University Library,gurukul Kangri Vishwavidyalaya
पञ्चीकरणम
Front matter
श्री ११०८ शङ्कसचार्य कृत
पञ्चीकरणम्
(प्रणवार्थ:)
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कानपुर प्रान्तान्तर्गत अमौर निवासि-
श्रीमत् पं० महादेव शर्म पाण्डेय शास्त्रिकृत
भाषा भावार्थ दीपिका सहितम् ।
प्रकाशक
बा० रूप किशोर टण्डन
एम० ए०, एल एल० बी एडवोकेट
मुद्रक
पं० चन्द्रशेखर शुक्ल, कानून प्रेस – कानपुर
"
सम्बत् १६९८ वि
Al
प्रथम वार १०००]
[ मूल्य )
भूमिका ॐ तत् सद् ब्रह्मणे नमः है वैदिक साहित्य के भीतर ओम् शब्द का बड़ा महत्व है यहां तक कि आदरार्थ जैसे माता पिता भादि का नित्य नाम साधारण नहीं लिया जाता उसी भांति इस (ोम्) का भी एक पर्याय (उपनाम) प्रणव रख लिया गया है ( जैसे माता पिता आदि को मां, अम्मा, बप्पा आदि कहते हैं ) वेद मन्त्र व उपनिषद व दर्शन आदि सभी शास्त्रों में माहात्म्य जप, विचार आदि रूप से इस ( ओम् ) का आधार लिया गया है तो शङ्का यह होती है कि यह केवल शब्द ही शब्द मात्र है कि और कुछ ? इसी शक्ता को लेकर कहीं कहीं उपनि. षदोंमें इसके अर्थ का भी विचार किया है यहां तक कि मांडूक्योपनि- षद् पुरा इसी का अर्थ ही है। और पातञ्जल दर्शनमें ईश्वरका वाचक । ( नाम ) कह कर इसका जप इसके अर्थ भावना को ही कहा (तज्जपः तदर्थभावनम् ) अर्थात् अर्थ भावना करना ही इसका प्रधान जप है इसके विचारसे समष्टि (पर्यक् ) व व्यष्टि (प्रत्यक् ) चेतन ( ईश्वर-जीवात्मा ) दो रूप से जो कहा जाता है उसकी एकता का ज्ञान हो जाता है ( ततः प्रत्यक् चेतनाधिगमः पन्तं० ) इसलिये अद्वैत सिद्धान्तवादी श्रीमत्परमहंस परिव्राजकाचार्य जगद्गुरु श्री शङ्कराचार्य जी ने पश्चीकरण विचार नाम की इस पुस्तिका में परम हंसों की समाधि विधि के नाम से इसी ओम् का अर्थ बहुत अच्छे ढङ्ग से किया है। ओम् के प्रायः ॐ, ओम् यह दो रूप लिखने में आते हैं। अर्थ विचार में ओम् के मात्राक्षर पृथक् कर ( अ उ म्) समझाया गया है इससे सगुण ब्रह्म व शब्द ब्रह्म का रूप इसे कहते । और अर्थ समझ जाने पर इसका पूर्ण अनुभव करके जो इसका संस्कारात्मक बुद्धि का बन जाना व निर्गुण ब्रह्म व परब्रह्मका रूप है उसे ॐ कहते हैं। इसी (ॐ) का रूपकालंकार से गणेशके रूप की व अपभ्रंशरूप से स्वस्तिक चिह्न की भी कबियों ने कल्पना की है। सो इस ओम् का संस्कृत भाषा में ही अर्थ था उसको सर्व साधारण जिज्ञासुओंके समझनेके लिये इसकी हिन्दी कर दी गई है।
( २ ) पञ्चीकरण इसका इसलिये नाम रखा है कि यजुर्वेद में (पञ्च- स्वन्त पुरुष प्रावियेश०) व अथर्व संहिताव चरक व तैत्तिरीय उपनि- पदमें आत्मा से ही पञ्च महाभूतों की उत्पत्ति कह कर उसी में आत्म प्रवेश पूर्वक संसार का बनना कहा गया है। एक का ही पांच होना और पांचों का आपस में समिश्रण हो न्यूनाधिकतासे बीज अंकुर रूप हो जगत् बन जाना और सब का अन्तमें एक ही हो जाना पश्चीकरण विचार कहा गया है (वेदान्त सूत्रों च पञ्चदशी आदि में बड़े विशद रूप से इस विषय का वर्णन है ) सांख्यादि शास्त्रों में अव्यक्त महान अहंकार आदि अनुक्रमसे जगत का बनना कहा गया है यह केवल प्रक्रिया भेद है या शिष्यों के समझाने के लिये श्रुति वाक्यों के आधार से पञ्च भूतों के समष्टि गुणोत्पन्न अन्तःकरण व प्राण को प्रथम कह कर पश्चात् पञ्चभूतों के पृथक् पृथक् प्रत्येक के अंश से उत्पन्न पदार्थों का होना वर्णन किया है जैसा कि परिशिष्ट में दिये हुये चित्रों के विचारने से निश्चय हो जायगा कि सब का कहना युक्तियुक्त व एक ही है सब शास्त्रों व सन्तों का कहना यही है कि एकता करो एक हो जावो ( फूट न करो फूटो मत ) तभी सुख होगा इसीलिये एक तत्त्वाभ्यास कहने में कहीं केवल प्रकृति से ही सब हुवा (व विकाश वादानुसार चैतन्य भी प्राकृतिक) कहा गया है । और कहीं चैतन्य के साथ उसकी शक्ति व महिमा व माया नाम से कह कर चैतन्य ही चैतन्य मात्र सब कहा गया है। किन्तु विचार व अनुभव युक्ति प्रमाण व वेद के बहुत वाक्यों से व सन्तोंके उपदेश से एक चैतन्य मात्र सत्ता स्फूर्ति पदार्थ ही होना निश्चय होता है इसी को स्पष्ट समझाने के लिये अद्वैतवाद के समस्त ग्रन्थ है यह बहुत ऊंचा सयुक्तिक प्रायः सर्वमान्य सिद्धान्त है इसीको बताने वाला ओम् इस शब्द का अर्थ है। ओम के अर्थ का विचार करने से पिण्ड (प्रत्यक् पदार्थ) ब्रह्माण्ड ( पर्यक पदार्थ ) के पदार्थों की एकता समझ में आ जाती जैसे केन्द्र परिधि व विन्दु गोले का सम्बन्ध विचार करने से दोनों की एकता समझ में आ जाती है। एक हो जाने पर सब प्रथम चैतन्य सत्ता स्फूर्ति मात्र पदार्थ रह जाता है। यह एकायक समझ में नहीं आ सकने के कारण से ही द्वैत अद्वैतवाद चल पड़े हैं प्रारम्भवाद, सत्कार्यवाद, विवर्तवाद व कर्म, उपासना ( भक्ति ) ज्ञान आदि मार्ग से "क्रिया इसी के समझने समझाने के योग्य शास्त्रों में कही हुई हैं। स्थूल से एक एक करने व उत्पन्न करने में प्रथम द्वैत वाद ही । स्थूल से सूक्ष्म तक जाने के लिये भी द्वैतवाद ही व आरम्भ पत्कायवाद अच्छा । द्वैतवाद में कर्म उपासना इसीलिये सुख कर साधन माने गये हैं। परन्तु सूक्ष्म कारण में पहुंचने के लिये विचार करते ही भेद लय होने लगता है यही ज्ञान व अद्वैतवाद का विवर्त है तो कारण से तुरीय समझने व अनुभव करने में द्वैत ( भेद ) का लेश कहां रह सकता है यही ओम् का पूग अर्थ ज्ञान व अनुभव आरम्भवाद-स्थूलसे स्थूल बनने व पैदा होने में लगता है जैसे दूध से दही बीज से अंकुर। सत्कार्यवाद ( परिणामवाद)-स्थूल से सूक्ष्म व सूक्ष्म से स्थूल होने में लगता है जैसे दूध के भीतर दही के परमाणु व बीज के भीतर अंकुर ( शक्ति ) न हो तो कैसे दही व अंकुर बन सको। विवर्तवाद - कारण से कार्य व कार्य से कारण होने में लगता है जैसे सांप का रस्सी होना, दूध ही में दही देख पड़ना, बीज ही अपनी शक्ति द्वारा अंकुर होना ( दूसरा बना सा देख पड़ना है)। प्रारम्भवाद -दूसरे से दूसरा होना। सत्कार्यवाद- दूसरे से दूसरा निकल आना व परिणत होना। विवर्त दूसरे में दूसरा देख पड़ना। कमे-कहीं ईश्वर है तदर्थ (तदाज्ञानुसार ) सब कर्म करना संसार सुव्यवस्थित रहने के लिये ( सत् ) । उपासना ( भक्ति)-ईश्वर सामने है उसकी पूजा प्रार्थना आदि करना ( अन्तः करण शुद्धि के लिये) चित) ज्ञान-ईश्वर सर्वत्र सर्वज्ञ सर्व रूप है इसलिये हम भी ईश्वर हैं ऐसा निश्चय करना ( एकता के लिये ) ( आनन्द ) सबको इसीसे इन तीन (सत् = है ... सदा रहना १ ) ( चित - ज्ञान रूप समझ के साथ २ ) (आनन्द - सुख मय सुख सहित ३) बातों की लालसा रहती है क्योंकि ईश्वर इन तीन गुग्ण युक्त है और उसीके हम अंश जीव हैं। सो यह तीनों बातें (सत्, चित आनन्द ) तभी प्राप्त होती हैं कि जब ॐ को अच्छी तरह अपनाया जाय । ।' हरि ॐ तत्सद् ब्रह्मणे नमः॥ ।
भूमिका परिशिष्ट जिनके मत से प्रथम चिन्मात्र एक तत्त्व था उनके मत से इस पंचीकरण के अनुसार जगत का उद्भव लय चिन्तन करना चाहिये। (देखो पृ० परिशिष्ट चित्र विचार)॥जिनके मत से प्रथम एक तत्त्व अचिन्मात्र था उनके मत से निम्न लिखित चित्र विचारना चाहिये अचित् (प्रकृति) के तीन गुण होते हैं उनके निवृत्करण से सब पदार्थ बनते रहते हैं। गुण तीन - सत्व उनका लक्षण-प्रकाश उनके परिणाम-ज्ञान रजः प्रवृत्ति क मोह द्रव्य अच्छा लगना मात्र ही सत्त्व को सत्ता है। कुछ अच्छा कुछ बुरा लगना रजः की सत्ता है। बुरा लगना मात्र तमोगुण की सत्ता है। प्रत्येक व्यक्तिका प्रत्येक पदार्थ में भिन्न २ भाव होना प्रत्येक गुणों की सत्ता है। विकाशवाद के अनुसार गुणों के द्वारा अचित् से ही चित् की भी उत्पत्ति होती है - ईश्वर २ जीव ३ इन्द्रिय ६ राजस - तामस - सात्विक आत्मा अन्तःकरण ४ प्राण ५ देह ७ महाभूत पांच : काष्ठलोष्ठादि । इस प्रकार परस्पर सम्बन्ध से गुणों द्वारा ही अचित् से चित् ( श्रात्मेश्वर जीव ) माने गये हैं आगे इन्हीं ६ पदार्थों से समस्त संसार बनता रहता है । परन्तु जिनको प्रथम चिन्मात्र मान्य वह चित् (ब्रह्म ) के साथ ही उसकी महिमा व शक्ति (व उसी के ही गुण भाव ) त्रिगुणामाया ( प्रकृति-स्वभाव जिसे अचित् कहते हैं ) मान ली गई है। वैदिक सिद्धान्त इसी प्रकार का है और यही विशेष सयुक्तिक और उत्तम है है ।
