The Asiatic Society, Kolkata

Satsai Of Tulsidas

Chaube, Viharilal, Ed. · 2006/04/29

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121 (7) तस्थ (य) के स्थान में चवर्गीय (ज) दिया गया है जैसे ए• सन्जोगाऽऽदि । जहा मोकार लघु पहा गया है वहां लिखा गया । जैसे ११३ एड में (राम सो)। जहां केवल ब है वहां उ पहा गया है क्योंकि-वडतेरे विद्वानों का मत है कि तुलसौ-दास जौ उकार'को विशेष काम में लाते थे और यह मौठा भौ सन पड़ता है जैसे वें एड में तुलसौ-दास के स्थान में दास है। जहां एकार कख पा जाता है वहां उसका था कार उलट दिया गया है जैसे १०३ एठ में । इसी प्रकार कई एक चिह है जिनका सात धागे दिखलाया है। पटना कौलेज बांकीपुर। ना१नवम्बर १८८६ बिहारी लाल चौवे. अक्षरों के बदलने का कारण ॥ भाषा को कविता में प्रायः दीर्घ अक्षर और मात्रा ख पड़े जाते परन्तु उनके लिखने का और छापने का कोई उपाय नियत न था। श्रीमान् डाकर ग्रियरसन और डा. हार्नलौ महाशयों को सूचना पर वंगाल रसियाटिक सोसाईटौ को भाषा पुस्तकों में नीचे लिखे (टाइप्) दीर्घ धादि के इस लिखने के लिये इस पुस्तक में लिये गये हैं। खरवर्ण । इनके स्थान में। ये लिये गये हैं एछ। उदाहरणा SS यो रामसो ... ११ ... प्रक ए (उलटा) ₹ (उलटा), ... () (') SM0019309 15985 ( 8 ) ध्यान भी जैसे साधारण लोगों के मुख से उच्चारित होते है वैसे लिखे गये हैं। इनके स्थान में। ये लिखे गये। एछ। . उदाहरण । खौराम श स. ... १ समस्त पद १ जन-मनन ग न... ... २ निरवान सज्जोगादि य ... ... १० ... प्रतच्छ घ-श... ख-श १३ भूखन ग्य... ... क ... क्रि... १५ २१ ६ ऋ रि ... ... ग्यान क्रिपान रिपुपति द्रिय ग्रिह दिग नि ६५ पर ग्रि ... ११८ ह दि १२२ इत्यादि तुलसौ-सतसई का सूचीपत्र । प्रथम सर्ग ३ ... ... ४ ... ... दी। को सङ्ख्या। विषय । पृष्ठ मधा। १से रवक, (मङ्गलाचरण) रामबन्दना ... राम को जाननेवाला मोक्षरूप है राम कामनाहौन हैं... ... ५ विराटरूप राम हैं.. ई राम पिता और सौता मा हैं... ७ से प्तक, राम-भक्त को दुःख नहीं होता न वे घर छोड़ कहीं जाते 8 सौता-राम अज्ञानी भक्त को रक्षा करते हैं १० 'सौता बुद्धि और राम विवेक हैं... बैनों देवमय राम की दया से ग्रस्थ बनता है ५ १२ राम और सूर्य आदि का रूपक... ५ १३ राम सम और कोई गुरु नहीं है ५ *१४ मे, सब पापों के हारी राम इस नाम का अर्थ ... है १६ तक राम-भजन बिना मुक्ति असम्भव... २१ सतसई (ग्रन्य) बनाने का सम्बत् और दिन बादि ... २२ सतसई में वर्णित विषय २३ गुरु से पाने पर इस का पूरा ज्ञान होगा २४ पाठों गणों के नाम यादि २५ से। २६ तक गुरु लधु पाल्ने आदि का विचार उदाहरण और राम आदि के गणों का विचार ११ ... ... ... ... ... . ... ० 1 (2) [प्रथम सर्ग विषय। ४ सजा। ... स . १२ ... ... ... ... १७ ... १५ दोराबी सला। राम नाम का सहसनाम तुल्य होना और चारो प्रकार के नायकों की सूचना... जीभ आदि का रूप और रस को सूचना ३० मुख और कमल का रूपक काव्य और केश आदि का रूपक ३२ रामयण और स्त्रीमुख अादि का रूपक... रामयश और कवि को उक्ति का रूपक... रामभजन बिन दोनों लोक नए २५ तुलसी रामभजन न छोड़ेंगे बिना भजन सब साधन व्यर्थ राम-भक्ति बिना मुक्ति असम्भव राम नाम और विद्याधों का रूपक राम नाम बिना सब मनोरथ झठा रामचरित और वाग का रूपक 88 राम-भजन से दोनों लोक सिद्ध ४२ साधुखभाव लक्षण ४३ राममहिमा अपूर्व 88 राम और काम दोनों विरुद्ध ४५ राम के न रहने से माया प्रबल राम-भजन में समय वितायो ७ रामभक्ति सब से अधिक चतुरता रामप्रेम बिना चतुरता व्यर्थ •४९ प्रेम और शरीर का रूपक राम और रक्ष यादि का रूपक ... ३१ राममुखचन्द्र और भक्तनेत्रचकोर . ... . ... ... ... ... १६ १७ १० 83 १९ . . ... ... ... :

प्रथम सर्म।] कीमा ४ सधा ५३ विषय। अम्मत और रामयद का रूपक भक्त दास होना कठिन रामभक्ति और भौति की भलाई अपराधों को क्षमा और सन्तोष सेवा की उत्तमता ५8 ... ... २९ ... ... २२ सब बाधक 32 ... ... ... २९ २४ २४ ... ... ... रामकृपा से कामना नाश २२ राम से प्रेम उचित ... २२ प्रेम बिना सब उपाय व्यर्थ ... २३ राम बिना सुख व्यर्थ... ... ६२ राम बिना सब खार्थों है ... ... राम भक्त का आदर करते हैं.. राम बिना मछलौ सौ दशा राम के भरोसे पाप अनुचित ... ... २४ सुलसी को रामही को आश ... ... ७ सब प्रकार राम से प्रेम उचित... ... ई० राम बिना बड़ा हित कोई नहीं ... २५ अपनी कुपुत्र से उपमा २५ ७. *से। राम को दया होने से कोई कुछ नहीं कर सकता... २६ ०२ तक) राम कृपा से सब भले होते है... २६ यहां से चातक और भक्त को और मेध तथा राम को। २१ उपमा दे कर इसके पूर्व प्रेम का वर्णन है। एक सौ एक १०७ सात के दोहे में राम को खातीजल और अपने को २६ चातक बनाया है ... ... २५ ...

( 4 ) [द्वितीय सर्ग। दो की मया। विषय। पृष्ठ सखा। मनहौं में घनश्याम राम हैं चातक के समान दूसरी ठौर खोजना न पड़ेगा ३६ भक्ति जल और मन मौन का रूपक कविको प्रोपोक्ति से रामराग और म्हगमन का रूपक ॥०॥ इति प्रथम सर्ग ॥०॥ &ܘܨ ... ६४१ से 588 से २४७ तक ... ४७ ४७ अथ द्वितीय मर्ग १ से। नाम माहात्म्य और रामप्रेम वर्णन ६३८ से १२तक (४१ तक १३ से) सन्तोष बादि के विषय में सामयिक उपदेश २३तक २४४ तक २४ से अब का उदाहरण दिखा कर राम की ३०तक स्थापकता वर्णन ३१ राम परब्रह्म रूप है परमेश्वर पालक है दुःख अपने कम्मे से मिलता साधु और कमल का रूपक... ३४ से। तीनों गुणों को दिखाकर राम इस नाम में ३ गुण और ४१ तक देवता का होना और इस के अक्षरों का अर्थ राम नाम में राम के भाइयों का रूप १५ तक ४६ पूर्व कर्मम के अनुसार जनों का धनादि पाना ४७ से । मयूर, कोकिल विलार का उदाहरण ५२ तक दिखाकर खभाव का दृष्करना ५४ होनहार का खभाव ही से होना ५४ ५४ यात्मा सुखरूप है १५से । खाभाविक बार्ता ५५ पु. तक ४६ ... ... ५२ ... . ... ...

द्वितीय सर्ग। ( 5 ) दोहों की सया। विषय। पृष्ठ सहा ५६ ... ... ... ... ... १७ .. राम का सब धर्ममय होना ... ५८ से । राम को व्यापकता. है. तक राम, सन्त और परमात्मा एक हैं ६२ मे १ जीव का लक्षण और काम (५ तक ६६ तीन प्रकार का देह राम और साधु का सम्बन्ध ६ साधुजन सेव्य ६९ से। ... ५७,५८ ... ५ ... ... ५६ ५६ ... ७० तक साधु पहिचान ... गुरू का अभेद ६० ६० ६० (६० से ६१ तक ... ... ७६ ... ... . यात्मा २ तक राम कृया से राम जाने जाते हैं ७२ और दुःख छूटने का उपाय 886 गुर और राम सीता और बुद्धि आदि का रूपक यही भक्ति आदि है जहां से जो आया वहां हो जायगा ८० से। और जल का रूपक... ८३ गुणों के कारण आत्मा का भेद ८४ से । जल और अग्नि के समान आत्मा का विकार और ५ तक खभाव का वदलना गुरु और दीप का रूपक ... सत्सङ्ग से। जल का मैला होना और नीचे जाना पडतक जो जैसा करता वैसा ही भोगता है ६१ रावन अपने कर्म से मरा ६४ ६४ 18 सन्त ६५ .

( 6 ) [रतीय सर्ग। ४ मधा। ... ... दीको सज़ा। राम भजन यात्मा का जड़हो के दुखपाना १४ • गुरू उपदेश से लोशनाश ६५ देह का बनना इस का अन्त होना... राम को जानने से परमपद पाना राम भजन से दुःखनाश विषय रूपौ मद से जीव का मतवाला होकर संसार में फंसना ... ६७ ६८ ... ... अद्धत मत ... २०१ विषय से टप्ति नहीं होती Ce क्रोधादि पाप मूल ... te दयाहौन गन्धहीन फूल के समान है इति द्वितीय सर्ग। .... अथ हतीय सर्ग। रसे ५३ तक, राम नाम की महिमा और भगन का उपदेश ८३ तक ८३ 28,8५ ... ... ५४ तामस त्याग ५५से पूजतक, राम नाम सरण ५६से ६०तक, प्रश्नोत्तर व राम को पहचानना दरसे तक, प्रश्नोत्तर दपसेर तक, राम भजन E५, ... ... L चतुर्ष सर्ग।] ( 7 ) विषय ... ... ... ... ... :.: :: - ... रोगको सधा। से तक, प्रश्नोत्तर राम नाम... ७३ सामयिक चार अर्थ ७४ मन को ज्ञान होने बिना दुख क्रोधादि त्याग असंतोष से नरक ७७ से ८०तक, गनशुभाऽशुभविचार सेवक, रामचन्द्र का टालना १०२ ... ... ... १०० ... ... राम प्रेम ... ... न्यूसेहतक, सामयिक वार्ता यादि ७८ से। काव्य और ग्रन्थ प्रसंशा आदि विषय १०१तक इति हतीय सर्ग। (१०६ से १९९५ तक . عمر २ ... ... ५ अथ चतुर्थ सर्ग। राम के बिना १४ विद्या जानना ध्यर्थ विना ज्ञान के जप तप व्यर्थ भक्ति वा ज्ञान विना पाक्ना व्यर्थ ११८ केवल बात से अज्ञान नहीं जाता सब कुछ निकट है यज्ञान के कारण नहीं देख पड़ता भक्ति वा ज्ञान विना अध्ययन व्यर्थ शब्द ब्रह्म को न जानने से सब का भ्रम में पड़ना.. शब्द ३ प्रकार का विधि, निषेध और मिश्रित । इनमें नम १२१ विना गुरु शब्दज्ञान असम्भव १२९ भम का कारण, चविचार १२२ : ६ .. ... G . ... ...

... ... ... ... १२७ ... ... ... १२६ ( 8 ) [चतुर्थ सर्ग। दोन को सङ्ख्या। विषया पृष्ठ समा। बिना गुरु ज्ञान असम्भव १२३ १२ इस भ्रम को साधु जानते हैं १२४ १३ शब्दज्ञान के बिना सुख दुःख का होना ... १२० १४ से । कम्म सिद्धान्त । कर्ता हो कर भी ईश्वर दोषी नहीं १६ तक) क्योंकि जीव अज्ञानवश कर्म करता और भोगता है १२५ दो अर्थ । १ शब्द-भ्रम । २ ब्रह्मज्ञान १२६ १७ शब्द समुद्र साधु सङ्ग से ज्ञातव्य १२७ बहुतेरे पढ़ते २ मर बिलाये भुक्ति न मिलो २० श्रवण और नयन का परस्पर विरोध १२ २१ शब्द के तीन भेद १२६ २२ सृष्टि विरोध यादि ... २३ चर जीवों के पांच भेद १३० २४ जीवों का आपस में विरोध २५ विराट् (परमेश्वर) में सब का रहना ... ... १३१ वेद के अनुसार सब विराट रूप २७ मात्मा को पहचानने में भ्रम कहने मुनने में भ्रम ... १३२ २६ मनुष्य गटष्णा में भ्रमते हैं १३३ इसके भ्रम पर सूगे का दृशान्त ... ३१ देख कर भी असत्य न समझना १३४ भ्रम के कारण हिता-ऽहित न बूझना १३५ अज्ञान के कारण भटकना ई विना राम कामना और विना कामना दुःख नहौं कूटता १३६ मिथ्या शिक्षित बालक के समान जीव भ्रम में रहते है लड़के के समान असम्भव काम करते हैं... ... ... ... . .. ... १३१ ... ... ... ... ... .

चतुर्थ सर्ग] ( 9 ) ३६ Be . ४३ ४४ ४६ ... ... ४७ वही बात विषय। पृष्ठमधा। अहिंसा को प्रसंशा बदेत मत। मिथ्या वृक्ष और जगत का रूपक । ब्रह्मसे होना १४ देवता और सौनकादि ऋषियों का भी इस रक्ष के अधीन रहना जो जन्मा सो जाल में फस दुःखी हुया १. कम्म के फल अनेक है पाते एक भी नहीं १४. जौव मगटष्णा में प्रसन्न रहते हैं ... ... १४१ अन्धपरम्परावत् यह बात चली जाती है... १४१ यह जगत् भेड़ के समान है १४२ पाथर्य और असम्भव १४२ जो न बूझे उसे क्या बुझाना १४२ ... १४३ ऊपर के कथन का निचोड़ अपने शरीर-ही में राम हैं १४१ अगोचर का मिलना असम्भव १४० मिथ्या उपासकों को निन्दा १४४ जैसे गुर वैसे चेला करें नरक में ठेलमठेला १४५ मिथ्या उपासकों की निन्दा १४५ दो अर्थ। उसी बात का उदाहरण १४५ सिद्धान्त । ऊपर के कई एक दोहों का निचोड़ इस ग्रन्थ में आत्मज्ञान कहा है जिस का होना राम के चाधीन है १४४ (तोष को प्रसंशा) राम और तोष एक ... १.४७ सन्तोष सब धनों से उत्तम ... जौष को मूर्खता १४ जगत को असत्यता ४ ४९ ... ... ५० ५१ ५२ ... ५४ ५५ ... १४६ .. ... ५६. ... 2 ( 10 ) चितुर्थ सर्ग। ... ... ... ... दोहों को सला। विषय। पृष्ठमधा। उसी का दृष्टान्त १५० भक्ति विना तीर्थादि भ्रमण व्यर्थ वर्य और ज्ञान की एकता १५१ ११ जीब के अपने कर्ता को भूलने पर दृष्टान्त -१५२ १७ की सिद्धान्त (कम्म ही प्रधान) १५२ ६५ गुरु उपदेश के विना भ्रम ... उसी बात का दृष्टान्त १५ तही बात । गदहे का दृष्टान्त . १५३ (८ वही बात । कुत्ते का दृष्टान्त असम्भव की इच्छा १५५ व्यर्थ परिश्रम १५५ ०१ से विषयो पण्डित और वैरागी का वर्णन दृष्टान्त के साथ १५६ से ७५ तक •२१५८ तक অন্ধৰ জী মুহী রূা জাযা বিন্দু १५८ अक्षर-ही के योग से जग हुया ऐन गैन के दृष्टान्त से शरीर और आत्मा का भेद... १५६ वही विषय... केवल पाठ पूजा से क्या लाभ ... १ गुरु उपदेश से विषय-टष्णा नाश २ विषय चाह को बुराई बेपरिमाण संसार और शरीर का रूपक... विषय-वासना छूटने का उपाय ५ विषय-रोग दूर होता वा नहीं इसकी परीक्षा शरीर-कान्ति का घटना बना... ... १४४ सत्सङ्ग और शुक्ल कृष्ण पक्ष को उपमा ... १८० . ... ... ७६ ... ... ... ४. . ...

पञ्चम सर्ग। [ 11 ) विषय। पृष्ठ सखा ... ... ... दोनों की सया। प्रयाग और सत्मा का रूपक ९ वही विषय... सज्जन समाज और राम का रूपक क्षमा और काशी का रूपक... क्षमा की प्रसंशा ६३ असा पक्ष और काशी का रूपक ६४ समय जाने पर फिर नहीं पाता ... ... ... ६५ वर्तमान काल ... ९६ ... ... ... मन और मान-सरोवर का रूपक काव्य के गुण आदि विषयों का वर्णण १८ सतसई और तालाव का रूपक मान-सरोवर और मन आदि का रूपक ... दैत मत का नाश १७१ कविता और गङ्गा का रूपक ... १७१ श्रोताओं के ३ प्रकार... १७२ सरय और कविता यादि का रूपक १७२ सरयू और कविता के रूपक द्वारा चारी पदार्थों का लाभ १७३ इति चतुर्थ सर्ग। १०१ १०२ १०३ १ अथ पञ्चम मर्ग। दो अर्थ । १ बर्थ विष्णु का राम हो कर अवतार होना । २ मनुष्य-शरीर को प्रसंशा ज्ञान-रूप राम है २ १०७ ( 12 ) [पक्षम सर्ग। . चुम्बक ... ... ... होती वी साधा। विषय। पृष्ठ समा। ३ प्रथम अर्थ । जन के समान जीव का संसार मे खाना और साधुओं की कृपा से सूर्य-रूप ब्रह्म में मिलना द्वितीयार्थ। मनुष्य-शरीर की प्रशंसा १७८ वात्मा का अविनाशी रह कर न घटना न बना ५ परमेश्वर और भक्तों के विषय में और लोहे का दृष्टान्त.. १७८ ६ जगत की उत्पत्ति के विषय में सूर्य का दृशान्त और की कृपा से परम पद मिलना ... १६. प्रत्यक्ष की सरलता और मुक्ति को कठिनता १८० जल और जीव तथा सूर्य और ब्रह्म का दृष्टान्त १८१ कर्म खभाव हौ से जीव के साथ रहता है १२ पृथ्वी में बीज की नाई जौव राम में लय होने पर भी आपस में नहीं मिलता १. दर्पण के दृष्टान्त से ब्रह्म को निर्दोषता. १८३ १२ कर्म का अनाश १८३ अल तरण के समान कर्म को द्धि १८४ २० शुभाशुभ के नाश से ब्रह्म खरूप होना १८४ १५ भक्ति के द्वारा शुभाशुभ का त्याग १८५ सौता और चन्द्रमा तथा राम और सूर्य का रूपक १८५ साधुओं की भक्ति में सौता के सदृश्य राम का प्रेम ११ अमि-योग से सोने के समान भक्ति-योग से साधुओं का निर्मल होना... जौ का जान बूझ कर कर्म को जाल में पड़ना ... १८७ कर्म के विषय में मकरी को जाल का दृष्टान्त १७ सत्सङ्ग के द्वारा जीवों का खाभाविक कर्म से मुक्त होना ... ... ... १६ C २१ पक्षम सर्ग] ( 13 ) विषय। . . ... ... दोसीको मजा। पृष्ठ समा। सूक्ष्म-शरीर का गुण स्थूल-शरीर मे पाया जाना २२ सूर्य मे जल के समान जीवों का ईश्वर से प्रगट होना और उसी में लय होना मिलने के समय जल के समान नौवों का अदृश्य होना १६० २५ नीतिहीन जीवों का दुःख में पड़ना पथा और पथिक के समान जौवों का सुख दुःख में अपने से गिरना ... १६१ सौताराम की कृपा के विना जौवों का सदा दुःखी वना रहना १६२ बुद्धि-रूपी सौता और भक्ति के कारण सन्तों का दुःखी न होना १६२ चन्द्रमा के समान बुद्धि-रूपो सौता को ग्रहण न करने से दुःखी होना ३.से । चकना चकई और कमल के समान विषयौ जनों का १तक सीता-जी को दुःखदाई जानमा १८० ३२ सर्व सुखदाई जल से जवासा गल जाता है उसी प्रकार विषयौ लोग भक्ति को दुःखदाई समझते हैं १६५ सौता-रूपी भक्ति और साधुओं की महिमा चन्द्रमा के तुल्य सुखदायी है ३४से औराम-रूप ज्ञान और सौता-रूपी भक्ति को समानता सूर्य और चन्द्र से सूर्य के द्वारा जल का अद्भुत रूप और पृथ्वी के विषय के सिद्धान्त विना गुरु के उपदेश नहीं ज्ञात होते ज्ञान को बड़े लोश से सिद्ध होने वाला दिखा कर भक्ति की सुगमता और प्रशंसा २०० ... ... १५तक ... - ( 14 ) [पञ्चम सर्ग ... ... . ... दोही की सधा। विषय। पृष्ठ सखा। २८ सत्सङ्गति द्वारा राम का मिलना २०२ रावण और विभौषण के उदाहरण से सेवक पद सुखदाई और सेव्य पद दुःखदाई... २०२ सूर्य और चन्द्रमा गर्म और ठंछे के कारण है २०३ ४१ रूप रहित होने पर भी शौत और उष्ण का नाम पड़ना २०२ ४२ काम्मत का गुण वर्णन २०४ 88 गन्ध शीत और उष्णता तौनो वस्तुओं का एथ्वी जल और अमि में पाया जाना २०५ गन्ध मौत और उषाता में चैतन्यता का ईश्वर से आना ४५ सद्गुरु की दया से ज्ञान पा कर जन का तौनो काल में समर्थ बना रहना 84 कोइल के बच्चे के उदाहण से जीवों का ईश्वर में मिलना ... २०७ ' सांसारिक पदार्थो के त्याग से मनुष्य में समता और विवेक माना २०७ विषय सुख को दुःखदाई जानने पर भी मन का इठ कर उसी के पीछे दौड़ना २.८ 88 खारथ के ज्ञान होने का उपाय २०६ उख और ई के दृष्टान्त से ईश्वर भजन और सत्कर्म के विना सुख का न मिलना २१० ५१ सुख दुःख का कारण मनुष्य आप ही है... पुर विना कर्ता के कर्म का न होना और गुरु के उपदेश के विना दुःख का निरत्ति न होना २११ कर्ता कारण और कार्य के सिद्ध होने पर भी विष- यासक्त हो कर कर्ता हौ का लोप करना २९२ ... ...

पञ्चम सर्ग] ( 16 ) ... ... ... ... ... : : ... दोनों को सङ्ख्या। विषय। पृष्ठ समा। ५४ जल और वायु के उदाहरण से मनुष्य का अपने को शुभाशुभ कर्म का कर्ता मान कर पाप का भागी होगा २१२ श्रीरामचन्द्र-जी को श्रेष्ठता कर्ता और कारण दो ही मुख्य है कर्म का आप-ही (खभावही से) उत्पन्न होना २९५ सब जीवों को अपने समान समझना, ममता का त्याग ५६-६० सव को सुहृद जानना विरोध त्याग २१४ पाँचो तत्वों से संसार और शरीर का बनगा ६२ गुरु को सेवा से ज्ञान होना २९७ ६३ नित्य और अग्त्यि की समानता २९६ ८४ ज्ञान के विना जीवों का दुःख सहना २२० ६५ चम से निज कर्म के फेर में पड़ना २२० कर्म की घटना समझ कर कर्म करना २२१ 0 सूर्य और चन्द्रमा के उदाहरण से दुर जनों की संगति से साधुओं का दुःख पाना २२२ माता पिता से पुत्र के समान ब्रह्म और माया से जीव का उत्पन्न होना २२३ द जीव का सर्व-रूप हो कर भी सब से अलग रहना... २२४ सोने के उदाहरण से जीवात्मा का सब स्थान में रह कर भी सब से अलग रहने का दृष्टान्त २२४ खात्मा का एक हो कर भी अनेक होना २२५ सोने के उदाहरण से (अर्थात् सोना सब भूषणों को जड़ है) केवल एक परमात्मा का सब पदार्थों का मूल होना . ... ... ..

( 16 ) [पश्चम वर्ग। ... ... ... ... १२३३ ... दौसी की सजा। विषय। पृष्ठ सया। ७३ भूषणों की नाई उपाधि के अनुसार बात्मा के गुण रूप धादि का बदलना २२. सोने के सदृश यात्मा के रूप का सर्वदा स्थिर और एक रस रहना .२२७ ७५ विचार कर अपना ईसुदेव करना २२८ श्रीरामचन्द्र-जी की भक्ति से मोक्ष पाना २२९ ज्ञान से भक्ति को अधिक सुलभता २३० सगुण में चारो गुणे का पाया जाना २३९ GEसे ) साधुओं का सब जानना और न जानने विना ८०तक मनुष्यों का दुःख पाना । खप्न में सांप से दुख पाने (२३२ का उदाहरण १ खप्न में जागने से जैसे सांप का भय जाता रहता है वैसे ही गुरु से पाये ज्ञान के द्वारा दुःख से निरत्त होना २३३ से । विषय की आशा से दुःख और निराशा से जीव का सुख पाना २३४-२३५ कर्ता और कारण की अचलता २३६ ५ को कमा दारा कर्ता का अपने रूप को जानना २९६ जैसे घड़ा विना कोहार के नहीं बन सकता वैसे यह जगत बिना कर्ता (परमेश्वर) के नहीं हो सकता. कर्ता का ज्ञान होने से ईश्वर का ज्ञान हो सकता है २३८ गुरु साक्षी और सज्जनोपदेश से मनोरथ सिद्धि ... २३६ अनेक कारणों का ज्ञान सब के कारण राम-ज्ञान के বিলা হয় २३६ ... १.. इतकी ४ ... ... ...

बड सन ( 17 ) दोही की सधा। १२ 28 विषय। सोने के दृष्टान्त से हरि-भक्ति बादि का उपदेश सोनार और जीव का रूपक ... २११ शरीर के कारण जीवात्मा अनेक योनि के वश होता है २४९ जौवों के घनेक योनि में जन्म पाने का कारण २४३ शरीर और वरतन के रूपक के द्वारा ईश्वर की पहचान २०० इच्छा- वासना-जीव के अनेक शरीर पाने का कारण है जिस के.त्याग से मुक्ति लाभ २९५ प्राण की अमरता और उसका अनेक शरीर पाना... १०६ वायु और जल शरीर के रहने के कारण है २४७ सूम और स्थूल दोनों शरीरों में कुछ न कुछ दोष (२०० अवश्य ही रह जाता है १२४ कर्ता और समय बदला करते हैं परन्तु कारण ज्यों का त्यों रहता है... ... ... ... ... इति पञ्चम सर्ग। अथ षष्ठ मर्ग। १ ... ३ जीवात्मा को अमरता और शरीर का भौ रूप बदलना २५२. काम कर के जीवात्मा का बंधना २५३ काम में लौन होने के कारण इस का सुख दुःख भोगना २५१ सत्व, रज, तम तीनों गुणों के कारण नाम पा कर । जीवात्मा का संसार में बन्धना २५३ अांख से बिना देखे त्वक बादि इन्द्रियों से गन्ध आदि गुणों का ज्ञान होना २५४ ५ ... 3 पड सर्ग] ( 18 ) ... ... चन्त होना दोनों को सधा। विषय । एड महा। बिन्दु और अक्षर के दृष्टान्त से परमात्मा को सर्व- थापकता दिखलाना २५४ पर्वोक्त दोहे का विषय २५५ रेस और विन्दु के दृष्टान्त से परमात्मा को सर्व- थापकता दिखलाना २५५ सूक्ष्म बिन्दु और स्थूल अक्षर के दृष्टान्त से परमात्मा को सूक्ष्मता प्रमाणित करना २५४ १० पञ्च तत्त्वों के मेल से शरीर का बनना और उन्हीं के अपने२ याश्रय में चले जाने के कारण शरीर का २५६ परमात्मा के जीव बनने का कारण अपनी इच्छा से पुत्र को बना कर पिता का नाम पाना १२ नाम के सुनने से वस्तु के गुणों का स्मरण होना पुत्र पिता के दृष्टान्त से ईश्वर का जगत्पिता कहलाना २५७ १० अनुखार यादि के दृष्टान्त से पिता पुत्र का अभेद ठहराना... २५६ सुत शब्द से कर्म का बोध होना और उन्हीं के दृष्टान्त से जीवों का माया में पसना... सुत के दृष्टान्त से स्थूल जगत् की प्रधानता और पिता के मरने पर जैसे लोग उसे भूल जाते हैं उसी प्रकार ईश्वर को भूल जाना... कम्म-रूपौ पुत्र को प्रधानता और कर्ता के आगे दौड़ना २४० कम्म-रूपी पुत्र के बिना सब व्यवहार का रक जाना २६१ संसार के पुत्रादि व्यवहार में पसे हुए लोगों को ज्ञानोपदेश का बुरा लगना... २५० c ...

( 19 ) पिड सन। विषय । ... ... दोनों को सधा । घड सधा संसार में पंस कर लोग ईश्वर को भूल जाते है और संसार-हो को सत्य कहते हैं २१२ ऋषियों के कहे हुए परमेश्वर का ध्यान करने से शान्ति होना २२ राम को समझने में विडम्बना... २८९ २२ बिना गुरु के सच्चा मार्ग कोई नहीं दिखला सकता २३ २४ सत्सङ्ग सच्चे मार्ग के ज्ञान होने का दूसरा उपाय २५ भले बुरे दोनों मरते हैं इस कारण सत्मा और गुरूपदेश को व्यर्थता २६० भाग्य की दुर्बलता दिखा कर सत्सङ्गति और गुरूप- देश की आवश्यकता का प्रमाणित करना २८४ जीवात्मा और परमात्मा के ज्ञान न होने के कारण एनादि को सब सुख का कारण समझना कर्ता-ही के करने से कर्म का नाम होता है और वह अपने को उस कर्म का कर्ता मान कर मेरा कर्म कह के पुकारता है इसी लिये उस को उस का फल भोगना पड़ता है २६ बामज्ञानी को किसौ कर्म का बन्धन नहीं लगता... ३० गटष्णा के समान इस संसार में जीव अज्ञानी हो कर ममता है... २१८ और शिष्य दोनों को अज्ञानता ३२ सदगुरु के उपदेश को आवश्यकता ३१ सबुद्धि और सुज्ञान पूर्वक महात्माओं के उपदेशा- बुसार कर्म करने से सुख मिलता है... २९ |२८ २९.

घड सर्ग, ( 20 ) विषय । ... ... ... १७ वस्तु के पाने ... दोनों की सला। ४४ सधा। सब वणों के कर्तथ कर्म का वर्णन करने की इच्छा से पहले ब्राह्मण के कर्म का वर्णन २६० ३५ क्षत्री के कर्म का वर्णन २४ वैश्य के कर्म का बर्णन... शूह के कम्मे का वर्णन... २६६ छयों शत्रुधों के जय पूर्वक सव वर्गों के लिये सार उपाय सन्तोषादि के ग्रहण से सब ठौर सुख का मिलना २७० 8. थानन्द खरूप जीव के साथ सदा आनन्द का रहना २७१ ११ मन के शासन करने से दुःख का दुःख न जान पड़ना २७१ ४२ विषय चिन्ता से जीव का विषय में फंसना २७१ ४३ केवल कहने सुनने से लाभ का न होना और लाभ- दाई हरि-भक्ति और तत्त्वज्ञान को यावश्यकता-२७२ ४४ सन्तोष के बिना सुख का न होना २७२ ४५ भक्ति और प्रेम की सब से अधिक बावश्यकता २०३ 84 ज्ञान और भक्ति-रूपी अमि से सव कर्म को भर कर यानन्द-रूपी मुक्ति का मिलना... २०३ कामना सब बन्धन का कारण है बिना उस के दूर जए मुक्तिका न मिलना २०३ निष्काम होने की कठिनता दिखला कर ब्रह्मादि देवताओं का भी सकाम होने के कारण दुःख | पाना २७४ ဦး बुद्धि के बड़ी होने का उपाय ... २७४ देह और आत्मा के एक समझने के कारण अनेक दुखों का भोगना... २७४ ४७ ... 86 ( 21 ) (घड सर्ग। ... ... - ... दोनों की सह्या। विषय। पृष्ठ सला। देह प्राण की भिन्नता के भेद-ज्ञान से दया का सदा बना रहना '५२ भूठों के साथ प्रेम करने के कारण जीव का झूठा बनना और सच्चे के प्रेम से सच्चा बनना भूठे विषय को सत्य समझ कर उस से अलग होने के लिये उपदेश देनेवालों से झगड़ना २७४ कर्म के अधीन हो कर जौवों का बार२ मरमा जीना और समय तथा ज्योतिषी और कर्म वा खरी और .मोह वा भूमि और जीव वा अन्धका रूपक २७७ समय को प्रधानता और उसी के अनुसार जगत् को उत्पत्ति पालन और नाश का होना २७७ कर्म और वृक्ष का रूपक २७० काल सब वस्तुओं का आधार है उसी के अनुसार सब बात होती है... २७६ समय की प्रधानता २७६ ५ समय के अनुसार नौवों का अनेक योनि में घमना कर्म के कर्तव्यों का वर्णन कठिन है ... २८१ मन को अस्थिरता २८२ बिना ज्ञान के मुक्ति का न होना २८३ शब्द और वर्ण का यभेद और उन्हीं के योग से नर का सब गुणों का घर होना... २८४ २० नाम जाति और गुण को देख कर अपने ही कर्म में भम का होना २८४ जीव का कर्म के ऐसा वशीभूत होना कि अज्ञान से ... 0 ... ... ... निर्मद हो जाना ...

पड सर्म ( 22 ) विषय। ... ... : ... दोषों को सला। घड मधा। कर्म के प्रभाव से जीवों का सब व्यवस्था में सुखी मानगा २५ (७ बिना गुरु के उपदेश काल को विपरीतवा नहीं जानी जा सकती २५ ( बिना गुरूपदेश के ज्ञान नहीं होवा २८७ विचार पूर्वक कर्म करने को रौति मन में गुरूपदेश के स्थिर होने से दुःख का नाश ... २८७ ७१ दुष्कर्म कर के भी जीव का मुख की आशा करना २८ भव-बन्धन छूटने के उपाय के जानने पर भी जीवों का माया के बश हो कर दुःखी रहना ... कर्म का भोग अवश्य करना पड़ता २८६ कर्म की प्रधानता का वर्णन २८९ नाना प्रकार मत होने का कारण २६. नौव दुःख से डर कर भी दुःख हो के काम में रहता है इस पर एक दृष्टान्त २६. अपनी दृष्टि के दोष को न कह कर जीवों का बात बनाना-२९५ अपने को चतुर समझ जीवों का जाल में फंसना २८१ माया में फंसने के विषय में मछली का दृष्टान्त २६२ केवल बात से कुछ नहीं हो सकता इस पर बात की दूध पाने का दृष्टान्त... २६३ २९५ बात छौ,भले बुरे का कारण २९६ बात ही से बात बनती है इस पर शवरी जटायु आदि का दृष्टान्त २६४ बिना बात सममे करने से करको जावा है इस पर दशरथ और विभीषण का दृष्टान्त ... बात की सामर्थ ... * * * ... ... 8 C ...

( 23 ) पिड सर्ग। . होगों की सया। विषय। घड सद्या ५ बात को सब का बीज ठहराना २६५ सांसारिक जीवों में नर्क के ३ लक्षण सांसारिक जीवों में खर्ग के लक्षण २९६ मो मनुष्य सांसारिक गुण, दोष से पर्ण है वह सदा दुःखी सखी बना ही रहता है २८७ काल की प्रबलता और उस के अनुसार भले बुरे काम का होना २६७ ६. सांसारिक कर से बचने के ३ लक्षण हैं निर्मल, विवेक वो सत् उपदेश और शास्त्रबोध रामचन्द्र को सेवा से भवबन्धन से छूटना... २९ पूर्व दोहे का विषय ... २९६ सदगुरु की कात्यन्त आवश्यकता २९ 88 सफाम और निष्काम के भेद से कर्म का दो प्रकार ... का होना ... ... १० राम नाम का माहात्य ३०. पूर्व दोहे का विषय राम नाम के माहात्य के बिना समझे सब व्यर्थ है सब पदार्थों में शुभाशुभ का भेद दिखलाना और उस के अनुसार समय का गुण दोष शुभाशुभ के भेद से कर्म दो प्रकार के होते है सब पदार्थों में भेद का होना सब भेदों के समझने के लिये गुरूपदेश को बावश्यकता' ३०५ ॥ इति षष्ठ सर्ग ॥ ... ९ ... ... ... १०१ सप्तम सर्ग-1] ( 24 ) - अथ सप्तम दो को सङ्ख्या । ३ ... ७ विषय । एड सधा। पाशा त्याग करना हो सब लिखने पढ़ने का फल है ३०४ पाशा रहने से योगी भी जाल से मुक्त नहीं हो सकता दांत के दृष्टान्त से अपने प्रयोजन के अनुसार नौवों का सांसारिक वस्तुओं को शुद्धता और अशुद्धता का मानना मोती और मूंगे के दृष्टान्त से साधुओं के खभाव की स्थिरता दिखलाना संसार में यात्म-खारथी बहुत इस पर दृष्टान्त... निर्जल स्थान के कूप के दृष्टान्त से मनुष्यों के कपट- शौलता का वर्णन ... दुष्कर्मियों को छोड़ कर और सभों का अपने मित्र- के निकट रहने से सुख पाना ३१२ वृक्षके दृष्टान्त से मित्र के क्रोधित होने पर भी सुखदाई हो रहना मेघ और सूर्य के दृष्टान्त से दुर्जनों को सङ्गति का सर्व प्रकार से त्याग करना ३१४ सूर्य के दृष्टान्त से राजा के व्यवहार का गुण दोष वर्णन ३१५ माली के दृष्टान्त से कलियुग में नौति चतुर राजा के होने की कठिनता का वर्णन विपत्ति में पड़े बड़े मनुष्य को कभी छोटा समझना ..न चाहिए प्रजाद के दृष्टान्त से रामचन्द्र को बाराधना और परोपकार का सब से उत्तम ठहरना... १० ११ ... १२ १३ साम सर्ग ( 25 ] २१८ २१ . ३१७ .. ३२० १९ ... ३२१ ... ... ३२२ दारों को मया। विषय। १४ परोपकार को बड़ाई और स्थिरता दिखलामा चन्द्रमा के दृशान्त से सत्सङ्गति की बड़ाई मोती और गुंजा के दृष्टान्त से बड़ों को सजाति का उपदेश १७ बड़े लोग समय के हेरफेर से कुछ क्षौण भी होयं वो भी छोटी से बड़े ही बने रहते हैं इस बात को चन्द्र और तारा के दृशान्त से ठहराना घोड़ा यादि छः बस्तु सदा ग देखने से बिगड़ जाते हैं जल के दृष्टान्त से अपनी भलाई करनेवालों के साथ दुर्जनों को दुरुता बाठ पदार्थों का स्वामी के बियोग से नष्ट होना और संयोग से अच्छा बना रहना नौचों को सत्मा मिले तो भौ निचाई नहीं छोड़ते इस पर चन्दन और सांप का दृशान्त... दर्पण के दृष्टान्त से दुर्जनों के कपटौ सुभाव का वर्णन २३ कुंएं के दृष्टान्त से अच्छे मित्र का लक्षण २४ अपने आय के अनुसार व्यय करना सब गुणों का मूल २५ शिष्य स्खौ यादि के कहने को मनोयोग पूर्वक सुनने और ग्रहण करने का वर्णन २८ स्त्री पुषादि चार साथियों के साथ बहुत संभाल के व्यवहार करने का उपदेश ... स्त्री, पुत्र, खानपान, मन्त्री, चाकर, मित्र और घर इन सातों के साथ व्यवहार करने का उपदेश २७ दीर्घ-रोगी, अत्यन्त-दुःखी, कटभाषी और कामौ . इन चारों के तुरन्त त्याग करने का उपदेश सौग पुरुष अपने मृत्यु को मोल लेते हैं ... ३२२ ३२४ ३२४ ३२५ ... २२६ ... ३२७ ... 4 ( 26 ) [सप्तम संग । ... ... ... ... ... ... दोन की कमा ४४ मधा। बज्ञानियों के उपदेश से चलने वाले शानियों का भौ दुःख पाना बिना अपने समझ विचार के मनुष्यों का सदा दुख पाना ३३१ वज्ञानी लोगों के व्यर्थ यत्न का वर्णन २२ दुखता करने के कारण अज्ञानी लोगों के नाश होने का निश्चय २४ बहुत माल को फैलाने वालों के सब कामो में सिद्धि होना असम्भव सौता और कृष्ण के दृष्टान्त से सब के प्रसन्न रखने के असम्भव होने का प्रमाण २४ ज्ञानी और विरक्त साधु के लिये प्रतिष्ठा और नामवरौ का दुःखदाई होना १७ बन्धपरम्परा वा भेड़ियाधसान के विषय में बन्ध्या बार अन्धे की निष्फलता ३९८ पूर्वोक्त दोहे के विषय का उदाहरण चारो वर्णों के अपने २ कर्म के करने से उन का परम सुख लाभ २३७ किसान का उदाहरण दिखला कर मुक्ति पाने-वालों के उत्तम मध्यम और निवर यत्नों का वर्णन ४१ दुःख पाने से अपने धर्म को न छोड़ना उत्तम जनों का सुभाव है अपनी भलाई बुराई के सदृश दूसरों की भलाई बुराई समभना सज्जनों का व्यवहार है ३४० ३ पारे के दृष्टान्त से सज्जनों का दुर्जनों के संग से भागने का उपदेश ... ... ... ... ४२ ... ... २०१ साम सर्ग] ( 27 ) दो कौ सया। ४४ ... ४५ ... . ... ga से कपट 88 ५१ समा। मन्थरा के दृष्टान्त से दुखों को मौठी बातों पर भी विश्वास करने में बड़ा धोखा ३११ दान और दया यादि कामों में लगे हुए सन्त जन हो मुख्य बौर हैं... १४२ जान नम्रता आदि पदार्थ विपत्ति के मुख्य साथी हैं २४३ पराक्रम सन्तोष और राम भरोस आदि बुरे समय के सहायक मित्र है ३४२ ईश्वर भक्ति और विद्या यादि गुणों में लगे रहने- वालों के लिये कभी विपत्ति का न पड़ना ३४० बामन-रूप परमेश्वर और विष्णु के दृशान्त व्यवहार करने वाले को अवश्य कला होना पूर्वोक्त दोहे के बर्णन द्वारा कपट से अवश्य दुर्यश होगा ३९५ बणि तुलसौ और विष्णु के दृशान्त से छल करने में सब को लश दिखला कर इस से दूर रहने का यत्न ३४५ मेलका बनिया आदि के दृष्टान्त से दुखों के सर के सब प्रकार त्याग करने का उपदेश कृष्ण और दुर्योधन के दृष्टान्त से मूों के सुभाव का कभी न बदलना ३७ दैव के विपरीत होने से सब वस्तुबों के खभाव का बदलना ३४० कौवा और बन्दर के दृष्टान्त से बिना बिचारे हठ-पूर्वक काम करने से अत्यन्त कर पाना बड़े शत्रु पर विश्वास कभी न करना चाहिये अव्यवस्थितचित्त मनुष्य का कुछ विश्वास नहीं जान बूझ कर अन्याय करने वालों को उपदेश देना व्यर्थ है ३५१ ५२ ५३ ... ... ५५ ... ... ...

( 28 ) सितम सर्म ... ... ३५४ ... ३५५ ... ३५७ हीवी पक्षा। विषय। ५६ विषय में लौन जनों को उपमा अधजली पतिब्रता स्त्री से... १० चन्त में दुःख देने वाले विषयों में तत्परजनों को उपमा चन्द्रकिरण को जल जान कर चाटने-वाले कुत्तेसे ११ पवित्र स्थानों में दोषी लोगों के अधिक पाये जाने का कारण (२ कलियुग का वर्णन पूर्वोक्त दोहे का विषय अर्थात् कलियुग का वर्णन (६९ दोहे से ६३ दोहे तक)... कलियुग और लड़ाई का रूपक हृदय-रूपी कमल गुण दोषों का साक्षी है सो अविवेक यादि के पाने से प्रसन्न और विवेक यादि को पाने से अप्रसन्न होता है बिवेक हौन मनुष्यों को पशुओं से उपमा हरि-भक्तों को लश देने-वाले बिवेक हौन मनुष्यों को कुत्तों से उपमा (स राजा का एक प्रकार का दोष प्रजा में तीन प्रकार से प्रगट होता है इस से और तेहरा घाव करने वाली तलवार से उपमा ६९ राजा के व्यवहार के अनुसार समय का भला बुरा होना राजा के प्रसङ्ग से समय का भला बुरा हो जाना राजा के भले होने से समय और प्रजा का बदलना बिच्छ महाराज सामादिक उपायों को विचार कर कुरान का भी उपहार लेते हैं वृक्ष के पल फूल के दृशान्त से उत्तम राजाबों के कर लेने का उपदेश ... ... ३५८ ... ३५ ... ७. ७२ ... ...

सतनसर्ग ( 29 ) ७४ ... ... ... ... ... ... ... दोनों की समा। विषय। ४ सखा। पृथ्वी और गौ का रूपक ७५ कुनौति रत राजा खजूर को शाखा के सदृश गल जाते हैं ३४५ खाद का पांव और सुनौति और रावण को सभा और एथ्वी का रूपक ३६५ ७७ राम-प्रेम धर्म-तत्पर और अच्छे राजनीति जानने- वाले राजा को राज्य लक्ष्मी नहीं छोड़ती बिजयी, उदार, सत्यभाषी राजा का ऐश्वर्या कभी नहीं घटता गोली, वाण, खर और उत्तम मध्यम नीच राजाबों का रूपक... ३६८ ८० सयाने राजा अपने शत्रु को अल के सदृश शिर पर रखते हैं परन्तु समय पाने पर उसे नाव के सदृश ३६ जिस राजा के धर्म हो वा है और सत्य मन्त्री है उस के निकट यापदा कभी नहीं खाती राजा, मन्त्री और कारोबारी के गुण का वर्णन अच्छे राजा का लक्षण उत्तम खामी का गुणानुसार छोटे बड़े दासों का चादर करना ३७२ ८५ और राजा और वृक्ष के पाल फूल और प्रजा का रूपक राजाओं के बली होने का वर्णन चक्रवर्ती महाराजाघों के गुण १८४ राम-राज्य गुणों के घाज कल न पाये जाने को. दिखला कर महाभारत के समय के गुणें का- कलि में पाया जाना डुबा देते हैं .. ... ४ ... ... ... ... हक्ष के मूल ( 30 ) सितम समे। दोहा की सया। E ... ... ६२ विषय। ५४ सखा। समयानुसार उत्तम वस्तु के भी त्याग का उपदेश... ३८. सरोवर में खम्मे के सादृश्य से शरीर में बात्मा की तुलना... B८० बड़ों के भगड़े के बीच में छोटों के न जाने का उपदेश ... अवस्था के अनुसार आश्रम में रहने-हारे मनुष्यों के धर्म का उपदेश ३०२ सब कामों के पहले विचार करने का उपदेश विषय और सरस ऊख का रूपक दिखला कर नौरस वैराग्य-रूपी वृक्ष की सेवा करने का उपदेश ३८४ बड़ों के नाम को न बिगाड़ना चाहिये इस विषय में यमराज का दृष्टान्त ३८४ खलों को बुराई करने से भले को काम नहीं त्याग करना चाहिए इस विषय पर देव-मन्दिर और ... ... ... ६४ ६५ ... ... कौवे का दृष्टान्त ३८५ (न गंवारो की बातों से दुःख न मानना चाहिए जिस का संसारी धर्मादि व्यवहार केवल अपनी बड़ाई दिखलाने के लिये है उस को अन्त में भी वही गति होती है परलोक में देवतायों से दण्ड पाने के भय की अपेक्षा इस लोक के क्रोधी राजाओं के भय का अधिक होना सुनौति से चलने-वालों को सर्वत्र सुख और कुनौति से चलने-वालों को दुःख का होना सुनौति कुनोति से चलने के विषय में राम, सयौव रावण और बालि का उदाहरण ... ३८७ १. १८ चतुर्थ सर्ग] ( 31 ) ३६० ... ३६१ ... ... ३८४ होगको मया। विषय । १०२ दुर्जन दान यादि काम करने में बहुत छोटे हों तो भी अपने को महादानौ करण और दधिच के समान जानते है १०१ दूसरे को कौर्ति को मय कर के अपनी कौर्ति बनाने की निन्दा १०४ पतङ्ग के दृष्टान्त से दुर्जनों के खभाव का वर्णन १०५ मछली और गादि के दृशान्त से दुर्बल जनों का संसार में दुःख पूर्वक निर्वाह होगा ... बड़े पापियों का सुख न पा कर परमेश्वर की निन्दा करना... १०७ यादव और कामदेव को साक्षी देकर अपने वर्गको त्याग करने वालों को हार १०८ आग लगने के दृष्टान्त से कलह का अत्यन्त बुरा होना दिखलाना १.६ शान्ति प्रधान लोगों के लिये हार जाना और अपना खोना उत्तम है १९० संसार में ३ प्रकार से और मित्रों को पह- चानने का चिन्ह क्षमा को प्रसंशा दिखला कर सज्जनों का दुशों की बात का सहना ११२ कौरवों और पाण्डवों के दृष्टान्त से क्षमा को प्रसंशा परशुराम और रामचन्द्र के दृशान्त से यह प्रमाणित किया है कि जो मीठी बातों से मरे उस के लिये कड़ी उपाय न करना कोध के बश हो कर कटु वचन बोलने का अनेक दोष २१५ ससमय कुसमय वस्तु के गुण अवगुण को घटा देते हैं ३९५ ... ... ... ३६५ ... ३६८ ४०.

( 32 ) [साम सर्ग। ... ... 808 ४०४ दोहे तक दोनों को उधा। विषय। 8 सुद्धा ऋण यादि पांच वस्तु बावन्त कष्ट के हेतु है ४०२ ११७ शिक्षा देने वाला गुरु चाहे क्रोधित हो कर चाहे प्रसन्न हो कर सब प्रकार अपने उपदेश द्वारा अपने शिष्यों की भलाई करता है ४०३ बवण्डर में पड़े हुए पवन और दुध राजा को उपमा से प्रजाघों का दुःख प्रगट करना १९६ बोलने को बुराई मलाई समझ बिचार पूर्वक बोलना उचित है... १२. कलियुग में कपट व्यवहार के कारण लोग परस्पर ठगहारी करते है... ४०५ १२१ कलियुग में सब कर्मों का विपरीत होना १०६ १२० दोहे से ले कर १२३ दोहे तक) ४०५ से ले कर १२३ कलियुग का वर्णन १२४ रामचन्द्र और कृष्णचन्द्र दोनों की तुल्यता दिखला कर भक्ति करने का उपदेश... १२५ कमाच और कमरी के दृशान्त से सतसई के भाषा में लिखे जाने का हेतु ४१. सतसई के अक्षर और मोती की माला का रूपक ४११ सतसई के भक्ति-पूर्वक पढ़ने-वालों का खर्ग प्राप्त होना ११९ राजा और विद्वान् के बीच तुलना दिखा कर विद्वान् को श्रेष्ठता का वर्णन ०१२ १२८ सतसई का माहात्म्य और उस के पढ़ने का फल ... ०११ (इति सप्तम सर्ग सूची समाप्त ।) टीका को समाप्ति का संवत् और तिथि धादि का वर्णन और अन्त में शिवायक-रूप मङ्गल ...३१४-१५ (इति शम्) 8०० तक ... ४०६ ... ... ...

॥॥ श्रीपरमेश्वराय नमः ॥०॥ तुलसौ-सतसई। विहारिकत-संक्षिप्तटीका-समेत । प्रथम सर्ग। नमो नमो खी-राम प्रभु परमा-तम पर धाम। जेहि सुमिरे सिध होत है तुलसी जन-मन-काम ॥१॥ अन्वय । परमातम पर धाम प्रभु सौराम नमः नमः । अहि सुमिरे तुलसी जम मनकाम मिध होत है॥१॥ अर्थ। इस जगत के (अात्मा) ईश्वर सब से अधिक तेजवी खामी मौता-रामजी को वारंवार नमस्कार होवे, जिम को स्मरण करने से तुलसी (मे) भक जनों की मनोकामना पूरी होति ॥९॥ राम बाम दिसि जानकी लखन दाहिनी ओर। ध्यान सकल कल्यान कर तुलसी सुर-तर तोर ॥२॥ अन्वय । राम वाम दिसि जानकी, दाहिनौ पोर खखन । तुलसी तोर सुरतरु सकल कखान कर ध्यान ॥ ।

१ तुमती-सतर। अर्थ। श्रीरामचन्द्र को वाई और सौताणी (बैठौ) है, और दाहिनी ओर लक्ष्मण जी (विराजते) हैं; तुलमोदाम (अपने मन से वा किसी भक से) कहते हैं, कि यह ध्यान कल्पवृक्षरूप है, और तेरे सब मंगलों को देनेवाला है ॥ २ ॥ परम पुरुख पर धाम चर जा पर अपर न चान। तुलसी सो समुझत सुनत राम सोइ निरबान ॥३॥ अन्वय । तुलमी परम पुरुख पर धाम चर, जा पर अपर पान न, सो राम समुझत सुमत सो निर्वाम । अर्थ । तुलसीदास कहते हैं कि जो सब से बड़े पुरुष (परमेश्वर) बड़े स्थान अथात् बैकुण्ठ में रहनेहारे, जिस के जपर और कोई दूसरा नहीं है, उस राम को समझता और सुनता है, वही मोक्ष सकल सुखद गुन जासु सो राम कामना हीन । सकल-काम-प्रद सरब-हित तुलसी कहहि प्रबीन ॥४॥ बषय। प्रबौन तुलसी कहहि जासु गुन सकल सुखद कामना हीन सो राम सकल काम प्रद सहित । अर्थ। कवि तुलसी कहते हैं, कि जिस रामचन्द्र का गुणानुवाद सब लोगों को सुख देनेहारा है, सो गमचन्द्र श्राप कामना रहित है, अर्थात् किमी बात की इच्छा नहीं करते, परन्तु सब लोगों का मनोरथ पूरा करते और सब के हितकारी ॥४॥ ~ ॥

प्रथम सन। माके रोम रोम प्रती अमित अमित ब्रहमण्ड । सो देखत तुलसी प्रगट अमल सु-अचल प्रचण्ड ॥५॥ अन्वय । अमित अमित ब्रहमण्ड जाके रोम रोम प्रति तुलसी सो अमल सुचल प्रचण्ड प्रगट देखत । अर्थ। जिस के एक २ रोम में असङ्ख्य ब्रह्माण्ड (वा लोक) हैं, तुलदास उस निर्मल अचल और परम प्रतापी राम को इस जगत में प्रगट देखते हैं ॥५॥ जगत जननि सी-जानकी जनक राम सुभ रूप। मासु किपा अति अघ-हरनि करनि बिबेक अनूप ॥६॥ अन्वय । लौजानकी जगत जननि सुभरूप राम जनक, जास क्रिपा प्रति बघहरनि पनप विबेक करनि । अर्थ। श्रीगैताजी (रस) जगत को मा, और कल्याणरूप श्रीराम पिता हैं, जिन की कृपा महा पापों को नाश करनेहारी और मत और अमत के अनुपम ज्ञान को देनेहारी है ॥ ६ ॥ तात मातु पर जासु के तासु न लेस कसेस । ते तुलसी तजिजात किमि निज घर तर पर-देस ॥७॥ अषय । पर जासु के मातु तात तासु कलेस लेस न तुलसी ते निज घर तजि परदेस तरन किमि जात । अर्थ। पर ब्रह्मरूप सौता राम जिस के मा-बाप हैं, उस को थोड़ा भौ दुख नहीं होता, तुलसी कहते हैं कि वे अपने घर को छोड़ (पान अपने इरादेव राम की सेवा कोड़) दूसरे देश में तर तुलसी-सतसई। के लिये काहे को जाएंगे, अर्थात् मुक्ति पाने के लिये दूसरे देव को पाराधना क्यों करेंगे॥७॥ पिता विवेक-निधान बर मातु दया-जुत नेह। तासु सुमन किमु पाइ अनत पटन तजि गेहा अषय। विबेक निधाम वर पिता नेह दयाजुत मातु, तासु सुत्रम गेह तजि किमु प्रमत अटन पार है। अर्थ। प्रति ज्ञान की खान श्रेष्ठ जिम के पिता (राम है), और अति कृपाशील माता (मौता) हैं, उनके पुत्र (भक तुलसौ) घर छोड़ (अपने दृष्ट को मेवा छोड़) क्यों दूसरी ठौर (दूसरों को सेवा में) भटकने पावेगे ॥८॥ बुद्धि-बिनय-गति-हीन सिसु सुपथ कुपथ गत-ग्यान। जननि जनक तेहि किमि तजै तुलसी सरिस अजान॥ अन्वय । ते जननि जनक बुद्धि बिनय गति होन सुपथ कुपथ ग्यानगत तुलमो मरिस अजान सिमुहि किमि तजै ॥८॥ अर्थ। वे (सर्वव्यापक मौतारामरूप) माता पिता ज्ञान नम्रता और चलन से होन और भले बुरे के ज्ञान से रहित तुलसी से अज्ञानी बच्चे को क्यों कर छोड़ें, अर्थात् सर्वथा अयोग्य मुभा पर भी दया अवश्य करेंगे ॥६॥ मात तात सिय-राम-रुप बुद्धि बिबेक प्रमान। रित अखिल भघ तरनतर तब तुलसी कछु जान॥१०॥ से भक प्रथम सर्ग। अवय। तरनतर बुद्धिरूपमात सिय, विबेक (रूप) तात राम प्रमान अखिल अघ हरत, तब तुलसी कछु जान ॥१०॥ अर्थ। अत्यन्त जवान वा तौत्र बुद्धि के स्थान में माता श्री सीता जौ को, और विवेक वा मत् असत् के विचार स्थान में रामजी को प्रमाणित किया, तो सब अज्ञानरूपी पाप नष्ट हुत्रा; तब तुलसी ने कुछजाना ॥१०॥ जिन तें उदभब बर बिभब ब्रहमादिक सन्सार । सुगति तासु तिन की क्रिपातुलसी बदहिँ बिचार॥११॥ अन्वय। जिन ते ब्रहमादिक सन्मार उदभव वर बिभव तास सुगति तुलसी तिन को क्रिपा बिचारि वदहि ॥ ११ ॥ अर्थ। जिन मौता राम से ब्रह्मा से ले कर (बण तक) संसार की उत्पत्ति अच्छा ऐश्वर्य, अर्थात् पालन, और उस को सुगति होता है, उन की कृपा से विचार कर के तुलमी (ग्रन्थ) कहते हैं । अथवा, उन्ही राम की कृपा से (तास सुगति) उस संसार को वा संसार के जनों को सुगति मुक्ति होती है ॥११॥ ससि रवि सोता राम नभ तुलसी उरसि प्रमान । उदित सदा अथवत न सो कुतसित तम कर हान॥१२॥ अन्वय । तुलसौ उरमि नभ प्रमान मसि रवि मौता राम सो सदा उदित अथवत न कुत्सित तम हानि कर ॥१२॥ अर्थ। तुलसीदास का हृदय आकाश सम है (जहाँ) मौता-राम- रूपी सूर्य चन्द्र सर्वदा जगे रहते हैं, वेहो (अथवत न) अस्त न होते, और खराब अन्धकार-रूपौ प्रज्ञान का नाश करते हैं। जहाँ .

तुलसी-सवलाई। कुखलित पाठ हो वहाँ मालाकार से मन को बेष्टित किये ऐसा अर्थ करना ॥ १२॥ तुलसी कहत बिचारि गुरु राम सरिस नहिँ धान। जासु क्रिपा सुचिहोत रुचि बिसद बिबेक अमान॥१३॥ अन्वय। तुलसी बिचारि कहत राम मरिस भान गुरु नहिं जासु क्रिपा सुचि रुचि अमान बिमद बिबेक होत ॥ अर्थ। तुलसीदास भली भाँति विचार कर कहते हैं कि राम के समान और कोई गुरु नहीं हैं, जिस को दया से पवित्र रचि (अर्थात् रामचन्द्र के चरित श्रादि सत्कर्मों में प्रौति) और शुद्ध अहंकारहीन ज्ञान अर्थात् ब्रह्मज्ञान होता है, अथवा शडू और अहंकाररहित ज्ञान में पवित्र प्रौति होती है ॥१३॥ राम सरूप अनूप अल हरत सकल मल-मूल । तुलसी मम हिय जो लगहि उपजत सुख अनुकूल॥१४॥ अन्वय। तुलसौ राम सरूप अनूप बल, सकल मलमूल हरत, जो मम हिय लगहि अनुकूल सुख उपजत ॥ अर्थ। तुलसी कहते हैं कि राम का रूप अनुपम भूषण है, अथवा गम इस नाम के दो अक्षर उपमाहीन वर्ण हैं, सब पापों के जड़ को नाश करते हैं, जिन के मेरे मन में लगने वा पाने से कल्याणकारी सुख उत्पन्न होता है। अथवा रा रस रूप जहाँ पाठ हो, वहाँ रा जल का रूप अनुपम है और अल अर्थात् व्यापक है, और मकार महौ पृथ्वी-रूप है, इन दोनों के संयोग होने से राम यह माम बना, जिस के भजने से अनुपम सुख (मुक्ति मिलती है ऐसा अर्थ करना चाहिये ॥१४॥ C अषमत। रेफ रमित परमा-तमा सह-कार सिय रूप। दीरघ मिलि विधि जीब इव तुलसीअमल अनूप॥१५॥ रेफ परममेश्वर का रूप है, उस में प्रकार मौताजौ का रूप है, और दीर्घ वा ब्रह्मादिक जौव है, इन तीनों के मेल से रा यह उपमा रहित निर्मल अक्षर बना ॥ १५ ॥ अनुस्वार कारन जगत स्खी कर करन म-कार। मिलित अ-कार म-कार भौतुलसी हर-दातार ॥१६॥ अनुखार इस जगत के उत्पत्ति का कारण है, मकार श्री का देनेहारा है, इन दोनों के योग से बना म जो तुलसीदास कहते हैं कि हर अर्थात् कल्याण का देनेहारा है ॥ १६ ॥ ग्यान बिराग ऽरु भक्ति सह मूरति तुलसी पेखि । बरनत गति मति अनुहरत महिमा बिसद बिसेखि ॥ ॥१७॥ तुलसी-ज्ञान वैराग्य और भनि तौनों का स्वरूप रामरूप मूर्ति जान कर अपनी मति बुद्धि और गति शक्ति के अनुसार अत्यन्त निर्मल इन के माहात्य का वर्णन करते हैं ॥ १७ ॥ नाम मनोहर जानि जिय तुलसी करि.परिमान । बरन विपरजय भेद त कहाँ सकल सुभ ग्यान ॥१८॥ तुलसी-राम दूस नाम को अपने जी में प्रति मनोहर समझ, (पौर परिमान करि) राम इस को ठीक कर, वरण अक्षरों के तुलसी-सतसई। उसट पुसट से सुन्दर ज्ञान का वर्णन करते हैं, अर्थात् राम में ब्रह्मा विष्णु और शिव तीनों स्वरूप एक हो कर स्थित हैं। रको विमर्ग किया फिर प्रोकार कर के श्रीम् । श्रीम-कार और मब मन्नों के बीज मौ नाम से निकलते हैं। श्री ही की प्रादि सब बौज ग्कार और अनुस्वार के योग से बने दम से राम में सब मन्त्रों के बौज है। फिर र के भागेम और म के धागे ह का पागत कर और को श्रीकार कर मोऽहम् इम मे बना ॥ १८ ॥ . तुलसी सुभ-कारन समुझि गहत राम रस नाम। असुभ-हरन सुचि-सुभ-करन भगति-ग्यान-गुन-धाम ॥१९॥ तुलमी-शुभ देने का कारण ममझ कर, गम एम रमरूपी मधुर नाम को धारण करते हैं, यह अमंगल के माश का और सुन्दर मंगल का कग्नेहाग और भक्ति ज्ञान और गुण का घर है ॥१८॥ तुलसी राम समान बर सपन हुँ अपर न पान । तासु भजन रति-हीन अति चाइसि गति परमान॥ ॥२०॥ तुलसी-कहते हैं कि गम के मदृश श्रेष्ठ और कोई में भी नहीं है, उन के भजन की प्रीति से रहित हो कर पर श्रेष्ठ मान पादर और गति मुकि को, अथवा शास्त्र में जिस का प्रमाण है उम गति अर्थात् (मायुज्य) मुक्ति को चाहता है ? यह असम्भव ॥२०॥ दूसरा सपने प्रथम वर्मा अधि-रसना बन घेनु रस गन-पति-दिन गुरु-पार। माधव सित सिय-जनम-तिषि सतसैया पवतार॥२१॥ अहि-रमना (२) धेनु-थन (8) रस (१) गन-पति-दिन (९) गुरु-चार माधव मित-मिय-जनम तिथि मतमैया अबतार (भी) सम्बत् १९४२ वैसाख मास शुक्लपक्ष की नवमी को इस मतम माम पन्ध का जन्म हुत्रा अर्थात् सतसई बनाई गई॥११॥ भरन हरन अति अमित विधिताव-अरय कवि-रीति। सङ्केतिक सिद्धान्त-मत तुलसी बदत विनीति ॥ २२ ॥ १०। कवि रौति न हरन, अति अमित विधि तत्वार्थ भरन बिनौत तुलमी मरेतिक सिद्धान्त मत वदत । अनेक प्रकार के तत्वों के अर्थ को पुष्ट करनेहारोहो कर भी कवियों को रौत, अर्थात् रस अलाहार आदि को, हरन करनेवारी नहीं है जो मतमई, उस में नम हो कर तुलसीदास मरेत के बारा सब मिङ्कामों के मत को कहते हैं ॥२९॥ बिमल बोध कारन सुमति सतसैया सुख-धाम । गुरु-मुख पदि गति पाइबिमल भक्ति अभिरामारा (विमल बोध समति कारन) निर्मल शान और अंची बुद्धि को करनेहागै और सुख को खान इस सतसई को लोग गुरु के मुख से पढ़ कर मन्दर गति मुक्ति और भक्ति पावेंगे। अथवा गुरु के मुझसे पढ़ेंगे, तो इस में गति पर्यात् पर्यापति होगी॥२९॥ 2 १. तुपती-सतपाई। म-न-भ-य-ज-र-स-त-लाग-जुत प्रगट छन्दवत होय। सो घटना सुख-दा सदा कहत सु-कवि सब कोय ॥२४॥ (म) मगण Sss, (म) मगण ।, (भ) भगण SI, (य) यगण Iss, (ज) जगण ।।,(र) रगण SIS, (म) मगण ॥,और (त) तगण , ये तीन तीन माषाओं के पाठ गण हैं । (लाग-जुत) लघु और गुरु के योग से जिस में जितने छन्द प्रगट होते हैं, उस रचना को सब अच्छे कवि खोग सुखदाई कहते हैं। गुरु और लघु मिल कर तीन २ मात्राओं के एक २ गण होते हैं। लघु का चिक मौधौ (0) और गुरु का (s) टेढ़ी पाई रक्खी गई है ।। २४ ॥ जत समान ततवान लघु अपर बेद गुरु मान । सञ्जोगा-ऽदि विकल्प पुनि पद अनन्त करिजान॥२५॥. (जत समान ततवान लघु) जितने समान हैं, अर्थात् अ, इ, उ, स, स, ये पाँच लघ हैं (अपर बेद गुरु मान) और चार ए ऐ श्री श्री को गुरु वा दीर्घ माना है। फिर संयुक्त के श्रादि और पाद के अन्त अक्षर को विकल्प से गुरु कर के अनेक प्रकार के पद जाने जाते हैं अर्थात् पदों का अन्त नहीं है ॥२५॥ दोरघ लघु करि सह पदव जहँ मुख लह विनाम। प्राक्रित प्रगट प्रभाव यह जनित बुधा-बुध बाम॥२६॥ (जेई मुख बिसाम लह तंई दौरघ लघु करि पढ़य) जहाँ विश्राम हो, वहाँ दौर्घ असर को भी खघु करके पढ़ना चाहिये (प्राक्रित यह पुषावध बाम भनित प्रभाव प्रगट) पणित मूर्ख और स्वौ सब के की गुरु विध भाषा में प्रभाव प्रगट है) हिन्दी कविता में अपने सुविध धबार, सरोकापढ़ना प्रसिद्ध की को चौर कहीं सयुको गुरु कर के पढ़ते रे ॥२६॥ दुइ गुरु सीता सार-गन राम सो गुरु लघु होइ। लघुगुरु रमा प्रत्य-गन जुग लहु हर गम सोइ ॥२७॥ अब गुरु सधु के उदाहरण को दिखाते हैं; मौता (यह) दोनों गुरु, राम पहला गुरु और दूमग लघु; रमा पहला लघु और दूसरा गुरु, चौर हर सब्द दोनों लघु अक्षर हैं। चिक दे कर यो जानना SS SIIS II मोता राम रमार "मौता" चार मात्रा का है दम से (मार गण) श्रेष्ठ 'उगण'; चार "राम, रमा" तीन तीन मात्रा होने से साक्षात् 'ढगण' हुये और हर दो लघु मात्रा के कारण ‘एगण' जत्रा ॥२०॥ सहस नाम मुनि-भनित सुनि तुलसी बल्लभ नाम । सकुपति हिय हसि निरखि सिय धरम धुरन्धर राम । ॥२८॥ (तुलसी बनाम नाम सहस नाम मम समि) तुलसीदास के प्यारे राम नाम को मात्र नाम के तुन्य मुनियों के मुख से सुम-कर मानको जौ धर्म के भार को धारण करमेहारे गम की ओर देख कर मन में मुसका कर खजा जाती है। मुकाने का यह भाव किमीताजी सोचती हैं कि मेरा नाम दोनो दीर्थ है, सो एक नाम तक है, और राम का एक आध और एक गुरु हो कर भी सहन .

१२
तुलसी-सतसई।
के तुला त्रा, यह पाश्चर्य है। फिर यह सोच कर कि राम
मेरे पति हैं, इन का नाम ऐसा होना ही चाहिये, यह समझ कर
लजा जाती हैं। द्वितीयार्थ। राम के नामों में तुलसी बलभ इस नाम
को सुन कर मौता सोचती हैं कि राम चन्द्र जो अनुकुल नायक है
सदा जामको बलभ कहाते, सो तुलसी बल्लभ क्यों हुये; तो दून को
अब दक्षिण मायक कहना चाहिये। ऐसा सोच कर लजाती हैं, फिर
रामकी ओर देख कर सोचतीं कि ये सदा प्यारी २ वात कहते और
तुलसी बल्लभ कहाते इस से भठ नायक हैं; फिर अपने मन में यह
सोच कर कि जानकी बलभ कहने को मुनियों में नहीं कहते और
हमारे प्यारे कहा कर भी तुलसी बल्लभ कहाते इस से लजाते भी
नहीं, इस कारण धृष्ट मायक हैं। ये ४ नायक राम कविगूढोकि
मेये ॥२८॥
दम्पति रस रसना दसन परिजन बदन सुगेह ।
तुलसी हर-हित बरन सिसु दम्पति सहज सनेह ॥२९॥
मुखरूपी घर मे (रस रसना) जल और जीभ स्त्रीपुरुषरूप है,
दति नौकर-चाकर है, और महादेव जी के कल्याण को करनेहारे
(राम) ये दोनों वर्ण लड़के हैं, जिन में स्त्रीपुरुष की प्रौति स्वाभा-
विक है। जीम को राम के स्मरण में स्वभाव हो से प्रीति रखनौ
'चाहिये॥ अथवा। इस दोहे में स्त्रीपुरुष का नाम प्रथम कह के फिर
रस मम्द कहा; इस से सब रसों में प्रधान श्टङ्गार-रस का नाम ले
कर अपने काव्य में नव रखों का वर्णन सूचित किया ॥२८॥

प्रथम सर्ग। . a हिय निरगुन नयनन सगुन रसना राम सुनाम । मनहुँ पुरट सम्पुट लसत तुलसी ललित ललाम॥३॥ मन से समझे कि राम निर्गुण हैं, और नेत्र से श्यामवर्ण राम को देखे, और जीभ से राम दस सन्दर नाम को जपे, तो ऐसी शोभा होती है मानो (पुरट) सुवर्ण के सम्पुटित मुख कमल में (ललित आसाम) सुन्दर होरा जड़ा हुत्रा प्रति मोभ रहा है। मानों पद यहाँ उत्प्रेता अलङ्कार है ॥ ३० ॥ प्रभु-गुन-गन भूखन बसन बचन बिसेख सुदेस । राम-सुकीरति कामिनी तुलसी करतब केस ॥३१॥ औगमचन्द्र को कीर्ति ही एक सुन्दर स्त्री है, और राम के गुणों का समह उस स्त्री के गहने कपड़े हैं, तुलमी दास का करतब (काव्य) केश हैं, जो कामिनी के बचनरूपी सुन्दर (दम) बङ्गों में मोभते । अर्थात् बचन मे यदि गमचन्द्र के गुणगणों का वर्णन हो, तो वह मफल है, नहीं तो व्यर्थ है ॥ ३१ ॥ रघुवर-कीरति तिय-बदन इब कह तुलसी-दासु। सरद प्रकास अकास छवि चारु चिबुक तिल जासु॥३२॥ रामचन्द्र को कीर्ति, भग्द खतु में श्राकाश के बीच गोभित होने वाला स्त्री का मुख है, जिस के सुन्दर छुटौ में तिल है । चन्द्र में वो दाग है, वही मानो गमचन्द्र कौनिरूपी स्त्री के मुख चन्द का तित है। अथवा तुलसी काव्य तिल है अर्थात् जिस प्रकार बाच १७ तुलसी-सतसई। और तिल दोनों स्त्री के शरीर से सोभते वैसे ही मेरी कविता राम या से मोभती ।। २२॥ तुलसी सेोभत नखत-गन सरद सुधा-ऽकर साथ। मुक्ता झालर झलक जनु राम सु-जस सिसु हाथ ॥३३॥ तुलसीदास कहते हैं कि शरदकाल के चन्द्रमा के साथ सब नक्षत्र सोभित हैं, सो कैसा देख पड़ता है मानो रामचन्द्र के यशरूपी लड़के के हाथ में मोतियों को भालर झलक रही है। यहाँ वर्ण- माला के और सब अक्षरों को तारा, और राम इन दो अक्षरों को चन्द्र बनाया है। अथवा गम यश को चन्द्र, और अपनी वाणी को तारा मम बनाया ॥ रूपक अलङ्कार स्पष्ट है ॥ ३३ ॥ पातम बोध बिबेक बिनु राम भजत अलसात । लोक सहित पर-लोक की अबस बिनासी बात ॥३४॥ श्रात्मा के ज्ञान और विवेक के न रहने से रामचन्द्र के भजन में खोग बालम करते है, दमी से दम लोक के महित परलोक की बात को अवश्य कर नष्ट कर देते हैं। यदि राम भजें, तो लोगों के दोनों लोक बनें ॥ ३४ ॥ बरु मराल मानस तजै चन्द्र सीत रबि घाम । मोर मदादिक कै सजे तुलसी तजै न राम ॥३५॥ चाहे राजहंस मान मरोवर को छोड़ दे, चन्द्रमा भौतखता को कोड़े, और सूर्य्य घास को त्याग करें, और मयूर में अपने वर्षा पत

प्रथम सना
१५
मदमत्त होने को छोड़ दे, परन्तु तुलसीराम राम भकिन छोड़ेंगे।
यहाँ महामिल पाठ है, वहाँ एक प्रकार का पत्थर, जिस से मार
निकलता है, ऐसा अर्थ करना ॥ ३५ ॥
पासन द्रिद पाहार द्रिढ़ सु-मति ग्यान द्रिद होय ।
तुलसी बिना उपासना बिनु दुलहे की जाय ॥३६॥
योगशास्त्र में कहे हुये योगियों के ममान चाहे घामम खव दृढ़
हो और भोजन, बुद्धि और जान सब दृढ़ हौ दृढ़ रहे, तो भी
रामचन्द्र को उपासना के बिना ये मब माना गॅड़ स्त्री हैं ॥३॥
राम-चरन-अबलम्ब बिनु परमा-रथ की पास ।
चाहत बारिद बुन्द गहि तुलसी चढ़न प्रकास ॥३७॥
श्रीगमचन्द्र के चरण के महारे के बिना मुकि पान की त्राशा ऐमौ
है, जैसे कि मेघ के वुन्द को पकड़ कर कोई प्राकाश पर पढ़ना
चाहे ॥३०॥
राम-नाम तरु-मूल रस श्रष्ट पप फल एक ।
जुगल सन्त जुग चारि अग बरनत निगम अनेक॥३८॥
गम नाम रूपी वृक्ष मूल है, और उम के (ग्म अट) छ पाठ
चौदहो विद्या पक्त हैं, और ज्ञानरूप एक फल है, अनेक निगम
बेद और माधु लोग उसे (युगल) अर्थात् जान और भकि मय,
चौर संसार में चारो युग में चार अर्थात् अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष
करके वर्णन करते है ॥२८॥

तुलसी-सतसई। । राम-काम-तरु परिहरत सेवत कलि-तरु ठूठ । खा-रथ परमा-रथ चहत सकल मनोरथ झुठ ॥३९॥ मनुष्यलोग रामरूपी कल्पवृक्ष को छोड़ कर ठूठे अर्थात् पत्ताफल- हौन कलिकाल के वृक्ष बहेड़े को मेवा करते हैं, और इस लोक और परलोक दोनों को चाहते हैं, (इस हेतु) उनके सब मनोरथ भूठे हैं। ऊपर के दोनों दोहात्रों में रूपक अलङ्कार हैं। किसी र पुस्तक में कम-तरु पाठ भी मिलता है। वहां राम यश कल्प वृक्ष का नाग है ऐमा अर्थ करना ॥ ३८ ॥ तुलसी केबल कामना राम चरित आराम । निसि-चर कलि-करनि हत तरु माँहि कहत बिधि बाम ॥४०॥ तुलमी दाम जी कहते हैं कि केवल (कैवल्य) मुक्ति की कामना है, और राम का चरित हो पाराम अर्थात् बागेचा है, और कलिकाल- रूपी गक्षम जो हाथी है, सो वृक्ष को नाश करता है, पर मोह में पड़ कर लोग कहते हैं कि भाग्य उलटा है ॥ अथवा कलि-करनी अर्थात् कलिकाल का काम हो राक्षस है जो भाग्य तरु को नष्ट कर देता है ॥४॥ खा-रथ परमा-रथ सकल सु-लभ एक ही ओर। हार दूसरे दीनता उचित न तुलसी तार॥४१॥ (खा-रथ) इस लोक का सुख (परमा-ऽरथ) मोक्ष एक ही रामचन्द्र मेवा से (म-सम) महल में मिल सकता है। तुलसीदास (अपने प्रथम सर्ग। मग वा दूमरे भा में) कहते हैं कि दूसरे को बेवा मेरे लिये पति नहीं है॥४१॥ हित सन हित रति राम सन रिपु सन बैर विहाय। उदासीन सन्सार सन तुलसी सहज सुभाय॥४२॥ जो अपने मित्र हैं उन में मित्रता, और रामचन्द्र में भकि करना चाहिये। प्रश्नों के साथ वैर न कर संसार से उदासीन रहना उचित है। वो (माधुओं कौ) स्वाभाविक प्रकृति है अथवा तुलसी अपन मन से कहते हैं कि ऐसे खभाव को तुम ग्रहण करो॥ ४२ ॥ तिल पर राखे सकल जग बिदित बिलोकत लोग। तुलसी महिमा राम की को अग जानन जोग॥४३॥ (निल पर सकल जग राखे) आँख में एक निल रिया विम के दारा लोग सब मंसार को देखते हैं, ऐसे रामचन्द्र के मान्य को कौन जान सकता है। ईश्वर ने आँख के तिल को ऐसा छोटा बनाया, तो भी उस में ऐसी शकि दो कि सब कुछ देख पड़ता है ॥ ४॥ जहाँ राम तह काम नहि जहाँ काम नराम । तुलसी कब हूँ होत नहि रबि रजनी एक ठाम॥४४॥ कहाँ रामचन्द्र हैं, वहाँ कामना वा कामदेव नहीं रहते, अर्थात् बज-पारि कर के अपनी काममा मिद्ध करे, तो खुर्गादि का मुख मिलता है, परन्तु परमेश्वर नहीं मिलते, और जब कामना वा भोग मिला, तो राम नहीं मिल सकते। यदि निष्काम पाराधना करे, तोपर मिखंता है। अथवा जिस पर गम की दहा हो, उसे 3 10985 तुलसी-सतसई। काम वाधा नहीं करता, क्योंकि रात और दिन दोनों एक ही समय एक स्थान में कभी नहीं हो सकते । दृष्टान्त अलङ्कार स्पष्ट है ॥४४॥ राम दूरि माया प्रबल घटत जानि मन माह । बढ़त भूरि रबि दूरि लखि सिर पर पग तर छाँह ॥४५॥ (राम दूरि प्रबन माया भरि बढ़त) जब रामचन्द्र दूर हैं, तो बलवती माया (कर्म को फाँस) बहुत बढ़ती है, पर यदि रामरूपी सूर्य्य मन में रहें, तो उन्हें देख कर माया घट जाती है, जैसे जब सूर्य रहते हैं, तो परछाँही बढ़ती है, और जब दोपहर को सूर्य शिर पर आ जाते हैं, तो परछाँही घट कर पाँव तले आ जाती है॥४५॥ सम्पति सकल जगत्र की स्वासा सम नहि होइ। सो स्वासा तजुराम-पद तुलसी अलग न खोइ ॥४६॥ तुलसी कहते हैं कि सब संसार का ऐश्वर्य एक माँस के समान नहीं होता अर्थात् मरते समय संसार का राज भी दे दो, तो भी एक स्वास नहीं मिलता, उम खास को रामचन्द्र का चरण छोड़ कर और किमी स्थान में न खोत्रो। राम भजन में समय बितायो तुलसी सो अतिचतुरता राम-चरन लबलीन । पर-मन पर-धन हरन को गनिका परम प्रबोन ॥४७॥ तुलसी कहते हैं कि वही चतुरता बड़ी है जो राम के चरण में लगी रहे, नहीं तो दूसरे का मन और धन हरने के लिये तो वेश्या बड़ी चतुर होती हैं। उन को चतुराई से जगत की बुगाई प्रथम सर्ग। १९ हौ होती है, वैसे ही मंमार को माया में फंस कर धन-धादि कमाने की चतुरता से मनुष्य को बन्धन हो होता है ॥ ४० ॥ चतुराई चूल्हे परे जम गहि ग्यानहि खाय । तुलसी प्रेम न राम-पद सब जर मूल नसाय ॥४८॥ वैसी चतुराई चूल्हे में जल जाय और वैमा ज्ञान जमराज का पाहार हो जिन से रामचन्द्र के चरण में प्रौति म उत्पन हो, क्योंकि ऐसे ज्ञान मे सब कुछ जड़मूल से नष्ट होता है, जीव और अधिक बधन में पड़ता है ॥४८॥ पेम सरीर प्रपञ्च रुज उपजी बड़ी उपाधि । तुलसी भलि सो बैदई बेगि बन्धाइ व्याधि ॥४६॥ (मरौर प्रपञ्च रुज) गगैर ही प्रपञ्चरूप रोग है और इसमें पौति उत्पन्न हुई है, तुलमी कहते हैं कि इस शरीर के कामक्रोधादि बड़ौर उपाधि और व्याधि को बाँधनेहारी बैई अर्थात् चान भला है जिस के होने में दम में में व्याधि घट जाती है ॥४८॥ राम बिटप तरु बिखद बर महिमा अगम अपार। आ कहज लगि पहुँच है ता कह तह लगि डार ॥५॥ रामचन्द्ररूपी श्रेय वृक्ष बहुत बड़ा है और उन का महान्य अमन चौर शेय है, परन्तु जिस को जहॉ तक उस महिमा का जाग रे उम का वही डार पकड़ के बचना हो मकता है। राम के परित अपार है इन में से थोड़ा भी जपं तो मुक्ति मिल सकती है॥५० २० तुलसी-सतसई। तुलसी कोसल-राज भजु अनि चितबै कहुँ ओर। पूरन राम मयत मुख कर निज नयन चकोर ॥५१॥ तुलसी दास कहते हैं कि अयोध्या के राजा राम को भजो धीर किसी को और न देखो अर्थात् किसी को भी उपासना न करो। रामचन्द्र पूर्णचन्द्ररूपी मुख के लिये अपने नेत्रों को चकोर पनी बना लो। अर्थात् जैसे चकोर चन्द्रमा के किरण को पीता है सेही तेरे नेत्र राम मुख देखें ॥ ५१ ।। ऊँचे नीचे कहुँ मिले हरि-पद परम पियूख । तुलसी काम-मधूख तें लागै कवनि हुँ रूख ॥५२॥ रामचन्द्र के चरण में प्रेमरूपी अमृत, चाहे जहाँ ऊंचौ वा नौची पात वा नौच के पास मिले, विना लिये न छोड़ो, इस में दृष्टान्त देते कि कामरूपी मधु के छाते से चाहे जिस ओर से लो मधुरूपी अमृत अवश्य मिलेगा। जहाँ "मयुख” पाठ हो वहाँ चाहे (कवनि खतें लाग) किसौ वृक्ष से लगे पर चकोर को चन्द्रकिरण (मयूख) से मुख होता है वैसे ही भक को भी होना चाहिये, ऐसा अर्थ करना॥५२॥ स्वामी होना सहन है दुरलभ होना दास । गाडर लाये ॐन काँ लाग्यो चरन कपास ॥५३॥ खामौ होना बहुत महज है, परन्तु सेवक होना बहुत कठिन है। पटाना देते है कि जैसे (गाडर) भेडी साया कि उस से जन मिलेगा, सपा उस के खेत कोई (मन) का वृक्षही चरने लगी। मनुष प्रथम सर्ग। २१ रेह इस लिये पाया कि पुन्य कर मुक्ति पायेंगे ; सो उसी मरौर से चौर भी पाप होने लगा ॥५॥ चलब नीति-मग राम-पद-प्रेम निबाहन नीक। सुलसी पहिरिय सो बसन जोन पखारत फीक ॥५४॥ मौति की राह से चलना और गमचन्द्र के चरण में प्रौति रखना बहुत अच्छा है, इस में तुलसी दृष्टान्त देते हैं कि ऐमा वस्त्र पहनना पाहिये वो धुलाने से फौका न हो जाय । इस संसार का सुखभोग नश्वर होने के कारण फौका है, परन्तु ईश्वर प्रीति नश्वर नहीं है॥५४॥ तुलसी राम क्रिपालु ते कहि सुनाउ गुन दोस । होउ दुबरी दीनता परम पीन सन्तोस ॥५५॥ तुलसीदास कहते हैं कि परम दयालु रामचन्द्र से अपना गुन अवगुन कह सुनात्रो अर्थात् क्षमा के लिये प्रार्थना करो तो तुम्हारी दौनता छोटी हो जायगी और मन्तोष बढ़ेगा ॥५५॥ सुमिरन सेबन राम-पद राम-चरन पहचानि । ऐसे हुलाभन ललक मन तो तुलसी हित हानि॥५६॥ राम के चरण को पहचान के उस को मेवा और स्मरण करो, जो ऐसे उत्तम लाभ में भी तुम्हारा मन न ललके, तो तुम्हारे कथान कौबड़ी हानि होगौ ॥५६॥ सब सनी बाधक भये साधक भये न कोय । तुलसी राम क्रिपालु तें भलो होय होय ॥५७॥ जितने मित्र मिले सब बाधा हौ डालनेहारे ज्ये, कोई सहायता २२ तुलसी-सतसई। नहीं करता, परन्तु अब श्रीराम दयानिधान से जो भलाई हो वही ठीक । तात्पर्य यह कि जितनी आँख कान नाक श्रादि इन्द्रियाँ वा लड़के वाले हैं, सब संसार में पुरुष को अपने विषय में लगा कर बाँधते है, परमार्थ के उपयोगी कोई नहीं, इस कारण ईश्वर को पाराधना परम उपकारी है॥५॥ तुलसी मिटइ न कलपना गये कलप-तरु छाँह । जो लगि द्रबह न करि क्रिपा जनक-सुता को नाँह ॥ ५८॥ तुलसीदास कहते हैं कि कल्पवृक्ष की छाया में जाने से भी भोग पाने की कल्पना नहीं रुकती, परन्तु यदि रामचन्द्र दया करें और भकिज्ञान दे कर चित्त को स्थिर करें, तो भाग को इच्छा कम हो मकती है, क्योंकि मनुस्मृति में लिखा है कि (न जातु कामः कामाना- मुपभोगेन शाम्यति) उपभोग करने से कामशमन नहीं होता ॥५८॥ बिमल बिलग सुख निकट दुख जोब न समइ सुरीत। रहित राखिये राम की तजे ते उचित अनीत ॥५६॥ (जौब बिमल) प्राण निर्मल शुद्धस्वरूप परमात्मा का अंश है, (सख बिलग) परन्तु नाना उपाधियों के बशीभूत हो कर सुखरूप परमात्मा से अलग हुआ है, (दुख निकट) और संमागै दुख में लिप्त हाहै। (राम की रहित राखिये उचित न) सो रामरूप परमात्मा से इस जीव को अलग रखना उचित नहीं है, (अमौत) बरन अलग रखना बड़ी अनौति का काम है। (समद राखिये) इस खिये ऐसा प्रथम सर्म। करना कि यह राम से समय अर्थात् मेल रक्खे। संसार के सब पदार्थ नश्वर है राम प्रमश्वर है, इस से उन से प्रेम रखना अवस चाहिये ॥ ५॥ जाय कहब करतूति बिनु जाय जोग बिनु छेम । तुलसी जाय उपाय सब बिना राम-पद-प्रेम ॥६॥ विना करनी के कहना व्यर्थ है, विना कल्याम के योग व्यर्थ और रामचन्द्र के चरण में भक्ति के विना संसारौ सब उपाय व्यर्थ है ॥६॥ तुलसी रामहि परिहरैं निपट हानि सुनु माद । जिमि सुरसरि गत सलिल बर सुरा सरिस गोदा६१॥ तुलमोदाम कहते हैं कि हे मन (सुनु) सुनो (गहि परिहरें 'मोद निपट हानि) रामचन्द्र के विमा सुख भी बड़ी हानि के समान है,जैसे गङ्गाजल जब गङ्गाजी में है तो उत्तम है, परन्तु वहौ मदिग में मिलने से अपवित्र मद्य हो जाता है॥११॥ परेचरै तापहि बरे फरे पसारहिँ हाथ । तुलसी स्वा-शरथ मीत जग परमा-रथ रघुनाथ ॥६२॥ जब तक वृक्षरूपी मनुष्य इराभग है तब तक लोग उसे चरते हैं; उस का धन जहाँ तक बने खाते पोते हैं, जब सूखना है तो नापते उसकी लकड़ी जलाते और मनुष्य पक्ष में सुख पाते हैं और जब फरता है तो हाथ पसार के उम का फल तोड़ते मनुष्य पक्ष में उस के साथ सुख भोगते हैं, इस प्रकार मंमागे लोग खारथ अर्थात् अपने

२७
तुलसी-सतसई।
काम के मनी हैं, परन्तु परलोक सुख देनेहारे वेवस रामजी
२॥३२॥
तुलसी खोटे दास को रघुपति राखत मान ।
ज्यों मूरख उपरोहितहि देत दान जजमान ॥ ६३ ॥
खराब सेवक का भी रामचन्द्र सादर करते हैं जैसे उपरोहित
मूर्ख हो तो भो जजमान उमे दान देता है ॥ ६३॥
ज्या जग बैरी मीन को श्रापु सहित परिवार ।
त्यों तुलसी रघुनाथ बिन बापन दसा विचार ॥६४॥
जैसे सब मंमार अपने परिवार महित मछली के शत्रु हैं, अर्थात्
बड़े मच्छ छोटे को खाते हैंउसी प्रकार रामचन्द्र बिना अपनी दशा
समभानी चाहिये । ६४॥
तुलसी राम भरोस सिर लिये पाप धरि भोट ।
ज्या व्यभिचारिनि नारि को बड़ी खसम को ओट॥६५॥
तुलसी कहते हैं की राम भरोसे पर शिर पर पाप की मोटरी
धर लिया जैसे खराब स्त्री के लिये अपने पति का भाड़ बड़ा रहता
है। अभिप्राय यह है कि गम भरोसे पाप करना अनुचित है ॥६५॥
स्वामी सीतानाथ-जी तुम लगि मेरी दार।
तुलसी काग जहाज कँह सनत और न ठौर ॥६६॥
हे प्रभु राम ! पाप हो की मुझे पाया है, मैं जहाजी कौवे के
समान समुद्र के मध्य में है, किसी और नहीं समती ॥६६॥

प्रथम सर्ग। २॥ तुलसी सब छल छाडि के कीजे राम सनेह । अन्तर पति साँ है कहा जिन देखी सब देह ॥६७॥ तुलसी (भक से वा अपने मन में ) कहते हैं कि मब प्रका, का छल छोड़ कर रामपद में प्रीति करो। जिम पति ने सब देह देखा उस से किस वस्तु का अन्तर है॥ ६७ ॥ सब ही को परखे लखे बहुत कहे का होई। तुलसी तेरो राम तजि हित जग और न कोइ॥६॥ बहुत क्या वर्णन करें मव को देखा और परीक्षा लिया अपना हित राम को छोड़ इस संमार में और कोई नहीं है ॥१८॥ तुलसी हम साँ राम को भलो मिलो है सूत। छोड़े बनइ.न सङ्घहे ज्याँ घर माहँ कपूत ॥ ६ ॥ तुलसी कहते हैं कि राम को मुझ मा अच्छा कुपुत्र भक वा अरुमा हुत्रा मृत मिला है। जैसे किमो टहन्थ के घर में कुपुत्र वा अरुझा सूत रहता है, तो न वह उमे रख मके न छोड़ मके ॥१८॥ कोटि बिन सङ्कट बिकट कोटि सत्रु जौ साथ । तुलसी बल नहि करि सके जो सुदिष्ट रघुनाथ ॥७॥ चाहे कहोरों विघ्न और बड़ा भारौ महट और कडोरों शत्रु भी हो, तो भी जो राम प्रसन्न रहें तो वे कुछ नहीं कर सकते न उन का बस लगे।। ७०॥

२८ तुलमी-सतसई। लगन मुहरत आग बल तुलसी गनत न काहि । राम भये जेहि दाहिने सबै दाहिने ताहि ।। ७१ ।। तुलमी, -लम माइत और योग के बल को कुछ नहीं गनते । क्याँकि राम जब जिम पर अनुकूल होते हैं उस के लिये सब सुखदाई हो जाते हैं ॥१॥ प्रभु प्रभुता ना को दई बोल सहित गहि बाँह । तुलसी ते जागत फिरहिँ राम छच की छाँह ॥७२ ।। श्री राम ने बॉह पकड़ कर और बात कह कर जिन्हें सामर्थ्य दिया वे राम को ग्च्छा में रह कर मावधानता से विचरते फिरते है॥७२॥ साधन सासत सब सहत सुभ न सुखद फल-लाहु । तुलसी चातक जलद की रीझ बूझ बुध काहु ॥ ७३॥ कोई कोई पण्डित चातक और मेघ की रीझ अर्थात् प्रीति समझते हैं। वह सब दुख महता है और (न सुखद न सुभ न फल लाभ अर्थात् ) उम को न सुख होता न कल्याण और न किसी फल का लाभ होता और न जल पाने का कोई माधन वा उपाय है। जहॉ सुमन सुखद पाठ हो वहॉ-बहुतेरे जन देनेहारे मंमारी कर्म फल को पाने के लिये अथवा फलरूप ज्ञान के हेतु मब प्रकार के साधन उपायों को करते हैं और दुख महते हैं बौर चातक तथा मेघ को प्रीति को कम लोग समझते हैं। ऐसा अर्थ करना चाहिये ॥३॥ के समान सुख प्रथम सर्ग। चातक जीवन जलद कह जानत समय सुरीति । लखत लखत लखि परत है तुलसी प्रेम प्रतीति ॥७४॥ चातक अपने प्राणरूप मेघ का वा जल और मेघ दोनों का सुसमय और सुरौति जानता है। औरों को उस का प्रेम और विश्वास देखते देखते कठिनता से लख पड़ता है। अथवा जैसे चातक के वचे देखते र मेघ जल को रीत जान लेते वैसे ही प्रेमी प्रौति और विद्यास को ममझ लेते हैं ॥७४ ॥ जीब चराचर जहं लगे है सब को प्रिय मेह । तुलसी चातक मन बसेउ घन साँ सहज सनेह ॥७॥ चर मनुष्यादि अचर वृतादि जितने जीव मंमार में है मब काजल परन्तु चातक के मन में मेघ को मसी प्रोति रहती है।०५॥ डालत बिपुल बिहङ्ग बन पियत पोखरिन बारि। सुजस धवल चातक नवल तार भुवन दस-चारि ॥७६॥ बन में वहतरे पनी विचग करते हैं और पोखरियों का जम्न पीते हैं परन्तु हे चातक चौदहाँ लोक में तेग निर्मल और नया यन्त्र का रहा है कि केवल स्वाती के मेघ का जन्न पीता है और नहीं ॥७॥ मुख मीठे मानस मलिन कोकिल मर चकार । सुजस ललित चातक बलित रहेउ भुवन भरि तार॥७॥ कोकिल मोर और चकोर की बोली मोठी है और मन कपट- भरा है। क्योंकि वे मब कोई मकोड़े मर्प और प्राग आदि के खान- प्यारा है

तुलसी-सतसई।
हारे है। परन्तु हे चातक लोक में तेरा सुन्दर नाम विराज रहा
॥ इन कई एक दोहाँ में अन्योकि अलङ्कार मान कर कोकिल
अादि मे दूमरे २ कपटी जनाँ और चातक से तुलसी श्रादि प्रेमी
भक जना का अर्थ भी ध्वनित होता है ॥७॥
माँगत डोलत है नहीं तजि घर अनत न जात ।
तुलसी चातक भक्त की उपमा देत लजात ॥७८॥
चातक स्वाती का जल माँगता है पर भक माँगता नहीं, और
घर छोड़ कहीं नहीं जाता । दूम से तुलमौदाम चातक की उपमा
भक से देने में लजाते हैं। उन दाँहों में चातक के मिस से भक की
महिमा दिखा कर हम में प्रतीप अलङ्कार द्वारा चातक से भी
अधिक भक को बड़ाई दिखाई। यदि ऐमा अर्थ करें कि भन माँगते
हैं और चातक नहीं मांगता, तो चमत्कारी नहीं पाती और बड़े २
कवियों मे लिखा है (चातकोऽपि हृषिताम्बु याचते-घट कर्परः)
कि प्यामा हो कर चातक जल मांगता है दूम से विरोध होगा ॥७८॥
तुलसी तीनों लोक माँ चातक हो के माथ ।
सुनियत जासु न दीनता किये दूसरो नाथ ॥ ७९ ॥
तीनों लोक में चातक हो के शिर (मुयश का मुकुट) है, अथवा
उमी के शिर को मचा शिर कह मकते है, जिस को दौनता न सुमने
में पाई अर्थात् जिम ने स्वाती जलद को छोड़ और किसी को
अपना स्वामी म बनाया ॥ ८ ॥

प्रथम सर्ग।
२९
प्रीति पपीहा पयद की प्रगट नई पहिचानि ।
जाधक जगत अधीन इन किये कनौड़ा दानि॥८॥
पपोहे और मेघ के प्रेम में एक नई बात देखी जाती है कि
जगत में अधीन जाचक श्राप लजाता है, परन्तु पपीहे ने अपने
दानी को लज्जित किया ॥ ८०॥
ऊँची जाति पपीहरा पियत न नीचा नीर।
कै आचे घन स्याम साँ कै दुख सहै सरीर ॥८१॥
पपीहा ऊँची जात का हो कर नीचे का जन्ल नहीं पीता, या तो
काले मेघा से माँगता, नहीं तो प्यामी का दुःख महता है॥ ऊँचौ
जात के भकभी धन के मम ग्यामवर्ण राम ही की सेवा करते हैं॥८॥
कै बरखे घन समय सिर कै भरि जन्म निरास ।
तुलसी जाचक चातकहिँ तऊ तिहारी पास ॥८२॥
या तो ममय पर स्वाती लगने पर मेघ शिर पर बरमता
(तो पौते), नहीं तो जन्म भर पाशाहीन होते, तो भी चातकरूपी
जाचक भक को केवल घनश्याम की आशा है ॥२॥
चढ़त न चातक चित कब हुँ प्रिय पयोद को दोख ।
या ते प्रेम पयोधि बर तुलसी जोग न गख ॥३॥
चातक भक के मन में स्वामी मेघ का दोष कभी नहीं पाता हमी
से उस का प्रेमभक्रिरूपो ममुद्र क्रोध के योग्य नहीं है ॥८३ ॥

तुलसी-सतसई ॥ तुलसी चातक माँगनाँ एक एक घन दानि। देत सो भू-भाजन भरत लेत छुट भरि पानि॥४॥ चातक मॉगनेहाग है और एक एक मेघ देनेहारे ऐसे हैं कि भूमिरूपी पात्र भर जाता है परन्तु वह अपने लिये केवल घाँट भर जल लेता है। अथवा चातक का माँगना और मेघ का देना दोनों एक २ प्रकार मे अद्भुत हैं, क्योंकि वह माँगता थोड़ा और मेघ देता बात है जिम में लोगों का उपकार होता है॥८॥ होइ अधीन जाचै नहीं सीस नाइ नहि लेइ । ऐसे मानी माँगनहिं को बारिद बिनु देव ॥५॥ अधीन हो कर नहीं मांगते न शिर नौचा कर के लेवे ऐसे मानी मॉगनेहारे को घनश्याम छोड़ और कौन देता है ॥८५॥ पबि पाहन दामिनि गरज अति झकार खर खीझ । दोस न प्रीतम रोस लखि तुलसी रागहिँ रीझ॥८६॥ वज पाषाण विजुली गरजना बहुत झटाम और अधिक क्रोध श्रादि अपने प्रभु का गेष देख कर भी उन का दोष नहीं गमता परन्तु भक्रिरूप अनुगग में डूबा रहता है ॥ (चातक वा भजन ) ॥ ८६ ॥ को न जिआये जगत मँह जीवन दायक पानि । भयो कनौड़ा चातकहिँ पयद प्रेम पहिचानि॥७॥ जीव वा प्राण के दनेहारे मेघ ने इस संमार में किस को नहीं जिलाया अर्थात् सभी को जिलाया परन्तु चातक के प्रेम को देख कर उसे लजित होना पड़ा॥७॥ - प्रथम सर्ग। मान राखिबा माँगियो पिय साँ सहज सनेछु । तुलसी तीनों तब फबै जब चातक मत लेहु ॥८८॥ मान रखना माँगना और स्वामी से स्वाभाविक प्रेम ये तीनों तभी सजते हैं जब चातक से उपदेश लिया जाय ॥८॥ तुलसी चातकहीँ फबै मान राखिबा प्रेम। बक बूंद लखि स्वाति का निदरि निबाहे नेम ॥८॥ तुलसी कहते हैं कि मान और प्रेम रखना चातक हो को शोभित होता है क्योकि खातो का बँद टेढ़ा देखे तो वह उम का निरादर कर अपना नियम निबाहता है अर्थात् मौधे हो बूंद को लेता है॥८॥ उपल बरखि गरजत तरजि डारत कुलिस कठोर। चितब कि चातक जलद तजि कब हुँ बान की ओर ॥१०॥ पत्थल बरम कर गरजता तड़पता है और बड़े कठिन वन को गिराता है (तो भी) क्या चातक मेघ को छोड़ दूमरे को श्रार कभी देखता है ॥ काकु है अर्थात् नहाँ देखता और कितना भी दुख पावे तो भी भकि में स्थिर रहता है ॥८॥ बरखि परुख पाहन जलद पच्छ करै टुक ट्रॅक । तुलसी तदपि न चाहिये चतुर चातकहिँ चूक ॥११॥ मेघ कठोर कठोर पत्थलों को बरम कर पल को तोड़ कर.

