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Shwetashvatropanishad
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अथ श्वेताश्वतरोपनिषत्प्रस्तावः। कृष्णयजुर्वेदस्य षडशीतिशाखासु श्वे. ताश्वतरशाखान्तर्गतेयमुपनिषदवगन्तव्या । यद्यपि वाजसनेयादिदशोपनिषदएवाधिक्येन लब्धास्पदाः सन्ति तथाप्यस्यामुपनिषदि प्रसिद्धवेदमन्त्राणामाधिक्येन रक्षणाद् ब्रह्मा- त्मज्ञानविषयस्य स्फुटतया वर्णनाच्चा- स्या उपनिषदो महत्त्वं सुस्थिरमेव । अ. स्यामुपनिषदि कस्यापोतिहासः कठोपनिष- दादिवत्प्रधानो नास्ति किन्तु वेदान्तविषय- स्यात्मतत्त्वज्ञानस्यातिसुगमतया व्याख्यान- मुपलभ्यते । अनोपनिषदि यद्यपि सर्वाणि पद्यानि सन्ति न कश्चिद्धगद्यो भागस्तथापि येऽल्पीयसीमपि संस्कृतभाषां विदन्ति तेऽत्र- त्याधिकतरपद्यानों मूलादेवार्थं बोर्बु क्षमाः सम्भवन्ति । भाग्यन्तु विशेषेण तात्पर्यबो- धनाय किञ्चिदपि संस्कृतमविजानतामर्थज्ञा- नाय दु यच्छन्दसामर्थस्य स्फोटनाय च मयारब्धम् ॥
[ २ ] अस्यामुपनिषदि षडध्यायास्तत्राद्य- ध्याये कालादीनामेकैकशः सम्भूय वा कार- णत्वं निराकृत्यैकस्य परगात्मनएवाभिन्न- निमित्तोपादानकारणत्वमुपपाद्य तस्य स्वदे- हस्थस्यैव ध्यानेन सदृष्टान्तेन साक्षात्कारपु. रस्सरं मोक्षोपायः प्रदर्शितः। द्वितीये योगा- भ्यासद्वारा सवितुर्दैवस्योपासनमुक्तं तृतीय- चतुर्थयोः स्तुतिप्रार्थनापुरस्सरं परेशस्य विशे- पेण स्वरूपं गुणाः कर्माणि चोक्तानि । प- ज्वमे जीवस्य बन्धकारणप्रदर्शनपुरस्सरं स्वी- यवास्तवस्वरूपपरमात्मतत्त्वस्यज्ञानेनाखिलब. न्धेभ्यो .विमुक्तिरुक्ता षष्ठे कालादीनां कार- णत्वं निराकृत्य नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वभावस्यै- कस्यात्मतत्त्वस्यैव निर्गुणस्यापि सर्वकार- णत्वं तद्विज्ञानेनैवाखिलवाधाभ्यो मोक्षश्यो- क्तइति । इत्थमस्यामुपनिषदि विशदरीत्या परमात्मतत्त्वज्ञानेन सर्वविधदुःखनिवृत्तिसा- धनपुरस्सरं परमानन्दावाप्तिरूपाऽभीप्सित- सिद्धिः प्रदर्शिता सा च योगाभ्यासद्वारा विशेषतो दृष्टानुनविकविषयवितृष्णेन लब्धं शक्या ॥
[ ३ ] भाषार्थ.-पूज्यपाद भगवान् शङ्कर खामिकृत (उपनिषद्भाष्य) व्युत्पन्न विद्वानों के लिये विशेष उपयोगी है, हमने साधारण संस्क तज्ञों के अर्थ और विशेष कर हिन्दीभाषा मात्र जानने वालो की सु. गमता के लिये समयानुसार प्रचरित सुगमसस्कृत और हिन्दीभाषा इस कृष्णयजुर्वेदीय श्वेताश्वतरोपनिषद्का सुगम व्याख्यान किया है। कृष्णयजुर्वेदकी छयाशी ८६ शाखाओमे से श्वेताश्वतरशाखाके अन्तर्गत यह उपनिषद् है। यद्यपि वाजसनेयादि दश ही उपनिषद् विशेष प्रतिष्ठित और प्रसिद्ध है, तथापि अध्यात्म प्रमिद्ध वेदमन्नों के इस उपनिपद्म विशेष कर संगृहीत होनेसे और आत्मतत्त्वज्ञान विषय का स्फुट प्रकार से वर्णन होनेसे इस श्वेताश्वतरोपनिषद्का महत्त्व भी प्रसिद्ध है । कठोपनिषदादिके तुल्य इस उपनिपमें किसी का इतिहास प्रधान नहीं है किन्तु आत्मतत्त्वज्ञानरूप वेदान्तविषय का विशेप सुगमतासे वर्णन किया है। इस उपनिपमें सब पद्यर- चना हो है गद्यभाग कुछ नहीं है, तथापि जो लोग थोडा भी संस्कृत जानते हैं वे भी मूलके सरल होने से मूलको ही समझ सकते हैं। तात्पर्य जतानेके अर्थ और जो कुछ नाममात्र सस्कृत जानते हैं उन को अर्थ जाननेके लिये और कठिन छन्दोंका अर्थ प्रकट करनेके लिये ही हमने भाष्य किया है। इस उपनिषद् मे छः अध्याय हैं उन में से प्रथमाध्यायमे काला- दिका पृथक् २ वा सम्मिलित कारण होनेका खण्डन करके और एक परमेश्वरको ही निमित्त तथा उपादान कारण सिद्ध करके उस अ- पने २ शरीरस्थ परमात्मतत्त्व को साक्षात् जानने द्वारा मोक्षका उ. पाय दृष्टान्त सहित ध्यानसे दिखाया है। द्वितीयाध्यायमे योगसा. धन द्वारा सवितादेवकी उपासनाका ही, तृतीय चतुर्थ अध्यायों में स्तुनि प्रार्थना पूर्वक परमेश्यर के विशेष कर गुण कर्म और स्वरूपों का वर्णन किया है । पञ्चमाध्याय मे बन्धन का कारण दिखाने पू- र्वक अपने वास्तविक स्वरूप परमात्मतत्त्वके जानने द्वारा सम्पूर्ण.ब.
[४] न्धनो से छूटना कहा और पष्ठाध्याय में कालादि के कारण होने का निराकरण करके नित्य शुद्ध बुद्ध मुक्तखभाव एक निर्गुण आत्म- तत्वको सब संसार का कारण कहा और उस के सम्यक्क्षानसे ही सब प्रकारकी बाधाओंसे छूटनेका वर्छन किया है । इस प्रकार इस | उपनिषद् मे सब प्रकार के दुःखोंकी निवृत्ति होने पूर्वक परमेश्वरके तत्वज्ञानसे सरल प्रकारसे परमानन्द प्राप्ति रूप अभीष्ट सिद्धि दि. खादी गयी है इस भूलोक के और स्वर्गादि के दिव्य सुख भोगने से हुए वैराग्यवान् पुरुष को यह सिद्धि योगाभ्यास द्वारा विशेष कर प्राप्त हो सकती है। निवेदको-.. भीमसेन शर्मा ब्राह्मणसर्यस्व-सम्पादक ओ३म्-श्रीमहागणाधिपतयेनमः । अथ कृष्णयजुर्वेदीयश्वेताश्वत- रोपनिषद्भाष्यम्। ओ३म्-ब्रह्मवादिनो वदन्ति । किं कारणं ब्रह्म, कुतः स्म जाता, जीवाम केन, कच सम्प्रतिष्ठाः। अधिष्ठिताः केन, सुखतरेषु वर्ता- महे,ब्रह्मविदो व्यवस्थाम् ॥ १॥ अ०-ब्रह्मवादिनी महर्पयो वाग्व्यापारे- णान्यवाच्यापेक्षया ब्रह्मवाधिक्येन बदितुं शीलाः शुद्धाः पुरुषाः परस्परमेकीभूत्या वद- न्ति । अस्य चराचरदृश्यस्य किं ब्रह्म कार- णमाहोस्विकालादिकारणमिति । अथवा- अकारणमिदं जगत् । अथवा ब्रह्मणः कारण- त्वेऽपि किमुपादानकारणं ब्रह्माहोस्विनिमि- त्तमथवोभयभिति प्रश्नः तच्च ब्रह्म किं णमस्ति । कुतो वयं जीवा जाताः स्म केन कारणेन वयं शरीरधारिणः कृताः, चिदात्म- कृष्णयजुर्वेदीयश्वेताश्वतरोपनिषदि- स्वरूपेण जीवानां नित्यत्वाच्छरीरधारिणा- मेवोत्पत्ती प्रश्नाशयः । केन च कारणभूतेन स्थितिकाले वयं जीवामः, क्वचाधारभूते प्रल- याद्यवसरे वयं प्रतिष्ठिता भवामः । केनाधि- ष्ठिता नियता वयं सुखेष्वितरेषु दुःखेषु च व- मिहे । हे ब्रह्मविदो ब्रह्मज्ञानिनः ! भवत्कृ- पाती वयमेतां व्यवस्थां लभेमहि जानीयाम।। भा०-अत्र पञ्च प्रश्नास्तेषु प्रथमः स- रम्भे संसारस्य कारणजिज्ञासायां, द्वितीयः प्रकृतिपुरुषसंयोगहेतुजिज्ञासायां, तृतीयः स्थि- तिदशायां कारणं ज्ञातुं, चतुर्थः प्रलयावस्था- यां कारणं ज्ञातुम् । पञ्चमश्च कर्मफलाप्ती का- रणं विज्ञातुमेवं च सर्वदेवतत्त्वं ज्ञातुं मनुष्य- रीक्षणमारब्धव्यमित्याशयः ॥१॥ भाषार्थः-(ब्रह्मवादिनी वदन्ति )वाणी के व्यवहारसे ईश्वर विषय की ही अधिक चर्चा करने के स्वभाव वाले शुद्ध महर्षि लोग परस्पर मिलकर विचार करते वा कहते हैं कि इस घराचर संसार का (किं कारणं ब्रल) या ब्रह्म ही कारण है ? अथवा अन्य कोई कालादि कारण है ? वा इस जगत् का कोई कारण ही नहीं । अथवा यह भी प्रश्न का अर्थ हो सकता है कि इस जगत के उपादान निमित्तों में से ब्रह्म कौन कारण है ? वा दोनों कारण ब्रह्म है और उस ब्रह्म का क्या लक्षण है (कुतो जाताः स्म) हम सब
प्रथमोऽध्यायः ॥
शरीरधारी जीव किससे उत्पन्न हुए हैं। वास्तविक स्वरूपसे
जीव नित्य हैं, इस कारण शरीर धारण सम्बद्ध जीवों का
प्रश्न जानो । ( केन जीवाम) हम सब किस की सत्ता से
जगत् की स्थिति दशा में जीवित रहते हैं ? ( सम्म.
तिष्ठाः) और प्रलयादि के ममय किस आधार पर हम सब
रहते ? ( केनाधिष्ठिताः मुखेतरेषु वर्तामहे ) और किस से
नियत किये हुए हम लोग सुख दुःखों में प्रवृत्त हो रहे हैं
अर्थात् हमको सुख दुःख कौन भुगाता है ? हे (अल्लविदः)
ब्रह्मज्ञानी लोगो! हम सब लोग ( व्यवस्थाम् ) इस विषय
की व्यवस्था अर्यात समाधान को श्राप की रुपा से ठीक २
जाने वा जान सकें।
भा०-इस प्रारम्भ के मन्त्र में पांच प्रश्न हैं उन में
पहिला सृष्टि के प्रारम्भ समय संसार का कारण जानने की
इच्छा से, दूसरा प्रश्न प्रकृति पुरुषके संयोग का हेतु जानने के
लिये, तीसरा जगत् की स्थिति दशा का कारण जानने को,
चौथा प्रलयादि दशा में जीव का आधार जानने और
पांचवां कर्मफल प्राप्ति में कारण जानने के लिये है। इसी
प्रकार सब काल में सभी विधारशील विद्वान् मनुष्यों को
गूढ विषयों का ठीक तत्व जानने के लिये समीक्षण वा
आन्दोलन करना चाहिये ॥१॥
कालः स्वभावो नियतिर्यदूच्छा
भूतानि योनिः पुरुष इति चि-
न्त्यम् । संयोग एषां न त्वात्म-
भावादात्माऽप्यनीशः
सुखदुःख-
हेतोः ॥२॥
४
कृष्णायजुर्वेदीयश्वेताश्वतरोपनिषदि-
अ०-कालः सर्ववस्तूनां बिपरिणामहेतुः,
स्वभावोऽग्न रुष्णत्वादिकरूपा पदार्थानां निय-
ता शक्तिः । नियतिः पुण्यपोपलक्षणं नियत-
विपाकं संचितं कर्म, यदृच्छा आकस्मिक्य-
कारणप्राप्तिः, भूतान्याकाशादीनि, पुरुषो वि-
ज्ञानात्माऽस्य सर्वस्य योनिः कारणमाहोस्वि-
देषां कालादीनां योगी योनिरिति विमर्श
प्रवृत्त न योनिरिति पदद्वयं प्रत्येकेन काला-
दिना सम्बध्यते । कालो न योनिः स्वभावो
न योनिरित्येवम् । सुखदुःखहेतोः स्वकर्मोपा-
र्जितेष्टानिष्टफलमागेषु बद्धत्वादनीशः परा-
धीन आत्मापि जीवोऽपि न योनिरात्मभा-
वादात्मत्वेन सर्वव्याप्तत्वेन सर्वनियन्तृत्वेन
न कोऽपि कालादि वो वास्य कारणमिति ॥
भा०—यद्यपि कालादीनि पृथक्पथङ्-
मिलित्वा वाऽस्य जगतो निमित्तान्युपादा-
नानि वा कानिचित्कारणानि भवन्ति । त-
थापि तेषां स्वयमसत्त्वादन्यसत्तापेक्षत्वारूप-
राधीनत्वात्सातिशयशक्तिमत्वानिरतिशयश-
क्तिमदेव सर्वनियन्त किमपि कारणानामपि
तेषां कारणं सम्भवत्येतच्च नत्वात्मभावादिति
कथयता सूचितम् ॥२॥
प्रथमोऽध्यायः॥ भाषार्थ:-( कालः स्वभावो नियतिर्यदृच्छा ) क्षणादि काल सब के परिवर्तन बदलने का हेतु स्वभाव -जैसे अग्नि की उष्णता अर्थात् अग्नि का स्वाभाविक गुण जैसे उष्णता गर्मी है वैसे पदार्थों को स्वाभाविक शक्ति, पुगय पाप रूप नियतफल को अवश्य देने वाला संचित वासनारूप कर्म अथवा यदृच्छा नाम अकस्मात् विना कारण ही संसार उ. त्पन्न हुन्ना, (भूतानि योनिः पुरुष इति चिन्त्यम् ) श्राका- शादि सूक्ष्म भूत पुरुष नाम जीवात्मा, क्या इन का. लादि में से कोई एक २ इस प्रत्यक्ष जगत्का योनि नाम का. रण है ? अथवा ( एषां संयोगः) इन सबका सयोग सृष्टि का कारण है। ऐसे विचारकी प्रवृत्ति में (न) नहीं अर्थात कालादि एक २ था इन का सयोग दोनों ही सृष्टिके कारण नहीं अर्थात् (आत्मभावात्सुखदुःखहेतोरात्माप्यनीशः ) जैसे अपने संचित इष्ट कर्म फल भोगों में फंसा होने से जीवात्मा पराधीन हुना किसी कार्य का स्वतन्त्र कारण नहीं होता वैसे पराधीन कालादिक भी सृष्टि के कारण नहीं हो सकते क्योंकि इनमें सर्वत्र व्याप्त सर्वनियन्तृता सब को अपने प्रा. धीन कर लेनेकी अनन्त शक्ति नहीं है। अर्थात् कालादि जड़ चेतन आत्मभाव नाम सर्वव्याप्त न होने से प्रबलता वा प्र. धानता के साथ स्वतन्त्र सृष्टि के कारण नहीं किन्तु पराधी- नतासे गौण कारण तो अवश्य हैं यह बात (प्रात्मभावात्) पद से जतायी है। भा०-यद्यपि कालादि जड़ और चेतन जीवात्मा ये दोनों ही पथक २ वा मिलकर इस जगत् के निमित्त धा उ- पादान भिन्न २ कारण गौणरूपसे हो सकते हैं जिसमें काल, नियति, यदृच्छा और जीवात्मा ये निमित्त तथा खभाव और भूत सृष्टि के उपादान कारण हैं। तो भी उनके स्वयं - ६ - कृष्णयजुर्वेदीयश्वेताश्वतरोपनिषदि- असत् होने के कारण अन्य सदात्मक ब्रह्म की सत्ता की अ. पेक्षा होने से और पराधीन होने तथा परिमित अल्प शक्ति घाले होने से असीम अपरिमित शक्तियुक्त कोई सर्वनियन्ता ही उन कालादि कारणों का भी कारण ठहरता है यह बात (न स्वात्मभावात् ) कहनेसे जतायी गयी है। अर्थात् एक परमेश्वर ही सब का मूल प्रधान कारण है क्योंकि उसके विना काल प्रकृति और जीवादि कारण सब मिल कर भी सृष्टि नही कर सकते ॥२॥ ते ध्यानयोगानुगता अप- श्यन्देवात्मशक्तिं स्वगुणैर्निगूढाम्। यः कारणानि निखिलानि तानि कालात्मयुक्तान्यधितिष्ठत्येकः॥३॥ अ०-एवमुक्तप्रकारेण कारणान्तरवादपक्षान्नि- राकृत्य दैकवेद्ये ब्रह्मणि प्रकारान्तरमपश्य- न्ती श्रुतिराह-यएकोऽद्वितीयः परमेश्वर का- लात्मयुक्तानि कालेन जीवात्मना पुरुषेण च संयुक्तानि निखिलानि तानि कारणोनि द्वि- तीयमन्त्रोक्तानि स्वभावादीन्यधितिष्ठत्यधि- ष्ठातृत्वेन नियमयति। तस्यैव परमात्मनः स्व- गुणैः प्रकृतिकार्यः पृथिव्यादिपञ्चभूतैश्च नि- गूढां संवृतोमाच्छन्नां देवात्मशक्ति ध्यान- योगानुगता ध्यानरूपं योगं ध्येयस्वीकारो- 9 प्रथमोऽध्यायः॥ पोयमनुगता ध्ये याकारपरायणाः समाहिता- स्ते पूर्वोक्ता ब्रह्मवादिनी महर्षयो जगतो निर्मात्रीमपश्यन् हार्दचक्षुषा दृष्टवन्तः । तत्र देवात्मशक्तिमित्यस्य समासव्यासो बहुधा स- म्भवति तद्यथा-देवस्य मायिनः परमेश्वर- स्यात्मस्वरूपामेवाऽस्वतन्त्रां मायाशक्ति ज- गतः कारणभतामपश्यन्त। अनेनैवाभिप्राये- णाग्रेऽस्मिन्न व ग्रन्थ उक्तम्-मायांतुप्रकृतिवि- द्यान्मायिनंतुमहेश्वरमिति । भगवद्गीतासू- क्तम्-मयाध्यक्षेणप्रकृतिः सूयतेसचराचरमि- ति । अत्रापि मायाशक्तिरस्वतन्त्रा ब्रह्मसत्त- यैवावस्थिताच स्वगणैः सत्त्वरजस्तमोभिर्नि- गूढाऽऽवृतामायाशक्तिर्गुणाश्चानावृताः। इत्ये- कः पक्षः। अथवा देवात्मशक्तिं देवतात्मना- ईश्वररूपेणावस्थितां शक्ति स्वगुणः सर्वज्ञ- स्वादिभिरीश्वरगुणैर्निगूढां ब्रह्मात्मनैवानुप- लभ्यमानाम् । तत्रोक्तम्-मायीसृजतेविश्वमे- तदित्यादि । इति द्वितीयः पक्षः। अथवा दे. वस्य परमेश्वरस्यात्मभूतां जगदुत्पत्तिस्थि- तिलयकी ब्रह्मविष्णुशिवात्मिकां शक्ति स्व- गुणः सत्वरजस्तमोभिर्निगूढां ब्रह्मात्मनैवानु- . कृष्ण यजुर्वेदीयश्वेताश्वतरोपनिषदि- पलभ्यमानाम् तथाचोक्तम्-ब्रह्मविष्णुशिवा- ब्रह्मन् ! प्रधानाब्रह्मशक्तयइति । शक्तयो यस्य देवस्य ब्रह्मविष्णुशिवात्मिकाः । अवस्थाभेद- मानित्य परस्यैव ब्रह्मणः सृष्टयादिकार्यं कु- वन्ति । मूर्तिमद् ब्रह्मव ब्रह्मविष्णुशिवनाम- रूपैः सृष्ट्यादिकं करोति नतु ब्रह्मादयस्ततो भिन्नाः स्वतन्त्राइति । इति तृतीयः पक्षः । अथवा देवात्मशक्तिमिति-देवश्च-आत्मा च शक्तिश्च यस्यब्रह्मणस्खयोऽवस्थाभेदास्तां प्रकृ- तिपुरुषेश्वराणां स्वरूपभूतां ब्रह्मरूपेणावस्थितां शक्ति कारणमपश्यन् । तच्चाग्रेप्रदर्शितम्- भोक्ताभोग्यं प्रेरितारंचमत्वा सर्वप्रोक्तंत्रिवि- धंब्रह्ममेतदिति । स्वगुणैः प्रकृत्याधुपाधिभि- निगूढां शक्तिम् । एकोदेवःसर्वभूतेषु गूढइ- त्युक्तत्वात् । इति चतुर्थः पक्षः । अथवादे- वस्य प्रकाशवरूपस्यात्मनो व्यापकस्य पर- मेश्वरस्य स्वरूपभतां दैवीशक्ति स्वगुणैर्नि- गूढां जगतः कारणमपश्यन्निति पञ्चमः पक्षः ॥ भा०-देवात्मशक्तिरूपे समस्तपदे ये पक्षाः प्रदर्शितास्ते शास्त्रानुकूलतया सर्व सम्यगे वाभिमताबोध्याः । सवपक्षेष्विदमैक्य- है प्रथमोऽध्यायः ॥ मनुसन्धेयम् यद्ब्रह्मसत्तयैव सदिवप्रतीय- मानं ब्रह्माधिष्ठितं बहुविध कारणमस्वतन्त्रं निमित्तोपादानभूतमस्ति तस्य सर्वस्य स्वातन्त्र्ये- णाचेतनत्वादशक्यत्वान्मुख्यतया जगदुत्पा- दकत्वं नास्त्यपिन्वेकस्यैव सर्वशक्तिमतः पर- मात्मनः सत्तया जगज्जायते तरमात्तस्यैव जगदुत्पादकत्वमभिज्ञा वेदाभिमतं मन्यन्ते । अस्व तृतीयमन्त्रस्याशयोऽयमस्ति-यदत्त - मानकालेऽपि सूर्यादीनामुदयारतादिनियमाः प्रत्यक्षमुपलभ्यन्ते प्रत्यहं चोत्पत्तिस्थिति- लयाः पदार्थानां जायमानो ये दृश्यन्ते तेपां कारणान्यपि बहूनि प्रत्यक्षेणोपलभ्यन्ते प- रन्तु सर्वपदार्थेषु गूढाऽतिमूक्ष्मा चर्मचक्षुा- मलक्ष्या सर्वनियन्त्री काचिच्छक्तिरस्ति यया नियन्त्रिताश्चराचरपदार्था नियमेन प्रवृत्ता दृश्यन्ते तस्याश्च पाश्चात्यादयो विद्वांसः कि- मपि नामान्तरं वदन्तु । तामेव देवात्मशक्ति परमात्मस्वरूपं सर्ववरतुपु गूढां तत्तन्नामरू- पावच्छिन्नामखिलपदार्थान्तः प्रविष्टामखिल- क्रियाकारिकामुत्पत्त्यादेः प्रधानकारगभूता- - १० कृष्णयजुर्वेदीयश्वेताश्वतरोपनिषदि- मतिप्राचीनकालेऽपि ब्रह्मवादिनो महर्पयो ध्यानयोगेन दृष्टवन्तो ज्ञातवन्तइति ॥ भाषार्थ-इस उक्त प्रकार से सृष्टि रचना के अन्य कारण बाद पक्षोका निषेध करके एक वेदके ही द्वारा जानने योग्य ब्रह्म मे अन्य कारणा को न देखती हुई श्रुति कहती है कि- (य एकः कालात्मयुक्तानि निखिलानि तानि कारणानि प्र- चितिष्ठति ) गो एक अद्वैत परमेश्वर काल और जीवात्मासे युक्त उन द्वितीय मन्त्र में कहे स्वभावादि मब कारणो को अधिष्ठ ता रहता हुआ नियम बद्ध करता है। उसी परमे शत्रर की ( स्वगुण निगूढाम् ) प्रकृति के कार्य महत्तत्त्वादि और पृथिव्यादि पचमहाभूतो से छिपी वा ढपी हुई ( देवा. स्मशक्तिम् ) परमात्म देव को प्रात्मस्वरूप शक्ति को (ध्यान योगानुगताः) ध्यानरूप योगाभ्यास में तत्पर ईश्वर प्राप्तिके उपाय मे संलग्न ईश्वर परायगा समाहित हुए ( ते ) चन ब्रह्मबादी महर्षियो ने जगत् की रचनेवाली (भपश्यन् ) दिय की प्राखो से देखा वा जाना ॥ देवात्मशक्ति-इम समस्त पद का अनेक प्रकार से समा सार्थ हो सकता है मो दिखाते है । देवनाम मायाके स्वामी परमेश्वर की आत्मम्वरूप सस्वतन्त्र पराधीन मायाशक्ति को जगत् कारया ब्रह्मवादियो ने देखा जाना । इसी भ भिप्राय को आगे भी ग्रन्थमे दिखाया है कि माया नामक प्रकृति को जगत् का उपादान जानो और माया का स्वामी अधिष्ठाता परमेश्वर है। तथा भगवद्गीता मे भी कहा है कि मुझ ईश्वर की अध्यक्षता में प्रकृति माया चराचर जगत् को रचती है। यहा भो माया शक्ति भरवतन्त्र और ब्रह्म की सत्ता से अवस्थित मन्तव्य है । सत्त्व, रज और तमोगु प्रथमोऽध्यायः ॥ ११ गों से वह माया ढपी हुई है पर गंगा प्रसिद्ध है यह एक पक्ष हुआ। द्वितीय पक्ष यह है कि--देवात्मरूप नो पर. मेश्वर उसी रूप से विद्यमान मवंशत्वादि ईश्वरीय गुणों के सहित छिपी हुई अर्थात् ब्रह्म स्वरूपसे प्रतीत न होती हुई शक्तिको ध्यान देखा । उनी अंशमें कहा है कि मायाधिष्ठाता भगवान् इस जगत्को बनाता है। यह द्वितीय पक्ष हुप्रा । अथवा संमारकी उत्पत्ति स्थिति लय करने वाली ब्रह्मा विष्णु शिव नामको देवनाम परमेश्वरकी आत्म रूप शक्ति को देखा, वह शक्ति अपने सत्वरजस्तमोगुणों से आच्छादित होनेके कारण ब्रह्म स्वरूपसे प्रनीत नहीं होती। ब्रह्मा विष्णु शिव ये तीनों ब्रामको प्रधान शक्तियां हैं। अवस्था भंदके आधार पर ये शक्तियां परमेश्वर के ही सृष्टि प्रादि कामको करती हैं। वा यों याहो कि साकार परमेश्वर ही ब्रह्मादि नाम रूपोंसे संसारको उत्पत्ति प्रादि करता है । एक ब्रह्म है भिन्न स्वतन्त्र ब्रह्मादि देव नहीं हैं। यह तीसरा पन हुआ। अथवा जिस ब्रह्मने देव ईश्वर जीवात्मा, और माया शक्ति ये तीन अवस्था भेद हैं उस प्रकृति पुरुष और ईश्वर रूप, ब्रह्म रूपसे अवस्थित शक्तिको जगत्का कारण ब्रह्मवादियों ने जाना। इस बातको भोक्ता जीव, भोग्य प्रकृति और प्र. रफ देव ईश्वर ये तीनों ब्रह्म स्वरूप हैं ऐसा आने इसी अन्य में कहा है । यह त्रिविध शक्ति भी प्रकृत्यादि उपाधियों से गूढ़ है । एक ही परमेश्वर सब चराचरमें छिपा है ऐसा भी भागे कहा है यह चतुर्थ पक्ष हुआ । अथवा ज्योतिः स्वरूप व्यापक परमेश्वरकी स्वरूप भृत देवी शक्तिको अपने गुगोंसे श्राच्छादित जगत्का कारण ब्रह्मवादिघोने ध्यानसे देखा ॥ भावार्थ:-देवात्म शक्ति इम समास किये पद में जो पक्ष ऊपर दिखाये है वेदानुकून होने से उन सभी को ठीक जानो कृष्णयजुर्वेदीयश्वेताश्वतरोपनिषदि- तथा सब पक्षोमे निम्न लिखित एकता भी है कि ब्रह्मकी सत्तासे ही सत्तात्मक प्रतीत होने वाला ब्रह्मसे अधिष्ठित प्रस्वतन्त्र निमित्त तथा उपादान रूप जगत्का बहुविध का रण है। उस सब कारण मे स्वतन्त्र चेतनता और शक्ति न होनेसे मुख्य कर ससारका उत्पादक नहीं होता किन्तु सर्व शक्तिमान् एक परमेश्वरकी सत्तासे जगतकी उत्पत्ति होती है तिससे उसी ईश्वरको जगत्का उत्पादक वेदानुकूल होनेसे विद्वान् लोग मानते है। इस तृतीय नन्त्रका अभिप्राय यह है कि वर्तमान कालमे भी सूर्यादिके उदय तथा अस्तादि हानेके नियम अटल दीखते है और सब पदार्थों के जो उ त्पत्ति स्थिति प्रलय भी प्रतिदिन होते दीखते है उनके भ. नेक कारण भी प्रत्यक्ष मिलते है। परन्तु सब पदार्थोको नि यममे रखने वाली प्रतिसूक्ष्म चर्म चक्षु से अदृश्य छिपी हुई सर्व नियन्त्री कोई एक शक्ति है जिससे नियमित हुए चरा घर पदार्थ नियत प्रवृत्ति वाले दीखते है। अर्थात् जहा तक शोच विचारके हम पदार्थों को जान सकते है उन सबसे भिन्न पति सूक्ष्म सबमे गूढ एक अन्य भी शक्ति नाम रूप रहितहै। पाश्चात्यादि विद्वान् उस शक्तिका कुछ भी नाम कहे परन्तु हमारे पूर्वज महर्षियोने परमात्म स्वरूप उसी दिव्य शक्ति को सब वस्तु प्रोमे छिपी उसी २ के नाम रूपसे विख्यात सत्र पदार्थोंमे प्रविष्ट सब चेष्टा कराने वाली उत्पत्ति आदि का मुख्य कारण वरूप अति प्राचीनकालमे भी ध्यान योग के द्वारा शोच विचार कर ज्ञान चक्षुसे देखा और जाना था। तमेकनेमिं त्रिवृतं षोडशा- न्तं शताभरं विंशतिप्रत्यराभिः।
प्रथमोऽध्यायः॥ " १३ अष्टकैः षड्भिर्विश्वरूपैकपाशं त्रि- मार्गभेदं द्विनिमित्तैकमोहम् ॥४॥ अ०-य एकस्तानि निखिलानि काला- त्मयुक्तानि कारणोन्यधितिष्ठति स चोपनि- षत्सु प्रकारद्वयेन प्रतिपाद्यते-जगत्सम्बन्धं विहाय केवलस्वरूपमात्रेण क्वचिव्याख्यान- प्रकारः क्वचिच्च-“एकस्तथा सर्वभूतान्तरा- त्मा रूपंरूपं प्रतिरूपो बहिश्य, इति तत्तन्ना- मरूपावच्छेदेन सोपाधिकस्य व्याख्यानम् । यथा पृथिव्यन्तर्गतोन्याकाशवाय्वग्निजलानि स्थूलदर्शनेन भिन्नानि प्रतीयमानान्यपि सू- त्रवस्त्रादिवद्वस्तुतोऽभिन्नान्येवाभिमतानि भ- वन्ति तथैव "सओतः प्रोतश्च विभूः प्रजासु,, इति वेदप्रमाणमाश्रित्य वाससि सूत्रवत्पर- मेश्वरतोभिन्न जगन्नास्ति । किन्तु सर्व ख- ल्विदं ब्रह्म नेह नानास्ति किजुन । इति म- स्वा तमिति पदेन सर्वनियन्ता पूर्वंतृतीयमन्त्र उक्तः परमोत्मा ब्रह्माण्डचक्रस्वरूपेण व्यप- दिश्यते। प्रकृतिरव्यक्तमव्याकृतं परमाएवो- ख्यं मायाऽभिधं वैकं सर्वस्य जगतः कारण- १४ कृष्ण यजुर्वेदीयश्वेताश्वतरोपनिषदि- मुपादानमेव सर्वाधारं नेमिस्थानीयमस्या- धिष्ठातुरद्वितीयस्य परमात्मनस्तमेकनेमिम् । त्रिवृतं त्रिभिः सत्वरजस्तमोभिः प्रकृतिगण- वृतमाच्छादितम् । ज्ञानेन्द्रियकर्मेन्द्रियभेदेन दशेन्द्रियारयेकादशं मनः पञ्चभूतोन्येवं पो- डश विकाराअन्तोऽवसानं विस्तारसमाप्तिर्य- स्यात्मनस्तादृशं षोडशान्तं यद्वा प्रश्नोपनिष- दुक्तपोडशकला अंशा अन्तोऽवसानं पूर्तिर- स्य । अथवाऽव्यक्तकार्य समष्टिरूपं विराट- सूत्रात्मद्वयं तव्यष्टिरूपाणि भूरादिचतुर्दश- भुवनानि तानि षोडशान्तोऽवसानं यस्य प्र- पञ्चात्मनावस्थितस्य परमात्मनस्तं षोडशा- न्तम् । शतस्थाढे पञ्चाशत्प्रत्ययभेदविपर्ययाः शक्तितुष्टिसिद्धिसंज्ञका अराइव यस्य तं श- ताईम्-तत्र पचविपर्ययभेदाः शक्तरष्टाविंश- तिभेदास्तुष्टेर्नवाष्टौ च सिद्धयइति पञ्चा- शत् । तमो मोहों महामोहस्तामिस्रोऽन्धता- मिस्रइति पत्रुविधाऽविद्याविपर्ययभेदाः । मनोबुद्धिरहङ्कारः पञ्चतन्मात्राणीत्यष्टप्रकृ. तिष्वात्मबुद्धिस्तमोऽष्टविधम् । अणिमाद्य- ष्टसिद्धिषु सामर्थ्यप्राप्तिरष्टविधो मोहः । प- प्रथमोऽध्यायः॥ १५ वसु प्रत्यक्षेषु पञ्चस्वानुनविकेषु च शब्दादि विषयेषु भोगोत्कण्ठा दशविधो महामोहः । दशसु दृष्टानुत्रिकविषयेष्वष्टविधेरैश्वर्यैः प्रयतमानस्य तेषामसिद्धौ यः क्रोधः सोऽप्टा- दशविधस्तामिनः । अष्टविधैश्वर्यण दृष्टा- नुनविकदशविषयेषु भोगायोपस्थितेष्वर्द्धभु- क्तपु वा मृत्युना हियाणस्य यः शोकः- "अहो ! महतोत्रमेण क्ले शेन च समुना. र्जिता मयेमे भोगाः नचोपभुक्ताः सन्निहित- वायं मरणकालः पश्यतो मम सर्वमिदं प्रेयः प्रलीयते नात्र किमपि कत्तुं शक्तइति शोक- सागरएव निमज्जामि,, जायते सोऽन्धतामि- स्वइति गद्यते । इत्येवमन्धतामिस्रोऽप्यष्ठा- दशबिधएवास्ति तथा सति विपर्ययनाम्नी- तमआदिपञ्चविधाऽविद्या द्वाषष्ठिभेदा स- मूकन्याद्यभावो दशेन्द्रियशक्तयो न- वतुष्टिषु चैकैकस्यां तुष्टी द्वेवे शक्ती इत्य- ष्टादश इत्येवमष्टाविंशतिशक्तयः । नववि. धा तुष्टिर्यथा-कश्चित्प्राकृतजगतस्तत्त्वमसा- रत्वं दुःखहेतुत्वं च सम्यग्बुद्ध्वा कृतार्णेऽ- स्मीति तुष्यति तत्त्वं ज्ञातुं शक्तइति च म- कृष्णायजुर्वेदीयश्वेताश्वतरा पनिषदि- न्यते स च पुनर्विरक्तः सन् विरक्तोऽहं सर्व त्यक्तं शक्तोवेति मन्यते तुष्यति च । एवमत्र द्विविधा शक्तिरस्ति । अन्यः कश्चित् किं जगतस्तत्त्वज्ञानेन किं वा संन्यासाश्रमोपो- दानेन मुक्तिस्तु स्वतएव बहुना कालेन भव- तीति मत्वा तुष्यति । अपरः कोऽपि मन्यते नहि भाग्यमन्तरेण किमपि प्राप्तुं शक्यं यदि भाग्ये मोक्षोऽस्ति तर्हि भविष्यत्येवेत्ति परितुष्यति । न जातु कामः कामानामुपभो. गेन शाम्यतीति मत्वा विषयसङ्गदोषदर्शना- दुपारम्य कश्चित्तुष्यति । इमाश्चतस्त्रस्तुष्ट- यो विपयाणामर्जनरक्षणादिषु हिंसादिदोष- दर्शनेनास्वीकरणजन्याः पञ्च तुष्टयइति नव- तुष्टयो व्याख्याताः । जन्मान्तरसंस्कारप्राव ल्यादनायासेन प्रकृत्यादिविपयं यत्तत्त्वज्ञानं जायते सा प्रथमो हनामिका सिद्धिः शब्दा- नामभ्यासमन्तरेण पूर्वकालीनसंस्कारप्राब- ल्याद्यच्छन्दश्रवणमात्राज्ञानमुत्पद्यते सा द्वितीया सिद्धिः शब्दविषया। शास्त्राभ्यासाद् यत्प्रष्टं ज्ञानमुत्पद्यते सा तृतीयाऽध्ययन- सिद्धिः । आध्यात्मिकादिसुखदुःखसहिष्णुत- प्रथमोऽध्यायः॥ १७ योत्पन्न ज्ञानं त्रिविधा सिद्धिर्ज्ञानस्य, सुह- तसङ्गन या ज्ञानस्य सिद्धिः सा च सुहृत्प्रा- निर्नाम सप्तमी सिद्धिः । आचार्याय हितव- स्तुदाने यो विद्यासिद्धिः साऽष्टमी । एवं पञ्चाशदराः सभेदाः परिगणिता भवन्ति । दशेन्द्रियाणि तेषां च शब्दस्पर्शरूपरसगन्ध- वचनादानविहरणोत्सर्गानन्दा दश विषया- स्तोन्येव विंशतिः प्रत्यरा अराणां दादाय कोलकाइव भवन्ति तादृग्भिर्युक्तम् । अष्टसं- ख्यापरिमाणमस्य सोऽष्टकस्तादृशैः पड्भिर- ष्टकैर्युक्तम् । पञ्च तत्त्वानि मनो बुद्धिरहङ्कार इति प्रकृत्यष्टकम् , त्वक्चर्ममांसरुधिरमेदोऽ- स्थिमज्जशुक्राणि धात्यष्टकम् । अणिमाद्येश्व- र्याष्टकम्, धर्मज्ञानवैराग्यश्वर्याधर्माज्ञानावै- राण्यानेश्वर्या भावाष्टकम् । ब्रह्मप्रजापतिदे- वगन्धर्वयक्षराक्षसपितृपिशाचा देवाष्टकम् । क्षान्तिर्दयाऽनसूयाशीचमनायासो मङ्गलम- कार्पण्यमस्पहेति गुणाष्टकम् । एतैः षड्भिर- ष्टकैर्युक्तम् । विश्वानि सर्वाणि स्वर्गनरका- दीनि रूपाण्यस्य, एकः कामाऽभिलाषरूप एव कृष्ण यजुर्वेदीयश्वेताश्वतरोपनिषदि- पाशो बन्धनमस्य तद् विश्वरूप चैकपाशं च विश्वरूपैकपाशम् । धर्माधर्मज्ञानमार्ग- भेदा अस्येति त्रिमार्गभेदं यता-उत्पत्तिस्थि- तिलयास्त्रया मार्गभेदा अस्य तत् । वे शुभा- शुभे पृथक् २ मिनिते पुण्यपापे वा तयोः कर्मणोनिमित्तभूतएको मोही देहेन्द्रियमना बद्विजोत्यादिष्वनात्मस्वात्माभिमानोऽस्येति द्विनिमित्त कमोहम् । एवं भूतं ब्रह्मणश्चक्र- मिव ब्रह्माण्डमधीमः स्मरामइत्युत्तरपद्यना- न्वयोऽवगन्तव्यः । यद्वोक्तविधं ब्रह्मचक्र ध्या- नयोगानुगता अपश्यन्निति पूर्वणान्वयः ॥ भा०-नात्र चक्रपदमालङ्कारिकं यत्कु- म्भकारशकठादीनों चक्राणि सातत्येन चा- न्तानि दृष्ट्वा तद्वद ब्रह्माण्डस्य चक्रत्वं कल्पि- तमिति । अपित्वनादिवेदाशयेन ब्रह्माण्ड- स्याविरतभ्रान्तस्य यच्चक्रत्वं स्वतः सिद्धं तब्द- देव गतिं लक्षयदुभिर्विपश्चिद्वयः शकठाङ्गादी- नामपि चक्रत्वमुपकलिपतम्। तेन ब्रह्माण्डस्य प्रधानं चक्रत्वमस्ति । कुम्भकारादिचक्राण्य- त्यत्पकालं भ्रमन्ति संसारचक्रं च प्रतिकल्पो- रम्भे स्वाभाविकेक्षणेन परमात्मना सकृदेव प्रथमोऽध्याय ॥ भ्राम्यते तच्च तन्नियमबद्ध प्रलयावधि सात- त्येन भ्राम्यति न कदापि मध्ये तस्य विराम. केनापि कर्तुं शक्यते । ध्यानयोगेन तत्त्वज्ञा एव तच्चक्रगतिं स्वात्मन्यालोचयन्ति। ये च केपि कदाचिच्चक्रगतिमालोचयन्ति ज्ञान- चक्षुषा सम्यक् पश्यन्ति त एव तस्मात प्राप्त- विरामा शाम्यन्ति दुखान्मुच्यन्ते च यद्यपि तेषां दृष्टौ चक्रमान्ति समाप्यते तथाप्यन्य- साधारणलौकिक्रपुरुषापेक्षया तत्तथैवाविरत- तया भ्राम्यति तस्मादनाद्यनन्तकालीना च- क्रगतिरस्ति । यद्यपि चक्रपदमत्र पद्ये नास्ति तथापि नेम्यरादिलि स्तदुपादानं स्फुटमे- वास्ति ॥४॥ भावार्थ -जो एक ईश्वर काल तथा मारमा जीवादि उन सम्पूर्ण सृष्टि के कारणो का अधिष्ठाता है । उपनिषद् ग्रन्यो में उसका दो प्रकार से व्याख्यान किया है। कहीं तो सत्तार के साथ व्यापक उत्पादक पालकादि सम्बन्ध को छोड़ के केवल स्वरूप मात्र से उमका वर्णन है और कही 'वह ई श्वर सब पदार्थों में उन्ही २ के रूप से व्याप्त हो रहा है। उस २ नाम रूप से सोपाधिक ईश्वर का व्याख्यान है। जैसे पृथिवी के भीतर विद्यमान आकाश वायु अग्नि जलादि स्थूण दूष्टि से भिम प्रतीत होने पर भी वस्तुन सूत तथा वस्त्र २० कृष्णयजुर्वेदीयश्वेताश्वतरोपनिषदि- वा सुवर्ण और कुरडलादि के तुल्य एक ही माने गये हैं वैसे विम भगवान् प्रजा मे मोत प्रोत है ऐसा वेद प्रमाण होने से वन में सूत के तुल्य जगत् मे ईश्वर है, ईश्वर से भिन्न जगत् नही है। किन्तु यह सब जगत् ईश्वर ही है सत् चित् मानन्द स्वरूप से ईश्वर विद्यनान है। ऐसा मानकर तम् पद से वृनीय मन्त्रोक्त सर्व नियन्ता परमेश्वर का ब्रह्मा बड चक्र रूप से व्याख्यान किया है ( तमेरुनेमिम् ) सबके अधिष्ठाता प्रतिीय स्वामी उस ईश्वर से अधिष्ठित प्रक ति प्रधान अध्याकृत अव्यक्त परमाणु वा माया प्रादि जिस के नाम हैं ऐसा एक सूत्र कारण ही जिसकी नेमि नाम नाह है ( निवृतम् ) सच्य रजम् तमस् तीनो प्रकृतिके गुणो से युक्त वा भाच्छादित ( षोडशान्तम् ) पाच ज्ञानेन्द्रिय पाच कर्मेन्द्रिय ग्यारहवा मन और पृथिव्यादि पाच भूत इन सी. लह विकाररूप पदार्थोंमे जिसके अन्त नाम विस्तार की स माप्ति सपूर्णता होती अथवा प्रश्नोपनिषद् में कही सोलह कलामो में जिस का अन्त है अथवा अध्यक्त का कार्य विरा- ट् और द्वितीय सूनात्मा ये दो समष्टि रूप तथा व्यष्टि रूप चतुर्दश भुवन इन सोलह मे है भन्तनाम समाप्ति नित प्रप च रूप से अवस्थित परमेश्वर को वह षोडशान्त कहा गया ( शताद्वारम् ) सौ के आधे पचास प्ररा के तुल्य जिसमे लगे है। पाच विपर्यय नाम मिथ्याज्ञान वा अविद्या के भेद, प्रकार की शत्ति, नौ प्रकार की तुष्टि और पाठ प्रकार की सिद्धिया ये ब्रह्माण्डरूप पहिये के पचाश भरा है। उन में तनस मोह, महामोह, तामिस्र और अन्धतामित्र ये पाच अविद्या नामक विपर्ययके भेद है जिन में से मन,बुद्धि महङ्कार पाचतन्मात्र इन आठ प्रकृरियों में भात्मबुद्धि होना अर्थात् इन को समझना कि ये ही मै भात्मा हू या पाठ भट्टाईस प्रथमोऽध्याय ॥ २१ प्रकार का सम अणिना-छोटा हो जाना महिमा-बहा हो जाना, गरिमा-भारी हो जाना, लघिमा-हलका हो जाता, प्राप्ति जिस को चाहे पकह वा छू सके, प्राकाम्य-इच्छा का विधात न होना, ईशित्व सब को अपने आधीन कर दमा लेना और वशित्व जिस को चाहे वशीभूत कर सकना इन पाठ सिद्धियो में सामर्थ्य को प्राप्त होना यह माठ प्रकारका मोह, इस जन्म में मिलने योग्य प्रत्यक्ष और जन्मान्तर में प्राप्त होने योग्य स्वर्गादि सम्बन्धी प्रानुअविक इन शब्दा दि पाच २ कर दश विषयो में भोगने की उत्कट इच्छा का होना दश प्रकार का महामोह दृष्टादृष्ट पाच २ शब्दादि दो प्रकार के दश विषयो मे आठ प्रकार की सिद्धियो के साथ भोगने का प्रयत्न करते हुए पुरुषके विषय भोगोकी सिद्धि न होने पर अर्थात् विघ्नादि के कारण उस को विषयभोग प्राप्त न होने पर जो क्रोध होता है वह अठारह प्रकार का ता मिस्रनामक मिथ्याज्ञान तथा वैसे ही पाठ सिद्धियोके द्वारा भोगने के लिये उपस्थित हुए प्रत्यक्ष परोक्ष दश विषयो का साधा भोग होने वा कुछ भी न भोग पाने पर ही मृत्यु प्राके जिसकी चोटी पकह ली उस पुरुष को जो शोक होता 'किहा ।।। मैने बढे परिश्रम और बडे कष्ट से ये भोगके सा. मान सचित किये थे, अब यह मेरे मरने का समय मागया भी मैने न भोग पाया मेरे देखते ही मेरा यह मिप भोग साधन सब नष्ट हुमा जाता है । हाय अब क्या करू अब कुछ नही कर सकता इस से शोक समुद्र में ही डूबता हू यह अठारह प्रकार का अन्धतामिस्र दु ख वा अ- विद्या है । इस प्रकार मिथ्याज्ञान वा विपर्यय रूप अविद्या के ६२ वासट भेद होते अर्थात् ६२ प्रकार का मिथ्याज्ञान । २२ कृष्णयजुर्वेदीयश्वेताश्वतरोपनिषदि- हो जाता है। गंगा आदि न होना दश इन्द्रियों की दश विध शक्ति और नव तुष्टियों के साथ १८ अठारह, एक २ तुष्टि के साथ दो २ प्रकार की शक्ति जैसे कोई धन के विना संतुष्ट है तो धन के प्रभाव में दुःख न व्यापने की शक्ति और धन के मिलने पर त्याग वा उपेक्षा कर देने की शक्ति इस प्रकार एक २ तुष्टि से दो २ शक्ति सम्बन्ध रखती हैं । इस मकार भट्ठाईस शक्ति कहाती वा मानी जाती हैं। नव प्र. कार की तुष्टि वा सन्तोष यह है कि कोई मनुष्य ससार के तव नाम असारता और दुःख हेतु होने को सम्यक जान कर मैं कतार्थ हूं ऐसा विचारकर संतुष्ट होता मैं तत्वज्ञान- ता हूं ऐसा मानता वही फिर विरक्त हुआ मैं विरक्त हूं सब त्याग सकता हूं ऐसा मानता और तुष्ट होता है ऐसे यहां दो प्रकार की शक्ति है। अन्य कोई कहता है कि जगत् के त. च्वज्ञान से वा संन्यासाश्रम के ग्रहण से क्या प्रयोजन है। मुक्ति तो बहुत काल बीतने पर स्वयमेव ही हो जाती है ऐसा मान कर सन्तुष्ट हो जाता है। तथा अन्य कोई मानता है कि भाग्य के विना कुछ नहीं होता यदि हमारे भाग्यमें मोक्ष है तो हो ही जायगा । ऐसा विचार स्थिर करके संतुष्ट हो जाता । तथा कोई पुरुष “विषय भोगों से कामना की तृप्ति होती नहीं, ऐसा मानकर विषयों के संग में दोष देखके भोगों से हटकर सन्तुष्ट होता है यह चार प्रकार की तुष्टि तथा पांघ विषयों के भोगों का संचय और रक्षादि करने में हिंसादि दोष देख के उनका स्वीकार न करने से पांच प्रकार की तुष्टि उत्पन्न होती ऐसे ये नत्र सुष्टि हो जाती हैं । जन्मान्तर के संस्कारों की प्रबलता से सहज ही में जो प्रकृत्यादि विषयों का तत्वज्ञान हो जाता यह जन्म सिद्धि नामक प्रथम कह सिद्धि है।
प्रथमोध्यायः ॥ २३ शब्दों का अभ्यास किये बिना ही पूर्व संस्कारों की प्रबलता से जो शब्द के सुनने मात्र से अर्थज्ञान हो जाता है यह द्वि तीय सिद्धि है इसी को सर्वभूनों का शब्दज्ञान भी कहते हैं । वेदादिशास्त्रों के अभ्यास द्वारा जो प्रवल ज्ञान वा प्रवलशक्ति पूर्व संस्कारों की प्रबलता सहित प्रकट होती यह तीसरी अध्ययन सिद्धि, माध्यात्मिक प्राधिदैविक माधिभौतिक इन तीन प्रकार के सुख दुःखादि द्वन्द्वों के निर्विकल्प सहनद्वारा हुई शान्ति वा सन्तोष तीन प्रकार की ज्ञानसिद्धि मित्र या शुद्ध हृदय पुरुषों के समागम से हुई ज्ञान की सिद्धि सुह माप्तिनामक सातवीं तथा गुरु के लिये हितकारी दुर्लभ दार्थ को भी विद्यावल से लाकर देना यह पाठवीं विद्या सिद्धि है । इस प्रकार ब्रह्मचक्र के पचास भरा गिनाये गये हैं। (विंशतिप्रत्यराभिः) दश इन्द्रियां और शब्द स्पर्शरूप रस गन्ध ये श्रोत्रादि ज्ञानेन्द्रियों के यथासंख्य पांच विषय तथा हाच का पकड़ना, पग का चलना, गुदा का त्याग, पस्य का मानन्द और वाणी का बोलना ये कर्मेन्द्रियों के पांच विषय सब मिलके वीस प्रत्यरा नाम पचास अराओं को पुष्ट रखने के लिये पच्चर कहाते हैं। इन से युक्ति, (अष्टकःषड्भिः ) पाठ २ सख्या बाले छ: भष्टकों युक्त इन में पांच सूक्ष्म तत्व मन बुद्धि और अहंकार यह प्रकृत्यष्टक त्वक् चर्म, मांस, रुधिर, मेदा, अस्थि, मज्जा, और और वीर्य यह धातुओं का द्वितीय अष्टक, अणिमा, महिमा गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व यह आठ प्रकारका तृतीयाष्टक धर्म, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य, अधर्म, ज्ञान, अवैराग्य, अनैश्वर्यं यह चौथा भावाष्टक ब्रह्मा, प्रशा पति, देव, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, पितर, और पिशाच यह पांचवां देवाष्टक, क्षमा, दया, अनुसूया, शौध अनायास मंगल
कृष्णयजुर्वेदीयश्वेताश्वतरा पनिषदि-
उदारता सन्तोष यह षष्ठगुणाष्टक इन छ अष्टको से
(विश्वरूपैकपाशम् ) वर्ग नरक, पशु, पक्षो, कोट पतग स्या
वरादि नाना रूप बाला एक कामना सुख भोग की अभि-
लाषा वा तृष्णा ही जिस की फासी वा बन्धन है (त्रिमा
र्गभेदम् ) धर्म अधम और ज्ञानके तीन मार्ग भेद जिस के
है अथवा उत्पत्ति स्थिति प्रलय रूप जिस के तीन मार्गभेद
है ( द्विनिमित्त कमोहम् ) शुभाशुभ नाम पाप पुण्य रूप दो
प्रकार को जो कर्म उन का निमित्त शरीर इन्द्रिय, मन,
बुद्धि और ब्राह्मणादि जाति इन अनात्म पदार्थों में श्रा
त्माभिमान कि ये ही हम है ऐसा एक मोह है जिसका उसे
द्विमिमित्तक मोह कहते है। ऐसे पहिया के तुल्य ईश्वर
का यह सत्सारचक्र वा ब्रह्मचक्र है इस को ब्रह्मज्ञानी लोग
ऐसा ही चिन्तन करते हैं।
भा०-यहा धक पद का अर्थ अलङ्कार से लेना पाव
श्यका नही है कि कुम्हार के चार वा गाढी के पहिये की
तुल्यता को लेकर ससार को चक्र कहा वा माना हो सो ठीक
नही किन्तु सनातन वेद के भाशय और अनुमानादि द्वारा
निरन्तर सदा भनगा करने परिवतन होने वाले ससार का
जो चक्रपन स्वत सिद्ध स्वाभाविक है उसी के तुल्य दशा
मानकर गाढी के पहिये प्रादि को भी विद्वानोने 'चक्र माना
वा कहा है। इस से ब्रह्मायड ही मुख्य चक्र है । कुम्हारादि
के चक्र बहुत थोहे काल तक घूमते परन्तु परमेश्वर के स्वा
माविक ईक्षण से प्रतिकल्प के प्रारम्भ में ससारचक्र एक वार
घुमा दिया जाता है। वह ईश्वर के प्रबल नियम से प्रलय
पर्यन्त निरन्तर घूमता रहता है जिनके एक बार घमानेमे अ
नेक असख्य जन्म मागादि होते रहते हैं। प्रलयके पूर्व बा चमें
ससारके जन्म मरणादि सम्बन्धो परिवर्तन प्रवाहको कोई जन
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प्रथमोऽध्यायः॥ रोक नहीं सकता। ध्यानावस्य सूक्ष्म एकाग्र बुद्धिसे तत्त्वज्ञानी लोग हो ससारचक्र के प्रवाहको अपने भात्मामें साक्षात् देख पाते वापरख सकते हैं। और जो कोई शुभ संस्कारी पुरयात्मा कभी इस जगतके परिवर्तन प्रवाहको ज्ञानसृष्टिसे सम्यक् देखते घा देख पाते हैं वेही संसारसागर की भयंकर तरंगों से बचने का उपाय करते हुये शान्त होते और दुःखों से छूटते हैं। यद्यपि उन तत्रज्ञ लोगोंकी दृष्टि में संसार चक्र का घूमना समाप्त होजाता है तथापि अन्य साधारण लौकिक पुरुषोंकी अपेक्षासे संसारचक्र का प्रवाह वैमाही निरन्तर वहा चला जाता है इससे सिद्ध हुना कि बीघ २ प्रलयकाल में प्रवाह के रुकशाने पर भी वार २ अनादि अनन्त असंख्य सृष्टि प्रनयोंका वार २ निरन्तर होते जाना भी एक धक्र प्रवाह है। इस से अनादि अनन्त संसारचक्रको गति निर्विकल्प सिद्ध है । यद्यपि चक्रपद इस श्लोक में नहीं है तथापि नेमि और भरा आदि चिन्हों से तथा छठे मन्त्र में ब्रह्मचक्र पद के स्पष्ट आने से चक्र का व्याख्यान स्फुट है ॥४॥ पञ्चस्रोतोऽम्बु पञ्चयोन्युग्रवक्रां पञ्चप्राणोमि पञ्चबुद्ध्यादिभूलान् । पञ्चावत्ता पञ्चदुःखौघवेगां पञ्चाश- वेदां पञ्चपर्वामधीमः ॥५॥ अ०-संप्रति नदीरूपेण संसारात्मकब्रह्म प्रवाहं दर्शयति । पञ्च ज्ञानेन्द्रियाणि स्रोतां- सि बुद्धिप्रवाहनिस्सरणस्थानानि यस्या अ.
२६ कृष्ण यजुर्वेदीयश्वेताश्वतरोपनिषदि- म्बुस्थानानोव तांपञ्चस्रोतोऽम्बु नदीमधोम इति सर्वत्र सम्बन्धो धोध्यः । पञ्चभूतानि पृथिव्यादीनि योनयः कारणानि प्रवृत्तिहेतूनि तैरुग्रा वक्रा च तां पञ्च प्राणा जर्मयो यस्यां तां, पञ्चबुद्धीनां चक्षुरादिज्ञानेन्द्रियजन्यज्ञाना नामादिभूलं कारणं मनो यस्यां तां, पञ्ज वि- पया आवर्तस्थानीया निमज्जनहेतवो यस्यां तां, गर्भवासजन्मजराव्याधिमरणजन्यपञ्चम- हादु खौधानां वेगो यस्यां तां, पढगानि च- तुश्चत्वारिंशज प्रत्यङ्गान्येवं पञ्चाशदुभेदावि- भागा यस्यास्तां [ तत्र चतस्त्रःशाखामध्यं शिर इति षडङ्गानि । विंशतिरड्गुलयः खो- तांसि मस्तकोदरपष्ठनाभिललाटनासाचिबुक- बस्तिग्रोवाकर्णनेत्रभूशड्खांसतण्डककक्षस्तन- वृषणपावल्फिगजानुबाहूरूणीति प्रत्यङ्गानि ] अविद्यादयः पञ्चक्लेशाएव पर्वाणि बन्धनानि यस्यास्ताम् । एव नदीरूपेणावस्थितस्यनिखि- लस्य जगतो दृष्टान्तोदाहरणरूपं शरीरमिद- मधीमः स्मरामइति ते ब्रह्मवादिनो ध्यान- योगानुगता अपश्यन्निति पूर्वेणान्वयः ।
प्रथमोऽध्यायः॥ २७ भा०-यथा निरन्तरमहोरात्रं नदीवह- त्येवं प्राणिदेहप्रधानः 'संसारोऽपि संसरत्येवा निशं नैरन्तयेण तस्मादेव तस्य संसारत्वम- न्वर्थं संघटते । अस्यां च संसारनद्यामना- दिकालानिमज्जन्नपि जीवो न बुध्यते न जागर्त्ति । कश्चिदेव कृतसाधनः सुकृत्स्वद- शां यदा चिन्तयति तदो सएतस्माद् दुःखप्र- धाननदीप्रवाहान्निस्सर्तुमपि प्रयततएव ॥५॥ भाषार्थः-मब इस पांचवें मन्त्रमें नदीरूपसे संसारात्मक ब्रह्माप्रवाह को दिखाते हैं--(पञ्चस्रोतोऽम्युम् ) पांच ज्ञाने- न्द्रियों के छिद्र बुद्धिरूप अम्बु नाम जल निकलने के सोता जिसमें विद्यमान हैं ( पञ्चयोन्युग्रवक्राम् ) पांच प्रथिम्यादि भूत ही इस नदीके योनि नाम उत्पत्तिस्थान हैं जैसे हिमा. लय पर्वत गङ्गा नदीके निकलनेका योनि नाम कारण है वैसे हम मनुष्यादि प्राणियों के शरीर पृथिव्यादि भूतोंसे निक लते वा वनते हैं । और कारण की उग्रता तीव्रता से जैसे गङ्गादि नदियों में अनेक प्रकार की टेढाई होती वैसे यहां भी पृथिव्यादि कारण से ही शरीरों में नाना प्रकारकी कुटि. लता पाती है इस से हमारी देहरूप यह मदी कुटिल है (पञ्चप्राणोर्मिम् ) इस शरीरनदी में प्रांच प्राण ही पांच प्र. कार की तरंगें हैं ( पञ्चबुद्ध्यादिमूलाम् ) ज्ञानेन्द्रियों से होने वाली पांच प्रकार की बुद्वियों का आदि मूल जिस में मन है ऐसी ( पञ्चावतम् ) पांच शब्दादि विषय जिप्ट शु. रीर नदी में भावत नाम भंवर अर्थात् जीवात्मा को छुपाने
२८
कृष्णयजुर्वेदीयश्वेताश्वतरोपनिषदि-
वाले चक्कर है ( पञ्चदुःखौघवेगाम् ) गर्भवास. जन्मसमय,
यद्धपन अतिशिथिलावस्था, व्याधि-रोग और मरण इन
पांच, दुःखों के कारण पापों का प्रवाह वेग से जिस में निरः
न्तर वहा करता है और (पञ्चाशझेदार) जिस शरीर नदी
के अङ्ग उपाग रूप मुख्य कर पचास भेद हैं [ दो हाथ, दो
गोड़े, ये चार शाखा एक शिर एक मदिरा ये छः मुख्य अंग
है वेद के छः अंगों से ही मनुष्य के छः अंग बने हैं क्योंकि
वेद ईश्वरीय विद्या ही सव का कारण है इन छ: अंगों में
४४ प्रत्यड्ग है जैसे-हाथ और पगों की वीस भङ्गुलियां
२१ स्रोतारूप नसे नाही २२-मस्तक नाम मूर्दा २३-उदर २४
पीठ २५-नाभि २६-ललाट नाम माथा २७-नासिका,
२८-चिवुक नाम ठोडी २९-वस्ति नाम पैदन ३०-कमठ ३१-
फान ३२ नेत्र ३३-भौहें ३४-शङ्ख ३५-कन्धा ३६-तरह नाम टं
कना ३१-कास ३८-स्तन नाम थन ३९ -धरडकोष वा उपस्य
४०-पसुलिया ४५-स्फिच् नाम कटिभाग ४२-मानुनाम घोटू
४३-चाहे ४४-दो जंघा ये चवालीस उपाङ्ग तथा पूर्वोक्त छः
मङ्ग सब पचास भेद हुए और ( पञ्चपर्वाम् ) और पाच
भविद्यादि कोश जिसमें पांच गांठे हैं ऐसे नदीरूप से विद्या
मान स्व ब्रह्माण्ड की रचना के उदाहरण नमूना रूप इस
शरीर को (अधीमः ) हम ब्रह्मवादी लोग स्मरणा करते हैं
ऐसा उन योगी और ज्ञानी लोगों ने देखा जाना है ।
-जैसे दिन रात निरन्तर नदी बहती है ऐसे ही
प्राणियों के शरीर ही जिस में मुख्य हैं ऐसा यह सब संसार
भी निरन्तर चलायमान रहता है इसी से उस का नाम सं.
