Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner

Dhwani Abhilekhan

Nirmal Jain · 2011/03

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-- ध्वनि-अभिलेखन SOUND RECORDING WORKS LIKE THIS

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मानव संसाधन विकास मंत्रालय (शिक्षा-विभाग) भारत सरकार द्वारा स्वीकृत
ध्वनि-अभिलेखन
(SOUND RECORDING WORKS LIKE THIS)
क्लेमेंट ब्राउन
जॉर्ज लेन द्वारा बनाए हुए 60 चित्रों सहित
अलंकार प्रकाशन
666, झील, दिल्ली-110051

Hindi Translation of 'SOUND RECORDING WORKS LIKE THIS'
by Clement Brown
By arrangement with
J. M. Dent & Sons Ltd., London
केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय (शिक्षा-मत्रालय) भारत सरकार के सहयोग से
कार्यान्वित 'लोकप्रिय पुस्तको की प्रकाशन-योजना' के अतर्गत स्वीकृत एवं
कैपिटल बुक हाउस दिल्ली के निमित्त अलंकार प्रकाशन से प्रकाशित
अनुवादक :
निर्मल जैन
पुनरीक्षण :
के. एन. दुबे
मूल्य
पचास रुपये (5000)
संस्करण
दूसरा: 1990
प्रकाशक
अलंकार प्रकाशन
666 मील, दिल्ली-110051
कावेरी प्रिन्टर्स प्रा० लि०, नई दिल्ली-110002

दो शब्द हिन्दी के विकास और प्रसार के लिए शिक्षा एवं समाज-कल्याण मंत्रालय के तत्वावधान में पुस्तकों के प्रकाशन की विभिन्न योजनाएँ कार्यान्वित की जा रही हैं। हिन्दी में अभी तक ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में पर्याप्त साहित्य उपलब्ध नहीं है, इसलिए ऐसे साहित्य के प्रकाशन को विशेष प्रोत्साहन दिया जा रहा है । यह तो आवश्यक है ही कि ऐसी पुस्तकें उच्च कोटि की हों, किन्तु यह भी जरूरी है कि वे अधिक महंगी न हों ताकि सामान्य हिन्दी पाठक उन्हें खरीदकर पढ़ सकें। इन उद्देश्यों को सामने रखते हुए जो योजनाएं बनाई गई हैं, उनमे से एक योजना प्रकाशकों के सहयोग से पुस्तकें प्रकाशित करने की है। इस योजना के अधीन भारत सरकार प्रकाशित पुस्तकों की निश्चित संख्या में प्रतियां खरीदकर उन्हें मदद पहुंचाती है । प्रस्तुत पुस्तक 'ध्वनि-अभिलेखन' इसी योजना के अन्तर्गत प्रकाशित की जा रही है । इस पुस्तक में ध्वनि के अभिलेखन एवं पुनरुत्पादन की आधुनिक विधियों को सरल भाषा एवं रोचक शैली में समझाया गया है। इसके अनुवाद और कापी राइटर यादि को व्यवस्था प्रकाशक ने स्वयं की है तथा इसमें शिक्षा मंत्रालय द्वारा स्वीकृत शब्दावली का उपयोग किया गया है। हमें विश्वास है कि शासन और प्रकाशकों के सहयोग से प्रकाशित साहित्य हिन्दी को समृद्ध बनाने में सहायक सिद्ध होगा और साथ ही इसके द्वारा ज्ञान-विज्ञान से सम्बन्धित अधिकाधिक पुस्तकें हिन्दी के पाठकों को उपलब्ध हो सकेंगी। आशा है यह योजना सभी क्षेत्रों में उत्तरोत्तर लोकप्रिय होगी ! annesini (गोपाल शर्मा) निदेशक केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय शिमा तपा समाज कल्याण मंत्रालय

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विषय-सूची 9 11 16 20 25 29 ... 33 37 ... 44 घर में संगीत ध्वानिकी स्टूडियो से लाउडस्पीकर तक स्टीरिओफ़ोनिक ध्वनि अभिलेखन-स्टूडियो भाइक्रोफ़ोन टेप-रिकार्डर रिकार्ड ग्रामोफोन पिकअप और घूर्णक स्थल प्रवर्धक लाउडस्पीकर ग्रामोफोन का इस्तेमाल फिल्म पर ध्वनि भविष्य की ध्वनियां आपका रिकार्ड-संग्रह ध्वनि-अभिलेखन से सम्बन्धित पेशे पारिभाषिक शब्दावली 48 54 57 63 ... 65 ... 67 69 70 74