तुलसी-सतसई।
टुकड़े टुकड़े कर देता है। तुलसी कहते हैं तो भी चतुर चातक
को (सेवा से) चूकना न चाहिये ॥ ८१ ॥
रटत रटत रसना लटी विखा सूखि गण अङ्ग।
तुलसी चातक के हिये नित नूतनहि तरङ्ग ॥१२॥
(पानी के लिये) रटते रटते जीभ लट गई हषा से अङ्ग सुख
गये (तो भौ) चातक के हृदय में नये (प्रेमरूपौ) तरङ्ग प्रति दिन
उठा करते है ॥२॥
गगा जमुना सुरसती सात सिन्धु भरि पूरि।
तुलसी चातक के मते बिन स्वाती सम धूरि ॥१३॥
गङ्गा यमुना मरम्वती (श्रादि नदियाँ) और मातों ममुद्र में जल
भरा है, तो भी तुम्नमी कहते हैं कि चातक स्वाती के जल विना
इन माँ को धूलि के ममान समझता है ॥६३ ।।
तुलसी चातक के मते स्वाति उ पियत न पानि।
प्रेम-विखा बढ़ती भली घटे घटैगी कानि ॥१४॥
तुम्नमौदाम कहते हैं कि (तुलमो के मते चातक स्वाति उ पानि
न पियत) मेरे मत से चातक स्वाती के जन्न को भी इच्छा भर नहीं
पौता, क्योंकि प्रेम को प्यास का बढ़ना भला है (घटे कानि
घटेगी) और यदि जल पी लेंगे तो इच्छापूर्ति के कारण प्रेम
घटेगा तो लज्जा जातौ रहेगौ ॥ ८४ ॥
सर सरिता चातक तजेउ स्वाति उ सुधि नहिँ लेइ।
तुलसी सेवक बस कहा जो साहिब नहि देव ॥१५॥

प्रथम सग। चातक ने तलाव नदी सब त्याग किया और खातीने भौखबरम नौ। तुलसीदाम कहते हैं कि जो खामौ न दे तो इस में सेवक का क्या वश चलेगा॥४५॥ पास पपीहा पयद की सुनुहो तुलसी दास । जो अँचवे जल स्वाति को परिहरि बारह मास ॥६६॥ पपोहे का मेघ को पाशा करना सन कर (पाश्चर्य होता है) जो बारहों महीने प्यासों मरेतोमरेपर खाति हौ का जल पोताई॥८॥ चातक घन तजि दूसरो जित न नाई नारि। मरत न माँगे अरध-जल सुरसरि हूँ को बारि॥६॥ चातक ने जीते जी मेघ को छोड़ और किमो के जल के लिये नटरी वा गला न रोपा और श्राधे जल में, बौच धग में, मरते मरते भी गङ्गा जी के जल को भी न मांगा ॥ ८७॥ याधा बधंउ पपीहरा परउ गङ्ग-जल जाइ। चाँच मूं दि पीवै नहीं धिग पीना पन जाइ ॥१८॥ व्याधे ने पपोहे को माग और वह गङ्गा के जल में जा गिरा, (परन्त) चौच मुंद लिया और जम्न न पीया, क्योंकि प्रेम के नष्ट होने के भय से पौने को धिक्कार समझा ॥८॥ बधिक बधे पर पुन्य जल उपर उठाई चाँच । तुलसी चातक प्रेम-पट मरत न लायो खाँच ॥६॥ याधे ने पपौर को माग और वह जा कर पवित्र जम्न में गिरा, तो भी अपना चोंच ऊपर उठा लिया। तुलमोदाम कहते हैं कि 5

तुलसी-सतसई।
(देखना चाहिये) पपौहे ने मरते समय भी अपने प्रेमरूपी वस्त्र में
खाँच नहीं लगने दिया ।। ८८ ॥
चातक सुतहि सिखाव नित आन नीर जनि लेहु।
यह इमरे कुल को धरम एक स्वाति साँ नेहु ॥१०॥
चातक अपने बच्चे को अथवा भक अपने मन वा शिष्यों को प्रतिदिन
मिखाते हैं कि दूसरा जल मत लेना क्योंकि मेरे कुल का यही धर्म
कि एक खाती को छोड़ और किमी से प्रेम नहीं करते ॥१०॥
दरस परस नहि आन जल बिनु स्वाती सुनु तात ।
सुनत घेचुत्रा चित चुभेउ समुझि नीति बर बात॥१०१॥
हे प्यारे विना स्वाती के दूमरे जल का स्पर्श वा दर्शन न (करना)
यह मौति की अच्छी बात सुनते ही बच्चे वा भक के मन में चुभ गई
तुलसी सुत
साँ कहत यह चातक बारहि बार।
सात न तरपन कीजियो बिना बारि-धर बार॥१०२॥
चातक वारवार अपने पुत्र से कहता है कि हे प्यारे विना खाती
के मेघ के जल तर्पण मत करमा ॥ १०२॥
बाज चङ्गुगत चातकहिँ भई प्रेम की पीर ।
तुलसी पर-बस हाड़ मम परिहे पुहुमी-नीर॥१३॥
बाज चङ्गुल में पड़े चातक को प्रेम का दुख हुश्रा, उस ने विचार
कि मेरा हाड़ परवा हो कर भूमि के जल में पड़ेगा। अथवा
चातक को यह डर हुत्रा कि ऐसा न हो कि मेरे हाड़ को कोई
दूसरे जल में गिरा दे ॥ १०॥
॥२०१॥

प्रथम सर्ग।
प्रसाद
अण्ड फोरि किय चेंचुधा तुख पर नीर निहारि।
गहि चङ्गुल चातक चतुर डारेउ बाहर बारि॥१०४॥
अण्डा फोर कर बचा निकाला पर उस के फुकले को जल में पड़ा
रेख कर चतुर चातक ने चङ्गुल से उसे पकड़ कर जल के बाहर
निकाल दिया ॥ १०४ ॥
होत न चातक पातकी जीवन-दानि न मूढ़।
तुलसी गति प्रसाद की समुझि प्रेम-पद गूढ़ ॥१०५॥
चातक भी पापो नहीं होता और उम का जल देनेहाग भी मूर्ख
नहीं होता। क्योंकि वह प्रेम के
गढ़तत्व
और की गति को
समझता है। अभिप्राय यह कि अति प्यामा हो कर भी और मक्षों
तथा गङ्गा प्रादि के जल को न पी कर प्रात्म पौड़ा का पाप चातक
को नहीं लगता और स्वाती में न वरमामेहारा मेघ भी ही नहीं
कहाता । चातक समझता है कि प्रसाद जी ने अपने पिता की
पाशा न मानो तो भी प्रेम के कारण पाप भागी न हुये ।। १०५ ॥
तुलसी के मत चातकहिँ केबल प्रेम-पियास ।
पियत स्वाति जल जान जगाचत बारहमास॥१० ६॥
तुलसी के मत से चातक को केवल प्रेम को प्याम है और मंमार
जानता है कि बारहों माम में चातक माँगा करता है परन्तु स्थानी
ही का जल पीता है। जहाँ तावत पाठ हो वहाँ १२ मास जला
करता है ऐसा अर्थ लगाना चाहिये ॥१०॥

तुलसी-सतसई।
एक भरोसो एक बल एक पास बिस्वास ।
स्वाति-सलिल रघुनाथ बर चातक तुलसीदास ॥१०७॥
इस दोहे में पा कर ऊपर का सब प्राशय खोल दिया। ऊपर
स्वातिनखरूप औरामचन्द्र को अथवा राम इस नाम के दोनों वर्गों को
खाती का जल समझना चाहिये, और एक उमौ को पाशा भरोसा
और बल विश्वास रखनेहारे चातकरूप तुलसीदास जी (वा तु-तुरङ्ग-
वाइन (राम) ल (लक्ष्मण) और सौ (सौता) दून के दास जो अच्छे
अच्छे भक्त हैं) उन को समझना चाहिये। जो भक अपनी भकि
में चातक के ममान दृढ़ रहते हैं उन को परमेश्वर अवश्य मिलते
। पहले अनेक दोहों में चातक को भकि को उत्कटता दिखला
कर भकों को चेताया है और मेघ के ममान श्रीगम को जीवन-
दाता दिखलाया है॥१०७ ॥
बालबाल मुक्ताहान हिय सनेह-तरु-मूल ।
हेरिहरु चित चातकहिँ स्वाति-सलिल अनुकूल॥१०८॥
पदयरूपी भूमि पर रामचन्द्र के गुणगणरूपी माती की माला को
थाला है उस में से स्नेहरूपी (पञ्चाङ्ग) वृक्ष का मूल निकलता है
हे मन जब लू चातक को वृत्ति को (हरि) खोकार कर (हेरु) उसे
खोजे तब स्वाती जलरूपी श्रीरामचन्द्र अनुकूल होवेगे अर्थात्
मिलेंगे। अभिप्राय यह कि खातिमलिलरूपी राम को खोजने के
लिये इधर उधर घूमना न चाहिये, वे सब के पदय में वर्तमान है,
भक्तिपूर्वक अपने मन ही में खोज लो ॥ १०८ ॥

प्रथम सर्ग। राम प्रेम बिनु दूबरो राम प्रेम सह पोन । बिसद सलिल सरबर बरन जन तुलसी मन-मीन ॥ १०६॥ (बरन बिसद सरबर) राम दूम नाम के दो अक्षर निर्मल मरोवर हैं, (प्रेम बिमद मलिल) उम में प्रेमरूप निर्मल जल है जिस में (तुलमो जन मनमौन) राम लक्ष्मण जानकी जी के भकों के मनरूपी मछली रहती है। प्रेमभकि के विना राम अनुकूल नहीं होते और उसी प्रेम के रहने से अनुकूल वा प्रसन्न होते हैं ॥ अथवा (राम प्रेम बिनु दूबगे) अर्थात् वह भक चित्तरूपौ मछली रामचन्द्र जौ के प्रेमरूपी जल के विना दुबलो हो मरती है और उमी प्रेम- रूपी जल को पा कर (पौन) मुटाती है । १०८॥ आप बधिक बर बेस धरि करउ कुरङ्गम राग। तुलसी जो मृग-मन मुरे परै प्रेम पट दाग ॥ ११०॥ इति श्रीगोखामितुम्नमौदामविरचितमप्ततिकार्या भक्रिनिई यो माम प्रथमः मर्गः॥ व्याध ने श्राप उत्तम भेष धारण कर के (कुरङ्गम राग) उस राग को बजाया जिम को सुन मृग माहित हो जाते हैं, ऐसे गग को सुन कर भी जो मृगरूपी मन मुर जाय तो प्रेमरूपी वस्त्र में दागी पड़ जायगी अर्थात् पक्का प्रेम नहीं होगा ॥ ११ ॥ ॥इति विहारिकृतमंक्षिप्तटोकायां प्रथमः मर्गः ॥

तुलसी-सतसई। अथ द्वितीय सर्ग। खेलत बालक व्याल सँग पावक मेलत हाथ। तुलसी सिसु पितु-मातु इव राखत सिय-रघुनाथ ॥१॥ पहले मर्ग में भकि कौ दृढ़ता दिखा कर दूसरे में उपासना दिखलावेंगे। लड़के सर्प के साथ खेलते और भाग में हाथ डालते परन्तु माबाप के ममान मौताराम जौ (लड़कों वा भक्कों को) रक्षा करते हैं। पूर्णपमालङ्कार है और भक को बालक को तथा मौतागम को मातापिता को उपमा दी गई है ॥१॥ तुलसी केबल राम-पद लागे सरल सनेह । तौ घर घट बन बाट मह कतहुँ रहे किन देह ॥२॥ तुलमोदाम कहते हैं यदि गम के चरण में खाभाविक प्रेम रहे तो मनुष्य का देह घर घाट वन राह चाहे जहाँ रहे अच्छा ही होता । अभिप्राय यह कि भक्रिहीन चाहे वन में तप करे चाहे गङ्गा के तौर बैठा रहे पर विशेष फल नहीं, परन्तु भक्रिसहित ग्रहस्थ को आश्रम में रहने से भी मुक्ति मिल सकती है ॥२॥ कै ममता करु राम-पद कै ममता परिहेलु। तुलसी दो मँह एक अब खेल छाडि छल खेलु ॥३॥ तुलसीदास कहते हैं कि या तो हूँ रामचन्द्र के चरण में ममता

द्वितीय सर्ग।
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कर, नहीं तो ममता को छोड़ दे। वैराग ले (छल शडि अबरो
मह एक खेल खेलु) कपट छोड़ कर इन दोनों में से एक खेल को
अवश्य खेलो ॥३॥
कै सोहि लागहिराम प्रिय के तु राम प्रिय हो ।
दुइ महँ उचित सुगम समुझि तुलसी करतब तोहु॥४॥
या तो राम तुझे प्रिय लगें नहीं तो भजन श्रादि कर के वू हौं
राम का प्याग भक हो जा। तुलसी कहते हैं कि इन दोनों बातों में
जो तुझे महज और उचित जान पड़े वहौ तेरा कर्तव्य है ॥ ४ ॥
दास
सँग कायर चलहिँ कुचाल ।
खर दूखन मारीच सम मूढ़ भये बस काल ॥५॥
कादर दुशु जन (वा मेग मन) (गबनारि दाम) रावण के
शत्रु
राम उम के दाम भक लोगों (वा तुन्नमी) के मङ्ग कुचाल चलते हैं
(भजन में विघ्न डालते हैं)। ये मूर्व खर दूषण और मागैच नाम
राक्षसों के ममान काल के वश हुये हैं ॥५॥
राबना-रि के
तुलसी-पति दरबार माँ कमी बस्तु कछु नाहि।
करम-हीन कलपत फिरत चूक चाकरी माहि॥६॥
(तुलमी-पति) राम के दरवार में किसी वस्तु को कमती नहीं है
परन्तु
जो कर्महीन उद्योगरहित भजमादि नहीं करते वा नहीं किये
हैं बौर (चाकरी) ग़मसेवा में चके हैं वे ही रोते फिरते हैं॥६॥

तुलसी-सतसई। राम गरीब-नवाज ह राज देत जन जानि । तुलसी मन परिहरत नहिँ घुरबिनियाँ की बानि॥७॥ गमजी गरीबों के बड़े मङ्गलदाता हैं और भक को पहचान कर राज भी देते हैं (जैसे विभीषण उग्रसेन श्रादि को दिया), परन्तु भक्तों का मन (घुरबिनियाँ) घर पर जा कर एक एक दाना बिनना (इधर उधर दूसरों की सेवा में भटकना जैसे मुर्गो करती हैं) इधर उधर भटकने का अभ्यास नहीं छोड़ता ॥७॥ घर कीन्हे घर होत है घर छोड़े घर जाय । तुलसी घर बन बीचहीं रहो प्रेम-पुर छाय ॥८॥ घर बनाने से घर हो का होना पड़ता है और घर को छोड़ देने से घर नष्ट हो जाता है, दम लिये घर और वन दोनों के बीच (प्रेम-पुर) राम को भक्तिरूपी नगरी में रहना चाहिये। (अर्थात् जा तप करना दोनों छोड़ कर केवल भकि करना अति उत्तम है दूस से घर वन दोनों वनते हैं ॥८॥ राम राम रटिबो भलो तुलसी खता न खाय । लरिकाई को पौरिबो धोखे उ बूड़ि न जाय ॥६॥ राम राम जपना बहुत अच्छा है क्योंकि इम में भक धोखा महीं खाता। दूम में दृष्टान्त देते हैं कि लड़कई में जिन्हे तैरना पाता है वे धोखे से भी पानी में जा पहें तो भी नहीं डूबते । यहाँ संसार समुद्र में डूबना लेना चाहिये ॥६॥ ग्रहस्थाश्रम और वन में दितीय सर्ग। १ तुलसी बिलम न कीजिये भजि लीजे रघुबीर । तन तरकस से जात हैं स्वास सरीखे तीर ॥१०॥ तुलसीदास कहते हैं कि राम भजने में कुछ भी विलम्ब म की- जिये क्योंकि शरीररूपी तरकस से तौर के ममान खाम निकली जाती है। अर्थात् श्रायुष्य बहुत शौघ्र बीत रहा है। रूपक अलकार स्पष्ट है ॥१०॥ राम नाम सुमिरत सुजस भाजन भयेउ कुजाति । कुतरु कुसरु पुर राज बन लहत भुवन विख्याति॥११॥ कुजाति (मेवरी, गोध, अजामिल आदि) गमनाम के स्मरण से अच्छे यश के भागी हुये, उसी प्रकार (दण्डक बन के) खगव वृक्ष (कुश श्रादि) कुमरु (खराब मरोबर) बन (दण्डक श्रादि) पुर नगर राज श्रादि मबॉ ने मंमार में प्रमिद्धि पाई ॥११॥ नाम-महातम साखि सुनु नर को केतिक बात। सरबर पर गिरिवर तरे ज्या तरुबर के पात ॥१२॥ राम नाम के माहात्म्य के मातियों को सुनिये (मरबर पर गिरि बर तरे) समुद्र में बड़े बड़े पहाड़ बौर पत्थल उत्तराये (ज्यों तक- बर के पात) जैसे सुवृक्ष के वा पीपल के बड़े बड़े पत्त तेरे और मनुष्य नाम माहात्म्य से बर श्रेष्ठ हो आय, दम की तो कुछ बात हो न कहनी चाहिये ॥ १२ ॥ ग्यान गरीबी गुरु-धरम नरम बचन निरमोस । तुलसी कब हुँ न छाड़िये सील सत्य सन्तोस ॥१३॥ 6

तुलसी सतसई।
(ग्यान) विद्या, (गरीबी) अहङ्कार रहित, (गुरु-धरम) गुरु का
दिया उपदेश, कोमल वचन, (निरमोख) मायाहीनता, भौल मचाई
और मन्तोष को कभी न छोड़ना चाहिये ॥१३॥
असन बसन सुत नारि सुख पापि हुँ के घर होय ।
सन्त-समागम राम-धन तुलसी दुरलभ दोय ॥१४॥
भोजन वस्त्र स्त्री लड़के दून का सुख तो पापी के घर भी होता
है, परन्तु तुस्तमौ दो को बड़ा दुर्लभ समझते हैं अर्थात् सज्जनों को
मङ्गति और राम को अर्पित वा मत्कर्म में लगता धन अथवा राम
भकि । जहाँ ये दोनों पाए जाय वहीं सब सुख जानना ॥ १४ ॥
तुलसी तीरहिँ के बसे अबसि पाइये थाह ।
बेगहिआय न पाइये सर सरिता अबगाह ॥१५॥
तुलमी कहते हैं कि तौर पर रहने से अवश्य थाइ मिलता है, परन्तु
(धारा के) वेग में जाने से पोखरे और नदी का थाह नहीं मिलता।
तौर यहाँ संभार समुद्र का समभाना चाहिये। अभिप्राय यह कि
संसार में न बूव कर मन अलग किये रहोगे तो पार जा सकोगे ॥१५॥
पग अन्तर मग अगम अल जल-निधि जल सञ्चार।
तुलसी करिया करम-बस बूड़त तरत न बार ॥१६॥
एक पाँव के अनन्तर जो मार्ग है उस में (अगम) अर्थात् अथाह जल
अर्थात् मंसाररूपी (जम्ल निधि) समुद्र के जल का (सधार) बड़ा तरङ्ग
है। तुलमोदास कहते हैं कि (कर्म बस करिया) अपने कर्म के
वशीभूत हो कर इस में डूबते और तरते कुछ देर नहीं लगती।
दुष्कर्म से डूबता और सकर्म से तरता है। अथवा (करिया कर्म-धम
'बूडन) पाप कर्म से डूबता बार गम की दवा से करता है ॥ १६ ॥

द्वितीय सर्ग। तुलसी हरि-अपमान से होत अकाज समाज । राज करत रज मिलि गये सदल सकुल कुरु-राज॥१७॥ तुलसीदास कहते हैं कि विष्णु भगवान के अपमान से बड़ी हानि होती है। इस में दृष्टान्त देते हैं कि (कुरु-राज) दुर्योधन अपनी सेना और परिवार सहित राज करते २ (श्रीकृष्ण) के अपमान से धूर में मिल गया। (महाभारत के उद्योग पर्व के एक सौ पचौमवें १२५ अध्याय में) श्रीकृष्ण का कहना न मान उन का अपमान किया इस से मकुल नए इत्रा ॥ १७॥ तुलसी मीठे बचन ते सुख उपजत चहुँ ओर । बसीकरन यह मन्त्र है परिहरु बचन कठोर ॥ १८॥ तुलमोदाम कहते हैं कि मोठा बचन बोलने मे मब को श्रानन्द होता है। यह (मोठा बोलना) वशीकरण मन्त्र है (हम कारण) कड़ी वालो को छोड़ देना उचित है ॥ १८ ॥ राम क्रिपा तें होत सुख राम किपा बिनु जात। जानत रघुबर भजन ते तुलसी सठ अलसात ॥१८॥ श्रीगम की दया मे सुख होता है उमी के न रहने मे सुख चला जाता है। यह बात जान कर भी मूर्वजन गम के भजन करने में अलमाते हैं ॥१८॥ सनमुख रघुनाथ के देह सकल जग पोठि। तजे केंचुरी उरग कह हात अधिक अति दीठि॥२०॥ श्रीगम के मन्मुख हो (उन को सेवा में लगो) और मंमार को

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तुलसी-सतसई।
छोड़ो। इस में दृष्टान्त यह है कि जब साँप केंचुरी छोड़ता है तो
उस की दृष्टि और अधिक हो जाती है। उसी प्रकार केचुरीरूपी
शरीर का मोह छोड़ कर आत्मा के ध्यान में लवलीन हो तो
परमकल्याण (मोक्ष) मिलेगा॥२०॥
मरयादा दूरहि रहे तुलसी किये बिचारि ।
निकट निरादर होत है जिमि सुरसरि बर बारि॥२१॥
तुलसी विचार कर कहते हैं कि मंमार से दूर हो रहने में
मर्यादा (उचित कर्म) है, मंमार में लिप्त रहने से अनादर (दुःख)
होता है। अथवा तुलमो ने बिचार किया है कि दूर ही रहने से
प्रतिष्ठा होती है और समीप रहने से अनादर होता है जैसे गङ्गा-
तट के रहनेहारे गङ्गाजल का अनादर करते हैं ॥२२॥
राम क्रिपा-निधि स्वामि मम सब बिधि पूरन काम।
परमा-रथ पर धाम पर सन्त-सुखद बर-धाम ॥२२॥
दयानिधान राम मेरे प्रभु है और सब प्रकार (मेरा) मनोरथ
पूरा करते हैं। जो श्राप मोक्षरूप बड़े तेजश्वित्रों से भी अधिक-
तेजश्वी और अपने उत्तम स्थान में सन्तों को सुख देनेहारे है ॥२२॥
रामहि जानहि राम रटु भजु रामहि तजु काम।
तुलसीराम-अजान नर किमि पावहि पर-धाम॥२३॥
रामचन्द्र को आनो, रटो, भजो और संसारी मनोरथ छोड़ो,
क्योंकि राम को नहीं जाननेहारे मनुष्य किस प्रकार (पर-धाम)
'वैकुंठ वा मुक्ति को पा सकते हैं?॥ २३ ॥

दितीय सर्ग। ४५ तुलसी-पति रति अब सम सकल साधना सून । अज-रहित कछु हाथ नहि अङ्ग-सहित दस-गून॥२४॥ तुलसीदास कहते हैं कि स्वामी का प्रेम अह के समान है और सब साधना (अर्थात् तीर्थ ब्रत श्रादि) शन्य के समान है। श्रद कर के हौन शून्य रहने से कुछ हाथ नहीं लगता परन्तु अङ्ग के माथ शून्य दशगुण अधिक हो जाता है। उमौ प्रकार रामभकिशून्य सब निष्फल है और रामभक्तिसहित मब दशगुना फल देनेवाला है। इस दोहे में रूपक अनहार है ॥२४॥ तुलसी अपने राम कँह भजन करहु निस्म । आदि अन्त निरबाहिबो जैसे नब को अझ ॥२५॥ सब शङ्का छोड़ कर अपने राम का भजन करो। जिम प्रकार नव का अङ्ग आदि और अन्त दोनों का निबाह करता है, वैसे ही तेग निबाह होगा और श्रादि अन्त दोनों बनेंगे । जहाँ "भजन कगे एक अर" पाठ हो वहाँ शुद्ध हो कर भकि महित गम का भजन कगे, अवश्य कल्याण होगा, जैसे नव प्रकार की भक्ति से श्रादि अन्त दोनों बनते हैं ऐमा अर्थ करना चाहिये ॥ २५॥ दुगुने तिगुने चौगुने पञ्च सष्ठ श्री सात । आठ हुँ ते पुनि नब-गुने नब के नव रहि जात॥२६॥ दुगुना तिगुना चौगुना पांचगुना छगुना मातगुना पाठगना और नवगुना करने से अन्त में नव का नव बना रहता है। चाई जितना हिसाव हो पर मब में नव तक र व्याप्त है, जिम हिमाव में देखो एक से नव तक के हो र देख पड़ते हैं ॥ २६ ॥ .

४६ तुलसी-सतसई। भ्रम दूर नब के नव रहि जात है तुलसी किये बिचार । रमेउ राम इमि जगत में नहीं देत विस्तार ॥२७॥ तुलमोदाम कहते हैं कि जिस प्रकार (सब गणित में बिचार करने मे) एक से नव तक के श्रद्धा व्याप्त हैं, उसी प्रकार राम इस संसार में (रमेउ) व्याप्त है और राम को छोड़ और दूसरा पदार्थ नहीं है। हम दोहे में वेदान्त के अद्वैत मत का दृष्टान्त दिखाया है। यह मंमार जैसे सुतुही में रूपा जान पड़े वैसा ही प्रानन्द स्वरूप आत्मा में आरोपित किया गया है और सत्य नहीं है। जैसे ठीक ज्ञान होने से सुतुही और मौप में से चान्दी का भ्रम जाता रहता है, उमी प्रकार यथार्थरूप में प्रात्मा को जान लेने से सब वस्तुओं का हो जाता है। इसी को अवैतवाद कहते हैं ॥२०॥ तुलसी राम सनेह करु त्यागु सकल उपचार । जैसे घटत न अङ्क नब नब के लिखत पार ॥२८॥ तुलमोदाम कहते हैं कि मब उपचार तीर्थ व्रतादिक छोड़ कर रामचन्द्र की भकि करो।जैसे नव के पहाड़े में नव का अङ्क नहीं घटता, बढ़ता ही जाता है। नव के पहाड़े के चक को जोड़ने १८१+ से बचता है। नव को एक के पहाड़े से गुखान करने और एक के पहाड़े को जोड़ने ५५+ से भी बचेगा। जैसे ६४२-१८ ६३ ६+६ और १ उन्नीस की। ६४३२७ और २ उन्तीस की Ex8-३६ ८१ +१६ १.+18 और उन्तालिस की+y=B५ और 8 उचास की इत्यादि। है २७.२+७.६ ४५8+५६ ७२ ७+२६ हितीय सर्ग। अझ अगुन साखर सगुन समुभत उभय प्रकार। खोये राखे पापु भल तुलसी चारु बिचार ॥२६॥ नव का अह (2) अगुन (ब्रह्मवत्) बोकार के समान है, और अक्षर (नव) सगुन राम के समान है। ये दोनों भेद देखने के हैं । वस्तुत: दोनों वस्तु एकही हैं। भली भात विचार कर देखो, तो जिम प्रकार दूध में से पानी निकाल लेने से केवल दूध बच रहता है वैसे ही विषय जल को छोड़ देने से प्रात्मरूप रह जाता है, वही भला है। मगुन उपामना पथ । सुन्दर बिचार से विषय को छोड़ आप को रख लेना यही भला है ॥२८॥ प्रहि विधि त सब राम-मय समुझ सुमति निधान । या तें सकल बिरोध तजु भजु सब समुझ न भान अगुन शान मार्ग और ! दूमरा मत दम प्रकार मब राममय ममझ कर, हे बुद्धिमानों में श्रेष्ठ ! सब विरोध छोड़ो और गम भजो, और मब को गम से जाना॥३०॥ राम कामना-हीन पुनि सकल काम करतार। याही ते परमातमा अव्यय अमल उदार ॥३१॥ रामचन्द्र मकन्न मनोरथ रहित है परन्तु मब कामों के कती है, दूमौ हेतु उन्हें (परमात्मा) परब्रह्म और निर्दोष मब विकार से रहित तथा उदार कहते हैं। जिम प्रकार लोहा स्वयं शकिहीन है परन्तु चुम्बक के लगने से उम में आकर्षण शक्ति होती है, वैसे ही माया के योग से कामनाहीन गम को मष्टि प्रादि कामों के रचने की अकि होती है ॥ ३९ ॥ ॥

तुलसी-सतसई।
जो कछु चाहत सो करत हरत भरत गत भेद।
काहु सुखद काह दुखद जानत है बुध बेद ॥३२॥
जो कुछ चाहते हैं सो करते हैं, और यद्यपि भेदहीन है अर्थात्
एक ही रूप हैं, तो भी (विष्णुरूप होकर) भरत अर्थात् संसार का
पालन करते हैं और (रुद्ररूप हो कर) हरत मंहार करते हैं।
(लोगों को समझ में) किमी को
दुख
और किसी को सुख देते हैं
परन्तु पण्डित और वेद जानते हैं कि जीव कर्मवश दुखसुख पाते
हैं परन्तु परमात्मा किसी को दुःख सुख कुछ नहीं देता ॥ ३२ ॥
सन्त-कमल मधु-मास कर तुलसी बरन बिचार।
जग-सरवर तर भरन-कर जानहु जल-दातार॥३३॥
(जग-सरबर) मंसाररूपी सरोवर में (सन्त-कमल) माधुजन
कमलपुष्य के सदृश हैं,जब ये (मधु-माम कर) चैते के सूर्य किरणों
से सुखने लगते हैं तो (बरन) रा-म ये दोनों अक्षर हस्त नक्षत्ररूप
हो जलवर्षा कर उन्हें पोषते हैं । कमल को (भरन-कर तर) अत्यन्त
पोषण करनेहारे (राम दोनों वर्णको) (जल-दातार) मेघरूप जानना
चाहिये॥ अथवा, जगतरूपी तालाव में के (कमल भरण कर कर)
कमलों के पोषण करनेहारे किरणवाले सूर्यरूप राम (रा-म) इन
वर्णों को जानना। अर्थात् सूर्यरूप हो माधुरूप कमलों को खिलाते
हैं ॥३३॥
एक सिष्टि मा जाहि बिधि प्रगट तीन कर भेद।
साविक-राजस-तामसहि जानत है बुध बेद ॥३४॥

रितीय सर्ग। ४९ जिस प्रकार इस एक संसार में (मात्त्विक, राजम, चार तामस) तौनों का भेद प्रगट है (साधारण लोग इन्हें भली भाँत नहीं समझते परन्तु) ज्ञानी पण्डित और वेद जानते हैं, उसी प्रकार राम नाम में भी है जो धागे दोहे में कहते हैं ॥ ३४॥ ता विधि रघुबर नाम मँह बरतमान गुन तीन। चन्द्र भानु अपि अनल बिधि हरि हर कहहि प्रबीन ॥३५॥ वैसे हो रामचन्द्र के (राम) नाम में (मत्त्व रज और तम) तीनों गन वर्तमान हैं, और सूर्य, चन्द्र और अनि, तथा ब्रह्मा, विष्णु पौर महेश तीनों देवता वर्तमान हैं,ऐमा बुद्धिमान जन कहते हैं ॥३५॥ अनल र-कार अ-कार रबि जानु म-कार मयक। हरी अ-कार र-कार बिधि मःमहेस निस्सङ्ग ॥३६॥ अग्नि का वौज र, मर्य का अ,ौर चन्द्र का म है। तथा अविष्णु- रूप, र ब्रह्मारूप, और म महादवरूप है। दम प्रकार ये का गम नाम में वर्तमान हैं। रामायण में (हेतु कृशानु भानु हिमकर के) कहा है ॥ ३६॥ बन अग्यान कह दहन कर अनल प्रचण्ड र-कार । हरि अ-कार हर मोह-तम तुलसी कहहि बिचार तुम्नमी विचार कर कहते हैं कि अत्यन्त प्रतापी अग्रिम्वरुप र-कार वनरूपी अजान को जला देता है, और हरि अर्थात् मर्यरूप प-कार मोह-मयारूपौ अन्धकार को नष्ट कर देता है। इन्दि में . 7

५.
तुलसी-सतसई।
अर्थ (यमामिलेन्द्रचन्द्रार्कविष्णुसिंहांशवाजिषु, शकाहिकपिभेकेषु
हरिनाकपिले त्रिषु) यमराज, वायु, इन्द्र, चन्द्र, सूर्य, विष्णु, सिंह,
किरण, घोड़ा, शक, सर्प, वानर, मेंड़क और कपिलवर्ण ये (१४)
अमरकोष में लिखे हैं ॥ ३०॥
चि-बिधि ताप हर ससि सतर जानहु मरम म-कार।
बिधि हरि हर गुन तीनि को तुलसी नाम अधार॥३८॥
आधिभौतिक प्राधिदैविक और आध्यात्मिक तीनों प्रकार के
दुःखों को चन्द्रवीज मकार शीघ्र हरण करता है यही मकार का
(मर्म) तात्पर्य्य जानना। रजोगुण ब्रह्मा, सत्त्वगुण विष्णु और
तमोगुण महादेव इन तीनों गुणों का एक आधार राम नाम
है ॥ ३८॥
भानु किसानु मयङ्क को कारन रघुबर नाम ।
विधि हरि सम्भु सिरोमनि प्रनत सदा सुखधाम॥३६॥
राम यह नाम सूर्य चन्द्र और अग्नि इन तीनों का (कारण) वीज
है और ब्रह्मा विष्णु महेश तीनों देवों का शिरोमणि है और
अपने शरणागताँ वा भनों को मदा सुख देनेहारा है ॥ ३८ ॥
भगुन अमूपम सगुन निधि तुलसी जानत राम ।
करता सकल जगध को भरता सब मन-काम॥४॥
तुलसीदास राम इस नाम को अनुपम श्रगुण तीनों गुणों से
परे और सगुण दिव्यगुणयुक्र मानते जानते हैं । सगुण हो कर सब
मंसार को बनानेहारा और सब के मनोरथ को पूर्ण करनेहारा
है॥४॥

द्वितीय सर्ग। छच मुकुट सब विधि अचल तुलसी जुगल हलन्त । सकल बरन सिर पर रहत महिमा अमल अनन्त॥४१॥ हलन्त रेफ छत्र है और म का अनुस्वार मुकुट है ये दोनों सब प्रकार से अचल है दून को निर्मल और अनन्त महिमा मब अक्षरों के शिर के ऊपर है। जहाँ "विद्धि अल" पाठ हो, वहाँ अतरों को जानना ऐमा अर्थ कहना चाहिये ॥ ४२ ॥ रामा-ऽनुज सगुन बिमल स्याम राम-अनुहार । भरता भरत सो जगत को तुलसी लसत अ-कार॥४२॥ राम नाम में का प्रकार गम अनुहार विष्ण के ममान निर्मल गुणयुक जग के स्वामी रामचन्द्र के छोटे भाई ज्यामवर्ण भरत का खरूप सोभता है ॥४२॥ राजत राजस ता-अनुज बरद धरनि-धर धीर। बिधि बिहरंतु अति आसु-कर तुलसी जन-गन पीर॥४३ (ता-अनुज ) प्रात् भगत के छोटे भाई (धरणि-धर) शेष के अवतार लत्मणजी वरदाता धौर (बिधि गजमा) रजोगुण ब्रह्मा के रूप मेोभित ई, और (अति प्रामु-कर ) बहुत शीघ्र (जन-गन पौर) भक जनों के ममह का दःख (विहरतु) विशेष कर हरण करते हैं ॥४३॥ हरन करन सकट सतर समर-धीर बल-धाम । मामहेस परि-दमन बर लखन-अनुज अरि काम॥४४॥ (मतर संकट हरन करन) शोध दुख को हरण करनेवाले बल के पुच और रण में धोर मकार महभप नमाजो के छोटे भाई ५२ तुलसी-सतसई। (काम अरि) काम के शत्रु महादेव के अवतार (अरि-दमन) शत्रुघ्नजी हैं॥४४॥ राम सदा सम-सील-धर सुख-सागर पर-धाम । अज-कारन अबैत नित समतर पद अभिराम ॥४५॥ मदा सुन्दर शौल के धारण करनेवाले श्रानन्दमय ब्रह्माखरूप (प्रज-कारन) ब्रह्मा के भी कारण अर्थात् उत्पन्न करने वाले (अद्वैत) केवल मदा मनोहर (ममतर पद) मम दो अक्षर के पदवाले वा शत्रु मित्र दोनों के लिये समभाव रखनेहारे अथवा शुभदाई चरणधारी राम हैं॥४५॥ होनहार सह जान सब बिभब बीच नहि होत। गगन गिरह करिवो कबै तुलसी पढ़त कपात॥४६॥ भवितव्य सब माथ ही माथ उत्पन्न होता है ऐश्वर्य बीच में नहीं होता है। तुलमोदाम कहते हैं कि कबूतर को श्राकाश में गिरह करना कौन मिखाता है। अभिप्राय यह कि जिस प्रकार कबूतर आकाश में स्वभाव हो से गिरह करते हैं, उमौ रौत पूर्व भाग्य के अनुसार ऐश्वर्यादि के भागी जन होते हैं ॥ ४६ ॥ तुलसी होत सिखे नहीं तन गुन-दृखन-धाम । भखन सिखिनि कौने कहेउ प्रगट बिलोकहु काम॥४७॥ तुलमीदास कहते हैं कि सीखने से शरीर में गुन और अवगुन महीं होता। इस काम को प्रगट देखते हो कि मयू को मर्पभक्षण करना कोई नहीं सिखाता है। अथवा (काम-भखन) काम अर्थात् धीर्य को खा लेना मयरौ को कौन सिखाता है। लोग कहते हैं हितीय सर्ग। कि नाचते मदमत्त मयूर के मुख से काम गिरता है, जिम को खा कर मयूरी को गर्भ रह जाता है ॥ ४७ ॥ गिरत अण्ड-सम्युट अरुन जलज पच्छ अनयास । अलल सुअन उपदेस केहि जात सु उलटि अकास॥४८॥ अलल एक प्रकार का पत्ती होता है उम का अण्ड गिरते ही बहा हो कर उड़ता है। (गिरत श्रादि) अण्डे के अाँधे गिरते ही (अरुण जलज पच्छ) अण्डे के भीतर के लाल जल से उत्पन्न पक्ष अथवा लाल कमल के सदृश मन्दर पङ्ख बच्चे को महज ही में हो पाता है। तब अललपत्नी का वक्षा उलट कर प्राकाश में उड़ जाता है, तो इसे (उड़ने के लिये) कौन उपदेश देता है ॥४८॥ विविध चित्र जल-पात्र बिच अधिक नून सम सूर । कब कवने तुलसी रचेउ केहि बिधि पच्छ मयूर ॥४६॥ जलपात्र (तलाव पादि) में (मर बिबिध चित्र) मर्य के प्रतिबिम्ब की अनेक प्रकार चित्रकागे कोई बड़ो कोई छोटो कोई ममान किम ने बनायौ। और मयूर का ऐमा मन्दर पक्ष और उम की रेखाओं को किम ने किम ममय किम गैत बनाया ॥४८॥ काक-सुता ग्रिह ना करै यह अचरज बड़ बाय । तुलसी केहि उपदेस सुनि जननि पिता घर जाय॥५०॥ कोरल घर नही बनाती यह बड़ अचरज की बात है। परन्तु उम का बसा उदने को मामर्थ होते ही अपने मा बाप के घर चला जाता है, उसे (जाने के लिये) कौन उपदेश देता है। प्रमिद्ध है कि कोरस ५ तुलसी-सतसई। अपना अण्डा कौवे के खोते में रख पाती है, वही पालता है, पर बड़े होने पर वह कोइल में मिल जाता है और कौवे को छोड़ देता है ॥ ५० ॥ सुपथ कुपथ लीन्हे जनित स्व-सुभाव अनुसार। तुलसी सिखवत नाहि सिसु मूखक इनन मजार॥५१॥ (जनित) मंमार में जन्मे जीव अपने २ सुभाव के अनुमार कुमार्ग और सुमार्ग में प्रवृत्त होते हैं। तुलमी कहते हैं कि विलार अपने बच्चे को ममा मा मारना नहीँ सिखाता ॥ ५ ॥ तुलसी जानतु है सकल चेतन मिलत अचेतु । कीट जात उडि तिय निकट बिनहिं पढ़े रति देत॥५२॥ तुलसी कहते हैं कि सब लोग जानते हैं चेतन और अचेतन दोनों अपनेर प्यागँ से मिलते हैं,कौड़ा उड़ कर अपनी स्त्री के पाम जाता है और वह विना (कामशास्त्र) पढ़े उम से भोग कराती है ॥ ५२ ।। होनहार सब आप तें ब्रिथा सोच करि जौन । कञ्ज सिङ्ग तुलसी म्रिगन कहो उमेठत कौन ॥५३॥ जो होनेवालाई सो स्वभाव हौ से होता है। दूम में मोच करना व्यर्थ है। (हम में दृष्टान्त देते है कि) (कन्च) मस्तक में उत्पन्न मृगों की मींग को कहो कौन ऐंठता है अर्थात् कोई नहीं, स्वभाव ही से वे टेढ़ी होती हैं ॥ अथवा (कञ्च) कोई के फूल को विकसित होना कौन सिखाता है॥ ५३ ॥ सुख चाहत सुख में बसत है सुख-रूप बिसाल। सन्तत जा बिधि मान-सर कबहुँ न तजत मराल॥५४॥ । रात को द्वितीय सर्ग। १५ १। जिस प्रकार (मराल) राजहंस सदा मानसरोवर में रहता है, और उसे कभी नहीं छोड़ता, उसी प्रकार जो जोव सुख चाहते, वे सुख (अर्थात् सुखदाई ईश्वरध्यान परोपकार प्रादि अवस्थाओं) में रहना चाहते है । सुख का रूप ठोक २ उम का पाना (विशाल) बड़ा भारी है, अर्थात् सब जानते हैं कि किम काम से सुख होता है। २ दितीयार्थ । श्राप मदा परमानन्दस्वरूप हो कर भी मुख पाने को इच्छा करता है और (सुख) मनुष्य शरीर में (बमत) रहता है। जैसे हंम मान-सरोवर को कभी नहीं छोड़ता । अर्थात् जीव परमात्मा का स्वरूप हो कर भी देहाभिमानी हो दंह के सुख से अपना सुख समझता है, (मान-मर) यदि (मान) देहाभिमान (मर करे) त्याग कर दे तो परमानन्द पावे ॥ ५४ ॥ नीति प्रीति जस अजस गति सब कह सुभ पहिचानि। बस्ती हस्ती हस्तिनी देति न पति रति दानि ॥५५॥ नीति प्रेम और यश अयश को गति दन का अच्छा पहिचान मव को होता है। (इम में दृयान्त) हस्तिनी अपने पति हस्तौ को बस्ती के बोच भोग नहीं करने देती॥ ५५ ॥ तुलसी अपने दुखद ते को कहु रहत अजान। कीस कुन्त-अकुर बनहि उपजत करत निदान॥५६॥ तुलसी कहते हैं कि अपने दुख देनेहारे का कौन नहीं जानता। बन में बन्दर गुग्गुल वा भाले के समान चोखे कटौले वृक्षों के बहुर को उपजते हो उखाड़ डालता है (क्योंकि उन' से बन्दर का दुख

तुलसी-सतसई।
पाने का भय रहता है)। कुन्त शब्द, यही कुन्ति का अपभ्रंश जान
पड़ता है, जिस का अर्थ गुग्गुल है ॥ ५६ ॥
जथा धरनि सब बीज-मय नखत अकास निबास ।
तथा राम सब धरम-मय जानत तुलसीदास ॥५७॥
जैसे पृथ्वी में मब बीज हैं और मब नक्षत्र श्राकाश में है, उमी
प्रकार राम मब धर्मों में हैं वा सब धर्मों के रूप हैं। ऐमा तुलसी-
दाम जानते हैं ॥ ५७ ॥
पुहमी पानी पावकहुँ पौनहुँ माँह समाइ ।
ता कह जानत राम अपि बिनु गुरु किमि लखि जाइ
॥५८॥
जो पृथ्वी जल अग्नि और वायु में भी (ममाय) व्याप्त है उम को
राम जानना चाहिये। परन्तु वह विना गुरु के (उपदेश) नहीं जान
पड़ता है। यदि कोई सद्गुरु मिले और सच्ची दृष्टि से लखावे तो
जाना जावे ॥ ५८॥
अगुन ब्रहम तुलसी सेाइ सगुन बिलोकत सोइ ।
दुख सुख नाना भाँति को तेहि विरोध में होइ॥५६॥
अगुन ब्रह्म वही राम है और सगुण भी वही है, उसी के विरोध
से नाना प्रकार के सुखदुख होते हैं ॥ ५८ ॥
सर जथा रन जीति के पलटि पाव चलि गेह।
'तिमि गति जानहु राम की तुलसी सन्त सनेह ॥६॥

हितीष सर्ग। दूर कर फिर असे बीरलोग रण जीत के वहाँ से चल कर घर फिर पाते हैं, उमौ प्रकार सम्मखोग (ममेह) मायापी समर जीत के राम की राह को जानते हैं अथवा वैसी ही साधु भकों के मेह से राम को गति है अर्थात् अनेक अवतार ले कर भकों के दुख को अपने परम धाम को चले जाते है॥६० ॥ परमा-तम-पद राम पुनि तीने सन्त सुजान। मे जग मह बिचरहिँ धरे देह बिगत अभिमान॥६॥ १ परमात्मा परब्रह्म, २ रामचन्द्र, और १ जानी सन्त खोग, कौनों एक है, जो सन्त लोग रेहाभिमान छोड़ कर (मनुष्य के मात्रधारण कर के) संसार में विचरते फिरते है॥११॥ चौथी सङ्ग्या जीब की सदा रहत रत काम। अहम न सन्त नराम रत निसि बासर बसि बाम॥२॥ पहले तीन मज्जा ब्रह्म को वर्णन किया, अब जीव का लक्षण कहते । जो (ग्त काम) मर्वदा अपने मनोरथ और कामना में लगे रहते वे जीव मञ्जक हैं। वे न ब्रह्म म माधु और न राम में प्रौनि करते परन्तु गत दिन इन्द्रिय मुख और स्खो के वश में रहते हैं। जहाँ "बामण से तन राम पद” पाठ हो, वहाँ ब्राह्मण का शरीर पा कर रामपद छोड़ ऐमा अर्थ करना चाहिये ॥१२॥ सुख पाये हरखत हसत खीझत लहइ बिखाद । प्रगटत दुरत निरय परत केवल रत विख-स्वाद॥६॥ सुख पाने से प्रसन्न होते और मते तथा दुग पाने से दुखो विखवाते हैं (प्रगटत) मनमते हैं (दुरत) भरते २ और केवल 8 पूज तुलधी-सतसई । (विख-खाद) विषय खाद में तत्पर हो कर (निरय परत) नरक में गिरते है (वेही जीव हैं)। स्यान्नारकस्तु नरको निरयः। इत्यमरः।।६।। नाना विध को कल्पना नाना बिध को सोग । खछम श्री असथूल तन कब हुँ तजत नहिँ रोग॥६४॥ अनेक प्रकार की कल्पना और दुःखशोक में पड़े रहते हैं (स्थूल- सन) स्थूल शरीर अर्थात् जब जीते रहते हैं और (सत्यदेह) जब मरने पर सूक्ष्म शरीर में रहते है तो भी कभी उन को (संसार- रूपी) रोग नहौँ शेड़ता, वे ही जीव हैं ॥ ६४ ॥ जैसे कुष्टी की दसा गलित रहत दोउँ देह । बिन्द हुँ की गति तैसई अन्तर ह गति रह ॥६५॥ जैसे रोग युक्त मनुष्य की देह मदा गलती रहती है वही दशा बिन्द अर्यात् उम के वौर्य विन्द से उत्पन्न उम के पुत्र श्रादि सन्तानों की अथवा कामी मंमारी मनुष्य को होती है कि उस को सूक्ष्म स्थल दोनों देह गलती रहती हैं और अन्तर अर्थात् उस शरीर के दूर होने से दूसरे जन्म के शरीर को भी वही गति होती है। भागे के दोहे में तीनों प्रकार का शरीर गिनाया है ॥६५॥ विधा देह गति एक विध कब हूँ ना गति पान । विविध कष्ट पावहिँ सदा निरखहि सन्त सुजान॥६६॥ सूक्ष्म स्थूल और कारण इन तीनों में से देह को एक गति होती है अर्यात् दुख बना ही रहता है कभी भी दूसरी गति नहीं होती। देही बिचारे अनेक प्रकार का केश भोगते है और इन के 'कारण को जानौ मन्त लोग देखते हैं अर्थात् जानते हैं ॥ ६ ॥ कुष्ट दितीय सर्ग। रामहि जाने सन्त बर सन्तहि राम प्रमान। सन्तहि केवल राम प्रभु रामहि सन्त न आन ॥६॥ श्रेष्ठ माधुजन राम को जानते हैं और राम भी अपने भा को जानते हैं माधुत्रों को केवल एक स्वामी राम है और राम के भी (मुख्यदास) सन्त छोड़ और कोई नहीं है । ६० ॥ ता ते सन्त दयाल बर देत राम धन रीति। तुलसी यह जिय जानि के करिय बिहठि अति प्रीति॥ ६८॥ में) दमी हेतु परम दयाग्नु माधु जन रामचन्द्र के (गम धन गैति) प्रेमरूपी भजन प्रकार श्रादि का वर देते है यह अपने मन में नियय कर के हठ कर के (राम वा मन्त पद पूरा प्रेम करना चाहिये ॥१८॥ तुलसी सन्त सु-अम्ब-तरु फूलि फरहिं पर-हेतु। ये इत ने पाहन हनै वे उत में फल देतु ॥६॥ तुलसी कहते है कि माधु जन धाम के मन्दर वृक्ष है ओ दूमरों के लिये फूलते फलते हैं अथवा पहन्ने फूल कर माधु पक्ष में प्रानन्द मगन हो कर और जो लोग नोच मे पत्थल मारते हैं वे उन्हें फल देते हैं। रूपक अम्नहार है॥ ६८ ॥ दुख सुख दोनों एक सम सन्तन के मन माहि। मेरु उदधि गत मुकुर जिमि भार भीजियो नाहिं॥७॥ माधुओं के लिये दुख सुख दोनों एक ममान है जैसे दर्पण में समुद्र.और सुमेरु पर्वत दोनों देख पड़ते है परंतु वह न जल से

तुलसी-सससई।
भौजे और न भार से दब जाय। अथवा दर्पण में दोनों प्रतिविम्बित
है परन्तु दोनों से दर्पण अलग है वैसे ही सन्त दुःख सुख मय
संसार में रह कर भी इस से न्यारे है॥७॥
तुलसी राम सुजान को राम जनार्दै सोह।
रामहि जानै राम-जन पान कबहु नहिं होइ॥७॥
तुलसी दाम कहते है कि जो मचिदानन्द राम को जानता है
और दूसरों को जनाता है वही रामभक है और दूसरा नहौँ । अथवा
राम बी अपने को जिस को जनाते है वही उन्हें जान सकता
और दूसरा नहीं जान सकता ॥१॥
सो गुरु राम सुजान सम नहीं बिखमता-लेस ।
ता की क्रिपा कटाछ ले रहे न कठिन कलेस ॥७२॥
(राम को जनानेहारा) वह गुरु श्रीश्रानन्दरूप राम के समान
रस में किसी प्रकार को थोड़ी भौ विषमता नहीं है उन की
रयादृष्टि से
बड़ा
भारी दुख वा जन्म मरण श्रादि क्रश भी नहीं रह
सकता ॥०२॥
गुरु कहतब समुझे सुनै निज करतब कर भाग ।
कहतब गुरु करतब करै मिटै सकल भव-सोग॥७३॥
(गुरु कहतव) गुरु का कहना वा उपदेश सुने और घूझे और
अपनी करनी को भोग डाले (गुरु कहतब करतब करे) गुरु के कहने
के अनुसार काम करे तो संसार का सब दुख मिट जाय ॥७३॥
सरना-ऽऽगत तेहि राम के जिन्ह दिय धी सिय-रूप।
जा पदनि घर उदय भये नासे भ्रम-तम-कूप॥ ७४ ॥

द्वितीय सा (१ गुरु खरूप उस रामचन्द्र को घरण में जाना जिन्होंने मौतारपी बुद्धि दो है जिस के चरणों के पदयरूपी घर में सूर्य के उगने से अज्ञानरूपी कूप के अन्धकार का नाश होता है। जहाँ "जा पानी घर उदय भय" पाठ हो वहाँ जिम गम की स्त्रीरूपी भकि के मनरूपी घर में उदित होने से सब भ्रम छूट जाता है ऐसा अर्थ करना॥०४॥ जा पद पाये पाइये आनन्द-पद-उपदेस । सन्सय रोग नसाय सब पावै पुनि न कलेस ॥७५॥ जिम चरण को पाने से मचिदानन्दरूपी वस्त मुकि का उपदेश मिलता है, मन्देहरूपी मब रोग नर हो जाता है और फिर कम नहीं होता॥७॥ मेधा सीता सम समुझि गुरु बिबेक सम राम । तुलसी सिय सम से सदा भयउ बिगत मग बाम ॥७६॥ (मेधा) बुद्धिरूपी मीता जी को ममझ और विवेक के ममान राम को अपना गुरु मान कर मन्तलोग मीतारूपी बुद्धि से (बाम मग) संसार के विषय कुमार्ग से छूट जाते हैं ॥२६॥ मादि मध्य अवसान गत तुलसी एक समान । नेई सन्त स्वरूप सुभ ले अनित्य गति पान ॥७७॥ पादि बीच और अन्न तीनों (अात्मिक) अवम्बात्रों में जो एक प्रकार समभाव से रहते है" (न दुख में दुखौ न सुख में सखौ और बरन दोनों के बीच में उदास) वेही मङ्गलदाईप माधु बार तुलसी-सतसह। । जो (अनित्य गति) सर्वदा बदलने हारे नश्वर मंमार में लौन है वे दूसरे (मन्त से) भिन्न है। अर्थात् "बालस्तावत् क्रीड़ासकः तरुणस्तावत्तरणोरक्तः । वृद्धस्तावत् चिन्तामनः परमे ब्रह्मणि कोऽपि न लमः ॥ अवस्था के विकारों से रहित सदा एक रस माधुजन रहते है। जहाँ अनीतगत पाठ हो वहाँ असन्मार्ग से रहित ऐसा अर्थ करना ॥७॥ एई सुद्ध उपासना परा भक्ति की रीति । तुलसी यहि मग पगु धरे रहे राम-पद प्रीति ॥७८॥ यही शुद्ध सेवा है और उत्तम भनि की रीति है और इस मार्ग से चलने से श्रीरामचन्द्र के चरण में प्रौति रहती है ॥७८॥ जह तें जो पायउ स है जाई जहाँ है सोइ। तुलसी बिनु गुरु देव के किमि जान कहु कोइ ॥७६ ॥ जो जहाँ से आता है वह वहीं जायगा परन्तु विना जमाये) कहो कोई किस प्रकार जान सकता है। माझ्यशास्त्र के मत से केवल वस्तुओं को अवस्था भर बदलती कोई पदार्थ नष्ट नहीं होता, वही बात दूस दोहे में कही है कि अनेक अवस्था में बदलते र फिर यह जहॉ से आया है वहाँ पहुँच जाता है ।।७।। अप-गति खे साई अबनि सो पुनि प्रगट पताल । कहाँ जनम कह मरन अपि समुझहिँ सुमति रसाल ॥ गुरु देव (के (अप) जल (खें गत) अाकाश में प्राप्त है और वही भूमि और रितीय सर्ग। पाताल में प्रगट है। सो इम का कहाँ जन्म और कहाँ मरण है अर्थात् नहौं है और इस बात को बुद्धिमानों में जो श्रेष्ठ हैं वे हो समझते हैं जल के दृष्टान्त मे श्रात्मा को नित्यता दिखलाई है जैसे जल अपने आधार के कारण नौला काला श्रादि दिखम्लाता है परन्तु है एक ही, वैसे ही श्रात्मा तमोगण श्रादि के मङ्गमे विकृत होता तो भी निर्विकार है॥८॥ सङ्ग दोख नै भेद अस मधु मदिरा मकरन्द । गुरु-गम ने देखहिँ प्रगट पूरन परमानन्द ॥८१॥ (वही श्राकाश भूमि पाताल में रहनेहाग) जल मनके दोष से कहौं गहत कहौं मदिग और कही पुष्परम होता है पर जल यही है ऐसी हो गति प्रात्मा को है (गुरु-गम) गुरुदत्त जान वा उपदेश मे जाना जाता अर्थात् जिन्हें गुरु जानाते हैं वे पूर्ण परमानन्दरूप प्रात्मा को देखते हैं। इसी प्रकार जौव भी जमी योनि में पड़ता है वैमा हो जाता और उम नाम से पुकारा जाता है। दूम को ममझाने के लिये जल का दृष्टान्त दिया है ॥८॥ डाबर-सागर-कूप-गत भेद देखाई देत । है एक दूजो नहीं देत श्रान के हेत ॥२॥ जल (वैसा ही जीव) एक ही है दूभरा नहीं है परन्तु गड़हाममुद्र और कूत्रों जैसे स्थान में रहा वैमा हो दिखाई दिया से यह जो (देत) दो होना है सो (पान के हेत) दूमरे (अपने आधार) के से है। ऐसा ही जीव को भी समझना चाहिये ॥८॥ ।

" तुलसी-सतसई। गुन-गत नाना भाँति नेहि प्रगटत कालहिँ पाइ । आनि जाइ गुरु ग्यान ते बिन जाने भरमाइ॥८३॥ (गुन-गत) अनेक गुणों से प्रात्मा पक्ष में सत्त्व रज तम तौनों में युक्र वह जलरूप श्रात्मा समय पा कर प्रगट होता है और गुरुदत्त ज्ञान से जाना जाता है और बिन जाने लोग भटकते फिरते है॥३॥ तुलसी तरु फूलत फरत जेहि बिधि कालहिँ पाव । तैसे ही गुन-देख-गत प्रगटत समय स्वभाव ॥८४॥ जैसे समय पा कर वृक्ष फूलता फलता है वैसे ही गुनदोष में लौन खभाव समय पा कर प्रगट होता है, अथवा गुण से दोष और दोष से गुण भी समय के स्वभाव अनुसार निकलता है ।। ८४ ॥ दोख हुँ गुन की रीति यह जानु अनल गति देखि । तुलसी जानत सो सदा जेहि बिबेक सुबिसेखि ॥८५॥ जैसे अग्नि को गति दिखाती है (अर्थात् चौंटी से ले कर अपर जितने बड़े छोटे जीव हैं सब में परिमाण के अनुसार अन्न पचाती और प्राण बचाती है परन्तु लग जाने से नगर का नगर राख बना डालती है) वैमी हौ गुण और दोष को भौ रीत है कि अवस्थानुमार दून मे भलाई बुराई होती है। यह जिम को विशेष विवेक है वही सर्वदा जानता है ॥५॥ गुरु त आवत ग्यान उर नासत सकल बिकार। जया निलय गत दीप मिटत सकल अंधियार॥८६॥ अग्नि रह कर रितीय सर्ग। (५ गुरु के उपदेश से मन में जान पाता और सब प्रकार का विकार नर हो जाता है जैसे घर में के दीपक से वहाँ का सब पन्धकार दूर हट जाता है ॥८६॥ जद्यपि अनि अनेक सुख तोय ताम-रस ताल । सन्तत तुलसी मानसर तदपि न तजत मराल ॥८७॥ यद्यपि ताल (झील आदि) में जल और कमल का अनेक सुख रहता है तो भी हम मानमरोवर को कभी नहीं छोड़ते वैसे ही मन जन मत्सङ्ग और रामपद को कभी नही त्याग करते ॥८७॥ तुलसी तोड़त तोर-तरु मानस इन्स बिड़ार । विगत नलिन अति मलिन जल सुरसरि हूँ बदियार ॥ ॥८॥ बाढ़ पाने से (सुरमरि हूँ जल) गङ्गाजल भी तौर के वृक्षों को तोड़ता, कमल को नष्ट करता और अति मलीन हो कर मामम ईम को उद्वेग देता है उमी प्रकार अनेक उपद्रव भी भजन और समान में हो तोभी न छाडमा चाहिये। अथवा, गङ्गाजलमम पवित्र सब शास्त्रों का मत तर्क वितर्क युक ममझ कर (मानस हंस बिडार) मानसरोवर गाम भकि में रमण करने हारे मन्तों का बिडारता रस से वे वेद का मागंम अवलम्बन कर उसी में रमन है॥८॥ मोजल जीवन जगत को परसत पाबन जौन । तुलसी से नीचे ढरत ताहि निबारत कौन ॥८॥ जो जल मंमार को जिलानेहाग और म्पर्ण करने में पवित्र वह मौके को पार (गिरता वा) ढरता है उसे कौन रोक। इन का ४

तुलसी-सतसई।
एक दोहों में अन्योकि अलङ्कार है। जलरूप परमात्मा जानना
सो विकारौ जीवात्मा हो कर प्रकृति और गुणों के मङ्ग श्रादि दोषों
से इस संसार में बन्ध गया है उस को
कुड़ाना
कठिन है॥८॥
ना करता है करम को सो भोगत नहिपान ।
बवनहार लुनिह सेाइ देनी लहइ निदान ॥१०॥
जो जिस काम का करनेहारा है वही उस के फल को भोगता है
दूमरा नहीं जिस ने जो बोया है वह माई लवेगा और अन्त में
अपना दिया पावेगा ॥१०॥
राबन राबन को हनेउ देख राम को नाहिँ।
निज हित अनहित देखु किन तुलसी आपुहि माहि।
॥६१॥
रावण के कर्म ने रावण को मारा इस में राम का कुछ भी दोष
नहीं है अपना हित अनहित अपने ही में अपने ही से होता है
विचार के देख लो ॥१॥
सुमिरु राम भजु राम-पद देखु राम सुनु राम।
तुलसी समुझहु राम कहँ अह-निसि यह तब काम॥२॥
राम चन्द्र का स्मरण करो उन्हे भजो उन का दर्शन करो और
गुणनुवाद सुनो दिन रात राम के विषय में चिन्ता करना यही
तेरा काम हो ॥८॥
रज अप अनल अनिल नभ जड़ जानत सब कोह।
यह चैतन्य सदा समुझ कारज रत दुख होइ ॥६३ ॥

रितीय सर्ग।
(७
(रज) भूमि, जल, अग्नि, वायु, पाकाश इन पाों को लोग बड़
जानते है और यह प्रात्मा चैतन्य है ऐमा ही समझना चाहिये केवल
कार्य में फसने के कारण यह भी जड़ हो कर दुखी होता है ॥६॥
निज कित बिलसत सो सदा बिनु पाये उपदेस ।
गुरु-पद पाइ सुमग धरै तुलसी इरइ कलेस ॥१४॥
विना उपदेश पाये वह अपने किये को भोगता है परन्तु जब उसे
गुह मिलता है तो (उस के उपदेश से) वह उत्तम मार्ग पर चलता
है तो सब क्लेश उम का छूट जाता है ।। ८४ ॥
सलिल
सुकर
सोनित
समुझ मल अरु अस्थि समेत ।
बाल कुमार जुबा जरा है सु समुझ करु चेत ॥१५॥
जल से अत्र उत्पन्न होता है जिम के भोजन मे नर में शुक्र और
मारी में शाणित होते तब दून दोनों के योग मे गर्भ पिण्ड होता है,
फिर लोह मल और हाड़मय हो कर वह (जल) बालक के रूप से
संसार में जन्म लेता है फिर कुमार तब युवा फिर अन्त में शुद्ध हो
जाता है। ध्यान दे कर ममम लो और चेत करो॥॥६५॥
ऐसहि गति अबसान की तुलसी जानत हेतु ।
तान यह गति जानि जिय अविरल हरिचित चेतु॥६॥
इसी प्रकार अन्त की गति का कारण जान कर अर्थात् मरण के
अनन्तर अपने कर्म के अनुसार फिर जन्म पा कर दुःखादि के भागन
की गति को जी में बैठा कर सदा अपने मन में ईश्वर का स्मरण
करो ॥८॥

( तुलसी-सतसई। जानै राम-स्वरूप जब तब पावै पद सन्त । जनम-मरन-पद तरहित सुखमा अमल अनन्त॥१७॥ जब यह जीव राम के स्वरूप को जानता है तब जन्म मरण से रहित निर्मल और अनन्त परमशोभा और साधु को पदवी को पहुंचता है ॥८॥ दुख-दायक जाने भले सुख-दायक भजु राम । अब हम को सन्सार को सब विधि पूरन काम॥८॥ दुःख देनेहारे विषयाभिलाष (शरीर) को भली भांत जान चुका है हेमन ! (तो अब इसे छोड़) सुख देनेहारे श्रीराम का भज । रामचन्द्र हमारी और मंसार भर की कामना के पूर्ण करनेहारे हैं। उन की दया से अहंता और संमार के जाल से छूटेगा ॥८॥ पापुहिमद को पान करि आपुहि होत अचेत । तुलसी विविध प्रकार को दुख उतपति प्रहि हेत॥९॥ अपनी मदिरा पौ कर श्राप ही अचेत होताहै दमी से इस जीव को अनेक प्रकार का दुःख महना पड़ता है। मद संमार का भ्रमजाल जिम में लोग श्राप से फमते है॥ अथवा जिस प्रकार कोई मनुष्य मद पी कर आप बावला बनता है वही दशा इस जीव की है कि मोहरूपौ मदिरा पी कर संसागै विषय के सुख में भूला जिस कारण अनेक दुःख की उत्पत्ति होती है ॥६८ ॥ जा सौ करसि बिरोध इठि कहु तुलसी को पान । सो नै सब नहिपान तब नाहक होसि मलान ॥१०॥ है दितीय सर्ग जिस से तू हठ के साथ बैर करता है वह दूसरा कौन है बता? (सच पूछ तो) (सो सब तब) वे सब तेरे ही हैं (ते भान नहीं भी दूसरा नहीं है तो व्यर्थ दुःखी होता । इस दोहे में भी भदैत मत का वर्णन है। सब स्थान में ईश्वर है और जगत केवल भ्रम- रूप है इस प्रकार जब दो पदार्थ हो नहीं है तो अपना और पराया कौन होगा ? | मच पूछिये तो किसी से भी विरोध करना उचित महौं है ॥१०॥ चाहसि सुख जेहि मारि कै सो तो मारि न जाय । कौन लाभ बिख नै बदलि नै तुलसी विख खाय॥१.१॥ जिम को मारने से सुख होता है वह तुझ से नहीं मारा जाता तो किम लाभ के लिये एक विष से बदन कर दूमग विष खाता है। विषयसुख की इच्छा और क्रोध लोभ आदि को मारने से मुख होता है सो तो मनुष्य से रोका ही नहीं जाता परन्तु विष ममान विषयसुख के भोग से टप्ति चाहत है जो श्रमम्भव है ॥ १० ॥ कोह द्रोह अघ-मूल है जानत को कहु नाहि। दया धरम-कारन समुझि को सुख पावत माहि॥१०२॥ क्रोध, ईष पाप के मन है यह कौन नहीं जानता और दया मूल है ऐमा ममझ कर कौन नहीं सुख पाता है अर्थात् क्रोधादिक से सब लोग दुःख और दयादिक से मुख पाते हैं। वहाँ "को दुःख पावत ताहि" पाठ हो वहाँ (नादि) उस से दूमरे धर्म का कारण ७. तुलसी सतसई। पर दया करने से कौन दुःख पाता है ? अर्थात् कोई नहीं पाता ऐसा अर्थ करना ॥ १०२ ॥ बना बनायो है सदा समुझ रहित हो सूल। धरुन बरन केहि काम को बिना बास को फूल ॥१०३॥ इति श्रीगोस्वामितुलसीदासविरचितायां उपासनापराभक्ति- निर्देशो नाम द्वितीयः सर्गः यह बना बनाया बहुत अच्छा है परन्तु तत्त्वज्ञान हौन होने के कारण दुःखदाई होता है। लाल रङ्ग किस काम का जो उस फूल में कुछ गन्ध हो न हो। यह मनुष्यतन सुन्दर हो कर भी दया धर्म रहित हो तो सुगन्ध हीन लाल फूल के समान प्रयोजन रहित है॥१०॥ ॥ ॥ इति विहारिकतमंलिप्तटोकायां द्वितीयः मर्गः ॥

[१] अथ तृतीय सर्ग। जनक-सुता दस-जान-सुत उरग-ईस भ-म-जौर । तुलसि-दास दस पद परसि भव-सागर गौ पौर ॥१॥ आनकी (दम-आम-सुत) दशरथ पुत्र राम (उरग-रंग) मों के खामी शेषावतार लक्षण (प्र-म-और) 'प्रकार भरत और मकार साबुन जौ को जोड़ कर (पाँच हुये अर्थात्) राम लक्ष्मण भरत शत्रुघ्न और मीता जी दून पाचों के दो र पैर मिल कर दश पद गये। इन दों पदों को स्पर्श करने से मंमार रूपी समुद्र के दुःख से छूटते हैं। भक लोग भव मंसार रूपी समुद्र को तैर जाते हैं। अथवा इम दन में किसी एक पद के पाने से भी दुःख छूटता है। मकार का अर्थ शिव सो शत्रुघ्न शिव के अवतार है। जहाँ “दम पद परखि" पाठ हो वहाँ इन दधों के पावों को देख कर अर्थात् ध्यान से मन में स्मरण कर ऐसा अर्थ करना ॥१॥ तुलसी तेरौ राग-धर तात मातु गुरु देव । ता तजि तोहि न उचित अब रुचित पान पद-सेव॥२॥ तुलसौ अपने मन से वा और भक जनों से कहते है कि हे चित्त! तेरे माता पिता, गुरु और देवता (गग-धर अनेक राग हैं उन पकार का पर्च भरत द्वितीय मर्ग के ४२ व दो मवर मबार काय मनु- दोरे में पहले ही का।

तुलसी-सतसई। में मार एक है) मारङ्ग धनुष धारी राम जी है उन को छोड़ कर (ताहि भान पदसेव रुचित न) तुझे और के पद की सेवा में रुचि करना उचित नहीं है॥२॥ तरक-बिसेख-निखेध-पति-उर-मानस सुपुनीत । बसत मराल ल-रहित करि तेहि भजु पलटि बिनीत॥३॥ (तरक विमेख) उ-यह अनर मंस्कृत में विशेष तर्क करने में प्राता है और (मिखेध) मा-यह निषेध करने में आता है दोनों मिल कर उमा हुश्रा (उन के) पति शिव जी के मनरूपी पवित्र मानसरोवर में (मराल) ईम बमता है। (तेहि ल-रहित करि) सम को लकार रहित कर (अर्थात् केवल मग वना) (बिनौत पलटि भजु) उसे उलटने से राम हुआ उन को द्रं नम्र हो कर भज ॥३॥ सुकला-ऽऽदिहि कल देह एक अन्त-सहित सुख-धाम । दै कमला कल मध्य को अन्त सकल सुख-धाम॥४॥ (शुक्र अन्त महित श्रादिहि एक कल देड) शुक्र शब्दवाचक मित- शब्द के श्रादि और अन्त में एक २ मात्रा दो तो मौता सुख धाम हुई। फिर कमला लक्ष्मी अर्थात् रमा शब्द हुआ उम के (मध्य में कल दै) अन्त मा की मात्रा मध्य में दिया तो राम हुआ। इस प्रकार मौता राम सब सुखों का घर बना। प्रथम मौता जी को सब सुखों का मूल कह कर मौतारूपी भकि करने का उपदेश दिया फिर राम सब सुख के धाम का ग्रहण करने का यह अभिप्राय या पाठामार-"अभिराम" रनि.-Ed..

रतीय सर्ग।। कि पहले मौतारूपी भकि करोगे तो सब सुख को खानि राम अवश्य मिलग॥ ४॥ बीज धनञ्जय रबि सहित तुलसी तथा मयत । प्रगट तहाँ नहि तम तमीसम चित रहत असर॥५॥ (धनञ्चय) अग्नि का वौज (कारण) र । (रवि) सूर्य का वौज घाउमौ प्रकार (मयङ्क) चन्द्रमा का वीज म। इन तीनों के योग में गम यह नाम बना । जिम के मन में गम नाम प्रकट हो वहाँ (तम तमी) अज्ञानरूपी अन्धकार वा तम और तमो अजान और मोहरूपी गत नहीं होती। वह मदा शान्त चित्त और निडर रहता है उम को किमी प्रकार का भय नहीं होता। अभिप्राय यह कि अनि, सूर्य और चन्द्रमा य तौना प्रत्यक्ष देव हैं और इन के प्रताप को सब कोई जानते हैं सो इन कं वौज गम में है इम कारण ऐमे प्रतापी राम के भजनहारे के पाम कीकर दःख पा मकता है ? ॥ ५॥ रञ्जन कानन कोक-नद बन्स बिमल अवतन्म । गञ्जन पुरहित-अरि सदल जग-हित मानस-हन्स॥६॥ (कोकमद कानन रचन बन्म अवतन्म) कमल बन के श्रानन्द दने. हारे निर्मल सूर्य वंश के भूषण, (मदन पुरहित-अग्गिधन) मेना के महित इन्द्र के शत्रु गवण को माग्नवाले और मंमार के हित कारक विमौ पुसकों में महिन मया पाठ रे उम का भौ च यहोरे। 10

तुलसी-सतसई।
साधु जन वा शिव जी के (मानस) मनरूपी मानसरोवर के इंस
(अर्थात् वाम कग्नेहारे) [श्रीराम को भजना चाहिये ॥६॥
जग तरह छत्तीस राम-चरन छव तीन।
तुलसी देखु बिचारि हिय है यह मतो प्रबीन ॥७॥
(जग) मंमार से छत्तोम हो कर रहो अर्थात् जैसे ३६ छत्तीस के
बह में छ और तीन दोनों को पौठ एक बोर है वैसे ही तुम जग
कौ पोर पोठ दे कर विरक रहो और गम चरण में (छ तीन) ६३
तिरमठ के ममान अर्थात् चरण सेवा में लीन रहो। तुलसी दास
कहते हैं कि यदि मन में विचार कर देखो तो यह मत अत्यन्त
उत्तम है वा (प्रबोन) माधुओं का यह मत है ॥७॥
कं-दिग दून नछत्र हनि गुनी अनुज तेहि कीन ।
जेहि हरि कर मनि मान हनि तुलसी तेहि पद लीन
(क) मस्तक (दिग) दिशा १० । दश मस्तक वा दशानन और दून
अर्थात् दश का दुगुना बीम । नक्षत्र शब्द से यहां (हस्त नक्षत्र अर्थात्)
हाथ लेना (बौम हाथ गवण को मार कर) उम के अनुज छोटे भाई
विभीषण को गणो राजा (कोन) बनाया। और जिन्हों ने हरि कर
वानरों के हाथ से (मणि मान हनि) मणि का प्रादर कम किया।
सादा काण्ड में “मनि मुख मेलि डारि कपि देहीं" यह चौपाई
. प्रमाण है। तुलसी दास अपने मन से कहते हैं कि ऐसे रामचन्द्र
के पद में (लोन) लगा रह ॥८॥

इतीब सा सिला साप मोचन चरन हरन सकल जञ्जाल । भरन करन सुख सिद्धि-सर तुलसी परम क्रिपाल ॥९॥ गौतम पषि को स्त्री अहिल्या पति भाप से पत्थल हुई थी सो उस बड़े शाप के छुड़ाने हारे सब प्रकार के जाल के दूर करने वाले। (मिद्धितर भरम) अथवा ऐश्वर्य के बढ़ाने हारे सुखदायो और अत्यन्त दयालु राम को भजो ॥ ८॥ मरन विपति-हर धुर धरम-धरा-धरन बल-धाम। सरन तासु तुलसी चहत बरन सकल अभिराम॥१०॥ (मर न) जो नहीं मरते अर्थात् देवता उन को विपत्ति शत्रु गवण को मारने हारे अथवा वारर मरने और मंसार में जन्म लेने के दुख को (मुकि दे कर) दूर करने वाले धर्म के भार तथा पृथ्वी के भार को धारण करने हारे और बल को खान तथा जिम कमब (वर्ण) अक्षर (अभिगम) मन्दर हैं ऐसे गम नाम को शरण तुम्नमो- दाम चाहते है। मकस्ल वरण अर्थात् मचगवर जाात मब के ग्मण कगमे हारे भी काई २ अर्थ करते है ॥१०॥ विहंग बीच यत तृतिय पति पति तुलमी तोर । तासु विमुख सुख अनि बिखम मपनै हु होसि न भार ॥११॥ (विहंग अर्थात् पति वाचक शब्द) शनि तिम के बीच का अक्षर- गहिरी पवित्र पारेप दोनों का करे।

04 तुलसी-सतसई। कु-ौर (रैयत अर्थात्) परजा शब्द के बतौय अक्षर-जा को लेकर कुजा बनाना । कुजा अर्थात् पृथ्वी से उत्पन्न जानकी के पति राम तेरे पति है। जिम से विमुख अभक होने से सुख का मिलना बड़ा (विषम) कठिन है। इस लिये सपने में भी इस से भोर (अर्थात् गाफिल) अमावधान न होना चाहिये ॥११॥ दुतिय कोल राजिब प्रथम बाइन निश्चय माहि । श्रादि एक कल दै भजह बेद बिदित गुन जाहि ॥१२॥ कोल अर्थात् वाराह शब्द के दूसरे अक्षर-रा, और राजिव कमल वाचक शब्द महोत्पल का प्रथम अक्षर-म, दोनों के मिलाने से राम हुआ और वाहन वाचक-जाम-शब्द का अर्थ जानना हा अर्थात् गम को निश्चय कर के जानो। (बाहन माहि एक कल दै) जान शब्द के प्रथम में एक मात्रा-ऊ-द कर, रामजू-बना, उन्ही को भजो जिम का गुण वेद में प्रसिद्ध है॥ अथवा कल शब्द के क में ई-लगा- कर को बना जो जान-के अन्त में जोड़ने में जानकौ हुआ। जानकी और राम का भजो ऐसा भी अर्थ कोई २ लोग करते है ॥ १२ ॥ बसत जहाँ राघब जल-ज तेहि मिति गो जेहि सङ्ग। भज तुलसी तेहि अरि-सु-पद करि उरु प्रेम अभङ्ग॥१३॥ राघब (जल-ज) मछलौ जहाँ बमता है अर्थात् ममुद्र की मिति मर्यादा-जिम के मङ्ग से नष्ट हुई उस रावण के परि शत्रु राम के सुपद सुन्दर चरण को (करि उर प्रेम प्रभङ्ग) अपने मन में अखण्डिा प्रेम- इतीय सर्ग। कर के भजो (ऐसा तुसमी अपने मन से अथवा लोगों से कहते हैं) हेतु बाँधने से समुद्र की मर्यादा का जाना इस दोहे में स्पष्ट है-करि हुसङ्ग चाहत कुमल तुलमो मन अपमोम महिमा घटौ सुमुद्र कौ रावन बसे परोस ॥१३॥ भजहु तरनि-अरि-त्रादि कहँ तुलसी प्रात्म-ज-अन्त । पञ्चा-ऽनन लहि पदुम मथि गहे बिमल मन सन्त॥१४॥ (तरनि-अरि-श्रादि) मर्य के शत्रु गहु के श्रादि वर्ण-रा, और (पात्मज) काम के अन्त अक्षर-म-को ले कर, गम हुआ। जिम को (पदुम मथि) कमल्न रूपी वेद को मथन कर के (पञ्चानन) शिव जी ने (लहि) पाया। उमौ गम नाम रूपी मत को (मन्त) माधुजनों ने अथवा निर्मल बुद्धि माधुओं ने ग्रहण किया है ॥१४॥ बनिता सैल-सुता-स को तास जनम का ठाम । तेहि भजु तुलमी दाम हित प्रनत मकल-सुख-धाम॥१५॥ मैल सुत हिमालय पुत्र मैनाक (ताम श्राम) उम का स्थान ममुद्र (ताम को बनिता) उम को स्त्री गङ्गाजी के जन्म को (ठाम) स्थान वामन रूप विषण का पद । उम को हे तुम्नमी दाम के मन वा और भक जन भजी, क्योंकि नम्र भकॉ के मुख का वह पद घर है॥१५॥ भजु पतङ्ग-सुत-आदि कहँ मृत्युञ्जय-अरि-अन्त । तुलसी पुस्कर-जग्य-कर चरन-पान्सु मिच्छन्त ॥ १६ ॥ (फ्ना सत) सूर्य के पुत्र कर्ण गधंय उस के श्रादि का अक्षर- तुलसी-सतसई। रा-और मृत्युचय शिव के शत्रु काम के अन्त का असर-म-मिल कर राम हुआ। राम के जिस पद के धूलि को रच्छा पुस्कर क्षेत्र में यज करने हारे ब्रह्मा जी करते हैं उस को भजो ॥ १६ ॥ उलटे तासी तासु पति सौ हजार मन सत्य । एक-सून्य-रथ-तनय कह भजसि न मन समरत्य॥१७॥ तामौ शब्द को उलटा करने से मौता हुश्रा उम के पति गम । मौ हज़ार, लक्ष, उम में मन शब्द के जोड़ने से शेष के अवतार लक्ष्मण । और एक पर शुन्य देने से दश हुश्रा उम में ग्थ लगाने से दशरथ बना । तिम के पुत्र भगत शत्रुघ्न। इन चारों सर्वशभिमान पुषों को हे मन ! क्यों नहीं भजता? ॥१०॥ दुतिय चितिय हर का सनहि तेहि भजु तुलसी दास । का कासन श्रासन किये सास न लहे उपास ॥१८॥ प्रथमार्थ। (हर त्रितिय दुतिय) महादेव के शितिकण्ठ और गजारि नामों से तोमग और दूमग अक्षर लेना दोनों मिला कर कञ्जा हुना अर्थात् जल-समुद्र से उत्पन्न लन्मी रूप जानकी जी, (हर का मनहि) महादेव जी का श्रामन चर्म काम और (कना) लक्ष्मी वाचक इन्दिग शब्द का तीसरा अक्षर-ग-मिलाने से मरा जिसे उलटने से राम हुमा। तुलसी दास कहते हैं कि मौता राम को भजो। (का कासन श्रासन करि माम न लह) कुश को चटाई का श्रासन कर के (बिमा गम माम लिये) माँस मत खो वरन (उपास) कर ॥

हतीव वर्मा दितौवार्थ। (हर का मन द्वितिय हिं) महादेव का म्यान वाराणसी बन्द के दूसरे अत्तर-ग-और हरामन चग्म शब्द के (हतिय) तौमरे अक्षर-म-को मिलाने से गम बना। हेमन,जो गमको भजो तो (का मासन पासम किये, उपाम मामन लहे का) कुश के पासन पर बैठ कर जपपूजा करने और उपवासरूप अतादि कर दह का मामन करने से क्या लाभ है अर्थात् इन का कुछ प्रयोजन नहीं ॥१८॥ आदि दुतिय अबतार कहँ भजु तुलसी विप-अन्त । कमल प्रथम अरु मध्य सह बेद बिदित मत मन्त॥१६॥ दुतिय कुर्म अवतार का पादि-कु और (विप) गजा शब्द के अन्त अक्षर जा को ले कर-कुजा-जानको हुई। और (कमल नाम) गजीव शब्द का प्रथम ग और कमन के बीच का अतर म इन दोनों के योग में गम हुआ। यह मौता गम पद वेद में प्रमिद्ध और माधुओं का (मत) इष्टदेव रूप है। इस को अवश्य भजना चाहिय। अथवा जोजन मौता गम को भाते हैं वे हौ मेरे मत से वेद के प्रमिद्ध माधु जन ह॥ १८ ॥ जेहि न गनेउ कछ मानम हु सुर-पति-अरि-भव-चाम।। जेहि पद सुचिता-अबधि-भब तेहि भज तुलमी दास ॥ • तौया । (रि-विध) का बामन : समाजोग । होगका हिनौय =रा।र (=महादेव ) का बामन चरम (पोन चमे )। चरम का बनीय-म। रा+म-रामG.A.G. tariपोयास' पाठवां सब करना चाहिये।

तुलसी-सतसई।
(सुरपति अरि भव त्राम जैहि मानस हु न गर्नउ । इन्द्र के शत्रु
रावण से उत्पन्न भय को जिस रामचन्द्र ने अपने मन में भी न सोचा
अर्थात् सकुल गवण का नाश कर डाला (शुचिता अवधि जेहि
पद भव) पवित्रता को सौमा गंगा जो जिस (विष्णु) के चरण से
उत्पन्न हुई हैं तुलसी दास अपने मन वा भक जना से कहते हैं
कि उम राम को भजो ॥ २० ॥
नैन
करन-गुन-धरन बर ता बर धरन बिचार ।
चरन सतर तुलसी चहसि उबरन सरन अधार ॥२१॥
नेत्र के दाग जो कान के गुण को धारण करता है अर्थात् चक्षुःश्रवा
मर्प उन म (वर) श्रेष्ठ जो शेष जी के अवतार लक्ष्मण उन से भौ वर श्रेष्ठ
(विचार धरन) विचार को धारण करनहारे श्रीगम के चरण के शरण
का प्राधार अबलम्ब शौघ्र हो करो। (उवग्न चहमि) यदि (हम मंसार
मे) बचना वा मुकि पाना चाहो ॥ २१ ॥
भजु हरि आदिहिं बाटिका भरि ता गजिब-अन्त ।
कर ता पद बिस्वास भब-सरिता तरसि तुरन्त ॥ २२॥
(बाटिका श्रादिहिं हगि) वाटिका शब्द के वाचक श्राराम शब्द के
आदि अक्षर को हरण करके राम रहा उन्हे भजा, फिर (राजिब) नाम
समौ उम के अन्त में (ताभगि) ता अक्षरकोभर दिया तब ममौता बना।
(ता पद विश्वास कर) उन के चरण में विश्वाम करो (भव-मरिता तुरन्त
तरमि) तो मंमार रूपौ नदी शीघ्र तरोगे अर्थात् भव सागर से छूटोगे
॥२२॥

रतीय सर्ग। जड़-मोहन-बरना-ऽदि कह सह चल चित चेत । भजु तुलसी सन्सार-अहि नहि गहि करत अचेत॥२॥ जड़ हग को मोहित करने हारे (गग) के प्रादि वर्ण को चार पञ्चल चित अर्थात् मन के भो त्रादि वर्ण को मिलानो तो राम हुना। अथवा चञ्चल है चिन जिम का स्त्री वामा के अन्त प्रहर म को लो तो भी राम होगा। गम को चेत कर के भजो (नर्षि मंसार अहि गहि अचेत करत) नहीं तो मंमार पो मर्प तुम्हें पका कर बचेत करेगा ॥ २३ ॥ अमर-अधिप-बारन-बरन दूसर अन्त अगार । तुलसी इखु-सह-राग-धर तारन तरन अधार ॥२४॥ अमर अधिप देवपति इन्द्र (बाग्न दूभर वरन) के हाथो ऐगवत का दूमरा अक्षर ग (पगार अन्न वरण) ग्रह वाचक धाम बन्द का दूमग अक्षर म। तुम्नमा कहते हैं कि (द) वाण के (मह) महित (राग धर) माग्ग धनुषवाण (धर) धागै गम तंगे तारणतरण मुकि दाता के भी मुकि दाता और (धार) अवलम्ब हैं ॥२४॥ जौ उर-बिज चाहसि झटिति तौ करि घटित उपाय। सुमनस-अरि-अरि-बर-चरन-सेवन सरल सुभाय॥२५॥ यदि (उर्षिज भूमि के पुत्र) मङ्गल को चाहो (तो झटिति उपाय चरित कर) तो शीघ्र ही उपाय करो। सुमनम देवताओं के परि रावण तिम के परि गम के (वर) श्रेष्ठ चरण को (महज स्वभाव से) निष्कपट हो कर मेवन करो ॥२५॥ 11 तुलसी-सतसई। दुतिय पयो-धर परम-धन बाग-अन्त-जुत सोय । भजु तुलसी सन्सार-हित या ते अधिक न कोय ॥२६॥ पयोधर मेघ अर्थात् धाराधर उस का द्वितीय अक्षर अर्थात् रा और बाग का वाचक पाराम शब्द का अन्त अक्षर म ले कर राम इत्रा मोई संमार में परम धन है संमार का कल्यान करनेहारा दूस से अधिक और कोई नहीं है इम से दूमौ राम नाम को भजना चाहिये। बाबा राधे राम महंथ जी जो अपनी बनाई बतीय सर्ग को टीका में पर्वत का अर्थ "धरा" लिखते हैं मो ठीक नहीं है। अमर कोश में लिखा है "धाराधरो जलधरः" धाराधर मेघ को कहते हैं ॥२६॥ पति पयो-धि पावन पवन तुलसी करहु बिचार । श्रादि-दुतिय-अरु-अन्त-जुत ता मत तव निस्तार॥२७॥ पति नाम भता शब्द का पहला भ पयोधि सागर शब्द का अन्त अर्थात् तीमगर अथवा मरोवर बाचक मर-शब्द का और पवन मरुत का तोमग अक्षर त तीनों युक कर विचार करो तो भग्त हुत्रा। तुलमी कहते हैं कि उन के मत (राम भकि) से तुम्हारा निस्तार अर्थात् मुक्ति है ॥ २० ॥ इन्स कपट रस-सहित गुन अन्त आदि प्रथम ऽन्त । भजु तुलसी तजि बाम गति जेहि पद-रत भगवन्त । २८॥ इंस-मराल का ल कपट छल का छ और रस शब्द से फूल का अतर-र

