Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Sunder Shyam Hamare
Front matter
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सुन्दर श्याम हमारे
रचयिता
गिरधर डागा
||श्री नृसिंही विजयते॥
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कुलदैव भगवान् श्री नृसिंह, बीकानेर
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स्व श्री सुन्दर लालजी डागा
ब्रह्मलीन धर्म सम्राट
स्वामी श्री करपात्री जी महाराज
स
"पितृ चरण कमलेभ्यो नमः"
"श्री गुरू चरण कमलेभ्यो नम."
मेरे परम पूज्य पिता श्री
जिन्होने
सुसंस्कारों के बीज बोये
एवं
मेरे परम आदरणीय विश्व वन्द्य
गुरूदेव
जिन्होने
संस्कारों को परिष्कृत किया
उन्हीं को सादर समर्पित
-मिरधर डामा
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रमेशभाई औड्या
,
ઝન
ઈ
.
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છે
ભગવાન શ્ની સેવા મેં સમપિત હય લ્હી
પ્રેમ પૂર જના પર સગવાન છે બીચ સીધા સવાલ છે ,
છેવ તે સે નિકે વો ગીત તે નિ છે #ય #મ
નિ વો કળી હગીત મા હય છે aiા સે
રર ટ ર પ્રભુ પ્રસને વેરતા તે , હસ મથે મે
સીમ માગવત મે ગોપીને વાયા હુમા ગોપીગીત, ગીત નહીં
ગીત છે
ભાઈ શ્રી ગિરિધર ૩ળા ની છે. માત્ર પૂર્ણ હક્ય સ
નિtછે હુયે પ્રભુ પ્રેમ છે મોતી છે , ભાવ કે ઘો
પિર શેર
જનન અને શ્રી મહ હાર શ્રીહરિ છે કે મેં આખિન યિા છે
ઉર આપની નીવન નૈયા “ હેયા છે રૂપ મેં નાનપતિ પરમાત્મા
છો વળ મિા ,
કમી અગન-માછા મે સ કર યામ હમારે ” પુસ્તpl
દ્વારા સમી ભાવ-નાત છે પ્રેમી સમલ પ્રસ્તુn #ને # કના
Bયાસ રૂમ મેં અમને હૈયય જો ગુમ રુમનામે તે વન
મારી વાત હું છે ડન પ્રેમ-પ ભાવપૂર્ણ ગાન સબ છે મને,
પર મસ્તી સે મર મેગા , #મ પ્રસન્ન કરેગા !
ખ.
1
سز निवेदन श्री हरिका अनुग्रह कब, कहां और कैसे होजाता है, यह कहना कठिन है जीव का भक्ति मार्ग की ओर आकृष्ट होना स्वयं जीव के वश में न होकर श्री हरि की इच्छा पर निर्भर रहता है. श्री हरि की अनुकंपा से एवं पूर्व जन्मो के पुण्योदय से ही ईश्वर के प्रति अनुराग जाग्रत होता है भक्ति मार्ग की ओर मुड़ने का यह पहला संकेत है तथा गन्तव्य की ओर जाने का पहला सोपान है. भक्ति ही एकमात्र साधन है जो साधक को हरि स्वरूप बना देती है. जिस प्रकार घर में किसी बर्तन मे रखे हुए गंगा जल को कभी ठोकर लग जाती है तो बारंबार क्षमा याचना के भाव से श्री गंगा जी का स्मरण करते हैं, उसी गंगाजल में स्नान करने के लिए जब कोई श्रद्धालु गंगा तट पर जाता है और स्नान के प्रयोजन से गंगा में प्रवेश करने के लिए सर्वप्रथम पैर डालता है तब उसे अपराध बोध नहीं होता क्योकि श्री गंगा जी उस श्रद्धालु को श्री हरि स्वरूपबना देती है, ठीक उसी प्रकार भक्ति रूपीगंगा साधक को हरि स्वरूप बना देती है. कभी कभी साधक की भक्ति अपने चरमोत्कर्ष पर पहुंच जाती है और साधक अपने साध्य से भी अधिक साधन अर्थात नाम जपको महत्व देने लग जाता है फिर नाम जप उसके लिए साधन न होकर साध्य हो जाता है. उसे नाम जप में ही परमानद की अनुभूति होती है. एक साधक ने नाम महिमा का उल्लेख करते हुए लिखा है "जो मस्ती भरी है तेरे नाम में, वो मस्ती नहीं है तेरे धाम में."महापुराणों एवं शास्त्रो में भी नाम जप व संकीर्तन की महिमा का बारंबार उल्लेख आता है. भगवान् श्री हरि ने स्वयं श्री नारद जी से कहा है "नाहं वसामि वैकुण्ठे, योगिनां हृदये न च, मद्भक्ता यत्र गायन्ति.तत्र तिष्ठामि नारद" गोस्वामी श्री तुलसीदास जी ने भी नाम महिमा का उल्लेख करते हुए कहा . कलियुग केवल नाम अधारा, सुमिर सुमिर नर उतरही पारा।" नाम संकीर्तन से ही भक्ति पुष्ट होती है. भक्ति न सिर्फ एक भाव है बल्कि रस सार है. इसी रस सार के माध्यम से आनंद रस सिंधु श्री कृष्ण को प्राप्त किया जा सकता है. भगवान् भूतभावन देवाधिदेव महादेव प्रभु आशुतोष, जो कि स्वय परम वैष्णव है, भक्ति मार्ग के निर्विवाद आचार्य हैं. जगत् जननी राज राजेश्वरी सुन्दर श्याम हमारे भवानीजीवो पर करुणा करके भक्ति मार्ग के बारे में भगवान् शंकर से समय समय पर जिज्ञासाऐ करती है और भगवान् शिव इसी माध्यम से जीवों को भक्ति मार्ग के मत्रो की दीक्षा प्रदान करते हैं कई साधक जो श्री कृष्ण की साधना करते है वे भगवान शिव की आराधना को अन्याय मानकर भगवान चन्द्रमोलि की पूजा नहीं करते महापुरुषों ने समय समय पर ऐरी भान्तियों को निराधार बताया हे वस्तुत: श्री कृष्ण की उपासना में भी भगवान् शकर का अनुग्रह आवश्यक है श्रीगोपाल सहस्त्र नाम जो कि श्री कृष्ण उपासना का एक महान् साधन है वह भगवान शिव का ही कृपा प्रसाद है भक्ति मार्ग के सबसे बड़े गुरु भगवान चन्द्रचूड शिव ही है. ऐसे करुणा सिंधु भगवान् शिव को गोरी सहित इस साधक का कोटि-कोटि वन्दन समर्पित है श्री कृष्ण उपासना की गहराई में उतरने के लिए तथा उच्च पात्रता पाने के लिए रास रासेश्वरी नित्य निकुंजेश्वरी वृषभान नन्दिनी श्री राधा रानी का कृपा कटाक्ष होना नितांत आवश्यक है. ऐसी करुणा की साक्षात मूर्ति श्री राधारानी ही अपने भक्तों पर दया करके आनन्द सिंधु रस सार रसिकेश्वर वृजेन्द्र नन्दन भगवान श्री कृष्णचन्द्र आनन्द कन्द परमानन्द के हृदय कमल में कारुण्य भाव जाग्रत करती हैं. श्री राधा एवं श्री कृष्ण एक दूसरे से उसी तरह अभिन्न हैं जिस तरह जल से तरंग. दोनों एक ही स्वरूप है. श्री राधिका जी भगवान् श्रीकृष्ण की आहादिनी शक्ति है. श्री कृष्ण की उपासना श्री राधिका जी की उपासना के बिना पूर्णता को प्राप्त कर ही नहीं सकती. श्री कृष्ण का साक्षात्कार साधकों को तभी स्वीकार्य होता है जब श्री राधाजी आकर साक्षी दे. इस प्रकार से साधक युगल स्वरूप की माधुरी छवि का रसास्वादन कर लेते हैं. ऐसी श्री राधा महारानी के पाद पनों में इस साधक का सर्वस्व अर्पण है. भगवान श्री कृष्ण स्वयं अकारण करुण करुणा वरुणालय है. कृपा के सिधु हैं. इसी सिंधु के एक बिन्दु की लालसा में साधक जन्म जन्मान्तरों से लगे रहते हैं. इसी अहेतुकी कृपा को पाने के लिए जीव प्रयास करता है और फिर इसी के सहारे अंतिम लक्ष्य भगवद्पादारविन्द का आश्रय प्राप्त कर लेता है. इसी मार्ग पर अनन्य भाव से लगे रहने परजीव के योगक्षेम को वहन करने की जिम्मेवारी भगवान श्री कृष्ण ने गीता में ली है. निश्छल भाव से जीव को सन्मुख होने मात्र की देरी है फिर तो बस गोपाल अपनी माधुरी बशीधुन से जीव रूपी गायो को घेर लाता है. बड़े-बड़े योगीन्द्र मुनीन्द्र परमहंस एवं साक्षात श्रुतिया भी गोपी रूप में प्रकट होकर श्री कृष्ण की और ऐसी आकृष्ट हुई कि प्रेमा भक्ति की आचार्या बन गयी परम ज्ञानी उदव को भी जिनका सुन्दर श्याम हमारे आश्रय लेना पड़ा, ऐसे श्री कृष्ण शरणागत वत्सल हैं और शरणागत को अगीकारकरनाउनके स्वभावकी विवशता है वेशरणागत का त्याग किसी भी परिस्थिति में नहीं कर सकते. ऐसे सरल सहज करुणासिंधु भगवान् श्री कृष्ण की शरण लेकर उनकी कृपा कटाक्ष की याचना करते हुए अपने प्रयासों को यही समझ कर अर्पित कर रहा हूं कि - "त्वदीयं वस्तु गोविन्दं, तुभ्यमेव समर्पये". इस अकिंचन जीव पर कैसे कृपा हुई यह तो बता पाना असंभव है पर इतना स्पष्ट है कि आध्यात्मिक लेखन कभी भी मेरा विषय नहीं रहा तथापि मेरे परम आराध्य युगल सरकार की असीम कृपा से ही लेखनी पकड़ने का साहस कर पाया हूं. अन्यथा मुझ जैसे तुच्छ जीव में भगवद गुणगान करने का सामर्थ्य नहीं है. इसमें निश्चय ही भगवान् शंकर, युगल स्वरूप श्री राधारानी व श्री कृष्ण प्रभु की कृपा ही हेतु है. इस अवसर पर मैं अपने पूज्यपाद पिताश्री स्व श्री सुन्दरलाल जी डागा एवं मातुश्री श्रीमति कान्तादेवीजी के प्रति अपनी हार्दिक कृतज्ञता प्रकट करना अपना पुनीत कर्तव्य समझता हूं, जिनकी गोद में बैठकर ही इस देह में आध्यात्मिक संस्कारों काबीजारोपण हुआ. इन्हीं संस्कारों के अंकुरित होने से सन्मार्ग पर चलने की प्रवृत्ति का निर्माण हुआ. मैं अपने हृदय के श्रद्धा सुमन उन्हीं के चरणों में अश्रुपूरित नयनों से अर्पित करता हूं. मेरे गुरुदेव परम पूज्य प्रातः स्मरणीय धर्म सम्राट स्वामी श्री करपात्री जी महाराज के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट किये बिना इस निवेदन को अपूर्ण मानता हूं. मेरे आध्यात्मिक संस्कारों को परिष्कृत करके श्रीराधाकृष्ण की भक्ति की ओर प्रेरित करने का जो अनुग्रह मुझ पर किया है उसके लिए मैं जन्म जन्मांतरों तक श्री गुरु चरणों का ऋणी रहूंगा. वैसे तो मेरे पास श्री चरणों के योग्य कुछ नहीं है फिर भी श्री गुरु चरण कमलों में मेरे हृदय के श्रद्धा के सर्वस्व उद्गार अर्पित करता हूं. मेरे जीवन में आध्यात्मिक चिन्तन एवं सत्संग का लाभ जिन महापुरुषों के सानिध्य में मिला उनमें से विशेषकर अनन्त श्रीविभूषित जगद्गुरु शकराचार्य स्वामी श्री निरंजन देवजी तीर्थ एवं ब्रह्मलीन स्वामी श्री कृष्णानन्द जी सरस्वती का हृदय से आभारी हूं एवं उनके चरणों में बारंबार हार्दिक अभिनन्दन अर्पित करता हूं. इस पुस्तक की रचनाओं में जिन भावों का समावेश है वे भी महापुरुषों के सत्संग का ही प्रसाद है. इसी संदर्भ में मुझे यह लिखते हुए गौरव हो रहा है कि मेरे परम आदरणीय संत हृदय परम पूज्य श्री रमेश भाईजी ओझा (पूज्य सुन्दर श्याम हमारे Im भाईजी) ने सदैव मुझे प्रोत्साहन दिया वसही मार्ग दर्शन दिया. इस पुस्तक का विचार एवं प्रेरणा भी उन्हीं से मिली उन्होंने सदैव मुझे अपना अनुज मानकर स्नेह वृष्टि की. उन्होंने आर्शीवचन के अमृत बिन्दुओं से इस पुस्तक की जो शोभा बढ़ाई उसके लिए आभार व्यक्त करने में स्वय को असमर्थ मानते हुए भी अपनी पूर्ण कृतज्ञता प्रकट करता हूं एवं समय-समय पर उनका समय लेकर जो कष्ट दिया उसके लिए क्षमा प्रार्थी हूँ. मैं सभी बुर्जुगों, स्वजनों, मित्रों एवं हित चिन्तकों का भी आभारी हूं जिन्होने मुझे इस मार्ग में आगे बढ़ने में प्रोत्साहन दिया. इस संदर्भ में श्री शशिकान्त जीतुलस्यान, श्रीकान्हारामजी छावल, श्री ओम दत्तजी पुरोहित, श्री स्नेहल मुजुमदार, श्रीदास जी डागा, श्रीकुमार बागड़ी एवं श्री सुशीलजी भैया का भी हार्दिक आभारी हूं जिन्होंने इस पुस्तक को मूर्त रूप देने में मुझे सहयोग दिया. विमोचन समारोह में इन गीतों को जिन कलाकारों ने अपने सुमधुर कण्ठों से गाया उनका भी आभारी हूँ. अन्त में मैं अपनी बहिन श्रीमति पुष्पादेवी मल्ल तथा धर्मपत्नि श्रीमति बीना डागा, पुत्र-त्र्यम्बक एवं पुत्री- कुमारी वृन्दा का भी उल्लेख करना चाहता हूं जिन्होंने प्रकट-अप्रकट दोनों रूप से इस में सहयोग किया. इस पुस्तक को भाव के अनुसार आठ खण्डों में वर्गीकृत किया है. जहांतक संभव हुआ है भजन के अन्त में तर्ज भी देने का प्रयास किया गया है. आशा है रसिक पाठक इससे लाभान्वित होंगे. इस पुस्तक के बारे में कोई सुझाव अथवा त्रुटियों की ओर ध्यान दिलाने वालों का भी मैं आभारी रहूंगा. कोई भी वैष्णव किसी भी भजन की राग अथवा तर्ज के लिए संपर्क कर सकते हैं. इस पुस्तक की न्यौछावर यही है कि कम से कम सप्ताह मे एक बार हरि नाम संकीर्तन करें इस पुस्तक के बारे में यही कहूंगा:- "सुन्दर श्याम हमारे" प्रभु का, मंगलाचरण सों वन्दन गायो, सुलभ बाल-लीला करने को, जगत् यशोदा-नन्दन आयो, रूप-स्वरूप-श्रृंगार निरखकर, बृज निकुंज-लीला सुख पायो, तड़पत राधे श्याम मिलन को, विरहानल को दाह लगायो, शरणागत-वत्सल के आगे, कर कर अर्चन शीश नवायो, 'गिरधर' प्रभु के हृदय कमल पर, अष्ट-कमल को हार सजायो." अत मे श्री राधाकृष्ण के चरणों में इन भजन पुष्पों को अर्पित करते हुए इस सरिता को सतत प्रवाहित होते रहने की याचना करता हूं. जय श्री राधे-जय श्री कृष्ण निवेदक बंबई- २३ जनवरी 19१६ गिरधर डागा
RESTHA
AARI
गाला
मंगलाचरण
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मंगलाचरण
क्रम
भजन
पृष्ठ संख्या
(1)
श्री गणेश जय गणेश
२
(२)
जयति विनायक जय गणनायक
३
(1)
जय जय गणपति जय गणनायक
४
(४)
हे सिद्धि विनायक विघ्न हरो
मुन्दर श्याम हमारे
॥ १॥ श्री गणेश जय गणेश, काट दो सभी क्लेश, विघ्न हरो दु.ख हरो, पाप ताप हुवे शेष..... .||1|| वक्रतुण्ड एकदन्त, रोग शोक करो अन्त; कृपावन्त दयावन्त, रिद्धि सिद्धि दो अनन्त....||२|| सिंदरी तिलक भाल, रक्त वर्ण मस्त चाल, बुद्धि ज्ञान है विशाल, भक्त वृन्द प्रणतपाल.... ...||३|| भालचन्द्र कर -त्रिशूल, कण्ठ सोहे हार फूल, कष्ट शेप हो समूल, ध्यान धरूंचरण धूल......||४|| धूम वर्ण गज करण, दीनता करो हरण, 'गिरधर' तेरी शरण, भक्ति देवो श्री चरण.....||५|| - (तर्जः सीताराम सीताराम सीताराम कहिये) सुन्दर श्याम हमारे २] ॥ २॥ जयति विनायक जय गण नायक, पार्वती सुत विघ्न हरो, रिद्धि-सिद्धि दायक सुर नायक, विपदा मेरी दूर करो।।१।। हे लंबोदर हे महेश सुत, त्रिविध ताप से मुक्त करो, एक दन्त गणपति गजानन, सुख वैभव से युक्त करो||२|| वक्रतुण्ड गजवदन अनूपम, सकल कामना पूर्ण करो, कृपासिंधु भगवन्त गणाधिप, कष्ट सभी के हरण करो।।३।। हे जगवन्दन गौरी नन्दन, सब पापों का नाश करो, गिरधर के इस हदय कुंज में, राधा कृष्ण का वास करो।।४।। सुन्दर श्याम हमारे ||३|| जय जय गणपति, जय गण नायक, जय जय गणराया, जय सुरनायक, उमा नयन तारे देवा, शिव सुखदायक, कार्तिक बंधु देवा,वन्दन लायक, जय जय....|| रूपनिरालो देवा, निरखन लायक, मंगल मूरति देवा, मंगलदायक, गजानन प्यारे देवा, सब के सहायक, एकदन्त वाले देवा, शुभ वरदायक, जय जय....... .॥२॥ विघ्न विनाशक देवा, सब सुखदायक, धूम वर्ण वाले देवा, रिद्धि सिद्धि दायक, विधा के दाता देवा, सद् बुद्धि दायक, परम कृपालु देवा, भक्ति प्रदायक, जय जय....||३|| कृष्ण पिंगाक्षी देवा, भक्त जन नायक, प्रभु वक्रतुण्ड देवा, सिद्धि विनायक, हे लम्बोदर देवा, आनन्द दायक. भाल चन्द्र धारी देवा,मुक्ति के दायक जय जय......||४|| गजवक्त्र विघ्नराजं,संकट नाशक, विकटमेव दयावन्त, मूषक वाहक, करुणा के सागर, सब गुण आगर, गिरधर पुकारे देवा, जग के उजागर, जयजय.......||५|| (तर्ज:- तू ही मेरे मन्दिर तू ही मेरी पूजा.....) सुन्दर श्याम हमारे ४] ॥४॥ हे सिद्धि विनायक विघ्न हरो, आनन्द करो दुःख दूर करो, हे कार्तिकस्वामी सबलकरो, मोहे असुर वृन्दसे अभय करो।।५।। हे दुर्गा दुर्गति नाश करो, मोहे अन्न धन वैभव युक्त करो, हे मृत्युञ्जय शिव दया करो, मोहे ग्रह बाधा भय मुक्त करो।।२।। हे शारद माँ अज्ञान हरो. मोहे निर्मल बुद्धिमान करो, हेमहालक्ष्मी दारिद्रय हरो, मोहे सत्पथ से धनवान करो। हे जाह्नवी गंगे पाप हरो, मोहे पुण्य सलिल को स्नान वरो, हे रवि तनया सब ताप हरो, मोहे जल यमुना को पान वरो।।४।। हे मारुत नन्दन मान हरो, मोहे राम सिया को ध्यान वरो, हे जनकसुता अब ध्यान धरो, मोहे राम कृपा वरदान वरो।।५।। हे कुलपति नरहरि त्राण करो, मोहे करुणावश प्रतिपाल करो, गुरुमातपितासिरहाथ धरो,मोहे बालक जानसम्हाल करो॥६॥ हे राधे रानी कृपा करो, मोहे कृष्ण कृपा का दान करो, हे मनमोहन उद्धार करो, मोहे भव सागर से पार करो॥७॥ मुरलीधर मुरली तान भरो, राधे पायल झनकार करो, वंशीधर वंशीनाद करो, मोहे बृज मण्डल को वास वरो।।८।। वृषभान सुता कल्याण करो, मोहे युगल चरण अनुराग वरो, 'गिरधर' बृजभूमि विहारकरो,मोहे शरण में लोस्वीकार करो।।। (तर्ज: जय राम रमा रमनं शमनं.......) सुन्दर श्याम हमारे
बाल-लीला
क्रम
भजन
पृष्ठ संख्या
(१)
हरि ने अद्भुत खेल रच्यो
७
(२)
जय जय बृज राज कुँवर
८
ऐसो नटखट नंदजी को लाल
9
(४)
कृष्ण ता ता थैया नृत्य करे
१०
(५)
आज हरिपोदे कनक हिडोले
૧૧
(६)
आज हरि नाचत नंदजी के अंगना
૧૨
(७)
आज मचल गये बाल कृष्ण
(८)
१४
बृज में धूम मचाई (होरी)
ऐसी अद्भुत मच गई (होरी)
(१)
सुन्दर श्याम हमारे
MARCu...in.
जय श्री कृष्ण
-
.
