Adarsh Library, Jaipur

Gariahat Ke Paul Par Ve Dono

Shodh Gorkishore · 2011/03

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गरियाहाट के पुल पर वे दोनों

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गरियाहाट के पुल पर वे दोनों
गौरफिशोर घोष
हिन्दी रूपान्तर
वगत माहपर
राधाकृष्ण

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अरुणकुमार सरकार
वीरेन्द्रनाथ चक्रवर्ती
अपने दो प्रिय कवि एवं मित्रों को।

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...
प्रस्तावना... 9
वह घोर उसका संसार... 13
केया और उसके वर्तमान का एक टुकड़ा... 20
पली के निकट उसकी मांगों की सूची... 22
उसको एक क्षण की स्वगतोक्ति...24
मीनू, लाल सिग्नल और उसका घरोंदा... 24
लाल सिग्नल के प्रति मीनू की स्वगतोक्ति... 28
पुल के ऊपर वे दोनों... 30
यजेश्वर का राजसूय और उसकी वर्ग चेतना (उसकी जवानी). 32
एक मनोरजक नाटक और उसके पात्र... 36
बाद की पंगत की उम्मीद मे वे और बहुत-से लोग... 37
लाल सिग्नल के प्रति मीनू की स्वगतोक्ति... 43
उस दिन के नाटक मे मीनू और दूसरे लोग... 44
उस दिन के भोज में उसको कुछ सुखद जानकारी... 48
शादी के घर आने के पहले शची का संकल्प... 53
केया और उसका (मन-ही-मन) कथोपकथन... 56
पुल के ऊपर दोनो : गृहस्थी को चिन्ता... 57
उसके पागलपन की लम्बी कैफियत... 60
मोनू की तत्कालीन अस्तव्यस्तता... 65
यज्ञेश्वर की निजी समस्मा...
१३

:
वह और केया : सभा-मंच पर... 77
मृत ससुर के साथ उसका कथोपकथन... 84
वादलों के वेड़े पर वह और मीनू... 86
उसकी एक क्षण की स्वगतोक्ति... 90
समाज की जटिलता... 90
हैवलॉक एलिस, कामसूत्र और मार्क्स : क्या राह ?... 92
यज्ञेश्वर की यौन-शिक्षा...101
पुल पर वह, मीनू मोर वे...103.
शची की शेष वात : एक अपनी तसवीर...106
गरियाहाट के पुल पर वे दोनों...115
मीनू का छोटा-सा प्रश्न...118
और वे भी हिले...118
एक अत्यन्त करुण नाटक का अन्तिम दृश्य...119
मीनू को कई ज़रूरी उपदेश...120
शोक-यात्रा का विवरण...125
उसी रात क्या हुना?...126
उपसंहार...133

प्रस्तावना आंखें खोलते ही मुझे लगा कि मुझे कोई कष्ट नहीं है। सारा शरीर महमा ताजा और हलका हो आया था। खुली हुई खिड़की से बाहर की ओर दृष्टि गमी । एक दिव्य प्रकाश की आभा से सारा कुछ बहुत ही सुन्दर लगा। धीमी हवा वह रही थी जो न तो ठंडी थी और न गरम । तरह-तरह के रंगो के फूल खिले थे। पक्षियों को भी आज कोई कष्ट नहीं था। उनके चहचहाने के साथ मेरे स्नायु-तंत्र ऐसी आश्चर्यजनक सीमा तक एकात्म हो रहे थे कि लग रहा था कि मैं इसका अन्यस्त हूं। लेटे रहने की जरा भी इच्छा न हुई । लगता था कि अभी जन्म लिया हो.~~-इस तरह का हलका और ताजा भरीर लेकर मैंने उम दिव्य प्रकाश के प्रवाहित पथ पर निकल पड़ना चाहा। उभी समय मानो कोई बोला, 'तुम फिर लौटोगे नहीं ?' मैं पाश्चर्य में पड़ गया, 'कहाँ ?' वह बोला, 'वयों, अपने में ?' मैं जब तक उनर कि युधिष्ठिर वोले, "पितामह, देव और पुरुषार्थ -इन दोनों में कौन श्रेष्ठ है ?" 'ए ! कही कोई मूर्ख की तरह बोल उठे और उनके कयोपकथन मे विध्न न पड़े, इमीलिए ओंठों पर उंगली लगाकर अस्फुट मन्द उच्चारण कर मैंने चुप रहने को कहा। इस मौलिक प्रश्न का उपयुक्त उत्तर सुनने की उत्तेजना भै भैरा कलेजा परथर कांपने लगा था।

10 गरियाहाट के पुल पर वे दोनों - भीष्म बोले, 'इस सम्बन्ध में संसार के पितामह ब्रह्मा ने वसिष्ठ से जो कहा था, वह सुनो : कृपक अपने खेत में जैसा वीज डालता है वैसा ही फल उत्पन्न होता है। मनुष्य भी अपने सत्कर्म और असत्कर्म के अनुसार विभिन्न फल प्राप्त करता है। जमे खेत के वाहर फल पैदा नहीं होता, पुरुषार्थ के विना वैसे ही देव भी सिद्ध नहीं होता।' सामने नहीं देखा, कव मानो कितने क्रुद्ध चेहरों ने मुझे चारों ओर से घेर लिया है। उनके कर्कश कोलाहल ने मुझे डर लगा, शेप वात शायद सुन ही नहीं पाऊंगा। । ।' आश्चर्य से वोल उठा, 'ये कौन हैं ?' मानो कोई बोल उठा हो, 'वे हमारे ही आत्मज हैं।' मैं बोला, 'वह क्या ? मैं तो उन्हें नहीं पहचानता वह बोला, 'दूर हैं, इसीलिए अपरिचित लगते हैं। पास आने पर बिल- कुल जान जाओगे।' 'श् श् श् !' फिर चुप रहने को कहा। भीष्म बोले, 'पंडित लोग पुरुषार्थ की खेत से और देव की वीज से तुलना करते हैं। जिस प्रकार खेत और बीज का संयोग है, उसी प्रकार पुरुषार्थ और देव के संयोग से फल उत्पन्न होता है। क्लीव पति के साथ जिस प्रकार पत्नी का सहवास निष्फल होता है, कर्म का त्याग कर देव पर निर्भर करना उसी प्रकार है।' वही क्रुद्ध चेहरे इस तरह चीख-चीखकर ताल-ताल पर इस प्रकार आवाजें लगाने लगे कि सचमुच लगा कि मैं और कुछ न सुन सकूँगा। मेरे स्नायु ! मेरे स्नायु ! अब मुझे डर लगा कि इस चिल्लाहट से अवसन्न हो जायेंगे-प्रामस: जद हो जायेंगे। 'हा ईश्वर !' में आस्विर ने चिल्ला पड़ा, 'क्या कोई नहीं है जो इन लोगों को रोक दे?'

गरियाहाट के पुल पर वे दोनों
मेरे आर्तस्वर का अनुकरण कर मानो कोई बोल उठा, 'कोई नहीं,
कोई नहीं।'
विस्मित होकर मैं बोला, 'लेकिन ये चीख क्यों रहे है ?'
वह बोला, 'ये लोग ये सब बातें सुनना नहीं चाहते, इमरोलिए।'
मैं क्लान्त होकर वोला, लेकिन में तो मुनना चाहता हूँ। मुनो, सुनो,
तुम्हें तो ये बात सुनाने के लिए किसी ने युलाया नहीं। तुम शोर भयो फर
रहे हो ?'
इस बात को मुनकर वे लोग जोरो में टठाकर हँसने लगे।
'श्र !'!'
भीष्म बोले, 'पुरुपायं द्वारा ही लोग स्वर्ग, भोग्य तिपय और पाडित्य
की प्राप्ति करते हैं।'
'हा-हा' हा-हा-हा ! हा-हा
जोरो की हंसी के आघात से कानो को बन्द कर लेने की इच्छा हुई।
भीष्म बोले, 'कृपण, क्लीव, निष्क्रिय, अकर्मण्य, दुर्बल और मनहीन
लोगो को अर्थ की प्राप्ति नहीं होती।'
'हा-हा-हा-हा-हा!'
भीष्म बोले, 'पुरुषार्थ का अवलबन कर कर्म करने पर देव उसका
सहायक होता है, किन्तु केवल देव से कुछ भी नहीं मिलता।'
उन युद्ध चेहरे वालों ने ईटें फेंकना शुरू किया।
मैं आतक्ति होकर केवल एक शब्द बोला, 'यह क्या ! यह क्या ?'
मानो किसी ने कहा, 'हम सब-कुछ तोड़ डालेंगे।'

12
गरियाहाट के पुल पर वे दोनों
धीरे-धीरे फिर अँधेरा घिर आया। पक्षियों का गान भयार्त चीत्कार में
मिल गया। मेरा शरीर फिर जीर्ण हो गया। कष्ट में पड़ गया। मेरी जीभ
फीकी-सी लगने लगी। मेरे स्नायु ! मेरे स्नायु !
-
वह बोला, 'हाय, कलकत्ता में कोई भी दिव्य प्रभात स्थायी नहीं
होता। यहां सव क्षण ही अनिश्चित होते हैं, और अस्थिर !'

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गरियाहाट के पुल पर वे दोनों धीरे-धीरे फिर अंधेरा घिर आया। पक्षियों का गान भयार्त चीत्कार में मिल गया। मेरा शरीर फिर जीर्ण हो गया। कष्ट में पड़ गया। मेरी जीभ फीकी-सी लगने लगी। मेरे स्नायु ! मेरे स्नायु - वह बोला, 'हाय, कलकत्ता में कोई भी दिव्य प्रभात स्थायी नहीं होता। यहां सब क्षण ही अनिश्चित होते हैं, और अस्थिर !'

वह और उसका संसार वे शादी के घर से लौटे थे~वह और उसकी पत्नी। 'एक टैक्सी कर लें!' उसकी पली ने बहे अनुरोध से कहा, 'इतना लम्बा रास्ता बस को इस भीड़ मे-सचमुच माजकल वही थकान लगती 'वाह ! अभी तो शचो ने इतना अनुरोध किया। तुमने कहा कि तुम छुटफी के भर होकर जाओगी?' वह सचमुच ताज्जुब मे आकर अपनी पत्नी के चेहरे की ओर देखता रह गया। 'वाह रै! तुम्हारे दोस्त की गाड़ी पर मै क्यो चढ़ गी? उससे तो बस की भीड़ में धक्के खाना कही अच्छा है। अपनी गाड़ी खरीदने की जिनकी हैसियत न हो तो उन्हें दूसरे की गाड़ी पर चढकर बड़ा आदमी न बनना हो अच्छा है। मे सब ठाठ तब अच्छे नहीं लगते।' उसका दिमाग गरम हो गया। वही मुश्किल से अपने को समत किया । 'शची मेरे भागे कभी शेसी नही वधारता। क्यो, मालूम है ? एक तो हम बहुत पुराने दोस्त और महकर्मी हैं, फिर मैं कभी...।' 'तुम्हारे बहुत दिनो के दोस्त को सहर्धामणी तुम्हारी कितने दिनो को दोस्त है?' 'क्या? क्यो? चाल-दाल देखकर तो लगता है कि कभी बहुत घनिष्ठ रही होगी। बाप रे, यया ढंग हैं ! दोनो इस तरह बातो मे मस्त थे कि बाहर की और 14 गरियाहाट के पुल पर वे दोनों किसी दूसरे की तरफ़ ध्यान ही न था। वाप रे बाप ! 'टे-क-सी! अरे, जल्दी बढ़ चलो। ए टैक्सी, श्याम बाजार चलोगे ?' टैक्सीवाला निर्विकार रहा । उसने कोई जवाब न दिया। वह बोला-~'क्यों, जायेगा?' कोई उत्तर नहीं। , - P- ऐसे अवसरों पर उसका दिमाग़ गरम हो जाता और उसके मन में इस तरह के विचार क्षण-भर में उठने लगते, जैसे : (क) रिवॉल्वर की एक गोली ने टैक्सी का टायर पंक्चर कर दो। महंगाई के इन दिनों में दो टायर खरीदने जाकर बच्चू को होश आ जायेगा कि पैसेंजरों के साथ ऐसे व्यवहार का नतीजा क्या होता है; (ख) एक गुप्त समिति का गठन करो- 'बस-टैक्सी-ट्राम-यात्री बांधव समिति'। टैक्सी-स्टेंड पर, वस और ट्राम के हर स्टॉप पर समिति के सदस्य हमले के लिए खड़े रहेंगे। बस यदि स्टॉप पर न व्हरे, ओवरटेक करके चली जाये, या उतरने के लिए पूरा मौक़ा न दे, या कंडक्टर यात्रियों के साथ बुरा व्यवहार करे तो साथ-ही-साथ गुप्त अस्त्र के प्रयोग से उसका पहिया पंक्चर कर दो। नो अपील, नो आगुमेंट । या टेक्सीवाला अगर...! । - 'टैक्सी ! टेक्सी !' वह भागकर उपर के फुटपाथ पर गया। टैक्सी रुकी। ड्राइवर एक तगड़े सरदार जी थे। उसने दरवाजा खोलते-खोलते अपनी पत्नी को पुकारा। पली जब प्रायः पहुंच गयी थी तो हांफ रही थी, तभी ड्राइवर ने पूछा, 'मोजी, कित्ये जाणा?' उसने जवाब दिया-'श्याम बाजार से थोड़ा आगे।' भर से टैक्सी चढ़ के चली गयी। उसकी पत्नी ने पूछा-'क्या हुआ, चली गयी ?'

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गरियाहाट के पुल पर वे दोनों 'और नहीं तो क्या ?' इस बार उसकी पत्नी की थोड़ी देर पहले की खुले दिल की हंसी तलवार की धार की तरह तेज हो गयी। 'मैं तो खड़े. खड़े देख रही थी। मुझे तो लगा कि तुम ड्राइवर के पास जाकर हाथ जोड़ रहे हो। तुम्हारे इस स्वभाव के कारण ही कोई तुम्हें पूछता नहीं। मेरे साथ ही वहुत उछल-कूद करते हो।' इस बार वह सचमुच डर गया। जानता था कि उसकी पत्नी ने इस बार सही भेद पा लिया है। इस बार उसकी नाक में नकेल डालकर उसे घिर- अभियोग के चूर-चूर कर देने वाले गहरे गड्ढे में ले जायेगी, जहां वह केवल चक्कर काटता रहेगा-बाहर निकलने का रास्ता उसे सूझेगा ही नहीं। - 'मीनू ! बस, वस ! रोक के, ए बस, रोक के ! रोक के !' बड़े जोश के साथ उसने और उसकी पत्नी ने फिर रास्ते के उस पारं दौड़ लगायी। 'शेक के, रोक के, रोक के !' वह इधर-उधर का होश छोड़कर वस के पीछे वेतहाशा भागा । 'ऐ रोक के, रोक के, रोक के !' वह अब खुशामद नहीं, सिंहनाद करने लगा। । बस रुकी नहीं। भीड़ में शुरू से आखिर तक भरी बस ने रुकने-रुकने को होकर उसे कुछ दूर वेदम करके दौड़ाया। फिर ऐसा महसूस हुआ कि उसका कलेजा फटकर चार टुकड़े हो जायेगा। उसकी आंखों के आगे अँधेरा छा गया। लड़खड़ाने लगा। उसकी छाती और सिर में धक-धक की आवाज उठने लगी। और पसीना ! अविरल पसीना धाराबार वहने लगा। उसने मन-ही-मन मार्तस्वर में पुकारा, मीनू, कहाँ हो तुम ? मैं मर रहा हूं। मरा जा रहा हूँ, मेरे पास आओ।' उसकी पत्नी ने फौरन उसफा चश्मा उतार लिया। वह भी हांफ रही थी। उसकी भी पीठ और कमर असह्य पीड़ा में फटे जा रहे थे। किन्तु वह अपनी पीड़ा की ओर ध्यान नहीं दे रही थी। आंचल ने उसका मुंह पोंछ रही थी। वह अभी तक बड़ी उत्तेजित थी।

गरियाहाट के पुल पर वे दोनो 'तुम क्या पागल हो गये हो ? पागल हो गये हो ?' उसकी पत्नी के बड़े स्वर में ममता थो; उनकी पली की आंखों और मुंह पर ममता थी; उसकी पत्नी की उंगलियों के हर स्पर्श से अब निर्मल ममता भरी पड़ रही थी। 'तुम्हें पता नहीं है कि तुम्हें उछल-कूद करना मना है ? तुम्हें पता नहीं है, तुम पर कैसी मुसीबत आ सकती है ? अभी ही आ सकती थी ?' उसकी पत्नी उतेजना में बहबहा रही थी और बीच-बीच में आंचल से उसे हवा कर रही थी, उसका पसीना पोछ रही थी। "जरा बैठोगे? मेरे पारीर से टेक लगाकर थोडा आराम कर लो। अव पोडा आराम मिल रहा है न? पानी पियोगे ?' छाती और सिर में तेज ऐंठन के कारण उसके मुंह से बात नही निस्त रही थी। फिर भी यह चाहता था कि उसे अपनी अन्तिम बात सुना ही हाले । मुंह से कुछ न कह सका। इसीलिए मन-ही-मन योतामेरा व्यक्तित्व है या नहीं, यह कोई बात नहीं, मेरी धारणा है कि मेरा व्यक्तित्व है. वास्तव में था, लेकिन मीन, यह कलकत्ता शहर है, यह भूलने से काम नही चलेगा! यहाँ, इस बाहर में आजकल जो हालत है, उसमें टैक्सी-ड्राइवर पा बस ड्राइवर को अगर तुम मेरे व्यक्तित्व को परख की कमोटो कहो तो भूल करोगी। कम-से-कम मैं यही समभता हूँ। यह मातें मन-ही-मन कहने के बाद ही उमने एक इकार लिया, और उसके बाद ही एक और। और आपनर्य है कि साथ-ही-साथ उसे सगा कि उसका कलेजा बहुत सालो और शरीर हलका हो गया। देखा, उसकी पत्नी उसी रास्ते पर सडी लाज-शरम भूलकर अपनी नकली रेसाय को साड़ी के लिजलिजे (क्योकि उस समय उसके ही पसीने से साडी का पल्ला लिजलिजा हो गया था)आंचल मे अमका मुंह और गला पोप रही है. गाय जिस तरह अपने बछड़े के शरीर को चाटती है । और रास्ते के इधर और उपर यह रमणीय दृश्य देखने के लिए कुछ लोग जमा हो गये हैं।

18 गरियाहाट के पुल पर वे दोनों हो!' उसके स्वाभाविक स्वर से उसकी पत्नी का मुखमंडल तुरन्त एक दिव्य आभा से दीप्त हो गया। 'अव कुछ अच्छा लग रहा है ? पानी पिओगे? जरा वैठोगे ?' उसने एक और डकार लिया । अब कुछ और आराम मिला। मुझे बस के पीछे इस तरह भागना नहीं चाहिए था अपनी पत्नी की भर्त्सना से उसने सोचा । उसने सोचा : (ग) गुप्त समिति के सदस्यों के पास एक छोटा लेकिन शक्तिशाली क्षेपणास्त्र रहेगा । जो बस यात्रियों के आकुल आवेदन को अग्राह्य कर इसी तरह निकल जाना चाहेगी, तो सदस्य लोग फौरन अचूक निशाने पर उस क्षेपणास्त्र की मार्फत चुम्बक का एक कड़ा वस के पीछे के बम्पर पर फेंकेगा। वह कड़ा मजबूत इस्पात के तार से जुड़ा रहेगा और इस तार का दूसरा हिस्सा खूटे से बँधा रहेगा। परिणाम- स्वरूप किसी भी बस का इस तरह प्रतीक्षा कर रहे यात्रियों की उपेक्षा कर निकल जाना सम्भव न होगा । गुप्त-समिति के सदस्य-गण इसके बाद मन की मौज के लिए पिस्तौल छोड़कर बस के टायरों को भी पंक्चर कर सकते हैं। उसकी पत्नी जो अब उसका शरीर पोंछ नहीं रही थी, बोली, 'बीच- बीच में तुम पर यह क्या भूत सवार हो जाता है ! पानी पिओगे ? सोडा पीलोन!' वह सोच रहा है : टैक्सी के लिए भी वैसी ही व्यवस्था चाहिए। एक- मात्र इन्हीं उपायों से कलकत्ता की बसों, टैक्सियों और ट्रामों को कर्तव्य- परायण बनाया जा सकता है। उसकी पत्नी बोली, 'शरीर अच्छा नहीं लग रहा है ? सोडा ले आऊँ?'

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20 गरियाहाट के पुल पर वे दोनों आये। हंसते रहते ही क्यों लगता है कि उम्र कुछ कम हो गयी है ? उसके बाद वे लोग धीरे-धीरे पुल पर चढ़ने लगे, पास-ही-पास । दोनों के पुराने शरीर ! फिर भी कभी-कभी यों लगता है कि इसी बीच कहीं अन- खोजा, अनदेखा ऐसा स्थान रह गया है जहाँ अव तक उन्होंने क़दम नहीं रखा ! नीचे से भों-भों कर भोंपू बजाते हुए विजली की ट्रेन निकल गयी। रेल के प्रकाशित डिब्बे बिलकुल ठसाठस भरे थे . .... 'यहाँ जरा रुकें, क्यों ?' इधर-उधर रेल की लाइनें टेढ़ी-मेढ़ी विछी थीं। अंधकार में प्रकाश की माला खिल रही थी। पास से वस, दो मंजिली-एक मंज़िली गाड़ियां, टैक्सी, लॉरी-भाग-दौड़ कर रही थीं। खूब हवा थी। अव पुल की इस ऊंचाई पर आकर उनकी घर लौटने की जल्दी जैसे मन्द पड़ गयी। 'अरे,' वह बहुत मुलायम गले से वोला, 'लेक चलोगी?' उसकी पत्नी ने आँखें फाड़कर देखा। अजीव उदास, अजीब विभ्रान्त ! दवे गले से पूछा, 'जाओगे ?' उसफा गला और भी धीमा पड़ गया। बोला, 'तुम्हें डर नहीं लगेगा?' उसकी पत्नी की आवाज़ अटक रही थी। बोली, 'ॐ हूं।' उसकी बात लगभग सुनायी ही नहीं पड़ रही थी। बोला, 'क्यों ?' उसकी पत्नी ने आँखें बन्द कर लीं। बहुत धीरे से बोली, 'पता नहीं।' केया और उसके वर्तमान का एक टुकड़ा हवा खूब चल रही थी। उसी रात को शादी का निमन्त्रण निवटाकर वह और उसकी पत्नी गरियाहाट के पुल की सबसे ऊँची जगह पर खड़े थे। बिलकुल चुपचाप । किसी भी जरूरी या गैर-जरूरी काम की और उनका गरियाहाट के पुल पर वे दोनो 21 ध्यान बिलकुल नहीं जा रहा था। यथा : (एक) उन्हें अपने उसो मुहल्ले में लौटना पडेगा, (दो) आजकल कलकता में हर के कारण सभी लोग शाम होते ही घरों में घुस जाते हैं, (तीन) सवारी के लिए गाड़ी का मिलना भी मुश्किल होता है, (चार) अपने मुहल्ले के बहुत ही परिचित परिवंश से बाहर रहना ठीक नहीं है, बल्कि खतरनाक है. किसी भी समय, किसी के हाथों सून हो सकता है, इत्यादि। फिर भी गरियाहाट के पुल पर उस ऊंचाई से, रात के दस बज जाने के बाद भी उन्हें हिलने की इच्छा न हुई। मेरी पत्नी के बाल कितने कम हो गये हैं। जोरो को हवा में उसकी पली के आगे की कोर के कुछ बाल फरफर उह रहे थे । और समय उसने देखाशि उसकी पली का सिर कितना विरला हो रहा है। कितने बाल थे कभी मेरी पली के सिर पर? गुच्छे-के-गुच्छे ! अब मैं अपनी पत्नी की कभी अवहेलना नहीं करूंगा-सिग्नल की लाल-लाल चमकती आँसो को और देखकर उसने प्रतिज्ञा की। बहुत प्यार करूंगा । बहुत दुलार दूंगा। उसके बालों की लटी में, जो कुछ भी बची हैं, सिर छिपाकर सोयी हुई पल्ली के बालों और शरीर की चुपचाप गध लूंगा। यह जरूर है कि बालों की सदों की गंय लेना उसे उसकी पत्नी ने नही, केया ने ही सिखाया था। स्नान कर बाथरूम से निकलते ही कया मंधी फेरते-फेरते उनके आगे आकर खडी हो जाती, लेकिन तभी जब वह केया के घर होता। मह देखो तो,' कहकर भीगे हुए बाल उसकी नाक में टूम देती। क्यों, कमी गंध है ?' कहकर व्या हंसने लगती । यह केया के सुदूर अतीत की बात थी। उसके भी। वर्तमान में केया शची की पत्नी थी। दाची माने एस० वी०, यानी उसके प्रतिष्ठान कर चीफएक्जिक्यूटिव : सेल्स । उमा बॉस । केया उसकी विलकुल चढती वयम की स्त्री-मित्र यो । केपा अब बाकी रह गयी यौ नेवल अपनी पत्नी के बालों में। उसके शरीर में जब प्रतिक्रिया न होती तो वह अपनी पत्नी के बाल मोरोपी 22 गरियाहाट के पुल पर वे दोनों बालों में मुंह डालकर गंध लेता, लेते-लेते कल्पना करता : सुदूर अतीत से उठकर आती एक ज्वार, ज्वर, कामोत्तेजना का एक स्राव सब बाधाओं के जाल के दोनों छोर काटकर उसके शरीर पर फैल जाता। छिटक जाता। उसी रात या दिन को जव भी इस तरह की अलौकिक घटना घटती, तो उसे लगता कि उसे कोई कण्ट नहीं है। उसका शरीर ताजा, स्वच्छ, हलका-सा हो जाता। . फिर केया को किसी दिन भी विस्तर पर लिटाने की इच्छा नहीं हुई, अव भी नहीं। केया अगर आकर मुझने सटकर बैठ भी जाये, सम्पूर्ण रूप में निरावरण होकर, फिर भी मैं चंचल नहीं हो उलूंगा-~यह बात शपथ- पूर्वक कह सकता हूँ। मैं उन दिनों केया के आगे कठोर नीति-वागीश वन गया था। उसने पत्नी की ओर देखा, और जब वह पत्नी के प्रति प्यार की अनुभूति में भर उठा, ठीक उसी समय स्वीकार करना पड़ा : तुम और मैं जब चरम संग्राम में लिप्त हो गये, केया ठीक उसके पहले के क्षण कहीं ने आ गयी, और तुरन्त उसने अपनी अशरीरी इलकी देह तुम्हारे शरीर पर फैला दी मीनू, ऑनेस्ट, तुम्हें पूरी तौर से उसने ढंक लिया। उसको भेद कर तुम्हारे पास में पहुंचना चाहता हूं मीनू, क्योंकि मैं तुमको प्यार करता हूं। मैं चाहता हूँ कि तुम मुझ पर विश्वास करो। पत्नी के निकट उसकी मांगों की सूची वह यदि अपनी पत्नी को चिट्ठी लिखता तो कुछ इस तरह : प्रियतमासु, मैं तुम्हारे पास आना चाहता हूँ, तुम मेरे पास आना चाहती हो। ठीक है न ? फिर हम एक ही विस्तर पर सोते हैं-पास-पास तकिये पर सिर रखकर । वदन से वदन सटाकर। लेकिन इसे हम निकट रहना नहीं कहते । मैं भी नहीं, तुम भी नहीं। तब फिर? तब निकट आना क्या होता है ? क्या वह इच्छा, जो अचरितार्थ है, जो तुम्हारे- - -- . गरियाहाट के पुल पर वे दोनों 23 मेरे सम्बन्ध को कुतर-कुतरकर खाये जा रही है ? हम धीरे-धीरे क्षत-विक्षत हो गये हैं । थक गये हैं। एक-दूसरे के प्रति हतोत्साह हो रहे हैं। कभी-कभी निर्दय भी। बीच-बीच में जब मैं हम लोगों के, विशेषतः अपने और तुम्हारे भविष्य की ओर देखता हूँ, तो मुझे लगता है जैसे कि हम दोनों प्रचंड वेगवान उत्ताल तरंगें हैं जो एक- दूमरे की ओर चली आ रही हैं, जिनका परिणाम अनिवार्यतः एक- दूसरे को आघात पहुंचाना है । मैं डर से आंखें मूंद लेता हूँ। तुम भी क्या हमारे भविष्य के सम्बन्ध में ठीक ऐसा ही चित्र देखती हो? डर लगता है ? आंखें बन्द कर लेती हो ? या कोई और चित्र तुम्हारी आंखो मे अंकित होता है ? मेरी आँखो में जिस कारण से दूसग कोई विकल्प नहीं है, यह एक ही चित्र रहता है, और उसी के परिणाम- स्वरूप तुम्हारे और हमारे बनाये संसार मे जो छन्दोभंग हो रहा है, उसका शीघ्र ही प्रतिकार करना मैं जरूरी समझता हूँ आघात पहुंचाना हमारा अपना धर्म नहीं है, काम्य भी नहीं है । हममे से प्रत्येक चाहता है-एक सामंजस्य में पहुंचना, चलने का ठीक ढग तय कर लेना, षयोकि वह जरूरी है। प्रियतमासु, यह तो सही बात है कि हम एक-दूसरे के मात्र नहीं हैं। हम एक-दूसरे पर निर्भर-मात्र हैं। हमारी गलती एक यही है, कि हम एक-दूसरे की किसी प्रत्याशा को मोलहो याना पूरी नहीं कर पाते। इस संसार में कोई भी किसी को प्रत्यागा को मोलही अनं पूरी नहीं कर पाता । इच्छाओ की कोई भौगोलिक परिधि नहीं इंटी, और साधन अत्यन्त सीमित हैं। अतएव, मायन और बाद में कुल अन्तर रह ही जाता है । यह अत्यन्त मूल्यवान मृत्र हन अमर मान लें तो जो हमारे मन मे बब होता है, हमागक सम्बन्ध उस हिंस्र-भाव से मुक्त हो मकता है। दिन-कार हननद- आघात का जनक है। घृणा एवं विद्वेप, तया ईयां और मलंदन भाव को पनपाने वाले साधन हैं । इस माद को इन्टर हमारे कष्ट मिट सकते हैं। अतएव यात्रा, हनना निश्चय करें।

