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Sanskrith Paath Mala Vol X X I I I

Pandith Sripad Damodar Sathvalekar

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H अंक २३ संस्कृत-पाठ-माला। • (संस्कृत-भाषाका अध्ययन करनेका सुगम उपाय ) भाग तेवीसवाँ । न - लेखक पं. श्रीपाद दामोदर सातवळे के स्वाध्याय मंडल, किल्ला-पारडी, (जि. सूरत) - चतुर्थ वार संवत् २००७, शक १८७२, सन १९५० Pr-

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EVE
अंक २३
0
संस्कृत-पाठ-माला ।
(संस्कृत-भाषाका अध्ययन करनेका सुगम उपाय )
भाग २३ वाँ
-
लेखक
पं. श्रीपाद दामोदर सातवळेकर,
स्वाध्याय-मंडल, किल्ला-पारडो, (जि. सूरत)
चतुर्थ वार
-
संवत् २००७, शक १८७२, सन १९५०
सूल्य ८ आने।

निरुक्तिका अधिक
विचार
गत भागोंमें वैदिक शब्दोंकी निरुक्तिका विचार किया है। उन भागों-
के अभ्याससे पाठकोंको वैदिक शब्दोंकी निरुक्तिकी ठीक कल्पना हो गई
होगी।
अब इस भागमें उसी निरुक्तिका विषय अधिक स्पष्ट करना है। आशा
कि पाठक इसके अभ्याससे अधिक लाभ उठावेंगे।
स्वाध्याय मंडल
किल्ला पारडी (जि. सूरत
निवेदक
श्रीपाद दामोदर सातवळेकर
-
--
मुद्रक और प्रकाशक-व० श्री० सातवळेकर, बी. ए.,
भारत-मुद्रणालय, किल्ला पारडी (जि० सूरत )

संस्कृत-पाठ-माला।
भाग तेईसवाँ।
पाठ १
'
पुरूरवाः।
पुरु + रवः' (पुरु) बहुत ( रवः) शब्द बोलनेवाला । अर्थात्
बहुत वक्तृत्व करनेवाला वक्ता, वादविवादमें कुशल ।
यह इसका अर्थ मनुष्य-विभागमें लगनेवाला है। इसका दूसरा भी
अर्थ है जो मेघमें लगता है । मेघका शब्द बड़ा भारी होता है उस शब्द
करनेवाले मेघका यह नाम है । इसका उदाहरण यह है-
महे यत्त्वा पुरूरवोरणाय।
अवर्धयन्दस्युहत्याय देवाः॥ (ऋ० १०१९५७)
'हे ( पुरू-रवः ) हे बडे शब्द करनेवाले ! ( यत् त्वा देवाः ) जब
तुझे देव ( महे रणाय ) बडे संग्रामके लिये और ( दस्यु-हत्याय ) शत्रु-
नाशके लिये ( अवर्धयन् ) वढाते हैं।'
जिस समय इस मंत्रका अर्थ मनुष्यवाचक होगा उस समय यह अर्थ
होगा-' हे गंभीर भावाजवाले वीर ! व्यवहार चलानेवाले पुरुष बडे युद्ध में
शत्रुविनाश करने के लिये तुझे संवर्धित करते

(४) 'देव' शब्द का अर्थ 'व्यवहार चलानेवाले लोग' ऐसा है क्योंकि देव शब्दमें 'दिव्' धातु 'विजिगीषा-व्यवहार' भादि अाँवाला है जब यह मंत्र मेघवाचक होगा उस समय इसका अर्थ इस प्रकार होगा- 'हे बढा शब्द करनेवाले मेघ ! ये सब वायुदेव बडे तेजके लिये तथा मकालादि दुष्ट शत्रुओंके निवारणके लिये तुझे बढाते हैं।' पाठक यहां दोनों भोंकी तुलना करें और देखें, कि यह मेघोंकी अन्योक्ति है अर्थात् मेघोंके उद्देशसे वीरोंका धर्म बताया है। मरुत् ये वायुदेव प्रसिद्ध हैं। उनका संबंध मेघोंके साथ है। पाठक वेदमंत्रोंमें यह अन्योक्ति अलंकार देखें और स्वयं इसका अधिक मनन करें; तब वेदकी गंभीरता स्वयं उनके ध्यानमें आजायगी। वेदमें यह अलंकारका विषय बडा महत्त्वका है और यह जाननेसे वेदका गुप्त अर्थ प्रकट हो सकता है। सोम सोम देवता प्रसिद्ध है, इसके अर्थ भी अनेक हैं, सोमवल्ली, चंद्र, विद्वान् , मात्मा, परमात्मा इत्यादि । इसका उदाहरण देखिये- सोमं मन्यते पपिवान्यत्साम्पंषन्त्योषधिम् । सोमं यं ब्रह्माणो विदुन तस्याश्नाति कश्चन । (ऋ. १०८५३) '( यत् ओषधि सम्पिषन्ति ) जिस मौषधिको साधारण लोग पीसते हैं, तथा ( सोमं पपिवान् मन्यते) सोम मैंने पिया ऐसा जो साधारण लोग मानते हैं, वे गलतीपर हैं । (यं सोमं ब्रह्माणः विदुः) जिस सोम- को ब्राह्मण लोग सोम समझते हैं (तं कश्चन न अनाति । उसको कोई नहीं पी सकता। मंत्रमें यज्ञ करके ही सोमपान करनेकी सूचना है। यधपि सोम एक दिव्य भौषधिका रस है तथापि उसका पान विधिपूर्वक करना चाहिये। विधिको छोडकर केवल औषधिका रस पीनेका नाम सोमपान नहीं है। यह तो यज्ञविषयक अर्थ हुभा । इसलिये इसको अधियज्ञ अर्थ कहते हैं १ - १ (५) " सोमको जो लोग पीसते हैं, रस निकालते हैं और समझते हैं कि हमने सोम पिया वे गलतीपर हैं क्योंकि जिसको ब्राह्मण लोग सोम समझते हैं वह सच्चा सोम चंद्रमा है; उसका रस कोई भी देवोंसे मित्र नहीं पी सकता। यह देवताविषयक अर्थ है इसलिये इसको अधिदैवत अर्थ कहते हैं । इस अर्थका ठीक प्रकार विचार मनमें स्थिर होनेके लिये यही अर्थ अध्यात्म भूमिकामें देखिये- साधारण लोग सोमको पीसते हैं, रस निचोडते हैं और समझते हैं कि हमने सोम पिया, परन्तु वे गलतीपर हैं । वास्तवमें ब्रह्मज्ञानी जिसको सच्चा सोम कहते हैं, वह चंद्र (का अंशभूत शरीरमें मन ) है, जिसका पान सब इंद्रियां कर रहीं हैं।" यहां यह बात स्मरण रखनी चाहिये कि सोम शब्दके अर्थकी भिन्न- तासे मंत्रका अर्थ सबका सब बदलता है। सोम शब्दका अर्थ यह है सोम- वल्ली, औषधि, चंद्र, मन, ज्ञानी गुरु, आत्मा, परमात्मा इ० । इन अर्थों में सोम औषधिका अर्थ तो सब जानते ही है; परन्तु अन्य अर्थ सब लोगोंके ध्यानमें नहीं पा सकते । सोमका अर्थ चंद्र भी है परन्तु चंद्रका प्रतिनिधि अंश से हमारे शरीरमें मनरूपमें है, यह मुख्य बात लोग भूल जाते हैं। जिस प्रकार सोम ( चंद्र ) के साथ सूर्य आदि अन्यान्य देवोंका संबंध उसी प्रकार शरीरके अंदर सोमका अंशरूप प्रतिनिधि मनरूपी है और उसका संबंध सब नेत्रादि इंद्रियोंके साथ है। मनकी शक्ति संपूर्ण इंद्रियोंमें भाती है यह बात जो जानता है उसको मनका रस संपूर्ण इंद्रियां पीती हैं " यह वेदका कथन ठीक रीतिसे समझमें था सकता है और वहीं भाव " सोमरस सब देव पीते इस वेदवाक्यमें देखने में पाठक समर्थ होंगे। सोममें “स+उमा " ये दो शब्द है। उमा का अर्थ " रक्षक विद्या" है। इस रक्षक विद्यासे जो युक्त होता है वह (स+उमा = सोमः ) ज्ञानी । इस ज्ञानीरूपी सोमका रस शिव्य निकालते हैं और पीते हैं । ज्ञानी 4 ।

सोमका रस " विद्यारस " ही है और हरएक पाठशालामें शिष्यवर्ग गुरुका यह विद्यामृतरस पीते हैं। सब लोग इस "सोमपान" को जानते । इस प्रकार सोमपानकी अनेक विधियाँ हैं। जो इन सब विधियोंको जानता है वही वेदके तत्त्वको समझ सकता है। पाठ २ अष्टाचक्रं वर्तत एकनेमि सहस्राक्षरं प्र पुरो नि पश्चा। अर्धन विश्वं भुवनं जजान यदस्याधं कतमः स केतु ॥ २२॥ (म० ११४) (अष्टाचक्रं ) माठ चक्रोंसे युक्त, (सहस्राक्षरं ) सहस्त्र अथवा हजारों अविनाशी धाराओंसे पूर्ण और ( एकनेमि ) एक केंद्रवाला यह प्राणयंत्र (प्र-पुरः) भागे और (नि-पश्चा) पीछे ( वर्तते ) होता रहता है इसने ( अर्धन ) आधेले ही (विश्वं भुवन ) सब भुवन ( जजान ) उत्पन्न किया है। और जो इसका शेष ( अ ) अर्ध है, (सः ) वह (क-तमः) कौनसा ( केतुः) चिन्ह है ? शरीरमें हृदयस्थानीय मानस सरोवरके पीछे एक पर्वत है, जिसका नाम मेरु पर्वत, मेरुदंड अथवा पृष्ठवंश है। इसमें आठ चक्र हैं, उनके नाम मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपूरक, सूर्य, अनाहत, विशुद्धि, आज्ञा और सहस्राक्षर हैं। एक ही नाभिमें इनका मध्य केन्द्र है, और प्रत्येक चक्रके सैकडों आरे चारों दिशाओंमें जाते हैं। इस प्रकार यह 'मज्जातन्तु-संस्थान' अपने शरीर में है। यह प्राणचक्रका वर्णन है । यह प्राणचक्र भागे और फिर पीछे चलता है। आगे पीछे चलनेका तात्पर्य श्वास और उच्छ्वासकी गति परस्पर विरुद्ध है, इसलिये वह गति (प्र पुरः नि पश्चा ) भागे और पीछे इन शब्दोंसे व्यक्त की है। क (७) प्राणायामद्वारा विशेष रूपसे और श्वासोच्छ्वासद्वारा साधारण रीतिसे प्राणशक्ति उक्त माठों चक्रोंमें पहुंचती है । प्राणका एक भाग शरीरके साथ संलग्न है और दूसरा आत्माके साथ लगा है । यह बतानेके लिये उक्त मंत्रमें कहा है, कि संपूर्ण स्थूल भुवन (शरीर) एक भागसे उत्पन्न करके अवशिष्ट भागसे किसकी सूचना करता है ? अर्थात् वह आत्माकी सूचना देता है, यह इस प्रश्नका उत्तर है। इस प्रकार यह प्राणका अत्यंत मनोरम वर्णन इस मंत्रमें है, वह बहुत ही विचार करनेयोग्य है। इस प्रकारके श्रेष्ठ प्राणको नमन अगले मंत्रमें किया है। यो अस्य विश्वजन्मन ईशे विश्वस्य चेष्टतः। अन्येषु क्षिप्रधन्वने तस्मै प्राण नमोऽस्तु ते ॥ २३ ॥ (म० ११४, हे प्राण ! जो (विश्वजन्मनः) सबका जन्म देनेवाले (चेष्टतः अस्य विश्वस्य ) हलचल करनेवाले इस जगत्का (ईशे) स्वामी है, तथा (अन्येषु ) अन्योंमें (क्षिप्र-धन्वने ) शीघ्र गति देनेवाले (तस्मै ते नमः अस्तु ) तुझको नमस्कार हो। हलचल करनेवाले सब प्राणियोंका प्राण ही स्वामी है, तथा यह संपूर्ण अन्य पदार्थोंको भी प्रेरित कर रहा है। यह इसका विश्वव्यापक कार्य देखना चाहिये। यो अस्य सर्वजन्मन ईशे सर्वस्य चेष्टतः। अतन्द्रो ब्रह्मणा धीरःप्राणो मानु तिष्ठतु ॥२४॥ (१११४) जो प्राण ( सर्व-जन्मनः) सव जन्म लेनेवाले (चेष्टतः सर्वस्य ) भोर हलचल करनेवाले सब प्राणीमात्रका ईशन कर रहा है। तथा जो ( अ- तन्द्रः) आलस्यरहित है, तथा (ब्रह्मणा धीरः) आत्माके साथ संयुक्त होनेके कारण धैर्यमय है, वह प्राण (मा) मेरे (अनु तिष्ठतु) साथ ठहरा रहे।

