Donar
Shriishivasvaroodaya
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श्री।
श्रीशिव
वरोदय।
महामहोपाध्यायधर्मशाखाग्रगण्य श्रीयुत पण्डित
मिहिरचन्द्रकृतभाषांनुवादसमेत.
श्रीशिवजी और पार्वतीजीका संवाद.
जिसमें
राजयोग, हठयोग, प्राणायामादि तत्त्वदर्शियोंकी
परमोपयोगी क्रिया वर्णित हैं ।
जिस्को
खेमराज श्रीकृष्णदासने
बंबई
निज "श्रीवेङ्कटेश्वर" छापाखानामें
मुद्रितकर प्रसिद्ध किया।
शके १८२०, स्वत
पत् ११
१९५५.
. इस पुस्तकका रजिस्टरी इक "श्रीवेङ्कटेश्वर" यन्त्राध्यक्षने स्वाधीन रक्खाहै ।
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भूमिकां।
दोहा।
अष्टसिद्धिनवनिधिमिलत, मिलतमोक्षसुखखानि ।
आत्माहनगतिहूमिलत, शिवस्वरोदयजानि ॥
यद्यपि यश, कीर्त्ति, धन धाम मोक्ष मिलने के अनेक
साधन हैं और साधक लोग निज बल, बुद्धि, ज्ञान,
ध्यान, धर्म, कर्मद्वारा भवसागर पार होते हैं नर
किस गतिको प्राप्त होते हैं यह अदेख भविष्यत
वाणी सदा संदेह मेहसी वर्षाती रहती है जिससे प्रायः
समयान्तरमें अनेकन धर्म कर्म पंथ चले हैं और
नित्य नवीन चले जाते हैं वास्तव में सत्य और मान के
योग्य वही वस्तु है जिसमें प्रत्यक्ष गुण प्रगट हो; अतः
यह जो पुस्तक “शिवस्वरोदय" उमामहेश्वर संवाद
तत्त्व ज्ञानकी हैं अलबत्तः इसके द्वारा बहुतोंने जीवन
सफल किया. तत्त्व, श्वास, नाडी प्राणायामकर सिद्ध
बन मानो साक्षात् परमेश्वरका उदाहरण कर दिखाया,
संस्कृतमें भी इस अलाय पदार्थका मिलना
बहुत दुर्लभ था परन्तु हमने बडी परिश्रमतासे संस्कृत
की अत्यंत शुद्ध पुस्तकसे सर्वक सुगमार्थ भाषान्त
कराया यद्यपि कायिक, मानसिक, वाचिक तो प्रत्येक
.
(४)
भूमिका ।
के पीछे लगे हैं और लगना मूम्भवभी है परंतु तदपि यह
केवल कायिकही क्रियासे नरराज किन्तु देवराज तक
"बनादेता है जिनको इस असार संसार में बेशुमार सुख
उठाना हो वह अवश्य इसकी उक्ति गुरुकी भक्ति निज.
शक्तिसे शारीरिक सुरदुर्लभ सुख भोगकर अन्तमें
निजेच्छासे आनन्दपूर्वक सुरपुरमें विचरेंगे.
आपका कपाभिलाषी-
खेमराज श्रीकृष्णदास,
"श्रीवेङ्कटेश्वर" छापाखाना-(मुंबई.)
श्रीगणेशाय नमः । अथ शिवस्वरोदयकी- अनुक्रमणिका। १ २ .... ar संख्या. विषयाः पृष्टांकाः १ मंगलाचरणम् . २ पार्वतीजीका शंभुके प्रति ज्ञान ध्यान और ब्रह्माण्डके उत्पन्न पालन लयका वृत्तांत पूंछना ३ श्रीशंकरजीका समझाना और उत्तर.... ४ श्रीशंकरजीका तत्त्वका स्वरूप वर्णन करना ५ ग्रंथपटनेका लाभ वर्णन ६ शंकरजीका स्वरोदयमाहात्म्य कहना ७ इसके पढनेके जे अधिकारी हैं उनके लक्षण कहना ४ स्वरमाहात्म्य... ९ श्रीशंकरजीका देहमें व्याप्त नाडियोंकी संख्या व उनकी चाल कहना १० शंकरजीका आडी तिरछी नाडियों व उत्तम निकृष्टके भेदकहना ११ इडा पिंगला सुषुम्ना आदि नाडियोंके स्थानकी व्यवस्था १२ नाडियोंके आश्रय जो वायुहैं उनके नामों तथा स्थानोंकी व्यवस्था .१३ नाडियोंका ज्ञानं वर्णन १४ 'नाडियोंके बहनेकी गतिनिरूपण १५ तत्त्वके ध्यान धरनेका काल और फलवर्णन १६ दुष्टादुष्टनाडी भेद १७ अमुकनाडी चलने में उचित कार्य करनेका वर्णन.....१५ .... १० विषयाः: (६) विषयानुक्रमणिका संख्या. पृष्ठांकाः १.८ चन्द्र सूर्य स्वरके स्थित रहनेका काल संख्या तथा गति वर्णन १५ १९ वाम दक्षिण नाडी जाननेका काल तथा त्रिलोक वश करनेकी किया २० जिस जिस दिन जिस नाडीके चलनेका फलहै .... .... .... वह वर्णन .... .... .... २१ तत्त्वके नरी ऊपर वहनेका विचार २२ वारान्तरमें वार संक्रांति राशियोंके भेदसे भुगतनेका वर्णन तथा शुभाशुभ ज्ञान २३ स्वर चलनेका शुभकाल वर्णन और उसमें कार्य कर्तव्यका वर्णन.... १८ २४ गम्यागम्य वस्तुओंका काल और फल १९ २५ स्वरोंके चलनेमें शुभाशुभ विचार २६ यात्रा कालमें स्वर उलनेका विचार. २७ विचारपूर्वक शयनसे उठनेका फल तथा और कार्य करनेका विचार... २८ पूर्ण तथा रिक्त हाथके कार्य करनेका फल.... २९ दूर तथा निकट गमनकालमें स्वर चलनेका फल .... २० क्रूरकामोंमें स्वरका विचार योग्यायोग्य स्वरोंमें आचरण करनेका विधान तथा त्रिदेव नाडीके वहनेका फल २५ ३२ इडांनाडीमें करनेसे जोजो कार्य सिद्ध होतेहैं उनका वर्णन 1... ३३ पिंगला नाडीके चलनेमें जो कार्य सिद्ध होतेहैं उनका वर्णन ३७ सुषुम्ना नाडीका ज्ञान र चलनेका फल ... ... .... २७ ....
विषयानुक्रमणिका ।। .... .... .... .... " .... .... संख्या. विषयाः पृष्ठांकाः ३५ स्वरोंके चलनेमें कार्याकार्य करनेका फल... ३६ विषमस्वर निषेध तथा पंडितोंको अवश्य जाननेकेस्वर ३२ ३७ संध्या जाननेका विभेद ३८ वेदनिर्णयनिरूपण ३९ सन्धिज्ञान ४० पार्वतीजीका परमगुह्यवार्ता शंभुप्रतिपूछना और शंकरजीका सर्वोत्तम स्वरकी प्रशंसा करमा ४१ स्वरहीसे मनुष्य पूजित होसक्ता है.... ४२ आठप्रकारके तत्त्वोंका विज्ञानकहना ४३ स्वरदेखनेका काल ४४ स्वर देखनेकी क्रिया और उनका रूपरंग वर्णन ४५ क्रमसे पांचों तत्त्व जाननेका विभेद ३७ ४६ तत्त्वोंको स्थित रहने की व्यवस्था ४७ स्वरोंकी स्वाद वर्णन ४८ स्वरोंकी माप ४९ ऊंच इत्यादि विषमस्वर चलनेका फल ५० निसतत्त्वमें जो कार्य सिद्ध होसक्ते उनका वर्णन और तत्त्वका स्वरूप व ज्ञान ५१ तत्त्वोंमें ग्रह जाननेका विभेद ५२ परदेश गयेके प्रश्नकरनेका शुभाशुभ फल कहना ५३ जलवायु पृथ्वी आकाश अग्निके क्रमसेगुण ५४ पंचतत्त्वोंका परिमाण ५५ पृथ्वी आदि तत्त्वोंमें लाभालीभ विचार ५६ पंचतत्त्वोंके गुणोंकी संख्या परिज्ञान ५७ क्रमसे नक्षत्रोंका तत्त्वोंमें विभाग ५८ शुभाशुभ तत्त्वका परिज्ञान ...५० " .... .... .... .... ;" ४७ .....४८ .... ....
(८) विषयानुक्रमणिका:। :: संख्या. विषया, पृष्ठांकाः ५९ लं, वे, यं, रं, है, बीजादिके यानकरनेका फल ६० श्रीमहादेव पार्वतीके तत्त्वसबन्धित प्रश्नोत्तर ५२ ६१ प्राणमें वायु स्थितके लक्षण और तत्त्वोंके विषय विचरते हुये जाननेका भेद ६२ प्राणश्वासकी गति न्यून करनेका फल ५५ ६३ चन्द्र सूर्य स्वरमें पयना करनेका परिणाम ६४ यात्राकालमें स्वर शुभाशुभ ६५ जीव स्वरमें कर्तव्य कार्य ६६ युद्धकरनेको चलते समय स्वर शुभाशुभ वर्णन ६७ नाडियोंका शुभाशुभ और गति वर्णन ५९ ६८ युद्ध विषयके प्रश्न फल ६९ युद्धमें स्वर फल ७० स्वरद्वारा द्यूतमें जीतना ७१ स्वर द्वारा प्राण छोडनेसे यह दण्ड न होना ७२ स्वर द्वारा स्त्री वशीकरण ६८ ७३ गर्भ प्रकरणम्.. ७४ गर्भिणीके प्रश्रका स्वर द्वारा उत्तर देना ७५ संवत्सर फलम् ७५ ७६ रोग प्रकरणम् ७७ काल प्रकरणम्. ७८ दूरपर स्थितभी काल जिस उपायसे देखा जाय " . .... www ... .... ७८ .... ८१ ८८ उसका वर्णन ९८ ७९ आसन मारने व प्राणायाम करनेकी विधि ८० स्वर ज्ञान होनेका फार ११ नाडी तथा तत्त्व ज्ञान होनेका फल... ८२ चंद्र सूर्य ग्रहणमें पढनेका फल १३ स्वरज्ञान होनेका उपाय १०० श्री! शिवस्वरोदयः। भाषाटीकासमेतः। - महेश्वरंनमस्कृत्यशैलजांगणनायकम् ।। गुरुं च परमात्मानंभजेसंसारतारणम् ॥१॥ अर्थ-महादेव, पार्वती, गणेश, गुरु और संसार पार करनेवाले परमात्माको भजताहूं अर्थात् प्रणाम आदिसे उनका सेवन करताहूं ॥ १ ॥ देव्युवाच ॥ देवदेवमहादेवकृपांकृत्वाममोपरि ॥ सर्वसिद्धिकरंज्ञानकथयस्वममप्रभो ॥२॥ अर्थ-पार्वती कहतहि कि हेदेवताओंके देव हेप्रमो मेरे ऊपर कृपा करिके संपूर्ण सिद्धियोंके करनेवाले ज्ञानको मेरेलिये कहो ॥ २ ॥ कथंब्रह्मांडमुत्पन्नकथंवापरिवर्तते ॥ कथंविलीयतेदेववदब्रह्मांडनिर्णयम् ॥३॥ अर्थ-हेदेव यह ब्रह्माण्ड कैसे उत्पन्न होताहै और किसप्रकार इसकी पालना होतीहै और कैसे इसकी प्रलय होतीहै इस ब्रह्माण्डके निर्णयको मुझे कहो ॥३॥ ईश्वरउवाच ॥ तृत्त्वाद्ब्रह्मांडमुत्पन्नतत्त्वेनपरिव , तते॥तत्त्वेविलीयतेदेवितत्त्वाद्ब्रह्मांडनिर्णयः॥
(२) शिवस्वरोदय ।
-अर्थ-महादेव बोले यह ब्रह्माण्ड तत्वोंसे उत्पन्न
होताहै और तत्वोंसेही इसकी पालना होतीहै और
तत्वोंमेंही लीन होजाताहै-इससे तत्वोंसेही इसका
निर्णय समझो ॥ ४॥
देव्युवाच ॥ तत्त्वमेव परं मूलं निश्चितं तत्त्व-
वादिभिः।तत्त्वस्वरूपंकिंदेवतत्त्वमेवप्रकाशय ५
अर्थ-पार्वती बोली कि तत्ववादियोंने ब्रह्माण्डका
मूल तत्वकोही निश्चित कियाहै इससे हेदेव तत्वका
स्वरूप क्याहै सो मेरेप्रति आपही प्रगट करें ॥ ५ ॥
ईश्वरउवाच ॥ निरंजनोनिराकारएकोदेवोमहे
श्वरातस्मादाकाशमुत्पन्नमाकाशाद्वायुसंभवः६
अर्थ-महादेव बोले कि मायारहित निराकार एक
देव परमेश्वरहै उससे आकाशमैदाहुआ और आकाशसे
वायु उत्पन्नहुई ॥ ६ ॥
वायोस्तेजस्ततश्चापस्ततःपृथ्वीसमुद्भवः॥
एतानिपंचतत्त्वानिविस्तीर्णानिचपंचधा॥७॥
अर्थ-वायुसे तेज और तेजसे जल और जलसे
पृथ्वी उत्पन्न हुई ये पांच तत्व एक .२ के प्रति पांच
प्रकारसे विस्तारको प्रा होते हैं अर्थात् :पंचीकरण
करनेसे पच्चीसतत्व होते हैं ॥ ७ ॥
तेभ्योब्रह्मांडमुत्पन्नतैरेवपरिवर्त्तते ॥
विलीयतेचतत्रैवतत्रैवरमतेपुनः॥८॥
भाषाटीकासमेत। (३) अर्थ-इनसे ब्रह्माण्ड उत्पन्न होताहै और इन्हीसे ब्रह्माण्डकी पालना होतीहै और इन्हीमें लीन होकर फिर सूक्ष्म रूपसे बना रहताहै ॥ ८ ॥ पंचतत्त्वमयेदेहेपंचतत्त्वानिसुंदरी॥ सूक्ष्मरूपेणवर्त्ततज्ञायतेतत्त्वयोगिभिः॥९॥ अर्थ-हे सुंदर पांच तत्वोंसे पैदा हुये देहमें ये पांचोंतत्व सूक्ष्म रूपसे वर्तते हैं उनको तत्वोंके ज्ञाता योगीजन जानतेहैं ॥ ९ ॥ अथस्वरंप्रवक्ष्यामिशरीरस्थस्वरोदयम् ॥ हंसचारस्वरूपेणभवेज्ज्ञानंत्रिकालजम् ॥१०॥ अर्थ-अंब शरीरके विषे स्थित स्वरोंकी उत्पत्तिहै जिससे ऐसे जो अकार आदिस्वर उनको कहताहूं जिनके ज्ञानसे हंस चार रूपसे भूत भविष्यत् घर्तमान तीनोंकालोंका ज्ञान होताहैं ॥ १० ॥ गुह्याद्गुह्यतरंसारमुपकारप्रकाशनम् ॥ इदंस्वरोदयंज्ञानज्ञानानांमस्तकेमणिः॥११॥ अर्थ-यह स्वरोदयज्ञान जितनी गोप्य व, छिपी वस्तुहें उनमें गुप्त-सार-उपकारोंका- प्रकाशक है और सब ज्ञानोंका शिरोमणी है ॥ १३ ॥ सूक्ष्मात्सूक्ष्मतरंज्ञानसुबोधसत्यप्रत्ययम् ॥ आश्चर्यनास्तिकेलोकेआधारंवास्तिकेजने १२॥
(४) शिवस्वरोदय । अर्थ-और यह स्वरोदये ज्ञान और भली प्रकार जानने योग्य और प्रतीतिका करताहै जो जन नास्तिक हैं उनको आश्चर्य्य दीखताहै और जो आस्तिकहैं उनका आधारहैं ॥ १२॥ अथ शिष्यलक्षणम्। 'शांतेशुद्धसदाचारेगुरुभक्त्यैकमानसे ॥ दृढचित्तेकृतज्ञेचदेयंचैवस्वरोदयम् ॥ १३ ॥ अर्थ-शांतस्वभाव-शुद्ध-उत्तम आचरणशील- गुरुकी भक्तिमें जिसका मन और दृढ चित्त किये उप- कारोंका ज्ञाता-ऐसे शिष्यकोही स्वरोदय देना॥१३॥ दुष्टेचदुर्जनेक्रुद्धमास्तिकेगुरुतल्पगे॥ हीनसत्वेदुराचारेस्वरज्ञाननदीयते ॥ १४॥ अर्थ-जो दुष्ट-दुर्जन-कोधी-नास्तिक-गुरुस्त्रीगा- मी-अधीर-और दुराचारीहो उसको स्वरकाज्ञान न दे. शृणुत्वंकथितंदेविदेहस्थंज्ञानमुत्तमम् ॥ येनविज्ञातमात्रेणसर्वज्ञत्वंप्रणीयते ॥ १५ ॥ अर्थ-हे देवी तू मेरे कहे हुये देहमें स्थित उत्तम ज्ञान को सुन जिसके ज्ञान मासही सर्वज्ञ हो जाताहै॥१५॥ -स्वरेवेदाश्चशास्त्राणिस्वरेगांधर्वमुत्तमम्॥ .स्वरेचसर्वत्रैलोक्यस्वरमात्मस्वरूपकम् ॥१६॥ अर्थ-संपूर्ण वेद-शास्त्र और उत्तम गांधर्व ( गान- भाषाटीकासमेत। विद्या ) और संपूर्ण त्रिलोकी से सब स्वरमेंहीहैं, और स्वरही आत्मा स्वरूप है ॥ १६ ॥ स्वरहीनश्चदैवज्ञोनाथहीनंयथागृहम् ॥ शास्त्रहीनंयथावत्रंशिरोहीनंचयद्वपुः ॥ १७॥ अर्थ-स्वरके ज्ञानसे हीन ज्योतिषी-और स्वामीसे हीन घर-शास्त्रसेहीन मुख-और शिरसेहीन देह- शोभित नहीं होते ॥ १७ ॥ नाडीभेदंतथाप्राणतत्त्वभेदंतथैवच ॥ सुषुम्नामिश्रभेदंचयोजानातिसमुक्तिगः ॥ १८॥ अर्थ-जो मनुष्य नाडी-प्राण-तत्व और सुषुम्ना आदि मिश्रित तीन नाडियोंके भेदको जानता है वह मुक्तिको प्राप्त होताहै ॥.१८॥ साकारेवानिराकारेशुभंवायुबलात्कृते ॥ कथयतिशुभंकेचित्स्वरज्ञानं वरानने ॥ १९॥ अर्थ-साकार[ व्यावहारिक ] वा निराकार [पार: मार्थिक ] में वायु [ स्वर ] केवल श्रम होताहै और है। पसर्वति कोई यह कहते हैं कि स्वरके ही ज्ञानसे शुभ होताहै ॥ १९ ॥ ब्रह्मांडखंडपिंडायास्वरेणैवहिनिर्मिताः॥ सृष्टिसंहारकर्ताचस्वरः साक्षान्महेश्वरः॥२०॥ अर्थ-बह्मांढके खंड और पिंड आदि. स्वरकेही (६) शिवस्वरोदय.। रचेहैं और सृष्टि और संहारका कर्त्ता साक्षात् महेश्वर [शिव ] रूप स्वरहीहै ॥ २० ॥ स्वरज्ञानात्परंगुह्यस्वरज्ञानात्परंधनम् ॥ स्वरज्ञानात्परंज्ञाननवादृष्टनवाश्रुतम् ॥२१॥ अर्थ-स्वरके ज्ञानसे परे गुह्य-स्वरके ज्ञानसे परे धन-स्वरके-ज्ञानसे परे ज्ञान न देखाहै और न सुनाहै२१ शत्रुहन्यात्स्वरबलेतथामित्रसमागमः॥ लक्ष्मीप्राप्तिःस्वरवलेकीर्तिःस्वरवलेसुखम्॥२२॥ अर्थ-स्वरका बल होय तौ शत्रुको हने और मित्रका समागम-और लक्ष्मी की प्राप्ति और कीर्ति और सुख स्वरके ही बलसे होतीहैं ॥ २२ ॥ कन्याप्राप्तिः स्वरबलेस्वरतोराजदर्शनम् ॥ स्वरेणदेवतासिद्धिःस्वरेणक्षितिपोवशः ॥२३॥ अर्थ-और कन्याकी प्राप्ति [विवाह ] और राजा का दर्शन-देवता की सिद्धि और राजा का वशमें होना स्वरसे ही होतेहैं ॥ २३॥ 'स्वरेणगम्यतेदेशोभोज्यस्वरवलेतथा॥ 'लघुदीर्घस्वरबलेमलंचैवनिवारयेत् ॥२४॥ अर्थ-स्वरके ही बलसे देशाटन होताहै और स्वरके ही बलसे भोजन-और स्वरके ही बलसे लघुशंका और मलका त्याग होताहै ॥ २४ ॥ सर्वशास्त्रपुराणादिस्मृतिवेदांगपूर्वकम् ॥
भानाटीकासमेत। स्वरज्ञानात्परंतत्त्वंनास्तिकिंचिद्वरानने ॥२६॥ अर्थ-संपूर्ण शास्त्र और पुराणादि स्मृति और वेदांग आदि ये सब स्वरज्ञानसे परे तत्व नहीं हैं.॥ २५ ॥ नामरूपादिकासर्वोमिथ्यासर्वेषुविनमः॥ अज्ञानमोहितामूढायावत्तत्त्वंनविद्यते ॥२६॥ अर्थ-इतने तत्वका ज्ञान नहीं होता तबतक नाम- रूप आदि नम मिथ्या हैं और मूढ जनोंको मोहनी तबतकही है ॥ २६ ॥ इदंस्वरोदयंशास्त्रंसर्वशास्त्रोत्तमोत्तमम् ॥ आत्मघटप्रकाशार्थप्रदीपकलिकोपमम् ॥२७॥ अर्थ-यह स्वरोदय शास्त्र संपूर्ण उत्तम २ शास्त्रोंमें उत्तमहै और आत्मारूपी घटके-काशार्थ दीपककी कलिका [कली ] के समानहै ॥ २७ ॥ यम्मकस्मैपरस्मैवानप्रोक्तंप्रश्नहेतवे ।। तस्मा देतत्स्वयंज्ञेयमात्मानोवाऽऽत्मनाऽऽत्मनि ॥२८॥ अर्थ-यह स्वरोदय प्रश्न करनेसे जिस किसको नहीं कहना किंतु अपने लिये अपनेही देहमें अपनी बुद्धिसे स्वयं जानना ॥ २८॥ नतिथिर्नचनक्षत्रनवारोग्रहदेवता। नचविष्टिय॑तीपातोवैधृत्याद्यास्तथैवच ॥२९॥ अर्थ-इस स्वरोदयमें तिथी-नक्षत्र-वार-ग्रह- देवता-भद्रा-व्यतीपात वैधृति आदिका दोष नहींहै२९ 4
(८) शिवस्वरोदय।
कुयोगोनास्तिकोदेविभतितावाकदाचन ॥
प्राप्तेस्वरबलेशुद्धेसर्वमेवशुभंफलम् ॥३०॥
अर्थ-हे देवि इसमें कोई कुयोग नहीं है और न
कभी होगा जब स्वरका शुद्ध बल प्राप्तहो तब संपूर्ण
फल शुनही होताहै ॥ ३० ॥
देहमध्येस्थितानाड्योबहुरूपाःसुविस्तरात्॥
ज्ञातव्याश्चबुधैनित्यंस्वदेहज्ञानहेतवः॥३१॥
अर्थ-देहके मध्यमें अनेक रूप और विस्तारवाली
बहुतसी नाडी स्थितहैं वे सब अपने देहके ज्ञानार्थ
विद्वानोंको जाननी ॥ ३१ ॥
नाभिस्थानगकंदोर्ध्वमंकुरादेवनिर्गताः॥
द्विसप्ततिसहस्राणिदेहमध्येव्ययस्थिताः॥३२॥
अर्थ-नाभि स्थानके कंदसे ऊपर अंकुरके समान
निकसीहैं और देहके मध्यमें ७२००० बहत्तर सहस्र
नाडी स्थितहैं ॥ ३२ ॥
नाडीस्थाकुंडलीशक्तिर्भुजंगाकारशायिनी॥
'ततोदशोध्वगानाब्योदशवाधःप्रतिष्ठिताः॥३३॥
अर्थ-नाडीमें स्थित और सर्वके समान सोतीहुयी
कुडली शक्तिहै उससे ऊपरको गई हुयी दश नाडी हैं
और दशही नीचेको गयीहैं ॥ ३३ ॥
देवेतिर्यग्गतेनाड्यौचतुर्विंशतिसंख्यया।
प्रधानादशनाड्यस्तुदशवायुप्रवाहकाः॥३४॥
.
