Bhartiya Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikaner
Sahitya -devta
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साहित्य-देवता
माखमलाल
चतुर्वेदी
प्रम्प-संख्या-२३.
मप्रसक वा विवा
भारती ममार
तौर इलाहाबार
द्वितीय संस्करण
सबत् २०१६
अस्प ८..
पीताराम पुडे
कोरर प्रेस सहावार
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स्वर्गीय पं० मापपराष जी समे
मेरे पीपम के पासणी-नियन्त्रक
स्वर्गीय
पणित मापवराषग्रीसमें
भी परणों में-
स्वर्गीप ० माघपरावगी समे
मेरे जीवन के पापी नियन्त्रक
स्वगीय
परित मापपपपजी समे
भी परणों में-
. भीयुत पं० मावनमानी चतुदी भूमिका मेरी इसमोलीका परिक्स में कोम- झी भूमिका लिलार है। मेरा इन पृये में किया हुमा सारा प्रयल ही एक भूमिका मात्र है। कोई माम्ययाली इस भूमिका के भागे, प्रास वस्तु को लिल र मेरे इस भरे पल को पूरा करेगा। इसी भाशा से मे मारती के मन्दिर में यह भघ्रा मर्य पदाने का साहस कर रहा है। -मालनकास पतुर्वेदी 岛 साहित्य-देयता अनुभमणिका १ सारिस्परेरणा मदिमख बाँ पानी पना अंगुलियों की गिनती पीढ़ी पवन गारी re ૫૨ ५५ गतक्रिया महत्वादापत स्वहिस्प की पेदी विम्यु, सिन्धुत्त प्रदेशर नीलाम बब रसबंधी योन उठे पसुमात्र पाखप्रय प्रस्ताव माया प्रमर निमास सोश-मारक 2ठे पागलपन मतलपारी पुष्पा बागी म सबनेगावा सौदा माधिक असदाय वामपन। राम मानेगाहे हो मुरडीपर। ८६ દર १२१ १२९ इसी पार मोहम तरमात्मान मे ममः परपाबी संवावा वह बीमिया मना गिरिषर गीत माप मुरही। 1-मामी से 'दरीकी निकट जीपमा प्रस्न- चित्री १११
सालित्य देवता
म
साहित्य-देषता
मैं तुम्हारी एक तसवीर सीपना पाहता हूँ।
'पर मूल मत पाना कि मेरी तमधीर सोपते सीचो मुम्हारी मी एक
तसवीर सिंपतीपली भा रही है।
भरे, मैं तो सही अपने माती पीपन की एक तसवीर अपने भटेनी
केस में रमले हुए हैं। हारी सहपीर पना पुछने के बाद में उसे प्रदर्शनी में
रखनेवाला है। किन्तु, मेरे मास्टर में यह पहसे देस लेना पाहता है कि मेरे
भाषी-बीवन को किस तरह पिर्धित कर तुमने अपनी जेब में रत पोड़ा है।
“प्रदर्शनी में रम्मो तुम भस्मी बमाई हस, भोर में अपनी पनाई हुई
रस ई, जल सम्हारी तसवीर ।।
ना सेनानी, मैं किसी मी माईने पर बिकने नहीं भाया। में फैमा है,
पर पतित होते समय ऐप देय शेता है। बहते समय तो मुम्ही, मले तुम्ही,
दीस पड़ते हो।
या देखना है।
मुम्हे । भोर ठम मे होपालम के घाट उतारने के समय, या
हरगिा महो मूल माना है कि तुम किसके हो।
भार पित्र सीचने की पैमी क्यों है।"
फम तक मे सम्हारा मोल सीन पूला करता था। भाव भपनी इस
बेदना ने लिनने के भानन्द मार मुझमे नही सैंमलता।
समुष पत्सरीमा बहुत मादी सतीपर बोम्मीला दी
प
मपिक हाता है।"
पिना मोम के कोटे पत्थर मी होते है जिनमें से एक एक कीमत पचासों हारियों से मही ती बासी । परन्तु- परन्तु मा ।" मेरे प्रियतम, तुम यह मूल्य नहीं हो विसी, ममागे गाहक की महानों को देसम्म भषि से अधिक मांग की जाती है। हाँ, तो म्हारा पित्र लीचना चाहता है। मेरी कल्पना की थीम को लिखने दो, फलम की जीम को बोल सेने दो । किन्त,दय भोर मसिपात्र दोनों तो काले है। तब मेरा प्रयत्न, चातुर्य का भम पिराम, मलाताका अमिराम केवल पपलता का गर्व गिरानेवाला माम मात्र होगा। परन्तुमा काली द अमृत-पिदुमों से भी अधिक मीठी भाषिक भाकर्षक और मेरे लिए भविक मूल्ममाम् है। मैं उनसे अपने भाराप्प पित्र यो वमा रहा। * कौन सा भार है। मामकसदर के मुग्प संसार को हो । चित्र जीने मुपासेलाउँ। तुम अनन्त पाप भामामों के ऊँचे और गहरे -पर सप्त पो हो। मेरी काली कसम का पल समेटे महाँ सिमटता। हम कम्पनाभों के मन्दिर में बिजली की मापक पोप को हो ! माना सुत के फूलों और लड़ाके सिपाही के रफ-विदुओं के संग्रह मारी तसवीर सी मै तुम तो पासी के घरोवर में अम्तरास्मा के मिपासी की पगमगा स्ट हो। तारों से परे, परमारों में खेलते हुए रक्त के बोम और तपन से तलासी, पर पंकियो, साथियों और सतामों तक को मालेपन में महलाये पुर। बेदनामों के निधन के पहालय, तमे किस माम से पुचीं। साहित्य-देवता २ साहित्य देवता । मानप-चीवन की भय तक पमपी हुई महचा के मन्दिर पनि की सीढ़ियों से उतरता दुभा म्पेय का माखन चोर या तुम्हारी ही गोद के कोने में राधे कहकर मही दौड़ा पा रहा है। महा, तब तो तुम बमीन को भासमान से मिलानेवाले जीने हो, गोपाल के परण रिहों को साथ-साप करने के सापन ! पनि की सीरियाँ मिस पण सपक रही हो, और कल्पना की सुकोमल रेराम-रोर विस समय गोबिन्द के पदारपिन्द के पास पहुंच कर मूलने की मनुहार कर रही हो उस समय यदि यह मस पड़ता होगा- माह,सम कितने महान् हो। इसीलिए साँगफेलो मारा, तुमारे परण-पिकों के मार्ग की कुची, तुम्हारे ही दार पर लटका गया है, मेरे मास्टर । पिहियों की पहा का संगीत, मैं और मेरी अमृप्त निस्पदिनी गाय मय-सप्ता, दोमो सुनते हैं । “ससि चलो समम के देस, गोगन पन के धनी गाप्लगेमें और मेरा मोहा दोनों महामही 'शम्म' मी मे अपनी यह तान ही मी। परन्तु वह तो तुम्ही मे, बिसने दिपद भार पतुष्पद छविको निग्रह तस सिताया । मरे, पर में तो मूल ही गया, मैं सा तुम्हारी तसवीर सीपने पालामामा . हा तो भप में तुम्हारी ससमीर सीपना पाहता हूँ । पराभों को कपा स्पनेपाली समान भार समारने के लिए लपेटी पानेवाली तो की पालें, इतिहास से भी परे सो भार या देतो भेगी-पद भनायके मेकर और शाहमादे कपास के गत मायदा अपने ऐश्वर्म को मस्तक पर रखकर मपाल बनने के लिए बायु के साम होई पद रहे है। इन दोनों घमानों के पति नंगीर तुम्हीं तो हो । विचारों के उस्मान और ++साहित्य पता सालित्य देवता । पतन तय सीपे भोर टेरेपन को मार्ग-दराक पना तुमी म कपास के तंतुओं मे मीने तार सीपार विचार हीरा मापार के कान में स्वामी पांचालीपाशी की लार पा रहे हो। फितने प्रशासन भाये और पले गरे। तुम्हारी मीन से रात थे तापा देनवासी सोरठ गाई की भोर समेरे सिरप-संहारो से घूमने माते समय उसी पीन से सुन के नारे पर के की चोट लगाई दी। मगाधिराजों के मस्तक पर से उतरनेवाली निमगामों की मस्ती मरी पौर पर और उनसे निकलने वाली सारों की सुरपानी से हरियाली होनेवाली भूमि पर, तगीली पपी से लिपरे तरल मालाम्मर महासागरों पर, और उनलारों को पार कर सारीमो के रफ से की मान, साम्रापाका निर्माण करने के लिए दौड़नेमाले महाओं के मंत्रों पर, तुम्ही मत तुम्ही बिले दीसते हो। अंगरकप्रपानमंत्री, इटली स्टेिटर, अशानिमान पदमुक्त, पीन काप कर पागतासभा और रूस का सिंहासम उसटने भौर कान्ति से शान्ति का परमादान करनेवासा परीष -बह तो तुमही हो । नदि तुम सर्ग न उतार तो मन्दिरों में किसी भारती उतरती। यहाँ पमगोदर टेंगे रहते उमूक पोलते। मतिफ के मन्दिर पहा मी तुमसे खासी है, नही तो हो रहा है। हारमीनारों और पिरामियों के एम्बर , तुमारे दी मादेश से भासमाम से बातेंर रहे। मानों की पुतलियों में यदि तुम कोई वसमीर मलीच देते तो के बिना दाँतो केही नीव गमती पिना बीम केही रकम लेती। साहित्य-पता ४ भातिव्य-देवता वैध कहते है पमनियों के रक की दौड़ कर भापार सदय है क्या इदय मुम्हारे सिवा किसी और का नाम है। प्यास का हा भौर वाल्मीकि राम पिसके पंखों पर पड़कर हगारो पो की फासीदते हुए भाग मी सोगों के पदयों में विराम र है। चाहे काम के बने हो पाहे मोर-पत्रों के पल तो तुम्हारे ही थे। रूठो नहीं, स्पाही के गार, मेरी इस स्मृति पर तो पत्पर ही पड़ गये कि- मै तम्हारा मित्र सीप रहामा । परन्तु सम सीधे कहाँ पठते हा महारा पिपड़ी टेली तार है। सिपहसालार, तुम देवल को मामात्य की पुमीती हो । इदम से कम कर, पमनियों में पौड़नेवाले रफ की दरहो और हो उन्माद के अतिरेक के रफ- तर्पण मी। माह, कौन नहीं जानता कि तुम कितनों ही की मेसी की धुन हा पुन पर, यो गोकुल से ग्ठकर विष पर अपनी मोहिनी का सेतु पनाये हुए है। घल की पीठ पर बमा मापा पुल मिटाव मिटता मही, मुलाये मूलता नहीं। प्रपियो का राग, पैग़म्बरों का पैग़ाम, ममतारों की मान युगों को पीरती किस लालटेन के सहारे हमारे पास तक मा परेसीहतो तुमहो। और भार मीकहाँहर रहो। सूरन और पाद का अपने रसके परिसे बना, पूम के पोदो पर पेठे, बदेही तो पो भा रहे हो पारे । उस समय हमारे साहितपदेपता सालिया देश संपूस युग का मूल तो मेह-ट्रम में पड़ने वाले कोटे से स्टेशन ब-सा मी नहीं होता। पर इस समय तो तुम मरे पास बैठे हो। तुम्हारी एक मुट्ठी में मूतशल प्रदेक्स पटपटा रहा है-अपने समस्त समर्मको समेत दूसरी मही में विश्व का विकसित पुरमा निराग पूल के मन्दन में परिवर्तित सस्म कमपिहारी, भार सो कासना की फुलवारियाँ मी विपकी स्मृतियों में तुहारी तर्मनी के इशारों पर सासहर तुम मात्र मही हो, इसीलिए कि मैं अनाम मही है। किन्तु रेमन्त पुल्प, यदि तुम मिल की प्रातिमा का बोम समालसे मेरे घर न पाते तो उमर भाकररा मी होता और नीचे पमीन मी, मदियाँ मीपाती, भोर घरोवर मी लहरते, परम्त मै और पिरिया, दोनो, और छोटे मोटे बीय-वस्तु सामाविक लता मो भौर भागों से अपना पेट भरते होते । मैं मर भैसाल में मी पचों पर रास्ता-मग पना होता | पीते-सा पुरांता, मोर-सा सता भोर फोपल-सा गा मी देता। परन्तु मेरा और पिस के हरियाशेपन का उतना ही सम्बन्म होता स्तिमा नर्मदा के तट पर हरसिंगार परामि में लगे हर टेलिमाफ के सम्मे का मर्मदा से कोई सम्बन्म हो। उस दिन भगवाम् 'समय' म जाने किसान पाने कब घन उमेठ कार कसते बनते । मुझे कौन जानता : विम्म की नामुमो और भरावली की सिरनियों के उत्लान भोर पतन इतिहास किसके पास लिखा है। इसीलिए तो मै तुमसे पता है। ऐसे ही ठे रहो, ऐसे ही मुमता।" साहित्यस्ता " द वता यो। इसलिए हि अतरतर की तरल-जूलित्र समेट कर, भरागक ! मै ट्रम्हारा पिन लोकना पाहता हूँ। . क्या तुम भरावा मही हो। तिनी गरियाँ तुमने पानापूर नहीं कातिने सिंहासम तुमने नहीं तोर गले । लिने मुकुटों को गला कर पोड़ों की सुनहली सोगीर महीं बना दी गई ? सोते हुए भलएर नरमुएडा के गागरण, नाड़ी रोगी के मर की माप बताने में गुरु सती है किन्तु तुम मुम्प होकर मी अमाने का गणित के श्रको पैसा मपा-तुला और दीपक पैसा स्पष्ट निर्माण करते गले मारे हो । भार, राम फरहानेवाले भाक्रमण को बरदारत किया जा सकता है, किन्तु मनोराम्म की ट तो दूर, उस पर पड़मेवाती ठोकर कितने प्रलय नहीं कर बालती। सोमे के सिंहासनों पर विराजमामों की हत्याभों से पमान के मनसियों के हाम लाल है और नको पर दिये जानेवाले रंग की तरह उस शकिकी सीमा निरिक्त है । परन्तु मनोराम्म की मृगशाला पर पड़े हुए पिना राम भोर रिमा सेना के पति के अपिचर नौसी कोन दे सके। मनोराम्प पर इटममाला तीर प्रलय की प्रथम पताबनी लकर सौटता है। मनोराम्प के मस्तक पर फहराता हुमा विषय पर विस दिन प्रति पूसरित हामे लगे उस दिन मनुप्पत दबीन से भी सहा मिलेगा। उम दिन, पासामुसी फट पड़ा होगा, रम टूट पड़ा होगा। पारे, शून्य के अंक गति के संकेत भोर पिस के पतन-पय की +सादिस्प-पता .
देवता
तमा विस्मृति की गति की लाल-मंडी तुम्हीं तो हो। हमारा रंग उतरने
पर का भास्मतर्पण ही है वो फिर तुम पर शालिमा परसा सके। बिस मंदिर
प्रमरा लिपट वाम, महाँगालोल हो उठे, उसमे मर-नारायण मही राते।
उस देश को पराये परण ममी पोने है, अपने मांस से पराये गुन्हे ममी
सौमाम्पशील बनाये रखने है, पराई उतरन भी पहनमी है। में, प्रियतम
मुम्हारी-
उतरन पहनी हुई तसवीर नहीं सीगा।
"
*
उत्तरम-री तर स्मरण हो पाया । पुरे समय, बुरे दिमो । अपमा
रुपम रखनेवालाही उतरन पहने ।
पो चितिय के परे भफ्नी अंगुली पहुंचा पामे, मो प्रताप के उस
भोर रस्सी पक्षको इसके, पर उतरन यो पामे।
कैप और बर्मन बेसी मापात्रों वापस कर सेन न उतरन मही,
वह तो माई पारे की मेंटहै।
एक मिसारिन माँ मेरी मी है। उसने मी रल प्रसव किये है। पस्परों
से कोमीले) को गिनती में अधिक ताली भतारण में मृदंग से
अधिक भाषा नेपाले।
मातृ-मन्दिर में उतरम पर एक दूसरे से होहल रहा है। बतरन-संपह
की बहादुरी का इतिहास उसकी पीठ पर लदा,हमा है।
गत वर्ष होनेवाले विस-परिवर्तनों के पे, पुराने भतपारों पर, भार
हम हवाई पहार के नये भाषिकार की तागास करते है।
साहित्य-पता
नासिव्य-देच वीणा, सी और मन-सरंग का सर्वनाश ही नहीं हो सुध हार- मोनियम मोर पियानो मी किम काम भाएंगे। हमारा कोई गीत मी तो हो। कला से महलाया इमा, पदय तोकर निकला हुमा। पीणा में तार नही, दिल में गुपार नहीं । म जाने हम तुम्हारा पमोसा मनाते है या मरण-त्यौहार । पैलगाड़ी पर पेठे पेठे हपाई गहाय देसा करते है। पिल्ली के रास्ता काट जाने पर हमारा अपराकन होता है। किन्तु येतार छ सार रिवरलैंड की खबर भास्ट्रेलिया पपाकर मी हमारी मुतियों को नहीं छता ! सब हमारी सरस्वती से तो उसव सम्पन्न ही से हो सकता है। ऐमिन के रूप में भपातीमालामुसीक एक म्यापार हमारी छाती पर हो रहा है। पारे, इस समय अपांगति की जाल-मालाओं में से ऊँचा उठने के लिए भारीण पाहिर । हपको ने इसी लालर से तो तुम्हारा नाम प्ण रसागा। परा तुम युग-संदेशवाहिनी अपनी पारी लेकर पैठ पाभो । रामायण में यहाँ पालकाएउ है, यहाँ लाएर भी ता है । तुम्हारी तान में भैरवी मी हो, कलिंगड़ा मीहा। सरा पन्सी लकर पैठ गाभा । मैं तुम्हारा पित्र मुरलीपर के रूप में पाहता है। + H 'शिप संहार करते है"-यन जाने । किन मेरे सपा तुम यरूर महलों के सहारक।। भापरियों ही स तुम्हारा दिप्य गान उटता है। ++ साहित्य-देयता साहित्य किन्तु यह हमारी पणे कटी देसी । पाले पद गमे है, पातायन बन्द हो गये है। सूर्य की नित्य मषीन प्राण प्रेरक और प्राण-पूरक किरणों की यहाँ गुमर कहाँ तो दार सटसटा कर लौट पाती है। दार पर पड़ी हुई घेखें पानी की पुकार करती हुई बिना फलक्सी रही प्रतिल लो रही है । पितृ तर्पण करनेवाले मरहों को लेकर में इस कुटी काला माफ करने ही में लग जाना पाहता में । कितने सपहर कि इस कुटिया में सूर्य दर्शन नहीं होते। मरे देवता । तुम्हारे मन्दिर की पर या भावा किये हुए है, तब बिना प्रकारा,पिना हरियालेपन पिना पुष्प चार बिना विस की मशीलता को तुम्हार द्वार पर तड़ा किये, तुम्हारा चित्र ही कराँ उतार पाऊँगा। विस्तृत मीले भासमान पत्रक पाकर मी देवता ! तुम्हारी तसवीर सीपने में शायद देवी-चितेरे इसीलिए असफल हुए, उन्होंने पन्द्र की रपतिमा की दावत में,सम मोर पित्रा की कल्पना पर पड़ने का प्रयस किया भार प्रतीक्षा की उदिमता में सारा भासमान परीक्षा कर पलते बने। इस बार मैं पुष्प ले र मही, कलियाँ तोड़कर भाने की तैयारी करूंगा, और ऐ पिरस के प्रसमप्रमात के मन्दिर, उपा के तपोमय प्रकारा की पावर तुम्हें पादाकर, महारे उस अन्तरसर का मित्र सीपने भाउँगा, यहाँ म अरोप संकटये पर अपने उपर के टुको पति करते र रोष के साथ खिला कर रहे होगे। भाय तो उदास, परामित और मपिप्प की वेदनामों की गठरी सिर पर जाद, मेरे पास में उन कमियों के माने की उम्मीद में मरता है, जिनके कोमल अन्तस्तस छेवैदकर उस समय पर तुम नगाधिराम काम पहने दोनों रूपों से भानेवाले संदेशों पर मस्तकाला रहे होगे, गंगी और साहित्य-देयता ++ २.
साहित्य द ता जमुनी का हार पाने पंग के पास तरल पुनीती पहुंचा रहे होगे, नर्मदा भार साप्ती की करपनी पहने विम्य को निरव नापने का पैमाना बना रहे होगे, कृप्या और कारी की कोरवाला मीलामर पाने विक्सनगर का सदरा पुरम प्रदेश से गुगार कर सम्मादि भौर भरावली को सेनानी बना मेवाड़ में माला जगाते र देहली से पेशावर भोर भूटान पीरकर अपनी पिर कापाणमयी वाणी से विश्व को न्यौता पहुंचा रहे होगे, और हवा और पानी की बेड़ियाँ तोड़ने का निरसय कर,हिन्द महासागर से अपने परण पुनषा र होगे- -डी उसी सपिष्ट मषिप्य में, हाँ सूची से कलियों का अन्तकरण पेद मेरे प्रियतम मैं तुम्हारा पित्र सीपने भावेगा। तब तक मित्र सीपने योग्य भरपिमा मी तो तयार रखनी होगी। पिना मस्तको को गिने और रक को मापे ही मैं तुम्हारा पित्र लीपने मा गया। दपता, मह दिम माने दो, स्पर सप गाने दी।
सालिर . मुक्ति भरत बद पानी एक मेरे पर ही में रहता है, पर जीवन मर हम एक दूसरे से नहीं मिले । एक मर्मदा-राट कोहार, गला-सट पर रहता है रे पार सो मीम की दूरी पर, पर हम रोग लामी लेते है, शिक्षमत मी कर लेते हैं, प्रसव भी हो लेते है, और रूठ मी ले। है । एक दूसरे के विलकुल पास रहते है। इदम के संमोग पर विचम पार, सस्तो मे पीवन के पियोग कर दिवाला कार दिया। मांगी पलकों के 'कम और ही साद बेहदय से अंगुलियों पर उतारने का पागलपन से सने सारी दीका सलोनापन, काली दो में मारे । से, किस रास्ते होकर । मिलन-सुस की माँग।-पाकरे, यो वियोग के मूसपम के सीहत परे । मुकि माँगमा मोका पाना नाही, तो पार के विमोग को हठकर म्योतमे बाते है, इसके पिना अंतर की एकरसता घ उनमें जर ही नही पड़ता, भारही महा पड़ता । अंतर में, 'रापारी से एक हो जामा, मीरा के गिरपर का प्यार है, प्रससी के रपुनाम की पराली सटो की लटकम है, तुकोपाराम (तुधराम) के पिठोवा के पदों की पाहट है, सूर की अपने गोपाल पेबसी के मेम्ब से मरी फटनर है। मफिर तो मुक्ति के माथे की लाली, मुस्ति के महाग का सिन्द-बिउ ! लोकमान्य ने गीतानहस्स में संन्यासियों पर एक तीर छोड़ा है-"सम्मासी होने पर मी मनुप्प को मोर लाल तो रहता ही है। बिनोपा ठीक प्रसे है कि या तीर भक्तों के पन्मुल नही मरेगा। बस और तुलसी,सूर और मीरा ने लालच को ही पेम्बास देर-पर फोड़ा मुक्षि भरत गौपानी ++ *
देव
मा, तपकिर उनके पास धनसा तालपर पाता, लालच छोड़ने के लालन
के सिवा । मक्ति की भाजी पिन लौन के सामने, 'मुक्ति की महमानी का
मूल्य ही सिमा।
प्रमादम मा बोस याम राशिका रानी
पारि पारप करत मरी मुक्ति भात बद पानी।'
किन्तु 'घामावादी' के माम से पदनाम के मुंह से निकलनेवाली पाणी
पर स्तिने नारामा वेदान्त की रेतीली भावार में 'सोजमस्मि' सुनकर हम
समझ मी लेते हैं, सिर मी उल्ला देते हैं । किन्तु यही बात यदि कोई मासुभो
से भिगोकर ममि की सरस्पती में घमा अपराषी!
यो भास-पास बहनेगले मद समीरण से काना-भूसी करता है, वो
तितलियों से खेलता,पिड़ियों से मिलकर बहता,गहा भौरयमुना के स्तर से
स्वर मिलाकर अपनी मीठी स्मृतियों को दुहराता, वो गएड होमे पर हया पर
वामे फसता, शानियों की पटक पुटकियों पजाकर समर्थन करता है उसे
रोकनेवाला कौन।
काम बोलना ही उससे पड़ी कठिमाई से होता है पिरपा पोलन
काम प्रपन पास से पाल सके।
सीम भौर रीझ दोनों ही कर उसके पागलपन पर राय सलने का
भधिकार मही गम तक ये किसी दर से, मासुभों के भतरों में लिसीन
भाई हो । उसके एक हीसर होता है-
"मनमारबान तेरी तुरत 4
तरे लिए प्यारे रिनुमानी हो एमो म ।
मक्तों की यही भान, पदय की यही पे-पसी, पापों का पही
++ मुक्ति भरत न पानी
-
.
म
सिलवार, मामवता का सनातनधर्म है। पाहे कोई सूली के तमे से लटमा
कर 'मनलहक' करदे पाहे काई पि का प्याला पीकर
'माई मैन पोबिन सौत्यो मोह
घपार कोई सुगों की पाली में,
'स्पाम पि सुधि विरौटी
पित चनहि कहाँ कहदे-
साहित्य देवता र মুনম यह अंगड़ाई, यह भालसी, यह शिपिलता री। एकरसता मेरा समाप है । शाम्सि मेरा जीवन है।" पर मुम्हे मर्यन होते कितनी देर लगती है। " मै तो समुद्र की लहरों के समान फली है। एक दूसरी से टूटी स, गल-विम्भों में पेंटी। सतह के बन्दीखाने में रहनेवाली मेरी मत्पता से पाप्पन की भाशा फ्यों करते हो।" घिस्य का पड़प्पन, उसकी मर्यकरता, उसकी स्टोरसा, उसका सारा विनायत्य पचो, पाटियों, पत्थरों और पर्वत मालामो तया हिल यन्तुओं के रूस में शतरंग के सेल की तरह उपाड़ा -बिना कर पड़ा हुमा है। देषि तुम मी उपी। नीपी हो, गहरी हो विस्तृत हा, गतिशीला हार फेरल तुम्हारे 3 टीले और तुम्हारी गोद में रहनयाल मर्यकर गीप तुम्हारी ठरही सरलाई की पादर भादे पिक की भोट से परे पड़े हुए है। तुम्हारी ठक में काई भाग मही लगामा पाहता, किन्तु क्या यह काई कड़ी मौग है कि पप तुसारा सरलतम संतकरण कराने के लिए मी और सुमारे भन्तरतम में निवास करनेवाली रमों की राशि लूट ले गानो लिए मी तुम पर पढ़ाई हो, तप यहाँ तुम समस्त म्मएडल का निगलन की सामर्थ रसती हो तो तुम्हारी फातीका पदने भौर तुमारी तरंगों की मगी पर पीनेवाला रात्रु का नहाली पहा तुमसे निगला न जा सके। देषि, यह सो पल- विनों के मार बनने समय है। लहरों के ट्टन, गल-पिन्दु हो पाने घामहीं। +मवा त्य "दीवाने, मेरी ठंडक पर किस गर्व करता है। कनकम-नाद की कवि कहानी लिखते है । मुझसे पारण-संपार की भाया की पाती है। इसीलिए मेरी दो ने 'मीवन नाम पाया है। मैं तो तेरा संगीत - मोहक हैं, मपुर ई, भार्य है। इस ठरक, इस मस्ती, इन सदरों में तो मेरी गोद में सेमनेवाले कर मपमान भी मुला सालने छ दावा रखती हैं । मेरी इस मोहकता से तुम कौन-सा संहार किया चाहते हो।" देवि! मैं तुम्हारी यह पात हरगिज नहीं भूलता कि तुम हिन्द-महा सागर मेसी हो । हाँ, तुम्हारी तरलाई का नाम पीयन भी है और मन मी है।जीवन हो-अपनी गोद में खेलनेवालों के लिए | और पन हो- सम शूटने के लिए मानेमाले लुटेरों के पल की परीक्षा लेने के लिए । घोने से सरोवर के अन्तरतम को ठकराने पर, पामी भस्मापारी के लिए, अपना पिर-संक्तिकरण सवा पर फेंक देता है। उसके प्रकार में मराकर की गोद में निवास करनेवाले काटे-छोटे बल-अन्तुओं को पातक देख नहीं पाता। ऐ महामदों और सरोवरों की स्वामिनी, क्या तुम्हारी गोद ही चोरी और परमारी के लिए तुमी छोड़ दी गई है। माना, तुम्हारी मारों के तार मिलने पर तुम मधुर हो मोहक हो, भाकर्पक हो । मिस दिन तुम्हार पर की तुम द स्वामिमी हो उसी दिन महाभा-यात का विनोद शोमता है ! से तो तुस से सिझेदन हरताकि मातकों के मामी को तुम्हारे तरल अन्ताकरण को पीरने भा पहुंचे हैं। उमके प्रहारोश पाप शहरों की संगीतमयी मुस्सु से नहीं-उनके पार पूर्ण पीतकार से दो। अमवा ++ साहित्य देव - तुम्हारा एक पार उठ पड़ना पड़े-से पेड़ को निगल सम्मा है। पा तो लहरियों के गुनगुनाने और तुम्हारे पुटकियाँ पचाने का समय मही है। इन महासी पपेड़ो पर तुम अपनी अनन्त गहराई के गर्भ में हुए मम अन्तुमो को पागरण का सन्देश पहुँचामो । लहरों को पर्वत-शसरों की समता करने के लिए उपेषित होने दो । देवि इस समय सान्त सतह का गर्न न करो । तम्हारी तली भयंकर है इस भमिमान करो। जिसमें टीप्ले है साइयाँ है भोर मयेकर हिस प्रासी मी है । उस इतिहास को सही भाकर मा म होने दो पिसमें पौगा पार्य प्रान्स का तस्तननि, मंच मैटिस-पू-मुझट-पारी और संहार मातार गार-यो मी तुम पर लूट लसोट करने भागे, निरहोंने मी तुम्हारे अन्तस्तल को मामोरा पे अपने सिंहासन पर जिन्दा लौटकर नहीं गये । ऐसे तिने संहारक पर्वतों को तुमने कल्पना की परत मही पना गला ! बिनकी शिलाएँ पिपित मले हों, पर उन न मोक है, न पोम है और न बल है। तब तू पाहता है कि मेरी गोद में कोई सेलेही नहीं। महामाया, मैं यह मही पाहता । सेले पर, जो तुम्हारे अपने हो। खेले पह, मो तुम्हारे अपने मन कर रहें । सेने पह, तुम्हारी गोद के धन, मिनकी माताओं की गोद में समान भादर और स्नेह के साप सेन सके। तरलाई की देवता, पो सेले , तुमारी लहरों की मी पर सेले तुम्हारी तरंगों की रक्षा पर । सेमे उसी समप तक जब तक तुम्हारा प्रकरण न हराया गाय, तुम्हारे ममार-तर की रस राशि म लूटी गाय । सुटेरे को जानने दो कि तुम्हारा हास्य यदि वरदान दे सकता है ता तुम्हारी प्रारम-रक्षा-पूर्ण उपल-पुथल प्रलय कर सकती है। और तुम समुद्र यद ता जैसी ही तो हो । बमुद्र में तो कितने ही गुमराह हो पाते हैं। किपमा ममी तुम तो सदियों से मात के लिए अपने अन्तर का दिव्य दार सोसे 4 तब क्या मै वह सब निगले गाउँ जो मेरी सतह पर है।" सष्टि मेनपा, मैं यह का पता है। वो तुम्हारी लहरों का मही तोति-मराहते को हमारी सताको नहीं मारते, पो पिरस के गुमराहो को राह पर चलाते है और स्वार्थ के लिए अपने प्रकाशित मस्त को मीचा पर पो हमारी रस-राशि को लूटने के लिए मीचे मही होते पिरम के उन पंधरा-साम्मा कराने की बात मैं सुमसे करता है। हमारी गोद की शोमा है। वे तुमसे निगले मी नहीं पा सकत । मसा यह मापार | पुष्प के रास्त्रों के पंप करने का यह मारा साल है।" विस की बाँसुरियों के पुर में मैं अपने सुर मिलाये रहती है। पमितो ग्रे पता है कि मेरी पारिकों में दाम में उमें लिपटमा, पिटना, भालिगम और पुम्पने प्रदान किया है और भाप मुम रय-निमंत्रण लेकर भाये हो विस समय में अपने बारा कान तक सीप नेगी, जिस समय मेरी परत लारे बोनकर सतह की धीमा को प्रोमा-सीमा मने सगेगी, उस समय पामते हो मा पुगी, पर मिडकी और से प्रहार का से बाहर हो धागे सर मेरे मी बाहर।" उस समय बिस तर करारा तलबार पार पिरा-पसारे पर सह कारमा है, उसो तर मेरी लहरों के प्रहारों से बहन पिपाल उठेगी।
साहित्य देवता उस समय शान्ति का गई करनेवाला अपघर काँप उठेगा और अपने निरीश्वर-पूर्व रदय में रिपर के अनुराग का भारोप कर भम्पर्मना करेगा न हो, म हो यह प्ररिक समय तक।" रात्रि रूले की पूटेदार साड़ी पहने कान्तिकारिणि देवि, महारा स्वागत कर रही है। पर सारी उपल-यमन में पम्म को मी सोमाम्प समझने के लिए प्रस्तुत है मदि पुनः प्रमात की भागद किरण भाकर मारे पम्दीलाने केदारों को सोले। तो सो, कोमलता से बनी मेरी सहस-सास कर-मालायें अपने कुरतम रूप में समर्पित है । फलफरठी की होड़ लेनेवाला कलरम प्रमटन पटनासूत्रक कोलाहल के रूम में है। भव भवा मी गुमराह म कर पायेगी, पीर मी बाचन गल पायेगा। भव अपने पद से प्रवाशित पत्र की पलि के मूल्य पर मी उपा का सागस होने ही पर मै अपने राम रगी।" ॥ .