हतीय सर्ग।
रस मकरन्द का श्रादि म उसी प्रकार गुण का अन्न व ले कर
महित वा युक करने से (लक्ष्मण) लक्ष्मण हुा । (लक्षमण भगवन्त
जहि पद-रत बाम गति तजि तेहि भजु) श्रीलक्ष्मण भगवान जिस
राम के चरण में प्रीति करते हैं छल और पाप छोड़ कर उसे भजो
॥२८॥
कना समुझि क बरन हरहु अन्त-आदि-जुत सार।
स्त्री-कर तम-हर बरन बर तुलसी सरन-उबार ॥२८॥
कना नाम मकग को ममुझ कर उस में से क वर्ण को हर लो
फिर मग बचा उमे उलट कर युक करने से सब नामों में मार
श्रेष्ठ नाम गम था। (मी-कर) शोभा के देने हारे (तम-हर)
अजान को दूर करने हारे ये दोनों (बग्न-बर) उत्तम अक्षर
(मग्न-उबार) अपनी शरण में आये हुये जनों को उबारने हारे
हैं ॥ २८ ॥
अझ दसा रस-आदि-जुत पाण्डु-सनु सह अन्त ।
जानि सुत्रन सेबक सतर करिहैं क्रिपा तुरन्त॥३०॥
(श्रा दमा) दश का अङ्ग (२०) दश (ग्म-आदि) ग्म शब्द का
श्रादि अक्षर र और पाण्डु मनु पार्थ शब्द के अन्य वर्ण थ के
माथ मबों को युक करने मे दशरथ हुआ। दन के पुत्र को शीघ्र
जान कर जो सेवा करेगा उस पर वे अवश्य गीघ्र कृपा करेंगे ॥३१॥
झटिति सखाहि बिचारि हिय आदि बरन हरि एक।
भन्न प्रथम स्वर दे भजा जा उर तत्व-विवेक॥३१॥

तुलसी-सतसई। भटिति (जीन वाचक बासु शब्द का प्रादि वर्ण प्रथम अक्षर हरि निकाल कर (सखा) मित्र मिलाने से सुमित्र हुथा। उस के अन्त में एक स्वर (श्रा) देकर सुमित्रा हुई जिस का विचार कर भममा चाहिये क्योंकि उन के हृदय में तत्त्वों का ज्ञान है अथवा जिम के मन में तत्त्वज्ञान है उन्हें भजना चाहिये ॥ ३१ ॥ आदि चन्द्र चञ्चल-सहित भजु तुलसी तजु काम। अघ-गञ्जन रञ्जन सुजन भब-भजन सुख-धाम॥३२॥ चन्द्रमा महित रात का नाम गका है उस का श्रादि रा अथवा दिजगज शब्द का रा लेना और उस में चञ्चल मन वा स्त्री अर्थात् वामा का म वा मन का म मिलाना तो राम हुत्रा तुलसी कहते हैं कि काम सुख भोग की इच्छा को छोड़ कर पाप के नाशक साधु जनों के प्रानन्ददायक मंमार के दुख को छुड़ाने हारे सुख को खान ऐसे राम को भजो ॥ ३२ ॥ बिगत-देह-तनुजा-सुपति-पद रति-सहित सनेम। जदि अति मति चाहसि सु-गति तद तुलसी करु प्रेम (विगत देह) जनक कौ तनुजा सुता के सपति स्वामी राम के हितकारी पद में नियम पूर्वक प्रौति करो यदि बड़ी सुन्दर गति और मति चाहो ॥ ३३ ॥ करता सुचि-सुर-सर-सुता ससि सारंग महि-जान। पादि अन्त सह प्रथम-जुत तुलसी समुहुन पान

तीव सर्मा
शुचि पविष सुर देवता के मर मानसरोवर की सुता पुत्री सरयू,
का वशिष्ठ जौ अथवा (करता) बद्धका पवित्र (सर-सर) माम सरो-
वर। उम को सता पुत्रौ माय । शशि चन्द्रमा का नाम मयंक ममारा
गग का रा मिला कर मग । उम को उलटने से गम अप्रा।
महिमान भूमि से उत्पन्न जानकी हुई। इन को दूमग नहीं
समझना चाहिये । अथवा (तुलसौ ममुझ, न भान) इन को तुलसी
दाम वा गम नत्मण और मौता के भक माधु जन जानते हैं और
लोग नहीं ममभते । जान का न केवल दोहे का छन्द मिलाने के
लिये दिया गया है और उसी कारण "मारङ्ग" के र को भी इस
पढ़ना चाहिये।
अन्वय । ममि (मयद) श्रादि वर्ण (म)
माग्ङ्ग (गग) प्रथम (ग)
सह (माथ) मिनायो (मग)
श्रादि अन्त युत (श्रादि वर्ण अन्त से युक कर के (गम) यदि
"शुधि करता" को एक पद मानो ता पवित्र करने वाले, अर्थ
निकलेगा। वेदोक कर्म करने के कारण वशिष्ठ "कर्ता" कहे जा सकते
हैं और मग्यू ब्रह्मा के बनाय मान मरोवर की पुत्री है इम के
विषय में मनु और गमायण के योक ।
ब्राह्मणेषु च विदांमो विदात्म कृतयुद्धयः ।
कतबुद्धिषु कतारः कर्टषु ब्रह्मवादिनः ॥ (मनु)
कैनामपर्वते गम : मममा निर्मित पग्म ।
ब्रहाणा नगाख : तेनेदं मानमं मरः॥

तुलसी-सतसई। तस्मात् सुखाव सरम: माऽयोध्यामुपगूहते। सरः प्रवृत्ता सरय: पुण्या ब्रह्म मरधुरता ॥ (रा) ॥ ३४ ॥ गिरिजा-पति कल अादि इक नक्खत हरि जुध जान। आदि अन्त भजु अन्त पुनि तुलसी सुचि मन मान॥ ३५॥ गिरिजा पार्वती पति शिव के श्रादि अक्षर में एक कला मात्रा दे कर मी लेना और नक्षत्र दूम के अन्त का त लेकर उस में भी एक मात्रा देना तो मौता हुा । हरि नाम तारा में का फिर अन्त अक्षर ग और युद्ध मङ्ग्राम में का म सब के मंयोग से मौताराम हुत्रा। मौताराम को (सुचि मन जान मान) पवित्र मन से जान कर मानो और भजो॥ ३५॥ रितु-पति-पद पुनि पड़िक-युत प्रथम आदि पुनिलेछु। अन्त हरन पद दुतिय महँ मध्य बरन सह नेह ॥३६॥ ऋतु पति बमन्त पद (श्रादि हरन) में से श्रादि का अक्षर निकाल लेने से मन्त रहा और द्वितीय पड़िक नाम रजत में (अन्त हरन) अन्त अक्षर निकाल लो तो रज बचा और उस के मध्य में पद शब्द लगाया तो मन्त पद रज हुश्रा। दूस का मध्य पद जो चरण है उम से (नेह) प्रौति करो। अन्वय । रितुपति (वमन्त) प्रथम बग्न लेहु (मन्त) पुनि पड़िक (रजत) अन्त वरन हग्न (ग्ज) प्रथम दुतिय पद मध्य मंहं पद युत (सन्त-पद-रज) रतीय सर्ग। मध्य पद मह नेह (बोच पद से प्रौति)। मल में "पडिक" चन्द "पदक" से निकला हुत्रा जान पड़ता है। कई एक पुस्तकों में "पड़िक" पाठ है दम कारण वही पाठ लिया गया है वस्तुतः परक पढ़ना अच्छा होगा॥ ३६॥ बाहन सेख सु-मधुप रव भरत-नगर-जुत जान । हरि भरि सहित विपरज करि आदि मध्य अवसान (बाहन) यान (और मेख नाग अवमान) वासुको के अन्त को कौ ले कर जानको हुआ) फिर (म-मधुप) मन्दर भवर शब्द का भी (श्रवमान) अन्त का अक्षर र लेकर वचन (मध्य इगि) शब्द के बीच के च को निकाल दिया तब ग्वन हुा। इन को मिनाने से जानकी ग्वन पद निकन्ना । फिर (भरत-नगर) मथुग शब्द के मध्य के वर्ण को निकाल लिया तो मग हा।) (विपर्ज कर जिमको उलटने से गम हुआ) इन मब का युक करने मे जानको ग्वण राम पद मिद्ध हुआ। दम जानको ग्वन गम का जानना और भजना चाहिये । अवय। बाहन (यान) अर्थात् (जान) सेख (बासुकी) आदि मध्य हरि (को) मधुप (भंवर) श्रादि मध्य हरि (ग) ग्व (शब्द अर्थात् बचन) मध्य हरि (धन) भरत नगर (मथुग) मध्य हरि (मग) विपर्य करि (उलट) (गम) तुलसी-सतसई। महित (सब को युक्त कर अर्थात् मिला कर जान अर्थात् जानो) जानकौ रवन राम को जानो। अथवा । दूसरे प्रकार से अन्वय और अर्थ। मेख वाहन (कुर्म) अवसान हरि (कु) सुमधुप रख (गुंजार) श्रादि अवमान हरि (जा) दोनों यक करने से कुजा सोता निकला तो मोताराम पद बना। मोताराम को (जान) जानो तो वे तेरे (आदि मध्य हरि) जन्म और कर्म को हरण करेंगे और (अवसान भरि) अन्तकाल अर्थात् मृत्यु को (भरि) पुष्ट करेंगे। वा । (आदि मध्य अवमान भरि) जन्म कर्म और मृत्यु तीनों को बनावेंगे अर्थात् जब तक जोश्रोगे तब तक सुख दे कर अन्त में मोक्ष देवेंगे ॥ ३७॥ तुलसी उडु-गन को बरन बनज-सहित दोउ अन्त । ता कहभजु सन्सय-समन रहित एक कल अन्त॥३८॥ (उडु गण के वरण) तारा शब्द के अक्षरों में से रा और (वनज) कमल में से म ले कर दोनों के अन्त अक्षरों को मिलाने से राम हुना। ये सब सन्देहाँ को दूर करने हारे हैं । (कल रहित) सब छल आदि कलाओं से रहित औद अन्त में अकेले सर्वोपरि विराज- मान रहते हैं उन को भजो॥ ३८॥ बारिज बारिज बरन बर बरनत तुलसी-दास। आदि आदि भजु आदि पद पाये परम प्रकास ॥३॥ (बारिज) रानीव का श्रादि राऔर (बारिज) महोत्पल का श्रादि रतीय सर्ग। म दोनों (बरन बर) उत्तम वर्गों को तुखमी (धादि पद) सब के पहले को वस्तु अर्थात् श्रादि कारण कह के वर्णन करते हैं इसी को भजना चाहिये (क्योंकि) दस को पाने से परम अर्थात् परब्रह्म परमे- वर का प्रकाश होता है, अथवा परम प्रकाश सब के ऊपर तेजी परमेश्वर मिलता है। (पदं व्यवमति त्राण स्थान समाघ्रि वस्तषु इति कोश.) ॥ ३८ ॥ भजु तुलसी कुलिसा-ऽन्त कहँ सह अगार तजि काम। सुख-सागर नागर ललित बली अली पर धाम॥४॥ (कुलिमा-ऽन्त) हीरा शब्द के अन्त ग और (अगार) धाम के अन्त म को मिला कर राम हुत्रा उन को सकल कामना हौन हो कर भजो। वे सुख के समुद्र बड़े चतुर सुन्दर बलवान, (अलति ममर्थो भवति इति अलौ) समर्थ वा अलो को फारमी शब्द मानो तो उदार और परम तेजश्वी हैं ॥ ४० ॥ चञ्चल सहित ऽरु चञ्चला अन्त अन्त-जुत जान । सन्त-सास्त्र-सम्मत समुझि तुलसी करु परमान॥४१॥ (चञ्चल) पारा और चञ्चला स्त्री अर्थात् वाम इन दोनों शब्दों के अन्त वर्णों को युक करने से राम हुत्रा। इस नाम पर मन्जन और शास्त्र सम्मत है ऐसा समझ कर इस को जानो और अपने मन में प्रमाण माना॥४१॥ 12 तुलसी-सतसई। आदि बसन्त इ कार दै आसय तासु बिचार । तुलसी तासु सरन परे कासु न भयेउ उबार ॥४२॥ वसन्त शब्द के श्रादि में (दू) दूकार जोड़ कर उस का अभिप्राय विचारो अर्थात् विसन्त विशेष कर के सन्त माधुजन राम पद तुल्य हैं और उन की शरण में जाने मे किम की रक्षा नहीं हुई है॥ ४२ ॥ ७ धरा धरा-धर बरन-जुग सरन हरन भव-भार। करन सतर तर परम पद तुलसी धर्मा-धार॥४३॥ धरा (पृथ्वी) शब्द के रा और (धराधर पर्वत) मही-धर के म को ले कर दोनों अक्षरों के योग से राम हुआ। राम जी मंसार के दुख को हरने वाले धर्म के आधार और शरण में रहने हारों को (मतर) शौघ्र (परम पद) मुक्ति के देने हारे हैं ॥ ४३ ।। बरन धनञ्जय-सुनु-पति-चरन-सरन-रति नाहि। तुलसी जग-बञ्चक बिहठि किये बिधाता ताहि॥४४॥ धनञ्जय वायु के सूनु पुत्र हनुमान जी तिम के पति स्वामी श्री- राम के चरण में जिस को प्रीति नहीं रहती और जो उन की शरण मैं नहीं जाता उसे ब्रह्मा ने व्यर्थ संसार के ठगने के लिये बनाया ॥४४॥ तुलसी रजनी पूनिमा हार-सहित लखि लेहु । आदि अन्त-जुत जानि करु ता साँ सरल सनेह॥४५॥ पूर्णिमा की रात का नाम राका, उस का रा और (हार) दाम टतीय सर्ग। शब्द के म को मिलाने से राम हुआ। इस (राका) के त्रादि और (दाम) के अन्त के अक्षरों को देख जान कर उन के चरण में निष्कपट प्रौति करो॥४५॥ भानु गोच तमि तासु पति कारण अति-हित जाहि। ग्यान-सु-गति-जुत सुख सदन तुलसी मानत ताहि॥ भानु सूर्य का बौज गोत्र अग्नि का बीज र और तमौ रात्रि (तासु) तिस के पति चन्द्रमा का बीज म तीनों के मिलाने से राम हुा । दून के कारण राम-नाम को तुलसी बड़ा हित-कारो सुन्दर गति के सहित ज्ञान-दायक और सुख का घर मानते हैं ॥ ४६ ॥ भजु तुलसी आधा-ऽदि कहँ सहित तत्व-जुत-अन्त। भव आयुर-जय जासु बल मन चल अचल करन्त॥४७॥ (ोघा-ऽऽदि) राशि के श्रादि रा और (अन्त तत्त्वजुत) तत्वों में आकाश व्योम का अन्त म लेकर दोनों के साथ मिलाने से राम हुआ तुलसीदास कहते हैं कि राम को भजो। जिस के बल से (भव) महादेवजी श्रायुर्जय अर्थात् मृत्युञ्जय अमर हुये और (चल) चञ्चल मन अचल किया अथवा चञ्चल अर्थात् अनेक योनि में घमने हारे मम को नाम का उपदेश दे कर अचल करते हैं ॥४०॥ देत कहा विप काज पर लेत कहा इतराज । अन्त-आदि-जुत-सहित भजु जो चाहसि सुभ काज ॥ ४८॥

तुलसी-साता। . नृप राजा काम पड़ने पर धौरा देता है सो उस का रा और फिर राजा जब अप्रसन्न हो कर दूतराज करता है तो मर्याद लेता है उस का म ले कर पहले के अन्त और दूसरे के श्रादि दोनों को युक्र करने से राम अत्रा। हे मन जो तू शुभ काम और अपना कल्यान चाहता हो तो राम को भज ॥४८॥ चन्द्र-रमनि भजु गुन-सहित समुझि अन्त अनुराग। तुलसी जो यह बनि परै तौ तव पूरन भाग ॥४६॥ चन्द्रमा को स्त्री अर्थात् नक्षत्रों में एक अनुराधा का गुण अर्थात् तौमरा अक्षर रा और अनुराग प्रेम शब्द के अन्त म को मिला कर राम बना तुलसी कहते हैं कि ममझ कर जो इस नाम का स्मरण तुम से बन सके तो तुम्हारे भाग पूरे हैं ॥ ४६॥ जिन के हरि-बाहन नहीँ दधि-सुत-सुत हि नाहि। तुलसी ते नर तुच्छ हैं बिना समीर उड़ाहि॥५०॥ हरि बाहन गरुड़ अर्थात् गरुवापन और दधि समुद्र का सुत पुत्र चन्द्र उस का सुत बुध अर्थात् बुद्धि ये दोनों जिन के नहीं हैं वे मनुष्य बड़े हलके होते हैं और बिना वायु के उड़ा करते हैं ॥५०॥ रवि चञ्चल अरु ब्रह्म-द्रब बीच सु-बास बिचारि। तुलसि-दास आसन करे अबनि-सुता उर धारि॥५१॥ (रवि) सूर्य अर्थात् अर्क (चञ्चल) लोल अर्थात् लोला (ब्रह्म द्रब) मजा जी अर्थात् लोलार्कादित्य और गङ्गा के बीच तुलसौदाम का

हतीय सर्ग।
सुन्दर बाम है वहाँ (अबनि-सुता) मौता जौ को हृदय में धारण कर
के तुलसीदास अपना श्रासन जमाते थे। काशी में अमी के
दक्षिण लोलार्कादित्य और गङ्गा जी के बीच में तुलसीदास की
कुटौ है वहाँ हो वे बैठते थे॥ ५१ ॥
बन-बनिता-दिगको-ऽपमा-जुत करु सहित बिबेक ।
अन्त आदि तुलसी भजहु परिहरि मन कर टेक॥५२॥
बन नाम जल अर्थात् नारा का रा और वनितादृगकोपमा स्त्री
के नेत्र का उपमान मछली का म दून दोनों के अन्त और आदि
के अक्षरों को युक्त करने से राम हुा । तुलसीदास कहते हैं कि
विचार पूर्वक मन को जड़ता दूर कर के राम को भजो ॥ ५२ ॥
उरबी-अन्तहुँ आदि-जुत कुल-सोभा-कमला-दि ।
करि बिपरज ऐसे हि भजह तुलसीसमन बिखादि॥५३॥
(उरबौ) धरा के अन्त का रा और फिर (उरबी) महौ शब्द के
प्रादि म को युक्र करने से राम हुा । फिर कुल शोभा कुल वंश को
शोभा शौल से होती है दूस से मौ और कमल अर्थात् तामरम का
ता दोनों के श्रादि अक्षरों के मिलाने से मौता हुा । राम सीता को
विपर्यय करके उलट कर अर्थात् मौता राम बना कर ऐसे अर्थात्
घर बैठे विना यज्ञादि के भी भजो तो सब दुःख नष्ट होगा ॥ ५३ ॥
तौ ताहि कह सब कोउ सुखद करहिं कहा तव पाच
परब चितिय बारिज-बरन तज बलीन सुनु साँच॥५४॥

६४
तुलसी-सतसई।
(बारिज) तामरस शब्द के (बरन) अक्षरों में से (त्रितीय हरक)
तौमरा अक्षर निकाल लो तब तामस बचा । इस बलवान तामस को
त्याग कर और मत्यता को सुन तो पाँच अर्थात् १ क्षुधा २ वृषा
३ निद्रा ४ बालस्य और ५ मैथुन तुम्हारा क्या कर सकते हैं और
सब जन तुम्हारे लिये सुखदायी हाँगे॥ ५४ ॥
नजहु सदा सुभ-त्रासु-अरि भजु सुमनस-अरि-काल।
सजु मत ईस अवन्तिका तुलसी बिमल बिसाल॥५५॥
सदा शुभ कल्यान वा मुक्ति को प्राशा छोड़ो और सुमनस देव-
तानों के परि रावण के काल मारने हारे राम को भजो । अवन्तिका
पुरी उज्जयिनी के ईश महाकालेश्वर महादेव के निर्मल और बड़े
मत को (मजो) धारण करो अर्थात् राम का स्मरण करो।
दूसग अर्थ । लभ के अरि काम क्रोधादि को छोड़ कर (आशु)
शौत्र राम को भजो और उज्जयन के राजा विक्रमादित्य के मत को
धारण करो त्रादि ॥ ५५॥
एत-बन्स-बर-बरन-जुग सेत जगत सब जान ।
चेत-सहित सुमिरन करत हरत सकल अघ-खान॥५६॥
(एत-बन्म) सूर्यवंशी राजाओं में वर श्रेष्ठ (बरण जुग) दो अक्षर
अर्थात् राम (सब जगत सेत जान) को सब मंसार की मर्यादारूप वा
भवसागर से पार करने के लिये पुलरूप समझो। चैतन्यता से स्मरण
करने से सब पापों को खान को हर लेते हैं। जहाँ "जगत मरि"
पाठ हो वहाँ संसार रूपी नदी अर्थ करना चाहिये ॥ ५५ ॥

हतोय सर्ग। ६५ मैची बरन य-कार को सह स्वर आदि विचारि। पञ्च प-बरगहिँ जुत सहित तुलसी ताहि सम्भारि ॥५७॥ य-कार का मैत्रीवर्ण अर्थात् समान वर्ण र-कार को ले कर (श्रादि खर) अ-कार से (सह) महित करो तो रा होगा फिर प-वर्ग के पाँचवें अक्षर से युक्त करना तब राम हुआ दूस राम नाम को तुलसी अपने मन वा भकों से कहते हैं कि तुम (सम्भारि) धारण करो वा उन पर भरोसा करो ॥ ५७॥ इल-अम-मध्य समान-जुत या ते अधिक न पान। तुलसी ताहि बिसारिसठ भरमत फिरत भुलान ॥५८॥ हल (ह य व र ल) दून अक्षरों में से र फिर ञम प्रत्याहर में से म लेकर उम के बीच में समान स्वर अजोड़ा तब राम हुआ जिस से अधिक और कुछ नहीं है तुलसौ अपने मन वा किसी शिष्य से कहते हैं कि उसे (राम को) विसरा कर हे मूर्ख क्याँ तू भूल कर भटकता फिरता है॥ ५८ ॥ कौन जाति सीता, सती, को दुख-दा, कटु बाम । कोकहिँ र ससि-कर दुख-द,सुख-दायक को,राम॥५६॥ सौता जौ कौन जात हैं ? (उत्तर) सती। दुख-दायक कौन है? कर्कशा स्त्री। (कोकहिँ) चकई को कौन दुख देता? (ममि-कर) चन्द्रमा की किरणें। कौन सुख देता है ? राम जी। इस दोहे में प्रश्नोत्तरालङ्कार वा चित्रोत्तर है श्राधे २ में प्रश्न और उत्तर दोनों ?

तुलसौ-सतसई। । ? ? कहे है। बाबा राधे राम जौ की टीका में जो अर्थ है वैमा अर्थ करो तो कुछ चमत्कारी नहीं पाती दूम से यह अर्थ किया गया॥५॥ को सकर, गुरु-बाग बर, सिव-हर को, अभिमान । करता को,अज, जगत को,भरता को, हरि जान॥६॥ (प्रश्न) (को सङ्कर) कल्यान-कारौ कौन है । (उत्तर) गुरु को श्रेष्ठ वाणी उत्तम उपदेश । (प्र) मङ्गल नाशक कौन है ? अहङ्कार। जगत का की कौन है ? ब्रह्मा । पोषण करने हारा कौन ? विष्णु भग- वान को जानिये ॥६॥ खर खेयस राजीब-गुन करु तेहि द्रिद पहिचान । पञ्च प-बरगहिँ जुत सहित तुलसी ता हित मान॥६॥ स्वर अर्थात् अ-कार श्रेयस कल्याण कारक है क्यों कि विष्णुरूप है (अकारो वासुदेवः स्यात्) राजीव तामरस तिस का (गुन) हतीय वर्ण र ले कर अमिलाने से रा हुआ। फिर पाँचवे वर्ग अर्थात् प वर्ग का पाँचवाँ अक्षर मिलाकर राम बना। दूस राम को (द्रिढ़) निश्चय कर के पहचानो और अपना हित-कारौ जानो ॥ ६१ ॥ होत हरख का पाय, धन, बिपति तजे का, धाम । दुख-दा कु-मति कु-नारितर, अति, सुख-दायक राम॥ (प्रश्न) (का पाय हरख होत) कौन वस्तु पाने से हर्ष होता है (उत्तर) धन । का तो विपत्ति) कौन वस्तु छोड़ने से विपत्ति होती वृतीय सर्ग। है (उत्तर) धाम । दुखदाई कौन है ? कुबुद्धि और बड़ी दुष्ट स्त्री। अत्यन्त सुखदेनेहारा कौन है ? राम जौ ॥ ६२ ॥ बीर कवन, सह मदन-सर, धीर कवन, रत-राम । कवन कर, हरि-पद-बिमुख, को कामी, बस बाम ॥६॥ बौर कौन है? जो काम वाण मह सके। धौर कौन है? जो रामचन्द्र के चरण में लगा रहता है। क्रूर कौन है? जो राम के चरण से विमुख विरुद्ध है। कामौ कौन है ? जो स्त्री के वश में रहता है ॥ ६३ ॥ ये कई एक दोहे भगवान् शङ्काराचार्य के प्रश्नोत्तरमाला से मिलते हैं। कारन को, कं, जीव को, खं, गुन कह सब कोय । जानत को, तुलसी कहत, सो पुनि आन न होय॥६४॥ जीव का कारण कौन है ? कं जल अर्थात् नारा में का रा और खं आकाश अर्थात् व्योम में काम दोनों को गणने से राम हुत्रा। जिम को मब लोग सब जौवाँ का श्रादि कारण कहते हैं। तुलसी कहते हैं कि यह (को) कोई साधु जन जानते हैं और जो जानते हैं वे दूसरे नहीँ अर्थात् राम के तुल्य है ॥ ६४ ॥ तुलसी बरन बिकल्प ते श्री चप-वितिय-समेत । अन-समुझे जड़-सरिस नर समुझे साधु स-चेत ॥६५॥ बिकल्प बोधक अक्षर वा और चप प्रत्याहार चट तक पका ? 13 तुलसी-सतसई। तौमरा असर त दोनों को (समेत) मिलाने से बात हुई। जो मनुब सत्य बात को वा वेद पुरान में कही यातें समझाता है वह माधुरै और जो नहीं समझता वह जड़ मूर्ख है ॥६५॥ जासु आस सर देव को अरु घासन हरि-बाम । सकल-दुख-द तुलसी तजहु मध्य तासु सुख-धाम॥६६॥ (देव-मर) मान-सरोवर जिस का त्रास स्थान है अर्थात् मानस- निवासी गज-हंस मराल के मध्य रा को और (हरि-बाम) विष्णु- भार्या लक्ष्मी का श्रासन कमल का मध्य म लेना तो राम हुत्रा मराल के मध्य रा को (तजहु) निकाल देने से मल रहा अर्थात् पाप मब के लिये दुखदाई है दूस से दूस का त्याग करो। राम-चन्द्र सुख के घर हैं (उन को भजो) ॥३६॥ चञ्चल तिय भजु प्रथम हरि जो चाहसि पर-धाम । तुलसी कहहि सुजन सुनहु यही सयानप-काम॥६७॥ (चञ्चल) पारा का रा और स्त्री अर्थत् बाम शब्द के अन्त का म ले कर दोनों के (प्रथम हरि) पहले अक्षर निकाल कर राम हुआ। तुलसी कहते हैं कि हे माधुजनो ! जो आप लोग परम पद चाहते हाँ तो मेरी बात सुन कर राम भजिये, क्योंकि यह सयानपने का काम है॥६॥ कुलिस-धरम-जुग-अन्त-जुत भजु तुलसी तजु काम । असुभ-हरन सन्सय-समन सकल-कला-गुन-धाम ॥ '६८॥

तृतीय सर्ग।
ए
(कुलिस) होरा और धरम दोनों के अन्त अक्षरों को (जुत)
मिलाने से राम डा। सव विद्या और गुनों के घर अमङ्गल को
नाश करनेहारे और सन्देहाँ को दूर करनेहारे राम को सब काम
छोड़ कर भजो ॥६८॥
खी-कर को, रघु-नाथ, हर, अनय कहत सब कोय।
सुख-दा को, जानत सु-मति तुलसी समता दाय॥६॥
?
(प्रश्न) कौन लक्ष्मी देनेहारा है ? रघुकुल-भूषण राम जी।
श्री को हरनेहारा कौन है? सब कहते हैं कि अनीति वा अन्याय।
सुखदाई क्या है? सुन्दर बुद्धि और समता दोनों को जानना
चाहिये। प्रश्नोत्तर है। जहाँ “हर अनयम' पाठ हो वहाँ
लक्ष्मी को हरनेहारा अपयश है, ऐसा अर्थ करना चाहिये ॥६॥
बैर-मूल, हित-इर बचन, प्रेम-मूल, उपकार ।
दो हाँ सरल सनेह-मय तुलसी करै बिचार॥ ७० ॥
झगड़े को जड़ क्या है ? बुराई करनेहारौ बात। प्रेम का कारण
क्या है। उपकार वा भलाई करना। तुलसी विचार कर कहते हैं
कि (दो हाँ) दो बार हाँ हाँ कर देना स्वाभाविक प्रेम है। किसी ने
कोई भली बात कही तो हाँ हाँ कर उस का मन प्रसन्न करने से
प्रेम होता है। जहाँ "दोहा” पाठ हो वहाँ दोनों अर्थात् प्रौति और
और का नाश करनेहारी उदासीनता अर्थ करना चाहिये ॥ ७० ॥

तुलसी-सतसई। ? ? प्राग कवन, गुरु, लघु, जगत तुलसी अवर न भान । स्रष्ठा को हरि-भक्ति-सम, को लघु लोभ-समान॥७१॥ (प्राग) विशेष ज्ञानवान कौन है ? गुरु । छोटा कौन है ? यह संमार और दूसरा नहीं (काँकि संमारी प्राकृत जन हौ छोटा काम करते हैं)। राम भक्ति के समान श्रेष्ठ दूस संसार में और कौन वस्तु है? और लोभ के समान छोटौ कौन वस्तु है ? कोई नहीं ॥१॥ बरन दुतिय नासक निरय तुलसी अन्त रसाल। भजहु सकल सीकर सदन जन-पालक खल-साल॥७२॥ निरय नरक के नाश करनेहारे नारायण शब्द का दूसरा वर्ण रा और रमाल आम के अन्त म को ले कर राम हुआ। सब लोग श्री लक्ष्मी के सदन निवास स्थान भक्तों को पालनेहारे और दुओं को दण्ड देनेहारेराम को भजो ॥ ७२ ।। थप सेयस-स्वर-सहित गुनि यम-जुत दुख-द न आन। तुलसी हल-जुत ते कुसल अन्ति-कार सह जान॥७३॥ चप प्रत्याहार च ट त क प वर्षों में से क और श्रेयस अर्थात् कल्यानकारौ स्वर ा दून को (गुनि) विचार कर मिखाने से का जत्रा, और यम दूम शब्द के म अथवा जम प्रत्याहार ज म उण न में से म ले कर मिलाने से काम हुा । काम के समान दुखदाई इस संसार में और कोई वस्तु नहीं है। फिर हल प्रत्याहार में से सके स्थान में र करने से हर छानब उस के अन्त र मध-कार द्वतीय सर्ग। मिलाने से हरि अश्रा जिस के समान सुखदाता और कोई नहीं है। हरि से यहाँ विष्णुरूप राम लेना चाहिये। द्वितीयार्थ । चप प्रत्याहार में से (गुन) अर्थात् तीसरा अक्षर त ले कर उसे प सहित करना तो तप हुआ। तपस्या (श्रेयस) कल्यान- कारौ है परन्तु (जम युत दुखद) नम शब्द वा प्रत्याहार में के म को (युक्त) मिलाने से तम हुआ। यदि वह तपस्या तमोगुण युक्त हो तो उस के समान (दुखद भान न) दुखदाई और कोई बस्तु नहीं है। हतीयार्थ। चप प्रत्याहार से (गुन) तौमरा वर्ण त और अम से पाँचवाँ न लिया तो तन हुआ यह शरीर यदि तप (वा ञम) यम अर्थात् अहिंसा, सत्य, ब्रह्मचर्य, अदम्भ और अचौर्य इन पाँचों के महित हो तो कल्यानकारी है। परन्तु (प गुनि) प-कार को दुगुना कर पप बनाया फिर (खर महित) श्राकार खर पहले प में युक्त किया तो पाप निकला। अथवा (चप-गन-युत) चप में से तीन अक्षर अर्थात् ट प क को उलटा पढ़ने से कपट हुआ। यदि शरीर पाप और हो तो दूस के समान दुखदाई और कुछ नहीं। चतुर्थार्थ। चप प्रत्याहार में का क (श्रेयम्) साक्षात् शिव स्वरूप है और अत्यन्त मङ्गलकारी है। तैतरीय, कौशौतकी, और शतपथ श्रादि ब्राह्मणों में, क प्रजापति कर के वर्णन किया गया है। क अर्थात् विष्णु रूप राम कल्यानकारी है परन्तु यदि (स्वर अम युत) इस में श्रा स्वर मिला कर जम का म मिलाइये तो काम हो जाता है जिस के समाक दुखदाई कोई नहीं॥ कपट युक्त

तुलसी-सतसई।
र ख के परस्पर बदलने और क तथा यम शब्द के प्रों के विषय
में प्रमाण।
रलयोर्डलयोश्चैव शषयोर्बयोस्तथा।
वदन्येषाञ्च सावर्षामलङ्कारविदो जनाः ॥
मरते वेधसि बध्ने पुंसि कः (अमरः)
को ब्रह्मणि ममौरात्म यम दक्षेषु भास्करे।
मयूरेऽमौ च पुंसि स्यात् (मेदिनौ)
अहिंसा मत्यवचनं ब्रह्मचर्य्यमकल्कता।
अख्येयमिति पञ्चैते यमाख्यानि व्रतानि च ॥
यद्यपि अम शब्द से यम शब्द भिन्न है तथापि उच्चारण में एक
सा सुन पड़ने के कारण यहाँ (जम) से यम का अर्थ लिया गया है
तुलसी यम गुन बोध बिनु कहु किमि मिट कलेस ।
ता ते सत गुरु सरन गहि जा ते पद-उपदेस ॥७४॥
यम प्रत्याहार य म ग ण न म का अथवा यम इस पद का म
ले कर उस में गुन अर्थात् तीन शब्द का अथवा गुन दस पद का न
मिलाया तब मन शब्द बना, तुलसौ पूछते हैं कि जब तक मन को
बोध यथार्थ ज्ञान नहीं होता तब तक किस प्रकार क्लेश
सकता है? (मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः)। दूस लिये ऐसे
उत्तम गुरू के चरण की शरण में जाना चाहिये जिस से उस पर
(बोधरूपी वस्तु ) का उपदेश मिले ॥ ४ ॥

हतीय सर्ग। भ-गन -गन का सौ करसि राम-अपर नहि कोय। तुलसी-पति-पहिचान बिनु कोउ तुल कब हु न होय ॥७५॥ भगण जिस में श्रादि अक्षर गुरु होय अर्थात् तामस । और जगण जिम में बौच का वर्ण गुरु हो अर्थात् विरोध । (का साँभ-गण ज-गण करसि) तुलसी संसारी पुरुष वा अपने मन से कहते हैं कि तामस क्रोध और विरोध झगड़ा किस से करता है दूस संसार में राम को छोड़ और कोई तो है नहीं (सियाराममय सब जगजानी)। बिना राम को पहचाने कोई योग्य वा राम तुल्य कभी नहीं हो सकता है। भगण जगण पदों से श्रादि और मध्य गुरु किसौ दो शब्द को ले सकते हैं जैसे मुनौति और उदास श्रादि ।।७५॥ तुलसी त-गन-बिहीन नर सदा न-गन के बीच । तिनहिँ य-गन कैसे लहइ परे स-गन के कोच ॥७६॥ तगण अन्त में जिस के एक लघु वर्ण अर्थात् IS SI सन्तोष। नगण जिस में तीनों लघु वर्ण हाँ अर्थात् नरक वा करमा ISS यगण जिस में श्रादि में लघु हो अर्थात् सुमेधा। जड़ता। सगण जिस में अन्त में एक गुरु हो अर्थात् तुलसी दास कहते हैं कि तगण सन्तोष रहित नर मनुष्य मदा नगप नरक के बीच गिरते हैं, उन को यगण (सभेधा) सुबुद्धि तुलसी-सतसई। किस प्रकार मिल सकती है वे तो सदा सगण मूर्खता रूपी काँच में फसे है ॥ ७६ ॥ इन्द्र-रवनि सुर देव-ऋखि रुकुमिनि-पति सुभ जान। भोजन दुहिता काक अलि आनँद असुभ समान॥७७॥ इस दोहे में उदाहरण के महित गणो का निर्णय है। जिस में तीनों गुरु हो उसे मगण कहते हैं जैसे (इन्द्ररमणी) इन्द्राणी। जिस में तीनों लघु वह नगण कहाता है जैसे (सर) अमर । जिम के श्रादि में गुरु वह भगण जैसे (देवऋषि) नारद। लघु वह यगण (रुकुमिनी पति) विहारी। इन चार गों को कवित्त को श्रादि में भदायक जानना चाहिये। S SS ISS ।। जिम के मध्य में एक गुरु हो वह जगण जैसे (भोजन) अहार । रगण जैसे (काक-दुहिता) कोकिला। " एक लघु अन्त में गुरु मगण जैसे (अलि) भवरा। । अन्त में लघु हो तगण जैसे (सुख) अानन्द । इन चार गर्यों को कवित्त को श्रादि में अशुभ समझना चाहिये । मगण नगण भगण यगण शुभा जगण रगण मगण तगण अशुभ॥०७॥ को हित,सन्त अहित,कुटिल नासक कोऽहित,लाभ। पोखक,तोखक दुखद,अरि सोखक, तुलसी,छोभा७८॥

हतीय सर्ग। १०५ ? हितकारी कौन है ? माधुजन । हानिकारक कौन है? कपटौ। नाश और अहितकारी कौन है ? लोभ। पुष्ट करनेहारा कौन है? सन्तोष । दुखदाई कौन ? शत्रु। शरीर को सुखानेहारा कौन ? (लोभ) डर वा चिन्ता ॥ ७८॥ सदान-गन-पद-प्रीति जेहि जानु न-गन-सम ताहि। ज-गन ताहि जय जुत रहत तुलसी सन्सय नाहि॥७९॥ नगन अर्थात् भरत के चरण में जिस की प्रौति सर्वदा रहती है उसे भरत के समान जानना चाहिये। जो जगन अर्थात् विचार वा विज्ञान युक्त है उस का मदा जय होता है दूस में कुछ भी सन्देह नहीं है। अथवा कवित्त को आदि में प्रीति दायक और जय दायक नगण और यगण को जानना चाहिये ऐसा भी अर्थ कर सकते ॥ ७८॥ भ-गन-भक्ति कर भरम तजित-गनस-गन बिधि होय। स-गन-सुभाव समुझि तजा भजे न दूखन कोय॥८॥ SS1 भ्रम सन्देह छोड़ कर भगन (माधव) अर्थात् राम जी की भक्ति करो। (त-गन बिधि होय) सन्तोष करने की आज्ञा है अर्थात् सन्तोष करना चाहिये, परन्तु (म-गन स-गन सुभाव ममुझि तजो) संगण ममता को सगण जड़ता का स्वभाव जान कर छोड़ दो। दून को तज कर राम भजने में कोई दोष न होगा। अथवा धम छोड़ कर भक्ति बढ़ानेहाने भगण को कवित्त को आदि में लौजिये परन्तु तगण को 14

तुलसी-सतसई।
सगण ही के समान अशुभ खभाव जान कर त्याग कौजिये मैगण
श्रादि को लेने में दोष नहीं ॥ ८० ॥
से
खिङ्गज-असन स जुक्त जू बिहरत तीर सु-धीर।
जग्य-पाप-मय-चान-पद राजत सी रघु-बीर॥८१॥
मींग से जो उत्पन्न हो उसे श्टङ्गज कहते हैं अर्थात् धनुष सा है
असन फेंकने का स्थान जिस का उसे श्टङ्गज-असन कहते हैं अर्थात्
शर हुश्रा। उस शर को (जू जुक) ज अक्षर युक्त
करो तो
सरय
जत्रा । यज्ञ शब्द से मख लिया और पाप शब्द से मल लिया इन
दोनों को (मय) युक्त किया तब मखमल हुा । मखमल है पद-
चान जता जिस का उसे यशपापमयपदत्राण कहते है।
(सु-धौर) बड़े धौर (स्त्रीरघु-बौर) शोभावान रघुवंशियों में श्रेष्ठ बौर
रामचन्द्र (लिङ्गज-अमन स जुक्त जू तौर) सरयू के तौर (जग्य पाप
मय पैद बान) मखमल का जता पहने (विहरत) टहलते हैं।
(राजत) शोभ रहे हैं ॥८॥
बान-जुक्त जू तट निकट बिहरत राम सुजान।
तुलसी कर-कमलन ललित लसत सरासन बान ।
८२॥
(बान) शर मैं (जू जुक) जू मिलाने से सरजू हुआ। सरजू तौर पर
प्रतिज्ञानवान श्रीरामचन्द्र अपने कमलरूपी हार्थों में सुन्दर धनुष-
धाण लिये टहलते हुये शोभ रहे हैं ॥८॥

बतीय सर्ग।
बिदु मेचक सिर-रुह रुचिर सीस तिलक धू बह।
धनु सर गहि जनु तड़ित-जुत तुलसी लसत मया ॥
(विदु) कोमल (मेचक) श्याम बाल शिर पर विराज रहे हैं और
मस्तक में तिलक दिये रेदी भृकुटौ किये श्रीराम मानौँ धन पर
लिये विजुलौ युक्त चन्द्रमा के समान शोभ रहे हैं । भू, धनु, तिलक
बाप, बाल की चमक बिजुली, ध्यामता मेघ और मुख चन्द्र के स्थान
में जानना चाहिये ॥३॥
इन्स कमल बिच बरन-जुग तुलसी अति प्रिय जाहि।
तीन लोक मह जो भजे लहे तासु फल ताहि॥८४ ॥
(इन्स) मराल का मध्य प्रक्षर रा और कमल का मध्य म मिलाने
से राम हुआ। राम को तीनों लोक में जो प्यार करता और भजता
है वह उस भजन का फल (संसार से) मुक्ति पाता है। अथवा तीनों
लोक में जो फल यज्ञ श्रादि से मिल सकता है सो मब भजनेवाले
को मिलता है॥४॥
आदि म है अन्त हु म है मध्य र है तेहि जान ।
अनजाने जड़ जीब सब समुझे सन्त सु-जान ॥५॥
श्रादि में म और अन्त में भी म है और मध्य में र है अर्थात्
मरम को जानो। जब तक लोग राम नाम का मरम और भेद न
जाने तब तक कीव जड़ है। और जब सब भेद, समझे तब सुन्दर
सन्तोनाते हैं॥८॥

१०८ तुलसी-सतसई। श्रादि द है मध्ये र है अन्त द है सो बात। राम बिमुख के होत है राम भजन त जात॥८६॥ आदि में द मध्य में र और अन्त में भी द है अर्थात् दरद । से यह दरद पौर बात राम से जो लोग विमुख हैं उन्ही को होती है और भजन से पौड़ा नष्ट हो जाती है ॥ ८६ ललित चरन कटि कर ललित लसत ललित बन-माल। ललित चिबुक दिज अधर सह लोचन ललित बिसाल॥ श्री राम के चरण अति सुन्दर कमर और हाथ दाढ़ी दाँत और होठ अत्यन्त मनोहर और नेत्र बड़े २ शोभ रहे है । (तुलसी, कुन्द, मन्दार,पारिजाता,और कमल से बनौ) बनमाला गले में विराजती है॥७॥ भरन हरन अव्यय अमल सहित बिकल्प बिचार । कह तुलसी मति अनुहरत दोहा अरथ अपार॥८॥ अक्षर अव्यय अनवर और निर्दोष हैं कोई लोग इसे भरते और कोई हरते हैं अर्थात् किसी अक्षर को मिलाते और हरते किसी अक्षर को निकाल लेते जैसे इस मर्ग के दोहों में किया गया है और कोई विकल्प कर के अर्थात् दो अर्थ में से एक अर्थ अपनौर बुद्धि के अनुसार करते हैं परन्तु दोहाँ का अर्थ अपार है कई प्रकार का हो सकता । अथवा (भरन) अलङ्कार, रस, और काव्य के गुणदि

रतीय सर्ग।
१०६
से पुष्ट करना, (हरन) दुःश्रवत्व अश्लीलत्व श्रादि दोषों का निकालना,
(अव्यय) पुनि वा एव श्रादि का प्रयोग (बिकल्प) गुरू को लघु और
लघु को गुरु मानना इत्यादिकों का (अमल) शुद्ध विचार अपनौर
बुद्धि के अनुसार लोग करते है परन्तु दोहों का अर्थ अपार है।८८॥
बिसिश्टा-ऽद्य-ऽलङ्कार मह सङ्केता-दि सु-रीति ।
कहे बहुरि आगे कहब समुझव सु-मति बिनीति॥८॥
अलङ्कारों के बीच में (विशिर) विशेष विलक्षण (सङ्कताऽऽदि)
कूटरचना आदि की सुन्दर रौति है उस को कहा है और आग
कहेंगे उन को सुशिक्षित नम्र और बुद्धिमान लोग समझेगे ॥ ६ ॥
॥
कोस अलशित सन्धि-गति मैची बरन बिचार।
हरन भरन सु-विभक्ति बल कबिहि अरथ निरधार॥
१०॥
(कोश) शब्द के अर्थ और लिङ्ग को बतानेवाले ग्रन्थ का ज्ञान,
(अलङ्कार) शब्दों और अर्थों का भूषण, अक्षरों और शब्दों का
परस्पर मिलना, (बरन मैत्री) कौन २ अक्षर आपस में सवर्ण हैं,
विभक्ति के चिन्हाँ के लोप और प्रगट रहने अथवा किमी शब्द में
से किसी अक्षर को निकाल लेने और किसी के बीच दूसरा वर्ण
बैठा देने त्रादि के बल और अबल का ज्ञान निस कवि को होता है
वही दोहों के अर्थ का निश्चय कर सकता है ॥६॥

तुलसी-सतसई। देस काल करता करम बुधि बिद्या-गति हीन । ते सुर-तरु-तर दारदी सुर-सरि-तीर मलीन॥६१॥ देश अर्थात् स्थान काल समय की कर्म बुद्धि विद्या श्रादि विषयों के बोध से रहित मनुष्य इस काव्यरूपी कल्पवृक्ष के तले पाकर भी (दारदौ) दुखी हैं और गङ्गा जी के तौर पर भी रह से मलीन है। इस ग्रन्थ को न समझने के कारण उन को कुछ लाभ नहीं है ॥६१॥ देस काल गति हीन जे करता करम न ज्ञान। तेऽपि अरथ-मग पग धरहिं तुलसी स्वान-समानार२॥ जिन को स्थान समय का बोध और कर्ता कर्म का ज्ञान नहीं है वे यदि काव्य के अर्थ कहने में लग तो तुलमी कहते हैं कि वे निश्चय कुत्ते के समान है विना सोच विचार भूकते है ॥ ४२ ॥ अधिकारी सब ओसरी भलो जानिबो मन्द । सुधा-सदन बसु बारहें चौथे अथवा चन्द ॥१३॥ भले अच्छे२ अधिकारी भी मब अपनौर ओमरौ अर्थात् अवसर वा पारी पर भले और (मन्द) खराब हो जाते हैं । इस संसार में भले अवसर पर मित्र भी भले होते और बुरे पर बुरे हो जाते हैं । इस में दृष्टान्त देते है कि चन्द्रमा यद्यपि (सुधा मदन) अमृत का घर है तो भी वसु श्राठवें (८) स्थान पर बारहवें पौर चौथे स्थान अर्थात् राशि पर मन्द (खराब) फख देता है।

हतीय सर्ग। बार (मन्द) शनैश्चर बुरा ग्रह हो कर भी पाँचवें श्रादि स्थान पर शुभदायी होता है। ८२ के दोहे में अर्थ न जानने वालों को निन्दा कर यहाँ दिखलाया कि वे अधिकारी हो सकते हैं ॥४३॥ नर बर नभ-सर बर सलिल बन-ज बिनै बिज्ञान। सु-मति मुक्तिका सारदा स्वाती कहहिँ सुजान॥६४॥ (नर) मनुष्यों में (बर) श्रेष्ठ जो मनुष्य साई (नभ) श्राकाश में (मर बर) सुन्दर पोखरा है उस के (मलिल) जल में (बन-ज) कमल रूपी बिनय नम्रता और विशेष ज्ञान है और अच्छौ बुद्धि ही मोप है। सो यह कविता बुद्धि सरस्वती रूपी स्वाती नक्षत्र पा कर उत्पन्न होती है ऐसा ज्ञानी लोग कहते है। मेतिौरूपी कविता नररूपी सर से उत्पन्न होती है। इस में रूपक अलङ्कार स्पष्ट है ॥१४॥ सम दम समता दीनता दान दया-ऽदिक रीत। दोख दुरत हर दरद दर उर बर बिमल बिनीत॥५॥ (सम) इन्द्रिय मन अहङ्कार आदि का त्याग, (दम) बाह्य विषय रूप रस गन्ध आदि से नेत्र जीभ नाक आदि इन्द्रियों को अपने ब में रखना, (समता) सब जीवों में ईश्वर व्याप्त है जान के मम बुद्धि रखना, (दौनता) अपने को नौचा समझ गुरु श्रादि से दोन रहना,देना, दया करना, श्रादि व्यवहारों से जिन, (दोख दुरत) जीवों के ईश्वर विमुख रहना श्रादि अवगुन दूर होते है और (दरद) दुःख .

११२
तुलसी-सतसई।
तथा (दर) डर का (हर) हरण नाश हो कर के (उर) अन्त:करण
निर्मल और (बिनौत) नम्र होते, वे साधु हैं और उन पर ईश्वर-
प राम को शीघ्र दया होती है। जहाँ “दोख दुरित” पाठ हो
वहाँ दोष और पाप को हर पीड़ा को (दर) दर डालता चूर्ण कर
नाश करता, ऐसा अर्थ करना चाहिये। ८५॥
धरम-धुरीन सु-धीर-धर धारन बर पर-पीर।
धरा धरा-धर सम अचल बचन न बिचल सु-थीर॥६॥
अन्वय । धरम-धुरीन, सु-धौर-धर, पर-पौर धारन वर, धरा,
धरा-धर सम अचल, सु-थौर बचन न बिचल ।
धर्म के भार को धारण करने में श्रेष्ठ बड़े धर्मो, बडे धैर्यमान,
दूसरे के दुख को उठा लेनेवालों में बड़े, (धरा) पृथ्वी पर
(धरा-धर) पर्बत के ममान अचल, जिस की स्थिर बात कभी विचल
मिथ्या नहीं होती ऐसे ऐसे जन भक्ति के योग्य होते है ॥६॥
चौतिस के प्रस्तार मैं अरथ भेद परमान।
करहु सु-जन तुलसी कहत या बिधि तँ पहिचान॥६॥
।
३४ चौतिश अक्षर (क से ले कर क्ष तक) के भीतर मब अर्थों का
भेद बर्णन किया है। तुलसी दास कहते हैं कि सज्जन बिधान
माधु जन ! श्राप इस रौति श्र के द्वारा इस भेद को जानिये ।
यहाँ व्यञ्जन वर्ण लिया है और छन्द में प्रस्तार होता है उस के
भेद से छन्द बनते हैं ॥१७॥

हतीय सर्ग। बेद बिखम क-बरण सु-तर सतर राम की रीति। तुलसी भरत न भरि हरत भूलि हरहु जनि प्रीति ₹८॥ (क बरण बेद) क-वर्ग का चौथा अक्षर घ और (बिखम) मया तीन उस का अन्तिम न ले कर दोनों को मिलाने से घन हुत्रा। घन मेघ संसार में जल को भरता है और फिर उस जल को नहीँ हरण करता वैसे ही मेघवत् श्याम वर्ण श्रीराम की मेघं से भी (सुतर) सुन्दर और (म-तर) शौघ्र रीत है कि भक्तों को सब देते हैं और फेर नहीं लेते दूस हेतु भूल कर भी राम के चरण से अपनी प्रीति को न (हरड) घटायो । जहाँ "सु-तरु" पाठ हो वहाँ उत्तम वृक्ष अर्थात् कल्प वृक्ष के समान उदार अर्थ करना चाहिये ॥६८॥ बन ने गुन कहि जानिये ता ते दिग दिग तीन । तुलसी यह जिय समुझि करि जग जित सन्त प्रबीन ॥१९॥ बन शब्द के-न और (तीन गुन ) सत्व, रज, तम तीनों गुणों में रज का र और तम का म लेकर तीनों को उलटा पढ़िये तो मरन हुआ। प्रथम दिग नाम दश और दूसरे दिग नाम दिश हुई। १० दिशा में मरन जान कर और दूस मरन को मन में अवश्य होनेवाला समझ कर बुद्धिमान माधु जन संसार को जीतते है अर्थात् विषय भोगादि संसारी कामों में इच्छा होन 15 तुलसी-सततई। हो कर ईश्वर के भजन में लगते है जिसके कारण संसार से तर जाते है । जहाँ “बान्तें गुन कहि जानिये ता-ते दिग दि द तौन" पाठ हो वहाँ ब-कार से तोपरा अक्षर म और त-कार से (दि दिग) ११ वाँ अतर र, फिर (दतीन) -कार का तीसरा अक्षर न लेना और योग करना तो मरन बना ऐसा अर्थ करना चाहिये ॥ ८ ॥ चन्द्र अनल नहि है कहूँ झूठो बिना बिबेक। तुलसी ते नर समुझिहैं जिनहिँ ग्यान रस एक ॥१०॥ (पद्र) चन्दमा से प्राकार छोड़ केवल म लिया और (अनल) अनि नाम बैश्वानर के नर को उलटा तो रन बना फिर तीनों अक्षरों को मिलान से मरन था। दूस ब्रह्मरूप अविनाशी जीव का (कई) तीनों काल में मरन नाश नहीं है केवल शरीर ही का नाश होता है यह कर्म भोगी प्राण एक श्राकार को छोड़ कर दूसरे में जाता है परन्तु (बिना विबेक) जिन्हें ज्ञान नहीं है वे झूठ हो भरन मानते हैं। इस सिद्धान्त को वेही समझेगे जिन को एक तत्त्वज्ञान है। दूसरा अर्थ । चन्द्र चन्द्रमा में (कह) कभी अमल अग्नि नहीं है (अर्थात् चन्द्रवरूप दूस मतमई ग्रन्थ में अमिरूप कोई भी दोष नहीं है) बिना ज्ञान के वियोमो खोग चन्द्र में भी अमि का आरोप करते है वैसे ही सतसई को जानना चाहिये अथवा चन्द्र सुख देनेहारे और अग्नि दुःखद कोई नहीं है केवल ज्ञान से दुख सुख .

हतीय सर्ग। होता है। इस को बेहो लोग समझेगे जिन्हे (गुरु का दिया एक ज्ञान रम है) ॥१०॥ सत-सैया तुलसी सतर तम हर पर पद देत । तुरित अविद्या जन दुरित बर तुल सम करि लेत ॥ १०१॥ ॥ इति श्रीगोखामितुलसीदामविरचितसप्तमतिकायां माथेत- वक्रोकिरसवर्णननाम हतीयः सर्गः ॥१॥ यह सतसई ग्रन्थ (सतर) शीघ्र (तम) अज्ञान को (हर) नाश कर (पर पद) परब्रह्मरूप राम को देती हैं तुरन्त श्रज्ञानरूप पाप को नाश कर के (अन) भक्त जनों को पर श्रेष्ट श्री माधु जन के तु ममान कर देती है ॥ १०१॥ ॥ना इति विहारिकतसंक्षिप्तटोकायां हतीयः सर्गः ॥॥

अथ चतुर्थ सर्ग। चौदह चारि अठारहो पढ़े सुने का होइ। तुलसी अपने राम कह जौँ लगि लखे न कोइ॥१॥ अन्वय । कोद् जो लगि अपने राम कह न लखै (तब लगि) चौदह चारि अठारहो पढ़े सुने का होई। तुलसी दाम कहते हैं कि कोई जब तक अपने राम को अर्थात् अपने स्वामी श्रीरामचन्द्र को अथवा (अपने) आप को और (राम) अर्थात् परमेश्वर को न लखे तब तक चौदहो विद्या चारो उप-वेद और अटारहो उप-पुराण पढ़ने सुनने से क्या होता है अर्थात् कुछ लाभ नहीं होता। क् यजु साम और अथर्वण चारो वेद, शिक्षा कल्प व्याकरण छन्द निरुक्त और ज्योतिष छ वेदाङ्ग, मीमांसा और न्यायशास्त्र पुराण और धर्मशास्त्र ये चौदह विद्या है। चौदह विद्या में श्राठारहो पुराण और चारो वेद भी आ गये तो फिर चार और अठारह शब्द दोहे में व्यर्थ पड़े दूस कारण किसौर टीका में जो "चौदह विद्या चार वेद और अठारह पुराण" अर्थ किया गया है मो अमङ्गत जान पड़ता है दूस कारण "चार" शब्द से आयुर्वेद, धनुर्वेद, गन्धर्ववेद और स्थापत्यवेद (कल को विद्या) दून चारो उप-वेदों को लेना चाहिये और "अठारह" शब्द से ।

चतुर्थ सर्ग। (१) आदि पुराण (२) नरसिंह (३) स्कन्द (४) शिवधर्म (५) आश्चर्य (६) नारद (७) कपिल (८) वामन (e) वरूण (१०) शाम्ब (११) मौर (१२) पराशर (१३) भार्गव (१४) मारीच (१५) कालिका (१६) देवी (१७) महेश्वर (१८) पद्म दून १८ उप-पुराण को लेना चाहिये। चौदह विद्या के विषय में श्लोक और एक दोहे में अठारहो पुराणों के नाम । अङ्गानि वेदाश्चत्वारो मौमांसा न्यायविस्तरः । पुराणं धर्मशास्त्रञ्च एता विद्याश्चतुर्दश ।। वेद वकार ब्रकार र दो मकार दो भकार। प ना अकु स्क ग लिङ्ग ये अष्टादश विस्तार ॥ ४ ब अर्थात् विष्णु, वराह, वामन और वायु ३ ब्र अर्थात् ब्रह्म, ब्रह्मवैर्त और ब्रह्माण्ड २ म. अ० मार्कण्डेय और मत्स्य २ भ. भागवत और भविष्यत् प. पद्म ना. नारद अ. अग्नि कु. कुर्म स्क. स्कन्द ग. गारुड़ १८ पुराण हैं ॥१॥ और लिङ्ग पुगण ये तन सुखाइ पञ्जर करै धरै रैन दिन ध्यान । तुलसी मिटै न बासना बिना बिचारे ग्यान॥२॥ अन्वय । तन सुखादू पञ्जर करै रैन दिन ध्यान धरै तुलसी बिना ग्यान विचारे बासना न मिटे ॥ शरीर को सुखा कर (तप करते २ पञ्जर करे) हड्डियों को ठटरी बना डाले और रात दिन ध्यान ही मैं मगन रहे तो भी (बिना ज्ञान

२९७
तुलसी-सतसई।
विचारे) ज्ञान का विचार करने के बिना बासना अर्थात् संसारिक
सुख की इच्छा नहीं मिटती ॥२॥
कल्य-दृक्ष को चिच लिखि कीन्हें विनय हजार।
वित्त न पावै ताहि माँ तुलसी देखु बिचार ॥ ३ ॥
तुलसी-दास अपने मन अथवा किसी भक से कहते हैं कि
(जैसे) कल्प वृक्ष का चित्र लिख कर कोई हजारों प्रार्थना करे कि
मुझे धन मिले परन्तु (ताहि माँ वित्त न पावै) उस से धन नहीं
मिलता यह बात विचार कर देखो। अभिप्राय यह कि मुक्ति के मुख्य
कारण ज्ञान वा भक्ति के बिना वेदादि अध्ययन चित्र के समान हैं।
बैठि निसाऽऽगम निलै मह करै दीप की बात ।
तुलसी देखु बिचार उर नतिम नेकु नसात ॥४॥
(निमाऽऽगम निलै मैंह बैठि दौप की बात करे) दूसरा दृष्टान्त देते
हैं कि रात आने पर कोठरी में बैठ के दीये की चर्चा करे परन्तु
(तम नेकुमहि नसात) अन्धकार कुछ भी नहीं दूर होता है उसी प्रकार
तुलसी-दाम कहते हैं कि हृदय में विचार कर देखना चाहिये कि
शास्त्ररूपी दीपक को केवल चर्चा करने से मोहरूपी अन्धकार (जान
रूपी दीपक के पदय में बलने के विना) दूर नहीं हो सका ॥४॥
निह सुन्दरि पुनि निकट कबि आँगन अंमत मूरि।
ने अति लघु ते लघु र बिनु समझे अति दूरि ॥५॥

चतुर्थ सर्ग ११६ प्रथम ज्ञान पक्ष का अर्थ। (ग्रह) अर्थात् मनुष्य को शरीररूपी घर मिला है और उस में (सुन्दरि) सुन्दर भक्ति भी है (पुनि कवि निकट) और पण्डितरूपी जौव पामा भी उमौ के समीप है(आँगन अम्मत मूरि) और अंगना कपो हृदय में अम्मत को जड़ ज्ञान भी है परन्तु (बिनु समभो) विमा भखी भाँति समझो (ते अति लघु ते खघु) वे अज्ञानी लोग बहुत छोटे से भी छोटे और (अति दूरि रहै) अत्यन्त दूरस्थित रह जाते हैं। द्वितीय लौकिक पक्ष का अर्थ । किमी मूर्ख मनुष्य के घर में परम सुन्दरी स्त्री है और उस के समीप में ज्ञानौ कवि भी रहता है और घर के अँगने में सव पदार्थों का देनेहारा कल्प वृक्ष का अङ्गुर भी है परन्तु वह गवार इन के गुण को नहीं समझता इसौ से वे इसे अति छोटे और दूर जान पड़ते हैं । अभिप्राय यह है कि परमेश्वर ने इस मनुष्य को ज्ञान बुद्धि सब कुछ दिया परन्तु यह उन को नहीं समझता इस लिये वे पूर्णफलदाई नहीं होते अथवा कोई सम वेद पुराण शास्त्र को उलटा करे परन्तु यदि उम वेद पुराण के उलटने पुलटने का फल ज्ञान भकिन हुद तो सब निरर्थक है॥५॥ यह तन अनुपम अयन बर उपमा रहित सु-चैन । समुझ रहित रटि पचि मरैकरत सकल अध्यैन ॥६॥ (यह बर अनुपम तम उपमा रहित सुचेन अयन ) यह श्रेष्ठ तुलसी-सतसई। उपमा हीन जिम की देवता भी इच्छा करते हैं ऐमा मनुष्य का शरीर अनुपम परमानन्द का घर है परन्तु (समुझ रहित सकल अध्यैन करत रटि पचि मर) ज्ञान हौन होने के कारण मब विद्याओं को पढ़ कर रटता २ पच कर मर जाता है। अभिप्राय यह कि जीव उपमा रहित मनुष्य देह पा कर भी ज्ञान और भक्ति के बिना पढ़ते २ मर भी जाता है परन्तु मुकि नहीं पाता ॥६॥ रसना-सुत पहिचान बिनु कहहु न कवन भुलान । जाने कोउ हरि-गुरु-क्रिपा उदित भये रबि-ग्यान॥७॥ जपर कई दोहाँ के द्वारा जीव के पास सब मुक्ति को मामग्री का रहना और वेदादि विद्याओं का पढ़ना आदि दिखला कर अब उन उपार्यों के निष्फलता का कारण कहते हैं। (कहहु रसना सुत पहिचान बिनु कवन न मुलान) कहो (रमना सुत अर्थात् जीभ से उत्पन्न) शब्द (शब्द ब्रह्म) को बिना पहचाने कौन मनुष्य नहीं भ्रम में पड़ता है ? अर्थात् सब ही भ्रम में पड़े हैं (रवि-ज्ञान उदित भये हरि गुरु कृपा कोउ जाने) सूर्य्यरूपी ज्ञान के में प्रकाशित होने से कोई कोई परमेश्वररूपी गुरु से जानते है अर्थात् संसाररूपी भ्रम में नहीं पड़ते हैं ॥ अभिप्राय यह कि शब्द को सब ही लोग सुनते हैं परन्तु उस के मुख्य प्राशय को बिना जाने अज्ञान वा मंसाररूपी भ्रम में पड़े रहते हैं जब कोई परमेश्वररूपी गुरु मिल कर सूर्य्यरूपी ज्ञान का उपदेश करता तब भ्रमरूपी अवकार दूर होजाता है। ऊपर के कई एक दोहाँ में दृष्टान्त और रूपक अलङ्कार हैं॥७॥ की दया चतुर्थ सर्ग १२१ धि-विध भाँति को सब्द बर बिघट न लट परमान । कारण अबिरल अल अपि तु तुलसी अबिद भुलान अन्वय । बर शब्द त्रि-बिध भॉति को, लर परमान, विघटन अपि तु अविरल अल कारण तुलमी अबिद भुलान । श्रेष्ठ वह रमनासुत शब्द तीन प्रकार का है (जो २१वें दोहे में अवणात्मक आदि कहा है) और यह शब्द (बिघट न) कभी घटना नहीं (लट) मदा वर्तमान है कारणरूप है अथवा (लट परमान बिघट न) अर्थात् जैसे टूटे और ममचे दोनों प्रकार के केश एक मैं बुझ कर लट पड़ जाता है और फिर छूटता नहीं उमौ प्रकार विधि-निषेध- मय बाणो का अलगाना कठिन है और कारण वा बीज स्वरूप है और (अविरल) अखण्ड (अपितु) और निश्चय कर (अल) सब सामर्थ्य है। तुलसी दास कहते है कि (अबिद) जो लोग इस शब्द के रूप को ठीक २ नहीं जानते हैं वे हो (भुलान) इस संसार को जाल में भूले हुये है। जो शब्द ब्रह्म को जान चुका है वह मुक्त हो सकता है। जहाँ "अल पियत तुलसौ अविध भुलान" पाठ हा वहाँ बिधि निषेधमय दोनों प्रकार के शब्दों को (पियत) सुनते हुये मनुष्यलोग "अविध” निषध वाणों में भूल गये है अर्थात् जिस को निषेध समझना चाहिये उसे बिधि और जिसे बिधि ममझना चाहिये उसे निषेध समझ लिये है ऐसा अर्थ करना चाहिये। यह पाठ उत्तम है॥८॥ युक्त 16 तुलसी-सतसई। दिग-भ्रम जा विधि होत है कौन भुलावत ताहि। जानि परत गुरु-ग्यान नैं सब जग सन्सय माँहि॥६॥ (जा विधि तद्रिग भ्रम होता है सब जग मन्सय माहि जानि परत ताहि कौन भुलावत) जिस प्रकार किसी को दिशा भ्रम हो जाता है और सब संसार मंशय मय देख पड़ता है तो उसे कौन भुलाता है अर्थात् कोई नहीं भुलाता केवल उस को बुद्धि में ऐसाधम पड़ जाता है कि उसे यह नहीं जान पड़ता कि किधर कौन दिशा है। परन्तु (गुरु ग्यान ते जानि परत) कोई श्रेष्ठ मनुष्य वा उस का गुरुजन उसे बताता है कि अमुक दिशा इस ओर है तब उसे जान पड़ता है। वैमी ही दशा दूम जीव की है जो श्राप से श्राप ऐसे भ्रम में पड़ा हुआ है कि बिना गुरु के उपदेश छूटना कठिन है। अभिप्राय यह कि जैसे कोई भूल से पश्चिम चला जाता है और जानता है कि मैं पूर्व जा रहा हूँ। बीच में किसी बुद्धिमान ने उसे बता दिया कि पूर्व इधर है तब उस के कहने पर वह पूर्व को चला, वैसे ही बिना गुरु के लोग विषय सुख में भूले हैं ॥ ६ ॥ कारण चार बिचार बर बरन न अपर न आन । सदा सोउ गुन-दोख-मय लखि न परत विनु ग्यान॥१०॥ व दोहे में दिशा भ्रम में पड़े मनुष्य के ममान जौवाँ का विधि निषेध-मय बाग में भूलना दिखा कर अब भूलने का कारण बताते हैं।

चतुर्थ सर्ग। १२३ अन्वय। चार कारण श्रान न, बरन बर कारन न, (किन्तु) म चार विचार, मोउ मदा गुन-दोख-मय बिनु ग्यान न लखि पड़त। (चार कारण आन न) दिशा भ्रम होने के चारो दिशा कारण हैं और कुछ नहीं उसी प्रकार (बरन बर कारण न) उत्तम बाणी अर्थात् शास्त्र श्रादि इस जीव के भ्रम होने के कारण नहीं हैं परन्तु चार अर्थात् चारु विचार सुन्दर विचार का न होना कारण है क्योंकि वह भी विचार सदा सर्वदा (गुन-दोख-मय) भला बुरा दो प्रकार का और बिना उत्तम ज्ञान के नहीं जाना जाता ॥ द्वितीय अर्थ (चार बर बिचार न अपर चार बरन बिचार कारण, आन न) चारो श्रेष्ठ दिशाओं का बिचार न होना और चार बरन अर्थात् ब्राह्मण क्षत्रिय आदि अथवा चारु सुन्दर बरण अक्षर शास्त्र श्रादि भ्रम होने के कारण हैं और दूमरा नहीं क्योंकि शास्त्र बिधि निषेध के भेद से सदा गुण दोष युक्त हैं और बिना ज्ञान के जाने नहीं जाते॥ अथवा-ब्राह्मण अपने कर्म को न जान कर अपने जाति के अभिमान से तरना चाहे क्षत्रिय समझे कि मैं राजा हूँ दूसरे का शासन करता हूँ मेरे लिये भजन नहीं है, वैश्य अपने धन के में रहे शूद्र अपना कर्म छोड़ दूसरा कर्म करे तो ये चारो अपने र भ्रम में पड़े कहे जा सकते हैं ॥१०॥ यह करतब सब ताहि को जेहि ते वह परमान। तुलसो मरम न पाइ बिनु सद-गुरु-बर-दान॥११॥ यह भव भ्रम होना उमौ (रामरूप परमेश्वर) का करतब है जिस

१२०
तुलसी-सतसई।
से वह अर्थात् वेदादिक प्रमाणिक समझा जाता है तुलसीदास कहते
है (बिमु सद-गुरु-बर-दान मग्म न पार हैं) कि बिना अच्छे गुरु के
वरदान रूपौ उपदेश के जीव को इस का भेद नहीं मिलेगा। अभि-
प्राय यह कि जीव को अपने करतय में भ्रम हुआ इसी से वह
संसार को जाल में बन्धा है सदगुरु मिलें तो कूट जाय ॥ १९ ॥
दिग-सम-कारन चारि ते जानहिँ सन्त सुजान।
ते कैसे लखि पाइहैं ने वहि बिबस भुलान ॥ १२ ॥
(सुजान मन्त ते चारि दिग-चम-कारण जानत) ज्ञानौ मज्जन लोग
उन दिशा-भ्रम वा ज्ञान-भ्रम के चार अर्थात् चारो दिशा अथवा
चारो वर्णों के अभिभानी हो कर अपने कर्म से हौन होने के कारणों
वा चारो वेदरूपी कारणों को जानते हैं । (जे वहि बिबम
भुलान
ते कैसे लखि पाद) परन्तु जो संमारो लोग उन्हीं चारो में बेबम
हो कर भ्रम में पड़े हैं वे (बिना गुरु के) कैसे जान सकेंगे ॥ १२ ॥
सुख-दुख-कारन सो भयेउ रसना को सुत बीर ।
तुलसी सो तब लखि परइ करें क्रिपा बर धीर ॥१३॥
(बौर सो रसना को सुत सुख-दुख-कारण भयो) प्रबल वही वाणी
सुख और दुख का कारण हुई तुलसौ दास कहते है कि (बर धौर)
बड़े श्रेष्ठ धैर्यवान मन्त लोग जो दया करें तब वह जाम पड़ेगी।
अभिप्राय यह कि विधि-निषेध वाक्य-जाल में पड़ा हुआ जीतब वही
छर सकता है जब माधु-लोग वा सब के स्वामी रामचन्द्र इस पर
रया करें॥१३॥

चतुर्थ सर्ग ।। अपने खादे कप मह गिरे जथा दुख होइ। तुलसी सुख-द समुझि हिये रचत जगत सब कोइ॥१४॥ ११वें दोहे में वेद के कर्ता हो को बाणों में भ्रम कराने का कारण कहा था सो अब "अपने खोदे" श्रादि से उस का खण्डन इस हेतु करते हैं कि ईश्वर दोषी नहीं हो सकता ॥ (तुलसौ सब कोइ हिये सुखद समुझि कूप रचत) तुलसी कहते हैं कि मंमार में सब लोग अपने मन में सुख देनेहारा जान कर कूत्रा खोदते हैं परन्तु (जथा) जैसे अपने खोदे हुये कूप में गिरने से दुःख होता है वैसी ही दशा इस जीव की है कि अपने ही किये कर्म में फस-कर दुख सुख पाता है॥१४ ॥ ता बिधि ते अपनो बिभव दुख-द सुख-द करतार। तुलसी कोउ काउ सन्तबर कीन्हे बिरचि बिचार॥१५॥ (ता बिधि त अपनो बिभव बिरचि दुख कौन्हो) उसी प्रकार से अपने ऐश्वर्या को बढ़ाकर दुख किया। (तुलमो कोउ २ मन्तबर बिचार बिरचि सुख करतार कौन्हे) परन्तु तुलसी दास कहते हैं कि कोई २ माधु जन उत्तम विचार कर के अपने उस ऐश्वर्या को सुख का करनेहारा वा देनेहारा बनाते हैं। अभिप्राय यह कि जीव अपने किये जाये कूपरूपी कर्म वा बाणौ में गिर कर दुख भोग रहा है जो कोई साधुआँ के उपदेश और सङ्गति से उत्तम विचार पूर्वक कर्म करता वा विधिभय वाणों के अनुसार चलता है बा.मुख पाता है। जहाँ तुलसी-सतसई। "दुख सुख दे करतार” पाठ हो वहाँ अपने बिभव में भूल कर लोग जैसा कर्म करते हैं वैसाही (करतार) ईश्वर (दुख सुख-दे) उन्ह दुख और सुख देता है ऐमा अर्थ करना अच्छा होगा ॥ १५ ॥ रसना ही के सुत उपर करत निरन्तर प्रीति । तेहि पाछे सब जग लगेउ समुझ न रोति अरीति॥१६॥ है परन्तु सर्वदा लोग (रसना हो के सुत उपर) वेद शास्त्र अादि बाणों में प्रेम करते हैं (नहि पाछे सब जग लगेउ) और बिचार करते र उन्ही के पीछे सब मंमार लगा है परन्तु (रौति अरौति) किस कर्म करने की विधि और किस का निषेध है इसको नहीं समझा। अभिप्राय यह कि शास्त्र के विचार से जब ठीक २ कर्म का ज्ञान हो तो सुख हो सकता ठौक २ ज्ञान होना कठिन है। जहाँ “करत करन तर प्रीति” पाठ हो वहाँ कान से अत्यन्त प्रेम करते है ऐमा अर्थ कहना चाहिये ॥ १६ ॥ माया मन तेईस भनि ब्रह्मा विश्न महेस । सुर देवी श्री ब्रह्म लौँ रसना-सुत उपदेस ॥१७॥ (माया-ईस ब्रह्म ते ब्रह्मा बिनु महेस औ देबो सुर मन लौं रसना सुत उपदेस भनि)। माया के खामी परमेश्वर से ले कर ब्रह्मा विष्णु शिव देवी देव और जौव तक वाणी के पुत्र अर्थात् शब्द के उपदंश को कहते हैं अर्थात् शब्द के द्वारा सब लोग उपदेश देते हैं। अभिप्राय यह चतुर्थ सर्ग। कि वेद धर्मशास्त्र पुगण श्रादि सब शब्दमय है और देव षि अादि के उपदेश से भरे हैं। द्वितीय अर्थ। माया मन ईश्वर श्रादि सब (रसना-सुत उपदेश भनि) बाणो के द्वारा वर्णन किये जाते हैं जहाँ "माया मन जिव ईस भनि" पाठ हो वहाँ जीव ईश अर्थात् ब्रह्म का अंश है परन्तु मन माया उस का मन माया के अधीन हुआ दूसौ दोष से जीव भूला ऐसा ब्रह्मा विष्णु महेश देव देवी सब वेदादि में (भनि) वर्णन करते हैं ऐसा अर्थ करना। यह अर्थ और पाठ पहले से उत्तम है॥१७॥ बरन धार बारिध अगम को गम करइ अपार । जन तुलसी सत-सङ्ग-बल पाये बिसद बिचार ॥१८॥ अक्षररूपी समुद्र (अगम) अमेय अर्थात् अथाह और (अपार) अनन्त है (को गम करदू) दूस का पार कौन पा सकता है ? (तुलमी जन) मीता राम लक्ष्मन के भक्त लोग (मत-मङ्ग बल) मज्जनों को मङ्गति के बल से (बिमद बिचार पाये) निर्मल विवेक पा कर (गम कन्दू) पार पाते हैं ॥१८॥ गहि सु-बेल बिरलइ समुझि बहि गे अपर हजार। कोटिन बूड़े खबर नहिँ तुलसी कहहिँ बिचार ॥१६॥ (बिरलदू समुझि सु-बेल गहि) बहुत थोड़े लोग इस बाणोरूपी समुद्र को समझ कर इस का पार पाये हैं अथवा (समुझि स-बेल गदि) ११ तुलसी-सतसई। शामरूपौ सुन्दर समुद्र के तट पर पहुंचे हैं। (अपर हजार बहि गे) परन्तु और दूसरे हज़ारों लोग जिन्हों ने शब्द समुद्र को नहीं समझा। वे बह गये (तुलसौ बिचार किये खबर नहिँ कोटिन बूड़े) तुलसी दास ने विचार किया है कि कड़ोरों मनुष्य विचार करते है इस शब्दरूपी समुद्र में डूब कर मर गये पता म लगा अभिप्राच वह कि ज्ञानप्राप्ति, क्रियाकलाप, जपतप करते २ बहुतेरे मर विलाये, पर म तरे। परन्तु भक्तिरूपी दृढ़-नाव को श्राश्रा जिन्होंने को, वे शीघ्रही बन्धन से कट गये इस से रामभकि करना-ही तरने का महज उपाय है॥१८॥ २ खबन सुनत देखत नयन तुलत न बिबिध बिरोध । कहहु केहि केहि मानिये केहि विधि करिय प्रबोध॥ ॥२०॥ (स्त्रबन सुनत) कान सुनता है वा कान के द्वारा लोग सुनते हैं (नयन देखत) आँख देखती है वा आँख के द्वारा लोग देखते हैं आँख के द्वारा सुन नहीं सकते और कान के द्वारा देख नहीं सकते (तुलत न बिबिध बिरोध) इन दोनों इन्द्रियों में जो अनेक प्रकार का बिरोध है मा मिटता नहीँ कहो किस कोर मार्ने कान को वा आँख को और (केहि बिधि प्रबोध करिय) किस प्रकार धीरज धरै वा ज्ञान पावें। अभिप्राय यह कि सुनते है कि सर्वव्यापी परमात्मा एक है और देखते हैं कि सब का श्रात्मा अपनी र शरीर में अलग अपने साथ है तो इन दोनों में से किसे माने ॥

चतुर्थ सर्ग। १२९ द्वितीयार्थ । श्रवण शब्द से श्रुति अर्थात् वेद लेना वेद में यह सुनने में आता है कि यह प्रात्मा ब्रह्म रूप है। नेत्र से अनेक विरोध देख पड़ता है अर्थात् अग्नि जल का विरोधी है, मिह हाथी का विरोधी है। विश्ली मूसे की विरोधिनौ और सर्प नकुल इत्यादि जीवों मैं और देव दैत्य श्रादि देवयोनियों में भी विरोध देख पड़ता है। कहिये किसको मान ? और का कर बोध हो ॥२०॥ सवना-त्मकध्वन्या-त्मक बरना-ऽत्मक बिधि तीन। वि-बिध सबद अनुभव अगम तुलसी कहहिँ प्रबीन॥२१ ? (तुलसी प्रबौन तीन विधि सबद कहि) तुलसीदास अथवा सौता- राम लक्ष्मण के भक्त कबि लोग तीन प्रकार के शब्द कहते हैं, अर्थात् एक जो स्पष्ट सार्थक सुन पड़े, दूसरा ध्वन्यात्मक अर्थात् जो अस्पष्ट मृदङ्गादि के शब्द के समान हो और तीसरा प्रकारादि अक्षरों से बना वर्णात्मक । दून तीनों प्रकार के शब्दों का (अनुभव अगम) ज्ञान होना बहुत कठिन है ॥ २१ ॥ कहत सुनत श्रादिहि बरन देखत बरन-बिहीन । द्रिस्यमान चर-अचर-गण एकहि एक न लीन॥२२॥ अन्वय। कहत सुनत श्रादिहिं बरन, देखत बरन बिहीन, दृस्यमान चर चर गन एकहिं, एक लौन न । कहने सुनने में सब के प्रथम कारण अर्थात् ब्रह्मा अपनी देवजाति वा ब्रह्मा के रूप में है। परन्तु (देखत) देखने में वा उन के और चरितों को विचारने 17 तुलसी-सतसई। मैं (बरन-बिहीन) गुणहीन देख पड़ते हैं । विष्णु और शिव की शक्ति से अल्पशनि हो कर कई वार भ्रम और मोह में पड़े हैं। अथवा (श्रादिहिं कहत सुनत बरन, देखत बरन विहीन) श्रादि ब्रह्म कहने वा वर्णन करने में और सुनने अर्थात् गुणानुवाद के सुनने में (बरन) रूप वा रङ्ग युक्त है अर्थात् सगुन है परन्तु देखने से वा विचारने से रूप रङ्ग रहित अर्थात् निर्गुण है। संसार में जो चर चर दो प्रकार के जीव देख पड़ते हैं सो सब भी (एकहिँ एक न लौन) आपस में विरोधी प्रत्यक्ष है ॥ २२॥ पाँच भेद चर-गन बिपुल तुलसी कहहिँ बिचार। नर पसु स्वेदज खग क्रिमी वुध जन मत निरधार॥२३॥ (तुलसी बिचार बिपुल चरगन, नर, पसु, खेदज, खग, कमी पाँच भेद कहहिं बुध जन मत मिरधार)। तुलसीदास विचार कर सम्पूर्ण (चर) चलनेवाले जीवों में मनुष्य, पशु सिंह आदि, खेदज अर्थात् चौलर श्रादि पसौने से उत्पन्न होनेवाले, पक्षी, और कौड़े मकोड़े पाँच भेद कहते हैं जिन को पण्डित लोग अपने मत से जानेंगे ॥ २३ ॥ अति बिरोध तिन मह प्रबल प्रगट परत पहिचान। अस्थावर गति अपर नहीं तुलसी कहहि प्रमान॥२४॥ (तिन माँ अति प्रवल विरोध प्रगट पहिचान परत) उन सब पर नौवाँ में बड़ा बसवान विरोध प्रगट देख पड़ता है अर्थत् मनुष्य

चतुर्थ सर्म।
मुगादि पात्रों को मारते व्याघ्रादि पशु मनुर्थों को मारते और
गिडादि पक्षी कौड़े मकोड़ें आदि को खाते दिखाई पड़ते हैं।
(स्थावर गति अपर नहीं) प्रचर अर्थात् वृक्षादि को भी दूसरी गति
नहीं देख पड़ती अर्थात् बड़े वृक्षों का छोटे वृक्षों को दबाना आदि
बिरोध दून में भी लक्षित होता है तुलसीदास दूस का प्रमाण कर
के अर्थात् सच सच कहते हैं ॥ २४ ॥
रोम रोम ब्रह्माण्ड प्रभु देखत तुलसी-दास ।
बिनु देखे कैसे कोउ सुनि मानै बिसुबास ॥२५॥
(तुलसीदास प्रभु रोम रोम ब्रह्माण्ड देखत) कबि तुलसीदास
अथवा भक लोग ईश्वर (राम) के बिराट स्वरूप के रोमर में ब्रह्माण्ड
देखते हैं (कोउ बिनु देखे सुनि कैसे बिसुत्रास मान) कोई बिना
देखे सुन कर कैसे विश्वास कर सकता है॥ २५ ॥
बेद कहत जह लगि जगत तेहि ते अलग न पान ।
तेहि अधार बेबहरत लखु तुलसी परम प्रमान॥२६॥
(परम प्रमान) बेद कहत जहँ लगि जगत तेहि अधार) दूस विषय
मैं बड़ा भारी प्रमाण वेद कहता है कि जहाँ तक लोक हैं उसी
विराट रूप राम के श्राश्रय में है अर्थात् सब का आधार वही है
(तुलसौ लख तेहि ते अलग न तहि अधार बेबहरत) तुलसी दास
देखते है वा और भनों से कहते है कि तुम लोग देखो कि
सम्पूर्ण जगत विराट रूप राम से अलग नहीं हैं उमौ के आश्रय से
जगत का व्यवहार चलता है ॥ २६ ॥

१३२ तुलसी-सतसई। सरखप खमत जाहि कह ताहि सुमेरु असूझ । कहेउ न सो समुशत अबुध तुलसी बिगत बिबूझ ॥२७॥ जिस को सरसो देख पड़ती अथवा मरसोरूप अन्तरात्मा समभ पड़ता है उस के लिये सुमेरु पर्वत के समान महान विराट खरूप राम असूम है अर्थात् नहीं देख पड़ते (तुलसौ से अबुध कहेउ न समझत) तुलसी दास कहते है वह अज्ञानी कहने अर्थात् समझाने पर भी नहीं समझता वह विलक्षण मूर्ख है अर्थात् जिस से उत्पन्न हुआ है पाला जाता है उस को नहीं पहचानता ॥ २० ॥ कहत और समुझत और गहत तजत कछु और । कहे सुने समुझत नहीँ तुलसी अति मति बौर ॥२८॥ कहता कुछ और है और समझता कुछ और है अर्थात् वाणी से कहता है कि मंसार असत्य है परन्तु उस में जानने योग्य परमेश्वर को न समझ कुछ और ही व्यवहार को महा समझ लेता है, और ही कुछ ग्रहण करता और और ही कुछ त्याग करता है अर्थात् समारो माया और संभार के बिभव को जो त्यान करने के योग्य है ग्रहण करता है और परमेश्वर और उस के नाम शान्ति बैराग्य आदि को जो ग्रहण करने के योग्य हैं त्याग करता है तुलसी दास कहते हैं कि बुद्धि का ऐसा छोटा है कि कितना कहो सुमो पर नहीं सकता अथवा सुनौ हुई (श्रुति) वेद को कहता है परन्तु उस के ठोकर मारांस को नहीं समझता ॥ २८॥ ..

चतुर्थ सर्ग। देखेउ करइ अदेख इव अन देखेउ बिसुभास । कठिन प्रबलता माह की जल कह परम पियास ॥२९॥ जो बात यह जीव देख रहा है उसे न देखौ सौ कर देता है अर्थात् देखता है कि यह संसार और हमारा शरीर अनित्य और नश्वर है परन्तु इन पर इतना कम ध्यान देता है कि मानो अन देखा कर देता है और जिस बात को नहीं देखा उस में विश्वास करता है (अथवा रामरूप परमेश्वर को दूस सृष्टि में अपने प्रभाव से फैला हुआ देखता है तो भी अन देखा मा हो जाता है) और कुटुम्बादि से भावी सुख जिस को इसने नहीं देखा है उस में विश्वास करता है। आहा! माया का कैसा प्रवल प्रताप है कि (जल) विषय सुख को (जो मृग हृष्णा के समान नश्वर है) बड़ी लालसा रहती है। अभिप्राय यह कि यद्यपि जीव इस संसार के विभव को देखता है कि चार दिन की चाँदनी फिर अँधेरा पाख है तो भी जैसे मृगे धूप में जल के भ्रम से अपनी प्यास को शान्त करने के लिये दौड़ते फिरते है वैसे ही यह विषय सुख को खालमा के पीछे बावला हो रहा है ॥ २८ ॥ सोइ सेमर सोई सुआ सेवत पाइ बसन्त । तुलसी महिमा मोह की विदित बेखानत सन्त॥३०॥ जैसे सेमर के फल को सुन्दर देख कर मारे मोह के सुग्गा उस की सेवा करता है परन्तु फल पकने पर उस में चाँन मारता है १५० तुलसी-सतसई। मंसारी सुख दुःखमय तो भूत्रा निकलता है तब अपने भ्रम पर पछताता है। फिर बसन्त ऋतु आने पर वही सुग्गा पहली बात भूल कर उसी सेमर के फल की सेवा करता है ऐसौ हौ दशा इस जीव की है कि होने के कारण सेमर के फल के समान है तिस को यह सेवता है और अन्त को दुःख पाता है तो भी विषय का पौछा नहीं छोड़ता तुलसौ दास कहते हैं कि मोह का मामर्थ विदित है ऐसा माधु लोग भी वर्णन करते हैं ॥३०॥ सुनत स्ववन देखत नयन सन्सय समन समान। तुलसी समता असम भौ कहत आन कह पान॥३१॥ कान से सुनता और आँख से देखता है तो भी इस का सन्देह जम राज के समान बड़ा दृढ़ है अथवा (मंमय समन) मन्देह का शाम्न होना (समान) जैमा का तैमा ही रह जाता है अर्थात् दूर नहीं होता तुलसी दास कहते हैं कि (असम ममता भौ) अममान अर्थात् संसार और विषय सुख श्रादि जो टेढ़ा है से इस को समान अर्थात् मौधा जान पड़ता है अथवा (असम) एक संख्या विशिष्ट श्रत मार्ग मम अर्थात् दैत के समान जान पड़ता है दूसी कारण (भान कह पान कहत) नाश होनेवाले संसार को सत्य समझता है। अभिप्राय यह कि जैसे सागा सेमर के फल को सच्चा फल समझता है वैमाही यह जीव भी संमार और विषय सुख को मत्य जानता है जहाँ “ सुभेउ सवन देखब नयन" पाठ हो वहाँ कान से सुना कि वह बड़ी सुन्दर है तो आँख से उस को देखने की इच्छा हुई (संसथ-

चतुर्थ सर्ग।
सुमन) तब अच्छे निर्विकार मन में संसयरूप यम (समान) समाया
कि अब किस भाँति उस से मिल । इस प्रकार विषय सुख भोगौ
जीव के लिये (असम) बिरुद्ध कर्म (ममता भौ) अच्छा हुत्रा ऐमा
अर्थ करना चाहिये ।। ३१ ॥
बस हा भौ अरि हित अहित सोऽपि न समुन्नत हीन।
तुलसी दीन मलीन मति मानत परम प्रबोन ॥३२॥
१ (हा अग्विस अहित भव हित समझत तुलसी सो मतिहीन
मलौन दौन अपि परम प्रबीन मानत) (हा इति कष्ट) बड़े कष्ट की
बात है काम क्रोधादि शत्रुओं के बश हो कर असुखकारी विषय
सुख को सुख कारी मित्र समझता है तुलसौ दास कहते है कि
यह जीव ऐमा बुद्धिहीन, दूषित, दुखौ भी हो कर अपने को बड़ा
बुद्धिमान मानता है॥
२ द्वितीयार्थ-(हा बस अहित अरि परम हित समझत मपि
प्रबीन मतिहीन मलीन न मानत) कष्ट के बश हो कर बसुतः
ग्रहस्ती के जाल में फमाने हारे होने के कारण प्रमङ्गल कारी
मंसारी धनदारादि ऐश्वर्य को अति मङ्गल दायक मित्र समझता है
वह दारा श्रादि चतुर कुटुम्ब भी जब यह सुद्धा अवस्था वा रोगादि
के कारण बुद्धिहीन दौन और दोषी हो जाता है तो इसे नहीं
मानता अर्थात् इस का श्रादर भाव नहीं करता। जहाँ "बम हो'
पाठ हो वहाँ उस जन को (हौ) इदय काम क्रोध लोभ पारिपरि
के वश हुश ऐमा अर्थ करना चाहिये ॥ ३२॥

तुलसी-सतसई।
भटकत पद अद्वैतता अटकत ग्यान गुमान ।
सटकत बितरन ते बिहठि फटकत तुख अभिमान॥३३॥
(अद्वैतता पद भटकत) अद्वैत अर्थात् सम्पूर्ण मचिदानन्द परब्रह्म
खरूप है इस सिद्धान्त में भटकता अर्थात् सन्देह के कारण विश्वास
नहीं करता (ग्यान गुमान अटकत) और यह संसार मचा है इस
ज्ञान के अभिमान में (फंसा हुआ) चूर है (बिहठि बितरन तें
मटकत) हठ कर के दान से भागता है अथवा वि विशेष रूप से
तरन जो मुक्ति वा भक्ति उस से दूर रहता है (तुख अभिमान
फटकत) भूसा रूपी अभिमान को ओसाता है अर्थात् आत्माभिमान
में झूठ ही अपने को मन रखता है ॥ ३३ ॥
जो चाहत तेहि बिनु दुखित सुखित रहित तेहि होय।
तुलसी सो अतिसय अगम सुगम राम तें होय॥३४॥
जिस को यह चाहता है अर्थात् मंसारी ऐश्वर्य, विषयसुख, अथवा
जप तप आदि कामना पूरी करनेहारे काम, वा वह सुन्दरी
जिस के रूप की प्रशंसा इसने सुनौ है। उन के विना यह दुखित
। (तेहि रहित सुखित होय) परन्तु बस्तुतः उन के न रहने से
यह जीव सुख पाता है यदि यह किसी वस्तु को कामना न करे
तो सुखी रहे। तुलसी दास कहते हैं कि सो अर्थात् इस जीब का
कामना रहित होना अत्यन्त दुस्माध्य है केवल रामचन्द्र की दया
से सुसाध्य
होता है॥३४॥

चतुर्थ सर्ग। १२० मातु पिता निज बालकहिँ करहिँ इष्ट उपदेस। सुनि माने बिधि आपु जेहि निज-सिरसहे कलेस॥३५॥ जैसे कल्पित (वाम-पन्थी) देवता की पूजा करने हारे माता पिता अपने बालक को उसी अपने मिथ्या इष्ट देव की पूजा का जिस प्रकार का उपदेश करते हैं उसी प्रकार उन के लड़के बाले उमे सुन कर मान लेते हैं और जन्म भर उस कल्पित देवता की पूजा का क्लेश अपने शिर पर ढोते रहते हैं वैसी ही दशा दुम जीव को है। अभिप्राय यह कि संसार को परम्परागत सत्य समझ के दूस के व्यवहार में पच मरते है ॥ द्वितीयार्थ। माता पिता अपने बालक को इस जगत के ऐसे अच्छे अभिलषित काम का उपदेश देते हैं जिन से बहुत काम निकले। (जैहि उपदेस सुनि श्रापु विधि निज-मिर कलेस सहै) जिस प्रकार (जल में मैन करनेहारे लक्ष्मी-नारायण का यह उपदेश सुन कर कि आप कमल पर बैठिये) आप ब्रह्माजी ने अपने शिर पर मधुकैटभ के उपद्रव का दुख उठाया वा सृष्टि की रचना का दुखदाई भार अपने शिर लिया जिम से आज तक नहीं लूटे तो संसारौ मनुष्य क्यों कर कूट सकता है॥३५॥ सब माँ भलो मनाइबो भला होन की आस । करत गगन को गेडुवा सो सठ तुलसी-दास ॥ ३६ ॥ तुलसी-दास कहते हैं (मो सठ भलो होन को श्रास सब माँ भलो मनाइबो गगन को गेडुत्रा करत) वह मूर्ख पुत्र जिम को पिता ने झठे 18

११
तुलसी-सतसई।
वाम पन्थ को देवता की पूजा का उपदेश दिया था अपने कल्यान होने
को प्राण से सब बस्तुओं की भलाई मनाता है और आकाश को
गेडुवा कर रहा है अर्थात् जो शून्यरूप कुछ नहीं है उस को गेडुवी
बनाता है।
अभिप्राय यह कि उस को देवता वा इष्ट पदार्थ हो झूठा ठहरा
तो उस से भलाई को क्या प्राशा हो सकती है दूस लिये मूर्ख पुत्र
श्रमम्भव काम कर के व्यर्थ अपने को दुखी करता है ॥ २६ ॥
बलि मिसु देखत देवता करनी समता देव ।
मुए मारि अबिचार रत स्वारथ साधक एव ॥३७॥
(अबिचार रत साधक देवता बलि मिसु मुए मारि स्वारथ देखत)
अबिबेक में पड़ के हिंसा-शौल वह मर्ख माधक अपने इष्ट देवता को
बलिदान वा पूजा देने के बहाने से मृतक तुल्य पशु को मार कर
अपने प्रयोजन को देखता है अर्थात् देवता के नाम पर पशु मार
कर आप खा जाता है। (समता एब देव करनौ) सच पूछिये तो सब
जीवों को अपने समान जानना अथवा मब पदार्थों को राम-मय
देखना हौ देवता का काम है अर्थात् जो सब को अपने ममान
जानता है वह श्राप देवता के तुल्य है किसी जीव की हिंसा करने से
रामचन्द्र प्रसन्न नहीं होते (अहिंसा परमो धर्मः) किसी को मनमा
वाचा कर्मण पोड़ा न देना यही बड़ा धर्म है ॥ ३७॥
बिना बीज तरु एक भव साखा दल फल फूल ।
को बरन अतिसय अमित सब बिधि अकल अतूल॥३८॥

चतुर्थ सर्ग। (बिना बोज एक तरु भव) बिना बौये के अर्थात् किसी के बिना उत्पन्न किये वृक्ष रूप एक परमेश्वर (राम) श्राप से श्राप हुये ब्रह्मा विष्णु महेश श्रादि उन की शाखा अपर देवता पत्र और लोकादि फल फल हुये उस का वर्णन कौन कर सकता है अत्यन्त अनन्त है और सब प्रकार से प्रगणनीय और अनपम है। द्वितीयार्थ। (बिना बौज) जैसे कलम बिना बीज होता है वैसे हो माया की महिमा से बिना बीज एक भव तरु यह संसाररूपी वृक्ष हुआ अर्थात् वेदान्तियों के मत से केवल भ्रान्तिमय और शून्य होने के कारण इस संसार को बिना बीज का वृक्ष कहा है (अतिमय अमित अकल साखा दल फल फूल को बरने) जिस में किमी को कारीगरी काम नहीं कर सकती और जिस के इतने अधिक कर्मरूपी शाखा पत्ता फल और फल हुये कि वर्णन करना असम्भव है सब प्रकार से अमय और अनुपम हैं ॥ ३८ ॥ सुक पिक मुनि गन बुध बिबुध फल आखित अति दीन। तुलसी ते सब विधि रहित से तरु तासु अधीन ॥३६॥ वृक्ष पर पक्षी रहते है इस वृक्ष के (बिबुध बुध मुनि सुक पिक गन) देवता पण्डित कृषि सुग्गा और कोकिल के झुण्ड हैं जो संसाररूपी वृक्ष के कर्मरूपी फल के अधीन हो कर बड़े दौन है अर्थात् जब कोई मंसार में श्रा कर उत्तम कर्म श्रादि करता तब देवता आदि की पदवी पाता है तुलसी दास कहते हैं कि वे शुक पिक आदि सब विधानों से होम है अर्थात् उन का इस वृक्ष पर २४० तुलसी-सतसई। कुछ अधिकार नहीं है और वह संसाररूपी वृक्ष उस रामरूप परमेश्वर के अधीन है। जहाँ "तुलसी ते सब बिरद हित” पाठ हो वहाँ (ते सब) वे सव शुक पिक श्रादि मुनिगन (तासु हित बिरद) उस ब्रह्मरूप राम के श्राज्ञाकारी वा प्रिय जस वखाननेहारे हैं जिस के अधीन वह वृक्ष है॥३६ ॥ को नहिँ सेवत श्राइ भव को न सेइ पछिताय । तुलसी बादहिँ पचत है आपुहिँ आपु नसाय ॥४०॥ (श्राद को भव नहिँ सेवत) जन्म पा कर कौन इस संसार को नहीं सेवता और सेवा कर के नहीं पछताता। तुलसी दाम कहते है कि व्यर्थ ही (आपुहि श्रापु पचत नमाय है) श्राप से श्राप मारे के गल कर नष्ट हो जाता है। अभिप्राय यह कि इस झूठे संसार में जो फैमा मो अपने कर्म को जाल में पड़ कर अनेक जन्म मरन के दुःख में पचता रहता है॥४॥ दुःख कहत बिबिध फल बिमल तेहि लहत न एक प्रमान। भरम प्रतिष्ठा मानि मन तुलसी कथत भुलान ॥४१॥ उस को अनेक प्रकार का निर्मल फल बताते हैं परन्तु प्रमाणरूप एक फल भी कभी नहीं पाते हैं। (तुलसी मन भरम प्रतिष्ठा मानि) तुलमी दाम कहते हैं कि अपने मन में भ्रम मे फल पाने का श्रादर मान कर (भुलान कथत) भूल से कहते फिरते हैं। जहाँ "बईत न एक प्रमान” पाठ हो वहाँ (एक प्रमान बहत न)

चतुर्थ सर्ग।
१४१
किसी के प्रमाण पर नहीं चलते अर्थात् कहने को तो कहते हैं कि
शास्त्र में अनेक प्रकार जप तप के फल लिखे हैं परन्तु श्राप उस के
अनुमार नहीं करते। मन में अपनी प्रतिष्ठा और भय के लिये
झठे ही कहते हैं ॥४१॥
मिग-जल घट भरि बिबिध-विध सीचत नभ-तरु-मूल।
तुलसी मन हरखित रहत बिनहिँ लहे फल फूल॥४२॥
(बिबिध बिधि घट म्ग-जल भरि नभ-तरु-मूल सींचत) संसार
में विश्वास करनेवाला अनेक प्रकार के घड़ों में मृग हृष्णारूपी जल
भर के श्राकाशरूपी वृक्ष को जड़ को मींचता है और तुलसीदास
कहते हैं बिना फल फूल पाये मन में प्रसन्न रहता है।
अथवा भूत आदि को पूजारूपी जल को अपने हृदय में भर के
नभ-तरु झूठे विश्वासरूपी श्राकाश वृक्ष को सींचते हैं और जो भी
अज्ञानी ही बने है तथापि मन में प्रसन्न रहते है ॥ ४२ ॥
सोऽपि कहहिँ हम कह लहेउ नभ-तरु को फल फूल ।
ते तुलसी तिन ते बिमल सुनि मानहिँ मुद मूल ॥४३॥
(मोऽपि कहहिँ हम नभ-तरु को फल फूल कह लहेउ) निश्चय है
कि भूत पूजारी संसारी भ्रम में पड़ के कहता है मैं ने आकाश
वृक्ष के फल फल को पाया और वे जो उस की बात को सुन कर
उसे श्रानन्द को जड़ समझते हैं उस से भी निर्मल हैं अर्थात् और
अधिक श्रम में पड़े हैं ॥ ४ ॥

१४२ तुलसी-सतसई। तेऽपि तिनहि जाँचहि बिनय करि करि बार हजार। तुलसी गाडरि के ढरन जाना जगत बिचार ॥४४॥ और दूसरे हजारों बार उन मिथ्या-विश्वासकों से प्रार्थना कर के माँगते हैं कि हम को भी बताइये कि जिस से पूजा कर के फल पावे तुलसी दास कहते हैं कि भेड़ की चाल के समान संसार का विचार है। अभिप्राय यह कि जैसे आगे चलनेवाली एक भेड़ो यदि कुँएँ में जावे तो उस के पीछे सब भेड़ो कूएँ में जा गिरती हैं वैसे ही भेड़िया-धमान संसार के विश्वासकों का है॥४४॥ ससि कर खग रचना किये अति सोभा सरसात । स्वरग सुमन अबतन्स खल चाहत अचरज बात॥४५॥ चन्द्रमा की किरणों की माला बना कर पहिने से अत्यन्त शोभा होती है परन्तु ऐसौ माला का बनना ही असम्भव है ऐसा ही संसार में विश्वास करनेहारा मूर्ख आकाश के फूल का भूषण बनाना इस अत्यन्त आश्चर्य बात को चाहता है। जहाँ "कह सोभा मरमात" पाठ हो वहाँ क्या मोभा हो सकती अर्थात् नहीं हो मकती ऐसा श्री करना चाहिये ॥४५॥ तुलसी बोल न बुझई देखत देख न जोइ । तिन सठ को उपदेस का करब सयाने लोइ ॥४६॥ तुलसी दास कहते हैं कि जो (बोल न बझाई) वाणी को नहीं समझता

चतुर्थ सर्ग।
१०५
और देखता जत्रा भी नहीं देखता है (मयाने लोद तिन मठ को का
उपदेस करब) बुद्धिमान लोग उन महामखौं को क्या उपदेश कर
मत है।
अभिप्राय यह कि जो कोई इस संसार को और कल्पित देवताओं
की पूजा को असत्य जान कर भी नहीं छोड़ना चाहता उस से कौन
कुड़ा सकता है ॥ ४६॥
जो न सुनै तेहि का कहिय कहा सुनाइय ताहि ।
तुलसी तेहि उपदेस ही तासु सरिस मति जाहि॥४७॥
जो नहीं सुनता उस से क्या कहना और क्या सुनाना अर्थात्
कहना-सुनना दोनों व्यर्थ हैं तुलसी दास कहते हैं कि जिन को
बुद्धि उन्ही के मदृश है वे ही लोग उन को उपदेश देते हैं ॥४७॥
कहत सकल घट राम-मय तौ खोजत केहि काज ।
तुलसी कह यह कुमति सुनि उर आवत अति लाज
॥४८॥
(सकल घट राम-मय कहत तौ केहि काज खोजत) कहते हैं कि
रामचन्द्र घट २ व्याप्त हैं तो फिर दूमरी और उन्हें खोजने क्या जाते
है (यह कुमति सुनि तुलसी कह उर अति लाज श्रावत) यह
कुबुद्धि सुन कर तुलसी दास को अपने मन में बड़ी लज्जा पाती है
अभिप्राय यह कि-जब अपने ही घट में राम है तो वहाँ हाँ खो-
जना चाहिये और दूसरी ठौर भटकना केवल मूर्खता हैं ॥ ४८॥

१४१ तुलसी-सतसई। अलख कहहि देखन चहहि ऐसा परम प्रबीन । तुलसी जग उपदेस हाँ बनि बुध अबुध मलीन ॥४६॥ ( ऐमो परम प्रबोन अलख कहहिँ देखन चहहिँ) ऐसे बुद्धिमान ( बड़े मर्ख) हैं कि जिस राम को अलख अर्थात् देखने के अयोग्य कहते हैं उम को देखना चाहते हैं (मलौन अवुध बुध बनि जग उपदेस हो) ऐसे अधर्मी और अज्ञानी लोग ज्ञानी बन के संमार को उपदेश देते हैं ॥ ४८ ॥ इहरत हारत रहित बिद रहत धरे अभिमान । ते तुलसी गुरुवा बनहिँ कहि इतिहास पुरान॥५०॥ (बिद रहित हहरत हारत (तथापि) अभिमान धरे रहत) विद्या- हौन होने के कारण इहरत थक जाते हैं अर्थात् जिस बात को खोजते हैं बह नहीं मिलती तब थकित हो कर भी अभिमान धरे हो रहते हैं तुलसी दास कहते हैं कि (कलि में) ऐसे लोग श्रा कर पुरानौ कथा कह कर जगत के गुरू बनते हैं। अभिप्राय यह कि कल्पित भूत प्रेतादिकों की पूजा करनेहारे कुछ मिद्धि न पा कर भी पा कर लोगों के पाम यह पुरानो कथा निकालते हैं कि मेरे पिता या गुरु अमुक देवता की पूजा वा बलिदान से बड़े सिद्ध हुये थे, यदि तुम लोग करो तो वैसी सिद्धि अवश्य पात्रोगे कोई कोई इतिहास पुराण आदि शब्द का महाभारत आदि .

चतुर्थ सम। इतिहास और भागवत प्रादि पुराण अर्थ करते हैं सो मत जान पड़ता है क्योंकि तुलसौ-दास बैष्णव थे, वे क्यों इतिहास पुराण को निन्दा करेंगे। यहाँ पुराने इतिहास से पैतीसवे दोहे में कहा परम्परा- गत इष्टदेव का मिथ्या-उपदेशरूपी इतिहास समझना चाहिये॥५०॥ निज नैनन देखत नहीँ गही आँधरे बाँह । कहत मोह बस तेहि अधम परम हमारे नाँह ॥५१॥ आपनौ आखों से तो देख नहीं पड़ता दूसरे अन्धे को बाँध पकड़ा (अधम मोह बस कहत हमारो नाँह परम ) नौच भ्रम में पड़ कर कहता है कि हमारे उपदेशक खामौ वा देवता बड़े हैं। अभिप्राय यह कि अज्ञानी गुरू के बारे में पड़ कर संसार में विश्वास किया। इसौ से चौरामौ योनि का अधिकारी कुत्रा ॥ ५५ ॥ गगन बाटिका साँचहीँ भरि भरि सिन्धु तरङ्ग । तुलसी मानहिँ माद मन ऐसे अधम प्रभा ॥५२॥ (सिन्धु तरङ्ग भरिए गगन बाटिका माँचहीं) संसाररूपी भठे ममुद्र के अभिलाषरूपो तरङ्ग से जल भर कर आकाशरूपी मिथ्या बाटिका को सींच रहे है। तुलसी दाम कहते है कि ये ऐसे नौच और निडर हैं कि मिथ्या से भी मन में प्रानन्द मानते हैं ॥५२॥ । दिखद करत रचना विहरि रग-रूप सम तूल । बिग बहन बिष्ठा करत ता ते भयो न तूल ॥ ५ ॥ 19 १४४ तुलसी-सतसई। ये मिथ्या विश्वासी (ट्रिखद बिहरि रचना करत) पत्थल पर बड़े सिंह का चित्र बनाते हैं जिस का रङ्ग रूप ठोकर सिंह के तुल्य होता है, परन्तु पनी उस के मुख में बौट कर देता है, इस से सिंह के पराक्रम को तुलना उस में न हुई । अभिप्राय यह कि यद्यपि वे लोग अपने मिथ्या देवता को ईश्वरवत् समझ के बलि आदि देते है परन्तु वह निर्जीव होने के कारण उस पक्षी को भी नहीं मार सकता और अपने भकों के मनोरथ का पूरा करना तो दूर रहा। दूसरा अर्थ-परमेश्वर ऐसे अपने भकों के अधीन हैं कि भक्त-जन पत्थल काट कर उस पर देवता का रङ्ग रूप सब उसी के तुल्य बनाते हैं और मुख में पक्षी बौट कर जाता है तो भी उस भक्त से रूठते नहीं ऐसे दयालु हैं। पहले अर्थ में (वि) विशेष हरि सिंह अर्थ किया गया। दूसरा अर्थ पहले से अच्छा जान पड़ता है ॥ ५३ ॥ । चाह तिहारी आप त मान न पान न आन । तुलसी करु पहिचान पति जाते अधिक न मान॥५४॥ (तिहारी चाह श्राप ते आन) तू अपनी इच्छा को श्राप अर्थात् आपने ही श्रात्मा से (पान) लाओ पूरी करो (आन न मान) और दूसरे को न मानो, तुलसौ दास कहते हैं (पति) अपने खामी राम को पहचान कर (ज़ा ते अधिक पान मान न) जिम से अधिक और को न मानना चाहिये।

चतुर्थ सर्ग।
अभिप्राय यह कि यदि तुम अपने राम को अपने घट में ढूंढ़ के
उन से अपनी इच्छा पूरी करात्रोगे तो शीघ्र फल पानोगे नहीं तो
दूधर उधर भटकते रह जाओगे॥ ५४॥
बातम बोध बिचार यह तुलसी कर उपकार ।
काउ कोउ राम प्रसाद ते पावत पर-मति पार ॥५५॥
(तुलसी उपकार) (हेतु) यह पातम विचार कर । कोउ २ राम
प्रसाद ते पर मति पार पावत)।
तुलसी दाम ने जगत के उपकार के लिये यह आत्मा के ज्ञान का
बिचार किया। कोई २ श्रीराम चन्द्र (रूपी गुरू) की कृपा और पर-
मति अर्थात् उत्कृष्ट बुद्धि वा भक्ति से इस बिचार के पार जायेंगे।
अभिप्राय यह कि इस ग्रन्थ में गोसाँई जी ने अत्मज्ञान का वर्णन
किया है परन्तु उस का यथार्थ बोध श्रीरामचन्द्र और गुरू को दया
के बिना नहीं हो सकता ॥ ५५॥
जहाँ तोख तह राम हैं राम तोख नहि भेद ।
तुलसी देखि गहत नहीं सहत बिबिध बिधि खेद ॥५६॥
जहाँ सन्तोष है वहाँ श्रीरामचन्द्र रहते हैं क्योंकि सन्तोष और
राम
में कुछ भेद नहीं है परन्तु संसार के मनुष्य लोग इस बात को
देख कर भी मंतोष को नहीँ ग्रहण करते इमी से वे अनेक प्रकार का
दुःख सहते अर्थात् भोगते हैं ॥ ५६ ॥

तुजसी-सतसई। गो-धन गज-धन बाजि-धन और रतन-धन खान। जब पावत सन्तोख धन सब धन धूरि समान ॥५७॥ संसार में गौ, हाथी, घोड़ा आदि पशु और अनेक प्रकार के रत्नों की खान हैं परन्तु इन सब धनों से सन्तोषरूपी धन बड़ा है क्योंकि जब सन्तोष मन में पाता तो और धन मट्टी के समान हो जाते है। सबों के रहते यदि मन्तोष न हुआ तो सब सब व्यर्थ हैं। जिसके पास कुछ नहीं है वह सौ रुपया चाहता मौवाला हजार हजारवाला लाख चाहता है और बहुत धन और जन होने पर भी इच्छा पूरी नहीं होती, जब सन्तोष होता है तभी इच्छा पूर्ति और सुख होता है॥३०॥ कुथि रटि अटत बिमूढ़ लट घट उद घटत न ग्यान । तुलसी रटत हटत नहाँ अतिसय गत अभिमान॥५८॥ अ०-(बिमूढ़ लट कुथि रटि अटत ग्यान घट न उद घटत ( भौ) तुलसौ प्रतिमय अभिमान गत हटत नहीँ रटत रहत ॥) (सन्तोष कर के रामरूपी गुरु को प्रसन्न करना छोड़ संसारो) मूर्ख खल कूथता और रटता हुआ इधर उधर भटकता है परन्तु आत्म- जान ऐसा दुर्लभ है कि उस के हृदय में नहीं आता तुलसी दास कहते हैं कि तो भी मूर्ख जन अभिमान के वश हो कर हारता नहीं बरन रटता रहता है। जहाँ (कधि रति) पाठ है वहाँ स्त्रौ पुत्रादि में प्रौति का वर्णन करता और ( बिमूढ़ वट) मूखों में वर्तमान हो के अहसार से भरने चतुर्थ सर्ग। १७ तीर्थादि में फिरता रहता है और पुराणादि के (इटत नहीं रटत रहत) पाठ से इटता नहीं रटता अर्थात् घोखता रहता है (घट ग्यान न उद घटत) तो भी रामरूप परमेश्वर की भक्ति से होन होने के कारण उस के हृदय में ज्ञान नहीं पाता। ऐसा अर्थ करना चाहिये ॥ ८॥ भू भुजङ्ग गत दाम भव का मन बिधि बिधान। तो तन बरतमान जत तत तुलसी परमान॥५६ ॥ प्र०-(दाम गत भुजङ्ग भव मन का बिधान बिद्धि, तुलसी जत तो तन बरतमान तत परमान)। भूमि पर पड़ी माला अर्थात् रस्मो में जैसे साँप का भ्रम होता है वैसा ही तुझ को इस झूठे संसार में सत्यता का भ्रम होता है, दूस को तू अपने मन को (बिधान ) कल्पना मात्र (विद्धि) जानो तुलसी दाम कहते हैं कि जब से तेरा शरीर का है तभी से तुझ को भ्रम हुआ है और रहेगा। अभिप्राय यह कि माला अन्धेरे में जिम प्रकार सच मुख साँप जान पड़ती है उसी प्रकार यह जगत भी प्रज्ञानरूप अन्धेरे में सत्य भाषमान होता है बस्तुतः सत्य नहीं है जहाँ "दाम भव काम न बिबिध बिधान" पाठ हो वहाँ यह माला है सर्प नहीं है उसी प्रकार यह धम है मंमार नहीं है और अनेक प्रकार की कामना भी (न) झूठी है, कुछ है नहीं, ऐमा अर्थ करना चाहिये ॥५ तुलसौ सतसई। भोडर सुक्ति बिभव पड़िक मनि गति प्रगट लखात । मनि भोडर अपि सुक्ति तें बिलग बिजानत तात॥६॥ अ.-तात, भोडर सुकि गत पडिक मनि बिभव प्रगट लखात (परन्तु) भोडर अपि सुनि मनि त बिलग बिजानत ॥ अब दूसरा दृष्टान्त देते हैं कि हे प्यारे ! जैसे अभरक और मौपौ में (भ्रम मे) चाँदी रत्नादि ऐश्वर्य प्रगट देख पड़ता है परन्तु (भ्रम दूर होने पर) श्रभरक और मोप मणि रत्नादि ऐश्वर्य से अलग हैं ऐसा ज्ञान होता है तैसे ही इस संसार में मत्यता का भाष होता है परन्तु श्रात्मज्ञान होने पर श्रभरक और सौपीरूपी संसार को झूटाई तथा रत्नरूपी श्रात्मा को सचाई प्रगट हो जाती है। परन्तु जैसे जिस पुरुष के मन में सर्प चाँदी और रत्न छा गये हैं उस को दूर से बार २ देखने पर भी रस्मी मौपी भरक में क्रम से पूर्वोत तौनों पदार्थ (न रह कर) भी सच मुच देख पड़ते हैं वैसे ही जिम के मन में संसार को सत्यता छाई है उस को (यह भूटा हो कर) भौ सञ्चा हो जान पड़ता है। जहाँ "भव डर सुकि बिभव पडिक मन गत" पाठ हो, वहाँ तेरे मन में संमार जो सत्य जान पड़ता है सो सौप में चाँदी के ऐश्वर्य के भ्रम के समान है ऐसा अर्थ करना चाहिये ॥ ६ ॥ राम-चरन-पहिचान बिनु मिटी न मन की दौर। जनम गवाँये बादही रटत पराए पौर ॥६१॥ रामचन्द्र के चरण का महा पहिचान न होने के कारण मम को चतुर्थ वर्ग। (दौर) अभिलाषा न मिटी दूसरे अर्थात् छोटे २ राजा बाब देवता और तीर्थों में रटता २ (बादही) व्यर्थ जन्म को विता दिया॥ अभिप्राय यह कि जब तक तुझे परमेश्वर की भकि वा ब्रह्मज्ञान न होगा तब तक लू चाहे कितना भी छोटे २ देवताओं की पूजा और तीर्थ ब्रत कर पर तुझ परम गति न मिलेगौ ॥ श्रीधरखामौ भागवत को टौका में लिखते है कि चाहे तप करें परबत से गिरें तौर्थों में फिरा करें वेद पुराण पढ़ा करें यज्ञ किया करें और बाद बिबाद किया करें परन्तु बिना विष्णु (रूप राम) के मंमार से नहीं कर सकते ॥६१॥ सुनै बरन मानै बरन बरन बिलग नहिँ ग्यान। तुलसी सु-गुरु-प्रसाद-बल परै बरन पहिचान॥६२॥ (बरन) अक्षर सुन पड़ता है वही माना जाता है वही ज्ञान स्वरूप तुलसी दास कहते हैं कि उत्तम रामरूप गुरू की कृपा के बल से बरण अतररूप ब्रह्म पहिचाना जाता है। अभिप्राय यह कि अक्षरमय शब्द होता है जिस को सुन कर लोग मानते हैं। वेद के मन्त्र भौ अक्षर हो के है और अक्षर हो उच्चारण किया जाता है। * तपन्तु तापैः प्रपतन्तु पर्वतादटन्त तीर्थानि पठन्तु चागमान् । यजन्तु यागैर्विवदन्तु वादहरि विना नैव हर्वि तरन्तु ।

तुलसी-सतना। द्वितीयार्थ। अथवा वरन शब्द में लेष, मान कर शाखा विधि निषेधमय वाणी अर्थ किया तब कान से सुनता है मन से उस वाण को मानता है और ज्ञान और शास्त्र की वाणी में भेद नहीं है. इत्यादि अर्थ हो सकता है॥६२ ॥ बिटप बेलि गन बाग के माला-कार न जान । तुलसो ता बिधि बिद बिना करता राम भुलान॥६३॥ अ.-बाग के बिटप बेलि गन, माला-कार न जान तुलसी विद बिना (जन) ता बिधि करता राम भुलान ।। जिस प्रकार से बगैचे में के छोटे २ वृक्ष और बेल-बूटे त्रादि अपने मोचनेहारे माली को नहीं जानते तुलसी दास कहते हैं उसी प्रकार से जन ज्ञान के बिना अपने का श्रात्मारूप श्रीरामचन्द्र को भूल गया है। अथवा माली सब वृक्ष और फलों को लगाता पर यह नहीं जानता, कि किस वृक्ष में कैसा लगेगा वैसा ही ज्ञान के बिना जीवात्मा परमेश्वर को भूल गया है॥६३ ॥ फूल-फल करतब हाँ साँ करम है कह तुलसी परमान । करनहार करता साई भोग करम निदान॥६४॥ पाप पुण्य प्रादि जो मनुष्य को करनी हैं उन हौको तुलसी दास कर्म कहते हैं और उन का करनेहारा कर्ता कहाता है यह प्रमाण है कि बहौ अपने शुभाशुभ कर्म को भोगेगा ॥

चतुर्थ सर्ग। अभिप्राय यह कि यदि पाप पुण्यादि कर्म न करेगा तो की न कहावेगा तेरा श्रात्मा यद्यपि निर्विकार है तो भी देहा-ऽभिमानी होकर कर्म करता है इसी से बार र जन्म ले कर उन के फल को भोगता है जब गुरु की कृपा से तुझे आत्म-ज्ञान होगा तब संसार के बन्धन से छूटेगा ॥६४॥ तुलसी लट पद तैं भटक अटक अपि तु नहि ग्यान । ता तें गुरु-उपदेस बिनु भरमत फिरत भुलान॥६५॥ अ०-(अपि तु तुलसी नहिँ ग्यान लट पद ते अटक भटक) तुलसी कहते हैं कि तू निर्विकार है (अपितु) किन्तु ज्ञान नहीं होने के कारण (लट पद) वर्तमान स्थान अर्थात् मंमार वा अपने शरीर में अटक कर भटक हरा है इसी कारण विना अच्छे गुरु के उपदेश के भूल से भ्रम में पड़ा हुआ फिरता है। अथवा (लर पद ते भटक पटक) बाल को लट के समान उभी- त्रा शुभा- शुभ कर्म में पड़ा हुआ भूला है शुभा- शुभ कर्म को जाल में बे-हाल हो रहा है गुरु के उपदेश के बिना भ्रम में पड़ा है॥६५॥ ज्यों बरदा बनिजार के फिरत घनेरे देस । खाँड़ भरे भुस खात है बिनु गुरु के उपदेस ॥६६॥ जैसे पौठ पर खाँड़ लादे बनजारे का बैल अनेक देश २ फिरता और भूमा खाता है वैसे ही अच्छे गुरु के उपदेश के बिना मनुष्य खाँडरूपी श्रात्मा को शरीर में लिये दुःखरूपों वा विषय सुखरूपी 20 सुलसी-सतसई। भूसा बुका रहा है और इस मंसाररूपी वा चौराशौ योनिरूपो देश में घूम रहा है॥६६॥ बुध्या बारत अनय पद स्व ऽपि न पदारथ लीन। तुलसी ते रासभ सरिस निज मन गनहिँ प्रबीन॥६॥ अनौति पथ में पड़ कर (बुध्या बारत) बुद्धि को त्याग देता है तौ भी अपने को पण्डित समझता है (स्वऽपि न पदारथ लौन) अपना पदार्थ जो परमात्मा है उस में लौन नहीं है। अथवा (ख अपि पदाग्थ न लौन) आप भी अव्यय ब्रह्मरूप पदार्थ में तत्पर नहीं है। तुलमी-दास कहते हैं कि ऐसे लोग (रामभ मरिम) गदहे के ममान हैं परन्तु अपने मन में अपने को बड़ा बुद्धिमान मानते हैं ॥ ६७ ॥ कहत बिबिध देखे बिना गहत अनेक न एक । ते तुलसी स्वन हा सरिस बानी बदहिँ अनेक ॥६॥ अ.-बिना देखे बिबिध कहत अनेक गहत, एक न, तुलसी हा खन मरिस अनेक बानी बदहि॥ जिन बातों को कभी नहीं देखा उन को अनेक बार कहते हैं और अनेक बातों को लेते है परन्तु एक मुख्य बात को नहीं लेते तुलमी-दास कहते हैं कि हा बड़े खेद की बात है वे कुत्ते के समान बहुत भूकते हैं। यदि स्वमहा को एक पद मानो तो उसका अर्थ कुन्ता मारनेहारा चाण्डाल हो सकता है। जहाँ “मोनहा" पाठ हो वहाँ सोना माग्ने- ।

चतुर्थ सर्ग।
वाले सुनार के ममाम हैं जैसे सुमार मोना चुराने के लिये आपस में
अनेक बोली वालते हैं वैसे ही अपने बुझने के लिये ये अनेक वेद
शास्त्र सुनाते हैं पर किसी का ठीक भेद नहीं पाते हैं।
बिनु पाये परतीत अति करत जथारथ हेत।
तुलसी अबुध अकास इव भरि भरि मूठी लेत॥६॥
विषय भोग से महा सुख कभी पाया नहीं परन्तु बड़ा विश्वास
उस के पाने में करता है तुलसी-दास कहते हैं कि अज्ञानी के
समान आकाश को भर मूठी पकड़ना चाहता है जो बात असम्भव है।
अथवा बिना फल पाये भी कुदेवताओं में विश्वास करता है
और सही प्रीति करता है वह अबूझ (अाकाश) शून्य हौ को मूठी में
भरता है इस कारण कुछ हाथ का कूछा ही बना रहता है ॥ ६ ॥
बसन बारि बाँधत बिहठि तुलसी कौन बिचार।
हानि लाभ बिधि बोध बिनु होत नहीं निरधार॥७॥
तुलसौ-दास कहते हैं कि हठ कर के कपड़े में जल बाँधता है हम
विचार को क्या प्रसंगा हो सकती है? बुराई भलाई को गैति के ज्ञान के
विमा निश्चय नहीं होता कि किम से लाभ और किस से हानि होगी।
अथवा किस कर्म, किस देव की पूजा वा किस मन्त्र से लाभ होता
किस से हानि इत्यादि के बिधि प्रकार को बिना जाने जो मन्त्र
माधने में लगते है उन को मिद्धि का कुछ निश्चय नहीं होता वग्न
और उलटा परिश्रम व्यर्थ जाता है ॥७॥

तुलसो-सतसई। काम क्रोध मद लोभ की जब लगि मन में खान। का पण्डित का मूरखौ दाज एक समान ॥ ७१ ॥ जब तक मनुष्य के मन में काम क्रोध अहङ्कार और लोभ श्रादि भरे हैं तब तक चाहे पण्डित वा मूर्ख हो परन्तु दोनों समान हैं। अभिप्राय यह कि वेद पुराण के पढ़ने का मुख्य फल कामादि शत्रुओं को जीत कर आत्मा का पहिचानना है सो न हुआ तो मूर्ख पौर पण्डित मैं क्या भेद है। अथवा काम को खान सुन्दर स्त्री, क्रोध को खान ईर्षा देष, अहवार को खान विद्या सुन्दरता आदि और लोभ को खान लाभ धन श्रादि में जब तक मन लगा रहे तब तक पण्डित और मूर्ख दोनों समान हैं। पण्डित होने का फल तो यही है कि दून में मन न दे॥ ७१ ॥ उत कुल की करनी तजी इत न भजे भगवान । तुलसो अधबर के भये ज्याँ बधूर के पान ॥ ७२॥ अब तुलमो-दास दूम दोहे में कच्चे माधुओं का वर्णन करते हैं जो बिमा ठीक ठीक ज्ञान हुये ग्टहस्थी छोड़ कर मूड़ मुड़ा लेते हैं । उधर अपने कुल की मर्यादा अर्यात् वर्णाऽऽश्रम धर्म को छोड़ कर माधु हुये और इधर साधु के कर्म अर्थात् रामरूप परमेश्वर के भजन में भी मन न लगा तो ऐसे लोग अधबर अर्थात् बीच के हो जाते हैं जैसे अधूर का पत्ता अर्थात् बवण्डर के बीच में उड़ता असा पत्ता न भूमि का म प्रकाश का किसी और का नहीं। न उन चतुर्थ सर्ग। से ग्टहस्थों का धर्म हुत्रा न माधुओं का। प्रति और निवृत्ति दोनों पर्थों से भ्रष्ट हुये ॥ ०२ ॥ कीर-सरिस बानी पढ़त चाखन चाहत खाँड़। मन राखत बैराग मह घर मह राखत राँड़॥७३॥ अब तुलसौ-दास इस दोहे में ऐसे पण्डित वा साधु का वर्णन करते हैं जो अपने मन और इन्द्रियों को बश में न ला कर पाषण्ड से वेदादि का पाठ करता और अपने को माधु दिखलाता है। मुगों के समान बिना समझे वेदादि का पाठ करते हैं और खाँडरूपी मुक्ति को पाना चाहते हैं मन बैगग के काम में लगाते हैं और घर में रॉड़ रखते हैं ऐसे पण्डित और साध बड़ौ निन्दा के पात्र हैं॥ २-अथवा सुगौँ के सदृश बोली बोलना चाहते परन्तु खॉड़ खाते और मन बैराग में रख कर घर में रॉड रखते हैं। अभिप्राय यह कि जैसे मधुर बाणी का बिरोधी खाँड़ है वैसे ही बैराग्य का विरोध करने हारी स्त्री है। ये न घर के हुये और न बैराग्य के हुये ग्टहस्थी और साधुपन दोनों से गये। राम-चरन परचे नहीँ बिनु साधुन-पद नेह। मूड़ मुड़ार बादहौँ भाड़ भये तजि गेह ॥ ७४ ॥ मन्तों के चरन में प्रौति न होने के कारण जिन को रामचन्द्र के चरण का “ज्ञान न हुआ ऐसे साधुओं के मूड़ मुड़ाने से कुछ भी तुलसी-सतसई। लाभ नहीं है क्योंकि वे बना बनाया घर छोड़ कर भ्रष्ट अथवा इंसी के योग्य भाड़ हो गये है अर्थात् जिस प्रकार भाड़ लोगों को रिभाने के लिये अनेक नकल करते हैं भेष बदलते हैं वैसे ही ये माधुभौ जोगौ का भेष बना कर पुजाते हैं परन्तु जोगी का कर्म इन में नहीं है । जहाँ “बिन साधन" पाठ हो वहाँ श्रद्धा आदि भकि के उपायों से रहति अर्थ करना ॥ ७४ ॥ काह भए बन बन फिरे औं बनि आउ नाहिं। बनते बनते बनि गाउ तुलसी घर ही माहिँ ॥ ७५ ॥ तुलसी दास कहते हैं कि बन बन फिरने से क्या हो सकता यदि उस से परलोक न बने घर में रह कर भी अच्छा कर्म करने से मनुष्य के दोनों लोक सुधर सकते हैं। अभिप्राय यह कि यदि मनुष्य ने मन और काम क्रोधादि शत्रुओं को न जौता तो उस के बन में जा कर तप करने से कुछ भी लाभ नहीं है ग्रहस्थाश्रम में रह कर भी यदि सुकर्म करे तो उस का परलोक बन सकता है॥७॥ जो गति जानै बरन की तन-गति से अनुमान। बरन-बिन्दु-कारन यथा तथा जानु नहि आन॥७६ ॥ जैसी दशा अक्षर को है अर्थात् अक्षर बिन्दुओं के योग से बनता है वैसी ही परौर को भी जानना चाहिये जैसे वर्ण का कारण बिन्दु है वैसे ही शरीररूपी अक्षर के बिन्दुरूप मन और इच्छा को भी कारण कहते हैं।

चतुर्थ सर्ग। १५९ मूल जान तु ही करता है अभिप्राय यह कि जैसे फारमी में बिन्दु (गोखता ) देने से अक्षर तुरन्त दूसरा हो जाता है वैसे ही शरीर में जैसी बामना हुई. वैमी हो उस को गति हुई अर्थात् विषय से विषयौ और भकि से भक्त होते हैं ॥ ०६॥ बरन-जोग भौ नाम जग जानु भरम को मूल तुलसी करता है तु ही जानि मानु जनि भूल ॥७॥ (जग नाम बरन-जोग भौ भ्रम को जानि मानु जनि भूल) अक्षरों ही के मिलाने से जगत का नाम हुश्रा अर्थात् ज+ग के मिलने से अग बना दूसे भ्रम का कारण समझो इस नाम का बनानेहाग तू ही है ऐमा जान कर मान ले और न भूल । अभिप्राय यह कि जगत मिथ्या है केवल तेरे हो भ्रम से मच आन पड़ता है और इस का नाम भी तुझी ने रकवा है ।। द्वितीयार्थ-वर्ण (अक्षरम् ) अर्थात् परब्रह्म और प्रकृति को इच्छा से जग का नाम हुा सो केवल ईश्वर को कौड़ा मात्र होने के कारण भ्रम का मूल है और इस का बनानेहारा परमात्मा का अंश तेरे शरीर में वर्तमान जीवात्मा ही है ऐसा तू निश्चय रख भूल मत ॥ ७॥ नाम जगत सम समुझ जग बस्तु न करु चित चैन। बिन्दु गये जिमि गैन ते रहत ऐन को ऐन ॥ ७८॥ (जग नाम जगत मम समुझ) जग संसार में नाम पाना नामौ तुलसी-सतसई। होना-जगत हो के समान भूठा जानना चाहिये अर्थात् जैसे जगत भ्रम है सत्य नहीं है वैसे ही इस में नामी होना भी व्यर्थ है क्योंकि अन्त को कुछ भी न रहेगा। अथवा जगत शब्द में का त निकाल लो तो वह जग हो जायगा दोनों समान असत्य होंगे। यह (बस्तु न चित चैन कर ) कोई मत्य पदार्थ नहीं है ऐसा अपने मन में विश्वास करो जैसे फ़ारसी के दो अक्षरों में कुछ भेद नहीं है यदि गैन के ऊपर से बिन्दु उठा लो तो केवल ऐन रह जायगा। अभिप्राय यह कि फ़ारसी में ऐन भला अक्षर है उस पर बिन्दु रखने से अशुभ हो जाता है वैसे ही विन्दुरूप विषयाभिलाष न रहने से शरीर सुखदाई होता है। अथवा इस नश्वर शरीर में चैतन्यरूप ऐन परमात्मा का स्वरूप है उस के ऊपर बिन्दु लगाने से वह शरीररूपौ (झठा गैन) हो आता है॥ ७८ ॥ স্বান্ত हि ऐन बिचार बिधि सिद्धि बिमल मतिमान। आन बासना बिन्दु सम तुलसी परम प्रमान ॥७॥ अ-मतिमान बिमलमिद्धि प्रापु हिं ऐन बिधि बिचारु तुलसी परम प्रमान, भान बामना बिन्दु सम ॥ ज्ञानस्वरूप और निर्मल सिद्धियाँ को धारण करनेवाले परमात्मा के स्वरूप अपने श्रात्मा को ऐन के समान विचारो तुलसौ-दाम अत्यन्त प्रमान से कहते हैं कि और सब बासना देहाभिमान विषयाभिलाष अादि बिन्दु के समान जानना चाहिये।

चतुर्थ सर्ग। १८१ अभिप्राय यह कि-दूस शरीर का चैतन्यरूप श्रात्मा यद्यपि मल- रहित है तो भी पञ्च-भौतिक शरीर का अभिमानी हो कर संसारी बासना और विषय के अधीन हो कर सुख दुःख का भागी होता है॥७॥ धन धन कहइ न होत कोउ, समुझि देखु, धनमान। होत धनिक तुलसौ कहत दुखित नरहत जहान ॥८०॥ तुलसी-दास कहते हैं कि केवल धन २ बकने से कोई कभी धनिक नहीं हो सकता, इस बात को अपने मन में समुझ कर बिचारो। और यदि कहने हो से कोई धनिक होता तो जहान में कोई दुखित दरिद्र न रहता, सब धनिक हो जाते। अभिप्राय यह कि केवल बिना समझे बुझे पुराणादिक का पाठ करने से विशेष लाभ नहीं यदि उन में कही हुई माधना न करे। इसी का दृष्टान्त ऊपर के दोहे में दिया गया है॥८॥ हिम को मूरति के हिये लगौ नौर को प्यास । लगत सबद गुरु तरनि कर सेामै रही न पास ॥८॥ हिम की मूर्ति के मन में जल को प्यास लगौ (गुरु तरनि सबद कर लगत से मैं श्रास न रही) परन्तु गुरुरूपी सूर्य के उपदेश- रूपी किरणों के लगने से वह आप गल कर पानी हो गई तब उस में जल की प्राश वा प्यास न रहो वा नष्ट हो गई। अभिप्राय यह कि हिम-मूर्ति यह मनुष्य शरीर इस को जल-रूपौ 21

१६२
तुलसी-सतसई।
संसारौ सुखो की इच्छा हुई परन्तु बीच में सूर्य के समान गुरु के
उपदेशरूपी किरणों के लगने से वह श्राशा जाती रही।
अथवा-(मूरति के हिये हिम-नौर की प्यास लगी) मनुष्य को
बर्फ के जल को प्यास (विषय हृष्णा) लगी। फिर सूर्यरूपी गुरु के
उपदेश के लगते ही उस मनुष्य में विषयरूपी हिम की प्यास इच्छा
न रहौ॥८॥
जा के उर बर बासना भई भास कछु पान ।
तुलसौ ताहि बिडम्बना केहि बिधि कहि प्रमान॥८॥
तुलसी-दास कहते है कि (बर बासना जा के उर कछु श्रान भास
भई ताहि बिडम्बना प्रमान केहि बिधि कहिँ।) जिस के हृदय में
उत्तम इच्छा कुछ और ही प्रकार से भासमान हुई उस के धर्मों के
प्रमाणों को किस प्रकार कह सकते है अर्थात् उस के भ्रम को प्रमाणित
करके मिटा देना बहुत कठिन है।
अभिप्राय यह कि श्रात्मा के पाने को उत्तम इच्छा के रहने पर
भी जब मनुष्य के मन में भूठे संसारी सुखाँ की अभिलाषा होती है
तो वह केवल बिडम्बना है।
अथवा-(जा के घर उर बासना भई) जिस के निर्मल मन में विषय
सुख की इच्छा हुई । (ताहि भान विडम्बना भास प्रमान कहि बिधि
कथरि ।) उस के और आडम्बरों को झुठाई का प्रमाण कौन कह
सकता है?॥८२॥

चतुर्थ सर्ग।
रुज तन-भव परिचय बिना भेखज कर किमि कोइ।
जानि परइ भेखज करइ सहज नास रुज होइ॥३॥
(तन भव रुज परिचय बिना कोई किमि भेखज करे) शरीररूपौ
संसार रोग जन्म मरण दुःख श्रादि वा शरीर में उत्पन्न रोगको बिना
जाने कोई किस प्रकार उस की औषधी कर सकता है जब रोग
पहिचान परे तो तुरन्त गुरु-वचन-रूप औषध करने से महज हौ में
रोग छुट जा सकता है ॥३॥
मानस व्याध कुचाह तव सत गुरु बैद समान ।
जासु बचन अल बल अवस होत सकल रुजहान॥८४॥
(नव कुचाह मानस व्याधि) तुम्हारी संसारी सुख और विषय
बासना ही मानसिक रोग है और उत्तम
गुरु
रोग को
दूर
करने-
हारे वैद्य के समान हैं (जासु अल बचन बल सकल रुज हान अवस
होत) जिस के समर्थ उपदेश के बल से सब रोग अवश्य कूट जाते हैं।
तिरामी के दोहे में रोग का परिचय श्रादि वर्णन कर के ८४ में
उस को भली भाँति समझा कर उस के कटने को औषधौ भी बतलाया
है अब ८५ में औषध करने पर कभी रोग अच्छा हुआ कि नहीं
दूस का पहिचान कहेंगे ॥८४ ॥
रुचि बाढइ सत-सङ्ग महँ नीति-छुधा अधिकाइ ।
होत ग्यान बल पौन अल बिजिन बिपति मिटि जाइ
•॥८५॥

तुलसी-सतसई। मत्-मङ्ग में प्रौति अधिक हो न्याय पथ पर चलने की इच्छा बढ़े जाण को शक्ति दृढ़ और (अल) समर्थ हो और दुःख और विपत्ति मिट जाय। अभिप्राय यह कि रोग छुट जाने पर जैसे क्षुधा श्रादि के बढ़ने से बल सामर्थ श्रादि होती है वैसे ही उपदेश के फल दूस दोहे में कहे हैं ॥५॥ सुकल पच्छ ससि स्वच्छ जिमि क्रिशन पच्छ दुति-हौन। बढ़त घटत बिधि भाँति बिद तुलसौ कहहिँ प्रबौन ॥८६॥ जैसे आकाश में कृष्ण पक्ष में चन्द्रमा को कान्ति एक २ कला कर के घटती जाती है और शुक्ल पक्ष में आकाश के बीच उन की शोभा बढ़ती है और वे खच्छ होते जाते हैं, (बिद) ज्ञानौ अर्थात् कषि तुलसौ-दाम मनुष्य को वहौ दशा कहते हैं अर्थात् ज्ञान प्रादि के होने से मनुष्य को कान्ति बढ़ती है और प्रज्ञान आदि से क्षीण होती है॥८६॥ सत-सङ्गति सित पच्छ सम असित असन्त प्रसङ्ग। जानु आपु कह चन्द्र सम तुलसी बदत अभङ्ग ॥८॥ सत्-सङ्गति शुक्र पक्ष के समान और दुर्जनों को सङ्गति कृष्ण पक्ष के समान है और अपने को चन्द्रमा के समान समझना चाहिये तुलसी-दास इस उपमा को अखण्ड बताते अभिप्राय यह कि मनुष्यों को प्रौति दुष्ठौँ को सङ्गति से कृष्ण पक्ष के चन्द्रमा दे. समान घटे और सज्जनों के मन में एक पल के चन्द्रमा - चतुर्थ सर्ग। के समान बढ़े तो समझना कि गुरु उपदेशरूपी औषध से उस का उपकार हुत्रा ॥८०॥ तौरथ-पति सत-सङ्ग सम भक्ति देव-सरि जान । बिधि उलटी गति राम की तरनि-सुता अनुमान ॥८८॥ मत्-मङ्ग जो है सोई तो तीर्थ-पति प्रयाग है और राम की भक्ति गङ्गाजी और (बिधि) करने योग्य काम (उलटौगति) उस के बिरुद्ध अयोग्य काम अर्थात् शुभाशुभ दोनों प्रकार के कर्मों का परित्याग (तरनि-सुता अनुमान) अर्थात् यमुनाजी जानना चाहिये। अभिप्राय यह कि गङ्गा यमुना युक्त मत-मङ्ग-रूप प्रयाग बास के प्रभाव से रामचन्द्र के चरण में भक्ति का होना मुख्य फल है॥८॥ बर मेधा मानहु गिरा धीर धरम न्यग्रोध । मिलन चिबेनी मल हरनि तुलसौ तजहु बिरोध॥८॥ धारण करनेहारौ बुद्धि मानो (गिरा) सरस्वती हैं और धीरज धर्म अक्षय-बर, तुलसौ-दास कहते हैं कि सब प्रकार के विरोधों का छोड़ना सब पापों के हरनेहारी त्रिवेणी का मिलना है। अर्थात् भक्ति ज्ञान और कर्म तीनों का रूप त्रिबेणे के मेल से भला होता है कर्म को परमेश्वर को अर्पण करे ज्ञान से अपने स्वरूप को जाने और भाक से राम में प्रेम बढ़ावै तो पुरम पद पवै॥॥

तुलसी-सतसई। समुझब सम मज्जन बिसद मल अनौति गइ धोइ । अवसि मिलन सन्सै नहीं सहज राम-पद होइ॥१०॥ (ममुझब बिमद मज्जन सम) सन्त के समाज में जा कर उन के भाव को समझना मानो प्रयाग में निर्मल त्रिवेणी स्नान के समान है जिस से सम्पूर्ण पाप अधर्म निर्मुल हो जाता है इस प्रकार सहज हौ में रामचन्द्र का चरण अवश्य मिल जाता है इस में कुछ संशय नहीं है॥८॥ छमा बिमल बारानसौ सुर-अपगा सम भक्ति । ग्यान बिसेसर अति-बिसद लसत दया सह सक्ति॥११॥ सन्त समाज और प्रयाग का रूपक बर्णन कर के परमेश्वर शिव ज्ञान और दुर्गा दया आदि का रूपक कहते हैं। क्षमा जो है साई निर्मल काशौ है और भक्ति जो है सोई गङ्गा जौ हैं अत्यन्त निर्मल ज्ञान विश्वनाथ हैं जो दयारूपी (मक्ति) पार्वती के महित विराजते हैं ॥१॥ बसत छमा ग्रिह जासु मन बारानसौ न दूरि। बिलसतसुर-सरिभक्ति जहँ तुलसौनय-क्रित भूरि॥१२॥ तुलमी जह जासु मन ग्रह क्षमा बसत, भूरि नय-कृत सुर-सरि भक्ति विलमत वारानसौ न दूरि । तुलमी-दाम कहते हैं कि कोई चाहे किमो स्थान में रहे यदि चतुर्थ सर्ग। उस के मनरूपी घर में क्षमा हो और अति धर्म और नौति युक्त गङ्गा जौ रूपो भनि बिराजमान हो तो (ऐसे पुरुष के लिये) काशी दूर नहीं है अभिप्राय यह कि काम क्रोध के बश क्षमा दया हौन पुरुष के लिये वाराणशी फल-दायिनी नहीं होती और उन गुणों से युक्त जन के लिये सब स्थान काशी ही है ॥२॥ सित कासौ मगहर असित लोभ मोह मद काम । हानि लाभ तुलसौ समुझि बास करहु बसु जाम ॥१३॥ (मित) शुक्ल पक्ष अर्थात् ज्ञान भक्ति क्षमा दया सत्मङ्ग आदि काशी है और (अमित) कृष्ण पक्ष लोभ मोह काम क्रोध अहङ्कार आदि मगध है (तुलसी हानि लाभ समुझि बसु जाम बास करहु) तुलसी- दास कहते हैं कि अपनी हानि लाभ समझ कर बाटो पहर निवास करना चाहिये। अभिप्राय यह है कि शुभ गतिदाई स्थान काशी और अशुभदाई स्थान मगध तुम्हारे शरीर हौ में बतला दिया अब शुभ गति चाहो तो सर्वदा क्षमा दया आदि रकलो और अशुभ चाहो तो काम क्रोध के वश रहो दोनों बात तुम्हारे हौ धौन हैं ।।८३॥ गये पलटि आवै नहीं है सो करु पहिचान । आजु साई सोइ काल्हि है तुलसौ भरम न मान ॥४॥ जो समय बीत गया है सो फिर नहीं आवेगा जो बर्तमान है उसे तू भली भाँति पहिचान ले तू जो श्राज है.मोई कल भी रहेगा

तुलसी-सतसई।
अर्थात् तेरा श्रात्मा त्रिकाल में अनश्वर है इस बात में तुलसी-दास
कहते हैं कि तुझे सन्देह नहीं करना चाहिये।
द्वितीयार्थ—यदि यह मनुष्य जन्म बीत जावेगा तो फिर इस का
मिलना बहुत कठिन है दूस लिये जिस मनुय्य देह में बर्तमान है
उसे भली भाँति चौन्ह कर शुभ कर्म करो जिम के लिये कोई माइत
देखना न चाहिये जो आज है मेराई कल है दूस में कुछ सन्देह
नहीं है॥४॥
बर्तमान आधीन दोउ भाषी
भूत
बिचार।
तुलसौ सन्सय मन न करु जो है सो निरुबार ॥६५॥
भाबी अर्थात् जो होगा (मरण) और भूत अर्थात् जो हो गया है
(जन्म) दून दोनों का विचार तुम्हारे वर्तमान शरीर वा कर्म के अधीन
है तुलमी-दाम कहते है कि तुम अपने मन में किसी प्रकार का सन्देह
मत करो परन्तु जो वर्तमान है उस का उद्धार कर अथवा जो तू है
अर्थात् चैतन्य परमात्मा का रूप उसे तू निश्चय कर ।
अभिप्राय यह है कि जो कुछ हुत्रा और जो कुछ होगा उस को
चिन्ता को छोड़ पात्म-तत्व का विचार कर इसी में तेरा कल्याण
है क्योंकि इस से और भाबी जन्म मरण का क्लेश तुझे न भोगना
पड़ेगा॥८५॥
मान-सरो-बर मन मधुर राम सुजस सुचि नौर।
हर विजिन बुधि बिखद अति बुध नय अगम सुथौर
॥६६॥

चतुर्थ सर्ग । - मन जो है मोई मान-सरोवर तड़ाग है उस में रामचन्द्र का सुन्दर जय पविच और मीठा जल है वह वृजिन अर्थात् दुःख को हरता है और बुद्धि को अत्यन्त निर्मल कर के पण्डितों को नौति को मस्थिर कर देता है। जहाँ “हटेउ विजिन बुधि बिमल भद् बुध नहिं धगम सुथौर" पाठ हो वहाँ बुद्धि के निर्मल हो जाने से दुःख दूर हो जाता तब वह मर पण्डितों के लिये सुस्थिर और सुलभ्य हो जाता है, ऐसा अर्थ करना। दूस दोहे में रूपक अलङ्कार स्पष्ट है ॥ ६ ॥ अलङ्कार कबि-रीति-युत भूखन दूखन प्रौति। बारि-जात बरनन बिबिध तुलसौ बिमल बिनौति।७ अब कबिता में जोर विषय पाये जाते हैं उन का वर्णन करते हैं। (अलङ्कार कबियों को रौति बर भूखन प्रीति दूखन विधि और विमल अबिनौति बरनन बारि-जात) जिस प्रकार स्त्री को गहने से शोभा होती है उमौरीत कबिता में शब्द और अर्थ के भेद से दो प्रकार के अलङ्कार होते हैं। कवि रीति (कबि संप्रदाय) यथा नदी में कमल वर्णन, स्त्री के सात मारने से अशोक का विकसना, सराव के कुल्ले से मवसरी का फूलना श्रादि । (भूखन दूखन रौति) गुणदोष यथा प्रोज, प्रसाद * स्त्रीणां स्पीत्प्रियविकसतिबकुलः शोधुगण्डूषसेकात् पादाघातादशोकसिलककुरवको वौक्षणालिङ्गनाभ्याम् । मन्दारो नर्मवाक्यात् पटुमदुइसनाचम्पको वक्रवाता- धूतो गीतान मेगर्विकसति च पुरो नर्तनात् कर्णिकारः ।। बलकार चौर गुणदोषों के जानने के लिये "बिहारी तुलसीभूषा बोध' नाम मेरी पुस्तक देखना भला होगा। 22 सुखसौ-सतसई। माधुर्य गुण से और अतिकटु अनौल ग्राम्य श्रादि दोष। इन सभों युक (बिनौति बिमल) और तुलसीदास की ममता से निर्मल को (बिबिध बरनन) अनेक प्रकार की बर्णना वही इस कवितारूपी मरोवर में (बारि-जात) कमलरूप हैं ॥८॥ विनय बिचार मुहिद्यता सोइ पराग रस गन्ध । कामाऽऽदिक तिहि सर लसत तुलसी घाट प्रबन्ध॥१८॥ दूम काव्यरूपी तालाव के कमलों में नम्रता पुण्यरज, कमल कौ धूली है, विचार रम है और मित्रता गन्ध अर्थात् कमल का सुगन्ध है, और काम तथा प्रादि पद से धर्म अर्थ मोक्ष चारो चार घाट कौ रचमा मोभित हैं। नम्रता का उदाहरण जैसे “तुलसौराम क्रिपाल ते कहि सुमाव गुन दोख । होत दूवरौ दौनता परम पौन सन्तोख” ॥ रस भक्तिरस जैसे "ज्यो जग बैरी मौन के पु सहित परिवार। बिनु अपनी दसा विचार" गन्ध मब से मेल जैसे "तुलसौ मीठे वचन तें सुख उपजत चहुँ ठौर। बसीकरण यह मन्त्र है तजि दे बचन कठोर" ॥१८॥ त्यों तुलसी रघुनाथ प्रेम उमगि कबिता-विलो चली सरित सुचि सार। राम बरापुरि मिलन हित तुलसी हरख अपार ॥६॥ जिस प्रकार उस मान-सरोवर से सरयू निकलौं उसी रौत इस मान-मरोवर-रूपो मन से प्रेमरूपौ तरङ्ग पूर्ण कविता ममहरूपी चतुर्थ सग। पवित्र और (मार) श्रेष्ठ वा उत्तम मदौ (सरयू) अपार धानन्द के भहित (राम बरा पुरि मिलन हित) रामचन्द्र को उत्तम पुरी मिलने के लिये चली। अभिप्राय यह कि मान-सरोवर-रूपी मन से कषितारूपी नदी निकले तो रामचन्द्र के सुयश और उन को पुरौ श्रादि का वर्णन करे जिस से अर्थ धर्म काम मोक्ष मिलें ॥६॥ तरल तरङ्ग सुछन्द बर इरत दैत तरु मूल । बैदिक लौकिक बिधि बिमल लसत बिसद बर कूल ॥१०॥ इस कबितारूपी नदी में अनेक प्रकार के छन्द जो हैं सोई चञ्चल तरङ्ग हैं जो वेद की विधि और लौकिक विधि अर्थात् वैदिक लौकिक दोनों मतरूपौ निर्मल उत्तम किनारों में के बैत अर्थात् जीव और ईश्वर दोनों मित्र हैं इत्यादि मत अथवा लौकिक वैदिक दोनों रोतरूपी वृक्ष की जड़ को उखाड़ डालते हैं ॥१०॥ सन्त-सभा बिमला नगरि सकल सुमङ्गल-खानि । तुलसी-उर सुर-सर-सुता लसत मुबल अनुमानि ॥१.१॥ सकल सुमङ्गल-खानि सन्त-सभा बिमला नगरि तुलमी पर सुथल अनुमान सुर-सर-सुतालमत॥ अयोध्या को पवित्र जान कर उम में सरयू वहती है परत यहाँ .

१०१ तुलसी-सतसई। सब उत्तम उत्तम कल्याण की खानि (सज्जन) माधुओं की सभा निर्मख भगरी (अयोधा-पुरी) में तुलसी-दास के पदयरूपी उत्तम स्थान को अनुमान कर सरयू नदौरूपी (कविता) शोभित होती है ॥१०॥ मुक्त मुमुच्छू बर बिखयि सोता विविधि प्रकार। ग्राम नगर पुर जुग सुतट तुलसी कहहि विचार ॥१०२॥ । तुलसी-दास विचार कर के कहते हैं कि जैसे सरयू नदी के दोनों किनारों पर पामादि बसते हैं वैसे ही नदौरूपी कविता के सुननेहारे तीन प्रकार के हैं अर्थात् मुक्त मुमुक्षु और विषयी तौनों प्रकार के श्रोता ग्राम मगर पुर हैं। मुक श्रोता वे कहाते हैं जो एक रस कथा में मन देकर सुनते, मुमुक्षु वे जो मुक्ति पाने की इच्छा से कथा सुनते हैं और जन को कथा सुनने की इच्छा भो है परन्तु मन एक रम नहीं है और विषयो वे जो विषय सुख में मन रखते हैं परन्तु थोड़ो अङ्का कथा में भी है॥१०॥ बारानसी बिराग नहि सैल-सुता-मन होय। तिमि अवहि सरजू न तज कहत सु-कबि सब कोय ॥१०३ ॥ मैल-सुता-मन बारानसौ बिराग नहिं होय तिमि सरय नाज सब कोय सुकवि कहत॥

चतुर्थ सर्ग। जिस प्रकार (मेल) हिमालय तिस की पुत्री पार्वती अथवा उसी पहाड़ से निकलनेहारी गङ्गा जी का मन काशी जी से अलग नहीं होता अर्थात् वह काशी को नहीं छोड़ती उसी प्रकार सरयू अयोध्या को नहीं छोड़ती ऐसा सब अच्छे अच्छे कबि लोग कहते है। अभिप्राय यह है कि सरयरूपी कविता अयोध्यारूपी सन्त-सभा को नहीं छोड़ती॥ १०३॥ कहब सुनब समुझब सौ पुनि सुनि समुझाइब पान । सम-हर घाट प्रबन्ध बर तुलसौ परम प्रमान ॥१०४॥ इति श्रीगोखामो-तुलसौदाम-कृत सप्तशतिका श्रात्मबोधनिर्देशो नाम चतुर्थः सर्गः ॥ तुलमी परम बर प्रबन्ध कहब सुनब समुभब पुनि मुनि श्राम ममुभाइब मो सम-हर घाट प्रमान ॥ तुलसी दास के दस अत्यन्त उत्तम ग्रन्थ वा कवितारूपी सरयू का कहना सुनना समुझना और सुन कर दूसरों को समझाना जो वही परिश्रम को दूर करनेहारा घाट है। सरयू नदी में परिश्रम से थके हुये जो लोग पाकर स्नान करते है उन का श्रम मिट जाता और वे बड़े प्रानन्द को पाते हैं परन्तु इस संसार के जौवों का अत्यन्त दुखदायौ परिश्रम उन का बार २ जन्म लेना.और मरना है मो ब्रह्मज्ञान न होने के कारण से होता है और, ब्रबंजान

२००
तुलसौ-सतसई।
देनेहारी तुलसीदास की कविता को पढ़ने सुनने से श्रात्मतत्त्व
प्राप्ति होती है और जीवों का संसार में वार २ जन्म मरन का क्रेज
दूर हो जाता है।
अपर के कई एक दोहों में रूपक अखबार है। १ अर्थ २ धर्म
काम ४ मोच का लाभ इस प्रकार होता है कि सेवा से अर्थ पाना,
श्रद्धा से अर्थ को भले काम में लगाने से धर्म और अर्थ धर्म
से काम आप ही सिद्ध होता है फिर राम-भजन गुण-गान
आदि से मुक्ति सहज ही से मिल सकती है, इस प्रकार सब फल
प्राप्त हो सकता है॥१०४॥
इति विहारि-कृत-संक्षिप्तटोकायां चतुर्थः सर्गः ॥०॥

अथ पचम सर्ग। जतन अनूपम जानु बर सकल-कला*-गुन-धाम । अबिनासौ अव्यय अमल भौ यह तनु धरि राम॥१॥ प्रथमार्थ (मकल-कला-गुण-धाम अधिनामी अव्यय अमलअनुपम राम) सब कला और गुण से पूर्ण, नाश रक्षित, आदि अन्त होन, * कला (डनर) ६७ चौसठ हैं यथा-१ गीत । २ वाद्य...बजाना । ३ हत्य..नाचना। ४ नाय...नाटक की खेल। ५ चालेख्य...चित्र बनाना । ६ विशेषच्छेद्य...हौरा धादि वेधना । ७ पुष्पास्तरण...फूल का बिछौना पादि बनाना । ८ दसनवसनागराग...राना। ६ मणिभूमि का कर्म... मणि की रचना यादि । १० शयन रचना...सेज बनाना। ११ उदक- वाद्य...जलतरफ बजाना। १२ उदकघात...जलताड़न । १३ चित्रयोग ...तस्वीर का सजना। १४ माल्यग्रन्थन...मालाDथना । १५ खरा. पीड़योजन...मुकुट चादि विधान । १६ नेपथ्ययोग...टार करना और वेश बनाना। १७ कर्णपत्रमा...कुण्डलादि। १८ सुगन्धयुक्ति... पादि बनाना । १६ भूषणयोजना...गहना चादि की रचना । २० जाल । २१ कौस्तुमारयोग...बहुरूपियापन । २२ हललाघव... पटे. पाजी० । २३ भोज्यविकार...बनेक व्यंजन बनाना । २४ पानकरसरागा. सवयोजन...केवड़ामद्य यादि । २५ सूचौवाणकर्म...वासचलाना । २५ सूचकौड़ा...चकाईलटूखेल धादि। २० प्रहेलिका...बुझउन कहनी ।

१०६ तुलसी-सतसई। सनातन निर्मल जिस के समान और कोई नहीं है ऐसे राम विष्णु भगवान ने (भव) संसार में (यह तनु धरि) इस मनुष्य के शरीर को धारण किया उन की पाराधमा को (बर जतन जानु) उत्तम यान वा काम जाममा चाहिये। २८ प्रतिमाला...पसबोली । २६ दुर्वचकप्रयोग...छलविद्या । ३० पुस्तक बाँचना। ३१ नाटकाख्यायिकादिदर्शन । १२ काव्य समस्यापूर्ति । २१ पट्टिका वाड़वेत्रविकल्प-वेत का पलङ्ग धादि विनना । ३० तक २५ तक्षण...बई का काम । ३६ वस्तुविद्या...थवई। ३० वर्णरत्न परीक्षा ।इधातुवाद । ३६ मणिराजज्ञान... होरा,जवाहिरी। 8. चाकर ज्ञान । ११ रक्षायुर्वेदज्ञान । ४२ मेषकुक्कुटलावकयुद्धविधि-भेडा पादि बड़ाने की रौत । ४३ शुकशारिका प्रलापक-चिडियों की बोली। 88 उत्सादन-उच्चाटन । ४५ केशमार्जन कौशल । १६ बक्षरमुष्टिका कथन...मूकपत्र । ४७ स्लेक्षितकुतर्कविकल्प। 8८ देषभाषाज्ञान | BE पुष्पसकटिकानिमितज्ञान.. •फूल से गाड़ी बनाना । ५० पत्रमालिका- कठपुतली । ५१ सम्बाथ...मन का प्रत्र । ५२ मानसीकाव्य । ५३ पमि- धानकोश। ५४ छन्दोज्ञान । ५५ क्रियाविकल्प... कार्यसिद्धि । ५६ नितकयोग-छलजानना । ५७ वस्त्रगोपन...ऊंन के वस्त्र की रक्षा। ५८ द्यूतविशेष...पासा खेलना। ५६ पाकर्षकोड़ा...खेल को अपनी पोर खोचना। • वालक्रीड़नकानि । ६१ वैगायिकीनां समाचातुरी । १ए वैयिकौगा-जयदेनेवाणी विद्या। ६३ वैयासिकौनां ज्ञानम्- पुराणदिवाँचने की चातुरौ । ६४ बड्विध राजनीति-(सन्धि, विग्रह, यान, पासम वैधीभाव और पाश्रय)। इति शिवतन्त्रोक-चतुःषष्टि-कला।

परम सर्ग। २७७ द्वितीयार्थ-(यह तनु सकल कला-गुन-धाम बर जानु) संसार में दूस मनुष्य देह को सब विद्या और गुणों का स्थान और श्रेष्ठ समझो क्याँकि (अनुपम अविनासी अव्यय अमल राम यह तन धर भौ) उपमा, नाश श्रादि अन्त और दोष हौन राम इस शरीर के धारण करनेहारे हुये। कई एक पुस्तकों में “ये तन अनुपम" आदि पाठ है वहाँ द्वितीयार्थ करना उत्तम होगा, और इस अर्थ में मनुष्य शरीर को बड़ी प्रसंशा हुई॥१॥ सदा प्रकासक रूप बर अस्त न अपर न मान । अप्रमेय अद्वैत अज या तँ दुरत न ग्यान ॥ २ ॥ अन्वय । सदा प्रकासक वर रूप अस्त न अपर न अप्रमेय प्रज श्रान न अद्वैत या ते ज्ञान न दुरत । सदा सर्बदा अपने प्रकाश से सब को प्रकाशित करनेवाले उत्तम- रूपवाले, कभी जिस का नाश नहीं होता, दूसरे नही परमेश्वररूप, मन वचन कर्म से जिस के परिमान को कोई नहीं जान सकता, (उसे अप्रमेय कहते हैं) श्राप से श्राप उत्पन्न ब्रह्मरूप अन्य नहीं केवल परमात्मा के रूप इसी कारन उन से ज्ञाम कभी दूर नहीं होता अर्थात् ज्ञानरूप राम हैं द्वितीयार्थ में "सब विशेषण अज अबैत ब्रह्म का लगा कर अर्थ करना चाहिये कि ऐसे ब्रह्म का रूप जो ज्ञान मो. (या तें) इस मनुष्य देह से दूर नहीं होता” कहना चाहिये ॥२॥ 23

तुलसी-सतसई।
जानहिं हन्स रसाल कहँ तुलसी सन्त न आन ।
जा की क्रिपा-कटाछ तें पाये पद निरबान ॥३॥
अन्षय (तुलसी सन्त इन्म रसाल कह जानहि न पान जा की
क्रिपा-कटाछ ते निर्वान पद पाये)।
तुलसौ-दास कहते है कि माधु जन पर-ब्रह्म विष्णु-रूप राम को
वा सूर्य को और ऊख के रस वा (रस शब्द से यहाँ जल लेना
चाहिये) पानी को जानते हैं अर्थात् वे यह समझते हैं कि जिस
प्रकार सूर्य की किरणों से जल बर्षा ऋतु में भूमि पर बरसता है
और फिर ग्रीन में उन्ही किरणों के द्वारा सूख जाता है और
कुछ नदी पोखरा आदि में रह जाता है उसी प्रकार परमेश्वर का
रूप जीव ईश्वर को माया प्रकृति से संसार में आता और फिर उन्ही
की दया से मुक्ति पाता है और दूस को साधु जन जानते हैं दूसरे
नहीं जानते । उन्ही की दया दृष्टि से मुक्ति पद मिलता है।
जहाँ “जान हन्स सुर-सम कहहु तुलसी सन्त न पान” पाठ हो
वहाँ (तुलसी कहहु हन्म सुर-सम सन्त जान न आन) तुलसीदास
ने कहा है कि सूर्य देवता के ममान तेजश्वौ साधु लोग दूस
मनुष्य धरौर के महात्म्य को जानते हैं दूसरा कोई नहीं जानता
(जा को क्रिपा-कटाक ते निरबान पद पाये) जिम की दया दृष्टि से
मुक्ति पद मिलता है ऐसा अर्थ करना चाहिये।
अभिप्राय यह कि देवतादिकों का शरीर केवल भोग के योग्य है
परन्तु मनुष्य शरीर से सब प्रकार का पुन्य ईश्वर भजन और भोग
भी हो सका है॥२॥

पचम सर्ग। तसत सलिल अपि पुनि गहत घटत बढ़त नहिरोति। तुलसी यह गति उर निरखि करियराम पद प्रौति॥४॥ सूर्य नारायण अपनी किरणों से भूमि के जल को खींच लेते हैं फिर बरमाते हैं उन को यह रौति है और खींच लेने और बरसाने में जल घटता बढ़ता नहीं वा उन को रौत न्यून और अधिक नहीं होती। तुलसौ-दाम कहते हैं कि अपने पदय से प्रात्मा को भी वैसी ही गति समझ कर रामचन्द्र के चरण में प्रेम करना चाहिये। अभिप्राय यह कि श्रात्मा घटता बढ़ता नहीं केवल शरीर घटता बढ़ता है इस कारण साधुओं को चाहिये कि शरीराभिमान छोड़ कर परमात्म-खरूप रामचन्द्र की भक्ति करें॥४॥ चुम्बक अस्मन रौति जिमि सन्तन हरि सुख-धाम। जानति रिच्छ-रसम सफरि तुलसी जानत राम॥५॥ जैसे चुम्बक को देख कर (अस्मन) लोहा खींच उठता है (सन्तन सुख-धाम हरि रौति तिमि) उमौ प्रकार माधु जन को सुख देनेहारे परमेश्वर की चेष्टा अपने भकों को श्रोर होनी चाहिये। (रिच्छरसम सफरि जानत) नक्षत्र की रीति को मछली जानती है अर्थात् अश्विनी से छठवी नक्षत्र पार्दा को जान कर मछली अण्डा देती हैं उमौ प्रकार से रामचन्द्र को रीति को तुलसी वा और भक लोग जानते हैं यदि जान । तिरीक, रसम पदच्छेद करो, तो जल की नौखौधार में तैरने की रौत मछली जानती है वैसे ही मत्त, राम- १८० तुलसी-सतसई ॥ रौति जानते हैं ऐसा अर्थ करना चाहिये। कई एक पुस्तकों में वाहन पाठ है कदाचित वह आहत शब्द से विगड़ कर बना है अर्थात् जो पीटा गया हो। अमन पाठ रखने से ठीक ठीक अर्थ होता है॥५॥ भरत हरत दरसत सबहिं पुनि अदरस सब काहु । तुलसी सु-गुरु-प्रसाद-बल होत परम पद लाहु॥६॥ (भरत सबहिं दरमत) जैसे जब सूर्य नारायण वर्षा ऋतु में जल बरसा कर संमार को भरते समय सब को देख पड़ते हैं परन्तु गौम सतु में सुखाते समय उन को रौति नहीं देख पड़ती वैसे ही संसार को गति है अर्थात् प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रौति से इस की उत्पत्ति पालन और नाश होता है तुलसीदास कहते है कि उत्तम गुरु की दया से इन ब वस्तुओं का ज्ञान होता है तब मुक्ति मिलती है ॥ ६ ॥ यथा प्रतच्छ स्वरूप बहु जानत है सब कोय । तथा हि लय-गति को लखब असमञ्जस अति सोय॥७॥ अन्चय। (यथा सब कोय बहु खरूप प्रत्यच्छ जानत है) सब लोग जिस प्रकार मंमार में अनेक प्रकार के रूप को प्रत्यक्ष देखते हैं (तथा हि को लय-गति लखब) वैसे हौ नाश की गति को कौन जान सकता है (मोय अति असमञ्चम) वह तो अति कठिन है अर्थात् मरने के अनन्तर मनुष्य को क्या गति होती है दूस का जानना बहत कठिन है।

पश्चम सर्ग। ११ द्वितीयार्थ। अन्वय (सब कोय यथा प्रत्यच्छ बहु खरूप जानत है) सब कोई जिस प्रकार प्रत्यक्ष बहुतेरे खरूप अर्थात् पञ्च भूत (पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश) से जगत की उत्पत्ति को जानते हैं (तथा हि लय गति को लखब) उसी प्रकार निश्चय इन के लय होने के प्रकार को (अर्थात् पृथ्वी जल में जल तेज में इत्यादि) भौ जानना चाहिये। परन्तु (सोय प्रति असमन्जस) उस परब्रह्म मुक्तिरूप राम का जानना अति कठिन है॥७॥ यथा सकल अप जात अपि रबि मण्डल के माँहि । मिलन तथा जिव राम पद होत तहाँ लय नाहि॥८॥ (यथा सकल अप रबि मण्डल के माहि जात तथा जौव राम पद मिलन जात तहाँ लय नाहिँ होत) जिस प्रकार से सब जल निश्चय कर सूर्य के मण्डल में जा कर लौन हो जाता है उसी प्रकार जब जीव राम पद में जा कर लीन होता है तो वहाँ दूस का नाश नहीं होता। अभिप्राय यह कि जैसे जल भूमि से वाफ के आकार में बदल कर आकाश में जा कर सूर्य में मिलता और इस का नाश नहीं होता वैसे ही जब तक जीव संसार में है तब तक यह अपना शरीर बदला करता है। उस को जन्म मरन कहते हैं परन्तु जब रामचन्द्र के चरण में मिला तो सब प्रकार के दुःखों से कट कर मुक्त हो जाता है। अथवा । रवि से पाया जल किरणों के द्वार सूख-बार फिर

तुलसी-सतसई।
सूर्य मण्डल में जाता और बादल हो कर आकाश में रहता है फिर
वर्षा में बरमता है सूर्य में मिल नहीं जाता उसी प्रकार जीव अपने
शरीर को बदला करता है परन्तु लय नहीं होता ॥८॥
करम कोस सङ्ग लै गयो तुलसी अपनी बानि ।
जहाँ जाइ बिलसै तहाँ परै कहाँ पहिचानि ॥६॥
(तुलमी अपनी बानि करम कोस मङ्ग ले गयो) तुलसीदास
कहते हैं कि जीव अपने खभाब हौ से अपने कर्म का भण्डार ले
गया और ले जाता है (जहाँ जादू तहाँ बिलमै पहिचानि कहा परे)
जहाँ जीव जाता है वहाँ अपने कर्म को भोगता है तो उस कर्म
की माया में भूले जीव से अपना रूप परमात्मा किस प्रकार
पहिचाना जा सका है।
अभिप्राय यह कि शुभाशुभ कर्म जीव के साथ अवश्य जाता है
चाहे जिस योनि में रहै परन्तु इसे कर्म का भोग अवश्य करना
पड़ता है बिना ज्ञान के अपना परमात्मरूप पहिचाना नहीं
जाता॥८॥
ज्याँ धरनी मह हेतु सब रहत यथा धरि देह ।
त्याँ तुलसी लय राम मह मिलन कबहुँ नहिँ रह ॥१०॥
जैसे पृथ्वी में सब बीज अपने आकार (अर्थात् कोई मनुष्य कोई
पशु पक्षी कोई वृक्ष श्रादि चर चर रूप) से रहते है परन्तु
आपस में मिल नहीं जाते उसी प्रकार परमात्मा रामचन्द्र में
जीवात्मा लीन हो कर भी कभी आपस में मिल नहीं जाता है॥१०॥

पचम सर्ग। सोखक पोखक समुझ सुचि राम-प्रकास-सरूप । यथा तथा बिभु देखिर जिमि आदरस अनूप ॥११॥ (सुचि प्रकास मरूप यथा सोखक पोखक समुझ) पवित्र प्रकाश- रूपी सूर्य जिस प्रकार लै और पालन के करनेहारे समझ पड़ते हैं (तथा बिभु राम जिमि अनप अादरस सरूप देखिए) उसी प्रकार से व्यापक राम परमात्मारूप अनुपम दर्पन में सब जौवाँ को देखिये। अभिप्राय यह कि उत्तम दर्पन में देखने से जिस प्रकार अग्नि जल मुखादि के रूप भली भाँति ठीक ठीक देख पड़ते हैं परन्तु उन के गुणों का लेप उस में नहीं लगता न वह भाग से जल न पानी से भौग मके | यद्यपि सब उस में है तो भी वह निर्दोष है ॥ ११ ॥ करम मिटाए मिटत नहिँ तुलसी किर विचार । करतब ही को फेर है या बिधि सार असार ॥१२॥ (तुलमी बिचार किए करम मिटाए नहि मिटत) तुलसीदास ने विचार किया है कि अपना किया शुभ अशुभ कर्म मिटाने वा नष्ट करने से किसी प्रकार नष्ट नहीं होता (या बिधि करतब हो के फेरे मार श्रमार है) इस प्रकार अपने करतब ही के फर से परमात्मा निर्दोष निर्मल है और जीव प्रसार अर्थात् मलौन हुआ है और ये परस्पर विरुद्ध होने के कारण नहीं मिलते ॥ १२.४ ' १८४ तुलसी सतसई। एक किर है दूसरे बहुरि तीसरो अङ्ग । तुलसी कैस हुँ ना मिटे अतिसय करम तरङ्ग ॥१३॥ किये जाते, पूर्व जन्म के किये और होनेवाले तीन प्रकार के . कर्म हैं। एक अर्थात्-किये जाते कर्म के करने से उस के साथ दूसरा होनेवाला भी होता है फिर तीसरा पूर्व जन्म कृत अपने (अङ्ग) शरीर ही के साथ उत्पन्न हुआ है। इस प्रकार कर्म का तरङ्ग (अर्थात् वृद्धि) तुलसीदास कहते हैं कि प्रत्यन्त है और किसी प्रकार नहीं नष्ट होता । अभिप्राय यह कि जो मनुष्य इस संसार में पूर्व जन्म में उत्तम कर्म किये हैं वा अब करते हैं उन को उस का फल सुख भोगना पड़ता है और जो पाप कर्म करते हैं उन्हे दुःख भोगना पड़ता है। कभी कभी पाप के करते पुन्य और पुन्य के करते पाप भी मंयोग से हो जाता है। इस प्रकार दोनों कर्म करनेहारे संभागै कर्म को जाल में फस कर जन्म मृत्यु के भागी होते हैं ॥ १३ ॥ इन दोउन्र ते रहित भी कोउ न राम तजि प्रान। तुलसौ यह गति जानि कोउ कोउ सन्त सुजान ॥ १४॥ (इन दोनों तें रहित सुजान राम तजि पान न भौ तुलसी यह गति को काउ मन्त जानिहैं ) इन दोनों प्रकार के शुभाशुभ कर्क में होग सुजान आत्मज्ञानी श्रीरामचन्द्र को शेड़ कर और परम सर्ग। १८५ को नहीं हुआ अर्थात् जो दो कर्म से रहित हो कर ज्ञानी है वह ब्रह्म स्वरूप हो जाता है। तुलसी-दाम कहते हैं कि इस कर्म जाल के भेद को कोई कोई बिरले साधु लोग जामगे ॥१४॥ सन्तन को लै अमि-सदन समुझहिँ सुगति प्रबौन। करम बिपरजै कबहुँ नहि सदा राम रस लौन ॥१५॥ पहले के कई एक दोहों में विरोधाभास अलङ्गार द्वारा कर्म की प्रबलता दिखा कर अब माधु जनों के कर्म जाल में न फसने का कारण कहते हैं। अन्वय (प्रबौन सन्तन अमि-सदन लै को सुगति समुझदि) जानौ साधु जन अमृत के घर में लौन रहना अर्थात् मुक्ति खरूप राम भक्ति में लगे रहने को उत्तम गति जानते हैं, क्योंकि इस में कभी भी कर्म का हेर फेर नहीं होता । क्योंकि वे जो कुछ कर्म करते हैं उसके फल को परमेश्वर को अर्पण किये जाते हैं। यद्यपि वे कर्ता हैं तौभौ ममतान रहने के कारण कर्म बन्धन उन्हे नहीं बाँधता और वे सर्वदा राम की भक्रि योग में लीन रहते हैं। अभिप्राय यह कि अमृतरूप भकि योग में लगे जन अपने शुभाशुभ कर्म को ज्ञानानि से नष्ट कर परमानन्द के भागी होते हैं ॥१५॥ सदा एक रस सन्त सिय निसचय निसि-कर जान । राम दिवा-कर दुख-हरन तुलसौ सौल निधान ॥१६॥ प्रथम अर्थ। सर्वदा एक भक्ति रस में लगे हुये माधों को लिये 24 तुलसी-वसमई। मौताजी चन्द्रमा और अति सुशील और दुःखों को दूर करनेहारे राम सूर्य के समान हैं अर्थात् दिन को सूर्य और रात को चन्द्र प्रजात्रों के दुख को हरते हैं उस प्रकार मौता राम भी हैं। सर्वदा एक रस भकि खरूप साधु जनों को (निसि-कर चन्द्रमा चदि आझादने धातु से निकला इस कारण) आनन्ददायक भकि खरूप मौता जौ को जानना चाहिये और दुःख को हरण करनेहारे दिवाकर अर्थात् सूर्यरूप (मौल-निधान) सुशील राम को जानना चाहिये ॥ १६ ॥ सन्तन की गति उरबिजा जानहु ससि परमान। रमित रहत रस-मय सदा तुलसीरति नहिचान॥१७॥ (मन्तन को गति उरबिजा ममि परमान जानह) चन्द्रमा के सदृश उर्विजा भूमि से उत्पन्न जानको जौ को साधुओं को गति अर्थात् भनि अवस्था जानिये जहाँ रस पूर्ण श्रीरामचन्द्र जौ (रमित रहत) बिहार करते हैं (पान रति नाही) और दूसरे में प्रौत नहीं करते । अभिप्राय यह कि जैसे जामको जी में श्रीरामचन्द्र की प्रीत रहती है वैसे ही मौता सदृश माधु की भक्रिों में भी रामचन्द्र प्रेम करते हैं। द्वितीयार्थ अन्वय । (मन्तन को भान रति नाहिं) माधुओं को मौता छोड़ और किसी में प्रीति नहीं है (मसि परिमान उरविजा गति जानह) चन्द्रमा के ममान शीतल मौता हो उन को गति हैं रामाय रति सदा रमित रहत) इस हेतु उन को आनन्दरम पूर्ण

पक्षम सर्ग।
१८७
भकि मैं वे लगे रहते हैं अर्थात् मौता जी के भजन में मगन
रहते हैं ॥१०॥
जात-रूप जिमि अनल मिलि ललित होत तन ताय॥
सन्त सौत-कर सौय तिमि लसहि राम-पद पाय॥१८॥
(जात-रूप) सोना जिस प्रकार अग्नि में रखने से अपने (तन)
शरीर को (ताय) तप्त कर के लालभभूका हो जाता है, उसी
प्रकार से माधुओं को बुद्धि (मौत-कर) चन्द्रमारूपौ मीता और
श्रीरामचन्द्र के चरण को पा कर मोभित होती है अर्थात् मौता-राम
की भक्ति में माधुत्रों के मन लगे रहते हैं इस कारण सदा वे
सुखी रहते हैं ॥१८॥
आपुहिँ बाँधत आपु हठि कौन छोड़ावत ताहि ।
सुख-दायक देखत सुनत तदपि सु मानत नाहि॥१६॥
इस मंमार के मनुष्य लोग (आप हठि पहुँ बाँधत) पाप हो
इठ कर के अपने को मंमार को शुभाशुभ कर्मरूपी जाल में
बाँधते है तो दून को कौन छोड़ा सकता है देखते और सुनते हैं
कि ज्ञानमय रामचन्द्र और सन्त सुख देनेवाले हैं तो भी उन को
नहीं मानते परन्तु जन्म मरण श्रादि के अनेक दुख के देनेहारे
विषय के पाछे दौड़ते हैं तो उन को कौन मुक्त कर सकता अर्थात्
कोई नहीं कर सकता ॥१८॥

१च्च तुलसौ-सतसई । जोन तार हैं अधम गति उरध तीन गति जात । तुलसी मकरौ तन्तु इव कब हु न करम नसात ॥२०॥ तुलसीदास कहते हैं कि कर्म का फन्द मकरौ को जाल मा . है। मकरौ जिस सूत से नीचे उतरती है उसी को पकड़ कर ऊपर चढ़ती है और उन्ही तारों से उस का ऊपर नीचे जाना आमा लगा रहता है उसी प्रकार मकरौ की जाल के ममान कर्म कभी नष्ट नहीं होता अर्थात् जिस प्रकार मकरी एक हौ तार से जपर नीचे दौड़ा करती है तार नहीं टूटता वैसे ही कर्म का भी तार नहीं टूटता इस के कारण लोग खर्ग नर्क भोगा ही करते हैं ॥२०॥ जहाँ रहत तह सह सदा तुलसी तेरी बानि। सुधरै विधि-बस होइ जब सत-सङ्गति पहिचानि॥२१॥ जहाँ तू रहता है वहाँ तेरे माथ सदा तेरा कर्म और स्वभाव भी रहता है (तुलसी जब बिधि-बम मत-मङ्गति पहिचान होय तेरी बानि सुधरे) तुलसीदास कहते हैं कि जब भाग्यवश से तेरे मन में सज्जनों को सङ्गति का पहिचान हो तो यह तेरौ बानि सुधर जायगी ॥२१॥ रबि रजनीस धरा तथा यह अस्थिर अस थूल । सूछम गुन को जौब कर तुलसौ से तन-मूल ॥२२॥ (यथा रबि रजनौस धरा) जिस प्रकार सूर्य और चन्द्रमा पक्षम सर्ग। १९६ अपने अपने किरण और प्रकाश के द्वारा पृथ्वी (धरा शब्द से यहाँ लक्षणा द्वारा उस पर के जीवों को जानना चाहिये) का पालन करते हैं। (तथा यह अस्थिर अस थूल) वैसे ही अर्थात् उसी अस्थिर भूमि के समान जीवों का यह स्थल-शरीर है। (तुलसी मो सछम तन गुन को जौब कर मूल) तुलसौ-दास उस सूक्ष्म शरीर के गुणों को जीवों का कारण कहते हैं अर्थात् जो जो बामना सूक्ष्म देह में रहती हैं वे ही स्थूल संसारौ में होती है क्योंकि शास्त्र के नियमों से कारण के যু कार्य में पाये आते हैं। (कारण- गुणा: कार्यगुणानारभन्ते)। वेदान्त के अनुसार पाँच पाँच ज्ञानेन्द्रिय कर्मेन्द्रिय ग्यारहवाँ मन बुद्धि और पञ्च महाभूत सूक्ष्म शरीर हैं इस प्रकार दोनों प्रकार के शरीरों में वेही गुण और स्वभाव पाये जाते हैं ॥ २२ ॥ श्रावत अप रबि ते यथा जात तथा रवि माहि। जह ते प्रकट तहौँ दुरत तुलसौ आमत ताहि ॥२३॥ (यथा श्रप रवि ते श्रावत रबि माँहि जात तथा (जीव) जर ते प्रकट नहीं दुरत तुलसौ ताहि जानत)। जिम प्रकार जल सूर्य से आता है और फिर सूर्य ही में चला जाता है अर्थात् सूर्य नारायण पाठ महीने तक भूमि पर के जल को किरणों से मोख कर वर्षा काल के आने पर उसे फिर वरमाते हैं (अष्टौ मासानिपीतं यद्भूम्याचोदमयं वसु। खगोभिर्मोनुमारेभे पर्यन्य: काल भागते । भागवत १० स्क० ) उसी प्रकार जब से यह

तुलसी सतसई।
जीव प्रगट होता है वहाँ हाँ अन्त में जा कर (दुरत) मिल जाता
तुखमौ-दास अथवा राम लक्ष्मण मौता के और भक उस बात को
अथवा उस ईश्वर को जानते हैं ॥२३॥
प्रकट भये देखत सकल दुरत लखत कोइ कोय ।
तुलसी यह अतिसय अगम बिन गुरु सुगम न होय ॥
२४॥
दुरत लखत तुलसी
(अन्वय) सकल प्रकट भये देखत का कोय
यह अतिमय अगम बिन गुरु सुगम न होय ।
सब लोग जिस प्रकार बरसते समय जल को देखते हैं उसी
प्रकार जब जीव जन्म लेता है तब सब लोग जानते हैं और देखते
हैं परन्तु जब अदृश्य बाफ के आकार में जल उड़ जाता है विरले
ही मनुष्य देखते हैं, वही दशा प्राण के मरने के समय होती है।
तुलसी-दास कहते हैं कि यह बात बड़ी कठिनता से जानी जाती
है और बिना अच्छे गुरु के जानने के योग्य नहीं होती। इस
कारण उत्तम
गुरु
को खोजना और परमेश्वर का भजन करना
बहुत आवश्यक है।
जहां"यह अतिमय अधम" पाठ हो वहां यह संसारी जीव बहुत
नौच और बुद्धि-हीन है इस लिये बिना गुरु के परलोक मंसारी जीव
के लिये सुगम नहीं हो सकता ऐसा अर्थ करना चाहिये ॥२४॥
या जग जे नय-हौन नर बर बस दुख-मग जाहिं।
प्रकटन दुरत महा-दुखौ कह लग कहियत ताहि ॥२५॥

पश्चम सर्ग। (अन्वय) (या जग जे नर नय-हौन (ते) बर बस प्रकटत दुरत महा-दुखौ दुखमग जाहिँ ताहि कह लग कहियत)। इस संसार में जो मनुष्य नौति से रहित हैं वे विषय में प्रामक होने के कारण हठ से अनेक योनि में जनमते और मरते हैं बड़े दुखौ हो कर दुख की राह में जाते हैं उन का कहाँ तक वर्णन करें वे अमङ्ख्य हैं ॥२५॥ सुख-दुख-मग अपने गहे मग कहुँ लगत न धाय । तुलसी राम-प्रसाद बिन सो किमि जाना जाय ॥२६॥ (अन्वय) (अपने सुख दुख मग गहे मग धाय केहुँन लगत तुलसी मो राम-प्रसाद बिन किमि जानो जाय)। जीव अपनी ही इच्छा से सुख अर्थात् शान्ति दया नियम आदि सुख देनेवाले काम और दुख अर्थात् काम क्रोध लोभ अहङ्कार क्रूरता कपट श्रादि दुखदाई कामों में पड़ते हैं परन्तु सुखदाई और दुखदाई राह दौड़ कर किसी को नहीं लगती अर्थात् जो सुखदाई कर्म करता है वह सुख पाता और जो दुखदाई करता वह दुख पाता है कर्म का बन्धन बिना कर्म किये किमी को नहीं बान्ध मकता। तुलसौ-दास कहते है कि श्रीरामचन्द्र की कृपा के बिना यह किस प्रकार से जाना जा सकता है। जिस पर रामचन्द्र जी की दया होती है वह अपने खभाव ही से भले काम में लगता है ॥ २६ ॥ ।

१९२ तुलसी-सतसई। महि तें रबि रवि तें अवनि सपनेहुँ सुख कहुँ नाहि। तुलसौ तब लगि दुखित अति ससि-मग लहत न ताहि ॥२७॥ (अन्वय) महि ते रवि रवि ते अवनि सपने हुँ कहुँ सुख नाहिं तुलसौ तब लगि अति दुखित (जब लगि) ताहि मसि-मग न लहत । जिस प्रकार जल भूमि पर से दृश्य अदृश वाफ के आकार में एक बार सूर्य में जा मिलता है फिर वर्षा में भूमि पर आता है उसी प्रकार जीव को भी गति है, इस को खप्न में भी कहीं सुख नहीं है जन्म मरण में घूमा करता है। तुलसी-दाम कहते हैं कि तब तक यह जीव बहुत दुखी बना रहता है जब तक सो चन्द्रमारूप बुद्धि वा मौता जी को शरण नहीं प्राप्त होती। जब चन्द्रमारूपी सौता जौ की दया दूस पर हुई तो इस के लिये मचिदानन्द ब्रह्मरूप राम का मिलना कठिन नहीं है ॥२०॥ के चक्र सन्सन की गति सौत-कर लेस कलेस न होय । सो सिय पद सुख-दा सदा जानु परम पद सोय ॥८॥ (अन्वय) मौत-कर मन्तन की गति कलेस लेस न होय मो मदा सुख-दा मिथ पद सोय परम पद जानु । चन्द्रमा अर्थात् बुद्धिरूप श्रीजानकी जो माधुओं को प्राश भरोस हैं इसी कारण उन को थोड़ा भौ दुःख नहीं होता वह चन्द्रमा सदा सुख नेहारा श्रीसीता जी का चरण है उसी को परम अर्थात् पर परम सर्ग। १९५ बहारूप राम अथवा परम पद मुक्ति जानना चाहिये। किसी किसी पुस्तकों में “जानु राम पद सोय” पाठ मिलता है वहाँ मौता जी बुद्धिरूप हैं, उन को रामचन्द्र जी का पद जानना ऐसा अर्थ करना चाहिये। जिस प्रकार माता, पिता के दूर रहने पर भौ, पुत्र का पालन करती और उसे पिता के पास पहुँचा देती है उसी रौत यहाँ मातारूप मौता जी भक पुत्र को रक्षा कर रामचन्द्र से मिला देती हैं ॥ २८॥ तजत अमिय ससि जान जग तुलसौ देखत रूप । गहत नहीं सब कह बिदित अतिसय अमल अनूप॥२९॥ (अन्वय) जग जान ससि अमिय तजत तुलसी अतिमय श्रमल अनूप रूप देखत सब कह बिदित गहत नहीं। संमार जानता है कि चन्द्रमा से अमृत निकलता है और चन्द्र के अत्यन्त निर्मल और उपमा-हीन रूप को देखता है और सब लोगों पर यह बात ज्ञात भी है। तो भी तुलसी-दाम कहते हैं कि चन्द्रमा को कोई ग्रहण नहीं करता उसी प्रकार से चन्द्रमा अर्थात् बुद्धिरूप मौता जी को संसार जानता है कि (अमृत तजत ) मुक्ति को देनेहारी है और उन का अत्यन्त निर्मल और उपमा-हौन रूप पुराणों के द्वारा सब पर विदित है और ध्यान के द्वारा देखा भौ जाता है। गोसाई जी कहते हैं कि तो भी उन को शरण को ग्रहण नहीं करता दुसौ से दुखी बना रहता है ॥ २८ ॥ 25 तुलसी सतसई। ससि-कर सुख-द सकल जगत को तेहिजानत नाहि। कोक कमल कह दुख-द कर यदपि दुख-द नहिँ ताहि . । अन्वय-मसि-कर सकल जगत सुख-द तेहि को नाहि जानत यद्यपि कर कोक कमल कह दुख-द. नहिं (तथापि) ताहि दुख-द । चन्द्रमा की किरणें सब संसार के लिये सुखदाई हैं इस बात को कौन नहीं जानता ? अर्थात् सबी जानते हैं कि चन्द्रमा को अमृत-मय चान्दनौ को देख कर सब को आनन्द होता है; और जो भी वे किरणें चकवा और कमल के लिये वस्तुतः स्वतः वा श्राप दुख देनेवाली नहीं हैं तो भी उन दुखदाई जान पड़ती हैं अर्थात् चकवा अपनी चकई के वियोग में और कमल अपने मित्र सूर्य के वियोमबे श्राप दुखी रहते हैं। इस कारण यद्यपि चन्द्र किरण अपनी ओर से उन्हें नहीं दुख देती तो भी अपने दुख के कारण ये (चकवा और कमल) उन्हें (किरणों को) दुखदाई मानते हैं। इसी प्रकार प्रौसीता जी वा माधुजन संसार में सब के लिये सुखदाई हैं तो भी नौर विषयौ खोग ने दुखदाई मानते हैं अर्थात् दून की भक्ति में उन सुख नहीं मिलता ॥२०॥ बिन देखे समुझे सुने सोउ भव मिथ्या-बाद । तुलसी गुरु गम कै लखै सहज मिटे विखाद ॥३१॥ पन्वय। भव बिन देखे सुने मोउ मिथ्या-बाद गुरु गम के खखै तुलौ सहजहि बिखाद मिटे।

