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Puran-tatv-prakash Volume-iii

Chimmanlal Vaisy · 2009/09

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पुराणसंग्रह-न्यमाला संख्या ३
CESSORROC0Rs
पुराणतत्वार्थमयं प्रकाशयन् ४
SCORNS-SERO
® ओ३म् ७
पुराण-तत्व-प्रकाश
ॐ भुवस्तले ग्रन्थवरः सुराजतु .
तृतीय-भार
जिस में
श्रीमद्भागवत, देवीभागवत, पन, विन्णु, शिम खि
अग्नि, कूर्म, वाराह, भविष्य, ब्रह्मवैवर्त्त, बाम
नादि पुराणों से धुद्धि के विपरीत और
सृष्टिक्रम के विरुद्ध बातें, गणेशो-
त्पत्ति तथा शाद्धविषय का
वर्णन किया गया है।
चिम्मनलाल वैश्य कासगञ्ज
निवासी ने
KHOOT
आादि बोधि विधिवद्विभावयर
.
नि.मि त कर
रामप्रसाद जैनीके प्रवन्ध से ग्लोबानगेटिंगवर्स
मेरठ में मुद्रित कराया।
द्वितीयाति ११००
सन् १६१६
मूल्य
ARRIA
2++2040193

निवेदन। इसवार श्री पिताजी की आज्ञा- नुसार मैंने इसका संशोधन कियाहै पाठकगण प्रसन्नता पूर्वकपाठकर आनन्द उठायें। श्रापका अनुचर- भद्रगुप्त वैश्य मोरम् पुराण-तत्व-प्रकाश तृतीय भाग एक मास व्यतीत होने पर श्रीमान पण्डित राम- प्रसाद जी बनारस से लौट अपने गृह पर विश्राम करने के पंश्चात् एक दिन कई एक महाशयों के साथ सेठजी के यहां पधारे। प्रवेश। आर्य सेठ-श्रीमान पण्डित जी और अन्य भन्न पुरुषों को अपनी कोठी में प्राते देख प्रसन्न दिस हो उठकर दोनों हाथ जोड़ सब महाशयों को नमस्ते कर कहा कि माइये, पधारिये, अशोभित इजिरे- श्रीमान पगिडत जी ने प्रेम पूर्वक आयुष्मान कहा और विराज- अन्य सब महाशय-यथा योग्य कहकर उचित स्थानों पर सुशोभित, दुए। आर्यसेठ और सुयोग्य पण्डित जी के बीच प्रेम पूर्वक कुशल प्रश्न होने के पश्चात् श्रीमान् परिडत जी ने कहा कि से जो मेरा मन तो पह चाहता है कि मैं बहुत दिनों तक पुराणों के विषयों को सुनता र परन्तु संसारी कार्य इतने लग गये हैं कि जिसके कारण अवकाश नहीं परन्तु फिर भी सुनने की इच्छा है इस लिये आप संक्षेप के साथ सरू से वेद, बुद्धि

और सृष्टिक्रम के विपरीत वातें गणेश महाराज, की वि:
चित्र २ उत्पत्ति तथा मृतकश्राद्ध सुनाकर पुराणलीलाको
इस समय समाप्त कर दीजिये । और फिर समय मिलने
पर देखा.जायगा।
आर्य सेठ-श्रीमान् की जो आज्ञा!
अन्य महाशयों ने-सेठ जी से कहा कि हमारी भी यही स-
माति है इसलिये आप अपने सेवकों द्वारा पूर्योक श्रोताओं को सूचना देदीजि-
थे कि कल से सायङ्काल के ६ बजे के पश्चात् पुराणों के विषय पर कथन
गा क्योंकि श्रीमान् परिडत जी भी बनारस से आगये हैं।
आर्य सेठ ने बहुत अच्छा कह सेवकों को बुलाकर अच्छे प्रकार
समझा दिया।
सेवकों ने सेठ जी की प्राक्षानुसार सर्व महाशयों को सूचना की
जिसके अनुकूल द्वितीय दिवस नियत समय पर महाशयगण पधारे।
ঘৃজজা ঘৰৰ
आर्य सेठ-श्रीमान् पण्डित जी.को आते देख उठ कर बड़े, प्रेम से.
नमस्ते कर कहा कि श्रीमान् श्राहये !
पण्डितजी-आयुष्मान कह विराजमान हुए और अन्य श्रोता-
गणों में से बहुधा सज्जन माकर यथायोग्य के पश्चात् विराजते. गये तब
सीमान् पण्डित जीने कहा कि सेठजी अब आप प्रारम्भ कीजिये ।
आर्य सेठ-मे बहुत अच्छा कह, निम्न लिखित मन्म से ईश्वर प्रा-
धना की
ओ३म् भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभि-
र्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवार्थ सस्तनूभियंशेमहि देवहितं
यदायुः।। य०.२५॥ २१ ॥

हे देवेश! देख विद्वानो ! हम लोग कानों से लदैन भन्द्र कल्याण को ही सुर्ने अकल्याण की बात भी हम कभी न सुनें । हे यशनीयेश्वर हे गश फारो हम अांखों ले कल्याण ( मङ्गल तुख ) को ही सदा देखें। हे हों ! हेजगदीश्वरः हमारे लव मज उपाङ्ग (मोजावि इन्द्रिय तथा सेनादि उपा) हिशर (er) सदा रहे जिनसे हम लोग स्थिरता से आपसी स्तुति और आपकी प्रज्ञा का अनुष्ठान सदा करें तथा हम लोग श्रात्मा, शरीर, इन्द्रिय और विद्वानों के हि- तकारक श्रायु को विधि मुखपूर्वक प्राप्त हो अर्थात् सदा सुख में दी रहे। श्री. पं० जी अब मैं वेद बुद्धि और सृष्टिक्रम के विपरीत बातों का वर्णन करताहू, देखिये विष्णुपुराण अं० ११०१३ राजा बेनके भरने पर देवताओं का उसकी भुजाओं को मथ निषाद और पृथु का उत्पन्न करना । राशा अंग की सुनीथा नाम पत्नी से वेन नाम पुत्र हुए जो पिता के परलोकगमन होने पर गद्दी पर बैठे जिन्होंने राज्यसिंहासन को सुशोभित करते ही राज्य भर में डोडी पिटवा दी कि हमारे राज्य में कोई मनुष्य यक्ष, दान, होम न करे क्योकि योग भोगाका करने वाला मारे सिवाय कोई दुसरा नहीं । इम ही यज्ञों के स्वामी हैं। इस पर ऋषियों ने राजा को बहुत समझा- था परन्तु जब उन्होंने उनकी बात को "न माना तब सब मुनियों ने कोपफर आपस में सम्मति कर कहा कि इस पापी राजाको भारडालना चाहिये क्योंकि यह सबके स्वामी विष्णु महाराज की मिन्दा करता है यह कहकर मन्त्र पढ़ कुश को जल में डुबो उसके ऊपर जल छिड़क दिया । राजा तो भगवान् की निन्दा करने से प्रथम ही मर चुका था परन्तु उस पर जल के पड़ने से अच्छी भौति मृतक होगया। इत्युक्त्वा मन्त्रपूतैस्ते कुशर्मुनिगणानृपम् । निजम्नुनिहतं पूर्व भगवन्निन्दनादिना ॥२९॥ : ' राजा के मरने के थोड़े दिनों के पीछे चारों तरफसे धूल उड़ती देख ऋषियोंने लोगोंसे पूछा कि यह धूल कहांसे श्रातीहै तब सबने उत्तर दिया कि श्री महाराज राज्य विना राजा के होगया है इस ले चोर लोग 'सप का धन लूटते और धूल उड़ाते हैं तब सब मुनियों ने पुत्र होने के अर्थ मन्त्र पढ़कर राजा की जांच मथी उसमें से एक अति कुरूप - . .

बहुत ही छोटे डील का काला मनुष्य निशता और ऋषियों ते पूछा कि मैं माफ तब उन्होंने उत्तर में कहा कि "वै इससे उसका नाम "निषाद" हुआ और उसके वंश वाले तव हो से विन्ध्याचल पर्वत पर पसने लगे और बहुधा इन लोगों को चोरी हो जीविका यो । रस पाए रूपी निपादके होने से राजा को शरीर निष्पाप होगया । तेन बारेण तत्पापं निष्क्रान्तं तस्य भूपतेः । निषादास्ते तथा जाता वेनकल्मषसम्भवाः ॥३७॥ फिर मुनियों ने राजा के शरीर का दाहिना हाथ मथा उस से महा- प्रतापी, शुभगुण युक्त पृथु जी उत्पन्न हुए जिनका शरीर अपने तेज से ऐसा प्रकाशित था,मानो दूसरी मग्नि की मूर्ति थी दीप्यमानः स्ववपुपा साक्षादग्निाखज्वलन् ॥३६॥ ऐसे राजा के होते ही आकाश से महादेव के कवचादि सब आये और सब लोग प्रसन्न हुए इनके होने से वेन जैसे पापी राजा भी स्वर्ग को चले गये क्योंकि पुं नाम नरकं से जो रक्षा कर उसी का नाम पुत्र है। तत्पुत्रेण जातेन वेनोपि त्रिदिवं ययौ । पुनास्नो नरकात् जातः स तेन सुमहात्मना ॥४॥ राजा पृथु ने गद्दी पर बैठकर प्रजा को सब प्रकार से मानन्दित किया और जब कभी राजा काही को जाये तो नदियां थाही होजाती, समुद्र का जल थम माता पृथ्वी में अन्न विना जोते केवल चिन्तना करने से ही उत्पन्न होजातागायें इच्छानुसार दूधदेतीथी परन्तु जिस समय कोई राजानथाउससमय अन्नादि का होनो गन्द होगया था इलले प्रजा बड़ी दुनी थी सवयह राजाहुए तब प्रजा जो भूखों मर रही थी इनकी शरण में आई और निवेदन किया कि विना राजा के होने से पृथ्वी ने अन्नादि चुरा लिया इस हेतु सब प्रजा दुःखी है अब भाप अन्नादि देकर रक्षा कीजि-यह सुन राजा धनुषवाण लेकर क्रोध से धरती के मारने के लिये दौड़े व गाय का वेष धर-मागी ब्रह्म भादि लोकों को गई परन्तु जर घूम कर देखा तब २ राजा को धनुष वाण लिये पीछे खड़ापाया इससे अपना बचाव न सागकर मारे भय के कांपती हुई राजा से चोली कि हेगाथ! क्या हमारे मारने से स्त्री हत्या का आपको कुछ दोष न होगा। है नुप पदि भाप प्रजा केरकार के अर्थ हमको मारा चाहते हो तो मेरे न होने पर ऋमा कहाँ रहेगी?राज ने कहा कि तुम हमारी मांडा के प्रतिकूल S बलसी हो इस लिये मैं तुमको याणों ले उड़ादूंगा और मैं अपने योग बस से अंजा को रफ्खंगा यह सुन घरणी फिर काँपने लगी और राजा से प्रार्थना कर कहा कि सब कार्य उपाय से सिद्ध होते हैं इसलिये हे नर नाथ ! जो मैं आप को उपाय बतलाती माप वही कार्य करें अन्नादि सब औषधियां हम में पच गई हैं सो आप दृध रूप दुह लीजिये आप बहुत प्रकार बछड़े धनाइये जिससे हम पल्हाकर सब पदाथ चुप्रादेगी परन्तु हमको बराबर भी अवश्य करदीजिये जिससे इधरूपो ओषधियां अपने २ स्थान पर अमें यह सुनकर महाराज पृथु जी ने सर्वत्र पृथ्वी पर पहाड़ ही पहाड़ थे धनुष की नोक से तोड़ फोड़कर दूर २ स्थापित पररादये। तत उत्सारयामास शैलार शतसहस्रशः। धनुष कोट्या तदा वैन्यस्तेन शैलाविवर्धिताः॥८॥ * प्रथम की सटि में प्राम पुर नगरादि तथा खेतीपाती कुछ नहीं होता थी महाराज पृथु ने पृथ्वी का बरावर कर ग्राम पुरादि यसा दिये और लोग बेतीपाती भी करने लगे चूंकि राजाने पृथ्वीके प्राण छोड़दिये इसलिये यह उसके पिता ठहरे नीले इसका नाम पृथ्वी हुआ । यही कथा मत्स्य पुराण अ० १० में भी है। कण्ड मुनि से प्रग्लोचा अप्सरा में गर्भ रहना फिर मुनि के शाप के भर से अप्सरा को मूी का आना और गर्भ का पसीना की राह निकलना जिसको जिसको वृक्षों से पोंछा फिर वायु ने इकट्ठा किया और चन्द्रमाने पोषण किया उसीसे मरीषा का जन्म होना । विष्णु अंश १ १० १५ ॥ जब प्रचेतसा मपस्या कर रहे थे उस समय कोई राजा नहीं रहा था क्योंकि प्राचीन हिर्षको नारदजीने ऐसा उपदेश किया था कि ये सब छोड. बनको वप करने चले गये थे इसलिये पृथिवी पर सब वृत्त ही वृक्ष होगये कहीं जोतने बोनेको धरती नहीं रही इसलिये बहुतसी प्रजा मर गई, क्योंकि वृक्षोंके कारण पवन भी नहीं चलती थी जब प्रचेतसा तपस्या करके निकले तब वृक्षों को देख बड़ा ही कोप किया और मुख से पवन व अग्नि छोड़ी सय वृद्धा जलने लगे पहिले.वायु के जोर.ले वृक्ष उखड़ पड़ते फिर अमि से जलते फिर पंचन उडी लेजावी जबसम्मानित अलगये थोड़े ही एगये अब पक्षी के राजो चन्द्रमा जी ने प्रचेतसों से कहा राजकुमारो ! लोप शान्त करो इन वृत्तों भी आप लोगों का कुछ काम निकलेगा अर्थात् इनके एक कन्या है ले जावो प्राधा तुम्हारी तपस्या के तेज से साधा हमारे तेज से इसमें महाप्रतापी दन्न प्रजापति नाम पुत्र होगा उसमें बड़ी लुष्टि नलेगी। यह कन्या वृक्षों को इस नांति निजी कि रक कण्ड नाम मुनि ध ये रमणीक नदी के किनारे तपस्या करने थे उनके चलायमान होने के लिये इन्द्र ने अम्लोत्रा नाम अप्सरा भेजी उस ने मुान को अपने यश; करलिया मुनि १०१ वर्ष तक मन्दराचल पर जाय उसके संग विहार करते रहे एक दिन उसने कहा कि मैं इन्द्र लोकको बाया चाहती हूं प्राज्ञा दीजिये मुनि उसमें प्रातल नो थे ही कहा कुछ दिन और रह आत्री श्रार सयसे वह रह गई इतने में १०१ वर्ष व्यतीत होगये उसने मुनि से कहा फिर मुनिने उसको विलमाया इतरी भाति कई बार कहा सुनी हुई एक दिन मुनि उठे और घब- राते हुए नदी की ओर चले अमरा ने कहा कि जायेगा मुनिने कहा बोलोमत संध्या करने का समय है काल बीत जावेगा उसने हंसकर कहा सैकड़ों वर्ष होगये आपको सन्ध्या करते नहीं देखा मुनिने कहा सत्य २ फहती है या हँसो करती है। हमको तो तू प्रातः सन्ध्या के पीछे मिली थी यह सायं सन्या का समय है सत्य २ वताओ कितना समय हुआ हास्य न कर। अप्लस बोलो हास्य नहीं करती आपको मेरे संग विहार करते हुए ६०७ वर्ष ६मान ३ दिन बीते ऋषि बोले सत्य ही कहती है इन तो यही मानते हैं तुम्हारे संग विहार करतेएक ही दिन बीता अप्सरा ने कहा कि भापके सामने मैं झंक ज्यों कहती फिर पूछने पर तो ऐले महाना के सामने कोई भी झूड न फहंगो यह सुन मुनि ने बड़ा पश्चात्ताप किया-हाय मैंने अपनी सब तपस्या नष्ट करदा ! नाना प्रकार से चिलाप कर उससे कहा कि हे दुष्टे! तू अमी इन्द्र लोक कोसा नहीं तो मैं तुझे भस्म करदूंगा, इतने में उसको भी मूर्छा प्रागई सर्वाङ्ग से पसीना बहा, मुनि ने बड़ा कोप करके फिर कहा कि चली जा यह सुन मुनि के आश्रम से प्रम्लोचा आकारा मार्ग हो भागी और वृक्षों के पल्लयों सें अपना पसीना पोंछने लगी इस कारण जो ऋषि के बीच से उसके गर्भ था वह रोमों की राह निकल वृक्षों में हो रहा- पवन ने उसको उड़ा इकट्ठा कर दिया और चन्द्रमा जी कहते हैं कि हमने अपने किरणों से पोषण कर बढ़ाया उसी से गारिपा नामक कन्या होगई यही मारिषा नाम्नी कन्या वृक्ष आपको देती है। नोट-पण्डित जी अब तो श्राप समझगये होंगे कि जिस ऋषि ने 8 ०७ वर्ष इन्द्र की भेजी अप्सरा के साथ रमण किया परन्तु ऋषि को सन्ध्या ही प्रतीत हुई, ऐसी बेहोशी तो मदोन्मत्त को भी नहीं होसकती इस पर तुर्रा यह 8०७ वर्ष रमण करने में केवल एकही वार गर्भ रहा और वह भी पसीने के मार्ग से निकल गया-हमने तो अभी तक पैद्यक ग्रन्थों एवं डाक्टरी से भी यही देखा सुना है कि पसीना एक प्रकार का मानुष विष है। फिर इसपर वह गर्भपसीना होकर विकल गया जो पेड़ को पत्तियों में लग गया जिसको वायु ने उड़ाकर इकट्ठा किया और चन्द्रमा ने किरणों से पाषण किया कहिये श्रीमान् यह किस नियम से उत्पत्ति है। बलदेव जी महाराज का विवाह और रेवतीजी के छोटे करने की सहज रीति । अ० ४ अ० १०॥ रेवत नाम राजा की रेवती नाम एक कन्या थीराजा उसके विवाह विषय में सम्मति लेने के लिये ब्रह्मा जी के पास गये वहा हा हा ; नाम गन्धर्ष गीत गा रहे थे जब गाना बन्द हुश्रा तब राजा ने अपनी कन्या के विषय में पूछा कि किस राजा के साथ विवाह करें, तब ब्रह्माजी ने कहा कि भाप फिसर राजा के साथ विवाह करने की इच्छा रखते हैं यह सुप राजाने का सुनाया जिसको ब्रह्मा जी ने कहा कि जिन २ के यहाँ आपको विवाह करना अभीष्ट है पौत्र प्रपौत्र तो क्या सन्तान में भी कोई नहीं रहा इस गाने के सुनने में बहुतसी चतुर्युगियां बीतगई।इस समय अठ्ठाइसी चतुर्युगी के द्वापर का अन्त होरहा है इससे अन्य किसीको यह कन्या दीजिये श्रापके भी वन्भुवर्ग मित्रादि सब नष्ट होगये हैं त राजा ने फिर पूछा कि यदि वह लोग नही रहे तो जो विद्यमान हैं उनमें से वतलाइये किसको कन्या देवें तब ब्रह्माजी ने अनेक प्रकार के गुण गा कर कहा कि परमात्मा परब्रह्म ने अपने अंश ले आजकल पृथ्वी के द्वारिकानाम पुरी में अवतार लिया हैं जो यलदेवजीके नाम से प्रसिद्ध वही उत्तमवर है यह सुन राजा पृथ्वीतल पर आये और देखा तो सब मनुष्य छोटे २ और बलहीन होगये थे । राजा ने द्वारिका में जाकर ब्रह्माजी की आशा- नुसार दलदेव जीके साथ विवाह कर दिया-परन्तु जव वलदेवजी ने देखा कि यह स्त्री तो बहुत ही लम्बी है इसलिये अपने हलसे दबा दिया जिससे उस समय की जैसी सब स्त्रिया थी वैसी रेखती भी होगई। अब उनके ।

मोट-फहिये श्रीमान् इस बातका भी कुछ ठीक है कि गान. सुनते २ बहुतसी चतुयु गियां व्यतीत होगई-बलदेव महाराज को पौराणिक पुरुषों ने परमेश्वर का अवतार बताया है फिर उन्हामे मदिरापान के समाचार और सूत का मारना खिम्ना है क्या श्रीमान् अवतारियों के यही कार्य हैं-भब यह भी सुन लीजिये कि स्त्रियों के छोटा करने का सहज उपाय पलदेवजी महाराज का हल था। + राजा निमि का मरना फिर देवताओं के मथने पर एक पुत्र का उत्पन्न होना । अंश अं० ५.॥ एक समय राजा निमि ने यज्ञ करने का विचार कर अपने पुरोहित वसिष्ठ श्री से कहा कि आप हमको यज्ञः कराइये यह सुन पलिष्ठ महाराज ने कहा कि राजन् । आपसे ५०० वर्ष भागे इन्द्र ने यह कराने का न्योता दिया है इस हेतु मैं प्रथम उनकी यश कराकर तुम्हारा यज्ञ कराऊंगा ऐसा न हो कि तुम किसी और को बुला लो । राजा ने इसका कुछ उत्तर न दिया, वह इन्द्र के यहां यज्ञ कराने को चले गये । इधर निमि ने गौतमादि को युला यज्ञ कराने का मा. म. कर दिया उधर वसिष्ठजी या समाप्त कराकर इधर माये देखा कि आधा यक्ष होगया । क्रोधित हो सोते हुए राजा को शाप दिया कि जानो तुम्हा- यह देह न रहे राजा.ने उठने पर शाप का वृत्तान्त जान यह कहा, कि इस दुष्ट गुरु की मी देह न रहे, शरीर छोडदिया राजा के शाप से जब बसिष्ठ जी का देवतीक हुआ तो इनका तेज मित्रावरुण मुनि की देव में समागया और उर्वशी अप्सरा को देखा ज्युत हो एक कलश में गिरा जिलसे. वसिष्ठ अगस्त दो पुत्र उत्पन्न हुए धर यशसमाप्त होने पर जब देवता अपना २ भाग वहां लेने को माये तय गौतमादि ऋषिर्या ने कहा कि राजा निर्मि का मृतक शरीर सैल में यधावत् रकमा मा.है भाप सब माशीर्वाद देकर जिलाइये । देशों ने निमि को सुसाया तब उन्होंने कहा कि देषगण, आप सब लोग संसार के ऊपर कंपा करते पस्यह-महीं जानते कि उत्पन्न होने ले भरने में कितने । फष्ट होते हैं। इस किये अब हम जीना नहीं चाहते वरन् प्रत्येक प्राणी की पलक पर बैठना चाहते हैं जिससे सबको स्मरण रहे । यह सुन देवों ने कहा कि अच्छा । उसी.समय प्राणी एलक,मारने लगे और राजा के पुत्र न होने के कारण राजाहीन राज्य रहने से चोरों ने बड़ा उपद्रव मवाया। तब ऋषियों ने भाकर राजा के शरीर को मग, जिससे एक पुत्र मा उसका नाम जनक विदेह होने.से. विदेह मथे. जाने से मिथिये नाम उस.वाहरू हुए।

..."जो नोक-क्या वसिष्ठ जैसे विद्वान् अषि को इतना भी ज्ञान न था कि यह शरीर तो चैसे ही अनित्य है फिर इस प्रकार हा शाप देना किरीयर देन रहे उनकी विद्वत्ता का परिचय करा रहा है। राम लीजिये विष्णुपुराण के निर्माता को बुद्धि से भी परिचय प्राप्त कीजिये। जब वसिष्ठ मरने लगे तो उनका तेज तो मित्रावरुण की देर में समागया और उर्वशी अप्सरा को देख फलश में गिरा उस से दो पुत्र होगवे एक बलिष्ठ दूसरं अगस्त । कहिये श्रीमान् ! यह हां तक विद्या और बुद्धि के अनुकूल है। राजा के मरने पर भी यश होता रहो परन्तु अब तो सूतक को मान सन्ध्यादि कम्मोका छोड़ देने है पूर्णा- हुती के समय देवता भाये तो उन्होंने उसे जीवित करदिया परन्तु वसिष्ठ ऋषि को किसी ने कुछ भी सुध नहीं ली । क्या यहां भी धन ही के गीन गाये गये तिसपर भी जब ब्राह्मणों ने निभि को पुनर्जीवित करहिया तो राजा ने कहा कि मैं अब जीना नहीं चाहता क्योंकि इसमें बड़े क्लेश है प्रत्येक हादी के ऊपर उठना, नीचे गिरना, सकोड़ना, फैलाना और चलना, यह पांच कर्म है । एवं पञ्च प्राण, पञ्च उप प्राण और ग्यारह जीवामा निम्ती रुद्रसंशा है उनमें उपप्राणों में जो कूर्म हैं उसका कार्य पलक बोलना सूचनाहै फिर भला यह कैसे माना जाय फिनिमि जबसे पलकों पर भार सबले यह मिया हुई मा राजा के मृतक शरीर के मथने से पुत्र की उत्पत्ति होना भी बाज़ीगरी का खेल है यदि यह सत्य है तो पुनहीन पुरुषों को इस ओषधि से अपना कार्य नि कर दुख प्राप्त करना चाहिये। वलदेव जी का मदिरापान कर यसुना को बैंचना। वि० अंश पा० २५ मानुषरूपधारा धरणीधर शेषाचतार बलदेवजो गौओं के साथ वृन्दावन में विहार करते थे जिन्होंने पृथ्वी का पतसा भार उसार डाला था कारण पाय पृथ्वी में विचरते थे उनके भोगके लिये घरुण जी वारुणी मे बोले कि हे मदिर! जिसरी हूँ बलदेव जीको सदा प्यारी हैं । तेरे पानकी उनको इच्छा पनी रहनी है इसलिये अब तू उन्हीं के भोग के लिये उनके निफट जा यह सुन वह अन्दापन में कदम्ब के खोढले में आय बसी । श्रीमान् घलदेवजी महाराज भी विचरते २ वही भान पहुंचे श्योकि उसकी महक उनको दूर से ही भा रही थी। निकट पहुंच सदिग की धारा देख वलदेव जी परम आनन्दित हुए और गो गोपियों के साथ यथेष्ठ पान किया। जब पच्छे प्रकार मतवाले होगये लय यमुना से कहा कि हे यमुने ! हमको गर्मी अधिक जान पड़ती है। तुम यहां चला आप्रो इम स्नान करेंगे। यमुनाने मतवाले जमझ उनकी बात पर कुछ ध्यान नहीं दिया तथ कोभित हो हल को किनारे लगाय खाया और कहा कि हे पापे ! म आई न - . १० खाईबाव जहां चाहे चली तोजा जय ऐसा हुआ तब यमुना उस स्थान को छोड़ जहां सदेवजी महाराज-थे यहां जांफर वहने लगी। फिर शरीर धारणकर प्रणाम कर बोली कि हे राम! इमपर कृपा कीजिये, हमको छोड़दीजिये। तब चाँदेव जीने कहा कि तू हमको और हमारे बलको नहीं जानता। हम बीच कर तेरे सइंज-धारा घरहेगे जिससे जहाँ चाहे वो 'कांग कर ले जा यह सुन यमुना ने बड़ी स्तुति का तो अपना ईल (दुबका) छिपा दिया । नोट-श्री पण्डित जी ! इस कथाले यकदेवजी,महाराजकामदिरापान करवा प्रकट होता है परन्तु यह पात देवताओं के विपरीत है.तिसपर पलदेवजी महा। राज विष्णु महाराज के भाई एवं अवतारी थे। फिर न मालूम न्यास जी ने इस कथा को क्यों शिखा फिर अन्य बातों को क्या करना। श्री महाराज पण्डितजी ने कहा कि सेठजी बांज यो हो विभाम दीजिये। आर्यसेठ-बहुत अच्छा ! इतने में सब महाशय चलदिये तय सेठ जी ने हाथ जोड़ सब महाशया को नमस्ते का। पं० जीभायुष्मान सेथा अन्य सब यथायोग्य कह पदिये। ॥ इति पञ्चदश परिच्छेद ।। अथ षोडश परिच्छेद । आर्यसेठ-श्रीमान् पं० जी को पाते देख प्रेमपूर्वक नमस्ते कर आइये--विराजिये। पण्डित जी-आयुष्मान् कहकर बैठ गये इतने में अन्य महाशय भी प्राये और यथायोग्य के पश्चात् विराजमाम हुये । तदनन्तर--- श्रीपं०जी ने कहा कि सेठ जी हम विष्णुपुराण से तो वेद और बुद्धि सधा तृष्टिक्रम के विपरीत बातों को सुन तृप्त होगये। अब भाप पद्म, अझारख बामन पुराण से सुनाइये। : : सेठजीने बहुत अच्छा कह यथाक्रम कहला भारम्भ किया। - ..