24 गरियाहाट के पुल पर वे दोनों अतएव आओ : (1) हम परस्पर हिंसा-भाव को दूर रखें, (2) हम परस्पर निकट आयें, (3) हम एक-दूसरे को प्यार करें, और (4) हम एक-दूसरे के प्रति आस्था रखें। उसकी एक क्षण की स्वगतोक्ति वात यों है। ऐसी चिट्ठी लिखना प्रवचन के समान भाषण देने से कहीं अच्छा है, क्योंकि आठों पहर को घरेलू बातें प्राय: ऐमी ओछी होती हैं कि उन को तूल देवर विषय का महत्व सम्यक् रूप मे स्पष्ट नहीं किया जा मकता । जिसके साथ दिन-रात घर-बार करना होता है, उसमे इस तरह यहा भी तो नहीं जाता। मंगार में हर क्षण इस तरह के बखेड़े पैदा हो जाने है. बिन्नकुल नुच्छ कारणों में, कि कहने और सुनने वाले-----दोनों के बीच ही हर वक्त व्यवधान की दुर्लध्य दीवार बडी होने लगती है। स्वा- भावित सम्बन्ध-मूत्र बिलकुल नष्ट हो जाते हैं। फिर देखिये, जो सदा ही पान रहे, उसे चिट्टी लिम्बी भी किस तरह जाये ? बात नाटकीय हो जाती है! पत्नी के निकट भाषण-मा देने का विचार तो और भी हास्यास्पद है रिन्न मीन तुममे में ये जरूरी बातें कहना ही चाहता हूं। मुझे कहना ही पडेगा। । मीन, लाल सिग्नल और उसका घरौंदा कुछ देर के लिए मीन मय भूल गयी थी। निग्नल के चमरते लान प्रदा का मम्मोहन था। भीन अब दान है। ममीप ही प्राय: बदन में टेक लगाये उसका पति है. जिसका उसे भान तक नही। भीतल वायु उसकी आँखों और नेहरे को आगम पहना रही है । अब कोई कष्ट नही है। पुल के नीचे में कितनी देते लेजी में निकलनी गयी-उधर-उधर और उधर मे. इधर । पुल के ऊपर में बहनेगे बम, प्रवेट लॉन्यिा. टेक्मियां गुजर गयो, } 25 गरियाहाट के पुल पर वे दोनों लेकिन उसका इन ओर ध्यान नहीं गया। अब धीरे-धीरे वह चेतने लगा। लाल सिग्नल को बंधी निगाह से देख रहा है। रेल की लाइनें टेढ़ी-मेढी चली गयी हैं। दाहिनी ओर एक बडा-सा मकान है। कमरे-कमरे मे रोधनी है । मीनू के हृदय से सहसा एक गहरी सांस निकली। अब उसके मन मे कही भी आने की बात नही उठ रही है। उसके मन मे उद्वेग, अस्थिरता, जलन-कुछ भी नही है। उसके गले में मुई गड़ने का-सा दर्द था-अब शायद वह भी नहीं है। . सहसा एक तेज हॉर्न को आवाज मे वह चौंक पड़ी। दूसरे ही क्षण उसे लगा कि उसका दाहिना हाथ झनझना रहा है। और याद आया कि वह अपने पति के साथ बहू-भात का निमन्त्रण खाने जोधपुर पार्क आपी थी और अब गरियाहार के पुल की सबसे ऊंची जगह पर पड़ी है। जिस घर में किसी के साथ भी उसका परिचय नही, उस घर में यह बहू-भात के संस्कार मे क्यों आयी? यही पर इतनी रात तक क्यों खडी है ? और, घर जाने की ही तबीयत क्यों नहीं हो रही है ? मीनू को कुछ विभ्रान्ति-सी लग रही है। वह कम ही बाहर निकलती है। निकालना चाहती नही, क्योकि वह जल्दी किसी से बातचीत नही शुरू कर सकती। उसकी कोई सहेली नही। बस की भीड मे उसका दम घुटने लगता है। उसे डर लगता है । ट्राम पर चढने में उसे डर लगता है कि बीच रास्ते में ही कही ट्राम रुक न जाये। वह लिफ्ट पर नहीं चढ़ सकती कि कही बीच ही मे लिपट अटक जाये और मुसीबत पैदा हो जाये । उसकी तबीयत होती कि केवल पति और वाल-बच्चो को लेकर ऐसी सब जगहो पर घूमने जाया जाये जहाँ उसके पति का कोई परिचित न हो। अपने और अपने लोगों के बीच कोई भी रुकावट, कोई छाया तक वह पसन्द नहीं करती। वह जानती है कि इसके लिए उसे कभी छुट्टी नहीं मिलेगी। इसी बीच चन्द्रमा निकला। यहाँ मे आकाश कितना बड़ा, चन्द्रमा कितना प्यारा दिखलायी पडता है ! एक सफेद बादल ने मानो चांद को मलमल का दुपट्टा उठा दिया ! उसे लगा कि चूंघट निकाले चन्द्रमा अब हलके से बेड़े 26 गरियाहाट के पुल पर वे दोनों पर तैर रहा है। यह भी अगर उसी तरह तैरते-तैरते घर पहुंच सकती! जाकर देखती कि विस्तर विछे हैं। बाल-बच्चे खा-पीकर सो गये हैं। सास मुसकराती हुई बाकर खड़ी हो गयीं। कह रही हैं-आओ मां, आओ, देखो तो, चेहरा एकदम मुरझा गया है। जाओ, आज अब कोई बात नहीं करूंगी, शादी की बात कल सुनूंगी । अब आराम करो। वह : मां, आपका खाना ? सास (हंसते-हंसते) : कुछ वाक़ी नहीं है, सब हो गया है। जूठे बर्तन सब जमा कर दिये हैं। नौकरानी काल आकर धो देगी। चाय के कप, फेटली-सव घो-पोंछकर रख दिये हैं। वह (झूठी शिकायत के ढंग से) : मां, यह आपकी बड़ी ज्यादती है। आपने यह सब करने को किसने कहा था ? सास : (हंसते-हँसते) : लो, पगली अव इतनी रात गये भागड़ा कर रही है ? जाओ, जाओ आराम करो। फलकत्ता में एक दिन निकलने के माने ही होते हैं उम्र का एक वरस कम हो जाना। वात को और न बढ़ाकर वह कपड़े-लत्ते उतारे बिना ही बिस्तर पर सुढ़क जायेगी। पति से कहेगी--पंखा पूरी स्पीड पर कर दो न ! - वह (जोश से) : जानती हैं, मां...? सास (रोफती हुई) : ॐ हुं, इस वक्त कोई बात नहीं। चेहरा एक- दम मुरझा गया है। लगता है, बस में नायी है। जाओ, पहले मुंह-आंखों सोधी आओ। बादी की बात बाद में सुनूंगी। सास पंखे की स्पीड बढ़ा देंगी। सास : दो मिनट बैठकर जग आराम कर लो। इतना रास्ता तय करना मुसीवत है। वह : मां, आग तो मंदिय, आंचे दिये। माम आंखें बन्द करेगी।मती रहेगी। सान : न, अब यह पागलपन नहीं होना। तो. आब बन्द कर ली। वह : हाय मानिया

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गरियाहाट के पुल पर वे दोनों 29 - वे लोग मुझे इन नजरों से देखेंगे, यह मैं शुरू-शुरू में तो नहीं समभी। उमका कारण था कि मैं गांव की लडकी' थी--यह उन लोगों का ही कहना था; मैने "लिखना-पढ़ना नहीं सीखा'-यह भी उनकी बात थी; मेरा ज्ञान ही कितना है, बुद्धि ही कितनी है --यह भी उनकी ही बात थी। वे लोग मुझ 'वहन-बहन, भावज-भावज' करते रहते; मेरे मैक से आये सावुन-स्नो लगाकर मब ममाप्त कर देते; मेगे माडी, साया, ब्लाउज पहनते और फाड़ते; और मैं सोचती कि ये लोग मेरे अपने हैं, कितने अपने हैं ! उस समय भी मेरे अन्दर प्रकाश था। उसके बाद जब एक दिन देखा कि मेरी सब चीजें समाप्त हो गयीं, सिंगार के मामान का डिव्वा साली हो गया, साडी-याटी सब फट चुके धे, और दे लोग मभली दीदी के कमरे में बैठकर मेरी गलतियां निकालत-तव से मेरे मन का प्रकारा थोड़ा-योटा कर चुनने लगा। मुझे तो मंझली दीदी के कमरे में अड्डा लगाने का वक्त नहीं मिलता। साना. पकाना, परोसना, फिर रमोई, फिर खाना देना ! दिन-रात के सारे क्षण मेरे लिए इमी तरह घिचपिच हो जाते। सबसे पहले सोकर उन्ती; सबके बाद सोने जाती। पति के माथ भी कब कहाँ सोने को मिला। कभी-कभी ऐसा हुआ कि आधी रात को पति को छाती से दवेल, उतारकर चले जाना पड़ा। घर पर आधी रात को सहमा ननदोई आये : उनके लेटने की जगह अपने पनि के पास मुभी को देनी पड़ती। दूसरा कमरा नहीं। मझली दीदी की तबीयत खराब है.-उनकी कच्ची नीद तोडने को डॉक्टरों ने मना किया है। मां के कमरे में सब ठसाठस । घर में मिर्फ मेरे लिए ही जगह न रहती! जितने दिनो मेरे अन्दर प्रकाश रहा, अच्छा रहा, उतने दिन में महज काम में सगी रही। हां, महर काम में | मैं सबयो साना देतो, अपना भात मुझे खुद ही लेना पडता। हारी-बीमारी होने पर मुनको ही सेवा- शुश्रूपा करना पडतो; मुझे कुछ होता तो मैं चुपचाप अकेले भोगती । मेरी याद किसी को नहीं माती। ऐसी छोटी-बड़ी, बहुत-सी घटनाओं से मेरे अन्दर को बत्ती बुझ गयी। हो, अब वहां अंधेरा है। यव मैं खुद भी तो कुछ देख नहीं पाती।

30
गरियाहाट के पुल पर वे दोनों
अव ये लोग कहते हैं-मैं स्वार्थी हूँ। नीच हूँ। मैंने आते ही उनका
स्वर्ण-संसार मिट्टी कर दिया। क्यों नही करूँगी ? तुम्हारा संसार तुम्हारे
निकट स्वर्ण हो सकता है, मेरे लिए क्या ? केवल अविश्रान्त मेहनत, केवल
उपेक्षा, सिर्फ और महज़ एकतरफ़ा देना-और देना।
-
पुल के ऊपर वे दोनों
वह बोला : 'असल में रात ज्यादा नहीं हुई है, पता है ? लेक चलोगी?
चलो न !'
उसकी पत्नी ने बड़े नींद-से भरे स्वर में कहा, 'न, ना।'
वह : 'डर लगता है ?'
उसकी पत्नी : 'नहीं। यहीं अच्छा लग रहा है।'
वह : 'सो तो है । असल में हवा चल पड़ी है न !'
:
उसकी पत्नी ने कोई जवाब नहीं दिया ।
वह : 'कलकत्ता का सब-कुछ तो चला गया। यह हवा ही रह गयी है
अब भी शरीर में शीतलता आ जाती है।'
उसकी पत्नी : 'देखो, यह भी कब किसी घेराव या बन्ध के पल्ले पड़
जाये"
उसकी पत्नी हमी । पत्नी को हँसते देख वह भी हमने लगा।
वह : 'यह जो हर दीवार पर मायिक-धर्म बन्द होने की अचूक
औषधि के विज्ञापन चिपकाते है न, तो सोचता हूँ कि उमी कम्पनी से
कलकत्ता वन्ध को रोकने की अचूक दवा निकलवायी जा सकती है या
नहीं । एक गोली में ही साला बन्ध खुल जाये !
उसकी पत्नी : 'हटो, असभ्य कही के !'
उसकी पत्नी जोगे में हमने लगी।
वह : 'शुरू में ही एक गलती कर बैठा हूँ। उस घर से निकलते वक्त
ही अगर यज्ञेश्वर से कहता कि गाड़ी का इन्तजाम कर दो, घर जाऊंगा,

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32 गरियाहाट के पुल पर वे दोनों.. ही वह देना ठीक था। खुद क्यों नहीं दी ?' वह : 'वाह !' उसकी पत्नी : 'वाह क्या? सामाजिकता वरावर वालों में ही होना उचित है। तभी मान-मर्यादा रहती है। मुझे क्यों ले गये ?' वह : 'वाह !' यज्ञेश्वर का राजसूय और उसकी वर्ग-चेतना (उसकी जवानी) यज्ञश्वर, हमारे ऑफ़िस की एंप्लाईज यूनियन का जनरल सेक्रेटरी, अत्यन्त वर्ग-सचेत और उत्साही लड़का है, यही मेरी हमेशा की धारणा है। उत्साही क्यों ? यज्ञेश्वर किसी से सम्मान के साथ बात नहीं करता, किसी को सम्मान-योग्य नहीं मानता। पूजा के पहले हमारे ऑफ़िस में हर बरस जोश का परिवेश वन जाता। किसी-किसी बार सुना जाता कि इस बार और चालाकी नहीं चलेगी, जोरों की हड़ताल होगी। इस वार आठ महीनों का बोनम मिलेगा, नहीं तो आठ महीने कम्पनी का पहिया नहीं चलेगा । यहाँ यह बता देना अच्छा होगा कि हमारी कम्पनी की विल्डिग ब्रेबो गेड पर शीट पाइलिंग की हुई दीवारों पर प्रतिष्ठित है, पहियों पर नहीं । इसलिए पहिया नहीं चलेगा के मतलब हम लोगों ने- काम नहीं होगा-ममझ लिया था। यज्ञेश्वर कहता, 'आप लोग एकजुट होकर मेरे पीछे आकर खडे हो जायें; दलाली करके अपने ऊपर मुसीबत मोल न लें। देखिये, इस संग्राम में जीत हमारी ही होगी। मै कम्पनी में नहीं डरता, डरता हूँ तो दलालों से; उनसे नफरत करता हूँ। मिडल क्लास, यानी मध्यवित्त वर्ग पर मैं विश्वास नहीं करता। वे लोग पेटी-बूर्वा है । वर्ग-गत रूप से ही अवमर- वादी' यज्ञेश्वर कहता, 'इम पेटी-बूर्वा वर्ग को लेकर लड़ाई लड़ना और उस लड़ाई में जीत जाना बहुत मुश्किल है।' an -

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34 गरियाहाट के पुल पर वे दोनों किसी तरह का अपना फ़ायदा नहीं चाहा। यह सही है कि उसे चाहने की कोई जरूरत ही न होती। मोरचे की सरकार के जमाने में उसके बड़े भाई की कोशिश से उसे एक वस और एक टैक्सी का परमिट मिल गया था। हमसे बताया था, अच्छा ही हुआ, हमारी एक सेकेंड लाइन ऑफ़ डिफ्रेंस हो गयी। बस और टैक्सी खरीदने का रुपया भी उसने खूब उत्साह दिखाकर इकट्ठा किया। एक दिन वह सीधे मैनेजिंग डायरेक्टर के कमरे में घुस गया। वह कभी भी स्लिप-ब्लिप भेजकर नहीं घुसता था । उन सब बूर्वा लोगों के तरीकों में उसे विश्वास न था। उसे वह अपमान- जनक और वर्ग-चेतना-विरोधी समझता ! - . मैनेजिंग डायरेक्टर से यज्ञेश्वर ने कहा, "देखिये, आज यूनियन के किसी काम से नहीं आया हूँ, यह मेरा व्यक्तिगत काम है। अगर सुनो तो कहूं, नहीं तो चलूं।' मिस्टर मोहता बोले, 'आप क्या घोड़े पर सवार होकर आये हैं ? बताइये, आपका क्या काम है ?' यज्ञेश्वर ने साफ-साफ़ कह दिया, कि वह एक बस और एक टैक्सी खरीदेगा। परमिट मिल गया है, रुपया नहीं है । अस्सी हजार रुपयों की उसे जरूरत है। यज्ञेश्वर ने कहा था, 'मैं कोई पक्षपात नहीं चाहता। क़र्ज़ के हिसाब में रुपया आप दिला सकते हैं या नहीं ? जो भी सूद होगा, मैं दूंगा। और आठ बरसों में रुपया चुकाऊँगा।' मिस्टर मोहता बोले, 'कोई असुविधा न होगी। यहाँ कोई पक्षपात की बात ही नहीं है । मामान्य लेन-देन है ! मैं अपने बैंक में कह दूंगा। मैं आपकी गारंटी दूंगा। कम्पनी में कोई मतलव नहीं। आप बैंक से ही कर्ज ले लेंगे। किमी का किमी पर कोई आभार भी नहीं रहेगा । बम ।' - मिस्टर मोहता की तबीयत ठीक नहीं है। एक जड़ाऊ मेट पहले ही भेज दिया था। वही जड़ाऊ सेट यज्ञेश्वर की बहू पहने बैठी है । बहुत गरियाहाट के पुल पर वे दोनों 35 पसन्द आया । मिस्टर मोहता ने कहा था कि आयेंगे नहीं, लेकिन आये थे। यज्ञेश्वर गरद का टीला कुर्ता, सोने की चेन, और चुलटदार धोनी पर्ने बच्छा लग रहा था। हम लोगों को देखकर वह 'माश्य महकर आगे बढा। इडिया किंग का पैकेट सोलकर बोला, "आज यही पिओ, भाई। मैंने अपनी पत्नी का यज्ञेश्वर से परिचय करा दिया । वह हंसकर बोला, 'आइये, भाभीजी।' मैं वोला, 'भाई, उसे जरा अन्दर ले जाओ। वह वोला, 'जरूर, जरूर । चलिये ।' तभी केया को लिये राची घुसा। उसने पहले मेरी ओर नही देखा, यजेश्वर की ओर देखा । केया ने मेरी पत्नी की ओर नही देखा, मेरी ओर देखकर मुमकरायो । यमेश्वर मेरी परनी को छोड़कर शची और केया को और 'आइये-आइये बहकर बढ गया। । उसके बाद वे लोग अन्दर चले गये । मैं और मेरी पत्नी वहीं सड़े रहे । मेरी पत्नी ने मेरी ओर देखा। मैंने देखा कि एक सपंदोल मजदूर- नेता लाइटर निकालकर मिस्टर मोहता की सिगरेट जलाये दे रहे हैं। मजदूर-नेता यज्ञेश्वर के बडे भाई के अतरंग मित्र थे। विशिष्ट अतिथियों की खातिर-तवाजह की जिम्मेदारी उन्ही पर भी। । यज्ञेश्वर कुछ ही देर बाद ध्यग्र होकर लौट आया। हमे देखकर बोला, 'यह क्या, आप अब भी यही खडे है ? आइये भाभीजी, माओ भाई।' मैने देखा कि मेरी पली इधर-उधर कर रही है। मैं बोला, 'चलो. चलो । जितनी जल्दी निबटा दिया जाये, उतना ही अच्छा है। बहुत दूर जाना है।' 'हाँ, हाँ, यज्ञेश्वर बोला, 'जरा जगह होते माप लोगो को बैठा दूंगा। अभी तो शाम हुई है। हमारी ओर से सब तैयार है। सबसे बढ़िया हलवाई को बुलाया है। ज्यादा लोगो को तो बुला नही पाया। ऑफिन में जो-जो लोग काफी नजदीकी हैं, उनमे से भी सबसे वह न सका 36 गरियाहाट के पुल पर वे दोनों एक मनोरंजक नाटक और उसके पात्र यज्ञश्वर चक्रवर्ती : वह । मोहता इंडस्ट्रीज का कर्मचारी और उस प्रतिष्ठान की कर्मचारी यूनियन का जनरल सेक्रेटरी और संघर्षशील मजदूर- देता। रत्ना : यज्ञेश्वर की नवविवाहिता पत्नी। भुवनेश्वर : यज्ञेश्वर का वड़ा भाई। चतुर कामरेड । लड़ाकू वाम- पंथी दल का अग्रणी नेता। गगन मुखर्जी : रत्ना का पिता । वहुत बड़ा ठेकेदार । मिस्टर मोहता : आमन्त्रित अतिथि। मोहता इंडस्ट्रीज़ के मैनेजिंग डायरेक्टर । व्यवसाइयों की सभा के अध्यक्ष । शची (एस० वी०) : आमन्त्रित अतिथि । मोहता इंडस्ट्रीज़ के चीफ़ एक्जिक्यूटिव-सेल्स । पहले कभी कवि थे। केया : उनकी पत्नी । सुन्दरी, सुवेशा, सुशिक्षिता । मीनू : मोहता इंडस्ट्रीज़ के एक छोटे अफ़सर की पत्नी। अत्यन्त सामान्य स्त्री। मीनू का पति : आमन्त्रित अतिथि । यज्ञेश्वर की यूनियन का अराज- नीतिक सदस्य । सामान्य स्तर का लेखक । मन में आशा है कि एक दिन रवीन्द्र पुरस्कार, अकादमी पुरस्कार, राजपीठ पुरस्कार, नोवल पुरस्कार और जय बांगला पुरस्कार पायेगा ! शची का पुराना साथी । मोरचा सरकार के कई मन्त्री (पहले के) : आमन्त्रित अतिथि। वही एक और मन्त्री : (वहीं)। वही और भी एक मन्त्री : (वहीं)। पार्टी के सेक्रेटरी : आमन्त्रित अतिथि। पुलिस कमिश्नर : (वहीं) । डी० सी० ट्रैफ़िक : (वही) । डी० सी० मिक्युरिटी : (वही)। डी० सी० साउथ : (वही) । डी० आई० जी० : प्रेसीडेंसी रेंज : (वही)। डिवीजनल कमिश्नर : (वही) ।

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38 गरियाहाट के पुल पर वे दोनों लेकिन अगर कोई उठा दे ? एकदम से यह सवाल उसके मन में जाग उठा। यज्ञेश्वर के जेव से रूमाल निकालते ही अजीव-सी एक मीठी गंध फैल गयी। अंग्रेजी सिनेमा देखने चौरंगी अंचल में जाने पर, या एयरपोर्ट के लाउंज में दो-एक मेमों के पास से झपटकर निकल जाने पर इसी तरह की गंध नाक में घुसती है । यज्ञेश्वर ने रूमाल से गला पोंछा। उसके बाद पता नहीं क्यों यज्ञेश्वर ने उसकी ओर देखा । जरा हंसा। उसके बाद बोला, 'तुम्हें कुछ ताज्जुब लग रहा है न ? असल में बात क्या है जानते हो, यह सब भाई-साहब की कारस्तानी है । उम्र हो गयी है न, इस वक़्त थोड़ा भावुक हो गये हैं । बन्धु-वान्धव सभी को निमन्त्रण दिया है। ज्यादा भीड़ जमा कर ली है।' यज्ञेश्वर का कंठ-स्वर ऐसा मुलायम होगा, ऐसी उसे भनक तक न - थी। केया के आते ही यज्ञेश्वर 'जरा आ रहा हूँ, भाई' कहकर चला केया के बदन से भी यज्ञेश्वर के रूमाल की-सी मीठी-मीठी गंध फैल रही थी। केया ऐसी सुन्दर दीख रही थी कि उसके समीप आकर बैठते ही सवकी नज़र उस पर पड़ी । शची इस बीच क्रम से मिस्टर मोहता, पुलिस कमिश्नर, और मोरचा सरकार के कई प्रभावशाली भूतपूर्व-मन्त्रियों के साथ सामान्य भाव से बातें कर रहा था और बीच-बीच में हँस भी रहा था -आज वह ज्यादा ही हंस रहा था। उसने केया से कहा, 'तुम यहाँ ? खाने को नहीं बैठी ?' केया बोली, 'तुम्हारी बीवी तो खूब खा रही है !' इसके बाद क्या कहा जाये, उसे फ़ौरन सूझ न पड़ा। केया उसके पास आकर बैठ गयी। सभी लोग केया की ओर देख रहे हैं, इसके मतलव कि ।

गरियाहाट के पुल पर दोनों 39 उस पर भी सबकी नजर पड़ रही है । इसके माने कि वे दोनों जो बातें कर रहे थे, उसे भी सब ने सभ्य किया। तो? अब सहना चुप हो जाना का ठीक होगा? एक सज्जन पान चबाते-चबाते निकले। केया को देखकर, 'अरे, सब टीक तो है ? बाबा की क्या खबर है ?' कहकर जरा रुके। फेवा बोली, 'सब ठीक है। बाबा अब एक बार नीचे आकर बैठते हैं। ठीक ही है।' 'अच्छा, अच्छा,' सज्जन खुदा हुए । बोले, 'यादवपुर में पर बनाकर बडे झमट में पड़ गया हूँ । वड़ा हगामा है । और वरदास्त नहीं होता। लगता है कि वह मकान छोट ही देना पड़ेगा । तुम्हारी मौसी तो डर के मारे अघमरी हो गयी हैं। समाज में स्थिति नहीं है। घर-घर बनाने से फायदा ही क्या " केया बोली, 'मौसी नहीं आयी ?' 'अभी-अभी आयो हैं बुलू के साय । मिलोगो ?" केया बोली, 'मिलने जाऊंगी।' 'अच्छा,' सज्जन बोले, 'अब जरा उधर चलूं।' 'अच्छा,' सज्जन के दूर जाने पर केया बोली, 'पता है यह घर किसका है ? इन्ही सज्जन का । यह सज्जन कौन हैं, जानते हो? रत्ना के पिता।' उसे भी इतनी देर बाद वात करने को मिली। बोला, 'यश्वर के . ससुर?' 'वह मेरे पिता के मित्र हैं, केया बोली, 'मामूली अवस्या से काफी परिश्रम कर खूब पंसा पैदा किया है। मौसाजी के हाथ भी पुले हैं ! लड़की को बिलकुल निहाल कर दिया है। पैरों के तलवे पर और औठ के नीचे सफ़ेदी है-~इसीलिए शादी नहीं हो रही थी। ग्ला लड़की सचिन बहुत अच्छी है। यह पर भी दहेज में दिया है या नहीं, समझ नहीं याता!'

गरियाहाट के पुल पर वे दोनों । उसे सहसा परेशानी-सी लगने लगी। फ़ौरन केया से बोला, या!" दूसरे एक आदमी के आकर केया के साथ बात करने से उसने मन- ही-मन कहा-इसमें यज्ञेश्वर का कोई हाथ नहीं। उसके बड़े भाई ने ही सारी व्यवस्था की है। भाई की अव उमर पक गयी है । समझती ही हो इस उम्र में लोग जरा ज्यादा भावप्रवण हो जाते हैं । इसीलिए...! . -- केया ने उस आदमी से कहा, 'मेरा फ्रिज पहले-सा काम नहीं दे रहा है । आपने तो उस वक्त वहुत गारंटी दी थी।' वह आदमी हंसा । वोला, 'सचमुच वह बहुत अच्छा फ्रिज है। यहाँ भी तो वही फ्रिज दिया है। लेकिन मॉडल दूसरा है। यह बहुत बड़ा है। फ्रिज का कोई क़सूर नहीं है।' केया वोली, 'तो हमें इतनी तकलीफ़ क्यों दे रहा है ?' वह आदमी हँसा। वोला, 'तकलीफ़ दे रही है कलकत्ता की इलेक्ट्रिक सप्लाई कम्पनी। वोल्टेज वरावर बढ़ता-घटता रहता है। उससे क्य मशीन अच्छी रहेगी ? इनकी मशीन, देखना, तंग करेगी ही नहीं।' केया ने पूछा, 'क्यों ?' वह आदमी बोला, 'यज्ञेश्वर बाबू उस दिन साले के साथ फ्रिज रंग पसन्द करने हमारी दूकान पर आये थे। गगन बाबू को तो ज होंगी, किम तरह का उदार-हृदय है, मुझसे टेलीफ़ोन करके कहा- मेरी मँझली लड़की की शादी है । बड़ी को जो दिया है, मझली वही दूंगा। उनके बड़े दामाद आजकल बहुत मज़े में हैं । फ़रीद फैक्टगे ले जाने के बाद से हालत एकदम बदल गयी है। गगन वा बड़ी लड़की को जिस तरह का फिज दिया मझली को भी वैस समझी ?' यजेश्वर बाबू ने जो पसन्द किया, वही दिया। उसने मन-ही-मन केया को समझाना चाहा कि यज्ञेश्वर अपने भाई को बहुत मानता है। वह आदमी बोला, 'मैने उनसे .

41 गरियाहाट के पुल पर वे दोनों लेकिन कलकत्ता मे पॉवर सप्लाई को हालत आजकल बहुत शोचनीय है- जब-तब वोल्टेज गिर जाता है। इसमे मशीन को नुकसान पहुंच सकता है। माप एक काम कीजिये, इसके माय एक वोल्टेज स्टेबिलाइजर और ले लीजिये, सिर्फ तीन सौ पचास स्पयो का झंझट ही तो है । वोल्टेज बिलकुल एक ही रहेगा और मशीन कोई तकलीफ न देगो, कभी नहीं। यज्ञेश्वर वाबू के अपने साले के मुंह की ओर देखते ही वह बोल उठे-~यह बात उनमें कहने की क्या जरूरत थी? बिल का पैसा तो हमें देना है। जो आप ठीक मममें वैसा करें। समभी?' उसने मन-ही-मन केया मे कहा-~यज्ञेश्वर इस मामले में बहुत झमेले में पड गये। समझी केया, उनके भाई जैसे भावुक हैं...। वह आदमी बोला, 'यह वात मैंने शची बाबू से भी कही थी; पूछ लीजियेगा। लेकिन वे शायद मुझ पर विश्वास न कर सके।' न, न, यह ठीक नहीं हैकेया झट से मन-ही-मन बोल उठी- वक्त हमारा हाथ कुछ तग था। उस आदमी के उठकर जाते ही केया ने उसको ओर देखा, और वह चौंक उठा, क्योकि वह केमा के मन की बात साफ-साफ सुन पा रहा था। केया : हमने उधार पर फिज लिया था। हम तो वह दहेज में नहीं मिला था। वह मन-ही-मन बोला- इस मामले में मजेश्वर का कोई हाथ नहीं पा। इसके बाद और भी चौक पड़ा, क्योकि उसने देखा कि केया भी उसके मन की बातो को खूब समझ रही है। वह : हाय तंग था के माने? केया : सारा मामला यज्ञेश्वर के सिर थोप दिया गया था। यह सब इन्तजाम सारे-का-सारा उसके भाई ने किया था। वह : ठीक । लड़की किसने पसन्द की ?

42
गरियाहाट के पुल पर दोनों
केया: उसके बड़े भाई ने।
वह : लेन-देन ?
केया : उनकी कोई मांग नहीं थी। एक भली-सी लड़की, सिर्फ़ सफ़ेद
दाग होने से उसकी शादी नहीं हो रही थी ! यज्ञेश्वर इस तरह के कोई
संस्कार नहीं मानता। वह संघर्पशील व्यक्ति है, क्रान्तिकारी है। वह इस
लड़की से शादी करने को तैयार हो गया। बाक़ी मामला उसके ससुर का
है। उनके पास रुपया है। वह उदार हैं। उन्होंने अपनी बेटी को खूब दिया।
इसमें यज्ञेश्वर क्या करे ? हाँ, इसे यूं कह सकते हैं कि यह उसकी एक
सुरक्षा की दूसरी सीमा-रेखा बनी।
वह : तीसरी सीमा-रेखा कहो। दूसरी रेखा तो एक वस और एक
टैक्सी खरीदकर ही तैयार हो गयी थी।
केया बोली : 'आदमी पक्का सेल्समैन है ।'
शची अब केया के पास आ गया और वह उसे फिर न दिखायी पड़ी।
-
शची : यजेश्वर इतना साधन-सम्पन्न है, यह मुझे पता नहीं था।
मिस्टर मोहता तक ताज्जुव में पड़ गये। पता है, मुझसे क्या कहा ? बोले,
एस० बी०, इन्ही लोगों के हाथ अव ताक़त की जड़ है। इनके साथ अपना
सम्बन्ध इस बात को ध्यान में रखकर ही बनाना पड़ेगा।
गची बहन दिनों बाद फिर बहुत उत्साहित लग रहा था। वह फिर
उनके साथ पुराने अन्तरंग तरीके गे बाते करने लगा।
गची आई थिक, ही इज गइट! क्या खयाल है ? और
तुम्हाग क्या बात है तुम्हारी पन्नी वहाँ है ? विजयी नहीं पड़ रही है।'
वेवा बोली, 'वह ग्याने वैट गयी है।'
गची को नाब हआ, 'उननी जल्दी ।
वह चट में बोला, "नाम जितना हीदी हाये उतना ही अच्छा।
दूर जाना पड़ेगा, वह भी कहाँ ?