पश्चम सर्ग। जैसे संसार में बिना भली भाँत परीक्षा किये केवल सुनने हौ से जान लोग भूठ अपबाद करते हैं कि चन्द्रमा चकवा और कमल के लिये दुखदाई है वैसे ही दुष्ट विषयो जन समझते हैं कि मौतारूपी भकि और मत्सङ्गति सुखदाई नहीं हैं ऐसा समझाना केवल मिथ्यावाद है। यदि वे गुरु अर्थात् सचे ज्ञानी से जान पा कर इस को बिचारें तो तुलसौ-दास कहते हैं कि सहज हौ से उन का दुख दूर हो जाय और भक्ति के प्रभाव से मुक्ति अवश्य मिले। द्वितीयार्थ अन्वय। बिनु माउ समुझे मिथ्यावाद भव देखे सुने गुरुगम के लखै सहजहिं बिखाद मिटे । बिना उस परब्रह्म परमेश्वर के जाने झठे आरोपित संसार को लोग देखते सुनते हैं और सचा जानते हैं यदि उत्तम गुरु के दिये ब्रह्मज्ञान से देखें तो संसार मिथ्या देख पड़े और ज्ञान हो जाने के कारण सहजहिं मुक्ति लाभ हो और सब दुःखों से जीव मुक्त हो जाएँ॥ ३१॥ बरखि बिस्व हरखित करत हरत ताप अघ-प्यास। तुलसी दोख न जलद कर जो जड़ जरत जवास ॥३२॥ अन्वय । तुलसी (जलद) बरखि बिख हरखित करत ताप अघ- प्यास हरत (तथापि) जो जड़ जवास जरत (तो) जलद कर दोखन। ३१वें दोहे में भकि और ज्ञान को प्रसंशा कर दम दोहे में दृष्टान्त के द्वारा विषय में लीन नौच जनों को निन्दा करते हैं। तुलसी-दाम कहते हैं कि मेष जल परस कर मार को तुलसी-सतसई पानन्दिन करता है और सब के दुःखरूपी पाप और प्यास को दूर करता है तो भी जो मूर्खरूप जवासा घास जर जाती है तो इस में मेघ का कुछ भी दोष नहीं है। अभिप्राय यह कि भक्ति और ज्ञान परम सुखदाई है तो भौ मूर्ख विषयी लोगों को अच्छे नहीं लगते तो इस में विषयो हो की जड़ता प्रगट होती है ज्ञान भक्ति किसी प्रकार दोषी नहीं ठहर सकती॥ ३२॥ चन्द्र देत अमि लेत बिख देखहु मनहि विचार । तुलसी तिमि सिय सन्त बर महिमाबिखदअपार॥३३॥ अन्वय। चन्द्र बिख लेत श्रमि देत मनहि बिचारि देख तुलसी तिमि मिय सन्त बर बिखद महिमा अपार । चन्द्रमा अपनी किरणों से संसार के विषरूप सन्ताप को हर लेते हैं और अमृत बरसाते हैं इस बात को मन में विचार कर भली माँत देखो। तुलसौ-दास कहते हैं कि उसी प्रकार मौता जौ वा मौतारूपी भक्ति और माधु जन हैं जिन को निर्मल महिमा बड़ाई का अन्त कोई नहीं पा सकता है। भकि और मजनों की प्रसंशा वर्णन से बाहर है चाहे विषयौ मूर्ख लोग उन्हें माने वा नहीं ॥ ३३ ॥ रसमि विदित रबि-रूप लखु सीत सौत-कर जान। लसत योग जस-कार भव तुलसी समुझु समान॥३४॥ अषय । रबि-रूप लखु रममि बिदित (तथा) मौत-कर मौत जानु योग जस-कार खमत भव तुलसी ममान समुझ।

पञ्चम सर्ग। सूर्य के रूप को देखो तो कैसा तौत्र और तेजश्वी देख पड़ता है उन की किरणों को लोग जानते हैं कि बड़ी कड़ी हैं मही नहीं जाती और चन्द्रमा को लोग शीतल समझते हैं जिस की ओर देखने से परम आनन्द अनुभव किया जाता है। इन दोनों के योग वा मिलने से कौर्ति को बढ़ानेहारा चन्द्रमा मोभित (भव) होता है मो तुलसौ-दास कहते हैं कि दोनों को समान समझना चाहिये अर्थात् यदि दिन को सूर्य सब बस्तुओं को नपा कर उन में का विष निकाल कर उन्हें उष्ण न करें तो चन्द्रमा को अमृतमय किरणे" उन्हें सुखदायिनी और शीतल न जान पड़ें इस कारण दोनों विरुद्ध गुणों का समान रहना आवश्यक है क्योंकि एक के विना दूसरे का ज्ञान होना कठिन है और दोनों के योग से बहुत अच्छा होता है उसी प्रकार सूर्य्यरूप ब्रह्मज्ञानमय श्रीराम को सूर्य के स्थान में समझना चाहिये और चन्द्रमा बुद्धिरूप श्रीसीता जी को भक्ति समझना चाहिये दोनों को मानने से बड़ा यश होता है और दोनों ही को समान जानना उचित है। द्वितीयार्थ का अन्वय। रबि रममि बिदित रूप लखु, मौत-कर मौत जानु, योग भव लसत, तुलसी जम समान-कार समझ सूर्य की किरणों को ज्ञानरूप जानो और (मौत-कर) चन्द्रमा को शीतल करनेहारा जल जानो अर्थात् सूर्य अपनी किरणों से भूमि के जल को खौच लेता है फिर बर्षा में उसी जल को बरमा कर संमार को ठण्डा करता है। उसी जल के योग अर्थात् मिखने से भव संमार मोभित होता है यदि वह जल न हो तो संसार नष्ट हो जाय।

१५ तुलसी-सतसई। 'तु' तुरङ्गवाहन राम, ‘स्ल' लक्ष्मण और 'मौ' सीता जी के (जस) यश कौर्ति को समान करनेहारी अर्थात् अपने भनों को सूर्य और जल के समान पोषण करनेहारी जानो। सूर्य वा ज्ञामरूप राम जसरूपी भक्ति को बरसा कर अपनी कौर्ति के फैलानेहारे भकों को मुक्ति दे कर अपने समान बना लेते हैं। दूसरे अर्थ में शौत शब्द का अर्थ जल किया गया है उस का प्रमाण । उदकन्तु जलं नौरं शीतं शीतलम् (मेदिनी) ॥ ३४ ॥ खेत अवनि रबि अन्सु कह देत अमिय अप-सार । तुलसी खूछम को सदा रबि रजनौस अधार ॥३५॥ ॥ अन्वय । रवि अन्सुअवनि अप कह लेत सूक्ष्म अपमार अमृत रजनौस (क) देत तुलसी (रबि रजनौस) सदा (अवनि) को अधार। सूर्य नारायण अपनी किरणों के द्वारा पृथ्वी पर के जल को (यौन तु में) मोख लेते है फिर जल के सूक्ष्म मार भाग अमृत को चन्द्रमा को देते हैं फिर (रजनी, रजनौस अप-मार अमृत कह अवनी को देत) चन्द्रमा रात को जल का मार भाग अमृत भूमि और भूमि पर की जड़ी बूटी को देते हैं। तुलसी कहते हैं कि इस प्रकार सूर्य और चन्द्रमा मंदा पृथ्वी और इस पर के जीव जन्तुओं के प्रशाधार हैं। इसी रीत सूर्य और ज्ञान के समान रामचन्द्र हैं और भकि बुद्धि और चन्द्र के समान सौता जी हैं।

पचम सर्ग। राम के भजन से ज्ञान होता है तब चन्द्र जखरूप मौता जौ भक को भकि दे कर मौतल कर अमृतरूप मुक्ति देती हैं। जहाँ "लेति देति” पाठ हो वहाँ नौचे के अन्वय के अनुसार अर्थ करना चाहिये। अवनि रवि असु कह लेति (रजनौम) अप-सार अमिय देत तुलसी रबि.रजनीस सदा सछम को पाधार । पृथ्वी दिन को सूर्य की किरणों को लेती है अर्थात् उन से तप्त हो जाती है तब रात को चन्द्रमा जल के सार अम्मत को दे कर उसे शीतल करते हैं तुलसी कहते हैं कि इस प्रकार सूर्य और चन्द्रमा सर्वदा सन्म जीवों के आधार हैं इन्ही के द्वारा पृथ्वी • सब जीवों को पालती है ॥ ३५॥ भूमि भानु असथूल अप सकल घरा-चर-रूप । तुलसी बिनु गुरु ना लहै यह मत अमल अनूप ॥३६॥ अन्वय। असथूल भूमि सकल चरा-ऽचर-रूप (प्रमथल) अप भानुरूप यह अमल अनप मत बिनु गुरु (जन) ना लहै। अमथुख अर्थात् अनित्य शरीररूप पृथ्वी सब चर चर जीवों का रूप अर्थात् शरीर है और सूक्ष्म जल सूर्य का रूप है अर्थात् जल को सूक्ष्म वाष्य के प्रकार से सूर्य मोख कर अपने मण्डल में रखते हैं। फिर वर्षा भतु में छोड़ते हैं यह भूमि और जल के विषय का निर्मल और अद्भुत सिद्धान्त बिना गुरु के उपदेश से मनुष्य नहीं जान सकते हैं।

तुलसी-सतसई। हितीयार्थ अन्वय । असथूल भूमि अप मकल चरा-चर-रूप भानु तुलसी गुरु बिनु यह अमल अनूप मत ना लहै। सब जीवों को श्राधाररूप अस्थूल शरीर पृथ्वी में जल सूक्ष्म है और सब चलनेहारे और नहीं चलनेवाले दोनों प्रकार के जीवों के रूप सूर्य नारायण हैं क्योंकि यदि सूर्य न हाँ तो कौन जल बरसा कर सब को जिलावे। इसी प्रकार पृथ्वी पर के सब जीवों के श्रादि कारण सूर्यरूप श्रीराम हैं जिन में प्रलय के अन्त में सब जीव लय हो कर विश्राम पाते हैं । विना किसी राम-भक गुरु वा उपदेशक के यह (अर्थात् रामचन्द्र को सूर्य के समान सब जीवों का आश्रय जानना) निर्मल और अद्भुत सिद्धान्त कोई नहीं पा सकता अर्थात् जान सकता है। दूस दोहे के पूर्वार्द्ध में न्यायशास्त्र का मत वर्णित जान पड़ता है क्याँकि न्याय में पृथ्वी का शरीर इन्द्रिय और विषय तीन भाग किया है जिन में हम सबों को शरीर को पृथ्वीरूप माना है ॥ ३६ ॥ तुलसी जे नय लौन नर ते निसि-कर-तन लौन । अपर सकल रबि गत भये महा-कष्ट अति दीन॥३७॥ तुलमी जे नर नय लीन ते निसि-कर-तन लौन अपर सकल रबि गत महा-कष्ट अति दोन भये। तुलमो-दाम कहते हैं कि जो मनुष्य नौति मार्ग में तत्पर हैं वे चन्द्रमा के किरणरूपी शरीर अर्थात् बुद्धिरूप भकि मार्ग में लगे पचम सर्ग। २.१ हुये श्रानन्द पाते हैं अर्थात् भक्ति के द्वारा मुक्ति के भागी होते हैं परन्तु और दूसरे सब लोग जो सूर्य अर्थात् जान-मार्ग के अनुरागौ हैं वे बड़े दुख में अर्थात् योगाभ्यास के स्थान धारणा समाधि आदि के बड़े कष्टसाध्य उपाय में परिश्रम से बड़े दुखौ रहते हैं। अपर के कई एक दोहाँ में भक्ति और ज्ञान दोनों उपार्थों का वर्णन कर के इस दोहे में ज्ञान को बड़े क्लेश से सिद्ध होनेवाला दिखा कर भति को सुगमता और प्रसंशा दिखाई है। दूस में यह शङ्का हो सकती है कि ऊपर ज्ञान और भक्ति दोनों को प्रसंशा कर तथा सूर्य और ज्ञान को रामरूप कह के अब उस को निन्दा क्यों करेंगे। इस लिये दूसरे प्रकार अन्षय और दूसरा अर्थ करते हैं। ये अतिकष्ट तन लौन नर ते सकल दौन, तुलमी श्रपर (2) रबि-गत, (वा) निमि कर नय लोन (ते) महा भये । जो जीव अत्यन्त दुखरूप शरीर में लौन है अर्थात् शरीर और दूम के भोग और पालन में लगे वा शरीर ही के सुख को परमार्थ समभाते हैं वे अन्त को क्लेशभागी होने के कारण बड़े दुखी हैं परन्तु तुलसी कहते हैं कि दूसरे लोग जो सूर्य्यरूप ज्ञान में लगे हैं या चन्द्रमारूप भक्ति मार्ग में तत्पर है वे वस्तुतः बड़े हैं अर्थात् सही प्रसंशा के पात्र हैं। अभिप्राय यह कि शरीर और संसारौ विषय भोग को कटदाई और तुच्छ जान कर शेड़ना और शाम तथा भक्ति को सदा रहनेवाले भानन्द का मल समभ उस के करने में तत्पर होना चाहिये ॥२०॥ 26 तुलसी सतसई। तुलसी कवन हुँ जोग ते सत-सङ्गति जब होय । राम-मिलन सन्सय नहीं कहहि सु-मति सब कोय ॥३८॥ तुलसी-दास कहते है कि किसी सुयोग अर्थात् तीर्थ श्रादि स्थानों में भाग्य के अच्छे होने पर जब साधुओं का सङ्ग होता है, तो उन को रौत और उपदेश को ग्रहण करने से राम मिल सकते हैं, इस में कुछ सन्देह नहीं, ऐसा सब बुद्धिमान लोग कहते हैं। सत्सङ्गति राम की भक्ति और राम के मिलने का उत्तम उपाय है॥३८॥ सेवक-पद सुख-कर सदा दुख-द सेव्य-पद जान । यथा विभौखन रावनहि तुलसी समुझु प्रमान॥३९॥ अब दूसरे प्रकार का दृष्टान्त दे कर भक्रि-मार्ग को पुष्टता दिखाते हैं। (सेवक-पद) रामचन्द्र का दास हो कर रहना मर्वदा सुखदाई है। इह लोक पर लोक दोनों के लिये उपकारी है, जीते जी ग्रहस्थी में रह कर राम की भक्ति करने से भनि-रस का अनुभव और अन्त को मरने पर राम के लोक वैकुण्ठ की प्राप्ति होती है। (सेव्य-पद दुख-द जान ) परन्तु स्वामी होना दुख का कारण होता है क्योंकि उस से लोग अहङ्कार ममता श्रादि दोर्षों के वश हो परमेश्वर को भूल कर विषयामत हो जाते हैं। इस में प्रमाण देते हैं कि जिस प्रकार देखो कि विभौषण अपने को राम का भक समझते थे इस हेतु सङ्का पश्चम सर्ग। के राजा हुये और रावण अपने को ज्ञानी समझ कर अहङ्कार और ममता के कारण विषय में डूब गया और पापकारौ ङत्रा। पहले मर्ग के ५श्व दोहे में भी मेवक-पद पाने की कठिनता और खामी होने को सरलता को दिखलाया है ॥ ३८ ॥ सौत-उष्म-कर-रूप जुग निसि-दिन-कर करतार । तुलसी तिन कह एक नहिँ निरखहु करि निरधार ॥४०॥ अन्वय। सौत उष्ण एक नहीं जुग कर करतार निमि-दिन-कर रूप तिन कहं तुलसी निरधार करि निरखड़। संसार में ठंढा और गर्म कोई नहीं हैं (जुम-कर करतार) दोनों के उत्पन्न करनेहारे चन्द्रमा-सूर्यरूप हैं, तुलसौ-दास कहते हैं कि उन को निश्चय कर ज्ञानदृष्टि से देखो। बिराटरूप भगवान के शरीर के एक भाग सूर्य-चन्द्र लोक की रक्षा और काम को चलाने के लिये परब्रह्म परमेश्वर की इच्छा से दिन रात को उदित होते हैं ॥४॥ नहि नयनन काइ लखेउ धरत नाम सब कोय । ता ते साचो है समुझु झूठ कबहुँ नहि होय ॥४१॥ अषय । काइ नयनम (भौत उष्ण गुण ) नहि लखेउ, मब कोय नाम धरत ता ते माचो ममुझ नहि होय। किसी ने आँखों से (शीतता और उष्णतारूप गों को ) नहीं देखा है, अर्थात् शौतत्व और उष्णत्व का ज्ञान बगिन्द्रिय से होता है आँख से तो नहीं होता, इस कारण आँख से दून को किसी ने न देखा कबहुँ झूठ

तुलसी-सतसई।
परन्तु व से ज्ञात होने के कारण सब लोग शौत और उष्ण का
नाम रखते हैं कि यह पदार्थ शौत और वह उष्ण है, इस कारण
इन को मत्य जानना चाहिये और कभी ये झूठ नहीं होगे। जल
जिस का गुण सदा शौत है सो भी अग्नि के संयोग से उष्ण हो जाता
है, चन्दन शीतल है उस के घिसने से भी भाग निकलती है, सूर्य
अत्यन्त उष्ण है तो भी अधिक शीतयुक्त देशों में वैमा उष्ण नहीं
रहता दूस से संयोग और समय के अनुसार अनुभव कर्ता के
अनुभव के अनुसार शीत उष्ण का व्यवहार होता है जिसे सत्य
समझना चाहिये॥४१॥
बेद कहत सब को बिदित तुलसी अमिय-स्वभाव।
करत पान अरु रुज हरत अबिरल अमल-प्रभाव॥४२॥
तुलसी बेद अबिरल अमल-प्रभाव श्रमिय-खभाव कहत अरु सब
कोउ कहत पान करत रुज हरत ।
तुलमो कहते हैं कि वेद सदा दोषहौन सामर्थ्य युक्त असत के
खभाव का वर्णन करता है और सब लोग जानते हैं कि पौने से
रोग दुख को दूर कर देता है। यह प्रभाव भी ईश्वर की इच्छा के
अधौन है क्योंकि (विषमण्यमृतं वचिद्भवेदमृतं वा विषमीश्वरेच्छया)
कहीं२ जस की प्रेरणा से बिष अमृत और अमृत विष हो जाता है
जैसे लदा में हुआ था "सुधा विष्टि भई दोउ दल माहीं। जिये
भालुकपि निशिचर नाहीं "॥ ४२ ॥

पञ्चम सर्ग।
२०५
गन्ध सौत अपि उष्णता सहि बिदित जग जान ।
महि बन अनल मा अनिल गत बिन देखे परमान
॥४३॥
गन्ध मौत उष्णता महि बन अनल गत जग बिन देखे परमान
जान सबहिँ बिदित मोपि अनिल गत ।
गन्ध शीतलता और उष्णता तौनों गुण क्रम से पृथ्वी जल और
अग्नि में हैं ऐमा मंसार के लोग बिना देखे भी प्रमाण जानते हैं
यह बात सब पर विदित है वह भी गुणत्रय तौनों गुण वायु
में हैं अर्थात् वायु सुगन्ध पुष्यादि के योग से सुगन्ध, शीत के योग
से शीतल,और अग्नि के योग से उष्ण हुश्रा करती है। न्यायशास्त्र
में (गन्धवती पृथ्वी, शौतस्पर्शवत्यापः उष्णस्पर्शवत्तेजः) गन्धयुक्त
को पृथ्वी शौतस्पर्शयुक्त को जल और जिस का स्पर्श उष्ण हो उसे
तेज ( जिस का एक भेद अनि है) कहते हैं परन्तु इन तीनों
गुणों का प्रत्यक्ष नाक और त्वगिन्द्रिय से होता है अाँख से नहीं
होता तो भी विना आँख से देखे भी और और इन्द्रियों से
जानने के कारण लोग इन्हे मानते हैं परन्तु ये तीनों पदार्थ
जड़ हैं इन में चेतनता केवल रामरूप परमेश्वर की सत्ता से
पाती है यह आगे के दोहे में कहेंगे। ४३ ॥
इन मह चेतन अमल अल बिलखत तुलसी-दास।
सो पद गुरु-उपदेस सुनि सहज होत परकास ॥४४॥

२.६
तुलसी-सतसई।
तुलसी दास इन मंह अमल अल चेतन बिलखत गुरु-उपदेस
सुनि मो पद सहन परकास होत ।
तुलसी-दास दून में निष्पाप वा निष्कलङ्क सब को भूषित
करनेहारे वा सब-समर्थ चैतन्यरूप परमेश्वर को विशेष कर देखते
वह रामरूप वस्तु सद्गुरु के उपदेश से सहज ही में प्रकाशित
होती है। जिस प्रकार सूर्य और चन्द्र में उष्णता और शौतता
थी उमौ रौत दून पदार्थों में भी पूर्वाक
गुण
परन्तु उन
गों का कारण केवल परमेश्वर हैं।
दूसरे प्रकार से अन्वय और अर्थ ।
दून मँह चेत न बिलखत तुलसी-दास (हन मह) अमल परकास
अल (होत) गुरु-उपदेस सुनि मो पद महज होत ।
पृथ्वी जल तेज बायु प्रादि तत्त्वों में ज्ञान नहीं है और ये
परस्पर (विलखाते हैं ) दूखी होते हैं अर्थात् विरोध करते हैं
अर्थात् जल आग को बुझाता है भाग जल को जलाती है जल
में मट्टी पड़ने से मलिनता आ जाती है अनि पृथ्वी को भस्म कर
डालता है इत्यादि तो भी तुलसीदास कहते हैं कि दून
मल रहित ज्योतिरूप समर्थ (परमेश्वर हैं') गुरु के उपदेश से
वह परमेश्वर रूप वस्तु सहज हो जाती है॥४४॥
में
प्रहि विधि से बर बोध प्रह गुरु-प्रसाद कोउ पाव।
हैं ने अल तिहुँ,काल महतुलसी सहज प्रभाव ॥४५॥

पचम सर्ग। अन्षय। काउ गुरु-प्रसाद हि विधि ते ग्रह बर बोध पाव, तुलसौ ते तिहुँ काल मह महज प्रभाव अल हैं। कोई कोई जन अपने सद्गुरु की दया से इस प्रकार यह सुन्दर जान पाते हैं तुलसौ-दाम कहते हैं कि वे ज्ञानी भूत वर्तमान और भविष्यत् तीनों काल में खाभाविक प्रतापवाले सज्जन और समर्थ बने रहते हैं । ४५॥ काक-सुता-सुत वा सुता मिलत जननि-पितु धाय । आदि -मध्य-अवसान गत चेतन सहज सुभाय ॥४६॥ अन्वय । काक-सुता-सुत वा सुता धाय जननि-पितु मिलत चेतन श्रादि-मध्य-अवसान गत महज सुभाय ॥ कोइल का बच्चा चाहे नर अथवा नारी हो (बड़ा होने पर दौड़ कर अपने माता-पिता में मिल जाता है यही दशा (चेतम) ज्ञानयुक्त जीवों की है। वह (आदि) जन्म (मध्य) बीच के समय और (अवसान) अन्त तीनों कालों में अपने खभाव ही से (चेतन गत) मत्यज्ञानयुक्त परमेश्वर में मिला हुआ है उस को सत्ता से अलग दूस को सत्ता नहीं है। अभिप्राय यह कि जैसे कौवा कोदल के अण्डे को सेता है परन्तु अण्डा फोर कर बच्चा होने और पर जनमने पर कोइल का बच्चाजा कर कोइला में मिल जाता है वैसे ही मच्चिदानन्दमय. परमेश्वर का अंश जौत जब तक इस को ज्ञानरूप पक्ष नहीं होता तब तक माया तुलसी-सतमा के बन्धन में पड़ कर संसार में फसा रहता है। शाम होते ही यह परमेश्वर में जा मिलता है।॥ ४६॥ समता स्वा-रथ-हीन ते होत सु-बिसद बिबेक । तुलसौ प्रह नित हौँ फबै जिनहि अनेक न एक ॥४७॥ अन्वय । खा-रथ-हीन ते समता स-बिमद बिबेक होत। तुलमी यह नित ही फबै जिनहि अनेक न एक । जो जन अपने सुख अर्थात् धन स्त्री श्रादि मांसारिक पदार्थों की इच्छा से हीन हैं उन में ममता अर्थात् शत्रुमित्र श्रादि सब में समान भाव आता है तब निर्मल विचार वा सार प्रसार पदार्थों का जान होता है। तुलसी-दास कहते हैं कि यह बात उन्हीं को मोभती है जिन को अनेक को श्राशा भरोसा नहीं है परन्तु एक परब्रह्म का अबलम्ब रहता है अथवा रामरूप सगुण ब्रह्म हो की आशा रहती है। पहले मनुष्य को मांसारी बासना और मांसारिक पदार्थों को प्रौति त्याग करना चाहिये जब तक विषय को लालमा मन में बनी रहती है तब तक निर्मल ज्ञान नहीं हो सकता। मांसारिक सुखाभिलाष ही जीवों को संसार में बाँध रखता है जब मनुष्य सब की आशा छोड़ एक परमेश्वर के चरण में लगता में ममता और बिबेक पाते हैं ॥४७॥ सब स्वा-अथ स्वा-ऽरथ रटत तुलसी घटत न एक । ग्यान-रहित अग्यान-रत कठिन कु-मन कर टेक॥४८॥ तब उस पक्षम सर्ग। सब लोग खारथौ खारथ रट रहे हैं जिस को देखिये वह धनदारादि को शोच में बिकल है (परन्तु) तुलसी कहते हैं कि एक भी पूरा नहीं होता क्योंकि सांसारिक सुख मगहष्णा के समान है और नश्वर होने के कारण अन्त को दुखदाई ही होता है। यद्यपि पूरी रौत सांसारिक सुख नहीं मिलता तो भी (ज्ञान-रहित अज्ञान-रत कु-मम कर टेक कटिन) बिबेकहीन अबिचार लौन मलौन मन का हठ बहुत कठिन है। मन ऐसा पश्चल है कि विषय सुख को दुखदाई जान कर भी उसी के पौछे दौड़ता रहता है॥४८॥ खा-रथ सो जानहु सदा ना साँ विपति मसाय । तुलसौ गुरु-उपदेस बिनु सो किमु जानेउ जाय ॥४९॥ सदा सा खा-रथ जान जा मे बिपति नमाय तुलसी सो गुरु- उपदेस बिनु किमु जानेउ जाय । सदा उसी वस्तु को खार्थ समझना चाहिये जिस से विपति दुख नाश हो जाय । यदि कहो कि संसार के पुत्र स्त्री आदि सब खार्थ के माधक है तो दून के रहते भी मनुष्य अनेक प्रकार का दुख भोगता है और ये उस के सब दुःखों को निवृत्ति नहीं कर मकते तो किस प्रकार ये खार्थ के माधक हुये ? । मचा खार्थदाता औरामचन्द्र को मानना चाहिये उन के विषय म. तुलसी-दास कहते हैं कि बिना सद्गुरु के उपदेश के किस प्रकार जाना जा सकता 27 २९. तुलसी सतसई। । जब अच्छे गुरु मिलें तब उन के उपदेश से राम पद में प्रीति जनमे जिम से प्रात्यन्तिक दुख की निवृत्ति हो ॥४८॥ कारज स्वा-रथ-हित करै कारन करै न होय । मनवा जख बिसेख ते तुलसी समझ सेाय ॥५०॥ खा-रथ हित कारज करै कारन न करे, मनवा जख बिसेख ते (कारम) होय तुलमी सोय समझा। मंमार के मनुष्य अपनी भलाई और सुख के लिये कार्य को सेवा करते हैं। अच्छे अच्छे मौठे मोठे पदार्थ मिठाई आदि के खाने पौने और अच्छे अच्छे वस्त्र धादि के पहनने प्रोढ़ने का उपाय सब लोग करते हैं परन्तु मिठाई और वस्त्र के कारण जख और रुई को नहीं देखते। तुलसीदास कहते हैं कि वस्त्र और मिठाई के विशेष कारण मनवा (कपाम के पेड़) और ऊख हैं उन को समझो। अभिप्राय यह कि जैसे मिठाई और वस्त्र विना ऊख और सर्दू के नहीं हो सकता वैसे ही ईश्वरभजन और सत्कर्म के विना सुख नहीं हो मकता सो इन दोनों से विमुख रह कर भी लोग सुख चाहते हैं मो किस प्रकार हो सकता है। दृशन्त अलङ्कार स्पष्ट है ॥ ५० ॥ कारन कारज जान तो सब काह परमान। तुलसी कारन कारजो सोते अपर न ान ॥५१॥ कारन कागज परमान तो सब काहू जान, तुलसी सो कारन ते अपर न, कारजोपान न ।

पञ्चम सर्ग। २११ नहीं व । कारण से कार्य होता है इसका प्रमाण तो सब लोग जानते हैं। बिना कारण कभी भी कार्य नहीं होता यह वेद से प्रमाणित है और लोक में भी सब लोग जानते हैं कि जख मिठाई का और मनवा वस्त्र का कारण है। तुलसीदास कहते हैं कि वह कारणरूप तू ही है और दूसरा नहीं है और कार्य भी दूसरा ही है। यद्यपि ऊख और मनवा मिठाई और वस्त्र के कारण हैं परन्तु ये दोनों पदार्थ विना किसान के उपजाये नहीं हो सकते इस कारण दोनों के मुख्य कारण किसान ही हैं। इसी प्रकार सुख दुखरूप कार्य के कारण भी भले बुरे काम हैं जिन के करनेहारे पाप ही हैं तो विचार कर देखने से निश्चय होता है कि सब के कारण करनेहारे मनुष्य ही हैं वे जब भला करते तो सुख और जब बुरा करते तो दुख पाते है। किमी किमौ पुस्तक में "कारज-कार जो मो ते अपर न धाम" पाठ मिलता है। तुलसौ-दास कहते हैं कि कार्य का करनेहारा जो है मो तू ही है और कोई दूसरा नहीं है ॥ ५९ ॥ बिन करता कारज नहीं जानत है सब कोई। गुरु-मुख सवन सुनत नहीं प्राप्ति कवन विधि होइ॥५२॥ सब कोई जानत है बिन करता कारज नहीं सबन गुरु-मुख सुनत नहीं, कवन बिधि प्राप्ति हो । सब लोग जानते हैं कि विमा करनेवाले के कोई काम नहीं

तुलसी-सतसा।
हो सकता अर्थात् जो दुख मनुष्य को होता है उस का करनेवाला
वह श्राप हो है परन्तु यह (गुरु-मुख) गुरु का शब्द (उपदेश) अपने
कानों से नहीं सुनता तो इस के दुख की निवृत्ति और सुख को
उत्पत्ति किस प्रकार हो सकती है। यह जान बूझ कर संसार
को जाल में फसता है। ध्रुव, नारद, प्रसाद श्रादि के समान
ईश्वरागधन नहीं करता तो इसे सुख और मुनि कहाँ से मिल
मके। मुख शब्द का अर्थ यहाँ शब्द है जिस से गुरु का शब्द
अर्थात् उपदेश अर्थ उत्रा ॥ १२ ॥
करता कारन कारज हु तुलसौ गुरु परमान।
खोपत करता मोह-बस ऐसा
अबुध मलान॥ ५३॥
करनेहारा, कारन और कार्य जो किया जाता है तीनों
के उपदेश से प्रमाणित होते हैं अर्थात् गुरु सबों को लखा सकता
है परन्तु (अबुध ऐसा मलान मोह-वस करता लोपत) अज्ञानी ऐसा
मूर्ख और विषयामक है कि भ्रम में पड़ कर कर्ता हो का खोप कर
देता है अर्थात् कर्ता को नहीं मानता परन्तु (अहङ्कारविमूढ़ात्मा
कर्ताहमिति मन्यते) पाप अहङ्कार के वश हो कर अपने ही को
कती मान लेता है इसी से जन्म मरण के महादुख को भोगा
करता है और मुक्ति का भागी नहीं होता ॥ ५३ ॥
अनिल सलिल विधि जोग ते अथा बौचि बहु होय।
करत करावत नहि कछुक करता कारन सोय ॥५४॥

परम सर्ग। जथा अनिल सलिल जोग विधि ते बड़ बीपि होय सोय करता कारन कछुक नहिं करत करावत । जिस प्रकार जल में वायु के योग होने से बहुतेरे तरङ्ग उत्पन्न होते हैं यद्यपि जल और बायु तरङ्ग के करता नहीं हैं और न इन को तरङ्ग उत्पन्न करने को कुछ इच्छा है उसी प्रकार (प्रकृतेः कियमाणानि स्वयं कर्माणि नित्यशः) स्वभाव ही से मदा कार्य उत्पन्न होते हैं परन्तु मनुष्य आप अपने को शुभाशुभ काम का कर्ता मानता है इस कारण उस के भोग में फसा रहता है पुण्य पाप का भागी होता है यदि वह अपने को कर्ता न माने और अपने मन इन्द्रिय को उस से अलग रकबे तो न फसे । कोई कोई टीकाकार इस प्रकार अर्थ करते कि जैसे वायु और जल के योग से पानी में तरङ्ग उठता है वैसे ही मत्मा के प्रभाव से बुरे मनुष्य भी अच्छे अच्छे काम करने लगते हैं यद्यपि माधु जन बुरों से भला काम कराने में निरुद्योग हाँ तो भी। बुद्धिमानों पर श्राप छलक जायगा कि कौन अर्थ बैटता है। यह अर्थ मूल से ठीक ठीक नहीं मिलता ॥ ५४ ॥ छेम-धरन करतार कर तुलसी-पति पर-धाम । सो बरतर ता सम न कोउ सब-बिधि पूरन-काम॥५५॥ करतार कर छम-धरन पर-धाम तुलसौ-पति, ता सम कोउ न सो बरतर सब-विधि पूरन-काम १ कामकरनेहारे जौव के कल्याण को धारन करनेहारे बड़े तुलसौ सतसई। २९४ तेजस्वी तुलसी के स्वामी अर्थात् श्रीरामचन्द्र जी हैं, उन के समान कोई नहीं है वे श्रेष्ठ से भी श्रेष्ठ हैं क्योंकि वे सब प्रकार से मनोरथ के पूर्ण करनेहारे हैं। २ द्वितीयार्थ-भकि पक्ष । अन्वय । तुलसी-पति पर-धाम कर (प्राप्ति) छेम-धरन (शेष पूर्ववत्) श्रीरामचन्द्र के परम धाम की प्राप्ति हो जीव के कल्याण को बढ़ानेवाली है क्योंकि वह सर्वश्रेष्ठ और सब प्रकार से भक जौष की कामना को पूरा करनेवाला है जिस के पाने से और किसी वस्तु के पाने की इच्छा नहीं रहती॥ ५५ ॥ करता कारन सार-पद अव्यय अमल अभेद। करम घटत अपि बढ़त है तुलसौ जानत वेद ॥५६॥ करता कारन अव्यय अमल अभेद पद तुलसी बेद आनत करम घटक अरु बढ़त है। काम का करनेवाला करता और जिस से काम उत्पन्न होता वह कारण ये ही दोनों मुख्य हैं (दून से उत्पन्न कर्म वा कार्य मुख्य नहीं है) और ये दोनों अनश्वर मल-हौन और भेद-रहित है। तुलसी-दास कहते हैं कि वेद जानता है और प्रगट करता है कि कर्म घटता बढ़ता रहता है। कर्म करनेवाला जीव अमर है और शाम के मत से प्रेरक माया प्रकृति कार्यों के कारण को जननी भी अव्यय अमल है। कार्य घटता बढ़ता रहता है। भरिपक्ष में लगाने से ऐसा अर्थ होगा।

पञ्चम सर्ग। २९५ करता और कारण ये दो मुख्य पदार्थ हैं। कर्ता की इच्छा से सत्सङ्गादि कार्य घटते बढ़ते हैं अर्थात् जब साधुओं की अधिक मङ्गति हुई तो भनि विवेक श्रादि कार्य बढ़े जिन के प्रभाव से अव्यय अमल अभेद ज्ञान हुआ और मुक्रि मिली और जो विषयौ आदि बुरों का सङ्ग हुा तो पाप के बढ़ने से पुन्य कर्म घट गया जिस से जन्म मरण श्रादि का दुख (अपि) निश्चयकर उत्पन्न हुआ इस को वेद जानता है॥५६॥ ते खेद-ज जौन प्रकार प्राप करै कोउ नाहि। भयेउ प्रकट हिँ के सुनी, कौन बिलोकत ताहिँ॥५॥ सुनौ जौन प्रकार ते खेद-ज आप प्रकट भयेउ तेहिं के कॉउ करें नाहि ताहि कौन बिलोकत। सुनो जिस प्रकार पसीने से उत्पन्न होनेवाले जीव (ढील लोख चौलर आदि) आप हो से उत्पन्न होते हैं उन को कोई उत्पन्न नहीं करता केवल शरीर का पसौना उन के उत्पन्न होने का कारण है। उन को कौन देखता है ? अर्थात् कोई नहीं देखता है। यह किसी पर विदित नहीं होता कि ये कब जनमे और आप खभाव हौ से वे उत्पन्न हो जाते हैं उसी प्रकार कर्म श्राप ही उत्पन्न होते हैं (प्रकृतेः रुपमाणानि स्वयं कर्माणि नित्यशः अहसार- विमूढ़ात्मा कर्ताहमिति मन्यते ) स्वभाव हो से प्रतिदिन किये जाते कर्म को यह जीव अपना किया समझ कर प्रहार करता तुमसौ-सतसई। और अपने को कर्ता समझता है इसी से शुभाऽशभ कर्म को जाल से नहीं कूटता ।। ५७ ॥ भयौ बिखमता कर्म मह समता किये न होय । तुलसौ समता समुझ कर सकल मान मद धाय ॥५८॥ अन्वय । कर्म मह बिखमता भयो किये समता न होय मकल माम मद धोय समुझ समता कर। जौवों के कर्म में (व्यभिचार लोभ क्रोध आदि के कारण) विरोध पड़ गया है अर्थात् कुकर्म जीवों से बन पड़ा है फिर उस को शुद्ध बनाना चाहते हैं मो शौघ्र नहीं सुधरता है। तुलसी-दाम कहते हैं कि विषमता के बीज अहङ्कार और मत्तता कामादि से मोहित होने को छोड़ कर और ज्ञान को बढ़ा कर सब जीवों में ममता करो। सब जीवों को अपने ममान समझ कर किसी पर क्रोध किमी के धन का लोभ न करो तो भला होगा ॥५८ ॥ सम-हित सहित समस्त जग सुहिद जानु सब काहु। तुलसी यह मत धारु उर दिन प्रति अति सुख लाहु॥ ५९॥ अन्वय । ममस्त जग सब काड सम-हित महित सुद्रिद जानु यह मत उर धार तुलसी प्रतिदिन प्रति सुख लाहु। संसार में के सब लोगों को समान भलाई के साथ अपना मित्र समझो चौर किसी से प्रत्रुता न करो यह सिद्धान्त अपने पदय पञ्चम सर्ग २१० में धारण करो तो तुलसी-दास कहते हैं कि सब दिन अत्यन्त धामन्द का लाभ होता है। संसार में अपने शत्रु से सब लोग दुख पाते हैं जब तेरा कोई अत्रु हौ न रहा तो तुझे क्योंकर दुःख हो सकता है। "मिया राममय सब जग जानौं” सब मंसार के लोगों को मौताराम समान जान कर सब से प्रेम करो जिस से सदा सुखी रहो ॥ ५ ॥ यह मन महँ निश्चय धरहु है कोउ अपर न आन। का सन करत बिरोध हठि तुलसी समुझ प्रमान ॥६॥ अन्वय । मन महं यह निश्चय धरा पान कोउ अपर न है तुलमी प्रमान समुझ इठि का मन बिरोध करत । अपने मन में यह निश्चय रकबो और कोई लोग दूसरे महीं हैं (अब सब संमार राममय है तो दूसरा कोई कहाँ से आवेगा) तुलसी-दास के कहने को प्रमाण मानो। हठ कर के किस के साथ विरोध करता है सब तेरे मित्र ही हैं। सब तेरे मित्र हैं इस कारण किसी के साथ बिरोध उचित नहीं है। यदि किसी से बैर न करेगा तो कोई तेरा शत्रु न बनेगा। तेरौ हौ करनी से पत्रु होते हैं। समता और मित्रता तेरा मुख्य कर्तव्य है ॥ १० ॥ । । महिजल अनल मा अनिल नभ तहाँ प्रगट तब रूप। जानि जाय बर बोध ते अति सुभ अमल अनूप ॥६॥ 28 २१ तुलसी-सतसई। अन्वय । तव सौ रूप (जहाँ) महि जल अनल अनिस नम नहाँ प्रगट, अमल अनूप अति सुभ (मो) बर बोध तें जानि जाय। तेरा वह रूप जहाँ पृथ्वी जल बायु अग्नि और आकाश हैं वहाँ प्रत्यक्ष ही है। इन पाँचौँ तत्त्वों से यह संसार बना है और तेरा जरौर भी इन्हीं से बना है तो दोनों पदार्थ एक ही हैं उन्नी पञ्च तत्वों से रचित शरीर में जिन से समस्त ब्रह्माण्ड बना है तेरा जीवात्मा बास करता है। यह जीवात्मा परमात्मा का अंग होने के कारण निष्पाप वा निर्लेप निरुपम और परम कल्याणरूप और सुन्दर ज्ञान से जाना जाता है। ब्रह्मज्ञान होने पर सब मायाकृत भेद मष्ट हो जाता है तब समदृष्टि होती है और सब प्रकार का विरोध दूर हो जाता है। विति जल पावक गगन समौरा । पञ्च रचित यह अधम मरौरा। ईश्वर अन्म जीव अविनामी। मत चेतन घन श्रानन्दरामी॥ मो मायावस भयो गोसाई। वर्थों कौर मर्कट की नाई॥ इत्यादि चौपाइयों से रामायण में यह विषय वर्णित है ॥६१॥ मी पै आकस्मात ते उपजै बुद्धि बिसाल । ना तो अति छल हीन व गुरु-सेवन कछु काल॥६२॥ अन्वय। पै जो बिसाल बुद्धि पाकस्मात ते उपजे ना तो का काल अति छल हौन है गुरुसेवन (ते उपजे)। अब जो पहले दोहे में कह चुके हैं कि "बर बोध ते जान पड़ें को बोध होने का उपाय कहते । परन्तु यदि वह बड़ी बुद्धि

परम सर्ग।
भगवत् छपा से श्राप से आप हो जाय तो बहुत उत्तम है नहीं तो
कुछ समय तक सब प्रकार के कपट से हौन हो कर गुरु की सेवा
करने से अवश्य ज्ञान हो सकता है।
अकस्मात् ज्ञान होना परमेश्वर की दया वा पर्व जन्म के संस्कार
से सम्भव हो सकता है॥६२॥
कारज जुग जानहु हिये नित्य अनित्य समान।
गुरु-गम ते देखत सु-जन कह तुलसी परमान ॥६॥
अन्वय । हिये समान नित्य अनित्य जुग कारज जानड, तुलसी
परमान कह सु-जन गुरु-गम तें देखत ।
अब जिन के बोध से कल्याण होता है उन का वर्णन करते हैं।
अपने मन में नित्य अनित्य दोनों कामों को एक मा जानो अर्थात्
जब तक मत् असत् का पहिचान न हो तब तक अज्ञानी के लिये
दोनों समान है। कभी कभी भ्रम में पड़ कर लोग सत्य को
असत्य और असत्य को सत्य जान उसौ की सेवा करते हैं। संसार
में स्त्री पुत्र धन धाम विषयसुख पुरुष को बाँध रखनेवाले हैं
उन्ही को लोग हित समझते हैं और सब को समान समझना
परोपकार सत्सङ्ग माधुसेवा ईश्वरभक्ति जो परम उपकारी वस्तु हैं
उन्ही में लोगों का कम अनुराग होता है। तुलसी दास प्रमान
के साथ कहते हैं कि सज्जन लोग गुरु की दी हुयी ज्ञानदृष्टि
से देखते है ॥१५॥

तुलसौ-सतसई। महि मयक प्रह-नाथ को आदि ज्ञान भव भेद । ता बिधि तेई जौब कह होत समुझ बिनु खेद ॥६॥ अन्वय । प्रह-नाथ मयत महि त्रादि ज्ञान भेद भव । तेई जीव कह समुझ बिनु ता बिधि खेद होत । सूर्य उदय के पहले पृथ्वी पर के सब पदार्थ अन्धकार में एक से जान पड़ते हैं परन्तु सूर्य और चन्द्रमा के उदय होने पर पृथ्वी अादि पदार्थों के ज्ञान का भेद होता है अर्थात् यह भूमि है यह जल और यह पर्वत है इत्यादि भिन्न भिन्न प्रकार का ज्ञान होता है। उसी प्रकार अविनाशी ब्रह्म के अंश दूस जीव को ज्ञान के विना दुःख होता है। जब तक अज्ञानरूपी अन्धकार से इस का मन ढका रहता है दूसे सत्य असत्य नहीं जान पड़ते परन्तु जब ज्ञानरूपी नेत्र खुल जाता है तो सुखदायक और दुखदायक पदार्थ देख पड़ते हैं । जब तक इसे ठीक ठीक ज्ञान नहीं होता इस के दुख की प्रात्यन्तिक निवृत्ति (मोक्ष) नहीं होती (सते ज्ञानान्न मुनिः) ॥ ६४ ॥ परो फेर निज करम मह भ्रम भव को प्रह हेत। तुलसी कहत सु-जन सुनहु चेतन समुझ अचेत ॥६५॥ अन्वय । निज करम मह फेर परो भव भ्रम को प्रह हेत। तुलसी कहत (हे) सु-जन सुनह चेतन अचेत समझ । अपने ही किये कर्म में भेद पड़ गया है यही जन्म पाने और पञ्चम सर्ग। २२१ भ्रम होने का कारण हुआ। तुलसीदास कहते हैं कि हे सत्पुरुषो ! सुनिये (अपने कर्म के हेरफेर हो जाने के कारण) चेतन बुद्धिमान जन भी अचेतन अज्ञानी समझे जाते हैं। शुभ अशुभ दोनों प्रकार के कर्म पुरुष को संसार में बांधनेवाले होते हैं। कभी कभी शुभ कर्म करने में अशुभ और अशुभ करते समय भी शुभ कर्म हो जाते हैं जैसे राजा नग ने एक गौ दो ब्राह्मण को संकल्प दौ। अजामिल ने अपने पुत्र में ममता मोह के कारण उसे नारायण कह पुकार मुक्ति पायो। दूस कारण दोनों कर्मों को छोड़ हरिभकि सत्मङ्गति श्रादि करना उचित है ।। ६५ ॥ नाम-कार दूखन नही तुलसौ किये बिचार । करमन को घटना समुभि ऐसे बरन उचार॥६६॥ अन्वय । नाम-कार दूखन (परन्तु) तुलसी ऐसे विचार करमन की घटना समुझि बरण उचार (किये दूषन) नहीं । केवल नाम के लिये अहवार के साथ जो जो कर्म किये जाते है वे दोषकारी होते है। परन्तु तुलमी-दास ऐसा बिचारते है कि कर्म की भवितव्यता समझ कर जो (काम करते) और वाक्य उचारण करते हैं उन का कर्म वा और वाक्य दूषणकारी नहीं होता। जैसे राजा दशरथ ने कर्म की घटना को विना सोचे विचारे कैकेयी को बर-दान दिया पीछे से पछतावा किया और दुःख पाया। यदि पहले से सोच विचार के वाक्य उच्चारण किये होते तो कभी भी दुःख भोगना न पड़ता।

२१२ तुलसौ सतसई। दूसरे प्रकार अषय और अर्थ। करमन को घटना समुभि ऐसे बरन नाम उचार किये (कि) तुलसी बिचारे दूखनकार नहीं । सब के अपने अपने कर्म का होना समझ कर इस प्रकार उनके (नाम के) वर्णों का उच्चारण किया गया है कि तुलसी-दाम के विचार में नाम रखमेवाले का कुछ दोष नहीं हो सकता। जैसे सूर्य के नाम "दिवाकर और 'तिग्मरमि” इस कारण रखे कि सन के उगने से दिन होता है और उन की किरणें बड़ी तीखी हैं। चन्द्रमा के नाम “निशाकर हिमकर" इस कारण रकले गये कि उन के उदय से रात को शोभा होती और उन की किरणें ठण्डी हैं इत्यादि। जिस प्रकार का दून का कर्म देखा गया उमी प्रकार का नाम रखा गया तो इस में कोई बात दूषण को नहीं है। अभिप्राय यह कि यद्यपि सूर्य और चन्द्रमा दोनों तेजरूप हैं परन्तु गुण के अनुसार उन के नाम भिन्न र इये हैं ॥६६॥ सु-जन कु-जन महि-गत जथा तथा भानु ससि माहि। तुलसी जानत हो सुखी होत समुझ बिन नाहि ॥६॥ अन्वय । (जथा) भानु ममि माँहि तथा महि-गत सु-जम कु-जन । तुलसौ जानत हौ (सु-जम) सुखी होत (परन्तु) समुभ दिन नाहि (सुखौ) होत। जैसे जब सूर्य चन्द्रमा में मिलते हैं तो चन्द्रमा की कला पचम सर्ग। २२१ कोण हो जाती है वैसे ही पृथ्वी पर जब माधु जन और दुष्ट एकत्र होते हैं तो साधु जन को माधुता को विनाश कर उन्हे दुखौ करते हैं । तुलसौ-दास कहते हैं कि ज्यों ही साधु जन दुष्ट को पहचान लेते हैं और उन का मङ्ग छोड़ देते हैं वैसे ही सुखी होने लगते हैं परन्तु जब तक उन्हें नहीं पहचानते तब तक उन के मङ्ग से दुःखी बने रहते हैं। यहाँ सूर्य के मङ्ग के लौण होने हो भर का दृष्टान्त दिया है और उतने ही अंश में सादृग्य है इस से कवि ने सूर्य को निन्दा को यह अभिप्राय नहीं निकलता है। अमावास्या को चन्द्रमा सूर्य्य एकत्र होते हैं द्वितीया से ज्यों ज्यों अलग अलग होते हैं त्यों त्यों उन को कला बढ़ती है॥६॥ से चन्द्रमा मातु*-तात भव-रौति जिमि तिमि तुलसी गति तोरि। मातु न तात न जानु तब है तेहि समुझ बहोरि ॥६॥ अन्वय । जिमि मातु-तात भव-रौति तिमि तोरि गति। तुलसी मातु न बहोरि तात न तब समझ है। जिस प्रकार माता पिता के जनमने को रीत है अर्थात् जैसे तेरे माता पिता अपने अपने माता पिता के रजबीज से उत्पन्न अये थे वैसे ही अपने उत्पन्न होने को रीत को भी जाने। अर्थात् न माना पिता वा न देवा न लोका न वेदा न यशा न नौ जुवति । गुप्तौ निग्लानिशन्यात्मकत्वात्तदेकोऽवशिष्टः शिवः केवलोऽहम् ? पौभगवराचार्यकननिर्गणदशकम् । .

२२8
तुलसी-सतसई।
माता के उदर में पिता के अंश के जाने से शुक्रोणित के मेल से
जैसे सन्तान होता है मो जैसे अपने मा-बाप से भिन्न नहीं है क्यों
कि "प्रात्मैव जायते” श्राप ही पुरुष पुत्र हो कर उत्पन्न होता
है उसी प्रकार (हे जौव!) तेरो भो उत्पत्ति ब्रह्म और माया के
योग से होती है। वू ईश्वर का अंश है माया के वश हो कर
अपने को स्वतन्त्र समझता है दमौ से संसार में बाँधा है।
तुलसौ-दास कहते हैं कि तेरी मा कोई नहौँ पुनः तेरा पिता
भी नहीं केवल तेरा ज्ञान हो जो कुछ है मो है। जब तुझे
आत्मज्ञान होगा तो माता पिता सब छूट जायँगे व मचिदानन्दरूप
हो जायगा ॥ ६८॥
सरब सकल ते है सदा बिसलेखित सब ठौर ।
तुलसौ जानहिँ मुहिद र ते अति मति सिर मार॥६॥
अन्वय । तै सरब (है) सदा सब ठौर (है) सकल बिमलेखित
है तुलसी ए सुहिद जानहि ते अति मति मिर मौर।
सवरूप है सर्बदा सब स्थानों में व्याप्त रहता है और सब से
अलग भी है। तुलमो-दास कहते हैं कि विद्वान इस बात को
जानते हैं वे अति बुद्धिमानों में भी श्रेष्ठ हैं।
जो सब ठौर है वह सब से अलग कयाँ कर हो सकता है इस में
विरोधाभास अलङ्कार हुश्रा ॥६॥
अलङ्कार घटना कनक रूप नाम गुन तीन ।
तुलसौ राम-प्रसाद ते परखहिँ परम प्रबीन ॥७॥

पथम सर्ग। । २२५ जपर के दोहाँ में परमात्मा के अंश जीवात्मा का सब स्थान में ध्याप्त रह कर भी सब से अलग होना कहा था उमौ अर्थ को अब दृष्टान्त दे कर प्रमाणित करते है। अन्वय । कनक अलकार घटमा तीन नाम रूप गुन । तुलसी परम प्रवीन राम प्रसाद ते परखहिं॥ सोने से अलङ्कारों की रचना होती है उन के तीन नाम रूप और गुण होते हैं परन्तु मोना एक ही है और सब अलद्वारों में व्याप्त है। करन कुण्डल और विजायठ तौन गहने एक ही मोने से बनाविये तो तीनों के नाम रूप और गुण (अर्थात् कान हाथ को शोभित कुण्डल कान को और विजायठ बांह को भूषित करता है) भिन्न र हुए परन्तु मोना सब में एक ही है। उसी प्रकार सत्त्व रज तम तीनों गुण और भूमि जल तेज वायु और आकाश दून पाँचों भूतों से यह मंमार और संसारी सब पदार्थ बने हैं, मब में प्रात्म-तत्त्व एक ही है परन्तु पदार्थ भिन्न नाम से पुकारे जाते हैं। तुलसी-दाम कहते हैं कि यह बात बड़े ज्ञानी लोग राम चन्द्र कौ दया से जानते हैं। एक पदारथ बिबिध गुन सङ्ग्या अगम अपार । तुलसी सु-गुरु प्रसाद नैं पाये पद निरधार ॥ ७ ॥ अन्वय । एक पदारथ गुन विविध प्रगम अपार मया तुलसी सु-गुरु प्रसाद ने निरधार पद पाये। मोना एक ही वस्तु है परन्तु उस के गुण अनेक हैं और नाम इतने अधिक है कि जिस को न कोई जान सके न गन सके। 29 २२ तुलसी-सतसई। अभिप्राय यह कि एक हौ मोना है जिस को अनेक प्रकार की औषधियाँ बनती है जिस के अमय गुण होते हैं। भूषण आदि से शोभा दानादि से पुण्य भक्षणादि से पुष्टि होती है। सोने की मुद्राओं चौर भूषणों के नाम इतने अधिक हैं जिन को गिन कर कोई पार नहीं पा सकता है। उसी प्रकार एक ही प्रात्मा है जिस के अंश से चौराषौ लाख जौवाँ की सृष्टि हुई है। तुलसी-दास कहते हैं कि उत्तम गुरु की दया से निश्चयात्मक बस्तु अर्थात् परमात्मा को पाते हैं। गुरु कृपा कर ज्ञान देखें तो परमात्मा का पहचान होवे॥७॥ गन्धन मूल उपाधि बहु भूखन तन गन जान । सोभा गुन तुलसी कहहिँ समुझाह सुमति-निधान॥७२॥ अन्वय । मूल गन्धन, तन भूखन गन बहु उपाधि जान तुलसी गुन सोभा कहहि सुमति-निधाम ममुझहि ॥ एक मल कारण केवल (गन्धन) मोना है शरीर के अनेक प्रकार के भूषणों के समूह जो सोने से बनते हैं उन्हें उपाधि जानना चाहिये। तुलसौ-दाम कहते हैं कि इन का गुण शोभा का बढ़ाना है और बस्तु सब में एक ही है। इस बात को बुद्धिमान लोग समभाते हैं। जिस प्रकार सब भूषणों को जड़ केवल एक सोना है उसी प्रकार मय पदार्थों का मल केवल एक परमात्मा है। जिस प्रकार मोने से चाहे जितने प्रकार के भूषन बनात्रो परन्तु मोना सब में एक ही है सब कापाकार भिन्न हो गया है, उसी प्रकार सोनारूप प्रात्मा सब में एक है। मंसारी पदार्थ चाहे जितने प्रकार के हाँ एक प्रात्मताल सब में है।

पचम सर्ग।
२१.
गुन गन घटित
जो बात अपर कह पके हैं उसी को दृढ़ करने के लिये इस
दोहे में फिर कहा ॥ ७९ ॥
मैसो जहाँ उपाधि तह घटित पदारथ रूप ।
सो वहाँ प्रभास मन गुन गन सुमति अनूप ॥७३॥
अन्वय । जहाँ जैसो उपाधि तह तेसो पदारथ रूप प्रभास (तथा)
अनूप
सुमति मन (गुन)॥
जहाँ पदार्थ में जिस प्रकार की उपाधि लगाई जाती है वहाँ वैसा ही
उस पदार्थ का रूप शोभा और गुण बन जाता है। जिन सज्जनों
के उपमा रहित सुबुद्धि है उन के मन दूस को जानते हैं ।
जिस प्रकार उपाधि के अनुसार मोने के रूप गुन श्रादि बदल जाते
हैं वैसे ही आत्मा की जैसी उपाधि हुई वहाँ वैसा ही देव मनुष्य
पशु आदि रूप और तदनुसारौ गन हो जाते है और उन की शोभा
भौ अपनी उपाधि के समान होती है। मोने के भूषणों में जैसे मैल
लगने से उस को शोभा बिगड़ जाती है उमौ रौत पापरूप मैल
प्रात्मा के सद्गुण को नष्ट कर देती है। अग्नि मंयोग से धातु की मैन
जल जाती है वैसे ही ज्ञानानि वा भक्रि के द्वारा प्रात्मा का मल ना
हो जाता है। इस बात को सत्मङ्ग और राम को दया से बुद्धिमान
लोग भली भाँत समझते हैं। इस दोहे में भी पूर्व कथित अर्थ को
दृढ़ किया है।०३ ॥
भानु बस्तु अस्थिर सदा मिटत मिटाये नाहि।
रूप नाम प्रगटत दुरत समुझि बिलोकहु ताहि॥७४॥

तुलसी सससई। अन्वय । बस्तु सदा अस्थिर जानु मिटाये नाहि मिटत रूप नाम दुरत प्रगटत ताहि समुझि बिलोकहु ॥ मोना सदृश आत्मारूप बस्तु सर्वदा स्थिर एकरूप एकरस रहती है ऐसा जानिये। उस का नाश करने से भी वह नष्ट नहीं होती, केवल जब २ उस का रूप बदलता है तो दूसरा नाम पड़ जाता है इस से रूप और नाम बार २ नर होते और फिर प्रगटते हैं दून को भली भाँत समझ कर देखो। वस्तुओं का प्राकार मात्र बदल जाता है परन्तु पात्मतल सब में एक है। यह बात सोने के उदाहरण से सिद्ध कर दिखलाया है।०४॥ पेखि रूप सङ्ग्या कहब गुन सु-बिबेक बिचार। इतनाई उपदेस बर तुलसी किये बिचार ॥ ७५ ॥ अन्वय । रूप पेखि (तथा) सु-बिबेक गुन बिचारि मया कहब। घर बिचार तुलसी इतनोई उपदेश किये। खरूप को देख कर और अच्छे विचार से गुन को मोच कर नाम रखना चाहिये। उत्तम बिबेक तुलसौ-दाम वा सुन्दर बिबेक युक्त इतने हौ उपदेश को तुलसी-दास-जी ने किया है। अभिप्राय यह कि बिना सोचे विचारे अपना इष्टदेव कर लेना अच्छा नहीं होता। गुण श्रादि सब मोच विचार के अपना इष्टदेव बना के तब देवताओं की सेवा करनी चाहिये। योगी लोग जिसका ध्यान करते हैं उस मनोहर-रूप-वाले प्रभु को राम, मेघ के समान शाम-वर्ण भक सुखदाई प्रभु को घनश्याम, फरसा धारण करनेवाले पषम सग २२६ । को परशराम, इस धारण करनेवाले को हलधर इत्यादि रूप के अनुसार संज्ञा के उदाहरण है। मछली के आकारवाले अवतार का नाम मत्स्य, कछुये के समान का कच्छप, शकर के तुल्य का बराह, मनुष्य और सिंह के सदृश रूप नृसिंह, और अति छोटे रूप के कारण बावन इत्यादि रूप को देख कर परमेश्वर के लोलावतारों के नाम हैं पूजा करने योग्य मूर्तियों के पाँच भेद हैं अर्थात् १ आप से प्राप प्रगटे जैसे औरङ्ग पानाभ शङ्कर श्रादि,२ देवताओं के स्थापित यथा जगन्नाथ ब्रह्मेश्वर बुधेश्वर ध्रुवेश्वर श्रादि, ३ सिद्धों के स्थापित पन्हरी- नाथ गोरख-नाथ श्रादि, ४ मनुष्यों के स्थापित नगर और ग्राम में बहुतेरे पाये जाते हैं, और धूवाँ स्वयं प्रतिष्ठित जैसे शालिग्रामादि जानना चाहिये। रूपों के भेद को आगे के दोहे में कहेंगे ॥ ७५ ॥ सदा स-गुन सौता-रमन सुख-सागर बल-धाम । जन तुलसी परखे परम पाये पद बिस्राम ॥ ७६ ॥ अन्वय । तुलसी-(जो) जन सदा सुख-सागर सगुन बल-धाम मौता- रमन परखे परम पद बिस्राम पाये। तुलसी-दास कहते हैं कि जिस मनुष्य ने सदा सच्चिदानन्द मूर्ति सगुण ब्रह्मखरूप बल के मौता के पति श्रीरामचन्द्र को पहचाना उस ने सब से उत्तम बस्तु मोक्ष को पाया क्योंकि सौन्दर्य, माधुर्य, सुकुमारता, खच्छता, पद्धता, उज्ज्वलता, प्रसन्नता, सुखमा, वात्सल्य, मधुरता, गाम्भीर्य, भक्तवत्सलता आदि गुण सब श्रीरामचन्द्र में थे।

तुलसौ सताई। महर्षी वाल्मिकि जी ने अपनी रामायण में रामचन्द्र जी का अपूर्व वर्णन किया है ॥ ७ ॥ स-गुन पदारथ एक नित निरगुन अमित उपाधि । तुलसी कहहि बिसेख तें समुझ सु-गति सुठि साधि ॥७७॥ अन्वय । स-गुण पदारथ नित एक उपाधि 'निरगुन अमित उपाधि (युक्त) तुलसी विसेख कहहि सुठि सु-गति माधि समुझ ॥ सुन्दरता, क्षमा, दया, सुशीलता श्रादि गुणों से युक्त अर्थ धर्म काम मोक्ष सब के देनेहारे सगुन (पदार्थ) परमेश्वर श्रीरामचन्द्र हैं (उन के पाने के लिये) सदा एक ( उपाधि) धर्म को चिन्ता करनी होती है अर्थात् शरणगत हो कर सेवा करना परन्तु रूप गुण श्रादि से रहित पर-ब्रह्म असंख्य उपाधि बाधाओं से युक्त हैं उन के पाने के लिये सूखे ज्ञान को प्राप्त करने में अत्यन्त परिश्रम और * इक्ष्वाकुवंशप्रभवो रामो माम जनैः श्रुतः । नियतात्मा महावीर्यो दितिमान् तिमान् वशी।१। बुद्धिमानीतिमान् वाग्मौ श्रीमान्छचुनिवईणः । विपुलांसो महावाडः कम्बुग्रीवो महानुः ॥२॥ महोरको महेवासो गूजन्तुररिन्दमः । बाणानुवाजा सशिरा सललाटः सविक्रमः ।। समः समविभक्ता सिग्धवर्यः प्रतापवान् । সীনৰ ৰিকাৰী অৰীৰা স্বাৱষঃ ৪। (इत्यादि वालिकोये रामायणे।)

पथम सर्ग। असंख्य विन्न होते है। इस लिये तुलसी-दाम सगुन ब्रह्मा रामचन्द्र को मिर्गुण से (विसेख ) सुखदाई कहते हैं इस कारण (समुझि) बिचार कर के (सुठि सुगति माधि) सुन्दर सुगति को साधो अर्थात् उत्तम बति पाने के लिये रामचन्द्र को पाराधना करो। इस में मुगुम ब्रह्मा औरामचन्द्र की भक्ति को ज्ञान से अधिक सुलभता दिखाई है ॥२७॥ यथा एक मह बेद गुन ता मह को कहु नाहि । तुलसौ बरतत सकल है समुझत कोउ कोउ ताहि॥७॥ अन्षय । यथा एक मह बेद उन कता मँह को नाहि तुलसी वरतत मकल है ( परन्तु ) ताहि कोउ कोउ समुझत। जिस प्रकार एक रामरूप परमेश्वर में चार गुण हैं। ग्रन्थकार प्रश्न करते हैं कि कहो उन चारो गुणों में कौन नहौँ हैं? अर्थात् सभी पर अचर जीव उन चारो के भीतर जाते हैं और सब इन्हीं में वर्तमान भी हैं अर्थात् सृष्टि पालन इन्ही के द्वारा होता है परन्तु इस के समझनेवाले विरले लोग हैं बहुत कम लोग समझते हैं। संस्कृत ग्रन्थों में इन गुणों का बहुत प्रकार से वर्णन किया है। 'भगवत्-गुण-दर्पण' नाम ग्रन्थ में पहले, ज्ञान, शनि, बल, ऐश्वर्य,वौर्य, * श्रेयः श्रितं भक्तिमुदस्य ते विभो! किश्यन्ति ये केवलवोधलब्धये । तेषामसौ सेशलवैव शिष्यते मान्यद्यथा स्थूलतुषावघातिनाम् । (श्रीमहागवतम् ) २३२ तुलसौ-सवसई। और तेज ये छ गुण संसार के पालन श्रादि के उपयोगी हैं। दूसरे, मत्यता, ज्ञानिता, अनन्तता, एकता, व्यापकता, निर्मलता, स्वतन्त्रता, आनन्दिता श्रादि भजन के उपयोगी गुण हैं। तीसरे, दया, कृपा, अनुकम्पा, अनृशंसता, वात्सल्य, सौधौल्य, सौलभ्य, कारुण्य, क्षमा, गाम्भौर्य, औदार्य, स्थैर्य, धैर्य, चातुर्य, कृतित्व, कृतज्ञत्व, पार्द्रता, जुता, सुहदता आदि गुण भगवान के सेवकों के लिये उपकारी हैं। चौथे, सुन्दरता, मधुरता, सुगन्धता, सुकुमारता, उज्ज्वलता, लावण्य, तारुण्य श्रादि शरीर के गुण हैं। इस प्रकार रामरूप भगवान के (बेद) चार प्रकार के गुण शास्त्रों में वर्णित हैं। संसार को उत्पत्ति, पालन, नाश आदि सब उन्ही गुणों से होते हैं इस से सब इन्ही में हैं और इन्ही को वरतते हैं ॥८॥ तुलसौ जानत साधु जन उदय-अस्त-गत भेद । बिन जाने कैसे मिटै बिबिध जनन मन-खेद ॥ ७९ ॥ अन्वय । साधु जन उदय-अस्त-गत भेद जामत, तुलसौ बिन जाने विविध जनन मन-खेद कैसे मिटे॥ हरिभक साधु लोग उदय से ले कर अस्त पर्यन्त मारी पृथ्वी का भेद जानते हैं। तुलसौ-दाम कहते है कि बिना जाने अनेक मनुष्यों के मनों का दुख किस प्रकार दूर हो सकता है। अभिप्राय यह कि जगत् कोई मत्य पदार्थ नहीं केवल माया को शक्ति से सत्य मा प्रतीत होता है इस बात को ज्ञानी माधुजन जानते हैं। विषयौ संसारी,जौव जब तक उसे ब्रह्मज्ञान न हो नहीं जान पचम सर्ग। सकता इसी कारण वह सुख दुख का भागी होता है। पूरा ज्ञान होने पर उसे भी इस जगत को चार दिन को चान्दनौ ज्ञात हो जायगौ तब वह दुखहीन हो जायगा ॥ ७ ॥ सन्सय सेोक स-मूल रुज देत अमित दुख ताहि । अहि अनुगत सपने बिबिध जाइ पराय नजाहि॥८॥ अन्वय । सन्मय समूल सोक रुज ताहि अमित दुख देत । जाहि सपने बिबिध अहि अनुगत पराय न जाद॥ ऊपर के दोहे में कही बात को अब दृष्टान्त दे कर स्पष्ट करते हैं। भ्रमरूप कारण से दृढ़ हो कर दुखरूपी रोग उसे अनन्त क्लेश दे रहा है जैसे किसी के पौछे सपने में अनेक साँप लगे हाँ और उस से भागा न जाय, अर्थात् उन के घेरे में पर कर वह बिचारा अत्यन्त दुखी हो। अभिप्राय यह कि सपने के माँप और उन से दुख पाना सब मिथ्या हो है परन्तु सपना देखनेवाले को उन से मचा क्लेश होता है उभौ प्रकार इस संमार के विषय सब झूठे हैं और उन के द्वारा विषयी लोगों को जो सुख होता है मो भी झठा है क्योंकि अन्त को उन दुख ही मिलता है॥८॥ तुलसौ साँचो साँप है जब लगि खुले न नैन । सो तब लगि जब लगि नहीं सुनै सु-गुरु-बर-बैन॥८॥ 30 तुलसी-सतसई। अन्वय । जब लगि मैन न खुले (तब लगि ) माँचो माँप है मो तब लगि जब लगि सु-गुरु-पर-बैन नहीं सुने ।। खप्न में जब तक आँखे न खुल तब तक साँप सच्चे से जान पड़ते हैं और ज्ञानरूपी श्राखों का खुलना तब तक नहीं हो सकता जब तक अच्छे-गुरु के सुन्दर वाक्यों को न सुनें । जब तक आखें न खुल खप्नका दुख नहीं होता और खप्न देखनेहारा महादुख में पड़ा ही रहता है जब कोई उसे जगा देता है और उस की आँख खुल जाती हैं उस का क्लेश सब भूठा और व्यर्थ जान पड़ता है उसी प्रकार जगानेहारा गुरु जब ज्ञानरूपी नेत्र खोल देता है तो यह जगत सपने को सम्पत मा किसी प्रकार दूर जान पड़ता ॥ ८१ ॥ पूरन परमा-रथ दरस परस न जौ लगि बास । तो लगि खनन,उघात नर जौलगिजल न प्रगासा८२॥ अन्वय । जौ लगि पास परसत (तौ लगि) पूरन परमा-रथ दरम न जौ लगि जल न प्रगास (तौ लगि) नर खन न अघात । जब तक जीव को विषय सुख की प्राशा स्पर्श करती है अर्थात् जौवों के मनसे विषय का अभिलाष भलीभाँत नष्ट नहीं हो जाता तब तक पूरी मुक्ति का दर्शन नहीं होता। जब तक विषय को प्राश तब तक संसार को फाँस । इम में दृष्टान्त देते हैं कि जब तक जल म प्रगटे तब तक मनुष्य एक क्षण भी बात नहीं होता संसार के खेतो- पथम सर्ग। २१५ करनेहारे देखा करते हैं कि कप जल बरसता है जब तक नल नहीं होता उनके मन को श्रानन्द दहीँ मिलता परन्तु जल पड़ते हो बे अानन्द से भर जाते हैं वही दशा संसारी जीव की है कि विषय सुख को त्राशा मिटते हो उन के मन में ज्ञान उपजता है। किसौ किमी पुस्तकों में "तौ लगि खन उप्यान नर" किसी में "खरज उघान नर" पाठ है। उप्यान शब्द का अर्थ जो सुखना करें तो वह असङ्गत मा जान पड़ता है क्योंकि श्रोप्याय धातु संस्कृत भाषा में बढ़ती वा परिपूर्णता का अर्थ देता है इस कारण "उघान" को अघान का अपभ्रंश मान कर अघाना अर्थ किया गया है। यदि "तौ लगि खन नर न उद्यान" अन्वय की जिये तो पहले पाठ का अर्थ “तब तक एक क्षण भी मनुष्य नहीं बढ़ता वा हप्त होता" होगा। इस प्रकार दोनो पाठ ठीक हो सकते हैं । तब लगि हम ते सब बड़ा जौ लगि है कछु चाह । चाह-रहित कह को अधिक पाय परम-पद थाह॥३॥ अन्धय । जब लगि कछु चाह है तब लगि हम ने सब बड़ो, चाह-रहित कह को अधिक ( तिन ) परम-पद थाह पाये। जब तक मनुष्य के मन में किसी वस्तु की इच्छा बनी है तब तक हो ( उसे समझना चाहिये) कि हम से सब लोग बड़े हैं क्योंकि पाशा-हीन के निकट कौन बड़ा है ? अर्थात् कोई भी बड़ा नहीं है। जिस ने पाशा छोड़ी उस ने परम पद मुकि का थाह (पता) तुलसी सतसई। पथा। श्राशा ही दुखदाई वन्धन है जिस ने सब प्रकार की प्रामा त्यागौ वह सुखी हा ॥३॥ कारन करता है अचल अपि अनादि अज-रूप । तात कारज बिपुल-तर तुलसौ अमल अनूप॥८४ ॥ अन्वय । कारन करता अपि अचल अनादि अज-रूप है तुलसी अमल अनूप तातें बिपुल-तर कारज । जिस से कार्य उत्पन्न होता है वह कारण और कार्य करनेवाला जीव भी दोनों स्थिर अनादि और जन्म-हौन हैं तुलसौ-दास कहते हैं कि मल-हीन उपमा रहित अर्थात् निर्मल और निरुपम उस कारण से (विपुल-तर ) बहुत से कार्य होते हैं । द्वितीयार्थ। कारण अर्थात् सब जीवों को उत्पन्न करनेहारा परमात्मा अथवा कारण का भौ कर्ता अर्थात् कारणों का भी कारण परमेश्वर और कर्ता अर्थात् उसी परमात्मा का अंश जीव जो सब कार्यों को करता है दोनों ही (अपि) निश्चय कर अचल अनादि और ब्रह्म के रूप हैं दून निर्मल निरुपम पदार्थों से अनेक प्रकार कार्य होते हैं ॥८४॥ करता जानि न परत है बिन गुरु-बर-परसाद। तुलसी निज सुख बिधि-रहित केहि बिधि-मिटै बिखाद ॥८५॥ * चाशा हि परमं दुःखं नैराश्यं परमं सुखम् । प्राशापाशस्य ये दासास्ते दासा जगतामपि । पाशा दासौकता येन तस्य दासायते जगत् ॥

पत्रम सर्ग अक्षय । बिन गुरु-बर परसाद करता (निज-रूप) न जान परत तुलमी निज सुख बिधि-रहित विखाद केहि विधि मिटे। बिना किसी उक्रम गुरु की कृपा के जीव को अपना रूप नहीं जान पड़ता इस कारण यह जीव अपने सुख के उपायों के ज्ञान से होन है तो उस का दुख किस प्रकार मिट सकता है अर्थात् किसी भाँति नहीं मिट सकता। जब तक जीव अपने परमात्मा के रूप को भली भाँत न पहचाने और ईर्षादेष मद मत्सर श्रादि को छोड़ श्रीराम- चन्द्र की शरण में न जाय और किसी हरि-भक का उपदेश दूसे न मिले तब तक किस प्रकार इस का मब क्लेश दूर हो सकता है? ॥८५॥ मिन-मय घट जानत जगत बिन कुलाल नहिँ होय । तिमि तुलसी करता रहित करम करै कहु कोय॥८६॥ जगत जानत मिन-मय घट कुलाल बिन नहि होय तिमि तुलसी कह करता रहित कोय करम करे। संसार भर जानता है कि मट्टी का घड़ा बिना काँहार के नहीं हो सकता अर्थात् सुन्दर चिकना घड़ा बिना बनानेवाले के कभी नहीं बन सकता उसी प्रकार तुलमी-दाम पूछते हैं कि कहो विना कर्ता के कौन काम (करता) होता है अर्थात् कोई भी काम बिना करने- वाले के कभी भी नहीं हो सकता है। जो जो काम देख पड़ता है मब के कोई न कोई करनेवाले अवश्य हो रहे हैं। वहौ दशा इस जगत को भी है। ऐसा बड़ा ब्रह्माण्ड बिना किसी कर्ता के कभी नहीं ।

२९
तुलसी-सतसह।
ता
हो सकता और इस जगत का एक अंश हम लोगों का शरीर भी
बिना किसी कर्ता के कभी नहीं हो सकता इस हेतु दून का कर्ता
अवश्य मानना पड़ा वह कर्ता श्रीपरमेश्वर के अवतार रामचन्द्र को
छोड़ और कौन हो सकता है। अब अपने कर्ता परमेश्वर को
पहचानना और उस की आराधना करना सब जौबाँ का मुख्य
कर्तव्य है ॥८६॥
ता ते करता-ग्यान कर जाते करम प्रधान ।
तुलसी ना लखि पाइहै। किये अमित अनुमान॥८७॥
ते
करता-ग्यान कर जाते करम प्रधान तुलमी अमित अनु-
मान किये ना लखि पाइहो ।
इस कारण कर्ता हौ का ज्ञान करो अर्थात् पहले कर्ता को भलो
भाँत पहचानो क्योंकि उमौ से मुख्य कर्म उत्पन्न होता है तो कर्ता न
हो तो कर्म कौन करे और जब कर्म ही न होगा तो उस का बन्धन
भी कहाँ मे श्रावेगा इस कारण कर्ता का जानना बहुत आवश्यक है।
कर्ता के पहचानने के लिये ऊपर कई एक दोहाँ में अनेक उपाय
बता चुके हैं जिन में गुरु सेवा सत्सङ्गति आदि मुख्य हैं। तुलसौ-दाम
कहते हैं कि नहीं तो असङ्ख्य अनुमान भी करते रहोगे तो भो नहीं
जान सकोगे। कर्म के उत्पन्न करने का मुख्य कारण कर्ता ही है तो
इस को बिना जाने नो कर्म के जानने के लिये अनेक उपाय भी
चाहे करे पर ज्ञान होना कठिन हो जाता है इस कारण कर्ता
हो के जानने में यत्न करो जिस से आत्मज्ञान अवश्य होगा ॥ ८७ ॥

पषम सर्ग। २३९ अनूमान साही रहित होत नही परमान । कह तुलसी परतच्छ जो सो कहु अपर को पान॥८८॥ अन्वय । साछी रहित अनूमान परमान नहीं होत तुलसी कह जो परतच्छ सो कह अपर पान न । सत्तासौ के दोहे में कह चुके हैं कि बिना कर्ता के ज्ञान अनेक अनुमान से कार्य सिद्धि न होगी उसी को और दृढ़ करते हैं । सातौ के बिना अनुमान प्रमाणित नहीं होता इस कारण तुलमी- दास उपदेश देते हैं कि जो प्रत्यक्ष है उसी को कहो और करो और दूसरे को मत करो। अभिप्राय यह कि अपने मनसे अनुमान करके अनेक प्रकार का कर्म जो दूं करता है बिना साक्षी के वह सब कुछ काम न देगा इस कारण अपने कार्य का माची रखना तेरे लिये बहुत आवश्यक है वह मानी तेरा गुरु वा माधु जन हो सकते हैं इस हेतु गुरु के उपदेश और मज्जनों को मम्मति से काम किया कर तो अवश्य तेरा मनोरथ सिद्ध होगा ॥ ८ ॥ *घिद कारन करता सहित कारज किये अनेक । नौ करता जाने नहीं तो कहु कवन बिबेक ॥८॥ करता घिद कारन सहित अनेक कारज किये जौ करता नहीं जाने तौ का कवन बिबेक किये। * किसी किसी पुस्तक में "तिमि कारन" चादि पाठ है वहाँ उसी प्रकार कारन चादि पर्थ होगा।

२४. तुलसी-सतसई। कर्ता (बनानेहारा) काँहार स्मृत्तिकारूप कारन ले कर अनेक कार्य ( घट आदि) बना चुका है तो केवल घट के कारन मृत्तिका को जान कर सन्तुष्ट हो रहा और यह न बिचारा कि मट्टी से बिना किमी कर्ता के ऐमा सुन्दर घट किस प्रकार हुआ। तुलसी-दास कहते हैं कि जो तूने कर्ता को न पहचाना तो कह तेरा बिबेक किस काम का हश्रा केवल अधरा रह गया। ने दूस अभिप्राय यह कि इस शरीर और जगत के बनने के अनेक कारणों को जान कर भौ जो व के मुख्य कर्ता श्रीराम को भली भाँत न पहचाना तो तेरा सब ज्ञान धर में मिल गया। सब कारणों के भी कारण श्रीराम का जानना बहुत आवश्यक है ॥८॥ वरन-कार करता कनक कारन प्रगट लखाय। अलङ्कार कारज सुख-द गुन सोभा सरसाय ॥१०॥ ऊपर के दोहे में घट का उदाहरण दिखा कर अब स्वर्ण का उदाहरण दिखाते हैं। अन्वय। खरन-कार करता कनक कारन सुख-द अलङ्कार कारज लखाय शोभा गुन सरमाय ॥ मोनार कर्ता मोना कारण और सुखदायी आभूषण वा गहना कार्य देख पड़ता है और अलङ्कार पहनने से जो शोभा होती है वह गुण है। मोने का स्वामौ वा बनानेवाला इन सभों का मुख्य खामी है।

परम सर्ग। २०१ यह दृष्टान्त देह वा संसार पर घट सकता है। देश और संसार को फैलानेहारा जीव सोनार है वही जीव कर्ता है। हरिभक्ति, ज्ञान मत्मङ्ग प्रादि सोना (इस जौवरूप मोनार के मुकवा बद्ध होने के) कारण हैं। संसार से मुक्ति वा उस में बन्धना अलकाररूप कार्य है। जो जीव शरीररूपी अलवार को पा कर हरिभक्ति, मत्मज, ज्ञान उपार्जन आदि भले २ कामों को करता है वह मुक्त हो सकता है और जो बुरा काम करता है सो संसार को जाल में बाँधा जाता जैसे शुद्ध मोमा में पीतल आदि खाद मिलानेवाला मोनार मोने के खामी के पास दण्ड पाता है उसी प्रकार यह जीव यदि मोनारूप देह को भले कार्य में न लगा कर बुरे कार्यरूपी मल से दूषित करे तो वह सब के खामौ रामचन्द्र के पास दण्ड पाने के योग्य होता है ऊपर के कई एक दोहों में रूपक अखदार स्पष्ट है ॥१०॥ चामौकर भूखन अमित करता करतब भेद । तुलसी ये गुरु-गम-रहित ताहि रमित अति-खेद ॥१॥ चामौकर (एक) करता करतब भूखण अमित भेद जे गुरु-गम- रहित (ते) ताहि रमित (ताहि) अनिखेद । मोना तो एक ही है परन्तु (कर्ता) मोनार के करतव्य वा करनी से उस मोने का (कुण्डल, विजायठ, वाला काम प्रादि) गहने अमय प्रकार के होते हैं। तुलसी-दास कहते हैं कि जो जन गुरू के दिये शान से हौन है वे उन्हीं गहनों में भले रहते और सुख पाते हैं। ऐसे लोगों को बड़ा दुख होता है। 31 २४२ सुलसी-सतसई। अभिप्राय यह कि मोनाररूप जीव भोग को इच्छा से नाम धर२ के अनेक प्रकार के कर्मों को करता है वही अनेक भूषण हैं। यदि जौन दून कर्मों का कर्ता अपने को न माने तो न बाँधे परन्तु भूषणरूप उन कर्मों का कर्ता अपने को मान कर उहीं में लिप्त रहता है दूस कारण संमार से मुक्त नहीं होता। जो लोग गुरु के उपदेश को पाये हैं वे कमाँ में लिप्त न रहने के कारण बद्ध नहीं होते. परन्तु जो गुरु-ज्ञान हौन हैं वे कर्म में लिप्त होने के कारण बद्ध होते हैं। जिम प्रकार एक ही सोने से सोनार भला बरा सब प्रकार का भूसन बनाता है उमौ प्रकार यह जीव एक ही मनुष्यदेह से सब प्रकार का कर्म करता है जिन के अनुमार फल पाता है ॥ ८१॥ तन निमित्त जह जो भयो तह सोई परमान। जिन जाने माने तहाँ तुलसी कहहिँ सु-जान॥१२॥ तन निमित्त जह जो भयो तह मोई परमान । सु-जान तुलसी कहहि जिन जहाँ जाने तहाँ माने । परमात्मा का अंश यह जीव अपनी शरीर के पुन्यपाप के कारण खर्ग मर्त्य पाताल आदि स्थान में देवता मनुष्य मर्प आदि जो कुछ हा अर्थात् जिस योनि में जन्म पाया वहाँ उसी को ठीक समझ लिया और उसी के अनुसार अपना काम करने लगा। ज्ञानौ तुलसौ- दास कहते हैं कि जिन महात्माओं ने जहाँ यह बात भली भाँत जाना कि देवता श्रादि योनि और स्वर्ग आदि लोक दूस श्रात्मा के लिये केवल एक खन के समान हैं कर्म के अनुसार अदला बदला पञ्चम सर्ग। २४३ करते हैं यह जीव परमात्मा का अंश अजर अमर है-वे होठोकर मत्य को माने हुए हैं ॥ ४२ ॥ मिन्मय भाजन बिबिधि-विध करता मन भव-रूप । तुलसी जाने ते सुख-द गुरु-गम ग्यान अनूप ॥१३॥ मिन्मय बिबिधि-विध भाजन करता (कुम्भकार तथा) भव-रूप (बिबिधि-विध भाजन) करता मन। तुलसी (ये अनप) गुरु-गम जाने ते सुख-द॥ जसे एक मट्टीरूप कारण से अनेक प्रकार के घड़े हाँडी कसोरे आदि बरतन बनते है जिनका कर्ता कुम्हार है उसी प्रकार अनेक प्रकार के जन्म के रूप को पाने का कर्ता मम है। (मनमेव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः) मन को अन्त में जैसौ बासना हुई तैमी योनि उस को दूसरे जन्म में मिली। तुलसी-दास कहते है कि जो लोग इस सिद्धान्त को गुरू के दिये हुये अतुल ग्यान से जानते है वे (दूसरों के लिये भौ) सुखदाई हो जाते है और श्राप तो पानन्द- मय ही है॥ जिस प्रकार मट्टी में पाँचो तत्त्वोंके गुन है उमौ रौत शरीर में भी सब तत्त्व हैं। परमात्मा का अंश जीव अनेक प्रकार को वासनाओं में पड़ कर ईश्वर को माया से भूल अपने रूप का बिस्मरण कर देता है और मरने के समय में भी उस की इच्छा इन्हौं झूठे पदार्थों में लिप्त रहती है इस कारण मंमार चक्र में घूमा करता है यदि गुरू को तुमसौ सतसई। रुपा से अना समय में उसका मन परमेश्वर में खगे तो वह भी मचिदानन्द परमेश्वरमय हो जायगा ॥ ३ ॥ सब देखत म्रित भाजन हि कोउ कोउ लखत कुलाल। जा के मन के रूप बहु भाजन बिलघु बिसाल ॥४॥ सब वित भाजन हिं देखत कोउ कोउ कुलाल लखत जा के मनरूप बड भाजन बिलघ विसाल । सब लोग मट्टी के बरतनों को देखते हैं परन्तु कोई कोई (उन के बनानेवाले) कुम्हार को देखते हैं जिस के अनुरूप बहुतेरे बरतन छोटे और बड़े बने है । संसार के मनुष्य लोग “बाजार" में फैलाये हुये छोटे बड़े बरतनों को देखते हैं और उन को अत्यन्त सुन्दरता पर मोहित होते है और उस कुम्हार को जिस ने अपने मन की इच्छा के अनुसार इन बरतनों को बनाया था सराहते हैं परन्तु उन मनुष्यों में से बहुत थोड़े से मनुष्य उन बरतनों के बमामेहारे कुम्हार के जान-पहचानवाले हैं। दूसरा अर्थ बरौर और परमात्मपक्ष में। सब लोग पञ्चभूत रचित शरीर को देखते हैं परन्तु इस शरीर के धारण करनेहारे जीवात्मा को (जो परब्रम्ह परमात्मा का एक अंश हो कर भी माया को जाल में फसने के कारण मट्टी के घड़े रूप भरीर को धारण किये हुये है) बहुत कम लोग पहचानते हैं। जिस की इच्छा के अनुसार अनेक प्रकार की योनि वा परौर कोटौं बड़ी हुई है अर्थात् जिस प्रकार का इस का कर्म पषम सर्ग। २४५ और वासमा हुई है वैसी ही शरीर दूस ने पाई है। कहने का यह अभिप्राय कि बिबिध योनि में घम कर सुख दुख का भोमना केवल जीवों को निज बासमा और करनी से हुआ है यदि ये सर्व बासनाहौम हो परमेश्वर में लौन होवें अवश्य जन्म मरण के क्लेश से कूट जावें ॥ ६ ॥ एकै रूप कुलाल को माटो एक अनूप । भाजन अमित बिसाल लघु तो करता मनु-रूपा९५॥ अभूप कुलाल माटौ एकै रूप अमित भाजन बिसाल लघु तो (अवश्य ) करता मनु-रूप। पहले कह चुके हैं कि कार्य अपने कारण के अनुसार होता है। उमौ नियम से अब अनुमान प्रमाण के द्वारा बासना को अनेक जन्म के होने का कारण सिद्ध करते है। अतुल कुम्हार और मट्टी दोनों एक ही प्रकार के हैं परन्तु इन कर्ता और कारण से अमय बरतन बड़े छोटे होते हैं तो दून के बड़े छोटे होने का कारण अवश्य कुम्हार का मन होगा। क्योंकि (कारणगुणा: कार्यगुणानारभन्ते) जो २ गुण कारण में रहते है वे कार्य में भी अवश्य पाये जाते हैं। तो यदि केवल कुन्हार और मट्टी को अनेक प्रकार के घटों का कारण मानिये तो ठीक नहीं होगा क्योंकि एक प्रकार के कारण से अनेक प्रकार का कार्य नहीं हो सकता इस हेतु घों के रूप रङ्ग में भेद होने का कारण कुम्हार का मन है यह सिद्ध जत्रा। .