पद्मषष्ठ.उत्तरखण्ड 1 अध्याय ६ बलके शरीर से धातुओं की उत्पत्ति। अब विष्णु और जालन्धर का घोर युद्ध होरहा था उस समय बल से हन्द्र लड़ने केलिये सम्मुख आये तब उन्होंने भयङ्कर शब्द किया सघ जिसको सुन पल इंसे तो उनके मुखसे मोती निकलने लगे ॥१६॥ ननादेन्द्रस्ततो भीमं तच्छ्रुत्वा सबलोऽहसत् । हस्तस्तस्यनिश्चेरुर्मुखतो मौक्तिकानि च ॥ प० षष्ठाचरखण्ड अ० १ श्लो० १६ ।। तब इन्द्र ने अंगकी अभिलाषा के कारण उससे संग्राम कर उसके प्रत्य- म्त बलकी प्रशंसा करी तबःबलने कहा घरदान मांगो। इसको सुन इन्द्र ने फहा कि यदि आप मुझसे प्रसन्न हैं तो आप अपना शरीर दीजिये । बल ने फहा कि शन्नो से काटकर हमारा शरीर लीजिये, क्योंकि सज्जनों का परम् कार्य • यही है कि परोपकार करें, तय इन्द्र ने मुदूर से शरीर काटने का प्रारम्भ किया परन्तु जब उसका शरीर मुद्भर से न फटा तब सारथी के कहने से वनले फा- टना प्रारम्भ किया तो अंग को एक भाग तो कनकाचल में. दूलराहिमाचल में तीसरा गोनग में, चौथा गंगाजी में, पाँचवर्क मन्दराचल में और विजय के अंग से उत्पन्न छठाभाग वनाकार में गिरा २३ ॥ कर्म और जानि में शुद्ध होने के कारण से उसकी देहके मन रमवीज से परिपूर्ण थे। घनले हाडों के जो कण गिरे वह छः कोण की मणि होगये तथा नेत्रों से इन्द्रनीलनषि कानों से मणिको मेदसे मरकत, जीभ से मूगे, दांता से मोती,मज्जा से मरकतमणि,नससे गाव- मनमणि, विष्ठा ले कांसा, वीर्य से चांदी, मूत्र से तांबा, श्रङ्ग के उद्वर्त्तन से पीतल, शन्द से पैडूर्यमरिण तथा श्रेष्ठ रत्न, नखों से सोना, रक्त से रस, मेद से स्फटिकमणि और मांस से मूंगा इत्यादि सब रत्न घलके शरीर से उत्पन्न हुए। . . - बजाकरे पपातांशः षष्ठश्च विजयाङ्गजः ॥२३॥ वस्य जाविविशुद्धस्य परिशुद्धन कर्मणा ।

( १२ ) कायस्यावयवाः सर्वे रत्नवीजत्वमागताः॥२४॥ वज्रादस्थिकणाः कीर्णाः पदकोपामणयोऽभवत् ॥२५॥ मजोद्भवं मरकतं गारुत्मतमभून्नसा । कांस्यं पुरीष रजतवीयं ताम्रश्चमूत्रजम् ॥२॥ अगस्यो इतनाज्जातं पित्तलं ब्रह्मवीतिकाः। नदाबेदूर्वमुत्पन्नं रत्नंचारुतरं तथा ॥२८॥ मोट-पदार्थ एवं भूगर्भविद्या के शाता विचारपूर्वक देखें तो सही कि घल के शरीर मनसून से चांदी, कांसा सव इत्यादि क्या र उत्पन्न होगया प्यारे मनासनिशे ! यदि वल की देव रत्नादि उत्पन्न हुए तो क्या पहिले पृथ्वी पर रत्मादि न थे ? शास्त्रों में पृथ्वी को रत्नगर्भा कहते हैं क्या यह मिथ्या ज्वर की अद्भुत उत्पत्ति और उसकी अपूर्व औषधि । सध्यास में लिखा है कि श्री कृष्ण महाराज वाणासुर के संग्राम को गये और वो उसकी सहायता के लिये महादेव जी उपस्थित थे जब दोनों में समाम हुना सम्म महादेव ने कृषण पर तापयर को छोड़ा तो कृष्ण ने शीतज्वर से उसका निवारण किया। कृष्ण और महादेवजी से छोड़े हुए यह दोनों ज्वर उन्हीं की श्राशा से मनुथलोक में प्रवेश करते हुए जो मनुष्य कृष्ण जी और महादेव जी को थुख सुनते हैं वे सय घर से छूटकर रोगरहित होजाते हैं। २३ । ३५॥ नोट----जवर की उत्पत्ति और इलाज को जानकर हम नहीं जानते कि बमान समय में जब कि ज्वर से सम्पूर्ण प्रजा दुखी होरही है क्यों नहीं धर्म- ममा इस संग्राम की कथा सुनाकर मारोग्यता प्रदान कराती। राजा सगर की रानीके साठ हज़ार पुन्नों का उत्पन्न होना। ब्रह्माण्ड-पो. प. अ. प चाकुवंश में खंगर माम एक प्रसिद्ध राजा थे उनके केशनी, और सुमति वह दो स्त्रियाँ थीं परन्तु सन्मान किसी के न थी इमलिये पुत्रको इका कैलासपर्वत पर जाकर संपत्या करने लगे कालांतर में पार्वतीनाथ उनके पास 'धाये जिसको देख राजाने रानी सहित प्रणाम कर दो पुत्र होने का वरदान मांगा तय शिवतीने कहा कि हम प्रसन्न होकर यह बरदान देते हैं कि तुम्हारी एक स्त्री के अधिमान से भरे हुए महाशूरवीर साठ हजार पुत्र होंगे और ये सब एक हो स्थान पर एक दिन में ही नष्ट होजायंगे और एक स्त्री से घंशकी रक्षा करने वास्ता महाशूरवीर एक पुत्रं होगा ऐजाकह अंसान होगये राजाभी अपने नगर को चले गये फिर दोनों के गर्भ रहा और समय पूरा होने पर सुपति.स्त्रोके एक तूम्बी उत्पन्न हुई और केशिनी स्त्री के देवताओं के समान रूपबाला एक पुत्र उत्पन्न दुधा तब राजा सगरने उस तूम्बोके फेकने का विचार किया उसी समय भगवान् और्ष ऋषि वहां श्राप और कहा कि राजन् । श्राप सा साहस मत कीजिये इस तूम्बो के भीतर.पुत्र हैं और तूम्बी के भीतर से जो बीज निकले उनकी यत्न से रक्षा कीजिये आप इल तूम्मी के बीजों को बीसे भरे हुए किसी पान में रखिंय त प्रापको सोठ हजार पुत्र मिलेंगे। "सम्यगवे कृते राजन् भवतोमप्रसादतः । यथोक्तं संख्या पुत्राणां भविष्यान्त न संशयः ॥४३॥ रजा ने अधि के ववनानुसार कार्य किया अर्थात् राजा ने एक बीज को 'पृथक् २ कर घी के बरतनों में रख दिया और पुत्रों की रक्षा के निमित पर धाय सब बरतनो के समीप नियत करदी फिर बहुत काल बीवने पर महाते- "जस्वी महावली साउहज़ार पुत्र होगायं । एवं क्रमेण संजातास्तेनयास्ते महीपते। : ववृधुः संघशो राजन्पाठिसाहसंख्ययाः ॥४७॥ . यह राजपुशवड़े होने पर बड़े २ कुकर्म करके देवताओं को कलेशित करने लगे तब घह अहाकी शरण म.गये, उन्होंने कहा कि तुम सब अपने २ घर जा. ओ इन संचिका थोडेदिनी ने लाश हो जावेगी। फिर कुछ दिनों के बाद राजा ने यज्ञ करने का प्रारम्भ किया और घोड़ा छोड़ा। सय पुत्र उसको रक्षा में लग गये घोड़ा पृथ्वी पर घूमता हुआ समुद्र के तट पर या तो अत्यन्त यत्न से रक्षा करने पर भी कहों अन्तान होगया संध पूत्रों ने प्रार राजासे कहा राजाने फिर सयको उसके खोजने के लिये भेजा परन्तु जब हड़ने पर घोड़ा और चुगनेयाला न मिला तब लौटकर पिता से कहा, उस समय राजा को क्रोधाया और कहा तुम भाम्य देशों में + . इंदने को जानो पन दिये । अनन्तर सगर के पुत्रों में पृथिवी को कुमार आर फावड़ों ने यत्नपूर्वक खोदना प्रारम्भ किवा इस समय बोदने से परख के स्थान समुद्रको बड़ा दुःख दुश्रा और चारो:योर.से समुद्र खोदने से उसके रहनेवाले अतुमसर्प, राक्षस और अनेक प्रकारके जन्तु सारपुत्रों में पीड़ा पाकर घोर शब्द करने लगे परन्तु वहुत काल,खोदने पर मो कहीं घोड़ा नहीं मिला मन्तको लगर के पुत्रों ने बड़ा फ्रोध किया तव उत्तर पाताल के कोने में खोइना पारस्म किया और पाताल नक खोदते चलेगये वहां देखा कि पृथियो में घोड़ा घूम रहा है उसके निकट कपिल महात्मा झी मी विराजमान है। परन्तमश्वं पाताले ददृशु पनन्दनाः ॥१५॥ दहशुश्चमहात्मानं कपिलं दीप्त तेजसम् ॥१७॥ संग्रहृष्टास्ततः सर्वे समेत्य च समंततः ॥१६॥ घोड़े को देख सब प्रसन्न हुए और महारमा का निरादर करने के लिये कालके वशीभूत हो फ्रोध सहित धोड़ा पकड़ने को दौड़े राजपुत्रों का यह व्यव- हार देख महात्माको बड़ा कोर्धे श्रीया फिर नेत्र खोलकर सगर के पुत्रों पर अपना तेज डाला जिसके लगतेही सगर के पुत्र भस्म होगये। नारद मुनिने पुत्री के नष्ट होजाने का सब पूछा गजा से कहा जिसको सुन राजाको बड़ा योक हुना। एण्डितजी-राजा सगरके साठहजार पुत्रों की उत्पति को सुनकर भी आप सिच में क्या यह मन नहीं हुमा कि यह पुराणयास महाराज कहे हुवे नहीं हैं। देखिये स्त्री के तुम्बी और उनके बीजों को पी के मटकों में रजने से पुत्र उत्पन्न होगये परन्तु तूम्यो की लम्बाई भी नहीं लिखी न जाने कितनी बड़ी होगी जिसमें ६० हजार बीज थे। देवताओं से वृक्षों की उत्पत्ति। वामनपुराण-अध्याय १७ में लिखा है कि पाश्विन, मास में अब शर को नामि कमज इत्पन्न-पो तर देवताओं में ले कामदेव के कदम्ब कुबेरके घट, महादेव के हृदय में धा, ब्रह्मा को देहके मायमाग से और, विश्वकर्मा के शरीर से करटकि, पार्वती के हाथ के तलवे में कुन्द, गणेशजोडे .मस्तक में संभाल, धर्मराज के वहिने पांगु में पन्नाश, बायें में काला पुखर, * ( १५ ). स्वामिकार्तिक के शरीर से जीया पोता, सूर्य के शरीर से पीपल, कात्यायनी शरीर से आंरी, लक्ष्मी के हाथ में चैल सणे से शरस्तव और बांसुकी सर्प. की फैली हुई पूछ के पृष्ठभाग में सफेद और काली दूध, साध्य देवतायों के दय में हरिचन्दन वृक्ष उपजा ऐसे जोर जिसड़े शरीर से उत्पन्न हुए वित. में उनकी प्रीति हुई। कन्दर्पस्यकरातु कदम्बश्चारुदर्शनः । तेन तस्य पराप्रीतिः कदम्बेन विवर्द्धते ॥२॥ यक्षाणामाधिपस्यापि.मणि भद्रस्य नारद । वटवृक्षः समभवत्तस्मिस्तस्यरतिः सदा ॥३॥ महेश्वरस्य हृदपे धत्तूर विटपः शुभः । संजातः स च सर्वस्य रति कृत्तस्य-नित्यशः ॥४॥ ब्रह्मणो मध्यतो देहाज्जांतो मरकंतप्रभः । खदिरः कंटकी श्रेयान भवादिश्वकर्मणः-11 गिरिजायाः करतले कुन्द गुल्मस्त्वजायत । गणाधिपस्य कुम्भस्थो राजते सिंधुवारकः ॥६॥ यमस्य दक्षिणे पार्श्व पालाशो दक्षिणोत्तरे । कृष्णोदुम्बर कोरौद्रो जातः क्षाभकरोव्ययः। स्कन्दस्य-वन्धुजीवश्वरवेरश्वत्थ एव च ॥ कात्यायन्याः शमीजाता विल्बोलक्ष्म्याः करेऽभवत् । नागानां मुखतो ब्रह्मच्छरस्तंवोठयजायत । वासुकेर्विस्तृते पुच्छे पृष्ठे दूर्वासितासिता ॥९॥ साध्यानां हृदये जातो बृक्षोहरित चन्दनः । एवं जातेषु सर्वेषु तेन तत्र रतिर्भवेत् ॥१०॥ नोट-रंस उत्पत्ति को पदकर मापही विचार करें कि यह ही व्यासजी मंदारा लिखित पुराण है। " श्रीपण्डितजी-लेडजी अब समय घहुत होगया इसलिये अब यस कीजिये। -- 'सेठजी ने कहा कि बहुत अच्छा । सय महाशय चलदिय । सेठजीने-श्री० पं० जी को नमस्ते की । श्री पं० जी आयुष्मान कह तथा अन्य यथा योग्य के पश्चात् चले गये। सेठजो अपने कार्य में लगगये। इति षोडश परिच्छेद। १. अथ सप्तदश परिच्छेद। -- सेठजी ने श्रीमान् पं० सी आदि को आते देख नम्रता पूर्वक नम- स्ते कर कहा कि थाइये! पंजी-आयुष्मान् तथा अन्य महाशयों ने यथायोग्य कहा और विराजमान हुए। - सेठजो-ने पं० जी की तबियतका हाल पुंछा कहा कि श्री महाराज आज मैं श्री शेषा पुराणों से वेद, बुद्धि तथा सृष्टिक्रम के विपरीत कथाएं सुनाता हूं। देखियः विश्वामित्र के शाप से.सरस्वती में रक्त की धारा का होना. फिर अन्य ऋषियों के वरदान से शुद्ध होना. वामनपुराण-अध्याय ४० में लिखा है कि विश्वामित्र और वसिष्ठ, मुनिके बीच तपरूपी ईर्षाके कारण बड़ोचर होगया था एक समय विश्वामित्र ने सरस्वती नदीको चुलाकर कहा कि घलिष्ठमुनि को अपने वेग से यही वहा मा तय मैं-'उनको मारूंगा उसने दुखित हो चमिडजी के समीप ला सब :

. वृत्तान्त कहा, उनको बहाकर-ले चली तब. बलिष्ठ महाराज ने लरस्वती की. स्तुनि की। इधर-सरस्वती ने बलिष्ठ को विश्वामित्र के समर्पण किया त्योही उन्होंने उनके मारने के लिये प्रहार किया। तब सरस्वती ब्रह्म हत्या के भय से. वसिष्ठ को उलटा बहाने लगी उस समय विश्वामित्र जी ने क्रोधित हो कहा .किमोहयुक्त राक्षसों से सेवित रहेगी। वह उसी प्रकार पहने हागी जिसकी देख देवता दुःखित हुए बहुत काल पीछे बहुधा मुनि तीर्थयात्रा के अर्थ सर एपंती पर गये फिर उसको बुला कारण को जान प्रसन्न हो अरुणानदी कोउसमें मिलाकर राक्षसोंकी मुक्ति के अर्थ वहांपर संगम तीर्थ की मुनियों ने कल्पना की जी.कोई सासंगम पर तीन दिन चालकर स्नान करता है वह पापोंसे छूट जाता है घोरकलियुग में भी स्नान करने से मुक्ति होती हैइसके पीछे सब राक्षस संगम में स्नानकर स्वर्ग को चले गये। नोट-क्या सरस्वती भी कोई शरीरधारी स्त्री थी और जब सरस्वती संगग में स्नान करने से पापों की निवृत्ति होकर मुक्ति होजाती है तो फिर सत्यादि यमनियम के पालन करने की क्या आवश्यकता? तथा इस संगमकाजब ऐसा प्रताप है तो फिर अपने पतित भाइयों को स्नान कराकर शुद्ध करलेने में क्या हानि? ब्रह्माके कानोंसे दिशाओंकी उत्पत्ति वाराहपुराण-अध्याय २६ में लिखा है कि जब. ब्रह्मा को चिन्ता हुई तब ब्रह्मा के कानों में दश दिशा उत्पन्न हुई। प्रादुर्वभूव श्रोत्रेभ्यो दशकन्या महाप्रभाः। पूर्वीच दक्षिणाचैव प्रतीचिचोत्तरा तथा ॥३॥ राजा विपश्चितसे नरकियों को एक अनोखा लाभ। मारकण्डेय अ० १४ । 2. जब राजा विपश्चित मरकर नरक को गया तब उसने यमदूत से कहा कि मैं नाना प्रकार के धर्मकार्य करता रहा फिर में क्यों नरक को माया तय ( १८ ). यमदूत ने कहा कि तुमने थोडा सा पाप पिछले जन्म में किया है उसको मैं तु.हे बनाताई देखो विदर्भदेश की राजकन्या पीवरी नाम स्त्री ऋतु से शुद्धहुई तय तुमने उसके साथागमन नहीं किया इस हेतु जो ऐसा करते हैं वह पितृ के ऋण से पापोषी होकर मरक में गिराये जाते हैं यही.तुम्हारा पाप है इसी से नरक भोग करायागया,अब तुम स्वर्गको चलो तव राजा ने कहा जहां तुम ले लोगे मैं वहाँ ही चलूंगा परन्तु यह यतलाओ कि यह लोग सो अति दुखी. कोई कुछ कोई कुछ दुःख उठा रहा है यह क्यों उठा रहा है ! अनेक जन्म में जो पाप या पुण्य जान या अनजान से उत्पन्न होते हैं वह सब कम्मों का फन. है, आत्मा के साथ रहता है देहसे या मनसे या पचनसे जिस प्रकार जो मनुष्य करता है उसी भांति उसके फल को पाता है दूसरी नहीं। अर्थात् विनापाप वा पुण्य के किये कोई भी सुख अथवा दुःख नहीं भोगता। जिस प्रकार ये पापी पुरुष इस घोर नरक में रहकर दुःख भोग रहे हैं इसी प्रकार हे राजन् ! पुण्यवान् मनुष्य स्वर्ग में देवता, गन्धर्व, सिद्ध और अप्सराओं के साथ गीत सयामुश्यादि द्वारा अपने पुण्य का फल भोगकर फिर देवता मनुष्य या तिर्यक् योनि को प्राप्त होते है। .. : अकुर्वन् पापकर्म पुण्यम्वाप्यतिष्ठते । यद्यत्माप्नोति पुरुषो. दुःखमुखमथापिचा ॥३३॥ प्रभूतमथवा स्वल्पं विक्रियाकारि चेतसः । तारतातस्य पुण्यंवा पापंवाप्यथचेतरत् ॥३४॥ क्षपयन्ति नरा घोरं नरकान्तववर्तिनः। तथैव राजन्! पुरायानि स्वर्गलोकेमरे सह॥३६॥ गन्धर्व सिद्धाप्सरसा गीतायैरुपभुज्यते । देवले मानुषत्वेच तिर्यक्त्वेच शुभाशुभम् ॥३७॥ सविस्मर वर्णन करने के पीछे यमदत ने कहा कि अब मैं समापकोजुनाचुका और सत्र भरक दिनाचुका अब आप दुसरे स्थान को बलिये जब राजा यमदूत फी मागे कर चलने को उपस्थित हुए तय नारकी लोग जो कष्ट में पड़े थे बोले कि हे राजन् ! माप हम सो पर कृपा करक एक घड़ी और यहां ठहर जाइये क्योंकि जो हषा श्रापके शरीर से ठोकर खाकर आती है उससे हम लोगों को बड़ा आराम मिाता है। अध्याय १५ लो०४॥ .

. प्रसादंकुरु भूपेति तिष्ठतान्वमुहूर्सकम् । . स्वदङ्गसङ्गी पवनोनमोहलादवतहिनः॥ जितने परिताप या दुःख जो हम लोगों के शरीर में है यह सब इस हवा के सागने से छूट जाते हैं, इसलिये ऐ नर ध्यान ! हम सधों पर पथा कीजिये ।। परितापंच गात्रेभ्यः पीडावाधाश्च कृत्सशः । अपहान्त नरव्याघ्र दयांकुरु महीपते! ॥४६॥ राजा नारकियोके इस वचनको सुन यमकूतसे. पूंछने लगे यह लोग मेरे रहमेसे क्यों प्रसन्न होते हैं ? मैंने मृत्युलोक में कौनसा पुण्य किया जो इन - लोगो के लिये भानन्ददायक होरहा है सो तुम मुझे पत्तखाओ। यमदूसने कहा कि पे राजन् ! जो आपने देवता, पितर और बभ्यागत इत्यादि को पहले लय- पंण करके शप अंन्नं खाकर अपना शरीर पाला था और जो कि आपका मन हर घड़ी इन्हीं बातों में रहता था इस कारण तुम्हारे अंग की स्पर्श हुई वायु आनन्दको देनेवाली है जिसके स्पर्श से इन सव पापकर्मी लोगोंको दंडका कष्ट मही जान पड़ता।:: .. पितृदेवातिथिप्रैष्यशिप्टेनान्नेन तें तनुः । पुष्टिमभ्यागतांयस्मात्तद्गतञ्च मनोयतः ॥५२॥ तब राजा ने कहा है यमदूत !.मेरी समझ में ब्रह्मलोक आदि स्वर्ग में वह सुन नहीं है जो सुख दुःस्त्रीलोगोंकी रक्षा करने से मनुष्यों को प्राप्त होता नै यदि मेरे रहने से इन नरकियोंको दण्ड का कष्ट नहीं जाना पड़ता तो मैं. इन दुःखी लोगों के लिये यहां ही रहूंगा तय यमदूत ने कहा कि यह धर्म और इन्द्र आपके लेने के लिये आये हैं जहां श्रापकां जाना आवश्यक है सो चलिये। धर्म: ने कहा कि ऐ राजन् ! तुमने मेरी सब प्रकार से. उपासना की है इसलिये मैं : तुमको स्वर्ग को ले चलूंगा इसपर इन्द्र ने कहा कि यह पापीलोग अपने पाप कम्मों की सज़ा भोग रहे हैं और मापने पुण्यकर्म किया है इसी लिये आपको स्वर्ग जाना होगा फिर राजाने कहा आप दोनों यह बताया कि मेरे पुण्य का प्रमाण कितना है तेव-धर्म ने कहा जिस प्रकार आकाश में तारे, समुद्र के जल में कण और गङ्गाके किनारे की चालु और महावृष्टि के विन्दु अगमित हैं उसी प्रकार है राजन् ! तुम्हारे पुण्य को भी गिनती नहीं । जबसे सुंम इन मरनियों पर रूपा कर रहे हो तबसे अब तक तुम्हारा समय सौ हजार वर्षका तीत । (२०) 'होगया! इसलिये अ आप स्वर्ग को चल वहाँ का सुख भोगें। यह पापोलोग अपने.बरसों का फल इल नरस में मोरंगे । तर राजा ने कहा कि यदि हमगो इन तानों की ही भलाई नहीं हुई तो अन्य कोई हमसे भलाई की थाशा बैले नरेगा ! अतः हे देवराज ! जो कुछ हमारा लुचत ! पुण्य) है उससे यह नरकी जन अपने कष्ट से छूटजावें। अविन्दवो यथाम्भोधौयथाचदिवितारकाः। यथावावर्पतोधारागंगायांसिकतायथा ॥७१॥ असंख्येयामहाराज! यथा चिन्दादयोहपाम् । तथा तवापि पुण्यस्य संख्यानैवोपपद्यते ॥७२॥ अनुकम्पयामिमामय नारकोविह कुर्वतः। तदेवशतसाहलं संख्यामुपगतं तव ॥७॥ कथं स्पृहां करिष्यन्तिमसम्पर्केषु मानवाः । यदि मत्सनिधावपासुकानोपजायते ॥७॥ तस्मात् यत्सुकृतं किंञ्चिन्ममास्तित्रिंदशाधिप ! 1 तेन मुच्यन्तु नरकात पापिनोयातनांगताः ॥७।। तत्र इन्द्र ने राजा से कहा कि भारको पैराठ हुश्रा- और देखो -चर मरफी लोग भी नरक के कष्ट से छूट गये। राजा के ऊपर फूल बरसने लगे और विष्णु भगवान् राजा का हाथ पकड़कर विमान में विटाकर वैकुंठ लेगये। ततोऽपतत्पुष्पवृष्टिस्तस्योपरि महीपतेः। पिमानचाधिरौप्येनं स्वलोकमनयद्धरिः ॥७॥ नोट-इस कथा में पूर्वापर विरोध है कारण कि पूर्व तो यह कहा कि सपने कर्म अपने हो पिये सुख यो दुःखदायक होते हैं और विना कर्म का फुल लोगे कोई तुन श दुःल नहीं पाता और अन्त में यह उति कि राजा ने श्रान पुश्र का फाज नरशियों को देदिया जिससे नारको नरक से छुटगये।

एक राजांकसाथ हरिणीका वार्तालाप ... मारकण्डेयपुराण-जि० २ अध्याय ३६ में लिखा है कि स्वरोधि अपने तीनों पुत्रोको पृथक् २राज्य देकर आप अपनी स्त्रियों से बिहार करने लगे, एक समय शिकार को गये और सुअर के पीछे दौड़े तम एक हरिणी ने माफर कहा कि आप इस बाण से मुझको मारिये मुभर मारने से पया लाभ यदि मुझको मारोगे तो मैं अपने दुःख से छूट जाऊंगी तय राजाने कहा तुझको फ्लेश क्या है ? हरिणी ने कहा कि मैं जिस पुरुषको चाहती है पह मन्य स्त्री पर आसक्त है तब राजा ने कहा कौनसा तेरा पति है जो तुमको नहा साहता, यह कौन पुरुष है जिसको तू चाहती है तंव हरिणी ने कहा कि मैं तुम्हींको चाहती हूं, तुम्हीने मेरा मन कर लिया है, तुमको भौरा से प्रीति है इस लिये मैं अपने जीवनको वृथा समझती हूं तब राजा ने कहा कि तू हरिणी है मैं मनुष्य हूँ मेरा तेरा संयोग किस प्रकार से होसकता है। हरिणी ने कहा जो आप प्रसन्न हो मुझसे भोग करेंगे तो फिर जो कुछ मॉप चाहेंगे वह संघ आप को प्राप्त होगा जब राजा ने उसके साथ भोग किया तो उसी समय यह सुन्दर स्त्री होगई॥२१॥ आलिलिङ्गततस्तांसु स्वरोची हरिणाङ्गनाम् । तेन चालिगितासद्यः सांभूहिन्यवपुर्घरा ॥२१॥ तब स्वरोधि ने पूछा तूं कौन है तब उसने कहा कि मैं पनकी देयता हूं देवता लोगों ने मुझसे विनय कर कहा कि तुम मनुको पेदा करो इस कारण मैंने आपसे कहा, यह सुन स्वरोचिने हरिणो ले भोगकर एक अपने समान तेजवान पुत्र उत्पन्न किया.तब देवताभी ने फूलों की वर्षा को और घुतिमान उसका नाम रक्खा गया। . . तस्यतेजः समालोक्यनामचक्रे पिता स्वयम् । द्युतिमानिति येनास्य तेजसा भासितादिशः।।२।। नोट-राजाका हरिणी से भोग करना और उसका स्त्री होना मापके विचारने योग्य है।

। २२ । श्रीमद्भागवत् पञ्चमस्कन्ध के प्रथम अध्याय में लिखा है कि राजा पियार ने यह विचारकर कि सूर्य सुमेरु पर्वत को प्रदक्षिणा करता है इस कारण माथे जगत् में रात्रि रहती है उसको में दिन लंगा ऐसाविचारकर अपने प्रकाशमय रथ पर बैठके यो समान घूमने लगा। येवा उहद्रथ चरणनमिकृतपारखातास्ते सप्तसिन्धव आसन्यत एवकृताः सप्तभुवी दीपाः ३१॥ महाराज प्रियव्रत त्यो पहिये से जो खाई पनी यही सात समुद्र होगये और जो भूमि उनके योग में रंदगई धद जम्बू प्लक्ष भार शालमली भादि सात द्वीप के नाम से प्रसिद्ध होगई। नोट-जहिये श्रीमान् क्या पहले समुद्र न थे? . मनुकी पुत्री इला का पुत्र होजाना। श्रीमद्भागवतके नवम स्कन्द अध्याय १ में लिखा है कि सूर्यवंश के आदि पुरुष महात्मा मनुके दश पुत्र थे उनकी उत्पत्ति से प्रथम मनुने महर्षि वसिष्ठ ले पुष्टि यश कराया जिसके प्रताप से मनुको स्त्रीके गर्भ से इला नामकी कन्या उत्पन्न हुई जिसको देख मनुको बड़ा असन्तोष उत्पन्न हुआ उन्होंने वसिष्ठसे कहा कि यह उलटा कार्य क्यों हुआ मैंने जो पुत्र को प्राप्ति के लिये यह किया था उससे पुत्री उत्पन्न क्यों हुई बलिष्ठजाने उत्तर दिया कि होता (श्राद्धति देने पाले. उन्नाटे संकल्प से यह उलटाफल हुश्रा परन्तु मैं अपने तेज से तुमको सपुत्र बनाऊंगा ऐसा कहने वसिष्ठने विष्णु की स्तुति की उससे प्रसन्न होके जो विष्णु ने वरदिया उसो घर के प्रताप से मनु को पुत्री इला पुरुष होगई और उसको नाम सुघुम्न रकबा गया ॥२१॥२२॥ एवं व्यवसितो राजन् भगवान्स महायशाः। अस्तौपीदादिपुरुषमिलायाः पुंस्त्वकाम्यया ॥२१॥ तस्मैकामवरं तुष्टो भगवान् हरिरीश्वरः । ददाक्लिाऽभक्तेन सद्युम्नः पुरुषर्षभः ॥२२॥ ...

