Natya Sodh Sansthan, Kolkata

Tulsidas Natak

Mukhopadhyaya,krishna Kumar · 2005/01/12

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॥ श्री:॥
तुलसीदास-नाटक.
लेखक-श्रीपंडित कृष्णकुमार मुग्योपाध्याय
गंगाविष्णु श्रीकृष्णदास,
मालिक-"लक्ष्मीवङ्कटेश्वर "स्टीम प्रेस,
कल्याण बंबई.
संवत् १९८३, शके १८५१.

100. No 966 Dare 24.895 ltern No :3/4 - 45557 Don, by मुद्रक और प्रकाशक- गंगाविष्णु श्रीकृष्णदास, मालिक- “लक्ष्मीवेङ्कटेश्वर" टीम्-प्रेस, कल्याण-वंबई. सन् १८६७ के आकर २५ के उ मुजब रजिधरी सब हम प्रकाशकने अपने आधीन रखा है +

पात्रमूची.
पुरुष.
अंपाम-लक्ष्मण-- महादेव-- महावीर-- देवतामण्डली
आत्मानम--राजपुरग्रामवासी एक ब्राह्मण,
तुलसीदास-ऐ पुत्र
नरसिंहदास-एक साधु.
गोवर्धनदास?
शिष्याण,
नारायणदाम,
चन्द्रिकाप्रमाद-रत्नावलीका भाई.
गरीबदाम-एक ब्राह्मण
मा चीन प्रेत--रव-चोर--विद्याभूषण--कविरत्न-नागरिकामा
जाहाता बादशाह--खोजाणा-वृन्दावनवासीगण --परशराम महल..
शिष्या इत्यादि.
स्त्री.
सीतादेवी-पार्वती-
रत्नावली--एक ब्राह्मणकी कन्या बादको तुलसीदासीत्री
चन्द्रावली-चन्द्रिकाप्रसादकी बी
हुलामी-आत्मारामकी स्त्री.
लक्ष्मी-दासी.
लीला...-गरीबदासकीत्री.
ब्रजबालायें बांदियां इत्यादि.

तुलसीदास नाटक। प्रस्तावना। गोलोक-श्रीरामचन्द्रजी और मीताजी की झांकी-महावीर और भक्तगण बैठे है.) (देवबालाओंका गाते हुए प्रवेश) गीत । राम राजीव लोचन- भक्तं वत्सल देव भक्त हृदय-रंजन । नयननन्दन नवघनवरण- मीतापति राम त्रिभुवन पावन- कगे कामना पुरण हम मांगे है शरण. भीना-( रामसे ) नाथ ! क्या कारण है कि. आज आपने वही रामरूपस गोलोकको शोभायमान किया है. और दासीको भी वही जनकनन्दिनीक रूपसं वामभागम स्थान दिया है। क्यों भक्त हनुमान, सह कपि-मण्डली, समागत हैं आज! क्या पुनः देवगण सुमर रहे हैं रामनाम, भयसे किसी दुष्टके, स्या रोते हैं रक्षकुल परित्राणके हेतु, स्मरण आते ही वह पूर्वकथा, तुलसीदास . भयमे काँप उठता है प्राण क्या भेजोगे नाथ पुनः मुझे नरलोकमें, महनेको दारुण व्यथा बिरहानलकी ? राम-देवी ! मायामुग्ध जीवगण रामनाम भूलकर संसार में बहुतही दुःख पा रहे हैं. वे सब मोहम अन्ध है । महामुनि वाल्मि- कन नरोक. उद्धारक हित, रामायणकी मष्टि की थी. परन्तु काल.. वश नरगण अमरीकी ननातन भाषा भूलने जा रहे हैं। इस कारण व्यथित हो मानेवर मेरे पास अर है। जानती हो देवी- मुनिको सदा प्रिय है मेग यह गमरूप. इमी हेतु बनाई है झाँकी, सह भक्तमण्डली मीता गमकी। महावीरः धन भनवनल, प्रभृ ' जन महामुनि पास अरह तनिश्रय है. आप इसका एक उपाय करंग... एक था वह भी समय, जब सारे भुवनमें मधुर तानसे, गॅजता था नाम मीतारामका सनकर हो जाता था गदगद-प्रेम नाचता फिरता था मैं चारों तरफ। अब हाय ! विदीर्ण होती है छाती अनाथनाथ, होकर उन्माद- - -- ७ (तुलसीदास घूमता संसारमें, परंतु शोक, दिखता नहीं है कोई अब भक्त मेरे रामका। सीतामे ) देवी ! यद्यपि दिया है मुझे वरदान तुमने अमरत्वका, किंतु क्या लाभ होकर अमर- रामनाम हीन संमाग्में ? ( गाते हुए वाल्मीकिका प्रबंश.) वरं न याचे रघुनाथ युष्म- त्पदाञ्जभक्तिः सततं प्रमास्तु । इदं प्रियं नाथ परं प्रयाचे 'पुनः पुनस्त्वामिदमेव याचे ॥ प्रणाम देव ! आहा धन्य है प्रभू ! आज आप मेरी इच्छा पूर्ण संवं हेतु रामरूपसे विराज रहे हैं. रामे:-कहिय मुनिवर किस कारण आज आप मुझे दर्शन देनेके लये गोलोकम पधार हैं ? आपके दर्शनसे मेरा मन बहुत ही प्रफु- ल्लत हो रहा है, आपके आगमनसे है भक्तप्रवर, सारा गोलोक कुलकमग्न हो रहा है। वाल्मीकिः-लीलामय ! अपूर्व है लीला तुम्हारी। भक्तभी बनाते हो तुम, मानभी तुम्ही बढाते हो भक्तोंका। कारण पूछते हो प्रभू, गोलोकमें आया हूँ क्यों?

