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Subodh Govil · 2011/03

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कृतांत
[ कहानी-संग्रह ]
सुबोध गोविल

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कृतांत
सुबोध गोविल
राजस्थान प्रकाशन
जयपुर

रहानी संग्रह -कृतात
प्रकाशक- राजस्थान प्रकाशन, जयपुर
मुद्रक-माडन प्रिण्टस, किशनपाल बाजार, जयपुर
मूल्य-पन्द्रह रपया मात्र
सर्वाधिकार-मुबाघ गाविल
प्रथम रास्सरण-1985
SITORT STORIES KAITANT
By-SUBODHG

समर्पण
मुझे इस बात का दुख जीवन पर्यन्त सानता
रहेगा कि मैं अपने पिता के जीवन काल में अपने
किसी रम वृक्ष पर उपलब्धि सुमन न खिना सका।
"माली सीन सौ मडा, ऋतु प्राय फ्ल होय'
शाश्वत सत्य है
पौर प्रव
जब मिलसिला बल पडा है
तो अपने पिता की प्राराभानो न अनुरूप मेरा ये
एक और उपलब्धि सुमन
।

अनुक्रमणिका
*
9
16
कृतात
* बहेलिया
नल्पतर
* मरीचिका
*
28
38
* गहेती
43
* बडी अम्मा
53
59
सुर
66
* हितपी
* निर्णय
* मिति-रक्षा
74
81

कथामुख . मैंने जब से होश सम्भाला है, मैं प्रतिदिन सहस्रो व्यक्तियो से मिलता और ये अनुक्रम आज भी जारी है । माज तक असख्य लोगो से मेरा परिचय हो चुका है । सबने मुझे अपनी एक अलग पहचान बताई है। किसी की पहचान मजहब से है, तो किसी परिशा से। किसी की गरीवी से है तो किसी की अमीरी से ? किसी की कारोबार से है, तो क्सिी की खानदान से । क्सिी की वेरोजगारी से है, तो किसी की पद से । कई लोग तो मुझे ऐसे भी मिले, जिन्होने अपनी पहचान विस्मत अथवा बद- किस्मती से बताई। अब मैं हतप्रभ सा, इनमे से ऐसे व्यक्ति की तलाश कर रहा है, जिसकी पहचान इन्सानियत से हो । ...मानवता से हो ! ये मेरी ही नहीं, सम्पूर्ण समाज की भासदी है। . .. जब जब भी मैंने समाज के 'स्वनिर्मित' इन वर्गों के किसी वर्ग विशेष मे से इन्सानियत या मानवता की पहचान रखने वाले व्यक्ति को खोजने का प्रयल किया है, तब तब मेरे इस कहानी सग्रह की एक एक कहानी का सूत्र- पात होता गया है। अव मेरे इस कथोपकथन मे कितना यथार्थ है, अथवा मैंने ये खोज कितनी निष्ठापूर्वक की है, इस बारे म जानकारी तो पापको इन कहानियो को आद्योपान्त पढने पर ही हो सकेगी। 'यातना', 'वकालत', 'पुत्रवधू' और 'प्रसव पीडा'-चार उपन्यासो के उपरान्त मेरा ये प्रथम कहानी सग्रह है। मेरी ये कहानियां समाज को कोई क्रान्तिकारी, नई दिशा देंगी या इनसे सामाजिक कुरीतिया के पुराने जर्जर महल ढह जायेंगे . ऐमा दावा तो

मैं कैसे कर सकता हूँ ! किन्तु इतना अवश्य कह सकता हूँ, कि मेरा पाठक
वर्ग, इन कहानियो के माध्यम से उठाई गई सामाजिक कमियो के बारे में
सोचने पर मजबूर अवश्य हो जायेगा !....और ये मेरा विश्वास है कि जब
कोई बात दिल-प्रो-दिमाग मे पंठ जाती है, तो देर-सवेर इन्सान उस दिशा मे
कदम उठाने को बाध्य हो जाता है ।
पूर्व की भांति अब भी मैं आपकी प्रतिक्रिया की बेताबी से प्रतीक्षा
करूंगा।
पापका,
सुबोध गोविल
56, वसुन्धरा कॉलोनी,
टोक रोड
जयपुर-राजस्थान

(ECE कृतांत . जिस अखवार को मैंने बडी दौडधूप के बाद प्राज बाजार से खरीदा था, उसे अपने कमरे मे प्राकर लापरवाही से मेज पर पटक दिया ।.... भब मेरे लिये इसका कोई महत्व नही रह गया था ।...जब वि इसी अखबार ने मुझे बताया है कि मैं इस वर्ष हायर संकण्डी मे फर्स्ट डिवीजन मे पास हुमा हूँ। मेरे सभी साथी उछल-उछल पर अपनी खुशियो को द्विगुणित कर रहे थे, लेकिन मेरा मन किसी के साथ अपनी खुशियां बांटने का न हुमा....इसीलिये 'घर चला पाया। पापा यथावत् अपनी खाट पर सो रहे थे। जी किया, उन्हे झकझोर कर उठा हूँ.. उन्हें बता दूं कि मैं फर्स्ट पाया हूँ। उनसे लिपट जाऊँ और वो उठकर खुशी से मुझे सीने से लगा लें। मुझ पर स्नेहिल प्राशीर्वादो की बौछार कर दें। एक वे ही तो हैं, जिन्हें ये खुशखबरी सुना कर मैं मानसिक तृप्ति प्राप्त कर सकता हूँ।...किन्तु ऐसा कुछ न हो सका । उस कमरे मे बरसो से पसरी वीरानियो ने मुझे फिर एक बार अपने दामन में समेट लिया। थक पर निढाल सा मैं उस कमरे मे पापा की खाट से सटकर पड़ी दूसरी खाट पर लेट गया। अपनी खुशियो एव उमगो की लहरो को अपने सीने मे दफन खाट पर पडते ही दीवार पर टगी मम्मी की फोटो पाखो के घेरे मे सिमट भाई. .पौर माखें, साथ, हो उठी ।. फिर, वही अहसास सूनेपन का, ममता की छांव की तडप का, दिल को वचोटने लगा। " मचानर पिकी की मावाज ने मेरे मन सागर मे कवर के समान गिरकर, उस पर तरती मम्मी की एक बहुत घु पली, पुरानी सी छवि को तहस-नहस कर दिया। पिवी अपने नौकर की गोद से उतर पर मेरे पास पाकर खाट पर बैठ चुका था। उIका मासूम चेहरा देखकर मैं हल्का या परखे। .. J- प्रसन्न हुआ.....मानसिक रूप से नही....मात्र चेहरे की भगिमा से। पिछले कुछ ही दिनो में पियो से प्रात्मीयता या एक वन्धन सा वध गया है। पिंकी की मम्मी जब भी वभी याजार जाती हैं, उसे मेरे पास से ने भेज देती हैं और वह कुछ समय के लिए मेरे पिलौनो से खेलने लगता है ।...मेरे खिलौनी से !....मेरे वो खिलौने, जो मेरे लिये बरसो पहले लाये गये थे ।....योटी साइविन, गेंद-बल्ला, मोटर, गुडिया ... और न जाने क्या क्या .....प्रब तो ये खिलौने अपने जीवन की वृद्धावस्था पर हैं,...लेकिन जब ये जवान थे, तब भी मुझे इन्होंने कभी पाल्हादित नहीं किया ।....इनके अस्तित्व ने सदैव मेरा मन बहलाने की बजाय, मेरे सूने जीवन को यादो को तपिश से और मधिक गरमाया है। थोडी देर बाद पाने को कहकर वो नौकर जाते-जाते मेरे हायो मे जो पर्ची थमा गया था, मैं उसे देखकर उछल पडा। हमारी नई पड़ोसन, पिंकी की मम्मी से इस बारे में मेरी पहले ही बात हो चुकी थी। इस पर्ची में मेरी मम्मी का पता था 1....पर्ची देखकर मेरे निढाल से जिस्म में न जाने कसे स्फूर्ति का सृजन हुअा....और मैं उठकर मम्मी को पत्र लिखने बैठ गया। प्रादरणीय मम्मी ।. प्राज प्रापको मेरा ये पत्र देखकर मालूम हो जायेगा कि मैं अब बडा हो गया हूँ |....इतना बडा, जो आपको पत्र लिख सकू। अापकी स्मृति अब एक रिश्ते का अहसास मात्र है । आप जब घर से गई थी, तब मैं इतना छोटा था कि अपनी भावनामो की भिव्यक्ति मेरे बस मै न थी। और पाज, जब अभिव्यक्ति बस में है, तो भावनाएं मर चुकी हैं । सच,....प्रब तो दिल की ये जिज्ञासा भी मर चुकी है कि मेरी भी कोई मा हो, जिसके पल्लू से लिपट कर मैं उसकी स्नेहिल छत्र-छाया का प्रानन्द ले सकें। मोह उससे होता है, जिसका अस्तित्व सामने होता है ।....पाप चली गई, तो शन शनः इस दिल के आईने में रची-बसी भापकी छवि भी अस्तित्व विहीन होती गई ..होती गई। उस समय तो पापा ने यह कहकर दिलासा दी थी कि मम्मी हम सब से रूठ कर बहुत दूर चली गई है ।....इतनी दूर, जहा से कोई लौट कर नही माता । लेकिन बाद में मालूम पडा कि माप हम सब से नहीं, केवल पापा से, कृतात/10 - रूठी हैं .....उन पापा से, जिनके साथ मापने अपने माता-पिता की सहमति के बिना अग्नि के समक्ष सात फेरे खाकर, आजीवन साथ देने का सकल्प लिया था ...उन पापा से, जिन्होने सर्प-दश के समय मापने जिस्म से जहर चूस लिया था, चाहे फिर उन्हे होश में लाने के लिए डॉक्टर का भी पसीने- पसीने हो गये थे। आपके चले जाने के बाद मैंने पापा के चेहरे पर भरपूर मुस्कुराहट की झलक कभी नहीं देखी।...कसे मरियल से हो गये हैं पापा.... पिछले कई बरसो से मैं यही जानने मे लगा हूँ कि भाखिर आप पापा से रूठी ही क्यों। .....उन्होंने कभी प्रापकी इच्छामो का दमन नहीं होने दिया .... मापने नौकरी करनी चाही, तो आपके इस फैसले के समक्ष भी वे नत-मस्तक हो गये थे । हो, .. पापा बताते है आपको शालू से बहुत प्यार है ।.... इसीलिये पापले उसे भी मुझसे छीन कर मेरा बचपन अपाहिज बना दिया । हर बार राखी पर उसकी याद मे प्रासू के दो कतरे बहा ही लेता हूँ।...अब तो वह भी बड़ी हो गई होगी ।...उसे तो आपने बहुत शाबिल बना दिया होगा न ....क्योकि आप इसीलिए तो हम लोगो को छोड गई थी, कि पापा के कमजोर प्रार्थिक धरातल पर शालू के भविष्य का महल खडा होना, आपकी नजरो मे सन्देहास्पद था। या फिर मुझे अच्छे कॉनवन्ट स्कूल में दाखिला दिलवा कर शालू को सरकारी स्कूल मे पढाने की योजना ने आपकी ग्राशाग्नो पर तुषारापात किया था 1....लेकिन यह तो आप भी जानती थी कि हम दोनो को कॉनवैन्ट स्कूल मे पढाना संभव न था, क्योकि इससे आर्थिक विक्षिप्तता पनपने का भय था ।....इसी बीच जब आपकी सविस लगी, तो पापा का रोम- रोम पुलकित हो गया था ।....अब उन्हे दोनो बच्चो को एक ही स्कूल मे पढाने मे कोई एतराज न था।...सर्विस प्रापकी पापा से भी अच्छी थी 1.... पापा तो सरकारी कर्क मात्र थे, जबकि माप प्राइवेट कम्पनी मे अच्छे प्रोहदे की भागीदार बनी। वे इस बात से भी आश्वस्त थे कि सरकारी नौकरी व प्राइवेट नौकरी मे पदोन्नति क्रमश कछुए पोर खरगोश की चाल के समान होती है । इसीलिये उन्होंने प्रापकी नौकरी के घोड़े को हम दोनो के भविष्य के रथ मे जोतने का निश्चय किया था। लेकिन तब ही, वो ज्वालामुखी फूटा, जिसके मलबे में हम दोनोमा -1-111 भविष्य, पापा की जिन्दगी की रूमानियत, अमन-चन और न जाने क्या-क्या दब कर रह गया था ! सच मम्मी,....कभी-कभार जब मैं जाने-अनजाने मे पापा के जख्मो को उकेर देता, तो पापा के दिल के गुवार हमारे समक्ष प्रस्फुटित होकर ही रहते ।....इसी शृखला मे एक चार पापा ने बताया था कि 'जब आपने पापा को ये कहकर अपमानित किया कि "जब आपके पास मेरी बेटी को पढाने-लिखाने, खिलाने-पिलाने के लिये पैसे नहीं हैं, ...तो तो मेरे पास भी आपके लाडले की पढाई-लिखाई और ऐश करने के लिये पैसे नहीं है ।"-तो उनका जी, एक बार तो आत्महत्या करने को हो माया था !....ये विलगाव का बीजारोपण था,...फिर इसे ऐसी और कई ,घटनामो का सिंचन मिला और ये वृक्ष फलीभूत हुआ .....पाप हर बात मे अब केवल शालू का ही ध्यान रखती ।....उसी के भविष्य निर्माण के प्रति सजग रहती, जिससे अलगाव के उस वृक्ष को और ने-बढ़ने का अवसर मिला ।.... यहाँ तक कि बात पारा की उपेक्षा तक प्रा पहुँची ।....माखिर एक दिन पापा के धैर्य का बाध टूट ही गया । उस दिन शाम को जव पापा टूटे से, थके हारे आफिस से लौटे तो मुझे घर पर अकेला देखकर उनका शालू की अनुपस्थिति के बारे में पूछना स्वाभाविक ही था । मैंने रु पासा होकर कहा था-"पापा,....हम लोग भाज स्कूल की पोर से पिकनिक पर जाने वाले थे।....टीचर ने पिकनिक के लिए बीस-बीस रुपये जमा करवाने को कहा था....पापा !....मम्मी ने शालू के पैसे तो जमा करवा दिये थे,....मेरे नहीं करवाये थे,...इसीलिये शालू तो पिरनिक पर गई है और मैं सवेरे से घर पर अकेला हूँ।" यही वो मनहूस दिन था, जब पाप पापा से झगडकर अपनी एक सहेली के घर चली गई थी, शालू को साथ लेकर .....और पापा ने शायद यह सोचकर बुलाने का प्रयास नहीं किया कि जव प्रापका दहकता माक्रोश मद पड जायेगा, तो पाप स्वय चली आयेंगी।. लेविन प्रापये प्रभिमान ने पापा की तमाम मावाक्षामो, भावनामो मोर प्रेम को रौंद पर रख दिया चार दिन बाद जब समाचार मिला वि मापने अपना तबादला अपनी कम्पनी की कलकत्ता प्रान्च में यरवा लिया है, तो पापा के लिए आगरा जैसी 7 .. । 12/तांत स t . रोमान्टिक कहानियों की जन्मभूमि, बंजर होकर रह गई थी। "वाइफ का ट्रान्सफर कैलकटा हो गरा है ।"....कहकर पापा समाज कंटकों से तो मुक्ति पा ली थी, लेकिन स्वयं को ग्रात्मा के समक्ष वे निरुत्तर हो गये थे । मुझे तो हाल ही में मालूम हुआ कि, इस अप्रिय घटना के लिये मैं ही. जिम्मेदार है। जिसकी सजा स्वरूप में आपके प्यार को सदैव तरसता रहा हूँ।....लेकिन जब पड़ोस वाली आंटी ने मुझे बताया कि मैंने आपकी कोख से जन्म नहीं लिया है, तो मेरे अविश्वास करने पर उन्होंने मुझे सविस्तार बताया कि, शालू के जन्म के बाद डाक्टरों ने आपके दोबारा मां न बन सकने की घोषणा कर दी थी .....और तवं आपकी सहमति से ही पापा मुझे किसी अनाथालय से लेकर पाये थे। प्रांटी कह रही थीं, न जाने वो कौन सी मनहूस घड़ी थी, जब अपने जीवन की अन्तिम सांसें गिनते मेरे अमृत पिता ने मुझे एक नजर देखने के लिए, आपके दरवाजे पर दम तोड़ कर मेरे अछूत होने का रहस्योद्घाटन कर दिया था।...और शायद उसी दिन से आपके हँसते- खेलते परिवार में विलगाव को सूत्रपात हुअा था ....मैं आपसे पूछता हूँ मम्मी....मेरा अछुत होना मेरा कृतांत था...फिर मापने गृह-त्याग क्यों किया ?....ये सब तो मुझे करना चाहिए था !....इसके लिए आपके सुखद दाम्पत्य तथा शालू के जीवन के रंगीन सपनों की प्राहुति देना कहाँ तक न्याय संगत था ? सच मम्मी ... ! तब, यदि मैं मानसिक रूप से परिपक्व होता तो ये अनर्थ कभी न होने देता। मम्मी....जानती हैं !....पापकी कम्पनी के ब्रांच मैनेजर का स्थाना- न्तरण अागरा हुअा तो संयोगवश उन्हें मकान भी इसी कॉलोनी में मिला । उनका बेटा पिंकी....बड़ा प्यारा है। उस दिन जब वो यहाँ आया, तो प्रापकी फोटो देखकर वो पापको पहचान गया । सच मम्मी,....मेरा रोम-रोम पुलकित हो उठा, जब पिकी की मम्मी से आपका पता मिला । ये पत्र में प्रापको पापा, से छिपकर लिख रहा हूं। मैंने इस वर्ष हायर सैकण्डरी पास किया है। प्रथम श्रेणी में प्रब इन्जीनियरिंग में प्रवेश लेने का विचार है ।....मेरा नही,....ये पापा की .. - . -.../12 . जिद है ....मैं जानता हूँ इसके लिये पापा को अपने जिस्म की बधी-सुधी हड्डियो पर बलात्कार करना होगा। पिछले दस बरसो से एक पहिये पर खिचडते-खिचडते उनकी जिन्दगी की गाडी की चूलें अब ढीली हो गई हैं। मापके चले जाने से उनकी जिन्दगी मे एकाकीपन का जो सैलाब ना गया था, उसने उन्ह गला-गला पर कमजोर बना दिया है । ...पापको खोपर उन्होंने जो कुछ सोया उसका हिसाब-विताय तो मेरे पास नहीं है, लेकिन हो जो कुछ उन्होने पाया है, वह निश्चित रूप से एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है ! अपनी उस जीवन निधि को, अपनी एक मात्र उपलब्धि को उन्होने अाज भी अपने जर्जर होते सीने मे सजो रखा है । उन्हे विश्वास है कि उनकी वही अनमोल उपलब्धि उन्हें इस संलाब मे मुक्ति दिला सवेगी।...मापके स्वाभिमान को ठेस पहुंची न । दि उन्होने इतनी महत्त्वपूर्ण उपलब्धि कसे अजित कर ली | ....ये तो अपनी अपनी विस्मत है मम्मी । - अरे !... मैं इतनी देर से उपलब्धि-उपलब्धि की रट लगाये हूँ, उसके बारे मे तो पातको बताया ही नही '.. जानती हैं, वो क्या है ?....पापा की वो अनमोल निधि है ट्यूबर- कुलोसिस । जिसे शार्ट मे टी बी कहते हैं। वो भी छोटी मोटी अवस्था मे नही . पूर्ण विससित | . वैल डवलप्ड ।" बस ।. .इतना ही लिख पाया था, रिमेरी कलम की आवाज जैसे रुघ गई थी। आगे कुछ लिखने की हिम्मत न हुई । अभी मैं इसी कशमकश मे था कि इस पत्र को पोस्ट करू' अथवा नही...कि अचानक सामने से पिंकी को लेने उसवा नौकर कमरे मे प्रविष्ट हुआ और उसने मेरी मुश्किल भासान कर दी। कई क्षणो के पात्म-मथन से भी निष्पं का जो माखन मेरे हाथ नहीं लग रहा था, वो जैसे उसके माते ही, स्वतः ही मेरी थाली में परोस दिया गया था। "ये पत्र डालना है बाबू'.....लामो हम डाल देंगे।" उसने लगभग झपट्टा सा मारा और वो पत्र, जिसे मैंने लिफाफे मे रखकर मम्मी का पता लिख कर तैयार कर रखा था, मुझसे ले लिया। मेरे पत्र के प्रत्युत्तर में चौथे दिन ही जब मम्मी का अगले दिन प्रागरा पहुंचने का तार पाया तो मैं खुशी से उछल पडा। जिस दिन मम्मी माने 114 वाली थी, उसी दिन मैं माखो मे प्रथलडियाँ लिये, सोते हुये पापा के चरण स्पर्श वर, उस घर से हमेशा-हमेशा के लिये निकल पडा था। मुझे विश्वास था कि मेरे कृतात की वालिमा से उस प्रोन मे फैले सत्रास के अधेरे अब सदा के लिये तिरोहित हो जायेंगे 1... किन्तु अपना बैग लिये घर से बाहर निकलते समय, अप्रत्याशित रूप से मम्मी से मेरा सामना-सामना हो गया । मेरी साथ, पाखें देखकर वे न केवल मुझे पहचान गई , अपितु उन्हें ये भी अहसास हो चला था कि मैं उन्हे सुखद-दाम्पत्य जीवन प्रदान करने के लिए इस घर से सदा-सदा के लिये जाने को तैयार खडा हूँ। उनके पीछे शालू थी। तत्क्षण मम्मी ने उद्वेलित होकर मुझे पाचल से लगा लिया था । ...मेरा बैग अब जमीन पर पड़ा था और मैं मम्मी से लिपटकर फफक-फफक कर रो पडा था। मैं सोच रहा था मेरी रगो मे बरसो पहले भी वही खून था जो आज है। सिर्फ मम्मी के देखने का भदाज बदलने से हम सबकी जिन्दगी के सुनहरे क्षण फिर लौट आये हैं ।....मन का रिश्ता क्या खून के रिश्ते से कम होता है । मेरी मम्मी के मन मे मेरे प्रति उमड़ा पड रहा प्यार, स्नेह इस बात का साक्षी है कि ये छुप्रा-छून सब इन्सान के मन का, उसकी नजरो का मैल है.... और पाज मैंने यह मैल आंसुग्रो मे घुलकर अपनी मम्मी की आँखो से बहकर निकलते हुये देख लिया था । ....माज कृतांत/15 । बहेलिया - रूपा ने ग्यारहवी कक्षा म प्रवेश किया तो सब लडके उसके सम्मान म अपनी अपनी सीट पर खडे हो गये। "सिट डाउन ब्वायज ।" एक मधुर सी आवाज उस कमरे मे गुजायमान हुई और इसी के साथ सब लडके यथास्थान बैठ गये। हायर सैकण्डरी क्लास के इस संक्शन से इस स्कूल के प्रिंसिपल साहब भी परेशान है । यहा चाहे कोई भी अध्यापक अध्यापिका क्यों न आ जाये, लडके किसी के समक्ष अनुशासित होकर नही बैठते । यही कारण है कि कोई भी अध्यापक अध्यापिका इस क्लास मे आने से पूर्व स्वय यो मानसिक रूप से तैयार करके, पूर्ण रूप से सजग होकर ही पाता है । इस क्लास मे कई टीचर्स के साथ नागवार हादसे गुजर चुके है । कि तु इस बारे मे इस स्कूल मे चन्द महीनो पूर्व ही स्थानान्तरित होकर पाई रूपा एक अपवाद है । शायद ये उसका सरल सौम्य व्यक्तित्व ही है जिसकी वजह से वह अपने विद्यार्थियो की प्रिय शिक्षिका बन गई है । स्कूल मे वह न तो अधिा बन ठन कर पाती है और न ही आवश्यकता से अधिक कुछ बोलती है । इसीलिये लडके उसका सम्मान करते । कहते हैं अपना मान अपमान इन्सान स्वय अपने व्यवहार व करमो से ही करवाता है । रूपा के स तुलित व्यवहार ने ही उसकी ये छवि बनाई है । ये बात अलग है कि लडके कभी-कभार रूपा की क्लास मे हास परिहास कर लिया करते है। अपने नाम के अनुरूप रूपसी रूपा ने अपने हाथ म लगा एक बडा सा पर्स, एक किताब व उपस्थिति पजिका मेज पर रखे और उसी मेज पर पडा डस्टर उठावर ब्लैक बोर्ड साफ करने लगी। "टीचर...."