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घर में संगीत इस पुस्तक का उद्देश्य ध्वनि के अभिलेखन एवं पुनरुत्पादन की आधुनिक विधियों को समझाना है । चूंकि ग्रामोफ़ोन अत्यधिक लोकप्रिय है इसलिए रिकार्ड को विशेष महत्त्व दिया जाएगा अर्थात् बताया जाएगा कि वह किस प्रकार अभिलेखित किया जाता है, कैसे तैयार किया जाता है, और फिर कैसे बजता है । ग्रामोफ़ोन अनेक रूपों तथा आकारों में बनते हैं और उनकी तकनीकी जटिलता बराबर बढ़ती जा रही है । लगभग 20 वर्ष पहले, जब कि लम्बे समय तक बजने वाले रिकार्ड इतने प्रचलित नहीं थे, रिकार्ड संग्रह करने वालों को अनुमान भी न था कि उन्हें कभी इतने विभिन्न प्रकार के साधन प्राप्त हो सकेंगे। घर में संगीत उपलब्ध कराने का दूसरा साधन अर्थात् टेप-रिकार्डर उस समय तक अपेक्षाकृत अविकसित ही था। ग्रामोफ़ोन का वास्तव में जीवन के संगीत-पक्ष में क्या महत्त्व है ? कई संगीत-प्रेमियों के लिए तो केवल इतना ही काफी है कि रिकार्ड से पुराने संगीत- कारों को फिर से सुना जा सकता है। आज के अनेक प्रकार के रिकार्डों का दूसरा लाभ यह है कि हम वह संगीत भी सुन सकते हैं जो प्रायः सार्वजनिक रूप से सुनने को नहीं मिल सकता । जिन सुनने वालों की रुचि विकसित तथा परिपक्व हो जाती है वे अपने सांगीतिक आयोजन के लिए ग्रामोफोन का उपयोग कर सकते हैं । गम्भीर श्रोता उसका उपयोग शायद संगीतज्ञों की तकनीक और संगीत-रचनाओं का सविस्तार अध्ययन करने के लिए करते हैं । नाटक और नृत्य के विद्यार्थियों के लिए भी वह बड़े लाभ की चीज़ है। 9 - रेडियो भी सगीत-प्रेमी को गोप्ठी में पहले-पहल सुने गए संगीत को एक हद तक पुन सुनने का अवसर प्रदान करता है। हालांकि रेडियो का इस पुस्तक में अन्यत्र जिक्र होगा, पर हमारा सम्बन्ध मुख्यतः अभिलेखन से ही है । यदि किसी श्रोता के पास अपना ग्रामोफ़ोन हो तो वह अपनी संगीत-योजना स्वयं ही बना सकता है, वह अपने अध्ययन तथा मनोरंजन के लिए उसी प्रकार मनपसन्द रिकार्ड चुन सकता है जिस प्रकार अल्मारी से कोई भी पुस्तक लेकर पढ़ी जा सकती है। 'ग्रामोफ़ोन' शब्द से कुछ पाठकों के मन में उस चल ध्वनि उत्पादक उपकरण का चित्र प्रस्तुत होगा जिसका स्वर संगोष्ठी के संगीत से सर्वथा भिन्न होता है। और वास्तव में यदि बूढ़े लोग इससे अब भी चित्र में दिखाए गए पुराने तरह के हॉर्न ग्रामोफ़ोन (Horn Gramophone) का अर्थ लगाते हों तो उनका कोई दोप न होगा। आधुनिक उपकरणों को देखते हुए तो उसकी ध्वनि टीन पीटने जैसी एव विकृत लगेगी परन्तु ध्वनि-अभिलेखन के सतत विकास की वह एक महत्त्वपूर्ण कड़ी था। वह 1920 के आस-पास का है परन्तु वैसे ही उपकरण कई वर्ष बाद तक प्रयुक्त किए जाते रहे और आपको अब भी कही-कहीं देखने को मिल ही जाते हैं। ETRETA MRIDHA 1920 के आस-पास का ध्यानिक प्रामोफोन ! हनि के मुख का व्यास लगभग ढाई फुट होता था। अब ध्यान देने की बात यह है कि ध्वनि-अभिलेखन की कला और वि बहुत विकसित अवस्था में है और उससे काफी हद तक यथार्थता प्राप्त कर 10 सम्भव है। मूल और अभिलेखित संगीतकी सीधी तुलना की जा सकती है। ऐसे प्रयोग लंदन के रॉयल फैस्टिवल हॉल तथा अन्यत्र भी किए जा चुके हैं। प्रायः यह पहचानना कठिन हो जाता है कि कौनमा संगीत 'मूल' है और कौनसा अभिलेखित। ध्वनि का इतना यथार्थ स्वम्प उत्पन्न करने वाला उपकरण हर किसी को उपलब्ध है। यह प्रायः महंगा होता है, परन्तु कोई भी रिकार्ड सग्रह करने वाला, चाहे वह तकनीकी दृष्टिकोण वाला हो अथवा नही, अपने रुपयों का उचित मूल्य रेडियो तथा इलेक्ट्रॉनिक उद्योग की वस्तुओं के रूप में प्राप्त कर ही लेता है। फिर भी अगले अध्यायों में जिन सिद्धान्तों का वर्णन किया गया है वे साधारणत: मुवाह्य विद्युत्-ग्रामोफ़ोन से लेकर 'उच्च तद्भपता' के महंगे तथा महत्वाकांक्षी उपकरण तक सभी पर लागू होते हैं। दृफटन एण्ड यंग लि. द्वारा बनाया हुआ स्टीरियोफोनिक उपकरण जिसमें रिकार्ड बनाने वाला एक पट (console) और दो लाउडस्पीकर है। ध्वानिकी ध्वनि का अभिलेखन कमे होता है यह समझने मे पहले ध्वनि की प्रकृति और आचरण गरे में कुछ जानकारी प्राप्त करनी आरगा है। " । - वानिकी' शब्द का प्रयोग कमरे या हाल के उन प्रभावों के लिए भी किया जाता है जो वे उनमें उत्पन्न की जाने वाली ध्वनि पर डालते हैं । ग्रामो- फोन उपकरण से उत्तम परिणाम प्राप्त करने के लिए भवन-ध्वानिकी विशेष महत्त्व की है, इसलिए हम इस पर आगे एक अध्याय में विचार करेंगे । अभी तो हम इस पर विचार करेंगे कि कमरे के अवरोध की अनुपस्थिति में ध्वनि वायु में किस प्रकार चलती है। जब आस-पास की वायु के दाव में विचरण होता है तो कान में ध्वनि का आभास होता है । ध्वनि उत्पन्न करने वाले कम्पन वाद्यों से उत्पन्न किए जा सकते हैं या वे दैनिक जीवन की वस्तुओं से उत्पन्न विक्षोभ से पैदा हो सकते हैं। वायलिन से ध्वनि-सरंगें निकलती हैं जो सब दिशाओं में फैल जाती हैं। जब किसी वस्तु से वायु में विक्षोभ उत्पन्न होता है तो उस से वायु-कण आगे-पीछे डोलने लगते हैं और 'ध्वनि-तरंग' उत्पन्न करते हैं । तरंग में समान दाब वाले दो बिन्दुओं के बीच की दूरी 'तरंग-दैध्यं' कहलाती है। ध्यान देने की एक महत्त्वपूर्ण वात यह है कि वायु के कण तरंग के पथ से हटकर किसी दूसरे स्थान पर नहीं चले जाते । वे इधर-उधर अवश्य डोलते रहते हैं, परन्तु एक वार ध्वनि-ऊर्जा समाप्त हो जाने पर वायु-कण पुन: अपनी मूल स्थिति 12 पर आ जाते हैं। उत्तेजित कण गति के दौरान घर्पण में अपनी ऊर्जा खर्च कर देते हैं, और यही कारण है कि यदि विक्षोभ एक निश्चित दूरी से अधिक दूरी पर हो तो हम उन्हें नहीं सुन सकते । इसके अन्य कारण भी हैं जैसे तरंग के पथ में किसी अवरोध के आ जाने से भी ध्वनि सुनना कठिन हो जाता है । तरंग में वायु के कण एक-दूसरे को धकेलते हैं। पहले व दवफर पास-पास आ जाते हैं, फिर दूर हट जाते हैं। ध्वनि-कम्पन की तीव्रता उसको 'आवृत्ति' कहलाती है जिसे आवर्तन प्रति सेकंड में मापते हैं और उसे c/s से व्यक्त करते है। चित्र में एक तरंग का सम्पूर्ण आवर्तन दिखाया गया है। - , यह तरग का एक आवर्तन है । त. दे. तरग-ध्य है। कुछ ध्वनियों की आवृत्ति इतनी अधिक होती है कि हम उसे सुन नहीं सकते और कुछ की इतनी कम होती है कि उन्हें सुना नहीं जा सकता। एक वयस्क व्यक्ति की 'आवृत्ति श्रवण सीमा' 25-16,000 c/s होती है । आयु बढने के साथ- साथ यह पराम घटता जाता है और वृद्ध मनुष्यों के लिए 25-8,000 c/s रह जाता है। छोटे बच्चों की श्रवण-सीमा सबसे अच्छी होती है जो 20-18,000 c/s तक हो सकती है (20,000 c/s तक की उच्च सीमा सम्भव है)। हालांकि ध्वनि ठोम और द्रवों में चल सकती है (पर निति में नही), पर हमारा सम्बन्ध ध्वनि के माव हवा मे आचरण ने है जिसमें वह लगभग 1100 फुट प्रनि मेकर की चाल में चलती है। यह वेग जात होने पर हम तरंग- 1 13 देयं निकाल सकते है-उसके लिए हमें वेग को आवृत्ति से भाग देने की आवश्यकता है। इस प्रकार यदि ध्वनि को आवृत्ति 30 c/s (यह बहुन मन्द स्वर है) हो तो उसका तरंग-दैर्ध्य 36 फुट होगा। 14,000 c/s वाली उच्च तारत्व की ध्वनि का तरग-दैर्ध्य लगभग 1 इंच होगा। एक सांगीतिक स्वर (note) में एक शुद्ध स्वरक होता है जिसे 'मूल' कहते हैं और उसके साथ कई 'सनादी' होते हैं। यदि मूल को चित्र में दिखाई गई एक तरंग की तरह व्यक्त करें तो संनादियों को अतिरिक्त तरंगों से व्यक्त कर सकते हैं । 'मूल' में संनादो स्वर जोडने पर हम सांगीतिक स्वर व्यक्त करने वाली संमिथ तरग प्राप्त कर सकते हैं । एक मरल उदाहरण के रूप में 50 c/s के मूल स्वर के दूसरे, तीसरे और चौथे मंनादी होंगे जिनकी आवृत्तियाँ क्रमशः 100 c/s, 150 c/s और 200 c/s होंगी । इससे उच्च सनादी भी हो सकते हैं जैसे पाँचवाँ, छठा, सातवाँ इत्यादि । इन संनादियो को अधिस्वरक या उच्च आशिक स्वर भी कहते है--विशेष रूप से सगीतकार इन्हें ये नाम देते हैं । musical note सांगीतिक स्वर harmonics संनादी स्वर fundamental मूग स्वर संमिश्र सांगीतिक स्वर में एक मूत तपाई सनावी होते है। । 14 इसलिए सांगीतिक स्वर एक संमिश्र ध्वनि है। स्वर का 'तारत्व' मूल की आवृत्ति पर निर्भर करता है जब कि स्वर का स्वरूप' इस बात पर निर्भर करता है कि संनादी किस प्रकार सयुक्त किए गए है। प्रत्येक साज में संनादी स्वरों का अपना अलग ही प्रकार होता है। उदाहरण के लिए अलगोजे की ध्वनि दूसरे संनादी में काफी तीव्र होती है। एक वाद्य-यंत्र की ध्वनि से दूसरे वाद्य-यव की ध्वनि का भेद इसी से किया जाता है। अनुभवी श्रोता एक ही प्रकार के दो वाद्य-यंत्रों का भेद भी बता सकता है-उदाहरण के लिए वह बता सकता है कि दो वॉयलिन दो अलग-अलग कारीगरों के बनाए हुए हैं । इसके अतिरिक्त विभिन्न संनादी स्वरों की आपेक्षिक प्रवलता भी इसमें सहायक होती है । सनादो के पैटर्न (harmonic pattern) पर इस बात का भी प्रभाव पड़ता है कि संगीतकार अपने वाद्य-यत्र को किस प्रकार बजाता है। निम्नलिखित चार्ट से आपको विभिन्न वाद्य-यंत्रों की मूल आवृत्ति और संनादियों का कुछ अनुमान हो सकता है। पियानो की एक सम्पूर्ण पटरी (keyboard) । बीन harp French 8a eta horn trombone दोम्बोन clarinet अलेग्नेट trumpet तुरही वामुरी flutel violin वायलिन कोना cellol स्नेयर snare ड्रगdrumi बाम इम bass drum बाग ट्या bass tubal बडा grandi पियानो pianol 100 03050 500 1.000 5000 10.000 20,0000/ 2000 कुछ पाद्य-यंत्रों के आवृत्ति परास । काली रेखाएं मूल के और बिन्दुदार रेखाएं संनादो के परास को व्यक्त करतो हैं । 15 दिखाई गई है और प्रत्येक परदे (key) पर स्वर की मूल आवृत्ति भी अंकित की गई है। इनके संनादी नहीं दिए गए हैं परन्तु उच्चतम की आवृत्ति लगभग 9000 c/s है । प्रत्येक स्वर का तारत्व उसके मूल से दर्शाया गया है, पर आप देखेंगे कि सबसे ऊचा 4186 </s वाला है । 2750 3270 5500 6541 110.00 13081 हमने देखा है कि सांगीतिक ध्वनियों का नियमित संनादी पैटर्न होता है। दूसरी ओर रव (noise) का पैटर्न यादृच्छिक होता है और उसमें हमें सांगीतिक स्प प्रत्यक्ष रूप से मालूम नही पड़ता । यह ध्यान देने की बात है कि वाद्यवृद के कुछ वाद्य-यत्न जैसे सिम्बाल (cymbals) रव- उत्पादक होते है। अकेले वाद्य-यंत्र के रूप में वे अधिक प्रिय नहीं हो सकते (कम-से-कम पश्चिमी लोगों के लिए तो नहीं) परन्तु वाद्यवृंद के समाघात (percussion) भाग में होने के कारण उनसे उत्पन्न रव ध्वनि के कुल प्रभाव में रुचिपूर्ण होता है तथा उसे और भी कर्णप्रिय बना देता 22000 26163 44000 52325 88000 104650 1760-00 209300 पियानो का स्वर-पट । कुछ परदों (keys) के सामने उनको मूल आवृत्तियां अंकित को गई हैं। 352000 418600 स्टूडियो से लाउडस्पीकर तक स्टूडियो में उत्पन्न की गई ध्वनि को एक या अधिक माइक्रोफोनों की सहायता से वैद्युत वोल्टता यानी 'संकेतों में बदलना होता है । संकेत को प्रवर्धक में से गुजारा जाता है और फिर चुंबकीय टेप अर्थात् फीते पर अभिलेखित किया जाता है । इस अवस्था में अभिलेख को पहले देख लेते हैं कि वह कलात्मक तथा तकनीकी दृष्टि से ठीक है या नहीं, फिर उससे डिस्क बनाने की तैयारी शुरू की जा सकती है। 16 फैक्टरी में, टेप-रिकार्डिंग के संकेतों को अन्य प्रवर्धन-परिपथों से गुजारा जाता है और फिर डिस्क काटने वाले यंत्र में भेजा जाता है जो एक मूल डिस्क पर खांचे वनाता है। इसी डिस्क से फिर रिकार्ड तैयार किये जाते हैं उनके तैयार करने की विधि आगे दी जाएगी। हमारे पास अव मूल संकेत रिकार्ड की नालियों में सूक्ष्म उतार-चढ़ाव या 'कटाव' के रूप में हमेशा के लिए अंकित हो जाते हैं। श्रोता के घर पर, खांचों पर एक पिकअप चलता है जो इन उतार-चढ़ावों को दूसरे वैद्युत संकेतों के रूप में परिवर्तित कर देता है। इसका प्रवर्धन किया जाता है जिससे वह इतना प्रबल हो जाए कि एक या अधिक लाउडस्पीकरों में ध्वनि उत्पन्न कर सके। अन्त में लाउडस्पीकर से ध्वनि को कान तक पहुँचने से पहले वायु में से होकर गुजरना होता है। जो विवरण आपने अभी पढ़ा वह काफ़ी सरल भाषा में दिया गया था, पर यह तो अभी से स्पष्ट हो गया होगा कि ध्वनि का अभिलेखन और पुनरुत्पादन एक अत्यन्त जटिल प्रक्रम है। इसमें कई अच्छे इलेक्ट्रॉनिक और यांत्रिक साधनों की आवश्यकता होगी और अन्तिम परिणाम प्राप्त करने में जो लोग सहायक होते हैं उन्हें अत्यन्त दक्ष होने की आवश्यकता होगी। परन्तु पिछले कुछ वर्षों में वैज्ञानिक प्रगति इतनी तीव्र रही है कि अब यह निश्चित हो गया है कि हम अपने घर के कमरे में बैठकर जो संगीत सुनते हैं वह यथार्थ रूप से वैसा ही है जैसा कि स्टूडियो में था। घर पर आप जो संगीत सुन रहे होंगे वह निश्चय ही कुछ घटा हुआ होगा-आपके घर के कमरे में 100 सगीतज्ञों की मंडली का वाद्यवृन्द आपको कैसा लगेगा? परन्तु अनुपात से काफ़ी घट जाने पर भी आधुनिक दक्ष तकनीक के कारण स्पष्टतः और स्वर के स्वरूप की दृष्टि से उसमें कोई भी अन्तर नहीं पड़ता। फिर भी, प्रत्येक रिकार्ड संग्रह करने वाला अत्यधिक यथार्थ परिणामों की कामना नहीं करता । कई लोग तो जटिल वैद्युत ग्रामोफ़ोन से ही संतुष्ट हो जाते हैं और उन्हें यह वात कुछ जंचती नहीं कि रिकार्डिंग इंजीनियर ने जो नये उपकरण दिए हैं उनका वे पूर्ण लाभ नही उठा रहे हैं । वास्तव में, कम-से-कम खर्च में ही वे काफ़ी आनन्द प्राप्त कर लेते है तो उन्हें इस बात की क्या चिता हो सकती है ? फिर भी, श्रोताओं की एक बढ़ती हुई संख्या ऐसी है जो अपने वाद्य-यंत्रों पर अधिक समय, श्रम और पैसा खर्च करने को तैयार हैं; और ऐसे ही श्रोताओं को आधुनिक उच्च तद्रूपता के सांगीतिक यंत्र पसन्द आते हैं। 17 अब हम कुछ तथ्य और आंकड़े देंगे सबसे पहली चीज है आवृत्ति ग्रहणशीलता । जैसा कि हमने पिछले अध्याय में देया था मनुष्य को ग्रहणीलता आयु के अनुसार घटती-बढ़ती है, पर औसतन 25-16,000 c/s होती है। इसलिए स्वाभाविक ही है कि स्टूडियो-माइक्रोफ़ोन मे लेकर श्रोताओं के लाउड- स्पीकरों तक के ध्वनि-उपकरण उसी परास के होने चाहिएं । अपने तथ्यों को पूर्णतः सही बनाने के लिए हमें इस ग्रहणगीलता में थोड़ी काट-छोट करनी होगी। इसका कारण पृष्ठ 15 के चाटं से स्पष्ट हो जाएगा : अधिकांश यंत्र लगभग 30 c/s मे निम्न तारत्व की ध्वनियां उत्पन्न ही नहीं करते। इसमें बड़े ऑर्गन (organs) अपवाद हैं जिन से 16c/s तक का स्वर उत्पन्न हो सकता है (आप इस धीमी गहरी ध्वनि को मुनने के बजाय उसे केवल अनुभव कर सकते हैं)। इस प्रकार ग्रहणगीलता 30-16,000 है, और वाद्यवृन्द में उत्पन्न होने वाली भी ध्वनियों इसी मीमा में होती हैं। इस परास में उपयुक्त पुनरुत्पादन होने पर श्रोता भिन्न वाद्यों के विशेष गुणों में भेद कर सकता है - +3 +21 +1- d8 0. -11 50 100 500 1,000 5.000 10,000 20,000 +2- dB b 1 -31 म 0 50 100 500 5,000 10000 20.000 1,000 आवृत्ति ग्रहणशीलता वक्र । (अ) पर्याप्त सम प्रहणशीलता; (ब) ग्रहणशीलता मे दो 'शिखर' हैं। 18 'उपयुक्त पुनरुत्पादन' शब्द को और अधिक व्याख्या करना उचित होगा। आवृत्ति ग्रहणशीलता का सम (smooth) होना आवश्यक है। यह चित्र में दो 'ग्रहणशीलता वक्रों में दर्शाया गया है। पहला वक्र लगभग सरल रेखा है और उससे यह पता चलता है कि वह जिस उपकरण के लिए है उसकी ग्रहणशीलता सब आवृत्तियों पर अच्छे है। दूसरे में कुछ उतार-चढ़ाव हैं तथा ग्रहणशोलता में शिखर हैं जिसका अर्थ है कि कुछ ध्वनियां घट जाएगी और कुछ अत्यधिक बढ़ जाएंगी और उसके परिणाम अरुचिकर होंगे। सम ग्रहणमोलता से यह अन्तर 'डेसिबेल' (संकेत dB) में मापा जाता है। माप का यह मात्रक चेल (Bel) का दसवां भाग है जो टेलीफोन के आवि- प्कारक डॉ. अलेक्जेण्डर ग्राह्य बेल के नाम पर रखा गया है। डेसिबेल का उपयोग इलेक्ट्रॉनिकी और ध्वानिकी के अन्य कार्यों में भी होता है। इसके उपयोगों का वर्णन आपको तकनीकी सदर्भ-ग्रंथों में मिलेगा। . अभिलेखन कम्पनियों द्वारा अपने काम के लिए जो उपस्कर काम में लाया जाता है उसकी आवृत्ति ग्रहणशीलता काफ़ी विस्तृत तथा सम होती है, और घरों में उपलब्ध सबसे अच्छे उपस्कर में भी यही गुण होते है । रिकार्ड बनाने वाले सुवाह्य यंत्रों तथा रेडियोग्रामों मे ये गुण नहीं होते...इसका मुख्य कारण यह है कि वे कम कीमत के होते हैं। फिर भी कौनसा यंत्र 'ही-फी' (Hi-Fi) है और कौन- सा नही, इसमें इतना स्पष्ट भेद करना संभव नहीं है। हमारा अगला विषय है : ध्वनि को विकृति । दुर्भाग्यवश उपस्कर के प्रत्येक अंग से थोड़ी-सी विकृति उत्पन्न होती ही है, इसमें स्टूडियो-माइक्रोफ़ोन और स्वयं ग्रामोफ़ोन रिकार्ड भी शामिल हैं । आवृत्ति की ग्रहणशीलता में कमी होना भी एक प्रकार की विकृति है और यहां तक कि जिस कमरे में बैठकर हम सुनते हैं उसके आकार और लम्बाई-चौड़ाई से भी कुछ विकृति उत्पन्न होती है। प्रवर्धक, लाउडस्पीकर तथा अन्य प्रकार के उपस्कर में 'संनादी विकृति' उत्पन्न की जा सकती है। जैसा कि हम देय चुके हैं, वाद्य-यंत्रों में संनादी स्वर उत्पन्न होते हैं और यह आवश्यक है कि हम उन सब को सुनें । परन्तु प्रवर्धक अपने स्वयं के कुछ अलग संनादी उत्पन्न करता है जो अवांछित होते हैं तथा ध्वनि में रूक्षता और खड़खड़ाहट उत्पन्न करते है । 'अन्तरधिमिश्रण' (intermodulation) एक अन्य प्रकार की विकृति है और इसके श्रव्य प्रभाव-जरो अस्पष्टता-बहुत भद्दे हो सकते है । यह उस समय होता है जब एक स्वरक दूसरे उपस्थित स्वरक पर ऐसे ढंग से प्रभाव डालता है कि दोनों से मिल एगा 19 असांगीतिक स्वर उत्पन्न हो जाता है। इंजीनियर का एक कार्य यह होता है कि उपस्कर बनाने में ध्यान रखे कि विकृति सवसे कम हो । सिसकार (hiss) और गुंजन (hum) जैसा पृष्ठभूमीय र व जो अभिलेखन या पुनरुत्पादन उपकरणों में उत्पन्न होता है, उसे भी निम्नतम रखने की आव- श्यकता है। सौभाग्य की बात है कि आधुनिक प्रवर्धकों में यह बहुत ही कम होता है। स्टीरिप्रोफ़ोनिक ध्वनि लम्बे समय तक बजने वाले स्टीरिओफोनिक रिकार्ड ब्रिटेन में 1958 में और अमरीका में उससे भी एक वर्ष पहले उपलब्ध थे। रुचि रखने वाले कुछ लोग स्टीरिओफोनी (त्रिविम ध्वनि) से पहले ही परिचित थे क्योंकि यह अट- लांटिक के दोनों ओर चुम्बकीय टेप-रिकार्ड के रूप में 1955 में ही आ गया था। बी.बी.सी. और अमरीकी रेडियो केन्द्रों से स्टीरिओफ़ोनिक प्रसारण भी संगीत-प्रेमियों को अच्छा लगा है। सबसे पहले यह समझ लेना आवश्यक है कि स्टीरिओफ़ोनी और 'ही-फ़ी' एक ही चीज नही हैं । एक सुवाह्य ग्रामोफ़ोन स्टीरिओफ़ोनिक रिकार्ड बजाने के लिए बनाया जा सकता है परन्तु कोई यह दावा नहीं कर सकता कि उससे ध्वनि का वह स्वरूप और स्पष्टता प्राप्त होगी जिसे संगीत के पुनरुत्पादन में उच्च तद्रूपता (ही-फ़ी) कहा जा सके। दूसरी ओर एक महंगा तथा उच्च कोटि का पुनरुत्पादक ऐसा बनाया जा सकता कि उससे नये रिकार्ड बजाए जा सकें और इसका परिणाम यथार्थता की दिशा में एक नया चरण होगा जिसे इंजीनियर बहुत वर्षों से प्राप्त करने में लगे हुए हैं । 'स्टीरिओफ़ोनिक शब्द को संक्षेप में 'स्टीरिओ' लिखा जाता है। ग्रामोफ़ोन के आविष्कार के वाद अभिलेखन की जो विधि प्रचलित थी उसका भी एक नाम रखना उचित रहेगा—इसे अव प्रायः 'मोनोफोनिक' (एक ध्वनि) कहते हैं । इसे संक्षेप में 'मोनों' कहते हैं । अब हमारे पास दो सरल और संक्षिप्त गन्द हैं और हम नये प्रकार के अभिलेखन का विवेचन शुरू कर सकते हैं। स्टीरिओ का ज्ञान मनुष्य के श्रवण और ध्वानिकी के वर्षों तक अध्ययन के बाद प्राप्त हुआ है । स्टीरिओ-अभिलेखन वास्तव में 1920-30 के दौरान प्रायोगिक 20 स्तर पर पहुँच गया था परन्तु उसे आम जनता के सामने (अर्थात् औद्योगिक रूप में तथा उपयुक्त मूल्य पर) लाने से पहले कई समस्याएं हल करनी बाकी थीं। हम जानते हैं कि जिस दिशा से कोई ध्वनि आ रही है उसका पता लगाना और ध्वनि के स्रोत की गति के बारे में आभास, दोनों कानों और तंत्रिका तंत्र (nervous system) की जटिल प्रक्रिया पर निर्भर करता है । जव स्रोत एक दिशा में हो जैसा कि चित्र में दिखाया गया है तो एक कान में दूसरे के मुकाबले उसकी तीव्रता अधिक होगी। इसका कारण यह है कि जो कान स्रोत से दूर है उसके मार्ग में सिर रुकावट जो कान स्रोत से अधिक दूरी पर डालता है। और इसके अतिरिक्त जो कान है उसके मार्ग में सिर रुकावट स्रोत से दूर है उस तक ध्वनि जाने में एक सेंकड डालता है। के अल्पांश के बराबर समय भी अधिक लगता है। जब ध्वनि खुली हवा में हो तो यह परिस्थिति आसानी से समझ में आ जाती है, पर जब बन्द स्थान-जैसे घर के कमरे या संगीत-कक्ष में ऐसा होता है तो परिस्थिति कठिन होती है। तव ध्वनि-तरंगें कई विभिन्न दिशाओं में चलती हैं : एक सीधी कान तक और बाकी दीवार, छत और फ़र्श से परावर्तित होकर। स्रोत x से ध्वनि सुनने वाले (0) तक सोषी तथा दीवार, छत और फ़शं से परावर्तित होकर आती है। दूसरी बातों का भी ध्यान रखना होगा। उदाहरण के लिए, यदि ध्वनि का स्रोत एक तरफ होने के बजाय हमारे सिर के ऊपर हो तो उसे सुनने के लिए हमें अपने सिर को पीछे की तरफ झुकाना पड़ता है। और स्रोत की दूरी का अनुमान लगाना कुछ हद तक इस बात पर निर्भर करता है कि हमारे तंत्रिका नंत्र को पहले कभी ऐसी परिस्थिति का अनुभव हुआ है या नही । 21 संगीतशाला में संगीत सुनते समय और वैसे भी अपने दैनिक जीयन में हम श्रवण तंत्र के इन गुणों को प्रयुक्त करते हैं। हमारे कान और मस्तिष्क, जो किसी भी कम्प्यूटर से अधिक जटिल हैं, उस जानकारी का विश्लेषण करते हैं जो सीधी और परावर्तित ध्वनि के मिश्रण से प्राप्त होती है और उससे हम भवन की 'ध्वानिकी' की जानकारी प्राप्त करते हैं । जो ध्वनि हम वहाँ मुनते हैं उसकी आलोचना कर सकते हैं और बता सकते हैं कि किस भवन की ध्वानिकी अन्य भवन से अच्छी है। ध्वनि-स्रोत का स्थान-निर्धारण बहुत महत्त्वपूर्ण है। बात यह है कि हमें विशेष रूप से यह जानने की इच्छा नही है कि वॉयलिन, संचालक के दाई ओर है या बाई ओर । पर हम मानसिक रूप से अलग-अलग वाद्यों को अलग-अलग पहचानना चाहते हैं और उन्हें अलग-अलग एकाकी सुनना चाहते हैं । हम उनकी गति से भी अवगत होना चाहते हैं जो वाद्य-संगीत में इतने महत्त्व को नही है जितनी कि नाट्यशाला में । अब आप यह समझ सकते हैं कि ध्वनि के अभिलेखन और पुनरुत्पादन में किस चीज की कमी थी जिसे इतने वर्षों तक स्वाभाविक माना जाता रहा। मोनो (एक) ध्वनि की असुविधाओं को संक्षेप में यों कह सकते हैं...वह श्रोता तक एक 'वाहिका' या पथ में पहुँचती है । स्टूडियो में प्रयुक्त होने वाला माइक्रो- फ़ोम (या कई माइक्रोफ़ोनों का संयोजन) एक अकेले कान की तरह कार्य करता है और उन बातों के बारे में जानकारी नहीं दे सकता जिनका उल्लेख ऊपर किया गया है। *-- ग रिकार्ड बजाने वाला यत्र O) अभिलवन यत्र लाउदम्पीकर स्टूडियो मोनो ध्यान में एक वाहिका का प्रयोग होता है-हर संकेत के लिए स्टूडियो से श्रोता तक एक ही पय होता है। वस्तुत: माइक्रोफोन ध्वनि को तीव्रता की विविधता के प्रति सुग्राही है और ग्रहण-सिरे पर हम मंगीत के तारत्व में पर्याप्त सामान्य परिवर्तनो का आनन्द लेने में समर्थ है। पर हम उसकी स्थिति तथा पार्थक्य का पता लगाने वाली अपनी गक्तियों को इस्तेमाल नही कर मकते और न ही हम गतियों का पता लगा सकते है। इसका अर्थ है कि स्पष्टता में प्रायः कमी भी हो जाती है 22 HI Coos और नाट्यशाला के लिए अभिलेखनों में गायक श्रोताओं के पास एवं दूर आते- जाते प्रतीत होते है। जैसा कि हम कह चुके हैं बहुत पहले ही यह देखा गया कि इन कठिनाइयों को काफ़ी हद तक हल किया जा सकता है । इसका हल-कम-से-कम-दो ध्वनि- वाहिकाएं होने पर संभव है। दो या अधिक माइक्रोफ़ोन वाद्यवृन्द का 'अवलोकन' करते हैं और अभिलेखन यंत्र तक पृथक्-पृथक् संकेत पहुंचाते है । वहाँ पर ये संकेत उस समय तक अलग रखे जाते है जब तक कि उन्हें दो लाउडस्पीकरों की सहायता से पुनः ध्वनि में न बदल दिया जाए। यदि स्टूडियो में दो से अधिक संकेत उत्पन्न किए जाते हैं तो उन्हें वैद्युत विधि से केवल दो ही संकेतों में बदलना होता है क्योंकि जहाँ तक लम्बे समय तक बजने वाले स्टीरिओ रिकार्डो प्रास्ट्रा पाधवृन्द को स्टोरिओफ़ोनिक विधि से अभिलेखित करने के लिए वो माइक्रोफ़ोन प्रयुक्त करने की एक सम्भव विधि । का सम्बन्ध है, यही सीमा है...और दो से अधिक लाउडस्पीकरों के लिए स्थान निकालना बड़ा कठिन होता है । जिस कुशल विधि से ये दोनों वाहिकाए रिकार्ड के खांचों में भरी जाती हैं वह पृष्ठ 42-43 पर बतायी जाएगी। इस बात का कोई खास कारण नहीं है कि अभिलेखन-स्टूडियो में प्रयुक्त किए जाने वाले माइक्रोफोनों की संख्या केवल दो ही हो। इस प्रकार हम यह शिवाय 1145 RA -- (का 4 इस विधि में रो माइक्रोफोन एक-दूसरे के अपर हैं और परस्पर समकोण पर। 23 : WHAT नही मानते कि दो माइक्रोफ़ोन मिलकर मनुष्य के एक जोड़ा कान का काम करते हैं। माइक्रोफोनों की संख्या इंजीनियर इस बात को ध्यान में रखते हुए निश्चित करता है कि वह किस प्रकार का अभिलेखन करना चाहता है। 71 - TKE लाउडस्पीकर अभिलेखन यंत्र रियाई यजाने वाला यत्र स्टूडियो स्टूडियो में दो बाहिकाएं होती हैं जो स्टूडियो से लेकर लाउडस्पीकर तक पृपक रखी जाती हैं। पुनरुत्पादित ध्वनि पर विचार करने पर हम देखते हैं कि लाउडस्पीकर के निर्गम में वह जानकारी होती है जैसे उपकरण का स्थान-निर्धारण, ध्वनि का प्रकार, गतियाँ -जिसे माइक्रोफ़ोनों ने ग्रहण किया था। वाद्यवृन्द दो लाउड- स्पीकरों के बीच फैला हुआ मालूम पड़ता है और श्रोता को अधिक स्पष्टता तथा -- L सुनने का कमरा स्टूडियो यौता लाउडस्पीकरों से ध्वनि-स्रोतों का पैसा ही स्थान-निर्धारण कर सकता है जैसा कि स्टूडियो में कर सकता 24 भिन्न यंत्रों में अच्छे सन्तुलन का अनुभव होता है। यदि अभिलेखन ऑपेरा या टक का है तो कलाकारों की गति आसानी से पहचानी जा सकती है.-वे उडस्पीकरों के बीच में तथा पीछे चलते हुए प्रतीत होगे । इसका अर्थ है कि ता के श्रवण तत को फिर से कुछ कार्य करना होगा और वह कल्पना कर कता है मानो वह स्वय नाटक या ऑपेरा में उपस्थित है । परिशुद्धि के लिए यह बता देना उचित होगा कि ऊर्ध्वाधर गति का नरुत्पादन नही किया जा सकता। स्टीरिओ का 'सर्वदर्शी' या विस्तृत प्रभाव तिज समतल तक ही सीमित है। यहाँ आपको यह याद दिला देना भी ठीक रि रेखित क्षेत्र में स्थित श्रोताओं को लाउडस्पीकरों के बीच होने वाली गति का आभास होता है। गा कि स्टीरिओ त्रिविमितीय (3-D) से भिन्न है । वास्तव में यह कहना मुश्किल कि त्रिविमितीय प्रभाव कैसे उत्पन्न किया जा सकेगा। अन्त में ध्यान रखें कि स्टीरिओ के लाभ गायक मंडली या ऑपेरा तक । सीमित नहीं हैं। दो वाहिका वाला सिद्धान्त प्रयुक्त करके अच्छा स्वरक त्पन्न करना सम्भव है और यह प्रगति वाद्य तथा कक्ष-सगीत, जाज तथा हल्के गीत, एवं अन्य प्रकार के संगीत में भी लाभदायक है। अनुभव के आधार पर ता चला है कि स्टीरिओ की सहायता से बाहर खुले स्थान की घटनाओं में स्तविकता का पुट लाना सम्भव है। अभिलेखन-स्टूडियो दि आप किसी अभिलेखन-स्टूडियो में विशेष रूप से उस समय... देखें जब वहाँ भिलेखन कार्य चल रहा हो, तो आप कहेंगे कि यह तो मंगीतमाला और प्रयोग 25 शाला का मिश्रण है । स्टूडियो एक संगीतगाला-जैसा लगेगा क्योंकि उसमें बहुत सारे संगीतकारों के बैठने की व्यवस्था और वाद्य स्टंटेड (music stand) होते हैं । कुछ अभिलेखन-कम्पनियां अच्छे वाद्यवृन्द और नाट्य अभिलेपन के लिए ऐसे बड़े सभा-भवनों का उपयोग करती हैं जो मूलत: अभिलेयन के लिए नहीं बनाए गए छत अमिलेखन का दृश्य। थे। इनमें संगीतशाला वाला प्रभाव अधिक अच्छा होता है और यदि उसमें श्रोता- गण के बैठने की व्यवस्था भी रखी गई हो तो यह प्रभाव और भी अधिक होगा। कई माइक्रोफोन, जो समंजनीय 'छड़ो' (adjustable 'booms') पर लगे रहते है या छत से लटके रहते हैं, तथा उनके साथ फैले हुए तार और अन्य चीजे सब मिलकर एक प्रयोगशाला-जैसा दृश्य प्रस्तुत करते हैं। स्टूडियो की दीवार, और फ़र्श से ध्वनि के परावर्तन पर नियत्रण करने के लिए जो कुछ करना पड़ता है उससे भी वह प्रयोगशाला-जैसा लगता है । अनुरणन या 'प्रतिध्वनि' का सावधानी के साथ नियंत्रण हर प्रकार के स्टूडियो के लिए बहुत आवश्यक है—चाहे वह सिफ़नी वाद्यवृन्द के लिए बड़ा स्टूडियो हो, या साधारण संगीत के लिए मध्यम आकार का कमरा हो, या वाद्य-संगीत के लिए छोटा-सा ही कमरा क्यों न हो। जैसा कि पिछले अध्याय में बताया गया था, ध्वनि विभिन्न पृष्ठों से टकरा. कर लौटती है, विशेष रूप से यदि वे दृढ़ पृष्ठ हों और ध्वनि-ऊर्जा का अवशोषण बहुत कम करते हों। इसका उदाहरण हैं दृढ़ और चमकदार पेंट वाली ठोस दीवारें। अनुरणन का प्रभाव उच्च, मध्य और निम्न आवृत्तियों पर भिन्न-भिन्न होता है परन्तु, सामान्यतः, वहुत अधिक परावर्तन होने से अभिलेखित ध्वनि में अस्पष्टता आ जाती है, जबकि बहुत कम परावर्तन होने पर गंगीन गे एक रूक्षता' मा जानी है जिससे संगीत अच्छी संगीतशालाओं के मधुर स्वरक से बहुम भिन्न होता है। 26 स्टूडियो के डिजाइन और निर्माण में वैज्ञानिक विधि तथा कुछ कलात्मक कार्य की आवश्यकता होती है। दीवारों आदि के कारण उत्पन्न 'अनुनाद' या कम्पन को रोकने के लिए ठोस संरचना.होना आवश्यक है। स्टूडियो में जो ध्वनि उत्पन्न की जाती है उसके स्वरूप पर स्टूडियो की आकृति का प्रभाव भी पड़ता है इसलिए उसकी लम्बाई-चौड़ाई आदि के अनुपात का ध्यान भी रखना होगा। यह भी देखा गया है कि छत पर अनियमित आकार के प्रक्षेपणों से तथा छत और दीवारों के बीच तीक्ष्ण कोने न रखने से भी परावर्तित ध्वनि पर नियंत्रण रखा जा सकता है। पृष्ठों के कुछ भाग पर विशेष ध्वनि-अवशोषक पदार्थ लगा दिया जाता है । एक सामान्य रूप से उपलब्ध पदार्थ सेलोटेक्स टाइल' है जो तन्तुयुक्त संरचना ध्वनि-अवशोषक टाइल। तथा तलीय छिद्रों के कारण ध्वनि-ऊर्जा को क्षीण कर देती है । इच्छित अवशोषण का स्तर और उससे टाइलों की संख्या सन्निकटतः परिकलित की जा सकती है, पर कभी भी पूर्णतः सही-सही परिकलित नहीं की जा सकती। यह देखने के लिए कि सिद्धान्त द्वारा उपयुक्त परिणाम प्राप्त हुए हैं या नहीं, परीक्षणों को हमेशा ही आवश्यकता होती है। यह अवशोषण उच्च और मध्य आवृत्तियों के लिए तो ठीक रहता है परन्तु निम्न आवृत्ति वाली ध्वनि के लिए तनुपटों की विस्तृत व्यवस्था होनी चाहिए जो निम्न आवृत्तियों के लिए 'समस्वरित' (uned) हों। स्टूडियो में जितने संगीतज्ञों को कार्य करना है, उनकी संख्या का भी, जहाँ तक हो सके, ध्यान रखना होगा। स्टूडियो में आने वाले प्रत्येक व्यक्ति से थोड़ा अवगोपण बढ़ जाता है । इस दृष्टि से नियंत्रण का एक अच्छा उदाहरण लन्दन के रॉयल फेस्टीवल हाल का डिजाइन है। उसकी थियेटर-जैसी सीटों के नीचे की तरफ ध्वनि-अवशोषक पदार्थ लगा रहता है। इससे खाली और भरी हुई सीट के अवशोपण का अन्तर बहुत कम हो जाता है । 27 अब हम यह मान लेते हैं कि हमारा स्टूडियो भली-भांति तैयार हो गया है तथा इंजीनियरों ने उसमें माइक्रोफ़ोन की स्थिति भी अच्छी तरह निर्धारित कर दी है। संगीतकार आ गए है और अब कार्यक्रम का किसी केन्द्रीय स्थान से संचालन करना है । यह स्थान एक अलग नियंत्रण कक्ष होगा जो स्वयं स्टूडियो से पृथक् होगा। सन्तुलन-इंजीनियर एक खिड़की से कार्यक्रम को देख सकता है नियंत्रण कक्ष की खिड़की से एक अभिलेखन-इंजीनियर ई एम.आई. स्टूडियो के अभिलेखन-कार्य-क्रम का निरीक्षण करता हुआ। दूसरा इंजीनियर टेप-रिकार्डर की देखभाल कर रहा है। और एक 'अन्तःसंचार' (intercom) तंत्र की सहायता से संगीतकारों से सम्पर्क बनाए रखता है । अलग-अलग प्रकरणो के बीच की समयावधि में टीका-टिप्पणी की जा सकती है या निर्देश दिए जा सकते हैं। नियंत्रण कक्ष की विशेषता यह है कि उसमें महंगे तथा सुन्दर उपकरण होते है । उसमें व्यावसायिक उपयोग का कम-से-कम एक टेप-रिकार्डर तथा उसके साथ सम्बद्ध प्रवर्धक और नियंत्रक होते हैं। इस कोटि के हेप-रिकार्डर का मूल्य 1000 पौड या उससे अधिक ही होता है। इसके अलावा वहाँ चुम्बकीय टेप (फ़ीता) की चरखियाँ भी दिखाई पड़ेंगी.-एक अच्छे स्टूडियो में जिस दिन काफ़ी कार्य होता है उस दिन कई मील लम्बी टेप खर्च हो जाती है ! नियंत्रण-कक्ष की खिड़की के पास एक दीवारगीर (console) होती है, जिस पर नियंत्रक लगे होते हैं और उनसे सन्तुलन-इंजीनियर कई माइक्रोफ़ोनों से आने वाले संकेतों का समंजन या मिश्रण करता है । 'मन्तुलन' शब्द का अभिलेखन मैं बहुत प्रयोग होता है । यह संचालक का उत्तरदायित्व होता है कि वह वाद्य- वृन्द के विभिन्न अंगो मे उत्पन्न होने वाली ध्वनि में सन्तुलन रखे, जब कि विभिन्न चंद्युत संकेतों के बीच सन्तुलन बनाकर इंजीनियर अन्तिम ध्वनि पर प्रभाव डालता 28 है। रान्तुलन-इंजीनियर आधुनिक प्रकार के लोकप्रिय संगीत-जिन्हें सामान्यतः 'पॉप' (pop) कहते हैं के अभिलेखन-कार्यक्रम के दौरान बहुत व्यस्त रहता है । उस समय वह नियंवक-दीवारगीर का ऐसे ढंग से उपयोग करता है मानो वह कोई वाद्य हो । वह लगातार सन्तुलन बनाए रखने में जोड-तोड़ करता रहता है जिससे सगीत में वह गुण उत्पन्न हो जो ऐमे मनोरजन के लिए उपस्थित विशाल जन- समूह को प्रसन्न कर दे। नियंत्रण-कक्ष मे दूसरे प्रभाव भी उत्पन्न किए जा सकते हैं। उदाहरण के लिए अभिलेखन में मौदर्य लाने के लिए या किसी अन्य उद्देश्य की पूर्ति के लिए कभी-कभी कृत्रिम अनुरणन उत्पन्न किए जाते है। यह प्रभाव या तो टेप-यंत्र में इलेक्ट्रॉनिक विधि में या एक अलग प्रतिध्वनि-कक्ष (echo-chamber) मे ध्वानिकी से उत्पन्न किया जा सकता है। हालाँकि नियवण-कक्ष स्टूडियो से ध्वनिरुद्ध रखा जाता है परन्तु कार्यक्रम को चालू अवस्था में भी, टेप-अभिलेख को 'अनुश्रवण' करके, सुना जा सकता है । इस कार्य के लिए यंत्र के साथ एक प्रवर्धक तथा लाउडस्पीकर जोड़ दिए जाते है। जब कार्यक्रम समाप्त हो जाता है तो इंजीनियर, कलाकारो के प्रतिनिधि और उनका मैनेजर और अन्य लोग, जो रिकार्डो के उत्पादन और विक्रय से सम्बन्धित होते है, टेप-रिकाई को मुनगे के लिए आते है और देखते है कि वह कला और शिल्प की दृष्टि से कमा है। तुरन्त पुन: सुनने की यह सुविधा चुम्बकीय टेप- अभिलेखन का एक बड़ा लाभ है । माइक्रोफ़ोन माटत्रोफोन का कार्य यह है कि वह तनुपट के उन सूक्ष्म कम्पनों से वंद्युत-मंकेत उत्पन्न करता है, जो उम तक पहुँचने वाली ध्वनि-तरगों के कारण उत्पन्न होते है। चल-कुडली माइक्रोफोन में ननुपट के माथ तार की एक छोटी कुंडली मम्बद्ध रहती है और वह एक शक्तिशाली चुम्बक के मिरे पर काफी निकट से लगी हुई होती है । चुम्बक और कुडली के बीच में केवल इतना स्थान रहता है कि उप- योग में आने ममय वे आपस में म्पर्श न करें। एक ध्वनि-तग के कारण तनुपट 29

