Bhartiya Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikaner
Sant Sahitya
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संत साहित्य
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संत-साहित्य
(भाषापरक अध्ययन)
[मागरा विश्वविद्यालय द्वारा दी० लिट० को उपाधि के लिये स्वीकृत शोध प्रदप]
डॉ० प्रेमनारायण शुक्ल
एम० ए०, पी० एच डी०, डी० लिट.
अध्यक्ष हिन्दी विभाग
ही० ए० वी० कालेज, कानपुर
प्रन्यम
प्यान्थामा
कानपुर
RANASI
रामबाग,कानपुर
प्रकाशक
प्रथम रामबाग कानपुर
मूल्य-अठारह रुपए
प्रकाशन तिथि
जुलाई १९६५
.मुद्रक
मानक प्रिण्टस आन दवाग कानपुर-१
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डा.मगीराम ग सोम एम ए पा एच डी डी लिट
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सतगुरु की महिमा अनत अनत क्यिा उपकार ।
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षया ले गुरु सतोपिए होस रहो मनमाहि ।
मेरे जीवन निमाता
गुरुदेव डॉ० मुशीराम शमा 'सोम'
कर कमलों मे
सादर समपित
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प्राक्कथन हिन्दी साहित्य की भक्तिकालीन धारा मे सत साहित्य का एक विशिष्ट स्थान है । सतो ने अपनी साधना द्वारा जहां एक ओर वयक्तिक जीवन को समुन्नत क्यिा, वहीं दूसरी ओर लोक-जीवन को भी उदात्तता की ओर अग्रसर करने का पुण्य प्रयास किया। अन्त एव बाह्य दोनो ही रूपो की पवित्रता तथा कथनी एव करनी को एकरूपता सतो की जीवन-यात्रा का प्रधान सबल थी। उहोंने साधना की जिस उच्च मनोभूमि पर प्रतिष्ठित होकर तत्व का दशन किया वह आध्यात्मिक चितन की एक बड़ी ही महत्वपूर्ण घटना सिद्ध हुई। राजनीति तथा शासन-व्यवस्था जीवन दिशाम परिवतन की सप्टि करती है । फलत समाज अपनी युगीन प्रवत्तियो के आकलित स्वरूप को लेकर चरता हैं । जब किसी देश मे दो या दो से अधिक सभ्यताओ का सम्मिलन होता है, अथवा राजकीय परिवतन होते हैं तब सामाय जीवन का क्षुध हो जाना स्वाभाविक है । इसी परिस्थिति में मानव के घय का उसके विवेक का परिचय मिलता है। यह निर्विवाद है कि सतो ने अपने युग की आवश्यकताओ को समझा था और वही ही निष्ठा के साथ अपनी विमल वाणी के उदघोष द्वारा जन-जीवन म एक प्राति उपस्थित कर दी थी। धर्मा घता, रूढ़ियो का अघानुसरण जातिगत भेदभाव सम्प्रदायगत कट्टरता आदि उन समस्त विघटनकारी प्रभावो के प्रति उहोने विद्रोह किया और उस व्यापक सत्य को परमतत्व को प्राप्त करने का आग्रह क्यिा जो हमारे प्राणो का प्राण है जो विश्वात्मा म अगोचर होकर रमण कर रहा है और जिसे हमारे वदिक ऋपियो ने सवद्रष्टा एव सवशक्ति सम्पन्न जानकर अपना उपास्य माना था। तमध्वरेपु ईडते देव मर्ता अमत्यम । यजिष्ठ मानुप जने । -ऋ० ५-१४-२ इन सतो ने अपनी शान-साधना एव उपदेश प्रक्रिया म विभिन्न धार्मिक धाराओं का प्रभाव ग्रहण करते हुए एक समन्वयात्मक दप्टिकोण रखा है। विरोध केवल वहीं पाया जाता है जहाँ शास्त्रो के तत्व को ग्रहण न करके उनका विवेकहीन अनुकरण किया गया है । विगत वर्षों में सत-साहित्य की इन विशेषताओं पर माय विद्वानो द्वारा गभीरतापूर्वक मनन हुआ है, और चितन सम्बधी अनेक नवीन दृष्टिकोण उपस्थित किए गए हैं जिससे सतो की लोरपरक दृष्टि तथा उनके आध्यात्मिक विचारा का स्वरूप स्पष्ट होता है । विवेचना के विविध रूपो क साथ ही साथ मतो की भाषा विशप"स्प से कबीर की भापा पर भी यत्र-तत्र विचार किया गया है। कबीर-साहित्य का अध्ययन एवं अध्यापन करते हए मुय ऐसा प्रतीत हुआ कि यदि सत-साहित्य का भाषा परक अध्ययन प्रस्तुत किया जाय तो काचित सत-साहित्य की विवचना म एक विशिष्ट अग को पूर्ति हा सकेंगी। विश्व म काई भाव या विचार जितना अधिक प्राचीन है भापा भी उतनी ही अधिक प्राचीन ह । विभिन्न भौगोलिक सीमाओं, राजनीतिक एव धार्मिक मात्तियो तथा नाना घटनाचका के प्रभाव स्वरूप भाषा भी अपना रूप बदलती रहती ह तथा क्षत्रगत विपताओ के कारण भिन्न-भिन्न नामो से अभिहित हाती ह । भाषा की इस विविधरूपा प्रकृति के दशन हम सता को रचनाओ म विशेष रूप से प्राप्त होते हैं । सता की उदारचेता प्रवत्ति जिस प्रकार विभिन्न धार्मिक मा मद्राओं के द्वारा परम सत्य का दान करना चाहती थी उसी प्रकार विभिन्न भाषागत स्वरूपो क माध्यम से उसी दान को-जीवन के सत्य को व्यक्त करना भी उसका अभीट था। इस प्रसग म यह स्मरणीय है कि हमारे समस्त धार्मिक ग्रंथ शास्त्रादि संस्कृत भाषा म ही लिखे गए । व्याकरणिक नियमा से जटिल होती हुई यह भाषा जन सामाय क्षत्र से हटकर एक विगिष्ट वग (पडित समाज) तक ही सीमित रह गई। इसीलिए सस्कृत भाषा को उस धूप जलयत माना गया है जिसकी सप्राप्ति कष्टसाध्य है। वस्तुत लोक-मानस ला भाषा में ही विकसित होता ह । धम का जा ज्योति लोक क अन्तस से प्रस्फुटित होती ह वही ला कल्याण करने में सक्षम हातोह । इस ज्योति को सवाहिका लार भाषा ही बन सकती है जो घर घर म उसक प्रकार को फ्ला सके । लार भाषा का स्वरूप उस पयस्विनी के समान है जो अपने दोना कूला से बधो रहबर भी अपनी स्वतः प्रकृति का परिचय देती है। वह अपने उदगम स्थान पर भले ही अत्यत सकुचित एव सीमित हा पर उत्तरोत्तर विकासो मुमी होती हुई वह विभिन्न भूमिखण्डो या सस्पा प्राप्त करती ह तथा अपने -जल-सीकरी द्वारा समीपस्य प्रग को सवर बनाती है। सता ने लौरवाणी की इसी उबरायक्ति द्वारा अपने अन्तस के निगूढ़ रहस्या, अनुभूतियो उपटणा आदि या व्यक्त किया । सतजन प्राय परिवाजक हाते ये जो इतस्तत श्रमण करते हुए साधनापरक मार्गों एवं लोकोनयन के सम्बध म उपदेश दिया करते थे। अपने प्रमण काल म ये सत विभिन्न प्रान्तीय योपियों से प्रभावित न हुए हो, यह सभव नहीं है। उपग देते समय क्षेत्र विशेष की भाषा के प्रभाव को पिसी न किसी रूप म स्वीकार करना ही पड़ता है । इसीरिए इनकी भाषा में वविध्य पाया जाता है। एक बात और जहाँ-जहाँ य सत भ्रमण करत प यहाँ-वहाँ वे अपना प्रभाव भी छोते धरते - । इस प्रकार उनको शिप्य महरा में प्राय अनेक क्षेत्रों के व्यक्ति रहे होंगे। मस्तु सम समय मुद्रण-क्ला के अभाव में उनके उपदश गुरु-परम्परा के माध्यम से मौखिक रूप से ही प्रचलित हुए जिन्हें विभिन क्षणीय व्यक्तिया ने अपने-यपने ढग से उपस्थित दिया। बाद में जब उनका संग्रह हुआ तो उनकी भाषा में विभिन्न क्षेत्रीय वालिया का प्रमाव स्पष्ट परिलक्षित होने स्गा, इसीलिए मालाको नै उनकी भाषा को परिमाजन एव परिष्कार के अभाव में पचमेल खिचडी की सना प्रदान की है। यह ठीक है कि सतों की भाषा में एकरूपता का अभाव है पर इस अभाव को हमें हेय दृष्टि से नहीं देखना है। हमें इस यग के स्वरूप और लोप-सस्कार व मआधार पर ही उनकी भाषा पर विवेचन करना चाहिए । सस्क्त के पश्चात प्राक्न पाली एव अपनश के अचल से लोक भाषाओं का निर्माण हुआ। हिन्दी भाषा का परिनिष्ठित रूप उस समय लोक जीवन के समक्ष न पास काथा अत लोक-कल्याण की दष्टि से सतजन जिस भापाल्प को अपना सके वही हम उनकी वानियों, गलों साखियों आदि में उपलब्ध होता है । इसम सलेह नहीं कि उनका भाषा अपनी मनर रूपता में भी एक रूपता रखती है। इस प्रसग में यह स्मरणीय है नि राष्टभाषा (राज मापा) को रेकर इस समय भारतवप में जो समस्या उपस्थित है उसका समाधान सतो को मापा ने बहुत पहले ही उपस्थित कर दिया है। उत्तर स पर दक्षिण तक सबों को भापा जियम सस्कत, गुजराती मराठी पजागे राजस्थानी ग्रज, अवधी, अरवी फारसी यादि भाषाओं के नल पाए जात है अन्त प्रातीय भाषा के रूप में प्रचलित थी। उस समय इस प्रकार का भाषा विवादन था। सतों ने भाषा-शास्त्र के नियमों का सम्यक अध्ययन रिए बिना ही किस प्रकार अपनी अभिव्यक्ति का सात बनाश और उस कौन-कौन से गन्द परिधान प्रदान किए आदि क्तिन ही प्रश्न बाज इमारी जिज्ञासा का विषय बने हुए हैं। प्रस्तुत प्रवध उसी जिज्ञासा के मन का एक सामाय प्रयास मात्र है। - इस अवध में भाषा से सीधा सम्बध रसन वाले विषय हो विवेचना का अप बन सके हैं। मापा जापन सम्मता, प्रकृति धम आदि के प्रभाव को लेकर घरती है। मत सत-साहित्य को मापागल प्रवृति पर विचार करत समय इन विषयों को ध्यान में रखा गया है। सत कवियों की रचनाओं में अनेक पारिभाषिक दान पाए जाते हैं जो कहीं-कहीं प्रतीक रूप में भी प्रयुक्त हुए हैं। इनका अध्ययन श्वना पदिल एव दुरूह है कि वह सम्प्रदायगत गुरुशिष्य परम्परा से ही सभव हो सकता है। प्रस्तुत उप में मैंने अतिश्चरित पारिभाषिक एव प्रतीकात्म-रूपों का लकर विचार किया है । मैं यह अनुमव करता हूँ कि यह अध्ययन एक स्वस्त्र राप या विषय बन सकता है। बस्तु यह विवेचन एक अग की पूर्तिमान है, पूर्ण विवेचन नहीं।
१०] किसी भी साहित्य की भाषा का अध्ययन उसके व्याकरणिक स्वरूप तया गग की बनानिक प्रक्रिया के परिचय की अपेक्षा रखता है । अत सत साहित्य की भाषा का अध्ययन करते समय इस दष्टि से भी विचार किया गया है। कबीर तथा अय सत कविया का साहित्य विद्वज्जनों के समक्ष काव्यात्मक दष्टि स विवेचना का महत्वपूण अग नहीं रहा है । वस्तुत काव्यात्मक सप्टि न तो सतो का उद्दश्य था और न उसके लिए उनके पास अवकाश ही या। भाव की भूमिका में प्रतिष्ठिन हात ही वाणी स्वत काव्यमय हो जाती है । इसीलिए सतो की अभिव्यक्तिपा म भी कायात्मक गुणो की समाप्ति स्वाभाविक है। प्रश्न केवल मात्रा का रह जाता है । इसी दृष्टि से सत-साहित्य में पाए जाने वाले काव्य-तत्त्वो को देखा गया है। गल और उनकै प्रयोग मानव-मस्तिष्क की चिंतनधारा का परिचय प्रदान फरते हैं । इसी माध्यम से किसी जाति को सामाजिक चेतना के इतिहास का भी हम पान प्राप्त होता है । विवेच्य सामग्री के अन्तगत इस तथ्य को ओझल नही होने दिया गया है। संक्षेप म प्राय की यह रूपरेखा है। इसके लिए सामग्री चयन के अभिप्राय स मैंने विशष रूप स भक्तिकाल के प्रमुख निगुण सत कवियो को ही लिया है । समस्त सत-कवियो कोरिया जाना सभव भी न था। प्रपथ के बलबर को अत्य- धिक विस्तार से बचाने के विचार से हमने उद्धरण देते समय यह आवश्यक नहीं समझा कि प्रत्येक उदाहरण के लिए प्रत्येक सत कवि को पक्तियां उद्ध त की ही जावें अत यहीं पर किसी एक कवि को पक्ति है तो कही पर विसी दूसरे कवि को पक्ति। पर इतना ध्यान अवश्य रखा गया है कि यथासाध्य विवेच्य विषय का प्रतिपादन किमीन किमी उद्धरण द्वारा अवश्य हो जाय । सत-पवियों के उपल ध साहित्य की गणिकता का भी प्रश्न मरे सामने रहा है। इस सम्बन्ध में अपन सीमित साधनों के कारण मैंने उ हों अथो के आधार पर विवना बरन उचित समझी है जिनको अय विद्वज्जन आधार बनाते आये हैं । स प्रवध वे लिखन म मैंने जिन प्रयो का उपयोग किया है उनकी प्राय समस्त सूची प्रवध के अन्त म दे दी गई है । वस्तन पूर्व लिसे गए प्रथ प्रत्येक भायी लराम के लिए पप प्रदान का काय करते हैं। मैंने जिन विद्वानो के प्रया एव विचारास प्रत्या या अप्रत्यक्ष रूप म लाभ उठाया है उनरे प्रति श्रद्धावनत होकर मैं अपना हापि भाभार प्रकट करता हूँ। मेरा यह परम सौभाग्य है कि मुझ वाचाय मुगीराम शर्मा, सोम एम०ए०, पीएच. डी. टी. लिट०, (भूतपूर्व अध्यक्ष हिली-विभाग डी० ए० पी० कालेज, ११ - कानपुर) के श्री चरणों मे बठने का सुअवसर प्राप्त हआ है। उनके परम उदार सत हृदय ने मेरे विद्यार्थी एव साहित्यिक जीवन का बनाया एव संवारा है। प्रस्तुत प्रवध में भी सना की ही भाति में उनक मूत्यवान विचारों एव सत्परामों से लाभान्वित हुआ हूँ। मैं किन शब्दों में उना प्रति अपना याभार व्यक्त करें। अस्तु मेरी मौन अदा हो उनके चरणों में समर्पित है। पूज्य गुरुवर ५० अयोध्यानाथ शर्मा (भूतपूर्व अध्यक्ष सनातन धम कालेज कानपुर) के सत्परामश द्वारा मेरे इस प्रवच क विषय का मूत्रपात हुआ था। मेरे प्रति उनको जो ममता है तथा उनके सहज वात्सल्य को प्राप्त कर जो मुझे शक्ति मिलती है, वह कभी भी न तो मेरी वाणी का विषय बन पाई है और न धन सवगी। सत-साहित्य में बरबा-फारसी के गो-सम्बधो विवेचन में मैं श्रद्ध य प० रामदुलारे अवस्थी के परामनों स विप लामान्वित हुआ है । उन्हान मेरे जीवन की प्रत्येक उपलपि की बड़ी लालसा एवं सतोप के साथ दसा है। इस मैं अपन प्रति उनका सहन स्नेह मानता है । अग्रज हा० श्रीनारायण अग्निहोत्री १० दीनवधु जी त्रिवेदी एम० ए० ए व मनुज प० मगलाप्रसाद अग्निहानी एम० ए० मरे जीवन को निधि के रूम म हैं। इनका सवव वयोग मेरो जीवन-यात्रा का सम्बल है । चिरजीवी हा० विश्वम्मरनाथ त्रिपाठी (पी० सी० एस०), श्री जगदीशप्रसाद द्विवेदी एम० ए० तथा श्री रामस्वरूप त्रिपाठी एम० ए० विभिन्न रूपों में मरे पारिवारिक जीवन र मग हैं । अपनी स्वभावगत सरलता एवं शालीनता द्वारा प्रस्तुत प्रवध क रचना-बार में इन सभी पक्तियों न समय-समय पर जा सहायता प्रदान की है उसर प्रति आभार मात्र व्यक्त करके मैं कसे उऋण हो सकता है। सच तो यह है कि मैं इनसे उऋण भी नहीं होना चाहता। इनके अतिरिक्त स्मतिपटल पर अक्ति न हान वारो जिन भय प्रत्यक्ष एव परोक्ष प्रेरणाओं ने मेरा उत्साह वदन किया है उन सबके प्रति भी मैं अपना हार्दिक आभार व्यक्त करता हूँ। अन्त में एक निवेदन और, प्रस्तुत प्रबंध मेर विचार से एक नवीन दिशा को मार प्रयम प्रयास मात्र है। इसका पत्र इतना अधिक विस्तत है कि अय प्रतिमासम्पन व्यक्ति इस समय में अधिकाधिक उपयोगी सामना प्रस्तुत कर सकते हैं। इस प्रवध द्वारा यदि बुधजनों का कुछ भी अनुरजन हो सका तो इस में उनका सहल उदारता एव अपना परम सौभाग्य समझूगा। পৃৎ বৃষি सवत २०२२ -~-प्रेमनारायण शुक्ल सक्षिप्त सकेत य. बयाय मवेत क० प्र० १०वी० क.सा. ३० जान 4. शब्द गुलाल. चरन०, चरनदास दरिया० दा०६० दादू० दूलन० धरमदास धरनी. घरनीदास कबीर प्रथावलो क्वीर बीजक कवीर साहब कवीर मान गूदडी कवीर गलावली गुलाल साहब की बानी चरनदास की बानी दरिया साहव की बानी दादू दयाल की बानी दूलन साहब की दानी घरमदास की वानी घरनीदास की बानी पृ० पृष्ठ बुल्ला वा. भा० भीसा० भीखादास मलूक० मलूकदास० यजु. पारी० रत्न वह शिव० सहजा० स.बा०स० बुल्ला साहब री बानी बानो भाग भीखादास की बानी मलकास को वानी यजुर्वेद यारो साहब की बानी रत्नावली वहारप्पा उपनिषद शिवसहिता सहजोराई को बानी स० सु. सतवानी संग्रह सत सुधासार सः पुराण विषय-सूची पष्ठसख्या अध्याय १७-२९ ३०-४८ ४९-८१ (१) सत-समीक्षा (२) साहित्य परिचय भारतीय दप्टिकोण पश्चिमी दष्टिकोण साहित्य सजन एक साधन साहित्य की गतिशीलता साहित्य की स्वतत्र सत्ता, सत-साहित्य की सामा य विशेषतायें। (३) भापा तया हिदी भाषा का विकास (अ) भापा, भापा की उत्सनि भाषा को विभिन्नता के, कारण भापा और सभ्यता भापा और प्रकति भापा और जीवन, भाषा और कविता, भामा और धम। (आ) हिन्दी भाषा का विकास हिती गम की व्युत्पत्ति, हिन् । समूह उदू हिदुस्तानी । (४) सत साहित्य को पारिभाषिक शब्दावली प्रतीकात्मक श ईश्वर जीवात्मा माया समार मन शरीर, यूप, निरजन, शब्द अनहद सुरति निरति, सहन, उमनि खसम अवधूत गुरु त्रिवेणी, पटचक सहस्त्रार चक कुण्डलिनी उलट बामियां तथा प्रतीका त्मक व मण्यावाचन। ८२-२१७ (५) मापा वैज्ञानिक विवेचन २१५-२४७ विपयय स्वर विषयय, यजन विषयय मात्रा भेद, लोप आगम मनोभावा क आधार से विकृत होने वाले गन्दा * रूप, सादश्य मूलक्ता महाप्राणीकरण अल्प प्राणी- करण घोपोकरण अधोपीकरण, सम्प्रसारण प्रण परिवतन स्वर-परिवतन माना सम्बधी स्वर परिवतन गुण-सम्बधी स्वर परिवतन, कतिपय अय परिवतन, सानुनासिकता, अनुनासिकता, द्वित्त्व । (६) व्याकरणिक विवेचन २४८-२८१ कारक, अन्यय, समास कृटत, तदित ।
(७) सत साहित्य मे विभिन्न भाषाओ के २८२-३५५
शब्द एव पद
सत-साहित्य म ब्रजभाषा के गल सत-साहित्य म
अवधी भाषा के शब्द, सत-साहित्य मे सड़ी बोली के
शब्द सन साहित्य म राजस्थानी भाषा के शद सत
साहित्य म पजाबी भाषा के शब्द सत-साहित्य में
भोजपुरी भाषा के शब्द हिदी सत साहित्य और
मराठी भाषा सत-साहित्य म गुजराती भाषा के शब्द,
सत साहित्य म अरबी फारसी के शब्द एव पद ।
(८) सत-साहित्य मे अलकार तथा मुहावरे ३५६-३७३
(९) सतो की मापा मे शब्दशक्ति
३७४-३८३
(१०) सतो को मापा और सस्कृति
३८४-३९५
(११) उपसहार
३९६-४०५
(१२) परिशिष्ट
४०६-४०९
(१३) सदभ ग्रथो की सूची
४१०-४१२
संत-साहित्य
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संत-समीक्षा न स्वा रासीयामिशस्तये बसो न पापस्वाय सत्य ।। ~ऋग्वेद ८।१९।२६ ऊपर उद्धत मत्र म सत्य शस्त परमात्मा का विषण है। सत्य स अभि प्राय है होने के यारय । परमात्मा ही एक ऐसी सत्ता है जो ममनभावन हाने के योग्य है। वही एक ऐसी शक्ति है जो है और जा है वहीं मया के अस्तित्व का भी कारण है । अत अस्तित्व को आकाक्षा रखने वाले उसी की शरण में जायगे उसी का भजन करेंगे। सत्य का अर्थ ही है ऐसी सत्ता जिसका भजन किया जा सकता है। अस्तु सत्य का अथ होगा सभजनीय अर्थात जिम गुण गाये जाय । ब? म सन सत्ता तथा सतो का प्रयोग भी सत गलक अथ म हुआ है ।। अध्यात्म विद्या के सुगूढातिगूढ़ रहस्या का उदघाटन करने वाले उपनिषद गया म परमात्मा को सत्यम कहा गया है तानि हय एतानि श्रीब्यक्षराणि सति यमिति" तयत 'सत" तदमतमय यत् 'ति' तमत्यमय मत्त 'यम' तमाम यति । यदनेनोमे पच्छति तस्मात 'यम' अहरहा एवं विस्वग लोक्मेति । -छादोग्य उपनिषद ४३१५ १- यहि अग्ने अग्निना विप्रो विप्रण मन सना । ऋ० ८।४३११४ एक सत विप्रा बहुधा वदन्ति । ऋ० १११६४१४६ २- उपनियत - उप-नि-सद-विवप । सद धातु का अर्थ है विशरण (नाग हाना), गति (प्राप्त होना), अवसादन (शिथिल करना) । अस्तु उपनिपर का तात्प५ है वह विद्या विशप जिमक द्वारा अविद्या का विनाश होता है और ब्रह्म की प्राप्ति होती है तथा जिस सतत अनुपालन द्वारा जम-मरण के दुस शिथिल पड़ जाते हैं । कठापनिपद शाकरभाष्य एउपाघात म इम विद्या महा गया है।
१८ ] सत-साहित्य स - सत्यम श स ति और यम के योग से बनता है। का तात्पय अमरता अर्थात जीव है। ति स तात्पय है नाशवान जगन । यम का अथ है जीव और नागवान जगत । इन दोनो को वश म-नियम म रखने वाला अर्थात ईश्वर । इसीलिए इश्वर की सना हुई सत्यम । इस सत्यम -ईश्वर का जानना बडा कठिन है। इस पर नाना प्रकार क आवरण पर हुए हैं । ईशोपनिषद म कहा गया है कि सत्य का मुख हिरण्यमय पात्र स ढका है । अत वहाँ ईश्वर से प्राथना की गई है कि सत्य की प्राप्ति के लिए वह आवरण हट जाव हिरण्यमयेन पारण सत्यस्यापिहित मुखम । तत्त्व पूषन्नपावणु सत्यधर्माय -ईशोपनिपद, मा १५ यह आवरण क्या है ? यह आवरण अनृत-असत का आवरण है । जिम प्रकार अरणी में व्याप्त अग्नि का भूमि व्याप्त धन राति का नान हम नहीं हो पाता उसी प्रकार अन्तस्तल म स्थित ब्रह्म का ज्ञान भी अनत के आवरण के कारण नहीं हो पाता। इसीलिए इस आवरण के हटाने की आवश्यक्ता प्रतीत होती है । इस आवरण के हटते ही उस परम सत का दान उपल ध हा जाता है। गीता के सत्रहवें अध्याय म सत और असत की विवेचना इस प्रकार की दष्टये । पर्म चव सदमावे साधुमावे च सदित्येतत्प्रयु यते । प्रास्ते क्मणि तया स छन्द पाय युपते ॥२६॥ पसेतपसि दाने च स्थिति सदिति चो यते। तदर्थीय सदित्येवाभिधीयते ॥२७॥ अपडया हुत दतं तपस्तप्त कृत च यत । असदिरपुच्यते पाय न च तत्प्रत्य नो इह ॥२८॥ ब्रह्म म ही मन ५ अटके रहने की स्थिति का नाम है सदभाव । साधन प्रिया म अविरत प म सपन रहन की स्थिति की मना है साघुभाव । जितन प्रास्त कम है उह मत कहा जाता है । प्रशस्त मा अथ है (प्र+Tस+क्त) प्रासा 4 योग्य। मगर विधान करने वा-याणवारी कम ही सत पाटि म बात है। आत्यतिर मगल का विधान तभी समव है जव मन निष्काम भाव से ब्रह्म में लीन हो जाप । जिस माघना को सम्पन्नता व आधार म यह परम गान्ति की मगरमय स्थिति प्राप्त होती है उस ही सत कहा जायगा और जा उस मगलविधान के कम म सलान है उस साधु की परवी प्राप्त होगी। यम (निया) काल म तपस्या (फूट क्यावस्था) म एव जीव व पल्याण प लिए किए गए दान म जो स्पिति होती है वह सब मदभाव ही है । इसी समाव को ब्रह्मभाव भी कहा जाता है क्यादि इन सत-समोसा ममस्त पापों म ब्रह्म का हो मूल उद्दश्य विद्यमान रहता है। कोई भी काय ब्रह्म स पथक नही रहता है । जो साधु प्राणा इस साधना में सिद्धि प्राप्त कर रत हैं व ही मचे साधु माने जाते है । इन साधुओ 4 समस्त बम विधान सत्यमय ही होता है। कम का तीय होना अत्मावश्या है । बम का तन्य रुपही जिस गीता ने यहाथ बम बहा है और जो कम बधन का कारण नही बनता साविकप की मष्टि करता है । इस म्प में श्रद्धा का विकास और अभिमान का विनाश हो जाता है। श्रद्धा सरित कम का रूप केवल भगवत्प्रीत्यय होने के कारण सत माना जाता है। इसके विपरीत फ्लाफ्ल, साम हानि-जनित अथवा प्रवत्ति पर कम असन माने जाते हैं। कामापभोग से मुक्त होकर सत्व बुद्धि की प्राप्ति के लिए ही ॐ तत सत" मत्र का उपदेश दिया जाता है। ऐसा व्यक्ति जिसने ससार की भसारता का समझ लिया है और इसक प्रपचात्मक रूप से पूर्ण विरक्त हाकर उस अणारणीयान महलोमहीयान् के प्रति निष्काम भाव से अपनी समस्त प्रवत्तिया एव क्रिया गति को समग्रत अपित करने उमी में पूर्णत लय हा गया है, वह सत पदवा का अधिकारी है । संसार के प्रति पूर्ण उपरामना की स्थिति ही सात्विक स्थिति है । इसी में सन भाव एव साधुभाव का उदय हाता है। वाता-साहित्य म सत गन्द का प्रयोग अनेक बार आया है । नमिपारण्य में जिन शौनक ऋपि तथा उनके साथ के अटठामी सहर ऋषि मुनियों ने दोष कारीन सत्र क्यिा था वे सब मत कोदि के ही प्राणी थे। इस प्रकार सतो की परम्परा भारतीय साहित्य वै मूर स्रोत तक पहुचती है । वदिक साधना को लेकर दो प्रकार के व्याख्या परव प्रथ हमार सामने आते हैं। एक ब्राह्मण-प्रथ और दूसरे उपनिषद अथ । ब्राह्मण प्रथ कमकाण्ड की उपान्यता प्रतिपादित करने हुयं ब्रह्मानुभूति के लिये जप-तप, प्रतादि अनुष्ठानो को आवश्यक बताते हैं किन्तु उपनिषद ग्रथों के ऋषिया न भक्ति के स्वरूप को जानकाण्ड के आधार से प्राप्त करना चाहा। वरिक भक्ति अपने मूलप म तोक परलोर दोनो का समय स्थापित करती हुइ च।। पर कालानर में आध्यात्मिर जावन एवं कोकिन जीवन का सतुलित स्प मिटने रमा । भागवत घम के विकास क्रम का विवेचन करते हुये विद्वद्धर डा० मुगीराम दार्मा का यथन है कि भागवत धम, हमारी समय में इसी प्रकार की परिस्थिति म उत्पन्न हुआ होगा । जब वेद मा वास्त विक अप विस्मृत हो चुका था और यदि पुरोहित उसक बाह्य म्प अर्थात यानि विधि विधान से ही चिपटे हुए थे।" आगे चल पर महाभारत काल के एम रितने हा प्रसग आते हैं जहाँ ग्राह्मण अपनी हिंसापरत प्रचत्ति का प्रदान करता है frतु १- डामुसीराम दाम-मत्ति का विकास पृष्ठ २३० १८ ] सत-साहित्य स ? सत्यम र स ति और यम के योग स बनता है। वा तात्पय अमरता अर्थात जीव है। ति स तात्पय है नाशवान जगत । यम का अय है जीव और नागवान जगत । इन दाना को सम-नियम म रखन वाला अर्थात ईश्वर । इसीलिए ईश्वर की सना हुई सत्यम । इस सत्यम –ईश्वर का जानना बडा कठिन है । इस पर नाना प्रकार के आवरण पर हुए हैं । ईशोपनिषद म कहा गया है कि सत्य का मुख हिरण्यमय पात्र स ढका है । अत वहाँ ईश्वर से प्राथना की गई है कि सत्य की सप्राप्ति लिए वह आवरण हट जाव हिरण्यमयेन पात्रेण सत्यस्यापिहित मुखम । तत्त्व पूषन्नपावण सत्यधर्माय दष्टये । -ईगोपनिपद, मन १५ यह आवरण क्या है ? यह आवरण अनृत-असत का आवरण है । जिस प्रकार अरणी म व्याप्त अग्नि का भूमि व्याप्त धन राशि का नान हम नहीं हो पाता उसी प्रकार अन्तस्तल म स्थित ग्रह्म का मान भी अनत के आवरण कारण नहीं हो पाता। इसीलिए इस आवरण के हराने की आवश्यक्ता प्रतीत होती है । इस आवरण के हटते ही उस परम सत वा दान उपल ध हा जाता है। गीता के सत्रहवें अध्याय म सत और असत की विवेचना इस प्रकार की गई है- सदमावे साधुमावे च सदित्येतत्प्रयुज्यते । प्रास्ते क्मणि तया सद पाय युयते ॥२६॥ मतपसि दाने घ स्थिति सदिति चोव्यते । चय तदर्थीय सदित्येवाभिधीयते ॥२७॥ अषद्धपा हुत दर्स तपस्तप्त कृत च यत । असदित्यु यते पाय न च तत्प्रेत्य नो इह ॥२८॥ ब्रह्म म ही मन अटके रहने की स्थिति का नाम है सदभाव । साधन त्रिया म अविरत रूप म सलग्न रहन की स्थिति को मना है माधुभाव । जितन प्रास्त यम है उहे सत कहा जाता है । प्रात या अय है (प्र+स+क्त) प्रासा + पोग्य । मगल विधान करन वार-वल्याणकारी रम हा सत कोटि म आत है। आत्यन्तिर मगल का विधान तभी समव है जव मन निष्काम भाव से ब्रह्म म लीन हा जाय । जिस साधना की सम्पन्नता व आधार स यह परम गति पी मगलमय स्थिति प्राप्त होती है उस ही सत का जायगा और जा उस मगलविधान वम म सलग्न है उस साधु को परवी प्राप्त होगी। यम (त्रिया) काल म तपस्या (फूट स्थावस्था) म एव जीव के यल्याण के लिए किए गए दान में जो स्थिति होती है वह मब ग दभाव हो है । इमी सदभाव को ब्रह्मभाव भी कहा जाता है क्योकि इन कम सत-समीक्षा समस्त कार्यों म ब्रह्म का ही मूल उद्देश्य विधमान रहता है। कोई भी काय ब्रह्म से पथक नहीं रहता है । जो साधु प्राणो इस साधना म सिद्धि प्राप्त कर देते हैं वे हो मचे साधु माने जाते हैं । इन साधुया का समस्त कम विधान सयमय ही होता है । बम का तदर्षीय होना अत्यावश्यक है । कम का तार्थीय रूप हो जिसे गाता न यनाथ कम कहा है और जो म बधन का कारण नहीं बनता सात्विक रूप की मष्टि करता है । इस रूप में श्रद्धा का विकास और अभिमान का विनाश हो जाता है। श्रद्धा मवरित कम का रूप क्वल भगवत्प्रीत्यय होने के कारण मत माना जाता है। इसके विपरात फ्लाफ्ल, लाभ हानि-जनित अथवा प्रवत्ति परक बम असत माने जाते हैं। कामापभाग से मुक्त होकर सत्व बुद्धि का प्राप्ति के रिए ही ॐ तत सत" मात्र का उपदेश दिया जाता है। ऐसा व्यक्ति जिमने समार की मसारता का समय लिया है और इसके अपचात्मक रूप से पूण विरक्त होकर उस अणोरणायान महतामहीयान् के प्रति निष्काम भाव से अपनी समस्त प्रवत्तिपा एच प्रिया गक्ति का समग्रत अर्पित करने जमी म पूर्णत स्य हा गया है वह सत परवी का अधिकारी है। ससार प्रति पूर्ण उपरामता की स्थिति हा सात्विर स्थिति है । इसी म सत भाव एवं साधुभावमा उदय झता है। वाता-साहित्य म मत र का प्रयोग मनक वार आया है । नमिषारण्य में जिन शोना ऋषि तथा उनके साथ के अटठासी सहल ऋषि मुनियो न दीप कालीन सत्र किया था वे सब सत कोटि के ही प्राणी थे। इस प्रकार सना की परम्परा भारतीय साहित्य व मूर स्रोत तक पहुँचती है । वदिक साधना को लेकर दो प्रकार व व्याख्या परक अप हमारे सामने आते हैं। एक ब्राह्मण मथ और दूसरे उपनिषद अथ । ब्राह्मण प्रय कमकाण्ड की उपादयता प्रतिपादित करते हुये ब्रह्मानुभूति के लिये जप-तप अनादि अनुष्ठानो को आवश्यक बताते है, किन्तु उपनिपट गयो के ऋपिया न भक्ति के स्वरूप को नानकाण्ड के आधार से प्राप्त करना चाहा । परिव भक्ति अपने मूलाप म गोर परलो दाना का समवय स्थापित करती हुई चली। पर कालातर म आध्यामिर जीवन एवं लोविक जीवन का सरित रूप मिटने लगा। भागवत धम में विकास प्रम का विवचन परते हुये विद्ववर डा० मुनीराम शर्मा का कथन है कि भागवत यम हमारी समा म इसी प्रकार की परिस्थिति म उत्पन्न हुआ होगा। जब वेद का वास्त विक अप विस्मृत हो चुका था और वतिय पुराहित उसके बाह्य रूप अर्थात यानिक विधि विधान स हो चिपट हुए थे। आग चल कर महाभारत पर एसे वित्तन हो प्रसग आते हैं जहाँ प्राह्मण अपनी हिमापरव प्रवत्ति का प्रगान करता है, रितु १- डा० मुशीराम शर्मा-भत्ति का विकास, पृष्ठ २३८ 1 १८ ] सत-साहित्य सत्यम र स ति और यम के योग स बनता है। स' का तात्पय अमरता अर्थात जीव है। ति स तात्पय है नागवान जगत | यम का अप है जीव और नाशवान जगत । इन दोनो को वश मे-नियम में रखने वाला अर्थात् ईश्वर । इसीलिए ईश्वर की सजा हुई सत्यम । इस सत्यम ईश्वर का जानना बडा कठिन है। इस पर नाना प्रकार के आवरण परे हुए हैं । ईगोपनिषद म कहा गया है कि सत्य का मुख हिरण्यमय पात्र से ढका है । अत वा ईश्वर से प्राथना की गई है कि सत्य की समाप्ति के लिए वह आवरण हट जाव हिरण्यमयेन पात्रेण सत्यस्यापिहित मुखम । तत्व पूषन्नपावण सत्यधर्माय -ईगोपनिपद, मा १५ यह आवरण क्या है ? यह आवरण अनृत-असत का आवरण है । जिस प्रकार अरणी म व्याप्त अग्नि का भूमि व्याप्त धन राशि का मान हम नहीं हो पाता उसी प्रकार अन्तस्तल म स्थित ब्रह्म का नाम भी अनत + आवरण के कारण नही हो पाता। इसीलिए इस आवरण के हटाने की आवश्यक्ता प्रतीत होती है । इस आवरण के हटते ही उस परम सत वा दान उपल ध हो जाता है। गीता के सत्रहवें अध्याय में सत और असत की विवेचना इस प्रकार की दष्टपे । . कम सदमावे साधुमाये च सदित्येतत्प्रपुज्यते । प्रास्ते कमणि तथा सघद पाय युज्यते ॥२६॥ यजतपसि दाने च स्थिति सदिति चोयते चव तदीय सदित्येवाभिधीयते ॥२७॥ अश्रद्धया हुत दर्त तपस्तप्त कृत च यत । असदित्युच्यते पाय न च तत्प्रेत्य नो इह ॥२८॥ ब्रह्म मे ही मन के अटके रहने की स्थिति का नाम है सदभाव 1 साधन प्रिया में अविरत रूप स सलग रहन की स्थिति की सना है साधुभाव | जितन प्रगस्त कम हैं उह मत कहा जाता है। प्रशस्त का अथ है (प्रशस+क्त) प्रासा के याग्य । मगल विधान करने वा'-कल्याणकारी कम ही सत कोटि म आत है। आत्यन्तिक मगल का विधान नभी सभव है जब मन निष्काम भाव से ब्रह्म में लीन हो जाय । जिस साधना की सम्पनता के आधार से यह परम गति की मगरमय स्थिति प्राप्त होती है उसे ही सत कहा जायगा और जो उस मगलविधान के कम म सलग्न है उसे साधु की पदवी प्राप्त होगी। यन (निया) काल में तपस्या (कूट स्थावस्था) म एव जीव के कल्याण के लिए किए गए दान म जो स्थिति होती है वह सब स दभाव ही है । इसी सदभाव को ब्रह्मभाव भी कहा जाता है क्योकि इन [ १९ सत-समीक्षा समस्त कार्यों में ब्रह्म का हो मूल उद्द-य विद्यमान रहता है। काई भी वाय ब्रह्म पथर नहीं रहता है । जो माधु प्राणी इस साधना म मिद्धि प्राप्त कर रते हैं वे ही मञ्च साध माने जाते हैं । इन साधुमा का समम्त बम विधान सत्यमय ही होता है । वम का तनाय हाना अत्याrयक है । वम पा तदर्थीय रूप ही जिम गीता ने यनाथ कम रहा है और जो कम बंधन का कारण नहीं बनता सात्विक रूप को मष्टि करता है। स प म अक्षा का विकास और अभिमान का विनाश हो जाता है। श्रद्धा सररित कम वा स्य देवर भगवत्प्रीत्यथ हान ३ कारण सत माना जाता है । इसके विपरान पाएल, लाभ हानि-जनित अथवा प्रवत्ति पर कम असत मान जाते हैं। कामापभाग से मुक्त हाकर सत्व बुद्धि की प्राप्ति लिए ही 'ॐ तत्त सत' मत्र का उपदेश निगा जाता है। ऐसा व्यक्ति जिसने समार की असारता को समय रिया है और इसके अपचारमक प स पूरा विरक्त होकर उस अपारणीयान-महतामहायान २ प्रति निष्काम भाव से अपनी समस्त प्रतिया एव निया शक्ति का समग्रत अर्पित करक उमी म पूर्णत रय हा गया है वह सत परवी का अधिकारी है। ससार प्रति पूर्ण उपरामता की स्थिति हो साविक स्थिति है । *सो म सन भाव एवं साधुभाव का उन्म होता है। वार्ता-साहित्य य मत का प्रयोग अनक वार आया है । नमिषारण्य म जिन गौनक मपि तथा उन माय के अटठासा सहन ऋपि मुनिया न नीष वारीन सर किया था वे सब सत कादि वे ही प्राणी । रस प्रकार सता की परम्परा भारताय साहिय के मूल मोत तक पचती है। यदि माधना को स्वरदा प्रकार के व्याख्या-परक अप हमारे सामन बाठ हैं। एक ब्राह्मण प्रय और दूसर उपनिपट प्रय । ब्राह्मण ग्य कमाण्ड को उपान्यता प्रतिपादित करत हुय ब्रह्मानुभूति द रिय जए-नए, अनादि अनुप्टाना का आया बताते हैं किन्तु उपनिपर ग्रथो क ऋपिया ने भक्ति २ स्वारा नानदार है आधार से प्राप्त करना चाहा। वरिष भक्ति अपन मूलम्प म रोग पर दानों का समय स्थापित करती हुइ चरा । पर कागतर म माध्यामिा जीवन एव रोक्ति जीवन का मनुलिन प मिग्ने रगा। भागवत थम व विकास का विवचन परते न्य विन्दर हा मुशीराम शर्मा का कथन है कि म मन हमारी समग मसी प्रकार की परिस्थिति म सत्सम मा हागा 7व का वा विज अथ विस्मृत हो चुका था और बनिय पुरहित उस बाह्य प न सा विधि विधान स हा चिपटे हुए ५।' आग पर घर महाभारत कार एक দী এম আর ই স য় সব বিষাদক মনি ৰা শুন কাস লি १- डा. मुनीराम दार्मा-मति का विरास, पE१८ २० ] [ सत-साहित्य ऋषि अहिंसा धम का पालन करने के लिए अपनी समस्त गतियो से सचष्ट एव सक्रिय निखाई पडना है । भागवत भक्ति हिंमा प्रधान यना अनुष्ठानों के नितान्न विपरीत थी। इसम जातिगत सीता का हा कर सभी जातियो में प्राणी चाहे वे पापी हो या पुण्यात्मा समान रूप स भक्ति में अधिकारी मान गय- किरातहूणा पुलिद पुलक्सा आभीरकका यवना सगादय । येऽये च पापा यदुपाश्रयाश्रया शुष्यन्ति तस्म प्रमविष्णवेनम ॥ -श्रीमदभागवत २।४।१८ ब्राह्मण ग्रथा के आधार पर होन वाले द्रव्य यना के स्थान पर प्राणयज्ञ मानयज्ञ आदि का प्रचार किया गया। छादाग्य उपनिपट (३।१५।४) में लिखा है अथ यत्तपादानमाजवहिंसा सत्य वचन मिति सा अस्य दक्षिणा । जो तप, दान सरलता अहिंसा और सत्य वचन है वही यन की दक्षिणा है। इन शो से द्रव्य स्प दक्षिणा का ही नही द्रव्यमय यज्ञा का भी निषध हा जाता है । गीता (४१३३) म भी दयमय यना से नानमय यन का प्ठ कहा गया है। दस नानयन मे समस्त कम अपने फता के साथ परिसमाप्त हात हैं। उपनिषद अथो मे श्रय और प्रय माग तथा परा और अपरा विद्या को लेकर जो विवेचन प्रस्तुत किया गया है वह पारलौकिक आध्यात्मिक नान की ही महत्ता प्रतिपादित करता है । परा विद्या द्वारा उस अक्षर ब्रह्म का नान प्राप्त होता है । इस नान की सप्राप्ति गुरू के बिना सभव नही है । इसी से भक्ति के टस विकास क्रम म गुरू का महत्व भी प्रतिपादित किया गया । कठोपनिषद का क्यन है- उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निवोधत । क्षुरस्य धारा निगिता दुरत्यया दुग पयस्तत्त्वयो वति ॥ १।३।१४ यहा पर ऋपि का उदबोधन है कि आलस्यमयी निद्रा मे साने वाले ऐ प्राणियो। यह अविद्यात्मा निद्रा तुम्हारे जीवन के लिए अत्यन्त भयावह है। अत १- श्रयान द्रपमयाद यज्ञानानयज्ञ परतप। सब कर्माखिल पाथ नाने परिसमाप्यते । २- श्रयश्च प्रयश्च मनुष्यमेतस्तोसम्मरीत्य विविनक्ति धीर । नयोहि धोरोभि प्रयसो वणीते प्रया मन्दा योगक्षमाद वणीते ॥ -कठोपनिषद १।२।२ ३- तत्रापरा ऋग्वेटो यजुवेंट सामवेदोऽयववेद शिक्षा कल्पो व्याकरण निरुक्त छदो ज्योतिषमिति । अथ परा यया तदक्षरमधिगम्यते । -मुडक १११३५ सत समीया 1 [ २१ चन य हाफर उठा और ब्रह्मनानो (गुरू) की गाज करख उमस अपनी वास्तविक अवस्था का नान प्राप्त करो। वस्तत अध्यात्म विद्या अत्यन्त गुह्य विद्या है जिसका नान बिना गुरु के सभव ही नहीं। गु का अर्थ है अधिकार और रु का अर्थ है निराक । गुम्ल हा जयकार को दूर करत नान का प्रयागपुज प्रदान करता है । उपनिपट ग्रंथों को चितनपद्धति का जनिया एव बौदा ने भा स्वाकार किया। उपनिपट के ऋपिया की भानि हो इन सम्प्रदाय वालान हिंसापूर्ण यज्ञा का विरोध किया। कमकाएर प्रधान भक्ति स्थान पर प्रभ का आनरिक साधना पर इन दोना सम्प्रदायान विशप बल दिया। इसस स्पप्ट है कि उपनिषद ग्रथा क अपि जनिया के तीयर और बौद्धो के श्रमण, परिवाजा अहत आनि सब एक सा ही विचार परम्परा के पापक थे। ये साधु महात्मा जिह ब्रह्मतत्ववेत्ता हान वे कारण सत बहा गया है भक्ति न बाद्याचार सबधी रूप पर आस्था नहीं रखन थ। भक्ति के साधन उन लिय महत्वलान थे क्याकि साधारणत लोग उन साधनों- जप-नप पन पूजा पाठ व्रत, दान आदि का ही भक्ति मान वठ थ। य प भक्ति की प्रारभिक अवस्था म मान जा सकते हैं पर दुवल मन प्राय हा 4 महत्व स अभिभूत हाकर इही तर सीमित रह जाता है और उसके मन म का होन पर दस महकार पर कर देता है । अहकार क जाग्रत हात हा चित्त की सात्विक स्थिति नष्ट हा जाती है और सात्विक भाव की अनुपस्थिति म सत एव साधु भाव कभी उत्पन ही नहीं हो सकता । इसीलिए ज्ञानाड मानन वार सतो न उस परम सत की अनुभूति प्राप्त करने के लिए अन्तस्साधना पर विशप बल दिया है। विभिन धार्मिक सम्पदाया की भांनि हिगे के सन कविया ने भी गुरु की महिमा का उलय क्यिा है । यथा- कोई बादी कोई विवादी, जोगो को बाद न करना । अठसठ तीरथ समदि समाय, पू जोगी को गुरमुखि जरना ।। -गोरखवानी, पृष्ठ ५ सच्चा जोगी सडन मन के पचड़े में नहीं पड़ता है। जिस प्रकार अहसठों तीर्थो (नदियों) का जर समुद्र म समाता है उसी प्रकार गिप्य को भी अपन गुरु के प्रति पूर्ण आस्था गगनी चाहिए और उसी की वाणी को-उपना को मनन चितन द्वारा निरन्तर पचाना (जरना) आत्मसात करता चाहिए। मुडकमा ऋषि भागिय में क्तव्य का निर्देश करता हुआ कहना है कि परमात्मा का भान प्राप्त करन के लिए मिष्य का जिनासु प म गुरु व पाम हाथ म समिधा रेकर (समित्पाणि) जाना चाहिए । इस प्रसग म ऋपि ने गुरु की भी व्याख्या कर दी है कि वह वेदशाता तथा ब्रह्मनिष्ठ हा- १- गुगस्वकार स्याद्रास्तनिराधर । अद्यतारकोपनिषद।
२२ ] [ सत साहित्य - "तद्विज्ञानाय स गुरूमवाभिगच्छेत्समित्पाणि श्रीप्रिय ब्रह्मनिष्ठम" -मुण्डक २२।१२ सत कवियो ने गुरु-सवयी अपने विचार इस प्रकार यक्त किये हैं- अगम अगोचर रहे निरतरि गुरु किरपा ते लहोऐ । क्हु कबीर वलि जाउ गुरू अपने सतसगति मिलि रहीऐ। -बीर दादू देव दयाल को गुरू दिखाई बाट । ताला कधी लाइ करि, खोले सब पाट । गुरु तरुवर अग डाल बहु पत्र बन फ्ल'राम । रज्जब छाया म सुखो चास्यू सर सुकाम ।। मौज करी गुरुदेव दया करि सबद सुनाय कह्यौ हरि मेरो। ज्यों रवि के प्रगटे निसि जात सु दूरि कियो भ्रम भानु अधरो। कायक वायक मानसहू करिहै गुरुदेवहि बदन मेरो । सु दरदास कहै कर जोरि जु दादू दयाल को हू नित रो॥ -सुदरदास दरिया सतगुरु सद सों, मिट गई खचातान । मरम जघरा मिट गया, परसा पद निर्वान ॥ -दरिया उपनिषदकाल स कर भत्तिकाल तक की इस परम्परा को देखने से यह भी पता चलता है कि हमारे ऋपि सत या गुरू दा कार के अनुसार अपनी कायपद्धति या कायसीमा को परिवर्तित करते रहे हैं । उपनिपद काल का ऋषि रौकिक यक्ति की ही भांति अपना लोकन्व्यवहार चलाता है पर उसका एक मात्र लक्ष्य है अध्यात्म चिंतन । वह प्रत्येक लौक्कि मकाण्ड को माध्यात्मिक व्याख्या उपस्थित कर देता है । यह स्थिति रामायण काल के प्रारभ तर चलती है । रामायण काल म बार ऋपि (सत) का विशिष्ट महत्व प्राप्त होता है । उसकी सम्मति क बिना किसी भी गुस्तापूर्ण वाय का हाना सभव नहीं है । वह विभिन्न यमादि कम कागे का विधान करता है विपणा की दष्टि से वह अपन मानापमान का ध्यान भी रखता है पर आत्मस्थ होने के कारण वह निरभिमानी भी है। महाभारत काल तक आते-आते एमा प्रतीत होता है कि जो यक्ति अध्यात्मचिंतन म रत हैं सत-समीक्षा [२३ वे लोन सम्पर स कुछ अधिक दूर हा गए हैं । उदाहरणाथ नारद और व्यास को हा ले लीजिए। य नाना अलौकिक शक्यिा से सम्पन्न है और मा-कभा इनका प्रयाग भी करते हैं वितु सामान्यत ये लोकजीवन के प्रति उदासीन है । इस स्थिति की प्रतिक्रिया का होना भी स्वाभाविक था जो भगवान कृष्ण द्वारा प्रारम्भ हुई। उहोंने निष्काम कम को प्रतिष्ठा की- मपि सर्वाणि कर्माणि समस्याध्यात्मचेतसा। निराशोनिममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वर ॥ गीता ॥३०॥ बौद्ध काल तक आते-आते गुरु की प्रतिष्ठा बढती है । ' संघ रण गछामि बुद्ध गरण गछामि से स्पष्ट है कि लोक-जीवन से अबा हुआ व्यक्ति गुरू की चरण गरण में ही जाकर शान्ति लाभ करता है। वस्तुत गुरू जीवन की कला सिसा देता है। उसकी सगति पाकर यह मिटटी का शरीर सुवण के समान दीनिवान बन जाता है । गुरू स्वत तो साधना द्वारा सिद्धि की प्राप्ति करता ही है साथ ही अपनी सिद्धावस्था म मग्न होता हुआ लोक हित साधन भी करता है। भगवान बुद्ध और महाबीर स्वामी इसक उदाहरण है । सामा यत बौद्धकाल में मन का वह स्वरुप विकसित हाने लगता है जिस हम मध्ययुग ये मत-सम्प्रदाय म देखते हैं। इसम तीन बाता की प्रधानता है-(१}गुरु की रहनी (२} गुरु की करनी और (३) गुरू की क्थना। रहनी र अन्तगत गुरु का रहन-सहन आता है जिसम उसके दो रूप देखे जात हैं--एक लोक्व्यवहार की रहनी और दूसरी आत्मस्थिति को रहनी। साधना पथ इसी रहनी का ही एक रूप है । इसम हम गुरू की परहित चिंतना मानापमान मे समभावत्व परम सतापा वत्ति मानि पाते हैं । 'करनी के अतगत गुरू द्वारा लोक-हित के कार्यों को सम्पन्न हाता हुआ देखते हैं । गुरू सामाजिक स्थिति को सुव्यवस्थित करता है। समाजपरक एवं व्यक्तिपरक आचार-व्यवस्था को नियत्रित करता है । 'कथनी क अन्तगत गुरु क लोक-हित सबंधी उपदेश आते है । इसम हम करनी और करनी का समवय पाते हैं। गुरू के यक्तित्व का परिचय उमको 'क्थनी म प्राप्त होता है। प्रस्तुत प्रसग म यह दृष्टव्य है कि सता की जो परम्परा उपनिषद कार से चला उसम कालान्तर म प्रमश नाम-भेद होता गया और सत गर उन विगिर महात्माओ के लिए प्रयुक्त होने लगा जो साम्प्रदायिक रूप म निगुण ब्रह्म की उपासना करते थे। इस सबंध में विटठल एव वारपरी सम्प्रदाय के नाम लिए जात हैं। निगुणोपासना के कारण ही पानदेव नामदेव, एकनाथ तथा तुकाराम के लिये सन एर का प्रयोग होता है । विद्वदर परसुराम चतुर्वेदी का मत है कि "सत दन्द प्रमा २४ ] | सत साहित्य स्टु-सा हा गया और काचित अनेक बातो म उहो (नानदेव, नामदेवादि) के समान हान व कारण उत्तर भारत के कबीर साहब तथा अ य एस लोगो का भी पीछे वहीं नामकरण हो गया। 'त्री चतुर्वेदी जी ने अपने इस मत की पुष्टि म मिस्टीसिज्म-न-महाराष्ट नामक पुस्तक लेखक प्रा० आर० डी० रानाड के मत का उल्लेख किया है। वे भा सत शट का विटठत सम्प्रदाय विशेष की वस्तु मानत हैं । पर इसका तात्पय यह नहा कि दूसर सम्प्रदाय म सत गब्द का प्रयाग नहा है। डा० वडथ्यवाट क्वीर दादू नानक आदि महात्मा का सन्त न बह कर निगुण मम्प्रदाय के कवि कहते हैं । . याकरणिक-प्टिम सत गर मम्वृत के सन गर का बहुवचनात ' म्प है जा अस धातु से बनता है। अम का अथ है हाना । अस म गत प्रत्यय लगा बर सन गब बनता है। सत से तात्पय है रह्ने वाला अथवा होने वाला शुद्ध रूप म हान वाला या रहने वाला एकमात्र ब्रह्म ही है । इसीलिए उस भी सत कहा गया है और साधक भी ब्रह्मनिष्ठ होने कारण अपना अस्तित्व अक्षण्ण रखता है इसीलिए उनकी भी स त मना हुई । म प्रमग म सन गट की व्याकरणिक याम्या म न लग कर सतों के स्वभाव आचरण आदि मे परिचय पाना अधिक समीचीन होगा। सत का परिचय उमका रप नही गुण है । जो व्यक्ति सत चित और आनन्द रूप प्रभु म अपन को निरन्तर लीन क्यि रहता है वही सच्चा सत है । कृपा सात फे स्प में साकार हो उठती है । मुख उसको अन्तश्चेतना का भी प्रमादी नहीं बनाता और न दुग्व कभी उसे क्तव्यपथ स विचलित करता है । कामनाओ का क्लुपित “यापार उसकी बुद्धि को कभी मलिन नही बना सकता। उसके स्वभाव म गम्भीरता एव प्रकृति म धय का निरतर वास रहता है । भूख प्यास उसे कभी यथित नहीं करती 1 नाक और मोह उसे कभी चचल नही बनाते । जम और मत्यु से वह उप रामता प्राप्त कर लेता है। श्रीमत् भागवत म भगवान कृष्ण न उद्धव स अपने भक्त का परिचय देते हुए कहा है - १ 2 उत्तरी भारत की सत परम्परा-पष्ठ ७॥ Now Sant is almo t a technical word in the Vitthal Sampradaya and means any man who is a follower of that Sampradaya Not that the followers of other Sampradaya are not Santas but the fol lowers of the Varkari ampradaya are Santas par excellence P 42 Preface in the Nirgun school of Hindi Poetry Page 1 सन परीक्ष्या यतरद भजत मूढ परप्रत्ययनय बुद्धि । -कालिदास । 3 सत समाक्षा ] [ २५ कृपालुरकृत द्रोहस्तितिक्ष सय दहिनाम । सत्यसारो नवद्यात्मा सम सर्वोपकारक । कामरहत धौन्तिो मदु सुचिरविचन । मनोहो मिवभुक गात तियरो मरणो मुनि । अप्रमतो गमोरात्मा पतिमानित पडगुण । अमाना मानद पो मा बाणिक कवि ॥ -श्रीमदभागवत~११४११०२९३१ साधारण प्राणिया के समान मन्त में समय मा विपयो का जाल बिछा रहता है पर ब्रह्मान र मान हान कारण विषया की माता उस सपना और आष्ट नहीं कर पाती । व समुद्र के समान सटर और अविकारो बन रहते हैं। समद्रम चाहे जितना जल प्रविष्ट हा और चाह उसस क्तिना हा जल निकल जाय पर उसम क्सिा प्रकार का परिवतन नहीं हाता । स एकरसता एव एकरुपता बनी रहती है। पर हो जस चन्द्र की अमतापम मराचिनामा को देखकर उह पान के लिए वह अपनी सहयातिसहम बाहयो कल्पकता है उसी प्रकार प्राध्यानावस्थिन मन्त भी उसकी सोममयो ज्यालाकी समाप्ति लिए सहस्रातिसहल कामनामा वा उसको ओर संचालित करता है। उसका समान कामनायें ब्रह्मा मस होती हैं। वह महमार सय एव भाग-साधन म ममता-सहत हार पूर्ण शाति का उपभाग करता है । यहा भात की ब्राह्मी स्पिति मानी गई है जिभ अवस्थित हार मन- पण पूणत विगुरु हा जाता है। गीता का क्या है- आपूयमाणमलप्रतिष्ठ समुद्रमाप प्रविशति यत । तहत कामा य प्रविति स स गानिमाप्नोतिन बामकामी १५ विहाय कामान य सर्वान पुमाश्चरति निस्पह । निममो निरहकार मतिमधिगच्छति ॥ एपा ब्राह्मी स्थिति पाय नना प्राप्य विम्रह्मति । स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणम इति ॥ -द्वितीय अध्याय, रोग ७०,७१७२ सन्त का मन सव ब्रह्मनिष्ठ हान २ कारण इस का बाध नहीं कर पाता। इसा तु वर दुसरे कारणों के प्रति द्वेष का अनुभव भी नहीं करता । वह ससार में समस्त प्राणिया! कूटस्पदव द प म देखता है तथा अपन धारातियोर शत्रु को भी मिश्वत देख कर उस प्रति निरन्तर स्नेह को अजस धारा प्रवाहित करता रहता है। वह ध्यानावस्थित होकर करुणाप्रावित हुत्य से अवनातर क मगणित ताप-तप्त प्राणिया को शान्ति प्रदान करन म लिये प्रतिक्षण अपन प्रभु को विरस-विरख कर पुकारा करता है । वह अपनी परावस्था म पहुँच कर यही सोचा करता है कि न तो मरा कोई अस्तित्व है और न मरा कुछ बपना ही है । अस्तु उस लिए 4 तोक २६ ] [ सत-साहित्य - को मोह ? क्योकि वह तो एकत्वमनपश्यत" है न? गीता के बारहवें अध्याय में कृष्ण ने अपने प्रिय भक्त के रूप को जो व्याख्या की है वही सन्त की याख्या है ।। सन्त प्राणी आत्मज होने के कारण नियत्व और अप्रियत्व के चक्र में नहीं पड़ता। वह आनदोपला घ के लिए बाहर की दौड-धूप से सवथा दूर रहता है । प्रिया की नितान्त परावस्था में प्रतिष्ठित होने के कारण वह सवथा एक रूप, एक रस रहता है । उसका चित्त सतत उद्वेग रहित अवस्था म ससार के समस्त प्राणियो का मगल- विधान करता रहता है । श्रेयस की प्राप्ति ही उसके जीवन का मूल मात्र है । उसके शुद्ध अन्त करण मे आत्मा का अपापविद्ध परमानन्दभाव समुदित होता है । महात्मा क्वीर ऐसे ही सन्त के मिलन को निरन्तर प्रतीक्षा किया करते हैं क्योकि उनका विश्वास है कि सन्त के शरीर का स्पर्श जीवन के समस्त पाप शाप को गात पर देगा- कबोर सोई दिन भला, जा दिन सत मिलाहिं। अक मरे भर भेटिया, पाप सरीरौ जाहि ॥ -क० प्र०, पृ०५० सतो की व्याख्या करते हुए कबीर का प्रयन है- निरबरी निहकामता, साइ सेती नेह। विषया सू न्यारा रहे, सतनि का अग एह ॥ सत न छाड सतई, जो कोटिक मिल असत। चदन भवगा बठिया तक सीतलतान तजत ।। -क०प्र०, पृ०५०-५१ सत अपनी ब्रह्म निष्ठा के कारण ब्रह्म रूप ही हो जाता है। सत-काव्य मे ईश्वर और ब्रह्म में भेद नही माना गया साइ सरोथे सत हैं यामे मीन न मेस । सत औ राम को एक क जानिये । दूसरा भेद ना तनिक आन ॥ -पलटू साहब की बानी। यस्मानोद्विजते लोक लोकानोद्विजने च य । हर्षामषमयोद्व गम तो य स च मे प्रिय ॥१५ अनपेक्ष शुचिदक्ष उदासीनो गतव्यय । सर्वारम्भ परित्यागी यो मदमक्त स मे प्रिय ॥१६ -गीता द्वाद। अध्याम ।
सतनामीक्षा [ २७ महात्मा तुलसीदास भी सत्त और अनन्त (ब्रह्म) मे भेट दष्टि नही रखते- 'जाने सुसन्त अनत समाना।' -मानस, उत्तरफाड । माधु-सगति से ही राम को उपलब्धि हो सकती है। इस तथ्य का सतों द्वारा अनेक बार कहा गया है- मेरे सगी दोइ जणा, एक पटणों एक राम । वो है दाता मुकति का, यो सुमिराब नाम । -10 प्र०,०४९ साथ मिल तव उपज हिरद हरि का हेत। दादू सगति साधु को, कृपा कर सब देत ॥१९॥ साथ मिल तब हरि मिल, तव सुख आनद मूर। दादू सगति साथ शो, राम रह्या भरपूर ॥२२॥ दादू० को शनी, प्र० भाग, साध को अङ्ग। सत का हृदय वहा दयालु हाता है । धामद से रहित वह निरन्तर परोप- पार वत्ति म ही लान रहता है। इसीलिए तो महामा तुलसी सतसग के सुख को स्वग और अपग पे सुख से भी कही अधिक श्रयस्कर मानते हैं- तात स्वग अपग सुख, रिय तुला एक अग। तुरन ताहि सक्ल मिल, जो मुखलव सतसग । -मानस सुदरकांड जीवन के दो पक्ष हैं-~-एक आध्यात्मिक जीवन और दूसरा भौतिक-जीवन । इन दोनों में से किसी एक के प्रति व्यक्त की गई लतिशयता जीवन के स्वाभाविक रूप का सप्टि नहीं कर पाती । जीवन की पूर्णता उसक सतुलन म है, समवय म है। इस विचार के समयन में यहाँ डा. वासुदेवशरण अग्रवाल का यह कयन द्रष्टव्य है कि सत वह है जो पृथ्वी पर निवास परत हुए दिव्यलोक का सदश भूतल पर लाता है। जो पक्षी के समान आकार में उड पर भी वक्ष पर आकर विश्राम करता है । जो व्यष्टि के बद्रमक चा उठ कर समष्टि जीवन के १ ये दानेपु दयालय स्पति पानापोऽपिन श्रीमदो। व्यग्रा पेब परोपकारकरणे हयात ये याचिता । स्वस्था सति व यौवना मद महा ध्याधि प्रकोपेऽपि ये, त स्तम्भरिव सुस्थित कलिमर क्लान्ता धरा पायते । -समापित रतमाण्डागारम पृ० ५४ २८ ] [ सत साहित्य प्रति आस्थावान नेता है जो स्वाथ को त्याग कर सामूहिक हित की बात सोचता है ऐसे “यक्ति का जीवन नीरस और गूय नही होता वह दिय आनट से गवित एव अभय प्रेरणा में संचालित होता है । जिस क्षत्र में इस प्रकार का एक भी यक्ति प्रकट हो जाय वहा ही ईश्वरीय ज्योति के साक्षात दर्शन समयने चाहिए। ईश्वर अपने बाप को सतो के रूप म ही प्रकट करता - सत-हृदय की गीर सम्पनता एव पर दुख-कातरता ये ऐस दो प्रमुख गुण हैं जिनके कारण सभी प्राणी उसकी ओर खिचे चले आते है । वह अपने को तो सदव मरत्व हीन समयता है पर दूसरे को सगा सम्मानित करत म उस आत्मसतोप हाना है ! कामादि विकारा से रहित होने के कारण उसकी चित्त की पत्तियां सतत शान्त रहती हैं और इसी कारण वह जीवन म सदव उत्फुल्लता एव उत्साह का अनुभव करता रहता है। मनसा वाचा कमणा प्रभु पर प्रीति होने के कारण वह समस्त प्राणिया म ब्रह्म की ही सता को प्रतिभासित होता हुआ देखता है । इसीलिए वह सब का और सब उस के बन जाते है । ऐमो स्थिति म किससे प्रम और किसस प? सभी तो उसके अपने हैं। सभी में वही आत्मतत्व विद्यमान है । अस्तु सभी के कल्याण के लिए उसके हृदय में गात एष शीतल अमृत की धारा निरन्तर प्रवाहिन रहती है । वह दूसरे के अणमात्र गुण को भी पवत के समान विगाठ एव महान रूप में देखता है- मनसि वचसि काये पुण्य पीयूप पूर्णा स्त्रिभवनमुपकार अमि प्रीणयत । पर गुण परमाणू पवतीकृत्य नित्य निज हृदि विक्सत सति सत क्यित । -मतृहरि -नौतिशतक महात्मा तुलसीदास ने मानस क उत्तरकाड म सतो क इहा उपयुक्त लक्षणो की विवेचना करते हुए लिखा है- विषम अलपट सोल गनाकर । पर दुख दुख सुख सुख देखे पर । सम अभूतरिपु विमद विरागी। लोमामरप हरष भय त्यागी । कोमल चित दीनह पर दाया । मन वच म मम मगति यमाया। सहि मानप्रद आपु अमानी। मरत प्रानसम मम ते प्रानी ॥ विगत काम मम म परायन । साति विरति बिनती मुदितायन । १ साहि य सदा का सत साहित्य विगपाक-१९५८ ।
