University Library,gurukul Kangri Vishwavidyalaya
बालसंस्कृतबोधिनी
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॥श्रीः॥
बालसंस्कृतबोधिनी।
( नवीनसंस्कृतजिज्ञासुजनोपकारिणी.)
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खेमराज श्रीकृष्णदास,
श्रीवेङ्कटेश्वर" स्टीम् प्रेस-वंबई.
श्रावण शके १८२५, संवत् १९६०.
अस्य ग्रन्धस्य पुनर्मुद्रणाधिकाराः १८६.७ तमाब्दीय २५ तमराजनियमनिबाद राजप.
हारूढीकरणेन "श्रीवेङ्कटेश्वर" यन्त्रालयाधिपत्यशीनाः सन्ति !
श्रीः।
बालसंस्कृतबोधिनी।
( नवीनसंस्कृतजिज्ञासुजनोपकारिणी. )
खानदेशीयरावेरग्रामनिवासिपरशुरामभइतनयेन
गोविन्दशास्त्रिणा निर्मिता।
तस्या इयं
तृतीयावृतिः
खेमराज श्रीकृष्णदासश्रेटिना
मुम्बय्यां
स्वकीये "श्रीवेङ्कटेश्वर" ( स्टीम) मुद्रणयन्त्रालये
मुद्रयित्वा प्रकाशिता।
श्रावण शके १८२५, मवत् १२.६०.
अस्य नगर पनद्र यादभितारा: १४६ मा ८.२५
गजनि यमनिय राजपदा होकर णन "श्रीवेङ्कटेश्वर"
मन्त्रालयाधिपत्याना: मनिन ।
MNROE प्रस्तावना. आजकल संस्कृतभाषाका प्रचार प्रायः इस पवित्र भारतवर्षमें स- वत्र हुआहै यह प्रवृनि बहुत सराहने लायक है. अपने हिंदुबालकों- को मातृभाषा सीखकर उसको उन्नतीमें लाना यह महान् भूषणहै इतनाही तो क्या; बरन इस भाषामें अपने शास्त्रग्रंथ हैं, जिनके आधा- रसे अपना धर्म दृढ चलताहै उन शास्रग्रंथोंको बाँचनेसे और समझनेसे जो कुछ फल निकलताहै: इससे तो इस भारतमिमें शुद्धवंशमें लियाहु- आजन्मही सार्थक होताहै. यह कितना बड़ा फल है; यह तो आप स्व- यही विचार करलो. ऐसे महत्कार्यको सिद्धकरना चाहे तो प्रथम संस्कृतभाषा सीखे इस बातमें तो कुछ संशय और विवादही नहीं. संस्कृतभाषा सीखनेके उपाय तो विद्वानाने अनेक २ कर रक्खेहैं. जिनके द्वारा असंख्यमनुष्य संस्कृतभाषामें प्रवीण हुएहैं. परन्तु जिनको संस्कृतका गंधमात्रभी नहीं उन लोगोंको तो चाहे वह सुला ग्रंथ क्यों नहीं, वहनी कठिनहीं लगताहै। जिससे वे लोग उत्साहस रहित होकर अायासमें प्रयत्न करना छाडदतहैं. इसलिये इन नवीन संस्कृतजिज्ञासु लोगों को संस्कृतभाषा सीखनेका उत्साह जिससे बढे ऐसा कोई ग्रंथ बनाना आवश्यक है. इसी हेतुसे श्रष्ठिपर्य श्रीकृष्णदासात्मज खेमराजमेठजीने मुझको ऐसा उपयोगी ग्रंथ बनानेकी प्रेरणा करी. तब मैंने अल्पबुद्धिके अनुसार यह “बालसंस्कृतबोधिनी"नामक ग्रंथ बनायाहै.-इस ग्रंथमें बालकोंको या कोईभी नवीन संस्कृत सीखनेवालोंको सुगम पडे ऐसे नि- प्रस्तावना. (३) --- तौ यम लिखकर संक्षेपसे सुगमरीति कीहै. तिस्के पीछे विभक्त्यर्थ, सामान्य सर्वोपयोगी ऐसे २धातुओंके अर्थसहित रूप लिखेहैं. फिर उपदेश बांधकर संस्कृतवाक्य और सामनेकी पंक्तिमें उसीका प्राकृतवाक्य ऐसे व्यव- स्थापूर्वक पाठ लिखेहैं. उस उस पाठके नीचे उसी पाठमें जो पहलेकी अ. पेक्षासे नवीन शब्द आयाहो, उस उस शब्दका अर्थसहित कोश लिखाहै इस ग्रंथके यत्नपूर्वक पढनेसे और वाक्य पाठ करनेसे सहज हीमें बहुतसे संस्कृत शब्दोंका ज्ञान होगा. शब्दकोश मुखपाठ आनेसे बहुत कार्य होगा कि जिस्से विभक्तिको और वचनोंको बदल कर चाहिये वैसे वाक्य कानेको आजायँ. कितनेक शब्द और क्रिया. पदोंके रूप ऐसे क्रमसे धरदियेहैं कि, बस उतना जोडके बोलनेसेही झट वाक्य होजाताहै. इस्को एकबार मात्र कोई अच्छे शिक्षकके पास पढले तो यह बहुतही उपयोगी होगा. ऐसा यह " बालसंस्कृतबोधिनी" नामक पुस्तक मैंन तैयार करके पुस्तकप्रसारणैकनिपुण सेठजी खेमराज श्रीकृष्णदासजीको अत्यंत उत्साहपूर्वक समर्पण किया. उन्होंने निज "श्रीवेङ्कटेश्वर" छापाखानमें छापके प्रसिद्ध किया. इसलिये मैं संतोषपूर्वक उनको धन्यवाद देताहूं और समस्त विद्वज्जनों और विशेष कारकै संस्कृतशिक्षकज- नों तथा संस्कृत विद्यार्थिजनोंको प्रांजल हो प्रार्थना करताहूं कि- 'संतः संतु मम प्रसन्नमनसो वाचां विचारोद्यताः सूतऽभः कमलानि तत्परिमलं वाता वितन्वंति यत्' सृक्तिरत्नावली. शके १८१५ गोविन्द परशुरामशास्त्री रावेरकर.
(४) पराभिमाय. I went through - Bal Sanskrit Bolhini" composed by Govind Slastri Raverkar with great pleasure. The arrangement of the lessons and vocabulary of words given in each lesson is very good. I think this will be useful to beginners, CHIMANLAL SANKALCHAND 10-9-13 Bombay: MARFAILI खानंदशीयरावरग्रामनिवासि-परशुरामभट्टतनयगोविंदशाखिभिःप्रणीत "बालसंस्कृतबोधिनी” ममाग्व्यं पुस्तकमतीव बालानामुपकारकम् । एत- दध्ययनन गीर्वाणभाषायां झटिति प्रवेशः सम्यक्तया भवदिति मे निश्चयः । ज्येष्ठकृष्णचतुर्दश्यां भामे। प्रभाकरशास्त्री गाडगीळ-कल्याण. शक १८१५ ज्येष्ठकृष्णाचश्यां नाम। I have gone cursurily over this small busk, “ Biak. Sanskrit Bodhini” composed by Govind Shastri Raverkar taking much trouble & spending a great deal of time. The arrangement of lessons & vocabulary of words with meaning is most induirable. This Book, I believe, will be very useful to almost all classes of beginners 13-6-9: HIRACHAND SAKALCILAND DOSHI. Sholapur. ये “बालमंस्कृतबोधिनी" "मामक ग्रन्थ बालविद्यार्थियोंको बहुत उपयोगी होगा. ता० १ २६॥१.३ शा० खुशालदास मगनलाल. Amon-aur- Pre- ----mnawrenie श्रीः। अथ बालसंस्कृतबोधिनी प्रारभ्यते। श्रीलक्ष्मीनरसिंहाभ्यां नमोवाणी सहस्रशः । उदीर्य कुर्वे गोविन्दो बालसंस्कृतबोधिनीम् ॥ १ ॥ सामान्य शिक्षा. १ अ इ उ क ल ए ऐ ओ औ इन नव वर्णोको मूल स्वर कहते हैं. अह विसर्ग (:) क ख ग घ ङ-कवर्ग-कंठस्थान. इ य श च छ ज झ भ-चवर्ग-तालुस्थान. ऋर प ट ठ ड ढ ण-टवर्ग-मर्धास्थान. ल ल स त थ द ध न-नबर्ग-दन्तस्थान. उ उपध्मानीय (प. फ) प फ ब भम-पदर्ग-ओष्ठस्थान. व-दंतोष्ट. ङभण न म-अनुस्वार ( . )-नासिकास्थान, जिह्वामूलीय ( क ख )-जिह्वामूलस्थान. २ प्रयत्न दो हैं आत्यंतर और बाह्य. क ख ग घ ङ च छ ज झ ट ठ ड ढ ण त थ द धन प फ ब भ म स्पर्श.-स्पृष्ट. यरल व-अंतस्थ-ईषत्स्पृष्ट श ष स ह-ऊष्म ईषद्विवृत. अ आ इ ई उ ऊ ऋ ऋल ल ए ऐ ओ औ-विवृत. संवृत. इन वर्गों में जिस वर्गका स्थान ( १ ले नियममें कहा हुआ ) और ये प्रयत्न एक मिलतेहों; वे वर्ण परस्परके सवर्ण कहलाते हैं.
(६)
बालसंस्कृतबोधिनी।
३ संस्कृतभाषा सीखनेकी इच्छा करनेवालोंको सबसे पहले
"शब्दरूपावली"और "धातुरूपावली” ये दोनों छोटेसे ग्रन्थ
अवश्यही पढ़ना चाहिये.
४ वे दोनों ग्रन्थ पढ़कर उनमें जितने शब्द, और धातुओं (क्रिया-
पदों ) के रूप चलाकर दिखाये हैं; उसी नियमानुसार अनेकानेक शब्द,
और धातुओंके रूप चलानेका दृढ़ अभ्यास रख्खे.
५ पाठक लोगोंक इतनी बात अवश्य करना चाहिये कि, विद्या-
र्थियोंकू वे दोनों ग्रन्थ शुद्धतापूर्वक ह्रस्व, दीर्घ, विसर्ग, अनुस्वार जहां
के तहां लगाकर पढ़ावें, और उनमें जो शब्द कहे हैं, उनके अंतवर्ण,
लिङ्ग, विभक्ति और वचन समझायें. और उस उस शब्दसरीखे और
और शब्द पूछे. तथा वे उमक मुखसे चलावे, बीच बीचमें विभक्ति
और वचन पूछताजावे, ऐसे धातुओंके अर्थ, काल, पुरुष, और वचन
समझावे. और बीच बीचमें पूछे, उसीके सरीखे दूसरे धातुओंके रूप
चलानेको कहे और कर्ना, प्रयोजककर्ता, कर्म, भाव धात्वर्थ इत्यादिक
अच्छी रीतिसे समझा देवे.
विशेष शिक्षा।
संस्कृतमें मात विभक्तियाँ हैं, प्रथमा, द्वितीया, तृतीया, चतुर्थी,
पंञ्चमी, षष्ठी और सप्तमी.-संबोधन और प्रथमा एकही है.
७ ये सात विभक्तियाँ कर्ता आदिक अर्थमं होती हैं. जैसा-
कर्ता- प्रथमा,तृतीया, षष्ठी.
संप्रदान- चतुर्थी.
कर्म- द्वितीया, षष्ठी.
संबंध षष्ठी.
करण- तृतीया
अधिकरण- सप्तमी
अपादान- पंचमी.
MARTPHARMANAND
शिक्षोपदेश। (७) Jasna ArranAmira-muv.WRAMNAMMA सामान्य शब्दोंसे विभक्तियोंके अर्थ. विभ० एकवचन. द्विवचन. बहुवचन. प्रथमा- वह, वो, सो. वे दोना. द्विती० उसको, तिसको, उन दोनोंको, तिन उनको, तिनको. ताको, उसे. दोनोंको. वे, ते . तृतीया उसकरिके. उनदोनों कारकै. उन कारकै. चतुर्थी- उसके लिय, उनदोनोंके लिये, उनके लिये, उनदोनोंके वास्ते, उनके वास्ते, उनदोनों के अर्थ. उनके अर्थ. उनसे. पंचम - उससे. उन दोनोंसे. पष्टी- उसको उसकी. उन दोनोंका, उन उनका उनकी. दोनोंकी. ---- सप्तमी- उसमें, उसके विषे. उन दोनोंमें, उन उनमें, उनके विषे. दोनोंके विषे. संवो०- ह, अयि, अगा, रे, अहो, हो, ओ. अहा, मो, हो, ओ. " भो, अये. १ हिंदीभाषामें पुल्लिङ्ग और नपुंसकलिंग शब्दोंका अर्थ एक सरीखाही होताहै (८) बलसंस्कृतबोधिनी। ये विभक्तियां जिस जिस शब्दसे कीजायँ, उस उम शब्दके अर्थ ऐसे करते जायें. जैसा-रामः-राम जो है सो (प्रथमा गम-राम जो है उसको (द्वि० ) रामेण-रान करिकै (तृ० ) रामाय-रामके लिये, ( च०) रामात्-रामसे, (५०) रामस्य-रामका, ( प०) राम-राममें रामके विषे. ( स० ) हे राम! -हे राम, अयि राम, अगा राम, अरे राम रे राम, भो राम, अये राम. (सं० ) इस रीतिसे द्विवचन, तथा बहुवचन जानना. और दूसरेभी सब शब्दोंका अर्थ करना. अध्यापकको उचितहै कि, इस रीतिसे पुंलिङ्ग, स्त्रीलिङ्ग और नपुंसकलिङ्ग शब्दोंके विभक्त्यर्थ, शिष्यों को अवश्य सिखला, जिससे वे अनेक अनेक शब्दोंके अर्थ करते जायँ. विशेप शब्दोंक रूप और उनके अर्थ. अस्मद् (मैं). युष्मद् (तृ) अहं-मैं. त्वं-तृ. प्रथमा आवां-हम दोनों. युवां-तुम दोनों. वयं-हम. यूयं-तुम. मां, मा-मुझकू, मेरेकं. त्वां, त्वा-तुझकं, तेरा द्विती० आवां, नौ-हम दोनोकू. युवां, वां-तुम दोनोंकृ. अस्मान, नः-हमळू. युष्मान, वः-तुमकू. [मया-मैंने, मेरे कारकै, त्वया-तेने, तेरे कारकै, तेरेसे. मेरसे. आवायां-हम दोनोने, यवाभ्याम्-तुम दोनोने, तुम तृती० हम दोनों कारकै, दोनों कारकै, तुम दोनोंसे. ? हम दोनोंसे. अस्माभिः-हमने,हम- युष्माभिः-तुमने,तुम कारकै,तुमसे. करिक, हमारेसे.