. .'. . (श:) नोट-न जाने हमारे पारासिक भाई इस विचित्र रीति से अब क्यों नहीं कार्य लेते । देखिये लड़की को पुत्र करदेनेका क्या सरल उपाय है व्यासंजीके पुत्र की इच्छा से भगवती महादेव का तप करना और महादेव से बर पाना फिर घृताची को देख कामातुर हो-वीर्यपात हो अरणी में गिरना और शुक्र का उत्पन्न होना। देवीभागवत स्कन्द १ अ०१० मेव पर्वत पर व्यासजी ने एकाक्षरी मन्त्र जप भगवती और शिवा का ध्यान निराहार सौ वर्ष तक किया कि जिसमे हमारे अग्नि, वायु अन्तरिक्षके तुल्य पुत्र उत्पन्न दोसको देख इन्द्र बड़ा व्याकुल हुआ और वह महादेव के पास गया तव महादेव जीने कहा तुम संशय मत करो क्योकि वह शक्ति सहित हमारा पुत्र के हेतु तप.करते हैं इन्द्रासन के लिये नहीं तुम कुछ चिन्ता न करो हम जाते हैं यह कह व्यासजी के पास पहुंचे और कहा लय गुण सम्पन्न तुम्हारे पुत्र होगा वह तपस्या करते रहे एक दिन अरणी सहित गुप्त अग्निको अग्निको इच्छा करके मथने लगे उसी समय में पुत्रं होनेकी इच्छा हुई जैसे मंथान और अरणी के संयोग और मंथन से अग्निं उत्पन्न होती है वैसे ही हमारे क्योंकर पुज्ञ उत्पन्न हो सकता है क्योंकि स्त्री सो हमारे है ही नहीं और स्त्री करना बंधन का हेतु है देखो शिवजी ऐसे महात्मा सो भी नित्य कामिनी की फांस में फंसे रहते हैं इस चिन्ता में लग रहे थे कि इतने में घृताची नाप अप्सरा दिव्य रूपं धारण किये हुये आकाश में दीख पड़ी गुनि जो घृतवत थे कामातुर हो चिन्ता करने लगे कि मैं क्या करूयह मुझे छलने के लिये आई है सम्पूर्ण महात्मा औरतपस्थी मुझे हंसेगे देखो १०० वर्ष तपस्या करके भी कामके पश्चोभूत होगये इसके उपरान यह गृहस्थाश्रम के सुख जो पुत्र उत्पन्न होने के समय होते हैं वह भी इस खेन होगा क्योंकि यह तो भोग भुगाकर आकांशको चली जायगी इस. लिये उन्होंद कहा कि यह हमारे योग्य नहीं है अपसरा श्रापके भयसे शुकीका रूप धारण करके निकल गई व्यासजी बड़े विस्मित हुयेकामातुरतो. हो ही गये थे बहुत मन खींचने पर मीन खिचा मुनिका धीर्य भरणी (ढाक की लकड़ी) में पतित होगया वह अधिक अरणीको मथने लगे उसमें व्यासजी के प्रकार उत्पन्न बा ! शुकीको देखकर पतित हुआ इसलिये पुत्रका नाम शुक मासिन देवताओं ने आकाश से वर्षाकी.और प्रसन्न हो, सब इनके स्थान . का पुत्र . जिससे कि ऋतुस्नाता स्त्रीका स्मरण था इसलेवीय न्युन हुज ( २५ ) पर आये वह पढ़ने लगे वेदविधिसे मुनिने यज्ञोपवीत कराया और वृहस्पतिको गुरु फरके चारों वेदपटशास्त्र पढ़े और गुरुदक्षिणा देकर पिताके पास भावे। 'नोट-इस कथा के देखने से ज्ञात हुआ कि इन्द्र एक क्षुद्र कोटिका राजा और तपस्वियों का बहुतायत से विरोधी था जैसा उस के प्राचरणों से विदित होता है। (२) क्या व्यासर्षि ऐसे अक्ष थे कि विना स्त्रीके पुत्र की कामना की ? (३)अरणी अर्थात् ढाककी लकड़ी पर.........पात होने से पुध उत्पन्न होगया? (४) 'शुचिर पूती भावे' धातुसे शुक्र शन्द बनता है यदि शुकी को देखकर शुकमाम रखलिया तो रेफकी मनुवृत्ति कहां से आई जो कि शुक्र-कहा जादा है व्याकरणाभिमानी पौराणिकी इसे सिद्ध करें? देवी भागवत । स्कन्द्र ३ अ०१ एक उपरिचर नाम चेदिदेशके राजा से जोकि अति धार्मिक सत्यसागर और द्विजपूजक थे, इनकी तपस्या से संतुष्ट होकर इन्द्र ने इन्हें स्फटिकमणिका.. एक विमान दिया जिस पर चढ़ कर वह अंतरिक्ष में फिरा करता था। इनकी . स्त्री का नाम गिरिको था जिस में उन्होंने ५ पुत्र उत्पन्न करके अन्य २ देशोंके राजा कर दिये थे फिर एक दिन गिरिका ऋतुस्नाता थी उसी दिन राजा के पिताने कहा कि श्राद्ध करने के लिये मृग मारलानी यह बड़ा धर्म संकट उभा चौपाई। उन ऋतुमती नारि नहि जाई । गर्भघात पातक त्यहि भाई। पिता वचन-माने नहि जोई। पापपुज ताडू कहें होई । पर वे पिता के वचन मान शिकार करने ही चले गये यहां यन में जाकर विचार के कि स्त्रीके निकट भेजेंगे राजाने वरगद के पत्तों के दौने । स्थानित कर दिया कि हम सब अमोघ वीर्यवान हैं जो यहा से धोय प्रेरित करेंगे तो पुत्र ही होगा। एकबाज जो राजा करके पालित संग हो या उससे " :

( २५. ) कहा कि इसे हमारी स्त्री के निकट पहुंचायो, यह सुन बमोन मेहन्दगुरु बट पत्र कोलके प्राकाशगर्ग हो उ कि अन्य काई वाज नांस जामीन ने लगा इस पर बड़ा युद्ध हुआ और वह घटपत्र का दौना यमुनाजी में गिर पड़ा. घाज जहां के वहां चले गये, उसी समय एक अद्रिका नाम अप्सरा जो कि यमुना में स्नान कर रही थी) ने एक ब्राह्मण (जो कि संध्या करने में उद्यत थे) के चरण कामातुर होकर आ पकड़े ब्राह्मण ने शाप दिया कि तू मछली हो वह यमुनाजी में मछली हो पतित (गिर पड़ी हुई और उसी समय उन दौने का पीय नागई दश माम के पश्चात् किसी मत्स्यघानी ने उसे पकड़ उदरविदारण किया तो दो मनुष्याकार जीव निकले कि जिन में एक पुत्र और एक कन्या था, उन्हें देख विस्मित होकर उन्ही राजा उपर चिरके पास लेगया क्यों कि वह राजा ही के आकार के से थे, इस से पुत्र को अपने सदश समझ के राजा ने ग्रहण किया बालक तो अलि धार्मिक सत्य सागर, महातेजस्वो और निकिता केतुल्य पकिमी मत्स्य नाम गजा हुआ और जो अन्या थी वह उलो मत्स्यजी- घी को देदी कि जिस के काली मत्स्योदरी मत्स्यगंधा बालवीय नाम हुए। एक दिन तीर्थ यात्रा करते हुए पाराशर मुनि भाये और खेवट से कहा हमें यमुना पार करो वह भोजन कर रहाथा उसने मत्स्यगंगा से कहा तू पार पहुंचा दे मुनी उसे देख कामातुर हो हाथ पकड़ अपना मनोरथ कहा तब वह घोली श्राप अतिकुतीन वसिष्ठजीके पुत्र वेदपाठी होकर मछली की गंध के समान जी को देख कामातुर होकर ग्रहण करते हो यह महाप्रर्थ है तब लज्जित होकर हाथ छोड़ दिये फिर पार पहुंच पकड़ने लगे फिर उसने प्रार्थना की कि आप मुझ दुगंधामे कैसी रुचि करते हो, तब मुनीने अपने रापोवल खे उसके अंग में ऐसी सुगन्ध फर दी जो चार कोसंसक कस्तूरी के समान फैल गई वय उपने फि उस पार से मेरा पिता देख रहा है और दिन में न करना भीत है इस मे रात होने दीजिये यह सुन मुनिने अने तपोवन में कुहरा उत्पन्न कर दिया और प्रसंग करना चाहा तब उसने कहा मेरा भी व्याई नहीं (प्रा है आप धीर्य वान हैं रति के पीछे मैं गर्भवती हो जाजगी तो मैं महां जाऊंगी और पिता से क्या हंगी मुनीने कहा कि तुम कन्या ही बनी रहोगी यह.सुन अपने कहा कि नहीं महागंज मैं यह चाहती हूं कि मेरे पिता को विदित म.हो-और-आप के समान पुत्र उत्पन्न हो और यह अंग झागंध और नई अवस्था बनी रहे तब मुनिने कहा तुम्हारे विष्णु के अंश से सब पुराणों का कहने हारा पुत्र उत्पन्न होगा जो त्रिलोकी में प्रसिद्ध होगा यह कह उससे सम्भोग कर यमु. नामें स्नान करने चने गये सत्यवती गर्भवती हुई समय पर यमुनाने द्वीप में पुत्र. उत्पन्न किया जो जन्मतेही माता से बोले हम तपस्या करने जाते हैं हम भी मुख पुर्धक जामो जय कभी हमको स्मरण करोगी तभी हम भाकर तुम्हारी ( २६.) मनोकामना सिद्ध रंगे वह कह कर चले गये तब इनका नाम द्वैपायन हुश्रा इन्ही ने वेदशारखा निर्मितको तो मोम नाम हुआ,सर्व पुराण महाभारतादि की रचना की तथा इन्होंने ही वेदों के विभाग कर अपने शिष्यों को पढ़ाये। नोट १--एका ओर मनुका यह वचन कि "भहिंसापरमोधर्मः "दूसरी और पौराणिकी शिक्षा कि "श्रावर्थ मृगमार कर लामो" हमारे वैवी माई जिसको ग्रहण करेंगे। २६म घृणित यातों को बच्चे भी तो कहते धीर करते लज्जित होगे क्या यह कोई ऐसी वस्तु है जो भेजी जावे परन्तु इस घृणित और असम्भव पान पर याद करना ही था है बुद्धिमान् केवल संकेत से इसका निर्णय करलेंगे ३-ग्राह्मण के शाप से स्त्री मछली हो गई और पत्ते में रक्खे हुए .........को खाकर मछली गर्भवती हो गई प्यार पौराणिकी भाइयो यह ग्यास महात्मा की उत्पत्ति और महर्षि पाराशर की करतूत है क्या यह सब बातें ऋषिनिन्दक नहीं है इसलिये इन पुराणों को व्यासकृत न काहये । राजा शान्तनु का सन्तान उत्पन्न करना। * . देवीभागवत स्कन्द २ अ० ५ ॥ शान्तनु नाम राजा एक दिन शिकार खेलते हुए यमुना के तौर पर गये पहा कस्तूरी मालती के समान सुगध आई राजा जिसको सूध चौकन्ने होनही की ओर गये तो वहीं जाकर देखा कि नदी के तट पर एक स्त्री यंगाररहिन मसीन वस्त्र धारण किये बैठी है और उसके शरीर से गंध मारह हैरान इसका लए योवन देख कामयश हो गंगा का मरण कर उससे पूछा कि तुम किसकी कन्या हो, वियाह होगया है या अभी नही, तुमको देख हमारा चित्त चाहता है कि तुम हमको अपना पति बनानो क्योंकि हमारी स्त्री हमको छोड़ फर चलो गई है दूसरी प्रभो नदी को है मैं तुम्हारा दास हूँ तब वह स्त्री बोली 'कि मैं.क्षकी कन्या हूं मेरा पिता घर गया है मैं नौका चलाती या भापकी ऐसी रहा हो तो मेरे पिता से कहिये। ये भापको दे देंगे तो मैं मानम् ३ प्रापपी दासी होने को घताने पिता केसीष जाकर कहा कि निपान ! तुम हमको अपनी पुत्री-दे दो मैं पटरानी बनाऊंगा तब निषाद ने कहा कि मैं पुत्री थापको इस प्रण पर देनेको उद्यत हूं कि आपके पीछे मेरो पुत्रीका पु ही राजा हो । राजा इसको सुन गृह पर पा उदास रहने लगा, जिसका वृत्तान्त जय भीम महाराज को ओ गंगाके पुत्र थेशात हुआ उन्होंने पिता को इच्छा पूर्ण करने के अर्थ आजन्म जितेन्द्रिय रहने का मत धारण कर दक्षाले आर निवेदन किया उसने पुत्री राजा शान्तनु को दे दी। नोट---इस खेवर जातिको कन्याको प्रथम तो पाराशरने भोगा फिर उसीसे शांतनु ने विवाह किया पक्षपात को छोड़ सत्यपूर्वक विचारोतो केवल वर्णसे जाति के मानने वाले पौराणिकी भाई ध्यास मुनिकी उत्पत्ति पर ध्यान दें और उनके जाररिता पारासर की करतूत को विचारें ? श्री पं. जी ने कहा कि सेठजी समय बहुत होगया है इसलिये इसकीजिये। 'श्रार्य सेठ-बहुत अच्छा सब महाशयों ने चलने की तैयारी की। सेठजी-ने पण्डित जी तथा सय महाशयों को नमस्ते की। पं०जी-जे आयुष्मान कहा और अन्य सयों ने यथा योग्य की और प्रस्थान किया, सेठजी विश्वास करने लगे। इति सप्तदश परिच्छेद। अथ श्रष्टादश परिच्छेद। सेठजी ने श्रीमान् पं० जी को प्राते देख ममूनापूर्वक नमस्ते कर कहा पं०जी-आयुष्मान कहा और विराजमान हुये, थोड़ी देर के बाद सब महाशय भी भागये और यथायोग्य कहा और विराजमान हुये। सेठजी-५० जी महाराज आज मैं और दिनों से रोचक हो नहीं किन्तु अनीषी कथासुनाता हूँदेखिये:- -(0)-- दनिता से अरुण और गरुणका उत्पन्न होना महाभारत आदिपर्व अध्याय ३१ । . प्रजापतिश्यप जी ने पुत्रकी इच्छा से या किया उस समय देवता, ऋषियों और गन्धों ने भी उस्की सहायता की, कश्यपजी ने यक्षकी लकड़ी लाने दिये इन्द्र और चालविल्या मुनि और अन्य देवोंकाभेजा इन्द्रादि देवता अपनी शक्ति के अनुमार पर्वतके समान लकड़ी का योझा लेकर विना कष्ट आने लगे परन्तु सय ऋषि लोग मिलकर भी एक छोटी सी लकड़ी को अतिकष्ट से ले जाने लगे इन्द्रजी उन ऋषियों को देख अचरज मानके उनकी हंसी करते हुए लांघकर चेगमे चलेगये जिससे बड़े २ ऋषियों ने अतिदुखी और क्राधयुक्त होकर इन्द्र के भयदायी एक महान कार्यका अनुष्ठान किया अर्थात् वे तशील ऋषिगण अपने तपाल से इन्द्रले सैंकड़ों गुण शूरता और वीरता में एक इन्द्र और उत्पन्न करने के लिये बड़े २ मन्त्रों से अग्निमें प्राति चढ़ाने लगे,जिसको सुन इन्द्रने यहुत दुःखो हो फिर कश्यपजी की शरण ली। कश्यपजी धालखिल्या श्रादि मुनियोंके समीप गये और पूछा कि क्या आप लोगों का कार्य सिद्ध होगया उन्होने कहा कि हाँ हुआ है नव कश्यपजी ने कहा कि ब्रह्माजीकी भाशामे इन्होंने इन्द्र का पद या है आप लोग दुसरे इन्द्रको चेष्टा कर रहे हैं इमदिये श्रापको ब्रह्माकी बात झूठी न करनी चाहिये और मैं आपके संकल्प को भी मिथ्या नहीं बनाना चाहता आप जिसको इन्द्र पनाना चाहते हैं वह महाबली वीर्यशाली पुरुष पक्षियों का इन्द्र होवे यही देवराज इन्द्र श्रापसे प्रार्थना कर रहे हैं श्राप उन पर प्रसन्न हो नव उन मुनि- योन कश्यपजी से कहा कि हम नयोंने इंन्द्रको उत्पत्तिकै निमित्त और आपकी सन्तानके उपमाने के हेतु इस रझंका प्रक्रिया है सोरमारे-कर्मफलको लेकर जो कुछ अच्छा जान पड़े वही कीजिये । इसी साल में यशस्विनी दक्षपुत्री वनिता ऋऋतुस्नान पूर्वक व्रतं करके शुचि होकर पुत्रको कामना से प्रतिके पास गई । कश्यपजो ने उसने अहा देवि ! तुम जो चाहती हो वह पूरा होगा मेरे संकल्प और बालखिल्य मुनिके तपोबल से तुम्हारे गर्भ से बड़ाभाग्यवान भुवन *धान दो पुत्र उत्पाया निलोक में पूजे जावगे। भगवान् कश्यपो फिर परिता से बोले प्यारो! तुम अगमस होकर अपने सुन् गर्भको धारण किये रहना क्योकि यरलोका नाननीय महावीर कापरूपी दोनों पक्षी सम्पूर्ण पक्षियों पर अधिकार फेलायें रहें। अनन्तर कश्यप प्रजापति रदय से देवराज से बोले कि हे पुरन्दर ! म्हारी सहायता करने वाले दो पुत्र उपजेंगे तुम सदा न्द्र बने रहोगे तुम कभी-ब्रह्मशानी, ब्राह्मणों का अपमान न करना यह सुन इन्द्र स्वगको चले गये। समय श्राने पर घनिताने अरुण और गरुड़ यह दो सन्ताने प्रसव की जिनमें अरुण विकलांग होकर सूय॑के सारथी बने और गम पक्षियों के इस्द्रपद पर बैठे। नोट-मी पण्डित जी देखिये यहाँ पनिता नाम की स्त्री के,गर्भले दो पक्षी उत्पन्न होगये इस सिद्धांत ने मिस्टर डारविन साहिब को भी जोड 'लिखते हैं कि पशुपक्षियों से क्रमशः:मनुष्योत्पचि होगाई,मात कर दिया क्योकि यहाँ हो डाइरेक्ट स्त्री के.गर्भसे,पक्षी उत्पन्न कर दिये इसीसे तो हम कहते हैं किःभाप इन.प्रमाणों पर विचार करें? कचका अद्भुत दृश्य। - . महामा०मोदिय० अ०६ जस् देवताओं और राक्षसों में संग्राम इमा तब देवोंने अंगिरा के पुत्र वृहस्पति और असुरोंने शुकको पुरोहित किया, देवना. युज में नितने दानवों को मारते शुक्राचार्यजी संजीवनी विद्या से उनको जीवित करदेते थे परन्तु बुहस्पति को या विद्या नहीं आती थी इससे देवगण अत्यन्त दुखी होते थे न देधा ने हम्पति के बड़े पुत्र, कच के निकट जाकर कहा कि हम आपकी शरण हैं अब बचाओ, महायता करो अर्थात् तेजस्वी शुक में जो विधी है उसको जाकर सीखो हमको यक्षांश देंगे तुम्ही उनकी पुत्री देवया - नीकी उपासना कर सकोगे और वह भी तुम्हारे श्राचार निवार से संतुष्ट हुये वो तुम संजीवनी विद्या को अवश्य ही प्राप्त होग यह सुन कच. ने शुरुजी के पास जाकर कहा कि मैं अंगिरा का पौत्र और वृहस्पति का पुत्र, है और मेरा नाम कच है आप मुझ को शिष्य-बनाये में सहनों वर्ष तक ब्रह्मचर्य धारण कहंगामापाशा कीजिये शुक्ल बोले तुम्हारा कल्याण होवे तुम्हारी बात मानली, "बह वहां रह कर कार्य करने लगे. इस बीच में देषधानी कच से और कच देव- यानी से भी सन्न रहते-तव अतानुष्ठान करते पांच सौ वर्ष व्यतीत होगये. तक दिन कच-निर्जन बनं में गौकी रखवाला कर रहे थे दैत्योंने यह जाम कर कियह कच है शौर संजोवनी विद्या के अर्थ आये हैं क्रोध कर मार डाला ..और उसको टुकड़े२.कर स्यार औरकुतों को दे दिया।

हवा शालावृकेभ्यश्च प्रायच्छल्लवशः कृतम् ॥२६॥ इतने में गौयें घर पर भाई और कच नहीं आये नय थोड़ीदेर देम्न कर देवयानीने अपने पिता शुक्र का किसूर्य किया .हते हैं गौ घर प्रागई परन्तु कच नहीं पाये पिताजी मुझ को निश्चय जान पड़ना है कि कर मारे गये सत्य कहती हूं विना कचके नहीं जी सकती शक बोले कन्च चले भानो तुम मरे हो मैं तुमको जिलाना हूं यह कहकर मृतक संजीवनी विद्या पढ़ कर कंचको बुलाया कच धुलाये जाते ही स्यार कुताके शरीर को फाद और मिल कर पापहुंचे और संजीवनी विद्या का प्रभाव देख कर प्रसन्न हुए देवयानी ने उनसे पूछा कितनी देर क्यों हुई उसने कहा मेरी गौ एक. वृक्ष की, छाया में यो मनुरों ने देख मुझने पूछा कि तुम कोनं हो मैंने कहा कि मैं कच दानवों ने मारकर मेरे टुकड़े कर स्यार कुत्ते को खिलादिये। अनन्तर देवयानो की आज्ञानुसार कच फूल बटोरने के लिये किसी बनको गया दानवोंने फिर भी उसको देख। वनं ययौ कचोविनों ददृशुर्दानवाश्यते । पुनस्तं पेषयित्वा तु समुद्राम्भस्यमिश्रयन् ॥ ४० ॥ पीसकर समुद्रके जलमें घोल दिया अनन्तर देवयानीने उनको देर तकन माते देखकर पिताको यह समाचार सुनाया इससे फिर शुक्र विद्या के बलंसे बुलाये गये उन्होंने वह सब हाल कह सुनाया इस के पीछे तीसरी बार उनको बैलेही देख कर जलाकर चूर कर मदिरासे मिलाकरउन शुकही को दे दिया.मागे देवयानी ने फिर पिताले कहा कि मैने कचको फूल :बटोरने के लिये भेजा था अब भी आते नहीं दीखते मुझको निश्चय जान पड़ता है कि यह मरे या मारे गये मैं निश्चय कहती हूं उसे कचके बिना मैं न जीऊंगी। शुक्र बोले बेटी बृहस्पति का पुत्र कंच मारा गया विद्याके पलसे जिलाता ईतिस पर भी असुर लोग मार डालते हैं देवयानी तुम शोकन करना उसको जीवित रखना मेरा असाध्य होगया है तब देवयानीने कहा कि मैं चिना भोजनों के गी क्योंकि उनका स्वरूप मुझे बड़ा प्रिय था तब शुक्र दैत्यों पर अप्रसन्न हुए और संजीवनी विद्या से कचको धुलायो कचने गुरु के पेटमै रहकर गुरुहत्याकेभयसे भयभीत होकरंधारे २ उत्तर दिया तब शुकने कहा तुम कौन पथसे मेरे पेट में जोधुळे हो क बोले कि है गुरु आपको कपों से मेरी स्मरण शक्तिलुप्त नहीं दुई जो जिस प्रकार सं.हुंधान संग स्मरण है इसलिये किं.कही इमको शुरुके कहने के लिये पाय वर में नई :* अपारकष्ट सहरहा हूँ मसुर ने मुझगेमार जलाय और धूर २कर मदिरा में शोलर मापको देदिया था पर है पून्य ! अापके रहते प्रापुरिक माया क्योंकर प्रामाणिकमाया से बढ़ सकेगी तब शुक्र ने देवयानी से कहा बेटी देवानि ! इस समय तुम्हारा प्रियानुष्ठान करमेरे नार होने से कच जी सकता है क्यों कि कर मेरे पेट के भीतर है मेरे बिना पेट फाड़े नहीं निकल सकेगा देवयानी बोली कच का नाश और भाप को मत्यु यह अन्गिवत् दोनों शोक ही मुझको जलाने लगे हैं कच के नाश होने से मेरा जीवन न रहेगा श्रापको कोई हानि पहुंचने से भी जी महीं सकती, तब शुक्रने कच से कहा कि हे ब्रहस्पति पुत्र कच! देवयानी के प्रेमी हो देवयानी भी तुम को भा रही है ऐसी दशा में यदि तुम कचस्वरूप इन्द्र न हो तो आज सजीवनी विधा तुम को देगा हूं ब्राह्मण के बिना दूसरा जन मेरे पेट में घुस के फिरजोवन पाकर नही निकल सकता सो तुम यह विद्या लो मैं तुम को जीवन देता ई बेटा मेरी देह से निकल कर पुत्र कपी हा कर मुझ को जिसाना, गुरु में विधाताम करके विद्यावान होकर धर्म पथ पर दष्टि रखना अकृतक्षन होमा कच ने गुरु से संजीवनी विद्या लाभ कर जिस प्रकार पूर्णमासी दिमसूर्य के अस्त होने पर पूर्ण चन्द्रमा प्रकट होता है उसो भांति शुक्र की कोख को फाड़ कर उसो क्षण साक्षात् निकल प्राये। गुरोः सकाशात् समवाप्य विदयाम्। भित्वा कुहिं निर्विचक्रामविप्रः॥५६ भनन्तर ब्रह्मपंज शुक्राचार्यजीको.मरे और गिरे ए देख कर संजीवनी विपा से उसको जिलाय और उठा कर के उस सिद्ध संजीवनी वियाको पाप्त कर गुरु को भक्ति से प्रणाम कर अपने घर को आये, यही कथा गास्यपुगण म०२५ में भी लिखी है। नोट-पं० जी उपरोक्त कथा पर आए विचार करें क्या माप की सम्मति मैं यह होना म भत्र है इसके अतिरिक शुक्राचार्य गक्षपों के पुरोहित ये तो क्या यह नर मांग के खाने वाले भी थे कि जर राजमों ने कव को चूरण कर और तीसरी बार उसके शरीर को जला मदिरा में मिला गुरु शुक्राचार्य को पिला दिया, उस समय उनको मनुष्य शक्ति की गंध भी नहीं प्राई. पेट बोलना कोन फाड़ कर निकलना इन असम्भववानों का क्या ठीक यदि मान भी लियो जावे कि ऐसी संजीवनी विद्या शुक्राचार्य के पास थीनो महाभारत में मृतक देवासुरों को क्यों नहीं तोविन कर लिया हमारो सम्मान में पर्शमान सनातन- धर्मा म मन संजीवनी विधा की खोज कर मृत पितरों को जीवित करलें तो , वृद्धावस्था के बदले युवावस्था। महाभारत आदि पर्व अ०८४ । राजा नहुष के पुत्र ययाति सम्र हुए जिहोंने पृथिवी का पालन कर भनेक यश किये जिनके देवयानी के गर्भसे यदु और तुओंसा, शीधिष्ठांके गर्भ दर्श अनु और पुरु उत्पन्न हुए। राजा बहुन काल तक राज्य करते रहे अन्तको कठोर जरासं पकड़े गये तब राजाने यदु, पुरु, तुर्वस, दुध और अनु इन पांचों पुओंको बुलाकर कहा कि मैं युवापन प्राप्त कर मनमाना भोग करना चाहता तुम मेरा बुढ़ापा लेलो तो मैं तुम्हार योवन से बहुत काल तक सुख भोग में दीर्धयज्ञ में दाक्षित था उस कालमै मुनि शुक्राचार्य के शापसे जराग्रस्त हमी इंसालये मैं संतापित हो रहा हूँ परन्तु किसोने भो स्वीकार ने किया तब छोटे पुत्र सत्यविक्रमी पुख्ने कहा कि प्राय मेरे यौवनको ले नये शरीर में विरा- "जिये मैं आपकी आज्ञाले जरा लेकर, राज्यशासन करता है यह नुन राजाने तप और वीर्यकोवलसे उस महात्मा पुत्र में धुढ़ापा प्रविष्ट कराया राजा अपने पुत्र ঞ্জি बने और ययातिकी वृद्धावस्था लेकर राज्यशासन करने लगे। यौवन पा युवा । एवमुक्तायांतिस्तुस्मृत्वा कॉन्यमहातपाः। संक्रमियामासजस्तदापूरौ महोत्मनि ॥ ३४ ॥ अंबराजाको इस नये शरीर में दो पत्नियों से आनन्द करते हुए सहन वर्ष व्यतीत होगये और भोगोसे तृप्त न हुए तब बुद्धिसे यह विचार कर कि प्रागमे घृन-छोड़ने सं'जिस प्रकार अग्नि बढ़ती है उसी प्रकार कामोत्पादक पिस्तुओं के देखनेसे काम बढ़ता ही है इसी तरह अनेक प्रकार से मनकोसमझा- कर अपने पुत्रको यौवन दे.धुढ़ापा ले लिया, । . क्राहिये पंडितजीपिकी बुद्धि'यह माना है कि प्रिताने बुढ़ापा दे पुत्रका यौवन ले लिया हो ? यदि ऐसा उस समय सम्भव था तो फिर क्या कर्मों का फल हो जाना था १५० जी! पुरोगोंके लेखों की भी आपने विचारा ही नहीं इनका परस्पर मिलान महर्षि स्वामी दयानन्दजीने ही किया तिस पर मी आप सब प्रसन्न होते हैं। :- " 3 ( ३३ ।। सौ पुत्रों की अद्भुत उत्पत्ति । म. भा. भा० अ० ११५ एक समय भगवान् द्वैपायन भूख और थकावट से कातर होकर गांधारी के पास आये गांधारी ने उनको सन्तुष्ट किया जिससे व्यास ने गांधारी की मार्थना के अनुसार यह घर दिया कि तुम्हारे पति समान धाय्यवान सौ पुत्र उत्पन्न होगे यथा समय गांधारी गर्भवती हुई गर्भ स्थिति के पीछे दो वर्ष बीत गये पर सन्तान नहीं हुई इस से पह बड़ी दुखी होने लगी आगे यह सुनकर कुन्ती के सूर्य के समान पुत्र उत्पन्न हुए हैं अपने गर्भ को स्थिर देख चिन्ता और अति मानमिकपीड़ा से व्याकुल होकर धूतराष्ट्र से छिपकर यत्न पूर्वक अपने पेट में श्रद्यान किया उससे दो वर्ष का वह गर्भ कटी हुई लोहे की गेंद के समान मांस पेशी स्वरूप में भूमि पर गिरा त्यों ही व्यास जी यह जान वहां पहुंचे और उसको देख कर कहा कि तुमने यह क्या किया है गांधारी ने कहा कि कुन्ती के सूर्य के समान पुत्र उत्पन्न हुए सुनकर अति दुःख से मैंने पेट में चोट मारी आपने पहिले मुभको वर दिया था कि लौ पुन उत्पन्न होंगे अब सौ पुत्रोंके बदले मांस पेशी पैदा हुई है तब व्यास जी ने कहा कि जो कहा लो ही होगा घृत से सौ घड़े भरकर अलग २ यत्न से रक्खो और ठण्डे जल से इस मांशपेयी को हिलामो अन्दर इस के न्हिलाते २ मांस पेशी बहुत हिल्लों में घट गई और प्रत्येक भाग अंगूठे के कोरे के समान हुमा अनन्तर वह सव मांस पेशी धृत-भरे घड़ों में रक्षित होकर अच्छे गुप्तस्थान में भली भांति रक्खी जाने लगी। स्वनुगुप्तेषुदेशेषु रक्षा वैव्यदधात्ततः॥ २१ ॥ ध्यासजीने कहा कि दो वर्ष के पीछे यह सब घड़े खोलना यह कह तप के लिये चले गये फिर योग्य काल में उन टुकड़ोसे पहले राजा दुर्योधनका जन्म और एक महीने के अन्तर धृतराष्ट्र के सौ पुत्र और कन्याने जन्म लिया। नोट-पंजी इस पर आप स्वयं विचार करें।