सत समीक्षा ]
[ २९
सीतलता सरलता मयत्री। द्विरा पद प्राति थम जनयित्री।
ये सब लयन वसहि जासु उर । जानेहु तात सत सतत पुर।।
सम दम नियम नीति नहि डोलाह । पम्य वचन बहू नहिं बोलहि ।
निंदा अस्तुति उमयसम, ममता मम पदक्ज ।
ते सम्जन मम प्रानप्रिय, गुन मदिर सुख पुज।।
सतों के जीवन को इस पुनीत गति को देख कर ही तो पुराणकार
"प्रायेण तीर्यामि गमापदेश स्वय हि तीर्थानि पुनति सत ।"
--क. १, अ० १९ श्लोक
२ साहित्य-परिचय भारतीय दष्टिकोण- मानव मननशील प्राणी है। वह अपने मनन को सुरक्षित भी रखना चाहता है। इसके रिए भाषा एक उपकरण है। वदिय ऋपि ने भाषा की कल्पना एक बल के रूप में की है- चत्वारि शुगा प्रयो अस्य पादा गोय सप्तहस्तासोऽस्य । विधा बद्धो बषमो रोरवीति महोदेवो मयां आविवे॥ -०४१५७१३० उस भाषा रूपी बल के चार सीग-नाम (सशा)आख्यात (प्रिया)उपसग और निपात तीन पर(तीन लिंग-स्त्रीलिंग पुल्लिग और नपुसकलिंग) दा गिर (कृदन्त और तद्धित) सात हाथ (सात कारक-कर्ता कर्म करण सम्प्रदान अपादान सम्बन्ध और अधिकरण) हैं तथा वह विधाबद्ध (तीन वचनो-एक वचन द्विवचन और बहु वचन से बंधा हुआ) । एसा बल (भाषा) मत्य लोक मे गजन करता हुआ घुस आया है। ऋषि के इस कथन का तात्पय यह है कि बखरी वाणी ने “याकरण सम्मत शब्दों के माध्यम से मानव भावनाजो का गाश्वत जीवन प्रदान करने का साधन दे दिया। प्राप्त साक्ष्य के आधार पर हम इस निष्कप पर पहुचते हैं कि आय जाति को कदाचित इसी बखरी वाणी का सब प्रथम दशन हुआ था। सभव है कि वेदवाणी उस प्रारभिक वाणी का कुछ अधिक विकसित रूप हो जिस मत्र द्रष्टा ऋषियो से प्राकृत जन बोलते रहे हो। पर साहित्य का प्रथमावतार इसी वाणी म आय जाति को प्राप्त हुआ जिसे उसने अपने विभिन्न उपायो द्वारा आज तक सुरक्षित रखा है। इस प्रकार जो साहित्य हम सब प्रथम उपर व हुआ वह वदिक साहित्य ही है । इस साहित्य में वे समस्त मूल तत्व प्राप्त होते हैं जिनसे आगे चल कर विभिन्न विचार-परम्पराओं का जमा। ये विचार परम्पराए शासन के रूप म उपस्थित हुइ । विचारो की विधि निषधात्मक अभि यजना के कारण यह प्रश्न होना स्वाभाविक है कि क्या इस साहित्य को सना प्रदान की जाय । सामान्यत यह देखा जाता है साहित्य परिचय कि वेद को तथा उत्तबधी साहित्य को शास्त्र की पदवी तो प्राप्त हुइ पर वह साहित्य न बन सका। वेद द्वारा क्तव्य मबधी तीन माग निश्चित किए गए--(१) ज्ञान माग, (२) कम माग, (३) उपासना माग ! विचार सबधी इन मागों मानवात्मा को इतना अधिक प्रभावित किया कि आज त विचारको के दल इही तीन मागों म विभक्त हैं। ये माग साधना के माग तो बने, पर साहित्य के माग बनने का इहें सौभाग्य न प्राप्त हो सका। रितु ध्यान देने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि वदिक साहित्य में सब कुछ बामन ही नहीं है उसम तीव अनुभूति की कोमल यजना भा विद्यमान है । हां इतना अवश्य है कि यह अनुभूति गुद्ध और पविन मारमा के लिये ही है । यथा- का ते उपेति मनसो वराय भुवदग्ने शतमा का मनोया । को वा यज्ञ परिदक्षत आप केन वा ते मनसा दागेम। ~ऋग्वेद, ११७६३१ (हे प्रभो तेरे मन को वरण करने के लिए कौन-सा उपाय है। हमारी कौन सो स्तुति तेरे लिए सुखकारी है। ऐसा यहाँ कौन है जो यज्ञ-वों द्वारा तेरी शक्ति कान्याप्न र सक। वह मन ही हमारे पास कौन सा है जिससे हम हदि प्रदान कर सकें।) + पापिनियो पक्षणप्रिय सन, त्या आगासि कृणवत्सखाते । मा त एनस्य तो यक्षिन भुजेम, यधिष्मा विप्र स्तुवते परूथम ।। ऋग्वद ७८८६ (हे प्रभो, जीवात्मा तेरा सदा का बधु और साथी है, पर तेरा प्रिय होकर भी तेरे प्रति अपराध किया करता है । है पूज्यदेव, पाप करते हुए हम भोग न भोगें। आप सका हैं । अपने स्तुति कर्ता भक्त शरण प्रदान गरें।) + भारताय वाडमय के प्रारभिक स्वरूप एव उमकै मोत की विवचनाम बमामि का निम्नाक्ति लोक प्राय उत्त किया जाता है- मा निपार प्रतिष्ठा रवमगम पावतो समा, परकोंच मियुनादेकमवधी काम मोहितम । एक दिन पाप ने कौंच मिथुन म से एर का वध कर दिया । वाल्मीकि की वाणी सहानुभूति स विगलित हो उठी और उनकी करुणा साहित्य के प्रथम अवतार का कारण बनो। विद्वानों ने उक्त श्लाक का एक दुमरा भी अय लिया है १- मा--गोमा या लक्ष्मी । निपाद-आश्रय । स्वमगम शाबती समा--तुम अनन्तवों सर प्रतिष्ठा को प्राप्त करो। मिथुन-षा की सतति वे जोह ।
३२ ] [ सत साहित्य गोभा से सपन तुम सत्व प्रतिष्ठा को प्राप्त हो क्योकि तुमने कु चावशजात काम मुग्ध युग्म (रावण-कुम्भकरण) म से एक का वध क्यिा। इन दोना प्रसगो के आधार से हम दो प्रकार के विचार प्राप्त होते हैं । पहला तो यह कि साहित्य की प्राथमिक विशेषता 'भाव है जिसकी ओर समेत करते हुए क्सिी कवि ने कहा है- श्लोक्त्वमाऽपद्यत यस्य गोर । अर्थात भाव प्रवण हृदय जिस अनुभूति से विगलित हो उठ उसको यजना साहित्य है । इसकी दूसरी विशेषता ग' है। दूसरे अथ म श्लिप्ट गदा के आश्रय स साहित्य का प्रथमावतार यही श्लोक माना इस दिशा की ओर सकेत कर रहा है कि साहित्य म प्रयुक्त गदावली केवल सकेताथवाचिका ही नही होती वरन उस साकेतिक अय से सबद्ध अयायवाची भी होना चाहिए । साय ही प्रासगिक अथ सम्वधवशात् अयाय की प्रतीतिकारक ध्वनि भी साहित्य का अग बनती है। इस प्रथम श्लोक म एक वस्तु और व्यक्त होती है जिसन साहित्य व दो रूपा को उपस्थित कर दिया है (१) यह छद स्तुतिपरक होने के कारण किसी नायक की स्तुति का वाचक है । इसस यह निष्कप निकला कि साहित्य किसी बाह्याथ साधन में प्रयुक्त हाकर किसी ख्यात चरित्र का वर्णन करता है। इस विचार परम्परा ने महाकाव्या नाटका, आख्यानो और कहानियो की सप्टि की। (२) स्वानुभूति की तीव्र “यजना करता हुआ यही छद मुक्तक गीति परम्परा का प्रथम श्लोक है। इस प्रकार इस प्रथम श्लोक से हम पाच विचार-माग प्राप्त हाते हैं--- १-रस सम्प्रदाय २-ध्वनि सम्प्रदाय ३-अलकार सम्प्रदाय ४-क्थानक काव्य या इति वत्तात्मक काव्य ५-स्वानुभूति परक मुक्तक काय इनके अतिरिक्त साहित्य की अय समस्त परिभाषाए भी प्रथम श्लोक में ही अवित हो जायगी। प्रस्तुत विवचन भारतीय दष्टिकोण को लक्ष्य म रख कर हुआ है । भारतवप में साहित्य शब्द को व्याख्या करते हुए विद्वाना न जिस अथ पर विचार किया है वह आगे की याख्या से स्पष्ट हो जायगा। व्याकरण शास्त्र की दष्टि से साहित्य गन के अथ पर विचार करते हुए हम देखते हैं कि धा धातु के साथ क्त प्रत्यय के सयोग से हित गब्द निप्पन होता है। 'स के योग से सहित का अथ हुआ साथ एकत्र । सहित का अथ है हित के साथ। इस सहित गल स भाववाचक समा बनाने के लिए प्यन प्रत्यय करने पर साहित्य साहित्य-परिचय ] मान्द बनता है । इस प्रकार साहित्य गलश अथ हुआ माहित हान का भाव । व्या करण-मम्मत इस अथ म दो बातें स्प है। पहली एकत्र की हुई ज्ञान राधिका हाना और दूपरी इस मान राशि का मानव हिताय होना } आचाय महावीरप्रसाद शिवेती-कृत साहिय को यह परिभाषा- 'मान राति के सचित काप का नाम साहित्य है मालित्य के शमय के अनुकूल है । भारतीय वाडमय म 'भान राग के सचित कोष' को दो भागों में विभक्त कर दिया गया है । पहला भाग पास्त्र बहाता है और दूसरा भाग काव्य अथवा साहित्य | गड शामु अनुगिष्टी' धातु से प्टन प्रत्यय के द्वारा निष्पन्न हुआ है जिसका अर्थ है गामन । हम पहले वह आये हैं कि वदिक माहित्य गास्न है। न क्वल वदिक साहित्य हा, अपितु समातियो से रेकर काम-गास्त्र तक सभी गात्र ही हैं । इन सब म क्तव्याक्तव्य का ही समावेश है। यद्यपि शास्त्र गब्द स ग्रहीन मनक प्रयो म ऐसे प्रसगो का प्रभाव नहीं है जो हृदयाह्लादकारित्व में काव्य की परिभाषा निकट मा जात है फिर भी विधि निषधामक प्रवति के कारण एस समस्त प्रयों को शास्त्र की मना प्राप्त हुई है। भारतीय बाडमय का वह भाग भी जिम साहित्य को सना दी गई है गासन करता है, परत उसका शासन रहीम के इस दाह का मांति है- रहिमन राज सराहिए, ससि सम सुखद शु होइ । पहा आपुरो मानु है तप्यो तरपनि खोइ ।। मूय तपता है और तारागण को ज्योति को अपने म विस्य कर लता है। परन्नु चद्रका तपना (सन) दूसरे प्रकार का है, वह तारागणों को अपनी मुधा रश्मिया स पाप्यायित करता हुआ ज्या स्ना को छिटका दता है । भारतीय वारमय मागास्य मनावतियों की दीप्ति का अपहरण करके चम पाता है परन्नु साहित्य मनावत्तियो को तृप्त करता हुआ बद्रिका बिखेर देता है। प्रारम शासन दोनों का है जिससे अमान का अधिकार नष्ट होता है परन्तु एक में शासन म तीक्ष्णता है अयागी मानस उसकी बार देख नहीं सकता, किन्तु दूसरे मामन मदु है योगी अयागी सब उसस आँख मिला कर तप्त हो सकते हैं। इसीरिए पास्त्र नारन है, उस पाम राजार है । परन्तु साहित्य साहित्य है, इसके पास मानव हिन-साधन को मधुर भावना है। इस प्रकार भारतीय साहिय को प्रमुख तीन विशेषतायें हैं- १-हित-साधन करना २-मानव-मनोवत्तियों को तप्त ररला ३-मानव मनावत्तियों का उन्नत करना ३. ] ! [ सत-साहित्य विद्वानो ने साहित्य की अनकानेक परिभापायें की हैं । प्रस्तत प्रसग मे हम इनका विवेचन परते हुए यह देखने की चेष्टा करेंगे कि ये सब परिभाषायें साहित्य की इही तीन विशेषतामा + अतगत हैं। हित-साधन १-हित पिहित तत्साहित्यम् । २-हित सनिहित तत साहित्यम । ३-हित सम्पादयति इनि साहित्यम । तप्ति ४-सहित रसन युक्तम् तस्य भाव इति साहित्यम । ५-हितेन निरतिशय पदेन तरच्छा अनाधान इच्छा विषयेण सहित साहित्यम । - उन्नयन ६-सम्यक निहित सद्धि तत सहित तस्य भाव साहित्यम । ७-अवहित मनसा महपिभि तत् साहित्यम । ८-अहित परमेश्वरेण इति सहित तस्य भाव साहित्यम । पहिली परिभाषा के द्वारा जिस रचना म हित छिपा हा उस साहित्य कहा गया है । उसका मूल उद्देश्य हित प्रकाशन नहीं होना चाहिए वह उसमे छिपा रहना चाहिए । उस हित को खोज निकालना भावक हृदय का काम है । भावक हृदय इस निहित हित को अपनी अपनी रुचि के अनुसार निकाल रते हैं । उदाहरण रिए वाल्मीकि की रामायण मनुष्य का क्तव्य की शिक्षा देती है अथवा निर्वेद का शिक्षा यह वात वाल्मीकि न कही भी नही कही पर सहृदय पाठन अपनी अपनी रुचि क अनुसार भाव ग्रहण करते हैं। दूसरी परिभाषा के अन्तगत हित को साहित्य म सनिहित माना गया है । अस्तु हित साहित्य सेवन का अवश्यम्भावी परिणाम होकर साहित्य सवन करने वाल के पास स्वत पहुंच जाता है । तीसरी परिभाषा म साहित्य का हित-उत्पादन का वारण-माना गया है । यह मनोवज्ञानिक तथ्य है कि मन जिस प्रकार की भावनाओं मे रमण करता है। मनुष्य का आचार भी उसी प्रकार का बन जाता है । सत साहित्य को सतत सेवा मनुष्य के माचरण-निर्माण म अवश्य कारण बन सकती है । टाल्स्टाय माक्स इसीलिए अधिक शक्ति-सम्पन्न है कि उसने हित-सम्पादन करने वाले साहित्य का निर्माण किया, कोरे वाद के वाधार पर वग-युद्ध की प्ररणा नहीं दी।
- - साहित्य परिचय ] उक्त तीनो परिभाषाओ में साहित्य को पहिलो विशपता हित साधन करना दिखाई देती है। चौथी परिभाषा मे रस से युक्त गाय को साहित्य की सना दी गई है। मानव प्रकृति के साथ रस के दो परिणाम होते हैं-(१) स्वादु (२) तोप । साहित्य की विपता यही है कि इसका गमन स्वादु होता है और वह मनोवत्तिया को तोप प्रदान करता है । गमनाम की विपना की ओर सकेत करत हुए तुलसी दास कहते हैं "स्वादु तोप सम मुगति सुपा क।" सूर का भी कपन है "परम स्वादु सय ही मुनिरन्तर अमित तोष उपजाये।" यह परिभाषा साहित्य के उस परिणाम की ओर संकेत करती है जा मानव पत्ति को तप्त करके आह्लाद प्रलायक हाता है। साहित्य की पांचवी परिभापा म इस की ही विशेष व्याख्या दी गई है। उसको 'निरतिशय प्रमास्पद कहा गया है।' अर्थात उसमे अधिक प्रमास्पद कोई अन्य वस्तु नहा । प्रेमास्पद श का अथ कोई पार विशेष न समझना चाहिए। काव्य या साहित्य पात्र से सम्बद्ध न होकर भाव से सम्बद्ध होता है। इसी की, व्याख्या आग के इस सूत्र म है-- इतरेज्छा अनाधीन इच्छा विपयेण । अर्थात् यह रस दुमरे को इछा कामावर्ती नहीं होता, परन स्वीय इच्छा का विषय होता है। अतएव कोई दूसरा हम रस चोध नहीं करा सकता। रस-बोध तो हम स्वय होता है। हमारी मनोवत्ति की जो तप्ति मान्य विषयक मानद से तादात्म्य प्राप्त करके होती है उसी का नाम इतरे छा अनाधीन इच्छा विषय कहा गया है। उक्त दोनो परिभाषाए मनोवृत्ति को तप्त करन की भावना व्यक्त करती हैं। छठी परिभाषा के अनुसार सज्जन लोग जिसे भली प्रकार धारण करते हैं उसे साहित्य कहते हैं । तात्तय यह है कि साहित्य देवल क्षुद्र वासनाओं को वस्तु नही है यह मनुष्य की मौलिन मनोवृत्तियो को उन्नयन (सब्लिमेनन) की ओर प्रवृत्त करने वाली यस्त है। यद्यपि सत और असत परस्पर सापेक्ष शल हैं परतु प्रत्येर देश और प्रत्येक काल अपने विगिष्ट मापको के द्वारा इनकी विशिष्ट परिभापाए बनाता रहता है। उन परिभाषामा के अनुसार सत-असत का स्वरूप निश्चय हाता है और साहित्य असत् पर सत की विजय दिखाने म समय होता है। संसार का कोई भी साहित्य इस विषय वा अपवार नहीं है। मातवी परिमाया में अनुसार सत का सम्यक् विकराम भारतीय सापक महपियाम मानते हैं । मपि भी जिस पाउमम का निरन्तर मनन करते हैं वह साहि त्य है। महर्षि वदन्यास का श्रीमाभागपत और महाभारत यदि साहित्य नहीं ता और क्या है । इस प्रकार साहित्य को प्रवृत्ति मनुष्य को मनाति का सदव ऊचा उठाने में सहायक रही है और यह शक्ति आज भी वसी ही सजीव है। 1 ३६ ] [ सत-साहित्य । आरवी परिभाषा के अनुसार भारतीय साधक अपने प्रत्यक काय म परमात्मा को देखता है। उसकी समस्त गतियो का नियामक भी वही परमात्मा है। अतएव वह मानता है कि साहित्य की हित-साधक क्ति प्रभु प्रदत्त है । वही अपनी अनुकम्पा से लोक विषयिणी मानव मनोवत्ति का जब अलोक विषयिणी बनाने की इच्छा करता है तब साहित्य का सृजन होता है। मानव मन सासारिखता से ऊपर उठ कर ब्रह्मा स्वाद सहोदर काव्यानन्द की प्राप्ति करके ऊचा उठता है और जिससे उसकी वत्तियो का उन्नयन होता है। इस प्रकार से अन्तिम दोनो मत भी साहित्य की तीसरी विशेषता 'उन्नयन' के अन्तगत आत हैं। पश्चिमी दृष्टिकोण भारतवर्ष की साहित्य सम्बा धनी यह विचार धारा विश्वजनीन है । ससार का प्रसिद्ध भाषाओं में साहित्य का प्राथमिक स्वरूप इसी रूप म ग्रहण किया गया है। अग्रजी भाषा में साहित्य के लिए लिटरेचर शल का प्रयोग किया गया है। "इसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका म लिटरेचर शल को -याख्या इस प्रकार का गई है- A general term which in default of precise definition may stand for the best expression of the best thought reduc d to writing Its vanous forms are the result of race peculianti s or of diverse ir dividual temperament or of political circumstances securing the predominance of one social class which is thus coabled to propogate its ideas and sentim ats 'लिटरेचर' का शादिक अथ अक्षर' से सम्बद्ध आक्षर है अर्थात वे विचार जी व्यजनादि की सहायता से व्यक्त किए जाय । इस अथ मे रिटरेचर शद का प्रयोग उन समस्त विचारो के लिए हो सकता है जो मनुष्य की अनुभूति म क्सिी प्रकार आते हैं। पर साहित्य वस्तुत कोमल एव श्रष्ठ वत्तियो को व्यञ्जना है। मध्यमारनाल्ड की साहित्य सम्बधिनी परिभाषा इसी भाव को व्यक्त करती है। कभी-कभी साहित्य का स्वरूप वयक्तिक मानस की प्रवृत्ति की विभिन्नता के कारण साहित्य की समकान सामा य धारा से नितात विभिन्न रूप में उपस्थित होता है। मिल्टन का व्यक्तित्व और उसका साहित्य दोनो ही इस तथ्य के उत्तम उदाहरण हैं। अग्रजी की साहित्य सम्बधिनी समस्त व्याख्याओ के अवलोकन करने पर यह पता चलता है कि पश्चिम के प्राचीन दानिका ने ये सब व्याख्याएँ पहले ही प्रस्तुत कर दी थी। प्लेटो जीवन के तथ्यो से सीधा सबंध रखने वाले ज्ञान संग्रह को साहित्य मानता है। उसका कथन है कि मनुष्य चिंतनशील प्राणी है। उसकी चितना के स्थायित्व के लिए साहित्य की आवश्यक्ता है। अतएव दानिक अथवा Literature is the best that has been thought and said in the world साहित्य-परिचय [ ३७ आलोचनात्मक माग पर चलने वाली उसकी चितना जिस ज्ञान का संग्रह करती है उसी का वाहन साहित्य बन जाता है । साहित्य के इस रूप में सौदय विचारक की रचनात्मक शक्ति के द्वारा उत्पन होना है। उमको रचनात्म तथा विचारात्मक शक्तियो के सयोग से जिस कृति वा जम होता है वह कलाकृति कहलाती है। हम देखते है कि प्लटो सब से अधिर बल साहित्य के अतरग विचाराल पर दिया है। उमके बहिरग स्वरूप पाली को वह विचार से सदव गौण मानता रहा है । प्लटा अपने दानिक विचारोम समाज का अधिक महत्व समझता है। उसकी दृष्टि म साहित्य व्यक्ति की अपेक्षा समाज के लिए है। समाज की दष्टि में वह व्यक्ति की उपेक्षा करता है। इसलिए उसने साहित्य के विचारात्मक और धारिविर मरा पर विशेष बल दिया है । जो वस्तु जितनी अधिक नसिक्ता के निकट होगी वह उतनी ही सुदर होगी क्योति क्ला कृतियों का प्रभाव मानव-जावन पर पडता है और कलाकृति म कलाकार के पक्तित्व को नतिकता प्रतिफलित होती है। भरस्तू पहला पश्चिमी दानित था जिसने कलाआ की प्यास्या की है। कलाओं को पांच भागों में विभक्त करके उसन कायक्ला का सव श्रेष्ठ स्थान प्रदान किया था। यह कला का मूल उदगम अनुकरण मे मानता है अपति जीवन व्यापारा की सच्ची अनुकृति का नाम ही बला है। कला के सम्बध म उसका मत यह है कि शब्द के माध्यम से सत्य को अनुकृति का य को उत्पादिका है । "ब्द-माध्यम स व्यक्त होने वाली अनुकृति य जय शल के साप ४द और गीतात्मकता का योग हो जाता है तब काव्य की उत्पत्ति होती है । इस प्रकार अरस्तु को दष्टि म साहित्य पाव्य मौलिक तत्व इस प्रकार है- १-दास्तविक जगत। २-अनुकृति की भावना। ३-अनुकृति में श-छन्द और गातात्माता। अनुकृति की इस भावना को वडसवथ ने भा स्वीकार किया है। वह अपनी पुस्तक 'पोएट्री एण्ड पोएटिक डिक्शन म कहता है Tb- principal object proposed in these poems was to chcose incidents and situations from common hfe ard to rel te or describe throu_hout as far as possible in a selection of language really used by mes and at the same time to throw over them a certain colouring of magazion and above as to make bese incidents and situa uons interestiog by tracing them truely though not ostentatiously the prima y laws of our nature स्पष्ट है कि डसवर जीवन की वास्तविक घटनामों के सत्य वणन को मान्य मानता है यद्यपि इस वणन म कल्पना में कुछ एसे रगों को मावश्याता ३८ ] [ सत-साहित्य स्वीकार करता है जिससे वह वणन रचिकर हा गाय । उसको दृष्टि मे क्ला के मूल 'तत्व इस प्रकार है १-जीवन की घटनाए २-उन घटनाओं के मूल मे मानव प्रकृति की प्राथमिक मौलिक वृत्तियाँ ३-उन वत्तियों का मनुष्य को अपनी बाली म स प वणन । ४-इस वणन पर कल्पना की छाया। ५-वणन की रुचिरता। पी० बी० शी के मतानुसार कल्पना की अभिव्यक्ति ही काव्य है । क्ला के शगव काल म प्रत्येक व्यक्ति एक नियम का प्रत्यक्षीकरण करता है जिसके द्वारा मनुष्य लगभग उसी स्थिति के निकट पहुंच जाता है जिससे सर्वोच्च आनन्द की उपलधि हानी है । परतु यह यक्तिगत भिनता इतनी स्पष्ट नहीं होती । यह भैर केवल उही स्थितियो मे दिखलाई पडता है जिनमें सौ न्य के निकट पहुँचाने की मह शक्ति बहुत अधिक होती है और जिनम यह गति अत्यधिक होती है वे ही कवि होते हैं।' जेम्स हनरी ले हण्ट (James Henry Leigh Hunt) कविता को पान मानता है । उसका कथन है- कविता एक तीन वासना है भयोकि यह गम्भीरतम अनुभूतिया का अ वेपण करती है तथा उसे उन अनुभूतियो को वहन करने योग्य होना चाहिए।' आगे वह पगन (वासना) की याख्या करता हुआ कहता है-यह वासना सत्य को और उ मुख होती है क्योकि सत्य के बिना अनुभूतियां अशद्ध तथा दोष पूण रहती हैं। यह सौन्दर्यानुगत तीव्र वासना है क्योकि इसका काय आनन्दमूलक उदात्ती Poetry may be defined as the expression of imagination every man in the infancy of art observes an order which approximates more or less closely to that from which the highest delight results but the diversity is not sufficiently marked except in those in stances where the predominance of the faculty of approximation to the beautiful is very great 'hose in whom it exists in excess are poets -A Defence of Poetry Poetry is a passion be ause it seeks the deepest impressions and because it must under go in order go convey them It is a passion for truth be ause without truth the erpression would be false or defective 2 3 क साहित्य परिचय परण तथा विशदीकरण है और इसलिए भी कि मान दानुभूति का प्रियतम स्वरूप ही सौन्दय है ॥ यह शक्ति की ओर जान वाली तीव्र वासना है, क्योकि शक्ति ही वह विजय पील प्रभाव है जिसकी कवि स्वत इच्छा करता है अथवा यह कवि के द्वारा पाठक पर पड़ने वाला प्रभाव है। जिन वस्तुओ अथवा प्रतिविम्बिा से इसका सम्बध रहता है उनको कल्पना सहायता से यह 'कविता धारण करती है और उदाहरणो के द्वारा व्यक्त करती है । इस यजा के लिए यह (कविता) अय प्रतिबिम्बो को भी स्वीकार करती है जिससे मूल वस्तुमा अमवा प्रतिबिम्बों पर अधिक प्रभाव पड सकता है।' ऊपर के इन विचारों में आधार पर काव्य मा साहित्य के मूल उपादान इस प्रकार मान जा सकते है- १-जागतिक वस्तुएँ २-पत्सब पीती राग या वासना ३-वासना से उत्पन्न जागतिक वस्तुआ का मानसिक प्रतिविम्ब । ४--इस प्रतिबिम्ब का शुद्ध और सत्य होना। ५-इस प्रतिबिम्ब मे आनन्दप्रदायिनी शक्ति को बहुलता तथा तज्जनित शक्ति सम्पन्नता। हण्ट महोदय की दृष्टि म काय के मौलिक उपादान वि मे अन्तनिहित नहीं होते । बाह्य उत्तेजको द्वारा एक रागमयी तीव्र इच्छा उत्पन्न होती है और उस TV भयो तीव्र इच्छा के द्वारा कवि हृदय विम्ब-ग्रहण करता है । यह विम्बग्रहण जितना हो शुद्ध और सत्य हाता है उतना कवि हृदय उसका व्यक्त करने में अधिक समय होता है । इस व्यजना म कवि की कल्पना उसकी सहायिका होती है। हेनरी ले हण्ट ने अपनी विवेचना में उन सभी बाह्य उपादानो का संग्रह कर दिया है जिसस सत्याप की उत्पत्ति होती है। परतु वह उस प्रतिभा की ओर सकैत नहीं करता है जो कवि हृदय क लिए अत्यन्त आवश्यक होती है । इस प्रतिभा के अभाव मे तीव्रतम उरोजकों के द्वारा प्राप्त अनुभूतियां भी लौकिक होकर रह जाती हैं और उनसे चरम It is a passion for beauty because its office is to exalt And refine by means of pleasure and because beauty is nothing but the loveliest form of pleasure It is a passion for power because poner ss 1 pression of trumph snt whether Cver the poet as desired by himself or over the reader as affected by the pot It embodies and illustrates its jopress on by imagination or images of the objects of which it treats and other images brought in to throw light on those objects - 2 3 ४. ] [ सत-साहित्य मान द की उपला घ नहीं हो पाती । कल्पना गद्ध प्रातिभ व्यापार नहीं है, वरन बाल्यावस्था से साय चलने वाली सहज मनोवत्ति है । इस मनोवत्ति को सतुलित अवस्था म लाने वाली भाव प्रवण प्रतिभा के बिना मरकाव्य अथवा सत्साहित्य का उन्य नही होता । सभवत हण्ट कल्पना में ही इस प्रतिभा को अतभुक्त मानते हैं । प्राय सभी पश्चिमी दाशनिकों ने काव्य का फल आनन्द IPleasure) माना है। सम्भवन 'प्लेजर शट का प्रयोग भारतीय रस के समान ही है, क्योकि काव्य-जनित मुख वस्तत लौकिक सुख नही है । पश्चिम के विद्वाना ने इस आनन्त की भावना का इतना आगे बताया कि वहां एक ऐसा सम्प्रदाय ही सडा हो गया जिसन आनन को रस को उच्च भूमि से गिरा कर कला की क्लाबाजी म मिला दिया। इस सम्प्रदाय के प्रवतक मास के विद्वान थे जिहोंने कला का केवल क्ला के लिए मान लिया और लोक से इसका सम्बघ छडा कर उसे केवर खिलौना बना दिया। बाडलेयर कहता है- Postry has no end beyond itself अर्थात् काव्य का स्वभिन्न काई भी प्रयोजन नही है । आस्कर वाइल्ड (Oscar wilde) इसी भाव को इस प्रकार व्यक्त परता है- काय सदाचार अथवा दुराचार की प्रतिपादिका कोई वस्तु नहीं है । जो कुछ है वह इतना ही कि कोई पुस्तक अच्छे ठग से लिखी गई है अथवा बुरे ढग से । कलाकार म सहानुभूति को भावना अक्षम्य है । सम्पूर्ण कला पूणतया अनुपयोगी है।' इस प्रकार सुन्दरता की वेदी पर इन करावारियो ने सदाचार का बलिदान क्यिा और सटाचार को निर्णायिका विवेक बद्धि का बहुत समय तक तिरस्कार किया । परतु अतत ये कलावादी भी इस बुद्धि की महत्ता को सम्पुणत अस्वीकार न कर सके । इन्ही में से कुछ ऐसे व्यक्ति निकल आये जो कला को महत्व देते हुए भी बुद्धि का साहचय स्वीकार करने पर बाध्य हुए । प्रसिद्ध क्लावादी फ्लावेयर को कहना पडा- हृदय और वद्धि अभित हैं । जो यक्ति टनम विभाजक रेखा खीचते है उनके पास दा म स काई भी वस्तु नहीं है।' पेटर क्लावादियो का प्रमुख आचाय था। क्ला क्ला के लिए है इम सिद्धान्त के अनुयायी पेटर को अपना गुरु मानते हैं । वह भी गन की प्रभावणालिनी शक्ति स्वीकार करता है और मानता है कि शन का उपयोग सहानुभूति सह्याग और मानवता की सेवा के रिए होना चाहिए । इस विषय म नस्तु स्थिति तो यह है कि पनि कला का उद्देश्य क्वल मनोरजन है तो वह क्ला निश्चय ही एक मादक पदाथ है । एकान सौदय भावना बौद्धिक जगत के लिए कभी भी उपादेय नही सिद्ध हो । 1 There is no such book as moral or immoral book Books are well written or badly written that is all An ethical sympati y in an artist is an unpardonable mannerism All art is quite useless The heart is inseparable from intelligence Those who have drawn a line between the two possessed neither 2 साहित्य परिचय ] [ ४१ सरती। हमारे इस कथन का यह भय नहीं वि वाच्य अथवा साहित्य जनित मानद उपक्षणीय वस्तु है । कोई कृति यदि आन द का उत्पादन नहीं करती तो निश्चय ही वह कृतिकार की मसफरता का द्योतक है । कृति का आनद स युक्त होना उसका एक स्वाभाविक गुण है । निश्चय ही यह भान अलौकिक, अकाल्पनिक और जाग तिक चेतना से नितान्त पर होता है । साहित्यकार गाश्वत, असाम और एक्त्व का सत्मार्गी हाता है। उसकी भावना म समम स्थान और नानात्य का अवकाश नही होता। उसको अनभूतियो म स्व-पर भेद शप नहीं रहता । सात्विक अनुभूतिया की पवित्र भमिका म साहित्य का सजन होता है । इस प्रसग में विद्वदर डा० मुशीराम गर्मा के निम्नाक्ति विचार दष्टव्य है- वाणी का स्रोत आत्मा म है। वारवी आत्मा का शक्ति है जो अपन सोरम अनिवचनीय अनभूत और अनिद्देश्य है। जम आत्मा बुद्धि स परे है उसी प्रकार उसकी शक्ति भा। क्ति और आत्मा का यह सरिष्ट रूप बेद म सोम ग से अभिहित किया गया है। सोम का अथ है उमा सहित । 'उमा ओ३म के गम म निहित है। 'उमा और ऊ दानो कापक्ति और शिव के नाम स निवधन किया जा सकता है। तात्रिको ने शिव ग अन्तगत इयोक्ति की सना दी है और लिखा है कि इसे सयुक्त होकर ही शिव को निवत्व प्राप्त हुआ है । यदि शिव म मेरूपी शक्ति का निकाल लें तो वे गवमान रह जाते हैं। दूसरे ग म आमा का अपनापन उसकी गति म है। ' का अव्ययाभाव उमा क कारण है। इस उमा से सयुक्त 'सौम हो 'मा३म है। ऋग्वेद के सोम सम्बन्धी सूक्ता म उसका एक विशण पवमान भी है। पवमान स्वय पविय है और दूसरा को भी पवित्र करन बाला है । आत्मा की शक्ति वाग्देवी भी पावमानी वहा गई है । अत साहित्य का स्वरूप एकात पवित्र है । इसका उपादक पवित्र है और इसक आराधक अध्येता भी परिणामत पवित्र होने चाहिए। ऊपर के इस क्थन म विद्वान मालाचक न यह स्पष्ट कर दिया है कि साहित्य का उद्देश्य जीवन को पवित्र बनाना है और जसा कि पह विवेचन हो चका है साहित्य की सार्थकता रसक द्वारा जीवन के उन्नयन म ही है । साहित्य सजन-~-एक साधना साहित्य का सजन एक विशिष्ट उत्सव विधान है। हमारी युग-युग की साधना जब सजन का उत्सव मनाती है तभी कला या साहित्य का जम होता है । चेतना के रथ पर गमन करने वाला मानव हृदय अपनी यात्रा म अनतपाल से गतिमान है उसको इस यात्रा का अतिम रक्ष्य क्या है यह तब तक नहीं कहा जा सकता जब तक १ सारस्वत (निवष-सप्रह) पृष्ठ १॥