(८) प्राण सब प्राणियोंका स्वामी है। प्राण है इसलिये इनको "प्राणी" कहते हैं। प्राण न होगा तो प्राणी भी नहीं होगा। यह प्राण जन्मसे मरने तक अपना कार्य करता है, इसलिये यह भालस्यरहित है। इसकी सुस्तीका ही नाम मृत्यु है। इसका एक भाग स्थूल शरीरमें कार्य करता है और दूसरा आत्माके साथ रहता है। आत्माके साथ रहनेके कारण ही यह प्राण अधिकसे अधिक बल रखता है। इस प्रकार बलवान् प्राण अपने अंदर रहे यह हरएककी इच्छा होना स्वाभाविक ही है ! उर्ध्वः सुप्तेषु जागार ननु तिर्यङ् नि पद्यते। न सुप्तमस्य सुप्तेष्वनु शुश्राव कश्चन ॥ २५ ॥ (अ. ११४) (सुलेषु ) सब सोनेपर भी यह प्राण ( ऊर्ध्वः जागार ) खडा रहकर जागता है । ( ननु ) कभी नहीं (तिर्थङ्) तिरछा होकर (निपद्यते) लेटता है। (सुप्तेषु ) सबके सोनेपर ( अस्य सुसं) इस प्राणका सोना ( कश्चन )किसीने भी ( न अनु शुश्राव) सुना नहीं। सब प्राणी थक जानेपर सो जाते हैं, परन्तु उनके सो जानेपर भी यह प्राण खडा रहकर जागता और पहरा करता है । जैसे इतर प्राणी थक जानेपर लेट जाते है, उस प्रकार यह प्राण कभी भी लेटता नहीं, अर्थात् विश्राम न करता हुआ सदा अपना कार्य करता रहता है । सब अन्य इद्रियां थक जाती हैं और विश्राम लेनेके लिये सो जाती हैं, उस प्रकार यह कभी थकता नहीं और न कभी विश्राम लेता है, उसके थकने और विश्राम लेनेका तात्पर्य मृत्यु ही है। जन्मसे मृत्युतक यह विश्राम न लेते हुए अपना कार्य करता है। प्राण मा मत्पर्यावृतो न मदन्यो भविष्यसि । अपां गर्भमिव जीवसे प्राण वध्नामि त्वा मयि ॥ २६ ॥ (अ. ११४)

(९)
हे प्राण ! (मत् ) मुझसे ( मा पर्यावृतः) पृथक् मत् हो। (मद्
अन्यः ) मुझसे मिस अर्थात् दूर (न भविष्यसि)तू न होगा। (अपां
गर्भ इव ) पानीके गर्भके समान, (जीवसे ) दीर्घ जीवनके लिये मैं ( मयि)
अपनेमें ( त्वा बध्नामि ) तुझको बांधता हूं।
प्राण शरीरसे पृथक् नहीं होना चाहिये, क्योंकि वैसा
पृथक
होनेसे
मृत्यु
ही होगी । मनुष्यको दीर्घ जीवन प्राप्त करना है, इसलिये प्राणायामद्वारा
प्राणका बल बढाकर प्राणको मानो अपने अन्दर बांधकर रखना चाहिये,
ताकि वह शीघ्र दूर न हो सके।
मैं प्राणशक्तिको अपने अन्दर बढाऊंगा' इस प्रकारकी भावना मनमें
स्थिर करनेसे भात्मविश्वास बढनेके कारण प्राणका भी बल बढ जाता है।
यह उपदेश मंत्रके वाक्यों में स्पष्ट है।
जीवन के लिये जैसी जलकी, उससे भी अधिक प्राणकी आवश्यकता है,
बात यहां स्पष्ट होती है।
प्रयत्न करके अपने अन्दर प्राणका बल बढाया जा सकता है और प्राणके
बलकी वृद्धि करनेसे अपमृत्युको दूर किया जा सकता है, अर्थात् पुरुषार्थसे
आयुष्यकी वृद्धि होना संभव है। यह बात इन मंत्रोंके वाक्योंका विचार
करनेसे स्पष्ट हो जाती है।
यह
पाठ ३
चन्द्रमाः।
इस शब्दकी अनेक व्युत्पत्तियां हैं उनमेंसे कुछ यहां देखिये-
१ चायन् दनति = चान् + द्रम = चन्द्रमाः = कृपा करता हुमा चलता
है।
२ चन्द्रः माता = चन्द्रमाः = तेजस्वी होता हुआ मापन करता है
अर्थात् कालका मापन करनेके लिये सहायक होता है।
है

(१०)
३ चान्द्रं मानं अस्य = चान्द्र-वर्षका निर्माण करता है।
चन्द्र शब्दकी व्युत्पत्तियां भी अनेक हैं देखिये-
१ चन्दतेः चन्द्रः = माल्हाददायक होता है।
२ चारु द्रमति = सुंदरताके साथ गमन करता है।
३ चिरं द्रमति - देरसे चलता है अर्थात् धीरे धीरे चलता है।
१ चम्यते इति चम्+द्रम पिया जाता है अर्थात् कृष्णपक्षमें यह
कान्तिहीन होता हुआ चलता है।
चन्द्र शब्दसे ही चन्द्रमा शब्द बनता है। जिसकी व्युत्पत्ति इसके
पूर्व बतायी है, अब इसका उदाहरण देखिये
नवोनवो भवति जायमानोऽहां केतुरुषसामेत्यग्रम् ।
भागं देवेभ्यो वि दधात्यायन्प्र चन्द्रमास्तिरते दीर्घमायुः ॥
(ऋ० १०८५/१९)
(चन्द्रमा जायमानः नवः नवः भवति ) चन्द्र शुक्लपक्षमें उदित
होता हुआ नया नया होता है। ( मला केतुः ) यह दिनोंका झंडा है
अर्थात् यह दिनोंका ज्ञापक है । ( उषसां अग्रे एति ) उषःकालके पूर्व ही
कृष्णपक्षमें उदय होता है । ( मायन् देवेभ्यः भागं वि दधाति )
यह आता हुआ देवोंको भाग देता है अर्थात् इष्टियां होनेके कारण यह
भाग देता है । तथा (चन्द्रमाः दीर्घ आयुः प्र तिरते ) चन्द्र दीर्घ भायु
देता है"
।
मृत्युः।
-
मृ धातु मरनेके अर्थमें है । उस धातुसे मृत्यु शब्द बनता है।
इसका अर्थ प्रसिद्ध है। इसका उदाहरण यह है-
परं मृत्यो अनु परेहि पन्थां यस्ते स्व इतरो देवयानात्।
चक्षुष्मते शृण्वते ते ब्रवीमि मा नः प्रजां रीरियो मोत वीरान
( १०॥१८॥१)

(११) "हे मृत्यो !( परं अनुपन्थां परेहि ) श्रेष्ठ अनुकूल मार्गपरसे हमें ले चल, (यः ते देवयानात् इतरः स्वः ) जो कि तेरा देवयानसे मित्र दूसरा अपना है । ( चक्षुष्मते श्रृण्वते ते ब्रवीमि) देखनेवाले और सुननेवाले यह कहता हूं। (नः प्रजां मा रीरिषः) हमारी सन्तानोंको मार्गमें नष्ट मत कर ( उत मा वीरान् ) और वीर लोगोंको भी नष्ट तुझे मैं मत कर।" जो देव मृत्युसे संहार करता है उसकी प्रार्थना दीर्घायुत्वके लिये यहां की है . मरुत् । मरुत् शब्दको व्युत्पत्ति इससे पूर्व बता दी है। परंतु दृढीकरणके लिये यहां पुनः देते हैं- (१) मित + रावी (मा+रु )= मरुत् = मितभाषी। (२)मित + रोचन = ई मा रुच् ) परिमितताको चाहनेवाले। (३) मरुत् + द्रवन्ति = म+द्र (६-र) = म + रद् - मरुत् = बड़े चलनेवाले। इस मरुत् शब्दवाले मंत्रका उदाहरण यह है- आ विद्युन्मद्भिर्मरुतः स्वकै रथेभिर्यात ऋष्टिमद्भिरश्वपर्णैः । आ वर्षिष्ठयान इषा वयो न पप्तता सुमायाः ॥ (ऋ० ११८८१) " हे (मरुतः) मरुतो ! हे वीरो! तुम (विद्युन्माद्भिः स्वकैं: ऋष्टिमद्भिः अश्वपर्णैः ) विद्युत्के समान चमकनेवाले, उत्तम तेजस्वी, अश्वोंसे पूर्णः ( रथेभिः आ यात ) रथोंसे आओ। हे ( सुमायाः) उत्तम कारीगरो ! तुम वर्षिष्टया इमा) विपुल अन्नके साथ ( वयः न) पक्षियोंके समान (न आपसत् ) हमारे समीप भाओ! इसके कई पदोंका अर्थ .. - (१२) १ स्वर्कः (सु+ अर्कः) = उत्तम तेजसे युक्त। २ अश्वपर्णः (अश्व-पर्णः ) = अश्व जिसको जोते हैं। ३ सु + मायाः = उत्तम कुशलतासे युक्त । माया शब्द कौशल्य अर्थवाला है। ४ विद्युन्मत् = बिजलीसे युक्त, तेजसे चमकनेवाला। ५ ऋष्टिमत् = शस्त्रास्त्रोंसे युक्त । इस प्रकार इस मंत्रके पदोंका विशेष अर्थ है। ऋभु ऋभुका अर्थ पूर्वस्थानमें बताया है। तथापि पुनः स्मरण दिलानेके लिये यहां बताते हैं- १ उरु + भान्ति = a+भु = प्रभु = विशेष चमकनेवाले। २ ऋतेन + भान्ति = ऋ+भु = ऋभु = सत्य व्यवहारसे शोभने- वाले। ३ ऋतेन + भरन्ति = ऋ+भु = ऋभु = सत्यसे युक्त होते हैं, सत्य व्यवहार करते हैं। इसका उदाहरण यह है- विध्वी शमी तरणित्वेन वाघतो मासः सन्तो अमृतत्वमानशुः। सौधन्वना ऋभवः सूरचक्षसः संवत्सरे समपृच्यन्त धीतिभिः॥ (ऋ०.११११०१४) ( वाघतः सन्तः मर्तासः ) वाहनोंसे जानेवाले सत्यवादी मनुप्य (तरणित्वेन शमी विष्टवी ) त्वरांसे कर्मोंको करनेवाले ( अमृतत्वं मानशुः ) अमरत्व प्राप्त करते हैं। ( सौधन्वनाः सूरचक्षसः ऋभवः ) उत्तम धनुष्यधारी उत्तम बुद्धिमान् कारीगर (संवत्सरे धीतिभिः समपृच्यन्त ) वर्षभर बुद्धिसे उत्तम कर्म करते हैं। इस मंत्रके कुछ शब्दोंका विशेष अर्थ-

(१३)
।
१ विष्टची ( विश्-कर्म करना ) = उद्यमी, पुरुषार्थी, कर्म करनेवाले ।
२ शमी = संयससे कर्म करनेवाले
३ सूरचक्षसः ( सूर + चक्षस्) = उत्तम दृष्टिवाले, बुद्धिमान् ।
सौधन्वनः - (सु-धन्वन् ) = उत्तम धनुष्यवाले।
५ धीतिः = कर्म, धारक कर्म।
६ तरणिः - ( त्वरा-नी) त्वरासे ले जानेवाले।
७ वाघत: - (वाहत) वाहनोंसे
युक्त, उठाकर ले जानेवाले।
अंगिरसः ।
इसका उदाहरण यह है-
विरूपास इहषयस्त इग्दम्भीरवेपसः।
ते अङ्गिरसः सूनवस्ते अग्नेः परि जज्ञिरे ॥
(म० १०१६२१५)
(वि-रूपासः ) विशेष रूपवाले, अर्थात् सृष्टिके रूपको जाननेवाले
(इत् ऋषयः) ही ऋषि (ते इत् गम्भीर-वेपसः) वे ही गम्भीरबुद्धिवाले
और (ते अङ्गिरसः) वे अंगरसविद्याके जाननेवाले (ते अग्नेः सूनवः ) वे
अग्निके पुत्रोंके समान तेजस्वी ( परि जज्ञिरे ) होते हैं।
इस मंत्रमें कुछ पदोंका विशेष अर्थ---
१ वि+ रूपासः = विशेष रूपवाले, सुंदर अथवा विविध रूपोंको
यथावत् जाननेवाले।
२ ऋषि = ज्ञानी, प्रगतिशील।
३ गंभीर + वेपस् = गंभीर बुद्धि अथवा गंभीर कर्मवाले।
४ संगिरसः - अंगमें जो जीवन-रस है उसकी विद्याके जाननेवाले।
इस प्रकार शब्दोंका अर्थ मनन करते हुए मंत्रोंके अर्थका मनन कीजिये ।
इस प्रकार मनन करनेसे ही मंत्रके गूढार्थका ठीक ठीक पता लग सकता है।
आशा है कि पाठक इल रीतिसे मंत्रोंके अर्थोंका मनन करके वेद मंत्रोंसे
दिव्य ज्ञान प्राप्त करेंगे।
-