( ३४ ) कृपा कृपी की विचित्र उत्पत्ति । एक समय गौतममुनि तपस्या में पढ़ना से लग रहे थे तय देवराजने जानपदीनाम्नी देववाला को भेजा वह उनके माश्रम पर पहुंच उनको लुभाने तागी गौतमने उस परमसुन्दरी को देखा तो उनके नेत्रों में प्रफुल्लता छागई और उनके हाथों से धनुषयाण धरती पर गिर पड़ा देह कांपने लगी तो भी उत्तम ज्ञान और तपस्या मेंढ़ प्रतिक्षा रहने से यह उत्तम धीरज धरे रहे परन्तु उसके देखने मात्रके विकार ही से उनका योयं गिर गया था पर यह उल बातको नहीं जान सके अनन्तर वह धनुपवारण कृष्णसार मृगका चर्म और उम आश्रम और अप्सराको तजकर अन्य स्थान में चलेगये उनका वीर्य एक सरकरडे की लकड़ी पर गिरा उसके दो भाग होगये और उससे एक पुत्र और एक कन्या का जन्म हुआ ॥ आदिपर्व अ० १३० ॥ जगामरे तस्तस्तत्तस्य शरस्तम्वेपपातच ।१२। शरस्तम्बे च पतितं द्विधातदभवन्नृप ! तस्याथ मिथुनं जक्षे गौतमस्यशरखतः । १३ । अनन्तर मृगयाके लिये मन पाने धूमने वाले महाराज शान्तनु के एक सैनिकने धनमें उस पुष और कन्याको देखा। धनुर्वाण और मृगकाचर्म देख कर उसने समझा कि यह दोनो धनुर्वेद में दक्ष फिसो ब्राह्मण को सन्तान हैं तब उस सैनिक ने धनुर्वाण और दोनों बच्चों को लेजाकर नरनाथ को दिख- लाया उन्होंने यह कहकर कि यह मेरी सन्तान हैं ले लिया और उनके सब संस्कार किये चूंकि राजांने कृपापूर्वक उनको पाला था इसलिये उनका कृपा कृपी नाम रखा। नोट-यह कथा उसले भी अद्भुत है वहाँ तो रसौली को घड़े में रखने से पुत्रोपत्ति दुई परन्तु यहां सरकण्डे के ऊपर...गिरने से पुत्र भौर कन्याकी उत्पत्ति होगई । प्यारे पं० जी! कुछ सा विचारिये मूर्खसे मूर्ख किसान भी इस बात को जान सकता है कि अंकुरोत्पत्ति जयहो होती है जब कि पृथ्वी और बीज रीत्यनुसार मिलते है न कि पिपरीत रीतिसे? ।

( ३५ )
हरिणी के गर्भ से कृष्यटंग का जन्म
वनपर्व अ० ११०
कश्यपमुनि एक तड़ागके निकट तपस्या करते थे बहुत काल चीतने पर
एक दिन जल में स्नान करते समय उर्वशी अप्सरा को देखते ही उनका वीर्य
स्खलित होगया उस वीर्यको एक हरिणी पीगई वह बहुत प्यासी थी इसलिये
गर्भिणी होगई पद पहिले जन्मकी देवकन्या थी जो ब्रह्मा के शाप से हरिणी
बनी थी और ब्रह्माने उससे यह भी कह दिया था कि जब तेरे गर्भसे मुनिका
अन्भ धागा तव ही तू इस योनि से छूटेगी ब्रह्माका ऐसा वचन अमोध होने के
कारण उस हरिणी के गर्भ महामुनि गीऋषि का जन्म हुमा।
तस्यां मृग्यां समभवत्तस्यपुत्रो महानृषिः ।
ऋष्यशृंगस्तपोनित्यों वनएवाभ्यवर्तत ।३५ ।
जो तप करने के कारण सदा वन ही में रहने लगे।
तस्यर्षेः शृङ्गशिरसिराजन्नासीन्महात्मनः । ३६ ।
हे राजन् ! महात्मा श्रृंगीऋषिके सिर पर दो सींग थे इसलिये इनका
यहनामदुधा।
परिडतजी और लीजिये हरिणी ले मनुष्य की उत्पत्ति होने लगी भष
क्या अब तो जिससे चाहे मनुष्य उत्पन्न कर लाजिये।
-(.)--
युवनाश्वकी कोखसेसन्तानोत्पत्ति
वनपर्व अ. १२६
इवाकुवंश में युवनाश्व नामक एक राजा हुए जिन्होंने अनेक यम किये
थे परन्तु कोई पुत्र न था। राजाने अपना गज्यमंत्रियों को दे श्राप योगाभ्यास
को चले गये । एक दिन भूख प्यास से व्याकुल हो भृगु आश्रम में पहुंचे

उसी रात्रि में भुगुने साँघुम्न राजा के वासते पुत्रेष्टिय कराया था राजा युव. नाश्व सौधुम्न से पहिले उस प्राश्रम में पहुंचा जहां मंत्र से पवित्र किये हुए कलश में जल भरा रखा था ऋषि लोग थक कर सव सोगये थेराजाने जाकर उसी समय ऋषियों से जाकर जल मांगो परन्तु सूजे कराठ का कोमल शब्द ऋषियों ने न सुना तब राजाने लश के पास जाकर जल पी लिया और बहुत शान्त हुभा जब अषि उठे तो उन्होंने कलश को जलसे खाली देखा और सब लोगों से पूछा कि यह किसका निन्दितकर्म है राजा युवनाश्व ने कहा कि यह मेरा कर्म है तब भृगु ने कहा कि यह कर्म तुम ने अच्छा नहीं किया यह जल पुत्र के वास्ते मंत्री से शुद्ध किया गया था मैंने तप करके पुत्र के वास्ते वह जल रखा था । इसलिये तुम्हारे अतुल पराक्रमी पुत्र होगा जो अपने बलसे इन्द्र को सी परास्त करेगा और गर्भाधान का दुःख भी तुम को प्राप्त न होगा तब सौ वर्ष पूरे होनेके पश्चात् महात्मा राजा युवनाश्व की बाई कोख फटी और सूर्य के समान एक पुत्र उत्पन्न हुआ परन्तु राजा यवनाश्व मरे नहीं एक अद्भुत कर्म दुधा। वामपाव विनिर्भिद्य सुतः सूर्य इवस्थितः। निश्वकाम महातेजा न च तं मृत्युराविशत् । २७ । तव महातेजस्वी इन्द्र उस पुत्रकी देखने के वास्ते माये इन्द्रले देवतामो ने कहा कि कौन पालेगा उसने अपनी छनभंगुली उस बालक के मुखमें दे दी और कहा कि मैं इसको पालूगा तरही इन्द्रादि देवताओं ने उस बालकका नाम मानधाता रक्त्रा इन्द्रकी छतअंगुलीसो पीकर वह बालक बढ़ने लगा। पंडिनजी ! अभी तक मथने अथवा मनुष्य वीर्य से अद्भुत २ उत्पत्ति आपको सुनाई अब आपने मंत्रोंसे पढ़े जलके पीनेसे राजाकी कोनसे पुत्र उत्पत्ति मुनी प्रब और क्या सुनाई। राजाके धके स्थान नहीं जमे उसके लिये इन्द्रजी अंगुलीने काम दिया। सामान्यरीतिसे सन्तान १० व ११ व १२ महीने में उत्पन्न होनी है परन्तु राशाके पेट में १०० वर्ष गर्भ रहा देलिये श्रीमान् यह पुराणों के चमत्कार हैं ? चर्बीके यज्ञकी गंधसे पुत्रोत्पति। वनपर्व अ० १२७ सोमक नाम गजा था उसके १ स्वरूपवती स्त्री थी जिसने पुत्र उत्पन्न . . - करने के लिये बड़े यत्म किये पर कोई पुत्र म हुआ जब राजा, पड़ा हुआ तव जन्तु नामक एक पुत्र उत्पन्न इभा माताओंने उसको लेकर पिछवाड़े फैदियो जय उस जन्तुको चीटियोंने काटा तो उसने भयानक शब्द किया तब सर्व माताधोंने बहुत दुःखी होकर जन्तुकोरोनेसे रोका परन्तु वह न रुका और उसके रोनेके शवको राजाने सुन मंत्रियों समेत उठकर पिछवाड़े गया वहासे:: पुत्रको लेकर-रणवास में पाया और कहा कि एक पुत्र वालेको सदा सन्देह रहता है इसलिये उसको धिक्कार है एक पुत्रका होना अच्छा नहीं मैंने पुत्रको इच्छा से सौ स्त्रियां की उसमें से किसी एक के केवल यही जन्तु नाम एक- पुत्र उत्पन्न दुआ है सो भी उत्तम नहीं इससे अधिक और मुझको क्या दुःख .. होगा इसके उपरान्त मेरी और मेरी स्त्रियोकी भषस्था व्यतीत होगई इसलिये.. हम सबके प्राण इसीमें धरे रहते हैं यदि कोई ऐसा उपाय कठिन भी हो जिससे पुत्र उत्पन्न होजावें तो भी मैं करूंगा । अस्विक्ने कहा ऐसा कर्म है परन्तु माप जब कर सकें तब राजाने कहाँ बाहे मेरे करने योग्य हो चाहे योग्य तो भी मैं सौ पुत्रों को चाहनाके लिये करने को उद्यत हूं ऋत्विकने कहा कि बाप जन्तुसे यक्ष कीजिये तो आपके सौ पुत्र होंगे जब चर्बीको होम किया जायगा तब उसके धुएंको धके तुम्हारी सब स्त्रियोंके पुत्र ही उत्पन्न होंगे तथा उसी स्त्रीके जिसका यह अष पुत्र है।उसीके फिर उत्पन्न होगा और उसीकी कोख में सोनेका एक चिहरदेगा। पुन:- तस्यामेव तु तेजस्तुर्भविता पनरात्मजः । उत्तरे चास्य सौवर्ण लक्ष्मपार्वे भविष्यति ॥२१॥ राजाने पुत्रको इच्छा से सैमिक या प्रारम्भ कर जन्तु को मारना चाहा तब उसको मानाने हाहाकार मचाया तो भी ऋत्विक्ने बलले उसको छीन उसकी चर्बी से हवन क्रिया स्त्रियों के गर्भ रहा |०१२॥ सर्वाश्च गर्भानलभस्ततस्ताः परमाननाः ॥६॥ दशः महीने में गजा सोमकके एक सौ पुत्र उत्पन्न हुप' निमें जन्तु सब से बड़ा एना सब मानाओको जैमी जन्तु प्यारा था वैसा कोई पुत्र नहीं उसकी कोख में सुवर्णकां चिन्ह भी था और वही सयमै अधिक गुणवान था। नोट-श्री पं०जो कहां तो वेषों की यह आशा कि "मित्रस्य चतुषा : सर्वाणि भूतानि समीक्षम्साम्" अन्यत्र इसी के अनुयायी महर्षिगों का यह .: उत्तरे (३८) उपदेश है कि " अहिंसा परमोधर्मः" औरंका यन जैसे पवित्र कर्म में यह घोरहत्या तथा बालककी चर्बी का हवन १. सज्जनो विज्ञागेतो सही कि चान्तविकं आपके पुरुषा ऐले हो निर्दयी एवं अपवित्र कम्मों के कर्ताथे यदि नहीं तो इस दुराग्रहको आप क्यों नहीं , छोड़कर एक मुम्नं ही कह देते हो कि यई वाममागियों की कपोल कल्पना है, कि ऋषि मुनियों की पदार्थविज्ञानी एवं मिषग्वर इस बात पर विचार करें कि -चर्चा के जलाने से क्या गर्भस्थिति हो सकती है ऐसी ही बातों ने नोसनतान- धम्म गौरव इतर देशनिवासियों की दुष्टि में घटा दिया परन्तु शोक है कि फिर भी सनातनी भाई एक स्वर होकर यह नहीं कहते कि यह पुराण व्यास ऋषि कृत नहीं हैं। अष्टावक्र का गर्भ के भीतर बोलना और पिता के शाप से पाठ-जगह टेढ़ा होना । " वनपं-अर्च० १३॥ उहालक नाम ऋषिके कहोड़ नामी पंक शिष्य थे वह गुरुकी बहुत सेवा: करते थे और उनके ही घर में रहते थे इस कारण बहुत दिन पढ़ते रहे जय उहालकने कहोड़को अपनीभक जाना तो अपनी पुत्री का विवाह कहोड़कें साथ. कर दिया तदनन्तर कहोड़की.स्त्री.को गर्भ रहा एक दिन उल.बालक गर्म ही में से अपने पिता से कहा कि हे पिता तुम समस्त रात्रि पढ़ते ही रहते हो सो मह-कर्म उचित नहीं। सर्वाङ् रात्रि मध्ययन करोषि नेदं-- पितः सम्यगियोपवर्त्तते ॥६॥ -शिष्यों के मध्य में महर्षि कहोड़ने अपनी निन्दासुन क्रोधित हो कर कहा. कि जो गर्भ के भीतर ही से बोलता है इस लिये तू माउ जंगह से टेढ़ा होगा. अन्तमें ऐसा ही कुत्रा और टेढे होने के कारण उनका नाम अष्टावक्र दुभा। नोट--पंडित जी श्रीकृष्ण महाराज ने गीतामें कहा है, कि अवश्यमेव - मोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम् " अर्थात प्राणियों को अपने किये हुए कम्मो के अनुसार फल मिलता है जैसा वावा तुलसीदासजीने भी कहा है कि कर्म प्रधान विश्व कर रखा। जो जस कीन तेस फल चाखा " तो बताइये ३च्चेने कर्म ही किया यदि कहो कि उसने पेट में से कहा कि सम्पूर्ण रात पदना ठीक नहीं, प्रथम तो गर्भ में बोलना ही ठीक नहीं और यदि वोला और उपरोक्त बात कही तो क्या पाप किया जिस पर पिताने ऐसा शाप दिया कि तू पाठ जगह से टेढ़ा होगा महाराज विना अपराध के ऐसा कठोर दण्ड क्या यहा महात्मापनका कार्य । एक मत्स्य का बढ़ना और प्रलय के समय नावका रोकना घनपर्व १० १०७ . सूर्य के पुर्ण महाप्रतापवान और प्रजापतिके समान तेजस्वी मनु हुए जिन्होंने बदरिका पाश्रम में जाकर ऊर्खवाटु तथा एक चरण से खड़े होकर दश सहसू वर्ष जिह्वा, शिर और नेत्रोको स्थिर करके घोरतप किया एक दिन भीगे बस्त्र जटाधारी मनुके पास जाकर एक मत्स्य बोला कि भगवन् मैं बहुव छोटा हूँ इससे मुझको बड़े मत्स्यों से बड़ा डर लगता है पाप उनसे हमारी रता करो मैं भी आपको इस प्रकार बदला इंगा यह सुन दयासे उसको पकड़ लिया फिर उसको एक पात्र में छोड़ दिया और पुत्र के समान उसका पालन करने लगे अब यह बहुत बड़ा होगया तो वह बोला कि भगवन् मेरे लिये कोई दूसरा स्थान बतलाये तब उन्होंने उस बरतन से निकालकर बावड़ी में डाल दिया बहुत वर्ष बीतने पर जब वह उसमें भी न समाया तो पाठ कोस लम्बी 'चौड़ी गंगामें डाल दिया जब वह उसमें भी बढ़ने लगा तब मुनिसे कहा कि मैं चल फिर नहीं सकता इसलिये माप प्रसन्न होकर समुद्र में डाल दीजिये पुनः वह हंसकर बोला कि मापने मेरी बड़ी रक्षाकी है इसलिये मैं कहता हूं कि थोड़े ही-कालमें इस सव चर और अचर जगत्को प्रलय होगी यह समय सब लोगों के नष्ट होने का आया है इसलिये हम आपको हितकी वात सुनाते हैं कि आप एक नाव बनाइये और उसमें दृढ़ रस्सी बांधिये जब प्रखयका समय आवेगा तष माप सप्त ऋषियोंके सहित उसी नाव चढ़ियगा और उसी नाव में सब जगत्के वस्तुओंके बीजोको रक्षापूर्षक क्रमले रख लीजियेगा। हे मुनिजन ! आप उस नाव में बैठ हमारा मार्ग देखना तब हम श्रवेंगे आप हमारे सिर पर सींग देखकर हमको पहचान लेना अव हम जाते हैं आप विना मेरी सहायताके उस घोर जलको तैरं नहीं सकते श्राप मेरे घचन में शंका मत कीजिये मत्स्य के वचन सुन मनुने कहा कि हम ऐसा हा करेंगे अनन्तर वे दोनों परस्पर भाक्षा (४०) लेकर इच्छानुसार चले गये उसके पश्चात् महाराज मनुने उसके कथनानुसार सव अगत्की वस्तुओं को इकट्ठा किया फिर एक सुन्दर नायमें वेट कर घोर तरजपाले हिमालय के शिम्बरसे बांध दिया फिर उस मत्स्यने कहा कि हे ऋषियों मुनिलोग हमको ही प्रजापति कहते हैं हमारा नाम ब्रह्मा है हमने मत्स्य रूप धारण कर इस आपत्ति से आपको छुड़ाया है। . नोट-श्रीमान् ! इस कथाको और बातों को छोड़ कर प्रलय की ओर श्राप ध्यान दीजिये कि अब स्थावर जंगमको प्रलय हुई तो रस्सी, नौका, जड़- घस्तु और सम्म ऋषि मछली शरीरधारी यह किस प्रकार शेष रह सकते हैं थदिरदे तो प्रलय कैसी। ---(०). विश्वामित्र का चुराकर कुत्तेका मांसपकाना। अनुसाशन १०.३ वीर्यशाली विश्वामित्र ने तपस्या के प्रभावसे महारमा वसिष्ठके एक. सौ पुत्रों का नाश किया था उनके शरीर में क्रोध उत्पन्न होने पर उन्होंने बहुतेरे महा तेजस्वी यातधान राक्षसों को उत्पन्न किया एक सौ ब्रह्मऋषियोले युक्त विद्वान् अत्यन्त महान कुशिकवंश इस मनुष्य लोक नाक्षणों के द्वारा स्तुतियुक्ति होकर. स्थापित हुमा ऋषीके पुत्र महातपस्वी शुनाशेक पशुत्वको प्राप्त होकर महायज्ञ से विमोक्षित हुए हरिश्चन्द्र ने निजके तेजके सहारे यहमें देवताओंको संतुष्ट कर बुद्धिमान् विश्वामित्र पुत्रत्व लाभ किया देवताओंने विश्वामित्र को देवरात नामक जो पुत्र प्रदान किया उसके ज्येष्ठ तथा राजी होने पर भी उनके अंन्य. पुषों ने उसे प्रणाम नही किया इसीसे उन्होंने उन पंचास पुषोंको शाप दिया, घे सब चांडाल होगये । इक्ष्वाकुका पुत्र त्रिशंकु वसिष्ठके शापसे चांडाल होगया इसीसे उसके बांधवाने उले परित्याग किया मनन्तर उसके दक्षिण दिशाको अपलम्बन करके भवाकाशिरा होने पर विश्वामित्रने स्वर्ग भेजा। विश्वामित्रकी कोशकी नामका देवर्षियोंसे सैवित एक चबुत बड़ी नदी : थी उस कल्याणी पुण्य सलिलवानी श्रेष्ठ नदीकी देवता और ब्रह्मर्षि लोग सदा सेवा करते थे। पञ्चयलयती उत्तम प्रसिद्धरम्भा नामकी अप्सरा उसकी तपस्या में विन करने से शापवश से शिला होगई थी। इली भूषिके शाप भय से पहिले समय में वशिष्ठ मुनि पत्थरखण्ड के सहित जलमें इवे थे और विशाप होकर जल से उठे थे तभी से पुण्य सलिल- बाली महानदी महात्मा वशिष्ठके उस ही कर्म विपाशा नामले विख्यात हुई। विश्वामित्र त्रिशंकुक्के यश करने में प्रवृत्त हुये तव वशिष्ठमुनि के पुत्रोंने उन्हें यह कहके शाप दिया कि जब तुम चांडालके पुरोहित हुये हो वो स्वयं चांडाल हो जानोगे इस ही शॉपके सत्य होने के निमित्त किसी नापत्तिकाल में विश्वामित्र.ने चौऱ्यावृत्ति से कुत्तेका निकृष्ट माँस चुराकर उसे पकानाप्रारम्भ किया इनने हा समय में हन्द्रने बाज पक्षीका रूप धारणकर उस मासको हरण -किया । इस समय विश्वामित्र ने भगवान् इन्द्र की स्तुति की इन्द्रने प्रसन्न होकर उन्हें शापस मुक्त कर दिया । "नोट-श्री पं० जी तथा प्यारे सनातनी भाइयों ! क्या वास्तव में अब भी ऐसी कथा पढ़कर कि विश्वामित्र ने चुराकर खाने के लिये कुत्तका मांस पकाया यही कहते रहोगे कि यह व्यास प्रणात है ? कारण कि जंगलो जातको छोड़ जिनकी कि शाप मलेच्छ कहते हैं यह भी तो चाहे जैसी श्रापति क्यों न हो कुत्तेका मांस खांना स्वीकार न करेंगे कि आप के ऋषि विश्वामित्र ऐसे धुणित कार्य करनेके लिये घरपरिकर हुये शोक !!! (१९) यह बात इसको भी स्पष्टतया.प्रकट करती है कि कर्म से ही आंति होती है.न कि केवल जन्म से ? क्योंकि त्रिशंकु चांडोल के पुरोहित बनने के लिये विश्वामित्र भी चांडाल होगये और फिर उसी जन्म में, इन्द्र-ने उन्हें फिर शुद्ध कर दिया अब यदि आर्यसमाज अपने वियोगी भाइयोंको प्रायश्चिन कर शुद्ध करता है तो क्या हमारे सनातनी भाइयों का यह धर्म है. कि उससे द्रोह वा उसके कार्य में विन डालें किन्तु ऐसे उदाहरणों को देख उनको चाहिये कि इस शुद्ध कार्य में सहायक धन वेदोकधर्म के अनुयायी यने । । है राजा नंगास्वन का एक जलाशय में स्नान करके स्त्री होना फिर तपस्या करके उसके सौ पुत्रों का होना। अनुशा० ५० १२॥ . प्राचीन काल में भंगास्थन नाम एक धार्मिक राजा था उससे और इन्द्र . .. (४२) से शत्रुता होगई एक समय राजा मृगया को गया तब इन्द्रने घही समय उत्तम समझकर उसे मोहित करना प्रारम्भ किया राजा इन्द्र के द्वारा मोहित होकर अकेला ही घोड़े पर सवार हो भ्रमण को जाते हुये वहां भूख प्याससे पीड़ित होकर दिशा भूल गया तब इधर उधर फिरकर घोड़ा एक वृक्ष से बांध दिया और फिर जल में स्वयम् स्नान करने लगा स्नान करते ही राजा स्त्री होगया। अथ पीतोदकं सोऽश्वं वृक्षे वद्धा नृपोत्तमः । अवगाह्य ततस्तात तत्र स्त्रीत्वमुपगतः ॥१०॥ राजा अपने स्त्रीरूप को देखकर बहुत व्याकुल हुआ कि क्यों कर नगर को जाऊं और अपने एक सौ पुत्रोंका सुख कैसे भोगा न जाने मैं क्योंकर स्त्रीत्व को प्राप्त हुआ इस भौति नाना प्रकार के सोच विचार कर अंतको घोड़े पर चढ़ नगर में आ पुत्रोले अपने स्त्रीत्व फा सच वृत्तान्त सुना, कहा कि तुम सय प्रेमले राज्य करो मैं वनको जाता हूं ऐसा कह वनको चला गया वहाँ पर एक तपस्वी के आश्रम के समीप तपस्या करने लगा जिसके गर्भद्वारा एक सौ पुत्र उत्पन्न हुये। तापसेनास्यपुत्राणामाश्रमेष्वभवच्छतम् । अथ सादायतान् सर्वान् पूर्व पुत्रानभाषयत् ॥ २३ ॥ पुरुषत्वेसुंतायूयं स्त्रीत्वे चेमे शतंसुताः ॥ २४ ॥ अन्तको सौ पुत्रों को लेकर अपने राज्य में गया और प्रथमके पुत्रों से कहा तुम मेरे पुरुष अवस्थाके पुत्र हो और यह मेरे स्त्रीत्व प्राप्त होनेके सौ पुत्र हैं इसलिये तुम प्रेमसे रहकर राज्य भोग करो। लीजिये पण्डित जी ! इस कथासे तो स्पष्ट प्रकट होगया कि ईश्वरीय नियम कुछ नहीं क्योंकि पुरुष अपने शरीर से स्त्री शरीरधारी होगया फिर उन्मी स्त्रीसे सौ पुत्रोंकी उत्पत्ति होगई। श्री पं० जी सेठजी बस कीजिये मैं इस विषय को सुन तृप्त होगया अब कल से किसी और विषयको सुनाये। सेठ जी.-श्री महाराज मुझे तो अभी और मुनाना था पर आपकी . .

