Shri Jain Swetamber Khartargacch Sangh, Jaipur
Rishidatta Ras
Front matter
No text on this page.
ऋषिदत्ता रास
TAITA
मुनि मणिप्रभसागर
* ऋषिदत्ता रास
मुनि मणिप्रभसागर
* सपादन
पू साध्वी श्री हेमप्रभा श्री जी म सा
* प्रकाशन
कान्ति प्रकाशन प्रतिष्ठान, पालीताणा
* अर्थसहयोग
पूजनीया विदुषो आर्या रत्न श्री हेमप्रभाश्री जी
म सा के सदुपदेश से
जैन श्री संघ, मोकलसर
* प्रकाशन वर्ष
वैशाख पूर्णिमा वि स २०४५, सन् १९८८
* मुद्रक
एम एल प्रिण्टर्स
सरदारपुरा, जोधपुर
समर्पण- प्रसून
जिन के जीवन में अनमोल गुण-मरिणयों की
कान्ति
और
हृदय
में प्रेम का सागर
तथा
वाणी में अद्भुत आकर्षण था
उन परम श्रद्धय पूज्यपाद गुरुदेव की
पावन स्मृति में समापित
विनीत
मुनि मणिप्रभसागर
उपलब्ध प्रकाशन " रुपये उठ जाग मुमाफिर भोर भई -प्राचार्य जिनकान्तिसागर सूरि १००० अमर भये ना मरेंगे १००० जिनगुरू गुण सचित्र पुष्पमाला १००० पतीस वोल विवरण १००० प्रजना सती का रास २०० मयणरेहा राग पौषध विधि प्रकरण (गुज) प्रतिमा बहार नत्यवन्दन पतुविशतिरा चिन्तन पर -मुनि मणिप्रभसागर २५० " २०० " . ३०० ३०० " दादाचिन मपुट ५००० १०० १०० इनसे शिक्षा लो धमारल्पारण चरित्रम् गप्तम दाताको स्मृति ग्रन्य दादा जिनसान मूरि जीवन चरित्र गुम्देय पीपलिया " " " . .
। । अभिव्यक्ति 'अनुभवगुरू - चरण रज' साध्वी हेमप्रभाश्री कथा-कहानियों का महत्त्व आज से नहीं प्राचीनकाल से है। इसकी लोकप्रियता का कोई अपवाद नहीं है । क्या बालक, क्या वृद्ध, क्या मूर्ख, क्या विद्वान्, कहानी सभी को समानरूप से प्रिय है। उपदेशकों के लिए तो यह माध्यम बड़ा ही प्रभावी है । उपदेश वही सरल, सुबोध और आकर्षक होता है जिसमें नैतिक व आध्यात्मिक मूल्यों को सुरूचिपूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया जाय । इसका सबसे अच्छा व उपयुक्त तरीका यही है कि उपदेश के साथ उपयुक्त कहानियो एवं दृष्टान्तो का सामंजस्य किया जाय । पागम साहित्य के परिशीलन से विदित होता है कि उस युग में उपदेश के साथ-साथ उसकी भावना को अधिक प्रभावी व सर्वग्राह्य बनाने हेतु बीच-बीच में प्रसंगानुकूल कहानियों की संयोजना की जानी थी। यहां तक कि स्वयं भगवान महावीर के उपदेशों में भी स्थान-स्थान पर लघु कथायो, रूपकों एवं दृष्टान्तों का प्रयोग मिलता है। ज्ञाता धर्म कथांग, विपाक सूत्र, उत्तराध्ययन, अंतगड़दशा, उपासक दशा आदि इसके ज्वलंत प्रमाण है। उपदेश के साथ-साथ प्रसंगानुकूल कहानियों का चयन उपदेश को इतना प्रभावी, प्रेरक व रोचक बना देता है कि जनमानस बड़ो सहजता से प्रादर्शों के प्रति आस्थावान बन जाता है। श्रोता या पाठक के आचरण में सत्य उतरे। उनके चरित्र में संस्कारों की प्रतिष्ठा हो। वे कथा की मूल भावना से अनुप्राणित बने, यही तो उपदेश का मूल लक्ष्य है। [ । . - - सामान्यत यह मान्यता है कि कहानी मनोरजन या साधन है। किन्तु जन कथानो एव बौद्ध स्थानो के लिए दावे के साथ कहा जा सकता है कि उनका मूल लक्ष्य मात्र मनोरजन या मानसिक तुष्टि नहीं है, वरन जन-जीवन मे उच्चतम सामाजिक, नैतिक व प्राध्यात्मिक-मूल्यो की प्रतिष्ठा करना है । अशुभ से निवृत्त कर मानव को प्रादर्शों के प्रति प्रास्थावान और मानवता के प्रति सवेदनशील बनाना है। कहानी कहानी नही, जीवन के प्रति समर्पण है। प्रागम युग से लेकर आज तक कथा साहित्य विपुल मात्रा मे लिखा गया । हा, युग-परिवर्तन के साथ-माय क्या के स्वरूप एव शैली मे अवश्य परिवतन पाया। प्रागमिक कथायें आवार म लघ तथा विशेप तथ्य को लेकर चलती है । प्रसग के अनुरूप उपदेश ने बीच-बीच में उनका कथन होता था। धीरे-धीरे इस शैली मे परिवतन प्राया। रामायण, महाभारत की शैली से प्रभावित हो, कवियो ने पौराणिक-शैली को अपनाया। फलत चरित्र ग्रयो का निर्माण हुप्रा । मूलकथा के साथ प्रासगिक अन्य स्थानो, विविध वणनो एव पूर्वभवो को घटनामो को जोडकर उसे विशेषावार देना इस शैली की विशेषता है। प्रादिनाथ चरित्र, शातिनाथ चरित्र, पाश्वनाथ चरित्र, विपप्टिशलावा पुरुष चरित्र यादि इसी शलो के उदाहरण है । पाख्यायिका-शैली में भी अनेक मननीय कथा प्रन्यो की रचना हुई। पादलिप्तसूरि की तरगवतीक्था, हरिभद्रसूरि की समराइच्चकहा, जिनेश्वर- सूरि की लीलावतीकथा, उद्योतनसूरि को कुवलयमाला कहा प्राख्यायिका शैली की प्रमुख रचनायें हैं । शब्द-कोप की तरह, कथा-कोपो की भी रचना हुई इनमे विभिन्न विपयो पर उपदेशात्मक' छोटी-छोटी क्यानो या अच्छा संग्रह मिलता है । जिनेश्वर सूरि रचित कथा कोप, धमदासगणि वृत उपदेश-माला, शुभवर्धन गणि की वर्धमानदेशना प्रादि इसी कोटि की रचनायें हैं । 1 ] .
आज भी अनेक विद्वान् लेखक प्राचीन-कथाओं, किसी महापुरुषके जीवन या जीवन गत किसी एक प्रसंग को लेकर अथवा जन-जीवन में व्याप्त अशुभ की निवृत्ति एवं शुभ की सत्प्रेरणा हेतु कल्पना प्रसूत अनेक कथाओं का सृजन कर कथा साहित्य को अधिकाधिक समृद्ध बना रहे है । भाषा को दृष्टि से कथायें समयानुसार अनेक भाषाओं में लिखी गई है। प्राचीन काल में बोलचाल की भाषा प्राकृत होने के कारण ग्रंथों की रचना प्राकृत में होती थी। कथायें भी प्राकृत में लिखी गई । जब साहित्यिक भाषा के रूप में संस्कृत का प्रचार-प्रसार बढ़ा तो कथाग्रंथों की रचना संस्कृत मे होने लगी। फिर अपभ्रंश युग आया तो कथायें अपभ्रंश मे लिखी गई । लोक सुगमता से समझ सके इसलिये प्रान्तीय भाषायें-जैसे गुजराती, गुजराती मिश्रित राजस्थानी, हिन्दी आदि में कथा ग्रंथों का अच्छा सृजन हुआ। आज मुख्य रूप से गुजराती और हिन्दी मे जैन कथाओं का विपुल मात्रा मे लेखन हो रहा है । प्रौढ एवं सिद्धहस्त लेखकों के अतिरिक्त कई युवा प्रतिभायें इस क्षेत्र मे कार्यरत है। जहाँ तक गद्य-पद्य का सवाल है कथाओं का गुम्फन दोनो शैलियों मे हुआ। गद्य-पद्य और उभयात्मक (चम्पु) कथायें पूर्वोक्त सभी भाषाओं में सैकड़ों की संख्याओं मे आज उपलब्ध है । मध्ययुगीन जन-भावनाओं को ध्यान में रखते हुए तत्कालीन विद्वान् कवियों ने कथाओं का गुम्फन विविध राग-रागिरिणयो एवं देशियों में किया जो रास चौपाई आदि के नाम से प्रसिद्ध है। ये रास एवं चौपाइयां बड़े ही लोकप्रिय एवं उपदेश देने मे उपयोगी सिद्ध हुए। लगता है उपदेश की यह शैलीजैनों ने वैष्णव सन्तों से ग्रहण (Adopt) की हो। वैष्णव सन्त भक्ति की मस्ती में जब अपने तम्बूरे पर तान छेड़ते थे, हजारों लोगो की भीड़ इकट्ठी हो जाती थी और भक्ति की मस्ती मे सभी झूम उठते थे । यह उपदेश पद्धति उस समय में खूब ही लोकप्रिय एवं उपयोगी सिद्ध हुई। राग-रागिणी, शब्द-स्वर एवं व्यक्तित्व का प्रभाव हृदय को गहराई [ iii से छू लेता है। हृदय को प्रापित एव भावो को तन्मय कर देने की जो शक्ति संगीत में है, अय क्सिी मे नही । इसीलिए उपदेशको ने अपने उपदेश को आकपक एव प्रभावशाली बनाने हेतु इस पद्धति को अपनाया। यद्यपि आज समय, विचार और पस दगी के बदलने के साथ उपदेश की यह पद्धति समाप्त सी हो गई है। तथापि इसका सर्वथा प्रभाव नहीं हुआ है । आज भी कई सप्रदायो मे इस शैली का अच्छा प्रचलन है । प पू प्रज्ञापुरूप प्रसिद्धवक्ता गुरुदेव श्रीजिन कातिसागर सूरीश्वरजी म सा भी इसी शैली के पुरस्वर्ता थे। प्राधा पौन घण्टे के अपने मार्मिक प्रवचन के बाद 10 मिनट अजना, मयण रेखा आदि सतियो के जीवन प्रसगो का वर्णन करके जीवन की वास्तविक्ता एव यथाथता का बोध श्रोतानो को इसी शैली में कराते थे । गुरुदेव के सुधा मधुर कण्ठ से जब स्वर-लहरी फूटती थी श्रोतामो के हृदय के तार झनमना उठते थे । श्रोतागण मस्ती मे झुम उठते थे। प्राचाय श्री के स्वर के साथ हजारो कण्ठो से निसृत स्वर जुट जाता था और समूचा बातावरण सगीतमय बन जाता था। उसका प्रभाव मन मस्तिष्क पर इतना गहरा होता था र सैकडो लोग जीवन की वास्तविकता का बोध पा, नये सिरे से जीवन जीने को कृतसकल्प हो जाते थे। अजना रास, मदन रेखा रास गुरुदेव को स्वय निर्मित कृतिया है। इम शैली को सबसे प्राचीन रचना है भरतेश्वर बाहुवली रास जो कि १२४१ मे शालिभद्र सूरिजी द्वारा लिखी गई थी। उसके बाद तो कई बड़े- बढे रास एव चौपाईया लिखी गई। प्रस्तुत कथा प्रस्तुत ऋषिदत्ता क्या मूलत जैन पुराणो में है । यह क्या 'इसिदता चरिय' के नाम से प्राकृत मे भी है । इसकी रचना ९-१० वी शताब्दी मे 'गुणपाल' मुनि ने की थी। संस्कृत मे कवि माहहकृत, विवेकमजरी में प्रलोक्बद्ध ऋषिदत्ता का लधु कयाना है। ऋषिदत्ता पुराण और आख्यान के v ] रूप में भी कई रचनायें है। ऋषिदत्ता के विषय में आज तक उपलब्ध और कृतियों की संख्या २८-२९ है । इनमें सबसे प्राचीनतम कृति 'लाल विजय जी' द्वारा रचित है, जो १६५९ में खंभात में लिखी गई थी। उसके बाद तो ढेर सारी कृतियां लिखी गई। यह कथा औपन्यासिक शैली में भी लिखी गई जिसके लेखक हैं गुजरात के जाने माने कथाकार मोहनलाल चुन्नीलाल धामी। वह अपने ढंग का निराला कथानन्ध है। इस कथा में पात्रों की उदात्तता, प्रेरणा शीलता, नारी के प्रेम की असीमता, द्वेष पर प्रेम, वैर पर क्षमा की अद्भुत विजय का चित्रण बड़ा हो सुहाना और मनोवैज्ञानिक है । लगता है इन्ही सब के कारण यह कथा जैन कवियों और लेखकों को बड़ी प्रिय है। प्रस्तुत कथा राजकुमार कनकरथ और ऋषिकन्या ऋषिदत्ता के पवित्र प्रेम की अद्भुत कहानी है। राजकुमार कनकरथ कावेरी की राजकुमारी रूक्मिणी को ब्याहने जाता है । राह में राजर्षि और उनकी पुत्री ऋषिदत्ता से उसकी भेंट हो जाती है। एक दूसरे को देखते ही वे एक दूसरे के प्रति आकर्षित हो जाते है, हृदय से चाहने लगते है । ऋषि उनकी मनोभावनाओं को समझकर शादी का प्रस्ताव रख देते है। आखिर दोनों की शादी हो जाती है । ऋषि जैसी सुन्दरी, सुरूपा और सद्गुणी पत्नी को पाकर 'एका नारी सुन्दरी वा दरी वा' मे विश्वास रखने वाला राजकुमार वहीं से अपने नगर लौट आता है। यह सुनकर रूक्मिणी के कोड़ भरे दिल को गहरा आघात लगता है। ऋषि को अपने राह का कांटा मानकर उसका हृदय प्रतिशोध की आग में जल उठता है। वह येन-केन-प्रकारेण ऋषि को उखाड़ फेंकना चाहती है । उसे सहसा सहयोगिनी के रूप में सुलसा मिल जाती है । सुलसा अपनी मैली विद्यानों के प्रयोग से निरपराधिन ऋषि को कलंकित कर मौत के मुंह में धकेलवा देती है किन्तु पुण्ययोग से ऋपि मरती नहीं है और पुनः पिता के आश्रम में पहुंच जाती है। इधर राजकुमार निर्दोष निष्कलंक पत्नी के वियोग से व्याकुल हो मरने को उतारू हो जाता है, [ v परन्तु माता का असीम वात्सत्य उसे रोक्ता है। वह ऋपि को एक क्षण नहीं भूलता। पुन रूक्मिणी को शादी या प्रस्ताव पाता है। राजकुमार केवल माता-पिता की सन्तुष्टि के लिये वैमन से शादी करने जाता है। आश्रम में फिर पुरुषवेशधारी ऋपिकुमार से उसकी भेट होती है। उससे मिलकर राजकुमार को ऐमा महसूस होता है, मानो ऋपिदत्ता ही मिल गई हो। राजकुमार उसे आग्रह कर अपने साथ कावेरी ले जाता है। वहा राजकुमार रूकमणी की शादी हो जाती है । अपनी सफलता के गर्व में सब कुछ भूलवर कमणी प्रथम मिलन मे ही अपिदत्ता के प्रति अपनी ईर्ष्या उगलती है। ऋपिदत्ता को विडम्बना के लिये रूक्मणी को दोपी जान राजकुमार क्रोध, घृणा और प्रात्मग्लानि से भर जाता है। उसे अव जी भी अच्छा नहीं लगता। वह अग्नि प्रवेश कर अपने आपको समाप्त कर देना चाहता है । एन मौके पर ऋपिकुमार अपने असली रूप में प्रकट हो, राजकुमार को बचा लेता है। ऋषि का सर्वाधिक उज्जवल रोमाचक एव मोहक व्यक्तित्व यहा देखने को मिलता है । वह राजकुमार को, रूकमणो का सारा अपराध भुताकर, स्नेह वी महभागी बनाने को प्रेरित करती है । यह ऋषिदत्ता के जीवन की अमर ज्योति है जो युगो-युगो तक उसे 'दीपशिखा' बनाये रखेगी। प्रस्तुत रास का उद्भव बात वि स २०४० को है । सिवाना का ऐतिहासिय शताब्दी महोत्सव दीक्षायें एव गुरदेव को प्रतिष्ठा का कायक्रम सानन्द सम्पन पर पू गुरुदेव श्री जिन याति मागर सूरीश्वर जी म सा मन्दिर दादावाडी के शिनायास हेतु मोकलसर पधारे । करीब १ सप्ताह वहा विराजे। हम लोग भी वहा इसी पायं हेतु प्राये हुए थे । प्रतिदिन गुरूदेव के प्रवचन होते थे। प्रवचन के प्रत मे १० मिनट शक्ति स्वरूपा नारी के समृद्ध रूप का प्रतिनिधित्व करने वाली लक्ष्मी की कहानी, गेय रूप में फरमाते थे। जब वे गाते थे श्रोता तन्मय हो जाते थे । कुछ दिन पूर्व ही मैंने प्रमिद्ध लेखक धामी द्वारा लिखित "ससार चायो जाय छै" (ऋपिदत्ता) पढी थी। मुझे प्रेममूर्ति कपिदत्ता ये स्फटिववत vi ) निर्मल चरित्र एवं मृदु-विनम्र स्वभाव ने बहुत ही आकृष्ट किया था । विचार पाया, कितना अच्छा हो यदि प्राचार्य श्री इस कथा को प्रसिद्ध रागों मे गूथ दे । जेठ वदी ३ का प्रभात ठण्डी हवा चल रही थी । वातावरण बड़ा सुखद था । गुरुदेव श्री प्रसन्न मुद्रा मे पाट पर विराजे हुए थे । साध्वी मण्डल वन्दन हेतु आया हुआ था। वन्दना के पश्चात् चर्चा के दौरान मैने निवेदन के स्वर में कहा 'गुरुदेव' मेरी ताव अभिलाषा है कि आप 'ऋषिदत्ता' रास अवश्य लिखें । प्रसिद्ध रागों मे आपके द्वारा लिखित महासती का यह रास बड़ा ही उपयोगी होगा । गुरुदेव ने मेरी भावना का आदर करते हुए स्वीकृति के स्वर मे कहा 'अवश्य प्रयास करूंगा।' किन्तु गहरा दुख है कि गुरुदेव के हाथों यह कार्य सम्पन्न न हो सका। किस्मत महरबान न होने से इच्छा पूरी न हो सकी । सोचा हुआ स्वप्न बनकर रह गया । लेकिन यह हकीकत है कि सच्ची भावना एक दिन अवश्य फलती है । उस रूप में तो इच्छा पूरी नहीं हुई, किन्तु रास की रचना अवश्य हो गयी । मैं तो इसे पू. गुरुदेव के वात्सल्य का ही प्रतिफल मानूगी। इस रास के रचयिता है प. पू. गुरुदेव के प्रधान शिष्य बहुमुखी प्रतिभा के धनी, ज्योतिर्विद् कवि हृदय, प. पू. मणिप्रभ सागर जी म.सा. । उनके बारे में कुछ कहने की अपेक्षा उनके कृतित्त्व से उन्हें समझना अधिक उपयुक्त एवं यथार्थ होगा। प्रस्तुत कृति प्रस्तुत रास पू. मुनि श्री ने गत चातुर्मास मे पालीताणा तीर्थ में रचा। जैसा कि रास के अन्त में उन्होंने स्वयं ने इसका उल्लेख किया है। सम्पूर्ण कथा भाग ९ ढालों में विभक्त है। प्रथम ढाल से पूर्व ७ दोहे तथा शेष ढालों से पूर्व एक-एक दोहा है । कुल मिलाकर १६ दोहे और १०५६ गाथाओं में यह रास पूर्ण होता है । ढालें इतनी प्रसिद्ध रागों में है कि साधारण लोग भी इसे आसानी से गा सकते है, ९ ढालें तीन रागों में है। १-३-४ और ५वी ढाल की प्रसिद्ध और प्रिय राग "मासू मूडे बोल" है। २ ढाल ऊंची -- + [ vii
,
और पहाडी राग "भीनासर स्वामी" में है। शेष चार ढाले ६-७-८ और ९
की गगा जल की तरह क्ल-कल बहती मधुर प्रवाह युक्त राग "पावन
पुरुषोत्तम भगवान" है।
काव्य प्रतिभा
रास मे मुनिश्री की कवित्व-शक्ति का अच्छा दशन हो जाता है। तया
उनकी काव्य प्रतिभा की मौलिक विशेषतायें सामने आती है। घटना एव
भावो की अभिव्यक्ति हृदय को छूने वाली है । मानवीय भावनानी, सवेदनामी
एव पारस्परिक मवों का इतना सहज स्वाभाविक वर्णन है कि इसे पढते-
पढते रामायण के पाम सजीव हो उठते हैं । सुख-दुख को मवेदनाए मोह,
प्रेम, ईर्ष्या, द्वेप, घृणा की भावनायें मयोग-वियोग की अवस्थाए, स्वाथ,
परायं की वृत्तिया किस तरह पायार लेती है और उस समय मानव मन या
क्या रूमान होता है और माना उस समय क्या कर गुजरता है इसका सजीव
और वास्तविर चित्रण इम रास में है। प्रकृति के हृदयग्राही वर्णन के
साथ उनकी स्वाभाविक क्रियायें-जसे फूलो का खिलना विक्सना प्रादि में
मानवीय भावनामो का प्रारोपण, सौदर्य का सवधक है। फूलो के स्वा-
भाविक सिलने का वर्णन देखिये-
हरियाली चौ तरफ विछाई, प्रकृति ने उस वन मे रे ।
पून-पून की बातें सुनते, हस जीवन मे रे ॥
वन की शोभा का वणन क्तिना स्वाभाविक है--
भोले-भाले मृग छौने ये करते इत-उत क्रीडा रे।
उहते रग-मिरगे पछी, हरते पीडा रे
सहज होन वानी क्रियानो एव घटनामो के माध्यम से प्रात्मा को जगाने
की कला देखिये--
क्ल-दल करते रहते झरने, कहते जग है अस्थिर रे ॥
मुक्त नही मैं मुक्त नहीं तुम, दोनो ही है बन्दी रे।
कर्मों से जो मुक्त वही, आत्मा स्वच्छदो रे ।।
Vil ]
॥
राजकुमार और ऋषि के सहज-स्नेह का संयत किन्तु सारगभित वर्णन बड़ा ही संवेदक है। राजकंवर ने ऋषिदत्ता की अोर निगाहें डाली रे । ऋपि नैनों से पिला रही है, अमृत प्याली रे । इस पर ऋपिराज की सूझ-बूझ कितनी उपयुक्त है- प्रणयाधीनो के नयनो को राजर्षि ने झाका रे । प्रेम भावना समय सभी को, जावे आंका रे।। ऋपि को तुम्हें सौपता हूं मैं, भेंट यही स्वीकारो रे ।। ऋषि की शादी के बाद राजपि की मनोव्यथा और ऋपि को राजकुमार के हाथों सौपते समय उनके मुंह से निकले उद्गार अभिज्ञान शाकुन्तलम् के कण्व ऋषि की याद दिलाये बिना नही रहते । रास को पढने से मालूम होता है कि ऋषिदत्ता वास्तव में श्रादर्श प्रेम की प्रतिमा है। वह हर समय, जीवन के हर मोड़ पर, हर व्यक्ति के साथ तो उसका प्रेम वेमिशाल है ही किन्तु रूक्मिणी जैसी घोर अपराधिन के लिये भी उसके हृदय में स्नेह का निर्भर कलकल बह रहा है। वह अपने प्रेम के पवित्र गंगाजल मे रूकमण के सारे अपराध धोकर उसे उज्ज्वल बना देती है। यह जानते हुए भी कि उसके दुख, कष्ट का मूल कारण रूक्मिणी है, अति प्रेम और राजकुमार को उसे स्वीकारने के लिये प्रेरित करना उसके प्रेममूर्ति होने का सबूत है । प्यार रूक्मिणी को दे उतना जितना मुझको देते । बहुत हर्ष होगा मेरे मन, वस इतना सा लेते ।। राजकुमार रूकमण जैसी स्वार्थी क्रूर नारी से प्रेम करने की बात कभी सोच ही नहीं सकता । वह उससे घोर नफरत करता है, उसे ऋषि की बात पर विश्वास नहीं होता किन्तु ऋपि स्पष्ट कह देती है कि प्यार आपका पाने का, जितना मेरा अधिकार । उतना ही बस उसे मिले, यह आप करो स्वीकार ।। [ ix ऋषि को मानवीय भावनानो मे पूर्ण प्रास्था है । वह जानती है कि प्रेम कभी जवरन नही हो सकता यह दिल को चीज है । जब तक राजकुमार के मन मे रूक्मिणी के प्रति रोप है, वह उसे प्रेम नहीं दे सकता । उस के प्रति राजकुमार के मन मे स्नेह का अकुर तभी फूट सकता है । या तो वह अपने आचरण से राजकुमार के दिल को जीते ! या राजकुमार चिन्तन द्वारा अपना रोप खत्म करे । इसलिये वह दोनो ओर पूरा प्रयास करती है। राजकुमार को ज्ञान की बातें समझाती है और रूक्मिणी को माफी मागने के लिये तैयार करती है। पापोदय से बुरे कर्म कर लेता है हर कोई । मिलती क्यो न वस्तुए वापिस, गई कही हो खोई ।। दया पार है प्रेम पार है, उसे क्षमा दे पाप । पापी से पापी मानव भी, करता नित्य न पाप ।। प्रेम मै वह ताक्त है, जो हिंसक पशुप्रो को भी शात बना देता है तो रूक्मिणी तो आखिर कोमल हृदया नारी थी । ऋपि के प्यार ने उसके हृदय को पानी-पानी कर दिया । ऋषि ने उसे वाहुप्रो मे भर उठा लिया है ऊपर । रूकमण के प्रासू गिरते ज्यो गिरता गिरि से निझर ।। मैं अपराधिन मैं हत्यारिन, मैं पापिन मैं डायन । मुझसे मिलने को क्यो पाई तुम हो भगिनी पावन । तुम देवी में हूं राक्षसणी कहकर के रोती है। ऐसी ही हालत होती है जब गलती होती है ।। पश्चाताप की प्राग अपना सारा कलिमल साक कर रूकमण भी खरा सोना बनकर राजकुमार के प्रेम की अधिकारिणो बन गई। परिस्थिनियो के साथ पूर्ण सामजस्य करके चलना ऋषि के जीवन की अद्वितीय विशेषता है । जहा राजकुमार दुख से घबराकर मरना चाहता है, वहा नारी होकर भी ऋपि, घबराती नहीं, प्रत्युत पूण साहस के साथ परिस्थितियों का सामना करती है। उसके शब्दो में उसके कार्यों में ज्ञान- विवेर एव साहस टपकता है। यह उसके विशुद्ध प्रेम की ताकत है । शक्ति है । यह कनकरथ के व्यक्तित्व पर उसके व्यक्तित्व की अपूर्व विजय है ।