(१४) पाठ ४ यथा धौश्च पृथिवी च न बिभीतो न रिष्यतः । एवा मे प्राण मा बिभेः। ( भ. २०१५।१) जिस प्रकार धुलोक और पृथिवी ( न बिभीतः ) डरते नहीं इसलिये (न रिष्यतः) नष्ट नहीं होते, इसी प्रकार हे ( मे प्राण) मेरे प्राण । (मा बिभेः)तू मत डर । यथाहश्च रात्री च न बिभीतो न रिष्यतः। एवा मे प्राण मा बिभेः । (अ. २।१५।२) जिस प्रकार (अहः ) दिन और रात्री नहीं डरते, इसलिये नष्ट नहीं होते, इसी प्रकार हे मेरे प्राण ! तू मत डर । यथा सूर्यश्च चन्द्रश्च न बिभीतो न रिष्यतः । एवा मे प्राण मा बिभेः। (भ. २।१५।३ ) जिस प्रकार सूर्य और चंद्र डरते नहीं इसलिये हानिको नहीं प्राप्त होते, इसी प्रकार हे मेरे प्राण ! तू मत डर । यथा ब्रह्म च क्षत्रं च न बिभीतो न रिष्यतः। एवा प्राण मा विभेः॥ (अ. २॥१५॥४) जिस प्रकार ( ब्रह्म ) ज्ञान और ज्ञानी, (क्षत्रं ) शौर्य और शूर वीर नहीं डरते, इसलिये नष्ट भ्रष्ट नहीं होते, इस प्रकार हे मेरे प्राण! तू मत डर । यथा सत्यं चानृतं च न बिभीतो न रिष्यतः एवा मे प्राण मा बिभेः। (अ. २११५१५) जिस प्रकार ( सत्यं ) सत्य और ( अन्-ऋतं) अत्यंत सरलता ये कभी डरते नहीं, इसलिये विनष्ट नहीं होते, इसी प्रकार हे मेरे प्राण ! तू मत डर। यथा भूतं च भव्यं च न मिलीतोन रिष्यतः। एवा मे प्राण मा विभेः॥ {अ. २१५६) मे - (१५) जिस प्रकार भूत और भविष्य डरता नहीं, इसलिये नष्ट नहीं होता। इसी प्रकार हे मेरे प्राण ! तू मत् डर। इस सूक्तमें स्पष्ट कहा है, कि डर ही नाशका हेतु है। इसीलिये हरएक को निर्भय होकर धर्मकार्य करना चाहिये । डरनेसे शक्तिकी क्षीणता होती है और निर्बलता भाती है । अर्थात् जो वारंवार डरते हैं, उनका मन अत्यंत कमजोर होता है। और मन अशक्त होनेपर उस पुरुषमें बल बढनेकी संभावना ही नहीं है। वैदिक धर्मके स्त्रीपुरुषोंको यह सूक्त मनन करने योग्य है । यह सूक्त कहता है, कि " देखो। पृथिवी और धुलोक, सूर्य और चंद्र आदि सब इसलिये बलवान हैं, कि वे नहीं डरते । यदि उनमें भीति उत्पन्न होगी, तो उनकी स्थिति नहीं रहेगी । इस प्रकार जो ब्राह्मण और क्षत्रिय नहीं डरते हैं, वे ही शक्तिशाली होते हैं; परन्तु जो डरते हैं, वे क्षीणबल हो जाते हैं । इसलिये प्रत्येक मनुष्य निडर होकर धर्मकार्य करे, आगे बढे और उन्नति प्राप्त करे।" तात्पर्य यह है, वैदिक-धर्मी मनुष्य सत्य धर्मके पालनके लिये निडर होना चाहिये । अतः गृहस्थी स्त्रीपुरुषोंको उचित है, कि चे अपने बालबच्चोंको बालपनमें ऐसी शिक्षा दें, कि वे निडर होकर बढ़ें और उनके मनमें किसी प्रकारका डरपोकपन न रहे। द्वाविमौ वातौ वात आसिन्धोरा परावतः । दक्षं ते अन्य आ वातु परान्यो वातु यद्रपः ॥ (ऋ० १०११३७१२) (द्वौ इमौ वातौ) ये दो वायु हैं । एक ( वातः सिंधोः आ) वायु हृदयतक चलता है । दूसरा (परावतः आ ) बाहरतक चलता है। (भन्यः ते दक्षं आ वातु ) एक वायु तुझे बल देवे और ( अन्यः यत् रपः परा वातु) दूसरा सब दोपोंको दूर ले जाचे । श्वास और उच्छ्वाल ये दो वायु हैं, वायु हैं, जो अन्दर जानेवाला वास है, वह बल देता है, और जो बाहर जानेवाला उच्छ्वास है, वह दोषों को दूर हटाता .

(१६) है। इस प्रकार दोष दूर करने और बल बढाने के कारण प्राणी जीवित स और बढ़ते हैं। आ वात वाहि भेषजं वि वात वाहि यद्रपः । त्वं हि विश्वभेषजो देवानां दूत ईयसे ॥ ( ऋ० १०११३७॥ अ०४।१३॥३) हे वायु ! (भेषजं मावाहि) सब दवाइयों को यहां ले आओ। हे वाट ( यत् रपः वि वाहि ) सब दोषों को दूर बहा दो। ( त्वं हि ) तू ही (विः भषजः ) सब औषधिरूप है। ( देवानां दूतः ) देवोंका दूत (ईयसे है और शुद्ध शुद्ध वायु सब औषधियों का सार है, इसलिये शुद्ध वायुके सेवन से स औषधियोंका सेवन होता है । और शुद्ध वायुके सेवनसे ही सब दोष द होते हैं, इसलिये शुद्ध वायु ही देवोंका दूत है । शुद्ध वायुके सेवनसे प्राय सब रोग दूर होकर नीरोगता प्राप्त होती है, शुद्ध वायु ही जीवनका हे है। यह वैदिक प्राणविद्याका तत्व जानकर हरएक मनुष्यको ऐसा प्रया करना चाहिये कि, जिससे प्रतिदिन शुद्ध वायुका सेवन उत्तम प्रकार है सके। किसी प्रकार भी अशुद्ध वायुमें व्यवहार न किया जाय, वायु सेवनद्वारा अपने अंदर जीवनका बल बढाया जाय । आ त्वागमं शंतातिभिरथो अरिष्टतातिभिः । दक्षं ते भद्रमाभाई परा यक्ष्मं सुवामि ते ॥ (ऋ० १०११३७४ ( त्वा ) तेरे पास ( शं-तातिभिः) कल्याणके विस्तार के साथ { अथो और (अ-हिष्ट-तातिभिः) भविनाशक शक्तिके साथ (अ गर्म) आया हूं ( ते भद्रं दक्षं आभाष ) तेरे लिये कल्याणकारक बल लाया है । और ( ते यक्ष्म ) तेरी बीमारी ( परा सुवामि) दूर कर दी है बमिारको कानेका मानसिक संदेश यह है। मैं अब तुमको माराम और आरोग्य देता हूं, और सब तुम्हारे दोषोंको हटा देता हूं। तुम अब बलवान ।

(१७) १ और निरोग हो जाओगे । इस प्रकार विश्वास देनेसे मनुष्य निरोग होने में बड़ी सहायता मिलती है। वातस्य नु माहमानं रथस्य रुजति स्तनयन्नस्य घोषः। दिविस्पृग्यात्यरुणानि कृण्वन्नुतो एति पृथिव्या रेणुमस्यन् ।। ( ऋ० १०१६८१) ( रथस्य ) रमणीय ( वातस्य )वायुका (महिमानं ) महत्त्व (नु) निश्चय से वर्णनीय है । वह वायु ( रूजन् ) सबको झुकाता हुआ ( एति) चलता है। ( अस्य घोषः ) इस वायुकी गर्जना (न्तनयन् ) बडी जोरसे होती है । ( दिवि-स्पृग् ) माकाशको स्पर्श करनेवाला वायु ( भरुणानि ) विविध रक्तवर्ण ( कृण्वन् ) करता हुआ ( उत) और ( पृथिव्याः रेणुं अस्यन् ) भूमिकी धूलि उछलाता हुआ ( एति ) चलता है। वायुका महत्त्व अत्यंत है, वायुके कारण भाकाशमें विविध लाल रंग प्रतीत होते हैं और जब यह जोरसे चलता है, तब धूलि भी आकाशमें उडती है। सं प्रेरते अनु वातस्य विष्ठा ऐनं गच्छन्ति समनं न योषाः । ताभिः सयुक्सरथं देव ईयतेऽस्य विश्वस्य भुवनस्य राजा ।। (ऋ. १०.१६८१२) (स-मनं योषाः न ) जिस प्रकार जिसपर मन होता है, उस पुरुषके प्रति स्त्रो जाती है, उस प्रकार ( वि-ठाः) विशेष स्थिर पदार्थ भी (एनं अनु गच्छन्ति ) इसकी गति के अनुसार चलते हैं और इस (वातस्य ) वायुकी गति के अनुसार ( सं प्रेरते ) हलचल करते हैं ! ( अस्य विश्वस्य भुवनस्य ) इस सब जगत्का यह ( राजा ) राजा और ( देवः) व्यवहार- साधक दिव्य पदार्थ ( ताभिः) उन पदार्थोके ( सयुक्) हाथ (स-रथं ) एकही स्थमें चलने के समान ( ईयले) चलाना है। यह वायु स्थिर पदार्थों को भी हिलाता है, जिस दिशासे यह वायु चलता है, उसी दिशासे सब पदार्थ झुकते जाने हैं। इसलिए ऐसा प्रतीत होता २[सं. पा. मा, २३] (१८) कि अत्यंत वेगवाले एक ही रथमें वायुके साथ अन्य पदार्थ भी मारूढ हुए हैं। अन्तरिक्षे पथिभिरीयमानो न नि विशते कतमच्चनाहः । अपां सखा प्रथमजा ऋतावा क्व स्विज्जातः कुत आ बभूव। (ऋ० १०११६८३) (अन्तरिक्षे पथिमिः ईयमानः) आकाशमागासे भ्रमण करनेवाला वायु (कत-मत् चन अहः ) किसी दिन भी (न नि विशते ) विश्राम नहीं लेता है । ( अपां सखा) वादलोका मिन (प्रथमजाः ) सबसे पहिले उत्पन्न हुआ हुआ (अता-वा) जलके मेघोंको चलानेवाला वायु (क्व- स्वित् जातः ) कहां भला रहता है और ( कुतः मा बभूव ) कहांसे प्रकट होता है? वायु सदा आकाशमें संचार करता है और किसी दिन भी छुट्टी नहीं करता । बादलोंको चलानेवाला यह वायु मेघोंका मित्र है। एक स्थानपर होता हुआ किसी अन्य स्थानमें प्रकट होता है । यह कहांसे आया है ? आत्मा देवानां भुवनस्य गर्भो यथावशं चरति देव एषः। घोषा इदस्य शृषिवरे न रूपं तस्मै वाताय हविषा विधेम ॥ (१० १०६१६८१४) ( देवानां आत्मा ) इन्द्रियोंका जीवनरूप ( भुवनस्य गर्भः) उत्पन्न होनेवाले पदार्थोंका केन्द्ररूप (एष देवः ) यह देव ( यथावशं चरति ) अपनी इच्छासे संचार करता है। ( अस्य घोषा इत् ) इसका केवल आवाज ही ( श्वपिवरे सुनाई देता है, (न रूपं) परंतु इसका रूप नहीं दिखाई देता। इस प्रकारके ( तस्मै वाताय ) वायुके लिये ( हविषा) हवनद्वारा पवित्रता ( विधेम ) करें। वायु ही सब इन्द्रियोंका प्राण सब प्राणियोंका वही आधार इसका रूप नहीं दिखाई देता । परंतु आवाजले इसका पता चलता है। हवन- द्वारा इसकी पवित्रता करनी चाहिये। sto (१९) । प्राण शरीरमें है और वायु जगत में है। शरीरके प्राणका जगत्के वायुके साथ अत्यंत घनिष्ठ संबंध है । जगत्के व्यापक वायुसे बल प्राप्त करके ही शरीरस्थानीय प्राण अपना कार्य करता है । बाह्य वायु दूषित हुआ अथवा पर्याप्त प्रमाणमें न मिला, तो प्राणी मर जाते हैं। इसलिये इस सूक्तमें कहा है, कि हवनादि द्वारा वायुको शुद्ध करके, उस वायुसे बल प्राप्त करके अपने अन्दर प्राणशक्तिका बल बढाना चाहिये। इस प्रकार प्राणका बल प्राप्त करनेसे दीर्व भायु, आरोग्य और बल प्राप्त होकर मनुष्य सुखसे यहांका जीवन-क्रम व्यतीत कर सकता है। - पाठ ५ वाक् ' शब्द वाणीका वाचक है । इसके उदाहरण ये हैं- यद्वाग्वदन्त्यविचेतनानि राष्ट्री देवानां निषसाद मन्द्रा। चतस्त्र ऊर्ज दुदुहे पयांसि क्व स्विदस्याः परमं जगाम ।। (ऋ. ८11००1१०) ( यत् अविचेतनानि वदन्ती ) जो अप्रत्यक्ष पदार्थोंकी बतानेवाली ( देवानां राष्ट्री) देवोंकी प्रकाशक (मन्द्रा) मानंद देनेवाली (वाक् निषसाद ) वाणी प्राप्त होती है, वह ( चतस्रः ऊर्ज पयांसि दुदुहे) चारों दिशाओंके भन्न और दूध देती रहती है । (अस्याः परमं क्व स्वित् जगाम ) इसका परम स्थान कहां है ? वाणी अप्रत्यक्ष पदार्थोंका भी वर्णन करती है, अग्न्यादि देवोंका वर्णन करती है और मनुष्योंको सब सुख-साधन देती है। चारों दिशाओं में इससे सुखसाधन प्राप्त हो रहे हैं, इसका प्रारंभिक कारण कहां है, इसका पता लगाना चाहिये । मात्माकी प्रेरणा ही इसका मूल कारण है। वाक्का दूसर उदाहरण यहां देखिये- - (२०) देवीं वाचमजनयन्त देवास्तां विश्वरूपाः पशवो वदन्ति । सा नो मन्द्रेषमूर्ज दुहाना धेनुवांगस्मानुप सुष्टुतैतु॥ (र. ८11००१) ( देवाः देवीं वाचं अजनयन्त ) देवाने दिव्य वाणीको उत्पन्न किया। (तां विश्वरूपाः पशवः वदन्ति ) उस वाणीको सब आकारवाले पशु बोलते हैं । ( सामन्द्रा) वह भानंददायक वाणी ( नः इषं ऊर्ज दुहाना) हम सबको अन्न और रसोंको देती हुई ( धेनुः वाक् ) गौके समान वाणी ( सुष्टुता ) प्रशंसित होती हुई ( अस्मान् उपैतु ) हमारे पास भाजाय । वाणी एक दिव्य शक्ति है,मानो यह देवोंकी बनाई है । पशु, पक्षी, मनुष्य सभी उसको बोलते हैं । यह आनंद देनेवाली वाणी हमारे सुखसाधनोंको बढाती हुई हममें प्रकट हो। गौ गौ शब्दका परिचय पाठकोंको है । यह शब्द गत्यर्थक गम् धातुसे बनता है। इसका यह उदाहरण है- गौरमीमेदनु वत्सं मिपन्तं मूर्धानं हिङकृणोन्मातवा उ। सृक्वाणं धर्ममभि वावशाना मिमाति मायुं पयते पयोभिः ।। (ऋ. १११६१२८) ( भिषन्तं वसं गौः अनु अमिमेत् ) आंख खोलकर देखनेवाले बछडेके लिये गाय शब्द करती है । ( सातदै उ मूर्धानं हिलाकृणोत् ) प्रेमके लिये निश्चयसे लिपर हिंकार शब्द करती है। ( सवरणं धर्म शान वावशाना) सुखके रसले अर्थात् चाटनेने प्यार करती हुई (मायु मिमाति ) प्रेमका शब्द करती है । और ( पयोभिः पयते ) दुग्धकी धाराओं पुट करती है। इस मंत्र में मौका बछडे के साथ जो अपूर्व रेल रहा है, उसका काव्यमय वर्णन किया है। इस मंसके अलंकारिक नीतिले जननेवाले दूसरे अर्थ अनेक हैं, परंतु उनका विचार यहां नहीं हो सकता। लेघ और वाणीः अर्थ उनमें - ।