तुलसीदास भयमे काँप उठता है प्राण क्या भेजोगे नाथ पुनः मुझे नरलोकमें, महनेको दारुण व्यथा बिरहानलकी ? राम-देवी : मायामुग्ध जीवगण गमनाम भूलकर संसार में बहुतही दुःख पा रहे हैं. वे सब मोहम अन्ध हैं । महामुनि वाल्मि- कने नगक उद्धारक हित, रामायणकी दृष्टि की थी. परन्तु काल.. वश नरगण अमरीकी सनातन भाषा भूलने जा रहे हैं । इस कारण व्यथित हो मानेवर मेरे पास अर है। जानती हो देवी- मुनिको सदा प्रिय है मेरा यह रामरूप. इसी हेतु बनाई है झाँकी, मह भक्तमण्डली मीता गमकी। महावीर:-धन भक्तवत्सलः प्रभृ ' जब महामुनि पास रहे तदनिश्रयह आप इसका एक उपाय करंग-- एक था वह भी समय. जब सारे भुवनमें मधुर तानसे, गॅजता था न म सीतारामका सुनकर जाता था गदगद-प्रेममे लाचता फिरता था मैं चारों तरफ। अव हाय ! विदीर्ण होती है छाती अनाथनाथ, होकर उन्माइ- हो तुलसीदास, ७ घूमता संसारमें, परंतु शोक, दिखता नहीं है कोई अव भक्त मेरे रामका। (सीताम्म ) देवी ! यद्यपि दिया है मुझे वरदान तुमने अमरत्वका, किंतु क्या लाभ होकर अमर- रामनाम हीन समाग्में ? ( गाते हुए वाल्मीकिका प्रवेश. ) वरं न याचे रघुनाथ युष्म- त्पदाब्जभक्तिः सततं ममास्तु । इदं प्रियं नाथ परं प्रयाचे 'युनः पुनस्त्वामिदमेव याचे ॥ प्रणाम देव ! आहा धन्य है प्रभू ! आज आप मेरी इच्छा पूर्ण कावं हेतु रामरूपसे विराज रहे हैं. रामः-कहिये मुनिवर किस कारण आज आप मुझे दर्शन देनेके लिये गोलोकम पधार हैं ? आपके दर्शनसे मेरा मन बहुत ही प्रफु- ल्लित हो रहा है, आपके आगमनसे है भक्तप्रवर, सारा गोलोक पुलकमग्न हो रहा हैं। वाल्मीकिः-लीलामय ! अपूर्व है लीला तुम्हारी । भक्तभी बनाते हो तुम. मानभी तुम्ही बढाते हो भक्तोंका । कारण पूछते हो प्रभू, गोलोकमें आया है क्या?

तुलसीदास
क्या नहीं जानते हो देव,
करते हो छलना ये क्यों ?
प्रभू जानते हो तुम
संबल त्रिभुवनमें, मेरा है केवल रामनाम
रामनाम गान, रामरूप ध्यान.
यही पंजी है केवल,
रामके इस दासकी।
प्रचार किया था तुमने हे राम!
नाम राम भृतलपर:
परंतु कालवश भूलगये नरगण
उस राम नामी मंत्रको।
फलसे उसके
पाप पूर्ण हो रही पृथ्वी,
जीवगण पा रहे दुःख अति संसारमें ।
हे राम ! देवाजाता नहीं दुख कष्ट उनका,
आया हूँ अनुमति ग्रहणके लिये,
हे नाथ ! इच्छा है मेरी
जन्म लेकर पुनः धरामें
नरदेहसे प्रचारूंगा
आपका शुभनाम।
रामः-धन्य है मुनिवर
है धन्य भक्ति तुम्हारी।

तुलसीदास करता हूँ आशीर्वाद- पूर्ण होगी अवश्य तुम्हारी मनोकामना । बाल्मीकिः-(महावीरले) हे रुद्र अवतार, वीर भक्त चुदामनि ! तुम्हारी पहायताका भिक्षुक हूँ मैं, देना दर्शन मुझे नर लोकमें ! महाबीरः-मुनिका, व्यर्थ मत लज्जित करो मुझको हो तुम सर्वथा प्रणम्प मरे । कृपाले तुम्हारे पुनः मंगारमें : सुनूंगा में नाम गीतारामका । पुलकिन हो रहाहूँ ! दखा दक- शरीर मेरा आनंदसे हो रहाहै रोमाञ्चित । धरा पर अवश्यही पाओगे तुम इस रामकिंकरको। भय नहीं है मुनि सफल होगी कामना जब त्रिभुवन पति हैं महाय इस कार्यके। गाओ, गाओ प्रेमसे सबसमका गुण गान ।

