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Patasheyp

Joshi Malti · 2011/03

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पटाक्षेप

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पटाक्षेप मालती जोशी

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अपने असंख्य पाठकों के नाम.
जिनके पत्रों ने मुझे निरंतर
लिखते रहने की प्रेरणा दी है।
-मालती जोशी

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क्रम
पटारोप ६
प्रतिदान १८
यानन्दी ७६

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पटाक्षेप चाय चढ़ाई ही थी कि इन्हनि आकर कहा, "पमा, एक कप पानी और, गौतम गाहब आए हैं।" मैंने पलटफर देगा, किचन के दरवाजे पर पड़े ये वह । सारी गोस, सारी मुमताहट चेहरे पर उतर आई थी। मुझं हंसी या गई । आर बच्चे फी है जनाब । बेचारे दफ्तर मेलौटकर एक प्याली चाय इत्मीनान से पीना चाहते हैं, मो यह भी नगीव नहीं है। पाय-नारता दे में लगाकर बाहर से जाते हुए मैंने छवि के कमरे में मांकरमहा, "छवि, गोद की शीशी।" "जी?" यह उपन्यास में ही हुई थी, हड़बड़ाकर उठ बैठी। "गौतम साहब आए हैं।" मैंने बताया। उनका नाम सुनते ही उसका मापा सलवटो से भर जाता था। पर मान उसने से ही गहन स्वर में कहा, "आप उनके पास थोड़ी देर बैठेंगी दीदी, में जरा फेर हो ।" उसी थावाड मे डरा भी ऊब, उरा भी यीश नहीं पी।चारी उन्हें पता करना सी गई है, मैंने सोचा। "और मुनाइए गौतम साहब, क्या हाल-बाल है. इस बार तो बहुत मरसे पार दर्शन दिए।" मैंने मैड पर चाय-नाश्ता सगाते हुए कहा । किसी विदेशी बैंकमी धोखाधड़ी का रिस्ता मुना रहे थे गोतम । उसे पटाक्षेप/१ - बीच ही में छोड़कर मेरी ओर मुखातिब हुए । दुआ-सलाम के बाद जो शुरू हुए, तो घर की, दफ्तर की, देश की, विदेश की, पता नहीं कितनी खबरें सुना गए। यह बैठे-बैठे बोर होते रहे । बड़ी मुश्किल से अपनी उवासी रोकते हुए बोले, "छवि को बुलाभो भई, इनका कितना टाइम वेस्ट करोगी । ही इजा 'ए बिजी मैन।" बड़ी मुश्किल से अपनी हंसी रोककर भीतर आई थी मैं और बंद दरवाजे पर दस्तक देते हुए कहा, "छवि, जल्दी करो। तुम्हारे भाई साहब ऑफ हुए जा रहे हैं।" "वस दीदी, अभी आयी," उसने कहा और दरवाजा खोल दिया। खुशबू का एक झोंका मुझे सराबोर करता हुआ निकल गया। उसकी धुंध से उवरकर मैंने देखा-बादामी रंग की नेट नॉयलान साड़ी, मैचिंग ब्लाउज और चूड़ियां, ढीला जूड़ा, जूड़े में गुलाव-छवि तो ऐसे संज-संवरकर खड़ी थी जैसे कहीं पार्टी में जाना हो। उसका सलोना रूप सदा की तरह मेरा हीन बोध जाग्रत् कर गया और मेरा ईर्ष्यालु मन कुनमुनाया, 'भला गौतम साहव के लिए इतने बनाव-सिंगार की क्या जरूरत थी?' "दीदी, पीयूष सो रहा है, उसे तो देख लेंगी न आप? दूध बनाकर : शीशी में भर दिया है मैंने ।" उसने अपने लुभावने अन्दाज में कहा और मेरे सारे विकल्प विला गए। फिर से ममतामयी दीदी बन गई मैं और उसे आश्वस्त कर बाहर भेज दिया। सोचा, पहनने-ओढ़ने के यही तो दिन हैं । 'किसी जमाने में मैं भी तो दिन में तीन-तीन बार साड़ियां बदलती थी, दर्जनों बार दर्पण में झांककर काजल-बिंदी ठीक कर लिया करती थी। लेकिन अब कोई मुझे देखे-~-सुन्दर दिखने का कोई उछाह ही नहीं रहा। और यह सब सोचते हुए पता नहीं कब मैं शीशे के सामने जाकर खड़ी हो गई । अपने टटपूंजिया वालों को किसी तरह समेटकर मैंने जूड़ा बनाया। फिर मुंह-हाथ धोकर कपड़े भी बदल डाले । अपने को संवारने की कोशिश में देर तक शीशे के सामने बैठी रही और वह कम्बख्त चीख-चीखकर कहता १० पटाक्षेप हा, 'यि बहुत सुंदर है, तुममे दम गुना, हजार गुना मुंदर है।' एकदम सारा उत्माह जमे निचुट गया। मन एक असहाय प्रोध से बनने लगा । मेरा गुम्मा हमेगा की तरह मुशील पर आया, जो छवि को साहकर इस घर में लाया है । उगके पर में आते ही में एक महत्त्वहीन नाणी होकर रह गई है। सड़किया, उनके पिता, पास-पडोमी-मब जमे चमीके इर्द-गिर्द घूम रहे हैं। मादी के दो साल बाद भी यह नवेली दुल्हन बनी हुई है । गुम्सा सकियों पर भी आया, जिन्हें जन्म देने मे, पालने में रा अस्तित्व ही रमहोन होकर रह गया है । गुस्सा इनपर भी "वह मला आदमी तो जमकर बैठ गया है। मुझे जरा बाहर जाना पा।" यह कर कमरे में आ गए थे, पता ही नहीं चला था। "जाने में आपको कौन रोक रहा है" मैंने कसली आवाज़ में "बुरा तो नहीं लगेगा?" "युग लगने की तो कोई बात ही नहीं है। वह कोई आपके लिए घोड़े ही आए हैं।" "पपा, आई हिम्लाइफदिम टोन," (मुझे यह लहना पसन्द नहीं है।) उन्होंने जरा मस्ती मे कहा । मैंने कोई जवाब नहीं दिया, मुह फैलाए बैठी . रही। "कुछ साना तो नहीं है बाजार से?" इन्होंने यूटी से कोट उतारते हुए पूछा। मैंने फिर भी कोई उत्तर नहीं दिया । यह चुपचाप बाहर निकल गए। मुरुदेर बाद ड्राइग रूम में इनका स्वर गुनाई दिया, "बच्ठा गौतम, सी यू अगेन," और फिर मीढ़ियां उतरने की आवाज आई-फिर स्कूटर स्टार्ट करने की। मारी आवाजें कानो मे समेटती हुई मैं चुपचाप यहा बंटी रही, निमी फाननू मामान को तरह । पोप अगर गले में फुनमुनासा नही तो मैं पता नहीं कितनी देर वहां चंटी रहती। उसको आते ही मैं करीब-करीव दौड़कर छवि के समरे में पहुंची। संतान आरकत मूले में कूदने की कोशिश करने लगा है। पटाक्षेप/११ अब भी मसहरी से मुंह निकालकर इधर-उधर देख रहा था। मुझे देखते ही किलक पड़ा और हुमसकर मेरी गोद में आ गया। उसे कलेजे से भींच- कर बड़ी देर तक अपना दुलार बरसाती रही, वह भी प्रसन्न भाव से मेरे अत्याचार सहता रहा। लेकिन सिर्फ प्यार से तो उसका पेट भरने वाला नहीं था। उसने फौरन ही दूध के लिए मचलना प्रारंभ कर दिया। उसे पलंग पर लिटाकर मैंने शीशी उसके मुंह में दे दी। और फिर उसके बाजू में लेट गई। मन इतना तृप्त था जैसे पीयूप शीशी का नहीं, मेरा ही दूध पी रहा है। यह नन्हा-सा प्राणी आते ही घर-भर का, मुहल्ले का एक खिलौना बन गया है । लेकिन मेरी तो जैसे इसने जिंदगी ही बदल दी है। मन करता है, बस चौबीस घंटे उसे कलेजे से लगाए रहूं और पूर्वी--मेरे लाला, मेरे छौने, तू इतने दिनों तक कहां छिपकर बैठ गया था। दूध पिलाकर मैंने उसे तैयार किया । जैसे कोई शरवत धीरे-धीरे सिप किया जाता है । मैं उसे इत्मीनान से तैयार करती रही । आखिर उसके धैर्य का बांध टूट गया और वह सड़क की ओर हाथ फेंकने लगा, तब मुझे अपना तामझाम समेटना ही पड़ा। "छवि, इसे थोड़ा धुमा लाऊं मैं। दोनों देवियां तो पता नहीं कहां गायब हो गई हैं।" मैंने ड्राइंग रूम में आकर कहा और नीचे उतर . आई। "पप्पू को घुमाने ले जा रही हैं मिसेज़ कुमार?" मैंने पीछे मुड़कर देखा, मिसेज़ चंद्रा थैलियों से लदी-फंदी हांफती हुई चली आ रही थीं। "इसकी मम्मी नहीं आई?"बुरी तरह हांफ रही थीं, पर बोले विना उन्हें चैन कहां। "मम्मी पढ़ रही है।" मैंने संक्षिप्त-सा उत्तर दिया। "अब की तो मास्टरजी बहुत दिनों बाद आए।" उन्होंने साथ-साथ चलते हुए दूसरा प्रश्न दाग दिया। "मास्टर जी कौन ? ओह, आप शायद गौतम साहब के लिए कह रही है। इनके दोस्त के छोटे भाई हैं। वह भी किमी नाइट कॉलेज में सोगॉलॉजी में एम० ए० कर रहे हैं। कहीं मे मच्दै नोट्स या कितावें मिल जाती हैं, टोदे जाते हैं।" मन लम्बी-चौड़ी सफाई दी और फिर लगा, इसकी कोई परत नही थी। "यही तो मैं लड़कियों से रह रही थी।मास्टरतो यपने ममय से आता है, मगर में जाता है । वह इतनी-इतनी देर कंठता भी नहीं है, इतने-इतने दिन गोन भी नहीं करता। और उमे छोड़ने सारा पर दरवाजे पर नहीं मादा है।" मैं तो स्तन्ध रह गई। मिसेज बढ़ा की नजर से कोई भी बात छूटती नहीं है । नीम-बाग उन्हें कॉलोनी मा 'चौकीदार कहते हैं । ठीक ही कहते मैंने फिर बकारण मफाई देते हुए कहा, "इतना लेट एडमीगन हुआ है उमका, इसलिए जहा से भी हेल्प मिलती है, से लेते हैं। अक्तूबर में तो उमने गनिज ज्वाइन किया है। हमने तो यही सोच लिया था कि उसी वहान घर में तो निकलेगी। चार हमउम्र लोगों के साय हंसगो-बोलेगी तो दमा मन मग जाएगा। आपने देगा तो था, कमी हो गई थी। दिन-भर कमरे में घुमी रहती थी। न किमीमे हमना, न बोलना । न ढग मे पहनना- न बोरना।" "देवर व लौट रहे हैं आपके ?" बगला अन्न नयार ही था। "अभी तो माल-भर यारी है। तीन माल के लिए गए हैं न।" उत्तर देते-देते यव में ही हांफ चली पी। माउंट आ गया तब कहीं जाकर मुझे गहत मिली। टन्हें दृशानदारों में उलझता टोडकर मैंने मार्केट का एक रार निया, कुछ टॉफियां परीदी और लोट पड़ी। नौटते हुए उनके नाय आने का माहन मुझमें नहीं था। मौटने हुए पड़ोस की दो-नीन मकियां मिल गई थी और मैंने राहत की माम नी ।इन मोगों में पाप को नेने के लिए होड़-मी मच गई और मुरे हाय मोघा परने का मौका मिल गया । मोटे-ताजे बच्चे देखने में तो - - . अच्छे लगते हैं, लेकिन उठाना पड़े तो भगवान याद आ जाते हैं। पीयूप अपनी भक्तमंडली में प्रसन्न था और फरमाइशी प्रोग्राम पेश कर रहा था। शुभा-विभा ने, छवि ने उसे कई करतब सिखा रखे हैं। लड़कियां मुग्ध हुई जा रही थीं । तेरह-चौदह साल की लड़कियां थीं थे, उन्हें मुग्ध होने के लिए कुछ भी काफी होता है । 'हाय, कित्ता स्वीट है, न ! हाय, कित्ता इंटेलीजेंट !' से होते हुए बात उसकी मम्मी पर उतर आई। घर पहुंचने तक छवि 'कित्ती स्वीट, कित्ती स्मार्ट, कित्ती ग्रेसफुल' वगैरह विशेपण पा चुकी थी। अपने घर की ओर मुड़ते हुए जब पीयूप को लिया, तो कितना भारी लगा मुझे वह ! किसी तरह सीढ़ियां चढ़कर मैं ऊपर आई । गैलरी में आकर पता लगा, कविता की जो पंक्तियां हवा में तैरकर मेरे कानों से टकराती रही थीं, उनका उद्गम-स्थान हमारा ड्राइंग रूम ही था। मुझे लगा, शायद छवि रेडियो खोलकर बैठ गई है । ड्राइंग रूम में आकर देखा, कवि महोदय सशरीर ड्राइंग रूम में विराजमान हैं। और उनकी एकमात्र श्रोता बड़ी तमन्यता से रसास्वादन कर रही है । भने ईश्वर को धन्यवाद दिया कि लोटते हुए मिसेज चन्द्रा मेरे साथ नहीं थीं। कमरे के वातावरण को गद्यमय बनाते हुए कहा, "छवि, अपने ' लाडले को देखो जरा, मुझे किचन में जाने दो, दोनों देवियां लौट आएंगी तो मुझे ही खा जाएंगी।" कवि और श्रोता दोनों जैसे समाधि से जाग पड़े । भावाभिभूत होकर छवि ने कहा, "कितनी अच्छी कविता लिखते हैं गौतम साहब !" "लिखता था," कवि ने करेक्शन स्लिप प्रस्तुत की, "कॉलेज के दिनों बहुत कुछ लिखा था।" "उस जमाने में तो सभी कवि होते हैं । यह नोन, तेल, लकड़ी का चरकर चलने के बाद भी जिनकी प्रतिभा शेष रह जाती है, वे ही सच्ने कवि होते हैं," और इस यथार्थवादी घोषणा के साथ मैंने मंच से प्रस्थान । में १४/पटाक्षेप कर दिया। पविगोष्ठी फिर नहीं जम सकी। क्योकि कुछ ही देर बाद स्कूटर स्दा होने की आवाज आई। कुछ ही पल बाद छवि किचन में थी। उसकी मांगों में कविताओ को पस्निया अब भी तैर रही थी। उसी भावविह्वत स्वर में बोली, "आपको पता है दीदी, गौतम साहब की लव मैरिज है। साप ही पहने थे वे दोनी । सारी कविताए मिसेज गौतम के लिए ही लिखी "छवि ! प्लीज जरा साड़ी बदलकर आ जाओ तो चटनी पीस दो। मुझे तो ये बाकी का काम निपटाते ही आठ बज जाएगे।" कविता-कानन में विचरण करने वाले उसके मन को मैंने निर्ममता से सिल पर पटकते हुए कहा। उसका चेहरा बुझ-सा गया और मुझे अपने-आपपर गुस्सा आने आफन को मारी गुभा उसी समय मेरे सामने आ खड़ी हुई, "मम्मी, भूय लगी है।" "भूख तो सगी होगी ही, तभी तो पर की याद आई है," मैंने उसे गिमोडते हुए कहा, "घड़ी देखी है ? यह समय है घर लौटने का?" "वे लोग रब से या गई हैं," छवि ने मिमियाकर कहा, लेकिन तब तक गुभा श्री पीठ पर दो घूसे पड़ चुके थे और वह सिसकती हुई चली गई थी गैस की नीली लपटों को शून्य दृष्टि से देखती हुई मैं देर तक गुममुम ही रह गई थी।