वंदे नंदनंदनं देवं
बाल-लीला
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हरि ने अद्भुत खेल रच्यो, कौतुक आज भयो मथुरा महुँ, आनन्द रस बरस्यो, अखिल विश्व ब्रह्माण्ड पति हरि, मानुष रूप धरयो। हरि.......! कृष्ण पक्ष की रात अंधेरी, चन्द्र नहीं निकस्यो, चन्द्रवंश को चन्द्र प्रकट भयो, विधि लेखन बिगड्यो। हरि....॥२॥ मायापति की माया व्यापी, दुर्गम सुगम कर्यो, बंदीगृह के दार उघड़ गये, बन्धन मुक्त हुयो}} हरि.....||३|| उमड़ घुमड़ घिर आई घटाएं, अविरल जल बरस्यो, विकल भये नभ तारा मण्डल, बिन मोहन दरस्यो। हरि.... 1४ा सूर्य चन्द्रमा झगरे दोऊ, वासर निशि झगरयो, ठहर गई गति कालचक्र की. अपलक छवि निरख्यो।। हरि......|| असुर वृन्द भयभीत हुए सब, धरा धर्म प्रगट्यो, सुर नर मुनि गंधर्व धरा गो, सबको त्रास मिट्यो}}' हरि......1100 सखिया नाचत प्रेम मगन होय, सखा वन्द हुलस्यो, नंदगाँव गोकुल बृज भूमि, जिनको भाग जग्यो।) हरि......[७॥ मात यशोदा अति हरखावे, नंद आनन्द बढ्यो, रूप मनोहर कृष्ण चन्द्र को, श्याम सप प्रकट्यो। हरि....JIn नंद भवन महं बंटत बधाई, सबको तृप्त करयो. 'गिरधर' दर्शन की अभिलाषा, चरणन शरण पड्यो।। हरि....! .. सुन्दर श्याय हमारे || २ || जय जय ब्रज राज कुँवर, नंद के दुलारे, जय जय ब्रज राज कुँवर, यशोदा के प्यारे।। मोर मुकुट तिलक भाल, गल में वैजयन्ती माल, लटपट घुघराले बाल, नेना मतवारे।। जय जय व्रज राज कुंवर......||१|| सुभग नासिका कपोल, कानन कुण्डल अमोल, मधुर मधुर कहत बोल, कर मुरली धारे।। जय जय ब्रज राज कुंवर..........||२|| ठुमक ठुमक डगमगाय, बृज रज में लपट जाय, माता ले उर लगाय, तन मन धन वारे।। जय जय ब्रज राज कुंवर. ॥३॥ ग्वालन संग विपिन जाय, नव लख धेनु चराय, मुरली की धुन सुनाय, बृज जन रखवारे।। जय जय व्रज राज कुंवर ..... गोपिन संग रचत रास, भक्तन की बुझत प्यास, 'गिरधर' छवि को निहार, कोटि काम वारे।। जय जय ब्रज राज कुंवर.....111 (तर्जः ठुमक चलत रामचन्द्र) ........ सुन्दर श्याम हमारे ऐसो नटखट....... ॥३॥ ऐसो नटखट नंद जी को लाल सखी, ऐसो नटखट नटवर कृष्ण सखी!! ऐसो नटखट........|| यमुना तट जाऊँ सखी मज्जन को, करे तकरार, लुकावे चुनरी।। ऐसो नटखट.. ../ जल भर जाऊँ सखी पनघट पर, फोड़ देवे कंकर से मेरी गगरी।। ऐसो नटखट.......||३|| दूध,दही, माखन अरु गोरस, चोरे चुरावे लूटे खावे सगरी।। ||४|| घर से निकसी दधि बेचन को, दान दिये बिन नहीं छुटकी। ऐसो नटखट.......||५|| मारग रोके बैयाँ मरोड़े, करे चोरी अरु सीनाजोरी।। ऐसो नटखट.......|| सांवली सूरत मोहिनी मूरत, निरख छवि सब कुछ बिसरी।। ऐसोनटखट.......॥७॥ बंशी सुनावे रास रचावे, गिरधर' से सखी कब झगरी. .हो 'गिरधर' से सखी नहीं झगरी ॥८॥ ऐसो सांवरो सलोनो प्यारो कृष्ण सखी, ऐसो मतवारे नैन वालो कृष्ण सखी। ऐसो नटखट.......|| सुन्दर श्याम हमारे कृष्ण ताता. ॥४॥ कृष्ण ताता थैया नृत्य करे. कालिय के फन, श्याम ताण्डव सो नाच करे, कालिय के फन।। कालिय नाग बसे यमुना जल,जहर मिलावे कालिन्दी के जल|| कृष्ण ताता ..../1111 कालकूट दूपित निर्मल जल,विष हरने को कर लियो मन।। .||शा खेलत फेंकी गेंद नदी में, कूद पडयो आनन फानना। कृष्ण ताता. ... ||३|| कालिय झापट पड्यो कान्हा पर, बांध लियो प्रभु नख शिख तन।। कृष्ण ताता ......||४|| नंद यशोदा सखा सखी सब. अकुलाये बिन चिते मोहन।। कृष्ण ताता. ..../191 कृष्ण मुक्त हुए पलछिन में, कूद चढ़े कालिय के फन|| कृष्ण ताता...... .1161 नाथ दियो कालिय एक पल महुँ, नाम पड्यो है कालिय दमन!! कृष्ण ताता.. ....1७11 नागिन करे पुकार प्रभु से, दया करो हे, मनमोहन।। कृष्ण ताता.......nl 'गिरधर' प्रभु की छटा निरख कर, हरखाये सब बृज जन मन।। कृष्ण ताता... ..19॥ सुन्दर श्याम हमारे 10 ||५|| आज हरि पोढ़े कनक हिडोले, आज कृष्ण पोढे कनक हिडोले, मणि माणक मुक्तावलि लटकत, रेशम डोर पिरोले|| पोदे कनक हिंडोले....|| मात यशोदा खेचत डोरी, झूलत होले होले।। पोदे कनक हिडोले.....||२ कबहुं नयन हरि मूंद लेत है, कबहुँ कनखियाँ खोले।। पोदे कनक हिंडोले.....||३|| बाल कृष्ण की सुन किलकारी, श्रवणन अमृत घोले।। पोदे कनक हिंडोले.....lin पैजनिया धुंघरू की गुंजन, कर्ण रन्ध्र को खोले।। पोदे कनक हिंडोले... .||५|| कृष्ण चन्द्र को रूप अनूपम, अंग अंग सब बोले।। पोदे कनक हिडोले...../ नंद यशोदा निरख श्याम छवि, हरख हरख कर डोले।। पोदे कनक हिडोले.....॥७॥ नारद शंभु विरंचि निरखत, झूलत श्याम हिंडोले।। पोदे कनक हिंडोले....11 'गिरधर' रूप की ज्योति अलौकिक, प्रेम को दीप संजोले।। पोदे कनक हिडोले...../191 .....1181 सुन्दर श्याम हमारे " आज हरि नाचत नंद जी के अंगना, आज कृष्ण नाचत नंद जी के अंगना, नंद जी के अंगना माँ यशुमति संगना।। आज हरि.. पीत इागुनि तन मोर मुकुट सिर, परम सुहाने जाके कमल से नयना॥ आज हरि .... लटकनिया घुघरू पैजनिया. ठुमक ठुमक धरे छोटे छोटे चरणा।। आज हरि......॥३॥ मुख मण्डल की शोभा अनुपम, अँखियन दुलकत प्रेम को अंजना] आज हरि...... 10 कृष्ण रूप छवि चहुँदिशि दमकत, रतन जड़ित नंदभवन के खंभना।। आज हरि. मात नचावत दे दे ताली, खन खन खनकत करन को कंगना।। आज हरि.......18 यशुमति निरखत श्याम छवि को, सब बिसराय के नाचे हरि संगना।। आज हरि... धन धन भाग यशोदा नंद के, रंग गये कृष्ण प्रभु के रंगना।। आज हरि... 'गिरधर' को प्रभु दरशन आशा, शगुन भये 'शुभ फड़कत अंगनाi) आज हरि नाचत नंद जी के अंगना, आज कृष्ण नाचत नंद जी के अंगना...../19॥ (तर्ज: नाचे नंदलाल नचावे.......) ....../1911 11७11 .11८॥ सुन्दर श्याम हमारे १२ ॥७॥ आज मचल गये बाल कृष्ण, ऐसी मन में ठानी रे, कि गैया दुहि लेॐ सारी रे||१|| कृष्ण कहे मोहे बृज की गैया, अतिशय प्यारी रे, कि गैया दुहि लेॐ सारी ।।२।। तात मात बहु विध समझावत, एक न मानी रे, कि गैया दुहि लेॐ सारी रे||३|| नवलख धेनु को दोहन निकसे, कृष्ण कन्हाई रे, कि गैया दुहि लेॐ सारी ।।४।। चले कलश दोहनिया लेकर, श्याम बिहारी रे, कि गैया दुहि लेॐ सारी रे।।५।। कृष्णा कपिला सकल धेनु, मन अति हरखाई रे, कि गैया दुहि लेॐ सारी रे|| पुनि पुनि नंद सिखावत श्याम को, गाय दुहानी रे, कि गैया दुहि लेॐ सारी रे।।७।। इत दुहनी उत धार दुग्ध की, श्याम रिसाई रे, कि गैया दुहि लेॐ सारी रे॥८॥ श्याम वदन पर शुभ्र दुग्ध कण, छटा निराली रे, कि गैया दुहि लेॐ सारी रे।।५।। धनि धनि भाग यशुमति नंद को, छवि बलिहारी रे, कि गैया दुहि लेॐ सारी रे||10॥ बालकृष्ण मुख निरख यशोदा, कंठ लगाई रे, कि गैया दुहि लेॐ सारी रे।।१।। या छवि निरखत प्रेम मगन भये, सब नर नारी रे, कि मैया दुहि लेॐ सारी रे||१२|| देख कृष्ण छवि मुदित भये विधि, शिव सनकादिक रे, कि गैया दुहि लेॐ सारी ।।१३।। 'गिरधर' प्रभु गोपाल लाल पर, तन मन वारी रे। कि गैया दुहि लेॐ सारी ।।१४।। . सुन्दर श्याम हमारे U ॥८॥ बृज में धूम मचाई. साँवरिया ने बृज में होरी रचाई, आज बिरज महुँ आनन्द छायो, खेलत होरी कन्हाई, बृज नर नारी विलोकत प्रभु को, मोहिनी मूरत छाई, ऐसी होरी मचाई....10 ग्वाल सखा संग मिलकर मोहन, खूब धमाल मचाई, मारी प्रेम रग पिचकारी, भाव गुलाल उड़ाई, रंग बसन्त लुभाई, ऐसी होरी मचाई....||२|| केसर रग गुलाब के जल संग. राधे श्याम भिगाई, प्रीत परस्पर छलकत रंग संग, शोभा बरनि न जाई, हर्पित कृष्ण कन्हाई, ऐसी होरी मचाई....||३ रंग गुलाल सों बृज रज ढक गई. कण कण रंग सजाई, श्याम रंग नभ मण्डल छायो, वसुधा राधे छाई, यही छवि सब मन भाई, ऐसी होरी मचाई...॥५ शिव सनकादिक शेप भवानी, नारद शारद गाई, 'गिरथर' गावत रसिया होरी, राधे मन हरखाई, कैसी मस्तीणई, ऐसी होरी मचाई...11911 बृज में धूम मचाई... मुन्दर श्याम हमारे १४ ॥९॥ अद्भुत मच गयी होरी, सी बिरज महुँ मच गई होरी. ऐसी गाँव को छोरो आयो, बरसाने की छोरी, हो बिरज.......10 मंदात श्याम गुलाल रंग जल, खेलत राधा भोरी. ऐसी बिरज......||२|| फेंक पिचकारी भिगोवे मोहन, रहे न कोई कोरी, ऐसी बिरज.... .||३|| रंग सों भरकर हरखी, बृज की इक इक गोरी, ऐसी बिरज.....|| कृष्पा रंग छायो बृज मण्डल, उड़त गुलाल बहोरी, ऐसी बेरज.. श्या सखा संग नाचत कान्हा, निरखत राधे चोरी, ऐसीबेरज.....10 ग्वा गोपाल मचावे ऊधम, जल की गगरिया फोरी, बेरज.....||७|| ग मद मस्त फिरत है, गोप वृन्द की टोरी, ..॥५॥ बिरज.....॥४ अंगध श्याम छकावत गोपिन, रपट लपट बरजोरी, ऐसी रज.....1911 बहु जि ढोल मुरलिया अरु डफ, गावत रसिया होरी. ऐसी रिज.....//101 र' अंखियाँ दरश की प्यासी, श्यामा श्याम की जोरी, बिरज में मच गई होरी . ' मिद्धत् मच गई होरी || ऐसी गम हमारे ऐसी
यशोदा-नन्दन
क्रम
भजन
पृष्ठ संख्या
१७
Se
सखी ऐ नंद भवन में (बधाई)
आज बिरज बाजे शहनाई (बधाई)
१८
(३)
बरसाने मंगल घन छायो (बधाई)
(४)
ર0
जागो मोरे कुंवर लाडले
मात यशोदा कुंवर श्याम को
२१-२२
(६)
२३
श्याम को सुलावे मेया
कुँवर कन्हैया सोजा (लोरी)
(७)
२४-२५
श्याम हमारे
16
-- यशोदा-नन्दन
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सखी ए नंद भवन में, भीडमची अति भारी रे, हरखे बृज के नरनार. नाचे बाल गोपाल, नंद भवन में धूम मची. अति भारी रे गोपाल ||५|| सखी ऐमात यशोदा. पूत निरालो जायो रे, जाके धुंघराले बाल, अरा भाल है विशाल, नंद भवन में.... ॥२॥ सखी ऐ मोहिनी मूरत, सॉवरी सूरत प्यारी रे, जाके नयन रसाल, भौहें कटीली कमाल, नंद भवन में....॥ सखी ऐ मुख मण्डल की. शोभा परम सुहानी रे, प्यारे सुन्दर कपोल, सब अंग सुडोल, नंदा भवन में.... 1101 सखी ऐ पलने में पोढे, नंद यशोदा को लालन रे, सखियाँ गावे मंगलगान, बादी नंद भवन की शान, नंद भवन में.... ॥५॥ सखी ऐ बंटत बधाई, नंद भवन के द्वारे रे, हीरा माणक मोती थाल, बाटे गोकुल भूपाल, नंद भवन में.... 11 सखी ऐ अदभुत् छवि को, तनमन धन बलिहारी रे, 'गिरधर' रूप को निहार, दरशन करके निहाल, नंद भवन में.... (तर्ज: जल्ला ऐ म्हें तो थोरा डेरा निरखन आया....) 1७1 सुन्दर श्याम हमारे ॥ २॥ आज बिरज बाजे शहनाई. नद भवन में बंटत बधाई. नंद यशोदा के ढोटा जायो, कुल गोकुल में हुई बधाई, आज बिरज बाजे . नंद आनन्द मे इत उत डोले, मात यशोदा मन हरखाई, आज बिरज बाजे .. || गोप ग्वाल नाचे हुलसावे, सखियाँ गावत गीत बधाई, आज बिरज बाजे.....॥३॥ घर घर मंगल दीप सजे हैं, तोरण वन्दनवार सुहाई, आज बिरज बाजे.....|| मुदित भये सब देव गगन में, आज विलोकत कृष्ण कन्हाई, आज बिरज बाजे.... 11५॥ चहके खग मृग, गोधन हरख्यो, वन उपवन बगिया महकाई, आज बिरज बाजे. .../11 प्रेम भाव पिघल्यो गोवर्धन, यमुना हर्षित वेग बहाई. आज बिरज बाजे... .||७|| गूंजत बृज सगीत मनोहर, गावत कोकिल मोर नचाई, आज बिरज बाजे....III कृष्ण लला के दर्शन पाऊँ, 'गिरधर' चाहत यही बधाई, आज बिरज बाजे शहनाई.....119॥ नंद भवन में बंटत बधाई (तर्ज:- तेरो मुख नीको कि मेरो .....) - सुन्दर श्याम हमारे ८
बरसाने......
बरसाने मंगल पन छायो, भान भवन आनन्द वधायो,
प्रेम वेल रावत प्रकटाई,कीरति कोख को पन्य करायो,
वरसाने...
पूरण चन्द्र कला अवतारी, बरबस कुमुदिनि रुप खिलायो.
..
||
मलिन भई नभ चन्द्र चांदनी. दामिनी पुति को तेज लजायो.
वरसाने..
.||३
बृज मण्डल बगिया लहराई. भादों में बासन्त समायो.
बरसाने........11
रूप रंग लावण्य सुहाई, निरख स्वरूप नयन सुख पायो,
बरसाने......191
ललना गावत गीत बधाई, मंगल ध्वनि अम्बर गुंजायो,
बरसाने...
बृज गोपिन निरखत हुलसाई, भान गोप मन मोद बदायो.
बरसाने...
नाचत गावत लेत बधाई, निज निज जीवन सफल करायो,
बरसाने.....
जनम जनम से आस लगाई, 'गिरधर' दरशन को ललचायो,
.......llen
.
बरसाने........
1190
(तर्ज:- तेरो मुख नीको कि मेरो......)
सुन्दर श्याम हमारे
W
॥४॥ जागो मोरे कुँवर लाडले जागो कृष्ण मुरारी, रजनी बीत गई मन मोहन, चन्द्रहुँलेत विदाई, मलिन भये नभ तारामण्डल, नभ अरुणाई छाई।। जागो.......|| प्राची दिश महुँ प्रकट्यो भानु, रवि किरणन छितराई, विकसे कमल भ्रमर सब उड़ गये, कपि खग शोर मचाई। जागो.........॥२॥ मंगल भोर भयो ब्रज मण्डल, यमुना अति हरवाई, घर घर हो रही मंगल आरती, जागो कृष्ण कन्हाई।। जागो.. .॥३॥ उठो लाल अब देर न कीजो, सखियाँ सब घिर आई, मंगला दर्शन दरश की प्यासी, प्राण पिया गिरधारी।। जागो.....||४|| नयन मूंद सब आये दरश को, मंगला गीत सुनाई, प्रथम दरश कर नंद लाल को, मंगल दिवस बढ़ाई।। जागो.....111 गंगा जमुना केसर जल सों, भर भर लाई झारी, उठो लाल मुख धोवन कर लो,न्हावन की तैयारी।। जागो.....||६|| ग्वाल बाल सब डटे द्वार पर, देखत राह तिहारी, नंद राय जी बाट निहारे, गैया दोहन सारी।। जागो.....॥७॥ मधु मेवा अरु दूध कटोरो, माखन मिसरी लाई, अपने लाल को भोग धरन को, सब पकवान बनाई।। जागो......11८11 तीन लोक महुँ मंगल कर दो, जाग उठो बनवारी, 'गिरधर' प्रभु के दरश के खातिर, मंगलदीप सजाई।। जागो.... (तर्ज:- अब जागो गिरधारी म्हारा) गृरश्याम हमारे . .....19॥ २० मात यशोदा कुँवर श्याम को, मंगल रूप सजायो, मंगल रूप सजायो. बड़े भोर मंगल ध्वनि करके, मंगला गीत सुनायो. लाल उठाय लगाय हृदय सों, मस्तक हाथ फिरायो, मस्तक हाथ फिरायो। मात यशोदा......|| निर्मल शीतल यमुना जल में,इत्र फुलेल गिरायो, कर कर उबटन दही चन्दन सों, कुंवर को खूब न्हवायो, कुंवर को खूब न्हवायो। मात यशोदा......॥२॥ हरि चन्दन सब अंग लगायो, नूतन वसन धरायो, अंग धरो रेशम को उपरनो, पीताम्बर पहिनायो, पीताम्बर पहिनायो। मात यशोदा......॥३॥ तेल सुगन्धि लगा मल मल के, लटपट केश सजायो, फेंटा केसरिया रंग बानध्यो, मोर मुकुट घरवायो, मोर मुकुट धरवायो। मात यशोदा......lil कुंकुम तिलक ललाट सजायो, कजरा नैन लगायो, मकराकृत कुण्डल पहिना कर, भूषण अंग धरायो, भूषण अंग धरायो। मात यशोदा......||५|| स सुन्दर श्याम हमारे
......
वैजयन्ती माला गल डाली. पुष्प शृंगार धरायो,
कमर में खोसी मुरली मनोहर, निरख महासुख पायो,
निरख महासुख पायो।
मात यशोदा......!
पलकन पोंछी भृकुटी संवारी, रूप डिठोनो लगायो,
लगी सजावन अधर गुलाबी, बरबस रूप खिलायो,
बरबस रूप खिलायो।।
गोद बिठायो दूध पिलायो, कुँवर कलेवो करायो,
मधु मेवा अरु माखन मिसरी, कर मनुहार खिलायो,
कर मनुहार खिलायो।
मात यशोदा......nl
नजर उतार बलैया लीनी, हृदय स्वरूप समायो,
'गिरधर पुनि पुनि चूम यशोदा, कुँवर को कण्ठ लगायो,
कुँवर को कण्ठ लगायो।।
मात यशोदा. ...||
(तर्ज - मैं ग्वालो रखवारोरी मैया माखन नाही चुरायो....)
m
श्याम को सुलावे मैया अंचल सों ओढ़ाय, कबहुँ श्याम को गोद सुलावे, कबहुँ थपावे गाल, अंचल सों ओढ़ाय, श्याम को. मधुर शयन की लोरी सुनावे, और करावे पय पान,अंचल सों ओढाय।। श्याम को.... .....||२|| श्याम को. रतन जड़ित चंदन को पलनो, रेशम होर बंधाय,अंचल सो ओदाय॥ श्याम को.....|| मखमल रेशम सेज निराली, नाना विध सजवाय,अंचल सों ओढ़ाय|| ...||४|| बार बार मुख चूम श्याम को, पलने में पोदाय,अंचल सों ओढ़ाय|| श्याम को.....॥५॥ पुनि पुनि निरखत श्याम वदन को, मन महुँ अति हरवाय,अंचल सों ओढ़ाय।। श्याम को..... In मात यशोदा देवत झूला, पोढ़त नंद कुमार,अंचल सों ओढ़ाय|| श्याम को.....॥७॥ जो सुख दुर्लभ सुर नर मुनि को, सहज यशोमति पाय,अँचलसों ओढ़ाया! श्याम को..... धन्य धन्य बृजमण्डल बृज जन, "गिरधर' छवि बलिहार,अंचल सों ओढ़ाया। श्याम को...|| सुन्दर श्याम हमारे ~ २३ . . ॥७॥ कुँवर कन्हैया सोयजा, बंशी बजैया सोयजा, अंचल सों ओढ़ाऊँ, शयन की लोरी सुनाऊँ, आजा मोरे कुंवर लाडले, तुझको गोद सुलाऊँ, बाहों में झुलाऊ झूला, प्रीत को गीत सुनाऊँ, हिवड़े से लगाऊँ, पय को पान कराऊँ, अंचल सों ओढ़ाऊँ, शयन की लोरी सुनाऊँ।। कुँवर कन्हैया.......||१|| चॅदन के पलग पर, रेशम डोर कसाऊँ, मखमल के बिछौने ऊपर, पीत वसन सजाऊँ. साँवरिया अब सोयजा, लाडले मोहन सोयजा, अंचल सों ओढ़ाऊँ, शयन की लोरी सुनाऊँ, कुंवर कन्हैया.. रंग बिरंगे पुष्प पिरोऊँ, प्रेम की कलियाँ बिछाऊँ, सेज सजाऊँ लाल गुलाबी, इत्र सुगंधी लगाऊँ, मनमोहन अब सोयजा, श्याम सलोने सोयजा, अंचल सों ओदाऊँ, शयन की लोरी सुनाऊँ, कुंवर कन्हैया.......॥३॥ फूल से कोमल श्री चरणन सों, गोचारण कर आयो, ककड़ कंटक पथ पर चलकर, कष्ट अपार उठायो, आ गोपाल सुलाऊँ, चरण कमल को दबाऊँ, अंचल सों ओढ़ाऊँ, शयन की लोरी सुनाऊँ, कुंवर कन्हैया.. .......//शा . ॥४॥ मुन्दर श्याम हमारे ४
.
निंदिया तेरी बाट निहारे, कब से खड़ी पुकारे,
तेरी सेवा करने आई, आजा नंद दुलारे,
यशुमति नन्दन सोयजा, देवकी नन्दन सोयजा,
अंचल सों ओढ़ाऊँ, शयन की लोरी सुनाऊँ,
कुंवर कन्हैया.......||५||
शयन को रूप निहारे तेरो, नयनन प्यास बुझाऊँ,
माधुरी मूरत हृदय धराकर, धन्य धन्य होय जाऊँ,
गिरधर प्रभु अब सोयजा, लाल गोविन्दा सोयजा,
अंचल सों ओढ़ाऊँ, शयन की लोरी सुनाऊँ।।
कुंवर कन्हैया.......161
कुँवर कन्हैया सोयजा, बॅशी बजैया सोयजा,
सॉवरिया अब सोयजा, लाडले मोहन सोयजा,
मन मोहन अब सोयजा, श्याम सलोने सोयजा,
नंद दुलारे सोयजा।
यशुमति नन्दन सोयजा, देवकी नन्दन सोयजा,
गिरधर प्रभु अब सोयजा, लाल गोविन्दा सोयजा,
अंचल सों ओढ़ाऊँ, शयन की लोरी सुनाऊँ,
कुंवर कन्हैया......./७॥
(तर्ज:- लल्ला लल्ला लोरी.....)
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सुन्दर श्याम हमारे
स्वरूप -शृंगार क्रम भजन पृष्ठ संख्या (1) श्री नाथ जी आप कृपालु हैं રા (२) श्री राधावर कृष्णचन्द्र. निज भक्तन हितकारी २८ सखी नंद जी को लाल,माता यशोदा को बाल २१ (४) हृदय महुँ कृष्ण को ध्यान धराऊँ ३०-३१ (५) श्री कृष्ण चन्द्र को ध्यान धरकर ૨૨ (६) तन मन वारी जाऊँ हो राधे कृष्ण (७) श्याम छवि मन भाई. अनुपम श्याम छवि ३४ (८) हो म्हाने श्याम सुन्दर हद प्यारो ऐ माय ३५-३६ कृष्ण कन्हैया की काली कमरिया (१) ३७ (10) (११) कमल नयन घनश्याम प्रभु की नंद कुमार यशोदा को लाल मन वृन्दावन को बहु तरस्यो ३१ (१२) ४० (१३) श्याम मेरे प्रभु श्याम मेरे प्रभु ४१ (१४) श्याम रूप अटपट, रग सांवरो निपट ४२ सुन्दर श्यायस्यार स
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॥ १॥ श्री नाथ जी आप कृपालु है, भक्तन की सुधि ना बिसारे हैं, ऐसो सुंदर श्याम स्वरूप निरख, हुए धन-धन भाग हमारे हैं। श्रीनाथजी आप........|| श्री यमुना जी के प्राणधनी, वल्लभ के नयन के तारे हैं, ऐसो सुंदर भाल तिलक सोहे, सिर मोर मुकुट को धारे हैं।। श्री नाथजी आप........||शा श्रवणन में सुशोभित कुंडल है.चिबुक की चमक निराली है, ऐसी बाँकी नयन की चितवन है, उर हार धरे वनमाली है।। श्री नाथ जी आप........ ..||३|| एक हाथ कटि पर डाले हैं, दुजे गोवर्धन धारे हैं, एक हाथ में मुरली धारे हैं, दूजे से भक्तन तारे हैं। श्रीनाथजी आप....... ||४|| प्रात: समय मंगला दर्शन, श्री अंग का दरश सुहाना है. पुनि ग्वाल बने शृंगार रचे, फिर राज भोग धरवाना है। श्री नाथ जी आप.... सां समय उत्थापन कर, फिर संझा आरती गानी है. संहा का भोग अरोगन हो, अरु शयन की लोरी सुनानी है। श्रीनाथजी आप........llen वल्लभ ने प्रभु की सेवा करी, विठ्ठल ने ध्यान धरायो है, नित चरणामृत का सेवन कर, यमुना जल पान करायो है।। श्रीनाथजी आप.......||७|| गोवर्धन नाथ कृपा करके भक्तन को काज सरानो है. गिरधर को भी अपना करके, भव सागर पार करानो है।। श्रीनाथजी आप........il (तर्ज: अब सौप दिया इस जीवन कस. 11५॥ सुन्दर श्याम ॥२॥ श्री राधावर कृष्णचन्द्र, निज भक्तन हितकारी, मोर मुकुट मकराकृत कुंडल, पट पीताम्बर धारी।। श्रीराधावर..........||1|| सजल जलद नयन दोउ, कर मुरली धारी, कुंकुम तिलक भाल सोहे, अधरन पर लाली। श्री राधावर... .॥२॥ गल में वैजयन्ती माल, कौस्तुभ मणि धारी, मधुर मुरली नाद सुनके. गोधन बलिहारी।। श्री राधावर.... ......||३|| बंकि नयन बाँके चरण, बॉकी अदाकारी, बाँके प्रभु की बॉकी छटा, जय बाँके बिहारी।। श्रीराधावर..........!! मोहिनि मूरत सावली सूरत, बृज जन सुखकारी, 'गिरधर' छवि को निहार, कोटि काम वारी।। श्रीराधावर..........||५|| (तर्जः अब जागो गिरधारी म्हारा मोहन) मुन्र श्याम हमारे R ॥३॥ सखीनंदजीको लाल,मात यशोदा को बाल, नाचे दे देताल ताल, नाम मदन गोपाल सज सोलह शृंगार, सुन नूपुर झाँकार, करे मुरली पुकार, आये नंद के कुमारा! सुन श्याम की पुकार, बंसरी में ले ले नाम, सखी दौड चली आई, सब छोड़ काम धाम|३|| रास खेले बृजनाथ, बृज गोपियों के साथ, सब नावे साथ साथ, माने खुद को सनाथ||४|| जाके धुंघराले बाल, ऐसो अनुपम भाल, तापे लट को घुमाल, जैसे मतवालो व्याल!!! अति सुंदर कपोल, मोर मुकुट अमोल, बोले अति मीठे बोल, मानो अमरत घोल ॥६॥ गल वैजयन्तीमाल, कर्ण कुण्डल कमाल, अति नयन रसाल, जिमि पंकज विशाल||७|| श्याम रुप सोहे ऐसे, जैसे घटा घनघोर, संग राधा की चमक देख, नाचे मन मोरा संग लेके ग्वाल बाल, करे बृज में धमाल, सब गोपियां बेहाल, पर करे न मलाल||| दधि माखन चुराय, लूट खोस खाय जाय, प्यारी बंसरी सुनाय, बृज गोधन चराय//101 होली खेले नंद लाल, फेंके प्रेम की गुलाल, चले मतवाली चाल,मानों गज या मराल||}} लीला करत बहोर, सब सखियॉ विभोर, राधा चिते उन ओर, जैसे चन्द्र को चकोरा॥१२॥ कस राजा को है काल, बृज जन रखवाल, गिरधर प्रतिपाल, करे सबको निहाल||१३|| सुन्दर श्याम हमारे स ।