सार कहना सार्थक है । इस संसार नदी में जीव भनादि
पान से उबता उछलता गोते खाता हुआ भी नही जागता
सचेत नहीं होता किन्तु कोई उत्तम साधनों धाला पुरया-
भा-
२ प्रथमोऽध्यायः॥ स्मा पुरुष अपनी भीतरी दशा को जब शोचता है तब वह इस दुःख प्रधान नदी के प्रवाह से निकलने के लिये भी प्र. वश्य प्रयत्न करता है। सर्वाजीवे सर्वसंस्थे बृहन्ते त- स्मिन्हंसो भ्राम्यते ब्रह्मचक्रे । एथगात्मानं प्रेरितारं च मत्वा जुष्टस्ततस्तेनामृतत्वमेति ॥ ६॥ अ०-अस्मिन्कार्यकारणोत्मकब्रह्म चक्रे केन संसरति केन वा मुच्यतइति संसोरमोक्ष हेतुद्वयप्रदर्शनार्थमाह सर्वप्राणिनामाजीवन- मीषज्जीवनमस्मिंस्तस्मिन्सजीवे सर्वपांप्रा- णिनां संस्थासमाप्तिः प्रलयो मरणं वाऽस्मि- स्तादृशे तस्मिन् पूर्वोक्ते ब्रह्मणः परमात्मनः स्वामिनो वृहन्ते महति चक्रे भ्रमणशीले सं- सारेऽविद्यादिक्लेशैर्हसो हन्ति गच्छति ज्ञानं गमनं प्राप्तिं च करोति हन्ति प्रतिकूलमिति वा हंसः । स्वरूपेण शुद्धो निर्मलः सदसदविवे चनशीलोऽपि जीवो भ्राम्यतेअनात्मभूतदेहा- दिकमात्मानं मन्यमानो देवमनुष्यतिर्यगादि भेदभिन्ननानायोनिषुशुभाशुभकर्मभिश्चालयते।
३० कृष्णयजुर्वेदीयश्वेताश्वतरोपनिषदि- केनहेतुनानानायोनिषु भमतीत्याह । स्वमा- त्मानं जोवं प्रेरितारमीश्वरं च भेदेनात्मद्वयं पृथक्पथग् ज्ञात्वाऽन्योऽसावन्योऽहमस्मीति जीवेश्वरभेददर्शनेन संसारचक्ने परिवर्तते । केनमुच्यतइत्याह तेनेश्वरेणजुष्टोदीर्घकालाव- धि निरन्तरंसेवितस्सच्चिदानन्दब्रह्मस्वरूपोऽहं मस्मीति समाधाय जीवोऽमृतत्वं मरणादिदुः खाभावमेति प्राप्नोति । भा०-यथा नहि कोऽपि जलाशयं विहाय शुष्कस्थलाज्जलमाप्तुमर्हति तथैव स- र्वदा शुद्धमुक्तेश्वरं विहाय दूरं स्वतोभिन्न वा मत्वा न कोऽपि मोक्षाधिकारी भवितुम- हति । यथा चाग्निरेव शीतस्यौषधं न कोऽ- प्यग्निमन्तरेण शीतस्यौषधं कदापि कर्तुम- हति । एवमीश्वराभयएव जीवात्मनः शुद्ध- मुक्तश्च कारणं नान्यदित्येतदेव “ तमेव वि- दित्वाऽतिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽय- नाय० इत्यादिना वेदमन्त्रेणाप्युक्तं बो- ध्यम् ॥ ६॥ भाषार्थः-इस कार्य कारण रूप ब्रह्मचक्र पर किस हेतु से भमता वा किससे मुक्त होता है. सो. दिखाते हैं ( सर्वा:
प्रथमोऽध्यायः ॥ जीवे ) सब प्राणियोंका निसमें थोड़ा जीवन है ( सर्वसंस्थे) सब प्राणियों का प्रलय नाम मरण जिसमें हो जाता (त. स्मिन् महन्ते ब्रह्मचक्र हंसो भ्राम्यते ) उस पूर्वोक्त वृहत् नाम बड़े सर्वस्वामी ब्रह्म परमात्मा के भ्रमणशील इस सं. सार रूप चक्र में हंस नाम ज्ञान, गमन और प्राप्ति करने घाला वा प्रतिकून का हनन विनाश करने वाला स्वरूप से शुद्ध निर्मल सत्यासत्य का विवेचन शील भी जीवात्मा अवि. द्यादि क्लेशों से जाता है अर्थात् जड़ माया स्वरूप अनात्मा शरीरादि को प्रात्मा मानता हुआ कि यही मैं हूं देव मनुष्य तथा तिर्यगादि अनेक योनियों में शुभाशुभ कर्मों द्वारा भूमता है। अनेक योनियां में क्यों ममता है सो क- हते हैं (प्रेरितारमात्मानं च पृषड् गत्वा ) अपने जीव स्त्र रूप और प्रेरक अन्तर्यामी ईश्वर को भेद के साथ अर्थात् दोनों प्रात्माओं को पृथक् २ जान कर अर्थात् वह ईश्वर मुझ से भिन्न है और मैं जीव सदा ही उससे भिन्न हूं इस प्रकार द्वैत भेद ज्ञानसे संसार चक्र में भूमता है। फिर कैसे मुक्त होता है सो कहते हैं ( जुष्टः ) उस ईश्वर के साथ से वित कि सच्चिदानन्द ब्रह्म स्वरूप ही मैं हूं ऐसा समाधान करके ( ततस्तेनामृतत्वमेति ) तदनन्तर उस दीर्घ काल तक निरन्तर किये सेवन वा अहंग्रह उपासना से भरणादि सम्ब- न्धी महादुःख से छूट कर मुक्त हो जाता है। भा०—जैसे कोई प्यासा मनुष्य जलाशय को छोड़ सूखी पृथिबीसे जलको प्राप्त नहीं कर सकता वैसे ही सर्वदा सर्वथा शुद्ध निर्दोष नित्य मुक्त ईश्वरको छोड़ वा अपनेसे पृथक् दूर मानकर कोई भी मोक्ष का अधिकारी नहीं हो सकता। और जैसे वेद के सिद्धान्तानुसार अमि ही शीत का औषध है इसी से किसी देश वा काल में कोई भी पुरुष अग्नि के ३२ कृष्णयजुर्वेदीयश्वेताश्वतरोपनिषदि- वित्रा शीत की निवृत्ति कदापि नहीं कर सकता इसी प्रचार ईश्वर का पात्रय वा शरण लेना ही जीवात्मा की शुद्धि वा निर्दोष होने और मुक्ति का कारण है अन्य नही यही वेद का अटल अटूट सिद्धान्त " उसी ईश्वर को जान मान वा प्राप्त होकर मनुष्य भरणादि सम्बन्धी महान् दुःखसागर से छूट सकता है किन्तु इस मोक्षके लिये अन्य कोई मार्ग वा उपाय नहीं है , इत्यादि वेदमन्त्रसे कहा गया है ॥ ६ ॥ उद्गीतमेतत्परमं तु ब्रह्म त- स्मिंस्त्रयं सुप्रतिष्ठाक्षरं च । अ- त्रान्तरं ब्रह्मविदो विदित्वा लीना ब्रह्मणि तत्परा योनिमुक्ताः॥७॥ अ०-एतत्प्रेरित ब्रह्मान्यस्मात्प्रपञ्चात् प- रमं निरतिशयं पदमपत्रमिवाम्भसा प्रपञ्जेना. संस्पृष्टं तूद्गीतमुत्कर्षेण वेदादिशास्त्रे गीत- मुपदिष्ट "पुरुषोन्न परं किञ्चित्सा काष्ठा सा परागतिः,, “तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिद- मुपासते,, इत्यादिना, मायाप्रकृत्याद्यभिधज. डकारणस्य स्वातन्त्र्यसिद्धौ द्वैतापत्तिदोपआ- याति तन्निराकरणायाह-तस्मिन् ब्रह्मणि जी- वेश्वरप्रकृतिभेदेन भोकभोग्यप्रेरितभेदेन वा त्रयोऽवयवा भवन्ति तत्राक्षरं चाविनश्वरं प्रथमोगायः॥ सर्वदैकरसं ब्रह्म प्रकृतिपुरुषरूपभोग्यभोक्त्रोः सर्वदा जगतः कारणावस्थायामपि सुप्रति- ष्ठाऽऽधारः कथ्यते । अर्थात्प्रकृतिपुरुषौ सा- क्षिस्वरूपे ब्रह्मणि जलेजलतरङ्गवदन्यत्वा- पादकनास्ति तस्मादद्वैतम्मेब अनानयोः प्रप- अनाणोनिषु भोजनादिषु वा ब्रहाविदो ब्रह्म- ज्ञानसाधनेषु प्रवृत्ता अन्तरं भेदं विदित्वा सच्चिदानन्दस्यरूपं नित्यं शुद्ध ध्रुवा बूटस्थ बाला- नित्योऽशुद्धोऽध्रुवशालोऽसत्प्रपञ्चत्तस्य रज्जौ सर्पवद्वस्तुतोऽभाव एवास्तीति ज्ञात्वा समा- धिपरा ब्रह्मणि लीनाः स्वरूपशून्याइव भूत्वा योनिमुक्ता जन्मजरामरणादिसंसारभयावि- मुक्ता भवन्ति ॥ भा०-यद्यपि भोग्यभोक्तरूपेण प्रकृतिपु. रुषयोरत्र पृथक्त्वं दर्शितं तथापि यथा - थिव्या विकाराणां कालत्रयेऽपि पृथिव्येवाड- धारः प्रतिष्ठाऽस्ति अतएवोक्तं वाचारम्भणं विकारोनामधेयं मृत्तिकेत्येवसत्यमिति पृधि- वीविकाराः पधिवीरूपाएव सन्ति तथैव नाम- रूपमात्रं प्रकृतिपुरुषात्मकं जगद् वस्तुतो न- कृष्णयजुर्वेदीयश्वेताश्वतरोपनिषदि- ह्मणोऽभिन्नमेव एवं ब्रह्मणि प्रपञ्चे च सदसद्- रूपमन्तरं ज्ञात्वा ज्ञानिनां मोक्षो जायते ॥७॥ भाषार्थ -( एतत्परमन्तु ब्रह्मोद्गीतम् ) यह पूर्वोक्त अन्तर्यामी प्रेरक ब्रह्म, अन्य प्रपञ्च मायादि से निरतिशय महान् शुद्ध नित्य है, जैसे कमन्न के पत्ते मे जल नहीं लगता वैसे ससार के दोषो का स्पर्श उसके साथ नही होता इसीसे वेदादि शास्त्र में उसका उत्कर्ष सर्वोपरि कहा गया है "पुरुष परमेश्वर से परे कुछ नहीं है वही सबकी काष्ठा [हद्द] सीमा तथा वही सरकी परागति है, चाहे यो कहो कि सब भावो की अन्तिम सीमाका नाम ही ईश्वर है माया वा प्रकृत्या- दि जड को खतन्त्र मानने पर द्वैतापत्ति दोष पाता है उत्त की निवृत्ति के लिये कहते है कि-[तस्मिलयम्] उस एक ब्रह्म में जीव ईश्वर और प्रकृति ये तीन वा भोक्ता भोग्य मोर प्रेरक ये तीन भेद व्यावहारिक है। [सुप्रतिष्ठाऽक्षर च] उन तीनो में अक्षर नान अविनाशी एवंदा एक रस रहने वाला ब्रह्म, प्रकृति पुरुषरुप भोग्य भोक्ता जीव और जह ससार का सर्वदा कारण दशा मे भो अच्छा माधार पच्छे प्रकार अपने अन्नगत सम्हाल के रखने वाला होता वा क हाता है अर्थात् साक्षीरूप प्रेरक एक परमेश्वर ने प्रकृति और जीव जलमे जलतरग के तुल्य वैतके साधत नहीं होते, जैसे तरज भी जल का रूपान्तर है वैसे ही प्रकृति पुरुष भी ब्रह्म से भिन्न नही इससे अद्वैत होना सिद्ध है ( ब्रह्मविदोबान्तर विदित्वा ) ब्रह्मज्ञान के साधनो मे लगे ब्रह्मज्ञानी लोग इन दो वा तीनो जीव ईश्वर प्रकृति मे परस्पर अन्तर-भेद जानकर कि नित्य शुद्ध पचन एकरम, वूाटस्य ब्रह्म है और संसार प्रनित्य प्रशुद्ध चल परिवत्ती है रज्जुमे सर्प जैसे वा स्तव मे नही किन्तु अज्ञान से सप जान भय होता वैसे ब्रह्म प्रथमोऽध्यायः ॥ में जगत् भी वस्तुतः नही है ऐसा जानके (ब्रह्मगि लीना. स्तस्परा योनि मुक्ताः ) समाधि द्वारा ब्रह्मके ध्यान में लीन और तत्पर हुए जन्म जरा भरणादि ससारके भयसे मुक्त हो जाते हैं। भा०-यद्यपि भोग्य भोक्ता रूप से प्रकृति पुरुषका ब्रह्म से पृथक भाव यहाँ दिखाया है, तथापि जैसे पृथिवी के वि. कारों का तीन काल में भी पृथिवी ही भाधारवा प्रतिष्ठा है। इसी लिये कहा गया है कि "विकार वस्तु वाणीसे कथन मात्र है किन्तु मृत्तिका ही सत्य है । इस से पृथिवीके वि- कारोंका पृथिवी रूप होना सिद्ध है । वैसे ही प्रकृति पुरुष रूप जगत् ब्रह्मसे भिन्न वस्त्वन्तर वास्तव में नही है । इस प्रकार परमेश्वर और जगत्में सत् असत् नित्य अनित्य प्रादि महान् भेद को जान कर ज्ञानी महात्माओं का मोक्ष होता है ॥७॥ संयुक्तमेतत्क्षरमक्षरं च व्य- क्ताव्यक्तं भरते विश्वमीशः । अ- नीशश्चात्मा बध्यते भोक्तभावाद् ज्ञात्वादेवं मुच्यते सर्वपाशैः ॥८॥ अ०-वस्तुतो ब्रह्मणएकत्वेऽद्वितीयत्वेऽपि व्यवहारदशायां जीवेश्वरप्रकृतीनामौपाधिक- भेदं दर्शयित्त्वा तत्वज्ञानान्मोक्षो जीवस्य दर्शयति द्वाभ्याम् । अक्षरमविनश्वरमव्यक्तं निरतिशयसूक्ष्म प्रकृत्याख्यं जगतः कारणं, ३६ कृष्णयजुर्वेदीयश्वेताश्वतरोपनिपदि- क्षरं विनश्वरं पृथिव्यादिस्थूलं जगवयमेत- संयुक्तमितरेतर संसृष्टं विश्वं सर्वमीशईश्वरो निरतिशयशक्तिः परमेश्वरो भरते धरति पु- छाति च । तृतीयोऽनीशोऽज्ञानवन्धनहेतोः सर्वस्वामित्वाद्र हितो जीवात्मा भोवतृभावाद् भोगोन्कण्ठाकारणाद्वध्यतेऽविद्यातत्कार्य देहे- न्द्रियादिभिः सम्बध्यते । पुनः स-कदापि सुकृतप्राबल्यावखरे देवं द्योतनशीलं परमा- त्मानं तत्त्वतो ज्ञात्वा सर्वपाशैर्बन्धनैर्मुच्यते ॥ मा०-जगतः स्थूलदशायामेवानन्तभा- रस्य ब्रह्माण्डस्य धारकेण भाव्यं प्रलयकाले सूक्ष्मदशायां च मारामावाद् धारकापेक्षव नास्ति । कार्यदशायां कारणं तत्रैव व्याप्तं तिष्ठति । लोकेऽपि यः प्रमरीश्वरः सोऽन्यान् विभर्ति यशानीशोऽप्रमः स मस्त्यादिवदुभो. गलोभेन बध्यते यदा च सोनभरपि प्रभुत्वं जानाति तदा सोऽपि दैन्यं जहाति दुःखादपि मुच्यतएवमिहापि त्वस्य वास्तवं स्वरूपं ज्ञात्वा सर्व बन्धन क्षः सम्भवति ॥८॥ भाषार्थः-उस्तुतः परमेश्वरको एक शाद्वितीय होने पर भी व्यवहार दशामें जीव ईश्वर और प्रकृतिका शौपाधिक भेद प्रथमोऽध्यायः ॥ दिखाके तत्त्वज्ञानसे जीवका मोक्ष होना दो मन्त्रोसे दिखाते हैं । (क्षरमक्षरं च व्यक्ताव्यकं संयुक्तमेतद्विश्वमो शो भरते ) क्षर नाम विनष्ट होने वाला व्यक्त पृथिव्यादि स्थूल कार्य जगत् और अक्षर नाम अविनाशी अव्यक्त अति सूक्ष्म जगत् का कारण प्रकृति वा मायाप्रकृति ये दोनों कार्य कारण सदा संयुक्त रहते कारणमें कार्य तथा कार्यमें कारण सदा ही श्रोत. प्रोत रहता यही सब संसार वा ब्रह्माण्ड भर है इस को अ- सीम शक्ति रखने वाला सर्वस्वामी परमेश्वर सदा धारण वा पोषण करता है क्योंकि वही इनका मूल कारण है। (भोक्तृभा. वादनीशश्चात्मा बध्यते) तीसरा ज्ञान बन्धनसे असमर्थ सव जगत्के साथ खामोपन न रखने वाला जीवात्मा अविद्यादि केशों और उनके कार्य शरीर इन्द्रियादि के बन्धनमें विष- यभोग के लालच से बंधता पीडित होता कष्ट भोगता है। और उनमेसे कभी कोई जीव ( देवं ज्ञात्वा सर्वपाशैर्मुच्यते) द्योतनशील सर्व प्रकाशक चेतनों के चेतन ईश्वरको वास्तविक खरूपसे जान कर सब बन्धनों से छूट जाता है । भाल-संसार को स्थूल दशा में ही ब्रह्माण्डका अत्यन्त बोमा होनेसे धारण करने वालेकी विशेष आवश्यकता है। और प्रलय हो जाने पर संसारको सूक्ष्म दशामे विशेष बोझा न होनेसे धारण कर्ता को वैसी अपेक्षा नहीं है । जगत् की कार्यदशामें कार्यमें कारण व्याप्त हो कर रहता और प्रलयके समय कारण में कार्य सूक्ष्म होकर रहता है। लोकमें भी जो समर्थ धनाद्यैश्वर्य वाला होता वही अन्य असमर्थों का पा- लन पोषण करता है और जो असमर्थ होता वह मछली शादि के समान भोगके लोम से बन्धन में फंस जाता है। जब वह असमर्थ भी प्रभुताके मर्मको जानता है तब दीनता को छो. ड़तो और दुःखोंसे भी छूटता ही है इसी प्रकार यहां भी ३८ कृष्णयजुर्वेदीयश्वेताश्वतरोपनिषदि- ईश्वरके और अपने वास्तविक स्वरूपको जानके ज्ञानी मुक्त होता है ॥८॥ ज्ञाज्ञौ द्वावजावीशानीशावजा- टेका भोक्तृभोग्यार्थयुक्ता । अन- न्तश्चात्मा विश्वरूपो ह्यकर्ता त्रयं यदा विन्दते ब्रह्ममेतत्।। अ०-जीवापेक्षया ज्ञो ज्ञानस्वरूपईश्वर- स्तदपेक्षया च जोवः शरीराद्यभिमानेनाज्ञो द्वाविमावीशानीशौ स्वाम्यस्वामिनावजावजा यमानी नित्यावनादी ईश्वरांशजीवस्य जन्म- मरणादि प्रवाहः कदारभ्य प्रवृत्त इति वक्तुं ज्ञातुं वाऽशक्यमतो जीवत्वस्यानादित्वम् । भोक्ता जीवो भोग्यं पृथिव्यादिविकारजन्य- मन्नादिकं बहुरूपं ताभ्यां भोक्तभोग्यार्थाभ्यां युक्तैका प्रकृतिरपि तृतीयाऽजाऽजायमाना नित्याऽनादिरिति यावज्जगतउत्पत्तिस्थिति प्रलयानामनादित्वादेव मायायो अनादित्वं ब्रह्मसत्तयैव वयोरात्मलाभावस्तुतोऽसत्त्वमिति । सर्वस्मिन् कार्य जगति तत्तद्रूपेण व्याप्तस्त- त्तन्नामरूपावच्छिन्नो वासस्सु सूत्रवदोतः प्रो- प्रथमोऽध्यायः॥ ३० तश्च सर्वरूपोऽह्यकर्त्ता निष्क्रियोऽनन्तोऽनन्त- शक्तिरात्मा व्याप्त ईश्वर इत्येतत्त्रयं ब्रह्म ब्रह्म- स्वरूपं ब्रह्मात्मकमेव यदा विन्दते प्राप्नोति लभतेऽर्धाद्यथाहाटके कटकोदि कल्पितं तथा भगवति प्रकृतिपुरुषो कल्पिती वस्तुतो हाट- कवदेकएव शुद्धो भगवानिति जानाति तदा विश्वमायानिवृत्तिरित्युत्तरेणान्वयः ॥ भा०-ईश्वरांशत्वेन जीवस्याजत्वं मायाया अपि ब्रह्मात्मकत्वेनैवाजत्वमवगन्तव्यम् । खरूपतः स्वातन्त्र्येण तयोरनादित्वे नेहना- नास्तिकिंचनेत्यादिश्रुतिविरोधात अयस्का- न्तवदनिच्छत्वादात्मनोऽकर्त्तत्वं सन्निधिमा- त्रेण च कर्त त्वमप्यस्त्येव । एवं व्यवहारद- शायामविद्योपाधेर्जीवत्वे समवायिकोरणोपा. धेश्च प्रकृतित्वेऽभिमतेऽपि ब्रह्मात्मकमेव वस्त- तः सर्वमिति तत्त्वज्ञानमेव मोक्षसाधनमित्या- शयः ॥६॥ भाषार्थः-( ज्ञाज्ञी द्वावजावीशानीशौ) जीवकी अपेक्षा ईश्वर ज्ञानस्वरूप और ईश्वरापेक्षासे जीव शरीराधभिमानी होनेसे अज है ईश्वर स्वामी मालिक और जीव खनाम उस की मिल्कियतके अन्तर्गत है तथा दोनों जीव ईश्वर अज नाम अनादि हैं ईश्वरांश जीव का जन्म मरणादि प्रवाह कब से चला ऐसा कहना वा जानना अशक्य होनेसे जीवको अनादि
कृष्ायजुर्वेदीयश्वेताश्वतरोपनिषदि-
कहा, पर जीवत्व अनन्त नही है क्योकि ज्ञानदशा मे जीव
भावमा अन्त हो जाता है पोर ( भोक्तभोग्यार्थयुक्ता ह्ये
काजा) भोक्ता जीव तथा पृथिव्यादि विकारो से उत्पन्न
होने वाला अनेक रूपोचे युक्त अन्न भोग्य है इन दोनो मे
युक्त पूरा मेल रसने वाली तीसरी एका प्ररुति भी प्रजा किसी
से उत्पन्न नहीं होनेने नित्य अनादि है जगत्के उत्पत्तिस्थि
तिप्रलयका प्रवाह क्वसे चत्ता इसशा आदि न होनेरो का-
रण रूप मायाको अनादि कहा है। तथा प्रकृति भोर जीन
दोनोका ब्रह्मसत्ता से ही खरूप लाभ होनेके कारण वास्तव
मे खतन्त्ररूपसे दोनो गमत् है। (विश्वरूपो ह्यकर्ताग्नन्त-
श्वात्मा) सब कार्य कारणात्मक जगत् मे उमी २ रूप से
व्याप्त वयोगे सूत जेसे उस २ वरो नामरूपसे माना जाता
वैसे ही जगत् के सन पदार्थो में उसी २ के नामरूपसे विद्यमान
परमेश्वर भी सनमे सूत्रवत् अोतप्रोत है इसीसे सर्वरूपधारी
प्रकर्ता निष्क्रिय अनन्त शक्ति वाला भात्मा ईश्वर (ए
तत् जय ब्रह्म यदा विन्दते ) इन तीनो जीव ईवर भोर
प्रकृतिको तरग फेनादिको जल स्वरूप जानने के तुल्य ब्रह्म
स्वरूप ब्रह्मात्मक जव जीव जान लेता है तब उस की मब
माया सब छन कपट ईा द्वेपादि दोप बृट जाते है ॥
भा०-ईश्वराश होनेसे जीवका पौर ब्रह्मात्मकरूपते ही
प्रकृतिका अनादि होना जानो। यदि स्वतन्त्र स्वरूपसे उन
दोनो को अनादि माना जाय तो ( मर्व खल्विद ब्रह्म) इ
त्यादि श्रुतियोसे विरोध दोप है । चुम्बकको तुल्य इच्छा र-
हित होनेसे आत्मा अमर्ता और मन्निधिमात्र से कर्ता भी
माना जाता है । व्यवहार दशामें विद्योपाधिका जी
वत्व और उपादानकारगोपाधि मारमाका प्रकृतित्व स्वीकृत
होने पर भो जीव और प्रकृति वस्तुन ब्रह्मस्वरूप ही है
ऐमा तत्त्वज्ञान ही मोक्षका साधन है यही माशय है ॥६॥
प्रथमोऽध्यायः॥ ४१ क्षरं प्रधानमताक्षरं हरःक्षरा- त्मानावीशते देव एकः। तस्याभि- ध्यानाद्योजनात्तत्त्वभावाद् भूय- श्चान्ते विश्वमायानिवृत्तिः ॥१०॥ इदानी प्रधानेश्वरयो।लक्षण्यं दर्शयि- त्वाऽऽत्मतत्त्वज्ञानेनामृतत्वं दर्शयति-महदादि- रूपेण विपरिणमत इति प्रधानस्य क्षरत्वम् । संहरति सर्व स्वस्मिन्निति हर ईश्वरः । अ- मृतं च तदक्षरममृताक्षरं ब्रह्म हरस्य विशेप- णमेतत् । एको देव ईश्वरः क्षरात्मानौ प्रकृ- तिपुरुषावीशतेईष्टे तयोः स्वामी प्रभुर्भवति खाधिकारे स्वनियमे तौ स्थापयति । तस्य देवस्याभिध्यानाघोजनादभेदभावेन संयोज- नात्तत्वभावात्तत्त्वस्य यथार्थभावस्य परमा- स्मस्वरूपस्य सत्यस्यात्रयणाद भूयः पुनःपुन- रभ्यासेनाभिध्यानादिसेवनाच्चान्ते विश्वस्या सुखदुःखमोहात्मिकाया मायाया आत्मत्वा- पन्नायाः प्रकृतेर्निवृत्तिर्भवति ॥ भा०-प्रधानेन तत्कार्यजन्यभोगेन च जीवस्य विशिष्टः सम्बन्धएव बन्धः परमा- ४२ कृष्णायजुर्वेदीयश्वेताश्वतरोपनिषदि- त्मतो विमुखीकरणहेतुश्वास्ति प्रकृतिर्मम नि- बन्धना जड़ा ततः पृथग्भावमन्तरेणेश्वरमा- प्तिरसम्भवा । अतः प्रकृतेहैयत्वमीश्वरस्यो- पादेयत्वं स्वस्य च तादात्म्यं यदा जानाति तदैव मुक्तिहेतुकं ज्ञानं जायते ॥ १० ॥ भाषार्थ -अब माया और ब्रह्मको विलक्षणता दिखाके मात्माके तत्त्वज्ञानसे मोक्ष दिखाते है-(क्षरं प्रधानममृता- क्षरं हरः) महत्तत्त्वादि रूप से परिणाम को प्राप्त होता इस कारण प्रकृति नामक माया क्षर नाम विनाशधर्मक है तथा प्रलय समयमें सत्र संसारको अपने भीतर हरण कर लेता इस से संहार कर्ता ईश्वर हर नित्य मुक्त और अविनाशी है (एको देवः रामानावीशते ) एक ही देव ईश्वर प्रकृति और पुरुष नाम जीवका खामी होता उन दोनो को अपने अधिकार और नियममें सदा स्थापित करता है ईश्वरले नि- यम वा इच्छासे विरुद्ध जीव तथा प्रकृति कुछ नही कर स- कते (भूयश्च तस्याभिध्यानाघोजनात्तत्त्व भावात् ) वार २ उस देव ईश्वरका समाधि द्वारा विशेष कर निरन्तर ध्यान करने, अभेदभावसे सयोजन करने और तत्व नाम परमात्मा स्वरूप यथार्थ भाव सर्वथा सत्य का आश्रय करने से ( भन्ते विश्वमायानिवृत्ति ) अन्त में प्रात्मभाव को प्राप्त हुई सुख दुःख मोहात्मिका सब बुद्धि प्रादि रूप माया की भी नि वृत्ति हो जाती है तब पुरुष केवल होनेसे मुक्त हो जाता है। भाo-प्रधान प्रकृति तथा उसके कार्य स्थूल जगत्सम्ब. न्धी भोगोंके साथ जीवका विशेष सम्बन्ध होना ही बन्धन तथा परमात्मासे विमुख करने वाला है। प्रकृति माया मुझ प्रथमोऽध्यायः ।। ४३ को बांधने वाली जड़ है उस से पृथक हुए विना ईश्वर की प्राप्ति असम्भव था दुर्लभ है ऐसा शोधा करें। इससे प्रकृति के त्याज्य होने, ईश्वर के ग्राह्य होने और अपने तादात्म्य सम्बन्धको जब जीव यथावत् जान लेता है तभी मुक्ति का हेतु ज्ञान हो जाता है ॥ १० ॥ ज्ञात्वा देवं सर्वपाशापहा- निः क्षीणैः क्ल शैर्जन्ममृत्युप्रहा- णिः । तस्याभिध्यानात्तृतीयं दे- हभेदे विश्वैश्वर्य केवल आप्त- कामः॥११॥ अ०-तं देवमीश्वरं ज्ञात्वा सर्वपाशानां बन्धहेत्वविद्यादिलशानामपहानिस्तैः क्षीणैः क्लेशैर्जन्ममरणयोः प्रहाणिः प्रकृष्टा हानिस्ते- नाखिलमेव दुःखं हीयते दूरीभवति। तस्ये- श्वरस्य पुनरप्यभिध्यानाद् देहभेदे पूर्वकर्मों- पात्तशरीरत्यागकाले विश्वमखिलमैश्वर्यम- स्य तादृशं प्रकृतिपुरुषद्वयापेक्षया ततीयं पदं ब्रह्म प्राप्य केवल एकः प्रकृतिसङ्गाद्विमुक्त आप्तकामो मुक्तिपदं प्राप्तो भवति मन्यते च प्राप्तं प्रापणीयं क्षीणाः क्षेतव्याः क्लशाः ॥
४४ । कृष्णयजुर्वेदीयश्वेताश्वतरोपनिषदि- भाव-सर्वमुमुक्षुपुरुषः सर्वदा पूर्व मि- ध्याज्ञाननिवृत्तये प्रकृष्ट उपायः कार्यस्तेनै- वोत्तरोत्तरं सर्वाभीष्टसिद्धिः सुलभा सम्भाव्य- ते । मिथ्याज्ञानापाय पराधीनतादिसर्वबन्ध- नानां निवृत्तौ दुःखाभावः प्रथमा कक्षा, न- ष्टेषु च मिथ्याज्ञानादिदोषेषु मरणादिभय- निवृत्तौ शान्तिलाभो द्वितीया दशा, तदन- न्तरमीश्वरबोध ईश्वरप्राप्तिस्तृतीयपरिणामो मुक्तिः ॥११॥ भाषार्थ:-(देवं ज्ञात्वा सर्वपाशापहानि:) उस देव ईश्वर को जानकर बन्धन के हेतु सब अविद्यादि सूक्ष्म क्लेशों का भी नाश हो जाता है (क्षीणोः क्लोशैर्जन्ममृत्युमहाणिः) और लोगों के क्षीण होजाने से जन्म मरण की उत्तम प्रकार सर्वघा हानि नाश हो जाता ( तस्याभिध्यानाद् देहभेदे विश्वैश्वर्य तृतीयस्) उस ईश्वर का वार २ ठीक ध्यान करने से पूर्व कर्मानुसार धारण किये शरीरका त्याग नाम मरण होने के समय सम्पूर्ण ऐश्वयोंके स्वामी प्रकृति तथा पुरुष को अपेक्षासे तृतीय ब्रह्मपद को प्राप्त होके (केवल प्राप्तकामः) प्रकृति के उङ्ग से छूट कर केवल अभीष्ट का. सना को प्राप्त हुभा मुक्तिपदको प्राप्त होता और मान लेता है कि मैंने प्राप्त होने योग्यको प्राप्त कर लिया तथा मेरे नष्ट होने योग्य होश बूट गये। भा०-सब मुमुक्ष पुरुषीको सब समयमें पहिले मिथ्याज्ञान को छुडानेके प्रबल उपाय करना चाहिये । उसीसे भागे २ सु. समतासे सव भीष्टोंकी सिद्धि होना सम्भव है। निथ्या ज्ञान प्रथमोऽध्यायः॥ ४५ छूटने पर पराधीनतादि सब बन्धनोंको निवृत्तिमें दुःख का अभाव प्रथम कक्षा, मिथ्याज्ञानादि दोपोंके नष्ट होने पर म. रणादिका भय बूटनेसे शान्ति प्राप्त होना द्वितीय दशा, त. दनन्तर ईश्वरका बोध ईश्वरकी प्राप्ति यह तीसरा परिणाम बदलनाही मुक्ति है ॥११॥ एतज्ज्ञेयं नित्यमेवात्मसंस्थं नातः परं वेदितव्यं हि किञ्चित्। भोक्ता भोग्यं प्रेरितारंच मत्वा सर्व प्रोक्तं त्रिविधं ब्रह्ममेतत्॥१२॥ अ०-एतदुक्तं तृतीयं ब्रह्म नित्यमेव स्वस्य आत्मन्यन्तःकरणे जीवस्वरूपेणाऽवस्थित- मेव ज्ञेयं नान्यत्र वहिः क्वाप्यन्वेष्यम् । क- ठोपनिषदि चोक्तम् “तमात्मस्थं येऽनपश्य- न्ति धीरास्तेषां शान्तिः शाश्वती नेतरेषाम्,, हि यस्मादतो ब्रह्मणः परं प्रकृष्टं कल्याणहे. तुकं न किमपि वेदितव्यमस्ति । भोक्ता जीवो भोग्या प्रकृतिर्माया प्रेरिता सर्वान्तर्यामीश्वरः सर्वं त्रिविधमप्येतद् ब्रह्म ब्रह्लव वेदे प्रोक्तं ब्रह्मणो भिन्नः कोऽपि भोकत्रादिनास्ति भो-। कत्रादिनामरूपैब्रीवावस्थितमित्याशयः ॥
कृष्णयजुर्वेदीयश्वेताश्वतरोपनिषदि- भा०-योगसमाधिना हृद्येव ब्रह्मणो ज्ञा- नायोद्योगः कार्यः । तेन बहिरन्वेषणाय प्र- यतमाना भ्रान्ता इत्युक्त भवति । लोकेऽपि यथा प्रधाने ज्ञातेऽप्रधानमनायासेनैव ज्ञातं भवति तथैव सर्वस्वामिनि ब्रह्मणि तादात्म्य भावेन ज्ञाते सर्वमेव ज्ञायते ॥ १२ ॥ भाषार्थः-(नित्यमेवैतदात्मसंस्थ ज्ञेयम् ) इस पूर्व श्लोक में कहे तीसरे परमात्मा को अपने अन्तःकरणा में नित्य ही जीव स्वरूप से अवस्थित जानना चाहिये किन्तु कहीं बाहर नहीं खोजना चाहिये अपने भीतर अन्तःकरण में ही मनुष्य को ईश्वर का ज्ञान वा प्राप्ति हो सकती है । कठोपनिषद् मे लिखा भी है कि "नो ज्ञानी लोग अपने अन्तःकरण में ही उस ईश्वर को देखते हैं उन ही को सनातनशान्ति और सुख प्राप्त होता है अन्यों को नही, (अतः परं वेदितव्यं किञ्चिन्नहि ) जिस कारण इस शारीरब्रह्म से परे उत्तम वा अधिक जानने योग्य और कुछ भी नही है इससे अपने भी. तर ही ब्रह्म को जाने । एक सर्वखामी मुख्य वस्तु ईश्वर के जान लेने पर वा उस की प्राप्ति हो जाने पर (भोक्ता, भोग्य प्रेरितारं च मत्वा ) भोक्ता जीव, कार्य कारण रूप स्थूल सूक्ष्म भोग्य जगत् रूप माया और प्रेरक अन्तर्यामी परमेश्वर इस सब त्रिविधको मानके भी वेदमें (सर्वमेतत्रिविधं ब्रह्मन् प्रोक्तम् ) इस सबको त्रिविधव्रह्म कहा है ब्रह्मसे भिन्न भो. क्तादि स्वतन्त्र कोई वस्तु नही है अर्थात् मोक्तादि नाम रूपों से एक ब्रह्म ही अवस्थित है यही आशय जानो।
प्रथमोऽध्यायः॥ ४५ भा०-योग समाधि द्वारा अपने हृदय में ही ब्रह्म को जानने का उद्योग करना चाहिये । इस कारण ईश्वर को बाहर खोलने का उद्योग करने वाले भ्रान्ति में हैं, यह सिद्ध हो जाता है। लोक में भी जैसे प्रधानके जान लेने वा मिल जाने पर प्रधान को मेल वा ज्ञान स्वयमेव हो जाता वैसे ही सर्वस्वामी ब्रह्म को अपने साथ तादात्म्य भावसे जानलेने पर सभी शेष जान लिया जाता है ॥१२॥ वहूर्यथा योनिगतस्य मू- तिर्न दृश्यते नैव च लिङ्गनाशः। स भूयएवेन्धनयोनिगृह्यस्तदो- भयं वै प्रणवेन देहे ॥१३॥ स्वदेह- मरणिं कृत्वा प्रणवं चोत्तरारणि- म् । ध्याननिर्मथनाभ्यासाद् देवं पश्येन्निगूढवत् ॥१४॥ तिलेषु तैलं दधनीव सर्पिरापः स्रोतस्स्वरणी- षु चाग्निः । एवमात्मात्मनिर- ह्यतेऽसौ सत्येनैनं तपसायोऽनु- पश्यति ॥१५॥सर्वव्यापिनमात्मा- नंक्षीरे सर्पिरिवार्पितम्। आत्मवि ४८ कृष्णयजुर्वेदीयश्वेताश्वतरोपनिषदि- बातपोमूलं तद् ब्रह्मोपनिषत्पर तद् ब्रह्मोपनिषत्परम् ॥ १६ ॥ इति श्वेताश्वतरोपनिषदि प्रथमोऽध्यायः॥ अ०-यथा वंशारणिदीपशलाकादिकार- णवस्तुन्यवस्थितस्य वह मूर्तिः साक्षानुरूपं न दृश्यते नैव च तस्य सूक्ष्मरूपावस्थितस्य नाशोऽभावोऽस्ति यद्यभावः स्यात्कुत उत्प- घेत । स भूयः पुनःपुनरेवेन्धनयोनिगृह्यो घर्पणमन्थनादिना साक्षानिस्सरति । तद्वा तवद्देहे ब्रह्मणः प्राकट्यमप्राकट्यं चोभयमे- वास्ति । प्रणवेन घर्षणादिना ब्रह्म गृह्यते साक्षाज्ञायते । स्वस्य देहमरणिं प्रणवं चोत्तरारणिं कृत्वा ध्यानयोगेन निर्मथना- भ्यासान्निगूढानिवदेवं दीप्यमानं ज्योतिः- स्वरूपं ब्रह्म पश्येत्साक्षात्कर्तुं यतेत । तिलेषु व्याप्त तैलं यथा पीडनेनोपलभ्यते, दधनि व्याप्तमदृश्यं घृतं यथा मन्थनेन सोक्षाज्जा- यते । खोतस्सु नद्याः समीपे भूमिभागखन- नेन यथाऽऽपो व्यज्यन्ते, अरणीष मन्थनेन ४ प्रथमोऽध्यायः॥ च यथाऽग्निराविर्भवति। एवमात्मेश्वर आ- त्मनि स्वस्यैवान्तःकरणे गृह्यतेऽसौ परोक्षोऽपि तेन जनेन साक्षात् क्रियते यएनं सत्येन व्या- जादिकं त्यक्त्वा सर्वभूतहितार्थवचनेन व्यवह- रन् ज्ञानेन्द्रियमनसामेकाग्रतारूपेण जितेन्द्रि- यत्वेन तपोऽनुष्ठानेन चोऽनुपश्यति सर्व पश्यन्तमनपश्यति । क्षीरे सर्पिरिवार्पित व्याप्नं सर्वव्यापिनमात्मानमोश्वरमात्मविद्या- तपसोश्च मूलं प्रधान प्रयोजनमुट्टेशः, आ. त्मविद्यातपांसि च ब्रह्मज्ञानमुद्दिश्यैवोपदि- ष्टानि । तपांसि सर्वाणि च यद्वदन्तीत्यादिक- थनादवसेयमेतत् । एषयव साध कर्म कारयति । उपनि। ददामिबुद्धियोगंतं येनमामुपयान्तिते इति भगवद्गीतासु । उपनिषदएव परा प्र- कृष्टबोधहेतुका यस्य येन वा मुख्योपायेन ब्रहाज्ञायते सएवोपनिषत्पदवाच्यइत्युभयथा- प्येकएवार्थो निस्सरति । द्वित्वमत्राध्यायप- रिसमाप्तिबोधना) विज्ञेयम् ॥ भा०-एतत्पद्यचतुष्टयेन "एतज्ज्ञेयं नि- त्यमेवात्मसंस्थम्, इति संक्षेपतो द्वादशपद्यो- क्तविषयस्य प्रपञ्चो व्याख्यानमिति यावत् । 9 ५० कृष्णयजुर्वेदीयश्वेताश्वतरोपनिषदि- तज्जपस्तदर्थभावनमित्यादियोगशास्त्रोक्तप्रका- रेण यो जिज्ञासुर्दीर्घकालावधि नैरन्तर्येणे- काग्रचेतसा जितवाक्कायमानसो वाचकप्रण- वेन वाच्यमीश्वरमुपास्ते ध्यायति तनिष्ठ- स्तत्परस्तद्बुद्धिर्भवति स कालेन स्वात्मन्येव साक्षाज् ज्ञानचक्षुषा पश्यत्येवेश्वरमिति न कश्चिद्धविकल्पः केनापि कर्तुं युक्तः ॥ १३-१६॥ भ० (यथा योनिगतस्य वन्हेतिनं दृश्यते नैव च लिङ्ग नाशः ) जैने वांस अरगि और दीवामलाई शादि अपने कारण में रहते हुए अमि का साक्षातरूप नहीं दीख पड़ता और न उन वांस आदि में कारणरूप अनि के चिन्हमा प्रभाव होता यदि अमाव होता तो उनमें से उत्पन्न ही कहां से वा कैसे होता ? ( स भूयएवेन्धनयोनिगृह्यः) वह अग्नि फिर २ वार २ ई धन के संयोग से घिसने मथने आदि द्वारा सा सात् निकलता प्रकट होता जल उठता है (तद्वोभयं वै प्रण- वेन देहे ) उसके तुल्य इस मानुष देह में प्रोम् की उपासना द्वारा परमेश्वर साक्षात् ज्ञात होता और ठीक चपासना हुए विना शरीर में प्रकट तिरोभत रहता अर्यात् इसी शरीर में प्रस्टता अप्रकटता दोनों होती हैं ॥ (स्वदेहमरणिं कृत्वा प्रगावंचात्तरारपिस् ) अपने शरीर को अर्थात् अन्तःकरण की त्तियों को नीचे की भरणि और ओंकारको जपरको द्वितीय अरगिण कर अर्थात् ओंकारके साथ ही अपनी बुद्धि इन्द्रिय, और शरीरको जोड़कर ( ध्याननिर्मथनाभ्यासात् ) ध्यानयोग के न थ मथने के अभ्याम से ( निगूडनद्देव पश्येत् ) बांस श्रादि में गुप्त अग्नि के सनान प्रकट हुए ज्योतिःस्वरूप अपने प्रथमोऽध्यायः॥ ५१ से प्रकट जाता हृदय में सब ओर से प्रकाशमान परमेश्यर को साक्षात् देख सकता है। (तिलेष तेलं दधनीव सर्विरापः स्त्रोतःस्वरशीषचा ग्निः ) जैसे तिलोंमे व्याप्त अदृष्ट तेल कोल्हू में डालके पेरने से निकलता जैसे प्रत्यक्ष न दीखता हुआ दही में व्याप्त घी मन्थन करने से साक्षात् दीखने लगता, जैसे नदी के समीप सोता में पहिले से अदृष्ट जल खोदने से घू प्राता और जैसे भरणी नामक लकड़ी में व्याप्त अदृष्ट अग्नि मथने का घिसने (एवमात्मात्मनि गृयतेऽसौ ) इसी प्रकार उस परोक्ष भी सर्वत्र व्याप्त ईश्वर को वह जीव अपने स्वरूप मे ग्रहण नाम साक्षात् करता है कि ( य एनं सत्येन तपसा- ज्नु पश्यति ) जो वहाना मात्र छोड़ के सब प्राणियों के हित कारी वचनों का व्यवहार करना हुना जितेन्द्रियतारूप तप से वा सच्चे मन से तथा चित्त की एकाग्रता के साथ तप के अनुष्ठान से सर्वद्रष्टा इस परमात्मा को ज्ञानदृष्टि से देखता है। (क्षीरे सपिरिवार्पितं सर्वव्यापिनमात्मानम् ) दूध जैसे घी व्याप्त होता वैसे सब पदार्थों जड़ चेतनों में व्याप्त (मात्मविद्यातपोमूलम् ) आत्मविद्या प्रात्मा के वर्णन का विषय और तप की प्रशंसा या व्याख्यान जिसकी प्राप्ति के उद्देश से प्रचरित किया गया है अथवा आत्मविद्या और तप नाम उसकी प्राप्ति का उपाय जानने का भी जो मूल है अर्थात् ईश्वर ही जिसपर कृपा करता है उससे वैसा उत्तम तप करा देता है तथा वही अपनी प्राप्ति की बुद्धि मनुष्यको देता है जिससे उसको जानलेते वा साक्षात् कर लेते हैं। तथा ( तद्ब्रह्मोपनिषत्परं तद्ब्रह्मोपनिषत्परम् ) जिस का बोध वा ज्ञान होने वा ईश्वर प्राप्ति का मार्ग बतलाने के लिये उपनिषद् पुस्तक ही परमउपयोगी हैं वा यों कहो कि ईश्वर प्राप्ति का सब से अधिक वा अच्छा मार्ग बतलाने
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कृष्णयजुर्वेदीयश्वेताश्वतरोपनिषदि-
वाले उपदेश का नाम ही उपनिषद् है । अर्थात् ब्रह्मज्ञानके
लिये मुख्य उपाय उपनिषद् है । वा जो मुख्य उपाय है
उसी का नाम उपनिषद है । इस दोनों प्रकार के कथन का
एकही नाशय है । और अध्याय की समाप्ति जताने के लिये
यहां द्विवंचन किया है।
मा०--"इस ब्रलको अपने अन्तःकरण में ही स्थित जानो,
इस प्रकार बारहवें मन्त्रमें संक्षेप से कहे विषय का इन चार
मन्त्रों से व्याख्यान वा विस्तार किया है । "उस नो३म् पद
का वाणी से जप उच्चारण और उसके वाच्यार्थ ईश्वर का
भावन नाम उपमें वार २ चित्त ठहराना वा लगाना,, इत्या-
दि योगशास्त्र में कहे प्रकार से जो जिज्ञासु पुरुष दीर्घकाल
पर्यन्त एकाग्रचित्त से मन वाणी और शरीर को वशीभूत
करके वाचक भो३म् पद से वाच्य ईश्वर की निरन्तर ध्यान
उपासना करता उसी में निष्ठा रखता उसी में तत्पर रहता
उसी में वुद्धि लगाता है वह काल पाकर अपने अन्तःकरण
में ही ज्ञान चक्षु से ईश्वर को साक्षात् अवश्य ही देखता है
इस में किसी को कुछ विकल्प नहीं करना वा मानना
चाहिये ॥ १३-१६ ॥
इति ब्राह्मणसर्वस्वाभिधमासिकपत्र
सम्पादकेन भीमसेनशर्मणा
निर्मितेश्वेताश्वतरोपनिषद्
भाज्ये प्रथमोऽध्यायः
समाप्तः॥
अथ द्वितीयाऽध्यायारम्भः। युञ्जानः प्रथमं मनस्तत्त्वाय सविता धियः। अग्नेयोतिर्नि- चाय्य पथिव्या अध्याभरत् ॥१॥ अ०-ध्याननिर्मधनाभ्यासाद् देवपश्ये- निगूढवदिति प्रथमाध्याये ध्यानमुक्तं तस्यैव द्वितीयाध्याये व्याख्यानं क्रियते--सविता मनआदीनां प्रेरकोऽन्तरात्मा प्रथमं ध्यान- कालारम्मे मनो युजानः समाहितं कुर्वनग्नेः शरीरव्याप्तस्य बुद्धेः कारणभूतस्य ज्योतिः प्रकाशं देहे निचाय्य निश्चित्य तत्वाय तत्त्व- बोधाय पृथिव्या अधि पार्थिवदेहस्य बुद्धि- स्थाने धियो धारणावतीश्चिन्तनपरा वा बु- हीराभरदाहरेत्स्वाधीनाः कुर्यात् । यतः सवि- ता सर्वप्रेरकः परमेश्वरोऽपि प्रथम सर्गारम्भ प्राणिदेहेन साकं मनोयोगं कुर्वन् कर्तुं वेच्छ- बग्नेज्योतिः स्थानं निचाय्य निश्चित्य पृथि- व्या अधि पार्थिवशरीरस्य मध्ये तत्त्वाय तत्त्वबोधाय धिय आभरदाभरत्यादधाति ॥
। कृष्णयजुर्वेदीयश्वेताश्वतरोपनिषदि- भा०-प्रकृतेर्महान्महतोऽहकारस्ततो मनः प्रादुर्भवति । महत्त्पदवाच्या च सत्त्वगुणा- त्मिका बुद्धिः सा चाहङ्कारप्रधानस्य मनसः कारणं कारणाधीनं च सर्वत्रैव जगति कार्य नियमेनैव लक्ष्यते । कठोपनिपदि चैतदभि- प्रेत्यैव "बुद्धिन्तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्नहमेव च ॥ मनसश्च परा बुद्धिः,, इत्युक्तम् । यथा- चेश्वरेण सर्गस्थितिलयेषु यानि कार्याणि स- म्पादितानि तथैव यथाकालं मनुष्यः कुर्वा. णोऽनिष्ठं जहातीष्टं चाप्नोति तस्मादयमेव धर्मः । यथा पार्क चिकीर्षन कोपि पिष्टा- दिकारणमादौ सम्पादयति सन्निहिते चादुष्टे सम्यकारणे कार्योत्पत्तिः सुलभा । एवमत्र मनोनिग्रहे बुद्धिरेव कारणं यद्यात्मनः स्वा- मिनो बुद्धिः स्वाधीना तदा सारथिरूपबुद्धे- रप्याधीनं प्रग्रहरूपं मनो भवति तथा च सति मनोनिरोधः सुकरः । पूर्वोक्तध्याननिर्मथना- भ्यासादीश्वरसाक्षात्काराय चादौ मनोनि ग्रहेणावश्यं भाव्यम् । न च वायकार्यमनसो निरोधमन्तरेण प्रदीपशिखावद् बुद्धः स्वैर्य सम्यक् प्रकाशश्च सम्भवति । नचास्थितप्रज्ञेन ५५ द्वितीयोग्ध्यायः॥ ध्यानादिकं कर्तुं शक्यते तस्मादीश्वरसाक्षा- त्काररूपतत्त्वबोधाय मनोनिरोधं कुर्वता क- र्तुमिच्छंता वा पुरुषेण बुद्धेयोतिः स्थानं सु- निश्चित्य तत्र बुद्धिः स्थाप्या तथा सति मनो- निग्रहेण तत्त्वबोधः कत्तुं शक्यते तत्सिद्ध्य- थं च ज्ञानसम्पादनपरस्य मम बाह्यविषय- ज्ञानादुपसंहृतं मनः परमात्मन्येव संयोजयि- तुमग्न्याद्यनुग्राहकदेवतानां यत्सर्ववस्तुप्रका- शनसामर्थ्य तत्सर्वमस्मद्वांगादिषु सविता प्रेरको देवः सम्पादयेद्यत्प्रसादाद्योगोऽवाच्य- तइति प्रार्थनीयम् ॥ १॥ भाषार्थ:-( ध्याननिर्मघनाभ्यासा० ) इत्यादि कथन द्वारा ध्यान साधनसे प्रात्मज्ञान होना प्रथमाध्याय में कह चुके हैं उसी का व्याख्यान द्वितीयाध्याय में करते हैं । जिस कारण सविता नाम सब जगत्का उत्पादक परमेश्वर भी पहिले सृष्टि के प्रारम्भमें मनुष्यादि शरीरोंके साथ मनका संयोग करनेकी इच्छा करता हुआ सूक्ष्माग्नि तत्त्वके ज्योतिः स्वरूप प्रकाशके स्थानको निश्चित करके पाथिभ शरीरके भी तर तत्त्वज्ञान को सिद्धि के लिये बुद्धियोंको स्थापित करता है इसी प्रकार ( सविता प्रथमं मनो युजानः ) मन आदि इ. न्द्रियों का प्रेरक अन्तरात्मा प्रथम ध्यानके प्रारम्भमें मनको समाहित स्थिर एकाग्र करता हुआ ( अग्नेोतिर्निचाय्य ) शरीर में व्याप्त बुद्धिके कारण रूप सूक्ष्मानिनत्वके प्रकाश स्थानको शरीरमें निश्चध करके (तत्वाय पृथिव्या अधिधिय कृष्णयजुर्वेदीयश्वेताश्वतरोपनिषदि- आभरत ) तस्वबोधके लिये पार्थिव शरीरके बुद्धिस्थान में धारणावती चिन्ता में तत्पर बुद्वियोंको अच्छे प्रकार धारण नाम स्वाधीन करता है। भा०-प्रकृति से महत् महत् से अहङ्कार और उससे मन उत्पन्न होता है। और महत्तत्वका ही नाम सत्त्वगुण प्रधान बुद्धि है और वह बुद्धि अहङ्कार में प्रधान मनका कारण है तथा कारणके अधीन कार्यका होना जगत्में सर्वत्र नियमके साथ ही दीखता है । इसी अभिप्रायसे कठोपनिषदें लिखा वा कहा है कि "शरीररूप रथ पर बुद्धि सारथि और मन लगाम है इन्द्रिय घोड़े हैं सारथिके हाथ में वा अधीन लगाम का रहना प्रसिद्ध ही है। तथा मनसे बुद्धि परे है,, सो कार्य से कारण पर उत्तम वा सूक्ष्म होता ही है। सृष्टि स्थिति और प्रलयके समय जिन कार्यों को ईश्वरने जिस प्रकार वा जिस क्रम अथवा जिस नियमके साथ उत्पन्न किया है वैसे ही उन २ कामों को करता हुआ मनुष्य अनिष्टसे बचता छूटता और इटको प्राप्त होता वा जितना कर्तव्य नियनानुसार क रता वा कर पाता है उतने इष्टका भागी होता है। इससे यही धर्म है। जैसे पाक बगाने की इच्छावाला कोई पुरुष पहिले भोजनके साधन माटा प्रादि को जोइता वा संचित करता है और निदोष ठीक साधन के होने पर प्रत्येक काम ठीक अच्छा सुगमता मे सिद्ध हो सकता है। वैसे यहां मन को वशीभूत करने में बुद्धिही मुख्य कारण है यदि स्वामिरूप मात्माके अधीन बुद्धि रहती है तो सारथिरूप बुद्धि के भी अधीन मन हो जाता है इस प्रकार सुगमतामे मनको चञ्च- लता मकजाती मन स्थिर हो जाता है। तब पूर्वोक्त ध्यान म म्बन्धी निर्मथनके अभ्याससे ईश्वरका साक्षात्कार जाननेके लिये प्रथन मनकी स्थिरता शान्ति प्रनय होनी चाहिये।
द्वितीयोऽध्यायः॥ किन्तु वायु के कार्य नाम सन्तान रूप मनकी स्थिरता वा रुकावट हुए विना दीपक को ज्योतिके समान बुद्धिको स्थिर दशा और सम्यक प्रकाश नही हो सकता और जिसकी बुद्धि स्थित नहीं ऐमा मनुष्य ध्यानादि कुछ नहीं कर सकता इस कारण ईश्वरके साक्षात्काररूप तत्वबोधके लिये मन को स्थिर करते वा करनेकी इच्छा करते हुए पुरुषको चाहिये कि वुद्धिके ज्योतिःप्रकाश स्थानको सम्यक् निश्चय करके उसी स्थान में बुद्धिको स्थापित करे ऐसा होनेपर मनके सक जानेसे ज्ञानसी दीति होकर तत्त्वज्ञान को प्राप्त कर सकता है और इसकी सिद्धि के लिये ज्ञान सम्पादनमें तत्पर हुए मेरे मनको बाह्य विषयसे हटाकर परमात्मा में संयुक्त करने के लिये अग्न्यादि अनुग्राहक देवताओंका जो सर्ववस्तुओं को प्रकाशित करनेका सामर्थ्य है उस सब सामर्थ्य को हमारे वाणी प्रादि इन्द्रियों में प्रेरक सविता देव प्राप्त करें कि जिस को कृामे योग प्राप्त होता है ऐसी प्रार्थना करनी चाहिये ।। युक्तेन मनसा वयं देवस्य सवितुः सर्व। सुवगैयाय शक्त्या ॥२॥ अ०-वयं मनुष्या बुद्विस्वायत्तीकरणपुर- स्सरं युक्तेन समाहितेन निरुद्धेन वा मनसा स- वितुः प्रेरकस्यान्तर्यामिणो देवस्येश्वरस्य स- वेऽनुज्ञायां ध्यानादिशुभकर्मणि स्वर्गाय वि. शिष्टसुखहेतुतपरमात्मप्राप्तये परमात्मवच- नोऽत्रस्वर्गशब्दः । तस्यैवसुखरूपत्वादितर- सुखस्य तदंशत्वाच्च शक्त्या यथासामर्थ्य ५८ कृष्णयजुर्वेदीयश्वेताश्वतरोपनिषदि- निरन्तरमवश्यं प्रयतामहइति द्रुढो व्यवसायः कार्यः॥ भा०-दुश्चरितान्मनो निरुध्यैव मनुष्यो ज्ञानयज्ञादिष प्रवृत्तोऽभीप्सितं सुखविशेषरू- पं परमात्मानमाप्नोति न चमनस्यसमाहित- इति ॥२॥ भाषार्थ -(वय युक्तेन मनसा ) हम मनुष्य लोग बुद्धि को स्वाधीन करने पूर्वक युक्त समाहित वा विषयोकी फसावट से अलग हुए शुद्ध मनसे ( सवितुर्दैवस्य सवे ) सबके प्रेरक न- न्तर्यामी देव ईश्वरको ध्यानादि शुभ कर्म रूप आज्ञामे सुत्र गैयाय शक्त्या) विशेष सुख स्वरूप परमेश्वरकी प्राप्ति के लिये यथा शक्ति निरन्तर प्रयत्न अवश्य करे। यह हमको दृढ निश्चय करना चाहिये कि सुख और शान्ति मिननेका ठीक यही मार्गहै। भा०-दुराधारसे मनको हटा कर ही ज्ञान यज्ञादिके लिये प्रवृत्त हुमा मनुष्य अभीष्ट विशेष सुख स्वरूप परमेश्वरको प्राप्त कर सकता है किन्तु मनके स्थिर हुए विना नहीं ॥२॥ युक्त्वाय सविता देवान् खर्यतो धिया दिवम्। बहज्ज्योतिःकरि- ष्यतः सविता प्रसुवाति तान्॥३॥ अ०-सविता प्रेरकोऽन्तर्यामो विषयेभ्यः प्रत्यावृत्तान्स्वः प्रत्यगात्मवृत्तिजन्यसखविशेष यतः प्रामुवतो धिया धारणावत्या सूक्ष्मबुद्धया द्वितीयोऽध्यायः ।। तत्त्वबोधेन दिवं द्योतनशीलं प्रकाशमयं बृहन्महब्रह्म ज्योतिः प्रकाशं करिष्यत आ- विष्करिष्यतो देवान् चक्षुरादीनीन्द्रियाणि मनोवृत्तिविशेषान् युक्त्वाय योजयित्वा स्वकृ- पया विषयेभ्यः प्रत्यावृत्त्य तान् प्रसुवाति प्रसुवेत् शुभमार्ग तान् सविता प्रेरयेदिति प्रार्थयामहे ॥ भा०-यथा चोदयकालीनः सवितपद- वाच्यः सूर्यः प्राणिनः स्वशक्तिप्रवेशेन प्रबोध्य कार्येषु प्रयोजयति । जगति सूर्यएव देवो मु- ख्यः प्रबोधकः प्रेरकश्च तस्मादेव तदुदयकाले प्रायेण प्राणिनो जाग्रति । सूर्यादिप्रबोधक- प्रेरकाणामपि निरतिशयप्रेरकः प्रबोधकञ्चा- नादिसिद्ध ईश्वरः । सएव यान् स्वकार्येषु प्रेरयति ते सद्यो जगति जाग्रति । स्वस्येष्टा- निष्टे विभज्य जानन्ति च येन यत्कार्यसिद्धि- नियोगतो हेतुतश्च सम्भाव्यते तेनैव तत्साध्य- मिति नियमएव सर्वत्रीपलभ्यते तस्मान्न नि- यमविरुद्धं किमपि कार्यमिति । इन्द्रियाणां विषयेभ्यो निरोधएव प्रत्यगात्मविचारवैशा- कृष्णयजुर्वेदीयश्वेताश्वतरोपनिषदि- रहस्य प्रधानं कारणं सचान्तर्यामिप्रेरकसवि- तुदेवानुग्रहेण निरोधः सुसाध्यस्तस्मात्प्रार्थना स्तुतिश्च सुगम उपायो योगसाधनस्य तथा च सत्ति मनसः स्थैर्य सुखानुभवो ब्रह्मज्ञानं चेति सर्व सुलभम् ॥३॥ भाषार्थः-( सविता स्वर्यतो धिया दिवं सहजज्योतिः करिष्यतो देवान् युक्त्वाय ) प्रेरक अन्तर्यामी ईश्वर विषयों पीछे शो फिर लौट इन्द्रिय शक्तियोके अन्तःकरगामें रुकनेसे बुद्धि वा ज्ञानकी अधिकतासे उत्पन्न हुए सुख विशेषको प्राप्त होते हुए और धारणावती सूधम बद्धि द्वारा हुए तत्वज्ञानसे प्रकाश शील अनन्त ब्रह्मज्योतिको प्रकट करते हुए चक्षु आदि इन्द्रिय रूप देवों नाम मनकी चक्षु आदि इन्द्रियरूप वृत्तियों को भ. पनी कृपाके साथ विषयों की ओरसे हटा वशीभूत निरुद्ध बुद्धि के साथ संयुक्त करके ( तान् गविता प्रतुवाति) उन इन्द्रिय देवोंको सविता प्रेरक अन्तर्यामी देव शुभ मार्गमें चलने के लिये प्रेरणा करे ऐसी प्रार्थना हम लोग करते हैं । भाo-जैसे उदय होते समय सविता नामक सूर्य अपनी प्रेरक शक्तिके प्रवेश द्वारा प्राणियों को जगा कर उन २ के कामोंमें ल गाता प्रेरणा करता है। सूर्य देवताही जगदमें मुख्य प्रेरक और जगाने वाला है इसी कारण सूर्योदय के समय प्रायः मनुष्यादि जागते हैं। सूर्यादि प्रबोधक और प्रेरकोंका भी सर्वोपरि प्रेरक और प्रबोधत अनादि सिद्ध ईश्वर है वही जिन मनुष्यों को अपने कर्तव्यमें प्रेरित करता है वे जगत् में शीघ्र ही जाग जाते और अपने इष्ट अनिष्टको विभागके साथ जानने लगते है। और जिसके द्वारा जिस कार्यको सिद्धि नियम वा हेतुता द्वितीयोध्यायः॥ पूर्वक अवश्य हो सकती है किन्तु अन्य के द्वारा उस कार्यको वैसी सिद्धि नहीं हो सकती उसी से उसको सिद्ध करना चाहिये यह नियम सर्वत्र उपलब्ध होता है इस लिये नियम विरुद्ध कुछ नही करना चाहिये इन्द्रियोका विषयोसे रोकना ही भी. तरी विधारकी वृद्धि और स्वच्छताका कारण है वह इन्द्रियोका निरोधलप योग अन्तर्यामी प्रेरक सविता देवके अनुग्रहसे सु. साध्य है तिससे अन्तर्यामीको स्तुति प्रार्थना ही योग साधन का सुगम उपाय है ऐसा होने पर गनकी स्थिरता सुखका म नुभव और ब्रह्मज्ञान यह सब होना सुगम वा सुलभ है ॥ ३॥ युञ्जते मन उत युञ्जते धियो विप्रा विप्रस्य बहतो विपश्चितः। वि होत्रादधे वयुना विदेकइन्मही देवस्य सवितुः परिष्टुतिः॥४॥ अ०-यो वयुनावित्प्रज्ञावेत्ता बुद्धिसाध्य- सर्वकार्याणां तत्त्वतो वेत्ता सर्वज्ञोऽन्तर्याम्ये- कइदेकएव होत्रा कल्याणहेतुका धा यज्ञा- दिक्रिया वेदद्वारा विदधे विधानं कृतवान् तस्य विग्रस्य विशेषेण व्याप्तस्य बृहतोऽन- न्तस्य विपश्चितः सर्वज्ञस्य देवस्य द्योतनात्म- कस्य सवितुरन्तर्यामिण ईश्वरस्य मही महती परिष्टुतिस्तैः कर्त्तव्या ये विना मेधाविनः कृष्णयजुर्वेदीयश्वेताश्वतरोपनिषदि- प्रकृष्टसूक्ष्मस्थिरबुद्धियुताः प्रत्यगात्मविचारे रता मनो युञ्जते निरुन्धन्ति विषयेभ्यः प्र- त्यावृत्य बुद्धितत्त्वेन स्वकारणेन योजयन्ति । उतापि धियो बुद्धीन्द्रियाणि मनः सङ्गात्प्रत्या- वृत्यात्मना साकं युञ्जत आत्मविचारे प्रवर्त्त- यन्ति । आतश्योपसर्गइति सूत्रेण कप्रत्ययान्तः प्राधातोर्विप्रशब्दः। विपश्चितइतिमेधाविनाम वयुनेति च प्रज्ञाया नाम निघण्टौ ॥ भा०-मनसो ज्ञानेन्द्रियाणां च समाधानं स्थैर्य विषयवासनातो निवृत्तिं चेच्छदुभिर्जनैः सवितपदवाच्यस्यैकस्यानन्तस्य सर्वज्ञस्यान्त- र्यामिणः सर्वप्रेरकस्य परमात्मनो दीर्घकाला- वधि नैरन्तयणकाग्रचेतसा विशिष्ठा स्तुतिः कार्या। अनन्यसाध्या च विषयवासनानि- वृत्तिर्यथा चोदकसाध्यां पिपासानिवृत्तिम- न्यसाधनेन चिकीर्षतः फलावाप्तिरसम्भवा तथैवात्राभ्यासवैराग्यादिसाधनैर्मनोवृत्तिनिरो- धावसरे परमात्मशरणागतिमन्तरेण नास्त्य- न्या कापि ततोधिका तत्तुल्या वा गतिरिति ।। भाषार्थ.-जो ( वयुनाविदेकइद्धोत्रा विधे) बुद्धि से होने वाले मानस गुप्त सब कामो का भी जानने वाला न न्तर्यामी एक ही ईश्वर विना किसीकी सहायता लिये कल्याण
द्वितीयोऽध्यायः॥
को हेतु धर्मानुकूल यज्ञादि क्रियाओंका वेद द्वारा विधान
करता अर्थात् कत्तध्य की आज्ञा देता है उन (विप्रस्य व
इतो विपश्चितो देवस्य सवितुर्महीपरिष्टुतिः) विशेष कर सर्व
व्याप्त अनन्त सर्वज्ञ सबको चेतन करने वाले प्रेरक अन्त.