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मेरा अंतर्मन जानता है कि इन प्रश्नों के उत्तर मेरे लिए महत्त्व नहीं रखने, अपनी नरयसनेम को छिपाने का एक साधन-मात्र हैं ये । "मी लगती है अब वह " मैंने अधीर होकर पूछा। "अरे यूव फैल गई हैं, गर्दन तो नजर ही नही आ रही।" "म?" और मेरा मन उल्लास से भर गया । मिसेज़ कश्यप जब उउनी मुन्दर नहीं रही, यह जानना कितना सुनद या! एक जमाना था उब मिसेज कश्यप ही नहीं, उनका ड्राइग रूम, उनके अचार, उनके स्वेटर्म, जनके बन्ले, सभी वाते चर्चा का, प्रशसा का विषय थीं। कम से कम अब एक प्वाइट तो उनका कम हुआ। "सच कह रहे हैं। बहुत मोटी हो गई हैं-~-मुझसे भी ज्यादा?" मैंने भारदस्त होने के लिए पुन. पूछा। "तुम्हें मोटी किसन कह दिया यू आर एंज स्निम एंड एंज सन ऐज एवर।" "अब रहने भी दीजिए," मैंने किमी नदोहा की तरह इतराते हुए "मच कह रहा हूं भाई कोई मेरे दिल से पूछे तेरे वीर नौकर और मुझे अपनी बाहों में समेटकर उन्होंन बैडस्विच लॉक कर दिया। उनरी वाहों का तरिया लिए हुए में देर तक तृप्त भाव में नेटी रही। मिड कश्यप का नाम लेते ही शकाओ का एक नूचानमा छाया, वह अब शांत हो गया था। मुख की उस परमावस्या में मन दहा तरल हो यारा था। मुझे एवि की याद हो आई, मैं यहां प्रिय की बाहों में मुड के लेटीहू योर वह येचारी ३ होले से मैं विस्तर से उठ आई, वह उसी तरह प्रगाढ़ निद्रा में निमग्न लेटे रहे। खिड़की का पर्दा सरकाकर मैंने देखा-बगल वाले कमरे की बत्ती का चौकोर प्रतिविद सड़क पर पड़ रहा था, जिसका अर्थ था, छवि अभी जाग रही है। मन करुणार्द्र हो उठा, क्या सुख देखा है वेचारी ने शादी का ! दो महीने लगकर भी तो अपने कलकत्ता वाले घर में रही नहीं। कभी मेरे पास, कभी मां के पास तीज-त्यौहारों के चक्कर में घूमती रही। तव यह पता थोड़े ही था कि सुशील को छह महीने के अन्दर ही विदेश चला जाना होगा। इतने वरिष्ठ लोगों के होते हुए कम्पनी उसे ही जर्मनी में ट्रेनिंग के लिए भेजेगी, खुद उसे भी इसकी आशा कहां थी ! पर इस चांस के मिलते ही दोनों घरों में खुशी की लहर दौड़ गई थी। फॉरेन रिटर्न होने का एक ऐसा शौक सवार था सवपर कि छवि की राय लेना भी जरूरी नहीं समझा गया। उसे चौथा महीना चल रहा था। एक साल तो इसी चक्कर में बीत जाता फिर जहां उसका मन होता, रह लेती। मइके ससुरे सवहि सुख, जवहि जहां मनुमान। और इसी तरह उसके दिन कट भी रहे थे। पीयूष पांच-छह महीने का था तभी उसकी पीहर से चिट्ठी बाई-"दीदी, मेरा यहां जरा भी मन नहीं १८/पटाक्षेप सग रहा, मुझे युना मीजिए।" दूसरे ही दिन पर यागरा जाकर लिया माए थे। यानी दुरनी हो गई पी यह ! मैंने प्यार से उमयी बनया मेने हुए कहा पा, "अरे, मोर रान में यह हाल हो गया है संरा,फिर मुझे तो मू पदह दिन में बदनाम कर देगी।" "दरगन दीदी, वर बोर हो गई म यहाँ।" उगने परा, "पर में गबर पाम माना-अपना पाम है। महेमिया अपनी पाई में मस्त है. जिनरी गादी हो गई है. उन्हें मरनी गृहप्पी गे पुगंन नहीं है। छोटी भाभी अपनी नौकरी में पता है, री भाभी का बनों में ही दिन बीत जाता है। एक में ही फासगू नउर आ रही पी यहाँ।" और पर गूग हनी हग दी। उसकी मारी प्यपा उम हगी में एनक गई पी। तब मैंने ही जिदगी पी, उग कॉर्नर भेजने पी। मुगीन उमे मेरे पाग हो गया था। यह भी मा-बार के यहां गे मेरे पाम अपनी सारी मा गई पी। हम पिण्याग पी, इम स्नेह को मैं गुटलाना नहीं पानी पी पीर जाने लगी थी, तब मे उसके पहरे पर पापी रोनर भा गई पी।जिर भी पीभी यह इतनी निरीह ममती रिदया हो पाती। । पटार/१९ ३ हौले से मैं बिस्तर से उठ आई, वह उसी तरह प्रगाढ़ निद्रा में निमग्न टे रहे। खिड़की का पर्दा सरकाकर मैंने देखा -बगल वाले कमरे की वत्ती का चौकोर प्रतिबिंब सड़क पर पड़ रहा था, जिसका अर्थ था, छवि अभी जाग रही है। मन करुणार्द्र हो उठा, क्या सुख देखा है बेचारी ने शादी का ! दो महीने लगकर भी तो अपने कलकत्ता वाले घर में रही नहीं। कभी मेरे पास, कभी मां के पास तीज-त्यौहारों के चक्कर में घूमती रही । तव यह पता थोड़े ही था कि सुशील को छह महीने के अन्दर ही विदेश चला जाना होगा। इतने वरिष्ठ लोगों के होते हुए कम्पनी उसे ही जर्मनी में ट्रेनिंग के लिए भेजेगी, खुद उसे भी इसकी आशा कहां थी ! पर इस चांस के मिलते ही दोनों घरों में खुशी की लहर दौड़ गई थी। फॉरेन रिटर्न होने का एक ऐसा शौक सवार था सवपर कि छवि की राय लेना भी जरूरी नहीं समझा गया। उसे चौथा महीना चल रहा था। एक साल तो इसी चक्कर में बीत जाता फिर जहां उसका मन होता, रह लेती। मइके ससुरे सवहि सुख, जवहि जहां मनुमान। और इसी तरह उसके दिन कट भी रहे थे । पीयूप पांच-छह महीने का था तभी उसकी पीहर से चिट्ठी आई-"दीदी, मेरा यहां ज़रा भी मन नहीं १८/पटाक्षेप पग रहा, मुग गुला सीनिए।" दूसरे ही दिन यह बागरा जाकर नियमाए इतना दरली हो गई भी यह ! मैंने प्यार से उगरी यसमा म महापा, "मरे, मां करार में यह हाल हो गया है रोरा, फिर मुझे सोमू पार दिन में बदनाम परदेगी।" "दरमास दीदी, बार बार हो गई में बहो।" उगने कहा, "परमें सरस पाप माना-अपना काम है। गहेमियां अपनी पाई में मन है, जिन गादी हो गई है. उन्हें अपनी गृहस्थी गे पुर्णन नहीं है। छोटी भाभी अपनी नौकरी में मरत है, पड़ी भाभी मारणों में ही दिन शीत जागा है। एर में ही पालतू नजर आ रही पी यहा।" भोर या गूग्री हंगी हंग दी। उगरी गारी पपा उस हमी में हमर गई थी। सय मने ही जिदमी थी, उगेनिन भेजोगी। मुनील उगे मेरे पाग हो गया था। यह भी मां-वार के यहाँ मे मेरे पास अपनी लागेमा गई पी।विसाग सोग स्नेह को मैं पटनाना नहीं पानी पी।और जाने सगी पी, तप गे उमर पहरे परापी रोनरमा गई पी। फिर भी मभी-कभी यह इतनी निरीह मगतीरिवाही माती। पटाक्षेप/१६ - - शाम की बात याद करके मन कैसा तो हो गया! वरामदे में आकर नेि धीरे से उसके गागरे का दरवाजा ठेला। यह खुला ही था । एक पलंग पर शुभा, विभा एक-दूसरे के गले में बांहें डालकर सो रही थीं। दूसरे पलंग पर लेटी छवि कुछ पढ़ रही थी। मैंने दूर से ही पहचान लिया, वह गौतम की डायरी थी। दीदी, आप!" वह चौंककर उठ बैठी। "सोई नहीं रे अभी तक, बारह बज रहे हैं।" "वाप रे, मुझे तो पताही नहीं चला। वैठिए न।" मेरे लिए जगह बनाते हुए उसने कहा। "इतनी अच्छी गाविताएं हैं गया? जरा देखू।" डायरी खोलकर देखा, पहले ही पृष्ठ पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा पा-'हेमा गुसुम फोगल करों में प्रणय का यह पुष्प सस्नेह समर्पित ।' कविताएं कुछ खास नहीं थीं। उन के उस दौर में सभी लोग गाविताएं लिखते हैं। जो नहीं लिख पाते वे पढ़ते हैं, वीस-इनकीरा वर्ष की भावुक उस थी, तभी तो छवि बारह बजे रात तक उन फटीचर कविताओं का रराग्रह परती रही थी। "बड़ी किस्मतवाली हैं मिरोज गौतम, जिनके लिए इतने प्यारे गीत लि. - २०/पटाक्षेप गए हैं।" मन कॉजी को उनट-नट करते हुए रहा । "हा दीदी, मेग्नि सब ये पहले पानी मिगेड गौतम बहा रह गई है।" "कंगेगी मला! सीन-तीन वम्चों को जन्म देने के औरासा वही रह जाती है ! यौर ये तो मापद मर्षिन भी है यहीं। हरि! गुर दिने रे नि भी मुविधा पाहिए।" "दीदी, मैं मुंदरता को बात नहीं कर रही थी। मेरा मानर है अर उनसे पहले पी-मी अंडरस्टैटिंग नहीं है । बहुत मदन गई है वह ।" "और यह बात तुम्हें मि. गौतम ने बनाई ! :, म तरह भी पोई अपने पर पी सात हर कहीं पता फिरता है।" मैंने पहा । "हर स्लिीमे सो नहीं रहता, पर जहां पोड़ी-बहल गहानुभूति मिलती है यहां तो चार जवान पर आ ही जाती है।" महानुभूति ' मैंने छवियोध्यान रो देया। इसे गौतम से गहानुभूति भर मे हो गई? अभी कल तर तो उन्हें गोद की गोली और 'मिस्टर गरेम' से उपनाम देती रही है पह, उनकी ऐगोनोमी नरल मारतो पो शिवप हमने-गते सोटपोट हो जाते, बलि मुझे होशंटना पाहता पा। डापरी फे पन्ने पलटते हुए मैं मंतिम पृष्ठ सर आ पपी पी। रपना शायद ताजाही पी, क्योकि मार मौर स्याही दोनों ही बरने-वाले-से पे. और मरमून भी: सहरा-ए-जिन्दगी में ठनी सार-सी तुम उनए पमन में फम्ने बहार-गो तुम। सुम सोन हो, कहां से आरर बरग गई हो, जनते हए जिगर पर भीनी पुहार-सी तुम। मपिता रामेरामान बहुत मामूली-सा है, परना समाजा गया किरगी कविता के लिए विको कारी दी गई है। पता नहीं, उसकी निगा उगार पड़ी भी है या नहीं। मन हमा पुपके से यह पेज पाइन। मेगिन कागतोकापर है, दोगरा भी निया नामस्ता है।

५ - रात-भर करवटें बदलती रही मैं। गौतम की कविताएं जैसी भी थीं, मेरे अतीत को कुरेद गई थीं, स्मृति-पटल पर अपने लिखे कई गीत नाच उठे थे। उन गीतों में क्या नहीं था-प्यार का सागर, आंसुओं की नदी, लगन की डोर, सपनों का झूला, आशा की डगर, कामना का नगर-किशोर कल्पनाओं का सम्पूर्ण संसार उन कविताओं में था। स्वांतःसुखाय ही थी वह काव्य साधना। मां का आतंक था ही इतना जबरदस्त । फिर भी पता नहीं कैसे एक दिन मेरी कॉपी उनके हाथ पड़ गई थी और मेरे देखते-देखते मेरे गीत अग्नि की भेंट चढ़ गए थे। उस भाग में सिर्फ कविताएं ही नहीं जली थीं, मन की अमराई भी झुलस गई थी। वसंत कितने ही दिनों तक वहां आने से कतराता रहा था। मां की आग्नेय दृष्टि से इतनी सहम गई थी मैं कि उस दिन रो भी नहीं पाई थी । आज वही रुलाई अपने समस्त आवेग के साथ फूट पड़ी थी। दुनिया में ऐसी लड़कियां भी हैं, जिनपर कविताएं लिखी जाती हैं, और मुझ जैसी भाग्यहीना भी है, जिसकी कोमल कल्पनाओं का निर्ममता से गला घोंट दिया गया था। पता नहीं दुनिया का हर अन्याय मेरे ही हिस्से में क्यों माता है ? इतनी इच्छा हुई कि एक बार फिर उसी उम्र में लौट जाऊं और जी खोलकर अपने गीत, अपनी कविताएं गाऊं, फिर से पुकारूं अपने जाने- . २२/ पटाक्षेप अनजाने प्रियतम की। अगले दो-चार दिनों में मेरे पाम यम यही साम या। जब भी समय मिनता, कारी लेकर वैट जाती और कविताओं की भूली-बिसरी पक्तियां जोड़-तोड़कर नियती रहती। आश्चयं तो इन दात पर हुमाफि दो-पार गीत पूरे के पूरै याद मा गए । गायद संतमन पीकिमी अंधरी गुमे दुर- कर बैठे हुए ये गीत बाहर आने की बाट जोह रहे थे। अगली बार जब गौतम आए, तो मुझे अपनी कॉपी की याद हो बाई । वीय इच्छा हुई कि उन्हे यतादू कि चाय-नाने के परे भी मेरा कुछ अस्तित्व है। छवि की कॉपियों और पुस्तकों की उपेक्षा करते हुए मैं जमगर वही बैठ गर्द। अपने काव्यपाठ की प्रम्नायना-मी करते हुए मैंने "आपरी पविताए हमने पड़ी थी, गौतम माय । मय, बहुत ही भावपूर्ण रचनाए वै 'हे है' करके हंग दिए। मायद उन्हें आने वाले सस्ट की कल्पना न पी। "कुछ गीत हमने भी लिगे हैं। गुनगे आप?" और उनकी सम्मति की परवाह किए बिना में अपनी कॉपी उठा नाई और सरन्नुम में मुनाने लगी। अपनी व्य और गीत यो रिमी तरह दगते हुए गौतम रविवाएं मुनते रहे । दाद देते रहे और पड़ी देगते रहे। दूसरा गीत ममानकर मैंने उनसरी राय जानने के लिए मिर उठाया, तो देया वह गरे हो गए हैं। "कविताओं में ऐमा गो गया भाभीनी, कि यार ही नहीं रहा-रान एक जगह दिनर पर भी जाना है।" उन्होंने क्षमामाचना के स्वर में रहा, अपना श्रीपग उठाया और सीढ़ियां उतर गए। छवि पता नहीं पर उठकर भीतर चली गई थी। स्कूटर की भाषा मृनते ही दौड़ी माई, "यह क्पा, गौतम साह्य पने गए? भार इतनी जल्दी?" "जाने से नहीं !" मैंने मृगी हमी हगते हुए कहा, "मंसार में ऐमा पटाक्षेप/२५ वि हुआ है आज तक जो चुपचाप बैठा दूसरों की कविताएं सुनता रहे ! चारे दस मिनट में ही मैदान छोड़कर भाग गए।" अपने इस विनोद पर मैं खुद ही हंसती रही, छवि ने साथ नहीं दिया। "मैं चाय बना रही थी।" उसने अस्फुट स्वर में कहा। "तो बना लो न ! तुम्हारे भाई साहब आते ही होंगे। मेरे हाथ की चाय पीते-पीते बोर हो गए होंगे, थोड़ा चेंज हो जाएगा।" न चाहते हुए भी मेरे स्वर में व्यंग्य की धार आ गई थी। गौतम ने मेरा काव्यपाठ पूरा नहीं सुना था, इसका मुझे दुःख नहीं था। पर छवि तो वहां बैठ सकती थी। आज ही चाय बनाने का कर्त्तव्य उसे क्यों याद आ गया? इतनी घटिया थीं मेरी कविताएं कि सुनी भी न जा सकें? क्या गौतम की कविताओं से भी ज्यादा ऊल-जलूल थीं? कविताओं की कॉपी जलाने के लिए इस वार मां को नहीं आना पड़ा, मैंने ही वह काम कर दिया। २४/पटाक्षेप ६ रविवार को उस दोपहरी मे घर एकदम सुनसान था। विधानसभा का सत्र एकदम सिर पर आ गया था, इसलिए पाना पाकर यह सचियालय चले गए थे । छवि लडकियों को पिक्चर दिखाने ले गई थी। घर में केवल मैं और पीयूप दो ही थे। समय काटे नहीं कट रहा था। वल्लभ भवन से यह लौटे तब पाच बज रहे थे। आते ही बोने, "वड़ा सूना-मूना लग रहा है । कहां गए मव लोग?" "पिक्चर।' "और तुम क्या यहां बेबी सिटिंग कर रही हो? तुम क्यों नहीं चली गई?" "वे लोग तो सडे मनाने गई हैं। मेरे लिए तो हफ्न के मन दिन वरावर है।" मैंने खीझकर कहा। "अरे, अरे, यह तो नाराज होने वाली बात हुई। पतो तुम्हे भी पिकचर दिया लाए।" "पिक्चर रहने दीजिए, पुमा लाएं तो वही बहुत है । हम तो उमरे लिए भी तरस गए हैं।" मैंने मुंह फलाकर कहा। "जो हुक्म करो सरकार।" इन्होंने नाटकीय अदाज में कहा और मेरा सारा गुस्सा उड़नछू। कुछ ही देर मे तयार होकर हम सोग निकल पड़े। पटाक्षेप/२५ स्कूटर पर बैठते हुए याद आया, कितने दिनों बाद हम लोग घूमने नि हैं। छवि के आने के बाद से निकलना हुआ ही नहीं। एक संकोच-सा है। उसके अकेले होने का अहसास रात में एकांत में भी पीछा नहीं छोई न्यू मार्केट में उतरकर हम लोगों ने छिटपुट शॉपिंग की और हाउस चले आए। रविवारीय भीड़ को चीरते हुए जब मैं ऊपर चढ़ थी, तव लड़कियों की याद हो आई। कॉफी हाउस आने का इतना शं दोनों को। महीने में एकाध बार तो यह हमें ले ही आते थे। तव शा खाना यहीं होता था, अव तो अर्से के बाद आना हुआ है। भीड़ तो थी, पर सौभाग्य से कोने वाली एक मेज़ हमें मिल गई वार वहां इत्मीनान से बैठ जाने के बाद मैंने पीयूप की ओर ध्यान । उसने मेरी सारी मेहनत पर पानी फेर दिया था। हवा में उड़ने सें. बालों का सिर पर एक टोप-सा हो गया था। काजल सारा फैल ग और दोनों मुट्ठियों से आंखें मसलकर उसने हाथ भी काले कर लि मैंने पर्स से रूमाल और बेबी पाउडर निकाला और उसे फिर से सं लगी। यह मनोयोग से मुझे देखते रहे । "पद्मा?" मैंने भौंहें ऊपर उठाई। "कभी-कभी इस छोकरे से बहुत रश्क होता है।" "क्यों भला?" "तुम जितना लाड़-दुलार इसका करती हो, जितना प्यार इसे दे इसका सौवां हिस्सा भी मुझे मिल जाता, तो मैं अपने को धन्य समझत "अव आप ऐसी ऊटपटांग बातें करेंगे, तो मैं उठकर चली जाऊं तुम तो नाराज़ होने लगती हो। मैं झूठ नहीं कह रहा। भी कहती है।" "कि पीयूप के आने से मम्मी का चिड़चिड़ापन बहुत कम है।" "अरे, "क्या?"

एक बहत तीया-मा जवाब मेरे होंठों तक आया था, लेकिन उसी समय ब.मी परिचित आवाज को गुन मेरे कान खड़े हो गए। "मुनिए, यह विभा की आवाज नहीं लग रही आपको ?" "तुम्हारा भी जवाब नहीं है पना। तुम्हें तो हर जगह अपनी राज- हमारियां ही नजर माती है । भगवान के लिए अब बोर मत करो। लडकियो को फिर छोटो और इन लडके की ओर देखो। पट्टा पूरे का पूरा दोसा उठाने की फिक मे है।" मैंने आशाकारी पत्नी की तरह ध्यान प्लेट की और केंद्रित किया। कुछ ही मिनट बीते होंगे और बगल वाले कमरे में हमी का फव्वारा छूटा । उसमें वि मी गनकती हंसी बिलकुल साफ सुनाई दे रही थी। उस हसी को बहुत दिनों बाद मुना था, शायद सुशील के जाने के बाद पहली बार । इस बार मैंने उनसे कुछ नहीं कहा। मैं उठी और सारे एटीकेट्स को तिलांजलि देकर बाहर वाले छोटे कमरे में भाका । मेरा अदाज गलत नहीं या। छवि और विमा तया गौतम और शुभा आमने-मामने सोफों पर बैठे पाबीच वानी मेज पर ढेर मारीप्टें पड़ी थी। "यरे आप?" मव लोगों ने मुझे एकसाथ देगा। "यही तो मैं भी सोच रही हूं। आप लोग यहां कैसे ?" "हम सोग रंगमहल मे निकले थे कि आप मिल गए। हमे जबरदस्ती यहां ले आए, माने ही नहीं।" छवि ने सफाई पेश की। "माभीजी, आप भी कपनी दीजिए न?" गौतम साहब इतनी देर बाद फूटे। "आप क्या समझ रहे हैं, मैं अकेली ही आई हूं यहा? नहीं भाई, अपनी पंपनी तो अपने साप है।" "तो भाई साहब को भी बुला लेते हैं न यहा। काफी जगह तो है।" "नो, नो, होट हिस्टयं योरसेल्फ," मैंने सख्ती से कहा और अबाउट टनं मर गई। यह परेगान मे इधर-उधर देख रहे थे। मुझे देखते ही मुमला पड़े, पटाक्षेप/२७ 'वालों की डांट खाते थे । कड़की के दिनों में एम०जी० रोड या नेहरू पार्क से भी जी बहला लेते थे। उनके साथ हर जगह अच्छी लगने लगती थी। उनकी बोलचाल, उनकी वेशभूपा सबका अपना आकर्षण था। उन दिनों शोखर दा मेरे आदर्श पुरुप थे । (शायद वे एकमात्र पुरुप थे जिनके संपर्क में आने का मुझे अवसर मिला था।) उनके किस्से बड़े मजेदार होते थे । और ठहाके जानदार । हम दोनों बहनें मुग्ध श्रोताओं की भूमिका अदा करती थीं। अपनी गुफा संस्कृति का कुछ ऐसा प्रभाव था कि वक्त पर कोई बात सूझती ही नहीं थी। कभी-कभी कोई मजेदार लतीफा अश्लीलता की सीमा को छूने लगता था, सारी मंडली हो- हो फरके हंस पड़ती। हम लोग सिर्फ मुस्कराकर रह जातीं। तब शेखर दा नाटकीय अंदाज में कहते, "ए लड़कियो, ज़रा अपनी खोल से बाहर आओ, जरा खुले में उड़ना सीखो। किस युग में जी रही हो ! इस कस्वाई मनोवृत्ति को छोड़ो और जरा खुलकर सांस लेना सीखो।" कस्बाई मनोवृत्ति उनका प्रिय शब्द था जो मुझे गाली-सा लगता, मैं तिलमिला उठती थी। उनके अभिनय पर सारी मंडली एक बार फिर खिल- खिलाकर हंस पड़ती थी। शर्म और अपमान से मेरे आंसू निकल आते। "पदम ! रो रही हो तुम ! क्या हो गया तुम्हें ? क्या मैंने कोई बहुत कड़ी वात कह दी ! आई ऐम वेरी सॉरी। रियली आई ऐम..." मैंने सिर उठाकर देखा, मेरा तकिया आंसुओं से भीग गया था। घड़ी. रात के तीन बजा रही थी, और यह प्यार से मेरी पीठ पर, माथे पर हाथ फेर रहे थे। उनके स्वर में व्यग्रता थी और आंखों से स्नेह छलका पड़ रहा . - था। कभी-कभी सोचती हूं-यह इतने अच्छे क्यों हैं ? ३२/ पटाक्षेप प-२