भाषाटीकासमेत। (९)
अर्थ-दो २ नाडी तिरछी-गयीहैं ये चोवीस नाडी
हैं तिनमें दश नाडी प्रधान, और दश वायुके प्रवाहको
करतीहैं ॥ ३४ ॥
तिर्यगूस्तिथानाड्योवायुदेहसमन्विताः॥
चक्रवतसंस्थितादेहेसर्वाःप्राणसमाश्रिताः ३६॥
अर्थ-तिरछी-ऊपर और नीचे स्थित और वाय
और देहके आश्रित सब नाडी देहमें चक्रके समान
स्थितहैं और सब प्राणके आधीनहैं ॥ ३५॥
तासांमध्येदशश्रेष्ठादशानांतिम्रउत्तमाः॥
इडाचपिंगलाचैवसुषुम्नाचतृतीयका ॥३६॥
अर्थ-उन सब नाडीमें दश नाडी श्रेष्ठहैं और उन दशोंमें
ये तीन उत्तमहैं कि इडा, पिंगला और तीसरी सुषुम्ना ३६
गांधारीहस्तिजिह्वाचपूषाचैवयशस्विनी॥
अलंबुषाकुहूश्चैवशंखिनीदशमीतथा ॥३७॥
अर्थ-गांधारी-हस्ति जिह्वा-पूषा-यशस्विनी-
अलंबुषा-कुहू-और दशवीं शंखिनी-जाननी ॥३७॥ -
इडावामेस्थिताभागेपिंगलादक्षिणेस्मृता ।।
सुषुम्नामध्यदेशेतुगांधारीवामचक्षुषि ॥३८॥
अर्थ-इडा नाडी वामभागमें-पिंगला दक्षिण भागनें
और सुषुम्ना मध्य देशमें और गांधारी वामनेत्रमें
जाननी ॥ ३८॥
(१०) शिवस्वरोदय। दक्षिणेहस्तिजिह्वाचपूर्पकर्णेचदक्षिणे ॥ यशस्विनीवामकर्णेआननेचाप्यलंबुषा ॥३९॥ अर्थ-दक्षिण नेत्रमें हस्तिजिव्हा और दक्षिण कर्ण- में पूषा और वामकर्णमें यशस्विनी और मुखमें अलं- बुषा जाननी ॥ ३९ ॥ कुहूश्चलिंगदेशेतुमूलस्थानेतुशंखिनी ॥ एवंद्वारसमाश्रित्यतिष्ठतिदशनाडिकाः॥४०॥ अर्थ-लिंग देशमें कुहूं और गुदास्थानमें शंखिनी जाननीइस प्रकार शरीरके द्वारों में दश नाडी टिकतीहैं४० इडापिंगलासुषुम्नाचप्राणमार्गेसमाश्रिताः॥ एताहिदशनाड्यस्तुदेहमध्येव्यवस्थिताः॥४१॥ अर्थ-इडा पिंगत्न सुषुम्ना ये तीनों प्राण मार्गमें आश्रितहैं ये दश नाडी देहके मध्य में स्थितहैं ॥ ४१॥ नामानिनाडिकानांतुवातानांतुवदाम्यहम् । प्राणोऽपानःसमानश्चउदानोव्यानएवच ॥ ४२॥ अर्थ-नाडियोंके आश्रय जो वायुहैं उनके नाम में कहताहूं कि प्राण अपान समान उदान और व्यान४२ नाग कूर्मोथकृकलोदेवदत्तोधनंजयः॥ हुदिप्राणोवसेन्नित्यमपानोगुदमंडले ॥४३॥.. अर्थ-नाग कूर्म ककल देवदत्त और धनंजय और प्राणवायु हृदयमें और अपान गुदामंडलमें सदैव वंसताहै. समानोनाभिदेशेतुउदान कंठमध्यगः॥
भाषाटीकासमेत ।
(११)
व्यानोव्यापीशरीरेषुसंधानादशवायवः॥ ४४ ॥
अर्थ-समान नाभिदेशमें कंठके मध्य में उदान और
सब शरीरमें व्यापी व्यान वायु होताहै ये दशवायुप्रधान...
प्राणाया:पंचविख्यातानागाया:पंचवायवः ॥
तेषामपिचपंचानांस्थानानिचवदाम्यहम्॥४६॥
अर्थ-पांच प्राण आदि और पांच नाग आदिहैं
उन नाग आदि पांचोंकेनी मैं स्थान कहताहूं॥ ४५ ॥
उद्द्वारेनागआख्यातःकूर्मउन्मीलनेस्मृतः॥
कृकलाक्षुतकृज्ज्ञेयोदेवदत्तोविजृभणे ॥४६॥
अर्थ-उद्गार (उगलना ) में नाग वायु और नेत्रों-
के उन्मीलनमें कूर्म और छींकनेमें ककल और विज़ं-
भण (जंभाई ) में देवदत्त वायु जानना ॥ ४६ ॥
नजहातिमृतंवापिसर्वव्यापीधनंजयः॥
पतेनाडीघुसर्वासुभ्रमंतेजोवरूपिणः॥४७॥
अर्थ-और सर्व शरीरमें व्यापी धनंजय वायु मृत
शरीरकोभी नहीं त्यागता जीवरूपी ये दश वायु .सर्व
नाडियों में नमतेहैं ॥ ४७ ॥
‘प्रकटंप्राणसंचारंलक्षयेदेहमध्यतः॥
इडापिंगलासुषुम्नाभिर्नाडीभिस्तिसृभिर्बुधः ४८॥
अर्थ-देहके मध्यमें जो प्रकट प्राणका संचारहै
उसको इडा पिंगला सुषुम्ना इन तीन नाडियोंसे ही
बद्धिमान मनुष्य जाने ॥ ४८ ॥
(१२) शिवस्वरोदय। इडावामेचविज्ञेयापिंगलादक्षिणेस्मृता॥ इडानाडीस्थितावामाततोव्यस्ताचपिंगला॥१९॥ अर्थ-वाम आगमें इडा पिंगला कहींहै इडा नाडी वामरूपसे स्थितहै और व्यस्त उलटी पिंगला स्थितह४९ इडायांतुस्थितश्चंद्रपिंगलायांचभास्करः ॥ सुषुम्राशंभुरूपेणशंभुर्हसस्वरूपतः॥५०॥ अर्थ-इडामें चन्द्रमा स्थितहै और पिंगलामें सूर्य और सुषुम्ना हंसरूपसे स्थितहै और हंस शंभुरूपसे स्थितहै ॥ ५० ॥ हकारोनिर्गमेप्रोक्त सकारेणप्रवेशनम् ॥ हकार शिवरूपेणसकार शक्तिरुच्यते ॥५१॥ अर्थ-स्वरके निकसनेमें हकार कहाहै और प्रवे. शमें सकार. हकार शिवरूप कहाहै और सकार शक्ति- रूप कहाहै ॥ २३ ॥ शक्तिरूपः स्थितश्चंद्रोवामनाडीप्रवाहकः॥ दक्षनाडीप्रवाहश्चशंभुरूपोदिवाकरः॥५२॥ अर्थ-और वाम नाडीका प्रवाहक चन्द्रमा शक्ति- रूपसे स्थितहै और दक्षिण नाडीका प्रवाहक (जलने- बला) शंक्षु रूप सूर्य स्थितहै ॥ ५२ ॥ श्वाससकारसंस्थेतु यहानंदीयतेबुधैः॥ तदानंजीपलेकेस्मिन् कोटिकोटिगुणंभवेत् ५३ भाषाटीकासमेत। अर्थ-जब श्वास संकरिमें स्थितहो उस समय जो दान बुद्धिमान् मनुष्य दें वह दान इस जीवलोकमें कोटि- गुना फल देताहै ॥ ५३ ॥ अनेनलक्षयेद्योगीचैकचित्तःसमाहितः॥ सर्वमेषविजानीयान्मार्गेवैचंद्रसूर्ययोः॥५४॥ अर्थ-एकाग्र चित्त और समाहित (सावधान ) योगी इसी मार्गसे देखे और चंद्रमा और सूर्यके मार्गमें ही सबको जानलें ॥ ५४॥ ध्यायेत्तत्त्वंस्थिरेजीवेअस्थिरेनकदाचन। इष्टसिद्धिर्भवेत्तस्यमहालाभोजयस्तथा॥५५॥ अर्थ-जो मनुष्य जिस समय जीव स्थिरहो उसी समय तत्त्वका ध्यान करै अस्थिर (चंचल) में कदा- चित् न करै उसके इष्टकी सिद्धि होतीहै और महान् लाभ और जय होताहै ॥ ५५ ॥ चंद्रसूर्यसमभ्यासंयेकुर्वतिसदानराः॥ अतीतानागतज्ञानंतेषांहस्तगतभवेत् ॥५६ अर्थ-जो मनुष्य सदैव चंद्र सूर्य स्वरोंका भली प्रकार अश्यास करतेहैं उनको भूत और भविष्यत्का ज्ञान हस्तगत (प्रत्यक्ष ) होताहै ॥ ५६ ॥ वामेचामृतरूपास्याज्जगदाप्यायनंपरम् ॥ दक्षिणेचरभागेनजगदुत्पादयेत्सदा ॥१७॥ अर्थ-वाम भागकी नाडी ( इडा') अमृतरूप और
(१४) शिवस्वरोदय ।
सब जगतकी पोषक होती है और दक्षिणके चर भागकी
पिंगला नाडी सदैव जगत्को पैदा करतीहै ॥ ५७ ॥
मध्यमाभवतिरादुष्टासर्वत्रकर्मसु ॥
सर्वत्रशुभकार्येषुवामाभवतिसिद्धिदा ॥२८॥
अर्थ और मध्यमा (सुषुम्ना ) नाडी क्रूरा और
संपूर्ण कौमें दुष्ट होतीहै और बामा नाडी संपूर्ण शुन
कार्यों में सिद्धिकी दाता होतीहै ॥ ५८ ॥
निर्गमेतुशुभावामाप्रवेशेदक्षिणाशुभा ॥
चंद्रःसमस्सुविज्ञेयोरविस्तुविषमःसदा ॥ १९ ॥
अर्थ-और गमनके समयमें वामा नाडी और प्रवे-
शके समयमें दक्षिण शुभ होतीहै और चंद्रमाको सम
और सूर्यको विषम सुदैव जानना ॥ ५९ ॥
चंद्रःस्त्रीपुरुषःसूर्यश्चंद्रोगौसेसितोरविः॥
चंद्रनाडीप्रवाहेणसौम्यकार्याणिकारयेत् ॥६॥
अर्थ-चन्द्रमा स्त्री और सूर्य पुरुष और चंद्रमा गौर-
वर्ण और सूर्य कृष्ण वर्ण जानना और जब चंद्रमाकी
नाडीका प्रवाह हो उससमय सौम्य कार्योंको करै ६०
सूर्यनाडीप्रवाहेणरौद्रकर्माणिकारयेत् ॥
सुषुम्नायाःप्रवाहणभुक्तिमुक्तिफलानिच ॥६१॥
• अर्थ-और सूर्य नाडीके प्रवाहमें रौद्र (कर)
कर्मों करावें और सुषुम्नाके प्रवाहमें भोग और मुक्ती
फलके देनेवाले कार्योंको करै ॥ ६१ ॥
भाषाटीकासमेत। (१५) आदौचंद्रःसितेपक्षेभास्कर हिसितेतरे॥ प्रतिपत्तोदिनान्याहुस्त्रीणित्रीणिकृतोदयौ ॥१२॥ अर्थ-शुक्ल पक्षमें प्रथम चन्द्रमाका स्वर और कृष्ण पक्षमें प्रथम सूर्यका चलताहै और प्रतिपदासे लेकर तीन २ दिन चन्द्रमा और सूर्यका स्वर बलवान होताहै ॥ ६२ ॥ सार्धद्विघटिकेज्ञेय शुक्लेकृष्णेशशीरविः॥ वहत्येकदिनेनैवयथाषष्टिघटीःक्रमात् ॥ ६३ ॥ अर्थ-और ढाई ढाई २॥ घटी शुक्ल पक्षमें चन्द्रमा ढाई ढाई २॥ घटी कृष्ण पक्षमें सूर्य एक दिनमें साठ घटी पर्यंत बहतेहैं अर्थात् दोनों स्वरोंकी क्रमसे २४ चौबीस २ आवृत्ति होती हैं ॥ ६३ ॥ वहेयुस्तटीमध्येपंचतत्त्वानिनिर्दिशेत् ॥. प्रतिपत्तोदिनान्याहुर्विपरीतेविवर्जयेत् ॥ ६४ ॥ अर्थ-और उन प्रत्येक ढाई २॥ घटियोंमें पांचों तत्व वहतेहैं और प्रतिपदासे लेकर जो चन्द्रमा और सूर्यके दिन कहें, उनसे विपरीत होय अर्थात् चन्द्रमाके स्वरमें सूर्यका और सूर्यके समयमें चन्द्रमाको स्वर चले तो उसको वर्ज दे क्योंकि वह अशुभहै॥ ६४ ॥ शुकृषक्षेभवेद्वामाकृष्णपक्षेचदक्षिणा॥ जानीयात्प्रतिपत्पूर्वयोगितद्यतमानसः ॥६५॥ अर्थ-शुक्ल पक्षमें प्रतिपदासे लेकर मथम त्रामा और (१६) शिवस्वरोदय । कृष्ण पक्षमें प्रथम दक्षिणा माडीको योगी एकाग्र अन्तः- करणसे जाने ॥६५॥ शशांकंवारयेद्रात्रौदिवावारयभास्करम् ॥ इत्यभ्यासरतोनित्यसयोगीनात्रसंशयः ॥ ६६ ।। अर्थ-रात्रीके समय चंद्र स्वरको और दिनके समय सूर्य स्वरको निवारण करै इस प्रकार आल्यासमें जो तत्परहै वही योगीहै इसमें संशय नहीं ॥ ६६ ॥ सूर्येणवध्यतेसूर्यश्चंद्रश्चंद्रेणबध्यते ॥ योजानातिक्रियामेतांत्रैलोक्यंवशगंक्षणात्॥६७॥ अर्थ-सूर्यके स्वरसे सूर्य और चंद्रमाके स्वरसे चंद्रमा बंद होताहै और जो मनुष्य इस क्रियाको जान- ताहै उसके वशमें त्रिलोक क्षण मात्रमें होतेहैं ॥ ६७ ॥ उदयुचंद्रमार्गेणसूर्येणास्तमनंयदि ॥ तदातेगुणसंघाताविपरीतंविवर्जतेत् ॥ ६८॥. अर्थ-यदि चंद्रमाके स्वरमें सूर्यका उदय हो और स्यके स्वरमें अस्त होय तो उस समय अनेक गुणोंके समूह पैदा होतेहैं और इससे विपरीत ( उलटा) होय तो उसको वर्जदे ॥ ६८॥ गुरुशुक्रबुधेदूनांवासरेवामनाडिका॥ सिद्धिदासर्वकार्येषुशुक्लपक्षेविशेषतः ॥ ६९ ॥ अर्थ-बृहस्पति शुक्र बुध और सोम इन चारोंमें वाम नाडी सब कार्यों में सिद्धि की दाता होती है.और शक्त
भाषाटीकासमेन । (१७)
पक्षमें यह होय तो औरती विशेष फल होताहै ॥६९॥
अर्कागारकसौरीणांवासरेदक्षनाडिका ॥
स्मर्त्तव्याचरकार्येषुकृष्णपक्षेविशेषतः॥ ७० ॥
अर्थ-आदित्य मंगल शनैश्चर इन वारोंमें दक्षिण
नाडीका स्मरण चर कार्यों में करना और इसका फल
कृष्ण पक्षमें विशेष कर होताहै ॥ ७० ॥
प्रथमवहतेवायुर्द्वितीयंचतथानलः॥
तृतीयंवहतेभूमिश्चतुर्थवारुणीवहेत् ॥७१॥
अर्थ-प्रथम वायु तत्व वहताहै द्वितीयबार अग्मितत्त्व,
तृतीय बार भूमि तत्व और चतुर्थ वार वरुण तत्त्व वह-
ताहै और पांचवी आकाशतत्व ॥ ७१ ॥
साईद्विघटिकेपंचक्रमेणैवोदयंतिच ॥
क्रमादेकैकनाड्यांचतत्त्वानांपृथगुद्भवः॥७२॥
अर्थ-ढाई घटीके मध्ये ये पूर्वोक्त पांचों तत्व क्रमसे
उदय होतेहैं और एक २ नाडीमें भी क्रमसे पृथक् पांचों
तत्व उदय होतेहैं ॥ ७२॥
अहोरात्रस्यमध्येतुज्ञेयाद्वादशसंक्रमाः ॥
वृषकर्कटकन्यालिमृगमीनानिशाकरे ॥७३॥
अर्थ-और रात्रि और दिनके मध्यमें चंद्र और सूर्म-
की बारह संक्राति जाननी तिनमें वृष कर्क कन्या वृश्चिक
मकर मीन संक्राति चंद्रमाकी होतीहैं ॥ ७३ ॥
(१८) शिवस्वरोदय । मेषसिंहौचकुंभश्चतुलायमिथुनधनम् ।। उदयेदक्षिणेज्ञेयःशुभाशुभविनिर्णयः ॥७४॥ अर्थ-मेष सिंह कुंभ तुला मिथुन धन ये संक्रांति सूर्यकी जाननी इस प्रकार उदय और दक्षिणके शुभ अशुभका निर्णय जानना ॥ ७४ ॥ तिष्ठेत्पूर्वोत्तरेचन्द्रोभानु-पश्चिमदक्षिणे ॥ दक्षनाड्याःप्रसारेतुनगच्छेद्याम्यपश्चिमे ॥ ७९ ॥ अर्थ-पूर्व और उत्तरमें चंद्रमा टिकताहै और पश्चिम और दक्षिण में सूर्य, दक्षिण नाडीके प्रवाह(स्वर) में दक्षिण और पश्चिममें नजाय ॥ ७५ ॥ वामाचारप्रवाहेतुनगच्छेत्पूर्वउत्तरे ॥ परिपंथिभयंतस्यगतोऽसौननिवर्त्तते ॥ ७६॥ अर्थ-और वाम नाडीके प्रचारमें पूर्व और उत्तरमें न जाय जायतौ उसको शत्रुका भय होताहै और गया वह फिर नहीं लौटता ॥ ७६ ॥ तंत्रतस्मानगंतव्यंबुधैःसर्वहितैषिभिः॥ 'तदातत्रतुसंयातेमृत्युरेवनसंशयः॥ ७७॥ अर्थ-तिससे सबके हितैषी उस समय नजाय यदि उससमयमें जायतों मृत्यु होने में संदेह नहीं होता ७७॥ शुक्लपक्षेद्वितीयायामवहतिचंद्रमाः॥ दृश्यतेलाभदःपुंसांसौम्येसौख्यनजायते ॥७८॥ अर्थ-यदि शुक्ल पक्षकी द्वितीयाके दिन सूर्य के प्रवा- भाषाटीकासमेत। (१९) हमें चंद्रमा वहे तो पुरुषोंको लाभदायक होताहै और उस समय सौम्य कार्य किया जाय तो सुख होताहै ७८॥ सूर्योदयेयदासूर्यश्चंद्रश्चंद्रोदयेभवेत् ।। सिध्यंतिसर्वकार्याणिदिवारात्रिगतान्यपि॥७९॥ अर्थ-जिस समय सूर्यके उदयमें सूर्य और चंद्रमाके उदयमें चंद्रमाकाही स्वरहो उस समय दिन वा रात्रिमें किये हुये सब काम सिद्ध होतेहैं ॥ ७९ ॥ चंद्रकालेयदासूर्यःसूर्यश्चंद्रोदयभवेत् ॥ उद्वेगकलहोहानिःशुभंसबैनिवारयेत् ॥ ८॥ अर्थ-जिस समय चंद्रमाके समयमें सूर्य और सूर्यके समयमें चंद्रमा होय तब उद्वेग कलह हानि होतेहैं और संपूर्ण शुभकी निवृत्ति होतीहै ॥ ६ ॥ सूर्यस्यवाहेप्रवदंतिविज्ञाज्ञानागम्यस्यतुनिश्च येन.॥ श्वासेनयुक्तस्यतुशीतरश्मे प्रवाहकाले फलमन्यथास्यात् ॥ ८१॥ अर्थ-बुद्धिमान् मनुष्य सूर्य के प्रवाहमें अगम्य (जो न देखी न सुनी ) वस्तुको ज्ञान निश्चयसे कहतेहैं और चंद्रमाके श्वासका प्रवाह होय तो अन्यथा फल होताहै अर्थात अगम्य वस्तुका ज्ञान नहीं होता ॥ ८१ ॥ अथ विपरीतलक्षणम्। यदाप्रत्यूषकालेनविपरीतोदयोभवेत् ॥ चंद्रस्थानेवहत्यौरविस्थानेचचंद्रमाः॥ ८२ ॥ M (२०) शिवस्वरोदय । अर्थ-जिस दिन प्रातःकालसे लेकर विपरीत स्वरोंका उदयहो अर्थात् चंद्रमाके स्थानमें सूर्य और सूर्यके स्थानमें चंद्रमा वहै उस समय यह फल जानना कि८२ प्रथमेमनउद्वेगंधनहानिद्वितीयके ।। तृतीयेगमनंप्रोक्तमिष्टनाशचतुर्थके ॥ ८३॥ अर्थ-प्रथममें मनका उद्वेग दूसरेमें धनकी हानि और तीसरेमें गमन और चौथेमें इष्टका नाश होताहै ॥८३॥ पंचमेराजविध्वंसंषष्ठेसर्वार्थनाशनम् ॥ सप्तमेव्याधिदुःखानिअष्टमेमृत्युमादिशेत्॥८४॥ अर्थ-पांचवेमें राज्यका विध्वंस और छठेमें संपूर्ण अाँका नाश और सातवेमें व्याधि और दुःख और आठवेमें मृत्युका हौनी कहाहै ॥ ८४ ॥ कालवयेदिनान्यष्टौविपरीतंयदावहेत् ॥ तदादुष्टफलंप्रोक्तंकिंचिन्यूनंतुशोभनम् ।। ८५।। अर्थ-प्रातःकाल और मध्याह्न और सायंकाल इन तीनों कालोंमें यदि पूर्वोक्त विपरीत स्वरोंका उदय यदि आठ दिनतक बराबर चले तो उस समय दुष्ट फल कहा है यदि कुछ कम विपरीत चलै तो शुभ फलजानना ॥ प्रातमध्याह्नयोश्चंद्र-सायंकालेदिवाकरः।। तदानित्यंजयोलाभोविपरीतंविवर्जयेत् ॥८८ ।। अर्थ-जिस दिन प्रातःकाल और मध्याह्नको चंद्रमाका
भाषारीकासमेत। (२१)
स्वर और सायंकालको सूर्यका स्वर चलै तो उस
दिन जय और लाभ कहाहै और विपरीत चलैं तो वजदे
अर्थात् अनिष्ट फल होताहै ॥ ८६ ॥
वामेवादक्षिणेवापियत्रसंक्रमवेशिवः॥
कृत्वातत्पादमादौचयात्राभवतिसिद्धिदा ॥८७॥
अर्थ-यात्राके समय वाम वा ददिण जो स्वर
चलताहो उसी चरणको प्रथम.आगे रखकर यात्रा करै
तो वह यात्रा सिद्धिकी दाता होतीहै ॥ ८७ ॥
चंद्रःसमपदःकार्योरविस्तुविषमःसदा ॥
पूर्णपादंपुरस्कृत्ययात्राभवतिसिद्धिदा ॥ ८८ ॥
अर्थ-चंद्रमाका स्वर चलता होय तो सम पद२-४
६-आदि आगे रखने और सूर्यका स्वर चलता होय
तो विषम पद १-३-५-आदि आगे रखने इस प्रकार
पूर्ण पाद आगे रखनेसे यात्रा सिद्धिको दाता होतीहै८८
यत्रांगेवहतेवायुस्तदंगकरसत्तलत् ॥
सुप्तोत्थितोमुखंस्पृष्ट्वालभतेवांछितंफलम्॥८९॥
अर्थ-जिस अंगका स्वर चलताहो उसी अंगके हाथके
तलसे शयनसे उठ कर मनुष्य मुखको स्पर्श करै तो
वांछित फलको प्राप्त होताहै ॥ ८९ ॥
परदत्तेतथाग्राह्यगृहानिर्गमनेऽपिच ॥
यदंगेवहत्तेनाडीग्राह्यतेनकरांघ्रिणी॥१०॥
