Shantarakshita Library Sarnath

Rahul Sankrithyan

Mddant Aanand Kauslyyayan · 21-04-06

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ভাল জীন্তনী মালা
राहुल सांकृत्यायन
भदन्त आनन्द कौसल्यायन
पीपुल्स पब्लिशिग हाउस (प्रा.) लिमिटेड
नई दिल्ली

मूल्य
२.५०
(131376
शान्तरक्षन मालक
डी. पी. सिनहा द्वारा न्यू एज प्रिंटिंग प्रेस, रानी झासी रोड, नई दिल्ली
मे मुद्रित और उन्ही के द्वारा पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस (प्रा.) लिमिटेड,
रानी झांसी रोड, नई दिल्ली से प्रकाशित ।

राहुल सांकृत्यायन राहुल सांकृत्यायन और लेखक कहानी की कहानी... स्कूल के बाद कालेज, कालेज के बाद विश्व- विद्यालय । आज तुम शायद स्कूल के ही विद्यार्थी हो । किन्तु किसी दिन विश्वविद्यालय के विद्यार्थी बनने की इच्छा तुममें जरूर होगी। विश्वविद्यालय के प्राध्यापक विश्वविद्यालय में ही पढ़े होते है। उनके नाम के आगे पी. एच्. डी., डी. एस्. सी. जैसी बड़ी-बड़ी उपाधियाँ जुड़ी रहती है। लेकिन क्या तुमने किसी ऐसे व्यक्ति के बारे में सुना है जो न किसी कालेज का विद्यार्थी रहा, किसी विश्वविद्यालय का, जिसने मैट्रिक की परीक्षा भी पास नही की, फिर भी जो एक से अधिक विश्वविद्यालयों में प्राध्यापक रहा ? मेरा विश्वास है कि तुमने इस प्रकार का उदा- हरण एकाध ही सुना होगा। हमारे देश में कई विश्वविद्यालय है। इनमें एक पुराना और प्रसिद्ध विश्वविद्यालय है : प्रयाग विश्व- विद्यालय । विश्वविद्यालय में प्रत्येक विषय का एक विभाग होता है और प्रत्येक विभाग के लिए एक विद्वान व्यक्ति प्राध्यापक होता है । घटना पुरानी है-लगभग २५ साल पहले की। प्रयाग विश्वविद्यालय के गणित विभाग में उस समय एक प्रसिद्ध गणितज्ञ गणितशास्त्र के प्राध्यापक थे। उनका नाम था : डा. बद्रीनाथ प्रसाद । डा. प्रसाद भारत के चोटी के गणितज्ञों में माने जाते थे, और उन्होंने अपनी गणितीय खोजों पर यूरोप के विश्व- विद्यालयो से पी. एच. डी तथा डो. एस्. सी. जैसी ऊंची उपाधियाँ प्राप्त की थी। उन्ही डा. प्रसाद का प्रयाग में घर । एक दिन की बात है। उनके घर पर एक अतिथि ठहरे हुए थे । अतिथि थे, एक साधु, एक बौद्ध-साधु ! तुम सोचोगे : विश्वविद्यालय के एक प्राध्यापक के घर पर एक साधु अतिथि कैसे ? साधु महात्मा शायद बहुत बड़े ईश्वर-भक्त होंगे ? नही; अतिथि साधु ईश्वर-भक्त नही थे। उस साधु का ईश्वर में तो विश्वास ही नही था। वे तो डा. प्रसाद के सम्माननीय अतिथि इसलिए थे कि वे एक 'विद्वान साधु' थे, देश-विदेश में उनकी कीर्ति फैल चुकी थी। : ६ इन्ही विद्वान साधु से मिलने के लिए एक दिन एक अन्य बौद्ध साधु डा. प्रसाद के घर पहुँचे। डा. प्रसाद के बच्चों ने नये आये साधु को घेर लिया और कहने लगे : "बाबा, आप भी हमको कोई कहानी सुनाइये।" आगन्तुक साधु सोचने लगे- -इन्हें कौन सी कहानी सुनाये ! अतिथि साधु ने पूछा-"क्या सोच रहे है आप ?" "सोच रहा हू कि इन्हें कौन सी कहानी सुनाऊं?" उत्तर मिला। अतिथि साधु बोले : "बच्चों को सोच-सोच कर कहानी सुनाई तो भले सुनाई। हमारा तो इन्हे हर दिन तीन कहानियाँ सुनाने का नियम है। हम तो साथ-साथ कहानी बनाते जाते है, और सुनाते जाते है। तुमने भी बहुत-सी कहानियाँ सुनी होंगी, पढ़ी होंगी। भूत-वैतालों की कहानियाँ, राजकुमारों-राज- कुमारियों की कहानियाँ, इतिहास की कहानियाँ । कहानियाँ सभी को अच्छी लगती है। और, यदि ऐसा कोई मिल जाय जो नित नई कहानियाँ सुनाता रहे तो फिर कहना ही क्या ! लेकिन जिन अतिथि बौद्ध-साधु की बात हम कर रहे है, उनके पास तो कहानियों का अक्षय भंडार था। और फिर, उन्हें बच्चों से बेहद प्यार था। ७

तुम सोचते होगे : काश ! हमें भी ऐसे साधु का
सहवास मिलता ! हमें भी उनसे बढ़िया-बढ़िया कहा-
नियाँ सुनने को मिलती !
आज वे बौद्ध साधु इस संसार में नही हैं। हाँ,
उनका कृतित्व-उनकी डेढ सौ से भी अधिक कृतियां-
जीवित है।
आज वे बौद्ध-साधु तुम्हें स्वयं कोई कहानी
सुनाने के लिए जीवित नही है, तब भी उनकी जीवन
कथा एक रोचक एव शिक्षाप्रद कहानी है । इस कहानी
को पढ़कर तुम जानोगे कि किस प्रकार उस बौद्ध साधु
ने घर से भागकर, दुनिया भर के मुल्कों की सैर की।
इसे पढ़कर तुम जानोगे कि किस प्रकार उन्होंने अपने
देश की ही नहीं, दूसरे मुल्कों की भी नयी और पुरानी
अनेक भाषाएँ सीखी।
इस कहानी को पढ़कर तुम जानोगे कि किस
प्रकार, बिना किसी कालेज या विश्वविद्यालय में पढ़े,
वे स्वयं विश्वविद्यालयों के प्राध्यापक बने और उनके
ग्रन्थ विश्वविद्यालयों में पढ़ाये जाने लगे।
क्या नाम था उन बौद्ध साधु का ? उनका
नाम ? .... उनके कई नाम रहे है। लो, मैं तुम्हें
क्रमशः बताऊंगा।
तो पहला नाम .
.
८

पहला नाम उत्तर-प्रदेश का आजमगढ़ जिला। इस जिले में एक-दूसरे से दस मील की दूरी पर दो गांव है-पन्दहा और कनैला। कनैला बालक के पिता का गांव है और पन्दहा बालक के नाना का । बालक का बचपन अधिक- तर नाना के घर पर बीता। नाना, रामशरण पाठक, पल्टन में सिपाही रह चुके थे और कड़े अनुशासन को पसंद करते थे। उनका अपना कोई लड़का नहीं था, केवल एक लड़की थी, इसलिए वे अपनी लड़की के बेटे-अपने नाती-को बेहद प्यार करते थे। बालक अभी पांच वर्ष का ही था कि नाना-नानी ने उसे स्कूल भेजने का फैसला किया। किसी के यह कहने पर कि उमर कम है, क्या पढेगा, नाना ने जबाव दिया-'बैठना तो सीखेगा।" पन्दहा से एक मील की दूरी पर 'रानी की सराय' मैं मदरसा था। वहां यह बालक अभी ढंग से बैठना सीख भी न पाया था कि मदरसा ही बंद हो गया ! ९

बालक साल में एक दो सप्ताह के लिए पिता के
गांव कनैला चला आता था। पिता का नाम था,
गोवर्धन पांडे और मां का नाम कुलवन्ती। कुलवन्ती
पन्दहा में उस बालक का जन्मस्थान
अपने पिता की, बालक के नाना की, एकमात्र सतान
थीं। बालक ने आगे चलकर बचपन की अपनी एक याद
के बारे में लिखा:
१०

"एक दिन मै मां के साथ ननिहाल से कनैला जा
रहा था । चलते समय आसमान ठीक था, किन्तु रास्ते
में पानी बरसने लगा। मै किसी की गोद में था। मेरे
हाथ में सत्तू की पिण्डी थी। पानी से पिण्डी भीग गयी
थी। किन्तु उस पिण्डी को मैने बड़े यत्न से हाथ में
दबा रखा था।"
एक साल बाद बालक पुनः रानी की सराय के
मदरसे में पढ़ने जाने लगा। पहली बार उर्दू की पढ़ाई
आरभ हुई थी। अब इस बार आरम्भ हुई हिन्दी की
पढ़ाई। बालक ने बड़े होने पर अपनी आरभिक पढ़ाई
के बारे में लिखा : "पढ़ने का काम मेरे लिए बिल्कुल
मुश्किल नही था। वस्तुतः चार मास की पढ़ाई के
लिए मेरे बारह मास यू ही बरबाद किये जा रहे थे।
असम्भव नहीं कि तुममे से भी कुछ विद्यार्थियों
को अपनी पढ़ाई से संतोष न हो। तुम भी सोचते हो
कि जब तुम्हें जूता पहनाया जाता है तो अच्छी तरह
यह देख लिया जाता है कि वह तुम्हारे पांव में 'फिट'
आता है कि नहीं। जब तुम्हारे लिये कपड़ा सिलाया
जाता है या सिला-सिलाया खरीदा जाता है, तब भी
यह देख लिया जाता है कि वह तुम्हारे बदन के ठीक

माप का है या नहीं। लेकिन यह स्कूल की पढ़ाई तुम्हें
ठीक बैठे या न बैठे, तुम्हें पढ़नी ही पड़ती है ! है न ?
पढ़ाई का यह क्रम सचमुच बदलना चाहिये।
लेकिन जब तक यह क्रम नहीं बदलता, तब तक तुम
क्या करोगे?
तब तक जो पढ़ाया जाता है, उसे तो मजबूरी से
पढ़ना ही पड़ेगा, लेकिन साथ ही चाहिये कि उस
विषय को खूब मन लगाकर पढ़ो, जिसमें तुम्हारी
अधिक रुचि हो।
उस बालक ने भी यही किया
मै
वह
"महापंडित" के नाम से प्रसिद्ध हुआ
तुम जानना चाहोगे : क्या नाम था उसका ?
उसका नाम था केदारनाथ !
केदारनाथ का जन्म अपने ननिहाल-ग्राम पन्दहा
में रविवार के दिन ९ अप्रैल १८९३ में हुआ था।
-और बाद
१२

सैर कर दुनिया की, गाफिल
क्या तुम में से किसी ने कभी यह तुक-बंदी या
बच्चों की कविता स्वयं गायी है या किसी दूसरे को
गाते सुना है :
"पढ़ोगे लिखोगे होगे खराब,
खेलोगे कूदोगे बनोगे नवाब ।"
केदारनाथ पांडे ने पता नही यह कविता
सुनी थी, या नहीं ? लेकिन इससे ही मेल खाती हुई
एक दूसरी कविता जरूर सुनी थी-
"सैर कर दुनिया की गाफिल,
जिन्दगानी फिर कहां?
जिन्दगानी गर रही तो
नौजवानी फिर
कहा
?"
केदारनाथ ने इस कविता को अपना गुरुमंत्र
माना। वह तेरह साल का हो गया था और दर्जा ६
की परीक्षा दे चुका था। उसके दिल में दुनिया को
देखने की बेहद लालसा थी। और फिर, अपने परि-
वार वालों से उसे एक बहुत बड़ी शिकायत थी।

केदारनाथ की आयु अभी ११ साल की ही थी,
वह अभी दूसरा दर्जा ही पास कर पाया था, तभी
उसका विवाह कर दिया गया।
आज तुम सर्वत्र देखते हो कि अधिकतर १८-२०
साल के हो जाने पर ही, समझदार हो जाने पर ही,
लड़को के विवाह होते है । लेकिन आज से ५० साल
पहले तक हमारे देश में अबोध बालक-बालिकाओं के
विवाह कर देने का रिवाज था । केदारनाथ भी इस
रिवाज का शिकार हुआ। जब वह यह भी नहीं जानता
था कि "विवाह" किस चिड़िया का नाम है, तभी
उसका विवाह कर दिया गया। बड़े होकर उसने अपने
इस "विवाह" के बारे में लिखा :
"उस वक्त ग्यारह वर्ष की अवस्था में मेरे लिए
यह 'तमाशा' था । चार साल बाद ही, जब मेरी
आयु १५ वर्ष की हुई, तभी मै इस 'तमाशे' को शक
की नजर से देखने लग गया था। १९०९, अर्थात् एक
साल बाद ही से मैने इस बन्धन से निकल भागने के
लिए घर को छोड़ देने का संकल्प और प्रयत्न करना
शुरू किया। एक साल और बीतते-बीतते तो मैने साफ
तौर से और निश्चित रूप से यह मानना और कहना
शुरू कर दिया कि मेरा विवाह हुआ ही नही ।"
१४

जब किसी बालक के माता-पिता अथवा दूसरे
बड़े-बूढ़े उसका विवाह ऐसी अवस्था में कर दें जब
वह इसके योग्य न हुआ हो, या वह इसके लिए
राजी न हो, तो क्या यह उसके साथ अन्याय
नहीं होगा ? केदारनाथ पाण्डे ने भी इसे अपने ऊपर
घरवालों का अन्याय ही समझा। वह अक्सर उन्हें
सुना भी दिया करता-
"इस ११ वर्ष की अबोध अवस्था में ही मेरी
जिन्दगी को बेचने का अधिकार तुम्हें किसने दिया
mics
१९०९ के बाद केदारनाथ ने घर आना-जाना
बिलकुल बन्द कर दिया। चार साल बाद तो उसने
एक प्रकार से घर से अपना सम्बन्ध ही तोड़ लिया।
और, इसके भी और चार साल बाद, अर्थात १९१७
मैं तो उसने यह भीष्म-प्रतिज्ञा ही कर डाली कि जब
तक उसकी आयु पूरे पचास वर्ष की नही हो जायेगी,
वह आजमगढ़ जिले की सीमा में पैर भी नही रखेगा !!

चलो कलकत्ता यह बात ठीक ही थी कि कि केदारनाथ पांडे के मन में दुनिया देखने की इच्छा घर किये थी। लेकिन दुनिया देखने के लिये घर से निकलना हो, तो उसके लिए भी कुछ-न-कुछ बहाना चाहिये न ? सो एक बार ऐसा अवसर आ गया। केदारनाथ १४ वर्ष के थे और अपने नाना के यहा रहते थे। मां और नानी का देहात हो चुका था। एक दिन की बात है। घर पर मक्खन को पिघ- लाकर घी बनाया गया था। पिघले हुए घी को बिल्ली के डर से एक उल्टी नांद के नीचे दबाना पडता था । घी को दबाते वक्त अधेरे मे केदारनाथ को मालूम नहीं हुआ कि मटकी कहां है। नाद का किनारा मटकी के ऊपर था। उस समय तो केदारनाथ को कुछ पता नही लगा, लेकिन दूसरे दिन देखा कि लगभग दो सेर घी- सारा का सारा-जमीन पर फैला पड़ा है। उसे डर लगा कि इतना सारा घी जमीन पर फैला देने का दंड अवश्य मिलेगा। दंड से बचने के लिए -

उसने घर से भाग जाने की ठानी। घर से बनारस,
विन्ध्याचल आदि समीप की जगहों पर वह एकाध वार
रेल से पहले हो भी आया था। इस बार वह कही दूर,
काफी दूर, जाना चाहता था---इतनी दूर, जितनी दूर
कलकत्ता ।
किन्तु वहाँ तक रेल से जाने के लिये पास मे पैसा
भी तो होना चाहिए। भाग्य से बैल की बिक्री से आये
बाईस रुपये उसके हाथ लग गये। वह इन्ही को लेकर
रानी की सराय स्टेशन की ओर चल पड़ा।
अपनी इस यात्रा के बारे में उसने स्वयं लिखा है :
"सूर्य ढल चुका था, जब कि मै रेल में सवार हुआ।
टिकट बनारस का लिया; क्योंकि वही रास्ता जाना-
पहचाना था। वही से मुगलसराय और आगे विन्ध्या-
चल गया। मन में झिझक जरूर थी, लेकिन घर लौटना
भी असभव था। दो-दो कसूर सिर पर थे-दो-ढाई सेर
घी खराब कर देने का कसूर और बाईस रुपये लेकर
भाग जाने का कसूर । अन्त में हार-पछताकर यही ते
करना पड़ा-चलो कलकत्ता।"
कलकत्ते मे केदारनाथ पांडे को घर से भागे हुए
अपने जैसे चार-पांच और भी तरूण मिले । सबकी एक
मण्डली बन गई। इस मण्डली की याद केदारनाथ को
बराबर बनी रही। इसके बारे में आगे उसने लिखा :
१७