४२ ] [ सत साहित्य मानवता की विकास क्यिा वा अतिम पग नि िचत न किया जाय । साहित्यकार अपनी यात्रा की अनभूतिया का दमन साकार रूप में उम समय परता ह जब उसक जीवन का सत्य भाषा और लिपिक स्पम यक्त होता है। उसकी बोध वत्ति उम उमके यात्रा पथ का अनभव-दान देती है और यह यनुभव ही उसके अन्न करण को परितो प्रदान करने के लिए अभि पक्ति के रूप का वरण करता है। मानव हृदय में आत्म और अनात्म भावा की व्याप्ति ह। ये दाना ही भाव उसक जीवन म एक सपप विशेष की मष्टि करते है । मधप का परिणाम होता ह अगाति-आकुलता। यह सघप किमी क्षण विशेष अथवा कार विशेप का नहीं है । अपितु चेतना के प्रारभिक क्षणो म सघप की राष्टि हो जाती ह । यस सघप-जनित आकुलता कम नाथ मानव आम माक्षात्कार करना चाहता ह । आम साक्षालार की पुण्य बला में वह जगत की विभिन परिस्थितिया को देखता ह अपने अतीत और वतमान की विवचना करता ह विधि निषध नियमा द्वारा शासित निया कापा की छानबीन करता है । इस प्रकार वह एक ओर अपन वो देखना है और दूसरी ओर गतिमान समार को। मसार को परिवतन गोलता एव आकानेक समस्याए उसके मानस-पटल पर एक प्र नमूचर विह अवित करती हैं और वह उन उत्तर की खोज म लीन हो जाता है । उमकी यह त मयता चितन पथ की गतिशीलता हो स्वत उत्तर धन कर उस समक्ष उपस्थित होती है। इस समय उसका हृदय एक विचित्र कुतूहल भर जाता है और वह भाव विभोर होकर अगुठिया स वाणी स बोट उटना है । उसके ये बा- ही कला का रूप धारण करते है । कलाकार की यह क्यिा साधना मापेक्ष्य होती है। इसीलिए वह कलाकृति द्वारा मानो अपनी साधना का उत्सव मनाता है। उसका यह साधना युग की पग डडियो पर चलती हई आती है। इसीलिए कोई भी यह दावा नहीं कर सकता कि उसकी साधना का यह प्रतिफल नितात मौलिक है। इतना अवश्य है कि कलाकार यी क्ला उसके अतीत का वरदान है जिसे वह वतमान के पान म रख कर उसे भविष्य के लिए सुरक्षित करने की कामना को सजोता रहता है । माहित्य की गतिशीलता प्राय लाग फ्ला या साहित्य को परिभाषा को सीमा म बाधना चाहते हैं । पूर्व के पप्ठो म अनेकानेक विटानो की क्ला साहिय सवधिनी परिभाषाओं का उल्लख किया है किन्तु सच तो यह कि साहित्य को कोई निश्चित और गाश्वत परिभाषा नरी की जा सकती। अभी हम कह आए है कि युग पथ पर चलने वाली साधना ही सानिय का रूप धारण करती है । अत जब तक युग का मानव चेतना का सयोग प्राप्त होता रहेगा तब तक नम गतिमील मसार में साहित्य कला के भी अनेकान रूप उपस्थित होते रहेंगे। अनुभव द्वारा इतना अव य कहा जा सकता ह कि साहित्य म जीवन का प्रतिबिम्ब होता ह उसम साहित्यकार की आत्माभि यक्ति हमने भो साहित्य परिचय ] [ ४३ होती है और वह उस राम के तार को यकृत करना चाहता है जो प्रत्येक भानच हृदध में विद्यमान है। माना मानव का राम सह समाज की सष्टि करता है । इसीलिए परस्पर उन भावा का यापार चरता है जिसकी अभियक्ति साहित्य म हाती है। साहित्य की स्वतन-सत्ता यग की बरटान पर सड़ा होकर साहित्यवार जब अपने चारा ओर देखता हैं तब एक ओर उसका वरुण एर सुख अतीत निहास के रूप म उसे सनेश देता है दूसरी ओर उसको धार्मिकमा नतिक्ता एव उमकी वयक्तिवता अर्थात आदा और यथाय के चित्र उसके मन म आरपण एव विक्षण के नाना रूपा की मष्टि करते हैं । उसका यह समस्त वातावरण उसे नवीन स्पति एवं प्ररणा प्रदान करता है जिसक परिणामस्वरूप वह स्वतत्र चेता बन कर अपने स्वतत्रपथ का निमाण करता है । एस प्रकार साहित्यकार अपन अतात और वतमान दोनो का ही उपामा है। वह युग के साथ है और युग मे अलग भी । स्वतत्र उदभावर साहित्यकार प्राचीनता के प्रति न तो विमूढ आग्रह ही रखता है और न नवीनता के प्रति अविवेकपूण उत्माह हो । उसका कृतित्व निश्चय ही गाय पूर्ण होता है। अपना मृजनात्मा गति पर पूण नास्था होन के कारण वह भविष्य का दप्टा वन वना है। इस प्रकार वह स्वदेश 4 भाग्य का सुहाग की लाली से अरजित करता रहता भारतीअमर रत्न स्वीर सूर नुलसी आदि एसे हो साहित्यकार थे जिने अतीत स स ह भर ही चतमान म भविष्य का शृगार किया था। उनकी शृगार भावनाति की मब म घड़ी विजपता यह है कि देश और कार की सीमा को वध कर मा उसकी सुपमा किरणे यत्र तत्र सर्वत्र विखर रही हैं। तालियो यतीन हो गर पर उनके चित्र माज तक घमिल नहीं हुए । सका कारण क्या है ? स्पष्ट है कि य साहित्यकार कर पत भावनाओ के चक्कर म ब भा भी नहीं पड । एनको सम्पूण अभि यत्ति जन जन के मानस की अभिव्यक्ति थी। इमोरिये आज वे जन जन के हृदय में विद्यमान है । इसी प म कला अपना स्वतत्र सता रखते हुये सोद्द य भा हाती है। कला या साहित्य की वास्तविक गति है सूर या वपना । जिस वदि का दाय जगत जितना हो र पना प्रवण हागा जिसकी चितन मियां गुह्यानिगुह्य प्रदा में जितनी ही दूर तक पहुच पर तत्व का दान कर सकेंगी वह अपनी अभियक्ति को सजीवता आधार स उतना ही महान होगा। इसी प म साहित्य और जीवन का सम्बध भी है। अन्यथा न ता साहित्यकार मा अभिनय करन वारे साहित्यकार का अभाव है और न अभिनयात्मक भावा का हो । सत साहित्य को सामाय विशेषताएं सतों का जीवन एर विशिष्ट प्रकार का जोवन था। व उस असैनिक ब्रह्म को शप्त करने के रिए लाम-जावन म दूर वन दूर हर र सिी पक्त कोदरा ४४ ] [ सत साहित्य या किमी पावन पयस्विनी के लट पर बठ बर माधना करने म अधिक विश्वास नहीं करते थे। वे साधारण गहस्या के बीच रह कर ही अपनी दनिश्चया का सहज रूप म पालन करते हुए भगवर भजन म औन रहा करते थे। कबीर जुलाहे थे जीवन भर जुलाहे का काम करते रहे सघना कसाई य उनकी जीविका का साधन भी मास वचना ही था। इसी प्रकार य समस्त सत अपन सामाजिक उत्तरदायित्व का पूण रूपेण पालन करते हुए ब्रह्मोपासना भी करते थे। जीवन के प्रति न तो उनमें कभी पलायनवादी प्रवत्ति का उ य हुभा और न उसके प्रति इतना व्यामोह ही हुआ कि वे उसी सासारिक जीवन को ही अपना एकमात्र लक्ष्य मान वर उसी तक सीमित रह । उनका जीवन भौतिक्ता एवं आध्यात्मिकता इन दोना का सम वय था। साहित्य जीवन की अनुकृति होन के कारण वह भी इन सतो की इसो समवयवाटी भावना से पूण है । यद्यपि प्रत्यक्षत सत कवि निगुण के उपासक प्रतीत होत हैं और सगुण उपासका द्वारा होने वाले भूमिपूजा का सवत्र उहाँन बडन किया है, पर यह सब होते हुए भी वे ब्रह्म के सगुण रूप को नितात विस्मत नही कर सके हैं। जाके नाभि पदम सउदनि ब्रह्मा चरन गग तरग रे । 'बहुत दिनन के विधुरे माधौ मन नहि बाध वीर, देह छता तुम्ह मिलहु कृपा करि, आरतिवत कबीर ॥ आदि कितनी ही एसी पक्तियां हैं जा इस तथ्य को प्रमाणित करती है । धार्मिक दृष्टि से सो का साहित्य अत्यन्त उदार एव समन्वयवादी है। उनमे धार्मिक महिप्पणता की मात्रा भी यथष्ट रूप म विद्यमान है। विशद्ध पान माग का उप देश दत हुए भी कबीर 'नारदी भक्ति का उपदश देते है । गातो की रीति-नीति से विरोव मानते हुए भी वे उनके प्रशासक वा जात हैं- ससारी साषत मला कवारी क भाइ। दुगचारी वघ्नों, बुरा हरिजन तहा न जाइ । --क० प्र०, पृ० ६६ स्पष्ट है कि कबीर को किसी सम्प्रदाय विपि स किसी प्रकार का द्वप नही है। वे प्रत्यक सम्प्रदाय को उत्तम साधनामा की ओर अग्रसर होते हुए देखन में अभिलापी हैं । जहाँ को भी माधना मे गथिल्य आडम्बर पाखड अथवा मिथ्याचार रिखलाई पाता है वही उनकी साधु आत्मा विचलित हो उठती है। उस सत के उपासक को अनत एव कदाचार असह्य हो उठता है। फ्लन अनीति और अनाचार क्वीर प्रथावली प० २१८ पर ३९० ૨ भगति नारदी मगन सरीरा, इहि विधि भव तरि कहे कबीरा । --क० प्र०, पद २७० सापित सण का जेवडा भीगा सू कठठाइ । दोइ आपिर गुरु बाहिरा बांध्या जमपुर जाइ। -०प्र०, ५०३६ १ ३ साहित्य परिचय के प्रति सतत विगहणा का भाव रखने के कारण उनकी उपस्थिति में उसका गान्त ज्वालामुखी विस्फोट कर उठता है। विरोध को इस तीव्रता में बिना किसी चम विचार के वह अमन की अत्यपिक भन्मना करने लगता है। पर उसका यह विराध विशुद्ध एव सात्विक हैं । कबीर परम्परा के जितने भी साधक हैं उन सब को प्राय यही स्थिति है । अस्तु हम सत साहित्य म एक ओर तो शास्त्रीय मर्यादाओ के प्रति अव हेलना क स्वरूप का दखत है पर दूसरी बार उन समस्त क्रियाओं का प्रतिपादन भी पाते हैं जिनके द्वारा मानव अपनी आचार-व्यवस्था का सम्यक रूप से प्रतिपादन करता हुआ अवम से पगम की ओर प्रस्थान कर रहा है। प्रत्येक मत ने अपनी साखी गनी-पदा आदि के माध्यम से मात्मचिन्तन प्रसूत भावा, विचारा एव तथ्यों का प्रतिपादन किया है । सत अपनी मामा के स्वर को सुनन के समस्त हात हैं और वे उस स्वर का दूसर को सुनाना भी चाहत हैं क्योकि उनका विश्वास है कि स्वानुभूति की जिस भूमिका में प्रतिष्ठिति होकर उन्होने जो तत्वचितन किया है वही मानव मार के लिए श्रयस्कर है । इसीलिए सत साहित्य में मानवता के स्वरूप को पूण व्याख्या पाई जाती है । उसी के हित-साधन म सतों क स्वरी का महत्व है। मन-साहित्य म साधना-परक खण्डन-मटन का स्वाप भी पाया जाता है । मूर्तिपूजा को लेकर प्राय सभी सतो ने उस विरोध एव उपहास किया है । अव- तारवाद के प्रति भासना की आस्था नही थी । वे मकाड का सत्व विरोध करते रहे । उहे जाति-पानि व ब धन जिनम जाडी जाकर मानवता सिसकियाँ भर रही थी, बडे ही अप्रिय प्रतीत हुए । अस्तु उन सब को निदा सन-साहित्य का विषय बनी । यही कारण है वि सत-साहित्य का प्रभाव उन जातियो के बीच अधिक रहा है जो दधी, दलित एवं पिछड़ी हुई रही हैं और जिह रमज की सज्ञा प्रदान की गई है। इस प्रकार हम दखत हैं कि सल साहित्य अपो युग का प्रतिनिधित्व करता हुमा उम विकास का, प्रगति का एक संदेश देता हआ चलता है। सतो की स्वतत्र उ- भावना गक्ति एव निर्भीर अभित्रियां उनक साहित्य को अत्यधिक प्रभावशाली बनान म सक्षम है। भारतीय मनपा धम का वितन मनन करने म ही आत्मपरितोय अनुभव परती रही है । अस्ति और नास्ति का विवेचन, ईश्वर जीव और जगत का चितन हो यो की चितनधारा का प्रिय विषय रहा है। आदिकाल से विभिन्न दानिका चिन्तकों ने आत्मा-परमारमा ६ सम्बधश विवेचन ही अपन जीवन का एकमात्र मूल मन्त्र-मा मान लिया था। यही कारण है वि जितने मत-मतान्तर भारत की पस [ सत साहित्य उवरा भूमि में पनपे उतने प्राय अयत्र नही । सत-साहित्य उही विचार-अकुरो म से एक है । सता की अपनी एक स्वतत्र चिन्तन गली हाती है। उनकी उदभावना शक्ति म भी एक विलक्षणता एव नवीनता का दर्शन होता है । अपनी युगीन परि- स्थितिया के अनुरूप सतो न जो कुछ भी दखा सुना तथा समपा उसे अपने ढग म व्यक्त किया है । उनय गत मुनन म बड अटपटे प्रतात हात हैं पर है व डावर अथवा वद्य की क्ड वी औषधि के समान ही । उनके अधिकार पथन स्वानुभूतिपरक होने के कारण प्रत्यक्षत यत्किचित गर्वोक्तियो से पूण प्रतीत होते है । पर वस्तुत गर्वोक्ति के प्रति सत-साहित्य में आस्था नहीं व्यक्त होती है । खरन-मग्न की स्थिति म जहा कही विरोधी मत अथवा सिद्धात का प्रतिवाद किया गया है वहाँ स्वमत अथवा स्व सिद्धान्त के महत्व का जक्न करत हुए आत्म विश्वास के आधार पर कुछ ऐसे तथ्यो को कह दिया गया है जो प्रत्यक्षत सत स्वभाव के विपरीत दप पूण प्रतीत होते हैं । यथा- सुर नर थाफे मुनि जना जहा न कोई जाय । मोटे माग क्बीर वे, तहा रहे घर छाइ। ३० ग्र० प०३१ अथवा झीनी झीनी विनी चदरिया साध ओढी सतन ओगे ओदि क मली को ही चरिया । दास कबीरा जतन से ओढो ज्यों की त्या धरि दोहीं चदरिया ॥ -कबीर प्रयावली पर ऐसे प्रसगो में प्रभ भक्ति के प्रति उस जटल विश्वास क दान करने का प्रयत्न करना चाहिए जिसके कारण व उस स्थिति के प्राप्त करने की घोषणा करते हैं । यहाँ साधक स्वत अपन लिए नहीं कहना है । उसकी यह धारणा क्वल अपने लिए नहीं है अपितु मामा यत उस प्रम-भक्त के लिए है जो भक्ति के वास्त- विक स्वरूप को समझ कर अपने का ब्रह्म म लोन कर चका है। ऐसे भक्त के लिए सभव और यमम्भव क्या । जहां राम ते अधिक राम कर दासा है वहाँ सचमुच ऐसी ही स्थिति होगी जिसके प्रति मानव मन लाख लाख स्पहाओं एव स्पर्धाओ को विखेर कर आश्चयक्ति अवस्था में उस महत्व का दान करता है। सत-साहित्य में धाकानेक स्थला म रहस्यानुभूति की उपलधि होती है । सत प्रत्या तव चिन्तक थे । उनका चितन का क्षत्र बडा व्यापक एवं गभीर था । उहोन आत्मा और परमात्मा के स्वरूप का परिचय प्राप्त किया था। यह परिचय केवल बौद्धिक विकास के रूप म न हाकर साधना को पूण परिपक्वावस्था के रूप में साहित्य परिचय ] था। अत अपना अनुभूति की गहनता म उहाने जिन तथ्या का प्रकटीकरण किया है सामाय धरातल स वही अधिक उथे हैं जिह साधारण मानव समझने में अस मथ है। जो साधक अपनी आत्मा का जितना ही आधन विकास कर लेगा वह उन रहस्यानुभतिया स उतना ही अधिक परिचय भी प्राप्त कर लगा और सत-साहित्य म प्रयुक्त उलटवासियां फिर उसके लिए मानसिक यायाम की वस्तु न हाकर, हृदय व प्रसाटम की वस्तु बनेगी। रात्मर कौशल का दष्टि स मत-साहित्य का परिशीलन करने वालो को प्राय निराश ही होना पडगा । रचना की काव्यमयता की ओर इन सतो का ध्यान नहीं था। वे अपनी अनभूनियो का दान मानव-समाज का दना चाहते थे और वह भी क्वल इसालिए कि बिना एमा किये उनकी कल्याणकारिणी प्रपति को परितोष नहीं हाता था । घुणाक्षर 'याय से जहाँ कही काव्यात्मकता आगई वहाँ भा गई, पर साधारणत उन नीतिपरक वचनाम, विमूढ मात्मामा को सत्य का दान करान म एवं विभिन मत मतान्तरो के आवरणा से आवत्त सत्य को निरावत करने म कला का मलना का मोर ध्यान कहाँ ? इसका यह अथ नहा है कि उनके साहित्य में काव्यमयता है ही नहीं । सत-साहित्य म एस कितने ही मामिम स्थल है जहाँ सत हृदय री स्निग्धता कामलता एवं भावुक्ता ऐसे रुपयापारी को सष्टि कर सकी है जा अपन प्रत रूप म ही बड प्रभावात्पादक है । सता मी शानियो एम दो म कही कही लक्षणा और “यजना का भी प्रयोग हुआ है । उनकी वाणी ध्वनि के प्रभाव को यक्त करता हुई काव्य की आत्मा के स्वरूप का उदघाटन करने म सक्षम है। पर यह सब है अपन सहज रूप म हो। इस ओर उनका ध्यान भी नहीं है । इसका एक कारण भी है और वह यह कि ये सत गास्त्रीय परम्परा के सत न थे। किसी पास गाला म वह कर न तो जहाने व्याकरण के सूत्रा को ही रटा था, और न साहित्य की विभिन्न विधामास परिचय ही प्राप्त किया था। इaaa प्रमण करने हुए साधुओ की सगति में वर-वठ पर श्रुत नान के रूप म इह जो मिल गया उसे तो रेलिया और अधिकाशन अपनी चितना पर हो अवलवित रह । अस्तु जसे तैसे अपन विचारो को सामाय जन जीवन तक पहुचा देना इनका उद्देश्य रहा । इसी रिए इनकी दृष्टि मापा सौष्ठव की अपेक्षा भाव सौष्ठव की मार अधिक रही। वह सभी सम्प्रटाया एवं प्राय सभी rat के लोगों के बीच म बटने का अवसर मिरता था। अस्तु सभी स्थाना की प्रवरित भापाओ का उन पर प्रभाव पडना भी स्वा भाविर था। यही कारण है कि इनकी रचनाओं में राजस्थानी पजाबी अवधी, प्रज, भाजपुरा खडा वाली गुजराती मराठी अरवी पारमी आदि भाषाओ के रूप पाए जात है । कहो रही सस्कृत गुद्ध तत्सम गन्दों का प्रयोग भी मिलता है । इसीरिए विद्वानो ने मतो की भाषा को खिचडी भाषा कहा है । इनको भाषा को सधुवकही भापा मा बहा जाता है।
४८ [ सत साहित्य इसमे सन्देह नही कि सतों की भाषा में अपने भाव को यजित करने की पूर्ण क्षमता है। विभिन्न प्रातीय शदो एव अपभ श स्पो व यवहार के कारण सत-साहित्य की भाषा में यत्र-तत्र दुस्हता भी प्राप्त होती है। पर सामा यत सत साहित्य की भाषा में एक विचित्र आजव, एक अदभुत प्रभावात्मक्ता एव स्पृहणीय माकपण प्रतीत होता है। उसकी अपनी निराली धज है। आगे के अध्यायो मे हम सत साहित्य की भाषा का ही अध्ययन करने का प्रयास करेंगे। - भाषा तथा हिन्दी भाषा का विकास अ-मापा प्रकृति का गुण है स्परण। इस स्फुरण या जकुरण म प्रकृति के चई अग सहायक बनने हैं । मानव हृदय म भी स्फुरण को यह शक्ति एव क्रिया विद्यमान है। उसकी सहज चेतना अपने दश्यमान जगत में एकाकार हो कर जिस स्प एवं भाव का सस्पश प्राप्त करती है यही उसके हग्य म बीज रूप वन पर विभिन्न कलाओ अथवा भापागत स्पा मे अकुरित होती है। स्पष्ट है कि मानध अपनी भाव निधि दूसगें के समक्ष रखना चाहता है तथा दूसरा की भाव निधि को स्वर देवना भी चाहता है । आदान प्रदान अथवा विनिमय की या वत्ति मानव की सहज बत्ति है। भावा और विचारो के विनिमय वा सहज सुलभ साधन है भापा ।' जागतिक त्रिया-कलापो में भी हम विनिमय के यागर का दखते हैं। विनिमय ही सामाफि सला को सुस्थिर एव सुदट करता है । यह नढता और स्थिरता कदापि सभव न हो सक्ती यदि भाषा न होती। सामाजिकवा की सस्थापना के लिए भाषा अत्यन्त आवश्यक है । लोक जीवन को कामनाआ आगा| इच्छामा और स्वप्नी को सवहन करने वाली भाषा ही तो है । भाषा न केवल धात्री के रूप में किसी भाव विशेप का पालन करती है अपितु वह नय-नये भावो एव विचारो की जमदात्री भी बनती है । हम परस्पर भावा के मान प्रदान द्वारा न केवल एक-दूसरे को आवश्यक्ताआ वो समझते हैं, अपित उनके सघप से उत्पन एक तीसरी वस्तु को प्राप्त भी करते हैं । इस प्रकार भाषागत विचार विनिमय नूतनातिनूतन विचारा की सृष्टि करता रहता है। In its broadest and most emotional s nse Language may be said to be any means of expressing emotional or mental conc rt by any living being or beings whatsoever and of commun cating them to or receiving them fc m other living beings -Louis H Gray--Foundation of language P 13 ५० ] [ सत साहित्य जिस समय हम वार्तालाप रत होते हैं अथवा किसी विचार पर मनन करते हैं उम समय हमारे मानसिक जगत मे भी भाषण की क्रिया काय करती रहती है। भाषा पनानिको ने इस भाषा का मनोवनानिक अथवा मन क्षत्रीय रूप कहा है। उच्चरित वाणी का त भौतिक है। मन म निहित वाणी दिखाई नहीं दती पर तु वह अनुभव म अवश्य आती है। वहाँ भी T और उनके अथ दोना विद्यमान रहते है । एक रूप + लिए जा - मन म सचरित होता है वह दूसरे रूप वाले 17 से पृथक रहता है। पायक्य के साथ वहाँ तारतम्य भी बना रहता है। भापा वहां स्वरित नही पर तु स्परित और क्रिया गोल यवश्य है। बाह्य भाषा उसी मानसिक क्षत्र की स्पदित वाणी का मुखरित रूप है। मानव अपनी चेतना के रथ पर अनादिकाल से गतिमान है। उसकी यात्रा की परिसमा त कहाँ और से होगी यह कोई नही कह सकता। चेतन मानव की सह जात भाषा भी उसी के समान निरतर गतिगीला है। जिस प्रकार जलवायु तथा अन्य भौगालिक प्रभाव एव सभ्यता के नाना रूप मानव की निर्माण किया म अपना महत्व पूर्ण योग दते रहते हैं उसी प्रकार भाषा की निमिति पर भी टन सबका प्रभाव कभी प्रत्यक्ष और कभी अप्रत्यक्ष रूप म पडता रहता है। भापा का एक विशप धम है उसका व्यक्ति सापेक्ष होना। यह यक्ति सापेक्षता कभी भौगोलिक और कभी सास्कृतिक कारणो से समाज सापेक्ष भी बन जाती है। अग्रज भौगालिक कारणो स त नहीं कह पात । इसलिए उनके गब्दा म ट का प्रयोग होता है । जिस देश का सास्कृतिक विकास जितना समुनत होगा उस देश की भापा और साहित्य भी उतने ही समन्नत होंगे । व्यक्ति सापेक्षता म गरीरावयवों का सगान गाना के उच्चा रण म अतर उत्पन करता रहता है। सिग्ध को हिद और पसा को 'पका सत्यनारायण का फत्यनारायण कहने वाले प्राणी प्राय देस जाते हैं। भाषा के व्यावहारिक रूप पर शिक्षा का भी प्रभाव पडना है। निस गब्द का उच्चारण एक विद्वान करता है उसी पद का उच्चारण उसी रूप में एक ग्रामीण नही कर पाता । क्वलो के उच्चारण की ही बात नही है उनके नामकरण की भी बात है। एक ही वस्तु एक ही रीति रिवाज के मिन भिन स्थानों में भिन्न भिन नाम पाये जाते हैं। उत्तर प्रश का निवासी चारपाई या खटिया गर का प्रयाग करता है लेकिन पजाब का रह्न वारा मया गब्द का प्रयाग करता है जब कि पत्तग उडान वाले पतग को एक डार विशप को भी मया कहत हैं । यज्ञोपवीत एव विवाह के समय कहीं कही यह प्रया है कि भाई अपनी विवाहिता बहिन को वस्त्र आदि प्रदान करता है। इस पद्धति का कही पर भात भजना और वही पर चीफ्ट पत्निाना कहा जाता है। Language is an article of export MM Lewis--Language in society Page 46 - 1 भाषा तथा दिदी भाषा का विकास ] साधारणत भाषा के दो रूप होते हैं एक उच्चम्ति रूप और दूसरा लिरित रूमा भापा का उच्चरित प हमारे दनिर जीवन मे विगत सम्बधित है । निरन्तर बालचाल में बाजाराम घर काम काज मन न म जिन गाएव वाक्यो का हम प्रयोग करते हैं वह सब भाषा का उच्चारित रूप है पर दनिक आवश्यकताओ को पूनि ही हमारे जीवन का आदि और अ त नही है। हम क्तमान म रह पर अपन अतीत को दखना चाहत है और जानना चाहते हैं कि हमारा याया वहाँ से प्रारभ हुई थो, हमने अतल सल का कितनी गहराइयो को नापा स्तिनी उत्त ग गल मालाओ का अतिक्रमण किया, किन बोहड बना का पार किया किन उपत्यकाओ म विनाम किया य विस्तृत राजमाग और य सुरम्य प्रदेश बच और कस बन विमने हमारी निधि को छीना और किसने अपनी निधि का दान देकर हम निहार पर लिया। हम अपने जीवन अश्रु कणा की कहानी और हास की परम स्निग्ध-ज्यो त्सना को अपने तर हा सीमित रखना नहीं चाहते। हमारी इच्छा होती है कि कोई हमारे आमुभा को पाछे हमारी आहो को दुल राय और हमारी हसी म अपने हृदय के उल्लास को घोल है। यही नहीं हम आने समस्त अनुभवो का दान भएन समस्त मान की मजूषा एव अपनी समस्त कामनामा वी बलना अपनी सतति को दे जाना चाहते है । हमारी साप हाती है हमारी सारों भविष्य का अभिनव शृगार पर। इस सब की पूर्ति भरपा के माध्यम से ही सम्भव है। निश्चय ही यह माध्यम भाषा का लिखित रूप होगा। हमारी समस्त सास्तनिक चेतना हमारी सभ्यता का समस्त प दूसरे गम हमारी यात्रा की गय विजय को बहाना भाषा में लिखित स्पम है। सुरक्षित रह सकती है। इस प्रकार विभिन्न जागतिक स्पोरा वाघ भाषा के ध्यापार में ही सभव है। मापा की उत्पत्ति भाषा एक अथ पूण नाद है समाज में समझी जाने वाली माथन ध्वनियों का समूह है। हम आँस हाथ आदि के मातो द्वारा भी भावा का ग्रहण कर सक्त हैं पर साथ ना के द्वारा जो भाव सकेत पण विय जात हैं वे विगए स्पष्ट और पुष्ट हात हैं। घामित प्रयत्ति पे प्राणी नाद के रूप मक्सिी विशिष्ट वरीय रणा को अनभव करते है, किन्तु बुद्धिवादी इस