वास्तव में ऋषिदत्ता का मन गंगा की तरह पवित्र हृदय सागर की तरह गहरा तथा चरित्र हिमालय की तरह ऊँचा था । लम्बी कहानियां कई घटनाओ को लेकर बनती है। लेखक एवं कवि के लिए सबसे कठिन बात होती है, दो घटनाओं को जोड़ना उन्हें इस तरह जोड़ना कि कथा के प्रवाह में जरा सा भी अन्तर न आये। इस कला में मुनिश्री बड़े माहिर, दक्ष व निपुण है। उन्होंने घटनाओं को इस तरह जोड़ा कि परिवर्तन का आभास पाठक को जल्दी से नहीं होता। वे प्रवाह (Flow) में बहता जाता है। वर्णन के साथ व्यावहारिक क्षेत्र से संचित-उपमान, संवादों में अपने- अपने कथन की पुष्टि हेतु दिये गये उदाहरण इतने सटीक है कि पढ़ते ही बनता है। नृप ने आज्ञा दी मंत्री को, पुर से इन्हें निकालो रे । जो सीजे ना धान्य उसे क्यों व्यर्थ उबालो रे ।। जीवित रहने पर शायद वो, मिल जाए ऋषिदत्ता । ऋषि । क्या? टहनी से जुड़ सकता पका गिरा जो पत्ता ।। कहीं-कहीं पर दिये गये दार्शनिक एवं शास्त्रीय उदाहरण उनके गंभीर ज्ञान के द्योतक है- श्वांस वहीं का वही रूक गया, रूकमण का भी भय से । विभक्तियां रूक जाती है, जब काम पडे अव्यय से । जीवन के नग्न- सत्यों का उद्घाटन, मानव को गंभीर चिन्तन के लिये प्रेरित किये बिना नहीं रहता। मानव स्वभाव का सूक्ष्म-विश्लेषण मुनिश्री की मनोवैज्ञानिक निपुणता का प्रतीक (Symbol) है। बेटे मन की स्थिति एक-सी रही नहीं रह पाती रे आज द्वष कल प्यार करे स्थिति पलटा खाती रे।। ऋषि के पुनर्मिलन की आशा में प्रतीक्षारत राजकुमार के मानसिक उतार-चढ़ाव का वर्णन देखिये। अनहोनी आकांक्षाओं में लेते सांस अणु-अणु में बस मचा हुआ है, एक बड़ा तूफान ।। इन्तजार वाली घड़ियो मे जो होता आनन्द । वो अस्सीम अनंत उसे क्या, बांध सकेगा छन्द ॥ उफान । [ xi रोया-रोया महक उठा ज्यो, महदे रजनीगधा। गोरखनाथ सिवा क्या जाने, मन का गोरख धधा । ऋषि के स्वागत मे पलव-पावटे विधाये बैठे राजकुमार की वेमनी देखिये- टोह मोरनी की करता है, मोर मचाकर शोर । मोहोदय से बन जाता है, सबका मन कमजोर ॥ भाषा शैली सतो की रचना को भाषा की कसौटी पर कसने से पूर्व पुछ बातो का ध्यान रखना अति आवश्यक है। सन्त भ्रमणशील होते हैं । व भिन्न-भिन्न देशो और गावो में भ्रमण करते हैं। उनका जन-सम्पक विस्तृत होता है । प्रत लोकभाषा का प्रभाव उनको भापा पर पडना स्वाभाविक है। प्रस्तुत कृति के विषय में भी यही बात है। कर्ता की मातृभाषा राजस्थानी है। हिदी-सस्कृत-प्राकृत एव अग्रेजी के पाप अच्छे विद्वान् है। विहार-क्षेत्र आपका विस्तृत होने से अन्य भाषा का ज्ञान भी बढता गया। जिसका प्रभाव उनको कृतियो में देखने को मिलता है। प्रस्तुत कृति हिदो मे हाते हुए भी धमीडा हरखी ददं दरिया, नेक-नजारा, मुवारक साचा, जोहला, सेरी प्रादि मारवाडी, उर्दू एव गुजराती शब्दो का यत्र-तत्र प्रयोग इसी बात का परिचायक है। अनुप्रास का प्रयोग वातावरण म सगीत पैदा करता है किन्तु कही-कहीं पर हठात् अनुप्रास लाने का प्रयास तुक्वन्दी सा लगता है। सन्त कवियो का ध्येय पाण्डित्य-प्रदशन या सस्ती वाह-वाह लेने वा नही होता, किन्तु जन-साधारण उनकी बात समझे एव जीवन को समुतत बनाने की सत्प्रेरणा प्राप्त करे, यह होता है इसके लिये अल्प और अनुरूप शब्दो मे कहना उपयुक्त होता है। प्रस्तुत रास के विषय मे यही बात है। मुनिश्री ने अपनी बात सरल-भाववाही भाषा में और सुबोध-शैली में प्रस्तुत की हैं । अनयर अलवरण और पाडित्य प्रदशन के झूठे मोह मे भावो की गरिमा कम करने को कही भी नहीं की। ऋपिदत्ता की कथा, मानव जीवन को समझाने और बनाने की सुगम सोटी है। इसे पढकर यदि जीवन म प्रेम को ज्योति न जली, जीवन के उपवन मे क्षमा के पुष्प न खिले तो इस कहानी को पढने का कोई सार न होगा न जीवन जीने का पानद ही पायेगा। xm ] अपनी बात बात वि. सं. 2040 की है । सिवाना का ऐतिहासिक महोत्सव सम्पन्न करा कर पू. गुरूदेव, मन्दिर दादावाड़ी के शिलान्यास हेतु मोकलसर पधारे हुए थे। साध्वी श्री हेमप्रभाश्री जी आदि भी वही आये हुए थे । प्रतिदिन गुरूदेव के प्रवचन होते थे मधुरवाणी, तात्विक विश्लेषण, व्यावहारिक परिवेश, प्रसंगानुकूल दृष्टान्तों, रूपकों एवं उदाहरणों के सामंजस्य के कारण पू. गुरूदेव श्री के प्रवचन इतने प्रेरक, रोचक व आकर्षक होते थे कि सैकड़ों व्यक्तियो की भीड़ उन्हे सुनने, खिंची-खिंची चली आती थी। उनकी गेय शैली उनके प्रवचन को इतना अधिक आकर्षक बना देती थी कि श्रोता झूम उठते थे। प्रभात का समय था । वातावरण बड़ा सुखद एवं सुहावना लग रहा था। पू. गुरूदेव श्री प्रसन्न मुद्रा में, पाट पर विराजे हुए थे । मैं गुरूदेव श्री के चरणों मे वैठा हुआ था । क्षमणी वृन्द वन्दन हेतु आया हुआ था । पू. गुरूदेव श्री के प्रवचन की चर्चा के दौरान साध्वीजी हेमप्रभा श्री जी ने निवेदन किया कि गुरूदेव ! यदि आप ऋपिदत्ता रास, प्रसिद्ध रागो में बनादें तो उसकी उपयोगिता मे चार चांद लग जायेंगे। मैने साध्वी जी के निवेदन का अनुमोदन किया। प्रकृति के गर्भ मे क्या निहित है, मनुष्य नही जान पाता। मुझे क्या मालूम था कि जिस बात का मैं अनुमोदन कर रहा हूं, वह मुझे ही पूरी करनी होगी। [ xiii के पल पालोताणा में ज्योही "ऋपिदत्ता रास' लिखने बैठा मन अतीत की स्मृतियो मे खो गया। आखे शून्य मे टिक गई। एक के बाद एक घटनायें फिल्म की तरह सरक्ती गई । हर घटना हृदय के जख्मो को गहरा कर गई। जिनके चरणो मे मेरे जीवन के तेरह बम त बोते थे। जिनके साथ मेरे जीवन पल क्षण क्षण के सस्मरण जुड़े हुए थे। जिनके कारण सारा अमन चैन था उन गुरुदेव के विछोह की तडफन से शरीर का रोया-रोया जल उठा । मेरे नेनो से चुपचाप प्रासू दुलक पहे। पर उन्हें पोंछने वाले वे कोमल वरद हाथ वहाँ ? दिल पुकार उठा, गुरुदेव, मुझे रोता बिलखता छोड पहां गये ? अब कहा पाक गा वह शीतल चरण छाया जहां बैठकर मुझे असीम शाति और तृप्ति मिलती थी । कहाँ से लाऊगा वह गोद जिसमे मुह ढापकर एक पल मे ही सारा गम-रज भूल जाता था । हृदय काप गया । कलम थम गई । कल्पना कुण्ठित हो गई। शन्द भीतर ही रह गये। घण्टो बीत गये सोचो में इतने मे कल्पना मे अवतरित प्रेममूर्ति ऋषिदत्ता मुस्कुराती हुई पहने लगी। अपने हृदय को मजबूत करो, सत्य को समझो । जो जाने वाला है जायेगा । जो मरणशील है मरेगा। उसके प्रति तुम्हारा मोह उचित नहीं। अगर तुम्हें प्रेम करना ही है तो अमर प्रात्मा से प्रेम करो। वह हर क्षण हर पल तुम्हारे समीप है। उनकी प्रात्मिक शक्तियो को आत्मसात् करने का प्रयास करो। साहस और विवेक पूर्वक सयम जीवन मे आगे बढत रहो । आखिर विजय तुम्हारे हाथ है । एक झटके मे ही मेरी विचार तन्द्रा टूट गयी । मैं आश्वस्त हुआ। अतद्वंद समाप्त हो गया । मैं यथाथ के धरातल पर उतर पाया । मेरे सम्मुख ऋषि के जीवन एक के बाद एक प्रसग उभरते चले गये । ऋपिदत्ता का जीवा वास्तव मे दद का दरिया था। हर समय प्रासूमो का सैलाब उसकी पाखो से वह रहा होगा । कितु उसका हर कदम हर निणय हर काय साहस XIV ] और विवेक से पूर्ण था। विषम से विषम परिस्थिति में भी उसका साहस नही मरता और विवेक की ज्योति नहीं बुझती। यही उसके जीवन की सफलता का एवं विजय का राज था । वास्तव में मानव जीवन एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है । उसका अपना लक्ष्य है, उद्देश्य है । विरले ही मानव उसे जान पाते है । अपने जीवन में उसे साकार कर सार्थक और कृतार्थ बना पाते है। जीवन सुख-दुख की प्रांख- मिचौनी, खुशी और गम की धूप छांह, मिलन की बहारें और बिछुड़न के पतझड़ के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है। किन्तु जो फूलों और शूलों दोनों को समान रूप से स्वीकार करते है, दोनों में समभाव' रखते है उनका जीवन आग मे रखे सोने की तरह निखरता है। वे दुगुनी चमक-दमक पाते है । उनका जीवन गौरवान्वित, महिमामण्डित होता है। वे दुनिया के प्रादर्श, श्रद्देय और समादरणीय बनते है। सुख की अपेक्षा दुख जीवन की वह कसौटी है जो जीवन के खरे खोटेपन को नीर क्षीर की तरह विविक्त कर देता है । दुःख की कसौटी पर वे ही खरे उतरते है जो सौ टंच के स्वर्णसम होते है । दुख यदि नहीं पाता तो मानव महान् ही नही होता । दुर्जन यदि नहीं होते तो सज्जन की पहचान ही क्या होती ? अमावस्या के कारण ही तो पूनम का महत्व है। अन्धेरा है तो ही प्रकाश की खोज होती है । राहुग्रस्त होने पर ही चन्द्रमा की वेदना जन मानस को व्यथित करती है। उसकी मुक्ति के लिये लोग तप- त्याग-दान-पुण्य करते है। ऋषि की कहानी इन्हीं सब सत्यो का साकार चित्रण है। जिनमें उसके जीवन की उदारता, सहिष्णुता, त्याग-संतोष-दया-प्रेम, समर्पण भाव, धीरता-गम्भीरता, क्षमा, धर्मप्रेम आदि सद्गुणों की मरिणयाँ पग-पग पर चमकती नजर आती है। जिसका प्रकाश समूची मानव जाति को दिशा दर्शन करता है। इस रास को लिखने में पू. गुरुदेव श्री के असीम....अनंत....अमृत मय आशीर्वाद ही निमित्त बने है। उनकी असीम कृपा के सहारे ही कलम चल सकी। [ xv साध्वी श्री हेमप्रभा श्री जी को पू गुरुदेव प्राचार्य श्री द्वारा दी गई स्वीकृति, मेरे द्वारा पूर्ण हो रही है, यह हप विपाद का। मिथित अनुभव है। इसके लेखन मे मु५ मिले मेरे छोटे गुरुभाई प्रिय मुनि मुक्तिप्रभसागर के के सहयोग का मूल्याक्न कर में उसके महत्व यो कम नहीं करना चाहता । बस इतना कहना ही पर्याप्त होगा कि उसको सेवा एव सहयोग के बिना यह काय मपन होना कठिन था। वहिन साध्वी विद्युत्प्रभा के प्राग्रह को भुलाया नहीं जा मयता, जिसके प्राग्रह के कारण यह लेखन शीघ्र सपन्न हो सका। विदुपी प्राय रत्न श्री हेमप्रभा श्री जी ने इसे प्राद्योपात पटा और मम्पादित कर इसे नया निखार दिया। इन सभी के अपनत्व भरे सहयोग के कारण यह सपन्न हो सका है । सभी के प्रति अाभार ज्ञापित कर मैं उऋण होना नहीं चाहता। -मुनि मणिप्रभसागर xi ] ऋषिदत्ता रास दोहा श्री वामांगज देव की पद कज रज शिर चाढ । सहज सुगुण श्रेणी चहूँ मेघ यथा प्राषाढ ॥१॥ श्री दादा गुरूदेव का शरण ग्रहण कर सद्य । पावन मन रचना करू श्रेष्ठ कथानक पद्य ।।२।। सुखसागर श्री जिन हरि श्री जिन कान्ति विशेष । मणि प्रभसागर शिष्य पर करूणा करे हमेश ।।३।। उपजे सुन कर अरूचि जो तो वह क्या विस्तार । अर्थ हीन संक्षिप्तता दे न सके जो सार ॥४॥ ऋषिदत्ता की शुभ कथा प्रेम शील भण्डार । मानो दरिया दर्द का शिक्षा अपरम्पार ।।५।। अन्य स्त्रियों सी स्त्री न जो सबसे बिल्कुल भिन्न । इसने होने दी नहीं परम्परा विच्छिन्न ॥६।। पाठक श्रोता प्रेम से पढे सुने दे ध्यान । रस बरसाने के लिये साथ करें संगान ॥७॥ [ 1 दाल पहली तर्ज-मा सू मूढे बोल सुनो भवि वारणी रे, धर्म निभाने वाली ऋषि को धर्म कहानी रे ।।टेर।। रथमर्दनपुर भूप हेमरथ, सुयशा सुन्दर रानी रे । पुत्र कनकरथ एक लाडला, अति पुनवानी रे, सुनो० ॥१॥ उगते सूरज के सपने से, पुत्र गर्भ मे पाया रे । सस्कारो की लोरो दे दे, इसे सुलाया रे, सुनो० ॥२॥ नही धाय माता का, माँ ने अपना दूध पिलाया रे । जब भी रोते देखा तव श्रा, गले लगाया रे, सुनो ।।३।। बचपन वचपन ही होता है, भले किसी का होवे रे । बादशाह का सुत हो तो क्या, कभी न रोवे रे, सुनो० ॥४॥ शिशु को माँ का प्यार चाहिये, वो माँ से ही मिलता है । सूरजमुखी कमल सूरज के, कर से खिलता हे, सुनो० ।।५।। जैसे वचपन वीता शिक्षा, ऊँची गई दिलाई रे । प्रथम मातृदेवो भव की शुभ, कडी पढाई रे, सुनो० ॥६।। माँ के पास बैठता उठता, खुलकर बाते करता रे । नही पिता से अधिक वोलता, रहता डरता रे, सुनो० ।।७।। जो होते हम उम्र उन्ही के, साथ मित्रता होती रे । अधेरे से करे मित्रता, वो क्या ज्योति रे, सुनो० ॥८॥ 2 ] .
होने दे अपवित्र नहीं जो, वो है मित्र सुहाना रे । व्यसन बुराई सिखलाए वो, दुश्मन माना रे, सुनो० ।।६।। मंत्री नगरसेठ सेनापति, राजपुरोहित जाया रे । नृप सुत के ये चार मित्र हैं, प्रेम सवाया रे, सुनो० ॥१०॥ राजनीति में परम निपुणता, राजकुंवर ने पाई रे । बात हारने की न कहीं जो, लगे लडाई रे, सुनो ।।११।। विद्वानों की बडी गोष्ठियाँ, राजसभा में होती रे । तात्त्विक चर्चाओं से चुनता, चिन्तन मोती रे, सुनो ।।१२।। विद्वानों का आदर करना, ऐसे सीखा जाता रे । जिसने देखा नहीं उसे क्या, करना आता रे, सुनो० ।।१३।। युवराजा के योग्य सभी गुण, राजकुवर ने पाये रे । गुण विन गादी पर बैठे वो, गधा कहाये रे, सुनो ।।१४।। राजकॅवर के तन पर डाली, यौवन ने अब छाया रे । खिले फूल की कलियाँ वैसे, खिलती काया रे, सुनो० ॥१५।। कावेरी से राजदूत एक, राजसभा में आया रे । एक महत्त्वपूर्ण संदेशा, नृप का लाया रे, सुनो ॥१६।। राजकुमारी नाम रूक्मिणी, सुन्दर रूप सुहाया रे । देखे कॅवर अनेक एक भी, दाय न पाया रे, सुनो ।।१७।। नाम आपके सुत का सुनकर, सबने मोद मनाया रे । जाना पहचाना है रिश्ता, सबको भाया रे, सुनो० ॥१८॥ [ 3 . भेजा मुझे यहाँ पर नरवर मानो अर्ज हमारी रे । नृप बोला कल उत्तर देगे सोच विचारी रे, सुनो० ।।१६।। मात पिता ने परामर्श कर सुत की सम्मति ले ली रे । राजदूत को विदा कर दिया ली गुड भेलो रे, सुनो० ॥२०॥ बधाइयाँ बाँटी जाती है सगे सनेही आते रे । मित्र परस्पर इसे रिझाते और खिजाते रे, सुनो० ॥२१॥ गज हय पैदल संन्य सजा कर वडी बारात सजाई रे। चले व्याहने को कावेरी शुभ दिन माही रे, सुनो० ।।२२।। लेकिन राजकँवर के मन मे खुशी नही इतराई रे । एक तरह की उदासीनता, भीतर छाई रे, सुनो० ॥२३॥ उत्तर दिशि मे बढते जाते प्रकृति वडी सुहाती रे । भिन्न२ फूलो की मीठी खुशबू आती रे, सुनो० ॥२४॥ देख काफिला वनवासी पशु दूर भागते जाते रे । उडते हुए पखियो वाले टोले आते रे, सुनो० ॥२५॥ धरती की शोभा है न्यारी शोभा वडी गगन की रे । महिमा वडी मगन की महिमा बडी छगन की रे सुनो० ॥२६॥ योग्य भूमि पर डाला देखो प्रथम पडाव मनोहर रे । छावनियाँ छाई अति सुन्दर वन के अदर रे सुनो० ।।२७।। मित्रो के सग गया घूमने राजकँवर उस वन मे रे । प्रकृति का सौन्दर्य सुहाना लगता मन मे रे, सुनो० ॥२८॥ . 4 ] . कलकल करती बहती नदियाँ, झर झर झरते झरणे रे । खडे पहाड़ किये सिर ऊँचा, बातें करने रे, सुनो० ॥२६॥ कसती व्यंग रंग में हँसती, मित्र मंडली प्यारी रे। जानैयों की जून जगत से, मानी न्यारी रे, सुनो० ।।३०।। कहा मित्र ने अटवी आगे, वो अरिमर्दन वाली रे । वो अपना दुश्मन कहलाता, जालिम जाली रे, सुनो०।३१।। लौटे सभी किया भोजन फिर, आगे हुए रवाना रे । अटवी निकट निशा होते ही, पड़ा रुक जाना रे, सुनो०।।३२।। पुर सा सुन्दर नगर गया बस, जलने लगी मसालें रे। किया प्रबन्ध सुरक्षा का सब, श्रम न निहाले रे, सुनो० ।।३३।। हुआ सवेरा चले पहर दो, सुख से अटवी लांघी रे । निपटे सभी तभी खाने की, चीजें मांगो रे, सुनो० ।।३४।। दुग्ध पान कर राजकॅवर अब, बैठा है सिंहासन रे । भावी के सपनों में खोया, करता चिन्तन रे, सुनो० ॥३५॥ इतने में अरि मर्दन नृप का, दूत एक चल आया रे । सुना रहा जो समाचार, नृप ने कहलाया रे, सुनो० ॥३६।। बिना इजाजत सीमा में घुस, तुमने मौत पुकारी रे । लौटो वापिस वरना रण की, करो तैयारी रे, सुनो० ॥३७॥ राजकॅवर बोला जा कह दे, लडने को तू आजा रे । दूत गया झट बजा दिया है, रण का बाजा रे, सुनो० ॥३८।।
- राजकँवर की सेना से लड, अरिमर्दन नृप हारा रे । बन्दी बना पडा पिंजरे मे, कोई न चारा रे, सुनो० ॥३६॥ आगे जाकर दया दिखाकर, अरि को मुक्त बनाया रे । जाओ अपना राज्य करो तुम, सिर न उठाया रे, सुनो।।४।। मुक्त नही मैं मुक्त नही तुम, दोनो ही है वन्दी रे । कर्मो से जो मुक्त वही, प्रात्मा स्वच्छन्दी रे, सुनो० ॥४१।। नेमिनाथ प्रभु के चरणो मे, सयम लेकर तरना रे । नही चाहिये राज्य उसे दो, जिसको करना रे, सुनो०।।४२।। राजकँवर ने नमन कर दिया, चले गये नृप झट से रे । दीक्षा लेकर मुक्त बने जग के, झझट से रे, सुनो० ॥४३।। जगा द्वप की जगह स्नेह, मन उभरा चिन्तन प्यारा रे । सुहावना लगता है वन का, नेक नजारा रे, सुनो० ॥४४॥ थके पडाव किया सेवक जन, गये ढू ढने पानी रे । विना अन्न पानी के टिकती, नही जिन्दगानी रे, सुनो।।४।। इधर हो गया भोजन सेवक, पानी ले ना लौटे रे । आए तव नृप ने पूछा तुम, सव हो खोटे रे, सुनो० ॥४६।। इतना समय लगा कैसे तुम, कहाँ गये सच कहना रे । सेवक तब जो घटित हुई, बतलाते घटना रे, सुनो०।।४७।। स्वच्छ सलिल से भरा सरोवर तट पर झूला डाले रे । सुन्दर कन्या को देखा मन, सशय पाले रे, सुनो० ॥४८।। 6 ] .