शिक्षोपदेश । (९) मा,मे-मुझकू,मेरेकू, तुभ्यं,ते-तुझकू,तेरेकू, तेरे अर्थ, मेरे अर्थ, मरे वास्ते तेरेवास्ते. आवात्यां, ना-हम युवाभ्याम्, वां-तुम दोनोंकू, तुम दोनों कं, हम दोनों के दोनोंके अर्थ, तुम दोनोंके वास्ते. अर्थ, हम दोनोंके चतु० वास्ते. अस्मात्यं नः-हमकं, युष्मात्य,वः-तुमकं,तुम्हारे अर्थ, हमारे अर्थ,हमारे तुम्हारे वास्ते. वास्ते. मत-मरसे,मेरी अपे- त्वत्-तेरेसे, तेरी अपेक्षासे, तेरे भासे, मेरे पाससे. पाससे. आवान्याम्-हम दो- युवाभ्याम्-तुम दोनोंसे, तुम पञ्चमी नोंसे हम दोनों की अपे- दोनोंकी अपेक्षासे, तुम दोनोंके क्षासे, हम दोनों के पामसे. पाससे. अस्मत्-हमसे, हमारीअ- युष्मत्-तुमसे,तुम्हारी अपेक्षासे, पेक्षासे, हमारे पाससे. तुम्हारे पाससे. मम, मे-मेरा-री-रा-, तव, ते-तेरा-री-ग, तुझक, मुझकं,मेरेकू, मो. तेरेकं, तोकं. आवयोः, नौ-हम दो- युवयोः, वां-तुम दोनोंका-की- नोंका-की-को-का, को-का, तुम दोनों. हम दोनोंकू. अस्माकं, नः-हमारा, युष्माकम्, वः-तुम्हारा-री री-रा-हमकं. रा-तुमकू. १ पंचमीमें 'आ' उपपद लगनेसे 'तक तलक' यहभी अर्थ होताहै. पष्टी - (१०) बालमंस्कृतबोधिनी। woNorwised . " मयि-मेरेविषे,मेरेमें, त्वयि तेरेविषे-तेरेमें आवयोः-हम दोना- युवयोः-तुम दोनॉविष,तुम दोनों में, सप्तमी. विषे,हम दोनोंमें. अस्मासु-हमारे विषे, युष्मासु-तुम्हारे विषे, तुम्हारेमें, हमारेमें, हममें. तुममें. इन शब्दोंकू संबोधन होता नहीं. ८ संस्कृत भाषामें अव्यय शब्दोंसे विभक्ति होती नहीं.-अव्य- य-तीनों लिंगोंमें, प्रथमादिक सर्व विभक्तियोंमें, और तीनों भी वच- नोंमें एकसरीखाही रहता है. रूपांतर पातानहीं. जैसा-स्वर, अंता, प्रातर-च, वा, ह, हि, खलु, किं, एव, एवं, नेनु, नूनं-इत्यादि. ९ संस्कृतभाषामें क्रियापदोंमें सर्व वाक्यकी पूर्णता होती है. क- यापदोंक अनेक प्रय ग हे हैं.मो समझना कठिन है. इस पुस्तकमें जहां तहां क्रियापदोंके शब्दोंका अर्थ शब्दकोशमें देय है. क्रियापदों- का साधारण ज्ञान धातुरूपावली पढनेमे होगा. ३० क्रियावाचक शब्दोंकू धातु ऐसा कहते हैं. तिन धातुओंसे कर्ता, कर्म और भाव (अर्थात् शुद्ध धातुका अर्थ ) इन्होंमें ये नीचे लिखेहुए प्रत्यय होतेहैं- एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमपुरुष निप तम् (झि)अंति परस्मैपदी मध्यमपुरुष सिप थम थ उत्तमपुरुष मिप वस मस एकवचन द्विवचन बहुवचन. प्रथमपुरुष- त (ते) आताम् (आते) झ (अंते) आत्मने- मध्यमपुरुष-थास ( से ) आथाम् ( आथे ध्वम् ध्वे) पदी. उत्तमपुरुष- इ (ए) वहि (वहे : महि ( महे) ये प्रत्यय वर्तमानकाल,भूतकाल, भविष्यकाल, आज्ञार्थ, विध्यर्थ क्रियातिपत्ति इन्होंमें कुछकुछ बदलजातेहै. जैसा-कहां कहां इन्होंक भिन्नामन्न प्रकार के आदेश होतेहैं.तिस्से इन्होंके रूप मूलरूपोंसे बदल जाते है, यह समझना कठिन है. इस लिय प्रथम केवल धातुरूपावली पढके मुख्य मुख्य धातुओंके क्रियापक रूप समझलेना और शिक्षकने विद्यार्थियों को सिखाना, - and ११ संस्कृत वाक्योंके अंतमें क्रियापदोंका प्रयोग किया जाताहै. वे क्रियापद धातुओंके रूप हैं. व्याकरण शास्त्रमें धातुओंके अनेक तरहके रूप चलाये हैं. परंतु प्रायःकारकै बहुतही वाक्योंमें 'कृ, भू और अस्' इन धातु- ऑका प्रयोग किया करतेहैं; इसवास्ते उन तीन धातुओका अर्थसहित रूपाख्यान नीचे दियाहै. उससे समझलेना.- कृ-धातु (परस्मैपदी सकर्मक)करना. एकवचन द्विवचन बहुवचन [ एकवचन] [द्वि० बहुवचन ] लट शिक्षोपदेश। (मैं ) करताहूं. प्रथमपुरुष-करोति वर्तमान- कुरुतः कुर्वन्ति ( वो ) करताहै. (वे ) करतेहैं. मध्यमपुरुष-करोषि कुरुथः कुरुथ (तू) करताहै. (तुम )करतेहो. काल उत्तमपुरुष-करोमि कुर्वः कुर्मः । हम )करतेहैं. लिद अनद्यतन प्रथमपुरुष-चकार चक्रतुः चक्रुः ( वो ) करताभया. ( वे ) करतेभये. पराक्ष मध्यमपुरुष-चकर्थ चक्रथुः चक्र (तू) ( तुम) भूतकाल उत्तमपुरुप-चकार,चकर चक्रिव चक्रिम (मैं) (हम) ५ टीप-संस्कृतभाषामें द्विवचन तथा बहुवचनका प्रयोग पृथक् २ होताहै; परंतु हिंदीभाषामें द्विवचन तथा बहुवचनका अर्थ एकही होताहै. " (११) RamREETMAL [ए०व.] ( वो ) करेगा. [द्वि० ब०व०] ( वे ) करेंगे. (तुम) कराग. (१२) (तू) ( में ) करूंगा (हम) करेंगे. (घो) करेगा. (तृ) " (वे ) करेंगे. ( तुम ) करोगे ( हम ) करेंगे (मैं) करूंगा. प्र०- कर्ता कतारी कारः अनद्यतन म०- कर्तासि कतोस्थः कतास्थ नविष्यकाल उ०- कर्तास्मि कर्तास्वः कास्मः लट्र प्र०- करिष्यति करिष्यतः करिष्यति भविष्यकाल म:- करिष्यसि करिष्यथः करिष्यथ उ०- करिष्यामि करिष्यावः करिष्यामः लोट विध्यर्थ प्र०- करोतु,कुरुतात् कुरुतां कुर्वतु म०- कुरु कुरुतात् कुरुतं कुरुत आज्ञार्थ उ०-करवाणि करवाव करवाम लङ् प्र०- अकरात् अकुरुताम् अकुर्वन् अनद्यतन म०- अकरोः अकुरुतम् अकुरुत उ०-अकरवम् अकुर्व अकुर्म बालसंस्कृतबोधिनी। ( वो) करे. तू ) कर. (वे) करें. ( तुम )करो. (हम )करें. ( मैं ) करू. " ( वो ) करताभया. ( वे ) करतेभये. (तू) (तुम) (म) (हम) भूतकाल प्र०- कुर्यात् म०-कुयाः उ०- कुर्याम् [ए. व.] (वा) कर. (तू) कर. (मैं) करूं. [द्वि० ० ब०व०] (वे) करें. (तुम ) करो. (हम) करें. विध्यर्थ विधिलिङ्ग कुर्याता कुर्युः कुर्थात कुयात कुर्याव कुयाम आशीलिङ क्रियास्तां क्रियासुः क्रियास्त क्रियास्व क्रियाम्म प्र०- क्रियात् आशीरर्थ २ म०- क्रियाः क्रिया क्रियास्तं ( वा ) करे. ) कर. (में) करूं. (वे ) करें. ( तुम ) करो. (हम) करें. शिक्षोपदेश। भूतकाल प्र०- अकात् िआकाष्टीम् अकार्युः म०- अकार्षीः अकाष्टम् अकार्ट उ०- अकार्पम् अकार्व अकाष्म ( वो ) करताभया. ( वे )करताये. (तुम ) में) (हम) लइ ( तुम ) करोगे. प्र०- अकरिप्यत् अकरिप्यताम् अकरिष्यन् (वा ) करगा. (व ) करेंग. क्रियातिपनिर म०-- अकरिष्यः अकरिष्यतम् अकरिप्यन उ०- अकरिप्यम् अकरिप्याव अकरिप्याम ( म) करूंगा ( हम ) करंग. यह क्रियापद दूसरे क्रियापद से साकांस रहताहे. नैसा- यदि वृष्टिरभविष्यत तदा मुभिक्षमभविष्यत्' 'जो बरसात होगी; तो मुभिक्ष होगा. (१३) कृ-धातु (आत्मनेपदी सकर्मक ) करना. (१४) प्र०- कुरुते वर्तमानकाल र म०- कुरुषे उ.- कुवै कुर्वते कुरुष्व कुर्महे कुवात कुर्वाथ कुवह लिट्र चक्राते चक्राथ चकृवह चक्रिरे अनद्यतन प- राक्षभूतकाल प्र०- चक्र म०-चकृष उ०- चक्र बालसंस्कृतबोधिनी। चकृढ़े चकृमहे अनद्यतन भविष्यकाल प्र०- कर्ता म०-कर्तासे उ०- काहे कतारा कर्तासाथे कारः कर्ताध्वे कर्तास्महे कतास्वह १ इसकेभी अर्थ पूर्ववत् समझना,
लूद्र
प्रि०- करिष्यते करिष्यते करिष्यन्ते
भविष्यकाल म०-करिष्यसे कारष्यथ करिष्यध्वे
उ०- करिष्ये करिष्यावहे करिष्यामहे
लोद
विध्यर्थ
कुरुता कुर्वानां कुवेताम्
आज्ञार्थ
म०-कुरुष्व
कुर्वाथां
कुरुध्वम्
(उ०- करवै
करवावह करवामहे
-
शिक्षोपदेश।
अनद्यतन
प्र०- अकुरुत अकुर्वाताम् अकुर्वत
म०-अकुरुथाः
भूतकाल
अकुवाथाम् अकुरुध्वम्
उ०-अकुर्वि अकुर्वहि अकुर्महि
लिङ्
प्र०- कुर्वीत कुर्वीयातां कुरिन्
विध्यर्थ २ म०- कुर्वीथाः
कुर्वीयाथां
कुर्मध्वम्
उ०- कुर्वीय कुविहि
कुवीमहि
(१५)
आशीलिङ्
(१६)
प्र०- कृषीष्ट
आशीर्थर म०- कृपीटाः
उ०- कृषीय
कृषीयास्तां कृपरिन्
कृपीयास्थां कृपीध्वम्
कृषीवहि कृपीमहि
लु
प्र०- अकृत
अतकाल २ म०- अकृथाः
आकृपाताम् अकृपत
अकृपाथाम् अकृढ़म्
अकृप्यहि अकृमहि
बालसंस्कृतबोधिनी .