"हमने अपना साम्यवादी समाज कायम कर लिया
था। यह भूल गये थे कि यह मेरा है, यह तेरा है।
हर किसी के पास जो कुछ भी था, वह सबका था-
सभी के साझे खर्च के लिए हमेशा हाजिर । हमने तै
किया था कि किसी को भी नौकरी मिले, उससे जो
भी आमदनी होगी, वह सबके लिए होगी। सबेरे हम
मूरी-भूजा ही खाकर रह जाते । दिन में एक बार शाम
को दिन रहते हो रोटी बनाते-खाते । दिन भर दो-दो
की जोडी बनाकर नौकरी की तलाश में घूमा करते।"
इन लड़कों में किसी को भी कभी कोई ढग की
नौकरी नही मिली। जो कुछ पढे-लिखे थे, वे
उमर के कच्चे थे। वे मेहनत का काम न कर सकते
थे। दो-एक जने जो उमर में बड़े थे, वे पढे-लिखे न थे।
कलकत्ता में केदारनाथ पांडे ने बहुत कुछ सीखा-
डबल रोटी खानी सीखी, जो जाति का ब्राह्मण नहीं है
उसके हाथ का बना भोजन खाना सीखा, यहाँ तक कि
सिक्खों के तदूर पर पकी हुई तदूरी रोटी और
'महाप्रसाद'-मास-भी खाना सीखा ।
नाना को पता लग गया था। उन्होने पत्र भेजा
और घर लौटने के लिये पैसा भी।
केदारनाथ पांडे चार महीने कलकत्ता रहकर घर
लौट आये।
१८

लगाओ निशान घर लौटकर काफी दिनों तक केदारनाथ इधर- उधर मटरगश्ती करते रहे। दुबारा स्कूल में दाखिल होने की उनकी इच्छा नही थी। इसी बीच उनकी 'राम प्यारी' बहन का देहांत हो गया, जिससे उन्हें बहुत प्यार था। नाना के यहां सभी कुछ था, किन्तु कोई काम नहीं था। भला बिना काम के कोई रह सकता है ? सो केदारनाथ ने फिर पढ़ाई शुरू कर दी। उन्होने लिखा है : "निजामाबाद में नाम लिखाने के बाद मेरे बहुत से साथी पास होकर चले गये थे। नये साथी थे, जिन्हें मै पहचानता नही था। अध्यापक पुराने ही थे। मुझे अच्छा नही लगता था। ऐसा मालूम देता था कि जैसे मै दौड़ में औरों से पीछे रह गया हूं।" निजामाबाद के स्कूल में केदारनाथ पांडे ने दुबारा पढ़ाई भी की और परीक्षा भी दी, लेकिन उनका मन

निजामाबाद में नही था। मन था कलकत्ता मैं।
इसलिए मौका लगते ही वह फिर कलकत्ता पहुंचे।
पिछली बार जब घर से भागे थे तो २२ रु. लेकर
चम्पत हुए थे। इस बार भी काफी रुपये लिये, लेकिन
कितने यह ठीक मालूम नही । रुपयों की एक माला भी
साथ ली, जिसे बेच खाना उतना आसान नहीं था।
इस बार कलकत्ते में केदारनाथ बहुत दिनों तक
बेकार नहीं रहे। उन्हे शीघ्र ही "मार्का-मैनी" का काम
मिल गया।
तुम पूछोगे यह "मार्का-मैनी" क्या है ?
"मार्का" कहते है निशान को और "मैन" कहते
है आदमी को। कलकत्ता से रेल के डिब्बों में जो माल
बाहर जाता था उस पर निशान लगाने पड़ते थे।
अपने-अपने माल पर निशान लगवानेवाले
निशान लगानेवाले आदमी को 'खुश' रखना चाहते थे।
उसे तनख्वाह तो मिलती ही थी; ऊपर से भी कुछ न
कुछ मिल जाया करता था।
"मार्का-मैनी" करने वाले अकेले केदारनाथ पांडे ही
नही थे, और भी बहुत से लोग थे। वे बहुत करके पैसा
लेते थे। केदारनाथ तो पैसा कमाने कलकत्ता गये नहीं
थे। वह तो गये थे, 'दुनिया देखने' ।
-
२०

केदारनाथ ने "मार्का-मैनी" का काम छोड़ दिया। थोडे ही दिनों बाद उन्हें 'सुधनी-साहु' वालों की कल- कतिया दुकान पर चिट्ठी-पत्री तथा हिसाब लिखने का काम मिल गया। 'सुघनी-साहु' की बड़ी दूकान वाराणसी में ही है। हिन्दी के प्रसिद्ध कवि जयशंकर प्रसाद 'सुघनी-साहु' खानदान के ही थे। केदारनाथ पांडे ने 'सुंघनी-साहु' के यहां मन लगाकर काम किया। हिन्दी में तो पत्र-व्यवहार करना ही पडता था। हिसाब-किताब भी रखते थे। साथ- साथ अग्रेजी में लिखी किसी चिट्ठी की नकल करके भी लोगों के पास भेजनी पड़ती थी। इतनी ए. बी. सी. डी. अब तक केदारनाथ ने सीख ली थी। खान-पान की गड़बड़ी से कलकत्ते रहते समय वह बहुत बीमार पड़ गये। काफी दिनों तक उन्हें अस्पताल मैं रहना पड़ा। अच्छे होने पर वह फिर कनैला लौट आये। घर आने पर फिर कलकत्ता लौट आने के लिए उन्हें सुंघनी- माहू की कई चिट्ठियां आई। लेकिन अब वे दूसरे रास्ते पर लुढ़के चले जा रहे थे, उन पर दूसरा ही भूत सवार हो रहा था ! तुम पूछोगे : कौन-सा भूत ? वैराग्य का भूत २१

क्या करूं? कहाँ जाऊँ?
मन की गहराई में क्या चल रहा है, कभी-कभी
इसका पता अपने आप को भी नहीं लगता। लेकिन
समय पाकर बीज फूटता है और अंकुर निकल ही आता
। वही धीरे-धीरे पौधा बन जाता है।
कनैला लौटने पर केदारनाथ पांडे ने वहीं रहनेवाले
एक 'बाबाजी' की कुटिया पर आना-जाना शुरू
कर दिया। यह बाबाजी किसी को बहुत उपदेश आदि
न दे सकते थे, न देते थे; क्योंकि वह तो स्वयं 'बाबाजी'
थे। हां, उन्हें 'सिद्ध-पुरुष' समझकर उनकी सेवा मैं
रहने वाले हरिकरणदास जी जरूर थोड़ी हिन्दी पढ़े
थे। उन्हें दूसरों को उपदेश देने की बीमारी भी थी।
उनके पास 'विचार-सागर' आदि वेदान्त के कुछ
ग्रन्थ थे जिन्हें केदारनाथ ने भी पढ़ा। हरिकरणदास
की संगत और 'विचार-सागर' जैसी पुस्तको का
केदारनाथ पर कुछ ऐसा असर पड़ा कि वह पढ़-लिखकर
साधु होने की बात सोचने लगे।
२२

उनके नाना चाहते थे कि वह अग्रेजी आदि विषय
पढे । लेकिन जिसे साधु बनना हो, उसे अंग्रेजो से क्या
लेना देना ? उस समय केदारनाथ केवल संस्कृत पढ़ना
चाहते थे। आगे चलकर "महापडित" बन जाने पर
तो वह कहा करते थे-"जिसे मूर्ख बनाना हो, उसका
सबसे अच्छा उपाय यही है कि उसे केवल 'संस्कृत'
पढा दो !"
सस्कृत पड़ने के लिए केदारनाथ ने बनारस या
अयोध्या जाने की सोची। किन्तु उन्हे डर था कि घर
वालों को कही पता लग गया तो वे पढाई मे बाधा
डालेंगे। इस बार वह साधु बनने के लिए ही घर से
भागना चाहते थे।
जैसा मन होता है, वैसा ही आदमी का बाहरी
व्यवहार हो जाता है। दिन में तीन बार स्नान करना,
नाक पकड़कर तीन-तीन बार भगवान का ध्यान
लगाना-यह केदारनाथ का नित्य-कर्म बन गया।
पहले दो बार घर से भागे थे तो पैसा लेकर ।
इस वार उन्होने बिना पैसा-धेला लिये ही भाग निकलने
की ठानी। सोचो न-वह 'साधु' ही क्या, जो घर के
पैसे-धेले के भरोसे पर यात्रा करे ?
केदारनाथ अब १६ साल के हो गये थे।

।
-
कुछ दिन
घर से पैदल ही निकलकर चलते-चलते अयोध्या
पहुँच गये। अयोध्या से मुरादाबाद । मुरादाबाद से
हरिद्वार तक के टिकट की व्यवस्था हो गयी थी।
हरिद्वार पहुंचकर 'गुरू' की खोज की। कोई ठीक गुरू
नही मिला । लोगो को जब मालूम होता कि घर काशी
के पास है, तो कहते कि सारी दुनिया तो पढने के
लिए काशी जाती है, और यह पढ़ने के लिए यहा
आया है !
एक पंडितजी पढ़ाने का झूठा विश्वास दिला,
मुफ्त
में आठ-आठ घटे लिखाई का काम
कराते रहे। जब केदारनाथ को असली बात समझ में
आई तो वह वहां से चल दिये। सोचा, पढ़ाई नही
होती, न सही; थोड़ी 'दुनिया की सैर ही सही।
इस यात्रा में वह देवप्रयाग, टेहरी, जमनोत्री,
गंगोत्री तक ही नहीं, 'केदारनाथ' तक हो आये !
तुम जानना चाहोगे कि पैसा पास में नहीं था, तो
खाना कहाँ से खाते थे ? सर्दी लगने पर कपड़े की
जरूरत कैसे पूरी करते थे ?
हर समाज और देश में ऐसे लोग है जो अतिथि
या अपने घर आने वाले को खिलाना-पिलाना अपना
कर्तव्य समझते है। और अपने देश में ऐसे लोग और
२४

भी अधिक है जो खास तौर से 'साधुओ' को खिलाना-
पिलाना, तथा उनकी जो भी सेवा बन पड़े करना,
अपना 'धर्म' समझते है।
सभी 'घुमक्कड़ो' को ऐसे लोगों का कृतज्ञ होना
चाहिए न ? उनका उपकार मानना चाहिए न ?
लेकिन बहुत से लोग तो उन्हे धन्यवाद तक न
देकर इसे सिर्फ 'भगवान की कृपा' मानते है !
हमारे महापडित इसे 'समाज की कृपा' मानते
थे!
जब कोई ठीक से पढ़ाने-लिखानेवाला नही मिला
तो केदारनाथ काशी वापिस लौट आये ।
जमनोत्री, गंगोत्री की यात्रा मे केदारनाथ के
लंगोटिया यार यागेश भी उनके साथ थे। लौटते समय
भी दोनों साथ थे। रास्ते में दोनों को मलेरिया ने
बहुत हैरान किया। धीरे-धीरे करके बड़ी मुश्किल से
काशी पहुँचे।
'वाराणसी' काशी का पुराना नाम था, इसीलिए
अब हम फिर से काशी या बनारस को वाराणसी कहने
लगे है। उस समय वहा चक्रपाणि नाम के एक
ब्रह्मचारीजी रहा करते थे। उन्होने केदारनाथ तथा
यागेश को लगभग एक सप्ताह अपने पास रखकर
२५

खिलाया-पिलाया। वे बड़े गोभक्त थे। उनके पास
'कृष्णा' गौ थी। या तो वह काले रंग की रही
होगी या उसका नाम उन्होंने कृष्णा रख लिया होगा।
वह सुबह उठते ही सबसे पहले कृष्णा की सानी-पानी
करते और उसी समय उसका दूध भी दुह लेते। इसके
बाद तुलसी-घाट पर स्नान करने चले जाते । वहां से
लौटकर पूजा-पाठ करते । पूजा-पाठ की समाप्ति पर
कृष्णा पर फूल चढ़ा और उसके अगले खूर पर अपना
मस्तक रख उसकी पूजा करते । कभी कृष्णा खाने-पीने
में या दूध देने मे इधर-उधर करती, तो उसके दो
डडे भी जमा देते थे ! मतलब यह कि ब्रह्मचारीजी
कृष्णा की 'पूजा' केवल फूलों से ही नही किया करते
थे, डण्डों से भी करते थे !!
कुछ दिन काशी रहकर दोनों मित्रों ने फिर अपने
गांव लौट आना से किया। केदारनाथ के मन में तो
'विद्वान साधु' बनने की धुन सवार थी।
अब घर के लोग इनके संकृस्त पढ़ने के इतने
विरोधी नही थे। आठ वर्ष पहले घर से कुल तीन
मील की दूरी पर वछवल के जिन फूफा जी के यहां
'सारस्वत-व्याकरण' पढ़ना शुरू किया था उन्हीं के यहां
अब फिर 'लघुकौमुदी-व्याकरण' शुरू किया।

अंधविश्वास का अंत
केदारनाथ मरते-मरते बचे ।
सचमुच मरते-मरते बचे, और वह भी अपनी ही
बेवकूफी के कारण !
किस्सा इस प्रकार है...
बनारस में रहते समय केदारनाथ 'किसी से कुछ
और किसी से कुछ' करके पढ़ने लगे। मतलब यह कि
पढ़ानेवाले 'गुरुजी' कई थे !
इसी समय की घटता है। केदारनाथ ने एक बार
मंत्र-जाप के द्वारा किसी देवी-देवता को प्रसन्न करके
उससे मन-मांगी मुराद पाने की कोशिश की। आठ
दिनों तक लगातार जप करते रहे । जब नौवे दिन भी
किसी देवी-देवता के 'दर्शन' नही हुए तो केदारनाथ
इतने अधिक दुखी हुए कि उन्होने अपनी जान देने के
लिए एक जहरीले फल के बीज ही खा लिए !
बड़ी मुश्किल से मरते-मरते बचे ।
सचमुच यह देवी-देवताओ का झूठा विश्वास भी
२०

किसी-किसी को पागल बना देता है और किसी-किसो
की तो जान ही ले लेता है।
देवी-देवताओं में विश्वास कम हुआ तो केदारनाथ
ने पढ़ाई की ओर अधिक ध्यान देना आरंभ किया ।
सस्कृत की पढ़ाई के साथ-साथ अग्रेजी भी पढ़ने लगे
और साथ-साथ हिन्दी के समाचारपत्र आदि भी।
अन्त में बाकायदा स्कूल में नाम लिखाकर पढ़ने
की सोची । बनारस के ही दयानन्द हाई स्कूल में सातवें
दर्जे में नाम लिखा लिया।
इस वक्त केदारनाथ पांडे की उम्र अठारह वर्ष
की रही होगी।
૨૮

भज बैरागी सीता-राम तुम सोचते होगे-वे अपना खर्च कैसे चलाते थे ? उस जमाने में काशी में संस्कृत पढ़नेवाले विद्या- थियों को तो प्राय. कुछ नही खर्च करना पड़ता था। या तो कोई कच्चा सीधा देनेवाला मिल जाता था, या पका-पकाया भोजन करा देने वाला । पुस्तक-पोथी, कागज-पत्र खरीदने के लिए भी कोई न कोई पैसा दे ही देता था। किन्तु अंग्रेजी स्कूल के विद्यार्थियों को यह सब सहूलियत नही थी। किसी के बहुत सिफारिश करने पर भी दयानन्द स्कूल में केदारनाथ की आधी ही फीस माफ हुई। इसी बीच छपरा जिले के परसा गांव के एक बड़े महन्त काशी आये । उनका रामोदार दास नाम का प्रिय शिष्य कुछ ही समय पहले मर गया था। उन्हें एक शिष्य की तलाश थी। उनकी ओर से जब केदार- २९ नाथ पाण्डे के सामने यह बात रखी गयी तो वह यही सोचकर उनके शिष्य बनने के लिए तैयार हो गये कि 'साधु' बन जाने से एक तो घर से पिण्ड छूट जायगा, दूसरे निश्चित होकर पढ़-लिख सकेगे। सन् १९१२ के सितम्बर महीने में केदारनाथ बनारस से छपरा पहुँचे। छपरा में स्वयं महन्तजी उन्हें लिवाने आये थे। छपरा से एकमा तक रेल की यात्रा थी। एकमा से कुल तीन मील की दूरी पर परसा का मठ था। एकादशी के दिन केदारनाथ पांडे महन्तजी के 'शिष्य' बने । कान में जो मंत्र फूका गया, सो तो फूका हो गया। साथ में आग में तपाई हुई पीतल की मोहर से इनका बदन भी दागा गया ! इसमें कोई संदेह नही कि यदि केदारनाथ को यह पहले से मालूम होता कि साधु बनने जाने पर उन्हे अपने बदन पर आग में तपाई हुई पीतल की मोहर-छाप लगवानी पड़ेगी, तो वे कभी 'साधु' नही बनते ! साधु बन जाने पर केदारनाथ का नाम केदारनाथ नहीं रहा। अब उनका नाम था, रामउदार दास- - रामोदार साधु बड़े-बड़े महन्तों को और उनके चेलों को मठ- मन्दिरों में किसी चीज की कमी नही रहती । रामो-