साहित्य देवता मगुलियों की गिनती की पादी साहित्य का उचित स्थान पर दम है, किसमें पीड़ियाँ भौर पुग अपने विश्वास को धरोहर कर दिपा र रस सके। ऐसेदर ही में कमाघ उदय होता है। हम तो 'कान' करने के मादी होते है, और 'म को सम्पूर्स मानकर उस पर गर्ष करने लगते है। तब यही माप हमारी कला का भी क्यों न होगा। पुष्प की सुन्दरता भार सुगम्प से मतवाला रदय उसके लता या एप की कसाब करता है, और कला से प्रमावित भार भासक पकि उस पाति का काम किया करता है जिसमें कला कार ने जन्म लिमा है। माओ, दीवारों और पत्थरों पर तो सपने उतर मारे १उनकी भातियों और भार्ययों ने यहाँ पग्म नहीं लिया। उनके जन्म सल को पशोदा की गोद तो है, हमारी समसाइट पर पोम समाप्सनेमाती महामवा, निसचे मुखग घे भनमा पीपमो की एकत्र पिन- गारियाँ एकत में उतर परती है, और लाहे से ना बालों से बनी कलम छ हिला देने पर किसी बाति का उसास, विकास, पेपना और पसिवान मनकार पर परस्पर मा दीवारों पर उतर पाती है। उस समय कलाकार 'सोनमस्मि' का उसा है। बेदामा की रेतीली काशी में नहीं। उस अपनी पाणी होता है- 'प्रेम पड़ी मति मोहरी, या में पुन समाप । 'मे तोह म्हपत नाम ॥ पिन यो पेदाम्स के सोनमस्मि के भाउमर को सर पाते है, मिस के इस सरूप दर्शन में सौ-सा दोष निभाते है। भैगुपियों की गिनती की पौड़ी n २.
साहित्य- य देवता पुसतकों में और उनके नियमों में जिस तरह प्रमु नहीं रहते छिन्तु युग की सीमारेला पननेवाले पकियों को देखकर उनके परयों के पिहों को हूँ। रकर पम्यो क नियमो नियमन होता माया है, उसी तरह पत्थर, मिही और घार पर किये गये कौराल, कमाघरों का निर्माण नहीं किया परते, अपने अन्तर के 'मनमोहन' की विसरन ही, उन पदामों पर साकार पाल पाते है। पिदियों की पहक, पुणो की महक, मालियों की मुसहराइट सतपुर के शिखरों की गोद हरियाली हो, और उस पर पेतपा नदी कमी करुण, कभी किकिमि भोर कभी नपर मन माना और नर्मदा या साप्ती का कमी कपटहार, कमी करपनी भौर कमी पिपा-पदी पन माना और गंगा, बमुना, इरावती और सि घु का दिम-किरीट से निमगा सिय होना ही ये स्मल है, को कलाकार की संमित कोमलता का गुदगुदाकर, सपनुप के रंग उस पर पढ़ाते है। भौर अन्तर का पानी माँसों से उतरफर, सपनो को सजीव करने का द्रम्प प्रसत कर देता है। कलाकार हगारों वर्ष पुरानी प्रतिहासिक दूरी को अपने अन्तर की प्रस्पेशा से इसलिए नहीं छते कि वे म्माम भार पाल्मीकि घा, होमर मौर भरस्म् युग पुन निर्माण कर दर्मपाले विपाता यनना पाहते है। " उतरे एए समान को, जीवन में उतारने के कारण, हम उतरे हुए भामों की तरह, उतरा हुमा वीरन बना लेते हैं, मार पप हमारी कला उसरी पदिनों का निर्माए कर दती है, पिसमें परिस्मिति की परत मालामो पर पान चपन मही हाता, तब हम सतह से पहुन नापसी कला में सर्प पठकर मी सपने में सात भाग पर मनुमा करते है और अपने द्वारा निर्मित हानवाती पीढ़ी घ नगएप पर प्रसने लगते है। २१ ++ अंगुलियों की गिनती की पोड़ी सालित्य देवता फिन्त नीम पीढ़ी तो युग के लार के ही भाकलन घ भपा है। कलाकार तो मतकाल करे, सुनहले मतघन को मी, अपनी अन्तर की भाँतों की चोरों से इसलिए पता है कि शक्ति मर भूतल की गहराई माप कर अपनी भाकांक्षा का एक माप पमा से और उसको उठाकर मयमा महिप्प की भोर रस और उसप्ते कप भागे अपनी फला-बिन्दुभों की सीमा तीच दे तो मिस में, युग से होड़ लेती हुई उसे अपनी एक अमर पीड़ी दिसाई । यदि इरादों पर पाने में रेल के टिकट काम भा गामा करते, तो कला के सर्ग को हम पत्परों और कारों से छ सकते थे। स्वप्नों को पाने पपप वा अन्तरवर + सप्न देश ही में से है। हपाई गहार पर पाकर जिस तरह हम हिमालय, विप्पा और सत पुरकी उचाई निचाई से परे हो पाते है और उन्मता की एकरसता में, एकरसता की उपसा की दुनिया में पॉपकर, उसे पार करते होते हैं, उसी तर जब हम अपने स्वप्नों के बागरण में होते है तब हम अपनी पीरिमों के ऐसे ही वायुयान बन पाया करते है। कला की पीली मेंगुलियों की गिमती पर होती है। गला से पहा की पूरी ही की तरह एक मारीच की दूसरे गरम से पूरी होती है, जिन्त उमके इरादों के 'अपनी पर पाने का सेतुप पाने पर, बमामा + पमाना, इस पार से उस पार, और उस पार से इस पार होता रहता है। उस कसा कर वाहन, कलाकार र विज्ञापन सिकने रामेवाता शरीर नहीं है, न उसय वान पिसास है, म उनासा न प्रिसकीन मुसुक । मैंगुलियों की गिनती की पीड़ी ++ २R साहित्य देव देवता ससार पाहम वो पर प्रेरणा है, जिस पर पह अपने सम्ए इरादा भार समों को लेकर उ पाती है, भौर तिस पर मी वह समय की दान से भागे पड़ गाया करती है। समय के साप राने पर ता सूरब और पोद, अपने प्रवरा से उसे हराकर, पो बम बान के अधिकारी हो जाते हैं। इसलिए कलाकार राहगीर का समय पाटने की बरतु-मात्र नहीं होगा, या समान पप प्रक, राहगीर होता । कमाघर से पाम कि उसका भाराम्य उसघ्र अपना है। विस निर्माता में उसे अपनाया है। निर्माता की तान में अपनी तान मिल पान की परिपान तो यही है न, किमक-मापन की तरह मक मी निर्माता । तमी तो मामा दम्म की फुटिलता और पम्पों की गटिलता , परे, 'साप्रमस्मि के कुछ मानी रह जायेंगे। निर्माण विसापरपम हो, निर्माण विसच मम्पयन, निर्माण सिघ्र चिन्तन हो, निर्माण मिसकी कमाई भार निर्माण ही मिसाथ भादासीन्य भार मानदहो,पिपाद मौर विमाद हो, तप निर्माण हो उसी पिरसमाधि पो मा उमे निमाए की समापि न छेगाता पंपत का पास होटर मो, समाधि के द्वारा, पीड़ियों में, परसा के रूप में सीरित रहनामा निर्माण ही बागापेगा। निर्माता की जिम्मेवारी पूरी करनाला, निमाता कीमा प्रपनी पार होगा। रोग उस्मान के भमात्र भौर पतन की परामप्य स मरा यानेपासा हमारा फेट, वीरम के पष्टीररी भूय भनुमन ही मही परसामु इस मूम्पको अमुमबहरते हैं, उमस एसम्स, मस्तितको पता है और उनी निकम्मी परियाँ कला के मसिर का सामा पास है। भंगुठियों को गिर्मती की पीड़ा .
साहित्य देवता फुरसत की पतियाँ रुप लोगों की सनक की परियाँ है, कुछ लोगों की लाचारी की पड़ियाँ कर लोगों की काहिली की पदिया है और कुछ लोगों की नारा की मी परिया है । फुरसत की परियाँ, और वैसी ही फुरसत की परियाँ कमा के अस्तित्व की पदिया है, कला के विकास की पहियों है, कवा के लिलवार की परियाँ है। वहाँ रुपा पुस्पार्यपती शेती है, और परमार्थ कला के पित्रों का रंग पन पाता है। दोरम्प के देवताभो, कहीं इन 'निकम्मो छ मी बीने दो। रेलगाड़ी के पबिशे, संकल्पों के भाने माने के लिए मी मोड़ी जमीन घोड़ो। कि फुरसत' की विन्दगी में, कलाकार, विरस को देखने, देखते रहने, मौर देखते-देखते प्रम देखते रहने के लिए मॉल और भातम्मरों से पाप कर रममा राया है। उस धमय अपने और अपनेपन को देखने का अपने नामाने और मुहलाने का प्रसर ही मही पाता । फरसत की महिमा, कमाघर के अस्तितकी भारावना है, भाराष्प की पूजा है, भारमष की भम्पर्ममा है । वे उसके भास्प-संकीर्तन की मही, पिस-संकीर्तम के लिए मात्म-दर्शन की पड़ियाँ है। उस समय उनी सुनी ऑन मुर गगत् की गुत्तियाँ सुलमाया करती है और मुंदी भाले, ससे बगल में पिएस के परम सत्य का रंग मरती रहती है। उस समय में माल पिस तोक को देखती है, उस लोक में उस कलाकार और उसकी कला हो मी देखती है। उसकी सेवा मोर उसकी तवारी ने मी देखती है। उसकी कमजोरियों और उसके पतन को मी देखती है। अपने उखान से, उत्थाम के रोप रोर पर की दूरी देसार, अपनी नपता और अपने पीर को समेटता रहता है। भौर भपने पतन के अंगुलियों की गिनती की पीड़ी + साहित्य देवता देखकर उत्सान की करारी बांग मारने के लिए, पनों की माला से, बल की प्रार्थना किया करता है। एघन्त नीमन का भवचरा कलाकार मन्दिर है, यहाँ पर अपने का'मधर्मएप-कर्मस्पता' के नास्तिक बन्दी-य से पाहर निकालप्ता है, और भारतामों की मूरत बनाता है,पिमान पर रंग पढ़ाता है और इस तरह भपने मूक वैमन को कलम पर उतारकर पिस में मेषता है, कि मिसे देतार दुनिया की रात-रात में पावाल हो उठे। मला, ऐसे समय या से माना जापे कि कला का अनुपाद मी होता है, उसकी नकन मी उतारी पा सकती है। इवानों के भादर्सका अनुबाद। भादर्य की इच्छामों की नकल ! नाभर बीवन देव में प्रत और प्रदेश में बैठ की अनुभूति होगा। गप कलाधर अपने अनम्त-चिन्तन में उतरा होता है, तप पर कला पिता के बोलिम मरे उल्लास से मामूपित भार कमा-माता के प्राण-मय पोम से पोमीसा होता है। किन्तु या उसका पिन्तन उसकी अलम पर उत्तर भाता है, तप वह अपना ही कला-पुत्र होकर विस के अन्तरतर की सुप्रेमल गोदों में सेलता रहता है। पाह की तीमता और पितन का माधुर्य, पे दोनों ही तो बजानिक संपर्पण की पस्त है, मिनसे पटत पड़नेवाले प्रकार को अपने मिस-मित्र रंगों के रफ से गीला कर, मस्तिल की अंगुलियों के द्वारा, विपिता के परक पर, कलाधर, विसनियता की, अपने मनमोहन की कोई समीर सीना करता है । मिसन भाराप्य र पीर में हो भौर पहुँप की तीनता २५ +भैगुलियों की गिनती की पीड़ी साहित्य देवता के माप से मा भपना हो, तो कलाकार की माँसों और अनार के प्रमेय के लिए, प्रकृति का सारा मप और खतरों का समस्त मगर, कलाकार के प्रपेरा के लिए अपने भन्तर का दार क्यो म सोल। कवायर की अंगुलियों की समस्त लिसबाहोंक में एक मनुहार एक अपोश एक मेदना एक माफी भीर एक मेसी होती है। यहाँ, उस मष्टीकरण के समप उसी अंगुलियाँ उसे पाने माराप से श्री अनिल मीठी मालूम होने सगती है। किस गोद के लिए कला दौड़ी भाती है। उम मॉसों के लिए यो कल्प माता की ममता और ममता की कत्मकता घमनुमति के माप से भन्दामा लगा सके। उस जानकारी की गोद पर, यो कला की भारुति और प्रेरणा को, मुदी माँखों से देसार शिल्पी के तुले सदनमालान कर सके और सुखी भागों से देसकर, स्मृति को विस्मृति के हवाले कर, कलाकार की पस्त में समा सके। कवानर साहै। पा अपने युग में स्फूर्ति के मनरा के रंग में भी मगमान की प्रागवान् प्रेरक और प्रपक ईबी है। उसके ससरों में रंग होते है, उसके रंगों में स्वर होते हैं। उसके पित्रण कीमात्मा सीप होती है। मपों पर दिलाये जानेवाले नाटक की तरह उसे समझने के लिए, सास पहेलिसो की फस्टन ही की प्रस्त नही होती। मिर्ग सप्न समझने की बुषि है। उनके पास कला व मल्प है। वो मुसकुराहट और पनी को समझ सकते है, कलाकार ने समम सकते है। योगीवन और मुस्सु को समम्म करते है, उस समय कलाकार की भाषा का करते है। चिन देसर प्लासर अपने आँसुओं और उत्सासों को वित्रित किया करता है,पाहे परसा के सत्सते, पर कसाघर के लिए वे सत्य की कल्पाता है। उन पड़ियों का संचय ही, माघर र सम्म्प पीपन है।
वता छलकम गगरी तुम सुवर्ष पर ललपे म थे। पापार दर की ऊँचाई ही इसका कारण न मा मुम्हें तो ठंडे पानी की चाह भी । मिट्टी की गगरीसीतिर ता लाये । सापान रहो, नहीं तो इसमें दरार पा गायगी । इसकी दरारें गुहा नहीं करती। . पर यह क्या भान है। इसकी एमक से तम्हारा भम्बर मार गया है। पाय परपराइट देकर अपने भनिमत से विस्मृत किये दे रही है। और एमान की भावाव से, पीने-पीने वासनेपाल, भाराम्प की पान, तुम्हारे कानों तक महो पहुँच पाती। पा गगरीश मरमदार दिया जाय। पर, सर-में-स्वर मिलने की विस्मृति में, जब तमारा मस्तक मुक पागा, तप पमरीसा रहन प्रियतम के परमों पर किसान पाने का मय मही है। तर रिहाप, गगरी पड़ी दुरासेपासे तरीद लापा | दो दमही की पीर । उमली, पलूटी, दर-दर पर लाकमेपाली, ते होभन भौर इस्राते ही टूट। क्या सपमुस। और पापीम, वो गगरी प्रेम रही है, स्नि मारों के मोम तरीदी थी। इसके दते ही मदत का प्रए, सनारे सतीस पाहम्पर +एका गगरी
साहित्य देवता
से कम उमालवर है। और सा सॉक्लाफ्न ही इसका समसे पड़ा अपराम
है। मा इसी अपराप की अपरापिन पुतलियों में सूचियाँ द दोगे।
सावरतनी भोपी है। सा इसमें प्रमानेवासी पल की अंजुलियों की
अपेचा, तुम्हारे दस की मटकी में मासूमों की अधिक डलियाँ ममाती
है, या मारी बातों के परदे के मीने, इसकी अपेक्षा भपिक
है,-मियसमाली।
और पुम पिड मिसलिए पड़े।
बलाने से।
किसपर।
गगरी पर।
क्या पक्षाने के अपरामक उपरदापिल उस पर है।
.
मा निमकर मे इसे मर चलाने, गारा था।
सातुमारे गुन कमजोरम में। उनमें पल बा कि बल का मोम
समाल कर, करें तरल अन्तरसतीच लाते।
क्या सोचते समय महाफ मही गरे।
तब गगरी अपने पाप से मरी माती।
भौर पर तुम्हारे गुन, मरी गगरी लींच म सके, तब गगरी अपरत
न रहती तोसा करती।
बसकन गरी
२८
श-देव ता सातमारी पर चार है कि पह भवबल मझे ही रहे, पर सकेनहीं। * और ले दमड़ी की इस गरीबिन का क्या कोई स्थान नहीं 1 पीप्म में पर तुम्हारे मस्तक पर पम्दन पर्षित होता है, सब तुम्हारे तरा के पदों पर गुलाब की सीप होती है, पर हमारे पन्दन में कपूर मार लेता है, पण वहारी सारी दो पर्फ परे हर हाल में किसोल करती होती है और विगली का पता घूम-घूम सारी पसली कामु पटोर कर, तुम्हारे सिर दे मारता है और परमरमट पैदा कर देता है उस समय वारे भन्नाकरण में भाग कौन लगा देता है। क्यों हम, गिरप्रसार गीत गोद से भी 'पानी पानी की पुकार ममा पैठते हो। माह | क्या सम उस रे दमड़ी की उपेक्षा कर, महर की मनुहार करोगे । क्या उस भाग को, मारी प्पास को–गुलाम का सुगन्धित रस पा सकेगा । कर्पू की बरसात अमर सकेगी। भरे, और, धम्हारे मीगने, परभराने, और प्रियतम की बातो की मिास में, पलकन की पनि के विम सलमे ही तक तो पात नहीं है। मापी रात में पप समर्पण के जागरण में, पानी-पर-पानी की माँग होगी, सप मरयल गगरी घता तुम दोनों दिसाला कार पेठापा माराम ने पनी के लिए तापाने समपराध इस प्रगल गगरीही होगा। क्या नहीं मामले सि गगरी यसर-पलक पर हमें भिगो रही, हेमरमरा रही २८ ++ क्सकन गरी साहित्य देवता और हारे प्ररूप-संपाद में पिस पालन पील रही है कि मगपूत गुन से, गहरे भर में फिर से पोकर, मुम 'भषबल' को पूरी मर ले सुकरन-सी कर नहीं, उदय-सी माउको समास कर, पपरीले कस के तरल अन्तःकरण से मर से। क सिंहासन पीर मुकुट, वीर और तोप विमम और पररान किरीट और कोपीन, शस्त्र और पास, ससे पागे दमड़ी की पख लागी गई। परिध से भर खाने न दे। इसकी क्षा के रिबाले में पीरिया परबाद होगी भाई।
साहित्य देवता शस्त्रक्रिया मृगपादक- धम फितन मपुर पालते हा मृदंग ! फिनने मस्तक तुम्हारी मस्तानी पुमफ पर नहीं पूम उठते । पर मेरा दुर्भाग्य देलो | भपीपरी की भामा है कि मैं तुम्हार बदन चारों भोर से पारों भार रामों की तरह पार है। सप लाग तुम्हारे सर पर मस्त हान के लिए भपने भापक तपार बनाते हैं तय म तुम्हारे पापनाच कस-कसार सीपने लगता है। और यह जानकर मी कि मेरी अंगुली मारते ही तुम पीस उठते हमें तुम पर प्रहार पर प्रहार करता पला माता हैं। क्या कहा-में निदय है। मेरे प्रहारों से तुम्हारी मगर म मेरा मूल्य मल पट राय, किन्तु 'भीर-पनि म विरम में तुम्हारा मूल्य पटा दसकर जीवित नहीं रह सकता । मैं यह मानता है कि तुम पर कम गुन, तानार सीप दूंगा, ता तुम्हें सर-समाधि दन कर पाप मुम् लगगा । पिर ता, राजरामी सासर-सहरों पर पदकर, समाधिस्स हान श सारा व्यापार ही एगा जायगा । हमारी पिर ममापि का पपन्य गार्मर, सब में शतपारी नहीं रातात्मिारा हो जाता है। किम् यदि मार गुनों का, तुम्हार पिस पपनों करीना करता है, तो तुम्हें मसिस रसार मस्तिस म रखन पाला पमा दता हूँ। डीसीबारों में सेहत ! या तो तुम्हारे गाम के सिनाक, हमारी किया शालता के खिलाफ तुम्हारी माहवा के सिलाफ, साबर समाप हुए मॉम ++ शरदिया द घरात लेकर किलामा विद्रोह है। कसै-तने तुमारे मस्ताने बीवन पर राम पलाउँसो में अपनी भार्यसहीनता प्रष्ट करूंगा। तप लाभो, मै एक धरा उठाउँ । लौह पना हो, चाहे बालों का, पाहे पास Nउटाउ, और सारे सीखे और सरे पन्पन काटकर फेंक है। बस फिर, बिन बन्पनों से सर बुझेगा, गिन सरों पर बन्मन पगे, उनकी ताल कितने ही दयों पर थिरक उठेगी। और पप 'महीर की कोहरियों' प्रमात-मेला में, म्हारी तान पर कुरमान, श्यामसुन्दर से रार ठानने भागी, तब रमामसुन्दर, भपीसरी के माँगन में बैठकर पिरमरिमो. हिनी बाँसुरी बनाकर महारे-बानमारे सर में सर मिला देंगे। तुम प्रोपरी ने अपने सर से स्वर मिलाने घ सौमाम्म प्रदाम किया है, किन्तु मेरे हाय में दरारिपान सौपा है, भौर उनके सर का हल रसकर, तुम पर प्रहार किन पामे की माझा दी है। पोलो, तुम पर हिमायत कर, तुम्हारे गौरम के खिलाफ सादर करूं, या तुमारे गौरव की तरुणाई में रात रात मस्तकों के साथ, मै मी तुम्हारे सर पर मुझगाउँ । प्पारे, मै अपरापी । मैं महारो। अस्पावरी। रामपारी हूँ। मैं तुम्हारे समयोर बन्पनों को काट देता है। उनमें सल, तने र, पमा देता है। में पिरकर भागे है। जैसे परखते है-रिममिम, रिममिम । क्या ये पों की वेदना पर बरसने भाये। 'हरीहरी' पुत्रर र,पक ने पाहि' मचा रती थी ये सामसुन्दर शस्त्रक्रिया ३२ साहित्य-देवता भाये भौर रुपकों की रास्परमामला हरी-हरी कर दी। ये काले दें उजली, और मूमि हरी । पिलर के रिस नियम से यह पहेली सुसमाये सुलमे। पर देखो इस तरफ उस तरफ भागे पीछे दा बामें केवल हरी- हरी पुन पंप गई है। भौर पर लो मैं उठा । मैं तो इस मोड़ हरियालेपन का संहार करूँगा। क्या तुम यह कहोगे कि मुझे अमृत-पिनुभों से प्यार नहीं। हरीतिमा से दुलार महीं। पाराम तुम यो फल देते हो उस अन्त मही रहने देते। तुम्हारे सहस सहस करों से पाटीई रात दो हामपाले केजर की जय हो। सम देते कहाँ हो, तुम तो परस पड़ते हो। इसीलिए प्राति महारी देम थे लेकर देसो किस तर मदियों नालों सरोपरों भोर सागरों में बॉट रही है। पर पस्रत का अमृत भूमि पर राने देर तुम्हारी अपार रुप मदार तुम्हें पर-समुद्र में पापस कर देती है । प्रातिको पानी पापस करते देस, मुझे भी अपना कम्म सूम उठता है। मैं मी हल उठाता और सारी हरियाली तोहरालता है। नहेपपे नीम उठते है कि मैंने उनसहरा गलीला तोर सलाहरी दुनिया बिगाह गली। किन्तु मेरी कटिया की रानी, मेरी मोपड़ी की परमेपरी पानती है कि माँ बसुन्धरा के पेट में ही सती सीता का निवास है। यह मुमसे कहती है कि, पेट पर पही पॉप-पोषकर,रममे पिरमर के दिये हर वो भन्नाण, मासाने के मोती, पर रखे है, उमें सिमरा पेट पीरकर, सुरक्षित रस दो। ++ शस्त्रनिया साहित्य देवता मामशफिकर्ष गुना करके हमें लौटा देगी । विश्वरचा के लिए, सिमरी के पेट का दम, पतों के काद-मूल फल ही से यहता है। में पातकाल उठाया, और पृथ्वी का पेट पीर बासा | और याला 'सादे, शारयादे' कपास के पौदे उग पाये । पर मैं फिर मी मही ठहरा। मैने सुरपी उठाई और कपास के सामी-संगियों का सेहार कर डाला । राबद्रोह की सजा पाये हर 'ए' क्लास के कैदी की तरह ने तूल-सलर अकेले र गये। हरिपास मरी भाँतो म प्रेता-निप्तर, सारी हरियाली विगार दी ! कपास के पौदे भी पीत उठे) उमकी गई मी तो एकान सा गई थी। र्पा, शीत, पाम पर्दास्त करने के लिए उतारू, सम्सौ-सा उपना कलेचा लिये रामेवाले गुणों के पिता सया अपने गुखों से, शासमों से, मीसा पारिपियों की लमा पपानेवाले, कपास को तो मैने दुःसन दिया होता। परम्तु, मेरे प्रहार उनकी परण-सेवा भी। मैमे अपने प्रयत्नों को माटी में मिशामा भौर कपास के भासपास सुरपी घ राख पलाया।भा, रागों की पही प्रहार-री, कहो की माररेरी पम गई। नाप मुमे तो तुमने रामधारी होने का शाप दिया है न बाने मो। 8 माहाकार- केसी पदिया फुलमारी है। गुलाब है, पमेनी है मपुमालती है -गरीब हरसिङ्गार मी है। पूर से यब बाग दीसता है, मुगपों की पाया उदर र देता है। निकट पाने पर, गम्भ सारामे लगती है। हितग मन्दम ऋष भनोता है। यहाँ, अपने प्रेमफिबो गरे है- शस्त्रक्रिया + सालित्य समाने की जमीन पर । पीपर पाठक के रान उपार वो मपार्य में 'पार अमरन को भोक भोर 'पही रहत पुरन्दर । पाल्मीकि से लगाकर तुलसीदास तक भार राम से लगाकर इत्रपति शिपामी भौर राणा प्रताप तक सब यही रहते है । म्यास मही है, पाल्मीकि यहीं है, कपिल यहाँ है, बाद यही है राम महीर परशुराम यही है, पर यही है, महामीर मही है रघु यही है, दिलीप यही प्यमी है, विदुर यही है नारद यही ? सरस्वती यही है, सीता यही है, द्रोपदी यही है, प्रताप यही है, शिवागी पही है, पत्रसाल यही,मकपर यही है, कपीर यही है, मीरा यही है सूर नहीं है, मैतन्य यही है, रामतीर्थ यहीं है, सराम नहीं है, रामदास यही। इस पर्माम का एक नामी उसाड़ा कि मना मनस्थी उठकर बातें करने लगेंगे। इनकी पतियों पर हम नन्दम पनाते पल रहे है। मरे मम्दन के सदर उतारन सो पिस के पात-से लोग भाते हैं। पे पत्थरों की पहा से कानाम्सी करते है और सरे हुए मारपत्रों की पूजा करते हैं, किन्तु भाव के मरे मन्दम की भार से मांग उमझर मी मही दसते। रूस, ईम्लर, ध, निमाक और भप बापान प्रादि मे, अपने साहित्यिक मापारे की मेंट घ मेला लगा रक्ता है। किन्तु ण्घष घशी प्रसाद भीर निहालसिंह वारदे,तो मेरे नन्दन की भार घर दसता मेरे नन्दन के फूल, सिकीट में कामहील पावे । इन पर मोरे घम लते हैं और वे मारे-से फूल मी लते है, मिनु रिस की पावरयता और पारसभाधार मेरा भार घनन्दन नहीं पन पाता । तिस पर भी ३४ ++ शस्त्रक्रिया साहित्य देव पा तुम कहते हो कि मैं रा हाम न। भपने पानी-पापड़े म समा। ना, मै नही मानूंगा । देव ! तुमारे फरणों पर पड़ाये पाने के लिए, पर मेरे बारा के फूल सीइस ही नहीं किये जाते, तब बाग के इन मोम को में बाग में राने हैं। मा में हरियाली कात्यारा प्रसार मी पता ही सप हरिमाली अपने बारा से लोद पहाउँगा । मागा नहीं। मैं भपने हौसलों और गरिमपुषों को मिी में मिला दूंगा बिन्त र पौधे का सम्पूर्ण स्म से भानी पर भाने के लिए पाम करूँगा । यो मिट्टी में मिले दाने' परिपूर्ण तापम की उमार में न भावार्य उनकी शानियों काट-काटकर इसी मन्दन की साद पमा दूंगा । मै तो इस पता की रसा में रस लाने के लिए अपनी परियों की साद देगा,इस बात के दाहिम में दर्द का-सा साद उसप करने के लिए युग की भरणमा तक की साद दूंगा। वम इस समय मुझे रोकसे हो। मम गालियाँ दें कि उनके सिलौन मैने मिटा दिवे, परन्तु में उम गालियों के मय से कुरा रस है। गिसकी माँसों में मावी महारा-गुलाव पृत रहा है वह को लगे गुलाब की पानी कतीपाती गलियों पर ममता से करे। मन्द-मन्दम ! पब तक मेरे अमरूदों का अमृत अपमी पर न भाये पर तक मेरे गुलाबों का गरम पसरियों को पानी घंटों पर मल-मूत कर महार न करमे लगे तब तक मेरा पुरा मुमसे कई वर हटा ले- भवी में किसकी माने। सामपन ! वम्हारे परसने के पहिले मै हरिपालीभमरता और मस्ती शरक्रिया साहित्य-देवता के खिलाफ, परम्परा से पिपककर, पतन के विद्रोह के सिलाफ विद्रोह पर मुकी हुई, सब गलियों को एक-एक कर काट गर्नेगा। उनके भास पास घंटे ही पाउँगा, उनकी पहों पर कीचाही गर्नेगा, जो सूज में मुलसने के लिए सुला छोड़ दूंगा । मैं नन्दन का हत्यारा नहीं, माली हैं। मेरा मम्दन मुझे नम्दनन्दन से मी अधिक प्पारा। में पचियों के साम लहराता है, कलियों के साम पटतता, फूलों के साप सिलता ईसा के साथ मेरा मस्तक मुक पड़ता है, उपपता के साप मेरी साप कमला गाती है और भोस-कमों के साप मेरो मालों में भी भासू भाकर मेरे पाग के पौदों के उमार के प्रानन्द मार बनते हैं। हमारा, मम्दन-नाराक, मुमे उस दिन बना, मिस दिन में, अपनी सी कई, पार तोर गर्ने, मदाली निगार हैं, और फरमका हय है। उस दिन निस्सोमपने नन्दन को, पीहर अंगल मनाने व अपरापी गरम हूँगा। प्पारे समर, मैं सदार नहीं मुझे तो मरे प्रमु ने, मावापर राने का शाप दिया है। मुझे जिन्दगी मर बही बने राना है। उपचारक- जैसा मुन्दर शरीर है, सो उपमागी पर है। रसों की शत्र-पिया करनेवालों मे, इस बारे पर, नायक भौर नापिनमेद के मिलने रितान नहीं ताने । पादन, पिकअपम, रंग-नयन, शुक-मासा, गार यह कि भोली देर पर कितना तमाशा नहीं सड़ा पिया हमार भार्पण मेल, घरियों के राम्दों के रोम में, सटीक बैठता है,तम हम सारे शरीर पर, न गामे किस-फिम महानवाघ भारोप करने लगते है। ७ ++पारप्रक्रिया देवता किन्तु पर शरीर की भाँतों में कोई रोग हो पाता है पर बदन में कही पोहा हो पाता है, तब ! यदि मैं तुमसे पार कर तो तुम्हारे फोरे से माहीं कर सकता । क्या तुम्हारे पातक से ममता करके, तुम्हारे अस्तित्व से हाय पो। ऐसे समय, बुरा हाल में रसर, मैं हमारी मनी पर मस्तक जुलाया वम्हारे अस्तित्व को मस्तक मुनकर तुमारी कमजोर परियों की पार और कारभान मूल पाऊँ। यही समप होता है, पर मुझे रोग और उसके उपचार पर अपना निरिक्षत मत पनाना होता है। भौर मेरे हरे लिये हुए मस्तित्व का नाम है, प्राण-रक्षा के लिए अपने को खतरे में गलमे में न हिचकिचानेवाली निर्मपराफि, और कम्म प्रतिमा । मप विश्व का विज्ञान, भानन्द और अस्पष्टता होता है, मेरा विमान होता है, उचित निर्णय मोर उसय साहसपूर्वक वर्णन । मही साहसपूर्वक उसे किया में उतारना । तमी में हवारों के प्राणों के साम लिसपार करने का एक रसता हूँ। यदि ऐसा न करूं तो में वर्षिक हो गाउँ । मैंने साईखाना नही ताला, मैमे प्राण प्रदाता गौरप-मनिर खोला है। देवता और दानम, सब अपना भस्तित्व लिये मेरे पास अपने पास म्स में रहते है। यह सच है कि सदा ही मेरे हागरक से रंगे होते है, मेरे पड़ों पर पुर्गन्धित द्रा पड़ा होता है, कमी-कमी मुझे भी रोग के कीटाख लग पाते है। हो यह मी सपो कि यह मेरा पुरा कोई इसारा उव्यता तो पाईसा के सूती पड़ा देता है, मन्सूर को फांसी दे देता है और मीरा को शस्मक्रिया ++ साहित्य देवता पिंप का प्पाला पिलाता है। किन्तु जब मेरा छुरा मेरे हाम में होता है तब सो प्राण-समार ही होता है । मोंकि मैं हमारा नहीं है, मुझे तो युग प्रमु मे केरल शन-किया सौंपी है। हाँ, पप में अपने कम्य में पदला, शृणा, संकीर्णता, तुम्हता ले भाता है, तब मानो मे अपने इस पतन से घोषित करता हूँ कि महत्पारा है। मेरी पिक की भोलें फूट गई है, मेरे पाण, प्राण-रक्षण के पवाय रक पान के लिए उतावले हो गये है। उस समय में, प्लेग के कीड़े से अधिक मकर, और विपनी कार से अधिक पातक हूँ। में ऐसा नहीं हो सगा। मुझे प्रमु ने प्राण रक्षा सोपी है। इसीलिए मै राम-किया किया करता है। समान के पेट में साहित्य के जीवन में और राजनीति के मस्तिफ में, सर पगह, मेरा छुरा, परामर पता होता है, मेरे भास परापर पहले
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रेशसित्य-देवता --- "मा करोगे पर कर ! 'सौदामिनी' का लेखक पनने की मेरे मन में इफा चामत् हुई। मैंने अपने नगर का सुन्दर वर्णन लिखकर मेगा । संपा- दक उसे पपा गया। में समम्म, शायद संपादों को यह नहीं रुषता । मगर की उदासीनता पोरकर मैंने जंगलों में कितने ही अमरूदों के तोते उड़ाये। गगन के सर में गिरपरों व भैरवी गान लिसा । रमणीय माहियों को मानपुर स्रोफमन मुहाल की गलियों से उपमा दी। रमशान को विस के विनोद भौर संतप्तपदय की सेहत का सापन पसाया । और, एकान्त को रात्रि के सपाटे-सा लिलकर भेजा। पर सबसस!'राष्ट्रीय-वीणा' के संपादक नी ने हरता पूरा होने के पहले ही मेरा लेल मेरे पास पापस भय दिया- मोप-यो । केवल लिफापर उनका अपना था।" पासी माया भीर सापनामें महीपती । वे समाफ्नाभा क पाको पर नहीं बैठ पाती । स्पा यी- "-सोपात महीं। संपादक कोमल लेसकों की भायाभो भोर साधनामों घसिरी होता है। बामसे ही, मेरी उस समय क्या हालत थी।" थापकी हालत । पुस्पार्य के संक्ति कर मातृ-मापा और उसके द्वारा मातृ-भूमि की अपिक सेषा होने के लिए जिस तरह पृष्ठ भपमी सुगंध के लिए कुछ रस बमीन से और पुष भासपास पानेवाली हसा में से सीपता है, उसी तरा-मापने कुछ अपनी दुरि से भौर क सप्पयन से अपने चे परिपत कर साहित्य-सेवा करना तय किया होगा। "ना, पर बात नहीं। संपादकों की उदासीनता से मेरा मन साहित्य-समा के परम हेतु से सिपकर कुछ समय के लिए हेतु-सम्म हो गया । उस समय ++मस्याकांसा की राम
द
महत्वाकाजा की राख
क्या पापने कमी लिसा ही नहीं।
"भालोचना के सिपा।"
फष मी नही कमी मी नहीं।
"कमी-कमी, कृषकका पात दिनों पहले।"
सब भाप लेसन की बन्म-तिवि कौन-सी है और समालोपन की
कौन-सी।
"लिखने की सुसी-पका को दफनाने के दिन कोही समालोचन के
मंगल प्रमात पनने का गौरव प्राप्त है।"
तब तो लेखक के पमरागही को समालोचनाममा मानना लेगा!