सोपरेगान हो गई ह इनकी बॉसिंग से दीदी।" दिएकदम फट
रमाका इनरी नजर में आवारा है । सब प्रोफमर्स बदमाग है।
भी यातकरी, पन देने सगते है।"
। पटार भी नहीं देती एक गर? हो कि अपनी पद में
ने एक बार यमहाप यायों में मेरी ओर देगा। होठ छपहले रे
राए, फिर एकाएक उठरर वह अंदर पनी गई।
गाघाते हुए मुझे याद आपा, मैंने एपि मे पहा, "मुगीना पत्र
तुम्हारी दरान में रय दिया है।"
मी निविप्तता में पावस-दाल मिलाती रही। नगरीयों

मुझसे कहानी का जिक्र भी नहीं किया था। मुझे गौतम पर क्रोध आ रहा था, जो छवि की कहानी के लिए यहां तक भागा आया था, जब कि मेरे दो-चार गीत भी सुनने के लिए उस दिन उसके पास समय नहीं था। "आ गईं शायद ।" गौतम की वात ने मुझे चौंका दिया। छवि सीढ़ियां चढ़ रही थी। "कहां रह गई थीं?" गौतम ने ही पूछा, "कॉलेज से तो कब की चली हो।" "बसों का चक्कर है न ! घंटा-भर तो प्रतीक्षा में ही बीत जाता है।" उसने थकी-थकी आवाज़ में कहा । "यह अपनी कहानी संभालो। अच्छा भाभीजी, अब पानी पिलाइए, चला जाए !" गौतम ने उठने की मुद्रा में कहा । ड्राइंग रूम पार कर रही थी, सुना गौतम पूछ रहा है, "फोन कर दिया था, फिर भी रुकी क्यों नहीं?" छवि का उत्तर सुनने के लिए मैं बड़ी देर तक सांस रोके दरवाजे की ओट में खड़ी रही। जब कुछ सुनाई नहीं दिया, तो किचेन में चली गई । वहुत पुरानी एक बात याद आई। एक वार इन्होंने मुझे सुशील के बेडरूम की खिड़की से कान लगाए हुए पकड़ लिया था। पहले तो गुस्से की रौ में काफी कुछ कह गए थे, फिर वाद में समझाया था, "देखो पद्मा, छिपकर सुनने में अपनी दुराई ही सुन पाता है आदमी । वेकार अपना मन खराब करने से फायदा ?" पानी लेकर लौटी तो देखा, गौतम गैलरी से टिका हुआ खड़ा है और पूछ रहा है, "मानसिंह अब तो परेशान नहीं करता?" "नहीं" छवि ने हौले कहा। "और मिश्रा को ज्यादा लिफ्ट मत देना । अब प्रोफेसर हो गया है तो क्या, नंबरी वदमाश है वह।" छवि कुछ नहीं बोली, उसी तरह सिर झुकाए बैठी रही। गौतम के जाते ही मैंने कहा, "यह सज्जन तो तुम्हारे लोकल गार्जियन बने हुए हैं। बड़ा रोव मार रहे हैं !" ३४/ पटाक्षेप "मैं सो परेशान हो गई हं हनी सिग से दीदी।" वि एकदम फट पड़ी, "हर महमा इनकी नजर में मापारा है। गर प्रोरेगसं बदमाग है । किमीगे भी बात करो, उपदेग देन सगते हैं।" "तो फटकार क्यों नहीं देती एक गार? हो कि मनी पर में जमने एक बार ममहाप आगों से मेरी मोर देया। होंठ कुछ गहने के लिए फहराए, फिर एराएक उटकर वह अंदर पनी गई। पाना पाते हुए मुझे याद आया, मैंने एवि से कहा, "मुगील का पत्र मामा है, तुम्हारी राज में रण दिया है।" वह उनी निलिप्तता से पायल-दाल मिलाती रही। न उनकी मांगों गे पनी पी फिरणे पटी, न गातो पर गुलाय उग पाए। "एक पत्र हम लोगों के पास भी आया है। यह परेगान है । गुमने कर से पत्र नहीं दिया उसे?" "बर रोज-रोज लियूं भी करा?" उसने धीरे से रहा। "यह बात हम मोग कहें तो गोमा देती है यि ! तुम्हारी उपगी सहनिया सो दिन में दो-दो चिट्टियो लिय मेती हैं।" मैंने हंसते हुए कहा, "कम से कम यही सोच लिया करो कि वहां वह निपट अकेला है।" "मैं यहाँ अरेसी नहीं हू ?" उसने सापकर रहा। उसकी बात मुझे यही की तरह सगी। मेरा सारा साइप्यार, सारी ममता उम गम के कारण पपं हो गई पी। पिने शायद अपनी भून महमूग पी। नरम स्वर में योसी, "मार अभी गोम के लिए यह रही पी सैटरी। महल मजदूरी समा सीजिए कि उसे लिपट दे रही हूं। कभी-कभी तो सनी कोरा होती है, पर माकर जाना पड़ता है। "ऐगी सोनमी मजबूरी है ? और मरतो वह मना भादमी तुम्हारा नाम भी सेने मगा है।" "यह भी मेरी ही पेपरपी है। मैंने सबमे रह रहा है कि वह मेरे परे भाई हैं।' "क्यों?" "दरअसल दीदी, घर से बाहर निकलो, खासकर कॉलेज जाओ, तो सिर पर किसीका साया बहुत ज़रूरी है। सी तरह की बातें होती हैं, और सव तो भाई साहब से कही नहीं जा सकतीं।" "शायद तुम ठीक कहती हो।" मैंने एक उसांस के साथ कहा, "मुझे तो इन बातों का अनुभव नहीं है। हमारे न कोई भाई था, न हमें वनाने की इजाजत थी। और कॉलेज मैं गई ही कितने दिन । मुश्किल से साल- . . भर।" "तो आपने वी०ए० फिर प्राइवेट किया है, क्यों?" "छोटी वहन की भूल का प्रायश्चित्त करना पड़ा मुझे। उसने लव मैरिज की थी, मौसी के देवर से।" "आप तो वताया करती हैं न, मांजी बहुत स्ट्रिक्ट (कठोर) थीं?" "स्ट्रिक्ट तो थीं। पूरे कस्बे में उनका दवदवा था। फिर भी रमा को वह नहीं रोक सकीं। रोकने का मौका ही न मिला। उन्हें तो सीधे शादी की खबर मिली थी।" "वहुत बौखलाई होंगी न?" "बहुत ज्यादा। सारा गुस्सा मुझपर ही उतरता था। उन्हें यह लगता रहा कि मैंने जान-बूझकर उन्हें अंधेरे में रखा, जब कि सचाई यह कि मैंने इस बात की कल्पना भी न की थी। मौसी की नाक के नीचे स कुछ होता रहा, पर उन्हें भी कुछ पता न चला। इतनी छोटी-सी उम्र इतना बड़ा साहस कर जाएगी रमा, किसीने सोचा भी नहीं था।" अनज ही मेरी आवाज में तल्खी आ गई थी। "दीदी, पता नहीं हमारे बुजुर्गों को लव मैरिज से इतनी एलर्जी : है ?" छवि कह रही थी, "मैंने तो एकाध वार ही उन लोगों को देखा पर इतना कह सकती हूं कि रमा दीदी के हसबैंड उनसे हर बात में स् रियर हैं। आप ही बताइए, उनसे अच्छा लड़का ढूंढ़ सकती थीं मां - । - ३६/पटाक्षेप इतनी अच्छी पर्मनानटी है, रमा दीदी तो उनके मानने पुछ भी नहीं है।" पीचूप जाग गया था, इमनिए पि राउटरर जाना पड़ा, नहीं तो पना नही रितनी देर बोलती रहती। सभी गुनगुमटी रहती है मौर ममी बोलने पर पाएगी, तो राने का नाम ही नहीं मैगी। भोर, मेरा तो गिर पकराने लगा था। परामर - "तुम्हारे साथ मुश्किल तो यही है पद्मा, कि तुम्हें वहम-सा हो जाता है कि हर कोई तुम्हारे विरुद्ध पड्यंत्र रच रहा है।" यह कह रहे थे। "मैं आपसे सफाई तो मांग नहीं रही," मैंने तल्खी से कहा। "लेकिन मैं तो सफाई देना चाहता हूं। पारा-सी बात को लेकर रात- भर रोती रहोगी, उसमें तो कोई तुक नहीं है। पता नहीं कितनी नदियों का पानी आकर तुम्हारी आंखों में समा गया है, कभी सूखता ही नहीं" अच्छा, अव चटपट तैयार हो जाओ।" "कह दिया न, मुझे नहीं जाना।" "देखो, अब जरा-सी बात को प्रेस्टीज इशू मत बना लिया करो। हरी अप। सवा सात ऑलरेडी बज चुके हैं। देर से पहुंचने में तो कोई चार्म नहीं है।" में पत्थर की तरह बैठी रही। बात जरा-सी थी भी और नहीं भी। कम से कम मेरे लिए तो वह पारा-सी बात नहीं थी। शुभा-विभा के स्कूल में वार्षिकोत्सव चल रहा था। पीयूष को दो दिन से बुखार था, इसलिए मैं कार्यक्रम देखने नहीं जा सकी। घर में बैठे-बैठे ही अपनी लाड़ली का सजा-संवरा रूप कल्पना में देखती रही थी। शुभा के गीत को दोहराती रही थी। किंतु आज पुरस्कार-वितरण - ३८/पटाक्षेप 1 पा, दोनों को सीन-तीन, पार-पार पुरसार मिलने पाने पेरितनी हगरत मे पहा पाउन सोगों ने, 'पारा, मात्र तो माप लोग आएगे न? आठ पने कार्यत्रम गुरू होगा । यम, दो घंटे का तो पात्रम है।' पन्होंने पूटते ही यह दिया, 'मैं या जाऊंगा बेटी। मम्मी नहीं आ पाएगी। पणू पीतवीयत टीर नहीं है।" दोनों के पहरे उतर गए थे। सना गुग्गा आपा मो, कम से कम उना दिल तो गोरते। याद में मुछ भी यात मनाई जागती पी।फिर दो घंटे के लिए मैं पली भी जाती, तो ऐगी पोई प्रलप तो नही था माती। मुगार तो पीयूप का गुबह ही नार्मम हो गया पा। मेरिन उन्होंने मागे पूछने पी भी जरूरत नहीं गमगी और भय भाषण रे पटार/ १० - - "दीदी," मैंने सिर उठाकर देखा, छवि मेरे पीछे खड़ी थी, "आप हो आइए दीदी । पीयूप को मैं संभाल लूंगी। अब उतना बुखार भी नहीं।" "नहीं, रहने दे, अव इच्छा नही हो रही।" मैंने रुंधे गले से कहा। "अपने लिए न सही, लेकिन लड़कियों के लिए तो आपको जाना होगा। आपको मेरी कसम है। और इतना कहकर ही वह रुकी नहीं। कंघी लेकर खुद उसने मेरा जूड़ा बनाया। मैं मुंह-हाथ धोकर आई। तब तक उसने मेरे लिए अपनी •. कोटा ज़री की साड़ी, शाल सव कुछ निकालकर रख दिया था। मन ही मन उवलती रही मैं । यही बात वह पहले भी तो कह सकती थी। तब इतना नाटक तो न होता । अव अपनी भलमनसाहत दिखाकर जैसे मुझे शर्मिदा करना ही उसका उद्देश्य था। लड़कियों की उदासी का खयाल न होता, तो उसके सारे अनुग्रह ठुकराकर घर में बैठी रहती मैं, कहीं नहीं जाती। अपने बच्चों की खुशी देखने जा रहे थे हम लोग और शकलें ऐसी बना ली थीं जैसे मातमपुर्सी पर जा रहे हों। वहां भी यह गुमसुम वने रहे । जब स्टेज पर अध्यक्ष का भाषण हो रहा था, तब इन्होंने पहली बार मुंह खोला "पहले से पता होता कि इतनी देर हो जाएगी, तो शर्माजी की नीलू से कर आते। छवि के पास बैठ लेती थोड़ी देर।" ४०/पटाक्षेप इना बुरा नल! यहाँ दहर भी घर की ही बातमोर रहे हैं। कापन समाल होते ही नकहा, "बापर चनिए। बचानकर स्कूल दा ने नाबालो।" पहरे में पता होता तो घर में इदना म्हा- भारत क्यों मचाती? बानी नजीबाती और पनी जानौं। इनानों में नदी मंदो महनियों को लेकर पर पहुंची, तद यह ड्राइंस रूम में बैठे पड़ रहे थे। हदेव ही दोने, “दन मिनिट प्नी"और बदटक हन वाव दरें, इन्होंने हा दोनों का एक फोटो ने निरा रिदो-चार अत्तर-अलप पोरंजन लड़कियों के कोर मीन ने डाले। तिने नान यह कमरा मुगीन ने भेनाया। विगमविगतका पर इनका सयोग करने थे हन नाग । कान का अवसर दिप है, यह इन्हें रात को म्याद दरे भी पाद हा, यह जानकर अच्छा लगा। इनका मूड मी बदमान कीमा ठीक हो गया था। प्रसन्न कन ने कांचे दना नाई नौरहरु चारों, नि हम चारों से एलान करते रहें। पता नहीं, तिने दिनों बाद यह मुमोकादाया। ना कि मेरा दिखरा हुआ पर हिर कुड़ आपा है। मंत्रा दो या कि छवि जाग रही होगी। कम ने कन इस गोर-गर से तो जान हो जाएगी। नारियों के इनाम देखेगी, उन्हें बधाइयां देती। पर देशा कुछ नहीं हुना, तो मन सट्टा हो गया। मन इन कहा मी, "टम नड़के को तो बांखों पर रखनीहूं। क्या सका इतना पत्र नहीं पा?" "हया वाव का बच्चा पहलू देदा करो पड़ा।" इन्होंने बाने नौम्य बंदार में रहा, "दुद की मात्रा इसने दहन कम हो जाती है। यही सोच तो कि दो राजों से जाग यही है देवारी। दान निस्कित होकर सोई होगी, क्मोकि दुखार नहीं है । और तिर रात भी तो हो गई है।" 'टीक है, ऐसा हो नहीं, मैंने काँचे को उसने दुर भोत्रा रात गए किसी भी विसपर वहन करने की हिम्मत नहीं पोरी पटा|४१ .११ "दीदी, मैं घर जाना चाहती हूं।" छवि का यह प्रस्ताव अप्रत्याशित रूप में मेरे सामने आया था। घर अर्थात् मां का घर। यह घर तो वेटिंग रूम है । सुशील के आने तक किसी तरह समय काटने का स्थान है। मन इतना खराव हो गया कि कारण पूछने की इच्छा नहीं हुई । उसीने बताया, "रात सपने में मां को देखा था; बहुत बीमार है । एक बार देखकर लौट आऊंगी।" "ठीक है, भाई साहव तुम्हारे क्या कहते हैं देख लूं । आखिर जाना तो उन्हींकी मर्जी से होगा न !" मैंने रूखा-सा जवाब दे दिया। यह सपने वाली बात मेरे साथ तो चल गई, लेकिन यह उसपर विश्वास कर लेंगे, यह असंभव था। दो-तीन दिनों से छवि सूजी-सूजी आंखें और उदास-उदास चेहरा लिए घूम रही है, यह क्या उनसे छिपा हुआ है ! मुझे तो डर था, उसके इस आकस्मिक निर्णय का दोष मुझपर न थोप दिया जाए। पर वैसा कुछ नहीं हुआ, इन्होंने बड़ी शांति से अपनी स्वीकृति दे दी और मैंने राहत की सांस ली। मैं भी कुछ दिनों के लिए जरा निश्चित होकर रहना चाहती थी। चौवीसों घंटे घर में किसी तीसरे व्यक्ति की उपस्थिति मन पर भार बनने लगी थी। नौकरी लगने तक सुशील भी हम - ४२/पटाक्षेप लोगों के साथ ही रहते थे। पर उनके साथ यह समस्या नहीं थी। छवि को लेकर हर वार मन मे यही सकोच बना रहता है-वेचारी अकेली है, उसका पति यहा नहीं है। जव एक बार जाना तय हो गया तो मैं अपनी सारी कड आहट भूल- कर उसकी तैयारी में जुट गई। पता नहीं क्यों मन में हमेशा एक डर-सा रहता है। कोई मुझे गलत न ममझ ले। दिन-दिन-भर आच के सामने बैठ- कर मैंने उसके भाई-भतीजों के लिए मिठाइया बनाई; रात-रात भर जाग- कर पीयूप के लिए सूट सीती रही। यरिक छवि ने एकाध बार कहा भी, "दीदी, कितनी मेहनत कर रही है आप ! मुझे, लगता है, मेरे जाते ही आप बीमार पड़ने वाली हैं।" कोई इतना-भर कह देता है, तो सारी मेहनत सफल हो जाती है। सारी थकान दूर हो जाती है । लेकिन यह भी हमेशा कहा नसीव होता जाने वाले दिन छवि जब अपनी पुस्तके मेज़ से उठाकर अलमारी में रख रही थी, तो मुझे याद आया। मैंने कहा, "छवि, गौतम की कोई कितावे होगी तो अलग रख देना। किसी दिन मागेंगे, तो मैं कहाँ ढूंढ़ती फिरूंगी।" "गौतम का ट्रांसफर हो गया है, बिलासपुर।" यह वॉश बेसिन के सामने खड़े शेव कर रहे थे, वही से बोले । "आपसे किसने बताया?" "उसका फोन आया था।" "एक बार घर आकर तो बता सकता था। यों तो दो-दो घंटे घोर करता रहा है।" सचमुच इतना गुस्सा आ रहा था मुझे। "वह आए थे दीदी, आप लोग घर पर नहीं थे।" छवि ने होले से बताया। "अरे, तो कब जा रहे हैं वे लोग किसी दिन याने पर ही बुला लेते उन्हे, विद फैलिमी।" मेरा गुस्सा भाप बनकर उड़ गया था और अब मुझे पटाक्षेप/४३ हस्य धर्म की चिंता हो रही थी। "अभी दो-तीन दिन तो मैं बाहर जा रहा हूं। लौटकर आऊंगा, तब देखी जाएगी।" इन्होंने कहा। साथ के लिए टिफिन भर रही थी मैं, अचानक जैसे मुझे ज्ञान प्राप्त हो गया। छवि रानी की माताजी एकाएक सपने में क्यों अवतरित हो गई, इसका रहस्य मेरे सामने सूर्य के प्रकाश की तरह स्पष्ट हो गया। ४४/पटाक्षेप १२ मैंने तो सोचा था कि छवि के जाने के बाद मैं अपने घर में निश्चित होकर रह सकूगो, किंतु उस समय पीयूप की बात मैंने नही सोची थी। उसके जाते ही घर इतना सूना हो जाएगा, दिन इतने लवे हो जाएगे, इसका गुमान ही नहीं था। लड़कियां खा-पोकर स्कूल चली जाती, तो एकांत जैसे मुझे लौलने को दौड़ने लगा। अजीब-अजीव आवाजे मेरा पीछा करने लगती। कभी लगता, झूले मे पीयूप कुनमुना रहा है और मैं दौडकर उसे उठाने जाती, तब खाली झूला मेरा मुह चिढाने लगता। कभी लगता, छवि सिर- हाने खड़ी होकर कह रही है-दीदी ! चाय ले लीजिए। सिर उठाकर देखती तो सिर्फ घू-धू करता सीलिंग फैन ही नजर आता। स्नेह के धागो में इतनी लिपट गई हू, खुद मुझे ही पता न था । लड़किया भी बहुत उदास हो गई थी। बहुत दिनो से एक भैया की फरमाइश थी उनकी, यह इस तरह अनायास की पूरी हो गई थी। चाची से भी अच्छी-खासी दोस्ती हो गई थी उनकी । उनके बिना वह कमरा खूब बड़ा-बड़ा लगने लगा था । और तो और, पापा भी उन लोगो के साथ चले गए थे । शुभा-विभा का वश चलता, तो शायद सिर्फ सोने के लिए ही घर पर आती। दो-तीन दिन तो मैंने बिस्तर पर पड़े-पड़े ही काट लिए। दो-तीन । पटाक्षेप/४५ न्यास पूरे के पूरे पढ़ गई मैं। चौथे दिन सोचा, अव कुछ हाथ-पांव लाना चाहिए। कुछ नहीं तो बगल वाले कमरे की सज्जा ही बदल दी ए । झूले को फोल्ड करके मचान पर डाल दिया जाए, तो दोनों पलंग स-पास आ जाएंगे। फिर यह कमरा उतना सूना नहीं लगेगा। काम इतना आसान नहीं था, जितना सोचा था। कमरे में सिर्फ झूला ही तो नहीं था। ग्राइप वाटर और टीथिंग सीरप की खाली शीशियां थीं, पुरानी नैपीज थीं, खिलौने थे, पाउडर के पुराने डिब्बे थे-इन सवको समे- टते-समेटते हांफ उठी मैं । हर चीज़ का स्पर्श पीयूष की याद दिला जाता था। झूले की मसहरी खोलते हुए तो मुझे रुलाई फूट पड़ी। किसी तरह मैंने मसहरी उतारी। नन्ही रेशमी रजाई धूप दिखाने के लिए एक ओर रख दी। फिर गद्दा समेटा"और यह क्या? गद्दा और दरी के बीच में एक सफेद कागज़ पड़ा था मुडा-तुड़ा-सा। बहुत पुरानी-सी आदत है यह। कागज का कोई भी टुकड़ा मिले । मैं पढ़े बिना नहीं रहती। मां के राज्य में घर में सिर्फ 'कल्याण' आता था। दैनिक अखवार भी हमारी नज़रों से दूर रखा जाता था। क्योंकि अक्सर उसमें भी चटपटी खबरें होती थीं। तब वाज़ार से जो भी सौदा आता, हम तत्परता से उसे खोलने बैठ जातीं। असली आकर्षण होता था उस कागज में जिसमें यह सौदा आया था। इन अखवारी कागजों ने हमें फिल्मी दुनिया की सैर कराई है, चुटकुले सुनाए हैं, बलात्कार और आत्महत्याओं की च पटी खबरें सुनाई हैं। मां को हमारी इस कारस्तानी का पता नहीं चल नहीं तो शायद उनपर भी वैन लग जाता। अव तो घर में पढ़ने के लिए इतना सब होता है, फिर भी पुर आदत नहीं जाती। हथेली से दवा-दवाकर उस कागज़ को सीधा किया पलंग पर बैठकर पढ़ने लगी। पढ़ते हुए हर पंक्ति के साथ मेरा खून होता जा रहा था। लिखा था: छवि, कल रात की उन्मत्तता के लिए क्षमा चाहता हूं। ऐसे क ४६ / पटाक्षेप क्षण जिन्दगी में कभी-कभार आ ही जाते हैं। उसके लिए अपने-आपको कोसना व्यर्थ है, यह भी जानता हूं। क्षमा मिर्फ इसलिए कि मैं तुमसे बड़ा था, उम्र में भी और अनुभव से भी । मुझे ही अक्ल से काम लेना था। पिछले दिनों ट्रांसफर रुकवाने के चक्कर में बहुत हाथ-पांव मारता रहा। भोपाल महंगा सही, यहां पत्नी के पास छोटी-सी नौकरी थी। मेरे मध्यवर्गीय जीवन में उसका बहुत बड़ा सहारा था। सब कुछ छोड़-छाड़कर नई जगह सेटिल होने को कल्पना कंपा देती है। लेकिन मेरा चाहा नहीं हो सका। बहुत ही भारी मन से कल तुम लोगों से विदा लेने पहुंचा था। तुम्हे अकेली देखकर कुछ अधिक हो भावुक हो उठा में, एक अनाम भावात्मक रिश्ता तुम्हारे साथ स्थापित हो रहा था मेरा, यह कल ही जाना और उसी आवेग मे घोड़ा बहक गया। तव पता नहीं था कि तुम मानसिक रूप से इतनी त्रस्त हो। पति का लम्बा प्रवास, घर का बोझिल वातावरण और बच्चे को बीमारी-इन सबने मिलकर तुम्हे किस तरह हिला दिया था, यह तो तव जाना जब तुम परकटे पक्षी की तरह मेरी गोद मे सिर रखकर फफककर रो पड़ी। मैं मनुष्य हूं, पत्यर नही। तव भूल गया था कि मैं किमीका पति हूं, पिता हूं। तुम किसीको पली हो, मो हो। वह तो एक भावावेग था, रोजमर्रा की जिंदगी में प्रवेश करते ही उतर गया है । मोचता हू" दि "ग। दरवाजे की घटी इतनी ककंश कभी नहीं लगी थी। उसी अस्तव्यस्त भाव से जाकर दरवाजा खोला मैंने। सामने यह खड़े थे हाथ में अटैची लिए। (" "आ""प "क्यों पहचान में नहीं आ रहा हूं क्या? दो ही दिन में इतना बदल पटाक्षेप/४७ - गया हूं? और तुम्हारी शक्ल ऐसी क्यों हो रही है ? घर पर तो सब ठीक- ठाक है न !"किसकी चिट्ठी आई है यह ? मांजी की?" उन्होंने व्यग्रता से पत्र मेरे हाथ से ले लिया। सरसरी निगाह से उसे पढ़ा, फिर टुकड़े-टुकड़े करके हवा में उछाल दिया। "यह क्या किया आपने ?" मैंने तैश में आकर कहा। "वही किया जो छवि को बहुत पहले करना चाहिए था।" इन्होंने शांत स्वर में उत्तर दिया। "लेकिन कम से कम एक वार" "जवाव-तलव करना चाहती हो न? अव भी कर लेना।" मैं गवाही दे दूंगा। फिर अटैची उठाकर भीतर जाते हुए बोले, "चौदह घंटे का सफर करके आया हूं। चाय-वाय तो पूछो।" चाय तो खैर मैंने बनाई ही। फिर नहाने के लिए पानी भी गरम किया। खाना भी बनाया, खाना खाकर बड़े इत्मीनान से तैयार होते हुए वोले, "ऑफिस हो आऊं ज़रा। आधे दिन की सी० एल० ही वच जाएगी।" इतनी हैरत हुई मुझे। इतनी बड़ी बात हो गई और इन्हें अपनी सी० एल० की पड़ी है। सच, इनकी थाह लेना मुश्किल है। शाम को दफ्तर से लौटे, तो लड़कियां घेरकर बैठ गई, "पापा, हमारे लिए क्या लाए ?" "अरे, मम्मी ने क्या अब तक तुम्हें बताया नहीं।" फिर भीतर आकर वोले, “मेरी अटैची अभी तक बाहर ही पड़ी है पद्मा, ड्राइंग रूम में ! ऐसी क्या नाराजी है भई !" फिर डाइनिंग टेवुल पर सारा सामान खोलकर बैठ गए। दालमोठ- पेठे के पांच-छ: पैकेट थे, अलग-अलग प्रकार के। गुड़िया थी, खिलौने थे। साड़ी और मीनाकारी वाली चूड़ियां थीं। पुस्तकें थीं । वह इत्मीनान से बैठे समझाते रहे कि कौन-सी वस्तु वह खरीदकर लाए हैं, कौन-सी समधीजी ने भेजी है। लड़कियां पास बैठी किलकती रहीं, पीयूप की याद आते ही उन ४८/पटाक्षेप , । . ३प लोगों का गला भर आया था। और जब इन्होंने बतलाया था कि वहां से चलने पर साथ आने के लिए वह खूब रोया था, तो एक तरह से अच्छा भी लगा था। मैं नितात उदासीन होकर उनकी बातें सुनती रही। अनमने भाव से चीजे छू-छुकर मैंने वापस रख दीं। उस समय सोच-सोचकर मेरा दिमाग सुन्न हुआ जा रहा था। दालमोठ की किस्मों की चर्चा जरा अच्छी नहीं लग रही थी। प्रसंग की गम्भीरता को देखते हुए इनकी सारी बातें ही बड़ी हास्यास्पद लग रही थीं। लेकिन रात वेडरूम में प्रवेश करने पर देखा, यह सब दिखावा था। वे भी उतनी ही बुरी तरह पाहत हुए थे। रोनों हाथों में सिर दिए पता नहीं कितनी देर अपनी मेज़ के पास बैठे रहे । मैं अपने बिस्तर पर पडे-पड़े देखती रही । आखिर जव आधी रात हो चली तो मुझसे नही रहा गया। "सोएगे नहीं क्या आज ! रात-भर के जगे हुए हैं।" मैंने प्यार से सिर पर हाथ फेरते हुए कहा। उन्होंने सिर ऊपर उठाया, आंखों में उदासी के गहरे बादल थे। "पमा !" थकी-सी बावाज मे वोले, "बड़ी उलझन में फंस गया हूं। भाज दफ्तर में भी जरा मन नहीं लगा । निरन्तर वही एक बात सोच रहा हूं।" "हमारे सोचने-विचारने से बीते क्षण लोट तो मकते नही। फिर परेशान होने से फायदा?" मैंने कुछ कहने की गरज से कहा। "एक बात मेरे मन मे आई है पना।" "क्या?" "हमें भूल जाना होगा कि इस तरह का कोई पत्र हमने देखा था। कर सकोगी इतना?" "वाह, इतनी देर सोचकर यही हल निकाला है?" "यह कोई बहुत मुशिल काम है पद्या?" "इससे क्या होगा?" मैंने वही पास एक स्टूल पर बेटते हुए रूखी आवाज में कहा पटाक्षेप ४६ ।