(२२) शिवस्वरोदय । अर्थ-दूसरेको दान देने वा ग्रहण करनेमें वा घरसे बाहर जानेमें जिस अंगकी नाडी चलतीहो उसी हाथ वा पैरको आगे करके वस्तुको ग्रहण करै तो ॥९० ॥ नहानिःकलहोनैवकंटकै पिभिद्यते ॥ निवर्त्ततेसुखीचैवसर्वोपद्रववर्जितः ॥ ९१ ॥ अर्थ-न हानिहो कलह हो-और न कंटक (शत्रु) से विधै और वह सर्वदा सुखी रहै और सब उपद्रवोंसे वर्जित रहेगा ॥ ११ ॥ गुरुबंधुनृपामात्येष्वन्येषुशुभदायिनी ॥ पूर्णागेखलुकर्त्तव्याकार्यसिद्धिर्मनःस्थिता॥९२॥ अर्थ-गुरु-बंधु-राजा मंत्री आदिसें शुभ-देनेवाली कार्यकी सिद्धि करनी होय तो पूर्ण हाथसे अर्थात् हाथमें कोई फल आदिलेकर करनी वह सिद्धि मनवां- छित फलको देतीहै ॥ ९२॥ 'आग्निचोराधर्मधर्मा अन्येषांवादिनिग्रहः ॥ कर्त्तव्याःखलु रिक्तायां जयलाभसुखार्थिभिः९३ अर्थ-अनिका दाह-चोर-अधर्म कार्य और वादिका निग्रह (पंड ) करना होय तो रिक्त (खाली) हाथसे ही जय लाभ सुखके अभिलाषी मनुष्य कार्य सिद्धिको करै ॥ ९३ ॥ दूरदेशेविधातव्यंगमनंतुहिमद्युतौ ॥
भाषाटीकासमेत । (२३) अभ्यर्णदेदीप्तेतुतरमावितिकेचन ॥ ९४ ॥ अर्थ-कोई ऐसे कहतेहैं कि दूर देशमें जाना होय तो चंद्रमाके स्वरमें और समीपके देशमें जाय तो सूर्यके स्वरमें गमन करै ॥ ९४ ॥ यत्किचित्पूर्वमुदिष्टलाभादिसमरागमः। तत्सर्वपूर्णनाडीषुजायते निर्विकल्पकम् ॥ ९॥ अर्थ-जो कुछ लाज आदि प्रथम कहाहै वह सब युद्धके समय तभी निःसंदेह होताहै जब नाडी पूरे २ स्वरसे चलतीहो ॥ ९५॥ शून्यनाड्याविपर्यस्तंयत्पूर्वप्रतिपादितम् ॥ जायतेनान्यथाचैवयथासर्वज्ञभाषितम् ॥ ९६ ॥ अर्थ-और शून्य नाडी चलती होय तो वह पूर्वोक्त फल शिवजीके कथनानुसार अन्यथा(उलटा)होताहै९६ व्यवहारेखलोच्चाटेद्वेषिविद्यादिवंचके । कुपितस्वामिचोरायेपूर्णस्थाःस्युर्भयंकराः॥९७ अर्थ-व्यवहार-दुष्ट-मनुष्यका उच्चाटन-वैरी-विद्या आदिसे ढगना-स्वामीका कोप और चौर आदि क्रूर कामों में पूर्ण स्वर भय के कर्ता होतेहैं अर्थात् अच्छे नहीं. 'दूराध्वनिशुभश्चंद्रोनिर्विघ्नोभीष्टसिद्धिदः॥ प्रवेशकार्यहेतौचसूर्यनाडीप्रशस्यते ॥ ९८ ॥ अर्थ- जो मनुष्य दूर मार्गमें जाया.चाहै उसको चंद्र (२४) शिवस्वरोदय । माका स्वर शुभहै और निविन्नु वांछितकी सिद्धि करताहै और प्रवेशके कार्यमें सूर्यकी नाडी श्रेष्ठ होतीहै॥९८॥ अयोग्येयोग्यतानाड्यायोग्यस्थानेऽप्ययोग्यता॥ कार्यानुबंधनोजीवोयथारुद्रस्तथाचरेत् ॥९९ ॥ अर्थ-अयोग्य कार्यमें नाडीकी योग्यता और योग्य कार्यमें अयोग्यताको कार्यका अनुबंधी जीव प्राप्त होताहै इससे जैसा स्वरहो तैसाही आचरण मनुष्य करै॥९९॥ चन्द्रचारेविषहतेसूर्योबलिवनियेत् ॥ सुषुम्नायांभवेन्मोक्षएकोदेवस्त्रिधास्थितः॥१०॥ अर्थ-चंद्रमाका स्वर चलै तो किसी के किये अप- राधकोनी मनुष्य सह लेताहै-और सूर्यका स्वर चलै तो बलवान्नी वशमें हो सकताहै और सुषुम्ना नाडीका स्वर होय तो मोक्ष होताहै इस प्रकार एक देव (स्वर) तीन प्रकारसे स्थितहै ॥ १० ॥ शुभान्यशुभकार्याणिक्रियतेहर्निशंयदा ॥ तदाकार्यानुरोधेनकार्यनाडीप्रचालनम् ॥१०१॥ अर्थ-जिस समय रात दिन शुभ और अशुभ किये जाय-ब कार्यके अनुसार नाडीको चलावे ॥१०१॥ अथ इडा। स्थिरकर्मण्यलंकारेदूराध्वगमनेतथा ॥ आश्रमेधर्मप्रासादे वस्तूनांसंग्रहे पिच ॥२॥ अर्थ-स्थिरकार्य-भूषण-दूर मार्गमें गमन-आश्रम- - A भाषाटीकासमेत.। (२५) धर्म-प्रासाद (मंदिर) और घरकी वस्तुओंके संग्रह (संचय ) करनेमें और ॥ १.२॥ वापीकूपतडागादिप्रतिष्ठास्तंभदेवयोः॥ यात्रादानेविवाहेचवस्त्रालंकारभूषणे ॥१०३ ॥ अर्थ-बावडी-कूप-तलाव-और देव-स्तंभ इनकी प्रतिष्ठा-और यात्रा-दान-विवाह-वस्त्र-अलंकार- भूषण इनमें ॥ १०३ ॥ शांतिकेपौष्टिकेचैव दिव्यौषधिरसायने ।। स्वस्वामिदर्शनेमित्रेवाणिज्येकणसंग्रहे ॥१०॥ अर्थ-शांति और पुष्टिके कर्म-दिव्य औषधि-रसा- यन-अपने स्मामीके दर्शन-मित्र-और व्यापार और कण ( अन्न ) के संग्रहमें ॥ १०४ ॥ गृहप्रवेशेसेवायांकृषौचबीजवापने ॥ शुभकर्मणिसंधौचनिर्गमेचशुभःशशी ॥ १० ॥ अर्थ-और गृहप्रवेश-सेवा-खेती-बीजका बोना- शुभ कर्म और संधि (मेल) और गमन इनमें चंद्रमा-- का स्वर ( इडा) शुभ होताहै ॥ १०५॥ विद्यारम्भादिकार्येषुवांधवानांचदर्शने ॥ जन्ममोक्षेचधर्मेचदीक्षायांमंत्रसाधने ॥ १०६ ॥ अर्थ और विद्यारंभ आदि कार्यों में और बांधवोंके - (२६) शिवस्वरोदय । दर्शनमें-जन्म और मोक्षम धर्ममें और यज्ञ आदिकी दीक्षामें और मंत्रकी सिद्धिमें ॥ १०६ ॥ कालविज्ञानमूत्रेतुचतुष्पादगृहागमे । कालव्याधिचिकित्सायांस्वामिसंबोधनेतथा१०७ अर्थ-कालका ज्ञान व सूत्र और चतुष्पादों (पशु) के घरमें . आगमन में कालकी व्याधिकी चिकित्सामें और स्वामीके संबोधन ( बुलावना ) में ॥ १०७ ॥ गजाश्वारोहणेधन्विर्गजाश्वानांचबंधने ॥ परोपकरणेचैवनिधीनांस्थापनेतथा॥१०८॥ अर्थ-हाथी व घोडेकी सवारी-धनुष्यका धारण- हाथी व घोडेका बांधना परका उपकार करना और निधी (खजाना) का स्थापन करना ॥ १८ ॥ गीतवाद्यादिनृत्यादौनृत्यशास्त्रविचारणे ॥ पुरग्रामनिवेशेचतिलकक्षेत्रधारणे ॥ १०९॥ अर्थ-गीत वादित्र (बाजा) नृत्य और नृत्य शास्त्रका विचार–पुर और ग्रामका प्रवेश और तिलक और ' 'खेतका धारण इनमेंनी चंद्र नाडी (इडा) शुभ होतीहै ॥ १०९ ॥ आतिशोकविषादेचज्वरितेमूच्छितेपिया ।। स्वजनस्वामिसंबंधेअन्नादेरुसंग्रहे ॥११॥ अर्थ-रोग-शोक-विषाद (उदासी) ज्वर पीडा- मूर्छा-अपने 'जन और स्वामीके संबंधों और अन्न
भाषाटीकासमेत। (२७)
और काठके संग्रहमेंभी चंद्र नाही श्रेष्ठहै ॥ ११ ॥
स्त्रीणांदतादिभूषायांवृष्टेरागमनेतथा॥
गुरुपूजाविषादीनांचालनेचवरानने ॥ १११ ॥
अर्थ-स्त्रियोंको दंत आदिका भूषण-वृष्टिका आग-
मन गुरुकी पूजा और विष आदिका चालन (बाहिर-
निकासना ) में हे पार्वति चंद्र नाडी श्रेष्ठहै ॥.१११ ॥
इडायांसिद्धिदंप्रोक्तंयोगाभ्यासादिकर्मच॥
तत्रापिवर्जयेद्वायुतेजआकाशमेवच ॥ ११२ ॥
अर्थ-इडा नाडीमें योगाभ्यास आदि कर्म सिद्धिका
दाता कहाहै तथापि इडा नाडीमें जब वायु और
आकाश तत्व-वहते हों तब इडाकोभी वर्ज दे॥११२॥
सर्वकार्याणिसिद्धयंति दिवासत्रिगतान्यपि ॥
सर्वेषुशुभकार्येषुचंद्रचार प्रशस्यते ॥ ११३॥
अर्थ-दिन और रात्रिके सब काम इडानाडीमें सिद्ध
होतेहैं और संपूर्ण शुभ कार्योंमें चंद्रमाका चार ( इडा)
उत्तम होता है ॥ ११३॥
अथ पिंगला।
कठिनफरविद्यानांपठनेपाठनेतथा ॥
स्त्रीसंगवेश्यागमनमहानौकाधिरोहणे ॥ ११४॥
अर्थ-कठिन और क्रूर (मारण आदि) विद्याओंके
पठने व पढानेमें-स्त्रीका संग और वेश्याके गमनमें और
महानौका ( जहाज ) के चढनेमें ॥ १४॥
(२८)
शिवस्वरोदय ।
भ्रष्टकार्येसुरापानेवीरमंत्राथुपासने ॥ विह्वलो-
द्धंसदेशादौविषदानेचवैरिणाम् ॥ ११९ ॥
अर्थ-भ्रष्टकार्य-मदिराकापान-वीरमंत्रआदिकी उपा-
सना-विह्वलहोना-देशका विध्वंस-और वैरियोंको विर्ष
देना-इनमें और ॥ १५॥
शास्त्राभ्यासेचगमनेभृगयापशुविक्रये ॥
इष्टिकाकाष्ठपाषाणरत्नघर्षणदारणे ॥ ११६॥
अर्थ-शास्त्रका अस्यांस-गमन-मृगया पशुओंका
बेचना-ईंट काठ-पत्थर रत्न इनका घिसना और तोडना
इनमें सूर्यनाडी (पिंगला ) श्रेष्ठ है ॥ ११६ ॥
गत्यभ्यासेयंत्रतंत्रेदुर्गपर्वतरोहणे ॥. द्यूते
चौयगजाश्वादिस्थसाधनवाहने ॥ ११७ ।।
अर्थ-गमनका अभ्यास-यन-तंत्र-किला और पर्वत-
पर चढना-यूत (जुआ ) और चोरीकरना-हाथी घोडा.
रथ-इनको साधना व चलाना-इनमें ॥ ११७ ॥
व्यायामेमारणोच्चाटेषटुर्मादिकसाधने ।
यक्षिणीयक्षवेतालविषभूतादिनिग्रहे ॥ ११८॥
अर्थ-व्यायाम (कसरत) मारण-उच्चाटन-षट्क-
ौंको सिद्धकरना-और यक्षिणी यक्ष बेताल-विष भूत
आदिका निग्रह (रोकना ) इनमें ॥ ११८॥
खरोष्ट्रमहिषादीनांगजाश्वारोहणेतथा ॥
नदीजलोवतरणेभेषजेलिपिलेखने ॥ ११९ ॥
'भाषाटीकासमेत। (२९) अर्थ-गधा-ऊंट असा हाथी घोडा इनपर चढना और नदीके जल वेगसे पार उतरना औषध करना और लीपना व लिखना-इनमें ॥ ११९ ॥ मारणेमोहनेस्तंभेविद्वेषोच्चाटनेक्शे ॥ प्रेरणेकर्षणेक्षोभेदानेचक्रयविक्रये ॥ १२०॥ अर्थ-मारना-मोहना स्तंभ ( रोक ) करना विद्वेष (वैर ) करना उच्चाटन और वशमें करना प्रेरण और खेती करना क्षोभ दान और लेन देनमें ॥ १२० ॥ प्रेताकर्षणविद्वेषशत्रुनिग्रहणेपिच ॥ खङ्ग- हस्तेवैरियुद्धेभोगवाराजदर्शने ॥ भोज्येस्ना- नेव्यवहारदीप्तकायैरविःशुभः ॥ १२१ ॥ अर्थ-प्रेतका आकर्षण ( बुलाना) शत्रुका निग्रह दंड खड्ग (तलवार) को हाथमें लेना वैरीके संग युद्ध भोग वा राजाके दर्शनमें भोजन व स्नान और व्यवहार-दीप्त (प्रकाशित कार्य) इनमें सूर्यनाडी (पिंगला) शुभकहींहै। भुक्तमार्गेणमंदानौस्त्रीणांवश्यादिकर्मणि ॥ शयनंसूर्यवाहेनकर्तव्यंसर्वदाबुधैः ॥ १२२॥ अर्थ-भोजनके द्वारा मंदामिकरने में और स्त्रियोंको वशमें करना सोना ये सब काम पंडितजन सूर्य स्वरके चलते समयमें करे ॥ १२२ ॥ क्रूराणिसर्वकर्माणिचराणिविविधानिच॥ तानिसिद्धयंतिसूर्येणनात्रकार्याविचारणा१२३॥
(३०) शिवस्वरोदय । अर्थ-संपूर्णक्रूरकर्म और अनेक प्रकारके चरकर्म वे सर्व सूर्यकी नाडी (पिंगला ) में सिद्ध होतेहैं इसमें कोई विचार नहीं करना ॥ १२३ ॥ अथ सुषुम्ना। क्षणंवामेक्षणंदक्षेयंदावहतिमारुतः॥ सुषुम्नासाचविज्ञेयासर्वकार्यहरास्मृता ॥१२४॥ अर्थ-जो पवन क्षणभर वामभाग और क्षणभर दक्षिण भागमें चलै वह नाडी सुषुम्ना जाननी और सुषुम्ना सब कार्योंको हारनेवाली कंहीहै ॥ १२४ ॥ तस्यांनाड्यांस्थितोवहिवलतेकालरूपकः॥ विषवत्तं विजानीयात्सर्वकार्यविनाशनम्॥१२॥ अर्थ-उस नाडीमें ठिकी हुयी अनिकाल रूप जलती है उस अग्निको विष बाली और सब कार्योंका नाशक जानना ॥ १२५॥ यदानुक्रममुल्लंध्ययस्यनाडीद्वयंवहेत् ॥ तदातस्यविजानीयादशुभंनात्रसंशयः॥१२६॥ अर्थ-जब अपने २ स्वाभाविक क्रमका अवलं- धन करके जिस पुरुषकी दोनों नाडी चलै तब उस पुरुषका अशुभ जानना इसमें संदेह नहींहै ॥ १२६ ॥ श्रणवामेक्षणंदक्षेविषमभावमादिशेत् ॥ विपरीतंफलंज्ञेयज्ञातव्यंचवरानने ॥ १२७॥ अर्थ-क्षणभर वाम भाग और क्षणार दक्षिण
भाषाटीकासमेत ।
भागमें पवन चले तो उसको विषम कहै और हे पार्वति
उसका विपरीत फल जानना ॥ १२७ ॥
उभयोरेवसंचारंविषवंतविदुर्बुधाः ॥
'नकुर्यात्क्रूरसौम्यानितत्सर्वविफलंभवेत्॥१२८॥
अर्थ-दोनों नाडियोंके संचारको विषवान् ऐसा
पंडित जन कहतेहैं उसमें क्रूर और सौम्य कर्म न करे
यदि करै तो वे सब निष्फल होतेहैं ॥ १२८ ॥
जीवितेमरणेप्रश्नलाभालाभेजयाजये ॥
विषमेविपरीतेचसंस्मरेज्जगदीश्वरम् ॥ १२९ ॥
अर्थ-जीने-मरण-प्रश्न-लाभ-अलाभ-जय-
पराजय-विषम-और विपरीत स्वरके चलनेमें जगदी-
श्वरका स्मरण करै ॥ १२९ ॥
ईश्वरेचिंतितेकार्ययोगाभ्यासादिकर्मच॥
अन्यत्तत्रनकर्तव्यंजयलाभसुखैषिभिः ॥१३०॥
अर्थ-ईश्वरका चिंतन करके उस समय योगा-
भ्यास आदि कर्म ही करना और जय लाभ सुखके.
अभिलाषी उस समय और कोई काम न करें॥१३०॥
सूर्येणवहमानायांसुषुम्नायांमुहुर्मुहुः॥
शापंदद्यादरंदद्यात्सर्वथैवतदन्यथा ॥ १३१॥
'अर्थ-जब सूर्यकी नाडी सुषुम्ना वारंवार वहै तो
उस समय जो शाप अथवा वर दे वह सब अन्यथा
(विपरीत) होताहै ॥ १३१ ॥
(३२) शिवस्वरोदय ।
नाडीसंक्रमणेकालेतत्त्वसंगमनेपिच ।।
शुभंकिंचिन्नकर्त्तव्यंपुण्यदानानिकोटिधा १३२॥
अर्थ-नाड़ीके संचलन (मेल) के और तत्वोंके
संचलनमें कोई शुभ कर्म न करना और पुण्य दान
आदि कर्मभी न करने ॥ १३२ ॥
विषमस्योदयोयत्रमनसाऽपिनचिंतयेत् ।।
यात्राहानिकरीतस्थमृत्यु-क्लेशोनसंशयः॥३३॥
अर्थ-जिस समय विषम स्वरका उदयहो तब मनसे
भी किसी कार्यकी चिंता न करै जो उस मनुष्यकी
यात्रा हानिकी करनेवाली होतीहैं और मृत्यु अथवा
केश होताहै इसमें संदेह नहींहै ॥ १३३ ॥
पुरोवामोर्ध्वतश्चंद्रोदक्षाधः पृष्ठतोरंदिः।।
पूर्णरिक्तविवेकोर्यज्ञातव्योदेशिकै सदा ॥१३॥
अर्थ-जब प्रथम वाम स्वर और पीछे चंद्र स्वरहो
और फिर दक्षिण स्वरके पीछे सूर्य स्वरका उदयहो ये
दोनों क्रम पूर्ण और रिक्त (खाली) सदैव पंडितों-
'ने.जानने ॥ १३४ ॥
अलवामाग्रतोदूतोज्ञेयोवामपथिस्थितः ॥
पृष्ठेदक्षेतथाऽधस्तात्सूर्यवाहागंतःशुभः॥१३६॥
अर्थ-वाम स्वरसे पीछे वा पहिले यदि आताहुआ
दूत वाम भागमें स्थितहो और दक्षिण स्वरके पीछे वा
पहिले आताहुआ दूत दक्षिण भागमें स्थित होय तो
शुभ होताहै ॥ १३५॥
भाषाटीकांसमेत
अनादिविषम संधिनिराहारोनिराकुलः ।।
परेसूक्ष्मेविलीयेत सासंध्यासद्भिरुच्यते ॥१३६॥
अर्थ-अनादि जो विषम संधि (सुषुम्ना ) निराहार
और निराकुल होकर पर सूक्ष्म ब्रह्ममें लीन हो जाय
अर्थात् एक रस चलती हुयी जिस सुषुम्नासे ब्रह्मकी
प्राप्ति हो जाय उस सुषुम्नाको सज्जन संध्या कहते हैं। ३६
नवेदवेदइत्याहुर्वेदोवेदोनविद्यते ॥
परात्माविद्यतेयेनसवेदोवेदउच्यते ॥ १३७॥
अर्थ-पंडित जन वेदको वेद नहीं कहते और वेद
वेदह भी नहीं-किंतु परात्मा जिससे जाना जाय वहीं
ज्ञानियोंने वेद कहाहै ॥ १३७ ॥
नसंध्यासंधिरित्याहुःसंध्यासंधिर्जिगद्यते ।।
विषमः संधिगःप्राणःससंधिस्संधिरुच्यते॥१३८॥
अर्थ-संध्याको संधि पंडित जन नहीं कहते और न
संध्याको संधि कह सकतेहैं किंतु जब विषम संधिमें
प्राणहो वही संधि कहातीहै ॥ १३८॥
इति नाडीभेदः।
श्रीदेव्युवाच ॥ देवदेवमहादेवसर्वसंसारतारक ॥
स्थितंत्वदीयहृदयेरहस्यवदमेप्रभो।। १३९॥
'अर्थ-पार्वती बोली कि हे देवों के देव! हे महादेव !
हे सब संसारके तारक ! जो रहस्य (गुप्त) आपके हृद-
यमें स्थितहै हे प्रभो ! वह मुझे कहो ॥ १३९.॥
(३४) शिवस्वरोदन । ईश्वरउवाच ॥ स्वरज्ञानरहस्यात्तुनकाचिच्चेष्ट- देवता ॥ स्वरज्ञानरतोयोगीसयोगीपरमोमतः॥ अर्थ-महादेव बोले कि-स्वरज्ञानके रहस्यसे परे कोई इष्ट देवता नहींहै-जो योगी स्वरके ज्ञानमें रहतेहैं वहीं योगी परम मानाहै ॥ १४० ॥ पंचतत्त्वाद्भवेत्सृष्टिस्तत्त्वेतत्त्वंप्रलीयते ॥ पंचतत्त्वंपरंतत्त्वंतत्त्वातीतंनिरंजनम् ॥ १४१॥ अर्थ-पांच तत्वोंसे सृष्टि होतीहै और तत्वमें ही तत्व लीन होताहै-पांच तत्वही परम तत्वहै और निरंजन (ब्रह्म) तत्वोंसे अतीत (परे ) हैं ॥ १४१ ॥ तत्त्वानांनामविज्ञेयंसिद्धियोगेनयोगिनाम् ॥ भूतानांदुष्टचिनानिजानातीहस्वरोत्तमः॥१४२॥ अर्थ-योगीजन सिद्धिक योगसे तत्वोंका नाम जाने जो मनुष्य स्वरोंको ही उत्तम समझताहै वह सबप्रमणि- योंके दुष्ट चिन्होंको जानसकता है ॥ १४२॥ पृथिव्यापस्तथातेजोवायुराकाशमेवच ॥ पंचभूतात्मविश्वंयोजानातिसपूजितः ॥१४३॥ अर्थ-जो मनुष्य पृथिवी-जल-तेज-वायु और आकाश इन पंचभूतात्मक विश्वको जानता है वही पूजित होता है ॥ १४३ ॥ सर्वलोकस्थजीवानांनदेहोभिन्नतत्त्वकः ॥ भूलोकात्सत्यपर्यंतंनाडीभेदःपृथक्पृथक् १४४
भाषाटीकासमेत । (३५)
अर्थ-भूलोकसे सत्यलोकपर्यंत सबलोकमें स्थित
जितने जीवहैं उनका देह भिन्न २ तत्वरूप नहींहै परंतु
नाडीका भेद पृथक् २ है ॥ १४४ ॥
वामेवादक्षिणेवाऽपिउदयापंचकीर्तिताः ॥
अष्टधातत्त्वविज्ञानंशृणुवक्ष्यामिसुंदरि ॥१४॥
अर्थ-वामभाग वा दक्षिण भागमें पांच२उदय कहे
हैं। हे सुंदरि उन तत्वोंको विज्ञान आठ प्रकारका मैं
कहताहूं तू सुन ॥ ३४५॥
प्रथमेतत्त्वसंख्यानं द्वितीयेश्वाससंधयः॥
तृतीयेस्वरचिह्नानिचतुर्थेस्थानमेवच ॥१४६ ।।
अर्थ-प्रथम तत्वोंका संख्यान (गिनती) दूसरा
भेद श्वासकी संधी-तीसरा मेव स्वरोंका चिन्ह चौथा
भेद स्वरोंका स्थान ॥ १४६ ॥
-पंचमेतस्यवर्णाश्चषष्ठेतुप्राणएवच ॥
सप्तमेस्वादसंयुक्ताअष्टमेगतिलक्षणम् ॥१४७॥
अर्थ-पांचवा भेद तत्वोंका रंग-छठे भेदमें प्राण-मार्त-
में स्वादका संयोग-आठवभेदमें गतिके लक्षण-॥१४७
एवमष्टविधंप्राणविषुवंतंचराचरम् ॥
.स्वरात्परतरंदेविनान्यथात्वंबुजेक्षणे ॥ १४८!
