फिर कहा सींगवाली गौ होती है इस में अतिव्याप्ति दोष है क्योंकि सींगहिरन आदिकेभी होतेहैं फिर किसी ने कहा एकखुरवालीगी होती है इस में असम्भव दोष है कुतः यह लक्षण गौ में सम्भव नहीं होसक्ता चो लक्षण प्रमाणहै जो सब दोषसे रहित हो जैसे गौ का लक्षण सींग शास्ता आदि वाली गौ विचा- --

उद्भिज पथवी कं भेदन करके उत्पन्न हये और मनु स.
भानन्दामृतषिणी।
रों इसमें कोई दोष नहीं आकाशमें एक गुण शब्द वायु
में दो शब्द स्पर्श तेजमें तीन शब्द स्पर्श रूप जलमें
चार शब्द स्पर्श रूप इस एथिवीमें पांच शब्द स्पर्श
रूप रस गन्ध पंचीकृत एथिवी आदि से ब्रह्माण्ड
हुआ ब्रह्माण्ड में चौदह लोक भः । भुवः स्वः । महः ।
जन। तप। सत्यः । ये सात ऊपर ऊपरके लोकहैं और
तल। वितल । सुतल । तलातल । महातल । रसातली
पाताल। ये सात नीचे नीचे के लोक हैं ब्रह्माण्ड
से मनु और शतरूपा हुये ब्रह्माण्ड में जो प्रथिवी उस
से औषधि हुई औषधि से अन्न माता पिता के खाये
हुये का परिणाम जो शोणित उससे स्थूल शरीर उत्पन्न
हुआ शरीर चार प्रकारके हैं मनुष्यादि के शरीर जरा.
युज अर्थात् जरससे उत्पन्न हुये पक्षी नागादि के शरीर
अण्डज अर्थात् अण्डे से उत्पन्न हुये लीक ज आदिके
शरीरः स्वेदज अर्थात् पसीने से उत्पन्न हुये तण दक्षादि
नक सनन्दनादिशरीर इन चारों से पथक है । मानवी
सृष्टि में हैं सुना जाताहै ये ब्रह्माजी के मन से उत्पन्न हुये
हैं यह स्थूल शरीर समष्टि व्यष्टि भेद करके दो प्रकार
का है प्रचीकृत पंचमहाभत और उनको कार्य ब्रह्माण्ड
और ब्रह्माण्डके भीतर जो पिच भूतोंका कार्य स्थूल शरी
रादिका समुदाय यह सब समष्टि और एथक पृथक् स्थूल
शरीराव्यष्टि इस स्थूल समष्टिं करके उपहित वहीं
मायोपहित चैतन्य विराट् कहा जाता है और स्थूल व्य.
ष्टि करके उपहित वही अविद्योपहित चैतन्य विश्व कहा

आनन्दामृतवर्षिणी। १ जाता है समष्टिा व्यष्टिकू जाति व्यक्ति सामान्य विशेष बनरक्षवत् तादात्म्य होने से उन करके उपहित विराट विश्वकीभी एकताहै इस जीव की प्रसिद्ध तीन अवस्था हैं प्रसिद्ध लिखने से यह अभिप्रायहै कोई मरण और मुंछी ये दो अवस्था और भी कहतेहैं परन्तु प्रसिद्ध तीनः अवस्था हैं जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति जाग्रत् का अर्थ जानने के लिये प्रथम इन्द्रिय और अन्तःकरण और शब्दादिःविषय और बोलनादि क्रिया और संकल्पादि अन्तःकरण के धर्म और दिव आदि देवताओं के सहित सबकं टथक एथक् लिखते हैं यह संकेत याद रखना चाहिये एक का अंक जिसके आगे उस• इ- न्द्रियःचा अन्तःकरण जानला इसीकू अध्यात्म कहते है और दोका अंक जिसके आगे उसकू ज्ञानेन्द्रिय का विषय वा कर्मेन्द्रिय की क्रिया वा अंतःकरण का धर्म जानना इसीकं अधिभूत कहते हैं और तीनका अंक जि- सके आगे उसकू देवता जानना इसीकू अधिदेव कहते हैं जिस इन्द्रिय और मनादि के आगे विषय क्रिया धर्म देवता लिखे हैं उसी उस इन्द्रिय मनादि के विषय क्रिया धर्म देवता हैं शब्दादि पांचकू विषय और बोलनादि पांचकू.क्रिया और संकल्पादिचारकूधर्म बोलते हैं श्रो- त्रादि इन्द्रिय सक्षम हैं कान नासिकादि जो स्थल शरीर में दीखते हैं ये उनका श्राश्रय हैं अर्थात् उनमें रहते हैं बहुत करके तो बहिर्मुखहैं कभी भीतर का भी कुछ ज्ञान होजाताहै श्रोत्र कान में रहताहै बहुत करके तो बाहरके शब्द सुनताहै कभी कान बन्द करनेसे कुछ शब्द भी- - ૪૨ श्रानन्दामृतवर्षिणी। तर का भी सुना जाता है श्रोत्र करके सुना जाताहै जो शब्द सो दो प्रकारकाहै एक शस्त्रादि का दूसरा भेरी आदिका सो पांचों भूतों में रहताहै २ दिक् ३ त्वक्सारे शरीर में रहताहै बहुत करके तो बाहर के शीत कोम- लादि कू विषय करताहै कभी उष्णादि वस्तु के खाने से भीतर के स्पर्श का ज्ञान होताहै १ त्वक् करके जो स्पर्श कियाजाताहै सो स्पर्श पांच प्रकारका शीत गर्म न शीतन गर्म कठिन कोमल शीतस्पर्श जलमें गर्म स्पर्श तेजमें न शीत न गर्म एथिवी वायुमें कठिन कोमल 8- थिवी में और एथिवी के कार्य वस्त्रादि में रहता है वायु ३ चक्षु नेत्रों में कृष्ण तारेके अग्रभागमें रहता बहुत करके तो बाहरके रक्त पीतादि रूप कू देखता है कभी नेत्रके मीचनेमें भीतरका भी तम प्रतीत होताहै ? चक्षु करके जो रूप देखने में आताहै सो सात प्रकारका शुछ नील पीत रक्त हरित कपिश चित्रभेद करके सो एथिवीमें तो सात प्रकारका और जलमें अभास्वर शुक्ल और तेजमें भास्वर शुक्ल रहताहैर सूर्य रसना जीभके अग्रभागमें रहताहै बहुत करके तो बाहरके मधुरादि रस अनुभव करताहै कभी डकार आने से भीतरके रस का भी ज्ञान होजाताहै १ रसना करके जो रस का अ- नुभव होताहै सो ६ प्रकार का है मधुर अम्ल लवण कटु कषाय पित्तभेद करके सो पृथिवी में तो६ प्रकारका और जल में केवल मधुर रहताहै २ वरुण ३ प्राण नाक के दोस्वर उनके अग्रभाग में दोनों के बीच में रहता है बहुत करके तो बाहरके गन्ध को ग्रहण करताहै कभी, डकार - १ -- आनन्दामृतबर्षिणी। आनसे भीतरके गन्ध का भी ज्ञान होजाताहै १ घ्राण क- रके जो गन्धका ग्रहण कियाजाताहै सों दो प्रकार का सुगन्ध दुर्गंध सो टथिवी में रहताहै २. एथिवी ३ यहां तक ज्ञानेन्द्रियों का निरूपण किया वाक् जीभमें रहता है १ बोलन २ अग्नि ३ पाणिं हाथों में रहताहै १ लेना देना २ इन्द्र ३ पाद चरणों में रहता. १ चलना फिरना २ विष्णु ३ उपस्थ मूत्र करने का जो शरीर में चिह्न उ. समें रहता है ? मैथुन मूत्रत्याग २ प्रजापति ३ वायु मल त्याग करने का जो शरीर में चिह्न उसमें रहता है १.मलकात्याग करना २ मृत्यु ३ यहांतक कर्मेन्द्रियों का निरूपण किया अन्तःकरण हृदय गोलकर्मे रहताहै सो त्तिभेद करके चार प्रकारका है मन बुद्धि चित्त अहं- कार मन १ संकल्प विकल्प मनोराज्याधि २ चन्द्र ३ बुद्धि पदार्थोंका निश्चय करना २ बृहस्पति ३ चित्त १. चिन्तवनकरना २ क्षेत्रज्ञ ३ अहंकार, यह मैंने किया यह मेरे करने योग्य है २ रुद्र ३ अमान अदम्भ अहिंसा क्षमा आर्जव वैराग्य शम दम मुक्तिकी इच्छा संतोष औदार्यादि ऐसी ऐसी और भी अन्तःकरण की सत्त्वगुणी वृत्ती हैं और तृष्णा दम्भ लोभ अहंकार अशम भोगों की इच्छा चपलता अभिमान रागादि ऐसी ऐसी और भी बहुत अन्तःकरणकी रजोगुणी उत्ती हैं और निद्रा आलस्य प्रमोद मोहाद्रि अन्तःकरणकी तमोगुणी हैं अर्थात् यह सब अन्तःकरण का धर्म है जो संकल्प विकल्पवाली वृत्ति सो मनकी और निश्चय- वाली बुद्धिकी और अनुसंधानवालीचित्तकी और अभि- आनन्दामृतबर्षियी। मानवाली अहंकार की ऐत्ति, सत्त्वगुणी ऐत्तिसे पुण्याक उत्पत्ति होती है रजोगुणी उत्ति से पापकी उत्पत्ति होती है, तमोगणी वृत्तिसे मूर्खता बढ़ती है तथा अवस्थाव्यतीत होती है उससे न कुछ इसलोक में प्राप्ति न कुछ परलोक में प्राप्ति पीछे तमोगुणी वृत्ति बहुत दुःख की हेतु है। निन्द्रियों कमेन्द्रिय क्रिया कमेन्द्रियों भूत ज्ञानेन्द्रिय विपर्य केचिता के देवता दिक आकाश श्रोत्र शब्द वात बोलना श्ररित वायु... त्व-., स्पर्श, घायु पाणिः लेना देना. तेज रूप: सूर्य: चलना चविष्णु. जल पृथ्वी प्राण गध चक्षु रसना घरुण उपस्थ मैथुमोदि प्रजापति पृथ्वी गुदा गुदा मलत्याग मृत्यु श्रोत्रादि इन्द्रियों के जो देवतादिक आदि । उन करकेयुक्त श्रोत्रादि करके जो अपने अपनेविषयों का अनुभव होनासो जाग्रत् अवस्था यह जो जानतीन- वस्था और यहस्थूलशरीरमन इन्द्रियादिका आश्रय इन दोनों काजो श्राभिमानी-जीवसो विश्वफहाजाता है प्रथम भी विश्वविराटकी एकतालिख आयेहैं इसलिये भेदकी ति त्तिकेलियेविश्वकं विराटपकरके देखे जाग्रत्अवस्था में जो भोगदेनेवाले कर्म उनका उपरामहुये सन्ते और बा हर श्रोत्रादि इन्द्रियों का उपरामहये सन्ते जागत्यवस्था में जोदेखा और तना उनहीं संस्कार करके केवल अन्त करण करकेजोनिद्रामें मपंचकी प्रतीतसोई स्वप्नावस्था बोही जाग्रत अवस्थाका अभिमानी जो विश्व सोई स्वप्ना वस्था औरसूक्ष्म शरीरका अभिमानी हुना तेजस कहाँ आनन्दामृतवर्षिणी। जाता है तैजस हिरण्यगर्भ की एकताहै तैजस कू'हिरण्य- गर्भरूपकरके देखेरजासत्स्वप्नमें जो भोगदेनेवाले कर्म उनका उपराम हुए सन्ते स्थूल सूक्ष्म शरीरोंकाजो अभि- मान उसके नित्ति होने से बुद्धिका कारणात्मा जोस्थित होना सो सुषुप्ति अवस्था मैंने न कुछ जाना सुखकरके मैंने निद्राको अनुभव किया जो जाग्रत् अवस्था में जिस अवस्थाकी व्यवस्था कहता है चोही सुषुप्ति है तात्पर्य जिल अवस्था में बुद्ध्यादि सब लय होजाते हैं वोही सुषुप्ति है वोही स्वक्षा अवस्थाका अभिमानी जो तैजसजी यह लोई सुषुप्ति अवस्था और कारण शरीर की अभि- मानी हुआप्राज्ञकहाजाता है प्राज्ञईश्वरकी एकताहै प्राज्ञ कंईश्वररूप करके देखें यहही प्राज्ञतीनों शरीर औरतीनों अवस्थाको अभिमान छोड़कर शुद्ध परमात्मा होजाताहै जो यह उपासनाकर मैं विराट् वा हिरण्यगर्भ या ईश्वर का शुद्धबलहूं इस उपासनाकरके वैसाही वैसा फलहोता अर्थात विराटादि की उपासना करने से विराट आदि होजाता है ऐसी ऐसी उपासना उपनिषद् आदि में भले प्रकार फलके सहित लिखीह और भी प्रणवआदिंड- पासता है शुद्ध ब्रह्मसे लेकर पाषाणआदि मूर्तिपर्यन्त उपासना हैं जैली अपनी सामर्थ्य जाने भेद उपासनावा अभेद उपासना वेद शास्त्रों में से निश्चयकरके करे पर मेश्वरकी जैसी उपासनाकडेगा वैसाही वैसा फल होवे. गा मुख्य अभेदउपासना शुब्रह्म की है और ईश्वर हिरण्यगर्भः विराट की अभेद उपासना और विष्णु शि- वोदि राम कृष्णादिकी भेद उपासना और नामोच्चारणा- ४६ आनन्दामृतवर्षिणी। दि पाषाणादि मूर्तियों की अर्चनादि ये सब उपासना उ. तरोतर गौषा है जो अभेद उपासना शुब्रह्म की न हो- सके तो भेद उपासना श्रीकृष्णचन्द्र महाराजादि की क रनेसे ज्ञानद्वारा मुक्तिमें सन्देह नहीं है जैसे कोई सिंह किसी पुरुषकी छायाकू देखकर दौड़ा उस छायासे पुरु- ष की प्राप्ति होगई इसी प्रकार मणिभासे आदि ले- कर औरभी बहुत दृष्टान्तहैं, अष्टावक्रजी का यह वाक्य है कि जिसकी जो मति है उसकी वैसेही गति होगी अ र्थात् दासोऽहम् जिसकी मतिहै वो दासही है और ब- राहमस्मि यह जिसकी मतिहै वह ब्रह्महीहै ब्रह्मविद्रौ व भवति इस श्रुतिसे इसप्रकार मायोपहित ब्रह्मका त- टस्थ लक्षण निरूपण किया इसीकू अध्यारोप कहते हैं अब इसका अपवाद लिखते हैं अधिष्ठान में भ्रा. न्ति करके। टी। जिसमें जो वस्तु कल्पित हो जैसे रज्जुमें सर्प। सूजो प्रतीत होना उस भ्रान्तिको अधिष्ठान से. व्यतिरेक करके भ्रान्तिका अभाव निश्चय करना जैसे शुक्तिमें रजतकी प्रान्ति प्रतीत होती है शुक्तिका रज- तसे व्यतिरेक करके यह रजत नहीं है शुक्तिहै यह जो रजतका अभाव निश्चय करना इसीकू अपवाद वाध विलापन भी कहते हैं सो बाध तीनप्रकार का है शास्त्र करके युक्ति करके प्रत्यक्ष करके वेद कहते हैं यह स्थूल सूक्ष्म प्रपञ्च नहीं है इस जगत् भ्रान्तिरूप में ब्रह्मसे पृथक कुछ नहीं है. एकः शुद्ध ब्रह्महै इस प्रकार शास्त्र करके प्रपञ्च से ब्रह्मका व्यतिरेक करके प्रपञ्चका अ- आनन्दामतबर्षिणी। ४७ भाव निश्चय करना यह शास्त्रकरके जगत्का बाधहै । और घटसे मृत्तिकाका व्यतिरेक करके घटका अभाव निश्चय करना इसी प्रकार ब्रह्मसे व्यतिरेक करके सारे प्रपञ्चका अभाव निश्चय करना और जो देखने में आताहै इसकू भ्रान्ति निश्चय करके ब्रह्ममात्र निश्चय करना यह युक्ति करके जगत्का वाधहै यह जगत् सब ब्रह्म है इसकं इसप्रकार जानना चाहिये ब्रह्माण्ड में जितने पदार्थ हैं संवमें पांच वस्तु हैं है भान होताहै प्या राह नाम रूप संस्कृतमें अस्ति भ्रान्ति प्रिय नामरूप से ससा बोलते हैं प्रथम के तीन अंश सच्चिदानन्द ब्र- मके हैं पदार्थ घटादिके नाश हुये भी नहीं नाश होते हैं और नामरूप ये दो मायाके हैं मायाकू मिथ्याहोने से यह कार्य भी उसका नामरूप दोनों अंश नाश हो- जाते हैं अन्य व्यतिरेक करके ब्रह्ममात्र निश्चय किया जाताहै सोई लिखते हैं जैसे एकंघट पदार्थ हैं भान होता है प्यारा है ये तीन अंश उसमें ब्रह्मके हैं और नामघट और रूप काला लाल गोलाकारदिये दो मा- याके अंश हैं है भान होता है प्यारा है यह ब्रह्मको घटमें अन्वय है फिर घट फूट गया मायांके दोनों अंश नाम रूप जोतेरहें घंटमें मायाके दोनों अंशों का व्यति- रेकहै और ब्रह्मका फिर भी अन्वय है कैसे टूक, भान होते हैं प्यारे हैं है भान होते हैं प्यारे हैं यह ब्रह्मके तीनों अंश वैसेही हैं फिर उन टूकोंका काल पाकर चूर्ण होगया मायाके जो अंश नाम रूप थे वे दोनों नाश हो- गये मायाके दोनों अंशों का चूर्ण में व्यतिरेक है और १.

-- आनन्दासतनर्षिणी। ब्रह्माका अन्वय है चूर्ण है भान होता है प्यारा है फिर वो वर्ण की काल पाकर नाश होगया नामरूप मायाके दोनों अंश नाशाहोगये वर्ष में माया के अंशों का व्य तिरेक हैं और ब्रह्मका ओवन है कैसे च का अभाव है भान होता है प्याराहै ये तीनों अंश जैसे प्रथम घट में थे वैसेही घटोत्रभाव में हैं। इसी प्रकार संब पदार्थों में अन्वय गतिक करो-ब्रह्माः निश्च करको ब्रह्म निश्चय करना तीनों अवस्था में भी अन्वय व्यतिरेक जानना चाहियो जाग्रत अवस्था में स्वप्न सुषुप्ति का व्यतिरेक है आत्मा का अन्वय है स्वप्न अवस्था में जानन सुप्तिका व्यतिरेकहैं आरसा अन्वय है सुषुप्ति अवस्था में जागत स्वप्नका व्यतिरे प्रात्मा का अन्वय है तुर्या अवस्था में जाग्रत स्वन सुर का व्यक्तिरेकहै आत्माका अन्वया है इसीप्रकार बुद्धिमा सब जगह विचार प्रसंग यथा युक्तिकरके भी जगत बाध है उसका यह क्रम है समस्त स्थल प्रपञ्च कल महाभूतों में मिलादे यह निश्चय करे पञ्चभूतोंसे एथक कुछ नहीं फिर स्थूल भूतों कू और सूक्ष्म पञ्चभूतों कार्य इन्द्रिय मनादि क पञ्च सक्ष्मभूतों में मिलादे फिर रथ्वीकू जलमें जलकं तेजमें तेजकू वायुमें वायुकाका शमें आकाश क अहङ्कार में अहङ्कारकं महत्तत्त्वमें मह- तत्त्व कू अज्ञान में अज्ञान मिथ्या है जैसे शक्तिमें रजत फिर अज्ञानकं शुद्ध चैतन्य में मिलादे फिर सदा अभ्यास केवल करके योही चिन्तवन करतारहै मैं शुद्धब्रह्म सन्त्रि- दानन्द परिपूर्ण नित्यमुक्त हूं जो कभी व्यवहार दशा में प्रपञ्च प्रतीत होतो वैसेही अन्वय व्यतिरेककरके चैतन्य ह श्रीनन्दामृतबर्षिणी। से पृथक् कुछ न जाने जैसे किसी मग रेती में यो भ्रान्तिहुई यो जल है वहां गया नेत्र सींग पैर से भले प्रकार निश्चय किया कि यो जलनहीं है फिर मृग उसी जगह आनकर जो देखताहै तो वहां फिर भी भ्रान्तिसे जल प्रतीत होताहै परन्तु फिर यो जानता है कि यो जल नहीं है भ्रान्ति है जो प्रशुकी यो बुद्धि है कि उस मृग- तृष्णा में फिर नहीं प्रवृत्त होता है बुद्धिमान् कि जिसने श्रुति स्मृति युक्ति अनुभव करके ब्रह्मा का निश्चय किया है वो कैसे संसार को सत्य जानेगा संसारका मिथ्याभास उसकं तबतकहै कि जबतक प्रारब्ध कर्म का रची हुआ जो शरीर नाश नहीं होताहै पीछे उसके मुतरूप है युक्ति करके संसार का बाध योहीहै कि संसारकू. मिथ्या समझ लेना र और मैं ब्रह्म हूं यो महावाक्य श्रवण करके जो हुआ अपरोक्षज्ञान और ब्रह्मक साक्षात् करके अज्ञान की जो नित्ति सो प्रत्यक्ष बाघहैं ऐसे तीन प्रकार करके संसार की बाधे करना-इस के अपवाद कहते हैं अध्यारोष अपवाद करके तत्त्वम् पदार्थों का साधन भी हुआहे. सोई दिखाते हैं माया से लगाकर स्थूल समष्टि प्रपञ्च जड़ और उस करके उपहित चैतन्यार और दोनों को आधार अनुपहित चैतन्य ३ ये तीनों पृथक् हैं और इन तीनों को तप्तलोहे के पिण्डवत् एक प्रतीत होना यो तत्पद का वाच्यार्थ है और पृथक् जो अखण्ड चैतन्य सो तत्पद का लक्ष्यार्थहे और अविद्यासें लगा कर स्थल व्यष्टि प्रपञ्च जड़ १ और उस करके उपहित चैतन्याराऔर इन दोनों का आधार अनुपहित अखण्ड TET - ५.० आनन्दामृतवार्षिणी। चैतन्य ३ ये तीनों पृथक् हैं और इन तीनों का तप्त लोहें के पिण्डवत् एक प्रतीत होना यो त्वम्पद का वाच्यार्थ है और पृथक् अखण्ड चैतन्य त्वम्पद का लक्ष्यार्थ है इनदोनों तत् त्वम् पदका लक्ष्यार्थ के ग्रहण करके और वाच्यार्थ कं मिथ्या जानकर वाच्यार्थ का त्याग करके तीन सम्बन्ध के सहित जहदजहतु लक्षण करके सोयो देवदत्तहै इस लौकिक वाक्यवत् तत्त्वमसि यो महावाक्य अखण्डार्थ का बोधक है तीन सम्बन्धों का अर्थ विना कुछ शास्त्रके पढेहुये भलेप्रकार नहीं जाना जाता है न भले प्रकार भाषा में लिखा जाताहै इसलिये कुछ तात्पर्य लिखे देते हैं सामानाधिकरण्यः १: विशेषण विशेष्य भाव र लक्ष्य लक्षण भाव ३ समान है अधिकरण जिस का सो सामानाधिकरण्य जो जिसमें रहे उसकुंअधिकरण कहते हैं किसी ने कहा सो यो देवदत्त है सो अर्थात काशी में तुमने हमने १६ वर्षकी अवस्था गृहस्थ आश्रम में जो देखा था सोई यो अर्थात अव हरिद्वारमें ३० वर्ष की अवस्था में जो दीखताहै सो यो देवदत्तहै पूर्व काशी १६ वर्ष की अवस्थादि का और हरिद्वार ३० वर्ष का अवस्थादि का त्याग करके केवल देवदत्त के पिण्ड माथ में दृष्टि करके यो अर्थ बैंठता है कि सोयो देवदत्त है कहे हुये अर्थ. कुछ त्यागदेना कुछ रखलेंना इसकू जहद- जहत लक्षण कहते हैं सो यो देवदत्त है। इस वाक्य को अर्थ जहदजहत् लक्षण करके होसक्ता है जैसे इसवाक्य जहद्जहत् लक्षणा है, ऐसे और वाक्यों में भी किसी जहत लक्षणा किसी में अजहत लक्षणा तात्पर्य जिस . आनन्दामृतवर्षिणी। वाक्य का अर्थ बुद्धि में न ठताहो कुछ विरुद्ध प्रतीत होती हो तो उस वास्य का अर्थ लक्षणा शक्ति व्यजनादि करके निश्चयं करते हैं उन वाक्यों के बहुत उदाहरण लिखने में विस्तार होता है. इसलिये थोड़े से उदाहरण लिखते हैं और उनके लिखनेका यहां कुछ प्रयोजन भी नहीं है जहत लक्षणा यहहै कि कहे हुये वाक्यार्थका त्याग करके और बनाकर लक्षणा करनी जैसे किसीने कहा गङ्गामे गावहै वहां से दूध लेनाओं उसने विचारा गङ्गाजी में गांवका होना नहीं बनतो इस हेतु से गङ्गाजीके तीरके गांव से दूध लेआया तात्पर्य कहनेवाले का तीरमें था जहत् लक्षणा से यों अर्थ बनसक्ताहै, अजहत् लक्षणा यह है कि कहे हुये वाक्यार्थ कंग्रहण करके और भी कुछ अर्थ बनाकर-लक्षणांक- रनी जैसे किसीने कहा कि दूधकी कौवन से रचा के रते रहना। उसने अजहत लक्षणा करके कौवन से भी रक्षाकरी औरों से भी रक्षाकरी क्योंकि तात्पर्य दूधी रक्षा में था, जैसे पङ्कजका अर्थ यों है कि जो कीव से उत्पन्न हो सो पङ्कज विचारो कीच से बहुत वस्तु कसैरू आदि उत्पन्न होते हैं परन्तु पङ्कज की शक्ति कमल में ही है, वाक्याथ के तात्पर्य कू समझना यो व्यंजना है जैसे किसी स्त्रीका पुरुष विदेशकू जाताथा स्त्री ने चलते समय प्रार्थना करी कि जहां आप का जानाहो उसी ज- गह मेराभी जन्म हो अर्थात् आपके जोते ही मेरे प्राण छूट जावेंगे, प्रसङ्ग सामानाधिकरणय कथासो सुनों सो और यो पद इन दोनोंका जैसे देवदत्तका पिण्ड अधि:

પૂર आनन्दामृतवर्षिणी। करण है ऐसे तत् त्वम् इन पदोंका शुद्ध चैतन्य अधि- करण है तत् त्वम् पदों का सामानाधिकरण्यः संवन्ध है। जैसे सो यो ऐसा कहो वा यो सोहऐसा कहो ऐसे तत् त्वम ऐसा कहोवा त्वम् तत् ऐसा कहो यो तत् त्वम् पदार्थो का विशेषण, विशेष्यभात्र सम्बन्ध है, जैसे सो यो इन शब्दों का और इनके अर्थोंकालक्ष्य लक्षणभाव सम्बन्ध है सो ये दोनों पद तो लक्षण हैं और इन लक्षणों से जो लेखाजावे सो लक्ष्य देवदत्त का पिण्डहै ऐसे तत् त्वम पदों का और उनके अर्थोका लक्ष्य लक्षणभाव सम्वन्धहै तत् त्वमये पद तो लक्षणहैं और इन लक्षणोंसे जो लखा जावे सो लक्ष्य एक शुद्ध चैतन्य है इस प्रकार तीन स- म्बन्ध करके अखण्डार्थका बोध होताहे जीवकी जो उ- पाधि अविद्या अल्पज्ञाति और ईश्वरकी उपाधि माया सर्वज्ञादि इन दोनों उपाधियोंका जहदजहत लक्षणासे त्याग करके तात्पर्य तत् त्वम् पदों के घाच्यार्थका त्याग करके लक्ष्यार्थका ग्रहणकरके केवल एक शुद्ध चैतन्यमें लक्षणा करनी तव तत्वमसि इस महावाक्य का अर्थ अखण्डार्थ निश्चय होताहै अखएडार्थ किसक कहते हैं सुनो स्वगतः जैसे वृक्ष में पत्र पुष्पादिका भेद और सजातीय २ जैसे अनार आबादि का भेद और विजा, तीय ३ जैसे वृक्ष और पाषाणादिका भेद इन तीन भेद करके जो रहित सो अखण्ड अथवा देश काल वस्तुक- रके परिच्छिन्न न हो सो अखण्ड सारे व्यापक होनेसे तोब्रह्म देशपरिच्छिन्न नहीं और नित्य होनेसे कालपरि- च्छिन्न नहीं और सबका आत्माहोने से वस्तुपरिच्छिन्न

आनन्दामृतवर्षिणी। ५३
नहीं जो इस शरीरमें सच्चिदानन्द भान होता है वोही
ब्रह्म है और जिसकू ब्रह्म कहते हैं वोही सच्चिदानन्द है
जव ऐसा ज्ञान हुआ तव त्वम् पदका अर्थ जो जीव
समझ रक्खा था वो उसी समय जाता रहता है और
तत् पदका अर्थ जो परोक्षथा तोभी उसी समय अपरोक्ष
होजाताहै फिर इसज्ञानसे जो होता है सो सुनो जो प्रथम
त्वम् पदका अर्थ जीव समझ रक्खाथा सोई अपरोक्ष
परमानन्दरूप करके शेष रहजाता है इसप्रकार तत्वमसि
जोमहावाक्यादि उनका अर्थ श्रवण करने से और मनन
निदिध्यासन करने से जो हुआ अपरोक्ष ज्ञान उस ज्ञान
करके अज्ञानकी जो नित्ति औरः परमानन्दकी प्राप्ति
इसीकानासमोक्षहै। इति श्रीद्वितीयोऽध्यायःसमाप्तःशी
तृतीयोऽध्यायः॥
। कर्मकाण्डी और उपासनावाले स्वर्ग वैकुण्ठादि की
प्राप्ति के सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य, सायुज्य नाम
करके मुक्ति कहतेहैं सो नाम मात्र मुक्तिहैं अनित्य होनेसे
साक्षात् मुक्ति नहीं जैसे किसी पुरुष कहना कि यो पु-
रुप सिंहहै वो पुरुष साक्षात् सिंहनहीं उसमें सिंहके से
गुण हैं ऐसे साक्षात् मुक्तिमें जोगुण दुःखोंकी निति और
परमानन्दकी प्राप्ति ये दोनों उन में भी थोड़े थोड़े हैं
सरे अध्याय के अन्त में जो मुक्ति कही है सो मुक्ति दो
प्रकारका है जीवन्मुक्ति १ विदेहमुक्ति जीवन्मुक्ति तीन
प्रकारको है श्रेष्ठ मध्यम र कनिष्ठ जीवते हुये उस आ:
नन्दकू सदा प्राप्त रहना अर्थात् स्वभाव करके निर्विकल्प
"र
४
M.
अथ तृतीयोऽध्यायः