दार दास को तो सचमुच किसी चीज की कमी नही
थी-कपड़े, बढ़िया खाना-पीना, पूरी आराम-तलबी !
परसा के इस मठ में आमदनी तो काफी थी,
लेकिन खर्च की कोई ठीक व्यवस्था नहीं थी। रामो-
दार दास ने शुरू के तीन महीने मठ की व्यवस्था
सुधारने में ही लगाये।
लेकिन वह यहां मठ की व्यवस्था सुधारने तो
आये नहीं थे। वह तो आये थे-पढ़ने-लिखने की
सुविधा पाने की आशा से। इसका यहा कुछ इतजाम
नही था।
एक दिन, पता नही कहा से मालूम करके,
रामोदार दास (अर्थात् केदारनाथ) के पिताजी और
फूफाजी परसा आ पहुँचे । महन्तजी को किसी न किसी
तरह राजी करके, "केवल दस दिन के लिए लिये जा
रहे हैं" कहकर, रामोदार को पकड़कर कनैला ले गये।
जो बात न परसा के महन्तजी की समझ में आयी
और न इनके पिताजी तथा फूफाजी की, वह एक ही
थी। दोनों समझते थे कि लड़के को अच्छा खिलायेगे,
पहनायेंगे, तो लड़का किसी दूसरी जगह जाने का नाम
नही लेगा। दोनों मे से कोई भी यह नही समझता
था कि पढ़ने-लिखने की भूख भी एक बड़ी भूख होती

है। दुनिया को घूम फिर कर देखने की भूख भी एक
बड़ी भूख होती है।
इसी 'भूख' को शान्त करने के लिए रामोदार
दास पहले कनैला से भागकर परसा मठ चले आये
और फिर यहां से भी मौका पाकर भाग खड़े हुए।
पहली बार घर से भागे थे तो उत्तर की ओर और
कलकत्ता गये थे। इस बार भागे-दक्षिण की ओर !
रामोदार दास ने अपनी यात्रा का विचार किसी
पर प्रकट नहीं किया। मठ में काम करनेवाले एक
आदमी से केवल तीन स्पये लिये। सामान के नाम
पर पास थीं-दो-एक संस्कृत पुस्तके, दो धोतियां, दो
लंगोटियां, एक गमछा और बिछाने के लिए एक
मामूली-सा कपडा। हाजीपुर पहुंचने पर आठ आने
का एक लोटा भी खरीद लेना जरूरी समझा गया।
जब सारी पूंजी कुल जमा ३ रुपये ही हो, तो
टिकट खरीद-खरीद कर क्या यात्रा हो सकती थी ?
रेल में एक वकील साहब मिले। उन्होने बड़े आग्रह से
साथ-साथ चलने को कहा। तै हुआ-खाने-पीने की
व्यवस्था वकील साहब करेगे और रेल की सवारी
बिना टिकट !
मद्रास में वकील साहब का साथ छूट गया।
रामोदार दास को भी वकील साहब के साथ रेल के
३२

डिब्बे में कैद होकर यात्रा करने की अपेक्षा अकेले
पैदल यात्रा करना अच्छा लगा।
दक्षिण भारत में हिन्दुओं के जो पवित्र-स्थान
हैं, वे सब 'दिव्य-देश' कहलाते हैं। रामोदार साधु को
अधिक से अधिक 'दिव्य-देशों की यात्रा करनी थी।
वे बहुत-सी जगहों पर गये। तिरुमिशी के मठ में
अधिक दिनों तक रहे । यहां उन्हे मठ का उत्तराधिकारी
बनाने की भी कोशिश की गयी।
यह ठीक है कि रामोदार साधु का चित्त पढ़ने-
लिखने की ओर ही अधिक था। दक्षिण के मठ में रह
कर वह संस्कृत ही पढ़ते रहे। इतना होने पर भी
'वैरागी' साधु थे । वैरागी साधुओं का कहना है :
"पढना-लिखना बम्हन का काम,
भज बैरागी सीता - राम ।"
mr

EXCELEMERENCE
पढ़ाई की भूख
अब दक्षिण से उत्तर की ओर वापिस आना
था। रामोदार साधु नासिक, उज्जैन से आगे बढ़कर
अहमदाबाद पहुंचे। गुजरात की यात्रा समाप्त करके
रतलाम, भोपाल, बीना, कटनी, प्रयाग और बनारस
होते हुए परसा वापिस लौट आये।
रामोदार दास को वापिस परसा लौट आने पर
कुछ खुशी नही हुई । यहां उन्हें बेमतलब की झंझटों में
उलझे रहना पड़ता था। उनके मन को तो दो ही बातें
प्रसन्न करती थीं-या तो देश-दर्शन या पढ़ाई-लिखाई।
इसलिए थोड़े ही दिनों बाद रामोदार साधु फिर
परसा से भाग निकले। इस बार भागने वालों में इनके
पुराने साथी वरदराज भी थे। बिना पैसे-कौड़ी के ये
दोनों साधु अयोध्या जा पहुंचे।
यहां इन्होंने एक पाठशाला में 'वेदान्त' और
'वेद' पढ़ना शुरू किया। अयोध्या में ही रहकर
रामोदार दास ने विशेष रूप से व्याख्यान देने का
अभ्यास बढ़ाया।
३४

यूं तो अयोध्या वैरागी-वैष्णवों का गढ़ है । वैष्णव लोग मंदिरों में बकरे आदि पशुओं की बलि देने के विरोधी होते हैं । किन्तु वही अयोध्या और फैजाबाद के बीच देवकाली नाम का एक प्रसिद्ध देवस्थान है। वहां नवरात्र के दिनों में बकरों की बलि होती थी। एक ब्रह्मचारी ने चाहा कि नवरात्र के समय उस मंदिर में बकरों की बलि न हुआ करे । रामोदार साधु और उनके कई दूसरे मित्रों ने इस काम में उस ब्रह्म- चारी की सहायता करने का संकल्प किया। नवरात्र के अन्तिम दिन सभी मंदिर में पहुँचे । वहां मार-पीट की नौबत आ गई। पण्डों ने इन साधुओं में से कुछ को पीटा । रामोदार दास बाल-बाल बचे । छीना-झपटी में इनके हाथ की शीशम की छड़ी टूट गई। मामला पुलिस में जाकर शांत हुआ। पिता जी आये और उन्हें पुनः घर वापिस ले गये। केदारनाथ पांडे अर्थात् रामोदार दास साधु अब २१ साल के हो रहे थे। अब घरवालों को विश्वास था कि यह शांति से घर में बैठेगा। उन्हे क्या पता था कि उसके दिल में कैसी उथल-पुथल मची है। रामोदार दास के सच्चे मित्र थे यागेश । दोनों - की सलाह हुई। इरादा पक्का हो गया। ज्योंही रामोदार दास के हाथ बीस-बाईस रुपये लगे, वह नौ- दो-ग्यारह हो गए, अर्थात् रेल में बैठकर प्रयाग चले आये। प्रयाग आने का खास कारण था-उस समय वहां हर छठे साल या हर बारहवें साल लगने वाला कुम्भ का मेला। कुम्भ का मेला समाप्त हो जाने पर रामोदार दास ने सोचा कि अब यहीं रहकर खाने-पीने लायक कुछ कमा लिया जाय और पढ़ाई को जारी रखा जाय । वह इण्डियन-प्रेस के दफ्तर में पहुँचे। वही से 'सरस्वती' निकलती थी, जिसके बहुत दिनों से वह पाठक थे। वहां 'सरस्वती' के सम्पादक आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी से भेंट नहीं हुई। उन्हें वहां मिले पं० लालजी राम शर्मा । शर्माजी ने बड़ी नम्रता से कहा-"यदि दो दिन पहले आये होते तो मै प्रूफ-रीडरी में रख लेता । अफ- सोस है कि अब कोई जगह नहीं है।" रामोदार दास तो पढ़ने-लिखने का खर्च चलाने के लिए ही चार पैसे कमाना चाहते थे, धन बटोरने के लिए नहीं । प्रयाग में रहते समय उन्हें पता चला कि आगरा में 'मुसाफिर विद्यालय' है, जहां पढ़ाई-लिखाई साथ भोजन की व्यवस्था है। आगरे का टिकट खरीद लेने पर रामोदार के पास बचे थे कुल आठ आने।

अयोध्या में रहते समय रामोदार दास साधु ने स्वामी दयानन्द का लिखा हुआ 'सत्यार्थ-प्रकाश' पढ़ लिया था। उस समय उन्हें आर्य-समाज के बहुत से विचार पसंद थे। आगरे का यह 'मुसाफिर विद्यालय' प्रसिद्ध आर्य-समाजी धर्म-प्रचारक पंडित लेखराम "आर्य मुसाफिर" की स्मृति में ही खोला गया था। केदारनाथ "विद्यार्थी" मिडिल तक की पढ़ाई कर ही चुके थे। संस्कृत खूब जानते ही थे। अंग्रेजी भी जरा-जरा सीख ली थी। वह भर्ती कर लिये गये। यहाँ रहकर उन्हें विशेष रूप से अरबी सीखनी थी। इस "मुसाफिर विद्यालय" में रहते समय अपने मन से केदारनाथ ने अपने मन के समाचार-पत्रों तथा किताबों की खूब पढ़ाई की। आगरे में लगभग सवा साल रहे । प्रयाग से छपनेवाले अंग्रेजी दैनिक समाचार- पत्र "लीडर" को-चाहे वह थोड़ा समझ में आये और चाहे बहुत-प्रतिदिन घटा-डेढ़-घंटा जरूर देखते थे। ऐसा करते-करते केदारनाथ विद्यार्थी का अग्रेजी अभ्यास बढ़ गया। रामोदार साधु अब पुन. अपने को केदारनाथ "विद्यार्थी" लिखने लगे।

१९१५ मै केदारनाथ 'विद्यार्थी' के अपने लेख भी छपने लग गये थे। हिन्दी में उन्होंने सबसे पहले मेरठ से निकलने वाले "भास्कर" में लेख लिखे और उर्दू में आगरा से निकलने वाले “मुसाफिर आगरा" मैं। तुम सोच ही सकते हो कि अपने छपे लेखों को देखकर केदारनाथ विद्यार्थी को कितनी खुशी हुई होगी। प्यारे पुत्र केदारनाथ का वियोग उनके पिता के लिये बहुत दु.खद था। एक बार केदारनाथ उन्हे देखने के लिये घर आये । तब वे तीन-चार सप्ताह पिताजी के पास रहे। "मुसाफिर विद्यालय" की पढाई कुल दो वर्ष की थी। वह समाप्त हो गई तो अधिकारियों ने आर्य- समाज का काम करने के लिए कहा। केदारनाथ का उत्तर था-"आर्य-समाज का काम तो मै करना ही चाहता हूं। लेकिन इतनी थोड़ी पढ़ाई लेकर क्या कर सकूगा ?" अधिक पढ़ने के लिए वे आगरा से लाहौर चले आये। वहां डी० ए० वी० कालेज के संस्कृत-विभाग में भर्ती हो गये । विशारद में नाम लिखा गया।

मैं घर के अयोग्य हूं.... उत्तर भारत में खूब गर्मी पडती है । छुट्टियों में सभी स्कूल-कालेज बंद हो जाते है तो लडके अपने-अपने घर चले जाते है। केदारनाथ को तो घर जाना नही था। वे विरालसी, मुजफ्फरपुर और आगरा कुछ-कुछ दिन रहकर फिर लाहौर चले आये । यहां मौलवी महेश प्रसाद ने, जिन्हे सब लोग 'भाई साहब' कहते थे, प्रस्ताव रखा कि समय आ गया है कि वैदिक-धर्म का प्रचार करनेवाले मिशनरी तैयार करने के लिए कोई ठोस कदम उठाया जाय । हुआ कि कोई विद्यालय आदि आरंभ करने से पहले घूम फिर कर यह अंदाजा लगाया जाय कि विद्यालय चलाने के लिए रुपया-पैसा आदि आवश्यक साधन जुटाये जा सकते है, या नही ? उत्तर-प्रदेश के कई स्थानो से घूमते-घूमते केदारनाथ 'विद्यार्थी' लखनऊ पहुचे । वहा के बौद्ध- विहार मे उनकी महास्थविर बोधानन्दजी से भेट हुई, तै जिन्होंने उन्हें बौद्ध-साहित्य के बारे में कुछ जानकारी दी। केदारनाथ 'विद्यार्थी' का स्वप्न था कि यदि वैदिक- धर्म के प्रचारार्थ कोई महाविद्यालय स्थापित हो तो वह नालंदा विश्वविद्यालय जैसा होना चाहिए। तक्षशिला, विक्रमशिला, वल्लभी, नालंदा आदि हमारे देश के प्रसिद्ध प्राचीन महाविद्यालय थे। नालंदा बिहार में प्राचीन राजगिरि के समीप एक प्रसिद्ध विश्वविद्यालय था । आज से एक हजार वर्ष पहले इसी विश्वविद्यालय से एक से एक बढ़कर कई विद्वान धर्म- प्रचारक बनकर तिब्बत, मंगोलिया, चीन आदि सुदूर देशों तक गये थे। केदारनाथ 'विद्यार्थी' की आयु इस समय २३ साल की थी और वे अपने आपको "स्वामी दयानन्द के भिक्षु" मानने लगे थे। जगह-जगह घूमते और व्याख्यान देते वह बनारस आये। वहां के आर्य-समाज में भी एक व्याख्यान हुआ। बनारस के लिए प्रस्थान करते समय उन्होने अपने मित्र यागेश को एक पत्र लिख दिया था। अभी बनारस में ही थे कि देखते क्या है कि स्वयं यागेश और उनके छोटे भाई श्यामलाल वहां आ पहुचे। दोनो के बहुत जोर देने पर केदारनाथ को फिर कनैला जाना पड़ा।

मौका पाकर फिर बनारस और बनारस से विन्ध्या-
चल की खोह में अहरौरा (मिर्जापुर) आ पहुंचे। उन्हें
विश्वास था कि यहां उनके घरवाले उनका पता न पा
सकेगे। लेकिन देखते क्या है कि एक दिन स्वयं उनके
पिताजी वहां आ पहुंचे। वे अपने पुत्र को कनैला
ले जाने में सफल नही हुये तो उन्होने भी कुछ समय
तक वही रहने का निश्चय कर लिया। एक दिन उन्हें
पता लगा कि केदारनाथ अहरौरा से भी निकल भागे है।
पिता का हृदय ठहरा ! बेचारे नौ-दस मील भागे-
भागे पैदल स्टेशन आये। गाड़ी लेट नही होती तो वे
केदारनाथ को नही पाते। केदारनाथ से वे हैरान थे
और केदारनाथ उनसे ! जैसे ही उन्होंने केदारनाथ को
प्लेटफार्म पर देखा, जोर-जोर से चिल्लाने लगे-“मुझे
क्यों मार रहे हो, मुझे भी अपने साथ ले चलो !"
केदारनाथ पिताजी को तो कहा ले जाते ? उन्हीं
के साथ वापस बनारस का टिकट लेना पड़ा। बनारस
पहुंचकर और रास्ते भर उन्होंने अपने पिताजी को
धीरे-धीरे समझाया :
"मै कनैला के अयोग्य हूँ। मै आपके काम का
नही रहा ।
...अब जोर देने का भयंकर परिणाम
होगा। आपको मेरे जीवन से हाथ धोना पड़ेगा।"
४१

पिताजी सहम गये। बोले : "अब मै तुम्हारे
रास्ते की रुकावट नही बनूगा। किन्तु साथ ही मै भी
कनैला न जाकर यही बनारस में ही अपना शेष जीवन
बिता दूगा।"
पिता गोवर्धन पांडे ने अपने कथन का पहला
आधा हिस्सा अक्षरशः पूरा किया। अब इसके बाद
फिर कभी पिता-पुत्र की भेट नही हुई !
केदारनाथ ने भी प्रतिज्ञा की कि अबसे पचास
वर्ष की आयु पूरी होने तक वह आजमगढ़ जिले की
सीमा में पैर नही रखेगे !
केदारनाथ की प्रतिज्ञा भी पूरी हुई । “महापडित"
बन जाने पर उन्होंने अपनी प्रसिद्ध और पहली बड़ी
पुस्तक "बुद्धचर्या" अपने स्वर्गीय पिताजी को ही
समर्पित की है। शब्द ये हैं
"मेरे
गृह-त्याग
से जिनके अवार्धक्य जीवन के
अन्तिम वर्ष दुःखमय बन गये, उन्ही साकृत्य-सगोत्र,
मलांव-पाडे, स्वर्गीय पिता श्री गोवर्धन की स्मृति में"।
..