क्रिया म प्राणी की उस सहन "क्ति । ध्वनित होता हुआ देखते है जिसका कुछ माग मनुष्यतर प्राणियो को भी उपलब्ध हुआ है । मनोविज्ञान विशारद भापा को उत्पनि म प्राणो को उस मानसिक चेष्टा को खत हैं जो अपनी अनभूतिया एवं आवश्यकताओ के प्रकटीकरण के लिए उह विक्र कर देती है। मापा मानि इसम नागरिक चेष्टाओ का सगरा भी समयत है । ना' With Sufficient caution the properties of language may help us to understand the structure of the world Wasan 3 Entwistle-Aspect of language Page 5 - ५२ ] [ सत-साहित्य के स्वरूप का मूल्यावन करते समय मत मनान्तरो की विभिन्नता अत्यन्त प्रवल और बहुमुखी हो उठती है । प्रस्तुत प्रसग म हम उन मत मता तरो के सबध म विशेष ऊहापोह नही करनी है। यहाँ पर ता उनका क्वल परिचयात्मक विवरण हो पर्याप्त होगा। मनुप्य मष्टि की एक अनुपम कृति है। वि व वे सभी याचार प्रकाराम मनुष्य आकृति की दष्टि से भी एक विशिष्टता रखता है । परतु उसकी वास्तविक विशिष्टता उसक नान म उसकी रागमयी प्रवृत्तियो में एव उसक विवेक म है । साधारणतया राग और ज्ञान सभी प्राणिया म हाना है। छाटे रा छोटा जीव भी अपन धुद्धि-बल से विभिन कार्यों म सलग्न रहता है । शक्कर के कणा की आर दौडती हुई चीटियाँ क्या नान Tय कही जा सकती है ? वे अपने बिलो म अन्नकणो का सग्रह करती हैं जो उनकी सजानता का परिचायक है । सी प्रकार क्या पक्षी के घोसले म उसकी बुद्धि और उसके ज्ञान का समावेश है। घर के आंगन में फुत्पती हुई विडियो के जोड जब कमरा के झरोखो, रोशनदानो मे एक एक तिनका कर बड़ी सावधानी स उह सजो कर घासले का निर्माण करते हैं और उस घोसरे म पलने वाले पक्षि शिशु के मुख म जब अन्न के कणो का वेला लाकर डालत हैं तब उनकी बौद्धिक कुशलता एव राग की उस परमपूत मजुल भावना का परिचय प्राप्त होता है जिसके कारण सष्टि सप्टि बनी है । ममता की मूर्ति हो तो इस विस्तत प्रसार का एकमात्र सम्बल है । गोधूलि वलरा में गोचारण मे आन वाली गायें जब रभाती हुई अपने बछडा के पास मा आकर उह चाटन लगती हैं तब प्र न हाता है कि नीड बनाने का नान सग्रह करने की वत्ति और ममता के य रूप-इन अवोध प्राणियो को कौन सिखा गया ? न तो इनकी कोई पाठशाला है और न ये वचारे कछ कह ही सकते हैं । इसे प्रकृति या प्रभु की कृपा ही मानना चाहिए कि बिना किसी शिक्षक के य सब कुछ सीख जात हैं । इसक लिए इह क्सिी निमित्त को खाजने की आवश्यकता नहीं होती। पर मनुष्य का मान सहज होने के साथ नमित्तिक भी है। गाय का बछडा जम लेते ही कूदने लगता है इसके बाद परतु मानव बच्चा पहले घिसलना सीखता है फिर वठना । घुटनो के बल सरक्ता और धीरे धीरे उगलियो के सहारे खड होकर चलना भी वह सोच लता है । प्रत्यक्षत उसकी ये समस्त त्रियायें ऋमिक विकास के रूप को यक्त करती हैं। - - आस्तिका के मतानुसार जिस मनुष्य जाति को ईश्वर प्रदत्त नान प्राप्त हुआ है उसकी भाषा भी ईश्वरीय प्ररणा से प्राप्त हुई है क्योकि नान बिना भाषा के ठहर हा महा सदता अर्थात वा परम्परा से चल ही नहीं सकता। ज्ञान और मापा का मम्बघ जोख्यि भाई और बहन की भांति है। भाषा मानव जाति की विशेष निधि १ रघनदन गर्मा-वारिक सम्पत्ति, पष्ठ २६१ मापा तया हिंदी भाषा का विकास ] [ ५३ । ३ प म है । विश्व R मानव का ऐसा कोई वग नहीं है मी कोई जाति नहीं है, जहाँ पर भाषा का प्रयोग न होता ह।। आदि मनुष्य नान और भाषा के महित ही उत्पन्न हुआ है। इस तथ्य का प्रमाणित भरन के लिए कहा जाता है कि जिस प्रकार हिपनोटिम करल वारा अपने सबजेस्ट के मुह से कवल मानसिक प्ररणा से एमी एसी नापामा शब्द धुरवा सकता है जिनको सबजेक्ट ने पहिले कभी नहीं सुना उसी प्रकार सच प्यापर और सव गतिमान परमात्मा न आदि म मूर पुरपा वे हृदयो म मान और भाषा का प्रकार किया। आदि सप्टि म पता होन वाल ईश्वरपुत्र आय पूर्ण ज्ञानी आत्मा होते हैं । उनको अपने “यापकत्व मे परमात्मा पूण प्राप्त नान और भाषा की याद दिला देता है, इसीलिए उनम मान और भाषा का प्रकार हो जाता है। इस तभ्य के आधार पर यह मानना आवश्यक हो जाता है कि समस्त भाषा शाखामा का एक ही आदि मूल था। साइस आफ द लगवेज के लेखक मक्समूलर महोदय इसी तथ्य को स्वीकार करते हैं।' भाषा उत्पत्ति के सम्बध में उपयुक्त मन के अनुमार भाषा को दवी मम्पदा कहा गया है। पाचात्य विचारका के मतो मे भी इस सिद्धात मा प्रतिपादन होता है। भारतीय मनीया ने भी शब्द ब्रह्म में महत्व क सम्ब ध म विशेष विचार किया है। चिन्तन की वनानि पद्धतिन भाषा की हत्पत्ति सम्बध में अनेक मतो को सस्टि की है। ये मत पातु सिद्धान्त, अनुकरण मूलक्तावाद मनाभावाभि यजक्ता वाद यनुरणनमूलकतावाद थमपरिहरणमूलकतावाद तथा विकासवात के समवित रपनदन गर्मा-वैदिक सम्पत्ति पष्ठ २६८ 2 What are called families of languages are only dialects of an ear lier specches (Chinas place in philosophy ) 3 If then God is the author of hum in language he must have had his own languago as well And we find, in fact that the word God memra plays a tremendous part in the Bible "Aod God sard Let there be light and there was ligit By the word of the Lord were the heavens made and all the host of ibem by the breath of his mouth 33rd Psalm 6) Not only did this word God create the whole world it also cares for the world and makes it frustful The spint of laoguage in civilization P 36 4 The Greek generalization about language were not improved upon until the cighteenth century when scholars ceased to view lan guage as a direct gift of God and put forth vanous theones as to its origio Language was an invention of ancient heroes or ५४ ] [ सत-साहित्य सिद्धात के रूप में भापा विनान के क्षत्र म प्रख्यात हैं। भापा की उत्पत्ति या मूल कारण कुछ भी रहा हो पर कदाचित इस सम्ब ध म सभी का मतक्य होगा कि भावो और विचारो को व्यक्त करने के लिए भाषा ध्वयात्मक प्रतीक के रूप में उप स्थित हुई और इस स्पाम कालनमानसार विभिन देशकाला म परिवतन भी होता गया। अस्तु भाषा का कोई एक स्थिर रूप नही माना जा सकता । जिम प्रकार यक्ति का व्यक्तित्व सीमावद्ध नी हा सना उसी प्रकार भाषा भी किती विशिष्ट सीमाओ म आबद्ध नही हो सकती। वह व्यक्ति की भांति ही पूण विराट का ओर सदव उमुख बनी रहती है। यहां पर हम यह देखना आवश्यक प्रतीत होता है कि भाषा व रूपो म परि वतन किस प्रकार सम्भव होते हैं। वदिक भाषा मे कर जाज तक को प्रा-गिक भाषाओ के रूप किस प्रकार निप्पन हुए-स विषय का अध्ययन विगेप महत्व का है । पहले हम भाषाओ म उत्पन होने वाली विभिनता पर विचार करेंगे। भाषा-विभिनता के कारण १-उच्चारण सौक्य या मुख-सुख क्सिी भी समाज म पठित अपठिन चतुर मूख सभी प्रकार के प्राणी होते हैं । ये समस्त प्राणी भाषा का उच्चारण समान रूप से नही करते है। इसीलिए एक ही समाज मे शब्दों के भिन भिन्न उच्चारण देखे जाते हैं । एक समाज म जब दूसरे समाज का अथवा एक देश में जब दूसरे देश का व्यक्ति आ जाता है तब गदा के स्वरूप में स्पष्ट अन्तर प्रतीत होने लगता है। नागरिका एव ग्रामीणा के गट प्रयाग में सवत्र भिनता पाई जाती हैं। नागरिक टिकट गब्द का प्रयोग करेगा और ग्रामीण टिक्क्स या टिक्स क्हेगा। हिन्दू रामच द्र क्हेगा जब कि मुसलमान रामचन्दर कहेगा। किंचितमात्र विचाभर सूक्ष्म-च्छिम स्टूल-सटल दुग्धाहार-नोग्वाहार या दोगधाहार ये सब मापा विभिन्नता + ही उदाहरण हैं। उच्चारण सौक्य और मुख सुख भी TIT रूपा का विकृत कर लिया करते है। २- अक्षरा का यूनाधिक्य लिपि म अथरो का यूनाधिक हाना भी मापा भिनता का कारण बन जाता है । उदाहरण के लिए अस्पो म प की ध्वनि नही हाती अस्तु उसक निजावणमाला म भी प नही हाता । इसीलिए गोप का वहां गोबा बन जाता है। else the product of a mystical spirit of the folk It b gan in mans attempts to imitate noises ( bow now theory) or in his natural sound producing responses ( The ding-dong theory) or in voilert out cries and exclamations (The Pooh Poob theory ) -Leonard Bocmfield-Language P5 १ भाषा तथा हिदी भाषा का विकास } [ ५५ ३-अमर्यादित उच्चारण जब उच्चारण करते समय ध्वनिया में भी आधिक्य और कभी यूनत्व कर देते है तब गन्नी के रूप में परिवतन हो जाता है । यथा- बस का बोस । यह बास गराज (Rose के माम्य में बाज हा । गुजराती तथा मराठी में ज के लिए झ को ध्वनि का प्रयोग होता है । अस्तु वसु महाराय बास स बोय बन गए । इस प्रकार को बढी हुई अमर्यादित ध्वनियों पाब्दो के रूप-विवार का कारण बना करती है । ४-व्याकरण को एकता का अभाव नागरिक भाषा के माकरण-सम्मत रूप का प्रयाग करता है जब कि एक ग्रामीण याकरणिक नियमा की प्राय उपक्षा पर दिया करता है। यह तो ग्रामीण जीवन की बात हुइ ! पर माहित्यिक क्षण में भी व्याकरण की एकरूपता के अभाव मे र प्रयागा म भिन्नता पाई जाती है । सस्कृत म तीन वचन हैं पर उसा म उदभूत हान वाली हिदाम देवर दा ही वचन हैं। इस द्वारा भी भापा रूपा म अतर उत्पन हो जाया करता है। एक ही ग भिन्न भिन्न भाषाा म भिन्न भिन्न लिंगा में प्रयुक्त होता है । ययाति दी म हाथी आता है दही अच्छा है पर बगला मे हाथी आती है दही अच्छी है प्रयोग होगा। एक ही भापा मगन्दो के प्रयोग म भतर देखा जाता है । यथा-वामु चरता है वायु चलती है 'आत्मा विचार करती है आत्मा विचार करता है आदि प्रयाग चला करते हैं । -गब्दा का नव निर्माण कभी-कभा भावा और विचारा को गोपनीयता की दष्टि स कुछ विशिष्ट शब्द सकेत (काड वडस) बना लिए जाते हैं। यही दूसरी भाषा में प्रचलित हार भाषा प को बदल दिया करते हैं । भिडी के लिए (lady finger ) का प्रयाग साकतिक्ar का ही उदाहरण है। बाटा के लिये ग्रामीण भाषा म पेपण (पिसान) दाम प्रचलित है। कही कही इसे पिहित भी कहते हैं और सा पिहित ने धी (पनधी) गन की सप्टि पर डाली। ६-अजन की क्रिया भापा के विकास में अजन की क्रिया का भी विशेष महत्व है। हम परस्पर मम्मिलन काल में नित नूतन शरों का आदान प्रदान करते हैं और अपनी भाषा के भाषगर को समद्ध बनाते हैं। पर इसके साथ ही कतिपय ग अति अप्रचलित होकर प्रयोग-बाह्य भी हो जाते हैं। यह प्रयोगवाहाता हो पायगे की मत्यु का कारण बनती है । एक सम विस्मृत हो जाता है तो उस भाव की अभि यक्ति के लिए दूसरा र स्थान ग्रहण करता है। भापा की यही प्रक्रिया उसको निरन्तर जीवनदान दिया वरती है।
५६ ] [ सत-साहित्य भापा, सभ्यता एव सस्कृति सभ्यता किसी जाति की उन प्रतिपत्तियो का नाम है जिहे वह सामाजिक सदभ मे कई यगो परिष्कारा के उपरान्त प्राप्त करती है । सभ्यता सभ्य का भाव है। सभ्य सभा के योग्य पुरुप का सूचक है । समा एक नही, अनेक व्यक्तिया स मिल कर बनती है। यह यक्ति प्राकृत नही सरकृत हाते हैं। इनके विचार इनकी वाणी तथा इनकी कायशी एक विशिष्ट साचे में ढली रहती है। सभ्य यत्तियो से आशा की जाती है कि वे जह्वादी न होकर सभावादी हागे। अपन को पीछ रख कर भी दूसरो का ध्यान रखेंगे। समिति म वठ कर वे इतन उदार तो अवश्य होग कि अपने साथ दूसर क दप्टिकोण का विचार कर सकें। वाणी दस सभ्यता की वाहिका है और इसीलिए भाषा का सभ्यता के साथ अविच्छिन सबध है । भाषागत शब्द वाक्यवियास, अभिव्यक्ति कौशल लोकाक्तियो तथा विच्छित्ति वभव आदि सभी से सभ्यता के विविध अगो पर प्रकाश पडता है। एक एक शब्त अपने गम में जिस विचार राशि को लिए हुए है वह हमार पूर्वजो की क्रिया प्रणाली विचार पद्धति तथा यवहार क्षमता की द्योतिका है । यदि ये शब्द जीवित है तो उनके साथ सबद्ध विचार राशि भी जीवित है और उसमें साम हमारी वह परपरा भी जीवित है जा यगो के अतराल को चीरती हुई अपनी सशक्त जीवनोपयोगी सामथ्य रखती है। वदिक युग के हरि, असुर देव राक्षस इद्र अग्नि मित्र वरुण आदि शब्द मे हम उन दिनो की प्रसरणशीला एव गवषणात्मक भाषा शली के दशन होत हैं । वदिक ऋपि जिस चिंतन पद्धति को अपने साथ लिए है वह उसकी सामाजिक्ता का भी परिचय देती है । वे नही चाहते कि मम कोई पाप का प्रशसक हमारा राजा बने । वे चाहते हैं कि हमारे क्म श्रष्ठतम कम हो। परम सत्ता जा हमारी जनक वधु विधाता सभी कुछ है हमारी उपास्य देवी बने । उसक अतिरिक्त अन्य किसी का गुणगान व्यथ है हानिकारक है । ब्रह्माड भर का वस उसी का है उसी ने हम सब को प्रदान किया है। गैर और यह विराट जगत यन के रूप म है जिहे देख कर हम अपना जीवन यज्ञपरायण बनाना चाहिए । टसी से जालोक विकीण होगा। यज्ञ के विपरीत पथ का प्रयाण वध का हेतु है। ऐस उदात्त समाज की कल्पना हम वैदिक भाषा में प्रयुक्त शब्दों से ही कर लेते है। यदि य शब्द हमारे पास न हात तो पया हम वेत्युगीन सम्यता का अनुमान भी लगा सकते थे। ब्राह्मण ग्रया मे यज्ञ के पारिभाषिक शब्दो की भरमार है जो उस युग की जातिगत विशिष्ट मनोवत्ति की परिचायिका है। कतिपय गब्दो का भाव यद्यपि आज लुप्त हा चका है तथापि आर्यों के मस्तिष्क से नि सत तथा याज्ञिक अनष्ठाना म प्रदर्शित हमारे पूर्वजो की निगा विशेष की ओर उ मुख मनोवत्ति उस युग की भाषा द्वारा जानी जा सकती है । उपनिपद एक भिन्न सभ्यता का दिग्दशन कराते है जिसम ब्रह्म चिंतन की प्रधानता है । यज्ञो को जो सभवत द्र ययज का रूप धारण कर चुके - भाषा तथा हिदी भाषा का विकास ] [ ५७ थे और जो सभव है हिंसा बहुल भी रह हा- उपनिषदो में इलाध्य ऋष्टि से नहीं देखा गया । हमारी समस्त जातीय शक्ति एव बौद्धिक चेतना, उस परात्पर तत्व में साक्षात्कार परत मरीन थी जिसे अणु से अण महान मे महान ईश्वरा का महश्वर देवताओम परम दवत रसको में सव श्रष्ट रक्षक और भुवन भर का आराध्य दव कहा जाता है। 'अन्न व ब्रह्म में लार प्राण मन, बुद्धि को पार कर तहुए उस मानन्दमया सता की उपलधि ही हमारा लक्ष्य बनी थी । सस्य इसा आयतन था और मधु विद्या रसो प स की अभिस्यापिका महता साधना । भारतीय सव से हा अ यात्मप्रिय रहे हैं पर उपनिषद का युग तो उन दिनो और निया कलापो से विशेष अध्यात्मप्रिय प्रतीत होता है। रामायण और महाभारत ये दाना महाकाव्य अथ अपन अपन युग का सस्कृ तियों के परिचायक हैं । उस युग में दो प्रकार को संस्कृतियों विद्यमान था। एक याय सन और दूसरा अनाय मस्कृति । रामायण के राम आय-सस्कृति के पोषक और रावण अनाय मरकृति का पालक था। इसी प्रकार महाभारत के कृष्ण आय मर्यादाओ के प्रतिष्ठापर है जब वि क्स और दुर्योधन के माय अनाय प्रवत्तियो का प्रोत्साहन देने वाले पाए जाते है । रामायण पूर्ण आत्शवादा यवस्था की सृष्टि करती है, पर महाभारत म पार यथाय क प का दान होता है । अयाध्या में राज्य को छाड कर राम वन को जाते है इसलिए कि भरत राज मुख मोर्गे पर भरत राम की पादुकालो का राम का प्रतिनिधि मान कर अपना जीवन एक तपस्वी संप की भांति व्यतीत करते हैं और घर को ही वन बना देते हैं । वितु महाभारत तक आते आते राज्य के लिए तिना भीषण ना महार हुआ। एF भाई दूसरे भाई व रक्त का प्यासा राज्य का इतना बडा मूल्य ।। यही है समान वे मादा और यथाथ का रूप हम प्रमश रामायण और महाभारत से प्राप्त होता है। उपासना क्षेत्र मा परि चय भी इन प्रयास प्राप्त होता । महाभारत म प्रयुक्त पद नारायण वासुद हरि तपा कृष्ण इस बात के प्रमाण हैं कि प्रभु की उपासना इन विभिर नामो से हाने लगी थी। इसम याज्ञिक अनुष्ठानो म हाने वाली बलि का भी उल्लख पाया जाता है, साथ ही ऋषियों के एक ऐसे वय का भी पता चला है जो ब्राह्मणा द्वारा प्रति पादित पशुबलि का विरोध करता था। भारतीय संस्कृति र सभ्यता सरधा इन सूचनाओ का देने वाली महाकाव्यो की भाषा ही तो है। इसलिए भाषा को मानव सस्थति को सवाहिका बहा जाता है। इसके अभाव में क्सिी भा सस्कृति का विकास एवं प्रसार अमभव है । 1 Lasguage is often said to be the vehical of human culture and indeed it would be difficult to imagin a culture however crude without language car Luis chavarna Aguilar Lectures in Linguistics, Pagell ५८ ] [ सत-साहित्य जन एव चौद्ध ग्रयों में से कितने ही प्रसग माते है जहाँ हिसा परफ यज्ञा का विरोध किया गया है और अहिंसा के माग को ही जीवन का कल्याणकारी माग माना गया है । जनधम प्र जीवन की कृच्छ साधना को विशेष महत्व प्रदान किया गया है । उनका विश्वास था वि शरीर ही आत्मा-परमात्मा के मिलन म बाधक है । अत इसे अधिकाधिक सयमप्रस्त बनाया जाय । जनधर्मानुसार अनगन और उपवास का इतना अधिक आधिक्य कि प्राणो का विसजन हो जाय साधना का सर्वोत्तम रूप माना जाता है । उस युग को जनपम को छाया म पलन वाली सभ्यता का रूप न ज्ञान हो पाता यदि जन प्रथा पी भापा ने उसके स्वरूप को मुरक्षित न रखा होता । इसी प्रकार बौद्धो के धम-ग्रयो म सम्यक दष्टि सम्यक सकल्प सम्यक वचन सम्यक कर्मान्त सम्यक आजीव सम्यक यायाम सम्यक स्मृति, सम्पक समाधि आदि गला के प्रयोग द्वारा बौद्धकालीन धामिक व्यवस्था का परिचय प्राप्त हाता है। कमरेश का निरोध करने के लिए समाज मे य अष्टांगिक माग प्रचलित थे । बौद्ध साहित्य मे पचशील शन आना है। पचनील के अतगत प्राणातिपात विरति अदत्तादान-विरति काम मिथ्याचार विरति मपावाद विरति तथा सुरा मरय-प्रमाद स्थान विरति की गणना होती है । पील के इन रूपो द्वारा भाचार परम्परा का नान होता है । यति ये गल न होते तो आज हम कसे जान सकते थे कि बौद्ध युगीन सभ्यता म धार्मिक व्यवस्था किस प्रकार की थी। इसी प्रकार अय हितन ही गल युगपरक मामाजिक जीवन के विभिन्न रूपा की व्याख्या करते हैं। T- अपने में अपने युग का इतिहास लिए हुए चरत हैं। मानव समाज-सापेक्ष प्राणी है उसका प्रत्यक गतिविधि समाज की गतिविधि बना करती है और समाज अपन क्रियाकलापो द्वारा सभ्यता के स्वरूप का निर्माण करता है । हम जिस प्रकार से अपने भावा का व्यक्त करत हैं तथा दूसर के भावा को सुनते हैं अत्याचार और अनाचार के प्रति जिस आवागमयो वाणी का प्रयाग करते हैं दया-दाक्षिण्य उत्सग आदि के प्रति जिन उल्लासमय स्वरो का सचार परते है वे सब हमारे अतस के स्वरूप को अभि यक्त करते हैं और यह अभियक्ति ही सामाजिक रूप में मभ्यता का आभास प्रस्तुत करती है । प्रकारातर से हम यह कह सरते है कि हमारी भाषा सभ्यता को प्ररणा प्रदान करती है । भाषा का ज्या ज्या उत्तरात्तर विकास हाना जाता है यारयों मनुष्य को अपन भावा र छिपान को एक कला विशष प्राप्त होती जाती है । मामायत यह देखा जाता है कि जो लाया वालना नहीं जानते या या कहिम कि जिनके पास भापा कोल नही है व अपन हृदय रे भाव का ज्यो का ज्यो बिना विमी क्लात्मक आवरण स्पष्ट कर देत हैं । पर जिह मापा की वा' का मान है व अपनी Language is an art and the arts are best defined as language -Aspect of Language Page 3 । --- भाषा तया हिंदी भाषा का विकास } । वाणी में बना ही माफक चमलार विधान उत्पन्न करते हैं और मनचाहे ढग स अपने भाव को व्यक्त कर देते है। ऐसी स्थिति में कभी कभी सत्य पर एक बता ही मोहक अवगुठन पड जाता है। इस दष्टि स एक साथ विचारक भाषा का अधिक श्रय नहीं प्रान कर सकता पर इसका एक दूमग भो पक्ष है । यदि भाषा न हाता तो हमारे भाव विचार अवगुटिन अथवा अनवगुठित किसी भी रूप म व्यक्त न हो मक्त थ । भाषा क अभाव में न तो हमारे स्व का विस्तार ही सम्भव था और न हमारी अरमान मलि का किसी प्रकार का सरक्षण ही हो पाता। परस्पर सराप को दिया म हम जिस मापा का प्रयास करते हैं उसके द्वारा भी हमारी मम्यता के स्तर का अनुमान किया जा सकता है । सलाप करते समय माया का एक नाटक सा होता है जिसम प्रत्येक पात्र अपन भीतर ही नाटय दिया करता है। जिस प्रकार प्रयक्षत वायु की लहरियां नहीं बोलती किन रडियो से हम वोल मुनत हैं, टेलीफोन के तार प्रत्यक्ष ध्वनि करते हुए नहीं दिखाई पडते सविन हम ध्वनि सुनते हैं रेडियो और तार तो केवल म यस्थता करते हैं सवादो का सब हन करते हैं उनके प्रसार में सहायक हान है सवाद देने वाला और उस ग्रहण करने वाला तो दूसरा ही है उसी प्रकार व्यक्ति और उमरा मुप केवल एक माध्यम है, बालने बारा ता काई दूसरा ही है जा उसक अतस मे विद्यमान है किन्तु जव ध्वनि गान सामने आ नात हैं तब व्यक्ति का समस्त यक्ति व प्रत्यक्ष हो उठता है और जस रेनिया टेलीफोन मादि किसा समाज की सभ्यता का परिचय देते हैं उसी प्रकार भापा भी किसी “यक्ति अथवा समाज की सभ्यता के रूप को व्यक्त करती है। जिस प्रकार सभ्यता का उत्तरातर विकास हाता जाता है उसी प्रकार भाषा का भी। स्पष्ट है कि “पक्ति का ढांचा नाद नहीं करता नाद करन वाली-भापा पे स्वरूप का निर्माण करने वाली तो उसकी आत्मा है । ज्यो ज्यो आत्मा का विकास होता जाता है या-त्या भाषा भा गतिमान होता जाती है। इस प्रकार भापा वास्तविकता और उसक पर के प्रसार में एक आदोलित गति के रूप म है । यह सल्व नवानाति नवीन हम अपन को प्रस्ट करने के लिए मवलनी रहती है। भाषा को एक आध्यामिक इकाई भी है जिससे समस्त विश्व में एक प्रकार की भावानुभूति को व्यक्त करने वाला वनिया म माम्य एवं सानुकूलता दे दान होते हैं। जिस प्रकार सम्पता का विकास समुदाय को अपना रखता है उवा प्रकार भाषा भी समाज की अप ॥ रसती है। एक व्यक्ति चाहे कितनी ही स्थितिया और सक्ता द्वारा अपने को व्यक्त करे पर भाषा का निर्माण नहीं कर सत्ता स्वम प्रह्म भी, भले ही यह अपन से सवार कर रे परन्तु वह भाषा को जम नहीं दे सकता। भाषा का अभिप्राय अथवा उमका ११ कुछ भी हो उसने जम के लिए अमर ६० ] [ सत-साहित्य व्यक्तियो का होना अपेपित है क्याकि व्यक्ति ही भाषा के स्वरूप को सवहन कर सक्त हैं । भापा एक प्रकार म मानया के बीच प्रतिष्ठिन एक परम्परा है । सभ्यता भी मानव-जाति को एक परम्परा के रूप म प्राप्त होती है। मानव की भाषा ही सभ्यता की परम्परा को अक्षुण्ण रखती हुई उसके भावी रूप का अभिनव ऋगार करने म सक्षम होती है । इस प्रसग म निम्नाक्ति विचार द्रप्ट य हैं - - The use of language is cultural accumulation and historical transmission is obvious and important This applies not only to sophisticated levels but to primitive ones as well A great deal of this cultural stock in trade of a primitive soc ety is presented in a more or less well defined linguistic form Proverbs medicine for mula standardized prayers folk tales standardized speeches song texts geneologies are same of the more over forms which language takes as a culture preserving instrument -Encyclopaedia of the social selences Vol IX Page 161 भापा और प्रकृति भाषा वज्ञानिक ने भाषा की उत्पत्ति के सम्बन्ध में विचार करते समय यह निश्चित किया कि प्राकृतिक क्रियाओ के अनुवरण के आधार पर कतिपय गली का निर्माण हा । उदाहरणाय पेड से पत्ता गिरा और पत की ध्वनि हुई । उसी ध्वनि के आधार पर पत्ता पर बना झरने का यर झर करके गिरना ही धरने के निर्माण का मूल हतु है । इस स यह निष्क्ष निकाला गया कि भापा प्रकृति में समाई ह' है और यह विचार इतना अधिक पुष्ट होता गया कि भ्रमवश लोगो ने भाषा का प्रकृति का ही एक अग मान लिया । कतिपय विचारको का यह मत है कि जलवायु और प्रकृति भाषा पर वाई प्रभाव नहीं डाल सक्ते उह यह मानने में भी पदाचित आपत्ति हो सकती है कि विभिन्न जातिया तथा उनकी भाषा से कोई नमगिक सम्बध है । भाषा को धुरी देशा तथा विभिन गतावरणो पर टिकी नहीं रहती। उसका घरा तथा जनपटा से भी काई सम्बध नहीं हैं जातियो और दलो के दल म वह नही फैसती।' इस क्यन से इतना ही तात्पय ग्रहण किया जा सकता - In the light of modern science no one dares to belteve that cli mate and the nature of the soil have any influence on the speech of man Nor has it ever been proved that there is a necessary natural connection between races and their language forms The centre of gravity of a language does not lie in countries and cli mate nor in houses and settlements Nor in the animal group ings and species of man -The Spirnt of Language in civil zation -Page 81 मापा तया हिदो मापा का विकास ] है कि भाषा का प्राण उपर उचित प्रयोग में है । उसका प्रयोग ही उसने विकास का URI मूल हेतु है । भौगोलि परिस्थितियां, परिवार, समाज आदि उसे प्रभा- वित कर सक्त हैं। स्प है कि यह प्रभाव सत और असत होना ही प्रकार के हो मस्त हैं किन्तु में प्रभाव अपना काम तभी करते हैं, जब वे भापा के अन्तरालम प्रविष्ट हो स । प्रयोग को गतिमयता के कारण ही भापार जड पडती हैं। जिस भापा का प्रयाग मन्त पड़ जाता है व भाषाएँ कालतिर में केवल एतिहासिक उल्लेख को वस्नु रह जाती है । इसके प्रतिकूल जिन भाषा का निरन्तर प्रयोग होता रहता है, उनक बालने वाले इतस्तत धुमत-फिरत है, वे भाषाण नित्य भूतन समद्धि को प्राप्त करती है और समुन्नत हो जाती है । अन्तु भाषा का प्रयोग ही उसकी प्रेरक गक्ति है। पर हमने भाषा के ऐतिहासिर उल्लेख की बात कही है। भाषा इति हास की सम्पत्ति बन र पूणत मृत नहीं हो जाता, प्रयाग के अभाव म वै विस्मृत अवश्य हो जाता है पर वे अपन धूमिल भूतकाल के प्रान्तर स किसी न किसी रूप से प्रचलित भापाया का सम्पक साप्न र लना है। जिह हम मृत भाषा कहते हैं उनके कोई न काल मत्मम या तदभव प म प्रचलित भाषाओं में पाये जाते हैं । भाषा की यह प्रकृति हम इस तथ्य को मान लेने के लिए प्रेरित करती है कि काईमा भाषा कभी मन नहीं होती। सामान्यत यह महा जा सकता है कि किमी भी प्रयोग म आने वाली भाषा का आरम्भ और मत होना ही चाहिए। वस्तुत्र भापा नि अबाध है । वह सहित ये आरमस चल कर अन तर चलती चली जायगी। भाषा की अबाध धारा म परिवतन व नाना आवतों का पहना स्वाभाविक है । मल्यों का यह समार भापाक नसनिक स्वर का पता भरे ही न लगा सके पर वह प्रकृति की सहचरी होने कारण शब्दा मोर वाक्यो के रूप में अपना निश्तर विकास करती रहती है । भाषा सम्पूर्ण प्रकृति में एक समानी के प म विराममान है, विश्व को समस्त ललित भाषाएँ उमको महिमामया गोद म ममाई हुई हैं । नत्य नारीरिक मरतो की भाषा है, सगीत नाद को विज्ञानमयी भाषा है चित्रकला गो और रेखाओं पा मसर सलाप है, स्थापत्य कला आनि ठोस जड पिडा के भीतर से आती हुई भाषा की गूज है और बविता तो भाषाओं की भी भाषा है। प्रतिदिन के बालपाल में प्रयुक्त हाने वाले गर अथवा नाद, लय अपवा ताल हमार मावा और इच्छाओं के अनुचर हैं। 