गरियाहाट के पुल पर वे दोनों शची ने उसने कहा, 'ऐं, जाने के लिए इतनी फ़िक! हम तुम्हें साप ले जायेंगे। शवी ने क्या मे कहा, 'मैंने मिस्टर मोहला से कहा, मजेश्वर के साथ अब मेरा तो करीब-करीब घरेलू सम्बन्ध हो हो गया। मिस्टर मोहता बोले-वह कैसे ? मैंने बताया, यमेश्वर के ससुर मेरे मसुर के परिवार के मित्र हैं। सुनकर मिस्टर मोहता सुश ही हुए ! तुम यझेश्वर और उनकी को एक दिन हमारे घर लाने का निमन्त्रण दे दो।' शची बोला, 'चलो, तुम्हारे साप उनकी अच्छी तरह बातचीत करा दूं। ये सब ऊँचे तबके के अपमर हैं । बातचीत बनाये रखना अच्छा ही है। दिन-पर-दिन हालत जो होती जा रही है !' केया ने थरकर उबासी ली। बोली, 'तुम्हारे साय तो मयत्री वात- चीत हो गयी है। हो गया। उससे अच्छा है, हम यहाँ जरा यातें करें।' उसकी ओर देखकर केया बोली, 'यह सो आजकल दिखायौ ही नहीं पड़ते । पत्नी ने तो नहीं मना कर दिया है ?' लाल सिग्नल के प्रति मीनू को स्वगतोक्ति यह जो तुम अभी जिस तरह देख रहे हो, जरा भी पलक नहीं झपती- मेरा सयाल था कि भगवान भी इसी तरह हमारी और देव रहे हैं। हम अच्छा करें या बुरा करें, उसकी रष्टि से कभी नही बच सकेंगे। उसी के निकट सब हिसाब-किताव लिया है। लेकिन क्या मच ही एमी बात है, बताओ? जो अच्छा काम करते हैं उनके लिए हिमाव की एक अलग किताब है न ? उमी साते के हिसाव के अनुमार भगवान वो उसे कुछ पुरस्कार देना होता है । ठीक है न ? यम-मे-कम ऐसा कुछ किये जाने से वे गमझ सकते हैं कि कहीं न्याय का विचार करने वाला कोई है । नहीं तो मैं अच्छा काम करके भी देहूं कि हमारे भाग्य में वही दुगंति है तो लोग अच्छा काम क्यों करना चाहेंगे, बताओ तो? हमारा काम ही बहुत अजीव है, पता है ? मैं तो कोई सगा पाती। रोज रात को सोने के पहले बिस्तर पर बैठकर मन 44 गरियाहाट के पुल पर वे दोनों - - 4 - को पुकारती हूँ, वही वचपन में जैसे दादी ने सिखा दिया था, वैसे ही। रोज़ ही उनसे कहती हूं : ठाकुर, मैंने कहाँ ग़लती की, मेरी भूल कहां हुई ? क्यों मैं किसी से कोई भी प्रतिदान नहीं पाती ? मुझे प्यार क्यों नहीं मिलता ? विना चाहे ही तो मैं संसार में सबको जो जिसे ज़रूरत है सब दे देती हूँ, कितनी आशा से अपेक्षा करती हूँ कि वे लोग भी मेरी जो ज़रूरत है, उसे इसी तरह पूरी करें। क्या इसमें बुराई है ? क्या यह अन्याय है ? और मेरी जरूरतें भी क्या बहुत ज्यादा हैं ? मुझे रानी नहीं बनना है। विलकुल नहीं। बस, कोई आकर मुझसे इतना-भर मुंह खोलकर कहे- तुम्हारे पास कपड़े-लत्ते नहीं हैं, सब फट गये हैं, क्यों? खा लो न ! या, ओहो, वहुत काम किया, विस्तर विछा दिया है, सो जाओ। क्यों, आँखें क्यों भरी हैं, क्या तबीयत ठीक नहीं है ? लेकिन इतना भी तो मेरे भाग्य में नहीं है। सभी केवल मुझसे लेने आते हैं। अगर अपनी हैसियत से देती तो वे लोग उसकी समालोचना में मुखर हो उठते हैं । मेरी सास की वात सुनोगे? पुराना घर जब उठा देना पड़ा तो क्यों ? हां, मेरे ही कारण । सब के लिए तो नापकर जगह मिली और मेरे लिए? बहुत कुछ सहने के बाद एक दिन मैंने साफ़-साफ़ कह दिया : घर-भर के लोगों के बीच मैं पति के साथ लेट नहीं सकूँगी। मेरे लिए दूसरे कमरे की व्यवस्था कर '. दो, नहीं तो मुझे मैके भेज दो। उस दिन के नाटक में मीनू और दूसरे लोग मीनू की ऐसी भगवती मुद्रा देखकर सब लोग स्तब्ध रह गये । सास ज़ोरों से रोने लगीं । ननदें तेजी दिखाने लगीं। मझली की आवाज़ सुनायी पड़ रही है। पर ननद उनके कमरे में जाकर जिस तरह तेजी से निकली हैं, उससे लगता है कि वे ही चुपचाप ईधन जुटा रही हैं। एक ननद (चिल्लाकर) : 'यह समझने में क्या रह गया कि आग कहाँ लगी है ? बेवकूफ़ तो नहीं हैं हम। हम घास में मुंह ठूमकर तो नहीं चल रही हैं ! अव मझली भाभी का कमरा उन्हें चाहिए ! जलन से छाती फटी जा रही है ! तुम वह कमरा मत छोड़ना, भाभी। देखें, क्या करेगी।'

- , गरियाहाट के पुरा पर ये दोनो (यह ननद टाइफाइड में मरने-गरने को हो भागी थी। तुगले तो देता था, भगवान, गयो? मीनू घोसी। विरार परपातानाशाब कर देतीगी। कोई उसके पास न फटमाता । मभगीको सो धारा होगा। उसी । हार्ट को तकलीफ़ है। उनका मन सदा तुराम रह पर-पटर in कहा पा-~-उनके लिए सापातिक हो समता है। गीति मन प्रगलागे के वास्ते मझराी दूसरी नगद मो शाप पर गिोमा मा गिटा शाला। मीनू बोली, तुमने तो देखा है भगवान, सोहा गाद का सामनाद गुन ही उठाना पड़ा था। टीम हैन? गिपं. हॉस्टर गाय मायाम-गोग लोगों के पर में आते ही मंगली मी तकसीम जमा माती । मह पान तो ठीक है, सभी यह बात जानते कि गगनदी विकली जात देती हैं, मैं नहीं । धीरे-धीरे मेरे पर लोगों ने भी गधान र विमाग कर लिया और सब के यन्त में इग माद ने भी, किसय पह मि.मी भाभी के अधिकार की रक्षा के लिए गहमर पापकर मी गाप झगडा करने को उट परी हई । मेरे ही विट न गयो गुट बना full कही भी अगर न्याय-अन्याय नाम का मर है, यह सिमा हो' बताओ, तुम ही बनाओ।) वही ननद (चीवर) : 'यगम में नागपमा या महाना है । तुम टम कमी में पहले ग ही हो, उस यम में ही मोगी। धान, दह क्या करती है। मंगली (मोट कोमल म्बर में): होगा, मागीमा वह यहगी, या के माय मानक लिए गया कमानाका माम (मिर पीटने वा) दिशा माना। मार-गरम बहा नी नी ? बाद में areact हैं। हमारे इमान में मुशानीhen Ex। और मादक पर काटी दहा rial या। और farter : (दहीकार matra7:Eutamm दो बार पर rail जी यानी मिटाहो - ई-r.

46 गरियाहाट के पुल पर वे दोनों ' आपको मालूम था, माँ ? यह सवाल, मैं जब इतनी बुरी हूं तो, कर सकती हूं या नहीं, भगवान, बोलो, बोलो तो!) मॅझली बहू (मीठे कोमल स्वर में) : 'मैं इधर-उधर पड़ी रहूंगी भाई, क्या किया जाये, शरीर जव खराब हो, अपने वर के पास जव नहीं जा पाऊँगी, वर के पास सोने का भाग्य जव न हो...।' सास (गहरी साँस लेकर) : 'ओफ़ ओह, तुम्हारे मुंह से ये बातें सुन- कर मेरी छाती फटी जा रही है !' वही ननद (रुआंसी-सी होकर) : 'वह वात मत कहो भाभी, मत कहो, मत कहो....' (मीनू ने भगवान के आगे फिर अर्जी पेश की, देखो, देखो। उन सबके दिलों में एक-दूसरे के लिए कितना गहरा दर्द और प्यार है। उन सबके पास कितना काफ़ी समय है ! उन्हें कितना समय मिलता है प्यार के पेड़ में फूल खिलाने के लिए! मैं इतना समय कहाँ से लाऊँ ? सूर्य निकलने के पहले मुझे उठना पड़ता है। चाय बनाकर उन्हें पुकारकर उठाना पड़ता है । सवकी सवेरे सुख-निद्रा तोड़ने की मैं ही एकमात्र अप- राधिनी बनती हूँ। उसके बाद दुनिया के काम के स्रोत में प्रवल वेग से वहते-बहते क्लान्त, थकी-हारी मैं जब भारी-भारी विस्तर विछाकर सवकी व्यवस्था कर सब-कुछ समेट पाती हूँ तब तक गहरी रात हो जाती है। नींद से आँखें बन्द हुई जाती हैं। उस समय मैं और मेरा स्वार्थ-रत शरीर----- इसके सिवा कुछ याद नहीं रहता। उस समय प्यार के पेड़ में फूल खिलाने की इच्छा तक नहीं रहती! वक्त भी नहीं रहता। तुम तो सब-कुछ देखते हो। फिर चुप क्यों रहते हो?) मीन : 'इस घर में जगह की यदि इतनी कमी थी तो बेटे की शादी करने क्यों चली थीं? इस तरह वेशर्मी से सोने की मेरी आदत नहीं है।' सास (चिल्लाकर) : 'शादी क्या हमने की ? मेरे बेटे पर जाने क्या जादू कर दिया था, यह तुम ही जानती हो !' मीनू : 'तो आपके बेटे ने ही ठीक नहीं किया। उसे ब्रह्मचारी बनकर रहना ही उचित था !' वही ननद : 'दादा को भलामानुस पाकर पटाते वक्त नहीं समझी थीं ?'

गरियाहाट के पुल पर वे दोनों 47 मीनू : 'तुमसे बात नहीं कर रही है। तुम चुप रहो। मैं मां से वह (सुनिये मां, मीनू ने भगवान के दरबार में फिर सवाल किया, सुनिये । इस घर में काम करते-करते मुझे इतनी मेहनत पड़ती है कि रात में विस्तर पर पडते ही नीद के मिवा और कोई इच्छा नहीं होती । आपका ना-समझ बेटा इतना भी नहीं समझता। मेरे यनुभूति-भून्य, अनिच्छुक शरीर से ही यह अपनी मांग पूरी करना चाहता है। आवश्यकता उसकी ही अधिक रहती है। लेकिन उस छोटे-मे कमरे में, नीचे विधे बिस्तर पर जब इतने लड़के-लड़कियां सोते हो तो उस आवश्यकता को पूरा करना मेरे लिए कैसे सम्भव है । यताइये । हम इन्सान हैं ! हमें बुरा लगता है कि आपके शटके को मनुप्य की निर्धारित मीमा से खीचकर पशु की सीमा तक ले आया जाये ! लेकिन वह सुनता नहीं। वह मतवाला होकर और उम्र हो जाता है। उस समय उसे रोकने में भी मुझे डर लगता है। यह किसी गुम्से की, लोभ की, घमड की बात नहीं है--सुविधा-असुविधा को बात है । इस घर के ढाई कमरो की सीमा में आप लोगों ने सुनहरे संमार का क्या मोह पाल रखा है, आप ही जाने । इस घर का मोह आप लोग क्यों नहीं छोड़ पाते, छोडने की बात उठते ही क्यो बातंक में मृतप्राय हो जाते हैं, मैं नहीं समझ सकती। केवरा यही समझ सकती हूँ कि इस घर को छोडते वक्त कितनी ही पुरानी आदतें आप लोगो को छोडनी पडेगी, जिन आदतो ने कितने ही असगत अधिकार-वोधो को जन्म दिया है.---- वह मन्त्र निरर्थक अधिकार-वोच आप लोगो के अह को तृप्त रखते हैं। यह अ फिर जीवित है, आप लोगो ने कल्पना में जिला रसा है अतीत मुगो के समस्त चित्रो को अंकित करके । वे सुख या तो कभी थे ही नहीं, या होंगे तो उनसे आज कुछ आता-जाता नहीं है। आज हमारे सबके लिए जितनी जगह की जरूरत है, वह इतने छोटे ठिकाने ने पूरी नहीं होती, असल बात तो यह है। है न ? मनुष्य इसी तरह तो आगे बढता है।) मीन के ज्वलन्त रूप के धारण करने से उस दिन यह हुआ कि उन दिन से उस घर मे उसे सभी दूसरी नज़रो से देखने लो .. । 1 48 गरियाहाट के पुल पर वे दोनों सबने कीचड़-भरा तालाव मान लिया था; उसी दिन पहले-पहल समझ में आया कि वह वैसी नहीं है। उस दिन के भोज में उसकी कुछ सुखद जानकारी पुल पर खड़े-खड़े उसने अपनी पत्नी को रह-रहकर देखा। लगा कि उसकी पत्नी बहुत सुखी है। कभी वह उदास हो जाती, कभी जैसे स्वप्न देख रही हो। इससे उसे खुद भी सुख मिल रहा था। किस प्रकार का कोमल भाव उसकी पत्नी के शरीर पर फैला हुआ था । 'वूफ़े ही करते, 'समझे ?' यज्ञेश्वर ने उससे बीच में कहा था। लेकिन क्यों नहीं किया, पता है ? कुछ कुंठित भाव से वनेश्वर ने जवाब दिया था, 'उस काम में कहीं मानो एक बड़प्पन की गंध है । अजीब-सा पूर्वा भाव रहता है । कुछ पता नहीं।' 'हे-हैं' करके अपने-आप ही हंसकर वह बोला था, 'तव भी लोग शायद कहते, ब्याह में यज्ञेश्वर ने बूफ़े किया था। समझे। लोग तो समझ- कर बातें करते नहीं। इसीलिए दादा ने कहा-न, पत्तल पर खिलाना ही ठीक है। शुरू से जो चला आ रहा है, वही चलेगा। इसमें कोई बात न उठेगी। क्या कहते हो?' सो ठीक है, उसने सोचकर देखा, यज्ञेश्वर का व्याह इस तरह निष्पन्न हुआ कि किसी ओर से कोई भी वात न उठे। वात उठने के सव तरह के कामों से उन्होंने यत्नपूर्वक अपने को बचा लिया था। यज्ञेश्वर ब्राह्मण है, उसने ब्राह्मण की लड़की से ही शादी की। शुरू से ब्राह्मण का विवाह जिस प्रकार होता है, यज्ञेश्वर का व्याह भी उसी तरह हुआ। वही अधिवास, नान्दीमुख ! वही शरीर में हल्दी, हाथ में यज्ञसूत्र वाँधना! वही माँ के पास बैठकर कहना, 'मां, तुम्हारी दासी लेने जा रहा हूँ।' निश्चय ही यज्ञेश्वर ने उपवाम किया था। भोर रात को सधवाओं के साथ दधि- मंगल किया था। दिन-भर में दो-एक सन्देश और कई कप चाय पीकर भी रह सकता है। अर्थात् जितना नियम-मंग आचार-सम्मत है, उसे भंग कर वह रह सकता है। इस तरह की बातचीत भी होगी, यज्ञेश्वर को जो थोड़ा भी जानता है, उससे होना सम्भव है, समझता है, जैसे:

गरिपाहाट के पुल पर वे दोनों 49 यज्ञेश्वर (बनावटी गुस्से से) : 'देखो, कार की बात करोगी तो भार साओगी।' यज्ञेश्वर को वहन (विवाहित) : 'वेकार नही छोटे भैया, यह करना पड़ता है।' पझेश्वर : 'मुमने वह सब न होगा।' यझेश्वर की भावज : 'जो कहती हूँ वह करो देवर, नही तो बहू बस में न रहेगी। वुढापे में शादी कर रहे हो न !' यनेश्वर की छोटी चाची : 'ले बाबा, ले, मुंह खोल । कई डले मसल- कर रखे हैं, धीरे-धीरे मुंह में डाले दे रही हूँ। अच्छा बेटा, राजा बेटा, इसे खा लो। यह दही और चिउडा है।' यज्ञेश्वर : 'तड़के-तड़के यह सब खाना पड़ेगा! पेट सराव हो जायेगा, चाचीजी।' यज्ञेश्वर की छोटी चाची : नियम-रीत तो मानना पड़ेगी, बावा । दिन-भर निर्जल उपवास में रहना पड़ेगा।' यज्ञेश्वर (खाते-खाते) : 'इसीलिए तो इस देश में क्रान्ति इतनी जरूरी हो गयी है। अपने इन सब सड़े-गले नियम-रीतियों को पब तक पालकर रखोगी?' (छोटी चाची का हाथ मुंह से हटाकर) 'अब नही चाची, प्लीज़, कहे दे रहा हूँ कि अब सारा-कुछ पेट से निकल जायेगा।' अथवा (पाम को)... । यज्ञेश्वर (बनावटी क्रोध से) : 'अब सचमुच थप्पड़ लगेगा।' यझेश्वर की वहन (तीन-चार बच्चो की मां-दबे हुए नाक के स्वर में) : 'अरे रे, देखो तो, छोटे भैया कह रहे हैं, मारेंगे । बैंठो न छोटे भैया, मां की गोदी में तो बैठोगे !' यज्ञेश्वर की भावज : 'जो कह रही हूँ करो न, देवर । मयेरे गे साम. खाह तग कर रहे हो।' यज्ञेश्वर 'मैं तंग कर रहा हूँ कि तुम लोग संग कर रही हो ?' यज्ञेश्वर की भावज : 'अच्छा, हम हो तंग कर रहे हैं, बारा; 1. .

50
गरियाहाट के पुल पर वे दोनों
तंग कर रहे हैं। लेकिन आज रात को ही तुम्हारी सब परेशानी खत्म हो
जायेगी।'
सव औरतें खिलखिलाकर हंस पड़ी।
यज्ञेश्वर की छोटी चाची : 'वैठो वावा, वैठो। माँ की गोदी में बैठो।
कहो-माँ, तुम्हारे लिए दासी लेने जा रहा हूँ। शुभ दिन किसी को कष्ट
नहीं देते। इस घर का कायदा-कानून जव है...।'
यज्ञेश्वर : 'अच्छा, इस सबके कोई मतलव होते हैं ? वेवकूफ़ी की
यज्ञेश्वर माँ की गोद में बैठ गया। औरतों ने हूलू-ध्वनि की। माँ के
आँसू बहने लगे।
यजेश्वर की भावज : 'देवर, कहो-माँ, तुम्हारी दासी लेने जा रहा
04
यज्ञेश्वर : 'इस बीसवीं शती में मनुष्य जव चाँद पर जा रहा है.
तुम लोग...'
यज्ञेश्वर की वहन : 'बोलो न, छोटे दादा...।'
यज्ञेश्वर की भावज : 'बोलो, देवर, बोलो...।'
यज्ञेश्वर की छोटी चाची : 'बोल,मेरा बेटा...'
यजेश्वर : 'मां, तुम्हारी बहू लेने जा रहा हूँ...।'
यज्ञेश्वर की वहन और भावज : 'यह क्या, यह क्या !'
यज्ञेश्वर की मां और चाची : 'रहने दो, रहने दो, आजकल के
लड़के...!'
यज्ञेश्वर ने उससे कहा, 'मेनू-टेनू सब छकू-दा का है, समझे। एकदम
चुना हुआ और उम्दा। खाओ भाई, मैं उधर देखू ।'
सचमुच वढ़िया खाना था। फ़िश-फाई, छोटी मूंग की दाल, परवल
के भीतर मंडा भरकर दोरमा, भरवाँ लूची, चिंगड़ी की मलाई करी, रुई

गरियाहाट के पुल पर वे दोनों 51 मछली, फाइड राइस, फर्स्ट क्लास रेजाला, अनन्नास की प्लास्टिक चटनी, पापड़, दही, रसगुल्ले, सन्देश, और वर्क-लगे पान । एकदम वदिया ! अमल में पास से देखे विना, उसे लगा, मनुष्य के सम्बन्ध में धारणा कभी सष्ट नहीं हो पाती। उसके सामने बैठे पहले की सरकार के मंघर्ष- गील मन्त्री खूब स्वाद ले-लेकर दावत खा रहे हैं। उनके पास बैठे सरकारी अफसर लोग, उनके पास यज्ञेश्वर के ससुर, और उनके आत्मीयजन और उपर गची, उसके पास केया, उसके पास वह । बहुत अच्छा माहौल था! सहमा केया (मन-ही-मन) : कौन सरकारी अफसर है और कौन संघर्षशील नेता---इस भोज की मजलिस में देखने से तो समझ में नहीं आता। यह चौकार (मन-ही-मन) : न, केया प्लीज । 'पों-खों-खो....' केया ने उसकी ओर मुंह उठाकर देखा। वीली, 'पानी पिओ, पानी पिओ । थोछा लग गया है।' उमने शरमाकर कई घुट पानी पी लिया। यह (मन-ही-मन) : असल में हम आदमी को वाद में देखते हैं, पहले उसकी पोशाक, पदवी-~यही सब तो देखते हैं। इसीलिए अकसर ठीक से नहीं समझ पाते, कोन आदमी कसा है। केया (मन-ही-मन) : अभी देखकर कौन कहेगा कि उनका इतना रोष है? वह (मन-ही-मन) : असल मे हम लोग तो उन्हें वर्तमान सामा- जिकता की पृष्ठभूमि मे देखते हैं । है न ? जब फिर दूसरे.... केया (मन-ही-मन) : उनमें किसने क्या दिया है, पता है ? वह विपन्न होकर (मन-ही-मन) : सामाजिकता मनुष्य को...। केया (मन-ही-मन) : एक ने दी थी चूड़ियां और दूसरे ने कड़े, एक और ने दी थी बनारसी साड़ी। दाम पता है ?

गरियाहाट के पुल पर वे दोनों -ह (मन-ही-मन) : असल में आदमी को...। केया (मन-ही-मन) : फिर हममें और उनमें फ़र्क ही क्या है ? वह अच्छी तरह लक्ष्य कर उनका खाना देखने लगा। एक सज्जन : 'अरे-अरे, कर क्या रहे हो छकू, मार देना है क्या ?' छकू : 'हथियारवन्द पुलिस जो न कर सकी, वह मैं क्या कर सकूँगा?' 'हा-हा-हा' करके सब हंस पड़े। एक दूसरे सज्जन : 'न-न, अब एकदम नहीं। एक भी नहीं।' छकू : 'एक पीस । मछली विलकुल ताज़ी है। सोनापुर की मछली है।' छकू बख्शी क्यों ऐसा अच्छा मजदूर-नेता है, इस भोज की सभा में इस वात को उसने समझा। भूतपूर्व मन्त्री महोदय लोगों को हाथ से रोकने पर भी रिहाई नहीं मिली । छकू के अनुरोध से और भी कई पीस फ़िश-फ्राई (क्योंकि मछली बहुत ही ताज़ा धी), मलाई करी (क्योंकि वागदा चिगड़ी मछली छकू एक-एक कर खुद छाँटकर लाया था), रेजाला (वेस्ट मुग़ल रेस्तरां के वावर्ची को लाकर छकू ने बनाने को बैठाया था) उन्हें लेना ही पड़ा था। और 'न न, और नहीं छकू, यह तो दुखद ज्यादती है, यह सव-कुछ कहते-कहते भी एक या दो रसगुल्ले या सन्देश सव को लेना पड़ा था-उन्हें भी, प्रशासन और शान्तिरक्षा के कर्णधारों और अन्यान्य अभ्यागतों को भी। - वो एकमात्र केया और वह, उनकी पंगत में उसने देखा, वे दोनों रिहा पा गये थे । परोसने वाले ने आकर जव केया को एक पीस लेने के लि आग्रह किया तो वह अजीव तरह की आवाज़ निकालकर इस तरह 'मैं पश्चिम बंगाल सरकार के 'अतिथि-नियंत्रण -कानून-अनुयायी-व्यवस को न मानकर मुसीबत में पड़ें, आप यह विलकुल नहीं चाहेंगे...।' आदमी ने घबराकर वह पीस शची के आगे डाल दिया। छकू ने जल्दी से आकर वात हलका करने के लिए कहा,

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54 गरियाहाट के पुल पर वे दोनों ऑफ़िस में संचित तनाव बहुत कम हो गया । फैलती हुई खुशबू ने वहुत प्रसन्न कर दिया। खूब साफ़ की हुई वनियाइन और अंडर- वियर ने उसे और स्वस्थ कर दिया। उसने अभ्यासवश कपड़ों की आलमारी खोली; एक हलका-सा सूट निकाल लिया। अभी तक कोई समस्या उसके सामने नहीं आयी थी। उसका हर कदम स्वाभाविक और जाना-पहचाना था। जिस भरोसे से मनुष्य विना किसी प्रयत्न के लक्ष्य पर पहुंच जाये, वह भरोसा उसमें मौजूद था। उसके वाद अकस्मात् जिस क्षण उसके मन में आया कि यज्ञेश्वर के व्याह में कौन-सा सूट पहनकर जाना ठीक रहेगा, वस, उसी क्षण से उसके मन की शान्ति की नींव हिलने लगी। नॉनसेन्त, उसने अपने को ही डाँटा, व्हाई ऐम आई सो शेकी ? - उसने केया से कहा, 'केया, धोती-कुर्ता दो।' और वह व्हिस्की की बोतल लेकर बैठ गया। केया तैयार होकर आने पर केवल यही बोली, 'इस वक्त क्या इसके विना पिये न चलेगा?' गिलास में ढालते-ढालते शची बोला, 'जस्ट ए स्माल वन । फॉर द रोड ।। ठीक किया, व्याह के घर धोती पहनकर ही जाऊंगा। बहुत देर नहीं ठहरूँगा, समझीं । और दैट क्राउड ! आजकल एकदम वरदाश्त नहीं कर पाता। वच निकलना ठीक न होगा, इसीलिए जा रहा हूं। औप- चारिकतावश, और क्या!' केया बोली, 'गगन मुकर्जी की लड़की के साथ तो उसकी शादी हुई। शादी में जाने को कह गये थे। उस दिन जा नहीं सकी, इसीलिए आज जा रही हूँ। नहीं तो मेरी भी जाने की वैसी तवीयत नहीं थी।' शची वोला, 'मेरा भी यही है । गगन मुखर्जी कीन है ?' केया बोली, 'वावा का एक मुवक्किल । लेकिन कभी एक मुहल्ले में 1. कितनी मूर्खता की पात है ! मैं इस तरह संशय में क्यों हूँ? 2. बस, एक छोटा पेग । कहते हैं न, राह में चलते वक्त...!

गरियाहाट के पुल पर वे दोनों 55 थे। अब गगन बाबू की बहुत अच्छी हालत है।' आराम के साथ गिलास से चुस्की लेते-लेते शची बोला, 'अच्छा!' यची के भीतर का तनाव फिर काम हो रहा था। केया बोली, 'खूव दे-दिलाकर लडकी का ब्याह करेंगे । यडे दामाद के तिए तो कारखाना ही सडा करा दिया था। रला उनको मझली लड़की है।' शची फिर खुश हो गया। बोला, 'उसकी और लडकी नहीं है ?' केया बोली, 'नहीं, लगता है नहीं, क्यो।" शची बोला, 'न, यो ही। वडा दामाद कारखाने का मालिक है। मंझला दामाद थमिक नेता । अच्छे खोज निकाले ।' केया बोली, 'तो वह क्या करेंगे ! यज्ञेश्यर बाबू क्या करते हैं तुम्हारे दातर में? दाची फिर ढाल रहा है, यह देखकर केया बोली, 'और पिओंगे?" शची बोता, 'दिस इज द लास्ट । यह गगन बाबू के दामाद के सौभाग्य की कामना के लिए ? यज्ञेदवर इज अ नाइस चैप। यो मेरे ही डिपार्टमेंट में काम करता है। लेकिन हमारे प्रतिष्ठान में ही इज मोर देन ए जनरल मैनेजर।" असल में शची की वेचनी का यही सबब था। राधी मिस्टर धारिया की जगह जनरल मैनेजर होने वाला था। ऑफिस की हवा से यही लगता था। पिचले दो वर्षों से यज्ञेश्वर ने जिस तरह धारिया को नेस्तनाबूद किया था उसमे उसको बात याद आते ही शची का तनाव बढ़ जाता । शची ने तय किया कि बहू-भात मे जायेगा। जितना सौजन्य दिसाना होगा, दिखलायेगा। उसके बाद शरीर ठीक न रहने की बात कहकर जल्दो लौट आयेगा। 1. यह माखिरो है। यज्ञेश्वर भन्ठा लडका है। मेरे विभाग में ही काम करता है लेकिन वहाँ किसी मैनेजर से उसकी प्रतिष्टा कम नहीं है।

56 गरियाहाट के पुल पर वे दोनों 1 केया और उसका (मन-ही-मन) कथोपकथन केया : बच्छा, शची इतना कि क्यों करता है ? वह (आश्चर्य से) : वाह, उसका मुझे क्या पता? केया : क्यों, नहीं पता? वह : तुम उसकी पत्नी हो, तुम्हें ही तो जानना उचित है। केया : सवाल को टाल क्यों रहे हो? तुम भी तो उसके दोस्त हो। वह : दोस्त ! ओ, हाँ ! वह तो कितनी पुरानी बात है। तव का शची अव का शची नहीं है । मैं भी अब वह नहीं हूं। केया : शची क्या शची था और तुम ही कौन से तुम थे? वह : यह तो तुम्हारी जानी वात है, केया। वह शचि था कवि । ब्रिलिएंट कवि। तुम जिसके प्रेम में पड़ गयी थी। मैं भी उससे स्नेह करता था, वह तो बहुत अतीत की बात है। केया : हाँ, बहुत अतीत की बात । अच्छा कवि बनने के लिए उसने बहुत कष्ट सहे थे । चन्दा करके हम लोगों का व्याह हुआ था । वावा ने शची को बहुत समझाया था। व्याह का सव खर्च देना चाहा था। मैंने वावा की बात नहीं मानी। शची की ही बात रखी। वह : हाँ, शची की वात मैं भी अमान्य नहीं कर पाता। केया : हम कोई नहीं कर पाते । उसने सवको वश में कर लिया था। वह : उसके चरित्र का यही सबसे बड़ा आकर्षण था। वह मानो कड़े पत्थर पर पांवों को जमाकर वात करता, और हम लोगों के पर जैसे हवा में रहते ! इसीलिए लगता कि वह जो कहता है, उसके बाद कोई बात कहने को नहीं रह जाती। केया: उसके बाद? वह : उसके वाद! केया: उसके बाद क्या हुआ वह : उसके बाद क्या होता? हम सबकी उम्र बढ़ती चली गयी! केया: उम्र बढ़ जाने से दोस्ती खत्म हो गयी, वाह ! वह : इसमें ताज्जुब की क्या बात है ? केया : ताज्जुब कर रही हूं तुम्हारी बुजुर्गी पर। सच्ची बात तुम ?

गरियाहाट के पुल पर ये दोनों 57 किमी तरह कहना नही चाहते । वह कौन-सा सब छिपा रहा हूँ ? केया:शची के पैरों के नीचे अब कोई कड़ी धरती नहीं है, यह सच है। यह उमे भी मालूम है । इमी से उमे डर लगता है, किसी भी मिद्धान्त पर स्थिर नहीं रह पाता। यह ः शची किससे डरता है ? केया : मिस्टर मोहता से, यज्ञेश्वर से, मुहल्ले के लफंगे लड़को से, तुमसे, मुझमे-और-तो-और अपने से भी । वह बचकाना डर है । याद है, कभी उसे अखबार पढ़ने का फैमा नशा था? शुरू से आखिर तक अस्त- बार पढ़े विना उसे साना हजम न होता। अब हमारे घर में कोई असवार नहीं आता। सब बन्द कर दिमे हैं । यह : क्यो? केया : हर दिन हत्या की खबरें छपती हैं । कही उन पर आँस न पर जाये, इमीलिए। पुल के ऊपर दोनों : गृहस्थी को चिन्ता पीतल वायु का स्पर्श होने पर पारीर स्वस्थ हो जाने से उसकी पत्नी को बात करने की इच्छा जाग उठी। मीनू को यह हमेशा क्षोभ रहा था कि यह अपने पति के साथ किसी तरह तबीयत भरकर बात न कर सकी। उसकी दुनिया में हाडतोड परिश्रम उसको नहीं अखरता था, किन्तु उराको कोई मुंह नही लगाता पा, यह उसके मन को बहुत सालता । खास तौर पर जब यह अपने पति के पास दो बातें करने जाती-~-कोई खाम बात नहीं, यों ही सीधी-सादी बातचीत--तो वह देखती कि उसके पति किताब में मुंह गड़ाये बैठे हैं और जवाब नहीं देते, तो उसका सारा जोग ठंडा पड जाता। वह बहुत खीझ उठती। तो वह क्या कुछ भी नहीं है ? और जभी उमे लगता कि वह कुछ नहीं है तभी उसके मन में माता कि वह उसके लिए कितना कुछ तो करती है। वह उसका दान दोनों हाथ मरकर सेता और प्रति दान मे कानी कौड़ी भी न देता! इतना स्वार्थी है वह । यह 58 गरियाहाट के पुल पर वे दोनों बातें जव उसके मन में उठतीं तो उसे लगता कि संसार एक रस्सी के समान बनकर उसे जल्दी-जल्दी कसता जा रहा है। उसकी देह में, उसके गले में फन्दा पड़ा है। फन्दे में धीरे-धीरे खिंचाव बढ़ रहा है। कई रातों को डर के मारे उसकी नींद टूट जाती। पसीना बहने लगता; उसका सिर फटने लगता, और ताज्जुब है कि वह पड़े-पड़े देखती कि वह यन्त्रणा पा रही है। तिल-मिल कर मर रही है। उसके लिए कहीं ज़रा भी किसी को कोई फ़िक्र नहीं। । उसके जीवन में बहुत कम ही ऐसा अवसर आता जवकि उसे अच्छा लगता, जैसे कि इस समय ! तभी उसे बातें करने की इच्छा होती । मीनू ने अपने पति के चेहरे की ओर देखा । उसकी दृष्टि कहीं सुदूर चली गयी थी। एकदम तन्मय होकर कुछ सोच रहा है। उसका चेहरा बहुत कोमल, बहुत करुण हो गया है। कुछ पहले न जाने फुसफुसाकर क्या कह रहा था? न जाने उससे कहाँ चलने की कह रहा था ? ओ हाँ, याद आया, उसे लेकर लेक जाना चाहता था । मीनू के ताप चढ़े वयस्क शरीर में भी सिहरन खेल गयी। लेक जाना चाहा था मीनू के पति ने, उसे लेकर ! भरपेट निमन्त्रण खाकर। किन्तु 'यह कलकत्ता क्या हो गया है, भाभी !' यज्ञेश्वर की एक बहन ने मीनू से पूछा था। ६ सहसा कोई जरूरी बात मानो याद आ गयी हो, इस भाव से मीनू वोली, 'यज्ञेश्वर बाबू की एक बहन को मैं पहचानती हूं, जानते हो ?' अचानक वह अपनी पत्नी की बात समझ न सका । वास्तव में वह अन्यमनस्क मनोवस्था में था। उस समय केया उसके दिमाग में थी। वह बहुत परेशान हो गया। केया वोली, 'शची यज्ञेश्वर के घर केवल औपचारिकता निभाने आये थे---जल्दी ही खिसक आयेंगे कहकर आये थे। तुम्हें क्या यह पता है ?' वह बोला, 'ऐसा है क्या?' मीनू वोली, 'हां। वह हम लोगों की समिति में आती थी। वह 59 -2 के पुल पर वे दोनों । की बहन है, यह मुझे यहां आने पर ही पता चला। लड़की बहुत है। इसी बीच कोशिश करके उन्हें किस-किम ने क्या-क्या दिया है, दसलाया। पाया भी बहुत है।' केया बोली, 'शची ने आने के पहले तो मुझमे यही कहा था।' वह बोला, 'यही होगा।' मीनू बोली, 'वह लोग तो इस मुहल्ले से चले आये थे। उनके पर बहुत बम-बम पड़े थे। यक्षेश्वर के भाई पर एक दिन कई लोग पाइपगन कर हमला करने भी आये थे। उसकी बहन ने कहा-असमर्थ होकर उठ नाये, भाभी। नहीं तो कितना बड़ा मकान था हमारा ! और पानी के भाव का किराया ? लडाई के दिनों हमारे बावा ने किराये पर लिया था। पचास रपये किराये मे आठ कमरे। हमारा जनम-करम सब यही हुआ। उसकी बहन बोली कि पता है, यह मुहल्ला उसके दादा के दल की मुट्ठी मे है । इसीलिए इम और से वे निश्चिन्त हैं।' फेया बोली, 'उसी शची को देखो तो। आया, घूम-फिरकर यातें की, मजाक सुना, मजाक किया, फितना कुछ साया। वह इतना नहीं खाता है। यह मिस्टर मोहता को खुश करने की बात नहीं है। वह मानो यज्ञेश्वर की नजर में चढने की कोशिश कर रहा है।' वह बोल उठा, 'क्या कह रही हो?' मीनू बोली, 'हो। उसकी बहन ने कहा-वे डर के मारे चले आये थे। फेया बोली, 'मैं कहती हूँ, शची डर गया है। पता नहीं, वह यमेश्वर से क्यों डरता है ?' वह बोला, 'यह तुम्हारी कोरी कल्पना है । इममे डर की भलाक वात देखी?' मीन बोली, 'उमकी बहन ने बतलाया था। मैं क्या मन मे बना हूँ ? उसकी बहन फिर बोली-हालत यह हो गयी थी कि उसका पूर फिरना तक बन्द हो गया था। न सिनेमा जा सकते थे और निकलना उन लोगो ने बन्द कर दिया था। सिर्फ पजेश्वर और उस को उनके दल के लडके पहरे में ले जाते । उन्हें भी अकेले में 60 गरियाहाट के पुल पर वे दोनों की हिम्मत नहीं होती थी। केया बोली, 'व्याह के घर आने के पहले शची ने सहसा दो पेग व्हिस्की पी ली, जिससे कि उसे यहाँ आने की हिम्मत पड़ गयी !' मीनू बोली, 'मुझे तो लगता है कि इस मुहल्ले में आकर भी वे बहुत निश्चित नहीं हैं । घर के बाहर कितनी पुलिस थी, देखा था ?' केया बोली, 'पुलिस के बड़े-बड़े अफसरों के साथ शची किस तरह दोस्ती कर रहा था, देखा था।' वह बोला, 'इसमें अस्वाभाविक क्या है ? उसने यह बात कही ज़रूर, किन्तु अकस्मात् खुद ही एक अस्वाभाविक काम कर बैठा। पुल की रेलिंग पर दोनों हाथों के बल गोरिला की तरह झुक गया। उसके बाद आसमान फाड़ने वाली हँसी हँसने लगा। उसके वाद-जैसे आकाश-पाताल कांप उठे उस तरह-चिल्लाकर बोला, 'और जिनके दल में लड़के नहीं हैं, पुलिस अफ़सर नहीं हैं, वे क्या करेंगे? यू वास्टई स! उसके पागलपन की लम्बी कैफियत मीनू वहुत डर गयी थी। उसकी आँखों और चेहरे से बहुत घबरा- हट के चिह्न प्रकट हो आये थे। मैं जानता हूँ, वह सोचती है कि मेरा दिमाग खराब हो गया है। अभी ही वह घर जाना चाहेगी। उसके पहले ही आप लोगों को अपनी बात बता देना चाहता हूँ। आप लोगों ने, जिन्होने हम दोनो को इस पुल पर आते देखा और इतनी देर से हमारे रंग-ढग का बहुत बारीकी में लक्ष्य कर रहे है, उनमे मेरा प्रश्न है- निश्चय ही आप लोग मीनू की तरह, माने मेरी पत्नी की तरह, मुझे पागल समझ रहे है। ऐमा मोचने का कोई कारण नहीं है। मै मचमुच में स्वाभाविक हूँ, आप लोगों की तरह ही साधारण । बहुत दूर से, उत्तर कलकाना दक्षिण, बहू-भान मे निमन्त्रण खाने आया था। यह जरूर । 1. प्रो हरामजादो!