-- ग इससे पहले कि रूपा ब्लक-बोर्ड साफ करके विद्याथियो की और मुखातिब होती, एक स्वर उस कमरे मे गूजा तो रूपा ने पलटकर सम्बोधन- कर्ता की ओर देखा। "बोलो मनीप!" "एक बात पूछ टीचर " लडके का प्रश्न प्रात्मीयता का पुट लिये हुये था इसलिये रूपा ने उसे अनुमति दे दी। "हा हा पूछो" "टीचर हमने सुना है, अगले महीने हम लोगो का जो टूर वम्बई जा रहा है आपने उसमे जाने से इन्कार कर दिया है ?" मनीप ने विधिवत खडे होकर प्रश्न किया था। "हा.-1.. तुमने ठीक ही सुना है।" "लेकिन टीचरे,- हम सब लोगो की ये हार्दिक इच्छा है, कि इस टूर में पाप हमारे साथ रहे ।" "नही मनीष, तुम्हे इस मामले में टीचर से जिद नही करनी चाहिये । तुम ये बात अच्छी तरह जानते हो कि किसी इन्सान की जब शादी होती है तो वो ।" इससे पहले, कि रूपा मनीष की बात का काई उत्तर देती, मनीष के अभिन्न मित्र विमल ने उस वातावरण मे परिहासपूर्ण फुहार विखेरने का प्रयास किया। किन्तु रूपा ने वस्तुस्थिति को देखते हुए इस वार्तालाप को वही खत्म कर दिया। "मनीप, इस बारे मे तुम्ह मुझसे जो कुछ भी पूछना हो, कनास के बाद स्टाफ रूम म पूछ लेना। यहा सब लोगो का समय बर्बाद करना अनुचित है । हा तो बच्चो । अाज हम लोग राजा हरिशचन्द्र की कहानी पढेंगे। ऐसा सच्चा इन्सान फिर कभी पैदा नही हुआ 'पापको प्रिसिपल साहब याद कर रहे है । अप्रत्याशित रूप से स्कूल के चपरासी ने वहा पाकर रूपा को यहानी प्रारम्भ करने से रोक दिया ।

"अच्छा, तुम लोग अपनी-अपनी किताबें निकालकर इस कहानी को एक बार पढलो ...फिर हम लोग इस पर चर्चा करेंगे। मैं जरा प्रिसिपल साहब के पास होकर पाती हूं 1 तुम लोग क्लास मे शोर-गुल मत करना।" तत्क्षण, रूपा अपने हाथ मे लगी किताब मेज पर रखकर कमरे से वाहर निक्ले गई।.. और अनुशासन के पर्दे मे छिपी उच्छ खलता वेपर्दा होकर रह गई। सभी लडके अपने-अपने स्वभाव व मानसिक स्तर के अनुरूप क्रियाकलापो, वार्तालाप मे पूर्ण रूप से मशगूल हो गये थे। "मनीष ।" रूपा के जाते ही विमल ने वार्तालाप का दौर प्रारम्भ कर दिया। ... 1 "तू भी बुद्ध है यार ।" "क्यो।। ... क्या हुआ ?" "अरे ऐसी बातें भी कोई किसी से पूछी जाती हैं ? उनकी नई नई शादी हुई है। ये दिन उनके, अपने पति के साथ हनीमून मनाने के हैं....या हम लोगो के साथ टूर पर जाने के ?..अबे टूर तो हर साल होते ही रहते हैं।... शादी तो जीवन मे एक ही बार होती है न .....इन दिनो उन्हें हमारा क्या ध्यान रहेगा । ..अभी, जब मैं क्लास में पा रहा था तो रूपा टीचर स्टाफ रूम मे बैठी अपने नवेले दूल्हे को पत्र लिख रही थी ।....प्रेम-पत्र " "अच्छा!" अचानक जैसे मनीष को भी विमल को बातो मे रस आने लगा था। "और नही तो क्या । ...और उसके बाद ये भी क्लास मे ही पाई है . बल्कि वो पत्र प्रभी इन्होने पोस्ट भी नहीं किया होगा । ....मेरे विचार से तो अभी उस पर्स मे ही होगा । बोल? देखें वो प्रेम पत्र ?" "ना ना.. छोड यार....किसी लडके ने चुगली कर दी तो मुफ्त जायेंगे मारे अपन लोग।" "छोड यार । किसकी हिम्मत है जो हमारी शिकायत करेगा'... उसे इस स्कूल में रहना है या नहीं। ठहर में देखता हूँ। विमल बडे आत्मविश्वास के साथ रूपा वी टेबल तक पहुच गया । वहा पडा पर्स उठाकर जब उसने खोला तो उसकी आखो मे क्षणिक चमक " 18 .... . .. उभर माई । उसमे वास्तव में एक अन्तर्देशीय पत्र मिला। पत्र देख कर उसका चेहरा विजय की मुस्कान से खिल उठा । अपने चेहरे पर अदम्य रूपाव लिये वह पर्स पुन उसी मेज पर रखकर, वो पत्र लेकर अपनी सीट पर लोट पाया। मनीष उसके इस 'साहसिक' कृत्य पर हतप्रभ हुआ, विस्फारित माखो से उसे देख रहा था। "विमल, ...वही हंसी-मजाक म कोई बखेडा न हो जाय यार । मेरी बात मान, वापस रख पा इस पत्र को । जरा सोच ये प्रेम पत्र कसे हो सकता है ?... उन्हें अपने पति को पत्र लिखने की जरूरत ही क्या है ?....जब नई-नई शादी हुई है ..तो साथ-साथ तो रहते ही होंगे दोनो पति पत्नी" "नही यार ।...मैं जानता हूँ ..इनके हजवण्ड भी टीचर हैं, उनका पोस्टिग किसी गाव के स्कूल मे है वो हर हफ्ते-पन्द्रह दिन मे आ पाते हैं .. पौर बाकी काम पत्रो से ही चलता है ।" "तू तो बडा चालाक है रे विमल I. तो फिर चल खोल इसे.... देखें तो, प्रेम-पत्र मे क्या क्या होता है ।" विमल ने वो अन्तर्देशीय पत्र खोलने के लिये उसके अन्दर उगली घुसाई ही थी कि सामने से रूपा को प्राते देखकर रूक गया। फुर्ती से उसने वो पत्र अपने नकर की जेब में रख लिया। "प्रब क्या होगा विमल ?" मनीष के चेहरे पर किंचित घबराहट खेल गई थी, उसने दबी आवाज मे विमल से पूछा था । "तू चिन्ता मत कर, और चुपचाप बैठा रह, कुछ नहीं होगा।" कहते हुये और सब लडको के साथ वह भी रूपा के सम्मान मे फिर एक बार अपनी सीट पर खड़ा हो गया । रूपा ने कक्षा मे पार पढाना प्रारम्भ कर दिया था, किन्तु मनीप मोर विमल का ध्यान उसरी पोर किचित मात्र भी न था। वे लोग यही इन्तजार करते रहे कि पब पीरियड सरम हो और रूपा टीचर 4 जाने के बाद वे इस पत्र को सोलकर पढ़ें और इसका आनन्द लें। उनके बहेलिया/19 4 .. औत्सुक्य का भान् रूपा को न था। ...पीरियड खत्म होते ही वह अपना पसंपादि लेकर कमरे से बाहर निकली तो उसी पलांश मे विमल भी मनीप को लगभग खीच कर बाहर ले माया । "चल वाहर किसी पेड के नीचे बैठ कर इस पत्र का मजा लेगें !....., यहा तो लडके चैन नही लेने देगें।" मनीष सहमति मे सिर हिलाकर विमल के साथ चल पडा । वे दोनो स्कूल प्रागण मे ही एक घने वृक्ष के नीचे बैठ गये और चोर निगाहो से इधर- उधर देखा । जव उन्हे कोई अपनी पोर मुखातिब हुमा नजर न पाया तो. विमल ने अपने नैकर की जेब से वो अन्तर्देशीय पत्र निकाल कर, खोल डाला। मनीप की उत्सुकतापूर्ण अनुज्ञा पर विमल उसे जोर-जोर से पढने लगा। लिखा था.... आदरणीय मम्मी 1. मधुर स्मृति । प्राशा है आप सब लोग वहा पर सानन्द होगें। पापा से कहिये, अब वो प्रसन्न रहा करें। उनके दिमाग पर मेरी शादी का जो वोझ था, आशा है अब उन्हे उससे मुक्ति मिल गई होगी। 'ये' पिछले रविवार को पाये थे । इस वार शायद न मा सकें। नौकरी छुडवाने के स्थान पर मेरा यहा ट्रासफर करवाकर पापा ने अच्छा ही किया । अब यहा, कम से कम जीवन मे व्यस्तता तो है .निष्क्रियता यू- भी मानसिक कशमकश की जननी होती है । एक बात लिखना चाह रही हूं लेकिन मेरी कलम अवरुद्ध हुई जा रही है। कैसे लिखू .. फिर सोचती हूँ, लिखे बिना भी, कही कोई अनर्थ न हो जाये । .पाप लोगो ने कैसे कैसे करते मेरा ब्याह रचाया है, ये मैं भी जानती हूँ।..फिर भी, ईश्वर को न जाने क्या मजूर है। ...मम्मी.. मेरी सास कई बार कह चुकी है दितेरे पिताजी ने शादी के बाद फ्रिज देने को कहा था, उसका क्या हुमा मैं जानती हूँ मम्मी, कि अपको ये सब पढ कर कैसा लगेगा । . क्या बीतेगी आपके दिल पर । लेकिन आप ये भी जानती हैं कि मेरा जैसा शॉक मान्जवर कब धक्का खाता है । ये तो यहा रहते नहीं हैं। मेरे लिये स्थिति - मम्मी। " -- प्रतिदिन अंसह्य होती जा रही है ।...मैंने अपनी स्टेट इंश्योरेंस पालिसी से दोबारा लोन लेने की कोशिश की थी....लेकिन सफलता नहीं मिली। मम्मी ।....कभी-कभी सोचती हूँ. .....भगवान ने नारी को क्यों बनाया है ? .....क्या सिर्फ दुःख भोगने के लिए !....क्या सिर्फ तिरस्कार झेलने के लिये !....मापने सदैव यही शिक्षा दी है कि, नारी जीवन पाया है, तो मात्मार्पण भी करो ।....लेकिन मम्मी....अगर तब भी मान-सम्मान न मिले तो?" खैर....छोड़िये इन बातों को ।....अपने बारे में क्या लिखू। शेष फिर ।....पत्र का उत्तर शीघ्र दीजियेगा ।.... आपके पत्र की प्रतीक्षा में आपकी बेटी, रूपा "अरे ! ....ये तो मामला ही और निकला !" विमल ने पत्र को प्राद्योपान्त पढ़कर कुछ अप्रसन्नता व्यक्त की। "विमल....!" .... .... . "यार, मेरी समझ में एक बात नहीं पाती!" "वो क्या ?" "हर मां-बाप अपनी हैसियत के अनुसार दान-दहेज देते हैं,....जबकि रूपा टीचर तो खूबसूरत, पढ़ी लिखी होने के साथ-साथ कमाऊ भी हैं ! फिर भी लड़के वालों का पेट क्यों नहीं भरता?". "अरे, लालची हैं साले !....मैं सोच रहा हूँ, क्यों न एक बार अपन लोग रूपा टीचर से मिलें!" "अरे मरवायेगा क्या !....छोड़....चल क्लास में ही चलते हैं !" विमल मनीष के कहने पर वहां से उठकर तो चला पाया, किन्तु उसके मन्तर में एक तूफान उमड़ पड़ा था उस पल । शायद वह इसी तूफान के वशीभूत होकर अपनी प्रिय रूपा टीचर के लिये कुछ न कुछ करने का संकल्प मन ही मन कर चुका था। बहेलिया/21

दिन पख लगाकर उडते जा रहे थे। विमल पोर मनीय उस पत्र के
बारे मे सब कुछ भूल चुके थे। किन्तु एक बार जब लगातार तीन दिनो तक
रूपा स्कूल नहीं आई, तो उस दिन विमल ने क्लास में बैठे-बैठे मनीष के
सामने रूपा की खोज खबर लेने का प्रस्ताव रख दिया।
'मनीय "
"यार, रूपा टीचर तीन दिनो से स्कूल नहीं पा रही हैं।...क्यो न
हम लोग उनके घर चलें। ...कही उनकी तबीयत तो खराब नही हो गई है !'
मनीष को प्रतीत हुमा मानो विमल ने उसके मुंह की बात ही छीन
ली हो । उसी पल दोनो मे आपसी "सहमति" हुई और दोनो चुपचाप क्लास
से निकलकर रूपा के घर की ओर चल पडे ।
विमल और मनीष ने जब रूपा के घर पहुचकर द्वार पर दस्तक दी
तो एक प्रौढ सी महिला ने दरवाजा खोला । उसकी भाव-भगिमा से स्पष्ट
था कि उसे इन लोगो का आना अच्छा नहीं लगा था।
"बोलो।"
"जी . रूपा टीचर का घर यही है ?"
"हा क्यो"
"ज जी....वो वो घर मे हैं ?"
प्रौढा द्वारा प्रदर्शित नाराजगी व अप्रसन्नता से विमल किंचित् सहम
गया था।
...
भारी-भरकम डील डोल की स्वामिनी उस स्त्री ने सक्षिप्त किन्तु रूखा
सा उत्तर दिया।
"क्या कही बाहर गई हैं ? हम लोग उनके स्कूल से आये हैं ।
तीन दिनो से वो स्कूल नही आ रही हैं । ....हमने सोचा ..कही तबीयत मादि
खराब न हो । ..तो....तो क्या वो कही बाहर गई हैं
"हा....वो एक शादी मे बाहर ही गई है।"
"
'तातक

"मरे। - "जी कब तक लौटेगी" "दो तीन दिनो मे।" और इसी सक्षिप्त उत्तर के साथ एक धमाके से, उस महिला ने द्वार बन्द कर लिया। दोना तरूण उस औरत के व्यवहार पर हतप्रभ थे। जितने स्नेह और अपनेपन से ये लोग रूपा से मिलने आये थे । यहा आकर इस अभद्र महिला के अभद्र व्यवहार से उन्हें बडा अटपटा लगा । विमल को तो इस व्यवहार पर क्रोध भी माया, किन्तु वह सयम की चादर से स्वय को ढापे रहा । माश्चर्य मिश्रित प्रोध लिये वे स्कूल लौटने लगे तो अप्रत्याशित रूप से उनके सिर पर चूडियो के धन्द टुक्डे प्राकर गिरे। विमल ये क्या!" मनीष ने चूडियो के उन टुकडो को हाथो में उठाकर प्रचभित किन्तु प्राशकित नजरो से ऊपर देखा । लेकिन वहा पर उसे कोई भी दिखाई न दिया। "मैं समझ गया मनीष ....ऊपर जरूर कोई न कोई है । ....देख, तू कन्धो का सहारा दे, . मैं इस खिडकी के छज्जे पर खडा होकर देखता हूँ. पर कौन है, जिसने हम लोगो पर ये काच के टुकडे फेके हैं।" "लेकिन यार I...किसी मुहल्ले वाले ने देख लिया, तो क्या होगा? ..."कही ऐसा न हो, हम लोग किसी उलझन मे फस जाये ।" "अरे तू चिन्ता मत कर .इस टीकाटीक दोपहरी मे सब लोग अपने- घरो मे हैं । ...कोई बाहर दिखाई दे रहा है क्या तुझे? बोल ।" विमल ने चारो ओर देखा और मीर की ओर से किसी उत्तर की प्रतीक्षा किये बिना वह खिडकी पर चढ गया । मनीष ने भी उसे अपने कन्धे का सहारा दिया, जिससे वह खिडको के छज्जे पर खड़ा हो कर छत पर देखने लगा। दो क्षण मे छत को देखकर वह तत्क्षण जमीन पर कूद पडा। "क्यो क्या हुआ ?" मनीष ने उत्सुकता से पूछा ITI 12241S.. "मनीप गजव हो गया यार !" "बोल तो सही !...हुमा क्या?" .... 51042010

'हे भगवान्
अव क्या
होगा।
1
"अरे मुझे तो पहले ही शक हो गया था। ...कि..ये साली बुढ़िया
हम लोगो से झूठ बोल रही है।"
"क्या मतलव ।"
मनीप का प्रोत्सुक्य प्रतिपल द्विगुणित होता जा रहा था।
"अरे रूपा टीचर ऊपर ही हैं उन्हे रस्सियो से बाघ रखा है इन
कमीनो ने । मैंने अपनी आखो से देखा है वह रस्सियो से वधी हुई धूप मे
पडी हैं। उनके मुह मे भी कपडा ठुसा हुआ है ।"
ये कैसा न्याय है तेरा विमल अव ।
हमे क्या करना चाहिये।"
"चलो भागकर स्कूल चलते हैं।
"स्कूल रूपा टीचर को ऐसी स्थिति मे छोडकर?"
मनीष ने हैरत से कहा था।
"अरे तुम चलो तो सही ये वक्त बातें करने का नहीं है।
और विमल तथा मनीष वेतहाशा भागते हुए स्कूल चले आये।
कक्षा में उस समय कोई टीचर न था । हाफते हुये, उन दोनो ने जब कक्षा मे
प्रवेश किया, तो वहा उपस्थित सभी लडको का ध्यान उन्ही को और केन्द्रित
हो गया । कि तु विमल ने अपनी श्वास सामान्य होने का भी इन्तजार नहीं
किया और कक्षा मे सब लडका को सम्बोधित करना प्रारम्भ कर दिया था।
'साथियो । अपनी रूपा टीचर, जो पिछले तीन-चार दिनो से
स्कूल नहीं पा रही है न । हम लोग अभी उनके घर गये थे । वहा उनकी
सास ने हमे बताया कि रूपा टीचर शादी मे गई हुई हैं। लेकिन, प्राप
लोगो को जानकर आश्चय होगा, कि हमने उन्हे वही, अपने ही घर की छत
पर रस्सियो से बधे हुये देखा है । हम लोग ये भी जानते हैं, कि ये सब
उनकी शादी में दिये गये दहेज को लेकर हुआ है। मैं चाहता हूं हम
सब लोग अभी उनके घर चलें और अपनी टीचर को उन वहशियो, कमीनो
74/कृतात