" ना, ऐसी बात नहीं है। कुछ लोग निरा पत्थर पूजते है। मैं अपनी
टॉक से एक मूर्वि पनाता हूँ और फिर उसको पूजता है।"
।
मापने लेखन को दफनामे की भावरमकता यो सममी।
"पोरों की दुनिया में भषिक दिन रामा टीक न सममा ।
भौर यदि एना सता।
तो चोर बनकर 17
क्सा पाप पा अपनी निरिसत राय दे रहै।
"विलास निरिक्त ।
।"
इस अनुभव को पुस्तित्र के कुछ पन्ने मा पा सकता।
महत्वाकांसाबीराब ++
१.
"या सरोगे पर!'सौदामिनी' लेखक बनने की मेरे मन में या पापत् ।। मैने अपने नगर स सुन्दर मम लिलर मेगा । संपा- एक उसे पचा गया। मैं समम्म, शायद संपादकों को यह नहीं रुपता नगर की उदासीनता पोरर मैने जंगलों में कितने ही भमस्मों के तोते उड़ाये। गगन के स्वर में गिरसरों का मैरपी-गाम लिता । रमणीय मादियों को कानपुर के सोध्मन मुहान की गलियों से उपमा दी। रमशान को विश्व के विनोद भौर संतापादय की सेहत का मापन पताया । भौर, एकान्त के राभि के सपाटे-सा लिसार मेया । पर समास । राष्ट्रीय-पीहा' के संपादक मी मेहता पूरा होने के पहले ही मेरा लेस मेरे पास वापस मर दिमा-- पोका-स्यो । पल लिया उन अपना मा। " पाती भाग भीर सामना नही होती है। वे संभाषनामों के मादा पर मी बैठ पाठीवपरी- *--सात मही संपादक कोमल लेतकी भाराभों और सामनाभों शिकारी हाता है। बामतेहा, मेरी उस समय क्या हालत मी!" भापकी हालत ! पुस्पा संक्ति कर मातृ-भाषा और उसके द्वारा मातृ-भूमि अषिक शसने के लिए-गिस तरह पप भपनी सुर्गप के लिए कप रस जान से मार व भासपात मानेवाली हवा में से सीचता है, उसी तर-आपने अब अपनी दृषि स भोर छ भम्पयन से अपने को परिफत र साहित्यमा मरना तय किया होगा। "ना, महपात महासंपादों की उदासीमता से मेरा मन साहित्य सेवा परम हेतु से सिंपर व समय के लिए हेतु-रान्य हो गया ! उस समय ++ मास्यासा की राम परस्पर-पिराधी दिशाभों के भन्दा लगा कर मैं अपना नया तुरने के लिए उदिमता के सरोवर में गोते लगामे लगा।" प्रदि उस समम मापने उसे लेलो की पुरुपामयी करुए-बीपनियों से सहारा लिया जाता और साहित्य शिस्लिमों के रूप में सिदा रहना तय किया होता तो- "तुम महीं सममाने । मेरी बेमी के लिए, मपुर साहित्य-सेवा का पिम्तन, कृपभ्य से मी पार पप्प मा। जो पोड़ी-बहुत सेवा मैने की थी, पर मेरे लिए पोम पी। पापे की कीलो में गा पारे पूरी मदनी हो, मगर मेरे पास-पास के मित्र उसे पानते । किसी लड़ते र के कोये में कुलट लग जाने पर वेदना होती है या नहीं, मैं मही पानता किन्तु पर रापामोहन पता था-सुम्हारी यौवन की रानी मामक कहानी 'पासन्ती-संपादक ने स्वीकृत की पामही यह समाल मेरे दस के भारपार हो जाता मा | पीने से उतरते रमीम पर गिर पाना में पर दारतकर सामाफिन्सु डाकिये कहानी छपने की इनवरी का पत्र लेकर पाना, मानो मेरे साहिस्पिन बीवन के लिए महामारी को बीमारी सेन पानामा इसलिए पहले मैने लेखक के माते, नाम समेत मिझोप हो पाना, और फिर मह उससे मी येत पथ में पलना तय किया।" यानी समालोषक होना मा गुरुवर, मैं तुमारा सिप्प होकर भागा है। मैं मी लेसकचीवन के भी- पाक में मही रहना पाहतारलेला के इस गौचन से समालोचन में, मम 'तमसो मा मोतिर्गमय। मारवाकोमाकीराब ++ ४२ माहित 3 समालोषक उपाष- "मल्हा-चीवन के कोप परदा ालीदार होता है। उसमें मनी मावना नकर मौत पर मा जाती है। जिसम्म देव भोसों में गिरफ्तार किया जा सके,ह समालोचक के महान् सिंहासन पर भासीन होने का मर्षि कारी महीं । महान् भेषधर में धनम्त योजनों पर निवास करनेवाले महतो कर पर कोई मोतिपी पता पा ले, किन्तु किसी देवर्षि की मी या सामर्प म होनी चाहिए कि सहल-सहस सूर्य की किरनों के भाष-पाप तेल र मी, पर हमारे हेतु को गिरफ्तार कर सके। कशास्त्र पादे गणित की सालतियों घकोई भदाला पाँप ले,-हिम उसे यह साहस मही करना चाहिए कि यह हमसे भाग ले सके । पुस्तक के पृष्ठ, पृष्ठ की पकियों और पक्तियों के भरों से भी किसी प्रेम के विषय में हमारे दिलाये हुए दोपों की तादाद प्रषिका सफनी पाहिए। हमें अपने भाइमस के लिए सस्प की प्रतीक्षा में सूरम भार वाद की तर ममावस भोर प्रमा की पाट नहीं देसनी पाहिए। हमारा सा किसी भी प्रेय पर उसी समयसमास-पाय जिस दिन हम चाहे।" राहु ता पूर्णचन्द्र पर ही पाश्मण करता है, बालपन्द्र पर मही। किन्त, समालोपना के रगत् में इस बात तमाल नही रसना पड़ता। यहाँ तो भनेक पालतको संहार पर समालापन की पाप मामी हाती है।" पाटे, महे पोपपना सिसाने के लिए मातायें मी तापपों के साय उनकी भेगुली पार पाती है। उसे गिरने नहीं देती । सा समालारक के लिए महीकरणीय नहीं है। 4 • महासाकी पत "मा हमारे प्रभाष बचन जिन्दा रखने के लिए, और हमारे अस्तित्व के 'बैरागी' जीवन पर मस्म लपेटने के लिए तरुण भौर नवागत लेत की मापाचा की रात बरूरी है।" तब तो साहित्य से कितनों ही की मालमत्मा हो पायेगी। "ह मही, अयोग्य नष्ट हो जायेंगे, योग्य निन्दा रगे।" सर भाप बर 'घदपिनी संपादक पर स्टे हुए है, किस कारण से । मेरे प्रमात्र को मस्तक म मुन्ननेवासी दुनियाँ बीमका को चुनौती मानना मेरा धर्म है।" और भमर उपन्यासकार मपुरेरा भी मर पड़ा क्यों कर रही है। मादमी सदा ही वीर-रस में नहीं रा सकता । उसे हात मी पाहिए। प्रमालोचक का हास्म पापा-मारी बिसे गा बिना भावस्पकता के मी उत्पन किया करता है। उसकी राति कम मन्यमा समर्थ होती " चिन्त, भाप मल समालोपाही सो मही है, संपादक मी है। क्या 'विपदम्त' के संपादक होने के नाते भाप पर कोई शिम्मेवारी नहीं है। पागल हो। भरे, समालोपन और भाकमरा की साप पूरी करने के लिए समा अपने पर प्रसारितों को खेसन और काम में 'महापात्र' सावित करने के लिए संपादम एक मातरमक रोजगार है।" भातिर पो काम नम्र-संतो से हो सकता है, पर मोर पहाई से क्यों किया पाता है। इसलिए कि विस 'नन्दन' पर मी हमारे तीर परमा, उसे साहित्य की दुनिया में श्मशाम हो बामा पाहिए । " महत्त्वाकांक्षा कीराम
गति
देवत
"
मास्तिर, समालोचना की भादर्स दिशा पुनने के महाप्रेम की भूमिात्र
में क्या मागावेगा।
"मही कि, प्रस्पेक लेखक भौर कपि पार है। ई विचार पुराता है,
को मापा और कोई रचना | यह नहीं होना चाहिए । लेसफ या कविका
मौलिक होमा बस्ती है।
मा विना पोरी के विचार, मापा और रपमा को सस्प-समता भी
सेमर महीं।
परन्त, लेखक या कवि के पास क्या प्रमाण है कि उसने चोरी
नहीकी"
क्या इस अर्थमा लेखक या करि होमा प्राति-अदच पोर
होना है।
'ता फिर क्या इसका भर्म यह है कि कहीं से विपार, कहीं से मापा,
कही से रोली और कहीं से रचनाहरुप कर मजे में लेसक पन लिया पाय!"
भापकी प्टि में कोई तक मले भादमी मी है।
"हमने सप प्रमों की परीक्षा नहीं, किन्तु परीक्षा से गामा है कि
मपिक तादाद पोरों की है।"
पिसी प्रेम या लत की पोरी पाने में पापको तिना समय
लगता है।
भपिसे प्रपिकप समाह।"
सो कैसे।
'गती या बंगाली के तर-सद पिपयों के प्रेम देसना गाहमने शुरू
दिया कि चोरिया एक के बाद दूसरी हमारे सामने भार सही दाबाती।"
++ मरस्थान की राय
पाहे उन लेसको ने भापके पर उन मयों को देखा मी न हो। "विना देसे पाय या मापा या मामून या शैलियों से मिल सकती है। मैं इस प्रश्म को जरा दूसरी तरह से समममे का क्स करूं, मगइन् ! मापने कमी ऐतिहासिक पुसतको पवा" और पैशामिक पुस्तकों को। 4 H रापनीति मर्मशास्त्र प्रादि के प्रेमी प्राफ्ने पदे ही होंगे। 'हो पा लेता है।" फिर उन यो में, कान-सी पाते दूसरे प्रमों के भापार पर माही निती गाती । इन विपयों के लेस का अपना राब मौलिकमा होता है, मापन कमी गहराई से सोपा है। 'मैने प्रायः एसे प्रषों की समालोचना मही की। मदि करता साइनमें मी पात का जा सकता था। सामही पदि उफ विषयों में मालि कता नहीं है, तो क्या साहित्य के लस में मी नहीं होनी चाहिये। तता माफ हो सरकार मैने यह नहीं कहा कि उनमें कप मासिक नहीं होता । मैं तो यह पूछ रहा है कि पप कपल कष विचार रा-सी शैली और तनिक मापा मिस आने पर कहानी, कषिता, उपप्पाप भादि के लेखक को सूचस्प कर भोर साबित किया पा सकता है, तो पापकी अदालत में दूसरे लेसने के सारे के सारे पिपर का निगलनेवाले कब विपयों के खेत पर मो मही करार दिये जाने चाहिए। यदि हाक मही, तो उन्हीं की तरह निदोप पमने के लिए साभाप साहित्य के सपने H मास्वाफसा की रास ++ मालित्य देवता दूसरे प्रयनगे के समान मात देंगे इन मिसयों का मी भरना मौलिक कक होता है। पर तु प्रमु, मुम मन्दबुधि को भार समझा ता, यह कौन-सा। "कित ऐसे विषय ही माहे हाते हैं।" ना मगन् । म्यातिप में मौमिक क्या होगा । माकरण में मामिछ नियम कौन-से है। भीर मूगोल की मॉमिक दुनिया कहा घमाइ मायेगी। सा यह सत्य नहीं है कि मासिकता के रकबर की मांग पर अपना मपूर्ण रक पड़ा पुकने के बाद भी केवल पेबारे साहित्य-शिल्ली हो दाशरातार करार दिये जाते हैं। यो सोमास, पाम्मीकि और धामिदास तमा समसौदाम भी इस मगान् की तरह म्पास पारी से नहीं पप सकती इमझे निकातिराम, पिसान, मोतिप, सई भौर मर्मशाव भादिपियो की भामोपना का पाझ गरीब हिन्दी-संसार मे समाते।इन पियों के प्रयो की भाप्रापना पास्म रोली और मापा की चोरी कर नहीं की जा सकती। यहाँ हडसन, मेनिटी पर भौर मौत को किरकिरी की मामा परने मे सर काम पमता हो। यहाँसो पिसान, इतिहास और ग्यातिप भादि पिय प्रचार पिया भौर प्रगाई भप्पसम पाहते हैं। यह राष्ट्र मापा में कहा मेमर ! "ता पा, साहित्यिको का पारीरने छ लाइसन्स ६ दिया माय?" मा, मगन् । साहित्य-रारीर के हिमा रहने के लिर, पाहर की पस्तु, पाहेपे पावन ही क्यों न हो हरगिटन जाने दीपिए । मौलिक शरीर पनि के लिए बाहर के भवन की हरत ! परन्तु, लियुग मा गया है। पानी। ++ महस्याचशादीराम साहित्य देवता पाहे उन लेखक ने पापके पड़े र उन मरों को देला मी म हो। "क्निा देखेपास्य या मापा या मामून या रोलियों से मिल सकती है।" मैं इस प्रश्न को गरा दूसरी तरह से प्रममने का पत कर, भगवन् ! भाफ्ने कमी ऐतिहासिक पुस्तकों को पढ़ा है। भगवा" और वैज्ञानिक पुस्तकों को। 4 " " रासमीति भर्मशास्त्र प्रादि के मम मी मापने पदे ही होंगे। "हाँ पढ़ लेता। फिर उन मेबों में, कौन-सी यातें दूसरे प्रबों के माधार पर मही लिसी जाती। इन विपयों के लेसको का अपना राम मोलिक क्या होता है, मापने कमी गहराई से सोचा है। 'मैने पास ऐसे मयों की समालोचना नहीं की। पदि करता ता इनमें मी गत फुल देसा वा सफता मा । साम ही नदि उत पियों में मौलि कता नहीं है, तो क्या साहित्य के प्लेस में मी नहीं हानी चाहिये।" तना माफ हो सरकार मैंने यह नहीं कहा कि उनमें कुछ मौलिक नहीं होता । मैं तो यह पूछ रहा है कि पर सन फर विचार रा-सी रोली भौर तनिक मापा मिल जाने पर कहानी, कविता, उपम्पास भादि के लेना को प-मप कर चोर साबित किया जा सकता है, तो पापी मदालत में दूसरे प्लेसको के सारे के सारे विपम निगममेवाले कर मिपयों के लेखक को नहीं मार दिये गाने पाहिए। यदि वे डाक नहीं, तो उन्ही तर निदाप पनने के लिए क्या भाप साहित्य के सेता महत्वाहा की राम++ ४१ साहित्य देवत म दूसरे पायरों के समान शामत देंगे। इन विषयों का भी माना मार्मिक कुछ हाता है। परमु प्रमु, मुझ मन्दबुद्धि को भार समझायें तो, पह कौन-सा। किन्तु ऐसे विषय ही मारेहाते हैं।" मा मगान् । ग्यातिप में मोनिक स्पा हागा । माकरण में मौशिक नियम अन-से है। और भूगोल की मामिक दुनिया कहा बसाइ बागी ? पा या सस्प नहीं है कि मौलिकता के रकार की मांग पर अपना मपूर्ण रकपड़ा दुकने के बाद भी जत देसारे साहित्य- शिसी ही दापासतार करार दिये वाते हैं । यो तापास, वाल्मीकि और कशिदास तमा तुमसीदाम मी इस भगवान् की तरह म्पाप्त पारी से नहीं गए मोहमके सियातिहास, विमान, मोतिप, तई और प्रर्य-शान प्रादि पियो की प्रामापना का पाळ गरील हिन्दी-संमार फसे सेमात इन विषयों के प्रमों को भा पापना पास्य, शंली भर मापा की चोरी कर नहीं की जा सकती। यहाँ हासन पेनिटी फेपर और पास की किरकिरी की माला परने से घर न पाता हो। यहाँ ता विज्ञान, इतिहास और गातिप भादि विषय प्रचय दिया और प्रगाद भयपन पाहते हैं। पर राष्ट्र-मापा में ही मनर ? साहित्यिको पारी करने का लाइसन्स द दिपा भाष!" ना, मगान् ! साहिस्प-रासर केरिदा रहन निर, वाहर चीपस्तु, पारे ये भासली पो म हो हरगिान पान दीपि । मानिक शरीर श्रीपाड़ के लिए बाहर के मानन करत परन्तु, पलियुगमा गपा है। यानी!" "तो क्या, ++ महस्वाक्षा कीराप साहित्य देवता रेलें, वहा और हमारे यहाज पिरस भर घशान लेकर हमारे दरवाजे उरेलते हैं। हमारे खेसच यह धम है कि विस के समस्त मान के घायों को गरम पानी के मूल्ले में बला दिया करें) किन्तु पे उसे पढ़ते है । पर पिस्व के क्तिकों की तरह क्तिन करते है और उस चितम को लिखते है । मला या पोरी क्यों न कही पावेगी । परन्त,- 'तव भाप साहित्य में मौलिकता माम की कोई वस्तुही नहीं मानते।" मानता मों नहीं है। मैं तो मानता ही है कि करिता, कमानी और उपन्यास के लेखक ने माँ के पेट से यन्म तो लिया ही होगा। माँ ने राय सिखाये होंगे, पिता ने पाम्प बनाना । शाला के पाठक में मापा 'बनाई होगी। पिदानों ने अपने विचारों और शैलियों से संस्कार किया होगा । और इसी पीच प्रयों ने पाकर विदामों का साम ले लिया होगा । तप फिर इतनों की चोरी करनेवाला साहिसिक, पोर क्यों न होगा । इसलिए मौलिकता का अक्षित मान मी ले तो भफ्नी मन्दादि के कारण यह मेरी समम में नहीं भाता कि भातिर मौलिकता है कोन बस्तु और पापेचारे साहिस्पिक ही की साइसाप्ती पो बनी रहती है। 'इस बात का पता उस दिन लगेगा, जब तुम अपना मुह किसी दिन मासिक 'विपदम्त की संस्थाओं को उठाकर देसांगे, जिनमें मैं अपमा ईमान म्पक किसा करता है। मापके इमान की बरा हो, मगन् । । 4 मलित्य देवता साहित्य की बेदी तुम्हारी दी। बेदी पर बिस पर मैं भादर से भाँसुभों के फूल पढ़ाने घे लालायित रहता, जिसकी भोर से मानेपाली वीरता की मकारों को सुनकर पापियों में पपिता उमझ पाती, कमसोरों में विमली दोर पासी, साहित्य की पनि पारा में अद्भुत राष्ट्रीय संगीत सुनाई पड़ने लगता, नीर पीर बिलगानेवालों का दल जिसके आस-पास कुतूहल से पंपल हो फुदकने लगता, साहित्य-सुपा के मधुर सरोवरों के सरसिप, मृग मद की मस्ती र महनेवाले परिमल को छोड़-फोड़ उसे सुगन्धित करने लगते ऐसी, ऐसी वर तुम्हारी दी। लो, एक बार मै उसकी भोर मुक है। मेरे बीपन का पह सर्वस्व, मेरी भाशाभों की पा पिटारी, मेरी वापति नटी की बर माप-पटी, गेरी मातृ-मि की गोद की वह शोमा भोर मेरे पिने ममाग की यह परम पावनी कर्तव्य-पीठिझा, देखें कैसी हो रही है। . . . . मैं उसे मूल्पपान् समझता है, किन्तु उसका मूल्म पोदी-सोने के टुको नहीं है। या मूल्यवान् होकर भी खरीदने, पेपने भौर उपहार में देने की पस्तु नहीं है । उसे पानेवाले के शरीर पर, फटे पुरानेपन' र राम्म पन में निरोप, गरीवी, पृणा, कानून और लक्ष्मी के गुलामों की रुपा के पीले बटे, पदों में पुरम की भार मदने देनेवाले पन्पन, शिर पर मिट मामे शीपना, कएठ में तोक भोर तिसपर मी माता की पूजा के माों से मस्स मीय सर, भासा में मम भीतीणता भार तुम्हारे परणों से पाने के लिए जामुमो की धारा, गालों पर ईसा के माता पालन की तैयारी, मुँह में मौन ४ + सादिय की धड़ी पा-3 देव . भाषा की मनोहर स्तोत्र माला, गदर में देश की दसो दिशामों में गूब मपाने पानी पीणा तमाएल को सवलताका सरूप पना गलनेपाली पुस्तक लिये र तुम, भौर हरामों में, अपनी श्यामता से श्याम के मन को मी माहलेनेवाली लेसनी, पा लेलनी पिसके पस पाने पर मरे हुमों में जीवन-म्पोति मगमगाने लगे, पिको ए मिलने टूट पड़े, सोते र पापति का सन्देश पापाने लगें और पिछले हुए भप्रगामियों को पन में पीछे छोड़ पैठने की अनते दीलें, ऐसे महरों के उपासक रादों के साधु, पदो के पूरक, प्पंयनों के रिश्यामद विहारी, सन्मियों के निर्माता, भौर पूतना मारण लम जीति' के अंग में नित नव प्राभूपयों को समर्पित करनेवाले, किन्तु पाणो का, मत्वाले हो तलम के घाट उतारनेकाले ही को अधिकार है कि भागे बड़े और तुम्हारी अमृत-सन्तानों की भाशाचे शिर पर घर र हारा पवित्र सन्देश सुनाने, तुम्हारा दिम्प दर्शन कराने और तुम्हारे लिए की भाषन्म तपस्मा का परपर परिचम देने के लिए भागे पड़े, और पाशीवाद के पल कणों से सिषित उस बेदी रूपी गोदी में पके हुए, परिमलरित, प्रफुल्लित पंकर के समान योमित हो पा महामाग, भौर उस मुम्हारे भावों के मतवाले के मस्त सौरम से महक उठे माता, पह तमारी दी। . * + पुकार और तम्हारे भाराप ने तुमारे एक सेवक को डा। उसने गिरिंगहरों में प्रोसकर तुम्हारी अमृत सम्तानों का मित्र पनकर महारा कीर्तिगान किया था, उसने हिंसकने से पूरित पीहर पन में तुमारे पाहन के नाम की गगम मेदिनी गवना सुमाने में साम दिया था, उसमे खरे पहनाने के लिए माला गुमने में अपने को भागे पड़ाया मा, और उसने सादिस्प की मेदी ++ ५० सातित्य देवता ता उस हिसको क हदयों को न हिलाकर, हिमालय के पुत्र की एक फन्दरा में अपना बोवन विता समर्थ के सन्देशों को हराया मा, भौर उसन कर्मपागक सन्देश पारकच सम्मा सेवक पनार दिमाया था। हम दौह पर, और ठम्हारी पेदी, उसी महवा और पम्पता की रक्षा के लिए उसके परणों में पैठार मी पाप-मगत भारापना की। उस संसार का परिवार माननमाले, 'या यया माम् प्रपचन्ते के प्रती, उस पपनों के 'िमीक, दरान के मिसारी और कमों के तपस्वी की छाया में बैठार हमने स्सात्रों का पाठ किया, पद यत्रों के सिवा रोप पन्यों पी रपना दिसलाइ, मारए भार उन्माटम के धिवा राप मानों का प्रयास किया और उस सांप दासनेपाले के सर में भा पाने के लिए प्रस्थत पात्म-समर्पण का पचन दिया | किन्तु उसने, उस संत्रता को परम सीमा की सेविश्व मनाकर, हतमागिनी पनानेपाल देव ने स्मारी हमारी माताओं और हमारी भासा और मादेरा के भनेक अनु सम्पानों को भपन पदो से रौद गला | गारम उसी प्टि में सरग मा। उसने पही सिद रिमा । उसने गौरव के सार फलम को मालाइत कर इकरा दिया । और वेदी पर परण रसकर पड़ने से पचाय, उस पर अपना मस्तक रसन की रमा प्रष्ट की। तब म मस्ता उठान मम्मक रएम पीर मम्मा भीर पर की पशि परानपान साग प्रश्न प्रानान मे मुरारी इस पेगारास किय । भोर मेदी के ये उपासक, अपर , भक्ति है, सदर भारापनामप ही को पाकर निहाल विसारी दी। .