1 मय प्रयाग द्वारा गासित होते हैं। प्रयाणा को विभिन्नता सनके रूप यापार को विभिन्नता बना परता है। वविता मदे एक अत्यधिक पावती प्ररणा के रुप बन जाते है । पिंगल और प्रयोग इनकी सीमा का निधारण करते हैं। पाव्य अधारा का जितना भी शास्त्रीय विवचन हुआ है उन सब में इस तथ्य को भवन स्वीकार दिया गया है कि कविता प्रति को अनुकृति है। प्रति और जिसकी अनुरति म कार अथवा मावि सुस मानता है वह वस्तुत उसको भात ६२ ] । सत साहित्य भापा का सगीत और सलाप है । उसी का मजन उसी को गुनगुनाहट, उसी की लय और उसी की तान है । इहीं सब का नारोह एव अवराह वाणी के रूप म वह अपन चतुर्दिक सुनता-सुनाता आया है। मानव का निर्माण प्रकृति के उपादानो स हुआ है । वह प्रकृति के ही उ मुत्त वातावरण म अपनी आँखें खालता है प्रकृति के ही विभिन्न उपकरण उसका लालन पाठन एव सवधन करत है और अततोगत्वा एक दिन वह अपने समस्त भौतिक- स्थल रूप को प्रकृति को ही सौंप देता है । इस प्रकार प्रकृति और मानव का परस्पर घनिष्ट सबध है । प्रकृति ही उसे उसके भावजगत कल्पनाजगत और उसकी भाषा का निर्माण करती है । इस प्रक्रिया मे हम प्रकृति मानव और उसकी कला को सगु फित पाते हैं । भापा भावो का सवहन करती है । भावो द्वारा मापा को बलवती एव गतिमती बना देन में ही काव्यत्व का साफल्य है । और भाषा का कलवर भावा क अन्तर का प्रक्ट कर सके भाषा प्रयागो द्वारा मूच्छित चेतनाए पुन जागरूक हा सकें तभी कवि प्रतिभा का मनोरम दान होता है । कविता का भाषाआ की भाषा कहने का यही अभिप्राय है । प्रत्यक भापा का प्राण उसका काव्यत्व है । वक्ता कलाकार और रवि भाषा के प्रयोग सबधी नियमों की अवहेलना कर सकते है अवश्य कित उसकी प्रकृति स दूर नी जा सकते । प्रकृति द्वारा निर्मित भापा अपना रूप बाल सकती है कि तु वह प्रकृति को छोड नही सक्ती । जिस प्रकार आत्मा के विना मस्तिप्प का अस्तित्व नही रह सकता उसी प्रकार घमग्य कविता और क्ला भी निष्प्राण है । धार्मिकता कविता और क्ला को वह सजीवनी शक्ति प्रदान करती है जिसस न केवर कविता और क्ला जीवित रहती है अपितु दूसरो को भी जीवन दान दे जाती है । इस सम्बध में हम यह भी सदव स्मरण रचना चाहिए कि जहाँ कही भी कविता और कला के आभ्यतरिक सौदय के दान होते हैं वहाँ भाषा की बावारभूत एक्स्पता स्पष्ट परिलक्षित हाती है । धामिक यक्ति के पानो म प्रत्येक वस्तु की भाषा सुनाई दता है । उससे विश्व की प्रत्येक वस्त पेड प्रस्तर खड जड जोव सभी सलाप करत हए प्रतीत होते हैं । केवल मनुष्यो का ही बातचीत का अधिकार नहीं प्राप्त है । घम प्राण “यक्ति से ता सभी वार्तालाप करते हैं। वह अपना कविता कला द्वारा संसार के समस्त स्थावर एब जगम पदार्थों को अनुप्राणित करता रहता है । उसम उनकी भाषा को समझने तथा उनके यवहार को दूसरो को समझाने की क्षमता है । कवि से तो विश्व का प्रत्येक कण पोलता है । सोलिए ब्रह्माण्ड का प्रत्येक सत्य उसके लिए भाषा का रूप ग्रहण करता है । भाषा जम का रहस्य आदि मानव को चिन्तन मुद्रा में सन्निहित है । विस प्रकार प्रकृति ने उम चेतना प्रगन को और प्रकृति से चनना प्राप्त कर क्सि प्रकार उसने अपने अन्तस्तर म भादो एव अनुभूतियो को सजोया और किस प्रकार उमने प्रकृति से ही प्रेरणा प्राप्त कर भाषा के माध्यम स उहे अभि यक्त ।
भाया तया हिदी भाषा का विकास ] किया-यह भय एक बड़े कौतूहल का विषय है। मानव की जिनासा वत्ति इस लिया भकभी पूर्ण ताप नहीं प्राप्न बरपाती क्योकि ज्यो-ज्यो मानव का, प्रकृति का विकास होता जाता है त्या-त्या भापा भी विकास को प्राप्त करती जाती है । इसी रूप में भाषा और प्रकृति का परस्पर घनिष्ट सम्बध है । भापा और जीवन किसी भी भाषा का जीवन मानव-जीवन की ही भांति गतिमान रहता है। यदि मनुष्य काय करना बर का है और उससे शारीरिक अवयव पूर्ण विश्राम की स्थिति में रह तो एक दिन एसा भी ना सकता है जब वह साधारण रूप स उठने वन म भी अगतता अनुभव करन लगे । उसको त्रियागीलता ही उमको सजीव बनाय रखती है। भाषा की भी यह स्थिति है । यह प्रयोग के माध्यम से ही स्पदन गोला बन कर अपत रूप का सतत विकास कर सकता है। जिस प्रकार प्रकृति की वनस्थली मकभी पतझड आले है और कभी बसत दी श्री-सुपमा वन कागार करती है कभी हिमाच्छादित उत्त ग गलमालाए हिमाशु की धवल ज्योत्स्ना प्राप्त कर रजतनी की सष्टि करता है और कमा कवल नारस शिलासड ही पवनराज की सम्पत्ति बनते हैं कमी जलधि को उतास तर, लाख-लाख अभिरापानों स मर कर निवार की रश्मिया को चमन के लिए मचल पडती हैं और वही सागर कभी एसा पर ऐसा मुस्पिर ममस्त पदनो से होन, उसी प्रकार कोई भी भाषा सदव प रूप नहीं रहती। प्रयाग को अतिशयता हो भाषा का जीवन बनता है। निरन्तर की अबाध गति ही भाषा का प्राण है । मापा को सप्राणता का दान उसको गति होनना तथा स्थायित्व के अभाव म है। भाषा-दान जीवित और मृत मापामा म किमी प्रकार का भर मह भानता । वह विराधो और मत विभिननाओ कामाबाई मायना नहीं प्रदान करता । विभिनतायें तो बहुलता की सृष्टि करती है । इसीलिए भाषा में विभिन्न स्वरूप एक दूसरे से पूपर नहीं हो सरते। उनकी मिन्नता म हो अमिता के दान होत है । जिम प्रकार उठते बाला म और पग्ने हुए जल प्रपाता म एक ही जल क दो मिन्न-भिन स्वरूप दिखाई परते हैं उसी प्रकार मापा भी विभिन्न स्वरूप है जिन पूल में एक ही तत्व विद्यमान है । स्वरा का मारोह एव अबरोह जस स्वर कोम्प व्यक्त करता है वसे ही भाषा भी अपने कई स्प व्यता कर मानी है। विराद को अमोमता अदापना और बभेदता की ही भांति कोई भी भापा ममीम अबाप और ममद रहती है और जस विराट साकार-मुगुण बन कर अपन का मोपित-सा कर देता है वही भाषा भी हमारी वेतनाओं म सिमिटर एक क्षणिक प्रकार रेन्वा रूप में बाँध जाती है। झापा को हम मस्तिष्क को पूण चेतन अवस्था भी मान मरत है । जिस प्रकार से चेतन मस्तिष्क नाना क्रिया-बलापो की मुष्टि करता है उसी प्रकार भापा भी ६४ ] [ सत साहित्य नादमय होकर सगुण हो जाती है और जसे सागर की अतल गहराई से उठ कर विराट लहरें फनिल परिवेष्टन स परिवेष्टित हो सशद एव साकार हो उठती हैं वस ही भाषा भी मानव क अन्तराल से फनिल लहरा प म उठ कर साकार बन जाती है । इसी रूप में वह मानव हृदय की पूण यास्या बन जाती है । सीलिए किसी भी भाषा का इतिहास उसके बोलने वालो के भावो-मानसिक चेतना का इतिहास है। हम किसी भी भाषा का त रें और उसके विकास का क्रमिक अध्य यन करें तो हम उस भाषा के बालने वालो के सम्पूण सास्कृतिक विकास एव राज नैतिक उपलधियो का परिचय पा सकते हैं । भापा कप में मानो हमारा समस्त बिखरा ज्ञान सवलित एव सजीव हो उठता है । हमार जीवन क चारा और जितना भी प्रसार है वह यद्यपि प्रत्यक्षत भाषा से भिन्न है पर सब नापामय है । जब कभी आवश्यक्ता होती है तब प्रस्तर अथवा पत्र शिलारा अथवा ताम्रपत्र पवन अथवा तारततु बोलने लगत है । ये सभी भाषा द्वारा अनुप्राणित होत है और समय मान पर भापा को सजीव भी बनाते हैं ।' हमारा समुन्नत जीवन हमारे राष्ट्र का गौरव चिह है । भाषा इस गौरव का वहन करने वाली-माध्यम बनती है । इस दष्टि स मानव-जीवन मे भाषा का महत्व और भी अधिक बट जाता है । वस्तुत भाषा एक विगेप मनोदगा है एक विशप स्फूर्ति है एक अमोघ शक्ति है । जिस प्रकार प्रत्यक राष्ट अपनी विगप शक्ति रखता है उसी प्रकार भाषा भी अपने मे एक विशष क्षमता सजोए रखती है। बड-बड विश्वव्यापी विप्लवो के मूल मे भापा की शक्ति काय करती रही है और रणचण्डी की दुधष मुद्रा को शात करके उस परम कल्याणी रूप देन में भाषा की ही अमोध शक्ति न काय किया है। जिस प्रकार राष्टो म युद्ध हात हैं उसी प्रकार भाषा विषयक युद्ध भी देख जाते है । उनम कभी-कभी ता इण्या और मूखता का ही दशन होता है । पर ये युद्ध जातीय जीवन का सजगता का प्रमाण भी प्रस्तुत करते है । जीवन स्वत एक सघप है । कभी हृदय में असत प्रवतिया जागरूक होकर युद्ध का रूप रच देती है। 1 The stone paper or bronze on which we write the air and wires through which we speak the ears with which we hear our lary nxes and vocal cords nerves and muscles lungs and hands even our brains become language when necessity arises though in themselves they are something completely different They allow language attributed to them in their turn give forth language whenever circumstances demand it -The Spirit of language in Civilization -Page 110 भाषा तथा हिदी भाषा का विकास ] हृदय का सत नमन के इस व्यापार प्रति विद्राह पर उठता है। इस प्रकार सत और असत का मप छिड़ जाता है। भापा भी जीवन स सम्बन्धित होने के कारण इस सपप से अछूतो कसे रह सकती है। मानव महाकाक्षा अपनी सावभीम सत्ता के प्रसार में ही सतोष अनुभव करना चाहती है । भाषा भी इसी वत्ति का अनुसरण करती है । वह मा सावभौतिक चक्रवर्ती साम्राज्य की आकाक्षा रखती है। कालचक्र के माध्यम से मानव मन की कामनाएँ जस कभी साकार होती है और कभी नष्ट होता हैं उमी प्रकार भाषा का साम्राज्य भी बनता बिगडता रहता है । पर प्रत्येक विनाश न क्वल निर्माण का बाज बाता है अपितु वह अपना एतिहासिक अस्तित्व भी किसी न किसी रूप में अक्षुण्ण रखता है । कौन कह सकता है कि आज हम जिस भाषा म जो नाना सूक्तियां, लोकोलिया और कहावतें उपमायें और पक प्रयुक्त कर रहे हैं वे सब नितात नवीन हैं । यह सब भापा कानन की भूमि म गिरे हुए बोज हैं जो उगते और बरले हुए सुनीघ काल से चल आ रहे हैं । इस गम की एक परम्परा सी लगी हुई है। जिस प्रकार समाज प्रमिक विकास करता जाता है उमी प्रकार भाषा भी धीरे धीरे अपना विकास करती है। मानव अपनी स्वाभाविक आवश्यक्ताओ क कारण एम दूसरे में मपक म आता है । यह सम्पक हो भापा के विकास का हेतु बनता है। पहले मनुष्य भी पशुओं जसी स्थिति म था किन्त धीरे धीरे उसन अमनी आवश्यताओं के आधार से वस्तुको वा मग्रह किया और उनका नामकरण किया। भावों और विकारो के विभिन्न रूप उपस्थित हुए और उनका आदान प्रदान भी हुआ। उसमें जीवन को इस प्रक्रिया म भाषा का योग अत्यधिक महत्वपूर्ण सिद्ध हुआ। स्पष्ट है कि भापा का यह योग प्रारम्भ म अस्थिर, धूमिल मा रहा हागा । पर पारे- धीरे उसमे स्थिरता आई होगी। यह स्थिति उसी प्रकार है जिस प्रकार अमिर विकास के उपरान ही आध्यात्मिक-स्थिति प्राप्त होती है। यदि सामाजिक जीवन एस कसम है ता भाषा उसका फूल ओर पल है।। भापा और कविता भाषा मानव भावो का माकार रूप है। मानव विचार शित भाषा के रूप म ही पिरकते हैं, विरारिमा भरते हैं। यदि भाषा न होती तो मानव हृदय श्री सवेदन तीरता को कहां स्थान मिलता । भाषा ही वो हृदय की ममम्त मनुहारो पल्पनाभा को रूप प्रदान करती है। कवि की आकुलता भाषा ही दे रूप मता 1 Language is aclher rool sor trunk but lower and fruit of Socratufe -The Spint of language in civilization Page 187 [ सत-साहित्य स्प-नवली हार एक ऐस भाव म्प का निर्माण करती है जिसम विश्व हृदय डूबने उत्तराने लगता है। प्रत्यक जाति दश एव गप्ट की भापा म उमका समूचा व्यक्ति स्व निखर उठता है । विना जिसे हम प्राणा का सगीत कहते हैं भाषा के बिना अपन अस्तित्व का निर्माण नहीं कर पाती । रस दष्टि सविता भापा को गो है। पर इस सम्ब म विचार का दूसरा पप भी है । मापा के जम या भय हम कविता का द सकन हैं । वायु जर त शात है तब तक वह गल से रहिन है किन्तु वायु का जागेडन विलाइन उसका कम्पन एव विवधन भीषण २व को सष्टि करता है । यहा की झकार गिरि क दरामो का रोर किसने नहीं मुना वायु का यह मारम मयन ही नब का कारण बनता है। इसी प्रकार ववि हृदय का मपन, उदोलन भाषा का जन्म देता है । कवि अपनी कला द्वारा भाषा वा शृगार करता है। कवि पाय निमाण के क्षणा म स्वपरा प्रवत्ति म उपर उठ कर तथा परत्व की अनुभूति मलीन र स्वाभाविक नास्तविकता का एक ऐसा रूप प्रा करता है जो बड़ा हेमा बडा हो आकपा एवं बडा हो प्रभावोत्पादक प्रतीत होता है जिसको देख कर प्रयेक सहृदय मानव आत्मविस्मृत होकर उसी रूप म लान हो जाता है । इसे हम दवि की एक विशिष्ट मजनात्मक शक्ति कहेंग ! कविता का कृतित्व भाषाको इमी नियालीरता म है। कवि अपनी कविता में भाषा क माध्यम से पार्थिव जगत कोय यास्तविक्ता की उपक्षा न करना हुआ विस्मय विमुग्धकारिणी अलोरिक्त' कोमट करता है। का य-जगत का यह सत्य प्रत्येक कवि के जीवन का सत्य है । स्पष्ट है कि प्रत्येक कवि अपने वयक्तिक रूप म ही काव्य-सृष्टि करता है। इसीलिए प्रत्येक कवि की भाषा म उसको यक्तिक्ता की छाप होतो पर भापा चयक्तिक होकर भी सावभौम बाती है । महपि वाल्मीकि की कविता मे उनकी अपनी वयतिकता की छाप है किन्तु उनकी रचना लोक हृदय की रचना है । कालिदास वाण भवभूति सब अपने अपन ढग मे अपनी भावरान को व्यक्त करते हैं । सूर के पद तुरसी की चापायां, बिहारी के दाहे भूपण देव और पदमाकर क छन्द सभी कृतिकार की विशिष्टतानो स युक्त हैं । काई राणिकता का सहारा ले रहा है तो कोई व्यजना का और काई पक उपमाा उत्पक्षाआ माध्यम से अपनी अभिव्यत्तिया की तोता प्रान कर रहा है। पर इन ममस्त वयक्तिक रूपा की यह विगैपना है कि लोक जीवन की अनुभूनि “न सब म समाई हुई है । इसलिए हम कहते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति की महगामिनी मापा ला जीवन का साहवर्य मुस प्रदान करती है। भाषा का मह रूप अनित्य होना भी गाश्वत है । दिग और पाल के बचनो से अकदा हुआ भी उ मुक्त मारमा के पखों स अ कृत है । साधारणत समस्त स सीमित पर कल्पना की उडान स भी परे हैं । जीवन को अनर पताओं एव विखलनाओ के समानारी असीम म विहरण तीला होती हुई भी व्यक्ति से उम स्व से शासित भाषा तया हिंदी भाषा का विकास ] तथा गास्त्रीय सृजनारमा इच्छा से पग्वेिष्टित है। वह अपने म स्थिर भा है, वितन म लोन मा है पर समस्त बरनो से पर है। दविता का म्वन्प ग्रहण करनेवाली भाषा वह सूय है जिसकी प्रकार रहिमपा अन दिगाम विवीण हाती रहती है । मापा और धम अति प्राचीनकाल स धमकी मापा और काव्य की मापाबीच एक सम्ब पसूचक मायना चली आ रही है। हमारा प्राचीन माहित्य ययय है । धम मा विवचन भी कविता में हुआ है। इसलिए धम व काव्य की भाषा का एक ही समया जाने लगता है । तात्विक दृष्टि स दानो म कोई उन्नर नहा है, अतर क्वल उनक क्रिया मा रुप में प्रकट होता है। काय जव अपना गह्नता और तावना के कारण जीवन म समा जाता है तब वहा धम बन जाता है और धम जब जीवन के सल से पैदल छितरात हुए निकल जाता हैं तब उम काव्य की सना प्राप्त होती हैं। धम की भाषा का सबस प्रथम गुण है उसका उभाषा होना। पार्मिक प्रया म पाये जान वाले प्राथनाम स्तान आदि का पढ कर हृदय म एक प्रकार की विशेष भाव-नया की उद्भावना हाती है। उम भाषा म भाव मानो मूतस्प धारण कर लेता है। पल्त श्राता एद पान उसम एक विशिष्ट प्रकार की तल्ली नता प्राप्त करता है। पामिर भाषा का दूसरा प्रकार नाटकीय हाता है । इस हम इच्छा और क्रिया की भाषा मा बह सकत है। इस नाटकीय भाषा म दनक्याय अनगत आन वाले सभी तत्वो का समावगहा जाना है। प्राचीन काल म प्राकृतिक घटनामा एक मानकोप बता की अभिक्ति पौराणि हग मिधिर (Mythical) से हाती थी। पौराणिकता को वत्ति सजा हम उपलf होती है उसकी तुलना वजानिक उपलचिपासना का जा सकता। पौराणि म ए प्रसार मापन विधान उपमान योजना आनि सनिहित होती हैं पर विनान की अभिव्यक्ति इस स नितान्त भिन्न है। पौराणिक बत्तों की सष्टि कामय जातीय जीवन में अध्यात्म का मवेत करना होता है। विज्ञान क्वल मूलभूत वस्तुओ का रेकर उनको व्याख्या करता है क्या और कसं रा उत्तर देता है, जब कि धम अथवा पौराणिस्ता मानव वे अन्तस्बल का परिकार परक उस दवा समेत प्रदान करता है। इस स विज्ञान की भाषा धार्मिक भाषा से भिन्न हो जाती है। - एम का आधार है विश्वास । मत घम की भाषा भी अपने में एक बहुत वहा विश्वास रकर परती है। विकास को रिपति म एक बही निष्ठा मा जाती है । यह निश्चयात्मिक्ता यो वृत्ति एक रास को सष्टि करती है जिसस गोन बनता है। पामिर अभिव्यक्तियो का गाताभर चली का यही एक कारण है। विश्वास की भूमिका म जव हुन्य सहज उसका अनुभव करता है तो उसकी ६८ ] [ सत साहित्य वत्ति अभिनयात्मक हो जाती है और यह अभिनयात्मक भाषा के माध्यम से व्यक्त होने लगती है। धम तत्व जसा शब्द से ही स्पष्ट है ईश्वर के सम्बध की चर्चा उपस्थित करता है और ईश्वर सम्बधी कोई भी वात गणनात्मा एव तार्किक रूप में प्रस्तुत नहीं की जा सक्ती इसी से धम की भाषा में काव्यात्मक्ता होती है। वनानिक प्रकृति और मानव जीवन की जो याख्या करता है वह कवि की व्याख्या से भिन्न होती है। कवि और मानव प्रकृति दोनो के गहन अन्तराल म प्रवेश कर ऐस स्वरूपों की उदभावना करता है जो वनानिक की गति के परे हैं और जब धम का वणन काय के रूप में होने लगता है अथवा या कहे कि जब धम तत्व की उदभावना करता है तो वह वज्ञानिक एव कवि दानो स ही आग बढ़ जाता है । वसे साधारणत रवि और वज्ञानिक दोनों ही तय्या के निरूपण म प्रतीकों का प्रयोग परते हैं पर एक धार्मिक व्यक्ति अपने निरूपण में कुछ ऐमी बातें सामने लाता जो वनानिक एव कवि दोना ही की पक्ड से बाहर रह जाती हैं और वह उस बात को एक अनोखी मापा एव विशिष्ट प्रतीको के माध्यम स प्रकट करता है। धम की भाषा कुछ ऐसी बात की अभिव्यक्ति करती है जा और किसी प्रकार की भाषा में सम्भव नही हो सकती । निश्चय ही धार्मिक व्यक्ति दवी शक्ति से सम्पन्न होकर एक दूसरे के मम को सहज ही समझ लेते हैं और इस रूप में अपने को यक्त करते हैं जिससे सम्पक में आने वाले उनकी ओर सहज ही सिंच जाते हैं।
आ-हिन्दी भाषा का विकास कोई भी भाषा किमी एक दिन, एक मास और एक वप क्या, दस-बीस वर्षों को भी कृति नहीं हाता है। वह जन-जीवन से अनुप्राणित होती हुई गत्तादियो म अपना रूप निश्चित कर पाती है। भाषा विकास का यह अमिक रूप साधारणत समझ म नहीं आता है। सामा यत लोगो का उस ओर ध्यान भी नहीं जाता है। भाया के सुदूर अतीत और वतमान का तुलनात्मक अध्ययन ही उसकी प्रारमिक अवस्था और विकसित रूप के बीच का अन्तर स्पष्ट करता है। भाषा विकास अम म स्थानीय प्रभाव विगप महत्व रखते हैं । प्राय यह दसा गया है कि एक ही परिवार का भाषाओं म स्थान की दृष्टि से कमा अन्तर पहता जाता है। यह अन्तर प्रारम में दृष्टिगोचर नहीं होता। उदाहरणार्य पेशावर से कलकत्ता तक यदि कोई व्यक्ति धीरे धारे पर ता मापा सबपी विविध भेद समय है, उस प्रतीत हो न हों। पावर और उससे पाय योस इधर की मापा लगभग समान रूप वाली है । लाहौर तक आते-आसे कुछ अन्तर प्रतीत होन लगता है। यह अतर उस समय अधिक स्पष्ट होता है जब हम लाहोर के चतुर्दिक प्रसरित गावों की बोली की पेावर क आसपास प्रचरित वाली से तुलना करते हैं । कुरुक्षेत्र के आसपास की घोली इसस और भी भिम है । परन्तु ये सब बोलियां आपस मे एक दूसरे से इतनी सबद हैं कि उनमा डान्तर विपत उच्चारण से ही जाना जा सकता है। पूर्व की चोर और भी आगे यदि हम वग प्रदेश की यात्रा भरता भी भापा भेद बढ़ता तो जायगा, परन्तु अपनी शृखला का परित्याग नहीं करगा। इसका कारण पैगावर से मलात तर बोलो जान वाली बोलियों का एक परिवार से सम्बद्ध होना ही है, परतु कलपते और पेशावर की बोरियों में कितना अन्तर है यह उस व्यक्ति के लिए विस्मयकारी ही होगा जो पावर से चल पर बीच में कहीं भी विराम नरेते हए सोधे क्लरत्त के अचल में प्रवेश करे।
७० ] [ सत-साहित्य स्थान और काल के अतिरक्ति भाषागत भेद आकृति पर भी अवलवित हैं । भाषा प्रथम व्यासरूप है या समासस्प इसका निणय भाषा वनानिक अद्यावधि नही कर सके । परतु जिन बोलिया का साहित्यिक रूप समाप्त हो जाता है उनके ग्रामीण एव शिष्टरूप म अन्तर आ जाता है । सस्कृत की जननी वदिक भाषा है परन्तु वदिक भापा म जिस प्राकृत शगवलि के दर्शन होत हैं वह सस्कृत में नहीं है । प्रयोगो की जो बहुरूपता वदिक भाषा मे है सस्कृत में उसका भी अभाव है । यदि भाषा जितनी प्रसरणशीला है सस्कृत उतनी ही नियम बद्ध । आकृति का यह अतर स्वय सस्कृत भाषा के विविधकालीन रूपो में भी दिखाई देता है । वाणकालीन सस्कृत उपनिषद के पिया की सस्कृत से भिन्न है । एक मे आजव है तो दूसरी म चम- स्कार एव बोज । सस्कृत की उत्तराधिकारिणी पाली और उसके पश्चात साहित्यिक पद पर समासीन हानेवाली प्राकृत एव अपभ्रश भाषाओ के रूपो म भी यही विरू पता दप्टिगाचर होती है। जिन अप्रभ्र श भापामा को हम आधुनिक भारतीय आय भाषामा को जननी मानते हैं उनम परस्पर उतना भेद नहीं है जितना उनकी पुगियो म है । शौरसेनी और महाराष्टी अप्रभ्र श भाषायें एक दूसरे के अधिक निकट है । यह नक्टय मुगलवार तक चला आया है । परन्तु आज व्रज तथा मराठी के रूप वपम्य को देखकर का चित् कोई कह भी न सकेगा कि इनकी जननी इतनी समरूपा थी। स्व० आचाय रामचद्र शक्ल ने बुद्धचरित की भूमिका म अप्रभ्र श म निहित ग्रज अवधी एव खडी वोलो के जिन मूल वीजो की ओर सक्त क्यिा है व वस्तुत महत्वपूर्ण हैं। उनमे हमे यह स्पष्ट समेत प्राप्त होता है कि प्रारम्भ में वोलिया एक दूसरे वे अत्यत निक्ट थी। सम्भव है यह प्रारम्भिक मरजाल का ही परिणाम हो, क्योकि आधुनिक वनानिक साधनों जसी बहुलता न होने पर भी उन दिनो काश्मीर पचनत राजस्थान, महाराष्ट मध्यप्रदा अग-बग एव कलिंग सब एक दूसर में सम्परु म आते थ और एक समान सकृति स गासित थे । वतमान युग विविधस्पा सस्कृतियो को घोषणा करता है यद्यपि इतिहास अपने अतीत म इसको कभी मा यता नही देता। प्रमाण के लिए यहाँ कतिपय उदारण देख एना युक्ति सगत प्रतीत हाता हैं । नीचे के उद्ध त पद हेमचद्र कृत व्याकरण के है- (१) अह आसावरि देहा दिहउ । सुस्थिर डाहररज्जा रिहउ । (२) जइ यह रावण जाइयउ दहमुह इवा सरीर । जणणि वियभी चितवइ क्वणु पियावउ खीर ।। (३) उडहा वियउ वराउ । (४) जग दालिदिहि दुविधऊ बल्बिघणइ मुहिज्ज ।
भाषा तया हिंदी भाषा का विकास ] (५) राणा सबवे वाणिया जेसलु बडडउ सेठि। ऊपर के इन उद्धरणा म ब्रजभापा के रूपादे स्पष्ट समेत विद्यमान हैं- [ ७१ व्रजभापा रूप अपभ्रश रूप दिहउ लिहउ जाइयउ उडडावियत डुब्बिर बडडउ दीनो (उडावियो) लोनो जायो उडायो हुब्यो बडो (वडडा) नीचे कतिपय एसे उदाहरण दिए जा रहे हैं जिनसे अवधी रूपों का सक्त प्राप्त हाता है- (१) दिन्न हत्थु नियगुण कडप्पह जगु ज्यपियो अवजसिण । (२) भवण वसत पयठठ । (३) मह सग्गगयस्स वि पिटिठ लग्ग । अपभ्रश अवधी भापा-रूप दीन पयटठ (पठा) पठ (लगा) राग यहाँ पर अप्रभा भाषा के कतिपय ऐस पद उद्धत कर रहे हैं जिनम सडी बारा और पजावी मापा रूप के सकेत प्राप्त होंगे (१) काह चलिअ हम्मीर बोर गअजुह सजुते । (२) दोल्ला मारिम रिल्लि मह मुच्छिम मच्छ सरीर । (३) वासीसर राणा क्यिउ पाणा बिरुजाहर भण मतिवर । अप्रनश पजावी खडी बोली मारिस पाण मारया पयाण मारा प्रयाण अपभ्रश भापा म वैसवाडी भापा सकेत १ विणास करु । गिरि हत्य धरु।