diaphragm
तनुपट
clamp
स्लैम्प
2015
coil
कुडली
magnet चुम्बक
घल-कंडली माइक्रोफोन का एक रेखाचित्र ।
में कम्पन होते हैं और उससे कुंडली चुम्बकीय बल-रेखाओं को काटती है, और
कुंडली में एक बहुत ही कम परिमाण की प्रत्यावर्ती वोल्टता उत्पन्न हो जाती है ।
यह संकेत प्रवर्धक परिपथों में से होता हुआ अभिलेखन-यंत्र में जाता है।
दूसरा सुपरिचित माइक्रोफ़ोन फ़ीते वाला माइक्रोफ़ोन है। इसमें कुंडली
के बजाय एक धातु-पत्र का फ़ीता प्रयुक्त किया जाता है, उसे चुम्बक के दो लम्बे
क्लैम्प
चुम्बकीय ध्रुष
OO
फीता
फ़ोते वाले माइक्रोफोन का सियान्त ।
ध्रुवों के बीच में लटका दिया जाता है । जब फीता कम्पन करता है तो उसमें
संकेत-वोल्टता उत्पन्न हो जाती है।
अभिलेखन के लिए कभी-कभी संधारित्र माइक्रोफोन (capacitor micro.
phone) प्रयुक्त किया जाता है। उसमें एक पतला तनुपट, एक दृढ़ प्लेट के बहुत
समीप तानकर लगाया हुआ होता है। तनुपट के कम्पनों से इलेक्ट्रॉनिक परिपथ
की धारिता में विचरण होता है जिससे अन्ततः संकेत प्राप्त होते हैं ।
व्यावसायिक उपयोग के लिए माइक्रोफ़ोन की आवृत्ति-ग्रहणशीलता बहुत
सम होनी चाहिए। ऐसा माइक्रोफ़ोन, जिसकी ग्रहणशीलता 30-16,000 0/s
30