॥४॥ ..||४|| .. ..... हृदय महुँ कृष्ण को ध्यान धराऊँ, प्रात समय मेरे श्याम प्रभु को, मगला चरण सुनाउँ] हृदय महुँ.... .... गंगा जमुना केसर जल में, श्री अंग स्नान कराऊँ। हदय महुँ..... .......२ दूध दही घृत मधु अरु शक्कर, पंचामृत नहलाऊँ। हृदय महुँ..... .॥३॥ चदन लेप करूँ श्री विग्रह. इत्र सुंगधि लगाउँ।। हृदय महुँ.... अंग सजाऊँ वस्त्र धराऊँ, पीताम्बर पहिनाऊँ। हृदय महुँ... तेल सुगंधि लगाऊँ मलमल. कुंचित केश सजाऊँ।। हृदय महं.. कुंकुम तिलक ललाट सजाऊँ, कजरा नैन लगाऊँ। हृदय महुँ............. ॥७॥ लटपट पाग केशरिया बांधू, मोर मुकुट धरवाऊँ।। हृदय महं .... मकराकृत कुंडल श्रवणन में, नक बेशर पहिराऊँ। हृदय महं... गल बिच हार मणि मोतिन को , बाजूबंद बंधाऊँ) हृदय महं.. हीरा माणिक जड़ी अंगूठी, कर कंगन पहनाऊँ। हृदय महुँ... .IIEI .....11911 .......//1011 ... .... सुन्दर श्यामसारे 10 ............. पैजनियाँ घुघर पग बांधू, लटकनियॉ लटकाऊँ।। हृदय महुँ..... .||1|| पुष्प शृंगार करु नख शिख से, वनमाला पहनाऊँ। हृदय महुँ... .||१३|| एक हाथ में लकुटी थमाऊँ दूजे वेणु धराऊँ। हृदय महुँ.... .||१४|| ऐसो अनूपम रूप कृष्ण को, खुद की नजर उतराऊँ। हृदय महुँ.................||१५|| रत्नासन बैठाय प्रभु को, माखन भोग लगाऊँ। हृदय महुँ.. ......1160 रुचि रुचि नूतन भोग लगाऊँ, कर मनुहार खिलाऊँ।। हृदय महुँ......... .....॥१७॥ काथा चूना लवंग सुपारी, नागर पान चढ़ाऊँ। हृदय महुँ... .....॥८॥ वाघ बजाऊँ गान सुनाऊँ, नाचत मन को रिझाऊँ। हृदय महुँ... ........11911 वन्दन करूँ अरु शीष नवाऊँ , चरणो में पड़ जाऊँ।। हृदय महुँ.... ....../॥२०॥ करुणा सिंधु प्रभु गिरधर से. भक्ति प्रसाद को पाऊँ। हृदय महुँ.................॥२॥ मखमल रेशम सेज सजाऊँ. लाल को सेज सुलाऊँ, हो शयन की लोरी सुनाऊँ। हृदय महुँ.. ......॥२२॥ (तर्जः अरोगो नरसिंह महाप्रभु अरोगो .....) सुन्दर श्याम हमारे || ५॥ श्री कृष्णचन्द्र को ध्यान धरकर, दण्डवत वन्दन करूँ, श्री राधिका की चरण रज को, प्रेम से मस्तक धरूँ.... .||1|| ऐसी युगल छवि मोहिनी का, किस तरह वर्णन करूँ, नहीं लेखनी का विषय यह, बस नयन मंदिर में धरूँ....॥२॥ ऐसी अलौकिक माधुरी, जोड़ी है राधे श्याम की, जिसने नहीं देखी पलकभर, ऑखफिर किस काम की....||३|| ऐसी कृष्ण की अद्भुत छवि, मानो घुमड़ आई घटा, संग दामिनी सी चमक सोहे, श्री राधिका जी की छटा,..|४|| ऐसा कृपा कटाक्ष करके, भक्ति मार्ग बताने को, गोलोक से उतरे धरा पर, प्रेम रस बरसाने को....... ...J३५|| श्री राधिका से कर निवेदन, शीष रख दूं श्री चरण, हेश्यामसुन्दर मदन मोहन, गिरधर तुम्हारी है शरण.....||६|| (तर्ज-- श्री राम चन्द्र कृपालु भज मन...) सुन्दर श्याम हमारे ॥६॥ तन मन वारी जाऊँ हो राधे कृष्ण,तन मन वारी जाऊँ, श्याम रूप मन मोहिनी मूरत कृष्ण, सोहिनी सूरत। मन मंदिर पधराऊँ, हो राधे कृष्ण.....|| गौर वर्ण राधे शरद चन्द्रमुख, पूनम चन्द्र मुख, नयनन प्यास बुझाउँ. हो राधे कृष्ण......||२|| श्याम कृष्ण की अद्भुत शोभा, अनुपम शोभा, अंग अंग शृंगा, हो राधे कृष्ण......||३|| श्वेत वर्ण श्री राधे सोहित,राधे मोहित, नख सिख रूप निहारूँ, हो राधे कृष्ण......४|| राधे कृष्ण सजे पुष्पन से, सजे कुसुमन से, वनमाला पहनाऊँ, हो राधे कृष्ण......|| · रत्न जड़ित शृंगार सुशोभित, कनक सुशोभित, नवलख हार घराऊँ, हो राधे कृष्ण..... 1|| बृज मण्डल में विहरे दोऊ, राधे विचरे दोऊऊ, कुंजन पुष्प सजाऊँहो राधे कृष्ण......||७|| ऐसी अनूपम युगल छवि, राधे कृष्ण छवि है, निरख निरख हरपाऊँ. हो राधे कृष्ण......hell राधे कृष्ण दया बरसा दो. कृपा बरसा दो, 'गिरधर स्वामी प्रेम बरसा दो, नेह बरसा दो, भव सागर तर जाऊं. हो राधे कृष्ण.. (तर्जः भवतारिणी ए गंगा........) ......||9 सुन्दर श्याम हमारे ॥७॥ "वर्हापीडं नटवर वपुः कर्णयो: कर्णिकारं विभवासः कनककपिशं वैजयन्तीच मालाम् रन्ध्रान्वेणोर धरसुधया पूरयन् गोपवृन्दै वृन्दारण्यं स्वपदरमणं प्राविशद् गीतकीर्तिः" श्याम छवि मन भाई, अनुपम श्याम छवि मन भाई गैया चराय लौट प्रभु आये, सखा मंडली आई गोप वेष अति रूप निरालो, मुरली मधुर बजाई अनुपम श्याम छवि मन भाई ॥१॥ मोर पंख सिर मुकुट सुशोभित, कर्णफूल शोभा न्यारी वैजयन्ती माला गल सोहे, पट पीताम्बर धारी अनुपम श्याम छवि मन भाई ॥२॥ वेणुरन्ध्र को कनक पियालो, अधरामृत छलकाई वंशी नाद कियो नंद नंदन, अधर सुधा बरसाई अनुपम श्याम छवि मन भाई ॥शा गोपवृन्द गावे हुलसावे, सखियाँ सब मतवारी कृष्ण चन्द्र को रूप निरखकर, गोविन्द लीला गाई अनुपम श्याम छवि मन भाई ॥४॥ चरण कमल अंकित बृजभूमि, देख प्रीत बढ़ जाई गोपवेष 'गिरधर' मनमोहन, वृन्दावन महुँ आई अनुपम श्याम छवि मन भाई 11911 (तर्जः राम चरण सुखदाई भज मन......) सुन्दर श्याम हमारे | ३४ ॥८॥ होन्हाने श्याम सुन्दर हयारो ऐगाय. श्याम से मिला हे सारयां हो राजी श्याम से सावली सूरत पल मुहानी ऐलीवारों रुपनार जाति प्यारो ऐ गाया। श्याम से मिलवाम्जास्यो......| कमल जस्ता परम रसीले. ऐजीवारी तिजधाडीमतहारी ऐ गायll स्थान से मिला हे जास्त.....|| श्यामल दित केस अचूत. ऐजीवापे मोर मुकुट मतवारी ऐ माय।। श्वान से मितगम्हेगारां... || भाल विशाल तिलक कस्तूरी. ऐजी वाँके प्रयान कुण्डल ने ऐ गाय॥ श्याम से मिलवा म्हे जास्यां.... 11 गढ बढ़ गातानयन कजरारे, ऐजीवा अपरन लाली पाई ऐ माया श्याम से मिलवा म्हेजास्या.. || गल विच हार मणिमोतिन को ऐजी वो तो पट पीताम्बरधारी ऐमाया श्याम से मिलवा म्हे जास्यां. ...in गुन्दर श्याम हमारे
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कृष्ण कन्हैया की काली कमरिया, कजरारी कमल सी कटीली कनखिया, कुंचित कुन्तल कर कंकणिया, कोमल कपोल करण कुण्डलिया ॥१॥ चंद्रवदन चंचल चरवैया, चिन्मय चतुर चपल चितवनिया, चंचरीक चूमत चरणनिया. चक्रपाणि चित्तचोर चुरेया।।२।। (प) पट पीताम्बर पाग पंखुडिया, पाद पर पुलकित पैजनिया, पंकज नयन पटल पलकनिया, प्रियतम प्राण, प्रिया परवशिया||३|| मोहन मदन मधुर मूरतिया, मस्तक मोर मुकुट मनबसिया, मुदित मनोहर मुरली मधुरिया, माल मोतिन महुँ माणक मणियां लालम लाल ललीलालनिया, लाहले लाल लली लाडनिया, लटपट लट लटकत लटकनिया, लाल ललाट ललाम लकुटिया|||| (ग) गोपीकृष्ण गुहारे ग्वालनिया, गीध गोधन गज गोप गरुड़िया, गोपीजन गोचारण गैया, 'गिरधर' गीत गोविन्द गवैया।|| सुन्दर श्याम हमारे }|१०॥ . कमल नयन घनश्याम प्रभु की, अंनियाँ अद्भुत् प्यारी है, काली नीली झील सी गहरी, प्रेम भरी मतवारी है.. 11111 भौहे कटीली उभरी पलकन, मदमाती रसवाली है, चपल पुतलिया इत उत डोलत, चितवन सब मनहारी है. ॥२१॥ पकज और नहीं विकरयो बृज, एक कमल बस छायो है, सुन्दर श्याम मदन मन मोहन, निज नयनन पधरायो है।।३।। मीन नयन की शोभा घट गई, मृगन हगन शरमायो है, खजन लोचन उपमा मिट गई, श्याम नयन मन भायो है..||४|| मुख मण्डल मधुराधिमधुरं, नयन सरोज लुभायो है, जिन जिन निरखि कृष्ण की अंखिया, रंक महानिधि पायो है.. ॥५॥ श्याम कुंज पंकज लोचन महुँ, राधे भमर समाई है, मधुर मधु मकरंद पान कर, अखियन प्यास बुझाई है.. 1|| एक रसीले नेत्र कमल महुँ. दूजो कमल समायो है, मुख अरविन्द, श्री राधे जी को, 'गिरधर' जयन बसायो है (तर्ज:- खड़ी नीम के ॥७॥ . . सुन्दर श्याम हमार ॥ ११ ॥ नंद कुमार यशोदा को लाल, चरण कमल वन्दऊँ गोपाल, निर्गुण सगुण सकल प्रतिपाल, मुनि मन रंजन मदन गोपाला', मोर मुकुट धुंघराले बाल, पाग केसरिया धरी गोपाल, घन घनश्याम को उन्नत भाल, लट को घुमाल सुहावे गोपाल सुभग नासिका नयन रसाल, झूमत कुण्डल श्रवण गोपाल, विलसित भू अरु बरुणि कमाल, मृग मद टीका भाल गोपालlis. कम्बु कण्ठ अरु गाल गुलाल, कौस्तुभ मणि धारी गोपाल, कर वेणु गल वैजयन्ती माल, लटकनिया लटकाई गोपाल|| मणि माणक मुक्ता की माल, नूपुर किंकिणि धरे गोपाल, बांके चरण मतवाली चाल, पग पैजनिया बांधी गोपाल||५|| पीत वसन तुलसी गल माल, विचरत वृन्दा विपिन गोपाल, मुरली मधुर बजावे लाल. धेनु चरावे बाल गोपाल||६|| कंदक खेले जगत भूपाल, रास रचावे कृष्ण गोपाल, लूट न खावत करे बेहाल, बृज जन निरखत नृत्य गोपाल||७|| अन्तयामी प्रभु महीपाल, भक्त हृदय मन मोद गोणल, चरण शरण हो करो सम्हाल, गिरधर गोविन्द हे गोपाल सुन्दर श्याम हमारे १ ॥१२॥ 7 मन वृन्दावन को बहुतरस्यो, बिन श्यामनयन सोजल बरस्यो तन सूख गयो अरु मुख कलस्यो, पर आज गोवर्धन मुख दरस्यो।। बृजराज नाथ गिरिराज धरण, गिरि रूप में प्रकटे श्याम चरण- मैं आन पड्यो श्रीयुगलचरण,स्वीकार करो अशरण के शरण।। मुख मण्डल रूप अलौकिक है, श्री अंग स्वरूप सुशोभित है, पट पीत वसन परलौकिक है, छवि देख मधुर मनमोहित है1316 गल माल वैजयन्ती धारी है, कुण्डल की शोभा न्यारी है, उर कौस्तुभ मणि शुभकारी है, चरणन आभा अति प्यारी है। एक हाथ कटि पर डारे है. दूजे गोवर्धन धारे हैं, अधरासन वेणु धारे है, घनश्याम सांवरे कारे है।।५।। नयनन चितवन मनहारी है, भक्तन के भव भय हारी है, गिरिराज प्रभु बलिहारी हैं, 'गिरधर' गोवर्धन धारी हैं।१६॥ गुमयमा JO मैं तो जनम.. मैं तो जनम..... ॥ १३॥ श्याम मेरे प्रभु श्याम मेरे प्रभु, बकि बिहारी नाथ, मैं तो जनम जनम तेरो दास, तेज पुंज सी छटा तुम्हारी, नयनन ज्योति बनी अति प्यारी, बाँकी चितवन सब मनहारी, अंखियन अजन शोभा न्यारी, कब से आस करूँ मनमोहन एक झलक की नाथ, ..॥ श्याम मेरे.......11 बाँके चरणन चित्त चुराई, पट पीताम्बर अंग धराई, सोलह विध शृंगार सजाई, नख शिख रूप हृदय पधराई, अब तो कृष्ण कृपा बरसाओ प्रकट हुओ मेरे नाथ, । श्याम मेरे.......॥२॥ माल वैजयन्ती कण्ठ में धारी, कानन कंचन कुण्डल धारी, चिबुक कान्ति छाई अति प्यारी, लाल अधर पर मुरली धारी, ऐसो अनुपम रूप निरख कर सब बलिहारी नाथ, मै तो जनम श्याम मेरे.. ऐसी अदभुत् छटा निराली, कृपा करो प्रभु बाँके बिहारी, मैं तो आयो शरण तिहारी, जय जय जय श्री रास बिहारी, शरणागत वत्सल प्रभु मोहन अपनाओ मोहे नाथ, मैं तो जनम. ..॥ श्याम मेरे.......|| अरज सुनो हे बकि बिहारी, ध्यान धरो प्रभु राधे बिहारी, बृज को वास वरो बनवारी, चरणन भक्ति दो गिरधारी, 'गिरधर' अब तो आन पड्यो है चरण कमल में नाथ. .॥३॥ मैं तो जनम श्याम मेरे... .1५11 (तर्ज- देख तेरे संसार की हालत. ...) सुन्दर श्याम हमारे 1
11 १४॥
श्याम रूप अटपट, रंग साँवरो निपट,
मुखड़े पे काली लट.धारे पीत रंग पटा।
सिर मोर को मुकट, पाग बंधी लटपट,
अंग अंग में कपट, मृग मद की लपट||२||
ऐसो जादूगर नट. देवे मति को पलट,
करे सब से कपट, कोई करे ना रपट||३||
ग्वाल गोपजमघट, लेके आवे पनघट,
देवे घट को उलट, कभी फोड़े जल घट||४||
कभी आवे चटपट, खेंचे चुनरी को पट,
लूटे दूध दहि घट लेवे माखन झपटा।।।
कभी खेले वंशीवट, कभी बृज पनघट,
ठाडो यमुना के तट, वेणु अधर लिपट[11.
श्याम मिले खट पट, नहीं मिले छट पट,
याद करूँ रट रट, प्रभु मिलो झटपटा७
श्याम मिलो झटपट, मिटे मेरी खटपट,
चित्त करे छट पट, तन रहे लटपटा।८।।
दशा मेरी है विकट करो दूर सब कष्ट,
खोलो अन्तर के पट, बसो 'गिरधर' घट19।।
सुन्दर श्याम हमारे
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निकुंज-लीला
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निकुंज-लीला क्रम भजन पृष्ठ संख्या (१) ४४-४५ राधे कृष्ण पिया संग नाची रे ऐसी कृष्ण मुरारी की निराली है छवि (२) ४६ (३) आज सखी सेवा कुंजन में ४७ (४) सावन बरसा बदरा गरजे ४८ (७) हमारे श्याम श्यामा की ४१ (६) श्री कृष्ण से राधा की प्रीत धनी ५० (७) वृषभान सुता श्री राधे जू के आज बिरज महुँ आनंद छायो (८) ५१ १२ ५३ (१) कृष्ण श्याम तनु राधे अति गोरी रे (१०) ५४ नटवर नवल किशोर अधरन मुरली धरे श्याम तेरी बंशी को सुन कर शोर (११) ५५-५६ (१२) ५७ जय जय जय यमुने महारानी सुन्दर श्यामबारे ॥ १॥ राधे कृष्ण पिया संग नाची रे. राधे श्याम सुन्दर संग नाची रे, वृदावन के रासस्थल में, रास रची अति प्यारी रे।। राधे कृष्ण. ....../10 पवन मंद अरु कमल सुवासित, शीतल अरु मनहारी है।। राधे कृष्ण.... ....॥२॥ शरद रात्रि को चंद्र मनोहर, धवल चाँदनी छाई रे।। राधे कृष्ण..... ...||३ नाना भॉति लता पुष्पन से, रमण कुंज शृंगारी रे।। ...॥४॥ श्याम प्रभु ने बशी बजाई, सखियाँ सब घिर आई रे।। ॥५॥ सब सखियाँ वर्तुल में विचरे, बीच पिया अरु प्यारी रे।। ..1111 कृष्ण रूप घनश्याम प्रभु को, श्वेत वर्ण राधे छाई रे।। 11७11 प्राण पिया अरु प्यारी प्रियतमा, डोलत संग गलबाही रे।। राधे कृष्ण.. राधे कृष्ण. . राधे कृष्ण राधे कृष्ण राधे कृष्ण.. 11८11 बाजत ढोल मृदंग बासुरी, बृज मंडल गुजाई रे।। राधे कृष्ण. ..11911 इक इक कान्हा इक इक गोपी, झूम झूम सब नाची रे।। राधे कृष्ण चौदह भुवन नाच रहे छम छम, व्योम सुधा बरसाई २।। ./1101 राधे कृष्ण सुन्दर श्याम हमारे नारद शंभु विरंचि नाचे, वेद ऋचाएं नाची ।। राधे कृष्ण..... ||1 राधे कृष्ण.. राधे कृष्ण... राधे कृष्ण... दशों दिशा वेणु ध्वनि गुंजत, नाचे सृष्टि सारी रे।। ||१३|| जनम जनम की चाह सभी की, आज प्रभु भरपाई रे।। .||१४|| सुर नर मुनि सब जीव चराचर, देखत रास निराली रे।। ॥१५॥ 'गिरधर' प्रभु इस आस में जीऊँ कब निरखू यह झॉकी रे।। राधे कृष्ण........../ राधे श्याम सुंदर संग नाची रे, राधे कृष्णचन्द्र संग नाची रे राधे मनमोहन संग नाची रे, राधे जगमोहन संग नाची रे राधे ब्रजमोहन संग नाची रे, राधे राधेरमण संग नाची रे राधे गिरधर के संग नाची रे, राधे ब्रज नन्दन संग नाची रे राधे यदुनन्दन संग नाची रे, राधे नंदनन्दन संग नाची रे राधे नटवर के संग नाची रे, राधे कृष्ण मुरारी संग नाची रे राधे प्रियतम के संग नाची रे, राधे थिरक थिरक कर नाची रे राधे ठुमक ठुमक कर नाची रे, राधे झूम झूम कर नाची रे राधे हर्पित मन हो नाची रे, राधे नाच नाच फिर नाची रे।। (तर्जः पग धुंघरू बाँध मीरा नाची रे) . . - ४७ सुन्दर श्याम हमारे ऐसी कृष्ण ॥२॥ ऐसी कृष्ण मुरारी की निराली है छवि, ऐसी राधे महारानी की निराली है छवि, एक श्याम वर्ण मन मोहन है. दूजी पूनम के चन्द्र सी उजाली है छवि। ऐसी कृष्ण... ... कृष्ण नंद यशोदा को लालन है, राधा कीरतिदा वृषभान की लली। ऐसी कृष्ण........॥२॥ कान्हा गोकुल की आँख का तारा है, राधा बरसाने की प्यारी है लली॥ .||३|| गम रास गये वृन्दावन में, राधे धूम मचाये वृन्दावन की गली। ऐसी कृष्ण........||४|| मोहन प्रेम से बजावे बंशी अति मधुरी. राधे छमछम नाचे संग बंशी की धुनी। ऐसी कृष्णा.........10 कृष्ण मोर पंख को मुकुट धरे, राधे रानी के मुकुट में मणियों जड़ी।। Tell श्याम गैया चराने नित मधुवन जाय, राधा खेलन के मिस पीछे श्याम के गई।। ऐसी कृष्ण.......७॥ राधा कृष्ण को शृंगार देखे नख शिख से, "गिरधर' प्रेम से निहारे राधा रानी की छवि।। ८|| (तर्ज - सासू लड मत लड़ मंत.. ) सुन्दर श्याम हमारे ऐसी कृष्ण... ऐसी कृष्ण.... ४५ ॥३॥ जाज समीरोदा कुंजल में लोलाकात है बनवारी. मपुर ध्वनिदेशीकीसुजठरतुध-बुधभूलीसारयाँ सारी. यमुना तट परकिंचीचलीजाई.श्यामप्रति सबजनारी। आजतबीसेवा...........॥ कोई भूली इक नयन में अंजन. दूजी आब है कजरारी. कोई भूली दुनरी को उपरतो. कृष्ण प्रेम रस मतवारी। आजसबीसेवा.... . बहु विधिलेलत श्याम पिया संग. बैठ गई राधे थक हारी, ऐसी सुकोमल कुंवरि राधिका दे,पाय पलोटत गिरधारी. हो चरण पलोटत बनवारी।। आज सखी सेवा..........||शा बृज गोपिन की प्रीत निराली, कृष्ण पिया को हद प्यारी. राधे रानी को रूप अनूपम, गिरधर की छवि है न्यारी॥ आज सखी सेवा..........॥४॥ (तर्ज:-छैल छबीलो प्यारो नंद जी रो लालो...) सुन्दर श्याम हमारे . .॥२॥ ॥४॥ सावन बरसा बदरा गरजे, नाच उठा मेरा मन मोर, वृदावन की कुंज गलिन में, झूला झूलत नंद किशोर।। नाच उठा मेरा मन मोर....|| इत से आई राधा रानी, उत से नटवर नंद किशोर, वृंदावन के सघन कुंज में झूला झूलत नद किशोर।। नाच उठा मेरा मन मोर... मोर पपीहा नाचत गावत, यमुना हर्षित करती शोर, वृंदावन के यमुना तट पर, झूला झूलत नंद किशोर।। नाच उठा मेरा मन मोर....||३|| ग्वाल बाल संग खेलत कान्हा, राधा के संग करत किलोल, वृंदावन के वशी-वट पर, झूला झूलत नंद किशोरा। नाच उठा मेरा मन मोर....||४|| बृज वनिता संग रास रचत है, नटवर नागर नवल किशोर, वृंदावन के रास मंडल में, झूला झूलत नंद किशोर।। नाच उठा मेरा मन मोर ....191 बृज मंडल में गुंजत गुजत, नुपुर ध्वनि अरु वेणु शोर, वृंदावन की पुण्य गलिन में, झूला झूलत नंद किशोर।। नाच उठा मेरा मन मोर.... यमुना जी के पुण्य सलिल में, ग्वालन के संग करत किलोल. कालिन्दी तीर कदम्ब की डालन, झूला झूलत नंद किशोर।। नाच उठा मेरा मन मोर.....11011 बृज मडल के चंद्र कन्हैया, राधा रानी है चितचोर, बृज मंडल की चन्द्र राधिका, कृष्ण कन्हैया है चितचोर।। "गिरधर' इस भ्रम में ही डोलत, कौन चन्द्र है कौन चकोरा। नाच उठा मेरा मन मोर. (तर्ज - अब जागो गिरधारी म्हारा मोहन) IIEI ॥८ गुन्दर श्याम हमारे IVE ॥५॥ हमारे श्याम श्यामा की, अधर की माधुरी लाली, श्री राधे गौर तनु सुंदर, श्याम छवि साँवरी काली14 कृष्ण नंदराय के लाला, राधिका भान की लाली. चहुँ दिशि छा रही बृज में, श्री लाली लाल की लाली||२|| अधर श्री आरुणी आभा, भोर अरुणाई शरमाई, साँवरे व्योम से मुख पर, रवि किरणन हो छितराई||३|| अधर पर लालिमा चमके, मलिन विद्रुम की परछाई, मिचोनी दंतुलिया खेले, माल मुक्ता सी लहराई।।४।। अधर रंग फागुनी शोभा, गुलालन कृष्ण पर छाई, धवल मुख राधिका अधरन, गुलाबी रंग की झांई॥५॥ बने प्रभु कृष्ण अद्भुत वर, अधर निज रूप की लाली, राधिका बन गई दुल्हन, अधर पर लाज की लाली11|| लाल के लब की लाली की. लालिमा लाली पर छाई, लालिमा लाली के लब की, लाल शृंगार धरवाई।७।। अधर पीयूष मधुराई, बंसुरिया छिद्र छलकाई, श्री राधे अधर की शोभा, प्रभु 'गिरधर' के मनभाई॥८॥ (तजर्दः- अनूपम माधुरी जोड़ी..... .) सुन्दर श्याम हमारे ४१ ॥६॥ श्री कृष्ण से राधा की प्रीत धनी, निज नयनन श्याम को रूप बसावे, श्याम बस्यो मन मन्दिर मॉही, श्याम छवि निरखत हुसलावे || रूपपीताम्बर को धरके, श्री राधे वल्लभ अंग सजावे, अंजन रूप बसे अंखियन में, लाल के गाल गुलाल लगावे॥२॥ कुंचित केश सँवार पिया के, मोर मुकुट मस्तक धरवावे, नख शिख से शृंगार सजाकर, बांसुरिया अधरन पधरावे||३|| श्याम पिया की प्रीत के वश, निजरूपको श्याम के माँही बसावे, देह धरी लीला हेतु ब्दय, प्राण परस्पर एक कहावे।।४।। श्याम नयन महुँ देख छवि श्री, मुख अरविन्द को रूप सजावे, कौन डिठोने की बात करो सखी, श्याम हगन पुतरी भरमावे।।५।। कुंज निकुंज विहार करे दोऊ, रास बिहारी रास रचावे, नृत्य करत रासेश्वरी राधे, 'गिरधर' रासेश्वर नचवावे||६|| सुन्दर श्याम हमारे १० .
॥७॥ वृषभान सुता श्री राधे जू के, चरण कमल को ध्यान धरूँ, बृजभूषण रास बिहारी के मुख चन्द्र स्वरूप बखान कसै|१ इक गौर तेज लावण्य निधि, इक श्याम तेज रस सिंधु है, मधुराधिमधुर माधुर्य निधि, आनन्द कंद सुख सिंधु है।।२।। श्री कृष्ण रूप पीयूष सिंधु, श्री राधे सुधा समाई है, इस सागर के हर बिन्दु में, राधे मधुराई छाई है||३|| श्री श्याम स्वरूप में राधे बसी, राधे महुं श्याम समाया है, दो रूप बने इक ज्योति के, इक काया है इक छाया है। जल से नहीं भिन्न तरंग हुई, नहीं सोम से किरणें भिन्न हुई, नही सूर्य से रश्मि भिन्न हुई, राधे नहीं कृष्ण से भिन्न हुई॥५॥ राधा बिन श्याम अधूरे रहे, बिन श्याम न पूरी है राधे, श्री राधे को नाम श्री कृष्ण रटे, श्री श्याम ही श्याम जपे राधे॥६॥ श्री राधे परम कृपाली है, श्री कृष्ण दया के सागर हैं. बिन कारण करुणा वृष्टि करे, बृज गागर में सब सागर है।।७।। बृज चन्द्र बने राधे वल्लभ, पुरुषोत्तम लीला धारी हैं. मुख चन्द्र किरण को पान करन, राधे बृज में अवतारी है। वृषभान सुता अब ध्यान धरो, मोहे युगल चरण अनुराग वरो, श्री कृष्ण कृपा को दान करो, 'गिरधर' बृज मण्डल वास करो।।।। (तर्ज: अब सौंप दिया इस जीवन का.......) - सुन्दर श्याम हमारे ॥८॥ ... आज बिरज महुँ आनन्द छायो, आज बिरज महुँ आनन्द छायो, सावन आयो धन बरसायो, वन उपवन बगिया महकायो, आज विरज.... उमड़ घुमड़ छायो घन अम्बर, विद्युत भूषण अंग सजायो, आज बिरज. ...||२|| काली घटा घिर आई गगन में, रिमझिम बरसत मेह सुहायो आज विरज.. ||३|| भीनी भीनी महकी बृज रज, गावत कोयल मोर नचायो, आज विरज. .॥४॥ नव पल्लव तरु लता फूल सों. बृज को कुंज निकुंज सजायो आज बिरज.. .....|| सघन कुंज बिच डाल कदम्ब पर, झूला रेशम डोर बंधायो, आज बिरज. .1111 गेदा गुलाब मोगरा जूही, नूतन बेल लता लिपटायो, आज बिरज... ॥७॥ शीतल मन्द सुगन्ध पवन सो, वृन्दावन को ताप मिटायो, आज विरज मेघ वर्ण घनश्याम सॉवरो, राधे गोरी के मन भायो, आज बिरज 11911 मंगल गान करे सब सखियाँ, माधुरी मूरत हृदय बसायो, आज बिरज.. .111011 झूला झूलत श्याम राधिका, गिरधर छवि निरखत हरखायो, आज बिरज. .......10 . ... गुन्दर श्याम हमारे ५२ ॥९॥ कृष्ण श्याम तनु राधे अति गोरी रे, राधेश्याम की मनोहर जोरी रे, राधे सहज सलोनी अति भोरी रे, श्याम माखन लुटावे कर चोरी रे||१|| राधे कीरति भान की दुलारी रे, प्यारे प्रियतम प्राण पियारी रे, राधे रूप की रसीली मतवारी रे, तापेरीझ गये श्याम बनवारी रे||२|| सब सखियो की प्यारी राधे रानी रे, जांकी साँवरिये से प्रीत पुरानी रे, राधे बृज मण्डल महारानी रे, वांकी चाकरी करे वनमाली रे||३|| श्याम मुरली बजावे अति प्यारी रे, राधे पायल को संगीत मनहारी रे, श्याम रास रचावे बृज भारी रे, मंत्र मुग्ध हुए विधि त्रिपुरारी रे।।४।। मोरे मन की चादर रही कोरी रे, आधी श्याम से रंगी आधी गोरी रे, मेरी मति रही अमित निगोरी रे, राधे श्याम रंग धोय के निचोरी रे11911 राधे एक नयन में छाईरे, श्याम छवि दूजे नैन मे समाई रे, मैने रसना बस इक पाई रे. राधेश्याम के भजन मे लगाई रे।।६।। दरशन तरसत अंखियॉ मोरी रे श्यामा श्याम की सलोनी जोरी रे, 'गिरधर' अरज करे कर जोरी रे प्रभु शरण में लेलो अब तोरी रे प्रभु थाम लेओ जीवन डोरी ३।१७।। सुन्दर श्याम हमारे ॥ १०॥ नटवर नवल किशोर. मुरली अधर धरे, त्रिभुवन जन मन मोहे, धुन सुन मुरली रे।।१।। नंद यशोदा कुमार, गिरिवर कृष्ण हरे, सुर नर मुनि हरखाय, धुन सुन मुरली रे।।२।। पवन बहे मदमस्त, सब मनहारी रे, शीतल मद सुगंध, धुन सुन मुरली रे।।३।। बरसत रिमझिम मेह, बिन ऋतु सावन रे, नाचत खग मृग मोर, धुन सुन मुरली ।।४।। चम चम चमकत चाँदनी, बिन पूनम रे, झर रह्यो गउन दूध, धुन सुन मुरली रे।।। कल कल कल बहे नीर, गिरि वन उपवन रे, पलट कालिन्दि बहे, धुन सुन मुरली रे||६॥ रंग बसन्त बहार, बगियन छाई रे, बिन ऋतु तरु फल देत. धुन सुन मुरली रे।।७।। उड़त अबीर गुलाल. रंग बिन फागुन रे. डोलत बृज नर नार, धुन सुन मुरली रे।।८।। बृज गोपिन भई बावरी, ऐ सुध बिसरी रे. हाम रहे सब ग्वाल, धुन सुन मुरली ।।१।। मगन भए सनकादि, विधि त्रिपुरारि रे, गावत शारद शेष, धुन सुन मुरली ||10|| नाचत कर शृंगार, राधे रानी रे/हो महारानी रे. प्रेम मगन प्रभु कृष्ण, धुन सुन मुरली रे।।११।। मांग रहा वरदान 'गिरधर स्वामी से, अधरामृत को पान, धुन सुन मुरली रे||१२|| (तर्ज - पणिहारी..) सुन्दर श्याम हमारे ॥११॥ श्याम तेरी बंशी को, सुन कर शोर, नाचे बृज भूमि को, इक इक मोर, मोर की संगत करे, कोयल को शोर, कपि खग मृग सब, कर रहे शोर।।।। कौन जादू कीनो प्रभु. बंसरिया तीर, सुध बुध भूल गये, ओर सब छोर, बाँसुरी ने हर लियो, हर मनमोर, जाने कब साँझ हुई, हुयो कब भो।।२।। भोर बिन विकस्यो, कमल किशोर, खिल गई फुलवारी, बगिया बहोर, बिखरी सुगन्ध, बृज में पुरजोर, छाय रही प्रेम की, बहार सब ओर. .. ||३|| बरबस नभ घिरी, घटा घनघोर, श्याम रंग बदरी ने,रूप लियो तोर, राधिका स्वरूप गाजे, दामिनी को शोर, प्रेम की फुहार में, भिगोयो चित्तचोरा भूल गयो चद्र, किरण को चकोर, शीतलमंद, पवन करे शोर, थम गयो यमुना को, कल कल शोर, रम झम मच गई, यमुना के छोरा॥५॥ सुन्दर श्याम हमारे
गणना कलाओं की, भूल्यो चन्द्र व्योम,
दिशा ज्ञान भूले रवि, बुध मंद भौम,
भटक रहे नभ, गुरु भृगु सोम,
ध्यान से विलग हुए, विधि शिवओम६||
साधु की समाधि छूटी, योगियों के योग,
भोगियों के भोग छूटे, रोगियों के रोग,
जप तप छूट गये. छूट गये होम,
धुन संग मस्त होय, नाचे सब लोग।।७।।
प्रभु सुन लो, विनती अब मोर,
चरण पहूँ, वन्दऊँ कर जोर,
'गिरधर' मुरली, अधर धरो तोर,
अधरामृत को, चखाय दो निचोर
(तर्ज-- छोटी छोटी गऊएं छोटे छोटे ग्वाल...)