आनन्दामतबार्षिणी।
समाधि रहनी श्रेष्ठ जीवन्मुक्ति १ प्रयत्न करके बहिर्मुख
अन्तःकरणकी हत्तियोंक निरोध करना मध्यमजीवन्मुक्ति
र यद्यपि दुःख सुखादि अन्तःकरण के धर्महोनेसे आत्मा
के साथ उनका सम्बन्धनहींहै यो विचार भी है तो मी
दुःखादि के सम्बन्ध करके अन्तःकरणका व्याकुल हो
जाना यों कनिष्ठ जीवन्मुक्ति ३देहपातके पीछे उस मा-
नन्द प्राप्त होना विदेहमुक्ति, श्रेष्ठ जीवन्मुक्तिका यो
नियम नहीं कि सब ज्ञानियों कू श्रेष्ठ जीवन्मुक्ति हो
जैसे औषध करने से रोगकी शान्ति होती है ऐसे प्रयत्न
करने से श्रेष्ठ जीवन्मुक्ति भी सम्पादन होसती है परंतु
कुछ नियम नहीं कि औषध करने से नियम करके
रोग जाता रहता है पुरुषार्थवादी तो यों ही कहते हैं कि
प्रयत्न मुख्य है जो श्रेष्ठ जीवन्मुक्ति किसी प्रतिबन्ध कर
के सम्पादन न होसके तो कुछ विदेह मुक्ति में संदेह नहीं
इस बातकं सिंई करते हैं ज्ञान की ७ भमिका तीन
प्रथमकी ज्ञानकी साधन भमिका हैं इसलिये वे भी ज्ञान
की भमिका कही जाती है चौथीमें अपरोक्ष ज्ञान होता
पिछली तीन जीवन्मुक्ति भमिका हैं प्रथमका लक्षणयोहै
शौच स्नानादि आचार गङ्गाजी से आदिलेकर तीर्थोका
सेवन विष्णु शिवादिकी पाषाणादि मर्तियों की पूजा अ.
श्चमेध यज्ञसे आदि लेकर यथाशक्ति ब्राह्मण अतिथि
भ्यासतोंकू अन्न वस्त्रादि देने ऐसें ऐसे और भी बहुत
कर्म यो प्रथम भूमिका । सगुण परमेश्वरके गुणानुवाद
सुनकर परमेश्वर में अनुराग होला और परमेश्वर के
भक्त जो साध ब्राह्मण उन में प्रीति होनी और मन वाणी

- D आनन्दामृतवर्षिणी। ଝୁy शरीर धन से उनका सत्कार करना जो कदाचित् साधू अपने घर चलेआवें तो मनकू आनन्द होनायो जानना हमारा बड़ा भाग्य है यो मन से सत्कार है और वाणी सेऐसाबोलनामहाराज आपकााना बहुत सुन्दरहुआ आप जंगम तीर्थ हो हमारे पवित्र करने के लिये आप आयेहो और शरीर से हाथ जोड़कर खड़या होजाना च. रण सेवा से श्रादि लेकर टहल करनी अथवा और जगह महात्मा ठहररहेहों वहां जाकर सेवाकरनी और धन से यथाशक्ति अन्न, वस्त्रादि देने और नित्यानित्य वस्तु का विचारना ऐसें ऐसे कर्मों से आदि लेकर भी बहुत कर्म है यो दूसरी भूमिका २ संसार के पदार्थोक दुःख रूपअनित्यं जानकर उनसे वैराग्य होना जैसा श्रीराम- चन्द्रजीकू वैराग्य हुआ है वाशिष्ठ ग्रन्थ सेंचो कथा प्रथमहीं वैराग्य प्रकरण में प्रसिद्ध है और साधन चतु: ष्ट्रय सम्पन्न होकर वेदान्त शास्त्रका श्रवण करनायो तीसरी भूमिका ३ शक्ति में रजतवतु संसारकं मिथ्या जानकर अपने निजस्वरूपका बोध होजाना कि मैं योहूं चौथी भूमिका योहि विदेह मुक्ति में हेतुहै चौथी भूमिका काले का लक्षण योहै कि जैसे कोई पुरुष समुद्रके तीर-खड़ा है जो जल की तरफ देखता है.तोज़लही.जलदीखताहै और जब पीछे देखता है तब मन्दिर वृक्षांदिही दीखते हैं ऐसे जब वो पुरुष अपने स्वरूप का अनुसंधान करता है तब संसार का अभाव और अपना स्वरूप साक्षात प्र. तीत होता है और व्यवहार के समय संसारके दुःखसुख शोक मोहादि जैसे पहले थे वैसेही भुने अन्नवत् प्रतीत ५६ अनिन्दामृतबर्षिणी। होते हैं जैसे भुनाअन्न भूख दूरकरने कूसमर्थ है जमनेकू समर्थ नहीं ऐसे उस ज्ञानी कू च्यवहार सुखदुःखादि का हेतु है परन्तु जन्मका हेतु नहीं और अज्ञानीकी बरा- बर उसकू दुःख सुख भी नहीं होते इस बातकं भी अभी आगे दृष्टान्त देकर सिद्धकरेंगे चौथी भमिकामें शरीर यातो चाण्डाल के घरमें या काशी में छूटो आनन्द पूर्वक छूटो या मच्छो रोग होकर लोटते पोटतें छूटो मुक्ति में सन्देह नहीं वो मुक्त उसी समयहोगया जिस समय उसंको ज्ञान हुआमोदि होने से ज्ञान कानाश नहीं होता जैसे विद्याकू स्वप्न सुषुप्ति मादि में भल भी जाता है परन्तु कुछ अगले दिननहीं बढ़ता ४ पाँ- ची भूमिकाका लक्षण यो है कि जैसे कोई पाव कोश समुद्रमै आधे शरीर जलमें खड़ाहो उसंकू बहुत वि चारने से समुद्रके तीरके मन्दिर रक्षादि देखा करते हैं वैसे उसकुँ संसारका व्यवहार बहुतः किसीके सुनने दे- खने से प्रतीत होता है.५ छठी भमिकामें गले तकाजल की कल्पना करलेनी ६ सातवीं भूमिकामें जलमें प्रवेश होजींना सातवीं भूमिकावाले का शरीर ह्रद बीस दिन रहती है क्योंकि भोजनादि का अभाव होजाताहै ७ चौथी भूमिकावाले से लेकर सातवीतक एकसे एकसिवाय ब्रह्म- वित कहें जाते हैं, ब्रह्मवित् ४ ब्रह्मविद्वर ५ ब्रह्मविद्वरी- यान ६ ब्रह्मविद्वरिष्ठ७मूर्ख योही कहते हैं कि जैसा हम- ने पांचवीं छठी सातवीं भूमिकाका लक्षण लिखाहै ऐसे ज्ञानी होते हैं और चौथीं भूमिकावाले मैं बहुत तर्क करते हैं उनके पूर्व पत्नके तर्कों का खण्डनावेदान्त शास्त्र आनन्दामृतबर्षिणी। में बहुत लिखा है कुछ एक लेशमात्र यहां भी लिखते हैं। शंका । कि जो खावे पीवे नहीं और शरीर इन्द्रि. यादि करके चेष्टान करताहो सों ज्ञानी है। उत्तरः। ज्ञान क्या हुआ रोगहुआ ऐसे तो रोगी होते हैं रोगियोंकू भी ज्ञानी कहा चाहिये।शंका । जिसकं दुःखं सुख न प्रतीत होता हो सो ज्ञानी है। उत्तरा दुःख सुखकाअभाव जड़ पदार्थों में होताहै वे ज्ञानी हैं। शंका । संसारका अनुभव न होना यो ज्ञानका लक्षणहै। उत्तर । संसार तो सुषुप्ति मूर्छा प्रलयादिमेंभी अनुभव नहीं होता वहांभी तो सं- सारका नाघहै। प्रश्ना फिर संसारका क्या बाध है और क्या ज्ञानका लक्षण है। उत्तर । संसार का योही बाध है कि जो दूसरे अध्यायमें तीन प्रकार का बाध लिख आये हैं और ज्ञान का भी योही लक्षण है कि जबतक जो शरीर प्रारब्ध कर्मका रचा हुआ नष्टनहीं होता तबतक संसारकं मिथ्या समझना तातार्य जबतक संसारमें स्ल. रूपसे मर्दन नहीं होसका क्योंकिमिथ्या पदार्थकं मिथ्या जानने से उसका अभाव नहीं होता जैसे बाजीगर के पदार्थ मिथ्या जाने से स्वरूप करके मर्दन नहीं होते इस प्रकार यह संसार रहता है परन्तु देहपात के पीछे स्वरूप से भी मर्दन होता है इस में वेद प्रमाण है अ- न्यथावशिष्ठादि ब्रह्मज्ञानीथे इसमें क्या प्रमाणहै। शङ्का। ज्ञानतो होगया फिर प्रारब्ध कर्मका फल दुःखादि क्यों न नाश हुआ। उत्तरातीरने पुरुषकू भेदन तो करदिया आगे क्यों चला और दूसरे कुम्हार ने बरतन उतारने के लिये चाक घुमाया बरतन तो उतार लिया फिर चाक ५८ GOIN आनन्दाम्मतवर्षिणी। क्यों धमता है । शङ्का । ज्ञान ने संसार कू स्वरूप से और प्रारब्धकम्भक क्यों ना नाश किया। उत्तर प्रा- रब्धे कर्म और यो संसार मिथ्या भास मुरदे की नाई कुछ ज्ञान के विरोध नहीं प्रत्युतं ज्ञान कू उत्साह व. ढ़ाने वाले हैं जैसे किसी पुरुष की सारी हुई हजारों लाशें पड़ी हों वो शूर उनको देख देख आनन्द होता है। शङ्काजो ज्ञानी पूर्ववत संसार के भोग भोगता रहा तो ज्ञानी अज्ञानी में क्या भेद हुआ। उत्तरा ज्ञानी राग- पूर्वक संसार के भोग नहीं भोगता जैसे किसीके शिरपुर कोई बेगार रखेदे तो क्या बेगार के उठाने में उसको उत्साहहै शङ्का बंगारी कूतो दुःख होता है जो ज्ञानी कू,भी दुःख हुआ तो ज्ञानका क्या फले हुआ उत्तर। ज्ञानीका दुःख मुक्तिक आनन्दमें दबा रहता है जैसे दो बेगारी हैं एक जानता है कि मैं दोघड़ी में छुटुंगा दूसरा नहीं जानता कि मैं कब छूटेगा हेवादी! बिचार देख दुःख दोनों का सम प्रतीत होताहै परन्तु जानने वाले कुंथोड़ा दुःख है नहीं जाननेवाले के बहुत दुख है ऐसे ज्ञानी अंज्ञानी के दुःख में बहुत भेदह शङ्का तुमतो जैसे प्रथमथै वैसेही अबभी दीखते हो ज्ञानहोकर कुछ और प्रकारके न हुये। उत्तर जिस समय तुमकं रज्जु में सर्प की भ्रांति हुईथी उसकं देखकर कंपने लगे थे औरागिर कर चोट लगगई थी फिर किसी के उपदेश और अपनी युक्तिसे रज्जुका अनुभव किया तुम कहो कि आप की सूरत भी बदली थी कहता है कि मेरी सरत तो नहीं बदली थी परन्तु अन्तःकरण की रत्ति वदलगई थी।

५९ आनन्दामृतबर्षिणी। उत्तरः। फिर हमारे अन्तःकरणके साक्षी क्या तुमहो जैसे भ्रांति समय तुमकू कंप थी पीछे निवृत्त होगई सूरत न बदली ऐसे हमकू भांति थी सो निरत्त होगई अपने अन्तःकरण के हम साक्षी हैं। शंका | तुम कहतेहो जो जगत् अज्ञानका कार्य है वो अज्ञान तो नाश होगया झार्य उसका कैले घना रहा: उत्तर प्रांति समय जो. तुमकं कपातीथी और गिरकर चोटालगीथी फिर जिस समयःची प्रांति दाई कार्या उस भ्रांति का वो कंप: और वो चोट उसी समय जाती रही थी कहता है कंप तो. दोघडीके पीछे और चोट दशदिनके पीछे गई थी। उ- तर आश्चर्य की बात है जो घडीभर भ्रान्ति नहीं रही उसका कार्य तो शदिलके पीछे गया और हमारा अ- ज्ञान पराई संख्यालेसी परे का था वो नाश हुआ है उ. सो कार्यकू कहते हो कि उसी समय क्यों न जाता रहा शरीर पत्तिके पीछे कार्य भी नाशाहोजावेगा और भी बहुत दृष्टान्त हैं उस कड़ने के पीछे वैसाही हरा प्रभ तीत होता है और किसी वस्त्र वा पात्र में गन्ध रक्खी हो-पीछे निकालने के भी कई घड़ी गन्ध बनी रहती है। और किसीकं स्वप्न में सिंहने भाड़पाया वो जाग उठा दे खता है कि सिंह नहीं परन्तु कम्प-दो घड़ी पीछे जाती है। शङ्कायो जो तुम भोग भोगतेहो ये ज्ञान कं नष्ट करदेंगे। उत्तरसालीते हुये चहने बिलाई को न मारा तो सरा क्या मारेगा और जैसे कोई वृजलगनेसेन सरा क्यों वो तुली की तीरले मरेगा जिसकाल में अज्ञान बः दाहुआ था उससमयातो ज्ञान जाशहुआनहीं अवतो उस ६० श्रीनन्दामृतबर्षिणी। अज्ञानकंज्ञानने नाशकरलियाउसकाकार्यये अन्न भक्ष- णादि तुच्छ पदार्थ ज्ञानकुंक्या नष्ट करेंगे। और दूसरेज पुरुष चार जार कं जानताहै वे चोर जार उसके बुरे होने का प्रयत्न नहीं करते और डरतेरहते हैं और जो प्रयत्न करें भी तो वो चैतन्य हैं ऐसे ज्ञानी इन भोगरूप चोरों को जानता है और तीसरे कोई स्त्री नेत्र शरीरादि करके तो सुन्दरहो परंतु उसकी उपस्थ इंद्रिय में गरमीका विका: रहो जो उस विकारकू जानता है. उसळू उस स्त्री के हाव भाव कटाक्ष नहीं मोहते न वो स्त्री उसके सामने हाव भाव कटाक्ष करती है ऐसे ज्ञानी इस मायारूपी स्त्री के अवगुणोंकू जानता है । शङ्का । जो तुम सदब्रिह्माहमस्मि ब्रह्माहमस्मि ऐसा अनुसंधानन करते रहोगे तब जो ब्रह्म- ज्ञान नष्ट होजावेगा।उत्तरातुमब्राह्मणोऽहम्ब्राह्मणोऽहम् इसका सदा अनुसंधान न करोगे तो लजावोगे जैसे तुम अपनी जातिकू नहीं भूलते वैसे हमने एकबर बस्तुका निश्चय कर लिया है वो हमारा ज्ञान कैसे जाता रहेगा और आपका निश्चय तो झूठा है एक युक्तिसे जाता रहता है योभी कहता है कि मेरा शरीर है और योभीक- हता है कि मैं ब्राह्मणहूँ कितना विरोध है ऐसा निश्चय तो आपका विना अनुसंधान के बना रहेगा और हमारा जो निश्चय है कि सहस्रों श्रुतिस्मृति युक्ति और अनुभव करके और तम सदृश बादियों के मतोंक खण्डन करके जो निश्चय किया है वो बिनाअनुसंधान के जातारहेगा। शङ्का । जिनकू शाप अनुग्रहकी सामर्थ्य होती है वे शानी हैं। उत्तर । शाप अनुग्रह ज्ञानका फल नहीं तप - - . अनिन्दामृतबर्षिणी। ६१ का फल है। शङ्का । ज्ञान बिना तपके कैसे हुआ। उत्तर तप। दो प्रकार का है एक तप शाप अनुग्रह की सामर्थ्य कसदेता है और एक तप ज्ञानकू उत्पन्न करता है।शङ्का। व्यास वशिष्ठ सनकादि भी तो ज्ञानी है। उत्तर । उनके दोनों प्रकारका तप है हमारे एकही है दूसरे तप न होने में कुछ ज्ञानी की क्षती नहीं है जैसे जौहरी बस्त्रादिकी परीक्षान करसंकेतो उस जौहरी की क्याक्षती है ऐसेही गएडा तावीज प्रेतादिकों के मन्त्रादि न जानता हो तो क्या ज्ञानीकी क्षती है तात्पर्य ऐसी ऐसी तकौका खण्डन बहुत वेदान्तशास्त्र में लिख रहाहै मुक्ति की इच्छावाला ऐसे २ बादोंमें बुद्धि को न समाप्तकरे केवल वेद वाक्य में विश्वासकरे और जो पुराणादि में जड़भरतादि लिखे है कोईकहे कि ऐमे ज्ञानी होते हैं तो क्या उसके मुखमें मारने के लिये श्रुतिरूप बच नहीं है तात्पर्य वेद ऐसा भी कहते हैं जैसे जड़भरतादि हुये हैं और ऐसाभी कहते हैं ज्ञानी अपनी अवस्था वालों के साथं बिहार करता हुआ और सवारियों में बैठाहुआ स्त्रियोंके साथ रमता हुआ वो ज्ञानी अपनी दृष्टि में कुछ नहीं करताहै वशिष्ठ याज्ञवल्क्य से आदि लेकर बहुत प्रसिद्ध हैं और जनक चुडालादि बहुत स्त्रीतक ज्ञानीहुये हैं क्या सब जड़भरतवत् प्राच- रण करते थे तात्पर्य यो मूर्खलोग वे शास्त्र के एक २ देशकू सुनकर वेदशास्त्र के तात्पर्यकू न जानकर कुछ कुछ बंकते हैं उनका निश्चय उनके रहो हम को क्या काम है हमें सिद्धान्त कहते हैं प्रथम तो जड़भरतादिभी खाना सोना आदि त्याग करके काष्ठ पाषाणवत् नहीं रहे सङ्ग - ६२ श्रानन्दामृतवर्षिणी। की भांति से उदासीन रहतेथे कयोंकि सङ्गी लोगों करके बोध होजाता है और निस्सङ्ग सुखा प्राप्त होता है। इसलिये सदा सुख की इच्छावालों ने सङ्ग त्याग देना ज्ञान की परीक्षा के लिखे वैराग्य उपरति बोधकं हेतुः । स्वरूप काय ३ अवधि ४ इन चार चार भेद करकेलिन खते हैं वैराग्य के हेतु आदि ये हैं। शब्दादि विषयों में दोषदृष्टिहोनी १ त्यागदेना फिर भोगों में दीतता न हो। नी३ ब्रह्मलोककंतुणवत् जमझना उपरतिहेतु आदि ये हैं । यमनियमादि १ अतःकरणका निरोध र व्या वहारका बहुत कम होजाना अर्थात् खाने सोने मेंभी स- कोच ३ सुषुप्तिवत् जाग्रत् अवस्था रहनी ।। बोधके हेतु आदि में है ॥ श्रवणादि तत्व मिथ्याँका जानलेना फिर अन्थिका उदय न होना अर्थात् देहादिमें अहंबुद्धि न होनी ३ जैसे प्रथमदेहादिमें अहंबुद्धि थी वैसीही स्वरूप में हदबुद्धिहोजानी मुक्तिकी इच्छावालों के वैराग्यांदि के हेतु आदि तारतस्यता करके रहते हैं क्योंकि सबके कर्म एक प्रकार के नहीं इन सबमें कि जो वैराग्यांदिके हेतु आदि लिखे हैं। उनमें तत्व मिथ्याका जानलेना जो बोध का स्वरूप लिखाहे योही मुक्तिका कारण है और सब ज्ञा नियों के घोही एकरस है. जोवेशण्यादिक हेतु नादि ऊपर लिखे हैं वैसे जो किसीकेंहों तो बहुत पुण्य का फलहै उ; ससे सिवाय कोई पुण्य नहीं और जो किसी प्रतिबन्धक रके तीनों एक जगह न देखने में आचे तो उनके फल ऐसे होगे कि पैराग्य उपरति तो पूर्णहो बोध किसी प्रः तिबन्ध से नहो तो मुक्ति नहीं होगी तपकेवलसे ब्रह्म आनन्दातबर्षिणी साकारकी प्राप्ति होगी और जो बोध बराग्य उपरति इस जन्ममें न देखने में आवे तो मुक्ति निश्चय होगी परन्तु जबकि यह शरीर रहेगा हर्ष शोकादि आभास मात्र बने रहेंगे बोधका स्वरूप सब ज्ञानियों के एकरस है. बैराग्य उपरति में तारतम्यताहे जैसे १०० यो दूध सबका एकरङ्ग एकरस और व्यक्ति दुबलापन मोटापन स्वभावादि पृथक् २ ऐसे १०० ज्ञानी ज्ञान सर्वका ए करस, और व्यवहार चलन स्वभावादि सत्यादि गुणों की उपाधिसे एथक पृथक् अर्थात् किसी के सत्त्वगुण बहुत किसी के रज तम बहुत है सत्वगुणी शुकदेव, वा- मदेव, जाड़भरत, सनकादिक और रजोगुणी जनक, चुडालादि और तमोगुणी दुर्वासादि सत्त्व रज तमो- गुणी बहुत बर्तने से सत्त्वगुणीरजोगुणी तमोगुणी कहे जाते हैं परन्तु तीनोंगुण सबके तारतम्यता करके बर्त- ते हैं। ज्ञान के होने और बैराग्य उपरति सिद्धिं लक्ष्मी आदि के न होने में यह व्यवस्थाहै ज्ञान उपरति वैराग्य सिदि लक्ष्मी आदि पुण्यका फल है जिसके पूर्ण पुण्य हुआ जैसे जलसे घट भरा रहता है उस के तो बैराग्य उपरति ज्ञानसिदि लक्ष्मी आदि सब होते हैं और जो केवल ज्ञान हो वैराग्यादि न हो तो उस से भी थोड़े पुण्यका फल है। और जो ज्ञान न हो वैराग्य उपरतिहो उससे भी थोड़े पुण्यका फलं है और जो वैराग्य ज्ञान तीनों न हों सिदि लक्ष्मी आदि हो उससे भी थोड़े पु. एयका फल है और जो सिदिवैराग्यांदिन ही केवलाल क्ष्मी राज्यादि हों उससे भी थोड़े पुण्यको फल है राजा - मानन्दामृतबर्षिणी। से लगाकर कङ्गाल पर्यन्त पुण्यकी तारतम्यता कल्पना करलेनी पुण्य की तारतम्यता से ज्ञानियों के वैराग्यकी भी तारतम्यता कल्पना करलेनी जो तीनों वैराग्यादि किसीज्ञानी के देखने में आये तो वो ज्ञानी ऐसाहै जैसा मनुष्यों में चक्रवर्ती राजा जैसे जड़भरत शुकादि हैं ऐसा नहीं समझना कि जो ऐसेही हों वोही ज्ञानी हैं और ऐसोही की मुक्ति होती है। शङ्का । फिर ऐसे पुरुषोंकी शास्त्र में बहुत प्रशंसा क्यों लिखा है। उत्तर। ऐसे पु. रुषोंकं जीवन्मुक्तिका बहुआनन्द रहता है जैसे चक्र वर्ती राजाकू मनुष्यानन्द बहुत रहता है और जैसे राजासेजो कमलक्ष्मी प्रादिवाले हैं उनक भीतो प्रानन्द तारतम्यता करके रहता है और वेभी तो मनुष्य ही कहे जाते हैं ऐसे वैराग्य उपरति में कम जो ज्ञानी हैं वे भी ज्ञानी हैं. अज्ञानी नहीं। शङ्का । ज्ञानी के लक्षण शास्त्र में ऐसे ऐसे लिखे हैं क्रोध शोक भय न होना जितेन्द्रिय, क्षमा, वैराग्य, दया, निर्लोभ, दाता सबका प्यारा होना। टी० । दाता होना अर्थात् अभय दान देना अभ- यदान दो प्रकार का है एक यह कि अपने शरीर वाणी मन से किसी कं भय न देना दूसरे ज्ञान का उपदेश करके संसार के दुःखों से अभय करदेना। मू। येज्ञान के चिह्नहैं ऐसे २ वाक्यों की क्या गति होगी। उत्तर। ऐसे २ वाक्य प्रथम तो ज्ञान होते के लिये और ज्ञान के पीछे जीवन्मुक्ति की सिद्धि के लिये ताकीद में हैं एकादशी के व्रतवत् नियम नहीं जो

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NN
आतिन्दोमतबर्षिणी
एक दाना भी अन्नका मुखमें जापड़े व्रत टूटजावे ऐसे
ही जो कभी किसी पापक उदय होने से ज्ञानी काम
क्रोध आजावे तो ज्ञानही जाता रहता जिस काल में
सनकादि महाज्ञानी श्रीनारायणजी के मिलने के लिये:
वैकुण्ठकू गये थे नारायण के पार्षदों ने जब उनकूभी-
तर जाने के लिये मनेकिया तब उनको क्रोध आ
गया फिरशाप देदिया अर्थ से योभी प्रतीत होता है।
कामकै विना क्रोध नहीं आता विचारो ज्ञान उनको
नहीं जाता रहा और यह जो शंकांकरे कि वे ईश्वर थे।
समर्थ थे अर्थात् वे ईश्वरकी दीकारक कोटीमें हैं तो
मनुष्य कोटीमें ऐसी २ अनेक कथा पुराणों में वेदों में दुभा,
वासादिकी प्रसिद्ध हैं और दूसरे यह कि मुनिका न्याय है।
जो समर्थ पुरुषोंकईश्वरोंकू काम क्रोधाये तो जीवका:
तो यह अनादि स्वभावहै जीवको कामक्रोध के आजीने
में क्या आश्चर्य है शंका। ज्ञानीको दूसरे,उपदेश की
रनेसे क्या काम है। उत्तर ज्ञानीकं जगत में यहही एक
करतोके योग्य है कि जैसवते अज्ञानी कं ब्रह्मतत्त्व का
उपदेश करे।शंका।श्रीभगवान तो.यह कहते हैं किकर्म
संगी पुरुषोंकं कर्मसे न हटावें । उत्तर श्रीभगवान् ने
कर्मसंगीपुरुषोंका उसी जगह विशेषण दे रक्खाहै कि
अज्ञानी कर्मसंगी ब्रह्मतत्वका उपदेश न करें। शंका।
ज्ञानियों की व्यवस्था तो ऐसी रसुनी जाती है कि जब
उनको ज्ञान हुआ फिर वेकिसीसे नामिले मौन होकर
उत्तराखण्ड को चले गये। उत्तर। यह लक्षण अवधिका
है कोई ऐसाभी हुआहो परन्तुं सबकी नियमानहीं और
..