के लिए बहुत सम हो, जो ध्वनि में उपेक्षणीय विकृति उत्पन्न करता हो, और जिसमें इनके साथ-साथ और बहुत से ऐसे गुण हों जिनको इंजीनियर कामना करता है, सम्भवतः बहुत महंगा होगा । एक अच्छे संधारित माइक्रोफ़ोन का मूल्य कई सौ पौड होगा। परन्तु टेप में रुचि रखने वाला अव्यावसायिक व्यक्ति जो पियानो या वॉयलिन पर अपना संगीत अभिलेखित करना चाहता है, प्रायः इसी से डर जाता है कि घर पर उपयोग किए जाने वाले मामूली माइक्रोफ़ोन का मूल्य 10 पौड है। छ से लटकाया हुआ माइक्रोफ़ोन । आवृत्ति-परास और विकृति के अतिरिक्त अभिलेखन-इंजीनियर के लिए 'ध्रुवीय ग्रह्णशीलता' भी बड़े महत्त्व की है । इस विधि से माइक्रोफ़ोन विभिन्न दिशाओं से आने वाली ध्वनियों को ग्रहण करता है । जो माइक्रोफ़ोन सभी दिशाओं के लिए सुग्राही होता है उसे 'सर्व-दिश' (omni-directional) कहते है । एक सवं-विरा माइक्रोफोन सभी दिशाभों की ध्वनियों को ग्रहण करता है। 31 कुछ माइक्रोफ़ोन, विशेष रूप से फीते वाले माइक्रोफ़ोन द्वि-दिश', (bi-directional) होते हैं । वे आगे और पीछे वाली ध्वनियों को सबसे अच्छी तरह ग्रहण करते हैं परन्तु पाव से आने वाली ध्वनि से उनमें एक बहुत दुर्बल संकेत उत्पन्न होता है। इस प्रकार की ध्रुवीय ग्रहणशीलता को 'आठ का अंक कहा जाता है, जिसका कारण नीचे दिए गए रेयाचित्र से स्पष्ट हो जाएगा। पाव DO एक वि-दिश माइक्रोफोन और उसकी 'आठ के अक' की घुवीय प्रहणशीलता। प्रायः 'एक-दिश' (uni-directional) ध्रुवीय ग्रहणशीलता वाले माइक्रोफ़ोन स्टूडियो में प्रयुक्त किए जाते हैं । ये एक ही दिशा से ध्वनि ग्रहण करते हैं । कुछ बहुतकीमती माइक्रोफ़ोनों में ध्रुवीय ग्रहणशीलता में परिवर्तन भी किया जा सकता है। अभिलेखन-इंजीनियर इस दिशात्मक-गुण (directional property) का कई तरह से उपयोग करता है । उदाहरण के लिए एक-दिश माइक्रोफ़ोन को किसी एक संगीतकार या उनके समूह पर फोकस किया जा सकता है । यह उसके रखे जाने या लटकाए जाने पर निर्भर करेगा और इससे अवांछित ध्वनियां कट जाएँगी । इस प्रकार के कई माइक्रोफ़ोन वाद्यवृन्द के अलग-अलग अवयवों से ध्वनि ग्रहण कर सकते हैं और प्रत्येक माइक्रोफोन के संकेतों का आपेक्षिक महत्त्व नियंत्रण कक्ष में निर्धारित किया जा सकता है। वाद्यवृन्द-संगीत में प्रायः यह शिल्प काम में लाया जाता है । दूसरी ओर कई अभिलेखन कम्पनियां एक अकेले, निम्न दिशा वाले माइक्रोफ़ोन का उपयोग अधिक पसन्द करती हैं जिसे वाद्यवृन्द के ऊपर लटकाकर रखा जाता है। स्टीरिओ के आविष्कार में माइक्रोफ़ोन के स्थान-निर्धारण में नई आवश्यकताएं उत्पन्न हो गई है । बहुत सारे माइक्रोफ़ोन होने आवश्यक नहीं है, 32 परन्तु जैसाकि हमने पिछले अध्याय में देखा था एक से अधिक की आवश्यकता होती है । दो या अधिक तो वाद्यवृन्द के सामने कुछ हटाकर रखे जा सकते हैं या उनकी बजाय एक डिब्बे में द्विक माइक्रोफ़ोन रखा जा सकता है जिसे ऐसे ढग से लटकाया जाए कि वह वाद्यवृन्द को ठीक प्रकार से 'ग्रहण' कर सके। यह अव एक आम तरीका होता जा रहा है कि अभिलेखन-कार्यक्रम का अधिकांश भाग स्टीरिओ माइक्रोफोन व्यवस्था से किया जाता है; चाहे रिकार्ड स्टीरिओ के रूप में बनाने हों या मोनो के रूप में । और यदि आप रिकार्ड संग्रह करते हैं तो आपने देखा होगा कि कुछ कम्पनियां एक ही कार्यक्रम के स्टीरिओ और मोनो दोनों रिकार्ड निकालती हैं और प्रायः एक ही मास में । टेप-रिकार्डर स्टूडियो में काम आने वाले टेप-रिकार्डरों का सिद्धान्त वही होता है जो घर में काम आने वालों का, पर उनमें उच्च कोटि की परिशुद्धि, विश्वसनीयता और कार्यकुशलता होती है । पर व्यावसायिक यंत्र का मूल्य निश्चय ही उसकी इंजीनियरी निपुणता के अनुसार होता है । व्यवसायी चुम्बकीय टेप प्रयुक्त करते है जिसे आप अपने उपयोग के लिए बाजार से खरीद सकते है। सबसे पहले हम टेप का निरीक्षण करेंगे और उसके बाद इस पर विचार करेंगे कि जब वह अभिलेखन-यंत्र में जाता है तो क्या होता है। टेप मजबूत किन्तु अत्यन्त लचीले प्लास्टिक पदार्थ का बना चौथाई इंच चौड़ा फ़ोता होता है जिसके एक तरफ़ फ़रस ऑक्साइड (ferrous oxide) का बहुत पतला और चिकना लेप होता है। कई विभिन्न प्लास्टिक पदार्थ काम में लाए जाते हैं परन्तु इनमें सव से अधिक प्रयोग में लाया जाने वाला पदार्थ पोलीवीनाइलक्लोराइड (polyvinylchloride) है और उसे (यह अच्छा ही है ! ) संक्षेप में पी.वी.सी. (P.V.C.) कहते हैं । टेप की कुल मोटाई (यानी प्लास्टिक की टेप और उस पर लेप) एक इंच के एक हजार से दो हजारवें भाग तक होती है। एक चरखी पर आने वाली टेप की लम्बाई टेप की मोटाई पर निर्भर करेगी । एक 7-उच की चरखी में-इस आकार की टेप घरेलू तथा व्यावसायिक 33 कार्यों के लिए प्रयुक्त की जाती है-'मानक' (standard) प्रकार की 1200 फुट और पतली 'दुगनी चलने वाली' प्रकार की 2400 फुट टेप होती है। चुम्बकीय लेप के रूप में फेरस ऑक्साइड के जो करोड़ों कण होते है यदि टेप पर उपयुक्त चुम्बकीय बल से उनके पैटर्न में परिवर्तन किए जा सकें तो उनमें संगीत या अन्य जानकारी 'संग्रहित की जा सकती है। चित्र में जो अभिलेखन-मुख (recording head) दिखाया गया है उससे ऐसा वल प्राप्त किया जा सकता है । gap अन्तराल क्रोड कोड एक चुम्बकीय अभिलेखन-मुख । अभिलेखन-मुख वास्तव में एक छोटा विद्युत्-चुम्बक होता है। इसमें एक चुम्बकीय क्रोड होता है जिस पर तार की एक कुंडली लिपटी होती है । माइक्रोफोन से आने वाले संकेत के अनुरूप एक सकेत-वोल्टता अभिलेखन-प्रवर्धक में उत्पन्न की जाती है और कुंडली पर प्रयुक्त की जाती है। इससे अल्प अन्तराल पर एक परिवर्ती बल उत्पन्न होता है या सही अर्थ में उसे चुम्बकीय क्षेत्र कह सकते हैं-जिस पर टेप, अभिलेखन-यंत्र से गुजरते हुए, रगड़ खाती है। हालांकि यह क्षेत्र बहुत कम होता है, पर फेरस ऑक्साइड के कणों की स्थिति में परिवर्तन करने के लिए काफ़ी होता है। • कुंडली पोह अन्तराल gap अभिलेखन-मुख में एक घम्बकीय क्रोड और एक कडली होती है । अन्तराल में एक क्षेत्र उत्पन्न हो जाता है। 34 एक बार ऐसा हो जाने पर कणों का यही पटनं तब तक बना रहता है जब तक कि दूसरे अभिलेखन द्वारा उन पर नया पैटर्न न बना दिया जाए। एक ही टैप को सैकड़ों बार प्रयुक्त किया जा सकता है। प्रत्येक नये अभिलेखन से एक नया पैटर्न बनता है। दूसरी ओर एक अभिलेखित टेप को (और उसमें भरे संगीत को) वर्षों तक रखा जा सकता है और पैटर्न संरक्षित रहेगा। यह तो पहले ही स्पष्ट हो चुका होगा कि टेप व्यावसायिक तथा अव्याव- सायिक दोनों ही दृष्टियों से लाभदायक है । न केवल उसे बार-बार काम में लाया जा सकता है बल्कि उससे काम करना आसान भी है । उसे वास्तव में 'सम्पादित' किया जा सकता है; आवश्यकतानुसार काटकर फिर से जोड़ा जा सकता है । अवांछित ध्वनियों या शब्दों तथा संगीत या भाषण के लम्बे-लम्बे अंशों को टेप में से काटकर अलग किया जा सकता है। यहां तक कि टेप के सभी छोटे-मोटे टुकड़ों को फरोप्राफ़ मॉडल ८८-एक उच्चकोटि का स्टोरिओ रिफाउंर । जोड़कर पुनः काम में लाया जा सकता है परन्तु व्यावसायिक अभिलेखन- इंजीनियरों को इतनी अधिक कंजूसी की जरूरत नहीं है । अधिकांश संगीत-रचनाओं को टेप की एक चरखी पर ही अभिलेखित कर सकते हैं; या फिर संगीत के खंड या भाग अभिलेखित करके उनका सम्पादन किया जा सकता है। जब अभिलेख को सुनना हो तो अभिलेखित टेप को केवल पहले की ही तरह एक दूसरे अभिलेखन-मुख से गुजरना होता है। इससे लेप के कणों के चुम्बकीय क्षेत्र में सूक्ष्म परिवर्तन, कुडली में अल्प संकेत-वोल्टता उत्पन्न कर देते हैं । यह संकेत प्रवर्धन-परिपथों में से होकर गुजरता है वहाँ उसमें इतनी शक्ति आ जाती है कि उससे लाउडस्पीकर में ध्वनि उत्पन्न हो सकती है। कभी-कभी एक तीसरा मुख भी प्रयुक्त किया जाता है। इसे लोपन मुख (erase head) कहते हैं और जैसाकि इसके नाम से ही पता चलता है, इसका कार्य यह है कि टेप पर पहले से जो अभिलेख हो उसे मिटा दे । रिकार्डर में वह ऐसे स्थान पर होना चाहिए कि टेप वाकी दोनों मुखों में जाने से पहले इसमें से होकर 35 गुजरे । इसमें उत्पन्न होने वाले चुम्बकीय क्षेत्र से पुराना चुम्बकीय पैटर्न मिट जाता है और टेप नये अभिलेखन के लिए तैयार हो जाता है । मुखों की व्यवस्था चिन्न में दिखाए गए टेप-पट्ट अर्थात् अभिलेखन-यंत्र के ऊपर वाले भाग से स्पष्ट हो जाएगी। टेप बाएं से दाएँ को चलता है । बाएँ हाथ की चरखी से निकलने के बाद टेप पहले लोपन पर, फिर रिकार्ड और फिर प्लेबैक अगों से होता हुआ दाएं हाथ की चरखी पर लिपटता जाता है । bcd 12.00 टेप-पट्ट पर मुख्य भाग : (a) टेप लम्बाई दर्शक; (b) लोपन मुख; (c) अभिलेखन-मुख (d) प्रतिश्रवण मुख; (e) कंप्स्टन; (1) पित्र रोलर। यह बहुत आवश्यक है कि टेप मशीन के ऊपर ठीक-ठीक और एकसमान चाल से चलता रहे क्योकि चाल में घट-बढ़ होने से संगीत के तारत्व में विचरण होता है । चाल इंच प्रति सेकड (i.ps.) में मापी जाती है और मानक चालें 15, 71 और 32 इंच प्रति सेकंड है । इनमें सबसे अधिक नाल व्यावसायिक अभि- लेखन के लिए प्रयुक्त की जाती है और बाकी दोनों घरेलू उपयोग के लिए होती हैं । जब चाल तेज होगी तो अभिलेख उतने ही कम समय तक चलेगा परन्तु व्यावसायिक अभिलेखन मे यह कमी प्रायः टेप की बड़ी चनियाँ प्रयुक्त करके दूर की जाती है। इममे आवृत्ति-ग्रहणशीलता का प्रश्न भी महत्त्व का है । 30-16,000८/5 की ग्रहणशीलता, जैसाकि हम देख चुके हैं, आवश्यक है, और यह टेप को अधिक चाल से चलाने पर प्राप्त की जा सकती है। इस प्रकार ये परम्पर विरोधी आवश्यकताएँ हैं : या तो हम टेप को अधिक चाल मे चलाकर अच्छी आवृनि- 36 ग्रहणशीलता प्राप्त कर सकते हैं या हम धीमी नाल रखकर, तथा प्राणी स्वर में कुछ कमी करके खर्च में कमी कर सकते है। टेप-पट्ट पर मुखों, चरखियों और आवश्यक नियंत्रणों के अतिरिक्त एक या अधिक विद्युत्-मोटर भी होते हैं । मोटर के शैफ्ट के साथ एक गतिपालक चक्र सम्बद्ध रहता है जिससे चाल में होने वाले विचरण को न्यूनतम किया जा सके । चलाने वाला बल अन्त में तकुए अर्थात् 'कैप्स्टन' तक पहुँचता है जिसपर टेप एक रबड के पिंच रोलर की सहायता से सटा रहता है । इस चालन वल से टेप विभिन्न मुखों से खिंचकर आता है । चरखी में उपयुक्त तनाव रखा जाता है ताकि टेप एक चरखी से दूसरी तक साफ़-साफ़ और समान रूप से लिपटता रहे । ये सब, यांत्रिक तथा अन्य वातें, स्टीरिओ अभिलेखन-यंत्र पर लागू होती हैं । परन्तु जैसाकि हम देख चुके है, कम-से-कम दो वाहिकाओं की आवश्यकता होती है और एक टेप पर दो 'पय' (tracks) अभिलेखित करके यह आवश्यकता पूरी की जाती है । दूसरे शब्दों में चुम्बकीय लेप को दो भागों में बांट देते हैं और उनके वीच एक खाली पट्टी रह जाती है । अभिलेखन-मुख में दो कोड और दो कुंडलियाँ gap अन्तराल अन्तराल gap रटोरिओ-मुस के दो अनाराल टेप पर दो पथ बनाते हैं। होती है जो एक-दूसरे के ऊपर लगी रहती है । इन्ही पर दोनों पथों की चौड़ाई निर्भर करती है । माइक्रोफ़ोन से प्राप्त स्टीरिओ-संकेत रिकार्डर में दो भागों में विभाजित रहता है, जो दो एक-जैसे प्रवर्धकों में से होकर गुजरते हैं और मुख की कुंडलियों के युग्म में पहुंचते है। इसी प्रकार से तीन या चार पथ बनाए जा सकते है - रिकार्ड अब हम उस स्थिति में पहुंच गए हैं जब संगीत, मोनो या स्टीरिओ रूप में, टेप पर सुरक्षित रूप में संरक्षित है । इम रूप में आप एक रिकार्ड खरीद सकते है। । 37 मोनो और स्टीरिओ टेप-रिकार्ड प्रतिश्रवण के अतिरिक्त अन्य कार्यों के लिए स्टूडियो टेप की सीधी प्रतिलिपियाँ जिनकी चाल 71 इंच प्रति सेंकड होती है- एच.एम.वी. (H.M.V.) और कोलंबिया ट्रेडमार्क के नाम से ई.एम.आई. रिकार्ड्स लिमिटेड तथा कई अन्य कम्पनियों ने तैयार किए हैं। परन्तु मंडलक रूपी रिकार्ड ही सव से अधिक प्रचलित हैं । अधिकांश लोगों को ये सुविधाजनक लगते हैं और उनके इस्तेमाल का तरीका भी सब लोग जानते हैं। यदि आप रिकार्ड संग्रह नहीं भी करते हों तो भी आप जानते हैं कि वे प्लास्टिक पदार्थ के बने मंडलक है तथा उनमें अभिलेखन उथली सपिल नालियों या खाँचों के रूप में अकित होता है । आधुनिक प्रकार के सूक्ष्म खांचों वाले रिकार्ड लचकदार तथा न टूटने वाले होते हैं । इनका अभिलेखन, 10 और 12 इंच वाले लम्बे समय तक बजने वालों में 337 प.प्र.मि. (परिक्रमण प्रति मिनट-r.p.m.) की दर से और 7 इंच वाले रिकार्डों में 45 प.प्र.मि. की दर से होता है। स्टीरिओ रिकार्ड इनमें से किसी भी दर से बजाए जा सकते है । पुराने 78 प.प्र.मि. वाले रिकार्ड (एक भंगुर प्रकार के प्लास्टिक) चमड़े तथा रंग और अपघर्पक पदार्थ से मिलाकर बनाए जाते थे, जो अब प्रचलित नही है । रिकार्ड बजाने के बाजों में कभी-कभी 163 प.प्र.मि. की चाल भी देखने में आती है। इस चाल पर बने कुछ रिकार्ड मुख्य रूप से भाषणों के रिकार्ड होते हैं और वे उपलब्ध हैं। ई.एम.आई. स्टूडियो में एक मंडलक पर सांचे काटना । बाई तरफ़ एक अभिलेखन-सेप है। ग तरफ एक व्यावसायिक टेप रिकार्डर है। बीच में अमिलेखन-प्रधक है। 38 रिकार्डो के बड़े पैमाने पर उत्पादन के लिए सबसे पहला कदम तो यह है कि टेप पर भरे संगीत का एक गुरु मंडलक (master disc) तैयार किया जाए। इसलिए टेप-यंत्र को एक अभिलेखन-लेथ (lathe) से जोड़ दिया जाता है जो देखने में एक भारी तथा जटिल घूमने वाले पट और पिकअप जैसा लगता है । परन्तु रिकार्ड को बजाने के बजाय यह यथार्थतायुक्त यंत्र एक चमकदार प्रलाक्षं मंडलक (lacquer disc) पर धारियां या खोचे वनाता (काटता) है। अभिलेखन-लेथ पर धारियां काटने वाला मुख एक विद्युत्-चुम्बकीय युक्ति होता है, जिसमें एक कुंडली और एक आर्मेचर होता है जो टेप-यंत्र से प्राप्त होने वाले सकेतों के साथ अनुकम्पन करता है । आर्मेचर (अर्थात् चल भाग) के साथ काटने वाला यंत्र लगा रहता है जो नीलम या हीरे की एक नोकदार 'सूई' होती है और उसे वैद्युत विधि से गरम रखा जाता है ताकि वह स्पर्श-विन्दु के पास प्रलाक्ष मडलक को नरम कर दे, जिससे उसमें खोचे अधिक सरलता और दक्षता से बन सकें। एक बार प्रलाक्ष मंडलक तैयार हो जाने के बाद निर्माण का कार्य चालू किया जा सकता है। मंडलक पर सोने या चांदी का घोल छिड़का जाता है जिससे वह विद्युत्-चालक बन जाए और फिर उसे विद्युत्-लेपन कुंड में रखा जाता है। यह विद्युत्-लेपन उसी विधि से होता है जैसे मोटर के भागों, टोटियों, चमचों आदि पर क्रोमियम या निकल का लेपन किया जाता है। कुछ समय बाद मंडलक पर धातु की एक पतली परत चढ़ जाती है जो बाद में उसके ऊपर से उतार ली जाती है। यह कवच, जिसे 'मास्टर' (Master) कहते हैं, एक 'नेगेटिव' (nagative) होता है-अर्थात् उसमें प्रलाक्ष मंडलक के खांचों के अनुरूप उभरी हुई रेखाएं होती हैं । इस से एक दूसरा मजबूत कवच तैयार करते हैं जिसे 'मदर' (Mother) कहते है । उसमें खांचे होते हैं । अब केवल ऐसे 'ठप्पे' (stampers) तैयार करना बाकी रह जाता है जिनका फैक्ट्री में प्रेस के रूप में उपयोग किया जा सके । ये बहुत मजबूत तथा दृढ़ नेगेटिव होते है जिनपर तैयार रिकार्ड की दोनों तरफ़ के खांचों के अनुरूप उठी हुई रेखाएं होती है । रिकार्ड बनाने के लिए विनाइल प्लास्टिक पदार्थ लगभग रंगहीन होता है, पर उसमें उपयुक्त मात्रा काजल मिला देते हैं-निर्माता चाहता है कि आपको रिकार्ड आसानी से दिखाई दे सकें । ये सब चीजें सावधानीपूर्वक मिलाई जाती है 39 Fa प्रलाक्ष मंडला पर चांदी का पोत दिएका जा रहा है। ताकि उनसे बने रिकार्ड का पृष्ठ चिकना रहे । इस प्लास्टिक मिश्रण को चादरें बनाकर उसे छोटे टुकड़ों में काटा जाता है इन पर एक-एक रिकार्ड तैयार किया जाता है। चित्र में एक रिकार्ड-प्रेस दिखाया गया है। इसमें नीचे एक स्थिर भाग होता है तथा ऊपर वाला भाग इससे कब्जों से जुड़ा होता है और प्रत्येक में एक एक रिका-प्रेस, जिममें प्लास्टिक का टुकड़ा नीचे वाले टप्पे पर रपा दिखाया गया है। कब्जे से जुड़े हुए ऊपर वाले भाग को बन्द कर देने पर रिकार्ड तैयार हो जाता है। 40 'ठप्पा लगा होता है। लेविल यथास्थान लगाकर नीचे वाले ठप्पे पर थोड़ा प्लास्टिक मिश्रण रखकर ऑपरेटर प्रेस को दवा देता है । उसे ऊपमा दी जाती है जिससे मिश्रण नरम होकर दवाव के कारण ठप्पे वाले भागों तक फैल जाता है। कुछ समय बाद प्रेस को खोलने पर एक लेविल-युक्त रिकार्ड तैयार हो जाता है । उसे वहाँ से बाहर निकाल लिया जाता है। प्रेस से मंडलक के चारों तरफ़ किनारों पर कुछ फ़ालतू पदार्थ लगा रह जाता है जिसे वहां से छोलकर साफ़ कर दिया जाता है । अव रिकार्ड पैकिंग विभाग तथा स्टोर में जाने के लिए तैयार है और वहां से बाजार में भेजा जा सकता है। जैसा कि पहले ही कहा जा चुका है रिकार्ड के खाँचे (या नालियां) सर्पिल होते हैं जो कोर पर एक सिरे से शुरू होकर लेविल के पास आकर समाप्त होते हैं । साँचे का उतार-चढ़ाव (modulation), जो मोनो रिकार्ड में एक तरफ़ से दूसरी तरफ़ लहरदार-सा होता है, बहुत ही जटिल होता है और माइक्रोफ़ोनों से आने वाले संकेतों का यांत्रिक रूप होता है । मास्टर रिकार्ड में खांचे बनाने वाले भाग का कार्य अब अधिक आसानी से समझा जा सकता है । वह मडलक में एक V-आकार का खांचा काटता है और उसके साथ-साथ संकेत के परिमाण और आवृत्ति के अनुसार एक सिरे से दूसरे साँचे का उतार-चढ़ाव। सिरे तक अर्थात् इधर-उधर दोलन करता है। खाँचे का एक बड़ा उतार-चढ़ाव (अर्थात् एक तरफ़ को हटाव) एक बड़ी ध्वनि को व्यक्त करता है । उतार-चढ़ाव का आकार निम्न और उच्च स्वरों और वास्तव में स्वरों की संनादी रचना पर निर्भर करता है। एक कठिनाई यह हुआ करती थी कि पास-पास के खाँचे दाएं-बाएँ हटाव अधिक होने के कारण आपस में मिल जाते थे, विशेष रूप से तीन ध्वनि से ऐसी - 41 कठिनाई की सम्भावना अधिक होती थी। अब आम प्रथा यह हो गई है कि तीव्र ध्वनि के लिए खांचों के बीच का स्थान अधिक रखा जाता है और फिर मन्द संगीत होने पर वह कम कर दिया जाता है । अभिलेखन-लेथ पर बीच के स्थान की घट-बढ स्वचालित रूप से प्राप्त हो जाती है । सूक्ष्म खांचों वाले रिकार्ड में प्रति इंच 200 से 300 तक खांचे होते हैं और खांचों की कुल लम्वाई, यदि उसमें प्रत्येक हटाव भी शामिल कर लिया जाए तो, आधे मील के आस-पास होती है । हालांकि मोनो रिकार्ड का खाँचा पार्श्व रूप से इधर-उधर होता है तथा उसकी गहराई एकसमान होती है, पर स्टीरिओ का खाँचा अधिक जटिल होता है। स्टोरिओ रिकार्ड के लिए सारे संसार में जो विधि प्रयुक्त की जाती है tip of stylus- मूई को नोक T मोनो रिकामा काट-क्षेत्र जिसमें दो पौधे पास-पारा दिसाए गए हैं। सामों की रोवार में परों में उतार-चढ़ाप है और उनसे गई पार्य में घर-उपर सततो है। जांचे को गहराई और चौड़ाई एकसमान होती है। उसका आविष्कार ए. डी. ब्लूमलीन (A. D. Blumlcin) नामक एक पुगल इंजीनियर ने किया था जो ई.एम.आई. को प्रयोगशाला में कार्य कर रहा पा। उसने एक ही गांचे में दो वाहिकाओं को अभिलेगिन करने पी समस्या की 1929 में ही जांच की पी। म्टोरिमो-अभिमेग में पटाई करने याला भाग पांच में घिर गे 45 हिती पर उतार-गद्वार उत्पन्न परता, और पायं गया धिर दोनों में पार गरगा है।गरा परिणाम पर होता है कि गांने पो गोढ़ाई और गहराई स्टीरियो रिकार्ड का काट-क्षेत्र । खाँचे की प्रत्येक दीवार पर एक वाहिका अंकित की जाती है। खाँचे का आकार दोनों वाहिकाओं में सकेतों की प्रबलता के अनुसार लगातार बदलता रहता है और सूई तिर्यक, कधिर तया पाश्र्व में चलती है। लगातार बदलती रहती है। यदि केवल एक ही वाहिका का उतार-चढ़ाव अभिलेखित करना हो तो कटर (cutter) खांचे की एक दीवार पर ही कार्य करता है और उसे ऊर्ध्वाधर से 45 डिग्री के कोण पर दवाता है। यदि विपरीत वाहिका के उतार- चढ़ाव अंकित करने हों तो गति दूसरी तरफ़ 45 डिग्री के कोण पर होती है । वस्तुतः, संगीत-संकेतों की जटिल प्रकृति के कारण दोनों वाहिकाओं का उतार-चढ़ाव एकसाथ ही अंकित करना होता है और तिर्यक गति के साथ-साथ ऊर्ध्वाधर तथा पार्श्व गति भी होती है । अधिकांश अवसरों पर दोनों वाहिकाओं में ध्वनि विल्कुल एक जैसी नहीं होती और काटने वाला भाग (कटर) तियक गति करता है । ऐसा कम ही होता है कि दोनों वाहिकाओं में कुछ समानताएँ हों, और ऐसा ऊर्ध्वाधर या पाश्र्वीय रूप से कटने पर होता है। एक स्टीरिओ रिकार्ड देखने में लगभग मोनो रिकार्ड जैसा ही लगता है और उसके खाँचो का आकार केवल एक सूक्ष्मदर्शक (microscope) से ही ठीक-ठीक देखा जा सकता है, या कम से कम एक आवर्धक लस (magnifying glass) की तो 43 आवश्यकता होती ही है। जिन प्लास्टिक पदार्थ और निर्माण-विधियों का वर्णन इस अध्याय में पहले किया गया है वह स्टीरिओ और मोनो दोनों प्रकार के रिकार्डो पर लागू होती हैं। ग्रामोफोन ग्रामोफ़ोन का सबसे प्रमुख भाग, और जिस पर सबसे पहले दृष्टि पड़ती है, वह 'पिकअप' (pickup) है जो (यांत्रिक रूप में) संकेतों को वैद्युत वोल्टता में परि- वर्तित कर देता है । उससे कम प्रत्यक्ष हैं एक या अधिक लाउडस्पीकर जो विद्युत् को ध्वनि-तंरगों में परिवर्तित करते हैं। इनके बीच में प्रवर्धक जुड़ा रहता है जो पिकअप की क्षीण वोल्टता के प्रवर्धन के लिए आवश्यक है। ये सभी अवयव प्रायः एक ही बक्स में जोड़कर रखे जाते हैं। आधुनिक प्रकार के अवयवों के आकार छोटे होने से आजकल निर्माता बहुत हल्के तथा सुवाह्य (सरलता से इधर-उधर लेजाए जा सकने वाले). रिकार्ड-बाजे बनाने में सफल हुए हैं। ट्रांजिस्टर-युक्त वाजे, विशेष रूप से जिनमें केवल 7 इंच वाले रिकार्ड ही वज सकते हैं, आकार में छोटे प्रकार के सुवाह्य रेडियो जितने होते हैं । सुवाह्य स्टीरिओ वाजे उनसे कुछ बड़े होते हैं जिनमें दो लाउडस्पीकर अलग भी किए जा सकते है और जो कभी-कभी उसके ढक्कन के रूप में भी होते हैं। आजकल 'कुर्सीनुमा' (chairside) रिकार्ड-वाजे बहुत प्रचलित हैं, जैसा चित्र में दिखाया गया है। उनकी ध्वनि का स्वरूप सुवाह्य और बड़े तथा कोमती रेडियोग्राम के बीच का होता है । इस प्रकार का उपकरण यदि मोनो रिकार्ड के लिए प्रयुक्त करना हो तो बहुत सुविधाजनक तथा अच्छा होता है । परन्तु स्टीरिओ के लिए एक दूसरे लाउडस्पीकर के लिए एक अन्य बक्स होना चाहिए । अधिक कीमत और बड़े आकार के क्रम में दूसरा उपकरण रेडियोग्राम है, उसके मुख्य संघटक अवयव वे ही रहते हैं, पर उसके साथ में एक रेडियो- अभिग्राही का नीचे वाला ढाँचा भी होता है । रेडियोग्राम के बाहरी रूप में कोई 44

