Hindustani Academy, Allahabad
Pilibhit Ka Sahitiyik Itihaas
Front matter
पीलीभीत
का
ক্লান্তুিষ্ট্রিজ লিঙ্ক
is
.
हिन्दी साहिंय परिषद
८१०.०
गणेपी
पीलीभीत
१६५७
पीलोमीत
का
साहित्यिक
प्रधान सम्पादक
गणेशशङ्कर शुक्ल 'बन्धु
एम० ए०, साहित्यरत्न
प्रकाशक
हिन्दी साहित्य परिषद् ( रजिस्टर्ड )
पीलीभीत
प्रथम बार १०००
सन् १९५७
निःशुल्क
सम्पादक मण्डल
सर्वश्री राधारमण त्रिवेदी 'रम्मन'
रणजीत सिंह वैद्य
"
शम्भुशरण अवस्थी 'शम्भु'
रमेशचन्द्र त्रिवेदी 'पुष्प
विद्यासागर पाठक
: मुद्रक :
स्वदेश प्रेस, (बाँसमण्डी) लखनऊ
"जिसने पा नर जन्म जगत में .. काव्य सुधारस पिया नहीं , लिया नहीं हरि नाम और 3 जिसने कर से कुछ दिया नहीं , देश - धर्म पर जिसने निज- मन-धन अर्पण किया नहीं , जीवित नहीं. मृतक है वह नर जिया भी तो कुछ जिया नहीं ।" - -स्व० नारायणानन्द सरस्वती ਨਾ ਹੈ ਤਾਂ ਇਸ ਵਾਰ ਵਾਰ
समर्पण:-
स्वर्गीय
श्री चण्डीप्रसाद जो
'हृदयेश
की
पुण्य स्मृति में
प्रेमोपहार
। उ में काट तिन पा प्रमा
शु-याराष्ट्र डा. धीरेन्द्र जी वी +
प्राक्कथन राष्ट्र-निर्माण में साहित्य का प्रमुख स्थान है। यही एक ऐसा साधन है जिसके द्वारा मानव अपने अतीत से प्रेरणा ग्रहण कर वर्तमान का अवलोकन करके भावी जीवन का निर्माण करता है। देश की राष्ट्र भाषा हिन्दी हो जाने पर प्रत्येक भारतीय का यह कर्तव्य है कि वह उसकी वृद्धि में अपना सहयोग प्रदान करे। इसके लिये प्रत्येक जिले को चाहिये कि वह अपने यहाँ के सभी साहित्यकारों को प्रकाश में लाये तथा उनके जीवन से नव-चेतना ग्रहण कर नवीन लेखकों एवं साहित्यकारों का सृजन करे । प्रस्तुत पुस्तक इसी उद्देश्य को लेकर लिखी गई है। इसमें पीलीभीत जिले के प्रायः सभी साहित्यकारों का परिचय देने का प्रयत्न किया गया है। साथ ही इसमें उन व्यक्तियों का भी सम्मिश्रण किया गया है जो पीलीभीत में अधिक समय तक रहकर प्रेरणायें देते-लेते रहे हैं। यद्यपि परिचयक्रम जन्मतिथि के अनुसार दिया गया है, फिर भी कुछ परिचय विलंब से आने के कारण यथास्थान न प्राप्त कर सके। सोचा यह गया था कि परिचय के साथ-साथ चित्र भी दिये जायें, किन्तु धनाभाव के कारण वर्तमान लेखकों एवं कवियों में से केवल उन्हीं का चित्र दिया गया है, जिन्होंने अपने ब्लाक का भार अपने ऊपर ले लिया है। दिवंगत साहित्यकारों के जो भी चित्र उपलब्ध हो सके हैं, उनके छपाने का भार परिषद् द्वारा वहन किया गया है। जिले में कोई इस प्रकार की संस्था न होने के कारण हमारे प्राचीन लेखकों की सामग्री सुरक्षित न रहकर अलभ्य हो गई। फलस्वरूप पर्याप्त प्रयत्न करने पर भी हम कुछ लोगों की कृतियाँ प्रस्तुत न कर सके । इसके अतिरिक्त इस पुस्तक में उन कवियों और लेखकों का परिचय सम्मिलित नहीं किया गया है, जो वास्तव में लेखक न होकर दूसरों से लेख एवं कविताएँ लिखवाकर अपने नाम से पढ़ते एवं समाचारपत्रों में प्रकाशित करवाते हैं।
( ८) हमको इस बात पर बड़ा हर्ष है कि परिषद् की इस योजना को सफल बनाने के लिये जिले का पूर्ण सहयोग प्राप्त हुआ है, जिसमें जिलाधीश श्री स्याल जी, नियोजनाधिकारी श्री श्रार० पी० सिंह जी, जिला बोर्ड के अध्यक्ष श्री राममूर्तिलाल जी एवं राजा राधारमण तथा जिला सूचना अधिकारी श्री इकरामउल्ला खां के नाम विशेष उल्लेखनीय हैं। साथ ही हम श्री जगदीश जी को भी धन्यवाद दिये बिना नहीं रह सकते जो समय-समय पर परिषद् द्वारा प्रायोजित गोष्ठियों का भार अपने ऊपर लेते रहे हैं। तथ्य संकलन में 'देशभक्त' के सम्पादक डा० आर० एस शर्मा एवं श्री रामबरण मिश्र तथा सर्वश्री उमाशंकर शुक्ल शास्त्री, कन्हैयालाल त्रिवेदी, श्यामसुन्दर सहाय सक्सेना, पीलीभीत और रामबहादुर मुख्त्यार, पूरनपुर ने हमारी अाशातीत सहायता की, जिसके लिये परिषद् उनकी ऋणी है । श्री जनार्दनस्वरूप जी अग्रवाल के सद्परामर्श के लिये भी परिषद् धन्यवाद दिये बिना नहीं रह सकती। परिषद् की भावी योजनायों ( जिनका उल्लेख पुस्तक के अन्त में किया गया है) को सफल बनाने का एकमात्र भार जनता के सहयोग पर ही अवलम्बित है। हम आशा करते हैं कि जनता हमें पूर्ण सहयोग इसी प्रकार प्रदान करती रहेगी। शीघ्रतावश प्रूफ देखने में यदाकदा कुछ अशुद्धियाँ रह गयी हैं जिनके लिये विज्ञ पाठक क्षमा करेंगे । गणेशशङ्कर शुक्ल 'बंधु' राधारमण त्रिवेदी 'रम्मन' सामान्य परिचय पीलीभीत जिले में हिन्दी साहित्य का प्रारम्भ अाज से लगभग ६० वर्ष पूर्व हुआ था, जब कि श्री "ख्याली द्विज' अपनी प्रारम्भिक कविताएँ लिखा करते थे, और स्व. नारायणानन्द सरस्वती अपनी लावनियाँ लिख कर इधर-उधर गाया करते थे। इसके पश्चात् श्री ब्रजनन्दनप्रसाद जी मिश्र ने जनता का ध्यान हिन्दी भाषा की ओर आकृष्ट किया । आपने "कुसुम बाटिका" नामक एक पुस्तक भी लिखी तथा ऐसे समय में जब कि कचहरी में उर्दू का ही वोल बाला था, अापने वकालतनामा के फार्म हिन्दी में छपवाए । जिले के प्रारम्भिक गद्य लेखक श्राप ही हैं । मिश्र जी की प्रतिभा से प्रभावित होकर नगर के कतिपय नवयुवकों ने सन् १६१६ के आसपास एक "कविमंडल" की स्थापना की, जिसमें राधेलाल भगत, कन्हैयालाल त्रिवेदी, चण्डीप्रसाद जी "हृदयेश", रामप्रसाद शुक्ल, मदनमोहन त्रिपाठी, चन्द्रदत्त जोशी, दुर्गाशंकर शुक्ल, हरिदत्त जी शास्त्री आदि कवि एवं लेखक भाग लेते थे। कविमंडल द्वारा हिन्दी साहित्य की उन्नति में प्रशंसनीय योग मिला। श्री चण्डीप्रसाद जी "हृदयेश' की लेखनी से प्रसूत होकर हिन्दी गद्य साहित्य का रूप निखर उठा। हिन्दी साहित्य में "हृदयेश" जी का अपना अलग स्थान है। अापको प्राचार्य रामचन्द्र शुक्ल एवं डा० श्यामसुन्दरदास ने हिंदी साहित्य के इतिहास में विशेष स्थान दिया है। कविमंडल में अधिकतर शृंगार प्रधान समस्याएँ दी जाती थीं, यही कारण है कि तत्कालीन साहित्य का सृजन शृंगार प्रधान हुआ । श्री रामप्रसाद जी शुक्ल एवं दुर्गाशंकर शुक्ल पद्य साहित्य को लेकर आगे बढ़े। कविमंडल की गोष्ठियाँ अधिकतर चन्द्र- दत्त जोशी के यहाँ हुआ करती थीं। चण्डीप्रसाद जी "हृदयेश", रामप्रसाद जी शुक्ल तथा चन्द्रदत्त जोशी की असामयिक मृत्यु हो जाने के कारण “कविमंडल" निष्प्राण सा हो गया और हिन्दी की प्रगति कुछ काल के लिए अवरुद्ध सी हो गयी। नगर के कर्मठ कार्यकर्ता श्री दुर्गाशंकर जी शुक्ल के अध्यवसाय , ( १० ) से एक बार फिर वह अवरुद्ध धारा गतिशील हो उठी और लोगों का ध्यान इस अोर पुनः आकर्षित हुया । सन् १६२५ से समाचारपत्रों का प्रकाशन प्रारम्भ हुया जि साप्ताहिक, दस दिवसीय, पाक्षिक, मासिक एवं त्रैमासिक पत्र सम्मिलित थे, जिनका पूर्ण विवरण अन्यत्र दिया गया है । सन् १९४० में आचार्य विश्वनाथ मिश्र अध्यापक राजकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, पीलीभीत एवं ललितहरि अायुर्वेदिक कालेज के छात्र श्री दयाराम पाठक के प्रयत्नों से हिन्दी साहित्य परिषद् का निर्माण हुआ, जो पाठक जी के चले जाने के पश्चात् समाप्त हो गयी (किन्तु उसकी कुछ धन राशि बरेली कारपोरेशन बैंक में अब भी सुरक्षित है) फिर भी आयुर्वेदिक कालेज के प्रधानाचार्य श्री विश्वनाथ जी द्विवेदी के प्रयत्नों से प्रतिवर्ष एक दो कवि सम्मेलनों का आयोजन कालेज में होता रहा, जिनमें बाहर के कवि भी भाग लेते रहे । यदाकदा पुरस्कार भी वितरित किए जाते रहे। श्री रामभरोसे लाल पाण्डेय “पंकज' एवं राजेन्द्रकुमार मिश्र “भानु" के द्वारा प्रतिवर्ष विजयादशमी के अवसर पर पूरनपुर में कवि सम्मेलन का श्रायोजन होता रहा है । ईंघचाई निवासी कुँ० शिवबख्श सिंह ने भी इस ओर अपनी पर्याप्त सेवाएँ प्रस्तुत की। इस समय पीलीभीत नगर में ऐसे व्यक्ति की आवश्यकता थी जो असंगठित साहित्यकारों को एक सूत्र में बांध सकता । इस कार्य के लिए श्री "बन्धु” जो आगे आए और आशातीत सफलता हुई। स्वर्गीय स्वामी नारायणानन्द सरस्वती जी की प्रेरणा से नगर के नवयुवकों ने मिलकर वर्तमान हिन्दी-साहित्य परिषद् का निर्माण सन् १६५४ में किया, जो सन् १६४० की परिषद् से सर्वथा भिन्न एवं स्वतंत्र रूपरेखा लेकर कार्यक्षेत्र में अवतीर्ण हुई। (पूर्ण विवरण अागे देखिए) हिन्दी साहित्य परिषद् पीलीभीत का इतिहास -- हिन्दी-साहित्य परिषद् पीलीभीत का श्रीगणेश स्थानीय 'बन्धु विद्या मंदिर' में सितम्बर सन् १९५४ को हुअा था। 'विद्यामंदिर' द्वारा आयो- जित कवि सम्मेलन में नगर के सभी प्रतिष्ठित कवियों ने भाग लिया था। वास्तव में इस आयोजन का उद्देश्य नगर में एक साहित्यिक संस्था का निर्माण करना था, जिसका अभाव श्री 'बन्धु' जी को निरंतर खटक रहा था। इसी समय स्वामी नारायणानंद जी सरस्वती 'अख्तर' रुग्णग्रस्त हो अपनी जन्मभूमि पीलीभीत पधारे । शैया पर पड़े-पड़े उनका विचार भी ऐसी संस्था की ओर गया। उन्होंने श्री 'बन्धु' जी को अपने गृह पर बुला- कर यह इच्छा प्रकट की कि एक हिन्दी संस्था की स्थापना की जाये जिसका कार्यभार वे ( श्री बन्धु जी) स्वयं अध्यक्ष बनकर संभालें । इसी काल श्री शंभुशरण अवस्थी 'शंभु' ने भी ऐसी संस्था के निर्माण के लिए श्री 'बंधु' जी से अनुरोध किया। स्वामी जी की इच्छा को श्री 'बन्धु' जी ने मूर्त रूप प्रदान किया, किन्तु अभाग्य से स्वामी जी उसका वह रूप न देख सके । नगर के उत्साही कवि सर्वश्री रमेशचन्द्र त्रिवेदी 'पुष्प', कृष्णस्वरूप पांडे 'निर्बल', हरिश्चन्द्र मिश्र 'पंकज', डा. ज्ञानभास्कर पांडे एवं 'बन्धु' जी के प्रयत्नों से विजयादशमी सन् १९५४ को स्थानीय आर्यसमाज मंदिर में नगर के साहित्यकारों की बैठक हुई तथा एक संस्था का निर्माण हुआ जिसका नाम 'हिंदी-साहित्य-परिषद्' पीलीभीत रखा गया, जिसके श्री 'बन्धु' जी अध्यक्ष एवं श्री हरिश्चन्द्र मिश्र 'पंकज' मंत्री निर्वाचित हुए इस समय ‘परिषद्' की सदस्यता निःशुल्क थी। कोई भी हिन्दी प्रेमी 'परिषद्' का सदस्य बन सकता था । परिषद् द्वारा आयोजित कवि सम्मेलनों का व्यय भार प्रायः उपरोक्त सज्जन ही वहन करते थे। यह कार्यक्रम एक वर्ष तक चलता रहा। इसी बीच परिषद् का एक विधान निर्माण किया गया, जिसके आधार पर ही वर्तमान कार्य-प्रणाली चल रही है।
( १२ ) एक वर्ष पश्चात् परिषद् को बृहत रूप देने के लिए स्थानीय पर- मट मंदिर में बैठक हुई । तदुपरांत 'बन्धु विद्या मन्दिर' में २ अक्तूबर सन् १९५५ ई० को विधान संशोधित हुअा एवं पारित किया गया । १-२-१९५६ को नवीन कार्यकारिणी का निर्वाचन हुआ, जिसमें श्री 'बन्धु' जी सर्व- सम्मति से अध्यक्ष निर्वाचित किये गये । २८-७-५६ को परिषद् ने निश्चय किया कि पीलीभीत जिले का साहित्यिक इतिहास प्रकाशित किया जाय। परिषद् का अपना कोई कार्यालय न होने के कारण 'बन्धु विद्या मंदिर के व्यवस्थापक से प्रार्थना की गई कि परिषद् का कार्यालय वहीं रखने की सुविधा प्रदान करें। फलतः कार्यालय 'बन्धु विद्या मंदिर' में रखा गया। सन् १९५६ ई० में परिषद् द्वारा लगभग २० गोष्ठियां एवं ८ कवि सम्मेलन आयोजित किये गये, जिसमें नगर के सभी विद्वानों एवं साहि- त्यिकों ने भाग लिया और बाहर से आये हुए सर्वश्री डा. हरवंशराय 'बच्चन', प्रोफेसर 'नीरज', 'रमई काका', वंशीधर शुक्ल, निरंकारदेव 'सेवक', 'सतोषी', अोमशंकर शुक्ल 'निर्भीक', 'जीवन', कुमारी मधु, सुरेन्द्र मोहन मिश्र, रामजी शरण एडवोकेट अादि कवियों ने भाग लिया। इसके अतिरिक्त एक कहानी प्रतियोगिता का भी आयोजन किया गया। यह कार्यकारिणी १५ दिसम्बर १९५६ को समाप्त हो गई । नवीन कार्यकारिणी का निर्वाचन ४ जनवरी १९५७ को सम्पन्न हुआ, इस समय कार्य कर रही है। जो समाचारपत्र पीलीभीत के विद्वान् हिन्दी की पत्र पत्रिकायें निकालने का प्रयत्न समय-समय पर करते रहे हैं । स्वर्गीय चण्डीप्रसादजी "हृदयेश" ने अपने काल में "मातृ-मन्दिर" नामक पत्र निकालने का विचार किया था किन्तु जनता का सहयोग न मिल सकने के कारण वे अपने इस विचार को कार्य रूप में परिणत न कर सके। मातृ-मन्दिर नाम को अमर करने के लिए उन्होंने इस नाम से एक पुस्तक भी लिखी थी जो अभाग्य से अधूरी रह गई। इस प्रकार पीलीभीत जिले से प्रकाशित होने वाले हिन्दी समाचार- पत्रों का इतिहास सन् १६२५ के पश्चात् प्रारम्भ होता है। हिन्दी का सर्व- प्रथम दस दिवसीय पत्र "ग्रामसुधार” सन् १६३७ में प्रकाशित हुआ, जिसके सम्पादक कुँवर भगवानसिंह एवं रामवरण मिश्र थे । इस पत्र में कभी चार और कभी छः पृष्ठ होते थे । इसके १८ अंक निकले । आर्थिक संकट एवं कुँवर साहब के एसेम्बली कार्य में व्यस्त होने के कारण इस पत्र का प्रकाशन ६ मास के उपरान्त बन्द हो गया। सन् १९३८ में पं० दुर्गाशंकर जी शुक्ल ने “जागरण” नामक साप्ताहिक पत्र निकाला । यह भी ६ मास के पश्चात् बन्द हो गया। सन् १९४५ में बीसलपुर (पीलीभीत) से “साधना" पाक्षिक पत्रिका का प्रकाशन हुआ, जिसके सम्पादक स्वर्गीय स्वामी रामानन्द जी थे। यह पत्रिका सन् ४७ में बम्बई से प्रकाशित हुई और इसका रूप मासिक हो गया । सन् ४८ के पश्चात् इसका प्रकाशन पुनः बीसलपुर से होने लगा। जिसके सम्पादक क्रमशः सर्वश्री बाबूराम कुमठेकर, श्यामकुमारी वर्मा, नरेन्द्रकुमार एवं सत्यदेव जी हुए । वर्तमान काल में इसके सम्पादन का भार श्रीसत्यदेवजी पर है और इसके प्रकाशन का भार साहू काशीनाथजी पर । यह एक आध्यात्मिक पत्रिका है जिसका वर्तमान रूप त्रैमासिक है । सन् १९४७ में पुनः पं० दुर्गाशंकरजी शुक्ल ने 'देशभक्त' नामक पत्र प्रकाशित किया, जिसके सम्पादन का भार वे स्वयं ही वहन करते रहे । यह पत्र एकाध अंक के पश्चात् बन्द हो गया ।
( १४ ) सन् १६४६ ई० से नगर के उत्साही नवयुवकों के सहयोग से "ज्योत्स्ना” नामक हस्तलिखित मासिक पत्रिका का प्रकाशन हुअा, जिसका उम्पादन श्री शम्भुशरण अवस्थी 'शम्भु' ने किया था। यह पत्रिका दो वर्ष तक चलती रही, जिसके अंतिम एकाध अंकों का प्रकाशन श्री हरिश्चन्द्र मिश्र "पंकज ने किया । मार्च सन् १९५१ में पं० राधेश्याम शर्मा ने अपने सम्पादकत्व में भास्कर प्रेस से 'देशभक्त' का पुनः प्रकाशन किया जो आज दिन तक हिन्दी जगत् की सेवा कर रहा है। २६ जनवरी सन् '५१ को एल० एच० शुगर फैक्टरी मजदूर यूनियन की अोर से 'मजदूर समाज' एक पाक्षिक पत्र निकला, जिसके सम्पादक श्री शिवसुमिरणलाल जौहरी थे जो नवम्बर सन् १६५५ तक चला। कुछ समय के पश्चात् श्री जौहरी के स्थान पर सम्पादक का कार्य ठाकुर वचनसिंह चौहान करते रहे। २६ जनवरी सन् '५१ में 'जिला ईख किसान संघ' पीलीभीत की ओर से 'किसान संघ' नामक पाक्षिक पत्र प्रकाशित हुअा, जिसके सम्पादक बाबू मुकुन्दलाल एम० पी० तथा श्री रामेश्वरदयाल गुप्ता एम० ए० थे। यह पत्र दिसम्बर सन् ५१ तक निकल कर बन्द हो गया। कुवर भगवानसिंह ने सन् '५१ के प्रारम्भ में एक पाक्षिक पत्र ( जगत ) निकाला, जिसका सम्पादन कार्य कुछ समय तक पं० टीकाराम करते रहे । तत्पश्चात् ठाकुर शाश्वतदेवसिंह ने सम्पादन का कार्य हाथ में ले लिया। यह पत्र एक वर्ष तक चला। सन् १६५२ के चुनाव के समय बाबू रामनारायण जब संसद् की सदस्यता के लिए खड़े हुए तो उनकी देखरेख में पीताम्बरप्रसाद सहगल ने एक 'विस्फोट' नाम का पत्र निकाला जो दो अंक निकलने के पश्चात् बन्द हो गया । फरवरी सन् १९५४ में स्थानीय जिलाधीश श्री अश्वनीकुमार श्राई. ए० एस० के संरक्षण में तथा श्री बी० बी० माथुर पी सी० एस० जिला नियोजन अधिकारी के सम्पादकत्व में 'विकास' नामक मासिक पत्र निकला। एक वर्ष के पश्चात् यह पत्र पाक्षिक हो गया तब से यह निरंतर निकल रहा है। इस समय इस पत्र का सम्पादन कार्य जिला सूचना अधिकारी श्री मुहम्मद इकरामउल्ला खाँ कर रहे हैं और 'विकास' के स्थान पर अब इस पत्र का नाम 'नव विकास' हो गया है।
( १५ ) फरवरी सन् १६५६ में तरुण बन्धु परिषद् की ओर से 'छात्र बन्धु' निकला जिसके संरक्षक कुवर भगवानसिंह तथा सम्पादक दिलीपसिंह भारतीय थे। एक अंक निकलने के पश्चात् यह पत्र फिर न निकल सका। आजकल पीलीभीत जिले से प्रकाशित होने वाले केवल हिन्दी के तीन पत्र हैं-प्रथम 'देशभक्त', दूसरा 'नवविकास' और तीसरा 'साधना'। .