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62 गरियाहाट के पुल पर वे दोनों -- है। अच्छा, अवं वताइये, कोई अगर इस संसार में रहकर कहे, मैं प्यार करना चाहता हूं, तो क्या वह पागलपन है ? अगर यह पागलपन हो तो मैं सचमुच पागल हूं, क्योंकि मैं सर्वदा अपनी पत्नी को, पत्नी के शरीर और मन और सत्ता को, किस तरह प्यार करूँ, इस प्रयल में रहता हूं। मैं मीनू को सुरक्षित रखना चाहता हूँ, क्योंकि मेरे घर के लोग उसे अच्छी तरह नहीं समझ सकते। सच कहने में क्या, कौन किसे समझ सकता है ? हम सभी तो बहुत कुछ अनुमान लगाकर ही चलते हैं ! - जो कुछ भी हो, मैं कोई व्यतिक्रम नहीं चाहता। पत्नी को साथ लेकर ऑफ़िस के सहकर्मी के बहू-भात के निमन्त्रण को स्वीकार करके आना व्यति- क्रम है, आशा करता हूं कि आप में से कोई ऐसा नहीं कहेगा। सच कहने में क्या है, यज्ञेश्वर के बहू-भात में न आने से भी चलता। मैं और वह एक ही विभाग में काम करते हैं, एक ही कोआपरेटिव सोसायटी के सदस्य हैं, और जिस कारण से वह हमारे ऑफ़िस की यूनियन का निविरोध नेता है, उसका ऑफ़िस का काम प्रायः ही इकट्ठा होता रहता और शची के आदेश से प्राय: ही उसका वाक़ी काम मुझे ही करना होता-यज्ञेश्वर के । साथ सम्बन्ध का पहला आधार यही बना। इससे ज्यादा नहीं, कम भी नहीं । कुछ समय हुआ, यज्ञेश्वर ने मेरे साथ दो-एक व्यक्तिगत समस्याओं के बारे में बात करना शुरू किया। उसके परिणामस्वरूप हम कुछ अन्तरंग हो गये । उसी सूत्र से हमने एक-दूसरे को 'आप' से 'तुम' कहना शुरू कर दिया। बस इतना ही। तो इसके लिए बहू-भात में आना ही होगा, ऐसी खास लाचारी तो नहीं थी। अपनी स्थिति इतने विस्तार से समझानी पड़ी, वह इस कारण से कि मैं सचमुच मीनू को लेकर घूमने निकला, उसके साथ कुछ अकेले रहने के लिए-~~-यह वात समझा नहीं सकूगा । अव देखिये, हम इस पुल पर इतनी देर से पास-पास खड़े हुए हैं, यह तो आप लोगों को अस्वाभाविक नहीं लगता? - -- ट के पुल पर ये दोनों या था किस तरह, वह भी आप लोगों को बता दूं। घर से निकल- क भीड़ वाली बस में भूलते-मूलते नौ नम्बर के बस टर्मिनस पर था। दूसरी मंजिल पर एकदम सामने की सीट पर बैठेंगे, इसलिए। एक ही वस सही थी। चटपट उसके ऊपर चढ़कर अपने मन के विक जगह मिल गयी। कलकत्ता में यह जरूर ही कहने लायक घटना परियों की कहानी-सी है। मचमुच परियों की कहानी, क्योंकि यह यस ली नहीं ! कुछ देर बाद एक दम, जो भरी हुई आयो, पता नही कहीं १, सुना कि वही जायेगी। उस वस में हमारे मन के मुताबिक सीट नहीं थी। उसमे चढ़ने का सवाल ही नही उठता था। तभी हमारा सकल्प स्पष्ट हो गया-आज सिर्फ मैं और मीन होंगे। किसी भी ऐमी घटना को आज हम अपने दोनों के बीच बाधा नहीं बनने देंगे। - मो राह देखते रहे। बीच-बीच में नीचे उतरकर जिसको स्टेट बम की वर्दी पहने पाता, उससे पूरता, यह वम कब चलेगी? वह कहते, उपर पूठिये। उधर का आदमी फिर दूमरी ओर भेज देता। वह फिर एक दूसरे आदमी के पास ! कलकत्ता शहर में निश्चय ही हमारे साथ आप एक राय के होगे कि स्टेट बरा कर्मचारियो से इस तरह का व्यवहार मिलना कोई अस्वाभाविक नहीं समझा जाता । इसीलिए मैं मव सहता रहा, और अपने निश्चय पर डटा रहा । आज मैं और मीनू हैं-वम । एक और बस आयो। चली गयी। मीनू फिर भी मेरा मतलब नहीं समभी। वह तब भी जानती थी कि निमन्त्रण में जाना ही हमारी इ यात्रा का लक्ष्य है। इसीलिए वह प्रत्येक बस के छूटने पर अधीर हो रही थी मैं मीनू के पास बैठकर मन-ही-मन समझाने की चेष्टा कर रह कि परेशान मत होना, मीनू । हम दूमरी बम से नही जायेंगे। हमारी यही है । अगर यह हमे कही पहुंचा देना चाहे, तो जायेंगे। नप दोनो यही बैठे रहेंगे। जब तक अच्छा लगेगा, तब तक ! उसके पान तो उतर जायेंगे। आओ, आज हम इम वस पर बैठकर अच्छे अध्याय शुरू करें। मीनू ने शायद समझने की कोशिश की, शायद : -- 64 गरियाहाट के पुल पर वे दोनों यदि उपहार में देने के लिए खरीदी साड़ी उसकी गोद में पड़े-पड़े उसे विरक्त न करती ! फिर भी वह कुछ नहीं बोली। सिर्फ दोनों पास-पास वैठे रहने के जादू से शायद थोड़ी देर के लिए आच्छन्न रहे । मैंने उससे कहना चाहा, परेशान न होना मीनू । सभी वसे ठिकाने पर पहुंचाती हैं, कोई पहले, कोई वाद में । आओ, हम इसी पर निर्भर करें। तभी शायद हम आगे चलकर आराम पा,सके ! - असल में बात क्या थी जानते हैं, अतीत में आवेगवश मैंने मीनू से वहुत-से वायदे किये थे। एक, उसे लेकर कहीं जाऊँगा, किसी अच्छी जगह जाऊँगा । निर्जन, थोड़े प्रसिद्ध या अप्रसिद्ध समुद्र के किनारे, या पहाड़ी शहर, या किसी गहरे जंगल के डाक-बंगले में सिर्फ यह देखने के लिए कि मनुष्यों से दूर, संसार से दूर, सिर्फ़ दोनों के एक साथ रहने में कैसा लगता है ! सच कहने में क्या, असल में मैंने चाहा था-अपने अलिखित उपन्यास के लिए एक मनोरम अध्याय को लिख डालना । ओह, आपसे यह नहीं बताया कि मैं खाली वक्त में लिखता भी हैं ! अब तो समझ गये होंगे कि अपनी पत्नी को लेकर एक स्थिर खड़ी वस के दो-मंज़िले पर सामने की सीट पर निश्चिन्त मन से सवार होकर वैठने में कोई अस्वाभाविकता क्यों नहीं थी ! मैं मीनू को किसी प्रतिश्रुत नन्दन कानन में न ले जा सका-उसका कारण मेरी अपनी कोई अनिच्छा नहीं, सीधे-सीधे आर्थिक अक्षमता थी। में यज्ञेश्वर की राजनीति नापसन्द करने पर भी उसकी ओर झुका हुआ था, उसका कारण यह था कि मेरे कार्यकारी जीवन में वही एकमात्र व्यक्ति है जो बीच-बीच में मेरी नजरों में अतिरिक्त लाभ का चित्र खींच देता था। वह चित्र होता कभी बढ़े महंगाई भत्ते का, कभी आठ महीने के वोनस बा, या इसी तरह की किसी और चीज़ का। ये सब बातें जिस क्षण से सुनता उसी क्षण से सिर्फ अपने और मीनू के निर्जन वास की सम्भावना मानो स्पष्ट और निकटवर्ती हो जाती। किन्तु यज्ञेश्वर जिस तरह अन्त तक थोक रुपया दिला देने का वायदा पूरा न कर पाता, गरियाहाट के पुल पर वे दोनो 65 भी उसी तरह मोनू को लेकर कुछ दिनों के लिए कहीं बाहर जाने का अपना वचन पूरा न कर पाता। कोई दूसरा उपाय उरूरी था। अपनी मां को या बहनों को कुछ दिनो के लिए मंझली बहन या बड़ी बहन या दूसरी सब विवाहित बह्नों के पर अगर भेज दिया जाता, तब भी इस घर मे ही केवल मैं और मीनू-सिर्फ़ हम दो लोग एक-दूमरे षा साप पा सकते । यद्यपि दूसरे माँ के लिए काफी परेशानी जताते और मीन के हाथों मां को उतनी सेवा भी नहीं हो पाती थी-इस बारे में प्राय: सब ही सर्वसम्मत सिद्धान्त पर पहुंच गये ये -~-फिर भीमा को कुछ दिनो के लिए भी किसी अधिकतर शान्ति की जगह ले जाने के काम के प्रति उत्साह न दिखाते। मां भी कही जाना नहीं चाहती थी। मंझली भाभी या दूसरों के सम्बन्ध में मां कई बार प्यार-भरी तरह-तरह की बातें करती, किन्तु उनमे किसी के पास जाकर रहने की बात उठते ही मां का जोश ठंडा पड़ जाता। इसलिए समझ सकते हैं कि मैं और मीन कुछ दिन अकेले रहेंगे, इतनी छोटी-सी हमारी अभिलापा भी पूरी न हो सकी। यद्यपि यह बात कष्टकर और दुप देने वाली थी, फिर भी बहुत असामान्य नहीं थी। सैकड़ों परिवारों में इस तरह की या इसी के समान अचरितार्थ अभिलापा-जनित पोड़ा को संकडों नर और नारी भोग रहे हैं, यह मैं जानता है। उनके पारस्परिक सम्बन्ध, किसी का कोई विशेष दोप न रहने पर भी, केवल वाहरी घटनाओ के अनिवार्य दवाव से क्रमशः परस्पर पोड़ा देने वाले और कद हो जाते हैं। ये सारी घटनाएं ऐसी रोजमर्रा की और ऐसी सीघो- सादी रामभकर ही शायद हम इन्हें स्वाभाविक मान लेते हैं ! और इन सारी घटनाओ का रस बदलने के लिए शुरू से हमने कोई प्रयत्न नहीं किया। रीति-रिवाउ ही ऐमा चला आ रहा है ! किन्तु में निप्रियता मे विश्वास नहीं करता। मैं भविष्य में विश्वास करता है। उद्योग में विश्वास करता हूँ। ईश्वर के दान के रूप में प्यार नहीं मिला तो क्या हुआ? माइप न, हम प्यार को खेती शुरू करें। बीते - 66 गरियाहाट के पुल पर वे दोनों क्षेत्र में जो लोग एक वार खुम्भी पैदा करना सीख गये वे क्या ईश्वर की परवाह करेंगे? यही सोचकर मैं नौ नम्बर के बस टर्मिनस पर मीनू को लेकर पहुंचा। इसी खयाल को लेकर बस की दूसरी मंजिल पर विलकुल सामने की सीट पर जाकर हम दोनों बैठ गये थे। मीनू से धीरज रखने की चिरौरी की। उससे कहा, 'वस का भरोसा रखो, वह हमें पहुंचा ही देगी।' और सचमुच प्रायः अलौकिक घटना घटी कि हमारी प्रार्थना पूरी करने के लिए सहसा वस में जान आ गयी। और कसा ताज्जुब है कि मील-पर-मील रास्ता निगलते हुए उसने हमें जोधपुर पार्क के स्टॉप पर पहुंचा दिया ! इतनी देर तक मीनू मेरे पास थी। मेरे निकट । इतने निकट वह वहुत दिनों से नहीं रही थी। रास्ते पर उतरते-उतरने मैंने मीनू से कहना चाहा-देखा मीनू, भरोसा रखने से ही मंजिल पर पहुंचा जाता है । इस- लिए आओ, मैं तुम पर भरोसा करूँ, तुम मुझ पर निर्भर रहो, तो देखोगी कि तुम्हें या मुझे कोई भी दुख न रहेगा। एक-दूसरे पर निर्भरता ही प्यार की सीढ़ी है। क्या कहते हैं आप लोग, यह पागल का प्रलाप है ? इसके सिवा देखिये, इतनी सीधी-सी बात कोई न समझेगा। अपने को मिटाकर कोई निर्भर करता है दल के लड़कों पर, कोई पुलिस पर, और कोई व्हिस्की पीने की वात सोचता है, कि वह अपने से भी अधिक अपनी है । कसी निष्ठुर हास्या- स्पद बात है! वह गोरिला की तरह दोनों हाथों से गरियाहाट पुल की रेलिंग पर झुककर आगे की ओर झुका रहा। उसके वाद ठठाकर हँस पड़ा। उसके वाद वोला, 'वास्टर्ड्स! स्सव साले नकाब पहने हैं !' मीनू की तत्कालीन अस्तव्यस्तता तुम्हारी तबीयत क्या खराब है ? मीनू उस समय उस गरियाहाट पुल पर 67 हाट के पुल पर वे दोनो MI -सड़े कुछ चंचल हो उठी। क्या तुम्हारी तबीयत खराब है ? आँखों र चेहरे पर पानी छिड़कोगे? थोडा पानी पियोगे? बैठोगे जरा? रेलिंग सहारे खड़े रह सकोगे? चलो, न हो तो घर चलें। समझ रहे हो? मीनू फिर डरने लगी। इतनी देर तक वह बहुत शान्त और स्थिर ही थी। और यय, इम क्षण उसे कैसी घबराहट हो रही थी! इसके बाद मीनू प्रमश: उद्वेग से आक्रान्त होती गयी। उसके लिए वरावर उद्वेग हानिकर है, ऐसा डॉक्टरो ने कहा था। उसके शरीर मे और मन में जो कष्टकर वेदनाएँ आदि थी, उद्वेग के बढ़ने से वे भी बढ़ जाती हैं-7. बरसो मे तरह-तरह की चिकित्सा कर कप्ट जरा भी कम न होने से मीनू को जानकार विशेपज्ञ चिकित्सको ने अन्त में उपरोक्त राय दी थी। समझे, मामला 'साइकोसोम टिक' है। बहुत दिनों से मोनू जब यन्त्रणा से अत्यन्त अधीर हो जाती, उससे मातनगाठी के पीर के पास ले जाने को कहा गया था। वह आज तक भी नहीं ले गया। दोनो के सम्बन्धों में साई पडने का यह भी एक कारण था। इम प्रकार के अशान्ति के दृश्यो में दोनो को कई बार भाग लेना पड़ा : स्थान-दायन कक्ष, विस्तर । समय---आधी रात । मीन वैचनी मे इधर-उधर कर रही है। उसका पति एक अंग्रेजी पुस्तक प्राणपण मे मन लगाने की कोशिश रहा है। बावरण पर एक स्त्री के कामोत्तेजक रमणीय तस्वीर है, और उस पर जो अंग्रेजी शब्द लिसा उसका अर्थ है उपपत्नी। मीनू (स्वर शिकायत-भरा) : 'बत्ती बुझायेंगे या नहीं?' अंग्रेजी पुस्तक में मैं पढ रहा था : जितनी भी विभिन्न वेश्याओ मे परिचय हुआ है, उनमें से मर्वाधिक स्पष्ट वक्ता, सुले स्वभाव वाली ही थी जो अपने अन्तर के मावो और उद्वेगो को बिना किमी हिचरि के व्यक्त कर सकती थी। मीनू : 'मैं परेशानी मे मरी जा रही हूँ। क्व से आँखें बन्द प्रयत्न कर रही हूँ।' था, जैसे मनोपन्थियों का 1.

गरियाहाट के पुल पर वे दोनों अंग्रेजी पुस्तक में आगे छपा है : आखिरकार, मैं भी मजा क्यों न लूटूं? वह प्रायः मेरी ओर देखकर खिलखिलाकर हँस उठती। क्या मेरे मौज-मज़े पर तुम्हें कोई आपत्ति तो नहीं होती? मीनू (बहुत तेज़ स्वर में) : 'जाने किससे कह रही हूँ ? तुम इंसान हो?' अंग्रेजी पुस्तक में नहीं, मैं सोच रही हूं कि हमारी एक-दूसरे के प्रति शारीरिक आसक्ति का आपकी शारीरिक और मानसिक सेहत पर कोई बुरा असर न पड़े ! मीनू : 'छी-छी-छी ! घर पर कुत्ता-विल्ली पालने पर भी आदमी उसकी देख-भाल करता है। और तुम कैसे हो ! एक इंसान साथ में लेटा चीख रहा है। उसका सिर फटा जा रहा है। और तुम्हें होश ही नहीं। जानवर !" मीनू फफककर रो पड़ी। मीनू का पति (ध्यान गया तो, घबराकर) : 'ऐं, यह क्या ? मीनू, रो क्यों रही हो ? रोती क्यों हो? तुमको क्या हो गया ?' मीनू फफक-फफककर औंधी लेटी रो रही है। मीनू : 'वावा-वावा ! ॐ ॐ, तुम्हारे मन को चोट पहुंचाकर व्या किया । ॐ-ऊँ ! उसका फल आज पा रही हूँ। ॐ ॐ ॐ।' मीनू का पति (बहुत घबराकर) : 'मीनू, ए मीनू, तुम्हें क्या हो ग है ? बताओ, बताओ प्लीज़ !' मीनू ॐ ॐ ॐ कर फफक-फफककर रो रही है । मीनू का पति (लाचार-सा मानो दर्शकों के प्रति) : आप ही बताइये । मैं क्या करूं? डॉक्टर बुला लाऊँ ? इसका एक चुम्बनले ही मीनू रो रही थी। मीनू का पति (मीनू से) : 'मीनू, मीनू, प्लीज़ !' मीनू का पति (अपने से) : पाखंडी, नराधम, तू क्षमा के अयो तेरी साध्वी पत्नी ऐसी पतिव्रता है, और वह यन्त्रणा से कातर हो और तुझे धिक्कार है, तू उसकी उपेक्षा कर उसके ही पास लेटा'

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. 70 गरियाहाट के पुल पर वे दोनों मीनू : 'इस पाप का प्रायश्चित जीवन-भर करना पड़ेगा। मीनू का पति (मीनू से : सहसा खफा होकर) : 'फिर पुराना रेकर्ड बजाना शुरू कर दिया। कितनी वार कहा मीनू, यह तुम्हारी मिथ्या. धारणा है । तुम्हारे बावा ने बाद में हमें आशीर्वाद दिया था।' मीनू (चीख कर) : 'झूठी बात है।' मीनू का पति : 'झूठ नहीं मीनू, सच, मैंने तो तुम्हें तुम्हारे वावा की लिखी हुई चिट्ठी दिखायी थी। कहो, वह चिट्ठी क्या नक़ली थी ?' मीन (थोड़ा नरम पड़कर) : 'मेरे वावा तुम लोगों की तरह झूठी बातें नहीं कहते थे। तुम बार-बार मेरे वावा की चिट्ठी लेकर मुझ पर चोट क्यों करते हो, बताओ तो।' मीनू का पति (नरम पड़कर) : 'मैं तुम्हें चोट नहीं पहुंचाता हूँ, मीनू । तुम्हें एक बात ही समझाना चाहता हूँ। हमने प्यार करके व्याह कर कोई पाप नहीं किया । न मीनू, मेरे पास खिसककर मत आओ । मैं तुम्हारे योग्य नहीं हूँ। कल से मैं दूसरे कमरे में लेटूंगा।' मीनू का पति (दर्शकों से) : मैं जानता हूँ कि पति के रूप में मैं अत्यन्त लालची हूँ। मेरी स्त्री कष्ट में है; हाथ, पीठ, गले में सुई गड़ने की-सी निरन्तर तीव्र यंत्रणा से वह परेशान है-मुझसे ज्यादा अच्छी तरह यह वात और कौन जानता है ? यह भी जानता हूं कि इस सबके बाद भी आपको जव मालूम होगा कि मेरी अभी, इसी क्षण क्या करने की तवी. यत होती है, तो आप लोग भी मुझे 'निकम्मा, पागल' कहकर धिक्कार देंगे। हृदय ! उत्तेजित मत होना। मीनू का पति (मीनू से) : 'न मीनू, न, प्लीज़, तुम अब मेरे शरीर से शरीर न लगाना । जग खिसको। यह क्या, इतने पास अपना मुंह मत लाओ। मेरे बदन पर हाथ मत रखो। न, न, मै तुम्हारा अधम पति हूं।' । मीनू का पति (दर्शकों के प्रति) : भद्र महोदय, और महिलाओ ! मैं पत्नी का महारा पाकर अब रमण की इच्छा रूपी शत्रु के द्वारा बहुत बुरी तरह आक्रान्त, और आत्मरक्षा में असमर्थ हूँ। इस तरह की हालत में एक कमजोर आदमी और अबला नारी की रक्षा करने का कोई

ट के पुल पर वे दोनों
अगर आप लोगों को मालूम हो तो तुरत बतायें।
भीनू (सिसककर : गद्गद् स्वर में) : 'गुस्सा तो मैं ही करती हूँ।
फेरकर तो मैं ही सोती हूँ। ये उलटी बातें हैं । ओः, ऊपर होओ न,
।'
:
मीनू का पति (मन-ही-मन : आकुल प्रार्थना करते हुए): है देव,
न्धर्व, हे अन्तरिक्षवासी पितामह-मातामह लोगो, तुम सब माक्षी हो।
मीनू के पति ने ब्लाउज का एक बटन खोला।
मीनू (खिसककर धीमी-धीमी आवाज मे) : 'यह क्या, ओह, यह
हरकत क्योकर मूझी?'
मीनू का पति (मन-ही-मन माकुल प्रार्थना में) : भूचर, रोचर,
जलचर, चराचर व्यापी सब जीवो, तुम सव साक्षी हो।
मीनू के पति ने एक बटन और खोला।
मीनू (और भी घनिष्ठ होकर फुसफुमाती आवाज में): 'न्-ना!
वस, ऐसे ही वक्त बहुत प्यार! दूसरे वक्त आँस उठाकर देखने को भी
तबीयत नहीं होती।'
मीन का पति (मन-ही-मन आकुल प्रार्थना) : चेतन और अचेतन
विराट और अणु-प्रमाण, दृश्य और अस्य, वस्तु और यवस्तु, मो समस्
अस्तित्व, तुम सव साक्षी हो।
..
-
मीनू का पति एक हुक के साथ सीचतान करने लगा।
मीनू (गद्गद् भाव में): 'अ , फट जायेगा, छोडो।'
मीनू ने स्वयं आसानी से हुक खोल दिया।
मीनू (आवेग से अस्थिर) : 'मुझे जरा देखो, मुझे जरा देसी
जरा देखभाल किया करो। मैं तो खतम हो गयी हूँ। मैं तो सूख

12 गरियाहाट के पुल पर दोनों मीनू का पति (संवेदना के गला भर आया) : 'मैं तुम्हें देख रहा हूँ, मीनू।' नीनू (नन की नावना उनड़ पड़ी) : 'वाक देखते हो! किस यंत्रणा नननी जा रही हूँ, एक बार तो पुछा होता?' नीनू का पति : 'क्यों नीनू, मैं तो तुम्हें डॉक्टर के पास ले जाता हूं।' मीनू (मार भी अधिक मानवी भावना से): 'तुम्हारा डॉक्टर खाक कुछ करता है ! इतना कहा कि मातनगाछी के पीर के पास एक बार ले चलो।' - मीनू का पति (सहला दर्शकों से) : नाऊ दिस इज टू मच। मेरी मोर से वात जरा साफ़ कर देने की जरूरत है। मातनगाछी का पीर ! मीनू फिर वही पुरानी शिकायत दोहरा रही है। जहां डॉक्टर की चिकित्सा से उसे कुछ लाभ नहीं हो रहा है, वहां मातनगाछी का पीर उसे किस तरह अच्छा कर सकता है ? मेरी तो समझ में नहीं आता। विज्ञान जहाँ असफल हो, देव भी वहां वेकार रहता है। मेरा हमेशा से यही विश्वास रहा है। इसी कारण से मैं मीनू को पीर-वीर के पास कभी नहीं ले गया । वहुत समझाया। कहा कि चिकित्सा-विज्ञान आज तक शायद इस रोग की कोई निश्चित औषधि नहीं निकाल सका। लेकिन दुनिया में चारों ओर रोगों को कम करने के लिए मनुष्यों के अथक प्रयत्ल निरन्तर चल रहे हैं। एक दिन दवा निकल आयेगी। मैं इसीलिए मीनू को मातनगाछी के पीर के पास नहीं ले गया--उसी अनाविष्कृत औषधि के लिए जेब में पैसे जमा कर रखे हूँ। मेरी इच्छा है कि मीनू भी विज्ञान के विश्वास में अपने को अर्पित करे। मीनू (स्वर में तेजी लाते हुए) : 'मेरे लिए तुम्हारे पास समय नहीं रहता। दोस्त की पत्नी को सिनेमा लेकर जाते समय तो बहुत-सा रहता है !' . 1. प्रय, यह तो नहीं सहा जाता।