निन्दामृतवर्षिणी. दूसरे सत्ययुगादि ऐसे समयथे कि अस्थि श्रादिमेंप्राण वमे रहतेथें और कुछ कवि पुरुषों का नियम है कि बढ़ा- कर लिखते हैं और जो ग्रहान मानो तो.ग्रंथोंका वनना उपदेश करना यह विना प्रयत्तिके कैलेंदने विद्या का लोपहुआ चाहिये वेंद्रश्रिीकृष्णचन्द्र महाराज कहते हैं कि ज्ञानके लिये गुरुजी के पास जावा हे अर्जुन तुमको वे गुरु उपदेश करेंगे देखिये जो प्रवत होंगे तो उपदेश करने और जो बोलें बतलावेंगे नहीं दृष्टांत युक्ति नदेंगे अथवा उनका पताही न लगेगा तो बोध कैसे होगा वेद कहते हैं कि आचार्यचान् पुरुष ब्रह्मक जानता है ता- त्पर्य यहही है कि मुर्ख वेदशास्त्रके हृदयकू न जानकर कुछका कुछ वक्ताह ऐसे २ सिद्धांत शारीरक भाष्यपंच- दशी आदि ग्रंथों में श्रुतिस्मृति प्रमाण देदेकर सिद्ध कर रखे हैं जिस किसी के संदेह हो वहां से निश्चय करें और जिमकी गुरु वेदांत में श्रद्धा है वहतो संशयाविपर्यय रहित होकर निश्चय मुक्ति होगामा इति श्रीआनन्द्रामतवेदान्तशास्त्रेटतीयोऽध्यायांना ॥ Rai m जो किसी पुरुष किसी पाप प्रतिबंधसे महावाक्य का अर्थ में न कर अपरोक्षका ज्ञान न होतो फिरसा. धन करै प्रथम अध्यायमें जोस्विकादि चार साधनको मुख्य-सार वही है नहीं चार प्राचार्यो ने नाना प्रकार से लाखो श्लोकों में और भाषा में कहा है उनहीं चारोंको अर्थ स्फुटि होने के लिये उनहीं चार साधनोंकू . अथ चतुर्थोऽध्यायः ॥ -- ६७ श्रीनन्दामृतवार्षिणी अव और प्रकारके लिखते हैं ज्ञानी के साधन दो प्रकार के हैं अंतरंग बहिरंग र अन्तरंगामुख्यहै बहिरंग गौण है बहिरंग साधन ये कहलाते हैं शौच (तात सन्ध्या वंदन वेद शास्त्रों का पढ़ना पाठ करना तर्पया हवन क- रना अतिथियिभ्यांगतिका पजनकिरनी सेवा करनी अन्नदेना ऐसें २ और भी बहुत निर्दयकर्म है उनके न करने में पाप करने से पापकी नियति होती है.* और पुत्रादि के जन्सादिमें जातकमा श्राद्धादि करने पू- णमासी संक्रीत्यादि में तीयों में जाना स्नान दान करना निष्काम यज्ञकरने ऐसे ऐसे औरभी चाहत मैमितिककर्म हैं, और कोई अपनेसें खोटकिमिशालासे विरुद्ध हो जाने उसकी निवृत्ति के लिये जान्द्रायणादिवत और श्रीलङ्गा जी में स्नानादि करने से औरभी लायश्चित्त कर्म हैं, और बद्रीनारायणादि के दर्शन करते तीर्थों का सेवन करना पाषाणादि मूर्तियोंळू पूजिना परिक्रमाकिरनीद्रांक घण्टादि बजाने चौके धोतीसे रोधी खानीयह खाना यह न खानी इसाबरतन में खाना इस बरतनसेन खाना इसके हथिका खाना इसके हाथका नासाना हाब्राह्मण यह क्षत्रिय वर्णादि यहा बह्मचारी यहाग्रहस्थीन आदि आश्रमी इसप्रकारके और भी बहुत बहिरंग साधन हैं पुराणों में धर्मशास्त्रादि में उनका बहुत विस्तार है। वहां से सुनकर सम्पादन करे परमप्रयोजनः उनकी आन्तः करणकी शुद्धि है बहिरंगाप्रथम मन्दबुद्धि के लिया है अन्तरंगा बुद्धिमान के लियोहै बहिरेमासाधम अन्तरंग साधनों की इच्छा रखते हैं अन्तरंगाबाहिरंग साधनों श्रीनन्दामंतवार्षिणी की इच्छा नहीं रखते और ऐसा जो कहते हैं कि कर्म काण्ड और उपासनाकोएड ज्ञान के साधन है वहाँ जी व्यवस्था है जो उपासना इसप्रकारकीहै किापाषाणादि मूर्तियों का पूजन करना और मांझ घण्टा बजाने पं. रिक्रमा करनी औरभी बहुत ऐसी ऐसी उपासना का बहिरंग साधनों में अन्तभाव और परमेश्वरकाध्यान करना मकरना विषयों से एक कर चित्त परमेश्वर "में लगाना ऐसी ऐसी उपासनाका अन्तरंग साधनों अन्तभावहै; अन्तरंग साधना ये कहलाता है मन में मान नहीं रखना कि ऐसे पण्डित जातीमें ब्राह्मण धन- वाले और अपने गुणोंकी औरोसे श्लाघा करानेकी इच्छा न रखनी इसका नाम अमान्वित है अधिर्मध्वज निहोना जो अपने में थोड़े गुणहाँ तो औरों के सामने बहुत नहीं प्रकट करने ऐसा हम जानते हैं. ऐसी पूजा करने हरेस ऐसे पाखण्डों कात्याग करना इसका चाम श्रदम्भित्वहिर मन वाणी शरीर से किसी कूदुःखान देना इसका नाम अहिंसा है ३ चेनयोजन किसीने आप कू बुरा बोला अथवा मार भी दिया समर्थ होकर उस कू कुछीन कहना यो समझना कि प्रारब्धका भोगा है इसका कुछ दोष नहीं इसका नाम क्षमा है प्रसन्न चेष्टा रखनी नम्र होकर चलना अकंडाऐंठ कर न चलना न बोलना मन्द मुसुकान पूर्वक ऐसा चोले मानो में. खसे फूल भरते हैं दूसरेका क्षोभित हृदयभी शान्त हो जाय इसका नाम कोमलता है। गुरुकी मनवाणीशरी- स्करके उपासना करनी व्यवहारमें छल न करना Urn 4

श्रीनन्दामृतवार्षिणी।
अन्तःकरणगत जो दोष हैं उनकं दूर करना इसका नाम
अन्तर शौच है और बहिः शौंच जल-मृत्तिका करके ७
सन्मार्ग में स्थित रहना जैसे जो जगत् में कहानी हैं।।
'धर्म किये जो होवै हानि तोभी न छोड़ाधर्मकी बानिया
एक इतिहासभी लिखते हैं एक ब्राह्मपा बाल्यअवस्थासे
ठाकुरसेवा करताथा कोई उस से पाप बुद्धिपचक नहीं
बनाथाएकदिन उसकी रस्ते में चार आदमियों ने घेर
लिया जो कुछाउसपैथा छीनलिया और कहा कि तुमकं
मारेंगे ब्राह्मण ने विचारा कि मैंने बाल्यअवस्थासे ठाकुर
सेवा करी है कोई पाप नहीं किया ये मुझस्थामारते हैं
सोमारो परन्तु जो ये कहैं तोठाकुरजीको तो तीर्थ में पधार
दूं कोई वहां पास जलाशय था उनसे आज्ञा लेकर ठाकुल
रिजाको सिंहासन हाथ में लेकर कहाहे परमेश्वर बाल्य
अवस्था से आपकी लंबी करी थी आज उसकी यो फल
है। क्रिविनापाप नाराजतिाहूं वहाँ आकाशवाणी हुई कि
तुमचे पूर्वजन्म में इन चारों को एकार घेर मारा थायो
पजाँका फल हैं जोतुमकू ये बाहरी एकवर मारते हैं यो सु-
नकवारों श्रादी वहां गयेशकालकि तुम किससे
बात करते थे उसने कहा तुम क्या काम है जो मुझ
कू मारना है तो मारतो बहुत चर जो उन्होंने बझाकिर
सबै व्यवस्था ठाकुरसेवादि की सुनादी चारों ने उँसन
-क छोईदिया और जो कुछ उससे छीनाथा देदियाऔर
कहा कि हमाचारों तेरेपिछले कियो का इसलोक परलोक
में बदला नहीं चाहते दहशी निग्रहकरना रात्रिकालो
चि उसमोडेढपहर सोना उससोसिवायः बासनपर

. 1 . श्रीनन्दामृतवर्षिणी। सीधा स्नानादि क्रिया के बिना वैठकर श्रवणादि क- रते रहना शब्दादि विषयों से बैरस्यि करना १० अंहकार न करना कि मैं ऐसा वैराग्यवालाई जन्म मृत्यु जरा व्याधि में दुःखं और दोष भी हैं वारंवार : उनका अनुसंधान करते रहती क्योंकि जब तक शरीर कें. किसी रोगने नहीं असा श्रौत्रादि इन्द्रिय भी बने रहते हैं जरा भी न होवे तबतक ही कुछ पुरुषार्थ, हो सकता है कोई कहें कि साहब जब प्यास लगेगी तबहीं कुंआ खोदलेंगे पीछे की बात किसने देखी हैं जैसे प्यास समयचो त्राहि त्राहि करके मरजीता है ऐसे ही जो बनेकाम में मोक्षका उपाय नहीं करते पीछे वही व्य वस्था होती है.१२, पुत्रदारादिमें आसक्ति न करनी अ- नित्यजानकर प्रीतिका त्याग करना पुत्रादि केन्दुःख सुख में यो अध्यासन करना कि मैं सुखी दुखीहूं। इष्टः अनिष्ट की प्राप्ति में संमचित्तारहना, क्योंकि लाभ हानि दिन रात्रि ऋतु युगादिवत् बदलते रहतेहैं श्रष्टा- बक्रजी कहते हैं कौनसी.वो अवस्था और कालहै कि जिसमें प्राणियोंकोद्वंद,हर्ष शोक हानि,लाम,सुख, दुःखा- दि नहींरहते जोपरायें वश होनेवाले कार्य हैं उनको जो प्रतीकार होता तो.बलराम युधिष्ठिरादि दुःखकरके क्यों दुःखी होते. ६५ परमेश्वर केलविषयाअनन्य योग करके भक्ति करनी अर्थात् परमेश्वरक बिता नहीं है :- जने के योगजिस भक्ति में ऐसी अव्यभिचारिणी भक्ति करनी तात्पर्य सर्वात्महष्टि हीना: ६ एकांतदेश शुई चित्त का प्रसन्न करनेवाला हो जिसजगह सिंह सर्प 5 ७१ अानन्दामृतवर्षिणी चौरादिकी भीति नहीं और आपकू स्त्रीआदिकरकेविक्षेप नहोवे उस देशका सेवन करना प्राकृत जोजन किज़ो स्त्रीकसिंग और खानासोनादिइसीकू कहते हैं किसशः रीरहुये कायोही फलही ऐंसों के समीप नहीं बैठनावे- दन्ति शास्त्रश्रवणादिविचारने में सदालगेरहना तत्त्व पदार्थों की जो शहिाउसी में निष्ठा रखनी तीसरे अध्याय में भी लिखाये हैं कि ज्ञान का हेतु श्रवणादि हैं ज्ञानके होनेमें ये मुख्य सायन, ईसीबातप्रथमातो वेद भग- वान ने कहा है फिर व्यासजीनेभी सत्र में कहा है कि वारंवार श्रवण करनाएकही बेरन करतापंचदशीकारभी कहते हैं कि मन वाणा आदिकन्तक सावकाशनहीं देना मरनेसोने पर्यन्तचेदान्त-शास्त्रकीचिंता करके कालकूविचारना तार पर्यश्रीकृष्ण श्रीशंकरचिार्य भगवान सत्यादि लेकर संबआचार्य इसी बात सिद्धकरते हैं कि मुक्तिकी इच्छा वाले वेदान्तशास्त्र वारंवार प्रवणकरनावेदान्तशास्त्र के विनाऔरपुराणं शास्त्रों का श्रवण करनाइसकाभी नियम कर दिया है क्योंकि बुद्धिएकहै विचल न जावे वशिष्ठजी भी कहते हैं कर्म वो है जो बन्धन के लिये न हो विद्यायो है जो मुक्तिकेलिये होनि कामकर्मके विना और कर्मके चल आयासके लिये है ब्रह्मविद्याके विना और न्यायशास्त्रादि चित्रकारी आदिवत् विद्याहै। सबसे सिवाय इसदेहका फल मुक्ति समझना मुक्तिकेसाधनों में ऐसे प्रलयकर- नोजैसे किसी के शरीर में अग्नि लगजावे वस्त्र बाल जलनेल जैसे वो गंगाजीकू दौड़ता है जो कोई रस्ते में एक बात भी करले अथवा लोभ देकर खड़ारक्खें तो

७२
श्रीनन्द्रामृतवर्षिणी।
नहीं खड़ी होती. ऐसे संसारके तापातपाहुआयो पुरुष
ब्रह्मविद्या गंगाजीक जल्दी प्रसन्नकरके प्राप्तहो स्त्री धन:
वस्त्रादि जो,रचे हुये मायाके ठे अनित्य दुखदायी प.
दार्थ हैं उनमें भोंगबुद्धि करकेपतंगवत नष्ट न हो
वीस साधन श्रीकृष्णचन्द्रने गीतीशास्त्र में कहा हैं और
२६ साधन दैत्रीसम्बत् के कहें हैं। उनकूभी सुनो अभय
होनालिसा लें. इसलोक परलोक में भय न करना तात्पर्य
पापात्माभिय हुआ करता है । अन्तःकरण कू भले.
प्रकार शुद्ध करना र ब्रह्मज्ञानका जो उपाय उसमें लगे
रहना ३ दानकरना यथाशक्ति कुछ अपनेपासनहोतो.
अभय दानदेनाः इन्द्रियों कू अपनेरविषयों से रोकना
पदव्ययज्ञ चान्द्रायणव्रतादि तपयज्ञ उपयज्ञपनापांठ
करना यो यज्ञचित्तत्तिनिरोध योग यज्ञ ऐसे ऐसेयज्ञसे
लगाकर ज्ञानयज्ञपर्यंत जैसा अपने अधिकारहोकरते
रहनाइवेदशास्त्रों का नित्य पढ़ना पाठ करना अपनेधर्म
का अनुष्ठान करना८ कोमलता अहिंसाः १० सत्य बो-
लेना जो प्रत्यक्षादि प्रमाण करकोभले प्रकारः सिद्धकर
लियाहै।शकोधन करतीतत्काल पश्चात्काल केवल दुःख
का हेतु है जिस समय क्रोध आवे वो समय किसी प्रकार
बितावे पीछे बिचारे जो उससमय में ऐसा कहती करता
तो क्या होता:१२ त्याग करनी १३ चित्त शान्तकरना
पीछे किसीके अवगुण नहीं कहते लिखा है कि जो
किया हुआ अवगुण किसीकी कहे तो बराबरी को पापी
होता है, और जो कुछ भला कर बढ़ाकर कहें तो दूना
पापी होता है जो अपने सामने किसीके अवगुण कहे

७३. अनिन्दामृतबर्षिणी। प्रथम उसी के पापी जाने दया अर्थात् किसी कं दुःख न देना और जो बने तो दूसरे का निवृत्त करदेना १६ लोलुप न होना अर्थात् कुछ पदार्थ के लिये पामरों के सामने दीनता न करनी १७ क्रूरक- ठोर चित्त न होना खोटे कामों में लोकलज्जारखनी वहां यो न समझता कि मेरे निन्दा स्तुति मान अ- प्रमान बराबर हैं: हा अपलन होना अर्थात् तथा क्रिया न करनी २ तेजस्वी रहना राजा आदिके छाया मान देवनी जैसें औरः श्रादमी हैं ऐसे चे भी हैं २९ क्षमा २२ धैर्य सत्यगुणी अर्थात् दुःख सुख भूख प्यास लाभ हान्यादि में चित्त कू स्थिर करना २३ शौच २४ किसीसे, द्रोह न करना चारगुण सम्पादन करने से चित्त प्रसन्न होजीता है चित्त के प्रसन्न होने से समस्त दुःखानाश होजाते हैं जो कि आपसे जाति विद्यामें बड़े उनासे द्वेष न करना वराबर के मित्रता रखनी २ छोटोपर दया करुणा करनी ३ पापी चौरजारोंकी उपेक्षाः करनीट आमाके विषय पूजाको अभिमान नरखना कि हमीपूजाके योग्यहैं जो दैवी सम्पत् को पुरुषहै उसमें ये गुण स्वभाव करके रहते हैं जिसमें ये गुण होंगे वो निश्चय मुक्त होवेगा और श्रीसुरी सम्पत् अवगुण दंभ काम क्रोधः लोभादि बहुत हैं गीता शास्त्र में लिखे हैं कुछ थोड़े से इस ग्रंथमें भी नवें अध्याय में लिखे हैं। , बन्धके लिये हैं जिसकूँ मुक्त होना है वहां से निश्चय करके उनसे वर्जितरहे दैवी सम्पत् के अनुष्ठान करने से आसुरी सम्पत का तिरस्कारहोजाताहै आसुरीसम्पत् ne १०

.
आनन्दामृतवर्षिणी-
के बजने से दैवी सम्पत के गणोंका अनुष्ठान होजाताहै
जो लक्षण स्वभाव से ज्ञानी के रहते हैं और साधक
प्रयत्न करने से सिद्धहोते हैं उनकू इस प्रश्न के उत्तर में
लिखते हैं। प्रश्ना कैसे पुरुषलोग ज्ञानीकहते हैं। और
कैसे बोज्ञानी बोलताहै र बैठताहै ३ चलता है टाउत्तर।
जिसकालमेयो पुरुषजितनी मन में वासनाहै सबकूत्याग
करके निजानन्दकरके तुष्टरहता है दुःखों में दुःखसुखमें
सुख नहीं मानतादूर होगये हैं भयंराग क्रोधजिसके उस
कुंज्ञानीकहते हैं। शुभ अशुभको प्राप्त होकर किसी जगह
प्रीति नहीं करता प्रियङ्क: प्राप्त होकर हर्ष नहीं करता
अप्रिया प्राप्त होकर शोक नहीं करता साक्षी हुआ बो-
लता है २ मुक्तिमें यत्न करनेवाले विचारवान के मन
भी जो इन्द्रिय हरलेते हैं उन सब इन्द्रियों की रोककर,
परमेश्वर परायण हुआ बैठा रहताहै ३ सारी कामना
का त्याग करके निर्मान हुआ और जो कामना फिर
प्राप्तहों उनमें ममता इच्छा नहीं करता हुआ निरहङ्कार
हुआ.बिचरता रहता ४.फिर भी ज्ञानी का लक्षण
और प्रकार करके सुनो यो ज्ञानी का लक्षण स्वसंवेद
और परवेद भी है उदासीनयत् स्थित हुश्रा॥
टी।उदासीनवत् लिखने में यो शङ्का है कि उदा-
सीनही क्यों न कही समाधान योहे दो मनुष्य झगड़ा
करनेवाला कोईतीसंसभी उदासीनचलाआवेवो देखता
रहै.वा चलाजावेतो झगड़े करनेवालों की कुछ हानिनहीं
होती परन्तु आत्मा उदासीनवत् तीन गणोंके झगड़ेका
द्रष्टाहै जो चला जावे अर्थात् उनका अभिमान छोड़ देतो
.

श्रीनन्दामृतवर्षिणी। भगड़ेकरनेवालेभीनहींरहते इसलिये उदासीनवत्कहा।। मूग गुणों करके नहीं बिचलता है यो बिचारता रह- ताहै कि गुण बतरहे हैं समान है पाषाण सोना निन्दा स्तुति मित्र शत्रु मान अपमान जिसके सारे आरम्भों के त्याग करने का स्वभाव है जिसका उसकं ज्ञानी गु- शातीत स्थित प्रज्ञ कहते हैं और जो ज्ञानी को केवल स्वसंवेद लक्षण है । सत्त्वगुणका जो कार्य प्रकाशादि रजोगुण का जो कार्य प्रष्ठत्ति आदि तमोगुण का जो कार्य मोहादिजो अपने आप प्रारब्धके बलसे प्राप्त हों तब कुछ हर्ष शोक नहीं करता जो नित्त होजावे तन्त्र कुछ हर्ष शोक नहीं करता मुक्तिकी इच्छावाले के तो सत्त्वगुण में राग हर्ष और रज तमोगुणमें द्वेष शोक होता है ऐसे २ साधन गीता शास्त्रादि में बहुत लिखे हैं तात्पर्य यो है जैसे बने शरीर इन्द्रिय प्राण अन्तःकरणकू नित्या प्रतिदिनासिवाय २ अभ्यास करके निरोध करे चशिष्टजीकहते हैं जैसे बने हाथ से हाथ दांत से दांत मलकरहाहाकारादिशब्दकरकेमनकूवशकरे विषयाकार अन्तःकरण की रत्ति सूक्ष्म करने से जो अपना स्वरूप हुआ,हुआ नहीं प्रतीत होता सो स्वरूप ज्ञान द्वारा अ. परोक्ष होजाताहै हुईवस्तु न प्रतीत होताहो इसमें टान्त कहते हैं जैसे लड़कों में पढ़ता हुआ किसी का लड़का उस लड़के का शब्द बाहर से एथक भलेप्रकार नहीं प्रतीत होता अर्थात् उसंक उसका पिता दूसरे से यों नहीं कहसता कि यो मेरा लड़को पढ़ता है ऐसही जिसके इन्द्रियादि अपने अपने विषयों में प्रवत होरहे आनन्दामृतवार्षिणी। हो उसकुँ ज्ञान होनो कठिन है जैसे जो वे ह लड़के पुत्र ढ़ने से चुप होजावे अथवा शनैः शनैः पदें और चो ल- ड़का अपने स्वभाव के अनुहार पढ़ता रहे तब लड़के का शब्द निश्चय होसलाह ऐसेही जो विषया कारः अन्तः- करणकी वृत्ति सक्षम होजावे तब अपनास्वरूप भलेप्र- कार प्रतीत होसक्ता है इसलिये अवश्य अन्तःकरण की सति सूक्ष्म करदेनी योग्यहै इन्द्रियों के रोकने से अन्तः- करणको उत्ति सक्षम होती है इसमें भी दृष्टान्त कहते हैं जैसे किसी तालाब में दशगूल लगरही हो उसकूँ जो सुखानाहो तो प्रथम गल बन्द करे फिर सर्य के ताने से तालाब सखजाताहै ऐसे प्रथम इन्द्रियोंकू निरोध करे फिर विचार रूप सर्य तपाये इसप्रकार अन्तःकरण की तिसूक्ष्महोसती हैभलाइसबातकी परीक्षा के लिये प्रथम महीना भरतो ऐसा अभ्यासकरदेखो कितनाभेद पड़ता है जिसके अभ्यास करने से नित्यं प्रतिदिन उसका फल करामलकवत् प्रतीत होताहो फिर उसके ना करो तो कहो उससे सिवाय और कौन पशु है। अन्तःकरण की रत्तियोंका सूक्ष्म होजाना इसी• मनोनाश कहते हैं ऐसे२ साधनों करके युक्त जो पुरुष सो ज्ञानद्वारा अनायास निरतिशय आनन्द प्राप्त होता है | इति श्रीआनन्दाऽमृतंबंपिण्यांचतुर्थोऽध्यायः ॥ ४॥ अथ पंचमोऽध्यायः ॥ सत्त्वगुणके बढ़ाने से रजोगुण तमोगुण के कम करने से ज्ञानद्वारा अपने स्वरूपकी प्राप्ति होती है इसलिये सत्त- ज

"
आनन्दामृतार्षिणीय
गुण के बढ़ानेरजातिमोगुण कम करने के लिये तीनोगुणों
का लक्षण लिखते हैं जिसप्रकार ये तीनों गुण देह के वि-
षय आत्माकू बन्धन करते हैं लो सुनो सत्त्वगुण निर्मल
होनेसें प्रकाशक शान्तिरूप है कोई उपद्रव उसमें नहीं
शान्तरूप होने सेजिो मापन कार्य सूखा उसके साथ
बंधन करताहै। और प्रकाशकी होने से प्रकाशक का
कार्य जोज्ञिात इसके साथ आजमाकाबंधन करताहैग्में
सुखी ज्ञानी ये सितके धर्म हैं। आत्मा से जोड़ देता
रजोगुणीका कार्य औरविन्धन प्रकार लिखते हैं रजो-
गुण सगात्मक अर्थात रामहै। निसा स्वरूप जिसका
और तृष्णा संशों की उत्पत्ति है जिससे सो रजोगुणी
आत्माकं कसों में संग श्रीमान
टी । जो वस्तु प्राप्त नहीं उसमें अभिलाषारनी
तृष्णा प्राप्तीबस्तु में विशेष आसक्ति होनी संग
मक शक्ति करके बन्धन करता रहतमोगा तम:
रूप है सब प्राणियोंकू मोह करनेवाला है सो तमोगुणी-
प्रमाक निद्रा आलस्यामादि करके बन्धना करता है।
संच श्रादि अपने अपने आविर्भाव में जो करते हैं उन
की शक्ति दिखलाते हैं। जिस समय रज तमोगुणकू
तिरोभाव करके सत्त्वगुण अविर्भाव होता है सोसत्व
दुःख शोकादि के कारण हमें सन्ते भी सुख के अभि-
मुखा करदेती है रजोगुण सुखादिके कारण हुये सन्ते भी
कामों में लगादेता है। तमोगुण शास्त्रजन्य ज्ञान: कू ढकी
करके सुखादि के कारण हुये सन्ते भी प्रमादादिमें जोड़े
देता है महंत पुरुष,पूर्व-संस्कारासे मिले भी उन्होंने
-

७५
अानन्द्रामृतबर्षिणी।
उपदेश भी किया उपदेश समय चित्त प्रमादमें लगा
रहा जिसहित साँवोही तमोगुण है महात्मा ने जो कहा
उसाअर्थक न धारण किया जिस हेतुसे वोही प्रमाद है
यो नियम है कि जबत्सिवका आविर्भाव होता है तब
रजतमतिरोभाव होजातेहैं जब रजोगुणको आविर्भाव
होता है तबसत्व तम तिरोभाव होजाते हैं जब तमी-
गुण का आविर्भाव होता है तब सत्त्व रज तिरोभाव हो-
जाते हैं जिस कालमें सरवादि देह में पढ़ा रहता है उन
कीस्वरूपीलिखते हैं इस शरीर के सारे द्वारों में जिस
समयप्रकाश होता है और अन्तःकरण में सुखका श्रा-
विभुवि होता है इस चिह्नसें जानना कि अब सत्त्वगुण
बढ़ाहुआहै ऐसेही लोभ प्रति काँका प्रारम्भ अंश
मस्टहा ऐसे ऐसे चिह्न करके जाने कि अब रजोगुण बढ़
रहा है और प्रकाश अप्रति प्रमाद मोहादिके आवि
भीक में यो जाने किवि तमोगुणवढरहाहै अन्तकाल
में जोगासवगुणादि का आविर्भाव होतो क्या २
फल होताहै सोई लिखते हैं जो अन्तकाल में सत्त्वगुण
बढ़ाहोचे तो यो देहधारी जीवाइस देहकं त्याग करके
जोकि पुण्यलोक है जहाँ मल नहीं है सुख भोगने के
स्थान है उन प्राप्त होताहै और रजोगुणमें भर
करके कर्मसंगी मनुष्यों में उत्पन्न होता है तमोगुण में
सरकरके पशु आदि मंढयोनि में उत्पन्न होताहै जिस
हेतु से इस शरीरमें अपने आप सरुवादिगुण आविर्भाव
होते हैं उसका कारण कहते हैं निर्मल फल जो ज्ञान
सुख सो पिछले सत्त्वगुणी कर्म का फल है रजोगुणी
है

७९ अानन्दामृतवर्षिणी। कर्म का फल दुःखादि है तमोगुणी कम्म का फल अ- ज्ञानादि है। सत्वगुण से ज्ञानादि होते हैं रजोगुण से लोभादि होते हैं प्रमाद मोहादि तमोगुण से होते हैं सत्वगुणी आदि पुरुषों कू देह के पीछे क्या फल होता है प्रथम तो यो कहाथा अन्तकाल में जो गुण बढ़ाहोवें उसका ऐसा फल होता है यहां तारतम्यता का वि- चाराहैजे सत्त्वगुणी हैं वे अपने गुणकी तारतम्यता से ऊपर के लोको प्राप्त होंगे जैसे इसलोक में ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्रादि की और राजा मन्त्री आदि की ता- रतस्यताहै ऐसही ऊपर भी देवता गन्धादि ब्रह्मलोकों की तारतम्यता है जितनी यहां मनुष्यलोकमें जिसके सत्त्वगुणकी वृत्तिसिवायरही है वो उसी लेखेसे ऊपरके लोको प्राप्तहोगा इसीप्रकार जो गुणी मनुष्यलोक में ब्राह्मण और चक्रवत्ति राजासे लगाकर चांडाल कंगाल पर्यन्त उत्पन्न होवेगा और तमोगुणी पशुत्रादि योनियों में अर्थात् कीट आदि सदिसे लेकर गों हंसादि पर्यन्त योनियों में उत्पन्न होवेगा औरजोज्ञानी हैं वो गुणातीत मुक्त होनेगावो यो जानता है कि मैं इन गुणों से एथक हूं गुणही कर्ता है मैं अकर्ता हूँ गुणोंका द्रष्टा साक्षी ई परमेश्वर कहते हैं गुणातीत मेरे भाव प्राप्त होगा तात्पर्य मुक्त होवेगा| देवता की पूजा करने और यज्ञ आदि दान तपादि करने से अन्न खानसे ऐसी ऐसी बहुत बातें हैं सत्यादिको परीक्षा होती है, तात्पर्य जों सत्त्वगुणी देवताकी पंजॉकर तो जानना कि यो सत्त्वगुणी है. ऐसही रज तमोगुणी की कल्पना करलेनी और है

अानन्दामृतवर्षिणी।
सेही यज्ञा दानादि में समझलेना सत्वगुण पूजा,दा.
नादि करनेसे सत्त्वगुण बढ़ता है इसलिये रजोगुणी तमो.
गुणीसंबन्धी पूजादित्याशिदेने के लिये सत्त्वगुणी संबन्धी
पूजादि सेवन करने के लिये प्रजादि कू सव रजातमो-
गुण भेद करके लिखते हैं । ब्रह्मा, विष्णु, महेश, सय्य,
शक्ति, गणेशादि के यजन करनेवाले सत्वगुणी हैं यक्षान
दि के यजन करनेवाले रजोगुणी हैं भंत प्रेतादि के यजत
करनेवाले तमोगुणी हैं रजोगुणी तमोगुणी ऐसा ऐसा
तप करता है कि शास्त्र में तो उसका विधान नहीं और
प्राणियों कं भय का देनेवाला घोर शरीर के बंद करने
वाला भखं वृथाः पाखण्ड करके एमा तपकरते है हेत
उसका यों है कि काम गिदम्भ आहारादि करके युक्त
जैसे कि नास्तिकादि के ब्रतादि हैं इससमय में बहुत
प्रसिद्ध है लक्षण उनके श्रीतुलसीदासजी नारामायणः
में लिखे हैं। तात्पर्य जो शास्त्र ने नहीं विधान किया तो
पाखण्ड है शास्त्र की विधि से करनी तप आदि सत्त्व
गुणी हैं- भोजन का भेद कहते हैं धनवाला अन्न घत
शर्करा करके युक्त और भोजन के पीछे शरीर में अपने
इस करके चिरकाल स्थिर रहे और स्निग्ध कोमलत्तर
और जिसके देखने से चित्त प्रसन्न होजाचे देखतही
मन अंगीकार करलेचे ऐसा अन्न अवस्था उत्साह शक्ति
आरोग्यका बढ़ानेवाला सत्त्वगुणी को प्रियह यज्ञा में
ऐसा-अनदेना योग्य है । अत्ति कटुअम्ल लवण उष्ण
तीक्ष्ण रुक्ष और दाह करनेवाला ऐसा अन्न दुखि शोक
रोगका बढ़ानेवाला है और भोजन के पीछे भी दुर्मन
MP

-.
करना ३ भलेप्रकार छष्टि जमाकर देखना गत एका
अनिन्दासतबर्षिणीय
करनेवाला रजोगुणी कू प्रिय है आतिशब्द सब के लाथ
जोड़ देना २:जिसकू बनहुये पहर बीतजावें और गत
रस ठंढाहोजावे और जिसमें दुर्गन्ध श्रावे बासी जूठा
शास्त्र करके निन्दित ऐसा अन्न तमोगुणी है .यज्ञाका
भेदः कहते हैं फलकी इच्छा नहीं है जिन्हें के योही
विचार करके कि यज्ञ करना वेदविहित है हमकं करना
योग्य है इसप्रकार मनकं समाधान करके जो यज्ञकरते
हैं सो यज्ञ सत्त्वगुणी हैं. १ फल का उद्देश कांक दम कर
रके जो यज्ञ करते हैं, सो रजोगुणी है र शास्त्र विधि
करके हील रजोगुणी तमोगुणी अन्नहै जिस यज्ञमें मंत्र
दक्षिणा करके हीन श्रद्धांकरके रहित जो यज्ञ सो तमो-
गुणी है. ३ तंपर्के आगे सत्त्वादि लेद करके लिखेंगेप्रथम
तपकू मन बाणी शरीर भेद करके लिखते हैं देवताबा
ह्मण गुरू और कोई महात्मा उनका पूजनकरना क्रोम
लरहना हिंसा न करनी पवित्र ब्रह्मचारहना इस
शारीरकतप कहते हैं । मैथुनके पाठा अंगहैं सबसे
बर्जित रहना इसका नाम ब्रह्मचर्य है शीगवुद्धि करके
स्त्रीका स्मरण करना कीर्तन करना र हाँसी चौहल
न्तमें बातकरनी ५ मन में संकल्पकरनी कियो कैसे
प्राप्तहो ६ योनिश्चय करना कि हम इससे संगकरेंगे
साक्षात भ्रष्ट होजाना रागपद सबके साथ जोड़देता
ऐसा वचन बोलना दूसरे उद्वेगन करते सत्यहाउस
कंप्यारालगे परिणाममें सुखका करनेवाला थोड़े अक्षरों
कहना वेदशास्त्र के पढ़ने पाठ का अभ्यास रखना इस
में