साहित्य त्य देवता पिन्दु, सिन्धुलर का दावेदार बल-बिन्दुनों में पदि मिमण समाय न हो तो पल-समूह सिन्धु म घला सके । इपिस के देपत्त में पति ने भी अपने को सीमा रेखा सीपने में असमर्थ पाया है। इस भूमिका का यदि कोई पक्ष पिम्दु-प्रतीक (इने पले तो यह किसी हिटमन, किसी सूर, किसी घराम, किसी पेखा के पास भाकर मर जाय। उपर से मीने की भोर गिरना-सी कोर तपस्या है। नीचे से उपर भोर अप्रलस समूल कुपकर गया मा, मामु पनार और चपर मी की भोर पकि ममकर रफ्क पाया, विपनर । कुमरे है वो उपर पड़ने को इतिहास कहते है, कुषहै पो नीचे उतरने को देषल बताते हैं। पहलों का उदाहरण मुफिसाद है। दूसरों का उदाहरण प्रपतारवाद है। परन्तु नीचे कर उतार ही तो उपर पाने का प्रबनम है। इसीलिए माइप मापे से उपर पड़ने की गण-गामा रमता है, और कति उपर से नीच का अपनी गंगा पहाता है। किन्तु टाटे में तो मे रहते। कि माता की सतह पर उतरानेवाले प्राति के इस प्रकारात में सीमा रेता सापने का पापन करते है। मैं तो भवतार की तरा उतावल, गंगा कीरा पागल, उतार को नमस्कार करके अपनी बात कहना चाहता हूँ। माँसो से देखने प्र उदार पौदा भनेक पपों करने के बाद, काही मासे दसनेमादव भाती दीसी । ये दोनों काम सष्टि में पड़नेवाले मजालो की तरह दूर रहे। किन्तु एक दिन कोई पाँसुरी पवा उन्या और दिन भाँती को मे देस रामा, उनमें पानी भर भामा। अस्पतभावेग उस पानी बिग्छ, सिधुत्व का दावेदार साहित्य देवता कोषाहर खेल रहा पा; और लोक-साय की लापारी पलकें बनकर उसे भन्दर को समेटना पाहसी थी। इस तरह स्नेह और शाम में पचास की सदी की बीत-हार पक रही थी। हा, पर मैने देसा, समूचा दिन बीत गया कित सूर के पॉप के कोई नियान समीन पर पाकी नहीं रहे । मिसे काई इतिहास करता, साहित्य प्रसा, यात करता। मैंने अपनी बाँसुरी, लाचार उटाइ। और साँसों कहागिरी रविस्टर में सूर भौर चाँद के हरी-हरी समीन पर गिने गये पापों और पुरयों का खेसा- गोल्प बाँसुरी की पनि में, पनियों में, पर उसे जमीन के परपरों, मोग पत्रों और सरगरों पर रख दिया। तोग कह उठे—'मुग पोल उठा । मुझे मही मालूम मेरी बाँसुरी के सिमा युग किस पीत्र का नाम है। बिस दिन पाँसुरी पाली मुझे हमे बाले निकल पड़े। राम के मानम के तो मैं हार म माता किन्तु शास दानव सर्पम्पासमा भीर मेरे प्रपत्तो के सारे रहस्छ पहभपनी पागौर पताकर उसे मतण कर गया । मैं उस समय पिलाता था । किम्नु, कति काम तो उस अभागी पस्त का नाम हैरिसके गीतों की नियस का मी तमाशाही दसा गातारेभीर चिसो सर्वनारा के रोदन का मी तमारा ही देता जाता है। मेरी लाचारी और उसासोच नाम मिस दिन 'कला' पर उस दिन मुझे मालूम हुमा किमरा मि-सपित 'स' मानो बाहार में पटा दिया गया। मेरी सिसक भार रोजगार हो गई। ये-मौसम मेरे नी में पानेवाली पेदनामीच मोसम पलानेवाले ही तो मुमेकलाग्रर के नाम से पदनाम करनेपाले पारपारी है। चिन्त, मही पाहे जितनी तर सदयासह इतनी बलरालिनी al विन्ड, सिम्पुस्य का दावेदार देवता मही होती कि किसी प्ररतमन्द पादे को देखकर पर अपने में यम पाहे पार ला सके । भोर अपमे भापक पासे के नोटों तक पहुंचा सके । निषाता के निर्माण में यही तो कमी है कि सीमापदता से मस्तित पमता है, सीमा तोहर पर मो-का-वो नही र माता । तम सूम की देन के मांदित उपकरणों के एकत्रित कर मेरे पन्पन और पनास के सापन एका दिने गये। उन्होंने शाम नाम पाया । और यो मीठा-मीम-सा, कोमल-मा, कल्पना में बेदाग और ऊँचा किन फर्मययता में लाचार-सा सूम क मा पाकर रा गया, उसे कला का नाम दे दिया गया। मानो कोई कहानी लिख रहा था और उसका पाला पाप मा- एकमा राणा और उसके यहाँ भी एक दासी । पा समाता मुझे कमी स्वीकार मही हुमा । इसीलिए मैने शाव को पिसे र पैसे की सरा रूप फरार पीचे फेंक दिया। और अपने लिए विद्रोह का रास्ता मस्तियार फिमा । भव मेरे शब्दों में कला, प्रप्लम के सिलवार को कहते है, विद्रोह विद्रोह की नही मावना की रिसने लयालों के परिवर्तन को जगत् पर उतारा । पाले मानवों के द्वारा चिार बनते थे, अब विचारों की ममीन पर पिपाता अपने मानव दालने पाप हो गया है। महशस मेरी खेलनी का प्रसाद या शाल पेपारा लापार था कि उससे सब कुछ बन सकता है, मानप नहीं । विपाता पो प्राणी विचारों पर मही डाल सकता, पिता के पनाये र होकर मी या है। तुप्पाद होकर मी गा। पलमान होकर मी पापीन है। राषि-म्दामन की गाय है। और पिन्त, सिन्धुस्य का पापेवार ५५ साहित्य-देवता मेरी प्रजनन-मापना यशादा मामिन है । दुही हा पायगी। हमरी दुरता ही जापगी। पाँमुरी के स्तर पर साँप समाप मूमने लगतष मानय का सा पाहता । रिभूमिपारी मुभा, पिरस पिति का स्वामी पनाहर सिहा सन पर पैगया गमा । मूर्य-फिरपो न भूमि की गलियों और पारामों से भूम पर मुने हिमालय के सिर पर हिमसः पनार उपत्त प्रदान किया। रिश्ता पहुत बड़ा पी, रातादियों मानवता का मुंह पम्दार देने के लिए स्नुि यदि म उसे सीकार कर लमा तो मरी पीदी, साबन की गायों की पाली, पर घप्त कपड़ों की पीड़ी, किसी दूपीन पान पर साम-मार परत रहन । सिंहासन पर पैठने समय मुझे भोलापम पामीमा मालूम हुमा । म तापही निन्दु पाम, पिसमें सम्मिश्रण-भावना का तामएप मा और पिन्दुती मयादा को मिटाकर सिम्पुस प्राप्त करने के लिए सदियो तर पतितो मुस निम्नगा पनने की तैयारी भी। मेरा ता समान ही दानशीन की भार पाने घई। उपके मन में नीचे भार बोट देना ही मेरा तरलार का वरदान है। रिसत की परमराहट से मै नगापिराब के मस्तक पर हिमरोल पमाफर वा दिया गया मा, स्न्ति सम की सूर्प-फिर, वा मेरी मानी पीर, मुझे नीघ पहा लाइ । भासरा दिसतामों ने भागा " यह परम उग्णम, परम निर्मम उचानिउप स-ौरस्तिने मीर गायगागारिनु मै प्ता समन के मानों की पाली मुन रहाया जो मरे उतार चमर्गरम प्रपर पदर पूजा कर रहे। और दातामों के उम मिहासन म 'उतरने गति पार, प्रगति पास पगह पापा, पमप पापा, रंग पाय, तरग पाय । और यहाँ तक में प्रालि ५५ ++ यिदु, मिथुपपदापार सालि त्य देव रहा अपने दोनों किनारे हरे-मरे पाये। मानो, याम ने उपल से मुमे देश निनला दे दिया। रूद की दासी, सूम के राजा के साग भौर गाहारी कौन-सा करती। यदि ममरा के दिमाग को विकृति राम को देशनिकाला दिलवा सकती थी तो मैं मी यही पब क्मो न ग्रहण करता। किन्तु, मेरा यह देशनिसला मानो, मसुरूपी मैके से अमरत के दिग्वियम के लिए मेरी क्दिा मी। पिग्भों के पारा पने जीवन में मेरे समान न मी किन्तु मेरी गति से मी सर निकलता था । ठोकर मुममें विपुत् भार संपर्ष मुममें संगीत मरता मा । मुझे पड़ते समय किसी ने न देखापा, किग्रा भासमान से उतरते समय मेरे टेभारे पैरों के निशान वनकर इन्द्रपतुप पनते बिगड़ते थे। पायु, उपर को मले वारे फिन्त तरमाई तो सदा भाकर्पण की भोर नामा करती है, चाहे उसे मुरुलार्पण कहिए । विस के समस्त प्रमनन का केन्द्र विन्दु भाकर्षण है। सन्तल के प्रमनन का मी, देपल के प्रबनम का भी। मा तुम मेरे इस भाव को कमा कहोगे। तब तो ठम मातृल को रोग गार योगे । शास और कवि से भगासने की नही जगह है। तुम सत्स धे म सममार मी उन पर पहस कर सकते हो और मेरे पापार मौन में से मी सतही सर मस्त होता है । विना उपकरण, पिना सेना, बिना सापन भौर विना सामर्प पर मे पैमय के घर से निग्रता-सा उमीन पर पार-बार पलटर वरल पारापाली किनारे पमाती पगग्रणी बनाता होता तम पदि पादश भा पाते है तो मैं किसी माह के नीचे सहा हो पाता है। में होता है, मेरा साहस होता है,मेरी कविता होती है। उस दिन सससीदास के शब्दों में राल्ला की सरा मेरे लिए कई पाक पिम्ता नही करता कि- विपु, सिन्धुस्व का दाषेदारी साहित्य देवत कार रिण र मोगत हर है राम सपम योउ माई ॥ पानी मुझे पहा नहीं सकता। गरमी मुझे जला को न पाई मी। उसने प्रवाहित कर दिया था। तब पानी मुझे केस बहाता । उन परसातीदों के पीप सारे हुए मरमरासे र मर शरीर र पृणी क हरि याले पेमष ने, फूलपालों ने फूल खेर, कोटीवालों ने घंटे लेकर और पत्नी पालों ने पची ही हिला-दुलार उस एप्रम में मेरा बादन किया था। उस समय मुझे ऐसा लगा कि किसी पालक पगल में उगा इभा में भी एक पल ही हैं। माना पायु की सनसनाहट मार पी की परफर में मै इमोह को मापा का कहूँ।ट कहानियाँ हसेस फूल पूजा करते से भौर पचे पीर पंपाते से नगर भाते थे। तिस पर उस समय टिटहरीका पोल पड़ना । मानो जमीन पर गहती ई भालों का भासमान में म्यता मेगा था। रैर के मार पर मैंने अपने दोनों हाय उस में लगा दिये थे। सिम्त उस माह की गो से गलियों में पढ़ता हुभा रस गलियों सममस्र मानो मेरी मुगाभों में मीना गा रहा हो । परों के मीप जमीन मी सिर पर भासमान को दादी यी, कॉप के पास पती दुपा कर मंठे म, जो हानों में रस दरही मी और मैं मदी के तट पर निसप तहापा। तप मुने यह रिमम से महाता कि मैं प्रतहूँ। तर, परसती बरसात में मै हरा-मरा मुसी हा उठने के पाय, इस फिम पात न ममाता ! भासमान स गिरते हुए निराकर पाई रिसी पि ने गाया हो या नहीं पाया हा, किन्तु, पत्तो की मस्तानी मानता ने मुझे रत्सक अमर हरियामपन म म पितु सिरपुस्य का दावेदार .
सालिया देवता । पानी में नीचेगाने दिमाम मानवस के भामास से मुझे नीचे गिरने ही दिमा । इस तर पनों के मौन गुरु ने मुझे एकरसता के हरिमालेपन कर ऐसा पाठ पढ़ामा कि भव यव कमी मेरे अमरूद की गल से मेरी कम्पमता गाय अपना कॉपा रगड़ने लगती है, तब मैं उस पर नाराज होने दौड़ता। कि कही यह ममद की गली में काले म पैदा कर दे। गलाष की चतरात्मा में उतरने के लिए किसी जगदीराक्द्र की मान-सीढ़ी की रिसी कवि को परूरत ही से पड़ सकतीदय तो यह स्टेशन है मिस पर भस्तिस्स भपमा लगेज लेकर मही भा पा सकता । भस्तित कर या स्थान, भाकर्षण का या देवालय, प्रवाह घमा भमरत्व, गति का पह संकेत-दर्शन, मेरे गुप्तांगों की तरह मेरे साथ है और पीलन की प्रमस परिमिततामों के साथ यह मेरे ही साथ रहता भाया है, मरे ही साथ रहता बायगा । मैं गतिशील में रण में मनाही है, में निम्नगामी 1, में किसकी समस्त हरीतिमा के भूमि के प्रविय ग्रिोम, उपा अपुष्प समानाने पाठा, बीवन रस हूँ।
सालिया देवता মীনাম गुलाम, तेरे पाम से 'मी गली मुक रही है। इसलिए कि तून भूमि से रस लिया है और पापुछ सौरम प्रदान कर दिया है। मूने अपने भारम प्रमात्र से प्राप्त देवत सि-सविध वायु के परयों पड़ा दिया है। इसी लिए तो पह, प्रातःकाल भाकर पचों से बेचैन छलियों पर पैसे मला परती है। फिम्स सेरी शामा, सेरा पुरपार्म, लियों की मला भार लालिस्प में पा है। माता करेंटों के सेव भोर पुरयाय में विधमान है। पिस्तु कला भार लालित्प, तेरभार पुरुषार्म -भारमा सपनीमाम पर निकल है। मान की गरिमा बहुत है, मानमत्त की मरीचिमालाभों पर टोटा है । तुझी और बेवजी तितलियों पहुत है। प्रमु-मामीने, नभ-विदेदी गरा का पता नहीं । गीत-मामान की मुहियों पर घट रही है, नन्दन की मयूरी कहाँक रही है। देवता पम्पर पनाकर सिद्र लपेटन- पाल , सर्व प्रमुधी भानरावाणी पननेभान हो। निर्सिटी की तादाद बढ़ानेले पिन वीणापारिपी के पुग-सरावाही मपूर नहीं है। क्यों?- 'एसपिए कि भार में नीलाम पर पिस्ने निष्ठा हूँ।' . . भावारीबी गर्म मही सगा। घरताइत के राम्दों अमर भपिचर भार पिरम निकला। एक दिन मरे बन्न पर मा-मार माना जाता था ! किरिनाद में अप'मा' उपसर्ग घलापा गया है।भार कर ममत पजमान पीतनारा में है। मिसाई ने संपह पर पहा है। सरसता मप्र पर निमारकी गोद में सागर ध सहरों पर, शिर ZH +भीसाम साहित्य देव देवता बीले हिमालय पर मले रहे पर मेरा ममत तो दाता के द्वार पर खड़ा रोगा! विपाता के द्वार पर सोगंगा-पल मिलेगा तुलसीन्दन | भय "अकाल मृत्यु हरणम्" के रिका की भाषा पर मचल मुत्सु न हो, तमी भाचर्य। 'स्योंकि प्राग मैं नीग्राम पर बिकने निखा है।' + + * " परितापनिताता -अमल का सा मणिचन संयोग है। कहते है ये सापलम्बी नहीं होते। हमने “सा पिया या विमुच्ने को कैसे मन्दर र में बदल दिया है। मैंस को दाना दो वह दूध देगी । हमें दाना दो, हम साहित्य देंगे। मैंस सर्व पास साकेगी हम साप दास रांगे। भैस के पार पाँव है हमारे भी ज्ञान के दो पैर भोर है। हम प्रमु को पुकारते समय करेगे—“पापोऽह पाप भाडामह कैसी पुरपाई है जिसे हमने " सोजमस्मि " से बदसा है। इदम का विधारमा हसारे "गगन-गैमीर" पूगा पात पिस कहता है-'पीर-यूगा परन्तु मैं सुनता है-शरीर पूमा' ! सब मेरी वाणी में रस पो हो। मेरी पीसा में स्वाद कहाँ हो। मेरी बाँसुरी में मूर्ति कसे हो। साधु विनोवा की इस बात का उत्तर में दो नीवाम पर निमा हुआ।' मालो कान्ति का मार्मक रंग लेटर तरुण परिवर्तन मा गया। साहित्य के दर्पण से वह अपने से प्रतिविम्मित करेगा तलमान पाणी ने अपने गर्म से गौरवमयी । पर पतन से पो छ रक पा रहा है। कल्पमा, सूर्ति कीवी लेट फाति को सतेज प्यक्षित के भावर्षक रंग में रित्रित करने उठ सड़ी है।मा मतपत का सायाम से मी उस मीसाम+ ६० साहित्य-देवता पुमल कुम रही है। भावी के हरिपालेपन को भी प्रलय से पुप्पित कर रही है। क्या यह मेरे लिए ठहरती हाय मै 'म तो नीलाम पर निकया एमा।' राजनीति नहीं चाहिए ! मापा रादों ही से ममी है मारा गम हैन ! राष्दों के फष मानी माफिर 'रावनीति' के राप्दों के का मामी नही। मोग्न चाहिर राम्प नहीं पाहिए | शम्द साहिर मर्प मही पाहिए। साहित्य पाहिए, किन्तु उस भापार राष्ट्र मही पाहिए। गुलामों के त्यौहार, वीर्य-शीनों के पल, पहरों की बीणा, गूगों के गीत,-ममस्कार मे और तेरी साप को। इतिहास मे, इसीलिए, रामामो मार सरदारों को लिसा योगानों भौर सैनिकों को मूल गया । राजपरिवारों भौर नापी ऐयाशियों लिखा, गरीबों की दमा भीर बलिदाम का मूल गया। इस दिशा में कालिदास, माप, पाप,-सम का भार लालित्य के नाम पर सेम और प्रताप फेट में पुरा मोक गये। सूतियों के पास में परियों सालाने सगी। इसीलिए मई लहर की मर्म-पेधिनी लसनियाँ, राली के द्वार तक, पतम सकिपत लेने भा रही है। भारसम्म दम्म म हाउँ, पहा, भात पम्प है। मेरा पान तो क्या इसलिए रि- 'नीलाम की पाली में मप माप सूदा गता है।' ++मीलाम साहित्य भय इतिहास, भटम्मों में, सारे कर्मरसता में बदल रहा है। पहातों भौर शहरों में गलियाँ और पूरे साफ कर रहा है। शहरों में समान बीवन की भाग महका रहा है। पागारों को पंचायतें बना रहा है।मामनों की महानता को, देवता के प्रसाद की तरा, कालू माई, रम पोनी मौर कोपा मेहतर में मुक्त होकर पाँट रहा है। अब साहिल, विस्व की उपल पुबल के रूप में समय सम्देश अपनी पीठ पर लादकर निकला है। उसकी मोली में मास भोर पाल्मीकि है, होमर भौर परस्त है, लसी भार घर है, नायरन और गेटे है। प्रोप के तो 'सेट' मी साहित्य से इतिहास की गाँठ बाप गरे,नारीबों के साहिल भौर इतिहास की गोरी और पाबनली मारत की यही गाँठ तोड़कर रख गये। इसीलिए वर्षिसतान के क्रमाली विवपचे पराक्य बनाने मारत के राम् भौर मादिर की पसटन गई, और अगानिस्तान के प्रमानुसाह के सर्पनारा को पपन्द के मुझा परे। 'मोहिम अपने को मीधाम पर बकाये हुए हैं। मेरी गाली तो 'धन-बम' के मीठे पैन पोलती, नगी औरतों से परो- बरों के पानी की माप रती, और दिगम्बरा-वासामों में गंगा में सैरार उनकी विशेशी बनाती बगत् का मारा मले हो, महाराव पगतसिंह सरा होने चाहिए | मीसामी पशु हरी पास के लिए सामा म करता। इस समस्त स में से कमल की तरा परिषर मामति के पद पर पद रसार महाराष्ट्र सम्त श्री रामदास दास-बोष भूपण के कुछ पर्चालेर भार्य-चीवन के अनार्य पतम के खिलाफ ल मचाता पाया । पर शस्त्र के नीवाम ++ त्यद मानपको शास्त्र का दानव पब याने देता । रामा परमसर मा प्रगा गूंगी मेह पनकर उसकी मी पर कट माने की चीज हा गई। उन दिनों नापमा, रंग मा प्रामोद मा, प्रमोद पा । रापातमीन या साहित्य उस समय क्या कर रहा बारह इसी पिमीनेपन पर,मक्सियों की सरह मिनमिना रहा मा। तिरुपलिवर, तुलसी, मीरा, नरसी महता, विद्यापति तुकाराम और नामदर और म पाने क्सिने सापक भाये, सुरे हुए हों और मुके हुए मस्तकों से। ये कप उँचा सींच सके पर मुसाल, राजपूती और हाँ, पहादुरी के सम मरे, पहले हो चुके है । सब मुझे मी विनोद, विलास भार वाहणी की जरूरत पो म होती इसीलिए- में नीलाम पर बरा पका मारा।' . * भाग इतिहास की इस पामरता में भाग लगानेपाली अंगुलिमा भाग भा गई-साहित्म कम्मापाड में मी । म्यारण और पिंगल के नियम उस समय लोगों को पापने के लिए तीम रह और अपना अधिकार भागमा रहे है। जब तरुणाई वाक्यों की नहीं, लौह-सएडा की गृहलाभों को प्राणों तक के मोल तोड़ने पर बल पड़ी है। भर माहस कीपर महानता के पकि, भौर मदमस संस्थानों तेजसिता के पाट उतरना रागा । ऐतिहासिक स्मृतियों, रसीली धषितामों भार मनोहरा यहति में पदि जिन्दा रामा रेता पतित होते हुए पापियों के लिए मही उसे उठने हुस मस्तानपन के लिए ममाता दनासगा।टामामी मियमों लदो भौर निपेपों के उस पार मी, मग 5 पड़ावगी। - ++मीसाम साहित्य देव वता उस भोर बार नवीन-सृष्टि करनेवाली नई रेखों और पे मलों की दुनिया पन म देने पर समाज को सेतु पॉपने का लजी-पत्नर पना लेगी और साहिम को पैर रसम्र उपर पड़ने की सीडी । राम-मसलाभों को पानहर मी, पापलचे पतन के खिलाफ इस पम में बागी भोर 'मविष्य की वीणा समाच, साहित्य तत भोर राजनीति के तारों को पीणा के काम उमेठ कर मी मुकिका तर गुपाने के लिए पाम फरेगी । बोम टुकड़ों में मोल मीशाम होते भाये है क्या हम 'मरण-रयौहार की कीमत पर, 'अमरता के माप, सरे न उसरेंगे। क्या इसीलिए कि:- 'म नीलाम पर पाके
यदेव
उप मेरा पार मग पानाहीतगतारीपHिz
अघ रसपती घोल उठे
करते है कि तुम मुझमें लगनवाली गांठ , हिम्म में दसता,
कि तुम तो मेरी लमा रस्सनेनाी वह पादर हा कि जिसमें गांठ लगाइ मी
गा सकती है और उसाला मी या साता है। तुम पराबिस उपा
उठाकर में एकान्त में सरूप-दर्शन करता और जिम मुन्दरता से लपटकर
मूव की सीमा हिरणों में सर्वरूप दर्शन सता है।
मुम्हारी मिठास एक सा भट्ट प है। अनन्न प्रयों पार
मी मानो पर ऐमा मृलता-मा, पर एमा लटकना-मा रह साता
तुमम पर किसी सामाषिक, किसी महान, किसी निर्माता ठिमी पिस्तून, मी
रक्षक, पिसी करणापन किमी दयासागर की कल्पना स्टार भीर मामांनी
मान्म हाती है । उस समय तो मेरी तुलना उस रास बन मन
सी हाती मिमकी मिठास सविसघ माघर बुदा महोरिया राममा
आप मुझे भौरी में झिझक मानम हाती र तब मै तुम अन्नई
गुना लपेटकर मफ्न का मामन से हिरा मना है। हिण, या
ममनित हाता हूँ तर सिसक और मुमक नाम-पान म बनी
की मनी पादर पहमार भर्ना ही माप के अपन भाग
-2
सामने सहा हा गाता है। साग पूछते हैं, मरी गाणी
है। किन्तु, उस समय मा पानों से स्टा परती भार -
मिपानी सेना करते है।
.
+4
TIMER
द उत्तर उतरकर पहा करता है साल के अनम्त पदे, उठ उठकर मेरे संकेत का सरूप-दर्शन किया करते है। पौच महीने भौर पम्पन परस, इन दो कठोर भन्तरों का रलकर मी बोटा-सा सिलाना, नन्हा-सा पपा समय की बड़ी-सी पठरी की गाद में आम सहमा है भौर उसे माँ कहकर, उससे मनग उत्पण होकर मी उसकी गोद से, उसके दम तक अस्तित की साधी रेला सीप समता है तब मेर पम में रुकावट कैसे खड़ी हा सकती है। . . तुम्हें ररक होता होगा, अनजान पोही! कि कितने सनह से सना होगा मेरा मार्ग ! पर तुम मा गानो कि मैंने पाकर कुछ नहीं पामा, लाकर पाना ही मेरे मिअस का इतिहास है। यह माने की पूल बिसर कर और रूप सा अमृत चाँद के कटोरे में मरकर तुम किसका स्वागत करने भा रहे हा भार के मप के सम्मुम मह सारी देन मिसारिन है । मन्तर के प्रकाश पर सूरम भार चांद दोनों ही दा काल पम! मुझे तो संकेत पहा मामा करता है वहा प्राति का पावलापन रहता है,यहाँ मत भा। मेरे पब का झार नही हाता भोर मदिहाता हो सापाबन्द ही हासा होगा । मेर मम्मुत रामपाली कााट ही मेरी सावधानी भार उससे टकरान मेरे मस्तक पर भाने पास ही यह पेदना देते विससे उत्पप इनेपाली उसासों को रात्र कर, में भाकपारीचतान च इतिहास मनाया करता है। मेरा प्रियतम भासमान के मत्तत्रों में छिपकर नहीं बैठता, बायोगियों के मना मन्दिरों मी मुतमाशी नहीं । पर तो नहीं रहता है। पर से माता-सा भार उपर से स्टकर माता-सा । उस प्रतिषण अनुमय करती है। मेरा दिसदार दितिय क परे ही नहीं किन्न पर उम्र के परे मी निवास करता है। अारसपती पोल उठे।
साहित्य देवता उसे नरहा देसफर, उसकी तोसली पोली सुनकर और उसे पुटनों के पान मांगन में जानकर सूर को दीपने लगता है और तुलसी वृक्ष से मनुप्प पन जाता है। + किन्तु भाग तो में तुम्हारे दरबारे भायाह । प्रनानि से मुम, सरा होने से बनकर पैठ गाभो । युक्ति के रसम्मो से सगी भोर विनोद के सिन से लदी तुम्हारी मापही में, में पाहता हूँ भार तुम हा सौर तुम्हारे सिषा मौर काई न ह।। म सहदय मुग की परि फी जीम बनार हारी हतियों की मिव्यस का स्वाद लने भाया हूँ। पोल दा, एक पार बोल दा। यह तो समय का काम होगा कि वह उसे अनन्त-युगों तक देसल और गीवित सासों घाम होगा कि से उसे दुहराने । पिना पैरोंवाली अपनी उस बालीकर, परा नगाधिराज के मस्तक पर पाने दो भार उपएर मानन्द सोजियों को मामभित करा, कि तुम्हारे भांमुमो में पाकर नानेपाली मन्तोमा की मिट्यस में न मन का प्रण करके भार । पे मर्यादा सम साझर पर से पलें, भोर मर पार ! पर उठा एक पार ! भीर गाद से पलटकर गिरा भनयन नपन पिनु पानी का एक संसार पसादा। लता मालारनामों की बहारदीयारियों में दर,नहीं, प्रा फर्घटदार तार हमारे पारों तरफ पर की तरह लग गाने क परपात मी,रा दरारय पन जामा, राम के पिता ! और अपनी पपनमुक्त कम्पनाओं के रों से भावनालोसी दयों दिशाम्रो उपना-माना दराला पा रय पसा हा पसाहार राति तुम्हारा युग यदि उसमें बैठकर मेर-पार न कर पाय, ता निस्स पढ़ते गानेवाले पन्द्रकी सरह उम दिशा में पढ़ता में पम्दाघर, १७ ++ जप रसयंती दम रखें यदे ता भारम पला भावे । पिला पहने दो कप को कि तुम्हारी पाणी उगल है, परम स्वतचाप नहीं है। तुम अपने द्वारा निर्मित मामे की माह घे भी अपने मन्दिर पर पड़ने की सीदी बना लो, और वार को मी, प्रहार थे मी, उपहार को मी। उम्र के परसों से पदा, कि तुम इतने नहा कि तुम्हारा अपमान नहीं हो सकता । पित, एक पात भोर कर दो- जमाने के तुम निर्माता हो, तुम ही निर्माता हो। - तुम्हें पता हे कि बोली समान के पाट भाकर और होती है और सम के पाट कच्छ और । समाम की पनिहारिन, दिनिगम की कामु-तरही पर पसर, पापनरहित रूप से दौड़नेवाली मनि है। उसमें सौ खून माफ है। किन्तु मा ममी ममी है, भौर प्रमी नहीं है। किन्तु, सम के इंटीले पौधे में से पर कमियाँ पटसार लम पर भावा करती है, तब तिनी हीबार कलम होकर ही भाया करती है। प्रतिमा की मर-म, स्याही से सास जैसा और काज से ससुर जैसा मप मामकर पद-निपेक्ष पिमा परती है, विस्त पाणी की साबन्दता में चितना कार मरण है, स्पाही भार कमारके मप में मनापल को वेष समनाली उतनी ही महान् अमरता है। पन्य है मिनी बोली, हसा पर से मी, भमर रहने को को पर उतर भाती है। ननु समान की सचन्दता पठन प ठोभ नही।समान में उतरना ही या पारिए, बिसे बरि मुग पागल पर उतार दे ताबा अमर हो उठे। . . सुले सदन के स्नेहियों के प्रारूप ही एमा मादक विससे स भात रसर मी मूरदास पन गामा करते है और इस कप पित्सर्यतीपोखरठे++ १८ ! साहित्य देवता 4 समाना सुटान उठ पड़ते है। यह सापार कि हमारी ईमानदारी से गुमरकर भानेवाले पागलपन को, हमारी ही तरह, हमारा मोता मी मूल गावेगा माइ मेरे, हे पावलों की कमी से हो, चाहे करों की अधिकता से-ऐसी दुनियाँ पड़ी मही हा करती। इस दुनिया में दो प्रापार ती रोग विस्तार मी। यहाँ साँसे ही गिनी जाती है मनुप्प नही। उन्हें मोचन में भानन्द है। मनुष्यमधी धम्हे मी सा पायेंगे, पर सम्हारा तो मान ही भानन्द है। उसास और उसास तुम्हारे भामन्द की सीऔर मीची तहों के नाम है। ठगहारी दुनियाँ बोटी है क्योकि मान के कोटों पर लोगों से उग्माद के पुप्पोच पोझ नहीं समलता। गंगार'-लोगों की वाम पर साधारस राप्प है। किन्त, सब तो यह है कि हम गैवार होना ही मूल गये। एम मातमी वा इम, ख का मारी गैगरी हमारा मनपन अपनी करारी वरपाई पर हमारे पास रा सके। प्रतिमा का पापा, इस नन्दन को साकर, कहाँ रहेगा । कल्पनाओं सताना अपनी पन्मनमुक्ति के लिए कौन-सा स्पाम देगा। परन्तु इस दुनियाँ प्र, तुम अपने का पठा दो, अपनी रोका पता दी। मपों पर, रंगमंचों पर, स गत् ने मन सौसा पदिमों पर दम लाकी सामाविक सता मत दिलामो दुलामा, पहाँ तो तुम मर्यादा के पम्दीलामे बही दार सालो। उस समय तुम्हारे ला, मारे मरूपन, तुम्हारे भमान और तुम्हारे पुगक भटपरेपन घ माम रसनतर और तुम्हारे मस्लामे पालो छ मूलने और मिटाने का परिक-म्पापार पलक पमाने , परपात् भी, युग "गार समान भप रसयती पोस उठे देवता वाली, सुग के सिपहसालार की जरूरत पूरी करनेपाली, तुमारी इति की अनन्तराशि उनकी स्मृति के द्वार पर पड़ी रागामी चाहिए । के तो मादूर है। उनकी कठपरता की लमी से पाने जाने के परमात, सौदे में समय देनेवाले, तब पुरा होना चाहते है, पर उनकी हामि के पल्ले, उनकी गाया मादरी से भषिक धमाल पा पापे और पा मात्र मी भत्सुम्प, दक्षतामों का प्रसाद मो, उनको रुपने और हम होनेवासी पस्तुर होनी पाहिर हमारे विनोद में, ठम्हारे भामुमो में, उपहारे मरण में मी पेप्सौदागर ही रहे है, सौदागर ही रहेंगे। + मारा दय-रस कमी पराचिस न हो, किसी की 'भार' और 'पाह' पर उसे सूखने देना तुम्हे सीहा न हो । किन्तु, उसमें पा सरलाई पर पाहिए, जिससे माल से भोले भाव तम्हारी कान को अपने गदर की गाँठ में पौष , भौर एकाम्त की माद की रगर सार, जप तुम्हारी कहन उनके पी में भुनने लगे, तब उसमें सनेह और साहस का मार मा पाये । नारी विषय पर होगी, गप मूलन का उदार सादा करनेवाले राहगीरों में, पहारी करन ऐसी मतमाली, ऐसी मारी तादाद में, मस्तानी के साथ रह जाये कि अपने अस्तित केबपो में उससे मुहान । सके, और पीरियों को तुमारी कान व साना सापने में अपने को गरवीला अनुमय करें । यही तुम्हारा महागा, गिसे यदि, तुम्हारे युग की पीदिमा-तुमारी की पीलियाई तो,-परसती के मन्दिर में अपने अस्तित्व के पते, उसे पुखन का स्यौहार मनाने मागी। जप रसर्वती बोमरठे++ साहित्य-देवता नभोमराल पर, उरूरत नहीं कि तुम नपत्रों की सरा ईंधी पहियों भार पे दिनों में भामा, भोर तारुएम में बग्मते ही, महारा विमापन हो। तुम सर्वनाश के नहीं सर्वप्राण के मछम्प वनकर क्यों न भाभो । पेज गिनने पाले प्रकाराक की पुस्तक के पन्न बनकर पान के पयाम, तुम अपने जमाने की उपश-पल के सरश बाहर पनकर क्यो म मामा! उम्मप पनकर भामो इतिहास यनार खोट लाभो । तुम्हारा सागत करनेवाल बरस, अपम्मा करें कि तुम पित्र में किस द्वार से भाये और किसीने पर पर लौट गये। . तरमाई और पिता परा पस्तुएँ मही, किन्तु एक ही वस्तु फरा माम। तम्म्याइ प्रतिमा की जमनी की गाद है। उप्र उतार में प्रतिमा तस्ए रह सकतीभार अमर प्रनहानपन क साप बरती गा सकती है किन्तु उम्र के द्वारा जीवन के चील-काट डाल सना शुरूहानक पाद, प्रतिमा अपन जन्म का परम दिन मनान महीं भाती प्रत तरणार कर गिरफ्तार परा और उसमें भपन जीवन-रयों चार सादा। पढ़ती हुई नामी के हृदय भौर पुदि के संयुध तय च यदि 'तुन नहीं हो, तब रि तुम्हार सागमन का माम ही क्या है? बीन दीपक जगमगाता रद।-यो ता उसमें मकटों च तेष पुग। इतिहाम श्री मासो म रा मनराल छग ला; और भरनी पौगोम अपना ज़माना दसा । दरिद्रता, समता, गग, मस्ट, गगार, रिवायपान + जय रसपती बोल उठे देव भाकमरा और प्रत्यापार मी गहनों के पहिमकर युग की मस्तानगी भागादी, उत्थान भोर पिता पमर भाती रही । + सीमा रसनेवाले मामा, सुम निस्सीम का माम लेकर उसे कल मित मत करो । कलम हुभो उस दिन, जिस दिन उन्मेप से या भेदमा से, तुमारा रक भासू बनकर भौर तुम्हारे भाँसू रफ पनकर उतर रहो। तुम मत बोलो, षोलने का काम करने पाल श्रम का पोस्सना मही पाला करते। तुम मत बोलो-क्योंकि तुम मूतन को परपर समझकर मार मरिष्प को महा कल्पना मानकर वर्तमान के गार से जारी हो । बाले पर जिनकी समीम मही केवल भोसू नही जल स्मृति नहीं बन पनि नहीं, किन्तु श्म सबको साप लेकर चिनकी वेरलिपार रसपती पोल उठे। * . भरे, लकधीरे गिनते हो। मास ने मंगल हरिबाला परफे मी एक भब कण पप्पीकर महीं दिया । युग के प्राचार्यस्व के दागी, हरिपालेपन की भूल मुलेया में, दिमागी-पशु विवरण किया करते है, पीरियाँ पिचरण नहीं करती । विपाता की वेररितयार की पलेर काम समेटकर परागाह हरिपाले किये जा सकते है। और सारे समुन्दर मरे पा सकता है किन्तु मानवता के मस्तक उनपर महीला करते कपि, सेनानी भारतातपमान के लिए तो, मस्तित्व की तलवार पर भरने अन्तर ही पानी पदाना होता है। . . श्तों की सरा सूतकर गिर पाने के लिए क्यों यम्मोत्सव मनाये पार्य भौर पो मरण स्पाहार । जब रसती पोप ठे++ १ साहित्य Calla मिट्टी में मिल जानेवाले दाने, उपर की हाहाही मेल खेला करते हमार साया में समाने पाला नपत्र अपन भाम-पास के भनेक नक्षत्रों की गति-विपिका संचालन करता है। रेगा कप काल-कल, कमी की पटस, पैशन की स्ममुम, बाँसुरी की तान, मृदंग की पुमक, पीणा की मिठास भार गम्मार पादलों की सरा यिजली के पार के साथ, बादल की प्रलयंकर हुंधर भोर इसके परसाप्त भौमुभों की तरह पार, असहाय, रिमम्मि-रिमझिम गिरकर, पुन अपनी मास-ममि की गोद में गिर पड़ना, यह एक ही कवि के भनक अवतार है। * तुम्हारा दिलबर, तुम्हारी कविता, तुम्हार मोस् तुम्हारा गुमन, उस सूति में निवास करता है जो तुम्हें प्राप्त हुई हो और जो तुम्हारे द्वारा प्राप्त सुम्हारे पूर्ति प्रदाता से पदकर मी पदि तुम्हार पाम काइ काम्य, काई सिर, काई पार, घर दुलार वाकी रह गाय, तासर के लिए, तुम सप चपला ला, पपार वि रामद कर पनाहा। पदि पाशिकी में तुमसे दीगरे म सोरीमा माती हो, और दिलदार पूजन में पुप्पो की तरह रप पि न पाये गा सकते हो ता तुम मप रामो का हलाकिस्तु, मीणा व हाय मन लगामा। सुम समुन्दर पांच सकते हा पटगृत के माप महापापि पनर समापिल सफले हा, काम पर टैंग मकने हा पर माइ मरे,तम मन-मन नहीं चला मामे माग महला मन-मन्दन मापन भाते, तदारा ना मार ही मद-नापन है। मम मान भीर मीगडी भाषा गार न परियों का सय रसबी पोटपटे T.- देव दिलदारपी भाया करता है। म कमिकमी पाया करते हैं। हाँ मूसो की वेदना मिस दिन उनके उदय से पाकर माँसों पर भाती और मालों से मुगा पर उतरती है उस दिम परमाला, एक ऐसा मूकम्प करती है पाकड़ी और छोटी, प्रीमती और सीमती माया को पूल में मिला देती है,ौर, सोने और चांदी के लादपाली उस जमीन पर पह मस्तानी प्तस्पाई सुरक्षेत्र और हमाई यहा 'कोमा' करती है। फिन्त, न पा रागमीति होती है न मर्म-शाख । उसका तो अपनी ही सार-पार का सौदा है। गिसकी वेदना में मी मिठास भाती है उसके प्रलय की मिठास मी निराली होती है। उसकी पीया के तारों में पर, तारे पिरोकर मिनराव मारता रहता है, क्योंकि कप चैन-सा का पापला-सा, ष पत्कर-सा, कप उतावला सा कब तुली भाँतो मनदसा-सा, फक मुदी भासों से देखता-सा कष सौहारों पर रोता-सा, कप मातालों में मुस्कराता-सा, अपनी कलम केले भास, सूरय की किरणों को संपारने के लिए पा टपचता ही उस दिम है, बिस दिन उसकी रसती बाल उठती है।