॥ ॐ स्वस्ति श्रीगणेशायनमः ॥ पञ्चीकरणम् (प्रणवार्थः) अथातः परमहंसानां समाधिविधि व्याख्यास्यामः। सच्छन्दवाच्यमविद्याशवलं ब्रह्म । ब्रह्मणोव्यक्तम् । अव्यक्तान्महत् । महतोहङ्कारः । अहंकारात्पंचत- न्मात्राणि । पंचतन्मात्रेभ्यः पंचमहाभूतानि । पंच- महाभूतेभ्योखिलं जगत् ॥ १॥ पञ्चानांभूतानामेकैकं द्विधाविभज्य स्वार्धभागं विहायार्धभागं चतुर्धाविभज्येतरेषुयोजिते पंचीकरणं मायारूपदर्शनमध्यारोपापवादाभ्यां निष्प्रपञ्चप्रप- उच्यते ॥ २॥ पञ्चीकृतपञ्चमहाभूतानि तत्कार्य च सर्व विरा- डित्युच्यते, एतत्स्थूलशरिमात्मनः । इन्द्रियैरों- पलब्धिर्जागरितम् । एतदुभयाभिमान्यात्मा विश्व एतत्त्रयमकारः॥३॥ अपञ्चीकृतपञ्चमहाभूतानि पञ्चतन्मात्राणि तत्कार्यं च पञ्चप्राणा दशेन्द्रियाणि मनोबुद्धिश्चेति (२) पत्रीकरणम् सप्तदशकं लिंगंभौतिकं हिरण्यगर्भ इत्युच्यते एत- त्सुक्ष्मशरीरमात्मनः । करणेषूपसंहृतेषुजागरित संस्कारजःप्रत्ययःसविषयः स्वम इत्युच्यते । तदुभया. भिमान्यात्मा तैजस एतत्त्रयमुकारः॥ ४ ॥ शरीरद्वयकारणमात्माज्ञानं साभासमव्याकृतमि- त्युच्यते । एतत् कारणशरीरमात्मनः । तच न सन नासन नापिसदसत् । न भिन्नं नाभिन्नं नापिभिन्नाभिन्नं कुतश्चित् । न निरवयवं नसावयवं नोभयम् । किन्तु केवल ब्रह्मात्मैकत्त्वज्ञानापनोद्यम् । सर्वप्रकारज्ञानो- पसंहारे बुद्धेः कारणात्मनावस्थानं सुषुतिः। तदुभ- याभिमान्यात्मा प्राज्ञ एतत्त्रयं मकारः ॥ ५ ॥ अकार उकारे । उकारोमकारे । मकार अोङ्कारे । श्रोङ्कारोहम्येव अहमेवात्मा साक्षीकेवलश्चिन्मात्रस्व. रूपो ना ज्ञानं नापि तत्कार्यम् । किन्तु नित्य शुद्ध बुद्धमुक्तप्सत्यस्वभावं परमानन्दाद्वयं प्रत्यग्भूत- चैतन्यं ब्रह्मैवाहमस्मीत्यभेदेनावस्थानं समाधिः ॥६॥ तत्वमसि । ब्रह्माहमस्मि । प्रज्ञानमानन्दं ब्रह्म । अयमात्मा ब्रह्म । इत्यादि श्रुतिभ्यः। इति पंचीकरण भवति ॥ ७॥ ॥ इति श्रीमत्परमहंस परिब्राजकाचार्य श्रीमच्छंकराचार्य विरचितं पंचीकरणम् ।।
पश्चीकरणम् (३) ॥ पञ्चीकरण का भाषानुवाद । (प्रणव का अर्थः) प्रणव [ोम् ] अब यहांसे परमहंसोंकी समाधि विधिको अच्छे प्रकार कहेंगे। सत् (है) इस शब्दसे कहने योग्य अविद्याचित्रित ब्रह्म (था)- टिप्पणी-अविद्या चित्रित का अर्थ यह है कि उस ज्ञान स्वरूप ब्रह्म में अविद्या अर्थात् अज्ञान व अविद्यमान माया उपदेश के लिये मान ली गई है क्योंकि ज्ञानी में प्रमत्तता उन्मत्तता जड़ता का भी ज्ञान होना सम्भव है परन्तु अज्ञानी में ज्ञान होना असम्भव है। जैसे बुद्धिमान पुरुष पागल का स्वांग भर सकता है किन्तु पागल कोई भी क्रम बद्ध कार्य नहीं कर सकता। इसलिये पहिले पहिल जो एक तत्व था वह अपनी समस्त शक्ति व महिमा जो प्राकट्य में जनद्र प दिखती है उससे युक्त था ऐसा मान कर ही आगे कहना बनता है पश्चात् अनुभव होने पर संशय नहीं रहता शक्ति महिमा जगद् पता ही अविद्यमान माया सूत में कपड़े की भांति दिखती है। ( उस ) ब्रह्म से अव्यक्त ( अर्थात् सत्व रजः तमः की साम्यावस्था रूप माया प्रकृति प्रधान ) । अव्यक्त से महत् । महत् से अहंकार । अहंकार से पांच तन्मात्रायें (शब्दतन्मात्रा १ स्पर्शतन्मात्रा २ रूपतन्मात्रा३ रसतन्मात्रा ४ गन्धतन्मात्रा ५ अर्थात् सूक्ष्म पंचमहाभूत)। तन्मात्राओंसे पांचमहाभूत (अाकाश? वायुर तेज ३ जल ४ पृथिवी ५)। महाभूतोंसे सब संसार(बना)॥१॥ पांचों भूतों में से प्रत्येक के दो दो हिस्से करके अपने आधे आधे भाग को छोड़ कर और आधे आधे भाग के चार चार टुकड़े करके दूसरों में से मिला देने पर पञ्चीकरण होता ( अर्थात् प्रत्येक भूतों में प्राधा अपना और आधे में चौथाई मिलना पञ्चीकरण कहाता है राशि पूरी बनी रहते संमिश्रण हो जाना पञ्चीकरण है ) यह पञ्चीकरण माया रूप दृष्टि गोचर होता है । इस प्रकार अध्यारोप ( संघात चौथाई दूसरे भूत पत्रीकरणम् को दूसरा पदार्थ समझना) अपवाद (संघात को पृथक २ करके मूल तत्व खोजना) से वही प्रपञ्च रहित (ब्रह्म) प्रपश्चित होता है ॥२॥ पञ्चीकरण किये हुये पांचो महाभूत और इनका कार्य सब विराट कहा जाता है। यह विराट ( संसार ) और अपना शरीर स्थूल है। इन्द्रियों से विषयोंका साक्षात्कार ( शब्द स्पर्श रूप रस गन्ध आदि का ज्ञान होना) जागरित ( जाग्र- दवस्था कहाती ) है। इन दोनों ( स्थूल जागरित ) का अभि- मानी आत्मा विश्व कहलाता है यह तीनों अर्थात् स्थूल जागरित तथा विश्व (ओंकारका प्रथम अक्षर) अकार (अ कहे जाते हैं)॥