15
अनिन्दामृतबर्षिणी
कू वाणी का तप कहते हैं २ मनकी प्रसंशता अक्रूरता
मनन करना मन विषयों से निरोध करना व्यवहार
में माया न करनी इसक मानलतापकहतही इन तीन
प्रकार के तपसात्त्विकादि भेदकरके तीन प्रकार का
कहते हैं एकाग्र चित्त करके फल की इच्छा न करके
परम श्रद्धा करके ऐसा जो तीन प्रकार का तप किया
है इसकं सात्विक कहते हैं जिन्होंने सरकारके लिये
लिये साधुह मान और पूजाके लिय दम्भकरके जो तप
किया है सो अनित्य होने से रजोगुली है २ बिना वि.
वेक के दुराग्रह करके आत्माको पीड़ा करके अथवा दू-
क्लरे के नाश के लिये जो तप करते हैं लो तमोगुणी है।
दानका भेद कहते हैं हम देता योग्य है इस बुद्धि
करके सुन्दर देशकालमें अनुपकारी सुपात्रों के जो दान
देनासो सत्त्वगुणी जो प्रत्युपकारी कूचा फलका उ
देश करके चा चित्त क्लेश करके जो दान देना सों
रजोगुणी आपात्रोंक चा अदेशकालमें देना और जो
सुपात्रों कामी दैना तो असत्कार अवज्ञा करके देना
यो न तमोगुणी है ३ कर्मका भेद कहते हैं फलकी
इच्छा ना करके यो चिचार कर कि कर्म करना वेदशास्त्र
की आज्ञा है नित्य करना चाहिये राग द्वेष के विना
अभिनिवेशन रखकर कर्म कियाहै सो सत्त्वगुणी
फल की इच्छा करके अहंकार करके बहुत प्रायास
करके जोक्रमकिया सो रजोगणी २ पश्चीतू भावी ध
नादि का व्ययाहिंसा-अपना बल इनकं नहीं विचार
करके केवल लोहसे जो कर्मका आरम्भ करना सो कम

आनन्दामृतवर्षिणी। २३ नमोगुणी ३ कर्ताका भेद कहते हैं त्यागदिया है अभि- निवेशकर्म में जिसने और गर्वकी जोधात बोलनी उस से रहित धैर्य उत्साहवाला कर्म की सिद्धि असिद्धि में निर्विकार ऐसा कर्मकर्ता सत्त्वगुणी १ रामी फलकी इच्छावाला लोभी हिंसात्मक अपवित्र हर्ष शोक करके युक्त ऐसा कर्यकर्ता रजोगुणी र प्राकृत अनव अवगुण कोशक्तिकछिपानेवाला आलस्यस्वभाववालाशौकशील दीर्घसूत्री अर्थात् घड़ीके काम के महीना लगावे ऐसा क्रर्मकती तमोगुणी ३ सुखका भैद कहते हैं तम रजों गुणी उत्तियों का निरोध कर कर जो सत्त्वगुण बढ़ता है कार्य उसका शांति संतोष निरंता बिधाह कोमलतादि उसकाल में जो अंतःकरण में सुख होता है सो सत्त्व गणी है प्रथम अन्तःकरण निरोधक समय तो यो विष की सदृश प्रतीत होता है परन्तु थोड़े दिनों तक पीछे तो सदा अमृत की सदृश है । इन्द्रियों का विषयों के साथ सम्बन्ध होने से अर्थात् खाने देखने मैथुनादिसे जो सुख होता है सो रजोगुणी उस क्षण में तो अमृत की सदृश प्रतीत होता है पीछे तो विषकी सहश है।२ निद्रा आलस्य मनोराज्यादि से जो सुख होता है सो तमोगुणी वह इस लोकका न परलोकको केवल आत्मा कं मोहनेवाला है तात्पर्य इसलोक स्वर्गादि में व देव- ताओं में ऐसा कोईनहीं एक शुद्ध प्रत्यगात्माके विना कि जो इन गुणों से रहितही त्याग ज्ञान बुद्धि धैर्य - दादि सत्त्वादि भेद से गीता शास्त्र में भले प्रकार लिखें हैं और जितना भेद ऊपर लिखा है उनका भी प्रय

कट भानन्दासतबर्षिणा।
गीतादि के श्रवण से निश्चय होसक्ता है जितनी बेद
शास्त्रों की प्राज्ञा है कि यो करना यो न करना सबका
तात्पर्य यो है कि जिसके करने से रज तमोगुण बढ़ते हैं
यह काम न करना और जिसके करनेसे सत्त्वगुण वता
है वह काम करना बुद्धिमान को विचारना चाहिये कि
प्रातःकालादि स्नान ध्यानादि करने से रंज तमोगुणका
नाश होता है वा नहीं जो जाने कि होता है तो सदा
जैसे छते वैतेही शास्त्रविहित कर्मों को करना योग्य है
जिस कालमें रज, तमोगुणकी वृत्तियों का तिरस्कार
और सत्त्वगुणकी वृत्तियों का आविर्भाव भलेप्रकार हो-
जावेथा उसकाल में यो मेरेकू करना योग्यह यो अयोग्य
है. यो रस्ताबन्ध दुःखादि को, है यो रस्ता सुख मुक्ति
का है सब जान जानेगा और वशिष्ठ व्यासादि कू जो
यो सामर्थ है लद सूत भविष्यत्काल की व्यवस्था कह
देनी यो सत्यगुणका प्रताप है जिसके जितना सिवाय
सत्वालहोगा उसके उतनाही सिवाय प्रकाश होगा ता-
पर्यः सत्त्वगुख के बढ़ाने से सिधस्वर्ण लक्ष्मी आदि भी
प्रासं होनी बहुत सहजहै और सत्त्वगुणके बढ़ने से ज्ञान
द्वारामुक्तहोजाता है या मुख्यफल ।।.."
: इति श्रीमान्दालवार्षिएयांपञ्चमोऽध्यायः ५॥ ::
अथ षष्टोऽध्यायः॥
प्रथम साधन अवस्था में कर्म उपासना करनी योग्यहै
ज्ञान में लमुञ्चयन करना अर्थात् कर्म उपासना ज्ञान
तीनों मिलकर मुक्ति होती है। ऐसा न विचारला श्रीशंकरा-
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आनन्दामतबर्षिणी। चार्य महाराजनेंगीता भाष्यादिनन्थों में सब समुच्चय का खण्डन भलेप्रकार प्रमाणपूर्वक किया है तात्पर्य इस बात कं 'सिद्धकियाहै केवल ज्ञानसे मुक्ति होती है ज्ञानकुं कर्म उपा- सनाकी इच्छा नहींकर्मउपासना ज्ञानकी इच्छाहैतात्पर्य विनाज्ञानकर्म उपासना से मुक्ति नहीं होती.यहांभी इसी बातसिद्धकरते हैं केवलज्ञानले मुक्ति होती है। शंकातिप योग यज्ञ स्नान व्रतादि का फल मुक्ति सुनाजालाहै उनकी क्यागति होगी। उत्तरांतप योगादि परम्पराकरके मुक्तिके साधन, ज्ञान तो साक्षात् स्वतंत्र मुक्तिका साधन है योही बात. श्रीरामचन्द्रजी ने भी लक्ष्मणजी के प्रति रामगीता में कही है वे जो कर्म उपासना वालें केवल कर्म उपासना से मुक्ति कहते हैं उनसे बूझना योग्य है कि वेदकी हजारों श्रुति द्वैत पर है उसकी क्या गति है कर्म उपासनाचाले जो बूझे कर्म उपासना पर जो हजारों श्रुतिहैं उनकील्या गति है इसप्रश्न के उत्तरमें ब्रह्मवादी तोयों कहते हैं किकर्म करने से अन्तःकरण शुई होती है उपासना से चित्त की एकाग्रता होती है यो उनका परम प्रयोजन है फिरज्ञा नहारा मुक्ति होती है तदुक्तम् ॥ धर्मसे विरति योग से ज्ञाना। ज्ञानसे मोक्षपद वेद बखाना ॥ यो शास्त्रार्थ दि. ग्विजय शारीरक भाष्यादि ग्रन्थों में बहुत ही जो बहुत चर्चाकरे वह उन ग्रन्थोंका श्रवणकरे यहां सिद्धांत लि. खतेहैं केवल ज्ञान मुक्तिका साधना है उसमें यो दृष्टांत है जैसे पाकक्रिया में लकड़ी जल वर्तनादि परम्परा करके गौण साधन है ऐसही कर्म उपासना मुक्ति को गौण सा- धन है ज्ञान तो साक्षात मक्ति का साधन है जो ऐसी - ८६ अानन्दामृतवर्षिणी। शंकाकरे पाकक्रिया में अग्नि गौण रहो जल वर्तनादि मुख्य हैं दृष्टांतमें यों आया कर्म मुख्य है ज्ञान गौण है उत्तर उसका यों है अविद्या और कर्म का विरोध नहीं कर्म भी जड़ अविद्या भी जड़ है अन्धकारकू अन्धकार नहीं दूर करसता विद्या ज्ञानरूप है योही ज्ञान, अज्ञान कूदूर करसता है जैसे प्रकाश अन्धकार कू इस हेतु से ज्ञान गौण नहीं होसक्ता तदुक्तम् ।। हुये ज्ञान बरु मिटे न मोहू तुम रामहि प्रतिकूल न होहू । शंका। कर्म गौण रहो ज्ञान मुख्य रहो उपासना कहां गई. उत्तराजो ऐसी उपासना है कि मैं ब्रह्म हूं अर्थात् अभेद उपासनाकातो ज्ञान में अंतर्भावहैं और दासोहम् अर्थात् भेद उपासना का कर्म में अन्तर्भाव है। इस प्रक्रिया में ज्ञान कर्म दोही है। शंका आत्मा तो सब शरीरों में परिच्छिन्न प्रतीत होता है आत्मा पूर्णता कैसे हैं । उत्तर परिच्छिन्नवत् श्रा. त्मा अज्ञानसे प्रतीत होताहै अविद्या के नाश होने से आत्मा पूर्ण जैसाहै वैसाही प्रतीत होने लगता है जैसे सूर्य के आगे बादल होनेसे वा मंदिर आदि की उपाधि से धप परिच्छन्न प्रतीत होतीहै बादल मकानकी उपाधि दूर होने से पूर्ण प्रकाश होजाता है जो आत्मा जीव अ- ज्ञान का जो कार्य देहादि में अहंबुद्धि इस करके आपकू का भोक्ता मानकर मैला होरहा है ज्ञान के अभ्यास से निर्मल होजाता है। शंका। जो ज्ञान बनारहा तो अद्वैत की प्रसिद्धि है। उत्त ज्ञान के अभ्याससे प्रकट होता है जोत्ति ज्ञान सो अज्ञाननाश करके और आत्माकू तिर्मल करके आप भी नाश होजाती है जैसेकतकरण अनिन्दामृतबर्षिणी। जल के मलकू दूरकरके आप भी नाश होजाती है । शङ्का । आत्मा ज्ञानरूप, वहां अज्ञान कैसेरहों। उत्तर । ज्ञानस्वरूप आत्मा अज्ञान का विरोधि नहीं उत्तिज्ञान अज्ञानका विरोधि है जैसे बांस में अग्नि रहती है परंतु उसकी विरोधि नहीं मथन करनेसे उत्पन्न होती है जो अग्नि सोविरोधि है। शङ्कायो संसार प्रत्यक्षदीखता है इसकं झंठा कैसे कहते हो । उत्तर । संसार स्वप्न की तुल्यहै जैसे स्वप्न अपने कालमें सत्यवत् प्रतीत होता है जाग्रत् में असत्यवत् प्रतीत होता है सत्य असत्य वत् प्रतीतहोता है. परमार्थ में दोनों प्रकार नहीं और जैसे देखने मैथुनादि से जाग्रत्में दुःख सुख होता है वैसा- ही स्वप्न में दुःख सुख होता है और जैसे स्वप्न के पदार्थ अनित्य हैं वैसेही नायित् के पदार्थ अनित्य है तात्पर्य भ्रान्तिकाल में जबतक जगत् सञ्चासा प्रतीत होता है कि जबतक अपना स्वरूप सच्चिदानन्द ब्रह्मसे अभिन्न सब का अधिष्ठान नहीं जाना जैसे रजत की जबतक श्रम से प्रतीत है तबतक शक्ति के विशेष गुण नील एष्ट त्रिकोणादि नहीं निश्चय किये संचित् रूप आत्मा में सब प्रपंच कल्पित हैं जैसे सोने में भमके बाली आदि कल्पित हैं और जैसे घटमकानादि की उपाधि से महाकाश पृथक् र घटाकाश मठाकाश बनावच्छिन्न वृक्षावच्छिन्न आकोश कहाँजाती है ऐसही आत्मदेहों की उपाधि से परिच्छिन्न कहाजाता है और जैसे जव घट मकानादि का नाश होजात्रे कैवल महाकाश रह- : जाता है. ऐसें देहसमूह अविद्या के नाशये आत्माभी .. आनन्दामृतवर्षिणी। पूर्ण रहजाता है सत्त्व तमा रजोगुणीकी नानाउपाधिसे जाति वर्ण आश्रमादि आसाम कल्परक्खेह जैसे जल स्वभावसे मीठा श्वेतहै उपाधि से खट्टे नाके लाल पीले की उलने कल्पना की जातीहैं स्थल सक्ष्म कारण तीनों उपाधियों से आमा टथक जानना चाहिये जैसे शुद्ध स्कटिक रक्त पीतरंग के योग से वैसाही प्रतीत होता है जैसे धानों को संसले से खोट पिछोड़कर चावल एथक करलेतेहैं ऐसे पंचकोशरूपी भूसी दूरकरके विचाररूप जो पिछोड़ना इस युक्त करिक आत्माको पंचकोश तीन शरीर से पथक शुद्ध जानना चाहिये। शङ्काः। तुम आत्मा क. सर्वगत कहते हो. सारे तो नहीं दीखता। उत्तरः । आत्मा सब कालमें सर्वगत है परंतु शुद्ध बुद्धि की वृत्ति में प्रतीत होताहै जैसे प्रतिबिम्ब सारे हैं परंतु स्वच्छपदार्थ दर्पण जलादिमें प्रतीत होता है देह इन्द्रिय मन बुद्धिप्रकृत इनसे आत्मा विलक्षाहै ये सब दृश्यह उनका जो दृष्टा साक्षी सो आत्माहै। शङ्का तुम आत्मा कू-निर्विकार कहते हो प्रात्मा तो विकारवाला प्रतीतहोता है क्योंकि मैं चलता हूँचो बोलताहूं ऐसे २ व्यापारसे व्यापारी दीखता है। उत्तर । एथकर जो इन्द्रिय मन प्राणादि ये एथक र अपने २ विषयों में अपनी र क्रिया में.जो प्रवत होते हैं. उनके साथ आत्माभी व्यापारीवत् विना विवेकः सूखों को प्रतीत होता है जैसेवादल के चल- तेहुये बालक कहता है कि चन्द्र चलता है बालक के तो योही निश्चय है परंतु विचारवान्कू भी भ्रान्तिसे चन्द्र का चलना प्रतीत होता है और जैसे नाक में बैठेहुये गङ्गा ८९ प्रानन्दामृतबर्षिणी। के तारकेरक्षादि चलतेंहुये प्रतीत होते हैं ऐसे आत्मामी व्यापारीवत् प्रतीत होता है देह इन्द्रिय प्राणमनादिसबं जड़पदार्थहें आत्मा चैतन्यकू आश्रय करके अपने अपने अर्थ में प्रवत होते हैं जैसे सूर्यके निकलने से मनुष्यादि अपने र काममें लगते हैं देह इन्द्रिय गुण कर्मादि अमल सचित् आत्मामें विवेकके विना अभ्यास कर रक्खे हैं जैसे श्राकाशमेनीलतामनादिकी उपाधि अर्थात मैंकर्तामोक्ता हूं ये अज्ञानसे प्रात्मामेंकल्प रक्खे हैं जैसेजलकाचलना चन्द्रमें कल्प रक्खाहै राग इच्छा सुखदुःखादिबुद्धिकेहुये प्रतीत होते हैं सुषुप्ति में बुद्धि लय होजाती है वहां नहीं प्रतीत होते इसलिये रागादि बुद्धि के धर्म हैं आत्मा के नहीं जैसे सूर्यका स्वभाव प्रकाश अग्निका उष्ण स्वभाव जलका शीत स्वभाव है ऐसे नित्य निर्मल आत्मा का सच्चिदानन्द स्वभाव है सचित् आनंद ये तीन पद हैं शास्त्र में ये तीनों मिलकर एक सच्चिदानन्द ऐसा बोलने में आता है. सत् जो तीनोंकाल भत भविष्यत् वर्तमानमें एकरस बना रहताहै भाषामें सत्तकू है कहते हैं और घट पदादिमें जो है यो शब्द प्रतीत होता है. सो आत्माही का अंश है यो बात दूसरे अध्यायमें जहां अस्ति भाति प्रियका प्रसंग है वहां भलेप्रकार सिद्ध कर आये हैं और चित चैतन्य रूपा ज्ञानरूप प्रकाशरूप परंतु ऐसा प्रकाश न समझना जैसा अग्नि सर्यादि का है क्योंकि ये तो स्वप्न सुषुप्ति में एकभी नहीं ऐसे समझो जिसके प्रकाश से जाग्रत् स्वप्न सुषुप्ति के पदार्थों का भान होताहै अ- र्थात जिस प्रकाश करके रूपादि मनादि सुख अज्ञानादि १ ९ मानन्दालवार्षिणी जाने जाते हैं जानन अवस्था में भी आत्मा के प्रकाशके बिना कुछ नहीं प्रतीत होसत्ता परन्तु सूर्यादि का भी प्र- काश है और सबका सुषुप्ति में तो केवल आत्माही का प्रकाश है छमहेनु से वहां भले प्रकार प्रतीत होता है कि आत्माका यो प्रकाशमात्मा स्वयः प्रकाश स्वप्न में भलेप्रकार प्रतीत होता है और आनन्दरूप जो कि सबसे सिवाय प्यारी वर उपनिषद याज्ञवल्क्य मैत्रेयी का संवाद है हे मैत्रेयी धन आत्माके लिये प्यारी पुत्र आत्मा के लिये स्लीआित्मा के लिये तात्पर्य सब प- दार्थ श्रीमाके लिये प्यारे हैं जो सव पर विपत्ति पड़ें लो प्रधान अपने शरीर की रक्षा करता है और ब्रह्मा- नन्द के लिये शरीर इन्द्रिय प्राणका भी नाश कर देताहै इसी हेतु से प्यारा आत्मा है वोही आत्मा आनन्दरूप वह आनन्दरूप रज तमोगुण की त्तियों में दवा रहा है इस आनन्दरूप का पंचदशी ग्रंथ में ब्रह्मानन्द के अ- ध्यायह योगानंद, प्रात्मानन्दा अढतानन्द, विद्यानन्द, विषयानन्द ये हैं नाम जिनके उनमें भले प्रकार निश्चय होसक्ता है । शंका आत्मा तो निर्विकार है बुद्धि जड़ है मैं जानताई यो किसकाधर्म। उत्तर। आत्मा का सचित् अंशऔरबुद्धिकी शत्तिये दोनों जुड़कर विवेकके विनायो व्यवहार होता है कि मैं जानताहिआत्मा कंजीव जानकर भयकू प्राप्त होता है और जब योजाने कि मैं जीव नहीं पर- मात्माह तब निर्भय होजाता है जैसे जबतक रज्जमै स- पजानता रहेगा तबतक निश्चय भय रहेगा वेद बार- स्वार कहते हैं जो जीव ब्रह्ममें किंचित् भी भेद करेगा आनन्दामृतवर्षिणी। उसको बड़ा भय होगा बिचारो जो जीव ब्रह्म में भेद है तो पूर्णब्रह्म कैसे है जो एकसे भेद हुआ तो अनेकजीन पशु पक्षी देवत्ता यक्ष प्राकाशादि से सबसे भेद हुआ तो जैसे और है ऐसेही ब्रह्मभी एकदेशी हुये और रामचन्द्र, कृष्णचन्द्र, विष्णु, शिवांदि मार्ति तो परमेश्वर की माया भय वास्तव नहीं इस बात परमेश्वर ने अपने मुखसे कहा है हे लक्ष्मी ! यो मेरा शरीर मायामय है साविक नहीं पद्मपुराण में गीताजी के माहाल्यो लक्ष्मीनारायण का संवादहै और गीता शास्त्र में परमेश्वर कहते हैं मुझ अव्यक्तकंजो व्यक्तिवाला जानते हैं वे मूर्ख हैं जब कि परमेश्वर आप ऐसा कहते हैं कि विवाद की बात है प- रन्तु मर्ख अपनी मूर्खतासे सच्चिदानन्द एकरस पूर्णब्रह्म • परिच्छिन्न एकदेशी कहेंगे अर्थात् बैकुण्ठ, कैलास, मथुरा, अयोध्या बासी कहेंगे और परमेश्वर के सद्भावले ऐसी ऐसी चर्चा करेंगे कि कृष्णचन्द्रने गोबर्द्धन उठानि- या इस हेतुसे कृष्णचन्द्र परमेश्वर हैं और जो श्रुतिस्मृति युक्ति हज़ारों परमेश्वर के सनाव में प्रमाण है कि जिन युक्तियोंसे नास्तिकोंके मतखण्डन किये जाते है लो नास्ति- कवेदकं न परमेश्वर कून परमेश्वर के वाक्यों कुं मानता है उसका मत केवलयक्तिकरके खण्डन होताहैमर्स उन यु- क्तियों कूतो जानते नहीं ऐसी तुच्छ युक्ति देतहें जिसकू बालकभी खंडनकरदे गोबईनके सिवाय कैलास शवणने उठा लियाहै और हजारों राजा पुराणों में प्रसिद्धहैं जिनके रथके पहिये के समुद्र बनेहये हैं, क्या वे परमेश्वर थे और परमेश्वर ने रावण मारा कंस मारा. और, अनेक 12 आनन्दातबषिणा जय करी यो परमेश्वर की क्या स्तुति है अर्थात् निन्दा है क्योंकि जो परमेश्वर करने कॅन करने कू और का और करदेने कू समर्थ हैं क्या वे ऐसी ऐसी उपाधि करके नानाप्रकार को अपने ऊपर दुःख उठाकर औरों से स- हाय लेले जय करते तदुक्तमा दोहा। प्रीति विरोध स- मान सन करिय नीति अस आहि. जो मृगपति बध मेडुकन भलो कहै को ताहि ।। चौपाई । भुवन अनेक रोमप्रति जासू। यह प्रभुता कछु बहुत न तासू । सो महिमा समुझत प्रभु केरी। जो बरणत हीनता घनेरी ।। और प्रसिद्ध हैं कि चक्रवर्ती राजाकू एक देशका राजा कहना षट्शास्त्री कू दो चार पोथी का पढ़ाहुआ कह चारपुत्रवाले कू एकपुत्रवाला कहना कितना अनर्थ है और जो यों कहो कि व्यासदेव बाल्मीकि जी आदिने क्यों परमेश्वर की ऐसी ऐसी स्तुति लिखी हैं सो सुनो जो परमेश्वरकू सच्चिदानन्द पूर्णब्रह्म नित्यमुक्त एकरस असंग ऐसा विचारने कू समर्थ नहीं योंहीं जानता है जैसे में उत्पन्न हुआ हूं मेरे माता पिता स्त्रियादि हैं ऐसे ही परमेश्वर माता पिता स्त्रीवाले होंगे और जैसे इसलोक में शरीर मकान उपवनादि सुन्दर सुन्दर जिस के होते हैं और जो शत्रुओं कू मार मार आपजय कू प्राप्त होता है उसकू मूर्खलोग बड़ा कहते हैं इसलिये उन मूखों के लियेव्यासादिजीने परमेश्वरकी ऐसी ऐसीस्तुतिलिखदी और विचारवानों के लिये वेदान्तमें जो स्वरूप परमात्मा का निश्चय किया है उसकी स्तुति लिखी है विचार देखो यो कुछ विरोध की बात नहीं जब मर्ख भेदवादी fomala . प्रानन्दामृतवर्षिणी। ९३० वेदान्त की ऐसी ऐसी युक्तियों में देवजाते हैं उत्तर नहीं देसक्ते तब यो बकने लगते हैं अजी ज्ञान बड़ा कठिन है कलियुगमें ज्ञान नहीं होता और जो ब्रह्मवादी ज्ञानी विशेष करके संन्यासी हैं उन कू कहते हैं कि कलियुग' में सन्यास वर्जित है उन से बूझना चाहिये श्रीमत्पर- महंस परिव्राजकाचार्य श्रीशङ्कराचार्य महाराज शिवजी का अवतार पद्मपादपरमेश्वराचार्य हस्तामलक प्रा. नंदुगिरिजीसे आदि लेकर बहुत ग्रन्थों में प्रसिद्ध है और बहुत से इससमय में प्रत्यक्ष हैं और श्रीशंकरा- चार्य महाराजकुंभी कोई दोहजार वर्ष बीते हैं जब कलि- युग था वा नहीं और जो कलियुग में शुचि ज्ञान नहीं होता तो व्यासजीने पुराणों में इतिहासों में भलेप्रकार सूत्रोंमें और श्रीकृष्णचंद्र महाराज ने गीताशास्त्र में ज्ञान क्यों कहा और प्रथम अध्याय में गीता भाष्यादि ग्रंथों का नाम हम लिंखायें हैं वे ग्रन्थ उन्होंने क्यों बनाये और जो यो शंकांकरे कि हरिका नामही ३ मेरा जीवन है और अन्यथा कलियुग में नहीं है ३ गति और जो केवल बोधके लिये प्रयत्न करते हैं वे केवलं तुष कूटते हैं ऐसे २ वाक्यों की क्यागति है। उत्तर ऐसे २ वाक्य कि कलियुगमें ज्ञान नहीं होता.ये वाक्य जो किसी जगहें नाम माहात्म्य की प्रशंसा वा भक्तिकी प्रशंसा वा कर्मादिकी प्रशंसा में व्यासादिने जोकहे हैं क्योंकि व्यासादि कवियों को यो नियम है जिस देवता वा भक्ति आदिकी प्रशंसा करते हैं वहां योंहीं कहते हैं कि जो है योंही है तो वो कहना उनका मूों के लियेहै , ९४ . -- Kr आनन्दामतबर्षिणी। आर जो यो न माने तो. ऊपर जो हमने प्रश्न कियाँ कि उन्होंने ज्ञान क्यों कहा उसकी उत्तरदो ताहाय प्र. थमही हम तीसरे अध्याय में लिखः आये हैं कि मूर्ख वेदशास्त्र के एक देशकू सुनकर वा अपने मतका हठ करके वृथा वाद करते हैं बुद्धिमान को वेदशास्त्रों का सि, द्धांत निश्चय करना-यो सिद्धान्तहैं कोई महात्मा यो कहते हैं कि हम आधे श्लोक में वो बात कहेंगे जो कोटि ग्रन्थों ने कही है सोई आधे.श्लोक में कहते हैं ब्रह्म सत्य : जमत् मिथ्या है जो यो सचिदानन्द लक्षणंवाला जीव है.सोई ब्रह्म है अपर: कोई ब्रह्म नहीं, योही ज्ञान: मुक्ति का हेतु है इति श्रीआनन्दाऽमृतवर्षिण्यांषष्ठोऽध्यायः॥६॥ अथ सप्तमोऽध्य श्रीशंकराचार्य महाराज ने हस्तामलकाचार्य से प्रश्न किया कि तुम कौन हो इसका उत्तर श्री हस्ताम: लुकाचार्य कहते हैं, मैं मनुष्य,देव,यक्ष,ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य शद्र ब्रह्मचारी, सहस्थी, वानप्रस्थ,सन्यासी, इन. में कोई नहीं निजाबोध स्वरूप शिर उन्होंने दृष्टान्त देदेकर कृपाकरके जो औरोंकू भी बोधहोजावे इसीअर्थकू सिद्ध किया हम भी उसी अर्थक संक्षेपःकरके इसंअध्याय में लिखेंगे और भी दृष्टान्तयुक्ति लिखेंगे जैसे मनुष्यादि का व्यवहार में प्रवत होना इसमें निमित्त सूर्यनारायण हैंऐसे देह मन प्राण बुद्धि आदिकी प्रति चेष्टामें जो निमित्त हैं और परमार्थरूपकरके तो कोई उपाधि द्रष्टा . याय .