(२१) हैं। - । इस मंत्रके कुछ शब्दोंका विशेष अर्थ- १ मिषन् = आंख खोलकर देखनेवाला। - मान्य करने के लिये, शुद्ध करनेकी इच्छासे, प्रेम करनेके लिये, शुद्ध करने के लिये। जिह्वासे चाटकर शुद्ध करनेके २ मातवै लिये। , अ+कया - ३ सृक्वाणं धर्म- मुखकी गर्मी, मुखमें जो लालारस है उसका प्रेम। गौ इसी प्रेमसे बछडेको चाटती है। ४ मायु: = शब्द, आनंद या प्रेमका शब्द, प्यारा शब्द । अन्या शब्द अहन्तव्य, अहननीय, हनन करनेके लिये अयोग्य, अवध्य ' इस अर्थमें भाता है। यह गौका वाचक होनेसे गो अवध्य है, यह भाव स्पष्ट होता है। इसका उदाहरण यह है- सूयवसाद्भगवती हि भूया अथो वयं भगवन्तः स्याम । अद्धि तृणमन्ये विश्वदानी पिब शुद्धमुदकमाचरन्ती ॥ (र, १११६४१४०) है ( भये ) अवध्य गौ ! (सूयवसात् भागवती हि भूयाः) उत्तम घास खानेवाली भाग्यवान् हो, (थो वयं भगवन्तः स्याम ) पश्चात् हम भी भाग्यवन्त बनेंगे। ( तृणं अद्धि ) बास खा और (आचरन्ती) घूमती फिरती हुई (विश्वदानी शुद्धं उदकं पिब) सदा शुद्ध जल- पान कर। गौ सदा उत्तम घास खावे, शुद्ध जल पीने और तेजस्वी होवे । इसका दूध पीनेसे मनुष्य भी भाग्यवान् होंगे। इस मंत्र के कुछ शब्दोंका भाव अब देखिये- १ सूबर साद् (सु+यवस+मद् उत्तम घास खानेवाली। २ भगवन्तः - भाग्ययुक्त, आरोग्ययुक्त, शोभायुक्त ! ROM (२२) - ३ विश्व-दानी= सर्वदा, सदा । ४ आचरन्ती= चलनेवाली, घूमनेवाली, भ्रमण करनेवाली। इसका दूसरा उदाहरण देखिये- हिंकृण्वतीवसुपत्नी वसूनां वत्समिच्छन्ती मनसाभ्यागात् । दुहामश्विभ्यां पयो अध्न्येयं सा वर्धतां महते सौभगाय ॥ (ऋ. ११६४१२७) ( वसनां वसुपत्नी) वसुओंकी पालनकी ( मनसा वत्सं इच्छन्ती) मनसे बछडेकी इच्छा करनेवाली, (हिंकृण्वती अभ्यागात् ) हिंकार करती हुई आती है। (इयं अध्न्या ) यह अवध्य गौ (अश्विभ्यां पयः दुहा) आश्विदेवोंके लिये दूध देवे तथा ( सा महते सौभगाय वर्धताम् ) वह बडे ऐश्वर्य के लिये बढे। इस मंत्र में गौका महत्त्व उत्तम प्रकार वर्णन किया है। अश्विनौ अश्वेिदेव घुस्थानीय हैं। इस शब्दका नित्य द्विवचन होता है । एक- वचन तथा बहुवचन कभी नहीं होता। इस शब्दकी व्युत्पत्तियां इस प्रकार होती हैं- १ न्यूश्नुवाते सर्व रसेन अन्यो ज्योतिषाऽन्यः = सब व्यापते हैं। .. एक रहले और दूसरा तेजसे । २ अश्वेः अश्विनौ अश्वशक्तियोंसे युक्त होनेके कारण इनको अश्विना कहते हैं अश्विदेव कौन हैं ? यावापृथिवी हैं, ऐसा कईयोंका सच है । अहोरात्र हैं ऐसा दूसरे कहते हैं। सूर्यचंद्र हैं, ऐसा कई मानते हैं । पुण्य कर्म करने- वाले राजा हैं, ऐसा ऐतिहासिकोका मत है। इसका उदाहरण यह है। प्रातर्युजा वियोधयाश्विनावेह गच्छताम् । अस्य सोमस्य पीतये ॥ (ऋ. १२२ १) (२३) -- - (प्रातः-युजौ अश्विनौ ) प्रात:कालसे संबंध रखनेवाले अश्विदेवो! (वि बोधय) विशेष रीतिसे जगा दो। ( अस्य सोमस्य पीतये) इस सोमके पानके लिये ( इह आ गच्छताम् ) यहां आओ। उपस् वश्' इच्छा या कान्ति अर्थवाला धातु है, इससे 'उस' बनकर उससे उषा, उषस् ' ये शब्द होते हैं। इसका उदाहरण यह है- उषस्तच्चित्रमा भरास्मभ्यं वाजिनीवति । येन तोकं च तनयं च धामह ।। (ऋ. १९२११३) हे ( वाजिनीवति उषः) हे बलयुक्त उषा ! (अस्मभ्यं तत् चित्रं आ भर) हम सबके लिये यह चाहनेयोग्य धन दे, ( येन तोकं च तनयं च धामहे ) जिससे बालबच्चोंका धारण-पोषण करेंगे इस मंत्रके कुछ शब्दोंके अर्थ- १ चित्रं - ( चायनीयं, महनीयं ) चाहनेयोग्य, इच्छा करनेयोग्य । २ वाजिनीवती = अजयुक्त, बलशालिनी । उषःकालका समय बल बढानेवाला है, इसलिये इससे पूर्व उठकर इससे बल प्राप्त करना चाहिये। इस समय सोना कभी योग्य नहीं जो सोयेगा वह उक्त शक्किसे वंचित रहेगा। । RE- पाठ वात आ वातु भेषजं शम्भु मयोभु नो हृदे । प्र ण मायूँपि तारिषत् ॥ (ऋ. १०.१८६१) ( वातः ) वायु ( भेषजं ) रोगनाशक औषधिको ( आ वातु ) लाता है। वह वायु (शम्भु ) शांति देनेवाला और ( हृदे) हृदयकी ( मयोभु ) प्रसन्नता और नीरोगता करनेवाला है, (नः हम सबकी ( मायूंषि ) आयु यह वायु (प्रतापित् ) दी बनाता है।

(२४) शुद्ध वायु रोग दूर करनेवाला औषधि ही है । वही हृदय और मनको शांति देनेवाला है, आनंद-प्रसन्नता उसीसे प्राप्त होती है। उत वात पितासि न उत भ्रातात नः सखा। स नो जीवातवे कृधि॥ यददो वात ते गृहे३ ऽमृतस्य निधिर्हितः। ततो नो दहि जीवसे ॥ (ऋ. १०११८६।२-३) हे वायो ! तू (नः पिता अलि ) हमारा पिता अर्थात् रक्षक है, (भ्राता) भाई है, और ( सखा ) मित्र है, इसलिये ( जीवातवे) हमारी दीर्घ भायुके लिये सहायता दो। हे ( वात ) वायो ! जो तेरे (गृहे) घरमें अमृतका ( निधिः ) खजाना रखा है, वह (नः) में ( जीवसे ) दीर्व जीवनके लिये ( देहि ) दो। उसकी प्राप्तिसे हम दीर्घ आयुका अनुभव करेंगे। इस सूक्त में स्पष्ट कहा है कि वायुझे अंदर अमृतका निधि है, और उसकी प्राप्ति होनेसे दीर्घ आयु प्रात होती है। वेदका उपदेश इतना सरल है कि उसमें कोई संदेह ही नहीं है । शुद्ध बायुका सेवन करनेसे अमृत प्राप्त होता है । यह बात यदि हरएक मनुष्य जान लेगा, तो वह तंग गलीके तंग मकान में कदापि निवास नहीं करेगा, और हवादार मकानमें रह- कर निलंदेह दीर्घजीवी बनेगा। यह वायु-सूक्त ऋग्वेदके दशम मंडल में है। इसकी देवता वायु और ऋधेि 'उलो वातायनः ' है। 'वातायन ' शब्दका अर्थ खिडकी, झरोखा, वारजा, उसारा, दहलीज, ज्योढी, चना, छत्ता, गुंबजदार घर, मंडपाकार घर, बारादरी, छन्ना, हुई छत, बराहा'। 'उल का अर्थ खुला, नमन करनेयोग्य, माने जानेवाला, गतिमान् ।' उक्त दोनों शब्दों अर्थ मिलानेले ' उलो वातायन:' का अर्थ निम्न प्रकार प्रतीत होता है- '. खुली खिडकी, सुला वरारदा, खुला छता. खली बारादरी" इत्यादि। - . सुली .

(२५) विचारसे इस सूक्तमें तो यह बात स्पष्ट हो रही है कि खुली खिडकी रखनेसे उत्तम हवा अन्दर आकर अन्दर रहनेवालों को अमृतका निधि अर्पण करती है । इसलिये गृहरचना ऐसी होनी चाहिये, कि जिससे खुली हवा घरमें भाजाय और घरमें रहनेवालोंको सुख, भारोग्य और दीर्घ जीवन देवे। प्रविशतं प्राणापानावनड्वाहाविव व्रजम् । अयं जरिम्णः शेवधिररिष्ट इह वर्धताम् ॥ ( अथव० ७१५३६५) (प्राणापानौ ) प्राण और अपान ( प्रविशतं ) अंदर घुसे (इव ) जैसे (अनड्वाही ब्रज) बैल गोशालामें घुसते हैं। ( अयं) यह (जरिम्णः शेवधिः ) वृद्धताका निधि ( अ-रिष्टः) बीचमें ही नष्ट न होता हुआ ( इह ) यहां (वधतां) बढे । प्राणायामसे प्राणापानका बल बढ़ता है। प्राणापान बलिष्ठ होनेसे दीर्घ आयुष्य प्राप्त होता है। अविर्न मेषो नसि वीर्याय प्राणस्य पंथा अमृतो ग्रहाभ्याम् । सरस्वत्युपवाकैानं नस्यानि वहिबदरै जान ।। (वा. य. १९९०) ( मेषः न ) मेंढेके समान लडनेवाला ( अविः ) संरक्षक प्राणवायु वीर्य के लिये ( नसि) नाकमें रखा है। (ग्रहाम्यां ) श्वास-उच्छ्वासरूप दोनों प्राणोंसे प्राणका अमृतमय मार्ग बना है। (बदरैः उपवाकैः ) स्थिर स्तुतियों द्वारा ( सरस्वती) प्रवाहमयी सुषुम्ना नाडी ( व्यानं ) सर्व शरीर-व्यापक व्यान प्राणका तथा ( नस्यानि) नालिकाके साथ संबंध रखनेवाले अन्य प्राणोंको ( बहिः जजान ) प्रकट करती है ! स्पर्धा करनेवाले शत्रुझे साथ युद्ध करके उस्का पराजय करनेवाला मेंढा होता है, यही प्रागका कार्य अपने शरीरमें है। सब मात्रियों और .