अर्थ-इस प्रकार चराचरमें व्यापक आठ प्रकारका
प्राण होता है-हेदेवि स्वरसे परे अन्यथा (इतर) ज्ञान
नहीं है ॥ १४८॥
(३६) शिवस्वरोदय । निरीक्षितव्ययत्नेनसदाप्रैल्यूषकालतः ॥ कालस्यवंचनायकर्मकुर्वतियोगिनः॥१४९॥ अर्थ-प्रातःकालसे लेकर सदैव स्वरको देखना- क्योंकि योगिजन कालक्षेपके लिये कौको करते हैं परन्तु उनको स्वर और तत्वकी पहिचान रहतीहै ॥ १४९ ॥ श्रुत्योरंगुष्टकौमध्यांगुल्यौनासापुटद्वये ॥ वदनप्रांतकेचान्यांगुलीदद्याचनेत्रयोः॥१५॥ अर्थ-कानोंमें दोनों अंगूठे-और दोनों नासिकाके पुटोंमें मध्यकी दोनों अंगुली मुखके प्रान्तभाग ( दोनों- होठोंका मेल) में और नेत्रों में शेष अंगुली अर्थात् नेत्रोंमें तर्जनी और अनामिका और कनिष्ठा मुखप्रांतमें लगावे ॥ १५० ॥ अस्यांतस्तुपृथिव्यादितत्त्वज्ञानं भवेत्क्रमात् ॥ पीतश्वेतारुणश्यामबिंदुभिनिरुपाधिकम् ।।१५१ अर्थ-इसके बीच में पृथिवी आदि तत्वोंका ज्ञान क्रमसे पीत-श्वेत अरुण (लाल) और श्याम बिंदुओंसे उपाधिरहित (स्पष्ट ) होताहै अर्थात् . पृथिवीका पीत- वर्ण जलका श्वेत तेजका लाल वायुका श्याम और आकाशका चित्र वर्ण होताहै ॥ १५१ ॥ दर्पणेनसमालोक्य तत्रश्वासंविनिक्षिपेत् ।। आकारैस्तुविजानीयात्तत्त्वभेदंविचक्षणः ॥१५२ 'भाषाटीकासमेत। (३७) अर्थ-दर्पणमें मुखको देखकर श्वासको छोडे और आकारोंको देखकर तत्वके भेदको पंडित जनजाने १५२ चतुरनंचार्धचंद्रंत्रिकोणंवर्तुलंस्मृतम् ॥ बिंदुभिस्तुनभोज्ञेयमाकारैस्तत्त्वलक्षणम्॥१५३ अर्थ-चतुरस्त्र (चोकोर )-अर्द्धचंद्राकार-त्रिकोण (त्रिकोणा) वर्तुल (गोला) बिंदुओंका आकार नेत्रोंको आगे दीखै तो आकाशतत्वका लक्षण जानना॥१५३॥ मध्येपृथ्वीरधश्चापश्चोर्ध्ववहतिचानलः॥ तिर्यग्वायुप्रवाहश्च नभोवहतिसंक्रमे ॥ १५४॥ अर्थ-मध्यमें पृथिवी-और नीचे जल-और ऊपर अनि और तिरछा वायुका प्रवाह होताहै और दोस्व- रोंका संक्रम चलता होय तो आकाश तत्वका चलना जानना ॥ १५४ ॥ आपाश्वेता क्षितिःपीतारक्तवर्णाहुताशनः॥ मारुतोनीलजीमृतआकाशःसर्ववर्णकः ॥१५॥ अर्थ-जलोंका श्वेतवर्ण-पृथिवीका पीत-अनिका रक्त-और पवन-नीलमेघवर्ण-और आकाश सब वर्ण- रूप होताहै ॥ १५५ ॥ अबस्थानपरत्वसे तत्त्वज्ञान। स्कंधयेस्थितोवह्निर्नाभिमूलेप्रभंजनः ॥ जानुदेशेक्षितिस्तोयं पादांतमस्तकेनभः १५६॥ अर्थ-दोनों कंधोंपर अनि-नाभिके मूलंमें पवन- -
(३८) शिवस्वरोदय ।
जानु (गोडे) देशमें पृथिवी-पाद(चरण)के अंतमें जल-
और मस्तकमें आकाश तत्व स्थित रहताहै ॥१५६॥
अब स्वादसेतत्वज्ञानप्रकार।
माहेयंमधुरंस्वादेकषायंजलमेवच ॥
तीक्ष्णंतेजःसमीरोम्लआकाशंकटुकंतथा॥१६७
अर्थ-पृथिवीका स्वर मीठा-जलका स्वर खारा-
तेजका स्वर तीखा-पवनका स्वर अम्ल-और आका-
शका स्वर कटु (कडवा ) होताहै ॥ १५७ ॥
अब गतीसे तत्त्वज्ञान।
अष्टांगुलंवहेद्वायुरनलश्चतुरंगुलं ॥ द्वादशांगु-
लिमाहेयंवारुणंषोडशांगुलम् ॥ १५९८ ।
अर्थ-वायुका स्वर आठ अंगुल-पवनका चार
अंगुल-पृथिवीका स्वर बारह अंगुल-और जलका स्वर
सोलह अंगुल चलताहै ॥ १५८ ॥
ऊ_मृत्युरधशांतिस्तिर्यगुच्चाटनंतथा।।
मध्येस्तंभंविजानीयान्नभःसर्वत्रमध्यमम्॥१५९॥
अर्थ-ऊर्ध्व स्वर चले तो मृत्यु-और नीचा स्वर
चलै तो शांति-तिरछा चलै तो उच्चाटन-मध्यका स्वर
चलै तो स्तंभ (रोकना ) ये काम करें और आकाश
तत्व सब कार्यों में मध्यम जानना ॥ १५९ ॥
पृथिव्यांस्थिरकर्माणिचरकर्माणिवारुणे॥
तेजस्क्रूिरकर्माणिमारणोच्चाटनेऽनिले॥१६॥
भाषाटीकासमेत । (३९) अर्थ-पृथिवी तत्वमें स्थिर कार्य-और जलमें चर कार्य-और तेजमें क्रूर कार्य और मारुत (पवन ) में पारण और उच्चाटन कर्म करनेसे सिद्ध होतेहैं॥३६०॥ व्योग्निकिंचिन्नकर्त्तव्यमभ्यसेयोगसेवनम् ।। शून्यतासर्वकार्येषुनावकार्याविचारणा ॥६१ ॥ अर्थ-आकाशमें कुछ काम न करै किंतु योगके सेवनका अयास करै और उसमें सब काम शून्य होतेहैं इसमें विचार न करना ॥ १६१ ॥ पृथ्वीजलाभ्यांसिद्धिःस्यान्मृत्युर्वन्हौक्षयोऽनिले नभसोनिष्फलंसर्वज्ञातव्यतत्त्ववादिभिः।।१६२॥ अर्थ-पृथिवी और जल तत्वसे सिद्धि वन्हि तत्वमें मृत्यु-और पवनमें क्षय (नांश) और आकाश तत्वमें सब काम निष्फल-तत्ववादियोंको जानने ॥ १६२॥ चिरलाभःक्षितेज्ञेयस्तत्क्षणेतोयतत्त्वतः ॥ हानिःस्यादह्निवाताभ्यांनभसोनिष्फलंभवेत् ॥ अर्थ-पृथ्वी तत्वसे अधिक लांच हो, जल तत्स तत्क्षण लाभ हो, वायु और अमि तत्वसे हानि प्रकार, आकाश तत्वसे निष्फल जानना ॥ १६३ ॥ पीतःशनैर्मध्यवाहीहनुर्यावद्द्वरुध्वनिः॥ कवोष्ण पार्थिवोवायुःस्थिरकार्यप्रसाधकः १६४ अर्थ-पीत वर्ण-और शनैःश्वा मध्यम चलनेवाला और हनु (ठोडी ) पर्यंत जिसका शब्द गुरु ( भारी) . (४०) शिवस्वरोदय । हो और जो किंचित् उपाहो ऐसे पृथिवी संबंधि वायु (स्वर ) को स्थित कार्योंका साधः पाहतेहैं॥१६४॥ अधोवाहीगुरुवानःशीघ्रगःशीतल स्थितः॥ यः षोडशांगुलोवायुः सआपः शुभकर्मकृत् १६६ अर्थ-जो नीचेको बहै और जिसकी ध्वनी गुरुहो- जो शीघ्र चलै और जिसकी स्थिति शीतलहो और जो सोलह अंगुल हो स्वर जलका होताहै उसमें शुभ काम करने ॥ १६५॥ आवर्तगश्चात्युष्णश्वशोणाभश्चतुरंगुलः॥ ऊर्ध्ववाहीचयक्रूरःकर्मकारीसतैजसः ॥१६६॥ अर्थ-जो आवर्त (मों) तक चले-अत्यंत उष्णहो और लालहो और चार अंगुल हो और ऊपरको चलै वह स्वर तेजका है उसमें क्रूर कर्म करने ॥ १६६ ॥ उष्णः शीतःकृष्णवर्णस्तिर्यग्गाम्यष्टकांगुलः ।। वायुः पवनसंज्ञस्तुचरकर्मप्रसाधकः ॥ १६७॥ अर्थ-जो शीतोष्ण हो और कृष्णवर्ण हो और तिरछा चलै और आठ अंगुलका हो वह वायु (स्वर) पवनका है उसमें चर काम सिद्धि होतेहैं. ॥ १६७ ॥ यः समीरः समरसः सर्वतत्त्वगुणावहः ॥ आंबरंतं विजानीयायोगिनांयोगदायकम्।।१६८॥ अर्थ-जो पवन (स्वर) एक रस-और सब तत्वोंके भाषाटीकासमेत । (४१) गुणोंको वहै उस स्वरको आकाशका जानै और वही स्वर योगियोंको योगका दाता होताहै ॥ १६८ ॥ पीतवर्णचतुष्कोणमधुरंमध्यमाश्रितम् ।। भोगदंपार्थिवंतत्त्वंप्रवाहेद्वादशांगुलम् ।।१६९॥ अर्थ-जिसका वर्ण पीतहो चौकोरहो और मधुरहो और मध्यमें वहै और जिसका बारह अंगुलका प्रवाह हो वह पृथिवी तत्व होताहै और भोगका दाता होताहै १६९ श्वेतमधंदुसंकाशंस्वादुकाषायमाईकं ॥ लाभकृतारुणंतत्त्वंप्रवाहेषोडशांगुलम् ॥१७॥ अर्थ-जिसका वर्ण श्वेतहो अर्धचंद्राकारहो स्वादु हो-कसेला आई (गीला) हो और सोलह अंगुलका जिसके प्रवाह का प्रमाणहो वह जलतत्व होताहै और लाभको देताहै ॥ १७ ॥ रक्तंत्रिकोणंतीक्ष्णंचऊर्श्वभागप्रवाहकम् ॥ दीप्तंचतैजसंतत्त्वंप्रवाहेचतुरंगुलम् ॥ १७१ ॥ अर्थ-जिसका रंग रक्तहो और जो तिकोनाले और तीक्ष्ण हो और जिसका प्रवाह ऊपरको हो और जो प्रकाशमान हो और जिसका प्रमाण चार अंगुलका हो वह तत्व तेजसंबंधी जानना ॥ १७१ ॥ नीलंचवर्तुलाकारंस्वादम्लंतिर्यगाश्रितम् ॥ चपलंमारुतंतत्त्वंप्रवाहेऽष्टांगुलंस्मृतम् ॥१७२॥ अर्थन्जो नीला गोल स्वादमें खट्टाहो और तिरछा (४२) शिवस्वरोदय । चलताहो और जो चपल हो और जिसका प्रवाह आठ अंगुलका हो वह तत्व पंवनसंबंधी जानना ॥ १७२॥ वर्णाकारेस्वादवाहे अव्यक्तंसर्वगामिनाम्॥ मोक्षदंनाभसंतत्त्वंसर्वकार्येषुनिष्कलम् ॥१७३॥ अर्थ-वर्ण आकार स्वाद प्रवाहमें जिसकी गति अव्यक्त हो अर्थात् जिसमें सबका हेल मेल पाया जाय वह आकाशसंबंधी तत्व जानना और सब कार्यों में निष्फल होताहै ॥ १७३०॥ पृथ्वीजलेशुभेतत्त्वतेजोमिश्रफलोदयम् ॥ हानिमृत्युकरौपुंसामशुभौव्योममारुतौ॥१७॥ अर्थ-पृथ्वीतत्व और जलतत्व शुभ होतेहैं-और तेजके तत्वमें मिश्र ( मध्यम ) फल होताहै और आकाश और वायु तत्वमें हानि व मृत्यु आदि अशुभ फल होतेहैं ॥ १७४ ॥ आपूर्वपश्चिमेपृथ्वीतेजश्चदक्षिणेतथा॥ लायुश्चोत्तरदिग्ज्ञेयोमध्येकोणगतंनभः ॥१७॥ . अर्थ-पूर्वसे लेकर पश्चिम पर्यंत पृथ्वीतत्व और दक्षिणमें तेज तत्व और उत्तर दिशामें वायु तत्व और मध्यकी दिशामें आकाश तत्व जानना ॥१७५॥ चंद्रेपृथ्वीजलेस्यातांसूर्येऽग्निर्वायदाभवेत् ॥ तदासिद्धिर्नसंदेहः सौम्यासौम्येषुकर्मसु।।१७६॥ अर्थ-चंद्रमाके स्वरमें पृथ्वी और जल तत्व और भाषाटीकासमेत। (४३) सूर्यके स्वरमें अग्नि तत्व जिस समय हों उस समयमें अच्छे और बुरे कर्मोंकी सिद्धि होती इसमें संदेह नहींहै ॥ १७६ ॥ •लाभःपृथ्वीकृतोऽन्हिस्यानिशायांलांभकृजलम् वन्हौमृत्युःक्षयोवायुर्नभःस्थानंदहेत्वचित् १७७ अर्थ-दिनमें पृथ्वी तत्वसे और रात्रिमें जल तत्वसे लाभ होताहै और अग्नि तत्वसे मृत्यु और वायु तत्वसे नाश और आकाश तत्वसे दाहनी कमी २ होजाताहै॥ जीवितव्येजयेलाभेकृष्यांचधनकर्मणि ॥ मंत्रार्थयुद्धप्रश्चगमनागमनेतथा ॥१७८॥ अर्थ-जीवन-जय-लाभ-कषि-धनका कर्म-मंत्रका कार्य और युद्धका कर्म प्रश्न गमन और आगमन इनमें पृथ्वी तत्व श्रेष्ठ होताहै ॥ १७८॥ आयातिवरुणेतत्त्वेशत्रुरस्तिशुभंक्षितौ।। प्रयातिवायुतोऽन्यत्रहानिमृत्यूनभोनले ॥१७९॥ अर्थ-यदि जलका तत्व होय तो शत्रुका आगमत. समझना और पृथ्वी तत्वमें शुभ होताहै और वायु तत्व होय तो शत्रु अन्यस्थानमें चला जायगा-और आकाश व अग्नि तत्व होय तो शत्रुकी हानि व-मृत्यु होगी१७९ पृथिव्यांमूलचिंतास्याज्जीवस्यजलवातयोः॥ तेजसाधातुचिंतास्याच्छून्यमाकाशतोवदेत् ॥ अर्थ-यदि किसके पूछनेके समय पृथ्वी तत्व होय (४४) शिवस्वरोदय ।. तो मूल (वक्ष आदि) की चिंता और जल व वायु तत्वमें जीवकी चिंता और तेजके तत्वमें धातुचिंता समझनी और आकाश तत्वमें शून्य कहै अर्थात् किसी चिंता न कहैं॥ १८० ॥ पृथिव्यांबहुपादास्युद्धिपदस्तोयवायुतः ॥ तेजस्येवचतुष्पादोनभसापादवर्जितः॥१८॥ अर्थ-पृथ्वी तत्व होय तो बहुतपादोंसे गमन होताहै अर्थात् बहुतोंके संग गमन करैगा-और जल और वायु तत्व होय तो दोपादोंसे (अकेला) गमन कहै-और तेज तत्व होय तो चार पादोंसे ( दोमनुष्यसे ) गमन करेगा- और आकाशतत्व होय तो पादोंसे रहित कहै अर्थात कहींभी नजायगा ऐने कहै ॥ १८३ ॥ कुजोवन्हीरविःपृथ्वीसौरिरापःप्रकीर्तितः॥ वायुस्थानस्थितोराहुर्दक्षरंध्रप्रवाहकः ॥३८२।। अर्थ-अग्नितत्त्वमें मंगल पृथ्वीतत्वमें सूर्य और जलतत्वमें शनैश्चर और वायुतत्वमें राहु तब जानना यदि दक्षिण स्वर चलताहो ॥ १८२ ॥ जलंचंद्रोबुधपृथ्वीगुरुर्वातःसितोऽनलः ॥ वामनाड्यांस्थिताःसर्वेसर्वकार्येषुनिश्चिताः १८३ अर्थ-यदि वामस्वर बहता होय तो जलतत्वमें चंद्रमा पृथ्वीतत्वमें बुध पवनतत्वमें बृहस्पति-और भाषाटीकासमेत। अमितत्वमें शुक्र जानना में संपूर्णग्रह सर्वकार्यों में इन पूर्वोक्ततत्वोंमें निश्चयसे स्थित रहतेहैं ॥ १८३ ॥ पृथ्वीवुधोजलादिंदुःशुक्रोवहीरविःकुजः॥ वायूराहुशनीव्योमगुरुरेवप्रकीर्तितः॥१८॥ अर्थ-पृथ्वीतत्वमें बुध-जलतत्वमें चंद्रमा और अग्नि तत्वमें-सूर्य-मंगल-और वायु तत्वमें-राहु और. शनैश्चर- आकाशतत्वमें बृहस्पति कहाहै ॥ १८४ ॥ प्रवासप्रश्नआदित्येयदिराहुंगतोऽनिले ॥ तदासौचलितोज्ञेयःस्थानांतरमपेक्षते ॥१८॥ अर्थ-यदि कोई मनुष्य परदेशमें गयेहुयेका प्रश्नकरै और उससमय सूर्यके स्वरमें राहु स्थित होयतो यह कहै कि वह परदेशी अन्यत्र जाने के लिये उसस्थानसे चलदिया ॥ १८५॥ आयातिवारुणेतत्त्वेतत्रैवास्तिशुभंक्षितौ ॥ प्रवासीपवनेऽन्यत्रमृत्युरेवानलेभवेत् ॥१८६॥ अर्थ-यदि प्रश्नकरनेके समय जलतत्त्व वहता होय. तो परदेशीके आगमनको कहै और पृथ्वीतत्वहोय तो परदेशी जहां गया-हो वहांही सुखीहै ऐसे कहै और वायुतत्व होयतो अन्यस्थानमें चलाया ऐसे कहै-और अग्नितत्व होय तो परदेशी मरगया ऐसे कहै ॥१८६ पार्थिवेमूलविज्ञानंशुभंकार्यजलेतथा ॥ आग्नेयेधातुविज्ञानव्योनिशून्यविनिर्दिशेत् १८७ (४६) शिवस्वरोदय । अर्थ-पृथ्वीतत्वमें मूल (वृक्ष आदि) का जानना और जलतत्वमें शुभकार्य अमितत्वमें धातुओंका ज्ञान और आकाशतत्वमें शून्यताको कहै अर्थात् किसीके ज्ञानको न कहै ॥ १८७ ॥ तुष्टिःपुष्टीरतिक्रीडाजयहर्षोधराजले ॥ तेजोवाय्वोश्चमुप्ताक्षोज्वरकंप-प्रवासिनः॥१८८॥ अर्थ-यदि परदेशीके प्रश्नके समयमें पृथ्वी व जल तत्व होय तो संतोष-पुष्टता-प्रीति-रति-क्रीडा-जय और हर्ष (आनन्द ) और यदि तेज व वायुतत्व होय तो सोना व ज्वरसे कंप परदेशीको कहाहै ॥ १८८ ॥ गतायुर्मृत्युराकाशे तत्त्वस्थानेप्रकीर्तिता ॥ द्वादशैताःप्रयत्नेनज्ञातव्यादैशिकै सदा ॥१८९॥ अर्थ-यदि आकाशतत्व होय तो अवस्थासे रहित परदेशीकी मृत्युको कहै-ये बारह प्रश्न तत्वोंके स्थान में कहेहैं इनको पंडितजन बडे यत्नसे सदैव जान॥ १८९॥ पूर्वायांपश्चिमेयाम्ये उत्तरस्यायथाक्रमम् ॥ पृथिव्यादीनिभूतानिबलिष्ठानिविनिर्दिशत्१९० अर्थ-पूर्व पश्चिम दक्षिण और उत्तर इन चारों दिशा ओमें क्रमसे पृथिवी-जल-तेज-और वायु ये चारों तंव बलवान् कहे हैं ॥ १९० ॥ पृथिव्यापस्तथातेजोवायुराकाशमेवच ।। पंचभूतात्मकोदेहोज्ञातव्यश्चवरानने १९१॥
भाषाटीकासमेन । (४७) अर्थ-हे पार्वति पृथ्वी अल तेज वायु और आकाश इन पांचों भूतरूपही यह देह जानना अर्थात् इन पांच भूतोंसे ही पैदा होताहै ॥ १९१ ॥ अस्थिमांसंत्वचानाडीरोमचैवतुपंचमम् ॥ पृथ्वीपंचगुणाप्रोक्ताब्रह्मज्ञानेनभाषितम्।।१९२॥ अर्थ-और इस देहमें अस्थि ( हाड) मांस त्वचा नाडी और पांचवां रोम ये पांच गुण पृथ्वीके हैं यह बात वेदांत शास्त्रके ज्ञाता ब्रह्मज्ञानी कहते हैं ॥ १९२ ॥ शुक्रशोणितमज्जाश्चमूत्रंलालांचपंचमम् ॥ आपःपंचगुणाप्रोक्ताब्रह्मज्ञानेनभाषितम्।।१९३॥ अर्थ-ब्रह्मज्ञानी कहते हैं कि वीर्य रुधिर मज्जा मूत्र और पांचवीं लाला ये पांच गुण जलोंके कहेहैं१९३॥ क्षुधातृषातथानिद्राकांतिरालस्यमेवच ॥ तेजःपंचगुणंप्रोक्तंब्रह्मज्ञानेनभाषितम् । १९४॥ अर्थ-ब्रह्मज्ञानियोंका कथन है कि क्षुधा तृषा निद्रा कांति और आलस्य ये पांच गुण तेजके कहेहैं॥१९४॥ धावनंचलनग्रंथःसंकोचनप्रसारणे ॥ वायो पंचगुणाःप्रोक्ताब्रह्मज्ञानेनभाषितम् ॥९॥ अर्थ-और वेदांती कहतेहैं कि दौडना चलना गांठ देना सकोडना व पसारणा ये पांच गुण वायुके कहे हैं। रागद्वेषौतथालज्जाभयंमोहश्चपंचमः॥ नभ पंचगुणंप्रोक्तंब्रह्मज्ञानेनभाषितम् ॥ १९६॥ का-
(४८) शिवस्वरोदय।
-अर्थ-और वेदांत शास्त्रके जाननेवालोंका कथन है
प्रीति-बैर-लज्जा-अय और पांचवा मोह ये पांच गुण
आकाशके इस देहमें होतेहैं ॥ १९६ ॥
पृथ्व्याःपलानिपंचाशच्चत्वारिंशत्तथांभसः॥
अग्नेस्त्रिंशत्पुनर्वायोविंशतिर्नभसोदश ॥१९७॥
अर्थ-इस देहमें पृथ्वी ५० पचास पल-जल ४०
चालीस पल-अग्नि ३० तीस पल-और वायु२० वीस
पल-और आकाश१० दस पल-होतेहैं अर्थात् पृथ्वी
आदि तत्वोंमें अगला २ तत्व क्रमसे दश १० पल कम
शेताहै ॥ १९७ ॥
पृथिव्यांचिरकालेनलाभश्चापक्षणाद्भवेत् ॥
जायतेपवनेस्वल्पःसिद्धोप्यनौविनश्यति १९८॥
अर्थ-पृथ्वी तत्व होय तो चिरकाल (बहुदिनों)
में लान-और जल तत्व होय तो उसी क्षणमें और पवन
तत्व होय तो थोडा लाभ होताहै और अग्नि तत्व होय
तो सिद्ध हुआजी कार्य नष्ट होजाताहै ॥ १९८ ॥
पृथ्व्या पंचापावेदा गुणास्तेजोद्विवायुतः॥
नभस्येकगुणश्चैवतत्त्वज्ञानमिदंभवेत् ॥ १९९॥
अर्थ-पृथ्वीके पांच गुण जलोंके चार गुण-तेजके
तीन गुण-वायुके दो गुण और आकाशका एक गुण
जानना यही तत्वोंका ज्ञान होताहै ॥ १९९ ॥
'भाषाटीकासमेत । (४९) फूत्कारकृत्प्रस्फुटितरविदीर्णापतिताधरा ॥ ददातिसर्वकार्येषुअवस्थासदृशंफलम् ॥२०॥ अर्थ-फूत्कार करनेवाली-फूटी हुयी और फटी हुयी और वृथा पडी हुयी यह पृथ्वी सब कार्यों में अपनी अवस्थाके समान फल देती है ॥ २० ॥ धनिष्ठारोहिणीज्येष्ठानुराधाश्रवणंतथा.॥ अभिजिदुत्तराषाढापृथ्वीतत्त्वमुदाहृतम् ॥१॥ अर्थ-धनिष्ठा-रोहिणी-ज्येष्ठा-अनुराधा-श्रवण- अभिजित् और उत्तराषाढा ये सात नक्षत्र पृथ्वीतत्त कहे हैं ॥२०॥ पूर्वाषाढातथाश्लेषामूलमाचरेवती ॥ उत्तराभाद्रपदातोयंतत्त्वंशतभिषकप्रिय।।२०२॥ अर्थ-पूर्वाषाढा-आश्लेषा-मूलं-आा-रेवती-उत्तरा- भाद्रपदा और शतभिषा-ये सात नक्षत्र जलतत्व कहेहैं। भरणीकृत्तिकापुष्योमघापूर्वाचफल्गुनी ॥ पूर्वाभाद्रपदास्वातीतेजस्तत्त्वपितिप्रिये २०३॥ अर्थ-भरणी-कत्तिका-पुष्य-मघा-पूर्वाफल्गुनी- पूर्वाभाद्रपदा और स्वाती ये सात नक्षत्र तेजतत्व ,२०३ विशाखोत्तरफ़ल्गुन्यौहस्तचित्रेषुनर्वसु॥ अश्विनीमृगशीर्षंचवायुतत्त्वमुदाहृतम् ॥२०॥ अर्थ-विशाखा-उत्तराफल्गुनी-हस्त-चित्रा-पुनर्वसु- अश्विनी और मृगशिर ये सात नक्षत्र वायुतत्व कहेहैं। ३
५०) शिवस्वरोदय ।
वहन्नाडीस्थितोदूतोयस्पृच्छंतिशुभाशुभ।
तत्सर्वसिद्धिमाप्नोतिशून्येशून्यंनसंशयः॥२०॥
अर्थ-वहृती हुयी नाडीकी तरफ पैठाहुआ जो दूत
शुभ वा अशुभ पूछे वह सब सिद्ध होताहै और शून्यमें
पूछे तो शून्य होताहै इसमें संदेह नहीं है ॥२०५॥
पूर्णोऽपिनिगमश्वासेसुतत्त्वेऽपिनसिद्धिदः॥
'सूर्यश्चंद्रोथवानृणांसंग्रहेसर्वसिद्धिदः ॥२०६॥
अर्थ-पूर्णती सूर्य तत्व अथवा चंद्र तत्व श्वासमें
बहता होय तो सिद्धिका दाता नहीं होता यदि दोनों
तत्वोंका संग्रह (मेल) होय तो संपूर्ण सिद्धियोंको देताहै.