श्रीनन्दामृतवर्षिणी
श्यादिजिसमें नहीं केवल आकाशवत् पूर्णएकरसह सो
नित्य प्राप्त स्वरूप आत्मा है स्थूलसूक्ष्म कारण शरीरी
पंचकोशों से प्टर्थक अवस्थाको साक्षी सचिदानन्दरूप
जो है सो आत्माह। शंका जैसे और पदार्थ आकांश
एथिवी श्रादिन्द्रिय मन बुद्धि आदिकरकेनिश्चय किये
जाते हैं ऐसे आत्मा तो नहीं जानाजाता। उत्तर। इन्द्रि-
य मन बुद्धि आदिकू आत्मांप्रकाशताहै जैसे दीप घटा-
दिकू बुद्धि आदि जड पदार्थो करके आत्माका कैसे नि-
श्चंय होसक्ताहै आत्मा तो स्वयंप्रकाश है आत्मा के
अपने जानने में इन्द्रिय मन बुद्धि-आदिकी इच्छा नहीं
जैसे दीपक के जानने में और दीपंकी इच्छा नहीं चि-
दाभांस के अर्थ जानने के लिये प्रथम दृष्टान्त लिखते
हैं महाकांश घटाकोश र घटमेंजल ३ जलाकाश
ये चार दृष्टान्त हैं अब दृष्टान्तमें समझौं शुद्ध चैतन्य १
कूटस्थ २ अंतःकरण ३ जीव है इसीका नाम चिदाभा-
सह अर्थात चैतन्यवत् प्रतीत हो परन्तु चैतन्यके लक्षण
करके रहित हो जीवका जो अधिष्ठान अर्थात् जीवंजि-
समें कल्पित है और कटवत निर्विकारं ठहरा रहे सो
कूटस्थ जीवका लक्षण यों है अविष्ठान,जो चैतन्य और
सूक्ष्म शरीर और चैतन्यकी जो छाया सूक्ष्म शरीर में
इन सब का संग जीव कहाजाता है और महाकाश ।
घटाकांश २ अभ्राकाश जलाकाशये चार दृष्टान्त
हैं. अब दान्ति में समझो शुद्धचैतन्य १ कूटस्थ र
ईश्वर ३ जीव और वोही चैतन्य ऐसे प्रकार का
है शुद्धचैतन्य १ साक्षी र प्रमात ३ प्रमाण ४ प्रमेय ५
।

श्रीनन्दामृतवाषण। फ६ उपाधि रहित शुद्धचैतन्य, १ अविद्योपहित साक्षी २ अंतःकरण विशिष्ट प्रमात ३ अन्तःकरण र च्यवच्छिन्न प्रमाण: घटावच्छिन्न चैतन्य प्रमेय अन्तःकरण: उत्यभिव्यक्तः चैतन्य सो फल चैतन्य दृष्टान्त इसमें तालाब गूलकेदार काहैयों विषय भाषामें भलेप्रकार नहीं लिखाजाता जो विस्तार करके लिखें भी तो इसका समझना कठिन है और जो समझ सक्ता है वो भाषा क्या पढ़े सुन्दर शास्त्र पढ़े सुने प्रत्यक्ष प्र- माण में और परमात्मा बुद्धि आदि का किस प्रकार ते विषय है और किस प्रकार विषय नहीं इसवाल के जानने में इस विषय का जानना अवश्य चाहता है इसलिये यो विषय वेदान्तशास्त्रार्थ के जाननेवालों से श्रवण क- रना योग्य है, जो इस ग्रंथ कं पढ़ावें सुनावेंगे वे अवश्य इस विषय कभी जानते होंगे हमने जो प्रसंग चिदा- भास के अर्थ जानने के लिये लिख दिया है जैसे मुख का आभासक मुखका जाननेवाला जो दर्पणमें दीखता है वो मुखसे कुछ:प्टथक् वस्तु नहीं, ऐसे बुद्धि में जो चि- दाभास है वो, चैतन्य से एथक कुछ वस्तु नहीं उसका जो अधिष्ठीना कटस्थ रूप सो नित्य प्राप्त आत्मा. जैसे दर्पण के अभाव में आभास की हानि हुये सन्ते एक मुख प्रतीत होता है वहां कुछ भी कल्पना श्रा- भास्यः भाभासक द्रष्टा हश्यः बिम्ब प्रतिबिम्बकी नहीं होती ऐसे ज्ञानके नाशहुये सन्ते कार्य उसका बुद्धि है। बुद्धि का नाश हुये सन्ते जो निराभासक त्रिपुटी रहित वस्तु है सो आत्माहै ध्याताध्यान,ध्येय प्रमाता प्रमाण . 14 आनन्दामृतबपिपीत ९७ प्रमेय,ज्ञाता,ज्ञान, ज्ञेयः इस त्रिपुटी कहतेहैं मनइंद्रिय आदि से पथक मन इंद्रिय श्रादि का आदि मन इंद्रिय आदि करके जो अगम्य सो आत्मा है सब जीवों की बुद्धि में जो एक चैतन्य अपनेआप शुद्धरूप ऐसे भान होता है कि जैसे अनेक जलके घटोमैएक सूर्य प्रतिबिम्ब करके भान होताहैसो आत्मा जैसे एक सूर्य अनेक नेत्रों कूक्रम करके नहीं प्रकाशता ऐसे आत्मा ज्ञानस्वरूप अनेक कंक्रम करके नहीं बोध करता शङ्का । जो एक चैतन्यः सब शरीरों में है तो यज्ञदत्तादिके दुःख-सुख देवदत्त क्यों नहीं अनुभव करता। उत्तर । अविद्या की उपाधिसे जिस शरीर में जिस जगह विशेष अध्यास है चहींकेतुःखादि अनुभव होसते है और जगह के नहीं होसक्ते जैसे जिसकं योही निश्चय है कि इस शरीर में चैतन्य और है यज्ञदत्तादि के शरीरों में और चैतन्य है तो उसकें भी एक काल में शरीर फूटने का दुःख और पलंग पर सोने का सुख और भी अनेक दुःख सुख अनुभव नहीं होसक्ते जिस काल में जहाँ अन्तःकरण की रत्तिहोगी उसी जगहका दुःखसुख प्रतीत होगा और जगहका नहीं होगा जो दूसरे शरीस्में अध्यास होंगी तो संदेह यज्ञदत्तादिके दुःख सुख प्रतीत होंगे जैसे मित्र पुत्रादि में अध्यास होता है तो उनकेंदुःखसुख में जो कहता कि मैंदुःखी सुखी हूं और यो बिचारना चाहिये कि जो प्र- थमशरीरमें चैतन्य था वोही इसशरीरम है फिर पूर्वजन्म के दुख सुख क्यों नहीं प्रतीत होते तात्पर्य जब एक शरीर में यो व्यवस्था है जो अन्तःकरण की बत्ति नेत्र भ अनिन्दासतबर्षिणीं। के साथ लगीहुई है तो रूपही का ज्ञान होताहै समीप बैठे कुछ कहोकरो किञ्चित् नहीं सुनता इसी प्रकार सब जगह कल्पना करलेनी हजार वस्तु घरमें खाने प्रहरने देखने की रखरखी हो जिस जगह अन्तःकरण की उत्ति है वोही दुख सुखकी हेतु है जब कि एक शरीरके दुःख सुख एकसमय होनेवाले उनका एक काल में अनुभव नहीं होसक्ता फिर अनेक शरीरों का कैसे दुःख सुख भ- नुभव होसके। शङ्का। अष्टावधानी तो उत्तर देना चौसर खेलनी आदि ऐसे ऐसे काम एकसमय किया करता है और दूसरे जो एक बालिस्त चौड़ा लम्बा खजला है उसकू दांतों से कुतर २ जो खाता है तो शब्दस्पर्श रूप रस गन्ध उसकू एक काल में प्रतीत होता है और तीसरे कोई कहता है कि मैं चन्द्र तारों के एक कालमें देखता इसका उत्तर दी। उत्तर । मूर्ख यो बात कहता है कि मैं एक काल में सबकं अनुभव करता हूं उसकू मनका मत्ति की खबर नहीं मन ऐसा चंचल है एक क्षण नहीं लगने पाता-प्रथम पदार्थ कुं अनुभव करके दूसरे पदार्थ में प्रटच होजाताहै इस बात• सक्ष्मदर्शी जानते हैं और सुनो यो प्रसिद्ध है कि वाणी आदि इंद्रिय बिना अंत:- करण विशिष्टि चैतन्य के युक्तहुये किसी क्रिया प्रवर्तन नहीं होसक्ते देखिये पुरुष पाठ जपभी करता है और अ- नेक मनोराज्य भी करता है विचारना चाहिये उसके मुख से श्लोक मंत्रजो उच्चारण होता है तो चैतन्य विशिष्ट मनका वाणी के साथ संयोगहै वो नहीं जो कहो कि संयोग है तो मनोराज्या कौन करता है और जो कहाँ संयोग 1 अनिन्दामृतवर्षिणी नहीं तो वाणी जड़ है उसमें क्रिया कैसे होती है तात्पर्य व संदेह प्रतीत होता, मनकी गति बहुत चंचल है मन मनोराज्यभी कियेजाता है और वाणी के साथ मिलकर उस विषयकू भी अनुभव किये जाता है मर्खयोंही ना- नता है कि मेरामन:पाठ जपमें नहींलगा जिनकू अपने मनकी भी खबरनहीं: उनसे ऐसी ऐसी शंका रहती हैं। इस उत्तर में तीनों प्रश्नका उत्तर है । श्रीशंकराचार्य भगवान कहते हैं कि यो जो जगत् दीखता है यो क्याहै क्या इसका रूप हैं यो कैसे हुआहै इसका क्या हेतु है यों बुद्धिमान को कभी नहीं चिन्त- वन करना फिर क्या चिन्तवन करना चाहिये यो माया भ्रांति इन्द्रजाल है यों चिन्तवन करना चाहिये जैसे किसी के पैर में कांटा लगजावे तोचों,योन. बिचारे मेरे यो कीटो कौनसे मुहूर्त में लगा है कौनासे पेड़का यहां कैसे आया ऐसा ऐसा चिन्तवन न करे जैसे बने उसके निकालने का उपाय करे ऐसेही संसार की निवत्तिका उपाय करे जैसे एक सूर्यका प्रतिबिम्ब अनेक जलके घटों में है जो घटकू लेकर चले तो सूर्य न तो उसके साथजाता है न पता है। ऐसे आत्माज्ञात स्व रूप शरीर इन्द्रियादि की क्रिया में है वो क्रियावाला नहीं जैसे ढक गई है बादल से दृष्टि जिसकी वो.यों मानता है कि सर्य छिपगये ऐसे अविद्या की उपाधि से यो पुरुष आपकू था बँधाहुआ. सानता है और जैसे किसी बन्दरने घट में हाथ डालकर दोनों हाथमें अन्न भरकर मुट्ठी बन्द करली पीछे ट्रिथा अज्ञाना से ची ची 100 अनिन्दामृतषिणा। किलफिल करे है विचारो उसकें किसने बन्धन किया है। और सुनो कोई तोते के पकड़ने के लिये मैदान में तो युगा डालदेखा है और दोबास खड़े करके बीचमें उस के नलकी जैसी पंखे में होती लगादेती है नीचे उसः नलकी के किसी पात्रं में जलभरदेता है तोता चगे के लालच आताहै प्रथम नलकीपर मानकर बैठता है उस नलकी का नियम है उसके ऊपर जानवर बैठा और वो फिरी और जानवर उलटा हुआ जो वो जानवर छोड़ कर भागजावे तो कुशल है नहीं तो यो हाल होता कि जब तोता उसानलकी पर आनकर बैठा और वो फिरी तोते न जाना यो मेरा आश्रय था जो इसकं छोड़ दिपी तो जाने कहां गिरूंगा उसकं वो पकड़े रहा फिर उस तोतेकी नीचे पाठ ऊपर क पैर होगये उस तोते ने जो जलकी तरफ देखा तो अपना प्रतिबिम्ब जल में प्रतीत हुआ उस तीतेका अध्यासन प्रतिबिम्ब में ल- गगया. फिर वो तोता यो जानता है कि.मैं डूब रहाई जल में ऊपर का सबाहाल भलगया था अज्ञान से चीची टीटी करै है विचारो उसकू किसनेबिधन कियाहै, ऐले यो कूटस्थ चैतन्यरूप अपने प्रतिबिम्ब चिदाभास से अध्यास करके बंधनवत् होरहा है, वास्तव बंध नहीं सब जगह जैसे किाश अनस्यूत है ऐसे आत्मा बाहर भीतर स्वच्छरूप अनस्यूत है किसी वस्तु कू स्पर्श नहीं कस्ता और जैसे श्वेतमणि रंगकी संनिधि होने से लाल ली प्रतीत होती है ऐसे प्रात्मा अविद्याकी उपाधि की भोक्ता प्रतीत होता है समस्त स्थूल सूक्ष्म उपा-

R
".
आनन्दामृतवधिe.
धि नेति नेति इस वाक्य से मिच करके जैसे दूसरे
अध्याय में जीव ब्रह्मकी एकता महावास्याक
है सदावोही चितवन करना चाहिये प्रथम तत्वम् पदोका
अर्थ लिख भी आये हैं फिर भी और प्रकार करके सुनो
कोई मुक्तिको इच्छावाला तीनताप जो संसारमें हैं उन
करके तपाहुआ और ॥
टी। ज्वर क्रोधादि करके जो ताप सो आध्यात्मिक
शत्रु चोर व्याघ्रादि करके जो ताए सो आधिभौतिक
शीतोष्ण पवनादि करके जो ताप सो आधिदैव ३ ।।
मू। संसारसे उद्विग्न हुआहै मन जिसकाशमदमा-
दिसाधनोंकरके युक्तसद्गुरुसे बूझताहै हेभगवन! जिससा-
धनकरके अनायासपूर्वकसंसाररूपबंधनसे मैं छटजाऊंसी
महाराज मुझकूसंक्षेपकरके केवल कृपाकरके कहो उत्तर।
हे साघो!तुमने बहुत अच्छा धूझा सावधाना मति होकर
सुनों तत्वमसि महावाक्यादि से उत्पन्न हुआ जो जीव
ब्रह्मका तादाम्य विषय ज्ञान सो मुक्तिका कारण है।
प्रश्न महाराज कौन जीव कौन ब्रह्म है फिसप्रकार करके
उनकी तादात्म्यता है और महावाक्य किस प्रकार करके
उसको प्रतिपादन करते हैं। उत्तरजीव कौन है तूही
जीव है और जो बूझता है कि मैं कौन हूं तहीं बेसन्देह
ब्रह्म है। प्रश्न हे. भगवन अब तक तो मैंने भलेप्रकार
पदार्थ भी नहीं जाना मैं ब्रह्मद् योजो महावाक्या इस
कू कैसे प्राप्त हूं। उत्तर । सत्य कहते हो वाक्यार्थ के
ज्ञान में प्रथम पदार्थ का ज्ञान हेतु है इसलिये प्रथम
तत्वम् पद का अर्थ सुनो अन्तःकरण और उसकी त्ति

. श्रीनन्दासतवर्षिणी। यो का जो साती चैतन्य घन नित्य एकरसा और देहादि में जो अहंबुद्धि ईसकू त्याग करके आत्मारूप करके जो चिन्तवन करने में आता है सो आत्मा त्वम् पदका अर्थ यो शरीर रूपादिवाला होनेसे आत्मा नहीं जैसे पञ्च महाभूतों के विकार घटादि हैं ऐसेही प्रत्यक्ष विकारवाला होने से देह भी है। प्रश्नः । जो देह अनात्मा है तो हेभ- गवन् आत्माकू करामलकवत् साक्षात् प्रतिपादन करो। उत्तर जैसे घटका देखनेवाला घटसे पृथक् होता ऐसे देहका देखनेवाला देह कैसे होगा और जैसे मकान में बैठाहुआ कोई यो कहे मैं मकान हूं तो विचारो कैसी खताकी बात है ऐसे ,यो चैतन्य रूप असंग निरवयव है और कहै कि मैं देहहूं अर्थात् पुरुष स्त्री ब्राह्मणादि हूं बिचारो इससे परे और क्या अज्ञान होगा देह तो उप- लक्षण है प्राण इन्द्रिय मन बुद्धि आदि दृश्य होनेसे सर्व अनात्मा है सबका जो द्रष्टा सो आत्मा है देहसे परे न्द्रिय इन्द्रियों से परे मन मनसे परे बुद्धि बुद्धि से परे जो बुद्धि का साक्षी सो आत्मा आत्माले किंचित नहीं और सब संघात भी आत्मा नहीं होसक्ता क्योंकि द्रष्टा दृश्य विलक्षण होते हैं देह इन्द्रिय की जो चेष्टा क्रिया में सदा उपचय अपचय चाली हैं कभी किसी प्रकार का शरीर कभी किसी प्रकार की इन्द्रिय मनादि की चेष्टादेखने में आती है कभी किसी प्रकार की जिसकीसनिधिमात्र से ये सब चेष्टा करते हैं। एकरस जो इनका द्रष्टा सोरआत्माहै. जड़पदार्थ देहादि जिसकी संनिधि से चैतन्यवत् प्रतीत होते हैं जैसे चुम्बक की संनिधि से लोहासो आत्माहै ऑनन्दामृतबर्षिणी १०३ मेरा मन इस समय कहीं गया अब मैंने स्थिर किया इस त्ति कू जो जानता है सो आत्मा है.जायत् स्वप्न सुषुप्ति का होनान होना इसकू निर्विकार हुआजो जानताह सो आत्मा है जैसे घटका आभासक दीप घटसे पृथकहै ऐसे देहादि का आभासकदेही पृथक् है देह स्त्रीपुत्र मकानादि के नष्ट होते रजो आपकू परस-प्रेमका आस्पद प्रतीत होता है सोई आत्मा है जैसे सूर्य पाप पुण्य का साक्षी में- संग संविकार है इसी प्रकार साक्षी चैतन्य रूप निराकार आत्मा है और ये६विकार देहक हैं जायते अस्ति वईते विपरिणमते अपक्षीयते विनश्यति देहइन्द्रियप्राणं मन बुद्धि अज्ञान का लक्षीत्वम् पदका वाच्यार्थहै अब तत्पद का अर्थ लिखते हैं परिपूर्ण एकरस नित्यानन्द ज्ञानस्व- रूप परमात्मा सर्वज्ञ परमेश्वर संपूर्ण शक्तिवाला जिसक वेद ऐसा प्रतिपादन करते हैं सो परमात्मा ब्रह्महै जो प्र- पंचका कारण अन्तर्यामी काँके फलंका देनेवाला जगत् की सृष्टि स्थितिः लय जिसके सकाश से होते हैं सोई तत्पदका वाच्यार्थ है और एक शुद्ध चैतन्य तत्त्वम् पदों का लक्ष्यार्थ है तत्त्वम् पदों की एकता दूसरे अध्याय में जैसे लिख आयेहैं वोप्रकार यहांचितवनकरलेनातात्पर्य जो तत्पद का लक्ष्यार्थ है सोई त्वम् पद का लक्ष्यार्थ है सो तूं है ऐसा. कहो. वा. तू सो है ऐसा कहो इस प्रकार गुरुने शिष्यफूंबोधन किया और कहाकि मैं ब्रह्महूं योवाक्यार्थ जबतक भलेप्रकार हद न हो तबतक शम दमादि साधनोंकरके युक्तहुआ श्रवण मनन निदिध्या- सनका अभ्यास नित्य प्रतिदिन करता रहे श्रवण ऐसे आनन्दामृतबाषणी करे सुना जाता है जिससमय कोई ऐमा रागगाता है मृगके मुखमें जो तृण होताहै सो बाहरका बाहरे और भीतर का भीतर रहजाताहै दृष्टान्तमें आप समझ लेना दश उपनिषद् बृहदारण्यादि भाष्य सहित शारीरक भाष्य गीताभाष्य ये तीन प्रस्थान वेदान्तके कहलाते हैं उनकूही ब्रह्मविद्या कहते हैं आदित्यपुराण पंचदशी आदि ग्रन्थोंका उन्हीं में अन्तर्भाव है ऐसे ऐसे ग्रयों का ब्रह्मनिष्ठों से श्रवण करना जब तक संशय विपर्यय भ- लेप्रकार न जाये तबतक वारंवार श्रादिसे अन्ततक इन ग्रन्थों का श्रवणकरना इसीका नाम श्रवण है मनन ऐसे करना जैसे पटवा रेशम कू सुलझाता है ऐसेही जो श्रवण किया उसकू एकान्तमें बैठकर चिन्तवनको पूर्व पक्ष साधन फलादि कूटथक् करे युक्तिसे सिद्धान्त वस्तु को पुष्टकरे इसीका नाम मनन है निदिध्यासन ऐसे करनी जैसे कोई बाजार में बैठाहुआ अपना काम कररहा था राजा की सवारी आगे कं चली गई कुछ न मालूम हु- श्रा ऐसे जो मनन करके सिद्धान्त वस्तु का निश्चय किया है कि मैं देह प्राण इन्द्रिय मन बुद्धि अज्ञान का साक्षी कूटस्थहूं इस का सदा चिन्तवन करना इस कू तो सजातीय प्रवाह कहते हैं और जैसे प्रथम देह में अध्यासनथा कि मैं ब्राह्मणादिहूं इसका सदा चिन्तवन न. करना इसकं विजातीय तिरस्कार कहते हैं इसप्रकार सजातीय प्रवाह और विजातीय तिरस्कार सदा करते रहना इसी निदिध्यासन कहते हैं श्रवण से अज्ञान का नाश होता है मनन करने से संशया का नाशहोता है * . M ५ . - प्रानन्दाहतवार्षिणी। निदिध्यासन करने से विपर्यय का नाश होता है फिर महावाक्यार्थ का ज्ञान भले प्रकारहढ़ होजाता है लोई मुक्तिको हेतु है। इति श्रीआनन्दामृतवर्षिण्यांसप्तमोऽध्यायः ॥७॥ अथाष्टमोऽध्यायः॥ नित्य यह विचार करता रहैकियोशरीर इन्द्रियादि अविद्या कार्य है बुबुदवत् नाशवान् है मैं तो इनसे बिलक्षण, एकरस हूं मैं देह नहीं इसहेतुंसे मेरे जन्मादि नहीं मैं इन्द्रिय नहीं. इस हेतु सें. शब्दादि विषयों करके मेरा संग नहीं मैं मन नहीं इस हेतु से दुःखं सु- खादि मेरे धर्म नहीं मैं प्राण नहीं इस हेतु से भूख प्यास मेरे धर्म नहीं मैं निर्गुण तो निष्क्रितानित्य निर्विकल्प नि- रंजन निराकार निर्विकार नित्यमुक्त निर्मल आकाशवत् सारे व्यापक बाहर-भीतर लेसंग अचल नित्य शुद्ध नित्यं बुद्धः अखण्डआनन्द अद्वय अत्तर अजर अमर हूं श्रीशंकराचार्य भगवान कहते हैं इसप्रकार जो अभ्यास निरन्तर करता रहे कि मैं इसप्रकार ब्रह्म होतो यो अ- भ्यास अविद्या कार्य के सहित हरलेता है जैसे रोग । औषध अभ्यास करने के साधन लिखते हैं.ये साधन गीताशास्त्रमें लिखे हैं शुद्धवुद्ध करके युक्तांसर्वगुणी धै- यसे उसी बुद्धिकू निश्चयकरके शब्दादि विषयों कू त्याग करके रागद्वेषकू दूर करके विविक्त देश में बैठकर सदा इसप्रकार भोजनका अभ्यास करना. योगशास्त्र में लिखाहै दो भाग तो अन्न करके पूर्णकरे और एकार्जल १४ । । - । १०६ आनन्दामृतवर्षिणी। करके और एक भाग पवनके प्रचार के लिये खालीरक्खे देह वापी मनकू निग्रहकरे अर्थात् अपनी इच्छापूर्वक अपने अपने विषयमें प्रवत न हों ध्यान योग जो नि: दिध्यासन इसी• मुख्य समझकर नित्य प्रतिदिन इस ध्यान योग का अभ्यास करते रहना वैराग्य कू आश्रय रखना अहंकार न करना कि मैं ऐसा विरक्तहूं काम क्रोध दुराग्रहकू त्याग करके प्रारब्धके बलसे जो प्राप्त होजावे उसी में सन्तोष करना जो पदार्थ पराई इच्छा से आजावे उसमें ममता छोड़कर सदानिदिध्यासन करना योगके बलसे खोटे मार्ग में प्रत्त न होना अर्थात् किसी कू शाप देना किसीपर अनुग्रहकरना योन करना परमेश्वर कहते हैं इस प्रकार अभ्यास करनेवाला जो मेरा वास्तव तत्त्व- स्वरूप है उसकं प्राप्त होजता है, समस्त दृश्यकं श्रात्मा में लयकरके जैसे प्रथम अपवादः लिख आये हैं एक आत्माकं निर्मल आकाशवत् भावना करता रहै रूपव- दि कू त्याग करके परमार्थका जाननेवाला परिपूर्ण चिदानन्दरूप करके स्थितर है इस प्रकार अभ्यास करते ! करते वृत्तिज्ञान उदय होकर अन्तःकरणके सहित समस्त अज्ञान कू भस्म करदेता है जैसे मथन करते करते बांस में अग्निउत्पन्न होकर समस्त वन भस्म करदेती है जैसे सूर्य के निकलने से प्रथम चांदना होजाता हैं ऐसे प्रथम मूलाज्ञान का नाश होता है फिर थोड़े दिनों के पीछे सब कार्य उसके स्थूल देहसे लगाकर अविद्यापर्यंत नष्ट हो जाते हैं आत्मा तो सदा प्राप्त है अविद्या करके अप्राप्तवत प्रतीत होता है जैसे अपने गले की माल भन जवि फिर

भानन्दासतबर्षिणी १०७
किसी के बतलाने से प्राप्तवत् प्रतीत होती है जैसे स्थाणु
में पुरुष शुक्ति में रजत रज्जुमें सर्प की भ्रांति ऐसे २
बहुत दृष्टांत हैं इसी प्रकार ब्रह्मके विषयजीवता है जैसे
दिक् का भ्रम सूर्य के उदय होने से दूर होता है ऐसे
यो वर्ण आश्रमादि की भ्रान्ति अविद्या के नष्ट होने से
आत्मा के आविर्भाव होने से दूर होती है जैसे कारण से
कार्य भिन्न नहीं ऐसे जगत् ब्रह्म से भिन्न नहीं कोई कीट
भ्रमरका ध्यान करते करते भ्रमरहोजाता है ऐसे जो जीव
सच्चिदानन्द रूप ब्रह्म सच्चिदानन्दब्रह्म का ध्यान करते
करते ब्रह्म होजाये तो इसमें क्या कहना है जैसे किसी
घट में १० छिद्र हो भीतर उसके दीप होवे उसी दीप
की प्रभा दश तरफ कूनिकल कर परिच्छिन्न प्रतीत होती
है ऐसे आत्मा दीपवत् शरीरघटवत् इन्द्रिय छिद्रवत् हैं।
जैसे उसदीपकं छिद्रद्वारा पवन लगलग प्रभा उसकी
मंद रहती है ऐसे इंद्रिय द्वारा विषय वासनारूपी पवन
लग लग आत्माका सच्चिदानन्दरूप मन्दसा प्रतीतहोता
है इन्द्रिया के रोकने से आत्मा सच्चिदानन्द साक्षात्
प्रतीत होताहै यावत् प्रारब्ध कर्म शेषहै तावत् विद्वान
उपाधिमें स्थित हुआ प्रतीत होता है परन्तु आकाशवत्
लिपायमान नहीं होता ज्ञानवान् पण्डित भी हैं परन्तु
मूर्खवत जानकर रहता है किसी जगह वायुवत् आसक्त
नहीं होता जब अविद्याका नाश होजाता है तब नि-
विशेष ब्रह्म में लयहोजाता है इसलाभ से परे कोई
और लाभ ब्रह्मलोकादि का नहीं इससुख से परे और
कोई सुख चक्रवर्ति राजाइन्द्र ब्रह्मादिका नहीं इसज्ञान

100 श्रानन्दामृतवर्षिणी।
से परे कोई और ज्ञान भूत भविष्यत् आदिका नहीं
इस प्रत्ययकू रूप आत्माक देखकर मूर्तिमान परमेश्वर
खने की इच्छा नहीं रहती यो रूप होकर फिर
मनुष्य हेत्तादि रूप नहीं होता यो जो श्रानन्द रूप है
इस आनन्दके एक लेशमें ब्रह्माजीसे लेकर चींटी पर्यन्त
प्रानन्दी हैं जिसकी आभा करके सूर्य चन्द्रादि मांसते
हैं सूर्य चन्द्रादि की भीमा करके जो नहीं प्रतीत होता
सोई प्रत्यंगात्मा ब्रह्म है यो रूप ज्ञानचक्षु करके दीखता
है कर्मचक्षु करके नहीं दीखता जैसे अंधेकं सूर्य उभा
हुआ नहीं प्रतीत होता तोपर्य यो रूपा अधिकारी
प्रतीत होता है जैसे स्त्री संग का आनन्द तरुण अवस्था
में आठदश वर्षकी अवस्था में लड़का लड़की जो उस
आनन्द के अनुभव किया चाहे तो क्याहोसक्ता है जिनके
मैले अतकरण हैं उनकं इसरूपका साक्षात् नहीं होसक्का
अन्तःकरण मैले होने से देवता गुरु वेदांतशास्त्र में श्रद्धा
काअभाव होताहैश्रद्धाके बिना गुरु कृपा नहीं करते गुरु
की कृपाके बिना कभी किसी काल में ज्ञानहुआहै.नं होगा
श्रीशंकराचार्य भगवान् कहतेहैं कि हजारों श्रुति अद्वैत
ब्रह्म प्रतिपालन करती हैं और यो आत्मा सच्चि-
द्वानन्दरूप भलेप्रकार निरन्तर प्रकाशवालीभी है परंतु
शिला गुरुकी कृपा मैले अन्तःकरणवाले सामान करनेक
समर्थ नहीं इसलिय चाहिये प्रथम अन्तःकरणकी शुद्धि
का उपायाको क्योंकि श्रीभगवान में भी प्रथम अर्जुन
कुंज्ञान उपदेश किया फिर कहा हे अर्जुन हमने तुमकू
बाल उपदेशः किया जो तुमळू यो ज्ञात अपरोक्ष न हु-
न