उ०- अकृषि
-
प्र०- अकरिष्यत अकरिष्येताम् अकरिप्यंत
क्रियातिपत्ति म०- अकरिष्यथाः अकरिष्येथाम् अकरिष्य म
उ०-अकरिष्ये अकरिष्यावहि अकरिप्यामहि
-
" " न " भृ-धातु (परस्मैपदी अकर्मक ) होना. प्र०-भवति भवतः भवंति (वो ) होता है. (वे) होतेहैं. वर्तमानकालम०-भवसि भवथः भवथ (तू) तुम ) हातहा उ०-भवामि भवावः भवामः ( मैं ) हाताहूं. (हम ) होतेहैं लिटू प्र०-बभूव वभूवतुः बभूवुः ( वा ) होताभया. ( वे ) होतेभए. अनद्यतन प- म०-वभूविथ बभूवथुः बभूव. ( तुम ) रोक्षभूतकाल (उ०-बभूव बभूविय बभूविम (में) (हम) लुद प्र०-भविता भवितारौ भवितारः वो) होगा. (वे ) होंगे. अनद्यतन म०-भवितासि भवितास्थः भवितास्थ (तू) ( तुम ) होवोगे भविष्यकाल उ०-भवितास्मि भवितास्वः भवितास्मः (मैं ) होऊंगा. (हम) हविंगे लूट प्र०-भविष्यति भविष्यतः भविष्यति ( वो ) होगा. ( वे ) होंगे. भविष्यकाल (म.- भविष्यसि भविप्यथः भविष्यथ (तू) ( तुम ) होवोगे उ.- भविष्यामि भविष्यावः भविष्यामः (में) होऊंगा. ( हम ) होवेंगे शिक्षोपदेश। 7 (१७) लोट (१८) विध्यर्थ आज्ञार्थ प्र०-भवतु,भवतात् म०-भव,भवतात् भवतां भवत भवाम भवंतु भक्त भवाम (वा) हाउ. (तृ ) हा (में) हाऊं (वे ) होवो. (तुम ) हावा (हम) हावें उ०- भवानि " अनयतन भूतकाल प्र०-अभवत् म०-अभवः उ०-अभवम् अभवताम् अभवन् अभवतम् अभवत अभवाव अभवाम ( वो ) होताभया. ( तु) ( म) वे) होतेभये. ( तुम) (हम) बालसंस्कृतबोधिनी। " विधिलिङ्ग विध्यर्थ प्र०- भवेत् म०-भवः उ०- भवेयं भवेतां भवत भवव भवयुः भवत भवम ( वो ) हाउ. (तू) हा. (में) होऊ. (वे) होवे. (तुम) होवो (हम) होवें आशीलिङ आशीरर्थ प्र०-भूयात् म०-भूयाः उ०-भूयास भूयास्तां भूयास्तं भूयास्व भूयासुः भूयास्त भूयास्म (बो) होउ. (तू) होउ. (में) हाउँ. ( वे ) होवें. (तुम) हावा. ( हम ) हावं. " प्र०-अभूत् म०-अभूः उ०-अभूवम् भूतकाल अभूताम् अभूतम् अभूव अभूवन् अभूत अभूम शिक्षोपदेश। ( घो) होताया. (व) हातभये. (तुम) (मैं) (हम) लङ् वे ) होंगे. प्रि० अभविष्यत् अभविप्यताम् अभविप्यन् क्रियातिपत्तिम० अभविष्यः अभविष्यतम् अभविप्यत उ० अभविष्यम् अभविष्याव अभविष्याम (वो ) होगा. (तू) मैं ) होऊंगा. (तुम ) होगे. ( हम ) होवेंगे ( १९) (२०) (उ०-अस्मि स्त अस-धातु (परस्मैपदी अकर्मक ) होना. प्र०-अस्ति स्तः संति वर्तमानकाल म०- असि स्थः स्थ स्वः स्मः प्र०- अस्तु, स्तात् स्तों सतु विध्यर्थ म०- एधि, स्तात् स्तं उ.- असानि असाव असाम इस धातुके सब क्रियापदोंका अर्थ '' प्र०- आसीत् आस्ताम् आसन् धातुके क्रियापदोंके अर्थ सरीखा करना. भृतकाल. म०- आसीः आस्तम् आस्त प्र०- आसम् आस्व आस्म प्र०- स्यात् स्याता विध्यर्थ म०-स्याः स्यात स्यात उ०-स्या स्याव स्याम १ अस्, धातुके रूप लिद लुट् आशार्लिङ और लुङ् इन प्रत्ययोंमें भू'धातुके रूप सरीखे चलना जैसे--लिट-बभूव इत्यादि लुट-भविता इ० लटू-भविष्यात इ० आशीर्लिङ्--भूयात् इ०ल अभविष्यत् इ० पूर्ववत् जानिलेना. बालसंस्कृतबोधिनी।
शिक्षोपदेश। (२१) , , ११ कितनेक शब्द क्रियापदोंसे होते हैं. उनको 'कृदंतशब्द' ऐसा कहते हैं. उनका अर्थ क्रियापदोंकासा बोलना. और वे विशे- षणभी होते हैं, इसवास्ते उन्होंका विशेषणका अर्थभी बोलना. परंतु उन्होंके रूप नामोके रूपसरीखेही चलते हैं. और इन्होंके लिंग विशेष्यवाचक शब्दोंके लिंगके अनुसार होते हैं- जैसे-गन्तव्य, वक्तव्य, कर्तव्य इत्यादि. उन्होंके अर्थ जानेयोग्य, बोलनेयोग्य, करनेयोग्य इत्यादि-इन्हों के रूप-गंतव्यं, गंतव्ये, गंतव्यानि. गंतव्यः, गंतव्यो, गंत- व्याः, गन्तव्या, गन्तव्ये. इत्यादिक शब्दरूपावली के अनुसार समझना १२कितनेक कदंतशब्द शुद्ध धातुके अर्थमेही रहते हैं। उन्होंक रूप नपुंसकलिंग प्रथमाके एकवचनांतही रहते हैं. जैसे-गन्तव्यम्, उत्था- तव्यम् इत्यादिकशब्दोंका-जाना, उठके खडे होना इत्यादिक अर्थ, और नपुंसकलिंग प्रथमैकवचनांतकासा प्रयोग है. १३ कितनेक शब्द, धातुओंसे उत्पन्न होते हैं. उनके लिंग निय- तही रहते हैं. जैसे-पुं० वसंत,देश,स्त्री अप, मिनि, नभोजन, प्रयोजन, दर्शन, प्रमाण इत्यादिक शब्द हैं. ऐसे यह शब्द एक एक लिंग ही रहते हैं: १४ कितनेक शब्द विशेषण रहते हैं. उनका प्रयोग या अर्थ ब- हुत करिके विशेष्यवाचकशब्दसे पहलेही कियाजाता है. परंतु कहां कहां वाक्यमें विशेष्यके पीछे विशेषणवाचकशब्द आता है, उसको विधिवि- शेषण कहते हैं. वहां उन विधिविशेषणोंका अर्थ विशेष्यवाचकशब्दों- के अर्थ बोलनेके पश्चात् बोलना. जैसे-"देवदत्तो ग्रामं गच्छन् तृणं स्पृशति"-देवदत्तनामक कोई एक पुरुष गामको जाता हुआ घासको , , छूता है. १५ कहां कहां षष्ठीका 'अनादर' अर्थ होता है. वहां 'सते' ऐसा उस षष्ठ्यंत शब्द के अर्थ बोलने के पश्चात् लगाना. जैसे-"पश्यतो हरः " (२२) बालसंस्कृतबोधिनी। Hinanton देखते संते चोर और कहां कहां सप्तमीका अर्थ "संते” ऐसा लगाकर होता है. इसको, सतिसप्तमी' ऐसी बोलनकी परंपरा है. जैसा-शासति महीं राज्ञि सर्वे लोका नन्दन्ते' राजा पृथ्वीको शासन करतसंते लोक सुखी होते हैं. कहां सति' इस पदका साक्षातमी प्रयोग कि- याजाता है जैस- पथ्ये सति गदार्तस्य किमौषधनिषवणैः पथ्य ( करत ) संत रोगीको औषध लेनेसे क्या ? इति शिक्षोपदेशः। . Mesome प्रथमः पाठः १. नित्यसामान्यकृत्योपदेशः। संस्कृतवाक्यानि- प्राकृतवाक्यानि- सोदयात प्राक् उत्थातव्यम सूर्यके उदयम प्रथम उठना, पश्चात गुर्वादीनाम् अभिवादनं फिर गुरु पिताआदिकांको नम- कर्तव्यम् स्कार करना. सत्समये इति वक्तव्यम् उस समयमें एसा कहना. भोः अभिवादये अमुक ) ना- अहो ( अमुक ) नामवाला में माहम् नमस्कार करताहूं. १ इन वाक्योंमें जितने शब्द गये हैं. और आगेके वाक्यों में विभक्ति लगाये, तथा शब्दकोशमें मूलरूपसे दिखाये नितने शब्द आवेंगे; वे सब अर्थसहित पाठ करें. और इन्होंके लिंग समझलेवें. फिर जब कोई वाक्य बोलनेका होवे, तब इन शब्दोंको अर्थक · अनुसार विभक्ति लगाकर वाक्यरचना करतेजॉय यह वाक्यरचनाका प्रकार शिक्षकोंने अपने विद्यार्थियोंकू अच्छी रीतिसें समझा देना चाहिये. जिससे वे अशुद्ध प्रयोग करें नहीं. २ इस वाक्यमें ( अमुक) जिस जगह हैं, वहां जो नमस्कार करनेवाला हो, उसने अपने नामका उच्चार करना. जैसे कि-"भोः अभिवादये ( देवदत्त ) नामाहम् " शिक्षापदेश। (२३) नस्थले गन्तव्यम् ततः शरीरशुद्धये मलोत्सर्ज- । फिर शरीरकी शुद्धि और मलमूत्र नार्थ च ग्रामात बहिःनिर्ज के त्याग करनेके लिये गामसे बाहर जहां मनुष्य न हो वहां जाना. तत्काले शुद्धजलं गृहीत्वा मू उस समय शुद्धजल लेकर मृत्रादि- वायुसर्ग कुर्यात कोंका त्यागकरे. पश्चात् पोडशगण्डपैः मुखशु-फिर मोलह गंडषों ( कुल्लाओं ) से द्धिं कुर्वीत मुखकी शुद्धि करे. अनंतरं दन्तधावनम् आचरेत फिर दाँतौन करे. तदनंतरं नद्यां स्नानं कर्तव्यम् तिसके अनंतर नदी में स्नान करना. अथवा कृपजलेन स्नायात किंवा कृवेक पानीसे स्नानकरे. नात्वा संध्याम उपासीत स्नानकरके संध्याकी उपासना करे. ततो देवान् नमस् फिर देवोंको नमस्कार करे. देवानां पूजा कर्तव्या देवोंकी पूजा करनी. अनंतरं भोजनं कुर्वीत फिर भोजन कर. मांसं न भक्षयेत् मांसको खावे नहीं. सुरां न पिवेत मद्यको पीवे नहीं. असत्यं न वदत झूठ बोल नहीं. स्वधर्म न त्यजेत् अपने धर्मको छोडे नहीं. एष वैदिकः सनातनो धर्मः यह वेदमें कहा हुआ धर्म सनातन कालका है.
(२४) बालमस्कतबोधिनी। शब्दकोश १. सूर्योदय-[ नाम] सूर्यका उदय, निर्जनस्थल-[ ना० ] जहा प्रातःकाल, सबेरा, प्रभात. कोई आदमी नहीं ऐसी जगह. प्राक्- [अव्यय ] पहले, प्रथम, गन्तव्य- [कना० ] जाना. आगे, आगेसे. तत्काल-[ ना० ] उससमय. उत्थातव्य-[ कदंतनाम ] उठ- शुद्धजल [ ना० ] स्वच्छ पानी. ना, जागना, खडेरहना. गृहीत्वा-[क० अ० ] लेकर. पश्चात-[अ०] फिर मूत्राद्युत्सर्ग-[ ना० ]मत्रआदि- गुर्वादि- [ ना० ] बडे, माता, कोंका छोडना. पिताआदिक. कुर्यात् [ कि० ] करे. अभिवादन- [ ना० ] नमस्कार गण्डूष-[ ना० ] कुरला, कुल्ला कर्त्तव्य-[ कना० ] करना मुखशुद्धि [ ना० ] मुखकी तत्समय-[ ना० ] उसकाल. स्वच्छता. इति- [अ० ] इसरीतिसे, ऐमा. कुर्वीत- [ क्रि० ] करे. वक्तव्य-- [ कना० ] बोलना. अनंतरम्- [अ० ] पीछे. भोः- [अ०] अहो ! दन्तधावन [ ना०] दाँतोन. अभिवादये-[क्रियापद ] नम- आचरेत्- [क्रि० ] करे. स्कार करताहूं. तदनंतरम्-[अ० ]तिसके पीछे. ततः-[अ० ] तिसके पीछे. कूपजल-[ ना० ] कुवाका पानी. शरीरशुद्धि- [ ना०] देहकी स्नायात्- [क्रि० ] स्नानकरे. स्वच्छता. स्नात्वा- [रु ०अ० ] न्हायके. मलोत्सर्जन- [ ना०] मैलका संध्या-[ ना०] जिसमें भगवा- छोडना. नका ध्यान कियाजाताहै, ग्राम-[ ना० ] गाम ऐसा कर्म. बहिः- [अ० ] बाहर. उपासीत-कि० करे, सेवनकरे.
शिक्षोपदेश। ( २५) . देव-ना०] देवता. स्वधर्म-[ ना.] अपने बाप दा- नमस्कुर्यात कि०]नमस्कारकरे. दा और अपन जो आचार न-[अ० ] नहीं. पालते हैं वह. भक्षयेत-[कि० ] खावे त्यजेत-[कि.] छोडे सुरा-[ ना. ] मद्य. वैदिक-[ ना० ] वेदमें कहाहुआ. पिवेत-[कि०] पीवे. सनातन-[ ना० ] पुरातन कालसे असत्य-[ना०] झंठ आयाहुवा. वदेत्-[क्रि०] बोले धर्म-[ ना०] आचार. द्वितीयः पाठः २. पाठशालोपदेशः। संस्कृतवाक्यानि प्राकृतवाक्यानि प्रत्यहं पाठशालांप्रति गंतव्यम् दररोज पाठशालामें जाना. तत्र आदी गुरूनभिवंद्य विद्या तहां प्रथम गुरुको नमस्कार करके अध्येतव्या विद्या पढना. गुरोः सकाशात् विद्याग्रहणप्र गुरुके पाससे विद्या लेनके प्रकार कारस्त्रिधा तीन हैं. गुरुकी सेवा करिक. वा द्रव्यदानेन अथवा द्रव्यके देनसे. अथवाऽन्यया विद्यया अथवा दूसरी विद्या गुरुको देनेसे. शालायां गुरुसमीपे अध्ययनं शालामें गुरुके पास पढना दृढ हो- दृढं भवति गृहे स्थित्वा यदध्ययनं तत् घरमें रहकर जो पढना है, सोशि- शिथिलं भवति थिल ( ढीला ) होता है. गुरोः शुश्रूषया ता है.
(२६) बालसंस्कृतबोधिनी। अस्यां पाठशालायां बहवो वि- इस पाठशालामें बहुत विद्यार्थी द्यार्थिन आयांति आते हैं. तेषां तु केचन विद्यार्थिनो वेद- तिनमें तो कोई विद्यार्थी वेदका स्याध्ययनं कुर्वति अध्ययन करतेहैं. कतिपये च विद्यार्थिनः व्याक- कितनेक विद्यार्थी व्याकरणशास्त्र- रणशास्त्रम् अधीयते को पढते हैं. तथा केचन तर्कशास्त्रं पठंति तैसे कोई विद्यार्थी तर्कशास्त्र पढते हैं. तथा तेषां मध्ये कतिपये वेदां- तैसे तिन्होंके मध्यमें कितनेक वे- तशास्त्रं पठति दांतशास्त्रको पढ़ते हैं. एवं सर्वे विद्यार्थिनः शास्त्राध्य- इसरीतिसे सर्व विद्यार्थी शास्त्र प- यनकर्तारः संति ढनेवाले हैं। अस्याः पाठशालायाः समीपे इस पाठशालाकं पाम अंग्रजी आंग्लपाठशालास्ति तत्र विद्यार्थिनः आंग्लभौम- वहां विद्यार्थी अंग्रेजी भाषा सी- भापां पठति खत हैं. तत्र चन्द्रशेखरो विद्यार्थी वहां चन्द्रशेखरनामक विद्यार्थी पंञ्चमं पुस्तकं पठति पांचवाँ पुस्तक पढता है. एकमासेन परीक्षा भविष्यति एक महीनसे परीक्षा होगी. अस्यां परीक्षायां दश विद्यार्थि- इस परीक्षामें दश विद्यार्थी पास हुए. नः उत्तीर्णाः विद्यैवैकं धनं सर्वधनेषु श्रेष्ठम् विद्या यही एक धन सर्व धनमें श्रेष्ठहै. तद्यथा दस्युभिः न ह्रियते चोरोंसे नहीं छीनाजाता है. १ इस नामके जगह चाहिये सो नामभी लगाना. ऐसा जहां चाहिये वहां सर्वत्र भी २ इस शब्दके जगह चाहिये सो संख्यावाचक शब्द धरना । वह ऐसा. करना।
पाठशालोपदेश। (२७) राजापि ग्रहीतुं न शक्नोति राजा भी लेनेको नहीं सकताहै. भ्रातृभिरपि न भुज्यते भाइयोंसे भी नहीं भोगाजाताहै. भारोपि न भवति बोझा भी नहीं होताहै. यथा रूप्यकादिधनं दानेन वि जैसा रुपयाआदिक द्रव्य दानसे नश्यति तथा इदं विद्याधनं नष्ट होताहै. तैसा यहविद्या- दाने कृते कदापि न विन धन दान किया तौभी कमीनी श्यति किंतु नित्यं व्यये कृते वर्धते एव तो नित्य खर्च करतनी बढताहीहै. तस्माद्विद्याऽध्येतव्या तिसवास्ते विद्या पढना. विद्यैव नृणां भूपणम् विद्याही मनुष्योंका भुषण है. नाश पातानहीं. शब्दकोश २. पाठशाला-शाला, पढनकी जगह. समीप-पास, नजदीक. तत्र-तहां. दृढ-मजबूत. अभिवंद्य-नमस्कारकरिक. स्थित्वा-रहकर. विद्या-ज्ञान, जानका ग्रंथ. शिथिल-ढीला,ढीली. अध्येतव्या-पढन योग्य. भवति-होता, ती-है. सकाशात-पासस बहु-बहुत. विद्याग्रहणप्रकार-ज्ञान सीखन- विद्यार्थिन-विद्यासीखनेकी की रीति. च्छाकरनेवाले. विधा-तीन प्रकारसे. अधीयते-पढतेहैं. शुश्रूषा-सेवा चाकरी. द्रव्यदान-धन देना. केचन-काईएक. अन्या-दूसरी. तर्कशास्त्र-न्यायशास्त्र. इ- तथा-तैसे.