-- "क्या होगा यह तो नहीं कह सकता, परन्तु याद रखने में दुःख ही दुःख , इतना जानता हूं। छवि को अगर किसी दिन पता चला, तो वह कभी मारे सामने सिर नहीं उठा सकेगी। सुशील अगर जान जाएगा, तो जिंदगी- भर सुख की नींद नहीं सो सकेगा। इतना बड़ा अन्याय मुझसे तो नहीं हो सकेगा।" "न्याय-अन्याय तो मैं जानती नहीं, लेकिन अगर मेरे भूलने से छवि का कलंक दूर हो जाता है, तो यही सही।" मेरे मन में धीरे-धीरे रोप उफनने लगा था। "यह कलंक-वलंक कहां की बातें ले वैठी तुम, हिश, इट इज़ ऑल हंवग "मैं छवि का पक्ष नहीं ले रहा पद्मा; लेकिन उसे कटघरे में रखने से पहले एक बार सोचो। क्या तुम विश्वास के साथ कह सकती हो कि सुशील वहां एकदम संन्यासी बना हुआ है ? इतने स्वच्छंद समाज में इतने सारे प्रलोभनों के बीच उसका मन एक वार भी नहीं डोला होगा? क्या तुम दावे के साथ कह सकती हो?" उनके तमतमाए चेहरे को एकटक देखते हुए मैंने बस इतना कहा, "काश, छवि सुन पाती, आप कितनी अच्छी पैरवी कर रहे हैं उसकी !" मेरे व्यंग्य से मर्माहत होते हुए उन्होंने कहा, "मैं किसीकी पैरवी नही कर रहा । सिर्फ इतना जानता हूं कि देश हो या विदेश, मर्द हो या औरत अकेलापन सबको एक-सा सालता है। यह मैं किसी और के अनुभव की बा नहीं कर रहा हूं। वही बात कर रहा हूं, जिसे तुम्हारी साहित्यिक भा में भोगा हुआ यथार्थ कहते हैं।" "अच्छा, यह यथार्थ, यह अकेलेपन का अहसास आपके हिस्से में पड़ा?" "तव जव तुम अपनी तीन हड्डियां तुड़वाकर पांच महीने तक अस्प में पड़ी थीं। जय मैं दफ्तर, घर और अस्पताल में चकरघिन्नी की घूमता था। तुम्हें शायद वह सब इतनी आत्यंतिकता के साथ याद लेकिन मैं तो नहीं भूल सकता। तुम्हारे साहित्य में संत्रास, कुंठा- ५०/ पटाक्षेप कुछ होता है, सब मैंने उन दिनों अनुभव किया है। घर में रहता तो खाली घर काटने को दौड़ता, क्योंकि मांजी बच्चों को लेकर चली गई थी। दफ्तर जाता तो सैकड़ों चिन्ताएं किसी जिद्दी बच्चे की तरह साय लग जाती। शाम होती तो अस्पताल का रुख करता, अपनी स्नेहमयी पत्नी से मिलने। लेकिन वहां सामना होता एक बीमार, चिड़चिड़ी, ईर्ष्यालु औरत से । उससे मिलने की कल्पना से ही मन कापने लगता। हॉस्पिटल के फाटक पर पहुंच. कर सोचता, उत्टे पैरों भाग जाऊं और किसी पिक्चर हॉल को शरण लूं।" "प्लीज।" मैंने तड़पकर कहा और उनका मुंह अपनी हथेलियों से बंद कर दिया। वे चुप हो गए, अपने हाथों में मेरे हाय लेकर धीरे-धीरे सहलाते रहे। फिर मृदु स्वर में बोले, "बहुत बुरा लगता है न उन बातो को मैंने उत्तर में पलके झुका दी। याद करना?" पटाक्षेप/५१ . १३ अपने मन का भार हल्का होते ही वे तो प्रगाढ़ निद्रा में खो गए, लेकिन मेरी आंख नहीं लग सकी। अस्पताल के वे दिन किसी दुःस्वप्न की तरह मेरा पीछा करते रहे। रोज़ की तरह स्टूल पर चढ़कर कपड़े सुखा रही थी, पता नहीं कैसे उलट गया। ज़मीन पर चित गिर पड़ी मैं और उसके बाद जब होश आया, तब मैं अस्पताल में थी, शरीर प्लास्टर में जकड़ा हुआ था। एक-डेढ़ महीने तो उसी तरह एकदम सीधे लेटना पड़ा था, हिप वोन टूट गई थी। लेटे-लेटे पता नहीं कैसे ऊटपटांग विचार आते रहते मन में। जिंदगी-भर लंगड़ाकर चलने की कल्पना से मन कांप-कांप जाता। डॉक्टर ने इशारा कर दिया था कि हमें दो लड़कियों पर ही भव संतोप कर लेना होगा। यह वात मन में कांटे-सी गड़ती । अपना नारीत्व व्यर्थ हुआ जान पड़ता। ऐसे समय इनसे सहानुभूति की, आश्वासनों की अपेक्षा रहती। सारा दिन जैसे सिमटकर पांच बजे की सुई पर केंद्रित हो जाता था। यह नियम से आते थे। घंटों पास बैठे रहते, कुछ घर की, कुछ बाहर. की सुनाते । अपने हाथों से चाय बनाकर पिलाते । फल काटकर देते । फिर पता नहीं क्यों लगने लगा कि उनके स्पर्श में स्नेह का उत्ताप अब पहले का: सा नहीं रहा है। वह मान एक रूटीन हो गया है, एक उबाऊ रूटीन । तब इतना असहाय अनुभव करती अपने-आपको . ५२ पटाक्षेप . हर रोज शाम किसीकी मदद से मैं अपने को संवार लेती और फिर बड़ी हसरत से दर्पण देखती, दर्पण देखती और रोना,आ जाता। तव अपनी सारी खीझ मैं इनपर ही उतारती। पता नही कैसे कसे उपालंभ देती। उस समय यह भी याद नहीं रहता कि मैं अस्पताल के जनरल वार्ड में पड़ी हूं, अपने परों चलने वाला हर व्यक्ति मेरी ईर्ष्या का पात्र था । हर सुंदर औरत मुझे जहर लगती, खास कर मिसेज कश्यप । पड़ोसी थे वे लोग । इस नाते जितना बन सकता था, मंदद कर देते थे। यह होटल में खाते थे, फिर भी यदा-कदा कुछ न कुछ बनाकर वह भेजती रहती थी। मेरे पास हर तीसरे-चौथे दिन आकर बैठती थी मिसेज कश्यप । कभी कपड़े बदलवा देती, कभी कंघी कर देती । कई बार मैंने उनसे चिट्ठिया भी लिखवाई हैं। पर इन सबके लिए कृतज्ञ होना तो दूर, मैं मन ही मन द्वेष से धधकती रहती थी। अभी उस दिन मिसेज़ कश्यप आई थी मिलने । गोलगप्पे-सी फूल गई हैं और वालों में भी सफेदी झांकने लगी है। यह सोचते हुए भी शर्म आती है कि उन्हे देखकर बहुत संतोप हुआ, राहत मिली । अस्पताल से लौटते हुए यही एक बीमारी साथ ले आई हूं मैं। जिस व्यक्ति से मन ही मन द्वेप करती हूं, उसे दुखी देखकर संतोप होता है। इनके बॉस की एक बड़ी प्यारी- सी लड़की थी। रूप ऐसा कि आंखें टिकी रह जाएं। उतने ही संपन्न घराने में व्याही गई है। पिछले साल सुना कि उसे कैसर हो गया है । सुनकर दुख होना चाहिए था, पर नहीं हुआ। और "और मैं एकदम अपने विस्तर पर उठ बैठी । अपने मन को खूब ठोक-बजाकर देखा-कल वाली बात से मन को दुःख कितना-सा हुआ था। बल्कि बहुत गहरे एक तृप्ति का अहसास हुआ था। छवि की कच्ची उम्र, उसका दूधिया रंग, उसका आकर्षक व्यक्तित्व, उसका भरा पूरा परिवार, विदेश जाकर ट्रेनिंग लेने वाला उसका पति, यहां तक कि नन्हा पीयूप भी सभीको लेकर मन में एक सूक्ष्म ईर्ष्या-सी थी। उस पत्र के रूप में मेरे हाय मैं एक ट्रप कार्ड आ गया था, जो पल-भर मे उसे निष्प्रभ कर सकता था। दस्तावेज़ के टुकड़े-टुकड़े कर देने से ही क्या बात समाप्त हो पटाक्षेप, ५३ .. उस जाती है ? अपने मन में इतना बड़ा चोर छिपा होता है और कभी-कभी अपने को ही पता नहीं चलता। "मेरे मन में एक बात आ रही है।" सुबह चाय का पहला पूंट लेकर इन्होंने शुरुआत की। "मया?" "अगर सुशील को बहुत असुविधा न हो, तो कुछ दिनों के लिए छवि को उसके पास भेज दें।" "इसी लायक हम होते तो क्या इससे पहले नहीं भेज सकते थे ?" मैंने कहा। "सो तो है, लेकिन हमारी लियाकत का सवाल अव इतना महत्त्वपूर्ण नहीं रह गया है। इस समय तो सोचना यह है कि वियोग की उनकी अवधि इतनी लम्बी न खिंच जाए कि मिलने की सम्भावनाएं ही समाप्त हो जाएं। व्यवस्था तो मुझे कुछ न कुछ करनी ही है। सिर्फ तुम्हारी राय जानना चाहता था।" मैं चुप बनी रही। "क्या सोच रही हो?" "सोच रही हूं कि यह दंड है या पुरस्कार?" मैंने संक्षिप्त-सा उत्तर दिया। इनका चेहरा अचानक तमतमा आया। कुछ सख्त लहजे में वोले, "पमा! हम लोगों ने तय किया था कि हम सब कुछ भूल जाएंगे।" "हम लोगों ने तय कुछ नहीं किया था। सिर्फ आपने प्रस्ताव-भर किया था। और किसी भी ऐसी-वैसी बात को भुलाना इतना आसान नहीं होता, कम से कम मेरे लिए नहीं है । मैं आप लोगों की तरह अल्ट्रा मॉडर्न नहीं हूं। रूढ़िवादी ही सही, लेकिन संस्कारी मन है मेरा।" इतनी-सी बात कहते हुए भी मैं हांफने लगी थी। "और तुम्हारे संस्कार, तुम्हारी रूढ़ियां, तुम्हारी मान्यताएं दैहिक संबंधों पर आकर समाप्त हो जाती हैं । तुम्हारे लिए पवित्रता का मापदंर ५४ पटाक्षेप - सिर्फ शरीर है। लेकिन इस हाड़-मांस से बने शरीर के परे भी एक वस्तु उसके लिए कभी सोचा है ?" एक असाधारण आवेश में इतना सब कुछ कह जाने के बाद यह क्षण. भर को रुके-शायद मेरे उत्तर के लिए। फिर गंभीर होकर बोले, "मैं ठीक तुम्हारी तरह एकांगी होफर नही सोच पाता, यही तो मुश्किल है। यह अनुभवहीन लड़की दो साल से पति की प्रतीक्षा मै मांखें बिछाए बैठी है। उसके पत्रों पर जी रही है। यदि उसके हाथ से एक प्रमाद हो भी गया, तो मैं उसे अक्षम्य अपराध नही मान सकता । आखिर हम लोग उन्हे भी तो क्षमा कर देते है, जो मन कही और रख आते हैं और साल-दर-साल दांपत्य का नाटक किए जाते है।" "यह किसके लिए कह रहे है आप?" मैं करीव करीव चीख पड़ी। बगल वाले कमरे में होमवर्क करती हुई लडकिया दौडी आई और भयचकित नजरों से हमें पूरने लगी । अपने आवेग पर लज्जित होकर मैंने सिर झुका लिया। "कहो बेटेराम ! क्या तकलीफ है आपको?" इन्होंने हंसते हुए पूछा, तो वे धीरे-धीरे अपने कमरे की ओर लौट गई। लेकिन उनकी आखो में तिरता हुआ संदेह साफ झलक रहा था। "मैं सिर्फ एक उदाहरण दे रहा था पद्या! तुम्हे इतना ऑफ होने की जरूरत नहीं थी।" इन्होंने कसैली आवाज में कहा और उठकर चले गए। खाली प्यालियों को शून्य दृष्टि से देखती हुई मैं पता नही, कितनी देर बैठी रह गयी। पटाक्षेप/ ५५ १४ सुशील का पत्र यथावकाश आ गया था। पत्र का प्रत्येक अक्षर बतला रहा था कि छवि के वहां पहुंचने की कल्पना-मात्र से वह कितना पुलकित हो उठा है। भैया-भाभी के त्याग, स्नेह, ममता और सूझबूझ की प्रशंसा में उसने पृष्ठ के पृष्ठ भर दिए थे। अब यही पछतावा होता रहा कि यह खयाल हमें पहले ही क्यों न माया। इतनी ही दौड़-धूप तव कर लेते हम । कम से कम अपने उत्तर-: दायित्व का तो ठीक से निर्वाह हो जाता। सुशील ने बार-बार लिखा था कि वहुत आउट ऑफ दि वे जाकर रुपयों का प्रबंध न करें। उसे थोड़ी निराशा ही तो होगी, वह झेल लेगा। घर-भर को परेशानी में डालकर मिलने वाली खुशी उसे स्वीकार नहीं है। दूसरे पत्र में लिखा था-सौभाग्य से उसके एक प्रोफेसर आठ महीनों; के लिए 'लेक्चर टूर' पर जा रहे हैं। उनका फनिश्ड फ्लैट आसान शर्तों पर मिल रहा है। अगर छवि का आना निश्चित हो, तो वह बात करे। निश्चित तो खैर था ही। तीसरे पत्र में था-छवि अगर जल्दी आ सके तो अच्छा है। ६-८ महीने का कोई छोटा-मोटा कोर्स वह पूरा कर लेगी। हां, अगर पीयूष साथ आए, तो असुविधा हो सकती है। यहां की जलवायु में बहुत फर्क है। शुरू- - ५६.:/पटाक्षेप गुरूम बड़ों को को परेशानी होती है। सिराह करने वाला भी कोई नही है बासपाता पत्रका सर सट पा, पह छवि को दिलकुल बोले में पाना चाहत था। उन दोनों के बीच वह बच्चा भी उसे गवारा नहीं था। इतनी दूर शायद वह अपने को उस बनदेसे बच्चे से जुड़ा हुआ महसूस नहीं कर प रहा था। उसके लिए शुभा-विभा और पीयूष में कोई खास बार नहीं था लेकिन छवि के पत्रों मे यह कसक साफ झलक जाती थी। सुशील मिलने का उल्लास, नया देश देखने का उत्साह-इन सबपर उदासी के एक पर्त-सी रहती। कितने प्रयासों से उसने अपने को संचार किया होगा इसे हम लोग समझ सकते थे। पटार'" १५ . और अप्रैल की एक सुबह वह अचानक ही आ खड़ी हुई। उसके आने के साथ ही घर में जैसे उत्सव का वातावरण हो गया। लड़कियों का आनंद जैसे छलका पड़ता था । मुझसे तो आते हो ऐसे लिपट गई कि सारा कल्मप पल-भर में ही धुल गया। साथ उसका भाई आया था, बोला, "दीदीजी ! यह महारानी परीक्षा देने के लिए हाजिर हुई हैं। मेरी तो समझ में नहीं आता कि पेपर में क्या लिखेंगी आखिर । एक दिन भी तो किताव खोलकर देखी नहीं । वस, जव देखो तब जीजाजी को लंबी-लंबी चिट्ठियां लिखी जा रही हैं। फॉर्म के पैसे तो विगड़े ही थे, यह किराया और ऊपर से खर्च हो गया।" "किताबें तो सब यहां छोड़ गई थी, वहां पढ़ती क्या खाक ! वह तो ऐसे जमकर बैठ गई वहां, हमने सोचा परीक्षा का आइडिया ड्राप कर दिया होगा।" अनचाहे ही स्वर मेरा स्नेहार्द्र हो आया था। लगा, जैसे शुभा- विभा की ही बात कर रही हूं मैं। एक शर्मीली मुस्कराहट उसके चेहरे पर खेलती रही। दोपहर में भाई जव अपनी सफर की थकान मिटा रहा था, वह मेरे पास आकर बैठ गई और बड़े रहस्यमय मंदाज में बोली, "मुझे तो पता है दीदी, मेरी अटेंडेंस इतनी शॉर्ट है, परीक्षा देने का कोई सवाल ही नहीं उठता, मैं तो सिर्फ आने ५८/पटाक्षेप का बहाना ढूंढ़ रही थी।" "यहां आने के लिए यहाना ढूंढ़ना पड़ता है तुम्हे ?" गैने पाहत रपर में कहा। "आप समझ नहीं रही हैं"दरमराल में पीयूष को भाप पारा छोड़ना चाहती हूं।" "मेरे पास?" "जी, और मां और बाबूजी जिद पर रहे हैं कि यह उन्हीका पारा रहे । उनके पारा छोड़ने को मेरा मन नहीं करता । साह-प्यार तो यह पाहत करते हैं, पर बच्चे के साथ तो सो परेशानियां होती है, जो उगवण की नहीं हैं। भाभियों पर मेरा विश्वास नहीं है । ये लोग यहा बच्छी हैं, गर' आपके पास रहेगा, अपनी दीदी लोगों में पाग रहेगा, सो मैं निश्चित होकर जा सकूगी । और किगीके पाग तो मैं उसे छोड़ नहीं सकनी और दिखी ही देखते उसकी मां भर थाई और यह मेरे कंधे पर गिर गणकर गुवक लगी। पता नहीं कितने दिनो से ग मायेग को यह अपने हिसाग, बैठी थी। व्यग्र होकर मैं उसकी पीठ पर, गिर पर हाथ फेरती रही । गुणीय पर इतना रोप याया। नन्हे-गे बच्चे को छोड़कर पल देना यातना आगान है ! मा बनकर देखें कोई तब पता चले। पटाक्षेत्र/