रे । गुन गुनाती कड़ी गीत की झूल रही वो झूला मानो उसे देख करके वन मन में फूला रे, सुनो० ।।४।। हमें देखकर उसी समय वो बनी नजर से ओझल रे । ढूंढी कई देर तक पर हम लौटे निष्फल रे, सुनो० ॥५०।। अच्छा जावो कहकर सबको विदा कँवर ने कीना रे । राजकॅवर ने ध्यान उसी पर अपना दीना रे, सुनो० ॥५१॥ सुबह घोषणा करवा दी है हमें न आगे जानारे । उन्हीं सेवकों को संग ले वन हुआ रवाना रे, सुनो० ॥५२।। हरियाली चौ तरफ बिछाई प्रकृति ने उस वन में रे । फूल फूल की बातें सुनते हॅस जीवन में रे, सुनो० ।।५२।। वनवासी कन्या वो होगी सुन्दर बडी सुहानी रे । यहीं घूमती हुई हमारे नजरों आनी रे, सुनो० ।।५४।। देख सरोवर बोले सेवक यहीं उसे था देखा रे । ये देखो उसके पैरों की दिखती रेखा रे, सुनो० ।।५।। इतने में वो खड़ी लता के पास नजर आ जाती रे । राजकॅवर के मन को सुन्दर आकृति भाती रे, सुनो० ।।५६।। उसने सोचा इससे सुन्दर नहीं अप्सरा होती रे ब्रह्मराज की है ये पुत्री क्या इकलौती रे, सुनो० ।।५७।। जाऊँ इसके पास बुलाऊँ पूर्वी परिचय सारा रे । कहीं ये ना हों जाय यहाँ से नौ दो इग्यारा रे, सुनो० ॥५८।। [ 7 सोचा ये भी देख रही है, प्यार भरे नैनो से रे । बोलेगी क्यो नही अमृतमय, स्मित वैनो से रे, सुनो०।।५।। देख सैनिको मित्रो को वो, दौड गई है वन मे रे । किधर गई कुछ खवर रही ना, एक ही क्षणमे रे, सुनो० ॥६०॥ राजकँवर ने कहा सभी से, तुम जावो मैं आता रे । रहा खोजता उसे वही पर, चक्कर खाता रे, सुनो० ॥६१॥ वन मे रहा घूमता आगे, जिनवर मन्दिर पाया रे । ऋपभ जिनेश्वर के चरणो मे, शीश झुकाया रे, सुनो० ॥६२।। वनकन्या को भूल गया मन, मे परिवर्तन आया रे । चमत्कार श्री जिन दर्शन का, वडा सुहाया रे, सुनो०॥६३।। प्रभु पूजन के लिये श्रेष्ठतम, फूल शीघ्र ले आया रे । वस्त्र शुद्ध थे ही स्तुति करके, लाभ उठाया रे, सुनो०।।६४।। आनन्दाथु लगे टपकने, अग उमग सवाया रे । उठ कर देखा तो सन्यासी, नजरे आया रे, सुनो० ॥६५।। जटा श्वेत बालो की सिर पर, लवी लबी खासी रे । गौर वर्ण मुख चन्दा जैसा, नही उदासी रे, सुनो०॥६६॥ किया प्रणाम कँवर ने झुककर, परिचय मुनि ने पूछा रे । थोडे मे हो सुना दिया है, हाल समूचा रे, सुनो० ।।६७।। इतने मे वनकन्या आई, अभी मुनि के पीछे रे । राजकँवर को देख रही है, झुकती नीचे रे, सुनो० ॥६८।। 8 ] राजकँवर भी बीच बीच में उसे देखता जाता रे । उसके मन का प्रेमभाव बह बाहर आता रे सुनो० ॥६६।। वन कन्या है कौन? कौन है आप मुझे दो उत्तर रे । किसने यहाँ बनाया इतना मंदिर सुन्दर रे, सुनो० ॥७०।। मुनि ने कहा कुमार हमारी लंबी बडी कहानी रे। पहले मैं प्रभुपूजन कर लूं बाद सुनानी रे, सुनो० ।।७१।। ऋषि, ऋषिकन्या दोनों ही उठ चले गये हैं भीतर रे । प्रभु पूजन अर्चन कर बोले स्तवन मधुर स्वर रे, सुनो० १७२। फिर आ राजकँवर से बोले आश्रम यहीं हमारा रे । वही सुनायेंगे हम तुमको जीवन सारा रे, सुनो० ॥७३॥ स्वच्छ पवित्र पाश्रम आंगन में पुष्पवाटिका प्यारी रे । काष्ट पर्ण मिट्टी से निर्मित कक्ष उदारी रे, सुनो० ॥७४।। राजकॅवर के लिये बिछाया कन्या ने दर्भासन रे । काष्टासन पर मुनि बैठे हैं तन मन पावन रे, सुनो० ।।७।। पय प्याला, फल ले आई है कन्या भीतर जाकर रे । अतिथि का सत्कार कर रहे प्रेम दिखाकर रे, सुनो० ।।७६।। प्रेमाग्रह को टाल सका ना जो कुछ था स्वीकारा रे । राजकंवर को सुना रहे ऋषि जीवन सारा रे, सुनो० ॥७७।। अमरावती नाम की नगरी नृप हरिषेण सुहाना रे । रानी प्रियदर्शन सुत श्री जितसेन बताना रे, सुनो० ॥७॥ [ 9 . इक दिन राजा हयारूढ हो गए घूमने वन मे रे । अश्व वक्र शिक्षित था दौडा अपनी धुन मे रे, सुनो० ॥७६।। खडा रहा इस वन मे आकर उतर गया नृप नीचे रे । सैनिक आए यहाँ ढूंढते पीछे पीछे रे, सुनो० ॥८०।। विश्वभूति नामक ऋषि कुलपति नरपति उनको नमता रे । ऋपि ने आशीर्वाद दिया है मन को गमता रे, सुनो ।।१।। कुलपति के प्यारे स्वागत से प्रमुदित होते सारे रे । किये हुए का गुण माने वे, सज्जन प्यारे रे, सुनो० ।।२।। ऋपि ने ऋपभ जिनेश्वर के गुण वडे प्रेम से गाये रे । नृप ने यह मदिर बनवाकर पुण्य कमाये रे, सुनो ।।३।। ऋपि ने खुश होकर राजा को विपहर मत्र सिखाया रे ऋषि की आज्ञा ले नगरी मे राजा आया रे, सुनो० ॥८४।। इक दिन राजसभा मे कोई नर अनजाना आया रे । मगलावती पुरी से आया काम बताया रे, सुनो० ॥८॥ रानी विद्युत्प्रभा भूप प्रिय दर्शन जन मन प्यारा रे । प्रीतिमति है सुता मनोहर रूप उदारा रे, सुनो० ॥८६।। गई टहलने वहाँ साप ने काटा पडी अचेतन रे । आप पधारो जहर उतारो सुनो निवेदन रे, सुनो० ॥७॥ सुनकर नरवर गया मत्र पढ अहि का जहर उतारा रे । राजकुमारी खडी हुई पा जीवन प्यारा रे, सुनो० ॥८॥ 10 ] नृप बोले में चलू सभी ने आग्रह पूर्वक रोका रे । दिया न जाता प्रेमिजनों को चलकर धोखा रे, सुनो।।८।। प्रीतिमति का पाणिग्रहण हरिषेण नृपति से कीना रे । दान दहेज हेज घर देकर जगजश लीना रे, सुनो० ।।१०।। विदा हुए निजपुर को लौटे जनता स्वागत करती रे । अगली रानी के मन रानी नहीं अखरती रे, सुनो० ।।९१।। राजकॅवर जितसेन कॅवर को राजा ने परणाया रे । पुत्रवधू से घर का आँगन शोभा पाया रे, सुनो० ।।१२।। माता पड़ी बीमार अचानक बहुत इलाज कराया रे । बच न सकी उड गई राख बन, काची काया रे, सुनो०।।६३॥ राजा के मन सदमा पहुंचा मन न महल में लगता रे । जन्म मरण की आग लगी जग, सदा सुलगता रे, सुनो०।।९४।। आश्रम में जा प्रभु चरणों में अन्तिम जीवन जीऊ रे । संयम की वर शुभाराधना अमृत पीऊ रे, सुनो० ॥६॥ प्रीतिमती ने पति की इच्छा पूर्णतया अब परखी रे । बोली नाथ ! साथ मैं आऊ हरखी हरखी रे, सुनो०।।६।। राजमहल में यहीं रहो तुम मानो मेरा कहना रे । रानी बोली मुझे आपके संग में रहना रे, सुनो० ।।७।। आत्मराधना में संयम में मैं न बनूगी बाधा रे । साथ ले चलो नाथ कहूं क्या, इससे ज्यादा रे, सुनो०।।१८।। [ 11
"
राजा ने अनुमति दी अपनी राजी हो गई रानी रे।
अनुमति देते आँखो मे से उतरा पानी रे, सुनो० ॥६६||
राजतिलक कर दिया गया जितसेन कवर के माथे रे ।
राजा रानी बन में जाते साये साथे रे, सुनो०॥१००।
साश्रुनयन दे रहे विदाई पुरवासी जन सारे रे ।
राज भोग सुख छोड आज वन वीच पधारे रे, सुनो०॥१०१।।
मार्ग साधना का न सरल है शूरवीर नर साधे रे ।
केवल वात वनाने वाले वे नर प्राधे रे, सुनो०॥१०२।।
विश्वभूति कुलपति न रहे अब इस दुनिया मे जीवित रे ।
देधारियो की होती है उमर सीमित रे, सुनो० ।।१०३।।
ऋपभदेव की पावन प्रतिमा पालवन अति प्यारा रे ।
आत्मसाधको सतो का सह-वास उदारा रे, सुनो०॥१०४।।
विश्वभूति के कृपा पात्र को जान रहे है सारे रे ।
सव आदर करते नृप सबको लगते प्यारे रे, सुनो०॥१०५।।
वातावरण वहाँ का राजा रानी के मन भाया रे ।
जो सवका होता उसके हित कुछ न पराया रे, सुनो०।।१०।।
विनय नम्रता भावुकता ने आश्रम का रग बदला रे ।
सत्य साधना से होना है जीवन उजला रे, सुनो०॥१०७।।
तप जप आराधन भक्ति में समय वीतता जाता रे ।
पलक झपकते छठा महिना होने आता रे, सुनो०॥१०८।।
12 ]
प्रीतिमती है गर्भवती जब नप ने ऐसी जानी रे ।
पूछा यह क्या बात बताओ रखो न छानी रे, सुनो०।।१०६।।
पहले जो बतला देती तो आप साथ नहीं लाते रे ।
छिपा न रहता गर्भ महिने ऊपर जाते रे, सुनो०।।११०।।
आश्रम वासी तपस्वियों के मन में नफरत भारी रे ।
आश्रम में वो ही रहता जो हो ब्रह्मचारी रे, सुनो०।।१११।।
राजा रानी ने आश्रम की मर्यादा को लांघा रे ।
संतों ने मिलकर आपस में निर्णय मांगारे, सुनो०।।११२।।
एकत्रित हो गये तपस्वी मिलकर निर्णय लेते रे ।
आश्रम में रहना न चाहिये हम कह देते रे, सुनो०।।११३।।
कहो कहाँ ले जायेंगे रानी को इस हालत में रे ।
करो वकालत आप नहीं इसकी इति अथ में रे, सुनो०।।११४।।
क्यों न सोचता नृप आश्रम में, रहा न जाता ऐसे रे ।
कहने को सब कहदें पर हम कहदें कैसे रे, सुनो०।।११५।।
बेहतर होगा आश्रम तज हम अन्य स्थान पर जाये रे ।
राजा रानी यहीं रहे इन को न सताये रे, सुनो०।।११६।।
इस पर सभी हो गये सहमत निकले सब संन्यासी रे ।
राजा रानी के मन छाई बड़ी उदासी रे, सुनो०।११७।।
दो ही दो हैं आश्रम में अब रानी मन में रोती रे ।
राजा कहता होनहार हो वो ही होती रे, सुनो०।।११८।।
[ 13
वीत गये नौमास वरावर जन्म सुता ने पाया रे । नृप ने इनकी सेवा मे सव समय लगाया रे, सुनो०॥११६।। गिरता गया स्वास्थ्य रानी का बस परलोक सिधारी रे। राजा के सिर आई भारी जिम्मेवारी रे, सुनो०।१२०।। दिल पर पत्थर रख राजा ने पुत्री को सभाला रे । नाम रखा ऋपिदत्ता उसको पोसा पाला रे, सुनो०॥१२१।। सस्कारो से सस्कारित अब उसको करते जाते रे । रानी की यादो मे आँसू झरते जाते रे सुनो०।।१२२।। ऋपिदत्ता हो गई बडी अब रूप निखरता जाता रे। लिया पिता की सेवा का व्रत वडा सुहाता रे, सुनो०।१२३।। हिरन हिरनिया पास घूमते स्नेह वडा वरसाती रे । वनवासी पशु उसकी दुनिया दूर न जाती रे, सुनो०॥१२४॥ इतनी रूपवती हे कन्या ऋषि ने इसे निहारा रे । वनवासी न उडा ले जाये वल के द्वारा रे, सुनो०।।१२।। विपापहारी मत्र मिला जब अजन विधि भी पाई रे। विश्वभूति की याद आ गई लू अजमाई रे, सुनो०।।१२६॥ जिसकी आखो मे अजन हो उसे न कोई देखे रे । वो सारी दुनिया को देखे अपने लेखे रे, सुनो०॥१२७।। पूरी तरह याद करके विधि अजन तुरत बनाया रे । सिखला दिया प्रयोग सुता को स्नेह सवाया रे, सुनो०।१२८।। 14 ]
वनवासी कोई भी उसको नहीं देखने पाता रे ।
घूमे जहां करे जो इसका जब जी आता रे, सुनो०।।१२६।।
सदा पिता की सेवा करती यौवन पथ में आई रे ।
ऋषि ने अपनी आत्मकथा दी साफ सुनाई रे, सुनो०।१३०।।
वो ऋषि मैं ऋषि कन्या है यह आगे बोल न पाये रे ।
खड़े रहे दीवार सहारे देह टिकाये रे, सुनो०।।१३१।।
राज कॅवर ने ऋषिदत्ता की ओर निगाहें डाली रे ।
ऋषि नैनों से पिला रही है अमृत प्याली रे, सुनो०।।१३२।।
प्रणयाधीनों के नैनों को राजर्षि ने झांका रे ।
प्रेम भावना समय सभी को जावे अांका रे, सुनो०।१३३।।
ऋषि बोले इन्कार न करना एक भेंट में देऊं रे ।
आज्ञा दो स्वीकार करू मै खुश-खुश लेऊ रे, सुनो०।।१३४।।
ऋषि को तुम्हें सौंपता हूं मैं भेंट यही स्वीकारो रे ।
मेरे सिर का भार प्यार के साथ उतारो रे, सुनो०॥१३५।।
कोमल बड़ी-बड़ी नाजुक है मैंने इसको पाला रे ।
रखना इसे संभाल मान घर का उजियाला रे, सुनो०॥१३६।।
प्राज्ञा शिरोधार्य कर पद में उसने शीष नवाया रे ।
ऋषि ने सिर चूमा सहलाया स्नेह दिखाया रे, सुनो०।।१३७।।
ऋषि से राजकंवर कहता यों चलिये भोजन करिये रे ।
आमंत्रण स्वीकार कीजिये जरा न डरिये रे, सुनो०।।१३८।।
[ 15
ऋपियो की प्राथम की अपनी अलग एक मर्यादा रे ।
तुमने कहा उसे खाने से माना ज्यादा रे, सुनो०।।१३६।।
वैठी ऋषि गड रही जमी मे मन से बाते करती रे ।
रोये रोयें बोल रहे मुख खुशिया तरती रे, सुनो०।१४०।।
कनक छावनी मे चल पाया सव वृत्तात सुनाया रे ।
वैठ ससानो के सग मे अव खाना खाया रे, सुनो०।१४१।।
शादी के निर्णय का स्वागत किया सभी ने मिलकर रे ।
सब वोले मूरख जन चूके आया अवसर रे, सुनो०॥१४२।।
पाच दिनो के वाद श्रेष्ठ दिन राजगुरु वतलाता रे ।
मूचित करवा दिया सैन्य को कुछ ना जाता रे, सुनो०।१४३।।
आश्रम मे पाते जाते सब जिनवर दर्शन करते रे।
मुनि से धर्म श्रवण कर मन मे खुशिया भरते रे, सुनो०।।१४४।।
शादी का दिन आया आश्रम ऋपि को गया सजाया रे ।
राजकवर ने ऋपि कन्या से फेरा खाया रे, सुनो०॥१४५।।
16 ]
दाल दूसरी . दोहा गये निवास स्थान पर, राजर्षि के साथ । बैठे दंपति सामने, जोड विनय से हाथ ।। तर्ज-भीनासर स्वामी० सुनिये नरनारी ऋषिदत्तारी, बात कहुं सुखकार । नहीं छुटे प्राणी हो चाहे राणी बांध्या कर्म लगार ॥टेर।। रुकिये कुछ दिन तक जहाँ जी, मानें मेरी बात । जाना तो है ही तुम्हें जी, ले इस ऋषि को साथ रे, सु०।।१४७।। प्रसन्नता के साथ मैं जी, यहीं रहूंगा नाथ । ठाली जायेगी नहीं जी, पूज्यपाद की बात रे, सुनिये।।१४८।। वातावरण पसंद है जी, सुन्दर जिन मन को मिलता है सुखद जी, आश्रम से पाल्हाद रे,सु०।।१४६।। सुन कर ऋषि गद्-गद् हुए जी, लगे बरसने नैन । चैन परम हो चित्त में जी, तब क्यों बोले बैन रे, सु०॥१५०॥ मित्रों से उसने कहा जो, जा सकते हैं आप । रुकना है मुझको यहां जी, बोल दिया यों साफ रे, सु०॥१५१।। कावेरी जाना न क्यों जी, पूछ रहे हैं मित्र । ब्याहोगे ना रुक्मिणी जी, लौटाओगे चित्र रे, सुनिये०॥१५२।। प्रासाद । . - [ 17 जाना कावेरी नही जी, करना नही विवाह । क्या होगा इस बात की जी, मुझे नहीं परवाह रे, सु०।१५३।। पुज्य पिताजी क्या नही जी, होगे मन नाराज । मै समझाऊँगा उन्हे जी, मेरे मन का राज रे, सुनिये०॥१५४।। यह ऋषि जीवन सगिनी जी, नही अन्य से काम । कितना रुकना है यहा जी, जाने प्रभु श्री राम रे, सु०।।१५।। मित्र उचित रहना यहा जी, रह तू सुख के साथ । हम अपने घर को चले जी, सुनो स्पष्ट सव बात रे, सु०॥१५६।। कर प्रणाम ऋपि चरण मे जो, लौटे सारे लोग । सैन्य व्यवस्थित कर लिया जी,कुछ नहिं नया प्रयोग रे ।।१५७।। आश्रम मे ही कर लिया जी, इन दोनो ने वास । जिससे ऋिपि अब रह सकेजी,पूज्य पिता के पास रे,सु०॥१५८।। पूज्य पिता के साथ मे जी, पति की सेवा नित्य । ऋपि कन्या के हो गये जी, दोनो दैनिक कृत्य रे, सु०॥१५६।। मूर्ति प्रेम सौजन्य की जी, सीमित करती बात । साय प्रात घूमने जी, जाती पति के साथ रे, सु०।१६०।। स्वामिन मां है आपके जी, प्रश्न किया धर प्यार । हा, है मेरो मा भली जी,ममता का भडार रे, सुनिये०॥१६१।। मां को देखा ही न था जी, मिला न माँ का प्यार । बचपन मे वो मर चुकी जी, ऋपि क्या जाने सार,सु०॥१६२॥ 18 ] - संतों मुनियों के प्रति जी, माँ का श्रद्धाभाव । सच्ची श्रमणोपासिका जी,आकृति भद्र स्वभाव रे, सु०॥१६३॥ मेरे से करतो. बहुत जी, मेरी माता प्यार । तुझे लगेगी बहुत ही जी, प्यारी और उदार रे, सु०।।१६४।। आज्ञा हो तो पूछ लू जी, एक बात मैं और । पूछो मत झिझको ऋषि जी,दिया कनक ने जोर रे,सु०।।१६५।। मुझे छोड़ किससे कहो जी, पूछोगी तुम बात । हम तुम दोनों एक हैं जी, जीयेंगे नित साथ रे, सु०॥१६६।। कहिये क्या परिवार में जी, चलता मांसाहार । यही पूछने के लिये जी, इतना किया विचार रे, सु०॥१६७।। ऋषि न हमारे घर कभी जी, होता मांसाहार । धर्म अहिंसा मानते जी, करते शाकाहार रे, सुनिये०॥१६८।। ऋषभ देव भगवान के जी, परम पुजारी भक्त । दया प्रेम वात्सल्य से जी, रोम-२ अभिषिक्त रे, सु०॥१६६।। ऋषि का मुखड़ा खिल उठा जी, जैसे खिले गुलाब । कितने अच्छे आप हो जी, जिसका नहीं जवाब रे, सु०॥१७०।। हथेलियों के बीच में जी, शीघ्र हथेली दाब । मौन लिया मनसे नहीं जी, मिलता नेक जबाब रे, सु०॥१७१।। ऋषि आयेगा क्या तुम्हें जी, रहना वहां पसंद । महलों का वातावरण जी,एक तरह से बंद रे, सुनिये ०।।१७२।। [ 19 - जहा रहोगे तुम वहा जी, रहना मुझे पसन्द । दूर न करना बस मुझे जी, इसमे सब आनन्द रे, सु०॥१७३।। महल अगर भाया न मन जी, तो आश्रम-सा स्थान । वही सजा लेंगे अपन जी, ऐसा ही लो मान रे, सुनिये०॥१७४।। प्रिय मेरे मन की कही जी, मानोगे इक वात । मृग-मृगी का जोडला जी, ले लोगे क्या साथ रे, सु०॥१७५।। मृगछौने भोले भले जी, इनसे मुझको प्यार । इन्हें साथ लेना मुझे जी, प्रेम सहित स्वीकार रे, सु०॥१७६।। ले न सके जो साथ तो जी, ये न जीयेंगे नाथ । बहुत-बहुत आत्मीयता जी, इनकी मेरे साथ रे, सु०॥१७७॥ ऋषि तेरी हर बात ही जी, देती अति आनन्द । ऐसे कहकर कर दिया जी,ऋपि का आनन बन्द रे, सु०॥॥१७८।। लगा अन्धेरा उतरने जी, आये आश्रम चाल । लगी सजाने ऋपि स्वय जी,तुरत आरती थाल रे, सु०॥१७६।। थमा दिया दीपक जला जो, राजर्षि के हाथ । शख बजा घटी बजी जी,की स्तवना सब साथ रे, सु०॥१८०॥ 20 ]
ढाल तीसरी
दोहा
ऋषभ जिनेश्वर की लगी प्रतिमा रम्य विशेष ।
कभी-२ रुचता अधिक ज्यों धार्मिक उपदेश ॥१८१।।
तर्ज—माँ सूमूढे बोल
हुआ विवाह महीना बीता याद नहीं घर आता रे ।
वातावरण सुहाना वन का मन को भाता रे, सुनो०॥१८२।।
भोले भाले मृगछौने ये करते इत उत क्रीड़ा रे ।
उडते रंग बिरंगे पंछी हरते पीड़ा रे, सुनो०।१८३॥
कल कल करते बहते झरने कहते जग है अस्थिर रे ।
दोष मुक्त मन तुल्य गगन नित, जग के ऊपर रे, सुनो०।।१८४।।
फूलों की सौरभ से सुरभित वन का कोना कोना रे ।
गंध रहित हो क्षम्य नहीं दुर्गन्धित होना रे, सुनो०।।१८५।।
छोटे बड़े सभी पशुओं का वन है अपने घर सम रे ।
एकाधिकार किसी का होना कहीं न उत्तम रे, सुनो०।१८६।।
मन में सुख होने से वन में सुख मिलने की आशा रे ।
क्या खेले नर पड़े नहीं जो सुलटा पाशा रे, सुनो०।१८७॥
कनक चटाई पर लेटा था तरू अशोक के नीचे रे ।
मृग मृगी के साथ खड़ी थी ऋषि के पीछे रे, सुनो०।।१८८।।
-
[ 21
राजपि चल पाये बैठे कवर पास मे आकर रे ।
ऋपि भी पाकर बैठ गई है शीश झुकाकर रे, सुनो०।।१८६।।
कुछ कहने को ही आये हैं सोचा राजकँवर ने रे ।
कुछ कहना प्रारभ किया है श्री मुनिवर ने रे, सुनो०।१६०॥
तुम सुविनीत कुमार कर रहे मेरी इच्छा पूरी रे ।
करु प्रशंसा तन से मन से भूरि भूरि रे, सुनो०।१६१।।
राजमहल को छोड यहाँ पर रहते हो आश्रम मे रे ।
आप नही पाते सुख सुविवाग्रो के भ्रम मे रे, सुनो०।।१६२।।
ऋपिदत्ता है पुण्यशालिनी इसने तुमको पाया रे ।
कर स्वीकार आपने मुझ पर भार चढाया रे, सुनो०।१६३।।
मुक्त किया चिन्ता से मुझको कहकर रोये रिषिवर रे ।
राजकँवर ने आँसू पोछे लेकर चीवर रे, सुनो०।१६४।।
ऋपिदत्ता के लिये आपसे है दो बाते कहनी रे ।
जो भी इसकी भूले होवे सारी सहनी रे, सुनो०॥१६५।।
राजमहल की पुत्रवधू सी कला न इसको आती रे ।
सह पाये अपमान न ऐसी इसकी छाती रे, सुनो०।१६६॥
गृह कार्यो मे कुशल नही है है ये भोली भाली रे ।
इसके लिये आप ही हो वस सदा दिावली रे, सुवो०।।१६७।।
सम्हालना इसके मन को मत पीडाये पहुचाना रे ।
तुम्हे देवता मानेगी ये इतना जाना रे, सुनो०॥१६८।।
22 ]
पाकर के सहवास आपका होशियार हो जायेगी।
आज्ञा शीष चढायेगी व्रत लिया निभायेगी, सुनो०।।१६६।।
अगर भूल हो जाये तो तुम इसे क्षमा कर देना जी।
मेरी अन्तर इच्छा पर बस हां भर लेना जी, सुनो०।।२००।।
राजकँवर ने कहा आप क्यों फरमाते हो ऐसा रे ।
हैं हम यहीं पास में फिर ये चिन्तन कैसा रे, सुनो० ॥२०१।।
नहीं कुवँर अब घर को जाना उचित रहेगा मानो रे ।
मैं भी मेरा रास्ता नंगा हठ मत ठानो रे, सुनो०॥२०२।।
आप कहाँ जायेंगे ऐसे राजकॅवर ने पूछा रे ।
चलो हमारे साथ वहेंगे भार समूचा रे, सुनो०।।२०३।।
वन में नई कुटीर नया जिनमंदिर बनवा देंगे रे ।
नई-२ धार्मिक शिक्षा ले मन बदलेंगे रे, सुनो०।।२०४।।
किसके लिये मुझे जीना है इसके खातिर जीया रे ।
मतलब रहा नहीं जीने से धापा होया रे, सुनो०।।२०५।।
अग्निप्रवेश मुझे करना है सुनकर दोनों चीखे रे ।
नहीं-२ ऐसा मत करना बोले तीखे रे, सुनो०।२०६।।
कहा सुता ने पूज्य पिता से ऐसा कभी न करना रे ।
वर्जित माना अात्म घात के द्वारा मरना रे, सुनो०॥२०७।।
बेटी मेरी बात सुनो तुम शील पालना मनसे रे ।
सेवा मान बड़ों का करना तनमन धन से रे, सुनो०।२०८।।
[ 23
अात्मघात से मुझे नही असमाधि होने वाली रे ।
मेरा भेद ज्ञान अतिदृढ है वात न खाली रे, सुनो०।।२०६।।
देह हुई अव जर्जर इसमे कुछ भी सार नहीं है रे ।
मरने से डर जीने से मन प्यार नही है रे, सुनो०।।२१०।।
राजपि से लिपट गई ऋषिदत्ता रोती रोती रे।
नाजुक दिलवालो की हालत ऐसी होती रे, सुनो०।२११।।
इधर घास वाली कुटिया मे, आग लगी जोरो से रे ।
ऋपि के द्वारा लगी लगी ना वह औरो से रे, सुनो०।२१२।।
कहा ऋपि ने राजकवर से तुम ऋषि को सभालो रे ।
कोई दुस्साहस कर ना वैठे इसको पालो रे, सुनो०॥२१३।।
उसे इसे सम्हला राजपि खडे हुए कर जोडे रे ।
परमेश्वर को वदन करके जल्दी दौडे रे, सुनो०॥२१४।।
उसी आग मे कूद पड़े वो इस काया को त्यागा रे ।
ऋपिदत्ता को छोड कवर आश्रम मे भागा रे, सुनो०।२१।।
शीतल पानी ला दे छीटे इसे होश मे लाया रे ।
उत्तरीय से हवा डालकर स्वस्थ बनाया रे, सुनो०॥२१६।।
दिया कँवर ने नही भागने पकडे रखा बराबर रे ।
गोदी मे ले सिर सहलाता खुद ही रोकर रे, सुनो०॥२१७।।
मै हो गई अनाथ मात का मुह मैने न निहारा रे ।
थे सर्वस्व आप ही ऋषि ने जोर पुकारा रे, सुनो०॥२१८।।
24 ]
ऋषि को उठा कनक कंधे पर आश्रम में ले आया रे ।
बाल ठीक कर मुह धो पानी पिला सुलाया रे, सुनो०॥२१६।।
पास बैठ दे रहा सान्त्वना देह लता सहलाता रे ।
कोमल हृदया नारी से दुख सहा न जाता रे, सुनो०।।२२०।।
देख
दूर से आग लगी कुछ सैनिक दौड़े आये रे ।
राजकंवर के मुख से वर्णन सुन चकराये रे, सुनो०॥२२१।।
राजकंवर ऋषि से कहता है देवी शोक निवारो रे ।
किया आत्म कल्याण पिताने जरा विचारो रे, सुनो०।२२२॥
पूर्वावस्था में राजा फिर बने पिता व्रत धारी रे ।
उत्तर क्रिया हमें ही उनकी करनी सारी रे, सुनो०।।२२३।।
सेनापति से कहा स्तूप निर्माण यहां पर करना रे ।
ऋषभदेव जिनवर का लेना भव-२ शरणा रे, सुनो०।।२२४।।
दोनों जिनमंदिर में जाकर जिनवर के गुण गाते रे ।
वीतराग बनने की इच्छा सतत जगाते रे, सुनो०।।२२५।।
प्रभु भक्ति कर बाहर आये मृग मृगी थे हाजिर रे ।
ऋषि के साथ खेलते हैं वे उछल उछल कर रे, सुनो०॥२२६।।
फिर घर आकर दोनों ने कर लिया प्रेम से भोजन रे।
अब इस वन में रहने का कुछ, है न प्रयोजन रे, सु०॥२२७।।
बिना पिताजी के सब सूना सूना लगता आश्रम रे ।
चले अपन अपने घर को करने को उपक्रम रे, सुनो०।।२२८।।
[ 25
सेनापति को बुला दिया आदेश नगर चलने का रे ।
सेवक लेता नाम नही इत उत टलने का रे, सुनो०।।२२६।।
दोहा
वन पोहर को छोडकर, ऋपि जाती ससुराल ।
कन्याओ को ही पता जो भी होता हाल ।
तर्ज-मूल
रथ मे चढते ही ऋपि सिसकी, डुसक डुसक कर रोई रे ।
गिर जाती जो नही थामता पति मनमोही रे, सुनो०।।२३०।।
हिरण और हिरणी का जोडा साथ ले लिया रथ मे रे ।
पौछ
रहा
पति अामू प्यारे वन के पथ मे रे, सुनो।।२३१।।
थकते जहा पडाव डालते जब भी हो जाता मन रे ।
राजकवर को घर के जैसा लगता था वन रे, सुनो०॥२३२।।
ऋपि अपने रास्ते मे करती जाती वृक्षारोपण रे ।
वृक्षा रोपण द्वारा मिलता नया प्रपोषण रे, सुनो०।।२३३।।
पति ने कहा वहा महलो मे कर न सकेगी ऐसा रे ।
ऋषि बोली वन मे तो कर लू लगे न पैसा रे, सुनो०।।२३४।।
ऋपि के निर्दोपी नैनो मे, बहुत बड़ा आकर्षण रे ।
इधर उधर दर्शन से होता प्रेम सवर्पण रे, सुनो०।।२३५।।
26 ]
ज्यों-२ शहर निकट आता था त्यों-२ मन का मंथन रे ।
चिन्तन की आदि होती है होता अंत न रे, सुनो०।२३६।।
मां नाराज नहीं होगी होंगे न पिताजी क्रोधित रे ।
की न रुकमणी से शादी घर, से अनुमोदित रे, सुनो०॥२३७।।
प्राजांकितता अपनी अपने को प्रांदोलित करती रे ।
उलाहना खाया न आज तक बात अखरतो रे, सुनो०।।२३८॥
नहीं चाहिये पुत्रवधू ऋषि कन्या यह वनवासी रे,
कह देगी मां तो क्या होगा, चिन्ता खासी रे, सुनो०।।२३९।।
मैं क्या उत्तर दूंगा कैसे कसे व्यंग सह लूंगा रे ।
जिसको लाया उससे कैसे स्नेह रखूगा रे, सुनो०।।२४०।।
उन्हें मना लूंगा में उनके पांवों में सिर रखकर रे ।
मां मेरा रक्षण कर लेगी प्रेम नजर धर रे, सुनो०।।२४१।।
सिखला देगी राजमहल की जीवन पद्धति प्यारी रे ।
माफ करेगी मनसे इसकी भूलें सारी रे, सुनो०।।२४२।।
हुआ हुआ सो किया-२ सो जो होगा देखूगा रे ।
अभी सोचने से क्या मतलब, घर पहुँचुंगा रे, सुनो०।।२४३।।
ऋषि से कहा सामने दिखता, वो अपना पुर आया रे ।
रथ की गति में वेग आ गया मन हरषाया रे, सुनो०।।२४४।।
पुर वन में सचिवादिक सारे स्वागत करने हाजिर रे
जय-२ बोलाते सब मिलकर मीठे मनभर रे, सुनो०।।२४५।।
[ 27
ऋषिदत्ता को देख-२ मन हुए प्रसन्न सकल जन रे ।
कुशल क्षेम सबने मिल पूछा वोले धन धनरे सुनो०।२४६।।
नगर प्रवेश हुआ दोनो का भीड लगी अति भारी रे ।
राज महल मे पहुच गई है अब असवारी रे, सुनो०॥२४७।।
पहले मा के पास पहुच कर अपना शीश झुकाया रे ।
सिर पर हाय फिराते मा ने स्नेह दिखाया रे, मुनो०।।२४८।।
ले क्या नाम बुलाऊ बेटी । 'ऋपि' ऋपि धीरे बोली रे ।
झुकी शरम से आखे नीची मन की भोली रे, सुनो०।।२४६।।
वेटा बोला पितृ चरण मे नमस्कार कर आऊ रे ।
मा वोली ऋपि को भी ले जा, सही सुझाऊ रे, सुनो०॥२५०।।
गये पिता के पास नमे वो झिझक रही ना मन मे रे ।
आशीर्वाद मिला हितकारी नव जीवन मे रे, सुनो०॥२५१।।
वेटी राजमहल तेरा ही घर है सुख मे रहना रे ।
लिये काम के दास दासियो से ही कहना रे, सुनो०।।२५२।।
किया इशारा राजकवर ने गई ऋपि उठ सत्वर रे ।
राजकवर से फरमाते हैं, ऐसे नखर रे, सुनो०।।२५३।।
ऋपि वनकन्या नही राज-कन्या है भोली भाली रे ।
वनवासी हरिषेण नृपति ने इसको पाली रे, सुनो०।२५४।।
राजा रानी से मैं परिचित सगपन नही अनजाना रे ।
था अपना सवध पुत्र सुन वहुत पुराना रे, सुनो०।।२५५।।
28 ]
?