भगवान बुद्ध का धर्म
इसी समय परसा के महन्तजी का तार मिला।
आकर मठ की व्यवस्था में सहायक बनने का आग्रह
था। केदारनाथ ने महन्तजी का आग्रह देख परसा हो
आने का निश्चय कर लिया।
लेकिन वेश ? वहां जाने के लिए तो रामोदार
साधु का वेश जरूरी था !
उसमें क्या लगता था ! रास्ते में कहीं से एक
कंठी लेकर गले में बांध ली और सिर-दाढ़ी सफाचट !
परसा का काम समाप्त करके, वहां से चले आये
और जबलपुर में 'वेद-मध्यमा' की परीक्षा दी। प्रथम
श्रेणी में उत्तीर्ण हुये।
१९१७ के अक्तूबर मास में रूस में क्रान्ति हुई
थी। उसकी खबरे छन-छन कर भारत पहुंचती थी।
वैसी साम्यवादी सूचनाओं से रामोदार दास बहुत प्रभा-
वित होते थे। उनके साम्यवादी विचार १९२३-२४
मैं "बाईसवी सदी" के रूप में पुस्तकाकार प्रकाशित
हुये।

रामोदार दास ने १९१९ में लाहौर से 'शास्त्री' की परीक्षा दी, किन्तु उतीर्ण नहीं हो पाये । इसके बाद उन्होने' काशी की 'न्याय-मध्यमा' और कलकत्ता की 'मीमांसा' परीक्षाएं भी दी। पहली में नापास और दूसरी में प्रथम श्रेणी में पास । लेकिन इसी समय रामोदार साधु में गहरे परिवर्तन हो रहे थे। तुम पूछोगे कैसे परिवर्तन ? रामोदार साधु के धार्मिक विचारों में धीरे-धीरे परिवर्तन हो रहे थे। जहां भी उन्हें 'भगवान बुद्ध की जीवनी' या कोई दूसरा बौद्ध-ग्रन्थ मिलता, वह उसे बड़े चाव से पढ़ते। वह ऊपर से वैष्णव साधु थे, भीतर से आर्य-समाजी, लेकिन अब एक ऐसी विचार- धारा की ओर आगे बढ़ रहे थे जो उन्हें इन दोनों से मुक्ति दिलानेवाली थी। उन्होंने बौद्ध तीर्थ-स्थानों की यात्रा करने का निश्चय कर लिया। रामोदार दास लुम्बिनी गये। यहां सिद्धार्थ कुमार का जन्म हुआ था । अब लुम्बिनी नेपाल-राज्य की सीमा में है। वह बुद्धगया गये । यहां सिद्धार्थ कुमार ने 'बुद्धत्व'

अथवा परमज्ञान प्राप्त किया था । बुद्धगया बिहार प्रांत
में गया के नजदीक है।
वह सारनाथ गये । यहां भगवान बुद्ध ने अपना
प्रथम उपदेश दिया था। सारनाथ तो वाराणसी के
समीप ही है।
वह कुशीनगर गये । यहां भगवान बुद्ध ने परि-
निर्वाण प्राप्त किया था, अर्थात् अपना शरीर त्यागा
था। कुशीनगर उत्तर-प्रदेश के देवरिया जिले में है।
इन स्थानो के अलावा रामोदार दास साधु ने
नालंदा, राजगिरि, जेतवन आदि बौद्ध ऐतिहासिक
स्थानों की भी यात्रा की। कुशीनगर की अपनी पहली
यात्रा के बारे में उन्होंने लिखा है :
"उस भूमि के भीतर प्रवेश होते वक्त मेरा हृदय उस
महान भारतीय की ओर खिचा हुआ था, जिसने अपनी
भूमि का नाम संसार भर में फैला दिया। और सारे
संसार के एक-तिहाई लोगों के लिए भारत को पुण्य
भूमि बना दिया।"
४५

गांधी की आंधी
क्या तुम्हारे मन में फिर वही प्रश्न नही उठा ?
इतनी यात्रा करने के लिए रामोदार साधु के पास पैसे
कहां से आते थे?
लेकिन वे अब "अनपढ़ साधु" थोड़े ही थे,
"विद्वान महात्मा" थे । कहावत तो तुमने सुनी ही होगी
कि राजा की पूजा तो अपने देश में ही होती है, किन्तु
विद्वान सर्वत्र पूजा जाता है ।
जहां भी जाते थे लोग "विद्वान महात्मा" का आदर
करते थे। खाने-पीने का इंतजाम कर देते थे और यदि
रेल से यात्रा करनी हो तो टिकट भी ले देते थे।
किन्तु रामोदार साधु को रेल की यात्रा करने की
अपेक्षा पैदल घूमना ही अधिक पसंद था।
तिरुमिशी में, जहां वे पहले भी रह आये थे, अब
कठिन संस्कृत ग्रंथों का अध्ययन करने की इच्छा से
दुबारा गये। तिरुमिशी में रहते समय रामोदार साधु
ने कुछ तमिल भाषा भी सीखी।
४६

इसके बाद उन्होंने कुर्ग में चार मास बिताये। वहां कन्नड़ भाषा का भी परिचय प्राप्त कर लिया। इसी समय रामोदार साधु को एक अति दुखद घटना का समाचार मिला। पिता की मृत्यु का समाचार यह सन् १९२१ की बात है। रामोदार दास तब २८ साल के थे। सन १९२१ । हमारे देश के स्वतत्रता-आंदोलन में यह वर्ष अत्यंत महत्व का है। रॉलेट एक्ट के विरोध में पजाब में गोली चल चुकी थी, जलियावाला बाग का काड हो चुका था जिसने हिन्दू-मुसलमानों के खून को ही नही, दिलों को भी एक कर दिया था। अग्रेजों से स्वाधीनता प्राप्त करने के लिए 'असह- योग-आंदोलन' शुरू हो गया था। रामोदार साधु ने इस आंदोलन में खुलकर हिस्सा लिया । परिणाम यह हुआ कि १९२२ में फरवरी से अगस्त महीने तक उन्हें पूरे छह महीने अंग्रेज सरकार ने अपना 'मेहमान बनाकर रखा, अर्थात् जेल में रखा। उन दिनों देश-भक्त लोग जेलखाने को या तो "कृष्ण-जन्म-स्थान" कहा करते थे, या कोई-कोई अपनी "ससुराल" भी! -

फूल से भी अधिक कोमल
काग्रेस में डटकर काम करने के फलस्वरूप और
छह महीने बक्सर जेल में रह आने पर छपरा की
कांग्रेस कमेटी ने रामोदार दास साधु को अपना मंत्री
चुन लिया।
उस साल अखिल भारतीय कांग्रेस का अधिवेशन
गया में होनेवाला था। रामोदार दास साधु ने उसमें
अपनी ओर से प्रस्ताव भेजा कि बुद्धगया का प्रसिद्ध
बौद्ध-मंदिर बौद्धों का है, वह उन्ही को सौप दिया
जाना चाहिए। किन्तु कांग्रेसी नेताओ ने इस प्रस्ताव
पर ध्यान नही दिया।
ऐसी 'अपरिवर्तन-वादी' कांग्रेस से रामोदार
साधु का मन कुछ उचाट हो गया। उन्होंने कांग्रेस के
मंत्रि-पद से त्यागपत्र दे दिया और कुछ समय के लिए
नेपाल चले गये।
बिहार में कांग्रेसी आंधी-तूफान के दिनों में साधु
रामोदार दास ने अपने एक भाषण में कह ही तो दिया
४८

-"राजनीति मे खून का वही स्थान है, जो पूजा-
पाठ में चंदन का।" इसी भाषण को बहाना बनाकर
नेपाल से लौटने पर सरकार ने रामोदारदास साधु को
दुबारा पकड़ लिया और दो साल तक-अप्रैल १९२३
से अप्रैल १९२५ तक-हजारीबाग जेल में रखा।
जेल में रहते समय रामोदार साधु ने अपना
अधिकांश समय पढ़ाई-लिखाई में बिताया-खूब पढ़ा,
खूब लिखा। जिसकी पढ़ने-लिखने की ईच्छा बलवती
होती है वह कहीं भी रहकर पढ़-लिख लेता है।
जेल में रहकर साधु रामोदार दास ने कुछ फ्रेंच
भाषा भी सीखी। किसी ने कहा है कि जो आदमी एक
भाषा जानता है वह एक आदमी के बराबर होता है;
जो दो भाषाएं जानता है, वह दो आदमियों के बराबर
हो जाता है।
रामोदार दास साधु अब कई आदमियों के बराबर
हो चले थे। तुम पूछोगे कसे ?
अब वे कई भाषाओं से परिचित हो गये
थे-हिन्दी, उर्दू, पालि, संस्कृत, अरबी, फारसी,
तमिल, कन्नड़, अग्रेजी और फासीसी भाषा से भी !
अब १९२६ चल रहा था और रामोदार दास
साधु की आयु ३३ साल की थी। वे पुनः यात्रा पर
१

निकले। पंजाब की ओर गये और उधर से ही लेह- लद्दाख के रास्ते पश्चिमी तिब्बत भी हो आये । इस यात्रा की एक करुण-कथा के बारे में उन्होंने स्वयं लिखा है : "मुझे एक कुत्ते की जरूरत थी। हन्ले गुम्बा के लामा ने कहा-बड़े कुत्ते बेवकूफ होते हैं । यह कुतिया हमारे पास ल्हासा से आयी है। आप भारत के लामा हैं। आप को ही मै इसे भेंट करना चाहता हूँ। "यह कुतिया बड़ी ही सयानी थी, बड़ी ही समझदार । किन्तु इसका शरीरान्त रास्ते में ही हो गया... "माता और पिता के मरने पर तथा मेरे लिए प्राण देने वाले नाना-नानी के मरने पर भी जो आंखें नहीं पसीजी, उन्ही में आज छल-छल आँसू उमड़े आ आ रहे थे..... किसी ने सच ही कहा है कि महापुरुषों के हृदय वज़ से भी कठोर और फूल से अधिक कोमल होते हैं। ५०

त्रिपिटकाचार्य
केदारनाथ विद्यार्थी या रामोदार साधु की धीरे-
धीरे बौद्धधर्म की ओर इतनी अधिक दिलचस्पी बढ़ी
कि उन्होंने श्रीलंका पहुंचकर बाकायदा बौद्धधर्म का
अध्ययन करने का निश्चय किया।
संयोग से सिंहल अर्थात् श्रीलंका के एक महा-
विद्यालय 'विद्यालकार-परिवेण' को एक संस्कृत अध्या-
पक की जरूरत थी। १६ मई १९२७ को, जिस समय
रामोदार दास साधु की आयु ३४ वर्ष की थी, वे
संस्कृत के अध्यापक की हैसियत से श्रीलंका पहुँचे ।
अब उनका पहनावा रामोदार साधु की काली
अलफी और
हाथ
में
तूम्बा नहीं था, बल्कि उसकी
जगह बढ़िया धोती-कुर्ता था।
श्रीलंका में वे "दम्बदिव पण्डितुमा", अर्थात् “भारत
के पंडित जी" के नाम से जाने जाते थे। विद्यालंकार
परिवेण के छात्र ही नही, उन्हें पालि पढ़ाने वाले उनके
आचार्य, और यहा तक कि परिवेण के प्रिंसिपल गुरुवर
५१

लुणुपोकुणे धम्मानन्द महास्थविर भी उनका आदर करते थे। रामोदार दास की यह पहली लंका यात्रा थी। इस बार वे डेढ़ बर्ष यहां रहे, लेकिन इस थोड़े से समय में ही उन्होंने बौद्धधर्म के धर्मग्रंथ 'त्रिपिटक' को छान मारा ।'त्रिपिटक' मूल पालि भाषा मे है और सारा ग्रन्थ लगभग ४० बड़ी-बड़ी जिल्दों में समाप्त होता है। 'त्रिपिटक' के अलावा उन्होंने इस बीच और भी नाना विषयों के ग्रन्थ पढ़े। पढ़े ही नहीं, स्वयं भी लिखे-एक तो "श्रीलंका" हिन्दी मे लिखा, दूसरे बौद्ध- धर्म दर्शन के गम्भीर ग्रंथ "अभिधर्मकोश" की टीका संस्कृत मे लिखी। यह सब कार्य उन्होंने तब किया, जब उन्हें दूसरों को रोज आठ-आठ घंटे संस्कृत पढ़ानी पड़ती थी ! ५२

लुप्त ग्रन्थों की खोज में
से
भगवान बुद्ध का धर्म भारत बाहर
केवल लंका
तक ही नहीं पहुंचा है। बर्मा, थाइलैड, वियतनाम,
चीन, कोरिया, जापान, तिब्बत और मंगोलिया में भी
फैला है। रामोदार साधु की इच्छा हुई कि बौद्धधर्म
का थोड़ा भिन्न दिखाई देनेवाला जो तिब्बती स्वरूप
है, उसकी तथा तिब्बती भाषा और साहित्य की भी
जानकारी प्राप्त करनी चाहिए। इसके लिए उन्होंने
सिपाल के रास्ते तिब्बत जाने का फैसला किया।
जब आदमी कोई दृढ़ संकल्प कर लेता है, और
उसके लिए हर मुसीबत झेलने को तैयार हो जाता है,
तो फिर सभी बाधाएं हट जाती हैं।
रामोदार साधु ने अपने तिब्बत जाने का न भारत
सरकार को पता लगने दिया, न नेपाल सरकार
और तिब्बत सरकार को ही। जब वे नेपाल और
तिब्बत की सीमा पर पहुँचे तब उनके पकड़ लिये जाने
का पूरा खतरा था। पकड़े जाते तो पता नहीं क्या गत
बनती?

उस समय उन्होंने मुझे एक पोस्टकार्ड लिखा :
"प्रिय आनन्द जी,
शरीर का मूल्य बहुत है। लेकिन समय आ जाय
तो कुछ नहीं। मै जिस कार्य को पूरा करने के लिए
निकला हूँ, या तो उसे पूरा करके रहूंगा, नहीं तो उसे
पूरा करने की कोशिश में ही अपनी जान दे दूगा ।
आपका-
रामोदार साधु"
तिब्बत में राहुल जी लामाओं के साथ : दाहिने सबसे अन्त में
रास्ते में बड़ी-बड़ी कठिनाइयों को झेलकर वह
किसी न किसी तरह तिब्बत की राजधानी ल्हासा

लामा
ने
पहुंचे। वहां पहुंचकर उन्होंने अपने आने का ऊंचा
उद्देश्य-धर्म का अध्ययन और बाद में उसका
प्रचार-संस्कृत श्लोकों में रचा और उसके तिब्बती
अनुवाद सहित किसी न किसी तरह दलाई लामा के
हाथों में पहुंचा दिया।
उस समय के तिब्बत के राजा और धर्मगुरु दलाई
कहला
भेजा-
"मजे मे रहें। किसी दिन सरकार बुलायेगी।"
ल्हासा में रामोदार दास तिब्बती साहित्य के
गंभीर अध्ययन के लिए पहुंचे थे। भोट (तिब्बती)
भाषा का कुछ ज्ञान तो उन्होने भारत में रहते ही छपी
पुस्तकों से प्राप्त कर लिया था। तिब्बत पहुँचने पर वे
मजे मे तिब्बती मे बातचीत कर सकते थे ।
इसी समय नेपाल और तिब्बत के बीच लड़ाई
छिड़ने को हुई। विद्यालंकार परिवेण के प्रिंसिपल
गुरुवर लु० धम्मानन्द जी को घबराहट तथा चिन्ता
होने लगी। उन्होंने मुझसे कहा कि पण्डितुमा (पडितजी)
को तिब्बत से शीघ्र वापिस आने के लिए लिखो।
रामोदार साधु को लिखा गया तो उनका उत्तर
आया कि जिन ग्रन्थो को पढ़ने के लिए आया हूँ, उन
प्रन्थों को साथ लेकर ही वापिस लौट सकता हूँ। उन

प्रन्थों को तिब्बत से खरीदकर लाने के लिए तीन
हजार रुपयों की जरूरत थी।
उस समय के तीन हजार रुपये आज के तीस
हजार रुपयों के बराबर होंगे। 'नायकपाद' धम्मानन्दजी
ने श्रीलंका के अपने श्रद्धालु दायकों से कहकर तीन
हजार रुपये ल्हासा भिजवाये ।
तिब्बत छोड़ने से पहले रामोदार दास वहां के
कुछ प्रसिद्ध ऐतिहासिक स्थानों को देख आये। वे डेपुङ
और सेरा जैसे प्रसिद्ध विहारों को देख आये, जहां
क्रमशः सात हजार और पांच हजार भिक्षु रहते थे।
वे समये विहार को देख आये। ग्यारहवी शताब्दी में
जब भारतीय पंडित दीपंकर श्रीज्ञान विक्रमशिला से
तिब्बत गये थे, तो उन्होंने समये विहार में संग्रहीत
संस्कृत ग्रंथों को देखकर कहा था कि इतने अच्छे ग्रंथ
तो विक्रमशिला विहार में भी नहीं हैं।
२४ अप्रैल १९३० को एक मंगोल लामा धर्मकीर्ति
को साथी बना रामोदार दास ने ल्हासा छोड़ दिया।
सिलीगुड़ी (दार्जिलिंग) और कलकत्ता होते हुए वे
२० जून को लंका पहुंचे।
उन्होंने अपनी इस प्रथम तिब्बत-यात्रा का रोचक
विवरण "तिब्बत में सवा साल" पुस्तक में लिखा है।