तत्त्वेरामोजयंप्राप्तःसुतत्त्वेचधनंजयः॥
कौरवानिहताःसर्वेग्मुद्धतत्त्वविपर्ययात् ॥२०७॥
अर्थ-श्रेष्ठ तत्वमें ही रामचंद्र की जय हुयी और
श्रेष्ठ तत्वमें ही अर्जुन की-और तत्वोंके विपरीत होनेसे
संपूर्ण कौरव युद्धमें मारे गये ॥ २०७ ॥
जन्मांतरीयसंस्कारात्प्रसादादथवागुरोः॥
केषांचिज्जायतेतत्त्ववासनाविमलात्मनाम् २०८
अर्थ-जन्मांतरके संस्कारसे अथवा गुरुके प्रसादसे
किनही निर्मल अत्मिाओंको तत्वोंकी वासना (ज्ञान)
होती है ॥ २०८ ॥
लंबीधरणीध्यायेच्चतुरस्रांसुपीतभाम् ॥
सुगंधस्वर्णवर्णाभांप्राप्नुयादेहलाघवम् ॥२०९॥
भाषाटीकासमेत। (५१)
अर्थ-(लं) यह बीज. पृथ्वी तत्वमें चतुरस्त्र
(चकोर ) सुवर्ण के समान प्रकाशमान पीतवर्ण-सुगंध
ध्यान करना और ध्यानका करनेवाला कांति व देहके
'लाधवको प्राप्त होताहै ॥ २०९ ॥
वंबीजंवारुणंध्यायेत्तत्त्वमशशिप्रभम् ॥
क्षुत्तृष्णादिसहिष्णुत्वंजलमध्येचमजनम् २१०॥
अर्थ-(वं ) यह बीज जलतत्वमें ध्यान करने
योग्य है-और अर्द्धचंद्रके समान इसका आकार है-
इसके ध्यान करने वाले को क्षुधा और तृषाकी बाधा
नहीं होती और जलमें डूबनेकी सामर्थ्य होती है अर्थात्
डूबनेसे दुःख नहीं होता ॥ २१० ॥
वीजमनिजध्यायेत्रिकोणमरुणप्रभम् ॥
बनपानभोक्तृत्वमातपाग्निसहिष्णुता ॥२११॥
अर्थ- (२) यह बीज अग्नि तत्वमें तिकोना-रक्त
वर्ण-ध्यान करने योग्यहै इसके ध्यान करने वालेको
बहुत अन्नपान भक्षण करनेकी सामर्थ्य होतीहै और धूप
और अनिके वेगको सहसकताहै ॥ २११ ॥
यंवीजपावनध्यायेद्वर्तुलंश्यामलप्रभम् ॥
आकाशगमनाचंचपक्षिवद्गमनंतथा ॥२१२॥
अर्थ- (0) यह बीज पवन तत्वमें ध्यान करने
योग्य है और वर्तुल (गोल) और श्यामरंगे होताहै-
इसको ध्यान करनेवाला आकाशमें गमन और पक्षियोंके
समान गमन कर सकता है ॥२१२॥
(५२) शिवस्वरोदय ।
हंबीजंगगनध्यायेन्निराकीरबहुप्रभम् ॥
ज्ञानंत्रिकालविषयमैश्वर्यमणिमादिकम्॥२१३॥
अर्थ- (है) यह बीज आकाश तत्वमें ध्यान करने
योग्य है जो निराकार और अधिक कांतिवालाहै-इसके
ध्यान करनेवालेको त्रिकाल ( भूत भविष्यत्
वर्तमान ) का ज्ञान और अणिमा आदि आठ सिद्धि
होतीहैं ॥ २१३ ॥
स्वरज्ञानीनरोयत्रधननास्तिततःपरम् ॥
गम्यतेस्वरज्ञानेनानायासंफलंभवेत् ॥२१४॥
अर्थ-जिस स्थानमें स्वरका ज्ञानी हो उससे परे
और कोई धन नहींहै-जो मनुष्य स्वरके ज्ञानसे गमन
करता है उसको अनायास (विना परिश्रम ) से फल
मिलता है ॥ २१४ ॥
श्रीदेव्युवाच ॥ देवदेवमहादेवमहाज्ञानस्वरो
दयम्।।त्रिकालविषयंचैवकथं भवतिशंकर२१५
अर्थ-पार्वती बोली-कि हे देवताओंके देव महादेव
हे शंकर यह महान् (बडा) स्वरोदय का त्रिकाल
(भूत #विष्यत् वर्तमान ) विषयक ज्ञान किस प्रकार
होताहै ॥ २१५॥
ईश्वरउवाच।
अर्थकालजयप्रश्नशुभाशुभमितिविधा ॥
एतत्रिकालविज्ञाननान्यद्भवतिसुंदरि ॥ २१६॥
'भाषाटीकासमेत । अर्थ-महादेव बोले कि हे सुंदरी-अर्थ (प्रयोजन वा धन ) भूत भविष्यत् वर्तमान तीनों कालोंका जय- प्रश्न-शुभ अशुभ (पराजय आदि) का जो तीनों कालोंमें ज्ञान है उसका कारण स्वरोदय है अन्य नहीं॥२१६॥ तत्त्वेशुभाशुभकार्यतत्त्वेजयपराजयो॥ तत्त्वेसुभिक्षदुभिक्षेतत्त्वंत्रिपदमुच्यते ॥२१७॥ अर्थ-तत्वकेही आधीन शुभ अशुभ कार्य हैं और तत्वके आधीन जय और पराजय है-और तत्वोंके ही आधीन सुभिक्ष और दुर्भिक्ष है-इस प्रकार तत्वको ही त्रिपद (तीनों कालोंके कार्योंका कर्ता) कहतेहैं॥२१७॥ श्रीदेव्युवाच ॥ देवदेवमहादेवसर्वसंसारसागरे ॥ किंनराणांपरमित्रसर्वकार्यार्थसाधकम् ॥२१८॥ अर्थ-पार्वती बोली कि हे देवताओंके देव महादेव इस संपूर्ण संसार समुद्रमें मनुष्योंका परम मित्र और मनु- योंके सब कार्योंका साधक क्या है सो कहो॥२१८॥ ईश्वरउवाच ॥ प्राणएवपरंमित्रप्राणएवपर सखा। प्राणतुल्यःपरोबंधु स्तिनास्तिवरानने ॥२१॥ अर्थ-महादेव बोले कि हे सुंदरमुखी पार्वती प्राण ही परम मित्र है और सखा है प्राणके समान अन्य और बंधु-नहीं है नहीं है ॥ २१९ ॥ श्रीदेव्युवाच। कथंप्राणस्थितोवायुर्देह किंप्राणरूपकः॥ तत्त्वेषुसंचरन्प्राणोज्ञायतेयोगिमिकथम् २२०॥
- (५४) शिवस्वरोदय । अर्थ-पार्वती बोली कि प्राणमें वायु किस प्रकार स्थित है और क्या देह प्राणरूप है और तत्वोंके विषय विचरते हुये प्राण को योगिजन किस प्रकार जान जाते हैं ॥ २२० ॥ श्रीशिवउवाच । कायानगरमध्यस्थोमारुतोरक्षपालकः ॥ प्रवेशे दशभिः प्रोक्तोनिर्गमेद्वादशांगुलः॥२२१॥ अर्थ-शिवजी बोले कि हे पार्वती इस कायारूपी नगरमें टिका हुआ प्राणवायु रक्षपाल (चौकीदार ) है- और वह प्राण प्रवेशके समय दश अंगुल और निकसने के समय बारह अंगुलका कहाहै ॥ २२१ ॥ गमनेतुचतुर्विंशत्रवेदास्तुधावने ॥ मैथुनेपंचषष्टिश्चशयनेचशतांगुलम् ॥ २२२ ॥ अर्थ-और गमन के समय चौवीस २४ अंगुल- का-और धावन ( दौड़ना) के समय बियालीस ४२ अंगुलका-और मैथुन के समय पैंसठ ६५ अंगुलका- और सोनेके समय में सौ १०० अंगुलका कहाहै २२२॥ प्राणस्यतुगतिविस्वभावाद्वादशांगुलम् ॥ भोजनेवमनेचैवंगतिरष्टादशांगुलम् ॥ २२३॥ :अर्थ-और हे देवी-प्राण की स्वाभाविक गति बारह १२ अंगुल है और भोजन और वमनके समय प्राणकी गति अठारह १८ अंगुल होजाती है॥२२३॥ - • भाषाटीकासमेत । . (५५) एकांगुलंकृतेन्यूनेप्राणनिष्कामतामता ॥ आनंदस्तुद्वितीयेस्यांत्कविशक्तिस्तृतीयके२२४ अर्थ-यदि प्राणकी गति एक अंगुल कम योगी. 'करले तो निष्कामता की प्राप्ति होती है और दो अंगुल कम करले तो आनंद की प्राप्ति और तीन अंगुल कम करनेसे कविताकी प्राप्ति होती है ॥ २२४.॥ वाचासिद्धिश्चतुर्थेचदूरदृष्टिस्तुपंचमे ॥ षष्ठेत्वाकाशगमनंचंडवेंगश्चसप्तमे ॥२२५ ॥ अर्थ-चार अंगुल कम करले तो वाणी की सिद्धि- पांच अंगुल कम करले तो दूर दृष्टि-छः अंगुल कम करले तो आकश गमनमें शक्ति-और सात अंगुल कम करले तो प्रचंड वेग हो जाता है ॥ २२५ ॥ अष्टमेसिद्धयश्चैवनवमेनिधयोनव ।। दशमेदशमूर्तिश्चछायानैकादशेभवेत्॥२२६॥ अर्थ-आठ अंगुल कम करले तो अणिमा-आदि सिद्धियोंकी प्राप्ति-नौ अंगुल कम करनेसे नौ निधियों की प्राप्ति और दश अंगुल कम-करनेसे दशों मूर्तियों अनेक रूपों) की प्राप्ति--और ग्यारह अंगुल कम होनेसे देहकी छाया का अभाव-प्राप्त होता है २२६ ॥ 'द्वादशेहंसचारश्चगंगामृतरसंपिवेत् ॥ आनखाग्रंप्राणपूर्णेकस्यभक्ष्यंचभोजनम् २२७॥ अर्थ-बारह अंगुल प्राणकी गति कम हो जाय तो
(५६)
शिवस्वरोदय ।
हंस गति गंगा जलके समान अमृत रस का पान प्राप्त
होता है यदि शिखासे लेकर नंख पर्यंत प्राणों को पूर्ण
योगी करले तो अक्ष्य और-भोजन किसको अर्थात
भक्ष्य भोजन निवृत्ति हो जाती है ॥ २२७ ॥
एवंप्राणविधिःप्रोक्तःसर्वकार्यफलप्रदः ॥
जायतेगुरुवाक्येननविद्याशास्त्रकोटिभिः २२८॥
अर्थ-इस प्रकार संपूर्ण कार्यों के फल देने वाली
प्राण की विधि कही है और जिसका ज्ञान गुरुके
वाक्यसे होता है-विद्या और कोटि भी ग्रंथोंसे नहीं
होता ॥ २२८॥
प्रातश्चंद्रोरविःसायंयदिदैवानलभ्यते ॥
मध्याह्नान्मध्यसवाच्चपरतस्तुप्रवर्तते ॥२२९॥
अर्थ-यदि प्रातःकाल चन्द्रस्वर और सायंकाल
को सूर्य स्वर दैववश न मिलैं तो मध्याह्न अथवा
अधी रात्रिसे परे प्रवृत्त होतेहैं अर्थात् मिलते हैं २२९
दूरयुद्धोजयीचंद्रःसमासनेदिवाकरः॥
वहनाड्यागतः पादःसर्वसिद्धिप्रदायकः॥२३०॥
अर्थ-यदि दूर देशमें युद्ध कर्तव्य होय तो चंद्र-
माका स्वर जयकारी होताहै और समीपके युद्ध में
सूर्यका स्वर जयकारी होताहै यदि वहती हुयी नाडी
के समय गमन कालमें पैर रक्खा जाय तो सब सिद्धि-
योंको देताहै. ॥ २३०॥
भाषाटीकासमेत।. (५७) यात्रारंभेविवाहेचप्रवेशेषगरादिके। शुभकार्याणिसिध्यतिंचंद्रचारेषुसर्वदा ॥२३१॥ अर्थ-यात्राके आरंभमें-विवाह गृह वा नगर प्रवेश आदि संपूर्ण शुभ कर्म चंद्रस्वरके चार में सदैव सिद्ध होते हैं ॥ २३१ ॥ अयनतिथिदिनेशैःस्वीयतत्त्वेचयुक्त यदिवहतिकदाचिदैवयोगेनपुंसाम् ॥ सजयतिरिपुसैन्यंस्तंभमात्रस्वरेण प्रभवतिनचविघ्नंकेशवस्यापिलोके ॥२३२ ॥ अर्थ-अयन-तिथि-वार इनके स्वामियोंसे युक्त पुरुषोंमें अपना स्वर वा तत्व दैवयोगसे वहै तो वह पुरुष शत्रुकी सेनाको स्वरके स्तंभ ( रोकना) मात्रसे ही जीतता है-और वैकुंठ लोकमें भी उसको विघ्न नहीं होता ॥ २३२॥ जीवरक्षजीवरक्षजीवाजेपरिधायच॥ जीवोजपतियोयुद्धजीवञ्जयतिमेदिनीम्॥२३२॥ अर्थ-जीव (अपने) अंगपर वस्त्रोंको पहिरकर जो जीव (जीवरक्ष जीवरक्ष) युद्ध में ऐसे जपताहै वह पुरुष जीवताहुआ संपूर्ण पृथ्वीको जीतताहै ॥ २३३ ॥ भूमौजलेचकर्त्तव्यंगमनंशांतिकर्मसु ।। वह्नौवायौप्रदीप्तेपुखेपुनर्नोभयेष्वपि ॥२३४ ॥ अर्थ-शांतिके कर्मोंमें पृथ्वी या जलतत्वमें गमन-
(५८)
शिवस्वरोदय ।
करै-और प्रदीन ( उप) होर्मे अग्नि और वायुतत्वमें
गमनकरै-और आकाशतत्वमें पूर्वोक्त दोनों प्रकारके
कीमें गमन नकरै ॥ २३४ ॥
जीवेनशस्त्रंबध्नीयाज्जीवेनैवविकाशयेत् ॥
जीवेनप्रक्षिपेच्छांयुद्धे जयतिसर्वदा ॥२३५ ॥
अर्थ-जीव स्वरमें शस्त्रको बांधे अर्थात् जिस तर-
फका स्वरचलै उसीहाथसे शस्त्रको धारणकर और जीव-
स्वरसेही शस्त्रको खोले-और जीवस्वरमही शस्त्रको जो
फैके वह मनुष्य युद्धमें सदैव जयको प्राप्तहोताहै २३५
आकृष्यप्राणपवनसमारोहेतवाहनम् ॥
समुत्तरेपदंदद्यात्सर्वकार्याणिसाधयेत् ॥२३६॥
अर्थ-जो मनुष्य प्राण वायुको खींच कर अश्व आदि
सवारीपर चढे-और पवनके उतारपर घोड़े की रकावमें
पैर रक्खे वह संपूर्ण कार्योंको सिद्ध करैगा ॥ २३६ ॥
अपूर्णेशत्रुसामग्रीपूर्णेवास्ववलंतथा॥
कुरुतेपूर्णतत्त्वस्थोजयत्येकोवसुंधराम् ॥२३७॥
• अर्थ-यदि अपूर्ण स्वरमें शत्रुकी सामग्री और
संपूर्ण स्वरमें अपनी सामग्रीका बल होय तो पूर्ण
तत्वमें इस प्रकार टिकाहुआ पुरुष अकेलानी पृथ्वीको
जीतताहै ॥ २३७ ॥
यानाडीवहतेचांगेतस्यामेवाधिदेवता॥
सन्मुखेऽपिदिशातेषांसर्वकार्यफलप्रदा ॥२३८॥
भाषाटीकासमेत ।.
(५९)
.
अर्थ-अपने अंगमें जो नाडी (स्वर) वहती हो
और उसी नाडीमें उस नाडीका देवता और उनकी दिशा
सन्मुख होय तो सब कार्योंका फल देतीहै ॥ २३८ ॥
आदौतुक्रियतेमुद्रापश्चाद्युद्धसमाचरेत् ॥
सर्पमुद्राकृतायेनतस्यसिद्धिर्नसंशयः ॥ ३९ ॥
अर्थ-मनुष्य पहिले मुद्राको करै और पश्चात् युद्ध
करै जो मनुष्य सर्प मुद्रा करता है उसकी सिद्धि होतीहै
इसमें संशय नहींहै ॥ २३९ ॥
चंद्रप्रवाहेप्यथसूर्यवाहेभटाःसमायांतिचयो
डुकामाः॥ समीरणस्तत्त्वविदांप्रतीतोया
शून्यतासाप्रतिकार्यनाशम् ॥२४॥
अर्थ-चंद्र स्वरके अथवा सूर्य स्वरके चलनेके
समय यदि समीरण (जल तत्त्व) वहता हो और तत्वके
ज्ञाताओंको वहताहुआ प्रतीत होजाय तो युद्ध करनेके
लिये भेट ( योद्धा ) अली प्रकार आगे-और यदि
शून्यता हो अर्थात् वायु वा आकाश तत्त्व बहते झेप
तो कार्यका नाश होताहै ॥ २४० ॥
• यांदिशंवहतेकायुयुद्धंतदिशिदापयेत् ॥;
जयत्येवनसंदेहःशकोऽपियदिचाग्रतः॥४१ ॥
अर्थ-जिस दिशाका पवन तत्त्व चलता हो उसी
दिशामें युद्धके लिये सेनाको भेजे तो चाहै आगे इंद्रनी
होतो भी जय होगी इसमें संदेह नहींहै.॥ २४१ ॥
(६०). - शिवस्वरोदय ।
यत्रनाड्यांवहेद्वायुस्तदंगेप्राणमेवच ॥
आकृष्यगच्छेत्कांतंजयत्येवपुरंदरम् ॥२४२॥
अर्थ-जिस नाडीका पवन तत्त्व वहता हो उसी नाडी
के पवनको कर्ण पर्यंत आकर्षण (खींच ) करके गमन
करै तौ पुरंदर (इंद्र ) कोसी जीतसकता है ॥२४२॥
प्रतिपक्षप्रहारेभ्यःपूर्णीगंयोभिरक्षति ॥
नतस्यरिपुभिःशक्तिर्बलिष्ठैरपिहन्यते ॥२४३॥
अर्थ-जो योद्धा प्रतिपक्ष (शत्रु ) के प्रहारोंसे अपने
संपूर्ण अंगोंकी रक्षा करताहै उस योद्धा की शक्ति को
बलवान् शत्रुभी नष्ट नहीं कर सकते ॥ २४३ ॥
अंगुष्टतर्जनीवंशेपादांगुष्ठेतथाध्वनिः॥
युद्धकालेचकर्त्तव्योलमयोद्धाजयीभवेत् २४४॥
अर्थ-अँगूठा और तर्जनी अंगुलि इनके वंशमें और
चरणके अंगठेमें युद्धके समय जो ध्वनि शब्द करै तो
लक्ष योद्धाओंको जीतसकताहै ॥ २४४ ॥
निशाकरेरवौचारेमध्येयस्यसमीरणः॥
- स्थितोरक्षेदिगंतानिजयकांक्षीगतःसदा ॥२४॥
अर्थ-चंद्रमा वा सूर्यके प्रवाह में यदि वायु तत्व
वहे तो उस समय गमन करनेवाला दिगंतों की रक्षा
करना है और सदैव जय को पाताहै ॥ २४५॥
श्वासप्रवेशकालेतुदूतोजल्पतिवांच्छितम् ।।
तस्यार्थःसिद्धिमायातिनिर्गमेनैवसुंदरि ॥२४६॥
आषाढीकांसमेत । ! (६१) अथे-जिस मनुष्य के चासक प्रवेश समयम दूत अपने मुखसे वांछित बातको कहै तो हे सुंदरी गमन करते ही उस मनुष्यका अर्थ सिद्ध होताहै ॥२४६॥ लाभादीन्यपिकार्याणिपृष्टानिकीर्तितानिच ॥ जीवेविशतिसिद्धयंतिहानिनिःसरणेभवेत्॥२४७ अर्थ-पूछे और कहे हुये लाभ आदि संपूर्ण कार्य जीव नाडीके प्रवेश समयमें सिद्ध होतेहैं और निकस- नेके समयमें नष्ट होतेहैं ॥ २४७ ॥ नरेदशास्वकीयाचस्त्रियांवामाप्रशस्यते ॥ कुंभकोयुद्धकालेचतिस्रोनाब्यस्त्रयीगतिः २४८॥ अर्थ-पुरुषों की अपनी दक्षिण नाडी और स्त्रियों की वाम नाडी और युद्धके समयमें कुंभक नाडी श्रेष्ठ होती है-इस प्रकार तीन नाडीहैं और तीनही उनकी गतिहैं ॥ २४८॥ हकारस्यसकारस्यविनाभेदस्वर कथम् ॥ सोहंहंसपदेनैवजीवोजयतिसर्वदा ॥२४९ ॥ अर्थ-हकार और सकारके भेद विना स्वरज्ञान कैसे हो सकता है इससे जीव सोहं और हंस इनदो प- दोंसें ही सर्वदा नय को प्राप्त होता है ॥ २४९ ॥ शून्यांगपूरितंकृत्वाजीवांगेगोपयेज्जयम् ॥ जीवांगघातमाप्नोतिशून्यांगरक्षतेसदा ॥२५॥ अर्थ-शून्य अंगको पूर्ण करके जीवांगकी रक्षा
(६२).