(२८) बालसंस्कृतबोधिनी। दस्यु-चोर. भ्रातृ-भाई. पठति-पढतेहैं. श्रेष्ठ-उत्तम. कतिपये-कितनेक. यथा-जैसा कि. सर्व-सब. शास्त्राध्ययनकर्तृ-शास्त्रका पठ- वियते-हरणकियाजाताहै. न करनेवाले. राजन्-राजा. संति हैं अपि-भी, समुच्चय, निंदा. आंग्लपाठशाला-अंग्रेजीस्कल. ग्रहीतुं-लेनको. आंग्लभौमभाषा-अंग्रेजीभाषा. शक्नोति-सक्ताहै. चन्द्रशेखर-चंद्रशेखरनामक. पञ्चम-पाँचवाँ. भुज्यते-उपभोग किया जाता है. पुस्तक-इयत्ता, भार-बोझा. ग्रंथ. रूप्यकादिधन-रुपैया आदिक पठति-पढताहै. द्रव्य. एकमास-एक महीना. विनश्यति-नष्ट होताहै. परीक्षा-इम्तिहान, चौकसी. कृत-किया, कियाहुआ. भविष्यति-होगी. कदापि-कभीभी. दशन-दश. व्यय-खर्च. उत्तीर्ण-उतरा, उतराहुआ, पा- वर्धते-बढताहै. स हुआ. नृ-मनुष्य. एव-ही, निश्चय भूषण-अलंकार. -- मिनसंगोपदेश (२९) INDI तृतीयः पाठः३. मित्रसंगमोपदेशः। संस्कृतवाक्यानि प्राकृतवाक्यानि- भो मत्र कुत आगतोसि ? अहो मित्र ! तू कहांसे आया है ! पहि स्वागतं ते आ, तेरा अच्छा आना हुआ. सुदिनमद्य भवत्समागमेन आज आपके समागमसे अच्छा दिवस हुआ. किमधीतमेतावत्कालपर्यतं? इतने समयतक क्या अध्ययन किया? कस्मिन्विषयेऽभ्यासः कृतः ? कौनसे विषयमें प्यास किया ? यत् अधीतं तत् दृढम् अस्ति जो अध्ययन किया वह दृढ नवा? ( मजबूत ) है, या नहीं? मम विद्या तु दृढा अस्ति मेरी विद्या तो दृट ( मजबूत ) है. प्रत्यहं च अधीये अद्यापि आजतक दररोज पढताहूं. तेन मे विद्या प्रतिदिनं सजी तिस कारकै मेरी विद्या रोजके भवति रोज तैयार होतीहै. त्वमपि विद्यायाम् अभ्यासं कुरु तृषी विद्या अभ्यास कर. तेन ते सज्जा विद्या भविष्यति तिस करिकै तरी विद्या तैयार होगी अस्माकं गुरुः नः पाठान् प्रति- हमारा गुरु हमसे दररोज पाठ दिनं पृच्छति तथा युष्माकं पृच्छति न वा ? तैसा तुम्हारा पृछता है या नहीं? विद्या तु गुरुशुश्रूषाम् अंतरा न विया तो गुरुकी सेवा करे विना सिध्यति सिद्ध नहीं होती. अतः नित्यं गुरुं परिचरेत् इस वास्तै हमेशः गुरुको सेवे. तुष्टे गुरौ किं दुर्लभं! गुरु संतुष्ट हुए संते फिर क्या दु- ला है !
बालसंस्कृतबोधिनी। ल्याण है. पाठसमये च निरर्थकं वचनं न पाठ लेनेके समय व्यर्थ भाषण वदेत् करे नहीं. यदा गुरुर्भाषेत तदा तत् श्रो जब गुरु बोले, तब वह सुननाही. तव्यमेव रुष्टे गुरौ न किंचित्प्रत्युत्तरं गुरुको कोष आनेपर कुछभी उल- दद्यात् टा जबाब देना नहीं. एतदेव युष्माकं अस्माकम् च यहही तुम्हारा और हमारा क- हितम् इतोऽन्यः पंथाः न विद्यते इससे दूसरा मार्ग नहीं. शालायां सर्वेभ्यः प्रागेव ग शालामें सबसे प्रथमही जाना. न्तव्यम् गत्वा च तत्र पठनीयान् पाठा और तहां जाकर जो पाठ पढनके न् पुनः पुनरावृत्त्या मुखो हैं, वे फिर फिर आवनि (मथा) देकर मुखपाठ करे. गुरुणा पृष्टे एव दक्षतया उत्तरं गुरुकेपछतेही ढीठाईसे उत्तरदेवे. दद्यात् अपृष्टे न किंचिद्वदेत नहीं पूछते कुछ न बोले. सत्यां पाठशंकायां नम्रतया पाठमें शंका होय तोविनयसे पूछे. पृच्छेत् गुरोरग्रे चांचल्यं नाचरेत् गुरुके आगे चालाकी नहीं, करे. न च क्रीडेत् खेले नहीं. नापलपेत् बकवाद करे नहीं. न निषीदेत बैठकसे बैठे नहीं गुरून् दृष्ट्वा उत्तिष्ठेत् गुरुजनोंको देखके उठ खडा होवे. गतान् कुर्यात् मित्रसंगमोपदेश। (३१) अध्ययनेन वंध्यं दिवसं न ग- अध्ययनसे रीता दिन नहीं गमावे. मयत आयुः स्वल्पमस्ति आयुष्य थोडा है. पढनेका तो बहुत है. अतःयत्सारं तदेव अध्येतव्यम् इसवास्ते जो सार होय वहीं पढना. अध्येतव्यं च बहु H मित्र-सखा. शब्दकोश ३. भोः-अहो, ओ. अधीये-( मैं पढताहूं.) अद्यापि-आजतकनी. कुतः-कहांसे. प्रतिदिनं-दररोज. आगत-आया. सजीभवति-तैयार हो ता-जी-है. असि-तृ ) है. कुरु-(तू) कर. एहि-(तू ) आ. स्वागत-अच्छा आना. पाठ-सीखनेका पहाडा. सुदिन-अच्छा दिन अद्य-आज. पृच्छति-( वो )पृछता-ती-है भवत्समागम-आपका मिलाप. तु-तो. किम्-क्या. गुरुशुश्रषा-गुरुकी सेवा. अधीतं-पढा, पढाहुआ. अंतरा-विना, बिगर. एतावत्कालपर्यंतं-इतने सम-सिध्यति-तैयार हो ता-ती-है. यतक. अतः इसवास्ते. विषय-भाग, प्रकार, देश. परिचरेत-(वो)सेवे. चाकरी करे. दृढ-पका. मजबूत. तुष्ट-संतोष पायाहुआ. प्रत्यहं-दररोज. पाठसमय-अध्ययनकी वेला.
(३२) बालसंस्कृतबोधिनी। . निरर्थक-व्यर्थ, फोकट. वदेत-(ो) बोले भाषेत- (वो ) कहे. श्रोतव्य-सुननेयोग्य. रुष्ट-कोधित. प्रत्युत्तर-उलट जबाब. दद्यात्-(यो) देवे. हित-कल्याण. इतः-इस्से, यहांसे. अन्य-दूसरा. पथिन् ( पन्थाः ) मार्ग. विद्यते-(वो) है. तत्र-तहां. पठनीय-पढनेयोग्य. पुनःपुनः-फिर फिर आवृत्ति-सबक, संथा. मुखोद्गत-मुखपाठ पृष्ट-पूछा. दक्षता-ढिठाई. उत्तर-जबाब. पाठशंका-पाठमें संशय. नम्रता-विनय. पृच्छेत्-( वो )पूछे. चांचल्य-चालाकी. क्रीडेत- (बो) खेले. अपलपेत-(बो) बकवादकरे, गुप्तरक्खे. निषीदेत- वो ) नीचे बैठरहे. दृष्ट्वा-देख करकै. उत्तिष्ठेत- वो ) उठ खडा होजावे. बंध्य-नीता, रहित. गमयेत-(वो ) गमावे, आयुस्-उमर. स्वल्प-थोडा-डी. अध्येतव्य-पढने योग्य ( विद्या). बहु-बहुत. सार-श्रेष्ठ, फलप्रद. ARMINORAMA I terime भोजनोपदेश। (३३) चतुर्थः पाठः ४. भोजनोपदेशः। संस्कृतवाक्यानि प्राकृतवाक्यानि- अयि बालक सूदं पृच्छ हे बालक ! रसोइयादारकं पंछ. रसवती सिद्धा न वा! रसोई तैयार हुई या नहीं? सुसिद्धं सर्वमन्नम् हुआ. उत्तिष्टत भोजनार्थम् भोजनके वास्ते उठा. इमे वयमागताः पे हम आये. अब भोजने व्यञ्जनोपस्कराः आज भोजनमें सालनके पदार्थ सब अन्न तैयार बहवः संति बहुत हैं. दु सर्वमपि भोजनीयमद्य सुस्वा- सबही भोजन आज बहुत स्वा- वर्तते भोःमृद मह्यं झटिति अन्नं प- हे रसोइयादार ! मुझकं जलदी अन्न रिवेविडि पगेस. भो मातः क्षुधा मां बाधते हे मा ! भूख मेरेकू सताती है. द्रुतं मे भोजनं देहि जलदी मुझक भोजन दे. अद्य भोजने तु पूरिकाः सोहा- आज भोजनमें तौ पूडी, सोहालि- लिकाः लड्डुकाश्च बहवः या ( कचौडी ), और लड्डु संति भोजनावसरे अतिथिम् आह्व- भोजनके समय अतिथि ( पाहुने, यामि या भिक्षुकों ) को बुलाताहूं. भोभो अतिथयः इहागच्छत अहो अहो अतिथिओ ! (भिक्षुको!) यहां आओ. इदं गृहीत ये कहो. ये लेवो. इदं ब्रूत (३४) बालमंस्कृतबोधिनी। जन करो. अहं प्रत्यहम् अतिथिं ब्राह्मणम् मैं दररोज अतिथि ब्राह्मणको बुला आहूय तेन सह भोजनं के उसके साथ भोजन करताहूं. करोमि नतु एकाकी कस्मिन्नपि दिने कौनसेनी दिन अकेला जीमनेको भोक्तुं प्रवृत्तः आसम् मैं प्रवृत्त हुंआ नहीं. अतिथयोऽपि साक्षाद्धरेमूर्तयः अतिथि भी प्रत्यक्ष भगवान्की संति मूर्तियां हैं. इति हि शास्त्रं प्रमाणम् ऐसा तो शास्त्र प्रमाण है. अहो ब्राह्मणाः यूयं यथेच्छं अहो ब्राह्मण हो! तुम यथेच्छ ओ- भुध्वम् यद्रोचते तदग्राह्यं जो रुचताहोय, सो लेना. यन्न रोचते तत्त्याज्यं जो नहीं रुचता होय, सोडार देना. इदं सुस्वादु जलं पीयतां यह मीठा जल पीना. एतच्च घृतं हैयंगवीनमस्ति यह घी कलके गोदोहनसे तैयार किया हुआ ( ताजा ) है. शाकास्तु समीचीनाः संति शाक-भाजी तो अच्छे हैं. तकं च घनमस्ति छाछभी धन ( गाढा) है. सूपादयः पदार्थाः शोभनाः दाल आदिक पदार्थ अच्छे हैं. विद्यते इदमन्नं भुंजतः मे भूयान संतो- ये अन्न खानेवाले मुझकू बडा सं- पः उत्पद्यते तोष उत्पन्न होता है. अद्य आतृप्ति भोजनं जातं आज तृप्ति होय तबतक भोजन हुआ. भोजनस्थले च रंगावली समं- भोजनकी जगामें सबओर रङ्गा- ततः सुविन्यस्ता आसीत् वली निकाली हुई थी.
भोजनोपदेश ।
(३५)
धूपगंधश्च सर्वतः परिव्याप्त धूपका सुवास सब ओर भरा हु-
आसीत
आ था.
सुविचित्राणि वादिवाणि अवा- अनेक प्रकारके बाजे बजने लगे.
यंत
भोजनोत्तरं मुखं प्रक्षाल्य अहं भोजनके पीछे मुख धोकरके तेरह
त्रयोदशगुणं तांबूलम् अ गुणका तांबुल मैं खाताभया.
भक्षयं
अन्योन्यश्च अददा दूसरेनकंजी में देताभया.
पश्चात् अहं किंचित्कालम् अ- फिर मैं कुछ देर सोतामया.
स्वपं
तत उत्थाय स्वकार्यम् अकरवं तदनन्तर उठके अपना काम मैं
करताञया.
एप एव मे नित्यक्रमः
यहाँ मेरा नित्यका क्रम है.
अनेन च आचरणेन कोपि न इस आचरणसे कोईली दुःख नहीं
सीदति
शरीरं च दृढं भवति शरीरती मजबूत होता है.
बुद्धिश्च वर्धते
बुद्धि बढती है.
तस्मात् इदं प्रतिदिनं कुर्वीत तिस वास्ते यह दररोज करे.
एष भोजनोपदेशः यह भोजनका उपदेश है.
शब्दकोश ४.
सूद-रसोइयादार. सिद्धा-तैयार.
पृच्छ-(तू) पूंछ. उत्तिष्ठत-(तुम ) उठो.
रसवती-रसोई.
व्यंजनोपस्कर-सालन दाल भाजी
पाता है.
(३६) बालसंस्कृतबोधिनी। maste घृत--धी. सुस्वादु-अच्छा मीठा. यथेच्छम्-इच्छाके अनुसार. झटिति-जलदी. भुंड्ध्वम् -( तुम ) जीमो. परिवेविति-(तृ )परोस. रोचते-रुचताहै, अच्छा लगताहै. क्षुधा-भूख. ग्राह्य-लेना, लेने योग्य. बाधते-(वो) सताता-ती-है. त्याज्यं-छोडना, छोडने योग्य. द्रुतं-जलदी. पीयतां--पीना. देहि-(तू)दे. पूरिका-पूरी. हैयंगवीन-कलके दिन गायको सोहालिका-कचौरी, सोहालिया. दोहन करके आज तैयार किया अतिथि-परोणा, भिक्षुक. हुआ, ( ताजा मक्खनका ) घृत, भोजनावसर-जीमनेका समय. शाक-भाजी. आयामि-( मैं ) बुलाताहूं समीचीन-सुंदर. इह-यहां तक्र-छाछ. घन-गाढा. आगच्छत-(तुम ) आओ गृहीत- तुम ) लेओ. सूपादि-दालआदिक. पदार्थ-चीज. बत- ( तुम ) बोलो. शोभन-अच्छा. आहूय-बुलायके. भुंजत्-जीमनेवाला. एकाकिन-अकेला. भूयम्-बहुतसा-सी. भोक्तम्-जीमनेको. सन्तोष-आनंद. प्रवृत्त-लगाहुआ. उत्पद्यते-उपजता है. आसम्- ( मैं ) था. आतृप्ति-संतुष्ट होवे तबतक. साक्षात-प्रत्यक्ष. भोजनस्थल-जीमनेकी जगह. हरि-विष्णु भगवान. रङ्गावली-चित्रविचित्र रंगोंका मूर्ति-आकार. वेलबूटी.
आपणोपदेश। (३७) समन्ततः-सब ओरसे, आस- प्रक्षाल्य-धो करकै. पाससे. त्रयोदशगुण-तेरह गुणका. सुविन्यस्त-अच्छी रीतिसे र- ताम्बूल-बीडा. क्खा-क्खी-हुआई. अभक्षयं-(मैं ) खाताहुआ. आसीत-था, थी. अददा-(मैं) देताहुआ. धूपगंध-धूओंका मुगंध. अस्वपं-(मैं ) सोताहुआ. सर्वतः-सब ओरसे. स्वकार्य-अपना काम. परिव्याप्त-भराहुआ. अकरवं-(मैं) करताहुआ. सुविचित्र-अनेकप्रकारका. नित्यक्रम-रोजकी चाल. वादित्र-बाजा. सीदति-(वो दुःख पाता-ती, है. अवाद्यंत-(वे ) बजतेनये, बज- वर्धते-बो) बढता-ती, है. ती गई. भोजनोपदेश-भोजनका सि- भोजनोत्तरम्-भोजनके उपरांत. खामन पञ्चमः पाठः ५. आपणोपदेशः। संस्कृतवाक्यानि- अस्मिन्ग्रामे आपणः अस्ति इस गाममें बजार है क्या ? किम् ? अत्र सर्वापि सामग्री मिलति यहाँ सब सामग्री मिलती है किम् ! किमपेक्ष्यते भवद्भिः? आप क्या चाहते हैं ? मम तु सर्वापि भोजनसामग्री मुझकू तौ सबही भोजनकी सामग्री अपेक्ष्यते चाहेती है प्राकृतवाक्यानि- क्या?