-::-:-:.:.. बौद्ध साधु फिर नाम बदला... पहले केदारनाथ पांडे, फिर रामोदार दास साधु और अब...? तिब्बत से लंका लौट आने पर रामोदार साधु ने बाकायदा 'भिक्षु' अर्थात् 'बौद्ध साधु' बन जाने का निश्चय किया। २० जुलाई १९३० को उनकी 'उपसम्पदा' हुई और उन्होने बौद्ध भिक्षु के काषाय वस्त्र घारण किये। और नाम? केदारनाथ पांडे का गोत्र था-सांकृत्य; इसलिए इससे सांकृत्यायन बना और नाम के लिए उन्होंने 'राहुल' पसन्द किया। इस प्रकार, केदारनाथ पांडे या रामोदार साधु का अब नाम था-राहुल सांकृत्यायन ! राहुल सांकृत्यायन ! यह नया नाम तो अब तुम जान ही गये । पुस्तक के आरम्भ में, प्रयाग विश्व- विद्यालय के गणित के प्राध्यापक डा. बी. एन. प्रसाद के घर की जो घटना एक अतिथि-साधु को लेकर घटी थी, वे यही बौद्ध साधु राहुल सांकृत्यायन थे।

उन दिनों भारत में "सत्याग्रह" चल रहा था।
लोगों के सिर थे और अंग्रेज सरकार की लाठियाँ।
राहुलजी ने एक दिन मुझसे कहा-"अंग्रेज सरकार की
लाठियों को सिरों की कमी नही होनी चाहिये ।"
पहले मैं और बाद में राहुलजी भी श्रीलंका से
भारत चले आये।
१९३१ में सारनाथ में “मूलगंध कुटी विहार"
का उद्घाटन हुआ। उसी समय प्रसिद्ध बौद्धधर्म
प्रचारक अनागरिक धर्मपाल ने भी 'भिक्षु' की दीक्षा
ग्रहण की। उत्सव की समाप्ति के बाद राहुल सांकृत्यायन
फिर तीसरी बार लका लौटे ।
इस बार श्रीलंका में कुछ ही महीने रह पाये थे कि
'ब्रिटिश बुद्धिस्ट मिशन' की ओर से निमन्त्रित होकर
हम दोनों ने धर्म-प्रचारार्थ लंदन के लिए प्रस्थान किया।
५८

:::::::.1.1.1:.:.1.
यूरोप-यात्रा
१९३२ की ५ जुलाई को हमारा जहाज कोलम्बु
से चला और २३ जुलाई को मरसाई (फ्रांस) पहुँचा।
पेरिस से लन्दन तक की यात्रा ट्रेन से की।
राहुलजी तो मेरा साथ देने के लिए ही लंदन
आये थे। वास्तव में मुझे ही एक धर्म-प्रचारक के
कर्तव्य को निभाना था। राहुलजी पर वैसा भार नहीं
था। लेकिन मेरी अपेक्षा बहुत थोड़ा समय इंग्लैण्ड,
फांस और जर्मनी में रहकर राहुलजी, न केवल उन
देशों के बौद्धों के हृदयों में, बल्कि उन देशों की विद्वत्-
मंडली के हृदय में भी अपने लिए एक विशेष स्थान
बना आये।
मै इन तीनों देशों में रहा कुल मिलाकर एक साल
आठ महीने। राहुलजी रहे केवल तीन महीने । लेकिन
इतने ही दिनों में वे मेरी अपेक्षा कहीं अधिक यूरोप को
देख-समझ आये । आखिर गहराई से देखने के लिए
वैसी आंख भी तो होनी चाहिए। अपनी इस यात्रा के बारे
में उन्होंने एक पुस्तक लिखी है- "मेरी यूरोप यात्रा"।
५९

तिब्बत से राहुलजी, ढेर सारे प्राचीन ग्रन्थों के
अलावा, कुछ बढिया चित्रपट भी लाये थे । पेरिस तथा
लंदन में इन चित्रों की प्रदर्शनी हुई। लंदन में रहते
ही उन्होंने ये चित्र, जिनकी कीमत एक लाख रुपयों से
कम न होगी, अपने ही देश के पटना-संग्रहालय को दान
देने का संकल्प किया। यदि वे चाहते तो उन्हें बेचकर
स्वयं लखपति बन सकते थे।
यदि तुम कभी पटना जाओ तो पटना-संग्रहालय
देखने जरूर जाना। संग्रहालय में तुम्हें राहुलजी द्वारा
वे तिब्बती चित्र देखने को मिलेगे; संग्रहालय-भवन
में ही 'काशीप्रसाद जायसवाल शोध-संस्थान में
तुम्हें वे ग्रंथ भी देखने को मिलेंगे जिन्हें राहुलजी
तिब्बत से लाये थे।
कार्ल मार्क्स का नाम तो तुमने जरूर ही सुना
होगा। मावर्स का जन्म जर्मनी में हुआ था, लेकिन उन
का अधिकांश जीवन लंदन में बीता था। उनकी
मृत्यु भी लंदन में ही हुई थी। वहीं के हाइगेट कबरि-
स्तान में उन्हें दफनाया गया था।
लंदन में रहते हुए राहुलजी कार्ल मार्क्स की
समाधि पर फूल चढ़ाना भला कैसे भूल सकते थे ? लिखते
६.

हैं : "हम ढूंढते-ढूढते उस कबरिस्तान पर पहुंचे।
बाहर कोई स्त्री फूल बेच रही थी। हमने उससे फूल
लिये।......वह विल्कुल साधारण कब्र थी, जिस पर
घास उगी हुई थी। इसी कब्र मे दुनिया के श्रम-जीवियों
का उद्धार करनेवाला अपने जीवन के अन्तिम क्षण तक
स्वयं परिश्रम करते रहकर......अब शातिपूर्वक सो
रहा था। मैने बड़े भक्ति-भाव से उन फूलों को समाधि
पर चढ़ाया। सिरहाने के पत्थर पर मावर्स का नाम
खुदा था। किसी ने वहीं एक लाल झंडा भी रख दिया
था"
लंदन से राहुलजी पेरिस गये। वहां से बलिन ।
दोनों जगहों में देखने योग्य स्थानों को देखा और
जिन-जिन विद्वानों से भेट करना चाहते थे, भेंट की।
राहुलजी रूस जाना चाहते थे। किन्तु उस समय
इसकी व्यवस्था न हो सकी।
अन्त में, जनवरी १९३३ मे वे लका वापिस लौट
पाये।
६१

............!!.....:::.:..:.::.:
फिर ग्रन्थों की खोज में
लंका में अधिक दिन रहने का काम नहीं था।
३० जनवरी को ही भारत के लिए प्रस्थान । गुरुवर
धम्मानंद के बारे में उन्होंने अपनी उस दिन की डायरी
में लिखा है-"विदा होते समय उन (गुरुवर) की
आंखों में आंसू आ गये। उनका बड़ा प्रेम है । कौन
जानता है, यही अंतिम दर्शन हों।" सचमुच, फिर गुरु-
शिष्य की भेट नही हो सकी।
राहुलजी लद्दाख हो ही आये थे। किन्तु वह
पहली यात्रा "पहली यात्रा" मात्र थी। अब निश्चित
उद्देश्य लेकर दूसरी बार हो आने का निर्णय किया ।
इस बार जम्मू-कश्मीर के रास्ते लद्दाख पहूँचे ।
गिलगित की खुदाई में बहुत से पुराने प्रन्थों का पता
लगा था, वे उन्हें देखते हुए ही कश्मीर से आगे बढ़ना
चाहते थे।
अपनी इस "लद्दाख-यात्रा" में राहुलजी ने
त्रिपिटक के एक प्रसिद्ध ग्रन्थ 'मजिकम-निकाय" का

हिन्दी अनुवाद कर डाला। भोट (तिब्बती) भाषा सीखने के लिए कुछ रीडरें लिखी । और भी बहुत कुछ। उन्होंने लिखा है : “काम से घिरे रहने में भी एक आनन्द आता है। इसलिए रात-दिन व्यस्त रहते भी वे तीन मास मेरे लिए खुशी के दिन थे।" लद्दाख कश्मीर में होने से और कश्मीर भारत का ही एक राज्य होने से राहुलजी भारत में ही थे; इसलिए बड़ौदा में होनेवाले प्राच्य-सम्मेलन के हिन्दी-विभाग का सभापतित्व करने के लिए उन्हे वापिस आने की जरूरत पड़ी तो वे शीघ्र वापिस लौट आये १९३४ में बिहार में जोर का भूकप आया । जन- धन की बेहिसाब हानि हुई । लोगो को अपार कष्ट हुआ। ऐसे समय राहुलजी दुखी जनों की सेवा करने के लिए बिहार में रहे। अब इरादा हुआ दुबारा तिब्बत जाने का । अपना अधूरा काम, या जो कुछ पिछली यात्रा में न किया जा सका था, उसे पूरा करना था। पिछली बार तो नेपाल के रास्ते छिपकर तिब्बत गये थे । इस बार नये रास्ते कालिम्पोग, सिक्किम होते हुए ल्हासा जाना ते किया। २० मार्च १९३४ को पटना से रवाना हुए। लिखाई का काम यात्रा में भी बराबर जारी रहा। ६३

राहुलजी ने त्रिपिटक के तीसरे हिस्से "विनय-पिटक"
का हिन्दी अनुवाद पूरा कर डाला।
तिब्बत जाने का उनका उद्देश्य था, उन संस्कृत
पुस्तकों का पता लगाना जिनका भारत में कहीं
पता नहीं था, लेकिन जो अपने मूल रूप में या भोट
भाषा में अनुवादों के रूप में, तिब्बत में प्राप्त थे।
तुम पूछोगे : तो क्या ऐसी पुस्तकें उन्हें वहां
मिली?
हो, मिलीं। एक नहीं, अनेक ऐसी पुस्तकें मिली
जो अपने देश के विद्वानों द्वारा लिखी जाकर भी अपने
देश से लुप्त हो गई थी, किन्तु तिब्बत के प्राचीन मठों
में उपलब्ध थीं !
राहुलजी को ऐसी बहुत-सी पुस्तकें तिब्बत में
मिलीं । आचार्य धर्मकीर्ति के ग्रन्थ "वाद-न्याय" पर
आचार्य शांतरक्षित की टीका मिल जाने से तो उन्हें
अपार प्रसन्नता हुई।
तिब्बत में रहते राहुलजी ने बहुत सी पुस्तकों की
नकल की, कुछ के फोटो भी लिये ।
बाद में जब फोटो धुलवाये गये तो वे बेकार
साबित हुए । जानते हो क्यों ? हंसो नही तो बताऊं।
महापडित राहुल सांकृत्यायन अभी "नौसिखिया"
फोटोग्राफर ही थे।

भिक्षु की अगली यात्रा
राहुलजी चुपचाप बैठने वाले व्यक्ति तो थे नहीं !
यात्राओं में भी पढ़ाई-रिखाई का काम चलता रहता।
इसी बीच उन्होंने एक पुस्तक लिखी—'साम्यवाद ही
क्यों ?" इसमे उन्होने बताया कि संसार को सुखी बनाने
के लिए "साम्यवाद" को छोड़ दूसरा मार्ग नहीं ।
तुम तो जानते ही हो कि इस समय राहुल
मांकृत्यायन बौद्ध भिक्षु थे ! उनका परिधान धोती-कुर्ता
या सूट-बूट नही था, बल्कि एक बौद्ध-भिक्षु के काषाय
बस्त्र थे। इसी वेष मे उन्होने जर्मनी, फ्रांस तथा
इंग्लैंड की यात्रा की थी।
अब उनकी इच्छा हुई पूर्व के बौद्ध देशों-बर्मा,
थाईलैड. कोरिया, जापान-की यात्रा करने की।
राहुलजी पानी के
जहाज से सिगापुर, हांगकांग
होते हुए ३ मई १९३५ को जापान पहुंचे।
जापान के सभी प्रसिद्ध नगरों को देखा और बाद
में "जापान" नामक पुस्तक में यात्रा-विवरण लिखा।

जापान के बाद राहुलजी कोरिया गये । कोरिया
के निवासी अपने देश को 'फूसन" कहते है, जैसे कि
तिब्बतवाले अपने देश को "भोट"। कोरिया के बाद
राहुलजी लगभग एक सप्ताह मचूरिया मे रहे। इसके
बाद तो सोवियत-भूमि का ही नम्बर था, जहा जाने
की लालसा उनके मन मे बहुत दिनों से थी।
सोवियत-भूमि के बारे में बाद में उन्होंने एक पूरी
पुस्तक भी लिखी है।
सोवियत-भूमि से राहुलजी ईरान के रास्ते लौटे।
ईरान में उन्होंने फारसी के लोक-प्रसिद्ध कवियो हाफिज
और शादी की समाधियां देखी।
उन्होने वहां महाकवि फिरदौसी की समाधि भी
देखी। यह वही फिरदौसी थे, जिन्हे महमूद गजनवी ने
लालच में पड़कर साठ हजार सोने के सिक्के देने के
बजाय, साठ हजार चाँदी के सिक्के देने चाहे थे ।
स्वाभिमानी फिरदौसी ने उन्हे लेने से इनकार
कर दिया था।
जानते हो ? ईगन में अंगूर इतने सस्ते बिकते हैं,
जैसे अपने देश में गाजर-मूली। लेकिन इसी ईरान
यात्रा के बाद राहुलजी के जीवन के लिए भयंकर संकट
खड़ा हो गया।

कैमरा पिस्तौल बना
राहुलजी मौत के मुंह में...
हां, मौत के मुंह में ! ईरान से लौटे तो उन्हें गले
की एक बीमारी ने ऐसा जकडा कि सचमुच मरते-
मरते बचे। उनके एक श्रद्धालु मित्र घूपनाथ सिंह ने
उनकी बड़ी सेवा की।
तुमने डा. काशी प्रसाद जायसवाल का नाम पढ़ा
या सुना होगा। अपने देश के बहुत बड़े इतिहासवेत्ता
थे, साथ ही पटना के नामी एडवोकेट । राहुलजी का
और उनका निकट का सम्बन्ध स्थापित हो गया।
दोनों विद्वान एक दूसरे का आदर करते थे। जायसवाल
जी चाहते थे कि और अधिक ग्रन्थों की खोज करने के
लिए राहुलजी पुन:, तीसरी बार, तिब्बत जायें।
इस बार-१९३६ में-राहुलजी नेपाल के रास्ते
तिब्बत गये । अब, पहली बार की तरह, छिपकर जाने
की जरूरत नही थी। लेकिन रास्ते के अनेक खतरे तो
थे हा । रास्ते में डाकुओ का डर बना रहता था।

के इसी तिब्बत-यात्रा की एक घटना है। राहुलजी तिब्बत से लौट रहे थे। दो डाकुओं ने आ घेरा। राहुलजी के गले में कैमेरा लटक रहा था। उसकी चमड़े की पट्टी ठीक वैसी ही थी,जैसी पिस्तौल लटकाने की होती है। डाकुओं ने वह पट्टी देखी तो समझा कि पिस्तौल है। वे जान लेकर भागे ! इस बार राहुलजी को तिब्बत में बड़े महत्व प्राचीन ग्रन्थ मिले । उन्हें आचार्य धर्मकीति के "प्रमाण- पातिक" और आचार्य असग के "योगाचार-भूमि" जैसे ग्रन्थ मिले। इन ग्रन्थों की प्राप्ति से, न केवल अपने देश के, बल्कि विदेशों के भी विद्वानों में इतनी उत्सुकता जागी कि सुदूर लेनिनग्राद (रूस) के आचार्य श्चेरवास्की जैसे महाविद्वान उन्हें देखने के लिए भारत आना चाहते थे। तो क्या आचार्य श्चेरवास्की भारत आये? नही, डा. श्चेरवास्की स्वयं भारत नहीं आ सके । उन्होंने राहुलजी को रूस आने का निमंत्रण दिया। राहुलजी तैयार हो गये । सोवियत सरकार की अनुमति मिलने में कुछ देर थी। इस बीच राहुलजी ने लाहुल हो आने की सोची। इस यात्रा में मै उनके साथ था। लाहुल से लौटने पर राहुलजी को उनके जीवन 4