के चगुल से छुडाय । क्या क्या आप लोग इस काम में हमारा साथ देने के लिये तैयार हैं?" विमल का इतना कहना या पि उस समरे म उपस्थित सभी लड़ये जोश-खराश के साथ बुनन्द प्रावाजा मे चिल्लाने लगे थे हा चनो । हम सब तैयार हैं। देखते ही देखते पचास साठ लडो का समूह अपनी कक्षा से निकल कर चल पड़ा । उस ओर, जहा उनकी प्रिय टीचर रिसी वहलिये वे शिक्जे मे फस कर यातना व सैलाब मे डूब उतरा रही थी। उन, इन्मान के रूप म छिपे भेडियो को सबक सिखाने, जो चादी के चन्द टुक्डो के लिये विसी भी दूसरे इन्सान के प्राण लेने म भी नहीं हिचकिचाते । विद्यालय परिसर मे से गुजरते जो जो छात्र राह मे मिले, वे उस समूह मे शामिन होते गये। होते गये। लडको के विशाल झुण्ड के साथ रूपा के घर पहुचकर जब विमल ने जोश-खरोश के साथ दस्ता दी, तो दरवाजा पुन उसी औरत ने खोला। विमल और मनीष उस औरत से वोई वात किये बिना कमरे मे समा गये और अन्दर के बरामदे म से होते हुये सीढियो पर चढ गय । वह प्रौढा हतप्रभ सी, ये सब नजारा देखती रही। इसी के साथ लडको की क्रुद्ध भीड ने उस महिला के साथ साथ उसके पति को भी घेर लिया था जो शोर गुल सुनकर द्वार पर चला पाया था। छत पर पहुचकर विमन और मनीप ने जो हृदयविदारक दृश्य देसा, तो उनकी पाखें साथ हो उठी थी। उन लोगो ने फुर्ती से रूपा के मुह मे ठूसा गया कपडा निकाला और उसके जिस्म पर वधी रस्सिया खोल डाती। धूप से उसका शरीर न केवत स्याह पड गया था, अपितु सात अनसने से कही कही फफोले भी पड गये थे । बन्धन मुक्त होते ही रूपा ने फफर फफकबर रोते हुय उन दोनो को अपनी बाहो मे भर लिया। उसका कण्ठ अवरुद्ध हो रहा था इस लिये वह मनीष और विमल से एक शब्द भी न बोल सकी। वे दोनो सहारा देकर निढाल हुई जा रही रूपा को नीचे लेकर आये तो रूपा ने रसोई की तरफ वहेलिया/25 इशारा किया, जहा पहुँचकर, साने वो जो कुछ भी मिला, वह उस पर टूट पडी । उरो यू माते देवार स्पष्ट हो गया था कि उसे दो-तीन दिन मूसा रसा गया था। रसोई में देसने पर विमल और मनीप को जो कुछ भी मिला, रूपा को बड़े स्नेह से सिलावर उसे पानी पिलाया भौर फिर राहारा देकर बाहर ले पाये। उन लोगो को यह देसवर माश्चयं के साथ प्रसन्नता भी हुई की क्रुद्ध भीड ने रूपा के सास-श्वसुर को मार-मार कर उनकी हालत दयनीय बना दी थी। इसी-बीच शायद किसी ने इस घटना की खबर पुलिस को दे दी थी ।... और सूचना मिलते ही पुलिस वहा पहुच चुकी थी। पुलिस यदि उस समय वहा न पहुचती तो लहयो को क्रुद्ध भीड न जाने उस दम्पति का क्या हथ करती। पुलिस इन्सपेक्टर ने माते ही उन दोनो को हिरासत में ले लिया था। ये सब देखकर विमल और मनीप पी पाखें विजय के उन्माद से चमक उठी थी। विमल ने इन्सपेक्टर साहब के इस कृत्य को सराहते हुये कहा था। "इन्सपेक्टर साहब,....ले जाइये इन कमीनो को ! ....ये समाज के दुश्मन हैं ' ....देश के दुश्मन हैं ? ...पैसे के लालच मे ये इन्सान को जान तक लेने से नहीं चूक्ते । जब तक ऐसे असामाजिक लोग हमारे समाज रहेंगे, दहेज-दानव हमारी बहनो, बेटियो और बहुमो के प्राणो की आहुति लेता रहेगा ।....हमारे देश में आज भी ऐसे कुटिल लोग हैं, जो जोक बन कर हमारे राष्ट्र का खून चूस रहे हैं ।.... हमे ऐसे लोगो को चुन- चुन कर खत्म करना है !" "बेटे ....हमे नाज है तुम जैसे देश के भावी कर्णधारो पर!.... तुमने अाज कानून की मदद करके जिस प्रकार अपनी टीचर के प्राणो की रक्षा की है....मैं कोशिश करुगा,....सरकार इसके लिये तुम्हें इनाम दे।" इन्सपेक्टर साहव विमल और मनीप वे कधो को थपथपाकर, उन्हे शाबाशी देकर, अपनी जीप में जाकर बैठ गये, जिसमें रूपा के सास-श्वसुर कृतांत/26 को पहले ही वंठाया जा चुका था !....और वह जीप धूल उड़ाती वहां से चली गई। "अच्छा भाइयो....अब आप, सब लोग भी स्कूल चलिये !....रूपा दीदी....आप माराम कीजिये !....हम लागों को आप हमारे जीजाजी का पता दे दीजिये, हम उन्हें टेलीग्राम दिये देते हैं।" रूपा का अश्रु बांध फिर एक बार ढह गया था |....उसने विमल और मनीप को अपनी बाहों में भर कर उन पर चुम्बनों की बौछार कर दी थी।

कल्पतरु "नो योर ऑनर, ...ये मनघडन्त कहानी है। ...सच्चाई ये है, कि वार- दात की उस शाम कुसुम देवी जब अपनी पडोसन कुमारी सुनीता को साथ लेकर मन्दिर मे पूजा करने पहुची, तो मन्दिर में ही अपने साथियो के साथ बैठ कर शराब पी रहे मुल्जिम उमेश ने, उन्हे मन्दिर मे जाने से रोका !.... कुसुम देवी द्वारा जब उन्हे रोके जाने का कारण पूछा गया तो उसने लड- खडाती जवान से बताया कि सुनीता नीची जाति की लड़की है । इसे मन्दिर में प्रवेश करने की अनुमति नहीं है | ....तब कुसुम देवी ने धृणित से चेहरे से व्यग करते हुये कहा-'वाह । तुम इस मन्दिर मे बैठ कर शराब पी सकते हो ' ....तुम्हारा कुता यहा बैठकर तुम्हारे द्वारा खा-खा कर फैकी जा रही 'मीट' की हड्डिया चबा सकता है .. और ये इन्सान...इस मन्दिर मे प्रवेश नहीं पा सकता। क्योकि ये अछूत है ...और तुम यहा के पुजारी के लडके हो ?... योर ऑनर .. इस प्रकार बात बढ गई और दीपावली की वो झिल- मिलाती रात कुसुम देवी के जीवन को अधकार के मॅवर के हवाले कर गई। ..कुसुम देवी के विरोध करने पर इसने अपने साथियो के सहयोग से उन्हे पकड कर उनके बालो मे बम की लडियां बाघ कर आग लगा दी ।... ये हादसा मुल्जिम के इसी कारनामे का परिणाम है ।.. कुसुम देवी के अस्पताल में कलमबद्ध किये गये बयान अदालत के समक्ष पेश किये जा चुके हैं .... अब मैं इस घटना के कुछ चश्मदीद गवाहो को अदालत के समक्ष पेश करने की इजाजत चाहूगा।" "इजाजत है।" न्यायाधीश महोदय की अनुमति पाकर वकील साहब के इशारे पर सुनीता विटनेस बॉक्स मे पहुच गई । पूर्ण रूप से निर्भीक होकर, प्रात्मविश्वास के साय । गीता पर हाथ रखकर उसे विधिवत् सच बोलने की शपथ दिलाई ..अब, गई, उसके बाद उसने अपना बयान दिया । इस प्रकार मुकदमा कई दिन चला और अन्ततोगत्वा न्यायाधीश महोदय न उमेश को एक वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनादी थी। उमेश दादा के पातक से सारे मुहल्ले वाले परेशान है। दूकानदारो से मुफ्त मे माल छीनकर ताड फोड करना, राह चलतो को छेडना और मुहल्ले की बहू-बेटियों के साथ अभद्र, अश्लील व्यवहार करना उसके प्रिय शौक है । उसके वृद्ध पिता भी अपने इकलौते बेटे की हरकतो से बहुत चिन्तित व दुखी है । आस पास के निठल्ले लडको की टोली ऊधम मचाने में उसका साथ देती है । इसलिये उसके हौसले बुलन्द होते जा रहे हैं। सुनीता के पिता शकर दपाल एक साधारण अध्यापक थे । उन्हे सुनीता का उमेश के खिलाफ अदा. लत मे बयान देना सालने लगा था। "तूने उमेश के खिलाफ प्रदानत म वयान देकर अच्छा नहीं किया बेटी। अब जव वो जेल से रिहा होकर पायेगा तो हम लोगो का जीना दुरूह कर देगा।" "इन्साफ की कुर्सी पर बैठकर न्याय करने वाले का दायित्व जितना महत्त्वपूर्ण होता है, उससे कही अधिक महत्त्वपूर्ण दायित्व गवाहो का होता है पिताजी। और फिर, जुल्म सहना भी तो उतना ही भीषण अपराध है जितना जुल्म करना ।" "लेकिन बेटी तालाब मे रहकर मगरमच्छ से बैर पालना भी तो खतरनाक है।" 'पिताजी, दुष्ट प्रारणी केवल अपने बैरी पर ही प्रारमण नहीं करता वो तो किसी को भी अपने शिकजे में लेकर हानि पहुचा सकता है ऐसे मे उसे शक्तिविहीन करना नितान्त आवश्यक हो जाता है और फिर कोई क्रान्तिकारी आन्दोलन चलाने के निये, पाहुति तो देनी ही पड़ती है . . एक चीज स्वय को मिट्टी के गर्भ म दबाकर ऐसे छाया-दार वृक्ष का सूत्रपात पर जाता है, जो बरसो तक जग को छाया देता रहता है। अपनी मिति-रक्षा । कल्पतरु/29 हैतु कभी मुझे अपने जीवन का भी बलिदान करना पड़ा तो कोई गम न होगा। ....बचपन मे आप ही ने तो सिखाया है पिताजी, की अपमानजनक, लम्बी जिन्दगी से सम्मानित जीवन चन्द लमहो का भी श्रेयस्कर है !" पिता पुत्री मे मतैक्य न हो सका था । शंकर दयाल जी ने निश्चय किया कि वे उमेश के जेल से छूटने से पहले ही अपनी बिन मा की दोनों बेटियो, सुनीता व अनीता के हाथ पीले कर डालेंगे .....इसके लिये उन्होने युद्धस्तर पर प्रयास भी प्रारम्भ कर दिये थे । ...लेकिन मार्थिक विक्षिप्तता और दहेजदानव उनके प्रयत्नो को विफल करते गये....करते गये ।... सन्तोपी शकर दयाल को, जीवन मे पहली बार आर्थिक अभाव ने अभिधात किया था। एक वर्ष का अन्तराल समाप्त होने पर उमेश जब कैद से छूटा तो उसके पाकोश का ज्वालामुखी फूट पहा ।... और जिस सुनीता का प्रसृत होने के कारण, उसे मन्दिर में प्रवेश करना गवारा न था, उसी के घर मे अपने साथियो के साथ दिन-दहाडे घुसकर उसने, सुनीता के उजाले दामन को स्याह कर डाला । प्रातकित, सहमे से मुहल्ले वाले पाषाण-प्रतिमा बने, पथराई आंखो से ये अनर्थ होता देखते रहे । उन सत्रस्त गलियो में उठी जुल्म की भभक ने एक और फूल को झुलसा दिया था। उमेश को फिर एक वर्ष का कारावास हो गया, लेकिन सुनीता का मन असह्यता के अहसास से बुझ गया । उसे अपनी इज्जत पर हुये हमले से अधिक शर्म इस बात पर थी, कि दिन-दहाड़े वो लम्पट घर मे घुस कर उसका जीवन बर्बाद कर गया और मुहल्ले के सहस्त्रो "युवा" और "मदं" लोग तमाशबीन बने देखते रहे, वे सहस्त्रो "मर्द" भी अकेले उमेश के समक्ष दीवार बन जाने का साहस न जुटा पाये । उनकी कायरता पर अधिक लज्जित व हत- प्रभ थी वह !... लोक लाज के कारण उसने पढाई भी छोड दी थी। समाज में अपने और अपनी विरादरी के मान-सम्मान को, अपनी धूमिल मिति को पुनः स्थापित करने के लिये उसने जो क्रान्ति लाने वा स्वप्न सजोया था, वो चूर चूर होकर बिखर गया था। उसे निराशा इस बात से थी कि इस /30 महायज्ञ मे वह अकेली रह गई थी ।....नितान्त अकेली ।.... निपट अकेली। स्वय को अकेली पाकर उसका मन अवश्य बुझ गया था, किन्तु उसने स्वय को इस जेहाद मे अकेले लड़ने के लिये तैयार करने की प्रक्रिया को अवाध गति से गतिमान् रखा था। उसके पिता उसकी इस प्रान्तरिक गति' से अनभिज्ञ थे । वे चाहते थे कि सुनीता कोई काम करे और वक्त का मरहम उसके घावो को तिरोहित कर दे। "बेटी | "यू घर मे पडे पडे जी और खराव ही होगा । "यदि तू अब अपनी पढाई जारी रखना नही चाहती, तो किसी छोटे मोटे स्कूल में, छोटे बच्चो को पढ़ाने का काम ही क्यो नही कर लेती ।" 'कम से कम तेरा मन इस ओर से तो हटेगा !" "माप कहते हैं तो ये भी कर देखती हूँ पिताजी।" सुनीता ने सहमति प्रकट की तो शकर दयाल जी ने अपने एक जान- कार साथी के स्कूल मे उसे भेजा । लेकिन वहां उसके अचरज का ठिकाना न रहा, जब शकर दयाल जी के मित्र ने ही उसे विस्फारित नेत्रो से देखा। "तो तुम हो शकर दयाल की बेटी ।" सुनीता ने शालीनता से कहा । "चर्चे तो तुम्हारे बहुत सुने हैं, लेकिन तुमसे साक्षात्कार प्राज ही हुमा "जी. S सुनीता तत्क्षण किंचित चौकी, तो शरर दयाल जी के मित्र ने जैसे उसे माईना दिखा दिया। "तुम जैसी बदनाम लड़की को हम अपने स्कूल मे से रख सकते हैं ? " हमे अपने स्कूल की साख नही गिरानी है |...जो लडकी स्वय प्रपना चरित्र निर्माण न पर सकी, उससे विद्यार्थियो के उज्जवल भविष्य निर्माण की माशा से की जा सकती है ?" पल्पतरु/31 सुनीता को काटो, तो सून नही ! ये उसके लिये अपमान की पराकाष्ठा थी। यहां तक कि अव सुनीता वदनामी की छाया उसकी छोटी वहिन अनीता के जीवन पर भी पडे बिना न रह सकी। उसे भी अपने सहपाठियो के समक्ष कई वार अपमानित होना पड़ा । इन सब घटनामो को शकर दयाल जी मूर दर्शक बने असहाय से, देखते रहे । उनका अन्तद्वन्द्व प्रति दिन द्विगुणित होता जा रहा था । वक्त पख लगावर उडता गया और उमेश जेल से रिहा होकर पा गया ।....किन्तु उसकी उच्छृ सलता व कुटिलता मे कोई कमी न पाई थी। अव भी उसके चेहरे पर पश्चाताप की शिकन के स्थान पर इन्तकाम की प्राकाक्षा ही थी । उसके पिता पण्डिन द्वारका प्रसाद ने उसे कई बार समझाने का प्रयास किया था। "वेटा। ....तेरे कुकर्म तुझे दो वार जेल भिजवा चुके हैं । अब भी तू सन्मार्ग तज कर, कर्मच्युत क्यो है ?....आखिर तू चाहता क्या है ?....अपने पिता के बुढापे का क्या हश्र करना चाहता है तू ?...तुझे अपने पिता का जरा भी खयाल नही है ?...दुनिया वालो के बच्चे जवान होकर मा बाप के बुढापे की बैसाखी बनते हैं....और तू .....तू मुझ वृध्द, असहाय के लिये नासूर बना हुआ है।" "आपने भी तो मेरे दादाजी को कितग दुख दिया है पिताजी !" उमेश के इस प्रतिवाद से प्रचभित हो गये थे पण्डित द्वारका प्रसाद । "मैंने ' ....मैंने क्या दुख दिया है तेरे दादाजी का?" "अपने पूर्वजो के जिस मन्दिर मे उन्होने अपनी जवानी में किसी नीची जाति वाले को घुसने नहीं दिया था....अापने न जाने किन लोगो की बातो मे आकर, सब तरह के लोगो को मन्दिर मे घुसने की इजाजत देकर, सारे मदिर को भ्रष्ट कर डाला ।....इसी गम मे तो उनके प्राण पखेरू उड गये थे !" "भगवान् तो सर्वव्यापी हैं मूर्ख । सब जगह विद्यमान हैं उनके दर्शन पर अकुश लगाने की हम इन्सानो की क्या विसात है | भला

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शताब्दियो से जो बुजुर्ग करते पाये हैं वो गलत है और
माप जो आज कर रहे हैं वो सही है ?
उमेश की आवाज मे व्यग का पुट था ।
अगर किन्ही अज्ञात कारणो से कोई कुप्रथा चल पडे तो क्या
उसक बारे म जानकारी होने पर भी उसे सुधारा नहीं जाना चाहिए ।
आखो देखी मक्खी निगली जा सकती है भला और फिर तुम पहले स्वय
को तो देखो। तुम खुद वहाँ बैठ का शराब पीते हो मास खाते हो
जानवरो को अपने साथ रखते हो फिर इसान के प्रवेश पर एतराज
घरने वाले तुम होते कौन हो । खाली दिमाग शैतान का घर होता है
निखटटू हो न उल्टी सीधी बात सोचेगे ही। अरे अपना भविष्य बनाने
के बारे मे तुम क्यो नही सोचते । यदि तुम्हारा यही हाल रहा तो वो दिन
दूर नहीं जब तुम्हारे खाने के भी लाले पड जायगे ।
प्रोफ्फो पिताजी। आप तो बेकार ही चिता कर रहे हैं ।
इतना विशाल व प्रसिद्ध मदिर है अपना । इसम जितना चढावा पाता है
उससे हम लोग ठाठ बाट से रह तो रहे हैं । आप क्या चाहते है कि मैं
कोल्हू के बैल की तरह दिन रात पिस पर अपने हँसने खेलने के दिन बर्बाद
?
पर लू
उमेश की इस बात पर द्वारखा प्रसाद जी व्यग से हंसे बिना न रह
सके।
हूं हंसने सेलने के दिन ।
सारी दुनिया को रुताकर तुझ एक
पल की भी हंसी मिले तो लानत है ऐसी हंसी पर
एक दिन जव पण्डित द्वारा प्रसाद जी अपन पूजागृह म थे एक
बच्चा बेतहाशा भागता हुमा उनर पास पाया।
कल्पतरु/33

"पण्डित जी !....पण्डित जी!!" उसके घबराये हुये स्वर को सुनकर पण्डित जी विस्मय से दौड़े दौडे पूजागृह से वाहर निकल आये। "क्या बात है बेटा?" "पण्डित जो...वो....वो पुलिस उमेश भैया को अस्पताल ले गई है "अस्पताल !!" किसी भावी अनर्थ की प्राशका से भयभीत हो गये थे पण्डित जी। उनके जैसे दिल-प्रो-दिमाग के तोते उड़ गये थे उस पल । "हाँ पण्डित जी।" "लेकिन हुआ क्या बेटा?" "कुछ लडको से उनकी लड़ाई हो गई थी।....लडको ने उन्हे डण्डो और पत्यरो से लहूलुहान कर दिया था |....वो ...वो बेहोश हो गये थे ।....और बेहोशी की हालत मे सब लोग उन्हे रास्ते मे ही पडा छोड़ गये थे ।....उनके माथे और पाखो से बहुत खून बहा है पण्डित जी.- माप ....पाप जल्दी से अस्पताल चलिये।" पण्डित द्वारका प्रसाद जी पर वचपात हो गया था। वे अपना सब काम-काज छोडकर अस्पताल पहुचे तो वहां डॉक्टर नारग ने घोषणा कर दी थी, कि उमेश की नेत्र ज्योति सदैव के लिये चली गई है ।....अब वो इस दुनिया को कभी नही देख सकेगा ।....पण्डित जी पर एक और पहाड टूट पडा। उनकी वृद्धावस्था की सध्या पूर्ण रूप से गहन अन्धकार में डूब गई। इस दुर्घटना से मुहल्ले वालो मे एक अदृश्य प्रसन्नता की लहर व्याप्त हो चुकी थी । आन्तरिक रूप से सभी प्रसन्न थे । "अच्छा हा....सारे मुहल्ले में प्रातक फैला रसा था। प्राखिर हर इन्सान को अपने कर्मों का फल तो भोगना ही पड़ता है !....यही .. इसी धरती पर ।....इसी जनम मे ।" उमेश ये पाव लगभग भर चुके थे। दो चार दिन में उसे अस्पताल से छुट्टी मिलने वाली थी। पण्डित जी चिन्ता में घुले जा रहे थे ।....पव .

कैसे कटेगा उमेश का अन्धकारमयी जीवन ?....कौन उस जैसे अपाहिज को अपनी लड़की देगा ?....कौन लड़की उस अन्धे की आंखें बन कर जीवन गुजारने को तैयार होगी ?....कैसे चलेगा उनका वंश ?....अपने मन में निरन्तर कौंपते इन प्रश्नों का उन्हें कोई उत्तर नहीं सूझ रहा था। "मरीज को मॉपरेशन के लिये ले जाना है,....प्लीज आप लोग बाहर चलिये।" नर्स ने जब उस वार्ड में प्रवेश करके पण्डित द्वारका प्रसाद जी और उमेश के कुछ दोस्तों से बाहर जाने का अनुरोध किया तो वे सभी हतप्रभ हो गये। "मॉपरेशन !!" पण्डित जी को जैसे अपने कानों पर विश्वास न हुआ था उस पल ! "जी!" नर्स ने अपनी बात की पुष्टि कर दी थी। पूरे प्रात्म विश्वास के साथ। "लेकिन....डॉक्टर नारंग तो कह रहे थे, अब एक-दो दिन में इरो अस्पताल से छुट्टी दे देगें ?.....अब यह प्रॉपरेशन किस लिये ?" इससे पहले कि नसं कुछ बोलती, स्वय डॉक्टर नारग उस कमरे में प्रविष्ट हुये। "पण्डित जी,...हमारे एक माई स्पेशलिस्ट पाज ही यहाँ पहुँचे है, ....उन्होने यही सलाह दी है .....माप निश्चिन्त रहिये, ईश्वर ने चाहा तो पन्या ही होगा !....लीजिये....पाप इरा पर अपने हस्ताक्षर कर दीजिये।" डॉक्टर नारंग के इशारे पर उनके साथ प्राई एक अन्य नर्म ने एक पंरपर रखा फागन मोर पंन पण्डित जी की पोर यदा दिग....और विस्मिा से पण्डित जी ने चुपचाप उस पर हस्ताक्षर कर दिये। तीन पन्टे के पाप्टप्रद इन्तजार के बाद गांपरेगन थियेटर में निकर कर डॉस्टर नारंग ने घोषणा यो, कि उमेश नी मानो वा पर सफल मापरेशन किया गया है ।... उमकी नेर यो नोट माई है । टर नारग कल्लत/35

की इस अभूतपूर्व उपलब्धि से वहां प्रसन्नता की एक लहर दौड़ गई। पण्डित
जी के दिल का बोझ हल्का हो गया था तत्क्षण । उनको भाखें प्रसन्नता से
साथ हो उठी थी । उन्होने कृतज्ञता प्रकट करते हुये, डॉक्टर नारग को
वधाई देने के उपरान्त इस अप्रत्याशित सफलता का रहस्य जानना चाहा, तो
उनके चेहरे पर फली सफलता की भाभा पलत झपकते ही तिरोहित हो गई।
उन्होने अथ पूरित नेत्रो से बताया-"पण्डित जी, दरअसल यहा कोई आई.
स्पेशलिस्ट नहीं पाया है ।....ये .. ये सव इस पत्र का कमाल है ।"
"पत्र ।।"
पण्डित जी पाश्चर्य चकित से उस कागज के टुकडे को देखने लगे जो
डॉक्टर नारग ने उनकी ओर वढाया था।
"अाप सुनीता को जानते हैं न ।"
"हां हां....वो अपने शकर दयाल जी की लडकी ।"
सुनीता का नाम आते ही उनके चेहरे पर अपराध-बोध झलकने
लगा।
"जी हाँ....ये पत्र उसी का है... अन्तिम !....उसने भात्म-हत्या कर
ली है।"
“आत्महत्या ।।"
"लेकिन... लेकिन... वो...।"
"पाप इसे पढ लीजिये ..सब कुछ समझ जायेंगे।"
डॉक्टर नारग की सलाह पर, हतप्रभ से पण्डित द्वारका प्रसाद जो वो
पत्र पढने लगे, जिसे वहां उपस्थित सभी लोग बडे ध्यान से सुनने लगे।
लिखा था-
मादरणीय पिताजी,
मेरी जिन्दगी अब प्रापके लिये नासूर बन कर रह गई है। मैं नहीं
चाहती कि मेरे उजडे हुए, स्याह गुलशन को आपके खून-पसीने का सिंचन
मिले ।
-~