साहित्य वता पसुधा का पालतू काव्य मौसम में उत्तर हानेकाले पत्तो, फलो भार गीपपारियों कतरा मॉप्सम में उत्तम होनेपाली कमा त्रिकालवापित मा अमर नही हाती पहपएचसी होती है। मौसम पदला नहीं,कि बस्तु मरी नहीं। काला मी पाहत भी हो पाती है, यहाँ पातों की मुगनियों से पिरामिरों और पहाँ से पत्तियों और पायुयानों से बातें करतीनपात्रो तक पहुंचती है। भीमला बहुत गतिमाम, दौड़नेवाली होती है। वह अपने प्रकटीकरण के विस्तार में, मदियों और पहाड़ो कोलपिकर पहुँचती ईमा परे समुद्रो कलोपार समम सध्ने, या समम रखने के अस्लिम कोए तक पाती है। हीमा भत्पन्त गहरी हाती है वह मसिमरों की तरह, गहरी-से-गहरी भैपरी गम्भीरता में उतरकर अपनी पहुँका प्रय, समीम पर डालते हुए माना के पास तक पहुँचाती है। श्री ना, चमत मात्र रंगों के जल की गहराइ में उतरते-उतरते पर रनों का सायने में सम्म होती है, जो रम युग के पनों से मही वार का सह। मिन्तु इस सार, इस गति, इस गाम्भीर्य और इस गहरा के प्रत्पन्नामात्र में मी प्राणन कमा निवास है।'' भरमम हार और प्रल तमा कमा में केवल 'मकर मात्र भरना स्पान पदल लेता है। ना तो समम्पल प्र माप है। धूसना, राम करना, सात लना, देखना, मुनना, पिल्लाना, पदनच सिखाना, पदन माना, रग-रग में रक पडेगाना, पाते, मानर का रिमी सन में,हिमी शिक्षा हे दारा नहीं सियानी पातो पिरते है, पर + पसुपर का पासकाम्य सालिय-देवता बाते मनुष्य, समाश्यन्य करता है। तब कम से कम हमारे कान, हमारी पाणी, हमारे साहित्य में सो रस, प्राण शकि गीपन मा तामगीप्टि-कोरस या अप्रत्यक्ष तक देखने की शफि पिस के पदों, कायों और घटनामों की तमा अंतरतम की पनि पिसमी भौर परिस्थिति की सराहमा पीलार, सरत पर विस्मृत हो गाने और परिस्थिति में सिका पाने की शकि, पर के विस्तार में मौगोलिक और मान-धारणा के पन्धन लॉप बाने का पल और माला बनाते समय फूलों के कलेये में से पानेवाले पोरे की सरामस्तु पस्तु में प्याप्त हो जाना या गुण तो हमारी रफ्ना में 'इन्स्टिंट' से- समापवन्य-माने चाहिए। नोपना, पाटना, दुम हिलाना, रोना, कराहना, बीकना भादि मौ से अधिक होनेवाली किमाएँ मी हम अपने भाप ही करते है किन्तु इन पर बीवन-यापन करना, सादिपिक न, अपने पूर्व-पुटप, पराभों की विरासत सयम रखना ही कहा जामगा। बर से माड़ो पर परमेशभादस कटी, तप से हमारी कल्पना ने हरी- हरी सफल गलियों पर लम्बी बलाँग मारना भी जोर दिया। मप हम बनी सर पर भाराम से पालते है । लोक-सीक ! मुफ्त्र को परे। हामी और पारे माड़ो पर मही परते, मिना हम प्रयास से सस्ते हरायानी हममें 'स्व-मा तोकिन्तु पलोंगे मारने का प्रवास मर क्ट गया है। स्वभाष के परे भम्पास को पांपाकर हम पव-जम्मा मही हो सकते। दुनिया की मित्र-पत्र में पशु-पक्षी, पट के बल रेगमेगाले भोर कीरे मका सप पलते है।सा हम इसी तरह गिम्दगी बिता देंगे। मा हम षमुपा का पावरकाम्प ++ साहित्य परिस्थितियों को सुद उत्पन कर उन पर पीनेवाले 'मानव' 'नहीं हो सकते। रि हमारी कलम से तो वा-पतित, भूमि-दर्पित पल ही निकलेगा-पाहे किसी रूप में निकले । उसमें से रफ, भौर जीवन-रस पो टपकने लगा। पशु गर्मी, सदी भार वर्ग-सापारी से सहता है। किम् मानब अपन पिन के तापमान कर नियमन करता है। वर्मा, रारद् भौर प्रीम में पहभपने शरीर भौर रहन-सहन में स्वयं तापमान पन्त्रण और निर्माण करता है। तब वृद्धि और पीरम के अगत् में तापमान निर्माण म कर सकने पाले यदि पशु-बीवन न बिता तो और कौन-सा चीनन उनके लिए रोप है। तापमान निर्माण करने के फ्य में, मानव ने पहले भागी सी। प्राति के अनुष, अपना मौलिक तापमान इंसने के लिए, माना मे भाग बनाई। शरीर की गर्मी हो ने उसे सिताया होगा क्या हम मी साहित्य को मालिक, अमर, दर्मिनीषी बनाने के लिए, अपने अन्दर और बाहर के तन्तनों की रगर से भाग पमा सकते। बुझे पीतन वो अस्तित्ववान मरण ही कहना पड़ेगा। मनोमापना के पदार-उतार की मासिकता को सपसे बाही हानि पहुँचाई हमारे पाप-उतार रहित बीपन फी नासिक मुश्पिा ने । पठिनाइयाँ उपमा कर, उनसे पिपिप पाभों से सेलहर, न गाने हममें चैन सी रास्ति, न-सी प्रेरकता, कीम-सा भाविष्कार पागता | सिन्तु सा, पी मौर मौर से राने की पतित मनाचि मे, विचारों की क्रियाशीलता को उन्म दन कवाय विषारोपण्याशी जन्म दिया। पिपारों के प्रगटीकरण में हम धिमन पौरपाकिसमार साहिस्म, पर्म, सस रारनीति–पिसी पत्र में संष्ट गरेपरमा ही नहीं पाते । परिणामतः हम माये पर संष्टों से प्रारम्भिक 03 ++ पमपाका पासत काम्प साहित्य वता महारोही में प्राय दे बैठते है । मुविधा और भागन्द के मामी मौसिक भाषा में दर ऐसाशी मोर नास्तिकता। भागी से दियासलाई, फिर दिये या मोमपतियों, फिर गैस, फिर पिपलीमारी भाषिकत मूल पनि शोष पर, कैसे सटोर मग्नि- संस्कार । परिणामतः भोपन, मयन, मागना, मरना, मारमा, सब कप मशीनों से होने लगा। पदयवाम मानव के नाश का विकास कहा पाने लगा। परमराते हुए , पदिघी दूर बंगल में भाग सुलगती दीली । पर साल पीला-सा प्रकारा। और बिना रास्ते की प्रतीक्षा किन सफा मानण उसी भोर । उसने लम्पाई से मुड़ना, उँचाई से पाना जाना, पप राह में नदी या पहार मिस गया। फिर पॉप, शेर, बटे,संदर-सप तो पुरुप के पर में-मिसमें पुरपा निकला । उस दर दीलनेवाली भाग में,फिर उस वीर मार्ग में, फिर शीत की भाषी रात के समय, एक किरातपदा की झोपड़ी के भांगन में हार सेकने के लिए अंगारों के मिलने में --एक-एक मे स्तिमा काम्प । पनपकियों में गैस के गलों में भौर पिवली के वाहनों के मी- हमारा काम्प न पाने क्या हो गमा । अब हम अमिता-पंक्ति में यदि तल पार का नाम माते है तो हमारे मर भोर सुकोमा हाम, हिलती कमर भौर पराले लटकते पाल मानो हमसे भागे घने दौड़ते है- “रमा मत मुए, यह तसबीर की तसबार है।" हम रिपशनरी का पहारमो की नदी, भौर पात-पित्रों के पदे, मपनी रसनामों में लिखते-सिसते, यहाँ तक पापे कि मानों की रगा से मानों के टुकड़े पुराने भीर मारों के भाव करलता से परोसने ही अपनी प्रतिमा बने लगे। मसुपा का पास काम्प ++ मालित्य देवत हमने अपने पीपन का अधिक भाग मा-काफी महत्व की पीय समम कर पिता दिया। और चिन्ता और सुप भाई ता राकि भौर साँसें नाकामी रह गई मी। प्रतिमा हीनता में हम अपनी याम्पता की कमी प्रपन भातक द्वारा पूरी करते नार भाते। उस समय ग भाई राष्ट्र पोलते हैं, वे भी हमार अपने मही होते, प्रत उ रास्पमम, दाभों या मन भोपाला पोलने हमने मदनी, युए, शूर-न बान सि-किस में, अपन प्रमुछ कल्पना की। किन्तु हम मल ही गय कि ये हमारी पहुँप के मातार है- भल और न पाने कर कहा के पन-गामी । किन्तु हम तो रेल के र में, दाई द्वारा पैदा कराय गये है। किसान की-सी विस्तृत, मल्लारपीसी गम्भीर, मायुपानी की-सी भी मार हममें मारे कासा तिसपर मी हम है साहित्य भाषार्म ही। पही क्यो, रिस की कठिनाइयों में रहार, पुरपाका शरीर पर उतारन का उदाहरण रखनपाल पशु-पत्तियों भादिमी हमन मामात प्रदान किया । उहें पालतु पना गला । पेइम पात के उदाहरण है कि पालन् साहित्यमाहाता है। साते सीताराम पाने –पर मिग कयुम द्वार से उन की राति ही नहीं मिली में भार तैर-सार मसे ही ल, फिन्ट मालिक मे मनाहा पर मार ली, याच पानी मुसा, भार पस लतम पर मीनों पानी दो पैप हा या गाय शाम पस्टा इदता पमा प्राय। पारा मपन पर पानपामा घामा में पर, पहाड माइमपान भाम ++ पमुपा का पालन् काय साहित्य देवता पास मारे। सी, रोट समुहताय और अंदरा से का। यह सुमा कर पालतू काम है, जिसकी रचना मानव नातव उसकी दिमागी पति के विषय में अधिक क्या कसा पास । उसे एकही विरोपण काफी है वह 'ची लिसता तप कला की दुनिया में पर्वतों से कौन टकराये, मदियों का प्रबाह जिससे मे, मोर नामों से जैन अनापूसी करे। पालतू' साहित्य देवता । मसहाय नास या अमर मिाग यदि तुम्हारी महक मोची मन की तरंग होती, ता तुम मास किये जा सकते। हानिरहित भोर भानम्दोसादक उपल-गुगल कही तो पिनाद करेंगे। किन्तु यहाँ घूमता हुमा पशु मही पपाता, ऐसे सुनसान में माना पकड़ा उठता है। विचारों के भाषाहन के एकाम्त में हम किससे पपड़ाते है। या अपने भाप से महीं तो किससे। फिर को भय रात में है, यह दिन में नहीं। और यह हमारा शोक, वर्षानुपर्प शाक्ममाएँ भोर पार करना । इसके बाद, पर माना - मानष के द्वारा संगठित नाय और प्रमु की इसा पर, इस मारा की सहमति का भारोप । ये सप पातें कर रही है कि इन यस्तुभों की दूसरी पार है । पर यह कि हमारे हाय में रानवाली मलम पर यो उतरता है, यह इसी पपड़ाहट, इसी शोक भोर इसी रफ-पिपासा के समर्थन में निष्लता रहता है। मय की कमी, हमें हपित करती है और उसय ममाव हमें सुनी। शोक से पाहर निकल पाना हमें हपित करता है और कभी भी शोक म होना ही हमें सुसी। 'सून पहाने मोम्य' का तून पहाना हमें हर्पित करता है और उसका भी मी सिर न उव्य साना हमें सुसी। किन्तु परिणाम के मुस मे हममें वो कायरता बार उसी में हमें पपहाता हुमा, मयाकुल साफ-पूर्ण और सूनी पना दिया। यह एक यह काम पाहे देवी म होकर रातमी हो, हित व तो है। ++ मसहाय माशया भमर निर्माण साहित्य देवता । मेशित न हो, किन्तु मील का पत्थर तोहै। बिनधी कलम पर पर उतरता है, उमा मखम पर फष तो उतरता है। मामष, अपने मम फा'सा कम तो ऐसी रसना में पाता है। किन्तु मम रमारा विकास देसो कि पिरष की परिवाँ म सुलमा कर, म कसर पास का-सा पारिस लिलने लगे। यदि पर्वतों से टकराने से मानव पहाये, मदियों का प्रवाह रोकने में लगने कासी चोटों से उसे छोड़ हो और नापो की भोर अपने से उठनेमाले कप पा स्पर्धा में खून पीने दारे, तो फिर सम किसके हाम में दी मारे । और कलम हाय में लिये पार काम तो चलेगा नहीं जगत् में मानर चाहे पशु की तर उपनाये गये हो, किन्तु मई मस्तु निर्माण कर मानों में पिपि के विमान अपने काम में लिया और उसमें विषमता उत्पचकार दी।हम मीठा-कापाहीमही, उपमोगी-निरूपयोगी सममने-सममाने लगे। मीन से सीता हुई मा मह, किन्तु माम्मीति कलम से जो समता पैदा हुई, उसने समूभी पाति में पर-पर, कम या भषिक प्रमाण में, उत्पब होना भारम्भ कर दिया। हमने रख लिसा पा कि मोटरे, मार्गा नाप लिसी थी,हिमहास पल पर, भोर पक्षियों को देतार पतंग उड़ाये किमाई पहार तर म मैराने लगे। पर हम चीपारी थे तबाह पाहे पिपता के विरस मे बनाया हो, किन्तु माना होकर अपनी कलम से हमने विपाता पिरस बनाना शुरू किया। अब या तो हम, पिसके उपित सप्टा, उपित पिपाता, उपित निर्माता पमें, पारि विस का बोमन उम सकमेगाले कमजोर पस होट मसाप नाराया प्रमर निर्माण ८२ साहित्य देवता र विसको पिर बीवधारियों व निरम हो जाने दे, प्रतिमा की सतह पर उस मारा कर। भाग के प्रखम बन्द / बोलो तमहारा नाम क्या है। असहाय मारा या भमर निर्माण । मानो कि अब तुम्हारी मी पर कुछ महीं छोड़ा जा सकता। तुम निरपरा रह सकते हो, निररुस परत किये जा सकते हो, निरकरा गीने दिये गा सकने हो, प्रतिमा की भपरिमित दौर की दिशा में प्रतिभा के भमान की भोर नहीं। हर माता, माता है, मदिमा धमनी है। भौर यदि गननी है तो प्रेम के अतिरेक और मासूत के पाने के बायोमीप प्रसपी पेदना भार संगोपन का कारागार निश्चित है। यदि साहित्य के राम बना हो, तो पोला, भपने गर्म से गापानी लिलाने पमोगे, भमका प्रमर मानव प्रसर अस्तित। पारम्म प्रसा,मानपता मम संस्कार तातुम् मही लिसना। जिस तरह हर सौहार पर मातीय संसारों और युग की माना पारणामों के तह बम गाते है, और यह सहसों अर्ममरे हा उठते हैं, उसी तरह कलम के पर में भनेत युगों के परारम मे, पो दिशाभों के द्वार साल से है। मगन-विहारी | मन तो तम्हें गगन-विहारी मर हो पाना है। पीपधारी माना उठाया और उसमे भाग और मारदे पाह पॉप के पल पलता मा । जैसा कि विनोबाय-परमा, पक्की और मूला, प्रारम्भिक मानपता की मानवोदी हुई निरासत है। किन्तु एक दिन पौर के साम, माना का सिर मा दिल, पादानों, पत्र। सौ-सौ परमों के सहल-सहस हो में से मार दगा, सिर से भसाप मारा पा भमर निर्माण साहित्य देवता . विचारों की एक सुनहली मीर-सी लटक रही है, जिसका माम तुमारी सप्टि, तुम्हारा निर्माण, साहित्य, कहा बाता है। उस दिन पाहर झाँकते-माकसे, हमने भीतर मात्र का । साँस से गुगर कर परतेनरते हम दिल में गये थे। और एक गाँठ लोप्त दीभी। उसी दिन से हमें तुली मौतों दील दीसते, मुंदी भासा मी दिसने मगा। उस दिन, साँस में से गुजरने के लिए, हमारे मन में क्यो का उदय हुमा मा, और सास से लौटते समय, हम अपने साब 'सिसिए' साये। पर हमारी, मलम वन्दों की भाग भी। ये हमारे रहे और पाली में । मामा कि हमारे 'यो मे पास और पेषात मही देसा और हमारा 'इसलिए' प्राण के माम पर सर्भमारा भौर प्रलय मी लाया । मानव पुनर्यम्म माने या न माने, किन्तु साहित्य तो पुमन्मा रहा और फिर रहा। किन्तु प्राय के नाम पर मारा लामा मी, प्राण ही लाना था। मह दिमागी ते बनाने पालो ने नहीं चामा हो, किन्तु प्रतिमा मे पाना । पोलिपिकी गोप करमे पालो को गाली देने वालों ही मे फिर पिके अमृत की तरह उपयोग के शोप किये। ठीक मी है, कोलम्पस की मात्रा ही में मौनिकता भी उसके अमेरिन मिसने में नहीं । यदि अमरीन म मिलता तब मी रेशम्पस हे प्रमर पर पर, सहस-मास भमरीकाएँ न्योछावर दी। इसी तर 'यो लेकर बाने और इसलिए लेकर साटने के प्रतिमा अगत् में, गति ही प्रमु है और प्राप्ति तो भारकर पत्र, बलदेवता, भौर परसों का मील का पत्थर ही बनने वाला है। मसहाय माश या भ्रमर निर्मास -देवत । . इसी प्रतिमा ने, जीपारियों के मले या पुरे जगत से हमें पीन लिया। हम कारण भार उपाय के दीवाने हुए । भौर उस दिन हमने अपनी पारणा पनाई । लोगों ने कहा, यहाँ रवि नहीं पाता, यहाँ कमि बाता है। किन्तु हमने यहाँ, जातियों यन्म दिया । जो पारणामों के गुलाम मने, उन्होंने माहप बनाया । गा पारणामो के शीरा पर पर शोध में भागे पदे, उन्होंने कला का निर्माण मिपा । पर्म पोला, मे पिम्तन है, कला पोली, मैं कल्पना है । भोर भादम और हाँगा की तरह दोनों देखने लगे-दूर तक क्या है। पदि मया है सो पाने पलो। और पदि पुरा है, संकट, मप है, मसाप्प है सो उपाय क्या है पुरुप ने कहा, 'बरा प्रति मे कहा, 'पलों' । पुरुप मान बनाने लगा, प्रकृति उसे सगाने के लिए मोचन, भवन, और गति के लिए भंगार की 'सान में लग गयी। परिणामतः यहाँ तक कसा माती-धर्म को मी पहाँ तक जाना पड़ता। भाई मेरे, क्या भार ही पूमा राल दागे। यदि नगलोगे तो, पत्र गति, गम-चन्मा, पजम्पापी, पत्र-मर्दन द क्या तुम्हारी फलम से नहीं उतरेंगी। मुहम्मद को इलाहाम हुमा था, अपियों में प्रचय दसा पा- भामा, भाग तो पम-दर्शन सही करना होगा-पन्म के, गौन के, उमार के, उपहास के, पिके, भरपि से, मोदके, मरण के मूल्य पर । -- साहित्य शुद . सन्देश-वाहक सुम कौन हो। क्या तुम मोतिपी हो। तुमने भानेवाले समाने के पात पहले, दिया, उसे हमने मो-पों समय का पा घूमता गया, सच होते पाया । हमने म्योतिष के पारंगत में कमी नहीं सुना, फिर तुम, ऐ पर ! भविष्य कैसे कर देते हो। यदि म्योतिषी नही हो, सो क्या तुम सर्य म्पोति नहीं हो, जिससे दूर तक छ भन्पकारमय समाना कटकर, नामद हुसी हुई अपने उदय की पात पता देता है। भरे, पर तुम सल मषिष ही तो नहीं प्रवे। तुम मतकाल की बातों में सममाते हो, पर्तमान की उसानों पर पचरा गलते हो और उनकी गोठों का पता बताते हो, भोर मषिष्प पित्रण पर,हमें खतरे की चेतावनी देते हो। तब सा तुम न केवल म्योविपी हो, म केषल मोति तुम मा समय के स्वामी, समन के सर्वस हो। या तुमारी ही वाणी में पिस पोल उमप या तुम पालण मुकार हो, यो दुलियों, परावितो, परापीनों और पतितो सोर से पुखर रही है। यह पा सारी फलमें कसार पर, तुमारी ही दिशा में पलने लगी। सा तुम मा मुगा हो, यो पारा माने व प्रमाना लिसने उठ पड़ती है। तुम कैसी पुचर, जैसी करण-घर, कसी पीर-पनि हो, मिसे हम दिल्ली के शाही महलों में, भौर हिमालय, पिप्पाक्स, भरावली भोर मीलगिरी के शिखरों और उनी दरियों में मकाँ सुनते है और सुनते है तुम्हारी शीतल धम को पांगसी+पांग,गंगा, फेटिस, नील, टेम्स भोर मिससिसिपी की तरल सम्वेण्याहरु ता पर बलशालिनी लहरों में मी। सुनते । मन्दिरों, मस्मिदो, गुरदारों, गिरनामों भादि समस्त देवालयों भोर पिस्स की उलमन के सापन पामारों भोर यन-स्थलों में भी। क्या यह तुम्हारी ही वाणी है, जो कलकचा में हमें Inferioritiy Complex से पपाती है और प्रार्थना में मिलीन हो पाती है, उस पार्मना में जो हमें या सुनीती देती है जिसने भाशा का ईश्वरीय सम्देश भक्ति होता है। क्या तुम ाली हो । यदि नहीं तो तुमारी भॉलों म किस वेदमा के मासू है, भौर तुम्हारे मुँह पर कान-सी उदासीनता ! उस समय उप सूरब तुम्हारी बाणीचे अपनी रिणों में गूम कर, सि को तुम्हारे अपनेपन में महला रहा है, तप शाही महलों की भौर शाही महलों की पा से समझनेपाली पिगली की पतियों सुम्हारी साँसों को पौधियाने, तुम्हारी पाणी और तुम्हारे मस्तिस के पासपास Electric-Viro fence पिबली क सारो की पागह पने भोर तुम्हारी प्रमापित भात्मामोघ विजली के फांसी क सम्मो से पिपत्र दमेघ पर क्यों कर रही है। सहस-त्रिए के साय, पिवली की रिणों का यह माम | और इतने कष्टों में मी,तुमारा यह मुरझास्प-यह पिना दाँतो फ मुंह से सिलसिप्पा पड़ना । मग उस पेदना में, तुम्हारी पिन सिनाहट का लााना मी दिपा हुमा है। क्या तुम न हो पोंकि तुम मरा पतन नहीं दरा सस्ते ! क्या तुम पानी का पाम इससिप संभाल रहे हो, कि तुम मुझे अपना मानते हो। पा मरे प्रति रहने गल प्रेम ही ने, तुम्हें करों का परदान दिया है। पर गिर तुम्हारी यह लमधर फैसी ? मैं तो प्रेम में पुकार भोर भारम-समपए भादी हो गया है, में तुम्हार प्रेम की सप्तपर घमर्ष उमे जान। सन्देश-यार साहित्य देवता सन्देश-वाहक हम कौन हो। क्या तुम मोतिपी हो। तुमने मामेबाप्ले समाने के पत पाले, बोन दिया, उसे हमने मोम्पों समय का पका घुमवा गया, सप होते पाया । हमने मोतिप के पारंगत में कमी नहीं सुना, फिर तुम, ऐ पर ! मविष्य कैसे कर देते हो। यदि मोतिषी मही हो, तो क्या तुम सस्प मोति नही हो, निससे दूर तक का अन्पचरमर ससाना कटकर, पा सदर छुपी हुई अपने गदर की बात बता देता है। भरे, पर तुम केवल मविणही तो नहीं करते। तुम भूतकाल की पातो में समझाते हो, वर्तमाम की उलमों पर प्रकारागसते हो और उनकी गाँठो का पता बताते हो, और मरिष्य का विवरण कर, हमें सतरे की तलनी देते हो । तब क्या तुम न केवल मोतिपी हो, न केवल मोति तुम मा समय के स्वामी, समय के सस हो। पर तुमारी ही पापी में विस बोल सठाक्या तुम पर कल्प-पुकार हो, बो दुलियो, परागिता, परापीनों और पतितों को ओर से पुकार रही है। यह क्या सारी कलमे SITE पर, तुमारी ही दिशा में पलमे लगी। क्या तुम पर मुगा हो, यो सारा जमाने का प्रमाना मिसने उठ पड़ती है। तुम सी पुकार, कसी कराण-प्रश्वर, सी पीर पनि हो, जिसे हम दिशी के शाही महलों में, और हिमालय, पिग्भ्याल, अरावली भोर नीलगिरी के शिखरों और उनकी परियों में पसा सुमते है भौर सुनते है तुमारी शीतल पूम का सागसीपांग,गंगा, यूरेटिस, नील, टेम्स और मिससिसिपी की तरस . सम्बए-पाक साहित्य देवत . पर पलशासिमी लहरों में मी। सुनते है मन्दिरों, मरिषदों, गुरदारों, गिरगामी भादि समस्त देवालयों भौर पिस की उलझन के साधम पाचारों और जन-स्थलों में भी। क्या यह तुम्हारी ही पाणी है, यो कलकत्ता में हमें Inferiontiy Complex से पपाती है और प्रार्थना में विलीन हो पाती है। उस प्रार्थना में जो हमें पह पुनौती देती है जिसमें भारा फारिपरीय सन्देश भक्ति होता है। क्या तुम दुमी हो । यदि नहीं तो तुम्हारी भाँतों म किस पेदना के मासू है, और तुम्हारे मुंह पर कौन-सी उदासीनता | उस समय मप सूरब तुम्हारी पाणी को अपनी किरणों में गंभ कर, पिस को तुम्हारे भपनेपन में नहला रहा है, तप शाही महलो की भोर शाही महलों की सपा से समझनेपाली विसली की पपियाँ तुम्हारी भाँसों को पौषियाने, तुम्हारी पाणी भोर तुम्हारे मस्तिस के भासपास Electric-Tiro fenco पिमली के तारों की पागा रुपने और तुम्हारी प्रमाप्ति प्रात्मानों का विवली के फोसी के सम्मों से पिपत्र दने का प्रयन क्यों कर रही है। सहस-रिए ये साम, पिपली की नियों का यह संपाम | और इतने करों में भी,तुम्हारा यह मुपदास्प-यह बिना दाँतों के मुंह से सिलसिला पहना । उस पेदना में, तुम्हारी सिन सिलाहट का तमना मी पिाहुपा है। सा तुम न हो क्योंकि तुम मेरा पतन मही दरा सस्ते ! सा तुम पनीकन पोम इसलिम मास रहे। भूमि तुम मुझे अपना मानते हो? कपा मेर प्रति रहनेगल प्रेमहीने, तुई करों का परदान दिया है। पर रि सुमारी यह लमघर पसी । मैं ता प्रेम में पुषचर और भारस-समर्पए प्रभादी हो गया है, में तुम्हारे प्रेम की सतपरमे गाने। + सन्देश-यादक --- 50 साहित्य देवता । क्या तुमारी यह लमधर कोई सन्देश लेकर पाई।- अपना पप बदल! मैं तुमे, भोर तेरे जमाने को पदलने के लिए पाम करूंगा।" भार, तुम पर बरसनेवाले निम्दा के अंगारों और दॉप-धात के अन्तर तम पेद गलनेवाले पहारों के बीच भी युगों में अनन्त सम्रापारिनी पाणी को नहीं पदलते। प्रत्यक्ष के पिनौनेपन के प्रसूनों को, यह जिस भरस्पर फिन्तु भालों में दीसनेवाले इंसान में से पते । पातक भोर प्रोही भन्तरतम को, तुम यह कौन-सी प्रतिमा की याद दिलामे लगे। बीनन की फरता को ककरियों को प्रेम के रस से भरे अंगूर कसे बनाने लगे। पतन के लिए प्रस्तुत पुप्प का, पवित्रता की सूची से बेदकर, या कौन-सी मासा पनाने लगे। पारुदी तमीमत में मनोगों के करों को मिलाकर लेदा कर देनेवाला कौन-सा पानी बहाने लगे। रायमुझटों को म्पाय केटो से इस तरह गोषमा, गदार दस का निम्मेवारी से मन पनाना,पापों की बाढ़ से परापाप भौर पारम-मिषेदन के बल पर पाबाना भार अमिमान के गले में नम्रता की बनमाला पहिनामा- तुम अपनी वाणी के प्रमाव से कर रहे हो। जैसी अनोसी है तुम्हारी पा पाणी। तुपारी पासी । पारतमन्दों व विसास है, काटमोगियों उभाराम, पीमारों की सेहत, गुलामों की प्रासादी। तुम म तो रामा हो, न रामकुमार हो, म पर्माचार्य हो, न लेसकपा पम्पधरान तुम्हारे पास भापर है, म तुम्हे नियम के पदक और पद ही प्राप्त है, न तुमने सम्पदाय पला कर पसे ही पनाने है, फिर मनुष्य, सम्देश-वाहरु साहित्य देवता । . केरल मनुष्य के नाते तुम्हारी वाणी में इतना पस क्यों है। पर पाणी वध गुनगुना उठती है तब पिरष वायला होकर उसे हराने लगता है, पेपैनी से मरी हाती तब विस की 'पीर' यन माती है, क्य बहादुरी की भाषा पनती है सप भूमण्डल के दरों के मारो पदल देती है पौर जा पश्चन्त में निकली तलवार के म्मान में रपन की तरह पुन गुनगुना पाती है, तब परपाचाप, प्रायश्रित और भारस-निवेदन में मरी होती है, यह किमकी पाणी है। तुम्हारी भाग से रिस उमाला भार सम्हारे पानी से हम पर पानी, किम्त तुम राजगारी तरक्षेचा या पेदान्ती मही ।। शिति, पल, नम, पापक, पान मले ही पिव पनामा करें, परम तुम्हें इनमे समी तक मतलप है सम तक ये मानवादय में उमगल, उमा भौर सुनहला निर्माण करने के काम भा सके। तुम कपि हो-पिरसादय के गायक । परन्तु हम हा पिना पक्ष किपे, पिना गाने कवि हारे मन श्री पलान् उपान पुयल भार सम्हारे समोघ पिस पनानेवाला पित्रण म तुम्हारी पाणी या प्रत्लग के पाट उतरने लगता है, सप मप्र पनकर सरस्वती भरनी मपि स उड़ा स गानमाले, और रसों से विस चरालनेपाल रससिद पनि हाकर तुम्हारी भार देसते भोर कर उटते है- -इपिपिपी परिभू रपम्भू तुम उपदेशक नहीं हो। म सुमने मन्दिर पनाये, न कमार पड़ी, म कर्मघर की रायद ही पर अमल किया, पर पानी दुनियाँ तो दण। तुम्हारी पाणी गुनी मही कि कसा पदरा गई स्मृति के पहले पंप गये, ++ सम्बेरा-याहक पा-१२ शालित्या और तुमारी एक-एक मात बीवन में उतारी पाने लगी । तुम रागा नहीं हो हमारी पाणी कारण बनकर, म लोगों पर राम पलातीन लोगों के लिए कारागार बनाती, न लोगों को बर्दस्ती मानने के लिए बाप्प करती, इसके सिमा न तुम्हारे पास सेना है न लगाना । सुम्हारे पास तो अपनी वाणी- मात्र है-फिर उस पासी को मानने वालों की तादाद पहे-पो भनेक राम्रो से मी भाषिक क्यों है, भार तुमारी भाशा से सूली पर चढ़ने भौर कारागार में जानेवाली करतना पड़ा सा क्यो । म सिपाही मी तो मही हो। न तो तुम्हारी ताकी बदी है न उस पर कार तमो लगेरे, म तुम्हार पास पन्त हैन उसम मरे जानेवाले कारतूस, न तुमचे 'हन्ट' से साा रहमा सिलाया गया म कलामद फर नाप-कूद मचाना, परन्तु सिपाही की तरह, अपने सस पर प्रार देने की तुम्हारी मस्तामी तैयारी किम सेमिक को गरमीला नही कर देती। महा ! राजा, सैनिक उपदेशक सतमेपण करि सिपाही-सब अपने माम पर पोलते है। परन्तु तुम्हारी पाणी1 म तो अपने शब्दा को प्रमुके नाम पर पोलते हो। वो लिखते हो, उसमें सम के मुँह की कालिमा पर मी-भगवान् क स्नेह का सपन-स्फरस होता है। पाम पिरप के सौमाम्प-साम्राम्प के मन्त्री नहीं हो। मा तम अन्तरतम क अनस के सन्दरा बाइक जीवन-दूत' मही ।। क्या हम पाप के कुम्मी-पाक में पार र, प्रमु की पाली की पी करनेवाल, रात मही होगरामा यो अपने से परे किसी की सपा मही मानता का उपदेशक यो प्रमु के भसिल के पुरे प्रकर अपना रोजगार पलाता है और वह तत्तरेचा, को अपने अस्तित से भी प्रमु के अस्तित्व को कमजोर मानता है जैसे तेरी वाणी साद पा सके, मेरे मिटमे का उम्माद पा सके। सम्मेए-पाक + वता तुम तो यह हो मा भाम् मरी चौखों से मी, उस संकट को स्पट देस सकते हो, गो तुमारे मन भौर समाने पर लूम रहा है। तुम उसकी सान हो जो मोल मही साना, उसके साम, चालिस मही सकता । उसकी पेतना या प्रसंगठित भार तितर-बितर पड़ी है, उसके पछील या सब कुछ पो दुध, उसके रक्षक यो पलवान् की कपलम से परने के लिए घटपटा रहा है। तुम शिधरी के मीर के निशान पर मुग्ध नही हाते, लपके भेदित हाने के पहले सपना हदप लगाते हाम माटे पेट, और अमीर्णवाल पनी के माम नहीं घुमते, मग