(२६) शरीरके सब शत्रुओंके साथ लडकर शरीरका आरोग्य नित्य स्थिर रखनेका बडा कार्य करनेवाला महावीर अपने शरीरमें मुख्य प्राण ही है। यह रोगोंके साथ मेंदेके समान लडता है। अविः " शब्दका धात्वर्थ " रक्षक " है । जो सब प्रकारसे रक्षा करता है, वह "अविः" है । इस शरीरकी रक्षा प्राणद्वारा होती है । इसलिये इस प्राणका यहां महत्त्व है। मनुष्यका स्वास्थ्य, आरोग्य, बल, आयु, उत्साह मादि सब प्राणपर ही निर्भर हैं, इसलिये हरएक मनुष्यको चाहिये कि वह अपने अंदर प्राणशक्तिका बल बढावे और रोगोंके साथ युद्ध कर उनका पराभव करके, स्वास्थ्य-संपादनद्वारा अपना आयु और आरोग्य प्राप्त करे। असुनौते पुनरस्मासु चक्षुः पुनः प्राणमिह नो धेहि भोगम् । ज्योक्पश्यम सूर्यमुच्चरन्तमनुमते मृळया नः स्वस्ति । (ऋ० १०१५९।६) 'हे असुनीते ! यही हमारे अंदर पुनः चक्षु प्राण और भोग धारण करो। सूर्यका उदय हम बहुत देरतक देख सकें। हे अनुमते ! हम सबको सुखी करो और हमको स्वास्थ्यसे युक्त रखो।' असुकी नीति' अर्थात् 'प्राण-धारण करनेकी रीति ' जब ज्ञात होती है, तब चक्षुकी शक्तिहीन होनेपर भी पुनः उत्तम दृष्टि प्राप्त की जा सकती है। प्राण जानेकी संभावना होने पर भी पुनः प्राणकी स्थिरता की जा सकती है । भोग भोगनेकी अशक्यता होनेपर भी भोग भोगनेकी शक्यता हो सकती है। 'असुनीति' अर्थात् प्राण धारण करनेकी रीति जाननेले और उसका अनु- छान करनेसे प्राणको शक्ति बडती है। श्वास, उच्छ्वास तथा अंदर और बाहर कुंभक इनका विचार असुनीति अथवा प्राणनीति शास्त्रमें होता है। प्राणका संबंध हरएक मनुष्य के साथ होनेसे हरएकको इस असु-नीति-शास्त्रका अध्ययन और विचार करना चाहिये और हरएकको इल शास्त्र के नियम जानकर, तदनुसार मनुष्ठान करनेद्वारा अपने प्राणका बल बढाना चाहियो ।

(२७) इस मंत्रमें 'मसु-नीति ' के साथ ' सूर्य ' का संबंध वर्णित हुआ है। सूर्य से ही प्राणशक्ति प्राप्त होती है और दीर्घ आयु भी वही देता है। सूर्यप्रकाशको छोडकर असुनीतिका अनुष्ठान हो ही नहीं सकता। इसलिये प्राणधारणकी रीतिका विचार और अनुष्ठान करनेवाले अपने आपको सूर्य- प्रकाशसे दूर न रखें। असुनीते मनो अस्मासु धारय जीवातवे सुप्रतिरा न आयुः । रारन्धि नः सूर्यस्य सहशि वृतेन त्वं तन्वं वर्धयस्व ॥ (ऋ० १०१५९५) हे ( असुनीते ) प्राणनीते ! ( अस्मासु ) हमारे अंदर ( मनः धारय ) मनको धारण कर और ( जीवातवे) दीर्घ जीवनके लिये भायु (अनु सु प्रतिर ) अनुकूलताके साथ उत्तम रीतिसे बढाओ। हमें सूर्य के ( संदृशि ) दर्शन अर्थात् प्रकाशमें (रारंधि ) आनंदपूर्वक रख और धृतसे शरीर बढा! आयुष्य बढानेकी रीति इस मंत्रमें वर्णन की है। पहिली बात मनकी धारणाकी है। मनकी धारणा ऐसी दृढ और पक्की करनी चाहिये कि, '' मैं योगसाधनादि द्वारा अवश्य ही दीर्घ आयु प्राप्त करूंगा, तथा किसी कारण भी मेरी आयु क्षीण नहीं होगी।" इस प्रकार मनकी पक्की धारणा करनी चाहिये। (१) बी पीकर शरीरको बढाना, शरीर सुदृढ पुष्ट और बलवान् बनाना (२) सूर्यप्रकाश के साथ अपने शरीरका संबंध रखकर आरोग्य, दीर्घ आयु और उत्साह प्राप्त करना तथा (३) दीर्घ जीवनकी धारणा मनके अंदर स्थिर करना । ये असुनीति अर्थात् प्राणनीतिके शास्त्रके तीन नियम इस मंत्रद्वारा प्रकट हो गये हैं। दीर्व आयुकी इच्छा करनेवाले मनुष्य इन नियमोंसें अपना लाभ सिद्ध करें। प्राण प्राण त्रायस्वासो असवे मृड । निते नित्यानः पाशेभ्यो मुश्च ।। ( अपवं ० १९६४४:४) (२८) हे प्राण ! हमारे प्राणका (त्रायस्व ) रक्षण करो। हे (मसो)जीवन | मृड) हमारे जीवनको सुखमय बनाओ। हे (निते) मनियम! निर्ऋत्याः पाशेभ्यः ) भनियमके पाशोंसे ( मुञ्च ) हमें बचाओ। अपनी प्राण-शक्तिका संरक्षण करना चाहिये, अपने जीवनको मंगलमय बनाना चाहिये तथा निर्ऋतिके जालोंसे बचना चाहिये । 'ऋति' का अर्थ 'प्रगति, उन्नति, सन्मार्ग, उत्कर्ष, अभ्युदय, योग्यता, सत्य, सीधा मार्ग, संरक्षण, पवित्रता' इतना है। इसके विरुद्ध जो कुछ अपवित्र है, वह निति' नामसे वेदमें प्रसिद्ध है । इस निर्जति अर्थात् अनियमसे ही सब दुःख और कष्ट होते हैं । इस कारण इस निर्ऋतिके अनियमयुक्त मार्गसे जाना किसी को योग्य नहीं है। ऋत अथवा ऋतिके नियमोले प्राणका बल बढाना और निर्गति अथवा अवनतिके कारणों को दूर करना, यही उन्नतिका सीधा नियम है। अज्ञानी मनुष्य निति के पाशोंमें बांधे जाते हैं, परंतु ज्ञानी मनुष्य उन पाशोंको तोडकर स्वतंत्रताले अपनी उमति सिद्ध करते हैं। प्राणपा मे अपानपाश्चक्षुप्पाः श्रोत्रपाश्च मे। वाचो मे विश्वभेषजो मनसोऽसि विलायकः ॥ (वा. य० २०३४) तू मेरे प्राण, अपान, चक्षु, श्रोत्र मादिका संरक्षक है । मेरे वाणीके दोष दूर करनेवाला तथा मनको शुद्ध और पवित्र करनेवाला है। धान्यमति धिनुहि देवान प्राणाय त्वोदानाय वा व्यानाय त्या दीर्धामनु प्रलिदिमायुक्षे धा । (वा० २० १२० ) प्राणाय मे वादा वर्चसे पवस्व व्यानाय ले बोंदा वर्चसे। पवस्त्रोदानाय से वचोदा वर्चसे पवस्व ॥ ( य० ७।२७) तू (धान्य ) धन्य है। इसलिये देवोंको धन्य करो। प्राण, उदान और व्याज जिथे तरा स्वीकार करता हूं। आयुष्यके लिये दीर्घ मर्यादा धारण करता हूं। मेरे प्राण, व्यान और उदानके तेजकी वृद्धि लिये , । शुद्ध बनो।

(२९)
पाठ ७
सूर्या
-
सूर्यप्रभा 'सूर्या' कहलाती है । इसका उदाहरण देखिये-
सुकिंशुक शल्मलिं विश्वरूपं हिरण्यवर्ण सुवृतं सुचक्रम् ।
आ रोह सूर्ये अमृतस्य लोकं स्योनं पत्ये वहतुं कृणुष्व ।।
( ऋ० १०४५/२०)
हे ( सूर्य ) सूर्यप्रभा ! ( सु-किंशुकं शरमाल ) उत्तम चमकदार निर्मल,
( विश्वरूपं हिरण्यवर्ण ) नाना आकारवाले सुनहरे रंगोंसे युक्त, (सुवृतं
सुचक्र ) उत्तम ढंके हुए और उत्तम चक्रोंसे युक्त (अमृतस्य लोकं आ रोह)
अमृतके लोकमें मारूढ हो और (वहतुं पत्ये स्योनं कृणुष्व ) यह विवाह
पतिके लिये सुखकारी बना ।
इस मंत्र के कुछ शब्दोंका विशेष भर्थ अब देखिये-
१ सुकिंशुकं- (सु+किंशुकं ) उत्तम पुष्पोंसे शोभित, चमकदार, पुष्पों
से सुशोभित ।
२ शलमाल ( शल्+मलि = शब+ मल)
= शब+मल )= मलरहित ।
३ विश्वरूप- अनेक साकारोंसे युक्त । अनेक प्रकारकी सुंदर सजावटसे
४ हिरण्यवर्ग- सुवर्णके वर्ण के समान वर्णमाला ।
सूर्य अपनी पुत्री “ प्रमा " चन्द्रमाको अर्पण करता है, उस समय
वह प्रमा सुदर रथपर चढकर पतिके घर जाती है। इत्यादि अलंकार
इस मंत्र पाठक देखें । इस वर्णन मंत्र वैदिक विवाह-पद्धतिके प्रकाशक
होते हैं।

(३०)
सविता
-
सविता सूर्यका नाम है । इसकी निरुक्ति इससे पूर्व बतायी है । अब
इसका एक और उदाहरण देखिये.
विश्वा रूपाणि प्रतिमुञ्चते कविः प्रासावीद्भद्रं द्विपदे चतुष्पदे
विनाकमख्यत्सविता वरण्योऽनु प्रयाणमुषसो वि राजति ॥
( ऋ० ५/८२)
( कविः विश्वा रूपाणि प्रति मुञ्चते) कवि संपूर्ण रूपोंको व्यक्त करता
है । (द्विपदे चतुष्पदे भद्रं प्रासावीत् ) द्विपाद और चतुष्पादोंके लिये
कल्याण अर्पण करता है। ( वरेण्यः सविता नाकं अख्यत् ) श्रेष्ठ सविता
सुखको प्रकाशित करता है। ( उषसः प्रयाणं अनु वि राजति) उषाके
प्रयाणके साथ विशेष प्रकाशता है।
इस मंत्रके कुछ शब्दोंका विशेष स्पष्टीकरण देखिये-
कवि, दूरदर्शी, बुद्धिमान् । (क+वि) क नाम उदकका
और वि नाम चलानेवाला, अर्थात् मेघोंका चालक । सूर्य मेघोंका
प्रकाशक होनेसे उसका यह नाम है।
(२) नाक ( न+ अ + क)= जहां दुःख नहीं।
सूर्य
सूर्य शब्द भी उसीका वाचक है। इसका उदाहरण यह है-
उदु त्यं जातवेदसं देवं वहन्ति केतवः।
दृशे विश्वाय सूर्यम् ॥ ( ऋ० १५०११)
त्यं ) उस (जातवेदसं ) ज्ञान देनेवाले (देवं सूर्यं ) सूर्यदेवको
(विश्वाय दृशे ) विश्वके दर्शनके लिये ( केतवः उद्वहन्ति ) किरण ऊपर
दर्शाते हैं।
इसी देवताका और एक मंत्र देखिये-
(१) कवि
-

(३१) चित्रं देवानामुदगादनीकं चक्षुर्मित्रस्य वरुणस्यायः । आ प्रा द्यावापृथिवी अन्तरिक्ष सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च ।। (ऋ० १११५१) ( देवानां चित्रं अनीकं उदगात् ) यह देवोंका दर्शनीय तेज उदयको प्राप्त हुआ है । यह मिन्न, वरुण, अग्नि आदि देवोंका (चक्षुः) ज्ञापक है अथवा प्रकाशक है । ( धावापृथिवी अन्तरिक्षं) द्यावा, पृथिवी तथा अंतरिक्षको इस सूर्यने (था प्राः ) परिपूर्ण कर दिया है । (सूर्यः जगतः तस्थुषः च आत्मा) सूर्य जंगम और स्थावरका भात्मा है। पूषा पोषण करनेवाली देवता 'पूषा ' कहलाती है। इसका यह उदाहरण शुक्रं ते अन्यद्यजतं ते अन्यद्विषुरूपे अहनी द्यौरिवासि । विश्वा हि माया अवसि स्वधावो भद्रा ते पूषनिह रातिरस्तु॥ (ऋ०६५८) हे (पूषन् ) पूषा देव ! (ते अन्यत् शुक्र) तेरा एक रूप प्रकाशमान है और ( ते अन्यत् थजतं ) तेरा दूसरा रूप यज्ञमय है किंवा यज्ञसे जो धूवां चलता है उसके समान कृष्णवर्ण है । अर्थात् ये { वि-धु-रूपे पहनी ) विरुद्ध रूपवाले दिन (अथवा श्वेत रंगवाला दिन और कृष्ण वर्णवाली रात्रि) ये ही तेरे रूप दौखते हैं। (धौः इव असि ) द्युलोकके समान प्रकाशमान हो । हे (स्व-धा-वः) अपनी शक्तिसे धारण करनेवाले देव ! (हि विश्वाः मायाः अवसि) संपूर्ण कुशलताओंकी तू रक्षा करता है। (ते भद्रा रातिः इह अस्तु ) तेरा कल्याणमय दान यहां हमारे लिये होवे। इस मंत्रके कुछ शब्दोंका अर्थ-. १ स्वधावः = स्वधावन् ( स्वधा-वन् ) अन्नवान् । ( स्व + धा+ वन् ) अपनी धारण शक्तिसे युक्त उदकका धारण करनेवाला।