भाषा पीलीभीत जिला तराई प्रदेश में स्थित होने के कारण अधिक उन्नति न कर सका। वनों से आच्छादित तथा आवागमन के साधनों से अधिक दिनों तक वंचित रहने के कारण यहाँ की भाषा भी उन्नत न हो सकी। यहाँ के मूल निवासी अधिकतर दक्षिण की ओर से आये। यही कारण है कि सम्पूर्ण जिले में विशेष कर दक्षिण भाग में कन्नौजी भाषा का प्रभाव है। अवधी भाषा पूर्व की ओर लखीमपुर जिले की सीमा के समीप बोली जाती है, किन्तु शेष जिले में इसका प्रभाव दृष्टिगत नहीं होता। जैसे-जैसे अावागमन के साधनों में वृद्धि होती गयी और व्यापार ने उन्नति की, लोगों का सम्पर्क मेरठ, मुरादाबाद, दिल्ली से अधिक बढ़ने लगा, और यहाँ की भाषा भी परिवर्तित होती गयी। मेरठ के आसपास बोली जाने वाली खड़ी बोली यहाँ के व्यापारियों ने अपनायी। आज जिले में इसका प्रभाव निरन्तर बढ़ता जा रहा है । यद्यपि ब्रज भाषा का पूर्ण प्रभाव एटा जिले तक ही सीमित है, फिर भी पीलीभीत जिले में कुछ प्रयोग (विशेषकर क्रियायें) ब्रजभाषा का भी होता है। पीलीभीत में मुसलमानों की सूबेदारी रही है। अस्तु यहां मुसलमानों के अतिरिक्त बहुत से हिन्दू भी खड़ी बोली में अरबी फारसी शब्दों को मिलाकर बोलते हैं, जिसे उर्दू कहते हैं । उर्दू का प्रभाव अब क्षीण होता जा रहा है। जिले के उत्तर में थारू लोग हिन्दी की अपभ्रंश भाषायें पहाड़ी तथा कुमानी मिलाकर बोलते हैं । सम्पूर्ण जिले को जनसंख्या (५०४४२८) के ७३.८ प्रतिशत व्यक्ति हिन्दी बोलते हैं । हिन्दुस्तानी बोलने वालों की संख्या १३५ है, जिसमें १० प्रतिशत शब्द हिन्दी भाषा के तथा ३.५ प्रतिशत उर्दू के शब्द रहते हैं। मूल रूप से उर्दू बोलने वाले ११८ प्रतिशत हैं । ०.७ प्रतिशत लोगों की मातृभाषा पंजाबी है तथा ०.२ प्रतिशत लोग अन्य भाषाओं का प्रयोग करते हैं, जिनमें सिन्धी, गुजराती, पहाड़ी, बंगाली, मारवाड़ी, कुमानी, मरहठी और तामिल सम्मिलित हैं।
वीरेन्द्रस्वरूप पाठक 'निर्भर' आपका परिचय पृष्ठ ६७ पर देखिये
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पं० ख्यालीराम अवस्थी ख्याली द्विज'
परिचय श्री ख्यालीराम अवस्थी 'ख्याली द्विज' गढ़ में , आपका जन्म ग्राम जादौपुर ( पीलीभीत ) में विक्रम सं० १६३१ को हुआ था । अाप संस्कृत, उर्दू और फारसी के अच्छे ज्ञाता हैं । आप- ने अपना अधिकतर जीवन अध्यापन कार्य में बिताया। रामपुर ऐसे उर्दू के में आप सदैव हिन्दी को प्रोत्साहन देते रहे हैं। अापकी कविताएं यदा कदा 'सुकवि' एवं 'कान्यकुब्ज' में प्रकाशित होती रही हैं । आपने अधिकतर कवित्त एवं सवैये लिखे हैं और बहुत ही भोजपूर्ण भाषा का प्रयोग किया है। गंगधारा ब्रह्म के कमंडल सों दामिनी दमक गई, याकि है प्रचंड ध्वनि रोष के नगारा को । याकि कोई शक्ति अवतीर्ण नभमंडल प्रकट हुई है याकि रौद्र मूर्ति दारा की । याकि शक्ति शंकर की लक्ष्य करने के हेतु, श्रा रही प्रखर ध्वनि हर हर नारा की। याकि यम रिपु याकि मुक्ति-सेल है सतेज, याकि धारा श्रारा सम ख्याली' गंगधारा की। भगवती महिमा चंड मुड मुडन के मुडन कौं काटि काटि, खंड खंड डन के ढेर कौं लगावती । खंगन सों छप्प छप्प भर भर घट्ट घट्ट रक्त घूट पी पी हरषावती । शुभ औ निशुंभ अादि असुर विनासिनी हौ, सिंह पै सवार तौ हूँ देर हौ लगावती । ख्याली द्विज' जोरै कर कालिके कहाँ हो क्यों न, कलि. के. कराल वार वेग प्रा बचावती । खप्पर कौं, स्वामी नारायणानन्द सरस्वती । स्वामीजी का जन्म सं० १९३४ विक्रमी में पीलीभीत नगर में हुया था। अापका प्रारम्भिक नाम लक्ष्मीनारायण तिवारी था। अापके पिता पं० श्रीकृष्णजी तिवारी, किराने की दूकान करते थे; स्वामीजी भी कुछ दिनों तक इस दुकान पर बैठते रहे। बाल्यकाल से ही आपको ख्याल गाने का चाव था । अासपास जहाँ कहीं ख्याल ( लावनी) गायी जाती थी। आप वहाँ अवश्य जाते थे और स्वयं चंग बजाकर कुछ न कुछ अवश्य गाते थे। धीरे धीरे आप स्वतः लावनियाँ लिखने लगे। लावनी के प्रति अापका इतना अटूट अनुराग था कि आपने अपने परिवार के साथ-साथ अपनी स्त्री के प्रति भी उदासीन होकर गृह परित्याग कर दिया और कुछ समय तक लापता रहे । भारत के विभिन्न भागों में आप ख्यालबाजों का अखाड़ा लिए भ्रमण करते रहे । सन् १६११ ई. के लगभग आप कानपुर पहुंचे जैसा कि ग्रापने स्वयं लिखा है। "मुझे थोड़ी ही उम्र से ख्याल गाने का शौक हो गया था। भगवत् कृपा से मैं ख्याल लिखने लगा। मैंने पं. गोपीनाथ बरेली वालों को अपना गुरु बनाया और उन की कृपा से मैंने इस विषय का काफी ज्ञान प्राप्त किया। मुद्दत भर से मैंने चंग वजा कर लावनी गायी। इधर बत्तीस साल से गाना छोड़ दिया । प्रथम मैं इसी लावनी का शौक पूरा करने के लिए ही कानपुर आया था। वह शायद सन् १९११ की बात होगी। शृंगार से विमुख व्यक्ति भक्ति में स्थान पाता है, यह बात स्वामीजी के जीवन पर भी चरितार्थ हुई । एकाएक श्राप के हृदय में कुछ ऐसी विरक्ति उत्पन्न हुई कि आपने साधु वेश धारण कर लिया । तब से श्रापने अपना शेष जीवन समाज सेवा एवं जन हित में ही व्यतीत किया । आप कांग्रेस के कर्मठ कार्यकर्ता रहे। आपने श्री देवीकुण्ड संस्कृत विद्यालय देवनन्द की स्थापना की, आप उसके मुख्याधिष्ठाता भी थे। जैसा कि विद्यालय की वार्षिक
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स्व. स्वामी नारायणानंद सरस्वती
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( १६ ) - "स्वामीजी विद्यालय के जीर्णोद्धार में अपना प्रमुख स्थान रखते हैं । जब विद्यालय के कार्य में शिथिलता आई कि अापने बाहर से आकर विद्यालय की बागडोर अपने हाथों में संभाल उसमें नव जीवन का संचार किया। १९१८ ई० से उन का निरंतर यही कार्यक्रम चलता रहा है।" स्वामीजी के चरित्र की सबसे बड़ी विशेषता उन की निष्काम सेवा है। वे देश की जो सेवा करते थे भगवान् की सेवा समझ कर करते थे। "सरस्वती जी की दो पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं पहली “लावण्य लता", दूसरी "लावनी का इतिहास" । लावनी के इतिहास में ३५२ पृष्ठ हैं जो ज्ञान मन्दिर पटकापुर कानपुर में प्रकाशित हुई थी। इस इतिहास की भूमिका अाप ने ६६ पृष्ठों में लिखी है जिस में लावनी सम्बन्धित सभी अंगों पर पाण्डित्य पूर्ण प्रकाश डाला गया है। लावण्यलता के सम्बन्ध में प्राचार्य “सनेही" ने इस प्रकार लिखा है- "प्रसन्नता की बात है कि इस पुस्तक “लावण्यलता” के लेखक स्वामी नारायणानन्द सरस्वतीजी "अख्तर" भी तुर्रा पक्ष वालों के समर्थक हैं । अाप ने अपनी प्रतिभा का सदुपयोग करके ऐसे ख्यालों की रचना की जो नीति, धर्म, ज्ञान, वैराग्य और भक्ति सम्बन्धी विविध विषयों से पूर्ण है । इस के अतिरिक्त इस पुस्तक में शब्दालंकार और अन्य सनयतें, जो ख्यालों में महत्व पूर्ण स्थान रखती हैं, प्रस्तुत हैं । ख्याल प्रायः सभी उपदेशप्रद और मनोरंजक हैं। इनमें कुछ प्राचीन एवं कुछ नवीन ढंग के हैं। वर्णन शैली बड़ी ही मनोहारिणी और चित्ताकर्षक है । साथ ही हमें यह कहते हुए भी संकोच नहीं होता कि ख्यालों की अन्यान्य पुस्तकों की तुलना में यह पुस्तक अपने ढंग की अनोखी और सर्वोत्तम है। श्राप सामयिक कविताएँ भी लिखते हैं और अच्छी लिखते हैं । हमें अाशा है कि अापकी कविताएँ समाज में अादर की दृष्टि से देखी जाएगी।" -"सनेही" स्वामी जी ने लावनियों में हिन्दी भाषा का प्रयोग करके हिन्दी के साथ बड़ा उपकार किया है। आप कानपुर से निकलने वाली "कवीन्द्र" नामक पत्रिका के सम्पादक भी कुछ काल तक रहे । आप उर्दू भाषा के भी अच्छे जानकार थे। देहावसान से लगभग छः माह पूर्व आप अपनी जन्मभूमि पीली- भीत पधारे। आपकी प्रबल इच्छा थी कि मेरा प्राणान्त मेरी जन्मभूमि में ही हो । अापके एकमात्र पुत्र पं० रामस्वरूप जी तिवारी ने आपका उप- । " ( २० ) चार शक्ति से बाहर किया, किन्तु कोई 'लाम न हुआ और स्वामी जी ने अगहन बदी प्रतिपदा सम्वत् १९११ को प्राण त्याग दिये । तदुपरान्त राम- स्वरूप जी का भी देहान्त हो गया । मृत्यु का अवधि के एक मास पूर्व स्वामी जी ने श्रीयुत 'बन्धु” जी एवं पुष्प जी को अपने समीप बुलाकर यह इच्छा प्रगट की थी कि नगर में एक हिन्दी साहित्य परिषद् की स्थापना की जाय । उनकी यह इच्छा पूर्ण तो हुई किन्तु खेद है कि उनके सामने परिषद् का निर्माण न हो सका । प्रस्तुत उदाहरण "लावनी का इतिहास" से उद्घ त किये गये हैं। सुख सुगन्ध लोभी मन मधुकर काम कमल पर जा बैठा। प्रेम पाँखुरी में फँसकर अपने को श्राप गंवा बैठा ॥ यह संसार सरोवर जिसमें नारि रूप है नीर अगम, पुत्र पौत्र परिवार रूप खिल रहे विमल पंकज उत्तम । कोई अरुण कोई नील श्वेत छवि भाँति-भाँति छहरात पदम् , तिन पर मोहित फिरे मधुप मन प्रिय परागकी चाह अधम । योवन रूपी जलज निरख धूं-धूं करता तहँ आ बैठा । प्रेम पाँखुरी" । x काया रूपी कमल काल रूपी कुजर जब लेवे तोड़, मूल मनोरथ नष्ट होय सब भाव भृग जावे संग छोड़ । अन्त समय कोई साथ न जावे खड़े रहे चहें कंज करोड़, प्रभु पद प्राप्ति पराक्रम कर इस रागरूप रस से मुख मोड़। नाता नीरज तज "नारायण" राम नाम गुण गा बैठा ॥ ....... x प्रेम पाँखुरी श्री राधेलाल 'भगत भगतजी का जन्म आज से ७२ वर्ष पूर्व सं० १९४१ वि० में मोहल्ला प्रासफजान पीलीभीत में हुआ था। आपकी सर्राफे की दुकान थी। भगतजी ने गद्य, पद्य मिश्रित "संसारोपवन वाटिका' नामक पुस्तक लिखी थी, जो स्वर्गीय राजा लालताप्रसाद जी को समर्पित की गयी थी। भगत जी की प्रतिभा से राजा साहब बहुत अधिक प्रभावित हुए । भगतजी का अधिकांश समय राजा साहब के यहाँ व्यतीत होता था किन्तु कुछ दिनों पश्चात् अपने स्वाभिमान पर आघात होता देख आप राजा साहब का भवन ही नहीं अपितु पीलीभीत नगर छोड़कर देहली चले गए। आप अपने समय के बड़े उदार प्रकृति पुरुष थे । तत्कालीन "कवि- मंडल' द्वारा आयोजित गोष्ठियाँ अधिकतर आपके ही निवासस्थान पर हुआ करती थीं।
श्री कन्हैयालाल जी त्रिवेदी
अाप भाद्र पक्ष कृष्णा अष्टमी सम्बत् १६४३ वि० में पैदा हुए थे ।
ललितहरि अायुवेदिक कालेज से वैद्यभूषण की परीक्षा पास करके सन्
१६२० ई० तक बाबूराम की धर्मशाला में आप संस्कृत पढ़ाते रहे । इसी
वर्ष अाप चण्डीप्रसादजी तथा पं० दुर्गाशंकर जी
शुक्ल
के साथ राष्ट्रीय
अान्दोलन में जेल गए । अापने ब्रजनन्दन प्रसादजी मिश्र के सहयोग से
छात्रोपकारिणी सभा स्थापित की थी। इस सभा में वे व्यक्ति व्याख्यान
देने का अभ्यास किया करते थे । इसका एक पुस्तकालय भी था जो आगे
चलकर सनातन धर्म सभा में विलीन हो गया।
सन् १९२० से ही श्राप चिकित्सा का कार्य कर रहे हैं । कविमंडल
के श्राप भी सदस्य थे और कविताएं लिखा करते थे।
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दीनन दान हौं देत सदा, प्रभु दारिद के दुख वेगि हरौ ।
सेवक हौं तुम स्वामि प्रभू चित आपन में यह ध्यान धरौं ।।
श्राप तौ दानी शिरोमणि हौ, यह जानि के द्वारे पै अान परौं
नायक हो सुखदायक हौ, शिव नाथ अनाथ सनाथ करौं ।
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श्री रामप्रसाद शुक्ल थे। शुक्ल जी का जन्म सन् १८८६ ई० में हुअा था। आपके पिता का नाम श्री कल्लूमल दलाल था । शुक्ल जी की रुचि प्रारम्भ से ही संस्कृत भाषा की अोर थी। प्रथमा परीक्षा उत्तीर्ण करने के पश्चात् अापका अध्ययन कार्य घर पर ही चलता रहा । पिता जी द्वारा उपार्जित सम्पत्ति ने आपको स्वतन्त्र प्रकृति वाला पुरुष बना दिया। आप बड़े ही जनप्रिय थे । नगर के प्रत्येक वर्ग के लोग आपको अपना नायक समझते थे। श्राप में अपार सहिष्णुता थी, साथ ही आप बड़े दबंगी पुरुष थे। जिस बात का श्राप अनुष्ठान कर लेते थे, उसे पूर्ण करके ही छोड़ते थे। इसके लिये यासको अनेकों कठिनाइयाँ भी उठानी पड़ी। शुक्ल जी में जन-सेवा की भी भावना थी । स्थानीय रामा स्कूल की प्रारम्भिक अवस्था में आप अवैतनिक अध्यापन कार्य करते रहे। सना- तन धर्म सभा के आप अग्रणी थे । अापके यहाँ साहित्यकारों का जमघट लगा रहता था । स्व. चण्डीप्रसाद 'हृदयेश' की साहित्यिक अभिरुचि आपकी ही प्ररणा एवं सत्संग से जाग्रत हुई थीं। श्राप कविमण्डल के सदस्य कुछ दिनों आप चुंगी में खजाञ्ची रहे, किन्तु विचारों में स्वतन्त्रता होने के कारण इस स्थान पर अधिक दिन तक न रह सके । जीवन के अन्तिम 'दों में श्राप पर एक व्यक्ति को गोली से मार देने का अारोप लगाया गया किन्तु यह बात निर्मूल सिद्ध हुई और शुक्ल जी निष्कलंक मुक्त कर दिये गये । इस मुकदमे में आपका बहुत अधिक धन हुया जिससे आर्थिक स्थिति कुछ बिगड़ गई । हिन्दी से अापको प्राधिक प्रेम था। आपने एक नायिका भेद लिखा था जिसमें अधिकतर घनाक्षरी छन्द का प्रयोग किया था। शुक्ल जी की अधिकतर रचनायें शृंगार रस प्रधान होती थीं। सनातन धर्म के ऊपर आपके बड़े ही श्रोजस्वी भाषण होते थे। आज से ३० वर्ष पूर्व ३७ वर्ष की आयु पाकर शुक्ल जी का देहा- वसान हो गया । अापकी समस्त रचनायें प्रिय मित्र पं० दुर्गाशंकर शुक्ल अपने यहाँ ले गये किन्तु उनके यहाँ से पुलिस द्वारा समस्त सामग्री अप- हुत हो जाने के कारण कोई भी रचना परिषद् को उपलब्ध न हो सकी। व्यय श्री व्रजनन्दन प्रसाद मिश्र आप श्री माधौ प्रसाद जी के पुत्र एवं रघुनन्दन प्रसाद जी के ज्येउ भ्राता थे । आपका जन्म लगभग सन् १८९१ में हुअा था । वर्तमान समय में श्री मुकुन्दलाल जी वकील एम० पी० जिस मकान में बैठते हैं, वहीं श्री मिश्र जी भी बैठा करते थे । आप पीलीभीत राजनैतिक क्षेत्र के प्रथम और सर्वश्रेष्ठ कार्यकर्ता थे एवं जिले के प्रथम एम० एल० सी० चुने गये थे। लखनऊ काँग्रेस अधिवेशन में मिश्र जी नगर के प्रथम प्रतिनिधि चुन कर भेजे गये थे । आप हिन्दी के कट्टर पक्षपाती थे। उस समय जबकि कचहरियों में सर्वथा उर्दू का ही बोलबाला था, अापने वकालतनामा हिन्दी में छपवाये थे। अापने १९१० ई० में होने वाले 'तिलक ट्रायल' का हिन्दी में अनुवाद किया था। इस पुस्तक का प्रकाशन भी हो चुका था । श्राप पीलीभीत जिले के सबसे प्राचीन गद्य लेखक थे । अापने "कुसुम वाटिका" के अतिरिक्त अन्य पुस्तके भी लिखी थीं जो अभाग्यवश प्राप्त न हो सकीं। आपने एक बंगला पुस्तक का अनुवाद किया था। माननीय गोविन्द वल्लभ पंत श्रापके परम मित्र थे । पंत जी प्रायः आपके ही यहाँ अाकर ठहरा करते थे। आपकी मृत्यु सन् १६२७ में हुई थी।
स्व० व्रजनन्दनप्रसाद मिश्र
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श्री चण्डीप्रसाद 'हृदयेश बी०ए० हृदयेश जी का जन्म आज से लगभग ६६वर्ष पूर्व सन् १८६१ में हुअा था। आपके पिता का नाम लाला शम्भूनाथ स्वर्णकार था। स्थानीय श्रमिक बंधु प्रेस जिस मकान में अाजकल स्थापित है, वहीं श्रापका निवासस्थान था। आपके पुत्र श्री कृष्णकुमार वर्मा (स्वर्णकार) इस समय लखनऊ के नरही मुहल्ले में निवास करते हैं। श्री चण्डीप्रसाद जो के उपनाम रखने की भी एक मनोरंजक कहानी है। आप प्रारम्भ में 'चन्द्र' उपनाम से कविताएँ लिखा करते थे, किंतु यह जानकर कि पुवायां नरेश भी 'चन्द्र' उपनाम से ही कविताएँ करते हैं, आपने अपना उपनाम परिवर्तित करना चाहा। अस्तु, यह निश्चय किया गया कि दुर्गा सप्तशती खोलने पर जो भी पृष्ठ खुले, उसकी प्रथम पंक्ति का प्रथम शब्द ही अपना उपनाम रख लेंगे,फलतः यही किया और उनका नाम 'हृदयेश' पड़ गया। आपने बहुत दिनों तक स्थानीय शुगर मिल में असिस्टेंट मैनेजर का भी कार्य किया । स्व. राजा लालताप्रसाद के अति निकट होने के कारण कुछ दिनों तक श्राप उनके प्राइवेट सेक्रेटरी के रूप में भी कार्य करते रहे। कुछ समय तक श्रार श्री सरस्वती पाठशाला झांसी के हेडमास्टर तथा श्री ललितहरि अायुर्वेदिक कालेज, पीलीभीत के प्रिंसिपल भी रहे । कुछ काल तक आप वर्तमान प्रधान मंत्री श्री सम्पूर्णानन्दके साथ डोगर कालेज, बीका- नेर में अध्यापन कार्य करते रहे । राष्ट्रीय विचारधारा माननीय सम्पूर्णा- नन्द जी के सम्पर्क में रहने से ही आपमें आई थीं। 'हृदयेश' जी उन साहित्यकारों में से हैं, जिन्होंने साहित्य साधना के साथ देश के स्वतंत्रता संग्राम में भी सक्रिय भाग लिया और यौवन के रुपहले दिन और रातें कारावास की काली कोठरियों में व्यतीत की। कांग्रेस के अहमदाबाद अधिवेशन में श्राप सम्मिलित हुए। श्राफ्के साथ अापके अभिन्न मित्र पं० दुर्गाशंकर शुक्ल और श्री कन्हैयालाल. त्रिवेदी ये । महात्मा गांधी के दर्शनों की अभिलाषा से जब साबरमती आश्रम में पहुँचे तो सर्वप्रथम उनकी भेंट माता कस्तूरबा से हुई। उन्होंने इनके ( २६ ) वहाँ पाने का कारण पूछा तो इन्होंने अपना अभिप्राय प्रकट किया। इस पर 'बा' ने इन लोगों को आदेश दिया, "जाओ और नवयुवकों से देश की जेलें भर दो । बस यही बापू के वास्तविक दर्शन हैं ।" इन शब्दों में जादू और हृदयेश जी के लिए भावी जीवन का संकेत था । लौटकर आपने जिला पीलीभीत के बमरौली नामक ग्राम में अपना ओजस्वी भाषण दिया । परिणामस्वरूप प्राप बसंत पंचमी की अद्ध रात्रि को अपने मित्रों सहित बंदी बना लिये गये। झांसी अधिवेशन में आपने स्वागताध्यक्ष के रूप में जो वक्तव्य दिया उससे स्व० श्रीमती सरोजनी नायडू अत्यन्त प्रभावित हुई थी। उनकी एक गल्प 'परित्यक्ता' पर सिकंदराराव जिला अलीगढ़ के निवासी सेठ लक्ष्मीनारायण जी की धर्मपत्नी ने एक स्वर्ण पदक प्रदान किया। 'हृदयेश' जी का अनेक भाषाओं पर अधिकार था । हिन्दी, संस्कृत, अंग्रेजी, मराठी, गुजराती, बंगला आदि भाषाओं का आपको अच्छा ज्ञान था। बंगला समिति के श्राप सदस्य थे और उनके साथ श्रापका पत्रव्यवहार बंगला के ही माध्यम से होता था। 'हृदयेश' जी नगर के तत्कालीन एकमात्र साहित्यिक संस्था 'कविमंडल' के जीवन्त सदस्य थे। आप बहुमुखी प्रतिभा के साहि-यकार थे । यद्यपि हिन्दी जगत् में आप अपने उपन्यासों एवं कहानियों के लिए ही प्रख्यात हैं तथापि श्राप कवि, निबन्धकार,अनुवादक और सम्पादक के रूप में भी हमारे सम्मुख अपनी मौलिकता एवं प्रोजस्विता के साथ आये । अापकी 'नन्दननिकुंज' ( कहानी संग्रह ), 'मनोरमा', 'मंगल - प्रभात' (उपन्यास), 'वनमाला' (कहानी संग्रह ) आदि पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। अापने कालिदासकृत 'रघुवंशम्' का हिन्दी तथा अंग्रेजी में अनुवाद किया। 'मातृ-मन्दिर' नामक आप एक पुस्तक लिख रहे थे, जिसमें भारत की प्राचीन, मध्ययुगीन एवं वर्तमान सतियोंकी जीवनियां प्रकाशित करने की योजना थी। इनमें से प्रथम दो खण्ड पूर्ण हो चुके थे, किंतु दुर्भाग्यवश तृतीय खण्ड पूर्ण न हो सका और अापकी मृत्यु हो गई। अापके लेख 'माधुरी' और 'चांद' में प्रकाशित होते थे। आप 'चांद के सम्पादक मंडल में थे। इसी पत्रिका के 'सती विशेषांक' के सम्पादन की भार श्राप ही को सौंपा गया था, किन्तु समय ने उन्हें इसका र्यको पूर्णन करने दिया श्वाप पीलीभीत नमर से भी मातृमन्दिर' नामक पत्र निकालना ( २७ ) चाहते थे किन्तु अापकी यह अाशा पूर्ण न हो सकी फिर भी इस नाम की रक्षा के लिए आपने 'मातृमन्दिर' नामक पुस्तक की रचना की। हृदयेशजी स्वभावत : विनोदी और घुमक्कड़ जीव थे । बाग- बगीचों एवं निर्जन बनों में भ्रमण करने में आपकी वृत्ति अतिशय रमा करती थी। कदाचित यही कारण था कि अापकी कहानियां और उपन्यासों में प्रकृति के रम्य दर्शन मिलते हैं। आपकी विनोदी प्रकृति का परिचय इस घटना से भी लगाया जा सकता है। कानपुर से प्रकाशित 'नारी समाज' की सम्पादिका सीतादेवी ने आपको एक पत्र लिखा जिसमें आपको 'भाई साहब' शब्द से सम्बोधित किया था। 'हृदयेश' जी ने उनको इस पत्र का उत्तर इस प्रकार दिया था-"कृपया भविष्य में आप मुझे इस शब्द से सम्बोधित न करें क्योंकि मैं प्राप लोगों (नारी समाज) का भाई बनकर सम्पूर्ण पुरुष समाज को अपना बहनोई नहीं बनाना चाहता हूँ।" आपके विषय में काव्यतीर्थ पं० नरेन्द्रनाथ शास्त्री एम० ए० ने लिखा है- "हिन्दी कथा लेखकों में आपकी भी एक विशेष तथा निश्चित शैली है। अापको मनोवैज्ञानिक या अनुभूतिवाद की कहातियों की अपेक्षा पात्रों द्वारा श्रादर्शवाद की पूर्ति कराना ही मनोतीत था । पाठक कहानी के द्वारा एक साहित्यिक लेख का अानन्द अनुभव करता है। आपकी कहानियों की कथावस्तु केवल दो या तीन पंक्तियों में ही अंकित की जा सकती है। अापने कहानियों में कल्पना का, मस्तिष्क की उर्वरता का तथा नाना प्रकार की उत्प्रेक्षात्रों और उपमाओं का समावेश किया है...."भाषा कल्पना गर्भित और कल्पनासमन्वित है और शैली संस्कृत के बाण और दण्डी का स्मरण दिलाती है।" 'हृदयेश' जी की कहानियां जनसाधारण के योग्य नहीं हैं । उनका पाठक स्वयं उसी प्रकार का भावुक एवं विद्वान होना चाहिए । यथा ""उसके कलित कुन्तल कलाप अधिकतर पृष्ठ भाग पर पड़े थे, और कुछ कपोल युगल के इतस्ततः लटक रहे थे। ज्ञात होता था, आज मानो दूसरा वारिधिबधु, पराजित सुधाकर का पक्ष लेकर, नागसैन्य का नायक बनकर, पन्नग महारथियों के मंडलीभूत होकर, कटाक्ष की कठिन कृपाण धारण करके, भृकुटी कोदंड पर नयन-शर चढ़ाकर, अंबर-प्रदेश के रणांगण में अमोघ दिव्य सौन्दर्य-वर्य परिधान करके, युद्ध के लिए परिकर- बद्ध हुआ है।" -'प्रणय परिपाटी
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.......