यामी ईश्वर की बड़ी अधिकतर स्तुति उन लोगोंको करनी
चाहिये वा वे कर सकते हैं कि जो ( विप्रा मनो युजत उत
धियो युञ्जते ) उत्तम सूक्ष्म स्थिर बुद्धि वाले भीतरी विचार
में तत्पर बुद्धिमान लोग मनको भौर ज्ञानेन्द्रियोंको योगा-
भ्यास द्वारा ठीक करते हैं अर्थात विषयोंकी भोगवासना से
मनको तथा ज्ञानेन्द्रियोंको पीछा हटाके आत्मविचार में
लगाते है।
भाo-मन और ज्ञानेन्द्रियोंकी सावधानता स्थिरता
और विषयवासनाकी निवृत्ति चाहते हुए मनुष्योंको उचित
है कि वे सवितृपदवाच्य अनन्त सर्वज्ञ सर्व प्रेरक अन्तर्या-
मी एक परमेश्वरको ही बहुत काल तक निरन्तर एकाग्रचित्त
से विशेष कर स्तुति प्रार्थना करें। क्योंकि विषयवासनासे
ठोक निवृत्ति हानेका अन्य कोई साधन नही है जैसे कि
जलसे मिटने वाली प्यासको अन्य वस्तुसे निवृत्त करनेकी
इच्छा वालेको फल प्राप्त होना कम सम्भव है। वैसे यहां
भी अभ्यास वैराग्यादि साधनोंके द्वारा मनको वृत्तियोंका
निरोध करनेके समय परमात्माके शरणागत हुए विना उस
से अधिक वा उसके तुल्य अन्य कोई गति नहीं है। क्योंकि
परमात्मा सर्वोपरि ससारी भागोंको फमावट से अलग है
विषयवासनाका लेशमात्र भी उससे सम्बन्ध नहीं रखता
तथा उसके शरणमें पहुंचते ही अर्थात् स्वरूपावस्थित होते
ही मनुष्यको ऐसा अद्भुन मानन्द मिलता है जिसके सामने
संसारके सब विषयोके भोग अत्यन्त फीके पड़ जाते है ॥४॥
कृष्णा यक्षुर्वेदीयश्वेताश्वतरोपनिषदि- युजे वां ब्रह्म पूयं नमोभि- विश्लोका यन्ति पथ्येव सूराः। शृण्वन्ति विश्वे अमृतस्य पुत्रा आये धामानि दिव्यानि तस्थुः।। अ०-अत्र वामिति वचन व्यत्ययेन वचनस्थाने द्विवचनम्। हेमनआदीनीन्द्रिया- णि वां युष्माकं कारणभूतं पूयं पूर्वैर्ब्रह्मा- दिभिरप्युपास्यं ब्रह्माहं युजे नमोभिश्चित्तप्र- णिधानादिरूपैः प्रणामनिर्बजसमाधिना च प्राप्तुमीहे तेन पथ्याइव सन्मार्गादनपेताः सु. खेन गच्छन्तो मनुष्याइव निर्वाधोः सूराः प्रकाशाः शुद्धा मालिन्यलेशेनापि रहिता मम श्लोकाः कीर्तयो वियन्ति विशेषेण दोघंका- लावधि चिरस्थायिन्यो भवन्तु । ये नरा यो- गाभ्यासादिशुभकर्मप्राबल्येन दिव्यानि धा- मानि स्थानानि ब्रह्मलोकादीन्यातस्थुः प्राप्ता- स्तेऽमृतस्य परमात्मनः पुत्राइव रक्षणोया; सर्वे जोवन्मुक्ता मुक्ताः प्राप्तसर्वयोगसिद्धयो वा यथेच्छाचारिणो ममेमां वाच शृण्वन्ति कृण्वन्तु ॥
६५ द्वितीयोऽध्यायः॥ भा०-यथा मनोनिरोधेनेन्द्रियाणि निरुध्यन्ते। बुद्धिसमाधानेन मन एकाग्रं जायत एवमा- त्मनि परमात्मविचारलग्ने बुध्यादिकं सर्व शान्तं तिष्ठति । तेन योगिना प्रतिज्ञातव्यं प्रार्थनीयं च योगिभिः सिद्वैर्जीवन्मुक्तानसी- मानं प्राप्नश्च ब्रह्मलोकादिवासिभिर्मम सङ्गोऽस्तु ते च मां मज्जन्तमुटुरन्तु मम वाचं वृण्वन्तु । नच तेन कीर्तिरेषणीयापितु पूर्वेषां योगिनां ज्ञानिनां च यथाऽद्यावधि चिरस्थायिनो नि- बधाऽनिवार्या कीर्तिर्गच्छति तथाऽन्येपा- मपि धर्मभास्कराणां सूर्यस्येवानिवार्यः प्रकाशः प्रसरत्येव । तदर्थ परमेश्वरेण विशिष्टः स- म्बन्धस्तच्छरणागतिस्तदुपासनमेव प्रधानम् । इमे च पञ्च मन्त्राः शुक्लयजुर्वेदस्यैकादशाध्या- यारम्भे यथायथमुपलभ्यन्ते । पाठान्तरं च शाखान्तरवदेवानुमोयते । तत्राधाऽनुष्टुप, द्वितीया गायत्री, तृतीयाऽनुष्टप, चतुर्थी ज- गती, पञ्चमी च त्रिष्टुप् । ताभिश्चर्भिर्योगा- भ्यासप्रकारः प्रदर्शितः ॥५॥ भाषार्थः हेमन और ज्ञानेन्द्रियो । तुम्हारी चेतनता के कारया ( पूर्वी ब्रह्म नमोभियुजे) पूर्व सृष्टि के प्रारम्भ वा कल्प ल कृष्णयजुर्वेदीयश्वेताश्वतरोपनिषदि- कल्पान्तरों में ब्रह्मादिको भी उपासना करने योग्य ब्रह्मको नम- स्कार प्रणाम स्तुति प्रार्थनादि तथा निर्बीज सनाधि द्वारा प्राप्त करनेकी चेष्टा मैं करता हूं। उससे (पथ्येव सूराः श्लोका वियन्ति) उत्तम मार्गको न भूले वा उससे च्युत न हुए सुख पूर्वक अच्छे मार्गमें चलते हुए मनुणोंके तुल्य प्रकाश रूप शुद्ध लेशमान भी मलिनतासे रहित मेरी कीर्ति वा यश दीर्घकाल तक विशेष कर घिरस्याधी हो । ( ये ) जो लोग योगाभ्यासादि शुभ कर्मों की प्रबलतासे (दिव्यानि धामान्यातस्युः )ब्रह्मलोकादि उत्तम स्थागों वा उत्तम दशाओं को प्राप्त हुये वे ( विश्वेऽमृतस्य पुत्राः शृगवन्ति ) नित्य मुक्त परमात्माको पुत्रके समान रक्षशीय सब जीवनमुक्त वा मुक्त वा योग सिद्धियों को प्राप्त हुए यथेच्छा. धारी पुरुष मेरी इस वाणीको सुनें । -जैसे मनके निरोधसे इन्द्रिय स्वयमेव वशीभूत हो जाते हैं तथा बुद्धि के सावधान निश्चल होने पर मन भी ए कान शान्त हो जाता है। इसी प्रकार अन्तरात्मा जब परमात्म रूप अपने विचार वा स्तुति प्रार्थना उपासना में लगता है तब बुद्धि प्रादि सत्र शान्त होकर ठहर जाते हैं। इस कारण योगी की प्रतिज्ञा वा प्रार्थना करनी चाहिये कि योगी सिद्ध जीव. न्मुक्त और ज्ञानको सीमाको प्राप्त हुये ब्रह्मलोकादिमें निवास करने वाले पुरुषोंसे मेरा सङ्ग हो वे लोग डूबने हुए मुझको निकालें मेरी प्रार्थना वाणीका सुनें। उस पुरुषको अपनी कीर्ति वा प्रतिष्ठाको इच्छा नहीं करनी चाहिये किन्तु पूर्वकालमें हो चुक्षा अनेक योगी वा ज्ञानियोंको जैसे अब तक घिरस्था- यिनी निर्विघ्न अनिवार्य कीति स्वयमेव चली जाती है वैमे धर्म सूर्य अन्य पुरुषों का भी प्रकाश जगत्, स्वयमेव फैलता है उमको कोई रोक नहीं सकता। उस योगप्राप्तिके लिये परमेश्वर भा- द्वितीयोऽध्यायः ॥ से विशेष मेल तथा उसके शरणागत होना उसकी उपा- सना करना ही मुख्य है। ये पांध मन्त्र यजुर्वेद के अध्याय १९ ग्यारहवेंके प्रारम्भमें ऐसे ही ज्यों के त्यों हैं । कुछ पाठान्तर है वह शाखान्तरमें होने के समान ही है। उनमें पहिले अनुष्टम् दूसरी गायत्री तीसरी अनुष्ट प्, चौथी जगती और पांचवी त्रि- टऋचा है इन पाधों मन्त्रों में योगाभ्यासकी रीतिका मूल दिखाया गया है ॥५॥ अग्निर्यत्राभिमथ्यते वायुर्य- त्राभियुज्यते । सोमो यत्रातिरि- च्यते तत्रसंजायते मनः ॥६॥ अ०-यत्र यस्मिन्योगाभ्यासे विषयवा- सनां विहाय प्राणायामाभ्यासेन वाक- र्मणा वेदाध्ययनेन च शारीरोऽग्निः परमा- स्मास्वरूपः प्रदोपयितुमभित्तः प्रतिदिनं म- ध्यते यत्र वायुरभियुज्यते प्राणवायुनिरोधोऽ- भ्यस्यते यत्र च सोमप्रधानं भोज्यमतिरि- च्यते त्यज्यतेऽल्पीक्रियत उत्तमभोजनवस्त्र- धारणादितो मन आकृष्यते तत्र मनो मननं संजायते यद्वा यत्र यागेऽग्निररणिभ्यामभिम- थ्यते, यत्र प्रय॑सम्भरणादौ पवित्रप्रेरितो वायुरभियज्यते यत्र दशापवित्रात्सोमरसोऽ- तिरिच्यते निस्सरति तत्र सोमयागादौ प्रा- कृष्णायजुर्वेदीयावेताश्वतरोपनिषदि- र्थितदेवानुज्ञातस्य योगिनो मनः संजायते स्वर्गभोगहेतौ कर्मणि प्रवर्तते । भा०—बहुभिः साधनैर्ज्ञानाग्नेरुद्वीपनेन समूल प्राणायामाभ्यासेन भोगोत्कण्ठाहासेन च मनः शुद्धं समाहितं सम्पद्यते यद्वा देवप्रे- रणया भोगहेतौ सोमयागादि कर्मणि योगि- मनः संजायते ॥६॥ भाषार्थः-( यत्राग्निरभिमथ्यते) जिस योगाभ्यासमें योगी पुरुप विषय भोगको वासनाको त्यागके प्राणायामके अभ्यास से तथा वेदाध्यन रूप वाणी के कर्मसे शरीरस्थ परमात्मरूप अग्निको प्रदीप्त करने के लिये मन्थन करता और प्राणके च. ढ़ाने उतारनेसे तथा पढ़नेसे वायु बढ़ता है ( यत्र वायुरभियु: ज्यते ) जिस योगमें प्राण वाय केरोकनेका अभ्यास किया जा. ता है और (सोमो यत्रातिरिच्यते) सोमतत्व जिसमें प्रधान है ऐसे भोज्य पदार्थको जिसमें लागता कम करता अर्थात उत्तम भोजन वस्त्रादिसै मनको हटाता है ( तत्र संज्ञायते मनः ) उसी योगाभ्यास में मनन शक्तिहिताहित पहिचानने की योग्यता प्र. गट हो जाती है। अथवा जिस यज्ञ में भरणियोंके द्वारा अग्नि का मन्थन होता, तथा अन्य संभरणादि कर्ममें पवित्रसे प्रेरित वायु शब्द करता और गित सोमयागमें दशा पवित्रसे सोमरस निकाला जाता है उस सोमयागादि कर्म में प्रार्थित देवताकी प्रशासे योगीका नन स्वर्ग भोगार्थ लगता है। भाग-बहुत साधनों द्वारा जानामिका उद्दीपन करके य. मनियमादि सहित. प्राणायामके अभ्यास और भोगको तृष्णा के त्यागसे मन शुद्ध समाहित स्थिर हो जाता है अथवा देवता । द्वितीयोऽध्यायः॥ ६ की प्रेरणासे स्वर्गीय सुख भोगके हेतु सोमयागादि कर्ममें योगी का मन लग जाता है ॥६॥ सवित्रा प्रसवेन जुषेत ब्रह्म पूर्व्यम् । तत्र योनि कण्वसे नहि ते पूर्वमक्षिपत् ॥ ७॥ षष्ठ्यर्थे तृतीया सवित्रा सवितुरन्तर्या- मिणोदेवस्य प्रसवेन सानुग्रहप्रेरणेन यो योगी पूर्यं सनातनं ब्रह्म परमात्मात्मानं जुषेत से- वेत । एवं यदि त्वं तस्मिन् ब्रह्मणि योनि निष्ठां कृण्वसे करोषि तदा ते तव पूर्वका- लीनं कर्म नह्यक्षिपत्-नहि जन्ममरणप्रवाहे दुःखबहुले स्रोतसि त्वां प्रक्षेप्नुमर्हति ॥ भा०-योऽन्तर्यामिणः सवितुर्देवस्यानुग्र- हेण प्रेरितो योगी भोगानिर्विष्णो ज्ञानसा- धनानि संचित्य शुटुसमाहितैकाग्रेण मनसा ब्रह्मण एवोपासनं करोति तस्यैव शरणं ग- च्छति नासावपरिमितं मरणादिदुःखं पुनर्ल- भतइति ॥ ७॥ भाषार्थः-( सवित्रा प्रभवेन पूयं ब्रह्म जुषेत ) अन्त. र्यामी सविता देवकी कृपादृष्टि सहित प्रेरणासे जो योगी पु. रुष सनातन ब्रह्म परमात्माका सेवन करे ( तत्र योनि कृरव से ) इस प्रकार यदि तू उस ब्रह्म में निष्ठा करता है तो 90 । कृष्ण यजुर्वेदीयश्वेताश्वतरोपनिषदि- (ते पूर्व नद्यक्षिपत्) तेरा पूर्वकालमें किया संचित वासनारूप कर्म, दुःख जिस में बहुत है ऐसे जन्म मरणादि प्रवाह को प्रबल तरङ्गों में तुम को नहीं फेंक सकता अर्थात तू संसार के पार होने योग्य हो सकता है । भा०-जो अन्तर्यामी सविता देवके अनुग्रहसे प्रेरित हुआ योगी भोग से उदासीन हुआ ज्ञान के साधनों को सं. चय करके शुद्ध समाधिस्य एकाग्र मनसे ब्रह्मकी ही उपासना करता उसीके शरण में रहता है। वह मरणादि सम्बन्धी अपरि- मितदुःखको फिर नहीं प्राप्त करता वा फिर नहीं फसता ॥७॥ त्रिरुन्नतं स्थाप्य समं श- रीरंहदीन्द्रियाणि मनसा संनि- वेश्य । ब्रह्मोडुपेन प्रतरेत विद्वान् स्रोतांसि सर्वाणि भयावहानि॥८॥ अ० ब्रह्मणि निष्ठाकरणमुक्त विशदी क्रियते-उरोग्रीवाशिरांसि त्रीण्युन्नतानि यस्य तत्समवनं शरीरं स्थाप्य संस्थाप्य हृदीन्द्रि- याणि चक्षुरादिज्ञानेन्द्रियाणि मनसा सन्नि- वेश्य सनियम्य तरूपदर्शनादिकमकृत्वा ब्रह्म प्रणव उडुपइव तरणसाधनं तेन भयावहानि नानानिरययातनाभयान्यावहन्ति प्रापयन्ति तानि सर्वाणि स्त्रोतांसीन्द्रियगोलकानि प्रब- लप्रवाहयुताः सरितइव विद्वान् प्रतरेत ॥
द्वितीयोऽध्यायः॥ ११ भा०-तज्जपस्तदर्धभावनप्रकारेण प्रा- णायामविधिरयम् । अभ्यासवैराग्यादिसाध- नैरिन्द्रियवृत्तीर्वशीकृत्यैव शरीरं सममचलं च स्थापयितुं शक्यते । इन्द्रियवशीकारः शरीर- स्थैर्य कारणं सति च स्थैर्य प्राणानायम्य मनसि प्रणवं जपन् प्रणवार्थमीश्वरं च भाव- यन् पुरुषो दुःखसागरं तरीतुं शक्नोतीत्याशयः ॥ भाषार्थः-पूर्व मन्त्र में ब्रह्म निष्ठ होना कहा है उमी प्रकार दिखाते हैं-(त्रिसन्नतं समं शरीरं स्याप्य ) बाती ग्रीवा और शिर ये तीनों जिस में ऊपर को उठे हों ऐसे सोधे शरीर को आसन पर स्थिर कर अर्थात् ऐसे शरीर से बैठकर तथा ( हृदीन्द्रियाणि मनसा सन्निवेश्य ) चक्षु आदि जानेन्द्रियों को मनकी रुकावट से रोककर प्रार्थात् इन्द्रियों के साथ मनको न लगा के किन्तु मनके साथ इन्द्रियों को जोष्ट के ( भयावहानि सर्वागि स्रोतांसि विद्वान ब्रह्माडुपेन प्रत. रेत ) प्रबल वेग से बहने वाली नदियों के समान विषयों में बहने वाली इन्द्रियों को नाना प्रकार के नरक भोग की यातना का भय पहुंचाने वाले जानता हुमा ओ३म् का जप और उम के वाच्यार्थ ईश्वर के चिन्तन रूप नौका से शिर के सात इन्द्रिय छिद्र सप्त स्रोतरूप नदियोंको तरे पार होवे। भा०-( तज्जपस्तदर्थभावनम् ) उस वाचक प्रगाव का जप वाणी से वार २ उच्चारण और उसके वाच्य ईश्वर का भावन वार २ चिन्तन सरीति से प्राणायाम का विधान यहां कहा जानी । अभ्यास और वैराग्य के द्वारा मन की वृत्तिरूप इन्द्रिय शक्तियों को वश भूत करके ही कोई शरीर ७२ कृष्या यजुर्वेदीयश्वेताश्वतरोपनिषदि- को निश्चल ठहरा सकता है अर्थात् इन्द्रियोका वशीकार शरीर की स्थिरता का कारण है और शरीरके स्थिर होने पर प्राण की गति को रोककर मनमे प्रणव का जप करता और प्रण- वार्थ ईश्वर का भावन करता हुआ दुःखसागर के पार हो सकता है ॥८॥ प्राणान् प्रपीड्येह स युक्तचेष्टः क्षीणे प्राणे नासिकयोच्छ्वसीत । दुष्टाश्वयुक्तमिव वाहमेनं विद्वा- न्मनो धारयेताप्रमत्तः ॥ई अ०-स प्राणायामाभ्यासो योगो युक्ता नियता शान्ता चेष्टा देहक्रिया यस्य तादृग्भू- त्वा मुहुर्मुहुर्निरोधेन प्राणान् प्रपीड्य प्रपी- डनेन श्वासगमनागमनशान्तिं सम्पाच तथा- सति क्षीणे स्थिरदशामापन्ने प्राणे नासिक- यैवोच्छ्वसीत न मुखेन । एवं दुष्टा अश्वा युक्ता अस्मिस्तादृशं वाहनमिवैनं शरीररथं विद्वान् विजानन्नप्रमत्ती रश्मिरूपं मनो धा- रयेत । यत्र दुष्टाश्वा यक्तास्तद्रथवाहको यदि निमेषमात्रमपि प्रमाद्यति विस्मरति वा तदा ते दुष्टाश्वाः ससारथिस्वामिकं रथं सद्यएव गर्तादिषु नयन्ति पातयन्त्येव वा । तथैव द्वितीयोऽध्यायः ॥ ७३ क्षणमपि विस्मृते दुष्टेन्द्रियवृत्तयः सद्यएव विषयगतैष शरीररचं नेष्यन्त्येवं जानानएव न प्रमाद्यति ॥ भा०-प्राणचेष्टायाः स्थिरीभावे शान्ता अपीन्द्रियवृत्तयो विस्मृत आत्मनि मध्येमध्ये पुनरपि विषयेषुधावन्ति तस्मादिन्द्रियवृत्तीनां निरोधकाले चेतस्येकाग्रेऽपि दुष्टाश्वानिवैवे- न्द्रियाणि जानीयाज्जितानीति न विस्मरेत् ॥६॥ भाषार्थ:-सयुकचेष्ठः प्राणान् प्रपीड्य) बह प्राणायामका अभ्यास करने वाला योगी पुरुष शरीरको चेष्टाको शान्तकार धार र रोकने द्वारा प्राण के गमन प्रागमनको शान्तप्रवाह से चननेवाला करके (क्षी यो प्रायो नासिकयाच्छसीस) ऐसा होने पर प्राय धीरे २ शान्त प्रवाह से चलने लगता है तब मुखको बन्द कर केवल नासिका से खास लेता जावे। सात द्वारों में मुख सब से बड़ा द्वार है इसी कारण इस में धापी और र. सना दो इन्द्रिया रहती है इसके बन्द रहने से दो इन्द्रियों को जीत सकता है इस लिये मुख को प्रथम बन्द करे परन्तु जव वल पूर्वक श्वास चलता है तब मुखका बन्द कर सकना कठिन है इस लिये प्राणशक्ति के निर्बल होने धीमे चलने वाली हो जाने पर ऐसा होना सुगम है ( दुष्टाश्वयुक्तं वाह- मिवैनं विद्वान् ) दुष्ट घोड़े जिस में जुड़े हो ऐसे रथ [ बग्घी अर्थात दो वा चार घोड़े की गाढ़ी ] के तुल्य दुष्ट इन्द्रिय घोड़ो से युक्त शरीर रथ को जागता हुभा (अप्रमत्तो भनी धारयेत) प्रमाद वा भून न करके लगाम की रस्सी रूप मन को दृढ़ता से पकड़े रहे। लिस गाड़ी में दुष्ट घोड़े लगे होते १० १४ कृष्णयजुर्वेदीयश्वेताश्वतरोपनिषदि- है उस का हाफने वाला यदि क्षण भर भी उन की ओर से ध्यान हटा लेवे, वा ये घाडे ऐसे दुष्ट है जो थोडा भी भूलते ही गाडी को ले भाग जायेगे ऐसा न जानता रहे तो वे दुष्ट घोडे रथके स्वामि सारथि त्था रथ तीनो को कही गढे आदि में ले जाके गिराते वा वृक्षादि में लेजाके दे देते हैं। वैसेही कोई योगी वा ज्ञानी इन दुष्ट इन्द्रियोकी स्वाभाविक दुष्टता को क्षण भर भी भूल जावे तो ये शीघ्र ही शरीर रूप रथको विषयरूप गड्ढोमे ले जाते ऐमा जानता हुआ ही प्रमाद को छोड कर योगी मन को वशी भूत रख सकता है । भा०-प्राण की चेष्टा के स्थिर होने से इन्द्रियोवी शक्ति के शान्त होने पर भी बीच र आत्माके किञ्चित भी भूल जाने पर वे इन्द्रिय फिर २ विषयो की ओर भडियाये पशुके स मान भागते हैं। इस कारण इन्द्रियोके रुकनेसे चित्तके एकाग्र होने पर भी दुष्ट घोडो के समान इन्द्रियो को जानता रहे किन्तु ये मेरे वशीभूत होगये ऐसा मानके भूल न जावे ॥en समे शुचौ शर्करावह्निवालुका- विवर्जिते शब्दजलाश्रयादिभिः । मनोऽनुकूले न तु चक्षुपीडने गुहा- निवाताश्रयणे प्रयोजयेत् ॥१०॥ अ-समेऽनिम्नेऽनुन्नते शुद्धे दुर्गन्धादि- रहिते शर्करावहिवालुकाविवर्जिते-शर्करा- पाषाणादि चूर्ण वहिसामोप्यं वालुकाधिक्यच यत्र तस्मादभिन्ने, कलहतुमुलादिशब्दाधिक्य- द्वितीयोऽध्यायः॥ ७५ जलं प्राण्योगमननिवासस्थानमाश्रयो, ग्राम- घोपादि-मनुष्यादिवासस्थानं तैरपि विशेषती वर्जिते तादृशे मनोज्नकूले मनःस्थैर्यहेतुके यत्र दृश्यविषयसत्त्वाच्चक्षुषोः पीडनमाकर्षणं न सम्भवति तत्र गुहायां निवातस्थाने वा पर- मात्मनि चेतः प्रयोजयेत् ॥ भा०-एवंभूते सर्वथा चित्तेन्द्रियाकर्षक- हेतुवर्जित एव गुहादिस्थाने योगाभ्योसरीत्या परमात्मध्यानं कुर्वन् योगिजनः फलभावस्या- दिति सम्भवति । यथा सत्स्वेव सम्यक्साध. नेष सर्वाणि कार्याणि सिध्यन्ति तथैवा- त्रापि ज्ञेयम् ॥ १०॥ भाषार्थः-( समे शुचौ शर्करावहिवालु हवालुकाधिवर्जिते शब्दज- लाश्रयादिभिः ) जहां अधिक जंधी नीचीपृथिवी ढारू न हो किन्तु समचौरस शुद्ध दुर्गन्धादि रहित हो, ककरोली वा पथ- रोलो न हो, जहां अग्नि वा गर्मी अधिक न हो, तथा जहां बालू अधिक न हो तथा जहां लड़ाई झगड़े वा मेला बाजार ग्रामादि के मनुष्योंका हल्ला गुल्ला न सुन पड़ता हो, जहां समीप वा सब भोर जलाशय न हो जिसमें जलार्थी प्राणि वा जलाशय निवासी नीव देखने में भावें ऐसे जगल देशमें वा (मनोऽनुकूले नतु चक्षुपीड़ने गुहानिवातात्रयणं प्रयोजयेत् ) ननकी स्थिरता के हेतु, जहां ग्रामादि सम्बन्धी कोई दर्शनीय वस्तु न हों जिन के दीख पड़नेसे चित्त उधरको खिंचे ऐसे अधिक वायुको गति कृष्णयजुर्वेदीयश्वेताश्वतरोपनिषदि- से रहित वा गुहारूप किसी स्पानमें योग साधन द्वारा मा त्मामें चित्तको लगावे किन्तु वहां भी विषय वासनाकी ओर मनको न जाने देवे ॥ भा०-जहां चित्त वा इन्द्रियोंको अपनी ओरखेचने वाला कोई कारण न हो गुहादि स्थानमें योगाभ्यासकी गतिसे पर- मात्माका ध्यान करता हुआ इष्ट सुख शानितरूप फलका भागी हो यह सम्भव है। अर्थात् जैसे सब साधनों के ठीक होने पर ही सब कार्यों की सिद्धि होती है वैसे यहां भी जानो ॥१०॥ नीहरधूमार्कानिलानलानां ख- द्योतविद्युत्स्फटिकशशिनाम्।ए- तानि सूपाणि पुरस्सराणि ब्रह्म- रायभिव्यक्तितकराणि योगे ॥११॥ अ०-योगे क्रियमाणे सिद्ध्यभिमुखे दी- र्घकालमभ्यस्ते नीहारस्तुषारोऽर्कः सूर्योऽनि- लोवायुरनलोऽग्निः खद्योतादयश्च प्रसिद्धा एषां रूपाणीव ब्रह्मण्याविष्क्रियमाणे ध्यानयोगे लक्षितानि भान्ति ब्रह्मज्ञानं ब्रह्मणः साक्षा- कारः सद्यो भवितेति योगसिद्धरूपब्रह्मज्ञा- नस्य पूर्वरूपाणि भवन्ति । भाव-न चाल्पकालाभ्यासिनोऽजितेन्द्रि- यस्य प्रमत्तस्य प्रतिकूलदेशे वा युञ्जानस्य
99
द्वितीयोऽध्यायः॥
कस्यापि योगसिद्धिसूचकचिन्हानि भवितुम-
हन्ति तस्माद्योगमन्यस्यन्सर्वाङ्गपूर्तये दीर्घ-
कालावधि निरन्तरं श्रद्धया तोत्राभ्यासेन
यतेत ॥ ११॥
भाषार्थ:-( योगे ) बहुत काल तक निरन्तर श्रद्धा पूर्वक
योगाभ्यास करते २ जब योग सिद्ध होने का समय प्राता है
तब (निहारघूमार्कानिलानलानां खद्योतविद्युत्स्फटिकशशि
नाम् ) तुषार धुना, सूय, आधी,अग्नि जुगुन, बिजुली, मणि
और चन्द्रमा ( एतानिब्रह्मपभिव्यक्तिकराणि रूपाणि पुर-
सराणि) इन सबके रूप समाधि में ब्रह्म परमात्माका ज्ञान
होने के पूर्व रूप होते है। अर्थात् जब योग सिद्धि द्वारा ई-
श्वरका साक्षात्ज्ञान होने का समय निकट भाता है तब ध्यान
में तुषारादि के से रूप क्रम से दीखने लगते हैं।
भा०-थोड़े काल के योगाभ्यासी वा योगभ्रष्ट अजितेन्द्रिय
प्रमादी निरुत्साही वा प्रतिकूल स्थान में योगाभ्यास करने वाले
किसी अधकचरे योगीको योगसिद्धि के सूचक चिन्ह नहीं दीख
सकते। इस कारण योगाभ्यास करता हुआ सब अङ्गों की पूर्ति
के लिये बहुत काल तक श्रद्धा के साथ तीव्राभ्यास द्वारा नि.
रन्तर प्रयत्न करता रहे ॥१९॥
एथव्याप्यतेजोऽनिलखे समु-
त्थिते पञ्चात्मके योगगुणे प्रवृत्ते।
न तस्य रोगो नजरान मृत्युःप्रा-
प्तस्य योगाग्निमयं शरीरम्॥१२॥
95 कृष्णयजुर्वेदीयश्वेताश्वतरोपनिषदि- अ०-पृथ्व्याप्यतेजोनिलखे समुन्धिते स्वदेहस्थपञ्चतत्त्वानां सम्यगुत्कर्षे निकृष्टांश- हासेन शुद्धांशे प्रवलत्वं यात उन्नते तदेवं पञ्चात्मके योगगुणे प्रवृत्तं दिव्यगन्धादिवि- पयप्रवृत्तौ सत्यां तस्य योगामिमयं शरीरं प्रा. तस्य योगिनो न रोगो न जरा न मृत्युः भा०-यथा च सुवर्णादीनां यथायथा शोधनोपायाः क्रियन्ते तथातथा मलिनांशा असारा निवर्तन्ते शुद्धांशाश्च सारा वैशार- द्यमानाः प्रदीप्यन्ते । सारएव सर्वत्र शुद्धांश उच्यते । सारएव चिरस्थाय्यसारश्च सद्यो वि- नश्वरी भवत्येव । एवं योगाङ्गानुष्ठानप्राव- ल्येन बहुकालीनेन दृढेन शरीरेन्द्रियान्तःक- रणानां मलिनांशाः शनैःशनैरपचीयन्ते शुः ट्ठांशाश्च सारभूता उपचीयन्ते । तथा च सति सारभूता वजमण्यादयश्चिरन्तनस्थायिनोऽवि- नश्वराइव योगिशरीरं चिरन्तिष्ठति । असा- रमेत्र रोगा जरा चानामति । यच्च दर्पणं यादृशं सारभूतं मालिन्यविहीनं च त- स्मिन् तादृशमेव रूपवैशारा सम्भवत्येवंशुद्धः सारभूतैरेवेन्द्रियैर्विप्रकृष्टतरगन्धादिविषयाणां ७० " द्वितीयोऽध्यायः॥ सम्यग्ग्रहणं सम्भवति ॥ “ज्योतिष्मती स्पर्श- वती तथा रसवती परा । गन्धवत्यपरा प्रोक्ता चतस्रस्तु प्रवृत्तयः ॥ आसां योगप्रवृ- तीनां यद्यकापि प्रवर्तते । प्रवृत्तयोगं तं प्रा- हुर्योगिनो योगचिन्तकाः ॥ योगमाये तु पञ्च षड् वा प्रवृत्तय उक्तास्तासु चतस्रो वि- षयवत्योऽविषया चैकोक्ता ॥ १२ ॥ भाषा:-(पृथ्व्याप्यतेजोऽनिलखे समुस्थिते) अपने शरी- रस्थ पृथिवी अम् तेन वायु और श्राकाशरूप पञ्चतत्वोंके निकृष्ट मलिनांश का नाश हो कर शुद्धांश की प्रबलता वा उन्नति होने से इस प्रकार ( पञ्चात्मके योग गुणे प्रयत्ते) दिव्यग धादि विषयों में प्रकृष्ट साक्षात वृत्ति होने पर अर्थात् ज्ञा. नेन्द्रियों के द्वारा सूक्ष्म व्यवहित और प्रति दूर के शब्दादि विषयोंका साक्षात् बोध होनेकी शक्ति प्रकट होने पर (तेस्य योगाग्निमयं शरीरं प्राप्तस्य नरोगो न जरा न मृत्युः) पञ्च- तरवकी शुद्वि द्वारा योगाग्निरूप शरीर को प्राप्त हुये उस योगी पुरुषको न रोग न निर्वगता और न मृत्यु सताता है । भाo- जैसे सुवादि धातुनों के शोधने का जैसा २ उ- पाय किया जाता है वैसे २ मलिन प्रभार अंश उन सुवर्णादि के निकलते जाते और शुद्ध सारांश निर्मलता को प्राप्त हुये अंश उज्ज्वल होते हैं । तथा सार ही सर्वत्र शुद्धांश कहाता और सार ही चिरस्थायी होता वा जो शुद्ध चिरस्थायी अंश है वही सार कक्षाता और प्रसार अपने स्वभाव से ही शीघ्र नष्ट होता है या जो शीघ्र नष्ट होने वाला है वह प्रसार क. हाता है। वैसे ही योग के तप आदि अङ्गों के अनुष्ठान की
कृष्णायजुर्वेदीयश्वेताश्वतरोपनिषदि-
प्रवलला से अर्थात् बहुत काल तक दृढ़ता के और निरन्तर
श्रद्धा के साथ साङ्गोपाङ्ग योगाभ्यास करने से शरीर इन्द्रियां
और अन्तःकरणके मलिनाश शनैः शनैः दूर हो जाते तथा शुद्ध
सारभून अंश रह जाते हैं । ऐमा होने पर शङःसार तस्त की
अधिक स्थिति रह सकने से ही बहुत काल ठहरने वाले सार
भूत अविनाशी होरा आदि के तुल्य योगी का शरीर महनों
वर्ष ठहरने वाला अविनाशी हो जाता है। प्रसार मिलन
वस्तु पर ही रोग और निर्वलतारूप जरावस्था अपना प्रभाव
[दखल] जमाते हैं इसी से योगी के शरीर यो रोगादि नही
दवा पाते । जो दपंग जैसा साररूप वा जैसा मलिनता रहित
होता उस में बैमा ही शब्दरूप दीखना सम्भव है। इसी प्र
कार शद्ध सारांशरूप निर्मल इन्द्रियों से प्रत्यन्त दूरस्थ सूक्ष्म
मा छिपे हुये गन्धादि विषयों का ग्रहणा या बोध योगी को
हो सकता है "ज्योतिष्मती, रसनी स्पर्शवती और गन्धवती
ये चार योगप्रवृत्ति कही है । इन योगप्रवृत्तियों में से यदि
किसी को एक भी सिद्ध हो जाय तो भी उस को योग में प्र.
विष्ट हुआ योगचिन्तक योगी लोग कहते हैं। ये किसी अन्य
ग्रन्थकार के दो श्लोक है गन में चार योग प्रवृत्ति मानी हैं
परन्तु (विषयवती वा प्रवृत्तिरुत्प्रनामनसः स्थितिनिवन्धनी)
इस योगसूत्र पर व्यासभाध्य में पाच विषयोंकी पांच प्रवृत्ति
मानी हैं। उन में चार विषयवती और एक विषया है ॥१२॥
लघुत्वमारोग्यमलोलुपत्वं
वर्णप्रसादं स्वरसौष्ठवं च । गन्धः
शुभो मूत्रपुरीषमल्पं योगप्रवृत्ति
प्रथमां वदन्ति ॥ १३॥
द्वितीयोऽध्यायः ॥ ८१ अ०-लघत्वमालस्याद्यभावआरोग्यं ज्व- रादिजन्यदुःखाभावोऽलोलपत्वं कर्मस्वचाञ्च- ल्यं शान्त्या धैर्येण च प्रवृत्तिर्वर्णस्याकृतेन- ह्मचर्यशौचाद्यनुष्ठानाधिक्येन शुद्धिर्दीप्तिः स्व- रसौष्ठवं सङ्कोचाद्यभावेन मानसशौचेन च स्वरस्य सम्यक् स्पष्टतया निस्सरणम्, शुद्ध- सात्त्विकाल्पाहारसेवनादेव शरीराच्छुभो ग- न्धो मूत्रपुरीषयोश्वाल्पत्वं जायतएव । इती- मां प्रथमां योगप्रवृत्ति वदन्ति योगीश्वराः। प्रथमश्रेणिं प्रविष्टस्य योगिनो लिङ्गानीमानि पूर्वरूपाणि भवन्ति ॥ भा०-योगाङ्गसेवनरतपुरुषस्य लघुत्वा- दिलिङ्गानि जायमानानि तस्य प्रथमयोगने- णिप्रवेशं सूचयन्ति। प्रथमणिप्रवेशानन्त- रमेव द्वितीयादिश्रेणिष प्रवेशो यज्यते । एवं च द्वितीयादिभूमिकास्वव पूर्वपद्योक्ता योग- प्रवृत्तिः सम्भवति यत्र योगाग्निमयं शरीरं योगिना प्रोप्यते । अत्र प्रथमपदोपादानादे- वान्यप्रवृत्त द्धितीयादित्वमायाति ॥ १३ ॥ भाषार्थः-(लघुत्वमारोग्यमलोलुपत्वम्) बालस्यादि को छोड कर शरीर का इलकापन, ज्वरादि रोगो का अभाव, कर्म करने में चञ्चलता का त्याग शान्ति और धीरज से प्रवृत्ति (वर्ण प्रसादं स्वरसौष्ठवं च ) ब्रह्मचर्य और शौचादि के अ ८२ कृष्णायजुर्वेदीयश्वेताश्वतरोपनिषदि- धिक सेवन से प्राकृति को शुद्धि प्रसन्नता शान्तिभाव का दीखना, सकोचादि के प्रभाव और मनके शुद्ध होनेसे स्पष्टता से सम्यक् वागी स्वर निकलना ( गन्धः शुभो भूत्रपुरीषमल्प योगप्रवृत्ति प्रघमा बदन्ति ) शुद्ध सात्विक अल्प भोजन के सेवन से शरीर के छिद्रो द्वारा शुभ अच्छे गन्ध का निकलगा और भून पुरीषादि मन्नो का कम उत्पन्न होना तथा कम निकलना योगीश्वर लोग इस दशा को योग की पहिली प्र. वृत्ति कहते वा योग की प्रथम श्रेणि में प्रवेश होने का ल क्षण लघुत्वादि को कहते मानते है । भा०-यमनियमादि योगाङ्गो के सेवन में रत पुरुष के शरीर में प्रकट हुए लघुत्वादि धिहू उस के योग को प्रथम श्रेणि में हुए प्रवेश को शताते हैं और प्रथम श्रेणी में प्रवेश होने पश्चात् ही द्वितीयादि श्रेणि मे प्रवेश हो सकता है। इस प्रकार द्वितीयादि भूमि वा दशा मे ही पूर्व इन्नोक में कही योग प्रवृत्ति हो सकती है कि हा योगामि स्वरूप शरीर को योगी प्राप्त कर सकता है । इस मन्त्र मे प्रथम पद के कहने से ही अन्य पूर्वोक्त प्रवृत्ति द्वितीयादि श्रेणि में होनी सिद्ध है ॥ १३ ॥ यथैव विम्बं मृदयोपलिप्तं तेजोमयं भाजते तत्सुधातम्। त- द्वात्मतत्त्वं प्रसमीक्ष्य देही एकः कृतार्थी भवते वीतशोकः ॥१४॥ अ०-यथैव विम्बं सुवर्णरजतादिमयं पात्रं शोधनाय मृदयोपलिप्तं यद्वा मालिन्य- रूपमृत्तिकया युक्तं तत्सुधातं सुधौतं सम्यक् प्रक्षालितं तेजामयं तेजःस्वरूपं शुद्धं सद्
द्वितीयोऽध्यायः॥
८३
भ्राजते शोभते यद्वाऽनौ धमायमानं मलिनं
विम्बं यथा भाजते तद्वा तद्वत्-[इवार्थेत्र वा-
शब्दः ] इन्द्रियादिसङ्गरहित एको देही देह-
स्वामी जीव आत्मतवं स्वीयमेववास्तविक
स्वरूपं परमात्मसदभावं प्रकर्षण सूक्ष्मया प्र-
ज्ञया समीक्ष्य वीतशोको निवृत्तशोकः सन्
कृतार्थः सिद्धसङ्कल्पो भवते ॥
भा०-स्वीय परमात्मरूपस्य साक्षात्का-
रेणास्य जीवस्य वयादि संयोगेन धातूना-
मिव यदा दुर्वासनादिजन्यं सर्व मालिन्यम-
नायासेन सद्यएव निवर्तते तदैकोद्वैतं स्वा-
त्मतत्वं ध्यानेन पश्यन् कृत कृत्यो जायते॥१४॥
भाषार्थः-( यथैव विम्बं मृदयोपलिसम् ) जैसे सुवर्ण
चांदी भादि धातुओं का पात्र शुद्ध करने के लिये मही से
मांगा लिप्त किया था सामान्य मलिनतारूप मट्टी से युक्त
हुमा ( तत्तेजोमयं सुधातं भाजते) वह अच्छे प्रकार धोनेपर
वा अग्नि से घर कर धोंपने से शुद्ध तेजोमय हुआ शोभित
होता चिलकने लगता है (तद्वैको देही-मात्मतत्त्वं प्रसमीक्ष्य
वीतशोकः कृतार्थो भवते ) उसी के तुल्य इन्द्रयादि के संगसे
रहित अपने स्वरूप में अवस्थित अकेला जीवात्मा अपने
वास्तविक शुद्ध परमात्मा स्वरूप को सूक्ष्म बुद्धि से अच्छे प्र.
कार समीक्षण करके शोक से रहित कृतार्थ हो जाता है ।
भा०-अपने परमात्मा स्वरूप के साक्षात् ठीक जान लेने
से दुर्वासनादि सम्बन्धी इस जीव को सब मलिनता जाब सुग.
मता से शीघ्र ही छूट जाती है तब एक अद्वैत अपने प्रात्म-
तत्वको ध्यान से देखता हुमा कृतार्थ हो जाता है ॥१४॥
कृष्णायजुर्वेदीयश्वेताश्वतरोपनिषदि- यदात्मतत्त्वेन तु ब्रह्मतत्त्वं दीपोपमेनेह युक्तः प्रपश्येत्। अजं ध्रुवं सर्वतत्त्वैर्विशुद्धं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः ॥ १५ ॥ अ०-जिज्ञासुर्जनी यदेह स्वदेहे दीपो- पमेनात्मतत्त्वेन स्वस्य जीवस्वरूपेण युक्तः रवरूपावस्थो विषयेन्द्रियादिसङ्गवर्जितो ब्रह्म- तत्त्वं ब्रह्मणस्तत्त्वभाव प्रकर्षण ध्यानगतः प- श्येत् । तदाऽजमजन्मानं ध्रुवमचलं सर्वतत्त्वै. विशुद्धमसंसृष्टं देवं दीप्यमानं स्वीयमीश्व- ररूपं ज्ञात्वा सर्वदुःखबन्धनैर्मुच्यते ॥ भो०-जीवस्यान्तःकरणेऽनेकाः कुवास- नारूपा दुःखबन्धहेतुका अनादिकालीना अ. हमेव मलिनः पापीत्यादयोऽज्ञानकारिता ग्र- न्थयो विद्यन्ते तासामेव पाशत्वं ताएव च सर्वविधदुःखमूलचिन्ता शोकादीनामुत्पादि- कास्तासामात्मदर्शनेन सत्यां निवृत्ती शोका- दयोऽपि निवर्तन्ते ॥ १५ ॥ भाषार्थ:-(यदेव दीपोपमेनात्मतत्वेन युक्तोब्रह्मतत्वम्) जब जिज्ञासु पुरुष अपने शरीरस्य अन्तःकरण में दीपक के तुल्य स्वरूप में अवस्थित अपने जीव स्वरूप से ब्रह्मतत्त्व को द्वितीयोऽध्याय ॥ (प्रपश्येत् ) पानावस्थित हो अच्छ प्रकार देखे और ईश्वर को ( अज ध्रुव सवतच विशुद्ध देव ज्ञात्वा सवपाशैमुच्यते ) भगन्मा अचल और सब पृथिव्यादि स्यूल सूक्ष्म तत्वो से अपरामृष्ट प्रसयुक्त प्रकाशमान अपनेको परमात्मस्वरूप जान के सब दु ख बन्धनो से छट जाता है । भा०-जीव के अन्त करगा मे अनादि काल से सचित ख बन्धन को कारण कुत्रासनारूप कि मै ही भलिन तथा पापी हू इत्यादि प्रज्ञान से हुई अनेक गाठे विद्यमान है वे ही फासने वाली रस्सी के तुल्य बाधनेवाली तथा वे ही सब दु खो का मूल चिन्ता शोकादि को उत्पन्न करने वाली है। स्वात्मज्ञान होने से उनकी निवृत्ति होने पर शोकादि भी छूट जाते है। एषो ह देवः प्रदिशोऽनु सर्वाः पूर्वो ह जातः स उ गर्भ अन्तः। सराव जातःस जनिष्यमाणः प्रत्य- ङ्जनांस्तिष्ठति सर्वतो मुखः॥१६॥ अ०-एप पूर्वोक्तो देवो दीप्यमान आत्मा सर्वादिशः प्रदिश्चानुगतो व्याप्तोऽन्तर्गर्भ मा- तुरुदरमध्ये पूर्व पूर्व जातः सर्गारम्भे ब्रह्म- रूपेण सर्व सृष्टुं स्वयमपि प्रादुर्भवति । स- एव जातः सएव च जनिष्यमाणो सर्गारम्भ सएव जीवरूपेण शरीरेषु प्रादुर्भूतः सएवचा- ग्रेऽपि प्रादुर्भविष्यति ततोऽन्य. स्वतन्त्रः कोऽ- पि जीवो नास्ति सर्वप्राणिषु प्रत्यङ् हृदि कृष्णयजुर्वेदीयश्वेताश्वतरोपनिषदि- जनानभिव्याप्य जीवरूपेण सर्वतोमुखस्ति- ष्ठति सर्वप्राणिगतानि मुखान्यस्य स सर्वतो मुखः ॥ तुरुदरे गर्भो भा०-सर्गारम्भा पूर्व परमात्मतो भिन्न न किमप्यासीत्तदनन्तरं सएव सर्वत्र व्याप्तो विधातृरूपेण सर्गारम्भे प्रादुर्भूतः। सएव मा. भूत्वा जायते। सएव जीवरूपेण जगति जाती जनिष्यते च सर्वप्राणिनां प्र. त्यगात्मरूपेण सर्वप्राणिषु तत्तदाकारेणाव- स्थितः ॥ १६ ॥ भाषार्थ-( एषो ह देवः प्रदिशोऽनुसाः ) यह पूर्वोक्त प्रकाशस्वरूप प्रात्मा सब दिशा और प्रदेशाओं में व्याप्त ( स उ अन्तर्गर्भ पूर्वो ह गातः ) वही सृष्टिके प्रारम्भ में ब्र झारूप से सब को रचने के लिये सब से पहिले प्रकट होता है ( भएव जातः स जनिष्यमाणः) सृष्टि के प्रारम्भ में धही परमात्मा जीवरूप से शरीरों में प्रकट हुभा और वही आगे होगा उससे खतन्त्र कोई जीवात्मा नहीं है। (प्रत्य- जनांस्तिष्ठति सर्वतोमुखः ) वही सब प्राणियों में है जान. शक्ति जिसकी ऐसा सब के हृदय में व्याप्त होकर जीवरूप से सब भोर सब को देखता है । भा०-सृष्टि के प्रारम्भ से पहिले पहिले एक परमेश्वरसे भिन्न कुछ भी नहीं था तदनन्तर सर्गारम्भ में वही सर्वत्र व्याप्त विधाता रूप से प्रकट हुआ, वही माता के उदर में गर्भरूप बनके उत्पन्न होता, और वही संसार में जीवरूप से प्रकट हुआ और आगे होगा। सब प्राणियोके बीच अन्त
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रात्मरूप
द्वितीयोऽध्यायः॥
विद्यमान उसी के आकार से उस २ में प्रव.
स्थित है।
यो देवोऽग्नौ योऽप्सु यो विश्वं
भुवनमाविवेश । य ओषधीषु यो
वनस्पतिषुतस्मैदेवायनमोनमः॥१७
अद-योगाभ्यासवनमस्कारादि कमप्या
त्मज्ञान साधनमिति दर्शयति-यो देव एकएव
नाना रूपेणावस्थित ईश्वरोऽग्नी योऽपसु य
ओषधीष यो वनस्पति योऽश्वत्थादिषु तत्त-
द्रूपेणावस्थितः एवमुपलक्षणमात्रकथनेन यो
विश्व सर्वं भवनं लोकमाविवेश तस्मै देवाय
नमोनमोऽस्तु ॥
भा०-सर्वव्याप्तेश्वराता द्वैताय यो भक्त-
यापुनःपुनर्नमस्करोति स्वेष्टसिद्धिं च ततो या
चते तमेव स्तौति च स्वभावेनैव भक्तवत्सल-
स्तस्य कल्याणमवश्यं करोतीति भक्त्यो नमः
स्कारादिना प्रसाद्यः। अहमोल्मोगुडाकेश सर्व
भूताशयस्थितः । वसूनांपावकश्चास्मि स्रोत-
सामस्मिजाहुवी । अश्वत्स्थःसर्ववृक्षाणामि-
त्यादिना तत्तद्रूपत्वं दर्शितम् । नमः पदस्य
द्विवचनमध्यायपूर्त्यर्थं चापि बोध्यम् ॥१७॥
CE कुष्णयजुर्वेदीयश्वेताश्वतरोपनिषदि- भाषार्थ -( योऽना योग्यतु योषधो यो वनस्पतिषु ) जो अग्नि मे जो जलो मे जो भोषधियो-गेहू जो भादि मे और जो वट पीपल आदि बनस्पतियो मे रहता इत्यादि प्र कार से ( यो देवोविश्व भवनमाविवेश ) जा देव ईश्वर सब लोक लोकान्तर ससार भर में प्रविष्ट हो रहा है (तस्मै देवाय नमोनम ) उस देव के लिये हम वार २ नमस्कार करते है वा करे अर्थात अग्नि, जाल, प्रोषधि और पीपल आदि वन स्पति इत्यादि सब मे जा उसी के रूप से विद्यमान है उस को नमस्कार करै॥ भा०-ससारस्थ अग्नि प्रादि पदार्थों में जो प्रबल वा अद्भुत शक्ति दीखती है व सब जिस की सत्ता मे वा नियम मे बद्ध होकर अपना २ काम देते है वही ईश्वर सर्वशक्ति मान् है। जो पुरुष सर्व व्याप्त ईश्वर को भक्ति के साथ बार धार नमस्कार करता और अपने इष्ट की सिद्धि उससे मागता उसी की स्तुति करता है ( स्वभाव से भक्तो का उद्धार करने वाला ईश्वर उस का कल्याण अवश्य करता है इस लिये भक्ति के साथ नमस्कारादि से उसको प्रसन्न करने का उद्योग अवश्य करना चाहिये भगवद्गीता अध्याय १० है कि हे अर्जुन ! मै स्व प्राणिया मे एकात्मा रूप से विद्यमान हू। वसुनो में अमि रूप , नदियो मे गगा रूप और वृक्षो मे पीपल रूप हू इत्यादि कथन से परमेश्वर का उर्स २ रूप होना दिखाया। यहा नम पद को अध्याय की समाप्ति दि. खाने के लिये द्वित्व किया है ॥ १७ ॥ इति ब्राह्मणसर्वस्वमासिक पत्रसम्पादकेन भीमसेनशर्मणानिर्मिते श्वेताश्वतरोपनिषद्भाष्ये द्वितीयोध्यायः समाप्तः ॥२॥ मे कहा .