तुलसीदास
( देव बालाआंका गाना)
हर्षोत्फुल्ल स्थान
सर्वदा होता जहां है रामगुणगान
हर काममें होंगाम
हर स्थानमें हों राम
मक राम राम राम
मबनाम, नाममा
विरहमें हो राम, मिलन में हो
अधर रमपान-उममें भी हों गम
जीवन में राम, मरण, राम
पाप राम राम. पुण्यम भी राम
इति प्रस्तान

प्रथम अंक ।
प्रथम दृश्य.
त्याग
.....
( बांदा जिलेके अन्तर्गत-राजगर-गाँवमें आत्माराम द्विवेदी की कुरा !
लङका गादमे लियेहा हुलामी आत्माराम और लमी. )
आत्मालाची दुध मत करो। जानता हूँ--यह बड़ा ही
कटोर काम है. एरंतु क्या करूं--कोई उपाय नहीं-इस सन्तानका
अवश्य करना होगा-लानक्षत्रके प्रथम चरण अर्थात
अभुनमल सत्यम इसका जन्म हुआ है. ज्योतिष शास्त्रक
मता, या तो इन शिशः अभी त्याग करना पड़ेगा या उराट वर्ष
द, कम टसका मर नहीं दे सकंग साध्वी शास्त्रकी अमर्यादा
का करूं?
हुलासी स्वामी ' इस बच्चेका मुखड़ा देखने के लि मंग मन
बड़ा व्याकुल हो रहा है. परंतु जब आपकी आता है तब
परन्तु ओह ... स्वामी क्या कुछ भी उपाय ...
सामाः-उपाय-महानाय : हुटानी जावरा है--सन्तानक
स्नहर पिताको अपेक्षा जाताही अधिक मरझती है. परंतु-देव
इच्छा नहीं है कि इस सन्तानको हम गृहम नवं उनकी इच्छा
पूर्ण होगी । अपने हृदयको पत्थर बनालो हुलासी, लाओ
शिशक दो में उसे कहीं पथपर रख आऊं,
हुलासीः-फिर इसके बाद क्या होगा प्रभू
आत्माः-इसके बाद क्या होगा ! ... इसके बाद नहीं होगा
जो होना होगा...इसके बाद-वही होगा जो भगवानको करना
होगा, इसके बाद वही होगा जो इस बच्चकै भागमें लिखा होगा:
लाओ हुलासा ... व्यर्थ बिलम्ब करनेसे कोई लाभ नहीं।