1
०९
।
आनन्दामृतबर्षिणी।
आहों तो अंतःकरणकी शुद्धिकेलिये निष्काम कर्मयोग
सुनो जैसे सोना मैला होताहै उसकू अग्नि में तायकर
शुद्ध करलेते हैं ऐसे अंतःकरणकू निष्काम कर्म योग
करके शुद्धकरता चाहिये कि ज्ञानकी इच्छावालेकू प्रथम
निष्काम कर्म मुख्य है शुद्धान्तःकरणवाले कू समाधि
साधनमुख्यहै। प्रश्नः। शुद्धांतःकरणवाले की क्याप
रीक्षाहै। उत्तरा जबजाने यहांके जो देखें सुने स्त्री आदि
पदार्थ हैं। स्वर्गादि के अमृतादि पदार्थ जो सुने हैं
सब कंचित्त न चाहै दुःखदायी जाने मुक्ति की इच्छीहो ।
तब निश्चयकरे कि अंतःकरण शुद्धहोगया फिर विवेक
वैराग्यादि साधनों करके युक्तहोकरयों विचार करेंक्ति
कौन हूं और यह जंगत् कैसे हुआ है व इसका की
और कौन है उपादान क्या है इसी का नाम वि.
चारहै यो देह पंचभूतों का विकार में नहीं इन्द्रिय मन
बुद्धि आदि में नहीं उनसे कोई विलक्षण हूं और जो
किसीने प्रथम त्यायशास्त्र- पूर्व मीमांसा वा पुराणादि
पढ़े सुनेहों वेदांतशास्त्र न सुनाहों इस हेतुसे उसके बहुत
संशय विपर्यायहो तो शारीरकभाष्य पढ़े सुने वहां-भः
लेप्रकार युक्तिपूर्वक निश्चयहोसक्ता है भारत भार्गव
तादि में तो जिस जगह जो ज्ञानका प्रसंग है तब तो
योही प्रतीत होता है कि ज्ञान मुख्य है और जिसजगह
कर्म उपासनादि का संग है वहां कर्मादि मुख्य
प्रतीत होते हैं वैष्णवादि अपने अपने मतकं मुख्य
बताते हैं औरों की असूया करते हैं भागवतादि में स्पष्ट
यो नहीं प्रतीतहोता कि समस्त वेद भारत पुराणादिका
नि

आनन्दासतबर्षिणी। कहा समन्वयहै अर्थात् मुख्य प्रयोजन किसमें है शा- रीरका माध्यमें भलेप्रकार श्रुति स्मृति युक्लिदृष्टांत देदेकर और अनेकदोषभेदवादि आदिमियों के मतों में दिखाकर और जिसलिये कर्म उपासनादिका वेदों में प्रसंगहै उतने अंशकू अंगीकार करके यो सिद्ध किया है कि समस्त वेदशास्त्र पुराणादि का ब्रह्म में समन्वय है सब श्रुति स्मृति प्रवृत्ति नित्ति मार्गकी कोई साक्षात् कोई पर- परा करके ब्रह्म कंबोधन करती हैं और जो यो बिरुद्ध प्रतीत होता है कि कोई श्रुति कहतीहै ब्रह्म मनका विषय नहीं कोई कहती है ब्रह्मसूक्ष्ममन बुद्धि करके जानाजाता हैं कहीं ऐसा सुनाजाताहै जब वैराग्य होवे उसी समय संन्यास करे कहीं ऐमा सुना जाताहै माता पितास्त्री आ- दिके त्याग में दोष है ऐसे २ विरुद्धवाक्य अनेकहैं विचा- रनेसे बिरुद्धवास्तव नहीं क्योंकि जैसा अधिकारीदेखो वैसाही उपदेश किया तात्पर्य सबका अविरुद्ध भलेन- कार शारीरक भाष्य में निश्चय होसक्ता है और मुक्तिके साधन ऐसेर सुने जाते हैं कि अन्तमुक्ति का साधन है और तीर्थ श्रीगङ्गाजीसे लेकर यावत् हैं उनमें स्नान करना बद्रीनारायणजी से त्रादिलेकर दर्शनपाषाणादिमतियों का पूजन करना पाठ जप करना चतुर्भुजी आदि मत्तियों का ध्यान करना सगुण निर्गुण ब्रह्म की उपासना से लगाकर वेदान्तशास्त्रका श्रवणमनन निदिध्यासन तक यौहीं सुना जाता है ये सब मुक्ति के साधन हैं अर्थात् एक एकादशी व्रत करने से मुक्त होजाता है विष्णुचरणोंदक पान करने से श्रीगङ्गाजी में स्नान करनेसे मुक्त होजाताहे

१११
मानन्दामृतबर्षिणी।
तात्पर्य सबके माहात्म्यमें योही प्रतीत होता है किये सब
मुक्ति के साधन हैं अब यो विचारना चाहिये मुख्य साधन
कौन है जिससे निश्चय मुक्तिहोजावे और जो किसी के यो
विश्वास है कि एकादशी आदि ब्रत करने से बद्रीनारा-
यणादिके दर्शन करनेसे श्रीगंगाजी में स्नान करने से
निश्चय मुक्त होजाता है फिर तृप्ति क्यों नहीं होती
तात्पर्य मुख्य साधन मुक्तिका वेदान्तः शास्त्र का श्रवण
मनन निदिध्यासन है और सब परम्परा करके गौण है
इस बात• भी प्रमाणपूर्वक शारीरकभाष्यमें सिद्ध किया
है और जो कि पूर्व मीमांसावाले स्वर्गादिकी प्राप्ति कू
मुक्ति कहते हैं और कोई एक देशी उनके कहते हैं कि
नित्य सुखका प्रकट रहना मुक्ति है सांख्यशाल वाले
कहते हैं देह बुद्धि आदि में अहङ्कारकी नित्ति हुये
सन्ते औदासीन्य रहना मुक्ति है पुराणवाले सालोक्य
सामीप्य सारूप्य सायुज्यकं मुक्ति कहते हैं. चार वाक्
कहते हैं किसी के आधीन न होना मुक्ति है न्यायशास्त्र
वाले कहते हैं २१दुःखों का अत्यन्त नाश होजाना मुक्ति
है २१ दुःख न्याय शास्त्र में प्रसिद्ध हैं अत्यन्त नाश
अत्यन्ताभाव कू कहते हैं अभाव चार प्रकार का है
प्राग्भाव जो घटसे प्रथम घटका अभाव प्रध्वंसाभाव
जो घट के नाश होजाने में घटका अभाव अन्योऽन्या-
भाव जैसे घट में घटका अभाव अत्यन्ताभाव जैसे
शशे के सींगका अभाव और अनेक ब्रह्मलोक गोलो-
कादिकी प्राप्ति कू मुक्ति कहते हैं गरुड़वाले जो कहते
हैं सो तो, लोकमैं बहुत प्रसिद्ध है. और भी अनेकमत हैं
,

।' मुक्त होजाऊंगा मेरे शत्रु मित्रादि और जगत बनार- १२ आनन्दायतबाषणो। अब विचारना चाहिये मुक्तिका क्या अर्थ है इसका भी निश्चयः शारीरकभाष्य में कियाहै कि अविद्योपहित जीव लामा शुद्ध बैतन्य का प्रतिबिम्ब मिथ्याघ्रांति से आपकं जीव मानता है अविद्याकी उपाधि से समस्त संसार मुक्तिपर्यन्त कल्प रक्खा है ब्रह्मज्ञान से अविद्या का नाश हुथे सन्ते जीवंरूप भ्रांतिका दूर होना यो मुक्ति है सर्व अनर्थों की नित्ति परमानन्द की प्राप्ति इसी मुक्तिका लक्षण है जैसे किसी घटगत जल में जो प्रतिबिम्ब सो जल के दूर होने से नाश होजाताहै फिर यो नहीं कहा जाता कि प्रतिबिम्न कहां गया और प्र- तिबिम्ब के नाश होने और न होनेमें सूर्य कुछ और प्रकार के नहीं होजाते दृष्टान्त में समझो कि शुद्ध चैतन्या जैसे प्रथम था वैसेही पीछे रहा जैसे स्वन के खलते हुये स्वप्न में जो पदार्थ कल्प रखें ये सब उसी समय नाश होजाते हैं ऐसे पीछे विदेहमुक्ति के समस्त संसार नाश होजाता है कोई ऐलान विचार करे मैं तो हेगा उनके पीछे के लिये यत्न करना मूर्खता है स्वान के दृष्टांतकूभले प्रकार विचारना चाहिये वेदांतशास्त्रवालों काजो कहना है वोतो अनुभव में भी आता है श्रुतिस्मृति श्रादि प्रमाण करके सिद्ध होसक्ता है और किसी शास्त्र पुराणादिका मत अनुभव में नहीं आताहै वेदों से विरुद्ध स्पष्ट प्रतीत होताहै विचारो जैसे जीव का देहपातहुआ वो यमपुरी • वा स्वर्गवा पितृलोक चैकुंठादिकं गया वा उसका जन्म उसीसमय इसालोको टोगया वागमन श्रानन्दामृतवार्षिणी। वाले जो कहते हैं या उसी की व्यवस्था हुई और जो बात ११३ कैसे अनुभवमें आवे कि सारी अवस्था में तो मूर्खताके काम करें अन्तकाल में काश्यादि में मरने से नियम क- रके मुक्त होजाता है जो ऐसे वाक्यों में हल करते हैं तो मुक्ति के लिये ज्ञानादि में क्यों माथा मारते हैं कहांतक लिखे हजारों ऐसी व्यवस्था है सब मतवाले अपने २ सतर्क युक्तिदे देकर सिद्धकरते हैं परन्तु समस्त व्यवस्था कोई भले प्रकार नहीं कहते क्योंकि कोई स्वर्गकू नित्य कोई अनित्य कहते हैं कोई । कोश्यामरणान्मतिः । इस श्रुतिका अर्थ औरही प्रकार कहते हैं और वो भी भले प्रकार नहीं प्रतीत होता कि स्वर्ग बैकुंठ कैलास ब्रह्मलोक गोलोकादि का कैसे भेद से कि लातलोक भूर्भुवादिहैं उनमेंही उनका अन्तर्भावहै वा कुछ और प्रकार है अथवा जिसकं ब्रह्मलोक कहते उसी कू वैकुण्ठपिटलोंकादि कहते हैं जैसे यो स्थित की व्यवस्था है इससे सिवाय सृष्टिकी व्यवस्थाहै क्योंकि जब प्रत्यक्षकी व्यवस्थानहीं बैठसक्की परोक्षकी कौन बैठासके यद्यपि यो व्यवस्था न कहीं लिखीहो परन्तु मेरे श्रवण करने में नहीं आई.जोकिसी ने सुनीहो प्रमाणपूर्वक अनुभव में आवे तो हम भी योही इष्ट है कि जैसे बने संशय दूर कर देना चाहिये यथा मति मैं कहताहूं किसीपक्षमें मेरी हठनहीं योजो व्यवस्था तो मुझकं शास्त्र में प्रतीत होती है और लोकमें यवनादि बहिस्तादि कहते हैं और इस बात में तो किचित भी सं. देह नहीं कि परमेश्वर सबका एकहै और यो भी निश्चय होता है. यवनादि भी नरक स्वर्गादिक अधिकारी है.यो

.."
18 आनन्दामृतबर्षिणी।
लियम नहीं कि सब नरकहीं कू जावें क्योंकि श्रीभगवान्
कहतेहैं सत्त्वगुणी ऊपर के लोकोंक प्राप्त होवेगाशम दम
संतोष दया कोमलता क्षमा दानादि सत्त्वगणको दृत्ति है
उनमें दीखतीहै इस हेतुसे निश्चय होताहै सत्त्वगुण की
तारतम्यतासे स्वर्गादिके अधिकारी हैं तात्पर्य इन सबके
मतों से मेरी जानमें अविरोध व्यवस्था नहीं बैठ सक्ती
परंतु वेदान्तशास्त्र के मत से बैठ सक्ती है सो सुनो वेदा-
तशास्त्रवाले ऐसा कहतेहैं कि यो जगत् अज्ञान करके
कल्प रक्खाहै स्वभवत् मिथ्या है जैसे स्वप्न में एक स्त्री के
साथ एकसमय । -पुरुष संगकरें दशोका सच्चा है विचा-
रनेसे झूठाहै तदुक्तम्॥चौपाई॥देखियसुनियगुणियमन
माही। मोहमल परमारथ नाहीं ॥ अर्थात् जगत्का का-
राणं मूल अज्ञानही है परमार्थ में नहीं जैसे एक रज्जु
पड़ी है कोई उसकं सर्प कोई भूत्रधारा कोई दण्ड कहते
सबका कहना भ्रान्तिकालमें सच्चा परमार्थ में झूठाहै
ऐलें आन्तिकालमें एक ब्रह्म में कल्पित स्वर्ग चैकुण्ठादि
सब सच्चे परमार्थमें झूठे हैं इस बातकी सिद्धि में बहुत
श्रुति स्मृति युक्ति दृष्टान्त इतिहासादि प्रमाण हैं वाशि
ष्टादि ग्रन्थों में अनेक इतिहास है वशिष्ठजी ने श्रीराम
चन्द्रजीक अनेक इतिहास सुनाकर इसीबात•सिद्धकिया
कई पुरुषोंने तप करके यो बरमांगा कि हमसब इसी
कालमें ब्रह्मा होजावें वे सब ब्रह्मा होगये और ये ब्रह्माजी
भी बनेरहे और उनके ब्रह्माण्ड सबके पृथक् २ हये और
एक ऋषिने तपकरके परमेश्वर से बरमांगा हे परमेश्वर!
ऑपकी माया देखू परमेश्वर ने कहा जो दृश्य पदार्थ हैं
हूँ

आनन्दामृतवर्षिणी। ११५ सवमायाहै ऋषिकू यों निश्चय रहा कि माया शब्दकरके कोई और पदार्थ है फिर परमेश्वरसे प्रार्थनाकरी कि म- हाराज नहीं घटने के योग्य यो पदार्थ उसके घटाने में जो चतुर वो माया देखा चाहता हूं महाराजने बर दे दिया कि देखोगे एक दिन वे ऋषि हषीकेशस्थान में गं- गाजी में स्नान करते थे गंगाजीके तीर आसन पूजादि रखदिये ऋषिपने जल में जो चुबकी मारी सो वे ऋषि-अ- पना ऋषिपना तो भलगये किसी धीवस्की लड़की हो. गये कालपाकर उसलड़की का विवाह होगया ४० वर्ष की अवस्था में कई लड़के व लड़की उसके उत्पन्न हुने और अपने पति के संगमें जो आनन्द और संग करके दुःख और संसारके अनेकताप और बालकोंके खिलाने देखने में जो आनन्द औरमल मत्र धोने में जो दुःख-सब कुंवे ऋषि स्त्री होकर अनुभव करते भये एकदिन वो स्त्री उसी जगह जहां ऋषिने चुबकी मारीथी जल भरने के लिये गई घटकू गंगाजी के तीरे रखकर गंगाजीमें स्नान करने लगी जब नीचे कू चवकी मारी जबतो वो स्त्री थी जब ऊपरको मुख उघाड़ा तब अपने शरीरकू देखे तो ऋषिका शरीर होगया और गंगाजीकेतीरे घटभी रखा दीखता है आसन पूजाभी रक्खी हुई दीखतीहै.यो भी स्मरण होता है मैं अमुक ऋषिहूं नित्य यहां स्नान क. रने के लिये आताहूं और योभी स्मरण होता है मैं अनुक पुरुषकी स्त्रीहूं यहां जल भरने के लिये आई थी पहले घरकाभी व्यवहार स्मरण होता है पिछले घरका भी व्यवहार स्मरणहोताहै दोनों घरों में प्रीति है स्पष्ट यो. -- . १६६ अनिन्दामृतबंषिण निश्चय नहीं होसक्ताह कि में ऋषि वा स्त्रीह उसकाल में उस स्त्रीका पति अपने लड़के के गोदलिये हुये उसी जगह आया ऋषिने देखा कि निश्चय योही मेरा पति फिर भलेप्रकार निश्चय होगया कि मैं गंगाजी में स्नान करने से ऋषि होगया उस पुरुष ने ऋषि से बझा महाराज मेरी श्री यहाँ जल भरने आई थी घट उसको यो एकखा है वो कहाँ गई आपने भी उसकें देखी है जो उसका चाक्य सुनकर और बालक लड़के कू देखकर मोह होगया ऋषि रोने लगा उस पुरुषने प्री- थनाकरके बझा महाराज वो स्त्री गंगाजी में डूबाई वा किसी सिंहादिने खालिया और तुम क्यों रोतेही ऋषि कहते हैं वो स्त्री तो मैं हूँ गंगाजी में स्नान करनेसे ऋषि होगया इसबातकी सिद्धि के लिये समस्त व्यवस्था पि. छलेघरकी और लड़केलड़कियोंकनामादि कहदिये उस पुरुष कू निश्चय होगया कि बसंदेह यो मेरो स्त्री है ऋषि उस पुरुषसे कहते हैं इसलड़के को भलेंप्रकार पा- लना यो करना वो करना उसने कहा कि तुम घरको चलो जो हुआ सो हुा बालकोंकू खिलाते रहना और घरके काम करतेरहना ऋषिजी उसके साथ हुये उसी समय वो परमेश्वर की माया दूर होगई यो व्यवस्था कोई एक पलमें बीती जितनी देर जल में चुबकी मारी जब ऋषि जीने ऊपरक शिर उभारा देखते हैं वोहीम- होना वोही महत ने वो पुरुष न वो घट है ऋषिजी कू निश्चयहुआ यो परमेश्वर को माया देखी स्कन्दपुराण में केदारखण्ड में यो कथा भले प्रकार लिखरही है और H +

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अनिन्दामृतवर्षिणी। ११७
वाशिष्ठादि ग्रन्थों में ऐसी बहुत कथाहै और बहुत प्रा-
णियों के यो बात प्रत्यक्षहै कि स्वप्न तो घड़ी वादोघड़ी
रहा और राज्यादि १०० वर्षे किये भले प्रकार बिचारो
माया में क्या नहीं बनसक्ता और यो जाग्रत् निश्चय
स्वप्नकी बराबर है क्योंकि जाग्रत् के पदार्थदुःख सुख
के हेतु है और अनित्यहैं ऐसेही स्वप्न के पदार्थ हैं और
जैसे जायत में स्वस का निश्चयकर कहते हैं ऐसे स्वप्न
में भी स्वप्नं का निश्चय किया करते हैं तात्पर्य यो जा-
प्रतमें जो प्रपञ्च दीखता है समस्त स्वप्न की बराबर है
माया है इससे सिवाय और क्या माया होगी कि गर्भ
में ठहरकर वीर्य चेष्टा करने लगता है और बहनेवाला
जो पदार्थ वीर्य है उसका कार्य कैसा कठिन होजाताहै
फिर उसी वीर्य में देखो कैसे हाथ पैरादि बन जाते हैं
फिर वोही ब्राह्मण साधु चोर जार कहा जाता है किसी
काल में तो वो लाड़ करने के योग्य किसीकालमै भोग
करने के योग्य किसी काल में पूजन करने के योग्य हो-
ताहैं किसी कालमें उसके देखकर प्राणी ग्लानि मानते हैं
किसीकाल में उसके पुत्रादि चाहते हैं कि यो मरजावे
तो सुन्दरं हैं किसी काल में उस शरीर के स्पर्श करने
से पातक लगता है मकान बस्त्रादि अपवित्र होजाते हैं
विचारो एक पदार्थ में कितनी कितनी अवस्था बीतती
जो एकरत पदार्थ नहीं सब क एकप्रकारको न दीले
सोई माया है चित्त तो बहुत चाहता कि ऐसी २ कथा
लिख कर इस बात के करामलकवत् सिद्ध करदें परन्तु
अन्यको विस्तार होता है बुद्धिमान एक दृष्टान्त में वि-

आनन्दामृतषिणी। चार ले अब बिचारो कि चेदांतशास्त्र का मत कैसा स- न्दर, परमेश्वर के तो परिपूर्ण नित्यमुक्त नित्यानन्दादि रूप सिद्धिकरना भक्ति ऐसी करनी-अपना आपा समस्त परमेश्वरमें झोक देना अपने अंशके न रखने से परमे- श्वरकी पूर्णता सिद्धहोती है और सबके मत अङ्गीकार करना सच्चा बताना यद्यपि स्वप्न के पदार्थ झठे हैं परन्त उस समयमें तो सच्चे हैं और सब मत वाले अपनेही मतकू हठ करके सिद्ध करते हैं औरोंकी असूया करते हैं पूर्व मीमांसावाले परमेश्वरकं नहीं मानते.जो भेद-उ- पासनावाले परमेश्वर कू मानते भी हैं तो परिच्छिन्न मानते हैं जबजीव ब्रह्म का भेद कहा स्पष्ट प्रतीत होता है परमेश्वर परिच्छिन्न है और जो वे ऐसा कहें कि पर- मेश्वर की मायामें क्या नहीं बनसक्ता तो परमेश्वर उन कू आनन्द रक्खें क्योंकि योही हमारा सिद्धांत है जब भदवादियों का अपने मत में ठिकाना नहीं पाता तब माया - अंगीकार करते हैं माया कू अंगीकार किया और वेदांतशास्त्र में प्रवेश हुआ क्योंकि वेदांत से सि- वाय और कोई प्रमाण नहीं वेदात कं त्याग करके तथा और अनात्मशास्त्रों में माथा मारते हैं. १८ विद्या मुक्ति के लिये मुख्य वेदान्त शास्त्र है १४ विद्यातो ये हैं ऋग, यजुः, साम, अथर्वण ये चार वेद और ६ इनके अंग शिक्षा, कल्प, व्याकरण, ज्योतिष, छन्द, निरुक्त और मीमांसाशास्त्र, तर्कशास्त्र, पुराण, धर्मशास्त्र ये -१४ विद्या हैं वेदान्तशास्त्र का मीमांसा में अन्तर्भाव है वैशेषिक शास्त्र का तर्कशास्त्र में और सांख्य पातं.

आनन्दामृतर्षिणी। जलि पशुपति वैष्णव रामायण भारतादि का धर्मशास्त्र ११९ में अन्तर्भाव है पुराण १८ हैं ब्राह्म पान स्कन्द मार्क- एडेय शैव वैष्णव गणेश सौर भागवत भविष्यत् ब्रह्म- बैवर्त लिङ्ग बामन बाराह कूर्म मत्स्य गरुड़ ब्रह्माण्ड और उपपुराण चाशिष्ठ लिङ्ग नारसिंह नन्दीय नारदीय बामनीय हंस तत्वासार दोास्य शिवधर्म कापिल बा- मन वरुण रेणुक बायवीय कालीयमहेश्वर पाराशर मा- रीच भार्गवादि भेद से बहुत हैं मनु याज्ञवल्क्य विष्णु यम आंगिरस वशिष्ठ दक्ष संवर्त शातातप पाराशर गौ- तम शङ्ख लिखित हरित आपस्तम्बी संस कात्यायन वात्स्यायन बहस्पति देवल बारद पैठीनसी इनके और औरोंकेभी किये हुयेबहुत धर्मशास्त्र है कोई १८ विद्या कहते हैं धनुर्वेद गांधर्ववेद अर्थशास्त्र ये चार मिलकर १८ होजाती हैं कामशास्त्रका आयुर्वेद में अन्तर्भाव है नीतिशास्त्र शिल्पशास्त्र अश्वशास्त्र गजशास्त्र रूपकार ६४ कलाओं का अर्थशास्त्र में अन्तर्भाव इसप्रकार १८ विद्या हैं वेदान्तशास्त्र का यो सिद्धांत है कि यो संसार स्वप्नवत् निष्प्रपञ्च ब्रह्म में भ्रान्ति करके नानाप्रकार की कल्पना कर रक्खी है जैसे कोई बागड़भमि में दूरसे रेती कू देखकर कहै कि यो नदी है कोई कहता है इसमें गोड़े जल है कोई कमर जल कोई अगम्य जल कहता है तात्पर्य सबकी कल्पना झूठी है जो जगत् सच्चा होता तो बड़े बड़े बुद्धिमान मीमांसा सांख्य पातञ्जलि न्यायशास्त्रादिवालों का सब का एक मत होता सब का मत पृथक् २ होने से.स्पष्ट प्रतीत शास्त्र और .- इस बातकी सिद्धि -१२० आनन्दामृतवाषिणा। होता है कि निष्प्रपञ्च ब्रह्म में भान्तिसे जगत् कल्पित है बहुत श्रुति स्टति आदि प्रमाण है और अनुभव में भी आवे हैं जैसी जैसी किसी की बुद्धि है पैसेही वैसा जमत कू कहते हैं और ईश्वर कू भी यथा- मति अंतर्यामी से लगाकर कुलदेवता माता शीतजा पीपल-शक्षादि जड़पदार्थ तक कहते हैं तो कुछ थोड़ा थोड़ामत उनकामी प्रसङ्ग से सुनो पूर्व मीमांसाशास्लवाले तो कहते हैं कर्म करने से मुक्ति होती है स्वर्गादि प्राप्ति · मुक्ति कहते हैं कर्म फलदाताहै और कोई ईश्वर नहीं स्वर्गादि नित्य है उनकी उत्पत्ति प्रलय नहीं कोई एक- देशी उनके ईश्वर कंभी मानते हैं सांख्यशास्त्रकाले यह कहते हैं कि जैसे दूधका वधि परिणाम होजाता है ऐसे प्रकृति जगत् रूप करके परिणाम होगई है और पुरुष जलगतःपद्म पत्रवत् प्रसंग है तात्पर्य परिणाम बाद सांख्यशास्त्रवालों का है आरम्भ बाद या शालवालों का है न्यायशास्त्रवाले यों कहते हैं कि यो जगत् प्रलय के समय ईश्वर की इच्छा से परिणाम रूप होजाता है अर्थात् पृथ्वी जल तेजवायुके परिमाणु होजाते हैं और सृष्टि के समय ईश्वर की इच्छा से परिमाणु मिलकर यकत्र्यापीक होकर फिर ऐसेही पृथ्वी आदि होजाते और कहते है इस जगत में सव सात पदार्थ है एथ्वी जलं तेज बायु आकाश कील दिक् अात्मा मन इन , पदार्थों के तो एक द्रव्य बोलते हैं और रूप रस गन्ध स्पर्शसंख्या परिमाणु एथक संयोग बिभाग परत्व अप- रत्वःगुरुत्व द्रवत्व स्नेह शब्द बुद्धि सुख दुःख इच्छा द्वेष rand- .

आनन्दामृतवर्षिणी। १२१ प्रयत्न धर्म अधर्म संस्कार इन २४ पदार्थोकं एकगुण बो- लते हैं ये गुणद्रव्यों में रहते हैं इसीप्रकार कर्म सामान्य विशेष समवाय अभाव ये पांच पदार्थ हैं और यावत् जगत् में पदार्थ हैं उनका इन्हीं सात पदार्थों में अन्त- र्भाव है जीव ईश्वर का भेद कहते हैं जीव ईश्वर दोनों व्यापक हैं एथिवी आदि प्यार द्रव्यकू परमाणु रूपकरके नित्य कहते हैं आकाशादि पांच द्रब्यकं सदा नित्य कहते हैं व्याकरणवाले कहते हैं शब्द ब्रह्म है सो नित्य है तात्पर्य बैयाकरण स्फोटवादी है पुराणवालों का मत प्रसिद्ध है कोई विष्णु कोई शिव शक्ति गणेश सर्यकू ईश्वर कहते हैं अपने अपने मतके एथक् २ शास्त्र सात्वत तंत्र नारद पंचरात्र कवलार्णवादिबना रक्खे हैं तात्पर्य पुराण- वालों का मत जैसा कि गरुड़वाले कहते हैं यो बहुत प्रसिद्ध है कहां तक लिखें बहुत मत हैं सांख्य न्याय शास्त्रादिवालोंका मत उसी जगह निश्चय होसक्ता है यहां तो एक नाममात्र उनका मत दिखा दिया है और नास्तिक बौद्ध चार्वाक आदिके १८ मत तो मुख्य हैं और भी बहुत भेद हैं वे ईश्वर वेद कूनहीं मानते कोई शन्य- बादी कोई कालबादी कोई स्वभाववादी कोई विज्ञान- बादी हैं कोई कपाली मतके हैं नानामत नास्तिकों के हैं और कठिन हैं पुराणवालोंके मतसे उनका बहुत बारीक मत है ऐसे ऐसे मत न्याय वेदान्त के पूर्व पक्षों में बहुत लिख रहे हैं क्योंकि वेदान्त नैयायिक उनके मतकं खण्डन करसक्ते हैं पुराणवालोंसे उनका मत खण्डन नहीं होसक्ता उनकी युक्ति बहुत बारीक है और जो पाखण्ड आनन्दारमतवार्षिगी अंब कलियुग में प्रसिद्ध है उनका लिखना योरया नहीं तात्पर्क चारवर्ण चारपान और अनुलोम प्रतिलो- मजादि जातिशास्त्र विहित हैं उनसे एथकाजिसका वेद स्टतियों में पतानलगे संव पाखण्ड मनुष्यों के रचे हुने हैं बुद्धिमान को विचार लेना चाहिये अन्तानी हिर- एयगर्भ विराष्ट्र वैदिक उशालनाबालें ईश्वर कहते हैं शिव विष्णु शक्ति सूर्य गणेशादि कू पुराणवाले ईश्वर कहते हैं भूम या भोपाल भूत पिशाच योगिनी श्रीला पीपल कुंदालादि अनेक है उनळू प्राकृत जीव ईश्वर कहते हैं इसके पूजनेसे सृष्टिहोती है इस हेतुले वे ईश्वर कहते हैं वेदोंसे और लोको अन्तर्यासी सूत्रात्मादि भेद करके विष्णु शिक्षादि भेदकरके राम कृष्णादि भेद करके राधावल्लभ गोपालादि भेद करते हनुमान जैस्वादि भेद करके पाषाणतिज्ञादिभेद कर के हजारों ईश्वर के प्रतीत होते हैं. अब बुद्धिमान विचार कौनसा ईश्वर संशा है कौनसा मत सका है। इस सत्या कहते हैं याही विचारों कि यह सब मायाहै विवर्तवाद आभासबाद अजातवाद वेदातहालवालोंका है सोई सत्य है और तत्वं पदों को जो एक लक्ष्यार्थ सच्चिदानन्द रूपा मोई परमेश्वर है इसी कू-ज्ञान कहते हैं ग्रोही ज्ञान मुक्तिका हेतु हो। इति श्री आनन्दाटतथापिण्यष्टमोऽध्यायः ॥ ८॥ अथ नवमोऽध्यायः । भू देहादिके साथ तादात्मकरके देहादि में जो अहंनुदितीक अज्ञात कहते हैं. यो निचा कि शाल्दा .