अथ तृतीयाऽध्यायारम्भः। यएको जालवानीशत ईश- नीभिः साल्लोकानीशत ईश- नीभिः । यएवैकउद्भवे सम्भवे च यएतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति॥१॥ अ०-मत्स्यवन्धनं जालमिवायं संसारः प्राणिबन्धहेतुत्वाज्जालं तस्य स्वामी जाल- वान्मायोपाधिरेकोऽद्वितीयो न तस्य स्वामि- त्वेऽन्यः कश्चित्सम्मिलितोऽस्ति । एवं यएक ईशनीभिः साधकतमाभिः स्वशक्तिभिरीशन- शीलाभिर्वा-ईशत ईष्टे सर्वं ववशे स्थाप- यति । यएकएवोद्भवे उत्पत्तौसम्भवे स्थिति- काले च सर्वाल्लोकानीशत ईशनीभिरित्यु- क्तानुवादो दाढ यार्थः । ( बहुलं छन्दसि ।२ ४ । ७३) शपो लुगभावः । ये जनास्तस्यैक- त्वंसजातीयविजातीयस्वगतभेदशून्यत्वमीशि- तृत्वं चैतवयं तत्त्वतो विदुस्तेऽमृता भवन्ति॥ भा०-यथा मत्स्या जालान्निस्सर्नु न शक्नुवन्त्येवं प्राणिनो दुःखाधिके जगति १२
कृष्णायजुर्वेदीयश्वेताश्वतरोपनिषदि-
मग्ना अपि प्रायेण संसारजालानिस्सर्जुमशक्ता
भवन्ति । यथा धीवरादिर्जालवान् जाले न
वध्यते तेन मत्स्यानेव बधनाति तथैवेश्वरो
न बध्यते । यश्च कोऽपि जालस्वामिना मैत्री
करोति न तं जाले बध्नाति सः। अपि तु
बटुमपि निस्सारयत्येवेति मत्वा जालस्वा-
मिप्रसादाय दुःखान्मुमुक्षुणा विशिष्टोद्योगः
कार्यः॥
भाषार्थ:-(जालवान् य एक ईशनीमिरीशते ) मछलियों
को पकड़ने के लिये जैसा जाल बनाया जाता वैसे ही माणियों
के बन्धन का हेतु होने से यह संसार जाल कहाता है उस
संसार जाल का स्वामी जालवान् मायोपाधि ईश्वर काहाता,
जो इतने बड़े अनन्त जालवाला अपनी अनन्त शक्तियों द्वारा
सब को वश में रखता है ( य एवैकवद्भवे सम्भवे च सालो-
कानीशत ईशनीभिः) जो एक ही किसी अन्य की सहायता
न लेकर उत्पत्ति और स्थिति काल में वा प्रलय करने के
समय सब संसार को अपनी अनन्त शक्तियों से उत्पन्न आदि
करता है उस की इच्छा से विरुद्ध तिलमात्र भी उत्पत्ति
स्थिति प्रलय नहीं होता ( यएतद्विदुस्तेऽमृता भवन्ति ) जो
मनुष्य उसको एकता अर्थात् सजातीय विजातीय और स्वगत
भेद से रहित होने को और सब स्वामीपन को तत्त्वरूप से
ठीक २ जानते हैं वे मुक्त हो जाते हैं ।
भाo-जैसे जाल में फसी मछलियां निकलना चाहती हुई
भी निकल नहीं सकती फड़फड़ा २ कर उसी में मरजाती हैं।
वैसे संसार के असंख्य दुःखों में फसे हुए भी प्राणी संसार
तृतीयोऽध्यायः । १९ नाल से प्रायः निकल नहीं पाते । जैसे मछली पकड़ने वाले धीमर आदि जाल वाले जाल में स्वयं नहीं बंधते किन्तु उस जाल में मछलियों को ही पपाडते बांधते हैं। वैसे ईश्वर भी संसार जाल में बद्ध नहीं होता और जो कोई इस जाल के स्वामी से मित्रता मेलमिलाप करता है उस को वह जाल में नहीं बांधता किन्तु स्वयं बंधे हुए को भी अपनी कृपा दृष्टि से अवश्य निकाल लेता है। ऐसा मान कर दुःख से छूटने की इच्छा वाले मनुष्य को उचित है कि संसाररूप जाल के स्वामी को प्रसन्न करने के लिये विशेष उद्योग वा प्रयत्न करे ॥१॥ एको हि रुद्रोन द्वितीयाय तस्थुर्य इमाल्लोकानीशत ईश- नीभिः । प्रत्यङ्जनांस्तिष्ठति सञ्चुकोपान्तकाले संसृज्य वि- श्वा भुवनानि गोपाः ॥२॥ अ०-यो जनान्मनुष्यादीन्संसृज्य सम्य- गुत्पाद्य प्रत्यङ् तदन्तःकरणेषु क्षेत्रज्ञरूपेण तिष्ठति तिष्ठन्व्याप्तएव स्थितिकाले विश्वा विश्वानि सर्वाणि भवनानि गोपा रक्षति । अन्तकाले प्रलयावसरे च यः संचकोप संकु- पितः सर्वं संहरति । एवं य इमाल्लोकानी- शनीभिः स्वीयमायाशक्तिभिरीशत ईष्टे हि यतो बहुदेवात्मकोऽपि स एको रुद्रः सर्गस्थि- - कृष्णयजुर्वेदीयश्वेताश्वतरोपनिषदि- तिलयावसरेषु जालबद्धानां रोदयितैकएवास्ति तस्मादेव पूर्वजा ज्ञानिनो योगिनश्च द्विती- याय न तस्थ पतस्थिरे । भा०-सर्गस्थितिलयरूपकार्यत्रयस्य ब्रह्मा- दयस्त्रयः कर्त्तार उपाधिभेदेन भिन्ना अपि वास्तवेन रूपेणैकस्यैव ब्रह्मादीनि नामान्त- राणि रूपान्तराणि च सन्ति । इह मुण्डो भवेह जटिलो भवेह शिखीभवेतिवदेकस्यैव नामानि रूपाणि च बहूनि भवन्ति । सम्प्र- त्यपि यउत्पबन्ते ये लवधायुष्काः सुखं जी- वन्ति ये च मियन्ते तेषां सर्वेषां प्रात्यहिक- सर्गस्थितिलयानामप्यतीतानोगतयोरिवैकएव ब्रह्मविष्णुशिवात्मकं प्रधानं कारणमिति ये सम्यग्जध्यन्ते ते च तमेवैकं सोपाधिकैर्बहुभि- र्नामरूपैरप्युपासते । यतः पूर्वैरपि मुमुक्षुभि- स्तस्य सर्वाधीशस्यैकस्यैवोपासनमभिमतम- तोऽस्माभिरपि तथैवानुष्ठेयम् ॥२॥ भाषार्थः-(यो जनान् ससृज्यप्रत्यड् तिष्ठति) जो मनुष्यों सम्यक उत्पन्न करके उन के भीतर अन्तःकरणोंमें क्षेत्रज्ञ नाम रूप से ठहरा और व्याप्त रहता हुआ ही जगत् के स्थिति काल में ( विश्वा भुवनानि गोपाः ) सब लोकों की रक्षा करता है ( अन्तकाले संचुकोप) प्रलय का समय प्राते को तृतीयोऽध्यायः। हो जो सम्यक् कुपित हुआ सब का संहार कर देता है । इस प्रकार जो ( इमांलोकानीशनीभिरीशते ) इन सब लोकों को अपनी अनन्त माया शक्तियों से उत्पत्ति स्थिति प्रलय करता हुमा स्वाधीन रखता है (हि-एको रुद्रः) जिस कारण संसार जाल में फसे हुए सभ प्राणियों को रुलाने वाला रुद्र अनेक ब्रह्मा विष्णु श्रादि देवता नाम रूप होता हुआ भो एक ही है इसी कारण पूर्वग ज्ञानी योगी लोगों ने भी (द्वित्ती याय न तस्युः) अन्य किसी द्वितीय की भक्ति उपासना नही की किन्तु उस एक की ही उपासना सब करते पाये हैं। भा०-सृष्टि स्थिति और प्रलयरूप तीन कार्यों के करने वाले ब्रह्मा विष्णु रुद्र नामक तीन कर्ता उपाधि भेद से नाम रूपमात्र भिन्न होने पर भी वास्तविक स्वरूपसे वे सव एक के ही ब्रह्मादि तीन नाम तथा रूप है। जैसे कोई कहे कि हे देवदत्त तू यहां मुण्ड हो यहां जटिल हो और यहा केवल शिखाधारी होजा । इसी प्रकार एक के ही बहुत नाम तथा रूप हो जाते हैं। वर्तमान समय में भी जो उत्पन्न होते जो उत्तम दशा में जीवित रहते और जो मरतेजाते हैं उन सबके नित्य होने वाले उत्पत्ति स्थिति प्रलयों का भी भूत भविष्यत् काल के तुल्य ब्रह्माविष्णुशिवात्मक एक ही प्रधान कारण है, जो लोग ऐसा ठीक २ जानते हैं वे देवता रूप सोपाधिक अनेक नाम रूपों से भी उसी एक की उपासना करते हैं। क्योंकि पूर्वज मुमुक्षु लोगों ने भी उसी एक सर्वाधीश की उपासना स्वीकार की है इस से हम को भी वैसा ही करना उचित है ॥२॥ विश्वतश्चक्षुरुत विश्वतोमुखो विश्वतोबाहुरुत विश्वतस्पात् ।
कृष्णयजुर्वेदीयश्वेताश्वतरोपनिषदि- संबाहुभ्यां धमति सं पतत्रै-- वाभूमी जनयन्देवएकः॥३॥ अ०-तस्यै वा द्वितीयस्य रुद्रस्य विरा- डात्मनाऽवस्थितिं तत्स्रष्टुत्वं च दर्शयति- सर्वत्र व्याप्त्या सर्वशक्तिमत्तया च विश्वतः सर्वप्राणिगतानि चक्षुषि दर्शनशक्तयो यस्य विश्वतः सर्वप्राणिगतं मुखं भक्षणभाषणरूपा शक्तिरस्य विश्वतः सर्वप्राणिनां बाहवः स्तम्भ- नशक्तयो यस्यैवं विश्वतः सर्वप्राणिनां पादा देशान्तरप्राप्तिशक्तयो यस्य स तादृशः सर्व शक्तिर्देवो द्योतनशील एकएवेश्वरो द्यावा- भूमी अग्नीषोमीयं देवासुरं सप्रकाशमप्र- काशं वेत्यादिरूपं द्विविधं द्यावापृथिव्यात्मक सर्ग जनयन् प्रादुर्भावयन् बाहुभ्यां बलट्टयेन दैवबलेनासुरबलेन च [बाहुवै बलमिति ब्रा- ह्मणम् ] यद्वा धर्माधर्माभ्यां सन्धमति संग- मयति पतत्रः पतनशीलैः संसरणस्वभावैः परिवृत्तिधर्मकैः पञ्चभूतैश्च विश्वा भूतानि संगमयति संयोजयति।धमतिर्गतिकर्मा निघ- ण्टौ २ । १४ । पठितः स चात्र ण्यर्थः ॥
तृतीयोऽध्यायः भाव-विश्वतश्चक्षरित्यादिकथनेन तस्य सर्वशक्तिमत्त्वमत्र प्रतिदितम् । एकएव चिदात्मा सर्वमनध्यादिप्राणिष्यवस्थितोऽन्तः- करणेषु खचैतन्येन दर्शनादिशक्तिं जनयति तस्मात् सा विश्वतश्चक्षुरित्यादिरूपेण कथ्यते। यथा कश्चित्राहुट्दयेन जलादिकं क्षोभयेदेवं यो भोग्यभोक्तरूपस्त्रीपुरुषादिविविधंशक्तिद्व- येन सर्वमविरतमवित्रान्तं निरन्तरं भ्रामयति यन्त्रारूढमिव । तस्माद्यस्य स्वाभाविक बले- नैव सर्वो लोकलोकान्तरोऽनन्तोपि सोडवि- रामेण भ्राम्यति स कियच्छक्तिरिति ध्येयम् । शुक्लयजुषि १७ । १९ मन्त्रोऽयं द्रष्टव्यः ॥३॥ भाषार्थ:-उसो एक अद्वैत रुद्र की विराटूप से स्थिति और विराट रूप की रचना करने वाला भी वही है यह दिखाते हैं । सर्वत्र व्याप्त और सर्वशक्तिमान होने से (विश्व तश्चक्षुरुत विश्वतोमुखः ) स्थिति समयमें सब प्राणियो में विद्य- मान् चक्षुइन्द्रिय हैं जिस के अर्थात् सब को सब ओर भागे पीछे भीतर बाहर देखने की जिसमें शक्ति है तथा सब प्राणि शरीरों में भोजन और भाषण करने की शक्ति जिसकी है वा प्रलय के समय सब ओर से जिस में सबके निगल जाने की शक्ति है ( विश्वतो बाहुरुत विश्वतस्पात् ) स्थिति काल में सब प्राणियों के शरीरगत हाथ पगों से जो सर्वत्र काम कर रहा है अथवा अनन्त ब्रह्माण्ड को थांभने पकडने धारणा कृष्णयजुर्वेदीयश्वेताश्वतरोपनिषदि- करने की जिन्न को शक्ति तथा दूर से भी दूर देशान्तर में पहुंचने की शक्ति भी जिसमें सब ओर से विद्यमान है । वह ऐसा सर्वशक्तिमान् (एको देवो द्यावामी जनयन् ) एक ही देव ईश्वर प्रमि-सोम, देव-असुर, वा प्रकाश अप्रकाश इत्यादि रूप दो २ प्रकार की आकाश पृथिव्यन्तर्गत सृष्टिको प्रकट करता हुआ (बाहुभ्यां संधमति ) देव बल और भासुर- बल इस दो प्रकार के बल से अथवा धर्म अधर्मस्प दो भुशाओं से सब प्राशियों को संयुक्त करता और ( पतःसम्) चलायमान स्वभाव वाले परिवर्तन शील पांच भूतों से सब घराघर को संयुक्त करता है। ब्राह्मण ग्रन्थों में वाहु शब्द का अर्थ बल लिया गया है [ दोही बल मुख्य हैं धन वण स्वतन्त्र नहीं किन्तु पराधीन है शिसको वुद्धिबल वा बाहु बल दोनों होते वा एक होता उसी के पास धन भी प्राजाता है ॥ भा०-(विश्वतश्चक्षुः ) इत्यादि कथन से उस ईश्वर का सर्वशक्तिमान सब में व्याप्त होना सिद्ध किया है। एक ही चेतनात्मा सब मनुष्यादि प्राणियों में अवस्थित रहता हुआ सब के अन्तःकरणों में अपनी चेतनता से' दर्शनादि शक्ति प्रकट करता है इसी कारण वह (विश्वतश्चक्षुः) इत्यादि नाम वाला हुआ है। जैसे कोई मनुष्य दोनों बाहु में बल पूर्वक जल प्रादि को क्षोभित करे वैसे जो भोग्य भोकारूप स्त्री पुरुषादि दो २ शक्तियों से सब संसारको बीचमें विश्राम न लेकर वा विराम न करके निरन्तर चक्र पर चढ़े हुए के तुल्य भ्रमा रहा है। इस कारण जिस के स्वाभाविक बल से ही सब लोक लोकान्तर अनन्त संसार भी निरन्तर भ्रमण कर रहा है कभी कोई ब्रह्मचक्र के वेग से निकल पाता है वह कैसी वा कितनी शक्ति वाला हो सकता है इस पर ध्यान । तृतीयोऽध्याय । देना चाहिये । शुक्ल यजुर्वेद १७ । १८ मे यह वेद का मन्त्र है ज्यो का त्यो यहा लिखा गया जानो ॥ ३ ॥ यो देवानां प्रभवश्चोभवश्च विश्वाधिपो रुद्रो महर्षिः। हिर- ण्यगर्भ जनयामास पूर्व स नो बुद्ध्या शुभया संयुनक्तु ॥४॥ अ०-क्षेत्रज्ञरूपेणावस्थितस्य तस्यैव सृष्टि- प्रक्रियां प्रतिपादयन्मन्त्रद्रष्टर्षिः स्वाभिप्रेतं प्रार्थयते यइन्द्रादिदेवानां प्रभव उत्पत्तिहेतु- रुटुभवः विभूतियोगहेतुश्च विश्वस्य सर्वस्या- धिपोऽधिष्ठाता पालयिता वा रुद्रः सर्वेषां शास्ता रोदयिता महर्षि. सर्वज्ञो निरतिश- यज्ञानी यश्च पूर्व सर्गारम्भे हिरण्यगर्भ हित- करं रमणीयामत्यज्वलं ज्ञानं गर्भऽन्तर्मध्ये यस्य तादृशं स्वस्यैवरूपं ब्रह्माणं पूर्व सर्गादौ जनयामास सर्व स्रष्टुं प्रकटीकरोति स ईश्वरः शुभया बुध्या नोऽस्मान् संयुनक्त येन निःो- यसमाजो वयं स्यामेति प्रार्थनां कर्म । भा०-यथा पुरतकादीनां निर्माणं प्रका- शनमन्येषु प्रवृत्तिश्चैकेनैव क्रियते तथास्य १३ कृष्णायजर्वेदीयश्वेताश्वतरोपनिषदि- भौतिकस्य दैविकस्य च सर्वस्य जगत उत्पत्ति प्रवृत्तिं च यएकएव ब्रह्मनामरूपेण स्वयमा. विर्भ य करोति तस्मादेव स सर्वाध्यक्षः सर्व- शास्ता सर्वज्ञश्चास्ति । यथा जलेनैव महती पिपासा निवर्तते नान्येन साधारणोपायेनैवं सर्वाधीशसर्वज्ञप्रार्थनोपासनध्यानादिनैव प्रा. मिनो महद्दुःखं निवर्त्तते ॥ ४ ॥ भाषार्थः-पूर्व मन्त्र में कहे क्षेत्रज्ञ रूपसे सब प्राणियों में विद्यमान उसी परमेश्वर की मृष्टि प्रक्रिया दिखाते हुए मन्त्र द्रष्टा ऋषि अपने अभीष्ट फल प्राप्ति की प्रार्थना करते हैं-(यो- देवानां प्रभवश्वोद्भवञ्च ) जो इन्द्रादि देताओंकी उत्पत्ति का और उन २ के महत्त्व नाम अष्टसिद्धि प्राप्ति का हेतु अर्थात जो देवों के देवत्वका भी कारण है (विश्वाधिपो रुद्रों महर्षिः ) जो सम जगत का अधिष्ठाता या रक्षक सर्वोपरि शासन पाता और महान् ऋषि नाम ज्ञानी सर्व जान. स्वरूप है । ( पूर्व हिरण्यगर्म जनयामास ) पहिले सृष्टि के प्रारम्भ में अर्थात् प्रत्येक कल्प में सब के हितकारी रमणीक प्रत्युज्ज्वल ज्ञान है मीतर जिसके ऐसे अपने ही स्वरूप को को सब सृष्टि रचने के लिये ब्रह्मा रूप से प्रकट किया और करता है ( स नः शुभया बुद्ध्या संयुनक्तु ) वह ईश्वर हम लोगों को अच्छी कल्याणकारिणो बुद्धि से संयुक्त करे जिस से हम निःश्रेयस सुख के भागी हों ऐसी प्रार्थना करते हैं। भा०-जैसे पुस्तकादि का बनाना और प्रवृत्तिनाम सर्वत्र प्रकाशित करना ये दोनों काम जहां एक ही करता वहीं उन पुस्तकादि पर उस का पूर्ण अधिकार होता वैसे भूतनाम तृतीयोऽध्यायः। तत्व और देवनाम शक्तिरूप सूक्ष्म तत्तत्रों सम्बन्धी सब जगत् की उत्पत्ति और उन २ कार्यों में प्रवृत्ति को एक ही ब्रह्मा नाम रूप से स्वयं प्रकट होकर करता है इसी से वह सर्वा ऽपर सब का शासक और सर्वज्ञ है । जैसे जगसे ही बढ़ी हुई भ्यास शान्त वा निवृत्त होती है किन्तु अन्य किसी साधा. रण उपाय से नही इसी प्रकार सर्वक्ष की प्रार्थना उपासना और ध्यानादि से ही जन्म मरणादि सम्बन्धी महान् दुःख निवृत्त हो सकता ॥४॥ या ते रुद्र शिवा तनूरघो- राऽपापकाशिनी। तया नस्त- नुवा शन्तमया गिरिशन्ताभिचा- कशीहि ॥५॥ अ०-पुनरपि तस्य स्वरूपं दर्शयन्मन्त्र- द्वयेनाभोप्टप्रार्थनां दर्शयति-हे गिरिशन्त ! गिरी पर्वते मेघे वा विद्यमानः शं सुखं तनोति भक्तमुपासकं सुखयति तत्सम्बुद्धी, मिथ्या- भाषिणां रोदयितः हेरुद्र !ते तव या शिवा सुखरूंपा सुखप्रदा शान्ताऽविद्यातत्कार्यवि- निर्मुक्ता सच्चिदानन्दब्रह्मस्वरूपाऽघोराऽभयप्रदा सर्वभयाऽपहारिणो चन्द्रविम्बवदानन्दप्रदा पापेतरस्य पुण्यस्यैव प्रकाशिनी स्मरणमा- त्रेणाघनाशिनी पुण्यमेवोपासकाय ददाति न १०० कृष्णायजुर्वेदीपश्वेताश्वतरोपनिषदि- कदापि पापफलमिति तनूस्तव स्वरूपं तया शन्तमयाऽतिशयेन पूर्णानन्दस्वरुपया तनुवा तन्वा स्वरूपेण नोस्मानभिचाकशीहि-अभि- पश्य कृपादृष्टिं विधेहि ॥५॥ यालिषु गिरिशन्त ! हस्ते विभय॑स्तवे। शिवां गिरित्र ! तां कुरुमा हिलेसीः पुरुषं जगत्॥६॥ अ०-हे गिरिशन्त रुद्र ! यामिषु पाप- फलस्य दुःखस्य हेतुमनिष्टफलप्रदानशक्ति पापिध्वस्तवे क्षेप्तं हस्ते विभर्षि धारयसि । हे गिरित्र ! गिरितो धर्मज्ञानप्रकाशावरका- त्तमोरूपपापात्रातः ! तामिषु शिवां शान्तां कुरु शान्त्या दुःखभोगं समाप्य त्वदुपासनेन वयं सुखिनः स्याम । जगज्जङ्गमं पुरुषं पुरुष- त्वप्रधानं विशिष्टधय॑कार्यसाधनक्षम कमपि मा हिंसीर्मा बधीः ॥ भा०-स्तुतिपुरस्सरा प्रार्थनाऽत्र प्रधा- नास्ति । रुद्रनामरूपात्मकेश्वरस्तुतिप्रार्थ- नाभ्यां ये पुण्यरूपाः संस्कारा हृद्याविर्भवन्ति तैः पूर्वसजिता दुःखहेतवः कुसंस्कारास्तिरो- तृतीयोऽध्यायः। २०१ भूयन्ते शिथिलोनियन्ते । द्वयेऽपि संस्कारा ईश्वराधीनाः पापसंस्काराश्च शस्त्राणीव दुःख- प्रदाः । यस्य कल्याणमयं मङ्गलमयं सर्वभया- पहं पुण्योदयरूपं च निरतिशयं स्वरूपं तदा- नयेणैव सूर्योदये महत्तमइव सर्वः कुवासना- रूपी हार्दः पापपुजः सद्यश्छिद्यते तस्यापि निरतिशयशुद्धज्ञानप्रकाशस्य परेशधृतस्य ज्ञान- तमश्छेदने शस्त्रत्वं बोध्यम् । यथायथा सर्वा- धीशस्य प्रार्थनां स्तुतिमुपासनां च चेतसा सम्यक करोति तथा तथा हृदि शुद्धो ज्ञान- प्रकाशो वृद्धिंगतो भवति। तस्मात्परमकल्या- णसाधनमेतदिति ज्ञात्वा सुज्ञेनानुष्ठेयम् । शुक्लयजुष्यपीमो मन्त्री द्रष्टव्यौ ॥ अ० १६ । मं०२।३॥५॥६॥ भाषार्थ:-फिर भी उन्हीं रुद्र भगवान् का स्वरूप वर्णन करते हुये दो मन्त्रीसे प्रार्थना दिखाते हैं हे (गिरशन्त ते या शिवाघोरापापकाशिनी तनूः) गिरि नाम पर्वत वा मेघ में विद्यमान रहते हुये उपासक मनुष्यों के लिये शं नाम कल्याण को विस्तृत करने वाले वा सत्यभाषणशील भक्त उपासक को सुखी रखने वाले तथा मिथ्यावादी वा वेदविरोधियों को रुलाने वाले रुद्र नामरुप ईश्वर तुम्हारा जो सुखरूप सुख- दाता शान्त अविद्या तथा माया जन्य कार्य के दोषोंसे पृथक् सच्चिदानन्द ब्रह्मरूप निर्भयता पहुंभाने वा सब प्रकारके भय १०२ कृष्णयजुर्वेदीयश्वेताश्वतरोपनिषदि- को हरने वाला तथा चन्द्रमा के तुल्य शान्ति सुख देने वाला और पाप से सर्वथा रहित निर्दोष पुण्य का ही प्रकाशक उपासक के लिये पुश्य,को ही देने वाला किन्तु कभी पाप में न गिराने वाला स्मरणगान करने से पाप नाशक शरीर रूप है ( तया शन्तमया तन्त्रा) उस अत्यन्त कल्याणमय पूर्ण श्रानन्द स्वरूप सुखदायी अपने शरीर से ( नोऽभिधाक- शोह ) हम लोगों को देखिये हम पर कृपादृष्टि कीजिये ॥ भाषार्थः-हे ( गिरिशन्त ! ) पर्वत वा मेघ में रहते हुये भक्तको सुखी रखने वाले रुद्रनामरूप ईश्वर ! ( यामिषुमस्तये हस्ते विभर्षि ) जिस दुःख के हेतु अगिष्टपाप के फल देनेको शक्तिरूप शस्त्रको पापियों पर फेंकने के लिये हाथमें धारण करते हो । हे ( गिरित्र ) धर्म और ज्ञान के प्रकाशको ढापने वाले बद्दल के समान प्रज्ञानान्धकाररूप पाप से बचानेवाले ईश्वर ! ( तां शिवां कुरु ) उस शस्त्रशक्ति को शान्त सुखमय करो जिससे हमलोग शान्ति के साथ दुःखभोग को समाप्तकर आपकी उपासना से सुखी हों और (जगतपुरुषं मा हिथंसी:) धर्मानुकूल विशेष कार्य साधने में समर्थ पुरुषार्थी सचेत मनु ध्यादि किसी को भी मत मारो गत बधो । भा०-स्तुतिपूर्वक प्रार्थना करना इन दोनों मन्त्रों में प्रधान' है । रुद्र नाम रूपधाले ईश्वर की स्तुति प्रार्थना के द्वारा जो पुण्य पवित्र स्वरूप संस्कार हृदय में प्रकट होते है उनसे पूर्वकाल के संचित दुःखों के हेतु कुसंस्कार पाप तिरो होते दब जाते वा शिथिल हो जाते हैं। अच्छे घुरे दोनों प्रकार के संस्काररूप पाप पुण्य फल भोगने में ईश्वराधीन रहते उनमें पाप के संस्कार शस्त्रो के समान हृदय में दुःखोत्पादक होते हैं । जिस का कल्याणकारी मङ्गलमय बधाने वाला निरतिशय पुण्य भूयं कासा उदय ही स्वरूप है उस रुद्ग भगवान् का शरण लेने से सब भयों २ मन परमकल्याण का तृतीयोऽध्यायः। १०३ की सूर्योदय हाते दो महान् अन्धकारके तुला मय कुवासना रूप हृदय का पाप समूह शीघ्र ही नष्ट छिन्न भिन्न हो जाता है ईश्वर में रहने वाला अत्यन्त शुद्ध वह ज्ञान प्रकाश भी अज्ञानरूप शत्रु के छेदन के लिये प्रवल शस्त्र मानना चाहिये सर्वाधीश की स्तुति प्रार्थना चपासना को जैमा सम्यकम लगा के मनुष्य करता है वैसा २ उम के हृदय जान का प्रकाश बढ़ता जाता है। इसो लिये स्तुति आदि साधन है यह जान कर विचार शील को अवश्य ऐसा ही करना उचित है । शक्ल यजुर्वेद अ०१६ में दूमरे तोमरे ये दोनो मन्त्र हैं ॥ ५॥६॥ ततः परं ब्रह्म परं बृहन्तं यथानिकायं सर्वभूतेषु गूढम् । विश्वस्यैकं परिवेष्टितारमोशं तं ज्ञात्वाऽमृता भवन्ति ॥७॥ अ० पुनस्तस्यैव कारणात्मनाऽवस्थिति प्रदर्शयन् ज्ञानान्मोक्षमाह-ततो जीवात्मयक्ता ज्जगतः परं कारणरूपेण पृथग्भूतं यद्वा ततस्माज्जगदात्मनो विराजः परं बृहन्तमत्यन्तं वृद्धं विधातुरपेक्षयापि वृद्धेः पराकाष्ठां प्राप्त सर्वभूतेषु सर्वचराचरेषु गूढं तत्तद्रूपेणैव यथानिकायं यस्य वरतुनो यादृश्याकृतिस्तस्यां तरूपेणैव व्याप्तमन्तरवस्थित विश्वस्य सर्व- १०४ कृष्णायजुर्वेदीयश्वेताश्वतरोपनिषदि- स्यैकमेव पारवेष्ठितारं तमेकमेव सर्वं ब्रह्माण्ड स्वस्यान्तः कृत्वा स्वात्मना सर्वं सर्वतो व्याप्या- वस्थितमीशं यथावस्थितं ज्ञात्वाऽमृता जन्म- मरणरहिता भवन्ति । भा०-ज्ञानी जनो देवमनुष्यादिसर्वप्रा- रायपेक्षया मायापेक्षया च शुटुममलं क्वाप्य- संसक्तं व्याप्तमनन्तं सर्वान्तर्यान्तर्यामिणम- खिलब्रह्माण्डं खान्तः कृत्वाऽवस्थितं स्वीयमेव वास्तवेनेदृशं परमात्मरूपं ज्ञात्वा मुक्तो भवि- तुमर्हति नान्यथा ॥७॥ भाषार्थ:-फिर उसी ईश्वर की कारणरूप से अवस्थिति दिखाते हुए जान से मोक्ष होना कहते हैं-(ततः परं यथा निकायं सवभूतेषु गूढं विश्वकं परिवेष्टितारम् ) उस जीव सहित जगत् से वा जगत् रूप विराट् से परे वस्तु को जैसी आकृति वा जिस का जैमा शरीर है उसमें उसी २ के रूप से व्यास सबके भीतर स्थित सब को सब ओर से आच्छादित करने अर्थात अपने भीतर रखने वाले (बृहन्तं तमीश ज्ञात्वा) ब्रह्मादि देवों सेभी अत्यन्त बई बड़प्पन को पराकाष्ठा (हद्द) को प्राप्त हुए उस ईश्वर ज्यों का त्यों 'जान कर ( अमृता भवन्ति ) जन्म मरणरहित मुक्त हो जाते हैं । भा०-देव मनुष्यादि प्राणी और जहात्मक मायाको अपेक्षा अति शुद्ध निर्मल, किसी में लिप्तन होने वाले, व्याप्त अनन्त सबके अन्तःकरण में विद्यमान् ,सब ब्रह्माण्डको अपने भीतर करके ठहरे हुए , वास्तव में अपने आप को ही ऐसे उक्त .
१०५ कृतीयोऽध्यायः। परमात्मरूप जानके जागी मनुष्य मुक्त हो सकता है अन्यथा नहीं ॥७॥ वेदाहमेतं पुरुषं महान्तमादि- त्यवर्णं तमसः परस्तात् ॥ तमेव विदित्वातिमृत्युमेति नान्यः पंथा विद्यतेऽयनाय॥८॥ अ०-इदानीमुक्तम) द्रढयितुं मन्त्रगनु- भवं दर्शयित्वाउद्वैतात्मतत्त्वज्ञानादेव मोक्षो नान्यथेति दर्शयति अहं मन्त्रद्रष्टा-एतं प्रत्य- गात्मरूपेण सर्वान्तःस्थं महान्तं सर्वात्मकत्वा- दादित्यवर्ण प्रकाशमयं तमशोऽविद्याज्ञाना- सर्वत्र परस्तादतिदूरमन्धकारराहित्यस्य काष्ठां प्राप्त [आदित्यप्रकाशाव्य वच्छेदार्य- मिदं मेघादिनाऽऽच्छाद्यते सूर्यप्रकाशो न तथा- ज्यम् ] पुरुष पूर्ण वेद जानामि । तमेव पुरुषं विदित्वा मृत्युमत्येति-अतिक्रामति मृत्युस्तं नाक्रामति मृत्यु जयतीत्यर्थः । अयनाय नि- रन्तरं शान्त्या स्थित्यय परमपदावाप्तये ।ब्रह्म चक्रण यद्धमणं तत्समाप्तयेनान्यः कश्चिदपि पन्था मार्गों लोके वेदे वा विद्यते ।
१०६ कृष्णयजुर्वेदीयश्वेताश्वतरोपनिषदि- भा०-शुक्लयजुषि-अ० ३१ । १८ अयं मन्त्रः । अयमाशयः यदा कदापि येन केनापि यत्रकुत्रापि यादृशं यावच्च शान्त्या स्थैर्य सुखं चावाप्यते तदा तत्र तेन प्रत्यगात्माभि- मुखतया शारीरात्मज्ञानेनैव च कालत्रयेऽपि तावत्सुखंस्थैर्य चावाप्तुं शक्यते । यत्र याद- शगुणाधिक्यं ततएव तल्लाभसम्भवात् । निर- तिशयमहत्त्वादिविशिष्टशारीरसर्वज्ञेश्वरवि- ज्ञानेनैवागाधसंसारार्णवोर्मिषुनिमज्जभिः पा- रगमनायोद्योगः कार्यः शान्त्या सुखेन स्थित्यै नास्त्यन्यः कश्चिदुपायइति ॥ ८ ॥ भाषार्थ:- :-अब पूर्वोक्त अर्थ को दृढ करने के लिये मन्त्र- द्रष्टा ऋषि का अनुभव दिखाके भद्वैत अपने से अभिन्न मारमा सत्यके ज्ञानसे मोक्ष होता है अन्यथा नही यह दिखाते हैं ( ग्रह मेतं महान्तमात्यिवर्ण तमसः परस्तात्पुरुष वेद) मै मन्नद्रष्टा इस जीवात्मरूपसे सब के भीतर शरीर में स्थित सर्वात्मक होने से महान् सूर्य के तुल्य प्रकाशमय तमोगुण रूप अविद्यान्धकार से सर्वथा अत्यन्त दूर [अन्धकार के प्रभाव की जहां सीमा हो जाती है उस दशामें स्थित तम से परे कहनेसे जताया है कि मेघादि से सूर्य का आच्छादन होता किन्तु उस को माच्छादित करने वाला कोई नही ऐसे ] पूर्ण व्याप्त पुरुष परमेश्वरको जानता हूं ( तमेव विदित्वा मृत्युमत्येति ) उसी पुरुष को जान कर जीव मृत्य को जीत सकता है (अयनाय तृतीयोऽध्यायः। १०७ नाम्यः पन्थाविद्यते ) शान्ति के साथ निरुपद्रव ठहरने का स्थान प्राप्त करने के लिये अर्थात् परम पद प्राप्ति के लिये अन्य कोई मार्ग नहीं है अर्थात् ब्रह्मपक्रके साथ जो प्रमादि काल से जीव भ्रमण कर रहा है उस की समाप्ति अन्य किसी द्वारा नहीं होती केवल एक ईश्वर तो जानके ही अत्यन्स शान्ति और सुख में स्थिर हो सकता है। भा०-शुक्ल यजुर्वेद भ० ३१-में यह अठारहवां मन्त्र है। इस मन्त्रका अभिप्राय यह है कि जब कभी जहां कहीं जिस किसी को जैसा कुछ स्थिर शान्ति वा स्थिर निरुपद्रय निरन्तर सुख मिला है मिलेगावा मिल सकता है तब तहां तिस को तैना सुख वा शान्ति स्वशरीर में स्थित ईश्वर की भोर तत्परतासे वा उस जीवको नित्य शुद्ध सच्चिदानन्द मुक्त स्वभाव जागनेसे ही मिला है मिलेगा वा मिल सकता है। जिस वस्तु में जैसा गुण वा शक्ति विशेष कर होती उस की प्रासि वही से हो सकती है प्यास तीनों कालमें जल से ही दूर हो सकती है अग्नि से कभी नहीं । इस लिये जिस में असीम महत्त्व वा सत्वप्रकाशरूप सुखादि गुण हैं उस शान्तिमय शारीर ईश्वर के विशेष ज्ञान से ही अगाध संसारसागर की भयङ्कर तरङ्गों में डूबते हुओं को पार होने के लिये उद्योग करना चाहिये शान्ति वा सुख से स्थिति होने के लिये अन्य कोई उपाय नहीं है ॥८॥ यस्मातपरं नापरमस्ति किञ्चि- द्यस्मान्नाणीयो न ज्यायोऽस्ति किञ्चित् ॥ वक्षइव स्तब्धो दिवि
१०८० कृष्णायबर्वेदीयश्वेताश्वतरोपनिषदि-
तिष्ठत्येकस्तेनेदं पूर्ण पुरुषेण
सर्वम् ॥६॥
अ०-कुतस्तमेव विदित्वामृत्युमत्येती-
त्यच्यते यस्माच्छारीरापुरुषात्परं प्रकृष्ठमपरं
सांसारिकं पारमार्थिकं वा तदभिन्नं किमपि
नास्ति न यस्मादणीयः सूक्ष्मतरं न च ज्यायो
महत्तरं किमप्यस्ति । अर्थात्परोऽपरोऽणीयान्
ज्यायांश्चसर्वात्मकःसएवास्ति।यश्चैकएवदिवि
प्रकाशानन्दमयेस्वेमहिम्नि स्वस्वरूपे वा वृक्ष-
इव स्तब्धोऽचलस्तिष्ठति तेन पुरुषेण पूर्णेन सर्व
मिदं जगत्पूर्ण व्याप्तमाद्यथा सूत्रैरोतप्रोतः
पूर्णः पटस्तस्मिन्सूत्रादन्यक्किमपि नास्ति तथा
ऽनेन शारीरेणाप्मना पूर्ण चराचरं जगदतो.
ऽस्मिन्नामेतरत् किमपि नास्ति । यस्मादी-
दुशस्तस्मात्तमेवाद्वितीयं पुरुषं ज्ञात्वा मृत्युम-
त्येतीति पूर्वपचेन सम्बन्धो योज्यः ।
भा०—यत्रोकादेः काष्ठाप्राप्तिः सएवे
श्वरस्तादृशं, स्वात्मानं जानन्नेव नित्यःशुद्धो
मुक्तोऽनादिरनन्तोऽचलः कूटस्थः सर्वशक्तिः
सर्वनियन्ता सर्वज्ञः सनातनः स्वयमपि सम्भ-
वतितस्यैव नित्यमुक्तस्यबोधो मोक्षहेतुः ॥६॥
तृतीयोऽध्यायः ।
१००
भाषार्थ:-किस कारण से उसी को जानकर मोक्ष हो
सकता है सो कहते हैं-( यस्मात्परमपरं किञ्चिन्नास्ति )
जिस शारीर आत्मा से शधिमा उत्तम संसार वा परमार्थ का
अन्य कोई पदार्थ नहीं है ( यस्माणाणीयो न ज्यायोऽस्ति
किञ्चित ) शिस से अधिक सूक्ष्म वा जिस से अधिक बड़ा
और कुछ नहीं जो सब सूक्ष्मों से सूक्ष्म बड़ों से बड़ा है
अर्थात् पर अपर अति छोटा और शक्ति बड़ा वही सर्धात्मक
सर्वमय एक शरीरस्थ आत्मा है ( एको दिवि वृक्षइव स्तञ्च-
स्तिष्ठति ) जो एक ही अपने प्रकाशानन्दमय स्वरूप या
महिमा में सदा वृक्षके तुल्य शचल हुमा ठहरा हुआ है ( तेन
पुरुषेण सर्वमिदं पूर्णम् ) उस सब में पूर्ण व्याप्त पुरुष से यह
सब जगत् पूर्ण है अर्थात् सब में ईश्वर भरपूर हो रहा
है अर्थात् जैसे ताना बानारूप सूत्रों से हो वस्त्र भरा पूरा है
उसमें
सूत
भिन्न कुछ नहीं वैसे इस शरीरस्य आत्मासे घराघर
जगत् पूर्ण है इस में शात्मासे भिन्न कुछ नहीं है इसी कारण
उस एक शद्वैत ईश्वर को जान कर जानी मुक्त हो सकता है
यह पूर्व मन्त्र के साथ इस का सम्बन्ध जानो।
। मा०-जिस में उत्तमतादि की असीमता (हद्द) है
यही ईश्वर होता वा ठहरता है अपने आत्म खरूप को
वैसा जानता हुआ ही ज्ञानी पुरुष ही नित्य शुद्ध मुक्त,
अनादि, अनन्त अचल कूटस्य सर्वशक्तिमान् सर्वनियन्ता
सर्वज्ञ और सनातन स्वयं भी हो सकता है उसी नित्य मुक्त
मात्मा का जानना ही मोक्ष का हेतु है ॥ ९ ॥
ततो यदुत्तरतरं तदरूपमनाम-
यम् । य एतद्विदुरमृतास्ते भव-
न्त्यथेतरे दुःखमेवापियन्ति ॥१॥
कृष्णयजुर्वेदीयश्वेताश्वतरोपनिषदि- अ०-तत इदंपदवाच्याज्जगत उत्तरं सूक्ष्म जगत उपादानं प्रधानं ततोऽप्यतिशयेन यदुत्तरं तदुत्तरतरं तच्चारूपं रूपादिगुणरहित मनामयमाध्यात्मिकाद्यखिलतापविहीनं ये जनाःस्त्रारमन उत्तरतरमरूपं तापत्रयरहितं वास्तवं स्त्ररूपमेतद्विदुर्जानन्ति ते अमृता मुक्ताभवन्ति । अथेतरेयेतथा न जातन्ति ते दुःखमेवापियन्ति लभन्ते ॥ भा-लोकोऽपि यःस्वस्य सुखिन्वकारणानि सम्घग वस्तुतो वेति स तथैव कुर्वाणः सुखं लभते यश्च नवेत्तिस दुःखमेवाप्नोति ॥ १० ॥ भाषार्थ:-( सतो यदुत्तरतरम् ) उस पूर्वोक्त इदंपदवाच्य स्यूल जगत से उत्तर नाम परे जगत् का सूक्ष्म कारण प्रकृति वा माया है उस से भी जो उत्तर नाम परे है ( तदरूपसना. मयम् ) वह रूपादि गुणों और सब प्राध्यात्मिक प्राधिभौ. तिक प्राधिदैविक दुःख वा उपद्रवों से रहित है ( य एतद्वि. दुस्तेग्मृता भवन्ति ) जो लोग त्रिविध दुःखों से रहित अरूप सब से परे अपने वास्तविक इस स्वरूप को जानते हैं वे अमृत नाम मुक्त हो जाते (अथेतरेदुःखमेवापि यन्ति ) और जो लोग वैसा नहीं जानते वे दुःख को ही प्राप्त होते दुःख- सागर में ही डूबते हैं। भा०-लोक में भी जो अपने सुखी होने के कारण की सम्यक् रीति से वास्तत्र में जानता है वह वैसा ही करता ,
तृतीयोऽध्यायः।
हुमा सुखको प्राप्त कर सकता है और जो सुख प्राप्तिके माग
को जैसा वा जितना नहीं जानता वह वैसा था उतना ही
दुःख पाता है ॥ १०॥
सर्वाननशिरोग्रीवः सर्वभूतगुहा-
शयः । सर्वव्यापी स भगवान्
तस्मात्सर्वगतः शिवः ॥ ११ ॥
अ०-संप्रति तस्यैव सर्वात्मकावं दर्श-
यति सर्वेष प्राण्यप्राणिषु मुखशिरोग्रीवा-
संबद्धभाषणदर्शनेक्षणनिगरणजीवनशक्तयोऽस्य
तादृशः सर्वप्राणिनां गुहायां बुद्वौ शेते व्याप्त-
स्तिष्ठति, श्रीयशोवीर्यज्ञानवैराग्यैश्वर्याणि
भगपदवाच्यानि यत्र निरतिशयानि विद्यन्ते
तादृशो भगवान् सर्वव्यापी शिवः सुखस्वरूप-
स्तस्मादेव सर्वगतोऽल्पगते भगवत्वसुखमय-
स्वयोरसम्भवात् ॥
भा–सर्वप्राण्यन्तःकरणेषु चिदाभास-
रूपेणावस्थिती योऽखिलशरीरगतमुखशिरो-
ग्रीवाद्यङ्गर्भाषणपर्यालोचननिगरणादिकर्म क-
रोति कारयति वा सएव भगवान्सर्वव्यापी
शिवोऽस्ति तस्यैव बोधोऽमृक्प्राप्तेहेतुरिति
पूर्वेण सम्बन्धः ॥ ११ ॥
११२ कृष्णयजुर्वेदीयश्वेताश्वतरोपनिषदि-
भाषार्थ:-अब उसी परमेश्वर का सर्वरूप होना दिखाते
हैं-( सर्वाननशिरो ग्रीवः ) सब मागियों में मुख शिर और
ग्रीवा सम्बन्धिनी बोलने देखने शोधने और निगलने की
शक्ति शिस की है अर्थात एक ही प्रारमा सब प्राणियों में
विद्यमान रहता हुआ अन्तःकरया तथा इन्द्रियोंको चेतनवत्
करके बोलना देखना शोचना तथा निगलनादि कर्म करता वा
कराता है ( सर्वभूतगुहाशयः) सब प्राणियोंकी हृदयस्य बुद्धिमें
जो व्याप्त रहता ठहरा हुआ है ( स भगवान् सर्वव्यापी ) शोभा,
कीर्ति, पराक्रम, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्य भगपदवाच्य
ये सब जिस समष्टिरूप में असीम विद्यमान हैं ऐसा वह भग-
घान् जिस कारण सत्र में व्याप्त प्रविष्ट होने के स्वभाव वाला
है ( तस्मात्सर्वगतः शिवः) इस से वह शिव नाम सुखस्वरूप
और सब में प्राप्त है।
भा०-सब प्राणियों के अन्तःकरण में चिदाभास सूप से
विद्यमान जो एक परमेश्वर सब प्रकार के शरीर में विद्यमान
मुख शिर और कण्ठादि अङ्गोसे बोलना शोचना और निग-
लनादि कर्म को करता वा कराता है वही सर्व व्यापी भग-
वान् शिव है वह प्रदीपादि प्रकाशवत् साक्षी अलिप्त होनेसे
निर्दोष है। उस ऐसे भगवान का ही जानना मुक्तिपाने का
हेतु हो सकता है इस प्रकार इस मन्त्र को भी पूर्व विषय
की पुष्टि के लिये जागो ॥ ११॥
महान् प्रभुर्वे पुरुषः सत्त्वस्यैष
प्रवर्तकः । सुनिर्मलामिमां प्राप्ति-
मीशानो ज्योतिरव्ययः॥१२॥
तृतीयोऽध्यायः।
अ०-यतो महानतएव प्रभुर्जगत उत्पत्ति-
स्थितिलयान्यथाकालमनायासेन कत्तुं समर्थः
सत्त्वस्यान्तः करणस्य प्रवर्तक प्रचारकःसुष्ठुस-
म्यनिर्मलां पापंदोषरहितामिमां परमपदप्राप्तिं
मुक्तिमीशानस्तस्या अध्यक्षोऽव्ययो ज्योतिर्मयः
परिशुद्धो विज्ञानप्रकाशखरूपश्च ॥
भा०-नहि कोऽपि स्वयमसिद्धः परान्
साधयतीति न्यायारिद्रोऽर्थिने धनं दातुम-
शक्तएव भवति तथैव यदि तस्मिन्महत्त्वा-
दिकं न स्यान्मुक्तःस्वामित्वादिकं च न स्या-
त्तदा कथमन्यस्मै दातुं शक्तः स्यात् ॥ १२ ॥
भाषार्थ:-( महान् प्रभुः पुरुषः ) जो महान् होता यह
प्रभु
समर्थ भी होता वा हो सकता है महान् होने से ही
जगत् के उत्पत्ति स्थिति लयों को अपने २ समयमें सहज में
कर सकता इसी से वह पुरुष है (एष सत्वस्य प्रवर्तकः )
यह सत्त्वगुणरूप अन्तःकरण नाम बुद्धि का मुख्य प्रवर्तका वा
प्रचारक है ( भव्ययो ज्योतिः सुनिर्मलामिमां प्राप्तिमीशानः)
सम्यक् पाप दोष रहित शच्छी निर्मल परमपद प्राप्ति रूप
मुक्ति का स्वामी मुक्ति का देने वाला सदा अविनाशी ज्योतिः
खरूप विज्ञान प्रकाशमय है।
भाo-खयं प्रसिद्ध अन्यों को सिद्ध नहीं बना सकता।
इसी के अनुसार धनहीन से किसी अर्थी को धन नहीं मिल
सकता। वैसे उस ईश्वर में महत्व वा मुक्ति का स्वामिपन
न होता तो शन्य को महत्वरूप मुक्ति कैसे दे सके ? ॥ १२ ॥
११४ कृष्णायण वैदीयश्वेताश्वतरोपनिषदि- अङ्गुठमात्रः पुरुषोऽन्तरात्मा सदा जनानां हृदये सन्निविष्टः। हृदामनीशो मनसाऽभिक्लृप्तो यएतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥१३॥ अ-अन्तरात्मा बुद्धी व्याप्तोऽङ्गुष्ठ- मात्रस्थानोपलभ्यत्वादगुष्ठमात्रः सदा सर्वा- वस्थासु जनानां जननमरणधर्मिणां हृदये सन्निविष्टो लिङ्गशरीरेण कृतसम्बन्धः। मनीशो ज्ञानस्येशानोहदा हृदयस्थेन मनसा मननेना- भिक्लुप्तो ज्ञातुं शक्तः पुरुषः सर्वत्र पूर्ण पुरि- शरीरे शयनाद्वा पुरुपः । य एतदात्मतत्त्व- मित्यमेव विदुस्तेऽमृता भवन्ति महाभयान- कान्मरणदुःखान्मुच्यन्ते ॥ भा०-ये स्वस्यान्तः प्रविष्ठं मननस्यापि प्रवर्तकं सर्वसुखाप्तिहेतुं तं बुध्यन्ते तएकाग्र- चेतसा तदन्वेषणपरास्तं विदित्वा सर्वमनिष्टं जहतीष्टं च लभन्ते । अर्थात्-पञ्जुकोशावि- योगेन तत्तन्मय इवस्थितः । शुद्धात्मानील- वस्वादियोगेनस्फटिकोयथा। इत्यात्मबोधे- तृतीयोऽध्यायः। ईश्वरोजीवकलयाप्रविष्ठोभगवानित्यादिप्रमा- णश्च सर्वत्र व्याप्तएकएश्वरो जीवरूपेण सर्व- शरीरेन्वयगुष्ठमात्रपरिमितहृदये विद्यते तस्य स्वदेहे विज्ञानं सुलभं तमेव जानाना मुक्ता भवन्ति । भाषार्थः-(सदा जनानां हृदये संनिविष्टोऽन्तरात्माउड- ष्ठमात्रः) जीवन की सब दशाओं में जो सब प्राणियों के व्यास रहता अर्थात् मरण पश्चात् लिङ्ग शरीर के साथ रहता, सब का अन्तर्यामी प्रेरक चिदाभास रूप से बुद्धि में अवस्थित हृदय के अंगुष्ठ परिमित स्याग में ध्यान योग द्वारा योगियों को प्राप्त होने वाला ( मनीशो हुदा मनसा. भिलप्तः पुरुषः) मननशक्ति का भी स्वामी हृदयस्य मनन. शक्ति से जानने योग्य पुरुष नाम सब में पूर्ण वा पुर नाम शरीर में रहने वाला ईश्वर है (य एतद्विदुस्तेऽमृता भवन्ति) जो लोग इस आत्मतत्वरूप ईश्वर को ऐसा ही जानते हैं वे महाभयानक मरणादि के दुःखसे बच जाते हैं । भाल-जो लोग अपने भीतर व्याप्त ज्ञान के भी प्रवर्तक सब सुखों की प्राप्ति के कारण ईश्वर को जानते हैं वे एकाग्र चित्त से उस के खोजने में तत्पर हुए उस को साक्षात् जाम कर सब भनिष्ट को छोड़ते और इष्ट को प्राप्त हो जाते हैं अर्थात्-"अन्नमय-स्थूलदेह, प्राणमय-इन्द्रिय शक्ति मनोमय विजन-बुद्धि बोधमय, मानन्द भय इन पांच कोशों में सन २ के रूप से ही विद्यमान है वह नील वस्त्रादिके संयोग से स्फटिक के तुल्य उस २ रूप वाला दीखता हुआ भी वास्तव में शुद्ध है यह बात भात्मवोध में लिखी है तथा नोवांश रूप से सब शरीरों में भगवान् विद्यमान है इत्यादि कृष्णयजुर्वेदीयश्वेताश्वतरोपनिषदि- प्रमागो के अनुसार जो सब में व्याप्त एक ही परमेश्वर है वही जीव रूप से सब शरीरों मे भो अड्गुष्ठ मात्र परिमाण वाले हृदय स्थान में विद्यमान है उसका अपने शरीर में ज्ञान होना सुलभ है, उसी को सम्प जानने वाले मुक्त हो सकते हैं ॥ १३ ॥ सहस्रशीर्षापुरुषः सहस्राक्षः सहनपात् । स भूमिं विश्वतो वृत्वाऽत्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम् ॥१४॥ पुरुषएवेद, सर्वं यद्भूतं यच्च भव्यम् । उतामृतत्वस्येशानी यद- न्नेनातिरोहति ॥ १५॥ अ०-सहस्त्रमसंख्यानि शीर्षाणि यस्यैव- मग्रेऽपि योज्यम् । अखिलपाणिगतशिरोऽक्षि- पादाघरोरालोचनदर्शनगमनादीनि यः करोति साक्षीरान् कारयति वा स विश्वतः सर्वतोऽन्तर्व- हिश्च भूमि पार्थिवशरीरादिकं भुवनं वा वृत्वा व्याप्य दशाङ्गुलिनिर्देश्यमनन्तं दशदिकथं सर्वं ब्रह्माण्डमतिक्रम्य तती बहिरप्यतिष्ठद् व्याप्तस्तिष्ठति । यद्वा दशाङ्गुलपरिमितं नाभे- रुपरि हृदयं तत्रात्यन्तमाधिक्येन तिष्ठति ।
तृतीयोऽध्यायः। १९७ यदिदं सर्व प्रत्यक्षेणोपलभ्यमानं स्थावरजङ्गमं यदभूतमतीतं विनष्ठं यच्च भव्यमनागतं तत् सर्वं पुरुष एवास्ति, उक्तमन्त्रेण तस्य सर्वात्म- कत्वेऽपि प्रपञ्चदोषग्रस्तः स नास्त्यपि तु जले तरङ्गादीनामसत्त्ववत्परमात्मनि जगत्कल्पन- मप्यसदेव किन्तु पुरुषएवाविद्याहेतोर्जगदरू- पेणावभासते वस्तुतः सर्वं खल्विदं ब्रह्म वास्ति उत सर्वात्मकः सन्नपि सोऽमृतत्वस्य मुक्तेरी- शानः स्वामी स्वयं सदा मुक्त एवं यच्चान्ने- नातिरोहत्यन्नभक्षणेन जीवति तस्य बस्यापि सर्वजङ्गमस्येशानः स्वाम्यस्तोति ॥ भा०-एकएवाहिभूतात्मा भूतेभूतेव्यवस्थितः। एकधाबहुधाचैव दृश्यतेजलचन्द्रवत् ॥ इत्यादिप्रमाणानुसारेण सर्वप्राणिवेक- एव चेतनात्मा प्रदीपादिवदसतएव साक्षिक- पेणावस्थितः स्वयमकर्त्तापि सर्वकम कारयति स विराडात्माऽसंख्यशिरआद्यवयववान् स्वेन सच्चिदानन्दरूपेण सर्वब्रह्माण्डमावृत्यातिरि- तोऽप्यस्ति त्रैकालिकं सर्वं च जगत्परमात्म- रूपमेवास्ति स्वयं च सदामुक्तएवास्ति भक्ता- बन्धनान्मोचयति । सर्वस्य प्राणिवर्गस्या- ११० कृष्णायजुर्वेदीयश्वेताश्वतरोपनिषदि- ध्यक्षोऽपि सएवारतीति ज्ञानं मोक्षसाधनं विज्ञेयम् ॥ १४ ॥ १५॥ भाषार्थः -( सहस्त्रशीर्षा सहस्त्राक्षः सहस्रपात् पुरुषः) मनुष्यादि के शरीरोमें विद्यमान शिर श्राख और पग प्रादि अगों से शोचना देखना और गमनादि कमाँ को जो करता वा साक्षी रूप से कराता है ऐमा सब में बाहर भीतर व्योमवत् भरपूर व्याप्त पुरुष है ( स विश्वनो भूमि वृत्वा दशाङ्गुलमत्यतिष्ठत् ) वह सब ओर से पार्थिव शरीरादि वा भुवन रूप जगत् को भावरण कर अर्थात् सब को अपने भीतर रख और स्वय सब के सब ओर तथा भीतर वाहर व्याप्त हो के दश अंगुलियों के संकेत से जताने योग्य दशों दिशा मे स्थित सब ब्रह्माण्ड का उल्लङ्घन फर सब के बाहर भीतर ठहरा है वा नाभि से ऊपर दशागुल परिमित हृदय में अधिकता से अत्यन्त ठहरा हुमा है (इदं सर्व यद्भूत यच भव्यं पुरुषएव ) वर्तमान समय में जो प्रत्यक्ष दीखता भूत नाम जो पूर्व हो चुका नष्ट हो गया था जो भविष्यत्में होने वाला है तीनों काल का यह सब जगत् पुरुष रूप ही है अर्थात् पूर्व मन्त्र से उस का सर्वात्मक होना सिद्ध होने पर भी संधार के दोष से लिस वह नहीं किन्तु जल में तर. गादि की कल्पना के तुल्य परमात्मामे जगतकी कल्पना भी असत् ही है क्योकि अशान से ईश्वर ही जगत् रूप से प्रतीत होता है वास्तव मे सब ब्रह्म ही है ( यदन्नेनाति. रोहत्युतामृतत्वस्येशानः ) जो अन्न खाकर जीवित रहता वा अन्न से शरीरधारी होता उस बद्ध जीवमात्र का और अमृत नाम मुक्तों की दशा का भी वह सर्वात्मक होकर भी स्वामी है अर्थात् स्वयं सदा मुक्त ही है अर्थात् मुक्ति भौर बन्धन सब उसी के आधीन है।
तृतीयोऽध्यायः । १९९ भा०-एकही चेतनारमा मनुष्य पशु पक्षी आदि भिन्न २ जाति- योमें अनेक रूप से विद्यमान है प्रदीपादिसे देखे बिना केवल चक्षुसे जैसे भच्छा बुरा कुछ काम नही होता परन्तु दीपकादिको पाप पुण्य नही लगता वैसे शरीरेन्द्रियादि श्रात्मा के बिना कुछ नही कर सकते आत्मा स्वय अकर्ता होने पर भी सब कर्म कराता है वह विराट रूप ईश्वर मनुष्यादि के शसख्य शिरमादि अवयवो वाला होकर भी अपने वास्तविक सच्चि दानन्द रूप से सब ब्रह्मासह को घर के सब में और सम से पृथक भी विद्यमान है। तीनो काल में होने वाला सब जगत परमेश्वर ही है अर्थात् ससार बुद्धि असत् और साटम बुद्धि सत् है । वह प्रात्मा सदा ही मुक्त है तथा भक्त उपासको को बन्धन कष्ट से छुड़ाने वाला है और सब प्राणियो का अधिष्ठाता भी यही है ऐसा सम्यक ज्ञान होना मोक्ष का साधन है ॥ १४ ॥ १५॥ सर्वतःपाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षि- शिरोमुखम् । सर्वतःश्रुतिमल्लोके सर्वमावत्य तिष्ठति ॥१६॥ सर्व- निद्रयगुणाभासं सर्वैन्द्रियविवर्जि- तम् । सर्वस्य प्रभुमीशानं सर्वस्य शरणं बहत् ॥१७॥ अ०-सर्वतः पाणयः पादाश्च यस्येति सर्वदिक्ष सर्वचरयोनिषु च हस्तपादाद्यवयवwww २२० कृष्णयजुर्वेदीयश्वेताश्वतरोपनिषदि- यक्तः । लोके प्राणिवर्ग सर्वमावृत्य तिष्ठति । सर्वेन्द्रियगणैरध्यवसायसंकल्पश्रवणादिशक्ति- बदाभासोऽस्य तम् । सर्वेन्द्रियसङ्गवर्जित सर्वस्य प्रभुं सर्वचरस्य स्थावरस्य च नियाम- कमीशानं सर्वचराचरस्य स्वामिनं सर्वस्य दृश्यस्य शरणं बृहदोनयभूतं तदात्मतत्त्व- मस्तीति ॥ भावार्थ:-प्राणिदेहेषु हस्तपादचक्षुरा- बङ्गानि वस्तुती जडानि तेषु प्राणिशरीरेषु यएकएवात्मा मठाकाशवदवस्थितो यश्च हस्तादिना चक्षरादिना च चेतनकार्य सर्व कारयति यश्च सर्वेन्द्रियसङ गरहितोऽपि नोट- स्वादिरूपेण प्रतीयते स एव परमेश्वरः सर्वा- ध्यक्षस्तस्यैव ज्ञानं मोक्षसाधनमस्ति ॥ १६.११॥ भाषार्थ:-(सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोऽतिशिरोमुखम् । सब ओर से सब योनियों में पकड़ने और चलने की हाथ पांच सम्बन्धिनी शक्ति जिस में हैं और सब ओर चक्षु शिर तथा मुख सम्बन्धिनी देखने शोचने भक्षण करने की शक्ति जिस में है ( सर्वतः अतिमत् ) और सर्वत्र सब प्राणियों में सुनने की शक्ति वाला तथा ( लोके सर्वमावत्य तिष्ठति ) जो लोक नाम प्रापिशरीरों में सब का आवरमा करके ब्रह्मागहमर ठहरा हुआ है ( सवैन्द्रियगुणाभासम् ) मन प्रादि अन्तः- करण तथा श्रोत्रादि बहिःकरणरूप सब इन्द्रियों के विषयरूप वृतीयोऽध्यायः। १२१ संकल्प प्रवणादि गुणों के साथ तत्तद्रूप से प्रतीत होने वाले ( सर्वेन्द्रियविवर्जितम् ) सन इन्द्रियो के भन दोषो से रहित ( सर्वस्प प्रभुमीशानम् ) सब गाड घेता सूर्य चन्द्रादि जगत् का नियामक और स्वामी ( सर्वस्य शरणं वहत ) और सब का बड़ा मात्रय माधार रूप धारक पालक उत्पादक नाशका एक ही ईश्वर है॥ मा०-प्राणियों के शरीर मे हाथ पाव आदि भङ्ग वाह हैं उन प्राणि शरीरो में जो एक ही आत्मा घर वा घटादि में आकाश के तुल्य विद्यमान है और जो प्रात्ना हाथ आदि घा चक्ष अदि से होने वाले चेतन सम्बन्धी सब काम करा रहा है, और जो सब इन्द्रिय तथा विषयों के गुण दोषों से रहित है तथापि जो श्रोता मादि रूप जान पडता है वही आत्मा सब का स्वामी परमेश्वर है अर्थात् जो जीव माना जाता है वही ईश्वर है उसीका ज्ञान मोक्षका साधन है १६९७ नवद्वारे पुरेदेही हंसो लेला- यतेबहिः । वशी सर्वस्य लोकसय स्थावरस्य चरस्य च ॥ १८ ॥ अ०-नव द्वाराणि सप्त शिरसि द्वे चाध- स्तादस्मिंस्तादृशे शरीरनगरे स्थावरस्य चरस्य च सर्वस्य दृश्यस्य वशी सर्व वशे यरय सः हन्ति सर्वमविद्यात्मकं स हंसो जीवरूपेणा- वस्थितः परमात्मा देहस्थो वहिर्विषयानुपा- दातुं लेलायतेऽभिलषतीव ॥
कृष्णयजुर्वेदीयश्वेताश्वतरोपनिषदि-
भा०-पुरुषशरीरे नवद्वाराणि स्त्रीशरीरेचक
प्रस्तावार्थमधिकं तादृशनगरात्मकशरोरेऽत्र-
स्थितोऽपि विषयानुपादातुं लेलायमानत्वेन
बढइव प्रतीयमानोऽपिस्वस्य वास्तविकस्वरूपेण
सर्व चराचरं स्ववशे स्थापयति तस्यैव शरीरे
जीवरूपेणावस्थितरय भगवतः सर्वानहानाय
ज्ञान सम्पादनीयम् ॥ १८ ॥
भावार्थ:-( स्यावरस्य परस्य च सर्वस्य लोगस्य वशी)
दृष्टि गोचर होने वाले स्थावर जगम सब संसारी पदार्थों को
वश में रखने वाला (नबद्वारे पुरे देही हसः ) सात शिर में
और दो नीचेके इन्द्रियरूप छिद्र जिसमें नौ द्वारे है ऐसे इस
शरीररूप नगर राजधानी में बैठा सब भविद्यादि दोषों का
हनन करने वाला होनेसे हस कहाता हुआ जीवरूपसे विद्या
मान परमात्मा ( वहिलेलायते) भाख भादि झरोखों द्वारा
बाहर को झांकता विषय भोग के अर्थ इन्द्रियों को लप.