रिकार्ड बजाने
नियन्त्रक
controls
ATT 47 record
player
45
पिकअप pickup
सधि connection
प्रवर्धक amplifier
लाउडस्पीकर
लाउडस्पीकर नियन्त्रण केबल
के तार
control cable
loudspeaker flex
फ़िलको द्वारा निर्मित एक संहत रिकार्ड-बाजा।

परिवर्तन किए बिना ही उसे स्टीरिओ में परिवर्तित किया जा सकता है क्योंकि उसके बक्स का आकार इतना बड़ा होता है कि लाउडस्पीकरों को उचित दूरी पर हटाकर रखा जा सकता है। उन्हें वक्स के सिरों पर फिट किया जा सकता है । फिर भी उनकी स्थिति की व्यवस्था में परिवर्तन करने पर स्टीरिओ-पुनरुत्पादन और अच्छा हो सकता है, और कुछ मॉडलों में दो लाउडस्पीकरों को रेडियोग्राम के मुख्य वक्स से अलग किसी सुविधाजनक स्थान पर रखा जा सकता है- उदाहरण के लिए 6 से 10 फुट के अन्तर से । जब उनका उपयोग नहीं करना हो तो उन्हें मुख्य वक्स में ही रखा जा सकता है। अन्त में, एक उच्च तद्रूपता (HI-Fi) उपकरण भी हो सकता है । ही-फी तंत्र पर इतना रुपया खर्च करने का उद्देश्य सबसे अच्छे परिणाम–अर्थात् सबसे अच्छी तथा यथार्थ ध्वनि -प्राप्त करना ही है। इसमें रुचि रखने वाले लोग बहुत ही उच्च कोटि तथा यथार्थता वाले अवयव लेना पसन्द करते है । ऐसी चीजें चूंकि बहुत कीमती होती है इसलिए उन्हें ऐमे रिकार्ड-बाजों में नहीं लगा सकते जो मूल्य की दृष्टि से सामान्य लोगों के लिए निर्मित किए जाते हैं। यदि बाहर वाला बक्स बहुत कीमती न हो तो मोनो तंत्र के लिए कम-से-कम खर्च 60 पौंड आएगा। इस बारे में कोई नियम निर्धारित करना सम्भव नही है। 100 पांड वाले उपकरण से बहुत अच्छे परिणाम प्राप्त हुए हैं और इससे भी अधिक मूल्य का उपकरण बनाया जा सकता है, विशेष रूप से स्टीरिओ और भी महँगे पड़ते हैं। कुछ तकनीकी प्रवृत्ति वाले लोग थोड़ा उपकरण स्वयं बना लेते हैं जिससे कीमत कुछ कम हो जाती है । उच्च तद्रूपता वाले उपकरण में सबसे प्रत्यक्ष चीज यह है कि उसकी दक्षता के स्तर और शिल्प को प्राथमिकता दी जाती है, और सुविधा पर इतना ध्यान नहीं दिया जाता है। इस प्रकार का स्टीरिओ के लिए बनाया हुआ उप- करण पृष्ठ 11 पर दिखाया गया है । ध्वनि के पुनरुत्पादन की यह विधि उन लोगों को पसन्द नहीं आएगी जो लोग ग्रामोफोन एक छोटे रूप में चाहते हों परन्तु यह ध्यान रखना चाहिए कि छोटा रूप तथा ध्वनि का यथार्थ स्वरूप दोनों एकसाथ प्राप्त करना सम्भव नहीं है। यदि यथार्थ परिणाम प्राप्त करने का निश्चय हो तो इसका अर्थ, उदाहरण के लिए, यह होगा कि लाउडस्पीकर अलग से होने चाहिए और वे ऐसे होने चाहिएं कि सम्पूर्ण आवृत्ति-पराग में न्यूनतम विरूपण हो । एक छोटे तथा अपने- आपमें पूर्ण उपकरण में लाउडस्पीकरों को दक्षतापूर्वक कार्य करने के लिए स्थान 46 नहीं होता, और वे दूसरी चीजों जैसे प्रवर्धक के वाल्व आदि के बहुत पास स्थित होते हैं। चित्र में ध्वनि-पुनरुत्पादक तंत्र के विभिन्न अवयव सरल रूप में दिखाए गए हैं । प्रवर्धक तंत्र के बीच में है और उससे ध्वनि के एक या अधिक स्रोत जोड़े रेडियो . O -1 loud- The speakers साउडस्पीचर ०००० o records रिकार्ड amplifier प्रवक OOL टेप tape हो फ़ो तंत्र में ध्वनि के स्रोत रिकार्ड, रेडियो और टेप हैं । जा सकते हैं। एक मरल ग्रामोफ़ोन में प्रवर्धक पिकअप को लाउडस्पीकरों (स्टीरिओ के लिए यहाँ दो है) से जोड़ता है। रेडियोग्राम तथा कई ही-फ़ी तत्रों में एक रेडियो के नीचे का दावा, या 'टर्नर' भी लगा देते हैं। इसके अलावा अधिक उच्च कोटि के हो-फी तंत्रो में प्रयुक्त होने वाला रेडियो टर्नर । तथा महंगे यंवों में कभी-कभी एक टेप-रिकार्डर भी लगा रहता है और इसका लाभ यह होता है कि आवश्यकता होने पर रेडियो का कार्यक्रम अभिलेखित किया जा सकता है। रेदियो का अभिलेखन केवल आप अपने घर पर मनोरंजन के लिए ही कर गकते हैं सार्वजनिक उपयोग के लिए नही । 47 पिकअप और घूर्णक स्थल पिकअप (pickup) जो छोटा-सा परन्तु वहुत बारीकी और दक्षता के साथ बनाया हुआ होता है, एक 'शीर्ष' (head) में संयोजित होता है जिसे कभी-कभी 'कारतूस' (cartridge) भी कहते हैं । यह शीर्ष एक सिरे पर जुड़ी हुई एक भुजा पर जुड़ा रहता है और यह या तो स्वचालित रिकार्ड बदलने वाले यत्र का एक भाग होता है या फिर इसे हाथ से उठाकर रिकार्ड पर रखना होता है । पिकअप में साधारणतः दो प्रकार की यंत्रावलि—चुम्बकीय और क्रिस्टलीय- प्रयुक्त होती हैं। किस प्रकार की यंत्रावलि को प्रयुक्त करना है यह इस बात पर निर्भर करता है कि उसे किस प्रकार उपस्कर के साथ प्रयुक्त किया जा रहा है और प्रयुक्त करने वाले की आवश्यकताएं क्या हैं। उदाहणारर्थ चुम्बकीय प्रकार के पिकअप में आवृत्ति-ग्रहणशीलता सबसे अच्छी होती है और विकृति सबसे कम होती है, परन्तु इस प्रकार के एक अच्छे पिकअप का मूल्य बहुत अधिक होता है । स्टीरिओ-रिकार्डों के लिए एक उच्च कोटि के पिकअप का मूल्य कम-से-कम 10 पौंड होगा, और प्रायः उससे अधिक ही होगा । परन्तु उसकी कार्यकुशलता इतनी उच्च कोटि की होती है कि ही-फी में रुचि रखने वाला उसीको लेना चाहेगा और व्यावसायिक व्यक्ति उसे रिकार्डों के स्तर की जांच करने के लिए लेना चाहेगा। . दूसरी ओर क्रिस्टलीय पिकअप सस्ता होता है और साधारण ग्रामोफ़ोन के लिए काफ़ी अच्छा होता है । उसकी निर्गम वोल्टता अधिक होती है और उसमें संकेत को वोल्टता वोल्ट के आसपास होती है जबकि चुम्बकीय प्रकार के पिक- अप में एक वोल्ट के कई हजारवें भाग तक होती है । निर्गम वोल्टता का अधिक होना प्रायोगिक दृष्टिकोण से बहुत महत्त्वपूर्ण है क्योंकि इसका प्रभाव उस प्रवर्धक परिपथ पर पड़ता है जिससे पिकअप जोड़ा जाता है। निर्गम वोल्टता अधिक होने का अर्थ है कि प्रवर्धक सरल हो सकता है तथा उसमें वाल्व भी कम हो सकते हैं। 48