गरियाहाट के पुल पर वे दोनों 73 मीनू का पति एक और बटन खोलने जा रहा था, रुक गया। मीनू का पति (परेशान होकर) : 'समय की कमी नही मोनू, तुम समझती क्यों नहीं कि मैं तुम्हे धोखा नहीं देना चाहता। तुम कही जाकर ठगो जाओ, यह भी नहीं चाहता। मैंने कहा था कि पीर का फूंका-पार्न -मब ठगी है।' मीनू : 'लेकिन उस दिन डॉक्टर साहब ने क्या कहा था ?' मीनू का पति : 'मीनू, सुनो, थोड़ा धीरज रखो । मैं जानता हूं कि तुम्हारी तकलीफो की हद्द नहीं है । तुम...।' मीनू : 'डॉक्टर साहब ने उस दिन क्या कहा था ? कहा था न कि एक बार जाकर देख सकते हो ! विश्वास रहने पर कई बार फल मिल जाता है। कहा था कि नही ?' . मीनू का पति (दर्शकों से) - मीनू का कोई दोप नही। उस तान कहा जरूर था। सिगरेट पीते हुए, छल्लो मे धुआं छोड़ते-छोड़ते करे अकुंटित मुंह से कह गया, यह अगर इतनी ही उत्सुक हैं तो एक बार है जाइये न ! शायद फूंके पानी से ठीक हो सकें। आएटर ऑल', जबकि साइकोसोमैटिक है। हमारी मेडिकल साइंस- ही क्या है ? एक अंधा दूसरे अंधे को राह दिखा रहा है ! छ. महीने से मुझे वराबर दुह के याद, आज उसका यह कहना है । बाव मीनू : 'डॉक्टर साहब ने क्या कहा था, बताओ तो?' मीनू का पति (हताश भाव से दर्शकों से) : मीनू एक झटके में उन रात को करवट ले गयी। मुझे पता है कि वह फिर इधर न होगी। विज्ञान की वेदी समर्पित हूँ। हाय, आज विज्ञान के साथ ही सोन पड़ेगा ! 1. माखिरकार 2. चिकित्सा विज्ञान mai गरियाहाट के पुल पर वे दोनों - . आज, इस समय इस पुल पर, बहती संजीवनी हवा में, मीनू फिर के पास है । आज मीनू वहुत अस्थिर है। आज मीनू जो साड़ी पहन- आयी है, उसमें वह अच्छी लगती है। वह हंसते-हंसते वोला, 'तुम क्या डर गयी थीं, मीनू ? सचमुच मेरी सी वहुत ज़ोर की हो गयी थी । वात क्या है जानती हो, छकू वख्नी का चेहरा याद हो आया था।' मीनू चैन की साँस छोड़कर वोली, 'ऐसा कहो। सचमुच मैं तो डर गयी थी। वह वोला, 'अरे धत्, इस कलकत्ता शहर में डरने से ही डर लगने लगता है, नहीं तो कोई डर नहीं। आज यह समझ गया। यह देखो न, यह छकू बख्शी, यज्ञेश्वर का बड़ा भाई, सारे मन्त्री आये थे, उन से डरने की कोई बात नहीं। आज इतने नज़दीक वैठकर उनके साथ खाया-पीया, इसी से समझ सका। ये लोग मामूली आदमियों की तरह हँसते हैं, खांसते हैं, वैसे ही खाते हैं, यह देखकर समझ पाया कि हम लोग जो प्रति- दिन समाचार-पत्रों के द्वारा इनकी बातें पढ़ते-सुनते हैं, रेडियो की मारफ़त इनका आह्वान सुनते हैं, और उसके बाद सोच लेते हैं कि इनका आकार कतना विराट है ! कितना कम जानते हैं हम, कितने बेवकूफ़ हैं ! अपनी बेवकूफ़ी की वात याद आयी, इसीलिए ठठाकर हंस पड़ा।' यज्ञेश्वर की निजी समस्या दूसरी और तीसरी पंगत के वीच के समय में जब मीनू औरतों में ज बैठ गयी और केया भी नहीं आयी, तो वह अकेला बैठे-बैठे अन् लोगों के आने-जाने, हंसने, दात करने के ढंग पर वारीकी से गौर क धा, और शची की भावभंगी में बहुत मज़ा ले रहा था। इस वक्त उसके माथ वातें नहीं कर रहा था; ऑफ़िस में मिलने पर वचकर जाता और उसे अच्छा न लगता। आज भी अभी तक शची उस नहीं मिला रहा था, यद्यपि केया ने देखते ही उसके पास खड़े हो साथ कुछ देर बातें कीं । शची स्पष्टतः उससे वचकर चला जा स गरियाहाट के पुल पर वे दोनों 75 हालत जव यह हो गयी तभी यज्ञेश्वर ने कई वी० आई०पी० अतिथियों को लेकर उसकी पत्नी के साथ परिचय कराकर उसे वाहर लाकर खातिर के साथ बैठाया । कुछ देर उनके साय मेजवान-सुलभ शिष्टाचार का विनिमय कर-यह अकेला बैठा है-यह देखकर पास की कुर्सी पर बैठ गया। देखकर लगा कि यज्ञेश्वर थोडा थक गया है और अन्यमनस्क हो गया है। यज्ञेश्वर को व्याह में मिता दूधिया गरद का कुर्ता गले के पास पसीने से गीला हो गया था। यजेश्वर बीच-बीच मे उंगली से बाएं हाथ की अनामिका की अनन्यस्त बड़ी अंगूठी इधर-उधर घुमा रहा था। उसके पास बैठे यज्ञेश्वर को लगा कि कुछ तो बाराम मिला । यझेश्वर उसके कान में बोला, 'अच्छा, तुम लेसक लोग बहुत सख्ती और यथार्थ को बातें लिखकर इस सड़े-गले व्याह के रीति-रिवाज बदल नही सकते ? देखो, हमें एक सास्कृतिक क्रान्ति की जरूरत है। तुम्हें किसी तरह की असुविधा तो नहीं हो रही है ? अगली पंगत औरतो की है। उसके बाद की पंगत में ही तुम्हें बैठा दूंगा।' उसके बाद जेब से रूमाल निकालकर गरदन और पीठ पोछकर यज्ञेश्वर बोला, 'लगता है कि अमिय-दा नहीं आये । उनके मुहल्ले में शुरू हुई है न-रोजमर्रा एक हत्या ! लगता है कि उन्हें वह मुहल्ला छोड़ना पड़ेगा। हर दिन जो कुछ हो रहा है, इसमें गहरा पड्यंत्र है। कोक पिओगे?' कहने के साथ ही यज्ञेश्वर ने आवाज लगायो, 'सूरज, इधर एक ठंडा से आओ।' इसके बाद ही सहसा गम्भीर हो गया। थोड़ा इधर उधर करने लगा । उसके बाद उसके कान के पास मुंह ले जाकर फुसफुसाकर बोला, 'एक उलझन में पड़ गया हूँ, भाई। एकदम निजी सलाह चाहता हूँ।' यह बोला, 'भाई, तुम को तो मालूम है कि राजनीति में मेरी कोई दिलचस्पी नहीं है।' यक्षेश्वर झटपट बोल उठा, 'अरे नहीं-नहीं, कोई राजनीतिक मामला नहीं है।' वह बोला, 'ट्रेड यूनियन के मामलो में मैं तुम्हें क्या सलाह ई 16 गरियाहाट के पुल पर वे दोनों उन मामलों में तो तुम्ही पारंगत हो।' यज्ञेश्वर परेशान होकर बोला, 'अरे, वे सब बातें नहीं हैं । एक विलकुल निजी और गोपनीय वात है। मैं क्या करूँ, वह बताओ। क्या कदम मुझे उठाना चाहिए? वह ताज्जुब में आ गया। बोला, 'तुम्हारी समस्या क्या है ? वह तो तुमने नहीं बतलायी। यजेश्वर अव और परेशान लगने लगा। रूमाल से कई वार गरदन, पीठ और चेहरा पोंछा। रगड़-रगड़कर नाक-मुंह-कान लाल कर डाले । सिगरेट निकालकर उससे बोला, 'एक पिओ।' खुद एक सुलगायी। कई बार धुआँ छोड़कर साहस जुटाया। उसके बाद सचमुच वचपन की एक नाजुक-सी, एक बहुत सुन्दर मुसकराहट उस संघर्षशील मजदूर-नेता के चेहरे पर खिल उठेगी, इसकी उसने आशा नहीं की थी। वह अवाक् होकर यज्ञेश्वर के मुंह की ओर देखता रह गया । यज्ञेश्वर हिचकिचाहट के साथ वोला, 'मैंने सोचा था कि तुम लेखक हो, शायद समस्या को स्वयं भांप सको। अमिय-दा ने कहा था कि विवाहित जीवन का भविष्य पहली रात को ही सब स्थिर हो जाता है। शादी की पहली रात को ही जो विल्ली नहीं मार सकता वह ज़िन्दगी-भर पछताता है ! लेकिन भाई, मुझे सेक्स के सम्बन्ध में कोई भी जानकारी नहीं है। दो रातें खिसक गयीं। पहली रात तो व्याह के झमेले में ही कट गयी। रात-भर औरतों ने जैसे घेराव कर लिया था। कैसा उपद्रव रहा। उसके बाद तो कालरात्रि थी। उस दिन एक-दूसरे का मुंह नहीं देखते। समझे, कैसी सड़ी-गली व्यवस्था है ! मैं कोई भी कदम नहीं उठा सका, समझे न ? ममिय-दा ने कहा था कि वह ही मुझे सव रास्ते बता देंगे। लेकिन कल से उनके मुहल्ले में जो हालत शुरू हो गयी है। अमिय-दा एकदम लापता हैं। फल बम गिरा था, गोली चली थी, खून भी हुआ था। आज पुलिस, मिलिटरी ने मुहल्ला घेर लिया है । अमिय-दा ने ही मुझे डुवा दिया। मैं उन्हें दोप नहीं दे रहा हूं। लेकिन मेरी समस्या समझ गये न ? दिस इज द ।

गरियाहाट के पुत पर वे दोनों
77
सई नाइट और अत्यन्त ऋशल नाइट' । में अमिय-दा के पथ-प्रदर्शन के
भरोमे चुप बैठा हूँ, क्या करूं, क्या नही समझ में नहीं आता।'
यझेश्वर बहुत करण हो रहा था। उसे उस पर बहुत प्यार आया।
यज्ञेश्वर को नहलाकर, बदन पार, दूध पिला, पेटी से कसी धोती पहनाकर
उसके दूधिया गालो की कई चुम्मियां लेने की उसकी तबीयत हुई !
यज्ञेश्वर बोला, 'अमिय-दा तो कहकर छुट्टी पा गमै, शादी की पहली
रात दिल्ली मारना ! बट हाऊ ?'
भुवन वायू-~~यज्ञेश्वर के बडे भाई-अचानक आकर वोले, 'जो लोग
लड़की के घर से सामान वगैरह तेकर आये हैं उन्हें अपने बाहर के कमरे
में जगह कर बैठाने का इन्तजाम कर दो।'
अनिच्छापूर्वक यज्ञेश्वर उठ सड़ा हुआ। उसके बाद उसकी ओर
विपन्न भाव से देसकर बोला, 'अचानक चले मत जाना भाई, अब तुम पर
ही भरोना है।'
यह और केया : सभा-मंच पर
एक रश्य:
वह और केया आस-पास दो कुसियो पर बैठे हैं। लेकिन दोनों देस
रहे हैं अनगिनत अभ्यागतो की ओर । वे आपस में बातें कर रहे है, लेकिन
सुनाना चाहते हैं दूसरो को । उन दोनों के आस-पास व्याह के घर के लोगों
का आना-जाना चल रहा है। वह इधर नजर भी नहीं डालते।
कैया : शवो इतना डिक क्यों करता है ?
वह : केया ने यह सवाल मुझमे पहले भी पूछा था और तुमको वह
:
1.
2.
माज तीसरी रात है।
अत्यन्त संकटकाल की, निर्णायक ।

78 गरियाहाट के पुल पर वे दोनों मालूम है। मुझसे वार-बार यह सवाल करने के माने क्या हैं ? केया क्या सोचती है कि शची के शराब पीने के बढ़ जाने में मेरा हाथ है ? केया का यह सवाल क्या मेरे विरुद्ध अभियोग-जनक है ? या, केया सोचती है कि शची की शराब के प्रति आसक्ति उत्तरोत्तर बढ़ने के लिए वह खुद ही जिम्मेदार है, और यही प्रश्न उसके खेद को प्रगट करता है? आप क्या सोचते हैं ? केया : शची से मैंने प्यार किया था। और प्यार कर ब्याह किया था। काम बहुत आसानी से नहीं हुआ। वह कई वरस पहले की बात है । तव शायद हमें स्वाधीनता मिलने-मिलने को हो रही थी। मैं कानूनन तभी वालिग़ हुई थी। शची की कविताएं पत्र-पत्रिकाओं में तभी प्रकाशित होना शुरू हुई थीं। शची उन दिनों बहुत तेज स्वभाव का था और उसका कैसा तो उग्र और मोहक आकर्पण था ! वह जैसे अलिफ़-लैला वाला चुम्बक पत्थर का पहाड़ हो ! उसके समीप से जो जहाज निकलता उसका मानो जोड़- जोड़ खुल जाता। और मेरे पिता थे बहुत कड़ी नजर रखने वाले और कठोर । गची मुझे बहा ले गया। पिता की लगाम मुझे रोक न सकी। इस सब मामले में जो प्रमुख गवाह और मेरे और शची के प्रधान मलाहकार थे वे आरके मामने, मेरी नज़दीक की कुर्सी पर बैठे है ! इस समय निर्विकार, निगमक्त, निर्विकल्प पुरुप की भूमिका में है । और अगान्ति की आग में मेन और वाची का जीवन वधक-वधकार जल रहा है ! जिनकी सक्रिय भूमिका में दिन हमारा जीवन गुरु हुआ था, आज वीच राह में आकर उसमे उब पनि दिग्बानी पग, तो उनका काम प्रकार निर्विकार रहना अच्छा लगता है और वह इस प्रकार निगमकत रह ही कैसे ! वह : को यह अभियोग! या नहीं, एक मगत प्रश्न है। आशा है कि आप सब लोग मेरे साथ एकमत होंगे। एक मग दृश्य : मैदान मे गांल्फ कोर्म के निकट किमी एक अपराह्न में-जो न बहुत गरियाहाट के पुल पर वे दोनो । गरम है न बहुत ठंडा—वही लोग । तीन-चार थाम के पेडों में कुंज व गया है। वे वही घास पर बैठे हैं। लेकिन एक-दूसरे को ओर देख न रहे हैं, सीघे दर्शकों को और नज़र किये हैं। दूर पर विक्टोरिया मेमोरिय रोशनी में चमक रहा है । दूरी पर ही रेस मैदान की सफेद, निचले घेरे में गतिशील वक्ररेखा है। गॉल्फ मे मेम साहब लोग जांघिये की तरह शॉर्ट पहने, सुललित पद-पल्लवी प्रगट करती, इधर से उधर या-जाकर गॉल खेल रही है । कही-कही उनके नजदीक होकर परिचारक चले जा रहे हैं- देर से पीठ पर गॉल्फ के डंडे-भरे तरकस बांधे हुए। गाय-मैसें चर रही है कही अपने में सोये नये जोड़े, चीटियों की तरह चलती हुई ट्रामे और वमें केया (अतीत की स्मृति से आच्छन्न) : यह कुज शची को बहुत मि था। वह (अतीत की स्मृति मे आच्छन्न) . केया के साथ उस समय में गची की यातचीत नहीं हुई थी। हम दोनों तव से ही यहां आकर बैठने थे । शची आता और लेट जाता। केवा: घास का सिरा तोडकर उमका अगला हिस्सा चबाता। वह : उसकी स्मृति बहुत तेज थी। घंटों कविता की भावृत्ति करत रहता। रवीन्द्र नाथ, जीवनानन्द, इलियट, ऑडेन। अमिय चक्रवर्ती- मिलायेंगे ये मिलायेंगे। कसे याश्चर्य की बात है, यह लाइन कितने दिन बाद याद आयी। पता है, पता है कि आग के चक्र का घूमना है- कहता, कौन बताओ तो? मैं उत्तर न दे पाता । खुद ही वह कहता, विष्ट दे। शायद ईश्वर नहीं है । खेर, मृष्टि आजन्म अनाय, काल की अव्यक वृद्धि शृंखला के अभिव्यक्त ह्रास मे-बताशो कौन है ? मेरे विमू चेहरे की ओर देखकर शची मुंह दावकर हंसता। सुधीन दन ! मूड घोड़े घाम खा रहे हैं कार्तिक को ज्योत्स्ना के प्रांतर मे, प्रस्तर युग घोडो के गमान--अब भी घास के लालच में चरते हैं पृथिवी के असा धारण आकार वाले डाइनासोर बाद में। आंखो में एक स्वप्न में डूबक प्रगाढ स्वर मे शची कहता, जीवनानन्द । या कभी : ओ डाक डार्क । दे ऑल गो इन्टु द डार्क, द वैकेंट इंटरस्टेल्लर स्पेसिज, द वेकेंट इ. A 78 गरियाहाट के पुल पर वे दोनों -- मालूम है। मुझसे बार-बार यह सवाल करने के माने क्या हैं ? केया क्या सोचती है कि शची के शराब पीने के बढ़ जाने में मेरा हाथ है ? केया का यह सवाल क्या मेरे विरुद्ध अभियोग-जनक है ? या, केया सोचती है कि शची की शराब के प्रति आसक्ति उत्तरोत्तर बढ़ने के लिए वह खुद ही जिम्मेदार है, और यही प्रश्न उसके खेद को प्रगट करता है ? आप क्या सोचते हैं ? केया:शची से मैंने प्यार किया था। और प्यार कर व्याह किया था। काम बहुत आसानी से नहीं हुआ। वह कई वरस पहले की बात है । तब शायद हमें स्वाधीनता मिलने-मिलने को हो रही थी। मैं कानूतन तभी वालिग़ हुई थी। शची की कविताएँ पत्र-पत्रिकाओं में तभी प्रकाशित होना शुरू हुई थीं। शची उन दिनों बहुत तेज़ स्वभाव का था और उसका कैसा तो उन और मोहक आकर्पण था ! वह जैसे अलिफ़-लैला वाला चुम्बक पत्थर का पहाड़ हो ! उसके समीप से जो जहाज़ निकलता उसका मानो जोड़- जोड़ खुल जाता। और मेरे पिता थे बहुत कड़ी नजर रखने वाले और कठोर । शची मुझे बहा ले गया। पिता की लगाम मुझे रोक न सकी। इस सव मामले में जो प्रमुख गवाह और मेरे और शची के प्रधान सलाहकार थे वे आपके सामने, मेरी नज़दीक की कुर्सी पर बैठे हैं ! इस समय निर्विकार, निरासक्त, निर्विकल्प पुरुप की भूमिका में हैं । और अशान्ति की आग में मेरा और शची का जीवन धधक-धधककर जल रहा है ! जिनकी सक्रिय भूमिका में एक दिन हमाग जीवन शुरू हुआ था, आज बीच राह में आकर उसमें जव व्यतिक्रम दिखायी पड़ा, तो उनका क्या इस प्रकार निर्विकार रहना अच्छा लगता है ? और वह इस प्रकार निरामक्त रह ही कैसे सकते हैं ? वह : तो यह अभियोग है ! क्या : नहीं, एक मंगत प्रश्न है। आशा है कि आप सब लोग मेरे साथ एकमत होगे। एकदूमग हय : मैदान में गॉल्फ कोर्स के निकट किसी एक अपराह्न में---जो न बहुत बहुत प्रिय 79 गरियाहाट के पुल पर वे दोनों गरम है न बहुत ठंडा-वही लोग। तीन-चार आम के पेड़ों से कुंज बन गया है। वे वही पास पर बैठे हैं। लेकिन एक-दूसरे की ओर देख नहीं रहे हैं, सीधे दर्शकों की और नजर किये हैं। दूर पर विक्टोरिया मेमोरियल रोशनी मे चमक रहा है । दूरी पर ही रेम मैदान की सफ़ेद, निचले घेरे की गतिमील वक्ररेखा है। गॉल्फ में मेम साहब लोग जांघिये की तरह शॉर्ट स पहने, सुललित पद-पल्लवी प्रगट करतो, इधर से उधर आ-जाकर गॉल्फ खेल रही है। कहीं-कहीं उनके नजदीक होकर परिचारक चले जा रहे हैं- देर से पीठ पर गॉल्फ के डंडे-भरे तरकस बांधे हुए। गाय-मैसें चर रही है ! कही अपने में खोये नये जोड़े, चीटियों की तरह चलती हुई ट्रामें और वर्मे! केया (अतीत की स्मृति से आच्छन्न) : यह कुज शची को था। वह (अतीत की स्मृति से आच्छन्न) : केया के साथ उस समय भी शची की बातचीत नहीं हुई थी। हम दोनों तव से ही यहां आकर बैठते थे।गची आता और लेट जाता । केया:घास का सिरा तोडकर उसका अगला हिस्सा चबाता । वह : उसकी स्मृति बहुत तेज थी। घंटों कविता की आवृत्ति करता रहता। रवीन्द्र नाथ, जीवनानन्द, इलियट, ऑडेन। अमिय चक्रवर्ती- मिलायेंगे वे मिलायेंगे । कसे आश्चर्य की बात है, यह लाइन कितने दिनो बाद याद आयी। पता है, पता है कि आग के चक्र का धूमना है---शची कहता, कौन बताओ तो ? में उत्तर न दे पाता । खुद ही वह कहता, विष्णु दे। शायद ईश्वर नही है । सर, मृष्टि आजन्म अनाथ, काल की अव्यक्त वृद्धि शृंखला के अभिव्यक्त ह्रास मे-बताओ कौन है ? मेरे विमूढ चेहरे की ओर देखकर शची मुंह दावकर हंसता। सुधीन दन ! मूढ । घोडे घाम पा रहे हैं कार्तिक को ज्योत्स्ना के प्रांतर में, प्रस्तर युग के घोडों के रामान–अव भी घास के लालच में चरते हैं पृथिवी के असा. धारण नाकार वाले डाइनासोर वाद में। यांखों मे एक स्वप्न मे डूबकर प्रगाढ म्वर मेशची कहता, जीवनानन्द । या कभी : ओ डार्क डार्क । दे ऑल गो इन्टु द डार्क, द वेकेंट इंटरस्टेल्लर स्पेसिज़, द वेकेंट इन्टु द वेकेंट, ।

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गरियाहाट के पुल पर वे दोनों 81 वह (विलाप के स्वर में) : शची अब कविता नहीं मुनाता । केया (विलाप के स्वर में) :शची ही मुझे यहां लाया था। दोनो (एक साथ) : शची आज हमारे पास से दूर चला गया है। बहुत दूर । और हम कितने पास-पास रहते हैं ! केया : मैं उसके संसार में हूं, उसके बिस्तर पर। मैं और वह एक ही दफ्तर में है । मैं उसी के विभाग मे, उसी के अधीन हूँ। वह: एक और दृश्य : पार्क स्ट्रीट के वार मे वे दोनो । काफी रात हो गयी है। उन दोनों ने शराब पी है । बीच-बीच मे कैवरे की लडकी विरक्ति-मूलक गाने गाती है। बीच-बीच मे रुक जाती है। वे उस असंतोप के समय में बातें करने लगते हैं। कोई किसी से बातें नहीं करता। वे दर्शको को अपनी बातें सुनाते है। वह (असहाय भाव से) : आप सब ही देख रहे है। आप साक्षी है। मने केया को शराब पीने से मना किया था। उसने फिर भी जबरदस्ती पी ली। सच कहने में क्या, मैं केया के इस बचकानेपन की जिद से बहुत ऊव उठा था। बहुत परेशान भी हो गया था। और तो और, एक वक्त बीता जा रहा था। लेकिन मैं जानता हूँ और आप भी देख रहे हैं कि तब वह एक हगामा मचा देगी। इस वक्त वह शान्त है, लेकिन गुस्सा हो जाने पर चाडाल बन जाती है। इसीलिए लाचार होकर मुझे हार माननी पडी और उसके साथ शराव भी पीना पड़ी। पर सच की खातिर यह भी स्वीकार करना होगा, मैं स्वीकार करता हूँ, मुझे इस वक्त नदा हो रहा है, और बहुत अच्छा तग रहा है । केया को और आप लोग अच्छी तरह नज़र डालकर देखें-उसकी दोनों आंखें एक रूपवान जला- शय का आभास दे रही है। उसका चेहरा कैसा तरल होता जा रहा है ! उसका कठोर भाव सम्पूर्ण रूप से तिरोहित हो गया है । कैया मेरी विशोर- अवस्था को मित्र है। आज इस भरे-पूरे मध्याह्न में वह जैसी सुन्दर लग रही है, ऐसी कभी नहीं लगी। मद्यपान किया है, क्या इसलिए ? या

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81 हाट के पुल पर वे दोनों .. वह (विलाप के स्वर में) : शची अव कविता नही सुनाता। केया (विलाप के स्वर मे) : शची ही मुझे यहाँ लाया था। दोनो (एक साथ). : शची आज हमारे पास से दूर चला गया है। बहुत दूर । और हम कितने पास-पास रहते हैं ! केया : मैं उसके संसार में हूं, उसके बिस्तर पर। वह : मैं और वह एक ही दफ्तर में हैं। मैं उसी के विभाग में, उसी के अधीन हूं। एक और रश्य: पार्क स्ट्रीट के बार में वे दोनो। काफी रात हो गयी है। उन दोनों ने शराब पी है । बीच-बीच मे कोबरे की लडकी विरक्ति-मूलक गाने गाती है । बीच-बीच मे रुक जाती है। वे उस असंतोप के समय मे बातें पारने लगते हैं। कोई किसी से बातें नहीं करता। वे दर्शकों को अपनी बातें सुनाते है। वह (असहाय भाव से) : आप सव ही देख रहे हैं। आप साक्षी हैं। मैंने केया को शराब पीने से मना किया था। उसने फिर भी जबरदस्ती पो ली। सच कहने मे क्या, मैं केया के इस बचकानेपन की जिद से बहुत ऊब उठा था। बहुत परेशान भी हो गया था। और तो और, एक वक्त बीता जा रहा था। लेकिन मैं जानता हूँ और आप भी देख रहे हैं कि तब वह एक हंगामा मचा देगी। इस वक्त वह शान्त है, लेकिन गुस्सा हो जाने पर चाडाल बन जाती है। इसीलिए लाचार होकर मुझे हार माननी पड़ी और उसके साथ शराब भी पीना पडी। पर सच की खातिर यह भी स्वीकार करना होगा, मैं स्वीकार करता हूं, मुझे इस वक्त नशा हो रहा है, और बहुत अच्छा लग रहा है। केया की ओर आप लोग अच्छी तरह नजर डालकर देखें--उसकी दोनों आँखें एक रूपवान जला- शय का आभास दे रही हैं; उसका चेहरा कैसा तरल होता जा रहा है ! उसका कठोर भाव सम्पूर्ण रूप से तिरोहित हो गया है। केया मेरी किशोर- अवस्था की मित्र है। आज इस भरे-पूरे मध्याह्न में वह जैसी सुन्दर लग रही है, ऐसी कभी नही लगी। मद्यपान किया है, क्या इसलिए ? या 82 गरियाहाट के पुल पर वे दोनों इतने दिनों का एक आवरण उतारकर आज सहसा वह अपने रूप में निकल पड़ी है ? या कि जो व्यवधान मुझे और केया को आज तक वरावर ओट में रखे रहाउस प्रथम वयस से ही वह अकस्मात् ढह गया और मैं पहले-पहल उसका अपूर्व रूप देख पा रहा हूँ? केया : यह मैं पहली बार ड्रिंक कर रही हूँ सो वात नहीं है। लेकिन वार में आकर खुल्लम-खुल्ला यह पहली बार ही पी है । यद्यपि जानती हूँ कि शची अगर आज की वात किसी तरह जान पाये, या इसका पता लगा ले कि मैंने उसकी बोतल से ही बीच-बीच में ड्रिंक करना शुरू कर दिया है तो उसे बहुत धक्का लगेगा। लगेगा न ? विचलित नहीं हो उठेगा वह ? पत्नी दूसरे पुरुप के साथ, चाहे वह अतीत का मित्र ही क्यों न हो, वार में बैठकर नशा करे, यह दृश्य देखकर कोई भी पति, वह खुद भी नशेवाज़ क्यों न हो, विना विचलित हुए कैसे रह सकता है ? वताइये ! लेकिन मुझे डर नहीं। शची यहाँ आये, मुझे देखे, मैं तो यही चाहती हूँ। शची विचलित हो उठे, मैं तो यही चाहती हूँ। इस तरह की एक आकस्मिक दुर्घटना के प्रबल आघात से मेरे और शची के बीच खड़ी दीवार टूट जाये, चूर-चूर हो जाये, यही मैं चाहती हूँ। या तो हम निकट आ जायें, नहीं तो हम भी चूर-चूर हो जायें। वह : किसी भी कारण से केया अपने को खोये दे रही है। अकसर वह ऐसी बातें कहती है, ऐसी रूठती है कि कोई मतलब समझ में नहीं आता। आज की बात ही लीजिये, जैसे वह यहाँ शराब पीने क्यों आयी? मुझको ही क्यों खींच लायी ? सिर्फ एक जिद ? या वह कोई मतलब पूरा करना चाहती है ? मुझे क्या किसी बात में किसी तरह फंसाना चाहती है ? मैं होशियार हो जाऊँ क्या? या मेरे प्रति आकृष्ट है ? वरावर ही उसने मुझे ही चाहा; मुझे नहीं जानने दिया; शायद पहले खुद भी न जान सकी हो-यह आज पहले-पहल जाना । सोचकर मुझे अच्छा लगता है । मैं किस तरह उत्तेजित हो रहा हूं! क्या मैं इस अवसर का लाभ उठाऊँ? केया : आदमी कितना बदल जाता है ! जैसा कि शची बदला है। जैसे कि बदला है यह आदमी, जो मेरे पास बैठा है। इसकी आँखों और

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84 गरियाहाट के पुल पर वे दोनों कर शची ने प्रतिष्ठा पायी । न, उसने उसे प्राप्त किया था। था तो कवि अब वह एक बड़े औद्योगिक प्रतिष्ठान का उच्च अफ़सर है । फिर भी उसे सुख नहीं है। मेरा जरूर कोई प्रमोशन नहीं हुआ। मैं अब भी शची की पत्नी हूँ, मिसेज़ वाग्ची। हमारे अन्दर जो एक-दूसरे के लिए आकर्पण था, वह धीरे-धीरे ठंडा पड़ गया। बहुत समय बाद, आज फिर वही आकर्पण, वही चांचल्य, वही अजीव-सी अस्थिरता मन में जाग रही है। वह : मैं केया का हाथ ज़रा पकड़ता हूँ, यह प्रगल्भता है क्या ? मैंने कभी केया का शरीर स्पर्श नहीं किया। आज सिर्फ उसका हाथ अपने हाथों में ले लिया। कैसा आश्चर्यजनक, कोमल स्पर्श है ! मीनू के हाथ क्षत-विक्षत हैं । गृहस्थी के कामों ने उसकी हथेलियों की कमनीयता को विलकुल छील डाला है। वेचारी ! मृत ससुर के साथ उसका कथोपकथन वे दोनों, वह और मीनू, जव गरियाहाट पुल पर खड़े आसमान की धुंधली शोभा में स्वप्न देख रहे थे, और मीनू उसके शरीर से शरीर टिकाकर कह रही थी, 'पता है ? यह है चन्द्र-मंडल-इसके अर्थ हैं कि वर्षा होगी, तभी एक अलौकिक वात हो गयी। एक हलका-सा वादल चाँद के ऊपर से हटा जा रहा था और दूसरी ओर से एक घना बादल उसे ढक देने के लिए तेजी से बढ़ा आ रहा था। आखिर मेघ ने चन्द्रमा को ढक दिया। उसके बाद महसा उसे पुकारा, अरे वावाजी, तुम कैसे हो ? वह खुन होकर बोला, अच्छा हूं। आपकी क्या खवर है ? मेघ वोला, अच्छी है। उसके वाद, मीन माँ की कमी खबर है ? वह हँसकर बोली, यह पास ही नो खड़ी है। मीनू, तुम्हारे बाबा। मीन मुन नही पायी । बोली, नदी में वान' पुकारेगा। चन्द्र-मंडल होने से वान पुकारेगा। 1. नदी इत्यादि में पानी का बढ़ पाना ।

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86 गरियाहाट के पुल पर वे दोनों - वह घबराकर मीनू से कहने लगा, 'मीनू, तुम्हारे वावा... ...', लेकिन देखा कि मीनू उसे ठेल रही है। वह वोला, 'वाप रे, सचमुच बहुत डर गया था। मीनू बोली, 'बीच-बीच में क्या तुम्हारे वाह्यज्ञान का लोप हो जाता है ? सिर पर आसमान फट नहीं पड़ा, यही खैरियत है ! उसने मीनू के दोनों खुरदरे हाथों को थप से दवा लिया और बोला, 'मीनू, मैं तुम्हें प्यार करता हूँ। और भी करूंगा।' मीनू का चेहरा करुणा से भीग आया । बोली, 'वह सब वाद में होगा, अभी चले चलो, वरसात पड़ने लगेगी।' उसने मीनू के हाथ को दावकर बड़े विश्वास के साथ उससे कहा, 'मैं अगर सचमुच तुम्हें प्यार करता हूँ तो वरसात न होगी ! कम-से-कम यह वादल हमें मुसीबत में न डालेगा । तुम देख लेना।' . उसने ऊपर नज़र डालकर देखा । बादल उन्हें छोड़कर बहुत दूर चला गया था। वह मन-ही-मन वोला : मीनू ने कुछ न जाना। मीनू बोली, 'देखा, पुल विलकुल खाली है।' तभी चन्द्रमा के चारों ओर इन्द्रधनुप का घेरा फिर खिलकर निकल . आया। - वह केवल बोला, 'देखो, देखो, मीनू, आकाश की ओर देखो। यह अपूर्व शोभा शायद जल्दी मिट भी जायेगी। बादलों के बेड़े पर वह और मीनू उसने मीनू के हाथ अपने हाथों में ले लिये । आकाश में तब तक वादल का वड़ा-सा टुकड़ा बहुत दूर चला गया था। इस समय उसका पीछा कर रहे हैं हलके-हलके, फीके-फोके, तरह-तरह के वादल । कुछ देर देखते रहने पर भ्रम होता है कि वे ही वादलों के वेड़े पर तैर रहे हों ! उसे मीनू की दोनों हथेलियों का अहसास भी हो रहा था। कैसी कटी-फटी खुरदरी हैं ! केया की हथेलियां मक्खन-सी चिकनी हैं। यज्ञेश्वर आज रात पत्नी की

रियाहाट के पुल पर वे दोनों
87
..ल हथेलियों का सुखप्रद स्पर्श पायेगा। और घेया की वह कोमलता
कभी नहीं मिटेगी।
यह आवेग मे भरकर बोल उठा, 'मीनू, अब मैं तुम्हे वर्तन मांजना,
कपडे धोना--पे सब काम न करने दूंगा।'
मीनू बोली, 'पता है, आज किस तरह वाया की बात याद आ रही
यह बहुत अधिक डर गया। साथ-ही-साथ उसने आसमान की ओर
देखा । न, कोई नहीं है।
वह परेशान होकर बोला, 'प्लास्टिक सर्जरी की आजकल जो उन्नति
हुई है, पता है, तुम्हारी दोनो हथेलियां आसानी से पहले की ही तरह की
जा सकती हैं।'
मीनू बोली, 'जानते हो, वावा की इच्छा थी कि मेरी शादी भी खूब
धूम-धाम से करेंगे।'
वह क्रमशः भडकने लगा।
झटपट बोला, 'तुम कुछ मत सोचो। मैं वचन देता हूँ कि तुम्हारे
मुलायम हाथ मैं फिर तुम्हें लौटा दूंगा।'
मीनू बोली, 'वावा ने सब तरह की दान-सामग्री खरीदकर रख ती
थी। मेरे लिए अलग, छुटकी के लिए अलग।'
वह बोला, 'आजकल तरह-तरह के लोशन भी आते है, समझी। हम
लोग न्यू मार्केट जाकर तलाश कर सकते है।'
मोनू बोली, 'याबा तो पुराने किस्म के आदमी थे
गहना, दहेज,
लड़की के सुख के लिए, उसका मान बनाये रखने लिए ये सब देना
उचित समझते थे कर्तव्य मानते थे।'
वह बोला, "विलायती चीजें भी बहुत मिलती हैं, समझी। इगके
सिवा भी तुम एक काम कर सस्ती हो। सवेरे बोतल मे जो दूध आता
है, उसका मवसन तुम हाथ में मल सकती हो, कच्ची हल्दी के साथ अच्छी