(३८)
बालसंस्कृतबोधिनी।
-
घृतं कियता मूल्येन लभ्यते? घी कितने कीमतसे मिलता है ?
तण्डुलानाम् एकसेरपरिमितानां एक सेर चावलोंका क्या दाम ?
किं मूल्यम्?
गोधूमचूर्ण कथं वर्तते? गेहूंका चून कैसा है ?
शाकान् समानय
भाजी लेआ.
द्वयोः ताम्रिकपणयोः तैलमा- दो पैसेका तेल ला.
नय
पत्रावल्यःक्क मिलंति ? पत्रावली कहां मिलती हैं।
एकपणस्य द्रोणकाः कति एक पैसके कितने दोंने देतहो ?
दीयंते ?
आपणः केन मार्गेण आयाति? बजार किस रास्तासे आता है ?
अत्र ग्रामे ब्राह्मणानां गृहाणि इस गाममें ब्राह्मणोंके घर कहां हैं ?
व सन्ति ?
अत्र च वणिग्जनानां गृहश्रेणी यहां बनियालोगोंके घरोंकी पं-
केन मार्गेणायाति? क्ति किस रास्तेसे आती है
तत्राहं गन्तुमिच्छामि तहां मैं जानेको चाहताहूं.
तत्र वयं गंतुमिच्छामः तहां हम जानेको चाहते हैं.
तद्भवान् जानाति किम् ? वह आप जानते हैं क्या ?
त्वं यदि जानासि तर्हि ब्रूहि तू जो जानता होगा, तो कह.
वृन्ताकाः कियन्मूल्येन सेरप्र- बैंगन कितनी कीमतसे सेरभर
मिता दीयन्ते ? देते हैं?
मम अङ्गरक्षार्थ वस्त्रं क्रीणामि मेरे अंगरखाके वास्ते कपडा खरी-
दताहूं.
सः किं विक्रीणाति ? पृच्छ वह क्या बेचताहै ? पूंछ.
तावतः किं गृहाति
तितनेका क्या लेताहै ?
आपणोपदेश । अहम् एतावत् ददामि मैं इतना देताहूं. इतः अधिकं मत्तो न लभ्यते इससे अधिक मुझसे न मिलेगा. यदि इच्छास्ति तर्हि गृहाण जो इच्छा हो तो ले. नो चेत् अन्यत्र पश्य नहीं तो दूसरी जगह देख. अस्य आपणगृहस्य मासिकं इस दूकानके मकानका दरमहा भाटकं किमस्ति ? भाडा (किराया) क्या है ? वस्तुं दीयते वा ? रहनेको देते हैं क्या ? मासि मासि भाटकं दास्यामि महीने महीने भाडा दूंगा. ग्राम-गाम. आपण-बजार. अत्र-यहां. सर्वा-सब सामग्री-मर सामान. मिलति-मिलता-ती-है. शब्दकोश ५. एकसेरपरिमित-एक मेरभर गोधूमचूर्ण-गेहूं का आटा. कथं-कसा. वर्तते-(वी) है. शाक-माजी. समानय-(तू) ला. द्वि-दोय. ताम्रिकपण-पैसा. तेल-तेल, पत्रावली-पत्नल. भोजन-भोजन, जीमना. अपेक्ष्यते-चाहेता-ती-है. घृत-धी. कियत-कितना. मूल्य-कीमत लभ्यते-मिलता-ती-है. तण्डुल-चावल. क-कहां. एकपण-एक पमा. द्रोणक-दोना. कति-कितने.
(४०) बालसंस्कृतबोधिनी। हूं . दीयंते-देतेहैं, दियेजाते हैं. वस्त्र-कपडा. मार्ग-रास्ता. कीणामि- मैं ) खरीदता-ती- आयात-आता-ती-है. विक्रीणाति-(वो) बेचता-ती-है. ब्राह्मण-ब्राह्मण. गृहाति-(वो) लेता-ती-है. गृह-घर. एतावत्-इतना. वणिग्जन-बनियालोग. ददामि-( मैं ) देता, ती-है. गृहश्रेणी-घरोंकी पंक्ति इतः-यहांसे, इससे. तत्र-तहां. अधिकं-ज्यादा. अहं-मैं मत्तः-मेरेसे,मुझसे. गंतुं-जानेको. इच्छामि-(में) इच्छताहूं. इच्छा-चाहना. गृहाण-(तृ)ले. नोचेत्-नहीं तो. भवान्-तू, आप. जानाति-जानता-ती-है. अन्यत्र-दूसरी जगह. यदि-जो. पश्य-तृ) देख जानासि-(1) जानता-ती-है. भाटक-भाडा, किराया. तर्हि-तो. मासिक-महीनेका. अहि-(तू) कह. वस्तुं-रहनेका. वृन्ताक-बैंगन. मास-महीना. अंगरक्षण-अंगरखा. दास्यामि-(मैं) देऊंगा-गी. वयं-हम.
जगदनुभवोपदेश। (४१) वृक्षाः कंपंते षष्ठः पाठः६. जगदनुभवोपदेशः । संस्कृतवाक्यानि प्राकृतवाक्यानि- मेघो गर्जति मेघ गर्जताहै. चंद्र आहादयति चंद्रमा आनंद देताहै. सूर्यः प्रद्योतते सूर्य प्रकाशताहै. वायुर्वहति पवन वहता है. झाड कांपते हैं. पर्णानि प्रचलंति पान हिलते हैं. फलानि प्रपतंति फल गिरते हैं. वसंतेऽभिनवा वनशोभा वसंतऋतुमें नूतन जंगलकी शोभा दृश्यते दीखती है. ग्रीष्मे प्रचंडातपो भवति ग्रीष्म ऋतु में प्रखर घाम (तडका) होता है वर्प? पृथ्वी सकर्दमा भवति वर्षाऋतुमें जमीन कर्दमसे युक्त होती है नदी वेगेन प्रवहति नदी जोरसे बहती है. जलं निर्मलं न मिलति पानी स्वच्छ नहीं मिलता है. शरहतौ चंद्रमाश्चंद्रिकया शरदऋतमें चंद्रमा चांदनीसे शोन- शोभते ताहै. सरःसु कमलानि विकसंति सरोवरों में कमल खिलते हैं. गगनं स्वच्छं दृश्यते आकाश स्वच्छ दीखता है. सर्वजनमनःप्रसादो भवति सब लोगकि मनको आनंद होताहै. हेमंते जठरानलः प्रदीप्यति हेमंतऋतुमें जठराग्री प्रदीप्त होताहै. .
(४२) बालसंस्कृतबोधिनी। तूख दूनी होती है. क्षुधा च द्विगुणी भवति शरीराणि पुष्यति शरीर पुष्ट होते हैं. शिशिरौ निशा महती भवति शिशिरऋतुमें रात्रि बडी होती है. दिनं स्वल्पं भवति दिवस छोटा होता है. जिह्वया रसं स्वदति जीभसे रस चखता है. श्रोत्रेण शब्दमाकर्णयति कानसे शब्द सुनताहै. चक्षुभ्या रूपं पश्यति नेत्रोंसे रूप देखताहै. घ्राणेन गंधं जिप्रति नाकसे गंधको संघताहै. त्वगिद्रियेण पदार्थान् स्पृशति त्वचा इंद्रीसे चीजोंको छूता है. वाणीसे बोलताहै. हस्तेन गृह्णाति हाथसे लेताहे. पादाभ्यां गच्छति पावाँसे जाताहे. पायुना मलम् उत्सृजति गुदासे मैल छोडताहे उपस्थेनानंदमश्नुते उपस्थइंद्रीसे आनंदको भोगताहै. मनसा कार्य चिंतयति मनसे कार्यको चितवन करताहै. इमानींद्रियकर्माणि संति ये इंद्रियोंके कार्य हैं. इति जगदनुभवः ऐसा जगत्का अनुभव है. वाचा वक्ति . शब्दकोश ६. मेघ-अत्र, बादल. प्रद्योतते-(यो)प्रकाशता-ती है. गति-(वो)गर्जना करता-ती-है. वायु-वायु-पवन. चंद्र-चांद. वहति-(वो)बहता-ती है. आहादयति(वो)आनंद देता-ती-है. वृक्ष-झाड. कंपंते-वे) हिलते हैं. सूर्य-मरज.
जगदनुभवोपदेश। (४३) -- " पर्ण-पान. गगन-आकाश. प्रचलंति-(वे ) हलते-ती-हैं. स्वच्छ-निर्मल. सर्वजनमनःप्रसाद-सब लोगों के प्रपतंति-गिरतेहैं. मनको आनंद देनेवाला. ग्रीष्म-उष्णकाल. हेमन्त-हेमंतऋतु. प्रचंड-अतिशय कड़ा. जठरानल-पेटमेंका अग्नि. आतप-धाम, तडका, धूप. प्रदीप्यते-प्रदीम होता-ती है वसंत-वसंतऋतु. क्षुधा-भूख. अभिनव-नृतन, नया-ई. द्विगुण-दुप्पट. वनशोभा-जंगलकी शाना. शरीर-देह. दृश्यते-(वो) दिखता-ती है. पुष्यंति-(वे) पुष्ट होते-ती हैं. वर्षर्तु-बरसातका समय. शिशिर-शिशिरऋतु. पृथ्वी-जमीन. निशा-रात्रि. सकर्दम-कादवसे युक्त. महती-बडी. नदी-नदी. दिन-दिवस. वेग-जोर. स्वल्प-थोडा, छोटा. प्रवहति-(वो ) बहत ती-है. जिह्वा-जीन. निर्मल-स्वच्छ. रस-स्वाद. शरहतु-सरदीका काल. स्वदति-(वो) चखता-ती है. चंद्रमस-चांद. श्रोत्र-कान. चंद्रिका-चांदनी. शब्द-आवाज, ध्वनि. शोभते-(वो) शोचता-नी-है. आकर्णयति-सुनता-ती है. सरस्-तालाव. कमल-कमल फूल. रूप-आकार. विकसंति-(वे )प्रफुल्ल होते,ती हैं. पश्यति-देखता-ती-है. ~- चक्षुस्-आँखि.
(४४) बालसंस्कृतबोधिनी। minatamdanian-mummmm प्राण--नासिकेंद्रिय. गंध-वांस, बोय. जिघ्रति-संघता-ती-है. त्वगिद्रिय--त्वचा इंद्री. वाच-वाणी. वक्ति-(वो )बोलता-ती-है. हस्त-हाथ. गृहाति-(वो) लेता-ती-है. पाद-पाव. गच्छति-(वो) जाता-ती-है. पायु-गुदा मल-मैला. उत्सृजति-(वो) छोडता-ती-है. उपस्थ-शिश्न, भग. आनंद-मुख. अश्नुते-(वो) भोगता-ती है. मनस्-मन. कार्य-काम. चिंतयति-(वो ) सोचता-ती-है. इंद्रियकर्माणि-इंद्रियोंके काम. जगदनुभव-जगतका अनुभव. सप्तमः पाठः ७. कालबेलोपदेशः। संस्कृतवाक्यानि प्राकृतवाक्यानि- अष्टादशनिमेपैः काष्ठा अठारह वार नेत्रोंके पलक खुलने और मृदनेसे एक काष्ठा होतीहै. त्रिंशत्काष्टाभिः कला तीस काठाओंसे एक कला होती है. त्रिंशत्कलाभिःक्षणः तीस कलाओंसे एक क्षण होताहै- द्वादशभिः क्षणैरेको मुहूर्तः बारह क्षणोंसे एक मुहूर्त होता है. त्रिशद्भिर्मुहूर्तेरेकः अहोरात्रः तीस मुहूर्तासे एक दिन और रात होती है. तदेव दिनं वोही दिवस. पंचदशभिर्दिनरक पक्षः पंद्रह दिवसोंसे एक पक्ष(पखवाडा) होताहै.
कालवेलोपदेश । ते यथा . महीने बारह. " द्वाभ्यां पक्षाभ्याम् एको मासो दो पखवाडौंसे एक महीना होताहै. भवति द्वाभ्यां मासाभ्यामेक ऋतुर्जा दो महीनोंसे एक ऋतु होताहै. यते एवं संवत्सरस्य पद ऋतवो ऐसे वर्षके छः ऋतु होते हैं. भवंति वे ऐसे वसंतः, ग्रीष्मः, वर्षा, शरत्, वसंत, ग्रीष्म, वर्षा, शरत्, हेमंत, हेमंतः, शिशिरः. शिशिर. मासाश्च द्वादश तेषां नामानि च तिन्होंके नाम. चैत्रः,वैशाखः, ज्येष्ठः,आषाढः, चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ, श्रा- श्रावणः, भाद्रपदः, आश्विनः, वण, भाद्रपद, आश्विन, कार्तिक, कार्तिकः, मार्गशीर्षः, पौपः, मार्गशीर्ष, पौष, माघ, माघः, फाल्गुनः. चैत्रवैशाखौ वसंतः चैत्र और वैशाख-वसंत. ज्येष्ठाषाढौ ग्रीष्मः ज्येष्ठ और आषाढ-ग्रीष्म. श्रावणभाद्रपदौ वर्षा श्रावण और भाद्रपद-वर्षा. आश्विनकार्तिको शरत् आश्विन और कार्तिक-शरत्. मार्गशीर्षपौषौ हेमन्तः मार्गशीर्ष और पौष-हेमंत. माघफाल्गुनौ शिशिरः माघ और फाल्गुन-शिशिर. त्रिभित्रंतुभिरेकमयनं भवति तीन ऋतुओंसे एक अयन होताहै. द्वाभ्यामयनाभ्यामेकं वर्ष भ- दो अयनोंसे एक वर्ष होताहै. वति तदेतन्मनुष्याणां वर्ष वह यह मनुष्योंका वर्ष है. और फाल्गुन.