७२ ] [ सत-साहित्य २ सोउ जुहिटिठर सकट पाआ। देवा लखिम केम मिटाआ। अपभ्रश वसवाडी कर धरु क्यिा धरा (कर धर) पाआ पावा मिटाआ मिटावा अप्रभ्र श भाषा मे भोजपुरी-मथली के सकेत १ वित्तक पूरल मुदहरा । वरिसा समआ सुवखकरा । २ अहिललइ महि चलइ मुअल जिकि उटठए । ३ घर णहि पिम सुणहि पहिअ मण इछल कहू । ऊपर के उद्धरणा म पूरल मुअल तथा इछल शल स्पष्टत भाजपुरी भाषा का रूप व्यक्त करते हैं । य सव भाषा रूप विक्रम की ११वी १२वी शताब्दि के पूर्व के हैं। इससे स्पष्ट है कि जिसे हम हिन्दी भाषा कहते हैं उसको मूल प्रकृति का प्रतिबिंब अप्रभ्र श भाषा म परिलक्षित होता है । व्रज अवधी बसवाडी खडी बोली भोजपुरी आदि भाषा स्पो के जो साकेतिक प्रयोग ऊपर व्यक्त किए गए है वे इस तथ्य के स्पष्ट प्रमाण हैं कि उस युग की काव्य भाषा में किसी एक ही स्थान की भाषा का प्रयोग न होकर सामा यत उम भाषा का प्रयोग हुआ है जो अधिकाशत समस्त उत्तरापथ म प्रचलित थी। इस प्रकार काव्य की एक सामोम भापा का रूप बन गया था जिसम विभिन्न प्रदेशो के अति प्रचलित शब्दा का प्रयोग पाप्त होता है । ऊपर के इस विवेचन स हम इस निष्कप पर पहुचते हैं कि प्रारम्भ से ही भाषा के दा रूप रहे हैं- एक साहित्यिक भाषा और दूसरा जन जीवन की भाषा । जन जीवन म यवहृत हान वाली भाषा की सना प्राकृत रही है । वनिक युग में जो प्राकृत भाषा थी उसका रूप गाया म प्राप्त होता है । मार्यों ने प्राकृत भाषा को प्रादेगिक क्षत्रो स हटा कर उस सव जन-यवहारापयागी बनाने की दष्टि से सवारा और याकरणानुमादित स्प प्रदान किया । भाषा का यह सस्कृत रूप कालान्तर म सामाय जन जीवन से दूर हान रगा। धार्मिक क्षत्र में महावीर स्वामी और भगवान गौतम बुद्ध के प्रवेग ने जन-सामा य की भाषा (प्राकृत) को विप बल प्रदान किया । प्राकृत भाषा का ही एक रूप पाली बना । भगवान बुद्ध ने जिस प्राकृत का अपनाया उसम उनकी प्रातीयता का प्रभाव होने के कारण उसे मागधी (प्राकृत) कहा गया । बुद्ध के उपदेगों एव सिद्धान्तो का लेकर साहित्य का जो रूप जिस भाषा म लिपिबद्ध हुआ उसका नाम पारी हुआ । इस प्रकार पाली प्राकृत का ही एक विशिष्ट भ- बन कर थाई । उस काल म भिन्न भिन्न प्रान्ता म साहित्य सृजन का काय हो ही रहा था अन जसा कि पहल कह आय है दूरस्थ स्थानो की भाषा क भाषा तया हिदी भाषा का विकास ] उच्चरित एव लिखित ए म भद होना स्वाभाविक था। इस प्रकार जो भाषा- विभेत उत्पन्न हुआ, उसस मागधो, अ माघा महाराष्टी और शौरसेनी भाषा के रूप सामने आए। इस समय तक प्राकृत भाषा में कई माड आ चुक थे। भाषा के विद्वानो ने इन मोडो को पहली प्रारत दूसरी प्राकृत और तीसरी प्राकृत कह कर स्मरण किया है। तीसरी प्राकृत के अलगत उस अपभ्रश भाषा का लिया गया है जा साहित्यिक प्राकृत के पश्चात जन जीवन बाच वालचाल की भाषा बनी।। अपना भापा क साहित्यिक रूप ग्रहण करने तथा व्याकरण नियमो से जकड़ जाने के पश्चात उनका स्वाभाविक प्रवाह एक दूसरे ही रूप म चलता रहा । यह रूप मिही अाम मूल अप्रभ श म मेल खाता है और कि हा अाम भारत की आधुनिक भाषाओ स मिलता है । उपर प्राकृत + जिन चार भेगे मगधी, मद्धमागधी महाराष्टी तथा गौरसनी का उल्लेख किया गया है उनमे स प्रत्यक का 'अपभ्रश रूप होना स्वाभाविक प्रतीत होता है । यथा मागधी अप्रनश अद्ध मागधी अपभ्र महाराष्टी अमन और शौरसनी अपनशाइन भाषाओं के रूप इस बात को प्रमाणित करते है कि भाषा उत्तरात्तर गतिमाला एव विकासशीला है । वयारणो ने शौरसेनी मप्र के तीन रूप मान हैं नागर ब्रायड और उपना- 'गर । विद्वानां का मत है कि इसी नागर (शौरसनी) अनश स हिन्दी की उत्पत्ति हुई। हम यह पहले देख चुके है कि किस प्रकार हमारी प्रान्तीय अथवा अन्य प्रादेशिक भाषा बीजरूप सा अप्रभ । म विद्यमान हैं । गुजराती तथा राजस्थानी का सम्बध गौरमेनी मन श मे बिहारी बगाली मासामी तथा उडिया का सम्बध मागधी अप्रन श स पूर्वी हिदी का अद्ध मागधी अप्रभ्र श स और मराठी का सम्बप महाराष्टा अप्रभस माना जाता हैं । इसी प्रकार दा की जय बालिया के सम्बधम भी उनर मूल बात को वल्पना की गई है । भाषा सम्बन्धी मह विवे 'चन सर जाज प्रियसन तथा अन्य अग्रजी विद्वानो के आधार पर किया गया है। पर भारतीय विद्वानो का यह मन है कि भारतीय भाषाओं में मूल स्रोत का पता लगान के लिए पश्चिमा विद्वाना का अनुकरण करना अधिक समीचीन नी है। ! 1 - जहाँ नर हिनी का सम्बध है स्पष्ट है कि उसका रूप ग्यारह्वा बारहवा तेरवी और चौरहवी तालीम बन अप्रभ्र व प्रयो म पाया जाता है। उसी से हि काय भावी स्वस्पा भी अनुमान लगाया जा सकता था। इस प्रसग म यह दृश्य है रिमन हिली प्रारम्भिक साहित्य म सस्कृत वा प्रयोग नहीं पाया जाता । चद कांच कृत पवाराज गसा म जिमको प्रमाणिरता के सबंध ० याममुटर दाम-हिन्दी भाषा और साहित्य, पष्ठ १४।
७४ ] [ सत-साहित्य मे विशेष ऊहापाह किया गया है सस्कृत के श’ प्राप्त होते हैं । कारान्तर म यही हि दो बज अवधी भोजपुरी, बधली छत्तीसगढी खड़ी बोली तथा उदू के रूप में देश के विसिन्न भागा में पनपी और साहित्यिक रूप म समद्ध हुई। हिदी शब्द की उत्पत्ति इसके पूर्व कि हम हिदी को विभिन्न बालिया और उनकी भाषागत विशेष ताओ का सत साहित्य व सदभ म विश्पण करें यह आवश्यक प्रतीत होता है कि हिदी गल की उत्सत्ति के विषय म थोडा विचार कर लिया जाय । प्रारम्म म हिती - भाषा वाचो न होकर क्वल स्थानवाची था। बौद्धकाल तक उत्तरी भारत का जम्बूदीप कहा जाता था । आज भी सकल्प पढते समय पडितगण जम्बूद्वीपे भरतखण्ड का प्रयोग करते है । फारस क निवासी सिधु नदी के तटीय प्रदेश का हिन्द कहा करत थे। इसी स हद प्रदेश का रहने वाला 'हिंदू कहा जाने लगा । इसी हिद से हिंदी बना जिसका अर्थ हुआ हिद प्रदश क। निवासी । इस प्रकार भापा म बहुत गल बनते है यथा पजाब स पजाबी, सिध स सिधी गुजरात से गुजराती आदि । अमीर खसरोक समय (सवत १३४०- १३८१) म हिदी ग का प्रयाग भारतीय मुसलमाना के लिए ही होता था। उसने हिदू तया हि दी दानो ही गन्ना का यवहार भिन्न भिन्न अर्थो म क्यिा है । उदाहरणाथ- 'बादशाह ने हिंदुओं को तो हाथी से कुचलवा डाला किन्तु मुसलमान जो हिदी थे सुरक्षित रहे। । 1 इस उद्धरण द्वारा स्पष्ट है कि भारततर देगो के मुसलमान भारतीय मुसल माना को प्रारम्भ में हिदी नाम से ही जानते थे । कालातर म उनकी भाषा को भा हिदी की समा प्राप्त हुई । इस भाषा का प्रयोग हिंदू तथा मसलमान दोना ही सम्प्रदाया में होता था। साधारणत हिटी राल से अभिप्राय है हिद देश की भाषा जिसम मारत म बाली जान वाली समस्त भापाए सम्मिलित हो सकती हैं । प्रारम्भ मे हिन्दी के लिए (1) whatever live Hindu fell into the kings hands was pounded into bits under the feet of elephants The Musalmans who were Hindis (Country born) bad their lives spared -Amirkhosru in Elliot III 539 Hobson-Jobson Page 315 भाषा तया हिदा भाषा का विकास ] [ ७५ हि दुई, हिन्दवी हिंदवी दक्खिनी दखनी या दकनी हिन्दुस्थानी हि दस्तानी खडी बोली रेना, रेनी उदू आदि का प्रयोग किया गया था किन्तु बाद म भेद परक प्रयोगो की दृष्टि स हिदी उद और हिंदुस्तानी ये तीन नाम ही अधिक प्रचलित जिस प्रकार किसी पवत से निकली हुई जल की एक क्षीण धार मदान तक आते-आते न जाने कितनी अय धाराओ की जल राति को अपने म समाहित कर लेती है और तब उसरा विस्तार अत्यधिक बढ़ जाता है उसी प्रकार प्रत्येक विवसन शीला भापा आसपास के भापा-बोली सम्बधी प्रभावों को आत्मसात करती हुई गतिमान होती है । इस दृष्टि स हिन्दी के लिए यह कहना बड़ा कठिन है कि किसी एक अप्रभ्र (शौरसनी) का ही इस पर प्रभाव है । हिनी के वतमान रूप तक आते-आते इस न जान क्तिन मोड लने पड़े हैं। न जाने कितनी उपत्यकामओ ऊची नीची भूमिया मरुस्थलो हरे भरे प्रदेशो में परिभ्रमण करती हुई हिन्दी को यह धारा आज अपने इस रूप को प्राप्त कर सका है। उसका यह रूप उसका श्री-सम्पन्नता का द्योतक है और अपन म विभिन्न कारणो के प्रभावी का सजोए हुए है । इस सम्बन्ध में डा० विश्वनाथ प्रमादरा यह मत ६ष्टय है हिन्दी म निश्चित रूप से किसी एक ही प्राकृत या अप्रभ्र के रूप और "क्षण न मिलन के कारण उसे उनम से किसी एक से ही "युत्पन्न मानना मुक्तिसगत नही प्रतात होता । यूरोप की 'रोमास कुल की भाषामा के समान हिन्दी वस्तुत सक्रमण की प्रणाली से विक सित हुई है व्युत्क्रमण की प्रणाली मे नही । उद्योतन सूरि की कुवलयमाला के अनुसार ८वी ९वीं शताधी मे कम कम सालह प्रादशिक भाषाएँ या बोलियां व्यवहत थी । उत्तर म पजाब और पूर्व म विहार-बगाल के बीच को भापायें और बालिया बोल चाल व रूप में अपनी-अपनी स्थानीय विपताओ बावजूद भी गन रान एक समान वादा की ओर उमस होती जा रही थी। वी स १२वी शताब्दी के अपभ्रश ग्रथो स यह स्पष्ट है कि इसी प्रवत्ति के कारण, उस समय की माहि त्यिक भाषा का बहुत कुछ अ म आदीकरण हा चका था भौर लिखित रूप म उनके स्थानीय भेदो मे बहुत अधिर अन्तर नहीं रह गया था । साहित्यिक व्यवहार लिए एक समान भाषा के रूप म हिन्दी का आविर्भाव उस समय में अपभ्रश प्र म स्पष्टत परिलक्षित होता है। सश्मण की इस प्रणाली से हिन्दी भाषा के तया उसके साहित्य के उदय और विकास के सर्वोष्ट प्रमाण हम मिलते हैं सिद्ध कवियों की कृतिया म। - हिन्दी शब्द समूह प्रत्येक सजीव मापा पर सस्कृति एव सभ्यता के परम्परागत रूपों का प्रभाव १ हिन्दी अनुशीलन धीरेन वर्मा विशेषार पष्ठ २०५६ [ सत साहित्य - पडता रहता है । यापारिक उद्द य अथवा अय कार्यों से एक स्थान से दूसरे स्थान म आवागमन भी भाषा ६ रूप विकास म महत्वपूर्ण योगदान करता है । साथ ही भौगोलिक परिस्थितियां भी गो रूप-वियास म अपना काय करती रहती हैं। किसी भी भाषा के विवचन में यह भी दृष्टव्य है कि उस भाषा के प्रारभिक गाय किस प्रकार बने किस प्रकार उनम परिवतन हु" किस प्रकार उनके रूप घिसे, और किस प्रकार सद्धित हुए । हिदी भाषा के वतमान म्प म क्तिनी ही धार्मिक सम्प्रदाय जनित सस्कृ तियां समाई हुई है। राजनीतिक प्रभावा से प्रभावित रूप भी टसमें दख जा सक्त हैं । सभप में यह कहा जा सक्त है कि अपभ्र ग काठ से प्रारभ होने वाली हिन्दी भापा के विकास म अनक मम्मिलित प्रभाव काय कर रहे है । इसम बहुत से गठन विशद्ध सस्कृत भाषा के है जो तत्सम रा ६ रूप में जान जाते हैं । हिन्दी म ऐस शता का भी प्रयाग-बाहुल्य है जिस हम अद्ध-तत्सम कह सकते है । अद्ध तत्सम से हमारा तात्पय उन शब्नो स है जो मूलन सम्कृत के ग है पर प्राकृत भाषा के शब्ना के साथ प्रयुक्त होने के कारण अपन को प्राकृत प्रभाव स बचा नही पाये हैं । हिन्दी म ऐसे शा का भी वाहुल्य है जिह हम तदभव कहते हैं । तदभव गब्द वे हैं जो सस्कृत के शब्द। स बिगड कर उसस भिन्न अपना रूप रखते हैं । हिदी म एक बहुत बडी संख्या में एस भी शब्द पाए जाते हैं जिन्हे हम देज कहते है । संस्कृत अथवा प्राकृत गन्दा की यत्पत्ति दी जा सकती है उनके सम्बध म यह जाना जा सकता है कि व किस धातु और किस प्रत्यय के योग से बने कि तु जब किसी गट को वयाकरणिक उत्पत्ति और उसका उत्पत्ति मूलक अथ न दिया जा सके तब उस शब की सना होगी देशज । यथा पेट गोड आदि । भारतवप सुदोष काल तक मुसलमानो के शासन में रहा है। हिंदू जिनकी भाषा हि दी कही जाती यी अधिवात जीविकोपाजन को दष्टि से अरबी फारसी पढते थे। इसलिए गासन के प्रभाव के कारण हिन्दी में उदू-फारसी के शब्द एक बहुत बड़ी संख्या में प्रयुक्त हुए । सहर सर दो नौ पयमाल वेवा जो सामा, (छाया) तथा जामा बगलबदी पायजामा रूमाल तक्यिा विस्तर मिसरी शकर पायजेब बाजूयद क्सिमिस पिस्ता बादाम अनार जलेबी अचार तस्तरी चमचा प्रत्यादि कितने ही फारसी के गब्द हिन्दी भाषा में पाए जाते हैं । इसी प्रकार हलाल मालिक रहू वारिस तरीका हरक्त आब स्वार सुल्तान इत्यादि अरबी के शल तथा गलीचा चाकू तमगा दरागा बहादर लाग वेगम ची मोगात इत्यादि कितने ही तुर्की - भी हिंदी में प्रयक्त होते रहते है । अग्रजो के शासन के प्रभाव के कारण अगस्त अप्रल अस्पताल अपील अफ्सर इपेकर इजीनियर इनकम- टक्स खूल, एजेट ऐजेसी कांग्रम गिलास गेट गाड टीन तारवाल टोटल | ७७ भाषा तया हिंदी भाषा का विकास ] डियुटी, दजन, नम्बर पलटन पम्प, पचर, रटन, बटन बकस, लही समन, सतरी रान, माति कितने ही अग्रेजी र हिन्दी में बहुलता म प्रचलन प्राप्त किये हुए हैं । हिन्दी में पुतगाली गना का भी अभाव नहीं है, यथा अलमारी, आलपीन, कमीज, यमरा, गमला गारद, गोदाम, तम्बाक तौलिया परात पिस्तोल, पोपा, फीता मज वातल आदि। भारत अपना विशालता के कारण अन प्रदेश में विभक्त है । प्राय, प्रत्यक प्रदेश अपनी भाषागत विगपता भा रखता है। हिनी अपनी सहज उदारता के कारण विभिन्न प्रादेशिक भाषाओ के गो का स्वीवार परक गतिमान है । हडतार (गुज राती) चौथ, पटेल देशमुख, (मराठी) गमछा, रसगुल्ला कविराज (बगला) हाही (कालमापा) लुगी (तिब्बती वर्मो) आदि गल इस तथ्य के प्रमाण हैं। इस प्रकार स्पष्ट है कि हिन्दी में विभिन्न भायात्रा करने का प्रयोर पाया जाता है । यह एक ऐसी मापा है जिसम दूसरी भाषा 21 को मात्मसात कर लेने की पूर्ण क्षमता है । मस्कृतनिष्ठ शब्दों का प्रयाग इस मापा का विशेषता है। । उदू हितो का ही एक दूमरा प है। इसका प्रयोग उत्तर भारत के प्राय समस्त शिभित मुसलमान नया व व्यक्ति जा मुसलमानों के सम्पक म रहे हैं यया पजाबी और का पोरी आदि परत हैं। प्रारम्भ म उदू नाम का अप साही पडाव लिमा जाना था। उसका प्रयोग किला के अधम भी हुआ है । ऐसा अनुमान किया जाता है कि उदू गज भारलवप म बावर क समय म आया और तभी में दिल्ली का राजभवन "उनए मुअल्ला के नाम से जाना जान लगा । उदू ए-मुअल्ला का अय हाता है महान शिविर | इस दरबार म जिस मिश्रित भाषा का प्रयाग होना या उसे 'जवाने उ कहा जाता था। कालान्तर म कवल उदू रह गया।' उद की उत्पत्ति के मध्य में स्वर्गीय चदवली पाइप ने उदु के रहस्य' उका उदगम और उदू का जवान आदि पुस्तका म विजय रूप से विचार रिया है । उहान इस विषय में अपना पुस्तक 'भाषा का प्रन' म दरिया ताफत का एक The word Urdu in the sease of royal camp came in to ladia probably with Babar and the royal residence at Delhi was styled Urdu Mualla the sublime cing The mixed language which grew up in the court and camp was called Zabao 1 urdus The camp language and heace behave eliptically urdu -Hobson Jobson Page 488 ७८ ] [ सत-साहित्य खुशबयान लोगा महत्वपूण उद्धरण देते हुए स्पष्ट क्यिा है कि-' गाहजहानबाद ने एक्मत होकर अय अनेक भाषाओ से दिलचस्प शब्द को जुदा किया और कुछ स दो तथा वाक्यो मे हेर फेर करके दूसरी भाषाओ स भिन्न एक अलग नई भाषा ईजाद की और उसका नाम उदू रख दिया । व्याकरणिक रूपो के विचार से हिन्दी और उर्दू म अधिकागत साम्य प्रतीत होता है । हिन्दी भाषा में भारतीय संस्कृति और सभ्यता का स्पष्ट प्रभाव परिलक्षित होता है कि तु उर्दू की यह विशषता है कि यद्यपि वह भारत में उत्पन हुई पर उस प्रेरणा ईरान और अरब से प्राप्त होती है । बाहर से आन वाले इस्लाम धर्माव- लम्बियो ने भारतीय लोगो से भावो का आदान प्रदान करन के लिए यह आवश्यक समझा कि यहाँ की भाषा को सीखा जाय । अस्तु कद्र स्थान दिल्ली तथा उस आसपास की भाषाओ को (लिपि का नही) उहोंने सीखा और उसका यवहार करना भी प्रारम्भ कर दिया । इस प्रयास मे वे अपनी मूल भाषा के शब्दो का सम प्रत हटा न सके और कनाचित ऐसा सम्भव भी न था। उनके द्वारा उनकी अपनी ही लिपि मे भाषा का जो मिलाजुला रूप बना वही उदु के नाम से जाना गया । प्रारम्भ म यह उदू भाषा उत्तरी भारत के पढ लिखे मुसलमानों की भाषा बनी और धीरे-धीरे शासकीय प्रभाव के कारण टस भाषा का जन जीवन म भी प्रवाहा गया । उदू के सबध म एक मत ता यह है कि उस पर दिल्ली की खडी बोली का प्रभाव अधिक है । दूसरा मत यह है कि दिल्ली म आने पर मुसलमान शासक इसे अपने साथ ही लाये थे । खडी बोली क प्रभाव से इसम बाद में कुछ परिवतन अवश्य हुए किन्तु इसका मूलाधार पजाबी को मानना चाहिए खडी बोली को नहीं । इस सबध मे अग्रज विद्वान ग्राहमवेली महोदय का सब से बडा तक यह है कि दिल्ली को शासन के द्र बनाने के पूर्व एक हजार से बारह सौ ईस्वी (लगभग दो सौ वर्ष) तक मुसलमान पजाब म रहे । उस समय वहा की जनता से सपक म आने के लिए उहोंने कोई न कोई भाषा अवश्य सीखी होगी और यह भाषा तत्कालीन पजाबी ही हो सकती है। यहां पर उदू के प्रश्न को लेकर हम नही उलगना है और यह प्रश्न इस स्थल पर अप्रासगिक भी होगा । हा इतना जान लेना आवश्यक है कि उदू का व्याकरण अरबी-सांचे पर ढला है । यद्यपि भाषा के प्रमुस आधार क्रियापद सवनाम एव कारक चिह्न सव के सब हि दी के ही हैं । उदू भाषा जो उत्तर भारत म हिन्दी तथा रेख्ता नाम से जानी जाती थी दक्षिण प्रदेश में जाकर दक्षिणी (दक्खिनी) नाम से प्रचलित हुई । यहाँ पर हिन्दी का किंचितमात्र भी प्रचार न होने के कारण इसमे १ धीरेन्द वर्मा-हिंदी भाषा का इतिहास पृष्ठ ६२ ।
माषा तया हिंदी भाषा का विकास ] फारसी के गाने का अधिकाधिक प्रयोग हुआ । उर्दू लेखको ने भारत की मुरम्य वसुघरा में रहते हुए भी प्रेरणा फारसी साहित्य से ही ली। उनकी उपमान-योजना समग्रत फारमी थलो पर ही सगठित हुई । उदू साहित्य के लेखको न उतरोत्तर हिन्दी पदा एव मुहावरो का सप्रयास बहिष्कार करना प्रारम्भ कर लिया। पलत समस्त पारिभाषिक जावली अरबी की आ गई । भाषा सस्कृति को पोपिका हाती है । भारत भूमि म ही जब इस प्रकार हिदी-सस्कृत से घणा और मरवी फारसी से अत्यधिक प्रेम बढा तब हिली और उर्दू की गति दो विभिन्न दिशाओं की भोर हो जाना स्वाभाविक या ! इस भाषा विभेद ने सम्प्रदायगत क्रटरता को विशेष प्रश्रय दिपा । सत-साहित्य में इसके स्पष्ट प्रमाण प्राप्त होते हैं। हिदुस्तानी उर्दू भाषा की ही भांति हिन्दुस्तानी की उत्पत्ति के सम्बन्ध मे भी मरक्य नही है। विभिन्न विचारला ने अपने-अपने दष्टिकोण से इस विषय पर विचार किया है । हिंदुस्तानी शन को बाबरकालीन बताया जाता है और इसकी पुष्टि उसके जीवन-सम्बधी मस्मरणो का उल्लेख किया जाता है जिमम उसने दौलतसा लोदी से बात करत समय हि दुस्तानी शव का प्रयोग किया था। - सन १६१६ में श्री शाम कोरियट ने हिदुस्तानी को गवारी भाषा के रूप में स्मा दिया है । सन १८८६ में हिंदुस्तानी के सबंध म यह मत प्रकट किया गया कि यह उतरी एव दक्षिणी भारत के मुसलमानो की भाषा है । भागरा एव दिल्ली के समीपवर्ती स्थानाम बोली जाने वाला हिन्दी फारसी तथा अन्य विदेशी गनों के योग से इसका विकास हुमा है । इस भाषा का दूसरा नाम उदू मुसलमानी राज्य म यह भाषा अन्तप्रान्तीय भाषा के रूप मे व्यवहत होती थी।" I bave made him sit down before me 300 desired a mad who understood the Hindustans language to explam to him what I said scatenca by sentence in order to reassure bita -Memoirs of Babar Lucas kings edition, Vol 2 PP 170 Hobson Jobson Page 317 But in fact the languare of Mohammedans of Upper Indra Bod cventually of the Mohammedans of the ecans developed out of the Hindi dislest of the Doab chiefly and of the terntory round Agra and Delhs with a mixture of Persian Vocables and . allguage us for a long time a kind of Mohammedan ling va franca over all lodia (Hobson Jobson PP 317) ८०] । सत-साहित्य प्रियसन का मत है कि यारुपीय प्रभाव के कारण हि दुस्तानी शब का निर्माण हुआ था । ' उसका यह भी क्थन है कि वे लोग हिदुस्तान की भाषा का ही हिन्दस्तानी मानते थे । इतना ही नहीं ग्रियसन महाशय हि दो का हिदुस्तानी शरी विशेष के रूप मे मानते हैं। उनका यह भी क्यन है कि हि दुस्तानी का प्राचीन तम स्वरूप उदू 'या रेख्ता में उपल ध होता है । उहोन हि दस्तानी को याख्या करते हुए लिखा है कि हि दुस्तानी भाषा गगा के उपरी दोआब की भाषा है । लिपि की दष्टि सापारसी और दिवनागरी दाना लिपियो में इसका प्रयोग हो सकता है । वे उर्दू कोहि दुस्तानी की ही एक एसी शली मानते हैं जिसम फारसी शो की प्रचरता रहती हैं और। इसके लिए केवल फारसी लिपि का ही प्रयागाहोता हैं । इसी आधार पर वे हिदी को हिदस्तानी को एक एसी ली मात्र मानते हैं जा देवनागरी लिपि म लिखी जाती है और जिसम सस्कृत ग दो का बहुत बड़ी संख्या में प्रयोग होता है। : डा धीरेन्द्र वर्मा मा मत है कि उत्पत्ति की दृष्टि स आधुनिक साहित्यिक हिन्दी ,तथा उदू के समान ही इसका, आधार भी खडी वाली है । एक तरह से यह, हिदी उदू की अपेक्षा खडी वाली के अधिक निकट है क्योकि यह पारसी मस्कूति के अस्वाभाविक प्रभाव से बहुत मुक्त है । स्वर्गीय च द्रवली पाण्डय ने अपनी पुस्तक काबवेब आफ हि दुस्तानी म हिंदुस्तानी भाषा के विकास और उसके मूलभूत कारणो पर गभीरतापूर्वक विवेचन क्यिा है । उनका स्पष्ट मत है कि हित्दुस्तानी का अर्थ है उदू । अपने मत के समथन म वे उडीसा के भूतपूर्व गवनर । मासफ्मली का यह मत उद्ध त करते है कि उदू हि टी नहीं है हिदुस्तानी शर सरल सदू के पर्याय के रूप म ही प्रयुक्त होता है ।। हिंदुस्तानी 17 हि दस्तान की भाषा के लिए भले ही प्रारम्भ म प्रयुक्त हुआ हो पर राजनीतिक परिस्थितियो क कारण उनीसवी गता दी तक थात अते । - । -- - 1 The word Hindustanı was coined under European influenco and means the language of Hindustan ---Linguistic Survey Vol IX Part I P 43 2 Linguistic survey of India Vol IX Part 1 Page 47 धीर र वर्मा-हिन्दी भाषा का विकास पृ० ६३ । 4, Indeed the general use of the term Hindustani is synonym for Urdu and a part from philology it has always used for it Cobweb of H odustant Page 5 5 It is sufficient for our purpose to know that Urdy is not Hindi and the word Hindustani is being used now a-days only synonym for simplified Urdu -National language for India Page 159 भाषा तथा हि वो भाषा का विकास ] यह शर उदू के समकक्ष माने जाने लगा। भाषा क्षत्र मे राजनतिक उद्दश्य भी प्रवेश पा गये । हिदू और मुसलमानो को निरन्तर अलग बनाये रखने की भावना से भी कदाचित् हि दुम्तानी उदू का विशेष प्रश्रय दिया गया । भारतीय राष्टीय कांग्रेस ने भी महात्मा गांधी के नेतत्व म साम्प्रदायिक विद्वेष को दूर करने के उद्दे य से हिस्तानी भाषा का एक ऐसा रूप सामने रखना चाहा जो हिदुओ और मुसल मानो दाना का समान रूप से स्वीकार हा सके। िदुस्तानो प्रश्न को लेकर दश क राजनतिक वातावरण में बहुत समय तक भाषा-आदोलन चरता रहा । दोना ओर से पन विपक्ष में अनेकानेक सबल प्रमाण एव तक उपस्थित किए गए पर भाषा के स्वरूप का निणय अथवा उसका प्रसार प्रस्तावा तों आदि से नही हाता है। भाषा की प्रकृति अपनी पूण स्वतत्र प्रकृति होती है । इतने वर्षों पश्चात आज यह स्पष्ट हो गया है कि हिदी उदू और हिदुस्तानी त'नो अलग-अलग हैं, यद्यपि उदू और हि दस्तानी मे बहुत कुछ साम्य है। हिदुस्तानी एक प्रकार स भाषा क्षेत्र में एक राजनीतिक आंदोलन ही था जो अब प्राय समाप्त सा है ।