३॥ जिन पांच भूतों का पञ्चीकरण नहीं हुवा व सूक्ष्मता हुवा है उनको पांच तन्मात्रायें कहते हैं। यह पञ्चतन्मात्रा और उनका कार्य पांचो प्राण दश इन्द्रियां मन तथा बुद्धि यह सत्रह तत्व लिंग ( लक्षण मात्र ) सूक्ष्म भूतों से बना हुवा ( संसार के भीतर भरा हुवा ) हिरण्य गर्भ कहलाता है (यह संसार के भीतर और ) अपने शरीर के भीतर का शरीर सूक्ष्म । इन्द्रियों के ( बाहिरी विषयों से ) उपसंहार हो जाने पर जाग्रदवस्था के संस्कारों से होने वाला प्रपञ्च सब विषयों सहित (अर्थात सोने समय का आन्तरिक प्रपञ्च ) स्वप्न कहा जाता है । इन दोनों ( सूक्ष्म स्वप्न ) का अभिमानी आत्मा तैजस होता है। यह तीनों अर्थात् सूक्ष्म स्वप्न तथा तैजस ( ओंकार का दूसरा अक्षर ) उकार ( उ कहे जाते हैं ) ॥ ४॥ दोनों ( स्थूल सूक्ष्म ) शरीरों का कारण अपने आपका न जानना आभास के सहित अव्याकृत कहा जाता है ( यह सब संसार का कारण ) और अपने शरीर का कारण, कारण शरीर ( यह ) न सत् (है) न असत् ( नहीं है)। और न कि पश्वीकरणम (५) के के सद्सव ( है नहीं है ) कहा जा सकता है । न भिन्न (पृथक २) न अभिन्न (अपृथक २)न कि भिन्नाभिन्न (पृथक व मिला बा) ही कहा जा सकता है। और यही कहाँ से कहा जा है कि वह अवयवों (अङ्गों ) वाला है व अङ्गों वाला नहीं है व अङ्गसांगता वाला ही है । किन्तु वह केवल ब्रह्म आत्मा के एकत्व ज्ञान से अपनोद्य अर्थात् एक हो जाना परन्तु जानना नहीं कि एक हो गया। सब प्रकार ज्ञान समाप्त होने पर बुद्धि का कारण भाव से ठहर जाना सुषुप्ति है इन दोनों (कारण सुषुप्ति ) का अभिमानी आत्मा प्राज्ञ कहाता है। यह तीनों अर्थात् कारण सुषुप्ति तथा प्राज्ञ ( ओंकार का तीसरा अक्षर ) मकार ( म कहे जाते हैं ) ॥ ५॥ अ ( स्थूल ) उ में ( सूक्ष्म में ) और उ ( सूक्ष्म ) म ( कारण ) में लय हो जाता है। तथा म ( कारण ) ओम् ( ब्रह्म ) में लय पाता है । ओम् ( सगुण ब्रह्म ) अहमि ( अात्म स्वरूप में ) ब्रह्मात्मैकत्व ज्ञान साधन में लय हो जाता है। मैं ही आत्मा(अापही प्राप)द्रष्ट्रमात्र (देखनेवालाही) केवल चिन्मात्र (ज्ञान स्वरूप) हूँ। न अज्ञान हूँ न अज्ञानका कार्य हूँ। किन्तु सदा रहने वाला निर्मल ज्ञानवान् स्वतन्त्र सत्य स्वभाव श्रेष्ठ सुख स्वरूप हूँ। प्रत्येक प्राणियों का चेतन रूप ब्रह्म ही मैं हूँ । इस अभेदसे ठहर जाना ज्ञान समाधि कही जाती है ॥६॥ क्योंकि उपनिषद वाक्योंके यह प्रमाण हैं-तत्वमसि = वह तू है। ब्रह्माहमस्मि = ब्रह्म मैं हूँ। प्रज्ञानमानन्दं ब्रह्म = जिससे जाना जाता है व सुख स्वरूप मैं हूँ। अयमात्मा ब्रह्म = यह आत्मा अपना वास्तविक स्वरूप ) ब्रह्म है। इत्यादि श्रुतियोंसे जाना गया है। यह पञ्चीकरण नामका विचार होता है ॥ ७ ॥ ॥ इति पञ्चीकरण अर्थात ओम् का अर्थ ॥
(६) पञ्चीकरणम् 8 पंचीकरण का पदच्छेद पूर्वक अर्थ 8 शक्ति से) शब्द অর্থ शब्द अर्थ अथ = अब ( अथवा मङ्गल द अधि. वस्थामें हों पृथक् २ प्रकट रूपमें कार व अनन्तर अर्थ का बताने न दिखते हों) प्रधान प्रकृति वाला शब्द है) अर्थात् स्थूल, माया शक्ति (हुई) सूक्ष्म, कारण पदार्थका जिसको अव्यक्तात् = ( उस ) अव्यक्त प्रधान वोध हो उसीका अधिकार है व प्रकृति से बोधके पश्चात् इसे समझे) महत् = महत् तत्व (बड़प्पनका गुण) अतः% यहां से अर्थात् बुद्धि, शक्ति व इच्छा परमहंसानाम् = परम हंसों की (परम कामना व सर्वदेशिविशेष गुण श्रेष्ट,हंस,साधक विवेकी पुरुषोंकी) मात्र (हुवा) समाधिविधिम् = समाधि (चित्तस्थिर)| महतः = (उस) महत्से ( सर्वदेश व्याप्त विधि (प्रकार ) को महत्त्व गुणयुक्त समष्टिबुद्धीच्छा व्याख्यास्यामः = विशेषता से कहेंगे सत् + शब्द वाच्यम् = सत् (है, इस)| अहंकारः = अहंकार तत्त्व ( परमाणु- शब्द से कहने योग्य सत्तामात्र एकदेशित्वगुणविशेष अविद्याशबलम् = अविद्या से चित्रित पार्थक्य बोधक ब्यष्टिबुद्धीच्छा. ( अविद्या अर्थात् अज्ञान रूप शक्ति मूल ) हुवा व वस्तुतः जो न हो यानी माया | अहंकारात् = अहंतत्व से (पार्थक्य व अपनी अव्यक्त शक्ति