(४६) बालसंस्कृतबोधिनी। कहाता है. उत्तरायणं देवानां दिनम् उत्तरायण देवोंका दिवस है. दक्षिणायनं देवानां रात्रिः दक्षिणायन देवोंकी रात्रि है. शुक्लपक्षः पितणां रात्रिः शुक्लपक्ष पितरोंकी रात्रि है कृष्णपक्षः पितॄणां दिनम् कृष्णपक्ष पितरोका दिवस है. भाद्रपदकृष्णपक्षः पितृपक्ष इ- भाद्रपदकृष्णपक्ष 'पितृपक्ष' ऐसा त्युच्यते माघकृष्णचतुर्दशी शिवरात्रि- माघ मासके कृष्णपक्षकी चतुर्दशी र्भवति 'शिवरात्रि' होती है. चैत्रशुक्लनवमी रामजयन्ती चैत्र शुक्लनवमी रामजयन्ती होतीहै. श्रावणकृष्णाष्टमी कृष्णज श्रावण महीनेके कृष्णपक्षकी अ- यन्ती टमी 'कृष्णजयन्ती होती है. जयन्तीदिनेषु उपोपणं कार्यम् जयन्तियोंके दिनोंमें उपवासकरना. सप्त वाराः सन्ति सात वार हैं. रविः, सोमः, भौमः, बुधः, रवि, सोम, मङ्गल, बुध, गुरु, शुक्र, बृहस्पतिः, भृगुः, शनिरिति और शनि ऐसे. शनिवारे श्मश्रुकर्म न कर्तव्यं शनिवार हजामत नहीं कराना. भौमवारे श्मश्रुकर्मणा आयु- मङ्गलबार में हजामत करानेसे उमर ष्यं क्षीयते घटती है. श्मश्रुकर्मणि चतुर्थी,पष्टीम्,अ- हजामत करानेमें चौथ, छठि, आ- टमी,नवमी, चतुर्दशी, पौ- ठम, नौमी, चौदस, पूनम और र्णमासीम, अमावास्यां च अमावस इन्होंको बर्ज दे. विवर्जयेत् शनिवारे तैलाभ्यङ्गो लक्ष्मी- शनिवारको तेलसे मालिश करना प्रदः लक्ष्मी ऐश्वर्य देनेवाला है. imnew ravani कालवेलोपदेश। (४७) सोमवारे तैलाभ्यङ्गः कांतिवर्धनः सोमवार में तेलायंग कांति बढ़ताहै. बुधवारे विद्यारम्भः शुभः बुधवार में विद्या सीखनेकी शुरु- वात अच्छी है. एतत्-ये. शब्दकोश ७. अष्टादश-अठारह. अयन-अयन-(वि०नाम.) निमेष-नेत्रोंके पलकोंका उघा- वर्ष-वर्ष. रना और मंदना. काष्टा-दिशा. मनुष्य-मनुष्य, आदमी. त्रिंशत-तीस उत्तरायण-जिसमें सूर्य की गति कला-कला-(विशेषनाम.) उत्तरकी तरफ, जाती है ऐसे द्वादश-बारह. छ:महीने. क्षण-क्षण-(वि०नाम) देव-देवता. मुहूर्त-मुहूर्त (वि.नाम.) दक्षिणायन-जिसमें सूर्यकी गति एक-एक. दक्षिण दिशाकी ओर जाती है; अहोरात्र-दिन और गत. वह काल. तदेव-बाही. रात्रि-रात. शुक्लपक्ष-उजीयारा पखवाडा. पक्ष-पखवाडा. पितृ-पितर. मास-महीना. भाद्रपदकृष्णपक्ष- भाद्रपद मा- संवत्सर-वर्ष सका कृष्णपक्ष. पट्-छः. पितृपक्ष-पितर पखवाडा'महालय ऋतु-ऋतु, मोसम. माघकृष्णचतुर्दशी-माघमास के वि-तीन. कृष्णपक्षकी चौदसी. पञ्चदश-पंद्रह.
(४८) बालसंस्कृतबोधिनी। me । -- शिवरात्रि-शिवरातं. रामजयन्ती-रामजन्म. कृष्णजयन्ती-कृष्णजन्म. उपोपण-उपवास. कार्य करने योग्य काम. सप्तन्-सात. वार-दिन. श्मश्रुकर्म-हजामत. आयुष्य-आयर्दा, उमर. क्षीयते-(वो) घटता-ती-है. विवर्जयेत्-(वो) दूर करे. तैलाभ्यङ्ग-तैलसे मालिस. लक्ष्मीप्रद-ऐश्वर्यको देनेवाला. विद्यारम्भ-सीखनेकी शुरुवात. शुभ-अच्छा, अच्छी. सच्चा बोल. अष्टमः पाठः ८. सामान्यनीत्युपदेशः । संस्कृतवाक्यानि प्राकृतवाक्यानि- देवं सेवस्व देवको सेव गुरुं भज गुरुको सेवनकर हरि स्मर हरिको स्मरणकर. सत्यं ब्रूहि धर्मका आचरण कर. मित्रं प्रीणीहि मित्रको संतुष्टकर. कोधको जीत. कामं जहि कामको नाशकर. दयां धारय दयाको धारणकर. देवान्पूजय पशून्पालय पशुओंको पालनकर. हिंसां मा कृथाः हिंसा मतकर. हिंसया लक्ष्मीः नश्यति हिंसा करनेसे लक्ष्मी नष्ट होती है. धर्म चर क्रोधं जय देवोंको पूजनकर.
सामान्यनीत्युपदेश । (४९) अहिंसा परमोधर्मः हिंसा नहीं करना यह श्रेष्ठ धर्म है. असत्यं मा बेथाः झूठ मत बोल. नासत्यात्पातकं परं झंठसे दूसरा अधिक पाप नहीं. याचकेभ्यो दानं देहि याचकोंको दान दे. दानाद्वै वर्धते यशः दानसे कीर्ति बढती है. विद्यां गुरोरवाप्नुहि गुरूसे विद्याको प्राप्तकर. विद्या यशःप्रापयति विद्या यशको कमाती है. विद्या अभ्याससाध्या भवति विद्या आयास करनेसे साध्य होती है. गुह्यं च गोपायति पितरं मातरं च प्रणम पिता और माताको नमस्कार कर. मातुः पितुश्चाधिकं किमपि मातासे और पितासे अधिक कुछ नास्ति नहीं है. मित्रादधिकः साह्यकर्ता नास्ति मित्रसे अधिक साहाय्यकारी नहींहै मित्रं सुखं दुःखं च सहैव अनु- मित्र सुख और दुःखको (मित्रके) भवति साथही भोगताहै. गुप्त बातको छिपाताहै. हितम् उपदिशति हितके उपदेश करताहै. आहतम् सूचयति अहितको जतादेता है. सत्कुलजां भार्याम् उपयमेत् अच्छे कुलमें पैदाहुई स्त्रीको व्याहे. परदारान्न गच्छेत पराई स्त्रीके प्रति जावे नहीं. परदारेभ्यो भयं भवति पराइ स्त्रीसे भय होताहै. परस्त्रियो द्रव्यस्यैव पराई स्त्रियां इव्यकी ही रहती हैं. तासु प्रेम न विद्य तिन्ही में प्रेम नहीं रहता है. परस्त्रीभ्यो दुष्टरोगा उत्पद्यन्ते पराई स्त्रियोंमे ( गरमी परमा आदि) खराब रोग पैदा होते हैं.
(५०) बालसंस्कृतबोधिनी। स्वस्त्रियमेवोपगच्छेत् अभक्ष्यं मा भुंक्थाः अपनीही स्वीके पास जावे. नहीं खाने लायक पदार्थको मत खाओ. ब्रूहि-(त) बोल. शब्दकोश ८. सेवस्व- (तू) सेव नकर. कृथाः-(तू) कर. गुरु-पढानेवाला, बड़ा. लक्ष्मी-ऐश्वर्य. भज-(तू ) सेव नकर. नश्यति-नष्टहोता-ती-है. हरि-भगवान्. अहिंसा- हत्या नहीं करना सो. स्मर-(तू) चितवनकर, परम-श्रेष्ठ, सत्य-सच्चा. असत्य-झूठ. बूथाः- (तू ) बोल. धर्म-शुद्ध आचार. पातक-पाप. चर- (तू ) कर. पर- श्रेष्ठ, अन्य, अधिक. प्रीणीहि- खुशकर. याचक-भिखारी, कँगाल. क्रोध- गुस्सा. दान-दान, खैरात. जय- (तू) जीत. देहि-(तू ) दे. काम-कामदेव. वै-निश्चयस. जहि- (त) नाशकर. वर्धते-(वो )बढ़ता-ती-है. दया-कृपा. धारय- (तू) पकड. यशस्-कार्ति. पूजय-(त) पूजाकर. विद्या-ज्ञान, इल्म. पशु-जानवर. अवाप्नुहि- (तू ) पा. पालय- (तू) रक्षणकर. प्रापयति-पमाता-ती-है. हिंसा- हत्या. अभ्याससाध्या-अस्याससे सि- मा- नहीं, मत. द्ध होनेवाली.
लोकानुभवोपदेश । (५१) पितृ-बाप. सुख-आनंद. भार्या-स्त्री. मातृ-मा. उपयमेत-(वो) व्याहे. प्रणम-(तू) नमस्कार कर. किमपि-कुछनी. परदार-दूसरेकी स्त्री. साह्यकर्ता-मदतकरनेवाला. गच्छेत्-(वो) पास जावे. भय-भीति, बर. दुःख-कष्ट उपगच्छेत्- वो) पास जावे. अनुभवति-(वो) भोगता-ती-है. द्रव्य-पैसा, धन, दौलत. सहैव-साथही. प्रेमन-प्रीति. गुह्य-छिपीबात. न विद्यते-नहीं है. गोपायति-(वो) गुप्तरखता-नी- परस्त्री-दूसरेकी खी. है, रक्षणकरता-ती-है. दुष्टरोग-खराबरोग ( गरमी परमा हित-कल्याण. आदिक). उपदिशति-(वो) कहता-ती-है. उत्पद्यते-उपजता-ती है. अहित-अकल्याण. अभक्ष्य-नहीं खाने योग्य. सूचयति-(वो) जतादेता-ती-है. सत्कुलजा-अच्छे खानदानके मा-नहीं, मत. कुलमें पैदाहुई. भुंक्थाः-(तू ) खा. नवमः पाठः ९. लोकानुभवोपदेशः । संस्कृतवाक्यानि प्राकृतवाक्यानि- अज्ञः शिशुःक्रीडति साधवः प्राणिमात्रेषु दयां अच्छे सज्जन सब प्राणियोंपर दया कुर्वति करते हैं. मूर्खबालक खेलताहै. -wareneurner- raman EDLARIORALIRAMAIL. Mmmm Menu Satusmomso- (५२) बालसंस्कृतबोधिनी। धीरो धैर्य न मुंचति धीर पुरुष धैर्य नहीं छोडता है. अहंकारी विनश्यति अहंकार करनेवाला नाश पाताहै. शोभनः शिशुर्विद्याम् उपार्ज- अच्छाबालक विद्याको मिलाताहै यति सुज्ञः केनापि सह कलहं न क- अच्छा जाननेवाला किसीकेसी रोति साथ झगडा करता नहीं. धनी व्यापारं कुरुते पैसेवाला व्यापार करता है. व्यापारे वसते लक्ष्मीः व्यापारमें लक्ष्मी रहती है. स्वामी भृत्याय वेतनं ददाति धनी चाकरको पगार देताहे. विद्या विनयं ददाति विद्या नम्रताको देती है. विनयात्पात्रताम् एति नम्रतासे योग्यताको पाता है. पात्रत्वात् धनम् आप्नोति योग्यतासे धन पाता है. धनात धर्ममानोति धनसे धर्म पाता है. धर्मेण सुखमेधते धर्म से सुख बढता है. गुरुसेवया बुद्धिर्वद्धते गुरुकी सेवासे बुद्धि बढती है. सुष्वाचरणेनापि बुद्धिर्वर्धते अच्छे आचार पालनेसेनी बुद्धि बढती है. सज्जनसंगात सत्फलं लभते अच्छे लोगों के समागमसे अच्छा फल मिलता है. दुर्जनसंगात् दुष्फलं प्राप्नोति दुर्जनोंके समागमसे खराब फल मिलताहै. अज्ञानामुपदेशो हिताय न मृखौंको कियाहुआ उपदेश करने- भवति वालेके कल्याणके वास्ते होता नहीं. किंतु तौ.
लोकानुभवोपदेश । (५३) अहिताय भवति अकल्याणके वास्ते होता है. सर्पाणां दुग्धप्राशनेन यथा जैसा सोको दूध पिलानेसे जहर गरलं वर्धते बढता है. द्वाभ्याम् अध्ययनम् उत्तमं भवति दोनोंसे पढना अच्छा होता है. तपस्त्वेकेनेवोत्तमं भवति तप तो एकसे ( अकेलेसे ) ही अच्छा होता है. द्रव्येण सर्व प्राप्नोति धनसे सब मिलता है. धनवंतं जनाः अधिकं मन्यते धनवानको सब लोक बडा मानते हैं. विद्यावंतमपि लोका मानयंति विद्यावान्कोभी लोक मानते हैं. विद्यावतं नरपतिरपि सत्क विद्यावानको राजानी सत्कार- रोति करता है. शब्दकोश ९. अज्ञ-मूर्ख. मुंचति-(वो) छोडता-ती-है. शिशु-बालक. अहंकारिन्-अहंकार करनेवाला. क्रीडति-(वो)खेलता-तीहै. विनश्यति-बो) नाश पाता-ती है. साधु-सज्जन. शोभन-अच्छा. प्राणिमत्र-सब जीव. उपार्जयति-( वो ) ग्रहण करता- दया-कृपा. ती-है. कुर्वन्ति-(वे ) करते-ती हैं. सुज्ञ-समझनेवाला. धीर-धीरजवान. सह-साथ. धैर्य-धीरज. कलह-झगडा.
(५४) बालसंस्कृतबोधिनी। धनिन्-पैसादार. व्यापार-उद्यम. कुरुते-(वो) करता-ती-है. वसते-रहता-ती-है. स्वामिन-धनी. भृत्य-नौकर, वेतन-पगार, तनख्वाह. विनय-नम्रता. पात्रता-योग्यता. एति-(वो) पाता-ती-है. धन-दौलत. आनोति-(वो) पाता-ती-है. धर्म-शास्त्रोक्त आचार. सुष्टु-अच्छा. आचरण-आचार. दुर्जन-खराबमनुष्य. सङ्ग-सहवास. दुष्फल-(बुरापाल) प्राप्नोति-(वो) पाता-ती-है. सज्जन-अच्छा मनुष्य. सत्फल-उत्तम फल. दुग्धप्राशन-दूधका पीना. गरल-जहर. तद्वत्-तैसा. सुख-आनंद. एधते-(वो ) बढ़ता-नी-है. सेवा-चाकरी. बुद्धि-अक्ल. वर्धते-(यो ) बढता-ती-है. अध्ययन-पढना. तपम्-तप. द्रव्य-धन. मन्यते-(वे) मानते हैं. मानयंति-सत्कार करते हैं. नरपति-राजा. विद्यावत्-विद्वान. दशमः पाठः १०. परस्परसंभाषणोपदेशः । संस्कृतवाक्यानि- प्राकृतवाक्यानि- कस्त्वं? त कौन है? क्या तेरा नाम है ? किं तव नाम?