मेरी अन्तिम इच्छा यही होगी कि मेरी प्रासं आप उमेश को ही दे दें। मुझे विश्वास है कि उमेश जब मेरी आखो से ये दुनिया देखेगा, तो उस समय उसकी आसो मे उच्च खलता व आक्रोश के स्थान पर शालीनता व ममता होगी। ...और वो सत्रस्त गलियां, जिनके सपास की तपिश से उसमे खिले फूल मुरझा जाते हैं....फिर प्रत्येक फूल की अरुणिमा को सहेज कर रख सकेगी। पापको याद होगा, मैंने एक बार कहा था कि-~-एक बीज स्वय यो मिट्टी के गर्म मे दबाकर ऐसे छायादार वृक्ष का सूत्रपात कर जाता है, जो वरसो तक जग को फल-फूल और छाया प्रदान करता रहता है । ..माज मैं भी स्वय को मिट्टी म दबा रही हूँ। मुझे प्राशा ही नहीं अपितु पूर्ण विश्वास है कि मेरे बीज से प्रस्फुटित कल्पतरु युगो-युगो तक जन-सेवा करता रहेगा । अपनी इस अभागिन बेटी को क्षमा कर दीजिये । पापणी बेटी, गुनीता। पाखो के रूप मे नव-जीवन पाकर उमेश, सुवक्ते शवर दयाल जी के पैरो मे गिर पडा था। शकर दयाल जी के दिल का एकमात्र योग, उनकी छोटी बेटी अनीता को उमेश ने अपनाने का सकल्प ले लिया था।

मरीचिका चचल-चपल नयनो की स्वामिनी, लावण्यमयी, कामिनी, .. ये रूपसी अब मेरी पत्नी है। एक दिन था, जब मैं इसकी एक झलक पाने को भातुर रहता था। जिस दिन इस रूप-रश्मि मे नहा न लेता, मैं सूरजमुखी, सिल न पाता !....और भाज!....माज वही रूप लावण्य मेरे साय, मेरे पलंग पर निर्वस्त्र पहा है ..और मेरे चचल मन से, उमगो या तूफान कोसो दूर है । मेरी नजर उसके जिस्म पर नही अपितु उस "क्लॉक" पर टिकी है, जिसने अभी- प्रभी अलार्म बजाकर मेरे सपनो के शीशमहल पो तहस-नहस पर दिया है। उनीदा हुमा मैं, इसके चेहरे पर अलार्म का पोई असर न पाकर, ढेर सा साहस बटोर कर इसे उठाने का प्रयास करता हूँ। "सीमा !....सीमा उठो,....छः बज गये हैं।" यह मुलबुलाई। लेकिन नीद ने उसका दामन नहीं छोड़ा। ऐसे ही दो तीन प्रयास और भी, जय विफल हुये, तो मैं बेचैन हो उठा। सात बजे से मेरी फैक्ट्री की शिफ्ट शुरू हो जायेगी,....पोर छ बजे तक सीमा की नीद ही नहीं सुनी है ! ....प्राज फिर देर से फैक्ट्री पहुँचू गा!....फिर यही बॉस से खिटखट में नहीं चाहता कि बॉस के चैम्बर में पहुंचकर फिर उन्ही सवादो की पुनरावृत्ति हो, जिन्हें एक बार सुनकर मैं तिलमिला उठा था। "मनीष !....माज तुम फिर देर से पाये हो!" "सर,....वो....दरमसल !" "सर....नई-नई शादी जो हुई है !" यॉस के पी ए. को अपना पक्षधर पापर मैंने अपने चेहरे पर पुते अपराध बोध को सिसियाहट मे बदल कर धो डालना चाहा, लेकिन वोरा की तनी हुई भवें मेरे हौसले पस्त कर गई। "तुम रोज-रोज शादी करोगे, तो इसका मतलब ये तो नहीं कि..... रोज-रोज देर से माने की छूट दी जाये 11" .

.माज की . मुझे वाटो तो खून नही । निरुत्तर हो गया था मैं उस पल । जी किया इस अफसर की कनपटी पर एक पूसा जड हूँ।... दूसरो की खुशियो से जलता है ये । उस समय तो मैं वहां से चला पाया लेकिन ये प्रश्न मेरे अन्तर को तब ही से सालता रहा है । "क्या वास्तव मे मैंने दूसरी शादी करके अपराध किया है ....और इसी प्रश्न के मानिन्द मेरे स्मृतिपटल पर रशिम का मोहक चेहरा हर पल तर तर जाता है .क्या वास्तव म उसके साथ अतिशय प्रत्या- चार हुआ है ?...कैसे कटता होगा उसका एकाकी जीवन ? उसकी जिन्दगी मे, प्रब तो नीरसता ने विकराल रूप धारण कर लिया होगा । नारी चाहे शिक्षित है, सुरक्षित आर्थिक धरातल पर खडी है, हर क्षेत्र में पुरुष के कन्धे से कन्धा मिलाकर चलने में सक्षम है, .फिर भी अबला है | आज भी उसे पुरुष के प्रश्रय की आवश्यकता है। प्रकृति प्रदत्त उसके कोमल व्यक्तित्व की रक्षा पिता, पति अथवा पुत्र सरक्षण मे सम्भव है। तिस पर परित्यक्ता । उसे तो समाज यू भी सामान्य नजरिये से नहीं देखता I , फिर ऐसी परिस्थितियो मे तो उस पर किसी न किसी प्रकार का लाछन लगना अवश्यभावी है । पुरुप प्रधान समाज मे ऐसी स्त्री पर जाने कैसी- कैसी नजर पडती होगी। "घोडी देर इसे और सोने दूं।" यही सोचकर मैं विस्तर से उठकर नित्यकर्म से निवृत्त होने मे लीन हो गया। बाथरूम मे मेरा कोई कपडा न था। वॉक्स रूम मे पाकर बक्से मे से अडरवियर बनियान निकाले और बक्से पर वेतरतीब से पडे शर्ट पेन्ट उठाकर वायरूम मे ही चला पाया। अचानक बाथरूम की तिखाल मे ठुसी हुई तौलिया पर ध्यान गया। तौलिया सीलन मे पडे रहने से वदवू छोडने लगा था। सब बातो को मनदेखा परके झटपट नहा कर पंन्ट चढाया, तो उसमे बटन नहीं था। न जाने क्यो, उस पैन्ट को देखकर फिर एक बार रश्मि मेरे स्मृतिपटल पर दृश्यमान हो गई। चुलबुली सी । मुस्कुराता चेहरा लिये । "ऐ श्रीमान् जी । प्रव उठना नहीं है। सवा छ बज रहे हैं । चलो प्रय अच्छे बच्चो की तरह वायरूम में पहुचो।. मैने सब कपडे और तौलिया रख दिया है ।....बच्चो की तरह पैन्ट के बटन तोह लाते हो !...टार दिये मरीचिका/39 है ।....प्रय उठो।" "हे भगवान् ऐसी बीपी रिगी को न देना, जो सेना के पमाण्डर पी तरह हरदम हयुम चलाती रहे ।....मामिर उठा ही दिया न "मैं चली जाऊंगीन |....तब पता लगेगा। ....सब काम किया कराया मिल जाता है न "क्यो। तुम वही जा रही हो क्या ?" " "हा..." "लेकिन कहाँ ?" "मायके।" "वैरी गुड, डालिंग कम से कम एक महीना रह कर पाना वहा,. तुम्हारी अनुपस्थिति मे चन से तो सो सकू गा में सवेरे के समय ।" "फिर तो, जब तक मैं मायके से लौटकर पाऊगी....तुम मुझे बेरोज- गार मिलोगे।" मैं तैयार होकर जब बैडरूम में पहुचा, तो सीज उठा । सीमा अभी तक बेसुध पडी सो रही थी। "अरे ।...सीमा, अभी तर सो रही हो।" इससे पहले कि मेरे धैर्य का बाध टूटता, उस मृगनयनी ने नेत्र खोलकर मुझे निहारा । उसकी प्राक्र्पक अगडाई भी मुझे वासी लगी। "डालिंग....प्लीज तुम ही चाय बना लो न |.....बिस्कुट तो रखे ही हैं। एष वप मुझे भी दे देना। बडी नीद पा रही है।" क्रोधाग्नि मे जलता मैं, विना कुछ खाए-पिये ही घर से निकल पड़ा। अगर यही हाल रहा तो सीमा से भी मेरे सम्बन्धो मे दरार पड जायेगी । उसका पालस्य, उसकी अकर्मण्यता, उसकी गरिमा को धूमिल करके उसे मेरी नजरो से गिरा देंगे । अगर ऐसा हुआ, तो क्या मैं सीमा को भी अब मेरे लिए ये एक नया प्रश्न था । रश्मि से भी तो यू ही, जरा सी बात पर तनाव पैदा हो गया था। शकी एक चिंगारी ने मेरा घरौंदा राख का ढेर वना डाला था। ठीक ही तो कहती थी रश्मि 1 मैं दिनa/40 छोड दूगा 7

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का कसे विश्वास दिया जा सकता है, पि विना समर्पण की भावना के वह दूसरे से निभा लेगा? ..जब समर्पण ही करना है तो पहले ही साथी को क्यो न पिया जावे ? जिससे दूसरे अथवा तीसरे साथी के समक्ष बलाव समर्पण करने को वाध्य होना पडे । प्रात्ममथन से अब निष्कर्ष का माखन निकलने लगा है। एक घरौंदा जो एक प्राक्रोश की आधी से धाराशायी हो चुका है, उसके प्रायश्चित स्वरूप अब नये घर की अस्तित्व रक्षा मुझे ही करनी है 1....और इस काम में मैं ' अब अपने अह को बाधा नहीं बनने दूगा। अपने कर्मों के फलस्वरूप, टूटते बिखरते, अकेलेपन का सत्रास भोगकर मैं क्यो मूर्ख बनू ?....अचानक मेरा ध्यान मेरे ठीक सामने सडी सीमा पर गया, जो बस स्टॉप पर मुझे अकेला खडा देखकर खिलखिला रही थी। "हू....जैसा मैंने सोचा था.... ..वही हुमा ।" "क्या मतलब 11" "गुस्से मे घर से निकले थे न ।....जरूर कुछ न कुछ उल्टा सीधा सोच रहे होगे ! ....सामने से बस चली गई और तुम विचार सागर मे डूबते, उतराते उसे जाते देखते रहे।" "क....क्या....क्या ...बस चली "जी हाँ मैंने दूर से स्पष्ट देखा है,, ....बस रुकी....यहा से कुछ सवारिया चढी और तुम....खडे ही रहे ।....लो.....तुम्हारा लच बॉक्स I....भव तो थोड़ा 7" सा मुस्कुरा दो" और मैंने उस सुनसान वस-स्टाप पर कनखियो से इधर उधर देखकर सीमा को अपनी बाहो मे भर कर, उसके कपोलो पर प्यार पाक दिया।

गहेली . ऋचा जब भी अपने बॉस के चम्वर मे जाती है, उसका बास जमनादास, अपनी माखों पर चढा मोटे फेम का चश्मा नाक पर सखा पर अपनी ललचाई नजरें उसके जिस्म पर गढ़ा देता है । उसका बस चले, तो ऋषा के पुष्ट, माकपंक, लावण्यमयी जिस्म को लील जाये वह ' मुह में दात, पेट मे भात हो न हो, विन्तु उसकी प्रौढ सी पाखो मे वासना की पुत- लिया, ऋचा को देखते ही अठखेलिया करने पर उतर पाती हैं । - मोर ऋचा का मन न केवल कसैला हो जाता है, अपितु कडुवाहट से भर जाता है।..लेकिन वह जानती है, कि फिलहाल इस प्रप्रिय स्थिति से बचने का कोई उपाय नहीं है । इसीलिये वह डिक्टेशन लेते समय कभी भी नजर उठा- कर जमनादास की ओर नहीं देखती है । कई बार तो हद हो गई है बुढऊ ने ऐसे प्रश्नील व घिनौने प्रस्ताव रखे हैं , कि ऋचा का जी तत्क्षण उसका मुह नोच खाने को हो पाया था। अपनी सहेलियो मे हठी, जिद्दी, गहेली पहलाने वाली ऋचा आज परिस्थिति में ऐसे भवर मे फस गई है कि अपने बॉस की भद्दी से भद्दी मजाक को भी उसे अनदेखा, अनसुना कर देवा पडता है। "तो... तो तुमने क्या सोचा ?. देखो, मेरी बात मानोगी तो दिन- दूनी रात चौगुनी तरक्की करोगी।" एक दिन जमनादास ने जब ऋचा के समक्ष अपना यह बेतुका प्रश्न दोहराया तो वह तिलमिला उठी। कहा वह पचपन वर्षीय विधुर,...और कहां वह नवयौवना | अपनी महत्वाकाक्षी, स्वप्निल पाखो मे प्रश्र क्रण लिये वह न जाने क्या सोच कर बॉस के चम्बर से उठकर चली आई। विना कोई उत्तर दिये। बिना डिक्टेपान लिये। और हतप्रभ से जमनादास, उसे रोकने का प्रयास विफल होने पर निश्चेष्ट से अपनी सीट पर बैठे रहे। किन्तु अब भी उनके चेहरे पर मात्मग्लानि या पश्चाताप को तपिश नहीं थी। उनके चेहरे पर अब माक्रोश का साम्राज्य था। "मतृप्त दर्प की कुण्ठा।