सुन्धरण्यास हमारे
॥ १२॥ जय जय जय यमुने महारानी, जय श्याम सुन्दर प्रिय पटरानी, जय कालिन्दी यमुना रानी, श्री कृष्ण मिलन की सहदानी।।। हिम शैल से प्रकटी शुभकारी, गिरि गर्जन नाद करत भारी, जल शीतल निर्मल सुखकारी, अति पावन पाप हरण कारी।।२।। श्री कृष्ण पिया को हद प्यारी, तेरो सुमिरण है मंगलकारी, सब वैष्णव करते बलिहारी, रवि तनया ताप हरणकारी॥३॥ बृज मण्डल विचरत महारानी, तेरी महिमा संत गुणी जानी, तेरो ध्यान धरे बृज नरनारी. भव सागर से तारण हारी।।४।। श्री वल्लभ विठ्ठल गिरधारी, नित करते यमुना बलिहारी, बृज वास वरो यमुना प्यारी, 'गिरधर' भक्ति दो महतारी।।५।। सुन्दर श्याम हमारे 10] क्रम पृष्ठ संख्या 1 तेरी मैया करे पुकार ૬૨ ६ (४) (५) (६) (७) (८) (१) (10) (११) (१२) (१३) (१४) ६१ विरहानल भजन ५१-६० श्याम बिना मात अति अकुलावे ६1 मात बिना श्याम अति अकुलावे मात यशोदा तड़पत बृज महुँ ६३. प्रभु बृज में पधारो नंदलाल ६४ कृष्ण चले तजि गोकुल सखी री मैं तो, तन मन बंध गई श्याम सुंदर अब आजारे ६७ आयो री सखी, श्याम सुन्दर घर आयो ६८ प्रियतम श्याम से कहियो रे ऊधो राधे श्याम को निहारे निज नयनन में हो श्याम तोहे राधा खोजे कृष्ण के स्वरूप ने चित्त लियो चोर ७२-७३ राधे! श्याम को मिलन को तरसे बृज गोपियों को साँवरो रुलाय गयो रे श्याम पिया बृज छोड़ गयो सखी मैं तो श्याम सुन्दर रंग राची राधा रोवे श्याम पुकार (गोपी गीत) ७८-७१ एक समय श्री कृष्ण प्रभु को आज कृष्ण ने कृपा करी घिर आई रे बदरिया सावन की घन घन घन बरसोश्याम मोरे मेरो मन वृन्दावन को तरसे ७० ७१ ७४ ७५ ७६ ७७ ८० (१६) (१७) (१८) (११) (२०) (२१) (२२) (२३) ८१ ૮૨ ८४ सुन्दर श्याम हमारे . लिहाजल
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||१|| तेरी मैया करे पुकार, कन्हैया बेग पधारो आय, हो तेरी मैया करे पुकार, कन्हैया लौट बिरज में आव।। तुझ बिन सूनो नंद भवन है. सूनो गोकुल गाम, वृंदावन की गलियाँ सूनी. सूनो है बृज धाम।। कन्हैया बेग पधारो आय. तेरी मैया करे पुकार, कन्हैया लौट विरज में आव........ यमुना तट है सूनो सूनो, सूनी कदंब की छाँव, वंशीवट है सूनो सूनो, सूनो सकल जहान।। कन्हैया बेग पधारो आय, तेरी मैया करे पुकार, कन्हैया लौट बिरज में आव......||२|| गैया सूनी ग्वाले सूने, सूने बृज नर नार, सूनी सूनी मात यशोदा, सूनो है नंद राय।। कन्हैया बेग पधारो आय, तेरी मैया करे पुकार, कन्हैया लौट बिरज में आव....॥३॥ राधा सूनी सखियाँ सूनी, सूनी मुरली की तान, सूनो सूनो रास मंडल है. सूनो वृंदावन धाम।। कन्हैया बेग पधारो आय. तेरी मैया करे पुकार, कन्हैया लौट बिरज में आव...... अंखियाँ सूनी बिन दरशन के, बाट निहार निहार, बिन मुरली के श्रवणन सूने, कृष्ण नाम झनकार।। कन्हैया बेग पधारो आय. तेरी मैया करे पुकार, कन्हैया लौट बिरज में आव.....isir कौन सी भूल हुई मेरे लाला, मोहे देय बताय, अब तो आजा कृष्ण कन्हाई, माखन देय लुटाय।। कन्हैया बेग पधारो आय, तेरी मैया करे पुकार, कन्हैया लौट बिरज में आव......11.- ८ .....in Pos सुन्दर श्याम हमारे "
राधा रोवें सखियाँ रोवें. श्याम पुकार पुकार,
नंद यशोदा नीर बहावें, बिलखे वृज नर नार॥
कन्हैया बेग पधारो आय,
तेरी मैया करे पुकार, कन्हैया लौट विरज में आव.....1011
गोपीजन सो नेह नहीं है, मीरा सी अरदास,
'गिरधर' प्रभु इक आस तिहारी, जनम जनम को दास,
कन्हैया बेग पधारो आय,
तेरी मैया करे पुकार, कन्हैया लौट बिरज में आव.....!!
तेरे भक्तन करें पुकार, कन्हैया वेग पधारो आय ८il
(तर्ज: जंगल मंगल देश म्हाने....)
सुन्दर श्याम हमारे
0
॥३॥ श्याम बिना ...... ॥ २॥ श्याम बिना मात अति अकुलावे. कृष्ण बिना नंद अति अकुलावे जब से कृष्ण गयो गोकुल से. मन धीरज नहीं आवे|| श्याम बिना मात अति अकुलावे. कृष्ण बिना नद अति अकुलावे॥१॥ श्याम बिना नहीं रेन को सोवे, दिवस चैन नहीं पावे, श्याम बिना..... कृष्ण बिना. ॥२॥ बाट निहारे बैठ झरोखे, लाल की याद सतावे. श्याम बिना..... कृष्ण बिना.. पंथ बुहारे आस लगावे. आवन पलक बिछावे, .कृष्ण बिना..... ॥४॥ अपने कुंवर को मुख निरखन को, नित प्रति ध्यान धरावे, श्याम बिना .....कृष्ण बिना..... 111 नित नित नूतन दही बिलोवे, माखन मिसरी बनावे, श्याम बिना...... 11६11 कबहुं करे शृंगार तैयारी, लकुटी वेणु सजावे, श्याम बिना......कृष्ण बिना..... ॥७॥ श्याम न आवे नहीं माखन खावे, मुरली धुन भरमावे, श्याम बिना......कृष्ण बिना...... कृष्ण पुकारे श्याम बुलावे, रोय रोय अंखियाँ सुजावे, श्याम बिना..... कृष्ण बिना 1191 पशु पक्षिन बृज जन तन मन को, कृष्ण विरह झुलसावे, श्याम बिना.... कृष्ण बिना..... नंद यशोदा बृज भक्तन को, गिरधर याद रुलावे, गिरधर प्रेम रुलावे. श्याम बिना. कृष्ण बिना.. 11८11 ..... 111011 कृष्ण बिना. .... सुन्दर श्याम हमारे ॥३॥ मात बिना श्याम अति अकुलावे. नंद बिना कृष्ण अति अकुलावे बृज को तजि मथुरा महुँ रहनो, एक घड़ी ना सुहावे! मात विना.....|| नंद भवन गोकुल की गलियाँ, बृज की याद सतावे॥ मात बिना.....॥२॥ बाबा नंद यशुमति मैया सो, लाड कोई ना लडावे। मात बिना.....||३|| रात दिवस मोहे चैन न आवे, मैया की याद सतावे॥ हो बाबा की याद रुलावे। मात बिना.....॥४॥ नहीं कोई प्रेम से कान्हा बुलावे, नहीं कोई लाला पुकारे।। मात बिना. ...1191 कौन सजावे कौन शृंगारे, माखन कौन खिलावे!! . मात बिना.....nn 'माखन में माँ नाम बसत है, बोलत कंठ रुधावे।। मात बिना....॥७॥ दूध दही अरु गो रस व्यंजन, देख नयन भर आवे| मात बिना.....IIII बृज गोपिन के प्रेम को माखन, खावन मन ललचावे। मात बिना.....1911 ग्वाल सखा संग खेलन तरसे, मुरली किसको सुनावे॥ . मात बिना.....100 बृज गोधन को सुमिर सुमिर कर, हिवड़ो भर भर आवे!! मात बिना.....॥ सब ते लुक छिप नीर बहावे, धीरज कौन बँधावे|| मात बिना.....॥२॥ महल शिखर चढ़ बाट निहारे, नजर कोई नहीं आवे! मात बिना..... बृजभूमि गोवर्धन कुंजन, 'गिरधर' मन तड़पावे।। -मात बिना श्याम अति अकुलावे|| नंद बिना कृष्ण अति अकुलावे.......||४|| . . सुन्दर श्याम हमारे .
||४||
मात यशोदा तड़पत बृज महुँ, मथुरा व्याकुल गिरधारी,
जब से कृष्ण गयो गोकुल से, सोई नहीं है नंद रानी,
रात दिवस बस श्याम पुकारे, अंखियन बरसत जलभारी।।
मात........||
श्याम बिछुड गयो मात यशोदा से, याद करत मन हद भारी,
छुप छुप नयनन नीर बहावे. चीर भिगोवे गिरधारी!!
मात.....||२||
दूध दही अरु माखन मिसरी, रोज बनावे बृजरानी,
बाट निहारे बैठ झरोखे, नंद भवन की महारानी।
मात......||३||
बैठ अटारी रास बिहारी रे, सोच करत मन महुँ भारी,
नंद यशोदा को नेहं सुमिर कर, नित प्रति रोवे यदुराई।।
मात......||४||
नंद यशोदा के अंसुअन जल से, बढ़ गई यमुना महारानी,
'गिरधर' प्रभु की देख रुलाई, भीग गये सब नर नारी।।
मात यशोदा.......191
(तर्ज: छैल छबीलो प्यारो...)
सुन्दर श्याय हमारे
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॥५॥ प्रभु बृज में पधारो नंदलाल, यशोदा थाने याद करे, रूपमति नंद भामिनी, बृज गोकुल की स्वामिनी, प्रभु थॉबिन हो असहाय, यशोदा थाने याद करे, प्रभु बृज में.. प्रभु बृज में.. बैठ झरोखे झॉकती. श्याम ही श्याम पुकारती, प्रभु मन में आस लगाय, यशोदा थाने याद करे, ......॥ बाट निहारे दार खड़ी, अखियन छाई स्याह पड़ी, प्रभु नयना नीर बहाय, यशोदा थाने याद करे, प्रभु बृज में.... अपलक राह निहारती. आवन पलक बिछावती, प्रभु सुध बुध सब बिसराय, यशोदा थॉने याद करे, प्रभुइज में... ...J॥४॥ मानस रूप सजावती, सब शिणगार धरावती, प्रभु मुरली अधर धराय, यशोदा थॉने याद करे, प्रभु बृज में........||५|| गऊन ने सहलावती, नैणा धीर बंधावती, प्रभु ऑसूडा ढलकाय, यशोदा थॉने याद करे, प्रभु बृज में. . ...llel नित नित भोज बनावती, माखन रोज सजावती, प्रभु ममता मिसरी मिलाय, यशोदा थॉने याद करे, प्रभु बृज में .. नंदराय समझावती, ग्वालन गोप सुनावती, प्रभु लीला थॉरी गाय, यशोदा थाने याद करे, प्रभु बृज में .॥८॥ अरज सुणो राधापति, ध्यान धरो गोलोक पति, प्रभु गिरधर ध्यान धराय, यशोदा थॉने याद करे, प्रभु वृज में ......! (तर्ज.- कोरो काजलियो........) ॥७॥ ... गुन्दर श्याम हमारे " ॥६॥ कृष्ण चले तजि गोकुल, नंदभवन बृजधाम, मात यशोदा सखियाँ, बिलखत बृज नर अरू नार, बृज-जन से प्रभुलेत विदाई, ग्वाल सखा सखियॉ घिर आई, बृज गोपिन निज प्रीत जताई, बरबस प्रभु अंखियाँ भर आई। कृष्ण चले.........10 मात यशोदा अति अकुलाई, सुत बिछुइत जननी बिलखाई, कृष्ण गमन हिवड़ो भर आई, मन महुँ धीरज कौन बंधाई।। कृष्ण चले... .॥२ कृष्ण चले... मात चरण प्रभु शीश नवाई, कृष्ण कुँवर निज कण्ठ लगाई, रोय रोय नयनन नीर बहाई, यशुमति चूमत कुँवर कन्हाई।। ..||३|| पुनि पुनि विनय करे ममतामयी, छोड़ नहीं जाओ मेरे कृष्ण कन्हाई, मोहिनी मूरत नयन बसाई, जिन निरखत बिन चैन न पाई।। कृष्ण चले.........|| श्री राधे बिलोकत कृष्ण जुदाई, प्रियतम छवि निज नयन बसाई, निज अंचल श्री मुख को छुपाई, घुट घुट नयन को नीर सुखाई।। कृष्ण चले.........19 बृज गोपिन रथ चक्र थमाई. मारग रोक चरण पड़ जाई, मुरली धुन अब कौन सुनाई, दधि माखन अब कौन चुराई।। कृष्ण चले.. ......../161 बृज नर नार यशुमति माई, कृष्ण विरह लखि सुध बिसराई, शंभु विरंचि मति भरमाई, गिरधर प्रभु की देख स्लाई।। कृष्ण चले.........७॥ (तर्ज: बीरा ओ म्हाने ओल्यू थारी....) सुन्दर श्याय हमारे ॥७॥ सखी री मैं तो, तन मन बंध गई, कृष्ण प्रेम की डोर, जब से मोहन तजि गये बृज को, साँझ हुई कब भोर।। सखीरी मैं तो. श्याम की प्रीत में सुध बुध भूली, होश गवायो मोर, विरह की मारी इत उत डोलूँ, कृष्ण चितऊँचहुँ ओरा। सखी री मैं तो..........॥२॥ दधि माखन को बेचन निकसी, वृंदावन की ओर. मारग सूनो सूनो लागे, बिन माखन के चोरा। सखीरी मैं तो .||३|| बंशी की धुन गुंजत वन में, मन भरमायो मोर, कबहुँ मुदित मन वन वन डोलूं, करि शृंगार बहो।। सखीरी मैं तो.........||४|| ग्वालन भूले गैंया चराना, नाचन भूलो मोर, सखियाँ भूली रास रचाना, बिन मुरली के शोरा। सखीरी मैं तो राधा रानी बैठी हिडोले, खेचत नहीं कोई डोर, श्याम पिया अब वश नहीं मेरे, मेरी जीवन डोरा। सखीरी मैं तो मात यशोदा बाट निहारे, माखन लिये बहोर, अब तो आजा कृष्ण कृपाला, विनती करूँ कर जोर।। .||७|| श्याम को खोजत खोजत थक गई, कहाँ गयो चितचोर, अब तो मेरी आशा छूटी. भीगे नयन के कोर।। सखीरी मैं तो. ......... या जग में प्रभु दर दर भटकी, पाई न कोई ठौर, अब तो गिरधर शरण तिहारी, विनती सुनियो मोरा। ||शा (तर्ज: ऐरी मैं तो दर्द दीवानी.....) ../11 ....IIEI सखी री मैं तो.......... सखी री मैं तो......... सुन्दर श्यार हमारे .........//॥ ॥८॥ श्याम सुंदर अब आजा रे, बृज जन तुझे पुकारेरे, नंद भवन के महल चौबारे, बृज गोपिन के घर के द्वारे, होय गये सब वीराने रे, बृज जन तुझे पुकारे ।। श्याम सुंदर. नंद यशोदा तुझे बुलावे, रोय रोय नैनन नीर बहावे, माखन किसे खिलावें रे. बृज जन तुझे पुकारे रे।। श्याम सुंदर. नंद बाबा को नव लख गोधन, घास न खावे नहीं होने देवे दोहन, अंखियन आँसू बहावे रे, बृज जन तुझे पुकारे रे।। श्याम सुंदर. .||३|| ग्वाल बाल नित खोजें तोहे. यमुना तट मन मोहन जोहें, खेलन गेंद पुकारे रे, बृज जन तुझे पुकारे रे।। श्याम सुंदर. JIII ललिता विशाखा राधारानी, सस्त्रियाँ खोजत हुई दीवानी, कौन संग रास रचाये रे, बृज जन तुझे पुकारे रे।। श्याम सुंदर. बरसाना मधुवन वंशीवट वृंदावन अरु यमुना को तट, मुरली कौन सुनावे रे, बृज जन तुझे पुकारे रे।। श्याम सुंदर. बृजभूमि गोवर्धन कुंजन, याद करे सब वन अरु उपवन, गिरधर तुझे बुलावे रे. बृज जन तुझे पुकारे रे।। श्याम सुंदर. (तर्जः थारी मुरली मनड़ो मोहो कान्हा...) . ......../19॥ ........11 ....//७॥ मुन्दर श्याम हमारे 0 ....॥३॥ 1॥९॥ आयो री सखी, श्याम सुन्दर घर आयो, श्याम पिया की, छवि निरखन को, चित मेरो अकुलायो, आयो री सखी....|| श्याम प्रीत वश, दर दर भटकी, नजर कहीं नहीं आयो, आयो री सखी....JRAI नंद भवन गई, श्याम दरश को, मन मेरोघबरायो, आयोरीसखी... सुनत उलहनो, अपने कुंवर को, यशुमति मोहे टरकायो, आयो री सखी....॥४॥ यमुना तट, वंशीवट खोज्यो, श्याम कहीं नहीं पायो, आयो रीसखी....||५|| श्याम के भ्रम में, इत उत दौड़ी, वश मेरे नहीं आयो, आयोरीसखी....10 वंशी की धुन, गूंजे श्रवणन, मन मेरो भरमायो आयोरीसखी....॥७॥ श्याम विरह से, तड्पी तन मन, नैन नीर भर आयो आयोरीसखी.... श्याम की धुन में, पलटी घर को, माखन खावत पायो, आयोरीसखी..../1900 'गिरधर लाल की, निरख-निरख छवि, सब जीवन धन पायो। आयो री सखी....||ton (तर्जःराम रतन धन पायो.......) ....IIII सुन्दरम्याम हमारे -- ॥ १०॥ प्रियतम श्याम से कहियो रे ऊधो, प्रियतम श्याम से कहियो, जा दिन से वो तजि गये बृज को, विरह ताप दुःख सहियो, बृज मण्डल के नभ मण्डल महुँ, चन्द्र अस्त ही रहियो।। ऊधो प्रियतम......|| हम से प्रीत लगा निर्मोही. मथुरा रमणी में रमियो, ऐसो कपटी निष्ठुर प्रेमी, बृज तजि मथुरा बसियो।। ऊधो प्रियतम......॥२॥ श्याम विरह में वन वन भटकी, खोज रही सॉवरियो, वंशी मधुर सुनन की चाहत, श्रवणन तड़पत रहियो।। ऊधो प्रियतम....॥३॥ सगा सम्बधी लोक लाज तजि.कृष्ण प्रेम रस पगियो (चखियो), कृष्ण पिया अब बिसरत नाही, एक रूप मन बसियो। ऊधो प्रियतम......||HIT निपट गँवार जान कर हमको, तज गयो प्रियतम रसियो, हृदय कमल मकरन्द पान कर, उड़ गयो भ्रमर सो छलियो।। ऊधो प्रियतम......॥५॥ वंशी सुनाई रास रचायो, प्रेम की होली रमियो, दधि माखन सब लूट के खायो, भूल गयो साँवरियो। ऊधो प्रियतम.....180 हम समझत नही ज्ञान तिहारो, श्याम हृदय महुँ बसियो, निराकार नहीं कृष्ण हमारो, प्रेम रूप रस भरियो।। ऊधो प्रियतम.... ..||७|| वश में नही अब हृदय हमारो, श्याम प्रेम रंग रंगियो, धवल ज्ञान को रंग तुम्हारो, कृष्ण रंग सो ढकियो।। ऊधो प्रियतम....IIII कृष्ण हमारो साँचो प्रीतम, प्रेम डोर में बंधियो, "गिरधर' से दृढ़ प्रीत हमारी, अंग अंग महुँ बसियो। ऊधो प्रियतम....॥9॥ सुन्दर श्याम हमारे ॥११॥ राधे श्याम को निहारे निज नयनन में, राधे कृष्ण को निहारे निज नयनन में, राधे श्याम को निहारे निज नयनन में दर्पण निरखत निज मुख मण्डल, श्याम छवि वसी अंखियन में, राधे श्याम को निहारे निज नयनन में कृष्ण बन्यो नयनन को अंजन, काली कजरारी प्यारी अंखियन में, राधे श्याम को निहारे निज नयनन में ॥२॥ रोय रोय अंखियों हुई रतनारी, हो रोय रोय अंखियाँ हुई गुलाबी, अघर की लाली छाई नयनन में, राधे श्याम को निहारे निज नयनन में ॥३॥ कबहुँ श्याम को प्रेम रिझावे, कबहुँ झगरत दरपन में, राधे श्याम को निहारे निज नयनन में ॥४॥ कृष्ण रूपकीज्योति अलौकिक, जगमग झलकत अंखियन में, राधे श्याम को निहारे निज नयनन में ॥५॥ श्याम छवि शीतल मनहारी, ताप मिटे सब पलछिन में, राधे श्याम को निहारे निज नयनन में ॥६॥ कृष्ण पिया को निरख राधिका, बंद करे दोऊ पलकन में, राधे श्याम को निहारे निज नयनन में ! कृष्ण विरह में सुधबुध भूली. लिपट पड़ी बाँके चरणन में, राधे श्याम को निहारे निज नयनन में||ll "गिरधर' राधे विरह में डुब्यो, प्रगट हुयो मन मंदिर में, राधे श्याम को निहारे निज नयनन में 191) हो राधे कृष्ण को निहारे निज नयनन में, होराधे श्याम को निहारे निज नयनन में।। सुन्दर श्याम हमारे 00 ॥१२॥ हो श्याम तोहे राधा खोजे कुंजन में पुकार, घनश्याम तोहे सखियाँ खोजे वन वन में पुकारा। हो श्याम तोहे राधा खोजे कुंजन में पुकार।। घनश्यामजी......ओघनश्याम.. बृजमंडल सूनो भयो रे कान्हा, कुंज रहो कुम्हलाय, जल जमुना कालो भयो रे कान्हा, बृज जन नीर बहाया। घनश्याम तोहे सखियाँ खोजे, वन वन में पुकार, हो श्याम तोहे राधा खोजे कुंजन में पुकारा। जैसे जल बिन माछली रे कान्हा, बिन चन्दा के चकोर, श्याम श्याम निश दिन रटेरे कान्हा, मूरत नयन संजोय।। घनश्याम तोहे सखियां खोजे ....||| रैन बितावेजाग के रे कान्हा. दिवस रहे बेचैन, तन मन डुब्यो कृष्ण में रे कान्हा. बरबस बरसत नैन।। घनश्याम तोहे सखियां खोजे...||३|| मुख आभा फीकी पड़ी रे कान्हा, अधर उड़ी मुस्कान, अंखियन छांई पड़ गई रे कान्हा, बाट निहार निहारा। घनश्याम तोहे सखियाँखोजे ....॥४॥ श्याम पिया बिन राधिकारे कान्हा, बिसरी सब शृंगार, अंखियन अंजन बह गयो रे कान्हा, अंसुअन जल की धारा। घनश्याम तोहे सखियाँ खोजे हो श्याम....!!! सुध बुध बिसरी राधिका रे कान्हा, कृष्ण बस्यो मन माँय, अंग अंगव्याकुल भयो रे कान्हा, विरह ताप झुलसाय॥ घनश्याम तोहे सखियाँ खोजे.. श्याम बस्यो तनराधिकारे कान्हा, राधा कृष्ण समाय, राधे 'गिरधर' कर कृपा रे कान्हा, युगल छवि दरशाय।। घनश्याम तोहे सखियाँ खोजे......॥७॥ (तर्ज:- उमराव थारी बोली....) सुन्दर श्याम हमारे ॥१३॥ कृष्ण के स्वरूप ने,चित्त लियो चोर, माधुरी मूरतिया ने,मन लियो मोह, इत उत खोज रही, मिल्यो नहीं मोय, कोई तो बताय देवो, कहां चित्त चोर.... ..|| राधिका के संग करे,लीला बहोर, ग्वाल सखा संग, करत किलोल, दरशन तरसत, नयनन मोर, कोई......||२ बॅसरी बजावे श्याम, यमुना के छोर, गावत कोयल, नाचत मोर, मुरली सुनन 'प्यासे, श्रवणन मोर, कोई.....||३|| बीत गई रजनी, हुय गयो भोर, सारी सारी रैन जागी, निंदिया को छोड़, यमुना के तट पर,बैठी सारी भोर, कोई.. .III कुंज निकुंज में खोज्यो सब ओर, वन उपवन भटकी, चहुँ ओर, कौन गली गयो माखन चोर, कोई....19॥ मुन्शश्याम हमारे
सब विषयन से छोड़ दियो मोह,
बंधगई प्रियतम,प्रेम की डोर,
श्याम की शरण रहूँ, सब कुछ छोड़,
कोई.....||
चरण कमल चित्त, लग गयो मोर,
चरण धूलि तन, रम गयो मोर,
चरण शरण पड़, खोज रही ठौर,
कोई....७॥
श्याम की छटा में, लटपट मन मोर,
छटपट छटपट करे चित्त मोर,
झटपट प्रकटो, नंद के किशोर,
कोई......
10
कृष्ण मिलन, तड़पत मन मोर,
अंसुअन निकसत, नयन की कोर,
गिरधर वश नहीं जीवन डोर,
कोई तो बताय देवो, कहाँ चित्त चोर||१||
(तर्ज:- छोटी छोटी गऊएं छोटे ग्वाल....)