( २८ )
'हृदयेश' जी सदैव हिन्दू-संस्कृति के परिपोषक रहे हैं। उन्हें हिन्दू
ललनात्रों की लज्जा प्रशंसनीय लगती है । वे लिखते है-
"हिन्दू-समाज की अबला मंडली में लज्जा का
प्रबल राज्य है ; हिन्दू ललनात्रों की प्रीति-मंदाकिनी सर्वदा लज्जा कानन
के अभ्यंतर हो में मधुर, परन्तु शनैः-शनैः कलरव करती हुई, वेग के साथ
किंतु श्रावेगरहित होकर बहती है। यहाँ प्रीतिपुष्प इतना नहीं खिलता
कि निर्बल होकर गिर पड़े। यहां का गुलाब खिलता है किंतु
खिलखिलाता नहीं है। कली फूल होती है, किंतु फूल का पल्लव कभी
..
सूखता नहीं।"
-प्रेम पुष्पांजलि
कहानियों के मध्य में आई हुई आपकी मौलिक कवितायें उनमें चार
चाँद लगा देती हैं । यथाः-
"श्राली, चलु तोहि बूझत श्याम ।
तू इत दामिनि सी दुरि बैठी, उत छाये घनश्याम ;
बन, उपबन, नव कुंज-पुंज सब, लसत अाज अभिराम ।
ढूंढ़ फिरे ब्रजराज तोहिं सखि, डगर-वगर ब्रजधाम ;
तो बिन अब 'हृदयेश विकल इमि, जिमि रति के बिन काम ।
-'नन्दन निकुंज'
प्रस्तुत चित्र सन् १९१४ का है, जब आप लखनऊ विश्वविद्यालय
के क्षात्र थे।
पं० मदन मोहन जी त्रिपाठी श्रीयुत पं० रामस्वरूप जी त्रिपाठी के सुपुत्र श्री मदनमोहन त्रिपाठी का जन्म सम्वत् १६५२ वि० में हुआ था। आपने संस्कृत साहित्य का अध्ययन प्रथमा तक किया । तत्पश्चात् अाप ज्योतिष में पारंगत हुए। श्राप स्थानीय राजा साहब एवं साहू साहब के राज्य ज्योतिषी हैं । आप नगर के प्राचीन कविमंडल के सदस्य थे। श्राप भी अपनी कविताएँ सवैये और कवित्तों में लिखा करते थे। श्वेत वस्त्र धारे मातु श्वेत पदमासन श्वेत मुख देख जाको चन्द्र हू लजाए जात । वीणा कर राख्यो जाके शब्द त्रिलोक मान्यो, मस्त हुए समस्त जग चित्र सों जान्यो जात । मोर की सवारी मातु, पुस्तक हू धारे हाथ, ताकी प्रभा देखि कै प्रभाकर हू छिपाए जात। ... प्रभायुत मातु सुत 'मदन' के काज हित, एती देर मेरी मातु कहे को लगाए जात । x x x हास्य एक समय बैठे हुते शम्भु शम्भुरानी संग, व्याल गल माल डाले भंग की तरंग, मैं । ताही समय नाहर ने मेरे शिव शंकर के, बैल की सुटाँग लई खेल की उमंग मैं । कि पर्यो बूढो बैल, चौंक परे भोले नाथ, छोड़-छोड़ बोलि धाए, भूति भरि अंग मैं । देखि के स्वरूप शंकर को, लोट लोट मातु गई हास्य की तरंग मैं ॥ हाव भाव श श्री रामचन्द्र दलाल 'मुहतोड़ आपका जन्म कार्तिक सुदी ८सं० १९५३ वि. को पूरनपुर जिला पीलीभीत में हुआ था। आपके पिता का नाम कल्लूमल है । 'नुहतोड़' जी हास्य रस की बड़ी ही मधुर कवितायें लिखते हैं । उर्दू शायरों को मुंहतोड़ उत्तर देना श्रापका पहला काम है। आप इस समय पूरनपुर में दलाली का कार्य करते हैं। आपकी रचनायें बोलचाल की भाषा में होती हैं। प्रार्थना डाल औ देव सदैव सहाय करो मम, जेब में सेव अनार बसायो। पाल के मालदहा, लखनाऊ की लाल मिठाई खवायो। ऊन की औ गबरून की दो पतलून कराय के फोन सिलाओ। कोट में नोट लगै दस बीस तौ गोट से स्वामिन श्राप लगायो। पं० चन्द्रदत्त जोशी आयुर्वेदाचार्य पं० चन्द्रदत्त जोशी का जन्म सम्वत् १९५२ के आस- पास हुआ था। श्राप बड़े ही चरित्रवान व्यक्ति थे । संस्कृत, हिन्दी तथा अंग्रेजी का श्रापको अच्छा शान था। आप स्वर्गीय चण्डीप्रसाद जी "हृदयेश" के समकालीन एवं “कविमंडल' के उत्साही कार्यकर्ता थे। श्राप बड़ी ही सुन्दर कविताएँ लिखा करते थे । २७ वर्ष की अल्प श्रायु में ही अापका देहावसान हो गया था। खेद है कि अापकी कोई भी कृति प्रयत्न करने पर भी उपलब्ध न हो सकी।
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स्व० श्री चन्द्रदत्त जोगी
Suman
( ३२ ) निकाला जाय । फलतः सन् १९३८ में आपने 'जागरण' नामक साप्ताहिक पत्र और सन् १६४७ में 'देशभक्त' निकाला । संस्कृत का अच्छा ज्ञान होने के कारण शुक्ल जी की भाषा में तत्सम शब्दों का बाहुल्य है। कहीं कहीं तो अनुप्रास की अनोखी छटा देखते ही बनती है । आपने अधिकांश कविताएँ ब्रजभाषा में लिखी हैं । यह भगवती की श्राराधना का ही फल था कि आपका जन्म, यज्ञोपवीत संस्कार, विवाह आदि जीवन के शुभ कार्य अष्टमी के ही दिन सम्पन्न हुए। इतना ही नहीं अापकी मृत्यु अष्टमी शुक्ल अाषाढ़ (द्वितीय) २००७ विक्रम को उधरनपुर ( हरदोई ) में हुई जब श्राप पूजन पर बैठे हुए शक्ति का ध्यान कर रहे थे, तब एकाएक आपका ब्रह्मांड फट गया और जीव ब्रह्म में समा गया। आध्यास्तव करुणामयी तू कल्पवेलि कल्पवासिनी तू, कैरव विकासिनी तू तें ही कुल बालिका । कमनीय कामिनी तू करिवर गामिनी तू, कारणप्रिया तू कौलिनी तू सुकपालिका । कुसुमायुधा तू त्यौं कदम्ब वनवासिनी तू , कोमला हृदै की बेस कीन्यों विकरालिका । कौलपालिका तू कामकला कला मालिका तू, कमलालया तू कमला तू मातु कालिका । तैं जड़ जीवन के जिय मैं गुरु ज्ञान की ज्योति जगावन हारी । तो सम कोऊ हितू न लखैयत पैयत तेरी कृपा फल चारी। भक्तनि की लै सजीवन मूरि सुसर्वसु रंक की ज्यों निधि प्यारी । तें भवसिन्धु अगाध परे. कौं अधार कै पार लगावन हारी ॥ -सौन्दर्य लहरी विन्दु से रौद्री, नाद से ज्येष्ठा तथा बीज से वामा शक्ति उत्पन्न हुई। उन्हीं से रुद्र, ब्रह्मा व विष्णु उत्पन्न हुए। वे ही इच्छा-क्रिया-ज्ञानात्मक हैं तथा वह्नि, इन्द्र व सूर्य के स्वरूप हैं । उस पर विन्दु के विद्यमान होने पर अव्यक्तात्मा-रव हुश्रा या प्रांतर स्फोट हुआ। उसको अागम विशारदों ने शब्द ब्रह्म कहकर पुकारा । दूसरों में किन्हीं ने शब्द ब्रह्म, किन्हीं ने
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Nina
PUR
hwa
Diyo
स्व० पं० दुर्गाशंकर जी शुक्ल 'रसिकेश'
bye
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( ३३ ) शब्दार्थ, किन्हीं ने उसे शब्द कहा । जिन्होंने शब्दार्थ या शब्द कहा, उन्होंने ठीक नहीं कहा क्योंकि शब्द व शब्दार्थ दोनों जड़ हैं । यह सब प्राणियों में चैतन्यस्वरूप हैं । अतः शारदातिलक के प्राचार्य कहते हैं कि मेरी सम्मति में इसे शब्दब्रह्म ही कहना उचित व युक्तियुक्त होगा। वही प्राणियों के शरीर में कुण्डली रूप से विराजमान है, वही पचास वर्णमय है तथा गद्य- पद्य रूप में वही प्रकाशित होता है। -'शारदा तिलक' अनुवाद से स्वागत समिति के मन्त्री से यह जानकर कि कांग्रेस का स्थान ब्रह्म- पुत्र महानद के तट पाण्डु घाट पर नीलांचल पर्वत के ठीक सामने है जहाँ से शिखर का सुरम्य दृश्य भलीभांति दृष्टिगोचर होता है, बड़ी ही प्रसन्नता हुई तथा कौतूहल भी बढ़ा। मन में एक अपूर्व उमंग भी श्री कामाख्या धाम के दर्शनों की उठी, क्यों न उठे ? अब की बार उसी सुरम्य प्रदेश का सुखद दृश्य देखकर नेत्रों को सफल करूंगा, जहाँ स्वयं राजराजेश्वरी माता श्री त्रिपुर सुन्दरी विराज रही हैं तथा जिनकी जगन्मोहिनी लोकोत्तर सुन्दर विभूतियों से उस प्रान्त के नर-नारी, कुमार, वनपर्वत, कंदरायें, उपत्यकायें, नदी, नद, सरोवर, कुंड, झरने, पशु-पक्षी, लता-द्रुम-कुज सभी विभूषित हुए कामरूप की कमनीयता का बखान कर रहे हैं। X x x वास्तव में अाजकल हमने अपने श्रद्धास्पद तीर्थों की मर्यादा अपने अपवित्र व गंदे व्यवहारों से बहुत हेय कर रक्खी है । यदि हम प्राचीन धर्म के अनुशासन से चलें तो तीर्थों की शक्ति भी अक्ष गण रहे तथा उनकी चिर पवित्रता हमारी पाप की मलिनता को परिमार्जित करने में भी समर्थ हो सके। 'मेरी कामरूप यात्रा से - आचार्य विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि, एम. ए. गौतम और कणाद के आदर्शों से अनुप्राणित एक आदर्श आर्य पिता श्री शिवलाल बख्शी के श्राप आदर्श पुत्र हैं । आपकी माता का नाम प्रेमवती देवी था । श्रापका जन्म ग्राम मकटुल जिला पीलीभीत में हुआ था। आपकी प्रारम्भिक शिक्षा 'गुरुकुल' वृन्दाबन में हुई । जब आप पञ्चम कक्षा में पढ़ते थे, आपके पिता ने आपको 'न्याय दर्शन' का भाषानुवाद उपहारस्वरूप देकर अापके हृदय में दार्शनिक प्रवृत्तियों का बीजारोपण किया। 'गुरुकुल' की शिक्षा समाप्त करने के पश्चात् उच्चतर अध्ययन के लिए आप काशी गए और वहाँ रहकर अापने काशी के सुप्रसिद्ध विद्वानों से भारतीय दर्शन तथा साहित्य शास्त्र का विधिवत विशेष अध्ययन किया। लेखन की प्रवृत्ति आपमें प्रारम्भ से रही है । भारतीय दर्शनशास्त्र को हिन्दी भाषा में प्रस्तुत करने की यापने विशाल अायोजना बनाई हुई है । 'तर्क भाषा' की शैली पर ही आपने श्री उदयनाचार्य के ईश्वरसिद्ध विषयक प्रसिद्ध ग्रन्थ 'न्याय कुसुमाञ्जलि' की हरिदासीय विवृत्ति पर विस्तृत हिन्दी व्याख्या लिखी है । इस न्याय कुसुमाञ्जलि की व्याख्या पर 'श्री हरजीमल डालमिया पुरस्कार समिति' दिल्ली की ओर से आपको एक सहस्र रुपये का दर्शन पुरस्कार' प्राप्त हुआ है। दर्शन के अतिरिक्त साहित्य शास्त्र के चुने हुए प्रमुख ग्रन्थों की हिंदी व्याखायें प्रस्तुत करने की योजना भी अापने बनाई हुई हैं । इस योजना के अनुसार 'अानन्दवर्धनाचार्य' के 'ध्वन्यालोक', 'वामन' की 'काव्यालंकार सूत्र वृत्ति' तथा 'कुन्तक' के 'वक्रोक्ति जीवित' की हिंदी व्याखाएं प्राप तैयार कर चुके हैं । 'हिंदी ध्वन्यालोक' पर उत्तर प्रदेश के राजकीय शिक्षा विभाग ने ८००) का पुरस्कार देकर अापको सम्मानित किया है । 'महात्मा ईसा' और 'प्रपंच-परिचय' अापके विद्यार्थी जीवन की प्रारम्भिक कृतियाँ हैं । 'महात्मा ईसा' में महात्मा ईसा की जीवन झाँकी के साथ उनकी धार्मिक भावनाओं का तुलानात्मक विवेचन है। 'प्रपंच. परिचय' ईश्वर, जीव और प्रकृति विषयक दार्शनिक मन्तव्यों से सम्बन्ध रखने वाला उच्चकोटि का दार्शनिक ग्रन्थ है।
में ( ३५ ) पिछले दिनों अापने बौद्ध दर्शन के विषय में "बौद्ध दर्शन का उदय और अस्त" नामक एक विशाल ग्रन्थ लिखा है। हिन्दी के साथ श्राप संस्कृत भाषा भी ग्रन्थ-प्रणयन में लीन हैं। इधर अापने संस्कृत में भी कई प्रौढ़ ग्रंथों की रचना की है । श्रापकी दर्शन मीमांसा' दर्शन शास्त्र के विषय में नवीन दृष्टिकोण से लिखी गई एक महत्वपूर्ण कृति है। संस्कृत की कारिका प्रणाली में इसकी रचना की ई है। इसके अतिरिक्त आपने फिलासफी के एथिक्स तथा साइकालोजी वेषयों पर क्रमशः 'नीति शास्त्रम्' तथा 'मनोविज्ञान शास्त्रम्' नामक दो तके गद्यात्मक संस्कृत में लिखी हैं । अधिकारी विद्वानों ने इनकी अत्यधिक प्रशंसा की है । संस्कृत में कारिकात्मक शैली से ही 'साहित्य मीमांसा', 'वैदिक साहित्य कौमुदी' तथा 'पाश्चात्यं तर्कशास्त्रम्' नामक तीन प्रौढ़ ग्रन्थ अापने और लेखे हैं । साहित्य-मीमांसा में प्राचीन तथा अाधुनिक पालोचना तथा साहित्य के रस, ध्वनि, वक्रोक्ति अादि समस्त सम्प्रदायों का परिचय दिया गया है और 'वैदिक साहित्य कौमुदी' में वेद, ब्राह्मण, यारण्यकार, उप- निषद्, कल्पसूत्र आदि के साहित्य का परिचय दिया है। भारतीय दर्शन तथा साहित्य शास्त्र पर मौलिक ग्रन्थ लेखन तथा संस्कृत वाङमय के चुने हुए कुछ अन्य ग्रन्थों की विशद हिन्दी व्याख्याएँ प्रस्तुत करने की योजना आपके हाथ में है। अापका भाषा पर पूर्ण अधिकार है। विषय नुसार प्रभावोत्पादक शब्द चयन यापकी भाषा की विशेषता है। "हिन्दी अाज हमारी राष्ट्र भाषा है । उसको विश्व की अन्य समृद्ध भाषाओं के समान विश्वजनीन एवं वैभवशालिनी बनाने के लिए उसके साहित्यिक भण्डार को सर्वाङ्ग पूर्ण बनाना प्रत्येक भारतीय विद्वान् का कर्तव्य है । इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए जहाँ उपार्जित वैभव के रूप में अाज के अधुनिक कला एवं विज्ञान यादि विषयों पर साहित्य निर्माण की आवश्यकता है वहां इस राष्ट्र भाषा की जननी देव भाषा संस्कृत के परम्परागत साहित्यिक वैभव को हिन्दी के माध्यम के द्वारा आज के समाज के सामने सुन्दर और भव्य रूप में प्रस्तुत करना भी आवश्यक ही है।" -'तर्कभाषा' से । ।
श्री धर्मरञ्जन लाला बाँकेबिहारीलाल जी भारतवर्ष की पुण्य भूमि में पुण्यात्मात्रों का जन्म सदैव ही होता रहा है, जिनकी दानशीलता एवं धर्मपरायणता का उदाहरण अन्य कहीं नहीं मिलता है। इसी युगपरम्परानुसार ऐसे घोर कलियुग में इस महान् श्रात्मा ने अपने जिले के कस्बा बिलसंडा में जन्म लिया, जिसने लगभग दो लाख रुपये की अपनी सारी सम्पत्ति स्थानीय "रामा इण्टर कालेज" को दान दे दी और आप स्वयं त्यागी जीवन व्यतीत कर रही है । इस पुण्यात्मा को हम सब लाला बाँकेबिहारीलाल जी के नाम से जानते हैं। अापका जन्म चैत अमावास्या सं० १६४० वि० में बिलसँडा (पीलीभीत) में हुआ था। अापके पिता का नाम ला० ठाकुरप्रसाद जी है। आपमें साहित्यिक एवं धार्मिक प्रवृत्ति जन्मजात है। श्राप शिव के भक्त हैं । व्यायाम में भी यापकी पर्याप्त रुचि है। आप बड़े दानी, उदार स्वभाव के व्यक्ति हैं। अापके एक सुन्दर सुता नाम की कन्या थी। जिसके जन्म के समय पीली बूंदें पड़ी थीं, इसके अतिरिक्त अापके कोई सन्तान नहीं है । अापकी सम्पत्ति भाइयों ने हस्तगत करनी चाही, इसी लिये अापने सारी सम्पत्ति दान कर दी। अापकी फुटकर रचनाएँ "जागरण" तथा "अहलकार" में प्रकाशित होती रहीं। अापकी 'प्रेम तरंग' प्रथम लहर , 'प्रेम तरंगिन' दूसरा भाग तथा प्रेम चमन बहार' प्रकाशित पुस्तकें हैं । आपकी प्रथम भाषा उर्दू है, फिर भी आपको हिन्दी का अच्छा ज्ञान है । श्रापकी कविताओं में यदा कदा उर्दू के शब्दों का प्रा जाना प्रथम भाषा उर्दू के कारण स्वाभाविक ही है । x x x x हमारे शिव के आभूषण अनोखे हैं, निराले हैं । तिलक है चन्द्र का माथे गले में नाग काले हैं। श्री गंगा जी लहरा खाती हैं शंकर की जटाओं में । गले में मुण्ड माला का अजायब हार डाले हैं॥ है बामाजी उमाजी पास रहती उनकी सेवा में ।
( ३७ ) श्री गनपत जी भी गोदी में मुहब्बत से बिठाले हैं ।। दयालू नाम सुनते थे हमें कब से यकीं आया । हुए जब से शरन 'बाँके' दया .से शिव ने पाले हैं। श्री रामेश्वरदयाल जी शुक्ल "गुदरी में लाल छिपे रहते हैं" वाली कहावत हमारे शुक्ल जी पर बिल्कुल ठीक चरितार्थ होती है । वर्तमान समय में अापकी पारिवारिक स्थिति का अवलोकन कर कोई ऐसा नहीं कह सकता कि यह वही हीरा है जो कभी बड़े राजाओं के पास रहा और पान अपने जीवन के अन्तिम क्षण अपनी जीर्ण-शीर्ण कुटिया बिलसँडा में रुग्ण शैया पर काट रहा है । यह है विधि का विधान | जो कभी धन-धान्य से परिपूर्ण था वह आज दाने दाने को मुहताज है ! जहाँ कल तक भव्य भवन खड़े थे वहीं अाज खंडहर अवशेष हैं। कहीं इसके ठीक विपरीत दृश्य भी दिखाई देता है। शुक्ल जी का जन्म अाषाढ़ शुक्ल सप्तमी संवत् १६४६ वि. में बिलसंडा (पीलीभीत) में हुआ था । अापके पिता का नाम श्री मातादीन शुक्ल है । आप बिलसँडा के प्राचीन निवासी हैं । आपके यहाँ वस्त्र व्यापार होता था किन्तु अाजकल अवस्था दयनीय है। अाप पं० दुर्गाप्रसाद जी मिश्र के सम्पर्क से साहित्यिक क्षेत्र में आगे बढ़े। आप राजा लालताप्रसाद जी के यहाँ आया-जाया करते थे। उन्होंने एक बार आपकी प्रतिभा से प्रभावित होकर आपको ५१) का पुरस्कार दिया था तथा पुवायाँ नरेश ने आपको ८० बीघा जमीन बसंतापुर परगना पुवायाँ जि. शाहजहाँपुर में दी थी। श्राप सं० १३१४ में ग्वालियर गये, वहाँ जाकर आपने महाराजा बलवन्त राव सेंधिया से भेंट की, जिन्होंने अापको १.१) नकद तथा एक पुस्तक “दशम् स्कंध भागवत्' नाम की भेंट में दी। आपकी प्रसिद्ध पुस्तके 'माया प्रपंच मंजरी", "नीलकंठ महत्तम" तग गो-रक्षा प्रचार नाटक हैं, इनमें 'गोरक्षा प्रचार नाटक लक्ष्मीनारायन-गनेसीलाल प्रेस मुरादाबाद में प्रकाशित हुई थी। किन्तु खेद है कि अत्यन्त प्रयत्न करने पर भी आपकी रचनाएँ प्राप्त न हो सकी।
श्री रणजीत सिंह वैद्य वैद्य जी का जन्म १० जनवरी सन् १६०१ में बहेड़ी (बरेली) के एक धनाढ्य परिवार में हुअा था । अापके पिता मुन्शी बहादुरसिंह कायस्थ होते हुए भो सदैव मांस-मदिरा से दूर रहे। जिसका प्रभाव वैद्य जी पर भी पड़ा । अापने प्रारम्भिक शिक्षा गुरुकुल कांगड़ी में पायी। विद्यार्थी जीवन से ही इन्हें हिन्दी साहित्य के प्रति अनुराग हो गया था। अापके लिखे हुए एक नाटक 'वर्षा' को देखकर नाटककार श्री राधेश्याम कथावाचक ने इन्हें कुशल नाटककार कह कर और नाटक लिखने के लिए प्रेरित किया किंतु आपके पिता जी आपको एक सुयोग्य वैद्य के रूप में देखना चाहते थे अस्तु उन्होंने इनके लिखे हुए नाटक को अग्नि में जला दिया। आप प्रारम्भ से ही राष्ट्र एवं आर्य संस्कृति के पोषक रहे हैं । समय-समय पर आपके तत्सम्बन्धी विचार 'आर्य मित्र', "सार्वदेशिक तथा “वीर अर्जुन" श्रादि पत्रों में प्रकाशित होते रहते हैं ।