ऐसी इच्छा है तो इस समथ समाप्त करता हूं । फिर देखा जायमा । ओ शम् । पं० जी तथा अन्य जन यथा योग्य के पश्चात् चलेगये। इति अष्टादश परिच्छेद। -(०)- अथ एकोनविंशति परिच्छेद । सेठजी ने श्री० पंडितजीको घा अन्य महाशयों को आते देख नम्रता- पूर्वक नमस्ते कर कहा कि प्राइये विराजिये। पं० जी-आयुष्मान तथा अन्य महाशय यथायोग्य काशिराज- 7 मान हुए। सेठजी ने कहा कि श्रीमहाराज आज मैं आपको आपकी आज्ञानुसार पुराणों से गणेश उत्पशि सुनाता हूं: देखिये:- . --10)- गणेश उत्पत्ति । 'शिवपुराण ज्ञानसंहिता अध्याय ३२ और ३३ से शिवजी महाराज पार्वतीजीके साथ विवाह करने पीछे कैलाश पर्वत पर निवास करने लगे। कुछ कालके पश्चात् जया और विजया. लखी पार्वती के साथ विचार करने लगी कि शिवजी के पास असंख्यगरण हैं जो उनकी श्राज्ञा पाकर द्वार पर रहते हैं। हमारे कोई भी गण नहीं यद्यपि महादेवके गण हमारे हागण हैं तो भी हमारा मन उनसे नहीं मिलता। सस्त्रियों को यह बात सुन पार्वतीजी विचार करने लगी। एक समय पार्वतीजी स्नान कर रही थी नन्दी द्वार पर स्थित थे। शिवजी उसके निषेक करने पर भी भीतर चले गये तय पार्वती लज्जिन हो स्नान से उठ बैठी फिर मखीकी बात रिचार हाथमें जल लेकर अपने शरीर से मैल उतार सबे अवयवों सहित सुन्दर पुत्रको निर्माण कर द्वार पर बिठला दिया और कहदिया कि कोई भीतरनाने पावे ॥

(४४) प्रतिष्ठाप्य तदाद्वारिनिवायर्यो इहागमेत् ॥ ११ ॥ फिर दूसरी बार पार्वतीजी सखियों सहित स्नान करनेो बंठों उसी समय महादेव जी गणों सहित पधारे और भीतर जाने लगे उस समय गणेश जी ने मना किया कि माताजी स्नान करती हैं और लकड़ी उठाई तब शिवजीने कहा कि मैं गिरिजापति हूं-और भीतर चलने लगे गणेशजी ने लकड़ी उठाफर ताइन किया उस समय शिवजी ने कोधित होकर नगों को आना दी और आपल में रूग्राम और बड़ा युद्ध हुश्रा इतने में ब्रह्माजी गये तव गणेश जीने उनकी डाढ़ी मूंछ उखाड़ ली तय शिवजी को मोघ आया और उनकी प्राज्ञाले अनेको प्रेत पिशाचादि बागये इधर पार्वतीने अपने गणों के निमित्त दो, शक्ति उत्पन्न की जिनके साय घड़ा संग्राम हुआ अन्तको शिवजीने गणेश का शिर त्रिशूल से लग कर दिया। एतदंतरमासाद्यशूलपाणिस्तथोत्तरे : आगत्य च त्रिशूलेन शिरस्तस्यन्यपातयत् ।। अश्शय३३॥६६॥ जिसको सुन पावतीने हजागें शक्तिया उत्पन्न कर दी जो संहार करने लगी तब नारद श्रादि सब देवता महादेवजी सहित पातीजी के मन्दिर में गये और अनेक प्रकार संविनय की तब उन्होंने कहा कि यदि मेरा पुन जावे और पूजनीय हो जावे तो सबकोभाराम होसपता है वरन् नहीं तब शिवजीने शिरको तालाश कराया परन्तुं जब बह नहीं मिला तब शिवजीने कहा कि हे देवनायो ! उत्तर की ओर जानां उधर से जो प्रथम प्राता बुधा मिले उसीका शिर लाकर इसके शरीर में लगादो, वह चले गये प्रथम उनको एक दांत का हाथी मिला ये उसका शरीर छेवन करके लाये और उनके गले पर अर्थात् शरीर पर लगाया तो शिव, विष्ण और ब्रह्माजीने कहा कि जिलमहात्मा के तेजसे हम सम्पूर्ण उत्पन्न हुए हैं वही तेज आकर प्राप्त हो । इतना कहते ही वह सुन्दर अंगयुक्त बालक उ3 बैठा। इत्येवमभिमंत्रणमंत्रितं च यदापुनः ३६। तदोत्तस्थौ पश्चायंशुभांगः सुन्दरस्तदा ।।

है
( ४५
तम इन गजाननका सब देवतानोने अभिषेक किया।
अभिषिक्तैस्तदादेवर्गणाध्यक्षैर्गजाननः ॥ ४०॥
वामन पुराण अध्याय ५४ में
लिखा है कि-
--
पर्वत मर महादेवजी पार्वतीके साथ आनन्दपूर्वक रहने लगे एक दिन
पार्वतीले महादेवजीने काली कहा यह सुन वह हिमालय पर्वत पर तप करने
चली गई और सौ वर्ष व्यतीत होने पर ब्रह्माजी वहां गये और कहा कि तेरे
तपसे मैं प्रसन्न हूं तेरे सब पाप कट गये अब इच्छा पूर्वक तुम पर मांगो तब
पार्वतीने शहा कि मेरा शरीर सुवर्णके समान हो जावे ब्रह्माजी यही वर देकर
चले गये और पार्वती मन्दराचल पर्वत पर पाकर महादेवजी के साथ रहने
लगी महादेवजो भी हजार वर्ष तक महामोह में उनके साथ लिप्त हो गये तब
मत्र देवता इन्द्र और अग्नि को साथ लेकर वहां गये तब अग्नि हंस का रूप
धर वहां पहुंचे जहां महादेव प्रानन्द कर रहे थे यह तुरन्त पार्वतीको त्याग
पाहर थाये सब देताओं ने प्रणाम किया फिर महादेवजीने कहा कि कहो तब
सबने कहा कि यदि आप देवताओंसे प्रसन्न हैं और पर देना चाहते हो तो
प्रथम आप इस महा
को त्याग दीजे तब महादेवजीने कहा कि मैं आपकी
घात माननेके लिये अय्यार हूं पर मेरे तेज मो कोन देवता धारण करेगा उस
समय अग्निने कहा कि मैं तब उन्होंने वीर्य को छोडा उमको अति ने पान
कर लिया फिर महादचजो मंदिर में गये और पार्वनीजी से कहा कि देवतादि
तेरे पुत्रका नहीं चाहते इस पर पार्वनाने सव को शाप दिया फिर शौचशालामें
स्नानकी इच्छा करने पर मालिना सुगंधित द्रव्यको ले उनके सुवर्ण मय शरीर
पर लगान लगा उसंस जो मल उरा उसस मालिनीके चले जाने पर पार्वताने
हस्ती के सुख के समान मुख वाला चार भुजाओं पुष्ट छातो और सुन्दर लक्षणों
से युद्ध पुरुषको रचा
तस्यांगतायां शैलेयीमलाच्चक्रे गजाननम् ॥५६।।
चतुर्भुजंगीनवक्षः पुरुषं लक्षणान्वितम् ॥६॥

फिर उस बालकको बना पृथ्वी पर छोड़ श्राप सुन्दर असिन पर स्थित हुई और मालनी धाकर पार्वती शिरको प्रोने लगी और हमी जिसको पाती जीने देखकर कहा कि तू क्यों हंमती है इस पर मालनीने कहा कि निश्चय तुम्हारे पुत्र होगा इसलिये हंसी आती है यह सुन पार्वतीजी विधान से समान करने लगी फिर स्नान कर महादेवजी की पूजाकर गृहको गई फिर महादेवजी भी स्नान करने लगे उस लमय सनके नीचे पार्वतीजीका रचा हुआ मल पुरुष चही स्थित रहा और महादेवशीके शरीरका पसीना और विभूति सहित पानी जो पड़ा तिसके मेजसे प्रथम सूंडके द्वारा तकार पुरुष उपस्थित मा। तत्संपर्कात् समुत्तस्थौ फूतकृत्यकरमुत्तमम् । अपत्यहिविदित्वा च प्रीतिमान्भुवनेश्वरः ॥६७॥ जिसको अपनी सन्तान जानकर प्रसन्नता पूर्वक ग्रहणकर पार्वती के समीप जाकर कहने लगे कि हे पिये प्रियगुणों से युक्त अपने पुत्र को देख यह सुन पार्वतीने वहां आकर अद्भ नरूप वाले पुत्रको अर्थात् जो पार्वतीजीने अपने मलका गजमुख पुरुष बनाया था वही देखा और प्रसन्न होकर पुत्रसे मिली तदनन्तर पुत्रके मस्तकको सूंघ महादेव पार्वती से कहने लगे कि हे देवि यह पुत्र नायकके विना उत्पन्न हुआ है इस धास्ते इनका नाम विनायक होगा। नायकन विना देविमयाभूतोपि पुत्रकः ॥७२॥ यस्माज्जातस्तो नाम्रा भविष्यति विनायकः ॥७३॥ लिंगपुराण अ में लिखा है किः-- एक बार देवतालोग यह विचार कर कि दैत्यलोग महादेवजीवा ब्रह्माजी को प्रसन्न कर मन माना घर ले लेते है और सदा हमारा पराजद करते हैं इस कारण शिवजीसे प्रार्थना करें कि दैत्यों के कर्मों में विघ्न और हमारे कमी में अविध्न करनेके अर्थ तथा नारियोंको पुत्र देने के लिये और मनुष्योंके सबकामको सिद्ध होनेके अर्थ गणपत्तिको उत्पन्न करें यह मनमें ठान सब देवता शिवजी के निकट जा स्तुति करने लगे उस रतुतिको सुन शिवजीने देवताओंको वर्शन दिये जिससे लब देवता प्रसन्न हुए और वार प्रणाम करने लगे तब शिवजीने कहा कि बभीष्टवरमांगोहम प्रसन्न है उस समय सब देवताओं की ओर सेवृहस्पतिजी ने कहा कि सय देवताओं के शव दैन्य निर्विन प्रापका पाराधन करते हैं और "- . ( .४७ । आप भी शीधू उन पर प्रसन्न हो जाते है अश्च सब देवताओंकी यहप्रार्थना है कि उनके कमा विन हुआ करें यह पर मिले इस प्रार्थना का सुन शिवजीने पार्वतीके गर्भ स.पुत्र उत्पन्न किया जिनका सुख हाधीका सा था हाथों में त्रिशल पाश धारण किये थे उनके जन्म होते हीपुष्पवृष्टि हुई । ततस्तदा निशम्य वै पिनाकधृक् सुरेश्वर । गणेश्वरं सुरेश्वरं बपर्दधारसः शिवः ॥७॥ और गण गणेशजोंके चरणों में प्रणाम करने लगे गजानन भो अपने माता पिताके आगे अानन्द से नृत्ये करने लगे जिसके संस्कार शिवजीने किये और गोद में ले मस्तक सूंघा और कहा कि हे पुत्र दैत्योंके नाशके लिये देवता ऋषि भौर ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मणों के उपकार के लिये तुम्हारा अवतार हुश्रा है भूमि पर जो दक्षिणाहीन यज्ञ कर उसके भर्म में तुम विंधन करो जो अन्यायले अध्ययन अध्या- .. पन आदि कर्म करे उसके प्राण हरो तुम्हारा पूजन विना श्रौतस्मार्त जो कार्य करेंगे उनको भी अमंगल हो होगो तुम्हारी पूजा विना किये देवताओं के भी कार्य सिद्ध न होंगे हम विष्णु और इन्द्र भी जो कार्य प्रारम्भ में तुम्हारा पूजन न करें तो विघ्न करो। गणेशउपपुराण अध्याय ७८ से ८१ तकः ।, सिन्धूनाम एक दैत्य राजा हा उसने अनेकान राजाओ. को मारा, जिस से बाधा इसके सेवक होगये वेदोक्त कमी के बन्द हो जाने से हाहाकार मचाया सब देवता और मुनी सम्मति पर विनायक जी की स्तुति करने लगे स्तुति करते हुये उन ऋषिणके आगे तेजसमूह आया जिसको देख सब देवादि विस्मित हुये पुनः बह तेज समूह सोम्य तेजस्वी मूर्तिवाला हो गया, तय सबने नमस्कार किया देवजीने ऋषि आदिको से कहा कि उस दैत्य मारनेके लिये हमारा गिरिजाके घर अवतार होगा और हम तुम्हारा वाञ्छित 'मनोरथ शीघ्र पूरा . फरंगे यह कह विनायक जी अन्तर्धान होगये एक दिन महादेवजी को तप करते. - हुये देख पार्वतीने कहा कि हे देव माप से बढ़कर और कौन है, जिसता आप ध्यान करते हैं उन्होंने कहा कि विनायक जी को तब पार्वती ने कहा कि मुझको उनकी कैम् प्राप्ति हो महादेवज़ोने एकाक्षरमंत्र जपने को कहा पार्वतीजीने इस को स्वीकार कर जपने का प्रारम्भ कर दिया और बारह वर्ष तक निरन्तर जपा जिससे प्रसन्न हो मुकुटकुण्डल बारे दशभुज त्रिशूल धारी गणेशजी उनके मागे आये और कहा हम तुम से प्रसन्न हैं पर मांगो.पार्वतीने कहा तुम ( ४८ ) होगे और तुम्हारा चाञ्छित मनोरथ पूरा करेंगे अन्तान हो गये नवनम्तर गणेशजी की प्राप्ति के लिये बनकर लव सावित्रा द्वारा गजानन की मूर्तिवना गौरीजाने उम्मकी बहुन प्रकार ले पूजा कीतच तो वह मूर्ति चैनन्म होगई जिसके तेजसे गारीनी सुर्छित हागई थोड़ी देर के पश्चात् सावधान हा पार्वती ने कि मुझसे पूजा म क्या बिगाड़ होगया तब वह रोज सौम्म्यात चांता होगया पानी के पूछने पर उल सौम्यमूर्ति ने कहा कि जिसका नुप्रने रानिदिन ध्यान किया वह हप गणेशजी तुम्हारी पुत्रता को प्राप्त हुये हैं तब पार्वती ने अहा कि आप बालकरूप हो जाइये सितम हम लाईप्यार से लिलावे पानीजीले धान सुन वह अनिलुन्दर घोलक होगये तर गौरीने उनको हाथोंमें उठा लिया और बहुत प्रसन्न हुई महादेवजी भी उसको देख बहुत प्रसन्न हुये। नोट-शिव, वामन, लिंगपुराण और गणेश उपपुराण गणेश महारण की उपति पड़कर स्वय विचार कीजिये कि किस २ प्रकारसे श्रीमान्का जन्म हुधा हम और कुछ कहना नहीं चाहते श्री पं० जी-घस सेठजी अब इतना ही रहने दीजिये और विषय सुनाइये श्री. पं० जगन्नाथजी-सेठजी आज हमें तनिकाम है अगर श्राप की राय और पं० जी की प्राक्षा हो तोनाज यहां ही विश्राम दीजिये- और विपय त । पडितजी---अच्छा सेठजी रहने ही दीजिये क्योंकि नित्यप्रति के श्रोताओका बोचमें न सुनना हानिकारक होगा। सेठजो -जैसी श्रीमान्की भाशा मोशम् । सब रयायोग्यके पश्चात् चले गये। इति एकोनविंशति परिच्छेद । 1 अथ विंशति परिच्छेद। आर्य सेठ --श्रीमान् परिडतजी अन्य सभ्यो सहित पधारे उनको नमस्ते की और कहा कि प्रारचे पचारिये। पंडितजी-नेमायुमान् कहा और अन्य सज्जनोंने यथायोग्य की ..

है प्राय सेठेम विषय मैं आप कोमृतकाद्ध के विषयमें सुनाताई,आप कृपा कर सुनिये श्रीमान् इस विषय में पुराणों में अनेकानेक प्रमाण परन्तु वेद में कोई प्रमाण नहीं मिलता पर वहां नो निम्नलिखित प्रमाण स्पष्ट कह रहा है कि मृतक शरीर के भस्म होने के पश्चात् कोई कर्म नहीं जैसा कि: भस्मान्तशरीरम् । इसके उपरान्त धर्म सभा सभ्यगण एकरवर होकर आवागमन को भी मानते हैं जिसके अर्थ आने और जाने अर्थात मरने और उत्पन्न होने के हैं फिर भलाआप ही बतलाइये कि मर गये वह जलन होगा तो फिर आप श्राद्ध किसका करते हैं।पण्डितजो जीव अनादि है जो अपनें २ कम्मर्मानुलार जन्म मरण को धारण करता है और जिस भांति मनुष्य पु बलों को उतार नये वस्त्र धारण कर लेता है उसी प्रकार जीव एक शरीर को छोड़ दूसरे शरीर में मवेश करता है जैसा कि श्रीमद्भागवत स्कंद १० पूर्वार्द्ध अध्याय १ में लिखा है। देहे पंचत्वमापन्ने देही कर्मानुगोऽवशः । देहांतरमनुप्राप्य प्राक्तनंत्यजते वपुः।।३६॥ जयं देहीका अन्त माता है उस समय जीवासा कमानुकूल परवश हो दूसरे देहको प्राप्त हो अपने पूर्व देह को त्याग करता है इसके अतिरिक्त जिस प्रकार चलते समय अलग पैर को उठा फिर पिछले पैर को उठाता है जैसे जोक, उसी भांति शरीरस्थ जीवात्मा कर्मानुकूल अपने शरीरको छोड़ दूसरे शरीर को ग्रहण करता है जैसा कि- ब्रजस्तिष्ठन्यदैकेन यथैवैकेन गच्छति । तथा तुण ज़लूकैवं देहीकर्म गतिंगतः ॥४०॥ इसके पश्चात् पुराणों में अनेक लेख उपस्थित है गीता; महाभारत भी पुकार २ फर कह रहे हैं फिर आप मृतकश्राद्धको क्यों कर मानते हैं जबकि प्रत्येक पुरुष अपने कम्मों का फल पाता है न कि पुत्रादिके कंम्मीका, यदि ऐसा हो ठीक है तो जिस पर धन है वह उसको व्यय कर अपने पितादिको चंग पहुंचा सकता है तो फिर उस प्राणोके पाप, पुण्यको कोई ठीक नहीं यथार्थ में (• ५० ) वहाँ भी घुस काम देती है,पण्डितजी यह सब लड़कोके खेल हैं, जिन्होंने भारत वासियों को चक्कर में डाल अपना खूब प्रयोजन निकाला है, श्रीमान्? यदि श्राप उन वेदमन्त्रों के अर्थों को विचार करें जो पण्डितंगण श्राद्ध समय पढ़ने है तो प्रत्यक्ष प्रकट हो जावेगा कि उनके यह अर्थ नहीं जैसा कि पौराणिकजन सुनाते हैं प्रथम आप सत्यअर्थों को श्रवण कर लीजिये। पितृ शब्द निघण्टु ४।१मैं पिता पद भाया है। पिताका बहुवचन ही पितर: है। निरुक्त ४॥ २१ पितापद के व्याख्यान में नीचे लिखा मन्त्र ऋग्वेद १ । १६५ । ३३ का प्रमाण दिया है कि:- -- द्यौमें पिता जनिता नाभिरत्र । इत्यादि । फिर निरुक्तकार इसके अर्थ करते हुवे रितापदको अर्थ इस प्रकार करते हैं कि:- पिता पाता वा पालयिता वा ॥ - अर्थात् पिना पालने वा रक्षा करने से कहा जाता है। (धौमें पिता) मन्त्र में frता शब्द सूर्य का वाचक है, और ऐसा हो स्वामीजी ऋग्वेद भाष्य में लिखते हैं। तात्पय्य यह है कि रक्षा वा पालने वाले जनकादि मनुष्यवर्ग राजा, सूर्य, चन्द्र, किरणं वायुभेद लिन का राजा यम कहाता है, इत्यादि रक्षको और पोजन करने वालोंका नाम पितर है वेदों में बहुत स्थानों में यम पितरों का मजा लिखा है । जैसे मनुष्योका राजा मनुष्य. मृगों राजा मृगराज सिंह, आषधियों का राजा सोप नाम ओषधि ऋतुओं का राजा ऋतुराज वसन्त है इसी प्रकार वायुभेद जो हमारे रक्षक और पालक हैं उनका मो राजायम वायु । हो है जैसा कि माध्यमिको यम इत्याहु रुक्ताः तस्मात्पितॄन्माध्य- मिकान्मन्यन्ते स हि तेषां राजेति॥ पितरस्पद निघण्टु ५। ५ में और इसकी व्याख्या निरुक्त ११ । १8 में है। अर्थात् यम मध्यस्थान देवता है यह नैरुत्तोंका मत है, इस लिये पितरों को भी मध्यस्थान देवता मानते हैं क्योंकि यह ( यम) उन पितरों का राजा है। फिर निरुक 14

१५)
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५१ )
वायुर्वेन्दोवान्तरिक्षस्थानः ।
वायुांअन्तरिक्ष स्थान अर्थात् मध्यस्थान पचता हर साली ऋग्वेद
१०।१४।१३ में:-
यमं हि यज्ञो गच्छत्यग्निदूतः ।
अग्नि जिसका दूत लेजाना पाला है वह यज्ञ वायुको प्राप्त है। यहां भी
यमका अर्थ घायुविशेष है। और यजुः = । ५७
यमः सूयमानो विष्णुः संभूियमाणो वायुः पूयमानः ।
यहाँ भी यम नाम वायुविशेप का है।
स्तुहीन्द्र व्यश्ववदनूमि वाजिनं यमम् ऋ० ८ । २४ । २२
यहा भी यम नाम वायुविशेषका है क्योंकि इस मन्त्रका देवता इन्द्र है
और इन्द्र ऊपर लिने निरुक्त।
वायुर्वा इन्द्रो वा अन्तरिक्षस्थानः ।
के अनुसार वायु का भी नाम है।
इसके अतिरिक्त यहाभी वेदाकी शिक्षा है कि प्रत्येकलिशरीरी जीवात्मा
स्थूल शरीर छोड़ कर आकाश में १२ दिन तक १२ आकाशी पदार्थों से प्राप्या.
यित । डिवेलप) होता है तब इसे किसी लोक में कर्मानुसार जन्म मिलता है।
हां, जिनका लिंगशरीर भी छूट जाता है उन मुक्तपुरुषों की यह अवस्था नहीं है।
सविता प्रथमेहन्नग्निदितीये वायुस्तृतीय आदित्यश्चतुर्थे
चन्द्रमाः पञ्चम ऋतुः षष्टे मरुतः सप्तम बृहस्पतिरष्टमे मित्रो
नवमे वरुणों दशम इन्द्र एकादशे विश्वेदेवा बादशे॥
(यजुः ३६।६ श्रीमदयानन्द सरस्वती माध्यम्-.
है मनुष्यो इस जीवकों [थमे ] पहले [अहन ] दिन शिविता]
यं [ द्वितीये दूसरे दिन [अग्निः] अग्नि, तीसरे वायु, चौथे महीना'

। पांचवे चन्द्रमा छठे वसन्तादि ऋतु, सातवें मस्तू , भाट, सूत्रात्मा, नवे प्राण, दशर्षे उदान, ग्यारह बिजुजी, और यारहवें दिन सब दिव्यगुण प्राप्त होते हूँ ३६।६। इस इससे यह भी जाना जाता है कि चूर्ण, अग्नि, वायु, चन्द्र, प्राण, उदान, विजुली और भोकाशगत अन्य सुब-दिव्यपादों का (जो देवता कहाते हैं) हवन करने से सुधार होता है इलीको तृप्ति और जुलता भी कह सकते हैं। इससे अग्निमें होमहारा पृथ्वी अन्तरिक्ष घार छौजोक इन तीनोंकी शुद्धि, वृद्धि और तृप्ति होनले भाशाशगत पितरों ( वायु विशेषों का भी उपकार सम्भव है। परन्तु मरण प्राप्त प्राणी किसी प्रकार परमात्मा की व्यवस्थानुकल १२ दिन में भिन्न भिन्न नियत पदार्थों को छोड़ अन्यत्र कहीं नही जा सकते और इसके मनन्तर स्थूल शरीर पाप जना लेकर भो एक लोकसें दूसरे लोक में नहीं जा पा सकते । इसलिये वर्तमान प्रचलित भाइदानादि कार्यों के पदायो की प्राप्ति ब्राह्मणों द्वारा पितरों को सर्वथा नहीं हो सकती हाँ, अग्निहोत्र से तीनों लोनका उपकार होता है। और इन्हीं श्राकाशगत पदार्थोका तात्पर्य संस्कारविधिस्थ अत्येष्टि प्रकरण समस्त मन्त्रों ने भी लग जायगा। ये समानाः समनसः पितरोयमराज्ये तेपाल्लोकः स्वधानमो- यज्ञो देवेषु कल्पताम् । अ० १६ मं० ४५ (ये) जो ( समान सहश ( सनसः) तुल्य विज्ञानयुक्त (पितरः) प्रजाके रक्षक लोग (यमंगस्य न्यायकारी राजा के राज्य में हैं (तेपाम् । उनका (खाकः ) स्थान (स्वधा | अ (नमः . सत्कार शौर। यश) प्राप्त होने शोग्य न्याय ( देवेषु ) विद्वानों में पताम् ) समर्थ हो । ४५ ! ये समानाः समनसो जीवा जीवघु मामकाः। तेवा, श्रीमयि कल्पतामस्मिल्लोके शतई समाः॥ १६ ॥ (थे जो अस्मिन् ) इस (लो) लोकमें ( जीयेषु) जोवते हुवों में (नमाना समान गुण कर्म स्वभाव वाले। समनता) समान धर्म में मन रखने वाले मानका ) मेरे जीवाः जीते पितर हैं (वेषाम् ) उनकी (श्रीः) सन्मी मयि । मरे समीप (शतम् ) सौ (समाः) वर्ष तक (कल्पताम् )समर्थ . होय ॥ ४६ . उदीरतामवर उत्परास उन्मध्यमाः पितरः सोम्यासः । असु यईयुवृका ऋतज्ञास्ते नाऽवन्तु पितरा हवेषु ॥ ऋ० १०।१५।१।. (ये) जो पितरः ) पिता मावि रक्षक जन [परासः] बड़े बरे] छोटे (मध्यमाः मध्यावस्था वाले हैं (ते) पितरःपालक रक्षक लोग(ना) हमको प्रत् ईरताम् ) उन्नत करें (सोम्याला ) चे सौम्यलॉग [असुम् । जोवन को (उतईयुः) उच्ने मधिक प्राप्त हो (मवृका जो किसी से शत्रुता नहीं करते और ऋतशा.), सत्यशानी हैं वे (हवेषु) जब २ हमे पुकार-राब:२ (उत्मवन्तु ) उच्च मावसे रक्षा करें, इसमें मृतश्राद्ध का लेशमात्र भी वर्णम: महीं। ये नः पूर्वे पितरः सौम्यासोनू हरें सोमपीथं वसिष्ठाः। तेभियंमसराणोहवीष्ठुशन्नुं शशिः प्रतिकाममत्तु ।। यः मम ५१ (ये) जो (ना) हमारे ('सौम्याख:) शास्वादि गुणों के योगसे योग्य (वासष्ठाः) अत्यन्तधनी र पूर्व) पूर्वज (पितर) पालन करने होरेशानी पिता आदि (सोमपीथम् । लोग्पानको (अनहिरे ) प्राप्त होते और कराते हैं तिभिः) उन (उद्धिः हमारे पालन की कामना करने हारे पितरो के साथ (इधाषिलेने देने योग्य पदार्थों की (उशन् कामना करने हारा (सरराण) अच्छे प्रायोको दाता यमः) पाय और योगयुके सन्तान प्रतिकासम्) प्रत्येक कामको भावार्थ:-पिता आदि पुत्रों के साथ और पुनःपितों आदि के साथ सब सुख दुःखों के भोग करें और सदा सुखकी द्धि और दुःख का नाश किया करें॥५१॥ त्वया हि नः पितरः सोम पूर्वे कर्माणि चक्रुः पवमान धीराः । वन्वन्नवाल परिधीशपोर्ण हि...वीरोभिरश्वैर्मघवा भवानः ॥५३ ।। हे (पवमान ) पवित्र स्वरूप पवित्र कर्म का और पवित्र करने हारे (सोम) ऐश्वर्ययुक्त सन्तान वया) तेरे साथ (ना) हमारे (पूर्व) - - " अत्तु) मोगे।

. पूर्वज (धीराः ) बुद्धिमान (पितरः) पिता आदि शानी लोग जिन धर्मयुक्त ( कर्माणि ) कन्नों का चः) करने वाले हुए (हि) उन्हीं का सेवन हम लोग भी करें । श्रावातः हिंसाकर्मरहिन (वन्वन् ) धर्म का सेवन करते हुए सन्तान! तू ( वीरेमिः) वीर पुरुष और ( अश्वैः घोड़े आदि के साथ (नः) हमारे शत्रुओं की (परिधीन् परिध अर्थात् जिनमें चारों ओर से पदार्थों का धारण किया जाय उन मार्गों को (अपोणुहि ) भाच्छादन कर और हमारे मध्य में (मघवा ) धनवान् (भव हो। भावार्थमनुष्य लोग भपने धार्मिक पिता आदिका मनुकरण कर और शत्रुओं को निवारण करके अपनी सेना के अड़ी की प्रशंसा से युक्त हुप सुखी होवें ॥ ५३॥ बहिर्षदः पितर ऊत्यर्वागिमा वो हव्या चकमा जुष- ध्वम् । तागताऽवसा शन्तमेनाथानः शंयोरपोदधात् ५५ है। पहिर्षदः) उत्तम सभा में बैठनहारे ( पितरस) न्याय से पालना करने वाले पितर लोगो ! हम (अर्वाक् पश्चात् जिन (वः) तुम्हारे लिये (ऊती) रक्षणादि क्रिया से ( इमा) इन (हव्या. भाजन के योग्य पदार्थों का (चक्रम) संस्कार करते हैं उनका श्राप लोग (जुषध्वम् ) सेवन करें और (शन्तमेन) अत्यन्त कल्याणकारक ( भवसा) रक्षणादि कर्मके साथ (श्रा, गत आर्य (अथ) इसके अनन्तर (नः ) हमारे लिये (शंयोः) सुख तथा (अरपः) सत्याचएम को ( दधात ) धारण करें और दुःख को सदा हमले पृथक् रक्खें 11 44 m आयन्तुनः पितरस्सोम्यासोग्निष्वात्ताः पथिभिर्देव- यानैः । अस्मिन्यज्ञे स्वधया मदन्तोधित्रुवन्तु तेवन्त्वस्मान ॥ ५८ ॥ जो (सोम्यासा) चन्द्रमा के तुल्य शान्त शमनादि गुण युक्त (अग्निच्या- ताः) अग्न्यादि पदार्थविद्या में निपुण (नः) हमारे (पितरः) अन्न और विद्या के दानसे रक्षक, जनक, प्रा पिक और उपदेशक लोग हैं (ते) (देवयानः ) प्राप्त लोगोंके जाने माने योग्य (पथिभिः) धर्मयुक्त मार्गों से (मा, यन्तु।) श्रावे (अस्मिन् । इस (यशे) पढ़ाने उपदेश करने रूप व्यवहार में वर्तमान होके (स्वधया) भन्नादि से ( मदन्त ) मानन्द को प्राप्त एप ( ५५ ) (अस्मान ) हमको ( अधि, अवन्तु ) अधिष्ठाता होकर उपदेश.करे और पढ़ान और हमारी ( अवन्तु) रक्षा करें। ५६. ये अमिष्वात्ता ये अनमिष्वात्ता मध्ये दिवः स्वधया मादयन्ते । तेभ्यः स्वराडसनीतिमता यथावशन्तन्वङ्क- ल्पयाति ॥ ६॥ (ये.) जो (अग्निध्वात्ताः) अच्छे प्रकार अग्नि विधाके ग्रहण करने तथा (ये)जो (अनग्निप्वात्तः) अग्नि से मिन्न अन्य पदार्थ विद्या के जानने हारे वा ज्ञानी पितृ लोग (दिवः विज्ञानादि प्रकाश के ( मध्ये) बीच (स्वधया) अपने पदार्थ फे...धारण करने कप क्रिया वा सुन्दर मोजन से (मादयन्ते ) आनन्द को प्राप्त होते हैं (तेभ्यः) उन पितरों के लिये (स्वराड्) स्वयं प्रकाशमान परमात्मा (एताम् ) इस (असुनीतिम्) प्राणों को प्राप्त होने पाले (तन्वम् ) शरीर को (यथावशम् ) कामना के अनुकूल (कल्पयाति) समर्थन करें। ६०॥ भावार्थ:-मनुष्यों को परमेश्वर से ऐसी प्रार्थना करनी चाहिये कि हे परमेश्वर ! जो अग्नि आदि पदार्थ विद्या को यथार्थ जानके प्रवृस करते और जो ज्ञान में तत्पर विद्वान अपने ही पदार्थ के भोग से सन्तुष्ठं रहते हैं उनके शरीरो को दीर्घायु कीजिये।।६।। और यदि अग्नि में डाले गये अर्थ को भी मान लें वो भी.यह अर्थ होगा कि "जो अग्नि में डाले गये और जो न डालेगये और आकाश के मध्य वर्तमान हैं, उन्हें स्वराट् परमात्मा शरीर देदेता है और वे अपने अन्ना- दिसे जहा जन्म होता है.) मानन्दित होते हैं। आच्याजानु दक्षिणतोनिषद्युमं यज्ञमाभगृणीविश्वे। माहिथंसिष्ट पितरः केनचिन्नोयदआगः पुरुषता कराम " ६२ ॥ हे विश्वे सब पितरः पितृ लोगों तुम [ केनचित् ] किसी हेतु से[नः] हमारी जो पुरुषता] पुरुषार्थता है उसको [ माहिसिष्ट ] मत नष्ट करो जिस से. हम लोग सुखको [कराम प्राप्त करें [यत् ] जो[:] तुम्हारा [आगः) अपराध हमने किया है,उसको हम छोड़ें तुम लोग इमम् इस [यसम्] सत्कार कप व्यवहार को [ अभि गणीत ] हमारे सम्मुख प्रशसित करों इमोजार्नु, जानु अवयवको [प्राच्य ] नोचे टककै दक्षिणतः तुम्हारे दक्षिण पश्चि [निषद्य बैठके तुम्हारा निरन्तर सत्कार करें। ६२ जिनके पितृ लोग, जब समीप आवे अथवा सन्ताम लोग सा समीप जोवे तब भूमिमें घुटने टिका नमस्कार कर निको प्रसन्न कर पितर लोग भी आशीर्वाद विद्या और अच्छी शिक्षा उपदेश अपनी सन्तानों को प्रसन्न करके सदा रक्षा किया करें। ६२ आसीनासोअरुणीनामुपस्थे रयिन्धत्त दाशुषे माय। पुत्रेभ्यः पितरस्तस्य वस्वः प्रयच्छेत तइहोजन्दधात ॥६३|| हैं [पितरः] पित लोगो ! तुम । इरा इस गृहाश्रम में श्रणीनाम. गौरवर्णयुक्त स्त्रियों के उपस्थे लमीप में आसीनामः ] बैठे हुई भ्यः पुत्र के लिये और दाशुषे ] दाता । माय ] मनुष्य के लिये स्थिम् । [धत ] धरो [ तस्य ] उस [वस्वः ] धनके भागोंको प्रि, यस्ता] वियों करो जिससे [ते] वे स्त्री मादि सब लोग[ऊर्जम् ] पराक्रम करें। धारण कर॥३॥ से ही मत्र दायभाग का मूल है। वे ही बद्ध है जो अपनी ही स्त्री के साथ प्रसन्ने अपनी पत्नियामा सत्कार करने हारे सन्तानों के लिये यथायोग्य पायमांग और संपत्रिी का सदा दान देते हैं और वे सन्तानों को सत्कार्ट करने योग्य होते हैं।.१४।६॥ पुनन्तु मा पित सोम्यासः पुनन्तु माँ पितामहः पुनन्तु प्रपितामहः पवित्रेण शतायुषा पुनन्तु मा पितामहाः पुनन्तु प्रपितामहाः पवित्रण-शतायुषा विश्वामायुपश्नवे अ... १६ म० ३७॥ सोम के योग्य पितर पूर्णायु के दाता पवित्रता से मुझको पवित्र पितामह पूर्णायु के दाता पवित्र ले मुझको शुद्ध करो प्रपितामहशुस पूर्णायुको प्राप्त करू प्राधत्त पितरो गर्भ कुमार पुष्करस्रजम् । यह पुरुषोसत् ।। यजु० अ० २.म० ३३ ।।