सबसे सरल प्रकार के चुम्बकीय पिकअप में एक अध्याधर आमेचर होता
है जो ऊपर से कोलकित होता है तथा उसके नीचे वाले भाग में सूई होती है,
Cor!
pivot
कटनी
प्रभा
rele
Face
रिकार्ड कातन
surface
of
record
सद
stylus
घुम्बकीय पिकअप का सिद्धान्त ।
जैसाकि चित्र में दिखाया गया है । केवल सूई की नोक ही रिकार्ड के खाँचे के
सम्पर्क में आती है।
एक छोटा किन्तु प्रवल चुम्बक, जिसपर बारीक तवे के तार की एक कुंडली
लगी होती है, इस ढंग से व्यवस्थित होता है कि उसके ध्रुव-अग्र आर्मेचर के दो
तरफ़ होते हैं । खांचे के उतार-चढ़ाव के कारण सूई और आर्मेचर इधर-उधर
tip
४
स
zroove
सई का ऊपरी सिरा खांचे की दीवारों पर टिका होता है।
कम्पन करते हैं और चुम्बक के अन्तराल के चुम्बकीय क्षेत्र में विचरण होता है
जिससे कुंडली में एक तद्नुरूप संकेत-वोल्टता उत्पन्न हो जाती है ।
'परिवर्ती प्रतियास' (variable reluctance) पिकअपों में एक दूसरे
प्रकार की व्यवस्था होती है जो चित्र में दिखाई गई है। इसमें
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toil Mynet Timi रिकाका तल surface of TEKpra यानक Piron com कुहनी stylur सरल परियर्ती प्रतियारा पिकअप (यांत्रिको संरचना का पारयं हाय)। आर्मेचर क्षतिज होता है इसलिए मूई एक सिरे पर उसमे समकोण पर लगानी होती है। कुछ प्रकार के स्टीरिओ पिकअपों में भी इसी प्रकार की व्यवस्था होती है, परन्तु उनमें चुम्बकीय ध्रुव के एक की बजाय दो जोड़े होने चाहिएँ । चूंकि मुई ऊर्ध्वाधर तथा तिर्यक् और पार्वीय रूप में भी कम्पन करती है इसलिए चुम्बकीय ध्रुव ऐसे होने चाहिए कि उनसे उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र में आर्मेचर की हर प्रकार को यादृच्छिक गति से विक्षोभ उत्पन्न हो । तब कुंड- लियों को ऐसे ढंग से जोड़ना होता है कि उनसे प्रत्येक वाहिका के लिए एक-एक अर्थात् कुल दो वोल्टताएं स्टोरिभो रिकार्ड के लिए उत्पन्न हों। सरल चुम्बकीय पिकअप की रचना (सामने से देखने मोनो रिकार्डों के लिए 'चल-कुंडली पिकअप' भी पर)। प्रयुक्त किए जाते हैं परन्तु स्टोरिओ के लिए इतने प्रयुक्त नहीं किए जाते। चुम्बकीय आर्मेचर और स्थिर कुंडलियों के बजाय, कुंडली एक चुम्बक के अन्दर कोलकित रहती है और सुई की गति के साथ-साथ घूमती है । चुम्बक की आकृति ऐसी होती है कि कुंडली उसमें ठीक समा सके । एक अन्य प्रकार के पिकअप में स्थिर कुंडली और चल-चुम्बक होता है । क्रिस्टल पिकअप कुछ क्रिस्टल पदार्थों के विचित्र गुण 'दाव-विद्युत्' (piezoelectric) पर निर्भर करते है, जिनमें सबमे सामान्य रोगेल लवण (Rochelle Salt) है । इस पदार्थ के एक छोटे गुण्ड को जव मोड़ा या मरोडा जाता है तो उसके तल पर थोड़ी-सी विद्युत्-वोल्टता उत्पन्न हो जाती है। पिकअप की यंत्रावली ऐसी होती है कि मुई की गति एक प्लास्टिक संयोजक के साथ विस्टल में प्रेपित कर दी जाती है । काफी वोल्टता प्राप्त करने के लिए गेगेल लवण के दो क्रिस्टल एकसाथ जोड़कर रखे जाते है और त्रिस्टल के तलों पर लगे नारों मे सकेत प्राप्त किए जाते हैं। 50 free end fired endee सिरा मुका सिरा किया coupler सयोजक कोलक "pirot tylus क्रिस्टल पिकअप का सिद्धान्त । इस प्रकार का पिकअप स्टीरिओ के लिए भी प्रयुक्त किया जाता है । विस्टलों के दो सेट होने चाहिएँ । सुई की गति उन तक एक उपयुक्त आकार के प्लास्टिक पदार्थ के बने सेतु (bridge) के द्वारा प्रेपित की जाती है। इसकी एक सम्भव विधि चिन्न में दिखाई गई है। fed end pirot कीलक crystal क्रिस्टल लास्टिक मेतु plasticA bridge ई stylus स्टोरिओ पिकअप में पिस्टलों का जोड़ा। सुई की गति एक प्लास्टिक सेतु द्वारा प्रेषित की जाती है । अब हम एक बहुत महत्त्वपूर्ण वस्तु-अर्थात् सुई—पर आते हैं । यह इतनी महत्वपूर्ण क्यों है? यह वह भाग है जो खाँचे को स्पर्श करता है और उसके उतार-चढ़ावों के तीक्ष्ण कोनों से टकराता है। उसकी चाल बहुत तेज तथा अत्य- धिक त्वरणयुक्त होती है। यदि उसकी बनावट ठीक न हो या उसकी देखभाल में सावधानी न रखी जाए तो रिकार्ड को हानि होगी, अर्थात् उसमें खरोंच, विकृति और अवांछित शोर होगा। मुविधा, ध्वनि के उत्तम स्वरूप, तथा कीमती रिकार्डों के कम-से-कम खराव होने की दृष्टि से प्रत्येक आधुनिक पिकअप में कीमती पत्थरयुक्त सुई होती है। यह हीरे या नीलम की शंकु के आकार की पालिशदार नोक के रूप में होती है। नोक को त्रिज्या मोनो पिकअप के लिए एक इंच का एक हजारहवाँ भाग और स्टोरिओ के लिए इसकी आधी होती है। सुइयों में काम आने वाला नीलम संश्लिष्ट (synthetic) होता है । उसके निर्माण के लिए सेलुमिनियम ऑक्साइड पाउडर को गरम करके उसके बड़े-बड़े 51 टुकड़े बनाए जाते हैं जिनसे सुई की नोक बनाने के लिए छोटे-छोटे टुकड़े काट लिए जाते हैं । नोक का भार जितना कम हो उतना ही अच्छा है क्योंकि जब वह खांचे के ऊपर से चलती है तो यांचे को उसे इधर-उधर हटाना पड़ता है। यही बात आर्मेचर के लिए भी लागू होती है जिससे सुई जुड़ी होती है । इसलिए उसका कुल भार प्रायः एक ग्राम के दो हजारहवें भाग के आस-पास रखा जाता है । सुई में प्रयुक्त होने वाले हीरे सच्चे होते हैं, और 'उनकी दृढता अधिक होने के कारण उन्हें ठीक आकृति देने तथा पालिश करने के प्रक्रम में बहुत समय लगता है । इसलिए हीरे की बनी सुई कुछ महंगी (3 पौड या उससे अधिक) होती है परन्तु वह नीलम से 30 गुना या उससे भी अधिक समय तक चलती है। यदि वह एक उच्च तद्रूपता वाले पिकअप के साथ लगी हो और रिकार्ड पर नीचे की दिशा में भार केवल तीन ग्राम हो तो हीरा तीन हजार घंटे या उससे अधिक चलेगा। यह उपयोग का वास्तविक समय है और इससे 4 हजार से भी अधिक लम्बे समय वाले रिकार्ड वजाए जा सकेंगे ! इस अध्याय को हम घूर्णक,स्थलों के विवरण के साथ समाप्त करेंगे जो पिक- अपों में प्रयुक्त होते हैं । अच्छे प्रकार के रिकार्ड-बाजों और रेडियोग्राम में रिकार्ड चेंजर (Record changer) लगे रहते हैं जिनके कारण रिकार्ड बजाने का कार्य केवल एक बटन दबाकर किया जा सकता है। पुराने प्रकार के 78 प.प्र.मि. (r.p.m.) वाले रिकार्डों के लिए रिकार्ड चेंजर अच्छा होता है, पर वे अव धीरे-धीरे खत्म होते जा रहे है और उनके साथ-साथ अव वह स्वचालित विधि भी खत्म होती जा रही है। उच्च तद्रूपता वाले उपकरण में रिकार्ड चेंजर की जटिलताएँ कुछ अच्छी नहीं लगती। उनमें कई जगह गड़बड़ होने की सम्भावना रहती है। इसके अतिरिक्त चाल की घट-बढ़ तथा पृष्ठभूमि वाले शोर को पूर्णरूप से हटाना बहुत कठिन होता है जो यथार्थता की दृष्टि से बहुत जरूरी है। अब सरल और मजबूत घूर्णक स्थल प्रयुक्त करने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही जिस पर एक-एक करके रिकार्ड वजाया जा सकता है। इनमें सबसे अच्छे को 'प्रत्यंकन घूर्णक स्थल' (Transcription Turntables) कहते हैं । यह नाम स्टूडियो में प्रयुक्त होने वाले व्यावसायिक उपस्कर से लिया गया है। हर प्रकार के घूर्णक स्थल विद्युत्-मोटर द्वारा चलते हैं। उनकी शक्ति घिरनी द्वारा संचारित की जाती है। अधिकांश में किनारे का अन्दर वाला भाग वल द्वारा घुमाया जाता है । मोटर-घिरनी.(motor-pulley) पर लगे दाँते से, - 52 जिसका आकार रिकार्ड की चाल पर निर्भर करता है, एक रबड़ का पहिया चलता है जो घूर्णक स्थल को किनारे से घुमाता है । एक सरल युक्ति से पहिये को दांते से संबद्ध कर देते हैं जिससे उपयुक्त चाल के लिए 'गियर-अनुपात' (gear-ratio) प्राप्त होता है। गोल्डरिंग-लको प्रत्यकन घूर्णक स्थल और पिकअप । अधिकतर घूर्णक स्थलों में यही विधि प्रयुक्त होती है । प्रत्यंकन प्रकार के वाजे की बनावट भारी होती है; घूर्णक स्थल एक गतिपालक चक्र की तरह कार्य करता है और चाल में अवांछित घट-बढ़ को कम कर देता है । उच्चकोटि के उपकरण में घूमने वाले भाग तथा वेयरिंग सावधानी के साथ बनाए जाते हैं तथा महंगे होते हैं। पिरणी pulley pulley घिरणी घूर्णक स्थल turntable रवड का पहिया motor मोटर रबड का पहिया किनारा किनारा rim रबड का पहिया Purpulley घिरणी - मुरय वेयरिंग . . . ० . मोटर किनारे से घुमाए जाने वाले पूरथल के मुख्य भाग। 53 प्रवर्धक पिकअप के कमजोर संकेतों के इतने प्रवर्धन के लिए, कि वह लाउडस्पीकरों को चालू कर सके, जटिल इलेक्ट्रॉनिक परिपथों की आवश्यकता होती है, जिनमें कई वाल्व तथा अन्य चीजें होती हैं । जो सरल प्रवर्धक-परिपथ चित्र में दिखाया गया है वह रेडियोग्राम या सस्ते ही-झी पुनरुत्पादक यंत्रों में प्रयुक्त होता है। यह क्रिस्टलीय पिकअपों के साथ प्रयुक्त करने के लिए उपयुक्त होता है । । V) T पिकअप from से VI pickup للعيا to loudspeaker लाउडस्पीकर को Va - ऋण पुन निविष्ट negative feedback पुश-पुल निर्गम के साथ प्रवर्धक का सरलीकृत परिपथ | VI और V2 वोल्टता प्रवर्धक-वाल्व हैं; V3 और 14 पुश-पुल निर्गम शक्ति-वाल्व हैं। वाल्व V1 पहले पिकअप को निर्गम वोल्टता का प्रवर्धन करता है और फिर संकेत को V2 में पहुँचा देता है । यहां संकेत 'निर्गम अवस्था' के लिए तैयार किया जाता है जिसे V3 और 14 से व्यक्त करते है। ये बड़े वाल्व हैं और इनका काम न केवल वोल्टता में वृद्धि करना है वल्कि उनमें इतनी शक्ति देना भी है कि वे लाउडस्पीकर को चालू कर सकें। वाल्व V3 और 14 को जिस युक्ति से सम्बद्ध करते हैं उसे 'पुरा-पुल' (push-pull) कहते हैं। यह पर्याप्त शक्ति प्राप्त करने की अच्छो विधि है और इसके साथ-साथ इससे संनादी विकृति भी कम हो जाती है। 54 . चूंकि वाल्वों का प्रतिरोध बहुत अधिक होता है और उन्हें. उत लाउड- स्पीकरों से सम्बद्ध करना होता है जिनकी संक्रिया निम्न प्रतिरोध वाली एक कुंडली पर निर्भर करती है इसलिए उसके साथ एक ट्रान्सफ़ॉर्मर T होना जरूरी है। हाँ, यदि लाउडस्पीकर का प्रतिरोध वाल्व के बराबर हो सके तो ट्रान्सफ़ॉर्मर के बिना ही उसे परिपथ के अनुकूल बनाया जा सकता है। ऐसे लाउडस्पीकर वास्तव में बनाए गए हैं, पर अभी सामान्य उपयोग में नही आते । आप सोच रहे होंगे कि इसमें ट्रांजिस्टर का उपयोग होता है या नहीं । जैसा कि आप जानते हैं उनका उपयोग सुवाह्य प्रवर्धक और रिकार्ड-बाजों में होता है, और उनसे बैटरी का कार्य अधिक विश्वसनीय हो जाता है तथा उनसे प्रवर्धक का आकार भी कुल मिलाकर घट जाता है । ट्रांजिस्टरों का एक विशेष लाभ यह है कि उससे वोल्टताओं का अच्छा प्रवर्धन होता है और बड़े उपकरणों में वह वाल्व के स्थान पर प्रयुक्त किया जा सकता है। परन्तु बड़े प्रवर्धक मुख्य सप्लाई से जुड़े होते हैं और उन्हें सुवाह्य नहीं बनाया जाता। इसलिए उनके लिए वाल्व ही ठीक रहते हैं। इसके अतिरिक्त अभी उच्च शक्ति के लिए ट्रांजिस्टरयुक्त निर्गम बनाने में कुछ कठिनाई है और फिर मूल्य के आधिक्य का भी तो ध्यान रखना होता है। ये कठिनाइयां दूर हो जाएंगी और ट्रांजिस्टर से परिपथ जिस तरह सरल हो जाता है सम्भवतः उसका लाभ अधिकांश लाउडस्पीकरों में उठाया जाएगा। एक रोचक विधि, जिसे 'ऋण पुनःनिविष्ट' (negative feedback) कहते हैं, बहुत से प्रवर्धकों में प्रयुक्त होती है । जैसा कि पृष्ठ 54 पर परिपथ में दिखाया गया है इसका सबसे सरल तरीका यह है कि प्रवर्धक की निर्गम वोल्टता में से कुछ, निवेश में पुनः प्रविष्ट करा दी जाती है। इसका सबसे पहला परिणाम यह होता है कि प्रवर्धक के 'लाभ' (gain) में कमी जाती है अर्थात् वोल्टता के प्रवर्धन की सीमा घट जाती है। यह बहुत अजीब-सा लगता है कि जो चीज इतनी मेहनत से प्राप्त हुई है उसे ऐसे खत्म कर दिया जाए; परन्तु इसके कई लाभ हैं। ऋण पुनःनिविष्ट से आवृत्ति-ग्रहणशीलता अधिक सम हो जाती है तथा विकृति भी कम हो जाती है ये दोनों ही वांछनीय हैं । इसके अतिरिक्त इससे अवांछित पृष्ठभूमीय शोर और वाल्व की गूंज भी घट जाती है, जो अन्यथा लाउडस्पीकर में आ जाती है। निर्गम वाल्व ऐसे रखने होते हैं कि उनसे विशेष उद्देश्य के लिए आवश्यक शक्ति प्राप्त हो सके, और साथ ही यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि निर्गम जितना 55 output transformers outpur, योल्टता प्रवर्धक वाल्व निर्गम ट्रासफार्मर निर्णम वाल्व parampirying mains transformar मुख्य तार ट्रासफार्मर रिष्टकारी पाल्य redifying स्टीरिओ प्रवर्धक का नीचे का ढांचा । अधिक होगा, कीमत भी उतनी ही अधिक होगी तथा उतने ही बड़े लाउडस्पीकर की आवश्यकता होगी। एक ट्रांजिस्टरयुक्त सुवाह्य उपकरण की निर्गम হাকি। 1 वाट तक कम हो सकती है, जबकि एक बड़े रिकार्ड-वाजे की लगभग 5 वाट तक कम हो सकती है। जिस उपस्कर में पुश-पुल निर्गम व्यवस्था होती है उसकी शक्ति 10 वाट या उससे भी अधिक होती है। यही शक्ति लाउडस्पीकर में जाती है । और चूकि कोई भी लाउडस्पीकर सौ प्रतिशत दक्ष नहीं होता इसलिए संगीत के रूप में जो शक्ति आपको मिलती है वह उससे कम होती है । वास्तव में 5 प्रतिशत दक्षता काफ़ी प्रायिक है ! नियंत्रक, जिनमें तीव्रता नियंत्रक और बन्द-चालू स्विच (on-off switch) भी शामिल हैं, प्रवर्धक परिपथ में सम्मिलित होते हैं । जहाँ बहुत अधिक नियंत्रकों की आवश्यकता होती है, उदाहरण के लिए उच्च तद्पता वाले प्रवर्धक में, उनके लिए परिपथ का एक भाग अलग से निश्चित किया जा सकता है । कुछ उदाहरणों में 'नियंत्रण एकक' (control unit) एक अलग उपकरण होता है जो एक लम्बे तार द्वारा प्रवर्धक के मुख्य ढाचे से जुड़ा रहता है। वह संकेत और शक्ति-संभरण का वहन करता है। अधिक महंगे उपकरणों में मोटे और अत्यधिक उच्च स्वर(bass and treble) के नियंत्रक हमेशा ही रखे जाते है जिनसे निम्न और उच्च आवृत्तियों का समंजन किया जा सके । एक और नियंत्रक 'वरणक स्विच' (selector switch) भी होता है जिससे पिकअप और रेडियो-टर्नर जैसे ध्वनि-स्रोतों को प्रवर्धक के साथ जोड़ा जा मकता है। 56 स्टीरिओ प्रवर्धक में सभी उपर्युक्त लक्षणों का समावेश होता है। परन्तु उसे एकसाथ दो संकेत लेने होते हैं। इसका अर्थ है कि उसके ढांचे में दो अलग- अलग किन्तु एक-जैसे प्रवर्धन परिपथ होने चाहिएं। उसमें दो संलग्न पिकअप 10 busse ITree साइंटिफिक एण्ड टेक्नीकल डेवलपमेंट्स लि. द्वारा निर्मित एक नियंत्रण एकफ । निवेश (pickup input) और दो जोड़े लाउडस्पीकरों के सम्बन्धन होते हैं । इस- लिए इसका अर्थ यह हुआ कि स्टीरिओ प्रवर्धक का मूल्य मोनो से दुगना होगा। पर वास्तव में यह सही नहीं है क्योंकि परिपथ में कुछ किफ़ायत की जाती है, और ढांचे का जाल कई संघटक अवयवों के लिए प्रयुक्त किया जाता है। नियंत्रकों की व्यवस्था ऐसी होती है कि दोनों संकेतों पर समान प्रभाव पड़े। । लाउडस्पीकर लाउडस्पीवर एक तरह से माइक्रोफ़ोन की उलट संख्या है। दोनों चीजें अभिलेखन और पुनरुत्पादन वाहिकाओं के विपरीत सिरों पर होती हैं। इसके अतिरिक्त माइक्रोफ़ोन तो ध्वनि-तरंगों को विद्युत्-संकेतों में परिवर्तित करता है जवकि लाउडस्पीकर का कार्य इससे विपरीत है। चल-कुंडली लाउडस्पीकर, जो प्रत्यक्ष रूप से हर रिकार्ड-बाजे, रेडियो और टेलीविजन संट में प्रयुक्त होते हैं, कई आकारों के बनते हैं। जेबी रेडियो में प्रयुक्त होने वालों का व्यास केवल 2 इंच होता है, जबकि कुछ उच्च तद्रूपता 57 तंत्र और सार्वजनिक भापण तथा सिनेमा आदि में उपयोग किए जाने वाले उपकरणों में 15 से 18 इंच तक के लाउडस्पीकर प्रयुक्त किए जाते हैं। រg magnet घलय चुम्वका -cone कौन centring device केन्द्रकारी युक्ति Coil कुडली frame लाउडस्पीकर का खण्डतः दृश्य । जैसा कि चित्र से स्पष्ट है लाउडस्पीकर के 'चालक भाग' (drive unit) (अर्थात् वह लाउडस्पीकर जो बक्स में बन्द नहीं होता) के मुख्य अवयव हैं : चुवम्क, तार की एक कुंडली और एक तनुपट जिसे 'कोन' कहते हैं। एक केन्द्रकारी युक्ति (centring device) कुंडली को चुम्बक के वृत्ताकार वायु-अन्तराल में अवस्थित रखती है और सभी भाग सम्पीडित या ढलवां धातु (cast metal) के एक फ्रेम में एकलित रहते हैं। इस विद्युत्-चुम्बकीय युक्ति की क्रिया आसानी से समझाई जा सकती है। प्रवर्धक से आने वाली वोल्टता के कारण कुंडली में तुरन्त एक धारा प्रवाहित होने लगती है और वह चुम्बक के अन्तराल से बाहर निकलने का प्रयत्न करने लगती है—यह एक सरल सिद्धान्त है जो भौतिकी को हर पाठ्य पुस्तक में दिया रहता है। परन्तु यहाँ प्रयुक्त वोल्टता वास्तव में संकेत हो है जो एक प्रत्यावर्ती वोल्टता के रूप में होती है तथा अपनी दिशा लगातार बदलती रहती है और कुंडली उसी के अनुकूल चुम्बक के अन्तराल में इधर-उधर गति करने लगती है। 'कोन' भी कुंडली से जुड़ा रहता है और वह स्वयं भी कम्पन करने लगता है जिससे हवा में विक्षोभ होता है और ध्वनि-तरंगें उत्पन्न होती हैं। जैसा कि 58 प्रत्येक ध्वनि-उत्पादक वस्तु के साथ होता है, कम्पन जितने द्रुत होंगे ध्वनि का तारत्व भी उतना ही अधिक होगा। फिर भी ऐसा लाउडस्पीकर बनाना कठिन होता है जिसमें एक ही कोन हो और वह सभी श्रव्य आवृत्तियों का दक्ष पुनरुत्पादन कर सके । गहरी धीमी ध्वनि के लिए बड़े तथा भारी कोन की आवश्यकता होती है जो प्रत्येक कम्पन के साथ काफी वायु 'धकेल' सके, और उच्च स्वरों के लिए हल्का कोन सब से अच्छा है। इस कठिनाई के कारण आवृतियों को दो भागों में बांटने की प्रथा चल गई है : निम्न आवृत्तियो को एक बड़े 'चालक एकक' में भेजा जाता है जिसे कभी-कभी 'वूफर' (woofer) कहते हैं, जबकि उच्च आवृत्तियों के लिए एक अलग छोटा यंत्र होता है जिसे 'ट्वीटर' (tweeter) कहते हैं—यह नाम उचित भी है । छोटा चालक एकक बड़े वाले के सामने केन्द्र पर लगाकर रखा जा सकता है, या फिर एककों को उनके वक्स में कुछ दूरी पर हटाकर रखा जा सकता है। दो या अधिक चालक एककों वाले लाउडस्पीकर तंत्र प्रायः ग्रामोफ़ोन में प्रयुक्त किए जाने लगे हैं और अधिकांश ही-फी तंत्रों में तो प्रयुक्त होते ही हैं । आजकल बड़े-से-बड़े लाउडस्पीकर जिस गहरे मन्द स्वर (bass note) को पुनः उत्पन्न करते हैं उस दृष्टि से वे काफी छोटे होते हैं । यदि उसे रोकने के लिए कुछ नहीं किया जाए तो कोन अपनी आगे की गति में जो हवा सम्पीडित करता है वह लाउडस्पीकर के दूसरी तरफ़ चली जाएगी और निम्न आवृत्ति की बहुत कम ध्वनि का पुनरुत्पादन होगा। इस स्थिति को दूर करने के लिए कोन के विपरीत पृष्ठों की दूरी अधिक-से-अधिक रखनी चाहिए। ग्रामोफ़ोन या रेडियो-सेट वक्स में यह कार्य सम्पन्न होता है और आम- तौर से वक्स जितना बड़ा होगा उतनी ही निम्न आवृत्ति का स्वर उत्पन्न हो सकेगा बशर्ते कि चालक एकक इसके लिए सुव्यवस्थित हो । प्रामोफोन या रेडियोग्राम के अकेले बक्स में ध्वनि के पुनरुत्पादन के लिए आवश्यक सब अवयव होते हैं क्योंकि अधिकांश लोगों के लिए यही सबसे सुविधा- जनक होगा। हालांकि इससे कुछ गहरे मन्द स्वर का भी पुनरुत्पादन होता है, पर इसका यह अर्थ नहीं है कि लाउडस्पीकर आदर्श रूप से कार्य कर रहा है। उदाहरण के लिए, जहाँ तक आकार और पदार्थ का सम्बन्ध है, हो सकता है कि बक्स ध्वानिकी की दृष्टि से आदर्श न हो । इसके अतिरिक्त हो सकता है कि लाउडस्पीकर, वाल्वों और पिकअप के समीप हो; और ध्वनि की तीव्रता एक निश्चित स्तर से अधिक होने पर उसमें अवांछित कम्पन उत्पन्न हो जाते हों। 59 लाउडस्पीकर को अन्य अवयवों से दूर रखने का सबसे सरल तरीका यह है कि उसे लकड़ी या अन्य किसी ठोस पदार्थ के बने 'व्यारोध' (bafie) पर लगा दिया जाए और इसे किसी सुविधाजनक स्थिति में खड़ा कर दिया जाए । ध्यारोघ लाउडस्पीकर। दुर्भाग्यवश जो सबसे सरल विधि है वह सबसे अधिक दक्ष नहीं है और कई लोग-विशेष रूप से जो उच्च तद्रूपता वाले उपस्कर पसन्द करते हैं-विशेष रूप से बना बक्स या यदि सही कहें तो 'कक्ष' काम में लाते हैं । इससे लाउडस्पीकर को अच्छा कार्य करने का अवसर प्राप्त होता है और बाकी उपस्कर से उसका सम्बन्ध केवल उन तारों द्वारा ही होता है जिनके द्वारा उसमें संकेत पहुंचते हैं । एक सवसे दक्ष और प्रचलित प्रकार का कक्ष निकासदार कक्ष है जैसा कि चित्र में दिखाया गया है। इसकी एक विशेषता यह है कि इसमें गहरे मन्द स्वर एक माधुनिक साउमपोकर कक्ष। 60 का उत्पादन काफ़ी होता है। निम्न आवृत्तियों पर कक्ष के अन्दर की वायु के प्रभाव के कारण निकास तथा लाउडस्पीकर के कोन दोनों से ही पुनरुत्पादन होता है। निकासदार कक्ष प्रायः कई भागों वाले लाउडस्पीकर के लिए प्रयुक्त किया जाता है, उसमें अन्दर एक मन्द स्वर चालक एकक लगा रहता है और कक्ष के शीर्ष पर एक या अधिक 'ट्वीटर' अपने लघु व्यारोध पर ही आरोपित होते हैं। drive umit चालक एकक K 'निकास Tent निकासदार कक्ष का नंग-बारतः दृश्य । लाउडस्पीकर से उत्पन्न विकृति आंशिक रूप में इस बात पर निर्भर करती है कि चुम्बक के अन्तराल में कुंडली की गति का विस्तार कितना होता है। चुम्बकीय अन्तराल से उसके बिल्कुल बाहर निकल जाने पर विकृति होगी, इसलिए कम्पनों को नियंत्रित या 'मन्दित' करना होगा । सावधानीपूर्वक बनाए गए कक्ष के अन्दर को वायु का भी मन्दकारी प्रभाव पड़ता है । एक पाक्तिगाली चुम्बक से भी यह कार्य किया जा सकता है, पर वह महंगा पड़ता है। साधारणतया श्रोता जितनी अधिक स्पष्टता चाहता है उसकी कीमत भी उतनी ही अधिक बढ़ जाएगी।आखिर विना कुछ पर्च किए तो आप कोई चीज प्राप्त नहीं कर सकते! तूपं (horm) एक अन्य दक्षतापूर्ण कक्ष है-इसका सिद्धान्त वही है जो पुराने ध्वानिक ग्रामोफोन का होता था। जब यह मॉडल तैयार किया गया पा तब यह भात था कि अधिक व्यास के मुरा वाले लम्ब सूर्य से सबसे अधिक परास की आवृत्तियों का पनस्त्पादन किया जा सरता है। यह यात वैद्युत प्रामोफोन पर भी होती 61