सुन्दर गुणी सुशीला सीधी मुख आकृति बतलातो रे ।
प्रसन्नता से राजकॅवर की फूली छाती रे, सुनो०।२५६।।
कावेरी क्यों गया न ? हमसे क्यों नहीं पूछाताछा रे ।
उलाहना भी दिया नहीं है झूठा साचा रे, सुनो०।।२५७।।
सुत से कहा पिता ने बेटे रोष न इस पर करना रे ।
रोत सोखते देर लगेगी दोष न धरना रे, सुनो०॥२५८।।
नृप ऐसा व्यवहार करेंगे सुत ने नहीं विचारा रे ।
श्रद्धा बढ़ी पिताजी के प्रति इसके द्वारा रे, सुनो०।२५६ ।।
आज्ञा ले मां पास या गया ऋषि ने किया इशारा रे ।
यहां मंगाएं क्या पति बोला हां हां प्यारा रे, सुनो०॥२६०।।
मां सुन वोली क्या है-सुतने, कहा जोड़ला लाये रे ।
बहुत पसंद तुम्हें आयेगा सही बताये रे, सुनो०।।२६१।।
दासी गई हिरण हिरणी के जोड़े को ले आई रे ।
इतना सुन्दर कह कर मां ने खुशी दिखाई रे, सुनो०॥२६२।।
महलों के पीछे उपवन में इसे रखा जावेगा रे ।
पशु में भी आत्मा होती है सुख पावेगा रे, सुनो०॥२६३।।
बोली सास घास देने को मैं ऋषि मिल जायेगी रे ।
पहले इसे खिलायेंगी फिर हम खायेंगी रे, सुनो०।२६४।।
इसे खिलाये बिना न खाना मेरी बहू को भाता रे ।
जुड़ जाता आत्मा से आत्मा का यह नाता रे, सुनो०।।२६५।।
[ 29
.
ऐसी जगह रखो वन मे महलो से दिखे हमेशा रे ।
पशुपालन भी एक कला है, और है पेशा रे, सुनो०।२६६।।
राजकँवर ने खाना खाया सास बहू ने खाया रे ।
करने को आराम कँवर महलो मे आया रे, सुनो०।।२६७।।
सुसशय्या मे सोया आई नीद थकान मिटातो रे ।
बैठगई ऋपि यही पास मे, नीद न आती रे, सुनो०॥२६८।।
दिन का वीता पहर तीसरा आख तुरत खुल जाती रे ।
सविनय उठी ऋषि झारी से, सलिल पिलाती रे, सु०॥२६६।।
तू कब आयी कवसे बैठी, अभी-२ मै आई रे ।
मा ने महल बताया सारा साथ घुमाई रे, सुनो०।।२७०॥
इन्तजार करती होगी मा वहा अपन को चलना रे ।
मा की आज्ञा पालन मे हम, करे न स्खलना रे, सु०॥२७१।।
मा के पास गये दोनो कुछ, स्त्रिया वहा थी आई रे ।
भद्रासन पर बैठ गये थे शीश नवाई रे, सुनो०।।२७२।।
मिलने आई हुई स्त्रियो ने करी प्रशसा भारी रे ।
रूप प्रशसा सुन ऋपि शरमा गई वेचारी रे, सुनो०।२७३।।
मा ने उसे खीचकर अपने पास तुरत विठलाया रे
अभिवादन कर गई स्त्रिया दिन ढलने आया रे, सु०॥२७४।।
प्रसन्नता की आभा विखरी माँ के मुख पर भारी रे ।
पूर्व जन्म की सबधित ऋपि लगती प्यारी रे, सुनो०।२७५।।
30 ]
अथ से इति तक बातें सुनने की इच्छा माता की रे ।
जिसे व्याहने गया रही वह कैसे बाकी रे सुनो।।२७६।।
दासी से कह दिया किसी को अव मत आने देना रे ।
घर की बातों में औरों का क्या है लेना रे सुनो०।२७७।।
नेत्र बरसने लगे सुनी जब मां ने घटना सारी रे ।
बैठी ऋषि रो पड़ी फफककर, नारी-नारीरे, सुनो०।।२७८।।
ने मां से कहा सुनो मां, बहू न रात को खाती रे ।
मां बोली अच्छा है बेटा धर्म निभाती रे, सुनो०।।२७६।।
तेरे अपने आप त्याग हो जायेगा सच मानो रे ।
तुझे खिलाकर खायेगी यह निश्चय जानो रे, सुनो०।।२८०।।
ऋषि को ले मां गई रसोई घर में जल्दी उठकर रे ।
घर अपने मालिक के उपर होता निर्भर रे, सुनो०।।२८१॥
दासी ने आ कहा आपके खडे मित्र कुछ बाहर रे ।
आया कॅवर मिला बातें की हाथ मिलाकर रे, सुनो०।।२८२।।
मिला निमंत्रण भोजन का इत फिर चल भीतर आया रे ।
पिता पुत्र ने साथ बैठकर खाना खाया रे सुनो०॥२८३।।
माँ के साथ रसोई घर में, सहायता ऋषि करती रे ।
पति की प्रसन्नता का पथ प्रतिपल अनुसरती रे, सुनो०।।२८४।।
रीतभांत से परिचित होते लगी न ज्यादा देरी रे ।
चलने से परिचित हो जाती सारी सेरी रे सुनो०।।२८५।।
[ 31
सास स्वय को सास नहीं गिन गिनती माता सरखी रे। अहकारिता पनप न पाई निश्चित परखी रे, सुनो०॥२८६।। हसती रमती देख ऋपि को महल झूमता सारा रे । लगता कनक महल भी लगता ऋषि को प्यारा रे,सु०॥२८७।। क्या आश्रम की याद न आती सुनकर रोना आया रे । प्रश्न पूछकर राजकवर ने धोखा साया रे, सुनो०॥२८॥ अर्थ पूछने का है मेरा कमी न कोई सलती रे । ऋषि खुल करके वतला दे तू कोई गलती रे सुनो०।२८६।। किसी बात की कमी न मेरा ध्यान सभी ये रखते रे । हिरण और हिरणी भी देखो यहा फुदकते रे, सुनो०।२६०।। दूर-२ रमणीय वनो मे कवर इसे ले जाता रे । नदियो के तट बहते झरने इसे दिखाता रे, सुनो०॥२६१।। पाव डुबोते रखती जल मे सुख से बैठ किनारे रे । फसलो मे हो खडी कवर को हेला मारे रे, सुनो०॥२६२।। खोजो मुझे आप आकरके छुपकर पति से कहती रे । पहाडियो पर चढने में पीछे ना रहती रे, सुनो०।।२६३।। सुनकर कुहू कुहू कोयल की गीत प्रेम से गाती रे । हँसती और नाचती अपने आप सुहानी रे, सुनो०।२६४॥ खिले हुए फूलो सी सौरभ तन से छोडा करती रे । देखा नही किसी ने आलस मोडा करती रे, सुनो०॥२६५।। 32 ]
पाँवों की गति गति शब्दों की देती नहीं सुनाई रे ।
शरम नैन में धरम चित्त में लिया बसाई रे, सुनो०।।२६६।।
नित उठ न्हा धो प्रभु मंदिर में जाती पूजा करतो रे ।
तन मन पुलकित हो उठता जब स्तवन उच्चरती रे,सुनो०२६७
भावों में बह जाती जब वो गीत भक्ति के गातो रे ।
मधुर मधुर आवाज कर्णप्रिय बहुत सुहाती रे, सुनो०।।२६८।।
खाती नहीं रात को खाना कटु न बोलती वानी रे ।
रखती नहीं नहीं पीती अनछाना पानी रे, सुनो०।२६६ ।।
नहीं उघाड़ी रखती चीजें जीवदया व्रत पाले रे ।
श्रावक जीवन की मर्यादा सदा संभाले रे, सुनो०।।३००।।
दिन पख माह वर्ष सुख वाले आँख फुरकते जाते रे ।
कल की सी है बात सभी मिल ऐसा गाते रे, सुनो०।।३०१।।
सुख के पीछे पीछे आता दुःख न नजर में प्राता रे ।
चुपके से आ बड़े जोर से नाड़ दबाता रे, सुनो०।।३०२।।
[ 33
दाल पाँचवी दोहा सुख के पीछे दुख है, सदा न रहता क्षेम । क्या होता ऋषि सग अब, हाल सुनो धर प्रेम ॥ तर्ज-मां सू मू ढे बोल इक दिन सुबह न वनने वाली, बात बनी अनहोनी रे । विन अपराधे अपराधी भई ऋपि सलोनी रे, सुनो०।।३०३।। राज महल के दरवाजे पर जनता शोर मचातो रे । हत्या हुई पुरुष की पुर मे कपकपातो रे, सुनो०।।३०४।। राजकँवर ने उठकर ऋषि के मुख की ओर निहारा रे । बिखरे पड़े मास टुकडो का बुरा नजारा रे, सुनो०।।३०५।। फैल रही दुर्गध मुह पर दाग रक्त के दिखते रे । पैर जमी से लगे उखडने कही न टिकते रे, सुनो०।।३०६।। सोचा ऋषि ने रजनी मे जा, यह हत्या की होगी रे । छुपकर इसमे रहता कोई राक्षस रोगी रे, सुनो०।।३०७।। आश्रमवासी ऋषिदत्ता ऋपि सुता कहाने वाली रे । उपर से उजली भीतर से इतनी काली रे, सुनो०॥३०८।। त्रिया चरित्र वडा दुर्गम है नोति शास्त्र सच कहता रे । मेरे जैसा नर नित स्त्री के वश मे रहता रे, सुनो०॥३०॥ फिर मन बोला ऐसी हो नही सकतो ये ऋपि वाला रे । इससे पहले रूप न ऐसा देखा आला रे, सुनो०॥३१०॥ 34 ] .
फिर मन बोला मांस खंड ये यहां कहां से आये रे ।
लगे खून के धब्बे कहते इसने खाये रे, सुनो०।।३११।
फिर मन बोला इससे पुछू देखू क्या दे उत्तर रे ।
ऋषि को जगा सुना कर घटना पूछी डटकर रे,सुनो०॥३१२।
नाथ! विषाद घृणा मुख पर क्यों देती मुझे दिखाई रे ।
तेरा ही मुख देख कंवर बोला झल्लाई रे, सुनो०।।३१३।
पुर में हत्या हुई पुरुष की शोर मचा है भारी रे ।
तू कोई डायन राक्षसणी है या नारी रे, सुनो०।।३१४।
ऋषि बोली इस घटना से संबंध नहीं कुछ मेरा रे ।
मेरी आंखों के आगे छाया अंधेरा रे सुनो०।।३१५।
मेरे अहितैषी नर ने यह कृत्य किया है सारा रे ।
पर न प्रमाण मिलेगा कोई मेरे द्वारा रे, सुनो०।।३१६।
निर्भय और नर्चित नेत्र से लगती पूर्ण सचाई रे ।
फंसी जाल में चिड़िया जाये क्यों न बचाई रे, सुनो०॥३१७।
कहा कॅवर ने मैंने मन में गलत धारणा धारी रे ।
माफ मुझे करदे ऋषिदत्ता निर्मल नारी रे, सुनो०।।३१८॥
पति ने स्वयं सलिल लेकर के, ऋषि का मुंह धो डाला रे।
मांस खंड नाली में डाले काम संभाला रे, सुनो०।।३१६।।
कुछ भी नहीं बना हो ऐसे दोनों बाहर आये रे ।
बहू सास को पुत्र पिता को शीष नवाये रे, सुनो० ॥३२०।।
१
=
[ 35
राजा के मुख पर स्वाभाविक दिखी रोप की रेसा रे । ऐसा पापी हत्यारा नर कही न देखा रे, सुनो०।।३२१।। माँ से ऋपि जो कहे कहेगो-राजाजी से माता रे। नृप घटना से जोडेगे इस ऋपि का नाता रे सुनो०।।३२२।। ऋषि ने नहीं किसी का कुछ भी अब तक काम विगाडा रे । कौन शत्रु है जिसको जाए आज लताडा रे, सुनो०।।३२३।। पति ने पत्नी से पूछा दुख आज तुझे पहुचाया रे । पत्नी वोली मेरा कृत अघ सम्मुख आया रे, सुनो०॥३२४॥ पाप उदय मे अगर न आये तो न वने कृत ऐसा रे । सह लूगी दुख जब भी आये चाहे जैसा रे, सुनो०॥३२५।। मेरे लिये आपको मेरा त्याग पडे जो करना रे । कर देना, दुख सह लेना, दुख से मत डरना रे, सुनो०।।३२६।। रख दीना कर मुह पर ऋपि के राजकवर ने अपना रे । वोला झूठ मान जो आवे ऐसा सपना रे, सुनो०।।३२७॥ मुख मे साथ रहू दु ख मे दू त्याग वने नही ऐसा रे । रीति नीति विपरीत ये वर्तन राक्षस जैसा रे, सुनो०॥३२८।। पहरा चौकी व्यर्थ गए हत्यारा गया न पकडा रे । नरहत्या करने वाला नर लगता तगडा रे, सुनो०॥३२६॥ नर की हत्या हुई दूसरे दिन भी पुर मे वैसी रे । हाहाकार मचा कहते जन स्थिति यह कैसी रे, सुनो०॥३३०॥ . 36 ]
ऋषि के मुख पर लगे खून के धब्बे पति ने भाले रे ।
पड़े मांस के खंड पास में इतउत डालेरे, सुनो०।।३३१।।
ऋषि को जगा दिखाया मुखड़ा और मांस के टुकड़े रे।
विषम तत्व बदनाम रहा कर देकर दुखड़े रे, सुनो०॥३३२।।
मुह धुलवाकर मांस खंड फिकवाये फिर नाली में रे।
राजकंवर को दोष न दीखा घरवाली में रे, सुनो०।।३३३।।
दे आश्वासन बाहर आया समाचार सब पाया रे ।
पूज्य पिताश्री के चरणों में शोश नवाया रे, सुनो०।।३३४।।
कहा पिता ने हाथ लगा नहीं अब तक वह हत्यारा रे ।
जाल बिछादो गुप्तचरों का कर हुशियारा रे, सुनो०॥३३५।।
गए मंत्रणालय में सेनापति सह राजकंवरजी रे ।
बडा असाधारण हत्यारा या निशिमरजी रे, सुनो०।।३३६।।
कर दी गई व्यवस्था सौंपी सबको जिम्मेवारी रे।
चिंतित थे पुरवासी प्यारे सब नर नारी रे, सुनो०।।३३७।।
आसपास अज्ञात व्यक्ति छुपकर ना आने पाये रे ।
सैनिक दल हो गया संगठित शहर जगाये रे, सुनो०।।३३८।।
काल रात्रि का तिमिरधरापर इधर उतर कर पाता रे ।
राजकंवर ऋषिदत्ता को आश्वस्त बनाता रे, सनो०॥३३६।।
कर दरवाजे बंद महल के नैन मूद ऋषि सोई रे ।
जगता रहा, कंवर आ पाए अन्य न कोई रे, सुनो०॥३४०।।
[ 37
ऋपि न जा सके नहीं आ सके मास डालने वाला रे । मन्द मन्द दीपक का उसने करा उजाला रे, सुनो०।।३४१।। आश्रम की स्मृति रही उभरती राजकवर मनमाहो रे । कभी प्रहरियो को पदध्वनि दे रही सुनाई रे, सुनो०।।३४२।। मध्यरात्रि के वाद कवर को नीद आ गई गहरी रे । पकड न पाये हत्यारे को कोई प्रहरी रे, सुनो० ॥३४३॥ प्रात उठकर देखा ऋपि मुख सना खून से सारा रे । पडे मास के खड, न दिखता कोई हत्यारा रे, सुनो०।।३४४।। जगा उसे मुह धुलवाया फिकवाये टुकडे सारे रे। जब तक चोर न पकडा जाये किसको मारे रे, सुनो०।।३४५।। ऋषि सासु के पास गई अपना दायित्व निभाने रे। राजकवर आ लगा पिता को शीप झुकाने रे,सुनो०।।३४६।। समाचार आया वालक की हत्या हुई करारी रे। शोर मचाती जनता मिलकर आई सारी रे, सुनो०।।३४७।। चुप्पी साधे हुए भूपति सुनते ध्यान लगाकर रे । सुत से पिता मागते समुचित कोई उत्तर रे, सुनो०॥३४८।। प्रिय सतान समान प्रजा की रक्षा अपने उपर रे । दर्द सुनू देखू कैसे मैं राजा बनकर रे, सुनो०॥३४६।। वयोवृद्ध मत्री, नृप, नृपसुत बैठ मत्रणा करते रे । क्यो निर्दोष लोग पुरवासी ऐसे मरते रे, सुनो०॥३५०॥ 38
हत्यारा मानव होता तो कहां भाग कर जाता रे ।
किसी गुप्तचर या प्रहरी के नजरों आता रे, सुनो०।।३५१॥
असुर पिशाच दैत्य या दानव है कोई हत्यारा रे ।
दुष्ट वासना पूरी करता हत्या द्वारा रे, सुनो०।।३५२।
दैवी तत्त्व बिना उस पर हम विजय नहीं पा सकते रे ।
हार आसुरी बल ही आखिर देखो थकते रे, सुनो०॥३५३।।
योगी सन्यासी साधक के पास शक्तियाँ मिलती रे ।
चमत्कार बतलाने वाली कलियां खिलती रे, सुनो०।।३५४।।
मोक्षमार्ग के आराधक कुछ काम न ऐसा करते रे ।
धर्म देशना देने वाले संत विचरते रे, सुनो०॥३५५।
बुला योगियों से ही इसका रास्ता पूछा जाये रे ।
तीनों सहमत होकर के अब सभा बुलाये रे, सुनो०।।३५६।।
ढिंढोरा पिटवाया पुर में आयो सब संन्यासी रे ।
चमत्कार दिखला कर काटो दुःख की फांसी रे, सुनो०।।३५७
सौ लगभग योगीजन पाये दे पादर बिठलाया रे ।
राजा ने सविनय दुख पुर का स्पष्ट सुनाया रे, सुनो०।।३५८ ।।
शक्ति उपासक आप लोग कुछ चमत्कार दिखालायो रे ।
प्रजा प्रजापति को आफत से आप बचाओ रे, सुनो०॥३५६।।
चुप क्यों बैठ गए हो सारे परचा हमें बताओ रे ।
मंत्र तंत्र जप लिखकर बाधा दूर हटाओ रे, सुनो०।।३६०।।
.
[ 39
लगे परस्पर मुह ताकने जोगी वावा सारे रे । राजा अपना गुस्सा इन पर वही उतारे, रे सुनो०॥३६१।। डीगे हाक हाक लोगो को ठग कर खाने वाले रे। तुम हो अपना उल्लू सीधा करने वाले रे, सुनो०॥३६२॥ मेरा काम करो वरना मैं यहा न रहने दू गा रे । स्पप्ट स्पष्ट उत्तर में सबसे अव मागू गा रे, सुनो०॥३६३।। नृप ने आज्ञा दी मत्री को पुर से इन्हे निकालो रे । जो सीजे ना धान्य उसे क्यो व्यर्थ उवालो रे सुनो०।।३६४॥ उठकर जाने लगे सभी इतने में योगिनी आई रे । कहा आपके प्रश्नो का उत्तर मै लाई रे, सुनो० ॥३६५}} नृप ने स्वागत किया वताओ कौन पुरुप हत्यारा रे । तुमने उसको पहचाना किस शक्ति द्वारा रे, सुनो०॥३६६।। याखे मूद योगिनी बोली-सपन रात को आया रे । एक देव ने मेरे को सव हाल सुनाया रे, सुनो०॥३६७।। कल नृप सब से पूछेगा पर देगा कोई न उत्तर रे । उन्हे निकालेगा तू जाकर कहना व्यतिकर रे, सुनो०।।३६८।। हत्या करने वाला व्यक्ति राजमहल का वासी रे । राजकवर की पत्नी है वो, है नहीं दासी रे, सुनो० ॥३६६।। जगल से लाये है जिसको वो जगल की डायन रे । करें न सतो को अपमानित मानो राजन रे सुनो०॥३७०।। 40 ]
और आपको ही कुछ बातें आवश्यक बतलानी रे ।
राजा ने कर दिया इशारा समझे ज्ञानी रे, सुनो०।।३७१।।
महासचिव सेनापति नृप सुत चले गये उठ बाहर रे ।
ऋषि से मिलने महलों में चल पाया कुवर रे, सुनो०।।३७२।।
जाकर पड़ा पलंग पर कुवर ऋषि घबराकर बोली रे ।
क्यों हैं इतने व्यथित कहो तो समझू भोली रे, सुनो० ॥३७३।।
राजसभा की बात बताकर कंवर कहे धर साहस रे ।
कृतकों के आगे प्रानी होता परवश रे सुनो०।।३७४।।
बिना आसुरी ताकत के महलों में कैसे आये रे ।
खंड मांस के यहां बिखेरे मुह रंग जाये रे, सुनो०।।३७५।।
तुझे दुखी करने का लगता उसका सही इरादा रे ।
और करे बदनाम तुम्हें ज्यादा से ज्यादा रे, सुनो०।।३७६।।
संन्यासिनी कहेगी उस पर नृप विश्वास करेंगे रे ।
किन्तु किसी भी हालत में हम नहीं डरेंगे रे, सुनो०।।३७७।।
वहीं मार देता मैं उसको ऐसा गुस्सा आया रे ।
मर्यादा ने रोक दिया मन को समझाया रे, सुनो०।।३७८।।
ऋषि बोली जो भी होगा फल भुगतूगी मैं सारा रे ।
कष्ट आपको जरा न होवे मेरे द्वारा रे, सुनो०॥३७६ ।।
भिजवा दिया यहीं पर भोजन गये नहीं ये करने रे ।
माता मदद करे मन का दुख चिंता हरने रे सुनो०॥३८०।।
.