का सबसे दुखद समाचार सुनने को मिला-डा० काशी-
प्रसाद जायसवाल के देहांत का समाचार । जिस समय
पटने में राहुलजी जायसवालजी की कोठी में प्रवेश
करने को थे, जायसवालजी की अर्थी कोठी से बाहर
लायी जा रही थी!
सितम्बर १९३७ को राहुलजी ईरान के रास्ते रूस
के लिए रवाना हुए । उनकी यह दूसरी सोवियत-यात्रा
थी। इस बार वे लेनिनग्राद के एक प्राच्य संस्थान में
प्राध्यापक बनकर गये।
राहुलजी को वहां जिस संस्थान में संस्कृत पढ़ाने
का काम मिला था, उसी संस्थान की सेक्रेटरी का नाम
था, ऐलेना । यही ऐलेना (लोला) आगे चलकर राहुल
सांकृत्यायन के सुपुत्र इगोर राहुलोविच की माता
बनीं।
राहुलजी को फिर एक बार तिब्बत जाना था,
इसलिए वे शीघ्र ही रूस से वापस भारत लौट आये।

1+....
भागो नहीं, दुनिया को बदलो...
जब से राहुलजी ने दुनिया की सैर करनी शुरू
की, तब से उन्होने कितनी भाषाओं के कितने प्रथो को
उलटा-पलटा होगा, इसका हिसाब लगाना कठिन है।
तुम देख ही चुके हो कि राहुलजी ने कितने रूप
बदले । वैरागी साधु रहे, आर्य-समाजी रहे, और
अब.
.
अब वे "भिक्षु" नहीं रहे । रह गये सिर्फ बौद्ध ।
राहुलजी बुद्धिवादी थे, विकासवादी थे । वे मानते
थे कि धीरे-धोरे परिवर्तन होने के सिद्धांत के अनुसार
यह दुनिया बनी है । आज भी हम चाहे या न चाहे तो
भी, इस दुनिया में परिवर्तन हो रहा है। यदि हम
बुद्धि से काम लें तो हम इस दुनिया की व्यवस्था में
ऐसा परिवर्तन ला सकते हैं कि यह आज की अपेक्षा
अधिक सुखी बन सके।
इसलिए आगे चलकर राहुलजी ने एक किताब
लिखी-"भागो नहीं, (दुनिया को) बदलो"।

1.1.1.tt-:.. जमींदार की लाठियाँ, और.... इस बार की तिब्बत-यात्रा राहुलजी की चौथी तिब्बत-यात्रा थी। इस यात्रा में उन्हे अनेक अमुविधाओं का ही नहीं, तिब्बती डाकुओं तक के खतरे का सामना करना पड़ा। राहुलजी का कहना था कि, “मरना उतना बुरा नही, जितना बुरा है मरने से डरना।" तिब्बत से लौटकर राहुलजी ने भारत के नंगे- भूखे किसानों-मजदूरों को सहायता पहुंचाने के उद्देश्य से ही नहो, 'किसान-मजदूर राज्य' स्थापित करने के उद्देश्य से राजनीति में सक्रिय भाग लेने का निश्चय किया। १९३८-३९ का जमाना था। देश पर अग्रेजों का शासन था; किन्तु कई प्रदेशों की तरह बिहार में उस समय कांग्रेसी मत्रि-मंडल स्थापित हो गया था। कांग्रेसी नेताओं ने किसानों-मजदूरों के बल पर अग्रेजों से थोड़ी- सी शक्ति छीन ली थी। उतनी ही शक्ति ने उन्है इतना मदमस्त कर दिया था कि ये उन्ही किसानों-मज- दूरों को भूल गये, जिनके बलपर यह शक्ति छोनी थी।

किसानों के जोतने-बोने के अधिकार के लिए राहुलजी ने किसानों के साथ अमावरी (बिहार) में "सत्याग्रह" किया। खुद हंसिया लेकर खेत काटना शुरू किया। जमीदार चिढ़ उठा। जमीदार के हाथीवान कुरबान ने पीछे से पहुंच कर राहुलजी की खोपड़ी पर भरपूर लाठी मारी। महापंडित के सिर से खून की धारा बह निकली ! यह बात जब सभ्य जगत को मालूम हुई तो सभी लोगों ने उस समय की कांग्रेसी-सरकार पर थू-थू किया। स्पष्ट हो गया कि कांग्रेसी सरकार मिल- मालिकों और जमींदारों की सरकार है; किसान-मजदूरों की नहीं! किसान-मजदूरों की सरकार होती तो क्या किसान-मजदूरों के नेता "राहुल बाबा" के सिर से खून की धारा बहती? लेकिन राहुलजी का दयालु हृदय तो देखो ! जिस कुरबान ने राहुलजी पर लाठी चलाई थी, उस पर सरकार ने मुकदमा चलाना चाहा । १९ अगस्त १९३९ को मुकदमे की तारीख थी। राहुलजी ने अदालत में पहुँचकर दरख्वास्त दी: "मै नहीं चाहता कि कुरबान पर मुकदमा चलाया जाय । उसे छोड़ दिया जाय।"

किसानों-मजदूरों के नेता महापंडित राहुल के हाथों में हथकड़ियां

राहुलजी की इस साधुता पर बिहार की जनता
जी-जान से कुरबान हो गयी !
इसके बाद पूरे ढाई वर्ष राहुलजी ने जेलों में
बिताये। इस सारे समय का उपयोग उन्होंने हिन्दी
साहित्य की श्रीवृद्धि करने में किया।
उन्होंने "दर्शन-दिग्दर्शन" ग्रन्थ लिखा। इसमें
उन्होने बताया कि आज तक के विचारक इस दुनिया
और किसी दूसरी दुनिया के बारे में क्या-क्या सोचते
रहे है।
उन्होंने "मानव-समाज" ग्रन्थ लिखा। इसमें
उन्होंने बताया कि आदिम अवस्था से उन्नति करते-
करते आदमी कैसे अपनी इस वर्तमान सभ्य अवस्था
तक पहुंचा है।
उन्होंने जेल में ही "वोल्गा से गंगा" नाम से बीस
कहानियां लिखी, जिनमे "मानव-समाज" में बताई गयी
बातों को ही कहानियों के रूप में समझाया गया है ।
राहुलजी की यह पुस्तक इतनी लोकप्रिय हुई कि बाद
मैं इसका देश-विदेश की १५ भाषाओं में अनुवाद हुआ।
जेल में उन्होंने हिन्दी में ही नहीं, भोजपुरी आदि
जनता की बोलियो में भी पुस्तके लिखीं।
-

LARE
असली धन
१९१४ से १९१८ तक दुनिया में एक विश्व युद्ध
हुआ था। अब १९४२ में यह दूसरा विश्व युद्ध चल
रहा था।
इसी समय की बात है।
राहुलजी जब-जब छपरा जाते थे, तो अपने मित्र
गोरखनाथ त्रिवेदी के यहां ठहरते थे। एक बार उनके
यहां चोरी हो गयी। हजारों का सामान चला गया।
राहुलजी के भी तीन बड़े-बड़े बक्से त्रिवेदीजी के यहां
रखे हुए थे। चोरों ने सोचा कि इनमें रुपये भरे होगे।
खेत में जाकर बक्से खोले । कुछ कपड़े थे, कुछ किताबें।
कपड़े ले गये, किताबें छोड़ गये। राहुलजी को बड़ी
खुशी हुई।
तुम पूछोगे : क्यों?
क्योंकि उनके असली धन को चोर नही ले गये
थे। वह अमली धन क्या था ? कई साल से बराबर
लिखी जानेवाली डायरियां। राहुलजी जहां कहीं भी
७५

रहते, सोने के पहले, अपनी दैनन्दिनी जरूर लिखते थे। इन्हीं डायरियों के आधार पर उन्होंने अपनी “जोवन- यात्रा" लिखी है-चार बड़े खंडों में। इस छोटे "जीवन-चरित्र" के बाद जब भी तुम पढ़ सको राहुलजी का अपना लिखा हुआ बड़ा “जीवन-चरित्र" -उनकी अपनी 'जीवन-यात्रा"-अवश्य पढ़ना । अब १९४३ चल रहा था। जानते हो इस समय राहुलजी की आयु कितनी थी ? हिसाब लगाकर देखो: १८९३ में जन्म हुआ था। अब १९४३ मैं ५० वर्ष के हो रहे थे। ५० की आयु ! याद है तुम्हें, राहुलजी ने क्या प्रण किया था? "पचास की आयु होने तक आजमगढ़ जिले की सीमा में पैर नहीं रखूगा।" अब वे ५० के हो चुके थे और आजमगढ़ जिले, अर्थात् अपने जन्म-स्थान जाने के लिए स्वतंत्र थे। हिन्दी के प्रसिद्ध जनवादी कवि नागार्जुन को अपना साथी बना कर एक सप्ताह के लिए वे आजमगढ़ हो आये । यह यात्रा राहुलजी के लिये एक प्रकार की तीर्थ-यात्रा थी।

सस में प्राध्यापक
राहुलजी को फिर रूस से निमत्रण मिला। वे
स्वयं भी रूस जाने के लिए उत्सुक थे। उनके पुत्र
इगोर और इगोर-माता रूस में ही थी।
लेकिन पासपोर्ट और वीसा मिलने में देर हुई ।
अपनी सरकार अपने देश से बाहर जाने के लिए जो
माज्ञा-पत्र देती है, उसे “पासपोर्ट" कहते है और किसी
दूसरे देश की सरकार अपने देश में आने की जो आज्ञा
देतो है, उसे 'वीसा' कहते हैं। उस समय भारत अंग्रेजों
का गुलाम था, उन्होने इसे एक बड़ा जेलखाना बना
रखा था। किसी भी देशभक्त का देश से बाहर जाना
आसान न था।
रूस जाने की तैयारी और उसके लिए खटपट
करते समय भी राहुलजी ने अपनी कलम को सुस्त
नही होने दिया।
"सिह सेनापति" नामक एक उपन्यास पहले लिख
चुके थे; "जय यौधेय" नाम का एक दूसरा उपन्यास भी
लिख डाला।

- राहुलजी इतना तेज लिखते या दूसरों को बोल- बोलकर लिखाते कि दो-तीन सप्ताह में ही एक पूरा ग्रन्थ लिख डालते थे। पासपोर्ट, वीसा और खर्चे के रुपये आदि की व्यवस्था हो जाने के बाद ४ जून १९४५ को वे लंनिन- प्राद पहुचे। पुत्र इगोर और लोला साकृत्यायन दोनों लेनिनग्राद में थे। राहुलजी लेनिनग्राद विश्वविद्यालय के प्राच्य-विभाग मे पहले संस्कृत और हिन्दी पढ़ाते रहे, बाद में तिब्बती भी। वे लिखते हैं कि "हमारे विभाग में १९४७ के आरभ में छात्रों और छात्राओ की संख्या चालीस के करीब थी, तथा अध्यापकों और भध्यापिकाओं की संख्या सात-आठ।" हमारे देश के विश्वविद्यालयों में विद्यार्थियों की संख्या इतनी अधिक और अध्यापकों की इतनी कम रहती है कि बेचारे अपने विद्यार्थियों को पहचान तक नहीं पाते । इस बार राहुलजी कुल २५ मास सोवियत-भूमि मैं रहे। उन्होंने इन २५ महीनों का विवरण एक स्वतंत्र पुस्तक 'रूस में पचीस मास" मे लिखा है, जो उनकी "जीवन-यात्रा" का ही एक भाग है। रूसी भाषा राहुलजी बहुत अच्छी तरह जानते ही थे। उन्होने मध्य एशिया को ताजिक आदि भाषाएं

भी सीखीं। केवल सीखी ही नहीं, बल्कि उन भाषाओं
की कुछ बढिया पुस्तकों का राष्ट्रभाषा हिन्दी मे अनु-
वाद भी किया।
मध्य-एशिया के इतिहास में राहुलजी की गहरी
रुचि थी। वे जानते थे कि सोवियत पुरातत्ववेत्ताओं
ने मध्य-एशिया के इतिहास पर बहुत काम किया है।
मध्य-एशिया की सस्कृति का भारत की संस्कृति से
गहरा सम्बन्ध है; इसलिए नवीनतम खोजों के आधार
पर वे मध्य-एशिया पर एक बडा ग्रन्थ लिखना चाहते
थे । रूस में रहते समय राहुलजी ने मध्य-एशिया के
बारे में बहुत-सी सामग्री, बहुत से ग्रन्थ एकत्र किये।
राहुलजी को अब दो जीवनों मे से एक का चुनाव
करना था। एक था सोवियत-भूमि मे रहकर जीवन
बिताना; दूसरा था भारत-भूमि लौटकर फिर पूर्ववत्
अपने देश, उसकी भाषा तथा साहित्य की सेवा मे जुट
जाना । उन्होंने दूसरे जीवन का ही चुनाव किया।
रूस में जो उपयोगी ग्रन्थ जमा किये थे उन्है
भारत लान की व्यवस्था हो गयी।
लोला साकृत्यायन को पति-विछोह का और इगोर
की पिता-विछोह का भारी दुःख था। ९ वर्ष के इगौर
ने तो राते हुए कहा था-"अब तुम नही आओगे।"

१९४७ के १५ अगस्त को राहुलजी ने अपने अन्य
सहयात्रियों के साथ उस पानी की जहाज मे, जो उन्हें
लन्दन से वापिस बम्बई ला रहा था, भारत का स्वा-
तंत्र्य-दिवस मनाया। बम्बई उतरे तो उन्होंने लिखा-
''आज भी बम्बई की सड़कों पर अभी १५ अगस्त
की तैयारी दिखलाई पड़ रही थी। आज भी महोत्सव
सम्बंधी दीपमाला हुई। तिरंगे झण्डे और बंदनवार
पताकाएं सभी जगह फहरा रही थीं, सभी जगह उत्साह
दिखाई पड़ रहा था। मुझे नए भारत में लौटने का
बड़ा आनन्द हुआ।

अंग्रेजी या हिन्दी ?...
पूरे दो साल के बाद राहुलजी फिर अपने देश
आये थे। इसी बीच अपना देश काफी बदल गया
था-परतत्र से स्वतंत्र हो गया था। किसी भी काम
में हाथ डालने के पहले राहुलजी के लिए यह आवश्यक
था कि वह अपने देश की उस समय की स्थिति को
अच्छी तरह से समझ लें। इसलिए राहुलजी ने कुछ
समय देश के भ्रमण में बिताया।
इसी बीच राहुलजी अखिल भारतीय हिन्दी
साहित्य सम्मेलन के सभापति चुन लिये गये।
भाषा के मसले पर कुछ मतभेद होने से राहुलजी
ने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से त्याग-पत्र दे दिया।
राहुलजी जब हिन्दी साहित्य सम्मेलन के सभा-
पति थे तो उनके पास दूर-दूर से निमंत्रण आते थे।
सम्मेलन के कार्य तथा यात्राओं के साथ-साथ
उनका अपना लेखन-कार्य भी चलता। इसके अलावा
उन्होंने एक और बड़ा काम हाथ में लिया।
कौन-सा काम?
८१

नयी सरकार के शासकों ने देश के विद्वानों को चुनौती दी : आप लोग कहते तो हैं कि देश के शासन का काम हिन्दी में होना चाहिए। लेकिन हिन्दी में शासन, विज्ञान आदि के शब्द हैं कहाँ ? राहुलजी जैसे महापडित ने इसे न केवल राष्ट्र- भाषा हिन्दी का, बल्कि देश के विद्वानों का अपमान समझा। उन्होंने चुनौती स्वीकार कर ली। विभिन्न विषयों के पारिभाषिक शब्दकोश तैयार करने की हिन्दी साहित्य सम्मेलन की ओर से एक बड़ी योजना बनी। राहुलजी प्रधान संपादक थे। कुछ ही महीनों के भीतर “शासन शब्दकोश" तैयार होकर प्रकाशित हुआ। बाद में विज्ञान की शब्दा- वाली से सम्बंधित और दो कोश प्रकाशित हुए। राहुलजी दर्जनों भाषाएं जानते थे। पारिभाषिक शब्दकोशों के अलावा उन्होंने अहिन्दी भाषा-भाषी क्षेत्रों के हिन्दी पाठकों के उपयोग के लिए एक छोटा "हिन्दी-कोश" भी तैयार किया। मैं तुम्हे बता ही चुका हूं कि राहुलजी ने भोट अर्थात् तिब्बती भाषा सीखने के लिए कुछ रीडरें तैयार की थीं। उन्होंने एक "तिब्बती-हिन्दी" और एक "तिब्बती-संस्कृत कोश" भी तैयार किया। ८२

राहुलजी संस्कृत भाषा तथा साहित्य के महापंडित
थे। उनकी संस्कृत विद्वत्ता के कारण ही वाराणसी के
सस्कृत-पंडितों की "श्रीकाशी पण्डित-सभा" ने १९३९
में उन्हें “महापंडित" की उपाधि से विभूषित किया था।
तुम सोचते हो, सस्कृत भाषा बहुत कठिन है ?
हां, कुछ तो है ही, क्योंकि यह जीवित भाषा नही
है, और फिर इसका व्याकरण भी बहुत कसा हुआ है।
राहुलजी इस बात को जानते थे। इसीलिए
उन्होंने तुम्हारे-हमारे लिए सस्कृत भाषा की छोटी-
छोटी ५ पुस्तकें लिखी हैं।
राहुलजी जब हिन्दी साहित्य सम्मेलन के सभा-
पति थे तो उन्हें बहुत व्यस्त रहना पड़ता था। परि-
णामतः स्वास्थ्य गिरने लगा। इसी समय वे "मधुमेह"
जैसे खतरनाक रोग के शिकार हो गये। रोज इन्जेक्शन
लेने पड़ते।
रूस जैसे ठडे देश में रह आने के कारण अब
राहुलजी को गर्मी में बहुत कष्ट होता था। इसलिए
उन्होने किसी पहाड़ी जगह बसने का निश्चय कर
लिया।
अपने पर्वतीय-निवास के लिए
लए राहुलजी ने
कालिम्पोंग को पसन्द किया ।
८३