से मरते हुए ग्रे, भून पर राटियाँ सिनानेवालों में तुम दीस पातेहारतमन्ने मार से हुमो में तगारे दर्शन हाते है उनमें रूरतमन्द गरीब होता है, और दषा हुमा लेंगहाही तुम्ह मदद मिलने से पाप, पम्हारी मारी महामता और शकि की परीक्षा होती है तब भी तुम उही के माप रहते हो। परन्तु वहारी पाणी रुकती महो, मुफती नहीं, पों। इसलिए कि तुम प्रभुक सन्देशवाहका देवत पेले-रेले का पागलपम प्रेम, साहिल के जगत् में, म की दम को लेनेपाली मीठी स्नुि पुरुपाममी सुकोमलता का नाम है । जीपम की सापों के उदय और मस्त को नित्य की मपीनता की ओर में गंगकर, सतरे की गोद में निवास करने पाले भनहोनेपन के निकट पहुँचना और इस पहुँच कर, सूर्य किरनों की सर निस्प अस्त होकर मी, फिर-विर र ममा पासपन पाना-नहीता 'इस जगत् के प्रेमी का प्रत्यक्ष प्रेम-सस्म हो जाना है। रामती के सदों में प्रेमी वह को प्रेम पर मरे, प्रेम या जिसपर-पिसकी अपौरुपेर राति पर, स्नाकी मोतप्रोतता पर और पति की चितिनकोछलेमेपाली सामर्प पर,-जगत् मर-मर कर रह गाय दर के मम भापार यही कहा पापगा । इसे कवि काहिर, पोरा फरिर, योगी कहिए, पनि काहिर पारदम पाद' के पुग में उसे बदन कहिए। (मा) प्रेम उसकी भागीर है, प्रेम पर उसी का एक पत्र भपिकार हो सकता है, जिसने अपने अन्तरतम की सामर्ष ते प्रेम की प्रलेक गतिविभि- उसकी सामों की मामु, उसलारियों, उसके मारों के पस पाने के सेलो और उसक बलि-कोरामों को अपनी उम्पल उदाधीमता और पेदना मम मुसाधन में बाँधने कर अभ्यरन मिया है। सस्ती लगम और उम्मल समर्पण, दोनों ही इस विनयी की प्रग है। अनन्त प्रेम काप अपने पास रान, और समाधि के माय की गति से अपने अन्तर के पगत् भौर भास - बैठे-बैठे का पागलपन ++ मालित्य देव ता पास के मातामरण में पढ़ने पर मी पा, उस कोप की कोई वस्तु सदय का पोम पटाने, भार नपी वस्तु के लिए स्माम पनाने के हेतु पाजार में नहीं रखता। हदय के भन्दर ही सौदागरो का टोटा कहाँ मिनपा के रिसर, मर्मदा की लहर, पेतवा का कलकल, मोर का गायन, मीन पर सुलीर, उदय में गहनवाली भायें, तमा एली का लालप,-पे सम सौदागर पाहर कोई परसभानेही कर दी। और उस बागीर के उपयोग में, प्रेमियों की 'उदार मर्सी' भी अप्पयन और दुलार की पस्तु होती है। उस जागीर की प्रत्येक पस्त, प्रत्यक पहरू, मापो के भगवान पर पढ़ती रहती है। उदार कह रसलिए, कि दान क समय पास का नहीं रसा माना और कस्सी उसमें इसलिए, कि पर और घश करारे संग्राम करके मी उसकी लहर का पात्र पर नही परसा पाते । इसे तलवार का पार पाहिए, क्योंकि उरभान र भतिरक और पतन के प्रारम्भ के बीचोबीच की हलकी रेगा पर पदर पलना होता है। पार और पितवार दानों रहस्यों में एक ही परम् पिना, भन्तर अनन्त निषियों का जगत् से छूटकर मले लाया हो, अपन अभिमत 5 सम्मुस रम दगा । और दूसरा उसके सामने कमी नहीं रसंगा, जिस पर उमन मानी लूट मात्रमापी है। इसीलिए पार पतित है, उसकी रति मारा अपराप की परापित प्रमा है,पर प्रेम-पथ कोदी है। पितबार भरन माम यापों और परदानों को अपने भाराम्प पर पदादता है। पर सारिस तागा महार में एक मरीह जोपबत-पातामा होमर बहतीह। लेप . पटेर पर साहित्य देवता । मोर साये पर निशाना अपमेही पर मेशता है। रूप, गुण, पन या प्रमाण किसी भी कीमत पर उसे नहीं सरीदा जा सकता | अपने समाएर में पर सूरब है । भपनी सितारों की दुनिया का मामतारा है। अपने पारा कर यहाँ पर भातप है, यहाँ पर पाबस मी है, बसन्त मोहै। की प्रेम राष्द चे मोर के जगत् से इसनी दर तीपे ले पा रहे, यहाँ तक विकार नहीं पहुँच पायेंगे । तलमान मे असफल हराकर यहायुमा नीचे रख दिया होगा, वही से सने कषि ने उसे उप लिया हागा । बदि मकि सपमुष कोई-पी पियानन्द के शगों में योग हो, तो उसे, मानों के इस दीवाने के दार माश्नि पनर राना पड़ेगा। भोर मुक्ति मेसी सुली,समन्द वस्तु को गरम बनकर, अपने पत्तों पर, इसी दीवाने दमता की प्राण प्रतिप्य करनी चाहिए । भोर मदि कोई प्रभु रहता हो, तो इस मतिरेड के पीमार से दूर पहा रहेगा । किस भाया से। सो, ममा कवि के निम्दा रहते, प्रेम पिचर के निकट ले जाना, पगत् की साम पटमा नहीं हो सकती । करि केहाबों जाने देर प्पमिवार में प्रेम को सर्पमा जापाने के लिए कोर दिया। अब पराब पाने को मही। भोर मदिया दोमो रूपों में है-प्रेम के रूप में भार म्पमिवार के भी-सोपहाँसिन्दा राम्य हो। राष्ट्र भदरों ही से पने वेपारे यहाँ घसीटे पाते है-मासको है। परम्न जाने पिके निष्ट होते है तब भपने गौरस के पूर्वमार ने भमुमा करते है। उनके कदम उठाने पर हर्प में भी परप्पनि होती है, पैठे-बैठे का पागलपन ++ साहित्य देवता पेदना में भी मसाक मुकत है। मुसान पहा मीठी होती है भार वहाँ उससे मी मीठे हो जाते है। प्रेम राम्द भप युग परिवर्तन की यमुना की लहरों से मांगना मारा भौर मालिक विचारको की पूर्तियों उसे पधार, नपत्रों को पार से ला अननशाला पना रही है, मताभप बह माया मर तासापों में भैसों के साथ नहीं मार सकेगा । पहाण की संगशे की कीमत पर मी पाँसुरी की पुन में भय कटाच' गाता सहा म र सफेगा। मार्गात ही गारेगा किन्तु समाने का माम्प सिलेंगे।
यदे अक्षत्रधारी पुरुषार्थ सम्त विनोबा एक बार उन लोगों से माराज हो उठे, जो अपने साहित्य को दुपा कर रखते है। उनोंने इस बात को अपने प्रपनों का सुद मोगमा पतामा । में तो इस भरराप का भारानी ही माना हुमा। स्ति एक उलग्न भार मी मेरे मन में म्यूकीर है- पप हर पचा पैदा होने के पश्चात् भार दिनों छुपाया जाता है। हर विचार, पच्चे की अपेक्षा अधिक दीर्घजीवी या भमर बनाने की साप हो, तो क्यों म पुशमा पार । विपारों के पातक, धनों से रफ घुसते है और भासों से सब राखते हैं। यह करियों के पदनाम प्रेम के अगत् की पात नहीं है। मेरा तो पिपारी कि जो लोग पोलने का काम किया करते है, ये काम का बालना बहुत कम पोल पाते है। पर सच है कि विचारों पर भारमण करनेवाले घमा महीं मानते और विचारों के हिमायती विचारों की रक्षा के लिए अपने हदय को मिला तो क्या मापड़ी मी नहीं बना पासे । तब पारीबिम विपार-वनमी का अपने नन्दमम्म के गोपन पर संगोपन की तबरदारी रतनी होती है। उन्हमा चार महलाना और सुरसाना हाता है। विचारों का प्रयनन पेरिसमार होता है, माना, किन्तु दा पातें स्पी। एक तो विचारों का शरीर सुमग, सुमरा, सराक हो और दूसरे, मुग केहदम में उन विचारों पापा सके। दुर्गा पूजा में मिट्टी के पटों की स्थापना का विधान है। हम इस समय साँस लेते हुए मिट्टी के पटी की स्थापना क्यों न करें। और बाजार तेल का मन्दादीपक उनके मस्तक पर सुलगाने के बगाय क्यों म मस्तक में प्रशसपारी पुरुपार्य ++ ५ ही स्नेह-दीप सुलगाते हैं दुर्गा सिंह साहिनी है। ये मे शकि- पूना है, जो अपनी दुर्गा को मसिह पाहिनी नहीं कहते । मरे रिपार से तो साहित्य की दुर्गा जमीन, माड़ियों, मदियो सराबरों, टीलों, टेकड़ियों, सेतों, सप्तिहानों यानी राष्ट्र का सिंहासन पनाती है, संशति के गहने पानती है, उमा-पुमल का राम-दरार पारण करती है और मुस्ट को ठुकरा कर किसी पाति के संकल्पों का, गरीयों के पीरों में उगे हुए पलो चहार अपने जोस बॉषती है और समस्त राष्ट्र के निपासियों की भात्मा का वस्त्र पहनकर मिपाशीलता क साम पंठ गाती है। गदि दुर्गा यह मही है ताहिर हकीन है मा दुर्गा है। सम्पदाय के पन्दीलाने में पन्द करके हम भएने ही बनी अपनी दुगा कमहीन भौर कामर तसपीर स्पों पनाते हैं। बम डिसी एक देश का निवासी किसी दूसरे देश के निवासी से मिलताहेता पर जोषित म्मकियों से पातपति परता है। हिन्तु नही म्पति जम हमारी मातृभूमि में भाताई तप हम पापों की पानी पलाम रसनेवाले लोगों से कुछ मही मोजता ! यह हमारे राष्ट्र के सपगारों से कानासी करता है और हमारे राल पर मस्त होने के पवाय रातान्दियों के सहार मारव के मोबपत्रों और कारों का पद-पद पर मस्तक उलाता है। यही फ्यों उन पत्मर लधरों भोर भाग-पत्रों पर लिखी हुई पक्रियो कोमा मुस्मान् समाने की तरह अपने साम ले जाता है। उस समय महामसे मी एक नमलता है। भोजप? गौर शिलाभों पर लिसे र हमारे माग्य की प्रतियो घरल भार गायों में पढ़ाने के लिए हमसे मामा होनेवाल घाम लेता है। जो कार पाम्य हम पीठ पर लाद सम्ने है, मसक ++ अशापारी पुरपार्य Eo সানি, पर नहीं। हम नाराज होते है कि हम समीयों की सूप या परिचमी जग सनी उपेक्षा करता है, किस उपेक्षशीम हम, उपेक्षा से अधिक के पद हमदार हो। नालन्दा भोर पैशाली, महाबोधि के तपोवृष घनकर एरिया के अरमान और जगत् के संकेत-पास है। यदि हम अपने पीप से गांधी भीर रपीद उठाकर एक तरफ रख दे तो हमारा माम्प किसी लिटिरा अदालत में लावारिस और दिवालिया होने की दरस्पास्त देता नकर भागा । फगत् में अस्तिखों की उपेक्षा महीं होती । बा हम देखते है कि काशीपसाद जायसवाल के परमों में बैठकर परिपम के लोग हमारी संसति और सम्बता की पाक मामते है, तब तिनी पार हम अपनी गाति में, भारतीय वाप्ति में भनेक मीकाशीप्रसादों का अपने रदय के अन्दर भारमदर्शन करते है। किन्तु हम किसी पाान् वस्तु पर भारमदर्शन तो तब कर सकें न, पर हमे अपने पारमसंकीर्वम से भसकारा मिले। वायसवाल बी अपने तप में स्यसीए कि उगोने मारतीय पाति की राष्ट्रराफि, राष्ट्र-गौरम भौर राष्ट्रीय-भादरी को लहरों के पत्थरों और सदियों के सरे भावपत्रों और त्रा में से सही-सलामत पीषित निकाला। किन्तु एक हम है, सिमामे पारसमाम बी भोर चमके से पम्प प्रयत्नशीखों के रुष्ट-साम प्रमलों पर अपनी बेबानकारी के सरदार सरेर दिवे ममास पर शकिरसनेवाले सूर्य की किरणें मी मर्यादा के सिताफहमारे कमर में प्रमेय नही कर सकती, पदि हममेद्वार पम्द कर रखे हो। र प्रतिमा की च और सांप साहित्य देवता । इतिहास परुष मालोक लेकर फव प्राणपान लोग भावे,सब हमने पन्ने पेपर पुस्तक प्रवरान करनेानों से अपिक कदापित उनान मूल्य नहीं हता। ये राष्ट्रीयता के संकेत युग में इतिहास का सन्देश अपनी पीठ पर लाद कर भाये किम्म हमारी पिहीनता के प्रारी हमारे दस-दार पर तरे १ भौर मे हमें हास-विलास क दिमागी पक्रनों से पार पाझर तिहास के उन गार संकेतों को न हमारी बातों पर पाने देते है,न हमारे सदर में प्रवेश करने देते है, न हमारी कलम पर उतरने दते है। फिर युग की जरूरत के अनुसार हमारी जाति के जीवन पर उन संदेशों के उतरने की पात ही दूर है। हम तो अपने देश के साहित्य भोर सीवन-निर्माता की बात को पिपित्र तरह से भूल जाते हैं। किसी पिन्तक हमारे पीप हाना भमिसाप है। हमारे पी पिन्तकों का माना उसी तरह मिस वर गायक भरना गीत गारे भोर मा पनी भुपद की तान जोर से सौप द और गीत के पनि बीपी उसी यह तान पर पाप, तो हममें से किसी के पास करठ नहीं कि गाय की मागे की रियो भनी सर-नारी से गर्मपूर्वक सपूर्ण कर देभोर भपने कएठ की तरलाई पर राष्ट्र के मस्तक हुलवा ले । स्वामी राम जैसे साल भीर मिद किरमारे बीच माना और पाना एक ऐसी ही पात है। हम उस सरम गायक की सर-महरी से राप्द-मारती का भनि पेझ न कर सके। प्रमो के सपनों के भादी हम, स्वामी रामक कपन में भी मुनि गीत दने के पाय पेदाम के पम्पन हने लगे। तम राम की बॉमुरी प्रसाद हमारी नसों में पनप ही मे सना है। एक हानी में राम ने कहा कि पन भाम के ममा पर पंडे या नीम क ए ++ मगरमपारी पुरणार्य वता मार पर भरा सूखा हो पा हरा हो, और फोर मन्पर भाने पर भाड़ों के पचे किंवा या मों की गलियाँ जेपी-नीभी हो, पे टूट मी मलेही पाम, चिन्नु कोकिला का भमिमान को गलागेल नहीं होता। यह पानती है कि उसका पतित भीत्कार करनेवाले पचों की माँगेल होती गलियों पर अवलम्मित नहीं है। दस टन की गलियों की अपेक्षा सका तोले बबन के अपने पो पर उसकी राफि और सतन्त्रता का गर्ष भता है। हमारे पील किसनी सादिस्यकोकिलार है, बो भपने हिलते नुसते पामय-सामो से म पगड़ाकर, अपने पड़ोस भनेक भन्मो को पीरकर भपमा पम बना में और अपने बन्पन-देरा से मुफि-सोक तक अपने पाने की ऐसी सही रेसा सींच दें, जिससे समस्त पापान तरपाई मुषि-देश का पर पा से। हम अपनी इस पादत स्पा करें। सदि किसी के दोप सुनता है तो दरम्त मान लेता और उस भद्रम्प को पेट में लेकर फिर पाहर लाता है और अपनी साहित्यिक पीढ़ी को उस निन्दा-निपि की खैरात पॉटता है। संसार के दोषों का मैं बिना प्रमाण सरल विरपासी होता है, और यह चाहता है कि मेरी ही तरह मेरा पाठक मी मेरी लोक-मिन्दा पर विश्वास परे। किन्तु यदि में किसी के एण, किसी की मालिकता, सिसी की उक्ता की ममता है तब मैं उसके लिए प्रमाण पमूस करने के सहार लेना पाहता है। यो कलाकार अपनी एक त मेरा को पाहन बनाकर अपने सम्पूर्ण सप्नो भोर इरादों को लेकर बैठ गाता है, जो सूरर और चाँद के प्रकार के सार होमनाही करता है,गोभपने पादर्शया भाराप्प की शान मिल गाने के लिए अपने प्रपल के टेसरों को पोड़ा करता है,मह मिन्दा मालपारी पुष्पार्य मालि य के महाया में साता पनकर कैसे प्राधे। उसके अंगों को तो समग्रम ही पनामा पा सकता है। यदि हम प्रेमवादमी की कमाकी माप महार पाते तो अपने भाकलन के अपराध का दराड तो उन्हें देही सकते है।यही हमारा पितृतर्पण हो रहा है। भौर, नकद-पर्म के उपासक म, उसे गीते पीही कर गलना चाहते है। यहाँ मी ऊँचाई को दमे के लिए अपने मम्तर की भेगुली मही पहुँच पाती हम सीम उठते हैं। भार, पे बिन्दु को कोसने लगते है। उत्थान के भमान और पता की पराकामा स मरा जानेवाला मेरा मानसिक पेट व स्वयं ही भास्मप्रकटीचरस की मूग अनुमय नहीरता तव औरों की ऐसी पेदमा की मेमेरुद्रक सिकर पिसारोप हो, गिसकी माता पडता हो, गिसकी पहन भविचारपूर्ण भात्म पाहा, मिसा माई परिणाम की गम्भीरता नभमान हो, पर और पाहे पोप हो, साहित्य तो मही हो सकता। मतभेद सोराने सामारिक है। पार्श के भिष-मिष होने से पप गीत में मिठास प्राप्ता है, तों और पुष्पों की मिमिमता में जप मारा गीला मार माता और संसार के सातो रस मिलन नाफ उम्मान रमपना दते है तब कौन हतामिलिभिवता में एकता स्थापित नहीं पा सनी मतमेद प्यारी बस्स है। रिमा-दीन समर्थन की अपेक्षा ईमानदार मतभेद अधिक मात्यान है। जिन पाहो मतभेद । बदला महो। भोर मया मारना हो, सिप में पीछे पड़ गया हूँ इस नन्दन को सा स्मशान ही पमार पोरगा। बप एक ही मनुष्य के जीवन में भनेर मात पदलते भोर भरना मा मत पनने के समय भरने पुराने मत रसनेमाल मसित पापा सर्प कोई दवानही पता परम भम्पों से मतभेद से पो उप मरानपारी पुरपार्य सा द उठे। यह सम्मान किनो विचार भाव हमारे हातमा पाद हमसे मतमेद रखने वाले के हो, और यो विचार भाव उसके है। किसी दिन हमारे होगा। किन्तु यही विचारों की है। सा भोर विकारों के लिए मही। मस्त । मैं तो कोमल और ललित साहित्य के समस्त पहारक मित्रों से कहता है- 'पनुगमय परि गात परो । हम एक पात वो स्मरस रसे । मन्त्रों के नियमों का निममन मठियों के म्पयहारों से होता भाया है। सर्व भागों में भाराप्प, भादर्य मा प्रमु कुपकर नहीं बैठता । दिन दिनों तरूणाई लोहसरों को तोड़कर मुफ होने के लिए पटपटा रही हो, उन दिनो हम प्याकरण भार पिल के नियमों के टूट पाने पर शोक प्रस्ताव पास न करें। यदि हम अपने और अपने से पहले के जमाने के पतन की ईमानदार किस्त देने के माम्म नहीं है, तो मस्तानी तरुणाई के भागे पड़ते र पैरों को सदियों भौर परम्पराभों से गाँधने का हमारा उपोग हमारे ही सौमाय के तिलाम हमारा विद्रोह कहा जापगा। विम दिनों हम कीर्ति और धन की ननदारी लोलार समस्त साहिस्पिकता को अपने पैर में टीक बैठनेसाले की पर पमा रासमा पाहत हो, जन दिनों तोसे लाद की लतीतात्मा जी, मीरा के से उन्माद , पण कीती निर्माता की, हमारी हिमायत ईमानदार हिमापत नहीं दी जा सकती हमने यो कप अपनी कृति से निर्माण किया, पर देश की पराधीनता और साहिल दिवालियेपन के अग्रसपारी पुरुषार्थ ૧૨ साहित य-देवता रूप में हमारे सामने है। यदि हम पतम के खिलाफ विद्रोह म कर सक मो हमें पाम अपन सिलाफ विद्रोह स्वीहत करना चाहिए। में भौर पर्मन, रूसी भोर इंगलिशनके साहित्या का मादान प्रदान है। भाईचारे के मेंट भी सर एक मापा दूसरी मापा से यदि रूप लती है तो कुछ देती है। किन्तु हमारे साहित्य में तो हम मिसमंगों की तरह लेते ही लते है। दने को हमारे पास क्या है। गा हम अपने देश होकी मापाभों से मादान प्रदान कर सम्पप स्थापित नहीं कर पाते तम परिषम की उबत मापामो से तो माईचारा या स्थापित करेंगे। शाम ही सार विमेवाली है। कह लोग शान्ति का निसरेरा पुरमा पापन कर रहे है और कुछ लोगों के साहट यहाँ मालूम होता है, पाहे षटमा दुनिया के किसी भी हिस्से में पटे। मैं तो इसे साहित्यिक मास्तिकता कहता हूँ। मैं ता सपना देसता है कि भगरेशी भरवारों के तार, समाचारों की पठन और उनकी विरोप बातों की अपनी भाषा में की पदा महल पहमें सम्तोप मदेस भार हमारे तरण सहाई के मैदानों में पहुँचने की कोशिश करें। मुझे तो एक क्रियाशील तरुण घ मुखाशों भौर दुनिया के घटनास्पलों में माफर मपनी मापा के पत्रों में सम्परा मेगना भोर पहाँकी परिस्थितियों पर प्रम्प लितना सम्पूर्ण साहित्य सम्मेलन के एक अधिवेशन स अधिक मासा मालूम होता है। युदक्षेत्रों में हम गूंगी मड़ों की तरह पार से मा बसाह से कट जाते है। जिन्तु हमारी पानी हनेगला भर नहीं आता। शासन की रिपमता से भारतीय मान राग्न मही हसरता। भोर राव रसर कार मारतीय, मान के पास नही या साता। मता की भाभौर पर की ममता के साप यह पिमता साहित्य के लिए । ++भरामधारी पुरपाप साहित्य देवता राहु और केतु हो रही है। यदिहमारे सनाशील, किनाशील, साहसी, साहिलिक तरुण पाहे तो अपनी साहित्यिक तेगस्मिता से सिर और पाये लगेर एक सम्पूर्ण मारतीय मानक का निर्माण कर सकते है। समुद्र से हम दूर मझे रहें, भिन्तु इस पात का मान तो हमें बल कि हमारे देश के सीन भोर समन्दर मारें ले रहा है, उस पर नौच मी पा रही है,मापारी पहास भी दाह रहे है और यही वहात मी समन्दर की छाती खेद रहे । या हमारे सातामों की मनमो ही पर यह परिस्थिति माहीं उतरती, सब लोगों की बॉलो में दौड़ते र महापाला समन्दर का माया से मुझेगा। और इस समसत परिस्थिति पर अपना कमा करने की रक्षा से वापत् हो। लकड़ी की मात्र पानी पर तैरती मी, और लोह के महल हवा में तैरने लगे। क्या हमारे पास ऐसा साहित्य है वो इन दो समानों को सीधी सही रेता सोचकर जोर। स्वाद के समान में किसी पुस्पार्ममय मिठास पर हमारी तस्साई सलसे, भोर का लालन साहित्य की कसम पर कैसे उतरे–पदि हसाई यहाजों पर हमारी तरुणाई, न दौर कार करने में उत्साहशील हो भौर न मिसलकर गिर पड़ने पर पुल्पा घमौहार मनाने याम्पा हो। हम बोहो या पाटे हमने पर-पर भौर पकिम्पपि में मरने पर पोया है। हमारे लिए मार गलना ही गुनाह नहीं है मर गामा तक गुनार हो गया है। पुरुप का लेसह मां से मई मार पर दीपक की तर स्पष्ट और गणित के प्रोजैसे सुलझे हुए विचार पाट करता किन्तु पुरुषार्थसम साहित्य और पांच बोम हमसे मही संमलता। हमें राटिया पाहणे, राष्ट्र नही पारि।पही तो कारण वोहम कमी-कमीप है कि प्रामपाप पुरुपाप
देवता
साहित्य पारि,राजनीति नहीं पाहिए भार के साहिस्पिक चिन्तन पर
सिम्मेवारी किया परपादानों हाथों में लाकर पीने सतरा भार
मरन का साद अपनी पीड़ी में पाये । पर पुरुषार्म रामपारी से मही हो
सना | पह तापम के पनियों के ही करने का काम है।सी
इसे करें।
राति देवता योगी मदिन पर, एक कहानी सुनी थी। पारित के किसी करि के दिमाप्ता की उपबनी। पर तिथि, उस किसान का नाम, उस कवि का नाम, और स्मृति के दीपालसोरेपन से उसके मुनामेवाले की सूरत, सब कच, मेरे मन से उतर गईमानो बीते समम के म लौटने का समर्थन करती हो। दो पकियाँ मी मिट गई-म्रग की करारी मिणो के पड़ने के पाद, सीई अमृत पिनों के निशान कैसे है। एक नागी मा, रंगीन-सा । मुस, पैन प्राचार, विचार, उठना, पैठना -राम भादमझात जैसा । मौसत भादमी, पतन उसके साम सेजता-सा, उत्साम सूरर की रिसों जैसा दूर दिलाई देता। मानो उस योग उसकी 'समम' में मा। राम का देल, साबका देवता, और समाज का मानव, सीना, उसका समर्थन म ते करते मी कसे इतिहासका सस होनेवाली पटना भाराने ही म लगेगा । पर तो हा पुच्ने पाली पटनाभोस इमली के वीरों पैसा गिनाइमा हिसाव है । तब फिर, योगी के बोग को कई मीन से मी से देख पाता। गोंहों और मीलों की नगरी-नगरी में एक पहा-सा परपर ही पादर' करलाता है। सिंदर के रंग से रंगीला--भोर मारिलि लोक मात्र । तिने परमो पर इस देवता के माम पर नहीं होता। मकोको को मापसाद पाहिए। रंग देखते ही रच-तर्पण समता । सोगी सालित्या ता गागी बरदान देता सग पर बोल उठते । (४) योग परि-पीरे पहा-सा मापार बन गया। जीवन की भस्मिर शहरों के नाम हुपियाँ लिली जाने लगी । 'मा, गोरा होगा', 'या, महाका मा', 'पा, विमयी हो जा', 'गा, तभमर हो या । लोग दंग मे-या अपने भाप मीठी पोइस पार से शराब नहीं पिलानी पड़तो- 'इस मिटास से पाली में दुर्गन्ध नहीं पाती। इस मिटास में कर दी पाते-परेर मिट जाते हैं। इस तरह मितने मुस, उतनी पावें । जोगी फूला, लगातार शियाँ लिमन लगा । पर गड़े में 4ठा मा,-गा उस तट कागहमे दस पाता । अपनी 'परिमितता' का उसे इतना उम्माद कि उसे तीन बोई सममता | मला ऐसा जमाएदोन मायक्पा गाने कि दुनियाँ उसकी सीमा के मी पो है, और उसकी हुरियों से मी भषिक पनी है। एक पान भाई, एक दिन | इसके पहले और गाने भा पुत्री पागी की शोहरत थी, कि उसके आँसुभो । सर पर टपच सने के बाद,-- मिट्टी मनरालपोकीमातामों के पिष्टी नहीं साते। सपान मे मी प्रार्थना की-'पापा, मेरा नहा मिट्टी माता है, जरा इसे पर मिट्टी का पुतला मिट्टी सपने से रोकेगा !-बागी सहमा ! दलित हूँ।- उसने कहा, 'भार सरसों भाइयो । पटे की माँ उठी और भंगार बरसती दापहरी में पली गा) कोमती। भसामती | कोन गाने। +योगी देवता इस 'स्वर' का रंग म उतरने देनेवाल, एक मनुष्प ने कहा, मी बरंगा न मा-उसकी तमपीर कसम ने मही,अदरत ने सीपीपी) होतो, उस मनुप्प मेधा-को निष्ठर हो पाया। परि-पीर तम असीम होगे, पर मारामापन उस असीम मी सीमाएं तोड़ने लगा है। -"क्यों भैया !बोगी मे भरकर पूछा । “भरे इस दोपहरी में,परसते अंगारों में पहाँ कौन मरने माता पिील भाल रही है, साँप मोर की एक में गच्छ पा रहा है, पीसा मारे प्यास के ग्राम के पहले के गले से माता पसीना पाट रहा है, और तुमने पीने से प दिया-'माई तरसों भादगा। पाकोमल फूल ! क्या इस गर्मी में इसरी बार बाहर पाकर ।" “पर, माता की ममता को, उगती फली के युग के वैषम्म में, यो तारे रामू !-और फिर मैप पर रहम क, पानी उसकी बातों में पन्तक पनर पैठनेवाली मिट्टी पर।" -बागी ने, अपने योगीसे पतन को, बतासे, नाम-रोप सत्लान की पाद में हमारा समय पीतते न पीतते तरसो भाग हो गया । माई भा गई। बेटा गोद मेथा। लाप्स, मिट्टी की याद में पार । म नही, लिलीमा मदीकर मही-मिती, मिही । बोगी ने अपने विचारों भोगन माड़ा बा- परसों। अप तो एक दिन की साप मारकर रोजगार बन गई। उसने दाबा के पार्षदों से, हम गोड़कर मा-"राम, मो सामू इस माह थे तो भाग मी तोटा दो माई | मिट्टी मेरे पते की होते, तप में इस माई की मनुहार के मोती से मी मिही छका गाणी पर, विना पमा १०८ साहित्य देवता की जी देसे, असे राम काट् !"-मगतो की स्टी भाँतों में पसीना भा गया । ठीक पैसाही 'स-सोना' जैसा भुगामों पर पाता है। ममक के पानी में न जाने क्या क्या गल जाता है। हवाम गोगी निरचय मी गल गया। उसने माती के गाने में हम रातकर कहा-'मिही नहीं साया करते राजा पाल-सुलम लिक मे, मानों हुएटी सिकारने का निश्चय दिया । मा पगली, हँसकर पल दी भव मेरा पेटा मिट्टी नहीं लायेगा।" त मुम्हारे सामी से धडियो,-मेरा पेटा माटी मॉग है-श्याम् एक दिन तबर लेकर पाया । हिसाब मिलाने में उलमे हुए परमर ने, दूसरे दिन देसा-माई भा गई।मोली महाराष,"शला गारो म्हनी नॉप माने।" उसने पर के दरवारों की तरफ देता–पल उड़ रही थी, और सब साँस के प्राय पेट में गा रही मी। मरने पानी को सेमाला-तिनी मिहीपा रोग पीता है। अनार समाला-मिट्टी की रियों का हिसाब मा। उसे, अपनी नस-नस में माटी दीख पड़ी। उसने ऐसा-पे-चना पानी, पेग्निा पाना भौर पूलि-यूसरित जगह उसके स्वाद के सापन है। उसने माई -" तेरा मेटा, मेरी एडी है माई। मिस दिन पा माटी साता है समम्म कि मेरे मी पेट में मारी है। कीन, कीर या पारेगा दुसी मा पली गई। पटा गाद में था। 'पपा एमा होगा भन!" "क दिन स्याम् मे पूछा । योगी ने पहा-मिट्टी सार तो मिट्टी सामा मही जामा मा ससा माईपणे महाँस गामो, यहाँ लोग मिही म साते हो।
साहित्य
त्य देव
ता
म सघनेवाला सौदा
कौन।
म
म
हम है। देश के सेवक, समाव के अंग और भापके मक।"
तप इस दाल-बल के साप पाई क्या है। और इतनी पुप्प-मालाएँ
लेकर।
"हाँ हम भापकी भारापना करने भारे हैं। भाप हमारा भास्म
निवेदन सुनिए ।
भाप तो सर्व जगदीपर के नाम से परिचित है। भाव का प्रत्येक
राष्ट्र-सेगी आपकी जनता जगदीवर की पूजा करता है। तब यह
उलटीभारापमा सी।
पह हमारी पीर पूगा है।"
परन्त में तो अपनी ही पूजा को मस्तक मुषता है। भापकी पूजा
सीस्त करने का मुममै म बल है, म तप है।
"हम तो देश में राम-राम्प लाने के लिए पापच बीवन परित्र
लिस्ना चाहते है।
तब तो पहले मुझे पनुप तोडमा पाहिर, फिर निर्वासित होमा पाहिए,
इसके परतात अपनी जानकी के हरण को बरदारत करने के लिए तैयार
होना चाहिए, और क्रि भापकी एक शिकायत पर गर्मपती जानकी सदा
के लिए निर्वासित कर देना चाहिए। सा पह सब ष भाप पाहते है।
हम तो पापकर गीपन पाहते है । लिसने के लिए, पाने के लिए
भौर पर पर पलमे के लिए।"
म सपमेवामा सौदा ++
A
सालित्यदेवति देवता भाप वाल्मीकि का भभिनय पूरा कर सकते हो, पर मुममें नट पन कर राम का मिनय दिसान और पुरुषार्य का ममा उड़ाने का साहस *क्यों, क्या हमारी सेवाको मूल्य नहीं है। पुम्हारी सेवा का भपार मूल्य है। इतना मूल्स मेने सार जीपन में पहले कभी नहीं देखा ! परन्लास महगी मत पर मी म सौद पर पदन पाग्य नहीं। मिलने शांत हो इस समम छम, करोड़ों लहरों में पेटे हुए समुद्रफ समाना कि तम्हारी शांति को मयंकर हाते जितनी देर लगती है। तुम सागर हो। तुम्हारी लहरों के बीच अपने को सिमपार में गलमे काम हो, न हो पा मालपा हेमनन्त । मुम् सान्त के साप म रोल । समुद्र के गर्म में मी जमीन है। तुम्हारी सरलाइ के मीपे मी करता है । समुद्र की सता मिलती है। तुम भी एक सन्देश के दीवाने हो उठने हो । समुद्र ही की तरराय में उपे हो, मीपहा, पसरले हो। भिरहो, किनारे न होकर भी उपर नहीं पढ़ते पयल हो, भस्पिर और नाराबान लहरों में मेटे हुए। या मारी लारों सप तार मिले हुए , तप तुम संगीत प्रेस मोहर, मपुर, भापक और पारा-सेपारकउस समय किमी गारीम की 'पार-मार' से लदी हुई तनिकसी नैय्या' मी मारी गोद में सिलगाती है। किन्त, पर हमारी सहरे एहदमर से टकरा उठनी *म सपमेयासा सौदा साहित्य देवता हो, पबमारी लहरों के तार पे मेल हो गये हों, उस समय उस समय तरल तरा-मालाभों से बन कर मी तुम कया हो, कोरा हो, प्रलपारी हो । उस समय तुम्हारी अपनी ही एक पनि दूसरी से मेल नहीं साती। गुमराह राहगीर ! माही तरह-मानामों से सिमपार करने का लासपी। तो, ठुकरा कर इसकी वीणा लारीले तारों को न तोड़। तार टूटते ही यह उपेपित हो पड़ेगी। या अपने पर होनेवाले प्रहारों का पीकर से पदला पुकामे उठ बैठेगी। उस समय इसकी पागना किसी से मसही पारेगी।
साहित्य-देवत
आशिक
-
"मुझे मोहटाते हो।
मैदानों पर एक पाप पार नहीं कर सका।
“पारी-बारी से सही।
रदितेर पास माता है तो उसके पास मही शासना ही पहुंचन
पर तरी भोर माफर्पण नहीं होता।
“मरे सौदर्य को देसते हो, मेरी मीनता "
मिट्यस ही सेरा राम है, यानता।
"मे साफ हूँ। सप्ट दीस पड़ती हैं। प्रत्यक्ष मत देती है। मेरी दया
बादल परस रहिरिपाला करते हैं। पर अपलासमा
है। श्याम प्रकरही ता तुम अपना सर पराया करते हो।"
हो, गिलास में मरा हुमा हलाहल है। स्पष्ट दीसती है, प्रसव कम
एती है, जो रे हाय पहा सा साफ है।पा महान है गहरा है, और
सामपन की तरह काला है। तेरे और मेरे पास उसकी उम्मलता
दसने के लिए भोसे छा है।
'पा इसघ नाम भन्म-मया नहीं है।"
सारा माम अन्य प्रदामही है।
पापन उसी भोर से
तु बिना गुनाही मन्दिर में मारा करती है। भाती है, मनुहार करती
है। निपटनी है,पिटती है। मोर उन पाम मुझे सब गाना पड़ता
+भाशित
पा.--१
साहित्य
देवत
है। यहाँ मेरी रुचि की गुलामी नहीं की जाती ! उस द्वारा 'गरों
सुनकर मुझे प्रतीक्षा की पहियों बितानी पड़ती है।
"और पाकर उठते है कि:-
' किसमा स्वापे, लोसना एमिना न भरणी को।' तो!