शिवस्वरोदय ।
करनेसे जय प्राप्त होती है क्योंकि जीवांगमें घात
(नाश ) को प्राप्त होताहै और शून्यांग संदैव रक्षा
करता है ॥ २५० ॥
वामेवायदिवादक्षेयदिपृच्छतिपृच्छकः ॥
पूणेवातोनजायेतशून्येषातंविनिर्दिशेत् ॥२५॥
अर्थ-यदि प्रश्नका कर्ता वाम वा दक्षिण की तरफ
बैठाहुआ युद्धका प्रश्न करे और उस समय पूर्ण स्वर
होय तो नाश न होगा और शून्य होय तो पात होगा
यह कहै ॥ २५१ ॥
भूतत्त्वेनोदरेघातःपदस्थानेऽबुनाभवेत् ॥
उरुस्थानेऽग्नितत्त्वेनकरस्थानेचवायुना॥२२॥
अर्थ-प्रश्न के समय पृथ्वी तत्व होय ती उदरमें-जल
तत्व होय तो पैरोंमें-अग्नि तत्व होय तो जंघाओंमें
और वायु तत्व होय तो हाथोंमें-घात होगा अर्थात्
शस्त्र लगेगा ॥ २५२॥
शिरसिव्योमतत्त्वेचज्ञातव्योपातनिर्णयः॥
एवंपंचविधोधातःस्वरशास्त्रप्रकाशिताः॥२५३॥
अर्थ-यदि आकाश तत्व वहना होय तो शिरमें
घावका निर्णय जानना इस प्रकार स्वर शास्त्र में पांच
प्रकारका घाव प्रकाशित कियाहै ॥ २५३ ॥
युद्धकालेयदाचंद्रःस्थायी जयति निश्चितम् ॥
यदासूर्यप्रवाहस्तुयायोविजयतेतदा ॥२४॥
भाषाटीकासमेत। (६३) अर्थ-जब युद्धके समय में चंद्रमाका स्वर चलता हो तोस्थायी (जिसपर चढाई की जाय)की निश्चयमें जय हयगी और जो सूर्यके स्वरका प्रवाह होय तो याची ('चढनेवाले ) की जयहोय ॥ २५४ ॥ जयमध्यतुसंदेहेनाडीमध्यंतुलक्षयेत् ॥ सुषुम्नायांगतेप्राणेसमरेशत्रुसंकटम् ॥ २५ ॥ अर्थ-जो जयके मध्यमें संदेह होय तो नाडीके मध्यको देखे यदि प्राणवायु सुषुम्ना नाडीमें चलता होय तो संग्राममें शत्रुको संकट हो ॥ २५५ ॥ यस्यानाड्याभवेच्चारस्तांदिशंयुधिसंश्रयेत् ॥ तदाऽसौजयमाप्नोति नात्रकार्या विचारणा २५६ अर्थ-जिस नाडीका चार (चलचा) होय युद्धके समयमें उसीदिशामें खडा होय अर्थात् चंद्र नाडीमें पूर्व अथवा उत्तरमें सूर्यनाडीमें दक्षिण अथवा पश्चिममें इस प्रकार वह युद्ध करनेवाला जयको प्राप्त होता है इसमें कुछ विचार नहीं करना ॥ २५६ ॥ यदिसंग्रामकालेतुवामनाडीयदावहेत् ॥ स्थायिनोविजयं विद्याद्रिपुवश्योदयोऽपिच २६७ अर्थ-यदि संग्रामके समय वामनाडी बहती होय तो स्थायीका विजय जाने और शत्रुके वसमें यायीका होना समझे ॥ २५७ ॥ यदिसंग्रामकालेतुसूर्यस्तुव्यावृतोषहेत.॥
शिवस्वरोदय ।. तदायायिजयविद्यात्रादेवांसुरमानवे ॥२५८॥ अर्थ-जो संग्रामके समय सूर्यका स्वर लगा तार बहता होय तो उससमय देवता राक्षस मनुष्यके युद्ध में यायीके जयको जानना ॥ २५८ ॥ रणेहरतिशत्रुस्तं वामायांप्रविशेन्नरः ॥ स्थानविषुवचारेणजयःसूर्येणधावता ॥२५९ ॥ : अर्थ-जो मनुष्य वामनाडीके प्रचारमें युद्ध में प्रवेश करताहै उसको संग्राममें शत्रु हरलेतेहैं और सुषुम्ना नाडीके बहते जो गमन करै उसको स्थान मिलताहै अर्थात् युद्ध नहीं होता सूर्य स्वरके बहते गमन करे तो जयको प्राप्त होताहै ॥ २५९ ॥ युद्धद्वयेकृतेप्रक्षेपूर्णस्यप्रथमेजयः॥ रिक्तेचैवद्वितीयस्तुजयीभवतिनान्यथा ॥२६०॥ अर्थ-यदि एक समय युद्ध विषयकप्रश्न दोहोय तो उस समय पूर्ण स्वर वहता होय तो प्रथमका जय और रिक्तस्वर वहता होयतो दूसरेका जय अन्यथा नहीं२६० -पूर्णनाडीगतःपृष्ठेशून्यांगंचतदाग्रतः॥ शून्यस्थानेकृतःशत्रुम्रियतेनात्रसंशयः ॥२६॥ अर्थ-यदि पूर्ण नाडीमें गया होय तो शत्रु पीठंपर आवे अर्थात् शत्रु पीठ दे कर भाग जाय शून्य नाडीका अंग होय तो शत्रु आगे आवै और शून्य स्थानमें किया हुआ शत्रु मरणको प्राप्त होता है इसमें संशय नहीं २६१ (६५) भाषाटीकासमेत.। वामचारेसमंनामयस्यंताजयोभवेत् ॥ पृच्छकोदक्षिणेभागेविजयीविषमाक्षरः ॥२६२॥ अर्थ-यदि कोई वाम भागमें बैठ कर प्रश्न करै तौ उसके प्रश्नके वा जिस वातको पूछे उसकें संमाक्षर होय तो उसका जय और विषम अक्षरवालेका पराजय होताहै यदि-दक्षिण भागमें बैठ कर प्रश्न करै तो विपम अक्षरवालेका जय और सम अक्षरवालेका पराजय होय ॥ २६२॥ यदापृच्छतिचंद्रस्यतदासंधानमादिशेत् ॥ पृच्छेद्यदातुसूर्यस्यतदाजानीहिविग्रहम्॥२६३॥ अर्थ-यदि पूछने के समयमें चंद्रमाका स्वर चलै तो संधि (मिलाफ) को कहै अदि सूर्यके स्वरमें प्रश्न करै तो उस समय विग्रह (लडाई) को जाने॥२६३॥ पार्थिवेचसमंयुद्धसिद्धिर्भवतिवारुणे॥ युद्धहितेजसोभंगोमृत्युर्यायौनभस्यपि ॥२६॥ अर्थ-यदि पृथ्वी तत्वमें युद्धका आरंभ होय तो युद्धमें बराबरी जलके तत्वमें जयकी प्राप्ति तेजके तत्वमें भंग (नाश ) वायु और आकाश तत्वमें,मृत्यु होताहै ॥ २६४॥ निमित्तकप्रमादाद्वायदानज्ञायतेऽनिलः॥ पृच्छाकालेतदाकुर्यादिदंयत्नेनबुद्धिमान २६६॥ अर्थ-यदि किसी निमित्तसे अथवा प्रमादसे प्रश्नके (६६) शिवस्वरोदय। समयमें दक्षिण या उपर स्वरका ज्ञान न होय तब बुद्धिमान् मनुष्य यत्नसे यह करै कि ॥ २६५॥ निश्चलांधारणांकृत्वापुष्पंहस्तानिपातयेत् ॥ पूर्णागेपुष्पपतनंशून्यवातत्परंभवेत् ॥२६६।। अर्थ-निश्चल धारणा करिके अपने हाथसे पुष्पको पृथ्वीपर गैरे-जो अपने अग्रभागमें पुष्प पडे तो पूर्ण फल और दूर पडे तो शून्य फल जानना ॥ २६६ ॥ तिष्ठन्नुपविशन्नापिप्राणमाकर्षयनिजम् ॥ मनोभंगमकुर्वाण सर्वकार्येषुजीवति ॥२६७॥ अर्थ-जो मनुष्य खडा होता और बैठताहुआ अपनी प्राण वायुको निश्चल मनसे शरीरके भीतर आकर्षण (खींचना) करताहै वह सबकार्योंकी जीवताहे अर्थात् उसके सब कार्य सिद्ध होतेहैं ॥ २६७ ॥ नकालोविविधंधोरंनशस्त्रंनचपन्नगाः॥ नशत्रुव्याधिचोराया शून्यस्थानाशितुक्षमाः॥ अर्थ-काल और अनेक प्रकारके भयानक शस्त्र- सर्प, शत्रु,व्याधि और चोर आदि शून्य स्थानमें टिकेहये ये सब मनुष्यको नाश करनेको समर्थ नहीं होते २६८ जीवेनस्थापयेद्वायुंजीवेनारंभयेत्पुनः ॥ जीवनक्रीडतेनित्यंयूतेजयतिसर्वथा ॥२६९॥ अर्थ-जीव स्वरसे वायुको स्थिर करै फिर जीवसे ही वायुका आरंत करे और जीवसे ही द्यूत क्रीडाका आषाटीकासमत.। १६७) आरंभ करै तो द्यूतमें सर्वथा जय होतीहै ॥ २६९ ॥ स्वरज्ञानिवलादग्रेनिष्फलंकोटिधाभवेत् ॥ इहलोकेपरत्रापिस्वरज्ञानीवलीसदा ॥२७॥ 'अर्थ-स्वर ज्ञानीके बलके आगे कोटि प्रकारके जी बल निष्फल होतेहैं क्योंकि स्वरका ज्ञानी इस लोकमें और परलोकमें सदैव बलवान होताहै ॥ २७० ॥ दशशतायुतंलादेशाधिपवलंक्वचित् ॥ शतक्रतुसुरेंद्राणांबलंकोटिगुणंभवेत् ॥२७॥ अर्थ-किसी मनुष्यको दश, किसीको शत,किसीको दश सहस्र, किसीको लक्ष, किसीको देशके राज्यका बल होताहै-इन्द्र और ब्रह्मा आदि देवताओंको उनसे कोटिगुना बलं होताहै इसी प्रकार स्वरका बल सब बलोंसे कोटिगुनाहै ॥ २७१ ॥ देव्युवाच।। परस्परंमनुष्याणांयुद्धेप्रोक्तोजयस्त्व या। यमयुद्धसमुत्पन्नेमनुष्याणांकथंजयः॥ अर्थ-पार्वती बोली कि मनुष्योंने परस्पर युद्ध जयकी प्राप्ति आपने कही जब यमराजके संग युद्ध होय तब मनुष्यका किन प्रकार जय होवे ॥ २७२ ॥ ईश्वरंउवाच ॥ध्यायेद्देवंस्थिरोजीक्जुहुयाज्जीवसं गमे । इष्टसिद्धिर्भवेत्तस्यमहालाभोजयस्तथा । अर्थ-महादेव बोले कि हे पार्वती जो मनुष्य स्थिर हो कर देवताओंका ध्यान करै और जीव संगम (कुम्भ- १६८ -शिवस्वरोदय। क) प्राणवायुमें जीवुक होम करै उस मनुष्यके इष्ट- की सिद्धि महालाभ और जय प्राप्त होगा ॥ २७३ ॥ निराकारात्ममुत्पन्नसाकारंसकलंजगत् ॥ तत्साकारंनिराकारंज्ञानेभवतितत्क्षणात २७४॥ अर्थ-निराकार परमेश्वरसे आकारवाला सब जगत् उत्पन्न हुआहै निराकार परमेश्वरके ज्ञानसे वह जगत् साकार (आकारवाला) उसी क्षणमें हो जाताहै २७४ श्रीदेव्युवाच ॥ नरयुद्धंयमयुद्धत्वयाप्रोक्तंमहे- श्वर ॥ इदानींदेवदेवानांवशीकरणकंवद॥२७॥ अर्थ-पार्वती बोली कि हे महेश्वर मनुष्य और यमराज का युद्ध आपने वर्णन किया अब देवताओंके देवोंका वशमें करना कही ॥ २७५ ॥ ईश्वरउवाच ॥ चंद्रसूर्येणचाकृष्यस्थापयेज्जीवमं- डले ॥ आजन्मवशगारामाकथितेयंतपोचनः ।। अर्थ-महादेव बोले कि स्त्रीके चंद्र स्वरको अपने मूर्य स्वरसे आकर्षण करके अपने जीव स्वरको मंडल में टिकावे तो स्त्री जन्मार अपने वशमें होती है यह तपस्वियोंने कलहै यह क्रिया अपनी विवाही स्त्रीमें ही हो सकतीहै ॥ २७६ ॥ जीवेनगृह्यतेजीवोजींवोजीवस्यदीयते ॥ जीवस्थानेग्रतोजीवोबालाजीवांतकारकः२७७॥
भाषाटीकासमेत अर्थ-पुरुष अपने जीव रेकरसे स्त्रीके जीवस्वरको ग्रहण करै और स्त्रीके जीव स्वरमें अपना जीवस्वर दे इंस प्रकार जीवके स्थानमें गयाहुआ जीव जिसका ऐसा पुरुष जन्मभरतक स्त्रीके वशमें रहताहै ॥ २७७ ॥ रात्र्यंतयामवेलायांप्रसुप्तेकामिनीजने ॥ ब्रह्मजीवंपिवेद्यस्तुबालाप्राणहरोनरः॥२७८ ॥ अर्थ-रात्रिके पिछले पहरके समय जिस समय जो. मनुष्य ब्रह्म जीव (सुषुम्नास्वर) को पीताहै वह मनुष्य स्त्रियोंके प्राणोंको वसमें करताहै ॥ २७८ ॥ अष्टाक्षरंजपित्वाततस्मिन्कालेगतेसति ॥ तत्क्षणं दीयतेचंद्रोमोहमायातिकामिनी २७९॥ अर्थ--उस कालके व्यतीत होने पर अष्टाक्षरमंत्रको जपकर जो पुरुष अपना चंद्र स्वर स्त्रीको देताहै तो वह कामिनी उसी क्षणमें मोहको प्राप्त होतीहै ॥ २७९ ॥ शयनेवाप्रसंगेवायुवत्यालिंगनेऽपिवा ॥ यःसूर्येणपिबेच्चंद्रसभवेन्मकरध्वजः ॥२८० ॥ अर्थ-शयनके समय वा स्त्रीके संगमें अथवा स्पर्शके- समय जो मनुष्य अपने सूर्य स्वरसे स्त्रीके चंद्र स्वरको पीताहै वह मनुष्य कामदेवके समान मोह करनेवाला होताहै ॥ २८० ॥ शिवआलिंग्यतेशत्याप्रसंगदक्षिणेऽपिवा तत्क्षणादापयेद्यस्तुमोहयेत्कामिनीशतम्२८३॥
(७०)
शिवस्वरोदय।
अर्थ-यदि शिव स्वर (सूर्य ) शक्ति स्वरसे(चंद्र)
स्त्री संगके समय मिल जाय अथवा पुरुष अपना चंद्रस्वर
स्त्रीको वह पुरुष सौकामिनीयोंको मोह सकताहै २८१॥
सप्तनवत्रय पंचवारान्संगस्तुसूर्यभे॥
चंद्रद्वितुर्यपट्कृत्वावश्याभवतिकामिनी॥२८२॥
अर्थ-बीके चंद्र स्वरको अपने सूर्य स्वरमें देने के
अनंतर सात ७ नव ९ तीन ३ वा पांच ५ वार संगहो
जाय अथवा स्त्रीके चंद्र स्वरमें अपना सूर्य स्वर कर दो२
चार ४ वाछः ६ वार मिल जाय तो वह कामिनी वश-
में होतीहै ॥ २८२ ॥
सूर्यचंद्रौसमाकृष्यसक्रांत्याधरोष्ठयोः॥
महाप मुखपृष्ठाकारंवारमिदंचरेत् ॥२८३ ॥
अर्थ-अपने सूर्य और चंद्र स्वरको सर्पकी गतिसे
खींच कर अधरोष्ठों पर स्त्रीके मुखसे अपना मुख स्पर्श
'करके वारंवार पूर्वोक्त प्रकारसे चंद्र और सूर्यका मेल करे
आप्राणमितिपद्मस्ययावनिद्रावसंगता॥
पश्चाजागतिवेलायांचोष्यतेगलचक्षुषी ॥२८॥
अर्थ-जितने स्त्री निद्राके वशमें रहै तबतक पूर्वोक्त-
प्रकारसे स्त्रीके मुखपद्मका पान करै पीछे जागनेके समय
मला व नेत्र इनका चुंबन करै ॥ २८४ ॥
अनेनविधिनाकामीवशयेत्सर्वकामिनीः॥
इदंनवाच्यसन्यस्मिन्नित्याज्ञापारमेश्वरी॥२८५॥
भाषाटीकासमेत (७१)
अर्थ-इस विधिसे कामी पुरुष सब कामिनीयोंको
नशमें करताहै परंतु मेरी यह सच्ची आज्ञाहै कि यह वंशी
करण किसी अन्य पुरुषको अर्थात लंपटकोनकहै २८५
इति वशीकरणम् ।
अथगर्भप्रकरणम्।
ऋतुकालभवानारीपंचमेऽह्रियदाभवेत् ।।
सूर्याचंद्रमसोर्योगसेवनात्पुत्रसंभवः ॥२८६॥
अर्थ-ऋतुस्नानके अनंतर जब स्त्रीको पांचवां दिन
होय उस समय पुरुषका सूर्य स्वर स्त्रीका चंद्र स्वर
चलता होय तो उस समय स्त्रीके संग करनेसे पुत्रका
जन्म होताहै ॥ २८६ ॥
शंखवल्लीगवांदुग्धेपृथ्व्यापोवहतेयदा॥
भर्तुरेववदेद्वाक्येदपैदेहित्रिभिर्वचः ॥२८७॥
अर्थ-जिस समय पृथ्वी और जल तत्त्व वहते.
होय उस समय स्त्रीको गौके दूधमें शंखवल्लीको खिलावे
फिर स्त्री अपने अर्तासे तीन बार भोगकी प्रार्थना करै ॥.
ऋतुस्नातापिवेन्नारीऋतुदानंतुयोजयेत् ॥
रूपलावण्यसंपन्नोनरसिंहःप्रसूयते ॥२८८।।
'अर्थ--जब स्त्री ऋतुस्नानके अनंतर उक्त औषधको
पीले तब पुरुष ऋतुदानदे अर्थात् भोग करे तो रूप-
और पराक्रमी-मुंदर नरों में सिंह पैदा झेता है॥२८८॥
(७२) शिवस्वरोदय । सुषुम्नासूर्यवाहेनऋतुदीनंतुयोजयेत् ॥ अंगहीनःपुमान्यस्तुजायतेत्रासविग्रहः ॥२८९॥ अर्थ-जो मनुष्य सूर्य स्वरके प्रवाहके संग सुषुम्ना स्वरके वहनके समय ऋतु दान देता है उसके अंगहीन और कुरूप पुत्र पैदा होताहै ॥ २८९ ॥ विषमांकेदिवाराचौविषमांकदिनाधिपः । 'चंद्रनेत्राग्नितत्त्वेषुवंध्यापुत्रमवाप्नुयात् ॥२९॥ अर्थ-ऋतके अनंतर विषम दिनोंमें पुरुषका सूर्यस्वर दिन वा रातिमें चले अर्थात स्वीका चंद्र स्वर चले और पृथ्वी-जल-अनी-इन तत्वोंमें गर्भाधान होय तो वंध्याजी पुत्रको प्राप्त होतीहै ॥ २९० ॥ ऋत्वारंभेरविपुंसांस्त्रीणांचैवसुधाकरः ।। उभयोःसंगमेप्राप्तवंध्यापुत्रमवाप्नुयात् ॥२९॥ अर्थ-यदि ऋतुके आरंजमें पुरुषोंका सूर्य स्वर और स्त्रीका चंद्रस्वर चले और दोनोंका संगम होजाय तो बंध्यानी पुत्रको प्राप्त होजाय ॥ २९१ ॥ ऋत्वारंभेरविःपुंसांशुक्रांतेचसुधाकरः ।। अनेनक्रमयोगेननादत्तेदेवदारुकम् ॥२९२॥ अर्थ-यदि मोगके आरंभ पुरुषका सूर्यस्वर चले और वीर्यपातके अनंतर चंद्रस्वर बहने लगे तो इसक्रम- योगसे स्त्री गर्भ धारण नहीं करती ॥ २९२॥ चंद्रनाडीयदाप्रश्नेगर्भेकन्यातदाभवेत् ॥
भाषाटीकासमेन। (७३)
सूर्योभवेत्तदापुत्रोद्वयोर्गोंविहन्यते ॥२९३ ॥
अर्थ-यदि गर्भवतीके प्रश्नके समयमें चंद्रमाकी नाडी
चले तो गर्नमें कन्या होतीहै और सूर्यस्वर चले तो पुत्र
और दोनों स्वर चलें तो गर्भ नष्ट होजाताहै ॥२९३ ॥
पृथ्वीपुत्रीजलेपुत्रःकन्यकातुप्रभंजने ॥
तेजसिगर्भपातःस्यानभस्यपिनपुंसकः ॥२९४॥
अर्थ-प्रश्नके समयमें पृथ्वी तत्व होय तो कन्या जल
तत्व होय तो पुत्र वायुतत्व होय तो कन्या तेजतत्व
होय तो गर्भका पात आकाश तत्व होय तो नपुंसक
होताहै ॥ २९४ ॥
चंद्रेस्त्रीपुरुषासूर्योमध्यमार्गेनपुंसकः ॥
गर्भप्रश्श्रेयदादूतःपूर्णेपुत्र प्रजायते ॥२९५ ॥
अर्थ-गर्भके प्रश्न समय चंद्र स्वर होय तो कन्या
सूर्यस्वर होय तो पुत्र सुषुम्नाका स्वर होय तो नपुंसक
होताहै बदि पूछनेवाले दूतके पूर्ण अंग होय तो पत्र
पैदा होताहै ॥ २९५॥
शून्येशून्यंयुगेयुग्मंगर्भपातश्चसंक्रमे ॥
तत्त्ववित्सविजानीयात्कथितंतत्तुसुंदरि ॥२९६॥
अर्थ-हे सुंदरीं पूछनेवालेके अंग शून्य होय तो
शून्य दो २ स्वर चले होय तो युग्म (दो) यदि
स्वरोंका संक्रम या सुषुम्ना होय तो गर्भका पात तत्वों
वेत्ता जाने ॥ २९६ ॥
(७४) शिवस्वरोदय ।
गर्भाधानमारुतेस्याचदुःखीदिक्षुख्यातोवारुणे
सौख्ययुक्तः॥ गर्भस्रावास्वल्पजीवश्चवह्नौभो
गीभव्यापार्थिवेनार्थयुक्तः॥२९७॥
अर्थ-वायुतत्वमें गर्भाधान होय तो दुःखवाला
और जलतत्वमें गर्भाधान होय तो दिशाओं में विख्यात
और सुखी, अमितत्वमें होय तो गर्भका पात अथवा
अल्पजीवी पृथ्वी तत्वमें होय तो भोगी-मुंदर-धनवान-
पुत्र पैदा होताहै ॥ २९७ ॥
धनवानसौख्ययुक्तश्चभोगवानर्थसंस्थितिः ॥
स्यानित्यवारुणेतत्त्वेव्योनिग विनश्यति२९८
अर्थ-जल तत्वमें गर्भाधान होय तो धनवान् सुखी
भोगवान् जिसके पास, नित्यधन रहै ऐसा पुत्र पैदा
होताहै आकाश तत्वमें गर्भाधान होय तो गर्भ नष्ट
हो जाताहै ॥ २९८ ॥
माहेंद्रेसुसुतोत्पत्तिारुणेदुहिताभवेत् ॥
शेषेषुगर्भहानिःस्याजातमात्रस्यवामृतिः२९९॥
अर्थ-पृथ्वी तत्वमें गर्भाधान होय तो पुत्रकी और
जल तत्वमें रहै तो कन्याकी उत्पत्ति होतीहै और शेष
तत्वमें रहै तो गक्षकी हानि वा पैदा होतेहीका मरण
होताहै ॥ २९९ ॥
रविमध्यगतश्चंद्रश्चंद्रमध्यगतोरविः॥
ज्ञातव्यंगुरुतःशोघ्रनवेदेशास्त्रकोटिभिः॥३०॥
भाषाटीकासमेत।
(७५)
अर्थ-सूर्य स्वरके मध्य में चंद्रस्वरकी और चंद्र
स्वरके मध्यमें सूर्य स्वरकी गति गुरूसे शीघ्र जाने यह
बात वेद और कोटि शास्त्रोंसे नहीं आती ॥ ३०० ॥
इति गर्भप्रकरणम्।
अथसंवत्सरफलम् ।
चैत्रशुक्लप्रतिपदिप्रातस्तत्त्वविभेदतः।
पश्यद्विचक्षणोयोगीदक्षिणेचोत्तरायणे ॥३०१॥
अर्थ-चैत्रके शुक्लपक्षकी प्रतिपदाको प्रातःकालके
समय तत्वोंके विभेदसे विचक्षण (पंडित) योगी दक्षि-
णायन और उत्तरायण देखे-अर्थात् उस दिनके
तत्वोंके नहनेले वर्षभरके फलको देखै ॥ ३०१ ॥
चंद्रोदयस्यवेलायांवहमानोऽथतत्त्वतः॥
पृथिव्यापस्तथावायुःसुभिक्षसर्वसस्यजम् ३०२
अर्थ-चंद्रस्वरके उदयके समय यदि पृथ्वी जल वा.