बस स्टॉप से घर पहुंचते-पहुंचते ऋचा ने अपने पालोडित होते मन को सहज परने मे किंचित सफलता प्राप्त कर ली थी। उसने प्रारममथन से निपका माखन निकाल लिया था।""अव वो इस कम्पनी में काम नही परेगी। उसके सोच मे एक स्थिरता समा चुकी थी। अपने निर्णय को अमली जामा पहनाने की एक दृढ प्राश्वस्ति ।""किन्तु घर पहु चते ही उसका सम्पूर्ण जोश-खरोश तिरोहित हो गया। एक उच्छु खल खरगोश की मानिन्द कुलाचे भरता उसका निर्णय जैसे उसके हाथो से छूट कर भाग गया और वह असहाय-सी अशक्त-सी उसे जाते हुये देखती रही । उसके निर्णय को चूलें चरमराने लगी थी जब उसे मालूम पडा कि प्राज उसके पिताजी को फिर एक पत्र मिला है, जो उनके जख्मो को उकेर गया है ।"उनकी चिन्ता को द्विगुणित कर गया है । उनके पास के पछी के स्वच्छन्द विचरण पर भी अकुश लगा दिया है उस पत्र ने लिखा था-नालाजी माप तो जानते हैं, विजय की पढाई-लिखाई से मेरा आर्थिक सत्त-निचुड गया है । "और अब, जब मेरा बेटा अपनी मजिल के वरीय है, मैं नही चाहूंगा कि उसे किसी भी कारण से एक कदम भी पीछे हटना पडे । आपको अपनी बेटी के भविष्य की चिन्ता न सही, लेकिन मुझे तो अपने बेटे को मजिल तक पहुचाना ही है !....मैं तो सोच रहा था, विजय को स्विट्जरलैण्ड की एक कम्पनी मे, जिसको बाच दिल्ली मे भी है. नौकरी मिल जाती, तो साप ही को वेटी राज करती ....इस नौकरी के लिये पहले उसे एक वर्ष की ट्रेनिंग के लिये अपने खर्च पर स्विट्जरलैण्ड जाना होगा ।....फिर इस बात के पूरे-पूरे चासेज हैं कि उसे दिल्ली वाच मे ही रस लिया जायेगा । विदेशी पर्म की ऐसी अच्छी नौकरी से पूर्व ट्रेनिंग के लिये जाने में मुश्किल से तीस हजार रुपये का खर्चा पायेगा। मैंने विजय को पच्चीस वर्ष पढाया है,....अव यदि आप शादी के समय तीस हजार रुपये या इन्तजाम भी नहीं कर सकते, तो मेरे विचार से आपकी बेटी मेरे बेटे के सान्निध्य का सुख भोगने के काबिल . इस पत्र को पढवर विक्षिप्त आर्थिक धरातल पर सह मचा के पिता पर वज्रपात हो गया था। स्प और शिक्षा के गहनो से सजी अपनी बिटिया के भविष्य की खुशिया भी, क्या अब उन्हें खरीदनी पड़ेगी ! विजय । के पिता या उसकी पढाई में सत्त-निचुड गया तो क्या ऋचा की पढाई खंराती थी। । ....ये पहला अवसर नही है, जिसन ऋचा के पिता को मात दी है । किन्तु ऋचा अव मार सान का तैयार नहीं है ।...नौकरी करना मजबूरी है | ....शादी करना तो मजबूरी नहीं ।। वहा वह असहाय थी.... यहा नही रहेगी। उसके अन्तर म सुपुप्त पडे उसके जिद्दीपन, उसमे हठ ने अब अपना नागफ्न उठा लिया है । अव उसे कुछ न कुछ करना ही होगा। रात को पिताजी व मा की नजरा से बचते-बचात ऋचा ने वा पत्र ढू ढ निकाला है, जिस पर वे दोनो ऋचा के प्रॉफिस से आने से पूर्व विचार- विमर्श कर रहे थे। पत्र को याद्योपान्त पढ़न पर उसका माथा ठनका । उसने सोचा-ये विज य, यही उसरा सहपाठी तो नहीं ।...जो बॉलज मे रूमानियत की चादर लपेटे उसे और न जाने कितनी ही लडकियो को देहा करता था । उसके प्रोत्सुत्रप ने उसे पिताजी की खपालमारी खोलने पर मजबूर किया, तो उसे विजय पा फोटो भी मिल गया- अरे हा ......ये तो वहीं है ।।....ईडिमट .....उसकी प्रासो म क्षणिक चमक उभर आई है। कॉलेज मे तो नेता बना फिरता था ! वह मन ही मन बुदबुदाई । अनायास ही ऋचा को उस वाद-विवाद प्रतियोगिता का स्मरण हो पाया है जिसमे दहेज के विरुद्ध अपना सशक्त पक्ष रखने पर विजय को सम्मानित किया गया था ।... कॉलेज मॉडिटोरियम तालियो वी तेज आवाज से गुजायमान हो उठा था तरक्षण ।....और भाज'...प्राज उसी के पिता...उसी के विवाह के लिये...! इससे भागे वह कुछ न सोच सकी। उसका मन घृणा स भर उठा था। विजय के उस प्रतियोगिता में व्यक्त किये गये विचारो की ये परिणति देख कर उसे घोर निराशा हुई । विजय की उस मिथ्यापरस्ती पर उसका मन आहत हो गया था। प्रशसा जब घायल होती है तब पात्रोश का जन्म अवश्यभावी होता है। उस समय जिस विजय की, ऋचा के मन में किसी कोने में प्रशसा हुई थी, आज उस वि या ये रूप देखकर ऋचा पर आरोश का भूत सवार हो गया है -अब मैं शादी रूगी-तो इसी विजय से । न जाने क्या सोच कर ऋचा ने अपनी जिन्दगी का इतना वडा निर्णय उसी पलाश मे ले डाला । न पेवल निर्णय, अपितु एक सकल्प किया था विजय को वर ने का, उस पल । न जाने किस भावना के वशीभूत होकर उसने ये निर्णय लिया है ये शायद वह स्वय भी नहीं जानती । शायद ये गहेली/45 उसी सिताब या प्रसर है, जो सहेलियों ने उसे दे रखा है .....गहेली... गहेली 1...अब यो वास्तव में गहेली होपर रहेगी। . "घरे •तुम ऋचा को अपने चैम्बर में अपने समक्ष खडा देख कर चौक पड़े हैं जमनादास । उनके लिये ये अप्रत्याशित लेपिन वाछित घटना है । "तुम्हारा तो स्तीफा मेरे पास पा चुका है।" "जी. .वही वापस लेने आई हू।" "वापस 11..यानी तुमने नौकरी नहीं छोडी ।।" जमनादास का चेहरा खिल उठा है। अपने समक्ष ऋचा को नत- मस्तक हुये देख, अब उसका दपं तृप्त हुमा है । प्रात्मतुष्टि से उसका मन चन्द लमही मे न जाने कितने बाब सजा लेता है । अपने नयनी की ठण्डक, ऋचा को देख पर न जासे कितने मधुर स्वप्न 'सजो डालता है। उसके विचार से मछली उसके बिछाये जाल में फस चुकी है 1.. बस, मर जाल खीचना शेष है ।. .लेकिन ऋचा इस बात से आश्वस्त है कि मौका पाते ही वह दामन झाडकर यहा से साफ, बेदाग, बच निकलेगी। उसे न केवल विजय के पिता द्वारा उसके पिता के लिये अपमानित करने वाले शब्द का प्रयोग सालने लगा है अपितु अपने कॉलेज के दिनो मे विजय के मन में प्रकुरित हुई दहेज विरोधी कोपल का निष्प्राण होना भी, हिन्दुस्तान की सहस्त्रो अविवाहिताप्रो के दुर्भाग्य की भयावह स्थिति के बने रहने का द्योतक प्रतीत होने लगा है। अन्ततोगत्वा उसने अपने दिल का गुबार निकालने के लिये विजय को पत्र लिखने का निर्णय लिया है। उसने लिखा--"कालेज की वाद-विवाद प्रतियोगिता में दहेज के विरुद्ध सशक्त पक्ष रखकर सम्मानित होने वाले युवक के पिता यदि उसी की 1/46 शादी में भारी भरकम दहेज मागे, तो उस युवक को क्या समझा जावे . कायर ! ....और कायर पुरुष जिन्दगी मे कभी समृद्धिशाली नहीं हो सकता।" ऋचा के प्रापचर्य का ठिकाना न रहा जब उसे अपने पन के प्रत्युत्तर मे विजय का पत्र मिला। किन्तु उसके विचार जानकर ऋचा के मन-अाकाश पर छाये क्रोध व घृणा के बादल और अधिक गहन हो गये है। लिखा है--रूप की लौ तो एक निश्चित अवधि के उपरान्त बुझ जाती है ।... किन्तु पैसो से ससाधनो की वो 'मशाल' खरीदी जा सकती है, जिससे जीवन पर्यन्त प्रसफलताप्रो के अन्धकार से दूर रहा जा सके । रूप-रश्मि से पेट की 'पाग नहीं बुझ सकती। ऋचा के समक्ष ज्यो-ज्यो विजय के विचारो का पिटारा खुलता जा रहा है, त्यो त्यो उसका सकल्प दृढ होता जा रहा है। एक दिन अप्रत्याशित रूप से ऋचा और विजय की मुलाकात हो जाती है। कॉफी हाउस मे बैठकर ऋचा उसे जीवन साथी का महत्व समझाने का प्रयास करती है, किन्तु विजय को तो वही 'मशाल' चाहिये । जीवन- 'साथी उसके लिये गौरण है । वार्तालाप के उस दौर में ऋचा को आभास होता है कि विजय उसे स्वीकार करने को तो तैयार है, लेकिन केवल उस स्थिति मे, जब उसके हाथो मे वाछित 'मशाल' हो । "ठीक है विजय....मुझे तुम्हारा प्रस्ताव मजूर है ।....लेक्नि, मेरी भी एक पात है !" "हा हा कहो न !"....विजय का मुख-मण्डल पाशा की किरण से देदीप्यमान् हो चला। "ये राज केवल मेरे और तुम्हारे बीच ही रहना चाहिये कि मैंने 'सुहागरात मे फूलो की सेज पर बैठ कर तुम्हारी प्रिय 'मशाल' तुम्हे देने का वचन दिया है .....तुम अपने पिताजी की सन्तुष्टि के लिये, चाहो तो उन्हे बता सकते हो, लेकिन मेरे घर वालो को ये वात मालूम नहीं होनी चाहिये ।" "मुझे मजूर है ।....लेक्नि....ये इतना पैसा तुम वहा से लाग्नोगी ?" "तुम्हे माम खाने से मतलब है न ।..हा.....मेरी एक शर्त ये भी रहेगी कि तुम इस बारे में मुझ से कुछ नही पूछोगे।" गहेली/47 "अच्छा बाबा....नही पूर्णगा।" विजय ने पुलक्ति मन से, रोमाचित होकर ऋचा का हाथ थामा, तो उसे अनुभूति हुई मानो पैसे देकर वह विसी मालिश वाले से सिर की मालिश करवाकर माल्हादित हो रही हो । खरीदा हुआ चैन । खरीदे हुये प्यार की मानिन्द। पुरुष वैश्या वी मानिन्द ! ऋचा ने विवाह के लिये तीन माह का समय मागा था। ठीक तीन महीने बाद दोनो वैवाहिक बन्धन मे बघ गये । एक ऐसे बन्धन में जिसकी नीव चादी के चन्द टुक्डो पर रखी गई थी।....जिसका प्राधार लक्ष्मी थी। वह लक्ष्मी, जिसे 'चचला' कहा गया है। ऋचा ने अपने वचन के अनुसार सुहाग की सेज पर बैठ कर अपने पति को तीस हजार रुपया की 'भी' भेंट चढा दी। उमे इस समय प्रसन्नता है तो केवल इस बात की, कि उसके पिताजी अब निश्चिन्त हो जायेंगे । उसने अपने पिता को, अपने जिस्म की बची खुची हड्डियो पर बलात्कार करने से बचा लिया है, पूर्व निर्धारित योजनानुसार शादी के पन्द्रह दिन बाद ही विजय स्विट्जरलैण्ड के लिये रवाना हो गया है। ..अपनी नव-विवाहिता से एक वर्ष बाद लौट पाने का वादा करके। स्विट्जरलैण्ड का एक छोटा सा खूबसूरत शहर लूसर्न ।. .जहा की एक कम्पनी में विजय को एक वर्ष की ट्रेनिंग के लिये भेजा गया है । ये आकर्षक शहर सैलानियो के लिये एक विशेप प्रापर्षण का केन्द्र है। इस शहर के बीच में से होकर जो नदी बहती है उसे रूएस नदी बहते हैं । मागे चलबर यही स्एस नदी एक सुन्दर, मनभावन झील में परिवर्तित हो जाती है जिसे लूसनं भील के नाम से पुकारा जाता है । इस भील मे नौका विहार होता है। यहा से नौकाय यात्रियो को पिलायम व टिटलिस भादि स्थानो तक ले जाती है जो गुन्दर, दर्शनीय स्थल हैं। 18 अपने घर, परिवार और देश से सहस्त्रो मील दूर लूसर्न झील मे नौका विहार के उन्मादक क्षणो मे विजय को ऋचा की कमी सालने लगती है। मन के किसो काने से आवाज आती है-बिन साथी सब सून । उसे अहसास होने लगता है कि जिस प्रकार गम बाटने से हल्के होते है उसी प्रकार खुशी भी साथी के साथ मिलकर ही द्विगुणित होती है। यहा का वातावरण और अपने वतन से दूरी विजय के मन मे जीवन साथी के प्रति आत्मीयता उसकी अहमियत का बीजारोपण कर गई है। एक शाम विजय, लूसर्न म अपनी कम्पनी के मालिक के घर उनसे मिलने पहुचता है, तो व अपने बगले की बार मे मिलत है। मिस्टर डब्ल्यू उब्ल्यू दिनकड अपनी कम्पनी की हिन्दुस्त नी वाच का मुआयना करके आज ही लूसन पहुचे है। प्रतिपल गहराती शाम और बढते हुये सुरूर के साथ ही मिस्टर किनकंड विजय को अपनी दिल्ली यात्रा के सस्मरण सुनाने लगते हैं। "यो sss इण्डियन ब्यूटी इज फेन्टास्टिक ।' अपने बास के मुह से बार बार भारतीय नारी की इस रूप में प्रशसा से उसे अश्लीलता की बू पाने लगती है। उसे आभास होने लगता है जैस उसका वास कोई जगली जानवर हो जिसके मुह इण्डियन ब्यूटी का लहू लग गया हो और वह बार बार उस स्वाद को याद करके लार टपका रहा हो । उसका जी चाहता है, बॉस की कनपटी पर एक घू सा जड दे, लक्नि वह कुछ नही कर पाता । उसका मन घृणा से भर जाता है। और वह इन अप्रिय बातो का रुख दूसरी ओर मोड़ने में सफल हो जाता है । कम्पनी के बारे में बात चलने पर मिस्टर दिनक्ड उसे बताते है कि अगले महीने यहा हम एक सेमीनार प्रागनाइज कर रहे है जिसमे सभी देशा की प्राचो के हैडस भा रहे है । भारत से भी | सुनकर न जाने क्या विजय को एक सुखद अनुभूति होती है । वह स्वय नहीं समझ पा रहा है कि जिन बाता पर भारत मे उसका भी ध्यान नहीं गया। यहा प्राकर उसे उन वाताम भी क्यो रुचि पैदा हो गई है यहा अपने देश की किसी भी माम । म बुराई उसके लिये असह्य हो जाती है और बढाई पर वह पुनर उठता है। जबकि उसने । । गहेली/49 अपने आपको ऐसा भारत मे कभी नहीं पाया है। किसी वस्तु, स्थान अथवा व्यक्ति का महत्व तब ही मालूम पड़ता है, जब वह बहुत दूर हो जाता है । पूर्व निर्धारित कार्यक्रमानुसार सेमीनार प्रारम्भ होने से एक दिन पूर्व जव विजय अपने बॉस के साथ एरोड्रोम पर पहुघा, तो इण्डियन एयर लाइन्स के एक विमान को देख कर उसे लगा, मानो ये उसका निजी विमान हो । और उसका सीना गर्व से तन गया । विमान से उतरते जिस प्रौढ व्यक्ति की ओर मिस्टर विनड ने इशारा पिया, विजय उनके हाथ से सूटकेस लेने को लपका। उसके साथ ही, एक खूबसूरत लडकी भी थी । उस प्रौढ से व्यक्ति से सूटकेस लेने के बाद जब उसका ध्यान पीछे पा रही लडकी पर गया तो वह हतप्रभ हो गया । उसे काटो, तो खून नहीं । बड़ी शोखी से उस मोर से माने वाली वह खूब- सूरत लड़की ऋचा थी। उस समय वक्त की नजाकत को देखते हुये, अपने बॉस की उपस्थिति मे अपने अन्तर के तूफान को मभिव्यक्ति प्रदान करने का साहस वह न जुटा सका । एरोड्रम पर ही एक पल के लिये जब विजय को एकान्त मिला, तो उसने क्रोध मिश्रित पाश्चयं से ऋचा से प्रश्न किया- "ऋचा !....ये सब क्या है ।। "शट अप। ....एण्ड बिहेव योर संल्फ " विजय इस अप्रत्याशित 'लताड से अचकचा गया । तीन दिन तक लूसनं मे ऋचा की उपस्थिति विजय को पल-पल जलाती व कुण्ठित करती रही । कई बार, जब बात करने का अवसर पाकर विजय ऋचा से कुछ पूछना चाहता, तो ऋचा उसे किसी न किसी तरह फटकार देती। और विजय के जरूमो पर जैसे नमक का छिडकाव हो जाता । वह समझ नहीं पा रहा था, क्या करे, क्या न करे। ....और तीसरे दिन विजय को पशोपेश मे छोड कर ऋचा अपने बॉस के साथ उसी शान-शौकत से स्वदेश लौट गई। विजय के अन्तर मे कौंधते कई प्रश्नो को छोड कर । उसके बाद विजय उसे कई पत्र लिखता है... लेकिन उसे अपने पत्रो का कोई उत्तर नही मिलता ।....उसकी कुण्ठा बढती जाती है तुम यहा ?"

अपनी एक धर्ष की ट्रेनिंग समाप्त करके जब विजय पालम ऐयर- पोर्ट पर उतरा तो अपने माता-पिता के साथ ऋचा को भी देखकर उसके मन के ज्वालामुखी का दहकता लावा फूटने को आतुर हो उठा है। किन्तु वहा भी माता-पिता एव मित्रो की उपस्थिति मे वह ऋचा पर प्रश्नो की बौछार करने मे स्वय वो विफल पाता है। लाजवन्ती बनी ऋचा ने जब विधिवत, उसके चरण स्पर्श किये तो वह तिलमिला उठा है । इन्तजार की प्रसह्य घडिया आखिर कट ही गई ।....और रात को जब ऋचा विजय के बैडरूम मे प्रवेश करती है, तो विजय उस पर वरस पडता है। "तुम जैसी गिरी हुई औरत को मेरे बेडरूम मे पाने का अधिकार किसने दिया?" "जिसने मुझे गिरी हुई औरत बनाया ।..तुमने ।" ऋचा इस बेबाक दोषारोपण पर विजय का प्राक्रोश और भडव उठता है ।...लेकिन ऋचा चुप नही होती। "विजय....जीवन के सफर मे मजिल तक पहु चने की कामना हर इन्सान सजोता है ।.....लेकिन मजिल एक होने पर भी इस तक पहु चने के कई रास्ते होते हैं, मनसा-वाचा-कर्मणा से लेकर साम-दाम-दण्ड-भेद तक .....और जिस रास्ते पर तुम चल पडे थे, वह निश्चित रूप से समाज के लिये एक जहरीला पथ था ।...तुम्हारे इस जहर को मारने के लिये मैंने भी जहर से काम लिया ।...एक बात बतानो "चन्द लमहे रुककर वह वह फिर बोलने लगी।"-अपनी मजिल तक पहु चने के लिये जब पुरप अपनी योग्यता व पौरुप को कैश कर सकता है, तो क्या नारी, आज की नारी के पास कैश करने को कुछ नहीं है । ....क्या उसे अपना रूप लावण्य वंश करने का अधिकार भी नहीं है ? पुरुष की योग्यता व नारी का रूप, दोनो ही मन- मोल गहने होते हैं....जब एक को बेचा जा सकता है, तो दूसरे को क्यों नही!"...और फिर तुम स्वीकार कर चुके हो कि तुम्हारे लिये जीवन साथी की मान मर्यादा, रूप लावण्य से अधिक महत्वपूर्ण वो मशाल है, जिससे, तुम्हारे विचार में माथिर विक्षिप्तता के तमाम भन्धवार दूर किये जा सकते गहेली/51 है 1....तुमने जिस मशाल से अपनी मंजिल को खरीदा है,....वह मशालं तुम्हें किसने दी .....मैने 1....मैंने वो मशाल तुम्हारी कीमत स्वरूप देवर तुम्हे खरीदा है |....जिस प्रकार अव मजिल तुम्हारी है....उसी प्रकार अब तुम मेरे हो .....अब किस मुह से तुम, मुझसे अपनी पत्नी होने का अधिकार छीन सक्ते हो?" ऋचा अपने तम-मन के मल को शायद शब्दो के रूप मे ढाल कर निकाल फैरने का प्रयास करती है। विजय पाषाण प्रतिमा बना, सब कुछ सुन रहा है ।....वह निरुत्तर है। उसका कण्ठ अवरुद्ध है ।....लेकिन वह महसूस कर रहा है कि उसके मन-मस्तिष्क मे इतने दिनो से छाया कुण्ठा का कुहासा अब छटने लगा है । अगले ही पल उसने अपने बोझिल चेहरे को आकर्षक, रूमानी मुस्कुराहट से सजा कर ऋचा को अपनी बाहो में भर लिया ।....ऋचा भी विजय के वक्षस्थल पर सिर रखकर भीग-भीग गई है।

बड़ी प्रम्मा " । - कॉलबल वजने पर मैंने दरवाजा सोला, तो पोस्टमैन को सामने खड़ा पाया । उत्सुकतावश उसके हाथ से तार नगभग झपटकर खोल डाला, तो हतप्रभ रह गया था। लिखा या "बड़ी अम्मा एक्सपायर्ड ।" पलक झपकते ही प्रांखें साथ, हो उठी और मेरे स्मृतिपटल पर बड़ी अम्मा का चेहरा दृश्यमान हो उठा। गोरा चिट्टा लेकिन झूरियों पड़ा.... ममतामयी हंसमुख चेहरा । पारमीयता अोढे शालीन चेहरा । मैंने उन्हें सदैव इसी रूप में देखा है । पूजा-पाठ मे उन्हें विशेष रुचि थी। वो दिन में कई-कई बार पूजा किया करती थीं। सानदान में हुई लगभग सभी शादियो में मैंने उहें तन-मन-धन से कार्य करते देखा है। दोनो ताइजी, मम्मी या दोनो चाचियों के यहां जब भी कोई विवाह होता, तो पारस और उससे सम्बन्धित सभी कार्यों का भार बड़ी अम्मा पर डाल कर सभी औरतें निश्चित हो जाया करती थी। कई बार तो किसी के यहां जापा मादि भी होता, तो वहां भी बड़ी अम्मा के प्रशासन के बिना काम न चल पाता । मुझे वो समय बार-बार याद माता है जब मैं बहुत छोटा था। मम्मी सर्विस करती थी। सवेरे नौ बजे वो तो चली जाती, फिर शाम को पांच बजे वापस पाती। मैं सारा दिन बड़ी अम्मा के सानिध्य में बिताता था। बड़ी अम्मा मुझे अपने कन्धे पर बैठाकर घुमाती। मुझे अच्छी-अच्छी कहानियां, गीत सुनाती । उन्होने मुझे मां के प्यार से कभी वंचित नहीं होने दिया । शायद उन्हें तब एक-ग्राप वर्ष के लिये हमारे यहां बुलाया गया था....मेरी देखभाल करने के लिये । उनके व्यवहार से सभी यही समझते थे कि बडी अम्मा हमारे खान- दान को सबसे बड़ी बहू हैं। बहुत कम लोग जानते थे कि बड़ी अम्मा वाले स्वर्गवासी ताऊजी हमारे पिताजी के दूर के रिश्ते के चचेरे भाई थे। मैंने होश सम्भालते ही बड़ी अम्मा को विधवा के रूप में ही देखा है । बड़ी अम्मा के व्यवहार से द्रवीभूत होकर ही, शायद हमारे बाबा साहब ने अलीगढ़ वाली ।"

हवेली बडी अम्मा के नाम कर दी थी। जिससे बुढापे मे उन्हें मार्थिक कठिना. इयो का सामना न करना पड़े। "क्या है प्रशान्त ?" अचानक पिताजी की आवाज ने मेरी विचार शृखला को तहस-नहस कर दिया। पोस्टमैन को गये काफी देर हो चुकी थी। मैंने चुपचाप वो तार पिताजी की पोर बढा दिया और उनके चेहरे पर उभरते ज्वार-भाटे को देखने लगा। "अजी सुनती हो ।" पिताजी के चेहरे की भाव-मगिमा से स्पष्ट था कि उन्हे भी गहरा आघात पहुंचा है। उनके सम्बोधन पर ज्यू ही मम्मी दनदनाते हुये उस कमरे में प्रविष्ट हुई तो पिताजी ने उन्हे भी सूचना दे दी। "अलीगढ से तार माया है, .बडी अम्मा नही रही।" "लो ..आखिर हमारे समझदारी से काम लेने का फायदा ही हुआ न ।...अब हमारे शैलेन्द्र का ही हवेली पर कब्जा हो गया।" यद्यपि मैं और पिताजी, दोनो ही मम्मी को प्रादत से भली भाति परिचित थे, फिर भी उनकी इस निम्न स्तर की बात से हम दोनो पाश्चर्य- चकित थे। "कमाल करती हो तुम भी .इतने दुःख को खवर पाई है, और तुमको हवेली के कब्जे की पडी है ?" "अरे, तो इसमे इतने प्राश्चर्य की क्या बात है |.. तुम्हारी भाभी क्या अमृत खाकर पाई थी ? मैं हल्ला न मचाती, तो क्या तुम शैलेन्द्र को अलीगढ मे फैक्ट्री डालने देते ?. शैलेन्द्र वेचारा क्तिनी देखभाल करता था तुम्हारी भाभी की। •अब मरना तो उन्हे थाही? और फिर, विधवा तो स्वय भी ईश्वर से मौत ही मागती है हमेशा की भाति उस दिन भी पिताजी मम्मी के समक्ष कुछ न बोल कतात/54 सके और मम्मी न जाने कब तक बडी अम्मा के लिये जले कटे शब्द उस वातावरण मे उडेलती रही। उस दिन शाम को खाने की मेज पर मौका देखकर मैंने ही बात छेड दी थी। 'पिताजी .बडी अम्मा की तेरहवी कब है १॥ "छब्बीस तारीख को।" "तो, हम सब को चलना कब है ?' "मेरे विचार से पन्द्रह को ही चलना चाहिये, क्योकि वहा सारा इन्तजाम प्रादि करना होगा न !" पिताजी का इतना कहना था, कि मम्मी फिर शुरू हो गई। "लगता है बड़ी अम्मा के मरने का दुख सबसे ज्यादा तुम्हारे पिताजी को ही हो रहा है .और सारे भाई लोग तो मुश्किल से एक-दो दिन पहले पहुंचेंगे। । पिताजी चुप थे । वे ऐसे समय मे प्रतिवाद नहीं करते हैं । यही कारण था कि घर मे कभी गृह-क्लेश को स्थान नहीं मिल पाया था। किन्तु मम्मी बोलती ही जा रही थी। "वडी अम्मा का ध्यान रखने के मामले में तुम्हारे पिताजी ठीक तुम्हारे दादा जी पर गये हैं। उन्होने अपने पाच पाच बेटे होते सोते लाखो की हवेली अपने रिश्ते के भाई की विधवा पुत्रवधू के नाम कर दी, और अब तुम्हारे पिताजी उनका अन्तिम संस्कार करने मे कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते हैं।" व्यग्य बाण छोडती मम्मी की पावाज म अचानक दृढता का समावेश "कान खोलकर सुन लो जी, हमारे पास कोई गढा हुमा सजाना नहीं है, जो हम सबके मन्तिम सस्कारा पर फूक्ते फिरें । .मोर सब भाइयों को भी तो भागे माने दो।..देखें तो सही, कौन-कौन क्या भर सकता है । बही भम्मा/55 मैं जानता था, इस समय लगभग यही राग अन्य चारो भाइयो के घरो मे भी पालापा जा रहा होगा । क्योकि वई वार शादियो मे जव भी सब लोग मिलते, तो हवेली के बारे में विचार-विमर्श करने के लिये बडी अम्मा से छिपकर दा ती बैठको का ग्रायोजन अवश्य दिया जाता था। कसी विडम्बना है । पाच-पाच सुहागर्ने मिलकर सदैव एक विधवा के विरुद्ध व्यूह रचना करते नही थकती थी। जब कि बडी अम्मा ने सदैव सबसे मिल जुल कर चलने का प्रयास किया है । लेकिन मेरी नजर म इस जलन का मुख्य कारण बाबा साहब द्वारा हवेली वडी अम्मा के नाम करना ही था। हवेली पर हमारा भी अधि- कार रहे, इसीलिये मम्मी ने शंलेन्द्र मैया की सहारनपुर मे लगी अच्छी खासी वैक की नौकरी छुडवापर उन्ह प्लास्टिक का सामान बनाने की फैक्ट्री अलीगढ मे डलवा दी थी। क्योकि स्वय को तो अपनी कानपुर की "पोश" वॉलोनी में बनी कोठी म रहना था, अन्यथा किरायेदार ही उसे हथिया लेते। इसीलिये तो पिताजी के देहरादून से रिटायर होते ही मम्मी पिताजी ने कानपुर वाली अपनी कोठी सम्हाल कर शैलेन्द्र भैया यो अलीगढ भेज दिया था। वल्कि मेरे विचार म तो इसम पाचो देवरानियो-जिठानिया वी चाल थी। उन्हें डर था कि बडी अम्मा के बाद उनका इकलौता पुत्र मनीप, जो मेरठ मे जूनियर इ जीनियर था, वही हवेली पर अपना माधिपत्य न जमा ले। सव का विचार था कि बडी अम्मा के वाद हवेली दो वेचा जाये तो लाख लाख रुपया पांचो भाइयो के हिस्से में पाराम से प्रा ही जायेगा। बडी अम्मा की तेरहवी वाले दिन पाची भाई सपत्नीक अलीगढ में उपस्थित थे । उस समय वहाँ का वातावरण शोषसतप्न न होर विवादपूर्ण था . .और विवाद का एर मात्र मुद्दा था हवेली । उस समय यहा इस बात से किमी को सरोकार न था कि बडी अम्मा के अन्तिम सस्वार की रस्म विधिवत् अदा की जा रही है अथवा नहीं। सब लोगा या ध्याT हथेली के बारे मपंगता करने पर था। जिम प्रौरत की उपस्थिति मात्र से सानदान म होने वाला कोई भी सस्सार विधिवत् सम्पन्न हो जाया करता था, माज उसके अन्तिम गम्भार यो प्रदापूर्वर सम्पूर्ण परवाने मे रिसी या ध्यान न था । हरा के बाद यही मम्मा रे पुत्र मनीष के इशारे पर जय य वरील ने बड़ी अम्मा द्वारा लिखित बिगी धगीत पे अस्तित्व मी जानकारी दी सो पाव " सभी को पासे जैसे फटी की फटी रह गयीं । सब लोग एक दूमरे के पाश्चर्य- चकित चेहरे को देखने लगे। "लो! ...बुढिया बाकायदा हवेली मनीप के नाम पर गई है ।.. अब तुम लोग कुछ नहीं कर सकते हो।" मम्मी ने बुरा सा मुह बनाते हुये पिताजी के कान म फुसफुसाया तो पिताजी उस क्षण भी शान्त व स्थिर रहे। वातावरण मे एक अदृश्य प्राक्रोश की लहर व्याप्त हो उठी थी। "तुम्हारी भाभी की दयनीय स्थिति को देखते हुये तुम्हारे पिताजी ने हवेनी उन्हें रहने के लिये दे दी थी, इसका मतलब ये तो नहीं वि पीढी दर• पीढी अव हवेली पर उन्ही का अधिकार हो गया पाचो देवरानियो जिठानियो मे कानाफूसी होने लगी थी । पाचो बहुप्रो वी पाखें अपने-अपने पतियो से जैसे एक ही बात कह रही थी। लेकिन प्रत्यक्ष रूप से उस समय कोई प्रतिक्रिया देखने मे नही आई थी। अानन-फानन मे सब लोगो के वापसी के कार्यक्रम बनने लगे। खाने के बाद जब पाचो भाई और उनकी पत्निया कमरे में अपने अपने घलने की तैयारी के साथ वार्तालाप मे मशगूल थे, तो मनीष को वहां आया देखकर सभी ने रूखा सा मुह बना लिया था। 'चाचाजी .ये अम्मा ने वसीहत लिखी थी, मुझे भी इसकी जान- कारी माज ही हुई है। मैं चाहता हूँ कि आप लोग इसे देख लें । लोगो को इसमे कोई एतराज तो नहीं है ?" मनीष ने एक लिफाफा ताऊजी की प्रोर बढते हुये अवरुद्ध कण्ठ से, प्रस्फुट शब्दो मे कहा। "नही नही वेटे ।..हमे क्या एतराज हो सकता है 1. •तुम्हारी अम्मा ने जो कुछ भी किया है, सोच समझार ही दिया होगा।" बडे ही स्नेहिल शब्दो के साथ ताऊजी ने वो निफापा पडे बिता ही पुन मनीप के हाथो मे देने का प्रयास किया, लेकिन मनीष ने उसे लिया नहीं। । ....आप बड़ी "मैं चाहता हूं आप लोग इसे एक बार पढ़ तो लें!" मनीप के आग्रह पर ताऊजी ने वो लिफाफा सोलकर पढना प्रारम्भ किया तो उनके पाश्चर्य का ठिकाना न रहा । उरामे लिखा या.... "ये हवेली मेरे पास लाला ज्ञान स्वरूप जी के पाचो लडको की अमानत है ....मेरे वाद ये हवेली उनके पाचो लड़को को ही वापस दे दी जाये !" वसीहतनामा पूरा पढते ही ताऊजी की आखों में हल्की सी एक अथ किरण फटी और उन्होने बडे गर्द से उसे ताइजी की और बढ़ा दिया। बड़ी अम्मा के इस अप्रत्याशित निर्णय पर सभी चक्ति थे। जीवन मे शायद पहली बार बडी अम्मा की सभी देवरानिया उन्हे मन ही मन श्रद्धा सुमन अर्पित कर रही थी। सारी उम्र, सबकी आखो मे खटकने वाली जिठानी माज मरणोपरान्त सभी की नजरो में महान हो गई थी। सभी को अपने व्यवहार पर, जो उन्होने बडी अम्मा के साथ किया था,... प्रात्मग्लानि थी। कृतांत/58