(३१)
२ माया = प्रज्ञान, ज्ञान, शिल्प, कुशलता, कारीगरी ।
३ भद्रा (भाजनवती) योग्य, पात्र, यथायोग्य कल्याण करने-
वाली।
४ रातिः = दान ।
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विष्णुः
विष्णु शब्दकी व्युत्पत्तियां इस प्रकार होती हैं-
१ विष्णुः विषितः भवति = जो व्याप्त होता है
२ विशति इति विष्णुः = प्रविष्ट होता है ।
३ व्यश्वाति इति = सर्वत्र व्यापता है।
सर्वत्र व्यापक होना, सर्वत्र प्रवेश करना आदि इसके अर्थ है । इसका
उदाहरण देखिये-
इदं विष्णुार्वं चक्रमे त्रेधा नि दधे पदम् ।
समूळ्हमस्य पांसुरे॥
(ऋ० १।२२।१७)
(विष्णुः इदं वि चक्रले ) यह व्यापक देव इस सबमें विक्रम करता है।
( त्रेधा पदं नि दधे ) तीन प्रकार अपने पदको रखता है । ( अस्य पांसुरे
समूढं) इसका किरण अंतरिक्षसे है।
इसका भावार्थ ऐसा है कि विष्णुदेव सर्वत्र व्यापक है, इस कारण वह
यहांले हरएक पदार्थसें अपना विक्रम दर्शाता है। जो तत्त्वज्ञानी लोग है
उनको व्यापक देवका साक्षात्कार हरएक पदार्थ में होता है। इसका पद
तीन स्थानों में रखा हुआ है । स्थूल, सूक्ष्म, कारण जात् के रूपमें यह अनु-
भव में माता है ! स्थूल जगत् प्रत्यक्ष होनेके कारण उसमें उसका अनुभव
मनुष्य कर सकता है। इसका आदि कारण कुछ अवश्य होगा, ऐसे तर्कसे
आदिकारणमें उनकी शक्ति होने का अनुभव भी हो सकता है। परंतु बीचके
रजोजोबसें उसका कार्य देखना ठिन है।

(३३)
यही बात सूर्यके विषयमें भी घटती है। देखिये सूर्य द्युलोक में है, वह
प्रत्यक्ष है, भूलोकमें उसके किरण भाते हैं और पदार्थ मात्रपर गिरते हैं,
वहां उनकी प्रत्यक्षता है। परंतु बीचके अंतरालमें सूर्य किरण प्रत्यक्ष नहीं
दीखते।
इस प्रकार पाठक विचार करके अध्यात्ममें और अधिदैवतमें मंत्रोंके
अर्थ समझें। मंत्रोंका मुख्य सामान्य अर्थ इस प्रकार देखना ही वेदज्ञानके
लिये अत्यंत आवश्यक है।
शब्दार्थ
त्यं ( तं)
उसको।
केतु किरण, ज्ञान।
दर्शनके लिये।
चित्रं = विलक्षण आश्चर्यकारक ।
जगत्
चलनेवाला, जंगम ।
तस्थिवान् ( तस्थुष )
स्थिर, स्थावर ।
दृशे 3
-
--
पाठ ८
सूर्धानमस्य संसीव्यायर्वा हृदयं च यत् ।
मस्तिष्कादूर्ध्वः प्रेरयत् पवमानोअधे शीर्षतः ॥
( अथव० १०।२।२६)
( अस्य ) इसका ( भूर्धानं हृदयं च ) मस्तिष्क और हृदय (सं) एक
करके (सीव्य) सीकर ( पवमानः ) पवित्र ( अथर्वा ) स्थितप्रज्ञ योगी
( शीर्षतः अधि । निरके उपर ( मस्तिका) मस्तिष्कसे ( ऊर्ध्वः परे
। मेरयत्) प्रेरित होता है। अर्थात् ( १ ) मस्तिष्क और हृदयको एक
३ [सं. पा. भा. २३]

(३४) बनाकर सम उन्नत रखना, (२) और पवित्र बनकर मस्तिष्कके परे अर्थात् तककी भूमिसे परे कूदना, ये दो उपदेश इस मंत्र में अत्यंत महत्त्वपूर्ण आगये हैं। किसी अन्य धर्मग्रंथमें इस प्रकार इस बातको साफ नहीं किया है, कि जो हृदय और मस्तिष्कको एक करनेके लिये बताया है। मस्तिष्कका कार्य तर्क-वितर्क-कुतर्क करना है, और हृदयका कार्य भक्ति करना है। दोनोंकी सम उतिसे उन्नति और विषमतासे हानि होती है। इस मंत्रका 'अथर्वा' शब्द स्थितप्रज्ञ योगीका वाचक है। वह योगी अपने प्राणको मस्तिष्कमें चढाता है और भात्मानंदका अनुभव लेता है। इस स्थितिको प्राप्त करने के लिये भी हृदय और मस्तिष्कको सम उन्नत करना आवश्यक है। प्राणद्वारा मनकी स्थिरता संपादन करनेका योगमार्ग इस मंत्रमें कहा है। यो वै तां ब्रह्मणों वेदामृतेनावृतां पुरम् । तस्मै ब्रह्म च ब्राह्माश्च चक्षुः प्राणं प्रजां ददुः॥ न वै तं चक्षुजेहाति न प्राणो जरसः पुरा। पुरं यो ब्रह्मणो वेद यस्याः पुरुष उच्यते ॥ (अथर्व० १०१२।२९-३०) जो उपासक भक्त अमृतसे वेष्टित ब्रह्मकी नगरीको जानता है, उसको ब्रह्म और (ब्रामाः ब्रह्मजनित इतर देवता चक्षु, प्राण और प्रजा देते हैं। चक्षुरादि इन्द्रिय, प्राण अर्थात् आयु वृद्धावस्थाके पूर्व उसको नहीं छोडते, जो ब्रह्मकी नगरीको जानता है। तद्वा अथर्वणः शिरो देवकोशः समुन्जितः । तत्प्राणो अभि रक्षति शिरो अन्नमयो मनः ।। ( अथवै० १०१२।२७) अथर्वाका जो सिर है, वह ( समुग्जितः देवकोशः ) देवों का सुरक्षित कोश है। प्राण उस मिरका संरक्षण करता है।'

(३५) इस प्रकार प्राणका महत्व है। प्राणशक्तिकी स्वाधीनता होनेसे शरीरकी संपूर्ण शक्तियां आधीन हो जाती हैं। और प्राणशक्तिकी स्वाधीनता करने- वालेको योगसाध्य सब सिद्धियां मिलती हैं। प्राणके साथ मन और मनके साथ प्राण समिश्रित हुए हैं। इसलिये प्राणके विचारके पश्चात् अब मनका विचार करना चाहिये । देखिये, मनके विषयमें ऋग्वेदके निम्न सूक्तमें क्या कहा है- यत्ते यमं वैवस्वतं मनो जगाम दूरकम् । तत्त आ वर्तयामसीह क्षयाय जीवसे ॥(ऋ. १०५८।१) ( वैवस्वतं यमं ) तेजस्वी नियमन करनेवाला ( यत् ते मनः ) जो तेरा मन (दूरकं जगाम ) बहुत दूर गया था ( तत् ते ) वह तेरा मन (इह क्षयाय जीवसे ) यहां निवास और जीवनके लिये ( आवर्तयामसि ) वापस लाता हूं। यत्ते दिवं यत्पृथिवीं मनो जगाम दूरकम् । तत्त आ वर्तयामसीह क्षयाय जीवसे ॥ ऋ०।१०५८२) जो तेरा मन धुलोक और पृथिवीमें दूर दूर घूमता रहा है, उसको यहां निवास और जीवन के लिये वापस लाता हूं। यत्ते भूमि चतुर्भृष्टिं मनो जगाम दूरकम् । तत्त आ वर्तयामसीह क्षयाय जीवले ॥ ( ऋ० १०५८।३) जो तेरा मन ( चतुःसृष्टिं ) चारों दिशाओं में भूमिपर दूर दूर भट- कता रहता है, उसको यहां निवास और जीवन के लिये वापस लाता हूं। यत्ते चतस्त्रः प्रदिशा मनो जगाम दूरकम् । तत्त आ वर्तयामसीह क्षयाय जीवसे ।। ऋ० १०५८४)

(३)
जो तेरा मन ( चतस्रः प्रदिशः) चारों उपदिशाओं में दूर दूर भटकता
रहता है, उसको यहां निवास और जीवनके लिये वापस लाता हूं।
यत्ते समुद्रमर्णवं मनो जगाम दूरकम् ।
तत्त आ वर्तयामसीह क्षयाय जीवसे ॥
( ऋ० १०५८५)
जो तेरा मन ( अर्णवं समुद्रं ) बडे गहन समुद्र में दूर दूर भटकता रहा
उसको यहां निवास और जीवनके लिये वापस लाता हूं ।
यत्ते मरीचीः प्रवतो मनो जगाम दरकम् ।
तत्त आ वर्तयामसीह क्षयाय जीवसे ॥
( ऋ० १०१५८१६)
जो तेरा मन (प्रवतः मरीचीः ) फैले हुए किरणोंमें दूर दूर गया था,
उसको यहां निवास और जीवनके लिये वापस लाता हूं।
यत्ते अपो यदोषधीमनो जगाम दूरकम् ।
तत्त आ वर्तयामसीह क्षयाय जीवसे ॥
( ऋ० १०.५४७)
जो तेरा मन ( अपः) जल और औषधियोंमें दूर दूर भटकता रहता है,
उसको यहां निवास और जीवनके लिये वापस लाता हूं।
यत्ते सूर्य यदुपसं मनो जगाम दूरकम् ।
तत्त आ वर्तयामसीह क्षयाय जीवसे ॥
( ऋ० १०१५८५८)
जो तेरा मन सूर्य और उषाकी ओर दूर दूर गया था, उसको यहां निवास
और जीवन के लिये वापस लाता हूं।
यत्ते पर्वतान्वृहतो सनो जगाम दूरकम् ।
तत्त आ वतंयामसीह क्षयाय जीवसे ॥
(ऋ० १०१५८१९)

(३७)
जो तेरा मन बडे बडे पहाडोंमें दूर दूर भटकता रहता था, उसको यहाँ
निवास और जीवनके लिये वापस लाता हूं।
यत्वे विश्वमिदं जगन्मनो जगाम दूरकम् ।
तत्त आ वर्तयामसीह क्षयाय जीवसे ॥
(ऋ० १०॥५८।१०)
जो तेरा मन इस सब जगत्में दूर दूर भटकनेके लिये गया था, उसको
यहां निवास और जीवनके लिये वापस लाता हूं।
पाठ ९
यत्ते पराः परावतो मनो जगाम दूरकम् ।
तत्त आ वर्तयामसीह क्षयाय जीवसे ॥
(ऋ० १०५८।११.)
जो तेरा मन (परावतः पराः ) हमारे ज्ञानके भी परले स्थानों में दूर
दूर भटकता रहा था, उसको यहां जीवन और निवासके लिये वापस लाता
यत्ते भूतं च भव्यं च मनो जगाम दूरकम् ।
तत्त आ वर्तयामसीह क्षयाय जीवसे ॥
( ऋ० १०॥ ५८५१२)
जो तेरा मन भूत और भविष्यके विषयमें दूर दूर घूमता रहता था,
उसको यहां निवास और जीवनके लिये वापस लाता हूं।
मनको एकाग्र करनेके लिये किस प्रकार उसको वापस लानेका प्रयत्न
होना चाहिये, इसकी सूचनाएं इस सूक्तमें पाठक देख सकते हैं । जो पाठक
मनकी एकाग्रता करनेका यत्न कर रहे हैं, उनको इस सूक्तसे बहुत बोध