[ 41
- थोडी देर बाद मे नृप का इन्हे बुलावा पाया गया पुत्र नृप ने निज मुख से यो फरमाया रे, सुनो०॥३८१॥ मेरी तबियत ठीक नहीं है लगता ऐसे वैसे रे। सुत ने कहा वैद्य बुलवाऊ जंचता कैसे रे, सुनो०॥३८२॥ अभी नही फिर वुलवा लेंगे होगी अगर जरूरत रे । सोना मेरे पास विगडना जाये सेहत रे, सुनो०।।३८३।। आग्रह करके राजवैद्य को कवर वुला ही लेता रे । नाड दिसा करके अत्युत्तम औपधि देता रे, सुनो०॥३८४।। सोना मेरे पास रात मे बेटे चाहे जैसे रे । विगडा स्वास्थ्य विगडता है झट समझो ऐसे रे, सुनो०॥३८५।। समझ गया सुत स्वास्थ्य न कारण कारण हे ऋपिदत्ता रे । पडा न सोना मुझे आज तक हिला न पत्तारे, सुनो०॥३८६।। भाल लिया करती थो माता रात विरात हमेशा रे ।। आज मुझे ही रहना है यह कारण कैसा रे, सुनो०।।३८७।। ऋपि को क्या हालत होगी जो मैं न महल मे सोया रे । भरा खून से मुह उसका नित मैने धोया रे, सुनो०।।३८८।। कहू पिताजी से मै यहा नही सो सकता रे । नृप की आज्ञा का उल्लघन नही हो सकता रे, सुनो०॥३८६।। अच्छा कह करके नरवर से कवर महल मे आता रे । राजा वोला जल्दी आना यदि तू जाता रे, सुनो०।।३६०।। 42 ]
हां आया कहकर महलों में ऋषि के पास खड़ा है रे।
ऋषि बोली क्यों उदासीन क्यों फिक्र बड़ा है रे, सुनो०॥३६१।।
ऋषि से सारी बात बताई सावधान तू रहना रे ।
उठ अपना मुंह धो लेना न किसी से कहना रे, सुनो०।।३६२।।
सुनकर ऋषि औधे सिर गिरकर फफक-फफक कर रोती रे ।
दुख
के समय स्त्रियों की ऐसी ही स्थिति होती रे,सु०।।३६३।।
कंवर पिता के पास आ गया ऋषि रह गई अकेली रे ।
गहरे गड्ढे में कर्मो ने इसे धकेली रे, सुनो० ॥३६४।।
होगा जो होने वाला है कहते आये ज्ञानी रे ।
ज्ञानी की वानी अभिमानी ने कब मानी रे, सुनो०।।३६५।।
हुमा सदा की भांति कांड जो होता रहा हमेशा रे ।
साधारण नर कहता है यह चक्कर कैसा रे, सुनो०।।३६६।।
नींद रात भर ली न कंवर ने मन में बहुत उदासी रे ।
आने वाला समय पता क्या आफत लासी रे, सुनो०।।३६७।।
हुआ उजाला समाचार इतने में ऐसा आया रे ।
नर की हत्या हुई आज भी नृप घबराया रे, सुनो०।।३६८।।
गुप्तचरों ने आंखों देखा सारा हाल सुनाया रे ।
युवरानी का मुंह लोही से खरडा पाया रे, सुनो०।।३६६।।
बिखरे हुए मांस के टुकड़े दिखते है बाहर से रे ।
अभी सभी हम आए कहने श्री.नरवर से रे सुनो०।।४००।।
[ 43
- + । ऋपि को छुडवाने रानी जी रोती रही विचारी रे । सास बहू को बहू सास को होती प्यारी रे, सुनो०।।४२१॥ ऋपि को जल्लादो को सौंपा आज्ञा एक सुनाई रे । घुमा शहर मे देना वाते साफ बताई रे, सुनो०।।४२२।। इसने की हत्याये सारी है ये डाकण नारी रे । इसे मार देने को आना है सरकारी रे, सुनो०।।४२३॥ कवर पडा बेहोश होश खो बैठी है महारानी रे ।। दास दासियो की आखो से बहता पानो रे, सुनो०॥४२४।। राजा के विपरीत किसी की निकल न पाती वानी रे । देखी सुनी नही जाती है करूण, कहानी रे, सुनो०॥४२५।। कहने सुनने वालो के मन दया उभरकर आती रे । हत्यारो की वज्र सरीखी होती छाती रे, सुनो०।।४२६।। वधिक ले गए ऋपि. को पुर मे मचा बडा कोलाहल रे। वडे, पहलवानो का मानो होना दगल रे, सुनो०।।४२७।। सुला दिया है राजकवर को एक पलग विछाकर रे । बैठ गए नृप वही पास मे चिंतित होकर रे, सुनो०।।४२८।। पहरेदार लगाते पहरा दरवाजे के वाहर रे । कोई जा आ नही सके महलो के भीतर रे, सुनो०॥४२६।। पाया होश कवर ने अपनी योडी आखे खोली रे । देख पिता को खोल न पाया अपनी बोली रे, सुनो०॥४३०॥ -- 1 46 ].
पानी दू यूं पूछ लिया है पूज्य पिता ने धीरे रे ।
मना किया सिर हिला कंवर ने छाती चीरे रे, सुनो०।।४३१।।
घृणा हो चुकी, राजकंवर को जनक महल से सुख से रे। ..
व्यथित हो रहा रोम-२ ऋषि वाले दुख से रे, सुनो०।।४.३.२।।
ऋषि मैं तेरे पास आ रहा कहता सुत चिल्लाकर रे ।
सुला दिया राजा ने फिर से मन झल्लाकर, रे, सुनो०।।४३३।।
बीत गये दिन तीन कंवर ने कुछ ना पीया खाया रे ।
घबडा उठे पिताजी यह क्या संकट आया रे, सुनो०।।४३४।।
मना सके तो मना पुत्र को नृप कहता रानी से रे ।
मेरे से है रोष रोष क्या अनपानी से रे, सुनो।।।४३५।।
रानी ने राजा को महलों से बाहर भिजवाया रे ।
पहरेदारों को हटवाया' द्वार खुलाया रे, सुनो।।४३६।।
लिया गोद में बेटे का सिर आंसू लगी गिराने रे ।
भूखी प्यासी बैठी सुत को दे सिरहाने रे, सुनो०।।४३.७।।
मां का मुखडा पोंछा सुत ने अपने ही हाथों से रे ।
रो मत मां कुछ लाभ नहीं इन सब बातों से रे,सुनो०।४३८।।।
रोने सिवा रहा क्या बाकी बेटे इस जीवन में रे ।
देवी जैसी बहू गई मरने को वन में रे, सुनो०।४३६ ।।
मां बेटे दोनों ही रोते. ऋषिः को सुमर सुमर कर रे ।'
दोनों के मुख से न निकलता कोई अक्षर रे, सुनो०।।४४०।।
--
[ 47
वेटे । पय या पानी कुछ भी लेगा या नहीं लेगा रे। मा का जीवन लेगा अपना जीवन देगा रे, सुनो०॥४४॥ आई एक वसता दासी कहती ऐसी वानी रे। रानी ने भी लिया नही है अन्न या पानी रे, सुनो०॥४४२।। लोगे आप तभी मा लेगी मा की ओर निहारो रे । मरो न अपनी प्यारी माँ को भूखी मारो रे, सुनो०।४४३।। ऋषि को क्या ले गए महल से दासी से यो पूछा रे। तू न साथ क्या गई सुनादे हाल समूचा रे, सुनो०।।४४४।। मुझे कौन जाने देते थे गए उसी को लेकर रे । चोरी छुपे गई थी लेकिन पुर से बाहर रे, सुनो०॥४४५।। कसे उसको ले गए ऐसा पूछ रहा है कुवर रे । आप अन्न जल लो पीछे कह दूगी व्यतिकर रे, सुनो०॥४४६।। मां भी बोली वेटे पानी पीले थोडा खा ले रे । औपवि ले मन स्वस्थ बनाले दुख मिटाले रे, सुनो०॥४४७।। हाल हुआ होगा क्या ऋपि का मा मै पहले जानू रे । वे जल्लाद इसे वक्से ये कैसे मानू रे, सुनो०१४४८।। उसका धर्म साथ है उसके वो ही है रखवाला रे । महासती सन्नारी है वो अमृत प्याला रे, सुनो०।४४६।। सिर पर हाथ फिरातो माता बोली पीले पानी रे । ली दो चार घूट कु वर ने जिद नही तानी रे, सुनो०।।४५०।। 48 ]
। राजवैद्य आए इतने में बैठे पाकर आसन रे ।
is नाडी देख बताते औषधि अति साधारन रे, सुनो०॥४५१।।
उतर जायगा ज्वर त्वरता से होंगे स्वस्थ कुवरजी रे ।
* काम करेगी दवा हमारी प्रभु की मरजी रे सुनो०।।४५२॥
वैद्य गए दे दवा पिलाया मां ने पय ले ताजा रे ।
में आई नींद शांति से सोया वह युवराजा रे, सुनो०।।४५३।।
हुआ सवेरा स्नान किया फिर बदले कपड़े तन के रे ।
लेकिन घाव नहीं भर पाये अंतर मन के रे, सुनो०।।४५४।।
माँ आई ले दूध कटोरा झटसे उसे पिलाया रे ।
दासी ने आ ऋषि का सारा हाल सुनाया रे, सुनो०॥४५५।।
पूरे तन को काला करके श्रोफल बांधे सिर पर रे ।
सारे रास्ते बरसाते थे. कुकुम उपर रे, सुनो०॥४५६।।
पांवों में बांधे थे घुघरू · ढोली ढोल बजाते रे ।
.
पूरे पुर में उसे घुमाया घृणा दिखाते रे, सुनो०।४५७।।
नागरिकों को हाल सुनाते हुए उसे ले जाते रे।
अररर अररर कह पुरवासी थे चिल्लाते रे, सुनो०॥४५८।।
किया कलंकित किसने इसको स्त्रियाँ परस्पर कहती रे।
बोले कौन सामने नृप के जनता सहती रे, सुनो०॥४५६।।
छिप छिपकर आगे पीछे मैं उसके साथ चली थी रे। .
शमशानों में पहुंच गई तब शाम ढसी थी रे, सुनो०॥४६०।।
[ 49
रवि
देख न पाया उसका उसने मुंह छिपाया रे ।
मै मेरे घर आई ये सब हाल सुनाया रे, सुनो०॥४६१।।
सुन वर्णन श्री राजकु वर जा खडा झरोखे माही रे ।
अपनी कायरता पर मन मे ग्लानि छाई रे, सुनो०॥४६२।।
ऋपि को वचा न पाया कोई उत्तर देना पाया रे ।
पूज्य पिताजी को विश्वास नही क्यो आया रे, सुनो०।४६३॥
ऋपि के प्रति हमदर्दी दिखलाते थे सारे पुरजन रे ।
पता न उसको माना क्यो अपराधन पापन रे, सुनो०।।४६४।।
अच्छी लगने लगी मौत अब जीवन लगता खारा रे।
दिन भर भीतर ही रहता है दुख का मारा रे, सुनो०॥४६५।।
गई जहाँ ऋपि जाऊँ मै भी वहाँ उसे मिल पाऊँ रे ।
परभव मे मिलने के खातिर अब मर जाऊँ रे, सुनो०॥४६।।
घृणा पिता से हुई न उनके दर्शन करने जाता रे ।
सम्हालने को आती रहती इसकी माता रे, सुनो०।।४६७।।
मा से बोला चलो ऋपभ प्रभु के मदिर मे जाये रे ।
दर्शन पूजन करके मनको शात वनाये रे, सुनो०॥४६८।।
आश्रम की पावनता से तू वहुत प्रभावित होगी रे।
अपने बेटे को फिर शावासी ही दोगी रे, मुनो०॥४६६।।
माँ बोली हा अपन चलेगे दर्शन वहा करेगे रे ।
कर्मवचनो से छूटेंगे पार तरेगे रे, सुनो० ॥४७०।।
50 ]
कहा कंवर ने महलों में अब मुझे नहीं आकर्षण रे । आश्रम में जाकर जीऊँगा सारा जीवन रे, सुनो०॥४७१।। मां ने दी न इजाजत जीता सादाई से घर पर रे । ऋषि को भूल नहीं पाता है सारी ऊमर रे, सुनो०॥४७२।। राजा ने सोचा था दुख की दवा बताई है दिन रे । कुंवर भूल जाएगा ऋषि को दुख को गिन गिन रे,॥४७३॥ समझाने की चेष्टा की करलो अब दूजी शादी रे । कुवर नहीं कैसे भी माना बात भूलादी रे, सुनो०।।४७४।। बीते साल जिन्दगी बीते ऋषि को भूल न पाता रे । ऋषि के सिवा किसी को साथिन नहीं बनाता रे,सुनो०।।४७५।। इक दिन माँ ले आई कोई एक नया संदेशा रे । किया प्रणाम किया करता था यथा हमेशा रे, सुनो०॥४७६।। सीधी राजसभा से आई तेरे पास यहां पर रे । दूत अभी कावेरी से आया खत लेकर रे, सुनो०॥४७७॥ राजसुता रूक्मिणी प्रतिज्ञा ले बैठी है ऐसी रे । आया क्यों न कनकरथ ब्याहने घटना कैसी रे, सुनो०॥४७८।। सिवा कनक के मैं औरों से ब्याह न करवाऊंगी रे । भले उम्र भर मैं क्वारी ही रह जाऊंगी रे, सुनो०॥४७६।। तेरे पूज्य पिताजी से नृप ने कहलाया ऐसे रे । भिजवाओ समझा कर सुत को जैसे तैसे रे, सुनो०॥४८०॥ [ 51 प्रश्न सुता के जीवन का हे सोचे गहराई से रे । कहता हू मै शीश झुकाकर नरमाई से रे, सुनो०॥४८१।। तेरे पूज्य पिताजी ने सव वाते मुझे सुनाई रे । समझाने को तुझे मुझे ही है भिजवाई रे, सुनो०॥४८२।। होना सो हो गया उसे तू वेटा अभी भुलादे रे । कर विचार उस कन्या का मत जीव रुलादे रे, सुनो०॥४८३।। मा तू यह क्या कहती मै क्या करु दूसरी शादी रे । कन्या के सिर ढोलूं मेरी यह वरवादी रे, सुनो०॥४८४॥ ऋपि के सिवा स्थान इस दिल मे अन्य न कोई लेगी रे। ऋपि ने जो सुख दिया नही वो सुख भी देगी रे,सुनो०॥४८॥ सिर पर बाध सेहरा निकलू वजवाऊं शहनाई रे । ऋपि को भूलूं ऐसी बातें मन न सुहाई रे, सुनो०॥४८६॥ मुझे न सुनना मुझे न करना मा चुप होकर रहना रे । में न मानता पूज्य पिता से जाकर कहना रे, सुनो०।४८७।। मा बोली बेटे मै तेरी समझ रही हू पीडा रे । तेरी पीडा मेरे सिर दे रही धमीडा रे, सुनो०॥४८८।। राजमहल मे रहते है हम सास न सुख को लेते रे । किसको दोप दोप कर्मो को आखिर देते रे, सुनो०॥४८६।। राजभोग सुख मुझे स्वय को लगते विष सम खारे रे । सोच रही हू धन्य श्रमणिया जन्म सुधारे रे सुनो०।।४६०।। 52 ] माँ के मुंह से सुनो कुवर ने बातें अंतर मन की रे। भूल गया दुख अपना सोची परिवर्तन की रे, सुनो०॥४९२ मैं क्या करू बता मां तू ही जो जंचता तेरे को रे। मन बेमन से स्वीकृत होगा वो मेरे को रे, सुनो० ॥४६३ कावेरी जा रूकमण से तू करले अपनी शादी रे । हित हैं इसमें हम सबका यह बात बिठादी रे सुनो०।।४६४ प्रसन्नता होगी क्या इससे स्पष्ट बतादे माता रे। मां बोली मैं क्या राजा का मन यह चाहता रे, सुनो०॥४६ मैं तो शांति तभी पाऊंगी जब जग को त्यागूगो रे । प्रभृ चरणों में महाव्रतों की दीक्षा लूंगी रे, सुनो०॥४६६ अभी नहीं जा सकती हूं कर्तव्य निभाना बाको रे । करूं बता क्या रीत यही आई दुनिया को रे, सुनो०॥४६७ बेटे पूज्य पिताजो का मन खुश तेरे को रखना रे । स्थितिवश जो भी किया उन्होंने उसको ढकनारे,सुनो०।।४६८ करती प्रीति प्रगाढ रूक्मिणी उसको ओर निहारो रे । स्त्री के ऊपर दयाभाव ला उसे उबारो रे, सुनो०।।४६६ ऋषि रूकमण में अंतर क्या है नारी आखिर नारी रे। तेरे ब्याहे बिना रहेगी अकन कंवारी रे, सुनो०।।५०० [ 53 increase in the angular momentum of the atom is- (116630-341. - Jor (3) B (4) TI
सुख देकर सुख पा सकता नर नियम प्रकृति का मानो रे।
बडे सयाने होकर बेटे जिद मत तानो रे, सुनो० ॥५०१।।
है अनुराग नही उसके प्रति सुख क्या दे पाऊगा रे ।
तडफूगा मैं और उसे भी तडफाऊगा रे, सुनो०॥५०२।।
बेटे मन की स्थिति न एक सो रही नही रह पाती रे ।
आज प कल प्यार करे स्थिति पलटा खाती रे,
सु०॥५०३।।
पूज्य पिताजी के प्रति कितना स्नेहभाव था पहले रे।
आज वडा अलगाव हो गया ऋपि के बदले रे,सुनो०।।५०४।।
प्यार नहीं कर पाया तो माँ होगी कैसी हालत रे ।
मा बोली बेटे फिर देखो जैसी किस्मत रे, सुनो०।५०५।।
दीप पुण्य का जलता जव तक अधेरा न सताता रे ।
वुझते ही दुख का अवेरा खूब स्लाता रे, सुनो०।।५०६।।
अच्छी तरह सोचले दू गी, हर प्रश्नो का उत्तर रे ।
मे तेरी मा तू है मेरा प्यारा पुत्तर रे, सुनो०।।५०७।।
तुझसे ज्यादा अनुभव मुझको तू तो कल का जाया रे ।
तेने क्या देखा है अव तक पीया खाया रे, सुनो०।।५०८।।
अनुभवियो की बातें होती वजनदार हितकारी रे ।
चाहे किसी उम्र वाना हो, नर या नारी रे, सुनो०।५०९।।
ऋपिदत्ता वाला आश्रम भी उसी मार्ग मे आता रे ।
वहा तुझे जाना भी है फिर क्यो सकुचाता रे, सुनो०५१०।।
54 ]
.
.
हो सुत
यों तुझको ना जाने देते, ऐसे जाने देंगे रे ।
तेरे कामों में बाधायें क्यों डालेंगे रे, सुनो०।।५११॥
इतना सुनते ही कुवर का मन भीतर से डोला रे ।
हां कावेरी जाऊँगा यों माँ से बोला रे, सुनो०॥५१२।।
मां ने
खुश
सिर
चूमा नृप के पास गई है रे ।
सुत
से जो भी बात हुई वो स्पष्ट कही है रे, सुनो०।।५१३।।
नृप ने सैनिक हटा लिये हैं कहीं भले ये जाये रे ।
नृप के सिर का भार हट गया मन हरखाये रे, सुनो०।।५१४।।
कावेरी की ओर रवाना हुआ कनकरथ कुवर रे ।
सब परिवार प्रसन्न हुआ है व्यतिकर सुनकर रे,सुनो०।।५१५।।
हृदय वेदना से परिपीड़ित स्मित संसार दिखाऊ रे ।
सेवक सेना सचिव सखा सह मन बहलाऊ रे, सुनो०।।५१६।।
जिस पथ से ऋषि को लाया था उस रास्ते से जावे रे।
ऋषि के बोये हुए वृक्ष लख याद सतावे रे, सुनो० ।। ५१७।।
वे ही झरने और जलाशय वो ही वन हरियाली रे ।
केवल ऋषि वो साथ नहीं सुख देने वाली रे, सुनो०।।५१८।।
आवश्यक कार्यो के कारण रूकते मन सुख पाते रे ।
चलते चलते उसी स्थान पर सब आ जाते रे, सुनो०।।५१६ ।।
उस वन की सुषमा से तन के रोयें पुलकित बनते रे ।
निर्दोषी विहगों का कलरव सुखकर सुनते रे, सुनो०।।५२०।।
[ 55
सौदर्यानुभूति करने को कु वर न वन मे आया रे । इच्छाये मर चुकी मात्र जोवित है काया रे, सनो०॥५२१।। सूचित किया सचिव को रथ उस ओर दौडता जाता रे । ऋपभदेव जिनवर का मदिर नजर समाता रे, सुनो०॥५२२।। नयनरम्य प्रभु की मूर्ति मन प्रेम अधिक उपजाती रे । दर्शन पूजन की विधि सारी इसको आतो रे, सुनो०॥५२३।। पहुच पडाव डाल मदिर मे दर्शन करने जाता रे। कर प्रणिपात मू दकर आखे ध्यान लगाता रे, सुनो०॥५२४॥ भूल गया दुख दर्द हृदय मे लेता हर्प हिलोरा रे । जीव अभव्य रहा करता है, कोरा कोरा रे, सुनो०॥५२५।। करुणामृत वरसाती प्रभु की मूरति नयन समाई रे । परभव मे जो साथ चले यह वही कमाई रे, सुनो०।।५२६।। मदिर से जब निकला सम्मुख ऋपिकु वर इक पाता रे । सुमन हाथ मे प्यार प्राख मे बहुत सुहाता रे, सुनो०॥५२७॥ उसने इसको इसने उसको प्रेम सहित अवलोका रे । दिया इसे फूलो का गुच्छा हृदय अशोका रे, सुनो०।।५२८।। आदर सहित सुमन ले ऋपि का स्वागत मुख से करतारे। ऋपि मदिर मे गया प्रेमरस झरणा झरता रे,सुनो०॥५२६।। करता कनक विचार ऋपि ये यहा कहा से आया रे । विनय विवेक भरा है इसमे मुझको भाया रे, सुनोः॥५३०।। 56 ]
उसके पीछे यह भी मंदिर में ही गया दुबारा रे ।
फूल रख दिये प्रभु चरणों में भावों द्वारा रे, सुनो०।।५३१।।
जब दोनों मंदिर से बाहर आये तब यह बोला रे ।
आप छावनी में आयेंगे अमृत घोला रे, सुनो०।।५३२॥
ऋषिकुमार पूछता परिचय मुझे दीजिये अपना रे ।
बोला कनक वहीं पर सारा होगा सपना रे, सुनो०॥५३३।।
इसे छावनी में ले पाया आदर से बिठलाया रे ।
अति आग्रह पूर्वक इसको भोजन करवाया रे, सुनो०।।५३४।।
ऋषिकुमार अब मुझे दीजिये परिचय अपना प्यारा रे।
परिचय द्वारा पुष्ट बनेगा प्रेम हमारा रे, सुनो०।।५३५।।
रहते थे हरिषेण राज ऋषि पहले इस ही वन में रे ।
ऋषिदत्ता कन्या थी उनके ऊंची गुण में रे, सुनो०॥५३६।।
राजकुवर से प्यार हो गया कर दी उससे शादी रे ।
हरयुग में रहती शादी की कुछ अाजादी रे, सुनो०।।५३७।।
अग्नि प्रवेश किया मुनिवर ने ऋषि ससुराल पधारी रे।
सूनी हुई तभी से वन की सुषमा सारी रे, सुनो०।।५३८।।
परिम्रमण पृथ्वी पर करता यहाँ अचानक आया रे ।
ऋषिभदेव का मंदिर मेरे मन को भाया रे, सुनो०।।५३९।।
रह गया यहीं पर तब से परिचय सत्य सुनाया रे ।
शब्दों में माधुर्य शहद सा मीठा पाया रे, सुनो०।।५४०।।
मैं
[ 57
राजकु वर ने अपना परिचय दिया प्रेम से सारा रे ।
कुछ न छुपाने का होता है मित्रो द्वारा रे, सुनो०॥५४१।।
कहा कनक ने धन्य हुअा मै ऋपिदर्शन के द्वारा रे ।
ऋपिकु वर बोला मनभावन विनय तुम्हारा रे, सुनो०।।५४२।।
राजकवर वोला क्यो मेरा मन आकर्षित होया रे ।
तृप्ति न होती रहूँ देखता खोया खोया रे, सुनो०॥५४३।।
सुनकर ऋपि हस रहा जोर से लग गया ज्ञान सुनाने रे ।
पूर्वजन्म के सवयो से हम अनजाने रे, सुनो०।।५४४।।
वैर स्नेह का कारण होता वह सवय हमारा रे ।
कभी नया वधन पड जाता परिचय द्वारा रे, सुनो०।।५४५।।
मेरे साथ आपका कोई है सबध पुराना रे ।
इसीलिए इस प्रथम मिलन मे प्रेम लगाना रे, सुनो०॥५४६।।
ऋपि वोले अनजान व्यक्ति के साथ प्रेम मत करिये रे ।
उसमे भी मै तो ऋपि हूँ यह सत्य समरिये रे,सुनो०।।५४७।।
आज यहाँ कल अन्य कही पर हमको होता जाना रे।
मेरे लिये नही है अच्छा स्नेह बढाना रे, सुनो०।।५४८।।
श्राप मुसाफिर रुक कर अपने स्थान चले जाओगे रे ।
स्नेह वाव कर मेरे से यो पछतायोगे रे, सुनो०१॥५४६।।
देता दु ख वियोग हमेशा समझाले निजमन को रे ।
जय ऋपभ कहकर ऋपि चलने लगे भवन को रे, सु०॥५५०।।
58 ]
कुवर द्वार तक पहुंचा करके लौट स्थान पर आया रे । ऋषि मरने के बाद आज ही मन हरषाया रे,सुनो०॥५५१॥ तप्त हृदय पर चन्दन का सा मानो लेप लगाया रे । मन में एक विचार नया उदय हो पाया रे, सुनो०॥५५२।। मेरे साथ न आ सकते ऋषि विनय अवश्य करूगा रे । साथ-२ रहने को उनको मनवा लूंगा रे, सुनो०।।५५३।। वैरागी त्यागी है फिर भी करूणा तो कर देंगे रे । क्या मेरे अनुनय को झोली में ना लेंगे रे, सुनो०॥५५४।। कल मैं उनसे पूछंगा जब जाऊंगा जिनमंदिर रे । मन की शंकाओं का निर्णय करना आखिर रे, सुनो०।।५५५।। ऐसे सोच गया सो सुख से आई निदिया रानी रे । प्रसन्नता से पुलकित रजनी बनी सुहानी रे, सुनो०॥५५६।। प्रातः कुवर गया मंदिर में ऋषि को ऊभा देखा रे । दोनों के मुख पर बिखरी है स्मित की रेखा रे, सुनो०॥५५७।। आओं चले आरती करलें कहा कुवर से ऐसे रे । राह आपकी देख रहा मैं भूलूं कैसे रे, सुनो०॥५५८।। दोनों ने आरती उतारी आदिनाथ जिनवर की रे । ऋषिदत्ता की सी आकृति लगती ऋषिवर की रे, सु०॥५५६।। बाहर आ ऋषि बोला मेरे आश्रम में तुम आये रे । एक दूसरे पर श्रुतचर्चा कर बतियायें रे, सुनो०।।५६०।। [ 59 चलिये मेरे यहा आप ही विनय मानिये मेरा रे । ऋपि ने कहा चले होने को हे अधेरा रे, सुनो०॥५६१॥ कु वर हुअा आनन्दित सुनकर ऋपि को घर ले आया रे । गले लगालू इसे अभी यो मन हरखाया रे, सुनो०।।५६२।। मर्यादा ने रोक लिया मै भोगी ह ये त्यागी रे । ससारी रागी होते ऋपि लोग विरागी रे, सुनो०।।५६३।। भग नही हो जाय उचितता ध्यान पूर्णत रखता रे । ऋपि मे ऋपि की पूर्ण मधुरता चखता लखता रे, सु०॥५६४।। पर्णकुटी मे आये सेवक प्रहरी शीश नमावे रे । राजकवर के लिये दूध का प्याला लावे रे, सुनो०।।५६५।। इसने ऋपि से कहा पीजिये ऋपि ने शीश हिलायारे । मै न रात मे जल भी पीता नियम बताया रे, सुनो०॥५६६।। राजकवर ने भी न पिया पय, केवल जल ही पीया रे । झिलमिल झिलमिल करता मद्धिम जलता दीयारे,सु०॥५६७।। काष्ठासन पर बैठे मिलकर लगी वात अव होने रे । वहुत पसद मुझे इस वन के सादे कोने रे, सुनो०।।५६८।। पहले भी आया था तब कुछ दिन तक रूका यहा पर रे । जीवित थे राजर्पि स्वय तव सुनलो ऋपिवर रे,सुनो०।।५६६।। अग्निप्रवेश किया उनने तब स्वय यही हाजिर रे । अच्छा तो उनको पुत्री यो बोले ऋषिवर रे, सुनो०५७०।। " 60 ]
हां, मैंने ही पाणिग्रहण कर लिया ले गया निजपुर रे ।
अच्छा, तो वह साथ नहीं क्यों दे दो उत्तर रे, सुनो०।।५७१।।
दिया जाय इसका क्या उत्तर निकल नहीं पाया स्वर रे।
हां! वह मेरे साथ नहीं यों कहता रुककर रे, सुनो।।५७२।।
बात व्यक्तिगत कुवर तुम्हारी मुझे पूछ क्या लेना रे ।
पूछा इसके लिये क्षमा मन से कर देना रे, सुनो।।५७३।।
[ 61
दाल छट्ठी
सुनलो ऋषिदत्ता रानी की पावन धर्म कहानी है।
पावन धर्म कहानी सुनकर बनना ज्ञानी है ॥टेर।।
तर्ज-पावन पुरूपोत्तम भगवान
नही-२ प्रात्मीय वन्धु तुम पूछो मना नही है ।
प्रेम प्रश्न पीडा उपजाए ऐसा बना नही है, सुनलो०॥५७४।।
ऋपिदत्ता की याद स्लाती रहती मुझे हमेशा ।
समग्रता से प्यार दिया था मैंने उसको ऐसा, मुनलो०।।५७५।।
लेकिन वचा न पाया उसको यह मेरी कमजोरी ।
ऋपिकुमार देखता जाता उसकी सूरत भोरो,सुनलो०।।५७६।।