परस्परसंभाषणोपदेश। स जगाम किम् कदा आगतोसि ये आताहूं. ( अमुक) नामाहम् मैं ( अमुक ) नामवाला हूं. एहि मित्र आ ओ मित्र ! स्मरसि मित्र तत्र वयम् अवसाम हे मित्र ! याद है ? कि. अपने वहां रहतेथे. अभिजानासि किं तस्मिन् गृहे याद है क्या ? कि अपने उस घरमें अभुज्महि जीमतथे. नाहं दक्षिणां दिशं जगाम मैं दक्षिणदिशाको गया नहीं. स आगच्छत् किम् वो आया क्या ? वो गया क्या ? (तू ) कब आया ? अयमागच्छामि कदा आगमिष्यसि कब (तू) आवेगा. मास्तु मतहो-नहीं चाहिये. अविचार्य किमपि न कर्तव्यम् कुछ भी विचार किये विना नहीं. करना. कश्चित् रक्षकः अस्ति न वा? कोई भी रखवाला है या नहीं? तावत् अत्र स्थातव्यम् तबतक यहां रहना. यावत् अहम् आगच्छामि जबतक में आताहूं. वद (तू ) बोल. क्यों नहीं बोलताहै. किं त्वया अपराद्धं? तुझने अपराध किया है क्या ? अथवा तुझने क्या अपराध किया है ? इमं तव अपराधं क्षम इस तेरे अपराधको क्षमा करताहूं. इतःपरम् एतादृशं कर्ममा कार्षीःइसके आगे ऐसा काम मत कर, इमं कोटपालं पश्य इस कोतवाल [सिपाही] को देख कुतो न वदसि (५६) बालसंस्कृतबोधिनी। एनम् आह्वयामि इसको (मैं) बुलाताहूं अयि मित्र पश्य जनानां प्रवृत्ति हे मित्र ! लोकोंकी चाल देख. सर्वेपि मनुष्याः स्वे स्वे कर्मणि सबही मनुष्य अपने अपने काममें अभिरताः संति लगेहुए हैं. मनुष्याणां च कर्तव्यं नुष्या मनुष्योंका काम मनुष्यही करते हैं. एव कुर्वति वे पशुकृत्यं मनुष्या नाचरति मनुष्य जानवरोंका काम करते नहीं. ये तु पशुवर्तते ते तु पशव जे लोग पशसरीखे रहते हैं, एव ज्ञेयाः तो पश ही समझना. अस्माकं तु मनुष्याणाम् इदं हम मनुष्योंको तो यह काम करने कर्म कर्तु नोचितं लायक नहीं. वयं तु इदं कदापि नो कुर्मः हम तो यह कभी नहीं करते हैं. नापि च करिष्यामः करेंगे भी नहीं. यदि त्वं करोपि तर्हि यथेच्छ जो त करेगा तो जैसी इच्छाहो कुरु अहं न द्रक्ष्यामि में नहीं देखूगा. न चात्र तिष्टामि मैं यहां नहीं खडा रहता. दुसरे ठिकाने जाताहूं. वैसा कर. अन्यत्र गच्छामि कः-कौन. त्वं-त. किं-क्या. नामन्-नाम. शब्दकोश १०. स्मरसि-(तू) स्मरण करताहै, याद करताहै. असाम-(हम ) रहेथे. अभिजानासि-(तू )याद रखताहै परस्परसंभाषणोपदेश। (५७) अभुज्महि-( हम ) जीमतेथे. कर्म-काम. दक्षिणदिशा-दक्खिन दिशा. मा कापीः-(तू)मतकर. जगाम-(वो-मैं ) गया. कोटपाल-कोतवाल, सिपाही. आगच्छत्-(वो) आया. पश्य-(त) देख. कदा-कब. आह्वयामि-( मैं ) बुलाता-ती-हूं. आगतोसि-(तू) आया. अयि-हे-अये-अहो. अयं-ये. जन-मनुष्य, लोग. आगच्छामि- मैं ) आताहूं. प्रवृत्ति-चाल-चलन. आगमिप्यसि-(तु ) आवेगा. अभिरत-लगाहुआ. मास्तु-नहींहो, नहीं चाहिये. कर्तव्य-करनेका काम. अविचार्य-विचार न करके. पशुकृत्य-जानवराका काम. किमपि-कुछभी. वर्तते-ह-रहतेहैं. कश्चित-कोईभी. ज्ञेय-जानना-जाननेयोग्य. रक्षक-रखवाला. उचित-योग्य. तावत-तहांतक. कदापि-कमीजी. स्थातव्यं-खड़े रहना. यदि-जो. यावत्-जबतक. यथेच्छं-जैसी इच्छा हो वैसा. वद-(तू) बोल. द्रक्ष्यामि-(मैं ) देवगा. कुतः-कहांसे, क्यों. तिष्टामि-(मैं) रहता-ती-हूं,रहूंगा- वदसि-(तू) बोलताहै. गी, खडा-डी-रहूंगा-गी. अपराद्धं-अपराध किया. अन्यत्र-दूसरी जगह. क्षमे-( मैं ) माफकरताहूं. गच्छामि-( मैं ) जाता ती हूं. इतःपरं-यहांसे आगे, इससे आगे. जाऊंगा-गी. एतादृशम्-ऐसा.
(५८) बालसंस्कृतबोधिनी। दिया? एकादशः पाठः ११. प्रासङ्गिकवचनोपदेशः। संस्कृतवाक्यानि प्राकृतवाक्यानि- मृगेंद्रस्य मृगेंद्रत्वं वितीर्ण केन सिंहको मृगराजपना जंगलमें किसने कानने मनस्यन्यद्वचस्यन्यत्कर्मण्यः पापी लोगनके मनने में दूसरा ( और- न्यद्धि पापिनां ही), बोलने म दूसरा (औरही) और काममेंभी दूसरा (औरही) होताहै. न्याय्यात्पथः प्रविचलंति पदं धैर्यवान् पुरुष वाजवी रास्तेसे न धीराः पगभरभी खसकते नहीं. देवेन देयमिति कापुरुषा व- नसीबसे दिया जाता है; ऐसा दन्ति आलसी आदमी कहते हैं. यत्ले कृते यदि न सिध्यति मेहनत कियेपर काम बनता नहीं कोऽत्र दोपः तौ यहां क्या गुनाह है ? गच्छ मूकर भद्रं त बद सिंहो जा सूवर ! तेरा भला हो, तु कहदे मया हतः कि, मैंने सिंहको मारा. पण्डिता एव जानन्ति सिंहसू- विद्वान् मनुष्यही सिंह और सूवर करयोवलम् का बल जानते हैं. गजा यत्र न गण्यन्ते मशकानां जहां हाथीकी गिनती नहीं, वहां तुका कथा मसाकी क्या बात? विधिरहो बलवानिति मे मतिः अहो दैवहीं बलवान् है ऐसी मेरी बुद्धि है. देवो दुर्बलघातकः देव दुबलोंका मारनेवाला है.
प्रासंगिकवचनोपदेश। (५९) विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चि- इस अजर अमर (आत्मा) का कर्तुमर्हति नाश कोईभी करसक्ता नहीं. न जायते म्रियते वा कदाचित् वह कभी उत्पन्नभी होता नहीं और कभी मरताभी नहीं. नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं इसको शस्त्र काटते नहीं और अमि दहति पावकः जलाता नहीं. कालो ह्ययं निरवधिर्विपुला च यह कालभी अनन्त है, और पृथ्वीभी पृथ्वी बड़ी है. बहुरत्मा वसुंधरा पृथ्वी बहुत रत्नोंवाली है. बालादपि सुभाषितं ग्राह्यम् बालकोंसेभी अच्छा वचन लेने योग्य है. कुतो मांसाशिनो दया? मांस खानेवालेको दया कहांसे ? निर्दयस्य कुतो धर्मः निर्दयीको धर्म कहांसे ? दग्धभूम्युप्तबीजस्य नाकुर जमीनमें बोयेहुए जले बीजको समर्थता अंकुर पैदा करनेमें सामर्थ नहीं. दीपनाशे तमोराशिः किमाहा- दीपकका नाश होनेपर अंधकारका नमपेक्षते राशि क्या बुलावा चाहता है ? समीहितार्थसंसिद्धौ मनः क मनवांछित काम तयार होनेपर स्य न तुष्यति? किसका मन संतुष्ट नहीं होता? अवश्यमनुभोक्तव्यं कृतं कर्म ( अपना ) भला या बुरा कर्मका शुभाशुभम् फल अवश्य भोगना चाहिये. सौभ्रात्रं हि दुरासदम् अच्छाभायपन दुर्लन है. भाग्य जाग्रति का कथा ? दैव जगता होय तो फिर क्या बात?
(६०) बालसंस्कृतबोधिनी। गुरुरेवहि देवता गुरुही एक देव है. आत्मीयापायशंका हि शंकु अपने नाशका संशय यह प्राणियों देहभृतां हदि के हृदयमें एक खीला है. प्रदीपैर्दीपिते देशे नास्ति त- दीपोंसे उज्ज्वलित किये प्रदेशमें मसो गतिः अंधकारकी गति नहीं. किं पुष्पावचयः शक्यः फल फल लगनेके समयमें फूल बीननेको काले समागते क्या योग्य है? आस्था सतां यशःकायेन ह्य जनोंको कीर्तिरूपी शरीरका स्थायिशरीरके रक्षण करनेमें इच्छा रहती है. क्षणसुंगर शरीरका रक्षणकर- नेमें इच्छा नहीं रहती. जीवितात्तु पराधीनाजीवानां पराये आधीनजीविकाकी अपेक्षासे जीवोंको मरण अच्छा. अप्रियस्य च पथ्यस्य वक्ता कुप्यारा परंतु हितावह वचनका श्रोता च दुर्लभः कहनेवाला और मुननेवाला दुर्लभहै. मरणं वरम् शब्दकोश ११. मृगेंद्र-सिंह. अन्यत्-औरही, दूसरा. मृगेंद्रत्व-मृगराजपना, सिंहपना. पापिन्-पाप करनेवाला. वितीर्ण-दिया. न्याय्य-वाजबी. पथिन-मार्ग. मनम्-मन. प्रविचलंति-(वे) खसकते हैं. वचस-वचन. पदं-पगभर. कानन-जंगल.
प्रासंगिकवचनोपदेश। धेर्य-धीरज. जायेत-(वो ) उपजता-ती-है. कापुरुप-आलसी, खराबआदमी. म्रियते-(वो) मरता-ती-है. यत्र-मेहनत. कदाचित-कभीभी. यदि-जो. छिन्दन्ति-(बे ) टूक करते हैं. सिद्धयति-(बो)तयार-होता-ती-है. शस्त्र-हथियार. दोष-गुनाह. दहति-(वो ) जलाता-ती है. सूकर-सुवर. पावक-अग्नि. भद्र-कल्याण. काल-समय. सिंह-सिंह, नाहर. हि-निश्चयसे. हत-माराहुआ. निरवधि-अपरिमित. पण्डित-विद्वान्. विपुला-बडी विशाल. गज-हाथी. बहुरत्न बहुतरत्नोंवाली. गण्यन्ते-गिने जाते हैं. वसुन्धरा-पृथ्वी. मशक-झींगुर, डांस. बाल-बालक. कथा-बात. सुभाषित-अच्छा भाषण. विधि-दैव. ग्राह्य-लेना, लेने योग्य. अहो-हो? मांसाशिन्-मांसखानेवाला. मति-बुद्धि. निर्दय-दयासे रहित. दुर्बल-दुबला. दग्ध-जलाहुआ. जलीहई. घातक-मारनेवाला. उप्तबीज-बोयाहुआ बीज. विनाश-नाश, मरण. अंकुरसमर्थता-अंकुर पैदा कर- अव्यय-जिसका नाश नहीं वो. नेमें मामर्थ्य. कश्चित-कोईभी. दीपनाश-दीपकका बुझाना. तमोराशि-अंधकारका समूह अर्हति-(वो) योग्य होता-ती-है. आह्वान-बुलावा, निमन्त्रण. कर्तु-करनेको.
(६२) बालसंस्कृतबोधिनी। अपेक्षते-(वो) चाहता-ती-है. गति-गमन. सभीहितार्थ-मनवांछित कार्य. पुष्पावचय-फूलोंका बीनना. संसिद्धि-तैयारी. शक्य-सके, योग्य, सकाय ऐसा. तुष्यति-(वो ) खुश होता-ती-है. फलकाल-फल लगनेका समय, अनभोक्तव्यं-भोगना, भोगनेयोग्य. समागत-आयाहुआ. कृत-कियाहुआ. आस्था-आशा. सौभ्रात्र-अच्छा भायपन. सत्-सज्जन. दुरासद-दुर्लभ. यशःकाय-कीर्तिरूपी शरीर. भाग्य-देव. अस्थायिशरिक-क्षणभंगुरदेह. जाग्रत्-जागता. जीवित-जीवन. आत्मीय-अपना. पराधीन-परायेके वश. अपाय-नाश. जीव-प्राणी. शङ्का-बहम, सन्देह. मरण-मरना. शकु-खीला, कील. वरं-अच्छा. प्राणभृत्-प्राणी. हत्-हृदय, कलेजा. पथ्य-हितावह, परहेज. प्रदीप-दीप, दीपक. वक्तृ-बोलनेवाला-ली. दीपित-प्रकाशित कियाहुआ. श्रोतृ-सुननेवाला-ली. देश-जगह. दुर्लभ-दुष्पाप्य. तमस्-अंधकार. अप्रिय-कुप्यारा. mu------- +L . ---.-part- -- aur maa मुद्रणालयोपदेश। HOMM ना है. द्वादशः पाठः १२. मुद्रणालयोपदेशः। संस्कृतवाक्यानि प्राकृतवाक्यानि- अस्मिन्मुम्बय्याख्ये नगरे मु- इस मुंबईनामकनगरमें छापाखा- द्रणालयःअस्ति अस्य नाम"श्रीवेङ्कटेश्वर" (स्टीम)इसका श्रीवेङ्कटेश्वर"(स्टीम्प्रेस ) मुद्रणालयइति ( छापखाना ) ऐसा नाम है. अस्य मुद्रणालयस्य क्षेमराज- इस छापाखानेका खेमराज नामक नामा श्रेष्ठी अधिपतिः अस्ति सेठ मालिक है. अस्मिन् मुद्रणालये बहूनि इस छापाखानामें बहुत पुस्तकें पुस्तकानि मुद्रितानि संति छपी हैं. बहूनि च पुस्तकानि विक्रय्या- बहुत पुस्तक बिकमेको तैय्यार हैं. णि संति एपां च सर्वेषां पुस्तकानां मू- इन सब पुस्तकोंकी कीमत बहु- ल्यम् अतीवोचितं वर्तते तही योग्य रक्खी हुई है. हेमित्र ! यदि कस्यापि पुस्तक- हे मित्र ! जो किसीभी पुस्तककी स्य अपेक्षा चेत् श्रीवेङ्कटे चाहना हो तो श्रीवेंकटेश्वर" श्वर मुद्रणालये पत्रं प्रेषय छापाखानामें पत्र(चिठी भेज मूल्यमपि पोस्टद्वारा प्रेपय पुस्तककी कीमतभी पोष्टमार्फत भेज. तेन शीघ्रमेव पुस्तकानि अत्र तिस करके जल्दीही पुस्तक यहां आयास्यंति आवेगी. कथमपि विलंबो न भविष्यति कैसानी विलंब न होगा. काव्यग्रंथाः पुराणग्रंथाश्च वह- काव्योंकी पुस्तकें और पुराणोंकी पुस्तकें बहुत हैं. वः संति (६४) बालसंस्कृतबोधिनी। -- भाषाग्रंथा अपि विपुला विद्यते भाषाके बने हुए ग्रन्थानी बहुत हैं. चंपूनाटकग्रन्थाश्च स्वल्पमूल्ये- चम्पूकाव्योंकी पुस्तकें और नाट- नैव मिलंति कोंकी पुस्तकें थोडेही कीमतसे मिलतीहैं. मूलसंस्कृतग्रन्थानां भाषांतरा- मूलसंस्कृतपुस्तकोंका( हिंदी) मा- णि कृत्वा अत्र मुद्रितानि पांतर करके यहां छपेहैं. संति येषांयेषां ग्राहकाणां यस्ययस्य जिनजिनग्राहकोंको जिसजिस पु- ग्रन्थस्य अपेक्षा विद्यते तै स्तककी चाहना होके,तिन्होंने स्तैर्मूल्यव्यवस्थापूर्वकप- कीमत भेजने वगैरहकी व्य- त्रद्वारा सूचनायां कृतायां वस्था करके चिठीद्वारा सूच- तानितानि पुस्तकानि अ ना कीजाय तौ पुस्तकें शीघ विलम्बितं प्रेषयिष्यंत अजीजाँयगी. अस्मिन्मुद्रणालये च शास्त्रिणः इस छापाखानामें शास्त्र पढे हुए पुस्तकानि शोधयंति लोक ग्रन्थ शोधन करतेहैं. अक्षरसंयोजकाश्च कीलाक्षरा- अक्षर जोडनेवाले ( कंपोजीटर ) णि संयोजयंति लोक अक्षर ( टैप ) जोडतेहैं. बाष्प मुद्रणयंत्रेषु पत्रसंचायिकाःमु-छापनेके यंत्र मशीन(स्टीम्-प्रेस) में द्वियंते फॉर्म छापेजाते हैं. मुद्रणयंत्रे मषी सिद्धवानीयते. छपनेके प्रेसमें स्याही तैय्यारही लाई जातीहै. चित्रविचित्रवर्णापि मपी भवति रंग बरंगकीनी स्याही होतीहै. एकस्मिन् यन्त्रे सुवर्णमुद्राक्षरा- एक प्रेसमें सोनेके अक्षर छपाया- णि मुद्रियंते करतेहैं.