१२ तुलसीदास, हुलासी:-नाथ ' तुम प्रत्यक्ष देवता हो--तुम्हारी आज्ञा मेरे लिये ईश्वर-आज्ञा है किन्तु प्रभू...क्या एक बार...केवल एक- बार भी इन्न वञ्चका मुख में नहीं चूम सकती? आत्मा:-नहीं अभागिन् नहीं ... हुलासी क्यों वृथा मायासे मुग्ध होम्वयम रोकर मझ भी मलाती हो । ( स्वगत ) अभीतक मैंने इस बच्चका मथ नहीं देखा है-फिर भी न जान हृदयक किस गमभागसे आंसूओंका स्रोत उमड़ा आ रहा है। लक्ष्मीः-अच्छा में पछती हूँ कि.नुम दोनाका मतलब क्या है. क्या सचमुचई। इस चाँदसे वच्चको तुम लोग मार डालोग--तुम टोग क्या पागल हो गये हो ? बड़ी कटिना स भगवानन गोहो हरीका और तुमलोग उस काल के बाद में डालने की सोच रहे हो ? तुम लोग कसे आदमी होजा? आत्माः-लक्ष्मी : तुम समझोगी नहीं यह शास्त्रका आदेश है। लक्ष्मी:-चन्हम जाय तुम्हाग मास्तर । अरे लड़का हुआ तुम्हारे और आदेश देग शाम्नर' आत्माः-उदासी-टभीक समझानकी मझम क्षमता है- क्या करूं ? भगवन मर हृदयम शक्ति दी। ओह...ाओं सती- बच्चे को दो-तुम्हार आदरक धनको मुझ को-मैं इस अनाथ बना- कर अनाथनाथ भगेस पर छोड आऊँ! हुलासीः यह लो प्रभृ ( उच्चको देती है। आत्मा:-परमात्मा तुम्हारे हृदयमें शांति द...उह विधा- ता. ! (प्रस्थान ) हुलामीः-हाय अभारे बच्चे ! क्यों तू इस अभागिन के गर्भम आया? विधाता-यदि इसीतरह छीन लेना था तो दिया क्या? पर- तुलसीदास १३ मात्रा यदि सत्यही में पतिव्रता हाऊँ पदि सत्य ही इस संसारम तुम्हारा कोई आस्तित्व हो-यदि सत्यही तुम भक्तवत्सल हो, तो मर वच्चपर कोई आंच न आने पाव ( प्रस्थान ) लक्ष्मी:-आहा ! : विचारीकी छाती फटी जा रही है भीतर ही भीतर आंसुओंको सखा रही है-दाख पंडित जी किधर गये. अगर हो सका तो नजलो उठा लाऊंगी प्रथम अंक द्वितीय दृश्य. गजपरका एक टूटा फटाररास्ता--मघाच्छन्न ( आत्मागमका प्रवेश बच्चेको लिये . अन्मा:-ओह....समस्त आकाश मेघाच्छन्न हो रहा है परंतु न जान कौन मर कानम मानो यह कह रहा है. कि इसी बच्चेसे .मन भारतवर्ष पवित्र होगा-क्या करूं ! भगवान्न मुझे इस शिग पालन करनेका अधिकार नहीं दिया। टम्म बच्चन यहीं पड़के तले. ख दं (बच्चे को पड़कं तले रख देता है ) अबोध शिशु देव- तागण ही तुम्हारी रक्षा करें. जाऊँ व उस अभागिनी क्या शा है?ओह दयामय!यह तुम्हारी कैसी कठोर नियति है । प्रस्थान है (गोदरधनदास और नागयणदासका प्रदेश) गोवरधनः-देखो भान जाने गुरुदेव आज क्यों इतने प्रसन्न चिन जान पड़ते हैं ? अच्छा क्या तुम कह सकते हो कि गुरजी सहमा कुरुक्षेत्र छोड़कर इस बाँद जिले में क्यों आये ? नागयणः-आश्रम छोड़नेके पहले गुरु जीने मुझसे कहा था कि बाँदा जिलेके एक गाँवमें एक महापुरुषने जन्मग्रहण किया है...वह देखो गुरुदेव इधर ही आरहे हैं। ( नरसिंहदास बाबाजीका प्रवेश ) पंडके तलेसे बच्चेको उठाकर गोवरधन और नारायणदासके पास आते है ) तुलसीदास नरसिंहदासः-शिष्यगण!इस बच्चेको मेरे कुरुक्षेत्रवाले आश्रममें ले चलो, यही वे महापुरुष हैं जिनके वारेमें मैंने तुमसे कहा था इसको आजस रामबोला कहा करो यही शिशु एक दिन संसार- में रामनामका प्रचार करेगा। गोबरः-प्रभू ! इस शिशुके मा बाप नही हैं क्या ? नरः--इसके पिताने ज्योतिष शास्त्र मतसे इसको त्याग दिया है। अच्छा चलो ( सवका प्रस्थान ) ( लक्ष्मीका प्रवेश लक्ष्मीः--इधरसे ही तो पंडितजी आये थे। परंतु कहाँ लड़का तो यहाँ कहीं भी नहीं दिखता चारों तरफ खोज डाला, परन्तु कहीं भी वह बच्चा नहीं मिला। ( एक पडोसीका प्रवेश) पडोसीः-अरे लछमी! तू यहां फिर रही है; पंडितजीके लड़का हुआ है. सुनकर हम तो वहीं जाय रहे हैं. कुछ भांग आंग तो वहां छनेगी ? मेसरजी त्रिवेदीजी सब आय रहे हैं। लक्ष्मीः-नहीं नहीं कोई मत जाओ. कोई मत जाओ. सबको मना कर दो। पडोसी:-मना कर दें ? अरे मना कैसे कर द ? हगारे पंडित- जीके लडका हुआ है. और हम आनन्द नहीं मनायेंगे! वाह तुम भली आई. पूडी लड्ड अकेली ही उडाओगी क्या ? लक्ष्मीः-तुम्हे अभी पूड़ी लड्डकी पडी है; यह नहीं मालूम कि यह लड़का होनेसे तो न होना ही भला था. पडोसीः-न होना भला था क्या ? तू क्या बउरी होगई है?

तुलसीदास, १५ लक्ष्मीः-हाँ हाँ पंडितजीने वह लड़का कहीं डाल दिया है. बयोंकि मूलानक्षत्रमें वह हुआ था. सबको मना कर दो. खबर- दार कोई मत आना। (प्रस्थान.) पडोसीः-लड़का मूलानक्षत्रमें हुआ था । लड़का नक्षत्र में कैसे हुआ ? लडका तो पेटमही हुआ करता है । शास्तर बाँचके मालूम होता है पंडितजीका माथा खराब होगया है. अरे यह भूषणजी आ रहे हैं. इनसे पूछं कि, लडका नक्षत्रम कैसे हुआ ? (भूषणज़ीका प्रवेश) पडोसी-पालागे महाराज ! अच्छा यह तो बतलाओ महा- रात ! कि लडका नवमस कैसे होता है ? लड़का तो पटेमेसे ही हुआ करता है न? भूषणः-क्यों तुम्हारे कोई लड़का हुआ है क्या पडोसी:-जी नहीं, मेरे तो नहीं, द्विोदीजी के एक लड़का हुआ है सो लछमी कह रहीथी कि, वह लड़का जाने मूला कि केला कौनसे नक्षत्रमें होनेसे द्विवेदीजी उसको कहीं डाल आये हैं। भूषणः-ए क्या यह सच है ? ( स्वगतं ) शायद लड़का मूला नक्षत्रके अभुक्त मूलसमयमै हुआ होगा- अथोचुरन्ये प्रथमाष्टघट्यो मूलस्य शाकान्तिमपञ्चनाज्यः । जातं शिशुं तत्र परित्यजेदा मुखं पितास्याष्ट समा न पश्येत् ॥ (प्रगट ) हाँ भाई लड़का कभी कभी ऐसे नक्षत्रोंमें हुआ करता (प्रस्थान) है।