कह दी कथा आप बीती सब दर्द और गमवाली।
व्याऊ रूक्मण से यह मा की बात न जाए टालो, ।।५७७।।
नही मानता तो न यहा आता न आप मिल पाते ।
लाभ बडा यह अाप मिल गये, खुले प्रेम के खाते,सुन०॥५७८।।
करूण स्वर से ऋपि वोले हे जीवन करुण तुम्हारा ।
कर्मों के आगे बेचारा जीव हमेशा हारा, सुनलो०।।५७६।।
वीत गये दो प्रहर रात के बोला राजकुमार ।
मेरी एक विनति है, कृपया कर लेना स्वीकार,सुनो०।।५८०।।
62 ]
मैंने मित्र आपको माना फिर यह विनती कैसी ।
जो कहना चाहो वो कहदो, उठी भावना जैसी,सुनलो.।।५८१।।
मेरे साथ आपको चलना होगा मेरे मित्र ।
काबेरी? शादी में? जाना है यह खेल विचित्र,सुनलो०।।५८२।।
साधु शादी में जाए है यह अनुचित जग व्यवहार ।
प्रेम भाव की पावनता को क्या समझे संसार,सुनलो०।।५८३।।
उचित और अनुचित जो भी हो छोडो उसकी बात ।
मुझे शांति देने को मेरे मित्र आइए साथ, सुनलो०।।५८४।।
ऋषिकुमार सोचता सुनकर मन ही मन से बात ।
टूटे दिलवाले कर लेते खुद ही की घात, सुनलो०॥५८५।।
साथ तुम्हारे आ जाऊं पर रह न सकूँगा नाथ ।
मैं वनवासी राजकंवर तुम मेल न खाए बात,सुनलो०.५८६।।
राजकंवर का मित्र कभी क्या हो सकता वनवासी।
पिता आपके मुझे आपको कब देंगे शाबासी,सुनलो०।।५८७।।
रानी रूक्मण को न लगे यह प्रेम हमारा अच्छा ।
स्त्री का राजाओं का होता बहुत कलेजा कच्चा,सु०॥५८८।।
ठेस किसी को लगे वहां पर, मुझसे रूका न जाता ।
मेरा हो अपमान कहीं तो टूट जायगा नाता,सुनलो०।।५८६।।
सोचा सुना सभी कुछ, बोला चलो अभी तो साथ ।
आगे की आगे देखेंगे समय प्रमाणे बात, सुनलो०।।५६० ।।
[ 63
लौटेगे इस ही रास्ते से अभी फिक्र क्या करना । साय नही रहना हो तो तुम वन मे यही ठहरना,सु०॥५६१।। ऋपि ने कहा साथ रहने से स्नेह वढेगा अपना । जव होगे हम जुदा सोच लो मुझे विरह से तपना,सु०॥५६२।। तुम होवोगे राजमहल मे होगी मुख-सुविधाऐ । वन मे मुझे अकेले रहकर करनो धर्म कियाऐ, सुनलो०॥५६३।। अभी छोड दो तो अच्छा है मत ले जाओ साथ । मित्र मित्र के लिये मानलो मै जो कहता वात,सुनलो०।।५६४।। वन मे महल बनाकर के में रहने यही लगूंगा। दोनो का मन लगा रहेगा मन को नही ठगूगा,सुनलो०१५६५।। जव भी मुझे बुलावोगे तव हो जाऊगा हाजिर । राज काज सभालेगे सब वफादार मत्रीश्वर,सुनलो०।।५६६।। राजकु वर के अत्याग्रह पर ऋपि ने हा कर दी है । हा भर के ऋपि ने कु वर के मन खुशियाँ भरदी है ।।५६७।। बातो मे खोये खोये ये पता नही कव सोये । हुआ सवेरा नित्य कर्म से निपटे न्हाये धोये,सुनलो०॥५६८॥ ऋपभदेव जिनमदिर मे कर पूजन फूल चढाये । तन्मयता से प्रभु स्तवना मे गीत भक्ति के गाये,सु०॥६६ राजकु वर की आखो मे से आसू वाहर आये । आसू चाहे जैसे हो ये जाते नही छुपाये, सुनलो०॥६००॥ 64 ] ऋषि ने पूछा अब तक भी क्या दर्द हुआ ना कमती । पलकों से अंसुवन की धारा जो थामी नाथमती,सु०॥६०१॥ इन गीली आँखों में नहिं था घुटन तड़फ या गम । भक्तिभाव का सुख संवेदन कह सकते हैं हम,सुनलो०॥६०२।। अच्छा तब तो तुम्हें शीघ्र ही होगा इच्छित लाभ । हो भी सकता है ऋषि मेरा होगा ब्याह सहाब, सु०॥६०३।। भले व्यक्ति हो भले वस्तु हो, जो हो तुम्हें पसन्द । जिसके मिलने से मानव को मिले परम आनंद,सुनलो०॥६०४।। प्रभु पूजन दर्शन स्तवना पर यदि आँसू बह जाए । इष्ट प्राप्ति के संसूचक वे ऐसा माना जाए, सुनलो०॥६०५।। ऋषिकुमार! मुझे कुछ प्रिय हो, ऐसी बात नहीं है । है तो ऋषिदत्ता है केवल-वो तो गई कहीं है,सुनलो०॥६०६॥ यदि ऋषिवाणी सच है तो क्या वो ऋषि मिल जायेगी। मुरझाए मनवाली कलियां क्या फिर खिल पायेगी ॥६०७।। मुख पर स्मित विस्मित नयनों से ऋषि ने उसे निहारा । प्रश्न उठाया गया नहीं फिर राजकुवर के द्वारा ।।६०८।। जुता हुआ रथ त्यार खडा था थी सेना तैयार । ये दोनों आरूढ़ हो गये, गूंजा जय जयकार,सुनलो०।।६०६।। आगे सैनिक पीछे सैनिक रखते हैं रखवाली। मीठे फल देने लगती जब फले पुण्य की डाली, सु०॥६१०॥ [ 65 T रहे देर तक मौन कु वर ने पूछा प्रश्न विशेष । । ऋपि सिर पाइल्जाम लगा क्यो दो इस पर उपदेश ।।६११।। कृत कर्मों का करना पडता जीवो को भुगतान । भला बुरा फल देने वाले कर्म शुभाशुभ जान, सुनलो०।।६१२।। पुण्य विना सुख पाप विना दुख नही किसी ने पाया । । कव? कैसे? क्या? किया गया यह नही समझ मे आया,सु ।६१३। क्या यह आशय है कहने का,ऋषि ने जो दुख पाया । वो उसके पापो का फल या हा हा सही सुनाया, सु०॥६१४।। दिये विना इल्जाम न आता निश्चित ' है यह बात । केवल ज्ञानी अवधि ज्ञानी कह सकते साक्षात्,सुनलो०॥६१५॥ जिसको इसने किया कलकित किसी जन्म मे मानो। उसने इसको किया कलकित सत्य तत्त्व पहचानो,सु०॥६१६।। उसी व्यक्ति के द्वारा पाए फिर ऐसा ही आल । ऐसा नियम नहीं है निश्चित कहते दीनदयाल,सुनलो०॥६१७।। आल चढाने वाला 'मन से करे नही अनुताप । तो उसके सिर पाल चढेगा छूटेगा तव पाप,सुनलो०।।६१८।। तत्त्व ज्ञान वाली ये वाते नई और मतिगम्य । सुनकर राजकु वर रस लेता कहता बहुत सुरम्य,सुनलो०।६१६। पूछा, खत्म हो गया होगा इससे उसका 'पापा ।। हम कैसे कह सकते निश्चितानानानही जव साफ,सुनलो ।६२०। 6630] । - । -
अगर रह गया होगा बाकी तो भुगतेगी फिर से ।
जन्म कहीं से जीव पाप का बोझ उतारे सिर से, सुनलो०॥६२-१॥
ऋषिदत्ता की याद झूठी है तत्त्वज्ञान के साथ।
इसे भुलाने को ऋषिवर अब, मोड़ रहे हैं बात, सुनलो. ६.२२।
उस दुःखद घटना को अपने मन से दूर निकालो। माना।
अपने को अपने वालों को शांति सहित संभालो,सुनलो.।६।२३।
खोया रहूं भले यादों में वो न मुझे मिल सकती ।
पंकज छोड किसी पत्थर पर भले कली खिल सकती,सुः ।।२४।
मुरझाए मन से ऐसे क्या शादी करने जाना ।
मित्र! मात्र पितृ प्राज्ञा का पालन करना माना,सुनलो.।६२५।
इस शादी से रूक्मण को ही मिल सकता आनन्द ।
मेरे दिल के द्वार अन्य के लिये मानलो बन्द, सुनलो०।६२६।
राजकुमार ! जरा सोचो यह द्वन्द्व भरा संसार । ।
शाश्वत शांति नहीं है इसमें, देखो करो विचार सुनलो०॥६२७।
इसे त्यागने का करते हैं ऋषि मुनि जन उपदेश । . ।
राजकुवर सुन बोला सच है झूठ नहीं लवलेश,सुनलो। ६२८।
क्षणिक सुखों के प्रति इस मन की नहीं छूटती.ममता ।। ..,
इसीलिये पलती आई है स्थिति में बड़ी विषमता,सुनलो.1.६२६ ।
भरी दुपहर का सूर्य चढ़ा सर समय हुआ भोजन का । ::
यात्रा रूकी छावनी फैली समुचित स्थल था वन का,सु.i६३०।
-
-
! [ . 67
दोनो जीमे साथ किया फिर हल्का सा विश्राम ।
यात्रा आगे बढी बढे रथ जैसा था प्रोग्राम, सुनलो०१६३१॥
ऋपि ने कहा तुम्हारे से क्यो हुआ मुझे अनुराग ।
प्रिय था मुझे आज तक केवल जो स्वीकारा त्याग,सु ॥६३२।
पूर्वजन्म का अपना कोई हो सकता सवध ।
राजकवर ने कहा मानलो, इसमे ही आनद,सुनलो०॥६३३।।
तुम्हे प्यार है मेरे से भी ऋपिदत्ता से ज्यादा ।
उतना ही है जितना उससे था कहता कर वादा,सुनलो।६३४।
तुम हो पुरुप और वह स्त्री थी इतना ही है अन्तर ।
आप मित्र हो वह थी पत्नी स्नेह वही आभ्यन्तर,सुनलो ।६३५।
नही प्रेम न किया कभी भी, लिंग रग का भेद ।
देह मात्र से निकला करता साधारण प्रस्वेद,सुनलो०।६३६।
सीता से भी अधिक स्नेह था लछमन से रघुवर का ।
मृत को मृत माना तव जाना कथन सत्य है सुर का,सु ।६३७।
राजकु वर हो बडे विचक्षण रखते ऊँचा ज्ञान ।
तुमने तो दे दिया विन्दु पर सिंधु सदृश व्याख्यान, सु ।६३८ ।
करने लगा कल्पना कु वर पाने वाले कल की।
मुझे छोड ले लेगे कल ये राह किसी जगल की,सुनलो ।६३९ ।
तब क्या होगा इसी दुख से लिया दीर्घ नि श्वास ।
ऋपि वोले क्यो बने वतायो एकाएक उदास, सुनलो ।६४०।
.
68 ]
भविष्य की कोई चिन्ता क्या सता रही है मन को । बीती बातों ने उद्वेलित किया कहीं जीवन को,सुनलो.।६४१। सिर्फ भविष्य काल को चिन्ता ने ही मुझे सताया । राजकुंवर ने इससे आगे कुछ भी नहीं बताया,सुनलो.।६४२। बोला ऋषि क्या जान सकू मैं बात आपके मन की। कहा कुवर ने आप मात्र हो औषधि रोग शमन की,सु.।६४३ । चले नहीं जाओगे ऋषि तुम करके मेरा त्याग । इतना मुझे बता दो मेरी जाये उदासी भाग,सुनलो.॥६४४॥ भला तुम्हें क्यों छोडूगा जब तुम्हें हो रहा दु:ख । फिर भी निश्चित समझो अस्थिर और क्षणिक है सुख,सु.।६४५ ऋषिदत्ता को आश्रम से जब आप ले गए साथ । ऋषि न रहेगी तब क्या मालूम थी यह सारी बात,सु.।६४६। चिन्तन सत्य यथार्थ आपका कौन करे इन्कार । सुख पीछे दुख दुख पीछे सुख सब करते स्वीकार,सु.६४७। कावेरी की सीमा में अब सबने किया प्रवेश । अभिवादन कर रहे सचिवगण जैसा नृप आदेश,सुनलो.।६४८। कावेरी के श्वेतमहल में इन्हें गया ठहराया । आगत स्वागत करने को सुरसुन्दर भूपिति आया,सु.।६४६ । नृपति हेमरथ ने जो मेरी विनति की स्वीकार । राजकुमार पधार गये हो ब्याहने मेरे द्वार,सुनलो०॥६५०।। [ 69 - . राजा ने पूछा अव कहिए आप कौन ऋपिराज । मेरे प्यारे मित्र साथ मे लाया इनको आज, सुनलो०।६५१। इसके लिये आपको भारी देनी होगी दाद । । । इन्हे देखकर सब मित्रो को कर सकते हो वाद,सुनलो०।६५२। नृप ने इनके साथ बैठकर भोजन किया यही पर ।। इन्हें यहाँ पर ठहराया औरो को और कही पर सुनलो०।६५३। कल शादी होने वाली है, राजसुता के साथ । ऋपिकुमार छेडता है अव एक अजब-सी वात,सुनलो०१६५४। कभी रूक्मणी को देखा है, कहिए राजकुमार । 'नही तो'। कैसे पूछ रहे हो प्रश्न वडा बेकार,सुनलो०॥६५५।। तो क्या उसे बिना देखे ही, उससे व्याह करोगे । अगर पसद नही आई तो किसमे डूब मरोगे, सुनलो०॥६५६।। ऋपिकुमार बोलकर ऐसा हँसा जोर से खिलखिल । हँसी मजाक वहाँ होती जब दिन जाता है हिलहिल,सु.१६५७। गुप्त सूचना मिलो तुम्हे यह है वो क्या विकलांग । ऐसा हो तो अभी भगे हम कूदे भरे छलाग, सुनलो०॥६५८।। हुई कलूटी काली तो क्या होगी तुम्हे पसन्द । प्रश्न उठाते जाते ऋपि करते ना हँसना वद, सुनलो०१६५६ । बोला राजकुमार आप कल करो क्यो न यह काम । महलो मे जा उसे देखलो ले भिक्षा का नाम, सुनलो०॥६६०॥ 70 ]
कहना उससे भिक्षा लूंगा दूंगा
दूंगा आशीर्वाद
अच्छा हुआ उपाय अनोखा मुझे आ गया. याद,सुनलो०॥६६१।।
गुण पर आधारित होती है पसंदगी ऋषि-जन की।
रूपाधारित पसंदगी होती है राजभवन की, सुनलो० ॥६६२।।
राजकुवर के मुख से निकली। इसी बीच में बात ।
ऋषिदत्ता में रूप और गुरण
खिले हुए थे साथ,सुनलो०।।६६३।।
ऋषि ने कहा रूक्मणी की मैं पढ़ता जब रामायण ।
ऋषिदत्ता के कथा भाग का करते तुम पारायण,सुनलो०।६६४।
रूप हुआ गुण नहीं हुए तो कर लोगे स्वीकार ।
गुण हो रूप नहीं हो तो क्या ब्याहने को तैयार,सुनलो०।६६५।
रथमर्दनपुर ले जाना है मुझे मात्र कर शादी ।
करो बेतुकी बातें मत हो बातों से बरबादी,सुनलो०।।६६६।।
उसे वहाँ रहने को दूंगा महल अलग से चाकर ।
मुझको उससे क्या लेना उसके जीवन में जाकर,सुनलो.।६६७।
ऋषि बोले क्या खेल -रहे-हो रूक्मण से यह खेल ।
उचित नहीं कहलाती शादी जो न बैठता मेल,सुनलो.।६६८।
मेरे से शादी करने की उसने क्यों जिद ठानी।
इच्छा के विपरीत सभी को बातें मैंने मानी,सुनलो.।६६९।
ऋषि ने कहा रूक्मिणी से मिल, करो स्पष्टता सारी ।
शायद हठ, दे छोड स्वयं का बच जाए वेचारी,सुनलो.।६७०।.
[ :71-
इतना है अवकाश कहाँ जो हो ये बातें सारी।
तो उसके प्रति तुम निष्ठुर मत बनना है वो नारी,सु ।६७१।
ऋपि रुक्मण से नही करू गा, मैं निष्ठुर व्यवहार ।
सुन पूरा सतुष्ट हो गया स्नेही ऋषि कुमार, सुनलो।६७२।
बतियाते वतियाते सोए दोनो सच्चे साथी ।
कल शादी हो जिसकी उसको नीद आज क्या पाती,सु ।६७३।
कावेरी के राजपथो को छिडका वासित जल से ।
गूज रहा है कोना कोना शब्दो के मगल से,सुनलो ।६७४।
बाधे तोरण द्वार-द्वार पर गाये जाते गीत ।
राजमहल सज रहा अनूठा जैसी रीत पुनीत,सुनलो०।६७५।
दुल्हे दुलहन को बिठलाया मडप मे ला करके ।
राजपुरोहित मत्र बोलता लय से गा गा करके,सुनलो ।६७६।
राजकवर के हायो मे रुकमण का हाथ रखाया ।
सप्त वचन सेवधे परस्पर बचन बडा सुहाया,सुनलो०६७७।
रथ पर बैठ साथ मे दोनो श्वेतमहल से आये।
राजकवर ने खोजा लेकिन ऋषि न वहा मिल पाये,सु ।६७८।
कल वापिस लौटुगा कहकर गए कही वे बाहर ।
सूचित हुआ सेवको द्वारा राजकवर को आखिर,सुनलो ।६७६।
इस व्यवहार कुशलता से मन हुआ प्रभावित भारी ।
राजकवर ने सोचा ऋपि वह त्यागी मैं ससारी,सुनलो।६८०।
72 ]
फूलों की शय्या पर बैठी सिमटी रूक्मण रानी । बिना बुलाए कैसे बोले दुल्हन चतुर सयानी, सुनालोः।६८१। नवपरिणीता के प्रति किंचित राग न पति के मन में । ऋषि के सिवा किसी को स्थान न देता है जीवन में,सु०।६६२। देख रही वो कब देखे पति मेरी ओर नजर धर । देखा तो स्मित उभरा पाई पति के निकट सरक कर,सु०।६८३। पहला प्रश्न यही पूछा है रूकमण ने साहस कर । ऋषिदत्ता कैसी थी नागिन रही तुम्हें जो हंसकर,सु०॥६८४॥ उठा उफान उदासी का सुनली निज आँखें मूंद । हृदय वेदना से भर आया गिरी न आँसू वूद,सुनलो०।।६८५।। ऋषि की सुन्दरता का वर्णन सुनना है तो सुन । उस सम देखे नहीं दूसरी स्त्री में रूप सुगुण, सुनलो०॥६८६।। स्त्रियाँ नहीं वे सभी देवियां तत्सम्मुख शरमाती। देवलोक में छिपी कहीं मुख न हमें बतलाती,सुनलो०॥६८७।। मिली मुझे वह पत्नी मेरा यही बड़ा सौभाग । किन्तु उजाड दिया किस्मत ने मेरा जीवन बाग,सु०॥६८८।। चली गई वह दूर यही था कुदरत को मंजूर । दया धर्म को छू न सके कर्मों के पुद्गल क्रूर, सुनलो०॥६८६।। ऋषिदत्ता की याद अभी भी क्या आती है नाथ । दुखती रग को छू वैठी है रूकमण की यह बात, सु०॥६९०।। ] 73 खुशबू सी ज्यो छुपी हुई वह सासो की धडकन मे। सभव नही भूलना उसको इस या उस जीवन मे,मु०॥६६१|| करना पड़ा मुझे तुझ से यह व्याह एक सयोग । शायद विधि ने किया नया ही मानो एक प्रयोग,मुनलो०१६६२। मुझे चाहते पाप नही क्या और न मुझ से प्रेम । प्रेम चाह ना वार वार करने का मुझको नेम,सुनलो०11६६३|| इमका अर्थ यही लू मै कुछ भी न सामने उसके । ऐमा कहकर उठो रुकमणी भरने वैठी डुसके,सुनलो० ॥६६॥ तेरा कुछ अस्तित्व नही है वोला राजकुमार । प्यार ऋपि को दिया तुझे अव दिया न जाए प्यार,सु०१६६५। गुम्से मे होकर स्क्मण ने उगला जहर अनोखा । गुनहगार बन गई प्रिया वह, यही रह गया धोखा,सु०१६९६। 74 ]
दाल सातवीं
दोहा
स्वार्थी नर देखे नहीं, ना सोचे परिणाम ।
रूकमण ने षड्यंत्र से, ऋषि को को बदनाम ।
तर्ज-पावन पुरूषोत्तम
देखा होगा उसे आपने जो जोगन थी आई ।
मैंने ही भेजा था उसको रख दी आज सचाई,सुनलो०१६६७।
आप न आए जब कावेरी लौट गए उस वन से ।
मेरे लिए बनी ऋषिदत्ता बहुत बुरी दुश्मन से,सुनलो०।६९८।
सुख में रहने दूं उसको मैं हो सकता यह कैसे ।
सुलसा से संपर्क किया फिर मैंने जैसे तैसे, सुनलो०।।६६६।।
जादू टोनों में पारंगत जूनी जोगण नामी ।
ऋषि की करवा दी जाए यों पूर्णतया बदनामी,सु०॥७००।।
एक व्यक्ति की हत्या होती थी ना पुर में प्रतिदिन ।
पकड़ा गया नहीं हत्यारा,बढ़ी कठिनता छिन छिन, सु०१७०१।
मांस खंड मिलते थे ऋषि के सिरहाने के नीचे ।
चेहरा रहता सना रक्त से जोगन उसके पीछे,सुनलो०॥७०२।।
उसी तुम्हारी प्राणप्रिया पर, आया था इल्जाम ।
मेरा सुख छीना था उसने उसका यह परिणाम, सु०॥७०३।।
[ 75
शय्या से उठ खडा हो गया, सुनकर राजकुमार । स्क्मण का सिर कट जाता जो होतो हाथ कटार,सु०॥७०४।। डायन तूने खुद करवाया ऐसा पाप भयकर । रूकमण को शय्या से नीचे पटका वाल पकडकर,सु०।।७०५।। सतापाकुल चल पाया है शयनखड से बाहर । हुया खिन्न मन तन मे गुस्सा याया रूक्मण ऊपर,सु०।।७०६।। मुझे प्राप्त करने रुक्मण ने,ऋपि को मरवा डाला। मेरे लिये हुई यह हत्या सारा सार निकाला,सुनलो०॥७०७।। मुझे न जीना, जीकर के भी मुझे यहाँ क्या करना । चिता जलाकर कूद आग मे अग्निस्नान कर मरना,सु०१७०८१ अदर जाकर उसने अपना, निश्चय उसे बताया। मुनते ही हो खडी वाहुओ को सम्मुख फैलाया,सुनलो०१७०६। आगे बढी लिपटने को तव पति ने धक्का मारा। छूने की कोशिप मत करना डायन कह दुत्कारा,सुनलो०।७१०। वाहर निकल झरोखे मे आ, खडा हो गया तत्क्षण । अरुणोदय की आभा से इत,गगन हो रहा पावन, सु०॥७११॥ राजकुमार हुए जाता है, उदासीन अत्यन्त । कही किनारा नहीं दीखता,नहीं सूझता पथ,सुनलो०।७१२।। भवर फसी किश्ती के जैसी मन की बनी अवस्था । आकुल व्याकुल अस्त व्यस्त तन की हालत हुई खस्ता सु।७१३। 76
रहा सांस घुट घूम रहा सिर कांप रहा है तन ।
बुला सेवकों से कहता है, सुनलो एक वचन, सुनलो०।७१४।।
करके चिता तैयार करूगा मै अब अग्नि स्नान ।
कहा पुनः मेरी आज्ञा पर शोघ्र दोजिये ध्यान,सुनलो०।।७१५।।
सन्न रह गए अनुचर सुनकर,बात हुई क्या आखिर ।
पुतले से हो खडे रो रहे बहते आंसू झरझर, सुनलो०।।७१६।।
रोने की आवाज श्रवण कर, दास दासियां आये ।
देख कनक को सहम गए सब,मन ही मन घबडाये,सु०॥७१७।।
ऐसा कैसे हो सकता है, छोडो गलत विचार ।
चले चलेंगे भले आज हो अपने पुर सरकार,सुनलो०।७१८।।
राजाजी को माताजी को मुह क्या दिखलायेगे ।
कावेरी में अग्नि स्नान कर जो यों जल जायेंगे,सुनलो०७१६ ।
कहीं नहीं जाना है मुझको मुश्किल मेरा जीना ।
कहते-२ राजकुवर का कडा कलेजा भोना, सुनलो०।।७२०।।
परिचारक घबडाकर भागे नृप को सूचित करने ।
राजकुमार हो रहे उद्यत अग्निस्नान कर मरने,सुनलो०१७२१॥
सुनते ही सुरसुन्दर राजा, आए भागे भागे ।
कुवर उतरता हुआ सीढ़ियाँ मिल जाता है पागे, सु०॥७२२।।
नृप अपनी बांहों में भरकर उसे ले गये भीतर ।
क्या कारण है मरने का क्या करते त्रिया चरित्तर,सु०१७२३।
[ 77
. चाहे जैसा दुस हो तो भी पराक्रमी नर सहते । आत्मघात करते न किसी को करने का भी कहते, सु०॥७२४।। स्वस्थ बनो आगे पीछे की सोचो सारी वात । कहा कु वर ने वस अव जीना रहा न मेरे हाथ, सु०॥७२५।। इम निर्णय का कारण भी अव, नही पूछिये आप । भरने लगा गला भूपति का रोते है चुपचाप,सुनलो०१७२६॥ मुझे हेमरथ पूछेगे तो क्या दू गा मै उत्तर । मरने तो दू गा न आपको, चाहे कुछ हो आखिर, सु०१७२७। चल ही रही वात यह सारी इतने मे ऋपि पाये । ठिठक गए दरवाजे पर ही पाव न वढने पाये, सुनलो०१७२८॥ नृप ने कहा आइए भगवन् कहा गए थे आप । बैठो सुनो कहानी सारी और करो इन्साफ,सुनलो०।७२६।। मित्र आपके क्या कहते है इन्हे जरा समझायो । तुम्ही इन्हे समझा सकते हो लो अब आगे पायो,स०॥७३०॥ ऋपि ने सकेतो से नृप को, कहा चले जाने को। चले गए नृप ऋपि आ बैठे इसको समझाने को,सुनलो०।७३१ । होलियो मे हाथ वावकर आर्द्र स्वरो से बोले । सहृदय मिले पूछने वाला दुखियारा दुख खोले, सु०।।७३२।। कहो हुआ क्या कह दो सच सच जो न छुपाने जैसा । एक रात मे ही पीछे से खेला नाटक कैसा, मुनलो०॥७३३॥ 78 ]
-
अनहोना हो गया सभी कुछ लाभ नहीं कहने में ।
पूछे मित्र,मित्र के हित,हित लाभ न चुन रहने में,सु० ।।७३४।।
एक दूसरे के दुख को हो दोस्ती गले लगाती ।
कहने से हल्की हो जाती,भरी हुइ दुख से छाती,सुनलो०।७३५।
उत्तेजित उद्विग्नमना हो कहता राजकुमार ।
ऋषिकुमार शांति से सुनता, मैत्री का व्यवहार, सु०।।७३६।।
गुप्त भेद खुल गया रात को ऋषिदत्ता थी शुद्ध ।
जानबूझ इल्जाम लगाया रूकमण ने हो क्रुद्ध ,सुनलो०।।७३७।।
सारा था षडयंत्र इसी का इसने हो मरवाया । ।
सुलसा जोगन के द्वारा सब काम बुरा करवाया, सुनलो०१७३८।
योगशक्ति का दुरुपयोग भी स्वार्थी नर कर लेते ।
उकसाने को कानों में जब लोग फूंक भर देते,सुनलो०।।७३६ ।।
ऐसा करके भी गौरव का अनुभव रूकमण करती ।
साधारण आत्मा पापों से पहले पोछे डरतो,सुनलो०।।७४०।।
ऋषि न रही तब मै क्यों जोऊ फिर रूकमण के साथ ।
इसीलिये कर अग्नि स्नान करलू में आतमघात, सु०।।७४१।।
ऋषि बोले मर करके भी जनमोगे कहीं दुबारा ।
पाप पुण्य का भोग वहां पर भरना होगा सारा,सुनलो०१७४२।
भ्रमणा में मत रहना आगे तुमको ऋपि मिल जाये ।
कोई जीव कहां जाता यह हमको कौन बताये,सुनलो०।।७४३।।
[ 79
-
आत्मघात करने वालो की दुर्गति ही होती है ।
ढोती वोझ बुरे घ्यानो का वो आत्मा रोता है,सुनलो०।७४४।।
मिले मुझे आश्रम मे तव क्या कहकर लाये साथ ।
सोचा नही अापने वो तो करते कैसो बात, सुनलो०।।७४५।।
तुम्हे दुखी करना न चाहता किसी कृत्य के द्वारा ।
मुनिकुमार क्षमा करदो अपराध हुआ जो सारा, सु०।।७४६।।
सुनो आत्महत्या करने का छोडो बुरा विचार ।
मित्रमित्र करते आए है मित्राग्रह स्वीकार, सुनलो०।।७४७।।
जीवित रहने पर शायद वो मिल जाए ऋपिदत्ता ।
ऋपि क्या? टहनी से जुड सकता पका,गिरा जो पत्ता,सु ।७४।
मृत भी क्या जीवित हो सकती मिले मुझे जो जिन्दा ।
मेरे सम्मुख ऐमो वातें मत करना आइन्दा, सुनलो०1।७४६।।
ऋपि को पुन. लौटना होगा हो जो तुम्मे सत्त्व ।
तत्त्व यही हे सकरपो का माना बडा महत्व, सुनलो०।।७५०॥
उसे कही देग्वा क्या जीवित समाचार या पाये ।
सत्य क्यो न बतलाया जाए क्यो कुछ भेद छुपाये,सु०।।७५१।।
ऋपिकुमार तुम्हारे पर है मुझे पूर्ण विश्वास ।
ऋपि के जीवित होने का होता है कुछ अहसास,सु०।।७५२।।
नही कर गा अात्मघात यह पहले करलो वादा ।
तव जा कोई बात करू गा,मेग यही इरादा, सुनलो०।।७५३॥
80 ]
4
राजकुवर ने वचन दे दिया नहीं करूंगा हत्या ।
'ऋषि बोले ऋषि जीवित है यह जाना मैंने मत्या, सु०।७५४।
क्यों न आज तक मुझे बताया है तो कहो कहां है ?