( ५७ ) पूर्व मन्त्र. में तो पिता पितामह-और प्रपितामह से प्रार्थना है कि हमें पवित्रता का उपदेश और प्राचारण करा, दूसरे का यह अर्थ है:-बड़ों का चाहिये कि (यथा जिस प्रकार ' इह) स कुल में पुरुषः पुरुष असत् । होवे उस प्रकार (पितरः ) पिता लोग (गर्भम् ) गर्भपा (मधित ) आधान करें और (पृष्करसूजम् ) सुन्दर (कुमारम् पुत्र को उत्पन्न करें । ये च जीवा ये.च मृता जाता ये च यज्ञियाः तेभ्यो धृतस्य कुल्यैतु मधुबारा व्युन्दती अर्थव०१८४५७ इस मन्त्र में यह कहा गया है कि मन को फूंकते समय जो धृत की धारा घद्ध पाती है, वह जीवित प्राणियों और मरे हुघे शवों (लाशो) की सुदशा करती है, अर्थात् जीवितों को गंगादि से बचाती और मरों को सड़ने आदि दुर्ग से रोकती है। पदार्थ-ये:च जोषाः) जो जाते हैं (ये च मृताः । और जो मरे शरीर हैं (ये.जाताः) जो बच्चे जन्मे हैं । ये च यशियाः) और जो यज्ञ के उपयोगी हैं (तेभ्यः) उन सबकी भलाई के लिये (धृतस्य ) घृत की (युन्दती ) टपकती (मधुधारा ) मधुरादि युक्त ( कुल्या) धारा (पतु प्राप्त होवे॥ प्रेहि प्रेहि पंथिभिः पूर्याणयेना ते पूर्वे पितरः परताः। उभा राजानौ स्वधया मदन्तौ यमं पश्यासि वरुणंच देवम् अथर्व १८१५४। अर्थात् मृत शरीर को फूकते हुए लोग इस मन्त्र को पढ़ते हैं कि जहां इससे पूर्व मरे हुये शरीर पूर्वजो के गये, वहां हो, और जिन मार्गों में शरीर के सूक्ष्म अवयंव ही यान (संघारी) है उन मार्गों से यह भी जाता. और #यन तथा * धरुण नामक भाकाश में पिराजने पाले भौतिक देवताओं में मिल जाता है । पदार्थ (हि प्रेहि) जा जा (पुर्याणैः पथिभिः) पुरशरीर ही जहाँ यान-सधारी है उन मागों से जा । (येन) जिन मार्गों से (ते पूर्वे तुझलें पहिले (पितर) बाप दादे (परेता) मरे हुए गये और वहां आकाश में यम.. देवम् ) वायु विशेष देव को (च) और । वरुणम् जल के दिव्य स्वरूप को (उमा) इन दोनों (राजानौ) प्रकाशमान देवों को जो कि स्वधया) श्मशानाहुति जो स्वधा है उससे (मदन्ती। सुधरे हुये हैं उन्हें ( पश्यालि.) देखता प्राप्त होता है तू.॥ ३ *देखी निघएट ५.५ और निरुक्त १० १६-२१. अन्तरिक्ष देवता प्रकरण ।।

अर्थात् मृतशरीर की दुर्गति नहीं होती, किन्तु स्वधा जो उत्तम द्रव्यों की पितृयनमें आहुति हैं उससे भाक्षाश में के [यम घायु परुण जल बिगड़ते नहीं, किन्तु [मदन्ती] अच्छे प्रसन्न उत्तम रहते हैं और उन्हीमें मृतशरीर मिल जाता है अर्थात् शरीर का गीला अंशवरुण में और शुष्कअंशयममें मिल जाता है। ये निखाता ते परोप्ता ये दग्धा ये चोद्धिताः। सर्वास्तानग्न आवह पितॄन्हविषे अत्तवे ॥ ये अग्निदग्धा ये अनमिदग्धा मध्ये दिवः स्वधया माद- यन्ते । त्वं तान्वेत्थ यदि ते जातवेदः स्वधया यज्ञ स्व- धितिं जुषन्ताम्॥ भधर्व १८२१३४-३५ ।। इन दोनों मन्त्रों में यह कहा गया है कि जोजो शरीर किन्हीं कारणों से भूमि में दब गय, जिनके देह ऊपर पड़े रहगये, जो बिना धृतादि कुंक गये जो वायु ने उड़ गये, अग्नि में मही फुकने पाये, अग्नि में किया हुमा होम उन सष आकाशगत मृत प्राणिशरीरावयवा को प्राप्त होकर उनकी सद्गात- अच्छी दशा करता है। . पदार्थ-[ये निखानाः] जो बगये [ये परोप्ताः] जो इधर उधर पड़ रहगये [ ये दग्धाः ] जो केवल फुक गये। ये च] और जो [उदिसा:-] ऊपर उड़ गये [ अग्ने] अग्नि [ तान् सर्वान् ] उन सब को [ हविषे] होम के पदार्थ [ आत्तवे] खानेके लिये [आवहा प्राप्त कराता है या करावे ॥ ३५॥ [ये अग्निदर : जो केवल अग्नि में फुके [अनग्निदग्धाः] और जो अग्नि में भी नही फुके [वित्रः मध्ये ] आकाश के मध्य हैं . जात वेदः अग्ने ! [तान् ] उनको [यदि ] यदि । त्वम् ] तू [ वेत्थ जानता=प्रोप्त होता है तो वे[स्वधा ] स्वधा कहकर दी हुई आहुति से [मादयन्ते] प्रसन्न होते अर्थात् सड़ने को छोडकर अच्छी दशा को प्राप्न होते हैं, अतः वे । स्वधया। उसी आहुति से [स्वप्रितिप्] पैतृक [यशम् यज्ञ का [जुपन्नाम् ] सेवनकरें । ये नः पितुः पितरो ये पितामहा ये प्राविविशुरुर्वन्तरिक्षम् य प्राक्षियन्ति पृथिवीमुतयों तेभ्यः पितृभ्योनमसाविधेम॥ अथर्व०१८।२१४६ ॥ अर्थ-[2]जो [नः ] हमारे [पितुः पितरः] बाप के बाए हैं, अतएव [ ये] जो हमारे [ पितामहाः ] वाया है। ये] जो कि [ उरु अन्तरि- क्षम् ] इलबड़े भाकाश को [माविविशुः ] प्रवेश कर गये हैं । ये] जो कि [ पृथिवीम् ] पुलिची को [ उन ] और [धाम् ] आकाश को [ आक्षयन्ति ] छोय रहे हैं [ तेभ्यः ] उन [पितृभ्यः ] मृत शरीरों के लिये [नमसा विधेम] छम पाहात करते हैं। ..

। अर्थात् पुत्रादि का कर्तव्य है कि पिता वा पितामहादि पूर्वजों की - म्त्येष्टि श्रद्धा पूर्वक करें, ऐसा करने से पृथिवी और अन्तरिक्ष लोक में जो मृतपूर्वज लोगों के शरीराऽवयव वायु आदि में हैं वे चिगड़ते नहीं, किन्तु सुधर कर मनुष्यादि प्राणियों को दुःख नहीं देते हैं । अन्यथा वायु जल को विकत करके.रोगादि उत्पन्न करते हैं । अप पतलाइये कौन से वेद मन्त्र की मात्रा ले मृतक पितरों को भार मिलता है। इसके उपरान्त श्राद्ध अर्थात् प्रत् सस्य का नाम है। श्रत्सत्यंदधाति या क्रिया श्रद्धा- श्रद्धया यत् क्रियते तच्छाद्धम् ॥ जिस क्रिया से सत्य की प्रहण कियाजाय उसको श्रद्धा और जो अखासे किया जाय उसका नाम श्राद्ध है। और:- तृप्यन्ति तर्पयन्ति येन पितॄन् तत्तर्पणम् । जिस कर्मसे तृप्त हो उसको तर्पण कहते हैं यह तृप्ति जीवित माता पिता मादिके साथ श्रद्धासे सेवा करने से होती है न कि मरने पर मरनेपरतो जीवात्माका उनसे.कोई सम्बन्ध नहीं रहता, फिर श्राद्धः और तर्पण कैसा? पण्डितजी -अब म आपको मृतकधाद्ध विषय की असली काय्य पाही सुनाते हैं जो पुराणों में लिखी हैं आप अच्छे प्रकार सुन उन पर विचार कीजिये, शिवपुराण ज्ञानसंहिता अध्याय ३० में लिखा है। किसी समय फल्गुनी नदी के किनारे लक्ष्मण सहित रामचन्द्र जी आये और सीता सहित पिताकी आक्षा स्मरणकर वहां स्थितहुये औरश्राद्धका समय जान कहने लगे अब क्या करना चाहिये तब फललेने के लिये लक्ष्मण को बन भेजा जब बहुत समय होगया तब स्वयं आप चले जानकी जी अकेली रह गई और उसने विचारा कि श्राद्धका समय, जाता है न मालूम अभी तक क्यों नहीं आये तब इंगुदीके पिण्ड घना कर स्वयम् जानकीजीने दिये तव दशरथादि पितरोंके हाथ निकले। किंचिदस्तुगृहीत्वातुतेनैव पिण्डकास्तदा । दत्तायदातयातत्रहस्ताश्चनिःसृतास्तदा ॥११॥ और तृप्त होकर कहने लगे, जनकात्मजे तुमधन्य हो जानकी जीने उनके. अनेक प्रकार भूषणधारी हाथों को देखकर कहा तुम कौन हो जानकोजीके यह बचन सुनकर उनके श्वसुर बोले कि हे पतिवते मैं तेरा श्वसुर इंतुम्हारेपिएड दान से मैं तृप्त होगया हूं तुम्हाराश्राद्ध भी सफल होगया। अहं दशरथोनामश्वशुरस्ते च सुबूते । तृप्ताः स्मतव पिण्डेनश्राद्धं ते सफलंकृतम् ॥१४॥ ऐसा कहने पर जानकी बाती इस तुम्हारे हाथ निकालने का विश्वास हमारे स्वामी न करेंगे, ऐसा कहने पर दशरथ बोते कि हे अन्ध इस विषय में तुम साजी करलो यह सुनकर फल्गूनदी, गौ अग्नि तथा केतकीले कहा कि तुद इस वार्ताको अच्छे प्रकार सुनलो इस में वे सब सादी हुए, तब के फल्गनदी आदि से अन्तर्शन हुए इस अवसर में रामचन्द्रजी आये और जानकीलीस बोले कि हे साचि तुम शीघू पवित्र हो जाओ क्योंकि नोद्धको समय आगया त्य जानकी विस्मृनहो कुछ न योनी तव रामने उनको मांश्चयंयुक्तदेव जानकी जीले पुंछा निल पर उन्होंने पूर्वका सब वृत्तांत कह सुनाया तब वह ब्रान्तयुक होलानी बोले कि तुम ने जानकी जी का कहना सुना हम ने तो कमी ऐसा नहीं देखा जैसा यह कहती हैं। अस्माभिर्विधिनानव दृष्टश्चैवाधुनातया ॥२३॥ इससे विदित होता है कि यह काम करने के लिये असत्यभाषण करती हैं तब जानकोजी लज्जित हो कहने लगी मैंने फल्गूनदी, गाय अग्नि और केतुकी इन चार को साक्षी कर लिया है श्रीरामजीने कहा कि यदि यह चारों साक्षी है देने नो हम तुम्हारे वचनों को सत्य मान लेंगेहतना कह श्रीरामजीने उन चारों नानियों से पूछा तो वह सब मोहित हो कहने लगे कि हम इस विषय को नहींजारने शारदा ते सर्वमोहमापन्ना न जानीमोवयंत्विदम् ॥२६॥ गह सुन दोनों भाई प्रापम में हास्य कर कहने लगे कि अब श्राद्ध करना चाहिये दिन बहुत बद्ध भाश और प्राइ बिना भोजनोंके करना चाहिये तब जानकी अत्यन्त दुःख से दुखी होकर कहने लगी कि यह क्या हुश्रा और फिर पाक बनाने लगी एयर श्राद्ध समय श्रीरामजी ने पितरों का मावाहन किया तब सूचकै पसे दाणी निवती कि हे पुत्र अब तुम क्यों हवन करते होरसने तो हमको दृप्त कर दिया तब सामने कहा कि मैं ऐसे कमी न मान गा फिर सूर्य से वाणी निकली कि पापरहित किये हुए छादको फिर नहीं करना चाहिये फिरभी रामने उनके वाक्यों को नहीलाना तव सूर्य साक्षीहोकर बोले कि अब तुम क्यों . श्राद्ध करते हो तंब राम"जय ऐसा शब्द करके राम लक्ष्मण से बोले हम धन्य हैंजंव कि कुलवधु ऐसी श्रेष्ठ है फिर राम लक्ष्मण भोजन कर परस्पर कहने लगे कि इन साक्षियोंने साक्षी क्यों नहीं दी, इस पर सीनाजीने उन चारों को शाप' दिया कि हे नदी जो तूने सुना और देखा तथापि सत्य नहीं कहा इससे तू पाताल में जाकर वह, केतकी आज से शिवके मस्तक पर चढ़ने योग्य न होगी निकट खड़ी गाय से कहा कि जो तू ने सत्य नहीं कहा इसलिये तू पूंछसे शुद्ध और मुंह से अशुद्ध और अग्निसे कहा कि तू सर्वभक्षी होगी। पंडितजी.. प्रथम तो यह विचारियै कि श्रीरामको सनातनी भाई : ईश्वरावतार मानते हैं परन्तु यहां इतनी भी सुध नहीं कि जानकी जी श्राद्ध कर चुकी द्वितीय जव जानकीजीने दशरथ जीके हाथ निकालने की वात कही तो श्रीरामजीने कहा किहमने तो कभी ऐसा नहीं देखा,तिस पर सीताजीने साक्षि- योको पेश किया परन्तु किसी ने साक्षी नहीं दी, फिर आप इस कथा से क्या प्रयोजन सिद्ध करते है, हमारी समझमें तो शिवपुराण के कर्माने श्राद्धमाहात्म्य को बढ़ाने के लिये श्रीराम के नामसे श्राद्ध की कथाको गढ़. लिया फिर भी विचारशीलों की दृष्टिमें कई दोष इष्टि भा रहे हैं अब दागे और श्रवण कीजिये। पद्मपुराण सृष्टिखण्ड अध्याय । + १० में लिखा है कि पूर्व समय में कुरुक्षेत्रके नीच' कौशिक नाम एक महात्मा हुए जिनके सात पुत्र थे जो गर्ग ऋषिके शिष्य हुए महात्मा कौशिक के मेर जाने पर दवंयोगले बड़ा कठिन हुर्मित पड़ा वह सब ऋषिके यहां गाय चंगया करते दिन अन्न न मिलने पर संब" भाइयोंने यह कुविचार किया कि अब अन्न नहीं निलमा इसलिये इस पिलोको ही भक्षण कर लेजब सबजनाने इस बात का विचारकिया तो उनले छोटाभाई वोला कि यदि इसके मारनेका ही विचार है तो श्रद्धकेरूप अर्थात् नामले बध्र करो। यद्यवश्यमियंवध्याश्राद्धरूपेणयोज्यताम् ॥५३।। ऐसा करने से मारनेका दोष हमको न लगेगा क्योंकि पितृलोग भीइसकों अमय समझते हैं । श्राद्धनिभोज्यमानायां पापं नश्यतिनोध्रुवम् ॥५३॥ तब सब ज्येष्ठ भाईयोंने श्राशादी अच्छा श्राद्धकेलियेही वधकरो ऐसाविचार कर सबसे छोटेने श्राद्ध करने का उद्योग किया तब दो भाइयों को दो और तीन भाइयोकोपितृब्राह्मण और एकको अतिथिधनायो अर्थात् पते छोटापाका हुआ इसप्रकार उन.सबने उस कपिलाको मन्त्रपूर्वक श्राद्धविधानसे भक्षण कर लियाहस के उपरान्त सब हत्यारोंने गुरुसे.कहा कि करिलाको शेरने खा लिया बछड़ा पाप लीजिये गुरुमहाराजने कुछ विचार किया और जाना कि ऐसाहीमा हागा मरने के पीछे यह सब के सब दशाणं देश में बहेलिये हुए, चं कि पिनरोके भाव सेवा किया था.इसलिये पूर्वजन्मकी जातिका स्मरण बना रहा औरव्याध के रूप में पाप न-करने से और,तीर्थयात्राके प्रभाव से मरने पर कालिजर पर्वत पर सब के लव मृग हुए वहां भी विज्ञान रहने से सुकर्म करने के. कारण मानससरके किनारे पर सातों चक्रवाक हुये फिर इस योनिमें वैराग्य रहा जिस से मरने पर ब्राह्मण हुए उसमें भो योगाभ्यासी फिर वह कालान्तर में परमपद को प्राप्त हुए इस लिये ऋषियोंने कहा है कि जब पितर श्राद्ध से सन्तुष्ट होते हैं तो.धन विद्या स्वर्ग, मोक्ष'पुत्र, धा राज्य और सब कुछ सुख देते हैं। पंडितजी महाराज यदि इस कथाको सत्य माना जाय तो प्रथम यह कठिन मालूम होता है कि वह सातो, ऋषिके बेटे और गर्ग ऋषिके शिष्य.हो जिनको कमी भी किसी जीवको हिंसाका काम नहीं पड़ा इनके पिता और गुरु दोनों महात्मा थे फिरन सातो.से [गाय हिंसाका होना आश्चर्यजनक है, हां भूखे थे शायद ऐसा होगया हो परन्तु इस कर छोटेने कहा कि श्राद्ध के नामसे मारिये पाप न होगा फिर उन सबने सम्मति दे दी भौर श्राद्ध किया जिसके फलसे उन.सब को जातिस्मरणं बना रहा और वह कालान्तर में तर गये क्यों कि श्रीमान् सनातनधर्मियोकी सम्मतिसे जब पितर बड़े कार्योंकोमृतकश्राद्ध करने से देते हैं तो क्या उनको यह भी खबर नहीं कियह माय भूखके कारण मारा चाहते थे पाप न लाने के कारण श्राद्ध करने के बहाने से मार श्राद्ध किया कहिये श्रीमान बिना मानसीसंकल्प होने पर भी पितरोने उनको भारका फल देही दिया क्या यह आश्चर्य नहीं है। पुन: यह अभक्ष्य भोजन था फिर पितरों ने उसको क्यों स्वीकार किया क्या पितर भी ऐसी हिंसा को स्वीकार करते हैं?