मधुपुरी मसूरी
जानते हो कालिम्पोंग कहाँ है ?
उत्तर बगाल में हिमालय की तराई में सिलीगुड़ी
शहर है । कालिम्पोंग सिलीगुड़ी से लगभग ४५ मील
दूर है और साढे चार हजार फीट की उंचाई पर
बसा हुआ है।
इसी कालिम्पोंग में १९४९ में एक बंगले में
राहुलजी अपने सहयोगियों के साथ रहने लगे।
सहयोगी?
हां, सहयोगी। राहुलजी ने इतने अधिक काम
हाथ में लिये थे कि अब उन्हें सहयोगियों की जरूरत
थी।
पारिभाषिक शब्द कोश को तैयार करने का काम
जारी था। इसमें प्रभाकर माचवे, विद्यानिवास मित्र,
सेनगुप्त आदि उनके सहयोगी थे । कुमारी कमला परियार
टाइप का काम करती थी। कुमारी कमला राहुलजी
के और भी कई कामों में सहायक होती थीं। राहुलजी
८४

को अपनी बीमारी की रोकथाम के लिए जो इन्जेक्शन
लेने पड़ते थे, वे भी कमलाजी लगा देती थी।
१९४९ के दिसम्बर में हैदराबाद में हिन्दी साहित्य
सम्मेलन हुआ। राहुलजी के साथ कमलाजी भी थी।
हैदराबाद सम्मेलन के बाद अजन्ता, एलोरा देखकर
वर्धा होते हुए राहुलजी प्रयाग लौटे।
राहुलजी उस समय भारतीय सविधान की अनु-
वाद-कमेटी के सदस्य थे। उन्हें इस काम के लिए
बार-बार दिल्ली जाना पड़ता था। कालिम्पोंग से
इतनी लम्बी यात्रा करना सुविधाजनक नही था।
और फिर, अपनी बीमारी के कारण तथा पढने-
लिखने का कार्य ज्यादा अच्छी तरह से एक जगह
रहकर कर सकने की सम्भावना के कारण भी, राहुलजी
को अब अपना "घर" बसाने की इच्छा हुई। अब
तक तो "घुमक्कड़" रहे । आखिर पंछी भी आकाश
में हमेशा उड़ता ही नहीं रह सकता, उसे भी एक
घोंसला खोजना ही पड़ता है। राहुलजी को अब न
केवल अपने लिए, बल्कि कमलाजी के लिए भी एक
'घर' की बड़ी आवश्यकता हुई। कमलाजी अब उनकी
केवल सहायक ही नहीं, पत्नी भी थी।
मित्रों ने कई प्रस्ताव रखे। राहुलजी और

कमलाजी ने उन पर विचार किया। इस बीच १९५० की गर्मी के चार महीने उन्होंने नैनीताल में बिताये। अन्त में स्थायी निवास के लिए राहुलजी ने मसूरी को पसद किया। वही एक बंगला खरीद लिया। अब तो राहुलजी मसूरी में 'घर' बसाकर रहने लगे थे। सच्ची बात है कि गृहणी के साथ ही घर बसता है । राहुलजी के प्रशसकों को, उनके मित्रों को -जिनकी संख्या बहुत बड़ी थी-मसूरी जाने पर राहुलजी. के निवास स्थान, 'हर्न क्लिफ हैप्पी वेली' में ठहरने का सौभाग्य प्राप्त होने लगा। मसूरी में रहते समय राहुलजी के पास कामों की कमी नही थी। इसी बीच उन्होने “राष्ट्रभाषा प्रचार समिति" की साहित्य-निर्माण योजना का भी काम हाथ में ले लिया था। मसूरी में रहते राहुलजी ने एक अलशेसियन अर्थात् भेड़िया कुत्ता पाल लिया। बड़ा भयानक कुत्ता था। कमलाजी ने उसका नाम रखा था "भूत" ! "भूत" भी भला कोई बढिया नाम है ? राहुल- जी ने "भूतनाथ" कहकर उसका पद ऊंचा कर दिया ! भूतनाथ को हमेशा कुछ न कुछ मुंह में लिए घूमने का शौक था। कोई नया आदमी तो उसके रहते

राहुलजी के बंगले की ओर झांक भी नही सकता था।
लेकिन काले मुहवाले लंगूरों से उसकी एक नही चलती
थी ! भूतनाथ लंगूरों की टोली के पीछे भागता तो
उनके दूसरे साथी दूसरी ओर से आकर राहुलजी के
बगीचे को उजाड़ कर भाग जाते ! राहुलजी की की-
कराई मेहनत बेकार !
८७

लिखने की रफ्तार हम किसी भी लेखक की कोई अपनी लिखी हुई पुस्तक पढ़ते है, तो बहुधा यह जान ही नही पाते कि इस पुस्तक को लिखने में कितनो हैरानी-परेशानी हुई होगी। राहुलजी ने जितनी भी पुस्तकें लिखी है, उनमें एक भी ऐसी नही थी कि जिसके लिखने में उन्हें काफी परिश्रम न करना पड़ा हो । बहुत अधिक लिखते रहने के कारण अब राहुलजी के अक्षर सुपाठ्य नहीं रह गये थे, इसलिए वे अब टाइ- पिस्ट को बोल-बोलकर लिखाने लगे थे। तुम्हें याद होगा कि राहुलजी जब रूस से लौटे थे तो "मध्य-एशिया का इतिहास" लिखने के लिए बहुत सारी ग्रन्थ-सामग्री साथ ले आये थे । अब उस सामग्री का उपयोग करना था। राहुलजी ने अपने मसूरी निवास के चार ही महीनों में लगभग दो हजार पृष्ठ बोलकर लिखवाये और "मध्य-एशिया का इतिहास" महान ग्रन्थ तैयार हो गया। बाद में यह ग्रन्थ दो बड़े खंडों में प्रकाशित ८८ हुआ और इसी पर राहुलजी को “साहित्य अकादमी" का पुरस्कार भी मिला। तुम सोचते होगे कि दो हजार पृष्ठों का इतना बड़ा ग्रन्थ चार महीनों में राहुलजी ने कैसा लिखा। चार महीने तो केवल मशीन की गति से बोलकर लिखाने में लगे। किन्तु इस ग्रन्थ की सामग्री एकत्र करने में उन्हें वर्षों का समय लगा। इस ग्रन्थ की सामग्री के लिए उन्हें अरबी, फारसी, रूसी, जर्मन, फेंच, अंग्रेजी आदि भाषाओं के सैकड़ों ग्रन्थों को छानना पड़ा। तभी जाकर यह ग्रन्थ तैयार हो पाया। इस तरह का ग्रन्थ पहले किसी भारतीय भाषा में तो था ही नही, अंग्रेजी में भी नही था । इसलिये बाद में राहुलजी के इस – “मध्य-एशिया का इतिहास" का अंग्रेजी भाषा में भी अनुवाद हुआ। राहुलजी के कृतित्व के लिए यह गौरव की बात तो है ही, राष्ट्र- भाषा हिन्दी के लिए भी कम गौरव की बात नही । राहुलजी को हिमालय से बेहद प्यार था। क्यों न हो ? हिमालय का चप्पा-चप्पा उनका देखा हुआ था। वे हिमालय का परिचय लिखना चाहते थे। "हिमालय-परिचय" योजना के अन्तर्गत ही राहुलजी ने "दार्जिलिग-परिचय", "गढ़वाल", "कुमाऊ", "जौनसार-देहरादून", "हिमाचल-प्रदेश" आदि ग्रथों की रचना की। ? ८९

जया-जेता
यह १९५३ का साल था। राहुलजी की आयु
का उनसठवाँ साल।
यदि कार्य की दृष्टि से देखा जाय तो राहुलजी
ने इतने ही वर्षों में इतना कार्य कर डाला था, जितना
कोई दूसरा एक से अधिक जन्मों में भी नहीं कर
सकता।
राहुलजी को अब नेपाल पर एक अथ लिखना
था। १९५३ के जनवरी महीने में उन्होंने फिर नेपाल
राज्य की यात्रा की । नेपाल से लौटकर उन्होंने
"नेपाल" नाम से एक बड़ा ग्रंथ लिखा।
इसी साल उन्होंने "मार्क्स", "स्तालिन",
"लेनिन" तथा "माओ-त्से-तुंग" जीवनी-ग्रंथ भी लिखे ।
९ अप्रैल १९५३ को राहुलजी पूरे साठ वर्ष
के हो गये । हमारी हिन्दी की पुरानी कहावत है-
"साटा सो पाठा" । इसका मतलब यही मालूम होता
है कि आदमी के साठ वर्ष पूरे होने पर ही वह हर
दृष्टि से पूर्ण होता है।
९०

सितम्बर १९५३
में राहुलजी और कमलाजी को
पुत्री का लाभ हुआ, और ३१ जनवरी १९५५ को
wammmmmmmm
पिता के साथ जया-जेता का मतिम चित्र
पुत्र का । माता-पिता ने लड़की को "जया" और लड़के
को "जेता" का नाम दिया।
अब तो जया-जेता काफी बड़े हो गये है। जया
१४ साल की होने जा रही है और जेता १२ पूरे
कर चुका है।
९१

सरहपा 'निराला'
एक बार राहुलजी प्रयाग आये तो महाकवि
निराला से मिलने गये।
राहुलजी निराला को बहुत मानते थे। निराला
को उन्होंने हिन्दी के आदि सिद्ध-कवि 'सरहपा' की
उपाधि दी थी।
सरहपा का नाम तुमने शायद न सुना हो ।
सरहपा आठवी शताब्दी के कवि थे। सरहपा ने जिस
भाषा में रचना की वह हिन्दी का आरभिक रूप है।
इतना ही नही । राहुलजी ने तिब्बती ताल-पोथी
के आधार पर सरहपा के दोहों का बड़े परिश्रम से
संपादन भी किया है, जो "दोहाकोश' के नाम से
प्रकाशित हुए।
राहुलजी ने निरालाजी को ठीक ही "सरहपा"
कहा था। दोनों ही हिन्दी के महाकवि थे। एक आदि-
काल का तो, दूसरा आधुनिक काल का। दोनों के
विचार ही नही, आचरण भी अनेक सामाजिक रूढ़ियों
के विरुद्ध खुले विद्रोह की घोषणा करते रहे ।
९२

वर्तमान युम के महाकवि और महापंडित साथ-साथ साम्यवाद का मूल्य तुम को याद होगा कि बम्बई हिन्दी साहित्य सम्मेलन के समय भाषा के सवाल को लेकर मतभेद होने के कारण राहुलजी कम्युनिस्ट पार्टी से अलग हो गये । लेकिन तब भी कम्युनिस्ट पार्टी ही राहुलजी की अपनी पार्टी थी। उन्होने इतने वर्षों में न कभी उसके विरुद्ध एक शब्द बोला, न लिखा। १९५५ की ५ फरवरी को उन्होंने पुन. कम्युनिस्ट पार्टी का सदस्य बनने की इच्छा प्रकट की। पार्टी के मंत्री अजय घोष ने उनका हार्दिक स्वागत किया। उस दिन के बारे में राहुलजी ने स्वयं लिखा है : "मुझे उस दिन बड़ी प्रसन्नता हुई।...मै ख्याल करता था कि पार्टी मेम्बर न रहते ही कही मुझे महा- प्रयाण न करना पड़े। ...अब मै जीवन भर के लिए पार्टी का मेम्बर हुआ ।" लेकिन राहुलजी जैसे महापंडित को भी अपने राज- नीतिक विचारो की कई बार काफी भारी कीमत चुकानी पड़ी है।

तुम शायद जानते होगे कि सरकारी पैसे से काशी
नगरी प्रचारिणी सभा की ओर से एक हिन्दी विश्वकोश
तैयार हो रहा है। जब इस विश्वकोश की योजना बनी
तो इसके लिए एक प्रधान-संपादक की जरूरत थी।
महापंडित राहुल सांकृत्यायन के रहते दूसरे आदमी पर
नजर नही जाती थी।
बहुत से विद्वान चाहते थे कि राहुलजी ही "हिन्दी-
विश्वकोश" के संपादक हों। लेकिन...
लेकिन कांग्रेसी सरकार के किसी मंत्री ने कह ही
तो दिया : "वे तो कम्युनिस्ट है...!"
कम्युनिस्ट होना, सबके लिए समान अधिकारों
और समान सुविधाओं का समर्थन करना, जैसे कोई
अपराध हो !
राहुलजी "हिन्दी विश्वकोश" के प्रधान संपादक
नही बन सके। उन्हें अपने कम्युनिस्ट होने का मूल्य
चुकाना पड़ा।
:
९५

चीन में क्या देखा?
तुम जानते ही हो कि राहुलजी ने तिब्बत की
चार बार यात्रा की है। वे अपनी कठिन यात्राओं में
अमूल्य ग्रन्थ सामग्री लाये थे और उनमें से कुछ ग्रन्थों
का संपादन भी किया था।
राहुलजी अपने इस कार्य के कारण संसार के
विद्वत्जगत में तिब्बती-साहित्य के चोटी के विद्वान
के रूप में ख्याति प्राप्त कर चुके थे।
तिब्बत अब चीनी गणराज्य का एक हिस्सा था।
चीन के विद्वान जानते थे कि तिब्बती-साहित्य के अनु-
शीलन के लिए भारतीय पंडित राहुल सांकृत्यायन एक
योग्य व्यक्ति हैं। दोनों देशों के सम्बंध भी अच्छे थे।
चीनी शासन ने राहुलजी को चीन आने का निमंत्रण
भेजा।
राजेन्द्र बाबू उस समय भारत के राष्ट्रपति थे
राहुलजी की विद्वत्ता का हृदय से आदर करते थे।
राष्ट्रपति के आदेश से राहुलजी को पासपोर्ट मिल गया।

१५ जून १९५८ को राहुलजी कलकत्ता से हवाई
जहाज द्वारा पेकिंग के लिए रवाना हुए । भारत छोडने
के पहले वे अपनी पत्नी तथा बच्चो की व्यवस्था करके
गये थे।
राहुलजी यही सोचकर चीन गये थे कि उन्हें
काफी दिन चीन में रहना पड़ेगा और उधर से ही
फिर एक बार तिब्बत भी जाना होगा। लेकिन...
राहुल जी अब ६५ साल के हो गये थे । अनेक
यात्राओं तथा अत्यधिक कार्य के कारण उनका शरीर
अब पहले जैसा नहीं रह गया था। वे पेकिंग में
गम्भीर रूप से बीमार पड़े। अब चीनी सरकार ने
उनके लिए बढ़िया इलाज़ की व्यवस्था की, साथ ही
भारत से उनकी पत्नी तथा दो छोटे बच्चों को भी
चीन आने का निमंण भेजा। पाच साल की जया और
तीन साल के जेता ने अपनी मां के साथ कलकत्ता से
पेकिंग तक की हवाई जहाज की यात्रा की। पापा जब
थोड़े स्वस्थ हो गये तो जया और जेता ने अपने माता-
पिता के साथ चीन के अनेक शहरों को देखा।
चीन में केवल साढ़े चार महीने ही रहकर राहुल
जी सपरिवार भारत लौट आये।
चीन से लौटकर राहुलजी ने दो पुस्तकें लिखी-
"चीन में क्या देखा" और "चीन में कम्यून" ।
९७

फिर श्रीलंका में
चीन जाने से पहले राहुलजी ने अपना मसूरी का
मकान बेच डाला था। अब पुनः एक मकान खरीदने
की चिता थी।
राहुलजी अब तक सौ से भी अधिक ग्रन्थ लिख
चुके थे। उनके दर्जनों ग्रन्थों के एक से अधिक संस्करण
भी हो चुके थे। उनकी किताबे छापकर और बेचकर
प्रकाशकों ने अपने "महल" सजाये थे।
किन्तु राहुलजी के पास अब इतना भी रुपया नहीं
था कि वे अपने परिवार के लिए छोटा-सा "निवास"
खरीद सकें।
अन्त में एक प्रकाशक उन्हें अग्रिम रुपया देने के
लिए तैयार हो गया। कलकत्ता के एक मित्र से तीन
हजार रुपये और उधार लेकर उन्होंने दार्जिलिंग में
एक मकान खरीद लिया।
इसी बीच उन्हें लंका से निमंत्रण आया।
तुम तो जानते ही हो कि किसी समय लंका के
९८