काता है।
भाषार्थ-पुरुष के शरीर नगर में नौ द्वार हैं सात शिर
में दो मलमूत्र त्याग के नीचे, स्त्रियों के शरीर में भूत्र त्याग
का एक छिन अधिक होता है। ऐसे नवद्वार वाले नगर रूप
मलिन शरीरमें रहता हुआ गी तथा विषयों को भोगार्थ लप-
कता होनेसे बद्ध जैसा प्रतीत होताभी अपने वास्तविक स्वरूप
से सब चराचरको जो वश में रखता है। उसी जीषरूप से
शरीरमें अवस्थित परमेश्वर को सब दुःखों से छूटने के लिये
सम्पक जागना चाहिये ॥ १८ ॥
१२३
तृतीयोऽध्यायः।
अपाणिपादो जवनो ग्रहीता
पश्यत्यचक्षुः स शृणोत्यकर्णः ।
स वेत्ति वेद्यं नच तस्यास्ति वेत्ता
तमाहुरग्र्यं पुरुषं महानतम् ॥१॥
अ०-अथ परमात्मनो वास्तविकं ज्ञाना-
त्मनावस्थितं निर्विकारादिवरूपमाह-यः
पाणिपादमन्तरेण सर्व गृह्णाति सर्वत्र गन्तं
च शक्नोति चक्षपी अन्तरेण सर्व पश्यति
कर्णमन्तरेण सर्वस्य गुप्तमपि शब्दं शृणोति
च स एवानन्तःकरणोऽपि सर्वज्ञत्वात सर्व वेद्यं
वेत्ति नच तस्याद्वैतत्वादन्यः कोऽपि वेत्तास्ति
नान्योऽतोऽस्तिद्रष्टेतिश्रुतिः । श्रुतमयमनादि
महान्तमनन्तं पुरुषं परपुरुषत्वयुक्तं सर्वोत्पा-
दकमीशं ब्रह्मविद आहुः ॥
भा०-जीवरूपेण शरीरावस्थत्वात्पा-
ण्यादिमान् प्रतीयमानोऽपि वस्तुतो विनश्व-
रसर्वसाधनरहित ईश्वरः स्वयमेव सर्वं वेत्ति
तस्यान्यः कोऽपि वेत्ता नास्ति सचानादिका-
लान्महत्त्वेन पूर्णी व्याप्तस्तद्विज्ञानान्मोक्षः ॥१६॥
१२४ कृष्णयजुर्वेदीयश्वेताश्वतरोपनिषदि-
भाषार्थ:-अब ज्ञानरूप से शावस्थित परमात्मा के
निर्विकारादि वास्तविक स्वरूप को दिखाते हैं (भपा.
शिपादो गायनो ग्रहीता) उम के हाथ पाव नहीं पर ग्रहण
सपा वेगसे चलना हाथ पाव का काम धारता ( पश्यत्यत्रभुः
स शृणोत्यकर्णः ) यह चक्षु के बिना ही सब के कामों को
सर्वत्र देखता उस के कान नहीं है पर सब की गुप्त बातों को
भी सर्वत्र सुनता ( स वेति वेद्यं न तस्यास्ति वेत्ता) अन्तः
करमा रहित होने पर भी वही सब जानने योग्य को जानता
परन्तु अद्वैन होनेसे अन्य कोई उसफा जानने वाला नहीं है
क्योंकि शरीरो मे एकेश्वर से भिन्न अन्य कोई देखने जागने
वाला नहीं है। यह श्रुति में कहा है । ( तमश्यं महान्त
पुरुषगाः ) उसको अगादि धानन्त सर्वोपरि पुरुपपग से युक्त
सर्वोत्पादक ब्रह्मधानी लोग कहते हैं ।
भा:-जीव का क्षेत्र रूप से शरीरोमें अवस्थित होने
से नाटमा हाध आदि वाला दीखता हुआ भी वस्तुतः विनाशी
सब साधनों से रहित ईश्वर स्वयत्र सब को जानता है
उसका वा गापा कार्य का अन्य कोई गागने वाला नहीं है
वह अनादि कालसे शानन्त पूर्ण व्याप्त है उसीके ज्ञानसे मोक्ष
होता है ॥ १ ॥
-
अणोरणीयानमहतो मही-
यानात्मागुहायां निहितोऽस्य
जन्तोः । तमक्रतुं पश्यति वीत-
शोको धातुः प्रसादान्महिमान-
मोशम् ॥२०॥
१२५ तृतीयोऽध्यायः। अ०-अस्य जन्तोर्ब्रह्मादिप्राणिमात्रस्य गुहायां हृदेशे सूक्ष्मादपिसूक्ष्मतरो महतोऽपि महत्तरो निरतिशयसूक्ष्मी निरतिशयमहां- श्वात्मा परमात्मा निहितोऽधिष्ठितस्तं मह- स्वादतिशयेन सर्वस्मादपरिच्छिन्नमतं क्लेश- कर्मविपाकाशयैरसंसृष्टमीशं तस्यैव सर्वधार- कस्य प्रसादात्तदनुग्रहमवाप्य वीतो निवृत्तो विषयाणामप्राप्तौ शोकस्तापोऽस्य तादृशी भूत्वैव जीवः कश्चित्पश्यति तत्त्वतस्तमयम- हमस्मीति साक्षात्स्वयमेवस्वात्मानं जानाति भा-निवृत्तशोकादिकल्मपः कश्चिदेव तस्य कृपयैव स्वस्यान्तःकरणे ध्यानेनैव निर- तिशयसूक्ष्मत्वादिविशिष्टमेवेश्वरं स्वीयं वा- स्तवं स्वरूपं कदाचिदेव वेत्ति । तस्मात्सा- धारणः कोऽपि स्वस्य वेत्ता नास्तीति पूर्वक- थनमपि पुष्टिमेव लभते ॥ २० ॥ भाषार्थ:-( अस्य जन्तोर्मुक्षायाम् ) इस ब्रह्मादि प्राणी मात्र की हृदप देशस्प बुद्धिमें ( भणोरणीयान्महतो महीया. नात्मा ) सूक्ष्मोसे सूक्ष्म और बड़ोंसे भी बड़ा अर्थात् सूक्ष्मता वा महत्वकी अन्तिम मीमाको प्राप्त क्षेत्ररूपसे ( निहितः) स्थित है। और महत्वकी असीमतासे सबसे अपरिच्छिन्न तम- क्रतं महिमाननीश धातोः प्रमादाद्वीतशोकः पश्यति ) कर्मफमा भोगकी वासनानोमे अलिप्त महत्वरूप उस ईश्वरको उसीकी ।
कृष्णायजुर्वेदीयश्वेताश्वतरोपनिषदि- कृपा धा प्रसन्नता से विषय भागो के न मिलने का शोच ताप जिम का निवृत्त हुमा ऐसा हो कर ही कोई यह मैं हूं इस प्रकार साक्षात् अपने स्वरूपको ज्ञानी जानता अर्थात् देखता जानता है॥ भार-शोकादि कल्मष जिस का दूर हुनाहो ऐसा कोई ही पुरुष उस की कृपा से ही अपने अन्तःकरण में ध्यान समाधि के द्वारा ही अत्यन्त सूदपतादि युक्त हो ईश्वर को नाम अपने वास्तविक स्वरूपको कभी जान पाता है। इस से साधारण कोई अपने पाप को जानने वाला नही है यह पूर्व का कथन भी ठीक पुष्ट हो जाता है ॥ २० ॥ वेदाहमेतमजरं पुराणं सर्वा- त्मानं सर्वगतं विभुत्वात् । जन्म- निरोधं प्रवदन्ति यस्य ब्रह्मवा- दिनोऽभिवदन्ति नित्यम् ॥२१॥ अ०-उक्तार्थदाढर्याय मन्त्रद्रष्टुरनुभवं दर्शयति-अहमेतमजरं जरावस्थारहितं विप- रिणामधर्मशून्यं पुराणं सनातनं सर्वात्मानं सर्वपामात्मरूपेण शरीरत्रवस्थितं सर्वान्त- र्यामिणं विभुत्वाद् व्यापकत्वात्सर्वस्मिन् गतं प्राप्तं यस्य ब्रह्मवादिनो जन्मनिरोधं प्रवदन्ति यं च नित्यमभिवदन्ति तं वेद जानामीति मन्त्रद्रष्टा वदति ॥
तृतीयोऽध्यायः। १२७ भा०-यस्य मिथ्याज्ञानापाये रागद्वेष- मोहदोषा दग्धबीजकल्पाभवन्ति सएव शोका- दिरहितो ध्यानयोगाभ्यासेन प्रत्यक्चेतनस्त्र- रूपं सर्वानन्दमयं परमात्मानं हृदि साक्षात्कु- धन्परमं संतुष्यति ज्ञातं मया ज्ञातव्यमिति च मन्यते ॥ २१ ॥ भाषार्थ-पूर्वोक्त विचार की दृढता के लिये मन्त्र दृष्टा ऋषि अनुभव दिखाते हैं कि { ब्रह्मवादिनो यस्य जन्मनिरोध प्रवदन्ति ) ब्रह्मवादी लोग जिस के जन्म होने का अभाव कहते (नित्पमभिवदन्ति ) और जिसको नित्य २ अभिमादन नमस्कार प्रणामादि करते है उस ( एतमगरं पुराण विभुत्वा. सर्वगत सर्वात्मानमहं वेद) इस जीर्णावस्था रहित अर्थात् जिसका परिवर्तन नही होता सदा एक से सामध्य वाले विभु -व्यापक होने से सव पदाथों को प्राप्त सब के मात्मरूप से शरीरो में अवस्थित सर्वान्तयामी मनातन ब्रह्म को मैं जानता हूं ऐसा मन्त्र द्रष्टा ऋषि कहते है भा०-मिथ्याज्ञान के छूटगाने पर मिस पुरुषके रागद्वेष मोदादि दोष भस्म हो जाते [लिन मे फिर उगने की शक्ति नही रहती ] वही शोकादि रहित पुरुष ध्यानरूप योगा- +पाससे अपने अन्तरात्मस्वरूप सर्व मानन्दमय परमात्माको हृदय में साक्षात् करना हुआ परम सन्तोष को प्राप्त होता और मानता है कि मैने ज्ञातव्य को जान लिया ॥ २१ ॥ इति ब्राह्मणसर्वस्वमासिकपत्रसम्पादकेन भीमसेनशर्मणानिर्मिते श्वेताश्वतरोपनि- पद्भाष्ये तृतीयोऽध्यायः समाप्तः ॥
अथ चतुर्थाऽध्यायारम्भः। यएकोऽवो बहुधा शक्ति- योगाद् वर्णाननेकान्निहितार्थो दधाति । विति चान्ते विश्व- मादौ स देवः सनो बुद्ध्या शुभया संयुनक्तु ॥१॥ अ०-य एकोऽद्वितीय ईश्वरः स्वयमघों ब्राह्मणो शरीरेषु तत्तन्नामरूपैरवस्थितोऽपि वस्तुतः सर्वजातिवर्णन्ववर्जितो निहितार्थों व्यवसितकर्मफलभोगप्रयोजनः स्वार्थनरपे. क्ष्येण स्वस्मिन्बहुविधशक्तीनां सम्बन्धादने. कान् ब्राह्मणादिवर्णान्दधाति विदधाति । स देव आदी प्रलयात्पूर्व सरम्भकाले विश्वं सर्वमिदं रक्षति । अन्ते प्रलयाबसरे च व्येति विनाशयति स नोऽस्मान् शुभया कल्याणा- भिमुखया बुद्ध्या संयुनक्तु येन निःश्रेयस- भाजः स्याम ॥ भा०-यएकोऽसहाय एवास्य स्थावरजङ्ग- मस्योहपत्तिस्थितिलयाननायासेनैव करोति ঘনঘাওয়ায় १२० सएव निरतिशयः सर्वाध्यक्षः स्वस्य कल्या. णाय मनष्येण प्रार्थनीयः ॥ १॥ भाषार्थः-(यएसोऽत्रों निहितार्थः) जो एक अद्वितीय ईश्वर ब्राह्मणादि शरीरो, उस २ नामरूपसे विद्यमान होने पर भी वास्तवमै सय जाति और ब्राह्मणादिपनको गुगा को रहित सबको शुभाशुभ कर्मफन भुगाना की जिसमें तृष्टि रचने का मुख्य प्रयोजन रक्सा है ऐसा हुआ (बहुधा शक्तियोगादने कान्वान्दचाति ) अपने में नाना प्रकार की शक्तिों का योग होने से अनेक ब्राह्मणादि वर्णो को [गो मूलरूप चार वर्ण और शवान्तर भेदों से असंख्य प्रकार के वालपादि हो जाते हैं ] बनाता है ( स देवोऽन्ते विश्वं वित्ति) वट देव ईश्वर सृष्टिस्थितिदो प्रान्तमें प्रनय का अभय भाते ही इस लगत् को विनष्ट कर देना ( चादी) और प्रनय से पूर्व समय में सत्र की रक्षा करता है ( स नो वद्ध्या शुभया संयुनक्तु ) वह ईश्वर कल्याणकारिणी उत्तम धनुराग बुद्धि से हम को संयुक्त करे जिससे हम निःश्रेयस सुखको भागी हो। भाषार्ध-गो एक ईश्वर किसी की सहायता न लेकर स्यावर जगमरूप इस सम जागत् के उत्पत्ति स्थिति प्रणयों को सहज में ही किया करता है वहो सर्वोपरि मनका स्वामी है है मनुष्यको अपने कल्पाण के लिये उसी की प्रार्थना करनी चाहिये ॥१॥ तदेवाग्निस्तदादित्यस्तवा- युस्तदु चन्द्रमाः । तदेव शुक्रं तद् ब्रह्म ता आपः स प्रजापतिः॥२॥ १७ १३० कृष्णयजुर्वेदीयश्वेताश्वतरोपनिषदि- अ०-अग्निः पाचको भस्मीकरणशक्ति- मान, आदित्यः कालविभागहेतुत्वात्सर्वभाव- परिणामनिमित्तम्, सर्वचेष्ठादिहेतुर्वायुः, मृदु- लावण्यादिगुणस्य प्रधानं कारणं चन्द्रमोड- भिधं सोमतत्वं सर्वत्र व्याप्तम्, शुक्रमतिशुक्लत्वं गुणः सर्वत्रस्थः, ब्रह्म बृहत्तरः सर्वस्योत्पादन- द्वारा बटुको हिरण्यगर्भआत्मा आपोऽन्त- हिनिवारकं शीतगुणप्रधानं तत्त्वं, प्रजापतिः प्रजातायाः सृष्टरक्षको विराडात्मा । अग्न्या- दिपदार्थानां यत्र निरतिशयत्वं भस्मीकरणा- दिशक्तीनां यत्र काष्ठाप्राप्तिः प्राधान्यं तदे- वात्मतत्त्वं प्रधानभावेनाम्न्यादिपदवाच्यम- दिग्न्यादिपदार्येषु तत्तन्नामरूपावच्छिन्न ब्रह्मात्मतत्त्वमेवास्ति नैवारन्यादयःपरमात्म- सत्तावलम्बनमन्तरेण किमपि कार्य साधु शक्ता इति बोध्यम् । एवकारः प्रत्येकमभिसं- बध्यते ॥ भा० संसारस्थवस्तुषु गौणमन्यादित्व- मन्यादिषु तत्तनामरूपेण विद्यमाने परा- त्मनि च निरतिशयं प्रधानमग्न्यादीनामप्य- ग्न्यादित्वस्य मूलकारणत्वात्तस्य । गौणमु- । चतुर्थोऽध्यायः ख्ययोर्मुख्ये कार्यसम्प्रत्यय इति न्यायोऽपी- दृशादेव वेदान्निस्सारितः पाणिन्यादिभिस्ततः सार्वत्रिक एव विज्ञेयः । लोकेऽपि गौणमुख्य- योर्विदुषोः प्रसङ्गे मुख्यएव विद्वत्पदवाच्यः प्रतीयते विद्वांस्त्वयमेवास्तीति वदन्ति तद्वदि- हापि योज्यम् । शुक्लयजुर्वेदे अ० ३२ अयमा- रम्भमन्त्रः ॥२॥ भाषार्थ:-( तदेवाग्निस्तदादित्यस्त द्वायुस्तदु चन्द्रमाः) सब को भस्म वा भक्षण करने की शक्ति वाला अमि वही, काल विभाग का हेतु होने से सब विद्यमान पदार्थों के परिणाम का निमित्तबाही, सब चेष्टादि क्रियाओं का कारण वही और सब प्रकार की कोमलता वा शोभा का मूल कारण चन्द्रमा नामक सोम वही है ( तदेव शुक्रं तद् ब्रह्म ता प्रापः स प्रजापतिः) तारे भादिको अत्यन्त शुद्ध कान्ति बाम्ना शुक्ल निर्मल वही, सब से बड़ा उत्पत्ति द्वारा सब का बढ़ाने वाला हिरण्यगर्भ ब्रह्मा वही, भीतरी दाह वा ताप का गिवारक- शीतल गुण की प्रधानता बाला शप् वही और उत्पन्न हुई सृष्टि का सर्वोपरि रक्षक विराडात्मक प्रजापति वही है। भभिप्राय यह कि अग्नि आदि पदों का जिस में गिरतिशय भर्थ घटता अर्थात् भस्म करने आदि शक्तियों को जिस में अत्यन्त सीमा हो जाती जो तम २ शक्तियों में सर्वोपरिप्रधान है यही मारमतव प्रधानरूप से अमि भादि पदों का वाच्यार्य है अर्थात् अग्नि आदि पदार्थों में उसी र भन्यादि- क नामरूपसे परिच्छिन्नसा प्रतीत होने वाला वही एक ब्रह्मास्त्र रूप भारमतत्व है। क्योंकि परमात्म सत्ताका अबलम्ब हुए - १३२ कृष्णयजुर्वेदीयश्वेताश्वतरोपनिषदि- बिना अग्न्यादिपदार्थ कुछ भी दाहादि कर्म नही कर सकते इससे अरन्यादि देवता नाम रूप यही परमेश्वर है मन्त्र में एव शब्द प्रत्येक अग्न्यादि शब्द के साथ लगाने के लिये है। भाषार्थ-अन्यादि नागक संसार के सब वस्तुओं में आत्यादिपन गौरा है और अग्न्यादि में तत्तद्रूप से विद्य- मान परमात्मा में प्रवल्यादिपन असीन है क्योकि अमि शादि के अग्न्यादिपन का भी मूल कारण यही है । गौया०) गौण मुख्य दोनों को प्रसङ्ग में मुख्यमें ही कार्य वा व्यवहार होता है । यह परिभाषारूप न्याय पाणिनि आदि आघायौं ने ऐसे ही वेद मन्त्रों से निकाला है और वेद से निकालने के कारण ही यह नियम सर्वदेशी है सब को मानने ही पड़ता है। लोक में भी गौण मुख्य दो विद्वानों के एकत्र होने पर वा दो की चर्चा होने पर मुख्य ही विट्वान् पद. बाच्य होता है। लोग कहते हैं कि विद्वान तो यही हैं । इसी प्रकार यहां भी अग्नि भादि पदों का वाच्यार्थ उस २ नामरूपसे विद्यमान वही एक ब्रह्म कहा जानी । यह मन्त्र यजुर्वेद प्रा० ३२ के प्रारम्भ में ऐषा ही ज्यों का त्यों है ॥२॥ त्वं स्त्री त्वं पुमानसि त्वं कुमार उत वा कुमारी । त्वं जीर्णो दण्डेन वचसि त्वं जातो भवसि विश्वतोमुखः ॥३॥ अ०-हे परमात्मन् ! सर्वस्योत्पादने त्वं खो त्वमेव पुमान्-स्त्रीरूपायां प्रकृती त्वमेवो- पादानशक्तिं दधासि निमित्तरूपं पंस्त्वं च १३३ चतुर्थोऽध्यायः। त्वय्येवास्ति । तथा त्वं कुमार उत कुमार्येव च भवसि । त्वमेव च जीर्णो वृद्धो भूत्वा दण्डेन वञ्चसि त्वमेव सर्वयोनिषु जीवरूपेण प्रादुर्भूतः सर्वप्राणिषु सर्वरूपो भवसि ॥ भा०-वाल्ययौवनवा?क्यावस्थास्वेकए- कएवान्मा वाल्याद्यवस्थारूपेण शरीरोपाधि- धर्मेण बालादिरूपः प्रतीयमानोऽपि वस्तुतो वालो युवा वृद्धो वा नास्ति । स्त्रीपुंसकुमार- कुमारीजीर्णपदैरवस्थात्रयबोधनेन सर्वचराच- रसंसारवस्तुष्वेकस्यैवात्मनोऽवस्थितिौंधिता। तथाचोक्तम्-एकएवहिमूतामा भूते भूते व्य- वस्थितः । एकधाबहुधाचैव दृश्यतेजलचन्द्र- वत् ॥ एवमेक एवेश्वरः सर्वप्राण्यप्राणिषटुभ- तानुभूतचिच्छक्तचा प्रविष्टो दर्शनादिहेतु- भवति ॥३॥ भाषार्थः-हे परगात्मन् । सब को उत्पन्न करने में (त्वं खी त्वं पुमानसि ) तुम्ही स्त्री और तुम्ही पुरुष हो अर्थात तुम्ही सब के माता पिता धाता भगिनी धा पति पत्नी शादि भावको प्राप्त हुए हो । यद्यपि सब संसार की उत्पत्ति में प्रकृति स्त्री है तथापि उसमें तुम्ही उपादानशक्तिको धारण करते हो और निमित्त कारणरूप पुरुषपन तुम में स्वतः ही हे तपा (त्वं कुमार उत्त वा कुमारी) तुम कुंआरे और कुंभारी १३४ कृष्णायजर्वेदीयश्वेताश्वतरोपनिषदि- हो अर्थात् वालक बालिकारूप तुम्ही हो ( त्वं जीणों दोन बञ्चसि ) तुम वृद्ध अवस्या वाले शरीर में लकही हाथ में लेकर उस के सहारे से चलते हो ( त्व जातो भवसि विश्व- तोमुखः ) और तुम ही सर्वयोनिस्य प्राणियों में जोधरूप से प्रकट हो के सर्व रूप होते हो। भाल-बालक युवा और बद्धावस्यानों में एकही प्रात्मा शरीरोपाधि के धर्म वालादि अवस्था रूप से प्रतीत होता हुआ भी वास्तव में मात्मा वालक युवा वा बुद्ध नही है। स्त्री पुंस् कुमार कुमारी और जीर्ण पदों से [ अर्थात् कुमार कुमारी से वाल्य, स्त्री पुंस् पदों से यौवन और जीणं प्रद से वृद्धावस्था दिखायी हैं। तीन अवस्था धोधन द्वारा संसार के सब चराचर पदार्थों में एक ही भारमा की विद्यमानता वोषित की है। यही बात ( एक एव हि०) लोकसे दिखायी है कि एक २ जाति में एक प्रकार से तथा भनेक जातियों में से एक ही नित्य पाहमा प्रतिबिम्बित है।स से सब घराघरमें प्रकट वा अप्रकट रूप से एकही चेतन शक्ति रूप ईश्वर प्रविष्ट होकर देखनादि चेतन का काम करा अनेक प्रकार नीलः पतङ्गो हरितो लोहि- ताक्षस्तडिद्गर्भ ऋतवः समुद्राः। अनादिस्त्वं विभुत्वेन वर्तसे यतो जातानि भुवनानि विश्वा ॥४॥ अ०-हे परमात्मन् ! नीलः कृष्णः पतङ्ग उत्पतनशीलो भ्रमरो लोहिताक्षो रक्तनेत्री चतुर्थोऽध्यायः । १३५ हरितवर्णः शुकादिस्तडिद्गर्भेऽस्या तादृशोमेध ऋतवः समुद्राश्चेत्यादिवस्तुषु तत्तद्रूपेणात्र- स्थितः । अतएव नास्त्यादिः कारणमस्य यतो विश्वानि भवनानि जातान्युत्पन्नानि ताद- शस्त्वं विभुत्वेनाद्यन्तशून्यावेन सर्वत्र वर्त्तसे॥ भा०-अग्निर्यथैको भुवनं प्रविष्ठो रूपंरूपं प्रतिरूपो बभूव । एवमीश्वरस्तत्तन्नामरूपेण सर्ववस्तुष्यवस्थित इत्येवात्रोपलक्षणेन प्रद- र्शितम् । यथा सूत्रमेव बहुविधवासोरूपेणा- वस्थितं भवति यथा च हाटकं भूषणनामरू- पेणावस्थितं दृश्यते तथा चोक्तम् । सच्चिदा- रमन्यनुस्यूते नित्येविष्णौप्रकल्पिताः । व्यक्त- योविविधाः सर्वा हाटके कटकादिवत् । इत्या- स्मबोधे-स ओतः प्रोतश्च विभः प्रजास्विति शुक्लयजुः संहितायाम्। इत्थं नीलकृष्णपत- ङ्गादिरूपेण भगवानेव विद्यते ॥ ४ ॥ भाषार्थ:-हे परमेश्वर ! (नीलः पतङ्गो हरितो लोहिताक्षः) उड़ने के स्वभाव वाला काला पक्षी भौंरा-नाम भ्रमर तथा हरा लाल नेत्रों वाला तोता भादि पक्षी ( तडिद्गर्भ ऋतवः समुद्राः) तडित नाम बिजुली जिस में रहती ऐसा मेघ, वस. न्तादि और समुद्र अन्तरिक्ष के वा पृथिवी के इत्यादि वस्तुओं में उन २ के ही नाम रूप से आप ही विद्यमान हैं
१३६
कृष्णयजुर्वेदीयश्वेताश्वतरोपनिषदि-
भार्थात् भ्रमरादि सव रूप तुग हो हो (अनादित्व विभु
त्वेन वर्तसे ) जिन का प्रादि नाग कारण कोई नही और
यतो जातानि भुवनानि विश्वा ) जिन तुम से यह सब स्लोक
लाकान्तर अनन्त ब्रह्माण्ड भर उत्पन्न हुआ है ऐसे तुम
भावन्त शून्य अनन्त रूप से विद्यमान हो ।
मा०-कठोपनिषद् में लिखा है कि 'जैसे अग्नि सब
जागत् के अरु २ पदार्थ गे उस २ के नाम मे ही मन रहा
है , इसी प्रकार ईश्नर सब वस्तु भो में उसी २ के नाम
रूप से व्याप्त हो रहा है । यहा नील पतङ्गादि के
उपलक्षणमान ने यह बात दिखगाई है कि जैसे एक सत
ही अनेक धन्ना के नाम रप से विद्यमान है तथा जैसे सुबश
अनेया भूषण नाम रूप हुमा दीखता है वैसे देव मनुष्य पशु
पक्ष्यादि रूप एक हो ईश्वर विद्यमान है। आत्मबोध में
लिम्वा है कि जैसे सुवर्ण मे कहादि भूषण अनुस्यून है वैसेही
सत् चित् स्वरूप विष्णु भगवान् में ये सब देन गनुष्यादि
व्यक्तिया श्रोत प्रोत है। तथा शुक्ल यजु सहिता में लिखा
है कि वह ब्यापक परमेश्वर नव प्रजा में ओत प्रोत हो रहा
है। इस प्रकार नील पक्षी भादि नाम रूप से एक भगवान्
ही विद्यमान है।
मे
अजामेकां लोहितशुक्रुष्णां
बह्वीः प्रजाः सृजमानां सरूपाः॥
अजो टेको जुषमाणोऽनुशेते जहा-
त्येनां भुक्तभोग्यामजोऽन्यः ॥५॥
/ १३७ चतुर्थोऽध्यायः । अ०-तेजोऽबन्नलक्षणां मायां दर्शयति लोहितशुक्लकृष्णां रज:सस्वतमोगुणमयीं समा- नरूपा उपादानकारणगुणप्रधाना बहीः प्रजाः सृजमानामजां स्वयमविनश्वरामनादिभूतामे- कोऽजः कश्चिदनादिर्जीवो जुषमाणः तया प्रीतिं स्नेहं कुर्वक्षनुशेते भजतेऽन्यः कश्चिच्च भुक्ता भोग्या मयाऽन्यैश्चेयमिति मन्यमान एनां जहाति तेन मुच्यते ॥ भा०-त्रिगुणात्मके प्रवाहेणानादिभूते जगति ये प्राणिनोभोगोत्कण्ठयाऽनुरज्यन्ते ते जन्म- मरणप्रवाहपतिता दुःखमेवाधिक्येन लभन्ते । ये भोगोत्कण्ठां समापयन्ति भोगा अस्माभि- भुक्ता नात्र भोग्यं विशिष्टं सुखमस्त्यपितु दुःखमेव बहुलमिति मन्यमाना जहत्येनामजां प्रकृतिं ते विषयदोपदर्शिनो मुच्यन्ते दुःखब- हुलासंसारचक्रप्रवाहात् ॥ ५॥ भाषार्थः-छान्दोग्योपनिषद् में वर्णित अमि, जल और पृथिवीरूपों में परिणत होने वाली अनादि सान्त माया नाम प्रकृति को दिखाते हैं (लोहितशुक्लकृष्णाम् ) रक्त- लाल रजोगुणी, शुक्ल श्वेत -सत्त्वगुणी, कृष्ण काली तमोगुणी इन तीनों गुणों वाली ( सरूपा बहीः प्रमाःसृजमानामेका मजाम् ) कारणा के गुणानुकूल कार्य होने से अपने तुल्य गुणों १८ १३८ कृष्णयजुर्वेदीयश्वेताश्वतरोपनिषदि- वाली नाना प्रकार की बहुतसो प्रजाओं को रचती हुई एक स्वरूप से अनादि प्रकृति से (जुषमाणो ये कोऽजोनुशंते ) प्रीति अनुराग करता हुआ कोई जोव उस के पास सोता उससे लिपटता सेवन भजन पूजन ध्यान उसी का करता है भन्योऽजो भुक्तभोग्यामेनां जहाति) और कोई अनादि लीय विरक्त सन्यासी महात्मा ज्ञानी इस प्रकृतिको असंख्य लोगों को भोगी हुई निकृष्ट वेश्या के समान विगही जूठी घृणित मान के छोड़ देता है उस के भोगने को बुरा समझता है इस कारण असंख्य बड़े २ दुःखों से बच जाता है । भा०-त्रिगुणमय, प्रवाहसे अनादि इस जगत में जो प्राणी विषय सुख भोगने को उत्कराठा से अनुराग करते हैं वे जन्म मरणाके प्रवाह में पड़े बहते हुए अधिकतासे दुःख ही पाते हैं। और जो भोगको वृष्याको समाप्त करते हैं कि भोग हमने भोग लिये अब अपने वा अन्योंके जूठे किये भोगों को क्याभोगे? इन भोगों में सुख थोष्टा तथा दुःख बहुत है ऐसा मानते हुए इस प्रकृतिमय संसारको छोड़ देते हैं वेही विषयों में दोष देखने वाले दुःख ही जिस में प्रधान है ऐसे संसारचक्र छूट जाते हैं। [लोक में श्रम-वकरा-और-वकरीको कहते हैं। जैसे कोई बकरा एकसे बहुत बच्चे जनने वाली वकरी से प्रेम करे और कोई उस वकरी से उदासीन विरक्त हो जरवे ऐसे ही अनेक जीव इस संसाररूप प्रकृति के गुण विषयों से प्रीति रखते उसीसे लगे लिपटे जन्मते मरते चले जा रहे हैं और कोई २ कभी २ इस शरीरादि वा खी भादि रूप प्रकृति से उदासीन विरक्त हो कर सनातन ईश्वर को प्राप्त हो जाते हैं ]॥५॥ द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वक्षं परिषस्वजाते। तयो- प्रवाह से चतुर्थोऽध्यायः। रन्यः पिप्पलं स्वादत्त्यनश्नन्नन्योऽ- अभिचाकशीति॥६॥ अ०-सुपर्णो शोभनगमनौ शोभनप्रकारेण जगतो रक्षको वा सयुजा सर्वदा संयुक्तो व्याप्यव्यापकसम्बन्धेनाभिन्नौ सखाया समा- नख्याती आत्मपदवाच्यौ तौ द्वी विज्ञाना- त्मपरमात्मानौ समानमेकमेव वृक्षं छिद्यमानं नश्वरं शरीरंपरितः स्वजाते समानयेते तयो- रन्य एको जीवः स्वादु पिप्पलं सुखदुःखरूपं कर्मफलमत्ति भुङ्क्तेऽन्यः परमोत्माऽनश्नन् फलभोगात्सर्वदेव नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वभावत्वेन विरक्तोऽभिचाकशीति साक्षिभूतः पश्यनास्ते। द्वत्यादौ सपांसलु गित्यादिना प्रथमाद्विवचन- विभक्तराकारादेशः॥ भा०-यद्यपि परमार्थतो विज्ञानात्मा जीवी वा कोऽपि नास्ति तथापि व्यवहारद- शायां प्राण्यन्तःकरणालोके चिदाभासस्य जीवत्वं मठघटाकाशादिवदविच्छिन्नत्वेन सर्व- शरीरावस्थस्यात्मनः परमेश्वरत्वमिति भेदम- भ्युपगम्यानात्मद्वयमुक्तं तच्चागामिमन्त्रेष पर- १४० कृष्णयजुर्वेदीयश्वेताश्वतरोपनिषदि- मार्चवस्त्ववधारणार्थमेव । ऋववाहितायां प्र- थममण्डले सू० १६४ । २० मन्त्रोऽय पठित ॥६॥ भाषार्थ - (द्वा सुपर्णा स्युजा सखाया) अच्छे प्रकार सर्व प्राप्त होने वाले वा जगत् के पदार्थों के सम्यक रक्षक [ पत्तृ-पतने से वा पृ पालन पूरणयो । धातु से पर्ण शब्द बना है] सब कालमे व्याप्य व्यापक सम्बन्धसे एक साथ रहने वाले तथा चेतन वा भात्मादि एक नाम से कहाने वाले दो पक्षियोके तुल्य जीवात्मा और परमात्मा ( समान वृक्ष परि- पखजाते ) विनाश को प्राप्त होने वाले अनित्य शरीररूप एकाही वक्ष पर रहते है (तयोरन्य खादुपिप्पलमत्ति) उन दोगो मे से एक जीवात्मा वृक्ष फल तुल्य सुख दुःख रूप कम के स्वादिष्ठ फल को खाता चीखता स्वादले २ कर खाता भोगता है और ( भन्योऽनभन्नभिचाकशीति) द्वितीय पर. मात्मा कुछ न खाता भोगता हुआ नित्य शुद्ध बद्ध मुक्त खनाव होने के कारण भोग से सदा विरक्त साक्षिरूप हो कर जीव के भोगो का तथा क्रियमाण कर्मों का सूर्यादिके प्रकाश वत् प्रेरक वा निमित्त है अर्थात् कर्म कराने ओर फल भुगाने वाला होने पर भी प्रदीपवत् निरिच्छ है । भा०-यद्यपि वास्तव में पारमार्थिक विचार से विज्ञाना त्मा वा सीव सच्चिदानन्द ईश्वरसे भिन्न कोई नही है तथापि व्यवहार दशा में सब प्राणियो के बुद्धिरूप दर्पण में चेतन शक्ति का आभास वा प्रतिविम्व जीव कहाता और घटमठा- काशादि के तुल्य अविच्छिन्नरूपसे सवप्राणि शरीरो में भव- स्थित परमेश्वर कढ़ाता ऐसा भेद मान कर इस मन्त्र में दो मात्मा इस लिये कहे है कि अगले मन्त्रो मे परमार्थ अवधारण जीवत्व को दुर्दशा दिखा कर किया जावे। यह मन्त्र मक्सहिता में १ । १६४ । २० है ॥ ६ ॥ भी वस्तु का १४१ चतुर्थोऽध्यायः। समाने वक्षे पुरुषो निमग्नोऽ- नीशया शोचति मुह्यमानः । जुष्टं यदा पश्यत्यन्यमीशमस्य महि- मानमिति वीतशोकः ॥७॥ अ०-समानएकस्मिन् वृक्षे छिद्यमाने नश्वरे देहे पुरुषो जीवोऽविद्याकामकर्मफल- रागादिजन्यगुरुभाराऽऽक्रान्तो नद्यामिव दुःखे निमग्नो निश्चयेन देहात्मभावमापन्नोऽय- मेवाऽहममुष्य पुत्रोऽस्य नप्ता कृशः स्थूली रूपवान् निर्गुणः सुखी दुःखीत्येवं कृतनिश्चयो नान्योऽस्मादस्मीति जायते मियते सम्बन्धि- बान्धवैश्च संयज्यते। एवंप्रकारेण निमग्नोमुह्य- मानो मोहं कुर्वन्ननीशयाऽसमर्थत्वेन शोचति पुत्रो मम मृतो भार्या मे नष्टा धनं मेऽपहृतं किं कुर्याम्-कथं जीवेयम्-अशक्तोऽहं प्रति- कम्-िन किमपि कर्तुं शक्नोमि । एवं रोदिति विलपति मुहुर्मुहुः सन्तप्यते दुःखा- नलेन दह्यमानः । यदा संस्कारप्रावल्याच्छु- भफलोदयाद्वीर्घकालनैरन्तर्यसत्कारासेवितयो- गाभ्यासेन तस्मिन्नेव शरीरवृक्षेऽनिमग्नमन्यं कृष्णयजर्वेदीयश्वेताश्वतरोपनिषदि- बहुभिर्जुष्टं स्वतोऽभिन्नमपि भिन्नमिवावि- घया प्रतीयमानमीशमनन्तशक्तिं पश्यति साक्षात्करोति तदाऽस्येशरय महिमानं बुद्ध्वा वीतशोकः सर्वविधशोकवर्जितो भवति मा०-लोकेपि यो यादृशदुःखप्रतीकारे समर्थो नासौ शोचति यश्च दु खनिवारणेऽ- शक्त. सएव शोकमग्नो जायते दुःखप्रतीकार- सामध्यं च प्रत्यगात्मविचारमावल्येन बद्धि- तत्ववैशारद्याज्जायते। यो हि लोके यादृशो बुद्धिमान् दृश्यते स तावदेव दुःखप्रतीकारमा- रमते मुच्यते च दुःखात् । ईश्वरबोधश्च बुद्धः सूक्ष्मत्ववैशारद्ययोरन्तिमं इत्यमतएवोक्तम्- "दृश्यते त्वग्यया बुद्ध्या सूक्ष्मया सूक्ष्मद- शिभिः,, अतएव सुखमभीप्सता दुःखं जिहा- सता च पुरुषेण समापितवाह्यविषयभोगोत्क- पठेनाध्यात्मरन्यासीनेन बुद्धध्यासढेन भाव्य- मियायातम् ॥ ७॥ भाषार्थ:-(समाने वृक्षे पुरुषो निममः ) एक ही नाश- धान् शरीरादि जगत् में जीवात्मा अविद्या काम शौर कर्म फल भोग की वासनामो सम्बन्धी भार से दवा हुमा दुःख रूप अगाध नदी में डूबता हुशा शरीर को ही प्रात्मा गा. नता है कि मै अमुक मनुष्य का पुत्र अमुक्र का पौत्र, दुर्वल
चतुर्थोऽध्यायः।
हृष्ट पुष्ट रूपवान्, कुरूप, गुणवान्, मूर्ख, पण्डित, सुखी वा
दुखी हूं ऐसा निश्चय वाला इन दशाओं से भिन्न ,मैं नहीं
ऐसा मानता हुआ गन्मना मरता स्त्री पुत्रादि के साथ संयुक्त
वियुक्त होता हुमा इस प्रकार इन्हीं मिथ्या विचारों में
निमग्न तथा ( मुह्यमानः ) मोह जाल में फंमा हुआ (अनी.
शया शोधति ) दुःख निवृत्ति के लिये असमर्थ हुआ शोधता
है कि मेरा पुत्र भर गया हा ! मेरी प्रिया स्त्री नष्ट हो गई
हा! मेरा धन छिन गया अधिकार छिन गया अब क्या करूं
कैसे जीवं मैं असमर्थ हूं वचने का कुछ उपाय नहीं कर स.
कता ऐसे रोता विलाप करता वार २ दुःखाग्नि से जलता
हुप्रा सन्ताप करता है। और ( यदा ) जब संस्कार की
प्रबलतानुसार शुभ फलाका उदय होने से दीर्घ काल तक
निरन्तर सेवन किये योगाभ्यास द्वारा उसी शरीर वृथा में
भी
दुःखसागर में न डूबने वाले ( अन्यं जुष्टमीशं
पश्यति ) अन्य बहुत ज्ञानियों योगियों से सेवित वास्तव में
अपने से अभिन्न भी अपनी अविद्योपाधि होने से भिन्न
प्रतीत होने वाले अनन्त शक्ति ईश्वर को साक्षात् देखता है
(भस्य गहिनानमिति वीतशोकः ) तब ईश्वर की महिमा
को जान कर सब प्रकार के शोकों तथा दुःखोंसे छूट जाताहै।
भा०-लोक में भी जो दुःख के निवारण में जैसा समर्थ
होता है उस को वैसा कम शोक सताता और जो दुःख के
निवारण में असमर्थ होता वही शोकसागर में डूबता है।
और दुःख हटाने का सामर्थ्य भी भीतरी विचार की प्रबल
तासे बुद्धितत्व की ठीक शुद्धि तथा सूक्ष्मता होने पर हो
होता है। जो जैसा लोक में बुद्धिमान् दीखता है वह वैसा
ही दुःख निवृत्ति का उपाय करता और दुःख से बच जाता
रहते हुए
१४४ कृष्णयजुर्वेदीयश्वेताश्वतरोपनिषदि- है। ईश्वर का बोध भी बुद्धि को ठीक शुद्धि और सूक्ष्मता का अन्तिम फल वा परिणाम है । कठोपनिषद् में कहा भी है कि " तेज सूक्ष्म बुद्धि द्वारा सूक्ष्मदर्शियों को ईश्वर दी. खता भी है ,, इसी लिये दुख का त्याग तथा सुख की प्राप्ति चाहने वाले पुरुष को वाह्य विषयोके भोग को तृष्णा को छोड़ के भीतरी प्रात्म विधार में रमते हुए बुद्धि पर भारुढ होना चाहिये यह अभिप्राय निफला जानो ॥७॥ ऋचो अक्षरे परमे व्योमन यस्मिन्देवा अधि विश्वे निषेदुः । यस्तन्न वेद किसचा करिष्यति यइत्तद्भिदुस्त इमे समासते ॥८॥ अ०-ऋच इत्युपलक्षणार्थम् । जम्वेदादेः सम्बन्धिनि प्राधान्येन वाच्येऽक्षरेऽविना- शिनि व्योमवद व्यापके परमे निरतिशये यस्मिन्नधि मध्ये विश्वे सर्वेऽन्यादयो देवा- स्तन्मयं सर्वं जगन्निषेदुर्निषीदति निरन्तरं तिष्ठति । तदविनाशि ब्रह्म यो न वेद न जानाति स ऋचो हग्वेदादिवेदाध्ययनेन किं करिष्यति ? न किमपीत्यर्थः । व्यर्थं तस्य वेदाध्ययनं यइद्यएव तद् ब्रह्म विदुस्त इमे समासते विगतकल्मषाः सर्वोपद्वरहिताः सुखेन सम्यगासते परमशान्त्या तिष्ठन्ति ॥
१४५ चतुर्थोऽध्याय भा० ऋग्वेदादय. सर्व कर्मकाण्डप्रति- पादका अपि वेदाः कर्मकाण्डवर्णनमिषेण नानानामरूपात्मकारन्यादिदेवतानां प्रतिपाद- नेन परमेश्वरमेव प्रतिपादयन्ति । अग्न्यादि- नामरूपैः परमात्मनएवावस्थितत्वात् । ब्रह्मा- र्पणं ब्रह्महविब्रह्माग्नौब्रह्मणाहुतम् । अहंक्रतु- रहयज्ञः स्वधाऽहमहमौषधम् । मन्त्रोऽहमह- मेवाज्य-महमगिरहहुतम् ॥ इत्यादिप्रमाणेष्वे- कस्यैव परमात्मनः कर्मसम्बद्धसर्वसाधनात्म- कत्वं दर्शितं तस्मात्कर्मप्रतिपादकवेदभागोऽपि चिदात्मबोधकएवास्ति । अयमेव परो धर्मों यद्यथाकथमपि योगाभ्यासादिना परमात्म- चिन्तनं कुर्यात्तदर्थ वेदोऽध्येतव्यो न च वेदा- ध्ययनमार्गेण परमात्मज्ञानसदृशमन्यत्र क्वापि सुखमानन्दो वास्ति तस्मात्तस्य परमधर्मस्वम्। अयमपि मन्त्रः । ऋग्वेदमण्डले १। सूक्त १६४ । ३९ द्रष्टव्य. ॥८॥ भाषार्थ -(ऋवो अक्षरे परमे व्योमन् ) यहा ऋच उप. लक्षणार्थ है इससे ऋग्वेदादि वेदोके सम्बन्धि मुख्य वाच्यार्य अविनाशी आकाश के तुल्य व्यापक ( यस्मिन्नधि विश्वेदेवा
मा०-
कृष्णयजुर्वेदीयश्वेताश्वतरोपनिषदि-
निषेदुः ) जिस असीम अनन्त ईश्वर के भीतर बड़ी २प्रत्र
सशक्तियों वाले सब प्रन्यादि देवता तथा देवमय सत्र स्थूला
सूक्ष्म जगत ठहरा हुआ है ( नद्यो न वेद शिमृचा करिष्य.
ति?) उस अविनाशी ब्रह्म को जो पुरुष नही जानता वह
ऋग्वेदादि वेद पढ़ के क्या मरेगा? अर्थात् कुछ नहीं, उस
का वेद पढ़ना व्यर्थमा दी- है ( यइत्तहिदुस्त इमे समासते )
और जो ही लोग उस ब्रह्म को जान लेते आत्म ज्ञान की
ओर जिन का विचार झुक जाता है वे इन पाप दोष उप-
दवादि से रहित होवार सुख पूर्वक शान्ति में ठहर जाते हैं।
.-कर्मकाण्ड प्रतिपादक ऋग्वेदादि सब वेद कर्म-
कासह वर्णन के द्वारा अनेक गाम रूपात्मक्ष अग्न्यादि देव.
तानों के प्रतिपादन से परमेश्वर का छी वर्णन करते हैं
क्योकि भन्न्यादि सब नाम रूपों से वही एक प्रात्मा अव.
स्थित है । श्रीभगवद्गीता में लिखा है शि ब्रह्म रूप
हविष् को जीव रूप ब्रह्म ने ब्रह्मात्मक अग्निमें होम किया
ब्रतार्पण हो जाता है । तथा वई छोटे यज्ञ स्वधा रवाहा,
वषट्कार, पुरोहाशादि, मन्त्र माज्य घृत, अमि, होम इत्या.
दि सभी में ईश्वर हूं। इत्यादि प्रमाणों में कर्म सम्बन्धी
सव साधन रूप एक ही. परमेश्वर को दिखाया है। तिस से
सिद्ध हुआ कि कर्म प्रतिपादक वेदमाग भी ईश्वर वोधर है।
मनुष्य के लिये यही परमधर्म है जो शिम जिसी प्रकार
योगाभ्यासादि के द्वारा परमात्मा का चिन्तन करे । उसी
को जानने के लिये वेद पढ़गा चाहिये और वेदाध्ययन के
द्वारा परमात्मा को जानने से होने वाले सुख के समान
अन्यत्र कहीं सुख वा मानन्द नहीं है। इसी से वह परमधर्म
है। यह भी ऋग्वेदमण्डल १ सूक्त ९६४ में ३८ उनतालीसवां
मात्र है॥८॥
१४७ - चतुर्थोऽध्यायः छन्दांसि यज्ञाः क्रतवो व्रतानि भूतं भव्यं यच्च वेदा वदन्ति । अस्मान्मायी सृजते विश्वमेतत्त- स्मिंश्चान्यो माययासन्निरुद्धः॥ अ०-यज्ञाः पञ्चमहायज्ञा दर्शष्टयादयश्च क्रतवो ज्योतिष्ठोमादयो मखाः, व्रतानि चान्द्रायणादीनि छन्दांसि दुःखवारकाणि गाय- व्यादीनि वेदचतुष्टयरूपाणि मनुष्येण से- ध्यानि, भूतं भव्यं भविष्यद्यच्च वर्तमानं त्रिका- लस्थं वस्तुजातं सुखं दुखं च मनुष्य क्तव्यम्। एतच्च वेदाः सृष्टः प्रयोजनं वदन्ति । अस्मा- देव प्रयोजनाद्धेतोर्मायायाः प्रकृतेःस्वामी मायाऽस्यास्तीति मायी विश्वं सर्वमेतद्यज्ञा- दिकं सृजते रचयति तस्मिंश्च कार्य जगति शुभमनुष्ठातुमादिष्टाअप्यन्ये जीवाः केचि- ज्जीवा माययाऽविद्यया सन्निरुद्धाः शुभकर्म- सेवनादूरीकृता रागादिभिर्बद्धाः ॥ भा०-अस्यां सृष्टौ केषांचिज्जात्रानां विशिष्टदुःखभोगायैव जन्म केषांचिन्मध्य- कक्षायां सुखदुःखोभयभोगाय केषांचिच्चाधि- कृण्णायजुर्वेदीयश्वेताश्वतरोपनिषदि- क्येन सुखभोगाय शुभानुष्ठानेन मोक्षभावाय च जन्म भवति तत्र मध्या उत्तमा अपि केचिदागेण रक्ता अधः पतन्ति कामक्रोधाद- यएव तेषां पातकाः शत्रवो ज्ञेयाः ॥ ६ ॥ भाषार्थ:-( यज्ञाः फतवो व्रतानि छन्दांसि) पञ्चमहा. यज्ञादि नित्य कर्म तथा दर्शष्टि आदि यज्ञ क्रतुनाम ज्योति- ष्टोमादि बड़े यज्ञ और घान्द्रायणादि व्रत वो सब का मूल ब्रह्मचर्य व्रत छन्द नाम छाता छप्पर छत्त मादि के समान विपत्तियों घाम मेघादि के समान भाने वाले दुःखों बचाने वाले गायच्यादि छन्दोबद्ध चारों वेद इन यज्ञादि कर्तव्यों के द्वारा मनुष्यादि प्राणियों को सुख मिले इस प्रयोजन से तथा (भूतं भव्यं यच्च वेदा वदन्ति भूत भविष्य और वर्तमान इन तीनों काल के सब पदार्थ और सुख दुःख सामान्य वा निकृष्ट मनुष्यादि भोगें यही सृष्टि रचने का प्रयोजन है ऐसा वेद कहते हैं ( अस्मान्गायीसृजते विश्वमे तम् ) इसी हेतु वा प्रयोजन से मायानामक प्रकृतिका स्वामी प्रकृति को सदा अपने भाधीन रराने वाला ईश्वर इस पू वोक्त यज्ञादि सब जगत् को रचता है इस उक्त प्रयोजन से मृष्टि की रचना होने पर भी ( तस्मिंश्चान्यो मायया संनि रुद्धः ) उस कार्य जगत् में भोग के लालच से शुभकर्मोंके सेवन द्वारा ज्ञानाधिकारी होकर मुक्त होने के लिये रचे हुए भी अनेक नीव अविद्याग्रस्त हो के शुभ कर्मों के सेवन से रुकं माते रागादि में बद्ध हो जाते है। भा०-इस सृष्टि में किन्हीं जीवों का विशेष दुःख भोगने के लिये ही किन्हीं का मध्यम दशा में रह कर सुख दुःख दोनों भोगने के लिये और किन्हीं का शुभ कर्मानुष्ठान द्वारा धतुर्थोऽध्यायः १४७ अधिक सुख भोगने वा मुक्ति होने के लिये जन्म हाता उन में मध्यम और कदी २ उत्तम कोटि के भी कोई २ मनुष्य रागादि में बद्ध हाके नीचे को गिर जाते हैं और उन को गिरागे वाले काम क्रोधादि ही मुख्य शत्रु जानो ॥ ९ ॥ मायान्तु प्रकृतिं विद्यान्मा- यिनन्तु महेश्वरम् । तस्यावयव- भूतैस्तु व्याप्तं सर्वमिदंजगत् ॥१०॥ अ०-मायामेव प्रकृतिमस्य जगतउपादा- नकारणं विद्यान्मायास्वामिनं कालत्रयेऽपिसर्ग- स्थितिलयेष मायाऽस्याधिकारेस्ति तं महान्त- मीश्वराणामपीश्वरं निरतिशयश्वर्य मायिनं विद्यात्तस्य चिदात्मकस्य मायिनो मायासं- बद्वैर्मायावशात्कल्पितावयवभूतैः सर्वमिदं भूरा- दिचतुर्दशभुवनात्मकं जगत् व्याप्तम् ॥ भा०-ब्रह्मभिन्नत्वेन मायया असत्त्वाद- वस्तुत्वाच्च तरय मायाऽपि तदात्मिकैवास्ति भिन्नत्वेन वस्त्वन्तरत्वे सति श्रुतिविरुद्धोद्वैता- पत्तिदोषः । हाटकादी भूषणकल्पनादिवद् ब्रह्मणि माया कल्पिताऽस्ति । अतो मायैव जगत उपादानं ब्रह्मैव वाऽस्योपादानमित्य- नर्थान्तरं बोध्यम् तस्य भगवतो मायाकल्पि- कृष्णायजुर्वेदीयश्वेताश्वतरोपनिषदि- ताकाशवाय्वाद्यात्मकं ब्रह्माधिष्ठितमिदं सर्व जगदस्ति ॥ १०॥ भाषार्थः- ( गायान्तु प्रकृति विद्यात ) माया को ही प्रकृति नाम जगत् का उपादान कारण जानो और (मायिन तु महेश्वरम् ) सृष्टि स्थिति और प्रलय तीनों काल में माया नागक प्रकृति को अपने अधिकार में रखने वाले माया के स्वामी असीम ऐश्वर्य युक्त अनन्त व्यापक ईश्वर को नायी जानो ( तस्यावयवभूतैस्तु व्याप्तं सर्वमिदं जगत् ) उस चि. दात्मक मायी ईश्वर के माया सम्बन्धी माया के कारण कल्पित हुए स्थूल सूक्ष्म अवयवों से यह सब चौदह भुवन स्वरूप जागत् व्याप्त हो रहा है। भा०-ब्रह्मसे भिन्न मायाका सद्भाव न होने तथा प्रस्त्व तर न होने से उस परमेश्वर की माया भी उसी का एक 'रूप है। क्योंकि भिन्न मानने से वस्त्वन्तर सिद्ध हो जाने पर वेद के अटल सिद्धान्त से विरुद्ध द्वैतापत्ति दोष भावेगा इस से सुत्रादि में भूषणादि के कल्पना मात्र होने के तुल्य ब्रह्म में मायां भी कल्पनामात्र है। इस से गाया ही जागत का उपादान कारण है वा ब्रह्म हो, इस सब जगत का उपादान कारण है ये दोनों बातें एक ही हैं । उस भगवान् की माया से कल्पित आकाश वायु भादि भवयनात्मक ब्रा से अधिष्ठित यह सब जगत है ॥ १० ॥ यो योनियोनिमधितिष्ठ- त्येको यस्मिन्निदं संच विचैति सर्वम् । तमीशानं वरदं देवमीड्यं निचाय्येमांशान्तिमत्यन्तमेति११॥
चतुर्पोऽध्याय
९५२
अ०-मायाकार्याखिलयोन्यधिष्ठात्रा विय-
यदादिकार्योत्पादकेन सर्वाधिष्ठातत्वोपलक्षि
तसच्चिदानन्दात्मना ब्रह्माऽहमस्मीत्येकाव-
ज्ञानान्मोक्ष दर्शयति-यएकोऽद्वैतोदेवीमाया-
विमुक्त आनन्दैकरसः परमेश्वरो योनियोनि
मूलोपादानमायायाः सर्वानवान्तरभेदानधि-
तिष्ठति सचान्तर्यामिरूपेणाप्रकृतिभेदेषु सत्ता-
स्फूर्त्तिमाविर्भावयन्नधिष्ठाताभवति यस्मिन्नीशे
प्रलयावसरे सर्वमिदं जगत् समेति लीयते
सर्गकाले चाकाशादिरूपेण विविधतामेति
नाना भवति जीवात्मा तमीशानं सर्वनिय-
न्तारं मोक्षरूपसर्वोत्तमफलप्रदमीड्यं वेदादिना
स्तुत्यं देवं निचाय्य ब्राह्माऽहमस्मीस्ति निश्चि-
त्येमा स्थालीपुलाकन्यायेन सुषुप्तादौ प्रत्यक्षे.