(६३ ) मांस से श्राद्ध की आज्ञा और पितरों की तृप्ति । - मत्स्य अ०१७ में लिखा है कि मत्स्य मास से दो, हरिण के मांस से तीन, मेंदे के मांस से चार, पक्षियों के मांस से पांच बकरके मांस से छु। विन्दुओं वाले हरिण के मांस से सात, एण संज्ञक मृग के मांस से अलि, स्कर और भैंसे के मांस से दस, खरगोश और कछुएं के मांस से ११ रौरव नाम की हिरन के.मांस से.१५. महीने तक, मेढा और सिंह के मांस से १२ वर्ष: तक तथा काल शांक जीव और गैंडे के मांस से मनातं बंधों तक पितर लोग तृप्त रहते हैं। दौ मासौ मत्स्यमांसेन त्रीन्मासानहारिणेनतु ।। औरभ्रेणार्थ चतुरः शाकुननाथ पञ्चवै॥३१॥ षण्मासच्छागमांसेन तृप्यन्तुं पितरस्तथा । सप्त पार्षत मसिन तथाष्टावणजेनतु ॥ ३२॥ दशमांसास्तु तृप्यन्ति वराहमाहिषामिषैः ।। शशकूर्मजमांसेन मासानेकादशैवतुः ।। ३३॥ रांरवेणच तृप्यन्ति मांसानि पञ्चदशैवतु। व्याध्यासिंहस्यःमांसमः तृप्तिर्दादशवार्षिकी । कालशाकेन चानन्ता खड्गमांसेंनचैवहिं॥ ३५ ॥ इसी भांति अन्य पुराणों में भी मांस खाने की आशाएं पाई जाती हैं. कहिये घेद की यह प्रामाकि "हिंसा परमो धर्मः कहां रही। सच तो यह है कि, स्वार्थी पुरुष अपने स्वार्थसिद्धि के सन्मुख किसी दोष को नहीं देखता इसी प्रकार श्री सिद्धि को समझिये परन्तु इस पर भी श्राद्ध की सिद्धिनहीं होती क्योकि पौराणिकों का यह ख़याल है कि हमारा किया श्राद्धादि जन्मान्तर में हमारे पितरों को पहुंचता है वह भी पद्मपुराण षष्ठ उत्तरखण्ड अध्याय के लेख से मिथ्या प्रतीत होता है। अब मैं श्रीमान् को इसकी पुष्टि में और एक, कथा सुनाता हूं।यहा कथा भविष्योत्तरपुराणान्तर्गत ऋषिपञ्चमी व्रतोद्यापन 4+ ( ६४ ) विधि में भाई है । जो मुरादाबादीय पं० प्रजरत्न (महर्षिकुमार ) भट्टाचार्य के हिन्दी अनुवाद सहित बम्बई गणपति कृष्णा जी के प्रेस में छपी है। हम - भूल और उसी का हिन्दी अनुवाद नीचे लिखते हैं। अत्रार्थ यत्पुरावृत्तं प्रवक्षामि कथानकम् । पुरा कृत- युगे राजा विदर्भायां बभूवह ॥ १६ ॥ श्येनजिन्नाम राजर्षिश्चातुवयानुपालकः । तस्य देशेऽवसदिनो वेदवेदा- ग - पारगः ॥ १७ ॥ सुमित्रो नाम राजेन्द्र ?.सर्वभूत हिते रतः । कृषिवृत्त्या सदायुक्तः कुटुम्बपरिपालकः॥१८॥ तस्य भार्या सुसाध्वी च पतिशुश्रूषणरता । जयश्री म. विख्याता वहुभृत्याहज्जना:॥१९॥ अतिचिन्तान्विता. साच प्रावृट्काले सुमध्यमा । क्षेत्रादिषु रतः साध्वी व्या- कुली कृत मानसा ॥ २० ॥.एकदा सात्मनः प्राप्तमृतुकालं व्यलोकयत् । रजस्वलापि सा राजन् ! गृहकम चकारह ॥ २१ ॥ भाण्डादीन्यस्पृशद्राजन्नृतौ प्राप्तेऽपि भामिनो । कालेन बहुधा साध्वी पञ्चत्वमगमत्तदा.।। २२ . तस्या भ- र्चापि विप्रोऽसौ कालधर्म मुपेयिवान् । एवं तौ दम्पती राजन् ! स्त्रकर्म वशगौतदाः ॥ २३ ॥ भार्या तस्य जय- श्रीः सा.ऋतुसंपर्क दोषतः । शुनायोनि मनुप्राप्ता. सुमि- रोपि नरेश्वर ! ॥२४॥ तस्याः सम्पर्क दोषेण , वलीवर्दो वभूवह । एवं तौ दम्पती राजन् ! स्वकर्म वशगौ तदा २५ ऋतु सम्पर्क दोषेण तिर्यग्योनिमुपागतो। स्वधर्माचरणा: जाता वुभौ जातिस्मरौ तथा ॥ २६ ॥ सुमित्रस्यच पुत्रो भूद् गुरुशुश्रूषणे रतः॥ २७ ॥ सुमतिनाम धर्मज्ञो देवता तिथि पूजकः । अथ क्षयाहे संप्राप्ते पितुस्तुमुमतिस्तदा२८ - ( ६५ ) भार्या चन्द्रवती प्राह सुमतिः श्रद्धयान्वितः । श्रद्य सांवत्स- रदिनं पितुझं चारुहासिनि ! ॥२१॥ भोजनीया द्विजाभीर पाकसिद्धिर्विधीयताम् ॥ ३० ॥ मुक्तं पायसभाण्डेव सर्पण गरलं ततः। दृष्ट्वा ब्रह्मवद्धीता शुनी भाण्डानि साऽस्पृशत् ॥ ३१ ॥ द्विजमार्याच तां दृष्ट्वा उल्मुकेन जघानह । भा- एडादीनि च प्रक्षाल्य त्यक्त्वा पाकं सुमध्यमा ॥३२॥ पुनः पाकं च कृत्वातु श्राद्धं कृत्वा विधानतः । ततो भुक्तषु विप्रेषु नोच्छिष्टं च ददौ वहिः ॥ ३३ ॥ भूमौ क्षिप्तं तयाशुन्या उपवासस्तदाऽभवत् । ततो रात्र्यां प्रवृत्तायां सा शुनी क्षुधिता भृशम् ।। ३४ ॥ वलीवर्दमुपागत्य भरिमिदमब्रवीत् । बुभु.. चिंताय हे भर्तनदत्तं भोजनादिकम् ॥ ३५ ॥ ग्रासादिक च न प्राप्तं क्षुधा मां वाधते भृशम् । अन्यस्मिन्दिवसे पुत्रो ममलेह्यं ददात्यसौ ॥ ३६ ॥ अद्य मह्यं किमप्येष उच्छिष्टम- पि नो ददौ । पायसान्ने पपाताध गरलं सर्प सम्भवम् ३७ मया विचिन्त्य मनसा मरिष्यन्ति द्विजोत्तमाः । संस्पृष्टं पायसं गत्वा बवाहं ताडिताभृशम् ॥ ३८ ॥ दुखितं तेन मे गात्रं कटिर्भग्नाकरोमि किम् । ततः प्राह स चानड्वान् भद्रे ते पापसंग्रहात् ॥ ३६ ॥ किं करोमि ह्यशक्तोऽहं भारवाहत्व मागतः। अद्याहमात्मनः क्षेत्र वाहितः सकलं दिनम् [४॥ मारितश्चात्माजेनाहं मुखं पद्ध्वा बुभुक्षितः । वृथा श्राद्ध कृतं तेन जाताद्य. मम कष्टता ॥ ४१ ॥. कृष्णउवाच-तयोः संवदतोरेवं मातापित्रोंश्च भारत ! | श्रुत्वा पुत्रस्तथा वाक्यं । ६६) यदुक्तंच तदोभयोः॥ ४२ ॥ पितरौ तो विदित्वोतु. दत्तवान सुमतिस्तदा । तस्या रजन्यां तत्कालंददौतस्यैचभोजनम् ४३ भाषार्थ-इसी बीचमे जो प्राचीन कथाका वृत्तान्त है सो मैं कहता पहिले सत्ययुग में विदर्भनगरी में चारों वर्गों को पालने वाले राजाओं में ऋषिके समान एक राजा श्येनजित् हुवे.थे, उनके देश में अनीसहित वेदों के अन्तका जानने वाला ॥ १६ ॥ १७ ॥ सम्पूर्ण प्राणियों के हितका करने वाला, खेतीके कर्मसे कुटुम्ब का पालन करने वाला एक सुमित्र नामक ब्राह्मण रहता था ॥ १ ॥पड़ी पतिव्रता, पतिकी सेवाम तत्पर अनेक मृत्य (नौकर ) और कुटुम्बियों से युक्त जयश्री नाम वाली उस ब्राह्मणकी एक स्त्री थी।१६एक समय वर्षाकाल में अत्यन्त चिन्ता से युक्त सुन्दर कमर वाली खेतके काम में: लगी हुई उस पतिव्रता. को चिंत अत्यन्त व्याकुल हुभा ॥ २०॥ एक समय उस स्त्री ने अपने ऋतुकाल को आता देखा और हे राजन् ! वह रजस्वला. होकर भी.घरके काम को करती रही ॥२१॥ हे राजन् ! ऋतुकाल प्राप्त होने पर भी उसने भारडादिक सब छुचे और वह स्त्री थोड़े ही समयमें मृत्यु को प्राप्त दुई ।। २२ ॥ और उसका पति भी समयानुसार मृत्युके वंश हुआ इसे प्रकार वे दोनों स्त्री पुरुष अपने कके वश हुये २३ ॥.उस को वह स्त्री जयश्री ऋतुकाल की सङ्गतिके दोषसे कुतिया की योनि को प्राप्त हुई। और हे राजन यह सुमिष ब्राह्मण भी।। २४ ।। उस स्त्रीके संग दोषसे उस समय बलोवर्द. (चैल हुआ हे राजन् ! तब वे दोनों स्त्री पुरुष इस प्रकार अपने कर्मोके वशीभूत हुवे ॥२५॥ ऋतुकाल की संगतिके छोप से वे दोनों पशु योनिकों प्राप्त होकर अपने धर्मके प्रताप से अपने पूर्वजन्म को याद करते हुये ॥२६॥ हे राजन् ! उसी प्रकार अपने किये हुये पहिले पापको भो..याद करते हुये पुत्रके ही घर उत्पन्न हुये। गुरुको अत्यन्तशुश्रूषा करने वाला; धर्मका जानने वाला; देवता और अभ्यागतो की पूजा करने वाला सुपतिनाम : सुमित्रकाः पुत्र था। फिर पिताके क्षयाहक प्राप्त होने पर उस समय वह सुमति ॥ २६॥ २८ ॥ श्रद्धा से युक्त होकर अपनी चन्द्रवती स्त्री से बोला कि है मनोहर हास्य करने वाली प्रांज मेरे पिताको वर्षीका दिन है। २६॥ है अधिक भय करने वाली आज ब्राह्मणों को भोजन कराना उचित है,सो तू जाकर पाक: भोजन.) तयार कर अपने पति सुमतिकी आज्ञा से उस चन्द्रवतो ने सय भोजन बनायेईनासद- नन्तरवीरके पात्र में सर्पने विर्ष छोड़ दिया,उसको देखकर ब्राह्मणों के मरजानके पान. कुतिया ने छू दिया। ३.१.१॥ उस पात्रको एती हुई उस कुतिया को देखकर उस ग्रामण की चन्द्रवती स्त्रीने उसे जलती लकड़ी रा और उसं सुन्दर कमर बाती चन्द्रवती ने भोजन को छोड़ सब पर्सनों भयं से खोरके को उस श्राज मैं को धोकर ॥ ३२॥ फिर दूसरा पाक बनाकर बड़ी विधिले श्राद्ध करके ब्राह्मणों के जोम जाने पर उसने जमीन में पड़ी हुई ब्राह्मणोंकी जूटन वाहर नहीं फेकी जिसले वह कुत्ती भूखी ही रही, फिर रात होने पर अत्यन्त क्षधा (भूख) लगी ॥ ३३॥ ३३॥ अपने पति (बैल) के पास आकर यह बोली कि हे नाथ ! बहुन भूखी हूं। किसी ने मुझे भोजनादि कुछ भी नहीं दिया॥१५॥ आज तो एक ग्रास'तक भी मैंने नहीं पाया, 'इल कारण भूख मुझे अधिक बाधती हैं। अन्य दिन तो यह हमारा पुत्र मुझे भोजन देता था ।। ३६ ॥ आज तो इसने मुझे जरा झूठन तक भी नहीं दी। आज खीर में सर्पका विष गिर गया था ॥ ३७॥सो यह बड़े २ श्रेष्ठ ब्राह्मण मर जायगे। ऐसा मैंने विचार कर खीरको छू दिया, इस कारण यहू ने मुझे बहुत माग || ३८ ॥ उस मारने से मेरा शरीर बहुत दु:खित हुआ और मेरी कमर भी टूट गई, अब मैं क्या करूं? यह सुनकर वह बलीव बोला कि सुभगे। तेरे पाण्के संग्रह से ॥ ३81 मैं भी अशक्त हूँ सो क्या करूं? बोझ के उठाने को प्राप्त है। आजके दिन मैं अपने पुत्रके खेत में सारा दिन चलाया गया ॥४०॥ और इस.मेरे पुत्रने भूनको प्राप्त हुए मेरे मुखको बांधकर, मुझे बहुत मारा, इसने यह आज श्राद्ध वृथा ही किया, क्योंकि मुझे तो श्रीज बड़ा कष्ट हुआ ॥४१॥ इतनी कथा सुनाय भीक. पणजी बोले-हे युधिष्ठिर ! उन दोनों माता पिता के इस प्रकार कथन करते 'समय जो कुछ उन दोनों ने कहा जिसको उनके पुत्र सुमतिने सुनकर अपने मा. सा और पिता जान कर उस रात्रिमें उसी समय उस अपनी माताको भोजन :- दिया॥ ४२ ॥४३॥ अब कहिये पुराणकी पुष्टि पुराण ही रह कर रहे हैं अब मैं इससे मागे आपको वह कथा श्रवण करता हूं कि-गयाभाव से प्रेतभाव नहीं छूटता। देखिये पद्मपुराण षष्ठ उत्तरखण्ड अध्याय १४६ में लिखा है कि-तुङ्गमद्रा नाम नदीके तट पर वर्ण आचारसेयुक्त धनधान्य संयुक्त कोहल नाम ग्राममै श्रात्मदेव एक श्रेष्ठ ब्राह्मण वेदविद्या की विधिमें निपुण रहता था। उसकी-स्त्री धुधुली नाम थी। जिसको पुत्र न होनेका घड़ा शोक रहा करता था। इसी दुःखमें “घरसे निकल बाहर को चल दिया । मार्गमें एक तालाब ले जल पी एफ वृक्षको छाया में बैठ गया वहां थोड़ी देरके पीछे एक सन्यासी जी भी आये । जो बड़े- शान्त चित थे। उनको बिठीकर उनसे प्रश्नोसर करने लगा थोड़ी देर पीछे संन्यासी जीने कहा कि आत्मदेव तुमको क्या क्लेश है। उसने कहा कि विना पुत्रके मैं महादुनी हो रहा हूं-यह सुन संन्यासी जी को घड़ी दया आई फिर योगी महाराज ने आत्मदेवके माथे की अक्षरमाला को देखकर कहा कि तुम्हारे सात जन्म तक पुत्रकी प्राप्ति नहीं है, तुम आग्रह न करो कर्मकी गति बड़ी यसवान है इसलिये बानको प्राप्त होकर सुखी रहो तष मारमदेवने सिसजी से ।

, कहा कि शानसे हमारे क्या होगा किसी प्रकार पुत्र दीजिये वरन् मैं आपके भागे प्राणोंको छोड़दूंगा तब योगीजोने कहा इस प्रकार के पुत्रले तुमको सुख न होगा इतना कद एक फल देकर कहा कि इसको अपनी स्त्रीको देना। तुम्हारे भय- श्यमेष पुत्र होगा आत्मदेव वहां से धरं माये और सवावृतांत स्त्रीसे कह कर वह फल भो उसको दे दिया। उसने भएनो सनीको खुला सव वृतान्त कह कर कहा कि यदि मैंने इसको साया तो मेरे गर्भरह जावेगा । उसको मैं कैसे सह सफूगां जो गर्भ तिरछा होगया तो मेरे प्राण निकल जायगे पुत्र उत्पन्न होने पर बड़े दुःख होते हैं इसलियों में नहीं खाऊंगीता सनीने भी कहा कि ऐसा ही करो जब पतिने पूछो तो कह दिया कि वालिया। इस बीच में उसकी यहिन अपनी इच्छाने उसके घर आई उससोसब अपना वृत्तान्त कह कर कहा कि मुझको बड़ी चिन्ता होरही हैं क्या करतब बहिनने कहा कि मेरे गर्भ है उत्पन्न होने पर मैं तुमको देदूंगी, तुम तब तक गर्भवती कोसमान छिप कर धरमें रहो. और परीक्षाके लिये यह फल गौको दीजिये यह कह वह अपने घरंको गई धुधुलीने पेलाही किया जैसा उसको यहिनने कहा था काल पाफर धुंधुली की बहिन के पुन उत्पन्न हुआ। जो यह धुंधुलीको.चुपके से दे गई तब धुंधुलीने पतिसे कहा कि सुखपूर्वक पुत्र उत्पन्न होगया यह सुन वह बड़े प्रसन्न हुए। और नालोंको दान दिया और जातकर्म किया। घर में गीत होने लगे। सक धुंधुलीने पति से कहा कि हमारे स्तनों में दूध नहीं है । इसलिये मेरी बहिनको धुला दीजिये जिसके एक महीना हुश्रा किं पुत्र होकरमरगया है। इसने ऐसाही किया और उसने उसका नाम धंधुकारा रक्लां वह नित्य पुष्ट होने लगा। त्रिमासे निर्गतेचाथ सा धेनुः सुषुवेर्भकम् ॥१६॥ तीन महीने के पीछे गौके बालक उत्पन्न हुमा जो.सब अंगोंसे सुन्दर दिव्य निर्मल दीप्तिमान था, वालकको देख पात्मदेवने आप ही इसके संस्कार किये यहुधा मनुष्य उसके देखनेको भाये, गौके समान कान होने के कारण गौ कर्ण नाम पड़ा. दोनों जग जवान हुए तो गोकर्ण तो पण्डित और ज्ञानी हुए और धुंधकारी महादुष्ट जो खेलते हुए बालकों को कुर में डाल दिया करता था, 'जिसने वेश्याप्रसंग से पिलाके सर्व द्रश्यका नाश कर दिया तब पिताने कहा कि इससे तो बिना पुरके मैं अच्छा था योगीके वचन सत्य हुए अब मैं कहाँ जाऊं क्या आगमें या कुएं में गिर कर प्राण देई इतने में गोकर्ण भाये और उसने उनको उपदेश दिया कि कौन पुत्र है, उससे कुछ नहीं तुम बन में जाकर भानन्द फरो। पिता पुत्रके उत्तम यवनों को सुन धनमै जा भानन्द करने लगे इधर धं धारोने माताले कहा कि वर शतजामो नहीं तो मैं तुझको मार दाहंगा.

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वह दुखी होकुएं में गिर कर मर गई..जिसको निकाल गोकर्णने उसकी जाति
के.ब्राह्मणों को घुला कर दाहकर्म कराया, और धुंधकारी घेश्याके साथ आनन्द
करने लगा फिर उस धेश्याने श्राभूषणाऔर वस्त्रों की इच्छा प्रकट कर कहा कि
भाप हमको दीजिये परन् अन्य पुरुषके पास चली जाऊंगी यह रात्रिको चोरी
कर लाया और उसको दिया फिर तो वेश्या अमूल्यभूषण वस्त्र देखकर विचार
करने लगी कि यह चोरी करके लाता है किसी दिन राजासे मारा जायगा इस
लिये हमको रसको मार द्रव्य लेकर पृथक् हो जाना चाहिये, यह सोच उसका
गला.फांस कर मारा जय वह इस प्रकार न मरा तो जलते हुए अंगार उसके
मुल पर रख दिये वह मर गया और महाप्रेत हुआ इधर गोकर्ण उसको मरा
जान तीर्थयात्राको गया और गया में उसका थाद्ध कर घरको आगया, एक दिन
गोकर्ण अपने मकानमे सोरहा था उस समयधुंधकारीने अपना भयंकर रूप
धारण कर उसको दिखलाया,गोकर्ण के पंचने पर उसने अपना पिछला सब
वृत्तान्त कहा कि मैं धंधकारी नामक तुम्हारा माई हूं,अपने कर्मदोषसे प्रेत दुमा
है, माताको वात दु:ख दिया, वह कुए में गिरकर मर गई, फिर.धनके लालच
से मुझको फांसीदेकर मारा,और मुंह पर अंगारे रखकर जला दिया, इससे मैं
प्रेतमाव को प्राप्त हुमा,अब आप.सुझ को प्रेतभाव से छुटाइये यह सुन गोकर्ण
तेदुःखी होकर धुंधकारी से कहा कि मैंने तुमको मनुष्यों के मुबसे मृतकामा
सुनकर गयाजी में पिंड़ दिया था, तुम प्रेत कैसे हो गये, गयाजी में पिडदेने से
दुर्गतिवान को भी शुभंगति निस्संदेह प्राप्त होती है, तुम कैसें स्वंग को नहीं
गये भाई गोकर्ण..महात्मा के वचन सुन. अन्याय १६७
तुभ्यं दत्तोमयां पिंडों गयायां त्वामहं मृतम् । १७ ॥
श्रुत्वा लोक मुखाद्भातस्त्वं कथं प्रेततांगतः ॥
गया पिंड प्रदानेन दुर्गतीपि शुभांगतिम् ॥१८॥
दुनिनात्मा धंधकारी ने कहा कि सौ गयाके श्राय से मेरी मुक्ति
होगी, हमारे उद्धार के लिये भापकों दूसरा उपाय करना चाहिये जिसको गौ-
का मुन विस्मय होकर बोला-
धुंधकारी दुखितात्मा प्रोवाच पुरतः स्थितः।
गया श्राद्ध शतनापि न मे मुक्तिभविष्यति ॥५०॥
:::उपायोन्यश्चिन्तनीयो.ममोद्धाराय वैत्वया।
इति तदाक्यमाकराय गोकर्णो विस्मयं गतः ॥५१॥

. श्राछों से मुक्ति नहीं है तो तुम्हारी असाध्य गति है, है प्रेत इस समय तुम निर्भय होकर अपने स्थानको जाओ, यह सुन धंधकारी अपने स्थान को गया, फिर गोकर्ण ने जान विरादरी कुल बान्धवों धर्मशास्त्र के जानने वाले याह्मणों से रात्रिका सर वृतान्न कहा परन्तु किसी ने उसका उपाय न बताया तब मव बाह्मणों ने सूर्यनारायणको स्तुतिको उस समय सूर्याजीने कहा कि धुंधकारीके महापापको शान्तिके लियेगोकर्णको श्रीमद्भागवतका सप्ताह सुनाना चाहिये घड उसको उद्धार करेगा। श्रीभागवत सप्ताहस्तस्योद्ध" भष्यिति ।७२।। यह सुन सब ब्राह्मणोंने प्रसन्न हो गोकर्णसे सब वृत्तान्त कहा तब तंगभद्रा नदीके किनारे पर ब्राह्मणोंका समाज में सव कौतुक :देखने के लिये नगरकी प्रजा श्राई तत्त्वंप्रर्थक जानने वाले श्रेष्ठ :धका गोकर्णजीने सावधान होकर आसन पर बैठ ॥७॥ गोको ज्ञाततत्त्वार्थो वक्ताध्यासनमास्थितः ॥७६॥ नारायण आदिक देवों को नमस्कार कर सप्ताह का प्रारम्भ कर बोलेकि धीहरिजीके वचनरूप.शास्त्रचरणकमससे उत्पन्न तीर्थ ॥७॥ नारायणादिकान्नत्वां सप्ताहं समवर्तयन् ।... श्रीहरेस्तु वचः शास्त्र तीर्थ पादाब्ज संभवम् ॥७७॥ जो सत्य है, तोधुंधकारी गति को प्राप्त हो जावे, इसी प्रकार मनसे श्रीमद्भागवत नाम का संकल्प कर Hel यदि सत्यं तदाप्नोतु धुंधुली तनयोगतिम् । इति संकल्प्य मनसा श्रीमद्भागवताभिधम् ।।७वा जन्माद्यस्यवतः" यहाँ से लेकर "धीमहि के अन्ततक-अर्यात पहिला श्लोक पूरा पढ़ चुके हैं, तिसी समय.धुंधकारी प्रेत श्राकर इधर उधर अगर बैठने को ईद कर- तत्र प्रेतः समागत्यं स्थानं पश्यन्नितस्ततः॥७ell सातं गांठ से युक्त दासं में पवन का रूप धारण कर प्रवेश कर गया और वे वैष्णव ब्रमबारे सुनते र प्रतिदिन उसो बांसको गड चिद में । - - - (७१.) "स्थित होकर सुनने लगा, जब पहिले दिन कथा समाप्त हुई, तब बांस की एक गांठ फट गई, यह अत्यन्त अद्भुत कौतुफ हुआ दूसरे दिन दूसरीगांठ फटी इस प्रकार एक २ गांठ फटती रही सातवीं गांठके भिन्न होने पर धुंधकारी शीघ्र ही प्रेतभाव को छोड़कर सुन्दर रूप धारण कर तुलसीदल से सुशोभित हो पीताम्बर धारण कर मेधों के समान भूषणों से युक्त हो प्रकाशित होगया सम्पूर्ण तत्वष्टि होकर गोकर्ण भाईको नमस्कार कर बोला हे भाई! आपने दया कर", प्रेतके कष्टसे हम को छुड़ा दियां । भागवत की वाती धन्य है ? बैसेही विष्णु लोककी गति देने वाला सप्ताह भी धन्य है। जिसके प्रभाष से प्रेतभावसे अत्यन्य व्याकुल मैं विमुक होगया। त्वयाहं मोचितो वन्धो । कृपयां प्रेतं कश्मलात् । धंन्या भागवती वार्ता प्रेतत्वोन्मूलिनी श्रुता ॥५॥ समाहोपि तथा धन्यो विष्णुलोक गतिप्रदः । यत्प्रभावाद्विमुक्तोह.प्रेतभावाभृशातुरः ॥६॥ आदं शुष्क लघुस्थूल वाङ्गनः कर्मभिः कृतम् । पातकं भस्मसात्कुर्यात्सप्ताहोऽग्निरिवेन्धनम् ॥८॥ नोट-अब भाप यह बतलाइये कि गोकर्णे के गया श्राद्ध से धुन्धकारी का प्रेतत्व नहीं गया फिर मुक्ति कैसी ?.फिर अन्यों के जाने का प्रया, ममाण, हां सूर्य नारायण की सम्मति से जब श्रीमद्भागवत का सप्ताह सुनाया तो उसको प्रेतत्व गया। अव बतलाइये, दोनों में कौन ठीक है इसके उपरान्त यह भी.विचार कीजिये कि जब व्यासजी ने १७ पुराणों के..पश्चात् भागवत् को. बनाया तो उससे पूर्व प्रेतों की.मुकि किस प्रकार हुई ? भीमान् वास्तव में न गया में पिण्ड देने से प्रेतत्व छूटता है न सप्ताह सुनने से । यथार्थ में मनुष्य अपनेर कम्मों का फल पाता है न कि अन्य कर्मों का फल जैसा कि मैं आपको पूर्व सुना चुका हूं। इस लिये आप स्वये जान लीजिये कि मरोका गया आदि में श्राद्ध क्या लाभ देता है। सच तो यह है कि स्वार्थी पुरुषों का उस्ता- दी है अपने स्वार्थ की विचित्र कथायें लिखते रहे और अन्त में वह सब-ऋषि... व्यास महाराज के सिर पर चपेट दी। इस कथा में गौ के पेट से मनुष्य की उत्पत्ति लिखी है, यह भी एक फल के खाने से, उसपरभी आप विचार करें। देखिये महामारत अनुशासन पर्व अध्याय ३१ में लिखा कि युधिष्ठिर महाराज पितामह से पूछते हैं कि किस काल में किस मुनिने धौद्धकोचलाया : " .