drive
unit
चालक एकक
एक मुड़े-तूर्य कक्ष का खण्डतः दृश्य ।
है, परन्तु गहरे मन्द स्वर-जिनका आजकल अभिलेखन किया जाता है के लिए
इतने बड़े आकार के तूर्य की आवश्यकता होती है कि वह औसत कमरे में नहीं रखा
जा सकता।
diffuser
विसारक
drive
unit
चालक एकक
स्तम्म कक्ष।
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सौभाग्यवश एक तूर्य को लकड़ी के एक साफ़ बाहरी कवच में 'लपेटकर रखना सम्भव है जिससे वह कम स्थान घेरे। इसमें चालक एकक को तूर्य के मुख पर आरोपित किया जाता है, और ध्वनि कोन के पीछे से तूर्य की तहों में से होकर आती है। अन्य कई प्रकार के कक्षों में 'स्तम्भ' सबसे लाभदायक है । वह लम्बा होता है, पर उसकी तिर्यक् काट का क्षेत्र केवल एक वर्ग फुट ही होता है और वह निम्न- तम स्थान घेरता है। इस कारण वह स्टीरिओ के लिए बहुत उपयोगी होता है क्योंकि उसमें दो लाउडस्पीकरों के लिए स्थान रखना होता है । चालक एकक का मुख ऊपर की तरफ़ होता है और ध्वनि एक विसारक की सहायता से सब दिशाओं में समान रूप से फैलती है। ग्रामोफ़ोन का इस्तेमाल इस परिच्छेद में ध्वनि उपस्कर के इस्तेमाल और देखभाल करने के सम्बन्ध में कुछ बातें बताई गई हैं। क्या करना चाहिए या क्या नहीं करना चाहिए-इस पर एक लम्बी पुस्तक लिखी जा सकती है, पर यहाँ हम केवल कुछ बहुत महत्वपूर्ण बातों का ही उल्लेख करेंगे। प्रत्येक यंत्र के लिए ठीक-ठीक देखभाल की आवश्यकता होती है। ग्रामो- फ़ोन उपकरण में भी कभी-कभी वाल्व बदलने की आवश्यकता होगी तथा प्रवर्धक के ढांचे पर जो धूल प्रायः जमा हो जाती है उसे सावधानी से साफ़ करने की आवश्यकता होगी (यदि आप यह कार्य स्वयं करें तो ध्यान रखें कि मुख्य सप्लाई को बन्द रखें)। लाउडस्पीकर पर ध्यान देने की आवश्यकता नहीं होती। दूसरी ओर घूर्णक स्थल पर हर छठे महीने से लेकर साल-भर तक देखभाल की आवश्यकता होगी जो उसके उपयोग पर निर्भर करेगा। बनाने वाली कम्पनी के निर्देशानुसार उसे बेयरिंग से हटाते हैं; उसके बाद किनारे, रबड़ के पहिए और मोटर-घिरनी को एक साफ़ कपड़े पर मेयोलेटेड स्प्रिट लगाकर साफ़ करते हैं । इससे धूल साफ हो जाती है जिसके कारण गतिमान भागों में फिसलन हो सकती है। 63 रबड़ के पहिए के त· पर दो बूंद तेल लगाइये (पर रबड़ पर न लगे) और घूर्णक के स्थल वेयरिंग का बीच वाला भाग यदि शुष्क मालूम पड़ता हो तो नीज़ लगाइये। इससे अधिक अच्छी तरह सफ़ाई का कार्य किसी पेशेवर व्यक्ति से ही कराएँ। पिकअप में सुई बदलना और भी अधिक आवश्यक है । उसे अधिक खराब होने से पहले ही बदल देना चाहिए अन्यथा वह रिकार्ड को हानि पहुंचाएगी। सुई की स्थिति का पता माइक्रोस्कोप से देखने से ही लग सकता है, पर इसकी व्यवस्था वहुत कम दुकानों पर होती है। सुई की नोक की दो छाया-आकृतियाँ चित्र में दिखाई गई हैं । एक नई है और दूसरी इतनी प्रयुक्त की जा चुकी है कि वह रिकार्ड के खाँचों को खराब कर देगी। 2. आवर्षित रूप में सुई को छाया-आकृतियों। (1) नई सुई, (2) खराब अवस्था वाली सुई। सुरक्षा के लिए वह माना जा सकता है कि नीलम की बनी सुई की (उपयोग की) आयु 50 घंटे और हीरे की उससे 30 गुना अधिक है । ये आंकड़े बहुत हल्के उच्च तद्रूपता वाले पिकअप के लिए कभी-कभी अधिक भी हो सकते है। दूसरी बात का सम्बन्ध स्टीरिओ से है। एक स्टीरिओ पिकअप से स्टीरिओ और मोनो दोनों प्रकार के रिकार्ड बजाए जा सकते हैं। मोनो रिकार्ड से मोनो ध्वनि ही निकलेगी। परन्तु मोनो पिकअप को स्टीरिओ रिकार्ड बनाने के लिए कभी प्रयुक्त नहीं करना चाहिए क्योकि उससे खांचे खराब हो जाएंगे। इसका कारण यह है कि मोनो पिकअप की सुई केवल इधर- उधर हो गति कर सकती है, परन्तु वह ऊँचे-नीचे कंटूरो (contours) पर चलने में प्रतिरोध अनुभव करेगी और एक खांचे में दो वाहिका अंकित करने पर कंटूर अवश्य ही होते हैं । सुई उन कंटूरों पर चढ़ते समय उन्हें नष्ट कर देगी। ध्यान में रखने वाली अन्तिम वात यह है कि लाउडस्पीकर से, आपके कान तक ध्वनि के पहुंचने में उस कमरे का भी प्रभाव पड़ता है जिसमें आप बैठे उसे सुन रहे हैं। चाहे आपका उपस्कर कितना भी बढ़िया क्यों न हो, यह तो . 64 कमरे पर ही निर्भर करेगा कि बिना विकृति के आप कितना निम्न स्वर सुन सकते हैं । इसको मालूम करने का तरीका यह है कि ध्वनि की तरंग-दैर्घ्य की कमरे की लम्बाई-चौड़ाई आदि से तुलना की जाय । कमरे की लम्बाई, निम्नतम स्वर- की तरंग दैर्घ्य के आधे से कम नहीं होनी चाहिए । उदाहरण के लिए 40c/s के लिए तरंग दैर्ध्य 28 फुट होता है इसलिए कमरा कम-से-कम 14 फुट लम्बा होना चाहिए जिससे यह आवृत्ति विना किसी 'आकस्मिक वृद्धि' के प्राकृतिक रूप में सुनी जा सके। पर 400/s वास्तव में गहरा मन्द स्वर है और केवल उच्च कोटि का उपस्कर ही उसे उत्पन्न कर सकेगा । यदि ऐसा उपस्कर एक छोटे कमरे में प्रयुक्त किया जाए तव भी हो सकता है कि उसकी ध्वनि काफ़ी प्रिय लगे, परन्तु 40c/s वाली ध्वनि, बास नियंत्रक (bass control) को घुमाकर, प्राप्त करने का प्रयत्न न करें। इससे विकृति उत्पन्न होगी। छोटे ग्रामोफ़ोन या सुवाह्य ग्रामोफ़ोन में कोई कठिनाई नहीं होती क्योंकि उनमें 100 c/s से कम आवृत्तियों का पुनरुत्पादन नहीं होता। यदि आप अन्य आवृत्तियों को कमरे के परिमाण से तुलना करना चाहें तो ध्यान रखें कि तरंगदैर्घ्य (फुट में) ध्वनि-वेग (1100 फुट प्रति सेकंड) को आवृत्ति से भाग देने पर प्राप्त होती है। फल को 2 मे भाग दें क्योंकि आपका सम्बन्ध अर्द्ध तरंग-दैर्घ्य से ही है। फ़िल्म पर ध्वनि ध्वनि-अभिलेखन की यांत्रिक और चुम्बकीय विधियों के विपरीत, जिनकी हम अब तक चर्चा कर रहे थे, फ़िल्म पर ध्वनि का अभिलेखन प्रकाशीय विधि से किया जाता है । अभिलेखन एक ध्वनि-पथ पर किया जाता है, जो चिन्न-'फेम' के साथ- साथ पूरी फ़िल्म में एक किनारे पर होता है । 35 मिलीमीटर की फ़िल्म में ध्वनि के लिए लगभग 3 मिलीमीटर चौड़ा स्थान छोड़ दिया जाता है। सबसे पहले 'परिवर्ती घनत्व' विधि ('variable density' method) प्रयुक्त की जाती थी। उसके अभिलेखन में प्रथम चरण तो वही था जैसा अन्यन्न था। 65 उसमें उसी तरह माइक्रोफोन और प्रवर्धक प्रयुक्त होते हैं और प्रवर्धक का निर्गम प्रकाशीय तंत्र में भेजा जाता है। एक विद्युत् बल्ब ऐसे ढंग से रखा जाता है कि उसकी प्रकाश-तीव्रता संगीत या भाषण के सकेतों की प्रबलता में विचरण के साथ- साथ घटती-बढती रहे । यह प्रकाश एक चलती हुई फ़िल्म के सामने रखे हुए दीर्घ- छिद्र पर पड़ता है और फिल्म पर, जो साधारण कैमरे की फ़िल्म की तरह प्रकाश- सुग्राही होती है, समस्त ध्वनि-पथ में उत्तरोत्तर क्षतिज रेखाएँ बनती चली जाती AMITRAIHERITAMITRAINITAL Nator 2. फिल्म पर ध्वनि-पय। 1. परिवर्ती धनत्य विधि। 2. परिवर्ती क्षेत्र विधि हैं । यह फिल्म नेगेटिव होती है और उसे डेवलप करने पर उसमें लगातार विचरण होता है जैसा कि चित्र में दिखाया गया है। सबसे अधिक पारदर्शक रेखाएं सबसे तीव्र प्रकाश से बनती हैं इसलिए वे सबसे प्रवल ध्वनि व्यक्त करती हैं । पय का घनत्व प्रकाशीय दृष्टि से पारदर्शक से अपारदर्शक तक होता है। जब फिल्म प्रक्षेपी द्वारा चलाई जाती है, तब एकसमान तीव्रता वाला प्रकाश एक दीर्घछिद्र द्वारा ध्वनि-पथ पर डाला जाना है। फिल्म के पार जाने वाला प्रकाग एक बार फिर पथ के घनत्व के अनुसार घटता-बढ़ता है और यह प्रकाश पुनः एक प्रकाश-विद्युत् सेल पर पड़ता है जो प्रकाश में होने वाले विचरण को विद्युत्-संकेतों में परिवर्तित कर देता है। 66 फिर इस संकेत के साथ वही प्रक्रम होता है जो पिकअपं से आने वाले संकेतों के साथ किया जाता है उसका प्रवर्धन करके उसे लाउडस्पीकर में भेजा जाता है। 'परिवर्ती क्षेत्र' विधि ('variable area' method) भी, जो अब सामान्य उपयोग में आती है, विद्युत्-प्रकाश पर निर्भर करती है । परन्तु इसमें प्रकाश की तीव्रता एकसमान रहती है जबकि उस दीर्घछिद्र की चौड़ाई जिसमें होकर वह जाता है एक विद्युत्-चुम्बकीय युक्ति से कम-अधिक होती रहती है । जैसा कि चित्र में दिखाया गया है डेवलप को हुई फ़िल्म के पथ का घनत्व तो एकसमान रहता है, पर उसकी चौड़ाई में विचरण होता रहता है । इस प्रकार फ़िल्म के ध्वनि-पथ वाले भाग का क्षेत्रफल घटता-बढ़ता रहता है। यदि आप इस चिन की तुलना पृष्ठ 14 के संमिश्र सगीतिक स्वर से करें तो आप देखेंगे कि ध्वनि-पथ का आकार वास्तव में ध्वनि-तरंग के ग्राफ़ीय रूप से मिलता-जुलता है । अब पहले की तरह पथ में से होकर आने वाले प्रकाश को एक प्रकाश-विद्युत् सेल से एकत्रित करना होता है और इससे प्राप्त संकेत का प्रवर्धन करना होता है। स्टीरिओफ़ोनिक ध्वनि को भी फिल्म पर अभिलेखित किया जा सकता है। इसके लिए प्रत्येक वाहिका के लिए एक पथ रखना होगा। तीन, चार या उससे भी अधिक पथ अभिलेखित किए जा सकते है। फ़िल्म पर स्टीरिओ ध्वनि का प्रसिद्ध उदाहरण वाल्ट डिजनी की फ़िल्म फेंटेसिया (Fantasia) है जिसकी स्टीरिओयुक्त प्रतिलिपि 1939 में अमरीका में दिखाई गई थी। पिछले 15 वर्षों में मुख्य प्रगति यह हुई है कि चुम्बकीय ध्वनि-पथ प्रयुक्त किए जाने लगे है । सिनेमास्कोप तंत्र में ऐसे चार पथ रखे जाते हैं-चित्र-फ्रेम के दोनों तरफ़ दो-दो पथ । तीन पथ स्टीरिओ-वाहिकाओं के लिए होते हैं और चौथा पथ सिनेमाघर में चारों तरफ़ रखे हुए छोटे-छोटे लाउडस्पीकरों की ध्वनि के पुनरुत्पादन के लिए होता है । इस दिशा में अगला चरण सिनेरामा (Cinerama) है जिसमें 5 पथ होते हैं। भविष्य की ध्वनियाँ हालांकि सुवाह्य रिकार्ड-बाजों में ट्रांजिस्टरों के उपयोग के अतिरिक्त उनका व्यापक उपयोग नहीं किया जाता, पर भविष्य में उनका अधिकाधिक उपयोग 67 किया जाएगा। उनसे न केवल उपस्कर आकार में छोटा होता है बल्कि उनसे शक्ति का स्रोत भी सरल हो जाता है, क्योंकि वाल्व की भांति उनमें किसी तन्तु को गरम करने की आवश्यकता नहीं होती इसलिए इस कार्य के लिए अलग से शक्ति की आवश्यकता नहीं पड़ती। इसके अलावा ट्रांजिस्टर के उपयोग के साथ- साथ और बाकी अवयव भी छोटे हो जाते हैं और उनसे बने उपकरण विल्कुल भिन्न होते हैं । उदाहरण के लिए, सभी इलेक्ट्रॉनिक परिपथ घूर्णक स्थल या हो-फी उपकरण के लाउडस्पीकर के बक्स में समा सकते हैं और इससे उपस्करों की संख्या घटाई जा सकती है। विद्युत्स्थैतिक लाउडस्पीकर अवश्य ही ध्वनि तंत्र के महत्वपूर्ण अंग वन जाएगे। इस प्रकार के लाउडस्पीकरों में कोई चुम्बक नही होता; यह केवल एक संधारित्र है जिसमें एक दृढ़ प्लेट और एक चल तनुपट होता है जिसका पृष्ठीय क्षेत्रफल काफ़ी अधिक होता है। सारे श्रव्य परास के लिए एक अकेला विद्युत्- स्थैतिक लाउडस्पीकर अव वाजार में मिलता है—जो अकाउस्टीकल मैनुफैक्चरिंग कम्पनी लि. का बनाया हुआ है । यदि आप अद्यतन विकास में रुचि रखते हों तो आपको इसे अवश्य सुनना चाहिए । इस प्रकार की युक्तियों को कमरे की दीवार पर लगाने का विचार भविष्य में स्थान की बचत को दृष्टि से बहुत अच्छा है—जो अभी सम्भव नहीं है । वे भविष्य के कमरों में काफी प्रिय लगेंगे; उनमें दीवार पर लगे टेलीविज़न पर्दै तथा कई वाहिकाओं वाले ध्वनि तंत्र होंगे। 68 पिकअप भी लगातार हल्के होते जा रहे हैं, जिसका अर्थ है रिकार्ड और सुई की लम्बी आयु । यदि डिजाइनर ऐसे पिकअप बना सकें जिनकी निर्गम वोल्टता अधिक हो तो बहुत उपकार होगा क्योंकि इससे प्रवर्धक अधिक सरल और सस्ते हो सकेंगे । परन्तु यह जरूरी है कि अधिक वोल्टता, आवृत्ति-ग्रहणशीलता खोकर प्राप्त न हो। हो सकता है कि टेप-रिकार्डरों का रूप भी कुछ बदल जाए। अलग- अलग चरखियों का प्रयोग तथा उनपर टेप को लपेटना बहुत ही कम हो जाएगा। चरखी और उसपर लिपटी टेप बन्द 'मैगजीन' के रूप में, जिन्हें सीधे ही प्रयुक्त किया जा सके, अभी से बाजार में मिलने लगी हैं, तथा जल्दी ही बड़ी संख्या में उपलब्ध हो सकेंगी। यह बात साधारण जनता द्वारा उपयोग किए जाने वाले उपकरण पर भी लागू होगी; अभिलेखन स्टूडियो में तो मशीन पर टेप चढ़ाने में अब भी कोई कठिनाई नहीं होती। इन परिवर्तनों का परिणाम यह होगा कि अधिक लोग घर पर टेप प्रयुक्त करने लगेंगे। रिकार्ड, रेडियो, टेप, टेलीविज़न और शायद फ़िल्मों के उपलब्ध होने से लोगों के पास एक अच्छा 'घरेलू संगीत केन्द्र' बन सकेगा। पर हम आशा करते हैं कि वे फिर भी सम्मेलनों में जाते रहेंगे यह जानने के लिए, कि ध्वनि- अभिलेखन अव भी ठोक कार्य कर रहा है या नहीं, असली चीज सुनना जरूरी है! आपका रिकार्ड-संग्रह रिकार्डों के साथ काम करने तथा उन्हें सम्भालकर रखने में कई बातों का ध्यान रखना जरूरी है। किसी भी रिकार्ड को बजाने वाले स्थान से नहीं पकडना चाहिए क्योंकि इससे उंगलियों के निशान पड़ जाते हैं जिन पर धूल बैठती है। रिकार्डो को हमेशा किनारे पर से पकड़ना चाहिए और बजाने के बाद उन्हें तुरन्त उनके थैले में वन्द करके रख देना चाहिए। यदि किसी रिकार्ड को सफ़ाई से रखा जाए तो वह उस रिकार्ड से दुगुना चलेगा जिस पर वायुमंडल में उपस्थित हजारों धूलि-कण पड़ते रहते हैं। इसलिए एक अच्छे किस्म का रिकार्ड-मार्जक (record-cleaner) प्रयुक्त करना चाहिए और उसमें दिए गए निर्देशों का पूरी तरह पालन करना चाहिए। 69 याद रखें कि यदि सफ़ाई का पूरा-पूरा ध्यान रखा जाएगा तो सुई और रिकार्ड अधिक समय तक चलेंगे। यदि रिकार्ड कम घिसेगा तो ध्वनि में निम्नतम विकृति होगी। यदि आपके पास रिकार्डो का बहुत बड़ा संग्रह हो तो उन्हें स्टैंड पर खड़ा रखें । रिकार्ड-बक्स सबसे अच्छा रहता है क्योंकि उसमें दरवाजे होते हैं और धूल से अधिक सुरक्षा रहती है । सबसे अच्छे प्रकार के बक्सों में खाने होते हैं जिनमें प्रत्येक में 12 से 20 तक रिकार्ड रखे जा सकते है । यदि खाने न हों तो रिकार्डो को सहारे की आवश्यकता होती है ताकि उन्हें बहुत सटे-सटे होने से तथा इतने ढीले होने से रोका जा सके कि वे एक-दूसरे पर न झुके रहें। यदि आवश्यकता हो तो रिकार्डो को चपटा लिटाकर भी रखा जा सकता है । विकृति को दूर करने के लिए हर ढेरी के रिकार्ड एक ही आकार के होने चाहिएं । उनको कमरे के सामान्य ताप पर रखना चाहिए, तथा नमी और अत्यधिक ताप से उन्हें बचाना चाहिए । ध्वनि-अभिलेखन से सम्बन्धित पेशे इस परिच्छेद का नाम "ध्वानिकी, ध्वनि-अभिलेखन और ध्वनि के पुनरुत्पादन को दृष्टि से धन्धे" हो सकता था क्योंकि इसका क्षेत्र काफी विस्तृत है, तथा डिजाइन और विकास वाली प्रयोगशालाओं, अनुसन्धान, उपस्कर के निर्माण तथा अभिलेखन स्टूडियों में बहुत काफी काम-धन्धा हो सकता है । डिजाइन और विकास वाली प्रयोगशाला में तथा घरेलू और व्यावसायिक उपयोग के ध्वनि-उपस्कर की निर्माणशाला में ऐसे अवसरों की संख्या सब से अधिक होती है जहाँ उच्चस्तरीय तकनीकी योग्यता की आवश्यकता होती है । इलेक्ट्रॉनिक्स तथा हल्के यांत्रिक इंजीनियरी कार्यों में हल करने के लिए हमेशा नई समस्याएं होती हैं और नये इंजीनियर के लिए इन दोनों विभागों में दक्ष होना बहुत आवश्यक है। 70 - रिकार्ड बनाने वाली तथा रिकार्ड बनाने और बजाने के उपस्कर बनाने वाली बड़ी कम्पनियों को प्रयोगशालाओं में आप कभी-कभी बहुत ही रोचक कार्य देखेंगे। ई.एम.आई. (E.M...), डेका (Decca), पाई (Pye) और फिलिप्स (Philips) इसके उदाहरण हैं । दूसरी ओर दर्जनों छोटी कम्पनियां हैं जो अलग- अलग चीजें जैसे रिकार्डिंग यन, पिकअप या लाउडस्पीकर निर्मित करती है। बड़ी और छोटी दोनों प्रकार की ही कम्पनियों में आजकल अधिकाधिक लड़कियाँ कार्य कर रही हैं। इस क्षेत्र में ध्यानिकी या मानवीय श्रवण से सम्बन्धित अनुसन्धान दीर्घ- कालिक हो सकता है, या वैज्ञानिक शोध के कारण जल्दी ही नई विधियां प्राप्त हो सकती हैं जिन्हें प्रयोगशाला में प्रयुक्त करके नये उपस्कर बनाए जा सकते हैं। विश्वविद्यालयों में भी अनुसन्धान होता है। रिकार्ड और ग्रामोफोन बनाने वाली कम्पनियाँ प्रायः रेडियो और टेलीविजन का भी निर्माण करती हैं। इसलिए रेडियो उद्योग के नये इलेक्ट्रॉनिक इंजीनियर की तकनीकी दक्षता का उपयोग ध्वनि-अभिलेखन के क्षेत्र में भी उपलब्ध है। यदि आप सोलह वर्ष के हैं तो आप कई निर्माण करने वाली कम्पनियों की 'शन शिक्षुता' (Student Apprenticeship) जैसी योजनाओं से लाभ उठा सकते हैं । अध्ययन-कार्यक्रम से उच्च तकनीकी योग्यता प्राप्त हो सकती है जैसे हायर नेशनल सर्टिफिकेट, टेक्नॉलॉजी का डिप्लोमा या डिग्री। 18 साल या उस से अधिक आयु के लोग जिनकी शिक्षा पब्लिक स्कूलों या ग्रामर स्कूलों में हुई हो और जिन्होंने अंग्रेजी, गणित और भौतिकी में G.C.E. परीक्षा 'A' श्रेणी में पास की हो वे यदि किसी विश्वविद्यालय या तकनीकी कॉलिज में पूरे समय शिक्षा न ग्रहण कर सकते हों तो उन्हें किसी उद्योग की तकनीकी प्रशिक्षण योजना से लाभ उठाना चाहिए । अंशकालीन अध्ययन से भी उच्च तकनीकी योग्यता प्राप्त की जा सकती है। आप एक 'संक्षिप्त पाठ्यक्रम' ले सकते हैं जिसमें आप एक वर्ष के समय को अपने कार्य और तकनीकी कॉलिज में बांट सकते हैं। फिर भी अंशकालीन अध्ययन और उसके साथ में सप्ताह में एक या अधिक दिन तकनीकी कॉलिज में उपस्थिति ही प्रायः सब से अधिक प्रचलित है। यदि आप पहले ही से स्नातक हैं और आपके पास विज्ञान, भौतिकी या इंजीनियरी की डिग्री है तो आपके पास विशिष्ट योग्यता प्राप्त करने के 71 लिए बहुत से विषय होंगे और आप उच्च विकास या अनुसन्धान के सीमित विपयों की समस्याओं पर जुटने से पहले एक सामान्य प्रशिक्षण प्राप्त कर सकते हैं। नियंत्रण कक्ष से स्टूडियो का दस्य । संगीत में वास्तविक और सक्रिय रुचि तकनीकी कार्य में बड़ी सहायक होगी । संगीत में योग्यता की आवश्यकता नहीं है परन्तु यदि आप कोई वाद्य बजाते हों या मंगोर-सभा में जाते हों तो आप लाउडस्पीकर से पुनः उत्पन्न होने वाली ध्वनि के स्वरूप के बारे में अनुमान लगाने के लिए अधिक योग्य होंगे। चाहे आपका कार्य कितना भी तकनीकी क्यों न हो, आपको ध्यान रखना चाहिए कि आपके सारे प्रयासों का अन्तिम परिणाम संगीत ही है। वी.वी.सा. के ध्वनि-स्टूडियों में प्राय: रिक्त स्थान होते हैं और आप उनकी आवश्यकताएं मालूम कर मकते हैं । उसमें डिस्क (disc) और टेप-रिकार्डिंग का 12 है कार्य भी शामिल होता है और एक रोचक बात यह है कि वी.बी.सी. के अपने ही डिजाइन और विकास विभाग होते हैं। वहां नौकरी के लिए योग्यता वही होती है जो कई मिर्माती कम्पनियों में रखी जाती है और आपको ध्वनि के अभिलेखन और पुनरुत्पादन में विशेष रुचि दिखाने का अवसर मिल सकता है। अभिलेखन-स्टूडियो में नोकरी के स्थान कम ही होते हैं जबकि उसके भुकाबले में प्रयोगशाला और निर्माण विभागों में अधिक स्थान होते हैं। सौभाग्यवश निजी स्टूडियों की संख्या काफ़ी है जिनमें बहुत से अवसर मिल जाते हैं। कभी-कभी संगीत-विषयक योग्यता की भी मांग होती है । स्टूडियो-इंजीनियर और देखभाल के लिए कर्मचारियों की समय-समय पर मांग होती है और सबसे नये भर्ती होने वाले-जिनके पास तकनीकी योग्यता हो या जो योग्यता को प्राप्त करने वाले हों...देखभाल के कार्य से शुरू कर सकते हैं और धीरे-धीरे स्टूडियो के विभिन्न कार्यों की विस्तृत जानकारी प्राप्त कर सकते हैं । सन्तुलन-इंजीनियर तथा अभिलेखन कार्य से संबद्ध अन्य लोग, उन उच्च कर्मचारियों में से होते हैं जो कई वर्ष तक कार्य करके विशेष योग्यता प्राप्त कर चुके होते हैं। उनकी संगीत-विषयक जानकारी काफ़ी अच्छी और विस्तृत होती है।