एक कालेज 'विद्यालंकार परिवेण' में राहुलजी संस्कृत
के अध्यापक रह चुके थे। इसी विद्यालय में उन्होंने
बौद्ध साहित्य का गम्भीर अध्ययन किया था और इसी
विद्यालय ने उन्हें "त्रिपिटकाचार्य" की उपाधि प्रदान
की थी।
१९५९ मैं यही विद्यालय एक विश्वविद्यालय बन
गया। १९५९ के जून महीने में राष्ट्रपति राजेन्द्र
प्रसाद ने ही विद्यालंकार विश्वविद्यालय का उद्घाटन
किया था।
विश्वविद्यालय को इस समय योग्य महाचार्यो की
आवश्यकता थी । वह अपने 'पण्डितुमा' राहुल
सांकृत्ययान को कैसे भूल सकता था ? उसने राहुलजी
को अपने दर्शन-विभाग के अध्यक्ष अर्थात् दर्शन महाचार्य
के पद पर आसीन किया।
अपना कार्यभार संभालने के लिए राहुलजी
सितम्बर १९५९ में केलानिया (लंका) पहुँचे ।

पापा के पत्र
बात बहुत पहले की है। उस समय राहुलजी की
आयु अभी कोई चालीस की होगी। उन्होंने मुझे एक
पत्र में लिखा था:
"कभी-कभी मन काम करना नहीं चाहता है, तो
उसे कहता हूँ, काम कर। आराम करने का समय
पचास के बाद आता है। तब भी कभी-कभी मन काम
से भागता है, तो कहता हूं, काम कर-प्रशंसा के
लड्डू मिलेगे। तब भी कभी-कभी मन कहना नहीं
मानता तो उसे जबरदस्ती काम मे जोत देता हूँ।"
अब तो राहुलजी, पचास ही नही, साठ भी पार
कर चुके थे। आयु के साथ-साथ उनकी काम करने
की रफ्तार भी बढ़ गई।
राहुलजी के साथ विद्यालंकार विश्वविद्यालय में
मैं भी एक अध्यापक था। अब भी हूँ। हम दोनों का
निवास एक ही भवन में था, इसलिए उनकी उन दिनों
की दिनचर्या को मै अच्छी तरह जानता हूँ।
१००

राहुलजी अपने हर मिनट का उपयोग करते थे। वे कहा भी करते थे कि "मैं सेकिंडों का तो नही, मिनटों का हिसाब तो दे ही सकता हूं !" वहां वे अपने विद्यार्थियों को संस्कृत में व्यख्यान देते थे। सिंहल विभाग के अध्यक्ष प्रज्ञाकीर्ति महास्थविर राहुलजी के अनुवादक बनकर बैठते । राहुलजी सस्कृत में बोलते जाते और उनके अनुवादक-पडित सिंहल-भाषा में विद्यार्थियों को समझाते जाते । राहुलजी को व्याख्यान की तैयारी करते कभी किसी ने नही देखा। वे बैठे-बैठे अपनी पुस्तक लिखते रहते । विश्वविद्यालय की घटी बजती । वे उठकर चले जाते । लौटकर आते तो फिर कलम हाथ में ले लेते ! इस बार राहुलजी कुल मिलाकर लगभग दो साल ही लंका में रहे । लेकिन इतने समय में ही उन्होंने लग- भग आधे दर्जन बड़े-बड़े ग्रन्थ तैयार किये । “तिब्बती- हिन्दी कोश" उन्होंने लंका में ही तैयार किया था। इसके अलावा उन्होने “पालिकाव्य-धारा", "पालि साहित्य का इतिहास", "सिहल के वीर पुरुष" आदि ग्रन्थ लिखे। जया-जेता दार्जिलिंग में थे। उन्हे पापा की याद आती और पापा को जया-जेता की । जाड़ों में दो बार १०१ परिग्रहला संबी313:26

जया-जेता अपनी मां के साथ पापा से मिलने लंका
गये। पापा ने लंका की खूब सैर कराई।
गर्मियों में जब विश्वविद्यालय बंद होता तो
पापा अपने प्यारे बच्चों से मिलने दो बार दार्जिलिंग
आते । दार्जिलिग में भी राहुलजी खाली नही बैठते ।
दो बार में दो पुस्तकें-"घुमक्कड़ जयवर्धन" और
"कप्तान लाल"---लिख डाली।
पापा को अपने वच्चों से अलग रहने में बड़ा
दुःख था, किन्तु क्या करते । विश्वविद्यालय की जिम्मे-
दारी सिर पर थी। फिर भी वे लंका से जया-जेता को
प्राय : रोज ही नियमित रूप से एक पत्र लिखते थे।
तुम सोचते होगे : जया-जेता तो उस समय छोटे
थे। उन्हें “महापंडित पापा" क्या लिखते थे और जया-
जेता उसे कैसे पढ़ते थे ?
बात यह है कि राहुलजी प्रायः रोज रात को सोने
से पहले जया-जेता के लिए एक कहानी लिखते थे-
इतनी सरल भाषा में कि छोटे-छोटे बच्चे भी समझ सकें।
तुम सोचते होगे : काश ! हमें भी ऐसी कहानियां
सुनने को मिलती !
तुम्हें ये कहानियां सुनने को तो नही पढ़ने को
जरूर मिलेंगी।
१०२

स्मृति लोप
शरीर के सामर्थ्य की भी एक सीमा होती है।
एक न एक दिन वह थक ही जाता है।
देश-विदेश की अनेक यात्राओं के कारण, मधुमेह
जैसी खतरनाक बीमारी और अत्यधिक बौद्धिक परिश्रम
कारण राहुलजी का शरीर ही नही अब मस्तिष्क
भी थक गया था। लका में ही उन्हे एक-दो बार
अस्पताल में रहना पडा ।
१९६१ के अगस्त में उन्होने लका से अन्तिम वार
विदा ली। अब वे ६८ साल के हो चुके थे। वे अपने
बच्चों के बीच दार्जिलिग वापस आ गये ।
दिसम्बर १९६१ में कलकत्ता में किशोरीदास
वाजपेयी का अभिनंदन समारोह होने वाला था। इस
समारोह में उपस्थित रहने के लिए राहुलजी से आग्रह
किया गया। स्वास्थ्य ठीक न होने पर भी राहुलजी
मित्रों के आग्रह को न टाल सके ।
मै तुम्हें बता ही चुका हूँ कि राहुलजी प्रतिदिन
१०३

नियम से अपनी डायरी लिखते थे। ८ दिसम्बर १९६१
के दिन उन्होंने अपनी डायरी का अन्तिम पृष्ठ लिखा :
"आज पांच बजे सबेरे घर से जा रहे है । दोपहर
तक विमान के अड्डे पर। डायरी लिखना छोड़ रहा
हूँ।"
राहुलजी सपरिवार कलकत्ता पहुँचे। एक दिन
जैसे-तैसे समारोह में भाग लिया। दूसरे दिन, अर्थात
११ दिसम्बर १९६१ को ही, पहली बार उन्हें कलकत्ते
में "स्मृति-लोप" का आघात हुआ !
स्मृति-लोप, अर्थात् उनके दिमाग ने काम करना
छोड़ दिया ! अब वे न तो अपने परिचितों को पहचान
सकते थे, न कुछ पढ़ सकते थे, न लिख सकते थे।
राहुलजी का शेष जीवन अब उनके "रोग की
करुण कहानी" मात्र ही तो है !
१०४

महाप्रयाण
राहुलजी के निकटस्य व्यक्तियों ने, उनके मित्रों ने,
उनके प्रशसकों ने उन्हे रोग-मुक्त देखने के लिए अपनी
ओर से कोई कसर नही उठा रखी।
अपने देश में कलकत्ता तथा दार्जिलिंग मैं उनकी
महंगी से महंगी चिकित्सा की व्यवस्था की गई ।
कुछ मित्रों को आशा थी कि रूस में राहुलजी का
उचित इलाज होगा। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के
प्रयास से राहुलजी को रूस ले जाने की व्यवस्था हो
गयी। साथ में उनकी पत्नी कमलाजी भी गयी।
रूस की सरकार ने राहुलजी के इलाज के लिए
कोई कसर बाकी नही छोड़ी।
राहुलजी जब मास्को के अस्पताल में थे तो इगोर
अपनी मां के साथ दो बार अपने पिता से मिलने आये।
राहुलजी मास्को के अस्पताल में कुल सात महीने
रहे। रूस की बढ़िया चिकित्सा भी उन्हें स्वस्थ करने
में असमर्थ थी। रूसी डाक्टरों का कहना था कि किसी
समय इनके सिर पर गहरी चोट लगी होगी।
१०५

तुम्हें याद ही होगा कि अमावरी सत्याग्रह के समय जमींदार के कुरबान नाम के एक हाथीवान ने राहुलजी के सिर पर लाठी का प्रहार किया था। मास्को से विमान द्वारा राहुलजी को दिल्ली होते हुए दार्जिलिंग लाया गया। २३ मार्च १९६३ को वे दार्जिलिंग अपने घर पहुँचे । जया और जेता को उन्होंने अपने सीने से लगाया। ९ अप्रैल १९६३ को राहुलजी ७० वर्ष के हुए। उसी दिन शाम को उन्हे बेहोशी आ गयी। उन्हें तुरन्त दार्जिलिंग के एडन-अस्पताल में ले जाया गया। पांच दिन अस्पताल में बेहोश रहे । १४ अप्रैल को दिन के ११.३० बजे यह महान- यात्री हिमालय की गोद में ही चिर-निद्रा में सो गया। दूसरे दिन सात साल के पुत्र जेता ने महापंडित पिता के पार्थिव शरीर को अग्नि दी। जिस स्थान पर उनका दाहसंस्कार हुआ, उसी के पास श्रीमती कमला ने अपने पति की स्मृति में एक "राहुल-चैत्य" बनवाया है। तुम जब कभी दार्जिलिंग जाओ, तो वहां जरूर- जाना। उस समाधि पर अपनी श्रद्धा के सुमन जरूर चढ़ाकर आना। १०६

HMAM
ye
भावानापर्यटक तत्ववेत्या, अनुभागाविद लिपिटकावार्थ साहित्यलावस्य
महापंडित राहुल सांकृत्यावर
जन्म आजमगड, अप्रैल, लिन जान area
comicharmend emmasokesitynoone
wwww
दाजिलिंग में महापंडित का स्मारक
१०७

कहानी का
अन्त....
इस पुस्तक के आरम्भ में प्रयाग के डा. बी. एन.
प्रसाद के घर तुमने जिस 'अतिथि बौद्ध-साधु' के दर्शन
किये है वे कौन थे, इसे तो तुम अब जान ही गये ।
और, शायद उन्हे भी जो दूसरे साधु उनसे मिलने
गये थे।
उस समय बच्चों को कहानियां सुनाने के लिए
सचमुच ही सोचना पड़ता था; और आज यह 'कहानी'
लिखते समय भी मुझे काफी सोचना पड़ा।
मुझे यही सोचना पडा कि मै तुम्हे कौन सी बात
सुनाऊ, कौन सी न सुनाऊ ? लगभग तीस वर्षों तक
राहुलजी का और मेरा निकट का सम्बंध रहा, और
फिर, वे स्वय इतना सारा हमारे-तुम्हारे लिए लिख गये
हैं कि मुझे बार-बार यही सोचना पड़ा कि आज
पहली बार तुम्हें "महापडित" के बारे में क्या बताऊं ?
राहुलजी ने बहुत पढ़ा, बहुत लिखा-यह तो तुम
जान ही चुके हो। उन्होंने कुल मिलाकर लगभग १५०
ग्रन्थ लिखे । उन्होंने दर्शन, विज्ञान, राजनीति, धर्म,
१०८

उपन्यास, कोश आदि कई विषयों पर अमूल्य ग्रन्थ
लिखकर राष्ट्रभाषा हिन्दी की सेवा की है।
तुम्हारे मन मे भी शायद राहुलजी की तरह
"धुमक्कड़" बनने की लालसा हो। तो तुम्हारी इसी
लालसा को प्रोत्साहन देने के लिए और घुमक्कडी के
तरीके बताने के लिए राहुलजी ने एक पुस्तक लिखी
है : "घुमक्कड़ शास्त्र"।
तुमने पढ़ा कि राहुलजी पहले हिन्दू साधु रहे,
फिर आर्यसमाजी और बाद में बौद्ध । तुमने यह भी
देखा कि आरम्भिक दिनों में उन्होंने “गांधीजी की
की आंधी" का साथ दिया, किन्तु जब उन्होंने देखा कि
कांग्रेस सरकार किसानों-मजदूरों की मददगार नही है,
जमीदारों और सेठ-साहूकारों की मददगार है तो
किसानों-मजदूरों का साथ दिया ।
भारतीय जनता से, भारतीय विद्वत्जगत से राहुल
को बहुत प्यार मिला, बहुत सम्मान मिला। भारत के
बाहर विदेशी विद्वान भी राहुलजी के पाडित्य की प्रशसा
करते थे। लंका के विद्यालकार विश्वविद्यालय ने तो
अन्त में अपने "भारतीय पंडित" को "साहित्य चक्रवर्ती"
की उपाधि से विभूषित किया।
राहुलजी जब अपने अतिम दिनों मे "स्मृति-लोप"
१०९

को अवस्था में थे, तो भारत सरकार को भी थोड़ी-सी
अक्ल आई । उसने महापंडित राहुल सास्कृत्यायन को
"पद्म-भूषण" का उपाधि-पत्र भेज दिया। इन्ही दिनों
भागलपुर विश्वविद्यालय ने उन्हें "डी. लिट." की
उपाधि से सम्मानित किया।
मै तुम्हें बता ही चुका हूं कि राहुलजी को अपने
जीवन में, अपनी यात्राओ मे, जो सुख-सुविधाएं मिली
उन्हे वे 'भगवान' की कृपा नहीं, बल्कि 'समाज की
कृपा' ही समझते थे। राहुलजी ने इसीलिए एक और
पुस्तक भी लिखी : "जिनका मै कृतज्ञ हूँ"।
११.

तिथियां
:
:
जन्म ९ अप्रैल १८९३ । ननिहाल-ग्राम पन्दहा मे, आजमगढ़
जिला। गोत्र : साकृत्य, पिता : गोवर्धन पांडे, माता:
कुलवन्ती देवी । नाना : रामशरण पाठक ।
बचपन का नाम केदारनाथ, चार भाई तथा एक बहन
मे सबसे ज्येष्ठ।
शिक्षा : आजमगढ मे मिडिल तक । आगरा मे अरबी-फारसी
की पढाई और लाहौर तथा काशी मे सस्कृत की।
१९१२-१३ : परसा-मठ के साधु तथा उत्तराधिकारी।
१९१३-१४ । दक्षिण का तीर्थाटन ।
१९२२ : बक्सर जेल मे छह मास । जिला कांग्रेस के मंत्री।
१९२३-२५ : हजारीबाग जेल में ।
१९२७-२८. लका मे
सस्कृत के अध्यापक तथा बौद्ध-साहित्य का
अध्ययन।
१९२९-३० : 'तिब्बत में सवा साल' -पहली यात्रा।
१९३२-३३ • इगलैण्ड और यूरोप मे।
: दूसरी तिब्बत-यात्रा।
१९३५ : जापान, कोरिया, मचूरिया, सोवियत-भूमि तथा ईरान
की यात्रा।
: तीसरी तिब्बत-यात्रा।
१९३७ : सोवियत-भूमि मे दूसरी बार ।
१९३८
: तिब्बत मे चौथी बार। इगोरं राहुलोविच का जन्म ।
१९३९ : किसान संघर्ष : अमावरी-सत्याग्रह । जेल मे ।
१११

१९४०-४२ : हजारीबाग जेल मे ।
१९४३
: चौंतीस साल बाद जन्मग्राम में । उत्तरा-खड की यात्रा।
१९४४-४७ : लेनिनग्राद (सोवियत-भूमि) मे प्राध्यापक ।
१९४७ : हिन्दी साहित्य सम्मेलन के सभापति ।
१९५० : मसूरी मे अपना घर ।
: पुत्री जया का जन्म ।
१९५५ : पुत्र जेता का जन्म ।
१९५८
: चीन मे साढे चार मास ।
१९५९-६१ : लका में दर्शनशास्त्र के महाचार्य ।
: दिसम्बर महीने मे "स्मृति-लोप" का आघात ।
१९६२-६३ : सोवियत-भूमि मे सात महीने चिकित्सा ।
मृत्यु : १४ अप्रैल १९६३ ।
A
पताल 31376
सान्नशान थालय
जितनी सारनाथ
SLM

Rahul Sankrithyan

Author
Mddant Aanand Kauslyyayan
Title
Rahul Sankrithyan
File name
Rahul Sankrithyan
Text
OCR done
Published
21-04-06
Publisher
Pepules Pub. House Pvt. Ltd. N. D.
Language
Sanskrit
Pages
112
Library
Shantarakshita Library Sarnath
Classification
Literture
DLI number
477556
Barcode
5990010152559.00
Scanning centre
IIIT, Allahabad
VMLT id
YQtzyw7Cn9e
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