88 गरियाहाट के पुल पर वे दोनों - तरह पीसकर । या फिर नीबू के छिलके अच्छी तरह हाथ में रगड़ सकती हो। दस मिनट नीबू के छिलके हाथ में घिसो, उसके बाद एक बर्तन में ठंडा पानी डालकर बैठी रहो । उसके बाद रात को अंडे की सफेदी के साथ थोड़ा-सा वोरिक अथवा सोडा-वाइका मिलाकर लगाओ और हाथ सुखा- कर सो जाओ। इससे होता क्या है कि दिन-भर कड़ा काम करने से जिस तरह टिशू निस्तेज हो जाते हैं, वे सब फिर जिन्दा हो जाते हैं, और हाथ का स्वास्थ्य और लावण्य फिर लौट आता है।' मीनू बोली, 'लेकिन तुमने जिद पकड़ ली कि तुम कुछ न लोगे। तुमने जिद की कि शादी रजिस्ट्री से होगी। मेरे वावा तो किंकर्तव्य- विमूढ़ हो गये थे! मंत्र नहीं पढ़े जायेंगे ! सात फेरे नहीं होंगे ! अग्नि- साक्षी, वरण-~-कुछ भी न होगा! यह भला किस तरह की शादी हुई ?' वह वोला, 'हाँ, मुझसे भी यही कहा था, यह कैसी शादी है !' मीनू बोली, 'वावा कुछ डर भी गये थे।' वह बोला, 'हां, मुझसे भी वही कहा था -अगर मेरी लड़की को कुछ दिनों बाद छोड़कर भाग जाओ, तो ? मैं वोला---पत्नी को छोड़कर अगर चला जाऊँगा तो फिर शादी ही क्यों कर रहा ?' मीनू बोली, 'उसके बाद ? बावा क्या बोले ?' 'वोले-हाँ, वह तो है। मैं वोला-सिर्फ़ यही नहीं, मंतर वाला व्याह करके भी अगर छोड़कर चला जाऊँ, तो ?' मीनू बोली, "फिर? वावा क्या बोले ?' 'वोले-हाँ, वह तो है। मैं बोला-इसमें तो गवरमेंट के खाते में दोनों के दस्तखत रहेंगे। भाग जाने पर भी निस्तार नहीं। पुलिस के प्यादे भेजकर आपकी लड़की या आप जव चाहें तव मुझे बंधवाकर घर मैंगवा सकते हैं।' मीनू हँसने लगी। बोली, 'हमारे जिम्मे पड़ा बंधवा कर मगाना !' उसके बाद हंसते-हँसते बोली, 'सुनकर वावा क्या बोले ?' 'ताज्जुब में आकर बोले-सच ! रजिस्ट्री की शादी ऐसी सख्त होती है ? मैंने कहा--जी हाँ, तीन कानूनों के फेरे सात फेरों से भी सस्त फेरे होते हैं। फिर देखिये, खर्चा कम । लड़की के पिता के झमेले कितने कम -- 89 गरियाहाट के पुल पर वे दोनों हो जाते हैं।' मीनू हंसी। बोली, 'हो, चावा तुम्हारी बात से बहुत निश्चिन्त हो गये थे। घर लौटते ही मां से कहा था, लड़का भला है, पर...।' उसने पूछा, "फिर ? क्या बोले ?' मीनू बोली, 'कहा, मुझे लगता है कि दिमाग़ कुछ खराव है।' वह बोला, 'हटो।' 'मैं क्या झूठ बात कह रही हूँ ? तुम्हारी तरह मैं गढ़कर बातें नही कह सकती। । वह खिन्न होकर बोला, 'तुम्हारे पिता के प्रति मुझे श्रद्धा थी।' मीनू उससे विलकुल सटकर खडी हो गयी। उसके बाद उसे आश्वा- सन दिया, 'वावा तुम्हे व-हु-त चाहते थे ।' उसके बाद वहुत धीमी आवाज़ में बोली, 'मैं भी तुम्हें प्यार करती हूँ। मुझे क्या लगता है, पता है ? हम दोनों बहुत ही बुद्ध हैं । मैं तो गांव की लड़की हूँ। लिखना-पढना नहीं जानती, बडी-बड़ी बातें नहीं बना सकती, फिर भी मैं तो तुम्हारी बातो मे आकर इस तरह ब्याह करने को तैयार हो गयी थी। गहनो का लालब नही किया; फर्नीचर का लालच नही किया । भी अगर इस तरह कर सकती हूँ तो पढी-लिखी लड़कियां क्यों नहीं कर सकती ?' उसने खुश होकर मीनू के दोनो हाथ पकड़ लिये । बोला, 'मीनू, तुम्हारी हथेलियों में ठीक कर दूंगा।' मोनू ताज्जुब में आकर बोली, 'क्यो, मेरी हथेलियों को क्या हो गया वह अधीर आवेग के साथ बोला, 'तुम्हारे हाथों में मैं सौदर्य के फूल खिलाऊँगा। शची की पत्नी केया के...', केया का नाम याद आते ही एक चूंट भरा..., 'दोनों हाथ जिस तरह स्वास्थ्य से सौदर्यपूर्ण है, तुम्हारे हाथ भी मैं वैसे ही....' उसकी बात काटकर मीनू बोली, 'लेकिन बाबा ने बहुत गलत नहीं कहा था-तुम्हारे दिमाग में सचमुच कुछ सरावी है।'

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गरियाहाट के पुल पर वे दोनों 91 एंड बॉर्डर' का क्रम बदलकर पहले ऑर्डर और बाद में लॉ मे लाना पड़ेगा। अर्थात् कानून और व्यवस्था नही, व्यवस्था और कानून ! नहीं तो समस्या का समाधान नहीं हो सकता-शान्ति स्थापना नहीं हो सकती। यज्ञेश्वर बहुत विरक्त होकर बोला, "एक शादी अगर इतनी समस्याएं पैदा कर सकती है, यह मालूम होता तो शादी ही न करता!' यज्ञेश्वर के बडे भाई के दोस्त बोले, 'वह मुहल्ला छोड़ आया, अच्छा ही हुआ। उस तरह रहने के कोई मयं होते हैं ? पहले दिन तेरे घर जाकर तो मैं घबरा ही गया था। नीवे पुलिस । दोमंजिल पर ताला । सोचा, बात क्या है ! भुवन क्या फिर भूमिगत हो गया? कांग्रेसी प्रजातन्त्र पर तो विश्वास नहीं किया जा सकता !' यजेश्वर अपने भाई के मित्र ते बोला, 'वह सुना था। असल में दादा के लिए ही हमे बहुत फिकर हुई थी। हमारे कॉमरेड पक्की खबर ताये थे। दादा का नाम उनकी सूची में आ गया था।' यज्ञेश्वर के भाई के मित्र वोले, 'एस० वी० ने चेतावनी नही दी ?' मज्ञेश्वर बोला, 'उन्होंने ही तो पहले बताया। यज्ञेश्वर के भाई के मित्र ने कहा, 'उसके बाद शायद केन्द्रीय पुलिस की हथियारयन्द टोली भेज दी।' यजेश्वर बोला, 'दादा जरूर नही चाहते थे।' यज्ञेश्वर के भाई के मित्र बोले, 'समाजविरोधियों से आत्मरक्षा के लिए हथियारबन्द संरक्षकों की जरूरत होती है।' यज्ञेश्वर बोला, 'उस मुहल्ले के ऑफिसर-कमांडिंग ने इस मामले में हमेशा सहयोग दिया। दादा ने उनसे कह दिया था, पुलिस देना चाहे तो दें, लेकिन खबरदार, केन्द्र को पुलिस मेरे घर की चौहद्दी मे न आये। दादा को तो जानते हैं, किस तरह के अडिग सिद्धान्तबादी आदमी हैं। हमारे कॉमरेड भी मुस्तैद थे। पर उस दिन अमिय-दा ने कहा था, उस मुहल्ले में हमारी नीव कुछ कमजोर हो गयी है । पुलिस के एक अफसर ने प्रशासन के एक अफसर से कहा था-सर, यह देखिये, एक मुहल्ले से दूसरे मुहल्ले में आना-जाना कम होता जा रहा है। यह, सर, सेमी-इन्सर्जेन्सी का बहुत साफ लक्षण है। इसका नतीजा है कि लोगों के मन में भक-सन्देह 1. कानून भोर व्यवस्था गरियाहाट के पुल पर वे दोनों - यह है कि जा रहे हैं। इसका नतीजा है कि खुफ़िया खबरों का स्रोत सूखता हा है। भुवन वावू एक संघर्षशील मन्त्री से वोले-अमिय भी इसी प पर पहुंचा है। वह उस दिन आये थे, समझे ? कह गये, हमारे चले के परिणामस्वरूप कॉमरेडों की नैतिक शक्ति में बहुत-कुछ ह्रास हो था। सिर्फ चार लड़कों ने आकर हमारे घर के पास के पार्टी ऑफ़िस । जला दिया था।' भूतपूर्व मन्त्री बोले, 'दुःख की बात तो लिस अब उस तरह सहयोग नहीं देती।' भुवन वावू वोले, 'मैंने अमिय से कहा था कि मामले को पूरे परिप्रेक्ष्य में रखकर देखना पड़ेगा। एक कदम आगे, दो क़दम पीछे---इस नीति के जनक तो स्वयं लेनिन थे। उसके बाद अमिय ज़रूर शान्त हो गया। प्रशासन के अधिकारी पुलिस के एक नये अफ़सर से वोले, 'तुम्हारी उम्र कम है, इसीलिए आसानी से घवरा जाते हो। लॉ एंड ऑर्डर का प्रश्न अपनी परम्परा से हटाकर देखना सम्भव नहीं है। हमारी परम्परा क्या है ? रामायना ऐंड महाभारता ! नरमेध, नरवलि, दीज़ सॉर्ट स ऑफ थिंग्ज ।। तुम कल के आई० पी० एस०, तुम छोकरों के चाहते ही यह सब बन्द हो जायेगा? - बस्शी परेशान-सा आकर बोला, 'चलिये, जगह हो गयी।' भुवन वाबू बोले, 'आप लोगों को, लगता है, देर हो गयी!'प्रशासन के अधिकारी वोले, 'वेटर लेट दैन नेवर। सब लोग जोरों से हँस पड़े। वह उठते-उठते केया से वोला, 'पता है केया, हंसी का यह एक झोंका ही सारे तनाव को उड़ा ले गया।' केया वोली, 'ठेगा !' - हैवलॉक एलिस, कामसूत्र और मार्क्स : क्या राह ? शची ने कहा कि वह उन्हें एस्प्लेनेड तक छोड़ देगा। मीनू राजी न शची नाज अच्छे मूड में है। 'एक दिन आओ न दोनों। नया मकान तो देखा ही नहीं।' केया और वह एक-दूसरे को देखने लगे। मीनू तुर 1. इसी प्रकार की वातें 2. देर मायद दुरुस्त मायद गरियाहाट के पुल पर वे दोनों 93 उठी, "उधर से इधर जितनी दूर है, इधर से उधर भी उतना ही।' शची सब को ताज्जुब में डालते हुए हंस पड़ा। चौला. 'मीनू हालिंग, तुम्हारे साथ मेरा मेल कहाँ है, जानती हो? इसी तरह हम दोनों खूब सच्ची, अच्छी-बुरी, इच्छा-अनिच्छा को अकपट भाव से प्रगट कर देते हैं। छल- कपट से मैं घृणा करता हूँ। तुम्हे पता है, तुम्हारे पति के साथ अब मेरी वोलचाल भी नहीं है । आई हेट हिम समटाइम्स ।' मीनू बोली, 'फिर गाड़ी में जो बहुत ले जाना चाह रहे थे ! मैं जिस चीज को पसन्द नहीं करती उसकी छाया के पास भी नहीं जाती।' शची 'हो-हो' कर हँस पड़ा। आज कुछ देर से उसे वैसा बुरा नहीं लग रहा है न, इसीलिए । 'तुम, आई मस्ट से, मुझसे भी ज्यादा ऑनेस्ट' हो । आओ न एक दिन ! तुम्हे और भी कंप्लीमेट' दूंगा। न, सचमुच ! एक दिन आओ। हमारा मुहल्ला इज ऐब्सोल्यूटली फी ऑफ एनी ट्रवल ।' केया और शची वाहर चले गये--शची हंसते-हंसते-केया शान्त । वह बोला, 'तो चलो, हम भी चलें।' मीनू बोली, 'लेकिन बहुत खिलाया। मास किस चीज़ का था, बताओ तो?' वह ताज्जुब में आ गया, 'क्यों ? बकरे का !' कैया बोली, 'हटो, मैं भी वही सोचती हूँ। हिन्दू के घर में क्या और कुछ देंगे? पर होटल मे होने से मुझे बहुत हिचकिचाहट होती।' वह बोला, 'तुम भी अजीब हो! अरे यह था ग्राम-फेड बकरा', रेजाला का गोश्त । स्पेशल टाइप । चलो चलें।' 1. मैं तो कभी-कभी उससे घृणा भी करता हूँ। 2. मैं दावे से कहता हूँ 3. ईमानदार 4. प्रशस्ति 5. किमी भी प्रकार की गडवड़ से भुवन है। 6 यकरा जिसे पना खिलाया जावा है-खास भन्छा गोश्त 94 गरियाहाट के पुल पर वे दोनों यज्ञेश्वर हांफते-हांफते आकर रास्ता रोक खड़ा हो गया। दिन-भर के परिश्रम से उसका चेहरा, आँखें इसी बीच पिचक गये थे। मीनू से बोला, 'भाभीजी प्लीज़, कुछ खयाल नहीं करेंगी। दादा (यज्ञेश्वर कितना नर्वस था वह समझ में आया उसके पहले-पहल इस तरह दादा कहने पर) के साथ मेरी एक बहुत निजी वात है। खास ज़रूरी, प्लीज़ । आप आइये न भाभीजी, रत्ना के साथ कुछ बातें करें। अव भीड़ नहीं है। आपको वहुत देर न रोकंगा भाभीजी, आइये !' जल्दी से मीनू को लेकर चला गया और फ़ौरन लौट आया। वोला, 'आओ मेरे साथ।' यज्ञेश्वर उसे मंडप से निकालकर सीढ़ी से दोमंज़िले पर ले गया। उसने जाते-जाते देखा, एक आदमी मंडप से उसे प्रायः धक्का देवाहर आकर एक टोकरी-भर जूठे गिलास-प्याले फेंक गया । एक कुत्ता चिल्ला उठा। कई भिखारी उस पर एक साथ टूट पड़े । तव शहनाई में पीलू राग की ठुमरी की तान लहरा रही थी। -- यज्ञेश्वर का किसी भी ओर ध्यान न था। वह मानो डूब रहा था और उसे तिनके का सहारा मिल गया हो ! कमरे में घुसते ही उसने धड़ाम से दरवाजा बन्द कर दिया । फूल-शैया का कमरा, रोशनी में नये सामान- सव चमक रहे थे। अलमारी, ड्रेसिंग टेबल, अच्छे-से शेड का टेवल लैम्प था। सहसा पूरे साइज़ का ड्रेसिंग आईना सामने दीख पड़ा। अभ्यासवश दांत साफ़ हैं या नहीं, यह जल्दी से देख लिया। उसकी यह आदत वस के आईनों में मुंह देख-देखकर पड़ गयी थी। मौक़ा मिलते ही आईने के सामने दांत निकाल देता। यज्ञेश्वर की नजरों से नज़र मिलते ही झट से आंखें फेरकर छत की ओर देखने लगा। फूल ! पूरी छत से गुच्छे-के-गुच्छे फूल झूल रहे थे। लाल, सफ़ेद, पीले, गुलावी, बैंजनी-रजनीगन्धा, पद्म, गुलाव। विस्तर पर फैला बहारदार वॉम्बे डाइंग का वेड-कवर । झक- झका कर रहा था, सिरहाने पर एक जोड़ा तकिया ! बीच के दो बड़े-बड़े तकिये डवल वेड की सीमा का निर्देश कर रहे थे। - यज्ञेश्वर वोला, 'वठो।'

गरियाहाट के पुल पर वे दोनों 95 वह वैठ गया। डनलपिलो के सुखद सहारे से उसके नितम्व-प्रदेश में सिहरन हुई। यज्ञेश्वर झप से उसके पास बैठ कोई भूमिका यांधे बिना उसके दोनो हाथ दबाकर बोला, 'दादा, कुछ उपाय बताओ। लगता है, मुझसे गुरुछ न होगा।' वह कहने जा रहा था-यज्ञेश्वर, उत्तिष्ठत, जाग्रत, प्राप्य वरान्.... उसके पहले ही यज्ञेश्वर बोल उठा, 'कल इस तरह का भद्दा काम हो गया, माने, मैं कर बैठा...!' यजेश्वर चुप हो गया। उसकी आंखों और चेहरे का भाव देखने से ही लग रहा था कि उसे बहुत तकलीफ हो रही है। ? यझेश्वर बोला, 'अच्छा, तुमने हैवलॉक एलिस पढ़ा है ? काममूत्र उन मब किताबों में क्या सचमुच स्त्री को, यानी...।' यज्ञेश्वर के कान और चेहरा लाल हो गये। यह फिर बोला, 'खुश करने के....' पदवर जैसे गहरी सांस छोडकर मुक्ति पा गया। मुंह की बात छीन- फर बोला, 'हां-हां, खुश करने को कोई ययार्य राह दिसायी है, या केवल तात्विक आलोचना है ?' वह बोला, 'मैंने वे सब कितावें आंखों से देखी तक नहीं हैं।' पजेश्वर ताज्जुब में पढ़ गया। 'मच ! सच कह रहे हो? तब तुम लेखक लोग इन सब बातों पर लिखते किस तरह हो ?' यज्ञेश्वर ने हताश नाव नरक महरी माम छोड़ी। इसके बाद ग्घे गले से बोला, 'अच्छा यौन-कमजोरी को हटाने के लिए हर रास्ते पर जो बड़े-बड़े साइनबोर्ड लटके हत है उन पर या नरोमा किया जा सकता है ? सचमुच क्या वे पुरुषों की दुदंदा हटा सकते हैं ?' वह बोला,'मा पठा भाई, मैं तो उपर कभी जाता नहीं । जाने की

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100 गरियाहाट के पुल पर वे दोनों कहूं। यज्ञेश्वर वावू के नेतृत्व में उन्हें हमने साठ घंटों तक रोक रखा था। मिस्टर धारिया की पत्नी, बाल-बच्चों ने आकर बहुत चिरौरी-विनती की। यज्ञेश्वर बाबू नहीं टले । बोले-इस समय हम संघर्ष में लगे हैं । या तो हम जीतेंगे या वह । हमें इस समय जीतने के सिवा दूसरा रास्ता नहीं है। । (वह वोला : पाठको ! जिन गवाहों को यहाँ बुलाया गया, आप सब लोगों ने देखा कि वे समाज के विभिन्न स्तर के लोग हैं। यज्ञेश्वर को वे बहुत दिनों से जानते हैं। इसीलिए मैंने इनकी गवाही को इतना महत्व दिया। इनकी गवाही से यज्ञेश्वर का जो स्वरूप निकला है, देख तो रहे हैं सुधी पाठको और सुशील पाठिकाओ, उसके साथ इस समय के यज्ञेश्वर में, जो हमारे सामने फूल-शया पर जुड़े पलंग पर भय और दुर्भावना में विल- कुल बत्ती की तरह बुझा जा रहा है, कोई मिलान नहीं है, और इस तरह का आदमी अकारण या सामान्य कारण से हार मान लेने वाला लड़का भी नहीं है। इसीलिए उसकी इस तरह की हालत देखकर मैं सचमुच उद्विग्न हो गया।) . यज्ञेश्वर हताश भाव से वोला, 'फिर दादा, मेरे तो बारह बज गये! लगता है कि मैं अपनी पली को कोई सुख न दे सकूँगा। मैं, मैं-मैं दादा, जरूर ही असफल रहूंगा। और छिपाने से क्या होगा? तुमसे साफ़-साफ़ कह रहा हूं।' । यज्ञेश्वर फिर बोला, 'कल अकेले-अकेले लेटा था। लेटे-लेटे वासरघर की बात सोचते-सोचते, लगता है, नींद आ गयी। स्वप्न में वासरघर जीवन्त हो उठा। वही औरतें, उनका छूना-छाना...बड़ी उत्तेजना हो आयो। और उसी उत्तेजना में एक भद्दा काम हो गया।' यज्ञेश्वर इस वार अधीर होकर वोल उठा, "जितनी रात बीत रही है, मैं उतना ही डर के मारे सूखता जा रहा हूं। पूरे वक्त काम में अपने को डुबाये रखकर मामले को दवाये रखा था। अब ? क्या करूं, बताओ !

गरिमाहाट के पुल पर वे दोनों Int उसके आमने-सामने होने में भी मुझे डर लगता है। फिर अगर वैसी ही भद्दी बात हो जाये तो ?' यजेश्वर की योन-शिक्षा वह बोला, 'वत्त यज्ञेश्वर, तुम्हारी जो समस्या है उसमें हैवलॉक एलिस या कामसूत्र या तमाम चिकित्सको ने यौन-दुर्वलताओं की मरम्मत करने के लिए बड़े-बड़े साइन-चोर्ड लटकाकर कारसाने सोल रखे हैं, उनमे से कोई भी राह दिखा पायेंगे या नहीं, मुझे एक यज्ञेश्वर मा फाडे देखते हुए बोला, 'तो क्या कोई उपाय नहीं है ?' वह बोला, 'वरस, हताश क्यो होते हो? तुम्हारा जो संकट है, वह मूलतः आत्मविश्वास का संकट है। इसीलिए सबसे पहले तुम्हे आत्म- विश्वास लौटाना होगा। और एकमात्र द्वन्द्ववाद ही इस युग में निराश लोगों की आशा है, निर्मल लोगों के लिए बल है। इसीलिए मुझे लग रहा है कि तुम कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो का अध्ययन करो ! तुम्हारे दाम्पत्य जीवन में सार्थकता अवतरित होगी।' मज्ञेश्वर बोला, 'कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो ! बात क्या है--साफ-साफ बताओ, भाई । मैंने तो कभी उस चीज की शकल तक नहीं देखी है, लेकिन कभी दादा के मुंह से बीच-बीच में उसके बारे में सुना जरूर है।' वह बोला, 'वत्स यज्ञेश्वर, कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो क्या है, यह जाने बिना जब इतने दिन तुम्हारा काम मजे में चलता रहा तो इस आपात- कालीन क्षण में उसे जानने की जरूरत नहीं है। सिर्फ तुम्हारी आश की मारमगत और विपमपरक मनोस्थिति के लिए जितने की जरूरत है वही वताता हूँ। महामति माक्स ने इतिहास का विश्लेषण कर देखा था कि मानव के विकास और उसकी प्रगति के मूल में समाज के मायिक स्वार्थ के विभिन्न स्तरों में निरन्तर द्वन्द्व है। इस हन्द का बोज सामाजिक संगठन में निहित है। सभी सामाजिक संगठन विशेष दशाओं में विशेष भूमिका अदा करते हैं। उसके बाद वे स्वयं ही अपनी विरोधी पाक्ति को जन्म देते हैं और अपने ही विनाश का कारण बन जाते हैं। इस द्वन्द्र 102 गरियाहाट के पुल पर वे दोनों । : है एक नवीन शक्ति, नये ढंग का सामाजिक संगठन । यह गति, यह चक्र अनिवार्य है। इसी प्रकार समाज सामन्तवाद से पूंजीवाद में पहुंचा। इसी प्रक्रिया और राह से आगे समाजवादी संगठन में पहुंच जायेगा। मार्स ने कहा है, सर्वहारा की विजय अवश्यभावी और अनिवार्य है। विजय अनि- वार्य है-यह आशा की उक्ति ही विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है। यही अन्तत: तुम्हें, मुझे, सभी को केवल जीत की ओर ढकेलकर लिये चल रही है। अतएव यज्ञेश्वर, इतिहास की अमोघ गति के साथ वह चलो। क्लव्य छोड़ो। रात्रि के संग्राम के लिए इतिहास की ओर देखकर अपने को प्रस्तुत करो। निश्चय ही विजय प्राप्त करोगे। 'वत्म, अव दूसरा मूत्र लो : व्यक्तिगत पूंजी और सत्ता के बीच के घने आन्तरिक सम्बन्ध । महामति मार्क्स के पहले यह सत्य इस प्रकार किती ने उठाया था-अपनी व्यक्तिगत पूंजी से पूंजी का निजी अंग भी अभिप्रेत है। अपनी शक्ति का वहाँ प्रयोग करो । आन्तरिक अन्तरंग सम्बन्ध पैदा हो जायेंगे। यह गति और चक्र भी अनिवार्य है।' वह फिर बोला, 'यजेश्वर, निजी अंगों की बात समझते होन! या उमकी व्याख्या की भी जरूरत है ? यज्ञेश्वर जोश में आकर बोला, 'अरे, नहीं-नहीं। तुम मुझे इतना बच्चा मत समझो। आन्तरिक सम्बन्ध, निजी अंग, ताक़त, शक्ति ! अब यह बात मेरे आगे पानी की तरह साफ़ हो गयी है। भाई, मुझे सच- 'मुच बल मिल रहा है ? विजय अवश्यम्भावी है ! उफ़, मास में इतना कुछ है ! वह बोला, 'एक और अचूक बात है। तुम्हारे काम आयेगी। उद्देश्यों की पूर्ति इस समय उपयोग में आ रहे सब आवरणों को बलात् उतार फेंकने पर ही होगी। वह आगे बोला, 'यज्ञेश्वर, तुम इससे अधिक यथार्थवादी और कौन- सा रास्ता चाहते हो? यज्ञेश्वर विस्मय से अवाक् होकर कुछ देर बैठा रहा। फिर वोला, “कसी ताज्जुव की बात है !" वह बोला, 'सखे यज्ञेश्वर, यह तो हुआ मार्क्स । इसके बाद है माओ।

गरियाहाट के पुल पर वे दोनों 103 वह तो है पाते में । उसका ब्रह्मवाक्य है : ताकत आती है यन्दूक की नली के मुंह से ! नली ही शक्ति का स्रोत है। अतएव उठो, जागो ! शक्ति के उत्स को जाग्रत करो!' पुल पर वह, मोनू और ये मीनू उसकी ओर देखकर हंसी। बोली, 'जो भी कहो, में आज तुम पर बहुत खफा हो गयी थी। तुम्हारा क्या? मुझे औरतों में छोडकर तुम बाहर खूब अड्डा जमाकर बैठ गये !' वह मुमकराया। बोला, 'मैं तो समझा था कि तुम्ही शायद वहाँ अड्डा जमाये हुए हो ! और बाहर अकेले वैठे-बैठे में शामियान का रग देख रहा हूँ, और आहे भर रहा हूँ !' मोनू बोली, 'तुम अकेले बैठकर आहें भरने वाले आदमी हो ? दोस्त की बीवी का साथ छोड़ते तो पल-भर नही देखा । ऐसी क्या बातें हो रही थी?' वह बोला, 'शची बहुत ज्यादा शराब पीता है। केया उससे बहुत चिन्तित है।' मीनू बोली, 'तुम्हारे दोस्त तो हमेशा से कल्पना मे खोये रहने वाले हैं। उनको समझना कठिन है। लेकिन यज्ञेश्वर बाबू की पत्नी मुझे अच्छी लगी। बातचीत में जरा भी बड़े लोगों का-सा हाव-भाव नहीं रखती। रत्ना की मां भी अच्छी हैं।' उसने मीनू बोली, 'अच्छा, तुम कह क्या रहे हो ?' मोनू हंसी। बोली, "इतना रास्ता पार कर निमन्त्रण खाने आये, दो-तीन घंटे अड्डा जमाया। उसके बाद पूछ रहे हो, रत्ना कौन है ?' पूछा, "रत्ना कोन?' इस बार वह भी हंसा। बोला, 'समझ गया। असल में मुझे सवाल न था। कलकत्ता को शादियों मे यही अजीव वात रहती है। लोग आते हैं, उपहार देते हैं, निमन्त्रण साकर उठ जाते हैं; लेकिन किसकी शादी है 104 गरियाहाट के पुल पर वे दोनों क्या हाल है-यह सब-कुछ न जानने से भी कोई नुकसान नहीं होता। बहुत लोग तो आकरसीधे धड़धड़ाते हुए खाने की जगह जाकर बैठ जाते हैं। उसके बाद किसी के हाथों उपहार भेज देते हैं। वहू तक को भी नहीं देखते !'. मीनू वोली, 'कैसा जमाना आ गया है। पता है, मैं तो परेशान हो गयी थी। आये थे शादी के घर, सब लोगों ने मिलकर क्या चांव-चांव शुरू किया, पता है ? सिर्फ़ हत्याओं के किस्से। किसके मुहल्ले में कितने खून हुए ! किसके घर में रात को कितने लोग छुरा-बम-पाइपगन लेकर सोने आये ! किसके पास से वे कितना चन्दा जबर्दस्ती ले गये! बस, यही सव वाते। दो-चार तो शाम के पहले ही चली गयीं। उन्होंने खाया भी नहीं।' वह बोला, 'उधर से हम ही आये हैं। और कोई नहीं।' मीनू बोली, 'अच्छी बात है, कितने बजे हैं ?' उसने घड़ी देखी, उसके बाद घड़ी को कान से लगाकर देखा, फिर हँसा। बोला, 'मीनू, घड़ी वन्द है। उसके बाद उसने घड़ी में चाभी दी। मीनू बोली, 'चलो, घर चलें।' वह बोला, 'अच्छा, चलो।' वे दोनों चलने के लिए ज्यों ही घूमे थे तभी देखा कि चार लड़के उनसे थोड़ी दूर पर खड़े चुपचाप सिगरेट पी रहे हैं और बीच-बीच में उनकी ओर देख रहे हैं । डर के मारे मीनू की अन्तरात्मा तक कांप उठी। उसका गला सूखकर काठ हो गया। उसका भी। वे एक क़दम भी हिल. न सके। । मीनू मन-ही-मन बोली : ये लोग वही हैं। वह मन-ही-मन बोला : वही होंगे। मीनू मन-ही-मन बोली : वे हमें मार डालेंगे। वह मन-ही-मन बोला : हाँ। मीनू ने मन-ही-मन कहा : हमें यही मार देंगे? इसी पुल पर ? उसने मन-ही-मन कहा : यहाँ भी मार सकते हैं, इसी पुल पर। या गग्यिाहाट के पुल पर वे दोनों 105 : यहाँ से पुल के नीचे ले जाकर मार सकते हैं। या यह भी हो सकता है कि हमें पकडकर कही ले जामें, जहां उन लोगों ने आदमियों को मार डालने का इन्तजाम कर रखा हो । उसके बाद अपनी सुविधा के अनुसार एक को, या दोनो को एक साथ मार डालें। उनकी जैसी तबीयत हो। मीनू मन-ही-मन बोली : उसके बाद हमे कहीं फेंक आयेंगे। वह मनही-मन बोला: हां, ये लोग इसी तरह करते हैं। मीनू मन-ही-मन बोली : लेकिन हमारे बायीं ओर तो कोई नहीं है। वह मन-ही-मन बोला :शायद वह उनकी चाल हो। मोनू ने उत्तर दिया : वह हो सकता है । वे सोचते हैं, हम वायी और से भाग सकते है। और तभी उनमे से कुछ लोग उधर से निकल बायेंगे। वह बोला : उसके बाद मारेंगे। मीनू : पहले डंडे से सिर के पीछे चोट करेंगे? वह : हाँ, लेकिन तुम्हे कैसे मालूम है ? मीनू : उसके बाद छुरी निकालकर गला छक् से काट देंगे? वह : हाँ, यही उनका ढग है । लेकिन मीनू, तुम कैसे...? मीनू : उसके बाद भी अगर बह देखेंगे, कि हम छटपटा रहे हैं, या कराह रहे हैं, या 'वचाओ' 'वचाओं' कह रहे हैं तो और कई बार पूरी चलायेंगे? वह : गोली भी चला सकते हैं ! मीनू : हां, वह हो सकता है। वही करते हैं। अच्छा, तो फिर वे लोग पहले ही गोली क्यो नही चलाते ? वह : यह ज़रूर सोचने की बात है। जवाय हमे मालूम नही । फिर सब सवालों का ठीक-ठीक जवाब भी नहीं मिलता। यही समझो कि हिन्दू लोग बलि के काठ मे बकरे का गला डालकर एक झटके में बलि दे देते हैं। मुसलमान लोग गले को नली पर कई बार छुरी रगडकर हलाल करते हैं। वैसा क्यों करते हैं और ये क्यो ऐसा करते हैं, इसका जवाब जरूर कुछ होगा। लेकिन उससे बकरे का क्या आता-जाता है ? लगता है कि इन लोगों के इसी तरह के कुछ कायदे होगे जिससे उनमे से एक आदमी पहले डंडा मारकर शिकार को जमीन पर गिरा देता है। उसके बाद दूसरा आदमी ..