पारिभाषिक शब्दावली Oyertone resonance reverberation monitoring intercom अधिस्वरक अनुनाद अनुरणन अनुश्रवण अन्तःसंचार अन्तराल अपघर्षक अपारदर्शक अभिलेखन अलगोजा अवमंदन आवर्तन प्रति सेकंड आवृत्ति ओपेरा उच्च आंशिक स्वर उच्च तद्रूपता उच्चावचन उतार-चढ़ाव उपस्कर एकाकी कोर खांचा गतिपालक चक्र घिरनी घूर्णक स्थल gap abrasive opaquc recording bassoon damping cycle per second frequeocy opera upper partials high fidelity fluctuation modulation equipment solo core चल-कुडली ठप्पा डेसिबेल तत्रिका तंत्र तकुआ, तर्क तनुपट groove fly wheel pulley turntable portable, movable moving-coil stamper decibel nervous system spindle diaphragm 74.

तरंग दैर्य तुरही, पूर्य दीवारगीर ध्वनिन्तरंग यानिकी धारिता नियंत्रण एकक निगम नीलम पटरी पप पारदर्शक पिंच रोलर पिकवर पुनानिविष्ट wave-lcogth pitch trumpet push button console sound-wave acoustics capacitance vent control unit output input sapphire kcy-board track calculation transparent -pinch roller pickup feedback reproduction photo-electric cell projection echo lacquer amplifier harmonic Tibbon flute musical instrument baffle boomin 33 microphone monitor प्रकाश-विद्युत् सेल प्रतिध्याति प्रवर्धक प्रसनादी फीता वाधिका भिनभिनाइट माइक्रोफोन मॉनीटर मोनो mono fundamental note noise record 75 वाद्य वाहिका विकृति विद्युत्-ग्रामोफ़ोन विद्युत्लेपन विसारक व्यारोध शिखर शैफ्ट संक्रिया संकेत संतुलन-इंजीनियर संधारित्न संनादी musical instrument channel distortion clectric-graniophone clectroplating diffuser baffic peak shaft Operation sigoal balance-cagiocer capacitor harmonic complex note coupler omni-directional portable stylus graduate stereo stereophonic notc tone character Hi-Fi 3.D समिथ स्वर संयोजक सर्व-दिशा सुवाह्य सुई स्नातक स्टीरिओ स्टीरिओफोनिक रवर स्वरक स्वरूप ही-फी 3-D 78

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Dhwani Abhilekhan

Author
Nirmal Jain
Title
Dhwani Abhilekhan
File name
Dhwani Abhilekhan
Text
OCR done
Citation
1968
Published
2011/03
Publisher
Alankar Prakashan Dehli
Language
Sanskrit
Pages
79
Library
Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Classification
Science
DLI number
551188
Barcode
4990010031954.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
XzqaF1V52N3
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