२०० तुलसौ-सतसई। यह कुम्हार माटी और घड़े का दृष्टान्त जीव और उसके शरीर धारण पर घटता है। परब्रह्म परमात्मा का अंश जीव माया को जाल में फस कर अनेक शरीर को धारण कर सुख दुख भोगता है मो यह दूस जौवरूप कुम्हार कर्ता और माटौरूप माया हो के कारण से नहीं होता बरन दूस जीव के अनेक योनि में जाने का मुख्य कारण इस को इच्छा वा कर्म करने और भोगने को बासना है। यह जिस प्रकार का कर्म करता है और उन का कर्ता अपने को मान कर उन के फल भोगने का अभिलाषी होता है उसी प्रकार को योनि में जन्म पा कर सुख दुख पाता है। इस जन्मरूपी जाल से यह तभी छूट सकता है जब गुरु की कृपा से या तो इसे पूरा ज्ञान हो, नहीं तो पूरी भक्ति हो कि सब कर्म का करानेहारा परमेश्वर को समझे और आप उन का दाम बन के काम करे। ये हो दो उपाय दूस जीव को मुक्ति के हैं दूसरे नहीं ॥६५॥ जहाँ रहत बरतन तहाँ तुलसौ नित्य स्वरूप । भूत न भावी ताहि कह अतिसय अमल अनूप॥६६॥ जहाँ बरतन (रहत) तहाँ नित्य स्वरूप (आत्मा) रहत तुलसी ताहि न भूत न भावौ (किन्तु) अनूप अतिसय अमल कह ॥ जहाँ बर्तन (जीवात्मा के रहने का पात्र) शरीर रहता है नित्य सदा बर्तमान रहनेवाला यह जीवात्मा भौ वहाँ हो रहता है अर्थात् निर्विकार परमेश्वर का अंश हो कर भी यह जीव माया के बश होने के कारण जहाँ जिस योनि में पड़ा उस योनि के शरीर के अधीन पञ्चम सर्ग -- हो कर वहाँ हो रहने लगता है। तुलसी-दास इसे न भूत जन्मा हुा वा शरीर के साथ नष्ट हो गया न भावी शरीर के साथ होने- वाला कहते परन्तु अत्यन्त निर्मल अर्धात् सब प्रकार के दोषों से रहित दूसी कारण उपमा रहित कहते हैं। परमात्मा का अंश होने के कारण यह जीव सदा अजर अमर है और चाहे जिस योनि में यह जाय पर नष्ट नहीं होता। तुलसीदास नौ दस दोहे में प्राण को अमरता और अन्य २ शरीरों में उत्पन्न होना प्रमाणित करते है ॥८६॥ स्वास समौर प्रतच्छ अप स्वच्छाऽऽदर्स लखात। तुलसी राम-प्रसाद बिन अविगति जानि न जात॥६॥ ऊपर कह चुके हैं कि यह जीवात्मा परमात्मा का रूप (अतिसय अमल) बड़ा निर्मल है। उस में यह शङ्का हो सकती है कि निर्मल है तो यह क्यों नहीं देख पड़ता है। उसी पर कहते हैं कि वह देख भी पड़ता पर बिना राम को दया लोग उसे पहचान नहीं सकते ॥ अन्वय । खच्छाऽऽदर्स (ब) खास समीर अप प्रतच्छ लखात तुलसी राम-प्रसाद बिनु अविगति न जानि जात ॥ निर्मल श्रारमी के समान स्वास वायु और जल साक्षात् देख पड़ता है अर्थात् जैसे मलहौन मौसे में मुख देख पड़े वैसे ही शरीर में जब तक वायु और जल है दूस में चैतन्यता देख पड़ती है जब तक खासा रहती है यह शरीर चलता फिरता बोलता चालता

२०७
तुलसी सतसई।
समझता बझता है परन्तु खास के निकल जाने पर चैतन्यता चली
जाती है तो यह चैतन्यता अवश्य परमेश्वर का अंश है। जो
प्रकार
अप जो है जल उस के संयोग से अर्थात् माता पिता के रजबीच के
योग से शरीर की उत्पत्ति होती है इस प्रकार जल वायु इस बरौर
की रक्षा के मुख्य कारण है और दून में कौ चैतन्यता परमात्मा
का अंश है तुलसी-दाम कहते हैं कि यह जीवात्मा परमात्मा हौ
। यह बात बिना राम को दया नहीं जानी जाती इसी से
(अविगति) मनुष्य को पहुंच से बाहर है मनुष्य को गति वहाँ तक
द्वितौयार्थ और अन्वय ।
खाम-ममौर-अप स्वच्छादर्श प्रतच्छ खात, राम-प्रसाद बिनु
अविगति न जानि जात ।
जिस प्रकार खास वायु में का जल निर्मल दर्पण में प्रत्यक्ष देख
पड़ता है अर्थात् मोसे पर नाक से फूकने से उस में छोटे २ बूंद
देख पड़ते है, वैसे ही राम के दयारूपी मोसे के बिना आत्मा
(अविगति) अगम्य है नही जामाजाता इस कारण राम सेवा सर्वोपरि
प्रावश्यक
है
है
तुलसी तुल रहि जात
जुग-तन अचल उपाधि।
यह गति तेहि लखि परत जेहि भई सुमति सुटि साधि
अन्षय । तुलसौ जुग-तन अचल उपाधि तिल रहि जात है तुलसी
जेहि मटि माधि सुमति भई नैहि यह गति लखि परत है।

figuौ-दास कहते हैं कि सूक्ष्म और स्थूल दोनों गति में घटस (उपाधि) दोष तिल थोड़ा सा अवश्य ही रह जाता तुलसी दास कहते हैं कि जिस को सुन्दर (माधि माध्वौ ) साधुओं की भी सुबुद्धि हुई उसे यह अवस्था अर्थात् उपाधि का रहना देख पड़ता है। मन लगा कर माधुओं को सेवा करने से उनके दिये ज्ञान के द्वारा उस उपाधि का सूक्ष्म भेद जान पड़ता है। उपाधि शब्द से यहाँ माया कृत दूसरे गण का दूसरे में देख पड़ना है जैसे नौले रङ्ग के दर्पण में मुख देखने से मुख भी नौला देख पड़ता है वा स्वच्छ स्पटिक में खाल फूल का प्रतिबिम्ब पड़ने से स्फटिक खाल देख पड़ता है तो मुख को नौलिमा और स्फटिक की साखौ का होना उपाधि कत है क्योंकि यह उन का खाभाविक धर्म नहीं है। और सूक्ष्म शरीर शब्द द्वितीय मर्ग के १४वें और पश्चिम मर्ग के २२वें दोहों में आ चुके है । इस मर्ग के २२वें दोहे में इस का थोड़ा सा वर्णन कर चुके है । यदि सूक्ष्म घरौर न मानिये तो संसारी स्थूल देह के किये कर्म का भोग किस प्रकार हो सकता है इस हेतु एक स्थूल शरीर कल्पना करना अत्यावश्यक है। *प्राण वायु, मन, बुद्धि १० इन्द्रिय और अपञ्चोकत ५ महा भूत बना सूक्ष्म शरीर होता है। कखक को छपी पुस्तक में तल 1 वेदान्तमत से इतने पदार्थों से सूक्ष्म शरीर बनता है। * पञ्चपाणमगोबुद्धिदशेन्द्रियसमन्वितम् । अपचौखतभूतोव्यं सूष्याट भोगसाधनम् । 32 तुलसी-सतसई। पाठ है इस कारण मैं समझता हूँ कि यह तिल का अपभ्रंश है जिस का अर्थ हिन्दी में थोड़ा है। तुल पाठ धम जान पड़ता है॥१८॥ करता कारन काल के जोग करम मत जान । पुनः काल करता दुरत कारन रहत प्रमान ॥६६॥ इति श्रीगोखामितुलसौदामविरचितायां मतमतिकायां कर्म- सिद्धान्तयोगो नाम पञ्चमः सर्गः समाप्तः ॥ का तैमा हो करता काल के जोग करम (करत यह) मत जान पुनः काल दुरत (तब) कारम करता दुरत कारन प्रमान रहत । कर्ता ममय के योग से अर्थात् समय के अनुसार शुभ अशुभ कामों को करता है यह सिद्धान्त जानना। और फिर जब समय बदल जाता है तब उसी के कारण करता भी बदल जाता है (परन्तु) कारण जैसे प्रमाणयुक्त रहता है। इस का अभिप्राय यह है कि कुण्डल श्रादि का बनानेवाला मोनार वा घट श्रादि का बनानेवाला कुहार जिस प्रकार समय और अपने साथ के लोगों को रुचि के अनुसार श्राभूषण और बरतन को बनाया करता है उसी प्रकार कुम्भकाररूप जीव भले समय और सत्सङ्ग के होने से भखा और बुरे समय और कुसङ्ग से बुरा काम करता है। समय का उदाहरण जैसे सत्य युग में सब जीव धर्म ही करते थे और कलि युग में अधिकांश लोग पाप हौ करते. इस मंत को यौक समभाना चाहिये।

परम समनः
फिर समय बीतता है अर्थात् कलियुग के अनन्तर सत्ययुम बाता
तब फिर (कारण) समय के कारण लोग धर्म करते हैं इस प्रकार
(करता दुरत) कर्म के करनेवाले भी समय और सङ्ग के अनुसार
(दुरत) बदलते रहते हैं अर्थात् बुरे भले और भले भी बुरे बन
जाते हैं परन्तु मट्टी मोना आदि कारण एक ही रहता है और
इन्ही के समान मायारूप कारण भी एक मा रहता है। अब बरों
को अपने कर्म से छूटने के लिये सत्सङ्ग करना अवश्य चाहिये उसी
प्रकार भलों को कुमङ्ग से बचना आवश्यक है क्योंकि काल समय
और सङ्ग के अनुसार कर्म और कर्ता दोनो में भेद होता है।
इस कारण सब वस्तुओं के कर्ता धर्ता संहर्ता परब्रह्म परमेश्वर
को थाम और आराधना करना चाहिये जिस से सर्वत्र सुख मिले।
&९॥
॥०॥ इति विहारिकृत मंसिप्टौकायां पञ्चमः सर्गः ॥०॥

अथ षष्ठ सर्ग। जल थल तन गत है सदा ते तुलसौ तिहुँ काल । जनम मरन समुझे बिना भासत समन विसाल ॥१॥ तुलसी-दास (अपने मन वा किसी भक मे) कहते हैं कि (३) बूजल पानी और थल पृथ्वी में है, और तेरा तन शरीर त्रिकाल भी इन्ही में (गत) लीन हो जाता है केवल जब तक व जन्म और मरण को नहीं समझता तभी तक (समन) जमराज तुझे बहुत बड़े जान पड़ते हैं। अर्थात् जब तक भूत वर्तमान और भविष्य तीनों काल में भूमि और जल वर्तमान हैं तब तक तेरा शरीर भी इन में है और तेरा तो किगै काल में नाश नहीं है। दूसरा अर्थ। हे मन तू सर्वव्यापी परमेश्वर का रूप है भूत वर्तमान भविष्यत् तीनों कालों में जल भूमि शरीर सब स्थान मैं. वर्तमान है। बिना समझे वा ज्ञान पाये तुझे मरना.जौना (सम न बिसाल भामत) सम एक प्रकार का न जान पड़ कर मरना बड़ा नाशकारौ जान पड़ता है और दुखदाई समझा जाता है और जौना भला समझ पड़ता है। जब तुझे ज्ञान हो जायगा तो सब दुख दूर हो जायगा ॥१॥ हैं तुलसी करता सदा कारन सब्द न आन । कारज सध्या सुख-दुख-द बिनु गुरु तेहि किमि जान॥२॥ तुलमी कहते हैं कि तू ही सर्वदा कर्ता है और जो काम करता बड संगे। अपना वही शब्द रूप तेरे बन्धन का कारण हो जाता है और दूसरा कोई नहीं। तुझ से जो कार्य हुश्रा और उस को जो संज्ञा अर्थात् नाम पड़ा वही सुख दुख का देनेहारा हुआ मो बिना गुरु के उपदेश के उसे कोई किस प्रकार जान सकता है अर्थात् नहीं जान सकता है। वेदान्त के मत से जगत् केवल धम मात्र है मचिदानन्दवरूप परमेश्वर का अंश जीव मारे अहङ्कार के किया कार्य समझ कर इस में फस कर दुख भोगता है॥२॥ कारज रत करता समुझि सुख दुख भोगत सोइ । तुलसौ सौ-गुरु-देव बिनु दुख-प्रद दूरि न होई ॥३॥ : मो कर्ता स्वरूप तू अपने को कार्य रत (जगत के काम में लौन) बान कर दुख और सुख का भोगनेवाला होता और यह (दुख-प्रद) दुखदेनेहारा तेरा कार्य वा विषयवासना मैं खबलौन रहना विमा श्रीगुरु देव के उपदेश दूर नहीं हो सकता। जब सद्गुरु के उपदेश से तुझे निर्मल जाम हो और तू अपने को पहचान तो शुभ अशुभ दोनों प्रकार के कामों को छोड़ कर दुःख मुक्त हो जायगा ॥३॥ कारन सन्द स्वरूप है सङ्ग्या गुन भव जान। करता सुर-गुरु ते सुखद तुलसौ अपर न आन॥४॥ (कारन खरूप शब्द भौ) शब्द हो कारण खरूप है (गणभव संज्ञा मान) और गुण से मंज्ञा अर्थात् नाम की उत्पत्ति हुई ऐसा जाना पाहिये यदि केवल मनुष्य कहो तो किसी व्यक्ति विशेष का बोधन से

२५४
तुजसो-ससस ।
होगा परन्तु यदि कुछ विशेषण लगा कर और उसके गुणों को बता
कर कहो तो व्यकि विशेष जाना जायगा और इस संज्ञा का कता
(सुर-गुरु वृहस्पति अर्थात् जीव ) जीव श्राप है और वहौ जीव सुख
देनेहारा है। तुलसी कहते है कि और कोई इस का सुख देनेहारा
नहीं है। अभिप्राय यह कि शब्द रूप ब्रह्म तो दूस संसार का कारण
है परन्तु वह संज्ञा और गुनहौन है। नाम और संज्ञा मत्व रज और
तम इन तीनों गुणें के योग से हुई हैं और इन्ही के कारण ब्रह्म का
अंश जीव अपने को कर्ता मान कर सुख दुःख का भागी होता है॥४॥
गन्ध विभावरि नौर रस सलिल अनल गत ग्यान ।
बायु बेग कह बिनु लखे बुध-जन कहिँ प्रमान॥५॥
(बिभावरि गन्ध) पृथ्वी को गन्धवती कहते हैं परन्तु गन्ध जिस
का ज्ञान नाक से होता है उस के रूप को किसी ने नहीं देखा है
और जल रसवान है और उसमें शौतलता गण है और शीतलता के
रूप का भी प्रत्यक्ष नहीं होता उमौ प्रकार अग्नि को उष्णता वायु में
का वेग आदि भी श्राखाँ से किसी को नहीं देख पड़ता परन्तु पण्डित
खोग उन बस्तनों का खक्षण कह के उन को प्रमाणित करते हैं।
पृथ्वी गण गन्ध नाक से जल को शीतलता अग्नि उष्णता और वायु
बेग भौ बक इन्द्रिय से जाने जाते हैं। इन सब गुणों का यह
करनेहारा परमात्मा का अंश जीव दून सों में फसा है ॥५॥
अनुखार अच्छर रहित जानत है सब कोह।
गुरुतुलसी जलगि बरन तासु रहित नरिहाइ॥६॥

बड संगे। दूसरा कुछ नहीं है यह बात सब लोग जानते हैं कि अनुखार अक्षर रहित परन्तु तुलसी कहते है कि जितने बरण हैं सब अनुस्वारमय अर्थात् पहले कलम से अनुसार वा बिन्दु ही निकला है फिर अक्षर होते हैं दूस प्रकार सब अक्षरों का वह कारण ठहरता है उसी प्रकार परमात्मा सब गुण और अवस्थाओं से रहित होकर भी सर्वमय कोई बस्तु उस से रहित नहीं है सब में उस को सत्ता है॥६॥ आदि हु अन्त हुँ है मोइ तुलसौ और न पान। बिनु देखे समुझे बिना किमि कोउ करै प्रमान ॥७॥ आदि में और अन्त में दोनों ठौर अनुस्वार है और वर्ण के रूप में परन्तु इस बात को बिना देखे और समझो कौन प्रमाणित कर सकता है पहले जब कलम रकबो और पौर जब उठात्रो तो अनुस्वार बनता है पर इस बात पर कम लोग ध्यान देते हैं। उसी प्रकार श्रादि अन्त में श्रात्मा वर्तमान है परन्तु माया- बश हो कर अपनेरूप को भूल कर विषय में लौन होने के कारण जौव बन गया। बिना ज्ञान के कोई उसे जान नहीं सकता ॥७॥ रहित बिन्दु सब बरन तें रेफ रहित सब जान । तुलसौ स्वर सञ्जोग तें होत बरन पद मान ॥८॥ बिन्दु और रेफ सब बर्गों से रहित हैं अर्थात् ये अकेले खत अक्षर नहीं कहाते परन्तु जब खर में मिलते हैं तो वर्ण को पद माते हैं बिना किसौ वर्ण के एक बिन्दु देने से शन्य हो रहना .

तुमायो सन तुलसौ-दास कहते हैं कि (सुत भव जोग बिनु) पुंधरा वा कर्म के बिना पिता को यह नाम नहीं मिलता। जब परने अपनी मया को प्रेरण कर के संसार को बनवाता है तो वह पित कहाता है अर्थात् जब उसे पिता कहाने और बहुत होने रश होती है तब वह जौव बनता है ॥ ११ ॥ सज्या कह तब गुन समुझ सुनब सब्द परमान । देखब रूप विसेख है तुलसी बेद बखान ॥ १२ मंज्ञा वा नाम का गुण कहना वा उच्चारण करना है शब्द का गुण सुनना और देखने का गुण रूप है इन तीन प्रकारों को अर्थात् सुनने कहने और देखने को वेदी ने बखाना है। अभिप्राय यह कि मनुब के सुनने बोलने और देखने से सब कामों को उत्पत्ति होती है यदि कोई जीभ काम और आँख मद कर बैठे तो कुछ भी नहीं है। मंज्ञा अर्थात् पिता पुत्र ब्रह्म जौब माया ईश्वर ये सब कहतब मात्र हैं अथवा पहले संज्ञा नाम के कहने पर गुर्यों का स्मरण होता है यथा ब्रह्म कहने से सच्चिदानन्दमय परमेश्वर और. जीव कहने से माया मोह में बद्ध संसारी प्राण प्रादि जाने जाते होत पिता ते पुत्र जिमि जानत को कहु नादि। जौलगि सुत परसो नही पितु पद लहइन नाशि॥१३॥ पिता से पुत्र होता है इस को कौन नहीं जानता पर्यात भर हैं परन्तु जब तक (सुत परसो नहीं ) लड़के का होता तब तक पिता यह पदवी कोई नहीं पाता। अर्थात् अपि पिता पुत्र में कुछ भेद नहीं है तो भौ पुत्र होने पर पिता जा पड़ती है उसी प्रकार यदि जौवाँ को सृष्टि न होती तो ईश्वर जौवों का कर्ता ब्रह्म किस प्रकार कहाता। पिता कहलाने को इश बनाने का कारण हुई ॥ १३ ॥ *तिमि बरन हि ते बरन कर सध्या बरन संजोग । तुलसी होई न बरन कर जौ लगि बरन बियोग॥१४॥ 'उसी प्रकार अक्षर के संयोग अर्थात् अनुखार आदि के मिलने से बरन कर बरन होत) एक अक्षर दूसरे अक्षर का बनानेहारा होता, (जौ लगि बरन बियोग) परन्तु जब तक अक्षर अलग २ नहीं होते (तब खगि बरन कर मझ्या न होत) तब तक उस अक्षर को दूसरो संज्ञा नहीं होती। इन दोहों में अक्षर का दृष्टान्त दे कर ईश्वर और उस से उत्पत्र समार वा कर्म और उस के अनुसार उत्पन्न होनेवाले जीव और पिता पुष का अभेद दिखलाया है। वेद में भी लिखा है कि (प्रात्मेव जायते पुत्रः) पुरुष श्राप हौ पुत्ररूप से उत्पन्न होता है ॥ १४ ॥ L वह "तिमि बरनन बरनन कर सया बरन सनाग" पाठ हो वर्धा तिमि उसी प्रकार (बरनन बरनन करें) अक्षरों की उत्पत्ति को वर्णन करना चाहिये पार वरणों के संयोग से (सध्याशाम होता है पर्थात् जब कई पक्षर मिलते हैं तब शब्द बनला बथा रामार म के मिलने से राम बना।

तुलसी देखहु सकल कहि विधि सुत बाधीन। 'पितु-पद परखि सु-द्रिढ़ भयेउ कोउ कोउ परम प्रबौन ॥ तुखसौ कहते हैं कि देखो इस प्रकार सब खोग सुत अपने वा कर्म (कर्म अपने से उत्पन्न होता है इस से उसे सुत कहते हैं) अधीन वा वश में रहते हैं" ( कोउर परम प्रबौन) कोई जो बड़े जानी है (पितु-पद परखि सु-द्रिढ़ भयेउ) पिता परमेश्वर के पर को ज्ञान दृष्टि से देख कर दृढ़ अर्थात् श्रावागवन से रहित हुये है कर्म को फांस और माया के ग्राम से कौन बच सकता है॥१५॥ जर देखो सुत-पद सकल भयेउ पिता-पदचाप। तुलसौ सो जानै सोइ जासु अमौलिक चोप ॥१६॥ जहाँ देखो वहाँ सुत पद जौव का कर्म वा पुत्र ईश्वर से उत्पन्न जगत् (सकल ) सब कुछ है अर्थात् इन्ही के धौन सब खोग हैं परन्तु पिता के स्थान में रहनेहारे परमेश्वर को वही जानता जिस को अनमोल ( चोप) अभिलाष वा बुद्धि है ॥ १६ ॥ त्यात सुधन तिहु लोक मह महा-प्रवल अति सांड जी कोउ तेहि पाळे करै सो पुनि आगे होइ ॥१७॥ सुधन मनुष्य का कर्मरूपी पुत्र तीनों लोक में प्रसिद्ध अंदा बलवान है यदि कोई उसे पोछे छोड़ना चाहे अर्थात् कर्म को संसार में छोड़ना चाहे तो वह आगे दौड़ता है अर्थात् उसी सार मनुष्य को संसार में जन्म ले कर फल भोगना पड़ता द्वितीयाधी ईश्वर कृत जगत् को रचना प्रति प्रसिद्ध और बलवान पदि कोई उसे जीतना चाहे तो माया के द्वारा संसार ही पसे कर भागे हो जाता है ॥१७॥ तुलसी होत नहौँ कछुक सुअन रहित व्यवहार। तही ते अगरज भयेउ सब विधि तेहि प्रचार॥१८॥ तुलसी कहते हैं कि (सुत्रम रहित ) बिना कर्मरूपी पुच के कुछ भी व्यवहार नहीं होता इसौ से सब रौत कर्म का प्रचार भागे उमा अर्थात् कर्म ही मुख्य समभा गया। दूसरा अर्थ। बिना माया को प्रेरणा जौव किसी संसारौ काम व्यवहार को नहीं करता इमौ लिये सब प्रकार से (ईश्वर ने ) सब पहले माया कृत कर्म को उत्पन्न किया कि उस से माहित जीव संसार में लगें। कर्म ही में फस कर जन्ममृत्य के बस हो कर जीव संसार में बंध जाता है॥१८॥ सुमन देखि भूले सकल भy अति परम अधीन । तुलसी जेहि समुझाइये सो मन करत मलौन॥१६॥ माया के कारण संसाररूपौ पुत्र को देख कर सब लोग भूले उसी के वश में सब प्रकार से हो रहे हैं। तुलसौ कहते हैं जिस को समभाभी वह उलटे अपना मन मोटा कर लेता है। अर्थात् संसार में ऐसा लिप्त जत्रा है कि जो उसे उपदेश दे उसको सा.अ.समभाता है। ...SAM तुलसी-सतसई। द्वितीयार्थ। अपने पुत्र वा कर्म श्रादि व्यवहार में सब भले है जिस को समझाइये कि जगत् के व्यवहार पुत्र स्त्रौ धनादि व्यर्थ हैं। वहौ मुझ से (यह समझ कि मुझे मेरे परिवार से अलग करते हैं) अपना मन मोटा कर लेता है ॥ १८ ॥ मानत मासाचा हिर सुनत सुनावत बादि । तुलसौ ते समझत नहीं आ पद अमल अनादि ॥२०॥ मन से उसी मायारूपौ पुत्र वा संमार के धन धाम को सहा समझते और अगड़ा कर के उसे सुनते सुनाते हैं और (ते.) वे संसार में फसे मनुष्य निर्मल और अनादि (पद) परमेश्वर को नहीं समझते हैं ॥२०॥ जाहि कहत हैं सकल सो जेहि कहतब सो ऐन। तुलसौ ताहि समुझि हिये अजहु करहु चितचैन॥२१॥ जिस को लू सब कुछ कहता है मो (कहतब ) बाण है अर्थात् शब्दरूप भगवान है और वही (ऐन) घर है उस को मन र समझ कर अब भी प्रसन्न हो। द्वितीयार्थ। सकल जाहि कहत है सो कहतब (मकल) ऐन सो समुझि तुलसी अजहु ताहि हिये करहु जेहि चित चैन (होय)। जिस *परब्रह्मरूप राम को सनकादि सब मुनिगण कहते हैं वहीं सः श्रीरामः सवितारो सर्वेषामौश्वरः यमेवेशः स्णुते सपुमानस्तु यमदस्मद्भूर्भुवः स्वः त्रिगुणमयो बभूव इतौयं मरहरिः स्तोतीयं गन्धमादनः सौतौयं यज्ञतनुः स्तोतोयं महाविष्णुः स्तोतीयं महाशम्भ लौतौयं तं मण्डलं तयति यत्पुरुषं दक्षिणक्षं मण्डलोवैमण्डलोया महलस्थमिति (सामवेदे तरौयशाखायाम्।) * यह संगै मरमेश्वर सब का (ऐन) श्राश्रय है उन्हें समझ कर तुलसीदास कहते हैं कि आज भी उन्हें अपने मन में धारण करो जिससे तुम्हारे मन में शान्ति और आनन्द होवे। द्वितीयार्थ उत्तम है॥२९॥ तुलसी जो है सो नहीं कहत पान सब कोइ । प्रहि बिधि परम बिडम्बना कहहु नका को होइ॥२२॥ तुलसी कहते हैं कि जो जिस प्रकार के श्रीरामचन्द्र है ठीक औक मो नहीं कहते परन्तु और का तौर हो कहते हैं अर्थात् अत्मारूप अपने राम को नहीं समझते हैं परन्तु कोई उन्हे मनुष्य समझते कोई केवल एक राजा समझ लेते हैं। इस प्रकार को बिडम्बना कहो किस को नहीं होती अर्थात् सव को होती है॥२९॥ गुरु करिबो सिद्धान्त यह होइ यथारथ बोध । अनुचित उचित लखाइ उर तुलसौ मिटइबिरोधार॥ जब मनुष्य गुरु करे तो उस के उपदेश से इस सिद्धान्त का कि संसार प्रसार और राम सच्चे बोध हो और उचित अनुचित जाना जाय और उदय से विरोध दूर हो जाय ऐमा तुलसीदास का मत है बिना गुरु के सच्चे मार्ग के दिखलानेवाले नहीं मिल सकते इस कारण गुरु करना मूल सिद्धान्त हुआ ॥ २३ ॥ सत-सङ्गति को फल यही सन्सय रहइ न लेस । अस्थिर सुचि सरल चित पावै पुनिन कलेस ॥२४॥ मत्सङ्गति का यही फल है कि मन्देह का घोड़ा भी अंश मौं तुमसौ-सतसई। रहमा और सब सन्देहों के दूर हो जाने से मन शान्त पवित्र और पौधा हो जाता है जिस से फिर मनुष्य दुख नहीं पाता। धमके दूर होने का प्रथम उपाय गरु उपदेश चौर दूमरा उपाय. चत्मा है। मत्सङ्ग में रहने से सब प्रकार का भ्रम दूर हो जा सकता है और मन शान्त हो कर परमेश्वर को पहचान सकता है ॥ २४ ॥ जो मरिबो पद सभनि को जाँ लगि साधु असाधु कवन हेतु उपदेस गुरु सत-सङ्गति भव बाधु ॥२५॥ . नास्तिक कहते हैं कि मरना अवश्य ही है तो खूब खा पौ लो गुरु और माधुओं के सङ्ग से क्या लाभ होगा। इन मतों का वर्णन करके खण्डन करेंगे। जो मरना माधु भले और अमाधु बुरे सब के लिये अवश्य है तो किस लिये लोग गुरु से उपदेश लेते हैं और संसार के सुख विलास को रोकनेवाले सत्मङ्ग को भी किस लिये करते है अर्थात् यदि इन से कुछ उपकार नहीं है तो क्याँ दुःख उठाना ॥२५॥ जी भाबी कछु है नही झूठो गुरु सत-सङ्ग । रेसि कुमति से छूट गुरु सन्तन को पर-सङ्ग ॥२६॥ जो किसी बात को भाबी नहीं है तो गुरु और साधुओं को सङ्गति से क्या लाभ है ऐसौं हौ कुबद्धि (और २५वें दोहे में कहीं कुबुद्धि) से लोगों से सद्गुरु और माधुओं को सङ्गति कूट जाती है क्योंकि उन को केवल भाग्य का भरोसा रहता है परन्तु वे यह नहीं समभाते कि भाग्य क्या बस्तु है। यदि बिचार करो तो यह बात * - पड सर्ग। प्रमाणित होती है कि जो कर्म पहले किये गये है उन्हीं के फल को भाग्य कहते हैं इस प्रकार कर्म ही प्रधान ठहरा तब तो गुरु पार साधुसङ्ग रूप कर्म अवश्य करने योग्य हैं। जब लोगों को पूर्वाक बुद्धि पाती है तब वे भला काम करते है और जब नहीं पाती तो उत्तम कर्म छोड़ केवल इन्द्रिय सुख के अधीन हो जाते हैं ॥२६॥ जौ खाँ लखि नाहौँ पड़त तुलसौ पर-पद प्राप। तो लगि मोह-बिबस सकल कहत पुत्र कहबाप ॥२७॥ जब तक मनुष्य को (पर-पद) श्रेष्ठ परब्रह्म और श्राप इन दोनों का भेद (बैतमत),अथवा पर-पद परब्रह्मरूप श्राप (अद्वैतमत) नहीं जान पड़ता, तभी तक मोह माया के अधीन हो कर मम लोग (पुत्र कह) अपने किये हुये कर्म वा बेटे को (बाप) पितास्वरूप अर्थात् सब सुख का कारण समझते अभिप्राय यह कि जब जीव और ब्रह्म का भेद, अथवा ब्रह्म और जीव का अभेद भली भाँत नहीं जान पड़ता तभी तक जौव संसार मे वद्ध रहते है। दितौयार्थ। जब तक जीवों को परब्रह्म परमेश्वर नहीं समझ पड़ता तभी तक वह माया के अधीन हो कर अपने लड़के वाले को साचा मानता है। ज्ञानी और भक्कों के लिये पुत्रादि मंसार में फमानेवाले होने के कारण अनुवत् जान पड़ते हैं ॥ २७ ॥ * (इस दोहे को चतुर्थ सर्ग के ७६ और ७७ के दोहों से मिना कर विचारना चाहिये ।) 34 २८८ तुलसो-मतसई। अह लगि सङ्ग्या * बरन-भौ मासु कह से होइ । ते तुलसौ सो है स-बल श्रान कहाँ कहु कोइ ॥२८॥ जहाँ तक संज्ञा (अर्थात् नाम है) मब (वरन-भव) अक्षर से उत्पन्न होती हैं मो वर्ण और मंज्ञा भी दूमी के मनुय्य हो के कहने अर्थात् उच्चारण करने से होती है। तुलसी कहते हैं कि वही यह पुरुष (म-बल) बलवान है और दूमग कहाँ से हो सकता अर्थात् दूसरा नहीं है। अभिप्राय यह कि सब कुछ इसी पुरुष के कहने करने से होता है यह अपने हाथ से जाल बिनता है और आप ही उस में फस जाता (अवश्यमेव भोकव्यम् कृतं कर्म शुभाशुभम् ) जो कुछ भला बरा काम किया जाता उसे अवश्य भोगना पड़ता है ॥२८॥ अपने नैननि देखि जे चलहिँ सु-मति बर लोग । तिनहिन बिपति बिखाद रुज तुलसौ सु-मति-सु-जोग ॥२९॥ तुलसौ-दाम कहते हैं कि (जे सु-मति पर लोग) जोर सुबुद्धि श्रेष्ठ लोग अपनी आँख से देख कर अर्थात् आत्मज्ञान और बुद्धि से बिचार कर चलते वा व्यवहार करते हैं उन को न बिपत न दुख और न पौड़ा होती है क्योंकि उन को (सु-मति-सु-जोग) अपनी उत्तम बुद्धि का बड़ा सहारा रहता है ॥ २८ ॥ निगा गगन-चर ग्यान बिनु करत नहीं पहिचान । पर बस सठ हठि तजत सुख तुलसौ फिरत भुलान

बड सर्ग।
२८
मृगा पशु और आकाश में उड़नेवाले पक्षी ज्ञान हौन हो कर न
जान सकते हैं और न यह बिचार करते कि आकाश में जल कहाँ से
हो सकता है परन्तु अज्ञान और लोभ के बश में हो कर सुख छोड़
कर मूर्ख हठपूर्वक इधर से उधर भटकते फिरते हैं ।
ग्रीष्म ऋतु में जैसे हष्णा के मारे दुपहरिये को
धूप
मृगे को
जल-सौ जान पड़ती है और वह उस के पीछे दौड़ता है ऐसी ही कुछ
दशा संमारी जीव को है। भ्रमरूप संसार को सत्य ममम इस में
फम कर दुख उठाता है ॥ ३० ॥
कहा कहाँ तेहि तोहि को जेहि उपदेसहु तात ।
तुलसौ कहत सु-दुख सहत समुझ रहित हित बात
॥३१॥
(तात तेहि कहा कहौं ) हे प्यारे उस को क्या हम कहें (जेहि
तोहि को उपदेसह) जिस ने तुम को (संसार में फमने का) उपदेश
दिया । (हित बात समुझ रहित) हित अर्थात् हितकारी माधुओं को
बात को ममझ से रहित हो के बड़े दुख को सहते हो । अथवा
(हित समुझ रहित) कल्याण को बुद्धि से होन अर्थात् मृगहष्णा में
पड़े रहने की बात को तुम से कह कर जिस ने तुम्हे सिखलाया उम को
मैं क्या कह । जिम गुरू के उपदेश से विषय हष्णा में डवा है उस
उपदेश देने और तेरे से उपदेश लेनेहारे दोनों को मैं क्या
कहं । तुम दोनों धन्य हो ॥ ३१ ॥
बिनु काटे तरु-बर जथा मिटै कौन बिधि काहि
त्यौँ तुलसी उपदेस बिनु निह सन्सय कोउ माहि॥३२॥

२० तुलसी-सतसई। जिस प्रकार बिना वृक्ष के काटे उस को छाया किसी प्रकार नहीं मिट सकतौ उसी रौत सद्गुरु के उपदेश के बिना कोई नि:संशय अर्थात् मन्देह रहित नहीं हो सकता। संशयरूपी राक्षसौ सब को ववश किये है बिना भले गुरु के उपदेश के वह क्यों कर दूर हो सकती है इस कारण भले के उपदेश को आवश्यकता सब को है॥३२॥ अपना करतब बापु लखि सुनि गुनि पापु विचार। ता तोहि को दुख-दा कहा सुख-दा सु-मति अधार॥ अपने किये को बू आप बिचारे और उसे सुन विचार कर सोचे तो तुझे दुख कहाँ हो सकता है अच्छौ बुद्धि हो सुख की खान है। जो कोई सुबुद्धि से सोच विचार कर काम करता है उस को कोई नहीं हो सकता यहाँ वहाँ दोनों ठौर सुख ही सुख मिलता है। केवल सुकर्म कर के ईश्वरार्पण कर देना चाहिये फिर तो राम जी शाप ही तेरी सहायता करेंगे ॥३२॥ ब्राह्मन बर बिद्या-बिनय-सुरुति-बिबेक-निधान । पथ-रति अनय-अतीत मति सहित दया सुति-मान १वें दोहे में कर्म की महिमा दिखा कर अब प्रत्येक वर्ण का कर्म कहते हैं। ब्राह्मण (बर) वर्गों में श्रेष्ठ है उस को विद्वान भम्र और बेद के ज्ञान से पूर्ण होना चाहिये। सत्पथ में प्रौति रक्खे और पनौति से अपनी बद्धि को दूर किये रहे और दया युक्त हो कर बेद को माने।

बहस। अथवा जो ब्राह्मण विद्या, ममता, विवेक और मत्पथ में प्रौति रको पनौति से बुद्धि को दूर करे और भेद प्रमाण सहित दया का करने- वाला हो वह श्रेष्ठ है॥३४॥ बिनय छच सिर जासु के प्रति पद पर-उपकार । तुलसी से छची सही रहित सकल-व्यभिचार ॥३५॥ क्षत्री का कर्म कहते हैं। नम्र हो और कत्र अर्थात् प्रजात्रों को दुख से बचानेहारा राज छत्र जिस के शिर पर विराजे और सदा दूसरों की भलाई करे और सब प्रकार के व्यभिचार, ब्राह्मण को दौ भृमि छौनना, परस्त्रीगमन आदि दोष से रहित हो, वही ठौकर क्षत्रौ है ॥ ३५ ॥ बैस्य बिनय मगु पगु धरै हरै कटुक बर बैन । स-दय सदा सुचि रुचि सरल ताहि अचल सुख ऐन। वैश्य नख रहे अपने मग गौ की सेवा व्यापार श्रादि में चले और कटवाक्य छोड़ मधुर भाषण करे। सदा दयावान् पवित्रता में प्रौति रकबे और मौधा व्यवहार करनेहारा हो उसे अचल सुख को खान जाममा चाहिये जहाँ "सचिसरलता हिये सदा सुख ऐन" पाठ हो वहाँ उस के पदय में सब प्रकार की पवित्रता सौधापन हो और सदा आनन्द में रहे ऐसा अर्थ करना चाहिये ॥ ३६ ॥ सूद्र छुद्र पथ परिहरै हिदय विप्र-पद मान । तुलसौ मम समता सु-मति सकल जीव सम जाना३७॥

तुलसी-सतसई।
शूद्र नौचे मार्ग चोरी चमारौ
बुरा
काम वा थोड़े धन से मत-
वाला होना अादि पाप युक्त
मार्ग को छोड़ देवे हृदय
से
ब्राह्मण के
चरण में अत्यन्त प्रेम करे। अपने मनसे सब जौनों को समान समझ
कर सब में मम बुद्धि रकले और आप भी बुद्धिमान हो ॥ ३ ॥
हेतु बरण बर सुचि रहनि रस निरास सुख-सार ।
चाह न काम-सुरा न रम तुलसी सुद्रिद विचार॥३८॥
(बर) श्रेष्ठ बरण के जो २ कारण कहे हैं उन में और पवित्रता
में बसे अर्थात् तदनुसार व्यवहार करे और रम अर्थात् १ काम
२ क्रोध ३ लोभ ४ मद ५ मत्सर ६ मोह इन छश्रो शत्रओं को
निराम करे अर्थात् त्याग देवे और काम कामनारूपी मदिग में
रमण न कर चाह को छोड़े और अपने विचार को दृह रकबे तो
(सख-मार) सुखौ होने को मुख्य बस्तु ( मार ) को पा चका, ऐसा
कह सकते है॥३८॥
जथा-लाभ सन्तोख-रत ग्रिह मग बन सम रौति ।
ने तुलसी सुख-मय सदा जिन तन बिभव बिनौति॥३६॥
मो
कुछ
मिले उसी में मन्तोष रकवे और घर में रह कर भी बन
बासी माधु समान रौत-नौति से चले अथवा ग्रह में ग्टहस्थ के नियम
और बन में बानप्रस्थ आश्रम की रौत से व्यवहार करे, वे हौ सदा
सुखमय सुखरूप हैं और ऐश्वर्य और मम्रता उन्ही कौ परौर में
विराजती हैं ॥ ३६॥

घटसर्ग।
रहै जहाँ बिचरे तहाँ कमी कह कछु नाहि
तुलसौ तह आनन्द सँग जात जथा सँग छाँह ॥४॥
ऊपर के दोहे में कहे लक्षण का मनुष्य जहाँ रहे वहाँ हो सुख से
बिहार करे किसी स्थान में उस के लिये किसी बात को कमतौ
नहीं। तुलसी कहते है यद्यपि उसे सुख को अधिक इच्छा नहीं तो
भौ उस के संग २ श्रामन्द परछाही के समान धूमा करता है। सदा
अानन्दस्वरूप होने के कारण सब स्थान में वह सुखी रहता है ॥४॥
करत तरक जेहि को सदा से मन दुख दातार ।
तुलसी जी समुझे नहीं तो तेहि तजइ बिचार ॥४१॥
केवल तर्क वा अनुमान से दुख मान लिया है इसौ से मन में
दुख
होता है मन जिस २ विषय पर धावता है यदि उसे उन्ही पर
जाने दौजिये तो
दुख
को मौमा न रहेगौ सदा दुख बढ़ता हो
जायगा। यदि दुख को विचार पूर्वक दुख न ममझे तो दुख अवश्य
इसे छोड़ देवे॥
दूसरा अर्थ। (जहि कौ) जिस बस्तु को (तरक) कामना सदा
करता है वही मन को दुख देती है तो जो इस के मन में किसी
बात को कामना ही नहीं तो क्यों कर दुख हो सकता है। जो मन
में समझ कर विचार करे तो कामना को त्याग कर दे फिर कुछ
दुख नहौँ ॥ ११॥
कहत सुनत समुझत लखत तेहि त बिपति न जाइ।
तुलसौ सब बिलग है जो लगि नहिँ ठहराइ॥४२॥

तुलसी-सतसई। जवनक विषय सुख की बात कहता सुनता समझता और देखता और जब तक उस से अलग हो कर नहीं ठहराता है तब तक इस का दुख दूर नहीं हो सकता ॥ दूसरा अर्थ। जब तक इन सब मंमारी जालों से अलग हो कर परम तत्व को नहीं ठहराता है (तब तक) कहने पुराणादि वाँचने सुनने समझने और देखने से इस का दुख नहीं दूर हो सकता। अभिप्राय यह कि मदा संसार हो को चिन्ता आदि में लीन रहने पादि कारणों से जीवात्मा इन्ही में फमा रहता है ॥ ४२ ॥ सुनत कोटि कोटिन कहत कौड़ी हाथ न एक । देखत सकल पुरान सुति ता पर रहित बिबेक॥४३॥ कडोरो ग्रन्थ सुनता और कहता है परन्तु एक कौड़ी भर ज्ञान हाथ महौं लगता। सब पुराण और वेद को देखता फिरता है तो भौ विवेक तत्व ज्ञान हौन हौ बना है बिना हरिभक्ति वा तत्वज्ञान के सब सुनना कहना लाभदायक नहीं होता जैसे बिना व्यापारादि किये कहने सुनने से धनवान नहीं हो सकता वही दशा जीव को है॥ ४३ ॥ समुझत है सन्तोख धन या ते अधिक न श्रान । गहत नहौँ ता ते कहत तुलसी अवुध मलान॥४४॥ समभाता है कि सन्तोष सर्वोत्तम धन है इस से अधिक और कोई धन संसार में सुखदाई नहीं परन्तु उसे (मन्तोष को) ग्रहम षष्ठ सर्ग २७३ नहीं करता दसौ से तुलमो कहते हैं कि मनुष्य अज्ञानी और दुखौ बना रहता है। कैसा भी धनौ क्यों न हो जब तक उसे सन्तोष न होवे वह अधिक धन लाभ के लिये दुखौ हो बना रहता है, वही दशा जीवात्मा को है॥४४॥ कहा होत देखे सुने सुनि समुझे सब रौति । तुलसी जौ लगि होत नहिं सुख-दराम-पद-प्रौति॥४५॥ सब रौतों को देखने सुनने और सुन कर समझने से क्या होता है। जब तक श्रीरामचन्द्र के सुखदाई पद में प्रेम न हो, सब पुराण शास्त्र आदि का देखना समझना बिना भक्ति के व्यर्थ है॥४५॥ कोटिन साधन के किये अन्तर मल नहि जाइ। तुलसी जौ लगि सकल गुन सहित न करम नसाइ॥४६॥ कड़ारों उपाय करने से भी भौतर का मल नहीं जाता है जब तक सब (तौनाँ) गुणों के मक्षित कर्म नष्ट न हो। कर्म को फाँस में पड़ कर मनुष्य जनमता मरता है और दुख सुख का भागी होता है, इसके नष्ट हो जाने से जड़ टूट जाती है। ज्ञान और भक्रिरूपी अग्नि से जब जीव सब कर्मों के फलों को जला देता है तो वह मुक्त होता है, नहीं तो इसे भले बुरे कर्मों का फल भोगने के लिये अनमना ही पड़ता है॥ ४६ ।। चाह बनी जो लगि सकल तब लगि साधन सार। ता मह अमित कलेस कर तुलसी देखु बिचार ॥४७॥ 35

२७४
तुलसी-सतसई।
जब तक इस जीव को चार स्त्री पुत्रादि की कामना बनी है तब
तक मकल माधन पुराण पाठादि तीर्थ व्रतादि इसे मुख्य बान
पड़ते हैं और उमौ चाह में अनेक बड़े दुख भरे हैं अर्थात् यज्ञ-
क्रिया से स्वर्ग होता है परन्तु भोग इच्छा पूर्ण होने के पहले हो वहाँ
से गिरना पड़ता है। तुलमो दास कहते हैं कि इस को खूब बिचार
कर देख लो॥ ४०॥
चाह किये दुखिया सकल ब्रह्माऽऽदिक सब कोइ ।
निश्चलता तुलसी कठिन राम क्रिपा बस होइ॥४८॥
दसौ चाह के वश हो कर सब लोग दुखी है और किस को कहिये
ब्रह्मादि देवता भी इस के अधीन होने से दुख पाते हैं। तुलसी
कहते हैं निश्चलचित्त वा कामना-हौन-होना अत्यन्त कठिन है,
रामचन्द्र
को
दया
से होता है॥४८॥
अपनो करम न आपु कह भला मन्द जेहि काल ।
तब जानब तुलसी भई अतिसय बुद्धि बिसाल ॥४६॥
जिस समय अपना काम अपने से भला बुरा न जाना जाय
अर्थात् कामना-होम होने के कारण अपने करतब की भलाई बुराई
का फल अपने को न मिले तब जानना चाहिये कि अपनी बुद्धि
बहुत बड़ी हुई क्योंकि अपने करतब की बुराई भलाई का भोका
यह होगा तो दूस का अवश्य कल्याण होगा ॥४८॥
तुलसौ जो लौँ लखि परत देह प्रान को भेद।
तो लगि कैसे कै मिटइ करम अनित बहु खेद ॥५०॥

षष्ठ सर्ग। २०५ है? तुलसी-दास कहते हैं कि जब तक (देह प्रान को भेद) देह को भी यह प्राण हो का एक भेद अर्थात् प्राण हौ का एक अङ्ग समझता है (बस्नुतः देह क्षेत्र है और आत्मा क्षेत्रज्ञ है देह जड़ है श्रात्मा चैतन्य है जब तक प्राणवायु देह में है तभी तक इसे सुख दुःख का ज्ञान होता है प्राण के निकल जाने पर देह में कुछ भी ज्ञान नहीं रहता इस कारण देह और प्राण दोनों भिन्न २ पदार्थ हैं, मो न समझ देह हौ को प्राण का एक भेद समझता है) तब तक कर्म से उत्पन्न अनेक प्रकार का दुख किस प्रकार मिट सकता है अर्थात् कभी नहीं मिट मकता ॥ ५० ॥ जोइ प्रान सेो देह है प्रान देह नहि दोइ । तुलसौ नो लखि पाइ है सो निरदय नहि होय॥५१॥ अन्वय | जो प्राण देह मो न है (हि) प्राण देह दोइ । तुलसी जो (यह ) लखि पाद है मो नहि निरदय होय । जो प्राण हैं मो देह नहीं है प्राण और देह निश्चय कर दो है' इस भेद को जो कोई समझेगा तुलसी कहते हैं कि वह कर नहीं होगा। प्राण और देह दोनों भिन्न र पदार्थ हैं ये कभी भी एक नहीं हैं यदि कोई एक देह से पाप करेगा तो उसे दूसरे देह पाने पर भी अवश्य भोगना होगा क्योंकि देह के साथ प्राण और कर्म कभी भी नष्ट नहीं होते ऐमा जो समझेगा कभी क्रूर न होगा। क्योंकि तब उम को उर बना रहेगा कि यदि हम इस देह से किसी के साथ वह २७६ तुलसौ-सतत्तई। क्रूरता करेंगे तो वह दूसरे देह में मुझसे भी क्रूरता कर बदला लेवेगा॥ दूसरौ र टौकाओं में जो देह और प्राण को एक होने का अर्थ किया गया है सो बहुत ही अमङ्गत जान पड़ता हैं क्योंकि तुलसौ-दास ऐसौ शास्त्रविरुद्ध बात नहीं कहंगे ॥ ५१ ॥ तुलसौ तै झूठो भयो करि झूठे सँग प्रौति । है साचो है साँच जब गहै राम की रीति ॥५२॥ तू (परमेश्वर का रूप हो कर ) झूठौँ में अपनी प्रौति लगाने के कारण अर्थात् झठे शरीर को भी प्राण सम सत्य जानने के कारण झूठा होगया है, मो जब (माँच है) मच्चा हो कर रामचन्द्र को रौत अर्थात् सब को ममभाव से देखना ग्रहण करे तो तू भी मचा हो जाय । अथवा तुलसी अपने मन को समझा रहे हैं कि हे मन! तू अपने शरीर अपने परिवार के शरीर श्रादि अनेक झूठे पदार्थों के साथ प्रेम करके झूठा बन गया है। तू केवल अपने अंश राम से स्नेह कर तो मचा हो जावेगा ॥ ५२ ॥ झूठी रचना साच है रचत नहीं अलसात । बरजत हूँ भगरत बिहठि नेकु न बूझत बात ॥ ५३ ॥ तू मचा हो कर झूठौ रचना रचता फिरता है और इस काम में पालस्य नहीं करता । जो कोई तुझे मना करता है तो उस से उलटे तर्क वितर्क कर बाद बिवाद करता है और बात को कुछ भी नहीं समझता॥

घष्ठ सर्ग अभिप्राय यह कि झूठे शरीर को सच्चा समझ चौरामी योनि में घूमा करता है, और दून शरीरों को कोई झूठा कहे तो उस से झगड़ने को तैयार हो जाता है ॥ ५३ ।। करम खरी कर मोह थल अङ्क चराचर जाल । भरत हरत भरि हरि गनत जगत ज्योतिसौ काल ॥ ५४॥ जगत में समय जो है वही एक ज्योतिषी है वह कर्मरूपी खरी को अपने हाथ में लिये है और मोहरूपी भूमि पर चराचर जीव- रूपी श्रद्धा को (भरत) बढ़ाता है (हरत) घटाता है (हरि भरत) फिर घटाकर बढ़ाता है। अर्थात् जीव लोग अपने कर्म के अधीन हो कर इस समय के द्वारा बार २ जनमते मरते रहते हैं। जिस प्रकार कोई ज्योतिषी किसी अङ्क वा हिसाब को खरौ से लिखता है फिर मिटाता है फिर लिखता है और जब तक वह हिसाब खूब ठीक नहीं हो जाता तब तक लिखता मिटाता रहता है, वही दशा दूस जीव को है यह समयरूपी ज्योतिषी के बश में तब तक जनमा मरा करता है जब तक इस कौ कर्मरूपौ खरौ नष्ट नहीं हो जाती॥ ५४ ॥ कहत काल किल सकल बुध ता कर यह व्यवहार । उतपति-थिति-लय होत है सकल तासु अनुहार ॥५५॥ हक्ष पक्ष । (अङ्कुर मूल) कालरूपी वृक्ष कोई बौज से अङ्कुर

तुलसौ-सतसई।
निकल कर कोई (मूल) केवल मोर हो रोपने आदि से सब समय
के अनुसार फूलते फलते हैं और फल कर नष्ट हो जाते हैं।
द्वितीयार्थ। (मकल बुध) सब ज्ञानी लोग कहते हैं कि (किल)
निश्चयकर (ता काल कर यह व्यवहार) उमौ काल का यह सब
प्रपञ्च है कि (तासु अनुहार ) उस के अनुसार (उतपति-थिति-लय
होत है) दूस जगत की उत्पत्ति, पालन और नाश होता है।
अर्थात् उत्पत्ति के समय में ईश्वर ब्रह्मा हो कर सृष्टि करता है फिर
विष्णु हो कर पालन करता और (समय पा कर) अन्त मैं रुद्र हो कर
मंहार करता है। सब कुछ समय के अनुमार होता है। सत्ययुग, त्रेता,
द्वापर, कलियुग भी अपने २ अवसर के अनुसार पाते रहते हैं ॥५५ ।।
अङ्कुर किसलय दलबिपुल साखा-युत बर मूल ।
फूलि फरत रितु अनुहरत तुलसौ सकल सतूल ॥५६॥
प्रथम (बर मूल) उत्तम दृढ़ कर्मरूपी मूल वा जड़ पड़ती है
तब उस में से अकुर निकलता तब पत्ता (विपुल किशलय युत शाखा)
फिर पूरे पल्लव के महित शाखा उत्पन्न होती है जो अपने (रितु
अनुहरत ) ऋतु के अनुसार फूल कर फल उत्पन्न करती है (दूस
प्रकार कर्म की कहानी) (मकल मल) मब प्रकार वृक्ष के तुल्य
है। अब कर्मरूपी वृक्ष का मूल एक वार अङ्कुरित हुआ तो जिस
प्रकार एक हक्ष वा एक बौज से अनेक बौज और दक्ष फैल जाते
है और उस का नाश करना कठिन हो जाता है उसी प्रकार कर्म
का बन्धन है जिस से कूटना अति कठिन हो जाता है ॥ ५६ ॥

घछ सग। २७६ कहतब करतब सकल तेहि जाहिरहित नहिं श्रान। जानन मान न पान बिधि अनूमान अभिमान ॥५७॥ कहना करना सब समय के अनुसार होता है जिस के बिना और कुछ नहीं है अर्थात् समय हो पा कर कर्मरूपौ वृक्ष फलता है और दूसरे प्रकार न जानना और न मानना चाहिये क्योंकि इस विषय में दूसरा अनुमान करना केवल अभिमान है। काल सब कर्म का आधार है इस में सब पदार्थ उत्पन्न होते स्थिर रहते और नष्ट हो जाते हैं । द्वितीयार्थ प्रात्मपक्ष । (जाहि रहित भान नहि) जिस से होन और कोई वस्तु नहीं है (सकल तहि कहतब करतब) सब उसी का कहना करना है वही शरीर में रह कर कहता और कर्म करता है जब शरीर प्रात्मा से हीन हो जाता है तो इस में कहने और करने का सामर्थ नहीं रहता दूम कारण सब करने धरनेवाला वही है परन्तु देहाभिमानी जौव (अभिमान) अभिमान करके (श्रान बिधि अनुमान न जान न मान) दूसरे प्रकार अनुमान करता अर्थात् अपने देह हो को कर्ता मान लेता है और मुख्य कर्ता को न जानता और न मानता है॥५॥ हानि लाभ जय बिजय बिधि ग्यान दान सनमान। खान पान सुचि रुचि अरुचि तुलसी बिदित बिधान॥ ५८॥ हानि, लाभ, जीत, हार, बिद्या, दान, श्रादर, खाने पीने का आनन्द, पवित्रता रूचि अरुचि सब काल पा कर अपने कर्म के अनुसार तुलसौ-सतसई। होता है और दमौ प्रकार (बिधान) सब को विधि होने का प्रकार जाना गया है ॥ ३८॥ सोलक पालक सम विखम भरम मगन गति ग्यान। अट घंट लँट नटनादि जहँ तुलसौ रहित न जान ॥ ५९॥ अवय । मालक पालक सम विसम भर्म मगन ज्ञान गति अट लट घट नटनादि जर (लगि) तुलमी (काल) रहित न जान । दुख देनेहारा पालनेहारा, माधु और कठोर, धम में गिरने वा ज्ञानगति में पड़नेहारा ज्ञानी होना (पट) सब योनि में घूमनेहारा, (घट ) घट कर एक योनि में रहनेहारा, (लट ) बर्त- मान ही जन्म में स्थिर अर्थात् उसौ में फिर जन्म पानेहारा, और (नटनादि) नट आदि की योनि में पड़ कर नाटक करने और नाचने- हारा, यह सब जहाँ तक हैं तुलसी कहते हैं कि दून से रहित जीव को नहीं जानना चाहिये अर्थात् जीव दून सब योनि और अवस्थाओं को अपने कर्म के बशीभूत काल के अधीन हो कर भोगता है काल के अनुकूल ये सब होते हैं। जहाँ “रम भ्रम गम गति ग्यान अट लट नट नादि जट" पाठ हो, वहाँ नौचे लिखे प्रकार अन्क्य और अर्थ करना चाहिये। 8 वर्तमान जन्म १ दुःखद । २ योनि जन्म । ३ छोटा होना । में रहना। ५ अपने से रहित न समझ ।

घष्ठ सर्ग अन्धय । मोलक पालक मम विखम रम (आदि) नादि म जान (अर्थात् नान्त जान ।) रमन, धमन, गमन, ग्यान गति, अटन, घटन, लटन, नटन, जटम । दुखदाई, सुखदाई, माधु, दुष्ट अर्थात् (जीव) कभी दुखदाई कभी सुखदाई कभी भला कभी बुरा होता है। रम श्रादि शब्दों को (नादि न जान) नकारादि न समझो अर्थात् नकारान्त जानो जैसे (रमन) कभी कौड़ा करता, घूमता फिरता, चलता, तौौँ में घूमता कम होता छोटा बन जाता एक हौ योनि में बर्तमान रहता, वा रोग से लटकर दुबला पतला हो जाता नाचता दूसरी बस्तु में जड़ा जाता इत्यादि अवस्थाओं से रहित जीव को न जानना चाहिये अर्थात् काल और कर्म के अधीन नौव इन सब अवस्थाओं को भी भोगता है। किसी किसो टीकाकारों ने जो "नकार के आदि लगा के" कह- के श्रादि शब्द का अन्त अर्थ समझा है वह अमङ्गत जान पड़ता है और दूसरे अर्थ में कल्पना का गौरव भी है अभिप्राय दोनों का एक ही है ॥ ५ ॥ कठिन-करम-करनी-कथन करता कारक काम । काय-कष्ट-कारन करम होत काल सह साम ॥ ६ ॥ कर्म के कामों का वर्णन करना कठिन है (करता) करनेहारा (कारक) करानेहारा काम ही है। (काल सह) समय पा कर कर्म अर्थात् अपनी करनी हो ( काय कष्ट कारन) शरीर के केश को करनेहारी अर्थात् दुखदाई और (माम कारन ) शान्ति करने- 36 २८२ तुलसौ-सतसई। वाली अर्थात् क्लेश को दूर करनेहारी भी होती है। अपनी करनी मुख्य है पुन्य करते समय पाप और पाप करते समय पुन्य हो जाता है जैसे राजा दक्ष ने शुभ यज्ञ में शिव का अपमान किया, राजा नग ने गोदान करते समय दूसरे ब्राह्मण को गौ दूसरे को दे दी, अजामिल अपने पुत्र को पुकारते समय तर गया इत्यादि । अभिप्राय यह कि कर्मों का जाल बड़ा भयङ्कर है इस से छूटना कठिन है दूस कारण सर्व कर्म त्याग उत्तम है। दूस दोहे में ककार को श्रावृत्ति अनेकवार होने के कारण वृत्त्यनुप्रास स्पष्ट झलकता है॥६०॥ चित रत बित बोहार बिधि अगम सुगम जय मौच। धौर धरम धारन हरन तुलसौ परत न बीच ॥६१ ॥ अन्वय। चित वितरत, वैौहार विधि (रत), सुगमजय (रत), अगम मौच (रत), धौर धरम धारन (रत), हरन (रत), तुलसी बौच न परत। कर्म की प्रेग्ना के अनुसार (चित्त) मन (कभौ) (वितरत) धन के कमाने में लगता है। (कभी) अनेक प्रकार के संसारी व्यवहार में फिर (सुगम जय) अच्छे प्रकार लोगों को जीत कर अपने अधीन करने में तत्पर होता और कभी (अगम मौच) अनजानी मृत्य पाता है। कभौ धौरता और धर्म को धारन करता है कभी (हरण) उन्हें छोड़ देता है अर्थात् अधौर और अधर्मी हो जाता है (बौच न परत) और कुछ अन्तर नहीं पड़ता, दून अवस्थाओं में किमो न किमी के बीच मन अवश्य रहता है और ये सब दशा कम के कारण काल पा कर मनुष्यों में प्रगट होती रहती हैं। को ७

षष्ठ सर्ग।
२८३
द्वितीयार्थ। मन धन में लौन रहने के कारण अनेक प्रकार के
व्यवहार में लगता है जिन में जय होना कठिन परन्तु पराजय
सुगम है। जो लोग धैर्य धर्म श्रादि को धारण करते है उन के
जय में और जो लोग धैर्य धर्म को हरण करते उन के पराजय
में बौच नहीं पड़ता है अर्थात् धौर का जय अधौर का पराजय
अवश्य होता है।
जहाँ अगम निगम जय मौच पाठ हो वहां (अगम निगम
पद से ) मन वेद पुराण के विचारने में लगता है ऐसा अर्थ करना
चाहिये ॥ ६१॥
खरब पातमा-बोध बर खर बिनु कब हु न होइ।
तुलसी खसम बिहीन जे ते खर-तर नहिँ साइ॥२॥
(बर पातमा बोध खरब) उत्तम श्रात्म ज्ञान अति सूक्ष्म है (खर
बिनु कब हुँ न होइ) जब तक मनुष्य अति (खर) ज्ञानाग्नि द्वारा
पापरूप सब मल जलाकर निर्मल न हो तब तक आत्मज्ञान उसे
नहीं हो सकता। तुलसी कहते है कि जो लोग (खमम) राम वा
गुरु स्वामी से रहित हैं वे (खर-तर) अति सूक्ष्म बुद्धि नहीं हो सकते
अर्थात् सद्गुरु जब तक न मिले तब तक आत्मज्ञान का होना
बड़ा कठिन है।
अभिप्राय यह कि या तो ज्ञानाग्नि द्वारा सर्व विध कर्म को जला
डाले (जो अति कटिन है ऐसा आगे कहेंगे) अथवा श्रीगमरूप प्रभु
को दया से सर्व पाप मुक्त हो तब मुक्ति का भागी हो सकता है॥३२॥

२४ तुलसी-सतसई। सबद रूप बि-बरन बिसद तासु योग भव नाम । करता नर बहु जाति तेहि सया सब गुन-धाम ॥६॥ शब्द का रूप विशेष (बरन ) अक्षर हैं सो निर्मल हैं और उन्हीं के योग से नर ऐसा कर्ता नाम बना है मो नर अनेक जाति के हैं और वही नर संज्ञा सब गुणों का घर है अर्थात् नर हो अपने कर्म से भला बुरा कहाता है। द्वितीयार्थ। शब्दब्रह्म का रूप वर्णहौन है अर्थात् उम का कोई रूप नहीं और रूप रहित हो कर भी वह शब्द निर्मल है उमौ बाणी के योग से संसार का नाम भव हुत्रा मो इस संसार का कर्ता नर ही है इसी को करनी से यह संमार में बन्धता है और अनेक जाति वा योनि में भरमता है और नाम पा कर सब गों का श्राश्रय होता है। हतीयार्थ। अन्वय । सब्दरूप बिबरन नर विसद तास योग भव माम, कर्ता सब गुणधाम (नर) मंग्या तेहि बहु जाति। सब्द, रूप, रम, गन्ध और स्पर्श के रूप से बिबरन भिन्न जन रहता है सो निर्मल है और इन के योग में जब रहता वा इन से मिल जाता तो (भव) उत्पत्ति होती है अर्थात् जीव नाना योनि में धमता है। कर्ता जीवात्मा है और अनेक गुणों के आश्रय मनुष्य को अनेक जात होती है॥६॥ नाम जाति गुन देखि कै भएउ प्रबल उर भर्म । तुलसी गुरु उपदेस बिनु जानि सकै को मर्म ॥६४॥ नाम सुन कर और जाति तथा गण को देख कर इस के मन में पछ सर्ग २८५ (अपने ही कम में) बहुत बड़ा भ्रम हुआ है सो तुलमी कहते कि बिना सद्गुरु के उपदेश के इस का भेद कौन पा सकता है अर्थात् बिना भले गुरु के मिले इस भ्रम से कोई भी नहीं कूट सकता। अभिप्राय यह कि कहीँ २ भला नाम उत्तम जाति ब्राह्मण श्रादि गुण सुशीलता उदारता आदि को देख कर पदार्था में जीव को भ्रम हो जाता है जैसे हनुमान जी को हुआ था परन्तु जब गुरु शिक्षा देते हैं तो उस का ठीक २ मर्म जाना जाता है जैसे “मुनि न होड़ यह निसिचर घोरा" यह वाक्य सुन कर हनुमान जी को राक्षम का ठौक ज्ञान हुत्रा ॥६४॥ अपन करम बर मानि कै पापु बंधेउ सब कोइ । कारज रत करता भण्उ श्रापु न समुझत सेोइ॥६५॥ सब लोग अपने कर्म को (बर) अच्छा समझ कर श्राप से श्राप बन्ध गये हैं अर्थात् कर्म को फाँस में पड़े हैं। (करता कारन रत भण्ड) करनेवाला जीव अपने कर्म के अधीन हो गया है और वह अपने मुख्य रूप परमेश्वर को नहीं समझता है। अर्थात् जौब ऐसा कर्म के वशीभूत हो गया है कि इस को यह ज्ञान नहीं है कि मैं परमेश्वर का एक अंश हूं परन्तु कर्ममय हो रहा है ॥६५॥ करता कारन को लखै कारज अगम प्रभाव । आजह सेो तह तह हरख तुलसी सहज सुभाव॥६६॥ कर्ता जो है वही सब कर्म का कारण है क्योंकि इम के बिना किये कोई काम नहीं होता इस बात को (को लखे) कौन विचारता है?

२
तुलसी-सतसई।
अर्थात् कोई नहीं सोचता परन्तु कार्य का प्रताप बड़ा भारी हो रहा
है क्योंकि जो जहाँ है सो वहीं अपने साथ उत्पन्न स्वभाव से (हरख)
प्रसन्न है। कर्म को फाँस में ऐमा मन है कि जिस अवस्था में है
उसी में यह जौब अपने को सुखौ मानता है।
अभिप्राय यह कि जौब कामना और बामना महित हो कर सब
काम में हर्षित रहता है यदि बासना हौन हो कर काम करे तो
बन्धन में न पड़े इस के विरुद्ध जिम योनि में पड़ा उसी में मग्न देख
पड़ता है दूसौ लोक के दुख में उबा है परलोक को उसे
कुछ
भी
सुध नहीं है ॥६६॥
तुलसौ बिनु गुरु को लखे बर्तमान बिपरीत ।
कहु केहि कारनते भएउ सूर उसिन ससि सौत॥६॥
बिना
सद्गुरु
के वर्तमान समय को परस्पर विरुद्ध बातों को
कौन समझ सकता है। कहो किस कारण से सूर्य उष्ण और चन्द्र
ौत हुये। जो २ बातें प्रतिदिन देख पड़ती हैं उन के भौ तत्व को
समझना बिना गुरु कृपा के नहीं हो सकता और बड़ी बातों के
ममझने को कौन कहे जहाँ "वर्तमान विधि रौत" पाठ हो तहाँ
वर्तमान इस समय को क्या रौत है यह भी बिना उपदेश नहीं
जानौ जातो ईश्वर ने जिस को जो गण दे कर जैसे स्वभाव का कार्य
करने को कहा वह
वैमा हौ करता
है सूर्य उष्ण और चन्द्र शौत
उमौके करने से हुये है यथा रामायण में "अहिप महिप जह
लगि प्रभुताई। योग मिद्धि निगमागम गाई । करि बिचार जिव
देखा
नौके । राम-रजाय
शोश मभ हो के" ॥६॥

पठ २८७ करता कारन करम तँ पर परमा-तम ग्यान । होत न बिनु उपदेस गुरु जी पढ़ बेद पुरान ॥८॥ कर्ता करनेहार, जौब । कारण माबाप और कर्म दून तौनों से (पर) परे (परमा-ऽऽतम ज्ञान) परब्रह्म परमेश्वर का ज्ञान है मो बिना गुरु के उपदेश के नहीं हो सकता चाहे कोई कितना भी बेदाँ और पुरानों को पढ़े। पहले दोहे में प्रत्यक्ष वस्तुओं के तत्त्वज्ञान का होना गुरु उपदेश बिना असम्भव दिखा कर इस दोहे से ब्रह्मज्ञान के होने का अत्यन्त असम्भव दिखलाया ॥ ६८ ॥ प्रथम ग्यान समुझे हिये बिधि निखेध बौहार। उचिता-ऽनुचितहिँ हेरिहिय करतब करइ सम्हार॥ई (प्रथम बिधि निखेध वैाहार समझे) पहले किस काम करने को आज्ञा शास्त्र में है और किम के करने का निषेध है इस व्यवहार को समझे (हिय उचिता-ऽनुचित हेरि) फिर अपने मन से उचित और अनुचित को देखे वा बिचारे (हिये ग्यान सम्हारि करतब कर) तब ज्ञान को हृदय में धारण कर के अथवा सम्भारि सावधान हो कर कर्म करे॥ ६॥ जब मन मह ठहराइ बिधि खौ-गुरु-बर-परसाद । प्रहि बिधि परमा-ऽऽतमलखे तुलसी मिटइ बिखाद॥७॥ (सौ-गुरु बर आदि) श्रीगुरुदेव को दया से जब (मन मह प्रति विधि ठहराय) मन में यह बिधि शास्त्रोक्त प्रकार स्थिर हो जाय तब श्रेष्ठ गुरु की कृपा से परमात्मा का ज्ञान होता है जिस से सब २७ तुलसी-सतसई। (विषाद) दुःख का नाश हो जाता है। इन दोनों दोहों में कहे प्रकार से राजा जनक के समान ज्ञान दृष्टि से कर्म करे तो कर्म के बन्धन में न पड़े॥७॥ बरबस करति बिरोध हठि होन चहत अक-हीन। गहि गति बक-हक-स्वान इव तुलसी परम प्रबौन॥७१॥ (तुलमो अपने मन से वा संमारौ मनुष्य से कहते हैं कि अपर को रौत को छोड़ कर) (परम प्रबोन) तू ऐसा बुद्धिमान (व्यङ्ग अर्थात् अबुद्धिमान) है कि बकुला हुण्डार और कुत्ते के समान चाल ग्रहण कर के (अर्थात् कपट, क्रूरता और लोभ के वशीभूत हो कर भौ) व्यर्थ हठ कर के झगड़ता है और "क-हीन" (न के सुर्ख यस्य) दुःख से रहित अर्थात् सब दुःख से हौन हो मुक्ति पा ईश्वर में मिलना चाहता है यह असम्भव है। जहाँ (अंक-हौन अर्थात् देह रहित) पाठ हो वहाँ शरीर-हौन हो कर परब्रह्म का रूप होना चाहता है ऐसा अर्थ करना चाहिये ॥ १ ॥ आक करम भेखज बिदित लखत नही मति-हीन । तुलसौसठ अक-बस बिहठि दिन दिन दोनमलौन॥७२ (करम) अपने किये कर्म के अनुसार जौव (प्राक) दुःखौ है (भेखन विदित) इसका औषध जाना हुआ है (मति-हौन) परन्तु बुद्धिहीन होने के कारण (लखत नहीं) पहचान नहीं सकता। तुलसी दास कहते हैं कि यह (मठ) मूर्ख हठ कर के (अक) दुःख के अधीन, वा यदि "क-बस हठि” पाठ हो तो भाग्य के अधीन, हो कर जन्म पाता है दूसौ से (दिन २) प्रति दिन कर्म के बढ़ने के कारण (दोन) दुःखौ और मलौन होता जाता है।

घष्ठ सर्ग। २८९ रामभजन सत्मङ्गति श्रादि उपाय प्रायः सभी जन जानते हैं परन्तु दुस प्रकार माया को जाल में फसे है कि उन को न कर और और काम करते हैं और उन्ही (क्रियमाण ) किये जाते कर्म के अनुसार अनन्त जन्म मरण के दुख में पड़े रहते हैं ॥ ७२ ॥ करता हौ तें करम-जुग से गुन-दोख सरूप । करत भाग करतब जथा होइ रक किन भूप ॥ ७३ ॥ (जुग कर्म) बिहित शास्त्र में कहा और निषिद्ध शास्त्र में बर्जित दोनों कर्म (कर्ता हौ ते ) करनेवाले हौ से किये जाते हैं अर्थात् दोनों को कर्ता ही करता है परन्तु वह कर्म (गुन-दोख सरूप) एक गुन कारक और दूसरा दोषकारौ है। (तथा ) सो जिम प्रकार के करतब को जो करता है उसी प्रकार का भोग उसे करना पड़ता है चाहे करनेहारा दरिद्र हो वा राजा हो । उस को अपने भले बुरे कर्म के फल को बिना भोगे छुटकारा नहीं। अवश्यमेव भोतव्यम् कृतं कर्म शुभाशुभम् । भले बुरे कर्म का फल इस जौव को अवश्य ही भोगना पड़ता है ॥ ३ ॥ बेद पुरान सास्त्र जत हु तत बुधि-बल अनुमान। निज करि करि करिहै बहुरि कह तुलसी परिमान ॥७४॥ बेद पुराण और शास्त्र जितने हैं सब बुद्धि के बल से अनुमान करते हैं कि (निज करि करि बहुरि करिहै) जौवं अपनी हौ करनी कर के फिर करेगा अर्थात् जो कर्म इसने किया है उस का 37 २९० तुलसौ-सतसई। फल भाग्य कहलाता है और उमो भाग्य के अनुसार वह दूसरे जन्म में फिर करता है इस प्रकार उमौ को करनौ उस से काम करातौ है अर्थात् कर्म हौ प्रधान है दूसौ को प्रमाण समझना चाहिये क्याँकि "कर्म प्रधान विश्वकरि राखा-जो जम कर मो तम फल चाखा।" जहाँ "निज निज करि करिहै" पाठ हो वहाँ अपना २ कर के (करिहै) संमार हौ का काम करते हैं अर्थात् संसारौ धन दारा में लौन रहते हैं पुराण आदि के कथन अनुमार नहीं चलते यह अर्थ करना चाहिये ॥ ४ ॥ बिविध प्रकार कथन करै जाहि जथा भौ भान। तुलसौ सु-गुरु प्रसाद-बल कोइ कोइ कहइ प्रमान॥७॥ (जाहि जथा भान भौ बिबिध प्रकार कथन करे) जिस को जैसा समझ पड़ा उस ने उस प्रकार कहा यही नाना प्रकार के मत का कारण है। परन्तु (सु-गुरु) सच्चे गुरु वा रामरूप गुरु की कृपा से जो कोई २ कहते हैं वही कहना प्रामाणिक है॥७॥ उर डर अति-लघु होन को भी लघु-सुरति भुलानि । स्वरन लाहु लखि परतनहिँ लखतलाह की हानि॥७६॥ यह मंसारौ जौब (उर अति लघु होन को डर) मन में छोटा होने से बहुत डरता है परन्तु ( लघु सुरति भौ मुलान ) छोटे रूप बाले संमार को माया में भूला है इस पर एक दृष्टान्त देते है कि जैसे किमी मनुष्य को थोड़े दिन के लिये पारस मिला उस समय लोहा बड़ा महगा था सो वह लोहे के मंहगे होने के कारण अपने

घष्ठ सग।
२६१
२
अधिक दाम के लोभ में ऐसा डूब गया कि उस को (स्वर्ण-लाह
नहि लखि परत) मोने के लाभ का कुछ भी ज्ञान वा बिचार
नहीं होता है परन्तु (लखत लोह को हानि) बार २ यही बिचारता
कि लोहा बड़ा महंगा है किस प्रकार खरौदें। ऐसा विचारते २
जिस का पारस था उस ने ले लिया। ऐसी ही दशा इस जीब को है
कि यह पारस रूप आत्मा पाये है परन्तु संमार मायारूपौ लोहे के
मोह में पड़ा है मंसार को अब छोड़ते हैं ऐसा विचार करते
अन्तसमय आ जाता है फिर इसौ में पड़ा रह जाता है परमेश्वर के
भजन में नहीं लगता ॥ ७६ ।।
नयन-दोख निज कहत नहिं बिबिध बनावत बात।
सहत जानि तुलसौ बिपति तदपि न नेक लजात ॥७॥
अपने ज्ञानरूपौ नेत्र का दोष तो यह जौब कहता नहीं और
अनेक प्रकार का तर्क बितर्क कर के बात बनाता है। जान बूझ कर
बिपत और दुख में पड़ा हुआ भोग रहा है तो भी थोड़ा नहीं
लजाता॥
जैसे किसी मनुष्य को आँख में रोग जत्रा हो और वह मारे
लाज के उस दोष को बैद्य से न कहे परन्तु जानता हो और उस के
कारण अनेक दुख भोगता रहे वैसे ही यह देहाभिमानौ जोष
सब दुख सह कर संसारौ जाल में फसा है ॥ ७७ ॥
करत चातुरी मोह-बस लखत न निज-हित-हान ।
सुक मरकट इव गहत इठ तुलसी परम-सुजान ॥७८॥

२६२
तुलसौ-सतसई।
माया के अधीन हो कर अपनी चतुराई प्रगट करता है परन्तु
अपनी भलाई को हानि को नहीँ बिचारता। फसानेवालों के कम्पा
और पिञ्जड़ा श्रादि में बन्ध जानेहारे सगे और बानर के समान
हठ पकड़े हुये है और अपने को बड़ा ज्ञानी समझता है। यह
जौब आप हौ से अपने को संसारौ माया में लपेटे है और देव का
दोष देता है संसार के ऐश्वर्य को कमाने में अपनी चतुराई कर के
बड़ाई ज्याँ २ पाता है त्याँ २ और जाल में फंसता है ॥ ७८ ॥
दुखिया सकल प्रकार सठ समुझि पड़त तेहि नाहिँ।
लखत न कण्टक मौन जिमि असन भखत भ्रम माहि
यह जौब संसार में फंसने के कारण सब प्रकार से दुखी है परन्तु
यह पुत्र कलत्रादि को माया में ऐसा लिप्त है कि इस को दूस का
दुख कुछ भी नहीं समझ पड़ता है ठीक वैसे ही जैसे मछली जब
बंसी के चारे को निगलती है तो उस को उस चारे में सुखदाई
भोजन का भ्रम हो जाता है और वह उस के भौतर के काटे को
मही देखतो परन्तु उमौ से वह मछली मारनेवाले के बन्धन में पड़
जाती है। इसी प्रकार संसारौ माया मनुष्य को दुखदाई नहीं समझ
पड़तौ परन्तु दूमौ माया में पड़कर यह जन्ममरण के महादुख में
पड़ता है॥ ७॥
तुलसी निज मन-कामना चहत सून्य कह सेइ ।
बचन गाय सब के विविध कहहु पयस केहि देव ॥८॥

घड सर्ग।
शून्य की सेवा कर के यह अपना मनोरथ पूरा करना चाहता है
मो इस का होना असंभव है क्योंकि बातरूपो गौ सब के अनेक है
परन्तु उन से किसी को दूध नहीं मिला ॥
तात्पर्य यह कि नश्वर संसार शून्य के सम' है दूस में लिप्त रह कर
कोई परमारथ की इच्छा करे तो वह केवल बात को गाय का
दूध चाहता है जो असम्भव है ॥ ८० ॥
बातहि बात हिँ बनि पड़े बातहि बात नसाय ।
बातहिँ आदिहिं दीप भौ बाहिँ अन्त बताय ॥८॥
जौब को जड़ता दिखा कर अब ८१ के दोहे से बात को मामी
का वर्णन प्रारम्भ करते है ॥
बात हौ से बात बनती है जो भली भाँत बात करते बने तो
बात ठौक होती है और बात हौ से बात नष्ट हो जाती है। अथवा
एक बात माधु सेवा ईश्वर भजन है जिस से मनुष्य का परलोक
बनता है दूसरी बात संमार में लिप्त होना और पाप करना है जिस
से नरक में जाते हैं ईश्वर भजन से बहुतेरे तर गए हैं और
संसार में लगने से बहुत से दुःखी हुए हैं। (दौप श्रादि हि बात
हि भौ)
दौया प्रथम
बायु
से ही उत्पन्न हुआ फिर अन्त को
बायु
हौ के द्वारा नष्ट हो गया। निर्वायु स्थान में दौप नहीं बल सकता
उसी प्रकार अधिक बाययुक्त स्थान में बुझा जाता है अथवा एक बात
शब्द का अर्थ (बाती समझ के) बत्ती किया तो बत्तौ के रहने से
दीपक बलता और बायु से बुझ जाता है ॥ ८॥

तुलसौ-सतसई।
बातहि तैं बनि आवही बातहि तें बन जात ।
बातहि ते बर बर मिलत बातहि ते बारात ॥८२ ॥
बात हौ से (घर हौ में) (बनि श्रावही) मनुष्य का परलोक
बनता है अर्थात् घर रह कर भी अच्छा काम करे तो उम को बन
जाती है और बात हौ से मनुष्य बन में जाता है। बात ही से
(बर) श्रेष्ठ (बर ) बरदान मिलता है और बात हौ से लोग बौरा
जाते हैं अर्थात् बात हौ भले बुरे का कारण है।
द्वितीयार्थ। भलौ बात कहने से लोग बहुत धन पाते और
सुखी होते हैं और बात हो से बनी बनाई बात भी बिगड़ जाती
है। वा बहुत बोलने से (बर-बर) बकवादौ कहाता है। आधे का
अर्थ जैसा का तैमा रहा ॥ २ ॥
बात बिना अतिसय बिकल बातहि ते हरखात ।
बनत बात बर बात ते करत बात बर घात ॥३॥
लोग बात (बचन वा बायु) के बिना बड़े दुख में रहते हैं
और बात हो (बचन वा बायु) से बड़े सुखी होते है। (बर बात
तें बात बनत) अच्छे बचन से ( बात ) काम बनता है और ( बात
पर घात करत ) बात हो से (बर) अपनी इच्छा मनोरथ नष्ट
हो जाता है अर्थात् काम बिगड़ जाता है। जैसे ब्राह्मण बालक को
रक्षा रूप बात अर्जन से न बनी इस कारण व्याकुल हुये शवरी
जटायु श्रादि से बात बनौ इस से राम प्रसन्न हुये इत्यादि अनेक
उदाहरण
।
है ॥ ३॥

घठसग। २६५ तुलसौ जाने बात बिनु बिगरत हर एक बात । अनजाने के जानि पड़े कुसलात ॥४॥ बात बिना ( बात ) ठीक २ तत्त्व के जाने सब काम विगड़ता है और जब तक वह तत्त्वरूपी बात नहीं जानौ गई तभी तक दुख है परन्तु जब वह जान पढ़ौवा जानी गई तब अनेक प्रकार के प्रानन्द होते हैं। द्वितीयार्थ। तुलसी-दास कहते हैं कि बात को बिना समझे बुझे करने से सब बात बिगड़ जाती है जैसे राजा दशरथ ने बिना बिचारे ऋषिकुमार को मारा उस के मातापिता से श्राप पाया बिभीषण ने समझ बूझ कर राम को शरण लो इस कारण उस को कुशल हुई इन कई एक दोहो में बात २ बनि २ श्रादि पदों के अनेक बार आने से अनुप्रास अलङ्कार है॥८४ ॥ ॥ प्रेम बैर, अरु पुन्य अघ, जस अपजस, जय हान। बात बीज इन सभन को तुलसी कहहिँ सुजान ॥५॥ ( तुलमौ सुजान कहहिं ) कबि तुलसौ दास वा तु. राम-लक्ष्मण और मौ० सौता के जाननेहारे भकलोग कहते हैं। कि ( प्रेमादि-दून मभन को बात बीज) प्रौति वा मित्रता बैर शत्रुता पुन्य धर्म अघ पाप यश-सुकौर्ति और कुकौति जौत और हार दन सबों का कारण केवल बात है। इसी बात के कारण लोग भले बुरे सब होते है इस से मधुर सत्य श्रादि बचन बोलना चाहिये प्रीति का उदाहरण जैसे विभौषण सुग्रोबादि, बैर का रावण कुम्भकरण-

तुलसी-सतसई।
श्रादि पुन्य जैसे
जटायु ने तिरियागुहार किया रावण ने परस्त्री
हरण किया। यश अपयश रामचन्द्र ने पिट आज्ञा पालनरूप महा
यश पाया दशरथ ने स्त्री की बात पर उन्हे बन भेज कर दुर्यश
फैलाया जौतने योग्य परशुराम और बालि से करते न बना
हारगये। श्रीकृष्ण को दयासे महाराज युधिष्ठिर ने दुर्योधन श्रादि
दुर्जेय शत्रुओं को भी जीत लिया इत्यादि ॥ ८५ ॥
बञ्चक-विधि-रत नय-रहित बिधि हिन्सा अति लौन।
तुलसी जग महँ बिहित बर नरक निसेनी तीन॥८६॥
( बञ्चक बिधि ) दूसरे को ठगने को रौत (नय-रहित ) परस्त्री
गमन परनिन्दा श्रादि अनौत करनेवाले (हिन्सा विधि अतिलौन )
हिन्सा के काम में बहुत लवलौन रहनेहारे ( ये तीन जग मह
बर नरक निसेनौ बिदित) ये तीनों संसार में बड़े नरक का चिन्ह
प्रसिद्ध है अर्थात् जिन लोगो में ये तीनो बातें पाई जाय उन को
जानना चाहिये कि नरक में से आये हैं और मरने पर वहाँ
हो जायँगे॥८६॥
सदा भजन गुरु साधु विन जीउ-दया सम जान ।
सुख-द सुनय-रत सत्य-ब्रत स्वरग सप्त सोपान ॥८॥
गुरु साधु और ब्राह्मण को भक्रि और सब जीवों को अपने
समान जान कर उन पर दया करना और सुख देनेहारी सुन्दर नौति
में और सत्यता और व्रत में प्रौति रखना ये सातो खर्ग को मौढ़ी है।
अर्थात् जिनमें ये
गुए
है वे मरने पर अवस्य स्वर्ग में जायेंगे॥८७॥

बड सर्ग। जे नर जग गुन-दोख-जुत तुलसी बदत बिचार। कबहुँ सुखौ कबहूँ दुखी उदय अस्त बेोहार ॥८॥ (उदय अस्त बेश्रोहार) जब तक सूर्य उदय और त्रस्त होते हैं। अथवा जब से संसार का उदय जन्म हुआ है और जब तक प्रस्त अर्थात् नाश होगा तब तक यही व्यवहार है कि जो मनुष्य संमार के गुण वा दोष में लगे रहते है अर्थात् विधि निषेध का काम किया करते तुलसौ-दाम बिचार के कहते है वे कभी सुखी कभी दुखौ हुआ करते हैं और जन्म मरन के फन्दे में पड़े रहते हैं। द्वितीयार्थ। जग जे नर गुन-दोख-जुत तुलसौ बदत ते कबहुँ सुखौ कबहूँ दुखौ यथा उदय अस्त बेत्राहार । पहले वर्ग और नरक का चिह बता कर अब दोनों का चिह कहते हैं कि संसार में जो लोग गुण और दोष दोनों से महित हैं बे कभी र सुखौ कभी दुखी रहते हैं जैसे सूर्य के उदय के समय बहुतेरे सुखौ और प्रस्त में दुखी होते वा दिन को भला और रात को बुरा काम करते हैं ॥८॥ कारज जुग के जुगल तम काल अचल बलवान । विविध बिबल ते ते हठहि तुलसी कहहि प्रमान॥८॥ (कारण जुग) दो काम है अर्थात् एक विधि और दूसरा निषेध वा विहित अविहित (युगल के तम) मो दोनों तमरूपी हैं क्योंकि भले बुरे दोनों प्रकार के काम मनुष्य को भोगने पड़ते हैं (काल 38 २९७ सुजसौ-सतसई। । अचल बलवान) समय बड़ा बलौ और अचल है क्योंकि काल पा कर दोनों कमी के फल का उदय होता है। (त्रिविध विबल) तौल विशेष बल हैं अर्थात् सत्त्वगुण, रजोगुण, और तमोगुण जिन से (हठहि) अभिमानी हो कर जौव कर्मों को भोगता है यह प्रमाण है। अथवा काल युग बलवान है सत्ययुग में मब लोग भला हौ काम करते थे और कलि में बुरा काम करते हैं इस प्रकार दोनों युगों को प्रेरणा से भला बुरा कार्य हुत्रा करता है ॥८॥ अनुभव अमल अनूप गुरु कछुक सास्त्र-गति होइ। बचइ काल क्रम दोख तें कहहि सु-बुध सब कोइ॥१०॥ जिस को (अमल अनुभव) निर्मल बिबेक हो और (अनुपम गुरु) अतुल्य गुरु उपदेश देनेहारे मिलें और कुछ २ शास्त्र का भौ बोध हो वह काल समय और (क्रम) कर्म के दोष से बच सकता है ऐसा (सुबुध सब कोई कहहि) सब अच्छे २ विद्वान लोग कहते हैं। अभिप्राय यह कि बिरले विद्वान लोग जो बुरा काम मब रौत त्याग करते और भला काम कामना-हौन हो कर करते है वे ही संसार के बन्धन से कूटते है नहीं तो छूटना बड़ा कठिन हैं ॥ ८०॥ सब विधि पूरन धाम बर राम अपर नहिँ धान । जा की क्रिपा-कटाच्छ तें होत हिये द्रिढ़ ग्यान ॥९॥ सब प्रकार से पूर्ण अर्थात् सकल ऐसय्य सम्पत्र (बर धाम) अत्यन्त तेजश्वी (अपर) बिस से बड़ा और कोई नही ऐरे राम जी पड सर्ग। २९६ (श्राम नहि) और कोई नहीं हैं अथवा (अपर पान नर्सि) और दूसरा कोई नहीं। उन्ही की कृपा-दृष्टि से (हिये) मन में दूर उत्तम ज्ञान होता है अर्थात् गुरु-भाव से उन को सेवा भक्ति करने से जीव ज्ञान पाता है तब कर्म और काल के बन्धन से छूटता और किसी को सेवा से मुक्त होना कठिन है। पहले संमारो जाल से मुक होने की कठिनता दिखा कर अब अपने इष्ट देव औरामरूप भगवान की सेवा का उपदेश किया है॥ १॥ है सो स्वामी सो तर सखा सो बरसुख-दातार । तात मात आपद-हरन सो असमय-आधार ॥१२॥ वहौ राम खामो, बड़े मित्र, उत्तम सुख के देनेहारे,माता-पिता, बिपत के नाशक और कुसमय में रक्षा करने हारे हैं ॥२॥ सुख-द दुख-द कारन कठिन जानत को तेहि नाहिँ। जाने हु पर बिनु गुरु-क्रिपा करतब बनत न काहि॥१३॥ सुखदुख का देनेवाला कारन जो कठिन कर्म है उसे कौन नहीं जानता अर्थात् सभी जानते हैं परन्तु जाम कर भी बिना गुरु-देव की कृपा से (काहि करतब न बनत) किसी से कम नहीं बनता अर्थात् बिन सद्गुरु के मिले सत्कर्म को जो लोग जानते भी हाँ तो भी करते नहीं बनता। इस हेतु सद्गुरु करना बहुत श्रावश्यक । यज्ञ, तप, जप, तीर्थ भ्रमण, व्रताचरण, माधुसेवा, सत्मङ्ग, पात्र- दान, परोपकार आदि अनेक शाभ और परपौड़ा, छल, अभौति, तुलसौ-सतसई। हिंसा, डाह प्रादि दुखदाई काम हैं इन को प्रायः सभी लोग जानते हैं। परन्तु कम लोग शुभ काम में लगते हैं अशुभ की ओर बहुताँ को इच्छा दौड़ती है कभौर शुभ काम करते अशुभ और अशुभ करते शुभ हो जाता है। इस कारण गुरु का लखाना आवश्यक है के लखाने से मनुष्य पहचान सकते हैं ॥ ६ ॥ तुलसी सकल प्रधान है बेद-बिदित सुख-धाम । ता मह समुझब कठिन अति जुगल भेद गुन नाम॥६४॥ (तुलसी सुख-धाम सकल प्रधान है) तुलसी जी कहते हैं कि पूर्वोक शुभ कर्म सुख का मूल है सब बस्तुओं में प्रधान है बेदाँ ने भी शुभ कर्म को बड़ी प्रशंसा को है परन्तु उन का समझना इस कारण बहुत कठिन है कि उन के नाम और गुन में दो भेद हैं अर्थात् एक मकाम और दूसरा निष्काम शुभ कर्म भी यदि कामना सहित किया जाय तो करने हारे पुरुष को भोग में बाँधता हैं और निष्काम कर के ईश्वर को अर्पण करने से बन्धन नहीं होता इस प्रकार कर्म के नाम के गुणों में दो भेद है । अथवा पदार्थ के नाम गुन के दो भेद होते हैं जैसे मिश्रो बहुत उत्तम है तो भी कफवालों के लिये दुखदाई होती है ॥ ८४ ।। नाम कहत सुख होत है नाम कहत दुख जात । नाम कहत दुख जात दुरि नाम कहत सुख-खात॥६५॥ नाम के कहने से सुख प्रानन्द होता है और दुख चला जाता

सह सर्ग।
।
३०९
अर्थात् नष्ट हो जाता है फिर नाम के कहने से तौनो प्रकार के दुख
होकर ( सुख-खात) सुख के इद में अर्थात् मुक्तिरूप आनन्द
शरोवर को मनुष्य पाते हैं।
जहाँ (सुख जात दुरि दुख-खात) पाठ हो वहाँ संसारिक विषय
सुख दूर हो जाता और दुख भाग कर (खात) अर्थात् कन्दरे मजा
धुसता है ऐसा अर्थ करना चाहिये॥६५॥
नाम कहत बैकुण्ठ सुख नाम कहत अघ-खान ।
तुलसी ता ते उर समुझि करहु नाम पहिचान ॥१६॥
नाम हो के जपने से लोग बैकुण्ठ का सुख पाते और (अघ-खान)
पाप के ढेर को नसाते हैं इस कारण तुलसौ कहते हैं कि हे भक्तो!
अपने मन में भली भाँत समझ के नाम को पहचानो।
अथवा प्रविधि-पूर्बक नाम लेने से पाप होता है। विधान के साथ
नाम जपने के विषय में पद्मपुराण में लिखा है कि (दशापराधयुक्तानां
म भवेत्सौख्यमुत्तमम्) दश अपराधों (अर्थात् १ माधुनिन्दा, २ शिव-
रामभेद, २ शास्त्रनिन्दा, ४ गुरु अनादर, ५ नाम की महिमा में तर्क
वितर्क करना, ६ नाम को दूमरे कामों के करने का उपाय जनाना,
७ अभकको नाम का उपदेश, ८ नाममाहात्म्य सुन कर प्रसन्न न होना,
८ नाम जप के काममिद्धि, १० नाम के बल में पापाचरण) से जो
महित है उन को नाम जप से उत्तम सुख नहीं मिलता ॥८६॥
चारो चौदह अष्ट-दस रस समुझे भरि पूरि।
नाम भेद समझे बिना सकल समुझ महँ धूरि॥१७॥

तुलसी-खतसाई।
(चारो) ग, यजुः, साम और अधर्व चारो वेद । चौदह) ब्रह्म-
घाम, रसायन, राग, वेद, ज्योतिष, व्याकरण, धनुषविद्या, जलविद्या,
पिङ्गल श्रादि छन्द, कोकमार, सालिहोत्र नृत्य, मामुद्रिक, और
काव्य श्रादि बनाने में चतुरता ये चौदहो विद्या। मौन, भविष्यत्,
बायु, वाराह, वामन, ब्रह्म, ब्रह्माण्ड, गरुड, मार्कण्डेय, पद्म, विष्णु,
नारदीय, लिङ्ग, ब्रह्मवैवर्त, अग्नि, कूर्म, स्कन्द और भागवत ये
बाठारहो पुराण और मौमांसा, वैशेषिक, न्याय, माय, योग और
बेदान्त ये वो शास्त्रों को भली भाँत समझा अर्थात् वेदाँ के यज्ञ
कर्मकाण्ड आदि सब विषय चौदहो विद्या को चातुरी और छवाँ
दर्शनों की कल्पनाशक्ति और तर्क वितर्क करने की शक्ति श्रादि सब
गुणों से भूषित हुआ तो भी नाम के भेद को बिना समझे उस का
सब समझना व्यर्थ है क्योंकि सब वेद और विद्याओं का सारांश
राम नाम है जिस के ग्रहण श्रादि से मुक्ति मिल सकती है।
चौथे मर्ग के प्रारम्भ में "चौदह चारि अठारहो" आदि पहले दोहे
में चौदह विद्या वेद और पुराण को गिना चुके है यहाँ चौदह विद्या
से चौदह छोटी विद्या ली गई “अङ्गानि" आदि श्लोक में कहौ चौदह
विद्या नहौँ बोधित हुई।
इस दोहे को चतुर्थ मर्ग के प्रथम और पञ्चम मर्ग के भौ प्रथम
दोहाँ से मिला कर पढ़ना चाहिये जिस में इस दोहे और उन दोही
का परस्पर भेद समझ पड़े।८० ॥
बार दिबस निसि मास सित असित बरख परमान ।
उत्तर दच्छिन आस रबि भेद सकल मर जान ॥१८॥

सह सर्म। रबि, मोम, मङ्गल, बुध, हस्पति, शुक्र, शनि ये मातो बार दिन और राचि, चैत्र, वैसाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण, भादव, कुधार वा श्राश्विन, कार्तिक, अगइन, पौष, माघ, फाल्गुन ये बारह मास इन मामों के शाल और कृष्ण पक्ष बर्ष (बारह महीनों का समय जिस में छ मास उत्तरायण और छ दक्षिणायन ) में सूर्य जिस दिशा में रहते हैं वह अयन कहाती इस प्रकार सब बस्तुत्रों में भेद है। इन में भी कोई २ किमी र काम के लिये शुभ कोई किसी के लिये श्राम होते हैं। यथा आदित्य सोम बुध वृहस्पति और एक शुभ काम के लिये शुभ अशुभ के लिये प्रशभ होते हैं मङ्गल और शनैश्चर अशुभ कार्य के लिये शुभ और शुभ के लिये अशुभ होते हैं । दिन को भले काम और रात को बुरे काम करने का समय है। अगहन फाल्गुन ज्येष्ठ और भाद्र शुम और शेष शुभ । शक पक्ष शुभ के लिये और कृष्ण अशुभ के लिये शुभ होते हैं। उत्तरायन शुभ काम के लिये और दक्षिणायन अशुभ काम को शुभ इत्यादि भेद सब पदार्थों में है ॥२८॥ करम सुभा-सुभ मित्र अरि रोदन इसन बखान। औरभेद अति अमित है कह लगि कहिय प्रमाना कर्म शुभ प्राइम के भेद से दो प्रकार के होते हैं शुभ कर्म मित्र है और अभ शत्रु होता है शुभ करने हारे सुख पा कर ३०४ तुलसौ-सतसई। इसते हैं और अशुभ कर्म के कर्ता दुख पा कर रोते हैं। कर्मों के और भौ अमय भेद हैं दून के प्रमाण को मै कहाँ तक वर्णन करूँ॥ कोई २ टीकाकार अर्थ करते हैं कि कर्म शुभ और अशुभ उन में शुभ कर्म दो प्रकार के हैं एक सकाम दूसरा निःकाम । निःकाम कर्म अति उत्तम है कर्ता कर्म कर के परमेश्वर को अर्पण कर दे और उस से किसी फल को बामना न रक तो कर्म करने से कर्ता वह नहीं होता। मकाम कर्म भी यदि श्रीरामचन्द्र को प्रसन्नता के लिये किया जाय तो उस का भी फल उत्तम ही होता है। मित्र और शत्रु में भी भेद है सज्जनों को मित्रता बड़ौ सुखदाई और दुष्टो को दुखदाई होती है। रोने और हमने में भी भेद है। कोई रोना श्रानन्द से होता है जैसे पुत्र मित्र और स्त्री आदि के मिलन में अश्रुपात और रोमाञ्च होते हैं और इन्ही के वियोग में दुखदाई अश्रुओं को धारा चलती है इस प्रकार सभी कामों में भेद होता है॥८॥ जह लगि जन देखब सुनब समुझब कहब सु-रीत । भेद बिना कछु है नहीं तुलसौ बदहिँ बिनौत ॥१०॥ अन्वय । जन देखब, सुनव, समुझब, कहब कछु जाँ लगि है भेद बिना नहिं विनीत तुलसौ बदहि । मनुष्यों का देखना, सुनना, समझना, कहना जो कुछ जहाँ तक है बिना भेद के कुछ भी नहीं है। नम्र तुलसी दास कहते हैं कि सब भेद युक्र है सब में कुछ न कुछ भेद है।

षष्ठ सर्ग। देखने में भेद यथा देवताओं का दर्शन पुन्यदाई और अपवित्र बस्तुओं का देखना वा परस्त्री को पापदृष्टि से देखना पापकारी होता है। वेद आदि का भक्ति से सुनना भला और ठट्ठा और देष करने के लिये सुनना समझना बुरा है। भली बात को बुरौ और बुरौ को भलो समझ लेना दुख सुख का कारण होता है। भलौ बात को भले मनोरथ से कहना और उमौ को बुरी इच्छा से कहना वा शास्त्रादिक को अशुद्ध कहना दुखदाई शुद्ध सुखदाई होता है। इस प्रकार सब बस्तुओं में सुरीति और कुरीति हैं जिन में एक सुखदाई और दूसरी दुखदाई होती है मनुष्य को चाहिये कि सुखदाई रौत का ग्रहण करे जिस में सुखौ बना रहे। यही गुमाई जी का उपदेश है ॥ १० ॥ भेद याहि बिधि नाम महँ बिनु गुरु जान न कोय। तुलसी कहहिँ बिनौत बर जा बिरश्चिसिव होय॥११॥ इति गोखामितुलमौदासकृत सप्तमतिकायां ज्ञानसिद्धान्त- निरूपणन्नाम षष्ठः सर्गः॥ अन्वय । बिनौत बर तुलसौ याहि बिधि नाम मह भेद कहहिं जो बिरश्चि सिव होय (तो भौ) बिन गुरु कोय न जान । इस प्रकार नम्रों में श्रेष्ठ तुलसौ-दाम नाम अर्थात् परमेश्वर के राम इस नाम में भेद कहते हैं जिन्हें यदि कोई ब्रह्मा और शिव के समान होय तो भी बिना गुरु के लखाये नहीं जान सकता अर्थात् गुरु का उपदेश भेदों को समझने के लिये अवश्य चाहिये ॥१०१॥ ॥०॥ इति विहारिकृत मंक्षिप्तटोकायां षष्ठः सर्गः ॥०॥ 39 श्रथ सप्तम सर्ग। तिन हि पढ़े तिन हौँ सुने तिन हि सुमति-परगास। जिन आसा पाछे करी गहि अबलम्ब निरास ॥१॥ अन्वय । निरास अबलम्ब गहि जिन पासा पाछे करी तिन हिं पढ़े तिन हिँ सुने तिन हिँ सुमति-परगाम (भयो)॥ जिम मनुष्य ने निराश हो केवल अपनी (अबलम्ब) श्राशा रख के (विषय सुख कौ) सब प्रकार को श्राशा को छोड़ दिया उमौ ने पढ़ा उसी ने शास्त्र को सुना और उसौ (के हृदय में) भले बुरे को विचारने को सुबुद्धि हुई ॥ जिसने अच्छे २ लोगों से पढ़ सब धर्मशास्त्र पुराण आदि के उपदेशों को सुन कर भौ विषय सुख को श्राशा को न छोड़ा वह व्यर्थ परिश्रम करनेवाला है, उस को उस के पढ़ने सुनने का कुछ भौ फल न हुआ। द्वितीयार्थ और अन्वय । जिन निराम-अबलम्ब गहि त्रामा पाछे करी तिन हिँ पढ़ तिन हौँ सुने तिन हिँ सुमति-परगास (हुआ)। जिस मनुष्य ने (निराम) जिस को किसी को पाशा नहीं बरन जो आप हो सब को श्राशा का स्थान है उस परब्रह्म परमेश्वर की श्राशा (अर्थात्) भक्ति को दृढ़ता से पकड़ लिया और सब के आशा- भरोसे को त्याग कर दिया उसी ने सब शास्त्र पढ़ा सब बड़े ऋषियाँ सप्तम सर्ग। के उपदेश को सुना और उसी को (सुमति-परगास) उत्तम ज्ञान भी हुआ, क्योंकि रामायण में कहा है कि । "पागम निगम पुरान अनेका । पढ़े सुने कर फल प्रभु एका ॥ तब पदपङ्कज पौत निरन्तर । सब साधन कर यह फल सुन्दर" ॥ सब पढ़ने लिखने का फल यही है कि परमेश्वर में भक्ति होवे । जब जिस के लिये लोग पढ़ते लिखते हैं वही न हुआ तो पढ़ना लिखना किस काम का? ॥१॥ तब लगि जोगी जगत-गुरु जब लगि रहै निरास । जब आसा मन में जगी जग-गुरु जोगी दास ॥२॥ अन्वय । जब लगि निराम रहै तब लगि जोगी जगत गुरु (परन्तु) जब मन में श्रामा जगौ (तब) जगत गुरु जोगी दाम । योगी जब तक विषय सुख वा धन श्रादि को श्राशा से दूर है अर्थात् उस के मन में किसी बात को चाह नहीं है तब तक सिद्ध जगत का गुरु (हित का उपदेश करनेवाला) वा (जगत गुरु) संमार से बड़ा है परन्तु जब विषय सुख वा धनलाभ श्रादि किसौ विषय को श्राशा योगी के मन में उठी तो संसार अर्थात् समारो मनुष्य हो गरु “बाबाजी श्राप को लोभ "बावाजी श्राप को लोभ न करना चाहिये इत्यादि कह के” उपदेश देनेवाला वा योगी के हित की बात कहने के तुलसी-सतसई। समय ज्ञानी होने के कारण योगौ से भी श्रेष्ठ हुश्रा और योगी उस का दास त्रा। अभिप्राय यह कि सब प्रकार के सुख को छोड़ कर एक परमेश्वर कौ चिन्ता में लगे हुये जन ऐसे योगी से जो गेहत्रा धारण करने पर भी विषय के पौछ धौड़ा करता है बहुत अच्छे होते हैं। सब विषय त्याग हौ योगौ होने का फल है॥२॥ हित पुनीत स्वा-रथ सहिँ अहित असुचि बिनु चाड़। निज मुख मानिक सम दसन भूमि परत भी हाड़ ॥३॥ अन्वय । खा-रथ असुचि अहित मब हिँ पूनौत हित बिनु चाड़ असुचि अहित, दसन निज मुख मानिक सम भूमि परत हाड़ भौ। पहले के दो दोहों में संमारी विषयों में योगी को न लपटना चाहिये कह कर अब संसार के लोगों को स्वार्थ-परता श्रादि दिखा कर तीसरे दोहे में निराश रहने का कारण दिखाते हैं। संसार को यह रीत है कि जब तक अपना प्रयोजन रहा तब तक अशुद्ध और अनुपकारी भौ बस्तु पवित्र और हितकारी जान पड़ती है परन्तु (बिनु चाड़) प्रयोजन न रहने पर (असुचि अहित मुचि हित ) अपवित्र अनुपकारी और पवित्र उपकारौ जान पड़तौ हैं। इस विषय में दृष्टान्त देते हैं कि दाँत जब तक मुख में रहता है लोग उसे मणि के समान जानते है परन्तु भूमि पर गिरा लोग उसे हाड़ समझने लगे। खारथौ ममुव्यों को दृष्टि अपने प्रयोजन पर अधिक रहती है ज्याँ टट कर.