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सुन्दर श्याम हमारे
. ........|| ॥ १४॥ राधे। श्याम मिलन को तरसे..... राधे श्याम मिलन को तरसे..... कृष्ण गयो निज कर्म भूमि को, लीला भूमि तजि के, वृन्दावन गोकुल सब सूने, मथुरा आनन्द बरसे।। श्याम मिलनकोतरसे.. देह भान को भूली राधेश्याम विरह में तइपे, रूप रंग लावण्य सुधा निधि, कृष्ण बिना सब कलुषे।। श्याम मिलनको तरसे... मोहिनी मूरत श्याम पिया की, कमल नयन में झलके, दुलकत अंजन अंखियन जल से.सावन भादों बरसे।। श्याम मिलनकोतरसे........!!! तन मन भीग्यो श्यामरंग में, अंग विरह सों झुलसे, रोम रोम में कृष्ण समायो, कण कण मोहन दरशी श्याम मिलनकोतरसे... .. कृष्ण विरह में भई बावरी, वन उपवन में भटके. कबहुँ कृष्ण बन वंशी बजावे. कबहुँ मुदित मन हरये।। श्याम मिलन को तरसे... 11911 कृष्ण चन्द्र को वदन बिलोकन, राधे रानी तरसे. युगल छवि निरखन अभिलाषा. 'गिरधर' अंखियाँ बरसे।। श्याम मिलनको तरसे........ In (तर्ज:- ममता तूंन गई मोरे मन से....) न ॥ १५॥ बृज गोपियों को साँवरो रुलाय गयो रे, राधे रानी को बिरज भोलाय गयो रे, श्याम प्रेम के भंवर में फंसाय गयो रे, राधे रानी ने हृदय से लगाय लियो ।।।। बृज छोड़ कृष्ण दारिका सिधार गयोरे, पर प्रेम को व्यवहार बतलाय गयोरें, मन मीत मन प्रीत को जगाय गयोरे, मूरत प्रेम की हृदय में बसाय गयो रे||२|| कृष्ण विरह ताप झुलसाय गयो रे, पर प्रेम की फुहार में भिजाय गयो रे, सारे बृज को निकुंज कुम्हलाय गयो रे, प्रेम भक्ति की सुवास फैलाय गयो रे||३|| धुन मुरली की साँवरो लिवाय गयोरे, पर प्रेम के संगीत में बहाय गयो रे, दधि दूध नवनीत को लुटाय गयो रे, पर प्रेम को प्रसाद भी चखाय गयो । प्यास रूप के दरश कीजगाय गयोरे, श्याम छविको नयन में बसाय गयो रे, मोहे भालू के तपन में तपाय गयो रे, पर प्रेम की कृपा बरसाय गयो रे॥५॥ भूलोक से गोलोक को पधार गयो रे, ज्ञान गीता को जगत को बताय गयो रे, सारे जग में प्रकाश फैलाय गयो रे, अरु पाप के तिमिर को मिटाय गयो || मोहे नेक सी झलक दिखलाय गयोरे, मन बावरे कोराह बतलाय गयोरे, मोरेतन मन प्यास को जगाय गयो रे, पर प्रेम को भजन सिखलाय गयो ।।७।। काहे बीच मंझधार में बहाय गयोरे, मोहे कौन के सहारे सम्हलाय गयो रे, "गिरधर' भवजल थाह घबराय गयोरे, श्यामा श्याम की शरण महुँ आय गयो ८|| सुन्दर श्याम हमारे आर्त भाव पुकार करूँ अब, 'गिरधर' दूर करो सब बाधा11911 . श्री श्याम बिना नही पूरी राधे राधे विना है श्याम ही आधा111 ॥ १६॥ श्याम पिया वृज छोड गयो राधी भूल गयी निज देठ को रात सुप खुप भूल गई रागरी, अरा भूल गई जग की सब बाथnilil सोजता जागताष्ण रटे अरा. प्यारा शुधा भूती सब राधा. ष्ण ही कृष्ण पुटार रे नित, प्राण से मोह दियो तजि राय मेनन राठ गई निदिया. अरु सूख गई अपुजल धारा. अंजन अंजन लोचन बह गयो, भये कृष्ण से रतनारा।।३।। कृष्ण पिया मुख धन्द्र स्वरूप को, बंद कियो निज नयनन राधा, गाँवरी सूरत मोहिनी मूरत, यन वन प्रोजे चकोरी श्री रा|| पूर्ण कला सी चन्द्रमुखी को, यस गयो कृष्ण वियोग अमासा. श्वेत कपोल भये कजरारे, मन्द पझ्यो मुख तेज उजारा।।! ध्यान धरे श्री श्याम पिया को, बात करे गोपी संग राधा, एक ही एक प्रसग चले बरा. माधुरी मोहन की रस गाथा॥६॥ कृष्ण वियोग में राधे तपी अरु, प्रेम में डूब गयो बृज सारा, कुंज सभी कुम्हलाय गये वृज, काली भई कालिन्दि की धारा 1७11 श्री श्याम ही श्याम जपे नित राधा, श्री राधेको नाम जपे नित श्याम, टेर सुनो मोरे श्याम प्रभु अरु, ध्यान घरो मोरी स्वामिनी राधा. सुन्दर श्याम हमारे ... ॥ १७॥ मैं तो श्याम सुन्दर रंग राची, मेरी प्रीत पिया से सांची, श्याम ही मेरो प्राण-धनी है, कृष्ण चरण की दासी, जनम जनम से कसं चाकरी, अंखियाँ दर्शन प्यासी|| ......|| कृष्ण पिया मोरे नयन बसत हैं, मन महुँ रहत उदासी, कृष्ण छटा मोरे मन में रम गई, प्रेम रूप सुख राशि।। मैं तो श्याम सुन्दर. मैं तो श्याम सुन्दर. ......|| दीन दयालु नाम प्रभु को, दीन जान अपनासी, कृष्ण पिया को प्रेम रिझाऊँ, भक्ति राह बतलासी।। मैं तो श्याम सुन्दर ......||३|| साधनहीन पुरातन पापिन, किस विध पार लगासी, अश्रुबिंदु को एक सहारो, करुणा वश अपनासी।। मैं तो श्याम सुन्दर ......|| मैं अबला वन्दऊ कर जोरी, सुन लीजो मोरी पाती, श्याम पिया अब कबहुँ मिलोगे. भटक भटक कर हारी।। मैं तो श्याम सुन्दर ......||५|| पंथ बुहारबाट निहारूँ, निश दिन रहत उदासी, रोय रोय नयनन नीर बहाऊँ. आय मिलो अविनाशी।। . मैं तो श्यामसुन्दर. ......IIEI आर्त भाव से श्याम पुकारूँ, छवि निरखन अभिलाषी. 'गिरधर' से दृढ़ प्रीत हुई अब, तजि वैकुण्ठ को आसी। मैं तो श्याम सुन्दर ......//७॥ (तर्ज: म्हारा जनम मरण रा साथी) सुन्दर श्याम हमारे राधा......11111 ॥१८॥ (गोपीगीत) राधा रोवे श्याम पुकार, प्रकटो प्रियतम प्राणाधार, तुम बिन प्राण रहे अकुलाय, सखियाँ फिर फिर करे पुकार, गोपी उवाच....... ब्रज की महिमा श्याम से बढ़ गई, तजि वैकुण्ठ रमा बृज बस गई, तन मन अर्पण बृज गोपिन कर, वन वन खोजत करे पुकारा। चितवन कमल नयन की बांकी, घायल हो गई हम बृज नारी, श्याम चरण बिन मोल की दासी,मारी नेत्र बाण की धार।। राधा....|| कालिय नाग अघासुर अजगर, पवन प्रचंड मेघ प्रलयंकर, विद्युत अनल भयंकर निशिचर, सबसे हमको लियो उबार। राधा....॥३॥ मात यशोदा के कुँवर कन्हाई, जग साक्षी अरु अन्तर्यामी, बह्मदेव वन्दन स्वीकारी, लीनो यदुकुल में अवतार।। हस्त कमल सब जग सुखदायी, जीव चराचर भव भय हारी, कृपा करो अब श्री पति स्वामी, अभय करो घर मस्तक हाथ। राधा....॥४॥ राधा...|1|| राधा....||६|| राधा....||७॥ बृजभूषण मुख हास सुहानी,मान छोड़ हो चरणन दासी, चितवो कमल वदन की झांकी, सुनलो सबकी करुण पुकारा। चरण शरण सब पाप छुड़ाई, जेहि चरणन फिर गैया चराई, कालिय मस्तक नाच नचाई, मेटो हृदय विरह सन्तापा मधुर वचन वाणी मनहारी, मुग्ध हुई सुनकर बृजनारी, अधरामृत के पान की प्यासी. दे दो हमको जीवन दाना। कृष्ण कथा सब जन सुखकारी, कवि गण गावत पाप भगाई, कथा प्रवण अति मंगलकारी, गावत गुणीजन बने अधार॥ हास मधुर चितवन मनहारी, लीला चिन्तन मंगलकारी. राधा...|| राधा...11911 गुन्बरश्याहमारे प्रीत प्रसंग विनोद सुहाई, आकुल व्याकुल हृदय हमार।। राधा...||1OIL कमल कठोर चरण मृदुलाई, वन महुँ विचरत धेनु चराई, कंकड कंटक पथ दुःखदायी, सुमिरत होवे कष्ट अपारा। राधा....|| गोचारण कर वन सों आई, कुंचित कुन्तल वदन सुहाई, गोरज शोभित मुख अरुणाई मन्मथ उदित बढ्यो अनुराग।। राधा....||1|| चरण कामना पूरणकारी, विधि पूजित भूषण मही धारी, कष्ट हरण भव तारण हारी, हृदय धरो श्रीचरण हमारा। राधा...||१३|| मधुर अधर मन प्रीत बढाई, त्रिविध ताप को शोक भगाई, वेणु नाद कर राग भुलाई, कर दो अधर सुधा का दान।। राधा...||१४|| पल युग सम बिन दरश बिताई, वदन विलोकत वन फिर आई, बाधित दरश पलक झपकाई, ब्रह्मदेव मतिमंद समान।। राधा...॥१५॥ नाथ तनय कुल बांधव भाई, छाड़ि सकल तव शरणन आई, चपल चाल मनहारी तुम्हारी, निशि न त्याग करो नंद दुलारा। राधा...||६|| प्रीत विनोद अनंग जगाई, प्रेम मुदित चितवन मन भाई, वक्षस्थल श्री सदन सुहाई, परवश मोहित चित्त हमार।। राधा...॥१७॥ बृजजन कष्ट हरण अवतारी, अखिल विश्व प्रिय मंगलकारी, दरश करन मन चाहत भारी, वरण करो भेषज उपचारा। राधा.....||१८॥ पाद पन कोमल यदुराई, वक्ष पटल बहु जतन धराई, वन वन विचरत अति दुःख पाई, भ्रमित हुई मति हे श्रीनाथ!! राधा...||1911 श्री शुक उवाच...... गोपिन गीत विरह को गाई, करुण रूदन मन प्रीत जगाई. वन माला पीताम्बरधारी, प्रकट हुए गिरधर' गोपाल|| (तर्ज:- सीता माता की गोदी में बजरंग....) सुन्दर श्याम हमारे 11 .... .॥ ॥१९॥ वृज की याद सताई... एक समय श्री कृष्ण प्रभु को. बृज की याद सताई, अपने सुखद सखा उभव से, निज मन व्यथा सुनाई। नयन जल भर-भर आई. बृज की याद सताई... उद्धव जी को मान ज्ञान को, भक्ति मार्ग बिसराई, प्रीत की रीत सिखावन प्रभु ने, निज संदेश पठाई।। यही प्रभु ने ठहराई, बृज की याद सताई.. श्री कृष्ण कहे सुन उधो प्यारे, नंद भुवन महुँ जाई, बाबा नंद यशुमति मैया को. कृष्ण का नेह सुनाई। माखन कौन खिलाई, वृज की याद सताई.. बृज गोपिन के नेह सिंधु में प्रेम की डुबकी लगाई, कृष्ण तुम्हारे प्रेम ऋणी हैं, प्रीत नहीं बिसराई।। लौट बिरज में आई, बृज की याद सताई.. ग्वाल सखा मंडल को ऊधो, कृष्ण की प्रीत जताई, तुम संग खेलन मन बहु तरसे, कैसे खेल खिलाई।। अॅखियन ऑसू बहाई. बृज की याद सताई........।। सब ते प्यारे बृज गोधन को,सैन संकेत बताई, 'गिरधर' तुमरे दरश को तरसे, यही प्रभु की करुणाई। मुरली किसे सुनाई, बृज की याद सताई.......||६|| .....|| सुन्दर श्वाय हमारे 0 ॥ २०॥ आज कृष्ण ने कृपा करी, मोहे बृज को दरश करावन की, अंखियाँ तरसत छवि निरखन, मोरे मनमोहन मनभावन की। बृज मण्डल की शोभा निरखी, रास स्थली बनवारी की, अंखियाँ तरसत छवि निरखन, वृषभान नन्दिनी प्यारी की॥२॥ छटा निहारी बरसाने की, राधे की रजधानी की, बृज गोकुल की गलियों देखी, यमुना की बलिहारी की, अंखियाँ तरसत छवि निरखन, मोरे राधे रमण बिहारी की||३|| अंखियाँ तरसत छवि निरखन, मोरी लाडली राधे रानी की||४|| गोवर्धन गिरिराज धरण की, पूजा अर्चन वन्दन की, अंखियाँ तरसत छवि निरखन, मोरे नंद यशोदा नन्दन की।।५।। बृज भक्तों से महिमा जानी, कुसुम सरोवर पानी की, अंखियाँ तरसत छवि निरखन, मोरी स्वामिनी राधे रानी की पान कियो यमुना के जल को. बृज रज मस्तक धारण की, अंखियो तरसत छवि निरखन, नंद लाल गोवर्धनधारण की।1।। नंद गाँव मथुरा वृन्दावन, फिर फिर सब की झांकी की, अंखियाँ तरसत छवि निरखन, वृषभान ढुलारी बांकी की||८|| राधे-कृष्ण कृपा बरसाओ, शरणागत प्रतिपालन की, 'गिरधर' प्रभु अब दया करो, मोहे युगल स्वरूप निहारन की।191, गुन्दर श्याम हमारे ॥२१॥ घिर आई रे बदरिया सावन की, सखी प्यास जगी वृन्दावन की||१|| आई आई रे घड़ी बृज जावन की, श्याम रूप को नयन में बसावन की, राधा रूप को नयन में बसावन की। जागी जागी मोहे चाह मन भावन की, श्यामा श्याम को निकुंज में बिठावन की||३|| छाई बृज में बहार भादों सावन की, झूला नंद के कुमार को झुलावन की, झूला भान की लली को झुलावन की||४|| जूही मोगरा सरोज गुलाबन की, हार वेणी अरु गजरा धरावन की॥५॥ कसे सेवा नित कुंज को सँवारन की, राधे कृष्ण के स्वरूप को सजावन की||६|| छाई सॉवरी घटा नभ सावन की, कृष्ण प्रेम की फुहार में नहावन की।७।। चाह बृज रज शीष पे धरावन की, संग यमुना को पान भी करावन की1८ ध्यान सॉवरे के रुप को धरावन की, राधे रूप को हृदय पधरावन की।1।। कसे विनती मुरलिया बजावन की, रास क्रीड़ा की झलक दिखलावन कीI1101 बाल भोग नवनीत को चढ़ावन की, संग मेवा पकवान भी धरावन की लागी लागी रे लगन गुण गावन की. प्रेम भाव से भजन भी सुनावन की||१२|| करूँ कामना श्री कृष्ण को मनावन की. पसँभावना श्री राधे को रिझावन की||३|| 'गिरधर' राधिका को अरज सुनावन की, इस देह को विरज मे बसावन की||१४|| गुरदार हमारे छ ॥ २२॥ धनघनघन बरसोश्याममोरे,घनश्याम, घनश्याम,घनश्याम . घन घन घन......... सावन आयो, अजहुँन आयो, बीती जाय बहार, घनघनघन..... वसुधा के सब अंग झुलस रहे, अब बरसो घनश्याम, घन घन घन......||२|| खग मृग कीट पतंगे पशुधन, तरस रहे घनश्याम, घन घन घन......||३|| मोर पपीहा बाट निहारे, गोधन है बेहाल, घनघनघन......॥४|| बाग बगीचे सरिता झारने, सूख रहे सब ताल, घन घन घन......||५|| जड़ चेतन सब जीव चराचर, आज पुकारे श्याम, घनघन घन......J1Ell दामिनी रूप धरो श्री राधे,मेघ बनो घनश्याम, घन घनघन......||७|| करुण कृपा बरसाओ भगवन, अरज सुनो घनश्याम, घनघन घन......11८11 'गिरधर' किस विध टेर लगाऊँ, कण्ठ हुए बेजान, घन घन यन......11911 सुन्दर श्याम हमारे ॥२३॥ मेरो मन वृंदावन को तरसे। श्री राधा जी की लीला भूमि, कृष्ण प्रेम रस बरसे, मेरो मन वृंदावन को तरसे|| कुंज गलिन में विचस निशदिन, न्हाऊँ यमुना जल से, मेरो मन वृंदावन को तरसे........॥२॥ कालिन्दी तीर कदम्ब की डारन, निरयूँ निज नयनन से, मेरो मन वृंदावन को तरसे........॥३॥ श्री राधे कृष्ण की लीला गाऊँ, नाचूं मुरली धुन से, मेरो मन वृंदावन को तरसे.. ..||४|| बृज गोपिन चरणन को ध्याऊँ, प्रीत करूं गोधन से, मेरो मन वृंदावन को तरसे... .॥५॥ बृज मण्डल की अनुपम शोभा, वासें तन मन धन से. मेरो मन वृंदावन को तरसे.. बृज रज में रम जाऊँ तन मन, छू भव बंधन से, मेरो मन वृंदावन को तरसे... .11७11 श्री राधा माधव विरह तापसे, अंग अंग सब झुलसे, मेरो मन वृंदावन को तरसे...... श्री बांके बिहारी रास बिहारी, दरशन अंखियाँ तरसे. मेरो मन वृंदावन को तरसे... राधा कृष्ण दरश बिन अब तो, नित प्रति नयनन बरसे, .||100 श्री राधे श्याम चरण रज चाखन, 'गिरधर' जिव्हा तरसे. ..IIEI ዘረዝ .1191 मेरो मन वृंदावन को तरसे... मेरो मन वृंदावन को तरसे.. गुन्दरम्याय हमारे
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-tara
शरणागत-सत्काल
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शरणागत-वत्सल भजन पृष्ठ संख्या ८७ (२) ८८ ८१ 90 (४) (५) ૬૧ १२ १४ १५ सखी री मैं तो कृष्ण के रंग..... निज भक्तन प्रतिपाल प्रभु तुम श्री राधे रानी कृपा करके श्री कृष्ण मुरारे यशोदा के प्यारे प्रीत की रीत सिखाई जगत को हे नंद नन्दन हे यदु नन्दन श्री कृष्ण की शरण में श्री राधे की शरण में जय राम रमापति....जय कृष्ण चन्द्र... शिव शंकर गंगाधर...कृष्णचन्द्र वंशीधर. . नंद यशोदा को लाल श्याम मनमोहन है १६-१७ श्री राधे गुण गाऊँ श्री श्याम गुण गाऊँ श्री कृष्ण सो दीन दयालु जगत में टेर सुनो मेरी श्याम ૧૦૧ कृपा करो श्री कृष्ण श्याम से प्रीत लगाले मनुआ बृज भूमि की महिमा जग में श्याम से मिलाय दे राधे मोहे लागी लगन प्रभु चरणन की मोहे चाह दरश नंद लालन की आज भक्त पर संकट आयो १८-99 (७) (८) (9) (10) (11) (१२) (१३) (१४) (१५) (१६) (१७) (१८) (११) (२०) १00 १०२ १०३ १०४-10 १०६ १०७ १०८ १09 सुन्दर श्याम हमारे ११०-१११ ૧૧૨ (२१) (२२) (२३) (२४) ११३ ૧૧૪ ૧૧૬ ૧૧૬ ૧૧૭ ૧૧૮ (२५) (२६) (२७) (२८) (२१) (३०) (३१) (३२) (३३) (३४) (३५) १११ तू ही नंद को कुमार.... मेरी सुनले पुकार प्यारे नंद के कुमार राधे रानी बृज महारानी... प्रभु गोविन्द ब्दारिका वासी- -तो हे सुमिरे द्रोपदी रानी कृष्ण मैं तेरी शरण आयो राधे रानी कृपा बरसाय दे रे प्रभु रास बिहारी ठाकुर के..... सॉवरिया मोरी विनती........ बसे मेरो मन श्री बृज उपवन शरणागत दीन दयालु प्रभु ૧૨૦ प्रभु कोटि कोटि वन्दन अरज सुनो मोरे श्याम सॉवरे सॉवरिये से प्रीत लगाई हे जंद दुलारे ध्यान धरो साँवरिया श्याम आओ ૧૨૬-૧૨૬ चल चल मोरे मन हे राधे वल्लभ अरज सुनो आरती राधे श्याम की कीजे (आरती) ૧૨૧ ૧૨૨ ૧૨૩ १२४ ૧૨૭ ૧૨૮ (३७) (३८) १२१ सुन्दर श्याम हमारे 4] 24 || १ || सखी री मैं तो कृष्ण के रंग रंग जाऊँगी, सखी री मैं तो कृष्ण पिया को रिझाऊँगी।। कृष्ण हमारो सांचो प्रीतम, नित नित ध्यान धराऊँगी, तन मन धन सब अर्पण करके, जनम सफल कर जाऊँगी।। मैं तो कृष्ण .......... कृष्ण पिया को रूप सजावन, पीत वसन बन जाऊँगी, चंदन सिल घिस घिस कर उनके, अंग अंग लग जाऊँगी।। मैं तो कृष्ण ..........||२|| कुंकुम रंग बिन तिलक धरूँगी. खुद अंजन बन जाऊँगी, प्रेम शलाका चढ़ चढ़ उनके, अंखियन में रम जाऊँगी। मैं तो कृष्ण ...........||३|| मोर पंख बन मुकुट चढूंगी. मणि माणक बन जाऊँगी, कनक हार में खुद को पिरोकर, हिवड़े से लग जाऊँगी।। मैं तो कृष्ण .॥४ा मैं तो कृष्ण. वेणु रूप धरे तन मन से, अधरामृत को पाऊँगी, सप्त सुरों की दीक्षा पाकर, गोविन्द लीला गाऊँगी। मैं तो कृष्ण...........10 कमल नयन को नयन बिठा कर, पलक को फलक लगाऊँगी, सत् चित् आनन्द रूप श्याम को, मन मंदिर पधराऊँगी। .....nl हृदय कुंज में धरंगी बिछौना, प्रेम की कलियों बिछाऊँगी, कृष्ण पिया को शयन कराके. चरण कमल को दबाऊँगी।। मैं तो कृष्ण.........७॥ धर्म कर्म तज चरण पढूँगी. प्रेम भगति से मनाऊँगी, 'गिरधर' को नहीं दरश मिल्यो तो, विरह ताप झुलसाऊँगी।। मै तो कृष्ण के रंग रंग जाऊँगी . सखी री मैं तो कृष्ण पिया को रिझाऊँगी . Ill सुन्दर श्याय हमारे ८७ ॥२॥ निज भक्तन के प्रतिपाल प्रभु तुम, विनती करता हूँ कर जोर, वृंदावन के पुण्य धाम में, दे दो कुछ कोने में ठौर।। विनती करता हूँ कर जोर......|| तुम बिन कौन सम्हाले प्रभुजी, दर दर भटका हूँचहुँ ओर, अब तो आकर मुरली सुना दो, करो कृपा की किंचित कोरा। विनती करता हूँ कर जोर........॥२॥ मन भटकत तन अटकत जग में, माया घेरत है चहुँ ओर, इस भव सागर से प्रभु अब तो, खेंचो बृज मंडल की ओरा। विनती करता हूँकर जोर.......॥३॥ सुख बरसाओ ताप मिटाओ, भक्ति मार्ग में देओ मोड़, राधा के संग दर्शन देकर, चरणन शरणन देओठौड़ विनती करता हूँ कर जोर........|| औरन को कोई और भरोसो, मेरो साधन नहीं कछु और, जनम जनम चरणन को चाकर, खेंचो मेरी जीवन डोरा। विनती करता हूँ कर जोर.. मैं हूँ तेरो भक्त पुरानो. इसमें नहीं कछु संशय और, मेरी विपदा दूर करो प्रभु, मैं चाकर तू स्वामी मोर।। विनती करता हूँ कर जोर.......nl जैसो भी हूँ तेरो हूँ मैं मत तड़पाओ मोहे और, हे नटनागर हे राधावर, अब तो करो कृपा की कोर।। विनती करता हूँ कर जोर.. मीरा के प्रभु नटवर नागर, बृज भक्तन के माखन चोर, गिरधर पगला इतना जाने, मेरा अपना नँद किशोर।। विनती करता हूँ कर जोर.... मैं हूँ उसका वो है मेरा, बीच नहीं है कोई और, जनम जनम का साथ हमारा, 'गिरधर' गिरधर का चितचोर।। विनती करता हूँ कर जोर ......||2|| (तर्ज:- अब जागो गिरधारी म्हारा मोहन) ........./1911 ........11७|| ...... सुन्दर श्याम हमारे . ॥३॥ श्री राधे रानी कृपा करके, चरणन में प्रीत लगा देना, दृढ़ भक्ति को मार्ग बता करके, भवसागर पार लगा देना। निज भक्तन पर किरपा करके, गोलोक से बृज में पधारे हैं, श्री कृष्ण के संग लीला करके, सब वैष्णव जन उद्धारे हैं||२|| श्री कृष्ण तुम्हीं में समाये हैं, यह कैसी अद्भुत माया है, दो देह धरी पर एक प्राण, इक दूजे की परछाया है||३|| श्री राधाजी की चाह बिना, श्री कृष्ण का ध्यान असंभव है. बृज मंडल का दुर्लभ दर्शन, उनकी ही कृपा से संभव है||४|| इस याचक की है यही विनती, बृज भूमि में मेरा वास रहे, राधा संग कृष्ण के दर्शन हों. तन मन सब उनके पास रहे। इस विषयी जगत को तज करके. कुंजन की सेवा रोज करूँ, नहीं चाह मुझे त्रिलोकी की, बस राधे कृष्ण का ध्यान घसा चाहे मोर बनूं चाहे येनु बनूं, चाहे यमुना जल की धार बनूँ, यदि बृज मंडल का वास मिले, तो गिरिवर का पाषाण बनूँ७॥ कभी गोप बनूँ कभी ग्वाल बनें, कभी कुंजन का शृंगार बनूं, श्री राधा कृष्ण की सेवा में, मुरली नूपुर झंकार बनूँ।।८।। जब जब नर देह तजूं तब तब, पुनि लौट बिरज रज में विचरूँ, श्री राधे कृष्ण चरण रज का, गिरधर नहीं स्वाद कभी बिससा श्रीराधे रानी.........॥ (तर्ज: अब सौंप दिया इस जीवन का....) सुन्दर श्याम हमारे 9 ॥४॥ श्री मुरारे यसोदा प्यारे. हम सबलातुमरे सहारे. यशोमा सारेज तारे. मरिन हमको कोस राम्हारे||१|| के दुलार, गोवा को पियारे, मन के सब कारज गरे. गोप को घिसारे गोवन पारे, नित मुरती में राधा पुगरे।।। गोपन धारेज रसवारे. गोपिन के जयनों के तारे, वृज रसवारे राको सहारे, वीजजोकटों से उबारे॥३॥ यसको संहारे असुर राक्ष मारे. पशुधा को सब भार उतारे, असुर राब मारे विप सतारे. सब संतज जित तुको पुकारे॥४॥ विध सब तारे सकल सुजियारे. सुर नर मुनि आरती उतारे, सफल सुसियारे पार उतारे. गिरधर 'गिरयर' कराण पुकारे॥५॥ सुन्दर श्याम हमारे १० .......... .॥२॥ ॥५॥ प्रीत की रीत सिखाई जगत को, कृष्ण चन्द्र मनमोहन ने, बिन कारण करुणा वृष्टि करे, ऐसे करुणा सिन्धु कृपालु हैं, उनकी ही कृपा की सृष्टि में, जड़ चेतन जीव बराबर है।। प्रीतकीरीत.. अपने स्वजनों से प्रीत करे, यह रीत सभी जीवों की है, निज रिपुओं से भी नेह करे, यह नीति श्री गोविन्द की है।। प्रीत कीरीत. दृढ़ प्रीत करी बृज गोपिन से, जिन अविरल भक्ति को दान दियो, ऐसा दुर्लभ रास रचा जिन संग, अरु प्रेम की बंशी को नाद कियो।। प्रीत कीरीत. .||३|| निज मित्र सुदामा से प्रीत करी, जिनको विधि लेख मिटायो है, निज अश्रु बिन्दु से सेवा कर, वैकुण्ठ सो भोग जुटायो है।। प्रीत कीरीत...........||४|| कृष्णा की करुण पुकार सुनी. हाट छोड़ दारिका धायो है, भगिनी की लाज बचाने को. तन चीर अपार बढायो है।। प्रीत कीरीत...........111 अर्जुन से प्रीत करी ऐसी, पग पग पर विपदा टाली है, गीता का ज्ञान करा कर के, सारथ की डोर सम्भाली है।। प्रीत कीरीत.. ...........IIEI ऐसी करुणा पशु पक्षिन पर भी नहीं भेद कियो नर पशुअन में, गिरधर गोधन सों प्रेम कियो, अरु मरदुल को गज घन्टन से।। प्रीत कीरीत.. ..../ 11 सुन्दर श्याम हमारे ११ ॥६॥ हे नंद नंदन हे यदु नंदन, तुम सकल जीव अवलम्बन हो, प्रभु अखिल विश्व रचना तेरी, बृज भूषण हो जग-वन्दन हो||१|| हे विश्वपति हे समदरशी. तुम सबके सम हितकारी हो, नहीं भेद तुम्हारी दृष्टि में, चाहे सुर नर मुनि पशु पामर हो।।२।। हे कृपासिंधु हे दीन बंधु, तुम धर्म हेतु अवतारे हो, पतितों के भी उद्धारक हो, शरणागत के रखवारे हो||३|| हे जगमोहन हे मनमोहन, मन मोहिनी मूरत धारे हो, ऐसी सोहिनी सूरत निरख निरख, तन मन धन तुम पर वारे हो।।४।। हे जगदीश्वर हे परमेश्वर, तुम दुष्टन के संहारक हो, तुम युग युग के अवतार पुरुष, सब संतन के प्रतिपालक हो।।५।। हे करुणा सिंधु कृपालु प्रभु, अति करुणा उर में धारे हो, जिनको जग में कोउ और नहीं, गिरधर तुम एक सहारे हो।।६।। (तर्ज:- जय राम रमा रमनं शमनं...) गुन्दर श्याम हमारे ॥