लावो उसे मुझे ले जावो अपने साथ जहां है, सु०।।७५५।।
मत टरकाओ मुझे हो रही मिलने की उतावल ।
उतावल में हो जाता है समझदार भी पागल, सु०॥७५६।।
चार दिशाओं के अधिपति सुर होते ही हैं चार ।
दक्षिण अधिपति के कब्जे में है वो सुन्दर नार, सु०।।७५७।।
कैसे उसे यहां ला सकता बडा कठिन यह काम ।
रहना होगा मुझे वहीं पर कर विस्मृत निजनाम, सु०।।७५८।।
होकर मुक्त यहां आए वो तुम्हें मिले दे प्यार ।
हो जाऊं मैं वहां समर्पित बनकर बहुत उदार, सु०॥७५६।।
ऋषिकुमार तुम्हें क्या दूं मैं दूं मैं मेरा आतम ।
भूलूगा उपकार नहीं यह साक्षी है परमातम, सु०॥७६०।।
रहो तुम्हारे पास तुम्हारी आत्मा तुम्हें मुबारक ।
बात एक मानोगे मेरी,मानो जो उपकारक, सु०॥७६१।।
एक नहीं सारी ही बातें मानूंगा तन मन से ।
अच्छा इसके लिये अभी से बंधते हो न वचन से,सु०॥७६२।।
सुखी रहो हो कुशल तुम्हारा ऋषि तुमको मिल जाये ।
ऐसे कहकर चले कुवर ने मन ही मन गुण गाये,सु०॥७६३।।
+
[ 81
उफान । ऋपि के भव्य समर्पण का मन धन्यवाद है करता। मित्र मित्र के लिये मरेगा,शत्रु कभी ना मरता, सु०॥७६४।। बात असभव सभव होगी, ऋपि आ मुझे मिलेगी। जड से उखडी हुई कली फिर अपने स्थान खिलेगी,सु०१७६५। अनहोनी आकाक्षाओ मे लेते सास अणु अणु मे वस मचा हुआ हे एक वडा तूफान, सु०॥७६६।। इन्तजार वाली घडिया में जो होता आनद । वो अस्सीम अनत उसे क्या बाध सकेगा छन्द, सु०॥७६७।। रोया रोया महक उठा ज्यो महके रजनीगधा । गोरखनाथ सिवा क्या जाने मन का गोरखधधा,सु०॥७६८।। पिघल गया परिताप स्थान ले रहा नया परितोप । दुख मे वैचेनी होती सुख मे होता सतोप, सु०॥७६६।। सजकर आने लगी वदलियाँ प्यारे नील गगन पर। प्यारी ज्यो श्रृ गार बनाती, प्यारे छगन मगन पर,सु०१७७०। टोह मोरनी की करता है मोर मचाकर शोर । मोहोदय से बन जाता है सवका मन कमजोर, सु०॥७७१।। बहुत दिनो के बाद भले हो होता मिलन मधुर ही। सुख उपजाया करती है वो पाने की सुर-सुरही,सु०॥७७२॥ शुक से सटकर बैठ सारिका दिखा रही है प्यार । मिलन भावना को देते है मानो नव्याकार, सु०॥७७३॥ 82 ]
दीवारों पर चित्रित चित्रों में आई है जान ।
नया खिचाव कर रहे पैदा, राजकंवर के प्राण, सु०॥७७४।।
ऋषिदत्ता आ खड़ी सामने सपना नहीं यथार्थ ।
व्याख्या सहित समझ में आया शब्दों का भावार्थ,सु०१७७५।
फैल उठे हैं बाहु पांव-लडखडा गए तत्काल ।
झुक कर किया प्रणाम उसी ने अपने को संभाल, सु०।७७६।
नहीं भ्रमणा है सत्य ऋषि कर लिया गया है निर्णय ।
यह बोले उससे पहले हो बोल उठी वो सविनय, सु०॥७७७।।
आप कुशल हैं सुन बोला वह धन्य हुअा मम जीवन ।
दूर हो गया तुम्हें देखकर तन मन का सूनापन, सु०।।७७८।।
मौनावरण लपेटे ऋषि को साथ ले गया ऊपर ।
फूल बरसने लगे गगन से, ध्वनि आती मीठे स्वर,सु०१७७६ ।
'महासती ऋषिदत्ता जयतु' प्रगट देवता कहते ।
सुन सुरसुन्दर दौडे आए कैसे पीछे रहते, सु०॥७८०।।
लोग बावले बने देखने सुनकर चर्चा सारी ।
ऋषि ऐसी कैसी है सुन्दर विधि ने स्वयं संवारी,सु०॥७८१।।
नृप ने कहा गजारूढ़ हो चलो महल में आप ।
शोभायात्रा में जनता कर लेगी दर्शन साफ, सु०।।७८२।।
राजकुमार और ऋषि बैठे बैठे भूपति साथ ।
मौन मधुरता मर्यादा की सभी मानते बात, सु०।।७८३।।
[ 83
। एक वार उठ उठी न फिर से ऋपि की पलकें भारी। लज्जाशोला होती ही है शीलवतो सन्नारी, सु०।।७८४॥ जीभर दर्शन किए सभी ने खुश मन से गुन गायें । भोजन के पश्चात् मत्रणा-गृह मे नृप ले आये, सु० ॥७८५।। ऋपि रानी के साथ ले रही, वातो का आनद । राजा राजकुंवर आ बैठे, अलग रुम मे बन्द, सु०॥७८६॥ अच्छा किया आपने अपना निर्णय वापिस लेकर । ऋपि को पा सकते न कभी भी प्राणाहुति यो देकर,सु०७८७। करना पड़ा किसलिये ऐसा वतलादो ना आप । अन्न त्याग रो रही रूकमणी कुछ न वोलती साफ, सु०१७८८। रोना वद किया उसने अव समाचार शुभ पाकर । संभव है वो मर भी जाती फासी या विष खाकर,सु०१७८६। आद्योपात सुनाओ हमको वो सारा वृत्तांत । जिससे वन पाए ये मेरा भ्रान्त चित्त भी शात, सु०॥७९०॥ राजकवर बोला न पूछिए अग्निस्नान का कारण । सुख के वदले दुस ही होगा मौन कीजिए धारण,सु०॥७६१॥ यद्यपि नहीं पूछना अच्छा पूछ रहा है फिर भी । शायद उपयोगी हो जाए प्रश्नावलि आखिर की,सु०।७६२॥ यथार्थता का बोध कराना जाए तुरा न माना। राजकवर ने मान लिया हे कारण सही सुनाना,सु०॥७६३॥ 84] मुझे वचन दे आप जानकर कर परिस्थिति पर गौर । देंगे नहीं रूकमणी को कुछ कोई दंड कठोर. सु०॥७६४॥ नृप ने कहा रूकमणी पर अब है अधिकार तुम्हारा । नहीं करूंगा सजा उसे मैं मेरे निर्णय द्वारा, सु० ॥७६५।। पहले से ले अब तक की सब घटना लगा सुनाने । सुन सुरसुन्दर लगा कांपने खुद का सिर खुजलाने,सु०१७६६। ऐसा अधम घिनौना कारज रूकमण ने करवाया । सुलसा द्वारा ऋषि के सिर पर ऐसा आल चढ़ाया,सु०।।७६७।। गुस्से में हो खडे बढ़े लेने के लिए कटार । नृप को जकड़ बाहुओं में यों बोला राजकुमार, सु०।।७६८।। मुझे न ऐसी सुता चाहिए छोडो राजकुमार । सुलसा जोगन सहित भेज दू यमराजा के द्वार, सु०।।७६६ ।। मुझे वचन दे रखा आपने कुछ भी दंड न दूंगा। करो माफ अपराध यही मैं कहता और कहूंगा, सु०।८००। नृप ने आज्ञा दो दासी को ले आजा रूकमण को । और बाद में बुलवाऊँगा, उस दुष्टा जोगण को,सु०।८०१। ऋषि को लेकर श्वेतमहल में कहा कुवर ने जाऊँ । बैठो यहीं आपके सम्मुख रूकमण से हुं कराऊँ, सु०।।८०२।। रूकमण आई मिला न पाई पति से नजर परस्पर । पितृचरण में प्रणमन करके बैठी बहुत सिमट कर,सु०।८०३। [ 85
बेटी बता जानती है क्या तू मुलसा जोगन को ।
और अभी वह कहाँ मिलेगी देखे उस पापन को,सु०1८०४।
अता-पता सव बता दिया हे रुकमण ने नरवर से ।
सेनापति को बुलवाया है भेज गुप्तचर नर से, मु०॥८०५।।
खडी रुकमणी काप रही है अपने मन के भीतर ।
तीखे और कठोर वचन से बोला नृप सुरसुन्दर, मु०।।८०६।।
कुल को किया कलकित तू ने मा की कोख लजाई ।
की बरबाद जिंदगी खुद की कुमति तुझे क्या आई,सु०1८०७।
ऋपि भी राजकुमारी ही थी तेरे जैसी प्यारी ।
नारी होकर तू नारी को बन बैठी हत्यारो, सु०।।८०८॥
उस पति को पाने को तूने कितना जाल बिछाया ।
तेरा मुंह देखना उसको जरा पसद न आया, सु०।।८०६।।
उसकी ऋपि मिल गई उसे क्या होगा तेरा हाल ।
घुटनभरे जीवन को कैसे पायेगो सभाल, सु०॥८१०।।
मै वध गया वचन से तुझको सजा नही दे पाता ।
सुनती रुकमन खडी खडी नृप और वोलता जाता,सु०।८११।
आँखें लाल हुई राजा की कहे क्रोध मे भरकर ।
क्रोध और मेघा सावन के वरसे सदा गरज कर,सु०॥८१२।।
दासी ने आ कहा आ गए सेनापतिजी बाहर ।
अगर आपकी आज्ञा हो तो मै आने दू अन्दर मु०॥८१३।।
.
86 ]
. कुछ हो स्वस्थ कहा राजा ने हाँ वे आ सकते हैं। आक़र नमकर भद्रासन पर बैठ गए झुकते हैं,सुनलो०।।८१४।। सेनापतिजी अपने पुर में रहतो सुलसा जोगन । उसे पकडना होगा है वह बहुत बडी अपराधन,सुनलो०।८१५। नाक काटकर कान' काटकर गदहे पर बिठलाकर । पुर में उसे घुमाकर करना राज्य परिधि से बाहर, सु०।८१६। सेनापति ने नृप आज्ञा को अपने शोश चढ़ाया । करके नमन काम करने को आगे कदम बढ़ाया, सु०॥८१७।। श्वास वहीं का वहीं गया रुक रूकमण का भी भय से। विभक्तियाँ रूक जाती है जब काम पडे अव्यय से,सु०।।८१८।। नृपनयनों से क्रोध वह्नि का निकल रहा है धूआं । कहा सुता से गिरी स्वयं तू खोदा गहरा कूत्रां,सुनलो०।८१६। दोष कनकरथ का न जरा भी, सारा तेरा दोष । अपने भाग्य सहारे पर कर जीवनभर अफसोस, सु०॥२०॥ नैन पोंछती हुई रूकमणी त्वरित वहां से चलदो । राजकुवर की ओर मुडा है राजा जल्दो जल्दो,सु०।।२१।। ऋषि के पूज्य पिताजो से था मेरा प्रिय संबंध । ऋषि भी मेरे लिये सुता है यहो मुझे आनंद, सुनलो०॥८२२।। कावेरी का राज्य तुम्हारा घूमो फिरो कहीं पर । चित्त विरक्त हुए जाता है, मुझे नहीं रूचता घर,सु०८२३।। [ 87
पूज्य पिता के तुल्य आप हो, हुकम आपका माना ।
विनति मानिए एक ग्राप भी राज्य छोड मत जाना,सु०१८२४।
बेटी ने जो भी भूलें की उन्हें भूलिए श्राप ।
भूलें होती है मानव से वात सुनो है साफ, सु०।।२।।
याद करोगे उन सबको तो होगा बहुत विपाद ।
दिल पर भार बना रहने से दिल होता वरवाद,सु०॥८२६।।
आज्ञा लेकर राजकु वर उठ ऋपि को लेकर आया ।
श्वेतमहल को जले हुए दीपो से द्योतित पाया, सु०१८२७१
88 ]
ढाल
आठवीं
दोहा
अपनों से ही होत है, दिल की पूरी बात ।
नैन मूद ऋषि कह रही, बहता नीर प्रपात ॥
तर्ज-पावन पुरूषोत्तम
उफन रही अन्दर उत्सुकता ऋषि से मांगू उत्तर ।
देखा करते प्रेम प्रश्न भी अपना अपना अवसर,सुनलो०।८२८।
शयनकक्ष में स्वस्थ मना हो ऋषि से किया सवाल ।
जीवित कैसे रही कहो तुम और रहा क्या हाल,सुनलो०१८२६ ।
करवट के बल शय्या पर लेटा है राजकुमार ।
नीचे बैठी ऋषि ने देखा ऊपर प्रांख उठाकर,सुनलो०॥८३०।।
प्रिय यह बात बहुत लंबी है, बैठू अगर सुनाने ।
रात बीत जायेगी निंदिया नहीं सकेगो आने,सुनलो०।।८३१।।
नींद नहीं आ रही मुझे तो, है सुनने का चाव ।
कहना शुरू करो जीवन का कम हो जाय तनाव,सु०।।८३२॥
ऋषि ने कहना शुरू किया है जीवन का वृत्तांत ।
आप जानते उससे आगे सुनो बनो मत भ्रांत, सुनलो०।८३३।
काला मुह पग नीले करके गदहे पर बिठलाया।
कृत्य सुनाते हुए शहर में अच्छी तरह घुमाया, सु०॥८३४।।
[ 89
-
खड़ा किया शमसान स्थान मैं वोला यो जल्लाद ।
अपने इष्टदेव को करले, जो करना हो याद, सुनलो०।८३५॥
घूम गई तलवार गगन मे मुझे रहा ना होश ।
उसी वक्त गिर गई वही पर कृत कर्मो का दोप, सु०१८३६।
बहुत देर के बाद उठी तो दिखा न कोई भी नर ।
चले गए जल्लाद वहाँ से, मर गई मुझे समझकर सु०१८३७।
वन की ओर भगी मै अपनी सारी शक्ति लगाकर ।
कोई पकड नहीं ले वापिस फिर पीछे से आकर, सु०१८३८।
नीचे ऊपर इधर उधर क्या, है क्या होने वाला ।
देखा नही, रूकी थकने पर देस निराला नाला सु०।।८३६।।
पैरो से लोही रिसता है काटे गडे पडे हे ।
फटी झाडियो से जो साडी, दिखते छेद वडे हे, सु०।।८४०।।
भय सताप वेदनाओ ने, मुझ पर घेरा डाला।
मैं क्या जानू ये क्या होते पडा न जिनसे पाला, सु०१८४१।
स्मृति स्वर्गस्थ पिता की आई रोई फफक फफक कर ।
वन को जला रहा दावानल मानो धवक धधक कर सु०१८४२।
मैने दी आवाज पिताजो, आमो मुझे बचायो ।
मै अब कही नही जाऊगी मेरा दु ख मिटाओ सुनलो०१८४३ ।
मै थी बडी लाडली मुझको करते कितना प्यार ।
आप जहा भी होवो सुन लो मेरी करुण पुकार, सु०१८४४।
.