सप्तम सर्ग।
१०६
वस्तु के स्वाभाविक गण दोष पर वे अल्प ध्यान देते हैं। इन्हौं
कारणों से संसार में लिप्त होना और संसारी सुखों को श्राशा करना
योगी के लिये उचित नहीं है ॥३॥
निज गुन घटत न नाग-नग हरखि परिहरत कोल ।
गुज्जा प्रभु भूखन करे ता तें बढ़इ न मोल ॥४॥
कोल नाग-नग हरखि परिहरत (ता ते) निज गन घटत न प्रभु
गुज्जा भूखन करे (ता तें) मोल न बढ़द् ।।
अब यह शङ्का होती है कि यदि साधु संमार से कुछ भी सम्बन्ध न
रकलेगा तो कोई भी उस का आदर न करेगा, इस पर कहते हैं कि
कोल भिल्ल गजमुक्का वा मर्पमणि को त्याग कर देते हैं अर्थात्
जो पर्वत पर कोल के सन्मुख गजमुक्का पड़ा रहता है परन्तु वह
उस का गुण न जानने के कारण उसे नहीं उठाता प्रसन्नता से वहाँ
छोड़ देता है, तो इस कारण मोती का मोल कुछ घट नहीं जाता।
उसी रौत प्रभु श्रीकृष्ण भगवान ने घुघुचौ को गहना के स्थान में
धारण किया था इस से कुछ उस का मोल नहीं बढ़ गया। जो
बस्तु स्वाभाविक जैसी है वह वैसी ही रहती है।
अभिप्राय यह कि साधु जन को उत्तमता जैसौ को तैमो बनौ
रहेगी चाहे संमार के जन उन का आदर करें वा नहीं ॥ जहाँ
"हरखि न पहिरत" पाठ हो वहाँ श्रानन्द से नहौं पहिनते ऐसा
अर्थ करना चाहिये ॥ ४ ॥
देह कुसुम करि बास तिल परिहरि खरि रस लेत।
स्वा-शरथ-हित भू-तल भरे मन मेचक तन सेत॥५॥

२१ तुलसी-सतसई। अन्धय । (जन) कुसुम करि तिल बाम देव खरि परिहरि रस लेत भू-तल खा-रथ-हित भरे (परन्तु ) मन मेचक तन सेत॥ यदि कहिये कि संसार में साधु के गुण को चाहे कोई समझे चाहे न समझे संसार में लौन रहने से माधु को कुछ हानि न होगी तिस पर कहते हैं कि संसार केवल स्वारथौ है ।। संसारी जीव (तेल बनानेहारे) पहले फूलों के द्वारा तिल को बाम देते हैं जब उस में सुगन्ध भिन गया तो कोल्हू पर चढ़ा कर उसे पेर डालते हैं और उस में को खरी निकाल कर तेल को ले लेते हैं। संसार में ऐसे अपखार्थी लोग भरे हैं कि जिन का मन बड़ा मेला है परन्तु रूप सुन्दर देखने में स्वच्छ है ऐसे लोगों से हो रहने में कुशल है जहाँ सुमन पाठ हो वहाँ भी यही अर्थ होगा ॥ ५॥ असुअन पथिक निरास ते तट भुइँ सजल सरूप । तुलसौ किन बच्चे नहीं इन मरुथल के कूप ॥ ६ ॥ अन्वय । निरास पथिक असुश्रन ते तट भुइ मजन मरूप इन मस्थल के कूप (तुलमो) किन नहीं बच्चे। जल पाने की अभिलाषा से समीप गये और जल न पाने के कारण निराम हुये पथिक के आँसुओं से जिन के किनारे को भूमि जल के रूप देख पड़ती है ऐसे दून निर्जल स्थान (वा माड़वार देश) के कूपों ने तुलसी दास कहते हैं किन को नहीं उगा अर्थात् सभी को ठग लिया।

सप्तम सर्ग।
माड़वार श्रीदि निर्जल देशों में बड़े २ कूप देख पड़ते हैं परन्तु
उन के भीतर पात्र डालने से पानी नहीं मिलता वहाँ जा कर
निराश पथिक रोने लगते हैं और उन के नेत्र जल से कूत्रों के
किनारे थोड़ा जल देख पड़ता है परन्तु भौतर खाली है। इन्ही
कूपों के मदृश संसार के मनुष्य है कि ऊपर से देखने में बड़े अच्छे
देख पड़ते हैं परन्तु भौतर मन में कपट भरे हैं। ऐसे लोगों को
पहचानना बहुत कठिन है इस कारण दून से दूर हो रहना भला है।
द्वितीयार्थ। अन्वय। तट भूहूँ मजल मरूप मरुथल के दून कूप
किन बच्चे नहीं ते पथिक असुन निराम (भे)॥
(तट भूई) ऊपर को सोभा सुन्दर जल के रूपवाले इन विषय
सुखरूपी मरुस्थल के कूपों ने किन्हे नहौ ठगा अर्थात् सभी को
धोखा दिया क्योंकि वे पथिक जिन्हाँ ने इस विषय सुख को भला
समझ कर सेवन किया अन्त में दुख पा कर निराश हुये और
श्राँसू बहाया।
संमारौ रूप रस श्रादि विषय कूप के समान हैं क्योंकि जिस
प्रकार मरुस्थल के कूप के निकट पहुँचने पर निर्जल देख के पथिक
दुखौ होते हैं वैसे हो अन्त में दुखदाई ये विषय सुख भी हैं। यदि
संसार हौ को कूप माने तो पुन्य भूमि होने के कारण सर्वथा संसार
को मरुस्थल के
कूप के समान नहीं कह सकते क्योंकि बड़े २ ऋषि-
लोग भी संसार में पा कर पुन्य अर्जन करना चाहते हैं ॥६॥
तुलसी मित्र महा सुख-द सब हि मित्र को चाड़।
निकट भये बिलसत सकल एक छपा-कर छाड़॥७॥

३१२ तुलसी-सतसई। छठे दोहे तक सत्सङ्गति और विशेष कर संसार के विषय और विषयौ पुरुषों को मङ्गति का वर्णन कर के अब मित्रता का वर्णन प्रारम्भ करते हैं। अर्थ । तुलसी दास जी कहते हैं कि मित्र बड़ा सुख देनेहारा होता है और सब को मित्र बनाने की इच्छा रहती है और केवल (छपा, रात्रि कर) चन्द्रमा को छोड़ कर और सब लोग मित्र के निकट रहने से प्रसन्न होते हैं। जब चन्द्रमा और सूर्य एक राशि पर आते हैं तो चन्द्रमा को कला क्षीण हो जाती है दूस कारण उस को प्रसन्नता प्रगट होती है मित्र शब्द में रोष है अर्थात् उस के अर्थ मखा और सूर्य दो हैं॥ द्वितीयार्थ । तुलसी दास कहते हैं कि (छपा रात में है कर किरण वा हाथ जिम का अर्थात् ) रात को काम करने हारों को छोड़ जितने लोग हैं मब मित्र के निकट रहने से अानन्द करते और सुखी होते हैं और सब को मित्र को आवश्यकता भी होती है परन्तु बुरे कर्म करनेहारे चोर और व्यभिचारी अपने कर्म को अपने भले मित्र के सन्मुख वा सूर्य के प्रकाश में नहीं कर सकते दूस से रात हो उनको अच्छी लगती है कि अन्धकार में अपना कार्य सिद्ध करें।जहाँ सुख-प पाठ हो वहाँ सुख पानेवाला अर्थ करना चाहिये॥२॥ मित्र-कोप बर-तर सुख-द अन-हित मृदुल कराल । द्रुम-दल सिसिर सुखात सब सह निदाघ अति-लाला॥ मित्र-कोप सुख-द बर-तर अन-हित मृदुल कराल मिमिर म-दलसुखात निदाघ सब अति-लाल ।

सप्तम सर्ग। मित्र का क्रोध हितकारी होने के कारण सुखदाई और अधिक प्यारा होता है परन्तु शत्रु का क्रोध कोमल वा थोड़ा भी हो तो भी बड़ा भयकारी है क्योंकि उस से बड़ी बुराई हो सकती है परन्तु मित्र के क्रोध से बुराई का डर नहीं रहता इस विषय में दृष्टान्त देते हैं कि हिम ऋतु में वृक्षों के पत्ते सूखते हैं परन्तु गौम में उष्पता मह कर भी सुन्दर लाल लाल निकल पाते हैं । यद्यपि माघ में भौत पड़ता है तो भौ वृक्षों के लिये हितकारी न होने के कारण पाले से सब बेलबूटे जलने लगते हैं और चैत्र में वसन्त मृतु पाकर बैसाख जेठ में नये २ पतों से शोभित हो कर बड़े प्रसन्न से देख पड़ते हैं॥८॥ खल नर गुन मानै नहीं मेटहिँ दाता-आप । जिमि जल तुलसी देत रबि जलद करत तेहि लोप॥६॥ दुष्ट मनुष्य उपकार के गुन को नहीं मानते बरन दानी के प्रताप को चौण करते हैं इस विषय में कबि तुलसौ-दास जी दृष्टान्त दिखाते हैं कि जैसे सूर्य अपने किरण से मेघ के जल को बढ़ाते हैं और मेघ उन्हौं अपने सहायक का लोप करता है अर्थात् जब अाकाश मैं मेघ अपनी घटा को फैलाता है तो सूर्य नारायण को छिपा देता है। सूर्य के प्रकाश को ऐसा ढाप लेता है कि अन्ध- कार हो पाता है। अभिप्राय यह कि दुष्टौँ के साथ भलाई करने से भी अपनी

३१०
तुलसौ-सतसई।
बुराई होती है इस कारण दुर्जन को सर्वथा त्याग ही करना
चाहिये ॥४॥
बरखत हरखत लोग सब करखत लखत न कोय ।
तुलसी भूपति भानु-सम प्रजा-भाग-बस होय ॥१०॥
अब इस दोहे से राज-नौति का वर्णन करते हैं।
अन्वय । तुलसौ बरखत सब लोग हरखत (परन्तु) करखत कोय
न लखत प्रजा-भाग-वस भानु-सम भूपति होय ।
तुलसौ-दाम कहते हैं कि जब सूर्य मेघों के द्वारा श्राकाश से
पानौ बरमाने लगते हैं तो मुसलधार दृष्टि को देख कर सब लोग
बड़े प्रसन्न होते हैं परन्तु जब गैम ऋतु में अपने प्रचण्ड घाम से
अदृश्य वाष्य के द्वारा सब जल को सोख लेते हैं तो कोई नहीं
देखता है तुलसी कहते है कि प्रजा के भाग्य से इसी प्रकार राजा
सूर्य के समान होता है कि उस के किये प्रजा के उपकारी कामों
को देख कर सब लोग प्रसन्न हाँ और जिस के ऊपर कोप करें
उस के धन और सुख को ऐसौ रौत हरण करे कि कोई यह न
कह सके कि राजा ने अन्याय से यह काम किया वरन किसी को
जान पड़े और किसी को जान भी न पड़े नहीं तो इस को अधिक
दण्डदायौ समझ के लोग भक्ति न करेंगे ॥१०॥
माली-भानु-कसानु-सम नीति-निपुन महि-पाल ।
प्रजा-भाग-बस होहिंगे कहिँ कहिँ कलि-काल॥११॥

सप्तम सर्ग। ३१५ जिस समय माली सूर्य और अग्नि के समान राज-नौति में निपुन राजा कलि-युग में प्रजा के भाग्य से किसी किसी समय में हाँगे सब दिन इस प्रकार के राजाओं का होना अति कठिन है। अभिप्राय यह कि जैसे माली समय पर अपने उद्यान में वृक्ष लगाता है और समय पर मौंचता है और जब काटने छाँटने का काम पड़ता है तब काटता छाँटता है अपनी बाग को ऐसा ठौक रखता है कि अपने २ समय पर सब वृक्ष फलते फूलते हैं बेप्रयोजन कहीँ घाम पात काँटे झडबैर नहीं लगने पातौ इसी प्रकार राजा भौ प्रजा का पालन पोषण रक्षा और दण्ड जिस वस्तु की आवश्यकता देखता है उस समय वैसा करता है। सूर्य के गुण को दशवें दोहे में कह चुके हैं। अग्नि के समान तेजखौ कि स्पर्श करने से जला डाले, सब लोग उरा करें, कोई मारे भय के पाप न कर सके और शत्रु समीप न श्रा- सके। माम दान दण्ड भेद चारो उपायों से अपने शत्र को वश में रको। सूर्य के समान सब को निज निज काम में लगावे इत्यादि अनेक गुण राजा में होने चाहियें ॥१९॥ समय परे सु-पुरुख नरहिँ लघु करि गनिय न कोय । नायक पीपर-बौज-सम बचै तो तरुवर होय ॥१२॥ अन्वय। कोय समय परे सुपुरुख नरहि लघु करि न गनिय पौपर बौज मम नायक बचे तो तरुवर होय । किसी मनुष्य को ऐसा न चाहिये कि विपत्ति पड़ने पर भी ११८ तुलसी-सतसई। उत्तम वंशीय मनुष्य को छोटा समझे क्योंकि वह पुरुष पीपर को बौये के समान छोटा भौ पापत्ति से बचने पर बड़े वृक्ष के समान हो सकता है। अभिप्राय यह कि भले लोग विपत के कारण होन अवस्था में भी रहें तो भी उन को छोटा न समझना चाहिये क्योंकि श्रापद से छूटने पर फिर भी वे बड़े हो जाते हैं इस पर दृष्टान्त दिया है कि जैसे पौषर को बौया बचते २ बची और उस में से अकुर निकला तो उस से बड़ा भारी वृक्ष उत्पन्न होता है। जहाँ “सुपुरुष नरन” और “नाजुक” पाठ हो वहाँ अच्छे लोगों को और बहुत छोटा अर्थ करना चाहिये ॥१२॥ बड़े राम-रत जगत में कै पर-हित चित जादि। प्रेम-पयज निबही जिन्हे बड़ा सौ सब हो चाहि ॥१३॥ जगत में राम-रत बड़े के जाहि चित पर-हित (बड़े) प्रेम-पयज जिन्हें निबही वड़ो सो सब हो चाहि । संसार में राम के भक्त बड़े हैं अथवा जिस के मन में दूसरे को भलाई रहती है वे बड़े हैं परन्तु जिन को प्रेम कौ टेक निबहौ जाती है अर्थात् सदा राम के भक्ति में लौलौन रहते हैं और उन की प्रतिज्ञा पूरी होती है उन को सब से बड़ा मानना चाहिए। अभिप्राय यह कि इस जगत में सब से उत्तम काम रामचन्द्र को सप्तम सर्ग। । बाराधना है और उसी के कुछ २ ममान परोपकार भी है परन्तु प्रसाद के समान दृढ़ प्रतिज्ञा कर के परमेश्वर की भक्ति करना और संसार के सब कामों से इस काम को उत्तम समझना सब बातों से उत्तम गिना जाता है प्रहाद के समान दृढ़ भक ईश्वर को अत्यन्त प्यारे है ॥१३॥ तुलसी सन्तन तें सुने सन्तत यह विचार । तन-धन चञ्चल अचल जग जुग जुग पर-उपकार॥१४॥ तुलमी सन्तन ते यहै विचार मन्तत सुने जग जुग जग तन-धन चञ्चल पर-उपकार अचल । तुलसी दास कहते है कि मैंने माधुओ से सदा यही बिचार सुना है कि प्रत्येक युग में शरीर और ऐश्वर्य अस्थिर हैं परन्तु दूसरों को भलाई करना स्थिर रहता है। अभिप्राय यह कि स्त्री पुत्र, भाई बंधु, मित्र संगो, घर दार, हाथी घोड़ा, गहना कपड़ा, राज पाट जितने पदार्थ हैं सब थोड़े दिन में छूट जाते हैं कोई भी इस जीव के साथ नहीं जाता जब तक इन वस्तु ओं के साथ इस जीव का सम्बन्ध है तभी तक ये सब उस के कहाते हैं परन्तु दूसरे को भलाई करने का यश जौव के न रहने पर भी बहुत दिन तक जगत में रह जाता है। शिवि दधौधि इरिचन्द कहानी एक एक मन कहहि बखानी।

२१८ तुलसी-सतसई। राजा शिवि हरिश्चन्द्र और दधीचि आदि बहुत दिन पहले दूस संसार से उठ गये परन्तु उन के सुयश की कथा आज तक लोग कहते सुनते हैं ॥ १४ ॥ ऊँचहिँ प्रापद विभव बर नौहिँ दत्त न होइ । हानि ब्रिद्धि विज-राज कह नहिँ तारा-गन कोइ॥१५॥ ऊँचहिँ श्रापद नौचहि दत्त विभव बर न होद द्विज-राज कई हानि-ब्रिद्धि कोद तारा-गन नहि। बड़े लोगों को विपत्ति छोटे लोगो के दिये हुए ऐश्वर्य से नहीँ होती चन्द्रमा के कृष्ण पक्ष में घटने और शुक्ल पक्ष में बढ़ने को कोई तारा बढ़ा नहीं सकता द्वितीय अर्थ बड़े लोगों को बिपत्ति और सम्पत्ति छोटों को नहीं मिलती अर्थात् यदि कोई छोटा बड़े के साथ रहे और बड़े के ऊपर कोई दुख था पड़े तो छोटे को नहीं लग सकता इस में दृष्टान्त देते हैं जैसे चन्द्रमा का शुक्ल पक्ष में बढ़ना और कृष्ण-पक्ष में घटना तारा-गर्गों के विषय में सुखदाद और दुखदाद नहीं होता अर्थात् चन्द्रमा के तेज को घटतौ बढ़तौ से तारों के तेज की घटती बढ़ती नहीं होती। अभिप्राय यह कि बड़ों को मंगत सदा करना चाहिए यह न डरना चाहिये कि जन के दुख सुख का धक्का मुझे लगेगा। बड़ों का दुख सुख छोटौँ से सम्हाला नहीं जा सकता है बरन छोटों के दुख सुख सप्तम सर्ग। के को बड़े लोग महज में घटा बढ़ा सकते हैं इस कारण सदा बड़ो को सङ्गति करनी चाहिए ॥१५॥ बड़े रतहि लघु के गुनहिँ तुलसी लघुहिँ न हेतु। गुञ्जा त मुक्ता अरुन गुञ्जा होत न स्वेत ॥ १६ ॥ तुलसौ लघु के गुनहि बड़े रतहिँ लघुहि हेत न मुक्का गुञ्जा तें अरुन ( होत ) ( परन्तु) गुना खेत न होत ॥ तुलमी-दास कहते हैं कि छोटों के गुणों से बड़े रङ्गे जाते है वा ( रतहिँ) तत्पर होते हैं परन्तु छोटों में कुछ बड़ों के गुण कारण अदल बदल नहीं होता इस बात पर दृष्टान्त देते हैं कि मोती करजनी के साथ रख दीजिये तो गुञ्जा से जाता है परन्तु करजनौ मोती के रङ्ग से उजला नहीं होता । यहाँ मोती का दृष्टान्त दिखला कर बड़ों का छोटों के गुणों से लिप्त हो जाना प्रमाणित किया परन्तु करजनौ के दृष्टान्त से छोटौँ का बड़ों के गुणे से न बदलना देखा कर प्रमाणित किया कि बड़ों के साथ से छोटो को कुछ भी हानि नहीं होती चाहे बड़ों को कुछ हानि हो तो हो इस कारण छोटों को सदा बड़ों का सङ्ग करना चाहिये ॥ १६ ॥ के रङ्ग लाल हो होहिं बड़े लघु समय सह तो लघु सकहिँ न कादि। चन्द्र दूबरा कूबरो तऊ नखत तँ बाढ़ि ॥१७॥ ( समय मह बड़े लघु होहि तौ लघु काढ़ि न सकहिँ)।

३२० तुलसौ-सतसई। कुसमय था जाने से बड़े लोग छोटे हो जाते है तो भी छोटा बड़े को विपत्ति को दूर नहीं कर सकता है। (दूबरो कूबरो चन्द्र तऊ नखत ते बाढ़ि) दितौथा का चन्द्रमा बहुत पतला और टेढ़ा होता है तो भी नक्षत्र से अधिक है। अभिप्राय यह कि कृष्ण पक्ष-रूपी समय के अधीन हो कर चन्द्रमा बहुत कृश और बक्र हो जाता है परन्तु उस की महिमा कुछ कम नहीं होती और नक्षत्रों से कहीं बढ़ कर उस को प्रतिष्ठा समझौ जाती है चन्द्र के उसी आकार को भगवान चन्द्रशेखर ने अपने शिर का भूषन बनाया है। पन्द्रहवें दोहे से ले कर सत्रहवें तक बड़ों और छोटों के पर- स्पर सङ्ग का दृष्टान्त के महित वर्णन है। इन दोहाँ मैं अन्योक्ति अलङ्कार मान कर यह उपदेश निकालना चाहिये कि छोटे लोगों के लिये बड़ों के साथ रहना सदा लाभदायक और उपकारी होता है। "मेवितव्यो महावृक्ष: फलछायाममन्वितः। यदि दैवात् फलं म स्यात् छाया केन निवार्यते ॥१७॥ उरग तुरग नारी नृपति नर नौचो हथियार। तुलसी परखत रहब नित इन्हहिं न पलटत बार ॥१८॥ तुलमी-दास कहते है कि माँप, घोड़ा, स्त्री, राजा, छोटे जन और हथियार इन सब बस्तुओं को सदा देखना चाहिये क्योंकि इन के उलट जाने में देरी नहीं लगती।

सप्तम सर्ग। अभिप्राय यह कि माँप उलट कर तुरन्त काट खाता है घोड़ा सवार को गिराता है स्त्रौ नौचा देखाती है राजा दण्ड देता है छोटे मनुष्य विश्वासघात प्रादि करते हैं और हथियार अपने शरीर हौ को काट डालता है इस कारण मनुष्य को चाहिये कि पूर्वोक्त बस्तुओं से सदा सचेत रहे क्योंकि दून के बिगड़ते देर नहीं लगती। द्वितीयार्थ । उरग अर्थात् हृदय में शीघ्र पसरनेवाला मोह, तुरग शौन चलनेवाला मन, नारी स्त्रीलिङ्ग बुद्धि जिम के भ्रष्ट हो जाने से मनुष्य का तुरन्त नाश हो सकता है, नृपति राजा सर्व ऐश्वर्य-युक परमात्मा जिम के विरुद्ध होने से प्रलय हो सकता है, नौचो नर छोटा मनोरथ जिस के होने से मनुष्य नाना दुःख में पड़ते है और हथियार मत्य शौल सन्तोष दया श्रादि जिन के द्वारा मनुष्य पाप को मार कर मुक्ति को पा सकता है इन सब बस्तुओं को सदा देख के करना चाहिये क्योंकि दून के बदल जाने में कुछ भी देर नहीं लगती। यह अर्थ लक्षणा द्वारा निकल सकता है ॥ १८ ॥ दुरजन श्रापु समान करि को राखद हित-लागि । तपत तोय सह जाहि पुनि पलटि बुतावत आगि॥१६॥ को श्राप समान करि हित लागि दुरजन राखद, पुनि तोय जाहि सह तपत (ताहि) अागि पलटि बुतावत ॥ कौन अपने ममान कर के भलाई की इच्छा से दुष्ट को अपने पास रख सकता है। अर्थात् कोई नहीं रख सकता है क्योंकि 41 ३२२ तुलसी-सतसई। जल जिम के योग से गर्म होता है फिर उलट उमौ आग को बुझा देता है। इस दोहे में दृष्टान्त के द्वारा यह देखलाया कि दुटों के मङ्ग से कभी किसी की भलाई नहीं हो सकती। चाहे कोई कैसे भी प्यार से दुष्टों को रकबे और अपने साथ अपने समान पालन पोषण करे परन्तु वह अपने हितकारकों के साथ अवश्य हो बुराई करता है उक्त दृष्टान्त में जिस आग के साथ से जल उष्ण होता है उसी को बुझा कर राख बना देता है। मनुष्य को चाहिये कि दुष्टों का साथ कभी न करें नहीं तो अवश्य दुःख भोगना पड़ेगा ॥१८॥ मन्त्र तन्त्र तन्त्री चिया पुरुख अस्त्र धन पाठ । प्रति गुन जोग बियोग ते तुरत जाहिँ ये आठ॥२०॥ मन्त्र, तन्त्र, तन्त्रौ, त्रिया, पुरुख, अस्त्र, धन, पाठ ये पाठ जोग प्रति गुन बियोग ते तुरत जाहिँ॥ (नमः शिवाय) श्रादि मन्त्र, विशेष विशेष नक्षत्र और मुहतों में विशेष विशेष बस्तुओं को ला कर शास्त्र में लिखे उपाय से उन के द्वारा अपने काम को सिद्ध करना तन्त्र, तन्त्री बीणा वा सितार श्रादि, स्त्री, पुरुष, इथिवार, धन अर्थात् सोना चाँदी, पाठ अर्थात् व्याकरण आदि का पढ़ना ये आठ पदार्थ सदा माय रखने से अधिक गुणयुक्त होते हैं और छोड़ देने से तुरन्त नष्ट हो जाते हैं।

सप्तम सर्ग। ३२१ अभिप्राय यह है कि मन्त्र सर्वदा जपने से, तन्त्र पाराधना करने से, बीणा बजाया करने से, स्त्री अपने साथ रखने से, पुरुष सेवा करने से, हथिबार सर्वदा अपने पास रखने से, धन भी पास रखने से, पाठ सदा पढ़ा करने से स्मरण रहता है और सब भी ऊपर कहे हुए प्रकार से बढ़ते हैं, परन्तु यदि मन्त्र का जपना छोड़ दौजिये तो उस में कुछ सिद्धि नहीं रहती, तन्त्र भी छोड़ने से निष्फल हो जाता है, स्त्रौ विगड़ जाती है, बीणा का बजाना भूल जाता है, पुरुष को प्रीति कम हो जाती है, हथिबार खराब हो जाता है वा दूसरा कोई ले लेता है, धन चोरी हो जाता है और पाठ भूल जाता है, कहावत प्रसिद्ध है कि "पर इथ विद्या पर इथ धन, न वह विद्या न वह धन” ॥ २० ॥ नीच निचाई नहि तजद जउ पावहि सत-सङ्ग । तुलसी चन्दन बिटप बसि बिनु बिख भइ नभुअङ्ग॥२१॥ नौच जो मत-मङ्ग पावे (तऊ) निचाई नहि तजे तुलसी चन्दन बिटप बसि भुङ्ग बिन बिख न भे ( भये) ॥ नौचों को मत-मङ्ग मिले तो भौ निचाई नहीं छोड़ते, तुलसी- दाम कहते है कि चन्दन के वृक्ष पर रह कर भी माँप विष-हौन नहीं हुए। इस दोहे में शीतल और सुगन्ध आदि उत्तम गुण-युक्त चन्दन के माथ बहुत दिन रह कर भी सर्प के विषहीन न होने के दृष्टान्त को देखला कर दुर्जनों का मन्तो के साथ रहकर भी जैसे का तैया तुलसौ-सतसई। बना रहना प्रमाणित किया। इस से यह बात सिर हुई कि दुष्टो के सुभाव का बदलना बहुत कठिन है। इस दोहे में मङ्गो के को न ग्रहण करने के कारण अतद्गुण* अलङ्कार हा ॥ २१ ॥ दुरजन दरपन सम सदा करि देखो हिय दार। सन्मुख की गति और है बिमुख भये कछु पार ॥२२॥ हिय दौर करि देखो दुरजन सदा दरपन सम, सन्मुख को और गति विमुख भये कछु और गति है॥ मन में विचार कर के देखो तो दुष्ट मनुष्य को गति दर्पण के समान है जो मामने देखने से कुछ और ही प्रकार का और पौछे देखने से दूसरे प्रकार का देख पड़ता है। दर्पण के मन्मुख अपना मुख ले जाने से ठोकर जैसी को प्राकृति हो वैसौ हौ देख पड़ती है परन्तु उस के सामने से अलग होने पर कुछ भी नहीं देख पड़ता, यही दश दुष्टों को है, जब तक अपने सामने है तब तक मौठौर बातें बना कर मन मोहित कर लेते हैं परन्तु बाड़ में गये तो कुछ भी स्नेह न रहा, बरन और भी निन्दा करते हैं। इस दोहे में दर्पण के दृष्टान्त से दुष्टों को दुष्टता दिखलाई गई जिस से यह बात सिद्ध हुई कि मामने दुष्ट लोग चाहें जितना प्रेम दिखलावे परन्तु विश्वास के योग्य नहीं हैं ॥२२॥ मिच क अवगुन मिच जो पर पह कप छाह जिमि आपनौ राखत आपुहि माहि ॥२३॥ भाखत नाहि "विहारी तुलसीभूषण बोध" १३वाँ दोहा देखो।

सप्तम सर्ग। ३२५ जो मित्र का अवगुन पर पहं नाहि भाखत मिमि कूप प्रापनौ छाहापुहि माहि राखत ॥ २९ वे दोहे तक दुर्जनों की यह पहचान दिखला कर २३ वें से मित्र के पहचानने को रौत देखलाते हैं। जो पुरुष अपने मित्र के अवगुण को दुसरों से नहीं कहता वही सच्चा मित्र है जैसे कूत्रा अपनी छाया को अपने ही भीतर रखता है। यहाँ कूत्रों और छाया के दृष्टान्त से छाया रूप अपने, मित्र के दोषो को अपने पेट हौ में रख छोड़े किसी से न कहे, अपने मित्र को सुमार्ग पर चलावे, उस के गुणों को सब स्थानों में फैलावे, उस के सुख को बढ़ावे और सदा हेलमेल रकबे तो मित्र जानिये ॥२३॥ तुलसौ सो समरथ सु-मति सु-क्रिती साधु सु-जान । नो बिचारि बोहरत जग खरच लाभ अनुमान॥२४॥ अन्षय। तुलसी जग सो समरथ सु-मतौ सु-क्रितो माधु और सु-जान जो लाभ अनुमान बिचारि खरच बोहरत ॥ तुलसौ-दास कहते हैं कि संसार में वही मनुष्य शक्तिमान बुद्धिमान पुन्यवान सज्जन और विद्वान बना रहता है जो अपने आय (आमदनी) को समझ कर बिचार पूर्वक खर्च का बरताव करता है। अभिप्राय यह कि मनुष्य को सदा अपनी आमदनौ बिचार कर खर्च करना चाहिये जिस में वह दुःख न पावे, जो लोग बिनासमझे

३२४
तुलसौ-सतसई।
बूझे श्रामदनी से अधिक खर्च कर बैठते हैं वे पीछे से पछताते और
विपत भोगते है क्योंकि विशेष कर उन्हें करण ले कर वा किसी
और बुरौ उपाय से धन प्राप्त करना पड़ता है जिस के कारण उन्हें
यहाँ वहाँ दोनों स्थानों में दुःख भोगना पड़ता है।
लिखा है कि "इदमेव हि पाण्डित्यं दूयमेव विदग्धता।
श्रयमेव परो धर्मो यदायान्नाधिको व्ययः"||
“यही पण्डिताई है यही चतुराई और यही परम धर्म है कि
प्राय से व्यय अधिक न होने पाबे" ॥ २४ ॥
सिख्य सखा सेवक सचिव सु-तिय सिखावन साँच।
सुनि करिये पुनि परिहरिय पर-मन-रञ्जन पाँच॥२५॥
अन्वय। मिख्य सखा सेवक मचिव सु-तिय पर-मन-रञ्जन पाँच
सिखावन माँच सुनि करिये पुनि (भूठ) परिहरिय ॥
चेला मित्र चाकर वा दाम और मन्त्री पतिव्रता स्त्री ये पाँचो
अत्यन्त चित्त को प्रसन्न करने वाले है दून को दी हुई शिक्षा को
सुनना चाहिये और जो सत्य हो तो करना भी चाहिये और मठ
झूठ
हो तो छोड़ देना चाहिये।
दूस में पर-मन-रञ्जन शब्द को यदि शिखावन का विशेषण
मानिये तो दून को शिक्षा पर दुसरे अर्थात् शिष्य को शिक्षा गुरु,
मित्र को मित्र, मन्त्री को राजा, सेवक को खामौ और स्त्री को
पति के लिये.अत्यन्त मनोहर होती है दूम लिये उन शिक्षाओं
को अवश्य सुनमा चाहिये, ऐसा अर्थ करना उत्तम होगा॥२५॥

सप्तम सर्ग। '३२७ तुष्टहिँ निज रुचि काज करि रुष्टहि काज बिगारि। तिया तनय सेवक सखा मन के कण्टक चारि ॥२६॥ तिया तनथ सेवक सखा निज रुचि काज करि तुहिँ (अन्यथा) स्टहि काज बिगारि (अतएव ) ये चारि मन के कण्टक ( है )॥ स्त्री पुत्र सेवक मन्त्री वा मित्र अपनी इच्छा के अनुमार काम करने से मन्तुष्ट होते हैं और इच्छा के विरुद्ध काज करने से क्रोधित हो कर काम विगाड़ देते है दूस से ये मनुष्यों के मन में काटे के समान गड़नेवाले है॥ इस कारण दून को इच्छा के विरुद्ध काम करने से ये अपने प्रभु के काम हो को बिगाड़ देते हैं तब प्रभु के मन में दुःख उत्पन्न कराते है इस कारण प्रभु को उन के रुचि के विरुद्ध अच्छा भी काम करने में सङ्कोच होता है। स्वामी को चाहिये कि इन चारो को इस प्रकार अपनी वश में रकवे कि अपने प्रभु से क्रोद्धित न हो कर प्रेम के साथ काम किया करें॥ २६ ॥ नारि नगर भोजन सचिव सेवक सखा अगार । सरस परिहरे रङ्ग रस निरस बिखाद विकार ॥२७॥ अन्वय। नारि नगर भोजन सचिव सेवक सखा अगार रङ्ग रस परिहरे सरस (अन्यथा) निरस बिखाद बिकार ॥ स्त्री, पुर, खानपान, मन्त्री, चाकर, मित्र और घर इन सातौँ के माथ प्रौति और श्रानन्द को बीच में छोड़ देने से ये सब अधिक तुलसौ-सतसई। रम देने वाले होते हैं। नहीं तो अधिक सहबास र रस-हौन हो कर और दुःख और भागड़े को बढ़ाते हैं। अभिप्राय यह है कि मदा स्त्री के साथ रहने से प्रौति घटतौ है कैसा भी सुन्दर नगर हो सदा उस में वास करने से उस को शोभा फौकी पड़ जाती है । एक ही प्रकार का भोजन सदा करने से चाहे वह कैसा भौ उत्तम परन्तु नि:स्वाद हो जाता है, मन्त्री नौकर और मित्र सदा पाम रखने से ढौठे और आज्ञा के भङ्ग करनेवाले हो जाते है और प्रभु में इन का प्रेम भी घट जाता है इस कारण राजनीति दून के सदा माथ को मना करती । कैसा भी उत्तम घर क्यों न हो जो लोग उस में सदा रहते है उन को दृष्टि में उस की शोभा वैभौ मनोहर नहीं बुझाती जैसी उन की दृष्ट में जान पड़ती है जो लोग थोड़े काल के लिये उस घर वा स्थान में आते है। इसी कारण महाराजो के यहाँ अनेक घर अनेक मन्त्री अनेक विवाहिता स्त्री अनेक नगर अनेक प्रकार के भोजन अनेक प्रकार के नौकर आदि रहते हैं जिम में सब लोगों को प्रीति बढ़तौ रहे। दूसौ सर्ग के बीसवें दोहे में कह चुके हैं कि स्त्रौ श्रादि बियोग से नष्ट हो जाती है और यहाँ कहते हैं कि सदा माथ से प्रीति घटती है तो इस में विरोध जान पड़ता है परन्तु इस के ठीक ठीक अभिप्राय को सोचने से कुछ भी विरोध नहीं है। उस दोहे का अभिप्राय यह है कि बहुत दिनों तक त्याग कर देने से स्त्री श्रादि नष्ट हो जाती हैं परन्तु इस का यह अभिप्राय है कि थोड़े दिन सप्तम सर्ग। ३२९ के लिये त्याग करना चाहिये और दून के साथ अत्यन्त संयोग न रखना चाहिये ॥२०॥ दौरघ-रोगी दारदी कटु-बच लोलुप लोग। तुलसौ प्रान समान जो तुरित त्यागिबे जोग ॥ २८॥ तुलसी दौरघ-रोगी दारदी कटु-बच लोलुप लोग जो प्रान समान ( तो भौ) तुरत त्यागिबे जोग ॥ बहुत दिन का रोगौ और अत्यन्त दुःखौ (करम जरु) कटुभाषौ (कड़ा बोलनेवाला) अत्यन्त कामौ ये लोग यदि प्राण के समान प्यारे हाँ तो भौ तुरन्त त्याग करने के योग्य हैं। अभिप्राय यह कि मङ्ग मे रहने से अपने दुःख वा दुर्गुण से अपने मङ्गो को भौ दुःखौ करते हैं इस लिये इन का त्याग तुरन्त हौ उचित है॥२८॥ घाव लगे लोहा ललकि खैचिव लेइब नौच । समरथ पापी साँ बयर तौनि बेसाही मीच ॥२६॥ घाव लगे ललकि लोहा खैचि लेब ममरथ नौच पापी माँ बेर तौन मीच बेमाही॥ जिम के सरौर में घाव लगौ हो अर्थात् घायल, लड़ाई के लिये तैयार हो कर लहलहा के धनुष वा तरवार खींचने के लिये तैयार, बलवान् पाप-करनेवाला, वा बड़ी शक्तिवाले दया-हौन से बैर करने- वाले दून तीन प्रकार के मनुष्यों ने अपनी मृत्यु मोल ली। अभिप्राय यह कि ये तीन मनुष्य अपनी मृत्यु को हाथ में लिये 42

३३०
तुलसौ-सतसई।
है,
रहते हैं, घायल मनुष्य थोड़ी घाव लगने से तुरन्त मर जाता
युद्ध
के लिये तैयार
पुरुष
अपने
शत्रु
से एक प्रहार पाने पर
तुरन्त मर जाता है और दया-हौन नौच पापी बलवान् तुरन्त पाप
कर के अपने को नष्ट कर सकता है।
अथवा (तौनि बैर मौच बेमाही) इन तीनों से शत्रुता करने-
वाले लोग अपने और उस के दोनों के मृत्यु को मोल लेते हैं
अर्थात् लड़नेवाले और शक्रिमान् से जो लोग शत्रुता करते हैं
उन्हें ये तुरन्त जम-धाम को पठा सकते हैं घायल तो अधमरे के
समान रहते हैं उन को प्राण लेते देते विलम्ब नही लगता ॥२६॥
तुलसी स्वा-रथ सामुहे परमा-रथ तन पौठ ।
अन्ध कहे दुख पाव के हि दिठिारे हिय-दौठ॥३०॥
खा-रथ सामुहे परमा-रथ पौठि हिय-दौठि अन्ध के कहे हि
दिठिारे दुख पाव ॥
अपने मंसारी बिषय सुख को भोर देखते हुये और ज्ञान वैराग्य
ईश्वर-भक्ति श्रादि परमा-ऽर्थको विसरा देनेवाले, अपने हृदय में ज्ञान
रखनेहारे, अन्धेके कहने से ज्ञानौ भौ(अवश्य) दुःख पाते हैं। अर्थात्
ऐसे संसारौ विषय में प्रामक चतुर ज्ञान के अभिमानी पुरुष के उप-
देश से दुःख होना सुलभ है। जो लोग श्राप हौ संमार-मागर में
डूबे है वे दूमरों का किस प्रकार उद्धार कर सकते हैं।
जहाँ अन्य कहे दुख पावक हि” पाठ हो वहाँ (हि) निश्चय
कर (दुख पावक) दुःखरूपौ भाग अन्धे के कहने से चलने वालों के
लिये प्रगट होती है ऐसा अर्थ करना चाहिये ॥ ३० ॥

सप्तम सर्ग। अन-समुझे नय सेाच बर अवसि समुझिये आप। तुलसी आपन समुझ बिनु पल पल पर परिताप॥३१॥ अन्वय । नय अन-समुझे बर सोच श्राप अवसि समुझिये, तुलमौ अापन समुझ बिनु पल पल पर परिताप । कहते हैं कि नौति को बिना समुझे काम करनेवाले मनुष्य को बड़ा दुःख होता है इस कारण आप नौति को अवश्य समझ कर काम करना चाहिये, तुलमी-दास कहते हैं कि अपनी समझ के बिना प्रत्येक क्षण में दुःख हुआ करता है अभिप्राय यह कि संसार के सब कामों को भली भाँत समझ के और उन के करने के लिये जो नीति की बात शास्त्र में कही हैं उन के अभिप्राय को भी भली भाँत बिचार के काम करना उचित है जो कोई ऐसा नहीं करता उम के दुःख का अन्त नहीं होता ॥३१॥ कूप खनहिँ मन्दिर जरत लावहिँ धारि बबूर। बोये लन-चह समै बिनु कुमति-सिरोमनि कर॥३२॥ कुमति-मिरो-मनि कूर मन्दिर जरत कूप खनहि घबर धारि लावहि समय बिन बोये लन-चह ।। (३१) एकतिम के दोहे तक सुनौति के उपदेशों को कह कर अब बत्तिस के दोहे से कुनौति का वर्णन करते हैं । अज्ञानियों में बड़े और निर्दयौ लोग जिस समय घर में भाग लगती है उस समय उसे बुझाने के लिये कूत्राँ खोदते हैं और ३३२ तुलसौ-सतसई। बबूर को पाँतौ को रोपते हैं और समय नही आया बीच ही में बोये हुये अनाज को काटना चाहते हैं। अभिप्राय यह कि कुबुद्धि और दुग्नौतिवाले मनुष्य जब विपत्ति श्रान पड़ती है तब उस को दूर करने का उपाय करते हैं अथवा जब गाढ़ौ विपत्ति उन्हें ग्रास करती है तब उस से कूटने के लिये तड़फड़ाने लगते हैं काँटेवाले बबर वा शत्रुओं के समूह को बढ़ाते जाते हैं प्रारम्भ किये हुये काम की सिद्धि कार्य के अन्त के होने के पहिले हो चाहते हैं अथवा (बिन समय बोये लन चह) कुसमय में बोये हुये अन्न को लवना वा कुममय लिये हुए कार्य के फल को पाना चाहते हैं ये बातें असम्भव है ॥ ३२ ॥ निडर अनय करि अन-कुसल बीस-बाहु सम होय । गया गया कह सुमति जन भयो कुमति कह कोय॥३३॥ निडर अनय करि बौस-बाह सम होय, सुमति जन गयो गयो कह कोय कुमति भयो कह ॥ ईश्वर वा राजा से न डर कर पर-द्रव्य पर-स्त्रौ हरन आदि अनीत के कामों को करनेवाले निर्बुद्धि मनुष्य रावन के समान नष्ट हो जाते हैं बुद्धिमान लोग नष्ट हुश्रा नट हुआ ऐसा कहते हैं परन्तु कोई कोई उमौ के समान अबुद्धिमान कार्य सिद्ध हुआ ऐसा कहते है ॥ अभिप्राय यह कि जो कोई किसी का भय न मान कर कोई बुरा काम करेगा बह चाहे राक्षमाधीश रावण के समान बौम-बाहु .

सप्तम सर्ग। ३३३ बाला भी हो तो भी बच नहीं सकता और दूसरे को कौन चलाता है सब बुद्धिमान लोग उस के नाश के विषय में निश्चय रखते हैं पर उसी के समान केवल दो एक निर्बुद्धि उस की भलाई का विश्वास करते हैं ॥ ३३ ॥ बहु सुत बहु रुचि बहु बचन बहु अचार बोहार। इन को भलो मनाइबो यह अग्यान अपार ॥३४॥ (जा के) बहु सुत बह रुचि बहु बचन बह अचार बीहार, दुन को भलो मनाइबो अपार अज्ञान (है)। जिन के बहुतेरे बेटे हैं, अनेक प्रकार के कामों में प्रौति है अनेक प्रकार की बात बोलते है बहुत से प्राचारों को करते हैं और अनेक प्रकार का व्यवहार चलाते हैं ऐसे लोगों का भला मनाना अर्थात् सब कामों में भलाई को इच्छा करना बड़े भारी श्रज्ञान की बात की बात है। अभिप्राय यह कि बहुत से पुत्रों के पिता के घर में कभी न कभी झगड़ा अवश्य होगी। जिन को अनेक प्रकार के कामों को करने की इच्छा है चाहे खाने पीने को हो, चाहे पहनने श्रोढ़ने को हो सब बात को इच्छात्रों का पूरा होना बहुत कठिन है। जो लोग बहुत प्रकार कौ बातें बोलते हैं सभाँ का सब होना बहुत कठिन है, जो बहुत प्रकार के प्राचार से चलते है उन के किसी न किसी प्राचार मे कुछ न कुछ बिकार होना अवश्य ही है,जो लोग बहुत भाँति के व्यवहार में लगे रहते हैं सब में मिद्धि होना अमाभव है इस कारण ३३४ तुलसी-सतसई। तुलसौ-दास जी कहते हैं कि ऐसे लोगों का अपने सब कामों में सफल होना असम्भव है,जो कोई सब को सफलता का मनोरथ करें वह केवल अज्ञानी है एक प्रकार के काम को मिद्धि भी बड़े पुन्य से होती है और सब को कौन कहे। इस कारण सब काम में परिमित पाचरण करना उत्तम है॥३४॥ अजस जोग की जानकी मनि चोरी की कान्ह । तुलसी लोग रिझाइबो करसि कातिबो नान्ह ॥३५॥ जानकी कि अजम जोग कान्ह कि मनि चोरी जोग तुलसौ लोग रिभाइबो नान्ह कातिबो करमि॥ मौता ऐमी पतिव्रता क्या कलङ्क के योग्य हो सकती है? अर्थात् कभी नहौं । ऐसे प्रतापी श्रीकृष्ण भगवान् क्या मणि को चोरी के योग्य हो सकते हैं ? अर्थात् कभी नहीं हो सकते । तुलमौ-दाम कहते है कि मंमार के लोगों को प्रसन्न करना बहुत पतला सूत कातना है अर्थात् सब को प्रसन्न रखना बहुत कठिन है नहीं हो सकता। मौताजो बहुत दिन तक रावण के घर में निर्दोष रही और मनसा बाचा कर्मणा सर्वदा रामचन्द्र जी के चरण से उन का प्रेम कभी घटा नहौँ तौ भौ अयोध्या में आने पर उन को मिथ्या अपवाद लगाया गया। श्रीकृष्ण भगवान् ने मणि नहीं चोराया था। प्रसेन नाम राजकुमार को मार कर एक सिंह मणि ले कर चला गया, तब उस सिंह से लड़ कर जामवन्त ने उसे मारा और मणि ला कर अपनी पुत्री को दिया परन्तु लोगों ने इस सत्य बाल को न जान सप्तम सर्ग। २३५ कर झठ मठ अनुमान किया कि गुप्त रौत से प्रसेन को मार कर कृष्ण हो ने मणि ले लिया होगा और दुष्ट लोगों ने ऐसा झूठा अपवाद फैला दिया। यद्यपि महारानी मौताजी और महाराज कृष्ण भगवान ने पीछे से अपनी सत्यता के द्वारा मिथ्या कलङ्क को दूर किया तौ भौ कुछ समय तक झूठे अपवाद के भागौ हुए। इन दो दृष्टान्तों को दिखला कर तुलसौ-दास जी कहते हैं कि मंमार में मब को प्रसन्न करना बहुत कठिन है। महौन कातते हैं इस कहावत के द्वारा उक्त बात को कठिनता को दिढ़ करते है इस कारण इस दोहे के पूर्वार्द्ध में काकू और उत्तरार्द्ध में लोकोकि अलकार हैं ॥३५॥ माँगि मधुकरी खात जे सोवत पाय पसारि। पाप प्रतिष्ठा बढ़ि-परी तुलसौ बादौ रारि ॥३६॥ जे मधुकरी माँगि खात पाव पसारि मोश्रत, तुलमी (तिन को ह) प्रतिष्ठा पाप बढ़ि परौ रारि बाढ़ी। जो माधुलोग रोटौ को भिक्षा माँग कर भोजन करते हैं और पाव फैला कर निःशोच हो मोते हैं उन का भी जब प्रतिष्ठारूपौ पाप बढ़ जाता है अर्थात् सब लोग यह बात जान लेते हैं कि अमुक माधु बड़े सिद्ध है तो झगड़ा फैल जाता है अर्थात् सब लोग जा २ कर माधु को दुःख देने लगते हैं। अभिप्राय यह कि मच्चे माधु जो किसी को उद्धौमट्टी में नहीं रहते है और सदा अपने इष्ट-देवता की सेवा में लगे रहते हैं

३३६
तुलसौ-सतसई।
७
वे संमार में नामवरी और प्रतिष्ठा बढ़ना भी एक पाप समझते हैं
संस्कृत में कहा है कि (प्रतिष्ठा करौ विष्ठा गौरवं चाति रौरवं)
प्रतिष्ठा एकरौ के मल के समान है और बड़ाई रौरव नरक के समान
है अर्थात् ये दोनों पदार्थ ज्ञानी और उदासीन के लिये विघ्न कारक
है दूमौ बात का तुलसौ-दाम ने दूस दोहे में वर्णन किया है इस
पर कई एक टीकाकार कहते हैं कि तुलसी दास ने यह बात
अपने ऊपर कही है, हो सकता है कि जब गोसाई जी का नाम
बहुत बढ़ गया, दिल्ली तक पहुंचा और दिल्ली के बादशाह ने उन्हें
बुला कर दुःख दिया उमौ पर उन्हों ने यह दोहा बनाया हो, अथवा
शिवभकों को भगड़ा पर यह दोहा कहा हो परन्तु इस बात को
ज्ञानौ लोग पहिले हौ से बुरौ समझते पाते हैं ॥३६॥
लही आँखि कब आँधरो बाँझ पूत कब पाय ।
कब कादी काया लही जग बहराइच जाय ॥३७॥
श्राधरो कब आँख लही बाँझ कब पूत पाय, कोढ़ी कब काया
लहौ (तथापि) जग बहराइच जाय ॥
मंमार को जड़ता और भेड़ियाधमान पर तुलसीदास कहते हैं
कि किस समय अन्धे ने आँख पाई ? किस समय बाँझ ने लड़का
जना? कुटौ ने कब निर्मल शरीर पाई ? अर्थात् यह कभी नहीं
सुनने में आया कि बहराइच जाने से उन लोगों ने उक्त बस्तुओं
को पाया तो भी संसार के लोग ऐसे अन्धपरम्परा से काम करने
वाले हैं कि बहराइच जहाँ मैयद मालार का रौजा है अपने मनोरथ
को पूरा करने के लिये जाया करते हैं ॥३७॥

सप्तम सर्ग। या जग को विपरीत गति का हि कहाँ समुझाय । जल जलिगा झख बाँधि गौ जन तुलसी मुसुकाय॥३८॥ या जग को गति बिपरीत जल जलि गौ झख बाँधि गौ तुलसी का हि समुभाय कहौ जन मुसुकाय ॥ इस संसार को उलटौ रौति है, पानी सूख गया मछली पकड़ी गई तुलसौ-दास कहते है कि किस को समुझा कर कहूँ मनुष्य इस-रहे है॥ अभिप्राय यह कि जब बरसात में जल को धारा बह चलती तो मछलियाँ चढ़ दौड़ती है और लोग जाल में पहरा ले ले कर मछली पकड़ने दौड़ते हैं उस समय सब पानी बह कर सुख जाता है और मछलियाँ पकड़ ली जाती हैं, तो भी मछली पकड़नेवाले दूर से सुन कर मछली पकड़ने दौड़ते हैं और चाहे मछली मिले चाहे न मिले “भेड़िया धमान मचा देते हैं कितना समुभाश्री नहीं सुनते ; ऐसी हौ दशा म संसारी नौव को भी है सुखरूप जल तो परमार्थ वा रामभक्ति में है उसे त्याग कर संमारी बिषय सुख पर दौड़ते है और मछली के समान बन्ध जाते हैं कितना भी समुभाइये कि बिषय सुख अन्त में दुःखदाई होता है नहीं सुनते। तिस पर तुलसी-दाम कहते हैं कि भजन उन का ज्ञान देख कर हँसते हैं कि ये कैसे मर्ख है ॥३८॥ कै जुझिवो कै बूझिबो दान कि काय-कलेस। चारि चार परलोक-पथ जथा-जोग उपदेस ॥ ३९ ॥ " 43 तुलसी-सतसई। के काय-कलेप के जूभिबो के बूझिलो कै दान इ.था-जोग चारि परलोक-पथ चारु उपदेश ॥ संसार के लोगों को जड़ता देखा कर अब उन के मुक्ति के उपाय का उपदेश देते हैं। (जथा-जोग) अपनी र योग्यता के अनुसार चारो वर्षों के लिये तुलमी-दास जी कहते है कि ब्राह्मण के लिये ज्ञान वा जप तप, क्षत्री के लिये सन्मुख रण में लड़ मरना, वैश्य के लिये (बभिबो) अर्थात् समझ बझ के मञ्च २ बाणिज्य और व्यवहार करना वा श्रद्धा समेत दान देना, और शूद्र के लिये दान देना वा (काय-कलेस) अपने शरीर को दुःख दे कर द्विजों की सेवा करना ये चार उपदेश परलोक में मुक्ति पाने के लिये चारो वर्षों के हितकारी है ॥३८॥ बुध किसान सर बेद बन मते खेत सब सौंच । तुलसी क्रिखि-गति जानिया उत्तम मध्यम नौच॥४॥ बुध किसान बेद सर बन मते मब खेत मौंच, तुलसौ उत्तम मध्यम मौच क्रिखि-गति जानिबो। परलोक मार्ग में बुद्धिमान लोग किमान हैं और बेदरूपी नालाब है जिस के अनेक सिद्धान्त जलरूपौ है उन्हीं जलों से अपने मतरूपी खेत को मौंचना चाहिये। तुलसौ-दास कहते है कि अपनेर परिश्रम के अनुसार उत्तम मध्यम और नौच खेती का फल जानना चाहिये। अभिप्राय यह है कि जिस प्रकार रौति के अनुसार जो श्राप सप्तम सर्ग। खेती में परिश्रम करता है वह उत्तम किसान समझा जाता है, जो थोड़े परिश्रम से मजूरों के द्वारा खेतौ का काम चलाता है वह मध्यम और जो सम्पूर्ण रूप मजर हो के जपर खेती का सब काम छोड़ देता है वह निकृष्ट किसान कहलाता है, उसी प्रकार को मुमुक्षु ज्ञान वैराग्य भक्ति श्रादि कामों में श्राप रात दिन लगे रहते हैं, प्रारब्ध को अपेक्षा नहीं करते वे उत्तम हैं और जो संसारी व्यवहार में रह कर प्रारब्ध को श्राश्रा करके थोड़ा बहुत ज्ञान वैराग्य भक्ति का भी काम किया करते है वे मध्यम और जो सम्पर्ण रूप से प्रारब्ध हौ को श्राशा रखते, ज्ञान वैराग्य भक्ति के कामों को करने में पूरे उद्योगी नहीं है कहते है कि लिखा होगा मो होगा वे निकर है, इस प्रकार परलोक के कामों को भी खेती के काम के समान जान कर परिश्रम करने का उपदेश तुलसौ-दाम जौ देते है । अथवा किसान के समान बुद्धिमान लोग वेदरूपौ सरोवर से मत- रूपी जल ले कर अपने हृदयरूपौ खेत को जैसे परिश्रम से माँचते है वैसे ही खेत के उत्तम मध्यम नौच सुभाव के अनुसार उत्तम मध्यम नौच फल होता है यही दशा परलोक को भी है॥४॥ सहि कु-बोल सासति असम पाय अनट अपमान । तुलसी धरम न परिहरहि ते बर सन्त सु-जान॥४१॥ तुलमो कु-बोल मामति महि असम अनट अपमान पाय जे धरम न परिहरहि ते सु-जान मन्त बर ॥

२४. तुलसौ-सतसई। तुलसी दास कहते हैं कि गाली क्लेश और अत्यन्त न्याय और अनादर पा कर भी जो लोग अपने किसान के धर्म को नहीं छोड़ते वेही लोग बड़े ज्ञानौ और सज्जन किसान कहलाते हैं। परमार्थ पक्ष का अर्थ । तुलसौ-दास कहते हैं जो माधु दुखों को कड़ी बातों को अनेक भान्ति के क्लेशों को और बड़े विषम सङ्कट को और अनादर को सह लेते है परन्तु धर्म नहीं छोड़ते वे हौ ज्ञानौ साधुओं में श्रेष्ठ हैं॥४१॥ अनहित ज्यौँ पर-हित किये आपन हिततम जान । तुलसौ चारु बिचार मति करिय काज सम मान॥४२॥ तुलसी आपन हित हिततम, पर-हित किये ज्याँ अनहित जान, सम काज करिय चार विचार मति मान ॥ तुलसौ-दाम कहते हैं कि संसारौ मनुष्य अपने हित को बड़ा हित जानते है, परन्तु दूसरे के हित जो करें मो अपने अनहित (ज्याँ) के समान जानते हैं। यह विषमता है, परन्तु साधु जन को समता से काम करना चाहिये (अर्थात् अपने अत्यन्त हितकारी काम के समान दूसरों को भलाई का काम करना चाहिये और जैमी अपनी बुराई वैसी ही दूसरे को बुराई) यही उत्तम विवेक और बुद्धि मानना चाहिये। द्वितीयार्थ। तुलसौ ज्यौँ पर अनहित किये आपन हित हिततम जान, सम काज मति करिय चार विचार मान ।

सप्तम सर्ग। ॥ तुलसौ-दाब कहते हैं कि जैसे दुष्ट लोग (पर) दूसरों को (अनहित) बुड़ाई करते है और अपनी भलाई को (हिततम) सब से बड़ा हित जानके (आपन हित) अपनी भलाई करते है, (सम) वैमा काम (तुम) मत करो और यह उत्तम बिचार मानो मति शब्द में श्लेष है जब उसे संस्कृत माना तो बुद्धि अर्थ किया, और जब हिन्दी माना तो निषेध वाचक अव्यय जाना । अभिप्राय यह कि पण्डित लोग अपनी भलाई बुराई के समान दूसरों को भलाई बुराई को जानते मानते हैं, और मूर्ख लोग इसी का उलटा मानते हैं। यही मज्जन और दुष्टों को पहचान है ॥४२॥ मिथ्या माहुर सु-जन कह खलहिँ गरल सम साँच । तुलसी परसि परात जिमि पारद पावक आँच ॥४३॥ सु-जन कह मिथ्या माहुर खलहिं साँच गरल सम, तुलसी परमि तिमि परात जिमि पारद पावक आँच परमि परात ॥ साध लोगों के लिये झुठाई विष के समान है और दुष्टों के लिये मचाई विष के समान है। तुलसौ-दास कहते हैं कि माधु जन मिथ्या से अथवा दुष्टों के मङ्ग से वैसा हौ भागते है जैसे पारा भाग के स्पर्श से भागता अर्थात् उड़ जाता है॥ ४३ ॥ तुलसी खल बानी बिमल सुनि समुझब हिय हेरि। राम राज बाधक भई मन्द मन्थरा चेरि ॥४४॥ तुलमी खल बिमल बानो सुनि हिय हेरि समझब, ‘मन्द मन्थरा चेरि राम राज बाधक भई ॥

३४२
तुलसौ-सतसई।
तुलसी-दास कहते हैं कि दुष्टों को निर्मल सुन्दर चिकनी बात
को सुन कर हदय में अच्छौ रौति सोच विचार कर खूब समुझ बूझ
के करना चाहिये। निर्बुद्धि मन्थरा नाम दामी भी कैकेयौ से ऐसी
मौठौ पेचेली बात बना कर बोली कि रामचन्द्र के राजा होने में
बाधक हुई अथवा दुष्टा मन्थरा सुनने में प्यारी बातें बना कर
राम के राज को रोकनेवालो हुई। इस कारण दुष्टों को भलो बात
का भी भरोसा करना न चाहिये और बहुत समझ
के
कहने पर विश्वास लाने से भौ भय रहता है। ४४ ॥
बूझ
के उन
दान दयादिक जुद्द के बौर धौर नहि आन ।
तुलसी कहहिँ बिनौत इति ते नर बर परमान॥४५॥
तुलसी (इति बिनौत) कहिँ दान दयादिक धौर जुद्ध के बौर
पान महीँ ते नर बर परमान ।।
तुलमी-दास जी यह एक विशेष नौति कहते हैं कि जो लोग
दान देने में दोनों के ऊपर दया करना आदि अच्छे कामों में
धैर्य रखनेहारे हैं वे हौ रण क्षेत्र के बौर है दूसरे नहीं, वे हो
मनुष्यों में श्रेष्ठ गिने जाते हैं इस बात को प्रमाण जानना ॥
अभिप्राय यह कि जो गति दानो
दयालु
और धौर पुरुष को
मिलती है वहौ गति रण क्षेत्र म सम्मुख लड़ कर मर जानेवाले
क्षत्री को मिलती है, ठीक ठोक मत्य शौच दया दान में लगा रहने-
वाला ठीक ठीक बौर है॥४५॥

सप्तम सर्ग। तुलसौ साधी बिपति के विद्या बिनय बिबेक । साहस सु-क्रित सत्य-ब्रत राम-भरोसा एक ॥४६॥ तुलसी विद्या बिनय बिबेक साहस सु-क्रित सत्य-व्रत एक राम- भरोमो विपति के साथौ॥ तुलसौ-दास कहते हैं कि ज्ञान, नम्रता, विचार, साहस, पुन्य मत्यरूपौ व्रत और सब के ऊपर एक रामचन्द्र का भरोमा विपत्ति के साथी हैं। अभिप्राय यह कि कसो हो भारी विपत्ति क्यों न हो यदि मनुष्य विद्वान हो तो अपनी जीविका कर के विपत्ति काट देगा। उमौ प्रकार नम्र विवेकौ साहसी सकती और सत्य-व्रतवाले पुरुष के निकट से विपत्ति श्राप भाग जाती है, इस लिये मनुष्यों को चाहिये कि ऊपर लिखे हुये गुणों को विपत्ति पड़ने पर भी न छोड़ें॥ ४६॥ तुलसी असमय के सखा साहस धरम बिचार । सु-क्रित सौल स्वभाब रिजु राम-सरन-आधार ॥४७॥ तुलसौ माइस धरम बिचार सु-क्रित सौल रिजु खभाव राम- सरन-प्राधार असमय के सखा॥ तुलसी-दास कहते हैं कि पराक्रम धर्म विवेक पुन्य अच्छा भोल कोमल स्वभाव और श्रीराम-जौ को शरण का अवलम्ब बुरे दिनों के सहायक मित्र है दून को किसी समय भौ त्यागना उचित नहीं है क्योंकि दून के रहने से सब प्रकार को दुःख-बखाय-बिलाय जाती है।

तुलसौ-सतसई। राम-जौ का भरोसा ऐसा है कि उस के आश्रयो को कभौ क्लेश नहीं हो सकता ॥४७॥ बिद्या बिनय बिबेक रति रीति जासु उर होइ। राम-परायन सो सदा आपद ताहि न कोई ॥४८॥ अन्वय । जासु उर बिद्या बिनय बिबेक रति राम-परायन रीति सदा होय ताहि को प्रापद न ॥ जिम के अन्तःकरण में ज्ञान नम्रता विचार मित्रता राम-चन्द्र को पाश्रा सर्वदा रहती है उस के निकट कोई विपत्ति नहीं पाती। प्रथम तो बिद्या दिगुण हौ ऐसे है कि विपत्ति न आने देय फिर मब से उत्तम राम की भक्ति है जिस के कारण परम आनन्द होता है॥४८॥ बिनु प्रपञ्च बरु भौख भलि नहिँ फल किये कलेस । बावन बलि साँ लौन्ह छलि दिन्न सबहिँ उपदेस ॥४६॥ अन्वय । बिनु प्रपञ्च बरु भीख भलि कलेस किये फल नहीं बावन बलि माँ छल लोन सबहिँ उपदेस दिन्ह ।। तुलसौ-दास कहते हैं कि बिना छल कपट के थोड़ी मौ भिक्षा भली है परन्तु छलरूप परिश्रम करने पर फल मिले तो भला नहीं, ऐसा मन में स्थिर रखिये क्याँकि भगवान विष्णु ने वावन रूप धर के राजा बलि से छल के द्वारा तीन पाव भूमि लौ, उस का फल यह हुआ कि उन्हें राजा बलि का द्वारपाल होना पड़ा और कपटौ सप्तम वर्ग। भी कहाये, भी उन्हों ने मानो यह उपदेश दिया कि कपट के द्वारा काम सिद्ध करने में यही गति होती है दम लिये छल न करना चाहिये क्याँकि छलौ को सुख नहीं होता। मौधौरोत से चलना ही उत्तम है चाहे उस से फल सिद्ध हो वा न हो ॥ ४ ॥ बिबुध-काज बावन बलिहिँ छलो भलो जिय जानि । प्रभुता तजि बस भे तदपि मन तें गइ न गलानि ॥५०॥ अन्वय । बावन भलो जिय जानि बिबुध-काज बलिहिँ छलो, प्रभुता तजि बस भे तदपि मन ते गलानि न ग ॥ बावनरूप भगवान ने परोपकार जान देवताओं के काम के लिये राजा बलि को छला, दूस का फल यह हुआ कि अपनी स्वतन्त्रता छोड़ के बलि राजा के अधीन हुए, तो भौ उन के मन से छली कहलाने का दुःख न दूर हुत्रा अर्थात् इतने बड़े सामर्थी ब्रह्मा आदि को श्राज्ञा देनेवाले विष्णु को भी भेवकाई करनी पड़ी यही कपट की महिमा है॥५०॥ बड़े बड़े ते छल करहिँ जनम कनाड़े होहि। तुलसौ सौ-पति-सिर लसै बलि बावन गति सोहिँ॥५१॥ अन्वय। बड़े बड़े तें छल करहिं जनम कनौड़े होहिं तुलसी मो हि बलि बावन गति सौ-पति-मिर लसे॥ जो लोग आप बड़े हो कर बड़े बड़े लोगों से छल करते हैं वे जन्म भर के लिये बिक जाते हैं,तुलसौ-दास कहते हैं कि तुलसी भगवान तुमसौ-सतसई। विष्णु लमो के स्वामी के सिर पर चढ़ौ रहती हैं वही बात बलि के माथ बावन भगवान की है। अभिप्राय यह कि एक समय जलन्धर नाम दैत्य महादेव जी से अपनी पतिव्रता स्त्री के तेज के कारण युद्ध में हारता नहीं था तब विष्ण भगवान ने जलन्धर का रूप धर के उस को स्त्री बिन्दा के पतिव्रता-पन को नष्ट किया । तब बिन्दा को प्रसन्न करने के लिये सदा तुलसी रूप से उसे अपने शिर पर धारण किया। यह कथा शिवपुराण में प्रसिद्ध है। उमौ प्रकार बलि से छल करने के लिये भगवान को मदा बलि के निकट रहना पड़ता है जब विष्णु भगवान के ऐसे प्रतापौ को छल करने के कारण इतना दुःख सहना पड़ता औरों को क्या कथा है। कभी किसी से छल करना न चाहिये ॥५॥ है तब खल उपकार बिकार फल तुलसी जान जहान। मेदक मर्कट बनिक बक कथा सत्य उपखान ॥५२॥ अन्वय । खल उपकार बिकार फल जहान जान, सत्य मेढ़क मर्कट बणिक बक कथा उपखान ॥ दृष्टों के माथ उपकार करने का फल बिकार होता है अर्थात् उस से अपनी बुराई होती है इस बात को संमार जानता है इसको मचाई के विषय में मेढ़क, बानर, बनिया और बगुले को कथा दृष्टान्त रूप से प्रमिद्ध हैं। किमो समय एक मेढ़क अपने कुटुम्बों से झगड़ा कर के प्रियदर्शन माम एक साँप को भूखा देख के उपकार करने की इच्छा से उसी सप्तम वर्ग। कूर्य में ला कर बसाया जिम में उस के भाई बन्धु और लड़के वाले रहते थे। मो प्रियदर्शन ने भलाई के बदले और और मेढ़कों के खाने के अनन्तर उसके परिवार को खा कर गङ्गादत्त को खाने पर झाँक लगायौ दूस का समाचार जब गङ्गादत्त ने पाया तब कुये में से भाग कर अपना प्राण बचाया। एक बानर ने किसी भूखे मगर को वृक्ष से गिरा २ बहुत सा फल खिला कर जिलाया अन्त को मगर ने बानर हो को खाने पर दॉत लगाया तब बहाने से भाग कर बानर ने अपना जौ बचाया। बर्षा ऋतु में भोजते हुये बानरों को देख कर उपकार करने को इच्छा से पक्षियों ने उपदेश दिया कि घर बना कर रहिये। उस उपकार के बदले में बानरों ने पक्षियाँ के खाँतों को नोच नाच मट्टी में मिला दिया । भलाई के बदले बुराई पायो । किसौ बनिये ने किसौ राजकुमार का उपकार करने के लिये अपनी स्त्रौ उस के निकट भेज दो जिस में उस राजकुमार के मन्त्र को मिद्धि हो। उस के बिरुद्ध उस राजकुमार ने उस को स्त्री को नष्ट कर दिया। किसी बगुले ने एक भूखे मरते नेउले को बुलाया कि वह एक सर्प को खावे उस ने केवल मर्प हो को नहीं खाया बरन बगुले के ऊपर भौ दाँत चलाया ॥५२॥ जो मूरख उपदेस के होते जोग जहान। दुर्जीधन कहँ बोधि किन आये स्याम सुजान ॥५३॥ जहान जो मरख उपदेस के योग होते (तो) स्याम सुजान दुर्योधन के बोधि किन पाये॥

तुबसो-सतसई। मूर्ख को समझाना बड़ा कठिन है शास्त्र में लिखा है कि "मूर्खस्य नास्यौषधम्” मूर्ख को समझाने की कोई प्रौषधि नहीं है इस पर तुलसौ-दास जी कहते हैं कि संसार में जो मूर्ख उपदेश देने के यो य होते तो बड़े ज्ञानी श्रीकृष्ण भगवान दुर्योधन को क्यों न समुझा पाते। जब कौरव और पाण्डव के बौच महाभारत के बड़ा भारौ युद्ध होने का सम्भव देख पड़ा तो उस को मिटाने के लिये श्रीकृष्ण भगवान वयं दुर्योधन के पास गये और समझाने लगे कि पाण्डवाँ को जीविका के लिये थोड़ी भूमि दे दो जिस में युद्ध की रुकावट हो जाय। परन्तु दुर्योधन ने एक भी न सुनी और अन्त को लड़ कर अन्न धन परिवार सहित मट्टी में मिल गया परन्तु उस समय श्रीकृष्ण का कहना न माना बरन उस का उत्तर कहावत हो गया है कि "मुच्यग्रं न दातव्यं बिना युद्धेन केशव" ॥ ५३॥ हित पर बढ़त बिरोध जब अन-हित पर अनुराग । राम बिमुख बिधिबाम गति सगुन अघाय अभाग॥५४॥ जब हित पर बिरोध बढ़त अन-हित पर अनुराग बढ़त (तब) बिधि गति बाम राम बिमुख होत प्रभाग सगुन बघाय ॥ जिस समय अपनी भलाई के विषय में विरोध बढ़ने लगता है और बुराई के विषय में अनुराग अर्थात् प्रौति अधिक होने लगती है तो समझना चाहिये कि भाग्य को उलटी गति है, रामचन्द्र बिमुख है और भलाई करने से भी बुराई होती है और अपने साम बर्ग। मनु और मिन दोनों बुराई हो करने खगते हैं तथा शुभसूचक चिन्ह भी प्रभाग्य फलदायक होता है ॥ ५४ ॥ साहस ही सिख कोप-बस किये कठिन परिपाक । सठ सकट-भाजन भाउ हठि कु-जाति कपि काक ॥५५॥ के पात्र में पड़े॥ कोप-बम सिख (न सुनि) साहस किये कठिन परिपाक, मठ कु- जाति कपि-काक हठि सङ्कट भाजन भये ॥ क्रोध के बश हो कर अपने हितकारकों को शिक्षा न सुनने और जल्दी से काम कर बैठने से परिणाम बहुत दुःखदाई होता है। इस विषय में मूर्ख और कुजाति बन्दर और कौत्रा बड़ी हठ कर के दुःख हुये अर्थात् बड़े दुःख अभिप्राय यह कि जो काम करना हो उसे धौरता-पूर्वक सोच विचार करना चाहिये। अबिचार के साथ क्रोधी और इठौ हो कर जो लोग काम करते हैं वे बड़ा दुःख पाते है इस विषय के दृष्टान्त नीचे लिखे हुये जीव हैं। कपि बालि को उस को स्वौ तारा ने बहुत समझाया और कहा कि श्राप सग्रौब से बिरोध मत कौजिये नहीं तो दुःख पाइयेगा क्योंकि उन के सहायक राम-चन्द्र जी हैं। परन्तु उस का कहना न माना और साहस-पूर्वक काम कर के मारा गया। बन के निवासी एक बन्दर ने चञ्चलता के साथ श्राधी चौरी हुई एक लकड़ी के बीच गड़े खूटे को हिला डोला कर उखाड़ने के लिये खींचा तब काठ के दोनों पटरों के बीच लटकता हुआ उसका सुनसो-वतवई। चूर हो गया और वह अण्डकोश दब के हठौ बन्दर मर के धूर में मिल गया। जयन्त नाम काक लोभ के बश हो कर 'परमेश्वर से बिरोध न करना चाहिये' शास्त्र के हम उपदेश को भूल कर मौता जी के चरण में चोच मार भागा जिम का परिणाम ऐमा हुआ कि उस को रक्षा कोई न कर मका अन्त को एक आँख फोड़ कर दण्ड दिया परन्तु गम न उम का प्राण न लिया। जहाँ "क्यति" पाठ हो वहाँ कुयोगौ अर्थ करना चाहिये, जिम से रावण को ममझना चाहिय क्योंकि यह भौ मागेच का कहना न मान लोभ और हठ को ठान योगी का रूप बना पञ्चवटी में श्रा कपट से मौता जी को उठा ले भागा और दम अबिचागै अन्याय काम के लिये अपन वंश के महित मट्टी में मिल गया ॥ ५५ ॥ मारि साँह करि खोज लै करि मत सब बिन बास । मुए नौच बिन मौच ते ये इन के बिस्वास ॥५६ ॥ ये मारि खोज लै मौह करि बिनु बाम मत करि ते मब नौच इन के बिखाम ते बिन मौच मुए। जो लोग पहले किमो को मारते हैं और फिर उन को खोजवा कर उन से शपथ ले कर मेल करते हैं बेडर हो कर उन से सम्मत करते हैं ये सब निर्बद्धि इन शत्रुओं पर बियाम करने के कारण बिना मृत्यु के मरते हैं, अर्थात् अपने हाथ हो से अपना घिर काटते हैं।

साम मर्ग। अभिप्राय यह कि जिस से एक बार गाढ़ौ शत्रुता हुई जो लोग फिर उस से मेल मिलाप कर के उस पर विश्वास करना प्रारम्भ करते हैं वे अपने हाथ से अपना दुःख बढ़ाते हैं क्योंकि राजनौत के अनुमार सत्रु का विश्वास न करना चाहिये ॥ ५६ ॥ रोक आपनौ बूझ पर खौझ बिचार बिहौन। ते उपदेस न मानही मोह-महोदधि-मौन ॥५७॥ (ये) आपनौ बझ पर रौझ बिचार बिहीन खौम मोह-महो- दधि-मौन ते उपदेस न मानहीं । अपने हों मन से बिना कारण प्रमन्न होते हैं बिना विचार बिमा किमौ दोष के क्रोधित होते हैं ऐसे लोग मोहरूपो ममुद्र को मछली हैं और अपने बुद्धि के भ्रम के कारण किमी का उपदेश नहीं मानते। अभिप्राय यह कि जो लोग बिना कारण किमी के ऊपर प्रमन्त्र वा क्रोधित होते है और बिना विचार निर्दोषौ को दण्ड देते हैं और दोषौ लोग दण्ड नहीं पाते ऐसे लोग केवल मोह के अधीन को प्रसन्नता का कुछ ठिकाना नहीं है। क्षण स्टा सणे तुष्टा रुया तुष्टा क्षणे क्षणे। अव्यवस्थितचित्तानां प्रमादापि भयंकरः। अर्थात् क्षण में प्रसन्न क्षण अप्रमत्र कभी रुए कभी तुष्ट अम्थिर चित्तवाले मनुष्यों का प्रमन्त्र होना भी दुःख-दाई होता है ॥ ५० ॥ समुझि सु-नौति कु-नौति-रत जागत हो रह मोइ। उपदेसिबो अगाइबो तुलसी उचित न होइ ॥५८॥ है में २१२ तुमसो-सतसई। मु-नौत समुझ कु-नौत रत जागत ही सोय रह तुलसी तिन को उपदेसिबो जगारबो उचित न होय । जो लोग अच्छी नौत गैति को जान बूझ कर बुरौ रौत नौत और कामों में लगे रहते हैं वे लोग जागते भौ मोये के समान हैं ऐसे लोगों को उपदेश देना मानो जागते को जगाना है इस लिये तुलमो-दाम कहते हैं कि ऐसे को उपदेश देना उचित नहीं है अथवा (जो जागत हो मोय रह ताहि जगाइबो उचित न होय)। जो जागता है परन्तु मोये का बहाना कर के आँख मूदे पड़ा है ऐसे का जगाना उचित नहीं। अभिप्राय यह कि जो मनुष्य रावण के समान सब विद्या का जाननेवाला भले बुरे कामों का समझनेवाला महापण्डित हो कर भी मौता के ममान परम्तौ-हरण करता निर-पराधियों का जीव हरता बुरे कामा से न डरता और दोनों को सताता है वह केवल हठधर्मो कहाता है और अभिमान से भग हुपा होने के कारण वह किसी का उपदेश न सुनेगा दूस कारण उस को उपदेश देना मानो राख में होम करना है। जागते को कौन जगावे दूम कहात के दोहे में पाने के कारण यहाँ लोकोकि अलङ्कार स्पष्ट है ॥ १८॥ परमा-रथ-पथ-मत समुनि लसत बिखय लपटान । उतरि चिता ते अध-जरौ मानहुँ सती परान॥५६॥ पग्मा-उरथ-पथ-मत समुझि बिखय लपटान लमत मानहुँ अध बरी मतौ चिता ते उतरि पराम ।

सप्तम सर्ग। ३५१ जो मनुष्य परलोक में मुख देनेवाले धर्मों को अथवा परलोक के मार्ग जान भकि उपामना श्रादि विषयों को ममझ कर रूप रस गन्ध स्पर्श आदि विषय के मुख में लौन रहता है मो मानो चिता से उतर कर भागो आधौ जगै पतिव्रता स्त्रो के ममान अभिप्राय यह कि जो मनुष्य पढ़ लिख के ज्ञान उपासना कर्म- काण्ड विवेक वैराग्य शान्ति श्रादि को जान, श्रवण भजन पूजन आदि भकि को गैतों को ममझ कर, विद्वान हो कर, मंमागै मन्दगै नागै, स्वादिष्ट कमांम भोजन, बर्जित गन्धा का लॅबना, परस्त्रो श्रादि का स्पर्श करना, निन्दित गौत और वेद निन्दा श्रादि को मनना आदि लौकिक विषयों में लपटा रहता है वह ऐमो मतो के ममान (जो यदि अपने पति के माय चिते पर जल गई होती तो परम गति पातो) नहीं तो प्राण के लोभ मे चिते पर मे उतर भागने के कारण न इधर को हुई न उधर को, आधी जल जाने मे शगेर भो खगब हो गया और लोक निन्दा भी हुई। दम दोह में मानो शब्द के आने के कारण वाच्या उत्प्रेक्षा अन्नकार है ॥ १८ ॥ तजत अमिय उपदेस गुरु भजत बिखय-बिख-पान। चन्द-किरण धोखे पयस चाटत जिमि सठ म्वान॥६॥ गुरु श्रमिय उपदेम तजत बिखय-बिख-पान भजन जिमि मठ खान चन्द-किरण धोख पयम चाटत ॥ ६ ॥ जो लोग गुरु के अमृत के ममान दोनों लोक में मुग्व देनेवाले उपदेश को छोड़ देते हैं और मंमागे विषय मुख को जो विष के 45

तुलसौ-सतसई।
करनेवाले अथवा टौका माला दाढ़ी और जटा बढ़ा कर पाखण्ड
करनेवाले सुपन्थ पर चलनेवाले साधु कहाते हैं अथवा चोर चतुर
अर्थात् चोरी करनेवाले बड़े चतुर कहावेंगे डाँकू योद्धा कहावंगे
अघोरपन्यौ मिद्ध कहावेगे और पाखण्डो सुपन्यौ कहावेंगे ॥ ६२ ।।
गौड़ गवार वि-पाल कलि जमन महा-महि-पाल ।
साम न दान न भेद कलि केवल दण्ड कराल ॥६३॥
कलि गौड़ गँवार नि-पाल जमन महा-महि-पाल न माम न दान
न भेद केवन्न कलि कगल दण्ड ।
कलि-युग में नौच जात और विद्याहोन गँवार गजा होंगे और
म्लेच्छ आदि चक्रवत्त महाराजाधिराज होंगे दूम कारण गज्य को
चार मुख्य बाते अर्थात् माम दान दण्ड भेद इन चागे में से
केवल दण्ड मात्र रह जायगा मो भी बहुत कगल दयाहौन
होगा।
अभिप्राय यह कि विद्वान बुद्धिमान गजनीति के जाननेवाले
धर्मिष्ठ राजा लोग कलि
युग
में न होंगे केवल बहुत नौच जात
जङ्गलौ निदई राजा उत्पन्न होंगे जो (माम) मिनाप (दान) कुछ
दे ले के मेल करना (भेद) अर्थात् शत्र के पक्ष वाले मन्त्री श्रादि को
फोड़ फाड़ के किमो से यद्ध और किमो से मेल कगना इन तीनों
उपायों को न कर के केवल किमी गत से दण्ड दे कर धन हरन
करना गजाश्री में.रह जायगा जिम से प्रजा को बड़ी पौड़ा होगी
॥३॥

सप्तम सर्ग। काल तोपची तुपक महि दारू अनय कराल । पाप पलौता कठिन गुरु गोला पुहमो-पाल ॥६४॥ अन्वय। काल तोपचौ महौ तुपक कगल अनय दारू पुक्ष्मी-पाल गुरु गोला पाप कठिन पलौता। कलियगरूप ममय गोलन्दाज है पृथ्वी तुपक श्रादि है बड़ौ घड़ो अनौति बारुद है अन्याई राजा लोग बड़े बड़े गोला हैं और अनेक प्रकार का पाप मोई कटिन पलोता है जिन के लगने से गोले कूटते हैं और प्रजालोग बड़ा दुःख भोगते हैं। इस दोहे में युद्ध का रूपक है॥ ६४ ॥ राग-रोख-गुन-दोख को साक्षी हिदय सरोज । तुलसी बिकसत मिव लखि सकुचत देखि मनोज ॥६५॥ ह्रिदय-मरोज गग-रोग्व-रन-दोख को माक्षो भित्र लखि बिकमत मनोज देखि मकुचत । हृदयरूपौ कमल प्रम क्रोध के गुण और मय दोषों का माक्षी है मो जिस प्रकार (मित्र) सूर्य को देख कर कमन्न खिलते हैं उमौ प्रकार अविवेकरूप अपने मित्र को देख कर कमन्नरूपी हृदय विकमित होता है और मन में उत्पन्न वगग्य विवेक और जानादि को देख कर चन्द्र को देख कमन्न के ममान मंचित होता है। अभिप्राय यह कि इन्द्राम्पो घोड़ों के द्वारा काम क्रोध लोभ मोह मद मत्मर श्रादि विषयों पर मन दौड़ता है और विषय मुख ३५८ सुलसौ.सतसई। .. को पा कर प्रमन्न होता है परन्तु ध्यान भकि विवेक और सब से अधिक वैगग्य के होने से मन बटुर जाता है ॥ ६५ ॥ बैर सनेह सयान पहिँ तुलसी जी नहिँ जान । ते कि प्रेम मगु पग धरत पसु बिनु पुच्छ बिखान॥६६॥ जो बैंग मनेह जान मयान पहि नहि जान ते कि प्रेम-मगु पग धरत तुलमो (ते) बिन पुच्छ बिखान पम् । जो लोग किमो से शत्रुता और किमो से मित्रता रखते हैं और विवेक होन है वे क्या हरिभकि के पथ पर पाव रख सकते हैं अर्थात् नहीं रख मकते, तुन्नमा-दाम कहते हैं वे बिना पुच्छ मोग के पशु है॥ अभिप्राय यह कि खाना मोना अपने मित्रों से मित्रता रखना और शत्रुओं से शत्रुता रखना श्रादि वाते और मनुय्य ई विवेक विचार ज्ञान आदि मनुष्यों के गुण हैं जो पशुओं में नहीं पाये जाते हैं जिन मनुव्यों में विवेक नहीं है वे पशु हो हे केवल पुच्छ और मीग नहीं है ।। ६६ ॥ राम-दास जाय कै जो नर कहिँ सयान । तुलसौ अपनी खाँड़ महँ खाक मिलावहिं स्वान ॥६॥ जो मयान नर गम-दाम पहँ जाय के कथहिँ तुलमो ते खान अपनी खाड़ गह खाक मिनावहि। जो मनुष्य अपने को बड़े चतुर मान कर राम के सच्चे भक के पास में ममान पह सतम सर्ग जा कर अनेक बातें बनाते है तुलमो-दाम कहते हैं कि वे कुत्ते के समान अपनी खाड़ में मट्टी मिलाते है। अभिप्राय यह कि जो संसारौ लोग अपने को बड़ा बुद्धिमान और पण्डित समझ के सच्चे और मौधे हरि-भक से तर्क-वितर्क और बाद-विवाद करते है वे अज्ञानी श्वान के ममान अपने हित को विगाड़ते है क्योंकि इस चाल से ईश्वर उन पर कोप करते हैं ॥६७ ॥ वि-विधि एक-बिधि प्रभु-अगुन प्रजाहिँ सवारहिं राउ। कर तें होत क्रिपाण को कठिन घोर घन घाउ॥६॥ एक-बिधि प्रभु-अगुन प्रजाहि त्रि-बिध, राउ प्रजाह मवाहिँ क्रिपाण को घाउ करतें कटिन घोर घन होत । राजा का एक प्रकार का दोष प्रजा में तीन प्रकार से प्रगट होता है क्योंकि गजा प्रजा को मोधा वा मन्दर बनानेवाला है इस में दृष्टान्त देते हैं कि हाथ से तरवार का घाव कड़ा भयङ्कर और घना होता है। अभिप्राय यह कि जैमा राजा होता है वमो हो प्रजा भी होती है यदि राजा धर्मी हो तो प्रजा धर्मिट, पापी हो तो पापिट और मधारण हो तो मधारण होती है कलियुग का गज है जिम में चार भागों में एक हौ भाग धर्म का रह गया है दमो कारण प्रजा में धर्म को अपेक्षा पाप बहुत अधिक है .हाथ हो से तरवार चलाई जाती है परन्तु तरवार का घाव हाथ से कहीं बढ़ कर होता ३६. तुलसौ-सतमई। है दमौ प्रकार गजा से दोष प्रजा में आता है और पिगुना बढ़ कर अपना फल उत्पन्न करता है। हाथ से मारने में जितना चोट लग मकती है उम से कहीं बढ़ कर तरवार से लगती है। वैसे हो राजा के बुरे काम का प्रभाव प्रजा को तिगुना दुःख देता है।६८॥ काल बिलोकत ईस रुख भानु काल अनुहार। रबिहिँ राहु राजहि प्रजा बुध व्यवहरत विचार॥६॥ . गज हि कान ईम रुख बिनोकत भानु कान्न अनुहार, गहु रबि हि प्रजा बुध बिचारि व्यवहरत ॥ ममय गजा की ओर देखता है अर्थात् गजा के व्यवहार के अनुमार फल उत्पन्न करता है और मुय ममय के अनुमार तोक्षण मृद वा मध्यम होते हैं राहु ग्रह सूर्य के लिये और प्रजा गजा के लिये दुःख उत्पन्न करता है दम कारण विद्वान लोग विचार के व्यवहार करते हैं। अभिप्राय यह कि ईश जो हैं गजा उम के व्यवहार के अनुमार समय कभी कभी बुग होता है जैसे महाराज वेणु के समय में हुआ था अथवा ईश अर्थात् परमेश्वर की इच्छा के अनुमार ममय भला बुग होता है और गौम ममय में सूर्य प्रति प्रचण्ड गोत काल में मन्द और प्रभात माम को मन्द मध्याह में प्रति प्रचण्ड हुना करते हैं ममय पा कर राहु सूर्य को दुःख देता है और गजा को प्रजा के दुष्कर्मा और माप से उत्पन्न क्लेश महना पढ़ता है इस कारण विद्वान लोग बात विचार के साथ चलते हैं । ६८ ॥

सप्तम सर्ग जथा श्रमस पावन पवन पाय सु-सङ्ग कु-सङ्ग । गहत सु-बास कु-बास तिमि काल महौस-प्रसङ्ग॥७॥ जथा अमन पावन पवन सु-मह कु-मग पाय, प-धाम क-बाम गहत तिमि काल महोम-प्रमङ्ग ॥ जिस प्रकार निर्मन श्री पवित्र बाय भनी थोर पर बम्न का माथ पा कर भनौ वा बुग हो जाता है उभो प्रकार प्रमप गजा के मङ्ग से भला बुग हो जाता है अर्थात् जब गजा माना होता है तब ममय भला होता है और जब गजा बुग होता है व ममय बग होता है। यह बात प्रत्य न । जब मोहरा फलों के बीच से पाती है तो शोतल श्रारा होता है बार जब दुर्ग-ध-यक पदार्य वा म्याना से हा कर पाता तो दश श्र-यक होता है। कहिय" पाठ हो वहा कहा। चाय" मा अर्थ काना उचित है ।। ७० ॥ जहाँ " भलउ चलत पथ सोच भय विप-नियोग नय नेम। कुतिय सु-भूखन भूवियत लाह नेवारित हेम ॥११॥ विप मोच भय नय नेम नियोग (द) भन्नत पय चलत (यथा) सु-भृखन कु-तिय भनियत इमारत मोह ॥ गजा के मोच डर नोति कानन बार अाता नेट पजा भी ममार्ग पर चलती है जैसे उत्तम उत्तम माहना में कमान को भी मोभित करते हैं और मोने मे ल हे का कुरूपता दूर को जाना है।