. तुलसीदास, पडोसी:-यह तो बड़े अचरजकी बात है. ऐ ! अरे लड़का कहीं मूला और केला नक्षत्र में होनलगे तो तो बस ! इसीलिये तो कहा है कि कलियुग है कलियुग । ए लड़का मृला नक्षत्र में... (प्रस्थान ) प्रथम अंक-तृतिय दृश्य. (आत्माराम द्विवेदीकी कुटिया हुलासी अर्धशायित अवस्थामें ) हुलासी:--वह है वह है । ऐ यह क्या मेरा बच्चा वह किसकी गोदीम बैठा, कौन हो तुम मेरे बच्चेको तुमने मुझसे क्यों छीन लिया ? दे दो, मेरे बच्चेको तुम मुझे लौटा दो...वह मेरा बच्चा है। (आत्मारामका प्रवेश) आत्मा:-यह क्या हुलासी ! तुम यह क्या कह रही हो ? जरा अपनको संभालो. हुलासीः-वह देखो उसने मेरे बच्चेको क्या करदिया ?यह उसके छाती पर उसने क्या लिख दिया है ? ऐ राम राम उसकी छातीपर ...कहाँ कहाँ-कहाँ गया बच्चा कहाँ गया ? यह तो सब राम राम लिखा हुआ है चारों तरफ राम राम क्यों लिखा है ! आत्माः-हुलासी प्रियतमे ! प्रकृतिस्थ हो देखो-मुझको क्यों रुलाती हो देवी ! दयामय यह तुम्हारी कैसीलीला है ? हुलासीः-तुम कौन हो...ऐ राम राम । राम नाम अक्षर मेरे चारा और क्यों घूम रहे हैं...वह देखो वह देखो वह देखो-आहा! पुत्र मेरा कैसा सुन्दर है क्या दिव्य रूप कैसी बिमल ज्योति उसके मुखड़के चारोंओर पड़ रही है, आहा वह कौन उसके सिम्पर हाथ रखे हुए हैं; धनुष बाण हाथमें शामवरण चारुनयन ! आहा सुन्दर दृश्य है। उसके शरीर में देखो कितने कितने सुकुमार धनुषवाण हाथमे लिये बैठे हैं सब एक समान कहाँ कहाँ धनुष भारी किधर गये ? यह तो सब राम राम लिखे हुए हैं।

तुलसीदास आत्माः-हुलासी ! हुलासी!! हुलासी:-कौन पुकार रहा है ? ओ तुम राम ! आती हूँ! भाती हूँ !! अभी आती हूँ !!! ठहर जामो ठहर जाओ। ऐं वह कौन- सा स्थान है ? शताधिक सूर्य वहाँ ज्योतिमय हैं. देवतागण सुस- जित होकर वहाँ खड़े हैं। विराट प्रासादमें वह रत्नखचित सिंहा. सन बिछा है और उसपर आहा-वह कौन है ? दिव्यकांतिमय देव- वा-हाँ हाँ वे ही राम हैं-देखो देखो संकेतसे वे मुझे बुला रहे हैं। छोड़ दो, छोड़ दो. मुझे जाने दो. वहाँ जहाँ मेरे पुत्रने जन्मके साथ ही मेरा स्थान बना रक्खा है । राम राम ! आओ मुझे ग्रहण करी; मुझे वहाँ ले जाओं। मुझसे यहाँ इस कलुषित पृथ्वीमें नहीं रहा जायगा-नहीं रहा जायगा। ले चलो राम. रा...म. (मृत्यु) आत्माः- ( देहको धारण कर ) हुलासी हुलासी! यह क्या शेष, सब शेष ! पुत्रवियोगिनी पुत्रके विरहमें राम राम करतीहुई उस गोलोककी ओर चलीगई । पुत्र गया, प्रियतमा गई, मेरा घर जल गय :-मेरा बनाबनाया घर बिगड़ गया । मेरा घर स्मशान होगया। हाय राम ! मैं इस जले स्मशानका पहरे देनेके लिये रहगया ? नहीं नहीं, मैं भी जाऊँगा. हुलासी ! मैं भी चलंगा तुम्हारे साथ । ठहरो ठहरो । राम, दयामय! तुम्हारी इच्छा पूर्ण हो। तुम मंगल- मय ईश्वर हो तुम्हारी मंगलेच्छा अवश्य पूरी होगी. परंतु मुझे अब इस क्षणभंगुर संसारसे कोई प्रयोजन नहीं है। मुझे तुम अपने चरणोंके नीचे स्थान दो. हुलासी हुलासी. राम राम ! ( गिर पडता है और मृत्यु होजाती है ) (लक्ष्मीके साथ पड़ोसियोंका प्रवेश) लक्ष्मी:-यह देखो, यह देखो. ये दोनों मूछित पड़े हैं।

१८
तुलसीदास
१ पडोसी:-( देखकर ) ऐं यह तो दोनों मृत हैं । कीसी
देहमें प्राणका संचार नहीं हैं।
( सब व्यात्त होकर देखते हैं तथा अफसोस प्रगट करते हैं। )
लक्ष्मी:-क्या मृत । दोनों देह प्राणहीन वाह वाह हा ! हा !!
हा !!! कैसा सुन्दर शास्त्रका आदेश है। कैसा सुन्दर उसका
फल है। हाः हाः हाः दोनों मृत वाह !! वाह ( चली जाती है)
२.पडोसी:-क्या उन्मादिनी हो गई है यह?
३ पडोसी:-आश्चर्य नहीं, अब देहके सत्कारका आयो-
जन करो।
प्रथम अंक-चतुर्थ दृश्य.
राजपथ.
(लक्ष्मीका उन्मादिनीके भेषमें गातहुए प्रवेश.)
गीत ।
तू उन्माद है विधाता-
उन्मादिनी यह सृष्टि तेरी, तू उन्मादोंमें ही रहता ।
कौन नहीं उन्माद जगमै
उन्मादके व्यापक पग पगमें,
उन्माद नृत्य भरो नर सबमें तू उन्माद रस ही पीता ॥
उन्माद है जो भक्त तेरे
उन्माद जो तुमको न टेरे
यह पृथ्वी नहीं उन्माद है रे मैं उन्मादिनी हूं त्राता ॥