इच्छा गुण विशेष से ) महिमा ऐश्वर्य जो संसार का पंच तन्माणि = पांच तन्मात्रायें अर्थात् मूल प्रधान प्रकृति कहाती है सूक्ष्म महाभूत-केवल वही वही उससे सुशोभित सत्ता मात्र) भूतमात्र-शब्द तन्मात्र १ स्पर्श ब्रह्म = सब से बड़ा सर्व शक्तिमान् सर्बज्ञ तन्मात्र २ रूपतन्मात्र ३ रस (ज्ञान, अज्ञान, उन्माद, प्रमोद तन्मात्र ४ गन्ध तन्मात्र ५ हुये सभी भावांका भण्डाररूप सगुण पंचतन्मात्रेभ्यः = (उन) पांच तन्मा- सर्वस्वरूप कूटस्थ एक पदार्थ)था त्राओं से ब्रह्मणः = (उस) ब्रह्मसे (सर्वसत्तामात्रसे) पंच महाभूतानि = पांच महाभूत अर्थात् अव्यक्तम् = अप्रकटरूप (अर्थात् सत्व आकाश, वायु, तेज, जल, रजःतमः यह तीनों गुण साम्या. पृथ्वी यह प्रकट हुये पश्चीकरणम् (७) am- शब्द अर्थ अर्थ पंच महाभूतेभ्यः = इन पांचमहाभूतोंसे कहाता है अर्थात् क्रम संधात अखिलम् = सब को दूसरा पदार्थ समझना। और जगत् = संसार (परिवर्तनशील, अस्थिर एक एक अवयव की भिन्नता से प्रवाहात्मक ) बना वर्तमान पदार्थ सिद्ध कर मूल पंचानाम्, भूतानाम् = पांचों भूतों का तत्वका देखना अपवाद कहाताहै। एकैकम् = (पृथक् २) एक एक को निष्प्रपञ्चम् = प्रपञ्च रहित द्विधा = दो दो (२-२) प्रपञ्च्यते = प्रपश्चिंत होता है । (पांचों विभज्य - विभाग करके भूतोंसे बने को या दिखावटी स्वार्धभागम् = अपना २ अाधा आधा विस्तार को प्रपञ्च कहते हैं) विहाय = छोड़ कर अर्धभागम् = प्राधे आधे भाग को पंचीकृत पंच महाभूतानि = पंची- करण किये हुये पांचों महाभूत चतुर्धा = चार चार ( ४-४) और विभज्य = विभाग करके तत्कार्यम् = उनका कार्य इतरेषु = औरों औरों में सर्बम् = सव योजिते = मिलाने पर विराट् इति = विराट् ऐसा पंचीकरणम् = पंचीकरण (होता है ) उच्यते = कहा जाता है अर्थात् प्रत्येक भूतों में आधा एतत् = यह ( विराट् ) आधा अपना और प्राधे का स्थूल शरीरम् = स्थूल शरीर है चौथाई चौथाई चारों भूतों में आत्मनः = अपना (शरीर ) अर्थात् मिलाना तो एक एक भूत की बाहर का जगद्र प-समष्टि और अपना अपना पृथ ग्रुप राशि उतनी ही रही परन्तु व्यष्टि यानी पिण्ड व ब्रह्माण्ड सम्मिश्रण हो गया यानी आधा का स्थूल शरीर कहाता है अपना और प्राधेमें चारो और स्थूल शरीर-मोटा मोटाखोखला मायारूपदर्शनम् = ( वही पञ्चीकरण) रूप ऊपरी घेरा (कवरCover) माया रूप (जादुका सा खेल ) इन्द्रियैः = इन्द्रियों से ( कान, खाल दृष्टि गोचर होने लगता है। आंख, जीभ, नाक यह ५ ज्ञाने. अध्यारोप+अपवादाभ्याम् = अध्या न्द्रियां हैं। मुंह, हाथ, पांव, रोप और अपवाद से । एक एक लिंग, गुदा यह पांच कर्मेन्द्रियां अवयवका मिल कर एक विशेष हैं। इन्द्रिय इन अङ्गोंकी विषय पदार्थ कल्पित होना अध्यारोप ग्रहण शक्तिको कहते हैं।
(८) पञ्चीकरणम् HTM जाग- अर्थ शब्द अर्थ अर्थोपलब्धि-अर्थ = विषयों (शब्द, ! दश-इन्द्रियाणि दशो इन्द्रियों स्पर्श,रूप, रस, गन्ध ५ वाणी, (इन्द्रिय स्थान की सूक्ष्म विषय ग्रहण,गति, क्षण त्याग २) की ग्राहक शक्ति) उपलब्धि-प्राप्ति(साक्षात्कार) मनः = संकल्प विकल्पात्मक अन्त:करण जागरितम् = जाप्रदवस्था है वृत्ति ( चित्त सहित मन) एतद्-उभय-अभिमानी- इन दोनो और (स्थूल और जाप्रत ) का अभि- बुद्धिः = निश्चयात्मक अन्तःकरण की मान करने वाला। वृत्ति ( अहंकार सहित वुद्धि) आत्मा श्राप अन्तः करण-भीतरी इन्द्रिय विश्वः = विश्व ( कहाता है) जिसकी चार वृत्तियां ( मन, एतत्त्रयम् = यह तीनों (स्थूल, बुद्धि, चित्त, अहंकार ) कही रित, विश्व का तिका) जाती है। बुद्धि-अपने स्थानमें अकारः = अ (अर्थात् ओम् का प्रथम रह कर निश्चय करने वाली अक्षर है ( अ-आदि-पहले वृत्ति जिसका भेद ही मूल अहं- समझ में आने वाला । कार है। मन-किरण रूप संचारी अ-श्राप्ति-प्रत्यक्ष मिलने वाला) इन्द्रियों में जाकर संकल्प विकल्प अपंचीकृत पंच महाभूतानि = नहीं पूर्वक विषय ग्राहक वृत्ति जिसक (या कि अल्पमात्र ) हुवा है भेद चित्त है पञ्चीकरण जिनका ऐसे पांच इति = इस प्रकार महाभूत (पञ्चतत्व ) सप्तदशकम् - सत्रह तत्त्व वाला (१. पंचतन्मात्राणि = पांच तन्मात्रा कहे इन्द्रिय ५ प्राण १मन १बुद्धि) जाते हैं ( अर्थात् सूक्ष्म, महा