....||४|| ॥७॥ श्री कृष्ण की शरण में, श्री राधे की शरण में, सब कुछ छोड़ गया. दोउ के चरण में।। श्री कृष्ण की शरण में... श्री राधे श्याम की जोड़ी मनोहर, प्रेम से बिठाऊँ मैं इन नयनन में|| श्री कृष्ण की शरण में. .॥२॥ श्री राधे जी विराजत बृज कुंजन में, कर कर दरशन हुआरे मगन मैं। श्री कृष्ण की शरण में.. ...॥३॥ श्री कृष्ण रचाये रास नित मधुवन में, धन धन हुआ उस छवि निखरन में। श्री कृष्ण की शरण में.. श्री कृष्ण बरसाये नित प्रेम मुरली में, वंशी सुन पायो सुख श्रवणन में।। श्री कृष्ण की शरण में... .||५|| श्री राधे कृष्ण दया की मूरत, कर किरपा मोहे लीजो चरणन में|| श्री कृष्ण की शरण में. .11६ श्री राधे कृष्ण संग प्रीत बढ़ाई, नहीं मोहे डर भव सिधु तरन मे।। श्री कृष्ण की शरण में... श्री राधे कृपाली अब किरपा कर दो, लग जाऊँ अब श्री कृष्ण की लगन में।। श्री कृष्ण की शरण में... .11८11 श्री राधे कृष्ण दया बरसा दो. 'गिरधर' अब आया तुमरी शरण में।। श्री कृष्ण की शरण में श्री राधे की शरण में, सब कुछ छोड़ गया दोउ के चरण में||१ (तर्जः ओढ़ चुनर मैं तो गईरे सतसंग में....) .||७|| सुन्दर श्याय हमारे ॥८॥ जय राम रमापति रघुनन्दन, जय कृष्णचन्द्र जय यदुनन्दन, जय कौशल्या दशरथ नन्दन, जय जय यशुमति नंद नंदन।।।। श्री राम ब्रह्म अविनाशी हैं, श्री कृष्ण पूर्ण अवतारी हैं, दोउ एक प्रयोजन प्रगट भये, पर लीला परस्पर न्यारी हैं।।२ श्री राम सूर्य कुल की शोभा, श्री कृष्ण चन्द्रकुल भूषण हैं, दोउ श्याम रूप मनमोहन हैं, श्री अंग धरे आभूषण हैं।॥३॥ श्री राम प्रगट भये मध्य दिवस, श्री कृष्ण निशा अवतारे हैं, दोउ धरा धर्म हेतु प्रगटे, सुर गो दिज संतन तारे हैं।।४।। श्री राम शुक्ल पख जन्म लियो, श्री कृष्ण कृष्ण पख आये है, दोउ साधु जन कल्याण कियो, अरु दुष्ट विनाशन आये हैं।।।। श्री राम जन्म रवि तपित हुयो, श्री कृष्ण जन्म घन बरसे हैं, दोउ निज युग के अवतार पुरुष, सुर नर मुनि पशु सब हरषे हैं॥६॥ श्री राम जन्म महलन में हुयो, श्री कृष्ण हुए बंदीगृह है, दोउ मुक्त करें सब बंधन से, भव सागरं पार करावे हैं ।।७।। श्री राम स्वजन बिच जन्म लियो, श्री कृष्ण रिपुन बिच आये हैं. दोउ सत् चित् आनन्द रूप धरे, आनन्द बरसाने आये हैं ॥८॥ श्री राम जन्म हर्षित जननी, श्री कृष्ण जन्म मॉ चिंतित है, दोउ त्रय जननी के लाल हुए, अरु भक्त प्रेमरस सिंचित है।।७।। श्री राम एक नारी व्रत है, श्री कृष्ण हजारों ब्याहे हैं. दोउ करुणा सिंधु कृपालु है. दीनन को हदय से चाहे हैं।।10। श्री राम करे कैकयी से नेह. श्री कृष्ण कंस संहारे हैं, दोउ धीर वीर अरु ज्ञानी है, सब विश्व उन्हीं के सहारे हैं ||१|| श्रीराम समर महुँ डटे रहे, श्री कृष्ण छोड़ रण भागे हैं, दोउ श्रत्रिय कुल अवतार लियो, अरु असुर सकल संहारे हैं ||१२|| श्री राम रहे मर्यादा में, श्री कृष्ण सदा हद लॉघे है, दोउ शरणागत प्रतिपाल करें, भक्तन के कारज साधे है||१३|| श्री राम वही श्री कृष्ण वही, जो भेद करे अज्ञानी हैं, दोउ चरणन प्रीत बढे कैसे. 'गिरधर' को राह बतानी हैं।|१४|| (तर्ज: जय राम रमा रमनं शमनं........) गुन्दर श्याम हमारे १४ ॥९॥ शिव शंकर गंगाधर शंभो. योगीश्वर हर त्रिपुरारी, कृष्ण चन्द्र वंशीधर माधव, योगेश्वर हरि अवतारी||| कृष्ण प्रभु गोलोक बसत है,शंकर शिवपुर रहिवासी, उमानाथ काशी के वासी, रमानाथ द्वारा वासी।।२।। पार्वती वल्लभ जगपिताशिव, राधावल्लभ जगत्पति. गोकुलपति श्री कृष्ण कन्हाई, महादेव कैलाशपति।।३।। यदुनन्दन हरि चन्दन धारे, चिता भस्म शिव ने धारी, भूतनाथ बाघम्बर धारे, केशव पीताम्बरधारी।।४।। शशि शेखर प्रभु चन्द्रमौलि के, मोहन मोर मुकुटधारी, सुन्दर श्याम के कुंचित कुन्तल, जटा जूट शंकर धारी।।५।। नव पंकज ब्दय नयन श्याम के, शंकर त्रिलोचन धारी, चन्दन लेप ललाट करे शिव. मृगमद श्याम तिलकधारी|| गौर कपूरी वर्ण महेश्वर, सांवरिया मुरलीधारी, माल वैजयन्ती धारी मुरारी, रुण्डमाल शिव ने धारी।।७।। आभूषण शृंगार कृष्ण को, पन्नग भूषण मदनारि, भंग धतूरा शंभु अरोगे, माखन मिसरी गिरधारी||८|| शंकर धरे पिनाक हाथ में, मधुसूदन सारंगपाणि, चक्रपाणि प्रभु कृष्ण मुरारी, मृत्युञ्जयी त्रिशूलपाणि।।१॥ हरि चरणन प्रकटी श्री गंगा, गंगाधर मस्तकधारी. नंदी वाहन करते शंकर, गरुड़ चढे गिरिवरधारी||१०॥ विल्वपत्र धारे गोपेश्वर, गोपीश्वर तुलसीधारी, वेणु अधर धरे मनमोहन, बम भोले डमरू धारी||१|| वासुदेव सब जग के पालक, संहारक शिव कैलाशी, आदि अनादि देव शिवाप्रिय, बृजभूषण प्रभु अविनाशी111२|| शिव शिव शिव भोलेभण्डारी, चतुर चपल प्रभु बनवारी, शरणागत प्रतिपालक केशव, आशुतोष प्रभु सुखकारी||१३|| 'गिरधर' प्रभु आराध्यदेव है, शिव शंकर गुरु विज्ञानी, महादेव देवाधि देव हैं, जगद्गुरु प्रभु वनमाली||१४|| नारद शारद शेष बखाने, हरि हरप्रीत कथा प्यारी, जो कोई भेद करे दोऊ में, पामर मंदमति भारी॥१५॥ सुन्दर श्याम हमारे || १०॥ नंद यशोदा को लाल श्याम मनमोहन है कृष्ण कन्हैया है नाम रूप जगमोहन है नंद यशोदा..... 10 वन वन गावे गैया चरावे, मुरली मधुर सुनावे, श्याम मनमोहन है नंद यशोदा..... । मात यशोदा को मन हरखावे, प्रेम डोर बंध जावे, श्याम मनमोहन है नंद यशोदा.... ||३|| मुरली धुन से राधे बुलावे प्रेम की सरिता बहावे, श्याम मनमोहन है नंद यशोदा..... ॥४॥ यमुना तट पर रास रचावे प्रेम की प्यास बुझावे, श्याम मनमोहन है नंद यशोदा.... 11 बृज गोपिन को खूब सतावे माखन लूट के खावे, श्याम मनमोहन है नंद यशोदा..... ॥६॥ ग्वाल बाल संग खेल खेलावे बृज मे धूम मचावे, श्याम मनमोहन है 11011 बृज भक्तन के मन को लुभावे आनन्द रस बरसावे, श्याम मनमोहन है नंद यशोदा..... III वृन्दावन में लीला दिखावे सुर नर मुनि मन भावे, श्याम मनमोहन है 11911 उद्धव जी को मान मिटावे प्रीत की रीत सिखावे, श्याम मनमोहन है नंद यशोदा. नंद यशोदा .... नंद यशोदा .... .../1101 गुन्दर श्याम हमारे " नंद यशोदा...... मित्र सुदामा से प्रीत निभावे, दुर्लभ भोग जुटावे,श्याम मनमोहन है नंद यशोदा.....! द्रुपद सुता की लाज बचावे, चीर अनन्त बढावे,श्याम मनमोहन है नंद यशोदा..... ॥१२॥ प्रिय अर्जुन को गीता सुनावे. कर्म को मर्म बतावे, श्याम मनमोहन है नंद यशोदा..... ||1 सूरदास की ज्योति जगावे. रूप को दरश करावे,श्याम मनमोहन है नंद यशोदा..... || मीरा बाई नित लीला गावे गरल सुधा बन जावे, श्याम मनमोहन है 111911 नरसी भगत की साख बढावे सॉवल शाह बन जावे,श्याम मनमोहन है नंद यशोदा..... ॥१६॥ जब जब भक्तपे संकट आवे तजि वैकुंठ को आवे, श्याम मनमोहन है नंदयशोदा..... ||१७॥ भक्त प्रेम वश नाचे गावे, बेचे तो बिक जावे, श्याम मनमोहन है नंद यशोदा..... ||1८11 दीन दयालु कृपालु कहावे. वेद पुरान बतावे. श्याम मनमोहन है नंद यशोदा..... 1191 जो कोई कृष्ण में ध्यान लगावे, परम गति को पावे, श्याम मनमोहन है नंद यशोदा..... 11201 'गिरधर प्रभु की शरण में आवे, भवसागर तर जावे,श्याम मनमोहन है नंद यशोदा..... 1Pl (तर्ज: आना सुंदर श्याम हमारे घर.....) सुन्दर श्याम हमारे का ॥ ११॥ श्री राधे गुण गाऊँ, श्याम गुण गाऊँ, श्याम गुण गाऊँ, गोपाल गुण गाऊँ, श्याम के चरण में, चित्त को लगाऊँ, श्री राधे के चरण में, शीश को नवाऊँ, श्याम गुण........ 11 हृदय कुंज में, कृष्ण को बिठाऊँ, श्री राधे के संग, झूला झुलाऊँ, ~ श्याम गुण.. ......॥२॥ श्याम चरण रज, सिर पे धराऊँ, श्री राधे की चरण रज, खुद रम जाऊँ. श्याम गुण.. मन मंदिर की, ज्योति जलाऊँ, नयन दीप से, रूप को निहारे, श्याम गुण. ...||४|| श्याम गौर छवि, नयन बसाऊँ, तन मन धन, बलिहारी जाऊँ, श्याम गुण... ./11 वंशी की धुन, नाचूँ गाऊँ. पायल धुन, श्रवणन मे बसाऊँ, श्याम गुण... ....III सुन्दर श्याम हमारे १८ ....... श्याम गुण.. नटवर नागर, कृष्ण पुकारूँ, छैल छबीली राधे, ध्यान धराऊँ, श्याम गुण.... .॥७॥ युगल चरण में, प्रीत बढाऊँ, जनम मरण को, फंद छुड़ाऊँ, .11८11 श्री राधे श्याम, कृपा सिंधु में, प्रेम भगति की,डुबकी लगाऊँ, 11911 श्री राधे श्याम, की जोड़ी मनोहर, निरख छवि, भव जल तर जाऊँ, ....//1011 श्री राधे रानी, कृपा बरसा दो, 'गिरधर प्रभु की, शरण में आॐ, श्याम गुण........../Ill (तर्ज: ओढ़ चुनर मैं तो गई रे सतसंग में.....) श्याम गुण.... . श्याम गुण.. . सुन्दर श्याम हमारे ११ श्रीकृष्ण... श्री कृष्ण.... श्री कृष्ण..... ॥ १२॥ श्री कृष्ण सो दीन दयालु जगत में, और नहीं कोऊ और नही, शरणागत को प्रतिपाल करे, ऐसो परम सनेही कृपालु है, निज भक्तन के सब कष्ट हरे, करुणा निधि दीन दयालु है।। श्री कृष्ण................ घट घट में व्यापक कृष्ण प्रभु, ऐसी अद्भुत लीला न्यारी है, भक्तों का मान बढ़ाने को, निज प्रभुता आन बिसारी है।। .ाशा श्री कृष्ण करे सब जीव मुक्त,भव बंधन काटे सारे है, ऐसो जगत् पति प्रभु प्रीत के वश, यशोदा को बंधन घारे है।। .॥३॥ बृज गोपिन प्रीत करी गहरी, जिन दुर्लभ रास रमायो है, सब जगत के पालन हार प्रभु, दधि माखन चोर के खायो है।। .II४ा सब संकट से बृज मंडल को, बस खेल ही खेल बचायो है, कंस पूतना असुर सकल, कर करुणा धाम पठायो है। ./11 जब सुरपति कोप को बृज पर, घन घोर प्रलय बरसायो है, अभिमान पुरंदर को मेट्यो, गिरधर गोवर्धन धारयो है।। ....IIEI ऐसी टेर करी रुवमी भगिनी , श्री कृष्ण नेह वश आये हैं, सब चिन्ता मेटी पल छिन में, कर हरण द्वारिका लाये हैं।। ../1७11 पाण्डवजन के परमाश्रय थे, जिन पर अति किरपा छाई है, कृष्णा को चीर अपार को, अर्जुन की लाज बचाई है।। ........./III भीष्म अटल अपने पन पर, श्री कृष्ण से प्रीत बढ़ाई है, अपने पन को बिसराय प्रभु, पर भीष्म की आन बचाई है।। 11911 सब संतन के हितकार प्रभु, पतितन उदारण कारण है, 'गिरधर' को एक सहारो तूं, भव बंधन हारण तारण है।। श्रीकृष्ण सो.... .........//toil सुन्दर श्याम हमारे श्री कृष्ण... श्री कृष्ण... श्री कृष्ण.... श्रीकृष्ण.... श्रीकृष्ण... 1100 . 1॥१३॥ टेर सुनो मेरी श्याम, शरण तेरी आयो, निज स्वामी तुझको जान. चरण में आयो| 'चरण कमल' अनुराग, भक्ति कर आयो, तजि सकल जगतजंजाल, हृदय पधरायो।।२।। "हदय कमल' नवनीत, प्रेम पिघलायो, मोहे एक भरोसो नाथ, आस कर आयो||३|| 'कर कमल' घरो मेरे शीश चरण,मस्तक धरवायो, करो करुणा दीन दयाल, भरोसो कर आयो। 'नेत्र कमल' सुख धाम. नयन बसवायो, ऐसो कमल नयन घनश्याम, देख हरषायो।।।। 'मुख कमल' रूप मकरन्द, भ्रमर बन आयो, कर अधरामृत को पान, अमर सुख पायो मुख मण्डल अनुपम रूप, नयन सुख पायो, ऐसो रूप रंग लावण्य, मदन शरमायो॥७॥ मोर मुकुट पट पीत, कर्ण कुण्डल लटकायो, लटकनिया कटि भाग, अधर मुरली पधरायो। वैजयन्ती गल माल, मणि कौस्तुभ सजवायो, ऐसो सहज रूप सुखराशि, ध्यान घरवायो।। करो काम क्रोध को अन्त, लोभ बिसराओ, है गिरधर स्वामी कृष्ण, कृपा बरसाओ।1101 जनम जनम को दास, नहीं ठुकराओ, 'गिरधर' तुमरी शरण, उसे अपनाओ मुन्रश्वार हमारे || १४|| कृपा करो श्री कृष्ण, ध्यान में आओ, अब आँख मिचौनी छोड़, प्रकट हुय जाओ। भटक लियो चहुँ ओर, ठौर नहीं पायो, सब छोड़ जगत जंजाल, शरण में आयोशा करुणा सिंधु अगाध, दया बरसाओ, कर कृपा बिन्दु की आस, प्यास कर आयो||३|| लोक लाज सब छोड़, तुझे अपनायो, मेरो और नहीं कोई नाथ, भरोसो कर आयो||४|| सुख दुःख लाभ अलाभ, सौंपने मैं आयो, मेरे जीवन रथ की डोर, थमाने चल आयो॥५॥ श्री राधावल्लभ लाल, स्वामिनी संग आओ, युगल छवि की प्यास, सुधा बरसाओ।।६।। भक्ति मार्ग की राह, मुझे बतलाओ. मैं बालक हूँ नादान, नहीं ठुकराओ।७।। कब से कसे पुकार, नाथ अब आओ, मेरी जनम जनम की चाह, उसे भर पाओ।।८।। मेरे प्राण रहे अकुलाय, नहीं तड़पाओ, अब विरह सह्यो नही जाय, छवि निरखाओ।।७।। मेरो जीवन तेरे हाथ, साथ ले जावो. मेरी नैया पड़ी मॅझधार, पार लगवाओ1101 हे शरणागत प्रतिपाल, नहीं बिसराओ, हे 'गिरधर' प्राणाधार, कृपा कर आओ।।११।। सुन्दर श्याम हमारे 1100 ।॥१५॥ श्याम से प्रीत लगाले मनुआ, श्याम से प्रीत लगाले मानुष तन पायो पुण्यन ते, हरि को ध्यान लगाले, दहन काम को करके प्राणी, क्रोध को आग लगाले।। श्याम से घट घट व्यापक कृष्ण प्रभु को, मन मंदिर पधराले, लोभ मोह मत्सर को तज कर, ज्ञान की ज्योत जलाले। श्यामसे.........||शा सब जीवों से प्रीत जोड़ले,दया धर्म अपना ले, मायापति की शरण में आकर, माया फंद छुडाले।। श्याम से.........||३ सुत दारा अरू सगा सबंधी, सब बन्धन कटवाले, झूठे नाते तोड़ के जग के, साँची प्रीत लगाले|| श्यामसे..... ./181 सब पतितन की छोड़ गुलामी, दीन दुःखी सहलाले, हरि विमुखन को छोड़ के दामन, संत समागम पाले।। श्याम से.........191 कथा श्रवण' अरु हरि 'कीर्तन','सुमिरन' लगन लगाले, 'चरण कमल' की सेवा करके, 'अर्चन' को फल पाले!! श्याम से.........JIMIT 'वन्दन' कर गोपाल लाल को, चरण दासता' पाले, वासुदेव श्री कृष्ण चन्द्र को. 'सख्य' भाव से ध्याले।। श्याम से .........1 गोविन्द से कर 'आत्म निवेदन', अविरल भक्ति पाले, नवधा भक्ति सरित धार में प्रेम की डुबकी लगाले।। श्यामसे......... करुणा सिंधु से विनती करके, अश्रु बिन्दु ढलकाले, 'गिरधर' प्रभु की कृपा दृष्टि से, यम को त्रास मिटाले।। 11911 श्याम से...... सुन्दर श्याम हमारे १०३ कृष्ण दीवानी रे, ..||३|| .......IIII ॥ १६॥ बृजभूमि की महिमा जग में, सबसे न्यारी रे, राधे राधे कृष्ण को प्यारी रे.......|| ब्रजभूमि में प्रगटे राधे, कृष्ण मुरारी रे, राधे कृष्ण को प्यारी रे........... .॥२॥ बृजभूमि को पावन कण-कण, यमुना को वारि रे, राधे कृष्ण को प्यारी रे......... बृजभूमि वृन्दावन शोभा, परम सुहानी रे, राधे कृष्ण को प्यारी रे.. बृजभूमि की माटी कृष्ण को, अतिशय प्यारी रे, राधे कृष्ण को प्यारी रे... .J॥५॥ बृजभूमि में वंशी बजाई, कृष्ण कन्हाई रे, राधे कृष्ण को प्यारी रे........... बृजभूमि दर्शन को तरसे, सुर नर नारी रे, राधे कृष्ण को प्यारी रे.. बृजभूमि को सेवन दर्शन, भव भय हारी रे, राधे कृष्ण को प्यारी रे.......... बृजभूमि की छटा निराली, सब मन हारी रे, राधे कृष्ण को प्यारी रे.. बृजभूमि के इष्ट राधिका, रास -बिहारी रे. राधे कृष्ण को प्यारी रे....... .||10 बृजभूमि की महिमा वेद, पुराण बखानी रे, राधे कृष्ण को प्यारी रे.. बृजभूमि गोवर्धन कुंजन, मंगलकारी रे, राधे कृष्ण को प्यारी रे.. .IIEI II७॥ .11८॥ ...../191 ..||१|| सुन्दर श्याम हमारे १०४ .... बृजभूमि रज सिर को धारी, शिव त्रिपुरारि रे, राधे कृष्ण को प्यारी रे... .॥३॥ बृजभूमि की इक इक गोपी, कृष्ण दीवानी रे, राधे कृष्ण को प्यारी रे.......... JIBII बृजभूमि की गैया सारी, कृष्ण पियारी रे, राधे कृष्ण को प्यारी रे.......... .॥19॥ बृजभूमि लीलाभूमि पर, तन मन वारी रे, राधे कृष्ण को प्यारी रे..........||161 बृजभूमि के जीव चराचर, कृष्ण पुजारी रे, राधे कृष्ण को प्यारी रे..... ....||१७|| बृजभूमि के जनमानस पर, राधे छाई रे, राधे कृष्णं को प्यारी रे.. बृजभूमि में राज करे, वृषभान दुलारी रे, राधे कृष्ण को प्यारी रे........ राधेरानी हृदय कुंज, स्वामी गिरधारी रे, राधे कृष्ण को प्यारी रे... बृजभूमि दर्शन को मेरी, अंखियाँ प्यासी रे, राधे कृष्ण को प्यारी रे... गिरधर राधे कृष्ण चरण की, करे चाकरी रे, राधे कृष्ण दीवानी रे, राधे कृष्ण को प्यारी रे, ..........111८11 .111911 ..........||2011 ..॥२१॥ . सुन्दर श्याम हमारे ॥ १७॥ श्याम से मिला दे, राधे कृष्ण से मिलाय दे, कृष्ण से मिला दे राधे, दरश कराय दे, श्याम से मिला दे राधे, कृष्ण से मिलाय दे, 'चरण कमल' महुँ, चित्त को लगाय दे, युगल चरण रज, सिर पे धराय दे, श्याम से मिला दे राधे, कृष्ण से मिलाय दे.....||१|| 'हृदय कमल' महुँ, करुणा जगाय दे, भव सागर से मोहे, पार करवाय दे, श्याम से..... 'हस्त कमल' में, बँसरी थमाय दे, माधुरी मुरलिया की, धुन सुनवाय दे. श्याम से......|| 'मुख अरविन्द के, रूप को सजाय दे, श्याम को स्वरूप मोरे, मन बसवाय दे, श्याम से.....|| 'कमल नयन' महुँ, कजरा लगायदे, बाँकी चितवन की, झाँकी करवाय दे. ...J191 कृष्ण प्रेम रस, मोपे बरसाय दे, अधरामृत से मोरी, प्यास बुझवाय दे, श्याम से......JMER कुंज निकुंज की, लीला दिखवाय दे, जनम जनम की मेरी, चाह भरपाय दे, श्याम से........॥७॥ यमुना के तट पर, श्याम को बुलाय दे, श्याम प्रभु से मेरी, भेंट करवाय दे, श्यामसे..... ......11८11 राधे कृपाली अब, दया बरसाय दे. "गिरधर' प्रभु संग, छवि निरखाय दे, श्याम से ....... . श्याम से....... कृष्ण से.......19॥ (तर्जःमने मारे मत मैया......) मुन्दर श्याम हमारे |Of ॥ १८॥ मोहे लागी लगन प्रभु चरणन की, मोहेलागी लगन श्रीचरणन की, सोवत जागत कृष्ण को ध्याऊ.टेव पड़ी हरि सुमिरन की। मोहे लागी.....|| मन मोरे बस कृष्ण बसत है, और नहीं कोउ औरन की। मोहे लागी.....||२ कृष्ण स्वरूप मदन मन हारी, आस करुं छवि निरखन की। मोहे लागी......॥३॥ रूपरंग लावण्य सुधा निधि, प्यास बुझे इन अँखियन की। मोहे लागी.....||४|| कृष्ण प्रीत की डोर बन्ध्यो हूँ, गाँठ खुले नहीं बंधन की। मोहे लागी.....|| जीवन डोर को कृष्ण सम्हाले, चाह मिटी जग विषयन की। मोहे लागी....nl जीवन नैया कृष्ण खेवैया, फिकर नहीं भव तरनन की। मोहे लागी.....!! कृष्ण कृपा पर ठोस भरोसो, आस कसें नहीं औरन की। मोहे लागी... धर्म, कर्म तजि कृष्ण पुकारूँ, त्रास मिटे यम फन्दन की। मोहे लागी..... कृष्ण बिना मोरी बगिया सूनी, चाह नहीं अब जीवन की। मोहे लागी.....||1011 'गिरधर' चरणन कसं चाकरी, प्रीत बढ़ी हरि चरणन की। मोहे लागी.....|| .....lll ......|| सुन्दर श्याम हमारे ॥१९॥ मोहे चाह दरश नंद लालन की मोहे प्यास दरश नंद लालन की मोहिनी मूरत साँवरी सूरत, मनमोहन मन भावन की।। मोहे......|| कुंचित केश लुभावनी अंखियाँ, शोभा गाल गुलालन की।। मोहे.....JRAI मोर मुकुट मकराकृत कुण्डल, माल वैजयन्ती गुलाबन की। मोहे.....||३|| प्रेम स्वरूप चपल नट नागर, पट पीताम्बर धारण की। मोहे....||४|| कृष्ण कृपालु दीन दयालु, ध्यान धस श्री गोपालन की। मोहे......|| प्यास जगी मोरे अन्तर्मन महुँ, माधुरी रूप निहारन की।। मोहे.....1180 अरज करूँ मोरे प्राण पिया से, मुरली मधुर बजावन की।। मोहे.....॥७॥ श्याम दरश को इत उत भटकूँ , नयनन प्यास बुझावन की।। मोहे.... 'गिरधर' दरशन आस करत हूँ, शरणागत प्रतिपालन की।। मोहे.....॥9॥ ......lll 1104 सुन्दर श्याम हमारे ॥२०॥ आज भक्त पर संकट आयो, कृपा करो यदुनाथ, कैसे बिसरायो मोहे श्याम।। कैसे बिसरायो धनश्याम.......||१|| कर्महीन अरु पामर कोरो, जैसो भी हूँबालक तोरो, करुण कृपा पर एक भरोसो, चरण कमल से नातो मोरो, विपदा ऐसी आन पड़ी है, दर करी बृजनाथ।। कैसे विसरायो धनश्याम............||२|| पूजा अर्चन ध्यान न जानूं, वेद पठन वन्दन नहीं जानूँ, कर्म को मर्म नहीं पहचानू, नेम धर्म बन्धन नहीं जानें, एक प्रभु की कृपा भरोसे, कूद पड्यो मँझधार।। कैसे बिसरायो घनश्याम......... .||३|| जब जब भक्त पे संकट आयो, कर्म लेख गृह कष्ट मिटायो, भक्त हृदय को त्रास भगायो, नाथ अनाथ को काज सरायो, आज तेरी उस करुणाई की, आस कसें भगवान!! कैसे दिसरायो घनश्याम.. IBI चाह नहीं मुझे धन वैभव की, मॉग कसैं नहीं सुख इस भव की, ना चाहूँ मैं मान प्रभुजी, और कहूँ नहीं, निज जीवन की, आज याचना करूँ प्रभु, इक जीवन को वरदान!! कैसे बिसरायो घनश्याम.. .191 टेर सुनो राधा के स्वामी, मीरा के नटवर गिरधारी. गिरधर प्रभु अब शरण तिहारी, करुणा कर आवो बनवारी, सब संकट से इस चाकर, को मुक्त करो मोरे श्याम।। कैसे बिसरायो घनश्याम............16|| (तर्ज: देख तेरे संसार की हालत......) . सुन्दर श्याम हमारे to ॥१९॥ मोहे चाह दरश नंद लालन की मोहे प्यास दरश नंद लालन की मोहिनी मूरत साँवरी सूरत, मनमोहन मन भावन की। मोहे......!! कुंचित केश लुभावनी अंखियाँ, शोभा गाल गुलालन की। मोहे.....||२|| मोर मुकुट मकराकृत कुण्डल, माल वैजयन्ती गुलाबन की।। मोहे.....||३|| प्रेम स्वरूप चपल नट नागर, पट पीताम्बर धारण की। मोहे....|| कृष्ण कृपालु दीन दयालु, ध्यान धरूँ श्री गोपालन की। मोहे......|| प्यास जगी मोरे अन्तर्मन महुँ, माधुरी रूप निहारन की। मोहे.....10 अरज करूँ मोरे प्राण पिया से, मुरली मधुर बजावन की। मोहे..... ....॥७॥ श्याम दरश को इत उत भटकूँ , नयनन प्यास बुझावन की।। मोहे......1111 'गिरधर' दरशन आस करत हूँ, शरणागत प्रतिपालन की। मोहे.....191 1100 सुन्दर श्याम हमारे ....॥२॥ ॥ २०॥ आज भक्त पर संकट आयो, कृपा करो यदुनाथ, कैसे बिसरायो मोहे श्याम।। कैसे बिसरायो घनश्याम... कर्महीन अरु पामर कोरो, जैसो भी हूँ बालक तोरो, करुण कृपा पर एक भरोसो, चरण कमल से नातो मोरो, विपदा ऐसी आन पड़ी है, दूर करो बृजनाथा| कैसे बिसरायो घनश्याम.. पूजा अर्चन ध्यान नजानूँ, वेद पठन वन्दन नहीं जाने, कर्म को मर्म नहीं पहचानें, नेम धर्म बन्धन नहीं जानूं, एक प्रभु की कृपा भरोसे, कूद पड्यो मँझधारा॥ कैसे बिसरायो धनश्याम........ ..||३|| जब जब भक्त पे संकट आयो, कर्म लेख गृह कष्ट मिटायो, भक्त हृदय को त्रास भगायो, नाथ अनाथ को काज सरायो, आज तेरी उस करुणाई की, आस करूँ भगवान।। कैसे बिसरायो घनश्याम.. चाह नहीं मुझे धन वैभव की, माँग करूँ नहीं सुख इस भव की, ना चाहूँ मैं मान प्रभुजी, और कहूँ नहीं, निज जीवन की, आज याचना करुं प्रभु, इक जीवन को वरदान।। कैसे बिसरायो घनश्याम......|| टेर सुनो राधा के स्वामी, मीरा के नटवर गिरधारी, गिरधर प्रभु अब शरण तिहारी, करुणा कर आवो बनवारी, सब संकट से इस चाकर, को मुक्त करो मोरे श्यामा। कैसे बिसरायो घनश्याम............||६|| (तर्जः देख तेरे संसार की हालत......) .||४|| सुन्दर श्याम हमारे 1109 ॥२१॥ तूही नंद को कुमार, तूं यशोदा को दुलार, तू गोवर्धन पार, तूही रास को बिहार ..||१|| तूही मात तूही तात, तूही मित्र तूही भात, तूजो माने वोही नात, तुझे प्याऊ दिन रात...||२|| तूही भानू की तपन, तूही चन्द्र की किरण, तूही वसुधा गगन, तूही आग की दहना। तूही रवि बुध सोम. तूही गुरु भृगु भौम, नूही मंद तूही व्योम, तूही जप तूही होमा तूही जीव तूही ब्रम. तूही काल को है क्रम, तूही फल तूही श्रम, तूही तेज तूही तम...।।५।। तूही नदियों का नीर, तूही धेनु तूही क्षीर, तूही द्रौपदी का चीर, तूही बृज का अहीसा तूही नदियों में गंग. तूही सिंधु को तरंग, तूही मतवालों भृग. तूही मधु मकरंद...॥७॥ तूही सांझ तूही भोर, तूही घटा घनघोर, तूही ओर तूही छोर, तूही चंद्र तूं चकोरा॥ तूही ऋतु में बसन्त, तूही साधु तूही संत. तूही रंक धनवन्त, तूं अनादि है अनन्त॥१॥ तूही रति तूं अनंग, तूं गरुड़ तूं भुजंग, तूही ब्रज को निकुंज, तूही ब्रह्म तेज पुँज||10|| तूहीजल तूही धार, तूही नाव पतवार, तूही गिरिको अधार, तूही सागर अपार|| तूही राग तूं बहार, तूही मेघ तूं मल्हार, तूही रूपा शृंगार, तूंकनक तूही हार....||२|| तूही सावन बयार, तूही मेघ की फुहार, सुन्दर श्याम हमारे 110 10 तूही वंशी की पुकार, तूही नूपुर झंकार||१३|| तूही राधे तूही श्याम, तूही वेणु तूही तान, तूही सीता तूही राम, तूही धनु तूही बाण||१४|| तूही लय तूही ताल, तूही नृत्य तूही गान, तूही बुद्धि तूही ज्ञान, तूही आन बान शान....||१५|| तूही पात तूही डाल, तूं कदम्ब तूं तमाल, तूही फूल तूही माल.तूं कमल तूही नाल||१६ तूही प्रेम तूं प्रसंग, तूही दीप तूं पतंग, तूही भंग की तरंग, तूही फागुन को रंग॥१७॥ तूही तन तूही मन, तूही प्राण को पवन, तूही नभ तूही घन, तूही वन उपवन111८11 तूही शीत तूही ताप, तूही धूप तूही छाँव, तूही गज तूही ग्राह,तूही नृसिंह वराह।।१।। तूही जल तूही थल. तूही नभ तूं अधर, तूही चर तूं अचर, तूही विधि हरि हरा॥२०॥ तूही गोप तूही ग्वाल, तूही गऊन गोपाल, तूही संत प्रतिपाल, 'गिरधर' रखवाल...||२|| सुन्दर श्याम हमारे ॥ २२॥ मेरी सुनले पुकार, प्यारे नंद के कुमार, मैं तो आयो तेरेदार, छोड़ कर घर बारा मैं हूँ बालक अनाथ, कर मुझको सनाथ, थाम मेरो अब हाथ, मेरी डोर तेरे हाथा|२|| मोहे तेरो ही अधार, मेरी बिगड़ी सुधार, मेरी नाव मँझधार, तेरे हाथ पतवाशा तेरो ज्ञान है अपार, मै तो निपट गॅवार, मेरी मति को सुधार, सब काज को संवारा| मैं तो रूप को कुरूप, तेरो रूप धनरूप, कब निरखू ये रूप, तेरो माधुरी स्वरूप....! तू है मेरो करतार, तू है जग भरतार, तू है खेवन को हार, मोहे पार उतारा। तेरी महिमा अपार, सब जग को सहार, मोहे कष्ट से उबार, विनवऊँ बारंबार||७|| करे तेरा जो भजन, करे ध्यान जो गहन, तेरो गीता को वचन, करे क्षेम को वहन।।८॥ 'गिरधर' की पुकार, गिरधर से पुकार, गिरधर को निहार, गिरधर भव तार||१|| सुन्दर श्याम हमारे 10 . ॥२३॥ राधे रानी बृज महारानी, चरण कमल मॉराखजो, चाकर अपनी जान स्वामिनी, प्रेम सुधा बरसावजो||१|| मैं अज्ञानी अरु बड़मानी, मान हमारो भगावजो, जनम जनम से आस करूँ मैं, कृपा दृष्टि कर आवजी||२|| अर्चन पूजन ध्यान न जानूँ, भक्ति राह बतलावजो, अवगुण एक धरो नहीं चित में, सब अपराध बिसारजो॥३॥ निर्बल साधनहीन जानकर, भवजल पार करावजो, श्याम पिया संग दरश दिखा कर, यमको त्रास मिटावजोगा बृज मण्डल को वास निरंतर, सहज सुलभ करवावजो, कृष्ण चन्द्र करुणा निधान की, मधुर छवि निरखावजो|| यमुनातट वंशीतट लीला, एक झलक दिखलावजो, रासभूमि लीलाभूमि महुँ, सेवक जान बुलावजो॥८॥ राधे रानी परम कृपाली, बालक जान सम्हालजो, बिना परिश्रम बिना साधना, युगल स्वरूप दिखावजो।७।। श्याम प्रिया बरसाने वाली, यमुना पान करावजो, वृन्दावन गोवर्धन भक्ति, मन मंदिर माँ राखजो॥८॥ करुण भाव से कसें प्रार्थना, करूणा कर स्वीकारजो, "गिरधर' चरणन करे वन्दना, मस्तक हाथ धरावजो1॥ (तर्ज:- श्री जी बाबा दीनदयाला....) सुन्दर श्याम हमारे 113 ॥ २४॥ प्रभु गोविन्द दारिकावासी ए. कृष्ण गोपीजन सुखराशि ए, प्रभु केशव सारंगपाणि ए. तोहे सुमिरे द्रौपदी राणी ए॥ दुर्योधन जाल बिछायो ए, शकुनि छल कपट रचायो ए, खूब दांव पे दांव लगायो ए. युधिष्ठिर राज गेवायो ए|२|| धन सम्पदा सब कुछ हारी ए, अरु बंधु द्रौपदी हारी ए, ऐसो संकट आयो भारी ए. कैसी कर्म गति हुई न्यारी ए||३|| सुन दुष्ट दुःशासन धायो ए, द्रौपदी कटु वचन सुनायो ए, सुन कृष्णा को मन घबरायोए, खलखींच सभा में लायो ए|| ऐसी फूल सी कोमल रानी ए. पांडवजन प्रिय पटरानी ए, कुल गौरव साख बखानी ए, दुःशासन एक न मानी ए|| द्रौपदी जब इत उतधाई ए, नहीं कोई बन्यो सहाई ए. श्री अंग को वस्त्र खिंचाई ए. कुरु वंश की गरिमा घटाई ए॥ जब सब कुछ करके हारी ए. तो सुमिरो गिरिवरधारी ए, आई आज शरण में तिहारी ए. मेरी लाज रखो बनवारी ए।।७।। हे माधव मदन मुरारी ए. गोपीजन मन सुखकारी ए, अति करुण दशा है हमारी ए. अब कष्ट हरो गिरधारी ए८ मेरी लाज के ओ रखवारे ए, तेरी बहिना आज पुकारे ए, आओ नंद यशोदा दुलारे ए. मैं तो केवल तेरे सहारे ए||७|| करुणानिधि धीर गॅवायो ए. फट छोड़ दारिका घायो ए. भगिनी को मान बचायो ए. तन चीर अपार बढ़ायो ए||10 दुःशासन खेंचत सारी ए, श्री कृष्ण की लीला न्यारी ए. सारी मँहुनिकसतसारीए, ऐसो कौतुकमच गयोभारी ए| बन्धन को करज चुकाई ए, बहिना को धीर बंधाई ए, द्रौपदी मनअति हरखाई ए. जब निरख्यो कृष्ण कन्हाई ए॥१२॥ मन मोहन अब तो आवो ए, मोहे युगल स्वरूप दिखाओ ए, 'गिरधर' को शरण बुलावो ए, भवसागर पार कराओ ए||१३|| 'गिरधर' को दरश करावो ए, भव बन्धन मुक्त कराओ ए, नयनन की प्यास बुझावो ए, करुणा करके अपनाओ ए||४|| (तर्ज:- मगरे रा मूंग मंगावो....) सुन्दर श्याम हमारे १४ ॥२५॥ कृष्ण मैं तेरी शरण आयो, श्याम मैंने विस्था जनम गँवायो, मानव देह मिली पुण्यन ते, हाथ कछु नहीं आयो, कृष्ण .....श्याम मैंने विस्था जनम गंवायो।। जिन पॉवन से दर दर भटक्यो, हरिव्दारे नहीं आयो, ना आयो कभी मंदिर दर्शन, तीरथ जल नहीं न्हायो, कृष्ण .....श्याम मैंने विरथा जनम गॅवायो। पाप कर्म किये दोऊ कर से, सेवा कर नहीं पायो, अर्चन वन्दन कियो नहीं कभी, पर उपकार भुलायो, ক্লা ... ..श्याम मैंने विरथा जनम गॅवायो॥३॥ पर निन्दा श्रवणन को प्यारी, कथा श्रवण ना भायो, सुनी नहीं वृन्दावन महिमा, मुरली सुन नहीं पायो, ক .....श्याम मैंने विरथा जनम गवायो। अंखियाँ भटकत जग माया में, श्याम न नयन बसायो, कृष्णचंद्र की विरह याद में, नयन नीर नहीं आयो, कृष्ण श्याम मैंने विरथा जनम गँवायो॥५॥ ललक रही रसना रस चाखन, धर्म कर्म बिसरायो, भक्ष्य अभक्ष्य उदर में मेल्यो, प्रभुप्रसाद नहीं पायो. कृष्ण ..श्याम मैंने विस्था जनम गँवायो|६ भोग विषय में खप गयो जीवन, कृष्ण ध्यान नहीं आयो, दीन दयालु विरद भरोसे, अरज सुनाने आयो, कृष्ण ......श्याम मैंने विस्था जनम गंवायो॥७॥ कृष्ण अब करुण कृपा बरसावो श्याम अपराध सभी बिसराओ, चलकर आऊँ बृज भूमि में, कुंजन नित शृंगारु, भजन कीर्तन कसें तिहारो, युगल स्वरूप निहारूँ, श्याम मैं चरणन में रम जाऊँ, कृष्ण मैं राधे को गुण गाऊँ||८|| ध्यान धरूँ बस युगल छवि को, नयनन वही बसाऊँ. 'गिरयर' प्रभु अब छोड़ सकल जग, तेरी लीला गाऊँ, श्याम मैं चरणन में रम जाऊँ, कृष्ण मैं राधे को गुण गाऊ191 सुन्दर श्याम हमारे ......|| ॥२६॥ राधे रानी कृपा बरसाय देरे, श्यामा दानी दया बरसाय देरे, बाट जोहूँ छवि निरखाय देरे, राह तफॅ छवि निरखाय दे रे, राधे.... राधे रूप को नयन में रमाय देरे, श्याम रूप को नयन में रमाय देरे, चित्त चरण कमल में लगाय देरे, राधे.. बृज के कुंज निकुंज दिखाय दे रे, लीला रास मण्डल की रचाय देरे, राधे....||३|| साँवरिया माधुरी मुरलिया सुनाय देरे, राधे छम छम पायल बजाय देरे, राधे...||४|| प्यारी बृज रजस्वाद को चखाय देरे, संग यमुना जल पान भी कराय दे रे, राधे...॥५॥ कृष्ण को माखन मिसरी खिलाय देरे, मोहे नेक सो प्रसाद दिलवाय देरे, राधे...nn हद भक्ति की राह बतलाय देरे, भव बन्धन से मुक्त करवाय दे रे, राधे.../101 झॉकी युगल स्वरूप की कराय दे रे, मेरो जनम सफल करवाय देरे, राधे....[ll 'गिरधर' प्रभु मोहे शरण बुलाय ले रे, श्यामा श्याम के चरण मे बसाय देरे, राधे.....191 सुन्दर श्याम हमारे ।। २७॥ प्रभु रास बिहारी ठाकुर के, श्री युगल चरण को ध्यान धरूँ, मोरे कृष्ण कृपालु के चरणन में, कर वन्दन कर अरदास करूँ| प्रभु आप रहोस्वामी मेरे, मैं जनम जनम तेरो दास रहूँ, नहीं और किसी की आस रहे, तेरी सेवा में दिन रात रहूँ||२|| प्रभु हृदय कमल करुणा धारो, मैं कातर भाव गुहार करूँ, मोहे चरण कमल अनुरागवरो, मैं पलपलहरिगुणगान करूँ॥३॥ प्रभु ज्ञान के सूर्य प्रकाश बनो, मैं मोह तिमिर को नाश करूं. मुखचन्द्रवदन किरणन चितवो, मैं संतचकोरसोपानकला। प्रभु गगन रूप विस्तार करो,मैं पंछी बन के उड़ान भरु, तुम बादल बन कर छाँव करो, मैं राही बन पथ पार का।। प्रभु उर्ध्वमूल अश्वत्थ बनो, मैं डाल डाल को पर्ण बनूँ, तुम कमल सहसदल रूप धरो, मैं भ्रमर रूप तहं वास करूँ||६|| प्रभुजल बनकर वसुधा बरसो, मैं भक्ति धार में स्नान करूँ, तुम यमुना वारि प्रवाह बनो, मैं मीन स्वरूप विहार कसँ७॥ प्रभु सत् चित् आनंद घन बरसो, मैं हरख मयूर सो नाच करूँ, मोहे स्वाति बिन्दुको दान करो मैं चातक बन कर पान करूँ।।८।। प्रभु कामधेनु को रूप धरो, मैं वत्स रूप पय पान करूँ, मोहे संत समागम अवसर दो, मैं श्रवण कथामृत पान करूँ||| प्रभुमधुवन वंशी नाद करो, मैं कोयल बन कर गान करूँ, मोहे मुरली रूप प्रदान करो, मैं अधरामृत को पान करूँ।।१०।। प्रभु आभूषण श्री अंग धरो, मैं माणक मोती हार बनूँ, निज कमल नयन महुँ ठौर करो, मै अंजन को शृंगार बनूँ॥५॥ प्रभुमात बनो मम तात बनो, मैं शिशुवत् करुण पुकार करूँ, मेरी नाव के तुम पतवार बनो, मै भव सागर को पार करूं|१२|| प्रभु कष्ट हरो दुःख दूर करो, मैं तुमसे बस इक मॉग करूँ, मोहे अविरल भक्ति प्रदान करो,मैं सब विषयन को त्याग कसँ॥१३॥ प्रभु राधा के संग कृपा करो, मैं युगल चरण से प्रीत करूँ, 'गिरधर बृजमण्डलवास करो,मैं पादयुग्म निज शीश धसँum (तर्ज:-पितु मातु सहायक स्वामी.....) सुन्दर श्याम हमारे 110 ॥ २८॥ या मोरी विनती को ध्यान धरो. साँवाहना मोरी विनती को ध्यान धरो. मनम को नहीं मोहे भरोसो, हार चरण पको, औरती को ध्यान धरो. विनया साँगायो करुणा ठाकुर की, ठग ठाकुर मे फस्यो, भूल चेमुखन की सही ठकुराई, निज ठाकुर विसर्यो, हरिगी को ध्यान धरो. विनारया ॥२॥ साँव सबधी सब खुदगरजी, फिर फिर सब परख्यो. सगार भटक्यो सगरे जग मे, अपनो घर विसर्यो, दरदी को ध्यान धरो. विनश्या ॥३॥ सॉक्रोध मद लोभ मोह के, माया जाल बध्यो, कार्माल्यो बस निज स्वारथ की, परमारथ बिसर्यो, राही को ध्यान धरो, विनारिया साँवा रूपमय रसना रसमय, घ्राण गंध भटक्यो, आँखभोगमय श्रवण शब्दमय, हरि चर्चा बिसर्यो, हाथती को ध्यान धरो, विनरिया सॉव अजामिल गणिका तारी, भिलनी को बेर चथ्यो, गीध विदुर को प्रेम से खायो, ऊँच नीच बिसर्यो, सागतीको ध्यान धरो. Tel साँव दयालु कृष्ण कृपालु, चरणन शरण पर्यो, दीनधर' प्रभु के विरद आसरे, निज कर्मन बिसर्यो, 'गिरती को ध्यान धरो, विन रिया साँवा प्रभूजी मोरे अवगुण चित्त न घरो) ||५ विनारिया ॥७॥ श्याम हमारे 1110 |॥२९॥ बसे मेरो मन, श्री वृज उपवन, रहे मेरो तन, नंद के भवन||१|| लगे मेरो मन, श्री राधे के चरण, हुवे मेरो तन, श्री कृष्ण की शरण।।२।। जपे मेरो मन, श्री राधे को जपन, तपे मेरो तन, श्री कृष्ण की तपन||३|| भजे मेरो मन, श्री राधे को भजन, रहे मेरो तन, श्री कृष्ण में मगन।।४।। चितुं निज नयन, श्री राधे को वदन, सुने श्रवणन, श्री कृष्ण के वचन॥५॥ करूँ सुकरम, हृदय हो रहम, मिटे सब भरम, धसँ निज धरम161 काम हो दहन, क्रोध हो दमन, स्वस्थ हो चलन, गर्व हो शमना७१ कष्ट हो सहन. लोभ होतजन, कसैं बस भजन, क्षेम हो वहन||८|| ध्यान हो गहन, साधना सघन, का सब जतन, सिंधु से तरन||५|| कृष्ण को वरण ,श्री राधे की शरण, 'गिरधर' रमण, दोऊ के चरण||१०|| . सुन्दर श्याम हमारे 191 ॥३०॥ शरणागत दीन दयालु प्रभु, मैं एक तिहारी शरण आया, मोहे स्वीकारो हे यदुनन्दन. मोहे सगरे जग ने ठुकराया। प्रभु व्यर्थ गयो सगरो जीवन, हरि चरणन चित्त न पधराया, नहीं तीरथ दान स्नान कियो, नहीं ध्यान हृदय में घरवाया॥२॥ हे मधुसूदन सारंगपाणि, नहीं जप तप ध्यान मोहे भाया, नहीं दीन दुखी की सेवा की, निज स्वारथ वश सब बिसराया||३|| मैं मंदमति पामर कामी, अरु मोहपाश में गहराया, अति लोभी हूँखल क्रोधी हूँ. सब जग विषयन में भरमाया|| नहीं कोई सद्गुण पास मेरे, इस झूठे जग ने बहकाया, मोहे पार करो करुणा सागर, करुणानिधि जगतूं कहलाया||911 प्रभु जैसो हूँ मैं तेरो हूँ, बस अपनी जान चला आया, दक आस बंधी विश्वास हुयो, शरणागत पाल शरण आयाIEl प्रभु सर्व धर्म परित्याग किया, इक तेरी शरण को अपनाया, प्रभु पाप पुंज से मुक्त करो, गीता का सार हृदय लाया॥१७॥ प्रभु करुणा सिंधु सुधा सिंधु की, एक बूंद को ललचाया, 'गिरधर' प्रभु की छवि निरख निरख, मन हरख हरख कर हरखाया1111 मुन्दर श्याम हमारे १२० . ......||२|| ||३१॥ प्रभु कोटि कोटि वन्दन स्वीकारो, माधव मदन मुरारी, निज बालक जान सम्हाल करो मोरी, आयो शरण तिहारी, प्रभु कोटि.... सुत दारा अरु सगा सम्बन्धी, सब की प्रीत बिसारी, प्रीत करी तुमसे मोरे प्रियतम, राधे रास बिहारी. प्रभु कोटि... मैं मूरख पापी अरु पामर, क्षमा करो अवतारी, अब तो सुन लो नंद दुलारे, विनती करुण हमारी, प्रभु कोटि......111 बाट निहारत अंखियाँ थक गई, प्रकटो कृष्ण मुरारी, टेर लगावत रसना सूखी, आय मिलो बनवारी, प्रभु कोटि...... मीरा तुलसी सूर कबीरा, शबरी कुब्जा तारी, नरसी नानक नामदेवकी, नैया पार उतारी, प्रभु कोटि......110 कृपा दृष्टि की वृष्टि करके, शरण में लो यदुराई, तुम तो सहज दयालु भगवन, फिर कैसी निठुराई, प्रभु कोटि......10 करुण दशा सुमिरो मोरी मोहन, बृज के कुंज बिहारी, "गिरधर' दर दर भटक लियो जग, रह गई आस तिहारी, प्रभु कोटि.......॥ (तर्ज:-थोरे दरशन सुंदुःख दूर..........) ||४|| . सुन्दर श्याम हमारे [१२१ ........... ॥३२॥ अरज सुनो मोरे श्याम सांवरे, पलक उघाड़ो घनश्याम, तीरथ मन्दिर फिर फिर आयो, रूप तिहारोमन में बसायो, प्रकट हुओ मोरे श्याम साँवरे, पलक उधाको घनश्याम, अरज सुनो.. ...||111 साधन जतन सकल कर आयो, फिर भी तेरो दरश न पायो, आय मिलो मोहे श्याम, साँवरे, पलक उघाड़ो घनश्याम अरज सुनो.. शा अन्तर मन अभिलाप जगायो, आशा को इक दीप जलायो, स्वीकारो मोहे श्याम, साँवरे, पलक उघाझे घनश्याम अरज सुनो...........॥३॥ रोय रोय नयनन नीर सुखायो, टेर लगावत धीर गेवायो, धीर बंधाओ मोहे श्याम, साँवरे, पलक उघाडो घनश्याम अरज सुनो.... .||४|| अश्रु बिन्दु दृग सों ढलकायो, विरहानल को दाह लगायो, मत तड़पाओ मोहे श्याम. साँवरे, पलक उघाड़ो घनश्याम अरज सुनो.. .1111 तूं ठाकुर मैं दास कहायो, चाकर को कैसे बिसरायो, अपना लो मोहे श्याम, साँवरे, पलक उघाडी घनश्याम अरज सुनो शरणागत वत्सल कहलायो, 'गिरधर तेरी शरण में आयो, शरण में लो मोहे श्याम, साँवरे, पलक उघाडी घनश्याम अरज सुनो.. .11७॥ ..........IIEI . . मुन्दर श्याम हमारे ॥३३॥ साँवरिये से प्रीत लगाई, मनमोहन मन प्रीत जगाई, माधुरी मूरत मन में बसाई, साँवरी सूरत नैन समाई, सांवरिये से.. मन वृन्दावन तन बरसाना, वक्ष पटल नव तुलसी सजाई, सांवरिये से... .IN नयन दीप में ज्ञान की ज्योति, लोभ मोह सब दूर भगाई, साँवरिये से.........||३|| श्रवणन छलके हरि रस गाथा, नाम जपन में रसना लगाई, सांवरिये से... .||४|| रोम रोम में प्रेम की धारा, नवधा भक्ति अंग समाई, सांवरिये से... तन की मटकिया कर्म की मथनी, भक्ति भोग नवनीत धराई, सांवरिये से... IMER मुरली धुन संग पायल छम छम, हृदय निकुंज में लीला रचाई, साँवरिये से.. 11७॥ अंसुवन जल नयनन ढलका कर, अन्तर करुण पुकार लगाई, साँवरिये से.........III 'गिरधर' तन मन अर्पण करके. जीवन धन की करी कमाई, साँवरिये से... ......./11 11911 सुन्दर श्याम हमारे ॥३४॥ हे नंद दुलारे ध्यान धरो, मनमोहन मन अज्ञान हरो, मेरो वन्दन अंगीकार करो, मोहे युगल चरण से प्यार वरो, हे नंद दुलारे.... मोरे मन ममता संचार करो, मोहे यशुमति सो सौभाग्य वरो, मोहे देह भवन किलकार करो, मोहे नंद सो आनंद दान करो, हे नंद दुलारे.............||२|| मोरे घर आंगन अवतार करो, माखन खाओ गो पाल करो, मोरे हदय कुंज शृंगार करो, राधा संग रमण विहार करो, हे नंद दुलारे... .||३|| मोरे अन्तर में उजियार करो, मोहे सूर सी दृष्टि प्रदान करो, मोहे दृष्टि दिव्य प्रदान करो, मोहे रूप को दर्शन दान करो, हे नंद दुलारे.... ...........॥४॥ मेरी आशा को बलवान करो, नरसी सो मन विश्वास भरी, मोहे प्रेमा भक्ति प्रदान करो, मन मीरा सो अनुराग भरो, हे नंद दुलारे........ मोहे बालक जान सम्हाल करो, मेरे दोष को नहीं चित्त ध्यान धरो, करूणानिधि करुणा दान करो, सिंधु से बिन्दु प्रदान करो, हे नंद दुलारे.............|| प्रभु शरणागत प्रतिपाल करो, मोहे भाव की भक्ति प्रदान करो, 'गिरधर' प्रभु अब स्वीकार करो, चाकर को चरणनवास वरो, हे नंद दुलारे.. .I1911 ........../1७11 सुन्दर श्याम हमारे ॥३५॥ साँवरिया श्याम आओ, प्रभु कृष्ण कन्हैया आओ, म्हारे मन रे मंदरिये रा, ठाकुर जी बण जाओ। यशोदा नन्दन आओ, नंद जी रा लाला आओ, म्हारे मन रे ऑगणिये में, रुण झुण करता आओ॥२|| गोपाल लाल थे आओ, प्रभु धेनु चरैया आओ, म्हारे मनड़े री गोचर भूमि, धेनु चरावण आओ||३|| वृन्दावन चन्दा आओ, संग राधे गोरी लाओ, म्हारे मन अंधियारो मेटो, चानणियो चमकाओ॥४॥ प्रभु कुंज बिहारी आओ, राधा रा प्रीतम आओ, म्हारे मन रे हिंडोले ऊपर, झूला झूलण आओ।।५।। प्रभु रास बिहारी आओ, गोपीजन वल्लभ आओ, म्हारे मन रे निकुंज मांही, लीला रास रचाओ। मतवाला मोहन आओ, ग्वालोंरा गोविन्द आओ. म्हारे मन पनघट आओ, गागर शीश धराओ७॥ वंशीधर माधव आओ. होठां मुरली पधराओ. म्हारे मन में विराजे राधे, मधुरी तान सुनाओ। म्हारा छैल छबीला आओ, प्रभु बंशी बजैया आओ. म्हारे मन माही नाचे राधे, घुघरिया घमकाओ। कानूडा लाल आओ, गोवर्धनधारी आओ, सुन्दर श्याम हमारे १२५ म्हारे मनड़े रे दिवले रे, ज्योति थे बण जाओ।1108 मनमोहन प्यारे आओ. मनहारी रूप दिखाओ, म्हारे मन री झरोखे झाँको, आनंद रस बरसाओ|५|| घनश्याम सॉवरा आओ, मनड़ेरी प्यास बुझाओ, म्हारे मन रा मरुधर ऊपर, मेहलियो बरसाओ॥१२॥ घट घट रा बासी आओ, म्हारे रोम रोम बस जाओ, म्हारे मनड़ेरी नैणा माही. काजल सा रम जाओ॥३॥ पारथ रा सारथ आओ. कृष्णा रा मोहन आओ, म्हारे मन री संभालो डोरी, तन री लाज बचाओ|१४|| मीरा रा गिरधर आओ, नरसी रा साँवल आओ, म्हारे मनड़े संकट काटो, कारज भी सॅवारो।।१५।। करमारा कान्हा आओ, प्रभु सूर रा श्यामल आओ, म्हारे मन रे कटोरे भरियो, माखण भोग चढ़ाओmein करुणा रा सागर आओ. दीनों रा बंधु आओ, म्हारो मनड़ो अधीर होवे, मस्तक हाथ फिराओ।।१७।। करुणाकर अब तो आओ, म्हारी विनती ध्यान धराओ, गिरधर प्रभु थारी शरण में आयो, भव जल पार कराओmell . मुन्दा श्याम हमारे 16 ॥३६॥ चलचल मोरे मन, गिरि वन उपवन, गहवर मधुवन, बृज वृन्दावन।।।। चल चल मोरेमन, जहाँ वंशी को वट, जहाँ यमुना को तट, रहे श्याम घट घटा२॥ चल चल मोरे मन, जहाँ यशोदा श्री नंद, जहाँ गोप ग्वाल वृन्द, रहे बड़ो ही आनन्द||३|| चल चल मोरे मन, प्रेम भाव से मगर, बरसाने की डगर, जहाँ राधे को नगराधा चल चल मोरे मन, घरचरणन चित्त, जहाँरास होवे नित, राधेश्याम के सहित) चल चल मोरे मन, जहाँ सॉवरो निकट, मुख झूमे काली लट, आवे ध्यान इाट घट||६|| चल चल भोरे मन, जहाँ मन मोहन, गैया करे दोहन, मिले पग धोवन।७॥ चल चल मोरे मन, जहाँ होवे सतसंग, बाजे ढोल झाँझ चंग, वीणां वेणु हो मृग।।८।। चल चल मोरे मन, जहाँ खूब हो भजन, होवे साधना सघन, रहूँ कृष्ण मे मगन।।५।। चल चल मोरे मन, जागे दरश ललक, जहाँ दिखे इक झलक, बस गिरे ना पलक||10| चल चल मोरे मन, जहाँ बसे वंशीधर, धर मुरली अधर, प्रभु मिले 'गिरधर||1|| १२७ सुन्दर श्याम हमारे ॥३७॥ हे राधे वल्लभ अरज सुनो, मैं वास कसै वृन्दावन धाम, बृज रज पावन को शीश धरूं, हर रोज करूं यमुना जल पाना। बृज लीला भूमि को सेवन करके, रात दिवस लेॐ हरि नाम, चाह कसें नहीं जग विषयन की, ध्यान धराये संग श्यामा|| रास की लीला दरश कसे प्रभु, सत संगत राधे गुणगान, दीन दुखी की सेवा करके, त्याD लोभ मोह अभिमान॥३॥ कुसुम सरोवर जल से न्हाऊँ, राधा कुण्ड में करूँ स्नान, कृष्ण कुण्ड में डुबकी लगाऊँ, नवल अप्सरा को जलपाना18 गोवर्धन गिरिराज धरण की, परिक्रमा को कस प्रयाण, नंदगाँव गोकुल बरसाना, बृज को शत शत करुं प्रणामा॥५॥ यमुना तट पर विचकै निशदिन, छाँव कदम्ब कसैं विश्राम, ध्यान लगाऊँ मुरलीधर को, श्रवण करूँ मुरली की ताना। लीला चिन्तन संत समागम, रहे न कोई दूजा काम, तीन लोक न्योछावर कर, मिले वास वृन्दावन धाम11७11 नंद-दुलारे भान-दुलारी, विनती पर दीजो अब ध्यान, 'गिरधर' जनम जनम से चाहे, चरणन सेवा का वरदाना1८।। मुन्दर श्याम हमारे Rel ॥३८॥ (आरती) आरती राधेश्याम की कीजे, युगल छवि नयनन भर लीजे, आरती राधेश्याम.......॥ श्याम स्वरूप यशोदानन्दन, मुनि मन रंजन असुर निकदन, गौर वर्ण राधे जग वन्दन, निश दिन ध्यान धरे नंदनंदन, गौर श्याम रस भर भर पीजे, निज निज जनम सफल कर लीजे. आरती राधेश्याम.....|| नयन रसाल बाल धुंधरारे, 'श्याम' तिलक कस्तूरी धारे, चन्द्रवदन नैना कजरारे, 'राधे' कुन्तल रूप संवारे, अनुपम रूप हृदय धरलीजे, तन मन धन न्यौछावर कीजे, आरती राधेश्याम.......||२|| पीताम्बर धारे बनवारी, राधे की चुनरी है रतनारी, मुख आभा दमकत अति भारी, दामिनि तेज लजावन हारी, रूप सुधा को पान करीजे, नयनन ज्योति पावन कीजे, आरती राधेश्याम....||३|| मोर मुकुट वैजयन्ती माला, कर्णफूल धारे नंदलाला, मणि माणक मोतिन की माला, उर धारे वृषभान की बाला, षोड़श विध शृंगार धरीजे, झांकी युगल स्वरूप की कीजे, आरती राधेश्याम......|| कीरति लाडली भान दुलारी, नंद यशोदा मन सुखकारी, शरणागत वत्सल भयहारी, विप्र धेनु सुर संत सुखारी, बाँके बिहारी किरपा कीजे, निज जन जान शरण में लीजे, आरती राधेश्याम.....|1|| कुंज बिराजे रास बिहारी, वाम अंग राधे मतवारी, मुरली धुन पायल मनहारी, धन धन निरख हुए नर नारी, 'गिरधर' प्रभु अब दर्शन दीजे, चाकर की विनती सुन लीजे, आरतीराधेश्याम.....1111 (तर्ज:- आरती युगल स्वरूप की कीजे......) . १ सुन्दर श्याम हमारे पृष्ठ संख्य क्रम (१) (२) (४) १३७ (६) (७) अष्ट-कमल भजन जय शंकर प्रतिपाला १३१-१३ शंकर दयालु ईश है १३३-१३४ हे शिव शंकर हे विश्वम्भर 135 हे भूत भावन चन्द्रशेखर १३६ जय माँ दुर्गा दुर्गति नाशिनी गणपति को शीप नवाऊँ (गवरजा) ૧૩૮ हर हर गंगे हर हर गंगे १३१ जय माँ शारद बुद्धि विशारद जय जय कमले विष्णु प्रिया करुणानिधि दीन दयालु हरे प्रभु रामभद्र मंगल मूरति मारुत नन्दन आओ सब मिल गाओ हरि ओम राधेश्याम को मनाऊँ, सियाराम को मनाऊँ गौरीशंकर को मनाऊँ... अरज सुनो नरसिंह देव १४० १४१ ૧૪૨ (9) (10) (११) (१२) (१३) १४३ १४४ १४५-१४६ (१४) १४७ सुन्दर श्याम हमारे 11101
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अष्ट-कमल
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जय शंकर प्रतिपाला, दीन दयाला, विनती हमारी सुन लीजिये, तेरी शरण में आये, तेरे रूप को निहारे।। झटपट दर्शन अब दीजिए॥ जय शम्भो किरपाला, भक्तन का रखवाला, भोले बाबा अब तो किरपा कीजिये, तेरा रूप है निराला, उस पर रुण्ड मुण्ड की माला|| स्ट पट दर्शन अब दीजिए॥२॥ जय महेश मतवाला, तीन नेत्रों वाला, भंग का प्याला भर भर पीजिये, डम डम डमरू का निनाद, करते ताण्डव सा नाच!! इाट पट दर्शन अब दीजिए। जय हर हर महादेवा, पार्वती के देवा, भक्तन को सनाथ अब कीजिये, तेरा गौर वर्ण कर्पूरी, धारे चिता भस्म की धूरी। शट पट दर्शन अव दीजिए। जय शिव शंकर प्यारा, काम को तुमने मारा, भक्तों की अभिलाषा पूरी कीजिये, सिर पर गंगा जी की धारा, सबको तेरा ही सहारा। दर्शन अब दीजिए॥५॥ जय बाघम्बर वाला, ओदेतन मृग छाला, संकट सबका दूर कर दीजिये, तेरी बैल की सवारी, तेरा नाम त्रिपुरारि।। झट पट दर्शन अब दीजिए॥६॥ सुन्दर श्याम हमारे
जय जय परम कृपाला. दीनों का रखवाला,
अपनी शरण अब लीजिये,
तेरो सों का शृंगार, तेरी महिमा अपरमपारा!