१६
"यह बच्चे को मेरे पास छोड़ जाना चाहती है।" रात मैंने उन्हें
या तो एगाचारगी वह भी चौंक उठे।
"तुमने गया जवाब दिया?"
"मैं तो आज ही सुशील को लिख दूंगी कि यह रोग मेरे वश का
ही है।"
"लेकिन परताव तो सुशील की ओर से आया नहीं है, जिसने किया है
उशीरो गाहो न ।"
"यह नहीं हो सकता।"
"गयों ?"
"उसने इतने विश्वास गो साथ गुशसे पाहा है कि मुशरो उसके सामने
मना करते नहीं बनेगा।"
"यही तो पूछ रहा हूं, गयों नहीं बनेगा?"
"रा लिए कि मैं उतनी दुष्ट नहीं हूं जितना आप समझते हैं।" मैंने
लगभग पीसकर कहा और रात को उरा शांत वातावरण में मुझे अपनी ही
मायाज बड़ी कर्कश लगी। इनकी ओर एक रोप-गरा फटाक्ष फेंककर मैं
दूसरी गारवट लेट गई।
कभी-गाभी सभी मेरी सहनशीलता की परीक्षा क्यों लेने लगते हैं ?
६०/ पटाक्षेप

सुबह से शुभा-विभा किलक रही थीं "मम्मी, चाची कह रही थी, पप्पू अब साल-भर अपने ही पास रहेगा। यह बात सच्ची है न !" मतलय महारानी जी सब कुछ तय करके बैठी हैं । विभा कहती रही, "मम्मी, झूला तुम अपने कमरे में तो नही रखोगी? हमारे कमरे में ही रखना, दोनो पलगों के बीच, रोएगी तो हम लोग संभाल लेंगे।" कितना चवर-चवर करने लगी हैं ये लोग ! महरी भी तो कम नही, कहने लगी, "वावा को रखिच लेना बाई। बच्चा रहेगा घर मे तो अच्छा लगेगा।" अब इससे सलाह मांगने गया था कोई? और तो और, श्रीमानजी भी! खा-पीकर मजे से आराम कुर्सी पर बैठे झूल रहे थे। ग्यारह बज रहे थे। बच्चे स्कूल चले गए थे। छवि भाई के साथ टाइम टेवल देखने कॉलिज गई थी। सोचा था, सबके जाने के बाद पत्र लिखूगी इत्मीनान से । कागज-पेन सब सजाकर बैठी थी और इनके दफ्तर जाने की राह देख रही थी। लेकिन इन्होने कपड़े तक नहीं बदले थे। "जाना नहीं है आज ?" मैंने चिढकर कहा। "आज छुट्टी ले ली है।" "किस खुशी मे?" "ऐसे हो। विशेपज्ञों का कहना है कि कभी-कभी दफ्तर से गोल कर जाना चाहिए, स्वास्थ्य के लिए अच्छा होता है. फिर कभी-कभी तुम्हारे साथ अकेले में बात करने की भी इच्छा होती है।" हारकर मैं मेज़ के पास से उठी और एक कुर्सी खीचकर उनके सामने जा वंठी, और बोली, “कहिए, क्या बात करनी है "कोई यास बात नहीं है, तुम काम कर लो अपना । चिट्ठी लिख रही थी न । किसे ? सुशील को ? लिख लो न, फिर बात करेंगे।" "आपके सामने नहीं लिख पाऊंगी।" "क्यों, इतनी प्राइवेट चिट्ठी है ? मजमून तो शायद रात को तुमने बता ही दिया था।" m पटाक्षेप/६१ "मजमून वह नहीं है जो आप समझ रहे हैं।" "तो फिर शायद छवि के बारे में लिखना होगा, ठीक है न?" "देखिए, मैंने कल भी आपसे कहा था कि मैं उतनी दुष्ट नहीं जितना आप समझ रहे हैं।" मेरी आवाज़ फिर ऊंची चढ़ गई थी। सूने घर में एक गूंज-सी पैदा करती हुई अपनी ही आवाज़ मुझे बड़ी कर्कश लगी। "यही तो मुसीवत है डालिंग, कि तुम उतनी दुष्ट नहीं हो जितना पोज करती हो।' ।" मैं तो हैरत से देखती रह गई। "हम सब जानते हैं कि तुम्हारे पास इतना प्यार, इतनी ममता है कि सिर्फ उसे छिपाने के लिए तुमने जवान पर इतने कांटे उगा रखे हैं; तुम्हारी इस असलियत को सब जान गए हैं । सुशील, शुभा, विभा-यहां तक कि छवि भी तुम्हें पहचान गई है। इसी विश्वास के साथ तो अपना वच्चा तुम्हें सौंपने आई।" मैं कुछ देर उनकी ओर देखती रही, फिर दीवार की ओर मुंह फेरकर मैंने कहा "."मैं किराये की आया तो नहीं हूं, जो साल-भर लड़के को संभालकर निर्विकार मन से लौटा दूंगी। कलेजे से लगाकर पालूंगी उसे और कल उसकी मां आकर उसे ले जाएगीन, यह मुझसे नहीं सहा जाएगा। बहुत दुःख उठाए हैं मैंने जीवन में, अब एक और झेलने की सामर्थ्य नहीं है । मैं सुशील को यही सब लिखना चाह रही थी, आप चाहें तो छवि से भी कह दीजिएगा।" कुछ क्षण कमरा निस्तब्धता में डूबा रहा। , - "पद्मा!" "इधर देखो।" "क्या है?" "अभी तुमने बहुत सारे दुःखों की बात की थी। उनमें से कितने मेरे नाम चढ़े हैं यह जान लेता तो आश्वस्त हो जाता।" ६२ Ins मैंने उनकी ओर देखा, अंतस् का सारा स्नेह आंखों में समेटे वह मुझे ही देख रहे थे । और अचानक मुझे लगा कि मह व्यक्ति निरंतर बारह वर्षों से इसी तरह मेरे सामने बैठा हुआ है। मेरी व्यथा-कथा सुनने के लिए अधीर, मेरे घावों पर मरहम लगाने को आतुर इसकी आखें निरतर इसी तरह स्नेह बरसा रही हैं । मैं ही पागल की तरह दूर-दूर भागती रही, अपने ही भय से प्रस्त, तकहीन सदेहो से घिरी हुई। किंतु अगर कोई कहना भी चाहे तो क्या सब कुछ कह पाना इतना आसान है ? कुछ कहने को फड़फड़ाए मेरे होंठ और फिर स्थिर होकर रह उन्हे ही फिर कहना पड़ा, "अच्छे-बुरे क्षण तो सभीके जीवन मे आते हैं, लेकिन उन्हें कोई यो अपने साथ नत्थी नहीं कर लेता। तुम्हारे साथ मुसीवत यह है पद्मा, कि तुम भूलती कुछ भी नहीं हो, इसीलिए मन पर एक भार-सा बना रहता है।" एकदम खीझ उठी मैं, पल भर पहले तरल हो आया मन एकदम फूत्कार उठा, "समझते क्यों नहीं आप, कि हर दुःख क्षणजीवी नहीं होता। कोई आधात ऐसा भी होता है, जो अपनी कसक छोड़ जाता है। कई घाव ऐसे होते हैं, जो अपने व्रण के कारण जीवन-भर याद रहते हैं."उपदेश देना बहुत सरल है आपके लिए, क्योकि आप नहीं जानते कि सात वर्ष की आयु मे पिता को खो देना क्या होता है। कैसा लगता है जब पिता की मृत्यु के साय ही अपनों के मुखौटे उघड़ने लगते हैं । कितना दुःख होता है जब पिता के साथ मां की शांत स्नेहमयी मूर्ति भी खो जाती है। शेष रह जाती है सिर्फ एक हेड मिस्ट्रेस, जो आतंक की सृष्टि करती है, आश्वस्त नहीं करती।" यह उठकर कमरे में चहलकदमी करने लगे थे। "मेरे पास भी वचपन की निश्छल हंसी थी, किशोर कल्पनाओं का सुंदर संसार था, खिलती उम्र के मधुर सपने थे। मां के कगेर अनुशासन मे सब कुछ झुलसकर रह गया । सुख-दुःख बंटाने वाली एक बहन थी, शादी पटाक्षेप/६३ "मजमून वह नहीं है जो आप समझ रहे हैं।" "तो फिर शायद छवि के बारे में लिखना होगा, ठीक है न?" "देखिए, मैंने कल भी आपसे कहा था कि मैं उतनी दुष्ट नहीं जितना । समझ रहे हैं।" मेरी आवाज़ फिर ऊंची चढ़ गई थी। सूने घर में एक -सी पैदा करती हुई अपनी ही आवाज़ मुझे बड़ी कर्कश लगी। "यही तो मुसीवत है डालिंग, कि तुम उतनी दुष्ट नहीं हो जितना पोज़ रती हो।" मैं तो हैरत से देखती रह गई। "हम सब जानते हैं कि तुम्हारे पास इतना प्यार, इतनी ममता है कि सर्फ उसे छिपाने के लिए तुमने ज़बान पर इतने कांटे उगा रखे हैं; तुम्हारी इस असलियत को सव जान गए हैं । सुशील, शुभा, विभा-यहां तक कि छवि भी तुम्हें पहचान गई है। इसी विश्वास के साथ तो अपना बच्चा तुम्हें सौंपने आई।" कुछ देर उनकी ओर देखती रही, फिर दीवार की ओर मुंह फेरकर ..."मैं किराये की आया तो नहीं हूं, जो साल-भर लड़के को संभालकर निर्विकार मन से लौटा दूंगी। कलेजे से लगाकर पालूंगी उसे और कल उसकी मां आकर उसे ले जाएगी-न, यह मुझसे नहीं सहा जाएगा। बहुत दुःख उठाए हैं मैंने जीवन में, अव एक और झेलने की सामर्थ्य नहीं है। मैं सुशील को यही सब लिखना चाह रही थी, आप चाहें तो छवि से भी कह दीजिएगा।" कुछ क्षण कमरा निस्तब्धता में डूबा रहा। "पद्मा!" ।" "इधर देखो।" "क्या है?" "अभी तुमने बहुत सारे दुःखों की बात की थी। उनमें से कितने मे नाम चढ़े हैं यह जान लेता तो आश्वस्त हो जाता।" मैं मैंने कहा - ६२/पटाक्षेप मैंने उनकी ओर देखा, अंतस् का सारा स्नेह आंखों में समेटे वह मुझे ही देख रहे थे । और अचानक मुझे लगा कि यह व्यक्ति निरंतर बारह वर्षों से इसी तरह मेरे सामने बैठा हुआ है । मेरी व्यथा-कथा सुनने के लिए अधीर, मेरे घावों पर मरहम लगाने को आतुर इसकी आखें निरंतर इसी तरह स्नेह बरसा रही हैं । मैं ही पागल की तरह दूर-दूर भागती रही, अपने ही भय से त्रस्त, तर्कहीन सदेहों से घिरी हुई। किंतु अगर कोई कहना भी चाहे तो क्या सव कुछ कह पाना इतना मासान है ? कुछ कहने को फड़फड़ाए मेरे होंठ और फिर स्थिर होकर रह गए। उन्हे ही फिर कहना पड़ा, "अच्छे-बुरे क्षण तो सभीके जीवन में आते हैं, लेकिन उन्हें कोई यो अपने साथ नत्थी नही कर लेता । तुम्हारे साथ मुसीबत यह है पद्मा, कि तुम भूलतो कुछ भी नही हो, इसीलिए मन पर एक भार-सा बना रहता है।" एकदम खीझ उठी में, पल-भर पहले तरल हो आया मन एकदम फूत्कार उठा, "समझते क्यों नहीं आप, कि हर दुख क्षणजीवी नहीं होता। कोई आघात ऐसा भी होता है, जो अपनी कसक छोड़ जाता है। कई घाव ऐसे होते हैं, जो अपने व्रण के कारण जीवन-भर याद रहते हैं "उपदेश देना बहुत सरल है आपके लिए, क्योंकि आप नहीं जानते कि सात वर्ष की आयु में पिता को खो देना क्या होता है । कंसा लगता है जब पिता की मृत्यु के साथ ही अपनो के मुखौटे उघड़ने लगते हैं । कितना दुःख होता है जब पिता के साथ मां को शांत स्नेहमयी मूर्ति भी खो जाती है। शेष रह जाती है सिर्फ एक हेड मिस्ट्रेस, जो आतंक की सृष्टि करती है, आश्वस्त नहीं करती।" यह उठकर कमरे में चहलकदमी करने लगे थे। "मेरे पास भी बचपन की निश्छल हंसी थी, किशोर कल्पनाओं का सुंदर संसार था, खिलती उम्र के मधुर सपने थे। मां के कठोर अनुशासन में सब कुछ झुलसकर रह गया । सुख-दुःख बंटाने वाली एक बहन थी, शादी पटाक्षेप/१३ के वह भी पराई हो गई। उसकी बरसों तक सूरत भी न देखने दी मां । खुले हाथों विधाता ने रूप लुटाया था मुझपर, एक ही चीज़ थी जिस- र गर्व था मुझे। लेकिन बीमारियों में वह भी उजड़कर रह गया है। संतान भी दी है ईश्वर ने तो दोनों लड़कियां, कल को अपने घर चली जाएंगी तो बस, बैठकर रोना ही तो है मुझे। यही तो लिखाकर लाई हूं।" और एक दीर्घ उसांस लेकर मैं चुप हो गई। इतना थक गई थी जैसे मीलों का सफर तय करके आई हूं। घूमते हुए यह एकदम मेरे पास आकर खड़े हो गए थे, "पद्मा!" "हां।" "और शेखर दा की बात नहीं कहोगी.?" शेखर दा की बात । मुझे तो जैसे काठ मार गया। "अपनी गाथा का जो सबसे दुःखद, लेकिन सबसे महत्त्वपूर्ण अध्याय है जो, उसे ही भूल गईं ?" मैं विजली की तरह उठ खड़ी हुई, "किसने बताया आपको यह सब? मां ने? रमा ने?"या शेखर दा ने?" "मां ने कव तुम्हारे मन में झांककर देखा है ? रमा को ही कव इतना अवकाश मिला है, और शेखर दा, उनके पास यह सब देखने वाली आंखें हैं होती, तो कहानी कुछ और ही नहीं होती आज?" "फिर कहां से जान गए आप सब ?" "तुमसे। इस तरह चौंको मत, पद्मा। तुम्हारे स्वभाव की ये अने विसंगतियां खुद अपनी कहानी कहती रही हैं, और साथ में तुम्हारी व्य में डूवी आंखें, खोया हुआ आत्मविश्वास, तुम्हें हरदम कोंचता हुआ तुम्ह होनबोध, मुझे प्रसन्न रखने के तुम्हारे हास्यास्पद प्रयास, मुझे खो देने तुम्हारा तर्कहीन भय-सभी कुछ तो मेरे सामने था, मैं वेवकूफ नह पद्मा। शेखर दा की तरह अंधा भी नहीं हूं। बहुत पहले जान लिया थ रमा का जिक्र छिड़ते ही तुम समूची ईर्ष्या से सुलग. उठती हो। शेख ६४ / पटाक्षेप .