गरियाहाट के पुल पर वे दाना र छुरी चलायेगा, उसके बाद एक और आदमी छाती में गोली श्रम-विभाजन की बात है। मीनू : हाँ, लगता है ऐसे ही होगा। लेकिन देखा, वे लोग कितने शान्त यी पड़ते हैं, और कितना धीरज रखकर हमारा इन्तज़ार कर रहे हैं ! वह : हाँ । पहले तो उन्हें कोई जल्दी नहीं है, क्योंकि उन्हें मालूम है हमसे उन्हें किसी रुकावट का सामना नहीं करना पड़ेगा। वे सामान्यतः से ही लोगों को मारते हैं जो न वाधा देना जानते हों, या भाग भी न सकते हों। दूसरे, जिस कारण से हमारे ऊपर उनको गुस्सा नहीं है, इसी से उनके मन में किसी भी तरह की उत्तेजना या चंचलता पैदा नहीं होती। मीनू : सिर्फ हम ही कांप रहे हैं। वह : पसीना भी छूट रहा है। मीनू : यह देखो...। 'वह देखो, अरे वह देखो,' मीनू ने फुसफुसाकर उससे कहा, 'वे हमारी ओर बढ़े आ रहे हैं।' उसने मीनू का हाथ पकड़कर उसे पास खींच लिया। फुसफुताकर मीनू से कहा, 'मीनू, तुम्हारे हाथ पसीने से तर हो गये हैं।' मीनू वोली, 'तुम्हारा हाथ कितना ठंडा है !' : - शची की शेष वात : एक अपनी तसवीर शची बोला : आप गवाह हैं । आप जो ईश्वर हैं, जो पाठक हैं, जिनके निक कुछ भी छिपा नहीं रहता, छिपाया नहीं जा सकता, वही आप जो इ वीच मेरी बातें कुछ-कुछ जान गये हैं ! और-तो-और, मेरे कहे बिना मेरी इच्छा अपने सम्बन्ध में कुछ कहने की नहीं थी। कहना चाहता नहीं, लेकिन मनुष्य-समाज ही ऐसा है, जहाँ कुछ छिपाकर रखा नहीं सकता। दूसरों के सम्बन्ध में हमारे स्वाभाविक कुतूहल और दूस चर्चा में हिस्सा बटाने की सहज प्रवृत्ति से ही हम दूसरों के गोपन अनधिकार प्रवेश करते हैं । विना कहे हस्तक्षेप भी करते हैं । इसी त हम हर रोज, हर क्षण अपने मन के रंगों की कूची से दूसरों का पट - गरियाहाट के पुल पर वे दोनों 107 करते जाते हैं। मैं यह भी जानता हूँ, माशा है कि स्वीकार करेंगे कि मेरी अपनी तसवीर भी-एक भी हो सकती है, और बहुत-सी भी हो सकती हैं-इस तरह आपकी आँखों के आगे सोल-सालकर रख दी गयी है। किसकी बनायी हुई है, इसका ठीक पता नही । लेकिन यहां पांच चित्रकार हैं जिनमें से प्रत्येक ही मेरा चित्र बनाकर दिखा सकता है। जैसे, (एक): मिस्टर मोहता। उनके साथ मेरा सम्बन्ध बहुत अँधेरे-उजाले का है। वह मेरे प्रतिपालक हैं । योग्यता के क्षेत्र में हम एक-दूसरे के गुणग्राही हैं । व्यक्तिगत रुचि-अरुचि के मामलों में हम दोनों के बीच दो ध्रुवों का अन्तर है। प्रतिष्ठान की जिम्मेदारियों के पालन में हम दोनों एक-दूसरे के विश्वास पात्र हैं। (दो): यज्ञेश्वर । मेरा अधीनस्थ कर्मचारी, जिसके अस्तित्व के सम्बन्ध में मैं कभी भी बहुत सचेत नहीं था। अव हो गया हूँ। सच कहने मे अब क्या, जब से यह पता चल गया है कि मैं मोहता इंडस्ट्रीज का जनरल मैनेजर होने वाला हूँ, अब मेरे लिए यनेश्वर के अस्तित्व के सम्बन्ध मे और अधिक आंखें यन्द किये रहना मेरे अपने अस्तित्व के लिए ही कभी घातक हो सकता है। अब से यह हमेशा मेरे दांतों में कंकड़ या आंखो मे धूल के कण के समान हो गया है-~-बराबरवैचनी का कारण। सच कहने मे क्या, मैं उसे जितना सम्मान देकर चलना चाहता हूँ, मन-ही-मन अपने को उसके लिए तैयार करता हूं। मिस्टर मोहता को भी उतना सम्मान देने की बात नही सोचता। (तीन) : मेरा पहले का एक मित्र, जिसे अब मैं उतना पसन्द नहीं करता। मेरी धारणा है कि वह पाखंडी है। लोग उसे सहृदय समझते हैं । मेरा खयाल है कि वह आपत्ति-विपत्ति के सम्बन्ध में बेवकूफ है- यद्यपि लोग उसे साहसी कहते हैं। मेरी धारणा है कि वह असस्कृत है, उजड है, जबकि लोग उसे स्पष्टभापी समझते हैं। छोडिए, लोग उसके बारे मे जो चाहें सोचें, मेरा उससे कुछ बनता-बिगडता नही । (चार) : उसकी पत्नी मोनू । वही कभी-कभी मुझे अच्छी लगती है। लेकिन उम पर मैं जरा भी असर डाल सका हूं या नहीं, इसमे मुझे सन्देह है। शायद नहीं। ओह, एक बात बताऊँ, मैं लड़कियो को कभी बहुत प्रभावित कर सकता था! और (पांच) : केया-मेरी पत्नी।

106 गरियाहाट के पुल पर वे दोनों . . गले पर छुरी चलायेगा, उसके बाद एक और आदमी छाती में गोली मारेगा । श्रम-विभाजन की बात है। मीनू : हाँ, लगता है ऐसे ही होगा। लेकिन देखा, वे लोग कितने शान्त दिखायी पड़ते हैं, और कितना धीरज रखकर हमारा इन्तज़ार कर रहे हैं ! वह : हाँ । पहले तो उन्हें कोई जल्दी नहीं है, क्योंकि उन्हें मालूम है कि हमसे उन्हें किसी रुकावट का सामना नहीं करना पड़ेगा। वे सामान्यतः ऐसे ही लोगों को मारते हैं जोन वाधा देना जानते हों, या भाग भी न सकते हों। दूसरे, जिस कारण से हमारे ऊपर उनको गुस्सा नहीं है, इसी से उनके मन में किसी भी तरह की उत्तेजना या चंचलता पैदा नहीं होती। मीनू : सिर्फ हम ही काँप रहे हैं । वह : पसीना भी छूट रहा है। मीनू : यह देखो...। 'वह देखो, अरे वह देखो,' मीनू ने फुसफुसाकर उससे कहा, ओर बढ़े आ रहे हैं।' उसने मीनू का हाथ पकड़कर उसे पास खींच लिया। फुसफुसाकर मीनू से कहा, 'मीनू, तुम्हारे हाथ पसीने से तर हो गये हैं।' मीनू बोली, 'तुम्हारा हाथ कितना ठंडा है !' : 'वे हमारी शची की शेष बात : एक अपनी तसवीर शची बोला : आप गवाह हैं । आप जो ईश्वर हैं, जो पाठक हैं, जिनके निकट कुछ भी छिपा नहीं रहता, छिपाया नहीं जा सकता, वही आप जो इस बीच मेरी बातें कुछ-कुछ जान गये हैं ! और-तो-और, मेरे कहे बिना भी मेरी इच्छा अपने सम्बन्ध में कुछ कहने की नहीं थी। कहना चाहता भी नहीं, लेकिन मनुष्य-समाज ही ऐसा है, जहाँ कुछ छिपाकर रखा नहीं जा सकता। दूसरों के सम्बन्ध में हमारे स्वाभाविक कुतूहल और दूसरों की चर्चा में हिस्सा बटाने की सहज प्रवृत्ति से ही हम दूसरों के गोपन क्षेत्र में अनधिकार प्रवेश करते हैं । विना कहे हस्तक्षेप भी करते हैं । इसी तरह से हम हर रोज़, हर क्षण अपने मन के रंगों की कूची से दूसरों का पट चित्रित गरियाहाट के पुल पर वे दोनों 109 आप कलेजे पर हाथ रख सोचकर तो देखिये कि क्या सचमुच हम कभी निश्चयात्मक रूप से सुलझे हुए होते हैं ? यह सुलभता क्या विलकुल अवास्त- विक नहीं है ? कम-से-कम मैं तो जानता हूं, अपने-आपके निकट कि मैं बहुत साफ-स्पष्ट नही हूँ। इसीलिए जीवन के किसी प्रश्न का उत्तर जल्दी से नही पा सकता । समस्या का सामना होने पर समाधान नहीं ढूंढ पाता हूँ। मैं किसलिए हूँ? कोई नियन्ता है ? वे कौन हैं-वही अत्यन्त वृद्ध ईश्वर- जिनकी आँखों में कीचड़ भरा पड़ा है ? या यह अटल विश्वास : इतिहास की नियति के अमोघ विधान मे वंचित मानव की जय अवश्य होगी ? अथवा सृष्टि की दुनिवार गति इधर-उधर के स्रोत में, पुरुषार्थ की पतवार पर वैठकर बारंबार लक्ष्य को ठीक करती है ? सुरा क्या दुख की ही असीमता का दूसरा नाम है ? सुख का उत्स कहां है ? धन में, मन में, मर्यादा मे, भोग मे, रमणी के कुम्भ-कुच में, नाभि-मूल मे, या वानप्रस्थ अथवा संन्यास में ? हत्या-युद्ध-ध्वंस मे क्या निर्माण की अन्तनिहित प्रतिश्रुति नहीं है ? शान्ति की स्थिति बन्धन का किचिन्मान सकेत नहीं देती ? बतलाइये, क्या इसका उत्तर किसी के पास स्पष्ट है ? या प्रश्न ही पहेली है-निरर्थवा, वाग्जाल-केवल समय बिताने के लिए दिमाग की कार खुजली ! . उस दिन चार-पांच लडको ने मिलकर एक निरस्त्र किशोर की हत्या कर दी। खुले रास्ते पर। तिमजिले के बरामदे मे खडे सहसा मेरी नजर उधर पड गयी।न, न, में उतरा नहीं। कही हत्यारे मुझे देख लें तो अपनी कारगुजारी के साक्षी के रूप मे कही मुझे पहचान न लें ! इसी डर से मैं झटपट कमरे में घुम गया। इसी बीच उन लोगो ने मुझे पहचान लिया या नहीं, जान नहीं सका। कई दिन बहुत डरा-डरा रहा । हर रोज किसी निश्चित वक्त पर घर न लौटना। गोकि मेरी अपनी गाड़ी है, लेकिन बहुत दिन उस पर नही चढा । हर दिन ऑफिस से अलग-अलग तरह की गाडी पर चढ कर घर लौटता। किसी-किमी दिन टैक्सी से मरा सयाल यह था कि तिमजिले से मेरे उतरते-उतरते ही वे लड़के को मार चुके होते। मैं उसे बचान पाता। लेकिन मेरा हिसाब ठीक नही बंठता । वह मर गया है.--यह सोचकर वे उसे वही फेंककर चले गये । प्राय: तीन घंटे लड़का 110 गरियाहाट के पुल पर वे दोनों सड़क पर पड़ा रहा । उसके बाद एक बूढ़े रिक्शेवाले की दया से वह अस्पताल में भरती हुआ। दो दिन बाद मर गया। तीन घंटे में इतना खून वह गया था कि उसे बचाया न जा सका। डॉक्टरों पर आस्था रखकर वक्त पर अस्पताल ले जाने पर उसे शायद बचाया जा सकता था। लेकिन डॉक्टरों पर मुझे ज्यादा आस्था नहीं है। तीन घंटे पहले अस्पताल पहुंच जाने पर वह शायद बच जाता ! आप लोग जो इस तरह की बातें हमेगा ही अखबार में पढ़ा करते हैं, या कभी संयोग से देखने का सौभाग्य भी पा जाये-आप क्या सोचते हैं कि वह बच जाता? देखिये तो, मेरी ज़िम्मेदारी कहाँ है ? हाँ, मेरी गाड़ी है, वह उस समय गैरेज में ही थी। गाड़ी निकालकर रास्ते पर निकाल लेता और उसके पास पहुंचने मे मुझे बहुत होता तो दस मिनट का वक्त लगता। उसके बाद अस्पताल । अधिक-से-अधिक पाँच मिनट । लेकिन मैने वह नहीं किया। मुझे कैसे पता चलेगा कि कितने लड़कों ने उसे मारा? कि वे अनाड़ी थे? हो सकता है कि थोड़ी देर बरामदे में और खड़े रह सकने पर वह मुझे देख लेते। और मैं उन्हें अनाड़ी समझकर शोर मचाकर लोगों को जमा कर लेता। सच-सच वताइये, आपमें में कोई भी मेरी पुकार का जवाब देता? या बुद्ध की तरह चिल्लाना और गोर ही मेरे पल्ले पड़ता-कोई निकलता नही-इस वीच मैं उनकी नज़रो में आ जाना, उनके द्वारा की गयी हत्या के सिलसिले में ! । आत्मन्क्षा के लिए सतर्क होना क्या अनुचित है ? आप क्या सोचते हैं, वताइये? मुझे तो लगता है कि उस दिन इस हालत में घर के अन्दर घुस जाने में मैंने कोई गलत काम नहीं किया; क्योंकि उन हत्याकारियों की कुशलता के सम्बन्ध में उस समय सन्देह करने का कोई कारण न था। मैं इस सरल विश्वास के कारण ही घर में घुस गया था कि हत्यारे अपना काम ठीक तरह पूरा करेंगे ! लेकिन महाशय, दुनिया क्या हो गयी है- देखिये, खूनी भी आजकल ठीक ढंग से खून नहीं कर पाते ! एक बड़े भारी उद्योग के भावी जनरल-मैनेजर के रूप में मुझे यह समझना उचित था कि कुशलता का मानदंड सर्वत्र गिर गया है। किन्तु हत्यारों के क्षेत्र में भी वह प्रयुक्त हो सकता है, यह मैं कैसे जानता? A - गरियाहाट के पुल पर वे दोनों 111 मैंने दफ्तर में कई लोगों को इस घटना की बात बतायी।। उनमें से हर एक से मुझे समर्थन मिला। पर्सनेल-मैनेजर दोले, आप कितने भाग्य- धान है कि उनमे से किसी ने आपको देखा नहीं, नहीं तो दो-एक दिन में अगर वदकिस्मती से कोई पहचान ले तो सन्देह कर ऐसा कह भी सकते हैं कि इस तरह की ही तरह के किसी आदमी को उस दिन बरामदे में खडे देखा था ! इसका मुझे खयाल ही नहीं आया था। ठीक तो है, इस तरह को आशंका बिलकुल वेबुनियाद भी नहीं हो सकती। हम लोगो ने, जिन्होंने लिखना-पढना थोडा सीख लिया है वे ही जानते हैं कि अपराध-विषयक विलायती उपन्यासो मे इस तरह की नजीरें बहुत अधिक हैं। पहले खून को दवा देने के लिए खूनियों ने अनेक गवाहो या गवाह के सन्देह मे बहुतों का सून किया है । अगाथा क्रिस्टी के उपन्यासो मे इस तरह के तमाम अकाट्य उदाहरण भरे पड़े हैं। इसी कारण से मैंने पर्सनेल-मैनेजर के सन्देह को उड़ा देने का साहम नहीं किया, क्योकि वे भी पढ़ाई-लिखाई बहुत करते हैं । उन्होंने अगाथा क्रिस्टी को घोलकर पीआ हुआ है ! उन्होंने ही सुझाव रखा, आपकी गाड़ी को ही शायद वे पहचानते हों, आप गाड़ी बदल लें। घर से निकलते और जाते वक्त बदल लिया करें। क्लब में एक गाडी से आयें, दूसरी गाडी से वापस जायें। और उन्होंने ही सारा बन्दोवस्त भी कर दिया । कई स्टॉफ-कारों में कई दिन घर लौटा । अनेक दिन टैक्मी से । कई दिन आतकित रहा। फिर अपनी गाड़ी लेकर हो निकलने का मनोबल लौट आया। ऐमे ही वक्त हमारे क्लब मे डॉक्टर बोले, जानते हैं मिस्टर वागची, आपके घर के पास उस दिन जिस लड़के का खून हुआ था, आपने बताया था न, वह वहां नहीं मरा, हजरत । उसे रास्ते से एक रिक्शावाले ने उठाकर अस्पताल में भरती करा दिया। मेरे ही एक दोस्त ने उसका ऑपरेशन किया। तीन दिन जिन्दा रहा, पता है ? स्टेटमेंट भी दिया था। लेकिन इतनी देर करके उसे अस्प- ताल ले जाया गया कि सून काफी वह गया था, और वह बच नहीं सका। स्टेटमेट दिया था ! छाती मे धन से चोट लगी। वह जब छुरा खाकर गिर रहा था, तब क्या वह मुझे देख पाया था ? मेरी शकल बताकर यह तो नहीं कहा कि एक आदमी ने तिमंजिले के बरामदे से खड़े-खड़े सब देखा

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गग्यिाहाट के पुल पर वे दोनों मैंने दफ्तर में कई लोगों को इस घटना को वात बतायी।। उनमें से हर एक से मुझे समर्थन मिला। पर्सनेल-मैनेजर दोले, आप कितने भाग्य- धान है कि उनमें से किसी ने आपको देखा नहीं, नहीं तो दो-एक दिन में अगर बदकिस्मती से कोई पहचान ले तो सन्देह कर ऐसा कह भी सकते हैं कि इस तरह की ही तरह के किसी आदमी को उस दिन बरामदे मे खड़े देखा था ! इसका मुझे खयाल ही नहीं आया था। ठीक तो है, इस तरह की आशंका बिलकुल बेबुनियाद भी नहीं हो सकती। हम लोगों ने, जिन्होंने लिखना-पढना थोड़ा सीख लिया है वे ही जानते है कि अपराध-विषयक विलायती उपन्यासो में इस तरह की नजीरें बहुत अधिक हैं। पहले खून को दवा देने के लिए खूनियो ने अनेक गवाहो या गवाह के सन्देह में बहुतो का खून किया है। अगाथा क्रिस्टी के उपन्यासो में इस तरह के तमाम अकाट्य उदाहरण भरे पड़े हैं। इसी कारण से मैंने पर्सनेल-मैनेजर के सन्देह को उड़ा देने का साहस नहीं किया, क्योकि वे भी पढाई-लिखाई बहुत करते हैं । उन्होंने अगाया क्रिस्टी को घोलकर पीआ हुआ है ! उन्होने ही सुझाव रखा, आपकी गाडी को ही शायद वे पहचानते हों, आप गाड़ी बदल लें। घर से निकलते और जाते वक्त बदल लिया करें। क्लब में एक गाडी से आयें, दूसरी गाड़ी से वापस जायें। और उन्होंने ही सारा बन्दोवस्त भी कर दिया । कई स्टॉफ-कारो में कई दिन घर लौटा । अनेक दिन टैक्सी मे। कई दिन आतंकित रहा। फिर अपनी गाडी लेकर ही निकलने का मनोबल लौट आया। ऐसे ही वक्त हमारे क्लब में डॉक्टर वोले, जानते है मिस्टर वागची, आपके घर के पास उस दिन जिस लड़के का खून हुआ था, आपने बताया था न, यह वहाँ नही मरा, हजरत । उसे रास्ते से एक रिक्शावाले ने उठाकर अस्पताल मे भरती करा दिया। मेरे ही एक दोस्त ने उसका ऑपरेशन किया। तीन दिन जिन्दा रहा, पता है ? स्टेटमेंट भी दिया था। लेकिन इतनी देर करके उसे अस्प- ताल ले जाया गया कि काफ़ी वह गया था, वह वच नहीं सका। स्टेटमेट दिया था ! छाती में धक से चोट लगी। वह जब छुरा खाकर गिर रहा था, तब क्या वह मुझे देख पाया था ? मेरी शकल बताकर यह तो नहीं कहा कि एक आदमी ने तिमंजिले के बरामदे से खडे-सडे सब देखा और

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के पुल पर दे दोनों 113 घटनास्थल पर ही न मार के, यह मुनकर मैंने उन्हें जो गाली दो, भी तो अन्तर ने निकली थी। इसीलिए मेरा'मैं इतना धुंबना या! ऐला संगयपूर्णही मेरा वित्र और चरित्र है। आत्मरक्षा के लिए नतकता-मूलक व्यवस्था करना और कापसा में विभाजन मोमारेखा रहा है, यह मुझे अभी ठीक से समझना जरूरी है। मैं तो इस बारे में दिलकुल ही अस्पष्ट हूँ। आप लोगों में वह सम्मावित आविष्कारक कौन है, आगे आइथे, उन्हें मैं नमस्कार करता हूं, क्योंकि वे ही इस युग के त्राता होंगे ! उनके निकट में नतजानु हूँगा, प्रार्थना करूंगा, दिखा दें, पहचनवा दें उस विभाजक मीमारेखा को, जिसके इन पार आत्मरक्षा हो और उस पार कापुरुषता। एक बार पहचान लेने पर फिर में इम सीमा को नहीं लागा। उस पार नहीं जाऊंगा। तभी आप देखेंगे कि हम ग्लानि की इम महामारी को निर्मूल कर सकेंगे, उसके प्रतिकार का मापन भी। हमारा विवेक रोगमुक्त होगा और हम नरक की यन्त्रणा से उद्धार पा जायेंगे! - ये बातें क्यों कह रहा हूं, वह भी सुनिये। अपने डॉक्टर के पीछे लगकर और पुलिस को कुछ खिला-पिलाकर लड़के के मृत्युकालीन वक्तव्य की नकल मैंने पा ली। मैं वेकार हो इतना डर गया था। मेरे सम्बन्ध में कोई भी उल्लंस उममे नही था। वह अपने आततायियों को भी नही पह- धान पाया था, क्योकि लड़का इस मुहल्ले का नहीं था। बह्नोई को फालिज हो गया था, यह ममाचार पाकर आया था कि कुछ दिनो यहां रहेगा। दीदी के घर में दूसरा कोई नहीं है, इसलिए। दवा खरीदने निकला था। उसके बाद आक्रमणकारी उस पर टूट पड़े। बिलकुल मामूली-सा किस्सा ! ऐसी वारदातों की खबरें अखबारों में रोज निकला करती हैं । जिस क्षण से यह जान लिया कि लडके ने किसी तरह से मुझे नहीं लपेटा है, तभी से देखिये, कसा आश्चर्य है कि मैं अपने को किस तरह अपराधी मान रहा हूँ ! सूनियों का शिकार, हत्यारे, और हत्या के साक्षी-यह तीन विन्दु

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कहा, रिवाहाट के पुल पर वे दोनों 115 'यह मैं हूँ'-दाची ने यह बात कहकर सबकी ओर देखा, उसके बाद बगल में बैठी केया की ओर देखा। उसके बाद गाड़ी को स्टार्ट करते- करते अपने-आप से मैं अब जरा क्लव जाऊँगा। केया से बोला, 'केया, चलो जरा क्लव घूम आयें।' कैया बोली, 'बहुत देर नही हो गयी है ?' गनी बोला, 'देर कहां, अभी दस ही तो हुए हैं।' उसके बाद गाड़ी मोड़ते-मोड़ते देखा कि भूतपूर्व मन्त्रियों, प्रशासकों और अफसरों ने अपनी-अपनी गाडी मे बैठकर थकान के भार से एक ही तरह में निढाल देह को गद्दियों पर फैला दिया है; यज्ञेश्वर और भुवन दरवाजे पर सई विशिष्ट अतिथियों को विदा कर रहे हैं । शाची ने एक हाथ से सिगरेट निकालकर ओठों में दवायी, लाइटर से उसे सुलगापा, उसके बाद कई चौ० आई०पी० लोगों से आँखें मिलने पर सिर हिलाकर विदा ली। उसके बाद बोला, 'अभी तो दस हैं, केया। रात तो अभी बहुत कम- सिन है, डालिंग!' - गरियाहाट के पुल पर वे दोनों वे बदन से बदन सटाकर खड़े थे । उमकी मुट्ठी में मीनू का हाथ था। पसीज रहा था। आस-पास पर आकाश में बहुत सौंदर्य है- देखने योग्य ! किन्तु इनका ध्यान उधर नही था। मीनू ने सोचा, तो अब सव समाप्त है। मीन फुसफुमाकर वोली, 'मुनो, वे आ नही रहे हैं। रुके हैं। हम लोगों को और वरावर देख रहे हैं।' उमने सोचा, हां, हमें देख रहे हैं । शायद मन-ही-मन तौल रहे हों। हम लोगों की लाश गायब करने में कितनी जगह की जरूरत पड़ेगी, शायद नाप-जोख कर रहे हो।

116 गरियाहाट के पुल पर वे दोनों वह वोला, 'जानती हो, मीनू, सहसा मन में एक बात उठी है।' मीनू वोली, 'क्या बात ?' वह बोला, 'तुम्हारे पिता के साथ हमारा एक पक्का समझौता हुआ मीनू ने सोचा, वे लोग क्या एक साथ भागकर हमला करेंगे? वह वोला, 'समझौता किस वारे में था, पता है ?' मीनू ने पूछा, 'किस बारे में ?' उसने सोचा, क्या मीनू सोच रही है कि मैं डर गया हूँ ? मीनू ने सोचा, अच्छा, वे लोग देर क्यों कर रहे हैं ? उन लोगों का क्या इससे और भी कुछ बुरा मतलब है ? वह वोला, 'तुम्हारे अपने पिता के घर जाने के बारे में, मैंने कहा था कि आपकी लड़की जितनी वार चाहे अपने पिता के घर जाये, मुझे कोई आपत्ति नहीं। पर आपको यह तो पता है सर, कि मैं कामकाजी आदमी ठहरा, मैं बार-बार वहाँ हाज़िर नहीं हो सकूँगा; मेरी तरक्क़ी रुक जायेगी । तुम्हारे बावा बोले-हाँ, हाँ, सो तो है ही । तुम्हारी उम्र तरक्की की है । तुम्हें ऑफ़िस से गैरहाजिरी तो नहीं चल सकती। मीनू जव आना चाहेगी, मुझसे कह देना, मैं ही उसे साथ ले आऊंगा।' मीनू बोली, 'लेकिन बाबा ने वरावर अपनी बात रखी।' वह बोला, 'मैंने भी। क्यों ? बरावर तुम्हें हावड़ा स्टेशन पर घड़ी के नीचे उनके हाथ में सौंपकर आता रहा या नहीं ? क्यों ? तुम तव कितनी जल्दी-जल्दी अपने वावा के घर जाया करती थीं ! मीनू बोली, 'बताओ तो, मेरा क्या कुसूर है ? उन दिनों तुम्हारे घर में पूरी जगह भी नहीं थी। दिन-रात लोग भरे रहते थे। एक पल के लिए तुम्हें अपने पास न पाती। एक क्षण के लिए अकेली नहीं मिल सकती थी। विलकुल वान्धव-हीन धाम ! असह्य हो जाने पर ही इसका प्रतिकार चाहती थी। तुम मुझे गलत समझते थे । दुनिया भर की वेकार बातें कहते 'फिरते थे।' । !

ए , के पुल पर वे दोनों 117 वह बोला, 'मैं कहता था-मीनू, नाओ, हम प्रेम के स्रोत में डुबकी 1 प्रेम की निधि से ऐश्वर्यवान हो उठे। इन सारी बातों को तुम बातें बताती हो, मोनू !' मीनू बोली, 'शायद बातें अच्छी हों। लेकिन बातों से मेरा क्या भला ता? बतलाओ तो?' वह बोला, 'मेरा एक अंक था। अंक इस तरह था : तुम-+-मैं- म। तुम्हारे और मेरे योग से एक ऐसा अशेप प्रेम मिलेगा कि उससे हमारे आत्मीय-बन्धुओं, को जितनी भी प्यार की कमी रही हो, सब पूरी हो जायेगी।' %3- मीनू बोली, 'तुम सिर्फ कहते थे-मीनू, स्वार्थ-त्याग करो।' वह उत्साहित होकर बोला, 'कहता था न !' मोनू बोली, 'मेरा तो कुछ था नही जिसका त्याग करती। सबको आराम से रखने के लिए, सबका मन पाने के लिए, सब-कुछ ही तो दे दिया था। मैं काम कर सकती थी, सवेरे से रात बोते तक, और उससे भी ज्यादा। लेकिन घर में और बहुत-से लोग भी तो थे । वे धीरे-धीरे मातसी होने लगे। उसके बाद वे समझने लगे कि कोई काम न करना, और मुझसे ही सब काम करवाना—यह सब उनका अधिकार है । केवल में ही क्षीण होने लगी। अच्छा, तुम्हारा अंक मिल गया ?' वह शान्त निश्चल भाव से बोला, 'नही मीनू, कही कुछ गड़बडी हो गयी थी।' मीनू बोली, 'तुम्हारे-हमारे योगफल मे अभी भी प्यार नहीं मिलता ?' वह बोला, 'यह जटिल भग्नांश का अंक है, मीनू । सीढी टूटने का अंक । जल्दी मिलाना मुश्किल है । धीरज के साथ हिसाब करते रहने के अलावा जवाव निकालने का कोई सरल तरीका नही है। एक-एक सीढ़ी चढना होगा । मिलाकर देखना पड़ेगा कि अंक गलत है, या तरीका गलत 116 गरियाहाट के पुल पर वे दोनों वह बोला, 'जानती हो, मीनू, सहसा मन में एक बात उठी है।' मीनू बोली, 'क्या बात ?' वह वोला, 'तुम्हारे पिता के साथ हमारा एक पक्का समझौता हुआ - मीनू ने सोचा, वे लोग क्या एक साथ भागकर हमला करेंगे ? वह वोला, 'समझौता किस वारे में था, पता है ?' मीनू ने पूछा, 'किस बारे में ? उसने सोचा, क्या मीनू सोच रही है कि मैं डर गया हूं? मीनू ने सोचा, अच्छा, वे लोग देर क्यों कर रहे हैं ? उन लोगों का क्या इससे और भी कुछ बुरा मतलव है ? . वह वोला, 'तुम्हारे अपने पिता के घर जाने के बारे में, मैंने कहा था कि आपकी लड़की जितनी वार चाहे अपने पिता के घर जाये, मुझे कोई आपत्ति नहीं। पर आपको यह तो पता है सर, कि मैं कामकाजी आदमी ठहरा, मैं बार-बार वहाँ हाज़िर नहीं हो सकूँगा; मेरी तरक्की रुक जायेगी । तुम्हारे बावा बोले-हाँ, हाँ, सो तो है ही। तुम्हारी उम्र तरक्की की है । तुम्हें ऑफ़िस से गैरहाज़िरी तो नहीं चल सकती। मीनू जब आना चाहेगी, मुझसे कह देना, मैं ही उसे साथ ले आऊंगा।' मीनू बोली, 'लेकिन वावा ने वरावर अपनी बात रखी।' वह वोला, 'मैंने भी। क्यों ? वरावर तुम्हें हावड़ा स्टेशन पर घड़ी के नीचे उनके हाथ में सौंपकर आता रहा या नहीं ? क्यों ? तुम तव कितनी जल्दी-जल्दी अपने बाबा के घर जाया करती थीं! मीनू बोली, 'बताओ तो, मेरा क्या कुसूर है ? उन दिनों तुम्हारे घर में पूरी जगह भी नहीं थी। दिन-रात लोग भरे रहते थे। एक पल के लिए तुम्हें अपने पास न पाती। एक क्षण के लिए अकेली नहीं मिल सकती थी। विलकुल बान्धव-हीन धाम ! असह्य हो जाने पर ही इसका प्रतिकार चाहती थी। तुम मुझे ग़लत समझते थे । दुनिया भर की बेकार बातें कहते फिरते थे।'

गरियाहाट के पुल पर वे दोनों 119 वह फुसफुमाकर बोला, 'मीनू, सुनो, इस मन्तिम समय एक बात कह दूं-एकदम कलेजे के सून से लिखी हुई।' .. एक अत्यन्त करुण नाटक का अन्तिम दृश्य पत्नी ने अस्त-व्यस्त वेग में आकर यध्य-भूमि में प्रवेश किया। पति वध्य- मंच पर बंधा है, जल्लाद बड़ी-सी तलवार कन्धे पर रसे चहल-दमी कर रहा है। पली (अत्यन्त कातर होकर) : नाय ! प्राणेश्वर !! जीवन- वल्लभ!!! तो विदा ! पति (धे गले से) : हृदयेश्वरी! प्राणाधिके !! प्रियतमे !!! तो विदा ! पत्नी : हाय प्राणेश्वर ! (मूठित हो जाती है) पति : अपि पतिव्रते ! क्षमा करो। अपने इस पाखंडी पति को क्षमा करो। मैं तुम्हें मुखी न रस सफा, मृत्यु भी इम अफमोम को मेरे मन में न मिटा सकेगी। पत्नी (सहाक से उछलती है) : अरे, ऐमा मत कहो, मत कहो। (रोते-रोते) हुई, मैं, हूं, बहुत सुखो यो, हूँ-ॐ। पति : तुमने बहुत सहनशीलता से सेवा की । और मैंने उपेक्षा और अनादर से तुम्हारे कोमल प्राणी को चोट पहुंचायो ! पली : नहीं, नहीं, मैं ही यपराधी हूँ ! घमंड मे, अविचार मे तुम्हारी जिन्दगी को मुमीवत बना दिया। मैंने, मैंने, मैंने ! पति : तुमने मेरे परो पर अंजलि देने के लिए प्रेमस्थली में कितने पुष्प चयन पिये, और मैं हाय...! (छाती पीटता है) पत्नी : ऐमा मत कहो। मैं और न मह सकेंगी। हाय मैं अभागिन, मेरे प्राण कितने कठोर हैं ! अभी भी नहीं निकलते। प्राणनाय ! जीवन- सर्वस्व ! आकंठ पिपामा लिये तुम कितने दिन मेरे पाम भागे-मागे आये और मैंने मूढ तुच्छ यभिमान में अविनय से तुम्हें लौटा दिया । मेरा अप- राध क्षमा के योग्य नहीं है। ।

118
गरियाहाट के पुल पर वे दोनों
मीन का छोटा-सा प्रश्न
अपने पति को, विशेष रूप से उनकी बात-चीत को, मैं कभी-कभी समझ
नहीं पाती। उसका कारण शायद यह हो कि मैं खास लिखना-पढ़ना कुछ
नहीं जानती। भापा को सजा-सँवारकर बात भी नहीं कर सकती। इस
समय ये मेरा हाथ अपने हाथ में पकड़े हुए हैं। मुझे लग रहा है कि किसी
कठोर पहाड़ से लगी खड़ी हूं। उन्होंने जो उत्तर पाना चाहा है, क्या वह
अव भी उनके हाथ की मुट्ठी में नहीं है ? क्या पता
?
और वे भी हिले
सहमा छायाएँ चलायमान हुई। गरियाहाट पुल के ठीक सिर पर जो
आसमान है, उसमें प्रकाश बुझ गया। मीनू ने तिरछी नज़र से देखा----
छायाएं बढ़ी आ रही हैं।
मीनू मन-ही-मन बोली : पुल की रेलिंग पर टिककर खड़े रहो ।
उसने मन-ही-मन कहा : क्यों ?
मीनू (मन-ही-मन) : वैसा होने से डंडे सिर के पीछे से मारने में
उन्हें सुविधा होगी।
वह (मन-ही-मन) : यह तो है ।
वह और मीनू रेलिंग पर टिककर खड़े हो गये।
वह (मन-ही-मन) : इस तरह से गला उनके सामने कर देना क्या
ठीक हुआ
?
मीनू (मन-ही-मन) : ठीक समझ में नहीं आता, तो क्या वे लोग
तुम्हारे, माने, हमारे लिए कानून-कायदे का उल्लंघन करते ?
वह (मन-ही-मन) : कानून-कायदे ? यज्ञेश्वर ने तो कुछ भी नहीं
तोड़ा। लेकिन क्या उससे उसकी क्रांतिकारी भावना में कमी आयी ?
मीनू (मन-ही-मन) : क्या पता!