सुरूर
"मजी सुनती हो ।"
"क्या है जी, क्यो इतनी जोर से बाग लगा रहे हो "
'अजी मेरा लच बॉक्स तैयार हो गया. दपतर को देर हो
-
.
1"
"ठहरो, पहले राजू और नीलिमा का खाना लगा हूँ, उन्हें देर हो गई
तो टीचर क्लास में नहीं घुसने देगी।"
"हाँ हो मुझे तो कोई कुछ कहने वाला है ही नहीं न . चाहे
जितनी देर से दफ्तर पहुचू
'तुम्हारा क्या है तुम तो बॉस की लताड सुनने के मादी हो चुके
हो.. कम से कम बच्चो को तो ऐसी बुरी लत न पडे ।"
खोज कर रह गये थे बेचारे कैलाश नाथ जी । बच्चों ने भी कनखियों
से पापा को देखकर हथेली अपने मुह पर रखकर बडी कठिनाई से रोका था
अपने हसी के फव्वारे को।
तेरह वर्ष पूर्व अपनी शादी मे मिले अपने उचक्टे सूट को पहनकर
तैयार खड़े कैलाशनाथ जी ने आलमारी से गन्दा कपडा निकाल कर मपनी
'वृद्ध' साइकिल पर गुस्सा उतारना प्रारम्भ कर दिया था। और उनका मन
जा उलझा मानसिक मथन मे। इस घर मे यदि किसी का तिरस्कार होता
है, तो वो मैं हूं। वच्चो से लदी-फदी गृहस्थी की इस बोझिल गाडी को
चरमरा चरमरा कर खीचने वाला में एकमात्र बैल हूँ। लेकिन इस ढुलाई
के प्रत्युत्तर मे मुझे क्या मिलता है। बेरूखी' फनियां ? बहिष्कार
प्रताडना?
भनादर?
"ये लो जी, तुम्हारा खाने का हिन्बा।"
7

अभी मानमिर मथन से निवर्प वा माखन भी न निवल पाया था, कि
उनकी विचार शृखला को उनकी धर्मपत्नी ने सडित कर दिया । वेचारे
कलाश नाथ जी, अपनी मशीनी जिन्दगी में फिर से धोल दिये गये थे।
।
...
और सुनो ।"
"अब क्या है भाग्यवान ?"
सरला द्वारा प्रावाज मे बलात् घोले गये माधुर्य ने उनके वढते
कदमो को वही जड कर दिया था।
"अाज दफ्तर से सीधे घर ही माना
"क्यो ?....कोई खास वात है क्या ?"
"और नहीं तो क्या"माज पहली तारीख है न
....बाजार नहीं
चलोगे क्या?"
"उफ मैं तो भूल ही गया था... ठीक है I... शाम को जल्दी घर मा
जाऊँगा....तुम तैयार रहना ।"
"हां हां, मैं तो तैयार रहूँगी,....लेकिन तुम कही पिछली बार की
तरह से...."
"प्रोफ्फो अब क्या स्टाम्प पेपर पर लिखकर दूं
पत्नी को दिये गये अपने वायदे को पुष्टि कर, लन्च बॉक्स साइकिल
के करियर मे लगाकर फौरना भाग लिये थे कैलाश नाथ जी।
"एक पंग और बना दो।"
"साहब....आप अपनी हालत तो देखिये ....क्या एव पंग और लेकर
माप घर जा सकेगे?"
कृतात/60

-- "बको मत I... तुमसे जो कहा है, करो।" उस बार के बैरे को तो दुतकार दिया था कैलाश नाय जी ने.... लेकिन वे स्वय अपनी हालत से अनभिज्ञ न थे । अपनी चेतना को तिलान्जलि देने पर आमादा थे वे । अपने कुण्ठित जीवन की छाया तक मदिरा में घोलवर पी जाने को आतुर । धर्मपत्नी की पाखो मे अनुनय-विनय के डोरे देखकर सुबह उसे जो वचन दे पाये थे, उसे तो अब से तीन घन्टे पूर्व ही, पहले पंग के साथ गले मे उलीच गये थे,.... और तब ही से इस बार मे जमे हुये थे कलाश नाथ जी । प्रत्येक माह की पहली तारीख की भाति माज भी वे अपने वेतन की गड्डी अटी मे दवाये, दफ्तर से सीधे यही मा टपके थे । पल-पल बढते सरूर के साथ-साथ उन्हे जिन्दगी से विरक्ति होती जाती थी।....शादी क्या हुई, मौज मस्ती के गुलशन मे कुलाचे भरती चचल हिरणी सी जिन्दगी, एक बोझिल खटारा गाडी बन कर रह गई थी ।....पग-पग पर मौत को निमन्त्रण देती जिन्दगी भला किरा वाम की । - "विलकुल टूट गये थे कैलाश नाथ जी ।....ऐसे मे इन कुण्ठानो से क्षणिक छुटकारा पाने का भी योई माध्यम मिले,....तो टूट पडता है इन्सान उस पर । ....और यही हुआ था कैलाश नाथ जी साथ। । "भरे । बलाश नाथ जी....पाप यहाँ बैठे है, और घर पर भाभी जी प्रापके लिये परेशान हो रही है।" "त....त तुम यहाँ क्यो माये हो....क ब...बाब मे हड्डी बनने ?" सुरा के सुरूर में घुत कैलाश नाथ जी ने बडी वठिनाई से पहचाना था मागन्तुक को। ये उनका पडोसी मित्र था। "मैं मापको लेने पाया हूँ ....क्या हालत बना ली है पापने अपनी ! बच्चे प्रापको इस इस रूप में देखेंगे तो क्या सोचेगें ?"भाभी जी पर क्या गुजरेगी ?.....तुषारापात नही ही जायेगा उनपर !" "वैसी सुवून पी दुनिया में सानन्द था मैं,....तुमने प्रावर मेरा सारा नशा हिरण पर दिया ।....चले जामो यहाँ सुरूर/61 बौखलाहट उनके चेहरे से चू रही थी। "इस क्षणिक सुख प्रदान करने वाली को सीने से लगाकर, उसका बहिष्कार करना कहाँ तक न्याय संगत है....जो अपने दामन में असीम प्यार लिये आजीवन आपकी राहो मे फूल बिछाने को कृत-सकल्प है .....सुरा के मोह मे आप उस सुन्दरी से किनारा कर रहे हैं, जो जीती है तो आपके लिये 1....मरती है, तो आपके लिये !" "उह....उसे पति नही....एक कमाऊ मशीन चाहिए....जिससे वो और उसके बच्चे ऐश कर सकें।" "छि ...छि ...ऐसी बातें करते हुए पापको शर्म आनी चाहिए।" "जिन बच्चो को प्राप इस दुनिया मे लेकर आये हैं, प्रति आपका कोई कर्तव्य नहीं है ?....क्या मापके माता पिता ने पापको नहीं पाला पौसा ?....यदि वो आपका अधिकार था, तो अपने बच्चो की परवरिश आपका कत्तं व्य है 1....अपने कर्तव्य से मुख मोडने वाला कायर ....क्या उनके कहलाता है।" "अच्छा-मच्छा....मुझे भाषण सुनना पसन्द नहीं है । घर पर बीबी मॉफिस मे बॉस की तरह पर यहां भी तुम मुझे चंन नही लेने दोगे '....चले जामो यहाँ से 1...इससे पहले कि इस बार मे कोई अप्रिय घटना घटे,. तुम यहाँ से चले जामो।" "ठीक है कैलाश नाथ जी,...मैं यहां से जा रहा हूँ। लेकिन माप भी याद रखिये ...पापकी पत्नी को मैंने भाभी कहा है । अव उनपर छाये यातना के बादलो को मैं अपने कर्तव्य के झाँखो से तितर बितर करके ही दम लूंगा।" कैलाश नाथ जी के मुख पर तमाचा सा मार कर उनका वह मित्र उस बार से बाहर निकल गया। 162 "कहिये, रात के दस बजे, सुरूर की घोही पर सवार फैलाश नाथ जी ने अपने घर का दरवाजा खटखटाया ।....यू. तो वाल्पनिक स्वर्ग में विचरण पर रहे वे शायद और देर से घर पहुचते । विन्तु भला हा गली वे कुत्तो का, जिन्होने फैलाश नाथ जी के डगमगाते कदमो मे स्फूर्ति सृजित कर दी थी, जिससे थोडे ही समय मे वे लम्बा रास्ता तय पर गये थे। "अरे! .....सव के सव सो गये क्या ?....अभी तो श्याम भी नहीं हुई। वही देर तक वे अपनी दस्तर या प्रत्युत्तर न पाकर खिसिया गये थे, वे । खिसियाहट में उनका शिथिल सा हाय फिर एक बार क्विाड से जा भिडा ..और उसी पल दरवाजा खुल गया । किससे मिलना है आपको "न जाने कम्बख्त इतनी रात गये यहाँ...कहाँ से चले पाते हैं।" "राजू के बच्चे....तेरी ये हिम्मत " मदिरा मिले वृद्ध खून मे उफान पा गया था उस पल । अपने बेटे के तेवर देखकर उनके प्राक्रोश मिश्रित पाश्चर्य का ठिकाना न रहा । दरवाजे की चौखट पर पर रखकर एक हाथ उन्होने अपनी सम्पूर्ण शक्ति से राजू के गाल की मोर घुमाया....किन्तु वह उसके कपोलो को छू तक न सका । "अरे ।....पापा पाप ?. उफ... मम्मी ने न जाने कडवी-डवी क्या दवा सी पिला दी... जो.. जो मैं पापको पहचान भी न सका।" पद्धं चेतनावस्था मे भी कैलाश नाथ जी को, राजू को झूमते हुये देख कर समझने मे एक पल भी न लगा कि ये भी शराब पिये हुए है ये नजारा देखकर उनका नशा कुलाचे भरते खरगोश के समान भाग निकला था। "तो....तो तूने प्राज शराब पी है ? सरला.. सरला ।" प्राक्रोशवश, मुनभुनाते हुये कैलाश नाथ जी ने अपनी धर्मपत्नी को आवाज लगाई। इससे पूर्व की सरला वहां पर उपस्थित होती, बैलाश नाथ जी ने राजू का वान पकडने का प्रयास किया...किन्तु व्यर्थ । ....अचानक उनका ध्यान बरामदे मे से उसी अोर पाती सरला पर गया तो वे हतप्रम ..

गये । सरला के कदम भी लडखड़ा रहे थे । हाथ पैर जैसे पूर्ण रूप से शिथिल पडे जा रहे थे । उसकी साडी का पल्लू , उसके वक्ष का सरक्षण छोडकर" जमीन को चूम चूम कर खिसक रहा था। "क्या है जी ?... क्यो चिल्ला रहे हो ?....ये वक्त घर में आकर शोर गुल करके हमारा सारा नशा काफूर कर दिया ।..क्तिने प्यार से पुचकार कर बुलाया था उसे 1" सरला का ये रूप देखकर तिलमिला गये थे वे । दात पीसते हुये उन्होने धडाम से दरवाजा बन्द कर लिया। "तो.. तो माज तुम सब लोगो ने शराब पी है ।" "पापा मुझे तो वडा मजा पा रहा है....ऐसा लग रहा है, जैसे मैं आसमान में उड रही हूँ नन्ही नीलिमा ने भी जब अपना रूप दिखाया तो कैलाश नाथ जी वे सयम का वाध टूट पडा । उसी पल उन्होने सामने एक कोने मे पडा बास अपने दोनो हाथो से उठा लिया । "प्राज....मैं तुम सब के सिर फोड दूंगा। .. मेरे सामने रोज नाटक करते हो कि आज घर मे पाटा नही है.....स्कूल की फीस नही है, यूनीफार्म सिलवाने के लिये पैसे नहीं है....और .. और अव मेरे पीछे जसे पंसो की बरसात हो गई ?....शराव सरीदने के लिये पैसे बरम पडे.. क्यो?" वास हाथ मे लिये, लडखडाते से वे सरला की पोर बढे । लेकिन सरला ने भी निर्भीकता से उनका सामना किया। "क्यो ?....तुम जव चाहते हो,.... .....जाकर बैठ जाते हो उस दुकान पर। प्रब....अब हमारा पीना तुम्हे इतना बुरा क्यो लग रहा है "ठहर कुतिया आज मैं तेरी और तेरे इन पिल्लो की साल उधेड दूगा ।....घर मे शराब कैसे प्राई ?....बोल,...कौन लेकर पाया है....शराब इस घर मे ?" "मैं ...मैं लाया है इन सब के लिये शराव ।" इससे पहले, कि लाश नाथ जी या डन्डा कोई अप्रिय क्तंब दिसाता उनके पडोसी मित्र बीच ही मे टपक पड़े। rati/64 ?"

! "हूँ ....तो...तो तुम हो गुप्ता !" "हाँ हाँ मैं ! ....और माइन्दा के लिये भी कान खोलकर सुनलो, अब हर पहली तारीख को,....या जब भी तुम उस बार मे देखे जानोगे....मैं इन लोगों को शराव लाकर दूंगा । इन लोगों को भी मालूम तो पड़े कि तुम जिस नशे के सागर में डूब जाना चाहते हो, उसकी गहराई कितनी हैं !.... जब तुम पी सकते हो, तो ये लोग क्यो ऐसे एश्वर्य से वचित रहे ? ....तुम जैसे लोग अपने आप को कुण्ठित करार देकर, शराब पीने के लिए जरूरतमद मान लेते है । शराब को, जीवन का एक अभिन्न अंग बना लेने पर आमादा हो जाते हैं ।....लेकिन वे इस बारे मे नही सोचते कि उनके इस कुकर्म से उनके घरवालों पर कैसा कुठाराघात होता है । ....ये प्रात्मघात है 1....इससे सो बेहतर होगा, तुम अपनी गृहस्थी रम जाम्रो ।....इसमे जो सुकून है वह इस शराब में कहाँ ! ....उधर देखो,...ये मासूम बच्चे तुम्हारे प्यार के प्यासे है । तुम्हारी पत्नी तुम्हारे सान्निध्य के सुख को लालायित है । उससे प्यार करके तो देखो ! ...तुम्हारे जीवन की कुण्ठा को इनका प्यार अपने पाप तिरोहित कर देगा।" "गुप्ता....तुमने मेरी आंखें खोल दी .....अब....अब मैं कभी शराब को हाथ नही लगाऊंगा ।....लेफिन तुम,. .....कम से कम मेरे बच्चो की जिन्दगी तो तबाह न करो! "मुझे खुशी है कैलाश कि मेरी बात तुम्हारे गले तो उतरी ! जरा सोचो,....जब मैं तुमको ये काम करते देखना गवारा नहीं कर सकता,.... भला बच्चों को क्यों कर ये गलत लत लगाने लगा ! चिन्ता मत करो,...तुम्हारे घर में किसी ने शराब नही पी है ।....ये तो मात्र अभिनय था, तुम्हारे सिर से सुरूर का भूत उतारने का।" लज्जित से कैलाश नाथ जी चुपचाप अपने कमरे की ओर बढ़ गये । बच्चे दौड़कर गुप्ता अकल से लिपट गये थे । सरला की वप्निल अांखो मे प्रब प्रसन्नता के डोरे छलक पाये थे। " .....तो सुरूर/65

हितैषी
"अरे ।
•.. खबर
"पापा........"
टैक्सी से उतरकर, हाथ मे सूटकेस लिये, सागर ने जब अपने घर
के अहाते मे प्रवेश करके अपने पिता को प्रावाज दी, तो केशव दत्त जी अपने
बेटे को देखकर खिल उठे।
सागर बेटे तुम
अचानक चले आये?
क्यो नहीं दी....!"
"बस, यू ही ।... सोचा अचानक पहुँचकर ग्राप सय लोगो को सर
प्राइज दूगा।"
सागर ने अपने घर के अहाते के लॉन मे, रबर के पाइप से पानी देते
अपने पिता के समीप ही सूटकेस रख कर उनके चरण-स्पर्श किये, तो केशव
दत्त जी ने भावातिरेक मे उसे सीने से लगा लिया।
"सदा खुश रहो बेटे | तुम्हारे पेपर्स कैसे हुए ?"
"पेपर्स क्या पापा... अब तो रिजल्ट भी पा गया है ].. आपके बेटे
ने शानदार सफलता प्राप्त की है पापा 1... अब देखियेगा मैं आपके होटल
को क्या से क्या बना दूगा।"
सागर के चेहरे पर उभर पाई पात्मविश्वास की प्राभा देखकर
वेशव दत्त जी के चेहरे पर रूपाब की चमक उभर आई थी।
"बेटे ।...इसीलिए तो तुम्ह बिजनेस मेनेजमेन्ट का कोर्स करने के
लिये भेजा था।. सैर।"प्रायो, अन्दर प्रायो....तुम्हारी मा भी प्राज सवेरे
ही तुम्हे याद कर रही थी। तुम्ह देखते ही खुश हो जायेगी।"
केशव दत्त जी ने भतिशय पात्मीयता से सागर को फिर एक बार
सीने से लगा लिया मौर बरामदे वी भोर चल पडे । उनके पास ही