लिङ्गम् = लिंग ( लक्षण ) वाला। भूत शब्दादि) भौतिकम् = (सूक्ष्म) भूतोंसे बना हुवा च = ( वह सूक्ष्म पञ्च तत्त्व ) और हिरण्य गर्भः - (हिरण्य अर्थात् तैजस तत्कार्यम् = उनका कार्य पदार्थ हैं गर्भ में जिसके वह पंच प्राणा= पांच प्राण ( १ प्राण- ब्रह्माण्ड व्यापी) हिरण्यगर्भ हृदय से मुख तक। २ अपान- ( सूक्ष्मसमष्टि शरीर) नाभि से गुदातक । ३ समान- इति = ऐसा नाभि हृदय के बीच में । उच्यते = कहा जाता है उदान-कराठ से सिर तक। एतत् = यह (हिरण्य गर्भ ) ५ न्यान-सव देह के भीतर) %= सूक्ष्म शरीर है 1 - सूक्ष्म शरीरम पञ्चीकरणम् जाप्रत अव. अर्थ शब्द अर्थ आत्मनः = अपना (अपने शरीर में उकार - उ अर्थातू ओम् का दूसरा भी भरा हुवा १७ तत्त्वों का अक्षर है (उ-उभय-दूसरा- सूक्ष्म शरीर कहाता है अर्थात् पहले असे ऊंची कक्षाका पदार्थ ब्रह्माण्ड व पिण्ड के भीतर उ-उत्कर्ष-ऊंची समझका पदार्थ सत्रह प्रकार की जो शक्ति भरी ऊपर व ऊंचा होनेसे उ कहाता है हुई है वही सूक्ष्म शरीर कही जाती है। स्थूल व्याप्त कार्य शरीरद्वयकारणम् = दोनों (स्थूल कारक विशेष शक्ति ) सूक्ष्म)शरीरों (देहों) का कारण आत्म + अज्ञानम् = अपने आपको करणेषु + उपसंहृतेषु = इन्द्रियों के भी न जानना (न जाननेकी भांति) उपसंहार होनेपर अर्थात् बाहिरी साभासम् = आभासके साथ (श्राभास काम छूट जाने पर दीप्ति, प्रतीति, प्रतिबिम्ब, तेज जागरित संस्कारजः स्थाके संस्कारों से होने वाला छाया, समानता सादृश्य आदि की भांति) प्रत्ययः = आन्तरिक वासनामात्र भोग | अव्याकृतम् = अव्याकृत (व्याकृत का प्रत्यक्षाभास । अर्थात् व्याकरण, विस्तार नाना- सविषयः : = सबै विषयों सहित । (सोने त्व रहित) है। अनेकतासे रहित समय का भीतरी दिखावा) एकीभूत सब एक ही हुवा, सम- भाव चैतन्य का घनीभूत ईश्वर स्वप्नः - सपना ( ख्वाब) इति = ऐसा इति = ऐसा उच्यते = कहा जाता है उच्यते = कहा जाता है एतत् - यह (अब्याकृत ) तद् + उभय + अभिमानी कारणशरीरम् = कारण शरीर है दोनों (सूक्ष्म, स्वप्न) का अभि. मानी अर्थात् मैं व मेरा माननेवाला आत्मनः = अपना(अपने दोनों स्थूल सूक्ष्म शरीरोंका कारण मूल प्रकृति आत्मा- आप है ) अर्थात् पिण्ड ब्रह्माण्ड का तेजस तेजस ( कहाता है) कारणमात्र। एतत् - यह तत् + च = सो वह (कारण रूप) त्रयम् = तिक्का ( तीनों मिलकर ) न = न (सूक्ष्म १ स्वप्न २ सत् = सत्तामात्र ( है, ऐसा ) व स्थूल का बोध कराने वाला) तैजस ३ (१०) पश्चीकरणम् न+अपि और न - और न एतत् - यह अर्थ 1 शब्द अर्थ असत् = अभाव मात्र (नहीं है, ऐसा) कारणात्मना = कारण आत्मा से व सूक्ष्म अर्थात् बुद्धिका अपने कारण भाव में। सत् + असत् = है व नहीं है या कि है व नहीं है या कि | अवस्थानम् = ठहर जाना स्थूल, सूक्ष्म रूप है ऐसा ही सुषुप्ति; = सुषुप्ति ( अवस्था कही कहा जा सकता है जाती है ) घन नींद जब स्वप्न न 3 (और ) न ( वह ) न देखता हो) उसे सुषुप्ति कहते हैं भिन्नम् = पृथक व फटा हुआ तद्+उभय+अभिमानी+आत्मा - न + अभिन्न - न अपृथक वजुड़ा हुवा उन दोनों ( कारण और सुषुप्ति का अभिमान करने वाला आप न+ अपि प्राज्ञः = प्राज्ञ ( सब कुछ एक साथ भिन्नाभिन्नम्। + कुतः+चित् = पृथक जानने वाला कहाता है) अपृथक फटा जुड़ा ही कहीं से (कहा जा सकता है ) न निरवयम् - न बिना अङ्गों वाला त्रयम् - तिक्का ( तीनों कारण १ सुषुप्ति २ और प्राज्ञ ३) न सावयम् - न अङ्गोंके सहित मकारः = म अर्थात् ओम् का तीसरा न + उभयम् = (और) न निरङ्ग व अक्षर है। (म-मापने वाला सांग ही कहा जा सकता है। व फेंकने वाला अर्थात् म कारण किन्तु = बल्किन् को कहते हैं कारण में ही सब केवल = खाली ( सिर्फ) लय होता और उसी से पुनः . ब्रह्मात्मैकत्त्वज्ञानापनोद्यम् = ब्रह्म निकलता है) (ईश्वर) श्रात्मा (अाप-जीव) अकारः 3 अ अर्थात् स्थूल एकत्व ज्ञानसे अपनोद्य (अर्थात् | उकारे = उ अर्थात् सूक्ष्म में ( लय ब्रह्म आत्माका एक हो जाना परन्तु जानना नहीं कि एक हो | उकारः = (और ) उ अर्थात् सूक्ष्म गया। इस प्रकारका (अनिर्वच- मकारे = म अर्थात् कारण में ( लय नीय ) कारण शरीर होता है। पाता है) सर्व प्रकार ज्ञान + उपसंहारे - सब मकारः = म अर्थात् कारण