. श्रानन्दामृतवर्षिणीन ११.२३ तो शुद्ध १ परिपूर्ण २ सिल्या चैतन्य ४ आनन्दा५ अखण्ड ६ अज. अमर ८ एकरसं. ९और भी बहुत विशेषण हैं और अशुद्ध देह परिच्छिन्न र असत्यः। जड़: दुःखरूप: ५ एकदेशी, ६ जन्मवालानाशा- वाला नित्य एक रस नहीं रहता. ९ आत्माकी और देह की जो एकती देखते हैं इससे परे और क्या अज्ञान होगा इस अज्ञान का कारण आसुरी सम्पत् है सोई दिखलाते हैं दम्भ दर्प अहंकार अपवित्र अभिमान :. वरळू न मानना क्रोध कठोरता मूर्खता धर्मकी प्रति कून जानना अधर्मकी नियंतिकू न जानना असत्य बो. लना जमत अवनीश्वरकहना बड़ी र कामना मनमें रखनी जो कभी पूर्ण न हो खोटें खोटे आग्रह करके स- ज्जनों ले नैर करना गुणवानों में दोष निकालना बुद्धि तमोगुणी होनी अर्थात् हमनें कथा कहीथी उससे ह- मारीक्षती हुई शालवालोंकू पाखंडी कहना चिन्ता ऐसी ऐसी करनी जिसका प्रलयापर्यंत ठिकाना न लगे नि श्चयः यो रखना जो हम खा पहर:जावेंगे स्त्रियों के साथ आनन्द भोग जावेंगे यही मुख्य देना नट बन्दरवालों कू कभी किसी साधु ब्राह्मणकू जो देता तो दम्भ आहे- कार करके और उनका तिरस्कार करके हजारों आशा- रूपी फांसियों में बँधे रहना अन्याय करके रुपयादि संचय करना यो मुझळू प्राप्त है जो प्राप्त कलंगामेरी रावर और कौन है धन हमारे बहुत कुटुम्ब हमारे बहुत ऐसे २ अवगुण आसुरी सस्पतालोंकू श्रीनगवान ने कहे फिर कहा: प्रेसे पुरुषों की मुक्ति तो दूर है। मुक्ति का and + १२४ आनन्दासतबर्षिणा। मार्ग भी उनळू नहीं मिलेगा ये पुरुष जगत् के भ्रष्ट करनेवाले हैं ऐसों • हम पशुकी योनियों में फेंकगे बारम्बार सर्प बिच्छू कीट शूकर कूकरादि योनियों में जन्म लेते रहेंगे फिर कहां काम क्रोध लोभ ये तीन न- एकके हारे हैं. अात्माकू मूढ़ योनियों में प्राप्त करने वाले हैं उनकू तो अवश्यही त्याग करना चाहिये प्रथम उनकू त्याग करके जो पीछे मुक्ति प्रयत्न करेगा तब सिद्ध होगा अर्जुन ने श्रीकृष्ण महाराज से प्रश्न किया। महाराज किस करके प्रेराहुमा यो पुरुष पापकू करता है इच्छा नहीं भी करता परंतु ऐसा प्रतीत होता है जैसा कोई वल करके पापमें जोड़ दे श्रीभगवान् ने कहा हे अर्जुन!जो तुमने बूझा पाप करने में क्या है सो सुनो काम हेतु है कामना होने से क्रोध होता है रजोगुणसे इसकी उत्पत्तिहै रजोगुणके जय करने से इ- सका भी जय होजाताहै अनंत है भोजनः जिसका बड़ा पापी मोक्षमार्गका बैरी कास जानो जैसे धप ने अग्नि कू मलने दर्पणकू जेरने गर्भकं ढक रक्खा है ऐसे कामः ने विवेक कू ढक रक्खा है प्राकृतियों कू तो यो काम भोंग समय मित्रसा.प्रतीत होता है ज्ञानी कूतो मोग समय भी दोखदृष्टि होने से बैरी दीखता है कितनाही भोग भोगो कभीप्ति न हो और दूनी अग्नि लगै इस की जयका उपाय यो है यो काम इन्द्रिय मन बुद्धि में रहता है क्योंकि विषयकू देखा सुना संकल्प विकल्प क्रिया निश्चय किया फिर कामका आविर्भाव होजाता है सो काम विवेक आवरण करके भात्मा के मोहता -- अनिन्दामंतवर्षिणी। १२५ है इसलिये यावत् इन्द्रिय का विषय के साथ सम्बन्ध नहींहुआ प्रथम मोहसे विषयों में दोषदृष्टि करके इ- न्द्रियोंक रोकना फिर इन्द्रिय नहीं रुकसक्ती देह इन्द्रिय मन बुद्धिसे परे जो श्रात्मा उसकू आश्रय करके इस पापी कामकू मारा जैसा यो परमेश्वरने अर्जुन कू उप- देश किया ऐसाही किसी गुरुने शिष्य कू उपदेश किया कि हे शिष्याय काल क्रोधादि प्रथम तो ज्ञानकी सिद्धि के लिये त्यागने योग्य हैं और ज्ञानहुथे पीछे जीवन्मुक्तिके लिये त्यागने योग्यह शिष्य कहताहै महाराज जीव- न्मुक्ति मुझकूमतहो देहपातके पीछे तो मैं विदेह मुक्त होजाऊंगागुरू कहते हैं जो तुमने यहांके तुच्छ पदार्थों के भोगने के लियेजीवन्मुक्तिका अंगीकार नहीं किया तो नि- इचय होता है स्वर्गादि पदार्थों के भोगने के लिये बिदेह मुक्तिका भी अंगीकार नहीं करोगे इसहेतुसे प्रतीत होता तुम स्वर्गमात्र से आपकू कृतार्थ जानोगे फिर नि- श्चय आपका जन्म होवेगा जो कभी तुमने अपने मन में यो मानाहो कि स्वर्गक्षय अतिशय साहस्य पतन इन तीन दोषों करके त्यागना योग्य है। टीका दिन दिन प्रति अपना किया हुआ पुण्य काम होतारहता है इसकू तो क्षय दोष कहते हैं और जैसे इस लोक में चक्रवर्ति राजा से लगाकर कङ्गाल पर्यन्त तार- तम्यताहै ऐसे स्वर्ग में विमान ऐश्वयादिकी तारतम्यता हैं अपने से अधिक विमानवाले कू देखकर मन में अन तिशय रहता यो दूसरो दोष है और जब समस्त पुण्य नाश होता है तब उसके गले की माला सूख जाती है वो

आनन्दार्षिणी
तो अपने आप वहां से नीचे गिरना नहीं चाहती परन्तु
वही ली जिसके साथ विहार करताथा टांगा पिकड़कर
उलटा डाल दिया इस्तीहै तीसस यो साहारा पतनदोषही।
विचारों कि इन तुच्छ प्रदार्थों में जो अनेक दोष
करके युक्त हैं श्रीभगवान् भी कहते हैं ओशन्द की आदि
भोग विश्वव दुःखके कारण हैं उनके नाश अप्राप्ति में
जो दावा हैं सोलों प्रसिद्ध हैं परन्तुः
प्रसिद्ध हैं परन्तु प्राप्तिकाल
तिकालः में भी
स्पी निन्द्रा भैयादि दोपों करके युक्त दुःखरूप है फिर
उनमें दोषष्टि करके क्यों नहीं त्यागते जन के तुच्छ
पदार्थ न त्यागे गये स्वादि के पदार्थो क कैसे त्यागोगे
और यो तुम्हारा बच्छापूर्वक वाचरण अनिष्टहै इस बात
में:श्रीसुरेसचराचार्यजी के वाकये के प्रमाण देते हैं जानी
है ब्रह्मतत्व जिसने उसका जो इच्छापक आवरमा
हुआ.तो कार पशु आदि और ज्ञानियों में क्या मेंद
हुआ जब धर्म में शास्त्रको आज्ञा क न मानकर इच्छा-
पूर्वक आचरण किया फिर अशुकिं भोजन में कितअकाएर
दोष प्रतीत होगा शिष्य कहता है महाराज मुझ इतने
हीमात्रसे अनिष्ट सायन किया गुरु उपहासपूर्वक कहते हैं,
ज्ञानसे प्रथम तो तुम मतमात्रकै दोषों करके शीथाः
अब समस्त लोगों की निन्दा महती अधिकार करते हो
श्रापके बोधकी क्या स्तुति हो सके आप दोधका जो
भव है सो आश्चर्य है ऐसा बोध तो हम भी नहीं हुआ
यो पात खोकने प्रसिद्ध है जो कालें कालपर और भी
बीट स्याही की पड़जावे तो कुछ नहीं प्रतीत होती परन्न।
श्वेतजदिर पर जोएक बीट मी. और गाकी पड़जाने

श्रीनन्दास्तवर्षिणीय १२७
बोभी से चमकती है ऐले. ज्ञानी को जो निश्चितभी
अन्याया आचरणतीत होतोभी मूर्ख सुवातकं बढ़ाकर
कले लगाते हैं यो तो उनकू विचारही नहीं कि
जोविधिनिषेध व्यवहार है यो गणों का कार्य है, द्रष्ट
नामशेजा है और जो स्वसंवेद लक्षण ज्ञानीके हैं उनकू
मखी क्या जानेगे केवल जड़भरतादि के दृष्टान्त देदिकर
निन्दी करेंगे जो उनकं कहाँ बोना है कि ये तीनों
गण सदा विदेह नुक्ताले प्रथम सबमें देवताला लगाकर
पशु पर्यन्त रहते हैं किसीक थोड़ें किमी के बहुताऔर
यो सब देखना सोनाखाना पीना आदि अन्ताकपा का
धर्मचन्तकारी मायाकाकार्य मोनेसेमिना लाईकोई
तो ऐसा जानते हैं कि अन्तरंग साधन मुंख्या है बहुत तो
बहिरंग साधनोंकजमाण देकर निन्दा स्तुति करते हैं।
शिष्य कहता है महारजि फिर क्या करना चाहिये गुरु
कहतह करना क्या चाहिने यो करनी चाहिये जो शकर
कुकर की बराबरता है इस चमनवन त्यागदों तुम तो
विचारवानहोजितने अन्तःकरणात दोष है सबका संग
त्याग करके देवता की वसंघरता अंगीकार करो तुम इन
मनुष्यों करके देवता के सम-पूजने के योग्यही काम
क्रोधादिमें जो जो शेष दुःखहैं सब मोक्षशास्त्र में प्रसिई
हैं वहाँसे तलाश करके दोषदृष्टि कर कर कासनादि का
त्यागकरके जीवन्मुक्ति सम्पादन करो शिष्य कहता है
महाराज मैंने अंगीकार किया कामादिका तो त्यागका
हंगा परन्त मनोराज्यकरने में तो मेरीक्षतीनहीं गुरू कहते
हैं मनोराज्य कू समस्त दोषों का चीज होने से श्रीभव

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१२८
श्रानन्दामृतबर्षिणी।
वान् ने क्षती कहीहै उस अर्थकं घटाते हैं जैठे बैठे मनो-
राज्य हुआ अमुक पदार्थ में अर्थात् स्त्रियादि में यो गुण
हैं उस गुणको ध्यान करते करते उस पदार्थ में सूक्ष्म
संयोग होगया संग होने के पीछे फिरः अधिक कामना
होगई कामनारूपी जो अग्नि उसकी शान्ति के लिये
किसीके पासगये कहा हमकू यो वस्तु चाहती है उन्होंने
न दी तब क्रोध उत्पन्न हुआ अब अपने दोष तो बिचा-
रते नहीं कि यो मेरे मनोराज्यने अनर्थकियाहै उसमें दोष
निकालते हैं कहते हैं देखो कैसे पापी अधर्मात्माजी हैं
साधु ब्राह्मणकी आज्ञा नहीं करतेझ्याधन छातीपर धरके
लेजावेंगे और अनेक कहने न कहने के योग्य शब्दों
कहते हैं और जो मनमें ताप होता है, उसके तो आप
साक्षी हैं फिर क्रोध से सम्मोह. अर्थात कार्य अकार्य के
विवेक का अभाव होगया फिर जो शास्त्र गुरु से सुना
सब भूल गये फिर चेतना रूपी बुद्धिका नाश होंगया
अर्थात फिरभी होशियार होजावे यो बुद्धि न रही फिर
अपने पुरुषार्थ से भ्रष्ट होगये विचारों मनोराज्यने कैसो
अनर्थ किया जो मनोराज्य होकर मन में कामनाआई
थी तो उसमें प्रवर्तन होनाथा जो प्रवर्त्त भी हुये थे तो
उनके न देने में जो अपमानहुआ था उसकंसहजाना था
उनकू कुछ यहा तहान कहनाथा जो उससमय इनकार
भी करदियाथा अथवा दुर्वाक्य भी कहदियाथा तो फिर
सत्त्वगुणी टंतिमें काम आते जो कुछ के दाता भी थे
आगे कू जो उनसे काम निकलता सो संब, नष्ट होगया
उनकू तो क्रोध में आकर यहा तहा कह बैठे फिर यो

: १.२६ है '' " RT आनन्दामृतबर्षिणी। मुख न रहा कभी उनके समीपही जा बैठे और जो कभी उनके सत्त्वगुणी वत्तिका विशेष उदय हो और बहुत दान करें तो आपकं कुछ नहीं मिलसक्ला सारी अवस्था कं तो उनसे सुरव्वत तोड़ बैठे और जिन्होंने सुना उन्हों भी अपने आपसे मन फेर लिया बारम्बार-विचारो मनोराज्य वडाअनर्थ करताहै इसलिये मनोराज्य का भी जय को मनोराज्य कामनाका जयकरने से ज्ञानद्वारा सुक्त होजाता है ॥ इति श्रीआनन्दामृतवार्षिणीनवमी ऽध्यायः॥९॥ मथदशमोऽध्यायः॥ प्रथम थोड़ेसे साधन जीवन्मुक्ति के लिये लिखमी आने हैं अब औरभी सुनो जिनके अनुष्ठान करने के कामादि का जय होजाताहै साधककू तो अभ्यास करने से लिख होतेहैं सिद्ध में स्वभाव से रहते हैं जीवन्मुक्ति ५ प्रयो- जन है प्रथम उनकं लिखते हैं । ज्ञानरक्षा तपर विस्मयादिका अभाव ३ दुःखों की नियत्ति ४ सुखका आविर्भाव ५ अर्थ इनका यो जीवन्मुक्तिके अभ्यास करने से संशय विपर्यय का उदय नहीं होता शुक राघव अस्मदादिवत अकृतउपासक के कदाचित संशयादि उदय होने के भयो अवश्य जीवन्मुक्ति का अभ्यास करना योग्यह श्रीभगवान कहते हैं, जिसके संशय है वो नाश होता है संशयादिकाउदय न होना ज्ञामरक्षा चित्त की एकाग्रता तेपद सब धर्मो से श्रेष्ठ ज्ञानी का तप लोकसंग्रहके अर्थहै. श्रीभगवान कहते हैं श्रेष्ठपुरुष १७ आनन्दामृतबर्षिणी जोजो आवरण करताहै सोई सोऔर भी आचरण करते हैं संग्रह भले तीन प्रकार के हैं शिष्य १ भक्त तटस्थ ३ शिष्यतोगुरुके शास्त्रविहित आचरणकू देखदेखअधिक अधिक श्रद्धा होकर फिर उनके वाक्य में विश्वासकरके मुक्त होता है १ और भक्त उनकी पूजादि करके वांछित फलकू प्राप्तहोता है * विभूतिकी कामनावाला ज्ञानी का पूजन करें जिस जिस लोक की मनसे भावना करेगा और जो जो कामना चाहेगा उसी उसलोक और उसीउस कामनाकू प्राप्तहोगा यो श्रुतिकाअर्थहै स्मृतिकाभी अर्थ सुनो जो. एकब्रह्मः का जाननेवाला भोजनकरे तो सम- स्त जगत् तृप्तहोता है इसलिये जो कुछ देबेयोग्य है सो ब्रह्मवित्• देनाचाहिये तटस्थ दो प्रकारका है स- मार्गी १ असन्मार्गी २ सन्मार्गी तो ज्ञानी के प्राचर- णकू देख देख अपने आप सदाचारकरके मुक्तहोगा, असन्मार्गी जीवन्मुक्तिकी दृष्टिकरके सारे पापों से मुक्त होगा यहां स्मृति प्रमाण है जिसकी अनुभवपर्यंत बुद्धि तत्व के विषय प्रवर्त हैं उसकी दृष्टिगोचर जो होगा अर्थात् कृपादृष्टि सें जिसकं वे देखेंगे वो सारेपापों से छूट जावेगा जो ज्ञानी कं वाणी आदिकरके दुःख देंगे मन करके द्वेष करेंगे वेज्ञानी के पापक ग्रहणकरेंगे यहां श्रुति प्रमाण है सुहृदः ज्ञानी के पुण्य द्वेषी ज्ञानी के पापकँ ग्रहणकरेंगे यो श्रुतिका अर्थ है २ जिस समय ज्ञानी की बहिर्मुख उत्तिहो उस समय उसके कोई दुर्वाक्य बोले उसकू सुनकर-अथवा वृथा कोई मार भी दे चित्त की "उत्तिमें राग द्वेष उदय न होना इसका मान विसंवदा IL ..

.. उस आनन्दक अनुभव करतीहुई उनकी आनन्दामृतंबर्षिणी का अभाव हैं ३ संसार के व्यवहार में धन के सञ्चः यादि में अनेक प्रकार के दुःख और मुक्ति के लिये श्र- वणादि में अनेक दुःख है जीवन्मुक्त के सब दुःख नाश होजाते हैं यदि आत्माकू जानता है कि मैं यो हूं फिर किसकी इच्छा करताहुआ और किस कामना के लिये शरीरकं दुःखदे यो श्रुति का अर्थ है ४ समाधिकरके दूर करदिये हैं चित्त के मल जिन्होंने और आत्मा में प्रवेश किया है चित्त जिन्हों ने उनकू जो सुख होताहै उसकू वाणी नहीं कहसती अपने अनुभवकरके जाना जाता है यो श्रुतिका अर्थ है जैसे कोई १६ वर्षकी स्त्री से १० । ११ वर्षकी लड़की बझे कि त सुसराल में गई थी तुझकू पतिके संगमें क्या आनन्द हुआ जैसे चो जानकर हँसकर चुपहोजाती है ऐसे ज्ञानी ब्रह्मानन्दकू अनुभव करतेहुये औरों को कमसमझ जानकर मौन रहते हैं यो सुखाविर्भाव पांचवां प्रयोजन जीवन्मुक्ति का कहा ५ जीवन्मुक्ति के लिये जो अष्टांग योग कहते हैं उसकू भी थोडासा सुनो योग के ८ अंगहैं यम, नि- यम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, स- माधि अर्थ इनका पातंजलिशास्त्र में भले प्रकार निश्च. य होसक्ता है यहां इसलिये नहीं लिखा कि इस योग करने की सम्प्रदाय लोप होरही है विना गुरु चो योग सिद्ध नहीं होसक्ता जिसकं ये योग करनाहो और कोई गुरु मिले तो वहां से उनका अर्थ निश्चयकरै परन्तु और प्रकार भी उनका अर्थ करते हैं परिपक्क है चित्त (श -- ..

....... १३२ प्रानन्दामृतवर्षिणी। जिनका वै इनका ऐसा अर्थ निश्चय करें. देहांदि में विरक्ति यम १ खात्मतत्त्व में अनुरक्तिं नियम २ जैसे बैठे चलते लेटे सुखपूर्वक निरन्तर. ब्रह्मेको चिन्तंबन होतारहे वहीं आसन है सुख पद्मादि श्रीसन मन्द के लिये हैं ३ प्रोणके चलतेहुये अपने पास सदा योग तप होतारेहे सोऽहम् सोऽहम् सोऽहम् इसका जो अर्थ उसले चित्तक स्थित करना अर्थात् योही निश्चय रेख- ना कि में ब्रह्महूं ४ श्रोत्रादि इन्द्रियोंकं शब्दादि विषयों से रोकना प्रत्याहार ५ बुद्धिः विषयों से विमुख करना धारणा छ जहाँ जहाँ दृष्टिं जावे वहीं वहीं नहीं देखना दृष्टिक ब्रह्ममयी करके सब जगतकं ब्रह्ममय देखना लो दृष्टि श्रेष्ठ है अथवा द्रष्टा दर्शन दृश्य इनका जहाँ वि. रामहो वहीं दृष्टि करनी नासाग्र दृष्टि बालकों के लिये है में असग सच्चिदानन्द परिपूर्ण निरवयचं एकरस' इस प्रकार चित्तं को समाधानकरना समाधि सोदो प्रकार की है सन्त्रिकल्प १ निर्विकल्प २.त्रिपुटीसहित सविकल्प, त्रिपुटीरहित निर्विकल्प २ निर्विकल्प समाधिकरने के समय चार विघ्न होते हैं लय निद्रा आजानी विक्षेप २: बारम्बार विषयों का अनुसन्धान होना काय ३ चित्तका रागादि से तो हट आना पर रन्तु स्वरूप में न पहुंचना बीच की रसिका नाम कषा- य हैं इसी स्तब्धीभावकहते हैं रसास्वाद ४ समाधि के प्रारम्भ समय सविकल्पका आनन्द होना कि मैं एसा आनन्दरूप परिपूर्ण हूं यो चिन्तवन होना इसकूँ रसास्वाद कहते हैं प्राणायाम आसन विषयों में दोष - Natm १३३ आनन्दामृतबर्षिणी। ट्यादि करके लय विक्षेपादिका जय करना चाहिये च- शिष्ठजी कहते हैं चित्तनाश करने के दो मार्ग है ज्ञान १ योग २ ये दोनों मार्गभगवान ने भी गीताशास्त्र में कहे हैं देहादि से परे आत्माकू जानना अर्थात् प्रसंग नित्यः मुक्त अपने कू निश्चय करना यो ज्ञान है और चित्तकी रतिको निरोध करना इसका नाम योगहै चित्तत्ति नि- रोध का प्रचार चार प्रकार से वशिष्टजी ने कहा है सदा घेदान्तशालकूपढ़ना सुनना विचारना १ जो ब्रह्मनिष्ठ साधु हैं उनका संग पदरना २ समस्त वासनाका त्याग करना ३ अष्टांग योग करना प्रथम साधन उत्तम अधिकारी के लिये हैं जो वहाँ चित्तका निरोध न हो तो ये तीन उत्तरोत्तर और जो चित्तके निरोधका प्रकार अात्मा संयमयोग नाम करके श्रीभगवान् ने गीताशास्त्र में कहा है उसका भी अर्थ संक्षेप करके लिखते हैं योगी मनकू समाहित करें अकेला एकांतमें बैठकर भलेप्रकार जीते हैं कश किये हैं मन इन्द्रियादि जिसने सो निरा- कोक्ष होकर शरीरयात्रा से सिवाय भोजन वस्त्रादि सा- मग्रीक त्याग करके पवित्र देश में शुद्धभूमि में अपना आसन बिछाकर वो आसन बहुत नीचा ऊंचा न हो नीचे कुशाको आसन जापर उसके मृगचर्मादि फिर ऊपरवस्त्रबिछाकर मनकं एकाप्रकरके वंशकरों है चित्त इन्द्रियों को किया जिसने सो उसपर बैठकर चित्त की शान्ति के लिये अभ्यास करें चित्त एकाग्र करने में देह की धारणा भी उपयोगी है उसका धारण प्रकार लिखते दहका जो मध्यभाग है उसकुँ शिर और ग्रीवाकू सम A ह श्रानन्दामृतवर्षिणी। निश्चय करके नासाग्रहष्टि होकर पूर्वादिकू नहीं देखता हुआ दूर होगया है भय जिसका सो ब्रह्मचारी व्रतमें स्थितहोकर श्रात्मामें है चित्त जिसका आत्माही में है परपुरुषार्थ जिसके इसप्रकार युक्तहोकर बैठे श्रीभगवान् कहते हैं जो इसप्रकार सदा मनकू समाहित करताहुआ निरोध हुआहै अन्तःकरण जिसका सो पराशांति कुं प्रा- तहोता है बहुत खानेवाले थोड़े खानेवालेकू भी बहुत सोनेवाले बहुत जागनेवाले कू भी योग सिद्ध नहीं होता तात्पर्य शास्त्रविहित सोना जागना बोलना चलना भोजनादि क्रिया जो नियमकरके करेगा उसकुँ दुःखोंका नाश करनेवाला- यो योग सिद्धहोताहै किस कालमें योग सिद्ध होता है इस अपेक्षा में कहते हैं जिस कालमें वश कियाहुआ चित्त आत्माहीमें निश्चय ठहरता है सब का- मना जो इसलोक परलोककी हैं उनकी इच्छा नहीं क- रता उसकाल में जानों कि योग सिद्धहुआ जैसे दीवा बन्दमकान में एकरस प्रकाशता है हलता नहीं-ऐसे जी- ताहै चित्त जिसने उसका चित्त प्रकाशता और निष्क- पता करके ठहरताहै योग करके निरुदहुआ चित्त जिस अवस्था में संसार के विषयों से उपरामहो और जिस अवस्था में शुद्ध मन करके आत्माही को देखें आत्माही में तोष करे उस अवस्था में निरतिशय सुख कू अनु- भव करता है फिर उस अवस्था में स्थित हुआ तत्वसे नहीं चलता उस सुखक लाभ करके अपर जो ब्रह्मलो. कादि के सुख उनकू अधिक नहीं जानता उस अवस्था में स्थित हुआबड़ेभारी दुःख करके भी नहीं बिचलता हैं

1
आनन्दामृतवर्षिणी।
दुःख का प्रथम किंचित् संयोगमात्र करके समस्त दुःख
और विषय सम्बन्धी दुःखोका वियोगहें जिसमें उसीकं
योग जानना सोयोगाचार्य शास्त्र में निश्चय करके
अवश्य अभ्यास करना चाहिये दुःखं बुद्धि करके प्रयत्न
की जो शिथिलता उसकं त्यागना चाहिये टिट्टी के घु-
रुषार्थकू स्मरण करना योग है जैसे कोई यो सङ्कल्प
रखताहै कि मैं कुशाके अग्रभागमें जितना जलठहरताहै
कुशासे इतनाही जल उठाकर समुद्रकं सुखाऊंगा ऐसा-
ही चित्तके निरोध करने का सङ्कल्प रक्खें सङ्कल्प से
आविर्भाव है जिनका ऐसे योगकी प्रतिकूलें जो कामना
उनकू सबकू त्याग करके और मन करके सवतरफसे
इन्द्रियग्राम · रोककर धीर्य करके शनैः शनैः अभ्यास
क्रमकरके उपरामही सहसा एकबारही जो पूर्वावस्था
में खाना सोना बोलना बैठनाआदि था उनका सबका
त्यागनकरे आत्मामें भलेप्रकार मनक स्थित करके कुछ
चितवन न करे पूर्वाभ्यासारजोगुणके वशमें मन जो फिर
चले तो प्रत्याहार करके अर्थात जिस जिस विषय में
मनजावै वहीं वहींसे रोककर मनके वश करे अर्थात्
आत्मांक विषय स्थिर करे इसप्रकार अभ्यास करते करते
रजोगुण का क्षय होने से योगसुख प्राप्त होजाता है
शान्त होगया है रजोगुणं जिसका इसी हेतुले शान्ति
है मन जिसका प्राप्त हुआ है ब्रह्मतत्त्व जिसके समाधि
उसकं जन्यसुख अपने आप प्राप्त होता है ऐसे संदी
अभ्यास करते हुये योगी दूर होगये हैं पाप जिसके वो
अनायास सुखपूर्वक ब्रह्मतत्त्व क प्राप्त होता है फिर

आनन्दामृतवाषणा। कृतार्थ होजाता है सो योगी सब भूतों में अपने प्रात्मा कू और सब भूतों के अपने आत्मा के विषय देखता है सारे समदृष्टि है जिसके उनकू श्रीभगवान् कहते हैं कि जो सुझाकू सर्वत्र देखता है उसकूँ मैं सदा अपरोक्षाहूं वो मुझसे पृथक् नहीं जो मुझ हूं इस प्रकार जानता है जैसे इसकी इच्छा हो काम त्याग करके तो लाज्ञाक- स्पयवत-कर्म करता हुआ जनकवत् निषेध कर्म करता हुआ दत्तात्रेयवत् वर तो निश्चय-सुरू होगा दो सर्च प्रकार मेरे विषय वर्तता है मुझ से थक् कुछ नहीं जानता जैसे आप कू दुःख सुख होते हैं दूसरे के दु- चाक्ष्य बोलने मेंदुःख स्तुति करने में सुख ऐसही अपनी उपमा करके सबकू समदेखें ली:इंदुःखें पुरुष मुझकं परम सम्मत है यो योग का लक्षण श्री- भगवान ने अर्जुन कूकहा छोर्जुन इस योग आस- समय मानते हुये बोलते भो हे परमेश्वर समला करके अर्थात् मनकी दो गति लय विक्षेप उनकं जय करके केवल आत्माकार अवस्थान, करके जो जो योग आपने कहा इस योग की दीर्घकाल जो स्थिति उसकू नहीं देखताएं किस हेतु से सनकू चंचल होने से हे कृष्ण- चन्द्र मन चंचल है स्वभावहीं से चपल है प्रमथन शीलवाला इन्द्रियों के क्षोभ करने वाला वलवाला विचार करके भी जीतने के योग्य नहीं प्रतीत होता विषय बासना करके अनादि का विषयों के साथ बधा हुआ है इस हेतु से दुर्भद है जैसे महाराज आकाश में पवन चलता है, उसकू घटादि में रोकना कठिन है ऐसा १३७ आनन्दामृतबर्षिणी। ऐसे मनका निग्रह कठिन जानताहूं वशिष्ठंजी भी कहते हैं. समुद्रका पान करजाना सुमेरु उखाड़ लेना आदि जो बहुत कठिन प्रतीत होते हैं सो होजाते हैं परन्तु मनका निग्रह कठिन है इस बातक अंगीकार करके मनके निग्रह का उपाय दिखातेहुये श्रीभगवान बोलते भये हे अर्जुन ! जो तुमने कहा सो सत्यहै मन ऐसाही है। परन्तु मनकी दो गति हैं लय १ विक्षेप र सो लयक तो अभ्यासकरके अर्थात् आत्मांकार प्रत्ययत्ति करके जय करना और विक्षेप वराग्य करके अर्थात् विषयों में दोषदृष्टि करके जय करना इनदो उपाय से निश्चय मन का निग्रह होजाता है अन्तःकरण की उत्तियों का सूक्ष्म होजाना इसीका नाम मनोनिग्रह है जिन्होंने देहादि नहीं वश किये हैं उनकं तो यह योगकठिनहै जिन्होंने अभ्यास वैराग्य करके मनकं वश करलिया है उनक.यहयोग इसी उपाय करके सहज है अर्जुन बूझते हैं महाराज! प्रथम तो कोई पुरुषासयोगमें श्रद्धा करके प्रदत्त हुआ परन्तु पीछे उसने भले प्रकार प्रयत्न न किया शिथिलोभ्यास रहा योग से चित्त चलकर विषयों प्रदत्त होगया ता- त्पर्यः मन्द वैराग्य होगया अथवा अभ्यास करते करते देह का बीचमें पात होगया वो पुरुष योगका फल जो ज्ञान उसकू नहीं प्राप्त होकर किस गतिक प्राप्त होता हैं क्योंकि कम के फलक परमेश्वर में अर्पण करने से अथवा काँका अनुष्ठान न करने से स्वर्गादि की प्राप्ति जो फल सो तो उसकूहोंगे नहीं ज्ञानके न होनेसे मुक्त न होगा दोनों तरफसे भ्रष्टहुआ महाराज कहाँ छन्नान- १८.