(तुलसीदास १ ९ प्रथम अङ्क-पश्चम दृश्य. ( वगीचा) (चंद्रिकाप्रसाद और चन्द्रावलीका प्रवेश.) चन्दाः-अरे जरा सुनो तो! चन्द्रिः-नहीं मैं ऐसे वाहियात बातोंको नहीं सुनता. चन्द्राः-देखो तुम्हे मेरी सौगन्ध है. चन्द्रिकाः-अच्छा बोलो सपाटेसे बोलो मैं टपाकसे सुनकर पटाखसे चला जाऊँ-हाँ जल्दी करो-एं नहीं बोली अच्छा मैं चला. चन्दाः-देखो ! दो बातें सुन जाओ. चन्द्रिः-दो बातें, अच्छा बोलो. चन्द्राः-तुम आजकल. चन्द्रिका:-एक. चन्द्राः-फिर वही. चन्द्रिः-दो...बस खतम हो गया. अब मैं चला- (जाना चाहता है) चन्दाः-(कपडा पकडकर ) देखो, अगर ऐसा करोगे तो शिर फोडकर मर जाऊंगी. चन्द्रिकाः-अरररर ! यह क्या ? मरना हो तो कोई और तरीका ढूंढ निकालो यह क्या शिर फोडकर मरना भी कोई मरना है ? अच्छा हाँ तो जल्दी कहो. क्या कहती हो? चन्द्राः-देखो तुम ऐसे बुरे संगतोंको छोड दो. कुछ देव देव- ताकी पूजा करो. कमानेका फिकर करो, नहीं तो कुछ दिनोंबाद जब घर सफा हो जायगा तब क्या भीख मांगोगे? .

२ तुलसीदास . चन्द्रिः- -बस, यही तो तुममें बुरी बातें हैं.अरे! जबतक है तब तक आनन्द करो मौज उड़ामो.अरे! अगर भीख मांगनेकी नौवत आयगी तब वह भी मांगलेंगे। जहाँ एक हजार भीखमंगे हैं वहाँ एक हजार एक हो जायेंगे । और देवताकी तो पूजा करनी चाहिये ही नहीं. क्योंकि देवपूजाके माने होते हैं कुछ मांगना घस जहाँ उनके सामने हाथ जोडके खड़े हो गये वहीं मुँहसे निकल गया भगवान् धनदे लड़का दे जोरू दे जेवर दे मिठाई दे अल्लम दे गल्लम दे. गरज यह कि दुनियांभरकी जितनी मांगे हैं, सबकी नामावली शुरू हो जाती है और देवता महाराजने कहीं भक्तकी परीक्षा आर- म्भकर दी तब तो होगई वहीं इतिश्री। हरिश्चन्द्र महाराज सरीखे श्मशान जगाओ या दाता कर्ण सरीखा बनकर बेटेपर आरा चलाना शुरू करो अरे बापरे बाप ! देवताओंसे तो दूर रहना ही उचित है। चन्द्राः-देखो मेरा कहना मानो. मैं तुम्हारे हाथ जोड़ती हूँ। चन्द्रिका:-बस बस बस बस, यहीं तुम सब मिट्टीकर देते हो. अरे अभी तो नाटकका पहला अङ्क चलरहा है अभीले अगर हाथ जोड़लोगी तब तो बस, यहीं खतम हो जायगा फिर दूसरे और तीसरे अङ्कमें क्या दिखाओगी ? तुम बड़े बातुनी हो? चन्द्रिः-अरे अभी तो कह रहीं थी ठहरोठहरोऔर अभी कहने लगी जाओ. यह खूब रही. देख चन्द्रा! अबसे जब मैं कहीं जायाकरूं तब मुझे तू रोका मत कर । चन्द्रा:-क्यों रोका क्यों नहीं करूं। चन्द्रिकाः-इसलिये कि जब तू मुझे एक बार रोकलेती है और तू मुझसे बात कियाकरती है......नहीं मैं नहीं कहूंगा... चन्दाः-जाओ (तुलसीदास, चन्दा:-नहीं नहीं बताओ (हाथ पकडती है ) नहीं कहोगे ? चन्द्रिका- हाँ अब ठीक पहला अडूसा मालूम हो रहाहै-नाट- कका अभिनय अब ठीक ठीक एकके बाद एक होता जाना चाहिये। जैसे कि, तुम्हारा पूछना-मेरा नहीं बताना तुम्हारा मान करना. दूसरे अङ्कमें मेरा बताना तुम्हारे मानका दुगना हो जाना-मेरा कारण पूछना-तुम्हारा न बताना मेरा भी गुस्सा हो जाना और चुप चाप बैठ जाना धीरे धीरे रोटी खानेके वक्त तुम्हारे मानको थोड़ी देरके लिये एक टोकरीमें बन्दकर रखना और मुझसे कहना. "चलो प्यारे रोटी खालो""मेरा गम्भीर होकर जवाब देना" "नहीं मुझे भूख नहीं है-" तुम्हाराबार बार विनती करना मेरे पे- टके भीतरसे आकाशवाणी होना अच्छालाओ"तुम्हारा खूब अच्छे । अच्छे भोजन लाना-मेरा चुपचाप बैठकर सब खाजाना-तुम्हारा पूछना "स्वामी थोडीसी पुरियाँ और लाऊँ" मेरा पेट देवके पराम- शंसे कहना “लाओ" तुम्हारा पुरियों लाना-मेरा खालेना खाकर तुम्हारे हाथसें एक पान लेना-सैर करने जाना यह तो हुभा दूसरा अङ्क खतम. फिर तीसरे अङ्कमें रातको मेरा वापस लौटकर देखना तुमने टोकरीमेंसे मानको निकाल लिया है-तीसरे पहरतक मेरी तुमसे बिनतियाँ करना-उसके बाद...कोई सुन न ले मेरा...तुम्हारे उन लाल चरणोंको धारण करना. तुम्हारे मान देवीका अन्तर्धान होना-मुखसे एक कपटभरी 'ज़ाओ' शब्दका निकलना उसके बादही...झिककसे हंस देना दोनोंका शुभ मिलना होना... (ढंग ढंग रंग ड्रापसीन-यवनिका पतन ) चन्द्रा- तो पूरे नाट्यकार हो रहे हो। चन्द्रिका:- हो रहा हूँ, नहीं वो ऐसे ही अभी तो न जाने क्या क्या बनूंगा और देख,आज कल दिल्लीमें पल्टन लाल पल्टन आई? वे सब मैदानमें अपनी लाल विषियोंके सामने ऐसा करते हैं. - ओहो तुम