वायुतत्व चलै तो सब खेतियोंका सुशिक्ष होताहै३०२
तेजोव्योनोर्भयंघोरंदुर्भिक्षकालतत्त्वतः॥
एवंतत्त्वफलंज्ञेयंवर्षमासेदिनेष्वपि ॥३०३॥
अर्थ-यदि चंद्रस्वरमें तेज और आकाशतत्व चलते
होंब तो घोरभय और दुर्भिक्ष होताहै इसी प्रकार सम:
यके तत्वानुसार वर्ष मास और दिनोंमेंभी संपूर्णतत्वोंकी
फल जानना ॥ ३३ ॥
(७६) शिवस्वरोदय ।
मध्यमाभवतिरांदुशासर्वेषुकर्मसु ॥
देशभंगमहारोगक्लेशकष्टादिदुःखदा॥३०४॥
अर्थ-मध्यमा (सुषुम्ना) नाडी क्रूर और सब-
कर्मों में दुष्ट (बुरी) देशका अंग-महारोग-क्लेश-कष्ट
आदि अत्यंतदुःखोंको देतीहै ॥ ३०४ ॥
मेषसंक्रांतिवेलायांस्वरभेदंविचारयेत् ॥
संवत्सरफलंब्रूयाल्लोकानांतत्त्वचिंतकः ॥३०॥
अर्थ-यदि मेषकी संक्रांतिके समय स्वरके भेदको
विचारै तो तत्वका चिंतक मनुष्य लोकोंको संवत्सरका
फल कहसकताहै ॥ ३०५॥
पृथिव्यादिकतत्त्वेनदिनमासाब्दजंफलम् ॥
शोभनंचयथादुष्टव्योममारुतवह्निभिः ॥३०६॥
अर्थ-मेषसंक्रांतिके समय पृथ्वी आदितत्वोंसे दिन
मास और वर्षका फल शोभन जाने-और आकाश पवन
और अग्नितत्वसे दुष्टफल जाने ॥ ३०६ ॥
सुभिक्षराष्ट्रवृद्धिःस्याबहुसस्यावसुंधरा ॥
बहुवृष्टिस्तथासौख्यपृथ्वीतत्त्वहेद्यदि॥३०७॥
अर्थ-यदि मेषसंक्रांतिके दिन पृथ्वी तत्व चले तो
सुभिक्ष देशकी वृद्धि पृथ्वीमें बहुत अन्न बहुत वृष्टि और
बहुत सुख होताहै ॥ ३०७ ॥
अतिवृष्टिः सुभिक्षं स्यादारोग्यसौख्यमेवच ॥
बहुसस्यातथापृथ्वीअप्तत्त्ववैवहेबादि ॥३०८॥
भाषाटीकासमेत (७७) अर्थ-यदि जलतत्व उस दिन बहता होय तो आत वृष्टि सुभिक्ष-आरोग्य और सुख और पृथिवीमें बहुत खेती होतीहै ॥ ३०८॥ दुर्भिक्षराष्ट्रभंगःस्यादुत्पत्तिश्चविनश्यति ॥ अल्पादल्पतरावृष्टिरग्नितत्त्ववंहेद्यदि ॥३०९ ॥ अर्थ-यदि अमितत्व चलताहोय तो दुर्भिक्ष-देशका भंग-और उत्पत्तिका नाश-और बहुत स्वल्प वृष्टि होती है ॥ ३०९ ॥ उत्पातोपद्रवाभीतिरल्पावृद्धिःस्युरीतयः॥ मेषसंक्रांतिवेलायांव्योमतत्त्ववहेद्यदि ॥३१०॥ अर्थ-यदि मेषसंक्रांतिके समय वायुतत्व चलता होयतो उत्पात-उपद्रव-भीति अल्पवृष्टि-ईति' (मूसे लगना आदि छः) होतीहैं ॥ ३१० ॥ मेषसंक्रांतिवेलायांव्योमतत्त्वंवहेद्यदि ॥ तत्रापिशून्यताञयासस्यादीनांसुखस्यच ३११ अर्थ-यदि मेषसंक्रांतिके समय आकाश तत्व बहता होय तो सस्य आदि और सुखकी शून्यता जाननी३३१ पूर्णप्रवेशनेश्वासेसस्यंतत्त्वेनसिध्यति ॥ सूर्यचंद्रेऽन्यथाभूतेसंग्रहःसर्वसिद्धिदः॥३१२ ॥ अर्थ-यदि श्वासका पूर्ण प्रवेश होजाय तो तत्वले १ अतिवृष्टिरनावृष्टिर्मूषिकाश्शलभाः शुकाः । अत्यासन्नाश्च राजानः षडेता ईतया स्मृताः।
(७८) शिवस्वरोदय। धान्यकी सिद्धि होतीहै और यदि तत्वोंके उदयके समय सूर्य व चंद्रस्वर विपरीत होजाय तो और चंद्रके योगमें सूर्य और सूर्यके योगमें चंद्रहो-तो अन्तका संग्रह सिद्धि (लाभ) को देताहै ॥ ३१२ ॥ विषमेवह्नितत्त्वस्याज्ञायते केवलंनभः॥ तत्कुर्याद्वस्तुसंग्राहोद्विमासेचमहर्षता ॥३१३ ॥ अर्थ-यदि विषम (दक्षिण) स्वरमें अमितत्वहो अथवा केवल आकाशतत्व होय तो उससमय वस्तुओंका संग्रह करै तो दोमासमें महर्घता (महंगा पना) होगी३१३ रखौसंक्रमतेनाडीचंद्रमंतेप्रसर्पिता ॥ खानिलेवहियोगेनरौरवंजगतीतले ॥ ३१४॥ अर्थ-यदि सत्रिके समय सूर्यकी नाडी वहतीहो और प्रातःकालके समय चंद्रमाकी बहने लगे और उस समय आकाश पवन अमितत्व इनका योग होय तो पृथ्वीके तलपर रौरव ( बडे २ अनर्थ ) होतेहैं३१४॥ इति संवत्सरप्रकरणम् । अथरोगप्रकरणम्। महीतत्त्वेस्वरोमश्चजलेचजलमातृतः॥ तेजसिखेटवाटीस्थशाकिनीपितृदोषतः॥३१॥ अर्थ-यदि प्रश्नके समय पृथ्वीतत्व बहताहोय तो स्व (प्रारब्ध) कारोग-जलतत्व चलताहोय तो जलोंकी भाषाटीकासमेत। (७९) मातृकाओंका-तेजतत्व वहताहोय तो खेटवाटीमें रहने वाली शाकिनी वा पितृदोष ( पीडा )से रोगका होना समझना ॥ ३१५॥ आदौशून्यगतोदूतःपश्चात्पूर्णेविशेद्यदि ॥ मूर्छितोऽपिध्रुवंजीवेद्यदर्थप्रतिपृच्छति ॥३१६॥ अर्थ-यदि पूछने वाला दूत पहिले शून्य अंगकी तरफ आयाहो और पश्चात् (पीछे) पूर्ण अंगकी तरफ बैठ जाय तो मूर्छितभी वह रोगी निश्चयसेजीजायगा-जिसके लिये वह पूछताहै ॥ ३१६ ॥ यस्मिन्नंगेस्थितोजीवस्तत्रस्थःपरिपृच्छति ॥ तदाजीवतिजीवोसौयदिरोगैरुपद्रुतः॥ ३१७ ॥ अर्थ-यदि जिस अंगमें जीव स्थितहो उसी अंगकी तरफ बैठाहुआ प्रश्नकरै तो रागोंसे पीडितभी वह जीव अवश्य जीवेगा॥ ३१७ ॥ दक्षिणेनयदावायु तोरौद्राक्षरोवदेत् ॥ तदाजीवतिजीवोसौचंद्रेसमफलंभवेत् ॥३१८॥ अर्थ-यदि वायु दक्षिणनाडीकी बहतीहो औरदूतकै मुखसे भयानक वचन निकलें तो वह जीव जीवेगा और चंद्रस्वर होयतो समान फल होताहै । ३१८ ॥ जीवाकारंचवाधृत्वाजीवाकारंविलोक्यच ॥ जीवस्थोजीवितप्रश्वेतस्यस्याजीवितंफलम्३१९ .. अर्थ-जीवाकारको धारकर और देखकर जीवमें (४०) शिवस्वरोदय ।। स्थित हुआ दूत जीनेका जश्न करै तो उसको जीवनका फल होताहै ॥ ३१९ ॥ वामचारेतथादक्षप्रवेशेयत्रवाहने ॥ तत्रस्थापृच्छतेदूतस्तस्यसिद्धिर्नसंशयः ३२०॥ अर्थ-वामनाडी (इडा)अथवा दक्षिणनाडी(पिंगला) इन दोनोंके चलने वा प्रवेश करनेके समय जो दूत प्रश्न करै तो उसकी सिद्धि होतीहै इसमें संशय नहीं ३२०॥ प्रश्नेचाधास्थितोजीवोचूनंजीवोहिजीवति ॥ ऊर्ध्वचारस्थितोजीवोजीवोयातियमालयम्३२१ अर्थ-यदि प्रश्नके समय दूत अधानागमें स्थित होय तो वह रोगी जीव निश्चयसे जीवै यदि जीव ऊर्ध्व भागमें स्थित होय तो जीव यमालय में जायगा।३२१ विपरीताक्षरप्रश्नरिक्तायांपृच्छकोयदि ॥ विपर्ययंचविज्ञेयंविषमस्योदयेसति ॥३२२॥ अर्थ-यदि विषमनाडी (सुषुम्ना) का उदय ही और प्रश्भका कर्ता रिक्त नाडीमें ऐसा प्रश्न करै जिसके अक्षर विषम (१-३.५ आदि ) हों तो विपरीत फल जानना॥ चंद्रस्थानस्थितोजीवःसूर्यस्थानेतुपृच्छकः॥ तदाप्राणवियुक्तोसौयदिवैद्यशतैर्वृतः ॥ ३२३ ॥ अर्थ-यदि अपनी जीव(श्वासवायु) चंद्रमाके चारों स्थितहो और प्रश्नकर्ता सूर्यके चारमें स्थित होयतो यह रोगी चाहै सौ.वैद्योंसे युक्तहो तो भी मर जायगा॥ .
भाषाटीकासमेत । (८)
पिंगलायांस्थितोजीवोवादूतस्तुपृच्छति ॥
तदाऽपिम्रियतेरोगीयंदित्रातामहेश्वरः॥३२॥
अर्थ-यदि जीव पिंगलामें स्थितहो और दूत वाम.
भागमें स्थित होकर पूछे तो उस समय भी रोगी मर
जायगा चाहै महादेव भी रक्षा क्यों न करै ॥ ३२४ ॥
एकस्यभूतस्यविपर्ययेणरोगाभिभूतिर्भवतीह-
पुंसाम् ॥तयोईयोबधुसुहृद्विपत्तिःपक्षद्वयेव्य-
त्ययतोमृतिःस्यात् ॥ ३२५॥
अर्थ-एक भूत (तत्व) के विपरीत होनेसेनी पुरुषोंको
रोग तिरस्कारका देते हैं और दो तत्वोंके विपरीत हो-
नेसे बंधु और मित्रोंसे विपत्ति होतीहै यदि दो पक्ष(१मा-
स ) तक व्यत्यय चला जाय तो मृत्यु होताहै॥३२५॥
इति रोगप्रकरणम् ।
अथ कालप्रकरणम्।
मासादौचैवपक्षादौवत्सरादौयथाक्रमम् ॥
क्षयकालंपरीक्षेतवायुचारवशात्सुधीः ॥ ३२६॥.
अर्थ-मास-प्रक्ष-और वर्ष इन तीनोंकी. क्रमसे
आदिमें विद्वान मनुष्य वायुके प्रचार वशसे क्षय (मरण)
के समयकी परीक्षा करै ॥ ३२६ ॥
पंचभूतात्मकंदीपंशिवनेहेनसिंचितम् ॥
रक्षयेत्सूर्यवानप्राणीजीव-स्थिरोभवेत्॥३२७॥
(८२) शिवस्वरोदय । अर्थ-यह पंच भूतात्मक दीप (देह ) को शिवरूप स्नेह (तेल) से सींच कर सूर्यरूप पवनसे जो प्राणी रक्षा करता है उसका जीव स्थिर होताहै ॥३२७॥ मारुतंबंधयित्वातुसूर्यवंधयतेयदि ॥ अभ्यासाजीवतेजीव सूर्यकालेऽपिवंचिते॥३२८॥ अर्थ-जो मनुष्य प्राणवायुको बांधकर दिनभर सूर्य स्वरका बंधन करताहै इस प्रकार अभ्यासके बलसे सूर्य कालका वंचन करके वह जीव जीसकता है ॥३२८॥ गगनात्स्रवतेचंद्रकायपद्मानिसिंचयेत् ॥ कर्मयोगसदाभ्यासैरमर शशिसंश्रयात् ॥३२९॥ अर्थ-आकाशमें गमन करनेसे चंद्रमाकी किरण नीचे गिरकर देहरूपी कमलोंको सींचतीहै इस प्रकार कर्मके योगसे योगी चंद्रमाकाआश्रय लेनेसे अभ्यासके द्वारा अमरहोजाताहै ॥ ३२१ ॥ शशांकंवारयेद्रात्रौदिवावार्योंदिवाकरः॥ इत्यभ्यासरतोमित्यंसयोगीनात्रसंशयः॥३३०॥ अर्थ-जो रात्रिमें चंद्रस्वरका और दिनमें सूर्य- स्वरका निवारण करताहै इस प्रकार अायासमें तत्पर वह योगी ही योगीहै इसमें संदेह नहीं है. ३३० ॥ अहोरात्रेयदैकत्रवहतेयस्यमारुतः॥ तदातस्यभवेन्मृत्युःसंपूर्णे वत्सरत्रये ॥३३१॥ अर्थ-जिस मनुष्यका प्राणवायु (श्वास ) अहोरात्र
भाषाटीकासमेत । (८३)
भर एक स्थानमें ही वहनासहै तब उस मनुष्यकी मृत्यु
तीन वर्षमें हो जायगी। ३३३ ॥
अहोरात्रद्वयंयस्यपिंगलायांसदागतिः॥
तस्यवर्षद्वयंप्रोक्तंजीवितंतत्त्ववेदिभिः॥३३२॥
अर्थ-जिस मनुष्य के श्वासकी दो गति अहोरात्र
पिंगलामें रहै तत्वके ज्ञाताओंने उस मनुष्य का जीवन
दो वर्षका कहाहै ॥ ३३२ ॥
त्रिरात्रेवहतेयस्यवायुरेकपुटेस्थितः॥
तदासंवत्सरायुस्तंप्रवदंतिमनीषिणः॥ ३३३॥
अर्थ-जिस मनुष्यकी प्राणवायु तीनरात्र तक एकही
नासिकाके पुटमें स्थित होकर चलै तो विद्वान् मनुष्य
उसकी अवस्था एक वर्षकी कहतेहैं ॥ ३३३ ॥
रात्रौचंद्रोदिवासूर्योवहेद्यस्यनिरंतरम् ॥
जानीयात्तस्यवैमृत्युःषण्मासाभ्यंतरेभवेत् ३३४
अर्थ-जिस मनुष्यका रात्रिमें चंद्रस्वर और दिनमें
सूर्यस्वर निरंतर वहै उस मनुष्यकी छः महीनेके भीलर
मृत्यु होतीहै ॥ ३३४ ॥
लक्ष्यलक्षितलक्षणेनसलिलेभानुर्यदादृश्य-
तेक्षीणोदक्षिणपश्चिमोत्तरपुर षट्तिद्विमासै
कतः॥ मध्यंछिद्रमिदंभवेदशदिनंधूमाकु:
लंतदिनेसर्वज्ञैरपिभाषितमुनिवरैरायु प्रमा
णंस्फुटम् ॥ ३३५॥
(८४) शिवस्वरोदय ।
अर्थ-जिस मनुष्यको लके विषे सूर्यका प्रतिबिंब
क्षीण (कटाहुआ) क्रमसे दक्षिण पश्चिम उत्तर और
पूर्वमें दीखे वह छ: ६ तीन ३ दो २ एक १ मास जीवेगा
अर्थात् दक्षिणमें जिसको कटा दीखे उसकी छः ६ और
पश्चिममें तीन ३ उत्तरमें २ पूर्वमें एक मासकी अवस्था
समझनी-यदि प्रतिबिंबके मध्यमें छिद्र दीखे तो दश
दिनकी अवस्था जाननी यदि संपूर्ण प्रतिबिंबमें
धूमसा प्रतीत होय तो उसी दिन मृत्यु जाननी यह
सर्वज्ञ मुनिवरोंने अवस्थाका प्रकट प्रमाण कहाहै ३३५
दूतःकृष्णकषायकृष्णवसनोदंतक्षतोमुंडि-
तस्तैलाभ्यक्तशरीररज्जुककरोदीनश्चपूर्णो
त्तरः ॥ भस्यांगारकपालपाशमुशलीसूर्या
स्तमायातियःकालीशून्यपदस्थितोगदयु-
तःकालानलस्याहृतः॥३३६॥
अर्थ-यदि प्रश्न करनेवाला दूत काले भगवे वस्त्र
धरकर अथवा दूतके दांतोंमें घाव होय मुंडित होय
तैलाभ्यंग किये होय हाथमें रस्सी लिये होय दीन होय
पूर्वोत्तर अर्थात् उत्तर देने में समर्थ और भस्म, अंगार,
कपाल, मुसल, ये जिसके हाथमें हो जो सूर्यास्तके
समय आवे-और जिसके पैर शून्य होयें इतने प्रका-
रका दूत पूछनेको आवे तो रोगी कालको प्राप्त होगा
ऐसा जाने ॥ ३३६ ॥
भाषाटीकांसमेत । (८५) अकस्माञ्चित्तविकृतिरकस्मात्पुरुषोत्तमः ॥ अकस्मादिद्रियोत्पातःसन्निपाताग्रलक्षणम्३३७ अर्थ-जिस रोगीके चित्तमें अकस्मातू विकार हो जाय और अकस्मात् उत्तम हो जाय और अकस्मात् इंद्रियों में उत्पात होजाय ये संनिपातके लक्षण जानने ॥ शरीरंशीतलंयस्यप्रकृतिर्विकृताभवेत्॥ तदरिष्टंसमासेनव्यासतस्तुनिबोधमे ॥३३८॥ अर्थ-जिसका शरीर शीतलहो प्रकृतिमें विकार होय वह संक्षेपसे अरिष्ट जानना और मेरे सकाशसे विस्तारसे श्रवण कर ॥ ३३८ ॥ दुष्टशब्देषुरमतेशुद्धशब्देषुचाप्यति ॥ पश्चात्तापोभवेद्यस्यतस्यमृत्युनसंशयः॥३३९॥ अर्थ-जो मनुष्य बुरे २ शब्दोंको कहै और जो शुद्ध शब्दोंको कहै और पीछेसे पश्चात्ताप करै उसकी मृत्यु होगी इसमें संशय नहीं ॥ ३३९ ॥ हुंकार-शीतलोयस्यफूत्कारोवह्निसन्निभः॥ महावैद्योभवेत्तस्यतस्यमृत्युभवेध्रुवम् ३४०॥ अर्थ-जिसका हुंकार शीतल होय और कूत्कार अग्निके समान होय उसकी चाहै महान् वैद्य रक्षा कदै तोनी निश्चयसे मृत्यु होगी ॥ ३४० ॥ जिह्वांविष्णुपदंध्रुवंसुरपदंसन्मातृकामण्ड- लमेतान्येवसरुंधतीममृतगुंशुकंधुवंवाक्षण-
-
(८६) शिवस्वरोदय ।
म् ॥ एतेष्वेकमपिस्फुटनपुरुषःपश्येत्पुरः-
प्रेषितःसोवश्यंविशतीहकालवदनंसंवत्सरा-
दूर्ध्वतः ॥३४१॥
अर्थ-जो मनुष्य जीभ (जिह्वा )आकाश ध्रुव-दै
वमार्गमातृकाओंका मंडल-अरुंधती-चंद्रमा-शुक्र-
अगस्ति-इनमें से एककोभी कहनेसे न देखे वह रोगी
अवश्य वर्ष दिनके अनंतर कालके मुखमें जायगा३४१॥
अरश्मिबिंबसूर्यस्यवन्हे शीतांशुमालिनः॥
दृष्ट्वैकादशमासायुर्नरश्चोर्ध्वनजीवति ॥ ३४२ ॥
अर्थ-जिस मनुष्यको सूर्य चंद्रमाके प्रतिबिंब और
अग्नि इनकी किरण प्रतीत न होय उस मनुष्यकी
अवस्था .ग्यारह मासकी जाननी ॥ ३४॥
वाप्यांपुरीषमूत्राणिसुवर्णरजतंतथा ॥
प्रत्यक्षमथवास्वप्नेदशमासानजीवति ॥ ३४३॥
अर्थ-जिस मनुष्यको सुपनेमें अथवा जागुंत अव-
स्थामें बावड़ीमें मल मूत्र सुवर्ण चांदी दीखे वह दश
मासंसे परे नहीं जीवेगा ॥ ३४३ ॥
क्वचित्पश्यतियोदीपंसुवर्णचकपान्वितम् ॥
विरूपाणिचभूतानिनवमासानजीपति॥३४॥
अर्थ-जो मनुष्य कभी २ दीपक को अथवा कसोटी
लगाया हुआ सुवर्ण और संपूर्ण भूतोंको विपरीत
देखे वह नौ महीनेसे परे नहीं जीवेगा॥ ३.४४ ॥
भाषाटीकासमेत । (८७) स्थूलांगोऽपिकृशः कृशोऽपिसहसास्थूल: त्वमालभ्यतेप्राप्तोकिनकप्रभायदिभवेत्लू रोऽपिकृष्णच्छविः ॥ शुरोभीरुसुधीरधर्म- निपुणःशांतोविकारीपुमानित्येवंप्रकृतिः प्रयातिचलनमासाष्टकंजीवति ॥ ३४५॥ अर्थ-जिस मनुष्यकी प्रकृति (स्वभाव )इस प्रकार चलायमान हो जाय कि स्थूल होय तो एकदम कश हो जाय और कश होय तो एकदम स्थूल हो जाय और क्रूर वा कृष्ण वर्ण होकर सुवर्ण समान कांतिवाला हो जाय शूर वीर होकर भारु होजाय-धार्मिक होकर अधर्मी हो जाय और शांत होकर चंचल हो जाय-तो वह मनुष्य आठ महीने जीवेगा ३४५॥ पीडाभवेत्पाणितलेचजिह्वामूलतथास्याद्रु धिरंचकृष्णम्॥विद्धंनचग्लायतियत्रदृष्टया जीवेन्मनुष्यासहिसप्तमासम् ॥ ३४६॥ अर्थ-जिस मनुष्यके हाथके तलवे पर जिह्वाके मूल- में रुधिर काला हो जाय और जिसके गातमें नोचनेसे दुःख न होय वह मनुष्य सात मास जीवेगा ॥ ३४६॥ मध्यांगुलीनांत्रितयंनवक्ररोगविनाशुष्यक्ति यस्यकंठः ॥ मुहुर्मुहुःप्रश्नवशेनजाड्यात्ष- इभिःसमासप्रलयंप्रयाति ॥३४७ ।।