( ३९ ) आपका बहुत सा साहित्य धनाभाव के कारण अप्रकाशित पड़ा हुआ है । “पौराणिक देवी-देव पूजन" "सती सावित्री या हिंदू कोड बिल", (नाटक ) एवं "वैदिक मानव" आदि पुस्तकों में आपके प्रौढ़ विचारों का दिग्दर्शन होता है । “पौराणिक देवी-देव पूजन" में आपने आर्य समाज तथा सनातन धर्म का समन्वय किया है । आपकी भाषा में संस्कृत शब्दों का बाहुल्य रहता है । “प्रहरी" शीर्षक लेख में आपने जीवात्मा और राष्ट्र के कर्णधारों को सम्बोधित करके लिखा है- "ऐ प्रहरी ! तू मायाविनी प्रकृति की पिशाचिनी मृग मरीचिका में पथभ्रष्ट हुश्रा त्रस्त हो रहा है..."यह माना कि तेरी यह भौतिक उपासना तेरे लिए गगनचुम्बी महल बना दे, तू विहंगम की भाँति गगन-बिहारी बन जाय,तू पल भर पदनिक्षेप न कर मोटरों की भों-भों पों-पों में विहरण करे। विद्युत की दीप्यमान दीप्ति गगनमंडल के तारक गणों को विभा ला दे, अग्नि, जल, वायु, तेरे दास-दासी एवं साधक-साधिकाएँ बन जाँय परन्तु तेरे अन्तराल का सत्यम्, शिवम्, सुन्दरम् तुमसे बहुत दूर हो जायेंगे इसलिए ऐ जागरुक प्रहरी ! सजग हो तेरे जीवन का ध्येय अभ्युदय निःश्रेयस सिद्धि है । तेरा अभ्युदय तभी सम्यक् होगा जब तू अपने भौतिक अभ्युत्थान को आत्म सम्पदा से विभूषित कर देगा।" भ्रष्टाचार निरोध समिति द्वारा "भ्रष्टाचार कैसे दूर हो" लेख पर आपको प्रथम पुरस्कार मिला है। - । श्री सूर्यप्रसाद शुक्ल 'रामशरण • शुक्ल जी का :न्म अाज से ५३ वर्ष पूर्व कानपुर जिले के रामनगर नामक ग्राम में हुआ था । अापके पूज्य पिता जी का नाम पं० गयाप्रसाद जी शुक्ल था, जो नम्बरदार के नाम से प्रसिद्ध थे । घर की आर्थिक स्थिति अच्छी न होने के कारण शुक्ल जी उच्च शिक्षा प्राप्त न कर सके। अल्प आयु में ही आपको गृहस्थी का भार सँभालना पड़ा । अस्तु श्राप नौकरी करने लगे। शुक्ल जी उन इने-गिने व्यक्तियों में से हैं जो स्वाध्याय स्वाव- लम्बन एवं आत्मनिर्भरता के बल पर जीवन में उन्नति करते हैं । आप बड़े भावुक, भक्त एवं दानशील व्यक्ति हैं । समय-समय पर श्राप कवियों का प्रोत्साहन बढ़ाने के लिये पुरस्कार भी देते रहे हैं । बाल्यकाल से ही आप पर मीरा, सूर के भक्ति-भाव पूर्ण पदों का ऐसा प्रभाव पड़ा कि आप उन पदों में बहते-बहते स्वतः वैसे ही पदों की रचना करने लगे। आपको भाषा बहुत ही सरल एवं भावपूर्ण होती है । आप लगभग २३ वर्ष से एल० एच० शुगर फैक्ट्री पीलीभीत में सेवा-कार्य कर रहे हैं और इस समय चीफ कैमिस्ट हैं । आपकी कवितायें अधिकतर बीसलपुर से प्रकाशित होने वाली श्राध्यात्मिक पत्रिका 'साधना' में निकलती रहती हैं। पद हरि जू हौं तो दास तिहारो। और न ठौर कतहुं मोकों निरख्यो सकल पसारो। निरबस है तव शरण तकी अब, तजि सब जगत सहारो। तेरो जस अस संतन गायो, निज जन नाहिं बिसारो। अशरण-शरण दयालु दीन पै, अधमन अधिक उधारो। सपनेहु जे जन शरण तकी तव, बूड़त लह्यो किनारो। साखी सही करी गज गनिका, जिनको जाय उबारो। 'रामशरण' निज ग्लानि गरिरह्यो, हौं तो निपट नकारो। कैसे कहौं कृपालु कृपा करि, बिगरी मोरि सम्हारो। प्रभु, श्री रामबहादुर मुख्त्यार मुख्त्यार जी का जन्म १ मई, १६०५ ई० को बीसलपुर जि० पीली- भीत में हुआ था। आपकी प्रारम्भिक शिक्षा बरेली में हुई । बाल्यकाल से ही आपकी प्रवृत्ति आर्य समाज की ओर थी। आर्य बाल-सभा के मंत्री बन कर आप अपनी सेवाओं द्वारा प्रार्य प्रतिनिधि सभा उत्तर प्रदेश के अंत- रंग सदस्य हो गए। ★ कांग्रेस में आपकी अधिक निष्ठा थी। कांग्रेस अान्दोलन में सक्रिय भाग लेने के लिए अापने हाई स्कूल से पढ़ना छोड़ दिया। बहुत दिनों तक आप कांग्रेस जिला अदालत पीलीभीत के "जज" पद पर कार्य करते रहे। आपकी सेवा एवं त्याग का परिणाम है कि आप सन् १९३० से १६४८ तक टाउन एरिया पूरनपुर के चेयरमैन पद पर निरन्तर रूप से .
( ४२ ) कार्य करते रहे । अापने पब्लिक उच्चतर माध्यमिक विद्यालय की स्थापना करके एक वर्ष तक अवैतनिक रूप से अध्यापन कार्य भी किया। आप हिन्दी-हिन्दू-हिन्दुस्तान के पक्षपाती हैं । भारतीय आर्य संस्कृति एवं देश की वर्तमान स्थिति के सम्बन्ध में आपके लेख यदा-कदा पत्रों में निकला करते हैं । प्रस्तुत गद्यांश "हिन्दी के मार्ग को प्रशस्त बनाइए" शीर्षक लेख से लिया गया है। x X. निःसन्देह हिन्दी अपने देश की राष्ट्र भाषा वैधानिक रूपेण घोषित हो चुकी है। परन्तु क्या यह सत्य नहीं है कि उसको अभी वह मान्यता प्राप्त नहीं जो वास्तव में एक स्वतंत्र देश की राष्ट्र भाषा को होनी चाहिए । इस न्यूनता का कारण क्या है ? प्रमुख कारण तो देश के कर्णधारों की उपेक्षावृत्ति ही है परंतु सचमुच जनता का भी कुछ कम दोष नहीं है। जनता का वांछनीय सहयोग कहाँ उपलब्ध है ? वांछनीय सहयोग की कौन कहे, देश के अनेक भागों में हिन्दी विरोधी आन्दोलन ही होते रहते हैं। अस्तु देशोन्नति की आधार-शिला राष्ट्र भाषा को देदीप्यमान करने, सर्वग्राहीय बनाने तथा सर्वांगी अलंकृत देखने के लिए हमें संगठित रूप से शीघ्र ऐसे पग उठाने चाहिए कि देश की नौका के खिवैया इसे मँझधार से निकाल ले जावें और जनता का पूर्ण सहयोग भी यथासमय प्राप्त हो सके। x x x x भाषा की लिपि अर्थात् लेखन-शैली में परिवर्तन जो चुपके-चुपके हो रहा है-उसको तुरन्त रोका जाय ।............"यह विद्यार्थी जब ऊँची कक्षाएँ उत्तीर्ण कर कार्य क्षेत्र में अवसीणं होंगे तो क्या यह हमारे पूर्वजों के रचित ग्रन्थ तथा वेद, शास्त्र, उपनिषद और रामायण श्रादि पढ़ और समझ सकेंगे । क्या इस अनुचित परिवर्तन से भाषा की अधोगति और भी न होगी। x X x x
श्री दीनदयाल शर्मा
पं. दोनदयाल शर्मा का जन्म १ जून सन् १६०६ में ग्राम कली-
नगर, तहसील पूरनपुर, जिला पीलीभीत में हुआ था। आपके पिता श्री
श्यामलाल पटवारी आपको केवल मिडिल तक ही शिक्षा दे सके । शर्माजी
ने अपने अध्यवसाय एवं श्री लेखराज सिंह डिप्टी कलक्टर को अनुकम्पा
से पटवारियान की परीक्षा उत्तीर्ण करके एक प्राइवेट पाठशाला स्थापित
की, तदुपरान्त श्राप नगरपालिका के विद्यालय में कार्य करने लगे और
अाजकल कालामन्दिर में पाठशाला में सहायक अध्यापक के स्थान पर कार्य
कर रहे हैं।
गाँधीजी
७
ते मूरख
गाँधीजी संसार में हो गए व्यक्ति महान ।
उनकी निन्दा जो कर, ते
करै, ते मूरख नादान ॥
नादान हिए की उनकी फूटी।
गई अचानक हाय देश की सम्पति लूटी ॥
कहते दीनदयाल धाक
जल-थल में बाँधी।
भारत के ही नहीं विश्व के वैभव
गाँधी।
श्रीराजमणि मिश्र
व्याकरणाचार्य पं० राजमणि मिश्र का जन्म श्रावण शुक्ल द्वितीय
सं० १६६५ वि० को बलरामपुर, जिला गोंडा में हुअा था । अापके पिता
का नाम श्री विश्वेश्वर मिश्र है। श्रापको प्रारम्भिक शिक्षा संस्कृत से
हुई। बलरामपुर स्टेट द्वारा प्रथम छात्रवृत्ति पाने का सौभाग्य श्रापको
ही मिला। आप बनारस शिक्षा के लिये गये, प्राचार्य श्री देवनारायण
तिवारी आपके गुरु हैं। सन् १९३३ में आपने व्याकरणाचार्य की
उपाधि ग्रहण की और सन् १९३४ से ही आप अध्यापन-कार्य
कर रहे हैं । इस समय पार स्थानीय राजकीय उच्चतर माध्यमिक
विद्यालय में हिन्दी विभाग के अध्यक्ष हैं ।
काव्य की अभिरुचि आपको बालपन से ही थी। कल्पना की डोर
से भावना की पतंग आप उड़ाते रहे । गद्य, पद्य, एकांकी सभी पर
आपका अधिकार है।
मधुमास
किसे तुम प्रिय न मधुर मधुमास ?
जन गण मन मयूर के नवधन नवजीवन के श्वास ।
राका राधा के प्रिय माधव, प्रतिभा के उल्लास ॥
शीत काल के शोषण से वन-उपवन थे उद्भ्रान्त ।
नव दल नव-सुमनों की श्री दे उनमें भरा विकास ॥
कोकिल का भी कंठ खुल गया, खुला पद्म मधुकोष ।
भ्रमरों के भी पंख खुले मधु स्वर का खुला विलास ॥
शीत उष्ण वैषम्य भाव का अब न कहीं भी लेश ।
समशीतोष्ण समीर भर रहा, सब में नव विश्वास ॥
कृष्ण वा से विरक्त दे भर जीवन
अनुराग।
कायाकल्प धन्य तरुओं का, धन्य-धन्य संन्यास ॥
वन को नन्दन वन करने की नव योजना महान ।
सत्यं शिवं सुन्दरं से हो पूर्ण
प्रशस्त प्रभास ॥
श्री ब्रह्मदेव जी शुक्ल निर्धनता के गहन अंधकार को चीरती हुई जिनकी ज्योति माँ सरस्वती की कृपा से जगी -जिसने अपने क्षेत्र ही में नहीं, अपितु राज- पूताना, धवलपुर, ग्वालियर एवं दतिया नरेश की छत्रछाया में रहकर उस क्षेत्र को भी अपनी प्रतिभा से प्रभावित किया-वह हैं श्री शुक्लजी जिनका उपनाम "ब्रह्म' है। अापके पिता पं० रामेश्वरनाथ भी अच्छे साहित्यिक हैं । शुक्लजी को यह गुण जन्मजात मिला है। श्री शुक्ल जी का जन्म कार्तिक प्रतिपदा सं० १६६५ विक्रमी सन् १९०६ ई० में अपने जिले के प्रमुख स्थान बिलसंडा में हुआ था । श्राप प्राचीन परिपाटी के कवि हैं-अापकी अधिकतर रचनाएँ छन्द, सवैया एवं घनाक्षरी में हैं-इनमें घनाक्षरी श्रापका भबसे प्रिय छन्द है-अापने राजपूताना में रहकर श्री लालबिहारीलाल जी से साहित्यिक क्षेत्र में अग्रसर होने की प्रेरणा ग्रहण की, इन्हें आप अपना गुरु मानते हैं। माँ सरस्वती की कृपा एवं अपनी प्रतिभा के आधार पर श्रापको राजा धवलपुर, दतिया, ग्वालियर तथा झाँसी के राजाओं के यहाँ श्राश्रय मिला जिन्हें श्राप समय-समय पर अपनी प्रतिभा से प्रभावित कर उपहार प्राप्त करते रहे। आपकी प्रमुख प्रकाशित रचनाएँ “राम बतीसी', "पार्वती महा- मंगल", 'राम की ओर' आदि हैं । आपकी भाषा अोजपूर्ण एवं प्रभाव- शालिनी है। व्योम रूपी ताल सों ज्यों गिरत कटि जलजात । शीश सुभटन के परें त्यों, रक्त लथपथ गात ॥ शूरबीरन के रुधिर सों, धारि बाढति जाति ॥ घोर वरषा में फिरति श्रति सरित ज्यों उतराति ॥ -'पार्वती महामंगल' जे निशि द्योस रहे उनमें तिनको अब देखत नैनन भागे। आँसुन के छिरिकान लगावत बारहिं बार मिले अनुरागे ॥
( ४६ )
भाइ को गाढ़ो सनेह निहारि के प्रीति में ऐसे कृपानिधि पागे ।
पोंछत धूरि पिताम्बर सों औ जटा अरुझी सरुझावन लागे ।
-राम की ओर
प्यारे श्याम सुन्दर सुजान धनु बाण धर ,
पीत पट वारे जो पै अाजु नाहिं आइहौ।
प्रलय को साज सब सजि है अकाल वीर ,
तब तौ दया के निधि दया उर लाइहौ ।
नीर भरे दृगन ये भा श्री भरत वीर
साँझ लगि मोहिं प्रभु जीवित न पाइहौ।
मृतक
शरीर पर
एहो रणधीर राम आँसू द्वौ बहाइहौ ॥
जानत हौं
मेरे इस
-'श्री राम बतीसी'
कालीशंकर त्रिपाठी अापका जन्म सन् १९१२ पौष मास की शुक्ला सप्तमी को हुआ था। इनके पिता का नाम पं. सूर्यप्रसाद त्रिपाठी और माता का नाम तुलसी देवी था । बाल्यकाल में पिता ने इन्हें "सुन्दर काण्ड" कण्ठाग्र करा दिया था और संस्कृत की प्रसिद्ध कहानियाँ महाभारत, मुद्राराक्षस तथा नल-दमयन्ती श्रादि इन्हें सुनाकर स्मृति-पटल पर अंकित कर दिया था । बालक की सुरुचि-लता स हित्य की ओर उठी, उस समय स्वतन्त्रता साथ संग्राम के आन्दोलन ने इन्हें लखनऊ के विद्यार्थी जीवन में पूर्ण भावुक बना दिया और 'साइमन बहिष्कार के अवसर पर यह अन्य साथियों के जुलूस में पीटे भी गए । किन्तु भावुकता के हृदय घट को पूर्णरूपेण से छलकाने वाला बंकिम बाबू का उपन्यास 'दुर्गेश नन्दिनी' है। उस उपन्यास के पढ़ते ही त्रिपाठी बालक के हृदय में यह संकल्प दृढ़ हो गया कि हिन्दी की सेवा करना पुनीत कर्तव्य है ।
( ४८ ) सन् १९३० के करबन्दी आन्दोलन ने इनकी जीवन-धारा ही बदल दी । आप सक्रिय अान्दोलन में भाग लेना चाहते थे किन्तु घर के बड़े-बूढ़ों की ऐसी इच्छा न थी। अतः श्राप कलकत्ते चले गए और दैनिक समाचारपत्र 'लोकमान्य' में सहायक सम्पादक हो गये । इस पत्र की दो वर्ष सेवा के बाद श्राप 'विश्वमित्र' के सम्पादक हो गए। इसी प्रकार फिर 'राष्ट्रबधु' की सेवा करते हुए आपका स्वास्थ्य गिरता गया। अन्त में खेद के साथ त्रिपाठीजी को कलकत्ता नगरी से बिदा लेनी पड़ी। कलकत्ता प्रवास के अवसर पर आपने पत्रों में छोटी कहानी इतनी सुन्दर प्रकाशित कराई कि साहित्यिक जगत में धाक बँध गई। उस समय का सबसे अधिक प्रसारित प्रयाग से प्रकाशित होने वाले 'भविष्य' ने आपकी कई कहानियाँ निकालीं उनमें "दारोगा साहब" तो बहुत ही प्रसिद्ध है। कलकत्ते के जीवन में घोर आर्थिक कठिनाई की तपस्या में तपने के बाद भी इस साहित्य-सेवी को इस क्षेत्र में कोई उचित स्थान न मिलने पर शक्कर के कारखाने में केमिस्ट का जीवन बिताना पड़ा; किन्तु स्थानान्तरित करने पर क्या गाने वाला पक्षी अपनी बान छोड़ सकता है ? इधर तीन-चार वर्ष से मूक भारती ने फिर कृपा की और त्रिपाठीजी को 'गिरा प्रसाद' प्राप्त हुआ। अापने कई छोटी कहानियाँ और तीन उपन्यासों की रचना की है। छोटी कहानियों में 'जीवन स्रोत', 'मुचकुन्द की नींद', 'नीलोफर', 'अनयना' और 'श्रद्धाञ्जलि' किसी भी साहित्य में रखने से रत्न की तरह चमकने वाली रचनाएं हैं । उपन्यासों में 'अवतार' भी श्री भगवतीचरण वर्मा के चित्ररेखा का स्मरण कराता है । किन्तु मुझे यह कहने में संकोच नहीं कि 'चित्रलेखा' फ्रेंच उपन्यास के आधार पर है और 'अवतार' अत्यन्त स्वतन्त्र । अवतार में भारतीय उच्च श्रादर्श है जिसके द्वारा विश्व-परि- वार की रचना कर लेखक सदा के लिये युद्ध, अशान्ति और विग्रह को समाप्त कराना चाहता है । कुछ उद्धरण अवतार के पढ़िए:- प्रारम्भ में-"पीनेवालो पियो, छक-छक कर पियो। इसके पीने में न तो प्याला, 'न हाला और न मधुबाला की आवश्यकता है ! सौन्दर्य-सिन्धु की सुधा अपने नेत्रों के प्यालों में भर-भर कर मनचाही मात्रा में पीलो-अतृप्त हृदय न जाना-निष्पाप रूप ही जीवन की सुन्दरता है-केवल विवेक इतना रहे कि सुधा को विषय में मिश्रित कर उसे विष न बना देना-पाप-विष से रूप ढल जाता है सुना है सुधा समान स्वाती की बूंद विषधर के मुख में पड़ कर विष बन जाती है।" - ( ४६ ) अन्त में-यदि इस युग के मानव तुझे प्राणी-मात्र का दुख सहने की सामर्थ्य नहीं है तो केवल इतना ही कर कि मानव-समाज के दुःखों को अपना दुःख समझ; नए विश्व के निर्माण में लग कर युद्ध को तिलाञ्जलि दे। तू कितना क्षुद्र प्राणी है, अभी यह पृथ्वी का कण-मात्र द्वीप बताएगा। "टूटते हुए तारे के समान द्रुत गति से वायुयान अाकाश की ओर सोधा चला। इसी समय द्वीप में प्रलयकारी गड़गड़ाहट हुई और ज्वाला की एक लपट पहाड़ी से निकली जो कई मील आकाश में घुसती चली गई। इधर नव-जात द्वीप खण्ड-खण्ड हो गया। प्रतिध्वनि में कोई कह रहा था-"मानव तू कितना क्षुद्र है।" अनन्त यौवना उपन्यास में लेखक ने दूसरा ही सन्देश दिया है। अत्यन्त रोचक और साहित्यिक तों द्वारा उसने मानवता को एक परिवार, एक संस्कृति और आर्य-रक्त से सम्बन्धित सिद्ध किया है तथा भारतीय प्रमाणों द्वारा त्रिपाठीजी ने इस उपन्यास में विश्व की विचार- धारा बदल दी है। अन्धी दुनियाँ एक विचित्र उपन्यास है। एक अन्धी लड़की संसार की प्रचलित भूलों की आलोचना करती है। इस दुनियाँ में कितनी कृत्रिमता, कितना आडम्बर और बड़े-बड़े चरित्रों में कितना नकलीपन पाया जाता है; यदि साहित्यिक ढंग से प्रदर्शित हुआ है तो केवल इस उपन्यास में। खेद का विषय है कि इन रत्न रचनाओं को हिन्दी संसार के समक्ष आने का अब तक अवसर नहीं मिला, जिनके द्वारा हमारी राष्ट्रभाषा का मुख उज्ज्वल होता और देश के अन्य भाषाभाषी कहते कि 'सत्य तो है हिन्दी का साहित्य भण्डार राष्ट्रभाषा के पद पर आरूढ़ होने के योग्य है।' यह लज्जाशील किन्तु स्वाभिमानी लेखक किसी प्रकाशक के पास अपनी कृतियों की प्रशंसा भेजना नहीं चाहता और कोई गुणग्राहक समुचित आदर के साथ पाण्डुलिपियों को देखने नहीं आता। देखें कब वह अव- सर आता है कि इस नई विचारधारा के चन्द्र का प्रकाश साहित्य-मेदिनी पर फैलता है। -
श्री रामभरोसेलाल पाण्डेय 'पंकज'
'पंकज' जी का जन्म आषाढ़ बदी १३ सं० १६७० वि० को गोला-
गोकर्णनाथ के समीप ग्राम सहसपुर जिला लखीमपुर में हुआ था । अापके