२० सत-साहित्य की पारिभाषिक शब्दावली प्रतीकात्मक शब्द मानव अपनी अनुभूतियो की अधिकाधिक विपद अभि यक्ति चाहता है कि तु जब ईप्सित भाव सोध सादे ढग से सम्यक रूपेण नही व्यक्त हो पाता है तब वह प्रतीको का सहारा लेना है । प्रतीक का गाभिक अथ है चिह्न । साहित्य म अधिकाश प्रताद दस्य जगत स ही सम्बधित हाते हैं । इसका कारण यह है कि प्रकृति के विभिन्न उपादानो एव स्वम्पो के साथ नायक परिचय के कारण हमारा रागात्मक सम्बध स्थापित हो जाना है । यह सम्बध जब तक हृदयस्थ रहता है तब तक इसकी अमूर्तावस्था रहती है कि तु जब हम प्रकृति के पदार्थो का प्रयाग अपनी भावाभिव्यक्ति के साथ करत है तब उस रागात्मक सम्बध का माना मूर्तीकरण हो जाता है । यथा सुमना का सौरभ तान देख कर हमार हृदय म एक प्रकार का विशिष्ट मानन्दाल्लास उत्पन होता है । सस्कारवतात इस क्रिया के प्रति हमारा हृदयस्थ राग त मयत्व प्राप्त कर लेता है । यह त मयता उस समय और भी अधिक सजग हो उठती है जब हम किसी उदार वत्ति का चित्रण करते हैं और उदारता त्याग आदि सरवृत्तिया का प्रभावोत्पादक चित्रण करन के लिए मुरभि-दान म लीन सुमनो को प्रतीक रूप म उपस्थित करत हैं । गूढानिगूट भावों को यजना प्रतीक के माध्यम से महज और सुस्पष्ट हो जाती है । जब हम प्रम घणा क्रोध आदि मनोभावात्मक शब्द का प्रयोग करते हैं अथवा सुख-दुख कष्ट पोहा आदि का अनुभवात्मक विवरण देत हैं तब हम केवल अपनी मनोटमा का सवेनात्मक परिचय दे पाते हैं। मनुष्य की वखरी वाणी केवल वखरी है भौतिक हाने के कारण सीमित सामय्यवाली है । अतएव उसमे सम्पूण अनुभूति को व्यक्त करन को शक्ति न कभी थी और न आज है । हमारी क्रोध की भावना स्वामी मित्र स्त्री पुत्र और गत्रु मभी के प्रति ययावसर व्यक्त होती है 1 सत-साहित्य को पारिमाषिक शब्दावला 3 पर मबक प्रति समान काम नहीं हाता है । वाणी में इतनी क्षमता नहीं है कि वह क्रोध के इस अन्तर का यत्त कर स ! स्वय स्त्री और पुत्र सम्व घी यणा म कितना अन्तर हो सकता है उसका गला भाग भी घणा ल स व्यक्त नहीं हो पाता है। भोजन के कप्ट, निवास ट और वस्त्र के छ म अन्तर सम है। परन्तु क्वल कष्ट द्वारा इन तीना ट का पयाय बाध नही हा सकता है । वाणी को इमी अममता के कारण अनादिकार म विप अनुभूति का अधिक स्पष्ट करन के लिए तरसदृा भनुभूतियो का स्पष्ट वणन करने का प्रया चली आ रही है। या.- स्मान् प्टिय वद्विष्मस्त वा जम्भे दध्म जिसक साय हमदप वर या जा हमारे साथ कैप करे उसका हमाटो म रम्बत हैं। जम्भ दम गजमाव का परिचायक है जिसम अपने देष्टा को इस प्रकार चबा जान का भारना उदित हानी है जिस प्रकार मुह में रख कर कौर चबा डाला जाता है । किसा रार का इस प्रकार चवाया नहीं जा सकता । उसकी गर्दन काट दी जा सकती है बाटी-बा अलग की जा सकती है, परन्तु एतना पहन पर भी पोप की वह तीक्ष्णता व्यक्त न होती जो 'चया जाना बढे सयक्त हाती है । इमा प्रकार एक दूसरा प्रयाग लीजिए पत्थर पसीजना । इम क्थन में तात्पय विमी गिलास पानी पानी हान में नही है । पत्थर का तात्पम कठोर हृदय और पसाजना का तात्पय द्रवित हाना है। वक्ता का मुख्य उद्देश्य हाता है विषप का बाध कराना । सक लिए वह अप्रस्तुत योजना अथवा अयोक्ति-विधान का सहारा लला है। टिपच म विचरण करन पाले म्प चित्रों का जाय ता इस प्रकार घर जाता है पर जिनकी विद भावात्मक सत्ता होती है उनका अनुभूति कराना एक वही जटिल समस्या होता है। ऐसी स्थिति म सावनिकता का ही आश्रय लना पड़ता है । सक्तम्प में उपस्थित की गई वस्तु के सम्बप में यह आवश्यक है कि वह मूर भाव र साम्प स्थापित कर और साथ ही रोक जीवन में भी सम्बद्ध हरदम प्रकार साकतिक स्वरूप पूर पा प्रतिनिधित्व करता है। प्रतीक विधान करिए यह आवश्यक है कि जो भी प्रतीक प्रयुक्त हो । कालानुरूप हर दागे का अपना स्वता जीवन होता है। उनकी श्वाम प्र वाम म कभी ता इतनी क्षमता मा जाती है कि वे सहपों वप पयत भी अपनी गति नही क्षीण हान देत और सनात कायगोर बन रहत पर कतिपय र वृह ममप तक चल र इतिहास को सम्पत्ति बन जात हैं । वुछ एसी भी होते हैं जा कार के आदतों को विदीप करके पुन अपना वभव पनि रन सपत हैं । इसीलिए प्रतोय रूप में आए हुए का भाषा में प्रचस्तिस्प के अनुरूप हाने स अप वाध रान में सरलया होती है। प्रनीकार अपन अपन स्वतत्र पत्र भी होत है। एक हो प्रतीक मिन भिम न्यानो म भिन्न भिन्न अप व्यक्त करता है । साहरणाय भारत में धूप जीवन-यापी पर अपवा शेशाता है। गात प्रधान देशों म यही धूप मुन ६४ ] [ सत साहित्य प्रतीक है । भौगोलिक परिस्थितियां ही एम अथ ग्रहण से लिए और उल्लस उत्तरदायी है। साधारणत प्रतीको की एक परम्परा होती है जिनके द्वारा भावाभियक्ति म एक स्वाभाविक गुण आ जाता है । उदाहरणाथ उपा सुख और सध्या दुख के प्रतीक रूप म सुदीघकाल से प्रयुक्त होती आ रही है। भारतीय साहित्य में ही नहीं, अपितु दूमरी भापा के साहित्य में भी ये दोनो ही उपा और सध्या जीवन सबधी तथ्यो का दिग्दशन कराने के लिए प्रयुक्त हुए है । देशगत एव परपरानुगत प्रतीको के अतिरिक्त युगगत प्रतीक भी होते हैं । छायावाद रहस्यवाद से प्रभावित का यधारा क अ तगत मधुमास और पतझड का प्रयाग मा सुख और दुख के दिए होता है । कतिपय प्रतीक व्यक्ति की रुचि विरोप का परिचय कराने वाले होते हैं । कवि परम्परा म टूटने या नष्ट होने के लिए मोम का पिघलना पखही का झडना सी का टूक टूक हाना प्रयुक्त होता था किन्तु अब प्रगतिवादियो न प्रगति विशेष का परिचय कराने के लिए भने हुए पापड का टूटना 'उपयुक्त समया । वयक्तिक्ता की दष्टि से साहित्य-जगत में कबीर की प्रतीक योजना विशष महत्व रखती है। इसका विवेचन हम इसी प्रसग में आगे करेंग। माहित्य मे प्रतीक विधान की एक सामाय परम्परा सुदूर अतीतकाल से चली मा रही है। ऊपर हम वेट का उदाहरण दे आए हैं । उपनिषदा म अनेक गाथायें पूणत प्रतीक पर आश्रित हैं । योग-वासिष्ठ से समस्त उपाख्यान प्रतीकात्मक हैं। श्रीमदभागवत का भक्ति सम्बधी आख्यान विशुद्ध रूप से प्रतीकात्मक ही है । वच यान सम्प्रदाय की साधनापति की अधिकार अभियक्तियां प्रतीको के माध्यम से हुई हैं । अन्यत्र भी धर्मोपदेश के लिए लिखे गए आख्यान प्रतीकात्मक हो हैं । सूफी साधको ने भी अपनी अध्यात्मपरक अभिव्यक्तिया में प्रतीक्षा का आश्रय लिया है । उदाहरणाण- नवी खड नव पौरो ओ तह वज्र किवार। चारि बसेरे सों घढ सत सा उतरे पार ।। -'जायसो। ये चार बसेरे सूफी सम्प्रदाय के अन्तगत चार पडाव हैं,- १ मरे सपने टूट गए जसे भुना हुआ पापड २ इन चार पडावो के सम्बध म साधना की दष्टि से विभिन विद्वानों ने विभिन्न प्रकार से नामकरण किए हैं । कहीं-कहीं पर इमम क्रम विपरीतता भी है- सन्त साहित्य की पारिमापिक पदावली ] १-गरीअत २-नरीक्त, ३-मारिफ्न ४-हकीरत । भाल म ही नही अपितु अयाय देशो म भी प्रतीर का महत्वपूर्ण स्थान है। प्रास और वेलजियम म तो उन्नीसवीं शताब्दि म यथायवाद व प्रति विद्राहा त्मक भावनाओं का प्रचार हुआ और प्रतीक विघास को साहित्य एव सगोत म विगि प्ट स्थान प्राप्त हुआ। सन् १८८६ म पिगारा नामक पत्र में प्रतीक्वाद एक सम्प्रदाय विप के रूप म स्वीकृत हुआ। इस मम्प्रदाय के लखक प्रतीको द्वारा अपनी विमिन मानसिक स्थितिया को व्यक्त किया करते थे। उस समय प्रतीक्वाद का मान्दोरन चित्रकला और संगीत म प्रभाववाद साप साप और उपचवन के दान क साथ-साथ उन्नासवी ताबि के अन्तिम भाग बादवाद स मिर कर उस रोमाटिसिज्म' की एक वासा बन गया जिसके साथ वह निवाघ पस सबद्ध है। आगे चल कर प्रतीक्वाली दो दला में विभक्त हो गया । एक न चलें का अनुगमन किया और दूसर न मार्मे का । दरें व अनुयायुयों न प्रतीक विधान में दूसर दल को अपक्षा सातिर अप की सरलता एवं स्पारता का विचार अधिक किया है। दा-विदेश का बात तो दूर रही । जीवन सामrय व्यवहारा म भी प्रती कारमता महत्व को देखा जा सकता है । साधारणत हम अपन घर को सजा कर रखते हैं। पर जब हम किसी अतिथि के आने पर अपने घर में कान-कोने को साफ (अ) भाचाय रामचन्द्र गुक्र - () नाचाय बद्रवली पाय- १-गरीमत बमकाह, २-तरीकत -उपासनाकाड, ३-हकीकत - नानवह ४-मारिफत-सिद्धावस्था । १-गरीबत बमबाड, २-नरोक्त -उपासनाकाह ३-मारिपत- जानकाह, ४-हकीक्त माननिष्ठ। - - (३) आचाय पुशीराम शर्मा- १-गरीमन जाना २ वरोरता ३-मारिपत- उपासनाशाह, ४-हकीक तथ्यप्राप्ति। वार-ए हिशनरी आफ इगलिश रिटेचर, पृष्ठ-२१६ । २ सीताराम चतुर्वेदी ममोपात्र पृष्ठ-१२७३ ।
८४] [ सत-साहित्य प्रतीक है । भौगोलिक परिस्थितियां ही इस अथ ग्रहण से लिए और उललस उत्तरदायी हैं। साधारणत प्रतीको की एक परम्परा होती है जिनके द्वारा भावाभिव्यक्ति म एक स्वाभाविक गुण आ जाता है । उदाहरणाथ उपा सुख और सध्या दुख के प्रतीक रूप म सुदीवकाल से प्रयुक्त होती जा रही है। भारतीय साहित्य म ही नहीं, अपितु दूसरी भाषामा के साहित्य म भी ये दोनो ही उपा और स या जीवन-सब घी तथ्यो का दिग्गन कराने के लिए प्रयुक्त हुए हैं । देशगत एव परपरानुगत प्रतीको के अतिरिक्त युगगत प्रतीक भी होते हैं । छायावाद रहस्यवाद से प्रभावित का यधारा के अतगत मधुमास और पतझड का प्रयोग प्रमश सुख और दुख के लिए होता है । कतिपय प्रतीक व्यक्ति की रुचि विगेप का परिचय कराने वाले होते हैं । कवि परम्परा म टूटने या नष्ट होने के लिए मोम का पिघलना पखडी का झडना शीश का टूक टूक हाना प्रयुक्त होता था किन्तु अब प्रगतिवादियो ने प्राति विशेष का परिचय कराने के लिए भुने हुए पापड का टूटना ' उपयुक्त समझा । वयक्तिकता को दष्टि से साहित्य-जगत में कबीर की प्रतीक योजना विशेष महत्व रखती है। इसका विवेचन हम इसी प्रसग म मागे करेंगे। - साहित्य में प्रतीक विधान की एक सामाय परम्परा सुदूर अतीतकाल से चली पा रही है । ऊपर हम वेद का उदाहरण दे आए हैं । उपनिपदो में अनेक गाथायें पूणत प्रतीक पर आश्रित हैं । योग-वासिष्ठ से समस्त उपाख्यान प्रतीकात्मक हैं। श्रीमदभागवत का भक्ति सम्बधी आख्यान विशुद्ध रूप से प्रतीकात्मक ही है । वज यान सम्प्रदाय की साधनापद्धति की अधिकारी अभियक्तियां प्रतीको के माध्यम से हुई हैं। अन्यत्र भी धर्मोपदेश के लिए लिखे गए आख्यान प्रतीकात्मक हो हैं । सूफी साधका ने भी अपनी अध्यात्मपरक अभिव्यक्तियो म प्रतीका का आनय लिया है। उदाहरणाण- नवो खड नव पौरी औ तह बन किवार । चारि बसेरे सों चढ़े, सत सों उतरे पार ॥ -'जायसी । ये चार बसेरे सूफी सम्प्रदाय के अन्तगत चार पडाव हैं - १ मेर सपने टूट गए जसे भुना हुआ पापड २ ग्न चार पडावो के सम्बघ म साधना की दष्टि से विभिन विद्वानो ने विभिन्न प्रकार से नामकरण किए हैं । कहीं कही पर इनम म विपरीतता भी है- सन्त साहित्य को पारिमाषिक शब्दावली ] [ ५५ १-शरीअत, २-नरोकत, ३-मारिफत ४-हकोक्त। भारत में ही नहीं अपितु अयाय देशो म भी प्रतीक का महत्वपूर्ण स्थान है। फ्रास और चलजियम में तो उनीसवी ताकि म यथाथवा के प्रति विद्रोहा स्मक भावनाओ का प्रचार हुआ और प्रतीक विधाम को साहित्य एव सगीत म विगि ष्ट स्थान प्राप्त हुआ। सन १८८६ म फ्गिारा नाम पत्र में प्रतीकवाद एक सम्प्रदाय विशेष के रूप मे म्बीकृत हुआ । इस सम्प्रदाय के लेखक प्रताका द्वारा अपनी विभित मानसिक स्थितियों को व्यक्त क्यिा करते थे। उस समय प्रताकवाद का "आदारन चित्रकला और संगीत मे प्रभाववाद के साप साप और उपचेतन के दान के साथ-साथ उन्नीसवी शतानि के अन्तिम भाग के आदर्शवाद से मिलकर उम रोमानिमिज्म' को एक साता बन गया, जिसके साथ वह निर्वाध रूप से सबद्ध है। आगे चल कर प्रतीववादी दादला में विभक्त हर गये। एक न बर्ले का अनुगमन किया और दूसरे ने मला का । मर्ले अनुयायुया न प्रताप विधान में दूसरे दल की अपेक्षा सावेतिक अथ की सरलता एव स्पष्टता का विचार अधिक किया है। देश-विदश का बात तो दूर रही । जीवन में सामान्य व्यवहारों म भी प्रती कात्मक्ता के महत्व को देखा जा सकता है । साधारणत हम अपन घर को सजा पर रखते हैं । पर जब हम क्मिी मतियि के आने पर अपने घर के काने कोने को साफ (अ) आचाय रामचन्द्र शुक्र- - १-गरीमत. कमबाट २-तरीकत उपासनाकाड, ३-हकीकत जानकांड ४-मारिफ्त-सिद्धावस्था । १-गरीमत-मबाड, २-तरीक्त -उपासनाकाडा ३-मारिफत- ज्ञानराड, ज्ञाननिष्ठ। (अ) आचाय च द्रवली पाडय--- । (६) आचार्य मुशीराम शर्मा- १-गरात ज्ञानरांड, २-तरीक्त ३-मारिफ्त-उपासनाकाड, -तय्यप्राप्ति। वार ए डिक्शनरी आफ इगलिश लिदेपर पृष्ठ-२१६ । २ सीताराम चतुर्वेदी समीक्षा शास्त्र, पृष्ठ-१२७३ ।
५४ ] [ सत साहित्य प्रतीक है । भौगोलिक परिस्थितियां ही इस अथ ग्रहण से लिए और उरलस उत्तरदायी हैं। साधारणत प्रतीको की एक परम्परा होती है जिनके द्वारा भावाभियक्ति म एक स्वाभाविक गुण आ जाता है । उदाहरणाथ उपा सुम्ब और सध्या दुख के प्रतीक रूप म सुदीवकाल से प्रयुक्त हाती आ रही है। भारतीय साहित्य मे ही नहीं, अपितु दूसरी भाषामो के साहि य मे भी ये दोनो ही उपा और सध्या जीवन-मब बी तथ्यो का निग्दशन कराने के लिए प्रयुक्त हुए हैं। देशगत एव परपरानुगत प्रतीका के अतिरिक्त युगगत प्रतीक भी होते हैं । छायावाद रहस्यवार से प्रभावित का यधारा क अ तगत मधुमास और 'पतयड का प्रयोग प्रमश सुख और दुख के लिए होता है । कतिपय प्रतीक व्यक्ति की रुचि विशेप का परिचय कराने वारे होत हैं । कवि परम्परा में टूटने या नष्ट होने के लिए मोम का पिघलना पखही का झडना शीश का टून टूक होना प्रयुक्त होता था किन्तु अब प्रगतिवादियो ने प्रगति विशेष का परिचय कराने के लिए 'भुने हुए पापड का टूटना 'उपयुक्त समझा । वयक्तिकता की दष्टि से साहित्य-जगत में कबीर की प्रतीक योजना विशेष महत्व रखती है। इसका विवेचन हम इसी प्रसग म आगे करेंगे। साहित्य म प्रतीक विधान की एक सामाय परम्परा सुदूर अतीतकाल से चली था रही है । ऊपर हम वेद का उदाहरण दे आए 1 उपनिषदो म अनेक गाथायें पूणत प्रतीक पर आश्रित हैं । योग-वासिष्ठ स समस्त उपाख्यान प्रतीकात्मक हैं । श्रीमदभागवत का भक्ति सम्बधी आख्यान विशुद्ध रूप स प्रतीकात्मक ही है । वन यान सम्प्रदाय की साधनापद्धति की अधिकाश अभियक्तियां प्रतीका के माध्यम से हुई हैं । अया भी धर्मोपदेश के लिए लिखे गए आख्यान प्रतीकात्मक हो हैं । मूपी साधकों ने भी अपनी अध्यात्मपरक अभिव्यक्तिया म प्रतीका का आ गय लिया है। उदाहरणाण- नवौ खड नव पोरी ओ तह वन क्विार। चारि बसेरे सा चढ, सत सों उतरे पार ॥ जायसी। ये चार बसेरे सूफी सम्प्रदाय के अन्तगत चार पडाव हैं, 2- १ मर सपन टूट गए जसे भुना हुआ पापड' २ इन चार पडावो के सम्बषम साधना की दष्टि से विभिन विद्वानो ने विभिन्न प्रकार से नामकरण किए हैं। कहीं कही पर इनम क्रम विपरीतता भी है- सत साहित्य को पारिभाषिक शब्दावली } { ८५ १-शरीअत, २-तरीकन, ३-मारिफत, ४-हकीकत । भारत म ही नहीं, अपितु अयाय देशा म मा प्रतीक का महत्वपूर्ण स्थान है। पास और वेलजियम म तो उन्नीसवां शतान्दि में यथाथवाद के प्रति विद्रोहा स्मक भावना का प्रचार हुआ और प्रतीक विघास को साहित्य एव संगीत में विगि घट स्थान प्राप्त हुमा । सन १९८६ म फिगारो नामक पत्र म प्रतीकवाद एर सम्प्रदाय विशेष के रूप म स्वीकृत हुआ । इम सम्प्रदाय क लेखक प्रतीकों द्वारा अपनी विभिन मानसिक स्थितिया का व्यक्त किया करते थे। उस समय प्रतीकवाद का 'आन्दोलन चिनला और सगीत म प्रभाववाद के साथ साथ और उपचेवन के दान के साथ साथ उन्नीसवी शतानि के अतिम भाग के आदर्शवाद से मिलकर उस रोमाटिसिज्म की एक शाखा बन गया जिसके साथ वह निर्वाध रूप से सबद्ध है। आगे चल कर प्रतीकवादी दा दलोम विभक्त हो गये । एक न बले का अनुगमन किया और दूसरे नै मलाम का । बलें में अनुयायुयो ने प्रतीक विधान मे दूसरे दल की अपक्षा साकेतिक अथ को सरलता एव स्पष्टता का विचार अधिक किया है। देश-विदेश की बात सा दूर रही । जीवन सामाय व्यवहार में भी प्रती कात्मता के महत्व को देखा जा सकता है । साधारणत हम अपन घर को सजा कर रसते हैं । पर जब हम किसी अतिथि के आन पर अपने घर के कोन कोन को साफ - (4) आचाय रामचन्द्र शुक्ल- १-शरीअत समकाडा २-तरीकत उपासनाकाड, ३-हकीकत - ज्ञानकोड । ४-मारिफत-सिमावस्था । (अ) आवाय पदवली पांडय- १-रोमत-कमकाड २-तरीक्त --उपासनाकाह, ३-मारिफत-शानबाट ४-कोक्त - ज्ञाननिष्ठ । 2 M नानपांड . (इ) आचार्य मुशीराम शर्मा- १-गरीमत २-तरीत -पमकार ३-मारिपत-उपासनाकांड ४-हमीक - तथ्यमाप्ति। बार ए डिक्शनरी आफ इगलिग लिटघर, पृष्ठ-२१६ । २ सोताराम चतुर्वेदी-समीक्षा शास्त्र, पृष्ठ-१२७३ । १ ९६ ] [ सत-साहित्य करके उसकी साज-सज्जा पर विशेष ध्यान देते है उसे नाना प्रकार क पक्वान एव सुस्वादु फल भोजन के लिए देते है सुवासित शीतल जल से उसकी तथा शान्त करते है तथा सुकोमल तल्प पर उसे शयन कराते हैं तब एक ओर अपन अतिथि को सुविधा का ध्यान तो रहता ही है साथ ही ये सब क्रियायें इस बात की भी परिचायिका बनती हैं कि हम अपन अतिथि का इस भांति से सम्मान करने की क्षमता रखत हैं । इसी प्रकार जब काई यक्ति प्रतिवप नए मॉडल की कार खरीदता है तब उसका यह अथ नहीं है कि नयी कार कुछ अधिक उपयोगी है । उससे ध्वनित यही होता है कि प्रतिवप नई कार लेने की उसम भमता है । जीवन मे एस क्तिन ही काय होते हैं जो वस्तुरूप मे उतना महत्व नहीं रखते जितना भावरूप में । - प्रतीक विधान की क्रिया व्यवहार जगत की अपेक्षा माव जगत मे अधिक देखी जाती है । इसी स साहित्यजगत में प्रतीको का अत्यधिक महत्व स्वीकार किया गया है विशेषरूप स धार्मिक साहित्य मे । यहाँ आध्यात्मिक अनुभूति को अभिव्यक्ति का प्रश्न रहता है । आध्यात्मिक अनुभूति सीधी सादी भाषा के माध्यम से नही "यक्त की जा सकती है। उसके लिए तो यद्यपि साई जाने जा पाव की बात है तदपि कहै बिन रहा न कोई । अपनी आध्यात्मिक अनुभूतियो को व्यक्त सभी करना चाहते हैं। इसके लिए वे लोकजीवन के उन रूपो चित्रो वस्तुओ एव सम्बधो का चयन करते हैं जिनम उनको अनुभूति का साम्य हो और जो सामा यत लाक्परिचित एव लोक प्रचलित भी हो। TI प्रतीक सबधी क्सिी साधारण मा यता की स्थापना करते समय हम धार्मिक प्रतीको को प्रमुख स्थान देना पडता है। कवि के लिए प्रतीको की उपयोगिता कदा चित केवल भावनाओ व उदभावन के माध्यम के रूप में ही हो (यद्यपि वह एसा बहुत कम करता है) पर धम पर विचार करने वाले के लिए ऐसा करना सभव नहीं। घम के साथ ही साथ आलोचना क्षत्र मे विमान की भी चर्चा की जाती है । विज्ञान में भी प्रतीका का प्रयाग होता है । आधुनिक विज्ञान की सर्वाधिक प्रमुख विशेषता है उसका प्रतीकात्मक तत्व । गणित अथवा भौतिक विज्ञानी सब प्रथम अपन आधारभूत सिद्धान्तों के प्रतीकात्मर स्पा के प्रति सजग हुए और उन्होने इसी प्रतीकात्मक विचार को वनानिक स्पम विकसित किया। वज्ञानिक रूप से तात्पय होता है पयवेक्षण और प्रयाग पर आधारित अधिकाधिक व्यापक सामा य सिद्धान्तो को स्थिर करना और विज्ञान में प्रतीकात्मक्ता का अंथ है तकसगत तथा गणित के समान अपरिवतनीय नियमा पर आधारित वास्तविक्ता का साकेतिक रूप। वास्त हिक्ता के प्रत्यक्षीकरण के दो माग हैं । एक के द्वारा हम वास्तविक गुणो तथा मूल्यो पर बल देते हैं और दूसरे के द्वारा इन गुणा एव मूल्या (व.यूज) के भावात्मक रूप को लेते हुए उनके परिणामगव एव तक-संगत सबधा को स्पष्ट करते हैं । इस ही सत साहित्म की पारिमाषिक शब्दावली ! हम दूसरे रूप में इस प्रकार कह सकते हैं कि मनुष्य दोहरी भाषा का प्रयोग करता है जिसे हम कलात्मक और वज्ञानिक की मजा प्रदान कर सकते हैं। विज्ञान की भाषा में तथ्य कथन का सरलतम रूप ही उसका सघटन होता है। इस प्रकार विज्ञान की अपनी भाषा होती है जिसका महत्व उसके सुगठित रूप म है। काप की भाषा भी सुगठित होती है पर वह केवल भावाद क का ही काय करती है किन्तु बज्ञानिक भाषा वा काय वस्तु-सकन करना होता है । विमान काध्य की भांति वास्तविकता का काल्पनिक प्रत्यक्षीकरण न करके तथ्याशी का विश्लेषण और वणन रस्ता है। इसीलिए वैमानिक भाषा म तथ्य का छायात्मक चित्रण न हावर उसका यथाथ एवम सुनिश्चितरूप यक्त होता है । विज्ञान की भाषा अपन चरम विकास पर प्राकृतिक भाषा से विछे करक कृत्रिम मापा का रूप ग्रहण करती है यहां कृत्रिम भाषा से तात्पय उस भाषा से है जिसका व्यवहार किसी विशेष उद्दश्य और स्थिरता के साथ किया जाता है। कायामक भाषा नाटकीय है किन्तु वज्ञानिक भाषा का आदश ही है उसका अनाटकीय होना । जब विज्ञान अपने तथ्यो की ममि यत्ति के लिए कायात्मक गली का माश्रय स्ता है तब भाषा को सामान्य अभिव्यञ्जना प्रणाली में प्रतीकात्मक्ता का जाना स्वाभाविक होता है। प्राय यम की तुलना विज्ञान स की जाती है। विज्ञान की ही भांति धम की परिभाषा करना अत्यन्त कठिन है। जिन घम सब धो वानो की हम प्राय चर्चा करते हैं उनके विषय म हम स्वत कोई स्पष्ट मत स्थिर नहीं कर पाते हैं । धमकी भाषा (जिसका अधिकार रूप प्रतीकात्मक है) के अध्ययन के माध्यम से धम का यत्किचित ज्ञान अवश्य प्राप्त कर देते हैं। पार्मिक भाषा के दोस्प किये जा सकते हैं-एक पम की गीतारमक भाषा और दूसरा उसका नारकाय रूप । प्रथम प्रकार में प्राथना मात्र आदि आते हैं । भाषा का यह रूप भावनाआ को उद्भावना करता है और साथ ही भाव के मूत रूप का आह्वान भी भाषा के दूसरे ना कोय रूपको हम इछा और निया की भाषा कह सकते हैं । इसम मुख्यत रन्त वपामा के अन्तगत पाने वाले सभी त वो का समावेश होता हैं, क्योकि गणनास्मन एव ताक्वि दष्टि में प्रवृत्ति के पत्तों के नाटकीयकरण एवं मानवीयकरण के लिए पही पुराण Myth) पारिभाषिक शर उपयुक्त हाता है। कुछ लोग का कहना है कि अत्यन्त प्रचीन काल मे प्रावृतिक घटनाओ और मानवीय वृत्तों की भाभि व्यक्ति इसी पौराणिक ढग (Mythical Style) मे होती थी। पर पौरापिपत्ता (Mythology) की चेतना को स्पष्ट करने का यह पूर्णरूप से भ्रामक ढग है। पौरा गिकता को वृत्ति से जा उपलग्धि होती है उसकी तुलना हम परवर्ती वानिष उपलपिया में नहीं कर सश्ते । हम किसी भी अय मे पौराणिकता की वृत्ति को १८] [ सत-साहित्य 1 - - F प्राचीनकाल म विनान का स्थान लेने वाली नहीं मान सक्ते । तात्पय यह कि केवल नाटकीयता गुण-सपन भाषा म ही यह गुण होता है कि वह वस्तुगत अथ-प्रकाशन मे सहायक होती है। पौराणिक वत्तो की सष्टि का अथ जातीय जीवन में अध्यात्म का सक्त करना होता है। पौराणिक वत्त आध्यात्मिक जगत का मौलिकवत्त है जो प्राकृतिक सकेत-साधनो के मा यम से अभि यक्त किया जाता है । अपन को आगे बढाता हुआ ज्ञान पदव पौराणिक वृत्त को विशेषरूपता रखता है। अध्यात्मजगत म जिन सकेतों-प्रतीको का प्रयोग किया जाता है उहे हम मुख्यत दो भागा म विभक्त कर सकते है-एक स्वर्गीय पदार्थों के प्रतीक और दूसरे पवित्र कृत्या के प्रतीक । प्रथम प्रकार के प्रतीको के तीन भाग किये जा सकते हैं- (अ) देवत्व अथवा ईश्वर के प्रतीक, आ)स्वर्गीय विशिष्ट गुणो के प्रतीक (इ) स्वर्गीय कृत्या के प्रतीक । इन समस्त प्रकार के प्रतीक विधानो को यह विशेषता है कि मूत-विधान एव विचार लिये जाते हैं अनभव के सकुचित एव सहनबोध चेतना कक्षन से और उनका प्रयोग होता है कही ऐसे अधिक विश्वजनीन एवम् आदा सबधो के सदभ मे जिनका अपने यापकत्व तथा सावभौमता र गुण के कारण सीध ढग से वणन किया ही नहीं जा सकता। हिन्दी साहित्य + अतगत निगणपरक सत साहित्य मे प्रतीक स्थापन की प्रकृति विशेष रूप से परिलक्षित होती है यद्यपि सगुणघारा के कवियो ने भी भावा भिव्यजन के लिए प्रतीको का आश्रय ग्रहण किया है। उदाहरणाथ तुलसी के चातक की प्रम साधना पर लिख गए सभी दोहे प्रतीक पद्धति पर ही हैं। उनमे चातक के माध्यम से भक्ति की अन यता व्यक्त हुई है । जसा पहल लिख आये हैं प्रतीर विधान आध्यात्मिक क्षत्र म विशेषरुप से पाया जाता है। साधक के हृदय में साधना-त्ति के क्षणा में जी मानन्दोल्लास उत्पन्न होता है उसे वह लोक कल्याण की भावना से प्रेरित होकर जन जन तक पहुचाना चाहता है। वह उस भावाल्लास का जब सव साधारण के समक्ष प्रचलित शो के माध्यम से ठीक ठीक व्यक्त नहीं कर पाता है उसे भाषा पगु सी प्रतीत होती है तब वह प्राय प्रतीको का आश्रय ग्रहण करता है । कबीर का एक पद देखिए- काहे री नलिनी तू कु मिलानी तेरे ही नाल सरोवर पानी। जल मे उतपति जल मे वास जल मे नलिनी तोर निवास ॥
सत-साहित्य को पारिभाषिक दायलो ] [८९ मा तलि तपति ने अपरि आगि। तोर हेत कह कासन लागि। कहे स्वोर जे उदुक समान । ते नहिं मूए हमरे जान । यही नलिनी जीवात्मा है और सरावर का जर समस्त विश्व में याप्त पर मात्म तत्व है जा उस कमलिनी म भी समाया है । इस बात्मा (कमलिनी) का जला साने वाली आग न ता नीचे तपती है और न ऊपर । एसा काई भी ब धन नहीं है जो आत्मा को बाँध सक्ता हा ! आत्मा का कष्ट तभी तब है जब तक वह अपन का अपने प्रभु मे भिन्न समझती है । जब यह आत्मा (कमरिनी) परमात्मा (जल) म लीन हो जायगा तब जम और मत्यु का भय जाता रगा और आत्मा वत स्प से प्रभु के समीप ही विहार करने लगगी। जीव और ब्रह्म की एकता का प्रतिपादन मरिनी और जल प्रतीको द्वारा किया गया है। सत साहित्य म ईश्वर, जीवात्मा मापा शरीर और मन कार विभिन्न रूपा म प्रतीक याजना पाई जाती है। ईश्वर ही इस सम्पूर्ण प्रसार का एकमात्र हतु है । बही सा है वही पालक है और वही सहारक भी है। संसार का स्वामी वही है। अत उस कही भरतार भनार (भर्ता) क्हो प्रिय और कही खसम रूप म स्मरण किया गया है । इमर अतिरिक्त उस बाप जोलाहा आदि भी कहा गया है । ईश्वर को ही भौति बाप भी पुत्र कोजाम देता है उसका पालन करता है और उस क्ल्याण के लिए उसका नियमन भी करता है। जिस प्रकार जुलाहा तानाबाना द्वारा कपडा बुनता है उसी प्रकार ईवर भी ता शरीररूपो वस्त्र र निमाण करता है। जीवात्मा के लिए पूत तिरिया मारि सबों का प्रयोग हुआ है । जिस प्रकार पुत्र पिता का ही अश है उसी प्रकार जीवात्मा भी ईश्वर काही अन है। पति के अभाव म जिम प्रसार पत्ला (तिरिया) का कष्ट हाता है, उसी प्रकार परमात्मा म अभाव म जीवात्मा भी कष्ट पाती है । इसा प्रकार अन्य प्रतीक भी अपना व्यापर अथ रखते हैं। सत साहित्य म प्रती योजना अपना विशेष महत्व रखती है। यहां हम पतिपय प्रतीकात्मक प्रयोगा के उल्लेख द्वारा यह दवन पर प्रयत्न करेंगे किसत कवियो या भावजगत जितना व्यापार और उनकी अनुभूति कितना गहरी होनी थी और उनकी दृष्टि कितनो दूर तर जाती थी। प्रस्तुत प्रसग म यह स्मरणीय है कि सत-साहित्य म कबीर द्वारा प्रयुक्त किए गए प्रतीत काही विशप मव है। अन्य सत विमान प्राय स्वीर को ही परपरम प्रताको प्रयास किया है।
९. ] [ सत-साहित्य साथ ही यह भी दष्ट य हैं कि प्रतीक्रूप म राया गया एक गब्द कहीं जीव के लिए है और कही माया के लिए है। मता की भाषा की विशेषता यही है कि उसमें शब्द चयन को अपेक्षा भाव प्रकाशन की ओर अधिक ध्यान दिया गया है। ईश्वर जह चेतन, गुण-दोपमय" सष्टि काम्प अनादिकाल से कुतूहल एव जिनासा का विषय रहा है। परिवतन के ये पुतले अपनी परिवतनीयता म हा गा वत हैं । सष्टि के आदिकाल से सूप चद्र नक्षत्रादि समस्त ग्रह एव उपग्रह नाश्वत गति से गतिमान हैं। उनकी गति मे एक नियम है, श्रम है। अपने समय पर ही घुमडली हुई घनाली ताप-नन अवनी को तषा को शान्त करने के लिए उतावली-सी प्रतीत होती है। शरद का स्वच्छ नीलाकात कीतिरोप रूप में कितना मदुल प्रतीत हाना है और वन-त्री को अपनी मुरभि का उसुक्त दान करने वाली सुमनावलिया कितनी मोहक है कितनी आक्षक है और वह प्रखर ताप, पथिवी को झुलसाने वाली उष्णता स्वय भी क्तिना तप कर सजन के क्तिने मूल्यवान उपकरणो की सष्टि करती है इस रहस्य का उदघाटन ही ता भारतीय मनीषा का अभिप्रेत रहा है । सौर मण्ल म नित्यप्रति होने वाला यह नतन उस पराक्ष नट के प्रति जिज्ञासा की सटि करता है । एसा प्रतिभासित होता है कि समस्त सष्टि के क्रिया कलाप के पीछे काई महान शक्ति काय कर रही है । विश्व के प्रकार पुज सूय चन्द्र नक्षत्रादि कितने नियमित स्म से संचालित होते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि काई परम चेतन सत्ता इन सबके मल म काय कर रही है । वदिक ऋषिया ने सूय का प्रकाश अग्नि की दाहकता जल की शीतलता वायु की गति और पथ्वी की स्थिरता में एक अचिन्त्य गक्ति की कल्पना की थी। यह कल्पना भावमय भक्ति के रूप में थी। उसमे व्यक्तित्व का अभाव था। विभिन्न शक्तियो के रूप में प्रकाशित होती हुई यही शक्ति निम्नाकित मत्र म एक यक्तित्व को लेकर प्रकट हुई है- हिरण्यगभ समवतताप्रभूतस्यजात पतिरेक आसीत । स दाधार पृथिवीं चामुतेमा कस्म देवाय हविषा विधम ॥ ०१०१२११ यह हिरण्यगम भूतो (पथ्वी जल अग्नि वायु और आकाग) का साथ ही समस्त प्राणिवा का जनक था । एक वही स्वामी या वही इस पथ्वी और आका का धारण किए हुए था। इमी गक्ति का विवेचन करते हुए ऋपि ने कहा- ऋत च सत्य चामोद्धात्तपसोऽध्यजायत ।'