मुद्रणालयोपदेश ।
(६५)
पश्यैतत्सुवर्णमुद्राक्षरांकितं पु- देख यह सोनेके अक्षरसे छपाहुआ
स्तकं कथं सुंदरं दृश्यते पुस्तक कैसा सुंदर दीखता है.
अन्ये च पुस्तकबन्धकाः पुस्त- दूसरे पुस्तक बाँधनेवाले 'बुकबाँ-
कानि बध्नति
इंडर ) लोक पुस्तक बांधते हैं.
बहूनि च कीलाक्षरनिर्माणयंत्रा- बहुत टाईप बनाने के मशीनें हैं.
णि विद्यते
एषु कीलाक्षरनिर्माणयंत्रेषु इन टाईप बनानक मशीनों में दरगे-
प्रतिदिनं बहूनि अक्षराणि
ज बहुत अक्षर पैदा होते हैं.
निष्पद्यते
इयं हि अक्षरावचयशाला
यह अक्षर (टैप ) जोडनेकी जगह
( कंपोजीटर खाता ) है.
तस्याम् अक्षरावचयशालायां उस कंपोजीटरखातामें बहुतसे
बहवो भृत्याः अक्षराणि ग्रं-
नौकरलोक टाइपको पुस्तक
थरूपेण अवचिन्वंति के रूपसे इकठा(कंपोज़)करते.
इत्येवमादीनि बहूनि कार्याणि इत्यादिक बहुत काम इस छापा-
मुद्रणालयेस्मिन् भवंति खानामें होतेहैं.
एतन्मुद्रणालयस्य पुस्तकालयः इस छापाखानका पुस्त्रकालय (यु-
अतिमहान् वर्तते कडिपो ) बहुत बड़ा है.
किं विशेषोल्लेखनेन ज्यारा लिखनेसे क्या है.
अस्मात् पुस्तकालयात् येषां इस पुस्तकालयसे जिनकी पुस्तकों
पुस्तकापेक्षास्ति तेपाम् अ- की इच्छा हो उन्होंको सब पुस्तकें
पेक्षितानि सर्वाणि पुस्तका- योग्य मूल्यसेही मिलती हैं.
नि उचितमूल्येनैव मिलंति
(६६) बालसंस्कृतबोधिनी। खेमराज श्रीकृष्णदास, खेमराज श्रीकृष्णदास, "श्रीवेङ्कटेश्वर"मुद्रणालयः "श्रीवेङ्कटेश्वर" छापाखाना-मुंबई, मुंबई इति नामा इस नामसे पत्रव्यवहार करना. पत्रव्यवहारः कर्तव्यः इति मुद्रणालयोपदेशः इसरीतसेछापाखानेका उपदेशहुआ. शब्दकोश १२. मोहमयी-मुंबई. (बंबई.) शीघ्रमेव-जल्दीहा. नगर-शहर. आयास्यंति-(वे) आवेंगे. मुद्रणालय-छापाखाना. कथमपि-कैसा भी. श्रीवेङ्कटेश्वरमुद्रणालय- विलंब-देर. "श्रीवेङ्कटेश्वर" छापखाना. भविष्यति होगा. क्षेमराजनामन्-खेमराज नाम- काव्यग्रंथ-काव्योंकी पुस्तकें. वाला. पुराणग्रंथ-पुराणोंकी पुस्तकें. श्रेष्ठिन्-सेठ. भाषाग्रंथ-हिंदी भाषाकी पुस्तकें. अधिपति-मालिक. विपुल-बहुत. विद्यते-(वे ) मौजूद हैं. मुद्रित-छपाहुआ. चंपूनाटकग्रंथ-चंपूकाव्य और विक्रय्य-बिकनेको तैयार. नाटकोंकी पुस्तके. मूलसंस्कृतग्रंथ-जिनमें मूल सं- अतीवोचित-बहुतहीयोग्य. स्कृत भाषाहै; ऐसी पुस्तकें. अपेक्षा-चाहना-इच्छा. भाषांतर-दूसरी भाषा (हिंदी- पत्र-चिठी. भाषामें उल्था ). प्रेषय-(तू ) भेज. अत्र-यहां. पुस्तक-ग्रंथ. मूल्य-कीमत. manorammam Palpamommm.hd TAMAN- मुद्रणालयोपदेश। (६७) diwwwww ग्राहक-खरीद करनेवाला. कथं-कैसा? पत्रद्वार-चिट्ठीके मार्फत. सुंदर-अच्छा. अविलंबित-शीघ. दृश्यते-(वो) दीखता-ती-है. प्रेषयिष्यते-(वे) भेजे जायगे. कीलाक्षरनिर्माणयंत्र-टैप तैयार शानिन्-शास्त्र पढाहुआ. करनेका यंत्र (फाउंडरी मशीन) पुस्तक-ग्रंथ. अक्षर-टैप. शोधयंति-(वे ) शोधन (शुद्ध) निष्पद्यन्ते-(वो ) नवीन तैयार करतेहैं. होते हैं. अक्षरसंयोजक-अक्षरोंको जोड- अक्षरावचयशाला-अक्षर जो- नेवाला ( कंपोजीटर.) डनेका खाता(कंपोजीटर खाता.) कीलाक्षर-खीलोंका अक्षर (टैप.) भृत्य-नौकर-चाकर. संयोजयंति-(वे ) जोडते हैं. ग्रंथरूप-पुस्तकका आकार. पत्रसंचायिका-फॉर्म. अवचिन्वंति-वे) इकठा करतहैं. मुद्रियंते-(वे ) छपेजातेहैं. जोडतेहैं-वीनतेहैं. मपी-स्याही. एवमादि-इत्यादि. सिद्ध-तैय्यार. पुस्तकालय-पुस्तकबेंचनेका आनीयते-(वो ) लाया-ई-जाता- दूकान ( बुकडिपो) ती-है. अतिमहत्-बहुत मोटा. चित्रविचित्रवर्णा-रंग बिरंग व- वर्तते-(वो) है. की. विशेषोल्लेखन-ज्यादा लिखना. सुवर्णमुद्राक्षर-सोनेके अक्षर. उचितमूल्य-योग्य कीमत. Aamiraramameer w (६८) बालसंस्कृतबोधिनी। Commerce त्रयोदशः पाठः १३. पुस्तकोपदेशः। संस्कृतवाक्यानि प्राकृतवाक्यानि- इदं पुस्तकं गोविंदशास्त्रिणा यह पुस्तक गोविंदशास्त्रीने रचा है. विरचितम् तदिदं क्षेमराजश्रष्टिना स्वाधि- वो यह खेमराजसेठने अपने अ- कारेण स्वकीये "श्रीवेङ्कटे धिकारसे निज "श्रीवेंकटेश्वर" श्वर" मुद्रणालये मुद्रितम् छापाखानामें छपाया. अनेन गोविन्दशास्त्रिणा अन्या- इस गोविंदशास्त्रीने दूसरे भी पुस्तकें नि अपि पुस्तकानि निर्मि निर्माण किये हैं; वे छपे हैं. तानि संति तानि मुद्रिता- नि संति अयं गोविन्दशास्त्री शिशून्सं- यह गोविंद शास्त्री बालकोंको सं- स्कृतं पाठयति; संस्कृता स्कृत पढाताहै: संस्कृतभाषाक नि पुस्तकानि च शोधयति पुस्तकोकोनी शुद्ध करता है. संप्रति अनेन हिन्दीभापया त- हालमें इसने हिन्दीभाषासे तर्कसं- कसंग्रहव्याख्या निरमायिः ग्रह नामक ग्रन्थकी टीका ब- लघुकौमुदीव्याख्या च त- नाई है लघुकौमुदीनामक व्या- यैव भापया निर्मीयते करण ग्रन्थकी टीका उसी (हिन्दी) भाषामें निर्माण का जाती है. अन्यानि च विचतुराणि पुस्त- दूसरेभी तीन चार पुस्तक मराठी कानि संप्रति महाराष्ट्रभाप- भाषासे व्याख्यान करकै या व्याख्याय विलिखति लिखता है. m unmun -- पुस्तकोपदेश। (६९) अस्य ग्रंथस्य पश्चात द्वितीय- इस ( बालसंस्कृतबोधिनी ) ग्रंथ भागोपि मुद्रयिष्यते का पीछे दूसरा भागभी छपाया जायगा. येन साधारणसंस्कृतज्ञाः अ- जिस करके साधारण संस्कृत जा- धिकज्ञानलाभे अधिकारि ननेवाले लोक अधिक ज्ञान- णो भवंति पानीमें अधिकारी होते हैं. तदपि पुस्तकं स्वल्पीयसैव स- बोनी पुस्तक (दूसरा भाग) बहुतही मयेन मुद्रयित्वा प्रकाशयि थोडे समयसे छपके प्रसिद्ध प्यते कियाजायगा. किं मित्र ! तुभ्यं रोचते वा इदं क्यों मित्र ! क्या तेरेको यह पुस्त- पुस्तकं ? यदि रोचते तर्हि क अच्छा लगता है ? जो वाचय; अन्यानपि वाचयितुं तेरेको अच्छा लगता होय तौ कथय बाँच और दूसरोंकोसी बाँच- नेको कह. इदं बालसंस्कृतबोधिनीपुस्त- यह बालसंस्कृतबोधिनीनामक पु- कं बालानां संस्कृतवा स्तक बालकोंको (जिन्होंने धकं भविष्यति इति प्रायो संस्कृत पढा नहीं उन्होंको ) बहूनां विदुषां मतं तेषां संस्कृतभाषा समझानेवाला मुखेभ्यः श्रूयते होगा, इस प्रकारसे बहुत विद्वा- न लोकोंका मत उनके मुखोंस सुना जाता है. इत्येप पुस्तकोपदेशः संपूर्णः इसप्रकारसे पुस्तकका उपदेश स- म्पूर्ण हुवा. । १ जिन्होंने यह बालसंस्कृतबोधिनीग्रंथ पढ़ा है.
(७०) बालसंस्कतबोधिनी। wwwwcountamamalner शब्दकोश १३. गोविन्दशास्त्रिन्-गोविंदनामक | द्वितीयभाग-दूसरा भाग. शास्त्री मुद्रयिष्यते-( वो )-छपाजा- अन्य-दूसरा-री. यगा-गी. अपि-भी. निर्मित-रचाहुआ-ई. साधारणसंस्कृतज्ञ-कुछ थोडा संस्कृत जाननेवाला. महाराष्ट्रभाषा-मरहटी भाषा. मुद्रितानि-छपहुए. अधिकज्ञानलाभ-ज्यादा ज्ञा- सम्प्रति-सांप्रत, हालमें. नका मिलना. शिशु-बालक. अधिकारिन-जिसको अधिकार संस्कृत-संस्कृतभाषा. है ऐसा, समर्थ पाठयति-(बो ) पढाता-ती-है. तदपि-वोनी, [ अव्यय होवे शोधयति-(वो)शुद्ध करता-ती-है. तबतौभी ऐसानी अर्थ होताहै.] हिन्दीभाषा- हिंदुस्थानी भाषा. स्वल्पीयम्-बहुत थोडा. तर्कसंग्रहव्याख्या-तर्कसंग्रह ना- समय-काल. मक ग्रंथकी भाषाटीका. मुद्रयित्वा-छपकरके. निरमायि-निर्माणकरी. लघुकौमुदीव्याख्या- लघुकौमु- प्रकाशयिष्यते-प्रसिद्ध किया जायगा-गी. दीनामक ग्रंथकी भाषाटीका. निर्मीयते-बनाई जाती है. वा-क्या? त्रिचतुराणि-तीन चार. व्याख्याय-भाषाटीका करके. वाचय-( तू ) बाच. विलिखति-(वो)-लिखता-ती-है. | कथय-(तू ) कह. तर्हि-तो.
पुस्तकोपदेश ।
(७१)
मुख-मुँह.
बालसंस्कृतबोधिनीपुस्तक- प्रायः-बहुत करकै
बालसंस्कृतबोधिनीनामक | विदुस-विद्वान्.
ग्रन्थ.
बालक-बच्चा, संस्कृत नहीं पढ़ा श्रूयते-(वो) सुना जाता-ती है
हुआ.
सम्पूर्ण-पूराहुआ.
संस्कृतबोधक-संस्कृतभाषाको
समझानेवाला.
इति बालसंस्कृतबोधिनी समाप्त.
पुस्तक मिलनेका ठिकाना-
खेमराज श्रीकृष्णदास,
"श्रीवेङ्कटेश्वर”( स्टीम् ) यन्त्रालय (मुंबई)
ऋय्यपुस्तक व्याकरणग्रंथाः। नाम • .. ०-६ ... . .. किं० रु. आ० सिद्धांतकौमुदी अतिउनम पंचपाठीसहित २-० अष्टाध्यायी, गणपाठ, धातुपाठ, लिंगानुशा० लघुसिद्धांतकौमुदीटिप्पणीसहितजिल्द मोटा अक्षर ०-१२ लघुसिद्धांतकौमुदी टिप्पणस० ग्लेज छोटा अक्षर कारकस्वरूप भाषाटीका सहित [व्याकरण] सिद्धांतकौमुदी तत्त्वबोधिनीटीकासहित संपूर्ण ६-० सिद्धांतचंद्रिका सटीक उत्तरार्द्ध सुबोधिनी और तत्त्वदापकासह सिद्धांतचद्रिका सटीक पूर्वाई सुबोधिनी और तत्त्वदीपिका टीका सहित... सिद्धांतचंद्रिका मूल सिद्धांतकौमुदी तत्त्वबोधिनी टीकासहित उत्तराई छपके तयार है ४-० रूपमाला संधिभागः अव्ययार्थक्षागः प्रयोगविधि संग्रहः ( कार- कसमासतद्धितदिक )क्रियाकलापः आख्यातचन्द्रिका धातु- रूपभेदः श्लोकयोजनिकोपायः १-४ रूपमालाव्याकरणका षडलिंगविभाग "संधिविभागः ०-५ "अव्ययविभागः.. प्रयोगविधिः शब्दरूपावली एकाक्षरीकोष सहित... ...०-१॥ धातुरूपावली लघुधातुपाठ सहित समासचक्र. संपूर्ण पुस्तकोंका ( बडा सूचीपत्र अलगहै ) ॥ आध आनेका टिकट भेजकर मुफ्त मँगालीजिये। पुस्तक मिलनेका ठिकाना- खेमराज श्रीकृष्णदास, "श्रीवेङ्कटेश्वर" छापाखाना-मुंबई. - 3 ०-२ -
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