३६२ तुम्नमौ-मतसई। अभिप्राय यह कि ममय बुग हो तो भी यदि राजा धर्मात्मा हो तो उम के भय से प्रजा को नियम धर्म के साथ अवश्य ही चलना पड़ता है जब कोई गजा अपने गज में ऐमौ श्राज्ञा का प्रचार करवा देता है कि जो कोई झठ बोलेगा विश्वाम-घात करेगा और चोरी करेगा उसे अत्यन्त कठिन दण्ड मिलेगा तो ये सब काम बहुत कम हो जाते हैं जैसे पुराने राजाओं के समय में हुआ है कमी भौ कुरूप स्त्री क्यों न हो खूब सुन्दर २ गहना और बस्त्र पहना दौजिये तो उड़ चलेगी। लोहे को तरवार बन्दूक श्रादि हथियारों के कबजाँ पर मोने की कलई करने से वे कसे जगमगा उठते है दमौ प्रकार बुरे समय को बुरी प्रजा भौ राजा के धर्म से अपने पाप को ढॉप रखती हैं ॥७१ ।। सुधा कु नाज सु-नाज फल पाम असन सम जान । सु-प्रभु प्रजा-हित लेहि कर सामा-ऽदिक अनुमान ॥७२॥ स-प्रभु प्रजा-हित कु-नाज म-नाज पाम फल सुधा असन सम जानि मामा-दिक अनुमान कर लेहि। अच्छे राजा-लोग प्रजात्रों को भलाई के लिये खराब अनाज मोटा चावल चना प्रादि सुनाज मन्दर उत्तम वासमती चावल गेहूँ अरहर श्रादि पाम श्रादि उत्तम २ फल फरइगै अमृत समान जान कर और इस से शान्ति होने का अनुमान कर के उपहार लेते हैं। अभिप्राय यह कि जो २ धर्मिष्ठ राजा-लोग है मो जब अपनी सप्तम सर्ग ३८३ राज-धानी से बाहर जाते है तो धनी निर्धन छोटी बड़ी प्रजा अपनी शक्ति के अनुसार बुग भला अनाज और फल जो कुछ उन के पास रहता है गजा के मनमुत्व ला कर भकि के माय उपहार देती हैं और प्रजा का प्रेम बढ़ाने के लिये गजा उसे प्रमन्त्रता से स्वीकार कर लेता है जिम में किमो प्रकार का दोष नहीं ममझा जाता ॥ ०२ ॥ पाके पकये बिटप दल उत्तम मध्यम नौच । फल नर लहहिं नरेस तिमि करि बिचार मन बीच ॥ ७३॥ नर बिटप फल दन पाके पकये लहहि तिमि नरेस उत्तम मध्यम नौच (फन लहि) मन बीच बिचार करि ॥ मंमार में मनुष्य लोग वृक्ष के फल पत्त को पक कर श्राप मे श्राप गिरने पर, वृक्ष में पके हुय फन को तोड़ने, और कच हौ फन को वृक्ष से तोड़ कर पकाने पर, उन्हाँ तीन उत्तम मध्यम नीच उपायों से फन पाते हैं, उमो प्रकार गजा तोन उपायों के द्वाग प्रजाओं से उपहार पाते हैं इस बात को अपने मन में विचार लीजिय। अभिप्राय यह है कि मनुष्य-लोग पहले वृक्ष को लगाते फिर उस को पशु-पत्नी से बचा कर पानी मे मीच का पालते पोमते है, तैयार होने पर जब फल लगते हैं और पक के भूमि पर गिरते हैं तो फल ले जा कर खाते हैं इसी प्रकार जो गजाधर्म-पूर्वक प्रजा का पालन कर के उन को रक्षा करता है और अपनो प्रमत्रता-पूर्वक बिना माँगे जो कुछ वे देते हैं उमो को ले कर मन्तुष्ट होता है वह उत्तम, जो किमो प्रकार को सूचना वा अपने काम-दारों को

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तुलसौ-मतसई।
प्ररणा से प्रजा को थोडौ प्रसन्नता से उपहार लेता है वह मध्यम
और जो काम-दारों के दाग सूचना करवा कर वा स्वयं श्राज्ञा दे कर
प्रजा को अप्रसन्नता से उपहार लेता है वह नोच कहलाता है और
वृक्ष के फलों को तोड़वा कर खानेवाले और कच्चे फलों को तोड़वा
कर पान के द्वाग पकवा कर खानेवाले किसान के ममान है ॥७३॥
कछ हाथ न लागिहै।
धरनि धेनु चरि धरम तिनु प्रजा सु-बत्स पन्हाय ।
हाथ कळू नहिं लागि हैं किये गोष्ठ की गाय ॥७४॥
धनि धेनु धरम तिनु चरि प्रजा बत्स पन्हाय, गोष्ठ को गाय
किये
पृथ्वो-रूपौ गौ धर्म-रूपौ घाम को खा कर प्रजा-रूपो अच्छे बछवे
के (नाज-रूपो से) अपने थन को भरती है। दूम पृथ्वी-रूपी गौ
को गोशाला में बची हुई गौ बनाने से कुछ लाभ न होगा।
अभिप्राय यह है कि जिस प्रकार छुट्टी कुटाई गौ वण आदि
घर के बहुत प्रमन्न रहती है उमो प्रकार धर्मिष्ठ राजा होने से जब
धर्म-रूपौ ण पृथ्वी पर बढ़ जाता है तब पृथ्वी अत्यन्त प्रसन्न रहती
है और अन्न प्रादिक अधिकाई के साथ उत्पन्न कर के अपने स्वामी
राजा और बच्वा-रूपो पुत्र को प्रानन्द देती है और केवल गो-शाला
में बन्धौ गौ के ममान थोड़ो मी घाम दे कर दूध-रूपौ कर दूइने से
कुछ भौ लाभ नहीं होता। जो राजा प्रजा को पुत्र के समान पाल-
पोस के उम को प्रसन्नता से कर लेता है वह राजा दोनों लोक में
मुख पाता है। रूपक अलङ्कार स्पष्ट है॥४॥

सप्तम स। कण्ट कण्ट है पड़त गिरि साखा सहस खजूर । गरहिं कु-विप करि करि कु-नय सो कु-चाल भुबिभूरि ॥ ७५॥ खजूर सहम माखा कण्ट कण्ट के सो गिरि पड़त भुबि कु-चिप भरि कु-चाल कु-नय करि करि गहि। खजूर के ४ को हजारों शाखा जिन को प्रत्येक गाँठ पर काँटे हो काँटे होते हैं मो टकड़ा तुकडा हो कर #मि पर गिर पड़ती है पृथ्वी पर दुष्ट गजा लोग बहुत खराब काम और अनानि कर के गल जाते हैं अथवा ( मो कु-चानि रिब) उन्ही बुरे गजात्रों को प्रभौति से पृथ्वी पर बहुत मौ कु-चाल्न बुगो गेत फैन्न गई है। अभिप्राय यह कि जितनौ गाठों से भरा हुआ खजूर वृक्ष अनेक काँटाओं के कारण टुकड़े २ हो कर गिर जाता है वही दशा कण्टक-रूप अनौति से भरे अधर्मी गजाओं की है जो श्राप गल जाने पर भी अपनी कुचाल से अपनी प्रजा को दुःखो कर छोड़ते हैं ॥ ७५ ।। भूमि रुचिर रावन-सभा अङ्गद-पद महि-पाल । धमै राम-नय सौम बल अचल होत तिहु काल ॥७६॥ भृमि रुचिर रावन-सभा रुचिर महि-पाल अङ्गद-पद गम-नय सौम धर्मबल तिहुँ काल प्रचन्न होत । ऊपर के कई एक दोहों मे कलियुग कुगज और अभौति का वर्णन कर के अब छहत्तर के दोहे से मनौत का वर्णन करते हैं। अनेक ग्बों से भरी हुई यह पृथ्वौ हौ गवण को अत्यन्त सुन्दर सभा सुन्नमौ-सतमई। है जिम पर धर्मिष्ठ राजा लोग अङ्गद जौ के पाव हैं सुन्दर रमणीय नौति-रूपी मौमा के धर्म के बल से अथवा महाराज राम-चन्द्र को सु- नौति-रूपी धर्म को मौमा को शक्रि से तीनों समय में चल रहते हैं। अभिप्राय यह कि दम संमार में जो राजा सुन्दर नौति और धर्म से चलेगा बह अनेक बिघ्न दुःख और शत्रुओं से बच कर रावण की सभा में अङ्गद जौ के पाव के समान मदा दृढ़ रहेगा जिस प्रकार रावण की सभा में बड़े २ बलवान राक्षस श्रादि अङ्गद के पाव को हिलाते थे तो भी वह न डगा उमौ प्रकार अनेक शत्रुओं के उठाने पर भी धर्मनोति युक्र राजा अचल रहेगा अङ्गद पक्ष में निकाल शब्द का अर्थ प्रादि मध्य और अन्त ममय और राजा पक्ष में प्रात: मध्यान्ह और सायं अथवा बर्तमान भूत और भविष्यत् काल करना अच्छा होगा। श्राशय यह कि जो राजा प्राचीन समय में धर्मनौति पूर्वक राज करते थे उन्हें कोई न हिला मका जो अब नौति पूर्वक करते हैं उन्हें कोई नहीं दुःख दे सकता है और जो सुधर्म औ सुनौति के माथ राज करेंगे कोई उन को न हिला सकेगा ।। ७६ ॥ प्रौति राम-पद नीति-रत धरम-प्रतीत सुभाय । प्रभुहि न प्रभुता परिहरै कबहुँ बचन मन काय॥७७n बचन मन काय राम-पद प्रौति-सुभाव नौति-रत सुभाव धरम- प्रतीत प्रभुता.प्रभुहि कबहुं न परिहरै। जिन राजाओं को प्रौति मनमा बाचा कर्मणा गम-चन्द्र के परण सप्तम सर्ग। में रहती है और जो राजा अपने स्वभाव से राज-नौति में लगा रहता है और स्वभाव ही से धर्म में प्रौति रखता है ऐसे राजा को प्रभाव उत्साह और मन्त्र से उत्पन्न प्रभुता कभी नहीं छोड़तौ अर्थात् जो राजा ईश्वर-भक धर्म-तत्पर हो कर राज-नौति से चलता उम का राज सदा अचल बना रहता है और उस को मामर्थ कभी नहीं घटती है॥७॥ कर के कर मन के मनहि बचन बचन जिय जान। भू-पति भलहि न परिहरहिँ विजय बिभूति सयान । ॥७८॥ विजय बिभृति कर के कर मन के मनहि बचन बचन जिय जिय जान मयान भल भृ-पतिहिं बिजय बिभृति न परिहहिं॥ युद्ध में जय और मब प्रकार का ऐश्वर्य जिम को जीत हाथ में रहती है और मन को उदारता श्रादि गुण मन ही में तथा बचन के मत्यता श्रादि गुण बचन हौ में बने रहते हैं ऐसे चतुर और मयाने राजा को रण जय और मब प्रकार का ऐयर्य कभी नहीं छोड़ता है। श्राशय यह कि जिन अङ्गो के जो ऐश्वर्य है वे उन्ही में रहते हैं। इितौयार्थ। (जिय जान ) मन में निश्चय कर जानिये कि जिम गजा के हाथ से करने योग्य जो काम हैं मो हाथ में रहते हैं अर्थात् जब तक सिद्ध नहीं होते तब तक न दूसरे के हाथ जाने पावे न दुमग जान सके और जिस काम को करने के लिये मन में विचारता ।

सुनसौ-सतसई। वह जब तक मिद्ध नहीं होता तब तक मन ही में रहता है मन की बात को दुमरा कोई नहीं जान सकता और बात के द्वारा जो होनेवाला है मो भी बात हो में गुप्त रहता है इस प्रकार राज-गौनि के कामों को गुप्त रौत से करनेवाले राजा का पराजय कभी महौँ होता और ये बुद्धिमान और उत्तम महाराज कहाते हैं ॥७८॥ गोली बान सु-मत्त सुर समुझि उलटि गति देख। उत्तम मध्यम नौच प्रभु-बचन विचारु बिसेखि ॥७८ ॥ उत्तम मध्यम नौच प्रभु-बचन बिसेखि गोलो बान सु-मत्त सुर बिचार उलाट गति ममुझि दे। उत्तम मब से भले उम से कम भले मध्यम और माँ से दृष्ट नौच इन तीन प्रकार के राजाओं की बात को विशेषता को गोली घाण और मात्रा स्वर को विधागे अर्थात् जैसे गोली बन्दूक के मुख से निकल कर जब तक निमाने पर नहीं लगतौ तब तक पौधे महौं फिरती उसी प्रकार उत्तम गजा का बचन जो मुख से निकला मो मिद्ध हुआ और मध्यम गजा का बचन बाण के समान अर्थात् जिस प्रकार बाण निकलते ममय देख पड़ता चलनेवाले को यह श्राशा होतो कि लक्ष्य को अवश्य वेधेगा परन्तु उस को गति दूर के लक्ष्य तक नहीं पहुँच शकतो यदि पूरी शनि हुई तो लक्ष्य में लगा नहीं तो बौच ही में गिर गया और नौ राजाओं के बचन मात्रा (मर) के समान है अर्थात् मनने में मात्रा का स्वर व्यञ्जन के अक्षर से मिला हुत्रा जान पड़ता है परन्तु अलगाने से व्यञ्चन साम सर्ग। २८७ भूठा जान पड़ना है अर्थात् बिना वर को महायता उस का उचारण सौ नहीं होता उमौ प्रकार कहते जाम पड़ता है कि यह बचन अवश्य हो सत्य है परन्तु जब उस की सचाई का समय आता है तो पूरा नहीं पड़ता ॥ ८॥ सचु सयाने सलिल इव राख सौस रिपु-नाव। बूड़त लखि डगमगत अति चपरि चहूँ दिसिधाव ॥८॥ मयाने भत्रु मलिल इव रिपु-नाव मौम राखत डगमगत बूड़त लखि अति चपरि चह दिमि धाव । बुद्धिमान वैरौ जल के ममान हैं, वे अपने हैं, वे अपने शत्रु को नाव के मदृश शिर पर रखते हैं परन्तु जब शत्रु नाव के ममान डगमगा कर डूबने लगता है तो उसे देख कर चारो ओर से अत्यन्त बल के माथ लपट कर दौड़ते हैं। अभिप्राय यह कि जैसे जल नाव को मदा अपने पोठ पर रखता है परन्तु किसी प्रकार यदि नाव डगमगानी तो चारो ओर से वेग के साथ उम में भर कर शौत्र उसे डुबा देता है। उसी रौत बुद्धिमान राजा अपने शत्रु को श्रादर भाव से शिर पर चढ़ाये रहते हैं परन्तु जब देखते हैं कि उम के ऊपर कोई विपत्ति आई है तो चारो ओर से लपट झपट कर उसे बिपत्तिरूपी मागर में रौड़ के ऐसा जुवा देते हैं कि वह जरा मन से नष्ट हो जाता n८॥ 47 सुलमो-मसमई। रैयत राज-समाज घर तन धन धरम-सु-बाहु। सत्यसु-सचिवहिँ सौपि सुख बिलसहि निज नर-नाहु ॥१॥ नर-नाहु धर्म-सुबाहु सत्यम-मचिवहि मिज रैयत राज-समाज घर तन धन मौपि सुख बिलमहि । राजा लग धर्म-रूपी सुन्दर बाहु को धारन करनेवाले सत्य-रूपी मन्त्री को अपनी प्रजा रान-सेना घर के लोग अपना मरौर धन साँप कर के श्रानन्द भोग करते हैं। अथवा धर्म-रूपी सुन्दर बाहु-बल रखनेवाले राजा मत्य-रूपी मन्त्री को अपना अन्न धन सब मौप के निश्चिन्त प्रानन्द करते हैं। अभिप्राय यह कि जिस राजा के धर्म बाहु हैं और सत्य मन्त्री हैं उस के निकट बिपत्ति नहीं पाती और धर्म तथा सत्य को धारन करनेवाला राजा मदा अकण्टक राज भोगता ॥२॥ रसना मन्त्री दसन जन तोख पोख सब काज। प्रभु कैसे विप दान-दिक बालक राज समाज॥२॥ रममा मन्त्री, दमन जन, सब काज तोख पोख, चिप प्रभु पालक से दामारिक के तोख पोख । राजा के मन्त्री को जौभ के समान होना चाहिये कि भला बुरा सब यथार्थ मता देवे जिस प्रकार जिन खट्टा मौग सब का खाद बता कर पेट को दे देती है, दाँत के समान राजा के साम सर्ग। कारोबारियों को होना चाहिये जो भोजन को काट कूट के मुख को दे देते है, राजा को मुख के समान होना चाहिये कि दाना- रिक दे कर के प्रजा का बालक के समान पोषण पालन करें। अभिप्राय यह कि जिस प्रकार दाँत सम वस्तुत्रों को काट शटके परने के योग्य बना के मुख को समर्पित करता है और जौम सब खाद को यथार्थ चौखती है और इन दोनों को सहायता से उत्तम भोजन मुख को मिलता है और मुख भो उसे खा कर प्ररौर के छोटे बड़े सब अङ्गों को पोढा करता है उसी प्रकार राजा के मन्त्री और सेवकों को होना चाहिये कि सब अपनी कमाई राजा को दे और राजा जौभ के ममान ले कर अङ्ग-रूपौ सब का पोषण करे रामायण में कहा भी है। मुखिया मुख मो चाहिये खान पान को एक । पोखे पाले मकल अङ्ग तुलसौ महित बिवेक ॥२॥ लकड़ी डौवा करछुलौ सरस काज अनुहारि । सु-प्रभु जुनाहिन परिहरहि सेवक सखा बिचारिशच् काज अनुहारि पकड़ो डौवा काकुनौ सम्म समान नाहिन परिहरहि (मो) मु-प्रभु । जिस प्रकार काम के अनुमार काठ, चिमचा, कलकल बड़ी सुखदाई होती है उसौ रौत अपने कामों को बिचार कर जो गजा कोटे बड़े नौकर चाकर और मन्त्रियाँ के समाज को नहीं त्याग करता है वह अच्छा गत्रा कहाता है। सेवक सखा ज २०९ तुलसौ-सतसई। अभिप्राय यह कि अपने २ समय पर सब बस्त काम देती हैं रसोई के लिये काठ न हो वा रोटौ उतारने सेकने के लिये चिमचा श्रादि वा दाल तरकागै आदि चलाने परोसने के लिये करछुल न हो तो बड़ी कठिनता भोगनी पड़े उमौ रौत छोटे कामों को करने के लिये छोटे नौकर और बड़े २ प्रयोजनों के लिये बड़े २ बुद्धिमान मन्त्री न रहें तो राज-काज में विघ्न हो सकता है इस कारण अच्छे राजा लोग बड़े छोटे मब प्रकार के लोगों को रखते हैं और उन को त्याग नहीं करते क्योंकि छुड़ा देने से वे जा कर शत्रु से मिल के राजा को बुगई भी कर सकते है ॥३॥ प्रभु समीप छोटे बड़े अचल होहि बलवान । तुलसी बिदित बिलोकही कर अङ्गुलि अनुमान ॥४॥ अन्वय। प्रभु ममोप छोटे बड़े प्रचल बलवान होहि। तुलसौ कर अङ्गलि अनुमान (प्रभु) बिलोकहो (इति) बिदित ॥ अपने स्वामी के निकट छोटे बड़े अचल निर्भय और बलौ बने रहते हैं। तुलसी-दाम कहते हैं कि हाथ को इङ्गलियों के समान खामी छोटे बड़े सब को अपने २ काम के लिये श्रावश्यक देखते हैं यह बात लोक में प्रमिद्ध है। अथवा जिस प्रकार हाथ को पाँचो अङ्गुली समान गिनी जाती और मनुष्य पाँचो को काम-काजी और प्यारो मानते है किसी के भी काटने से मपाम पौड़ा होती है, मब को पूरी और बलवान रखने के लिये यत्र करते हैं उसी प्रकार अच्छे स्वामौ करते है।

सप्तम सा २०३ यदि "हाथ की पाँचो अनुलौ बरावर" रस कहावत को दोहे में अन्तर्गत समभिये तो लोकोकि अलहार होगा ॥४॥ तुलसी भल बरनत बढ़त निज मूलहि अनुकूल । सकल भाँति सब कह सुख-द दलन सहित फल-फूल ॥८५॥ तुलसी बरनत निज मूलाई अनुकूल दलन-महित फल-फूल भल बढ़त सकल भाँति सब कहं सुख-द (होत)। तुलसौ-दास कहते हैं कि (वृक्ष प्रादि ) अपने मूल अमुमार अर्थात् जड़ में पानौ त्रादि देने से अपने पत्ता फल फूल श्रादि सब महित भली भाँत बढ़ता और मब प्रकार सब के लिये सुख-दाई होता है उसी प्रकार राज अपने मल राजा के अनुमार सब के लिये सुख-दाई होता है बढ़ता है ऐमा कवि वर्णन करते है। अभिप्राय यह कि राज में गजा मष का मान राजा को भलाई बुराई से सब को भलाई बुगई होती है इस से सब के लिये उचित है कि राजा को भलाई करे ॥८५॥ के है इम कारण स-धन स-गुन स-धरम स-गन स-जन सु-स-बल मही-प। तुलसी ने अभिमान बिन ते वि-भुवन के दीप ॥८६॥ मधन गुन स-धरम म-गन मौ-प सु-म-बल, जे अभिमान बिन ते पि-भुबन के दोप। सब प्रकार के धन पूरे कोष के सहित मौर्य औदार्य धादि गुणों से युक, दान मान तप क्षमा दया आदि धओं से प्रोभित १०० तुलसौ-सतमई। । बौर अच्छे र नौकर चाकर और सेना से युक्त राजा बड़ा बसी होता है। तुसमी-दाम कहते हैं कि दून में जो राजा अभिमान रहित होते हैं वे वर्ग, मर्य, पाताल तीनों लोकों में श्रेष्ठ है। ऐसे महाराजाओं का मिलना दुर्लभ है॥८६ ।। साधन समय सुसिह लहि उभय मूल अनुकूल । तुलसौ तौनी समय सम ते महि-मण्डल मूल ॥८७॥ (जे) माधम समय सुमिद्धि लहि (जाहि) उभय माधन मल अनुकूल तुलमो ते तीनौ ममय सम महि-मण्डल मल । अपना कार्य मिद्ध करने के समय ही में जो लोग मिद्धि पाते हैं और जिस को इस लोक में सुख देनेवाले भोजन बस्त्र प्रादि और परलोक में सुख देनेवाले धर्म कर्म और राज्य के सब अष्टाङ्ग अनुकूल है उन के लिये तुलमौ-दाम कहते हैं कि लोक और परलोक को मिद्धि और कार्य को सफलता दुम तौनों के समय पर सिद्ध हो जाने से वह राजा भूमण्डल के सब राजाओं के मण्डली में भी मुखिया गिना जा सकता है अभिप्राय यह कि सब प्रकार का सुख मिलना बड़े पुन्य का काम है। राज्य के मात बङ्ग, गजा मन्त्री मित्र कोष गज्य किसा और सेना राज ये सब दृढ़ और अपने वश में रहे लौकिक सुख के पदार्थ सुगन्ध, स्त्री, बस्त्र खान पान भोजन गहने और वाहन (सवारी) सब सन्र और उत्तम मिले और जो मनोरथ करे उस को मिद्धि में किसी प्रकार का विन्न न हो ऐसा राजा अवस्य सप्तम सर्ग। से अपने राज समूह का भूषण कहा जा सकता है। जहाँ मल मूल पाठ हो वहाँ सब कल्याण का कारण ऐसा पर्थ करना चाहिये ॥८॥ भारत रौत रामायन अनुहरत सिख जग भौ तुलसी सठ को को सुनै कलि कु-चालि परतीति ॥८॥ (को) गगमायन मिख पनुहरत जग भारत रौत भौ। तुलसी को को मुनै कलि मठ कु-पालि परतीति । कौन रामायण को शिक्षा अर्थात् पिता को प्राजा माममा जान्न खभाव हो कर काम करना परस्त्रौ हरण न करना आदि धर्म का अनुमरण करता है अथवा रामायण के ममय का अर्थात् बेता युग जिम में तीन भाग पुन्य और एक भाग पाप था कौम अनुकरण करता है अर्थात् कोई नहीं करता है। मंमार भारत के समान हो गया अर्थात् लड़ाई झगड़ा अपने २ अंश के लिये युद्ध डाइ कपट इत्यादि के करने के कारण संमार भारत के समान कलि युग में हो रहा है अथवा कलि युग के आने के समय के कुछ पूर्व भारत उत्रा इस कारण उम समय धर्म का एक हौ पाव रह गया तो अब मा लोग बुरे समय के अनुसार पाप करने लगे। अब तुलमो-दास के उपदेश को कौन सुनता है कलि युग के दुटों को बुगै रौतों से पर विश्वास और अनुगग अभिप्राय यह कि कलि में रामायण के उपदेश की रौत पर नेवाले बहन कम है राम के राज में जैसा धर्म था वैसा है ।

सुनसो-सतसई।
होना कलि में बहुत कठिन है वा रामायण में तुलसी-दाम जौ ने
जो उपदेश दिया है उस के अनुमार भी लोग नहीं चलते व
तो महाभारत के समान भाई के उचित अंश को न देने में परम
ठौ दुर्योधन से बड़ों को बाजा के विरुद्ध चलने वाले नृप
और युद्ध कर सकुल नाश को पावेंगे।
"राम राज" का सुख जो कहावत हो गया है नौचे को
चौपाइयों में तुलसौ-दाम वर्णन करते है।
चौपाई।
राम राज बेठे त्रयलोका। हरखित भएउ गाउ सब मोका ॥
बैर न कर काह मन कोई। राम प्रताप विखमता खोई ।।
दोहा।
वरनाश्रम निज निज धरम निरत वेद पथ लोग।
पलहिंमदा पावहिं सुखहि नहि भय मोकन रोग ।।
चौपाई।
दैहिक दैविक भौतिक तापा। राम राज महि काहि व्यापा ॥
सब मर करहिं परस्पर प्रौतौ । चलहिं सुधरम निरत श्रुति नौती॥
पारिउ परन धर्म जग माँही। पूरि रहा सपनेहुँ अघ नाहीं॥
राम भकि रत भर पर नारौ । सकल परम गति के अधिकारी।
पसप बित्यु नहि कवनिउ पौरा'। सब सुन्दर सब निरुज शरीरा॥
गरि दरिद्र कोउ दुखौ म दौमा । नहिं कोउ अन-धम लकवण होना।
सब निर्दम्भ धर्म रत धरनौ। नर अरु मारि चतुर भ करनौ।
सब गुनग्य सब पण्डित ग्यागौ। सब क्रितम्य नहिं कपट मयानौ।

नाम
१.
होता।
राम राबविगेस समाराचर जग माहिं।
कास धरम खभावगुण
क्रित
दुख काइहिं नाहिं॥
चौपाई।
भूमि मत सागर मेखला । एक भूप रघु-पति कोमला
भुवन अनेक रोम प्रति जास् । यह प्रभुता का बहुत न तास ॥
मो महिमा समुभत प्रभु केरौ । यह परणत हौनता घनेरौ।
मो महिमा खगे-म निजबानौ। फिरि यह चरित तिमऊं रति मानौ।
सो जाने कर फल यह लोला। कहहिं महा मुनि स-मति सु-सौला ।
राम राज कर सुख-मम्पदा । बरणि न सकहिं फौम मारदा।।
सब उदार सब पर-उपकारी। विज-सेवक सब नर नारी॥
एक-मारि-व्रत रत मर भारी। ते मन बच निज-पति हितकारी॥
रोहा।
दण्ड यतिन कर भेद जह मर्तत चित्य-ममाज ।
जीतहिं मनहिं सनिय श्रम राम-चन्द्र के राज ||
पाई।
फूलहिं फलाह सदा तक कानन । रहहि एक मङ्ग गज पचानन ॥
खग निगर महज विसराई। समणि परस्पर प्रौति बढ़ाई॥
कूजहि खग विग नामा बिन्दा । अभय च िबन करहि अनन्दा ॥
सौता सुरभि पवन वह मन्दा । गुचन अलि लेवस्तु मकरन्दा ।।
सता पिटप माँगे फस द्रवहौं। मम भावते धेनु पय सवहो।
48

तुलसी सताई।
ममि-सम्पन्न सदा रह धरणै। त्रेता भर मत-मुंग को करणे ॥
प्रकटे गिरि मामा मणि-खानी। बगदाऽऽतमा रूप पहिचानौ ।।
मरिता मकल व बर बारौ। मौतल अमल खाद सुख-कारो॥
सागर निज मर्यादा रहहौं । डारहिरन नटमि नर लहहौं ।
सरमि-ज महल सकल तड़ागा। अति प्रसन्न दस-दिसा विभागा ॥
दोहा।
विधु महि पूर पियूख-रवि तप तेज न काज ।
मार्ग बाग्दि देहिं जल रामचन्द्र के राज ॥
चौपाई।
कोटिन बाज-पेय प्रभु कौन्हे। अमित दान विप्रन कई दौन्हे ॥
श्रुति-पथ पालक धरम-धुर-न्धर । गुणा-तौत अरु भोग पुरन्दर ।।
पति अनुकुल सदा रह मौता। सोभा-खानि सु-मौल बिनौता ॥
जामति क्रिपा-सिन्धु प्रभु-ताइ । मेवति चरण-कमल मन लाई ॥
यद्यपि यिह सेवक व मेकिनौ। सभ प्रकार सेवा-विधिलि॥
निज कर गिह परिचर्या करहीं। रामचन्द्र श्रायसु अनुसरहीं।
बेहि विधि क्रिपा-सिन्धु सुख मानहि। मोद पिय सेवा विधि उर धानति॥
कौसल्याऽऽदि मासु ग्रिह माहौं । सेवहि सबै मान-मद नाही ॥
उमा-रमा-ब्रह्माणि-पन्दिता । जगदम्बा सन्मत ममिन्दिता॥
दोहा।
मा क्रिपा-कटाक सुर चाहत चितवनि मोर।
राम पदारविन्द रत रहति खभावनिोद ॥

सामवर्ग।
चौपाई।
सेवहि माऽनुकुख सभ भाई। राम चरण रति प्रौति सहाई।।
प्रभु-पद कमल विखोकत रहहौँ । काहि क्रिपाल हमर्हि का कहौं ।
राम करहिंधातन पर-पौतौ। नाना भांति मिखावहिनौती॥
हरखित रहहिं नगर के खोगा । करहिं मकल सुर दर्लभ भोगा।
पानिधि विधिहि मनावत रहहौँ । श्री-रघु-बौर परन-रति चहौं ।
रामचन्द्र के राज में धर्म का वर्णन यो किया है
मोचिय विप्रो वेद विहीना। तमि निज धरम विखय लवलौना।
मोपिय विपति जो नोति म जाना। जेहि न प्रजा प्रिय प्राण ममामा॥
मोपिय वैस्य क्रिपण धनवाना। जो न अतिथि सिव-भकि मु-जाना।
मोचिय सूद विप्र-अपमानौ। मुखर मान-प्रिय ग्यान-गुमानी ॥
मोचिय पुनि पति-बञ्चक नारी। कुटिल कलह-प्रिय इच्छा-चारौ।।
निज त परिहरई। जो नहि गुरु प्रायस अनुसरई ॥
मोचिय बटु
दोहा।
मोचिय विहीनो मोह-वस करे धरम-पथ त्याग ।
मोपिय यति प्रपञ्च-रत बिगत बिवेक विराग॥
चौपाई।
।
खानम सोइ सोचग जोग। तप बिहाय जेहि भावत भोग ॥
मोरिय पिसन अकारण क्रोधी। जननि-जनक-गुरु-बन्ध-विरोधी॥
सब विधि मोपिय पर अपकारी। निज जन पोखक निर्दय भारी॥
सोचनीय बौँ विधि मोई। जोन काड़िछल हरि-जन होई॥
"राम राज" या धान कस कहावत हो गया है इससे उसका
वर्षन दिवसाचा ॥८॥

तुबनी-साई। काल-जोग होय। सु-हित सुख-द गुण-जुत सदा काल- घर धनजारत अनल जिमि त्यागे सुख नहि कायदा सदा सु-हित सुख-द गण-जुन ते काल जोग दुख दोष। घिमि अनल घर धन जारत त्यागे कोय मुख नति। जो वस्तु सर्वदा हित करनेवाली है जैसे कमल के लिये सर्य तथा सदा सुख देनेवाले जैसे सस्य के लिये जल और सव दिन उत्तम गुणयुत दूध भी समय के अनुमार दुखदाई होता है जैसे मौत-काल में अनि सुखदाई होती है परन्तु समय पा के वही अनि घर धन में मग जाती है तब उन्हें जला के राख बना देती है परन्तु सब दिख के खिये उस के त्याग देने में सुख नहीं होता है। पभिप्राय यह कि यद्यपि सर्य का नाम कमल-बन्धु है तो भी बस नरहने पर उसे सखा डालते हैं। नख खेती बारी के लिये पछा है तो भी अधिक जल होने से सस्य सड़ जाता है। घो दुध प्रादि भोजभ निर्दोष है तो भी ज्वर श्रादि का एक रोगों में दुख- दाई होता है बिना अग्नि संसार का काम नहीं चल सकता है परन्तु अधिक अग्निहोने से प्रसन्न हो जाता है इस कारण इन सब बस्तुओं को सब दिन के लिये त्याग करना उचित नहीं है केवल भला बुरा भमय देख के काम करना चाहिये ॥ ८ ॥ तुलसी सर-घर सम्म जिमि तिमि तम घट माहि। सब मनपन हुँतन सो समुश सु-बुध-जन तालिम तुबरी मिमि सस्वर सबतिमिव पर मारिनलम स्वतादि भुष-वन मसुभा तुलसीदास कहते हैं कि जैसे उत्तम नाखाव में समा गड़ा रहता है उसी प्रकार चैतन्य खरूप जीवात्मा शरीर में रहता है चौर सूर्य के धाम से वह बना नहौँ समता इस बात को विधान खोग समझते है । खम्भा जल में रहता है परन्तु बसमय नहीं हो जाता है उसी प्रकार पात्मा शरीर में रहता है परन्छ भरीरमय नहीं हो जाता। परमात्मा सर्व शेष-दौन निक्षेप है। (द्वितीय प्रामङ्गिकार्थ)। जैसे सरोवर में खम्भा रहता है और जल के उपदेपन से रखोला बना रहता है और सूर्य के घाम से भी नहीं सूखता है सेतो (घट ) शरीर में शत्मा है जिसे पण्डित लोग समभातेरे और जिसका जैसा अपराध हो उसे वैसा ही दण्ड देते हैं परन्तु त्याग नहीं करते ॥१०॥ तुलसी झगड़ा बड़न के बीच परहु अनि धाय । खरे खोह पाहन दोज बीच रूइ जरि जाय॥ ८१॥ तुलसी बड़न के भागड़ा बौष धाय जमि पर जोर पाहन रोग खड़ेगर बीच जरि जाय ॥ तुलसी-दाम कहते हैं कि पड़ो को बड़ाईच दौड़ कर मत पड़ो रस में इवान देते हैं कि बोजा पत्र पापस में रमोपाते वो पौष मारे।

३८२ तुलसी-सवसई। . अभिप्राय यह कि जब चकमक पत्वल में से भाग निकालने लिये लोहे से ठोकते हैं तो भाग निकल के बीच कोई को भस्म कर डालती है और पत्थल और खोहे की कुछ हानि नहीं होती है उसौ रौत दो बड़े र जनों में जब युद्ध होने खगता है तो छोटौं का उन के बौष पड़ना भला नहीं होता क्योंकि विचबई मारा जाता है॥८॥ भरथ आदि इन परिहरहु तुलसी सहित विचार। अन्त गहन सब कह सुने सन्तन मत सुख-सार ॥२॥ प्ररथ आदि सहित बिचार इन परिबरा, तुलसौ सन्तम मत अन्त गहन सब कह सुखसार सुने । अर्थ, धम, धर्म, पुण्य काम, भोग और मोक्ष ये चार पदार्थ हैं तिन के माह में विचार के साथ (इन) हिंसा छोड़ देना चाहिये अर्थात् धन और धर्म के बढ़ाने में मनमा बाचा कर्मण किमी को पौड़ा न देना चाहिये और विचार के साथ अपराधी को दण्ड देना उचित है तुलसौ-दास कहते हैं कि साधु जनों के मत के अनुसार श्रम समय में (गहन) बन में जा बसना सब के लिये सुखदार होता है ॥ मौति में लिखा है कि,- "प्रयमे मार्जिता विद्या दितीये नार्जितं धनम् । हतीये नार्जिता कौर्तिचतुर्थे किं करिवति ॥" १ पहली अर्थात् वाचावया में विद्या पढ़ना, द्वितीय युवावखा साम । ए में धन फिर धर्म से उत्पन्न वा और असम चे पन में बन में वा कर ईश्वर का भजन करना उचित है। इस अवस्था में कि-ौन होने के कारण मनुष्य के पर्थ धादि का उपार्जन नहीं हो जो बात है उसे ग्रहण सकता ॥ ८९॥ गहु उकार विविचार पद मा फल हानि बिमूल । महो जान तुलसी जतन बिन जाने इव सूल ॥६॥ उकार विबिचार पद गहु तुलमी हो (तथा) मा फल हानि विमल (कर) विन-जान जतन मूल इव ॥ उकार तर्क के महित विशेष विचार करो अर्थात् विशेष तर्कना और विवेक के माथ काम में लगो क्योंकि "बिना विचारे जो करे मो पाई पछताय" विना तर्क और विचार के जो काम किया जाता है उम में पीछे से दुःख होता है विचार होने पर तुलमी-दाम कहते हैं कि (हो) पाचर्य कारक जो काम है उन्हें भी त जानेगा और (मा) निषेध युक है जिन कामों का करना शास्त्र में मना है उन के फल को हानि निर्मूल कर डालो अर्थात् वैसे कामों को कभी न करो। जब तुम को विवेक होगा तब आप ही तुम मास्त्र-निषिद्ध काम न करोगे विना ज्ञान का जो काम करने में यत्र किया जाता है मो (सस) पौड़ा देनेवाले के समान होता हे भले काम से भी बुरा फल होता है जैसे राणा नग ने विना विचार एक गौ दो माहाणे को दौथी उस से दुख पाया। विचार और तर्क के साथ सब काम उत्तम होते" से विचार और नर्क अवश्य कर्तब ॥३॥ काम तुमो-सतसई। नीच निरावर्षि निरस तर तुलसी सौच जख। पोखत पयद समान जल बिखय जख के रूखा ६४॥ अन्वय । तुलमो नौच निरम तर निरावहिं पयद समान जल विषय जख के रख पोखत चाहिं। संचार के मूर्ख लोग जानियों के लिये सुखदाई वैराग्य रोगराने के कारण विषय-रस रहित नौरस वैराग्य-रूपौ वृक्ष को उखाड़ के फेंक देते हैं और मेघ के समान जल से विषय-रूपी सरस जखके वृक्ष को बढ़ाते और मौंचते है। अभिप्राय यह कि संसार को उखटौ रौत पड़ गई है जो लोग ज्ञान वैराग्य हरि-भकि श्रादि की ओर मन लगाते हैं वे नौरम समझ जाते है क्योंकि ये इस लोक के व्यवहार से कुड़ा कर परलोक में मन लगाते हैं और जो लोग विषय वासना में बौन रह कर संसारौ मुख में बौ लगाते हैं वे सरस समझे जाते हैं परन्तु रस के विरुद्ध काम करने से मनुष्य को अधिक सुख होता चौकिक सुख नश्वर होने के कारण अन्त में दुखदाई होता है।॥४॥ खोक बेद हूँ लौँ दगी नाम भूल को पोच । धरम-राजजम-राज जम कहत सकोच न सोच च॥९॥ उपर के दोहे में कह चुके हैं कि लोक को उसटौ रौतरेष सी बात का उदाहरण दिखाते हैं साम। अवय। मोहनामको भूख लोक वेद इंजीदगी धर्माणको) यम-राजयम कह सकोचसोकन। लोक में ऐसे मुर्ख हैं कि पछा नाम कहने में ये पाते हैं। सो यह बात केवल खोकही में नहीं परन बेद तक प्रसिद्ध है। पौष लोग नाम पुकारने में भी भूल करते हैं धर्म-राज ऐसा उत्तम माम उत्तम लोग कहते हैं उम से जो मध्यम यम-राज कहते हैं और (पोच) नौच लोग बिना मदोष और विचार यम कहते है। बड़ों के नाम को बिगाड़ने में अपराध होता है सो छोटे लोग यह बात नहीं विचारते बिना महरोषबड़ो के नाम को बिगाड़ते हैं और पुराण, धर्मशास्त्र, उपनिषत् और बेद में भी यह बात मिलती है ऐसा तुलसी-दाम कहते है ॥६५॥ तुलसी देवल राम के लागे लाख करोर। काक अभागे इगि भरै महिमा भाउ न थोर॥१६॥ . दो दोहों में दुर्गा को दुष्टता का वर्णन कर के पब इस दोहे थे यह बात प्रमाणित करते है कि इस से बड़ो का कुछ विगाड़ नहीं होता है। अषय । तुलसी राम के देवल खाख करोर खागे (परन्तु) अभागे काकरगिभर महिमा थोर न भण्ड। तुलसीदास कहते हैं कि राम के मान्दर में चारों करोड़ों 49 .

तुलसी-सतसई। रपये लगते हैं परन्तु प्रभागे कौवे उस पर भी हग भरते हैं तो इस से राम जी के देवालय का माहात्य कम नहीं होता। उसी प्रकार यदि वैराग्य और भक्ति को निन्दा दुष्ट लोग करते हो तो भी उन का माहात्य कम नहीं होता। "तुलसौ-दाम के दूसरे स्थान के वर्णन के अनुसार दुर्यों के उपहास से माधुओं का माहात्य बढ़ता है उन्हों ने रामायण में कहा है। खल उपहास होर भल मोरा। काक कहहि पिक कण्ठ कठोरा ॥ इस कारण माधु और सब्जनों को भकि और परोपकार करने से घटना न चाहिये चाहे दुष्ट जन कितना भी उपद्रव करें ॥८६॥ भलो कहाँ जाने बिना को अथवा अपबाद । तुलसी गाँवर जानि जिय करव न हरख बिखाद ॥१७॥ अन्वय । जाने बिना भलो कहहिं अथवा को अपबाद (देखि) तुलसौ गाँवर जानि जिय हरख विखाद न करव । बिना जाने चाहे कोई भला कहे वा कोई दोष लगाये तो उसे (गाँवर ) अजान समझ कर बुद्धिमान को अपने मन में उस के कहने पर हर्ष वा विषाद न करना चाहिये। अज्ञानी और गँवारों की बात पर ध्यान देने से दुःख को छोड़ मुख नहीं होता इस लिये गोसाई तुसमी-दाम कहते हैं कि इन को बात पर बुद्धिमानों को थान हो न देना चाहिये ॥८॥ ।

साम सर्ग। तन-धन महिमा धर्म हिजा कह सह अभिमान । तुलसी जियत विडम्बना परिनाम हुँ गति जामा अषय । जेहि धर्म-मह अभिमान नन-धन महिमा (भा कई) जियत बिडम्बना परिनाम (बिडम्बना) गति जानि । तुलसी-दास कहते हैं कि जिस मनुष्य का धर्म पाचरण करना बहार के महित है, और अपने शरीर और धन को बड़ाई देख- खाने के लिये है, उन के लिये जौते जो इस संसार में मका है, अर्थात् लोग संसार में नकल कह के उस को इंसी करते हैऔर अन्त में भी ऐमौही नकल को गति जाननी चाहिये। अभिप्राय यह कि जो धर्म का प्राचरण अपने शरीर को बड़ाई पा धन की बड़ाई देखलाने के लिये किया जाता है, और दम्भीर अभिमान से भरा रहता है, उस से इस लोक में दुर्नाम और निन्दा होती है और परलोक में भी विशेष फल नहीं होता, इस कारण मिरहदार चौर निर्दम्भ हो कर धर्म करना चाहिये ॥८॥ बडा विबुध दरवार ते भूमि भूप-दरबार । जापक पूजक देखियत सहत निरादर-भार ॥६॥ पवय । भूमि भूप-दरबार विबुध-दरबार ते बरो जापक पूजक निरादर भार सहत देखियत । पृथिवी पर राजाओं का दरबार देवताओं को मभा से भी बड़ा जान पड़ता है क्योंकि मापक अर्थात् गजा के मति के विरप चार पूजा करनेवाले बड़े अपमान को महते ये देखे जाते है।

तुलसी-सतसई। अभिप्राय यह कि रस लोक में मनुष्य के लिये परजोक का दए वा किसी देवता को दो यातना वैसी कठिन और भारी नहीं जान पड़तौ क्योंकि उस का दण्ड भविष्यत् में होनेवाला है, परन्तु भूमि के क्रोधी राजाओं का डर अधिक कार्यकारी होता है, क्योंकि तुरन्त दण्ड पाने के डर से लोग चोरौ श्रादि बुरे काम से दूर रहते हैं, और जो कोई यहाँ के राजाओं को विरुद्ध बातें दूसरे राजाओं से कहता है, या ऐसे राजाओं की पूजा (भक्ति) छोड़ कर दूसरों को भक्ति करता है, उस को अनेक प्रकार का दण्ड मिलता है, से प्रसाद ने अपने पिता दैत्यराज हिरण्य-कश्यप के मत के विरुद्ध विष्णु की भकि दिखलाई दस लिये अनेक प्रकार का दण्ड उई सहना पड़ा। अाज कल भौ जो कोई राजा के विरुद्ध काम करता है, अनेक रण्ड पाता है ॥६॥ खग-मृग मौत पुनीत किय बन हुँ राम नय-पाल । कुनय बालि रावन घहिँ सुखद बन्धु किय काल॥१०॥ अन्वय । पुनौत नयपाल राम बनाई खग-रग मौत किये -नयपाल बालि रावन घरईि सुखद बन्धु काल किय। पवित्र सुनौति के पालन करनेवाले रामचन्द्र ने बन में भी मौतिमार्गों पकौ (जैसे जटायु प्रादि) और पशु (जैसे जामवन्त) रिकों के राजापौर सुपौव बानरों के राजा को अपना मिच बनाया. चोर दुनौति को पाखन करनेवाले वालि और राव ने अपने घर ० सतम वर्मा हौ में सुखदाई निज भाई सयौव पौर विभीषण को अपना काल अर्थात् मृत्यु देनेवाले अचु किया। अभिप्राय यह है कि अच्छी नौति के साथ चलनेवाले ममुख घर वन स्वदेश परदेश सब स्थान में सुख पाते हैं, और कर-स्वभाव पौर अपवारों लोग चाहे घर चाहे वन वहां से दुःख पाते हैं, इस कारण मनुष्य को सनौति के साथ चलना चाहिये॥१.०॥ राम-लखन विजयी भये बम हुँ गरौब-नेवाज। मुखर बालि-रावन गये घर ही सहित समाज ॥१०॥ अन्वय। गरीब-नेवाज राम-लखम बन विजयी भये मुखर बालि-रावन घरही महित समाज गये। दुखियों पर दया करनेवाले राम-लक्ष्मण ने वन में भी रावण त्रादि बड़े बड़े शत्रुओंको विनाश कर जय लाभ किया. परन्तु कटु-भाषी बालि और रावण अपने घर ही में अपनी सेना और परिवार के महित विनाश को प्राप्त हुये। पहले (६८) दोहे में जो बात कह चुके हैं दृढ़ता देखनाने के सिये और उसी पर्थ को अधिक पुष्ट करने के लिये इस दोहे में भी वहौ विषय वर्णन किया। रस से यह सचित डा कि कुनौति कु:ख-भाव सर्वथा त्यागने योग्य हैं क्योंकि इन के नहीं त्यागने से पब बासि और रावण के ऐसे प्रतापी धुरन्धर राजा -कुख न ये तो पात्र कच्छ के गाधारण राजाओं के विषय में का कहना।

२९. तुलसो-सतसई। बनेऽपि दोषाः प्रभवन्ति रागिणों रहेऽपि पञ्चेन्द्रियनियहस्तपः । अकुमिते कर्मणि यः प्रवर्तते निवृत्तरागस्य ग्रहं तपोवनम् ॥ १.१ ॥ बारे टाट म दै सकार तुलसी ने नर नौच । निदरहिँ बलि हरिचन्द कह कहु का करन दधीच ॥१.२॥ तुलमी जे मर नौच, दारे टाट न दै भकहिं बलि हरिचन्द कर निदरकिरन दधीच का कऊँ। ऊपर सुनौति से चलनेवाले राजाओं का वर्नण कर के १०२ दोहे से दुर्जनों के स्वभाव का वर्णन करते हैं । तुलसी दास कहते हैं कि जो लोग स्वभाव के कुटिल और नौष ३ वे अपने दार पर आये हुये याचकों को टाट तक नहीं दे सकते। परन्तु राजा बलि और हरिचन्द्र को निन्दा करते हैं और कहते कि मेरे सामने करण और दधीचि क्या हैं ॥१.२॥ तुलसी निज कीरति पहाई पर कौरति को खोय। तिन के मुंह मसि लागि हैं मिटिहिन मरिहैं धोय॥ १०३ अन्वय । तुलसी (जे) पर कौरति कई खोय निज कौरति पति तिन के मुंह ममि लागि में धोय मरिहैं (परत) मिरिहिन । पर्य। तुलसौ-दास कहते हैं कि जो लोग दूसरे को नामवरी साम वर्मा को मिटा का अपना या बढ़ाना चाहते हैं उनके मुख में कारिख खगेगा और धोतेर मर जावेंगे तो भी नही मिटेगा। प्राशय यह कि जो कोई ईर्षा और देष के कारण दूसरे के या को नाश करना चाहता है और उसके द्वारा अपने या को बढ़ाना चाहता है वह अपनी भलाई न कर बुराई करता है क्योंकि उस का पत्र तो कुछ होता नहीं वरन दुर्यश फैखता हे लोग उसे दुष्ट और पर कौरति को परानेवाला कह के इस लोक में उस को निन्दा करते और परलोक में यहां के दुर्नाम के कारण वह नरक-गामी होता है॥१.३॥ नौच चा-सम जानिबो सुनि लखि तुलसौ-दास । दौलि देत महि गिरि परत बचत चढ़त प्रकास ॥ १०४॥ अन्वय । तुलसौ-दाम नौच सुनि लखि पङ्ग मम मानियो ढौलि देत महिं गिरि परत खेचत अकाम चढ़त । तुलसौ-दास कहते हैं कि नौचों को रौति सुन कर और देख कर उन्हें पतन के समान जानना चाहिये क्योंकि डिलाई देने से भमि पर गिर पड़ते है; और खींचने से श्राकाश पर चढ़ जाते हैं। पामय यह है कि जिस प्रकार पतङ्ग इलका है वैसे ही दुष्ट बन भौ पदव के इसके होते हैं जैसे पतन को हरीयों डोली कौनिये अर्थात् बढ़ाये त्यों २ वह नौ को गिरता जाता है उसी प्रकार जैसे जैसे के मथ खे-पौ शेरों को बढ़ाये PER तुलसी-सतसई। मनसे नौचे हो कर अपनी मिचाई खिलाते हैं परन्तु वो चेह-रूपी डोरी को खींच सौजिये अर्थात् निहितो के उन को रख दीजिये तो वे ठोक रीति से चलते है जैसे पता को डोरी को खपिये तो वह आकाश में ठीक रीति से उड़ने लगता है गिरता पाना महौं "पार्यवन्न कुटिलेषु हि नौतिः” दुष्टों के सङ्ग पौधापन वा मद्यवहार नौनिवर्धक नहीं होता है उन के साथ कड़ाई करने से से वे सीधे प्रकार से चलते है। किसोर टीकाकारों ने डोरी खींचने" का अर्थ खेह ज्यादा करना लिखा है सो भ्रममा जाम पड़ता है क्योंकि स्नेह-रूपो डोरो को खीख लेता जिस प्रकार पतन को बढ़ने से रोकता है उसी रौति प्रौति को डोरो खींच लेना अर्थात् कम कर देना भाषा में अधिक बोलते हैं ॥१०४॥ सर-बासी काचो भखहि पुर-जन पाक प्रबौन । काल-छेप हि बिधि करहि तुलसौ खग-मुग-मौन ॥ १.५॥ बषय । सह-वामी काचो भखर पुर-जन पाक-प्रवीन, तुलसी -मौन केहि विधि काल-छेप करहिं॥ माथ के रहनेवाले कचाही खा जाते हैं और नगर के निवासी मार कर ले जाते और सुन्दर मांस रौंध कर भोजन करते हैं ऐसौ अवस्था में तुलसीदास कहते हैं कि कोटे २ पो, मगादिपए और मालियों किस प्रकार अपने जीवन-कास को मुख पूर्वक विता सातौं पर्थात् नहीं बिता सकतौं । .

सप्तम वर्मा कहने का अभिप्राय यह कि दुख और सोधे खभाववाले जोड़ों का इस संसार में सुख से रहना बहुत कठिन है जैसे छोटौर चिड़ियों को बड़े बाज श्रादिक मार कर कथा हो खा जाते चौर हरिण शशकादि पशुओं को बाघ और चौता त्रादि सह-बासी हो मार कर खा जाते हैं और छोटौर मछलियों को उनकी माथी बड़ी बड़ी मछलियाँ कच्चा हो निगल जाती हैं और मनुष्य खोग इन को पकड़ के घर लाते तब ममाला लगाते और पका कर खाते हैं इस प्रकार दुर्बल जनों को एक ओर से परोसौ-परोसौ दुःख देते और दूसरी ओर से राजा श्रादि भी दण्ड दे कर केग-दाई होते हैं इस कारण बहुत मौधेपने से चलने में संमार में सुख- पूर्वक निर्वाह नहीं हो सकता है तो जहाँ जैमा देखना वहाँ वैमा बर्ताव करना उचित है॥ १०५ ॥ बडे पाप बाढे किये छोटे करत लजात । तुलसी ता पर सुख चहत विधि पर बहुत रिसात ॥ वे दुष्ट जनों का यह खभाव है कि वे अत्यन्त अनौत करने में भी महौं रते॥ पापों में भी जो बढ़ कर पाप हैं उन को करते हैं बार शेटे ५ पाप करने में अथवा पुण्य के द्वारा उन पाों को छोटा बनाने में सजाते हैं। तिस पर भी मुख चाहते हैं और सब न पाने पर बोध कर कहते हैं कि देव परम दुष्ट है। 50 तुलसी-सतसई। बड़े पापी छोटे मोटे जीवों को मारने में सन्तुष्ट न हो कर ब्रह्म-हत्या करते हैं । मद्यप साधारण मदिरा के पान से सन्तुष्ट म हो कर सरा पासव श्रादि महा २ मद्य को पौते हैं। चोर लोग कोटौर चोरौ से असन्तुष्ट हो कर ब्राह्मण प्रादिक का सोना चोराते हैं। परस्त्री-गामौ लोग साधारण स्त्रियों से न सन्तुष्ट हो कर अपने गुरु को स्त्रौ चाचौ मामौ श्रादि के सङ्ग का महा-पाप बटोरते हैं और इन पापों के दूर करने का उपाय यज जाप हरि-भजन तीर्थ-भ्रमण मत्मा-ऽदि को नहीं करते तो उन का पाप कैसे कटे ॥१०॥ सुमति निवारहि परिहरहि दल सुमन-हुँ सङ्घाम । स-कुल गये तनु बिन भये साखौ यादव काम॥१०७॥ अन्वय। सुमति निवारहिं (महाय) परिहरहिं दल सुमन-3 संग्राम, (जय) परिहरहिमकुल गये यादव तनु बिन भये काम माखौ॥ जो लोग सुबुद्धि वा मेल को त्याग करते हैं और अपने सहायक साथियों को छोड़ देते हैं वे पत्ते और फल से भी युद्ध करने में जय-लक्ष्मी को त्याग करते हैं कुल के महित नाश को प्राप्त हुये। यदुवंशी लोग और शरीर को नाश करनेवाला कामदेव इस विषय में साक्षी हैं। भाजय यह है कि कुमति और वापस का बिगाड़ ऐसा बुरा है कि रन में पड़े हुये लोग बहुत तुच्छ वस्तुओं के युद्ध में भी नाश को पाते हैं। जलकौड़ा करने के समय मधुमत्त होने से यदुवंशी क्षत्रियों के बीच आपस में छेड़छाड़ हुई जिसके कारण एक प्रकार की घास

साम सर्ग।
से कर परस्या खड़ने खगे और लड़ते पड़ते निर्मूल हो गये और
कामदेव ने बिना बिचारे प्रकार के मारे महादेव जी के जपर अपना
फूलरूपी वाण सन्धाना और शिवजी के कोप से अपने शरीर को
भस्म किया। इन दो दृष्टान्तों से यह बात प्रगट होती है कि ऐक्यता
बौर विचार जयलाभ करने के लिये परम पावश्यक है और फुटमत
तथा कु-बुद्धि नाश के कारण हैं। इस कारण दम को परित्याम
करना अवश्य चाहिये॥१०॥
कलह न जानब छोट करि कठिन परम परिनाम ।
लगत अनल अति नीच-घर जरत धनिक-धन-धाम।
१०८॥
अन्वय । कलह छोट करि न जानब परिणाम परम कठिन, अति
नौर-घर अनल लगत धनिक-धन-धाम-जरत ॥
मनुष्य को चाहिये कि अगड़े को छोटा कर कभी न जाने क्योंकि
उस का फल अन्त को बड़ा हानि-कारक होता है इस में शान्त देते
है कि निर्धन नौच के घर में भाग लगती है जिस से आसपास के
रहनेवाले बड़े २ धनौ-लोगों के घर और धन जल कर राख हो
जाते हैं। कलहरूपी अग्नि छोटी भी हो तो भौ बढ़ते बढ़ते इतनी
बढ़ सकती है कि सर्वम नाश कर सकती है। इस कारण कलह से
मदा दूर रहना चाहिये ॥१८॥
अझे ते भल बूझिवो भलो जीति ते हारि ।
जहाँ जाय जाँडायिवो भलो जुकरियं विचार ॥१॥

तुलसी-सतसई। अषय । अझे तें भिवो भल, जौति में हारि भयो, कुविचार करिय जहाँ जाय (तहाँ) जहंडाथिबो भलो। विमा बिचारे लड़ाई छेड़ देने की अपेक्षा विचार कर सहना अति उत्तम है। अविचार पूर्वक जीत पाने से हारना उत्तम है। यदि विचार कर शान्ति को धारण कौजिये तो जहाँ जाना वहाँ अपने को ठगा देना भला है। "मतं दद्यान्न विवदेत्” सौ देना परन्तु झगड़ा न करना इत्यादि नौतिवाक्यों से और युद्ध में जय पराजय के अनिश्चय से शान्ति बौर क्षमा करनेवालों का यह मत है कि झगड़ा करना सर्वथा त्याज्य है। बहुत स्थानों में ऐमा देखा गया है कि अति अन्याय से न्यायवाले लोग बड़े भारी राक्षस के राजा को जीत लेते हैं, और बड़े २ बिजयी भौ अन्त को जोते जा कर दुःख मागर में डूबते हैं। जैसे दमो ग्रन्थ में रामचन्द्र और रावण का उदाहरण दिखला चुके हैं और भाग कौरव श्री पाण्डवों का उदाहरण दिखलायेंगे। यद्यपि परशराम जौने २९ वार पृथिवी को निःक्षत्रिय किया परन्तु अन्त- ममय रामचन्द्र से हार मान पछिताये ॥ १०८॥ तुलसौ तौनि प्रकार ते हित अनहित पहिचान । परबस परे परोस-बस परे, मामला जान ॥११॥ अषय । तुलमी हित अनहित तौनि प्रकार ते पहिचान । परबस परे परोम-बम मामला परेजाम ॥ गंमार में मचे मित्र और शत्रु तीन प्रकार से पश्चिाने जाते हैं।

सामसमें। अर्थात् जब कोई किमी पहाट में पड़ के दूसरे का बन्धुत्रा उचा, अथवा परोस में जब श्राग लगी वा किसी के घर में चोर पैठा तो रात को परोसियों से सहायता मांगने के समय परोस के हित अन- हित को परीक्षा होती है और जब राजा के यहाँ कोई (अभियोग) वा मामला अपने ऊपर पड़ा तब भी अपने मित्र और शत्रु पहिचाने जाते हैं। प्राशय यह है कि संसार के लोगों के भिन्न र स्वभाव के कारण कि के मन का महज में जानना कठिन है। क्योंकि जो लोग खाभाविक मित्र है वे कड़ी बात और दोष कह कर अपने मित्र को कोधित करते हैं। जो लोग ऊपर के मित्र और भौतर के हैं वे ऐसी मौठी मोठी बातें बना के बोलते हैं कि सुननेवाला उस को अपना परम हित समझ प्यार करने लगता है। ऐसी अवस्था में शत्रु मित्र का पहिचानना कठिन हो जाता है इस कारण नौति में दून के पहिचानने के लिये सु-अवसर दिखलाये गये हैं। अर्थात् जब कोई मनुष्य बन्धन में पड़ता है तो उम के स्वाभाविक मित्र उसे छोड़ाने के लिये और स्वाभाविक भत्रु उसे फंमाने में लग जाते हैं और उदामोन लोग बैठ रहते है । दमौ प्रकार घर में अग्नि और चौर भय होने से तथा राजकीय दोष अपने ऊपर खगने से शत्रु मित्र परिचाने जाते हैं। नौतिशास्त्र में लिखा है। "उत्सवे व्यसने चैव दुर्भिक्षे राष्ट्रविभवे । राजदारे समाने च यस्तिष्ठति म बान्धवः ॥ पुष जन्मारि उत्सव भान मरणादि व्यसन युद्ध राबद्रोपर्यात् चुप चाप तुलसी-सतसई। बखवा वा राजा के स्थिति के गड़बड़ होने पर राजा के द्वारे पर अर्थात् मामला पड़ने पर मशान में अर्थात् किसी के मर जाने पर जो खड़ा हो कर सहायता करता है वह सच्चा बन्धु कहलाता है ॥१९॥ दुरजन बदन कमान सम बचन बिमुश्चत तौर। सज्जन उर बेधत नहीं छमा सनाह सरीर ॥ १११ ॥ दुरजन बदन कमान सम बचन तौर विमुञ्चत । क्षमा मनाह शरीर मज्जम उर नहीं बेधत। दुष्ट लोगों के मुख-ही धनुष के समान है जो बचन-रूपौ तौर को छोड़ा करते हैं परन्तु क्षमा-रूपी कवच अरौर में रहने के कारण सज्जनों के मन को नहीं बेधते ॥ दुष्टों का यह सुभाव होता है कि वे सदा कटु-बचन बोला करते परन्तु मज्जन लोग उन के कटु बचन पर कुछ ध्यान नहीं करते। जमा-रूपौ कवच रहने के कारण मज्जनों के हृदय में दुर्जनों के बचम का कुछ भी घाव नहीं लगता। क्षमा अत्यन्त उत्तम गुण इसे त्याग न करना चाहिये। किमी २ पुस्तकों में “दुरजन बचन पाठ है सो छापे को भूल जान पड़ती है क्योंकि उसी के अनन्तर फिर बचन है। दो वार पचन नहीं हो सकता ॥१११॥ कौरव पाण्डव जानिबो क्रोध छमा को सौम । पाँचहि मारि न सौ सके सबै निपाते भीम ॥११२॥ अन्वय। क्रोध और क्षमा को मौम कौरव पाण्डव जामियो, सौ पाँचभि मारिसके भौम सबै निपाते।

सप्तम वर्ग। ३६८ । कोप और क्षमा की मौमा दुर्योधनादि कौरवों और युधिष्ठिर अादि पाण्डवों को जानना चाहिये। क्योंकि दुर्योधन आदि सौ भाई मिख के युधिष्ठिर श्रादि पाँचो भाइयों को नहीं मार सके परन्तु अकेले भौम ने सब भाइयों को क्रम क्रम से मार गिराया। पाण्डवों में युधिष्ठिर ऐसे क्षमाशील थे कि दुर्योधन ने लाक्षा-भवन में जराना द्रौपदी कौ चौर खींचवाना, जुवा खेलवा कर सर्वख ले कर बारह वर्ष धनबाम और एक वर्ष अज्ञात बास करने के लिये सभों को राज्य से निकाल देना श्रादि अनेक उपाय और उपद्रव किये। परन्तु पाण्डव लोग सब सहते चले गये। दम उमा का फल अन्त को ऐसा हुआ कि पाँचो पाण्डवों ने थोड़ी मौ सेना को सहायता से कौरवों कौ महा सेना को मार गिराया। उसौ पर तुलमो-दाम-जी ने लिखा है कि क्रोधान्य दुर्योधन अनेक महाय और मौ भाइयों के माथ रह कर भी पाण्डवों को न मार मका । और थोड़े महायकों को इकट्ठा कर पाण्डवों में भीम ने सब भाइयों को मार डाला ॥ १२२॥ जो मधु दौन्हें नैं मरै माहुर देउ न ताउ । अग जिति हारेपरसु-धर हारि जिते रघु-राउ ॥११॥. जो मधु दोन्हें ते मरे ताउ माहुर न देउ परसु-धर जग जिति हारे रघु-राउ हारि जिते। जो कोई मधु श्रादि मोठी वस्तु देने से मरे उसे मंखिया पारि विष मत दो। परशुराम जौ को जिन्हों ने संसार भर के सपियों को

तुजसो-वनतई।
पौत खिया था रघुकुल भूषण रामचन्द्र जी ने हरा कर प्रार्थना
पादि के बारा जीत लिया।
सदा को यह रौति है कि जो काम क्षमा श्रादि के द्वारा सहज में
हो सकता है, उस के लिये क्रोधादि कर के बड़ा परिश्रम करना
नौति से विरुद्ध है। इस विषय में दृष्टान्त देते हैं कि धनुर्यज्ञको
समय अत्यन्त क्रोधी परशुराम जौ जनकपुर में जा कर रामचन्द्र जी
के अपर क्रोध कर कटु-वचन-रूपी वाण छोड़ने लगे और रामचन्द्र
नौ ममता के माथ कोमल र वाणी से उन के क्रोध को घटाने लगे।
अन्त को क्षमा गुण
के द्वारा रामचन्द्र जौ ने
परशुराम को ऐमा
हराया कि उन से धनुष ले कर परशुराम जौ के पुण्य लोकों को
राम ने नशाया।
क्रोध कर के कुवचन कहना बहुत हानिकारक है। और जमा
करना बड़ा सुखदाई होता है। इस कारण कोपित हो कर कुवचन
बोखमा म चाहिये ।। ११३ ।।
क्रोध न रसना खालिये बरु खोलब तरवारि।
सुनत मधुर परिनाम हित बोलब बचन विचारि।
११४॥
रसना क्रोध न खोलिये वरू तरवारि खोखब सुनत मधुर हित
परिणाम बचन वोलब।
जिला के बारा कटु-वचन बोल कर अपने पदय के कोप को
प्रमट न करना चाहिये। क्योंकि कोष बीभूत मनुष्य एगारवचन

सप्तम सर्ग। ..१ लिये राज के द्वारा बोल सकता है, जिस का करना बहुत कठिन है। कटु-वचन-रूपी बाण से विधे-डये अत्रु से मन्धि होने पर भी भय रहता है। इस नौति कटु-वचन क्रोध दिखलाना ममा करती है। बरन शत्रु को मारना हो तो तरवार खोल कर उसे मार डालना चाहिये सुनने में मौठा और अन्त में हित कारक वसन सदा बोलना चाहिये। क्रोध के वश कटु-वचन बोलना सदा नौति के विरुर है, क्योंकि इस से संसार में बहुत से शत्रु हो जाते है और एकौर्ति भी होती है ॥ ९१४ ॥ तुलसी मौठो समय त माँगी मिलै जो मौच । सुधा सुधा-कर समय बिन कालकूट से नौच ॥११५॥ मृत्यु मिले में चन्द्रमा अन्वय । तुलसी समय ते जो माँगो मिले तो मौच मौठो समय बिन सुधा-कर सुधा काख-कूट ते नौच । तुलसौ-दाम कहते हैं कि उचित समय में यदि माँगो तो वह भी मौठौ जान पड़ती है, परन्तु कुममय चौर अमृत भी हलाहल विष से भी दुःख-दाई होते हैं। श्रामय यह है कि श्रावस्यक ममय पर यया पतिव्रता स्त्रीके पति मर आने के समय में अत्यन्त दुःखौ रोगी के लिये यदि मांगी हुई मृत्यु मिले तो वह बड़े सुख का कारण होती है। उसी प्रकार पति के वियोग-रूपी अग्नि से जलती हुई विरहिनौ के लिये प्रमत के किरणवाला चन्द्रमा दुःख-दाई चार अनेक रोगों से पीड़ित 51 तुलसी-सतसई। ४०२ है दौर्घ रोगी के लिये अमृत के समान खाद भोजन दिन का काम देता । इस कारण सु-समय कु-समय वस्तु के गुण अवगुण को घटा बढ़ा देते हैं॥ ११५॥ पाही खेती लगन बडि रिन कु-व्याज मग-खेतु । बैर अापु बडन नैं कियो पाँच दुख हेतु ॥ ११६ ॥ अश्चय । पाही खेती, बड़ी लगन, कुव्याज रिन, मग खेतु श्रापु ते बड़न ते वैर, पाँच दुख हेतु कियो। अपने घर से दूर पर खेत बोमा, बड़ौ प्रौति, बहुत व्याज बढ़ाने- वाला सण, राह पर का खेत, और अपनी अपेक्षा बड़े लोगों को के लिये किये जाते हैं अर्थात् इन के करने से दुःख होता है। आशय यह है कि दूर की खेती पहले तो वहाँ सब अन्नादि वस्तु ले जा कर बोना फिर उस को रक्षा करना बहुत कठिन होता है इस लिये सुख चाहै तो इसे त्याग करे। बड़ी प्रीति भी अन्त में वियोग होने से बहुत दुःखदाई होती है। इम कारण अत्यन्त प्रेम ईश्वर को छोड़ कर और किसी में अन्त को सुखदाई नहीं होता। अथवा बड़ी लगन का अर्थ अनेक लोगों से वा श्राप से बड़े से प्रौति भी दुःखदाई होती है। क्योंकि शास्त्र में समान से प्रौति करना लिखा है अथवा एक मम को कहाँ कहां लगाये। ऐसा पण जिस का व्याज बहुत हो बड़ा दुःखदाई होता है। क्योंकि उस से छुटकारा पाना बड़ा कठिन है। राह के समीप शत्रुता पाँचो मनुष्य को सप्तम बर्ग। खेतौ रहेने से गौ पादिक को पशु जाते हैं दो चार कवर खा लेते हैं। इस प्रकार महज में खेती उजाड़ हो जाती है। और अपने से बलवान को अचुता अपने लिये नाश-दुःखकारी होती है। इस कारण इन पाँचो दुःखदाई वस्तुओं से बचना चाहिये ॥ ११६ ॥ रौझि खोजि गुरु देत सिख सखहिँ सुसाहिब साध । तोरि खाय फल होय भल तरु काटे अपराध ॥११७॥ और अन्वय । गुरु सिखहिं, सखा मखदि साधु सुमाहिब (जगहि) रीमि खोभि सिख देत तोरि फल खायेभल होय,तरु काटे अपराध होय । गुरु अपने चेलों को, मित्र अपने मित्र को, साधु जन अथवा धर्मगौल राजा प्रसन्न हो कर वा क्रोधित हो कर जगत के लोगों को, सिला देते हैं । वृक्ष से फल तोड़ कर खाने में भलाई होती है परन्तु वृक्ष को काटने में अपराध होता है। आशय यह है कि मंसार में पढ़ानेवाला अपने मव शिष्यों को चाहे कोध कर वा प्रसन्नता-पूर्वक सत्य उपदेश देता है। उमौ प्रकार मित्र मित्र को सज्जन लोग और गजा संमार के भले बुरे लोगों को वृतादि न काटने को भलो मिक्षा देते हैं। परन्तु दुर-जन यह नहीं मोचते कि वृक्ष रहेगा तो पुनः फल देगा और वृक्षादि को काट डालते हैं। यह बात न करना चाहिये। और अच्छे राजाओं को भी अपनी प्रजा को बचा कर उन से दण्ड धादि लेना चाहिये। अथवा गह और मखा अपने माधु शिष्य और मिचो को प्रमत्रता से तुलसी-सतसई। और और बुरों को क्रोध से उपदेश देते हैं कि लोड़ कर फस खाना खाहिये॥ ११०॥ चढे बधूहिँ चङ्ग जिमि ज्ञान ते सेोक-समाज । करम धरम सुख सम्पदा तिमि जानिबो कुराज । ११८॥ अवय। मिमि बधूरहि चढ़ो चंग, जिमि ज्ञान ते मोक समाज तिमि कुराण करम धरम सुख-सम्पदा जानियो। निम प्रकार बवंडर में पड़ा हुआ पतङ्ग, और जैसे तत्वज्ञान से दुःख समूह नष्ट हो जाता है उसी प्रकार खराब वा दुष्ट राजा के राज में सत्कर्म धर्म, सुख आरोग्यता श्रादि सम्पदा अन्न धन प्रादि जाननी चाहिये। त्राशय यह कि जैसे बवंडर में पड़ कर गुडौ टूक टूक फट जाती है। ज्ञान से राग देष मद मात्सर्या विला जाते हैं वैसे ही खराब राजा होने से प्रजाओं का यज्ञ पूजा तप दान मत्य शौच दया श्रादि मम धर्म और पुत्र पौत्र धन धान्यादि का सुख घट जाता है ॥१८॥ पेट न फूटत बिन कहे कहे न लागत ढेर । बालब बचन बिचार युत समुझि सुफेर कुफेर॥११६॥ अन्वय। बिन कहे पेट न फूटन कहे ढेर न लागत (यात) सफेर कुफेर समुभि विचार युत बचन बोलब। किसी को निन्दा कु-वचन बिमा कहे पेट नहीं फटता और कहने से धन का ढेर भी नहीं लग जाती तो अपने वचन की बुराई कौ दशा .

सप्तम
सन
भलाई समझ कर विचार पूर्वक वचन बोलना उचित है। क्योंकि
किसी को बुरी बात कहने से उस को बुराई होती है और अपने
को कोई लाभ नहीं होता इस कारण बहुत विचार के वचन बोलना
चाहिये जो कोई बिना विचार बोलना है सो पौछे पडताता है॥१९॥
प्रौति सगाई सकल बिधि बनिज उपाय अनेक ।
कल-बल-छल कलि-मल-मलिन डहकत एकहि एक।
१२०॥
अन्वय । सकल बिधि प्रौत सगाई अनेक बमिज उपाय कल-
बल-छल कलि-मल-मलिन एकहिं एक उहकत ।
सब प्रकार का प्रेम का सम्बन्ध अर्थात् सेवक खामी, स्वामी सेवक
को भकि, मित्र भित्र का प्रेम, राजा प्रजा का पालन, पुत्र माता
पिता मसुर आदि का प्राज्ञाकारी, स्त्री पुरुष श्रादि का प्रेम, जितने
संसारौ सम्बन्ध हैं, और व्यापार बनिज श्रादि करने की जो अनेक
उपाय हैं। सब कल-बल अर्थात् कपट व्यवहार और छल अर्थात्
ठगहारौ श्रादि कलियुग के पापों से मलिन हो रहा
कारण मनुथ लोग एक दूसरे को ठग लेते हैं।
घोर कलिकाल में जितनी श्रापम को प्रौति श्रादि है मो अपना,
हित माधन के लिये वा धन-लाभ के लिये लोग कहते हैं।
उसो प्रकार बनिज व्यापार में अनेक प्रकार कु-व्यवहार चोर
ठगहारी फैल रही है। भिव्य गुरु छोटे बड़े प्रजा गजाआमामी
महाजन को ठगने की चेष्टा कर रहे हैं और कलियुग के पाप
में पड़ रहे हैं ॥१२॥

तुलसी-सतसई। कलि युग दम्भ सहित कलि धरम सब छल समेत व्यवहार । स्वारथ सहित सनेह सब रुचि अनुहरत अचार। १२१॥ अन्वय । कलि मब धरम दम्भ महित, सब व्यवहार छल समेत मब सेड स्वारथ महित, सब प्रचार रूचि अनुहरत । में दानादि जितने धर्म है सब पाखण्ड युक हैं और देन-खेन श्रादि व्यापार कपट युक्त है भाई बन्धु श्रादि को प्रौति अपनी भलाई के महित है और सब का चाल-चलन अपने मन के अनुमार है। अभिप्राय यह कि सत्य, शौच, तप, दान, तीर्थ, व्रत, साधुसेवा पिढभकि आदि जितने वर्ण और आश्रम के धर्म है सब कपट से भरे हुए हैं बनिन व्यापार लेन-देन आदि लौकिक व्यवहार सब छल विद्रसे पूर्ण हैं, सब लोग स्वार्थ के लिये प्रौति करते हैं। मचा प्रेम बहुत कम पाया जाता है जैसा वेद में लिखा है और धर्म शास्त्र जैसा बतलता है उन्हें छोड़ कर मन मामता प्राचार ध्यवहार करते हैं इस प्रकार मब कर्म कलि में विपरीत और स्वार्थ से भरे गये हैं ॥ १२१॥ धातु बन्धी निरुपाधि बर सद-गुरु-लाभ स-भीत । दम्भ दरस कलि-काल मह पोथिन सुनिय सुनौत ॥ १२२॥ अवय । विरुपाधि धातुबंधौ, मदगुरु लाभ वर, कखिकाखम निरुपाधि सभौति दंभ दरस, पोथिन सुनौति सुनिय ।

सप्तम सर्ग। कलि में निदेषता केवल धातु हौ में बंध गई है अर्थात् सोना चांदी आदि धातुओं में जो मैल और मुरचा त्रादि लग जाते हैं मलाने शदि से दूर किये जा सकते है, उत्तम गुरु का मिखना हो बड़ा भागै लाभ है। और दर्श (अर्थात् दर्शन के लिये देवतारिक का मन्दिर) पाखण्ड युक और भय महित है, और अच्छी नौति को वात केवल पुस्तकों में देखने में बाती , लोक व्यवहार में उस का प्रचार बहुत कम देख पड़ता है। इस कराल कलिकाल में भूमि पर के पदार्थ उपाधि से भरे हैं, मनुष्यादि में कफ बात पित्त को अधिकाई क्षुधा, पिपामा, रोग, दुःख, देखने में आते हैं लाभ भी सब भय से भरे हुए हैं, केवल यदि कोई उत्तम गुरु मिल जाय तो उन के उपदेश से परम लाभ हो सकता है, अथवा सद्गुरु का मिलना ही परम लाभ है, और सब लाभ मित्रता प्रादिक भय से सदोष है, क्योंकि जिस से मित्रता कौजिये वह कपट के द्वारा अपना ही अर्थ माधता है, मचे मित्र का मिलना बहुत कठिन है, केवल लाभ के लिये लोग मित्रता करते है, दर्शन के योग्य देवतादि के मन्दिर लोगों ने बनवाये हैं उम में प्रत्यक्ष कोई देवता तो देख पड़तौ नहीं परन्तु दम्भ पाखण्ड बड़त है, और मौति का यवहार मनुष्यों में होना चाहिये मो तो कलियुग में सुनौति से चलनेवाले बहुत कम देख पड़ते है परन्तु पुस्तक नीति के वर्णन से भरौ हैं, इस दोहे में परिमया है ।। १९९॥

तुलसी-सतसई। पहार उदुक फोर िमूरख सिल सदन लागे अढक पहार। कायर कर कुपूत कलि घर घरसरिस उहार ॥१२३॥ अन्वय। मरख लागे मदन मिल फोरहिं कलि घर घर कायर कूर कुपूत उहार मरिस । कलि युग में मूर्ख लोग पहाड़ पर चोट लगने पर घर में श्रा कर मिल अर्थात् मसाला पीसने के छोटे २ पत्थल को फोरते हैं। इस लिये तुलसौ-दाम कहते हैं कि कलि युग में प्रत्येक घर में भौर और निर्दयौ कुसन्तान उहार अर्थात् भले कामों को छिपाने के ढपने के समान देख पड़ते है। अभिप्राय यह कि इस कलिकाल में ऐसे २ मूर्ख है जो बिना साभ के दुसरों को हामि करने में श्रामन्द पाते हैं भारी पहाड़ में जहाँ उन का वश नहीं चल सकता अपना पराक्रम नहीं दिखलाते, और में पा कर, छोटे पत्थलों को फोड़ते हैं वा छोटे २ जौवों को दुःख देते हैं, और जो कुछ भला काम भी किसी घर में है भी उसे वे बुरा २ काम कर के परदे के समान ढ़ाप लेते हैं। भाषा में यह कहावत “कि पद्धकै पहार फोरै घर को सौख" प्रसिद्ध है,और वही कहावत इस दोहे में पाई है, इस कारण यहाँ लोकोकि प्रलपर समझना चाहिये। कोई २ टौका कार लिखते कि "घर को मिल घर के लगे पत्थल फोरते हैं अदुक पहाड़ पहाड़ से पत्थल नहीं लाते" यह टौका भ्रम से की जान पली क्योंकि इस पर्थ में कोई चमत्कारी नहीं पाती॥ १२३॥ घर .

सातम वर्ग। जौ जगदौस तो अति भलो जी महोस तो भाग। जनम जनम तुलसी चइत राम-चरन अनुराग॥१२४॥ • अन्वय। जौ जगदौस तौ पति भलो जौ महौस तौ भाग, तुखसौ जन्म जन्म राम-परम अनुराग पहत ॥१२४॥ ऊपर कई एक दोहों में कलि-काल का वर्णन कर के अब राम- चन्द्र में अपने प्रति अनुराग और मतमई को प्रथमा के साथ ग्रंथ को समाप्ति वर्णन करते हैं। जो खोग इस जगत् के खामौ औ-शष्ण-चन्द्र धामन्दकन्द को भजते हैं वे बहुत अच्छा काम करते हैं, और जो (महौम) इस संसार के राजा सब गुणों के धाम श्रीराम-चन्द्र का भजन करते हैं, उन का भी बड़ा भाग्य है, अर्थात् अपने २६ए देवों के मचे उपासक सब प्रशंसा योग्य हैं, परन्तु तुसमौ-दास जौ जन्म जन्म श्री-राम-चन्द्र जौ के परणा-इरविन्द में अपनी भकि चाहते हैं। इस दोहे के विषय में नीचे लिखौ हुई कथा प्रसिद्ध है। एक समय जब तुलसौ-दाम जौ ब्रा में गये तो वहाँ के रहने वाले औ-कृष्ण के उपासकों ने चाहा कि तुलसी-दास राम को छोड़ कृष्ण की भकि करें और तुलसी दास से कहा कि भगवान् विष्णु के माशात् । खरूप पौषष्ण भगवान को छोड़ कर अयोध्या के राजा दशरथ के पुत्र रामचन्द्र को श्राप क्यों भजते हैं। इस बात का उत्तर तर्क वितर्क, केदारान दे कर औ-तुलसीदास जी ने सोधी रौति और कोमल वचन से यह कह कर दिया कि चिभुवन के खामौ अार्यामौ नौकरी भगवान की उपासना भखौ है, परन्तु मेरे चित्त के चोर, राजाओं में 52 १९. तुलसी सतसई प्रधान, कोजस-किशोर, श्रीराम पन्द्र जी हैं। उनकी सेवा को; . और उन के चरण-कमल के मकरन्द को मेरा मन-मधुप सर्वदा पान करने में अत्यन्त सुख पाता है। इस कारण मैं जन्म जन्म उन्हौं के चरण-कमल को भकि चहता हूँ। तुलसौ-दास जी के जीवन चरित में भी यह बात मिलती है, कि नाभा जौ से भेंट करने के अनन्तर जब तुलसीदास जी ने श्री कृष्ण भगवान का दर्शन किया तो वहाँ कई वैष्णवों ने व्यङ्ग वचन कहा जिस के उत्तर में तुलसी-दास जी ने यह दोहा पढ़ा। का वरण कवि श्राज को भले बने हो नाथ । तुलसी मस्तक तब नवे धनुष-बान स्यौ हाथ ॥१२४ ॥ का भाखा का संसक्रित विभव चाहिये साच । काम जो आवै कामरी का लै करिय कमाच॥१२५॥ अन्वय । माच विभव चाहिये का भाषा का संस्कृत का कामरी काम श्राव (तौ) कमाच ले का करिय ॥ १२५॥ चाहे मखत हो चाहे भाषा हो उस में सच्चे ऐश्वर्य का वर्णन होना पाहिये इस बात में दृष्टान्त देते हैं कि कमरी से यदि अधिक काम निकले, तौ (कमाच ) रेशमी जामों को ले कर क्या कौजिये। अभिप्राय यह कि यदि कोई बड़ा कर कि संस्कृत विद्या के रहते गोस्वामी तुलसीदास जी ने राम-चरित को भाषा मैं को तर्णन किया तो इस का उत्तर यही है कि राम-पन्द्र परित-रूपी उत्तम विषयको चाहे। जिस भाषा में वर्णन कौजिये तम-ौहोगा। चार कषि यग में संस्कृत जामने-वाले योग बहुत नहीं हैं। सारण साम सौ. १९ । भाषा में वर्णन करने से अधिक लोगों के बोध-गम्ब होगा। और संस्कृत में वाल्मीकि जी ने राम-परित वर्णन किया ही भाषा में राम-चरित नहीं था। इस कारण तुलसीदास जी ने भाषा-हौ में रामायण बनाई। इस के विषय में कमरो का दृष्टान्त दे कर के, या सूचित करते हैं,कि वह रेशमी वस्त्र को अपेक्षा अधिक काम देती । जब जल दृष्टि पाई, तो कमरौ ओढ़ जल से बचे। विश्राम करना हुआ, तो उसे बिछा कर लेंट गये। मौत लगा, तोझाड़ कर प्रोढ़ लिया। इस प्रकार कमरौ अधिक काम देने वाली है॥१९५॥ बरन बिसद मुकता सहस अर्थ सूच-सम तूल। सतसैया जग वर बिसद गुन-सोभा-सुख-मूल ॥१२६॥ अन्वय । बिमद बरन मुकता मदृम अर्थ सूत्र, मम वल जग-वर मोभासुख-माल मतलैया अब मोती को माला और मतमैया का रूपक वर्णन करते हैं। सतसई के अक्षर निर्मल मोती के ममान हैं और उनके पर्थ मोती गुथने को कई के सूत के समान हैं। इस प्रकार मन्दर शोभा और भानन्द को जड़ दम संमार में सतमई-रूपो माला निर्मल है। अभिप्राय यह कि इस संसार में सुन्दर २ शब्द-रूपो मोतियों से गुथौ हुई मतमई-रूपौ माला को जो कोई कण्ठ में धारण करेगा, वह परमानन्द पावैगा, क्योंकि मतमैया में शोभा, गुण, दोनों पाये जाते हैं ॥ १२६ ॥ पर माला बाला सुमति उर धारै युत सुखसोभा सरसाय निति लहै राम पति-गेह ॥१२॥ गुन विमद । नेह।

११२ तुलसी-सतसई। अन्वय । सुमति बाला नेह युत बर माला उर धार, (तो) निति सुख शोभा सरमाय गम-पति को गेह लहै,॥ १२७ ॥ सुन्दर बुद्धि-रूपी स्त्री अथवा ( बाला ) को ( वाला ) पाठ करने से ( समति-युत) पुरुष अपने कण्ठ वा इदय में धारण करे, तो. सर्वदा आनन्द-रूपी शोभा मरम होती जाय, और अन्त को खामो राम-चन्द्र जी के धाम अर्थात् स्वर्ग को पावे। अभिप्राय यह कि मतमई के भकि के युत पढ़ने वाले जन राम- भकि और विष्ण लोक को पाते हैं ॥ १२७ ॥ भूप कहहिँ लघु गुनिन कहँ गुनी कहहिँ लघु भूप। महि गिरि पर गत लखत जिमि तुलसौ खरब स्वरूप॥ १२८॥ अन्वय । भूप गुनिन कह लघ कहहि गुनी भूप कह तुलमो जिमि महि-गत गिरि-गत खरब स्वरूप लखत (तथा) गिरि पर गत महि पर गत खरब स्वरूप लखत ॥ १२८॥ राजा-लोग गुणो-लोगों को अपने से छोटा कहते हैं, और गुणो-खोग राजा-लोगों को अपने से छोटा कहते हैं। इस पर तुलसी-दास जौ दृष्टान्त देते हैं, कि जिस प्रकार मही पर के मनुष्य परबत पर के मनुष्य को छोटा देखते हैं, और परबत पर के मनुष्य भूमि पर के मनुष्यों को छोटा देखते हैं, परन्तु वस्तुतः अपने अपने स्थान पर दोनों बराबर हैं। .. अभिप्राय यह कि धन के लाभ की इच्छा से गणो-लोग प्रापजा कर राजाओं के यहाँ रहते हैं, तब राजा लोग उन्हें अपना नौकर जान के छोटा समझते हैं। परन्तु जब गुणो निर्लोभ रहता है, तो राजा लोग प्रार्थना कर गुणों को अपने दरबार में खयं बोखाने हैं, ऐसौ लघु काहि समम सन। अवस्था में गुणणे योग राजा को कोटा समझते हैं। इस पर पुराना दिया गया है, कि अपनी अवस्था में एक दुसरे को छोटा मममता परन्तु गुणौ अधिक पादर-योग्य होता है। क्योंकि पिना उम के राजानों को मभा को शोभा नहीं हो सकती जिसके विषय में हितोपदेश का यह बोक निर्णय करता है। (विद्वत्त्वञ्च मृपत्वञ्च नैव तुज्यं कदाचन । खदेशे पूज्यते राजा विद्वान् सर्वत्र पूज्यते ) ॥ कि विद्वान् और राजा किसी प्रकार समान नहीं हो सकते, क्योंकि राजा अपने ही देश में पूजा जाता है, और विद्वान् सब और पूजे जाते हैं। दोहा चारु बिचारु चलु परिहरि बाद-बिबाद । सुक्रित सौम स्वा-रथ अवधि परमा-रथमर्याद॥१२॥ इति श्री-गोखामि-तुलमी-दाम-कृत-मप्ततिकायां राजनीति-निरूपणं नाम मप्तमः सर्गः ॥ समाप्ता चेयं सप्तशती॥ अवय। स-कत मौम स्वारथ अवधि परमारथ माद चार दोहा विचार वाद-विवाद परिहरि पल ॥ १२८ ॥ सु-छत (पुण्य को) सौमा. और अपने अर्थ के सिद्ध करने की अर्थात् खोक मुख को मर्यादा है, और पर-लोक सुख की अवधि है। सुन्दर दोहों को विचार कर और वाद अर्थात् इठ पूर्वक प्रगड़ा और शोध के महित तर्क वितर्क को छोड़ कर रस मतमैया के दोहे के अनुमार चखिये।

४९०
तुलसी-सतसई।
अभिप्राय यह कि मतमई के जो दोहे हैं वे राम नाम के
गुण
भूषित होने के कारण परम पुण्य के देने वाले हैं,और लोक सुख के
बढ़ाने वाले हैं। क्योंकि इन में धर्म और नौति का भी वर्णन है,
और राम-भक्ति के द्वारा मुक्ति को भी मर्यादा को देने वाले मतमैया
के दोहे हैं। जो कोई तर्क वितर्क और मत-सम्बन्धी झगड़ों को छोड़
कर इस के अर्थ को भली भाँति विचार कर चलेगा वह सुख पावेगा।
मतमई में वर्णन की गई नौति की बातों को विचार कर,
उन के अनुसार चलने से मनुष्य राग द्वेष से कट कर, वाद-विवाद-
दौन हो सकता है। छठवें मर्ग के वर्णन को पढ़ कर ज्ञान पा
सकता है। हतौयादि मर्ग के कृट दोहाँ को जानने से कूट-स्थ
परमेश्वर का ज्ञान होता है, जिम से लोक माया से छूट कर मनुष्य
मन में ईश्वर की भकि उत्पन्न होती है, जिस से परमेश्वर की
प्रसन्नता होगी और जौव को परम-सुख मिलेगा।
इस प्रकार सब वस्तुओं का वर्णन कर अंत में परमार्थ को प्राप्ति
का निर्देश किया ॥ इति शुभम् ॥
दोहा।
काशी सुख-राशी निकट मथुरा-पुर एक ग्राम ।
जिला यमनपुर मध्य जो बमत परम अभिराम ॥१॥
तहाँ रहे दिज-कुल-कमल-बन्धु बन्धु-सुख-धाम।
"रक्षपाल चौवे" परम-रभ्य शुद्ध-गुन-ग्राम ॥२॥
नौ पण्डित रछपाल के पुत्र विहारौ विप्र ।
काव्यामृत रस-खाद जो लाभ कौह अति विप्र ॥२॥
वर्ष चन्द्र शर श्रद्धभूप्राचिन मित तिथि मात ।
मतमैया संक्षिप्त शभ टीका कौन्ह ममाप्त ॥ ४ ॥

माण। १५ अन्त में शिवाष्टकरूप मजल ॥ लौजिये प्रणाम नाम-मन्त्र मोहिंदौजिये। विश्वनाथ पाप से विमुक मोहिं कौजिये। क्याँ बिलम्ब होत नाथ शौन दुःख कौजिये। थापनौ पुरी निवास मोहिं शम्भु दौजिये ॥ ९ ॥ हे भुजङ्ग अङ्ग धारि भक्त को बहारिये। गङ्ग के तरङ्ग शौच वौच भूति धारिये॥ मोर मोह काम क्रोध दूर त्राशु कौजिये। अपनो पुरौ निवास मोरि शम्भु दौजिये ॥ २ ॥ मै न कौन पुण्य पाप जाल मोर नामिये। दौन हौन मैं मलौन बुद्धि मो प्रकाशिये ॥ भुक्ति मुनि शकि दान नाथ श्राप कौजिये। पापनौ पुगे निवाम शम्भु मोहि दौजिये ॥ ३ ॥ कोटि कोटि सूर्य के प्रकाश ते प्रकाशिये। हे महेश मोर क्रश यौन क्यों न नाशिये दाम मैं न पाश और पाम क्यों न लीजिये। पापमो पुरौ निवाम मोहि भन्न दौजिये ॥ ४ ॥ मोर चित्त वित्त मत्तं ताहि पाए शासिये। धर्म कर्म दान दक्ष क्यों न प्रेम फालिये। श्राप क्यों न हो दयाल श्राशु हौ पमौजिये। आपनौ पुगै निवास मोहि बन्न दौजिये ॥ ५ ॥ ॥

११६ तुलसी-सतसई। भो दयाल नित्य विल्व पत्र भार मोर पाप लीजिये। मोहि मोह-हीन और भक्रि-लौन कौजिये। पाशुतोष क्यों न विप्र नम्र देखि रौझिये। पापनौ पुरी निवाम मोहिं शम्भु दौजिये ॥ ६ ॥ और दान मोहि नाहि चाहिये। भकिदान श्री कपाल नेम याँ निवाहिये । मैं इंदौन दुःख छोम भक्रिपौन कौजिये। श्रापनौ पुरौ निवास शम्भु मोहिं दौजिये॥७॥ मध्यजट्टजूट गङ्गधारिकौर्ति गाइये। देवराजबास सौ पुरौ सुवास पाइये ।। सच्चरित्र के पवित्र गान प्रेम भौजिये। प्राशुतोष को पुरी निवास बा लौजिये ॥ ८ ॥ काशिका निवास बाट पद्य नित्य गाई हैं। शम्भु के समीप जो निवास बौँ मनाइहैं। दौन हौन हो “बिहारि" भनि चित्त लाइहैं। काशि बाम ईश भक्ति मो अवश्य पाद ॥८॥ इति विहारिकता सप्तशतिका-मंचिन्न-टौका समाप्ता॥ (ों तत्सत् ॥

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Satsai Of Tulsidas

Author
Chaube, Viharilal, Ed.
Title
Satsai Of Tulsidas
File name
Satsai Of Tulsidas
Text
OCR done
Citation
1988
Published
2006/04/29
Publisher
The Asiatic Society Of Bengal, Kolkata
Language
Sanskrit
Pages
449
Library
The Asiatic Society, Kolkata
Classification
Literature Of Individual Languages
Keywords
Tulsidas - Poetry
DLI number
292703
Barcode
4990010202590.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
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