तो मेरा पमान होता है
'यो प्राशिको साप धरकर दोषार पाता है।
'तब हमारा क्या होगा। दिमियपिभी पोली।
मेरे पास क्या उचर वासिषा इसके-
मेरे जीवन में मुनहली साप बनाम दुम मी पस पहो, उसी सबीने साँबजे
स्यमपनमोर।
वत असहाय श्यामघन ! मेरी स्मामलता कर, मेरी उपटक का, मेरे श्यामल-दम की सरलता कर प्रत धारस हिरे रनेवाली हिम-कारियों, मेरे लिए तरसती हुई हपकों की भाँतों का, और मेरी याद में कमलाते हुए हरिमालेपम ,शिक करके, प्रभवन, तुम मुझे प्रम में मत गलो। जगत् की मोमीली और गन्दी पायु से परे, मेरे भासमान में उपे पर विपरने, भौर नगापिरागों के भगम और भदो रिसरों से निप्प भालिंगन करने पर, मोके पचे लेटर, प्रियतम, तालियाँ मत पमाभो। देसो, मैं पय मूल पाउँगा। प्रिय, तो सुम हो, यो मुझे लिये-लिने न माने कहाँको धूम रहे माण, दम छुपे रहकर, जगत पर जीवन उलधने का सारा गौरर मुझे मले ही दे दो, फिन्त रेखोग पोते में से पायेंगे, जो प्रतिक्षण अनुभव करते है किजीवन पास की गेरी पर बारामा है। सहारे मेरे, मै तो सदा ही तुम्हारी गति का गुलाम, तुम्हारी मीर माहता है। मैं तो मिटने की, मिट जाने की पहा - भनित्य है। नित्य तो तुम ही हो, भनिल पोम मेरे साप सेला पाहे मुझे अपने साय सिलामो। कमी मेरा पर्दा पनाकर सूरव सदो, कमी मेरा भरा बनाकर सूरग के राम्प को भीतर दो, कमी मेरा नगारापमार पाप्म को चुनौती ++सरायपामपन!
महित्य देवता
देने लगो, कमी मरे पर्पण कसा कर प्रकार कर, मम्मकार पर पार पर
पार करो, भोर कमी मेरी सेना बनाकर पन र पासा पर टूट पड़ो
परम्त मैं पा से मने कि मुझे सो, तुम्हारी, हाँ केवल तुम्हारी मी पर
देव-द होकर गिर जामा है।
मेरी श्यामलता के लारीले पाहन, मेरी तरलता के भरम
मेरे बातम के भयक को महाँ ममेर दो, गहमारी मार दो।
साहित्य देवत
तुम आनेवाले हो
मेरा सारा पाा, बिना मौसम के ही फूल उव्या
-इसलिए कि तुम भानेवाले हो।
भोर फूस मी नीले है, पीसे है, लाल है, हरे है, मैंगमी है, नारंगी
मी है।
मगर इन फूलो पर गंजमेपाले परिम्द सर एक ही रंग के है, हप्स,
रसाम, घले।
,
दूसरा करता है-
इन बनेवालों में से एक साता है, भाग उनके एक-एक माप उनके
सामने रस दो। पात सहा, अब न सहो।
-समय को आम मत पनाभो । प्रम समय
पनामी। प्राण दो, पणय दो।
तीसरा बता है-~-पुष्प में बन्द होकर, रि निकल माना जैसा ।
प्रणय का सेल सेलम प्राए मूल्य करना कैसा।
भोर, इन जनेपालों को, मैं अपनी भागाभों का प्रतिनिधि करकर,
इमकी कम्पलता में, कितनी उम्पलता भनुमा करता है।
नससिए कि तुम भानेवाले हो।
तुम भानेवाले हो इसलिए-मन र घिर, उसकी हर पेदना
भानन्द हो उठी है।
राम भानेवाले हो इसलिए-घली गर्मान भपन पर हरे पिच,
हरियाली अपने पर लाल पित्र, पलों की ताली भपने पर प्रमरों के
परले पित्र पना रही है।
+ मुम मापाले
द राम भानेवाले हो इसलिए-काले भासमान की जमीन पर, मटमैले बादल चित्र बना रहे है, और बादसों में सुनहली नागन मनन नियती रित्रित हो उठती है। तुम पानेवाले हो इसलिए-समन्दर के मोतियों के साद के नारे हो पाने की कल्पना कर, भासमान, मे-मीठे मोती परसा रहा है। तुम मानेपासे हो इसलिए—सूर की फिरनों ने पर जगमगा दिया है, पानु ने कमर दी है। भौर, अब तुमारा सन्देश प्रागसा, उसमें युगो पुगों का मारापही पास सिल्पामादम मानेमाले हो।
साहित्य
वता
मुरलीधर
'क्या तुम समीत हो।
तुम मेरे समीत मह हो। मालापों की तरह म मेरो ममी पर लौटते
कहाँहरमाना किंतुम्हारी पा के बादल परिसपार परस पड़ते परन्तु
उस समय तुम मेरी मलार नहीं बने होते ।
--'तप क्या तुम मेरी मदम'
हो तुम मेरे प्रहार सह लेते हो, चिन्तु मेरे पन्धन में सका जाने के लिए
का तैयार हाते हो। मीठे बालते हो, परन्तु मर पर भाटा लगाने की रिरमैन
उस मधुराई के पदले तुम्हें उन देनी होती है। और 'सप कुष' मरे, मे
तुम्हारी पाणी पर यह इलयम कैसे रख सकता कि तुम पाहर पास
रोहो, तुम अन्तकरण रहित हो।
"भार ! तब तुम पीसा हो) मारद क माद से पिस मास
र दनेशती
परन्तु मीणा तो मेरी गोद में रहती है । तुम या पारात सीहत
करते हो? मामा, मनधरते ही वीणा सर देती है, मनुहारते हो तुम दौड़
मातेरोरिस्तु मेरे सर पर सदा ही तो तुम्हारे द्वार नहीं मिलते। सर से
सर न मिलने पर सरकारी से घिरा मर दनेवाली बीणा को गाद में
लेहर, भोर तप से लगार मी, मुमे उसके कान मेटने पड़ते है।पर,हाप!
तुम तो मेरे घमो ग्रेवीया पनाने के लिए पूमते हो।
-'तर मपुर मुरली के मिग तुम और साहो'
++ मुरलोपर।
मन्द
वता
पर अपने भोट पर तुम्हारे प्रेतकर भपमी वेदमामों भोर उलामो
की गय करा मना सकता। और तुममें विद्र। और उन पर मैं अपनी
उँगलिया रस सकता।
माह पाना, तुम म सहीत हो, न मदम हो, न पीणा हो म
मुरली हो-
"तुम सो मुरलीपर हो।'
.
साहित्य देवता गृह कलह "ये भायेंगे मही; किन्तु इसी रास्ते से होकर गुजरेंगे। "-मुना कि विजली दौड़ गई। इतनी सी देर में अरमान से निकलेंगे। मुँह ने घा, मुझे मस्तक मुबार यह करने दो। "हम तुमारे कारखाने का अमिमान फरते हैं।" रिस समय, परे दिनों, उहोंने इस भोर से गुजरने र भपराप किया, तब अपनी फुलमारियों छोड़ने के समाप में फुष कइने, कपन, कर गुनगुनाने देना । भुति का पम तो छोड़ना नहीं चाहिए। कानों ने कहा। मेष सीम गमे-भरे, मिन्हें देखने के लिए रातों को, गागर,ति- मनु में भी योग बना दिया और पुतलियों के धरागारों का पो-पोटर साफ रम्सा, या उनके माने का समय हुमा तब हमें पन्द कर मस्ता मुखने भौर अपना रामायण गाने पैठ गये। हमें अपनी भन्तर की काम कोठरी में उौद कर लेने दोपही प्राचीन अलस जगाने राना।" डिन्त हाय, मे इस एकता ही में लगा रहा पे भावे और पले मी गये। . ܐܐܐ ܐ BLALL
वता
तप
"
.
इसी पार
इस तरफ होता है, तुम उस पार हो । पलो, लेलें । " मोले।
ना, हरगिज मही-मेरा उपर मा।
"तब तुम जैसे निर्मम हो।
में अपनी निर्ममता का तुम पर प्रदर्शन नहीं किया जाता ।
निर्ममता भूटी है।"
पर सरीहै।
प्रमाण।
इसघ पिता रोप नहीं है, इसकी माता उपरता नहीं है, इसी पान
भविपार-पूर्ण भासपा मही है, इसका माई परिणाम की गंभीरता कर
मामान नहीं है।
“तर स्त्रियों मही महादुर की तरह उस भोर हाते।'
मरे कैदी, में तुम छोड़ना नहीं चाहता।
'मरे, या तो सिलवाद है।
तुम्हें तो परदाम और साप, उलचि भर पलय प्रमी तिलपा।
किन्त, में तो ऐसा लमही खेलेगा जिसमे में और तुम, दोनो, एक
ही पार न रह सके।
A
मेमे अपने सारे प्यालों मचा-रामा पानी भी पीपा दिया है, इसलिए
हिहम दोनों इसी पार रहे।
साहित्य देवता ।
मोहम
'कृष्टता'इस इलगम पाम मैं हो विपाकर राँगा।
'तू मोहक मले होः परम्त जब मेरे सर मही है सब संगीत तेरे माद
पर के दिन रोपेगा । मलार की तरलाई, मासापरी की मस्ती और मोरठ की
पेदना स्पा सेरे हमाल की जाय।
पर पन तोहापा मैं सुनने का मी मुश्ताक नहीं हूँ।
कवल येही सुन सकते है जिनके मस्तक रोल सके।
तप क्या मेरे उपहारों का कोई उपयोग महीं।
बोम मात्र है। उनाय बोम्म ही सीपसमा है।'
मरे ससा, साइनस कोई उपयोग नहीं ।
पसंदेरा-पान कर सकते है । और यदि तू संपारे तो-'
प्यारे, तुम्हारा नम मर निकल गाना पाहिए, मुझे उने सपार कर क्या
ममा है। पर क्या मैं एक पात ।
तुम्हारा नाम
'भाइन'
क्पा, तुम्हारे संदेश के पाद मी मेरा करत पेमा हीरा जाएगा दिम
पर व शिधपत हो। या म्हारी मारनी यही भार डिस हो
बायगी।
शातिर
स्था
देवता
तस्मात मझ मे नमः
मैं-गुरुदेव, मेरा पहला पित्र विगा गया है। कितना मिशत हो गया
मे-तोरबालसा में दूसरा बमाता हूँ।
-मरे, पहली भागारे कमी सेमारनामों पर बैठकर नहीं भाई ।
मैं—परन्त तसपौर में मेरी भारमीयता को है।
मा री भारमीयता का दुनिया में उपसल भाया ही नही।
शत प्रमातही भागा-पर लिस देना है।
मैं-मेरे लिए दूसरा चारा क्या है। कम-सी सेहत है।
२-पारा है कि अमी सूरी नहीं है भार कसम द्वार में है।
सेहत है कि अभी ऐप है। लोग एक अन्तिम तसपीर बनाकर मी
अमर हो मेते है। मेरी तो अभी सिर ताली पड़ी है।
में साग जोसेंगे।
-पहले त्रिक देतार तुमपर सिंगे, दूसरे नियों को देसर
अपने आप पर / उस समय मूल का मुन्स पुषर मी, भस्तिलक मनम्त
राशि तेरे पसे पड़ी पायगी।
मैं-मेरे मार ! मेरी भूसंता के प्रदर्शन में तुम किस सुसका भमुमब
करते हो।
-मेरे बीजन के शाप, बरे वरदान बनाकर रसना पाहता है।
मैं-पापा मेरा गदा पिप सिदा रसने से होगा।
तस्माद मध मे ममा +
१२४
साहित्य देवता -अपने असफल प्रयलों को, भप्रफल कर, गम्दामा पाद दूसरा मित्र पीलन की सामन्दिर हागा सो पहले मित्र को उसकी सीढ़ी पलाने गौरव प्राप्त होगा। लोगों के मस्तक रसने के लिए मन्दिर प्रदान करोग परम्व परण रतार यहाँ तक पाने के लिए। में-पस चित्र को नष्ट करता? पे-तोटममा के हत्यारे के नाम से मा-नाम होगे। भौर पर, उममें निवास करनेवाले विनर की पाल-इत्या होगी। . भर मै पिचपाले कपड़े पहनता है। प्यामाम्मर मिदाता हैं। पीताम्बर मोदता है। पहनी हुई पिहियों, पोहुर हों, पोलते हर मरनों की भारापमा करता है। खाने के पापो पर, पगाने के मृदंग पर और कान उमेटने पीसा पर, मुझे मेरे साराय की तसवीर लिसी पीसती है। दौड़मे, सेनने, रोने, गाने, मरने, मारने भार मिटने-मिटाने समसा भों में, मेरे प्रिय ! एक मपा भित्र पनकर, मेरी एलम के घाट उतरते, मी दीत भार! पर मीले रंग में पिवित, हरी पास पर पीई, पान पगाती, वहारी मुक्तास्प-मयी सात तसवीर में मत: मुशा मेरा पल होता है कि मेरे मर से, 'तुम्पमेर समर्पितम् निरने रिम्नु यों ही में इस पाव की पिता बने में उलझता है कि कही मेरे भामू टपटपणार विरित नातून लार्षिमा नाराले,त्योहा मेरी पान से गलियार निमल पाता है। "स्मात् मई मे ममः।
यह पारसी पह एक पाणी है, जो सोफ-पीलन केदय को सोच-सोचकर किल्ला रही है और पिलासिताकर सोपसी है। एक मुबारे, को उनकी भोर से उठ रही है, पिनकी मुगायें उठ नहीं पाती, और उन माम्प लिस रही है, जिन्हें रासम ने लिस्ना-पहना माही सीरस्ने दिया । एक पासी है, यो मोपरियों की कराह रे रापमहलों में ले जाकर टकराती है और राबमानों के अपमानों को मोपहियों के पा-पस में मिले भम के प्रसाद की तरह मारा करती है। एक पाणी है, चा गलियों में, पों में, झोपड़ियों में, महलों में, पहाड़ों में, गुफाओं में, भीड़ों में, एचस्तो में, लिमयों में, विषय-पग की पागों में, ले लोसा लिये, पराबर माई पाती क्लीमा एक मासी है, कि समस्त पमों के देव मन्दिरों में गिस व गतिगाल, विसच पर उन्मुफी-फिन्त पते सिंहासनोभारम्पर है कि उस पाणी कोकम सुनें। एक वाणी है, जो कि गाँत मारसच मराँव, संदेश वाहिनी बनकर, पर प्रत्रको और यहाँ तक विसनादम है, यहाँ तक किसी भी प्रार्थमा के गौरव से गीली भोर पोमीली है। एक माणी है, जो संन्नों को प्रार्थमा की करिमा माक्र पोलती है और मिनार की पमकियों में गिनु की मुनहली भाशा के दर्शन करती है। कलया लियो लोकजीवन बदलित कोया पन उठने की पार पनर सड़ा परपाणी १२१ साहित्य देवता है। मुँह है कि मुफ-हास्म में विस-परिवर्तन के पाल महापलय की पाणी पनकर भा रहे हैं। मुमायें है कि कप्ट-भोगी के गल के हार है, भगवा राति के निर्देश भी लसफार है, प्रमादये हुए के लिए दरित हाने का दूना स्वीटर है। पह लोक-जीवन के लिए प्रताड़ना सहता है। लाफ जीवन की भी प्रताड़ना सहता है, और उस जीवन पतनोन्मुस लोक-जीपन की सम्रपट के लिए सर्य प्रतारमा बन जाता है क्योंकि यह लाफ-सीपन छप्पार करता है। लाक-मीवन की पसी पनकर, उनकी भैरपी पनगर, उनकी सास पनघर, उनकी उसोस पनार भौर उन मस्तक पनर स्थिर रहता है। संकटग्रह में, कारागार में भार वर-गह में यह मुफि की एक ही पारी वालता है। स्पद के गुमराहों को पर प्रमु-पय का पता दता है। दरा-पाता और रिसास-पातकों में पर उनमें निवास करनपाले प्रभुच्चे घर जगाता । निंदकों की सहिष्णुता उटामा है, कूरों की कोमलता जगाता है, भार पष-मगों को यह अपने बल पर मे पप-दाम करता है। लोक-जीवन के भाम्प र भविष्य निसता है। हिम्म रिस फी गुलिपो मुलमार तत्वात नहीं बनना पाहसा । पर पति है। लाहनीयन के प्रामुमों से गीला, लाम्चीवन की पाहों से दरदीला, भौर इस बा से दूर कि पारितो, और इस पान पिना जाने किमि है। पह न ममान है, न सरदार । न पर्मापार्य है, न परस्सा दनेशता । पह एक पाती है, सिमके पागे पिस लापरीकि उगे मुने । उसमे गह ૧૨૭ या पानी साहित्य देवता है, जिसमें कोटि-कोटि दुसियों की भारमा सिसक रही है। उसमें गर्मन है, यो मोतामों की मर्मययता को साबित कर रहा है। उसमें विश्वास है, जो बलि-पश्यिों और कमोरी स्वीकार करनेवालों का अपनी गयी पक-पक के बीच रक्षण कर रहा है। पापाणी है, जो रावासा नहीं है, किन्तु टि-कोटि भादमी, काटि कोटि मामय, मिससे पार है, अनन्त सेना नहीं है, किन्तु उसके एक रिवास पर घटि-कोटि म्पति बरे हुए है। गह पाणी है, जो दवा देने में अपने को भी समा नहीं रवी, पो पुराइयों से अपने सिर पर लेती है और भयाइयो प्रमु के परमों पर पढ़ाती पाती है। मावासीहर देश में गति में है, हर पर्म में है। मी भाशा से और कमी भाशा से पैग़म्बरों का अनुवाद करक या पाणी भमरी में स्वपेल्ट, म्रि में पर्मिल, रूस में लेनिन, पर्मनी में हिटलर, इटली में मुसोलिमी टकी में मुस्तम कमाल, चीन में पागलाई रोक, भौर विश्व में न बाने कहाँधा सा-क्या बी गई। किन्तु गुरुदेव रसीद की बोली में मारत की बह पिता, मासूम मा साहित्य पर पुरुषार्थ, उस पाणी के सो का बागरण, सेवामाप की मोपड़ी में निवास करता है। उपार लिया हा यह दिन में प्राप सौपता हूँ।
साहित्य देवत संवाददाता मैं माददाता | संवाद देना मेरा काम है। दुनियों में विसे पीस पार गाली देकर मी, फिर-फिर देले पिना नहीं रहा पाय, उसे कहते है भएपार । दुनिया के सान में पहिले शोषक, फिर पितक, फिर कवि फिर लेखक, फिर पत्रकार रि भाता है संपाददाता। अपनी इस पतन के गुपयों में एक-दूसरे से कोई मेल हो या महो, किन्तु संवाददाता क्या नहीं . . पर शोषक की तरह पते लगाता है, चिंतक की तरह पस्त या पटना ताल मालता है, विकी तरह कल्पना की वायु-सरंगों पर से पटना कए पीन-पीन कर रसता है, लेसक की तरह पर्वा करता है, सम्पादक की तरह अपने जमाने की जनता की पि संवारता है, भौर म जाने रिस दिया में, न पाने कम ट्टकर, कमी परिस्थितियों में पार, कमी उनसे मगहर, भोर कमी उनका निमाण कर, सपना में रल-निर्माण करता है, किन स्वयं मन्द-मूल-पारस पर सन्तुष्ट होता है। पर्मशाला में मेरी बहरत पाती है, मनायों के माने पर, सि का साहित्य गदा जाता है, रेलपे स्टेशन के तीसरे द के पेटिग रूपों में जनता की पापा फ्टसी है, पेरपागारों में शरा भार साप्स में लिपटा हुमा मानर साँप भपना सष्ट सम्प, सर भौर गार प्राट करता है। यहाँ मेरा सरत होती है। मेरे साहस में जगत् की माह की अगुपी, मेरे भेप पदलने में जगत् मनुमा, और उनके राने और ये साने में रिसके हम भाग पड़ने व एकदम छुपा होता है। दो की काना मी में यदि में दूसरा ૧૨ +पपादसता साहित्य यदेव ता तो समाचार कर सामी हूँ और तीसरा हूँ तो समापार घ मोहतार । किन्त पदिपामा हूँ सो फिर एक राताप्दी पी गहा के घाटों पर मात्र से लोग उसरे नहीं कि उन्होंने सपने पथ सीधामी दी, और मैं मानो बीमे के लिए साँस पा गया । बेल से मुसदमे पर भदासत में गाते रदी माषालाती से मै मिल लिया किस काली पी दीवारों की शालिमा फॉप उठी। जूर के पड़ों पर मैने गरत लगाया कि एक के हजार देखनेगालों को प्रसार भाषा | गस पर कि मैं समाददाता । मुमस मुझट रते है, सिंहासन दिलसे है, भोर रास्योपाने हाग रासो की रापम लाकर अपनी सफाई देने दौरते है। पनि में मन्दिर र घंटर पदता है, भारत कर देटर, श में ही मानता है। मप्तमिद में, मन र पिस तरह तर-पोत कर घमा पना पाता है, मुझे पता है । गिरने में एक पतिस्मा के नीले शितना भन्मधर पिपा रहता है, मुमसे अपना हुलिमा और अपनी सनात पता जाता है।
साहित्य लहरें चीर विषया मना परावेपन के इस पारापार में, क्या अपने अस्तित को दूसने से पाये राना, और भाराप्प-सट तक पहुँचाना है। तो लाहे की दीवारें, सागर के तरल परस्मस पर दौड़ाना, और पानी में भाग लगाना सीलिप | क्या अपने दुर्भाग्य को दो टुको कर देना है। सो उठिए, सागरों और महा सागरों का भामन्त्रस सीन्स कीपिए दुर्भाग्य समुद्र की लहरों में पा सुपा है तार काटते पलिए, इमाग्य, मार दियाँ, दानो से परोंगे। म्यारयाम, लेख, भोर पितामों से यह महागा। मशाह पाहिए। बह ममान महा लहरें उसे निगान गायेंगी, मला न हो, लारें उम सिलपार बना लेंगी, पर कसा मा हो, उस पर रवान गायेंगी- नीचे रतनों से भरा समुद्र-गर्म भार उपर नक्षत्रों तक राम्प, में अपने प्रियतम पर बार देंगी। सूबसूरत सुपा, पतवार हाथ में ले। वही सेरी योमा है। पटिया कर, उन्हें महार सेनानी पति पाहिए। पेटे थे, उगास के कम्पास पर 43,दिशादर्शन करानेपाली प्राणों की मामासरी पाहिए। पदिपरा के सीमोल्लंपन की यह तयारीमा, सा पाये हुए यार उगन रिमय र दमंगे, पट-स्सापमा घपट रिमबल रयों से मरे गाने की साप परेगा, भार यह मन्दादीपक मि मम-भूपर की भारती उतारेगा। अंग लगी तलवार से मीपू घट के, और उस पर मिन्दुर लगाने पासे पर, भलिस के महासठिनाइयों के सागर की तरंगों पर तैरा +सारपोरपिसपा ममा
यदे
६, और मन्नार बनने के लिए भागे परमागण, समुद्र पूजन को पल
पत्रिम तलारों को काटने उठ पेस त् समुद्र पार से लसीको लोटा भौर
सून तू अपने बार्म से, समस्त शरणागतों कीरता कर सोये हुए वे दिम
₹. पिसे भारमपी पीरी मी र लाये, प्रमानमारसलाये और
सलारा।
साहित्य-देवता गिरिधर गीत है, मीरा मुरली है कषि के पर निर्धनता से प्रश्नल नहीं पड़ता, महता पाता है, मीरसता का मौसम ा गाने पर । उस समय उसके पिपार और मात्र, पाणी के पाहन पर पैठार विजय-यात्रा करते हिपकने लगते हैं। मान की परिमितता में का उपयोग, हदय-फमन होता है, भोर मान घपोम लदने पर, भाषा से इस कुपाने का पहला सुलपापा पाता है। किन्त कवि के पास, मापा, मान में और मसान में, सदेव हदय के ईमानदार प्रगटीकरण का सापन होती है। करिता कोष लोग, विलास या पिनोद मामते है। जो लोग अपने प्राण-दान घे मी पिलास मानते है, उन मनस्पियों को तो पिता के मी विलास और विनोद मामने का भषिधर है। किन्तु पया पीता गिलास महीं, यह तो एक निर्माण है, महान् निर्माण है। हिमालय की तरह स्वामी, गंगा की तरह उपयोगी, सूर्यकिरणों की तरा पारश्यक, भौर गायु की तरा मनिषार्म लोग कहते है, रिसान की पार में, पिता का किनारा-कास पा रहा है। जो लोग, मिलाने के सूप न उराहते हुए भाम की गालियों के पिता कर भोर मानते है, उनकी कापिता तो फिनमी से पार पर पी भाग मी पारिता मरने ही के लिए मिन्स को लाग पिता को समप के पंस मामले है, उन्हे पिता ने मरए की बात पर रिवास कैसे हो। पप ताइप है, और उसमें सुमन मनोमापोंघ भागमन है, या तक ममुप्प के पदय पर, मनोमागे का असर होता रहता है, तप तक पिता भमर है।हा, पद न रहे।हम पदों के मानी हालत सममें, तो इसमें मुर स्मि पापों की इपिता न चन्द शरीर +गिरिधर गीत मीरा मुरती साहित्य देवता . है, मनोमावों की कपिता बन्दादप है, बालों की कमिप्ता का चन्द पुतलिया है। विशप्ता ने, अपनी प्रत्येक पक्ष, पदार्थ निरोप में छुपाकर रखी है। चन्द के मानी ही, दुपाकर रखने के है । पर सस्प है कि काम्म के संकतो भार कला के उम्मेप में, अनुकरण मरण है। परन्तु हम एक 'मीरा' भोर उसके 'गिरिपरी नाम करन के संपन से नही र सकते । मीरा है प्रति, गिरिपर है प्रमु । गिरिधर मार है, मीरा उसनद । गिरिधर गीत है, मीरा मुरली है। कवि और कविता का यही तो सम्बन्ध होता है। क्षत्रियों के प्रति विद्रोह करनेवाले परशुराम को अपनी तपस्वा पादहीन रही उन्होंने पधियों परोिप पत्रियों ही के उपकरस लेकर किया इसीलिए उनकी तपस्किता मे हार साई और एक सषि के हामो उप अपना राब-दर सौपना पड़ा। कवि और प्रमु के पीप तो भोर मी पड़ी टेर है, हम तो प्रमु के खिलाफ विद्रोह करते समय लाचार है कि प्रमही के उपकरणों से काम लें। हाहम महमले करते बारें किये उपकरण 'प्रमु' मामक किसी 'मामपर' के महीं, वे प्राति के उपकरण है, और प्रमु नाम की कोई पस्तु नहीं | ठीक है, पर माम बदलने के मानी, किया बदलने के तो होते मही । म तो कविता की बात ही लिल रहा था। हाँ, तो कविता में हम प्रमु और प्राति का अनुकरण करने को पाप, क्योंकि उनके सिलपार, फपि के राप्दों में, ममीन भोप उदय करते रहते हैं।
साहित्य यद के सारी से मेरे सर में सर न मिलामो गायक में दर्शको की बैठक में से गुमगुना उठा है। मुम पर दरकस उठे है। निष्ट के मुमम दर हा रहे है, पूर के मुक पर अंगुली उठा हे हैदेखो ये अंगुलियों तुम पर नहीं उठी-- "नवम अपने पर म उठाभो। म तो ठम्हारे साभ उठभे पापा या गाया, हम मेरे सर के साथ हिम उतार की भोर पले। शिस तरह गाकी बालिमा और बीम व राम नाम दोनों, एक-दूसरे स दूर लेते है, गायक उतनी ही दूर मुमधे तुमे रहना होगा। जरूरत नहीं किस्म एक-दूसरे को देखें, स्मरण की, पर्पन पोरी से, दो पुग र लेते है गायक, मीह के सिंचाग में उतार स पड़ार पा हमा है। जरा ठहरो, मम मा म गुनगुनामा यो मेरा सपना है, भार । किसी के घठ पर पाम न लारा मछ। स्टेशन के एसी ने गारा सन्दूक तोरा, सो तुम पिप उटे में, मैंने भी तो गुनगुनार तपारे गौरव प्रतिमा मा। उसे तुमने पैसे देने से इमर किया था, मुझे मी अपना सर देने से एमयर रोगायक। सूरब मे रिश्ते से भरना प्रप्रय मही पदापा, गायु मे रिते से भरनी गति म रोडी-रिस्ता पाकिम मापा कारागार --सामे-
साहित्य देवता
रिता !-माना के प्रयायतन में, समर्थक दने र प्रबल सो मही
रिश्ता-अपनों में संकट में राजने का मार्ग बन गया !