पिता का नाम स्वामीदयालजी पाण्डेय है। सन् १६४२ से 'पंकज' जी
पूरनपुर (जि० पीलीभीत ) में रहते हैं।
कविता करने की प्रेरणा आपको अपने ताऊ श्री भगवतीदीनजी
पाण्डेय से प्राप्त हुयी, जो हिन्दी और संस्कृत के अच्छे कवि हैं ।
पीलीभीत जिले में हिन्दी भाषा की उपेक्षा देख कर आपने प्रति-
क्रिया रूप में कितनी ही गोष्ठियाँ की तथा उर्दू का विरोध किया ।
पूरनपुर
में अापने अच्छी साहित्यिक जागृति की है । आप बड़े ही परि-
श्रमी एवं अध्यवसायी व्यक्ति हैं।
आपको भाषा में अोज तथा माधुर्य कूट-कूट कर भरा है। कोमल
कल्पनायें अापकी लेखनी से निःसृत होकर काव्य में चमत्कार उत्पन्न
कर देती हैं।
आपकी रचनायें विभिन्न मासिक पत्रिकाओं में निकला करती हैं।
शबरी के राम
गुण गान राम नाम का हो करती थी सदा
लीन रहती थी प्रेम-वारिधि-तरंग में।
ध्यान धरते ही कभी रोती हँसती थी कभी
नाच उठती थी कभी भक्ति की उमंग में ।
राम के सहस्र नाम उसने मुदित होके
ले के पर्ण-कुटी से लिखे थे अंग-अंग में।
अतिरिक्त राम के न कोई था उपास्य देव
रोम-रोम उसके रंगे थे राम-रंग में।
( ५१ ) एक ओर प्रताप-प्रण एक ओर मेरे कुछ राजपूत ही हों चाहे यवन-नरेश की अनी रहे। मोरचा कदापि न हटेगा मेरा एक पग काल के समक्ष क्यों न बाजी ही ठनी रहे । अंग-अंग मेरे कट जाँय परवाह नहीं नोक बरछे की रक्त-विन्दु से सनी रहे। चेतक हमारा रहे रान में हमारी ओर म्यान में हमारी रिपु भंजनी बनी रहे ॥ श्री विश्वनाथ मिश्र, एम० ए०, साहित्याचार्य आपका जन्म लखीमपुर में ५ अगस्त १६१४ ई० में हुआ था। आपके पिता पं० पुत्तूलाल जी बड़े साहित्यानुरागी थे। अापने प्रारंभिक शिक्षा संस्कृत में पाई तथा श्रागरा विश्वविद्यालय से संस्कृत में ही एम० ए० को परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। आपने एम० ए० हिन्दी में किया है। आजकल आप डिग्री कालेज नैनीताल में प्राध्यापक हैं। पीलीभीत एवं लखीमपुर की साहित्यिक संस्थाओं के जन्म का श्रेय आपको है। महाकवि 'अनूप' के शर्वाणी नामक महाकाव्य का सम्पादन अापने ही किया है। विद्याप्रेम, साहित्य-सेवा एवं कवितानुराग अापके स्वाभाविक गुण हैं । श्रापकी रचनाएँ सरस एवं भावपूर्ण होती हैं । आपमें एक सफल अालोचक के गुण भी विद्यमान हैं । 'कवि के प्रति आपके दो कवित्त देखिए :- ( १ ) घोर अंधकार से प्रपूर्ण शून्य मंडल में, वृषभानु मंडल का भरता विकास तू। भावना विहीन मरुथल से मनों को मंजु, करता समुज्वल सनेह का निवास तू। तेरी महिमा की गरिमा से गुरु भूमितल, सकल कलाओं का अकेला अधिवास तू । bom ( ५२ ) परम स्वतंत्र, न नियन्त्रण कहीं भी कोई- मानव नहीं रे कवि ! ब्रह्म का विकास तू ॥ ( २ ) तेरी द्युति से ही छु तिमंत है अनन्त ज्योति, सारा अन्तरिक्ष जग मग बन जाता है। सुन्दर, सुवर्णमयी, भव्य भाव भंगिमा से इस वसुधा में सुधा धार प्रगटता है ! नरत्व में बिखेरता है, कर तू असंभव संभव दिखाता है। तेरी शक्तिमत्ता की महत्ता की इयत्ता नहीं , रस - सृष्टि-सत्ता का तू दूसरा विधाता है ॥ तत्त्व अमरत्व का रानी चन्द्रावती मंगलाप्रसाद पारितोषिक विजेत्री रानी चन्द्रावती का जन्म श्रावण मास, सम्वत् १६७० वि० में बम्बई नगर में हुआ था। आपके पिता का नाम श्री गोविन्दलाल पीती है, जो नगर के प्रसिद्ध रईस हैं। रानीजी का पाणिग्रहण-संस्कार सन् १६२८ ई० में पीलीभीत नगर के सुप्रसिद्ध रईस लालताप्रसाद जी के सुपुत्र राजा राधारमण जी के साथ सम्पन्न हुआ। समाज सेवा की भावना आपमें प्रारम्भ से ही थी । सन् १९४२ ई० के आन्दोलन में अाप रचनात्मक कार्य करना चाहती थीं किन्तु अापकी यह मनस्कामना पूर्ण न हो सकी । अस्तु, आपने अपना जीवन गो सेवा हित में लगा दिया । गो सम्बन्धी अापका विस्तृत अध्ययन है। आपने इस विषय में 'सन्तुलित गोपालन' नामक पुस्तक भी लिखी है जिसमें गो सम्बन्धी प्रत्येक विषय का बड़ा ही वैज्ञानिक एवं अन्वेषणात्मक विश्लेषण किया गया है । इस पुस्तक का मूल्य इस बात से ही स्पष्ट है कि आपको इसी पुस्तक पर १२००) का मंगलाप्रसाद पारितोषिक प्राप्त हुआ । वास्तव में यह पुस्तक अपने ढंग की अद्वितीय है। ।
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( ५३ )
आप समय-समय पर छोटी-छोटी कहानियाँ एवं लेख भी लिखती
रतही हैं । अापको भाषा शुद्ध एवं सरल होती है ।
इस समय श्राप नगरपालिका पीलीभीत की अध्यक्षा हैं।
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कलाय सोलह प्रकार की होती हैं । संगीत, साहित्य, चित्र, शृंगार
इत्यादि का जीवन में अत्यन्त महत्व है । कला मानव के हृदयगत भावों
का प्रदर्शन करती है। चित्रकार अपने भाव-चित्र, संगीतज्ञ अपनी
स्वर लहरी और साहित्यिक भाषा के लालित्य के द्वारा अपने विचारों को
जनता के सम्मुख प्रस्तुत कर देता है जिसे देख सुन कर मनुष्य कलाकार की
कृति पर मुग्ध हो उठता है।
भावुक कलाकार जीवन के स्मरण में भी सौंदर्य तथा अानन्द का
अनुभव करता है और अपने उस अानन्द को वह अंकित कर चिरस्थायी
व विश्वव्यापी बनाने को उत्सुक होता है। उसमें कृत्रिमता नहीं, दिखावट
नहीं।
-'तरकारी, मिठाई और हम' से
श्री राममूर्तिलाल गुप्त
श्री सुन्दरलालजी के योग्य पुत्र श्री राममूर्तिलाल गुप्त का जन्म मार्च
सन् १९१४ में कलोनगर जिला पीलीभीत में हुआ था।
गुप्तजी का बाल्यकाल बड़े लाड़-प्यार में बीता, किन्तु विधि की
विडम्बनावश जब आपकी आयु केवल ७ वर्ष की थी, अापके पिताजी
का स्वर्गवास हो गया । अतः अापका लालन-पालन अापकी मौसीजी ने
किया।
प्रारम्भ से ही आपके विचार राष्ट्रीय रहे हैं । सन् १९३७ में श्री पुरुषो-
त्तमदास टंडन पार्क इलाहाबाद में पं. जवाहरलाल नेहरू का व्याख्यान
सुन कर आपके विचारों को और अधिक बल प्राप्त हुआ, तब से निरंतर
कांग्रेस में कार्य कर रहे हैं । आपने सन् १९४२ के आन्दोलन में सक्रिय
भाग लिया था। यह अापकी क्रियाशीलता का ही परिणाम है कि आप
सन् १९४८ से जिला बोर्ड के सदस्य होते आ रहे हैं तथा दो वर्षों से
श्राप जिला बोर्ड के अध्यक्ष हैं ।
आपने सन् १९३७ में एक भिखारी भारत' नामक पुस्तक लिखी
थी, जिसमें भारत की दयनीय दशा का बड़ा सुन्दर चित्रण किया गया है ।
अापकी भाषा में उर्दू शब्दों का बाहुल्य रहता है ।
प्रस्तुत पद 'भिखारी भारत' से ही उद्धृत किया गया है-
फाँसी
हू झूल जाऊँ सह सूली सूल जाऊँ,
सीने पै त्रिशूल खाऊँ पाऊँ सारी वेदना ।
तेज धारदार लागे तोप व
दौड़ आवे काल आगे तो भी कोई खेद ना।
देह को कटाना पड़े धज्जी उड़वाना पड़े,
कोल्हू में पिराना पड़े बाल बाल छेदना।
नाथ ये 'भिखारी' आज तो भी नहीं आवे
बाज,
शीघ्र चाहता स्वराज्य. यही मेरी कामना।
କ
बन्दूक दागे,
श्री रामेश्वरनाथ साहू 'घायल' नगर के सुविख्यात रईस साहू श्यामसुन्दरलाल खत्री के योग्य पुत्र साहू रामेश्वरनाथ का जन्म १५ जनवरी सन् १९१५ को हुआ था। अाप नगर के बड़े उत्साही कार्यकर्ता एवं प्रदेशीय कांग्रेस कमेटी के सदस्य हैं । स्थानीय कोआपरेटिव बैंक के खजाची-पद का भार श्राप पर ही है । श्राप सर्वप्रथम १५ फरवरी सन् १६४१ ई० को माननीय गोविन्दवल्लभ पन्त के द्वारा कांग्रेस के सदस्य बनाये गये। श्रापको काव्याभिरुचि सन् १९२८ ई० से प्रारम्भ हुयी। आपने अपनी सर्वप्रथम कविता रायबहादुर बाबू बहादुरसिंह आनरेरी मजिस्ट्रेट, सदस्य नगरपालिका (जो गोली से मारे गये थे ) के निधन पर लिखी। जिले की जनता के आप प्रिय पात्र हैं, जिसके फलस्वरूप श्राप जिला बोर्ड के एक प्रमुख सदस्य चुने गये । अापकी कविता के विषय देश-भक्ति एवं समाजोत्थान हैं । आप हास्य रस की भी सुन्दर कवितायें लिखते हैं । भाषा की सरलता जन-साधारण के हृदय पर तत्क्षण प्रभाव डालती है। इस समय आप हिन्दी साहित्य परिषद् के उपाध्यक्ष हैं। प्रस्तुत काव्यांश "अमर शहीद" शीर्षक कविता से लिया गया है। अमर शहीद जो मातृ-भूमि के हित हँस-हँस बलिदान हुआ करते हैं। x है याद अाज राणा प्रताप का त्याग यहाँ जन-जन को है याद शिवा जी औ झाँसी की रानी हर एक मन को गोविन्द सिंह के पुत्र हमें उत्साह दिया करते हैं जो मातृ-भूमि........" क्या भूलेंगे बलिदान भगतसिंह का स्वतन्त्रता-रण है भरा दृश्य जलियाँवाला चौरी-चौरा कण-कण वीरों के सीने यही दृश्य तो चीर धरा करते हैं जो मातृ-भूमि के".." x x में में श्री सियाराम आर्य आपका जन्म फाल्गुन पूर्णिमा सं० १६७४ वि० को हुआ था, आपके पिता श्री गोकुलप्रसाद बदायूँ के रहने वाले थे । पिता जी के देहा- वसान पर 'आर्य' १० मास की अल्पायु में पूरनपुर अपनी बुआ के पास श्रा गये। आपकी शिक्षा-दीक्षा आर्यसमाज पूरनपुर द्वारा हुयी। समाज में रहकर स्वाध्याय के सहारे पापको हिन्दी का अच्छा ज्ञान हो गया, और आप सुन्दर कविताएँ लिखने लगे । आपकी कविता के विषय धर्म तथा राजनीति हैं । आप एक कुशल संगीतज्ञ भी हैं । श्रापकी भाषा बोल- चाल की भाषा है। प्रस्तुत कविता स्वतन्त्रता दिवस पर लिखी गयी है । x x x आज देश की स्वतन्त्रता का दसवाँ दिवस मनाया अगणित बलिदानों को देकर पुण्य पर्व यह श्राया। सत्तावन की क्रान्ति प्रथम इसका संदेशा लाई, वीर सिंहिनी बनकर गर्जी रानी लक्ष्मीबाई, तिलक, गोखले महापुरुष नौरोजी दादा भाई जन्मसिद्ध अधिकार हमारा यह आवाज लगाई सत्य अहिंसा का बापू ने महामंत्र सिखलाया अगणित बलिदानों श्री गणेशशङ्कर शुक्ल 'बन्धु',एम. ए.,साहित्यरत्न नगर के श्रेष्ठ कलाकार एवं स्थानीय हिन्दी - साहित्य परिषद् के अध्यक्ष श्री गणेशशङ्कर शुक्ल 'बन्धु' का जन्म कानपुर जिले के अन्तर्गत प्रसिद्ध स्थान रामनगर में महाशिवरात्रि सं० १६७३ को हुआ था। दो वर्ष की हो श्रायु में आपको पिता की परम स्नेहमयी गोद से वंचित होना पड़ा और एकमात्र माता के ही संरक्षण में पालित, पोषित होकर अपने सतत अध्यवसाय द्वारा आपने एम. ए. एवं साहित्यरत्न की उपाधियाँ ग्रहण की। ★ श्रापके अग्रज श्री श्रो३म् शङ्कर शुक्ल अपने विद्यार्थी जीवन से ही अत्यधिक काव्यानुरागी रहे हैं। उनकी सुरुचिपूर्ण साहित्यिक कृतियों ने बन्धु जी के बाल्यकालीन जीवन में ही एक विशेष अनुराग उत्पन्न कर दिया था। तभी से आप अपनी जीवन अनुभूतियों को साकारता प्रदान कर सरस्वती के मन्दिर में अर्पित करने का सौभाग्य प्राप्त करते रहे हैं।
(५८) बन्धु जी लगभग गत २० वर्षों से स्थानीय एल० एच० शुगर फैक्ट्री में कैमिस्ट के पद पर कार्य कर रहे हैं। फैक्ट्री के ऐसे कोलाहल- पूर्ण वातावरण में रहकर भी कल्पना के सुकुमार जगत में विचरण करना आपकी अपनी विशेषता है। आप मूलतः कवि हैं, किन्तु अापकी लेखनी से यदा-कदा सुन्दर कहानियों एवं एकांकी नाटकों की भी प्रसूति हुई है। कविता के साथ-साथ आपको कहानियों के माध्यम से उन अवशेष भावों को व्यक्त करने के लिए आवश्यक जान पड़ा है जो छन्दों को संकुचित परिधि में बंधने से असमर्थ रहे हैं । 'देवी', 'कलाकार का पतन' एवं 'अर्थी' आपकी सुन्दरतम कहानियाँ हैं। बन्धु जी के काव्य में मुखरित भाव तो हैं ही, कला भी इससे कम सुन्दर नहीं है । भाषा की ओर आपका विशेष ध्यान रहता है; उसमें कहीं भी क्लिष्टता एवं दुरूहता नहीं श्राने पाई है वरन् सर्वत्र प्रसाद गुण विद्यमान है। गहन से गहन भावों को सुस्पष्ट बोल-चाल के शब्दों में इस प्रभावोत्पादक ढंग से व्यक्त किया गया है कि श्रोता अथवा पाठक के हृदय को वह तत्क्षण मोह लेते हैं। आपकी कविता-पाठ की शैली भी इससे कम मोहक नहीं है। आपकी रुचि गीतों की ओर विशेष है किन्तु अापने समय-समय पर घनाक्षरी, सवैये अादि प्राचीन छन्दों का भी अधिकार के साथ प्रयोग किया है। इन छन्दों में आपने यत्र-तत्र ब्रजभाषा के लालित्यपूर्ण शब्दों का भी समावेश किया है। बन्धु जी के गीतों का एक संग्रह 'कल्पना' के रूप में प्रकाशित हो चुका है, जिसका हिन्दी जगत् में विशिष्ट स्थान है। अापके गीतों का एक दूसरा संग्रह 'राका' शीघ्र ही प्रकाशित होने जा रहा है । पीलीभीत नगर में साहित्यिक जागृति का श्रेय भी श्री 'बन्धु' जी को ही है। आपके सतत प्रयास एवं पथ-प्रदर्शन से कवियों का स्तर उत्तरोत्तर बढ़ रहा है। आप नगर में गुरुवत् कार्य कर रहे हैं। शिव का बालरूप केश छिटकाये रहता है सदा पाठों याम भाल में दिठौना चन्द्ररूप अर्द्ध गोला है । वाणी बोलता जो भेद पाते न मुनीश 'बन्धु' नंगी फिरता हैं न तो तन में मँगोला हैं।
( ५६. ) सर्प-बिच्छुओं से भय खाता न, खिलाता उन्हें, ऊँच, नीच लाँघता मँमाता गाँव टोला है। धूल फाँकता है, राख तन में लपेटता है काशी निवासी अभी शिशु है निरा भोला है ॥ x x - गीत साध्य से नहीं मुझे तो साधना से प्यार है। (१) एक दिवस तीर पर खड़ा हुआ प्रसन्न चित्त, प्रश्न किया “बावली नदी इधर कहाँ चली" ? "मैं किसी की रूपराशि पर विमुग्ध, हो अधीर- फिर रही हूँ, खोजती, पुकारती गली-गली' । "किन्तु तुम युगों-युगों से इस प्रकार बह रहीं- क्या मिला अभीष्ट"? तो कहा-"पिया के द्वार पर"- भीख से नहीं मुझे तो याचना से प्यार है" । साध्य....। (२) जिस समय कुसुम, कली मुकुल रहा बना रहा फूल गया बस यही महान भूल हो गई फलस्वरूप उस कुसुम की एक-एक पंखुड़ी शुष्क हो स्खलित हुई स्वमेव धूल हो गई फूल धूल की कथा मनोव्यथा बता रही कामना बनी रहे कभी न काम्य प्राप्त हो बस इसीलिये मुझे तो कामना से प्यार है। साध्य....! मानता हूँ पूर्णिमा का चाँद पूर्ण हो गया देखता वहाँ चरम विकास भी प्रकाश का, किन्तु क्या कभी मयंक ने विचार भी किया यह चरम प्रकाश है प्रथम चरण विनाश का, इस विकास औ' विनाश ने मुझे सिखा दिया, मिल गया उपास्य तो उपासना समाप्त है। इसीलिए मुझे उपासना से प्यार है। साध्य से नहीं मुझे तो साधना से प्यार है। बस
(६०)
चतुष्पदी
जिसको अपनाया स्वयं, उसको निभाना सीखो।
उसके दुख-दर्द में कुछ हाथ बटाना सीखो ।
भूमि पर मन्दिर औ मसजिद के बनाने वालो-
पहले
इन्सान बनाना सीखो।
इन्सान को
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"किन्तु कलाकार को कभी अपनी उद्विग्नता के कारण को न भूल
जाना चाहिये। तुम्हारी अाज की उद्विग्नता तुम्हारी दुर्बलता का प्रतीक
है । तुम कलाकार हो, कला का सृजन तो "स्वांतः सुखाय' होना चाहिये,
साथ ही यदि लोक-कल्याण की भी भावना हो तो अतीव सुन्दर है। कला-
अमूल्य वस्तु है । तुम संसार से अपनी कला का मूल्य मांगना चाहते हो।
तुम चाहते हो संसार तुम्हारी प्रशंसा करे । गौरव तो सभी को प्रिय होता है
किन्तु उसके लिए हमें स्वाभिमान न खो देना चाहिए । कलाकार का यह
महान् पतन है कि वह अपनी कृतियाँ लिये हुए इधर-उधर यश के लिए
व्याकुल
फिरा करता है। दीपक अपने स्थान पर जलता है, जिसे प्रकाश
की आवश्यकता होती है, वह दीपक को हाथों पर उठाकर बड़ी रक्षा के
साथ यहाँ-कहाँ ले जाता है। दीपक स्वयं नहीं घूमता । तुम कलाकार
हो, अपने विज्ञापन एवं प्रकाशन की चिन्ता न करो। संसार शलभ की
भाँति तुम्हारी प्रकाशमयी कविता पर स्वयं टूटने लगेगा । तुम कला का
सुजन करते रहो।"
-"कलाकार का पतन" से
श्री रामसनेही दीक्षित 'निज'
आपका जन्म २२ नवम्बर सन् १६१८ ई. में ग्राम बेला जिला
शाहजहाँपुर में हुआ था । श्रापके पिता का नाम पं० रामबिलास दीक्षित
है। काव्य के प्रति श्रापका अनुराग विद्यार्थी-जीवन से ही है। श्राप
अधिकतर भक्ति एवं समाज सम्बन्धी कविताएँ लिखते हैं । आप प्राचीन
★
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शैली के कवि हैं । घनाक्षरी और सवैया आपके प्रिय छन्द हैं। इस समय
श्राप पब्लिक हायर सेकेण्ड्री स्कूल पूरनपुर में अध्यापनकार्य कर रहे हैं ।
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गोकुल में प्रगटे मुरलीधर रास रचो ब्रज कुंजन में ।
नाग को नाथ बकासुर मारि बिहार कियो वन नन्दन में।
पाहुन जाय बने शबरी घर, धाय गये गज क्रन्दन में ।
चाल कुचाल हठी कपटी, मन मेरो करौ निज बन्धन में ।
कामना
तुम मानव हो संसार बीच पुरुषार्थ परम दिखलायो।
श्रीकृष्णचन्द्र के कर्मयोग को सभी आज अपनायो।
है यही कामना हम सबकी तुम सफल सभी हो जात्रो।
बन कर के अनुपम रख सभी निज देश-भाल चमकायो।
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पं० जागेश्वरदयाल त्रिपाठी
.