बगीचे में काम करते नौकर ने दौड़कर सागर का सूटकेस उठा लिया था। "अजी"मैंने कहा... सुनती हो !....देखो तो, फोन पाया है !" केशव दत्त जी सागर को साथ लिये अपनी पली रुक्मणी के कमरे में पहुंचे तो वह भी अपने बेटे को देखकर पुलकित हो उठी थी। मां के चरण स्पर्श करते ही, सागर पर आशीर्वादों की बौछार होने लगी थी। "जुग जुग जियो बेटे, दूषों नहामो....पूतों फलो।" "भरे भरे मां" मोर सब तो ठीक है...लेकिन ये पूतों फलो वाली बात माज के युग के अनुकूल नहीं है।" सागर के इस परिहास पर तीनों खिलखिलाकर हंस पड़े थे। "तेरे पापा यही कहते रहते थे, कि सागर के विना पर बड़ा सूना. सूना सा लगता है ...अब तेरे माने से फिर से इस पर में कहकहे लगने लगेंगे। घर की रोनक तो बच्चों से ही होती है न !....अव तू जल्दी से हाथ मुंह धो ले....सफर की थकान भी कुछ कम हो जायेगी..मैं तेरे लिये कुछ खाने को लाती हूँ।" सागर के सिर पर अपना स्नेहिल हाथ फिराते हुये, उस पर ममता उड़े लती रुक्मणी अपनी प्रांखों में खुशी से छलक प्राये प्रथ, करए लिये रसोई में समा गई। "वेटे, नाश्ता करके स्वामी जी के पास, उनसे आशीर्वाद लेने चलेंगे। तुम तो जानते हो, उन्हीं के आशीर्वाद से तुम आज यहां तक पहुंचे हो ..... वैसे - वो मक्सर तुम्हारे बारे में पूछा करते थे 1....अब तुम पा ही गये हो.... धो भी तुमसे मिलकर बड़े प्रसन्न होगे।" "हो हो....क्यों नहीं... मैं तो स्वयं उनसे मिलने का विचार कर रहा था....सा चल रहा है उनका योग-प्राधम ?....माप नियमित रूप से वहां जाते है न!" "विलकुल !... भरे योग साधना प्रारम्भ करके भला कोई उसे छोड़ सकता है ! ....छा, तुम जल्दी से तैयार हो जामो, वैसे भी समय हो . हितपी/67 "जी, बहुत अच्छा ।" केशव दत्त जी को आश्वस्त करके सागर निवृत होने चला गया तो वे पुन लॉन मे पाकर पानी देने लगे। वेटे के भविष्य की योजनाओं के बारे में मन में कौंधते प्रश्नो के वारे में अभी केशव दत्त जी निर्णय के किसी कगार तक पहुचे भी न थे कि सागर ने पुन लॉन मे उनके पास आकर उनके मन सागर मे उमडते तूफान पर अकुश लगा दिया। "पापा....मैं तैयार हूँ।... अब स्वामी जी से मिलने चलें ?" "हा हा ...मैं तुम्हारी ही प्रतिक्षा कर रहा या।" तत्क्षण वेशव दत्त जी ने पानी का पाइप वही छोड दिया और उनके एक इशारे पर सागर ने वरामदे मे खडा स्कूटर स्टार्ट कर लिया। केशव दत्त जी चुपचाप उसके पीछे की सीट पर बैठ गये । स्वामी जी के ग्राश्रम के रिसी पर्मचारी ने जब प्रापर बताया कि स्वामी जी अभी योग-साधना मे तल्लीन हैं, तो वेशव दत्त जी और सागर वहा बनी पत्थर की बैंच पर बैठ गये । "पापा... शोभा दीदी और माया दीदी के क्या हाल हैं " स्वामी जी का इन्तजार करते सागर ने उन नीरस से क्षणो को वार्तालाप की फुहारो से सुहावने क्षण बनाने के विचार से वार्तालाप प्रारम्भ किया था। ... माया का तो "दोनो अपने-अपने ससुराल मे बिलकुल ठीक हैं अभी कल ही पन आया था ।....क्यो ?....क्या तुम्हारे पास उन लोगो वे पत्र नही पहु नते थे" "पत्र तो दोनो के ही आते रहते थे।... दरअसल वर्ष के अन्तिम दिनो में अपनी परीक्षा में व्यस्त रहने के कारण मैं उन्हे पत्र नहीं लिख सका था.... शायद इसीलिये । कुछ समय से उन लोगो के भी मेरे पास नहीं आये थे । ... माया दीदी के क्पा हुग्रा "इसी महीने की दस तारीख को लडका हुमा है ।....अच्छा हुआ बेचारी को इस बार लडका हो गया वरना उसे भी तुम्हारी मा वही ऊट- " 1168 . 1 उनका पत्र पटाग सलाह देती ..जो मुझे दिया करती थी। लडके ये इन्तजार म ज्यादा बच्चे पैदा करने से क्या फायदा एक लडवा गोद ले लो ना? तुम्हारी मा भी बस। अपना खून अपना ही होता है | दूसरे का वच्चा बडा होकर न जाने कसा निक्ले, कौन जाने । अपना खून होगा तो कम से कम सुकर्मी तो होगा | .तुम्हारी मा के पास तो बेवार की बातो का मडार भरा पडा सागर अपने पिता के आवेगपूर्ण शब्दो का चुपचाप सुनता रहा । यद्यपि वह उन विचारो से सहमत न था, किन्तु फिर भी, पिता के समक्ष वह चुप ही रहा । शायद वह इस विषय पर पिता से कोई बहस उस समय नहीं करना चाहता था। "और । शोभा दीदी के यहा तो सब ठीक है न । भी मेरे पास बहुत समय से नही पाया ।'' सागर ने वार्तालाप प्रवाह का रुख दूसरी ओर मोडने के विचार बेटे। दरअसल वे लोग भी अपनी गृहस्थी म व्यस्त रहती हैं । अब वो तुम्हारी बहने ही नहीं किसी की पत्नी मा और बहू भी है फिर, गृहस्थी की भी तो सारी जिम्मेदारिया निवाहनी पडती है उन्ह 'स्वामी जी आपको बुला रहे हैं।" अप्रत्याशित रूप से वहा पाकर आश्रम के उसी व्यक्ति ने पिता पुत्र के वार्तालाप मे विघ्न डाल दिया .और वे दोनो उठ खडे हुये । "स्वामी जी प्रणाम ।" स्वामी जी की कुटिया मे पहुच कर केशव दत्त जी व सौगर ने स्वामी जी ये चरण स्पर्श क्येि तो प्रत्युत्तर मे उन्हे प्राशीर्वाद मिला। "कैसे हो सागर बेटे। तुम्हारे पिता तुम्हारे भविष्य के बारे मे बहुत चिन्तित रहा करते थे. तुम्हारे इम्तहान हो गये?" "जी स्वामी जी उसका परिणाम भी मा गया है अापके ही प्राशी- दि से में सफल हो पाया हूं।" सागर न श्रद्धा स शीप नवा वर स्वामी जी की बात का उत्तर दिया। से वहा। . " हिपी/69 "शावाश बेटा....तुम्हारी सफलता से हमे जो प्रसन्नता हुई है, उसका पन्दाजा शायद तुम्हे न होगा । ....अब तुम्हें अपने पिता के कामकाज मे हाथ बटा कर, उन्हें चिन्ता मुक्त कर देना चाहिये ।" "आपके आशीर्वाद से जब इतना सब कुछ हुमा है महाराज, तो भव प्रागे भी मैं मापकी व पापा को अपेक्षामो के अनुरूप खरा उतरने का प्रयास करूगा।" सागर की बातो में स्वामी जी के प्रति सम्मान के साथ-साथ एक दृढ सकल्प की झलक भी थी। "शाबाश बेटे,....देखा केशवदत्त ! फंसा होनहार व माज्ञाकारी पुत्र पाया है तुमने ' तुम जैसे जिद्दी व मन्द बुद्धि इन्सान के लिये इससे अप्रतिम नेमत और क्या हो सकती है ?" "महाराज | ये तो माप भी जानते हैं कि मैं दुनिया वालो के समक्ष चाहे जितनी भी जिद्द बहस कर लू किन्तु माप मे मुझे अटूट विश्वास है । अपार प्रास्था है । प्रापके समक्ष नत-मस्तक होकर, भापका मशविरा शिरो- धार्य कर मैंने सदैव किसी न किसी रूप मे लाभ की ही प्राप्ति की है !" "किन्तु केवल मुझ मे ही ये मास्था क्यो ?....केशव दत्त....जो भी अपने हित की बात करे,....प्रच्छी बात करे, उसी की बात माननी चाहिये । स्वय को सर्व गुण-सम्पन्न समझ कर, दूसरो की नेक सलाह को भी बिना सोचे-समझे ठुकरा देना....मूर्खता की पराकाष्ठा है ।....तुमको जानकर पाश्चर्य होगा कि अब जिस पुत्र की सफलता पर तुम फूले नहीं समा रहे हो, उसकी प्राप्ति तुम्हे उसके सौजन्य से हुई है, जिसमे तुम्हें किंचित मात्र भी मास्था नहीं हैं ....यानी....तुम्हारी पत्नी रुक्मणी।" "वो....वो कैसे महाराज ?" केशव दत्त जी ने माश्चर्य से प्रश्न किया था। "उस सक्ट के समय मे वही मेरे पास प्राई थी,....क्योकि वह जो बात तुम्हे समझाना चाहती थी, वह तुम उससे समझ नहीं रहे थे। इसी- लिये हमे हस्तक्षेप करना पड़ा था।" वांत/70 - "महाराज, आप क्या कह रहे हैं ?....मेरे लिये तो ये एक पहेली-सी है। "साफ-साफ पहिये न |.....क्सा सकट |...सा हस्तक्षेप !" केशव दत्त जी की जिज्ञासा प्रति पल द्विगुणित होती जा रही थी साफ-साफ सुनना चाहते हो ?....तो सुनो ।....ये सागर, तुम्हारी सन्तान नही है।" "क....क्य....क्या ! ! " स्वामी जी की मह बात सुनकर केशव दत्त जी द सागर दोनो बुरी तरह चौंक पड़े। उन लोगो को ऐसा प्राभास हुप्रा, मानो स्वामी जी ने कोई-भारी-भरकम गदा, उनके सर पर मारी हो। "मैं जानता था कि सच्चाई जानकर तुम्हारे मन-प्रो-मस्तिष्क के तोते उड जायेंगे ।... किन्तु सत्य को नकारा नहीं जा सकता।....तुम्हे ध्यान है बरसो पहले की वो बातें !....जय तुम्हारा होटल एक छोटा-सा रेस्टोरेन्ट मात्र था ।...शादी के बाद जब लगातार दो बार लडकिया पैदा हुई थीं, तो तुम बौखलाये से रहते थे।....कितने चिढ चिढे से हो गये थे उन दिनो मे तुम !...जब तुम्हारी पत्नी तुम्हे दिन-रात समझाया करती थी कि-"मब लडके की चाह मे हमे बार-बार सन्तानोत्पत्ति नहीं करनी चाहिये । डॉक्टर्स की भी उस समय यह सलाह थी। बल्कि डॉक्टर ने तो यहा तक कह दिया था कि यदि अब रुक्मणी मा बनी तो उसकी जान को खतरा पैदा हो जायेगा ।....किन्तु तुमने उसकी एक न सुनी 1.... पाखिर तुम न माने और वह फिर गर्भवती हो गई थी।" तुम्हें समझाने के उसके सभी प्रपल जब विफल हो गये थे....तब लाचार होकर वह दुखी,"परेशान सी, मेरी शरण मे माई थी।" "....मापके पास !....मापके पास क्यो माई थी वो?" स्वामी जी की बातो मे प्रतिपल हतप्रभ हुये जा रहे केशव दत्त जी की उत्सुकता उस पलाश मे अपनी चरम सीमा पर जा पहुची थी। "इसलिये, कि वो ये भली भाति जानती थी कि तुम मेरी हर बात मानते थे ।....इसलिये उसने मुझ से बड़े दुखी मन से याचना की, कि मैं हितेपी/71 तुम्हे समझाऊं वि तुम उसे पुन मा बनने पर विवश करके उसका जीवन खतरे म न डालो 1...तब भी समय था। डॉक्टर की सलाह थी कि रक्मणी की कोख म पलत शिशु-भ्रूण को प्रसव की स्थिति तक नहीं पहु चने देना चाहिये। .और इसीलिये, तुम्हारे और तुम्हारी पत्नी के हित के लिये उस दिन मुझे जीवन मे पहली बार तुमसे झूठ बोलना पडा था । तुम्ह ध्यान होगा उस समय मैंने तुमसे कहा था कि गर्मधारण बाद तुम्हारे, अपनी पत्नी के साथ रहने से ही वार-वार तुम्हारे घर मे कन्या पंदा हाती है 1... और इसीलिये मैंने तुम्हारी पत्नी को, गर्भधारण के बाद एक वर्ष तक तुमसे दूर रहने की सलाह दी थी। और तुम चूकि मुझ पर अधा-विश्वास करते थे, इसलिये तुमने अपने विवेक से कोई काम न लेकर, मेरी ये बेतुकी वात मानकर एक वर्ष के लिये अपनी पत्नी को मायके भेज दिया था। ....याद है न "जी .." स्वामी जी की बातो से सम्मोहित हुये जा रहे केशव दत्त जी केवल इतना ही बोल सके थे। "जानते हो, वहां रुक्मणी के मायके मे क्या हुआ था ?" । .. केशव दत्त जी का कण्ठ जैसे अवरुद्ध हो गया था उस पल | स्वामी जी के इस प्रश्न के उत्तर मे उन्होने अपनी प्रश्नवाचक निगाहे स्वामी जी के तेजस्वी चेहरे पर गढा दी थी। "मायके पहुँचते ही तुम्हारी पत्नी ने सबसे पहले वहा एक नर्सिंग होम मे गर्भपात करवाया था।' "गर्मपात । । ।" केशव दत्त जी फिर एक बार बुरी तरह चौंक गये थे । "पोर हा तुम्हे यह जानकर प्राश्चर्य होगा, कि वही के एक अनाथालय से उन्होने नन्ह सागर को गोद लिया था। और उसी अनाथ सागर यो लेकर एक वर्ष बाद जब तुम्हारी पत्नी लोटी, तो तुम सागर को देखकर अपने सभी दुख दर्द भूल गये थे ।....इतना ही नहीं, मानसिक रूप रिपी/72 से प्रसन्न रहने से तुम्हारा होटल भी दिन दूना-रान चौगुना फलता फूलता रहा। और उसका परिणाम भी आज तुम्हारे सामने है । " जरा सोचो सागर वो गोद लेने मे न केवल तुम्हारा ही हित हुप्रा, अपितु एक अनाथ को सुदृढ प्राविक व पारिवारिक धरातल भी मिला । आज देश की बढती याबादी को रोकने के लिये प्रपा पतंव्य स्वरूप, यदि देश वा प्रत्येक नाग- रिक, पुन अथवा पुत्री की चाह मे आवश्यकता से अधिक बच्चे पैदा करके स्वय की आर्थिक विक्षिप्तता को दावत देने के स्थान पर, ऐसी परिस्थिति म अनाथ बच्चो को गोद लेकर उन्ह सरक्षण प्रदान करे, ता क्या हम खुश- हाल, समृद्धिशाली नही हो जायेंगे। हर व्यक्ति अपनी जिम्मेदारी को समझे, अपने विवेक से काम ले तो क्यू मुझ जैसे प्रादमी को तुम जैसे लोगो यो समार्ग दिखाने के लिये भूठ का सहारा लेना पडे ? क्या ये झूठा नाटक करके स्वय को तुम्हारी नजरो से गिराना पड़े।'' 'नहीं नहीं स्वामी जी .आपने जो कुछ किया है उससे प्राप मेरी नजरो म और महान् हो गये है। -मैं जानता हूँ आप जो कुछ करेंगे मेरे हित के लिये ही करेंगे । इसीनिये तो मैं आपकी सब बातें मानता हूँ। माज मेरा यह विश्वास और दृढ हो गया है कि ग्राप ही मेरे सच्चे हितैषी हैं।" केशव दत्त जी ने फिर एक बार स्वामी जी के चरण स्पर्श करके, अपने पास सड़े सागर को अपने सीने से लगा लिया था। . तात/73 निर्णय उस दिन शाम के चार बजे उसे पल्पना का फोन मिला था। उसने सवेरे-सवेरे राम निवास बाग मे बुलाया था । वह हैरान था, कल दोपहर को तो कोई बात न थी, ऐसा एक्दम क्या याम आ पडा? भोर की कोपल फूटी मोर मधियारे ने अपना फैला माचल धीरे धीरे समेटना प्रारम्भ पर दिया। चारो मोर कोहरे की धनी तह के कारण वह मोटर साइकिल बहुत धीरे धीरे चला रहा था। अचानक म्यूजियम के सामने लॉन पर कल्पना यो सडा पार उसने गाडी वही पार्क कर दी। सर्दी से ठिठुरे अपने दोनो हाथो को आपस में रगडते हुये वह सीढ़िया चढ वर लॉन तक पहुंच गया। "हलो पप्पू "हलो रतन ।" कहकर वल्पना उस की पोर बढी। "इतनी सर्दी मे यहा बुलाकर क्या हमारे प्यार की परीक्षा ले रही हो" रतन के शब्दो मे शिकायत का पुट था। "घबरा गये क्या ?....लोग तो अपनी महबूबा के लिये प्रासमान से तारे तर तोड लाने का दम भरते हैं।" कल्पना के आकर्षक चेहरे पर एक मधुर सी मुस्वान तैर गई। "तुम्हारे लिये ये भी करना पडे तो करेंगे, जानेमन, सुन्दरता की कामना कौन नहीं करता?" कहते हुये रतन ने कल्पना को अपने सीने से लगा लिया। "तो,....पापको भी किसी की कामना है ?" कल्पना ने अपने आपको बन्धन मुक्त करते हुये प्रश्न किया । "तुम्हारी... तुम्हारी चाहत की तपिश ने मुझे इतना गरमा दिया है कि इस कड़कती सर्दी का अहसास तक न हुआ | लम्बे घने धुंघराले बाल, पतली मृणाल सो वाहे, सुराहीदार गरदन, हिरणी सी चपल पाखे, गुलावी लरजते होठ और रात की रानी सा महकता जिस्म । सच क्लाना तुम्हारी ये निधि ही तो मेरी कामना है रतन से अपनी प्रशसा सुनकर कल्पना के चेहरे पर प्रसन्नता की एक भी किरण न उभरी, बल्कि वह उदासी के मवर में जा फसी। रतन ने उसकी चिबुक को ऊपर उठाते हुये कहा "क्या बात है, तुम इतनी भावुक हो गई?" "तुमने बिल्कुल ठीक कहा रतन पुरुप की आखें औरत की देह मे लगभग इन सब खूबियो को तलाश कर लेती हैं, लेकिन मैं अपने बारे में कुछ और भी जानना चाहती हूँ। क्या मेरे शारीरिक सौन्दर्य के अतिरिक्त मेरे भीतर कोई ऐसा प्रार्पण नहीं है, जो तुम्हे बाधकर रख सके ?" कहते-कहते अथ लडिया उसके कपोलो पर चू पडी। "मोऽऽऽ....डालिंग, लगता है हमने गलत टॉपिक छेड दिया । चलो नीचे रेस्तरा पर चाय पियेंगे ! सूरज की किरणो के पृथ्वी पर प्रागमन के साथ ही भोस की बूदें धीरे-धीरे प्रोझल होकर वातावरण को शुष्क बना रही थी। रतन ने कल्पना के हाथ मपनी हथेलियो के बीच ले रखे थे। उस कडकती सर्दी मे चलते हुये दोनो के जिस्म कार से ठण्डे थे, लेकिन अन्तर में एक माधी थी ।....विचारो की आधी। चलते-चलते कल्पना ने रतन को बताया कि उसके पिता भी उसकी मा से सदैव यही कहा करते थे। पर आश्चर्य की बात है कि इस पर भी वे अपनी फैक्ट्री में काम करने वाली अपनी संक्रेटरी के दीवाने रहे । कहते थे- "उसके सफेद संगमरमरी जिस्म में ऐसी चमक है जैसे उसका जिस्म हाड-मास का न होकर हीरे का बना हो". '....एक दिन उनकी सेक्रेटरी के पिता घर पाये भोर गिडगिडाते हुये मा से बोले, "आप अपने पति को समझाइये न।" कुछ दिनो वाद पिताजी उस लडकी के साथ विदेश चले गये, जहाँ से फिर कभी न लौटे ! ....मैं ये चाहती हूं कि औरत के प्रति खिंचाव का कारण मानसिक होना चाहिये मात्र दैहिक नही ।" निर्णय/75 रतन ने करपना वो अपने वाजुनो मे कस लिया । उसे चुम्बनी वी यौछार से रोमाचित कर डाला I....तुम बहुत प्यारी गुडिया हो । जानेमन तुम तो अच्छी-खासी दार्शनिक निकली।" चाय पीने से पहले दोनो एक ठेली वाले से मूगफली लेकर पार्क की एक बैच पर बैठ गये । "हा अब कहो क्या बात थी ?....इस समय कैसे बुलाया था मुझे " मूगफनी का दौर प्रारम्भ होने के साथ ही बातो का सिलसिला भी फिर से चल पडा। "मा या पन पाया है । उन्होने मेरे लिये कोई लडका देख लिया है । इसीलिये कोई निर्णय लेने से पहले मेरी स्वीकृति मागी है ।.....दरअसल मैं शीघ्र ही कोई निर्णय लेना चाहती हूँ।" "वस । इतनी सी बात । ..मैं समझा, न जाने क्या सीरियस बात है जो इतनी सवेरे बुलाया है तुमने ।" ". वैसे मा ने ये भी लिखा है कि यदि मेरी पसन्द का भी कोई लडका हो तो उन्हे स्वीकार्य होगा।" रतन ने बात अनसुनी कर दी तो कल्पना ने उसे फिर से कुरेदने का प्रयास किया। इस पर रतन अजीब सा मुह बनाकर बोला, “पर ऐसी भी क्या जल्दी है "मा अपनी जिम्मेदारी पूरी कर देना चाहती है ...फिर इसमे बुराई भी क्या है ?" रतन का चेहरा अव गम्भीर हो गया था। शायद उसने देख लिया था कि वचाव का कोई रास्ता नहीं हैं। नीची निगाह किये मूगफली छीलते हुये बोला, "यप्पू दरअसल मैं अपने सम्बन्धों को कोई नाम न देवर रोमा- न्टिक जिन्दगी जीना चाहता हूँ। क्योकि शादी क बाद वही घिसी पिटी बातें, वासी समस्याएं, वही एक रसता रह जाती है । सचम, शिवाह के बाद प्रेम चुर जाता है। जिन्दगी ये तमाम रग पीके हो जात!" 11/76 'मैं यह "प्रेम कोई ऐसी स्थिति नहीं है जिसे तुम पक्ड वर रस सयो । यह तुम्हारा कोरा वहम है कि, प्रेम विवाह के बाद मर जाता है। दरअसन काम जर ता वेवन शरीर ता सीमित रहता है तब तक वह केवल तुष्टि मान है । लेकिन जब पाम हमारे मन्तर ये पुष्प को पसुडिया की तह खोत पर रस देता है, तव वास्तविकता का अहसास होता है जा जिन्दगी की असली चाह है।" किन्तु दा पल रुककर कल्पना ने फिर बालना प्रारम्भ किया । नही कहती कि किसी का, एक खास उम्र तक विवाह यो टालना गलत है किन्तु अकारण टालने की नीति मपनाना पाम जीवन स अग हटने वाली बात है और सुनो, प्रेम का सचय उसकी हत्या है । उसे फैलने दो उसे प्रफुल्लित हाने दो। इसी म उसका विवास है । स तान के रूप म प्रादमी अपना विस्तार पार सन्तुष्ट होता है। इससे उसकी प्रात्मा मन और प्राण का विस्तार होता है ।' बल्पना ने रतन की बात का उत्तर देत हुए कहा । "उफ्फ पप्पू तुम ये क्या बखडा ले बैठी ? "रतन, य वपेडा नही है हमारी अपनी समस्या है । जीवन की सवस कठारतम समस्या ।" कल्पना अव हॉस्टल लौटना चाहती थी। उस पता था, थाडी सी देर होने पर परसो वार्डन ने उसे फटकारा था। बड़ी मुश्किल से सॉरी कह कर पीछा छुडाया था उसने । लविन माज उसे फैसला करना ही था । इसलिये वह निणय की तह तक पहुंचना चाहती थी। सहसा रतन उसके काधे पर हाथ टिका धीरे से बाला, खाना खायोगी? । . 'कहा 'एल एम बी मे 'विचार तो बुरा नहीं।" वह किसी यन्त्रचलित हिरणी की तरह माटर साइकिल पर बैठ गई। जौहरी बाजार पर पहुंचते पहुंचते उसका जिस्म कापने लगा था । उसन रतन की पीठ पर हाय रख लिया था । लम्बा छरहरा जिस्म तीखे नैन नक्श निणय/77