प्रकारके ज्ञानके नाश हो जाने पर ओंकारे = ओम् अर्थात् सगुण ब्रह्ममें बुद्धेः = बुद्धिका (लय हो जाता है) होता है) पश्चीकरणम् (११) -ad मैं हूँ इस ano तत् + कार्यम् अहम् = मैं अस्मि - हूं अर्थ शब्द अर्थ ओंकारः = (वह) ओम् (सगुण ब्रह्म) समाधिः = (ज्ञान ) समाधि ( कही अहामि = अहंभाव में जाती है) अर्थातू यही निर्वि- सत्ता मात्र में ) कल्प समाधि है । (क्योंकि उप- एव = ही ( ठहर जाना चाहिये.) निषद् वाक्योंके यह प्रमाण हैं- अहम् = मैं (आत्म स्वरूप निर्गुण) १ तत्वमसि छांदो. २ ब्रह्माह- एव = ही मस्मि बृह. ३ प्रज्ञानमानन्दं प्रात्मा श्राप साक्षी = देखने वाला ( द्रष्टामात्र ) ब्रह्म एतरेप. ४ अयमात्मा ब्रह्म भांडू. केवल = खाली ( प्योर Pure) चित् +मात्रस्वरूपः = ज्ञानरूप (हूँ) तत् = वह (आत्मा) न+अज्ञानम् = न अज्ञान हूँ त्वम् - तू न+अपि = और न असि ब्रह्म - परंतत्त्व (आत्मा) - उस (अज्ञान) का कार्य हूँ ( संसार रूप हूँ) किन्तु = बल्कि नित्य - सदा रहने वाला प्रज्ञानम् - ज्ञान स्वरूप व ज्ञानाधार निर्मल ( पाप रहित) शुद्ध - वज्ञप्तिमात्र (आत्मा) बुद्ध = ज्ञानवान् ( समझदार) आनन्दम् - सुख स्वरूप, सुखमात्र ब्रह्म - परंतत्त्व (मैं हूं) मुक्त- छुटा हुश्रा, अबद्ध सत्यस्वभावम् = सत्य ( यथार्थ ) अयम् = यह ( व्यष्टि, पिण्ड व्याप्त) स्वभाव (अपनी सत्ता) वाला आत्मा = श्रापा रूप ( मैं मात्र) परम आनन्द+अद्वयम् - श्रेष्ठ सुख ब्रह्म = परंतत्त्व ( हूं) स्वरूप द्विभांति रहित इत्यादि 3 इस प्रकार और भी प्रत्यक्+भूत चैतन्यम् प्रत्येक श्रुतिभ्यः श्रुतियों (बेदों व उप- प्राणियों का चेतनरूप (आपा) निषद् वाक्यों ) से निश्चय ब्रह्म - ब्रह्म (मूलतत्त्व - असलियत) करना चाहिये ही इति पंचीकरण भवति = ऐसा अहम् 3D मैं पञ्चीकरण विचार होता है अस्मि = हूँ, एकही पांच प्रकार का होकर इति इस प्रकार और पांचो पांचो का सम्मिश्रण अभेदेन = अभेद से हो संसार रूप हुवा सा विचारने अवस्थानम् 3D ठहरना से सावधान होता है। ॥ इति पञ्चीकरण (प्रणवार्थः) समाप्त ।। . - %3D - (१२) पञ्चीकरणम् कारण अन्तःकरण - श्रोत्रा ज्ञानेन्द्रिय पंच महाभूत स्थूल कर्मेन्द्रिय परिशिष्टम् अधिभूत अधिदैव अध्यात्म विषय (देवता) इन्द्रिय आत्मा - ॐ संज्ञान चैतन्य स्फुरण ब्रह्म + माया = ओम् चिन्तन वासुदेव चित्त ईश्वर+प्रकृति = शक्ति, प्रधान अहंकरण रुद्र अहंकार अव्यक्त (म्) संकल्पविकल्प चन्द्र निश्चय ब्रह्मा बुद्धिः ) (सत्त्व प्रधान) महान् - काम- इच्छा-समष्टिबुद्धि दिशा शब्द (रजः प्रधान) अहंकार स्पर्श वायु त्वचा (तमः प्रधान) पंचतन्मात्र (उ) रूप सूर्य नेत्र वरुण रसना अश्विनी नासिका जगत् (अ) यह चित्र इसी ग्रन्थके उपक्रमानुसार है । भाषण अग्नि वाक् ग्रहण हस्त म् ओम् गवन विष्णु पाद तरण प्रजापति उपस्थ अवस्था-जाग्रत् स्वप्न सुषुप्ति तुरीय त्याग मृत्यु गुदा समष्टि-विराट हिरण्यगर्भ ईश्वर परमात्मा तैजस प्राज्ञ आत्मा संयोग व्यष्टि-विश्व समष्टि व्यष्टि पदार्थ-स्थूल सूक्ष्म कारण श्रात्ममात्र कार्य ब्रह्माण्ड पिण्ड छिद्र-अवकाश विष्णु आकाश जैसे एक गेंदकी भांति कोई गोल विक्षेप-गति सूर्य वायु (अण्डाकार) वस्तु लेना उसमें जहां चाहे वहीं केन्द्र मान कर परिधि पर्यन्त संबंध ताप-पाचन शक्ति मान ले तो गोला सब केन्द्रों का शैत्य - क्लेदन गणेश जल आधार व सम्बन्धी होगा और केन्द्र आधार-धारण महेश पृथिवी भिन्न २ अपनो सत्ता रखते हुये गोले के ऊर्ध्वनयन-निर्माण प्राकाश उदान आश्रयी सम्बन्धी होंगे। इसी प्रकार पिंड पाचन-परिणमन अग्नि समान (केन्द्र) व ब्रह्मांड (परिधि गोला , का प्राण सम्बन्ध है । पिण्ड (बिन्दु) की इन्द्रियां प्राणन-श्राकर्षण सूर्य और ब्रह्माण्ड विराटकी इन्द्रियां देवताही | संचालन-रोधन वायु व्यान कही जाती हैं दोनों परस्पर सम्बन्धी हैं। अधोनपन-अपकर्षण पृथ्वी अपान पश्चीकरणम् (१३) पंच महाभूतों के सूक्ष्म व स्थूल रूप से सम्मिश्रण होकर जो पदार्थ बनते हैं उनका संक्षेप साधारण रूपसे निम्न लिखित चित्र से बहुत कुछ समझना विस्तार रूपसे तो अनन्त आघात प्रत्याघात अंशांश संश्लेष विश्लेष अनेक प्रकारसे समस्त संसारही बन रहा है । अपञ्चीकृत (सूक्ष्म पञ्चीकरण) किये मूक्ष्मभूत (तन्मात्र) कार्य वायु तेज यह सूक्ष्म शक्तियां पिण्ड ब्रह्माण्ड में व्याप्त हैं - श्राकाश वायु जल पृथ्वी 3 सूक्ष्मभूत समष्टि सत्वांश अाकाशीय- स्फुरण चित्त अहंकार मनः बुद्धि = अन्त:करण समष्टि, रजोश-वायवीय-उदान प्राण समान ब्यान अपान प्राण प्रत्येक, सत्वांश - तैजस ...