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१७
कमरे के वातावरण में एक उमस-सी भर गई थी। मैंने पंखा फुल
स्पीड पर खोल दिया। फिर खिड़की के पास खड़ी होकर बड़ी देर तक
खुली हवा में सांस लेती रही।
यह धीरे-धीरे तैयार हो रहे थे।
"कहीं बाहर जा रहे हैं ?"
"हां, आर० टी० ओ० ऑफिस जाऊंगा जरा, लाइसेंस रिन्यू कराना
mp
मैं समझ गई, उतनी बड़ी बात कह जाने के बाद कमरे की उमस उन्हें
भी व्याप गई थी।
"जाने से पहले एक बात सुनेंगे?"
"कहो।" उन्होंने जूतों के तस्मे बांधते हुए जवाव दिया।
"विश्वास कर सकेंगे?"
"कहो तो।"
"वहुत पहले मैंने एक सपना देखा था। कच्ची उम्र में सभी लड़कियां
इस तरह के सपने देखती हैं, तब लगता है जीवन का संपूर्ण सत्य यही है,
वाकी सब शून्यवत् है । इस उम्र के सपने ऐसे सर्वव्यापी ही होते हैं। पता
नहीं कितने सालों तक उसे अपने गले का हार वनाए रही। फिर जानते हैं
६६ / पटाक्षेप

क्या हुआ? सुशील की शादी में उन्हें इतने दिनों बाद देखा और अवाक् रह गई । क्या यही है वह अलौकिक व्यक्तित्व, जिसके लिए मैं मीरां बनी हुई थी? यह नितांत साधारण व्यक्ति रमा का पति-भर हो सकता है। आलोक का पिता हो सकता है। मेरा स्वप्न-पुरुष फिर कहा खो गया? हैरान थी में।" "कसा लगा था तब ? बहुत दुख हुआ?" "नही, एक रीतेपन का अहसास-भर हुआ, वस । कितना आश्चर्य है न।" वे उठकर मेरे पास आए, दोनों कंधों पर हाथ रखते हुए बोले, "इसमें आश्चर्य तो कुछ भी नहीं है। जीवन में कितनी ही चीजें तुम्हारे हाथों से फिसलती रही हैं। उनमें एक और नाम जुड़ गया। सिर्फ एक बात याद रखो पना, कि सब कुछ खो जाने के बाद भी तुम देखोगी कि मैं तुम्हारे पास हूं, हमेशा से था। इट इज ए प्रॉमिज ।" और यह अंतिम बात कहते-कहते उनकी आवाज भारी हो आई थी। मैंने हौले से उनके हाथ हटाते हुए कहा, "वाहर जा रहे थे न आप?" "सो तो जा रहा हूं।" वह चलने को हुए और फिर जैसे कुछ याद था गया उन्हें । दरवाजे के बाहर से बोले, "सुबह आलोक का टेलिग्राम आया था। दराज में है, देख लेना।" "आलोक को तार देने की क्या जरूरत पड गई ?" मैंने पूछा, लेकिन तब तक वह जा चुके थे। दराज खोलकर मैंने वह गुलाबी कागज निकाला, सफेद पट्टी पर काले अक्षर चमक रहे थे "पापा इज नो मोर।" पटाक्षेप । ६७ प्रतिदान "अम्मा ? आज पूर्णमासी है, तुम कुछ करने के लिए कह रही थीं. ?" "क्या सचमुच आज पूर्णमासी है ?" "हां, तुम्हें अब क्या तिथियां भी याद नहीं रहती, अम्मा ?" "नहीं रे"सोच रही हूं कि एक महीना हो गया। और उस दिन सोच रही थी कि उसके विना एक दिन भी नहीं जी सकूँगी..." "अम्मा..." इसके वाद कान तो कुछ नहीं सुन सके, पर मेरी कल्पना की आंखों ने देख लिया कि मां का सिर वेटे के कंधे पर टिका है और दोनों निःशब्द रुदन में डूब गए हैं। मन कंसा-कैसा हो आया ! मैं भारी कदमों से रसोई की ओर मुड़ गई। दरअसल मैं इनसे एक बहुत ही जरूरी बात कहने गई थी। आज सुवह नहाते समय एक दर्द की लहर शरीर में दौड़ गई थी-वही चिर प्रतीक्षित आशंकित लहर । मैंने सोचा था, इनके दफ्तर जाने से पहले नसिंग होम चल- कर चेक करा लेते तो ठीक था। पर ठीक इसी समय उद्धव का प्रसंग छिड़ जाना मुझे वड़ा अशुभ-सा लगा। एक खीझ-सी हुई मन में। क्या मरने के बाद भी उसका साया हमारी गृहस्थी के ऊपर मंडराता रहेगा? ६८/पटाक्षेप मेरे इस घर में थाने से पहले ही उदव मेरे जीवन में आ गया था। अपनी सबसे प्यारी साड़ी पहनकर मैं इनके साथ घूमने गई थी। 'नंदनयन' को हरी-हरी दूब पर बंटते ही इन्होंने बिना किमी भूमिका के कहना प्रारंभ कर दिया था, "संध्या, शादी मे पहले मैं अपने घर का चित्र तुम्हारे गामने रखना चाहता हूं। मेरा बहुत छोटा-मा परिवार है । मा हैं, जिन्होंने लाप मुसीबतें झेलकर मुझे इस काबिल बनाया है। दूमरा है उदय, मेरा छोटा भाई -१५ वर्ष की कच्ची उम्र में ही यस-दुर्घटना में उमके दोनों पैर बेकार हो गए हैं । पाच वर्षों से वह बिस्तर पर है (यहा इनकी मांग भर आई थी), मेरे और अम्मा के माधे प्राण उमीमें यमते हैं । मुझे ऐमी पत्नी चाहिए जो मेरी इन जिम्मेदारियों को खुशी-खुशी बाट सके। तुममे हो मकेगा यह मव ?" इन्होंने प्रश्न-मरी वाखो से मुझे देखा था। इनके करुण मम्मोहन ने मुझे बाघ लिया और उस अनजान अपंग युवक के प्रति मन ममता मे भर उठा । यह तो उमी दिन जान गई कि इनके अंदर का पुत्र और भाई इन- पर मदा हावी रहेगा। तब तो इमी वात पर मुग्ध होकर अतमंन से इन्हे वर लिया था, और अपने मानस में राम और लक्ष्मण के साथ नित्य नये विनोद की कल्पना में विवाह की तिथि को जोडती रही । शादी इनके ताऊजी के यहां हुई । इम पुशी के मौके पर भी माजी ने अपने बीमार बेटे का साथ नहीं छोड़ा और मेरे मन में उनका आसन और ऊचा उठ गया। लोकाचार जैसे-तैसे निबटाकर हम लोग पहली बार घर पाए थे, वह दिन बाज भी भूलता नहीं है । पड़ोमी गिरिजा बाबू स्टेशन पर हमे लेने आए थे। उन्होंने बताया कि नई भाभी को लेकर उद्धव के आनद और उत्कठा की मीमा नहीं है। माजी के पीछे पडकर उसने पूरे मकान की मफेदी कर- दाई है । मादी की रात मुहल्ले की औरतों को बुलाकर रतजगा भी करवाया है। बंदनवार उमने खुद अपने हायों बनाए हैं। तांगा सकते ही मैंने देखा, वदनवारो मे सजा, लिपा-पुता पर अपनी प्रतिदान/६६ । स्त दीनहीनता लिए सामने खड़ा था। भाग्य के थपेड़ों के बीच दो ाथ वालकों के साथ जिंदगी की राह पर चलने वाली मांजी का प्रतीक- ही लगा वह मुझे। दरवाज़े पर संभवतः पड़ोस की किसी सुहागिन ने हम लोगों की आरती तारी। वही मुझे भीतर ले गई। घर में घुसते ही यह कोने में लगे पलंग की ओर लपके और "भैया" की पुकार के साथ दोनों एक-दूसरे से लिपट गए। किसी रामलीला में देखे भरत- मिलाप का दृश्य मेरी आंखों के सामने सजीव हो उठा। फिर उन्होंने मुझे खींचकर उसके सामने खड़ा कर दिया और कहा, "देख, अपनी भाभी तो देख; वोल! पसंद आई कि नहीं?" "भाभी" कहते हुए उसने मेरे दोनों हाथ पकड़ लिए। उस स्पर्श से सिहरकर मैंने अपनी लज्जानत आंखें उठाकर ऊपर देखा। मेरी कल्पना का उद्धव यह नहीं था। मेरी कल्पना का उद्धव सिनेमा और उपन्यासों का मरीज़ था-लाख कष्टों के वावजूद जिसके चेहरे की कांति अक्षय रहती है, वेदना और यंत्रणा जिसे और आकर्षक बना देती है। मेरे सामने जो उद्धव था, वह यथार्थ का उद्धव था। किशोरावस्था में ही अपंग हो जाने के कारण वह बुझ-सा गया था। अपनी विवशता की पीड़ा और कर्मण्यता का अहसास अभावों में पले उसके कंकालप्राय चेहरे को और भी कठोर बना गया था। हृदय से न सही, पर उसे अपनी समस्त आंतरिकता के साथ मैं ग्रहण न कर सकी। अपनी कल्पना का यह विद्रूप मुझसे सहा नहीं गया। एक वत्सल सीता, एक फ्लोरेंस नाइटिंगेल आविर्भाव से पूर्व ही विलीन हो गई। पता नहीं किस संवेदन शक्ति से उसने मेरे मन को पढ़ लिया और में हाथों को थामने वाले उसके हाथों की गरमी धीरे-धीरे लुप्त हो गई। उन मेरे हाथ छोड़ दिए। "मुझे लिटा दो अम्मा, मैं बहुत थक गया हूं," कर उसने आंखें मूंद लीं। उसकी इस आवाज़ पर पता नहीं कहां से मांजी निकल आई ७० / पटाक्षेप उन्होंने उसे लिटा दिया। इनका इशारा पाकर मैंने उनके पांव छुए. पर सिर पर जरा-सा हाथ रख देने के अतिरिक्त उनके मुंह से आशीर्वाद के दो शन्द भी न निकले । एक जबरदस्त अपेक्षा-भंग का वातावरण घर में छा गया था-हम सबके सपने कपूर की भाति उड गए थे। मुझसे इस बारे में कभी भी किमीने कुछ नहीं कहा। मैं हमेशा सफाई देने के लिए छटपटाती रही, पर विना अभियोग के सफाई कसी? पम्मी के जन्म के बाद बस इन्होने इतना कहा था, "एक बार इसे अम्मा को दिया लाते।" इस बार घर जाने पर मैंने अपने मधुर व्यवहार से माजी का मन मोह लिया। पम्मी तो जैसे उनके गले का हार बन गई थी। अपनी पिछली भूलो का प्रायश्चित्त करने के लिए कृतसकल्प मैं माजी को माय ले चलने के उपाय कर रही थी। मुझे मालूम था कि इनके मन में हमेशा यह इच्छा रही है। वगले के उस मुनिश्चित कोने की तरह इनके मन का कोना भी खाली-पाली रहता था, यह भी मैं जानती थी। इसलिए उद्धव को भी इस बार मैंने शिकायत का मौका नहीं दिया। उसने कभी कोई उत्सु. कता नहीं दिखाई। बीमार व्यक्तियो का अह वैसे भी भारी होता है । पर मैं अपने कर्तव्य-योघ से सव कुछ कर रही थी। मुझे पुशी थी कि इस वार दिन खैरियत से गुजर रहे है। शायद चौथे या पांचवे दिन की बात है। मैं नहा रही थी। दो कमरों का छोटा-सा घर था। रसोई बद करके नहाना पडता था। तभी मैंने सुना, उद्धव कह रहा था, "अम्मा, भाभी कहा है ?" "नहा रही है। क्यो रे?" माजी ने पूछा । मुझे भी आश्चर्य हुआ कि आज मेरी क्या जरूरत पड़ गई। "एक बार गुड्डो को मुझे दो न अम्मा ?" कुछ क्षण पामोशी रही। "अम्मा, बस थोडी-सो देर को।' इस बार उसके स्वर में बला की आजिजी थी। शायद तभी तो मांजी मे नही रहा गया होगा। उसका असीम दैन्य मुझे खल गया । मुझसे छिपा- कर मेरी वच्ची को देखने का प्रस्ताव ऐसा ही कुत्सित लगा, जैरो मेरो अनु. - प्रतिदान/७१ पस्थिति में किसीने मेरे जेवरों का बक्स खोल लिया हो। उसके कंकालप्राय खुरदरे हाथों द्वारा पम्मी के शरीर के सहलाए जाने की कल्पना से मैं सिहर उठी। क्या पता उसने अपने घिनौने मुख से उसे चूम भी लिया हो। पता नहीं कौन-सी बात मेरे मन में गड़ गई कि किसी तरह वेतरतीवी से साड़ी पहन मैंने दरवाज़ा खोल दिया और झपटकर उसकी गोद से पम्मी को उठा लिया। उसे छाती से लगाए मैं मुड़ी ही थी कि मांजी से आंखें मिल गई। बेटे का अपमान वहां प्रतिविवित हो उठा था। पता नहीं वहां क्या-क्या था-क्रोध, अपमान घृणा"पर मेरा साहस न हुआ कि उनकी ओर देख सकू। - घर की यह मेरी अंतिम यात्रा थी। यह तो हर दूसरे-तीसरे महीने जाते और एक उदासी की पर्त-सी ओढ़कर वापस आ जाते । कई बार मन हुआ कि जाकर उसे देख आऊं। उन लोगों की गलतफहमियां दूर कर आऊं, पर अपने पर से विश्वास ही जैसे उठ गया था । विधि का विधान भी कैसा है ? उसके अंतिम समय भी जाना न हो सका। वह ही गए और आते समय मांजी को ले आए। जो कमरा वर्षों से उद्धव और मांजी की प्रतीक्षा करता रहा था उसमें मांजी अकेली आई थीं। उनके साथ आई थी शोक की एक काली छाया, जो निरंतर घर पर छाई रहती। उनके आते ही घर एकदम छोटा हो गया था और प्रच्छन्न रूप से दो दलों में बंट गया था। मैं कितनी अकेली पड़ गई थी? "संध्या, तुम्हारा जी कैसा है ?" मैंने चौंककर देखा, कुरसी की पीठ पर हाथ रखे यह खड़े थे। "इधर से गुजरा तो देखा डाइनिंग टेबल पर सिर रखे सो रही हो । पहले तो सोचा सो लेने दो, पर देखता हूं चेहरा वेहद उतरा हुआ है-खैरियत तो है ?" "मेरा खयाल था-एक बार नसिंग होम हो आते।" "जरूर, जरूर," वे बोले और तेजी से बाहर निकल गए। कुछ ही देर में हम लोग गाड़ी में सड़क नाप रहे थे। तब खयाल आया, चलने से पहले r मांजी से कहना चाहिए था पर घबराहट में याद न रहा। नसिंग होम पहुंचने-भर की देर थी। उन लोगो ने मुझे हाथोहाय लिया और दूसरे ही क्षण में प्रसूति-कक्ष में थी। मुझे मिस्टर के हाथ सौंपकर यह चले गए थे-दपतर या क्या पता बाहर ही बैठे हो । सफेद कपड़ों मे लिपटी उन नसों के बीच में अपने-आपको नितांत असहाय और अकेला अनुभव करने लगी। पम्मी के समय की यादे अपनी सारी वहशत के साथ मुझपर हावी हो गई और मेरा दम घुटने लगा। उसी समय दरवाजा खुला और डॉक्टर अलकारानी ने कहा, "मिसेज श्रीधर, आपको सास आई है।" मैंने देखा, माजी अपराधी-सी मुद्रा में सिरहाने खड़ी हैं। "मुझसे रहा नही गया । विटिया दुलारी को साथ लेकर चली आई।" "ठीक है।" मैंने कहा । मुझे वडी शर्म आ रही थी। घर से निकलते समय इनसे कहकर भी नही आ सकी थी। उसी समय दर्द की एक लहर उठी और मैंने "ओ मां" कहकर मांजी के दोनों हाथ पकड़ लिए। पीडा के वे क्षाण बीत जाने पर भी मुझे याद रहा कि वे दुबले-खुरदरे हाथ अजीव-सी ममता से भीगे हुए थे। उस समय भी वह माथा सहला रही थी और मुझे अच्छा लग रहा था। दर्द के वे क्षण कितनी बार दोहराए गए। माजी हर वार मेरे साथ पसीने से नहीं आती थी, मानो मेरो पीडा को वह अणु-अणु के साथ अनुभव कर रही थी। डॉक्टर ने दो-तीन बार आदर से, फिर कुछ रुखाई से उनसे धीरज रखने के लिए कहा । एक बार तो दबी जवान से बाहर बैठने का भी अनुरोध किया । पर मैं उन्हें दृढता से पकडे रही। उन भावविहीन चेहरो के बीच उन्हीका चेहरा तो था जो मेरो वेदना से विह्वल हो रहा था। मेरी पीड़ा को एक अकेली वह ही तो समझ रही थी, क्योकि सृजन की यह पीर उन्होंने भी सही थी। फिर एक अजीब-सा विचार मन मे आया। जिसे इतनी पीडा के साथ जन्म दिया गया हो, उसे अपनी ही आखो के सामने तिल-तिलकर मृत्यु के मुख में जाते देखना कितना दुःख देता होगा? किस तरह सहा होगा उन्होने उसे ? प्रतिदान/०३ - कौन-सी पीड़ा अधिक कठिन है-जन्म की या मृत्यु की? पाने की या खोने की ? अपने विचारों के रेले में मैं देख रही थी कि डॉक्टर और नर्स दोनों के चेहरे वदहवास-से लग रहे थे। मैं अपने-आपको किसी वर्फीले प्रदेश में जाते हुए देख रही थी। वे लोग विचित्र दृष्टि से मुझे घूर रहे थे। हर पांच मिनट पर तड़पा देने वाली वे दर्द की लहरें पता नहीं कहां खो गई थीं। उनकी प्रतीक्षा में कमरे में एक तनाव-सा भर गया था। मुझे मम्मी वेतरह याद आ रही थीं। वह हमेशा कहती थीं कि डिलीवरी में दोनों का जन्म होता है...मां और बेटे का । तभी तो ४२ वर्ष की उम्र में शिशु को जन्म देने की पीड़ा उनसे सही नहीं गई। ऑपरेशन रूप से बाहर लाते हुए स्ट्रेचर पर उनका सफेद निष्प्राण चेहरा बार-बार आंखों के सामने आ रहा है। कैसा होता होगा मरण-पार का देश ? क्या वहां जाने पर मम्मी से फिर भेंट हो सकेगी? और उद्धव, क्या वह भी मिलेगा? उसकी करुण- असहाय आंखों का अभियोग क्या अब भी उतना ही ताज़ा होगा? अपनी सफाई में मुझे क्या कहना होगा? स्स इंजेक्शन की जैसे कई एक सुइयां चुभो दी गई हों, पर मेरी चेतना लौट आई। और कम्बख्त वही दर्द फिर उभर आया । सफेद कमरा, सफेद चमकीले वल्व, सफेद वस्त्रों में लिपटी नसें, सव जैसे धूम गए । केवल दो दुवले-खुरदरे हाथ स्थिर थे, जो मेरे माथे पर थे । शिशु के कर्कश रुदन से कमरा भर उठा, तनाव टूटने लगा था और हर चीज़ जैसे फिर अपनी जगह पर लौट आई थी। डॉक्टर अलका कह रही थी, "मांजी, मुवारक हो, पोता मांजी ने हाथ जोड़कर कहा, "वह तो जो भी है, भगवान की देन है, पर आपने मेरी बेटी को बचा लिया.." इससे आगे वह कुछ न कह सकी उनका गला रुंध गया। सिस्टर ने उन्हें सहारा देकर विठा दिया । थकान से बोझिल पलकें उठाकर मैंने देखा, उनका चेहरा भी वेहद थका हुआ लग रहा था। जैसे पीड़ा का हर क्षण उन्होंने मेरे साथ जिया हुआ है।" ७४ / पटाक्षेप