४) केन संकल्पितं श्राद्ध कस्मिन्काले किमात्मकम् । भृग्वाङ्गिरसके काले मुनिनाकतरणवा ॥१॥ इसको सुन भीमजी ने कहा कि हे राजन् ! अत्रि के गोत्र में एक निमि नाम के भूपि हुए उनका पुत्र भीमान् इमा जो कुछ काम के पीछे मरगया जिसके विरह में वह रात दिन न्याकुल रहते थे जिससे उनकी बुद्धि विक्षिप्त हागई जिससे वह अपने पुत्र श्रीमान के वान पान, बैठना, उठना, चलना फिरना आदि उसकी क्रियाओं का स्मरण करते रहते थे। एक अमावस्या को कुछ ग्राह्मणों को बुला दक्षिणाप्रकोपों पर बिठा स्वयं शुचि हो लवए वर्जित भोजन कराया और दक्षिणाप कोण पर श्रीमान् के नाम और गोत्र का रुचा- पण कर कुछ पिण्ड अपने मृतक पुत्र के नाम पर रक्ले सो उनको शोक हुआ। तत्कृत्वा समुनिश्रेष्ठो धर्मशङ्करमात्मनः । पश्चातापेन महता तप्यमानोभ्यचिन्तयत् ॥१६॥ इससे प्रथम इस कर्म को किसी मुनि ने नहीं किया। हाय यह मैंने क्या अनुचित कर्म किया ऐसा न हो कि ब्राह्मण मुझको भस्म करदें। अकृतं मुनिभिः पूर्व किं मयेदमनुष्ठितम् । कयं नु शापेन न मां दहयुर्ब्राह्मणा इति ॥१७॥ इस प्रकार चिन्ता करते हुये अपने कर्ता भत्रि का स्मरण किया ये भा- कर सर समझागये कि अब चिन्ता न करो ब्रह्मा में इस कल्प को विचारा था अब तुमने उनका भारस्म करदिया। भीम जी कहते हैं कि इसी निमि से यह 1 भाइचला। निमः संकल्पितस्तेयं पितृयज्ञस्तपोधन ! ॥२०॥ इसको विशेषता से जानने के लिये हम धाराहपुराण से निमि की कथा नुनाते हैं। निमि और महात्मा नारद का सम्वाद । वाराहपुराण प्रणय ११ में लिखा है कि मनु के वंश में अमेय नाम ब्राह्मण जिसका पुत्र निमि और इसका पुत्र श्रीमान् जो बड़ा तस्त्री था .काव घश हो परलोक गमन करगया जिसके कारण महात्मा निग्नि रानदिन शोकातुर . . रहने लगे कुछ दिन व्यतीत होने पर माघ मास की द्वादशी को महात्मा के मन में यह विचार उत्पन्न हुआ कि पुत्र का श्राद्ध करना चाहिये, यह विचार कर उसने बहुत प्रकार के मूल, फल, कन्द और मासादि अनेक प्रकार के भक्ष्य पदार्थों को इकट्ठा करके- यानि तस्यैव भोज्यानि न सूलानि फलानिच । यानिकानिच भक्ष्याणि नवश्वरस सम्भवः ॥३१॥ आमन्त्र्य ब्राह्मण पर्व शुचिर्भूत्वा समाहितः ॥३॥ वाराह सस्कृत १८७ अध्याय ।। ब्राह्मणों को निमन्त्रण के पुत्र का स्मरण कर विधान और भक्ति से ध्राह्मणों को भोजन करा दक्षिणा दे विसर्जन कर, दक्षिण दिशा में भूमि पर फुयों को बिछा उसके ऊपर नाम और गोत्र का उच्चारण कर पिण्ड दान किया फिर समाधि से परमात्मा का ध्यान कर बहुत रात्रि व्यतीत होने पर पुत्र शोक से व्याकुल होकर कहने लगा यह लाद्ध आज तक किसी ने नहीं किया मैंने मोहवश यह काम किया जो पिण्डदान पुत्रके निमित्त दिया। प्रकृतं मुनिभिः सर्व किं मया तदनुष्ठितम् ॥३१॥ यदि मेरा कृत्य मुनियों को विदित हो तो शाप देकर उसी क्षण भस्म . करखें। " कथं ते मुनयः शापात्प्रदहेयुनमामिति ॥४२॥ यदि इस कर्म को देवता, भसुर, गन्धर्व, पिशाच, सूर्य और राक्षस जोगले तो हमको क्या कहे?" सदेवासुर गन्धर्व पिशाचोरग राक्षसाः। किं. वक्ष्यन्ति च मां सर्वे ये वैपितृपदे स्थितः ॥४२॥ हाय हमने बिना विचारे क्या किया। इस प्रकार रात्रि गई दिन आया फिर कहने लगा कि हाय लोक में निन्दा हुई और पुत्र का प्राण भी न मिला। इम पड़े मूर्ख हैं। हमारे पढ़ने, योग फरने और ज्ञान को धिक्कार है इसभांति : अनेक प्रकार से रुदन कर रहे थे कि इतने में महात्मा नारद जी पधारे जिनका. मुनि ने सत्कार कर बिठाया और निमि उनके सन्मुख खड़े हुए जिनको देख नारद मुनि ने कहा कि इस विषय में महात्मा जन. कुछ विचार नहीं करते क्योकि लपका जीवन प्रायु के अनुकूल होता है काल आनेपर कोई एक चांस भी नहीं ले सक्ता! तब मुनि ने कहा कि मैंने स्नेह में फंसकर पुत्र के निमित्त सात ब्राह्मणों को भोजन कराया और दक्षिणा दे विसर्जन किया। भूमि में कुश : रख दक्षिण सुख हो जल के साथ, पिण्डदान दे नाम उच्चारण किया । हे महात्मन् ! यह शोक मोह के वश होनेसे जो अयोग्यकर्म हुआ सो माप- 'हमको नष्ट बुद्धि जानकै क्षमा करें और ऐसा उपदेश करें जिस के करने से छमारा पाप दूर हो और यह कर्म जो हमने किया वह पहले महात्मा, ऋषि और मुनि किसी ने नहीं किया इस कारण मैं बारम्बार भयभीत होरहा हूं। अनार्य जुष्टमस्वयंमकीर्ति करणं द्विज ।। नष्ट बुद्धिः स्मृतिः सत्वोह्यज्ञानेन विमोहितः ॥६४॥ न च श्रुतं मया पूर्वं न देवऋषिभिः कृतम् । भयं तीनं प्रपश्यामि मुनिशापात्सुदारुणात् ॥६५॥ -वाराह संस्कृत ०.१८७। ६५ कृपा करके हमारे भय को दूर कीजिये तब नारद जी ने कहा कि- भय मत करो पितरों की शरण में, प्राप्त हो तो आपने किया है उसमें किसी भांति का अधर्म नहीं है केवल धर्म ही है, इसको सुन निमि ने मन, वच, कर्म से प्रार्थना की कि पितरों में प्रापकी शरणहूं, इतना कहते ही निमि का पिता पितृलोक से पाया और निमि को पुत्र शोक से दुःखी देख समझाने लगे कि तुमने पितृयज्ञका संकल्प किया है. इस धर्म की ब्रह्मा जी ने पितरों के लिए स्वयं शाया दी है इसलिये यह यज्ञ करना योग्य है। . पितृयज्ञति निर्दिष्टो धर्मोऽयं ब्रह्मणास्वयम् ॥ इस पर नारद ने ब्रह्मा जी.को प्रणाम कर पितृ यज्ञ का विधान सुनाया कि जलने जन्म लिया है उसकी मृत्यु अवश्य होती है और मरने पर धर्मराज की शेक्षा पालन करनी होती है। जन्म लेकर जितने जीवातें हैं उनमें कि- सीका अमरत्व ( अर्थात् मृत्यु न हो) नहीं होता। इसलिये हे निमि ! जिसने . । ७५ ) जन्म लिया है यह अवश्य मरेगा और मरा हुमा अवश्य जन्म लेगा इसलिये वह कर्म करना उचित है जिसके करने से मनुष्य के लय पारों का प्रायश्चित तथा मुक्ति प्राप्त हो। हे निमि विचार करो कि सात्विक, राजल और तापस इन तीन गुणों के अनुसार मनुष्य फर्म करते हैं और वली भांति उनकी गति होती है। सात्विक कर्म करना कठिन है राजस और तामस कर्म करने से मनुष्य अल्पायु और अल्प बुद्धि होते हैं । सात्विक कर्म करने से प्राण त्यागने पर देवता, राजस से मनुष्य तथा तामस नारने से राक्षस होता है। हे निमि ! धर्मशान. वैराग्य और ऐश्वर्यादि कर्म को साविक कहते हैं । क्रूर, मिथ्यावादी और जीवहिंसक, लज्जाहीन और विषाद करनेवाला तामस कशाता है। जिस के करने से मनुष्य प्रेतयोनि में प्राप्त होता है। राजस गुण वे कहाते हैं कि जिनसे मनुष्यों में मान अभद्धा और नाना मांति के भोगों की इच्छा अपनी प्रशंसा और जिन्हों में यह धर्म है सो साविक गिने जाते हैं शान्ति, दान, ज्ञान श्रद्धा, नपं ध्यान भादि करने से स्वर्ग व मोत दोनों का अधिकारी होता है इसलिये निमि निज पुत्र के मरने फा शोक न करो। शोक करने से बुद्धि, घले और देह इन तीनों की हानि होती है इन्हीं को हानि होने से लज्जा, धृति, धर्म कीर्ति, लक्ष्मी, नीति, स्मृति और विवेक यह सब नष्ट होजाते हैं । इस लिये हे निमि ! इन बातों कोविचार कर आप शोक त्याग कीजिये। लज्जा धृतिश्चधर्मश्च श्रीः कीर्तिश्चस्मृतिर्नयः । त्यजन्ति सर्व धर्माश्च शोकेनोपहतं नरम् ।। एवं शोक त्यजित्वातु निःशोको भव पुत्रक ! fier इसके पश्चात् फिर नारद जी ने मरण समय का कृत्य और श्राद्ध की सब क्रिया संक्षेप से निमि को सुनाई जिसको सुन निमि ने अपने को धन्य माना इस पर नारद जी ने कहा कि हे निमि । तुमने निज प्रेत पुत्र के निमित्त जो श्राद्ध किया है या आजसे चारों वर्णी के सद मनुष्य करेंगे। कर्तव्यां एव संस्कारः प्रेतभाव विशोधनः । नेमि प्रभृतिभिः शौचं चातुर्वण्यस्य सर्वतः। भविश्यति न सन्देहो दृष्टपूर्व स्वयम्भुवाः ॥७॥ कृत्वातु धर्म संकल्प प्रेतकार्य विशेषतः । ७ - 1 न भेतव्यं त्वयापुत्र प्रेतकार्ये कृते सति ॥७६॥ तस्मात्प्रभृति लोकेषु पितृयज्ञो भविष्यति । एवं यास्यसिवत्सत्वं न शोकं कर्तुमर्हसि ॥ धाराहपुराण संस्कृत अ० १८८ श्लोक ७७॥ और तुमको इसके करने से अच्छा लोक प्राप्त होगा। तुम शिवलोक, विष्णलोक, ब्रह्मलोक आदि लोकों में जहां इच्छा करोगे इस कर्म के प्रताप से बछांही प्राप्त होगे। शिवलोकं ब्रह्मलोकं विष्णुलोकं न संशयः ॥ श्री पण्डितजी ! इस व्याख्यान में विचारना यह है कि निमि महा- स्मा स्वयं प्राप वर्णन करते हैं कि मैंने मोह से पुत्र के निमित्तपिण्डदान किया जिस पर सी पुत्र न मिला । हे नारद! ऐसा काम प्रथम किसी ने नहीं किया यदि निमि और नारद के सम्बाद को सत्य मानाजावे तो यह भी सत्य मानना पड़ेगा कि निमि ले प्रथम इस कार्य को किसो ने नहीं किया तो भला निमिके पुत्र से प्रथम जितने पुरुषों फामरण हुआ उनको कौनसे फर्मों ने श्रानन्द दियाइस के उपरान्त जय नारद जो से मिलाप हुआ तो निमि ने अपनी भूल को फिर । वर्णन किया तब नारदजी ने पितृयज्ञ का जहां विधान है सुनाया। वह कौन है ओ जन्मता है, वह मरता है जो मरता है वह जन्मता है इसलिये मनुष्यों का ऐसे कर्म करने चाहिये जिससे मुक्ति हो और मुक्ति सात्विक अर्थात् शान, वैराग्य श्रादि के द्वारा प्राप्त होती है। इसलिये हे निमि, तुम मोह को त्यागकर जाय॑ करो क्योंकि मोह से धृति, धर्म, कीर्ति, स्मृति और विवेक जातारहता है। इसके उपरान्त यदि मृतकश्राद्ध से कुकर्मी जीव नरक से बच जाते हैं तो फिर पितृ श्राद्ध में नारद महाराज ने यह क्यों कहा कि सात्विक कर्म करने से मोन होती है फिर भला जो मरता है वह जन्मता है और जहां जन्मता है वहाँ कर्म करता है तो फिर भला श्राद्ध करके किसको नरक से पार किया जाता है। भला पण्डित जी जब कर्म को प्रधान माना तो सम्पूर्ण आयु के अच्छे फम्मों का फल श्राद्ध न करने से कभी मिट सकता है। इसी भांति सारी मायुचुरे कर्म करनेवाले के पुत्रके श्राद्ध करने से पाप मिट सकते हैं ? कदापि नहीं? यदि ऐसा होता तो फिर क्या? नहीं नहीं प्रत्येक को अपने कामों के फलों को भोगना पड़ेगा। , श्रीमान् ने शिवपुराण, वाराहपुराण, भविष्यपुराण से श्राद्ध के विषय को सुना इनसे भी अनोखा श्राद्ध जोवित मनुष्यों के हितार्थ सुनाता हूं अर्थात् जब कोई माता, पिता, भाई इत्यादि परदेश में हो या कारागार में हो तो वह अपने घर से उन मनुष्यों की तृप्ति अच्छे प्रकार से कर सकते हैं। न जाने हमारे सनातनी भाइयों ने इसको क्यों भुला दिया । अतएव. इसको सुन कर कार्य में लाना चाहिये । देखिये विष्णुपुराण चतुर्थ अंश अध्याय १३ में लिया है-एक समय श्रीकृष्णचन्द्र महाराज के एक सम्बन्धी का मणि चोरी होगई और वह मणि की चोरी श्रीकृष्ण महाराज को लगाई गई परन्तु यह मणि ऋतराज के विलमै पहुंच गई थी क्योंकि चोर और ही था उससे सिंहको मिलो और सिंहसे ऋतको मिली थी फिर कृष्ण महाराज ऋक्ष के साथ युद्ध करने को उसको गुफामें घुस गये थे और अपने साथियोंको द्वार पर खड़ा कर गये। गिरितटे च सकलमेव यदुसैन्यमवस्थाप्य । सात आठ दिन के भीतर श्रीकृष्ण महाराज को लौट कर न भाते देख साथियोंने जाना कि श्रीकृष्णजी को शत्रुने मारडाला अतएव वे सय द्वारिका- पुरी को लौट आये और उनके भाइयों से सवहाल कहदियात सय भाइयोंने उनकी श्राद्धादि क्रियाको जिसले श्रीकृष्ण जी के प्राणों की रक्षा होती रही। श्रद्धादत्तविशिष्ठपात्रोपयुक्तान्नतोयो । दिनाकृष्णस्यबलप्राणपुष्टिरभूत् ॥ २७ ॥ अन्तको कुछ काल में ऋक्षको जीत श्रीकृष्णजी मणि ले घर आये। श्री पं०जी ..-महाराज अव आप भले प्रकार समझगये होगे कि यह जीवितावस्था में भीकृष्ण महाराजका श्राद्ध किया गया जिससे वह पुष्ट होते रहे। पण्डितजी ने कहा कि सेठजी अथ इस विषय को समाप्त कीजिये पष्टुत होगया। सेठजी -श्रीमान को जैसी प्राशा मैं वैसा ही करूंगा परन्तु अब भाप विचार तो कीजिये कि वेदों में तो मतकश्राद्ध का विधान है ही नहीं उन्हीं के अनुसार पुराण भी पुकार २ कर कह रहे हैं कि श्राद्ध करने से कुछ लाभ नहीं हाता जैसा कि अपने पद्मपुराण अ० १६६ के इतिहास को श्रवण किया कि धुशकारी की श्राद्ध हो नहीं किन्तु गया में पिण्डेदान देने से भी मुक्ति नही हुई श्री पं० जी जब पुराण ही बतला रहे हैं कि निमिने श्रौद्धको चलाया फिर किस प्रकार श्राद्धविधि वेदोक्त हो सकती है। श्री पं० जी-लेठजी इतनी ही कथाओंसे मैंने भले प्रकार समझ लिया कि केवल स्वार्थियोंने अपना प्रयोजन सिद्ध करने के लिये इन कथाओंको गढ़ लिया और महर्षिके नामको पदनाम किया लालाजी वेद, बुद्धि और सृष्टि- क्रमके विपरीत यातो, गणेश महाराज की उत्पत्ति और मृतकश्राद्धको कथा ओंको सुन मेरी आत्मा तृप्त हो गई अब मैं इस समय पुराणलीला को नहीं सुनना चाहता हा मैं जिन पुराणों पर बड़ा ही विश्वास करता था उनको लीला- ओंको सुन आज मेरी पुराणों से बहुत ही अश्रद्धा होगई सेठजी भव आप इतने - विषय को भी मुद्रित करा दीजिये। देखें हमारे भाई इनका क्या उत्तर दें मैं तो आज से ही अपने यजमानों को समझा बुझा इन मिथ्यारीतियों को उनसे छुटा वेदोकविधिका पालन करना सिखाऊंगा। धन्य है स्वामी दयानन्द सर- स्वतीजी महाराज को फि जिन्होंने वेदोकमार्ग बतलाकर हमको श्रेष्ठ विम बनाया मैं तन मन से महात्माजीके चरणोंको सिर नवाता हूं तदनन्तर आपको श्राशीर्वाद देता हूं किपरमपिता परमेश्वर आपको सब प्रकारके प्रानन्द मंगल दै और अपने कटुवाक्योंके कहने की क्षमा मांगता हुआ आपकी सहनशीलता का धन्यवाद देता हूं परमात्मा श्रापको अधिक सहनशक्ति देजिससे आप नाना प्रकार के कटुवायों को सहन करते हुये देशका तन मन और धन से उपकार करें अन्य सज्जनों ने कहा कि सेठजी व हम सब भी पुराणों की लीलाओको सुन संतुष्ट हो गये अब और बल कर पुन:- अन्य महाशयों की ओरसे लाला शङ्करलालजीने खड़े होकर कहा कि मैं आज श्रीमान् पण्डितजीको तथा सेउजीको धन्यवाद देता हूं जिनकी परमकृपा से हम लवको पुराणों की अपूर्व और अद्भुत वातों के सुनने का अवसर मिला पुनः हम श्री स्वामी दयानन्द सरस्वती जी और उनके गुरु स्वामी विरजानन्द सरस्वती जी महाराज का कोटानुकोटि धन्यवाद देते हैं कि जिनकी कृपासे हमारे धर्मकी रक्षा हुई। सेठजीने--कहा कि मैं प्रथम उससर्वशकिमान् जगदीश्वर को कोटिशः धन्यवाद देता हूं कि जिनकी महतीरुपाले मेरी इच्छा पूर्ण हुई पुनः श्रीमान पण्डित रामप्रसादजी और पाप सज्जनौको धन्यवाद देता हूं किजिन्होंने अम्- ( 8 ) , ल्यसमय को प्रधान कर मेरी भनोकाममा सिद्धकी श्राशा है कि श्रीमान् तथा आप सब निष्पक्ष होकर सत्य ग्रहण करेंगे। । इसके पश्चात् मैं न्यायकारी वृटिश गवर्नमेण्ट का धन्यवाद देता कि जिसके श्रेष्ठशासन में प्रत्येक मनुष्य अपने विचारों को प्रकट कर सकता है हे ज.दीश्वर ! हमारे ऊपर ऐसी न्यायशील, गवर्नमेंट का शासन सदा रहे जिनके राज्यमें शेर और बकरी निर्भय होकर एक घाट पानी पीते हैं इसके पश्चात् महाशय छवम्मीजालजी भजनोपदेशक ने श्री.पं. रवि- शङ्करजीशर्मा संरक्षक महाविद्यालयस्वालापुर निर्मित भजन हारमोनियम पर गाया। टेक मेरी यह अर्ज जगदीश्वर, व्याकर आप उनसीजे। हमारे जार्ज पञ्चम को, चिरायुः हे प्रभो! दीजे । दयामय आप हैं स्वामिन् , अदल भी आपका कामिल । हमारे राजराजेश्वर को, दोनों ही अदा कीजे । १ ।। दया से दुःख को मेटे, भदल से सुख फैलावें। - तेरी भक्ती में चित लावे, यह शक्ति दान दे दीजे ॥२॥ करें सम प्यार पुत्रों पर, वह गोरा हो चाहै काला। पिताके धर्म हैं जितने, वह सारे ही सिखां दीजे ॥३॥ बताया राजकामारग, पिता तुमने जो वेदों में । उसी मारगका अनुयायी, शहनशाहको बना दीजे ॥४॥ विनय अन्तिम ये शर्मा की; पिताजी.आपसे हरदम । हरिश्चन्दर सा करावादी, करण सां दानी कर दीजे.॥ ५॥ जिसको सुन सब महाशयों ने करतलध्वनि से प्रसन्नता प्रकट कर श्री पञ्चमजार्ज महोदयको धन्यवाद दिया पुनः सेठजी ने निम्नलिखित मंत्र को पढ़ शान्ति की। द्यौः शान्तिरन्तरिक्षधेशान्तिः पृथिवी शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्ति वनस्पतयः शान्तिर्विश्वेदेवाः शान्तिब्रह्मशान्तिः सर्व शान्ति शान्तिरेष शान्तिः सामा शान्तिरेधि।

.
श्री पण्डितजी --न चलने की सय्यारी की।
सेठजी--ने खड़े होकर हाथ जोड़ षड़ी नन्नता से श्रीमान् को नमस्ते
अन्य महाशयो को यथायोग्य कहा।
श्री पण्डितजी ने प्रसन्नतापूर्वक श्रायुष्मान् कहा और चलाइये।
अन्य सज्जनोंने यथायोग्य कहा सेठजी'भपने कार्य में लगगये ।।
।
इति विंशति परिच्छेदः ।
।
समाप्तोय पुराणतत्वप्रकाशस्यतृतीयोभागः ।

* ओ३म् *
गृहस्थाश्रम का दूसरा भाग
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कृपा कर एक बार इस विज्ञापन को पढ़. अपने पुत्र
'पुत्रियोंको पढ़ाकर इष्टमित्रोंको भी पाठ कराइये
अर्थादर
पुत्री-उपदेश
मूल्य १
H
गृहस्थाश्रम अर्थात् नारायणी शिक्षा के मथम भाग
का आपने इतना पान किया है जिसका संरकी वन में भी ध्यान न
या आपने उसकी चौबीस हज़ार कापिया:हाथोंहाथ खरीदली जिससे
"उत्साहित होकर मैंने उसके दूसरे भाग को जिस परिश्रम और चि-
चार तयाँ खोजसे लिखा है, उसका आनन्द मुझको जवही पास होगा जेष
आप स्वाध्याय कर अपने पुत्र त्रिों और स्त्रियों को पाठ करायेंगे
इस पुस्तक के लिखने का मुख्य अभिप्राय यह है कि गृहस्थाश्रम किस..
प्रकार वास्तविक गृहस्थाश्रम बन सकता है आप इस... पुस्तक को
वेद, उपनिषदों स्मृतियों का सॉर, गीता, महाभारतादि का
तत्व, प्राचीन और अर्वाचीन तत्ववेत्ताओं के मालूमात का
,
.

. खज़ाना समझिये, हकीकत में किताब क्या है मानो गृह- स्थाश्रम को स्वर्गधाम बनाने की कल है, जीवन-सुधार की कुञ्जी है, अानन्द और प्रेम उत्पन्न करने का वाला है। पूर्ण आरोग्यता, अपूर्व वल, उत्तम वुद्धि और सुयोग्य सन्तान उत्पन्न करने के लिये आश्चर्यजनक सद् वैद्य । सर्वत्र मान प्रतिष्ठा करने का उस्ताद । अन्य देशों से भारत में धन बँचलाने का एंजिन रूपी मित्र है। सन्तान सुधार और मुयो- ग्य बनाने का प्राचारी, मनुष्यजीवन के पाला उद्देशों का बतानेवाला कर्मयोगी है जिसके बिना आप अपने देश, जाति और कुल का गौरव नही रख सकते मैं आपको इस पुस्तक की सूची कहांतक सुनाऊं सच मानिये किताब की उपयोगता विषयों की गम्भीरता, भाषा की लालित्पना हाथ में लेकर पढ़नेहोसे मालूम होगी, उस समय श्राप स्वयं इसकी प्रशंसा करने लगजायेंगे। इसकी तारीफ़ में अनेकान प्रशंसापत्र आचुके हैं जिनसे हम भापको कुछ सुनाने हैं- श्रीमान् बाबू गोपेश्वर जी उपमंत्री श्रीमती आर्यप्रोत निधि सभा संयुक्तप्रान्त आगरा व अवध महाशय चिम्मनलाल वैश्य रचित, पुत्री उपदेश नाम पुस्तक वास्तव में कन्याओं तथा स्त्रियों के लिये अत्यन्त शिक्षा पूर्ण है स्त्रियों के लिये जितनी बातें मावश्यक तथा उपयुक्त हैं उन पर शास्त्रों सथा.नीतिज्ञों के वचन लिखकर उनको.भलीभांति समझाया है बहुतसी बातें जो बहुधा स्त्रियाँ जानती हैं परन्तु उनके कारण तथा उपयोग से अनभिज्ञ हैं उनका साफ़ २ निर्णय इस पुस्तक का एक विशेष गुण है लेखक महाशय का प्रयोग सराहनीय है यदि यह पुस्तक विवाह के उपहार में तथा कन्या पाठशालाओं में पारितोषिक के रूप में दी जावे तो इसका वास्तविक उप- यंग हो । कागज छपाई आदि मच्छो केवल दोष इतना है कि किताब बहुत बड़ी है और कहीं २ भाषा कुन लिए है। + न

( ग ) .
भारतवर्ष के प्रसिद्धउपदेशक श्रीमान पण्डित हरिशङ्करमुरार
व्यास।
गृहस्थाश्रम के दूसरे भाग को मैंने भायोपान्त पढ़ा चित्त पर पड़ा
प्रभाव पड़ा । सुन्दर लेख शक्ति, उपचभाव, मनोहर पाक्य रचना बतला
रही है, कि लेखक का जीवन पवित्र है। यदि प्रत्येक गृह में इस पुस्तक
का नियमपूर्वक स्वाध्याय हो तो निःसदेड पुत्र पुत्रियों का जीवन भादर्श
बन सकता है, इसलिये मैं ज़ोर के साथ प्रत्येक गृहस्थ से प्रार्थना करता
इंकि इस उपयोगी पुस्तक को मंगाकर अपने ग्रहों की शोभा को बढ़ावें
और ग्रन्थफर्या को धन्यवाद दें।
श्री पं. महेशीलाल जी डिप्टी इन्सपेक्टर
पुत्री उपदेश पुस्तक क्या है मानो फूलों का रस है या यों फाहिये
कि गड़े हुए खज़ानों को आपने खोदकर निकाला है ।
श्री ठा. गिरवरसिंह जी स० डि० इन्सपेक्टर
इसको पुत्री-उपदेश ही नहीं कहना चाहिये वरना मनुष्यमात्र के
जीवन में पथपदर्शक और सुधारक समझना चाहिये क्योंकि इसके नवीन
प्रशंसनीय विषयों से अनुभवि जीवन बनता है ।।
बाबू रामनारायण जा भू० पू० मैनेजर कस्मन्डास्टेट
वा प्रधान आर्यसमाज वागेवकी
पुत्री-उपदेश योग्यता पूर्वक लिखी गई है विषय उपयोगी मनोरन्जक
और शिक्षापूर्ण है, स्त्रीशिक्षा के लिये यह पस्तक बहुत उपयोगी है।
..
चिम्मनलाल वैश्य तिलहर
,

- उपन्यास स्वरूप में स्त्री-शिक्षा की अनूठी पुस्तक । नारीभूषणा अर्थात् प्रेमधारा द्वितीय एडीशन मूल्य )) पिय सस्मनो ! यह पुस्तक शिक्षा की कुञ्जी प्रेम की पुहिया औ अपने ढंग को निराली एवं अट्ठा है इसकी भाषा सरल नधा रोचक है, सुन्दरता में मनको हरने वाली है। इस के पाठ एवं श्रवणपात्र से कुमति देवाका कूच होजाता है। सासवडू वो देवरानी जिठानी और ननद भौजाईयों में प्रेम की धारा बहने लगती हैं गृह में शान्ति का राज्य स्था- पित हो जाता है अधिक क्या कहें यदि आप अपनी-सन्तानों को धनवान इद्धिमान, धर्मात्मा, सुशील, सदाचारी, भादि उत्तम गुणों से विभूषित करना चाहते हो तो एकबार मेमधारा का अवश्य पाठ कराइये ।। शिक्षादायक आदर्श जीवनचरित्र । भी स्वामी दयानन्द जी सरस्वती, बड़ा टाइप, ३ चित्र, ८ पेजी रायल ४०० से अधिक पृष्ठ मूल्य केवल १०), महाराजा दशरथ ॥ आज्ञापालक श्रीराम ) भातृस्नेही लक्ष्मण),तपस्वी भरत ,धर्मराज युधिष्ठिर, )॥ वीरेश्वर अर्जुन ) माननीय द्रोणाचार्य ) नीतिज्ञ विदुर ) महाराजा दुर्योधन )। महात्मा पूर्ण महाराजा धृतराष्ट्र) भरतोपदेश)। स्त्रीशिक्षा की सर्वोपयोगी अद्वितीय पुस्तक । नारायणी शिक्षा अर्थात् गृहस्थाश्रम । यह वही पुस्तक है जिसकी प्रशंसा भारत एवं विदेशी जोंने मुक्त- कंठ से की है अपनी योग्यता के कारण यह बारहवीं वार छप चुकी है। गृहस्थ सम्बन्धी कोई ऐसा विषय नहीं जिसका इसन आन्दोलन न किया गया हा १००० के लगभग विषयों से युक्त ८ पेजी ६०० पृष्ठ होने पर भी मूल्य केवल शा) समस्त अठारह पुराणोकी मीमांसा पुराण-तत्व-प्रकाश तीन भागों में पृष्ठ संख्या ५०० से अधिक, अठपेजी रायल साइज, मूल्य प्रय- मका ) द्वितीय का ॥) श्राने, तनीय का 1) इसकी प्रशंसा व्यर्थ है। पुस्तक हाथ में लेकर अगरह पुराणों के प्रत्येक विषय ( मूर्तिपूजा, प्रत, तीर्थ, श्राख, भवतार आदि) का खण्डन आप पुराणों में ही कर सकते हैं। पौराणिकों को एक बार पढ़ने एवं सुनने या शंका समाधान करने से ही वैदिकधर्म स्वीकार करना पड़ता है। इसके पाठ करने से विचित्र २ बातों का पता लगेगा। पढ़ते. २ इंसते.२: लोट पोट हो जायेंगे। अत: प्रत्येक गृहस्थी एवं प्रत्येक आर्यसमाज को एक पुस्तक अपने पास अवश्य रखनी चाहिये ताकि प्रसिपक्षियों से शास्त्रार्थ में कुछ अटक ही न रहे। हमारी पुस्तकों की प्रशंसा। . मा० प्रति सभा, यू. के माननीय पा० नन्दलाल जी,बी. ऐस-सी० एल एल बी तथा अन्य प्रार्य विद्वानों सभ्य महिलाओं और भारत के प्रसिद्ध सम्पादक सरस्वती, आर्य मित्र, सद्धर्म-प्रचारक, पेदा- काश, भारत सुदशामवर्तक, नवजीन, आनन्द, नागरी-प्रचारक भादि २ समाचार पत्रों ने मुक्तकंठ से की है इनके अतिरिक्त- विदेशीजन ।.. श्री० एन० निरअन स्वामी, फोवंफमेजर, शयर, श्री० ५० वि. शीलाल जी वर्षन नेटाल , अफीका भादि.फे महानुभावों ने प्रशंसा पत्र भेजे हैं। और भी भारत वकील, बैरिस्टर सपजज, मुन्सीया सेट, साहकारों के सहसूशा प्रशंसा-पत्र उपस्थित है।

हमारी अन्य उपयोगी पुस्तकें । . गर्भाधानविषि ) वीर्यरता) पथार्यशान्तिनिरूपण। शान्तिशतक) इतमकाश) संसारफल:) शिष्टाचार )। प्रेमपुष्पावली, (पकसा पर सार- गर्भित व्याख्यान २० षड़े पृष्ठ) मू०)। नीत्युक्तस्त्रीधर्म) स्मृत्युक्तस्त्री- धर्म। चित्रशाला)। ईश्वरसिदि)। भजनों की पुस्तकें । भजनसारसंग्रह)॥ स्त्रीज्ञानगजरा नं.१॥ २॥ भजन पपासा कमाना। . इसके अतिरिक्त संस्कारविधि, सत्यार्थप्रकाश, मनु- स्मृति भास्करप्रकास, संगीतरत्नप्रकाश १० भाग आदि धार्यसामाजिक पुस्तकें भी हमारे यहां मिलती हैं । नोट-नाम व पता बहुत साफ २ हिन्दी उर्दूबा अंग्रेजी में लिखनाचाहिये। देखने योग्य नवीन महारानी मन्दालसा का पूर्ण वृत्तान्त तथा पुत्रों को दिये हुए उपदेश सहिद जीवन चरित्र ८० पृत की पुस्तक म्य |

मनोहरचित्र
श्री स्वामी विरजानन्द जी सरस्वती दएसी मू.), भी स्वामी
दयानन्द जी सरस्वती मू० ) श्री पं० लेखराम जी श्री पं. गुरुदत्त भी
महात्मा हंसराज मी तथा महात्मा भन्शीराम जी मूल्य प्रत्येक का एफ २
भाना। सात चित्रों का एक प्रूप मूल्य र माना।
श्री. महाराजाधिराम पक्षमा नी का चित्र मय दम्पति कई रंगों
में और परिवार सहित है। अन्य दो दो भाना।
क्या श्राप रामायण पढ़ते हैं।
यह पुस्तक १२ पेनी साइज़ में सद्रित हुई है वैसे तो आपने अब तक
भनेकों तरह की रामापणे पढ़ी होंगी, परन्तु अव भाप इसे पदियेगा तब
आपको मालूम होगा कि यथार्थ में मापने रामायण पढ़ी हैं या नहीं।
पस्तक पुत्र पुत्रियों एवं सभी के देखने योग्य है । मूल्य फेवल दो भाने ।
मिलनेका पता-
चिम्मनलाल भद्रगुप्त, वैश्य
तिलहर जिला शाहजहानपुर
Tilhar, ( Shahjahanpur ) U. P. [India]

* भाश्म * हमारे महेशऔषधालय '... की प्रायर्वेदोक्त अद्भुत एवं चमत्कार. दिखानेवाली जड़ी. -बूटियों एवं रसायन द्वारा निर्मित पवित्र एवं सस्ती औष- धियां जिनके गुणोंकी महिमा अापको सेवन करने से स्वयं विदित होजावेगी माहेश्वरवटीं । ::::::स्त्रियोंके इसको भाप हर मौसम में सेवन कर समस्त रोशंका इलाज एषं बवासीर, सकते हैं। अजीर्ण को दूर कर भून मा श्वास प्रमेह, उपदंश आदि कठिन रोगी औषधिया भी अनुभूत प्रयोगों धढ़ाने पानी एवं प्रमेह का नाश कर से बनाई जाती हैं एक बार किसी रोग अपूर्व बल देने वाली एकमात्र औषधि है की औषधि मंगाकर सेवन कीजिये है। मूल्ब २० गोली १): फिर आपको स्वयं विश्वास होतावेगा. महिलाविलासतैले । इसके अतिरिक्त - अनेक प्रकार के सुगन्धित एवं गुणः जाडोंमें सेवन करने योग्य कारक द्रव्यों के योगसे सिरदद और मूसली, सुपारी, वादाम तथा चक्कर को टूरकर मस्तक-को बलिष्ट करनेवाला है फी शीशी ॥y सुहागसुठिपाक और सुवर्ण, वालवाटिका । रजते वंग, त्रिवंग, कान्तिसार आदि भस्में भी प्रति उत्तम बच्चोंके समस्त रोगोंको दूरकर उन रीतिसे निर्मित इमारे यहाँ को वलिष्ट करनेवाली एकमात्र देसी भौषधिोखे बनाई है मगो मिलती हैं। "मिलने का पता:- चिम्मनलोलभद्रगुप्त वैश्य विलहर ज़ि० शाहमहांपुर U. P. INDIA.

* ओ३म् ।
पुत्री प्रियम्वदा देवी रचित
पुस्तकें।
कलियुगीपरिवार का एक दृश्य ॥]
धमाांचाची और अभागाभतीजा
मूल्य 1)
आनन्दमयी रात्रि का स्वप्न)
उपरोक्त पुस्तकों की अब बहुत
थोड़ी कापियां शेष रहगई हैं लेने
वाले सज्जन शीघ्रता करें।
मिलने का पता
चिम्मनलाल वैश्य
तिलहर ज़ि० शाहजहांपुर।

999
ముని ముందుకు
SMK 1982 MASAS Denetleme Makin
लीजिये
योधा भीमसेन जी का
जीवन-चरित्र
छपकर तय्यार होगया
मूल्य
विशेष प्रार्थना
बहुधाजन वी० पी० मंगवाकर वापिस कर देते हैं
जिससे कारखानेको नुकसान महसूलके सिवाय
किताब ख़राब होजाने से बड़ी हानि
उठानी पड़ती है। अतः-
संगानेवाले आई विचार कर वी० पी० मंगाने के पत्रं
जाकरें विना प्रयोजन हानि देना उचित नहीं ।।
चिम्मनलाल वैश्य,
तिलहर जि० शाहजहांपुर.
ಓstssssssssಸದುಪಷnskಳಸಿ.ಬಿಸಿಬಿಡಿಬಿಡಿಸಿಟಿವಿ ಕುಸಿದಿವಸಿಷಷಷ ಬಸವನಾಥ
Imatwawanwarwwwsaney

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Puran-tatv-prakash Volume-iii

Author
Chimmanlal Vaisy
Title
Puran-tatv-prakash Volume-iii
File name
Puran-tatv-prakash Volume-iii
Text
OCR done
Citation
1919
Published
2009/09
Publisher
Globalprinting Works Merath
Language
Sanskrit
Pages
94
Library
Sanmati Library, Jaipur
DLI number
322456
Barcode
99999990252928.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
XwGSoqsjb8l
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