२२२
तुलसीदास
(स्टेजके ऊपर (Quick march) किक मार्च करता हुआ) किक मार्च
किक्क माच्च किक्क माच (उड़ती बोसा Flying kiss देकर) अन्न
टन्न (अबाउट टर्न करना और प्रस्थान )
चन्द्रांवलीका गाना।
प्रीति-नगरमें रहती सयनी
है प्रीति गठित यह अंग
दिन रैन प्रवाहित होती हृदयमें
प्रीतकी ही तरंग
प्रीति नयनसे प्रीतही बदनमें
प्रीति ही प्राण. मनमें
भनुंगी-भजुंगी-जलुंगी सजनी
प्रीति सुखदहनमें
पियाकी प्रीति जाने न रीति-
विमोहित अनंग
प्रीति रसवति पियाकी प्रीति
अनंग पान भंग
प्रथम अंक-षष्ठ दृश्य.
( बाबा नरसिंहदासका आश्रम)
(तुलसीदासका गातेहुए प्रवेश)
निहारो निहारो हृद अरविन्द माझमें
आनन्दि साधू-
परेप्रेम पुलके धाम गोलोक सम

तुलसीदास
२३
रसतरंग खेला--सीता राम लीला
चिर बिहार भक्त-चित-फुल्ल सरोजमें।
(नारायण दासका प्रवेश)
नारा:-तुलसीदास ! सत्य ही तुम्हारी संगीतमें एक अपूर्व
मूर्च्छना रहती है। जब तुम एकाग्रचित्त होकर गाने लगते हो
तब ऐसा ज्ञात होता है कि, तुम्हारे संगीतकी स्वरलहरी हृदयके
प्रत्येक स्पन्दन एक अद्भुत लहर खिला देती है।
तुल:-भाई ! यह तुम अपने गुणग्राहकताका परिचय द हे रहो
नहीं तो मैं कोई संगीतज्ञ नहीं. मैंने कहीं संगीतकी विधिपूर्वक
शिक्षाभी नहीं पाई. यह केवल मेरे प्राणके उद्गार है जो कुछ जीमें
आता मैं वही गाता रहता हूँ।
नाराः-तुलसी! तुम निश्चय ही एक समय अपनी इस स्वर
लहरीसे समस्त भारतवर्षके हृदयमें एक आनन्दका स्रोत बहा
दोगे. जाऊँ, आरतीका समय हो गया।
(प्रस्थान)
तुलसी:-गुरुदेवने पहले मेरा नाम रामबोला रखा था-हे
राम ! तुम आशीर्वाद दो कि, मेरा जीवन राममय हो. राम ! मैं
बडा अभागाहूं-गुरुदेवके मुखसे सुना है कि, मेरे जन्मते ही पिता
माताने मेरा परित्याग कर दिया. नहीं मालूम कौन हैं वे पितृदेव
और कौन है वे मातृदेवी-न जाने वे अभी तक जीवित हैं अथवा
नहीं ? दयामय राम रघुवीर ! सुना है-तुम बड़े दयालु हो अनायोंके
नाथ हो-राम ! तुम मुझे कब दर्शन दोगे ? मैं तुम्हारा नवदूर्वा.
दल श्याम रामरूप देखकर कब कृतार्थ होऊंगा? आभो प्रभू
तुम्हारी सुन्दर मोहनमूर्ति लेकर एकबार मेरे सामने आभो। मैं
नयन भरके तुम्हारा अपूर्वरूप देखू ।
"