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आनन्दी गाड़ी में अकेले बैठे-बैठे मैं बोर हो चली थी। धूप में चिलचिलाती हुई सड़क को पार करके मेरी आंखें बार-बार उस इमारत से टकरा जाती थीं, जिसमें वह छोटी-सी डिस्पेन्सरी थी-जहां सुन्दरसींग सुबकती हुई पूनम को लेकर गया था। अजीव-सा माहौल था वहां का, ऊपर की दोनों मंजिलों में छोटे-छोटे कबूतरखानेनुमा फ्लैट्स बने हुए थे। नीचे ढेर सारी दुकानें थीं। मोहन डेरी, शिव शंकर पान भंडार, कृपाल टी हाउस, एवरेडी लांड्री, : न्यू स्टाइल हेयर ड्रेसर्स और भी न जाने क्या-क्या। उन सबके चमकते साइनबोर्ड स की भीड़भाड़ में डॉ० आहूजा की वह छोटी-सी सफेद नेमप्लेट खो-सी गई थी। सुन्दरसींग का ध्यान न जाता तो शायद हम लोग यहां रुकते भी नहीं। पता नहीं कैसी क्या डिस्पेंसरी है, साथ चली जाती तो ठीक था। यहां वाहर बैठे-बैठे मेरी खीझ धूप के साथ क्रमश: बढ़ रही थी। सबसे ज्यादा गुस्सा तो इस शैतान छोकरी पर आ रहा था। अपने खेल-खिलौने छोड़कर वहां कबाड़खाने में आने की क्या जरूरत थी! पता नहीं उसे सामान अनपैक होते हुए देखने में क्या मज़ा आता है। बैठे-विठाए हो गई न मुसीबत । कितनी बड़ी लोहे की पत्ती थी, सीधी धंसती ही चली गई पैर में । वच्चों की स्किन तो होती ही नाजुक है । ओफ, कितना खून निकला था! मुझे ७६ / पटाक्षेप तो चक्कर-सा आने लगा था देखकर । वह तो पता नही सुन्दरसोंग ने ही क्या-क्या लगाया तब जाकर खून बन्द हुआ था। इतना गुस्सा आता है इनपर। इस अजनबी शहर में लाकर पटक दिया दौर चल दिए टूर पर। वस, कह दिया, "अरे भाई, अभी तो सुन्दरतीग है चार-पाच दिन तक।" उसे भी तो मैं ही जिद करके लाई हूं। यहां वालों के भरोसे रहती तो घर सेट करने में 5 महीने लग जाते । पता नहीं कैसे लोग हैं, जरा भी मुरव्वत नहीं, मुलाहिजा नहीं। अदव-कायदा तो जानते भी नहीं। मच, छोटी जगहो में इन बातो का बहा आराम होता है। और पड़ोसी भी किस कदर रूखे है, इतना रोना-पीटना हो गया, पर कोई झाका भी नही। वहां होते तो अभी सारी कॉलोनी जुड जाती। अस्पताल तक मुझे आना भी न पड़ता और जाती भी तो क्या इस तरह टुकुर-टुकुर सड़क तकती बैठी रहती ! खुद डॉक्टर साहव आकर भीतर लिवा जाते। "हुजूर । डॉक्टर साहब अन्दर बुला रहे हैं।" मैंने चौककर सिर उठाया । सुन्दरसीग सचमुच खडा हुआ था। खिड़की के पास उसने दुवारा अपना सदेश दुहराया तो मैंने पूछा, "मुझे क्यो बुला रहे हैं । फोस के पैसे तो दिए थे न तुझे । और वेवी कहा है ?" "वेदी अभी अन्दर ही हैं। डॉक्टर साहब कुछ पूछ रहे थे। मैं समझ नहीं पाया । हुजूर खुद चली जाएं तो अच्छा हो।" भुनभुनाते हुए गाडी से उतरकर मैंने सड़क पार की। सीढियां चढ़ने ही दवाइयों की मिली-जुली तेज गध से मेरा माथा घूम गया। किमी तरह अपने ऊपर काबू पाकर मैने भीतर प्रवेश किया। सामने डॉक्टर की कुर्मी खाली घी और दोनो ओर दीवर से लगी बैंचो पर मरीच बैठे हुए थे । कोने वाली एक बैंच पर पूनम लेटी थी। उसके पाव मे वडा-सा बैंडेज बंधा था। उसका सिर एक अपरिचित महिला की गोद में था और वह थकी-मी भावाड में रह-रहकर 'मम्मी' को रट लगाए हुए थी। मेरी सारी खीझ, सारा गुस्सा पता नही कहा चला गया। मैंने लपक- शारी.... 1 । कर उसे गोद में उठा लिया और वहीं बैठकर उसे दुलारने लगी। मुझे देखकर उसकी रुलाई फूट पड़ी और मैं उसे पुचकारने लगी। वह महिला मुझे लगातार घूरे जा रही थी। मेरी दृष्टि पड़ते ही वोली, "आप इसकी मम्मी हैं ? फिर आप बाहर क्यों बैठी रह गई थीं?" उसकी धृष्टता पर मुझे बहुत गुस्सा आया। अपनी नाराजी को भरसक चेहरे पर उतारते हुए मैं चुप बनी रही। उसने फिर कहा, "आपको साथ आना चाहिए था। वहुत रोई थी वेचारी। मां साथ रहे तो बच्चों को धीरज बंधता है। नौकर तो. नौकर ही होते हैं।" मैंने फिर भी कोई जवाब नहीं दिया और उठकर डॉक्टर साहब क मेज़ के पास खड़ी हो गई । कम्बख्त सुन्दरसींग भी बाहर बैठा रह गया था। साथ रहता तो कम से कम इस देवीजी को बतलाता तो, कि वह किससे बात कर रही हैं और कैसे बात करनी चाहिए। अभी कुछ देर पहले पूनम को उनकी गोद में देखकर धन्यवाद देने की बात मन में उठी थी पर अब तो कोई सवाल ही नहीं था। एक हिकारत-भरी नज़र उस ओर फेरकर मैंने आवाज को यथाशक्तिी दवंग बनाते हुए डॉक्टर साहब से पूछा “आपने बुलाया था ?" डॉक्टर साहब अभी-अभी भीतर से आए थे, तौलिये से हाथ पोंछते हुए बोले, "वेवी को ए० टी० एस० लगाना बहुत ज़रूरी है। पहले कभी लगाया है यह इंजेक्शन?" "ठीक से याद नहीं है। आज-भर राह देख लीजिए। कल तक शायद इसके डैडी आ जाएं।" "येट करने की तो कोई जरूरत ही नहीं है। रिएक्शन देखे लेते हैं।" डॉक्टर साहब ने कहा और नर्स को सिरिज लाने का ऑर्डर दिया। सारी तयारी देखकर पूनम ने मुझे कसकर पकड़ लिया और सहमी-सहमी नज़रों मे डॉक्टर की ओर देखने लगी। तब मुझे भी भान हुआ कि उतने बड़े जन्म का ड्रेसिंग करते समय वह कितना तड़पी होगी, घबराई होगी? मैं । ७८/पटाक्षेप - रही दिलेरी से इजेक्शन के दोनों राउंड्स में उसे थामे रही । पर जिसे दखाने के लिए यह सब कर रही थी वह तो उसे टा-टा करके कर की जा चुकी थी। घर लौटकर सुन्दरसीग ने बताया कि वैवी वहुत घबरा गई थी। वह तो उन बहनजी ने यातो में उन्हें वहलाए रखा नहीं तो बहुत मुसीबत हो जाती। सुनकर में उल्टे उसीपर यरस पड़ी। "वेवकूफ, मुझे भी तो आवाज दे सकता था ! वेकार किसीके अहसान लेने की क्या जरूरत यौ?" दूसरे दिन सुबह सवेरे ही यह लौट आए। मैं तो भरी बैठी थी। उनके घर में पाव रखते ही बरस पड़ी। महानगर ने दो दिन में ही मुझे पस्त करके रख दिया था। यहा का मकान, यहा का नौकर, यहा के पड़ोसी, महा के डॉक्टर--सभीसे मुझे नफरत हो गई थी। यह खुद तो ऑफीसर बने मोज मार रहे थे और यहा सारी समस्याओं से मैं अकेली ही जूझ रही थी। दर्जी, धोवी, डॉक्टर, मास्टर सभीका इन्तजाम मुझे ही करना था। कम से कम मेरी नाजुक हालत का ही खयाल किया होता । कुछ देर तक तो यह चुपचाप मेरा भाषण सुनते रहे। फिर एकदम ताव साकर उठे और सुन्दरमीग को लेकर बाहर निकल गए। चाय तक नहीं पी। आधे घंटे बाद लौटकर आए और बोले, "कम्पाउडर साथ लेता आया हू, पूनम को ड्रेसिंग करवा लो। और शाम को पाच बजे टीचर आएगी, बच्चों वाला कमरा मेट करके रख देना।" 'टीचर की इतनी क्या जल्दी थी। मैंने कहना चाहा पर अबाउट टनं कर गए थे। उनका कसला स्वर मुनकर ही समझ गई थी कि अद चुप रहने की वारी मेरी है। दरअमल मुझे ही कुछ मत्र से काम लेना था। आते ही उनका मूड पराव कर दिया । शाम ठीक पाच बजे दरवाजे की घटी बजी। सुन्दरसोग दरवाजा खोलने गया तो वडा पुश-युश लौटा । "हुजूर, यह तो वही अस्पताल वाली यहनजी हैं। चलिए अच्छा हुआ, वेबी को उनसे डर नहीं लगेगा।" मैंने उत्सुकतावश कमरे में झांककर देना, हमारी उपदेशिका जी आनन्दी/७६

राहगी-सिमटी एक कुर्सी पर बैठी थीं और कमरे के साज-समान को अवाक्
होकर देख रही थीं। मुझे लगा था, मुझे देखकर वह सकापका जाएंगी।
पर कहां ! वह तो एकदम प्रसन्न मुद्रा में उठ खड़ी हुई और मुस्कराते हुए
बोली, "देखिए न बहनजी, कैसा संयोग है। कल ही आपसे परिचय हुआ,
आज यहां भेंट हो गई। सुवह डॉक्टर साहब का सन्देश मिला, तब तो यह
माल्पना भी न थी, कि हम अपनी नन्हीं सहेली के यहां जा रही हैं।"
"आपको डॉक्टर साहब ने भेजा है ?"
"हां, सुबह शायद साहब ने उनसे बात की होगी।"
"ओह तभी!" नहीं तो मैं खुद हैरान थी, कि इतनी जल्दी इन्हें टीचर
कहां से मिल गई।
"बेबी कहां है ?"
"उसे तो अभी रहने दीजिए। भाप तो अभी पप्पू को, मेरा मतलब है
पुनीत को ही तैयार कीजिए । यहाँ सुनते हैं सभी बड़े स्कूल्स में पहले टेस्ट
लेते हैं, तभी एडमिशन मिलता है।"
जतनी देर में सुन्दरतींग पूनम को गोद में उठाकर ले आया था और
पह परिचित चेहरा देखते ही किलक पड़ी थी। नमस्ते बांटी" उसने कहा
और उनके गले में दोनों बांहें डालकर झूल गई।
"तुम्हारा पविजन कैसा है देवी?"
"पुखता है. पूनन ने चेहरे को उत्तयों से भरते हुए उत्तर दिया, "पर
पता है, बाद में रोईनहीं। दवाई लगानेवाए देन. तबभीन्हीं रोई। हैन
मन्नो:"उल्ने गवाही के लिए मुझे पुकारा नहीं बोली।
"बरे सह. हमारोनन तो बहुद रोजी है।"
"
रोनासनः सा है. हर दिन-भरता
र साना इको कर
बुद रही है। भारत नगर