90 ]
मरने दिया आपको मैंने मैं हूं बडी अभागिन ।
मर जाती मैं साथ देखने पडते मुझे न ये दिन, सु०१८४५।
जाऊं कहाँ करूँ अब मैं क्या रास्ता मुझे बताओ।
मेरी रक्षा जहां हो सके मुझे वही पहुंचाओ, सु०॥८४६।।
डूब गई इस चिन्तन में तब मिला मुझे आभास ।
ऋषभदेव की छाया में जा होगा प्राप्त प्रकाश, सु०॥८४७।।
उस आश्रम में पहुंच गई मैं प्रभु के दर्शन पाये ।
और अतीत समय के सारे दृश्य स्मरण हो पाये,सु०।८४८।
ढांढ़स मुझे बंधाये ऐसा कोई नजर न आया ।
फिर भी मैंने बहुत सुरक्षित स्वच्छ स्थान को पाया सु।८४६।
रहते थे राजर्षि उसी कुटिया को पौंछा झाडा ।
व्याघ्र चर्म भी वहीं पडा था नहीं किसी ने जाडा सु०।९५०।
जा तालाब किनारे पर कर लिया शांति से स्नान ।
फलाहार कर लेट गई धर श्री जिनवर का ध्यान सु०।८५१॥
हुआ सवेरा उठकर लाई चुनकर फूल मनोहर ।
प्रभु की पूजा कर स्तुति बोलो शान्त भाव भर मृदुस्वर।८५२।
वन में यहां अकेली ही हूं मन में उठा विचार ।
शील रतन कोई न लूट ले लुच्चों का सरदार, सु०।।८५३।
पूज्य पिता को कही हुई वो औषधि आई याद ।
सिर्फ कान में रखने से स्त्री बने पुरुष साह्लाद सु०।।८५४।।
[ 91
दे निकाल तो स्त्री हो जाए, वह औपधि ले पाऊ ।
हो जाऊ निश्चित सर्वथा सुख से शोल वचाऊ सु०।१८५५||
कुछ मेहनत के बाद लगी वह अौषवि मेरे हाथ ।
स्त्री से नर बन चुको नाथ। मै सही सुनाती वात, सु०१८५६।
रथमर्दनपुर के युवराजा उस पाश्रम मे पाये।
उनने मुझको मैने उनको देखा नैन विछाये, सु०१९५७।
ऋषिकुमार वो तू हो खुद यो वोला राजकुमार ।
ऋषिदत्ता हँस पड़ी जोर से हा मेरे सरकार, सु०।।८५८॥
दोनो निद्राधीन हो गए सुनाकर कया सुनाकर ।
तट से टकराकर क्या शात न बन जाता रतनाकर,सु०१८५६)
तन से सुखी सुखी है मन से और सुखी जीवन से ।
सुखी वही है जो मुख माने सजग विवेकी मन से सु०1८६०।
ऋपिकुमार ऋपि ही थी यह भेद सामने आया।
आनदित मन हुआ हो गई पुलकित कचन काया सु०१८६१।
कितने कष्ट उठाये ऋपि ने सुनकर दुख भर आया।
पितृ चरण जिनशरण ग्रहणकर अपना शील बचाया,सु०१८६२
मेरे को भी बचा लिया में मरने को जाता था।
किसका कहा करू कैसे भी समझ नहीं पाता था, सु०।८६३।
ऋपिकुमार नही मिलता तो ऋपि न मुझे मिल पाती ।
मिलने की आकाक्षा इह पर भव में नित तडफाती,सु०।८६४
92 ]
दोनों बैठे हुए परस्पर कथा व्यथा की कहते ।
संयोगों के वश संसारी जोव नहीं क्या सहते, सु० ।।८६५।।
ऋषि ने कहा याद है ना जो ऋषि को वचन दिया था।
हाँ हाँ इच्छित देने का वादा उस समय किया था, सु०।८६६।
जो कुछ तुम्हें चाहिये बोलो काम नहीं है शक का ।
पालन करें अपन दोनों ही अपने-२ हक का, सु०।।८६७।।
प्यार रुकमणी को दे उतना जितना मुझको देते ।
बहुत हर्ष होगा मेरे मन बस इतना सा लेते, सु०।।८६८।।
लगा सोचने राजकुंवर है इसमें क्या गहराई ।
रूकमण के प्रति प्रेम दया यह ऋषि को कैसे आई सु०।८६६।
ऋषि ! तू यह क्या मांग रही है, है ना तुझको होश ।
रुकमण में तो अनगिनती के भरे हुए है दोष, सु० ।।८७०।।
प्यार आपका पाने का जितना मेरा अधिकार ।
उतना ही बस उसे मिले यह आप करो स्वीकार सु०१८७१।
उसका मुंह न देखना उसके लिए न दिल में स्थान ।
उससे मैं नफरत करता हूँ कैसे दू सम्मान, सु०।।८७२।।
घृणा दूर करनी ही होगी देना होगा प्यार ।
आप प्यार के सागर होजी देखो करो विचार, सु०।८७३।
क्रोध आपका हो जायेगा क्षण में पानी पानी ।
अडना लडना करते रहते, अज्ञानी अभिमानी सु०॥८७४।।
पापोदय से बुरे कर्म कर लेता है हर कोई ।
मिलती क्या न वस्तुऐं वापिस, गई कहीं जो खोई,सु०।८७५ ।
Shco
[ 93
ऋपि तू
ऋपि तू भावुकता मे वहती हुई जा रही पागल ।
उसके भीतर सुलग रहा हे ईर्ष्या का दावानल सु०॥८७६।।
तुझे मौत के मुह मे डाला रच करके पडयत्र ।
उसे यही पर जोने दो रहने दो सदा स्वतत्र, सु०॥८७६।।
तू बच गयी रह गई जीवित मुझे मिल गई पाकर ।
तेरी मेरी किस्मत थी यह कहता सत्य घुमाकर, सु०।।८७८।।
होगी उसमे ईर्ष्या यह तो स्त्री का सहज स्वभाव ।
उसमे परिवर्तन आयेगा पाकर प्रेम प्रभाव, मु०॥८७६।।
जितना समझ रही है उतनी सरल न है वो।
एक-एक को तीन बतातो वो न मानती हे दो, सु०॥८८०।।
सुलसा को जो सजा हुई है मेरे ही कहने से ।
मेरे पर गुस्से वो होगी दूर रही सहने से, सु०।।८८१।।
अगर आप पर क्रोध नही हो हो मन पश्चाताप ।
प्रेम पापका माग रही हो तो क्या करते आप, सु०11८५२।।
ऋपि तू भोली समझ रही हे सवको खुद के जैसा ।
लेकिन खरा खग होता है खोटा सोटा पैसा, सु०।।८८३।।
करुणा पात्र नही होती है दुनिया की हर अात्मा ।
नही महात्मा मे तुल पाती भटकी हुई दुरात्मा, मु०॥८८४।।
दयापात्र हे प्रेमपात्र है उसे क्षमा दे आप ।
पापी से पापी मानव भी करता नित्य न पाप, सु०।।८८५।।
94 ]
उसने कब माफी मांगो जो उसे क्षमा दी जाये ।
वो तो तेरे पर मेरे पर उल्टा जोश दिखाये, सु०॥८८६।।
कुरेदिए मत घाव पुराने जो बीता सो बीता।
हारा कौन कौन फिर जीता है यह एक फजीता सु०।।८८७।।
नरम हो गया होगा अब दिल मुझसे प्यार करेगी।
लिये प्यार के दुनिया मरती वो क्यों नहीं मरेगी सु०।८८८।
मिल तू उससे मनोभावना ले तू उसकी जान ।
फिर तू चाहेगी वैसा ही होगा मुझे प्रमाण, सु०।।८८६।।
ऋषि अब तो खुश है ना बतला, तू जीती मैं हारा ।
प्यारा मुझे वही होगा जो तुझे लगेगा प्यारा, सु०।।८६०।।
ऋषि ने कहा एकदम खुश हूं प्रिय तुम बने उदार ।
उदारता के मिलते हैं ये जन्मान्तर संस्कार, सु०।।८६१।।
कल उससे मिलने जाऊंगी लाऊंगी सदेश ।
उपजाऊंगी उसे समाधि शेष रहे ना क्लेश, सु०।।८६२।।
ऋषि को भोली भावुकता पर खुश है राजकुमार ।
मान बडाई ईर्ष्या इस पर, कर पाई न प्रहार, सु०।।८६३।।
प्रात: उठ ऋषि रथ पर चढ़कर राजमहल चल आई ।
नृप से पूछ मिली रूकमण से दशा देख पछताई सु०॥८६४।।
मुख मुरझाया मैले कपड़े पहना कोई न गहना ।
आँखे सूजी मन है सूना मुख से शब्द न कहना, सु०।।८६५।।
[ 95
उमे देखने का यह पहला अवसर ऋपि ने पाया । इससे पहले उससे सम्मुख ऋपि का मुख ना पाया सु०1८६६। ऋपिदत्ता ये मिलने आई रुकमण ने जब जान।। सडी हुई लेटी चरणो मे मुह क्या इसे दिसाना, सु०।८६७। ऋपि ने उसे बाहुप्रो मे भर उठा लिया है ऊपर । रुकमण के आंसू गिरते ज्यो गिरता गिरि से निर्झर,सु०१८६८1 ऋपि वोली मत रो मत रो कुछ लाभ नही रोने मे । लाभ तुझे होने वाला हे मरल नरम होने मे, मु०॥६६॥ चलते चलते लग जाती है कभी कही पर ठोकर । चलता क्या न दुबारा वो नर मावधान मन होकर,सु।६००। हर जीवो के सिर पर कितना हे कर्मों का बोझ । कितनी कितनी बाबानो से गुजर रहे है हर रोज, सु०१६०१॥ विषय वासनाऐ जहरीली भरी हुई है मन मे। असावधानी बरती जातो इसीलिये जीवन मे, सु०॥६०२॥ सभल गई तू वडी सयानी करदे रोना बद । मेरा कहना मान ध्यान से मिलकर ले पानन्द सु०१।९०३।। मै अपराधिन मै हत्यारिन, मै पापिन मै डायन । मुझसे मिलने को क्यो आई तुम हो भगिनी पावन सु०१६०४। तुम देवी मै हू राक्षसणी कह करके रोती है । ऐसी ही हालत होती है जब गलती होती है सु०11९०५।। 96 ] JT मुझे न देवी कह तू मैं भी तेरे जैसी नारी । मैंने दे दी क्षमा कभी की तूं है भगिनी प्यारी, सु०।६०६। चाह रही मैं तू स्वामी से मांगे माफी मन से । माफ करेंगे वे तेरे को मैं कहती हूं प्रण से, सु०॥६०७।। मैं अधमाधम कैसे जाऊं, अपना मुंह दिखलाऊं । ऋषि ने कहा सत्य है सब कुछ ले विधि मैं सिखलाऊं,सु०१६०८। तू चल मेरे साथ समर्पण कर पति के पांवों में । जी भर प्यार करेंगे वे भी भरकर निज बांहों में, सु०॥६०६। प्यार स्नेह पाने की मैंने लायकात खो डाली। मेरे से तो अच्छी है वो जहरभरी कोई प्याली, सु०॥६१०॥ जा तू उनसे कह देना है उनका मुझे सहारा । उन्हें याद कर कर काढूंगी, मेरा जीवन सारा, सु०॥९११।। चल पगली हो खडी बदल ये कपडे कर शृगार । मैं लेने को ही आई हूं झटपट हो तैयार, सु०॥६१२।। देवी नहीं महादेवी है सचमुच में ऋषिदत्ता। मानूं इसका कहना कैसे टालूं ये अलबत्ता, सु०॥६१३।। ऋषि के कहने से रूकमण ने सजे सद्य शृगार । राजारानी भी इतने में सहसा गए पधार, सु० ॥१४॥ ऋषि को रूकमण को देते हैं दोनों आशीर्वाद । आशीर्वादों का होता है अमृत सा आस्वाद, सु०॥६१५।। [ 97 . ऋपि स्कमण को तुझे सोपती, ऐसी बोली माता । नृप बोला आभार मानना बेटी मुझे न आता, सु०॥१६॥ हम दोनो के सिर से तूने भारी बोझ उतारा । सबको शाति मिलेगी इसका, श्रेय तुझे हे सारा, सु०।।१७।। बडे उदार हृदय है स्वामी, उनमे नही दुराव । हम दोनो के साथ करेगे, प्रेम भरा वरताव, सु०॥६१८।। रुकमण को लेने मै आई, मान वहन इक छोटी। कोई खोटी कहे उसे मै, मारू कसकर सोटी । सु०।।१९।। रथ मे साथ विठा रूकमण को, महलो में ऋपि पाई। ऋपि के सरल चित्त की गुण गाथा रूकमण ने गाई, सु०१६२०॥ साथ भले के भला करे नर ऐसे बहुत गले है । साथ बुरे के भला करे नर ऐसे कम निकले है, सु०।।६२१।। ऋपि का यही वडप्पन है जो भला किया रूकमण का। धर्मराज ने बुरा न चाहा दुर्मन दुर्योधन का, सु०॥६२२।। शयनखड मैं खडा कर दिया रूकमण को लाकर के । पति से कहा उसे ले आई आप मिलो जाकर के,सु०11९२३।। ऋषि के साथ साथ चल पाये शयनखड मे स्वामी । रूकमण झुकी गिरी चरणो मे मानी अपनी खामी,सु०॥२४॥ ऋपि ने वचन ले लिया मुझसे दू गा तुझको प्यार । तेरे पर जो भी गुस्सा था उसको दिया उतार, सु०॥६२५॥ 98 ] चली गई ऋषि इन्हें मिलाकर बैठे दो के दो ही। प्यार नहीं हो पाता आवे अगर तीसरा कोई, सु०॥६२६।। घृणा पाप विष निकल गया है पति के मन से सारा । रूकमण प्यारी बनी पलक में आत्मसमर्पण द्वारा,सु०॥६२७।। अपना और पराया है यह भेद स्वयं करता है । अपने आप स्वयं जीता नर और स्वयं मरता है, सु०॥६२८।। घुलना मिलना मिश्री जैसे जिस किस को भी आता। उसके लिए कहीं भी जावो, मिलता खुल्ला खाता,सु०॥६२६।। ऋषिदत्ता का रूकमण से है स्नेहपूर्ण व्यवहार । रूकमण की सब झिझक गई मिट,मिला प्यार ही प्यार,।६३०। प्यार और परमात्मा में क्या, अंतर मिला कहीं पर । प्यार करो तो परमात्मा है, हाजर सदा यहीं पर, सु०।।६३१॥ वह क्या प्यार सार समझेगा, जिसके मन में खार । उसको मीठा कभो न लगता, मधुर-मधुर संसार,सु०॥६३२॥ ऋषि पति से कहती रहती थी,रूकमण है गुणवाली । मनभावन वह रूप न भाता जो हो मन से कालो,सु ०।।६३३।। पिछलो स्मृतियां हो जाने पर रूकमण कुछ दुख पाती। तब सहलाती पीठ हाथ से ऋषि ढाढस बंधवाती,सु०॥६३४।। बोती बातें याद नहीं कर, नैन न भर पानी से । होतो आई भूल सदा से जीवित हर प्राणी से, सु०।।६३५।। [ 99 हसी खुशी से कावेरी मे बीत गया कुछ काल । ऋषि ने पति से कहा एक दिन सुनिये परम कृपाल,सु०१६३६। अव रथमर्दन नगर चले मा करती होगी याद । हमे देख सुन वो पायेगी परम शाति आह्लाद, सु०॥९३७।। कल ही चल देते हैं ऐसे बोला राजकुमार । करवाता हू अभी सूचना राजा के दरवार, सु०॥६३८।। रथ मे बैठ गया महलो मे, नृप को किया प्रणाम । घर की ओर हमे जाना कल, बना लिया प्रोग्राम,सु०।६३९। जितना आप रुको उसमे है प्रसन्नता अति भारी । अगर आपको जाना है तो, करवा दू तैयारी, सु०।।९४०।। महलो मे भी खवर करा दी ये सब कल जायेंगे । रानी सुन बोली ये पूछो, वापिस कब आयेंगे, सु०।।६४१।। ऋपि के पति के सम्मुख देती,रूकमण को मा सीख , ससुराल मे शोभा लेना, रहना विल्कुल ठीक, सु०॥६४२॥ पति से पीछे सोन। पहले जगना रखना ध्यान । सासु और ससुर का करना,विनय तथा सम्मान,सु०॥६४३॥ महलवासियो दासदासियो, पर नित दया दिखाना । पीहर नही वही होता है, स्त्रो के लिये ठिकाना,सु०।।६४४।। ऋषि | तू भी है वेटी मेरी, रखना इसका ध्यान । तूं है वडी और यह छोटी, और बुद्धि नादान, सु०॥६४५।। 100 ] Atomic SurucuIC -un- ऋषि की बडी प्रशंसा करते, आकर नृप सुर सुन्दर । घो न छुपा रहता खिचडी में, भले पडा हो अन्दर,स०।६४६। ऋषि बोली मेरे में ऐसी, नहीं योग्यता दिखती । हम दोनो बहने आपस में स्नेहभाव पर टिकती, सु०।।६४७।। दिया आपने स्नेह मुझे जो, उसका पार नहीं है । भुलूंगी न कभी उसको मैं, सार विचार यही है,सु०।।६४८।। हुई भूल हो गया कहीं पर, अविनय मेरे द्वारा । क्षमा मांगती जाते जाते, माफ करें वो सारा, सु०।।६५६ ।। सबकी आंखें गीली है अरू, भारी है आवाज । इस पर से हम कर सकते हैं,दुख का कुछ अन्दाज,सु०१९५०। कर प्रणाम महलों से निकले, श्वेतमहल चल आये । आये प्रमुख नागरिक मिलने,स्नेह क्यों न दिखलाये,सु०॥६५१। ऋषि रूकमण घिर गई स्त्रियों से,जाती हो हां जायो । हमें भूल मत जाना फिर कब अायोगी बतलाओ,सु०।।९५२।। राजकुवर की आंखों आगे, खडी हुई आ माता । मानो माता को कहता है आता हूं मैं आता,सु०॥९५३।। ऋषि को जीवित जान सभी को,उपजेगा मन विस्मय । रूकमण का यदि नाम आ गया,तो क्या होगा है भय,सु०।६५४। महलवासियों की नजरों से, रूकमण गिर जायेगी। हीन भावनाओं के सम्मुख, क्या स्थिर रह पायेगी,सु०।९५५। - [ 101 नाम रुकमणी का न कही पर, लिया जाय तो ठीक । बात एक सी हो तीनो की, ले पहले हम सोख, सु०॥६५६॥ डूबा हुआ विचारो मे यो, करवट बदल रहा है। इतने में ऋपि ने पाकर के, ऐसा वचन कहा है,सु०॥६५७।। कैसे छाइ हुई दीखती, मुख पर वडी उदासी। रहना यही चाहते हो क्या, वन श्वसुरालयवासी,मु०।९५८।। परामर्श तेरे से करना, वोला राजकुमार । घर जाकर के कसे कहना, पहले करे विचार, सु०॥६५६।। वात मुनाये बिना न सावित, होगी तू निर्दोष । नाम रूकमणी का न कही, आ जाये यह अफसोस,सु०१६६० । अगर अकेली जोगन पर ही, डालें सारा दोष । उसको ऐसा करने मे क्यो, मिला कहो सतोप, सु०॥६६१॥ रुकमण की वो परम सखी थी इसीलिये कर पाई । वावक बनने वाली ऋपि को यो दोपण ठहराई,सु०11९६२।। अरि को मारे काम पडे तो, अपने प्राणि उवारे, । सखी सखी को सुख पहुचाये,बाचा विध्वन निवारे,सु०।।६६३॥ जोगन ने कावेरी जाकर, रुकमण से बतलाया । ठिठक गई वह सुनकर किस्सा,गुस्सा भारी आया,सु०।६६४।। शादी के पश्चात् रूकमणी, ने यह बात बताई। मैने कही नृपति से उनने, उसकी करी पिटाई, सु०॥६६५।। 102 ]
देशनिकाला उसे दे दिया, कहना यही बराबर ।
राजकुमार और ऋषि ने मिल,निर्णय लिया परस्पर,सु०।६६६।
पूज्य पिताजी जब जानेंगे, ऋषिदत्ता निर्दोष ।
तब उनको अपने में होगा,बहुत बहुत अफसोस, सु०।।६६७।।
दुःख व्यक्त जब करे पिताजी, रखना हमको ध्यान ।
रूकमण अपने मुह से सच-सच, दे दे नहीं बयान,सु०।६६८।
103
दाल नवमी दोहा घर जाने की बात से, छाया दिल मे हर्ष । मन हर्षित हो जायगा, माता के कर दर्श ।। तर्ज-पावन पुरुपोत्तम ऋपि वोली में समझा दूगी, रुकमण को सब वात । कभी कभी रहता न देखलो, अपना दिल ही हाथ,सु०१६६६। इतने मे आ गई रुकमणी, बैठ गई है पास । इसके आने से तीनो को, हुआ परम उल्लास,सुनलो०॥९७०।। रथमर्दनपुर देखेगी तू, रूकमण पहली बार । हा हा उससे पहले आश्रम, देखूगी धर प्यार, सु०॥९७१॥ जिस आश्रम मे आप पली हो, है वह भूमि पवित्र । उसकी धूल सुगवित होगी, जैसे बढिया इत्र, सु०॥९७२।। ऋपि बोली उस आश्रम मे है, ऋषभदेव का मदिर। दर्शन कर तूं झूम उठेगी, मन के अन्दर अन्दर, सु०॥९७३।। इतने मे कह रहा कनकरथ, छोडो बाते अन्य । मा की वत्सलता पाकर तूं, हो जायेगी धन्य, सु०॥९७४।। सुनकर मा का नाम रूकमणी, गदगद हुई विशेष । मा को छोड इसे जाना है, प्रियतम वाले देश, सु०।।९७५।। . - 104 ] बोत चुकी थी रात बहुत ही, कर अब बातें बन्द । तीनों लेने चले स्वयं ही, निद्रा का आनन्द, सु०॥९७६।। क्योंकि सवेरे जल्दी चलना, करना और प्रयाण । जल्दी सोना जल्दी उठना, श्रेष्ठ स्वास्थ्य का प्राण,सु०।।६७७।। कावेरी के लोगों से ले, विदा प्रयाण किया है जिस रास्ते से आये वो ही, रास्ता पुनः लिया है,सु०॥९७८॥ दिखी दूर से ही मंदिर की, ध्वजा स्वयं लहराती । जिनदर्शन करने हित इनको, मानो हो बुलवाती,सु०।।९७९ ।। रूकने की इच्छा से इनने, डाला यहीं पडाव । आदिनाथ प्रभु के दर्शन का, उमडा अन्तरभाव, सु०॥६८०॥ न्हा धो तीनों पहुँचे मन्दिर, प्रभु की पूजा करते । मधुर स्वरों से स्तवना करके, भव से पार उतरते,सु०६८१। राजर्षि के स्तूप पहुंचकर, ऋषि हो गई निढाल । खडा किया रूकमण ने उसको, अच्छी तरह संभाल,सु०।२८२। कुटिया में जाकर के तीनों, करते हैं विश्राम । तीनों ने मिल बना लिया है, रूकने का प्रोग्राम,सु०॥९८३।। रूकमण स्वयं लगी कुटिया की, साफ सफाई करने । श्रम से जी न चुराया जाये, यही भावना भरने,सु०॥९८४।। उसे सजा दी मंदिर जैसी, घी के दीप जलाये । वातावरण स्वच्छ, हो तो मन,प्रसन्नता भर जाये,सु०॥९८५।। [ 105 - तीनो गए घूमने ऋषि अब, दिखलाती वो स्थान । पहली बार जहा पर देखा, पति को प्रारण समान,सु०।।९८६|| जुडी हुई रहती है स्मृतियाँ, स्थान समय के साथ । सुना सुनाकर ताजी करना, है अपने ही हाथ, सु०॥९८७॥ अगर सुनाने मे रस हो तो, थके न सुनने वाला । पी जाता पीने वाला हो, कोई पिलाने वाला, सु०॥१८॥ आ कुटिया मे भोजन करके, तीनो सुख से सोये । विना काम जग करके अपना,भला स्वास्थ्य क्यो खोये,सु।९८६। समाचार आने का देने, भेज दिये है दो नर । कभी चूकते नही चतुर नर,जैसा भी हो अवसर,सु०॥६६०॥ आश्रम से चल दिए सवेरे, रथमर्दन की ओर । घर की ओर पहुचने मे पग, पडते कव कमजोर,सु०।६६१॥ समाचार पा पूज्य पिताजी, सम्मुख लेने आये । देख दूर से ही तीनो ने, अपने शीश नवाये, सु०।६६२॥ निकट पहुचते ही ये तीनो, रथ से उतर पडे है । क्योकि सामने आने वाले, इनसे बहुत बडे हे, सु०।।६६३।। पितृचरण मे नमस्कार करता है राजकुमार । पिता पुत्र का नाता होता,पावन परम उदार, सु०॥६६४॥ प्रणमन कर ऋषि रूकमण दोनो,खडी किनारे जाकर । इन तीनो को प्रणमन करते, पुरवासी जन आकर,सु०१६६५। . 106 ] , झूम रहे हैं सब खुशियों में, बोल रहे जयकार । स्वागत में ऐसा करने का, है सबको अधिकार, सु०॥९९६।। स्वागत यात्रा शुरू हो गई, धूमधाम के साथ । घूम घूमाकर राजमहल में, पहुंचे धरणीनाथ, सु०॥६६७।। गए घरों को सभी नागरिक, पाकर नृप अभिवादन । स्वागत यात्रा का माना है, सबने यहीं समापन, सु०॥६६८॥ ऋषि रूकमण को लेकर पहुंचा, बेटा मां के पास । चरणों में सिर टेक वंदना, करता है सोल्लास, सु०॥६६६॥ मैं ऋषिदत्ता चरण वंदना, माताजी करती हूं। मैं रूकमण पद वंदन करती, पांवों में गिरती हूं,सु०।१०००। मां पुतली-सी बनो रह गई, ऋषि को यहां निहार । सपने में हूं या जगती हूं, करने लगी विचार, सु०।१००१ माँ दोनों तेरी बहुएं हैं, बोला राजकुमार । पर ये ऋषि आ गई कहाँ से,सुना कथा का सार,सु०।१००२। सब कुछ बतलाया जायेगा, जो कुछ छुपा रहस्य । समाधान के लिये समुत्सुक, रहता नित्य मनुष्य, सु०।१००३। पहले पूज्य पिताजी को कर, आयें अभी प्रणाम । ना कहने का प्रश्न न उठता, है यह पहला काम,सु०११००४। तीनों गए पिताने सुत को, बिठलाया है पास । देख रूकमणो ऋषि को खींचा,एक दीर्घ निःश्वास,सु०११००५। [ 107
-
,
बेटा । है ये कौन पिताजी, है ये वो ऋपिदत्ता।
वो कैसे हो सकती है ये, जानू मै अलबत्ता, सु०११००६।
जल्लादो को बुला पूछिये, उनने क्या था मारा ।
चल जायेगा पता बाद मे, सब कुछ मेरे द्वारा,सु०११००७
मां को और आपको सवको, सब कुछ है बतलाना ।
न्हाले धोले भोजन करले, हो ले नया पुराना, स०।१००८]
ऋपि रुकमण के साथ महल मे, पाया राजकुमार ।
तीनो होने लगे त्वरा से, न्हा धोकर तैयार, सु०११००६।
भोजन कर सब पहुच गए है, राजाजी के पास ।
यथास्थान सब बैठे लेते, शाति प्रेम की सास, सु०।१०१०॥
अथ से इति तक लगा सुनाने, स्वय कनकरथ वात ।
रोने लगे नृपति पीडा से, सव सुनने के साय, सु०।१०११।
पुत्रवधू के साय हुआ यह मेरे के अन्याय ।
इसके सिवा नही या मेरे, सम्मुख अन्य उपाय, सु ।१०१२।
वधे होगे कर्म चीकणे, करे कौन अनुमान ।
कैसे छूटुंगा पूछू मै, मिले अगर भगवान, सुनलो ११०१३।
ऋषि ने कहा पिताजो इसमे, नही आपका दोप ।
नही रोइए स्वस्थ होइए, धरिये मन सतोप ।१०१४।
मेरे पापोदय से मेरे, सिर आया इलजाम ।
जीवित बची मिली या सबसे, यही बडा शुभ काम ।१०१५।
.
108 ]
क्षमा चाहता हूं तेरे से, बेटी करदे माफ ।
पाप बहुत हल्का हो जाता, हो यदि पश्चाताप ।१०१६।
राजसभा में सबके सम्मुख, ऋषि की बात करूंगा।
लोगों में इसके प्रति ऊंचा, आदर भाव भरूगा ।१०१७।
सुलसा की अपराध कहानी, आद्योपांत सुनानी ।
जनता जान सकेगी जिससे, पापिन बड़ी पुरानी ।१०१८।
मां के साथ उठे ये तीनों, आज्ञा ले नरवर की।
मर्यादाएं सभी पालते, अपने - अपने घर की ।१०१६ ।
मां के पास पहुंचते ही गुण, रूकमण ऋषि के गाती ।
ऋषि होती न उदार अगर तो, मै न यहाँ आ पाती ।१०२०।
ऋषि बोली मेरे गुण गाना है तो है तो मैं लो जाती ।
रूकमण ने की बात बंद, सुन माता हर्ष मनाती ।१०२१।
राजसभा में राजकंवर ने, सारा भेद बताया ।
पुरवासी लोगों ने सुनकर, बड़ा अचम्भा पाया ।१०२२।
राजसभा में अपना निर्णय, लगे सुनाने नरवर ।
मुझे संयमी बन जाना है, राजपाट सब तजकर ।१०२३।
जग के मोह जाल में फंसकर, चक्कर खाता प्राणी ।
संयम के पथ पर चलता है, कोई आतमज्ञानी ।१०२४।
सुत को राज्यभार यह सौपू, मैं लू संयमभार ।
करे आप अनुमोदन मेरा, सपन बने साकार ।१०२५।
[ 109
राजपुरोहित को दी आज्ञा, श्रेष्ठ मुहूर्त बताना ।
सुत को राज्य विठाना मुझको, सयम व्रत अपनाना ।१०२६॥
राजकुवर ने आकर घर मे, सारी वान सुनाई ।
ऋपि स्कमण सुनकर के चौंकी, यह क्या मन मे आई ।१०२७)
माताजी | क्या जाने देगी, उन्हें इस तरह घर से ।
अच्छे कामो मे क्यो बाधा, पडे विचक्षण नर मे ११०२८
नृप ने खुद ही रानी जी से, कह दी सारी बात ।
रानी वोली माय-साय हम, मयम लेंगे नाय ।१०२६
सासो का कुछ भी न भरोसा, पाकर के स्क जाय ।
भोग त्यागना अच्छा है ये, वाल जभी पक जाय ।१०३०।
श्रेष्ठ मुहूर्त देखकर सुन को, दिया राज्य का भार ।
इतने मे आचार्य पधारे, करते उग्र विहार ।१०३११
भद्राचार्य नाम गुस्वर का, साय शिष्य परिवार ।
उपवन मे खुल गया मानलो, दिव्य ज्ञान भडार १०३२।
धर्मलाभ लेने को पहुचे, पुरवासी जन सारे ।
धर्मगुरु के बिना कौन जो, भवसागर से तारे ।१०३३।
धर्मदेशना द्वारा अमृत, वरसाया गुरुवर
ने
तरने वाले जीव आ गये, प्रभु के गुरु के शरणे ।१०३४।
राजा रानी दोनो ने ही, धारा सयम भार ।
क्योकि विरागी मन को लगता, है ससार असार ।१०३५।
।
110 ]
तप-जप-संयम अनुष्ठान कर, मुनि आराधन करते ।
संलेखन संथारा करके, मन ममता परिहरते ।१०३६।
राज्य कनकरथ ने संभाला, सत्य न्याय के साथ ।
शासन उसका उत्तम होता, जो न करे पखपात ।१०३७।
श्रेष्ठ स्वप्न से सूचित जन्मा, ऋषि के सुत पुनवान ।
शूर साहसी ही होती है, शेरों की सन्तान ।१०३८।
नाम सिंहरथ रखा हो गया, बड़ा और गुणवान ।
बिना बुद्धि के विकस न पाते, कला और विज्ञान ।१०३६।
ऋषि ने और कनकरथ ने निज, सुत को सौंपा भार ।
संयम लेकर तप-जप द्वारा, उतर गये भव पार ।१०४०।
हुई समाप्त कहानी ले लो, लेने लायक सार ।
सुख दुख भोग रहा है प्राणी, कर्मों के अनुसार ।१०४१।
धूप और छाया सम सुख दुख, आते-जाते रहते ।
हम भी अस्थिर तुम भी अस्थिर ऐसा हमसे कहते ।१०४२।
सुख में फूले दुख में भूले, भूल वही जीवन की।
समझ रहे स्थिति सब संसारी, अपने-अपने मन की ।१०४३।
खरतरगच्छ स्वच्छ सुखसागर, संप्रदाय सुखकारी ।
पावन परम्परा अति प्यारी, भवजल तारण हारी ।१०४४।
श्रीजिन कान्ति पूज्य सूरीश्वर. पुण्यवान गुणवान ।
जानी-ध्यानी-व्याख्यानी गुरु, मेरे जीवन प्राण ।१०४५।
मरिण मन मधुकर गुन-गुन करता,गुरु पद कज में लीन ।
मैं माध्यम हूं स्वर लहरी का, वही बजाये बीन ।१०४६।
[ 111
-
भार सुमेरु गिरि मे है जितना, उससे ज्यादा भार ।
मेरे गुरु का मेरे पर है, कैसे सकू उतार ।१०४७।
(मुझ) मरिण को सयय चिन्तामणी दे,चमक दमक दी सार ।
परम पूज्य गुरुदेव कान्ति के, गुण है अपरम्पार ११०४८।
भले न कोई जाने माने मै जानू मै मानूं ।
जीवनभर गुरुवर की महिमा, मन भर नित्य वखानू ।१०४९।
मणि-मणि कहकर मुझे बुलाते, देते ज्ञान अमोल ।
विना स्नेह के कौन दिखाये, अपना सब कुछ खोल ।१०५०।
गुरु करूणा से लिखा गया यह, ऋपिदत्ता का रास ।
स्वर्ण कान्ति ज्यो दोपे चमके, देता रहे प्रकाश ।१०५१।
इसमे भूल नजर आये तो, पढना श्राप सुधार ।
मुन सनेही विद्वज्जनगण-विनती करें स्वीकार ।१०५२।
शत्रुञ्जय गिरि की छाया को, पावनतम पहचान ।
हरि विहार मे चौमामे का, चुना शातिप्रद स्थान 1१०५३।
गुरुभाई महयोगी साथी, मुनि मुक्तिप्रभ सागर ।
विनयी विद्याभ्यासी रखते, मेरा ध्यान वरावर ११०५४।
दो हजार चम्मालीस भादव, उज्जवल चौथ सुहाई ।
सवत्सरी मनाई मैंने, रचना नई वनाई ।१०५५।
'मणिप्रभ' कहता सुनने वाले, लेगे इससे सार ।
मानूगा अपरोक्ष इमे मै, बहुत बड़ा उपकार ।१०५६।
- इति०
.
-
.
112 ]
No text on this page.