णानुभूतां शान्तिमत्यन्तमेति प्राप्नोति ॥
भा०-सर्वस्य रथूलसूक्ष्मस्य योऽध्यक्षः
सर्गस्थितिलयहेतुः सर्वनियन्ता सर्वरक्षकः सर्वा-
परि सुखप्रदः सर्वथा सर्वदा च शान्तिमय-
रतरय प्रत्यगात्मनो देहादिप्वात्मभावं विहाय
चिदात्मस्वरूपबोधएव निरतिशयशान्तिप्राप्तः
प्राणिनः प्रधानं कारणमस्ति ॥ ११ ॥
कृष्णयजुर्वेदीयश्वेताश्वतरोपनिषदि-
भाषार्थः-माया से उत्पन्न सब देव मनुष्यादि योनियों
के अधिष्ठाता आकाशादि कार्य के उत्पादक सर्वाधिष्ठाता
होने से उपलक्षित सच्चिदानन्द रूप मात्मा के साथ में ब्रह्म
हूं इस प्रकार का एकत्व ज्ञान होने से मोक्ष होना ग्यारहवें
मन्त्र से दिखा (य एको योनियोनिमधितिष्ठति ) जो एक
भद्वैत देव माया से विमुक्त आनन्द रूप परमेश्वर माया
नामक मूल उपादान के सब अवान्तर भेदों का अधिष्ठाता
है अर्थात् वह अन्तर्यामि रूप से प्रकृति के प्रवान्तर भेदों में
उत्पादनादि स्फूर्ति प्रकट करता हुना अधिष्ठाता होता है
( यस्मिन्निदं सं च विधैति सर्वम् ) जिस ईश्वर में
प्रलय के समय यह सब जगत् लीन होता और उत्पत्ति के
समय भाकाशादि रूप से नाना प्रकार के भेदों वाला प्रपाट
होता (तमीशान वरदगीडय देवम् ) उस सर्वनियन्ता मोक्ष
रूप सर्वोत्तम फल देने वाले वेदादि शास्त्रों से स्तुतिके योग्य
ईश्वर देव का मैं ही ब्रह्म ईशानादि रूप हूं (निघाय्येमां
शान्तिमत्यन्तमेति ) निश्चय करके स्थालीपुलाकन्याय से
निन्दादि के समय प्रत्यक्ष अनुभव की हुई इस अत्यन्त शान्ति
को प्राप्त हो जाता है शिस में दुःख उपद्व वा विनों का
लेशमात्र भी नहीं है।
भा०-सब स्थूल सूक्ष्म जगत का जो स्वामी सृष्टि स्थिति
तथा प्रलय का कारण सर्वनियन्ता, सर्वरक्षक, सर्वोपरि
सुखदाता सब काल में और सब प्रकार से शान्ति स्वरूप है
शरीरादि में प्रात्मभावना न करके उस अपने वास्तविक
स्वरूप का बोध ही जीव को अत्यन्त शान्ति मिलने का
प्रधान कारण है ॥ ११ ॥
.. चतुर्थोऽध्यायः । १५३ यो देवानां प्रमवश्चोभवश्च विश्वाधिपो रुद्रो महर्षिः। हिर- गयगर्म पश्यत जायमानं स नो बुद्ध्या शुभया संयुनक्तु ॥ १२ ॥ अ०-अखण्डिततत्त्वज्ञानाय प्रार्थनामाह- यो देवानां स्थूलसूक्ष्माग्न्यादितत्यानां तत्तद- भिमानिदेवानां च प्रभव उत्पत्तिस्थानमुदुभवो नियमेन तै कार्यसाधको विश्वस्याधिपती रुद्रः शास्ता महर्षिः सर्वज्ञः सर्वविद्यानिधा- नस्य वेदस्य प्रकाशकोऽस्ति। जायमानं सर्गा- रम्भे विधातरूपेण प्रादुर्भूयमानं हिरण्यगर्भ- नामरूपात्मकं परमेश्वरं हे जनाः पश्यत ज्ञान- चक्षुभ्यामितिशेषः । स सर्वज्ञः शुभया धर्मा. नगामिन्या कल्याणकारिण्या रजस्तमोलेश- मलापैतया तत्त्वज्ञानरूपया बुध्या नोऽस्मान संयुनक्तु इति प्रार्थयामः॥ भा०-तस्येश्वरस्य गुणकर्मस्वभावानामा- लोचनेनैकाग्रचेतसा रतुतिप्रार्थनाभ्यां चान्यो- पायापेक्षयाऽधिक्येन शान्तिमयं सुखं मनुष्ये- णाप्तुं शक्यते ॥ १२ ॥ २० कृष्णायक्षुर्वेदीयश्वेताश्वतरोपनिषदि- भाषार्थ:-अखिसत तत्वज्ञान प्राप्ति के लिये प्रार्थना कहते हैं ( यो देवाना प्रभवश्चोभवश्व ) जो स्थूल मुक्ष्म अम्यादि तत्वों का तथा उन २ अग्न्यादि के अभिमानी देवो का उत्पादक और नियम के साथ उन २ से कार्य लेने वाला ( विश्वाधिपो रुद्रो महर्षिः) सब का स्वामी सब का शासक सर्वज्ञ नाम सब विद्यामओ के आधार वेदका प्रकाशक (हिरण्यगर्भ पश्यत जायमानम् ) सृष्टि के आरम्भ में सब के उत्पादनार्थ विधाता रूप से प्रकट होने वाले हिस्य गर्भ नाम रूपात्मक परमेश्वर को हे मनुष्यो। ज्ञानदृष्टि से देखो ( स शुभया बुद्ध्या नः सयुनक्तु ) वह ईश्वर शुभ कल्याण कारिणी धर्मानुगामिनी रजोगुण तमोगुण से लेश मान भी तम से रहित तत्वज्ञान रूप बुद्धि से हम को संयुक्त करे ऐसी हम प्रार्थना करते है। भाo-उस ईश्वर के गुण कर्न स्वभाषों के आलोचन द्वारा एकाग्रचित्तसे स्तुति प्रार्थना करके जैसा अधिक शान्ति सूप सुख मनुष्य को प्राप्त हो सकता है वैसा अन्य उपाय से नहीं ॥ १२॥ यो देवानामधिपो यस्मिं- ल्लोका अधिश्रिताः। य ईशेऽस्य द्विपदश्चतुष्पदः कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥ १३ ॥ अ०-यो देवानाममितशक्तिमतां ब्रह्मा- दिदेवानां तवान्तरभेदानां चाधिपः स्वामी यस्मिन्नीश्वरे आधारे भूरादयो लोका अधि- चतुर्थोऽध्यायः। उपरिश्रिता यदाधारेणावस्थिता अध्यस्ता लोकनामरूपैः प्रतीयन्ते । यएव परमेश्वर- स्तत्तल्लोकस्यद्विपदो मनुष्यादेश्चतुष्पदः पश्वा- देवेश ईष्टे तान् सर्वान्स्वाधीनान् करोति तस्मै कस्मै काय सुखानन्दमयाय '[ स्मैभावच्छा- न्दसः ] देवाय हविपा चरुपुरोडाशादियज्ञसा- धनैर्विधम परिचरेम सेवेमहि । अत्र "लोप- स्तआत्मनेपदेपुर, इति सूत्रेण छन्दोवन्मत्वा ईष्ट इतितलोपः । अधीगर्थदयेशां कर्मणीति सूत्रेण कर्मणि पष्ठी च ॥ भा०-चरुपुरोडाशादियागसाधनस्तस्य यजनेन स्तुतिप्रार्थनादिकरणेन स्तुत्यादी वागादेविशेषनियोगेन चेश्वराभिमुखतया म- नुष्येण शान्त्याप्तय उद्योगः कार्यः ॥ १३ ॥ भाषार्थः-( यो देवानामधिपः) जो अतुल शक्ति वाले ब्रह्मादि देवी तथा उन के शवान्तर भेद रूप देवों को वशी. भूत रखने वाला ( यस्मिंल्लोका अधिश्रिताः) जिस सर्वा- धार ईश्वर के बीच भूरादि लोक जिस के सहारे से ठहरे हुए हैं वा जिस में भूरादि लोक अध्यस्त हैं। अर्थात् भूरादि लोक नाग रूप से प्रतीत हो ( य ईशोऽस्प द्विपदश्चतुष्पदः) और जो परमेश्वर उस २ भूः, भवर आदि लोक में रहते इस गनुष्यादि दो पग वाले और पश्वादि चार पग धाले प्राणि मात्र को स्वाधीन रखता है ( कस्मै देवाय इविषा विधेम) । कृष्णयजुर्वेदीयश्वेताश्वतरोपनिषदि- सस मुख वा मानन्द स्वरूप देव की हम लोग अपने घरुपुरो हाशादि यज्ञ के साधनो से पूजा करे मा०-धरु पुरोहाशादि यज्ञ के साधनो से उसका पूजन करने द्वारा तथा रतुति प्रार्थनादि करके अर्थात वाणी भादि को अन्य कामो से रोककर स्तुति भादि में ही अधिक लगा कर ईश्वर की भोर तत्पर रहते हुए मनुष्य को शान्ति प्राप्त करने के लिये उद्योग करना चादिये ॥ १३ ॥ सूक्ष्मातिसूक्ष्म कलिलस्य मध्ये विश्वस्य स्वष्टारमनेकरू- पम् । विश्वस्यैकं परिवेष्टितारं ज्ञात्वा शिवं शान्तिमत्यन्तमेति१४॥ अ०-सूक्ष्मतरप्रकृतिपरमाण्वादेरव्यक्ता- दप्यतिशयित सूक्ष्मतमं सूक्ष्मत्वस्य काष्ठां प्राप्त कलिलस्यागाचस्यानन्तस्य गहनस्य मोहावृतरय जगतोमध्येऽन्त साक्षिरूपेण निर- जनतयावस्थितमतएव विश्वस्य सर्वस्य स्रष्टा- रमनेकरूपं तत्तद्वस्तुनि तत्तन्नाम्ना रूपेण च विद्यमानं विश्वरयैकमेव परिवेष्टितारम- नन्तं शिवमानन्दमयं परमात्मानं ज्ञात्वाऽ- त्यन्तं शान्तिमेति॥ भा-निरतिशयसूक्ष्मत्वानन्तत्वनिर्वि- कारित्वादिकारणादेव कल्मषागारे जगति १५७ चतुर्थोऽध्यायः । सर्ववस्तुषु वर्तमानः सर्वस्य स्रष्टा सन्नपि पर- मेश्वरो वस्तुदोषैर्न लिप्यते तस्मादेव तस्य निरतिशयशान्तस्य ज्ञानं जीवस्यात्यन्तशा- न्तिप्राप्तः कारणं विज्ञेयम् ॥ १४ ॥ भाषार्थ:--(सूरमातिसूक्ष्म कलिलस्य मध्ये ) सूक्ष्म से भी अति सूक्ष्म प्रकृति परमारवादि नामक अध्यक्त से भी परे [ वारीकी की हद्द को पहुंचे ] मोह रूप अगाध अनन्त अविद्या से ढपे महाभयङ्कर ससार समुद्र के बीच साक्षीरूपसे वर्तमान निष्कलङ्क [ वेदाग ] रूप से अवस्थित इसी कारण (विश्वस्य स्रष्ठारमनेकरूपम् ) सब के उत्पादक तथा उस २ वस्तु में विद्यमान (विश्वस्य परिवेष्टितारमेकं शिव जात्या) सब संसार को अपने भीतर रखने वाले एक ही आनन्द स्वरूप शिव को जानकर (अत्यन्तं शान्तिमेति ) जीव अत्यन्त शान्ति को प्राप्त हो जाता है। -सूक्ष्मता अनन्तता और निर्विकारीपग के असीम होने से ही पापों के आधार जगत् में तथा जगत्के प्रत्येक पदायों में वर्तमान रहता और सब को उत्पन्न करता हुआ भी ईश्वर संसार के दोषों से दूषित नहीं होता इसी कारण उस सर्वोपरि अत्यन्त शान्तस्वरूपका जानना जीवको अत्य- मत शान्ति प्राप्त होने का कारण जागो ॥ १४ ॥ सराव काले भुवनस्य गोप्ता भा- विश्वाधिपः सर्वभूतेषु गूढः । यस्मिन् युक्ता ब्रह्मर्षयो देव- १५८ कृष्णयजुर्वेदीयश्वेताश्वतरोपनिषदि- ताश्च तमेवं ज्ञात्वा मृत्युपाशां- पिछनत्ति ॥१५॥ अ०-सएव स्थितिकाले भुवनस्य चरा- चरस्य गोता रक्षिता विश्वस्याधिपः स्वामी ब्रह्मादिस्थावरावधि सर्वभूतेषु गूढोऽदृश्यउद्- भूतानुभूतचिदात्मनाऽवस्थितो ब्रह्मर्षयो ब्रह्म- त्वप्रधाना ज्ञानिनो देवता इन्द्रादयः क्षत्रत्व- प्रधाना यरिमन् युक्ता संगच्छन्ते यमानुवन्ति तमेवंभूतं ज्ञात्वा जीवो मृत्युपाशान् छिनत्ति तादात्म्यमाप्नोति ॥ भा०-अशी शीतनिवारणपाचनादिशक्ति- रस्तीति ज्ञात्वैव तथा कुर्वाणस्तत्फलं लभते। एवमीश्वरं स्वात्मनाऽभेदेन तत्तच्छक्तिमन्तं ज्ञात्वैव जीवो मरणादिजन्यापरिमितदुःखा- न्मुक्तो भवितुं शक्नोति ॥ १५॥ भाषार्थ.- (सएव काले भुवनस्य गोप्ता ) बही संसार के स्थिति काल में सब घराचर का रक्षक विश्वाधिपः सर्व भूतेष गूढः ) सब का स्वामी ब्रह्मादि स्थावर पर्यन्त सब में अदृश्य हो के प्रकट वा अप्रकट चिदात्म रूप से अवस्थित (ब्रह्मपयो देवताश्च यस्मिन् यक्ताः ) तपस्त्री ज्ञानी ब्रह्मर्षि ब्राह्मण और क्षत्रत्व प्रधान इन्द्रादि देव जिस से मेन करते जिस को प्राप्त होते नाग जिस में लीन हैं। तमेवं जावा . - चतुर्थोऽध्यायः १५ मृत्युपाशांश्विनत्ति ) उस को ऐमा ही गानकर जीव मृत्यु की फासियो पो काट डालता और उसी का स्वरूप ही जाता है। भाल-शीत निवारण और पकाने प्रादि की शक्ति अमि में है ऐसा जान कर ही उपाय करता हुआ पुरुष उस उस फल को जैसे प्राप्त कर पाता है। इसी प्रकार ईश्वरको अपने से अभिन्न वैसी २ शक्ति वाला जानकर ही जीव मरने प्रादि में होने वाले अपरिमित दुःख से छूट सकता है ॥ १५॥ एतात्परं मण्डमिवातिसूक्ष्म ज्ञात्वा शिवं सर्वभूतेषु गूढम् । विश्वस्यैकं परिवेष्टितारं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः ॥ १६ ॥ अ०-प्रतपनानन्तरं ग्रीष्मादिकाले घृत- स्योपरि यत्साररूपं मण्डमतिसूक्ष्म दृश्यते । तद्वत्साराणामपि सारं सारवस्तुवन्मुमुक्षूणा- मानन्दप्रदं सर्वेषु जायमानेषुगूढ शिवं ज्ञात्वा तथैक विश्वरय परिवेष्टितारं देवं ज्ञात्वा जीवः' सर्वपाशैरखिलदुःखहेतुबन्धनेर्मुच्यते । अत्र ज्ञात्वेत्यस्यावृत्तिढिर्या ज्ञात्वैव सर्व- पाशैर्मुच्यते नान्यथेति ॥ भा०-घृतादिसारवस्तूपादानायव सर्वो लोकस्तदाप्त्या सुखलाभं मन्यमानोऽनिशं कृष्णायजुर्वेदीयश्वेताश्वतरोपनिषदि- यतते। यश्च साराणामयसीमः सारस्तं प्रायेण न जानन्ति ये केऽपि कदाचित्तादृशं सार- तायाः काष्ठी प्राप्तमीशं कथमपि विदन्ति ते तादृशमेवानन्तं सुखमश्नुवते । एकपदेनजी- वाभिन्नस्य परेशस्यात्यन्तात्यन्तसूक्ष्मत्वबो- धने नानन्दातिशयवत्वं निर्दोषत्वं सर्वप्राणिषु चित्स्वरूपेणावस्थानत्वं सर्वस्य सत्तादिनद- तया व्यापित्वं च सम्यग्जानानः प्राण्यखिल- बन्धनाद्विमुच्यते ॥ १६ ॥ भाषार्थ:-( घृतात्परं मण्डमिवातिसूक्ष्मम् ) तपाये -छाने हुए घी के ऊपर पड़ने वाली सार रूप अति सूक्ष्म मलाई के तुल्य ( सर्व भूतेषु गूढ शिवं ज्ञात्वा) उत्पन्न हुए सब पदार्थों में गुप्त सार वस्तुओं के तुल्य मुमुक्षुओं को प्रा. नन्द देने वाले शिव को जानकर ( विश्वस्यैकं परवेष्टिता देवं ज्ञात्वा ) और सव ब्रह्माण्ड के चारों ओर लपेटकर सब को अपने भीतर रखने वाले देव को जानके ही (सर्व पाशः) जीव के सम्पूर्ण बन्धनों से (मुच्यते ) छूट जाता है। यहां ज्ञात्वा पद ढूढ़ता के लिये दोबार पढ़ा है कि जान के ही मोह की फांसों से छूट सकता है अन्यथा नहीं । -घृतादि वा चांदी सुवर्णादि सार वस्तुओं का ग्रहण करने के लिये ही सब लोग उस की प्राप्ति से सुख मानते हुए सदा उपाय करते है परन्तु जो सारोंका भी सार, सारपनकी जिसमें पराकाष्ठा है उसको प्रायः लोग नही जानते और जो कोई जब कभी जिम क्षिती प्रकार उस सारपनकी भा- প্ৰায়ঃ १६१ अन्तिम दशा ईश्वर को जान लेते हैं वे उस की अपेक्षा अन्य असार वस्तुओं का त्याग कर वैसे ही असीम मुख को प्राप्त हो जाते हैं इस ग्रन्थ के अनेक मन्त्रो में कई बार कहे ( सर्वभूतेषु गूढम् ) इत्यादि पद उस २ अभिप्राय को दृढ करने के लिये है इस मन्त्र में एक पद से जताया है कि जीव से. अभिन्न परमेश्वर की सब से प्रति सक्षमता का बोध होने से उस की प्रत्यानन्द स्वरूपता निर्दोषता संघ प्राणियों में चैतन्य रूप से स्थिरता और सम पदार्थों को सत्तादि देने वाला होने से उस की व्यापकता को जानता हुन्मा ही प्राणी सब बन्धन के हेतु दुःखों से बूट सकता है ॥ १६ ॥ एष देवो विश्वकर्मा महात्मा सदा जनानां हृदये सन्निविष्टः। हृदा मनीषा मनसाऽभिलप्तो य- एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥१७॥ अ०-विश्वं सर्व महदादिकार्य कर्मक्रि- यमाणमस्य विश्वकर्मा महांश्चासावात्मा सर्व- व्यापी जनानां हृदये सदा सन्निविष्टो जला- द्यपाधिषु सूर्यादिप्रतिविम्बवदवस्थितः । मनीषा बुद्धिरूपेण सूक्ष्मातिशुद्धहृदयस्थमनन- रूपात्मानात्मविवेकज्ञानेनाभिक्लप्तोऽभिव्यज्य- मान एष प्रकृतो देवोऽस्ति ये साधनचतुष्टय- सम्पवाविरक्ता जना एतत्तत्त्वमस्यादिवाक्य- २९ कृष्णयजुर्वेदीयश्वेताश्वतरोपनिषदि- प्रतिपाद्यमखण्डैकरसमेकमात्मतत्त्वं विदुस्तेऽ- मृता मुक्ता भवन्ति । अत्र मनीषेति तृतीय- कवचनविभक्तः सुपामित्याकारादेशः ॥ मा०-सर्वोत्पादकः सर्वान्तर्यामी सर्व सुखहेतुरीश्वरोऽस्मदन्तःकरणएव सदाऽवस्थि- तस्तदेव वास्तवं मम स्वरूपं नाहं शरीरे. न्द्रियान्तःकरणादिरूप इति मत्वा विविक्ता- वकाशे निरुद्धैकाग्रचेतसा ये तं ज्ञातुं यतन्ते ते तद्वोधेन दुःखान्मुच्यन्ते ॥ १७ ॥ भावार्थ:-(विश्वकर्मा महारमा जनानां हृदये सदा संनिविष्टः) माया के सम्बन्ध से मादादि सब कार्य जगत् को रचने वाला सर्वत्र व्यापक जलादि उपाधियो में सूर्यादि के प्रतिविम्ब के समान मनुष्यो के हदय में सदा ही विद्य मान ( मनीषा हुदा मनसाभिक सः) सूक्ष्म अति शुद्ध हद यस्य मननरूप मारमा अनात्मा के विवेक बुद्धि वा ज्ञान से प्रकट जात होने वाला (एष देवः ) यह प्रकृत देव ईश्वर है (यएतद्विदुस्तेस्ता भवन्ति ) शमादि चार साधनोसे युक्त तथा विरक्त जो मनुष्य तत्वमसि० इत्यादि प्रमाण प्रति. पाद्य प्रसरह एक रस अपने से श्रमिक एक प्रारम तव को जानते हैं वे मुक्त हो जाते हैं। मा०-सब का उत्पादक सब का अन्तर्यामी सब सुखों हेतु ईश्वर हमारे अन्तःकरण में ही सदा अवस्थित है वही हमारा वास्तविक स्वरूप है। किन्तु शरीर इन्द्रिय और भन्तःकरण आप हम नही है ऐसा मान कर रोके हुए एकाग्र नाते हैं ॥१७॥ बतुर्योध्यायः। चित्त से एकान्त प्रदेश में जो लोग उस को जानने का बटन करते हैं वे उस ईश्वर को जानकर शान्ति को प्राप्त हुए दुःख से छूट यदाऽतमस्तन्न दिवा न रात्रि- नसन्न चासच्छिवराव केवलः । तदक्षरं तत्सवितुर्वरेण्यं प्रज्ञा तस्मात्प्रसृता पुराणी ॥१८॥ अ०-यदा निर्बीजासंप्रज्ञातसमाधिकाले तमः कार्याविद्यादिक्लेशजन्यदुर्निवार्यसूक्ष्म- वासनानामध्यभावस्तत्तदा न दिवा दिन- मिति, नच रात्रिरिति, नच जगत्सद विद्य- तइति, नच मच्छरीरं मदीयाः पदार्था वा न सन्ति सर्वाभावइति, कोपि चेतोवृत्तिरूपुः प्रत्ययो न भवत्यपितु स्वरूपशून्येनेव ध्येया- कारनिर्भासेन तत्स्थतदजनतायाः समापत्तेः पराकाष्ठां प्राप्तेन तेन कल्याणमयएकः पर- मात्मैव दृश्यते। अर्यान्निवातस्थप्रदीपज्योति रिव स्वीये वास्तविकपरमात्मस्वरूपेऽवतिष्ठते। सच्चात्मतत्त्वमक्षरं स्वभावेनैवाविनश्वरं सवि. तुरुदयकालीनसूर्यादण्याधिक्येन शोभमान प्र- कृष्णयजुर्वेदीयश्वेताश्वतरोपनिषदि- काशमयं तस्यापि कारणत्वात् । तस्मादेव पुराणी सनातनी प्रज्ञा प्रकृष्टसर्वोत्तमज्ञान- साधिका बेदवाणी शैलानदीबज्जगति प्रसृता॥ भा०-"समाधिनि—तमलस्य चेतसो निवे- शितस्यात्मनि यत्सुखं भवेत् । तद्वाचा वक्तुं न केनापि शक्यतेऽतस्तादृशालौकिकाद्भुत- सर्वोत्कृष्टसुखानुभवाय योगसमाधिमन्तरेण नान्यः कोऽप्युपायइति मत्वा स्वीयपरमात्म- स्वरूपेऽवस्थित्याऽनुभूयमानानन्दावाप्तये योगा- भ्यासस्तल्लिप्सुना प्रयत्नात्कार्यइति ॥ १८ ॥ भाषार्थः-(यदाऽतमस्तक दिवा न रात्रिः) नव निर्वाज वा असंमजात नामक समाधिस्य हो जाने के समय तमोगुण के कार्य अविद्यादि क्लेश तथा अति कठिनता से निवृत्त होने वाली भविद्यादि को सूक्ष्म वासनानों का भी प्रभाव हो जाता है तव न दिन है ऐसा कह सकते न रात्रि (न सत्र धासच्छिवएव केवलः) अगत् विद्यमान है वा मैं विद्यमान हूं ऐसा भी नहीं कहा जाता, मेरा शरीर वा मेरे पदार्थ तथा अन्य मनुष्यादि नहीं हैं ऐसा भी मान नहीं होता किन्तु किसी प्रकार की भी चित्त की वृत्ति उस समय नहीं होती अपने स्वरूप से शून्य से हुए केवल ध्येय के भाकार में लगे तत्स्थ उसी की भोर मुकावट और तन्मय होना रूप समा. पत्ति की अन्तिम सोमा को प्राप्त जीवात्मा कल्याणमय एक परमात्मा को ही दीरने लगता है अर्थात् निर्वात स्थान के दीप ज्योति के तुल्य नपने वास्तविक परमारण . चतुर्थोऽध्यायः। १६५ खरूप में अवस्थित हो जाता है (तदक्षर तत्सवितुर्वरेण्यम्) या पात्मतत्व स्वभाव से ही अविनाशी उदय कालके सूर्यसे अधिक शुद्ध प्रकाशस्वरूप तेजोमय है क्योकि वह सूर्यादि प्रकाशों का भी प्रकाशक है ( तस्मात्पुराणी प्रजा प्रसना) उसी ईश्वर से सर्वोत्तम जाग की हेतु सनातन वेदवाणी पर्वत से निकल के नदी के समान जगत में फैली है। भाo-"समाधिद्वारा धोकर शुद्ध किये चित्तको परमात्मा में लगाने से जो सुख होता है वह वाशी से कहने में नही माता, इससे इस तथा अन्य उपनिषदो में कहे अनुसार वैसे भलौकिक सर्वोत्तम अद्भुत सुख का अनुभव करने के लिये योग समाधिको छोड़ के अन्य कोई उपाय नहीं है ऐसा मानकर उस अपने परमात्म स्वरूप अवस्थित होने से प्रतीत होने वाले मानन्द का स्वाद चाहने वाला पुरुष प्रयत्न के साथ योगाभ्यास का अधिमानतीसंवेग से उपाय करे ॥ १८॥ नैनमूर्ध्वं न तिर्यचं न मध्ये परिजग्रभत् । न तस्य प्रतिमा अस्ति यस्य नाम महद्यशः॥१॥ अ०-एनमुक्तं सर्वस्माद्वरेण्यं परमा- स्मानमपरिच्छिन्ननिरंशनिरवयवत्वादिनोवं मध्ये तियञ्चं वा न कोऽपि परिजनभत्परि- ग्रहीतुं शक्नोति । न केनापि हस्ताद्यवयवेन स गृह्यते । यस्यैकस्याखिलदिग्देशकालेष्वप- १६६ कृष्णयजुर्वेदीयश्वेताश्वतरोपनिषदि- रिच्छिन्नं नामाभिधानं महद् यशोऽस्ति । सर्वदिग्देशकालेषु यएकएवेश्वरः कैरपि स्वस्व- भाषानामभिर्गीयते तस्य प्रतिमा उपमा कापि नास्ति ययेदृशइति केनापि निर्दिश्येत॥ भा०-परिच्छिन्नं वस्तु ग्रहीतुं निरोद्धं, वा शक्यते परेशस्तु सर्वदिग्देशकालेष्व- परिच्छिन्नोऽस्ति तादृशाखण्डैकरसो द्वितीयः कोपि नास्ति येनोपमीयेत । भगवतः पूजार्थं प्रतिमानिर्माणमवतारविग्रहाणां क्रियते नतु दिगाद्यनवच्छिन्नस्याखण्डस्य, भगवतो नाम जपो महद्यशः करोति ॥१६॥ भाषार्थ:-(नैनमूर्ध्व ग तिर्यञ्चन मध्ये परिजनभत् ) प्रय तथा अवयवोसे रहित होनेसे अपरिचिव सबसे उत्तम परमात्मा को ऊपर नीचे वा बीचमें कहीं भी कोई सय मादि से पकड़ नहीं सकता ( यस्य नाम महद्यशः) जिस एक ईश्वर का सब दिशा देश और कालों में नाम के प्रचार द्वारा यश फैला है अर्थात् सब देशों और कालों में अपनी २ भाषा के किन्ही २ नामों द्वारा सब मनुष्य तीनों काल में अपने कल्याणार्थ एक ही ईश्वर को पुकारते गाते हैं ( तस्य प्रतिमा नास्ति) उस की कोई प्रतिमा नाम उपमा नहीं है जिस की समता द्वारा जताया जाय कि ईश्वर ऐसा है। भाल-परिच्छिन न.वस्तु को कोई पकड़ वा रोक सकता है और परमेश्वर सब दिशा देश और कालों में भाकाशवत् प्रबाड अपरिच्छिन्न है। वैसा प्रखबह एक रस द्वितीय 4 चतुर्थाध्यायः १६७ कोई पदार्थ नहीं है जिस की तुल्पता दिखायी नावे कि श्वर ऐसा है। भगवान की पूजा के लिये जो प्रतिमा बनायी जाती है सो अवतार शरारों की बनती हैं किन्तु दिगादि में एक रस भखरह व्यास ईश्वर की प्रतिमा नहीं बनती। भगवत् का नाम जपना महती कीर्ति करने वाला है॥१९॥ न संदूशे तिष्ठति रुपमस्य न चक्षुषा पश्यति कश्चनैनम् । हृदा हृदिस्थं मनसा यएनमेवं विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥२०॥ अ०-अस्य निर्गुणस्य प्रकृतेश्वरस्य रूपं संदृशे मनुष्याणां समक्षे दुग्गोचरे न कदापि कापि तिष्ठति । अतएव कश्चन को- प्येनं चक्षुषा न साक्षात्पश्यति । किन्तु हृदा हृदयस्थेनाविषयासक्तन स्वरूपावस्थेनैकाग्रेण मनसा सूक्ष्मशुद्धविचारेण हृदिस्थमेव स्वरूपा- भेदेन यएनं ज्ञातुं प्रवर्तते सएव पश्यति हार्दा- नुभवेन साक्षात्करोति। एवं येतं विदुर्जानन्ति तेऽमृता मरणादिजन्यापारदुःखरहिताः प्राप्तमु- क्तदशा भवन्ति। भा०-अरूपस्य वास्तवेन निर्गुणस्य निराकारस्वरूपस्य परमात्मनः कोऽपि दर्शन कृष्णायजुर्वेदीयश्वेताश्वतरोपनिषदि- कत्तुं न शक्नोति । तस्मादीश्वरः कोऽपि ना- स्तीति मत्वा मनुष्या नास्तिका न स्युरेतदर्थं भगवानसुरराक्षसांदिविध्वंसायास्तिकभक्तानां रक्षणाय धर्मस्य संस्थापनाय च युगेयुगे यथा- वसरं बहुविधान स्वीयान् मायाकल्पितान् मायोपाधिकान् मानुषादिशरीरविग्रहानावि- र्भाव्य दृष्टिपथमायाति । तानि च रूपाणि मायोपाधिनत्र दृश्यन्ते नतु वास्तविकानीति बोध्यम् तस्माद् वास्तवेनारूपोऽदृश्योऽपि मायोपाधिना रूपवान दर्शनीयश्च भवति ॥२०॥ भाषार्थ.-(अस्य रूप सदृशे न तिष्ठति ) इस निर्गुण प्रकृत ईश्वर का रूप गुण मनुष्योके सामने कही कभी नही ठहरता इसी से ( एमं कश्चन चक्षुषा न पश्यति ) इस निर्गुण को कोई पुरुष साख से साक्षात् नही देख सकता किन्तु (हदा मनसा हदिस्यं य एनम् ) विषयो की ओर न झुके वा न फसे, स्वरूप में अवस्थित, एकाग्र, शुद्ध सूक्ष्म विधार से अपने में ही स्थित इस ईश्वर को अपने खरूप से अभिन्न जानने के खिये जो चेष्टा करता है वही उस को हदय के अनुभव से साक्षात् कर पाता ( एवं विदुस्तेऽमृता भवन्ति ) जो लोग इस उक्त प्रकार से उस को जान लेते वे मरणादि के अपार दुःख से छूट जाते है। भा०-वास्तव में रूप रहित निर्गुण निराकार अखबह स्वरूप ईश्वर है इसी कारण चर्म चक्षु से उस का दर्शन कोई नहीं कर सकता इस दशामें ईश्वर कोई होता तो कही कभी - चतुर्थोऽध्यायः दीखता न ? ऐसा मान कर मनुष्य नास्तिक न हो जांप रस पारण भगवान् असुर राक्षसादि स्वभाव वाले दुष्ट प्राणियों का विष्वत करने प्रास्तिक भजनों की रक्षा करने और धर्म की फिर २ स्थापना करने के लिये यथावसर प्रत्येक युग में माया कल्पित मायोपाधिक्ष अपने बहुविध मनुष्यादि रूप वाले अवतार शरीरोंको प्रकट करके मनुष्यों के दृष्टि. गोचर होते हैं। परमात्माके अयतार रूप मायात्मक उपा. धियों से ही देखने में आते हैं किन्तु वे रूप वास्तविक उस के नहीं हैं। तिस से सिद्ध हुप्रा कि ईश्वर वास्तव में अरूप तथा अदृश्य होने पर भी मायोपाधि से कृत्रिम रूप धारण करके देखने योग्य भी होता है ॥२०॥ अजातइत्येवं कश्चिद्भीरुः प्रति- पद्यते । रुद्र ! यत्ते दक्षिणं मुखं तेन मां पाहि नित्यम् ॥ २१ ॥ अ०-ईश्वरप्रसादादेवेष्टप्राप्तिरनिष्टहानं सुकरमिति मत्वा मन्त्रद्वयेन प्रार्थनोच्यते--हे रुद्र ! सर्वेषां शास्तः ? इति यस्मात्त्वमजातो न जायसे तत्सहचरितदुःखव्याधिजराक्षुत- पिपासादिभिश्च न युज्यसे तस्मादेवं मत्वा कश्चिद्धभीरुः संसारार्णवमज्जनभयादभीतस्त्वां प्रतिपद्यते तारकस्य तव शरणं गच्छति न सर्वः । अतो हे रुद्र ! यत्ते तव दक्षिणं प्रधा.
१७२ कृष्णायजुर्वेदीयश्वेताश्वतरोपनिषदि- नमाभिमुख्यं कृपाकटाक्षेण स्वभक्तान्वीक्षण तेन मां मुमुक्षं जिज्ञासुं नित्यं सर्वदा पाहि पालयेति प्रार्थये यद्वा दक्षिणं सोत्साहं प्रवी- णत्वगम्भीरत्वयुक्तं ध्यातं मुखं यद्वा दक्षिण- दिशिभवं यमाभिधं मुखं तेन मुखेन मां शर- णागतं पाहि रक्ष॥ भा०—लोके धनाद्यैश्वर्येण स्वतउत्कृष्टं सुखं भुजानान् दृष्ट्वैव वोत्कृष्टसुखाप्तये जनाः प्रयतन्ते तथैवेहापि सर्वदु खाद्विमुक्तस्य प्रार्थ- नोपासनाश्रय एव दुःखान्मुक्तेः प्रधान कारणं नहि कोऽपि दुःखालयश्चितो लोकेऽपि सुख- मानमर्हति ॥ २१ ॥ भापा:-सब ईश्वर की कृपा बा प्रमत्रता से ही इष्ट सुख की प्राप्ति और अनिष्ट की हानि सुगमता से हो सकती है ऐसा मान कर दो मन्त्री से प्रार्थना कही गई है (रुद्र । अजात रत्येवं कश्चिद्भीरुः प्रतिपद्यते ) हे सब के शासक रुद्र नाम रूप ईश्वर जिस मारण तुम जन्म लेकर व्याधि जराक्षुधा पिपासा और मरणादि के दुःखों में नहीं पहते सदा शुद्ध एफ रस रहते हो इस कारण तुम को ऐसा ही जान वा माग के संसारसागर में डूबने वा गोता खाने से डरा हुना मेरा जैमा मनुष्य तुमशो प्राप्त हो पाता है अर्थात पार करने वाले तुम्हारे शरण को गहता है किन्तु सब नही । इस से हेश्वर । ( यत्ते दक्षिण मुखं नेन मा नित्यं पाहि ) जो भक्त पर तुम्हारी प्रधान कृपा दृष्टि है उस से मुझ जिज्ञासु १७१ चतुर्थोऽध्याय मुमुतुको नित्य सदाही रक्षा करोयही प्रार्थना करता हू अपवा प्रवीणता गम्भीरता युक्त ध्यान किया जो तुम्हारा उत्साह पूरित मुख है, अथवा दक्षिण दिशा में विद्यमान यमराज स्वरूप जो तुम्हारा मुख है उससे मुझ शरणागतकी रक्षा करो। भा०-ससारी मनुष्य लोक में धनादि ऐश्वयं के अधिक होने से अपनी अपेक्षा उत्तम मुख भोगने वाले मनुष्यो को सुन देख वा जान कर ही उत्तम सुख प्राप्तिके लिये धनादिक उपार्जन में श्रम करते हैं। वैसे ही यहा भी सब दुखों से मुक्त ईश्वर की प्रार्थना उपासना का आश्रय लेना ही दुख से मुक्त होने का प्रधान कारण है। क्योकि जगत में भी कोई मनुष्य दु ख के शरणागत रहता हुआ सुख प्राप्त नहीं कर पाता ॥ २१॥ मानस्तोके तनये मा न आयुषि मा नो गोषु मा नो अश्वेषु रीरिषः । वीरान्मा नो रुद्र ! भामितो वधीहविष्मन्तः सद- मित्त्वा हवामहे ॥२॥ अ०-हे रुद्र ! सर्वत्र सीदसि तिष्ठसि सदः पचाद्यच् । तादृशं सर्ववस्तुष्ववस्थितमिदेव त्वा त्वां हविष्मन्तो हव्यादिसाधनामादिकं कुर्वाणा वयं यतो हवामह आयामस्तस्मात्त्वं न नस्तोके पुत्रे, तनये पौत्रे, न आयुषि, नो १७२ कृष्णयजुर्वेदीयश्वेताश्वतरोपनिषदि- गोषु नोऽश्वेष च मा रीरिषो रोषं क्रोधं मा कुरु तव रोषेण तेषां विनाशो माभूत । तथा मत्कृतापराधेन भामितः क्रोधितो नो वीरान पराक्रमशोलान् भृत्यादीन्मा वधीनों हिंसय । भा०-ईश्वरभक्तानां पुत्रादयोऽकाले नैव मियन्ते । नास्ति यस्मात् बलिष्ठो, यत्समो या कश्चित्प्रमर्नास्ति न तमनादृत्य कोऽपि कमपि मारयितुं प्रभवति। अतएवोक्तम्-मृत्यु- र्धावति पञ्चमइति । प्रधानमृत्युदुखवारणप्रा- र्थनेऽन्यान्यल्पानि दुःखान्युपलक्षणेन तदन्त- भूतत्वादेव दूरीभवितुमर्हन्ति । दुःखस्यानि- टस्य हानमेव प्राधान्येनेष्टावाप्तिर्बोध्या । ज्ञानेन मरणादिभयनिवृत्तिरेव प्रार्थनायाः प्रधानं प्रयोजनमल्पायुषि पुत्रादीनां मरणं न स्यादिति तु गौण प्रार्थनाफलं बोध्यम् । अयं चान्तिमो मन्त्री यजुषि अ० १६ षोडशः पठित. ॥ २२॥ भाषार्थः-(रुद्र समित्या हविष्मन्तो यामहे । हे रुद्र सन वस्तुओ में व्यापमा अवस्थित ईश्वर । तुम को भाज्यपु. रोहाशादि हविष्यादि साधनों से होम करते हुए हम लोग लिस कारण बुलाते पुकारते स्तुति प्रार्थना करते हैं तिस से तुम ( मा नस्तोके तनये मा नायुषि ) हमारे पुत्र पौत्र और । चतुर्थोऽध्यायः १७३ हमारे स्वयं जीवन में ( मा नो गोषु मा ना प्रश्वषुरीरिषः) हमारी गौशो तथा हमारे घोड़ो में रिष क्रोध मत करो। तुम्हारे रोष-क्रोध से हमारे पुत्रादि का नाश न हो जाये ( भामितो मा नो वीरान् वधीः ) हमारे किये अपराधों से क्रोधित हुये हमारे पराकमशी लभृत्यादिको हिंसा न कीजिये। भा०-ईश्वर के भक्त पुरुषों के पुत्रादि अकाल में नहीं मरते। जिस से अधिक बलवान् बानिस के तुल्य कोई स्वामी नहीं है उसकी इच्छा के बिना उस का अनादर करके कोई किसी को मार नहीं सकता। इसी लिये कठोपनिषद् में कहा है कि "ईश्वर जहां नहीं चाहता वहां से पांचवां मृत्यु भी भागता है, सब से मुख्य मरण दुःख निवारण की प्रार्थना में उपलक्षमा से उस के अन्तर्गत होने वाले अन्य बाटे २ सब दुःख दूर हो सकते हैं और अनिष्ट दुःख का छूटना मुख्य कर पटकी प्राप्ति हुई जानो और ज्ञान के द्वारा मृत्यु मादि का भय छूटना ही मुख्य कर प्रार्थना का प्रयोजन है तथा पूर्णय हुए बिना बीच में पुत्रादि न मरें यह भी प्रार्थना का गौण प्रयोजन है। यह बाईसवां मन्त्र यजुर्वेद अ०१६ मं०१६ है ॥२२॥ इति ब्राह्मणसर्वस्वमासिकपत्रसम्पादकेन भीमसेनशर्मणा निर्मिते श्वेताश्वतरोप- निषदभाष्ये चतुर्थोऽध्यायः समाप्तः॥
अथ पञ्चमाध्यायारम्भः। द्वे अक्षरे ब्रह्मपरे त्वनन्ते विद्याऽविद्ये निहिते यत्र गूढे। क्षरन्त्वविद्या ह्यमृतं तु विद्या विद्याऽविद्ये ईशते यस्तु सोऽन्यः॥ अ०-यत्र यस्मिन्नक्षरेऽविनश्वरे निरति- शये ब्रह्मणा हिरण्यगर्भात्परे परस्मिन् पर- मात्मनि, यद्वा ब्रह्म परमात्मतत्त्वं परं याभ्यां, प्रवाहेण जगत अनादित्वानास्त्यन्तोऽवसानं ययोस्ते तादृश्यौ हे विद्याऽविद्ये निहिते अव- स्थिते गूढे अनभिव्यक्ते सूक्ष्मत्त्वाददृश्ये वर्तते । तयोः क्षरं कल्याणमार्गाच्च्युतिहेतु- रविद्याऽमृतं सर्वविधदु खान्मुक्तिहेतुर्विद्याऽस्ति। यस्तु विद्याऽविद्ये ईशते नियमयति स निर- तिशयशक्तिः सर्वज्ञः परेशस्ताभ्यामन्यः ॥ भा०-यो जनोऽविद्यादिनेशान्सर्वानर्थ- हेतूंस्त्यक्त्वा ज्ञानप्लवेन संसारसागरं तरोतुं सर्वदुःखाद्विमुक्ति चेच्छति । तेन विद्याऽवि- - ঘাঁথায় १५ द्ययो स्वाम्येवाचयितव्य । नहि सर्वशक्ति- स्वाम्याश्रयेण विना तदीयवरतुनो हानमुपा- दान वा कोऽपि कर्तुमर्हति ॥ १ ॥ भाषा -(अक्षरे ) शिस निरतिशय पविनाशी (ब्रह्मपरे) ब्रह्मा नामक हिक्षय गम से परे विद्यमान परमात्मा में (ब्रापरे स्वनन्ते विद्याऽविध निहिते गूढ ) परमात्मा रूप प्रात्मतस्त्र जिन से परे है ऐसी प्रवाह से जगत् के प्रमादि हाने पर लिन का अन्त नाम समाप्ति नही किन्तु सदा निग का सार चला जाता है ऐसी दो विद्या और अविद्या नाम ठोक समझना और उलटा समझना दोगो सूदमरूपसे अवस्थित अदृश्य हुई वत्तमान हैं (सरस्वविद्या ह्यमृतन्तु विद्या) उन दानोमें से कल्याण मागसे अलग करने भुलाने वाली अविद्या कहाती और भरणादि सम्बन्धी महादु खदायी भयोसे बचाने वा सब दु खोसे छुडान वाली विद्या कहाती है (यस्तु विद्या विद्येशते सोऽन्य ) और जो विद्या प्रविद्या की व्यवस्था वा नियम का है जिस के नियम से विरुद्ध विद्या विद्या कुछ भी नही कर सकती जिस पर उसकी कृपा होती उसको विद्या और जिम पर कोप होता उसी को अविद्या घरती है वह अत्यन्त शक्ति वाला सर्व ईश्वर विद्या विद्या दोमो से भिन्न तीसरा है॥ भा-जो मनुष्य सब प्रमों के हेतु अविद्यादि क्लेशो को छुड़ा के जात वा विद्यारूप नौका के द्वारा संसाररूप समुद्र के पार होगा वा मन दुखो से छूटना चाहता है उस को उचित है कि विद्या तथा विद्या के स्वामी का ही शरण लेवे । क्योकि सर्वशक्तिमान स्वामी का सहारा लिये बिना को कोई भी होड नही सकता न ग्रहण कर वस्तु कृष्णयजुर्वेदीयश्वेताश्वतरोपनिषदि- सकता है जो कि राजाको श्राज्ञा पाकर वा इशारा मात्र पाकर राजकर्मधारो किसी को पकड़ते वा छोड़ते हैं। वैसे ही नार्मानुसार मनुष्यादि को अविद्या पकड़ती वा छोड़ती है॥१॥ यो योनियोनिमधितिष्ठत्येको विश्वानि सूपाणि योनीश्च सर्वाः। ऋषिं प्रसूतं कपिलंयस्तमग्रे ज्ञान- बिभर्ति जायमानं च पश्येत् ॥२॥ अ०-योऽग्ने मैथुनसर्गात्पूर्वं सर्गारम्भ कपिलं कपिलवण शुद्ध सात्त्विकं तैजसवर्ण- प्रधानाकृतिमृषि ज्ञानाधारत्वयोग्यं स्वेनैव प्रसूतमुत्पादितं तं ज्ञानदसंस्कारैर्बिभर्ति पुष्णाति । जायमानं प्रादुर्भूयमानं ज्ञानादि- शुभगुणोत्कषैर्लब्धोच्चप्रतिष्ठं च पश्येत्पश्यति तदुपरि कृपादृष्टिं करोति यश्च योनि योनि पृथिव्यादिकं स्थानंस्थानं विश्वानि रूपाणि सर्वान् रूपादिगुणान्सर्वा योनीश्च सर्वाणि प्रभवकारणानि चाधितिष्ठति नियमयति स कपिलादिभ्योऽन्यःपरइति ॥ भा०-ब्रह्मा देवानां प्रथमः सम्बभूवेत्य- न्यत्रोक्तम् । सहि सर्वप्राणभृत्सु प्रथमो मुख्यः पञ्चमोऽध्यायः। १७७ सर्वोपरि वेदादिशास्त्रस्य गूढाशयं बुद्धवान् सर्यापेक्षया प्रशस्ततमा धार्मिको ज्ञानी चाभ- बत् । नहि ब्रह्माणमन्तरेण प्राणभृत्वन्यः कोऽपि तत्समस्ततोऽधिको या सम्भवति । अत एव ब्रह्मादिस्थाक्रान्ता जीवगतिः सबै- मन्यते । नच तादृशः कोऽपि देवः परमाल- कृपामन्तरेण सिद्धः सम्भवति । तस्माद्यस्य कृपया ब्रह्मादयोऽपि महत्त्वमामुवन्ति सएवा- स्माभिरामयितव्यइत्याशयः ॥२॥ भावार्थ:-( योऽने कापिलं समृर्षि प्रसूतम् ) जो मैथुन सृष्टि से पूर्व सृष्टि के प्रारम्भ में तैगसताश्व प्रधान शुद्ध सश्त्र गुणी तेजस्वी ज्ञानी होने योग्य अपने प्राप ही उत्पन्न किये उन दृषि नाम ब्रह्मा को (ज्ञानविंगति गायमानं च पश्येत) वेद के संस्कार रूप मानो से पुष्ट करता और प्रसिद्ध प्रकट हुए उस ब्रह्मा पर कृपादृष्टि करता वा रखता है (य एको योनियोनिमधितिष्ठति) और जो एक ही ईश्वर प्रत्येक पृथिव्यादि कार्य स्थान २ का (विश्वानि रूपाणि योनीच सर्वाः) सब रूपादि गुणों तथा जिन से रथून चार्य वस्तु उत्पन्न होते उन सब सूक्ष्म कारण तत्वों का अधिष्ठाता नियन्ता होता वह कपिलादि से भी अन्य नाम परे हैं। भाo-"सब इन्द्रादि देवतामोमें मुख्य अला को प्रत्येक महाकल्प के प्रारम्भ मे परमेश्वर पहिले उत्पन्न करता है, यह मुबहकोपनिषद् में कहा है। एक परमेश्वर से नीचे मत्र २३ र ११८ कृष्णायजुर्वेदीयश्वेताश्वतरोपनिपदि- जगत्के प्राणियोमें सर्वोपरि ब्रह्मा है ब्रह्मासे भिन्न प्राणियो में अन्य कोई उत्तम वा अधिक नहीं हो सकता। इसीलिये ब्रह्मा से लेकर स्थावर पर्यन्त जीव की गति सत्र शास्त्रकार मानते है । परमात्मा को कृपा के बिना कोई मनुष्यादि प्राणी वैसे ब्रह्मापन के अधिकार को प्राप्त नही कर सकता इस कारण जिस की कृपा से ब्रह्मादि भी महत्त्व को प्राप्त होते है उसी का भानय हम लोगो को करना चाहिये यह आशय है ॥२॥ एकैकं जालं बहुधा विकुर्व- बस्मिन् क्षेत्रे संहरत्येष देवः । भूयः सृष्वा यतयस्तथेशः सर्वाधि- पत्यं कुरुते महात्मा ॥३॥ अ०-एष उक्तो देवईश्वरी मनुष्यपशु- पक्ष्यादिरूपमेकैकं जालमेकैकं जातिभेदं जी- वस्य बन्धहेतुत्वान्मत्स्यादिवन्धकं जालमिव बहुधा नानाप्रकारामेकैकां नानाभेदभिक्षां जातिं विकुर्वन् विशेषेण निर्मिमाणएवास्मिन् क्षेत्रे मायात्मके पञ्चतत्त्वमये ब्रह्माण्डे संहरति नाशयति । मुहुर्मुहुरुत्पादयति नाशयति च । ईशोभूयः पुनरपि तथा तथैव मध्येमध्ये यत्तयो यतीन [सुपो व्यत्ययः] लोकव्यवस्थायै यत्नशी- पञ्चमाऽध्यायः। १७० लान् धर्मव्यवस्थापकानसुरविध्वंसकांचावता- रान् मर्यादापुरुषोत्तमान्राजर्षीन् ब्रह्मर्षी श्च सृष्ट्वात्पाद्य संहरतीति पूर्वेणान्वयः । एवं महात्मा निरतिशयात्मवविशिष्टः परेशः सर्वस्य सर्गस्थितिलयान्कुर्वन् सर्वाधिपत्यं कुरुते। भा०-संजीवयति चाजस्रं प्रमापयति चाव्ययः । मन्वन्तराण्यसंख्यानि सर्गः संहा- रएव च । क्रीडन्निवैतत्कुरुते परमेष्ठी पुनः पुनः ॥ इति मनुस्मृती-तथा “सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत् ।,, इत्यादि वेदे यदुक्तं तस्यैवायमाशयः। योहि लोकेऽपि येषां यादृशं यावच्चावस्थापरिवर्तनं कर्तुं शक्नोति स तेषां तादृशएवाधिपतिर्भवति । यश्च यरय सर्गप्रतिसौ करोति न च कोपि तथा कुर्वन्तं व्याहन्तुमर्हति स मुख्योऽध्यक्षः ॥ ३ ॥ भाषार्थः-(एष देव एकैकं जालं बहुधा विकुर्वन् ) यह पूर्वोक्त देव नाम प्रकाश स्वरूप ईश्वर, जीवो के बन्धन [ कैद होने पक जाने के हेतु होने से मछली आदि को पकड़ने के जाल के समान] के हेतु मनुष्य पशु पक्षी श्रादि नामक एफ २ जाति भेद को नाना भेदो बाला विशेष कर बनाता हुआ [ ईश्वर ने मनुष्यादि एफ २ जाति में असख्य भवान्तर १० कृष्णायजुर्वेदीयश्वेताश्वतरोपनिषदि- जाति भेद कर्मानुसार किये हैं ] (अस्मिन् वत्र महरति) नाया. निर्मितपञ्चतत्वनय इन ब्रह्मायहरूप सदमे लीन करना जाता है [ शो २ शरीरादि शिम २ पृथिव्यादि से उत्पन्न होते वे गर २ कर मदा डसी २ अपने कारण तत्त्वमें लीन होते जाते हैं ] प्रार्यात् वार २ उत्पन्न और नष्ट करता जाता है (ईशो. भूम्स्तथा यतयः सृष्ट्वा ) ईश्वर फिर २ वैसे पूर्व कहे साधा- रणों को रचना के समान ही बीच २ में लोक की व्यवस्था कारने के लिये धर्म की व्यवस्था बांधने वाले अनुर राक्षसादि प्रकृति वाले धर्ननाशक प्राणियोंफा विध्वंस करने वाले श्रव. तारों को और विशंप उद्योगी यनगी न साहसी मर्यादापुर- योत्तम राजर्षि या ब्रह्मर्षियों को उत्पन्न करके उन का भी संहार किया करता है [जैसे महाराजा भगवान् रामचन्द्रनी वा कृम्पादि हुए ] इस प्रकार (महात्ना सर्वाधिपत्यं कुरुते) निरतिशय सात्मिकशक्ति वाला परमेश्वर सन बट २ पराक्र- मियों की भी उत्पत्ति स्थिति लय करता हुआ-अर्थात् यहाँ से भी नहीं की अपने घर में घुमाता हुआ सब का खामी बनता है। मा०-गनुस्मृति में कहा है कि "अविनाशी ईश्वर सब को चार २ उत्पन्न नष्ट करता है। तथा अपने श्राप एक ही दशा में ठहरा हुआ सेन करने के समान असंख्य गन्धनसरों में प्रसंस्पबार सृष्टि और तप किया करता है। तथा वेद में कहा है कि "विधाता ईश्वर सूर्य चन्द्रमादि वह २ शक्तिधारी वा कार्य माधक पदार्थीको भी पूर्व फल्पों के समान ही बनाया करता है,, इत्यादि का अभिप्राय यहां पाहा नानी लोक में भी जो पुरुष शिन का जैसा विगाड़ वनाथ कर सकता है वह वैमा ही उनका प्रधिपति होला और जिस के उत्पत्ति प्रलय चियमानुसार जो करता और पञ्चमाऽध्यायः। १८१ वैसा करते हुए उस के काम में कोई विघ्न नहीं डाल सकता इसी से बद सघ का मुख्य अध्यक्ष स्वामी है ॥ ३ ॥ सर्वा दिश ऊर्ध्वमधश्च ति- र्यक् प्रकाशयन भाजते यवनड्- वान् । एवं स देवो भगवान् वरे- एयो योनिस्वभावानधितिष्ठत्येकः४ अ०-यद्-उ-अनड्वान् यद्वदनड्वाना- दित्यः सर्वादिश ऊर्ध्वमधश्च तिर्यक् प्रका- शयन भ्राजते [इवार्थेऽत्र-उ ] एवं स भग- वान् परमात्मापि प्रजावोतप्रोतसच्चिदा- नन्दस्वरूपेणोलमधश्च तिर्यक् सर्वा दिशः प्रकाशयन् भ्राजते तथा वरेण्यो वरणीय एको जीवमायाभ्यामभिन्नोऽद्वितीयः स देवो द्योतनशीलः परमात्मा योनिस्वभावान् स्वस्व- कारणस्वभावधारिणः' पृथिव्यादीन् देवादीश्व पदार्थानधितिष्ठति ॥ भा०-यथा सूर्यप्रकाशसाहाय्यमन्तरेण न कस्यापि किमपि कार्य निष्पद्यते तथैव सच्चिदानन्दस्वरूपेण सर्वत्रावस्थितः सर्वचाम- यन् य ईश्वरः सर्वजगद्यात्राहेतुत्वेनास्य सर्व- कृष्णायजुर्वेदीयश्वेताश्वतरोपनिषदि- स्याधिष्ठाता भवति । यथाप्रकाशयत्येकः कृ- स्नलोकमिमरविः । क्षेत्रक्षेत्रीतथाकृत्स्नं प्र. काशयतिभारत। इति गीतासु-निमित्तैमनश्च- क्षुरादिप्रवृत्ती निरस्ताखिलोपाधिराकाशक- ल्पः । रत्रिलोकचेष्टानिमित्तं यथायः सनित्यो- पलब्धिस्वरूपोऽहमात्मा ॥ ईदशमेव प्रकाश- नमधिष्ठातृत्वं चात्रबोध्यम् ॥१॥ भाषार्थः-( यदनड्वान् सर्वा दिशउर्ध्वमन तिर्यक् प्रका- शयन् माजते ) जैसे सूर्य ऊपर नीचे और बीच में तिरछी सव दिशा नाम, सब पोरके पदार्थों को प्रकाशित करता हुमा स्वयं प्रकाशित रहता है। एवं भगवान् घरेपय एकः स देवः) इसी प्रकार भजन सेधन तथा स्वीकार करने योग्य वह एक अद्वितीय जीव और माया भी जिस में कल्पित अभिन्न है ऐसा देव द्योतनशील परमात्मा भी सत् चित् प्रानन्दस्वरूपसे सव में प्रोतप्रोत हुआ अपर नीचे वीच में सब दिशानों को प्रकाशित करता हुमा सुशोभित हो रहा है तथा (योनिस्व. भावानधितिष्ठति ) अपने २ कार के स्वभावको धारण करने वाले पृथिव्यादि और देवतादि पदार्थों का अधिष्ठाता वनता है। भा०-जैसे सूर्य के प्रकाश की सहायता के विना किसी का कुछ काम नहीं चलता वैसे सत् चित् भानन्दस्वरूप से सव में ठहरा सब को भमण कराता हुआ ईश्वर सब संसारको नियनानुसार चलने का हेतु होने से सब का अधिष्ठाता होता है । भगवद्गीता में कहा है कि जैसे एक सूर्य इस सव त्रिलोकी को प्रकाशित करते हैं वैसे सब के घट २ में विद्या पञ्चमाध्यायः। १८३ मान ईश्वर सब शरीरो को चेतन करता है। और इस्ताम- लकस्तोत्र में कहा है कि जैसे अन्धकार को हटाकर सूर्य सब कर्मोंके निमित्त कारया है वैसे मन तथा चक्षुरादि इन्द्रियोको चेतनताका निमित्त कारण अन्तरात्मा ईश्वर है वही अहपद- वाच्य शरीरी है। वह आकाश के तुल्य सब उपाधियो से रहित है। ऐसा ही सूर्यवत् चेतन प्रकाश द्वारा सबका अधि ठाता ईश्वर है ॥४॥ यच्च स्वभावं पचति विश्व- योनिः पाच्यांश्च सर्वान परिणा- मयेद्यः । सर्वमेतद्विश्वमधितिष्ठ- त्येको गुणांश्च सर्वान् विनियो- जयेद्यः॥५॥ अ०-यो विश्वयोनिः सर्वस्य कार्यस्य प्रधानं कारणमीश्वरी यच्च स्वभावं वाय्वा- देर्गतिमत्त्वादिकं पचति साधयति । यच्च पाच्यान परिणतियोग्यान् पृथिव्यादीन् परि- णामयेत्परिणामयति यः सर्वान् सत्त्वरजस्त- मोरूपान्सभेदान् गुणांस्तत्रतत्रेन्द्रियादिषु यच्च विनियोजयेद्विनियोजयति तदेतत्स एकः सर्व विश्वमधितिष्ठति । सर्वस्य पचन विपरिणा- १८४ कृष्णापतुर्वेदीयश्वेताश्वतरोपनिषदि- मनं विनियोजनं च तस्य सर्वाधिष्ठातृत्वम्। यच्चेति क्रियाविशेषणमभ्युपगन्तव्यं सुधोभिः॥ भा०-लोकपि तस्यतस्याधिष्ठातृत्वं तत्रत्यैः कैरपि कर्मभिरेव यथा निष्पद्यतएव- मिह परमात्मवर्णनप्रसङ्गेऽप्यनगन्तव्यम् ॥५॥ भाषार्थः-(यो विषयोनिर्यञ्च स्वभावं पति ) जो सब कार्य बस्तुशों का मुख्य कारया ईश्मर वायु में गति अग्नि में उगाता आदि स्वभाष नाम प्राकृतिक गुणों को जो पफाता सिद्ध करता (पाच्यांश्च सर्वान् परिणामयेत् ) अपनी २ दशा बदलने परिपात होने योग्य पृथिव्यादि को उत्पत्ति प्रण- यादि में उस २ परिणाम दशा को को प्राप्त करता ( यः म. र्वान् गुणांश्च यद्विनियोजयेत् ) और जो ईश्वर अपने २ अवान्तर भेदों सहित सत्व रनस्तमोरूप सब गुणों को उन २ इन्द्रियादि में जो नियुक्त करता (एकः सर्वमेतद्विश्वमधि- तिष्ठति ) वह एक ईश्वर इस सब कार्य कारणरूप ब्रह्माण्ड का अध्यक्ष खामी इस प्रकार ठहरता है अर्थात् ( एतत् ) सब को पकाना सव का परिणाम करना और सब को सयमें युक्त करना यही उस का सर्वाधिष्ठाता होना है। मन्त्र में यत्पद क्रिया का विशेषण जागो। भा०-लोक में भी उस २ का अधिष्ठाता स२ सम्ब. न्धी किन्हीं कमों के द्वारा ही जैसे होता है वैसे यहा भी सबको पकाने भादिके द्वारा ईश्वर सर्वाधिष्ठाता होता है ॥५॥ तद्वेद गुह्योपनिषत्सु गूढं तद्- ब्रह्मा वेदते ब्रह्मयोनिम्। ये पूर्व 7 पञ्चमाध्यायः। देवा ऋषयश्च तद्विदुस्ते तन्मया अमृता वै बभूवुः ॥ ६॥ अ०-वेदानां गुह्याउपनिषदो वेदगुह्यो. पनिषदो वेदाशयं मूलमुपादाय याः प्रोक्ता- स्तासु वेदगुह्योपनिषत्सु तदात्मतत्त्वं गूढं संवृतं विशिष्टाभ्यासरूपान्वेषणेनोपलभ्यं, तदु ब्रह्मणो वेदस्य योनि कारणं वेदएव योनिः कारणं प्रमाणमस्य वा तादृशं ब्रह्मा विधाता हिरण्यगी सर्ववेदपारगश्चतुर्वेदविदेव वेदते ज्ञातुमर्हति । पूर्व पूर्वकाले ये रुद्रादयो देवा ऋषयश्च तद् ब्रह्मात्मतत्त्वं विदुस्ते तन्मया- स्तदात्मस्वरूपाः सन्तोऽमृता भरणादिजन्य- महादुःखान्मुक्ता वै मुक्ताएव बभूवुः । तथैवे- दानीमपि येतं जानन्ति ज्ञास्यन्ति वा तेऽपि तादृशा दुःखमुक्ता भवन्ति भविष्यन्ति च ॥ -येये जना यथायथा वेदाशयज्ञान- साधनेन परमात्मानं जानन्ति ते तथातथा तन्मया अमृताश्च भवन्ति तावदेव च ब्रह्म- त्वमपि तेपुतेषु भवत्येव ॥ ६ ॥ भावार्थ:-(बेदगुह्योपनिषत्सुतद्गूढम् ) वेदों का गुह्य 'गूढाशय मार्मिक सिद्धान्त प्रकाशित करने वाली उपनिषदोमें भा०- २४ कृष्णयजुर्वेदीयश्वेताश्वतरोपनिषदि- वह भात्मतत्त्र गूढ़ नाम गुप्त है अर्थात उपनिषदों का विशेष अभ्यास बार २ शोच विचार रूप मर्म खोजने माप्त हो सकता है ( तद् ब्रलयोनि ब्रह्मा वेदते ) ब्रह्म नाम वेद के उत्पादक प्रकाशक कारण वा वेद दी जिस की सिद्धि में कारणा नाम प्रमाण है.ऐसे उस ईश्वर को चारों वेद के ना. नने वाले वेद पारग सृष्टि कर्ता हिरण्यगर्भ नामी ब्रह्मा ही जान सकते हैं ( पूर्व ये देवा ऋषयश्च तद्विदुः ) पूर्व कालमें जिन २ इन्द्रादि देवताओं ने तथा ब्रह्मर्षि वा राजर्षियों ने ब्रह्म नामक भात्मतरव को जाना था इसी से (ते तन्मया अमृता वै बभूवुः ) वे लोग उसी ब्रह्म में लोग भरणादि सम्बन्धी वढे २ दुःखोंसे मुक्त ही हुए। इसी प्रकार इस समय भी जो लोग ईश्वर को जानते हैं वा जानेगे वे भी वैसे ही दुःखों से मुक्त होते हैं और होंगे। भाल-जो २ पुरुष जैसे २ वेदाशय रूप वेदान्त के जान रूप साधन से परमात्मा को जानते हैं वे वैसे २ तन्मय और मुक्त होते तथा उन २ में उतना ही ब्रह्मपन भी सदा बढ़ता जाता है ॥६॥ गुणान्वयो यः फलकर्मकर्ता कृतस्य तस्यैव स चोपभोक्ता । स विश्वरूपस्त्रिगुणस्त्रिवा प्राणा- धिपः सञ्चरति स्वकर्मभिः ॥ ७॥ अ०-अधुना द्वादशपर्यन्तैः षड्भिमन्त्रै- स्त्वं पदार्थस्य जीवभावापन्नस्य वर्णनं प्रस्तू- पञ्चमाध्याय । १८७ यते । गुणः कर्मज्ञानकृतवासनामयैः सत्त्वा- दिगुणकार्यैरिन्द्रियैर्वाऽन्वयः सम्बन्धो यस्य यथा चक्षुषा पश्यति श्रोत्रेण शृणोती- त्यादिः । फललाभेच्छया कर्मणां कर्ता तस्यैव स्वयंकृतस्य फलार्थस्य संचितस्य क- र्मणो भोगोन्मुखस्योपभोक्ता स विश्वरूपो नानायोनिषु नानारूपधरः सुखदुःखमोहात्म- कगुणत्रयेण सम्बद्धस्त्रिवा धर्माधर्मज्ञान- जन्या देवयानादयस्त्रयो मार्गभेदा अस्येति पञ्चवृत्तिकस्य प्राणस्याधिपश्चैवं भूतो जी- वात्मा स्वकृतकर्मभिरेव देहादेहान्तरं सञ्च- रति गच्छति ॥ भा०-अत्र पद्यषटकेन जीवस्य स्वरूप- स्वभावादिकं स्पष्टतया वर्ण्यते । अविद्योपा- धिर्जीवइति वेदान्तसिद्धान्तः, अविद्याजन्य- कामकर्मादयो जीवस्य गुणान्वयत्वादौ कारणं बोध्यनतएव गुणान्वयत्वादेर्वैपरीत्यं च पर- मात्मन्यदेवावगन्तव्यम् । तादृशजीवस्य स्वीयवास्तवस्वरूपपरमात्मवोधेन सर्वबन्ध- नेभ्यो विमुक्तिं वक्ष्यति ॥ ७ ॥ ,
कृष्णयजुर्वेदीयश्वेताश्वतरोपनिषदि-
भाषार्थ -अब यहा से १२ पर्यन्त छ मन्त्री से जीव
रूप हुए त्व पदके अर्थ आत्मा के बर्णन का प्रस्ताव करते
है । ( यो गुणान्वयः फलकर्मकर्ता ) जो कर्म के जानने की
बासना रूप गुणो से घा सत्वादि गुणो को कार्य इन्द्रियो से
सम्बन्ध रखने वाला [जैसे भाख से देखना कान से सुनना
मादि काम है ] तथा फला भोग मिलने की इच्छा से कर्म
करने वाला (कृतस्य तस्यैव स चोपभोका) स्वय पाल मिलने
अर्थ किये उसी सचित कर्म के प्रारब्धरूप सुख दुख फल का
भोगने वाला ( स विश्वरूपत्रिगुणास्त्रिवर्ना ) वह नानाम-
कार की योनियो में नाना प्रकार के रूप धारण करता, सुख
दुख और मोह रूप सत्त्वादि तीनी गुणसे बन्धा, तथा ज्ञान
पूर्वक किये यागादि पर्म से देवमार्ग, केवल धर्म से पित्यान
तथा अधर्म से तिर्यगादि योनि मार्ग थे ज्ञानादि के सम्बन्धी
उत्तम मध्यम निकृष्ट तीनो मार्ग मिस के जाने माने के
लिये है ( प्राणाधिप, सुपरति स्वकर्ममि.) तथा पाच भेदो
वाले मारा झा खामी ऐसा जीवात्मा अपने किये कर्मों को
द्वारा ही एका पारीर छोहको शरीरान्तर को जाता ब्रह्मचक्रमे
निरन्तर घूमता है।
भा०-सारण में प्रलोको द्वारा जीव के
रवरूप तथा स्वाभावादि का स्पष्टनया घर्शन करते
है । वेदान्त का सिद्धान्त यह है कि भविद्योपाधि लीव है,
अविद्या ज्ञान से प्रकट होने पाले काग कर्मादि जीव नाम
सूक्ष्म शरीरी साया युक्त भात्ना दो गुणो से बद्ध होने में
शारण गानो, इसी कारण जीव को गुणान्धित कहने से
गुणान्वयादि से विपरीतता परमात्मा में अर्धापत्ति द्वारा
सिद्ध है। ऐसे जीव की अपने पारतविक स्वरूप परमात्मा के
दोध द्वारा सब दुख बन्धनो से मुक्ति कहेगे ॥ ७ ॥
१८९ पञ्चमाध्यायः। अङ्गुष्ठमात्री रवितुल्यरूपः संकल्पाहङ्कारसमन्वितो यः । बुद्ध र्गुणेनात्मगुणेन चैव-आराग्रमा- त्रोऽप्यपरोऽपि दृष्टः ॥८॥ अ०-योऽङ्गुष्ठमात्रपरिमितहृदेशेऽवस्थितो रवितुल्यरूपो ज्योतिःस्वरूपः संकल्पाहवारस- मन्वितः सङ्कल्पैरहवारेण बुद्धेर्गुणेन सुखदुः- खादिभोगरूपेणात्मगुणेन शरीरगुणेन जराम- रणादिना समन्वितश्चैवाराग्रमात्रः प्रतोद- प्रोतलाहशल्यानभागमात्रसूक्ष्मपरिमाणोऽप- रोऽपि जीवः सूक्ष्मदर्शिभिदृष्टः साक्षात्कृतो भवति द्वितीयोऽपिशब्दोऽत्र सम्भावनार्थ तेना- परोऽपि जले सूर्यप्रतिबिम्बवदन्यऔपाधि- कोऽपि जीवात्मा सम्भावितस्तत्त्वरित्यर्थः ।। भा०-अगुष्ठमात्रपरिमाणं सङ्कल्पादिभिः समन्वयः स्थूलसूक्ष्मशरीरगुणेन सयोगश्चैत- त्सर्वं स्थूलसूक्ष्मशरीरोपाधिकृतमौपाधिकम- स्ति । उपाधिना सहैव मोक्षे निवर्तते रवि- तुल्यप्रकाशात्मकत्वं स्वाभाविकं नैव निवर्तते। यदास्य संकल्पादयो निवन्ते तदा दुःखा- कृष्णयजुर्वेदीयश्वेताश्वतरोपनिषदि- न्मुच्यते निःश्रेयसमधिगच्छति । “यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि श्रिताः । अथ मोऽमृतो भवति,, संकल्पादीनां प्राबल्यमेव ब्रह्मचक्रेऽवस्थाप्य भ्रामयति । तरमात्सकल्पा- दिसमन्वितत्वप्रदर्शनं तच्छिथिलीभावे मुक्ति- प्रदर्शनार्थम् ॥ ८॥ भाषार्थ - ( योऽडगुष्ठमात्री रवितुल्वरूप ) जो अगूठा बराबर हृदयस्थान में रहता तथा सूर्य के तुल्य प्रकाश स्वरूप ( सकल्पाहङ्कारसमन्वितो बुदुर्गुणोनात्मगुखेम चैव) वस्तुप्रो को प्राप्ति वा कार्यों की सिद्धि के संकल्प नाम कामनानी से नहङ्कारों से सुख दुःख भोगरूप बुद्धि के गुण से [ भागो बुद्धि सुख दुःखादि की प्रतीति का नाम ही बुद्धि वही भोग है यह वात्स्यायन का मत है और भात्मा नाम शरीर के जरा मरयादि गुणसे समन्वित सम्पद रहने वाला (भारा अमात्राऽप्यपरोपि दृष्ट ) बैल प्रादि को हाकने के पैगा या कोठा भादि मे लगी भारा नाम लोहको परई के सूदमतर भप्रभाग के समान अतिसूक्ष्म जीवात्मा को सूक्ष्म दशियो ने साक्षात् देखा वा गाना है इस मन्त्र मे द्वितीय प्रपिशब्द सम्भावना अर्थ में है इससे जल में सूर्य प्रतिविम्ब के तुल्य सूक्ष्म स्थून शरीरोपाधि से अवच्छिन्न जीवात्मायी सभावना तत्वज्ञो ने की है। भा०-अङ्गुष्ठमात्र परिमाण, संकल्पादि से युक्त होना, और स्थून सूक्ष्म शरीर के गुण के साथ सयोग दिखाना यह सब स्थूल सूक्ष्म शरीरोपाधिसे हुआ औपाधिक है। इसी कारणा मोक्ष में उपाधिके साथ ही मायामें लीन हो जाता है पञ्चमाध्याय परन्तु सूर्यवत् प्रकाश स्वरूप होना मात्माका स्वाभाविकपन निवृत्त नही होता जब इसके संकल्पादि निवृत्त हो जाते तब दुःखों से छूटता और मुक्ति को प्राप्त होता है । (यदा सर्वे) इत्यादि कथम द्वारा यही बात कठोपनिषद् मे स्पष्ट कही है कि गब हदय में ठहरी हुई कामना छूटती है तभी मुक्त हो सकता है। संकल्पादि की प्रबलता ही ब्रह्म चक्र में घर के मनुष्य को भमा रही है। इस से सकल्पादि सम्बन्ध दिखाना उस के शिथिल होने पर मुक्ति होना दिखाने वा जताने के लिये है॥८॥ वालाग्रशतभागस्य शतधा- कल्पितस्य च । भागो जीवः स विज्ञेयःसचानन्त्यायकल्प्यते॥ अ०-शतधाछिद्यमानस्य वालाग्रभागस्य य एको भागस्तस्यापि शतधाकल्पितस्य यो भागस्तावत्परिमितो लिङ्गोपाधि वी विज्ञेयः सच जीवः स्वीयवास्तविकस्वरूपेण आनन्त्या- यानन्तभावाय नास्त्यन्तोऽस्य तादृशमोक्षभा- याय कल्प्यते ज्ञानयज्ञादिना समर्थः क्रियते॥ भा०-एतेनातिसूक्ष्मत्वं जीवात्मन उ- च्यते । नच त्रसरेणुपरिमितस्य वालाग्रभा- गस्य दशसहस्त्राणि भागाः केनापि कल्पयितुं शक्यास्तस्माच्छब्दार्थप्राधान्यं विहाय वाक्या- कृष्णयजुर्वेदी यश्वेताश्वतरोपनिषदि- शयएव वक्तुरिष्ट । य इम मध्नद वेद आ- मान जीवमन्तिकात् । ईशानं भूतभव्यस्य न ततो विजुगुप्सते । एतद्वैतत् ॥ इति कठो- पनिषद्युक्तत्वात्परमात्मैव जीवरय वास्तव स्वरूपमस्ति, अनत्यमतिसूक्ष्मपरिमाणकथन तु लिङ्क शरीरोपाधिकृत बोध्यम् ॥ ६ ॥ भाषार्थ -(वालाग्रशतभागस्य शतधा कल्पितस्य च ) बालके अग्रभाग के सौ टुकह करने पर हुआ जो एक भाग उस के भी फिर सौभाग करने पर जो एक भाग (भागो जीव स विज्ञेय ) उत्तो परिम ण वाला लिग शरीपाधि वाले जीव को मानो ( स चानन्याय फलप्यते ) वह जीव अपने वास्तविक स्वरूप से जिस का अन्त नाम नाश नहीं ऐसे मोक्ष को प्राप्त होने के लिये ज्ञानयज्ञादि द्वारा समर्थ किया जाता वा होता है भा०-इस कथा से जीवात्मा का अति सूक्ष्म होना कहा है। किन्तु त्रसरेणु के तुल्य परिमाण वाले वाल के प्रश्न भाग के दश हजार दुकडे हो समाना सम्भव नही । इसलिये यहा शब्दार्थ की प्रधानता लेना वक्ता को रट नही किन्तु वाक्य का भाशय लेना मात्र नभीष्ट वा उचित है कठोपनि. द् ४ बल्ली में कहा है कि कर्म फन भोक्ता जीवात्मा को जो मनुष्य भूत भविष्य के स्वामी परमेश्वर के साथ अभिन्न जानता है तभी मोक्ष रूप निर्भय दशा को प्राप्त होता है, पस से सिद्ध है कि जीवात्माका वास्तव स्वरूप परमेश्वर ही है। और यहा कहा अति सूक्ष्म परिमाण लिग शरीरोपाधि कृत जानो। ।
पञ्चमाऽध्यायः। नैव स्त्री न पुमानेष न चैवायं नपुंसकः । यच्छरीरमादत्ते तेन तेन स युज्यते ॥ १०॥ अ०-एष जीवात्मा ब्रह्मात्मस्वभाव- त्वात्स्वरूपतो नैव स्त्री नैष पुमान नचैवायं नपुंसकोऽपितु यद्यत्स्त्रीत्वादिसंबद्धं शरीरमा- दत्ते तेन तेन स्त्रीत्वादिना स जीवो युज्यते प्रयुज्यते लोके कन्येयं जाता पुत्रो जातो वेति । अर्थात्तत्तदुर्मानात्मन्यध्यस्याभिमन्यते--सुरू- पोऽहं कुरूपोऽहमहं पुमानहं स्त्री नपुंसकोऽ- हमित्यादि । भा०-जीवात्मनि स्त्रीत्वादेः किमपि चिह्न खतो नास्ति । अपि तु शरीरएव ली. त्वादिचिहानि स्फुटमुपलभ्यन्ते । एवं च पितापुत्रादयः सम्बन्धा अपि शरीरसंयोगा- देवात्मनि व्यवह्रियन्ते । अविद्याग्रस्तैरेवा- स्माभिः शरीरधर्मा जीवात्मनि शुद्धेऽपि यो- ज्यन्ते । तदेव दुःखस्य प्रधानं. कारणम् । तत्त्वज्ञानोदये मिथ्याज्ञानापाये च पुंदेहधा- रिणा स्त्रीशरीरधारिणा वा प्रत्यगात्मविचार- । - २५ कृष्णयजुर्वेदीयश्वेताश्वतरोपनिषदि- रतन जीवेन स्त्रीत्वादिरहितं शुद्धं ब्रह्मात्मक नित्यमखण्डैकरसं सर्वशक्तिमदाप्तकाममान- न्दमयं स्वख्य रूपं बुद्ध्वा नानादुःखरहितेन सुखिना भूयते ॥ १० ॥ भाषार्थः-( नैव स्त्री न पुमानेष नचैवायं नपुं सकः) यह चक्षु आदि से देखना आदि कर्म करने द्वारा प्रत्यक्ष प्रतीत होता जीवात्मा साक्षात् ब्रह्मस्वभाव वाला होने रूप से न स्त्री न पुरुष और न नपुंसक है किन्तु ( यद्यच्छरीरमादत्त तेनतेन स युज्यते ) खोपन आदि गुण वा चिन्होसे सम्बन्ध रखने वाले जिस २ शरीरको कर्मानुसार धारण करता है उस र स्त्रीपन आदि के साथ वह जीव लोक में प्रयोग किया जाता है कि यह कन्या हुई, पुत्र हुआ वा नपुंसक [हिजडा] हुमा अर्थात् उस २ स्त्री प्रादि शरीरके धर्मों को अपने में आरोपित करके अभिमान करता है कि मैं रूपवान् कुरूप, स्त्री, पुरुष वा नपुंसक हूं इत्यादि देहात्मवादरूप स्था अज्ञान कहाता है। भाo-जीवात्मा में स्त्रीपन आदि का कोई चिन्ह स्वयं नहीं है किन्तु स्त्रीपन वा पुरुषपन आदि के चिहू इस शरीर मे ही स्पष्ट दीखते हैं। इसी प्रकार पिता पुत्रादि के सम्बन्ध [नाते रिश्ते ] भी शरीर के संयोग से ही प्रात्मा में कहे जाते हैं । अविद्या में फंसे हुये ही हम लोग स्वय शुद्ध भी जीवात्मा में शरीर के गुणों वा धर्मों को लगाते वा मानते हैं यही मुख्य दुःख का कारण है। और जब तत्वज्ञानरूप विद्यासूर्यका उदय होनेसे मियाज्ञानका नाश होने पर भीतरी अध्यात्म विधार, तत्पर पुरुष देहधारी वा स्त्री देहधारी जीवास्मा स्त्रीपन आदि से रहित अपने को शुद्ध ब्रह्मवरूप पञ्चमाध्यायः। नित्य,प्रखण्ड, एकरस, सर्वशक्तिमान् सब कामनाओं को प्राप्त, श्रानन्दस्वरूप जान पाता है तभी नाना प्रकारके अपार र दुःखो से रहित हुना सुखी हो जाता है ॥१०॥ संकल्पनस्पर्शनदृष्टिमोहा- साम्बुवृष्टयात्मविवद्धजन्म। कर्मा- नुगान्यनुक्रमेण देही स्थानेषु सूपाण्यभिसम्प्रपद्यते ॥ ११ ॥ अ०-केन निमित्तेन जीवः शरीराण्यद- त्तइत्युच्यते--यथा--ग्रासाम्बुनोरनजलयोर्व- ष्टया मुखद्वाराऽन्तरासेचनेन निगलनेनात्मनः शरीरस्य क्रमशो रसरुधिरादिक्रमेणैव विवृद्ध- जन्म वृद्धिः प्रत्यक्षं जायते। तथैव पूर्वोपा- त्तदेहपातावसरे देहो जीवः सज्जितकर्मजन्यः सूक्ष्मैः संकल्पनस्पर्शनदृष्ठिमोहैः स्थानेषु मनु- प्यादियोनिषु कर्मानुगानि कर्मानुसारोणि रूपाणि मनुष्याकृत्यादिसम्बद्वानि शरीराण्य- नुक्रमेण-अभिसम्प्रपद्यतेऽभितः सम्यक् प्रा- नोति । सर्वत्रैवायं जीवः पूर्व संकल्पयत्ति प्रत्यभिज्ञादिना कामयते तदनन्तरमिन्द्रिया- र्थसंनिकर्षण स्पृशत्ति ज्ञानेन्द्रियैर्विषयमनुभ- ..
कृष्णयजुर्वेदीयश्वेताश्वतरोपनिषदि- वति स्पर्शनपदमत्रोपलक्षणार्थ तदनन्तरं प- श्यति जानाति सुखानुशयिना रागेण रज्यते इशिरत्र ज्ञानार्थः । तदनन्तरं च विषयं भोक्तुं प्रवर्तते तदासक्तो मुह्यति ॥ भाo-जीवः कर्मानुकूलानि मनुष्यादिश- रीराण्यादत्त यथा कस्यचिज्जीवस्य मानुष- देहेनोपार्जितं बहुविधं नानायोनिषु गमनहे- तुकं प्रबलं कर्म तत्रापि यत्कर्म तेष्वाधिक्येन प्रबलं तस्य फलं यत्र भोक्तुं युज्यते तादृश- जाती तादज्जायते तदनन्तरं च यादृशकर्म- फलभोगपर्यायस्तादृशजातौ स जायते । तथा च द्वादशे मनुनोक्तं संगच्छले-"श्वसूकरखरो- ष्ट्राणां गोजाविमृगपक्षिणाम् । चण्डालपुक्क- सानां च ब्रह्महा योनिमृच्छति,, ॥ ११ ॥ भाषार्थः-किस कारण मनुष्यादिस्य जीव शरीरोंको धारण करता है सो कहते हैं ( ग्रासाम्बुकृष्टयात्मविवृद्धजन्म ) जैसे मन जल खानेसे रस रुधिरादि बनने द्वारा क्रमशः शरीरकी प्रत्यन वृद्धि होती है। वैसेही पहिले धारण किये शरीर के छूटने के समय ( देही संकल्पगस्पर्शनदृष्टिगोहैः ) जीवात्मा संचित्त कामों से होने वाले सूक्ष्म कामना, इन्द्रियों की प्रवृत्ति, साक्षात् बोध वा दृष्टिपात और मोह नाम उस २ शरीरादि में शासक्ति फंसजागा तथा अपने को भूलगागा इन सबों के
पञ्चमाध्यायः।
द्वारा ( स्थानेष कर्मानुगानि रूपाणि 1-अनुक्रमेणाभिसम्प्र-
पद्यते ) मनुष्यादि योनियों के शरीर रूप स्थानों में मनुष्याद्या-
कृतियों वा भिन्न २ व्यक्तियों से सम्बन्ध रखने वाले भिन्न २
रूपों को कर्मों के क्रमानुसार सम्यक् प्राप्त होता है। यह
जोधात्मा सभी कामों में सर्वन ही प्रथम प्रत्यभिज्ञादि द्वारा
संकल्प करता, तदनन्तर इन्द्रिय और विषयके संयोगसे स्पर्श
कारता अर्थात् ज्ञानेन्द्रियों से विषय का अनुभव करता है।
स्पर्शनके सब शरीर में व्याप्त होनेसे उपलक्षणार्थ ग्रहण है।
तदनन्तर देखता जानता नाम सुखानुशयी राग से रंग नाता
है तिस पीछे विषय को भोगने में प्रवृत्त होता उस में लिस
हुना सब भून जाता यही मोह है।
भाः-जीवात्मा कर्मानुकूल मनुष्यादि शरीरों को घारग
करता है। जैसे किसी जीव के मनुष्य देह से संचित किये
नागा योनियों में जन्म लेने के हेतु बहुत प्रकार प्रवगा कर्म हैं
उन में भी जो अधिकता से प्रबल कर्म होता उसका फल नहीं
भोगना उचित है वैसी नाति में प्रथम जन्म लेता और उसके
अनन्तर जैसे कर्म फल भोगकी पारी होती वैषी जाति में
वह जन्म लेता है। इसी के अनुसार १२ वारहवें अध्याय में
मनु जीका कहना ठीक घटता है कि 'कुत्ता नभर गधा, जंट
गौ, बकरी, भंड़, मृग, पक्षी तथा धानुक भली प्रादि योनियों
में ब्रह्महत्या करने वाला जीव क्रमशः जन्म लेता है ॥ ११ ॥
स्थूलानि सूक्ष्माणि बहूनि
चैव रूपाणि देहीस्वगुणैर्वणोति।
क्रियागुणैरात्मगुणैश्च तेषां संयो-
गहेतुरपरोऽपि दृष्टः ॥ १२ ॥
१८ कृष्णयजुर्वेदायश्वेताश्वतरोपनिषदि- अ०-देही जीवः स्वगुणैः स्वकृतकर्मजन्य संचितसंस्कारैरेव तदनुकूलानि स्थूलानि सू- क्ष्माणि च बहूनि रूपाणि मानुषादिनाना- रूपाणि शरीराणि वृणोति स्वीकरोत्यादत्त । तत्तत्क्रियागुणैः पूर्वकृतकर्मगुणैरात्मगुणैभौति- कशरीरगुणेश्च सम्बद्धस्तेषां रूपाणां संयोगस्य हेतुः कारणमपरोऽपि परमात्मतो भिन्नोऽपि सांसारिको जननमरणादिमानौपाधिको जीवो दृष्टः सूक्ष्मदर्शिभिः साक्षात्कृतः । अर्थात्पर- एवात्मा मुख्यतया प्रेरकत्वेन प्रधानः संयो- गहेतुस्तत्वज्ञैरनुभूयतेऽपरस्त्वौपाधिक्रभेदेन दृ. श्यते ॥ भा०-स्थूलानीत्यादिना पूर्वस्यैव स्पष्टा- र्थोऽनुवादः । जीवः शरीरेण संयुज्यते कर्मा- नुकूलानि शरीराणि स्वीकरोति यद्यपीशापे- क्षया जीवः परतन्त्रः स तनियमबद्ध एष कर्मानुगानि निरयादिरूपशरीराण्यादत्त त. थापि जीवः संयोगहेतुर्भवति जीवमन्तरेण को जायेत ?, यो जायते स एव जीव इति लक्षणं च निस्सरति शुद्धः परमेश्वरो'लोक- चेष्टानिमित्तसूर्यडवेच्छादिरहितः प्रयोजकः पञ्चमाध्यायः। कारयिता पापपुण्ययोरस्ति । अन्तःकरणापा- ध्यवच्छिन्नश्चिदाभासमात्रो जीवः कर्ताऽस्ति। अतएव शरीरसंयोगहेतुत्वमुभयोरपि मन्त- व्यम् ॥ १२॥ भाषार्थ:-( देही सगुणेरेव बहूनि स्थूलानि सूक्ष्माणि च रूपाणि वृणीति ) जीवात्मा अपने किये कर्मों से संचित होंग वाले संस्काररूप संचित कर्मों के द्वारा ही मनुष्यादि सम्बन्धी नाना प्रकारके रूपों वाले स्थान सुक्ष्म अनेक शरीरों को धारण करता है ( क्रियागुणेरात्मगुयोश्च तेषां संयोगहेतु रपरोऽपि दृष्टः) और पूर्वकृत उन २ संचित कर्मों के गुणों नाम सस्कारो से और भौतिक शरीर सम्बन्धी जातीय गुणों से संयुक्त हुना, उन २ स्थूल सूक्ष्मशरीररूपों के संयोग का हेतु नाम कारण परमात्मा से भिन्न जीवात्मा भी सूक्ष्मद- र्शियों ने माक्षात् किया इस देह में विद्यमान है अर्थात् चु म्बकवत् प्रेरक होने से परमात्मा ही मुख्य कर शरीर धारणादि प्रकृति सयोग का प्रधान हेतु विद्वानोंने नाना माना है तथा अपर नाम जीवात्मा तो स्थूल सूक्ष्म शरीरोपाधियोंके कारण भिन्न प्रतीत होने वाला सयोग का गौण हेतु है। भा० स्यूनानि-श्रादि कथन से पूर्व कहे अंश को ही स्पष्टार्थ अनुवाद है । जीव शरीरो से सयुक्त होता कर्मानुः सार शरीरों को धारण करता है । और यद्यपि ईश्वर की अपेक्षा जीव परतन्त्र है वह उस के नियम में बन्धा हुभा ही कर्मानुसार नरकादि भोगरूप शरीरों को धारण करता है तथापि शरोर के साथ संयोग होने का हेतु जीव भी अवश्य है। मनुष्यादि प्राणियों की चेष्टा के निमित्त सूर्यनारायण ।
२०० कृष्णयजुर्वेदीयपनेताश्वतरोपनिषदि- के तुल्य इच्छादि रहित सदा शुद्ध निविकार परमेश्वर पाप- पुख्य करने और उनके फल भोगने मे साक्षीमात्र प्रयोजक कर्ता है। और अन्त कारणोपाधिसे पृथक् प्रतीत होने वाला चिदामासनान जीव प्रयोज्य कर्ता है। इसी कारण शरीरसं योग के तथा यार्थी के हेतु दोनों को मानना चाहिये ॥ १२ ॥ अनाद्यनन्तं कलिलस्य मध्ये विश्वस्य स्वष्टारमनेकरूपम् । विश्वस्यक परिवेष्टितारं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः ॥ १३ ॥ अ०-कलिलस्य गहनस्य परिवर्तनशी- लस्य संसारस्य मध्येऽनाद्यनन्तं सदैकरसम- परिवर्तनशीलं विश्वस्य सर्वस्य स्रष्टारमनेक- रूपं तस्मिंस्तस्मिन् मायात्मके वस्तुनि तत्त- दुरूपेणैव व्याप्तं विश्वस्यापरिमितस्यापि स- वस्य ब्रह्माण्डस्यैकमेव परिवेष्टितारं स्वात्मना सर्वतो व्याप्यावस्थितं देवं स्वरयैव वास्तवं स्वरूपं परेशं ज्ञात्वा प्राणी सर्वपाशैर्बन्धन- दुखैर्मुच्यते ॥ भा०–स सप्तमादिमन्त्रैः प्रतिपादिन आत्मा स्वयं शुद्धोऽपि कल्पिताऽविद्याज- न्यकामकर्मफलरागादिगुरुभारैराक्रान्तो दुःख- २०१ पञ्चमाध्यायः। सागरनिमनो देहेऽहम्भावमापन्नो वासना- बटुः प्रेततिर्यङ्मनुष्यादियोनिषु जीवभावं प्राप्तः कदाचित्पुण्यवशादीश्वरार्थनिष्कामक- र्मानुष्ठानेन वीतरागादिमलो ब्रह्मात्मज्ञानेनो- त्पन्न हामुत्रार्थफलभोगविरागः शमादिसाध- नचतुष्टयसम्पत्तस्तं स्वीयं वास्तवस्त्ररूपमा- त्मानं तत्त्वतो ज्ञात्वा विमुच्यते ॥ १३ ॥ भाषार्थ:-( कलिलस्य मध्यग्नाद्यनन्तम् ) एक दशा में न रहने वाले परिवर्तनशील अगाध वा असीम संसारममुद्र के बीच, जहा कोई भी एकसा नही रहता वहा अनादि अनन्त एकरस अपनी दशा न बदलनेके स्वभाव वाले (विश्वस्य स्रष्टा रमनेकरूपम् ) सब नगर के रचने वाले उस २ गायात्मक पदार्थ नाम वस्तुमात्रमें उसो २ के रूप से व्याप्त ( विश्वस्यक परिवे. ष्टितारम् ) अपने स्वरूप से सब ब्रह्मारह-को सव ओर व्याप्त होके अवस्थित एकही सबको अपने भीतर रखने वाले (देय मात्या सर्वपाशेर्मुध्यते )प्रपर्नेही वास्तविक स्वरूप देव ईश्वर को जानकर प्राणी सब दुखमन्धनो से छूट जाता है। गा-सप्तमादि गत मन्त्रो में जीत्र रूप से कहा वा मात्मा स्वयं शुद्ध होने पर भी कल्पित मविद्या के कारण प्रकट होने वाले काम और कर्म के फल तथा रोगादि रूप भनेक बोझो से दबा हुआ दुःखेसागर में गोता खासा शरीर को हम मानता वासना बन्धनों से बंधा प्रेत पश्यादि और मनुष्यादि शरीरो मे जीव भाव को प्राप्त हुआ कभी पुग्यो दय होने पर ईश्वरार्पण निष्काम कर्म के अनुष्ठान दि मलिनता निवृत्त होने पर भात्मज्ञान ऐहिक तथा २६ से रागा.
२०२
कृष्णयजुर्वेदीयश्वेताश्वतरोपनिषदि-
स्वर्गीय सुख भोग का लालच छूट जाने पर शमादि साधनो
युक्त हुआ अपने वास्तविक मारम स्वरूप को जान कर
मुक्त हो जाता है ॥ १३ ॥
भावग्राधमनीडाख्यं भावा-
भावकरं शिवम् । कलासर्गकरं
देवं ये विदुस्ते जहुस्तनुम् ॥१४॥
अ-भावेन सत्तयैव ग्राह्य [ अस्तीत्ये-
वोपलब्धव्यइति कठे] यस्य सत्तयैव सर्व
सत्तात्मकमुपलभ्यते तस्यैव परा निरतिशया
सत्तेति ग्राह्यम, यद्वा भावेन विशुद्धान्तःक-
रणेन गृह्यते यस्तम् । नीडो निवासस्थान
गृहदेहादिकं तद्गहितं, भावः स्थूलः सोऽ-
भावी लयस्तयोः कारं शिवं कल्याणमयं
तनिष्ठाः कल्याणमेव लभन्ते, कलानां प्राणा-
दिषोडशमुण्डकोपनिषदुक्तानां सर्गकरंतादृशं
देवं दीप्यमानं परेशं ये स्वात्मत्वेन विदुर्जा-
नन्ति ते तनुं शरीरं जहति त्यक्त्वा च वि.
देहमुक्ता अपि भवन्त्येव ॥
भा०-सर्वत्रैवास्तीति मत्वा यः सर्वदा
न तं विस्मरति तस्य गुणान् कर्माणि च
सर्वदा ध्यायति सएव तं ज्ञातुमर्हति ॥१४॥
पञ्चमाध्यायः। २०३ भाषार्थ:-(भावग्राह्यममीडास्यम् ) जिसकी सत्ता से की सब सत्तारूप दीखता है उसी की सत्ता सर्वोपरि गिरतिशय अविनाशिनी है इस कारण ईश्वर है क्योंकि उस के बिना किसीको अस्ति-है ऐसानहीं माद सलते इससे भो सदा है वह ईश्वर भाव नाम सत्तासे ही ग्राह्य है अथवा भाव नाम विशुद्धान्तः करब से ग्रहण करने योग्य है तथा नीड़ गाम घर वा शरीरादि कोई जिस का निवासस्थान नहीं (भावाभावकरं शिवम् ) स्थूल सृष्टि और प्रलय करने वाला कल्याणस्वरूप जिस का शरण लेने वाले सभी करपाण को ही प्राप्त होते हैं (कलासकर देवं ये विदुस्ते बहुस्त नुम् ) तथा प्रांगादि सोलह कला नाम मुरहकोपनिषद् में कहे सृष्टि के भागों नाम भगों को रखने याला ऐसे देव नाम परमात्माको जो लोग अपना वास्तविक स्वरूप जानते हैं वे शरीररूप बाधनको छोड़ देते और विदेश मुक्त भी हो ही जाते है। भा०-सर्वत्रही है इस प्रकार मानकर सय कालमें उत्तको जो नहीं भूलता, खाते पीते चलते फिरते बैठते उठते सब दशा वा स्थानों में उसी की महिमाले संसारको व्यवस्था चलती है ऐसा देखता विचारता शोचता है उसके गुपा काँ ध्यान करता है वही उस को जाग सकता है ॥ १४ ॥ इति ब्राह्मणसर्वस्वमासिकपत्रसम्पादकेन भीमसेनशर्मणा निर्मिते कृष्णयजु- वैदीयश्वेताश्वतरोपनिषदभाष्ये पञ्चमोऽध्यायः समाप्तः ॥ का सहा 1 अथ षष्ठाऽध्यायारम्भः॥ तु स्वभावमेके कवयो वदन्ति कालं तथान्ये परिमुह्यमानाः। देवस्यैष महिमा लोके येनेदं भ्राम्यते ब्रह्मचक्रम् ॥१॥ अ०-एके केचिल्लोके विद्वत्त्वेन विदिताः परीक्षकामासाः कवयो विद्वांसः स्वभावमेव कारणं वदन्ति तथाऽन्ये वेदमर्माजानानाः परितो मुह्यमानाः कालं कारणं वदन्ति । देवस्येश्वरस्य महिमा तु महत्त्वमेव सर्वस्य कारणमिति तु लोके वेदमर्मावलोकने ज्ञानो- दये निष्पद्यते येन महिम्नेदं ब्रह्मचक्रमनि- शमविरतं भ्राम्यते ॥ भा०-कालस्वभावो निर्यातर्यदृच्छेत्यादि यदुक्त प्रथमाध्याये तदुपलक्षणार्थमत्र काल- स्वभावयोर्ग्रहणम् । कालः प्रजा असृजत कालो अग्रे प्रजापतिम् । अथर्ववेदे । इत्या- दीनि वेदशास्त्रवाक्यानि दृष्ट्वा सापेक्षनिर. पेक्षतया शास्त्रव्यवस्थामबुद्ध्वा च केचित्प- २०५ षष्ठाऽध्यायः। ण्डितम्मन्याः कालादीनि कारणानि वदन्ति। तदिदमज्ञानम् । यतएकएव भूतभविष्यका- लकारणानां सूर्यादीनामपि कारणं निरति- शयमिति बहुत्र वेदादिषु सूचितम् । यद्यपि कालादीनि गौणानि सापेक्षाणि कारणानि भवन्ति तथापि निरपेक्षप्रधानकारणापेक्षया तेषामकारणत्वमवगन्तव्यं यद्वा कालः प्रजा असृजतेत्यादिवाक्येषु कालात्मकः प्रजापतिः परमेश्वरएव कालादिपदवाच्योऽभिप्रेतइति युक्तम् ॥१॥ भाषार्थ:-(एके स्वभाव तथान्ये परिमुयमानाः कवयः काल वदन्ति ) लोक में विद्वानपनसे प्रसिद्ध कोई परीक्षका. भास लोग स्वभाव को तथा वेद के मर्म को न जानते हुए सच ओर से परिडताई के अहंकाररूप मोह अन्धकार में फसे अपनेको पण्डित मानने वाले काल को कारण कहते या मानते है ( लोके देवस्यैष महिमा तु ) परन्तु वेद का मर्म बोध रूप ज्ञानोदय होने पर तो उस परमात्मा की महिमा महत्व सष का कारण है यह सिद्ध हो जाता है (येनेद ब्रह्मचक्रं भ्राम्यते) जिस महिमा नाम अचिन्त्य भगन्त माश्चर्यरूप शक्ति से यह ब्रह्मचक्र प्रत्येक समय निरन्तर भ्रमाया जाता है। भा०-( कालः स्वभावो०) इत्यादि जो प्रथमाध्यायके भारम्भ में कहा है उस के उपलक्षणार्थ यहां काल और स्वभाव का ग्रहण है "काल प्रजा को रचता और काल ने २०६ कृष्णायजुर्वेदीयश्वेताश्वतरोपनियदि- ही पहिले प्रजापति को नत्पन्न किया, यह अथर्ववेद में कहा है। वेद शास्त्र के इत्यादि बचनों को देख के और सापेक्ष निरपेक्ष रूप से शास्त्र की व्यवस्था को न जानकर अपने को परिहत मागने वाले पसिहताभास कोई लोग बालादिकों को सन्न का कारण कहते हैं सो यह उन का मज्ञान है । क्योकि वह ईश्वर भूत भविष्यत् काल के कारण सूर्यादि का भी निरतिशय निरपेक्ष कारण है यह बात वेदा. दिशास्त्रों के अनेक स्थानों में सूचित की गयी है। यद्यपि अथर्ववेद के मन्न कामर्थ सापेक्ष दशामें कान को कारणता दिखाने परक हो सकता है तथापि निरपेक्ष प्रधान कारगा की अपेक्षा उनका कारण ग होना बान मानना भी ठीक सिद्ध ही है अथवा ( कालः प्रजा प्रसृजत० ) सत्यादि वेद वाक्यों में कालात्मक परमेश्वर ही कालादि पदों का वा ध्यार्थ लेना इष्ट है ऐसा मान लेना चाहिये ॥१॥ येनावतं नित्यमिदं हि सर्व ज्ञः कालकालो गुणी सर्वविधाः । तेनेशितं कर्म विवर्त्तते ह एथ्व्या- प्यतेजोऽनिलखानि चिन्त्यम् ॥२॥ अ०-यो ज्ञो ज्ञानस्वरूपः सर्ववित्सर्वज्ञो गुणी शुद्धत्वनिष्पापत्वादिगुणवान् काल- स्यापि यः कालोऽन्तकरः। कालकारइति पाठे कालस्यापि कर्त्ता येनावृतं हि व्याप्तमेव सर्व- मिदं जगत्सदावतिष्ठते न कदाप्यव्याप्तम् ।
२०७ घष्ठाध्याय'। तेनेशितं तदधिष्ठातृप्रयोजकं सर्गाद्यर्थं यत् कर्म विवर्तते परिणमति तच्च परिणतं पृधि- ध्यादिपञ्चभूनात्मकं भवतीति चिन्त्यं सुधीभिः । भा०-क्रियमाणं सञ्चितं प्रारब्धनाम्ना भोगोन्मुखं च त्रिविधं कर्म । यदादौ क्रियते तदेव परिणतं सञ्चित भवति तस्यापि परि- णामः फलं सर्वत्र जायते । यथा वृक्षमूले कृतं सेचनादि कर्म रसादिरूपेण सञ्चितं फलरूपं जायते । एवमत्राप्ययस्कान्तमणिकल्पेश्वरप्र- योजककर्त्त के प्रकृत्याधारं सारम्भे सदा जायमानं संक्षोभनसञ्चलनादिकर्म परिण- तिमापन्न कालेन पृधिव्यादिपञ्चतत्त्वफला- त्मक सम्पद्यतएवं च सोऽयस्कान्तमणिकल्प ईश्वरोऽस्य सर्वस्य प्रधानमनन्यं कारणं सि- ध्यति । सम्प्रति स्थूलकार्यदशायामपि तेन व्याप्तमेव सूर्यचन्द्रपथिव्यादिकं सर्वं जगन् नियमेन प्रवाहहेतुकं जायते । तदव्याप्तिम- न्तरेण न किमपि कदापि व्यवस्थया स्थातुं कार्यं साधु वाऽलं भवति ॥ २॥ भाषार्थ:-(यो ज्ञः सर्वविद् गुणी कालकालः) जो ईश्वर ज्ञान स्वरूप सर्वज्ञ शुद्ध तथा रुदा निष्पाप होने
२०८
कृष्यायजुर्वेदीयश्वेताश्वतरोपनिषदि-
प्रादि गुणो वाणा और कालका भी काल है अर्थात् कालको
भी खा जाने घाला तथा ( कालकार' ) ऐसा पाठान्तर
माना जाय तो जो काल का भी कर्ता करने वाला है (येना-
धृतं हि सर्वमिदम् ) जिस से ब्याप्त ही यह सब जगत् सदा
रहता अर्थात् जिस मे प्रयाप्त एक नयाभर भी कोई तृण
मात्र मी वस्तु नही ठहरता ( तेनशित कर्म विवर्तते ६)
वही जिस का प्ररक वा अधिष्ठाता है ऐसा जो कर्म नाम
किया सष्टि रचना के लिये प्रवृत्त हाती, वही परिणाग को
प्राप्त हुपा कर्म ( पृथ्ञ्याप्यतेजोऽनिलखानि चिन्त्यम् )
पृथिवी जाल मनि वायु तथा आकाश नामक पञ्चतरवरूप
संसार वनता है यह विधारशीलो को चिन्त्य हैं।
भाo-क्रिपमाया संचित और भोगने में आने वाला
प्रारधरूप यह सीन प्रकार का फार्म कहाता है जो प्रथम
करते समय क्रियमाण कहाता वही द्वितीय दशा में परिणत
हुमा संस्कार और दीर्घ काल तक रहने वाले संस्कार ही
बासनारूप से सचित कर्म कहाते और घही कर्म तीसरी
दशा में परिणाम को प्राप्त प्रारण्य फल रूप होता है। इस
का प्रत्यक्ष दृष्टान्त यह है कि जैसे
वृक्ष की जड़ में किया
जलसोचनादि कर्म रसादिरूप से उस वृक्ष मे संचित होता
हुमा काल पाकर फगरूप से प्रकट होता है। इसी प्रकार
यहा चुम्बक पत्थर के समीप होने मात्र से लोहे में क्रिया
प्रकट होने के समान सृष्टि के प्रारम्भ में ईश्वरकी समीपता
होने मात्र है लोहस्थानी माया में संक्षाभन वा संचलनरूप
सूक्ष्म स्वाभाविक जो क्रिया होती जिसका प्रेरक को ईश्वर
ही ठहरता है वही क्रिया परिणाम को प्राप्त होती हुई
पृथिव्यादि पञ्चतत्व फल रूप से प्रकट हो जाती है। इस
प्रकार वह ईश्वर चुम्बक पत्थर के समान कुछ चेष्टा वा
षष्ठाऽध्यायः। २०४ पच्छा न काता हुमा भी सब सृष्टि का मुख्य कारस सिद्ध हो जाता है। इस विचार के साथ सांख्यादि किसी दर्शन का विरोध नहीं आता। वर्तमान समय की स्थूल कार्यदशा में भी सूर्य, चन्द्र वा पृथिव्यादि सब जगत् उस ईश्वर से व्याप्त हुआ ही नियम पूर्वक प्रवाह-ढर्रा चनने का हेतु हो रहा है। उम की व्याप्तिके बिना कोई भी वस्तु कदापि नि- यम के साथ किसी कार्य को सिद्ध नहीं कर पाता । इस से वह अब धी चुम्बक के समान क्रिया का हेतु है ॥२॥ तत्कर्म कृत्वा विनिवर्त्य भूयस्तत्त्वस्य तत्त्वेन समेत्य यो- गम्। एकेन द्वाभ्यां त्रिभिरष्टभिर्वा कालेन चैवात्मगुणैश्च सूक्ष्मैः ॥३॥ अ०-तदभूतसर्गरूपं कर्म कृत्वा विनि- वर्त्य भूयः पुनरीक्षणपुरस्सरं तत्त्वेन तत्त्वा- न्तरेणावादिनैकेन द्वाभ्यां त्रिभिर्वा तथाष्टभिः प्रकृतिभिः [ पञ्चतन्मात्रतत्त्वानि मनो बुद्धिर- हङ्कारइत्यष्टौ सांख्याभिमताः प्रकृतयः] योगं समेत्य संगमय्य तथा कालेन, सूक्ष्मैरात्म- गुणैः संकल्पादिरूपैरन्तःकरणगुणैश्च तत्त्वस्य पृथिव्यादितत्त्वस्य संयोगं कृत्वा नानाविधं वस्तु सृजति । सर्वं ब्रह्मचक्रं चालयतीति च॥ २७ कृष्णायजुर्वेदीयश्वेताश्वतरोपनिषदि- भाo-ईश्वरः सर्गारम्भे पूर्व सूक्ष्मात्स्थूलभू- तानि सृजत्यनन्तरं सर्वं परस्परसंयोगेन पञ्च- विधं कृत्वा द्विभौतिकत्रिभौतिकानि चातुर्मी- तिकपाञ्चभौतिकानि च नानाविधानि मन- प्यादिप्राणभृच्छरीरादीनि सृष्ट्वा तत्र बुध्या. दीनां संयोगं कृत्वा सर्वं चालयति ॥ ३ ॥ भाषार्थ:-( तत्कर्म कृत्वा विनिवर्त्य) पूर्वोक्त पञ्चभूतों की सृष्टिरूप कर्मको करके ईश्वर ने फिर ईक्षण किया अर्थात भतों से अगली होने वाली सृष्टि के लिये ईश्वर ने अपना भीतरी सामात्रिक विचार करके ( भूयस्तत्त्व नैकेन द्वाभ्यां त्रिभिरष्टभिर्वा कालेन च सूक्ष्मैरात्मगुणैश्चैव तत्त्वस्य योगं समेत्य ) फिर एक दो वा तीन तत्त्वान्तरोंके साथ [जगत के किन्ही पदार्थो में दो का फिन्हीं में तीन का और किन्हीं में धार तत्वों का संयोग प्रधान माना जाता और यदी ठीक है। आकाशतत्त्व यद्यपि सत्र में है तथापि उस का संयोग नाग बन्धन किसी में नहीं होता सदा समसे अलग निलेप रहता है। [ एका का १ के साथ संयोग होकर दो का, एक का दो के साथ मेल होकर तीन का और एकका तीन के साथ मेल होकर चारफा संयोग बनेगा तथा पवितन्मात्र तत्व और मन बुद्धि अहङ्कार इन सांख्य दर्शगकार की मानी हुई पाठ प्रकृतियों के साथ, काल के साथ और सङ्कल्प नाग कामना इच्छादि अन्तःकररा सम्म्मन्धी सूधागुणों के साथ पृथिव्यादि तत्व का संयोग करके नाना प्रकार के सांसारिक पदार्थ व. गाता और सब ब्रह्मचक्र को प्रवाह के साथ चला रहा है।
पछाध्याय । भा०- -ईश्वर सृष्टि के प्रारम्भ में प्रथम सूक्ष्म ते स्थून पृषिव्यादि भूतो को रचता तदनन्तर सम भृता को परस्पर मिलाके अर्थात् एक २ को पौध २ प्रकार का करके [ इसीको पञ्चीकरण करते हैं जिस में पाघ भून पचीस प्रकार के हो जाते है द्विभौतिक त्रिभौतिय, धातुभौतिक और पाच- भौतिक नाना प्रकार के मनुष्पादि प्राणाधारियोके शरीरादि पदार्थों को रथके तथा उन में वृद्धि भादि का सयोग करके सब जगत् के प्रवाह को निरन्तर चलवा रहा है ॥ ३ ॥ आरभ्य कर्माणि गुणान्वि- तानि भावांश्च सर्वान्विनियोज- येद्यः। तेषामभावे कृतकर्मनाशः कर्मक्षये यातिस तत्त्वतोऽन्यः ॥४॥ अ०-सत्वादिशुभगुणान्वितानि कर्माण्या- रभ्य कुर्वाण. सर्वान् भावान्सर्वान्संकल्पान् यो विनियोजयेदीवरार्पितानि कर्गादिन्द्रि- याणीन्द्रियार्थेषु वर्त्तन्तइति धारयन्प्रकृतिः कुरुते कमैति जानन्वा कुर्यात्तेपां कर्मणां- सक्ल्पाऽहकाराणामभावे कृतानामपि राग- द्वेपरहितकर्मणां नाशो जायते नच तदा कर्माणि नवानि सज्जायन्ते । एवं कर्मक्षये. ऽविद्यादिकेशवासनानां नाशे स जीवस्तत्त्वतः
कृष्णयजुर्वेदीयश्वेताश्वतरोपनिषदि-
पृथिव्यादितत्त्वेभ्यो वस्तुतोऽन्यश्चैतन्यस्वरूपो
याति स्थूलदेहं सूक्ष्मशरीरं च त्यक्त्वा केवलो
गच्छति मुक्तो जायते ॥
भा०-नच प्राणभृता
शक्यं त्यक्तुं कर्मा-
ण्यशेषतइति गीतायामुक्तं तच्च कर्मणां याव-
देहभाविवादैकान्तिकमेव सत्यम् । तस्मा-
द्रागद्वेषवियुक्तानि दर्शनादीनि स्वाभाविकानि
कर्माणि कुर्वाणो विज्ञो वालोन्मत्तादिव-
तज्जन्यशुभाशुभफलैः संस्कारसञ्चयाभावान
लिप्यते । शास्त्रविहितानि विशेषेण सर्वाणि
कर्माणि वाऽयस्कान्तवत्प्रयोजके परमगुरौ
समर्पयेत् यथा वालादयो व्यभिचारस्तेयादिक
दुष्कर्म किमपि न कुर्वन्ति तथा विरक्तोपि
न करोति संरकाराभावात् । येये च सूक्ष्माः
सल्पा उत्तिष्ठन्ति तांरतान् तत्रैव विलाय.