भय सेवा होगी या महत्वाकांपा की पूर्ति । विश्व का हित होगा या
अपनी प्यास धुझाने का प्रयल।
रिश्ता, गायक, समर्पण की मातियाँ न बनामो, उतार को रूप-दान न
दो, पुल्पाहाट में म रसो।
,
Zod
मालित्य-देवत
'दूरी की निकटता'
'' भौर 'म' क्यों न ।
-नही 'हम' कहा।"
त
यो।
“
-
'साय घूमते ह, साय अम करते हैं, साथ लाहा लमे है, नापसाय
सिर देते है।
तप भी क्या हम साय है। दार मे हार मान मिनाहा, मी-से-की
मिला है क्या।
-यह भी क्या है।"
अमरस्त; मिममें मरए नहीं होता। प्राण, गो काटे कटे म मिगये
मिटे,न परामे षटे-
*-भौर उसम्म माप
निष्ट भान पर पे-पापान की-सी दूरी रसहर और दर रसर, मोर
दूर रार, पणय के मालिकन भोर माम समर्पित करके दही, मिर उठाने
भौर सिर देनेगाले सिरपारी जान पाये हरि जी गया है, प्राण कहाँ।
दूरी में क्या ह।
देखत में तुम पर भामुमो के पल पदाउँ। मुम्हारी याद पर पलि
पलि गार्ड, तुम्हें पान के लिए मारा रह।
-सा यह गनिमता मही है।।
मीनिमा दूर र सुम्हारे गुग मुनने सुनते मही यस्ता र
तप सुहार गप-गान गाते नहा भरतार कर तुम्हारी पाद मरी
• 'दूरापी निररमा
भ
"
पा.-.८
साहित्य-देवता . साँसे बन पाती है। दूर तब तुम्हारे मान पर लटकले परणों पर मत्ला रसते पी में उमेठन मही पाती दूर तब मेरे बाग़ के माओं की पारी के की भी मदन पनाकर पहाँ ता है वहीं तुम्हारे मस्तक पर पम्दन-सा पढ़ाने लगता है और माता का ममदान करता है किन्तु तुम अपमानित नही हात दूर है तब, मरी, किसी भी रस की कई मी गुनगुनाहट, तुम्हारी पार्यना सामगान पन बाती है। तब किया तुम्हारी सेवा और मेरी सेवा तुमारा मनोरंजन हैदर हूँ ता तुमारी हर कमी भाखोपना, तुम दी गई। पाली मुम्हारा किया हुआ हर शुम्पन तुम पर फिमा दुमा हर भाराप भार तुम अपने मे कोटा मानकर, सुगंभपने अन्तर में जगह दमे पर पापाजन अपमी बाँसुरी पर तुम्हें मृत्म के लिए विपरा करना, अपनी रीम में तुम्हें पुकार उठना, अपनी सीमा में तुम्हे इतकार उठना, और फिर अपने को मी तुमसे पड़ा, कमी बोटा, पामा-यह मेरा सपोरा में अनुभव कर पाता है। भौर पर हूँ तप ' मेरे मानकर कौम-फोन लाइ मही लहाता, कौन कौन शिधयते मही करता कौन-कौन भारोप मही करता, कौन-कौन से अपने अपराम गिन-गिमार तुम्हारे सामने नही रस देता--पोंकि उस समय ना पाता है में, और होणावा प्रति नप्रभारम-निवेदन।
साहित्य-देवता
बीबम का प्रश्म-चिन्ह स्त्री
)
मर भार अमर, पर और अपर भोर कर तथा पस्तु, सर में एसा
धन-सा नाम है जो ये,पपी पर रार उपर का उठना नहीं जानते। फिरत
सुदूर-से-मुहर उपर से मसहार, मेरम् भनिमार्य, मह, नीचे की भार
पले भाते हैं। क्या इसे भारर्पण करते है। सुरास जमझ, पहुँ।
की मिप्रस, बन्म व संकेत, मरण की प्राप्ति भीर ममरता परि
सन्देश।
को महो तुममें उलमन मालूम होती, पार्पण । मिट्टी में मिला (मा
फ्न, मिट्टी में मिला rभा पाण, यह लो, भाघराको पला! कप और
पवर में से सर उटामा मा !! परन्तु समय सो दयालु भ्यासापरा नही
है। उसने नहीं मी उगती हरियाली पर लो कोटे उगा दिये।
तसुम निगार पल भार्पण से ! और सूरन सप देन चौद
समाप देने, हा पाए इने भोर कीप की ममि मीठा-सा स्वाद देन में जुट
गये। तुम्हारे घंटे भपिक है या समय के दिन भरिक शापद, घंटे मुरब
मिहनत , प्रम के दौर पराम किये गटी है, तुम्हारी
उन दिनों से काटोप इस तरद गामा उस पार राई
गिसक उम्र के वर्षों से उसी कलानियाँ पनत गुना हर रिपरे
उम्मस भागाकारती है।
कोमल रतिया में भार मगही उठान में ही ये घटेनने
उत्पान और परमा निर्माए मि मिण ! म ए: रातो, रि
.
"मीयता मश्न-पिमल्ली
देव नमै काटे । मिनी हरियाली माडी लगी है। लोगों ने कहा ये फोटोवाले किन्तु इन काँटों में से यह क्या होने लगा । गुशार ! यह लाल-साल सारे। यह गुदगुदी सी रेसी है। यह पसुड़ियों की हरियाली मुट्टी में क्मा पा है, लोलो मो भोहो तुम हो भाकर्षण ! तुम्हारा सो स्पमात्र मीचे की भोर पाना पान | और यह लो, दस-पाँच से मी झोटोमाली कहानी उनके पानी म पूष पाया कि हरे भो में से निकलने पासी ऐपनाग की सार-हगार जीमों की तरह सिलनेवाली कलियों की पलहियाँ, ये जमीन पर पा गिरी। मैंने पूमकर देता इतनी मठोर यात्रा । कार ने पूसती और कोटी में जिन्दगी बिताती, अपने परिणाम पर पहुँचने में इतनी मेकरम् । भाहो म नामाकर्षण। किसने उस दिम का पा, भार्पण न हो तो कोई पोंगी। फिर म पाने किसने उस पर मापा-टीका की भी कि मार्पण के पिना सुस कहा। मा बिन मार्पण है। सुखी है। क्या को पुती दीखते है उम सम में भाण है। सब तो यह जीवन का राप है जो मिलकर रहा होगा। भौर पा सुस सपके पास है तब वह दुःस से भी बदतर होगा। किन्तु अभी तो उस काटेमाले पर ने कराया किमाहरीतिमा लेटर सुस से उटा मा और पाकर्षण पान पतुड़ी पड़ी पूल में मिल गया। जिससे पूछे किला ऐसा सुसही नहीं है पिसमें किसी भार्पण कस्मत ही महापौर क्या ऐसा कोई भासणहीमही पिसमें मुख मीयम का प्रश्न-धि-सी साहित्य देवता कीन हो। ताप के पैने भाकर्षण समेरे को साँप के साथ सेलमेश सिलपार प्रदान पो करता है। इसी लेकर लौटने के बाद ली याने पासी सांसो समेत अपना पेट भरने पे लिए मोती लान पाले पनाप के मन में तरि पैसा यह भारर्पस फो उत्पप करता है कि पा अपनी हामी, एक ससि च मी जिसके साथ भनम्त सॉमे प्रभी सम जी, पारी पर पामे मोर पानी में मिलाने क लिए गोते पर गाते सराय । अत्यन्त गरीप, रूप से रिटत, पेमप से रहित, कण से लापार गौर पुष्ठ र रागी रेल एटश्रम से यूटी पूरियों के दुको भोर तरघरी से लिप्ट हुन पर समेट कर एक अपे, पागल रिसर में पौमार स्त्री के पास उसके मुंह में जूठी सरकारी पणे में से मोपनापन यो डाल रहा है और द्विरागमन के प्रयम-मिलन, प्रमरा मस्तकी प्रतिम भेट फी, सारपानी और उतना के साब न दोनो ही प्राणी हसाने पाला पदनसीपों भोसों में यह मामू क्यों भागये हा या तुम हो भार्पण ! सा दम हो मुसामा दोनों एक साय हो मा एक मा पुरा है मार हमरा माता पा रहा है ! भारर्पण, यदिदम ही हो तो नारद जीबी सादी की पठी परियो सादरने के लिए सम्हें किसी ग रोय नहीं। पया मन प्रभु से अधिक पनपान सभा सर्पप, यो परम्हें नहा राफ मनाम पेपर से मनाप पर पाते हुरिया माइप पा कह रहामा उस दिन राम शादी पर इस पापी राजार मी रिसी माहपी स्लिाप में मिली है भार्पण या मे मे जान तिमीणा लसर भारद दाल गर्मान पर, या पगली पपरान प्रतम मोदी उपेपर, सड़ा। ++सायन का प्रश्न यगर-नी मालित्य देवता उन्हें प्रेम करने कोष प्राता है भाकपए । गर्म मालूम होती है । लाब लगती है। लिक से शादी म्हारा कोई रिश्ता हो सकता है। धेश्मा से सगाकर परम-मफ तक सब मिस प्रेम शब्द पर अपना अधिकार रखना चाहे, से हुए हों, उस राद के साई भय र पाते है। तो क्या, एक सिंपाप से बीवन श्री परिसमाप्ति तक यो रोर हिल रही है और जिस पर पक्षियों की तरह फिर उड़ता और फिर पैसा सम्पूर्स ममास कामापेतन परा हुमा है, उस पर सपा-प्रेम के अस्तित्व क मानी मानने से कोनर कर सकता है। जीवन की दोपहरी बोली, प्रेम ने मुझे क्या नहीं दिया। और उस दोपहरी में भामेवाले पेशा सेद- विभो मे कहा, इस कमक्त्त प्रेम ने हमसे मा-क्या नहीं ले लिया। पंची-पपी-सी दीलनेपाली उसाँसों की मन पर अनम्त पोझीली अगपित गाँठ में तम्हारा रास्प देस प्रेम-पा, गाम्भीर्य का दिमाला पहले तुर, पामार कुचे तर टूट-टूट पड़ते मासुमो में, तमारा पोटापन दस्। बीपन की पाहों का पना-मोरिमा समेटकर मै पला किस तरफ मा। साँसो की या सहक धिम तीर्थ की भार पा रही है और कहोगाकर परना होगा । मा मरण के महान् क्षेत्र पर | सा पालापारी है कि मुझे मृत्यु के मन्दिर तक जाना ही होगा। रिका तीर्थ नहीं है। तीर्थ में मी के बिना लोग नहीं जाया करते । म मुम घरागार में सवार हो। उस जगह यहाँ पर मेरी मामा-महीमही पा सकती। जीपन का प्रश्म-चिर-सी १४२
साहित्य देवता
चन्म की पहली साँस के साय मे तो रोया भाप
नप्तीप! जीवनी
मैन अपित मापाचीच धीमी। किन्त, पायाम सुम मा गये। माँ के
रूप में से गुजर कर मेरे मुँह में । मेरे रुदन तुमने पहा मरी सामो
काठमने हसा । भीर में मूल ही गया कि मैं पहिल दिम राया मा।
मौर दम पारीपने मुमे दम पिनाने, मुझे लगते, मुम मैगुलियो
पलाते मेरो पशु-चमी हिनचारियों में से माना बसवाव पाहते मरे बीपन
* विकास के लिए तापमान निमारा करते और पुप की स्निप पाराम
मरी मनम्त सोसीको गहने। मने ही सो मह मप अनर्म दिया है। में
माहीं जानता था कि मुम कौन हो। भार मी नही मानमा ।
तुमने कहा 'मी' पातो पा और मैने मोगा। भार यह दम हो
प्रेम ! तो यह हारा न-सा दुलार मिली जाने वाली साँस में, किय
पानेवाल धम में और इस तरह सम्पूर्ण जीवन में मा गपपरा या
तुर सये संपर्प ।
पम्पमा,
कति और तिये मरी चार माहीहै। पनिया
सम पुष हारा तो संपर्पण प्रवरदान मुझे क्यों ? और यह संपपए
किस दिम पुरेगा या ली जानेपाली मनिम साम के दिन सम प्रमाग
चाद्गर प्रेम, यह सास और इप माही काल महा
साया तुरे पूरी बरनी है और पोम मुझ सान है। मैं ता राहत
तात्यायनतिपत पात्रा में मिलनपाला पुली, बिम सारा काम
उठावर मृत्यु के 'महामा' तह पवादना।
यह न मानेगा कि साँस मेरी मही है। माना मेवारामजान
हिम-पिस ना पने पाप है। और मारी रिमापा और
१४२
“मीपन का प्रश्न-बिग-बी
शालिस्य देवता । किनकारियों में या सपान के तूप को याद भाती है सब रुदन याद माता है। संकट भामा, कि रुदन भाया । अनहोना था कि मन, कठोर उवार है कि बदन असीम धुमाष किएन । एक मग मन है कि पीरन की पहली साँस के साप मिका । अाँसुझा ने वा से हरा मरा ही रक्षा। बग्म में वो यह परखा है मन्म-विपि में हो या पहा माहै। भात-मिचानी का सेल पुरा नहीं होता, यह पूरा हो जाता है, गम बरसों से तरस-सरस कर पानेवाला व्यक्ति माँस-मिचौनी सेसने पालो में शामिल हो पाय। और मरण के पशों में मी उसका खेल समाप्त महो। तुम ऐसे ही रास्पबादी हो प्रेम | मालिर तुम हो क्मा सिर में पा मीठी-मीठी-सी तसवीर पमती है, क्मा पर तुम हो। फिर वो इवामा-सा घटना पनकर कही पट जाता है यहाँ तुम क्यों हामि मिलते हो। क्या तुम पर पण हा मिसे सनारा के तण गमागम मा अमिपेम करके कहा जाता है। अमवा तुम यह हो यो निर्माण में अपने असा भवा अपने से मीग पनार अपनी ही गोद में फिर से सराने के लिए लला पड़ता है। क्या तुम महान् मामपल के भमा विष के महान् निर्माण के लाचार, एक से दा होने की नस्वी शर्त हो। निर्माण से पहले मी भार निर्माण के पार भी नि दो की यह लापारी पगार पलते-फिरते गतिशील अस्तित्व ही के पीई पो पड़ी है। पलि में तटमनेपाल फम फो और भीपम का प्रश्न-चिम-खी १४४ - शुभ ता पए की रात पर मानेपाषेपम च दूसरा पर मार दूसरे ना सहाना पी मरत क्यों नही हाती ! पिन घमों का पामिन बगा में हो म भी पमा हुमा मुनाइ बाप उन्हें सिर भाम-पास दूरी पर रस्न र्घ मुसता स्पिन की हमे वा नादीनदीक रहते तर मी पहा वात नी| और रिन भोयों का मामन से मारने हा पानवाला पदार्म म नदीत भार भाग रुपने पर पीछे का पदाम तझ म मासूम स, जो सफर कपाल में रसन कई मागनी मिर्च है ? यह स दिशाको मन्मसर में र चार पक हा सनर में दादा लापटेन सटचने का पतुराद का धन्यवाद स्मि दिरा साप ! क्या गही इस बात के लिए रिम्मेरार है कि पृक्षों में मार पनों में राजा मी गुर ह, रानी मी तुर । भरना पियतम भी मे हो भीर शिरतमा भी मे हा । घनघताई, मत करों में निमारा घरस मही रहला । मप या, इस रस की मारपक शर्त है मि भदन गतिहीन हा, प्रगमिहान सरा, जड़ सामाना, निनाएको पहिचा तमसा में मत्सम पागरएयास वग म घी पता श्री मांग करती है, किमु मेरा पमुमना मुभा मुकाम सिम गार एं कि निर्माएकी पा प्रेन की शर्त उतार, दैत, क्यों है। रिर तुम्हारे पार पतार मी सा पिपित्री पेन ! ण्ड रामा पा, मत्लनत भत्ताधारी 1 मानाही सना या सौर माना महापरिनता पा मान लो। गो माल मे न परते से यह उसप ररते ५। जापादों से नहीं पाते 4-उपररपर ते ५ भत्तापरी राराको में गलेष। और मसू भरपाप धन सा पह, पप मन अमापारों की पनी-मामा मयानी पृउनि पर सिो मुघममता कमरे पर हाय रग सीपन का मरन पिग्द-बी प.-१६ साहित्य देवता कर मुस्करा उठता है मौर पीपन की मांग कर उस्ता है तो चम्म होकर, पावला बीवन अपने समस्त मीठेपन को लेकर उसपर समर्पित हाने क्यों दौरा है। यदि का है तो पापा को सतारेकि को किसी पर प्रेम न कर सकन पर मुझपर प्रेम करता है। क्या यह सम्मेलन मी प्रेमही करा पायगा, प्रेम या प्रेम की विरासस पान के लिए मातक की पृष्ठभूमि निर्माण करना प्रेम की परिमापा कहा बारगा। ना यह वात नही है कि इन पक्षियों के लेखक ने अमापरमक भातक की ममानक भूमिका ले ली। मची मिच लीजिए | एक सदाला है, गुणी है, पिया का मंगर है ता कर भागार है । यस, बीवन की खरीद मोल्स को इतभी शर्त फाफी हो गई। फिर प्यास तो हरएक को लगती है न! करोड़ों की भापी दुनिया की प्यार के लिए करोड़ों की ऐसी पापी दुनियाँ कहाँ से लाई पामगी। यदि माहीं तो सोशागार गोपियों के कनीमा क्या इतिहास के परे के युग को घोरर पुमा जगत् में अनेक भतार पारण करेंगे ! और गा तो बताभो कि मिस गुसा कर गुणा सममार पासी भौगों ने अपने भापको समर्पित किया, यदि उससे अधिक गुणस, मिल गया तो। और मिलता होता गया तो पा रोगामा एक के प्रति ईमानदार हाकर दूसर को इससे रहना ही प्रेम की परिमापा होगी। समार संगठन बिगाने का त एम्प धरण देकर मै अपने पर उधर नहीं पाहता। ममा प्रेम, जीवन की अस्थिरता नाम होगा क्या प्रेम के बागार सो चीर पास सुनि मकर माद सजा का प्रेम हकदार होता इसमें भारपर्य क्या ! और तम यो प्रेम 'राम' धाई मर्यपाहिए ससा प्रेम नाम की नहीं है इस रूपरं माने जीयन का प्रश्न यिम-स्त्री १४१ साहित्य देवत पाई, की दुनिया में। रुपपा, माना, पार-परस्मि पर घमाम है। कटोर मादर्शवाद भोर रुपमा-माना-पार, क्या ये दानों ही बीवन की राह के दो परम है। हिर जा पा रोटियों के समाधर मेरी भार से माह के राबगीच मेर पर के पास से मही गारने दना वह भादरा प्रेमी है। मेरी गाड़ी से पापा करते। मैं उनके घट पहिन लिया इग्ना है। ये मेर द्वारा पर्प हिय गर अपने सपनों घहिसार महीं रसले भर में उनके द्वारा मटर पनी बस्नुभोधमता गोमा नहीं रसता हूँ। पा लेन-दन में यह मानपान मा प्रसारपान लापरवाही प्रेन की अनिवार्यता तप मेरी प्राधामो की इदि पर प मुर्ण-डेरी जगा पार सुपरी ग्यिा मुटानेराना मिम जाम तोरपा पौवन के गहन के पार में प्रतिम मर्पिक दान लगना हो प्रेम छा गायगा! किन्त, एसपस पा भरए-सतरा सौन्दर्य मानकमारी। पर पर उतरते हुए माना धी भोसों के दतात नीना पसन के लिए मौन्दर्यम से मपा माल दिते रिश्ते है । सौन्दर्य!-पिमाम रिदी पक्ष है। मेरा सपना जिसमें पदमरी। PE मगा-मा पापा, नगेनोपरानपपलधता, नीस्मिना, कमी दमा, भार कमी रानाला साह पर भागदौर और पम्प गेमने, इसरान, साने लगा। पापा मेरी उदारता है। परमानना है।मासि-पन्पुतरायाम मानर दुरीममुरी मारनामोमदाम मागम दने के लिए मानर निर्मित में दो घरायसोपाने सगा? रिमा मेरों और बस में म गारनिनस्नेराम मनी ++जीयन का प्रथम-गिन्दी साहित्य देवता या सौन्दर्य-लोलुफ्ता न भी मही तो मेरे सुम्पन भोर हाल-माप के मीना पीप मेरी बाई भोर ताँगे पाके से टकरा कर गिरा हुमा काला, मैले कपड़ोपाला किन्तु वरसती करुणामयी, असहाय भासाषामा पपा मुम प्रेम के सम्राट् के सपा-कों का पहला अधिकारी क्यो न हुभा। मेरे पीपल के पेड़ के से होती तो पह देखता कि मेरा र पुपम और पुसार एप प्रेम के तिलाफ मेरा पिपासपात का। एक भोर या दोनों भोर उकसनेवाले मीटेपन की बाजी लगाकर पदम-प-कदम पहना भोर अपने भमिमत की नार पर सदैव सुन्दर बनकर ममते राना और इस सुन्दरता की होड़ा-हाड़ी का सेल सतत पारी राना, सा यही सौन्दर्य है। मान ने जीवन को सुसाने को पिरमासमाव-पूर्ण कला सिताई है-जिनके पास मामही है इस हाट में क्या करें। भोर मानिने एक रागा या भार उसके पी एक रानी। रागा कृष सॉरला था रामी गौर नर्स । एक दिन की पात किम से रामी सौन्दर्य विस हो गया। यह मा, रूपई भोट में राया को जिस रानी में खार तास पुरा दीयते या रूप का पर्दा विद्रोपाला होते ही रानीक सप गुण बनकर पड़ गये, और फिर एक नये रूप की तलारारि, पमरे पद, पीले, काले पे भेद मी होने लगे पार ये सब प्रेम के माप पर । माँ पीता पन के रुदम स पकी मुस माँग उय करती थी। उप रमणी रूपकी रासी नित नय वमसूरत साने लगी। तपर, या मन भमिमत के कष्टों में प्याकुल होने का मारक है हमेपल इसीलिए म कि पिलास के सुसद पलों में पारा पा रहीदि पिन का मान पिाह-नी २४८
श-देव
ता.
शिलास घरज-कर पमूल न सकेता प्रेम प्रखित ही शापन
नहीं पाहिए।
बोलो प्रेम (क्या तुम रूप पर प्रसाम्पित सानिविपाता मम
ने मिन प्रभागों के मर नहीं पोते उनके मरघदर सा उनके पर
दिया जाएगा ! क्या उन पदयों को मोह उठते हम हिन्दगी भर कष्ट
पदारत कर लेंगे दम सुती रहो । या उन हदयों को निगहोंने अपने
सानारा पता म दिया और उदय के पानी से प्रत्यापारी भामर-म
हरारा करके रसा। तम तो हसरत की समना में भाग लगने का
तमाशा रूपकीहाट स सुन्दर पार कड़ी मही दसा गा सकता। उसी रूप
सीहाट में घिसने जाकर लोटना महाँ गाना | और उसी हार के तिमाह
मिझोर कर निसने तामत पर भार सँटना नहीं जाना।
कहो प्रेम, तम रूप सप रूप में सुस भनुमर परेंहि तन में। म
वा मुम के सामी मे म सधी रहन रस र मापदादास
ममा
विना पाय-मा या, पिवना पहा राम मोर प्रप टिप हुर!
जिवनादाय-सा राम, मानाप हप्तान रतना
दवा-धीर न माने मिना उनमें से सस्ता है।
एक पिमाह सपना उपार ना-दान-रस पर सारी
हम,सर्प में परियों पिताते है, दिनी मे दिन, मानों से माने, मोम
परस सहादते है। नार इसाबाद हम रात का मार-पर।
एक मनहोला, माँ गर्न से रहने काम दिन के रासन से
"सीपना मनचिन-की
स्य देवता प्रारम होता है और राम कहलाने के लिए परेशान करनेवालों की पेनी के पीप, सी पानेवाली अन्तिम सास के साथ खतम होता है। मपटम-पटना में, जिसकी साँसे रोप राई,यो विछोह में, पटमा में, रोग में, कयों में, यमराव फ होकर निकल भामा, उसघ इर्ष, संपर्प से पुनः प्रारम्भ होता। ऐसे स्टोर पर्व में भी,तम बी ले पाते हा-तम-प्रेम !! प्पार, पा सुल से मी तुम्हारा कोई रिश्ता है। कम लोग जानते है। मा मुस से हमारा रिश्ता नहीं है। कम लोग इस पर मिसास करते है! मो प्रेम । सुत मी ताठमारी ही तरह रहस्सों से मरा है। चोर येत मे जाकर रोता है, देरामक खेल में पार गस्ति होता है- एक कार्य में, एक रूप में, एक असुविधा में, एक खतरे में, दो भूमिकाएँ- एकनारा की दूसरी सुरस निर्माण । सम्पूर्ण समझदारी के दापेदारों से पूछो, मा उहे प्रेम का भी दावा है। भौर समर्म मान की उसमन भरी सुलमों के गम्तिों से पूछो- उन्होंने मुल पाया है। और स्पा समस्त संसार के समस्त पुरम और पिरोपतामों की रूप में, उनके भन्तरारमा और पहिर्मल मे, महकमीधान पाया है कि प्रेम और सुत, कप साम भात का अलग अलग ! प पाते है, का पले पाये। भोर रिसके भामे पर कम पाता है। सिसके गाने पर कान माता। सिक माने पर मन भाताहै। गर्म,पेरामी, और सस्टों में मी,जीवन की तर, दुसरामे जाने मालप उत्सव करने में सफल तुम, प्रेमा को-टुको शले और रक-दान में लालुहान जीपन का माम बिम्जी साहित्य-देवता माम्म पर उसी के रफ से 'भानद लिसने में परम निपुर दम, प्रेम कौन इताहिजगत् म तम्हे मधुर कहार,माधुर्य के साप रिपासपात नहा क्यिा। मोर कौन सना है कि उसने रिपासपात किया ही-मनिपनीय राम ! प्रेम भार मुल! यदि तुम दुश्मन हा ता सग, पदि तुम मुम्म माता पर मह प्रिय, पदि तुम मित्र हो तो पड़े पदपत्रधारी, परि तुम कमारी हा तो बड़ी ममहर, पदि तुम पक्ष हाता निर्दय, भार पदि तुम अस्तिता हा ता पर भापक, मधुर, मारक। तुम में विना पोरा किये, ठम में से मिना भारपार गुगर, दमारा बिना साप किपदी, सुम्हारा महान मूल्य मानन के लिए मानपरितना सापार। तिना उत्तापलाालिना भम्पा 'प्यार प्रेमा'प्राएं करने लगता है। ठीक मी है, 'सिर' दने की पात मी लोग सिर ही में तो सोपोर। भौर मूल्य मी लिना मारी, भमी उस दिन मप्रापापा ने गाहारिकर दी। हमाराहामा जिना भारी-गरी, मुस्ट, साना, चाँदी, रक, राम्प, रगत भापरू, पायक्या-क्या नहीं मर गये तुम । छिन्तु 'सुरा' कपिना मी या कार बीना पाहे । प्रम कश्मिा मी पा घर मीना पार-मार इन दानों का प्रतीक, न दानों न माग,ग्न दानो की मुरर्ण प्रश्मि न !-ग्री। गी! तुमने हमें बम दिया पार दिया तुमनाये मुग दिया और दिसा माना । तुम्हारे सहमे सर्गधर दार सुप गया, रुघाट की दीगर समने 4, तुम्हार स्नाम भन्यों पदीगन लगाऔर गुज गर भार प्रोगराम भाग। हमारे नह न हमारी समम मांगा, उस पमधमा पनापा, हमार "मीयन प्रश्न- पित्री साहित्य देवता 1- - मनोमायों में सुप्रेमस भोर पारीकसैबारीक किया, और प्रेम-पम के ईमामदार पुमारिपोच सुख के पेभर से गोः मर दी। पितु जी-उम चा या महान् रापि अपने में रते हर मामा तुम भी अपने जीवन-पत्र में, माँसे मैंद कर ही पली बा रही हा तुम रानो पति, यह परले, सबसे पहले गानो, कि क्यों प्रेम के भगतारमा प्रमु ने सुममें की है। किस मतसप, किस उरेश्य से ! क्यों तुम्हें मा परदान प्राप्त है तुम मा भवसर से उत्तम भार परिस्थितियों से काप हमारे केरल रुव परसों की गाँठ में पे जीवन , सर्ग पनाने की क्षमता रखती हो, स्या मानमी हो कि प्रेमशम से को सुम माना के लिए सर्ग मिर्माण करती हो, उसे तुम्हें हिस-किस मारकीय ठिमाइयों में से गुगर र निर्माण रना होता है। भोर समीन पर उत्पथ होकर, भासमान च, स्वर्ग कौन-सा मुम तुम्हारे पाले में पुखता रहता है। पुत्रिभो सौ के अभिमय संस्करण ! भो प्रेम के मारतर और स्टुतम साद, तुम अनुमा परो भोर गानोतुम्हारी हस्तरेलाभों पर भार्पण शीला भूमि का समार, उसी राकि उस स्नेह, उसार हरिपामा, भार सहनशकि और सबसे अपिक उसय प्रश्नम टपरा हुमा है। यह गानो, क्योकि इसे पामर ही तुम खान पाभोगी कि तुपारे सर्व के मस्तिस्म परदान मा है!-हरे कस कर जगत, फिर नमाल, फिर नया पल-पौर समय का दिना छोरसाला अमर हाना ।
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