आपका जन्म ग्राम बनजरिया जि. पीलीभीत में बार (आश्विन)
सुदी ४ सं० १९७७ वि० में हुआ था। गृह की स्थिति ठीक न होने के .
कारण आपको उचित शिक्षा न प्राप्त हो सकी । मिडिल उत्तीर्ण करने के
उपरान्त श्राप व्यवसाय में लग गए । विद्यार्थी जीवन में दो चार कवि-
ताओं की रचना की, तदुपरान्त १९५० तक साहित्य-सेवा के रूप में कुछ न
लिख सके। किन्तु १९५० से अनुकूल वातावरण पर पुनः प्रयास प्रारंभ
किया । जो अब उत्तरोत्तर बढ़ता ही जा रहा है।
आपने प्राचीन कवियों के अनुसार सवैया छन्द को अधिक उपयुक्त
समझकर उसमें ही अपने भावों को बाँधा है । घनाक्षरी छन्द भी आपको
प्रिय है। आजकल आप लकड़ी का व्यवसाय करते हैं ।
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दुःख तुम्ही
प्रभु जानत हो सब मेरी व्यथा,
भव - सिन्धु से पार लगावन हारे ।
प्रहाद के दुःख तुम्हीं ने हरे,
तुम गीध अजामिल तारन हारे॥
पति राखत हौ तुम दीनन की,
नख पै गुरु . पाहन धारन हारे।
मट लाज रखी प्रभु द्रोपदि की,
तुम नाथ हौ कंस पछारन हारे ।
श्री नित्यानन्दजी शास्त्री “विनय विद्या का आभूषण है"-उक्ति के अनुसार शास्त्रीजी विद्वान् होने के साथ-साथ अत्यन्त विनम्र स्वभाव के व्यक्ति हैं । विनम्रता ने अापकी विद्वत्ता में चार चाँद लगा दिए हैं। श्रापका उपनाम "भानु" है । शास्त्रीजी का जन्म अपने जिले की प्रसिद्ध तहसील बीसलपुर (पोलीभीत ) में श्री पं० रामस्वरूपजी पाण्डेय के परिवार में जुलाई १६२१ को हुअा था। अाजकल पार "श्रीराम इण्टर कालेज" बीसलपुर में संस्कृत के अध्यापक हैं । वैसे आप सन् ४५ से अध्यापन कार्य विभिन्न स्शनों पर करते रहे हैं। आपने प्राचीन एवं अाधुनिक दोनों प्रणालियों में काव्य रचना की है । आपकी भाषा क्लिष्ट संस्कृतयुक्त रहती है। श्रापकी "गुरुशाला', "विद्याशाला" तथा "राधा स्तवन' अप्रकाशित पुस्तकें हैं। हे तान्ने ! कलंक मिटावन को, तव श्रानन अन्य शशांक बनो। टीको तह लाल गुलालन को, छलते छिटकावत भानु-भनो। रेखा जग खींच दिखावति है, कर कल्पित कर कलंक सनो। यों जानि परी जन आश्रित को, कर देत कलंकित नारि जनो। x देखौ भानु हरि-हर की विचित्र भिन्नता, श्याम तन वे इन कपूर सो सुहायो है। चन्द्र ऊपजे, बसायो इन चन्द्र भाल, गंगा प्रगटैया वे, इन गंगा शीश पायो है । रमापति कहाते वो, उमापति कहाते ये, वे तो शेषशायी, इन शेष लपटायो है । सागर के बसैया वे, सुमेरु के सुवैया ये, वंशी बजैया वे इन सीग ही बजायो है । x x
श्री गुणानन्द पाठक
पाठक जी का जन्म पीलीभीत नगर में चैत्र मास सं० १९८३ में
हुआ था । काव्य की ओर अधिक अभिरुचि होने के कारण आपको
परीक्षा में अनुत्तीर्ण होना पड़ा । फलतः अभिभावकों को ताड़ना से
अापको काव्य क्षेत्र से विमुख होना पड़ा और आपका काव्य संग्रह अापके
कण्ठ तक ही सीमित रहा । आपकी प्रारम्भिक रचनाएँ साम्प्रदायिक भावों
से पूर्ण होती थीं, किन्तु अाजकल श्राप शृंगार, भक्ति और हास्य ही
लिखते हैं । अापके गीत बड़े सरल होते हैं।
आप सरल भाषा का प्रयोग करते हैं और शुद्ध हिन्दी के पक्षपाती
हैं । फिर भी आपकी भाषा में यदा-कदा उर्दू के शब्द श्रा ही जाते हैं ।
नूरजहाँ का सौंदर्य
अरुण कपोल, मुख कमल सुरम्य गोल,
छाजत है पूर्ण इन्द्र-धनु सी नथुनियाँ ।
नयन युगुल दुई भ्रमर पराग रस,
लिपटे हैं भूलि सुधि-बुधि और दुनियाँ ॥
रति गॅथ-Dथ तारे, झूमर तिहारे रचे,
नील घन जैसी लहरावति उढ़नियाँ।
अधर सुधा-रस को चाहत करन पान,
दंतनि की दुति देति दमकि दमिनियाँ ।
।
श्री हरिश्चन्द्र 'मधुकर'
अापका जन्म ५ अक्टूबर सन् १९२६ ई० को स्थान पूरनपुर जिला
पीलीभीत में हुआ था। अापके पिता का नाम मूलचन्द है । बाल्यकाल ही
से आप अपना स्वतंत्र व्यवसाय करने लगे। पत्नी के देहावसान पर
श्रापके भाव मुखरित हो उठे जो बीजरूप में पूर्व से ही विद्यमान थे ।
"तुम गयीं गया सब कुछ मेरा केवल दर्दीले गीत रहे।"
सुमन के
श्राप ब्रजभाषा एवं खड़ी बोली दोनों में कवितायें लिखते हैं।
आपके कवित्त बहुत ही सरस होते हैं ।
प्रति
पायौ जो अनूप रूप रस गन्ध जोवन तौ,
जोई सोई अलिन हिये न बसिबो करौ।
डगर चलत परदेशी डगरोहिन के,
उर न चलाई नैन गांसी गसिबो करौ।
राखौ करौ पल्लवन श्रोट मेंदुराई अंग,
निस चाँदनी न ऊँचे चढ़ि लसिबो करौ।
'मधुकर' तेरे ही भले को समुझावै तुम्हें,
जाहि ताहि अागे न सुमन हँसिबो करौ।।
श्री शम्भूशरण जी अवस्थी, साहित्यभूषण
,
नगर के प्रतिष्ठित कवि श्री शम्भूशरण जी अवस्थी का जन्म वैशाख
कृष्ण नवमी सं० १६८३ वि० को हुअा था। आपके पिता श्री ख्याली-
राम जी अवस्थी 'ख्याली द्विज' एक अच्छे कवि हैं । अस्तु अवस्थी जी
के ऊपर अपने पिता का यह प्रभाव भी पूर्णरूपेण पड़ा।
आपकी प्रतिभा सर्वतोन्मुखी है । कविता,
कहानी, निबन्ध, एकांकी, नाटक आदि
साहित्य के विविध अंगों पर आपने बहुत कुछ
लिखा है । श्रापकी रचनाएँ “अधिकार"
(लखनऊ), "प्रताप" (कानपुर), "रानी"
(कलकत्ता ), "दीदी" ( इलाहाबाद ),
"नोक-झोंक" (आगरा) "मस्ताना जोगी"
(देहली),“कान्यकुब्ज" (लखनऊ), "सुकवि"
(कानपुर) आदि अनेकों पत्र-पत्रिकाओं में
प्रकाशित हो चुकी हैं । आपने नगर से “ज्योत्स्ना" नामक हस्तलिखित
मासिक पत्रिका का सम्पादन भी किया था।
आप शिष्ट हास्य के पक्षपाती हैं । हास्य रस की रचनाएँ 'हकीम जी'
एवं बहनोई जी' के उपनामों से लिखते हैं। आप स्थानीय हिन्दी साहित्य
परिषद् के कोषाध्यक्ष हैं और आल इण्डिया पोस्टल इम्प्लाइज़ यूनियन तृतीय
श्रेणी पीलीभीत के शाखा मंत्री हैं। श्रापकी कविताओं का संग्रह "श्रद्धा
के फूल" शीघ्र प्रकाशित हो रहा है।
श्राप कवित्त, सवैये, गीत, अतुकान्त छन्द अधिक लिखते हैं।
श्रापकी भाषा शुद्ध प्रसाद एवं माधुर्य गुणों से युक्त होती है । आपका
एक गीत उदाहरणार्थ नीचे प्रस्तुत है।
न जाने कहाँ चाँद मुस्का रहा है ?
पहिन श्याम परिधान मातम मनाने-
चले मेघ, अाया चला संग सावन ।
तड़पता हृदय देखकर दामिनी को,
उमड़ वेदना का रहा नीर प्लावन ।
अकेला, ( ६७ ) तिमिर का कफन शीश पर पूर्णिमा के, पड़ा देख जग शोक सा छा रहा है। जला सब सुखों का जवासा अरे अब, हगों में अँधेरा समाने लगा है। व्यथा कूककर कोकिला कह चुकी तो पपीहा विरह गीत गाने लगा है। अँधेरी डगर दूर पथिक डगमगाता चला जा रहा है। हँसी की किरण डूब दुःख कालिमा में, समाई न जुगनू बनेंगे सितारे। सिसकते अधर उर-उदधि में विकलता, अगम है न जिसके कहीं हैं किनारे। पड़ी मृत्यु की शान्त छाया अरे...... प्राण का दीप अपना बुझा जा रहा है। न जाने कहाँ चाँद मुस्का रहा है। x x x बात, समस्या पूर्ति भी आप अनूठे ढंग से करते हैं- रस है ज्ञानी का कथन है समाया ईख के समान रस, जीव ग्रन्थियों में ब्रह्म एक रस है। कवियों से पूछो तो करेंगे नौ रसों की विश्व हितकारी भक्त कहते भक्ति रस है। "शम्भू' बातून जानते हैं बात रस की बात यमुना के तीर वाला याद रास रस है। किसी पाक-शाला बीच षट्रस व्यञ्जन तो, मेरी घरनी को बड़ा प्यारा रामरस है ॥ "नवीन कवि' शीर्षक लेख में आप लिखते हैं : “यही दशा लेख लिखने वालों की हुआ करती है यदि उनमें अध्ययन की कमी है, विषयों का ज्ञान नहीं तो उनके पास है ही क्या ? ऐसी दशा में यदि वे उच्च विषयों पर अपने अल्प ज्ञान से लेखनी उठाते हैं वो यह अपनी अवता का ही प्रदर्शन करने बैठते हैं। -
श्री राजेन्द्रकुमार मिश्र 'भानु', विशारद
'भानु' जी का जन्म १ जनवरी सन् १६२६ ई० को पूरनपुर जिला
पीलीभीत के एक सम्पन्न परिवार में हुआ था । अापके पिता का नाम पं०
रामस्वरूप मिश्र है । बचपन से ही आपको साहित्य से रुचि रही है । साहि-
त्यिक समारोहों में श्राप तन-मन-धन से भाग लेते हैं । श्राप प्राचीन तथा
नवीन दोनों शैलियों में कवितायें लिखते हैं। आपकी रचनायें भाव-प्रधान
होती है । भाषा में प्रसाद गुण का प्राधिक्य है । मुहावरों का प्रयोग
काव्यश्री को और बढ़ा देता है । अापकी रचनायें समय-समय पर सुकवि
और माधुरी में निकलती रही हैं।
चकोर चाँद से
ऋद्धि-सिद्धि आजकल दासियाँ हुयी हैं सभी,
शत्रु भी तुम्हारे अब अनुकूलने लगे।
मद से प्रभुत्व में गयन्दक समान श्राप,
मन्द-मन्द श्रानन्द हिंडोले झूलने लगे।
रह न गया था शेष तुमको धरा पैं और
हमको ही शूल लेके व्यर्थ हूलने लगे।
दिन न रहे हैं सदा एक से किसी के व्यर्थ,
चार ही दिनों की चाँदनी पै फूलने लगे।
पाहन भी देख के द्रवित हो गया है हमें,
आपके रिंगी है अभी ज तक न कान पर।
जितनी महान याचनायें की गई हैं बस,
उतना ही चढ़ते गये हो अभिमान पर ।
मिलता न लेश अवकाश तुम्हें साथियों से
लाले से पड़े हैं किसी चाहक की जान पर ।
कौन सी सुरा को पी लिया है जो तुम्हारा सदा,
रहता दिमाग सातवें ही आसमान पर ।
.
।
श्री चण्डीशंकर शुक्ल जी स्व० पं० गुमानीलाल जी वैद्य के सुपुत्र श्री चण्डोशंकर शुक्ल का जन्म सन् १६२८ ई० में पोलभोत नगर में हुआ था । नगर कांग्रेस संस्था के कर्मठ कार्यकर्ता एवं सफल कवि श्री दुर्गाशंकर शुक्ल आपके अग्रज थे। शुक्लजी बाल्यकाल से ही स्वतंत्रताप्रिय एवं स्वेच्छाचारी रहे हैं । पाप बड़े विनोदी हैं । विद्यार्थी जीवन में अपने सहपाठियों के विनो- दार्थ श्राप शब्दों को छन्दबद्ध करके काव्य रूप में सुनाया करते थे । आचार्य पं० विश्वनाथ जी मिश्र के आशीर्वाद से शुक्ल जी एक सफल कवि बन गए। अापके सवैये एवं छन्द बड़े मार्मिक होते हैं । यद्यपि स्व० बाबू जय. शंकर प्रसाद जी से श्रापकी उपमा देना अत्युक्ति होगी फिर भी इतना अवश्य कहा जा सकता है कि शुक्ल जी की दूकान एक बार प्रसाद जी की सुरती की दुकान का स्मरण करा देती है। नगर के कलाकार सायंकाल आपकी दुकान पर प्रायः जमघट लगाए रहते हैं । श्रापकी दूकान 'प्रसाद' जी की दूकान कहलाती है। वसंत ऋतुराज का आगमन देख अरे, कलिका. भन में इठलाने लगी। खिलने लगे पुष्प नये-नये और, पिको कुहू तान सुनाने सुनाने लगी। अमराइयाँ आज रसाल की भी, निज अंक में बौर को लाने लगी। वर वायु वसंती चली और सृष्टि, वसंत के गायन गाने लगी।
श्री हरिश्चन्द्र मिश्र 'पंकज'
आपका जन्म ६ जनवरी सन् १६२८ ई० में पीलीभीत नगर में
हुश्रा । आपके पिता श्रीयुत ब्रजकिशोर जी मिश्र बहुत ही सरल एवं साधु
पुरुष हैं । पंकज जी बाल्यकाल से ही संगीत के प्रति अधिक अभिरुचि
रखते हैं । इनकी इस अभिरुचि ने इन्हें एक कवि बना दिया है। इनके
भावपूर्ण गीत जब इनके कोमल कंठ से निकलते हैं तो एक अनोखे
अानन्द की उपलब्धि होती है। आप अधिकतर गीत ही लिखते हैं ।
अापकी भाषा सरल और जनसाधारण की बोल-चाल की भाषा
होती है । इस समय आप स्थानीय तहसील में एकाउण्टेण्ट हैं ।
प्रीत बड़ी श्रासान, निभाना अति दुष्कर है।
मरना है अासान, जिलाना अति दुष्कर है ।।
चाँद खिलखिलाकर तारों से करे प्रीत की बातें।
किन्तु बनी अभिशाप चकोरी को पूनम की रातें ।
खा-खाकर अंगार जलाया उसने अपना तन-मन ।
किन्तु तुझे पाषाण रुलाना अति दुष्कर है ।
मरना है अासान, जिलाना अति दुष्कर है।
मृत्यु जन्म की
पूरक है यह सभी मानते श्राये।
साँस बुलबुला है धोखा है सभी जानते आये ।
फिर भी तो अभिमान रूप, धन पर करते फिरते हैं ।
विष पीना आसान, पचाना अति दुष्कर है।
मरना है आसान, जिलाना अति दुष्कर है।
श्री तारानाथ अवस्थी
घुघचाई जिला पीलीभीत निवासी पं० श्यामलाल अवस्थी के यहाँ
आपका जन्म जनवरी १९२६ ई० को हुश्रा । आपने हाईस्कूल तक शिक्षा
प्राप्त की है। काव्य की प्रेरणा का श्रेय श्राप श्री बन्धुजी को देते हैं और
इस नाते उन्हें अपना गुरु मानते हैं । आपने फुटकर छन्द और गीत लिखे
हैं । जिनमें हृदय-स्पर्श करने की पूर्ण क्षमता है।
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जागरण का देकर संदेश,
उषा क्यों चल दी अपने देश !
तुमने स्वयं किसी की दुनिया रचकर अपने हाथ बिगारी,
तुमने ही झुलसा दी कितनों की पुष्पित फलती फुलवारी,
प्रहरी प्रणयोन्मत्त प्रपंची, परमारथी
प्रणीत पुजारी,
कुछ तो लिए खुमार
नयन में कुछ आशाएँ शेष !
उषा क्यों चल दी अपने देश !!
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अाज रण मध्य पार्थ सामने खड़ी है चमू,
स्वजन सभी हैं मुझे कोई न बिराना है।
बोले पाण्डु-पुत्र दीनबन्धु यह बतायो हमें,
यहाँ किस हेतु रार किससे बढ़ाना है।
गद्गद् कएठ
सव्यसाची को निहार प्रभु
सोचने लगे कि पाठ गीता का पढ़ाना है।
मान सर्वव्यापी मुझे
घमासान युद्ध कर,
श्राना है जिसे उसे अवश्यमेव जाना है।
डा० लक्ष्मीकान्त मिश्र 'कौशल' एम० बी० बी० एस०, एच० एम० बी० एस०, साहित्यरत्न अापके पूज्य पिता श्री बालमुकुन्द मिश्र विद्यालंकार, शास्त्री "मधुर" स्वयं एक अच्छे कवि हैं । इन्दोंने श्री चण्डीचक्रस्तोत्र, विद्यावती एवं विदुलावती नामक पुस्तकें लिखी हैं । श्री "कौशल जी डाक्टरी पास करके अपने पिता के साथ ही कार्य करने लगे। इसी बीच श्रापकी नियुक्ति स्टेट हास्पिटल देवास (इन्दौर) में हुई । तदुपरान्त धामपुर के दातव्य औषधालय में चले गए। आज- कल अापने स्वतंत्र चिकित्सालय प्रारम्भ किया है। श्राप नगर के योग्यतम चिकित्सक, समाजसेवी एवं हिन्दी के अनन्य प्रेमी हैं। आप इस समय "विधवा का स्वप्न" नामक सामाजिक उपन्यास लिख रहे हैं । अापने फुटकर कविताएँ भी पर्याप्त लिखी हैं ।
कविता
शतशः प्रणाम तुमको, सर्वेश दीनबन्धो।
हे विश्व के विधाता, अव्यक्त सौख्य सिन्धो ।
हे श्रात्म-भू विधाता, हम सब के तुम पिता हो,
हम बन्धु हैं परस्पर हम सबमें एकता हो ।
"कौशल" तेरा सहारा, विश्वास है हमारा,
अज्ञान नाश होकर, कल्याण हो हमारा।
अच्छे हैं या बुरे हैं, सन्तान हैं तुम्हारी,
कर-बद्ध प्रार्थना है रक्षा करो
हमारी ॥
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डा० रमेशचन्द्र गर्ग
अलीगढ़ मुहल्ला मामू-भाजा के निवासी लाला केदारनाथ के सुपुत्र
डा. रमेश चन्द्र गर्ग को जन्म ८ जुलाई सन् १६२६ को हुा । आपकी
प्रारम्भिक शिक्षा उझियानी, जिला बदायूँ में हुई। काशी विश्वविद्यालय
से आपने ए० एम०, एम० एस० की उपाधि सन् १९५० में ग्रहण की। .
काव्य की प्रेरणा प्रापको विद्यार्थी जीवन से ही मिली है । आपका जीवन
सतत संघर्ष में ही व्यतीत हुप्रा है । प्रारम्भ में आपने लिखा था-
"ग्राओ हम तुम मिलकर साथी ऐसा खेल रचायेंगे।
तरु पल्लव की शाखाओं में सुन्दर महल बनायेंगे ||"
इस समय श्राप ललितहरि आयुर्वेदिक कालेज, प.लीभीत में
प्राध्यापक हैं।
मरघट में जल रही चिता है धधक रहे अरमान किसः के।
तुम सुन्दर हो. इसीलिये, कि मैंने तुमको प्यार किया है।
a
श्री
कृष्णकुमार श्रोत्रिय, B.
Com.
श्रोत्रिय जी का जन्म ३ जुलाई, सन् १६३१ को मुरादाबाद जिले में
हुअा था । अापके पिता का नाम माखनलाल श्रोत्रिय है।
श्रोत्रिय जो की अभिरुचि साहित्य की ओर पहले से ही थी, किन्तु
अभिभावकों द्वारा कामर्स की शिक्षा प्राप्त करने के लिये बाध्य होने के
कारण आपको अपने हृदय के विरुद्ध संघर्ष करना पड़ा और सफलता-
असफलता की धूपछाँह जीवन-मार्ग पर निरन्तर आती रही .
सन् १६५५ ई. में अन्तरतम में छिपा हुआ काव्य-स्रोत पुनः
स्फुरित हो उठा । फलतः आपने अनेकों कवितायें लिख डालों, किन्तु
सारी काव्य-सामग्री अग्नि में जल जाने के कारण अब केवल अल्पसंख्यक
गीत शेष रह गये हैं।
इस समय आप जनता उच्चतम माध्यमिक विद्यालय पूरनपुर में
कार्य कर रहे हैं । आपकी भाषा बड़ी ही सरल होती है । आपने सर्वत्र
खड़ी बोली का प्रयोग किया है। आप हास्य रस की भी अच्छो कविता
लिखते हैं।
गीत
प्रणय-पंथ पर जब बढ़े हैं चरण यह सदा बढ़ रहे और बढ़ते रहेंगे।
रात्रि की कालिमा में उषा झाँकतो
हार के प्रावरण में विजय हँस रहो।
है मरण के परे जिन्दगी नित नई
यह चिता की लपट मुस्करा कह रही।
याद मधुमास की है शिशिर दे रहा
यह लतायें विटप से गले मिल रहीं।
ले यही कामना स्वप्न मेरे मधुर हैं सदा पल रहे और पलते रहेंगे:
प्रणय-पंथ पर जब बढ़े हैं चरण यह सदा बढ़ रहे और बढ़ते रहेंगे ।
श्रीमती मनसा देवी शुक्ल, विशारद
आपका जन्म श्राज से २५ वर्ष पूर्व कानपुर नगर में हुआ था।
श्रापके पिता का नाम पं० रामबिलास जी मिश्र है। श्राप हमारी हिन्दी.