"जाओ, अपनी कितावे लाओ और भैया को बुला लाओ।" सुन्दरसीग की गोद में बैठकर जब वह चली गई तो मैंने पूछा, "आपकी बेवी का नाम भी पूनम है ?" "नही, मैं तो मजाक कर रही थी। वेवी का मन बहला रही थी।" "कितने बच्चे है आपके ?" "दो लड़कियां हैं, बस्स!" "और लड़का?" उन्होंने सिर हिलाकर नकारात्मक उत्तर दे दिया। "अरे !" बिना वजह मेरा स्वर सहानुभूति से आई हो उठा। "क्या फर्क पडता है बहनजो।" मेरी सहानुभूति को व्यर्थ करते हुए उन्होंने लापरवाही से कहा, "यहा कौन पेशवाओं की जागीर पड़ी हुई है, कि उसके लिए वारिस जरूरी है। अपने लिए तो दोनों बराबर हैं।" उनका यह वेफिक्र लहजा मुझे ईर्ष्या से भर गया। यहा तो इतना निश्चित होना कभी आया ही नहीं। पुनीत के बाद पाच साल तक बच्चा घर में नहीं आया तो मैं घबरा उठी थी। इस वार लगता है, कि बहुत जल्दबाजी हो गई है। पता नहीं कैसे सम्भाल पाऊगी। पूनम के वक्त डर लग रहा था कि कही फिर से लडका न हो जाए। अब लगता है, कि फिर लड़को हो गई तो-एक चिन्ता दहेज की ही मुझे रात-रात सोने नहीं देती। इनसे तो कुछ भी कहो मजाक में टाल देंगे। रात मैंने कहा, "सुनिए, टीचर टूढ़ने में तो आपने बहुत फुर्ती दिखाई है। उसकी क्वालिफिकेशन्स का तो पता कर लिया था न !" "तुम्हारे लड़के को सिक्स्थ में एडमिशन चाहिए न ! इतना तो उसे माता ही होगा । माई डियर लेडी, शी इज ए रेग्यूलर टीचर।" "तभी तो, वहनजी, वहनजी कहती रहती है। इतना ऑकवर्ड लगता है।" अब मैंने अपने मन की असली वात प्रकट की। "तो क्या कहकर पुकारे कोई आपको? मंडम?" इनके स्वर मे व्यंग्य का पुट था। "दरअसल कुमुद जी, महत्वपूर्ण यह है कि आप उन्हें क्या कह- आनन्दी/१ कर पुकारती हैं । तुम्हें तो मालूम है डियर, इस घर में मैं किसी भी टीचर का अनादर बर्दाश्त नहीं कर सकता।" "मालूम है बावा, कितनी बार एक ही बात कहेंगे।" मैंने वेजारी से कहा और उनके इस प्रिय विषय को बन्द कर दिया। नहीं तो अभी रामा- यण खोलकर बैठ जाएंगे कि हमारे पिताजी हेडमास्टर हैं, हमारी बुआ टीचर थीं, चाचा टीचर थे । हमारे नाना संस्कृत के पंडित थे और मामा फारसी के विद्वान हैं.----पता नहीं मास्टरों के परिवार में ये अनोखेलाल कहां से पैदा हो गए और इतना अभिमान है इन्हें अपने खानदान का कि हर किसीके सामने बचपन की गाथा लेकर बैठ जाएंगे। कभी-कभी तो मेरी पोजीशन इतनी विचित्र हो जाती थी। - •. बच्चों की टीचर को पुकारने की सचमुच एक समस्या थी। 'बहन जी' मेरी जवान पर चढ़ता नहीं था और मुसीवत यह थी कि उनका नाम तक हमें मालूम न था। डॉक्टर साहब ने शायद इन्हें बताया भी हो पर वह उस दिन इतने तैश में थे कि बाहर आते ही सब कुछ भूल गए। दो-चार दिन बाद मौका लगने पर मैंने ही पूछ लिया, "आपको क्या कहकर बुलाया जाए ?" मेरा प्रश्न समझने में उन्हें कुछ समय लगा। फिर धीरे से बोली, "कहने को तो लोग मुझे मिसेज आचार्य भी कहते हैं। वैसे नाम मेरा आनन्दी है। आपको जो भी अच्छा लगे, कह लें।" "आनन्दी, नाम तो बहुत अच्छा है। मेरी एक मौसी हैं. उनका भी यही नाम है।" "जी हां, नाम तो अच्छा है, मां-बाप ने बहुत सोच-समझकर रखा है। जीवन में न सही, नाम में तो भानन्द है ही।" उन्होंने कहा और हंस दीं। इतनी बड़ी वात के साथ यह हंसी बड़ी बेतुकी लगी। मैंने कहा, "चलिए, आप नाम तो सार्थक कर रही हैं। हमेशा खुश . ६२/ पटाक्षेप रहती हैं।" "खुश रहे विना चारा ही क्या है ? अपने सारे दु.य मोड़कर आपके घर जाऊं, तो आप मुझे गेट से ही विदा कर दे। इसलिए अपने राम तो मस्त रहते है।" उन्होंने कहा और उसी शाही अन्दाज से अपना बैग कधे पर टागकर नमस्ते की और चल दी। पता नही लोग इतने मस्त कैसे रह लेते हैं ? यह औरत अपनी पड़- यडिया साइकिल बरामदे से टिकाकर जब भी घर में दाखिल होती है तो एक मुस्कान के साथ । उसके चेहरे की रंगत बतलाती है कि वह दिन-भर धूप मे यहा-वहा घूमती रही है पर थकान का जरा-सा चिह्न भी उनके व्यवहार में नहीं होता। वही ताडादम पिलखिलाहट, वही बच्चों का-सा उत्साह । यो घर-घर ट्यूशन्स करने के पीछे भी कोई मजबूरी रही होगी। लेकिन इस बात को भी यह अपने 'फिकर नॉट' अन्दाज मे ही वयान करती। कहती, "ये सप्ली. मैटरी वाले विद्यार्थी मुझे बहुत अच्छे लगते है। अगर सबके सब पान होने लगे, तो मेरा क्या हो । स्कूल से अपने राम को हर साल अप्रैल में छुट्टी मिल जाती है।" "आपके हस्बैंड क्या करते हैं ?" एक वार मैंने उत्सुक्तावश पूछ ही लिया था। "क्या करेंगे, बस राज करते हैं।" उसी लहजे में उत्तर मिला था। समझ गई थी, कि बहुत छोटी-मी पोस्ट पर होंगे। तभी न वैचारी इतनी परेशानी उठा रही है। और पता नहीं इतनी परेशानी के बावजूद वेचारी कैसे इतनी खुश रह सेती है। चेहरे पर कभी कोई शिकन नही, परिस्थिति के लिए मन में कोई कडवाहट नहीं। और एक में है, मुझे तो लगता है जैसे ससार में मुझमे ज्यादा दुयो प्राणी कोई और है ही नहीं। नौकरी की एक बटालियन पीछेपूट जाने का दृष हमेशा सालता रहता है। ऊपर से मकान इतना छोटा मिला हुआ है कि लगता है चारों ओर से मुझे लीलने को ही दोडा आ रहा है। शिकायत आनन्दी/८३ करो तो यह कह देते हैं कुछ सामान कम कर दो। सुनते ही मुझे तो रोना आ जाता है। इतनी हसरत से जमाई हुई गृहस्थी है मेरी; कौन-सी चीज़ फालतू है जो उठाकर फेंक दूं । नई परिस्थितियों से समझौता करते-करते इतनी पस्त हो गई मैं कि एक दिन बुखार ही हो आया । यह तो हस्व मामूल दौरे पर ही थे। किसी तरह चपरासी से कच्ची-पक्की रोटियां सिंकवाकर बच्चों को खाना दिया और पड़ रही। इतना गुस्सा आ रहा था इनपर-~-एक तो ऐसी सड़ी-सी जगह में लाकर पटक दिया, ऊपर से यह भी नहीं, कि ढंग का कोई नौकर ही ढूंढकर दिया होता। मिसेज़ आचार्य उस दिन ठीक बेडरूम के दरवाजे पर ही आकर खड़ी हो गई, "वेबी ने बताया कि आपकी तबीयत ठीक नहीं है।" और कोई दिन होता तो मुझे इनकी यह हरकत शायद अच्छी न लगती। पर उस दिन मैं तरस गई थी, कि कोई आकर मेरा हाल पूछे। "आइए न !” मैंने उठकर उनके लिए जगह बनाते हुए कहा। पर वह पलंग पर नहीं बैठीं । ड्रेसिंग टेवल वाला स्टूल खींचकर उसपर वैठती हुई धीरे से बोली : "साहब शायद यहां नहीं हैं ?" बस, मुझे तो बहाना मिल गया। पता नहीं कितनी देर तक मैं बड़- बड़ाती रही। उस समय यह भी भान नहीं रहा कि इतनी सारी बातें हर किसीके सामने करनी भी चाहिए या नहीं। अपना ज्वार खत्म होते-होते मैंने अनुभव किया कि इस वीच उनकी आंखें वरावर मुस्कराती रही हैं । शायद मेरी सारी बकवास को उन्होंने पूनम और पुनीत की नोंक-झोंक से ज्यादा महत्त्व नहीं दिया था। इसका अहसास होते ही एकदम मुंह फुलाकर चुप हो गई मैं। मेरे चुप होते ही वह अपने हमेशा वाले अन्दाज़ में बोली, "आप बीमार हैं न, इसीलिए इतनी परेशान हो रही हैं । नहीं तो, सच बात तो यह - ८४/पटाक्षेप है कि मर्द बाहर रहते ही अच्छे लगते हैं। पर सौरने में देर-तरेर होबार तो गुस्सा तो जरूर आता है, लेकिन ये लोग घर में रहें न, तो परेशान कर डालते हैं। ठीक कह रही हूं न !" और उस प्रश्न पर मुझे एकदम हंसी आ गई। अपनी पहली दाली कोफ्त भूनकर मैं इनकी तानाशाहो के किस्से लेकर बैठ गई, "बाप रे, र में रहते है तो सबकी अच्छी परेड हो जाती है। ये क्विा को फैली है? यह वॉश बेसिन कितना गन्दा हो रहा है ? ये झाले कब ने नहीं निकाले गए? यह निटिंग घर-भर में क्यों घूम रही है-तब तो सचमुच ऐसा लगता है कि ये महीने में दस दिन बाहर रहते हैं तो वीस दिन रहा करें।" शाम होते-होते मेरा गुस्सा उतर गया था, और बुखार भी। कुछ लोग होते ही ऐसे हैं कि उनके साय आदमी अपनी मारी परे- शानियां कुछ समय को भूल जाता है । यह वात चाहे में सबके सामने स्वीकार न करूं, लेकिन यह सच है कि मिसेज आचार्य से बात करने के बाद घडी से बड़ी समस्या भी छोटी-सी नजर आने लगी थी। उनको दुग- मिजाजी की जैसे मुझे छूत लग जाती थी। (उनका असर बहुत देर वा नहीं रहता था, सो बात अलग है।) जिम दिन पुनीत की टी० सी० और प्रोग्रेस काई टार में मिले ये उम दिन में इसी तरह मायूस बनी गुमसुम बैठी हुई थी। यही नदारयाधि कब पाच बजे और यह घर आएं। बाज लड़ाई होना निरित्रनु पाउदा मना किया था मैंने, ट्रांसफर रुकवा नहीं मकरें तोष्टी दो रे नछे हैं। आप चले जाएगे तो डिस्टवं हो जाएगा बंधारा। पर दर दोन्नती करके रहे। सरकार के वफादार नौकर जी टहो। घर मे बैठना असह्य हो गया तो मैं बाहरबाग तयारी। टीक पाच बजे मिसेज आचार्य की महडिका कतिपदा धविन हुई। "अरे! तबीयत तो ठीक है न मात्र महा महार-मागमा दानी रहा है आज ?" उनकी तेज़ निगाहों ने आते ही मेरा परीक्षण कर डाला। "मैं बताऊं आण्टी, भैया का रिजल्ट आया है आज।" हमारी चुन- मुनिया को बीच में बोले बिना चैन कहां । "भैया का रिजल्ट आया है ! पास तो हो गए हैं न !" उन्होंने सशंकित स्वर में पूछा। "पास तो हो गया है । ८१% मार्क्स हैं।" मैंने मरी-सी आवाज़ में कहा। "अरे वाह, तब तो मिठाई खिलाइए। आपकी शक्ल देखकर तो मैं डर गई थी। इतना अच्छा तो रिजल्ट है।" "क्या खाक अच्छा है। क्लास में थर्ड आया है।" मेरी आवाज़ ऐसी थी, कि वस रोही पड़गी। "तो उससे क्या फर्क पड़ता है। मार्क्स तो कितने अच्छे हैं। आप तो फौरन मिठाई मंगवाइए। और पुनीत है कहां !" "भैया तो सो रहे हैं दिन-भर।" पूनम ने बताया। "हाय वेचारा, आपको उदास देखकर नर्वस हो गया होगा। मैं तो बहनजी, लड़कियों के पचपन प्रतिशत नम्बर भी आ जाते हैं तो खूब शाबाशी देती हूं। अरे, हमसे तो अच्छी है। यहां तो हमेशा जनता क्लास ही आती रही है । वस, फेल कभी नहीं हुए । खींच-खींचकर गाड़ी बी०ए० तक पहुंचा ही दी। वही अब काम आ रहा है।" और आधा घंटे वाद चाय छानते हुए मैं इनसे कह रही थी, "पुनीत का रिजल्ट आया है आज । इक्यासी पसेंट मार्क्स हैं।" "और रंक ?" "रैक तो खैर थर्ड आया है। पर उससे क्या फर्क पड़ता है। मार्क्स तो देखिए न, कितने शानदार हैं। अपने तो पचपन प्रतिशत से आगे कभी बढ़े ही नहीं।" वाद में स्वयं मुझे ही आश्चर्य हुआ, कितने सहज भाव से कह गई थी ८६ / पटाक्षेप

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" आत्मकेन्द्रित होने की भी सीमा होती है और मैंने शायद उस सीमा को पार कर लिया था। क्योंकि लगातार एक हफ्ते तक जव मिसेज़ आचार्य नहीं आई तब भी सिर्फ यही चिन्ता बनी रही कि बच्चों के टर्मिनल्स सिर पर हैं, कहीं फेल न हो जाएं। यह कभी सोचा ही नहीं कि उनकी अपनी भी समस्या हो सकती है कोई । नहीं तो इतनी रेग्यूलर रहने वाली वह इतने दिन तक घर न बैठतीं। साहब बहादुर भी एक दिन बोले, "दिन-भर भुनभुनाती रहती हो। किसी दिन हरीराम को घर भेजकर पता ही करवा लेतीं।' "घर का पता यहां किसके पास है ?" मैंने मुंह फुलाकर कहा। "मेरे पास है। आज गाड़ी नहीं ले जाऊंगा। तुम शाम को खुद ही उनके यहां चली जाना।" ! अरे वाह !" "सच कह रहा हूं कुमुद । दरअसल वह बड़ी विचित्र परिस्थिति में फंस गई हैं। उनकी बड़ी बेटी किसीके साथ भाग गई है। शायद हम उनकी कुछ मदद कर सकें। कम से कम पूछ तो लें ही।" "आपको कैसे पता चला?" "कल दफ्तर में वात हो रही थी। वैसे ४-५ रोज पहले पेपर में भी पढ़ा था। पर तव यह पता नहीं था कि यह वीणा आचार्य उन्हींकी लड़की "मैं खुद मैं चुप ही रही, क्योंकि मैं पेपर सिर्फ सिनेमा के विज्ञापनों के लिए ही देखती हूं। हां, पहले से पता होता तो इस खबर को जरूर पढ़ती। वहां जाने की मेरी ज़रा भी इच्छा नहीं थी पर इनके आगे मेरी एक न चली। पूरे रास्ते मेरा मन धक-धक करता रहा है कि वहां जाकर आखिर कहूंगी क्या? ऐसा लग रहा था जैसे किसीके यहां मातमपुरसी पर जा रही हूं। यह प्रसंग तो उससे भी कठिन था। कहीं वह यह न समझ लें कि मैं तमाशा देखने आ गई हूं। पता एकदम ठीक था, घर ढूंढने में ज्यादा दिक्कत नहीं हुई। लेकिन Im गाडी के रुकते ही आसपास की खिडकियों में इतनी सारी आंखे टंग गई यौं कि मैं नर्वस हो उठी। बन्द दरवाजे पर धीरे से दस्तक देते हुए मैंने मोहन से कहा, "तुम गाडी उधर कही चौड़े मे पार्क कर लेना। यहा तो सारा रास्ता ही घिर गया है।" "अरे, आप हैं।" दरवाजा खोलते ही मिसेज आचार्य ने पूछा और वह मुझे हाय पकड़कर भीतर ले गई। शायद बहुत देर बाहर खड़े रहना उन्हे भी अच्छा नहीं लग रहा था। भीतर जाते ही उन्होंने दरवाजा बन्द कर लिया और एक अघेरा-सा कमरे मे भर गया। किसी तरह मिमेज आचार्य के पीछे-पीछे चलती हुई मैं दूसरे कमरे मे पहुंची, जो शायद रमोईघर था। दीवार से टेक लगाए पटरे पर बैठी एक दस-बारह साल की लड़की 'चन्दा मामा' पढ़ रही थी। "मोन, उठ तो", उन्होने कहा और पटरा मेरे आगे विछाते हुए कहा- "वैठिए न।" "मीनू " बाहर के कमरे से एक परखराती आवाज आई। "क्या है ?" वेजारी से मीनू ने कहा। "कौन आया है ?" "मम्मा की सहेनी हैं।" "भोटर में कौन आया है "कहा तो मम्मा की सहेली है।" मीनू ने कहा और धीरे से वीच वाला दरवाजा उडका लिया। आवाज अत्र भी था रही थी पर अर्थ-वोध नहीं हो रहा था। "मीन, चाय बना झटपट ।” मिसेज आचार्य ने कहा। दरवाजा बन्द होते ही उनके चेहरे का तनाव कम हो गया था। "चाय-याय रहने दीजिए-दरअसल में देखने आई थी, कही आप बीमार तो नहीं ?" मैं सफाई से झूठ बोल गई पर इतना कहते-कहते भी मुझे पसीना छूट गया। उन्होंने कुछ जवाब नहीं दिया। वे कप-प्लेटें निकालती रही, मीनू को अच्छी चाय बनाने के निर्देश देती रही, उसे स्टोव जलाने में मदद करती - रहीं। हाथ धोकर जब वह मेरे पास आकर बैठी तो उन्होंने कोई दूसरा ही विषय छेड़ दिया था। मुझे उस वार्तालाप में ज़रा भी मजा नहीं आ रहा था। उल्टे कोपत हो रही थी। इनपर तो इतना गुस्सा आ रहा था- भेज दिया संवेदना प्रकट करने के लिए। अरे, यहां किसीको कोई मलाल भी तो हो पहले। मैंने यह अपेक्षा भी नहीं की थी कि वह मेरे गले में बांहें डालकर रो पड़ेंगी। पर इतनी बड़ी बात हो जाने पर आदमी कम से कम उदास तो होता है। यहां तो वस । "मम्मा, पापा को दे आऊं?" हमारे सामने दो कप रखते हुए मीनू ने होले से पूछा। "दे दे।" उनकी आवाज में हिकारत स्पष्ट थी। "पापा, उठिए चाय ले लीजिए।" दूसरे कमरे से मीनू की आवाज आई। उत्तर में नहीं सुन सकी क्योंकि मिसेज आचार्य ने उठकर धीरे से बीच वाला दरवाजा फिर लुढ़का लिया था। "वीमार हैं ?" मैंने धीरे से पूछा। "कव से?" "बरसों से।" इस अप्रत्याशित जवाव पर मैं चौंककर रह गई । कमरे में घुसते ही जो एक भभका-सा मेरी नाक में घुसा था उसका रहस्य अब खुला । अब उस घुटन-भरे वातावरण में बैठना मेरे लिए असह्य हो गया। किसी तरह चाय पान समाप्त करके मैं उठ खड़ी हुई, "चलूंगी मैं भव, घर पर बच्चे घवरा रहे होंगे। हरीराम भी पता नहीं अब तक आया भी कि नहीं।" 'उन्होंने कुछ देर और बैठने का अनुरोध नहीं किया। सुपारी कतरती हुई बोली, "चलिए, आपको गाड़ी तक छोड़ आऊं।" "कौन है ?" बाहर वाले कमरे में पैर रखते ही प्रश्न हुआ। "मैं हूं। बहनजी को सड़क तक छोड़ने जा रही हूं।" उन्होंने जवाब दिया और मुझे लेकर सड़क पर आ गई। मीनू हमलोगों के पीछे दरवाजे तक आई थी। "मम्मा, जत्दी आना" उसने कातर स्वर में कहा। "मीन !" उसी ककंश स्वर में अन्दर से बुलाहट हुई। "मेरी स्नफ की डिबिया कहा है?" "मिसेज आचार्य !" कुछ दूर तक चलने के बाद मैंने कहा "आपके मिस्टर को आइसाइट क्या बहुत सराव है ?" "बहुत ज्यादा।" "क्या शुरू से ही है या." "शुरू से तो नहीं थी। भाग्य की यह मेहरवानी तो इन लड़कियों के जन्म के बाद हुई है।" "कोई एक्सीडेंट हुआ था?" "हा, एक्सीडेंट ही समझिए। आनन्द केमिकल्स में अच्छी नौकरी थी एक दिन लेबोरेटरी में पता नहीं कैसा विस्फोट हो गया? चार-पांच लोग घायल हो गए । इनकी तो आखें ही जाती रही।" "कम्पनी ने मुआवजा तो दिया होगा?" "दिया था न ! उसीके सहारे तो ट्रेनिंग की। उसीकी कृपा से तो यह दो कमरों का घर बच रहा । नहीं तो इसे भी वेचना पड़ता।" "आपके हस्त्वंड अब कुछ नहीं करते ?" "करते हैं ! मेरी चौकीदारी करते हैं।" "नहीं, मेरा मतलव था, आजकल काफी व्यवसाय चल पड़े है ।" मैंने बिना वजह सकुचाते हुए कहा। "मैं समझ गई आपका मतलब, लेकिन बहनजी, काम तो करने वाले के लिए होते हैं । और कुछ नहीं तो घर बैठे ट्यूशन ही कर सकते थे। एम० एस०सी० पास हैं। पर आंखे गई तो नौकरी छूट गई। नौकरी छूट गई तो दिल टूट गया-- अपने पास तो दिल है ही नहीं। टूटने का सवाल ही नहीं उठता । ग्यारह साल से इस गृहस्थी की गाड़ी धीच रही हूँ मैं। मीता का बनवास तो चौदह साल में पूरा हो गया था। मुझे स्तिने दिन भगतना है. ईश्वर हो जानता है।" मानन्दी/१५

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Patasheyp

Author
Joshi Malti
Title
Patasheyp
File name
Patasheyp
Text
OCR done
Published
2011/03
Publisher
Xxxxxxxxxxxxxx
Language
Sanskrit
Pages
94
Library
Adarsh Library, Jaipur
Classification
Geography
DLI number
552079
Barcode
4990010032808.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library of India
Rights
Copyright permitted
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