(३८) प्राप्त हो सकता है। मनकी एकाग्रता करनेके समय ही उसकी चंचलताका ठीक ज्ञान होता है । मन क्षणार्धमें दूर दूर भटकनेके लिये चला जाता है। उसको पुनः एक स्थानपर लानेका दृढ अभ्यास करनेके विना उसको वश करनेका और कोई उपाय नहीं है । अभ्यास और वैराग्यसे ही मनकी एका- ग्रता सिद्ध होती है । अभ्यासका अर्थ वारंवार प्रयत्न करना है और वैराग्य- का भाव दूसरी बातोंसे मनको हटाकर एक ही कार्यमें लगाना है। इस प्रकार अभ्यास और वैराग्यसे मनको एकाग्रता सिद्ध होनेसे मनुष्य अद्भुत शक्तिसे युक होता है। यह सामर्थ्य उसको इसी समय प्राप्त होता यन्मे छिद्रं चक्षुषो हृदयस्य मनसो वातितृण्णं बृहस्पति तद्दधातु । शं नो भवतु भुवनस्य यस्पतिः ॥ (वा. य. ३६२) (१)(यत्) जो ( मे ) मेरे ( चक्षुषः ) माखका (हृदयस्य ) हृदयका ( वा मनसः ) और मनका (अति-तृण्ण ) अत्यंत फटा हुआ (छिद्रं ) छेद है, ( तत् ) उस ( मे) मेरे दोषको (बृहस्पतिः ) ज्ञान- का अधिपति ( दधातु ) टीक करे। (२) ( यः) जो ( भुवनस्य पतिः) सृष्टिका स्वामी है, वह ( नः ) हम सबका (शं) कल्याणकर्ता भवतु) होवे। (७) हमारे चक्षु आदि बाह्य इंद्रियोंमें, हृदय में और मनमें जो न्यूनता अथवा हीनता छिपी हुई हो वह परमेश्वरकी दयासे दूर होवे । ( २ ) तथा जगदीश हमारा कल्याण करे । हरएक मनुष्य अपने हृदय, मन और चित्तकी परीक्षा करे और देखे कि उसमें कौनसा दोष है, कौनसा छिद्र हुआ है और उसकी अवस्था कैसी है। उक्त प्रकार जहां दोषकी छाया प्रतीत हो, वहां उस दोषको हटावे और अपने हृदयको सदा शुद्ध और निर्मल रखे। क्योंकि हृदयकी शुद्धतासे ही मनुष्यकी श्रेष्ठता और अशुद्धिसे कनिष्टता .. - (३९) सिद्ध होती है । हृदयकी शुद्धताके लिये ज्ञानमय सर्वज्ञ परमात्माकी भक्ति करनी चाहिये । हृदयकी शुद्धताके लिये परमात्माकी भक्तिके विना दूसरा कोई उपाय नहीं है । जितनी भक्तिकी दृढता होगी, उतना मन पवित्र होगा, क्योंकि दयामय परमात्मा भक्तोंके अंतःकरणमें दोष नहीं रखते और भक्तोंको निदोष बनाते हैं । यदि मनमें पापविचार आ जाय, तो उसको किस प्रकार हटाना चाहिये, इस विषयमें निम्नलिखित मंत्रोंका विचार कीजिये और बोध लीजिये । परोऽपेहि मनस्पाप किमशस्तानि शंसलि। परेहि न त्वा कामये वृक्षां वनानि सं चर गृहेषु गोषु मे मनः॥ अथर्व०६४५।१) हे (मनः-पाप) मनके पाप ( परः) दूर (अपेहि ) हट जा। (किं) क्या तू (अशस्तानि ) बुरी बातें (शंसलि ) बताता है ? (परा इहि ) हट जा। (त्वा न कामये ) तुझको मैं नहीं चाहता । (वृक्षान् वनानि ) वनोंमें वृक्षों में ( सं चर ) फिरता रह । ( मे मनः ) मेरा मन (गृहेषु गोषु) घरमें और गो आदि पशुओंकी पालनामें है। नमें पाप विचार जाय, तो उसको उसी क्षण दूर हटाना चाहिये । अपनी प्रबल इच्छाशक्तिसे उस पापविचारको दूर हटाना चाहिये और कभी पापका प्रभाव अपने मनपर होने नहीं देना चाहिये । मनको शुभ विचारले युक्त करके अपने घरकी उन्नति में लगाना चाहिये। अपनी उन्नति अपनेसे ही प्रारंभ होती है । दूसरोंको दोष न देते हुए अपनी शुद्धता स्वयं करनेका दृढ यत्न करना चाहिये । इस विषयमें और देखिये- अपोहि मनसस्पतेऽपक्राम परश्वर । परो नित्या आ चश्व बहुधा जीवतो मनः॥ (म. १०११६४१) हे ( मनसः-पते) मनको पतित करनेवाले कुविचार ! ( अप एहि ) दूर (४०) हो जाओ, (अप काम ) दूर भागो! (परः चर ) परे चलो। (परः नित्याः) दूरके विनाशको ( आ चक्ष्व ) देखो। (जीवतः मनः ) जीवित मनुष्यका मन ( बहु-धा) बहुत सामर्थ्य से युक्त है। मनके अंदर कुविचार, बुरे स्याल माने लगे, तो उनको वहांसे उसी क्षण हटा देना चाहिये । उस बुरे विचारसे जो भविष्यत्में होनेवाली हानि होगी, उसका विचार करके, मनमें अनेक प्रकारकी शक्तियां हैं, यह स्मरण रखकर, कभी गिरावटका विचार पास नहीं आने देना चाहिये। भद्रं वै वरं वृणते भद्रं युञ्जन्ति दक्षिणम्। भद्रं वैवस्वते चक्षुर्बहुना जीवतो मनः ॥ (ऋ० १०१६॥२) (वैवस्वते) तेजस्वी मन ! तू जो (वै वरं वृणते ) निश्चयसे श्रेष्ठ विचार पसंद करता है, वह ( भद्रं ) कल्याण प्राप्त करता है । जो (दक्षिणं युञ्जन्ति ) दक्षताके साथ योजना करता है, वह ( भद्रं ) कल्याण प्राप्त करता है। अपने ( चक्षुः) आंखको । भद्रं ) कल्याणकारक बनाओ। (जीवतः मनः बहु-त्रा ) जीवित मनुष्यका मन बहुत समर्थ है। कल्याणकारक विचार ही पास करना, दक्षताके साथ सब कर्तव्य करना भौर चक्षु भादि सब इंद्रियों को भलाई के मार्गपरसे ही चलाना चाहिये। मनुष्यका मन अनेक प्रकारकी धारणा करता है, इसलिये यदि वह कल्याणकी धारणा करेगा, तो कल्याण प्राप्त करेगा, इस कारण मनमें कभी बुरा विचार खडा होगा, तो मन और शरीरपर उसका बडा हानिकारक परिणाम होता है, इसलिये इस विषयमें बडी सावधानता रखनी चाहिये । इस रीतिसे मन शुद्ध होनेके पश्चात् उसकी शक्ति बढानेका यत्न करना चाहिये । इस विषयमें निम्न मंत्र देखिये। मनस्त आ प्यायतां वाक्त आ प्यायतां प्राणस्त आ प्यायतां। चक्षुस्त आ प्यायतां श्रोत्रं त आ प्यायताम् ॥ (वा० य०६।१५) -

(४१)
.
हे मनुष्य ! (ते ) तेरा (मनः) मन ( मा प्यायतां ) उन्नत होवे ।
तेरी
वाचा उलत होवे। तेरा प्राण उन्नत होवे । तेरा कान उन्नत होवे।
अर्थात् मनुष्यको उचित है, कि वह अपनी शक्तियोंका विकास करे।
मनुष्यके अंदर जो मन, वाणी, प्राण, बांख, कान भादि शक्तियां हैं, उन
सब शक्तियोंकी उन्नति होनी चाहिये । अपनी शक्तिकी उन्नति करनेके
लिये ही मनुष्यका जन्म है।
शब्दार्थ
दूरकं
क्षयः = गति, निवास।
छिद्र - छेद, सुराख।
अतितृण्णं
= अत्यन्त फटा हुभा।
निंदनीय।
निति = भापत्ति, बुरीरीति, दुष्ट व्यवहार ।
दूर।
अशस्त -
पाठ १०
सुश्रुतौ कौँ भद्रश्रुतौ कौँ भद्रं श्लोकं श्रूयासम् ॥
(१० १६२१४)
मेरे कान (सुश्रुतौ) उत्तम उपदेश श्रवण करनेवाले हैं, मेरे कान
कल्याणकी बात सुननेवाले हैं । इसलिये मैं ( भद्रं श्लोकं ) कल्याणमय यशके
विषयमें उपदेश (श्रूयासं) सुनूं ।
कानोंसे ऐसे उपदेश श्रवण करना चाहिये, कि जिससे सदैव अपना
कल्याण हो और मरना यश बढे ।

(४२)
यही नियम संपूर्ण भन्य अवयवोंके कमौके विषयमें यथायोग्य रीतिसे
समझना चाहिये।
सुश्रुतिश्च मोपश्रुतिश्च मा हासिष्टां सौपर्ण चक्षुरजस्रं ज्योतिः।
(भ. १६२१५)
( सुश्रुतिः ) उत्तम बात श्रवण करना और ( उपश्रुतिः ) उसका अंगी-
कार करना, ये दो गुण (मा) मुझे ( मा हालिष्टां ) न छोडें, ( सौपर्ण
चक्षुः) गडके समान तीक्ष्ण दृष्टि मेरी होवे और ( अजस्त्रं ज्योतिः ) सतत
तेजस्विता मुझसें वास करे।
उत्तम उपदेश सुनना, उत्तम उपदेशके अनुसार अपना भाचरण करना,
सूक्ष्म दृष्टिका उदय और तेजस्विता ये चार गुण मनुष्यको अपने अंदर
बहाने चाहिये।
ऋषीणां प्रस्तरोऽसि नमोऽस्तु दैवाय प्रस्तराय ।
(अ. १६१२१६)
तू ऋषियोंका (प्रस्तरः ) प्रसारक है। तुझ (देवाय प्रस्तराय) दिव्य
प्रचारक लिये नमस्कार हो।
ऋषियोंके दिव्य ज्ञानका प्रचारक ऋषिसंतान है। जो दिव्य ज्ञानका श्रेष्ठ
प्रचारक होगा उसका सत्कार करना उचित है।
मूर्धाहं रयीणां मूर्धा समानानां भूयासम् ॥
(अ० १६।३।१)
मैं ( रयीणां मूर्धा ) धनोंका सिर और समान विद्वानों में सिर-स्थानीय
(भूयासं) हो जाऊं।
हरएक मनुष्यको ऐसा प्रयत्न करना चाहिये, कि जिससे उसकी योग्यता
विद्वानों में भी उच्च बन जाय ।

(४३) । विद्या और धनका एकत्र निवास होना इष्ट है। सरस्वती और लक्ष्मी एकत्र रहे, इसीसे मनुष्यकी उन्नति होगी। असंतापं मे हृदयमुर्वी गम्यूतिः समुद्रो अस्मि विधर्मणा ॥ (१० १६३१६) मेरा हृदय ( असंतापं) संतापरहित होवे । ( ग-यूतिः ) इंद्रियोंकी गति ( उर्वी) बडी हो। ( विधर्मणा) विविध धर्मनियमोंके पालन करनेके कारण मैं ( सम् उत्-द्रः) सम्यक् रीतिसे उत्कर्ष के लिये गति उत्पन्न करनेवाला हूं अथवा समुद्र के समान गंभीर हूं। हृदयमें शांति रखनी चाहिये। इंद्रियों और अवयवोंका बल बढाना चाहिये और उन्नति प्राप्त करनेके लिये सदा प्रयत्न करना चाहिये । नाभिरहं रयीणां नाभिः समानानां भूयासम् ॥ ( १० १६४।१) मैं ( स्यीणां नाभिः) धनोंका केंद्र और समान लोगोंका मध्य (भूयासं) हो जाऊं। अपने चारों ओर धनधान्य हो और समान विचारवाले लोक चारों ओर रहें, तथा मैं उस प्रकार सबका केंद्र बनकर रहूं यह इच्छा हरएक मनुष्यको मनमें धारण करनी चाहिये । स्वासदसि सूषा अमृतो मत्वा ॥ ( अ० १६वार) तू (सु-आसत् ) उत्तम अवस्थासे युक्त, ( सूपाः) उत्तम उषःकालोसे युक्त और मयों में अमर है। (१) अपनी अवस्था उत्तम करना, (२) प्रातःकाल उठकर उप:- कालके पूर्व अपना कार्य करनेको सिद्ध होने का नाम उत्तम उपःकालवाला होना है। (३) तथा मरनेवालोंमें अमरभाव अर्थात् मनुष्योंमें देवी-शक्ति से युक्त मन प्रकाशित रखना चाहिये।

(४४)
मधुमती स्थ मधुमती वाचमुदेयम् ।।
(म० १६।२।२)
प्रजाजनों ! तुम (मधुमती स्थ ) मीठे स्वभावसे युक्त हो, मुझे (मधु.
मती वाचं) मीठा भाषण करना उचित है, क्योंकि उसीसे अहिंसामय
शांति सर्वत्र स्थापित होकर मीठे व्यवहारसे ही जगत् वश में भा सकता है।
।
पाठ ११
असुर्य लोक
असुर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसावृताः ।
( यजु. ४०३)
इस मंत्रमें “ अन्धतमसे व्याप्त भसुर्य लोकमें मात्मघातकी लोग जाते
हैं " ऐसा कहा है। यहां असुर्य लोकका विचार करने के समय निम्नलिखित
उपनिषद्वचन सबसे प्रथम देखना चाहिये-
अनन्दा नाम ते लोका अन्धेन तमसाऽऽवृताः।
तांस्ते प्रेत्याभिगच्छन्ति अविद्वांसोऽबुधो जनाः ॥
(बृह० उ० ४१)
जहां आनन्द नहीं है ऐसे लोग भन्धतमसे व्याप्त हैं उन लोगोंमें
अविद्वान् और अज्ञानी लोग जाते हैं।"
इस उपनिषद्वचनमें " असुर्या
नाम"के स्थानपर
अनन्दा नाम शब्द है और “आत्महनो
के
के स्थानपर अविद्वांसोऽवुधो जनाः " ये शब्द हैं। इन