१३८ आनन्दामृतबर्षिणी। बत् यह वही में नाश होजाता है हे परमेश्वर! आप स- वैज्ञहो इसका उत्तर देसक्केहो श्रीभगवान् बोलते भये हे अर्जुन! इसलोक में तो उसका जो दोनों मार्गसे भ्रष्ट होना है और परलोकमें जो नरक की प्राप्ति ये दोनों उ- सके नहीं क्योंकि अच्छा कर्म करनेवाला कोई भी दुर्ग- तिकू नहीं प्राप्त होता और जो तो श्रद्दाकरके योग में प्रस्तहोनेसे शुभकारी है फिर उसकी क्या गति होती है इस अपेक्षामें कहते. ब्रह्मलोकादि जो पुण्यकारी पुरुषों के भोगस्थान उनकं प्राप्त होकर और बहुतदिन वहां के भले प्रकार भोग भोगकर जो इसलोकमें 4- वित्रधनवाले पुरुष हैं उनके कुल में वो योगभ्रष्ट जन्म लेता है यह गति तो बड़े अभ्यासकरनेवाले की है और जिसके ज्ञान होने में कुछ थोड़ीसी देर रहीथी वह बुद्धि- मान ब्रह्मनिष्ठ योगियों के कुलमें जन्म लेता है इस लोक में मुक्तिका हेतु होने से ऐसा जन्म होना बड़ा दुर्लभ है.वो जो पूर्व देहमें ब्रह्मविषय बुद्धि करके योग करताथा फिर वो दोनों कुल में से किसी कुलमें उसी योग प्राप्त होजाता है फिर अधिक मुक्तिके लिये प्रयत्न करताहै जो पराये वशभी हो तो भी पूर्वाभ्यास उसकं विषयों से हटा- कर ब्रह्मनिष्ठ करदेता है इस अर्थक कैमुर्तिकन्याय करके हड करते हैं ज्ञानकी इच्छावाला जो नर कुछ ज्ञान उस कुंप्राप्त नहीं हुमाथा और पापके वशंसे योगभ्रष्ट भी हुआ परन्तु फिर कॉल पाकर जिसकी यह गति कि शब्दब्रह्मक उल्लंघकर वर्तता है। तात्पर्य वेदोंने प्रति पादन किये जो स्वर्गादि फल उनका तिरस्कारकरके . आनन्दामृतवर्षिषी १३६ उन से अधिक फल जो ब्रह्मानन्द उसके अनुभव करता हुआ अपने आपकू कृतकृत्यं जानता है और जिन्होंने जन्म जन्म में प्रयत्नकरके दूरकिये हैं पाप फिर पिछले जन्म में सिद्ध होकर वे उस गतिक अर्थात् ब्रह्मानन्दकू प्राप्त होवें तो इस में क्या कहना है *अब और प्रकार के विषयों में दोषदृष्टिपूर्वक जीवन्मुक्ति के साधन सुनो संसारी लोक दो पदार्थोकू विशेष कहते हैं धन १ खीर प्रसिद्धहै कि चोरी, हिंसा, झूठ, दम्भ, काम, क्रोध,गर्व, : मद, भेद, वैर, अविश्वास, स्पा, असूया, निन्दा, छ- लादि अनेक अनर्थ करके धनसिद्ध होता है और उसके कमाने में परदेशमें रहना नीचांकी टहल करनी परा- धीन रहना आदि और रक्षा करनेमें चोर राजा आदिका भय और व्यय करने में उसके कम होने का दुःख और नाश होने में जो दुःख उसका लिखना क्या चाहिये सका जानते हैं तात्पर्य जिसके आदि मध्य अन्त में केशही छेशहै ऐसे दुःखोंके कारण धनकू धिक्कार हैं और जो प्रा- कृत जीव धनसे स्त्री मदिरा मांस द्यत राग द्वेष अभि- मान अहङ्कारांदि ऐसे ऐसे यहां अनर्थ कर कर नरकका सामान करते हैं वो व्यवस्था कहांतक लिखें तात्पर्य जि- तने पाप हैं संबधनसे होते हैं यह धन पापी विद्वान् विचारवान्से भी अनर्थ करादेता है इसबातकी सिद्धिमें श्रुतिस्मृति इतिहास युक्ति आदि बहुत प्रमाण हैं इसके त्यांगका अधिक माहात्म्य शास्त्र में लिखाहे संसारसमुद्र में कन्तिा कांचन दो आवर्त हैं तीनोंभुवन इनमें भ्रमरहे हैं जो इन दोनों से विरक्तहैवो मनुष्यादि नहीं परमेश्वर " . १४:० प्रानन्दामृतबर्षिणी। हैली की स्तुति सुनो चांडाल के. घरकी बराबर स्त्री हैं। चांडालके घरमों मल मूत्र मांसादिपड़े रहतेहैं द्वारेमें चिह्न के लिये अस्थि लगेरहतेहैं अस्थिके खम्भ चर्मकी रज्जुलें बँधे रहते हैं मकानके ऊपर चर्म पड़ें रहते हैं जो उसके मकानकी यह व्यवस्थाहै तो बिचारोकि उसमकानकी जो मोरी जहांकू उस मकान का मल जाता है उसकी क्या उपमा देनीचाहिये विचारो स्त्रीमें ये सब बस्तु हैं वा नहीं श्रीका शरीरमकानवसू भीतर उसके मलमूत्रादिका होना प्रसिद्धहै मुख हारेवत् दाँत अस्थिवत् पैर हस्तांदि में अस्थि खम्भवत नाड़ियों से बँधेहुये हैं: शरीरके ऊपर वर्महै वा कुछ और है मोरीवत् उस शरीरमें मलमूत्र त्याग करने के रस्तेहैं देखो उनकं ऊपरसे देख र यो जीव बिना विचारके कैसामानन्दं होताहै वृथा नरकवत मोरी में डूबता है. विचारो इससे सिवाय और क्या नरक होगा जो यह कहो कि हमकू तो ये दोष नहीं फुरसे बेशक हम भी जानते हैं कि ऐसे जीव जिनकूविष्ठा मुरदे के मांसमें दोष नहीं फुरते उनके लिये अनेक प्रयत्न करते हैं प्राप्ति के समय अपने कृतकृत्य मानते हैं. हमारी दृष्टि में वे भी तो जीवहैं कुछ यह न समझना ऐसे शूकर कूकरही होते हैं मनुष्य भी बहुत ऐसे होते हैं अब विचारो मनुष्य शरीरमें और पशु में क्या भेदहा हजारों जगे इनबातों हा प्रसंगहै इसप्रसंगकू बहुत क्यालिखें बुद्धिमान् जीव- नयुक्ति की इच्छावाला इसीप्रकार सब पदार्थों में दोष दृष्टि कर फर उसका संग न करें और वोही चांडालके घर का हमारत अपने शरीर में घटावे अर्थात् चाण्डाल मी

.in
करना यो ज्ञानीका बासनाबधका हेतु नहीं श्रीभगवान्
अनिन्दामृतबर्षिणी।
१४१
उस घरमें यों अध्यास नहीं करता मैं घर हो यो अध्यास
है कि मेरा घरहै ऐसे अध्यासी करनेसे तोचों चाण्डालहै
और जो देहतऐसा कहते हैं कि हम देह हैं अर्थात् ब्राह्मण
क्षत्रिय आदि बर्ण ब्रह्मचारी आदि आश्रमी पण्डित
धनवाले हैं बिचारो यो देह चाण्डाल के घर की बराबर है।
वा नहीं जब देहक यो कहा मैं देहूं फिर वो कौन हुआ
तात्पर्य ऐसे विचार देहमें से अंध्यासको त्याग करे नम
से और पदार्थमें प्रतीत होना इसकं अध्यास कहते हैं।
बोसना दो प्रकारकी है शुद्ध मिलनी २ मुक्ति के लिये
शास्त्रविहित अनुष्ठान करनेकी और श्रवणांदिकी बासना
शुद्धा भोगों की बासना और संसारमै प्रसिद्धहोने की बा-
सना मिलनार शुद्ध वासना मुक्तिकी हेतु मलिन वासना
जन्मक़ी हेतु देहयात्रा के लिये भिक्षादि का जो प्रयत्न
कहतेहैं जिसमें शरीरका निर्वाह होवें वो कर्म करताहुआ
पापकू नहीं प्राप्तहोता ज्ञानीने शरीर यात्रासे सिवाय
और बासना का त्याग करना तीन बासना बहुत दुःख
करके त्यागी जाती हैं देहबासना १ लोकबासना २ शा-
स्वबासना३शसिरक बहुत उपटने चंदनादि लगा लगा-
कर चिकना चाँदना रखना और जो इच्छा रखनी कि यों
शरीर सदा आरोग्य रहे यो देह बासना १ यो इच्छा
रखनी कि सब लोगमुझंक भला कहैं यो लोकनासनार
शास्त्रबासना दो प्रकारकी हैं एकतो बहुत पढ़ने सुनने
की इच्छा रखनी अर्थात् जाने इस शास्त्र में क्या क्या है
दूसरी जो कर्म जपादि करना शास्त्रविहित करना यो
my
१

इच्छा रखनी यो शास्त्रबासना ३. इन करक युक्त जो अानन्दामृतबर्षिणी। १४२ पुरुष उसकू ज्ञानी भी भले प्रकार नहीं होता तात्पर्य तीनों बासना किसी की पूर्ण हुई न होंगी युक्तिसे बिचार देखो वा गुरुशास्त्र से निश्चय करलो और ये जो दो प्रकार हैं।एकतो मनोनाश, नाश बासना क्षय और दूसरा सदा वेदान्त का श्रवणादि करना २ इनका अविन रोध सुनो जिसकू संशय विपर्यय करके रहित भले प्रकार ज्ञान होगया है उसकें तो मनोनाश बासना क्षय मुख्य है श्रवणादि गौण हैं और जिसकू भले प्रकार ज्ञान नहीं हुआ संशय विपर्ययहै उसकूश्रवणादि मुख्यहै मनोनाश बासना क्षय गौण हैं मनों नाश वासना क्षयं के साधन सनो वाशिष्ठ में लिखा है जो जागताहुआ सुषुप्तिवत् रहै और जिसका जागना निर्वासन हो सो जीवन्मुक्त है श्रीभगवान कहतेहैं ज्ञानी सदा संतुष्टरहे मनादिकू बश रक्खे मौन रहे मौनी के तात्पर्य कोई नहीं पासक्ता ब- हुत लिखने से क्या प्रयोजन है मौनमें बहुत सुख और लाभहैं और मैं असंग हूँ, यो दृढ़ विश्वास रक्खे आत्मा में अर्पित करी है मन बुद्धि जिसने जिससे लोग उद्वेग न करें जो लोगों से उद्वेग न करे सो भक्त मुझको प्यारा है भक्त स्थितप्रज्ञगुणातीत शब्द करके बहुत प्रकार श्री. भगवान ने जीवन्मुक्तके लक्षण कहेहैं निस्टही कोई नहीं प्रारम्भ जिसके किसीकं नमस्कार न करनी न लेनी न किसी की निन्दा स्तुति करनी समर्थ हुआ: मिथ्या जान कर कर्मों का त्याग करदेना सर्पवत बहुत पुरुषों से डरता रहे नरकवत् सम्मानसे डरता रहे मुरदेवत् स्त्रियों से ड AL + श्रीनन्दामृतवर्षिणी। १४३ रता रहे किसी स्त्री से बात न करे.पहली देखीहुई कू स्म- रण न करे स्त्रियों की. कथान कहें न सुने काष्ठकी और लिखीहुईकू भी न देखे. उसकू देवता ब्राह्मण कहते हैं तात्पर्य जीवन्मुक्त कहते हैं ऐसे ऐसे और भी वाक्य हैं हे युधिष्ठिर मुक्तिमें जाति कारण नहीं शम दमादि गुण कारण हैं ये शम दमादि गुण जो चाण्डाल के भी होंगे तो देवता उसकू ब्राह्मण कहते हैं, जैसे स्वप्न में प्रपञ्च प्रतीत होता है ऐसे जाग्रत् प्रपञ्च का निश्चय करे जैसे बाजीगरके पदार्थों में बासना नहीं होती ऐसे इन पदार्थों कं जानकर बासना न करे अपने कुं असं- गजानने से और संसार को.मिथ्याभाव निश्चय कर- ने से शरीर कू क्षणभंगुर जानने से बासना का उदय नहीं होता जिसका निर्वासन मन है उसङ कर्म और कर्म के फल स्वर्गादि समाधान करना मन का जपकरें- ना आदि कुछ अपेक्षा नहीं आत्मानन्द से.एथक् सब इन्द्रजालवत् हैं जब ऐसा निश्चय हुआ फिर मनकी वासना कहां जावे जन्म जरा व्याधि मृत्यु में दुःखही दुःख, है फिर भी कुछ एक बार नहीं बारम्बार दुःख उ- नका अनुसंधान करतेहुये बासना का उदय नहीं होता कुसंग के त्यागने से भी बासना का उदय नहीं होता. ज्ञानी को किसीका संगन करना योही उनका मुक्तपद है क्योंकि संगसे अशेष दोष होतेहैं योगरूढ़ भी कुसंग करनेसे प्रतीत होजाताहै थोड़ी सिद्धिवालाजो कुसंग से पतित होजावे तो इसमें क्या कहना है, श्रीमद्भागवतमें लिखाहै स्त्री के संगी जो पुरुषहँ मुक्तिकी इच्छावाला

प्रनिन्दामृतवर्षिणी।
उनका संगत्यागदे इन्द्रियों के शब्दादि विषयों में प्रदत्त
न करे बिचरे तो अकेला विचरे यदि एकान्त में बैठकर
चित्तकू अनन्त भगवान में जोड़ें जो सर्वथा संग ने
त्यागाजावे तो साधुओं का संगकरे समस्त बासनाका
त्यागकरदेना चाहिये जो सव न त्यागी जावें तो मुक्तिको
वासना, रक्खे स्त्रियोंका और स्त्रीसंगी पुरुषों का संग
विद्वान् दूरसेही त्यांगदे एकान्तमें बैठकर आलस्य के
त्यागकरके स्वरूप का चिन्तवन कर स्त्रीका संगःसाक्षात्
ऐसा अनर्थ नहीं करता जैसे स्त्रीको संगी कारसंग
अनर्थ करता है. दृष्टान्त यो है ज्योष्ठ के महीने में दिन
भर धूपमें चला जावो वा खड़ारहो परन्तु मरता नहीं
उसधप करके तपाहुना जो रेत उस में बैठरहने से
निश्चय होता है कि मरजावे इसी प्रकार सब पदार्थों
की सन्निधि ऐसा अनर्थ नहींकरती जैसा भोगीका संग
अनर्थ करताहै महज्जनों का संग मुक्तिका हेतु है कामियों
का संग नरक का हेतु है ऐसे ऐसे साधन करके युक्त जीव
अपरोक्ष ज्ञानद्वारा निश्चय मुक्त होजाता है।
है, देश आदमी नदीउतरे पार जाकर संख्या करी कि
कोई हममेंखेडूबा तो नहीं जिसने संख्याकरी उसने आप
कंन गिना फिर यो निश्चय करलिया कि हम दशथे एक
डूवगया व आप को भूलकर रोनेलंगा उस समय कोई
और पुरुष वहां भागया उसने बझांकितम क्यों रोतेहों
कहा कि हम दश पारसेउतरे थे अब नव है।एक नदी में
डबगया उसने जो अपने मन में संख्या करी तो दश
प्रत्यक्ष हैं उसने कहा तुम शोक मत करो देशवा है यो

१४५ ... 'प्रानन्दामृतबर्षिणी। वाक्य सुनकर उसको निश्चय हुआ कि दश- वांडूबा नहीं कहीं इसनेदेखाहै अपने आपकू दशवां निश्चय नहीं किया इसकूतो परोक्षज्ञान कहते हैं फिर उसने कहा कि तू मेरे सामने संख्याकर तब फिर उसने वैसेही आपसे एथक् नवकू गिना आपकून गिना उसने कहा दशवा तू है तब उसने जाना कि बे सन्देह दशवां मैं हूं इसकूँ अपसेवज्ञान कहते हैं ऐसेही जिसने गुरुशास्त्र से सुनकर यो निश्चय कर रक्खाहै कि कोई ब्रह्महै आपकू निश्चय नहीं किया कि मैं ब्रह्महूं इसकूतो परोक्षज्ञान कहते हैं यो परोक्षज्ञान गुरुशास्त्रपूर्वक जिसकूँ है सो ज्ञान वुद्धिपूर्वक उसके कियेहुये समस्त पापोंकू अग्नि- वत् भस्म करदेता है जब यो निश्चय हुआ कि मैंही ब्रह्महूं इसकू अपरोक्षज्ञान कहते हैं यो अपरोक्षज्ञान गुरुशा- स्वपूर्चक जिसकं है सो ज्ञान मूलाज्ञानसहित समस्त संसारकू दूरकर देताहै अर्थात् उसका जन्म नहीं होता वो निरतिशयानन्द कू प्राप्तहोताहै इसप्रकार परमात्मा का स्वरूप चिन्तवन करने से पृप्ति तो नहींहोती परन्तु अन्यके विस्तारकेभय से अलैं परिपूर्ण परमेश्वरकू बार- स्वार नमस्कार है कैसे वे परमेश्वर हैं जिन्होंने गोपियों के वस्त्र हरे हैं ऐसे जो श्रीकृष्णचन्द्र महाराज उन में प्रथम दासोऽहम् यो मेरी बुद्धि थी सो महाराजने अपने श्वभावके अनुसार मेरा भी दाकार हरलिया अब सोऽहम् योशेषबुद्धिहोगई बारम्बारमहाराजक इसहेतुसे नमस्कार करताहूं कि मुझकू ऐसा निश्चय होताहै व्यतीत जन्मोंमें महाराजकूकमी नमस्कार नहीं किया क्योंकि मोयेजन्महु- . १६ हामृतवर्षिणी। मा और इसजन्ममें जो नमस्कार किया तो आगेकंजन्स नहीं होवेगास्थूलादि शरीरों के अभाव होनेसे नमस्कार कौन करेगा इसी लिये पिछले अपराध के क्षमाके लिये और आगेकं नमस्कार न करना इसकृतघ्नता महादोष दूर होने के लिये इसी जन्म में बारम्बार नमस्कार करता श्रीकृष्णचन्द्राय नमोनमः ३ जिस की देवतामें पर- सभक्ति और जैसी देवता में वैसेही शुरुने है उस आत्मा ककहे हुये ये अर्थ प्रकाश होंगे अन्यकं नहीं होंगे यो श्रुतिका अर्थ है श्रीमत्परमहंस परिव्राज स्वामी मलूक गिरि जी महाराज चरण कमलों का पूजने वाला अवर शिपय आनन्दगिरि नामने यो ग्रन्थ आनन्दा तर्षिणी मुन्शी वंशीधरजी जिन के किंचित गुण प्र. थम आध्याय में लिखेहैं उनकं सुखपूर्वक ब्रह्मतत्व जानने केलिये उनकी भावा भक्तिपूर्वक प्रार्थनासे अतिसुगम अतिपवित्र अतिगुप्त सब विद्याधों में श्रेष्ठ जो इस में प्रातस्य सो सुखपूर्वक जानाजावे. प्रत्यक्ष फल है जिस में सो गाजहितीय ज्येष्ठ शुरूपत द्वितीया रविवार से वल उनीसौ पन्द्रह १९१९ में विनिर्मित करके समाप्त किया पढन सुनने वालोंकू शान्तिहों शुभहो हरि अतः सन् हरितसत् हरि तत्सत् श्रीकृष्णचन्द्रायः नमोनमुःइति श्रीआनन्द्रसितवर्षिायादशमोऽध्यायः समा अपारससारसमुद्रमध्येनिमज्जतोमेशरणाकिमस्ति । गुरो कृप्पलोकृपयावतद्विश्वेशपादाम्बुजदीर्घतौका के बाहिकोयो विवयानुरागि:कोवा विमुक्तीविषयेविरतः ॥

१४७ 1 आनन्दामृतबार्षिणी। कोवास्तिघोरोनरकःस्वदेहस्तृष्णाक्षयःस्वर्गपदंकिमस्ति २संसारहत्कस्तुनिजात्मबोधा कोमोक्षहेतुःप्रथितःसएव।। द्वारंकिमेकंनरकस्यनारीकास्वर्गदाप्राणभृतामहिंसा ३शे तेसुखंकस्तुसमाधिनिष्ठोजागर्तिको वासदसद्विवेकी । के शत्रवःसन्तिनिजेंद्रियाणिकान्येवमित्राणि जितानितानि कोवादरिद्रोहिविशालकृष्णःश्रीमांश्चकोयस्य समस्त तोषः ॥ जीवन्मृतःकस्तुनिरुद्यमोय कावास्मृतास्यात्सु खदादुराशा ५ पाशोहिकोयोममताभिधानंसंमोहयत्येव सुरेखकास्त्री ॥ कोवामहांधोमदनातुशेयोमृत्युश्चकोवाप यशःस्वकीयम् ६ कोवागुरुयोहिहितोपदेष्टाशिष्यस्तुको योगुरुभक्तएवा कोदीर्घरोगोभवएवसाधोकिमौषधंतस्य विचारएव ७ किंभूषणाद्भूषणमस्तिशीलंतीर्थपरंकिंव मनोविशुद्धम् ॥ किमत्रहेयंकनकंचकान्ता सेव्यसदाकि गुरुवेदवाक्यम् ८ केहेतबोब्रह्मगतेस्तुसन्तिसत्सङ्गतिः तिविचारतोषाः ॥ केसन्तिसन्तोखिलवीतरागाअपास्त मोहाःशिवतत्त्वनिष्टाः ९ कोवाज्वरःप्राणभृतांहिचिन्ता मूर्योऽस्तिकोयस्तुविवेकहीनः॥ कार्याप्रियाकाशिवविष्णु भक्तिःकिंजीवनदोषविवजितेयत् १०... विद्याहिकाब्रह्म गतिप्रदायाबोधोऽस्तिकोयस्तुविमुक्तहेतुः ॥ कोलाभआ स्मावगमोहियोजितंजगत्केनमनोहियेन ११शरान्महां शूरतरोऽस्तिकोवामनोजबाणैर्व्यथितोनयस्तु ॥ प्राज्ञोऽ स्तिधीरश्चसमोऽस्तिकोवाप्राप्तोनमोहललनाकटाक्षः१३ विषाद्विषकिंविषयाःसमस्तादुःखीसदोकोविषयानुरागी। धन्योऽ स्तिकोयस्तुपरोपकारीक पूजनीयोनंनतत्वनिष्ठः १३. सारस्ववस्थास्वपिकिनकायकिवाविधेयंविदुषाप्रय ." - 1.

१४८ आनन्दामृतवार्षिणी।
नात् ॥ स्नेहंचपापंपठनंचधर्मः संसारमूलंहिकिमस्त्यवि
द्या १४ विज्ञान्महाविज्ञतमोस्तिकोवानायपिशाच्यानचे
वंचितोयः ॥ काशृंखलाप्राणभृतांचनारीदिव्यत्रतंकिंच
निरस्तदैन्यम् १५ ज्ञातुंनशक्यहिकिमस्तिशैवैर्योषिन्म
नोयच्चरितंतदीयम् ।। कोदुस्त्यजासर्वजनैर्दुराशाविद्यावि
हीनःपशुरस्तिकोवा १६ चासोलसंगःसहकर्षिधेयोमूर्खे
श्चपापैश्चखलैश्चनीचैः ॥ मुमुक्षुणांकित्वरितविधेयल
सङ्गतिनिर्ममतेषुभक्तिः १७ लघुत्वमूलचकिमर्थितेवगुरु
त्वबीजयदयाचनकिमाजातोऽस्तिकोयस्तुपुनर्नजन्मको
वामृतोयस्यपुनर्नमृत्युः १८ मूकस्तुकोबाबधिरश्चकोवा
युक्तंनंवक्तुसमयसमर्थः ॥ तथ्यं सुपथ्यनशृणोतिवाक्यवि
श्वासपात्रनकिमस्तिनारी १९ तत्वकिमकंशिवमद्वितीय
किसुत्तमंसच्चरितवदन्ति ॥ किंकर्मकृत्वानहिशोचनीयः
कामारिकंसारिसमर्चनाख्यम् २० शत्रोर्महाशत्रुतमोऽ
स्तिकोवाकामासकोपन्तिलोमणः ।। नयंतेको विष
यसएचकिदुःखमलममताभिधानम् २१ किम्लण्डनसा
क्षरतामुखस्यसत्यंचकिम्मतहिततदेवा। सत्यात्सुखंकिंस्त्रि
यमेवसम्यक् देयं परं किल्वभय सदैव कस्यास्तिनाशे
मनसोहिमोक्षःसर्वथानास्तिभयंत्रिमतौ ॥ शल्यपरकि
निजमूर्खतेवककैयुपास्यागुरवश्चराः २३ उपस्थित
प्राणहरेकृतांतेकिमाशकार्य सुधियाप्रयत्नात् ॥ वाकाय
चित्तैःसुखदयमनमुरारिपादाम्बुजमेंवचित्यम २४ केंद
स्यवःसन्तिकुवासनाख्या:कशोभतेयःसदसि बिंद्यः ।
मातबकायासुखदासुविद्याकिमेधतेदानवशात्सुविद्या
कुतोहिनीतिः सततंविधयालोकापवादाविकाननाच॥को

प्रानन्दामृतबर्षिणी। १४६
वास्तिबंधुःपितरौचकोवाविपत्सहायौपरिपालकौयौ २६
बुद्धयानबोर्बुपरिशिष्यतेकिंशिवंप्रशान्तनुखबोधरूपम् ।।
ज्ञातेतुकस्मिविदितंजगत्स्यात्सर्वात्मकेब्रह्मणिपूर्णरूपे
२७ किन्दुर्लभंसद्गुरुरस्तिलोकेसत्सङ्गतिब्रह्मविचारण
उच ॥ त्यागोहिसर्वस्यशिवात्मबोधःकिदुर्जयंसर्वजनैर्म
नोजः २८ पशोःपशुःकोनकरोतिधर्म प्राधीतशास्त्रोपिन
चात्मबोधः ॥ किंतद्धियंभातिसुधोपमस्त्री केशत्रवोमित्र
वदात्मजाद्याः २९ विद्युञ्चलंकिंधनयो वनायुर्दानम्पराक
ञ्चसुपात्रदत्तम् ॥ कण्ठंगतैरप्यसुभिर्नकार्य किंकिंविधे )
यमलिनंशिवार्चा ३० किङ्कर्मयत्प्रीतिकरंमुरारेःवस्था
नकार्यसततम्भवाब्धौ ॥ अहर्निशंकिम्परिचिंतनीयं सं
सार मिथ्यात्वशिवात्मतत्त्वम्३१ कण्ठंगतावाश्रवणङ्गता
वाप्रश्नोत्तराख्यामणिरत्नमाला ॥ तनोतुमोदंविदुषांसुर
म्यारमेशगौरीशकथेवसद्यः३२॥
इत्यानन्दामृतवर्षिणी समाप्ता ॥

TATA SON 7.SAR . क Hom. MON ne REET . जो कि खण पुगणों में श्रेष्ट है जिनको पंग वेद भी हैं जिस से श्रादि ? नामा २ वन ३ विराट ४ उद्योग यू सीमा ६ ख ७ वर्ण शल्य ९ लौनिक १० दिशोक ११ ची १२ गालि १६ अनुमन्न १४ अवध १५ आश्चमवालिक १६ नुशाल १७ स्यगारोहण १८ और हरिक- शपर्व १६ हैं.-जिसको आगरापुर पीपलमरडीनिवाति चौरासिया गौड़ वंशातंर प्रधान परित कालीचरणजी संस्कृताध्यापक निगमानज लख. जज ने संस्कृत महाभारत से प्रत्यक्ष का मापा से उल्था किया है इतके - या २ पर्व भी खरीदारों को मिल जाते हैं----यह पुरतक भी अवश्यही अवलोकन करनीचाहिये ।। भीनमाला जिससे भविष्य त्रयीत् जो भागे लावगी उन्ही बलुओं का वर्णन और अनेक प्रकार के देवी और देवताओं के मतादिक और उनापनादि वर्णित है - जिलको जयपुरनिकालि पण्डित दुगाप्रसादजीने भापान्तर दिया है ।। FREE! रवाना जिसमें अगवान वाराहीने पृथ्वी से धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष सिद्ध है , लिये इनिहाससंयुक्त कथायें वर्णन फी हैं-जिसको जयपुरनिवासि परिडत माधवप्रसादनीने भाषान्तर किस छोर पण्डित सरगूप्रसाद और दुर्गाप्रसाद- जीने उसी उल्थ को शुद्ध किया था वह अच्छी तरह से छपाहुया वर्तमान है ।। Frorary जिसमें जगदुत्पत्ति, स्थिति, पालन और सोमवंशी और चंद्रवंशी राजानी का कथन वा श्रीकृष्णजीका परिपूर्ण चरित्रादि कथा वर्णित हैं जिसको बारह- वकीप्रदेशीय धनावलीमामनिवासि पण्डित महेशदत्तजीने प्रत्यार का भाषा में सर्थ किया। लोअर पर हजागेत FEATREEZERETARIATERTAINMENT . , Mon m-t m

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Anandamritvarshini

Author
Swami, Anandgiri
Title
Anandamritvarshini
File name
Anandamritvarshini
Text
OCR done
Citation
1907
Published
2009/10
Publisher
Lakhanow, Munshi Navalkishor Press
Language
Sanskrit
Pages
170
Library
Sanmati Library, Jaipur
DLI number
322291
Barcode
99999990248866.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
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XmruWbaTHSV
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