साहित्य परिषद् के अध्यक्ष तथा सुपरिचित कवि श्री गणेशशङ्कर शुक्ल
"बन्धु" की धर्मपत्नी हैं। आपके साहित्यिक जीवन का समारम्भ पति के
संसर्ग में हुश्रा। आप हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग की मध्यमा परीक्षा
उत्तीर्ण कर गृहस्थ जीवन में लगी हुई हैं। आपके जीवन में श्रापकी एक
सहेली गायत्री देवी अग्रवाल का अधिक प्रभाव पड़ा, जिसके वियोग में
आपने "सहेली के नाम पत्र" नामक एक पुस्तक लिखी है। आपकी
कहानियाँ बड़ी भावपूर्ण होती हैं । अापकी कविताएँ अधिकतर अपनी
सहेली एवं पति के लिए ही लिखी गयी हैं। आपकी भाषा सीधी-सादी
बोलचाल की भाषा है।
नयनों में मेरे प्रियतम,
मूंद कर सोये।
मैं शीतलता पहुँचाती,
वारुणी कपोल .भिगोये।
हैं पलक
x
x
X
आँखों से मोती लेकर,
अञ्चल में अपने भरती।
एकान्त समय को पाकर,
मैं उन्हें पिरोया करती।
निज प्रियतम के आने पर,
जयमाला।
पूरी होंगी श्राशाएँ,
होगा चहुँ ओर उजाला।
पहनाऊँगी
श्री ओमप्रकाश सक्सेना श्री ताराचन्द जी सक्सेना के पुत्र श्री ओमप्रकाश सक्सेना का जन्म २४ जौलाई सन् '३२ ई० को पूरनपुर (जि. पीलीभीत) में हुआ था । श्राप इस समय अार्य पाठशाला पूरनपुर में अध्यापक हैं । बाल्यकाल में श्रापकी रुचि नाटकों में अधिक रमली थी। फलस्वरूप आपने "अमर शहीद अरुण” नामक एक नाटक लिखा था, जिसमें देश की तात्कालिक परिस्थिति का अच्छा चित्रण किया गया है। इस नाटक में नवयुवकों के प्रति एक संदेश है । भाषा जनसाधारण की भाषा है । तृतीय दृश्य अरुण-लक्ष्मी, टकसाल में छपे करेंसी नोट का नाम नहीं है सुरेन्द्र ! हमारे लाखों-करोड़ों देशवासी अपना खून - पसीना एक करके जो उपजाते हैं वह है लक्ष्मी, वही है धन-दौलत । हमारे गौराङ्ग प्रभु आज इसी मेहनत को चूस रहे हैं । हिन्दुस्थान कंगाल बन रहा है और इंगलिश्तान में सोना इकट्ठा हो रहा है । इस लूट को रोकना होगा। सुरेन्द्र-लेकिन उसके लिए शक्ति । अरुण-शक्ति कुछ नहीं | घर-घर में एक ऐसी आग जल उठेगी, जिसमें इनकी मशीनगर्ने धरी की धरी रह जायेंगी। प्रत्येक भारतीय बालक शेर का बच्चा बन जायेगा । गोली का जवाब गोली से दो सुरेन्द्र, फिर देखो यह मुट्ठी भर अंग्रेज अपना बिस्तर.......। सुरेन्द्र किन्तु हथियार कहाँ से आगे ? अरुण-सुरेन्द्र ! न हथियारों की कमी है और न रुपयों की, यदि कमी है तो सिर पर कफन बाँधकर घूमने वाले नवजवानों की । हमारे नवजवान नारी के प्रेम पर मर मिट सकते हैं लेकिन मातृभूमि का प्रेम उनमें बलिदान की भावना उत्पन्न नहीं कर सकता, इसीलिए हम आज तक गुलाम हैं ।
( ७७ ) सुरेन्द्र-नहीं अरुण ! देश में ऐसे नवजवानों की कमी नहीं, जो बलि- वेदी पर हँसते-हँसते प्राण निछावर कर देते हैं। तेल से लबालब भरे दीपकों की कमी नहीं है। कमी है तो उस मशालची की जो इन दीपकों को जला दे। x -'अमर शहीद अरुण' x x श्री वीरेन्द्रस्वरूप पाठक 'निर्भर' x x निझर जी का जन्म श्रावण कृष्णा पञ्चमी सम्बत् १६८६ विक्रम में ग्राम मुड़िया हुलास जिला पीलीभीत में हुआ था । अापके पिता पं० भैरोंप्रसाद जो पाठक हैं। श्रापको सन् १६४८ ई० में स्वतन्त्रता की प्रथम जयन्ती पर लिखी गयी कविता पर पुरस्कार प्राप्त हुआ था । विद्वानों के संसर्ग में आकर कवि के विचारों में परिपक्वता आई और भाषा परिष्कृत होती चली गयी। नवीन एवं प्राचीन दोनों शैलियों में श्राप रचनाएँ करते हैं तथा भाषा में संस्कृत के तत्सम शब्दों का बाहुल्य रहता है । इस समय 'निर्भर' जी स्थानीय दुग्धेश्वर संस्कृत महाविद्यालय में अध्यापक हैं । + कमनीय केकियों के कलकंठ क्लान्त करि, कोकिला की काकली ही कूजत दिगन्त है। चम्पक चमेली कञ्ज केवड़ा कुमुद नाशि, ढाक श्रो गुलाब गेंदा कियो रूपवन्त है ।। एक ओर रो रहे हैं, नग्न तरु दो-दो बंद, एक ओर पल्लव-प्रसून पालवन्त है। मेरे उर-अन्तर तो होलिका का दाह - चण्ड, किन्तु तुम कहते हो सरस वसन्त है। "मैं युगों से जी रहा हूँ" व्यर्थ की श्राशा सँजोए, मैं युगों से जी रहा हूँ। X X x
"
(७८)
कब शलभ की वेदना पर दीप-उर में श्राह श्राई ,
फेंक कर निर्भर कणों को सानु गिरि की मुस्कराई।
चक्रवाकी की उर-व्यथा पर कब निशा ने जल बहाया
यात पपिहे की पुकारों पर जलद कब तरस खाया ।
पाप है पाकर व्यथाओं को व्यथित हो धैर्य खोना
पूर्णतः अभिशाप है दुख में दुखित हो रंच रोना ।
श्राँख में दुख से उमड़ते चिह्न निष्ठुर जग न देखे ,
इसलिए ही अश्रुअों को मैं दृगों से पो रहा हूँ।
मैं युगों............।।
श्री कृष्णस्वरूप पाण्डेय 'निर्बल'
श्री कन्हैयालाल पाण्डेय के सुपुत्र 'निर्बल' जी का जन्म माघ शुक्ल
अष्टमी सम्वत् १९८६ को शाहजहाँपुर में हुआ था। आपकी अधिकांश
★
शिक्षा पीलीभीत में हुई । अाजकल श्राप बरेली कालेज में विद्याध्ययन कर
रहे हैं। साहित्य की ओर अापकी रुचि बाल्यावस्था से ही है जो अब
- (७६) रहे प्राण मेरे! , में - क्रमशः विकास के पथ पर है। आपके प्रिय रस शृगार एवं हास्य हैं । आपने गीत, कवित्त, सवैया अादि विभिन्न छन्दों में अपनी लेखनी उठाई है। खड़ी बोली एवं ब्रजभाषा दोनों का आपने सफल प्रयोग किया है। श्राज- कल श्राप 'वियोगी शतक' एवं 'गोपी विरह लिख रहे हैं। आपकी रचनाएं सुकवि, रसराज, प्रताप साप्ताहिक एवं कान्यकुब्ज श्रादि में प्रकाशित हो चुकी हैं। श्राप उदीयमान कवि के साथ-साथ एक सफल कथाकार भी हैं। बुझी दीपिका जल सजनि की सलोनी लिए याद उर में उमङ्गे अनूठी उठीं अाज मन में , निठुर प्रियतमा की प्रतीक्षा करूँ मैं कली सी खिली थी कभी जो चमन नहीं किन्तु दर्शन हुए अाज तक हैं बसी भावना बन हृदय के गगन में , दृगों से चले अश्रु रूठे हुए नहीं हो सके हैं अभी गान पूरे ! बुझी दीपिका जल रहे प्राण मेरे !! नहीं जानता था लगन यह समय की मिटेगी कहानी हमारे प्रणय की जगत अाज सूना मुझे लग रहा है नहीं प्राश है और सुखमय मलय की हृदय में सँजोये प्रणय और प्रियतम बुझी वर्तिका रात रोती रही है हुअा प्रात ऊषा विहँसती चली है रहे किन्तु अरमान अपने अधूरे । बुझी दीपिका जल रहे प्राण मेरे !! से , " , गद्य खंड "देखो, जिस प्रकार सागर की उत्ताल तरङ्गों में नाव को एक माँझी के साथ की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार मेरे साथ की अपेक्षा बड़े- बड़े कलाकार करते हैं । तुमने तो कल इस क्षेत्र में पैर रक्खा है । सांसा- रिकता से बचो, पर इस प्रकार नहीं कि अपने विचारों में उलम जानो। विद्वान् , दूरदर्शी, लेखक विश्व की प्रति वस्तु में मुझे पाते हैं। मुझ पर
अाश्रित रहकर ही कोई कलाकार कला को पा सकता है । मेरा नाम प्रेरणा
है, सुना कलाकार!
तो तुम्ही प्रेरणा हो?
हाँ, मैं ही प्रेरणा हूँ।
कलाकार ने दौड़कर प्रेरणा को बाहुपाश में भर लिया। उसके नेत्र
गोले थे। प्रेरणा का भी सारा अञ्चल भीग गया था।
अरे ! तुम रो रहे हो कलाकार । शान्त हो । मेरी ओर देखो, कला
का आवाहन करो।"
----
श्री रमेशचन्द्र त्रिवेदी 'पुष्प
"पुष्प" जी का जन्म फाल्गुन शुक्ल पक्ष सप्तमी सं० १६८६ वि.
को स्व० श्री बहादुरलालजी त्रिवेदी के यहाँ हुअा था । पिता के हृदय ने
बालक को बड़ी आशाओं से पाला, किन्तु देव "मेरे मन कछु और है, कर्त्ता
कछु और" । पिता की असामयिक मृत्यु ने
बालक के जीवन-विकास
( ८१ ) को सीमित कर दिया। फिर भी आर्थिक अभाव के वातावरण में किसी न किसी प्रकार खिलता हुआ यह “पुष्प" माँ भारती के चरणों में अपने को अर्पित करने की चेष्टा में लगा ही रहता है। "पुष्प" जी विद्यालय में होने वाले साहित्यिक आयोजनों में अपने गुरुजनों द्वारा दी गयी कविताओं का सस्वर मधुर पाठ करने में सिद्ध कंठ थे। उनके यही संस्कार भावी जीवन में उन्हें काव्य की ओर ले चले। आपकी कविताओं का विषय प्रधानतः “हिन्दू राष्ट्रीयता" होता है, जिसमें भारत के प्राचीन सांस्कृतिक भावों का मोह परिलक्षित होता है । भावानुसार भाषा भो भोजपूर्ण एवं उत्तेजक होती है । आजकल "पुष्प" जी नगरपालिका पाठशाला पीलीभीत में अध्या- पक हैं तथा स्थानीय हिन्दी साहित्य परिषद् के प्रचार मंत्री के रूप में भी श्राप स्तुत्य कार्य कर रहे हैं । गीत 'चला हूँ मधुर गीत गाकर, जगत को जगाने, मैं यह जीर्ण वीणा बजाने चला हूँ। न है राग अावाज, और भाव कुछ भी, यह माँ का रुदन मैं सुनाने चला हूँ। X x x " जीवन । मेरे मन बसी मातृ-भक्ती सदा से, चढ़ाता चरण मातु मैं "पुष्प" चढ़े आज जन जन का, जीवन कुसुम सम, यही भावना उर बसाने चला हूँ॥ x x X जगीं भाव से यदि नहीं भावनाएँ तो फिर खड्ग कर में उठानी पड़ेगी। खड़ी भारती है लिए हाथ खप्पर, प्रलय-गीत गा, अरि जगाने चला हूं कवि जाग उद्बोधित कर दे जन समाज | कवि जाग जाग अब जाग ।।
( ८२ )
नव मादक मधु स्वप्न सजाना
मोह मत्स्य
प्राजस्य भगाना।
त्याग नायिका भेद सखे तू ,
गान जागरण सुना श्राज॥
कवि जाग जाग अब जाग ।
उद्बोधित कर दे जन समाज ॥
----
श्री रामकृष्ण मिश्र
phe
मिश्रजी का जन्म आश्विन कृष्ण ७ सं० १६६० वि० को पीलीभीत
नगर में हुआ था। श्राप पं. रामस्वरूप मिश्र के सुपुत्र
सन् १९५२ ई० में आपने कुछ काल के लिये बरेली में निवास
किया, जहाँ पर बाबू रामजीशरण तथा श्री निरंकारदेव सेवक के सम्पर्क
में आकर श्रापके हृदय से काव्य-श्रोत उमड़ पड़ा तब से श्राप निरन्तर
साहित्य-सेवा कर रहे हैं ।
आप नवीन एवं प्राचीन दोनों शैलियों में कविता करते हैं, जिसमें
आपके गीत बड़े मधुर होते हैं । भाषा में प्रभाव एवं सरलता अापकी विशे-
पता है।
वंदना
दीनन को दुःख हरौ, अवनि को भार धरो,
प्रेमिन सों प्रेम करौ देवि महादानी हौ।
पढ़ो नाहिं कोऊ नथ कट किस भाँति पंथ,
साथ नहीं साधु संत, बुद्धि मों समानी हो ।
जानि या तिहारी रीति, कामना बिसारी प्रीति,
काल सों न खावौं भीति, कीरति बखानी हो ।
गति है बेढंगी और नाहिं कोऊ संगी मातु,
बारो या उबारो तुम शारदा भवानी हो ॥
श्री राधारमण त्रिवेदी 'रम्मन' बी० ए० नगर के उदीयमान कवि श्री राधारमण त्रिवेदी का जन्म ११ जुलाई सन् १६३४ को मोहल्ला केसरीसिंह में हुआ था। आपके पिता का नाम पं० रामलाल त्रिवेदी है। प्रारम्भिक शिक्षा घर पर ही समाप्त करने के पश्चात् आपने इण्टर की परीक्षा बरेली कालेज बरेली से उत्तीर्ण की। बरेली कालेज में प्रवेश लेने के पश्चात् अापके अग्रज श्री रामकुमार त्रिवेदी का, जो एक सफल कवि थे, देहावसान हो गया । अस्तु, रम्मन जी 109 को अपनी शिक्षा स्थगित करनी पड़ी, किन्तु शिक्षा एवं साहित्य के प्रति आपकी अभिरुचि अधिक होने के कारण आपने फिर अपना अध्ययन प्रारंभ किया और आगरा विश्वविद्यालय से हिन्दी में विशेष योग्यता प्राप्त करके कला के स्नातक की उपाधि प्राप्त की। कालेज जीवन में साहित्याचार्य डा० रामासरे मिश्र तथा डा. ए. के० दास गुप्ता की प्रतिभा ने श्राप पर ऐसा प्रभाव डाला कि आपके अन्तस्तल से काव्य-स्रोत स्फुरित हो उठा और आप इन श्राचार्यों के , ( ८४ ) प्रिय पात्र बन गये। श्राज इन्हीं प्राचार्यों का आशीर्वाद है कि 'रम्मन' ऐसे कवि पर पीलीभीत नगर को गर्व है। इस समय आप न्यायाधीश के कार्यालय में कार्य कर रहे हैं । श्राप एक सफल कवि एवं कहानीकार हैं और प्राचीन एवं आधुनिक दोनों शैलियों में कविताएँ लिखते हैं । 'रम्मन' जी की रचनाओं में मधुरता एवं सरसता प्रमुख रूप से पाई जाती है। आपका शब्द-चयन बड़ा ही मधुर एवं हृदयग्राही होता है। काव्य में सरसता लाने के लिए श्राप कभी- कभी खड़ी बोली के कर्कश शब्दों के स्थान पर ब्रज भाषा के कोमल शब्दों का प्रयोग करते हैं। 'जागरण', 'चिरमिलन', 'समाधि-दीप', 'शंकर का विषपान' आदि आपकी ख्यातिप्राप्त कविताएँ हैं। कवि सम्मेलनों में श्रोता लोग आपको मंच से उठने नहीं देते । अाजकल श्राप 'दो वचन' खंडकाव्य की रचना कर रहे हैं । अापका कथन है- प्यार की हर घड़ी, है युगों से बड़ी, प्यार ही जिन्दगी का सखे सार है। मेघ कर दें बरस पूर्ण धरती सरस पर बुझी चातकी की कहीं प्यास है ! जीव चाहे करे मृत्यु का ही वरण पर शरण को गहे स्वाति की श्रास है। डोलती है पवन, डोलता कुज वन , खिल रहा है सुमन, प्यार साकार है । कराटकों में पली मुस्कराती कली भौंर का गेह है, प्राण का द्वार है। शूल की राह में, प्यार की चाह में, हर कली की चटक एक झंकार है। प्रगविवाद की ओर अग्रसर होते हुए 'रम्मन' जी लिखते हैं- कवि प्राज अनूठा गीत धरती मुस्काये, अम्बर सारा नाच उठे , हो जायँ सरस मधु से फिर तारों की गलियाँ । चाँदनी किरण के पंख फुलाकर विहगों से- तरु की छाया में श्राज मनायें रंगरलियाँ अँगड़ाई ले कोकिल फिर पंचम स्वर गाये , गुन-गुन-गुन गाती फिरे अरे अलि की टोली । सुकुमारी लतिकाएँ सिमटे तरु-अंचल में , सिरमौर बनें वे कोमल कुसुमित सी कलियाँ । , - सुना !
, में फूल कर अरु (८५) ढपली ढोलक अरु मुन-मुन करती कामों पर बाँसुरिया की धीमी ध्वनि में , हो जाँय मल्हारे, सावन के फिर गीत छिड़े 'वीरन श्राश्रो' रखिया बाधू 'कँगना लूगी 'सब मोल चुका दूंगा बहिना' सुन बगिया खिलें। पड़ जायँ हिंडोले उपवन की फिर डालों में पैंग बढ़ायें श्रामिनियाँ। छुन छुन करती बाजे पायलिया आँगन में, 'घर आये मेरे कन्त' कहें फिर कामिनियाँ। कवि आज अनूठा गीत सुना। समस्या पूर्तियाँ भी श्राप बड़े अनूठे ढंग से करते हैं- केहि कारन डोलत नींद भरी कजरारी दुर्यो अलि नैननि ते अरु कुकुम की बिंदिया बिगरी । केहि तोरी सखी सुठि भामनियाँ मृदु माल अरी मुतिया न लरी। किन मोहि लियो मन मोहनियाँ तोहि कौन अरे छलिया ने छरी । अलसात जिया कछु दीठि परै केहि कारन डोलत नींद भरी ॥ केहि भाँति कहौं सुनु साजनियाँ सखि लाज के मारे हौं जाति मरी। जेहि चीर हो जमुना तट पै बरजोरी करी बहियां पकरी । अोहि नैननि मोहिनि डारि छर्यो तब ते दृग लागे न एक घरी । सखि रैनि जगी हौं कदंब तरे यहि कारन डोलत नींद भरी । श्री चन्द्रभाल पाण्डेय पाण्डेय जी का जन्म सं० १६६२ में पीलमीत नगर के एक कुलीन ब्राह्मण परिवार में हुआ था । आपके पिता का नाम श्री उमाशंकरलाल है। हाई स्कूल परीक्षा उत्तीर्ण करने के उपरान्त श्रापको एक वर्ष तक ननिहाल में रहना पड़ा और वहाँ श्री वंशीधर जी शुक्ल के सम्पर्क ने श्रापके हृदय में कुछ लिखने की प्रेरणा उत्पन्न की जो श्राज भी आपको निरन्तर.उस दिशा में ले जा रही है।
( ८६ ) सुकुमार भावों को प्रकाशित करने वाली श्रापकी सरस भाषा आपके अन्तर की वेदना और निराशा को कहाँ तक सँभाल सकी है, यह नीचे की कविता से देखा जा सकता है। अन्तिम साँसें गिनकर मेरी, दीवारों से मत टकराना । कुछ कहना कह लो मुझसे, फिर मत पीछे से पछताना ।। x x x दुनियाँ मुझसे कहती आई कवि निर्मोही है दीवाना। तुम्ही बताओ मैंने तुम पर कब अधिकार किया मनमाना। तुम भी जग-सम निष्ठुर होकर मुझ पर पत्थर मत बरसाना। जो कुछ" जब मरघट में मेरी, प्रेयसि ! धू-धू करके चिता जलेगी, और तुम्हारी उसी राह से , सज कर जब बारात चलेगी। तुम्हें कसम है मेरी होकर मुझ पर आँसू मत बरसाना । x x x श्री हरिश्चन्द्र शुक्ल 'वज वज्र जी का जन्म २४ अगस्त सन् १९३४ में ग्राम मरौरी जिला पालीभीत में हुआ था। परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक न होने के कारण मिडिल पास करने के पश्चात् आपने ट्यूशनों द्वारा धनोपार्जन करके परि- वार के भरण-पोषण का भार अपने ही कन्धों पर संभाला और स्थानीय रामा इण्टर कालेज से इण्टर की परीक्षा उत्तीर्ण की। इन कठोर परिस्थि- तियों ने कवि की कोमल कल्पनाओं और भावुक भावनाओं को कुंठित कर दिया। सम्भवतः इसीलिए आपने अपना उपनाम 'वज्र' रक्खा। मद्यनिषेध पर अापने बहुत कुछ लिखा है। आपकी भाषा जन- साधारण की भाषा है जिसमें उर्दू के प्रचलित शब्दों का प्रयोग अधिकता ( ८७.) से मिलता है और यदाकदा आंग्ल भाषा का सहारा भी आपकी कविता में सौन्दर्य ले श्राता है। अाजकल आप पीलीभीत तहसील में जमीदारी उन्मूलन विभाग में कार्य कर रहे हैं। गीत त्यागँ किसे, किसे अपनाऊँ, सारा जग निमूल बटोही ? एक डाल में ही पुष्पित हैं जहाँ फूल औ शूल बटोही ! सन् सन् कर समीर का झोंका जब मलयागिरि से आता है। जीवन को जीवन कर देता- जीवन सरस बना जाता है। वही तनिक ऊषणता पाकर , लू का रूप धरा करता है। जो जीवन देने वाला है, जीवन वही हरा करता है। भी रहे अनुकूल हमारे, वही आज प्रतिकूल बटोही ? त्यागँ किसे, किसे अपनाऊँ, सारा जग निमूल बटोही ! १ श्री सुदर्शन मिश्र बी० ए० । मिश्र जी का जन्म श्राज से २१ वर्ष पूर्व पं० कृष्णस्वरूप मिश्र के यहाँ हुश्रा था । अपने स्नातक की उपाधि हिन्दी, अंग्रेजी और दर्शनशास्त्र लेकर प्राप्त की। विद्यार्थी जीवन में कविवर 'प्रसाद' और 'निराला' की साहित्यिक कृतियों का अध्ययन करके आपके हृदय में और कुछ जानने की जिज्ञासा जाग्रत हो उठी और काब्यस्रोत प्रवाहित हो चला। श्रापकी कविताओं में उपरोक्त दोनों कवियों का प्रभाव स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है । भाव को गहनता के साथ-साथ भाषा भी कुछ क्लिष्टता लिए रहती है, जिसे मिश्र जी अपनी निर्बलता मानते हैं । निराशा के प्रत्येक कक्ष में मिश्र जी को अाशा के दर्शन होते रहते हैं। अाप अाशावादी कवि हैं, जैसा कि उनकी रचना से स्पष्ट है। इस समय आप श्री दुग्धेश्वर संस्कृत महाविद्यालय में अध्यापन कार्य कर रहे हैं । अापका निवासस्थान स्थानीय मोहल्ला आसफजान में है।
(८८ )
गीत
मानता हूं मैं मरण को ही वरण करना पड़ेगा ,
पर कभी क्या जिन्दगी का काफिया यूँ रुक सकेगा ?