~श्रोत्र रसना नासिका ज्ञानेन्द्रिय प्रत्येक, रजोश प्राप्य -वाक् उपस्थ गुदा = कर्मेन्द्रिय प्रत्येक, तमोश-पार्थिव-शब्द रस तन्मात्र त्वचा नेत्र स्पर्श रूप गन्ध %2mom पश्चीकृत ( स्थूल ) भूत कार्य (हर एक भूतोंमें हर एक के सम्मिश्रण से यह पदार्थ बनते हैं ) तेजः पृथिवी आकाश वायु जल शोक क्रोध भय श्राकाशीय मोह - वायवीय प्रसारण धावन आकुञ्चन वलन निद्रा तैजस चुधा श्रालस्य तन्द्रा(तृषा) कान्ति जलीय लाला स्वेद मूत्र शुक्र पार्थिव रोम चर्म नाड़ी अस्थि मांस ( यह सब व्यष्टि गत स्थूल शरीरमें देख पड़ते हैं) (१४) पश्चीकरणम् महाभूत विशेष कार्य ( इसी प्रकार प्रत्येक भूतोंमें कुछ न कुछ विशेषतासे अनेकानेक पदार्थ बने आकाश वायु तेज जल पृथ्वी लक्षण रिक्त गति उष्ण शीत जड़ता गुण लघु रूक्ष तीक्ष्ण स्निग्ध IND उपमा - प्रात्मा प्राण अहंकार मनः - जीवन स्पर्शन वाक प्राण मनः दिव्यता विकार कोश परिश्रम श्वास मल उष्णता स्वेद विज्ञानमय मनोमय प्रानन्दमय प्राणमय अन्नमय आत्मा = एक पदार्थकी द्विधाशक्ति । चित् अचित = ( सापेक्ष्यसे कल्पित ) चित् चैतन्य क्षेत्रज्ञ अचित्- अपरा- जड़ क्षेत्र - परा - अक्षर परस्तात् । क्षर - अवस्ता। - सत्व रज तम दो पदार्थों से विधा दो पदार्थों से त्रिधा - १ चित् से सत्व । २ अचित् से तम । ३ सम्मिश्रणसे रजः । श्राकाश वायु तेज जल पृथ्वी - तीन पदार्थों से पञ्चधा सत्व से आकाश १। सत्वरनसे वायु २। रजसे तेज ३ । रज तम से जल ४ । केवल तम से पृथिवी ५ ईश्वर ( समष्टि व्याप्त ) जीव (ब्यष्टि व्याप्त) चित् । अचित सत्व-प्रकाश-ज्ञान रजःप्रवृत्ति-कर्म- तप-मोह-द्रव्य कानून प्रेस, कानपुर में मुद्रित ।
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निवेदन यों तो वेदान्त विषय पर बहुत से ग्रन्थ हैं और एक से एक बढ़ कर व श्रेष्ठ कहे जा सकते हैं। स्वयं श्री शङ्कराचार्य जी ने इस विषय पर अनेकों प्रन्थ रचे किन्तु यह ग्रन्थ ( पञ्चीकरण ) ऐसा है जिसमें वेदान्त के मूल सिद्धान्तों को सूक्ष्म रूप में समावेश कर दिया गया है । ध्यान करने के लिये तो यह अद्वितीय प्रन्थ है। अर्थ के सहित प्रणव ( अोइम् ) के जप का जो विधान ( तज्जपस्तदर्थ भावनम् ) श्री पातञ्जल योग दर्शन में बतलाया गया है उसकी भी पूर्ति इस ग्रन्थ से होती है क्योंकि इसमें सृष्टि की उत्पत्ति व लय तथा मध्य की एवं स्थूल. सूक्ष्म व कारण अवस्थाओं का वर्णन करते हुए अोइम् शब्द की पूर्ण व्याख्या की गई है। इस बात का अनुभव करते हुए कि बहुत से अधिकारी सजन ऐसा ग्रन्थ न मिलने और संस्कृत न जानने के कारण इस अनुपम रचना के लाभ से वञ्चित रह जाते हैं इसीलिये इस ग्रन्थ को भाषा टीका व उत्तम सरल व्याख्या सहित प्रकाशित करने का प्रयास किया गया है । इस ग्रन्थ के व्याख्याकार ग्राम अमौर जिला कानपुर निवासी श्रीयुत शास्त्री महादेव जी पाण्डेय हैं आप वेदान्त तथा दर्शनादिक शास्त्रोंके उच्चकोटिके विद्वान हैं। श्रीराम जानकी मन्दिरके सत्स. ङ्गियों के अनुरोध से उन्हों ने इस ग्रन्थ को इस रूपमें सर्व साधारण के लाभार्थ लिखने की कृपा की । इसके प्रकाशन का श्रेय सर्व श्री बाबू विश्वेश्वर दयाल जी, पं० हरप्रसाद जी भार्गव, पं० भगवती प्रसाद जी त्रिपाठी, बा० रघुनाथ प्रसाद जी गुप्त, बा० तुलसी राम जी गुप्त, बा० बाल गोविन्द जी, पं० रामाधीन जी, बा० शिव गुलाम जी आदि सत्सङ्गी महानुभावों को प्राप्त है । उक्त सभी सज्जन धन्य- वाद के पात्र हैं। यदि विद्वद् जनों व धर्मानुरागी महानुभावोंने इस रचना से सन्तोषजनक लाभ उठाया तो उपनिषदादि अन्य महत्वपूर्ण धार्मिक ग्रन्थों के प्रकाशन की चेष्ठा की जायगी। विनीत रूप किशोर टण्डन एडवोकेट सूटर गञ्ज, कानपुर
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