(४५) - शब्दोंसे स्पष्ट हो जाता है कि आत्मघातकी लोग' वे ही हैं कि जो अविद्वान् और अज्ञानी हैं । और मसुर्य' लोक वे हैं कि जो 'मानन्दरहित हैं' और जहां केवल कष्ट और दुःख हैं। उपनिषद्वचनोंकी तुलना करनेसे इस प्रकार अर्थ खुल जाता है । अब हम वेद मंत्रोंके प्रमाणसे 'मसुर्य' शब्दका अर्थ निश्चित करते हैं। असुर्य शब्दके विषयमें अर्थका निश्चय करनेके समय लिखा गया है, अब यहां वेदमंत्रोंमें 'असुर और असुर्य ' ये शब्द किस अर्थमें आये हैं इसका विचार करना है। इसलिये ऋग्वेदके एक दो मंत्र देखिये- हिरण्यहस्तो असुरः सुनीथः सुमृळीकः स्ववां यात्वर्वाङ् । अपसेधन्रक्षसो यातुधानानस्थाद्देवः प्रतिदोषं गृणानः ॥ (ऋ० १॥३५॥१०) " सुवर्णके आभूषण हाथमें धारण करनेवाला, उत्तम नेता, उत्तम स्तुति करनेयोग्य, भात्मिक बलसे युक्त ( असु+रः ) जीवन देनेवाला देव ( भर्वाङ् यातु ) हमारे पास आ जावे ( रक्षसः अपसेधन् ) राक्षसों का नाश करनेवाला और यातुधानोंको दूर करनेवाला प्रतिदिन स्तुतिको ग्रहण करनेवाला यह देव है।" इस मंत्र में राक्षसोंका नाश करनेवाला देव 'असुर' शब्दसे यहां वर्णित हुआ है। इससे सिद्ध है कि यह असुर शब्द परमेश्वरका यहां वाचक है । तथा और देखिये- त्वं विश्वेषां वरुणासि राजा ये च देवा असुर ये च मर्ताः ॥ (३० २१२७।१०) " हे असुर वरुण ! जो देव हैं और जो मर्त्य हैं उन सबका तु राजा है।' मंत्र में देवोंके ज्येष्ठ देवका नाम मसुर कहा है। इस प्रकार असुर शब्द पर- मात्माका वाचक है, क्योंकि वही प्राणशक्तिका देनेवाला है, वही हमें जीवन देता है। इस असुर देवका अर्थात् परमात्माका जो सामर्थ्य है। वह असुर्य है। अब इस मसुर्य के प्रयोग मंत्रों में देखिये - (४६) धारयन्त आदित्यासोजगत्स्था देवा विश्वस्य भुवनस्य गोपा। दीर्घाधियो रक्षमाणा असुर्यमृतावानश्चयमाना ऋणानि ॥ (ऋ० २।२७।४) सब भुवनोंके रक्षक और जगत्में रहनेवाले आदित्य देव इस (असुर्य) प्राणोंके बलको रक्षण करते हुए धारण करते हैं।' इस मंत्रमें परमात्माक इस असुर्य बलका धारण जगद्रक्षक आदित्यदेव करते हैं, ऐसा कहा है। और देखिये- इंशानादस्य भुवनस्य भूरेन वा उ योषद्रुद्रादसुर्यम् । । ऋ० २।३३।३९) यह भुवनोंका स्वामी ईश्वर है, उसकी { असुर्य) शक्ति इससे कोई भी छीन नहीं सकता अर्थात् यह परमात्माकी निजशक्ति होनेसे उसके पास सदा रहती है और वह इस शक्तिसे सबको जीवन प्रदान करता है। अब स्वयं पर- मात्मा कहता है- अहं राजा वरुणो मां तान्यसुर्याणि प्रथमा धारयन्त । (ऋ० ४१४२६२) राजा वरुण हूं मेरे लिये ही वे असुर्य बल सबसे पहिले धारण किये गये थे।" अर्थात् वे सब बल परमात्माके ही हैं और उनका सब अन्य देव धारण करते हैं और उस प्राणके बलसे बलवान होते हैं। तथा और देखिये- सत्रा वाजानाभवो विभक्ता यद्देवेषु धारयथा असुर्यम् ॥ . (ऋ० ६॥३६॥१) यह ईश्वर अन्न धन अथवा बल सबको देता है और सूर्यादि देवोंके अन्दर अपना बल धारण करता है। संत्रमें है कि परमेश्वर अपना बल संपूर्ण देवों में स्थापन करता है, अर्थात् इस बलसे लव देव बलवान होते हुए अपना कार्य करने में समर्थ हुए हैं। सूर्यके अन्दर वही बल प्रकाशके रुपले दिखाई देता है। वायु में गति और अग्निमें दाहकता आदि गुण उस्सीले हैं, इसी प्रकार अन्यान्य देवो अन्यान्य शक्तियां के कारण दिखाई देती है। इसी कारण कहा है कि- । -- कहा (४७) । मह्ना देवानामसुर्यः पुरोहितो विभु ज्योतिरदाभ्यम् । ( ऋ० ८।१०।१२) " संपूर्ण देवोंका यह मुखिया है, इसका कारण यह है कि इसमें असुर्यः) जीवन देने की शक्ति है और इसमें (महा) महत्त्व भी विशेष है और इसके अन्दर न दबनेवाला व्यापक तेज है।" इसमें भी संपूर्ण देवोंका मुखिया यह असुर्य शक्तिवाला परमेश्वर हैं ऐसा स्पष्ट कहा है। अर्थात् परमेश्वरकी विशाल सत्ता इस असुर्य शक्ति के कारण ही सबके ऊपर हुई है। भन्य देवोंमें भसुर्य शक्ति नहीं है और केवल इस परमेश्वरमें ही वह शक्ति है, इस कारण परमेश्वरका प्रभुत्व सबके ऊपर हुआ है। ये असुर्य बल कितने प्रकारके हैं इस विषयमें निम्नलिखित मंत्र अवश्य देखनेयोग्य है- चत्वारि ते असुर्याणि नामादाभ्यानि महिषस्य सन्ति । त्वमंग तानि विश्वानि वित्से येभिः कर्माणि मघवञ्चकर्थ ॥ (ऋ० १०॥५४॥४) " तेरे न दबनेवाले चार असुर्य बल हैं जिससे विविध कर्म तू करता इस ईश्वरकी यह अदम्य शक्ति है इसलिये ही जगत्के अन्दर चलनेवाले अनंत कम वह कर सकता है। और इसी कारण वह सबमें श्रेष्ठ " असुर्य" शब्द जिन मंत्रोंमें प्रयुक्त हुआ है ऐसे मंत्र अनेक हैं उनमेंसे कुछ मंत्र यहां दिये हैं। इनको देखनेसे पाठकों को पता लग जायगा कि असुर्य' शब्दका अर्थ ' जीवन शक्ति देनेवाले ईश्वरका अदम्य बल' ऐसा है। वेदमें इस भसुर्य शब्दका दूसरा अर्थ नहीं है। ईशोपनिषद्के इस तृतीय मंत्रमें जो 'असुर्य लोक' शब्द है उसमें यह अर्थ स्वीकृत किया जाय तो" जीवनशक्तिसे युक्त लोक " ऐसा अर्थ उस शब्दका बनेगा । जीवनशक्तिले तो सब ही लोग हैं, सब प्राणी तो हैं ही, विशेषतः सब मनुष्य इस जीवनशक्तिसे युक्त है । अन्योंका विचार हम यहां छोड देते हैं । और केवल मनुष्योंका ही विचार करते हैं। सब मनुष्य यदि इस (४८) असुर्य शक्तिसे युक्त हैं तो उनमें भले और बुरे सभी लोग आगये, यह स्पष्ट ही है। जिस प्रकार यह भसुर्य बल सज्जनोंमें है उसी प्रकार दुर्जनों में भी है । यह पढकर पाठक भाश्चर्यसे चकित होंगे, परन्तु इतना आश्चर्य इसमें नहीं है क्योंकि यह ( असु-र्य ) प्राणोंका बल जैसा सज्जनों के शरीरों में कार्य कर रहा है उसी प्रकार दुर्जनोंके शरीरोंमें भी कार्य कर रहा है। क्या सजनोंके शरीरमें ही प्राणशक्ति है और दुर्जनोंके शरीरमें नहीं ? ऐसा कोई नहीं कह सकता। प्राणमात्रमें अदम्य प्राणशक्ति है । यह प्राणशक्ति आत्माकी ही शक्ति है । ' असु' शब्द प्राणवाचक है। 'असु-र' शब्द प्राणशक्ति देनेवाले आत्माका वाचक, और असुर्य शब्द उसके अदम्य बलका वाचक है । इससे स्पष्ट विदित होगा कि आत्माकी असुर्य शक्ति प्राणीमात्रमें है । वह शक्ति सजन और दुर्जनमें समानतया व्याप्त है। दोनों स्थानोंपर वह कार्य कर रही है। ऋग्वेदादि चारों वेदोंमें 'असुर्य ' शब्दका यही अर्थ है और दूसरा कोई अर्थ नहीं है। ऐसी अवस्थामें यजुर्वेदके ईशोपनिषद् ( म० ४०) में आये हुए 'असुर्य' शब्दका भिन्न अर्थ मानना कठीन है। वेदों किसी एक स्थानपर आये 'असुर्य' शब्दका भी भिन्न अर्थ होता, तो ईशोपनिषद्के असुर्य ' शब्दका अर्थ भी भिन्न मानना संभव होता, परंतु वेद के असुर्य शब्दवाले संपूर्ण मंत्र हमने देखे हैं। उनमें एकका भी अर्थ इससे भिन्न नहीं है, इसलिये ईशोपनिषद्के इस 'असुर्य' शब्दका अर्थ 'मात्माकी जीवनशक्ति' ऐसा ही मानना उचित है। यह अर्थ लेनेपर भी बुरे और भले लोगोंकी व्यवस्था उत्तम प्रकार हो जाती है, ' अन्धतमसे व्याप्त असुर्य लोक ' और " आत्मप्रकाशसे प्रका- शित असुर्य लोक " ऐले दो भेद, इलके माननेसे इस शब्दका ठीक अर्थ ध्यानमें आसकता है। इस विषय में आधिक विवेचन पूर्व स्थानलें लिखा ही है। इसलिये अब इसका भधिक विचार करने की आवश्यकता नहीं है। -

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श्रीमद्भगवद्गीता टीका लेखक- पं० श्रीपाद दामोदर सातवळेकर इस 'पुरुषार्थबोधिनी' भाषाटीकामें यह बात दर्शायी गयी है कि वेद, उपनिषद् आदि प्राचीन ग्रंथोंकेही सिद्धान्त गीतामें नये ढंगसे किस प्रकार कहे हैं । अतः इस प्राचीन परंपराको बताना इस 'पुरुषार्थ- 'बोधिनी' टीकाका मुख्य उद्देश्य है, अथवा यही इसकी विशेषता है। गीता-के १८ अध्याय ३ भागोंमें विभाजित किये हैं और एकही जिल्दमें बांधे हैं । इसका मू. १५) रु. और डाकव्यय १॥) रु. है। लेकिन मनीआर्डरसे १२॥) रु. भेजनेवालोंकों हमारे अपने व्ययसे भेज देंगे। प्रत्येक अध्यायका मू० ॥) और रा. व्यय ..) है। श्रीमद्भगवद्गीता-समन्वय । 'वैदिक धर्म के आकारके १३६ पृष्ट, चिकना कागज,सजिल्दका भू. २) रु०, डा. न्य) डाव्यय सहित मूल्य भेज दीजिये । भगवद्गीता-श्लोकार्धसूची। इसमें श्रीगीताके श्लोकाधोंकी अकारादिक्रमसे आद्याक्षरसूची है और उसी क्रमसे अन्त्याक्षरसूची भी है। मूल्य केवल •in.) डा. न्य..) भगवद्गीता लेखमाला। गीता' मासिकके प्रकाशित गीताविषयक लेखोंका यह संग्रह है। इसके १,२,६,७ भाग तैयार हैं, जिनका मू.५)रु. और डा. व्यय १॥) है। मंत्री-स्वाध्याय-मण्डल, पारडी (जि० सूरत)

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Sanskrith Paath Mala Vol X X I I I

Author
Pandith Sripad Damodar Sathvalekar
Other authors
Ccl
Title
Sanskrith Paath Mala Vol X X I I I
File name
Sanskrith Paath Mala Vol X X I I I
Text
OCR done
Citation
1950
Publisher
Sri Satvalekar Bharath Mudranaly
Language
Sanskrit
Pages
54
Library
Scl
DLI number
368409
Barcode
2020010007452.00
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