यति । ध्यानहेयास्तवृत्तयइत्यादियोगसूत्रो-
क्तप्रकारेण यदा सजितवासनाः शिथिली
भवन्ति नव्याश्च नोत्पद्यन्ते तदा प्रवृत्ति-
हेतुसञ्चितकर्माभावे दीर्घकालनरन्तर्यसत्का-
रासेवितध्यानयोगाभ्यासादिना स मुक्तो भ-
वति ॥४॥
२१३ पष्ट पाया। भाषार्थ:-( गुणान्वितानिक स्वारभ्य ) सत्वादिगुगो से युक्त काँका का भारम्भ करके कर्म करता हुमा भी ( सर्वान् भावान् यो विनियोजयेत् ) जो पुरुष सब भावों नाग काम नामो को ईश्वर मे समर्पित करदे त्याग देवे ( तेषागभावे कृतवर्मनाशः ) उन कर्मों के अहङ्कारो वा सकल्पों के प्रभाव मे रागद्वेष रहित होके किये कर्मों का नाश हो जाता अर्थात् उन स्वाभाविक वा शात्रीत कर्मों से नये २ संस्कार समि- नही होते (कर्मक्षये स तत्त्वतन्यो याति) इस प्रकार चित वासनानोका धीरे धीरे ध्यानादि द्वारा नाश होने पर वह जीव पृथिव्यादि तत्वोसे अर्थात् पार्थिव स्थूल शरीरसे सृहम से भी अपनेको भित्र जानता हुमा वस्तुतः शरीरसे भिन्न है शरीर छोड़के कैवल्य दशा को प्राप्त हो जाता है ॥ भा०-"जीवित रहने पर्यन्त कोई प्राणी सव कमों को नहीं छोड़ सकता" यह गीता में कहा है सो शरीर र नम काँका साप होने से यह अत्यन्त ही सत्य है। इससे व कर्म छूट नही सकते तो जानी वा निज्ञासु पुरुष रागद्वेषादि दोषो से रहित देखना सुनना भादि स्वाभाविक कमों को करता हुआ भी बालक वा सन्मत्तादि के समान संस्कारोंका सञ्चय न होनेसे संचित कर्म से होने वाले शुभाशुभ फलो से लिप्त नहीं होता। विशेष कर शास्त्रोक्त वा सभी कों को चुम्बक के तुल्य सब के प्रेरक परमेश्वर में समर्पण कर देवे नपा जैसे काम संकल्प ग होने से बालकादि पोरी व्यभिचा. रादि किसी दुष्ट कर्म को नही करते वैसे कामना पूर्वक सङ्कल्पोके प्रभावसे विरक्त भी वैसे काम नहीं करता। और वासना रूप से अवस्थित जो २ सूदम संस्कार जागीके चित्त में उठते हैं उन २ को वही लीन वा नष्ट करता जाता है (ध्यानहेयास्तवृत्तयः ) इत्यादि योग सूत्रों में कही रीति कृष्णयजुर्वेदीयश्वेताश्वतरोपनिषदि- । से गय सचित वासना धीरे २ शिथिल होती जाती शौर नयी वासना उत्पस नही होने पानी तब संमार में फंसायद के हेतु सधित कम के अभावमे दीर्घकाल तक निरन्तर अदा भक्ति के साथ सेवन किये ध्यान योगाभ्यासादि द्वारा वह योगी मुक्त हो जाता है ॥ ४ ॥ आदिः स संयोगनिमित्तहेतः परस्त्रिकालादकलोऽपि दृष्टः। तं विश्वरूपं भवभूतमीड्यं देवं स्व- चित्तस्थमुपास्य पूर्वम् ॥ ५॥ अ०-स ईश्वर आदिः सर्वकारणानामपि कारणं शरीरसंयोगादिनिमित्तानां सञ्चितक- मणामविद्यादीनां च हेतुखिकालाद्वर्त्तमाना- तोतानागतरूपकालत्रयात्परो भिन्नोऽवच्छे. देन तत्र कालो नोपावर्त्तते सच प्राणादिषो- खशकलास्वन्तर्गतो नास्ति । एवंभूतो मनी- पिभिर्दृष्टः साक्षात्कृतः क्रियते च तं तादृशं विश्वरूपं सर्वरूपवद्वस्तुषु तत्तद्रूपेणावस्थितं भवत्यस्मात्सर्वमिति भवो भूतोऽविनश्वरो नित्यं विद्यमानएवेदृशमीड्यं सर्वस्तुत्यं देव- मीश्वरं स्वचिसस्थं पूर्वमुपास्याऽयमहमस्मीति तन्निष्ठो भूत्वा जीवस्तत्त्वतोऽन्यो यातीति षष्ठाऽध्यायः। २१५ तन्निष्ठो भूत्वा जीवस्तत्त्वतोऽन्यो यातीति पूर्वणैवान्वयः ॥ भा०-चेतः समाधाय तस्याद्यादिपदैः कृतं व्याख्यानं विविक्तप्रदेशे यो ध्यायति वहिःकरणान्यन्त:करणानि च वशीकरोति स- एकस्मिन् अन्धेऽध्याये पद्ये वा तस्य स्वा- मिनो महत्वमानन्दस्वरूपं च मनसोपलभ्य तुष्यत्येत्र सएव साधुकर्म कारयति तं यमेभ्यो लोकेभ्यउन्निनीषतइत्यादि प्रमाणेन सएव सर्व कारयति ॥५॥ भाषार्थः-(स भादिः योगनिमित्तहेतुः ) वह सब का आदि मूल कारण, शरीर संयोगादि के निमित्त-संचित कर्म घा अधिद्यादि का भी हेतु अर्थात् शुभाशुभ कर्म कराने वाला है (निकालात्परः) भूत भविष्य वर्तमान रूप तीनों काल से परे नाम भिन्न जिस में भेद करने वाले काल की प्रव नहीं कि पहिले पा वा मागे होगा वा अय हुमा पहिले न था इत्यादि (प्रकलोऽपि दृष्टः) जो प्राणादि सोलह कलामो के अन्तर्गत नही ऐसे ईश्वर को जानी ध्यानी लोग साक्षात देखते जानते हैं (तं विश्वरूपं भवभूतगोड्यम् ) सब रूपवान् वस्तुप्रो मे उसो २ रूप से अवस्थित, सत्र के उत्पप्ति स्थान अविनाशी नित्य विद्यमान, सबको स्तुति मार्थना करने योग्य (खचित्तस्थं देवं पूर्वमुपास्य ) अपने चित्त नाम अन्तःकरण में स्थित ऐसे दिव्यस्वरूप ईश्वर को यही मै हूं इस प्रकार " कृष्णयजुर्वेदीयश्वताश्वतरोपनिषदि- तत्पर तन्निष्ठ हाने पूर्वक प्रथम उपासना करके लीव पञ्च- तत्त्वमय शरीरके बन्धन से छूट सकता है । भा०-चित्त का समाहित करके उस के माद्यादिपदों से किये व्याख्यान को जो पुरुष एकान्त में बैठ कर शोचता और बाहर भीतर के इन्द्रियो को वशीभूत करता है वह एक ग्रन्थ वा एक अध्याय अथवा एक श्लोक में ही उस सर्वाध्यक्ष के महत्त्व वा आनन्दस्वरूप को मन से प्राप्त करके सन्तुष्ट अवश्य होता है जिस को ऊपरी दशामें पहुंचाना चाहता उससे वही शुभ कार्म कराता है और वही ईश्वर अशुभ कर्म कराता है, हम प्रमाणानुसार वही सब कराता है ॥ सवक्षकालाकृतिभिः परोऽन्यो यस्मात्प्रपञ्चः परिवर्त्ततेऽयम् । धर्मावहं पापनुदं भगेशं ज्ञात्वा- त्मस्थममृतं विश्वधाम ॥ ६ ॥ अ-समानं वृक्षं परिषस्वजाते-इत्या- दिषु वृक्षः संसारउक्तस्तस्याकृतयः सूर्यादीनां रचनाप्रकारभेदाः कालाकृतयोऽहरादिरूपा- स्ताभिः परो भिन्नोऽन्यस्ताभिरलिप्तः । यस्मा- दयं प्रपञ्चो व्यक्तीभूतः संसारः परिवर्तते- आविर्भवति तिरोभवति च तं धर्मावह ध्या- यिनां धर्मप्रापकमधर्मनाशकं सर्वेश्वर्याणा- मीशं स्वामिनं विश्वस्य धामाधारममृतमम- - यष्ठा पाया। रणधर्मकमात्मस्थं स्वान्तःकरणस्थं ज्ञात्वा तत्त्वतोऽन्यो याति ॥ मा०-आत्मा यद्यपि संसारवृक्षकालाद्या- तिषु तत्तदाकाररूपेणैव तत्रतत्र प्रविष्टस्तथापि वारतवस्वरूपेण वृक्षाद्याकृतिभ्यो भिन्नएव । सर्वाकृतिरहित्त्वादेवातीन्द्रियरतस्मादेव ध्या- नयोगाभ्यासादिप्रबलतरसाधनैः शुद्धया सूक्ष्म प्रज्ञया तं कश्चिदेवाश्चर्यमिव पश्यति ॥ ६ ॥ भाषार्थः-( यरमादय प्रपञ्चः परिवर्तते ) जिससे यह प्रत्यक्ष दीखता स्थूग जगत्का सब फैलाव प्रवृत्त हुआ है। शीत शिससे इस सबका उत्पत्ति विनाशरूप सदा परिवर्तन होता रहता है ( स वृक्षकालाकृतिभिः परोऽन्यः ) वर सूर्यादि सप वक्षनाग माशवान् संसार की भिन्न २ बनावटों तथा दिनरात प्रादि काल की भिन्न २ आकृतियों से अलिप्त और सपा अलग है ( धर्मावहं पापनुदं भगेशन ) उस, ध्यान शीण पुरुषों के दृश्य में धर्मको पहुंचाने, सञ्चित करने वाले पापरूप अधर्म को भगाने वाले, सय ऐश्वयोंके स्वामी (ज्ञात्वात्मत्स्यममृतं विश्व धाम ) सबके आधार भूत मरण धर्मसे रहित ईश्वरको आपने अन्तःकरणमें स्थित जानकर जीव संसार के दुःख यन्यनों से छूट सकता है। भार-मात्मा यद्यपि संसार वृक्षको और कासादिकी माया तियों में उन्हीं के नामरूपसे विद्यमान रहता हुमा समकारक या प्रवर्तक है तथापि अपने वास्तविक स्वरूपसे कालादिमी श्राकृतियोंसे भिन्न ही है। सब प्रकार को बनाबटोसे रहित होने के कारण ही ईश्वर अतीन्द्रिय है इन्द्रिय गोधर नदी
२१८
कृष्णयजुर्वेदीयश्वेताश्वतरोपनिषदि-
होता, इसी कारण ध्यान तथा योगार पासो द्वारा शुद्ध सूक्ष्न
बुद्धि से कोई ही उस को भाश्चय के तुल्य जान सकता वा
देख सकता है ॥६॥
तमीश्वराणां परमं महेश्वरं
तं देवतानां परमं च दैवतम् ।
पति पतीनां परमं परस्तावि-
दाम देवं भुवनेशमीड्यम् ॥७॥
अ०-ईश्वराणां वैवस्वतादीनां राजादीनां
वा परमं महेश्वरं राजाधिराजादीनामपि
महान्तं निरतिशयं प्रभु देवतानामन्यादीनां
च परमं देवतं निरतिशयदेवत्वेन संयुक्त
पतीनां प्रजापत्यादीनामपि परमं पतिं रक्षक
सूक्ष्मतराव्यक्तादपि परस्तात सूक्ष्मतरं तं भुव-
नानामीशमीड्यं सर्वरतुत्यं देवमीश्वरं विदाम
वयं जानीयामेति जनरुत्साह उद्योगो वा
कार्य:
मा०-अत्र सर्वभावापेक्षयेश्वरस्य निर-
तिशयत्वं रफुठमेव प्रत्याय्यते तस्मात्तस्य
सातिशयज्ञानायोद्योगो न कार्यः । ईश्वरत्वा-
दीनां यत्र काष्ठाप्राप्तिः एव वाच्य ईश्वरोऽ-
त्रोपनिषत्सु ज्ञेयत्वेनेष्टइति ॥ ७ ॥
षष्ठाऽध्यायः। २१ भाषार्थः-(तमीश्वराणा परमं महेश्वरम् ) उस यमराज भादि ईश्वरोके भी परम ईश्वर अर्थात् राजाधिराजों [शाह. शाहो ] के भी ऊपर अनन्त सामर्थ्य वाले प्रभु ( तं देवताना परमं च देवतम् ) उस अन्यादि वा इन्द्रादि देवताओं के भी परम देवता सर्वोपरि देवतापन से युक्त ( पतीनां परम पति परस्तात् ) प्रजापति आदि प्रजा रक्षको के भी परम रक्षक, अतिसूक्ष्म अव्यक्त नामका कारण से भी परे सूक्ष्मतर (भुवनेशं देवमीय विदाम) उस सब भुवनों के स्वामी सबको स्तुति करने योग्य देव ईश्वर को हम जाने वा जान सके ऐसा उत्साह वा उद्योग मनुष्योंफो करना चाहिये । भा०-यहां सब विद्यमान पदार्थों की अपेक्षा स्पष्ट की ईश्वरको निरतिशय प्रतीत कराया है इसलिये उसको किसी से छोटा वा किसी के बरावर नानने का उद्योग कदापि नही करना चाहिये । ईश्वरादिपनके जहां काष्ठा प्राप्ति नाम बद्द है वही वाच्य ईश्वर यहां उपनिषदोमें जाननेको इष्ट है 130 न तस्य कार्य करणं च विद्यते न तंत्समश्चाभ्यधि- कश्च दृश्यते। पराऽस्य शक्ति- विविधैव , श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च ॥८॥ अ०-तस्य कार्य शरीरं करणं चक्षुरादि- साधनं च वस्तुतो न विद्यते तत्समस्तत्तुल्य- स्ततोऽभ्यधिको वा न कश्चिद्ध दृश्यते स्वाभा- २२० ॥ कृष्णयजुर्वेदीयश्वेताश्वतरोपनिषदि- विको ज्ञानक्रियारूपा सर्वविषयज्ञानप्रवृत्ति- लक्रिया स्वसनिधिमात्रेण सर्वस्य वशीकर- णरूपा चास्येश्वरस्य विविधव परा निरति- शयाऽनन्ता च शक्तिः स्नूयते वेदादिति शेषः भा०-नहि लोकेषु कोऽपि ज्ञानेन्द्रियै- मनःषष्ठीविना ज्ञानक्रियां भोगायतनशरीरेण विना या बलकियां कत्तुं शक्रोति । यश्च स्वभावेनैव देहेन्द्रियैर्विनापि सर्वस्य धारण पालनं च करोति । सर्वहिताय सर्वविद्यामयं वेदं चोपदिशति तत्तुल्यस्ततोऽधिको वा को भवितुमर्हति ? न कोऽपीति बहुविधावतार- शरीरेषु सत्त्वपितानि शरीरेन्द्रियाणि वास्त- विकानितस्य न भवन्ति किन्तुनाट्यदृश्यवत्क- ल्पिसान्येनातउत्तं मायामाणवको हरिरितिा। भाषार्थ:-( तस्य कार्य करणं च न विद्यते ) उत्त ईश्वर पार कार्यनाम शरीर तथा करशनाम चक्ष आदि इन्द्रिय वास्तव में नहीं हैं ( न तत्सनचाभ्यधिकश्च दृश्यते ) तथा न कोई उस के बराबर और न कोई उस से अधिषा दीखता है ( खासावित्री ज्ञानमलक्रिया परा व विविधैव शक्तिरस्य श्रूयते ) खाभावियो मन विपयोषो चागने की प्रवृत्ति ज्ञान- क्रियारूप और अपनी समीपता होनेगान से सब पृथिव्यादि तो वशी पारने वाली स्वाभाविकी मलक्रियारूप नाना प्रकार सी परा नाम अनन्तशक्ति इस ईश्वर की वेद से सुनी जाती वा सिद्ध योगी ज्ञानियों के कथन से सुनने में भाती है ।
पटाध्यायः। २२१ भा०-लोक में कोई पुरुष मन सहित छ. ज्ञानेन्द्रियो के बिना जानक्रिया नाम किमी को जान सकमा तगा भोग के स्थान पारीर के बिना किसी प्रकार का उठागा धरना पक हना फेकनादि बल सम्बन्धी कुछ फर्म नही कर सकता। परन्तु लो स्वभाव से ही शरीर और इन्द्रियो के विना भी सय गत् का अनन्त धारणा पालन तथा सव के हितार्थ शुद्ध सर्व विद्यालय वेद का उपदेश मनुष्यों को करता है । उस के तुल्य वा उससे शधिक और कौन हो सकता है? अर्थात् कोई नदी । अनेक प्रकार के अवतार शरीर धारण करने पर भी वे भवतार के शरीरेन्द्रिय ईश्वर के वास्तविक नदी होते किन्तु नाटक दिखाने के तुल्य कल्पनामात्र शरीर होते है इसी कारण श्रीमद्भागवत मे लिखा है कि मायामात्र अवतार शरीर होते है।॥८॥ न तस्य कश्चित्पतिरस्ति लोके नचेशिता नैव च तस्य लिङ्गम् । स कारणं करणाधिपा- धिपो न चास्य कश्चिज्जनिता न चाधिपः ॥६॥ अ०-लोके तस्य कश्चित्पति स्त्यतएव चेशिता नियन्ताऽपि नास्ति । नच तस्य किमपि लिङ्गं चिह धूमादिवदनुमापकमस्ति । करणाधिपस्येन्द्रियस्वामिनो जीवरयाप्यधिपः खामी स सर्वस्य कारणमभिन्ननिमित्तोपा- २२२ कृष्णयजुर्वेदीयश्वेताश्वतरोपनिषदि- दानमस्त्यतएवास्य कश्चिज्जनिता जनयित्तो- त्पादको नास्ति नचास्य कश्चिदधिपोऽस्ति ॥ भा०-कस्याप्यधिकारे यो न तिष्ठति सर्वदा सर्वथा स्वतन्त्रो निराकारः सर्वाध्यक्षः सर्वनियन्ता सर्वोत्पादकः सर्वविधशक्तः काष्ठां प्राप्तश्च सएवेश्वरो नो ब्रह्म दधात्त्रित्युत्तरे. णान्वयः ॥६॥ भाषार्थ:-( लोके तस्य कश्चित्पत्तिास्ति ) दृष्टि गोघर होने वाले संसार में उसका कोई पति नाम रक्षक वा पालक नही है (न चेशिवा नैव च तस्य लिङ्गम् ) न उस का कोई नियन्ता-उस को नियम में चलाने वाला तथा न धूमादि से अनि आदि को जानने के तुल्य उसका अनुमान कराने वाला जगत में कोई चिन्ह है ( स कारणं करणाधिपाधिपः) वह सब संसार का निमित्त तथा उपादान कारण ओर करण नाम इन्द्रियों के स्वामी जीवका भी अधिष्ठाता प्रभु है ( नचास्य कश्चिज्जनिता न धाधिपः) और इस ईश्वरकान कोई उत्पा दक कारण और न कोई स्वामी है। भा-तो किसी के आधीन नही रहता, सब काल में सब प्रकार से जो स्वतन्त्र, निराकार, निराधार, निर्विकार, सर्वस्वामी सर्वनियन्ता, सर्वोत्पादक और असीम शक्ति वाला है वही ईश्वर हमारे लिये ज्ञानमय वेद का धारण करे यह अगले मन्त्रको प्रार्थना के साथ सम्बन्ध जानो ॥६॥ यस्तूर्णनाभइव तन्तुभिः प्रधा- षष्ठाध्याय, २२३ . : नजैः स्वभावतो देवएकः स्वमाव- णोत्। स नो दधातु ब्रह्माप्ययम्१० अ०-यथोर्णनाभिः स्वदेहजै स्तन्तुभिः स्वस्यैव देहमावृणोति । तथैव प्रधानजैः प्रकृ- तिजैस्तन्तुभि-महदादिकार्यात्कार्यान्तरापन्न- स्तारतरै नाभेदभिन्नः पदार्थैर्यएको देव ईश्वरः स्वभावतः स्वाभाविकेनैव गुणेन स्वं स्वस्य रूपमावृणोत् सर्वस्मिन्कार्यवस्तुनि व्या- ण्यादृश्योऽवस्थितः । स ईश्वरो नोऽस्मभ्यम- प्ययमव्ययमविनश्वरं ब्रह्म दधातु ददातु तद्रू- पोऽहं भवेयमित्याशयः॥ भा०-परमेश्वरस्यैव सम्यक स्वरूपबोधे तत्त्वज्ञानमुत्पद्यते तदैव मिथ्याज्ञाननिवृत्तिः सत्यामेव तस्यां दुःखनिवृत्तिरतो जिज्ञासुपु- रुपैरात्मबोधायेश्वरप्रार्थनमावश्यक कार्यम्॥१०॥ भाषार्थः ( कर्णनाभव) जैसे मकरी अपने ही देह से मकट हुए जालरूप सूतों से अपने को ही ढांपती है वैसे ही ( प्रधानजैस्तन्तुभिर्यएको देवः खभावतः स्वभावणीत ) प्रकति नामक प्रधान से होने वाले महदादि कार्यों के नाना भेद भिन्न ताररूप [ सिलसिलेवार | सूत्रोंसे जो एक ही देख ईश्वर अपने स्वाभाविक गुण से अपने स्वरूप का प्रावरण फरता अर्थात् सब कार्य वस्तुओं में व्यापक होके दृश्यरूप २२४ कृष्णायजुर्वेदीयश्वेताश्वतरोपनिषदि- से ठहरता है [ प्रथया या कहो कि कार्य पदार्थ जो प्रेयरप यने हैं उन की फंसावट ही अपने वास्तविक सारूप के न दीख पड़ने का ढक्कन वा संकावट है (हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं सुखम् ) इस वेद मन्त्रका भी यही अभिप्राय है] ( स नोऽध्ययं ब्रह्म दधातु ) वह ईश्वर हमारे लिये अधिनाशी प्रात्मतत्यके शुद्ध ज्ञानका दान करे अर्थात् अटल तत्वज्ञान हम को देवे ऐमी प्रार्थना हम करते हैं। भा०-परमेश्वरका ही ठीक २ वरूप जाग लेने पर तत्य. ज्ञान होता है तभी मिथ्याज्ञान जो सब दुःखों का मूल कारण है उस की निवृत्ति होती और भाविद्या की निवृत्ति होने पर ही मनुष्य की भीतरी भांखें खुली और दुःख दूर भागते हैं इस कारण शात्मबोध होने के लिये ईश्वर की प्रार्थना करना आवश्यक मानो ॥ १० ॥ एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा । कर्माध्यक्षः सर्वभूताधिवासःसाक्षी- चेता केवलो निर्गुणश्च ॥ ११॥ अ०–एको देव ईश्वरः सर्वप्राणिषु गूढः संवृतः सर्वाशेष्वयस्यग्निवद व्याप्तिशीलः सर्व- भूतानां प्राणिनामन्तरात्मा प्रेरकः कर्मणा- मध्यक्षः प्रयोजकत्वात् सर्वभूतेष्वधि-उपरि- भावेन स्वस्यानन्तशक्त्या नियमयन् वसति, षष्ठाध्याय २२५ साक्षी सर्वस्य शुभाशुभं कर्म सर्वत्र पश्यति सर्वस्य चेताऽन्तःकरणानां चेतयिता केवलः सर्वस्मात्सदा निर्लिप्तो निर्गुणः सत्त्वादिगु- णासंसृष्टः॥ भा०–एवं प्रकारेण सर्वत्रावस्थितं सर्व- साक्षिणं सर्वनियन्तारं भूरादिलोकेष्वग्न्यादिषु च तत्तन्नामरूपैरेव विद्यमानं तत्तदात्मक यो जीवः स्वीयं वास्तवं स्वरूपं जानन् सदैवान- यति सएव कृतार्थः सम्पद्यते ॥ ११ ॥ भाषार्थ:-(एको देवः सर्वभूतेषु गूढ. ) एक ही देव ईश्वर सब प्राणियों में गुप्त सूक्ष्मरूप से छिपा ( सर्वव्यापी सर्पभू- तान्तरात्मा ) सब वस्तुओं के सर्वाशा में लोहे में अनि के तुल्य व्यापक, स्त्र प्राणियों का अन्तर्यागी मेरक (कर्माध्यक्षः सर्वभूताधिवासः ) प्रयोजन होने से कानों का प्राध्यक्ष, सब प्राणियों को अपनी अनन्त शक्ति से गिया में घनाता हुआ सब में स्वामी होकर बसता ( साक्षी घेता केनलो निर्गुणश्च ) सत्र के शुभाशुभ कमाँ को सर्वत्र देखता, मब के अन्तःकर गो को धिताने वाला, सदा सब से अलग और सत्वादिगुणों से पदा अलग रहता है। भा०-इस प्रकार से सर्वत्र विद्यमान, सर्वसाक्षी और सर्व नियन्ता पृथिव्यादि लोकों में अग्न्यादि में तथा नतुष्य पश्वादि में उस २ के ही नाम रूपों से विद्यमान उच्च २ रूप परमेश्वर को जो मनुष्य अपना वास्तविक स्वरूप जामता हुआ सदा शरण लेता वही कृतार्थ हो जाता है ॥ ११ ॥ २० २२६ कृष्णायजुर्वेदीयश्वेताश्वतरोपनिषदि- एको वशी निष्क्रियाणां बहूना- मेकं बीजं बहुधा यः करोति। तमा- त्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरास्तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम् ॥ १२ ॥ अ-निष्क्रियाणां क्रियारहितानां बहूना- मन्तःकरणावच्छिन्नचिदाभासानां जीवानां य एको वशी वशे स्थापयिता। अन्तःकरणोपा- धिभेदेन बहुत्त्वमापन्नश्चेतनात्मा वस्तुतोनि- क्रियएवानात्मशरीरादिधर्मान्वस्मिन्नारोग्य कर्ता भोक्ताऽहमित्यभिमन्यते । एक बीज प्रकृत्याख्यं कारणं यो बहुधा नानाकार्यरूपं करोति विस्तारयति । ये धोरा ध्यानशीला- स्तमात्मस्थमात्मन्यवस्थितमनुपश्यन्ति सर्वान पश्यन्तं पश्यन्ति जानन्ति तेषामेव मोक्षाख्यं शाश्वतं सनातनं सुखं नेतरेषामिति ॥ भा०-भूषणादिबहुभेदभिन्नमपि सुवर्ण- मेकमेव यथा सदखिलभूषणान्यधितिष्ठति यथै क्रमेव सूत्रमखिलं वासोजातमधितिष्ठति तथैव देवमनुष्यतिर्यगादिगतं जीवजातमेक- एवातला परमेश्वरोऽधितिष्ठति तदधीनाः सर्वे २२७ षष्ठााध्याया। जीवाः सच वस्तुतो निष्क्रियः कर्त स्वभोक्स- स्वादिशन्यः सएवाहमस्मीति पश्यन् धीरो नित्यं शान्तिसुखमाप्नोति नान्यः ॥ १२ ॥ भाषार्थ -( बहूना निष्क्रियाणा य एको घशी ) क्रिया गुण रहित अन्तःकरशोपाधि से भिन्न २ प्रतीत होने वाले व्याप्त एक पात्मा के छायारूप बहुत नीयो को जो एमाही अपने साधीन रखता अर्थात् चेतन खरूप एक ही भात्मतत्त्व अन्तःकरणो के भनेक होने से अनेक रूप प्रतीत होता हुश्रा क्रिया गुण से रहित है यह शरीरेन्द्रियो के धर्मों को अपने में भारोपित करके अपने को कर्ता मोक्तादि मानता है। ( य एक बीज बहुधा करोति ) गो प्रकृतिरूप एक ही बीज नाम कारण को असंख्य प्रकार का कार्य रूप बनाता फैलाता है ( ये धीरास्तमात्मस्थमनुपश्यन्ति ) जो ध्यागी जानी योगी लोग सब को देखते हुये उस को अपने स्वरूप में अवस्थित देखते जानते है कि ईश्वर ही नीव नाम रूप से विद्यमान है ( तेषा शाश्वतं सुख नेतरेषाम् ) उन्ही को मुक्तिनागक सनातन सुख मिलता है भन्यो को नही । भा०-भूषणादि अनेक रूप होता हुमा भी सुवर्ण जैसे वस्तुत एक ही रहता है और सब भूषणादि एक सुवर्ण के ही अधीन होते हैं वा जैसे सभी वन एक सुवर्ष के ही अधीन होते हैं। वैसे ही देव मनुष्य पश्त्रादि सभी योनिस्य जीव मात्र एक ही भात्मसत्त्व के अधीन है। और वह आत्मा कर्तृत्व भोक्तवादि से रहित निष्क्रिय है । वही सर्वगत मारमा मेरा वास्तविक खरूप है ऐसा लागता हुआ विद्वान् शान्ति सुख को प्राप्त होता है अन्य नहीं ।। १२ ।।
- कृष्णयजुर्वेदीयश्वेताश्वतरोपनिषदि- नित्यो नित्यानां चेतनश्चे- तनानामेको बहूनां यो विद- धाति कामान्। तत्कारणे सांख्य- योगाधिगम्यं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः॥ १३ ॥ अ०-नित्यानां जीवानां पृथिव्यांदीना- वा मध्ये योऽतिशयेन नित्यः, चेतनानां जी- वानां मध्ये यो निरतिशयचेतनः, यएको बहूनां जीवानां कामान् कामनानिमित्तान् भोगान् शुभाशुभकर्मफलानि विदधाति तत्सर्वस्य का- रणरूपं सांख्ययोगाधिगम्यं चेतनाचेतनभेद- बोधजितेन्द्रियवादिना प्राप्तुं योग्यं देवं द्योतनात्मकमीश्वरं ज्ञात्वा सर्वपाशैः सर्व- दुःखबन्धनैर्जीवो मुच्यते ॥ मा०-यत्रकत्वं नित्यत्वं चेतनत्वं विधा- तृत्वं सर्वकारणत्वमेकानचेतःसाध्यविवेकेन ज्ञेयत्वं देवत्वं च निरतिशयं काष्ठां प्राप्तं तस्यैव बोधोऽगाधसंसारार्णवपारगमनाय से- तुरिति तस्य . नित्यत्वचेतनत्वाभ्यामेव जी.
षष्टाध्यायः।
२२९
वानां नित्यत्वचेतनत्वे विकारेषु प्रकृतिगुण-
बद विद्यते इत्यभिप्रायः ॥ १३ ॥
भावार्थ:-( यो गित्यानां नित्यश्चेतनानां चेतनो बहूना.
मेकः कामान् विदधाति ) जो नित्य जीवों वा पृथिव्यादि में
भी सर्वोपरि नित्य, चेतन नीयो में जो सर्वोपरि चेतन गो
बहुतोमें एक ही ईश्वर है वही कामनारूप संकल्प ही जिनके
निमित्त कारण है ऐसे शुभाशुभ कर्म फलों को देता भुगाता
वा निपत करता है । ( तत्कारणं साख्ययोगाधिगम्यं देव
धात्वा ) उस सबके कारण विवेकल्पातिरूप सांख्यज्ञान और
सावधानता जितेन्द्रियता रूप योग से ही प्राप्त होने योग्य
चेतन प्रकाशमय देव ईश्वरको जानकर जीव (सर्व पाशर्मुच्यत)
सब दु ख के बन्धनो से छूट जाता है ।
मा०-जिस में एकत्व, नित्यत्व, चेतनत्व, रचनाशक्ति
सर्व कारणत्व, एकाग्न धित से सिद्ध होने वाले विवेक द्वारा
पत्व, और देवत्व असीम दशा को पहुंचा विद्यमान है
उसी का नानना अगाध संसार सागरके पार पहुंचने के लिये
अच्छा सीधा उत्तम पुल बंधा हुआ है जैसे मानव शरीरादि
विकार पदार्थों में मूल कारण पृथिव्यादि के गन्धादि गुण
रहते हैं वैसे एक अपरिच्छिन्न आत्मा के ही नित्यत्त्व और
घेतनरव सब पृथिव्यादि में या जीयो में विद्यमान है ॥१३॥
न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्र-
तारकं नेमा विद्युतो. भान्ति
कुतोऽयमग्निः । तमेव भान्तम-
नुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं
विभाति ॥१४॥
२३० कृष्णयजुर्वेदीयश्वेताश्वतरोपनिषदि- अ०-तत्र तस्मिन् ब्रह्मणि न सूर्यो न चन्द्रतारक भाति नेमाः प्रत्यक्षमुपलभ्यमाना विद्युतः कार्याग्नेः कारणभूता अपि यदा भान्ति तर्हि कुतोऽयं कार्योऽगिर्भायात् । किन्तु तमेव परमात्मानं भान्तं प्रकाशयन्तं सर्वं सूर्यादि- कमनुभाति तत्प्रकाशसाहाय्यमुपलभ्यैव प्र- काशते । अर्थात् तस्य भासा दीप्त्या सर्व- मिदं सूर्यादिकं विभाति प्रकाशते सूर्यादीनां स्वतः प्रकाशनसामर्थ्यं नास्ति किन्तु परमे- श्वरएव तत्तन्नामरूपावच्छिन्नस्तेषां प्रका- शस्य मूलमस्ति ॥ भा०-यथा सूर्योदयकालानन्तरं नक्षत्रा- ण्युल्कापाताश्च दिवा सन्तोप्येवं तिरोभवन्ति यथा तदभावः प्रतीयते सर्वत्रैव सजातीयेन बलवता निर्बलसजातीयबाधनियमात् । एवं प्रकाशस्वसामान्येन सजातीयपरमात्मनि प्र- काशमयसमक्षे सर्वे सूर्यादयोऽस्तं यन्ति । अतएव ब्रह्मज्ञानोपायेषु सूर्यादेः प्रकाशस्यो- पयोगो नापेक्षते ॥ १४॥ भाषार्थ:-( सत्र न सूर्यो न चन्द्रतारक भाति ) उस पर. मेश्वर में न सूर्य न चन्द्रमा और न तारे, प्रकाश करते (नेमा
षष्ठाऽध्यायः।
२३९
विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः ) तया ये प्रत्याच धगकने वाली
विजुली जो. कार्यरूप भौतिकानि का कारण है वे भी जब
संस में प्रकाश नही कर सकती तो इस कार्यरूप अग्नि की
क्या शक्ति है जो वहा प्रकाश पहुंचावे किन्तु ( समेव भान्तं
सर्वमनुभाति ) उसी परमात्मा को प्रकाशित देख के सब
ज्योति प्रकाशित होती है अर्थात् ( तस्य भासा सर्वमिद
विभाति ) उसी के दिये प्रकाश को पाकर ये सत्र सूर्यादि
प्रकाश करते है सूर्यादि पदार्थों में स्वय प्रकाशन शक्ति नही
है किन्तु उनमें उस २ नाम रूप से विद्यमाग एक परमेश्वर
ही उनकी प्रकाश शक्ति का मूल कारण है ।
भाo-जैसे सूर्यका उदय होने पश्चात् दिनमें वहीं आकाश
माडल में विद्यमान भी तारागण तथा उल्कापात ऐसे उप
जाते या दव जाते है जिस से उन का दिन में प्रभाव ही
प्रतीत होता है सो यह सर्वत्र का नियम है कि सजासीय
बलवान् निर्वस सजानीग का सदा ही बाधक होता है।
इस प्रकार प्रकाशपन की सामान्यता प्रकाशखरूप सजा
तीय परमात्मा के सामने सब सूर्यादि का प्रकाश अप्रकाश
हो जाता है या यों कहो कि जिन योगियों के अन्त करण में
भागज्ञान के प्रकाश का उदय होता है उन को सूर्यादि का
प्रकाश फीका प्रतीत होने लगता है। इसी लिये ब्रह्मज्ञान
के साधन वा सपायों में सूर्यादि के प्रकाश की अपेक्षा नहीं
मानी गयी है ॥ १४ ॥
एको हंसो भुवनस्यास्य मध्ये
सरावाग्निः सलिले सन्निविष्टः ।
तमेव विदित्वातिमृत्युमेति नान्यः
पन्था विद्यतेऽयनाय ॥१५॥
कृष्णायजुर्वेदीयश्वेताश्वतरोपनिषदि- अ=अस्य सर्वस्य भुवनस्य ब्रह्माण्डस्य मध्ये एकएव हंसोऽविद्यादितमो हत्या निर- तिशयतया विविक्तःसएषाग्निरविद्यादिदाहको भूत्वा सलिले देहात्मना परिणते मानुषादि- शरीरे यद्वा यज्ञदानादिना शोधिते सलिल- वत्स्वच्छेऽन्तःकरणे सन्निविष्टो जलेऽग्निरिव प्रविष्ठस्तत्तद्रूपएव वर्तते तमेवैकं विदित्वा जीवो मृत्युमत्येति । अयनाय परमपदाप्त- योन्यः पन्था न विद्यते ॥ भा०—अग्नितत्त्वादिष तत्तदाकारणाव-. स्थितस्य यस्येश्वरस्य सर्वदाहकत्वं प्रकाश- कत्वं हंसत्वं विवेचकत्वं च निरतिशयं काष्ठां प्राप्त तस्यैव बोधो मोक्षस्य सर्वदुःखप्रहा- णस्य हेतुरस्ति ॥ १५॥ भाषार्थः-( अस्य भुवनस्य मध्य एको हंसः) इस अनन्त अलाहके बीच एक ही विद्यादि अन्धकार सर्वथा नाशक था सब का सर्वोपरि विवेचक है ( एवाग्निः सलिले सकि. विष्टः) वही अविद्यादि का दाहक दोषों को सर्वथा नष्ट करने वाला अग्नि हो कर जलसे पृथिवी भोषधि अन्न और शुक्र द्वारा परिणाम को प्राप्त हुए मनुष्यादि के शरीर में वा यादानादि के द्वारा स्वच्छ जलके तुल्य भन्तःकरण में प्रवेश करके जल में अनिके तुल्य उसी २ के रूप से विद्यमान है (तमेव विदित्वा मृत्युमत्येति ) उसी को जान कर जीव षष्टाध्याय मृत्युरूप ग्राहके भय से बच सकता है ( अयनायान्यः पन्था न विद्यते) परमपद मासिके लिये अन्य कोई मार्ग नही है। भा-अग्न्यादि तात्री उस २ के रूपसे विद्यमान निस ईश्वर के सबको जलाने की शक्तिरूप अग्निपन प्रकाशकता और ईसरूप विवेचन शक्ति ये सब गुण निरतिशय पसीम- रूप से हैं उसी का जानना सब दुःखों से छूटने का मुख्य स विश्वविश्वविदात्मयो- निर्जः कालकालो गुणी सर्वविद्यः। प्रधानक्षेत्रज्ञपतिर्गणेशः संसार- मोक्षस्थितिबन्धहेतुः ॥ १६ ॥ अ०-स विश्वकृत्सर्वस्य कर्ता स्रष्टा विश्व- वित्सर्वस्य वेत्ता-आत्मा सर्वान्तर्यामी सर्वस्य योनिः कारणं ज्ञो ज्ञानस्वरूपः कालस्यापि कालः कर्ता वा शुद्धत्वादिगुणवान् सर्ववित् सर्व विन्दति प्राप्नोति । प्रधामक्षेत्रपतिः प्रकृ- तिविज्ञानात्मनोः पालकः । सत्त्वादिगुणाना- मीशः संसारः प्रवाहप्रवृत्तिर्मोक्षो निःश्रेयसा- धिगमः स्थितिः प्रलयो बन्धो देहेन्द्रियादि- मिर्जीवस्य सम्बन्धः सर्गस्तेषां हेतुः कारणम् ॥ भा०-यतः सएव संसारमोक्षादिदशानां हेतुस्तस्मात्तस्यैव शरणगतस्तमेव विदित्वाऽ- ।
२३४ कृष्णयजुर्वेदीयश्वेताश्वतरोपनिषदि- पारसंसारसमुद्रपारं भवितुं शक्नोति नान्यः कश्चिदुपायोऽस्ति ॥ १६ ॥ भाषार्थ.-(स विश्वकृद्धिश्वविदात्मयोनि.) पद सब का स्रष्टा सब का ज्ञाता सर्वान्तर्यामी प्रेरक तथा सब का कारण (ज्ञः कालकालो गुणी सर्वविद्यः) जो कि ज्ञानस्वरूप काल का भी अन्त करने वा रचने वाला शुद्धत्व निष्पापस्वादि गुण युक्त तथा सब को सदा प्राप्त है (प्रधानक्षेत्र पतिर्गुणेश.) प्रकृति और बुद्धिगत चिदाभासरूप जीव का पालक रक्षक, सत्त्वादि गुणों का स्वामी और ( संसारमोक्षास्थितिबन्धहेतु.) प्रवाहरूप से जगत् की प्रवृत्ति, मोक्षप्राप्ति, प्रलय और उत्पत्ति का कारण है। भा०-जिस कारण बद्दी बन्ध मोक्षादि दशाओं का हेतु का धर्ता है इस से विज्ञानात्मा जीव उसी के शरणागत हुमा उसीको जानकर अपार संसार समुद्र के पार हो सकता है किन्तु विपत्तियोसे बचनेका अन्य कोई उपाय नहीं है ॥१६॥ स तन्मयो एमृत ईशसंस्थो ज्ञः सर्वगो भुवनस्यास्य गोप्ता। य ईशेऽस्य जगतो नित्यमेव नान्यो हेतुर्विद्यते ईशनाय ॥१७॥ अ०-यो ज्ञो ज्ञानस्वरूपः सर्वगः सर्व- व्याप्तोऽस्य सर्वस्य ब्रह्माण्डस्य गोप्ता रक्षक- स्तन्मयो तत्तद्वस्तुनि तत्तन्मयो ज्योतिर्मयो वाऽमृतो मरणरहित ईशे प्रधानत्वमापन्ना- २३५ बष्टाध्यायः। स्वैश्वर्यवतीषु राजादिविभूतिषु विशेषेण यः संतिष्ठते स ईशसंस्थ एवंभूत एवास्य सर्वस्य जगतो नित्यमेवेशे नियन्ता भवति । नाना- विभूतिरूपावस्थितिमन्तरेणान्यो हेतुरीशनाय न विद्यते। भा०-यदि परमेश्वरः सर्वमयोऽविनं- श्वरो ज्ञानस्वरूपः सर्वत्र व्याप्तश्चराचरस्य रक्षको राजादिरूपनानाविभूतिपु विशेपेणा- वस्थितो न स्यात्तदा सर्व ब्रह्माण्डं स्ववशे स्थापयितुमपि न शक्नुयात् । किन्तु सर्वमय- स्वादिनैव सर्वनियन्ता भवति ॥ १७ ॥ भाषार्थ:-( यो ज्ञः सर्वगोस्य भुवनस्य गोप्ता) जो जानस्वरूप सर्वव्यास इस सब ब्रह्मारहका रक्षक (स तन्मयो मृतईशसंस्थ ) वह उस २ अाकाशादि पदार्थ में उसी २ के रूप से विद्यमाग अथवा ज्योतिःस्वरूप मृत्यु से रहित इस २ समुदाय में प्रधानता को प्राप्त ऐश्वर्य वाली राजादि विभतियों मे विशेषरूप से अवस्थित ऐसा रहता हुआ ही ईश्वर (भस्य जगतो नित्यमेवेशे) इस जगत् का नित्य ही नियन्ता अपने नियम में चलाने वाला होता है किन्तु ( ईशनायान्यो हेतुर्न विद्यते ) अनेक विभूतियों में विशेषरूप से अवस्थित रहने आदि से भिन्न सर्वनियन्ता होने के लिये अन्य कोई हेतु नहीं है अर्थात् गीतामें लिखा है कि मै ईश्वर मनुष्यो में राणा, मृगों मे सिंह हूं, इत्यादि ॥ कृष्णयजुर्वेदीयश्वेताश्वतरोपनिषदि- प्रत्येक समुदाय में प्रधानरूप से ईश्वर ही विद्यमान रहता हुमा नियन्ता होता है। भा०-यदि परमेश्वर सर्वमय, अविनाशी, ज्ञान स्वरूप, सब में व्याप्त, चराचर का रक्षक और राजादि रूप अनेक विभूतियो में विशेष रूप से अवस्थित न होता तो सव ब्रह्मायड को अपने वश में नहीं रख सकता इस कारण सर्व- मय होने भादि कारण से ही सर्वनियन्ता हो रहा है ॥२७॥ यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्व यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै । तह देवमात्मबुद्धिप्रकाशं मुमु- क्षवै शरणमहं प्रपद्ये ॥१॥ अ०-यः परमेश्वरः पूर्व प्रत्येकसारम्भे सर्ववेदान ज्ञातुं योग्यं पुरुषविशेषं विदधाति सृजति । यस्तस्मै वेदांश्च प्रहिणोति प्रगमयति प्रकर्षणान्यादिद्वारा प्रापयति तमेवात्मबुद्धि प्रकाशं स्वस्य सूक्ष्मातिविशारदबुद्धिद्वारैव प्रकाशो बोधो यस्य भवति तादृशं देवं द्यो. तनशीलमीश्वरं शरणं सर्वाश्चयभूतं मुमुक्षुधं मुमुक्षुः सववाहं प्रपद्ये प्राप्नोमि । भाo-मामपि स ईश्वरो ब्रह्मक् वेदतत्त्व ज्ञानपात्रं कुर्यात्तस्य शरणागत्या वेदतत्त्वं
२३७
घष्टाध्याय ।
यो सन्नेव
मुमुक्षुः
ज्ञातुं योग्योऽहं भवेयम्।
त सर्वस्य शरणं प्रपित्सते तस्यैव तत्सम्ब-
न्धेन शुद्धा सूक्ष्मा च बुद्धिस्तस्य प्रकाशिका
बोधिका भवति सत्यामेव च तादृशमनीषा-
यां वेदस्य मर्म ज्ञातु स शक्नोति तस्मान्मु-
मुक्षुणा सतैव पुरुषेणसआश्रयितव्यइति ॥१८॥
भाषार्थ (म पूर्व ब्रह्माण विदधाति) जो परमेश्वर
प्रत्येक कल्प सृष्टि के प्रारम्भ में सब वेदो को जानने की
योग्यता रखने वाले ब्रह्मा नामक पुरुष को रचता (यो
वै तस्मै बेदाच महिणोति) तथा जो हो ईश्वर उस ब्रह्मा के
लिये वेदो को ममि भादि के द्वारा अच्छे प्रकार पहुचाता
है (प्रात्मबुद्विप्रकाश तर शरण देवम् ) अपनी प्रति
भुद्ध निर्मल बुद्धि द्वारा ही जिस को मनुष्य जान सकता है
उसी प्रसिद्ध सब के मात्रयरूप प्राधार शरण लेने योग्य देव
प्रकाशमय ईश्वरको (मह मुमुक्षु प्रपद्ये ) मै ससारके भगाध
दुसो से कूटने की पडा रखता पुमा ही प्राप्त होता हू॥
भाo-मुझ को भी वह ईश्वर वेद का तत्व जानने योग्य
करे उस की शरणागति द्वारा वेद के तत्व को जानो योग्य
मैं दोक । इस प्रकार जो दुखो से छूटने की इच्छा रखता
हुभा ही उस सबने प्राय [भासरे] को प्राप्त होना
चाहता है उसी की, ईश्वरोपासना द्वारा सून निर्मल हुई
बुद्धि सस को जताने प्रकाशित करने वाली होती और वैसी
बुद्धि होने पर ही मनुष्य वेद का मर्म जान सकता है
इस से मुमुक्षु होकर ही मनुष्यको ईश्वरका शरण लेना
चाहिये ॥१८॥
२३८ कृष्णयजुर्वेदीयश्वेताश्वतरोपनिषदि- निष्कलं निष्क्रियर्थशान्तं निरवद्यं निरञ्जनम् । अमृतस्य परसेतुं दग्धेन्धनमिवानलम्। अ०--अथ तस्य निर्गुणं स्वरूपमुच्यते निष्कलमंशांशिभावरहितं निष्क्रिय निर्विकारं शान्तमचलं कूटस्थं निरवद्यमनिन्द्यं निरञ्जन निष्कलङ्कं दग्धेन्धनानलमित्र सर्वधा शुद्ध- ममृतस्य परं सर्वापेक्षया प्रकृष्टं सेतुं शरणं मुमुक्षुः सन्मेवाहं प्रपद्यइति पूर्वपद्येन साक- मेवान्वयः॥ भा०-वस्तुतो निरवयवादिरूपस्यैव परमात्मनो ध्यानं बोधः शरणागतिश्चापार- दुःखसमुद्रापारगमनाय यादृशंप्रधानं साधनं न तादृशमन्यत्सम्भवति सर्वस्थूलवस्तुषु तत्त- दाकारेण साकारे सगुणेऽपि तस्य वास्तव निर्गुणं स्वरूपं ध्यायेदित्यभिप्रायः ॥१६॥ भाषार्थ:- :-अम परमेश्वरका निर्गुण स्वरूप कहा जाता है ( निष्फलं निष्क्रिय शान्तम् ) शशिभाव और क्रिया से होने वाला विकार जिस में नही ऐसे शान्तिमय अचल कूटस्य सदा एकरस (निरवयं निरञ्जनम् ) जिस में कोई अवगुण न होगे से किसी को ग्लानि नही होती सब कलंकों बष्ठाऽध्यायः २९ से रहित ( दग्धेन्धनमिधानलम् ) इंघन के जलचुकने पर जिस का धुश्रां मिट गया हो ऐसे अग्नि के समान सर्वधा शुद्ध ज्योतिः स्वरूप { अमृतस्य परं सेतुम् ) और महाभयङ्कर मरसादि सम्बन्धी दुःखसागर के पार होने के लिये सर्वोपरि सर्वोत्तम पुल सप को मुक्ति की इच्छा रखता हुमा ही मैं प्राप्त होऊ या पूर्वपद्य के साथ मेल वा अन्यय इस का भी जानो। भा०-वस्तुतः निरवयवादि रुप ही परमात्मा का मानना, ध्याग करना या उसका शरण लेगा अपारदुःखसा. गर से पार होने के लिये जैसा बहा मुख्य साधन है वैसा अन्य कोई साधन नही हो सकता अर्थात् स्थूल पदार्थों में उस र के रूप से विद्यमान "सगुण साकार परमेश्वर में भी उस के वास्तविक निर्गुण स्वरूप का चिन्तन करै ॥१॥ यदा चर्मवदाकाशं वेष्टयि- ष्यन्ति मानवाः । तदा देवमवि- ज्ञाय दुःखस्यान्तो भविष्यति॥२०॥ अ०-यदा यस्मिन् स्थूलसर्गाभावकाले प्रलये चर्मवत्संकुचिताः सन्तो मानवा जीवा आकाशमविच्छिन्न शून्यदशापन्नमिव प्रकृ- त्याख्यं तत्त्वं वेष्टयिष्यन्ति तदाश्रयं करि- ध्यन्ति तदा देवमीश्वरमविज्ञाय स्थूलदेहेन्द्रि- यभोग्यस्य दुःखस्य प्रलयावधि सापेक्षोऽन्तों नाशो भविष्यति ॥
कृष्णयजुर्वेदीयश्वेताश्वतरोपनिषदि-
भा०-प्रलयकाले रात्रौ स्वप्नावसरइव
मूर्छितोन्माददशायामिव वा स्थूलदेहसम्ब-
द्वानां विषयेन्द्रियसंनिकर्षीत्पन्नानां च दुःखा-
नामभावो जायते । तदानीं जातेऽपि दुःखा-
भावे परमात्मज्ञानप्रकाशाभावादानन्दानुभयो
न जायते । तस्मानासौ मुक्तिसुखे परिगण-
नमर्हति ॥
'भाषार्थ:-( यदा चर्मवन् मानवा भाकाशम्) लब स्थूल
सृष्टि के न रहने पर प्रलय के समय अग्नि में चामके समान
संकुचित हुए मानव नाम जीवात्मा प्रकाश तुल्य
भवि.
च्छिन्न शून्य दशा को पहुंचने के तुल्य हुए प्रकृति वा माया
नामक तथ्य का ( वेष्टविष्यन्ति ) पाश्रय करेंगे अर्थात् स्थूल
शरीरादि के न रहने पर माया के अवलम्बसे जब जीव ठह-
रंगे ( तदा देवमविज्ञाय दुःखस्यान्तो भविष्पत्ति ) तष
काशमय अपने वास्तवस्वरूप ईश्वरको न जाम कर भी
शरीर और इन्द्रियों से भोग में भाने वाले दुःखों का प्रलय
समय तक के लिये सापेक्ष नाश हो जावेगा।
भा-रात में भराभर सोते समय के समान वा मूर्षित
उन्माद ( वेहोश ) दशा के तुल्प स्थूल शरीरसे सम्बन्ध रखने
वा विषय और इन्द्रियों के संयोग से प्रतीत होने वाले दुःखों
का प्रलयके समय प्रधाव हो जाता है । तब दुखों का प्रभाव
होने पर भी अपने असली स्वरूप ईश्वर का मोध न होने
अर्थात् ईश्वर के सम्बन्धका ज्ञान प्रकाश न होने से मानन्द
का अनुभव नहीं होता इसी से मुक्ति मुख में उस को नही
गिन सकते ॥२०॥
षष्टाध्याया।
२४१
तपःप्रभावादेवप्रसादाच्च ब्रह्म-
ह श्वेताश्वतरोऽथ विद्वान् ॥ अ-
त्याननिभ्यः परमं पवित्रं प्रो-
वाच सम्यगृषिसङ्घजुष्टम् ॥२१॥
अ०-बहिरन्त करणानां वशीकरणेन द्वन्द्वस-
हनशत्तिरूपात्तपसईश्वरप्रसादाच्च ब्रह्म विद्वा-
नात्मतत्त्वं विजानन् श्वेताश्वतरोऽध खानु-
भवदृढत्वानन्तरमृषिसघजुष्टमृषीणां मह-
र्षिब्रह्मर्षीणां समूहेनानन्तसुखावाप्नये जुष्टं सेवितं
परमं पवित्रं ब्रह्मात्यानमिभ्यः पूज्यप्रशस्ता-
श्रमवासिभ्यस्तपस्विभ्यः संन्यासिभ्यः सम्यक
प्रोवाच॥
भा०-तपसआधिक्याट्टीर्घकालनरन्तर्य-
सत्कारासेवितादीश्वरप्रणिधानविशेषाच्च स-
र्वदा सर्वएव जनो ब्रह्म ज्ञातुमर्हति । यश्न
सम्यक्तया यज्जानाति सएव तदन्यस्मै वक्तं
शक्नोति च तस्माद् ब्रह्मजिज्ञासुना प्रवलं तप.
ईश्वरप्रणिधानं च दीर्घकालावधि अंडया
निष्ठया तत्परतया च कार्यम् ॥ २१ ॥
कृष्णयजुर्वेदीयश्वेताश्वतरोपनिषदि- भाषार्थः-(तपःप्रभावाद्देवप्रसादाच्च ब्रह्म विद्वान् इश्वेता. श्वतरः) बाहर भीतरके इन्द्रियोंको वशीभूत करने द्वारा शीतो. वणादि सहन रूप तप बरासे और ईश्वरकी प्रसन्नता वा कृपा मात्मतत्व को जानते हुए श्वेताश्वतर नामक प्रसिद्ध तपस्वी ऋषिने ( अथ ऋषिसच जुष्टं परम पवितम् ) अपने अनुभव रूप धान को दृढ़ करने पश्चात् ब्रह्मर्षि महर्षियो के समुदाय ने अनन्त सुख प्राप्तिके लिये सदा जिसका सेवन किया है ऐसे परम पवित्र आत्मस्वरूप का ( प्रत्याश्रमिभ्यः सम्यक् मोवाच ) अत्यन्त पूगनीय तपोवन के निवासी परमहंस सं. न्यालि तपस्त्रियोके लिये सम्यक वर्णन वा उपदेश लिया । भाग-दीर्घकाल तक श्रद्धा वा सादर के साथ सेवन किये भधिक प्रबल तप से तथा तन मन धन लगाके अधिक काल तक श्रद्धा के साथ निरन्तर की परमेश्वर को विशेष भक्ति से सब काल में सभी मनुष्य आत्मतत्त्व जान सकते है। जो मनुष्य सम्यक प्रकार से जिस को जान लेता है, वही अन्य को उपदेश द्वारा जता सकता है । इसलिये भात्मतत्व के जिज्ञासुको इन्द्रिय निग्रह पूर्वक उग्र तप और ईश्वर भक्ति विशेष समारोह से करनी चाहिये ॥ २१ ॥ वेदान्ते परमं गुह्यं पुरा कल्पे प्रचोदितम् । नाप्रशान्ताय दातव्यं नापुत्रायाशिष्याय वा पुनः ॥२२॥ यस्य देवे परा भक्ति- र्यथा देवे तथा गुरौ । तस्यैते षष्ठाऽध्यायः २४३ कथिता ह्याः प्रकाशन्ते महा- त्मनः। प्रकाशन्ते महात्मनः॥२३॥ इति श्वेताश्वतरोपनिषत्समाप्ता ॥ अ०-वेदान्तउपनिषत्सु ब्रह्मर्षिभिर्विदि- तवेदितव्यः परावरज्ञैः पुराकल्पे पूर्वेऽति- प्राचीने सारम्भकाले परमं गुह्यं गोप्या- नामपि गोप्यतममात्मतत्त्वं प्रचोदितं प्रोक्तं तदप्रशान्तायापुत्रायाशिष्याय वा पुनर्न दात- व्यम् । नास्ति शिष्यः पुत्रश्वाऽस्य यश्च शास्तुं योग्यो नास्ति तादृशायोभयस्मै न देयमपि तु देवईश्वरे यस्य परा भक्तिर्यथेश्वरे तथैव गुरौ यस्य भक्तिः श्रद्धाऽचाञ्चल्यमनन्यमन- स्कता चास्ति । अथवा गुरुरूपेणावतीर्णमी- श्वरं स्वगुरुविग्रहं यो मन्येत । श्वेताश्वतरण महात्मना कथिता एतस्यामुपनिषद्युक्ता अर्थास्तस्य महात्मनः प्रकाशन्ते तेनं सम्य- ग्विज्ञायन्ते ॥ भा-निवातप्रदीपवद्विषयवायुनाऽचलि- तरागद्वेषरहितचेतसा यादृशो विषयमर्माव- कृष्णयजुर्वेदीयश्वेताश्वतरोपनिषदि- घिविचारः सम्यग्जायते न तादृशश्चलचित्ते. नेति यश्चाप्रशान्तोऽपुत्रोऽशिष्यो वा नाऽसी शास्त्रस्य मर्म ज्ञातुं शक्नोति । यथा दुष्ठसङ्गेन दोषा आयान्त्येवमध्योपनादावप्रशान्तादि- सङ्गेनाशान्त्यादिदुःखहेतुदोषागमनसम्भवः प- रित्रमानर्थक्यं तु दोषोऽरत्येवातस्तादृशेभ्यो महाविद्यादानं प्रतिषिलु शान्तिनद्वादिगुणा. न्विताय च दानमुत्तममिति सर्वमवदातम्॥२३॥ भाषार्थ -(पुरा कल्पे वेदान्ते परमं गुह्य प्रचोदितम् ) पूर्व बीते शतिप्राचीन सारम्भ काल मे वेद के सिद्धान्तरूप उपनिषदो के बीच पूर्वापर के जानने वाले साक्षात् प्रबल शानी ब्रह्मर्षि लोगो ने ईश्वर सम्मन्धी अत्यन्त गूढ विषय कहा है जिस को सर्वसाधारण लोग सहज मे नही समझ सकते इसीलिये ( नामशान्ताय नापुत्रायाशिध्याय वा पुन- दातव्यम्) जिस को शान्ति वा लोभादि निवृत्ति द्वारा बैराज्य नही हुमा (लोभी-तृष्णा को नदी में बहने वाला काली शान्त स्थिर स्वस्य नहीं रह सकता] वा शिस के पुत्र न हो वा जो किसी का पुत्र न हो अर्थात् व्यभिचार से उत्पन्न होने के कारण जिस का पिता कोई खास न हो- ऐसे को तथा जो धर्मनिष्ठ सभ्य गुरुभक्त मनुष्य नहीं ऐसे को वेदान्तका उपदेश न देवे। परन्तु (यस्य देवे पराभक्तिर्यथा देवे तथा गुरौ) जिस योग्य श्रद्धालु शिष्यको भनेक देवता रूपधारी परमेश्वर से प्रबल भक्ति हो और जैसी ईश्वर में वैसी ही भक्ति गुरके शरीर में हो वा गुरुको जो ईश्वरका अवतार ही वष्टाध्यायः। २४५ मानता हो गितेन्द्रिय हो लोभ लालच रहित हो ( कपि. ताएतेऽर्यास्तस्य महात्मनः प्रकाशन्ते महात्मनः प्रकाशन्ते ) इस उपनिषद् में श्वेताश्वतर महर्षि ने कहे ये विषय उसी ईश्वरभक्त गुरुभक्त महाशय के हृदय में प्रकाशित होते उसी महात्मा के हृदय में प्रकाश उत्पन करते हैं। भार-वायु रहित स्थान में रक्खे हुए जलते दीपक के तुल्य काम क्रोध लोभादि विषयवायु से न हुलाये हुए चित्त से जैसा सूक्ष्म विषय का मर्म पर्यन्त विचार वा बोध हो सकता है। वैसा पञ्चग चित्त से कदापि नहीं होता। इसी कारण को प्रशान्त अपुत्र और अशिष्य है वह शास्त्र के मर्ग को कदापि नहीं जान सकता। जैसे दुष्ट के सच से दोष लगते हैं वैसे ही उपदेश वा पढ़ाने भादि में प्रशान्तादि के सङ्ग से ज्ञानीको दुःख कष्ट वा दोष लगे यह सम्भव है और परि- श्रम का व्यर्थ होना भी दोष ही है इसलिये वैसोको विद्या दान करना निषिद्ध किया है । और श्रद्धालु महाशय गम्भीर शान्त सुशील को विद्या देना उत्तम है ॥ २३ ॥ इति ब्राह्मणसर्वस्वमासिकपत्रसम्पादकेन भीमसेनशर्मणा निर्मिते श्वेताश्व- तरोपनिपदभाष्ये षष्ठोऽ- ध्यायो ग्रन्थश्चायं समाप्तः॥
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ब्रह्मप्रेस इटावाकी सर्वोत्तम पुस्तकें आर्यमतनिराकरणप्रश्नावली। सनातनधर्म सज्जनों को विपक्षियों से शास्त्रार्थ और शंकासमाधान करने के लिये जैसी पुस्तक की आवश्यकता है यह वैसी ही पुस्तक है इसका प्रथम संस्करण छपते ही छूगन्तर हो गया था, मांगों की भरमार देखकर इस का द्वि. त्तीय संस्करण छपाना पड़ा अब इस में प्रश्नों की संख्या भी अधिक बढ़ा दी गई है । प्रश्नों की संख्या अब ४० सौ से. ऊपर पहुंच गई है इस पुस्तक को हाथ में लेकर भाप भायं. समागियो के कहर से कहर परिहत को वात की बात में पहाड सकते हैं, इस में जो प्रश्न कापे गये हैं उनका जवाब आर्यसमाजी एक जन्म में तो क्या सात जन्मों में भी नही दे सकते मूल्य सिर्फ 1) दयानन्दमतविद्रावण । यह पुस्तक भी प्रार्यसमानियों के मुख्य ग्रन्थ सत्यार्थ प्रकाश के खरडन में मनापी गयी है पुस्तक की भाषा बही रोचक और दिलचस्प है इसमें जिस खूनसूरती के साथ पोहे ही में सत्यार्थप्रकाश की कोसालेदर की गई है वह देखने योग्य है पुस्तक देवरी नि० सागर निवासी ला० भवानीम. साद नम्बरदार की बनाई हुई है सिर्फ) पाना है। भास्कराभासनिवारण । भार्यसमाजियो के मुख्य ग्रन्प सत्यार्थप्रकाश का साहन जिस खूबसूरती के साथ मुरादाबाद निवासी पं० ज्वालाम- साद जी मित्र ने किया है वह किसी से छिपा नहीं है पर यह देखकर किसे शोक न होगा कि ऐसी उपयोगी पुस्तक का खबहन भी मेरठ के समाजी पं तुलसीराम जी ने करने का
दुरसाइप किया था इसमें स्वामी तुलसीराग के बनाये सी
भास्करप्रकाश की आलोचना की गयी है यद्यपि प्रम मे
पूरे भारगकाश का स्वपडा नही है तथापि जितना चिरा
गया है मतगे से यह बात पाठको को विदित हो जाती
कि प० तुमनीराम ने अपनी पुस्तक में किस चालातो से
काम निया है और किस तरह की परस्पर विरुद्ध वाते
लिखी है हम भास्करप्रकाश के पूरे २ खसहन को एक पुस्तक
शोध छपाने के उद्योग मे हैं तब तक पाठको को इस से
सन्तोष करना चाहिये । सू०१८)
विधवाविवाह मोमांसा।
इस पुस्तक मे विधवा विवाह की मालोचना की गई
है जगत्प्रमिद्ध प. भीमसेन जी शर्मा की लेखनीकी करामात
कौन नहीं जानता, विधवा विवाह के बारे मे विपक्षियोको
शङ्का शो का निराकरण करके शास्त्रों की ठीक २ घ्यवस्था
लगाने वाला यह पुस्तक अपने ढग में एक ही है। इस में
सीन प्रकरण है १-वेदगन्नार्थप्रकरणम् । इस मे विधवाधि
बाह और नियोग के पक्ष मे जितने वेदमन्त्र आर्यभमाजी
शादि विधर्मी पेश करते है उन सब का भाष्य करके सिद्ध
कर दिया गया है कि वेद में कहीं भी विधवा विवाह या
गियोगका गन्ध नही है, दूसरा प्रकरण स्मृतिप्रमाण व्यवस्था
पर इस मे स्मृति सम्बन्धी प्रमाणों की मालोचना है तो
सरा यौक्तिक प्रकरण है इस में जो दसोले विधवाविवाह
के विषय में विपक्षी पेश करते है उन का समाधाग है
इस बार के एडीशन में कई एका भव्य प्रमाण जो विपक्षी
पेश करते है उनका सगाधान भी किया गया है । मूल्य =)
पता-मैनेजर ब्रह्मप्रेस इटावा।
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पुस्तकोंका सूचीपत्र * ५-ब्राह्मणसर्वख मासिकपत्र पिछले भाग, (तीसरे भागसे १२वें। भाग तक के सेट मौजूद है ) प्रति भाग का १॥) एकसाथ सब भाग लेने पर १०) अष्टादश स्मृति हिन्दी भाषा टीका सहित ३) भगवद्- गीता भै टो०२॥) याज्ञवल्क्यस्मृति सटीक ११) अष्टाध्यायीपाणि- नीय सटीक सोदहरण २) ईशोपनिपद् सभाष्य है) केनोपनिषद् सभाष्य १) प्रश्नोपनिषद् सभाष्य ॥) उपनिषदों का उपदेश (प्रथम खण्ड ) ११) द्वितीय खण्ड १) सतीधर्म संग्रह ।) पतिव्रता- माहात्म्य )॥ भर्तृहरि नीतिशतक भा० टी० ७) भर्तहरि वैरा- ग्यशतक छ) भर्तृहरि शृङ्गारशतक ) दर्शपौर्णमासपद्धति १) इष्टिसंग्रह ॥) मानवगृधसून ॥) आपस्तम्बगृधसूत्र ।) यज्ञपरिभाषा- सूत्रसंग्रह ॥) पञ्चमहायज्ञविधि ) भोजनविधि )॥ सन् योपा. सनविधि )॥ कातीयतर्पणप्रयोग ) नित्यहवनविधि)॥ वेदमार शिवस्तोत्र )। दयानन्दमतविद्रावण ।) आर्य्यमतनिराकरणप्रश्ना- वली ।) आश्वमेधिकमन्त्रमीमांसा ) सत्यार्थप्रकाशसमीक्षा ) पञ्च- कन्याचरित्र) विनावित्रामीर्मासा ।) मूर्तिपूजामण्डन) उनठन ॥ बावृष) दयानन्दको विद्वत्ता )॥ नमस्ले मीमांसा )॥ सनातनधर्मप्रश्नो. चरावली ) प्रमग्न)। गोरत्न) भजन बिनोद)॥ रम्भाशुकसम्बाद सचित्र १) पुराणकत्त मीमांसा )॥ जैनास्तिकत्वविचार )॥ दुनिया की गति )। गीतासंग्रह 1 ) योगसार ।) कर्तामण्डन )। विधवोद्वा- हनिषेध)। सुमनवाटिका ) रामगीता) रामहदय ) आदर्शर- मणी ।) छन्दोबद्ध अंगरेजी हिन्दी वल्लभ कोष ॥) अंगरेजी हिन्दी च्यापारिक कोष २) हनुमानचालीसा )॥ राम्चान्दीग )। उश- रत्नमाला )| धर्मरक्षा और भारत विनय )। साङ्गीतगोरक्षा)। भज- नरनावली -) त्रैभाषिक व्याकरण शब्दावली 1) शिवाजी और मरा- ठाजानि ।।) गुरुगोविन्दसिंह ।) अभिमन्युवध की यूनान की कहा- नियां) आर्पकृषिविज्ञान !) भारतीय आख्यान ) हिन्दुओ का सामाजिक आदर्श ) मूर्तिपूजा (पं० अम्बिकादत्त व्यासरत ) ॥l) अवतारमीमांसा ॥) अक्षविज्ञान १) मैनेजर ब्रह्मप्रेस इटावा
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