(८८) शिवस्वरोदय ।
अर्थ-जिस मनुष्यको बीचकी तीन अंगुली नमुड़े
और रोगके विनाही कंठ सूख जाय और जिसको वार-
वार पूछनेसे जड़ता होजाय अर्थात् पूर्वापरका अनुसं-
धान न रहै वह मनुष्य छः महीनेमें मरणको प्राप्त
होजायगा ॥ ३४७॥
नयस्यस्मरणंकिंचिद्विद्यतेस्तनचर्मणि ॥
सोवश्यपंचममासिस्कंधारूढोभविष्यति ३४८॥
अर्थ-जिस मनुष्यके स्तनोंका चाम बधिर हो
जाय वह मनुष्य पांचवें महीनेमें चार मनुष्योंके कांधेपर
अवश्य चढेगा ( मरैगा) ॥ ३४८ ॥
यस्यनस्फुरतिज्योतिःपीड्यतेनयनद्वयम् ॥
मरणंतस्यनिर्दिष्टंचतुर्थमासिनिश्चितम् ॥३४९॥
अर्थ-जिस मनुष्यके नेत्रोंकी ज्योति प्रकाश न
होय और दोनों नेत्रोंमें पीडा होय, उस मनुष्यका मरण
चौथे मासमें अवश्य कहाहै ॥ ३४९ ॥
दंताश्चवृषणीयस्यनकिंचिदपिपीड्यते ॥
तृतीयंमासमावश्यंकालाज्ञायाभवेन्नरः ॥३५॥
अर्थ-जिस मनुष्यके दांत और अंडकोशोंमें दवा-
नेसे पीडा कुछी न होय वह तीसरे महीनेमें कालकी
आझमें पहुंचेगा ॥ ३५० ॥
कालोदूरस्थितोवापियेनोपायेनलक्ष्यते ।।
तंवदामिसमासेनयथादिष्टंशिवायमे ॥ ३५१ ॥
भाषाटीकासमेत ।
(८९)
अर्थ-दूर पर स्थितभी काल जिस उपायसे दीख
जाय उस उपायको शिवशास्त्र के अनुसार संक्षेपसे कह-
ताहूं ॥ ३५१ ॥
एकान्तविजनंगत्वाकृत्वाऽऽदित्यंचपृष्ठतः॥
निरीक्षयेनिजच्छायांकंठदेशेसमाहितः॥ ३५२॥
अर्थ-कि एकांत विजन वनमें जा कर और
सूर्यको पीठपर करके अपनी.छाया को सावधानीसे
कंठ देशमें देखे ॥ ३५२ ॥
ततश्चाकाशमीक्षेतह्रींपरब्रह्मणेनमः॥
अष्टोत्तरशतंजत्वाततः पश्यतिशंकरम् ॥३५३॥
अर्थ-फिर आकाश देखे और 'ह्रींपरब्रह्मणेनमः'
इस मंत्रका १०८ वार जप करें तो वह मनुष्य शिव-
जीकोदेखेगा ॥ ३५३ ॥
शुद्धस्फटिकसंकाशंनानारूपधरहरम् ॥
षण्मासाभ्यासयोगेनभूचराणांपतिर्भवेत् ॥
वर्षद्वयेनतेनाथकर्ताहर्तास्वयंप्रभुः॥३५४॥
अर्थ-जिन शिवजीका रूप शुद्धस्फटिकके नुल्यहै
और जो नानारूषको धारतेहैं इस प्रकार छः महीने
यास करनेसे भूचरों (प्राणी) का राजा होताहै
और दो वर्ष अायास करनेसे कता हर्ता, स्वयंप्रभु
होजाताहै ॥.३५१ ॥
(९० शिवस्वरोदय । त्रिकालज्ञत्वमानोतिपरमानंदमेवच ॥ संतताभ्यासयोगेननास्तिकिंचित्सुदुर्लभम्३५५ अर्थ-और निरंतर आयास करनेसे भूत भविष्यद वर्तमान तीनों कालोंका ज्ञान और परम आनंदको पाप्त होताहै और उसको कोई वस्तु दुर्लभ नहीं होती ३५५ तद्रूपंकृष्णवर्णयःपश्यतिव्योग्निनिर्मले ॥ पण्मासान्मृत्युमाप्नोतिसयोगीनात्रसंशयः॥३५६ अर्थ-जिस योगीको निर्मल आकाशमें वह शिव- जीका रूप कृष्णवर्ण दीखे वह योगी छः महीनेसे मृत्युको प्राप्तहोगा इसमें संशय नहीं ॥ ३५६ ॥ पीतेव्याधिर्भयंरक्तेनीलेहानिविनिर्दिशेत् ॥ नानावणेथचेचस्मिनसिद्धश्चगीयतेमहान् ३५७ अर्थ-पीला दीखे तो व्याधि लाल दीखै तो भय नीला दीखे तो हानि होतीहै यदि उसमें नाना वर्ण दीखें वो योगी सिद्धियोंको प्राप्त होताहै ॥ ३५७ ॥ पदेगुल्फेचजठरेविनाशक्रमशोभवेत् ॥ विनश्यतोयदाबाहूस्वयंतुम्रियतेध्रुवम् ॥३५८॥ अर्थ-यदि छायामें पैर गुल्फ ( रकने) पेट-ये-न टीखें अथवा भुजा नदीखें तो निश्चयसे योगी मृत्युको प्राप्त होगा ॥ ३५८ ॥ वामबाहुस्तथाभार्यानश्यतेतिनसंशयः ।। दक्षिणेचनाझोहिमृत्युमाप्तंविनिर्दिशेत् ३५९॥
भाषाटीकासमेत (९१)
अर्थ-यदि वामभुजा न दीखै तो भार्या नष्ट होगी
इसमें संशय नहीं दक्षिण सुजा नदीखै तो बंधुओंका नाश
होगा और एक मासमें अपनी मृत्यु होगी.॥ ३५९ ॥
अशिरोमासमरणविनाजधेदिनाष्टकम् ॥
अष्टाभिःस्कंधनाशेनछायालोपनतत्क्षणात्३६०
अर्थ-शिर न दीखै तो मासभर-जंघा नदीखी तो
आठ दिनमें कंधे नदीखें तो आठ दिनमें-सर्वथा छाया
न दीखे तो उसी क्षणमें मृत्यु जाननी ॥ ३६० ॥
प्रातःपृष्ठगतेरवौचनिमिषाच्छायांगुलीश्चा-
धरंदृष्ट्वानमृतिस्त्वनंतरमहोच्छायांनरःप-
श्यति ॥ तत्कीसकरास्यपार्थहृदयाभा
वेक्षणार्धात्स्वयंदिङ्मूटोहिनर शिरोविगम
तोमासांस्तुषड्जीवति ॥ ३६१ ॥
अर्थ-जो प्रातःकालके समय सूर्यको पीठ की तरफ
करके छाया पुरुषके अंगुली और होठ नदीखें तो निमिष
मात्रमें और फिर छायाको और अपनेको न देखे
तो आधे निमिषमें मृत्यु होगी और छायाके कान,
कंधे, हाथ, मुख, पार्श्व, हृदय, नदीखें तो आधे क्षणमें
मृत्यु होगी और छाया पुरुषका शिरं नदीखे और स्वर
दिशाओंका ज्ञान न रहै तो मनुष्य छः महीने जीता।
एकादिषोडशाहानियदिभानुर्निरंतरम् ॥
वहेद्यस्यचवैमृत्युःशेषाहेनचमासिके ॥ ३६२॥
(९२) शिवस्वरोदय ।
अर्थ-जिस मनुष्यका एक एक दिनसे सोलह दिन
पर्यंत नियमसे सूर्य स्वरही चलता रहै उस मनुष्यकी
मृत्यु पंद्रह दिनके भीतर हो जायगी ॥ ३६२ ॥
संपूर्णवहतेसूर्यश्चंद्रमानवदृश्यते ॥
पक्षेणजायतेमृत्युकालज्ञानेनभाषितम्॥३६३॥
अर्थ-जिस मनुष्यका निरंतर सूर्य स्वरही बहता
रहै और चंद्र स्वर कभी भी नदीखै तो उस मनुष्यकी
मृत्यु पंद्रह दिनके भीतर हो जायगी ॥ ३६३ ॥
मूत्रपुरीषंवायुश्चसमकालंप्रवर्तते ॥
तदाऽसौचलितोज्ञेयोदशाहेम्रियतेध्रुवम्॥३६४॥
अर्थ-जिस मनुष्यके मूत्र-मल-वायु एक बार
निकसे उसको चला चली पर जाने वह दस दिनमें
अवश्य मर जावेगा ॥३६४॥
संपूर्णवहतेचंद्र-सूर्योनैवचदृश्यते ॥
मासेनजायतेमृत्युःकालज्ञेनानुभाषितम्॥३६५॥
अर्थ-जिस मनुष्यका बराबर चंद्रस्वर बहताहै और
सूर्य स्वर एक वारंभी न दीखै वह मनुष्य एक मासमें
मर जायगा वह कालके ज्ञानियोंने कहाहै ॥ ३६५ ॥
अरुंधतींध्रुवंचैव विष्णोस्त्रीणिपदानिच ॥
'आयुहीनानपश्यंतिचतुर्थमातृमंडलम् ॥३६६॥
अर्थ-अरुंधती-ध्रुव-विष्णुके तीन पद-चौथा
मातृ मंडल-इनको जो न देखे वह आयुसे हीन
समझने ॥ ३६६॥
भाषाटीकांसमेत । (९३) अरुंधतीभवेजिह्वाध्रुवानासाग्रमेवच ॥ भ्रुवौविष्णुपदंज्ञेयंतारकमातृमंडलम् ॥ ३६७॥ अर्थ-जिह्वाको अरुंधती नासिकाके. अग्रभागको ध्रुव भ्रुकुटियोंको विष्णुपद और तारकाओंको मातृ- मंडल कहतेहैं ॥ ३६७ ॥ नवध्रुवंसप्तपोषपंचतारांविनासिकाम् ॥ जिह्वामेकदिनप्रोक्तंम्रियतेमानवोध्रुवम् ॥३६८॥ अर्थ-जो भुकटी नदीखें तो ९ दिनमें कानोंका शब्द न सुने तो सात दिनमें तारा न दीखै तो पांच दिनमें नासिका न दीखै तो तीन दिनमें जिह्वा न दीखै तो मनु- ज्यका निश्चयसे मरण कहाहै ॥ ३६८ ॥ कोणावक्ष्णोरंगुलिभ्याकिंचित्पीड्यनिरीक्षयेत् ॥ यदानदृश्यतेविदुर्दशाहेनभवेन्मृतः॥३६९॥ अर्थ-नेत्रोंके कोनोंको अंगुलियोंसे कुछ दबा कर देखे यदि दबानेसे जलकी बिंदु न निकले तो जानलो कि दस दिनमें मरजायगा ॥ ३६९ ॥ तीर्थस्नानेनदानेनतपसासुकृतेनच ॥ अपैर्ध्यानेनयोगेनजायतेकालवंचना ॥३७॥ अर्थ-जो बीर्थोंके स्नान-दान-तप-मुकत-जप- ध्यान योग इनसे कालकी चूचना हो जातीहै अदि आयाहुआभी काल टल जाताहै ॥ ३७० ॥ शरीरंनाशयंत्येतेदोषाधातुमलास्तथा ॥ - (९४) शिवस्वरोदय । समस्तुवायुर्विज्ञेयोबलतेजोविवर्द्धनः ॥ ३७१ ॥ अर्थ-धातु-और मल आदि ये दोष शरीरको नष्ट कर देते हैं और वायुकी समानता बल और तेज बढा- नेबाली होतीहै ॥ ३७१। रक्षणीयस्ततोदेहोयतोधर्मादिसाधनम् ॥ योगाभ्यासत्वमायांतिसाधिजप्यास्तुसाध्यताम्॥ असाध्याजीवितंनंतिनतत्रास्तिप्रतिक्रिया३७२।। अर्थ-इससे उस देहकी रक्षा करनी जो धर्म आदिका साधनहै-योगाभ्यास ही जपरूप हो जाताहै और योमसे असाध्य साध्य हो जाताहै-जो योगाभ्यास न होय तो असाध्य मरजातेहैं उनका कोई प्रतीकार (इलाज ) अन्य नहीं । ३७२ ॥ येषांहदिस्फुरतिशाश्वतमद्वितीयं तेजस्तमोनिवहनाशकरंरहस्यम् ॥ तेषामखंडशशिरम्यमकांतिभाजां स्वप्रेऽपिनोभवतिकालभयनराणाम् ॥ ३७३ ॥ अर्थ-जिन मनुष्योंके हृदयमें अनादि, अद्वितीय, अंधकारके समूहका नाश करनेवाला और गोपनीय तेज (शिवस्वरोदयका ज्ञान ) फुरताहै अखंड चंद्रमाके समान रमणीयहै कांति जिनकी ऐसे उन मनुष्योंको स्वममें भी कालका भय नहीं होता ॥,३७३ ॥
मापाटीकासमेत।
(९५)
इडागंगेतिविज्ञेयापिंगलापमुनानदी ॥
मध्येसरस्वतींविद्यात्त्रयागादिसमस्तथा ॥३७४
अर्थ-इडा नाडी गंगा और पिंगला नाडी यमुना
नदी जाननी और मध्यकी सुषुम्ना (सरस्वती)-इन
तीन नाडीके संगमको प्रयागके समान समझना ३७४
आदौसाधनमाख्यातंसद्यःप्रत्ययकारकम् ॥
बद्धपद्मासनोयोगीबंधयेदुड्डियानकम् ॥३७५ ॥
अर्थ-प्रथम साधनकोही शीघ्र प्रतीति का कारण
कहाहै-इससे योगी पनासनको बांध कर उड्डियानक
नाम आसनको बांधै अर्थात् अपानकी गतिको
ऊपर करके नाभिरंध्रके समीप लावे ॥ ३७५ ॥
पूरक कुंभकश्चैवरेचकश्चतृतीयकः॥
ज्ञातव्योयोगिभिनित्यंदेहसंयुद्धिहतवे॥३७६॥
अर्थ-योगी जन अपने देह की भली प्रकार शुद्धिके
लिये पूरक-कुंभक-रेचक-इनतीनों प्राणायामोंको जाने
पूरक कुरुतेवृष्टिधातुसाम्यंतथैवच ॥
कुंभकेस्तंभनंकुर्याज्जीवरक्षाविवर्द्धनम् ॥३७७१
अर्थ-उनतीनोंमें पूरक प्राणायाम ( बाहरकी
वायुको भीतर खींचना) वृष्टिसे देहको सींचता है और
संपूर्ण धातुओंको समान करताहै-और कुंभक प्राणायाम
(बाहरभीतरकी वायुको स्थिर रखना ) देहकी धातु
ओंका स्तंभन (जहांकी तहां रखना) करताहै और
जीव की रक्षा को बढताहै ॥ ३७७ ॥
(९६) शिवस्वरोदय । रेचकोहरतेपापंकुर्यायोगपदंब्रजेत् ॥ पश्चात्संग्रामवत्तिष्ठेल्लयबंधचकारयेत् ॥३७८॥ अर्थ-रेचक प्राणायाम (भीतरकी वायु बाहर निकालना ) पापको हरताहै इस प्रकार जो प्राणायाम करताहै वह योग पदको प्राप्त होताहै-फिर जो योगी समान रूपसे टिकताहै वह लय बंधको करा सकताहै अर्थात् मृत्यु को रोक सकताहै ॥ ३७८ ॥ कुंभयेत्सहजवायुयथाशक्तिप्रकल्पयेत् ॥ रेचयेचंद्रमार्गेणसूर्येणापूरयेत्सुधोः ॥३७९ ॥ अर्थ-स्वाभाविक वायुको अपनी शक्तिके अनुसार कुंभक प्राणायामसे रोके चंद्रस्वरसे रेचक करै और सूर्य स्वरसे पूरक प्राणायामको बुद्धिमान मनुष्य करै॥ चंद्रपिबतिसूर्यश्चसूर्यपिबतिचंद्रमाः॥ अन्योन्यकालभावेनजीवेदाचंद्रतारकम्।।३८०॥ अर्थ-जिसके चंद्र स्वरको सूर्य स्वर और सूर्य स्वरको चंद्र स्वर परस्पर समय २ पर पीवें वह चंद्रमा और वारों की स्थिति पर्यंत जीवेगा.॥ ३८० ॥ स्वोयांगेवहतेनाडीतन्नाडीरोधनंकुरु॥ मुखबंधममुंचन्वैपवनंजायतेयुवा ॥३८२ ॥ अर्थ-जो योगी अपने अंगमें जो नाडी वहती होय उसको रोक कर और अपने मुखको बांध कर मुखसे
भाषाटीकासमेत।
(१७)
पवनको न निकसने दे वह योगी वृद्ध अवस्थासे युवा
अवस्थाको प्राप्त होताहैगा ३८५ ॥
मुखनासाक्षिकर्णातानंगुलीभिनिरोधयेत् ॥
तत्त्वोदयमितिज्ञेयंषण्मुखीकरणंप्रियम् ॥३८२॥
अर्थ-मुख-नासिका नेत्र-कान-इनको अपनी
अंगुलियोंसे रोके इसी को तत्वोदय षण्मुखीकरण और
प्रिय जानना ॥ ३८२॥
तस्यरूपंगतिःस्वादोमंडलंलक्षणंत्विदम् ।।
सवेत्तिमानवोलोकेसंसर्गादपिमार्गवित् ॥३८३॥
अर्थ-उसका रूप यह है कि वह योगी तत्वोंका रूप
गति स्वाद मंडल लक्षण-इन सबको जगत्में जानताहै
और तत्वोंके हेलमेलमेंभी पृथक् २ मार्गको जान
सकताहै ॥ ३८३ ॥
निराशोनिष्कलोयोगीनकिचिदपिचिंतयेत् ।।
वासनामुन्मनांकृत्वाकालंजयतिलीलया॥३८॥
अर्थ-आशा रहित और शुद्ध रूप योगी किसी
वस्तुकी चिंता न करै और वासनाओंके त्यागसे लीला
(अनायास ) से कालको जीतताहै ॥ ३८४ ॥
विश्वस्यवेदिकाशक्तिर्नेत्राभ्यांपरिदृश्यते ॥
तत्रस्थंतुमनोयस्ययाममात्रभवेदिह ॥३८५॥
अर्थ-सर्व विश्वके जाननेकी शक्ति नेत्रोंसे दीखते
हैं उस शक्तिके विषय जिस.योगीका मन एक-ग्रह
मात्र टिके ॥ ३८५॥
शिवस्वरोदय।
तस्थायुवतेनित्यंघटिकात्रयमानतः॥
शिवारातंत्रंसिद्धस्यगुणगहरे॥ ३८६॥
अर्थ-उस योगीकी अवस्था प्रति दिन तीन२ घटि
काके प्रमाण बढतीहै-यह बात यमगुणवान् मिट्टोंके
समूहमें शिवजीने तंत्र शास्त्र में कहीहै ॥ ३८६ ॥
बद्धपद्मासनस्थागुदगतपवनंसनिरुद्धयामु
मुच्चस्तंतल्यापानरंध्रक्रमजितमनिलंप्राण-
शत्त पनिरुद्धय ॥ एकीभूतंसुषुम्नाविवर-
मुपगतंब्रह्मरंध्रेचनीत्वानिक्षिप्याकाशमार्गे-
शिवचरणरतायांतितेकेऽपिधन्याः ॥ ३८७ ॥
अर्थ-योगी पद्मासनको बांधकर गुदामें स्थित
पवन (अपान ) को रोक कर उसको ऊंचेको लेजाय
और अपान रंधर्म जीवे ( स्थिर) हुये उसको प्राण
शक्तिके संग रोक कर दोनों की एकता करै जब वे दोनों
एक हो जाय और सुषुम्ना नाडीके रंध्रमें पहुंचावे फिर
ब्रह्मरंध्रमें लेजाकर आकाश मार्गमें छोडदे-इस प्रकार
शिवजीके चरणों में रत जो कोई योगी जातेहैं (मरतेहैं)
वे धन्यहैं ।। ३८७ ॥
एतब्नानातियोयोगीएतत्पठतिनित्यशः॥
सर्वदुःखविनिर्मुक्तोलभतेवांछितफलम् ॥३८८॥
अर्थ-जो योगी इसको जानताहै और नित्य पढ-
ताहै संपूर्ण दुःखोंसे रहित वह योगी वांछित फलको
प्राप्त होताहै ॥ ३८८ ॥
भाषाटीकासमन ।
(९९)
स्वरज्ञाननरेयत्रलक्ष्मी पादतलेभवेत् ॥
सर्वत्रचशरीरेऽपिसुखंतस्यसदाभवेत् ॥३८९ ॥
अर्थ-जिस मनुष्यको स्वरका ज्ञानहै उसके चर-
जाँकेनीचे लक्ष्मीह और उसके शरीरमें और जहां वह
जाय वहां सुख उसको होताहै ॥ ३८९ ॥
प्रणवःसर्ववेदानांब्रह्मणोभास्करोयथा ॥
मृत्युलोकेतथापूज्यास्वरज्ञानीपुमानपि॥३९॥
अर्थ-संपूर्ण वेदोंमें जैसे ओंकार और ब्राह्मणों को
जैसा सूर्य पूज्यहैं इस प्रकार इस मृत्यु लोक में स्वर-
ज्ञानी पुरुषती पूज्यहै ॥ ३९० ॥
नाडीत्रयविजानातितत्त्वज्ञानंतथैवच ॥
नैवतेनभवेत्तुल्यंलक्षकोटिरसायनम् ॥३९१ ॥
अर्थ-जो मनुष्य पूर्वोक्त तीनों नाडियोंको जानताहै
और जिसको तत्वका ज्ञान है उसकी तुल्य लक्ष्य
कोटि रसायन नहीं हैं ॥ ३९१ ॥
एकाक्षरप्रदातारंनाडीभेदविवेचकम् ॥
पृथिव्यांनास्तितद्रव्यंयहत्त्वाचानृणोभवेत्३९२
अर्थ-नाडी प्रेक्षका विवेचन करने वाला जो एक
अक्षरजी देदे -पृथिवीमें वह द्रव्य नहीं है जिसको
देकर अनृणी हो जाय अर्थात् उसका बदला दैसके ।
स्वरस्तत्वंतथायुद्धदेविवश्यस्त्रियस्तथा।
गर्भाधानचरोगश्चकलानैवमुच्यते ॥३९३ ॥