पर घुघराले बालो से पटा ललाट, चौडी छाती, उन्मादक रम भरी सी मासे,
भारी-भरकम पुरषोचित मावन | सभी कुछ उसने रतन में पाया था। रतन की
पीठ के सगं से एप प्रजीय सा उन्माद उसके जिस्म में दौड़ गया। उस क्षण के
स्पर्श से यह रोमाचित हा उठी थी । एल एम वी पहुच कर वे एक कविन
मे जा बैठे।
बरा मार्डर ले जा चुरा था। दोनो शान्त थे, लेक्नि मन मे, उमडते
द्वन्द्व को दोनो समझते थे। कुछ पलो वी सामोशी को मासिर यल्पना ने ही
भग पर दिया।
"तुमने सिसोदिया गार्डन देखा है ?"
"हा, रडा सुन्दर बाग वनवाया है महाराजा ने । बडे पारखी
प्रादमी होगे वे | बल्वि बहे रोमाटिक भी होगे।"
"ये तुम कैसे कह सकते हो।"
"अरे ये तो मानी हुई बात है, उस जमाने के राजा लोग सैकडो
रानिया रसत थे।"
"क्या बर रहे हो? इतनी औरतें और एक प्रादमी । यह
तो कोरा
व्यभिचार हुमा
"व्यभिचार नहीं, दरअसल य सुन्दरता के लिये पिपासा है । जहा
सुन्दरता दिखी, वहा उसका उपयोग किया।"
"यह पिपामा ही तो व्यभिचार है । प्रेम का अहसास ही वहा शुरू
होता है जब हम उसे सूक्ष्म रूप से महसूस करें। तुम इसे सही समझते हो
क्या
वह रतन की प्रतिक्रिया देखना चाहती थी।
"अरे, ये तो राजा महाराजायो की बातें हैं । कहा राजा भोज कहा
गगू तली | हम तो जिन्दगी घसीट रहे है। हम तो बस तुम्हारे दीवाने हैं।
देखें, वहा तक निभाती हो।"
वैरे के पुन प्रागमन के साथ बातो का सिलसिला टूट गया ! दोनो
178

2
चुपचाप खाना खाने लगे। खाना खाते हुये रतन ने डिपार्टमेट का जिक्र छेड
दिया।
'तुम्हारे डिपार्टमट का क्या हाल है
"मैं ज्यादा दखलदाजी नहीं करती, पर कल प्रोफेसर उपाध्याय को
फटकारना पडा।"
"ऐसा क्या हो गया था।"
"वडा बेशरम है ! कहता था सुन्दर लडकियां हमेशा याद रहती है ।
जब मैंने कहा कि, "सर पाठ्यक्रम तक रहियेगा तो खिसिया कर रह गया"
"बडा रोमाटिक स्वभाव है उसका । एक दिन मुझसे कहता था, हीरे
की अगूठी पहना करो इससे लडकी खिंची चली आती है । बडा मजेदार
।
1
प्रादमी है वह
"रहने दो उस मजेदार आदमी को । कम्बख्त बडा रसिया है
किसी दिन किसी लडकी की सैण्डल खाकर ही होश ठिकाने पायेंगे उसके । '
कहकर कल्पना जोर से हस पडी।
बैरा खाने के बर्ता ले जा चुका तो वे दोनो कॉफी का इन्तजार करने
लगे । लेकिन इसके लिये उन्हे अधिक इतजार नहीं करना पड़ा ।
"रतन, फिर मे मा को क्या लिखू।"
कॉफी का घूट भरते हुये कल्पना ने फिर वही प्रसग छेड दिया ।
शक्कर कम है ।" वात पलटने की गरज स तेज स्वर में रतन
ने बरे से कहा ।
कल्पना को उस पर शक हो चला था। लेकिन धैय के अतिरिक्त
चारा भी क्या था। किन्तु चन्द लमहो बाद ही कल्पना ने उस वातावरण मे
फिर से अपना प्रश्न उडेल दिया।
"ऐसी क्या जल्दी है कप्पू ? ' उसने खीज कर कहा था।
"अगर मुझे मा की बात को मानना पडा तो सचमुच मेरे लिये वह
एक बड़ी समस्या होगी।
निर्णय/79

यह ता तुम्हारे प्रेम को परीक्षा होगी ! मैं तो फिलहाल आजाद पछी की भाति जीना चाहता हूं।" कल्पना फफक कर रो पडी। 'तुम मद हो । तुम औरत की लाचारी को कैसे समझागे? औरत आदमी को चुनती है फिर उसे छोडना नहीं चाहती । जब कि पादमी पादमी इस कुछ महत्व नहीं देता। क्या वेवकूफी की बात करती हो? हिम्मत से काम लो। रतन र चेहरे पर आक्रोश की परत चढ चुकी थी। रतन ने जब ल्पना को विश्वविद्यालय का फाटक पार कर गल्स हॉस्टल क नुक्कड पर उतारा तो कल्पना एक्दम नमस्त वह कर हास्टल के फाटक की ओर बढ गइ थी । उसका मोह खत्म हो चुका था । सारी रात वह विचारा के भवर म फसी रही । न जाने कब उसे नीद मा गई थी। सवर उठत ही उसन दराज स पर निकाल कर मां को लिख दिया- जो ठीर समझो निणय ले लो। जरूरत पड़ने पर मुझ बुला लेना। और उसी दिन उसने वो पत्र डाक म डाल दिया था।

मिति-रक्षा उसके हाथ से मटकी छूटते छूटते बची थी। साथ म फुवा न होती को शायद मटकी अव तक चकनाचूर हो चुकी होती। उसने अपना घाघरा समेट कर तनिक ऊपर उठा लिया और दोनो घुटनो के बीच दबाकर जय उस पोसर म से मटकी भरी तो उसका ध्यान अनायास ही बनवारी की ओर चला गया था। जो कुछ ही दूरी पर खडा उसे ललचाई नजरा से देख रहा था। और उसने धवरावर घुटनो के बीच की दूरी बढा दी जिससे उसकी गोरी गोरी खूबसूरत टागा यो फिर एक बार उस घाघरे ने अपने प्राप म समेट लिया। नवा उसके डर वो भाप चुकी थी। उसने स्वय जल्दी से अपनी मटकी भरकर अपनी बाहो के घरे मे समेटकर यमर पर रख ली और दुनारी को चलने का इशारा करके स्वय भी वहां से चल दी। अपने भयभीत चेहरे को बनाव कठोरता प्रोढावर दुलारी ने बनवारी की ओर देखा और फुनवा के पीछे होली। बनवारी को देखकर वह डर अवश्य गई थी लेकिन वह जानती थी कि बनवारी कोई गुण्डा नहीं है । एक अच्छा सासा सूबसूरत जवान है । गाँव का छैना । उसया गठा हुआ जिस्म लम्बा पद व घु घराने वार किसी भी नवयौवना यो प्राकर्षित करने के लिये कापी थे। तव ता वो खुद ही मरी जाती थी बनवारी पर । पानी लेन के बहाने वह कई बार भवेली यही पोखर पर पावर घण्टा बनवारी स प्यार की बातें किया करती थी। दीनू वावा से तो उसकी इस विषय पर बात करने की हिम्मत न होती थी किन्तु अपनी मा स उसने साफ साफ कह दिया था रिया व्याह करेगी तो बनवारी से । मां वा भी एतराज इसनिये 7 हुमा पारि यनवारो ने तब तर गाव स्कूल की सबसे बडी जमात पाचवी पास परये उस गाव म अपन पिता को एक मात्र परचूनी की दूवान सम्भार की थी। उरावी मा न दीनू पाया पो राजी करवे पण्डित जी गे पूछपर अच्छा सा मुहूत दयपर वनयारी के साप दुलारी की सगाई भी पर दी थी। विवाह सूत्र म बधकर अपना छोटा सा घर बनाने के उन्माद म दोगा प्रेमी फले न समात पे।

उस दिन सेविन पिर. अचानक एए दिन दुतारी के मन मागन में उल्कापात हुमा जिसन उसपे अन्तर म सनवती सी मचावर रस दीपी जय भोर पी यापन फूटी, पानिमा ने माना पापाचर धीरे धीरे समेट लिया तो मूरज की किरणा व पृथ्वी पर प्रागमन व साय ही सारे गाव म ये समाचार माग की पटाये समान पर गया शिबनवारी ने रात का भराव पीकर पटवारी जी की सडयो से बलात्कार पर निमा मोर वो फरार हो गया है। थोड़ी ही देर बाद पटवारी जी की लड़की अपने घर म साडी का फदा लगावर छत से नटरी मृत पाई गई। इस घटना न दुतारी के जीवन के तमाम रगीन सपना यो चूर चूर परम पिसरा दिया था। प्रच्छा दुनारी प्रव तू जा, मैं चलती हूँ" पुलवा की नावाज ने दुगारी की विचार श्र.पता को सण्डित कर दिया। उसे पता भी न चला कि वह फुलवा ये पीछे पीछे चलकर पोखर से घर तक का लम्बा रास्ता कब तय कर गई ।.. घर पहुचकर उसकी मा ने सहारा देकर उसके सिर पर रखी मटवी उतरवाई तो खीज उठी। तुझे क्या हो गया है री दुलारी' 'क्यो। दुलारी विचित माश्चय चक्ति सी अपनी चपल कि तु बोझिन सी पाखो को अपने जिस्म पर घुमतो हुई पात्म निरीक्षण बरने लगी। एक घण्टे म लौटकर पाई है और ये चुल्लू भर पानी लेकर । क्या हुमा मा?" चनी है 7 'मा वो वो फिर मिल गया था। मा को बिगडते देख उसने भोनेपन से स्पष्टीकरण देने का प्रयास दिया। कौन? वही मुना बनवारी" हा मा इसीनिय तो मैं जल्दी स भाग पाई। 'कोई छेडखानी तो नही की उसने तेरे साथ ? ही मैंने उस मौका ही नही दिया। हूँ । दुतारी की मा उस क्षण चितित सी हो गई। . 182 "पकड़ा गया था, तो मन को शान्ति तो थी !....न जाने कम्बस्तं दरोगा जी को क्या पट्टी पढ़ा कर छूटकर मा गया....जीना हराम कर दिया है जनम जले ने !....सगाई तोड़ दी....फिर भी पीछा नहीं छोड़ता....अपनी करनी का फल एक दिन जरूर भुगतना पड़ेगा कम्बस्त को !... मुकदमा तो चल ही रहा है ससुरे पर !....खैर !...छोड़ इन बातों को....देख कल शाम को भोलाराम जी कथा में नहीं आ पाये थे....उनका प्रसाद रखा है, .. उनके घर दे पा सामने एक तिखाल में रक्खे कटोरे की ओर इशारा करते हुये दुलारी की मां ने प्रादेशात्मक स्वर मे कहा था। "मां....भोलाराम जी का घर तो बहुत दूर है ।. ..देख कितना दिन चढ़ गया है |....और मैंने अभी तक कलेऊ (नाश्ता) भी नहीं किया है !" "अच्छा, प्राज तेरे बापू तो शहर गये है....इसलिये मैने दलिया बनाया है....अन्दर कटोरे में तेरे लिये रखा है,....जल्दी मे खाकर चली जा।" बड़े प्यार से अपनी लाडली को नाश्ता करने को कहकर उसकी मा तो घर के कामकाज में व्यस्त हो गई और दुलारी नाश्ता करके, प्रसाद का कटोरा उठाकर भोलाराम जी के घर की ओर चल दी। भोलाराम जी ने अपने खेत पर ही कच्चा-सा मकान बनवा रखा है । इसलिये उनका मकान बस्ती से थोड़ा अलग पड़ता है। उसी पगडण्डी पर काफी आगे चलकर पुलिस चौकी है, जहां से वही रास्ता कस्बे को जाता है । भोलाराम जी को प्रसाद देकर दुलारी ज्योही वापस लौटने के लिये उनके घर से निकल कर थोड़ी दूर चली ...उसके पाव तले जमीन निकल गई । सामने से बनवारी को अपने तीन-चार साथियो के साथ उसी ओर आते देख उसकी रुह कांप उठी। पीछे मुड़कर जब उसने देखा तो भोलाराम जी के घर का दरवाजा बन्द हो चुका था। उसी क्षण जब उसने बनवारी और उसके साथियो को अपनी ही ओर आते देखा तो घबराकर वह पीछे मुडकर भागने लगी । भोलाराम जी का घर निकल जाने के बाद वे लोग पूर्ण रूप से दौड़ने लगे थे। उन लोगों का इरादा भापकर उसने अपने पापको उन हैवानो मिति-रक्षा/83 , से बचाने के लिये बेतहाशा भागना शुरू कर दिया। कई क्षणो की दौड़ के बाद अचानक उसका ध्यान पुलिस चौकी की ओर गया, और....उसकी डूबती नैया को जैसे तिनके का सहारा मिल गया ।....पीछे मुड़कर देखा तो उसे तनिक राहत मिली ।....क्योगि वनवारी और उसके साथी कापी दूर पहले ही रक चुके थे । वे जानते थे कि प्रागे पुलिस चौकी है । अपने अस्त-व्यस्त कपडो में बेतहाशा भागती हाफती हुई दुलारी उस पुलिस चौकी के कम्पाउण्ड मे समा गई, और वनवारी और उसके साथी थककर, लाचार से पत्थरो पर बैठकर सुस्ताने लगे। "दरोगा जी....दरोगा जी....मुझे बचा लीजिये....वो बदमाश मेरे पीछे पडे हैं।' हाफती हुई दुलारी जव चौकी पर पहुची तो वह वहा पहरे पर खडे सिपाही के समक्ष गिडगिडाने लगी। "कौन लोग तुम्हारा पीछा कर रहे हैं ?" सिपाही ने विनम्र भाव से पूछा। "....वो....बनवारी....और उसके साथी, रास्ते में ही बैठे हैं वो लोग' "ठीक है....तुम पवरामो मत....यहाँ आराम से बैठकर सुस्तालो। मैं उन बदमाशो को अभी पकडकर लाता हूं।" एक टेवल के चारो ओर पडी चार-पाच कुसियो मे से एक पर दुलारी को बैठाकर वो सिपाही कमरे से बाहर चला गया ....अब दुलारी ने राहत की सास ली। उसने अपने अस्तव्यस्त कपडे ठीक किये....और चूनर से अपना सिर भी ढक लिया। माज अगर वो भागती-भागती इस चौकी तक न पहु चती तो बनवारी उसका न जाने क्या हश्र करता ....इस विचार से मन ही मन वह इस चौकी वालो के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने लगी । सरकार द्वारा खोली गई ये चौकी ग्रामीणो के लिये कितनी हितकर है । ....उसने मन मे सोचा। ....अभी उसकी सास पूर्ण रूप से सामान्य भी न हो पाई थी " वह काप उठी थी। ala/84 " १. " वि दरोगा जी ने पुन उसी कमरे मे प्रवेश किया। इग बार उसके साथ तीन सिपाही और भी थे। "हूँ तो वो बदनाश तुम्हे परेशान कर रहे थे?" "जी माई बाप । दरोगा जी ने दुलारी ये ठीच सामने पडी मेज के दूसरी ओर रखी कुर्सी पर बैठते हुये प्रडकर पूछा, तो दुलारी कृतज्ञ दृष्टि से हाय जोडकर उसके समक्ष नतमस्तक हो गई। ठीक है घबरानो मत । हम यहा क्सिलिये बैठे है ? हम तुम्हारी रक्षा करेंगे। लेकिन हम पहले वो चीज तो दिखानो, जिसकी हमे रक्षा करनी है "मैं समझी नही दरोगा जी पाप क्या देखना चाह रहे हैं 'एल्लो इसम समझने को मैंने कौन सी पहली वुझा दी ?" तुम्हें अपने इस कटीले जोवन की ही रक्षा करवानी है न ?' 'दरोगा जी sss .' अब उसे मालूम पड़ा कि वह भयकर पडयन का शिकार हो चुकी है । दरोगा जी की बात का अर्थ समझते ही वह कठोरता से चीख पड़ी। एक झटके मे कुर्सी से उठकर बाहर जाने के लिये ज्यो ही वह पीछे मुडी, दरवाजे पर खडे तीनों सिपाहियो के वहशियाने चेहरे देखकर उसकी चीख निकल पडी। "अब जाती कहा है यहाँ पाने के बाद जब तक फैसला न हो जाये, यहा से जाने की इजाजत नही है !" इससे पहले कि दुलारी उस कमरे से बाहर निकल पाती, उन तीनो में से एर सिपाही ने क्विाड अन्दर बन्द कर लिये। मुझे कोई फैसला नही करवाना मुझे जाने दो।" दुलारी अपमान व भय से चीख पडी । उसे अपने सतीत्व पर छाये सकट का आभास हो चगा था। रोम रोम भावी अपमान व पीडा की प्राशया से मिहर उठा था और वह एक वेबस पछी-सी उस कमरे में चक्कर काटने लगी, जहाँ . मिति रक्षा/85 अपनी प्रासो मे वाराना के डोरे लिये वो चारो दरिन्दे उसकी चढ़ती जवानी वो अपनी हवस का शिकार बनाने को प्रयत्नशील थे।....एक झपट्टे के साथ उसके पीछे से एक सिपाही ने उसया गदराया बदन अपने वाजुनो मे भर लिया, और वह तिलमिला उठी। उसकी हृदयविदारक चीख उस कमरे की दीवारो से टकरा-टकरा कर दम तोड गई। इससे पहले कि वो बन्धन मुक्त हो पाती दूसरे सिपाही ने उसकी गिरेबा से चोली पक्डवर जोर से खीच डाली और दुलारी के अछूने जोबन पर चढा वो प्रावरण भी उसका साथ छोड गया । दुलारी के भरे-पूरे जिस्म की झलक पाकर उन सभी सिपाहियो की पाखें चु घिया गई और वे कुटिल मुस्कान बिखेरते हुये अपने होठो पर जीब फिराने लगे। "कमीनो....कुत्तो....मैंने तुम्हारा क्या बिगाडा है '.. मुझे देखकर तुम्हें अपनी बेटी की याद नहीं पाई ?....हरामी के पिल्लो...सरकार तुम्हें गांव वालो की रक्षा की तनखा देती है...मोर तुम थू........" पाखो से अश्रु लडिया टपकाते हुये घृणित चेहरे से दुलारी ने उस सिपाही के मुह पर थूक दिया, जिसने उसकी चोली खीची थी। "स्साली थूकती है ?" दुलारी के मुह से निकले अपमानजनक शब्द सुनकर वो सिपाही तो बेहयाई से मुस्कुरा रहा था, किन्तु ज्योही दुलारी ने उसके मुह पर थूका.... जोश मे आकर उसने अपनी दोनो हथेलियो के किनारो से उसके गले के दोनो मोर एक साथ बलिप्ट वार किया...और दुलारी एक सिसको लेकर शान्त वह बेहोश होकर उस सिपाही की बाहो में झूल गई, जिसने उसे पीछे से पक्ड रखा था....मौर फिर देश व समाज के दुश्मन, गद्दार, पथभ्रष्ट समाजक्टक अपनी विक्षिप्त मानसिकता का परिचय दे रहे थे। "दरोगा जी, मुझे अभी अभी एक छोरे ने बताया है कि बनवारी के डर से भागकर दुलारी यहा भागई है दुलारी की मा ने चौकी कम्पाउण्ड में घुसते ही सामने सडे सिपाही से प्रश्न किया जो अभी अभी उसी कमरे में से निकला था। हो गई। .. " कृतांत/86

"
"प्रन्छर...
... तो वो दुलारी तेरी बेटी है ?"
अपने अस्त-व्यम्न कपड़े ठीक करते हुये उम मिपाही ने बड़े राव से
म किया।
"जी माई बाप ।
"सम्भालकर रखा कर अपनी छोकरी को,....गांव के गुण्डों में हमने
गया है उसे !"
दीनू काका की पत्नी को कृतज्ञता प्रकट करते देखकर उस सिपाही का
व द्विगुणित हो गया।
"कहाँ है मेरी बेटी ?"
"अन्दर है,....दरोगाजी उसकी रपट लिप रहे है ।....दो मिनट ठहर,
पीपाती है तेरी बेटी।"
"बड़ी मेहरवानी सा'व....माज आपने मेरी बेटी को बचाकर जो इसकी
IT की है, मैं आपके इस एहसान की कीमत कमे चुकाऊगी !
दुलारी की मां सिपाही की बात से पाश्वस्त हो गई थी कि उसकी
। सुरक्षित है। इससे पूर्व कि मिपाही फिर कुछ बोलता, दुलारी उम कमरे
बाहर निकल पाई । पथराई पाखें व निहाल जिस्म लिये । चार कदम
गे बढ़कर वह अपनी मां से लिपट गई।
"मां.....मेरी रक्षा की कीमत तुम्हें चुकाने की जरुरत नहीं है....मैंने
चुका दी है।"
कहकर वह फफक-फफक कर रो पड़ी ।....उसके अन्तर में प्रव मदा
लिये वेदना और अन्धकार का माम्राज्य हो चुका था।
"
7
मिति-रक्षा/87

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Karitant

Author
Subodh Govil
Title
Karitant
File name
Karitant
Text
OCR done
Citation
1967
Published
2011/03
Publisher
Rajasthan Prakashan Jaipur
Language
Sanskrit
Pages
89
Library
Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Classification
Literature
DLI number
551450
Barcode
4990010032189.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
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