क्या घटा घनघोर भी हर दीप्ति दिनकर की सकेगी।
क्या अमा काली छपाकर छवि सदा को छीन लेगी ?
पृष्ठ अन्तिम क्या मनुज इतिहास का आकर रहेगा ?
क्या मरण जड़, पथ कभी भी जिन्दगी का, रोक देगा ?
मौत सारी जिन्दगी को क्या कभी भी जीत लेगी ?
क्या प्रलय भय से उमड़ती सृष्टि जग की रुक सकेगी ?
कब रुका उन्माद यौवन का, जरा भय से, मरण से ?
कब कली की गति रुकी है देख ढेरों पुष्प झड़ते ?
त्यागते कब पल्लवों को, तरु-लता पतझार-भय से ?
कब तमिस्रा घोरतम भी जीतती लघु तारकों से ?
बँडहरों के अट्टहासों से महल कब ढह सके हैं ?
कब प्रगति के पंथ, दृढ़ प्राचीर में बँध रह सके हैं ?
दी चुनौती कब न ऊषा ने निशा को मुस्करा कर ?
कब निराशा, दृष्टि में आई, क्षितिज से हार खाकर ?
मान लूँ मैं हार कैसे जिन्दगी की मौत से फिर ?
जिन्दगी है गति विकसती, मौत केवल विन्दु सुस्थिर ?
जिन्दगी को समझने वाला मरण से कब डरेगा ?
पा मरण-विश्राम क्षण भर, जिन्दगी-पथ पर बढ़ेगा !
मानता हूँ मैं मरण को ही वरण करना पड़ेगा
पर कभी भी जिन्दगी का काफिला क्या रुक सकेगा?
श्री प्रकाश चन्द्र त्रिपाठी 'मधुर' आपका जन्म १५ सितम्बर १६३६ ई० को पीलीभीत नगर में हुआ था। आपके पूर्वज संस्कृत के परम विद्वान् थे, अतः आपकी प्रारम्भिक शिक्षा संस्कृत से ही प्रारम्भ की गई। प्रथमा परीक्षा उत्तीर्ण करने के पश्चात् आपने स्थानीय रामा इण्टर कालेज से इण्टर परीक्षा उत्तीर्ण की। विद्यार्थी जीवन से ही अापने गीत लिखने प्रारम्भ कर दिये थे । आपके गीतों में वेदना और टीस भरी हुई है । भावुक कल्पना ही आपके ★ गीतों की मुख्य देन है। आपको अभिरुचि जितनी काव्य की ओर है; उतनी ही कहानियों की ओर भी। "सागर में तूफान","भाँवरें","अाशा" अापकी सुन्दर कहानियाँ हैं। इस समय श्राप सुहाग नामक सामाजिक उपन्यास लिख रहे हैं। श्रापके मधुर कण्ठ-स्वर ने आपके कविता-पाठ में और भी चार चाँद लगा दिए हैं। इस समय आप स्थानीय विक्री कर कार्यालय में कार्य कर रहे हैं।
(१०) गीत तुम भी जी भर मुस्का लेना। डालें। , बालें। " १ जिस दिन मेरे शव पर सब मिल बेरहमी से उल्का मेरे ना रहने पर दुनियाँ वाले घी के दीपक जब अखिल विश्व को भा जाए मेरा जीवन भर का सोना। पागल कह मुझे पुकार उठे, जब धरती का कोना कोना । जब तार हृदय की तंत्री के बजते बजते ही टूट जायें । श्रो प्राण बना निर्जीव मुझे , जीवन भर को ही रूठ जाय । जग में तो होगी दीवाली , तब तुम भी दिए जला लेना ॥ जब मुझको जाता हुआ देख पूनम चन्दा को चूम उठे। मेरा घर जलता जग बेहोश खुशी में झूम उठे। जब विहँस उठे स्वर्णिम प्रभात बहती हो मृदु-मय मृदुल वात । जाती हो हँस तेरी बरात मेरी अर्थी के साथ-साथ । धुंघट पट 'और बढ़ा लेना है कसम निगाह बचा लेना। जब चिता जल रही हो मेरी तुम रात-सुहाग मना लेना। दुनियाँ तो ठुकराएगी तुम भी ठोकर एक लगा लेना ॥ तुम भी जी भर मुस्का लेना ! हो औ, N D ,
श्री विनोद कुमार त्रिपाठी
अापका जन्म श्रावण कृष्ण त्रयोदशी सं० १६६५ को साहूकारा,
पीलीभीत में हुआ। श्राप पं. मदममोहन त्रिपाठी के पुत्र हैं।
इस समय श्राप राजकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में विद्या-
ध्यन कर रहे हैं। आप अधिकतर गीत लिखते हैं, जिसमें निराशा ही
निराशा दृष्टिगोचर होती है ।
अापके विचार हैं-
"तुम्हीं कहो कब हुआ विश्व किसका, इससे ही-
रखते रहो 'विनोद' व्यथा सब अन्तरतम में ।"
-
गीत
निष्ठुर जग मत छीन सहारा, क्षणिक वितान तना रहने दे।
अरमानों का कानन रचकर,
वृक्ष कल्पना लगा संजोए ।
प्यार-लक्ष्य जीवन में लेकर,
भाव कुसुम हर डाल पिरोये ।
गीत-कली के अधर मुंदे से, खुल क्षण भर को ही लेने दे !
x
X
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मानता जीवन अस्थिर,
किन्तु प्रबल है माया जग की।
अन्त समय तक जान सका है,
कौन गती कब चञ्चल मन की।
किन्तु शपथ है तुमे, गीत में भरे 'विनोद' भाव रहने दे ?
श्री कैलाशचन्द्र गुप्त अाज के में जब , गुप्त x गुप्त जी का जन्म १ फरवरी सन् १६३६ को पीलीभीत नगर में हुश्रा था । कविता करने की प्रेरणा प्रापको सर्वप्रथम एक बाल संस्था द्वारा प्राप्त हुई । स्थानीय 'हिन्दी साहित्य परिषद्' द्वारा आयोजित गोष्ठियों में भाग लेने के कारण आपकी काव्या भिरुचि और बलवती होती गई। युग कि सर्वत्र शृंगार रस का ही बाहुल्य है, जी इस वातावरण से सदैव दूर रहे। यही कारण है कि तरुण कवि होते हुए भी आपने इस रस की एक भी पंक्ति नहीं लिखी। देश-सेवा तथा मानव समाज अापकी कविताओं के विषय हैं। नवीन विचारधारा के साथ-साथ आप नवीन शैली में कविता लिखते हैं । प्रगति, शांति हो, अभिनव जीवन , पंचशील कल्याण जयति जय ! x यह कदम बढ़ा उस ओर जिधर मानव कहते हों विश्व एक , पद्धति कामों की एक प्रगति सब राज्य एक यह घरा एक फिर हो पुकार इस नये पंथ पर- प्रगतिशील अभिनन्दन जय । देवता के युग चरण में राष्ट्र का श्राह्वान होवे । सिंह सोता जाग जाये, अवनि अम्बर कांप जाये। आय व्रतियों का जगत सब , पुनः लोहा मान जाये । राष्ट ध्वज की कीर्ति का संसार में जयगान होवे ! x ,
श्री रामदेव वाजपेयी
श्राप श्री
"
नत्थूलाल जी वाजपेयी के
सुपुत्र
हैं और स्थानीय रामा
इण्टर कालेज में शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। आपका जन्म सन् १६३६ ई.
में ग्राम देवकली में हुआ था जो जिला शाहजहाँपुर में है। कविता
की ओर अापकी रुचि अाठ वर्ष की श्रायु से ही है तब से आप कविता
लिख रहे हैं । आप विद्यालय में समय-समय पर होने वाले कार्यक्रमों में
भाग लेते हुए साहित्यिक क्षेत्र में अग्रसर हुए । आपकी रचनाएँ
कुमार संदेश", "सोमू दादा", "बीरबल संसद","वीर अर्जुन" अादि पत्रों
में प्रकाशित होती रहती हैं। अाप अवधी भाषा में कविता लिखते हैं ।
हास्य अापकी कविताओं का प्रधान रस है।
'लडिकवा हुइगै सब बेकार'
उइ कोटु पैरट औ टाई पहन,
मुहँ माँ खरिया चूना पोतेन ।
फिर कंघा सन उइ बाल काढ़ि,
पायन मा फलेक्स जूता डारेन ।
करिकै मेहरारुन सो सिंगार ॥
x
x
x
मैं अपने काव्य सरोवर का,
विकसित सरोज मतवाला हूँ।
मधुकर मुझसे ही मधु लेते,
मैं भरता उनका प्याला हूँ।
कुमारी शान्ति शर्मा अापका जन्म सन् १६४१ ई० में हुआ था। आपके पिता का नाम श्री मदनमोहन शर्मा है। श्राप स्थानीय राजकीय उच्च माध्यमिक कन्या विद्यालय में द्वादश श्रेणी में शिक्षा प्राप्त कर रही हैं। बाल्यकाल से ही आपकी रुचि कविता एवं कहानी की अोर थी। कविता लिखने में आपको विशेष सफलता प्राप्त न हो सकी। अस्तु आपकी रुचि कहानी कला पर ही केन्द्रीभूत हो गई। इतनी अल्प आयु में ही अपने अनेक कहानियाँ लिखी हैं। जिनमें राष्ट्रीय भावनाओं एवं स्नेह का अच्छा चित्रण किया गया है । आपकी भाषा बोलचाल की भाषा होते हुए भी पाठकों के हृदय पर अधिक प्रभाव डालती है। प्रस्तुत गद्यांश "प्यार का मूल्य" नामक कहानी से उद्धृत किया गया है।
( ६५ ) ................"रजनीश तो गया। छोड़ो उसे । तुम्हारी तो वही अादत है कि जो खिलौना टूट गया, हम तो उसी से खेलेंगे"..."स्त्री एक अबला है। उसकी शादी इसलिए की जाती है कि उसकी रक्षा का भार सम्पूर्ण रूप से पुरुष पर आ जाय और उस भार के ग्रहण करने का अधिकार प्रत्येक योग्य पुरुष को है । "भइया !"..""फूट-फूट कर रो पड़ी रजनी । फिर स्वर को संयत करके बोली--मैं आपकी आत्मा को किसी बात पर मजबूर करना नहीं चाहती। मैं शादी का अाधार प्रेम मानती हूँ । भइया ! क्या मैं इतना नीच कार्य कर सकूँगी कि रजनीश के पवित्र प्रेम का गला घोंट दूंगी। प्रेम एक अलौकिक वस्तु है। ईश्वर मेरे साथ एक शारीरिक श्राकर्षण रखता आत्मिक नहीं। और जहाँ केवल शारीरिक आकर्षण होता है, वहाँ प्रेम नहीं, वासना होती है। जहाँ केवल आत्मिक आकर्षण होता है, वहाँ मित्रता होती है। शारीरिक और आत्मिक अाकर्षण के मिश्रण का नाम ही प्रेम है।" x x x इनके अतिरिक्त कुछ कलाकार, जो पीलीभीत जिले के साहित्यिक क्षेत्र में प्रेरणाएं देते लेते रहे हैं, निम्नांकित हैं, जिनका परिचय प्रयत्न करने पर भी उपलब्ध न हो सका, जिसके लिए हम अब भी प्रयत्नशील हैं । जैसे ही ये परिचय हमें प्राप्त हो सकेंगे, हम परिशिष्टांक में निकालने का प्रयत्न करेंगे। सर्वश्री विश्वनाथ द्विवेदी, सोमदेव शास्त्री, हरिदत्त शर्मा, राधारमण गुप्त, कवि कोल्हू, 'अमर' एम० एस० सी०, दयाराम पाठक, चण्डीचरण वाजपेयी, जगन्नाथप्रसाद वाजपेयी, ज्ञानभास्कर पाण्डेय, लक्ष्मीजी मिश्र 'व्यथित', बालमुकुन्द मिश्र 'मधुर', श्यामलाल मिश्र 'श्याम', अनपट जी, रामकुमार गोयल, परमात्मास्वरूप 'शिष्य', स्व. रामकुमार त्रिवेदी, लक्ष्मीकान्त गोस्वामी, शिवप्रसाद 'सागर', देवदास 'कुसुम', कैलाशचन्द्र सक्सेना एवं कुमारी 'विदुषी' आदि ।
लोकगीत
भारतवर्ष ऐसे देश में जहाँ ८५ प्रतिशत जनता ग्रामों में रहती है,
लोक-गीतों का महत्वपूर्ण स्थान है । ग्रामीण विचार जनता तक पहुँचाने
के लिये ग्राम भाषा हो उचित ठहरती है । यह लोकगीत माताओं, बहनों
द्वारा बहुत समय से गाये जा रहे हैं। माङ्गलिक कार्यों में विभिन्न स्थानों
से आने वाली स्त्रियों द्वारा यह गीत बहुत दूर-दूर तक फैल जाते हैं,
जिनका स्थान भेद ज्ञात करना कठिन है। प्रायः देखने में आता है कि
कुछ लोक-गीत केवल कुछ शब्दों के परिवर्तन के साथ पूर्व से पश्चिम तक
एक से गाये जाते हैं। पीलीभीत जिले में प्रायः निम्नलिखित गीत अधिक
गाये जाते हैं।
(१)
सोहर-जच्चा रानी ने जायो नंदलाल, बधाई जदुनन्दन की। टेक
बोलौ री नाउन की बिटिया नगर बुलानो दै अावौ राम
सब सखियन से जाय यो कहियौं बिनती करी है बनाय
जच्चा रानी ने
घर-घर से सब सखियाँ आई आन मई इक ठौरी राम
नंद बबा से जाय यो कहियौं दे दुलीचा बिछाय
जच्चा रानी ने....
हनि लई जसोदा रानी मंझनि किवरियाँ मुख पै अंचल डारो राम
अपने लला को मुख दिखरावी, जिन दरसन हम अायो राम
जच्चा रानी ने..
खोल दई जसोदा मंझनि किवरियाँ, मुख से अंचल खोल्यो राम
हमरे लला को मुख तुम देखो, देश्रो असीस बनायो राम
जच्चा रानी ने..............
( ६७ )
(२)
बरुवा-काको री आँगन मूंज, कौन रानी मूंज चिरै।
का जो धरनि पै लोटै, जनेऊ के कारने ।
दादुल के आँगन मूंज, दादी रानी मुंज चिरें,
राम जी धरनि पै लोटें, जनेऊ के करने !
दादुल वाके मारें पोछै
ढिग बैठारें,
देहों बेटा सोने को जनेऊ, जनेऊ बड़ी उत्तम रे।
देवी-गीत
(३)
बैठउपा-रैन भुअन गढ़ नीको, अबला को गढ़ नीको
बार-बार वाकी माता बरजै, कठिन पंथ देवी को
बारहिं कोस बनहिं बन जैहों, सिंहु उहै कजरी को
रैन भुअन गढ़ नीको....
बार-बार मत बरजौ माता, सुफल पंथ देवी को,
बारहिं कोस बनहिं बन जैहौं सिंहु मारि जालिपा परछौं
तब बालक जननी को-रैन भुवन गढ़ नीको
माता वाकी आँगन लोपै दीपक बारै घी को
सात सखी मिल मंगल गावै, बहिन सँजोवे टीको
रेन भुअन गढ़ नीको"
(४)
मेरो जियरा लहरियाँ लेय, भवानी तेरे दरसन को
मोहि ससुर जान नाय देय, भवानी तेरे दरसन को
बहुअरि, वारो मँडूला तेरी गोद फेरि जैहो दरसन को
मेरो जियरा लहरिया लेय, भवानी तेरे दरसन को
ससुर के स्थान पर प्रायः स्त्रियाँ जेठ, देवर आदि सबका नाम लेकर
याती हैं।
(६८) (५) भात-खूब बनो नौरंगिया भात, अजब बनो नौरंगिया भात । मचल रहो नौरंगिया भात ॥ लाला किसकी गाड़ी दुरदुरी, किसके बैल कचास किसके मोजा रँगरँगे किसके जर्द, कमान। भइया बड़े की गाड़ी दुरदुरी छोटे के बैल कुचास बड़े के मोजा रंगारंगे, छोटे के जर्द कमान । . (६) घोड़ी-बृन्दाबन सहरु अमोल नई घोड़ी पाई । घोड़ी,किन तेरो कीन्हों मोल, कौन तोय लेई ।। बाँके दादुल मोल चुकाय सौदा लेत हैं ! घोड़ी, कै लख तेरी मोल, कै लख देत हैं , घोड़ी दस लख मेरो मोल नौ लख देत हैं। बृन्दाबन सहरु अमोल.नई घोड़ी पाई बन्ना-अटा चढ़ि देखु हो मइया, मेरो लाल बना। सिर तेरे झालर को मौरा, मौरी में लाल लगे । अरे ! मोती से जड़े। कान तेरे सूरत के मोती, चुन्नी में लाल लगे अरे! मोती से जड़े। नैन तेरे कसमीरा सुरमा, भौजी में लाल लगे। अरे ! मोती से जड़े। मुख तेरे नरवर को बीड़ा, जीजा में लाल लगे। अरे ! मोती से जड़े। अंग तेरे काँसे को बागा, कमर तेरे गुजराती पटुका। मामा में लाल लगे, फूफा में लाल लगे॥ अरे ! मोती से जड़े। जाँघ तेरे अतलस का तम्बा, नारे में लाल लगे । अरे ! मोती से जड़े। पैर तेरे मखमल के जूते, मेंहदी में लाल लगे। अरे ! मोती से जड़े ..
( ६ ) संग तेरे नीला सा घोड़ा, भइयों में लाल लगे। अरे ! मोती से जड़े। संग तेरे हरियालो डोला, बन्नो में लाल लगे । अरे ! मोती से जड़े। (८) जेवनार-ग्राये-आये अदरु करि लीजो लाल मोहन बृषभानु के आये, जब द्वारे पै सब आये तब चन्दन पलिका डारो । लाल तब अतलस सेज बिछाई, तुम बैठो कृष्ण मुरारी लाल" जब गऊ के गोबर मँगाये, तब कंचन बगरि लिपाये लाल जब कंचन बगरि लिपाये, तब चन्दन पाटुलि डारी लाल" तब पैर पखारन बैठो कृष्ण मुरारी लाल" तब पानन पातल डारी, लाल मोहन वृषभानु के श्राये, जब आलू परोसन लागे तब केला की सुधि आई। लाल मोहन वृषभानु के पाये। इसी प्रकार केले, भालू के स्थान पर सभी तरकारियों एवं मेवों के नाम लेकर गाया जाता है। लागे, तुम (६) गारी-पकरियौ लोगो चोर भागे जात । x x x '' हिन्दी साहित्य परिषद् पीलीभीत की कार्यकारिणी सन् १९५७ ई० १. श्री गणेशशङ्कर शुक्ल 'बन्धु' अध्यक्ष २. " साहू रामेश्वरनाथ उपाध्यक्ष ३. राधारमण त्रिवेदी रम्मन' प्रधान मन्त्री रणजीत सिंह वैद्य गद्य मन्त्री ५. हरिश्चन्द्र मिश्र 'पंकज' पद्य मन्त्री ६. रमेशचन्द्र त्रिवेदो 'पुष्प' प्रसार मन्त्री " शम्भुशरण अवस्थी 'शम्भु' कोषाध्यक्ष 5. विद्यासागर पाठक आय-व्यय निरीक्षक ६. सत्यनारायण शुक्ल सदस्य १०. सदस्य विनोद कुमार त्रिपाठी कैलाशचन्द्र ११. सदस्य १२. कृष्णकुमार सदस्य १३. वीरेन्द्रस्वरूप पाठक सदस्य उमाशङ्कर शुक्ल " सदस्य चण्डीशङ्कर शुक्ल सदस्य दानदाताओं की सूची २५०) जिला बोर्ड, पीलीभीत ७) श्री लक्ष्मीकांत मिश्र १००) को० केन डेवलपमेंट यूनि ७) श्रीयुत रामचरण रामकुमार यन लिमिटेड, पीलीभीत ७) श्री धन्नालाल नंदलाल २०) आर्य समाज, पूरनपुर ५) श्री सूर्यप्रसाद शुक्ल १५) राजा राधारमण ५) म्युनिसिपल शिक्षा कर्मचारी १५) साहू रामेश्वर नाथ एशोसियेसन, पीलीभीत १५) यल० यच० सुगर मिल, ५) श्री धर्मेन्द्र कुमार त्रिवेदी पीलीभीत श्री राजेन्द्र सिंह ११) श्रीयुत भगवतशरण कैलाशचन्द्र ५) श्री धर्मवीर बी० विद्यालंकार ११) श्री नन्हूमल गणेश प्रसाद रामजीमल ११) डा० रामकुमार त्रिपाठी श्यामलाल अयोध्याप्रसाद गोपीनाथ ५) श्री सीताराम कृष्णकुमार श्रो नानूराम रामकरनदास ५) श्री हरगोपाल वकील १०) विकासाधिकारी,ललौरी खेड़ा ५) साहू रामकृष्ण ५ ) ) श्रीयुत ११) श्रीयुत ११) ( १०२) ५) श्री रघुनाथ वकील महेन्द्र सिंह २ ) २) २) चण्डीशंकर शुक्ल " शम्भुशरण अवस्थी 'शम्भु ५) श्री श्यामसुन्दरसहाय मुख्त्यार ५) श्री रामलखन रईस ५) श्रीयुत रामचरण राधेश्याम ५) श्री शिव सुमिरन लाल ५) रामलीला कमेटी, पूरनपुर ३) श्री विशनकुमार २) श्री गणेशशङ्कर शुक्ल 'बन्धु' १) भसीन ब्रदर्स १) श्री रामसिंह फोटोग्राफर सन्तराम ३) विद्यासागर पाठक कालीचरण " २ ) , मुन्नीलाल पटेल रामप्रताप अग्रवाल २) रामेश्वरदयाल वैद्य , शान्तिकुमार अग्रवाल २ ) " रामकुमार गुप्त ,, राम आसरे अवस्थी रामकिशोर मुनीम २) १ ) १ ) १) १ ) ३ ) १) १ ) १) १) जंगबहादुर विशनलाल २) २) शिवशरण वैश्य " रामकुमार मिश्र " २) रमेश चन्द्र वकील " , हरिश्चन्द्र शुक्ल राजेन्द्रकुमार सर्राफ " २) डा० सूरज प्रकाश अग्रवाल २) श्रीयुत विशेश्वरनाथ राजपाल सिंह द्वारिका प्रसाद १) श्रीयुत मंसाराम श्रोम- प्रकाश हलवाई २) श्री नरेशचन्द्र कटियार २) बी० यस० कंचन श्री छोटेलाल पंसारी "
१
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(१०३ )
श्री बल्देव प्रसाद हलवाई १) श्री रमेशचन्द्र त्रिवेदी 'पुष्प'
यस यस० वर्मा
रामदेव वाजपेयी
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१)
१)
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रणजीत सिंह वैद्य
१)
सीताराम अग्रवाल
राधारमण त्रिवेदी
१)
,, रामकिशन सर्राफ
" फुटकर
1)
१३
" कुन्दनलाल सर्राफ