झट पट दर्शन अब दीजिए।७॥
जय मृत्युञ्जय देवा, स्वीकारो मेरी सेवा,
औघड़दानी अब तो सुन लीजिये,
विपदा ऐसी आन पड़ी है, ऐसी संकट की घड़ी है।।
झटपट दर्शन अब दीजिए।
शिव शंकर अब आओ, भारत देश बचाओ,
दुष्टों का संहार अब कीजिये,
गिरधर कब से पुकारे, तेरी आरती उतारे।।
झाट पट दर्शन अव दीजिए।
(तर्ज: निर्बल से लड़ाई बलवान की)
सुन्दर श्याम हमारे
॥२॥ शंकर दयालु ईश है. शिव शंभवाय नमो नमः, शंकर कृपालु देव है, शिव शंकराय नमो नमः॥ शिव शीघ भूरी जटा धरी, चंदन को लेप ललाट में, मस्तक विराजे चन्द्रमा, शिव चन्द्रमौलि नमो नमः।। शंकर....|| 'शिव' गंगधार प्रचंड है, लेवत हिलोर लटा जटा, गंभीर धीर स्वरुप शिव, गंगाधराय नमो नम.|| शंकर....||२|| 'शिव' गरल गल महुँ पान कर, सब सृष्टि को संकट हरो, विष कण्ठ अवरोधन कियो, शिव नीलकण्ठ नमो नमः॥ शंकर....||३|| 'शिव' गौर वर्ण कर्पूर सो, अरु अंग लेपन भस्म को, हे भूत भावन देवता, भस्माम्बराय नमो नमः।। शंकर..... 'शिव' वसन बाघम्बर धर्यो, शृंगार अंग भुजंग को. गल रुण्ड-नाग की माल सोहित, भूतनाथ नमो नमः।। शंकर....॥५॥ 'शिव' सृष्टि कारण रचयिता, पालक सृजक संहारक, शिव लोचनं त्रय धारी हो, त्रिलोचनाय नमो नमः। शंकर....I161 'शिव' नित्य शुद्ध स्वरूप चिन्मय, सोमनाथ उमापति, कर शूल दंड पिनाक पाश, पिनाक पाणि नमो नमः।। शंकर....॥७ 'शिव'काल के महाकाल हो, मृत्युञ्जयी प्रभु त्र्यम्बक, हे मल्लिकार्जुन नागनाथ, घृष्णेश्वराय नमो नमः॥ शंकर.....1 सुन्दर श्याम हमारे
'शिव' डमरू नाद मृदंग साथ, हो नाच ताण्डव सो करे,
गण नंदी ,गी संग, दे नटराज राज नमो नमः।।
शंकर...191
'शिव' अखिल विश्व भरण करे, सब जीव कष्ट हरण करे,
हे भीम शंकर विश्वनाथ, विश्वम्भराय नमो नमः।।
शंकर....1100
'शिव' अमरदेव अनादि है. यह वेद निगम बखानते,
सब भक्त वृन्द पुकारते. ममलेश्वराय नमो नम:||
शंकर ..
'शिव' भंग रंग तरंग में, मदमस्त मतवाले रहे.
हे आशुतोप स्वयं प्रकाशित, वैद्यनाथ नमो नमः।।
शंकर.....||1||
'शिव' शक्ति ज्ञान स्वरूप से, शिवधर्म वृष वाहन करे,
कामारि हो त्रिपुरारि हो, रामेश्वराय नमो नमः।
शंकर.. ||३||
'शिव' भक्त पर करुणा करो, सब पाप बन्धन तोड़ दो,
'गिरधर' चरण वन्दन करे, हे विश्वरूप नमो नम.!!
शंकर.... ||१४||
'शिव' भक्त वत्सल दानी हो, अब आर्त स्वर पर ध्यान दो.
'गिरधर' तुम्हारी शरण आया, रूप दर्शन दान दो।
शंकर......||५||
शंकर दयालु ईश है, शिव शंभवाय नमो नमः,
शंकर कृपालु देव है, शिव शंकराय नमो नमः।
(तर्ज:- सत् सृष्टि ताण्डव रचयिता नटराज राज नमो नम:)
सुन्दर श्याम हमारे
॥३॥ है शिव शंकर हे विश्वम्भर, जगजननो जाडो. तीन लोक के आध्य दाता, जनजसे डरते...til हे जगदीश्वर हे गौरीश्वर, सदसंबटले नुनको. जटाजूट धारी अविनाशी, सुब संपत्ति युरो..... |२|| हे करुणा वरुणालय शंभो. कृपा दृस्टिसेतृत करो, आशुतोष हर हर महादेवा, सकल सृष्टि संतत हो.....!!! हे त्रिपुरारि हे मदनारि, अहंकार सब दूर्नकरी. शरणागत-वत्सल भगवन्ता.मनोकामना पूर्णब्रो...il हे अखिलेश्वर हे विश्वेश्वर, आधि व्याधि को दररो. मृत्युञ्जय गंगाधर शंभु. गृह दाया सब दूर करो..... हे गोपेश्वर हे रामेश्वर, दुर्लभ दर्शन दानशे. 'गिरधर तेरी शरण में आया, स्वप्न सभी सरकार करो....!!! (तर्ज: जय जय हर हर गौरीशंकर...) - m सुन्दर श्याम हमारे ॥४॥ हे भूतभावन चन्द्रशेखर, चन्द्रमौलि महेश्वर, केदारनाथ कृपा निधे, गौरीपति रामेश्वरा हे भूतनाथ दिगम्बरं, भूरी जटा भरमाम्बरं, केदारनाथ दयानिधे, गंगाधरं बाघम्बास हे गौर वर्ण स्वरूप चिन्मय, नीलकण्ठ सुरेश्वरं, केदारनाथ कृपा करो, नन्दीश्वरं अखिलेश्वरा|३|| हे आशुतोष भुजंगभूषण, सोमनाथ उमापति, केदारनाथ दया करो, शिव त्र्यम्बकं गिरिजापति||४|| हे भीमशंकर विश्वनाथ, विश्वम्भरं विश्वेश्वरं, केदारनाथ अरज सुनो, नागेश शिव सर्वेश्वर।।५।। हे मल्लिकार्जुन वैद्यनाथ, शिवाप्रियं वृषभध्वज, केदारनाथ विनय सुनो, मृत्युञ्जयी धर्मध्वज||६|| हे काल के महाकाल शिव, प्रभु शंकरं ममलेश्वरं, केदारनाथ शरण में लो, त्रिपुरारि शिव घृष्णेश्वरं।।७।। शिव शंभवाय शिव तराय, त्रिलोचनाय जगत्पति, केदारनाथ प्रसन्न हो. वन्दन कसें पशुनापति।।८।। भक्त वत्सल दीन बंधु, दीन स्वर पर ध्यान दो, केदारनाथ शरण पड्यो 'गिरधर' को भक्ति दान दो।।५।। २ . ||५|| जय माँ दुर्गा दुर्गति नाशिनी, सिंह वाहिनी नमो नमः, जय नव दुर्गा मंगल कारिणी, भव भय हारिणी नमो नम.. जय जय शैलपुत्री' जगजननी, 'ब्रह्मचारिणी' नमो नम अद्भुत रूप चन्द्रघन्टा' को, 'कूष्माण्डेति' नमो नमः।।२।। 'स्कन्दमात' अम्बे जगदम्बे, कृपा वत्सला नमो नम:, भक्त वत्सला 'कात्यायनी' माँ, 'कालरात्रि' माँ नमो नम || मात भवानी 'महागौरी' माँ. वृषभवाहिनी नमो नमः, सुख वैभव सौभाग्य दात्री माँ. 'सिद्धिदात्री माँ नमो नम ।।४।। शंभु प्रिया कैलाश वासिनी, मातृरूपे नमो नमः महिषासुर मर्दनी माँ दुर्गे,शक्ति रूपे नमो नमः।।।। जय माँ पार्वती सुखराशि. कृपा रूपिणे नमो नमः, भक्ति मुक्ति आरोग्य दायिनी, भक्ति रूपे नमो नमः॥६॥ अन्न धन परिपूर्ण दायिनी, अन्नपूर्णे नमो नमः, सदबुद्धि निर्मल मति दायिनी, विद्या रूपे नमो नमः।।७।। शरत्र धारिणी दुष्ट तारिणी. दुर्गा रूपे नमो नम , पाप विमोचनी शाप विमोचनी. माया रूपे नमो नम ||८|| भगवती दुर्गे संकट हारिणी, देव पूजनी नमो नमः, सुर नर मुनि संताप हारिणी, 'गिरधर' माते नमो नम:।1911 सुन्दर श्याम हमारे ॥६॥ गणपति को शीप नवाऊँ ए, श्री चरणन ध्यान लगाऊँ ए, माता गवरल रा गुण गाऊँ ए, ईशर जी को ध्यान धराऊँ ए|| सखियाँ सब मन हरखाई ए. मॉ गवरल पूजन आई ए, केसर जल भर कर लाई ए, माता गवरल ने नहलाई ए॥२॥ चंदन रो चौक पुरायो ए, हीरॉ रो बाजोट बिछायो ए, बहु विध शृंगार धरायो ए. मॉ गवरल रो रूप सजायो ए|३|| खूब इत्र सुगंधि लगाई ए, चुनरी कसूमल ओढ़ाई ए, हाथों में मेंहदी रचाई ए. आभूषण अंग सजाई ए|| शुभ रंग रंगोली बनाई ए, सतरंगी गुलाल लगाई ए, चित मन से ध्यान धराई ए, सब मंगल गीत सुनाई ए।।५।। ईशर जी म्हारे घर आया ए, बाई गवरल रे मन भाया ए. हिमाचल जी मन हरखाया ए, मैनाजी ने घणा सुहाया ए||६|| गवरजा ईशर प्यारी ए. वारों रूप अनूपम भारी ए, गवरल अरु ईशर जोड़ी ए, कैसी अद्भुत अविचल जोड़ी ए।७।। सोने रो थाल सजायो ए, जामें छप्पन भोग धरायो। ए. कर कर मनुहार जिमायो ए, फेर पान को बीडो चढ़ायो ए||८|| ईशर संग विदा कराई ए, बाई गवरल ने पहुंचाई ए. म्हारी अंखियॉ भर भर आई ए. 'गिरधर' ने पूजा गाई ए।।७।। म्हारी अंखियाँ भर भर आई ए, ईशर जी ने गवर भोलाई ए, ईशरजी ने गवर भोलाई ए, ईशरजी ने गवर भोलाई ।। (तर्ज:- मगरे रा मूंग. .....) गुन्दर श्याय हमारे | ॥ ७॥ हर हर गंगे हर हर गंगे, जय हर गंगे जय हर गंगे, जय जय गंगे हर हर गंगे, जय जय जय जय हर हर गंगे||१|| जय हर गंगे हर हर गंगे,अलकनन्दिनी जाह्नवी गंगे, सकल अमंगल नाशिनी गंगे, भव भय हारिणी तारिणी गंगे।।२।। प्रकट भई हरि चरणन गंगे, स्वर्ग लोक विचरत हर गंगे, भूमण्डल अवतरी श्री गंगे.शीश जटा धारी शिव गंगे।।३।। जटा शंकरी पावनी गंगे,भागीरथ वन्दित हर गंगे, सगर पुत्र तारिणी श्री गंगे, भागीरथी मंदाकिनी गंगे।।४।। शीतल निर्मल जल हर गंगे, तरल तरंगे हर हर गंगे, कल कल नाद करत हर गंगे, हिम शिखरे बहती हर गंगे।।५।। पुण्यदायिनी सुरसरि गंगे, त्रिभुवन ताप विनाशिनी गंगे. पाप विमोचनी हर हर गंगे,शाप विमोचनी भगवति गंगे॥६॥ सुर नर मुनि मन हारिणी गंगे,पुण्य स्वरूपा भगवति गगे. जग जननी जग तारिणी गंगे, मुक्तिदायिनी हर हर गंगे।।७।। शक्ति स्वरूपा हर हर गंगे,भक्ति स्वरूपा हर हर गंगे, मुक्ति स्वरूपा हर हर गंगे, 'गिरधर' माते हर हर गंगे।।८।। सुन्दर श्याम हमारे 1191 ॥८॥ जय माँ शारद बुद्धि विशारद, हंसवाहिनी नमो नमः, शरद चन्द्र सो रूप तिहारो, वीणा पाणिनि नमोनमः||१|| श्वेत पद्म आसन आरुढ़ा, इन्दुवदनी नमो नमः , धवल वस्त्र श्री अंग सुशोभित. पंकज नयनी नमो नमः ।।२।। मणि माणक सिर मुकुट विराजत. माला धारिणी नमो नमः , नाना विध शृंगार सुशोभित, अभयदायिनी नमो नमः ||३|| करुणामयी मॉ विश्व भारती. पुस्तक धारिणी नमो नमः, बह्म रुद्र हरि करे वन्दना, देव पूजिनी नमो नमः ॥४॥ मात सरस्वती महाभागिनी, विद्या रूपे नमो नम., बुद्धि दायिनी भक्ति दायिनी, मुक्ति दायिनी नमो नमः ।।५।। हे जग जननी मात शारदे, कृपा वत्सला नमो नमः , शुद्ध बुद्धि सन्मार्ग दर्शनी, 'गिरधर' माते नमो नमः ॥६॥ गुन्दर श्याम हमारे १४० ॥ ९॥ जय जय कमले विष्णुप्रिया, जगजननी लक्ष्मी नमो नमः, जय श्री लक्ष्मी जय महालक्ष्मी, राज्य लक्ष्मी माँ नमो नम:||१|| अन्न धन सौभाग्य दायिनी, भक्त वत्सला नमो नमः, रिद्धि सिद्धि आरोग्यदायिनी, कमलासनी माँ नमो नम:||शा मंगलदायी रूप अलौकिक, चन्द्रमुखी माँ नमो नमः, सुन्दर वदन सुनयना देवी, त्रिपुर सुन्दरी नमो नमः।।३।। पट चुनरी रतनार धारिणी, कुंकुम धारिणी नमो नमः, अंग अंग शृंगार सुशोभित, विश्व विमोहिनी नमो नमः।।४।। षोडश विध शृंगार सज्यो मॉ, भूषण धारिणी नमो नमः, नव पंकज को हार घरो मॉ, पद्मावती माँ नमो नमः।।५।। हरि चरणारविन्द नित सेवत, हरि वामानां नमो नमः, अटल अमर सौभाग्यवती माँ, वैकुण्ठ स्वामिनी नमो नम:। अखिल विश्व ऐश्वर्य दायिनी, सम्पत्ति दायिनी नमो नमः, सुर नर मुनि संताप हारिणी, चंचल चपला नमो नम.७॥ प्रगट भई सागर मंथन महुँ, हरि परिणीता नमो नमः, जय जय रमा रमापति रानी, कृपा मूर्ति नमो नम:||८|| शंख चक्र अरु गढ़ा धारिणी भक्ति स्वरूपा नमो नमः, जय श्री देवी आध शक्ति मॉ, 'गिरधर' माते नमो नमः।।१।। सुन्दर श्याम हमारे ॥ १०॥ करुणानिधि दीन दयालु हरे, प्रभु रामभद्र रघुनन्दन है, जय दशरथ नन्दन राम हरे, जय कौशल्या सुखधाम हरे।।।। श्री अवधपुरी पावन नगरी, त्रैलोक्य में सबसे न्यारी है, जहाँ जन्म लियो हरि सूर्यवंश, ऐसी लीला भूमि प्यारी है||२|| सब विश्व के पालनहार प्रभु, श्री राम मनुष तन धारे हैं. धन कोख हुई कौशल्या की, दशरथ कुल में अवतारे हैं।।३।। कैकयी रानी सौभाग्यवती, कुल भूषण भरत से जाये हैं, ब्दय लाल सुमित्रा के प्रकटे, रिपुसूदन लखन पियारे हैं।।४।। श्री अवध में अद्भुत् धूम मची, डफ ढोल मृदँग गुंजाय रहे, कुल दीपक जगमग ज्योत करे, सब गीत बधाई गाय रहे।।५।। नभ मण्डल छाये देव सभी, नयनन में प्यास दरश की लिए, सब निरखत अपलक बाल ब्रह्म, श्री राम लला छवि नयन लिए| प्रभु सकल अमंगल नाशक हैं, पतितन के भी उद्धारक हैं, सुर नर मुनि गो दिज तारक हैं, शरणागत के प्रतिपालक है।।७।। श्री राम स्वरूप में श्याम बस्यो, श्री श्याम स्वरूप में राम बस्यो, इक नयनन राम को रूप बस्यो, दूजे नयनन घनश्याम बस्यो।।८ रघुकुल गौरव अरु मान बढ्यो, प्रिय नगर अयोध्या को भाग जग्यो, श्री चरण कमल अनुराग बढ्यो, 'गिरधर' मन राम से प्यार।। (तर्ज:-अब सौंप दिया इस जीवन का .....) सुन्दर श्याम हमारे मंगल मूरति मारुत नंदन, पुत्र अंजनी को, ज्ञानशील गुण धाम, पवन सुतनीको, शरणागत रखवारो प्यारो, हनुमत रंग रंगीलो, पुनरासर बिराजे म्हारो, बजरंग वीर हठीलो.....||१|| कनक शैल सी देह धरीजाको, अंग अंग गठीलो, संत हृदय मन मोद करे, कपि कुल को है गर्वीलो, राम प्रभु को दास, श्री राम नाम रसीलो, पुनरासर......|| वैदेही की खोज करन को, सिंधु लंघन कीनो. भक्त विभीषण को अपना कर, वरदहस्त धर दीनो, प्रभु संदेश सुनाय सिया को, मन को दुःख हर लीनो, पुनरासर.....||३|| बाग अशोक उजाड़ बनाकर, दहन लंक को कीनो, अजर अमर वरदान माता, जानकी से लीनो, सिय संदेश बताय राम को, सहज कृपा धन लीनो, पुनरासर.....॥४॥ दल बल मर्कट भालू के संग, खल दल बल हर लीनो, धौलागिरिको लाय कर के, लखन कष्ट हर लीनो, असुर वृन्द संहार कर मद,रावण को हर लीनो, पुनरासर.....{५॥ नाग पाश बन्धन से मुक्ति, गरुड़लाय के कीनो, महावीर विक्रम बजरंगी, समर भयंकर कीनो, अहिरावण को मर्दन करके, सब संकट हरलीनो, पुनरासर......! प्रभु आवन को शुभ संदेशो, भरत लाल को दीनो, अवध पुरी के जन मानस को, विरह ताप हर लीनो, "गिरधर' की विनती सुन लीजो, ताप हरो अब तीनो, पुनरासर......11 (तर्ज: कठे सुंलाई झूठ कठे सूं... . . सुन्दर श्याम हमारे 1४३ ॥ १२॥ आओ सब मिल गाओ. हरि ओम, आओ सब मिल गाओ, शिव ओम, जपो रे भैया ओम हरि ओम्र शिव ओम।।१।। रहे शुभ सब ग्रह और योग, जपो रे भैया ओम हरि ओम शिव ओमा|| रहे परवश रवि बुध सोम, जपो रे भैया ओम हरि ओम शिव ओम||३|| तेरो क्या करे गुरु भृगु भौम, जपो रे भैया ओम हरि ओम शिव ओम॥४॥ नही राहु शनि केतु हो विलोम, जपो रे भैया ओम हरि ओम शिव ओम||५|| नहीं बने जप तप और होम, जपो रे भैया ओम हरि ओम शिव ओमा करलो पुलकित इक इक रोम, जपो रे भैया ओम हरि ओम शिव ओमा७॥ प्रभु बसे जल थल अरु व्योम, जपो रे भैया ओम हरि ओम शिव ओमा 'गिरधर' रटे हरि ओम शिव ओम, जपोरे भैया ओम हरि ओम शिव ओम।।७।। सुन्दर श्याम हमारे Tw ॥ १३॥ राधेश्याम को मनाऊँ, सियाराम को मनाऊँ, गौरीशंकर को मनाऊँ, लक्ष्मीनाथ को मनाऊँ|१|| कुलदेव को मनाऊँ, सब देव को मनाॐ. तात मात को मना, शीष गुरु को नवाऊँ, राधेश्याम.....||२|| सत संगत को जाऊँ, हरिभजन सुनाऊँ, निज प्रभुता भुलाऊँ गुण प्रभु जी के गाऊँ। राधेश्याम......||३|| जप होम भी कराऊँ, पुण्य दान भी कराऊँ, साधु सेवा कर आॐ. ढुःख दीनों का बटाॐ।। राधेश्याम......1 काम क्रोध तजि आॐ, लोभ मोह बिसरा. निर्मल मति पाऊँ, छल छिद्र न रचाऊँ। राधेश्याम......॥५॥ पूजा थाल को सजाऊँ, हरि मन्दिर को जाऊँ. मेरे ठाकुर को नहलाऊँ, चंदन अंग में लगाउँ।। राधेश्याम......|| अम्बर रेशमी पहनाऊँ, कजरा नैन में लगाऊँ अंग अंग को सजाऊँ, सब भूषण धराउँ।। राधेश्याम......॥७॥ . सुन्दर श्याम हमारे "
माल पुष्प की धराऊँ, फूल बंगली बनाऊँ,
वास इत्र की फैलाऊँ सेवा भोग भी चढ़ाऊँ।
राधेश्याम.... 11८11
मूरत नैन में बसाऊँ, ध्यान हिरदे में धराऊँ.
सेवा चाकरी बजाऊँ, सारे हुकुम उठाऊँ।।
राधेश्याम....../191
ढोल मॅजीरे बजाऊँ, घण्टा नाद को गुंजाऊँ.
धूप दीप को सजाऊँ, प्रभु आरती भी गाऊँ।
राधेश्याम.... .[tOIL
सारे जग को भुलाऊँ, हरि शरण में जाउँ
ऐसी लगन लगाऊँ, तन मन रम जाऊँ।।
राधेश्याम.....
प्रेम भक्ति से मनाऊँ. मेरे स्वामी को रिझाऊँ,
चरणो में पड़ जाऊँ, अंसुवन ढलकाॐ।।
राधेश्याम......शा
देहभान को भुलाऊँ, प्रभु रुप में समाऊँ
'गिरधर' डोरको थमाऊँ, भव जल तर जाऊँ।
राधेश्याम... ||
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सुन्दर श्याम हमारे
४
अत्रुपदया के सागर, तेजपुंजत्रैलोदय उजागर, गिरधर कुलपति चरण को चाकर, नरसिंहस्वानोरे, ॥ १४॥ अरज सुनो नरनिंइदइनरलतहरीरे, जरज सुनो नरदेवनजतिमारे, असुर कहिदाह मायेनंदिनु जयादारी. गो नर तुर दिवसंतदरी, पुकारे, अरज तुनो......10 पुत्र प्रहाद महादिहानी.मकस्सिननितत्परगानी. संत हृदय हरि कोइयत्री, दाल तारी रे, अरज तुनो..... III असुर जनतनहुं पारदडायो, दहुदिप त्रास प्रहाद नायो, अधरम नेट पर परदायो, प्रजदतारी रे, अरज तुनो..... कनक कशिपुढोनान निटादन, मल प्रहाद को कष्ट निवारन, अखिल विश्व दुःखदर भगादन, नर तनु धारी रे, अरज तुनो...... कनक दर्मती देह तुम्हारी, शीश सिंह को प्रलयंकारी. गर्जन नाद हुयो अति भारी, भवभय हारी रे, अरज सुनो.....10 विधि दर पाय असुर गायो, नरहरि तप खंभ प्रकटायो, फाइ उदर नवा मार गिरायो, सब दलिहारी रे, अरज सुनो...... शरणागत वत्सल अवतारी, मुनि मन रंजन सब तुझकारी, असुर निकंदन मंगलकारी, हरि अनिवाशी रे, अरज सुनो.....|| ....IIII (तर्ज: दर्शन दो यनश्याम नाथ........) अरज सुनो. सुन्दर श्याम हमारे
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