गरियाहाट ये पुल पर ये दोनों
12
वह फुसफुमाकर बोला, 'मीन, एगी, न ग .
--एकदम कलेजे के सून गे निती।'
एक अत्यन्त फरण नाटक का प्रतिमाय
पत्नी ने अस्त-व्यस्त वेग में यापर यध्य ममि मप्र (Mam.
मंच पर बंधा है, जल्लाद वही-गी तयार पानामा
कर रहा है।
पत्नी (अत्यन्त कातर होकर) : नाय ! प्राणया पाना
वल्सन!!1 नो विदा!
पति (धे गले मे) हृदयश्वरी! प्रागापिक !! famin 11ी
विदा!
पत्नी : हार मापेम्बर ! (मनि होती है)
पनि: अभिनित मार्गानेsealthy
करो। नुन्हें मुदा न ममा, marimhirvain
ननिमी

गरियाहाट के पुल पर वे.दोना
त : प्रिये, कहो, तुमने क्षमा कर दिया।
नी : प्रियतम, अपराधी तो मैं हूँ। कहो, तुमने क्षमा किया।
पति : प्राणेश्वरी, कहो, तुम मुझे प्यार करती हो ।
पत्नी: प्राणेश्वर !
पति : कहो, कहो, तुम सुख में थीं।
पत्नी (अत्यन्त आवेग के साथ) : हृदय के राजा !
पति : कहो, कहो, प्राणाधिके, मैंने तुम्हें कष्ट नहीं दिया। उपेक्षा
ही की।
पत्नी : तुम्हारे न रहने से मेरा संसार सूना हो जायेगा, प्रियतम !
पति : ओह, हो, कैसा विचित्र सुख है ! फिर जिन्दा रहने की मेरी
इच्छा हो रही है।
पत्नी (आश्चर्य का बहुत बड़ा आघात सँभालकर) : ऐं ! क्यों ?
पति (उत्साह में भरकर) : तुम और मैं-हम दोनों प्रेम की अनन्त
सुख-शया पर शयन करेंगे।
पत्नी : किन्तु अगर तुम फिर मेरी उपेक्षा करो, मैं तुमको अविनय के
साथ लौटा दूं, छोटी-छोटी बातों पर फिर अगर झगड़ा-झंझट हो? पहले
समझ लो।
पति : वह तो है । तो विदा, प्रियतमे ! जल्लाद, आओ।
पत्नी (शोक में अधीर होकर) : विदा, प्राणवल्लभ ! ऊँऊ-ॐ।
मीन को कई जरूरी उपदेश
वह बोला, 'मीनू, डरना मत । वे तुमसे कुछ न कहेंगे।'
मीनू बहुत डर गयी थी। वोली, 'किस तरह मालूम हुआ?'
वह बोला, 'क्यों, अखवार पढ़कर । वे लोग औरतों को वहुत
पीटते नहीं हैं । जो कह रहा हूँ, सुनो। तुम्हारे पास जो रुपये हैं, उनसे
दिन चल जायेगा न?'
मीनू बोली, 'रुपया कहाँ है ? इस महीने दवा-दारू में जो

121 के पुल पर वे दोनों खर्च हुआ ? तुम तो कोई हिसाव रखते नहीं। उसके बाद खुद ही तो देरों रुपये ले लिये। वह बोला, 'मैं हिसाव नहीं चाहता। तुम्हारे पास जो कुछ रुपया है, उससे दस दिन के करीव चल जायेगा? राशन है, बाजार-आजार है ?' मीनू हिसाव लगाकर दोली, 'दम दिन? हां, उतना चल सकता है, क्योंकि मछली तो कई दिन खरीदनी नहीं है।' वह बोला, 'हां, मछली के दाम तो बढ़त चढ़ गई हैं !' मोनू धोली, 'तो जो कुछ है उसमें दो गगन; कल ही तो एक रामन लेना होगा और दस दिनों का सौदा हो वादगा।' वह थोड़ा निश्चिन्त हया । बोला, 'दन । नौ फिर कोई दाम गिर नहीं। अब जो बता रहा हूँ दह याद रहो। कल ही बाद यह दबर अखबार में निकल पारंगी। इसलिए मदर देने के लिए उन्हें पोस्टकार्ड खरीदने में पैमा वरदाद नहीं करना पडेगा। हमारे देशवर में कर्मचारी लोगों का एक फह है-पाट फंड। तुम्हें गंद चार दिनों में ही मिल जायेंगे। हजार के करीब मिलेगा पांच मो के दबाव में सब काम हो जायेगा, ममन।' मीन बोली, 'पाट का हवं उदारता है.' वह बोला, 'इन बुद्ध, घाट-मई र दर और बह रहा है? दह मझेम्वर, गनी-दही प्रकार कर दिन में ही मठ शरीर को निरलदानालाघाट पलों की माला, मगर, सद करड़ा-दहीनद लेकर जान देखनाबान बॉक्रिम में मैं ही तो पहले मद्दन नहायाना हा पहला होने का पूरा लाम में पा जाऊँगा! टम लिए दुन् विन्दा नहीं कन्नी होगी । मेरा जो पद है, मनं मग्न पर डरत्राय दिन में सादा की छुट्टी होने की बात नहीं है। दिमी दिनार के मुनिका ने मुझकरके जनरल मैनेजर तक एक दिन की पूरी ष्ट्टी का नियम है ।जिर में मजदूर-यूनियन का एक पदाधिकारी हूँ, यज्ञेश्या मेरा मामला हाय में नेगा, ऐसा लगता है। यह भी हो सकता है कि पूरी छुट्टी मंजूर कराने । देता होने पर सवको ही कुछ अतिरिक्त पपया मिर 1 .. गरियाहाट के पुल पर वे दोनों - किन यह लाभ मुझे मिलेगा या नहीं, यह पक्का नहीं है । तुम स्त देकर देख सकती हो। अच्छा, वीमे की पालिसियां तो ठीक से बोली, 'लेकिन एक तो मेरे पास नहीं है।' बोला, 'वह बन्धक रखी है। दूसरी पालिसियों के बंडलों के साथ की रसीद है । परसों ही खेतू को बुलाकर उसका इन्तजाम झटपट लना। एक बात याद रखना, इस तरह की घटनाओं से या अकाल- का एक फ़ायदा होता है। लोगों की सहानुभूति बहुत जल्दी मिलती इनके हाथों मरने पर, मैं देखता हूं, आजकल परस्पर भाई-चारे के व बहुत जल्द जाग उठते हैं । तुम्हारा कर्तव्य है-भाई-चारे के इन भावं ताजा रहते-रहते अपना सारा काम पूरा कर लेना ! लेकिन ये वह इनों तक ताज़ा नहीं रहते । तुम्हें बहुत समय मिलेगा तब तक जब तक के हमारे ऑफ़िस का दूसरा आदमी न मरे !' मीनू बोली, 'तुमने तो मर जाने के बाद से क्या करना होगा, वह सब बता दिया । लेकिन पुलिस के मुर्दाघर में जाओगे कैसे, यह तो बतलाया नहीं।' - । वह बोला, 'इतना व्यौरा जाने विना भी तुम्हारा काम चल जायेगा। वहां मुझे पुलिस की गाड़ी या ऐंबुलेंस में पहुंचा जायेगा । हमारा कोई खर्च नहीं होगा। उससे तो बीमारी भोगकर स्वाभाविक मृत्यु होने से ही तुम्हारे सिर पर फ़ालतू खर्च का बोझ पड़ता! अव सुनो मीन, मन में ये बातें फिर से दुहरा लो : (एक) घाट फंड का रुपया वसूल करना, (दो) कम्पनी से पिछले महीने का वेतन वसूल करना, (तीन) कोऑपरेटिव से मेरे शेयर का रुपया, सूद और क़र्ज़ लेना, (चार) प्रॉविडेंट फंड और ग्रेच्युइटी का रुपया वसूल करना, और (पांच) वीमे का रुपया वसूल करना । यह पांच-सूत्री कार्य तुम्हें करना होंगे। जीवन बीमा खतरे से दुर्घटना का भी लिया हुआ है । इसलिए दुगुना रुपया मिलेगा। समझी खबरदार, यह सारा रुपया पाकर घर-वार में कुछ मत लगाना। स गरियाहाट के पुल पर वे दोनो "123 दो बैंकों में फिक्स्ड डिपॉजिट में रख देना। विधवा का काम उसी से चल जायेगा। समझी? बाल-बच्चों के पदाने-लिखाने के काम में बेकार पैसा नष्ट करने न जाना। समझी?' मीनू ने अत्यन्त आज्ञाकारिणी पतिव्रता की तरह सिर हिलाकर उत्तर दिया। उसके बाद चारों ओर आंख फाड़कर देखा, गरियाहाट पुल एकदम सूना हो गया था। एक खाली बस, जिस पर 'गैरेज' लिखा था, हड़हड़ाती हुई आयी और चली गयी। कोई-कोई माल ढोने वाली लॉरियां शोर मचाती इधर-उधर होती निकली जा रही थी। मीनू के मन में उठा कि खाते के पन्नों में अब तक बहुत-सी तसवीरें-वस, लॉरी, प्राइवेट, आदमी, टैक्सी-एक साथ खिंच रही हैं । किसने उसे रवड से मिटाकर इतनी देर में इस हालत में ला पटका है, जहां केवल मीनू, उसका पति, और वे लोग है । और कोई भी नहीं है। इतनी देर मे मीनू को एक जरूरी बात याद आ गयी। झटपट वोल उठी, 'अब वे करीब-करीव आ ही पहुंचे है। हाँ जी, इतना किराया देकर इस घर में रह सकते हैं ? वह बोला, 'देखो, असल काम तो भूल ही गया था। यह तो सरकारी मकान है। शची के नाम पर यह मकान लिया हुआ है। घर का आखिर तक खयाल नही रहा। मुझसे कहा था-तू रहेगा, तो आखिर तक मत छोडना । इसी से हम उसमें चले गये । उसी के नाम से किराया है। उसके बाद पता तो है, हम में परस्पर बहुत-सी आपसदारी हो गयो । एक बार अलगाव भी हो गया था। लेकिन जानती हो मीनू, कलकत्ता मे जिगरी दोस्त भी छूटना बरदारत हो सकता है, लेकिन मकान नहीं छोडा जा सकता! इसीलिए शची को छोड़ देना पडा, शची का मकान नही छोडा। खबरदार ! तुम यह मकान मत छोड़ना । गवर्नमेंट का मकान है, किराया देने का जिम्मा भले आदमी का नहीं रहता। तबीयत के मुताविक बाकी लगाते रहेंगे। फिर मकान शची के नाम है । और जानती नो हो, उसका दिल बहुत कोमल है। उसके बाद आरमालानि को छूत का रोग टम हमेशा 124 गरियाहाट के पुल पर वे दोनों लगा रहता है। हमें, माने तुमको इसका फायदा पूरी तरह से उठाना होगा। जैसे : (एक) तुम बीच-बीच में शची के पास जाओगी, देखोगी कि वह तुम्हारी सहायता करने के लिए व्याकुल हो जायेगा, किन्तु मर्यादा के साथ और उसके दिल को बहुत चोट न पहुंचाकर तुम उसकी सहायता अस्वीकार कर दोगी; (दो) अपनी मुलाकात के वक्त वातों-ही-बातों में अच्छे अन्दाज़ में उसे ऐसा इशारा दोगी कि जिससे वह समझ सके कि उसके प्रनि दवा अभिमान कलेजे में लेकर ही मैं अकाल मारा गया। इससे शची के मन में आत्मग्लानि उत्पन्न करने का एक अनुकूल परिवेश तैयार हो जायेगा। शची प्रायश्चित-स्वरूप जीवन-भर तुम्हारा घर का बकाया किराया देकर आत्मग्लानि से छूटने का निरन्तर सुअवसर पाने को उत्सुक रहेगा। देखोगी कि वह क्रमशः स्वस्थ हो जायेगा। यह तो हुआ शची के स्वभाव का अच्छा पक्ष । फिर मालूम तो है कि मानव-समाज में केवल किसी के अच्छे पक्ष पर भरोसा रखने से ही ज़िन्दगी नहीं चलती। एक दिन गायद शची के इस अच्छे स्वभाव पर ही वितृष्णा जाग उठे ! तुम्हारा बाकी मकान का किराया देने में उसे ऊब आ सकती है। तव ? उस ओर भी तुम्हें ध्यान रखना पड़ेगा। इसीलिए यज्ञेश्वर के साथ भी तुम्हें घनिष्ठता का नाता बनाये रखना पड़ेगा। तुम यज्ञेश्वर को 'यज्ञेश्वर देवर' बना लेना और उसके साथ तुम्हारे, यानी हमारे नावालिगों के भविष्य को लेकर हमेशा चर्चा करना । इसमें यज्ञेश्वर का चूंकि अपना कोई दायित्व नहीं है, इसके कारण हैं; (एक) नावालिग़ लोग अभी तक काफ़ी छोटे हैं; (दो) जो नकदी रकम मैं मोटे तौर पर रखे जा रहा हूं, यज्ञेश्वर को मालूम है, कि उसके द्वारा उनका भरण-पोपण कर कुछ दिनों के लिए निर्वाह होगा। इसलिए वह हमारे नावालिगों के भविष्य शीर्पक तत्व के प्रति सदा ही उत्साह के साथ काम करेगा। और शची अर्थात शची का बुरा पक्ष जिस क्षण सोचे कि यज्ञेश्वर तुम्हारे तथा हमारे नाबालिगों का पृष्ट-पोषक है, उसी क्षण से वह (उसका बुरा पक्ष) अनावश्यक झमेलों से रिहाई पाने के महसूल के रूप में तुम्हारे वक़ाया किराये का भुगतान कर देगा । क्योंकि हाल का जनरल मैनेजर शची उर्फ, जी० एम०, किसी सामान्य कारण से यूनियन के नेता यज्ञेश्वर का विराग-भाजन होना .

125 हाट के पुल पर वे दोनो : ही न चाहेगा। याची तव अपने मन को हमेशा समभायेगा कि अपने स्वर्गीय (भूतपूर्व) मित्र के परिवार को अन्तःप्रेरणा से ही सहारा चला आया है-उसकी आत्मा महान और परमार्थी है यह न्त्विना उसे स्वस्थ रखेगी। मानव-समाज में, मनुष्य-मनुष्य में, मीनू, ईचारे की भावना इसी तरह पैदा होती है ! जो कोई इस तत्व को है, समाज उसकी ओर से कभी मुंह नही मोडता।' शोक-यात्रा का विवरण की मृतदेह लेकर जुलूस चितरंजन एवेन्यू के मार्ग से विनय-बादल-दिनेश स्क्वायर पर मोहता इंडस्ट्रीज के मुख्य कार्यालय पर जव पहुंचा तो सारे प्रतिष्ठान में गहरे शोक की छाया व्याप्त हो गयी। मोहता इंडस्ट्रीज नामांकित डोजन से चलने वाली लॉरी फ्लो की माला से मजायी गयी थी-उससे एक ऐसा अलौकिक रूप निकल आया था कि लग रहा था, जैसे अभी-अभी स्वर्ग से पुष्पक-रथ उतर माया हो ! लॉरी पर एक नया पलंग फूल-मालाओं से विशेष रूप से शोभित हो रहा था । पलंग पर उजली चादर से आच्छादित उसका प्राणहीन, दिव्य शरीर रखा हुआ था। सहकर्मी लोगो ने आपस मे थामकर उसकी निस्पन्द देह के साथ पलग उतार लिया; उसके बाद कुछ समय उसके शरीर को दफ्तर के हॉल में रखा गया। सारे विभागों के कर्मचारी हॉल में जमा होकर गम्भीर मुद्रा मे उसे अन्तिम एक वार देख आये। प्रतिष्ठान के मैनेजिंग-डायरेक्टर, जनरल-मैनेजर,कर्मचारी- संगठन के प्रधान, अफसरो को परिपद् के सामान्य अध्यक्ष, चतुर्थ श्रेणी और सफाई मजदूरों की कांग्रेस के अस्थायी सभापति की ओर से शव के ऊपर पुष्प-स्तवक और मालाएं अपित की गयी। मृत के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने के उद्देश्य से एक संक्षिप्त भाषण मे वर्कसं-यूनियन के प्रधान यज्ञेश्वर बाबू बोले, "किसी भी राजनीतिक दल के साथ कोई सम्बन्ध न रखने पर भी हमारे स्वर्गीय सहकर्मी और घनिष्ठ मित्र अत्यन्त प्रगतिशील और समाज के प्रति जागरूक व्यक्ति थे । माक्र्स- वाद के सम्बन्ध मे ऐसा अगाध पांडित्य बहुत कम लोगों में मैंने देखा है।

126 गरियाहाट के पुल पर वे दोनों उनके इस आकस्मिक निधन से हमने एक मित्र खो दिया, और हमारे संगठन ने एक सुधी परामर्शदाता और कर्मठ व्यक्ति को।' अफ़सरों की परिपद् के मुखिया बोले, 'हम यही जानते थे कि वह यूनियन के भी एक कार्यकर्ता थे। इसके सिवा हमारी वरावर यह धारणा रही कि वे केवल हमारे ही साथ थे। वे जिस प्रकार प्रचार की ओर से निष्पक्ष और उदार-चेता थे, यही उसका सर्वोत्तम प्रमाण है।' नये जनरल-मैनेजर----उन्होंने उसी दिन कार्यभार संभाला था-इतने अभिभूत हो गये कि एक बात भी न कह सके। मैनेजिंग डायरेक्टर मोहता ने बताया कि इस प्रतिष्ठान में कोई भी अभी तक इस तरह नहीं मारा गया। इस कारण से हम सब ही एक वेचैनी से आक्रान्त हो रहे हैं। उन्होंने दधीचि की तरह अपना बलिदान देकर हम सबकी वेचैनी दूर की। उद्योग के मालिक आज के दिन की पूरी ही छुट्टी देना चाह रहे थे, लेकिन सव संगठनों ने एकमत होकर यही उचित माना कि आज आधे दिन की छुट्टी की घोपणा हो, और दूसरे किसी दिन को शहीद-दिवस के रूप में मनाकर ओवरटाइम काम किया जाये ! ऐसा होने से मृतक के प्रति पूर्ण सम्मान व्यक्त होगा। मैनेजमेंट ने वह मंजूर कर लिया है।' उसकी मृतदेह फिर सुसज्जित लॉरी पर रखी गयी। इसके बाद केउड़ातला श्मशान में विजली के दाह-गृह के महासमारोह से उसकी अन्त्येष्टि क्रिया सम्पन्न हुई। मृत्यु के समय वे अपनी पत्नी, पुत्र-पुत्री, पिता- माता, भाई-वहिन और कितने ही आत्मीय-मित्रों को छोड़ गये ! श्मशान में उद्योग के प्रबन्धकों की ओर से उनके प्रति, उनके परिवार वालों के प्रति घोषणा की : स्वर्गीय के लिए प्राप्य सम्मान के रूप में ओवरटाइम बेनिफिट के साथ एक महीने का एकस्ट्रा वेतन मंजूर हुआ है ! ? उसी रात क्या हुआ पहले नरुण के आगे बढ़ते ही मीन ने उसे प्राय: रोक रखा। उसने मीनू को फरीव-कीव खीचकर हटा दिया । लड़का अब उसके आमने-मामने खड़ा हो गया। उसके शरीर में एक ठंडी बिजली की-मी मिहरन दौड़ गयी।

गरियाहाट के पुल पर वे दोनों
127
लडका बोला, 'दादा, दियासलाई है ?'
दियासलाई क्यों मांग रहा है ? ऐसी बात तो नही थी। पहले तो
सिर पर डंडे की चोट पड़ेगी ! यही है न, मीनू ? दियासलाई क्यों मांग
रहा है ? तो क्या यह कोई इशारा है ? पूर्वी बंगाल में नाव से नाव भिड़ा-
कर डाकू लोग जिस तरह कहते हैं, आग लग गयी है भाई ।
लड़का फिर बोला, 'ओ दादा, सुन रहे हैं, दियासलाई है ?'
वह बोला, 'है।'
लड़का बोला, 'देंगे?'
.
यह भी हो सकता है कि लड़का मचमुच दियासलाई ही चाहता हो ।
यज्ञेश्वर बोला, जानती हो, आजकल ऐसा हुआ है कि राह मे चार छायाएँ
इकट्ठी हुई हैं, यह देखकर ही नर्वस हो जाता हूं। यज्ञेश्वर, जिसके अपने
हाथ मे ही पार्टी के असंख्य लड़के हैं, उसी ने एक दिन यह बात कही थी।
उसने दियासलाई निकालकर लड़के के हाथ में दे दी।
लड़के ने सिगरेट सुलगायी। उसके बाद चिल्लाकर बोला, 'अरे, है
भाई, है, आओ।'
मीनू के बदन में कम्पन शुरू हो गया ।
अचानक नम्बर नौ की एक बस आ गयी।
वह बोला, 'मीनू, बस । अरे, रोक के !'
मीनू गला फाड़कर चीख उठी, 'रोक के !'
वस नही रुकी।
लड़का इन लोगो से बोला, 'वस तो इस पुल पर रुकती।
दादा।'

गरियाहाट के पुल पर वे दोनों और लड़का बढ़ आया। बोला, 'जव दियासलाई है तो क्या दो- रट नहीं हैं ?' लड़का और बढ़ आया। नू चिल्ला उठी, 'ऐ ए टैक्सी ! टै-क-सी !' ह चिल्लाया, 'ट-क्-सी ! टै-क्-सी !' टक्सी धर्र से निकल गयी। . - - लड़का बोला, "सिगरेट है, दादा?' वह बोला, 'सिगरेट ? हां, है।' लड़का वोला, 'क्यों बे, कहा था न ?' एक लड़का बोला, 'दादा, एक देंगे?' वह बोला, 'लीजिये न, पीजिये।' उसने सिगरेट निकालकर दी। लड़का बोला, 'कहाँ जायेंगे, दादा?' एक-दूसरे लड़के ने सिगरेट सुलगायी। वोला, 'क्यों वे, चलेगा नहीं?' वह बोला, 'चिड़िया मोड़।' एक और लड़का आगे आया। वोला, 'कौन-सी सिगरेट है वे ?' एक दूसरा बोला, 'चिड़िया मोड़ ?' एक और वोला, 'चारमीनार !' एक दूसरा बोला, 'चारमीनार ? धत् !' एक और बोला, 'चिड़िया मोड़ जायेंगे? इतनी रात को? क्या वात है ?' एक और बोला, 'तो पीता क्यों नहीं ?' वह वोला, 'वात कुछ नहीं है। हम वहां रहते हैं।' एक और बोला, 'कहा कि नहीं पिऊँगा। दूर से दादा को वहुत समझा था। सोचा था, कुछ अच्छा मिलेगा।' एक और बोला, 'चिड़िया मोड़ पर रहते हैं ? तो यहां क्या कर है हैं ?' मीनू बोली, 'निमन्त्रण पर आये थे।'

स्याहाट के पुल पर वे दोनों
129
--
एक और बोला, 'सव साले नवाब हैं ! पता है, आजकल पारमीनार
-बड़े आदमी पीते हैं।'
एक और बोला, 'अरे, उसकी वात छोडोर बस हेकड़ी-ही-हेकही है।'
एक और वोला, निमन्त्रण पर बाय थे। उस चिड़िया मोड़ से यहाँ!'
एक और बोला, 'क्या शौक है, बाप रे बाप!'
दूसरा बोला, 'पागल हुआ है।'
एक और बोला,"हिम्मत है, भाई।'
दूसरा बोला, 'छोड़ भाई, दादा के लिए एक चारमीनार छोड़ दे।'
मीनू बोली, 'अरे, वह टैक्सी।टे-क-सी!"
टैक्सी जरा धीमी भी नहीं हुई।
एक मोर बोला,'यहां खड़े-खड़े टक्सो-टैक्सी करने पर कोई रोकेगा ?'
एक दूसरा बोला, "इस पुल पर खड़े-खड़े दोनों अब तक क्या करते
बह भौंचक्का होकर बोला, 'क्या कर रहे थे अब तक?'
एक और बोला, 'हां-हां इतनी देर से देख रहे हैं हम । एक बार
लिंग पकड़कर झुक गये थे। एक बार दोदो को पकड़कर खीचतान कर
९ थे।
वह बड़े ताज्जुब में आकर बोला, 'हम ?'
एक और बोला, 'टैक्सी, टेक्सी! मरे यहां खड़े चिल्ल-पों करने से कोई
साला ड्राइवर न तो पुकार मुनगा और न गाड़ी रोकेगा।'
एक और लड़का मीनू की आवाज की नकल करके चिल्लाया, 'है-क
एक दूसरा वोला, 'अवे साले चुप हामीपन करेगा तो एक घर
हरे का नक्शा बदल दूंगा।'
एक और वोला, 'एक बार माप रेसिंग पर जाकर मुके, दो
रेलिंग पर जाकर झुकी। हमने देखा ! काका मंगा या

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बिहार के पुल पर दोनो
ने जी भरकर सांस ली। इसमें इतना सा ही-११५५१५९६
बात है?"
-
वह डर गया। मीन को गया है। पी 00.
देगो । उसने पुकारा, गो, भुप हो ।'
मोनू धोती, 'मयों शुग है, ह fair at 110, Hindi
तुम उनका मुंह कर रहे हो ? अधार सर २३ ।। {{{{{{4} { ४९
रहता तो भाग नाही परामर HTI AM Aft minitih.
चेहरे मे मेरे यिनू का पहरा सिता tihanti fift al.1
हमारा विलू अगर जिन्दा हता, रहन भाग 1
तरह बदतमीजी करता, जय भूष 2 TRY | inhinyt
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मात्ममपंग करने की बात भी। मामा, HEALTian
का पानी कहाँ गिरे, धान | HI144pnhat
'हायवा!'

गरियाहाट के पुल पर वे दोनों एक लड़का भागा-भागा आया। वे लोग चिल्लाते हुए उसकी तरफ़ गे। लड़का हॉफ्ते-हांफते बोला, 'अरे वाप रे, कैसा कंजूस, कहाँ छिपाकर रखा, साला ढूंढ़ने से नहीं मिला। तक़दीर से दो पकेट शाम को अलग 'रख दिये थे। यह ले।' वे लोग फिर शोर करने लगे। पकेट खोलकर सवने एक-एक सिगरेट मुंह में लगायी। जलती हुई दियासलाई की तीली संवके मुह के आगे 'घूमने लगी। उसके बाद शोर मचाकर जाते-जाते वे एक जगह थमककर खड़े हो गये। उन लोगों ने एक टैक्सी को शोर कर घेर लिया था। चिल्ला रहे थे, दनादन अपना बदन पीट रहे थे। सहसा एक लड़का भागा-भागा उनके पास आया। हांफते-हांफते बोला, 'आइये दीदी, आइये, एक साले को...माने एक टैक्सी पकड़ ली मीनू ने उसकी ओर देखा । उसने भी मीनू की ओर । उसके बाद मीनू उससे बोली, 'तुम फिर हड़बड़ाकर भागना मन वीमार मादमी। गिर-गिरा पड़ोगे !'

उपसंहार मैं मीनू के इस तरह के उजवकपन का समर्थन बिलकुल न कर सका। लड़के हत्यारे नहीं हैं, गोकि हम पहले यह न समझ सके, इसीलिए भाग्य से बच गये बिलकुल भाग्यवश ! ये लोग सूनी नहीं हैं, लेकिन अगर होते ! मीनू-कैसी मुश्किल है यह, उसे समझाना कठिन है । तर्क उसके दिमाग में बिलकुल नही बैठता । मीनू की धारणा अभी भी यही धारणा है कि कौन हत्यारा है और कौन हत्यारा नहीं है, यह शकल देखते ही समझ में आ जाता है । और तो सब वेकार बातें हैं । औरतों के लिए ही यह बात कहना सम्भव है । या, वह दूसरे युग की बात है। आज के कलकत्ता में ग्यारह बरस का लडका मुंह पर शिकन लाये बिना छुरी चला देता है। एक बार भी पलक नहीं झपकाता! पन्द्रह-सोलह वर्ष की किशोरी फन्दा डालकर शिकार फांसती है; वर्ग के शत्रु के गले की नली दो टुकड़े कर देने के लिए जोश के साथ छुरी बढा देती है। यहां कौन खूनी है और कौन खूनी नहीं है--यह शकल देखकर समझा जाये, ऐसा ही आसान है क्या? महाशय, मैं तर्कशास्त्र का अनुसरण करके चलता हूँ। इसीलिए आज के कलकत्ता में मेरे निकट सब खूनी हैं । हो सकता है, कोई खुद हत्या करे, और नहीं तो किसी-न-किसी तरह किसी दूसरे हत्यारे की सहायता करे। इसी कारण से मैं सब पर सन्देह करता हूं, सब पर। यहां तक कि अपने पर भी । और हमेशा होशियार रहता हूँ, क्यों कि यह बात तो सभी जानते हैं कि चमत्कार वार-बार नही दोहराये जाते !

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Gariahat Ke Paul Par Ve Dono

Author
Shodh Gorkishore
Title
Gariahat Ke Paul Par Ve Dono
File name
Gariahat Ke Paul Par Ve Dono
Text
OCR done
Citation
1912
Published
2011/03
Publisher
Xxxxxxxxxxxxxx
Language
Sanskrit
Pages
146
Library
Adarsh Library, Jaipur
Classification
Literature
DLI number
552153
Barcode
4990010032874.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library of India
VMLT id
Y6WHjuMfEB0
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