तुलसीदास, गाना। दे दे दर्शन राम ! अभागा हूँ मैं दर्शण अभिलाषी। तुम्हारा लूँ मैं केवल नाम, तुम हो सब गुणोंके राशी। सुना है हमने राम ! तुम नहीं किसीपर बाम । जो लेता तुम्हारा नाम, तुमहो उसके अन्तरवासी ॥ (प्रस्थान) (नरसिंहदास बाबाजी और नारायणदासका प्रवेश) नारा:-गुरुदेव ! आपने कईबार कहा है कि, तुलसीदास महा- पुरुष हैं. भगवत्कार्यके लिये ही उनका जन्म हुआ है. तब क्यों प्रभू उसका विवाह कराकर उसे संसार आश्रममें भेज रहे हैं। नरसिंहः-क्यों पुत्र ! संसार आश्रमको क्या तुमने इतना नीचा समझ रक्खा है ? इस आश्रममें रहकर क्या भगवत्प्राप्ति नहीं होती? नारा:-नहीं गुरुदेव! मेरे कहनेका यह तात्पर्य नहीं है-मेरे कहने- का केवल यही अर्थ था कि, तुलसीदासको ऐसे कठोर परीक्षामें न डालकर यदि संन्यास दे दिया जाता तो क्या हानि थी ? नरसिंह-नहीं पुत्र ! तुळसीदासको गृहास्थाश्रम देखनेका विशेष प्रयोजन है। जो पृथ्वीका उपकार करने आये हैं उनको संसार आश्रमको भी अच्छी तरह देख लेना चाहिये. जिससे कि, वे संसारक्लिष्ट व्यक्तिके दुःख-कष्टको भली प्रकार समझ- सकें और उनके दुःखोंको दूर करनेमें समर्थ हो । अच्छा जाओ. सुलसीदासको मेरे पास मुलालाभो। (नारायण जाकर तुलसीदासको साथ लेकर आता है तुलसीदास प्रणाम करते हैं) नरसिंह:-कल्याण हो। पुत्र! मैंने भवतक लालन पालन किया है यथासाध्य शिक्षा भी दी है. अब मेरी इच्छा है कि, तुम्हारा २५ . तुलसीदास विवाह कर तुम्हें संसार आश्रममें प्रवेश कराऊँ। मैंने एक ब्राह्मणको प्रतिश्रुति भी दी है कि, उनकी कन्यासे तुम्हारा विवाह करूंगा। तुलसी:-प्रभू! आपहीका दिया हुभा यह प्राण है-नहीं तो आज संसारसे तुलसीदासका अस्तित्व विलीन हो जाता, आपका आदेश मेरे लिये ईश्वर आदेशके समान है। नरसिंहः-ईश्वर तुम्हारा मङ्गल करें-पुत्र ! मेरा कर्तव्य तुम्हारे प्रति जहाँतक मुझसे हो सका है मैंने विचारा अब मैं तुम्हारे विवाहके पश्चात अन्यत्र जाऊंगा। तुलसीः-तब क्या प्रभू आप हमको छोड जायग ? मैं अपने पिता-माताको नहीं जानता, न कभी उन्हे देखा है. मैं जन्मसे पित मातृहीन हूँ परंतु देव! आपके स्नेहसे मैंने कभी उनका अभाव अनुः भव नहीं किया. आपको ही में अपना पिता और आपको ही मैं मांताके समान देखता हूँ. पिताकी भांति आपने मुझे शिक्षा दी मेरे उपनयन आदि संस्कार किये और आपने ही माताकी भांति मेरा लालन किया. मेरी छोटी छोटी आवश्यकताओंका अनुभव कीया और अब आप हमै छोड़ जायेंगें क्या देव! फिर मुझे द्वितीयवार पितृहीन होना पडेगा. नरसिंहः-धैर्य धरी पुत्र ! व्याकुल मत होओ समय आयगा तब फिर मेरा तुम दर्शन पाओगे। तुलसीदास- नाम तुम्हारा एक दिन होगा प्रचारित समस्त भारतमें। करता हूँ आशीर्वाद । रहे मति, रघुवीर पदमें सदा। - 0 --- तुलसीदास तुलसी:-आज्ञा गुरुदेवकी है सिरोधार्य, रहे मति मेरी रघुवीरपदमें सदा, हो सकल आशीबाद आपका। नरसिंह:-आओ पुत्र ! गीता पाठका समय हुआ. तुलसी:-नलिये प्रभो. (दोनोंका प्रस्थान) प्रथम अङ्क-सप्तम दृश्य. ( दीनानाथ पाठकका गृह ) ( रत्नावली गाते हुए नजर आना.) गीत- सार इस संसारमें, राम बिन कुछ भी नहीं खेल मिट्टीका है सव और सार है कुछ भी नहीं। श्यामरूप राम है एक आराम सब संसारका वह नाम जिसकी है जपमाला उसको भय कुछ भी नहीं। आते जाते हैं अनेक, नरनारि इस नरलोकमें क्या काम उनको है यहाँ, पूछो खबर कुछ भी नहीं ॥ (चन्द्रावलीका प्रवेश) रत्ना:--मेरे मुखकी ओर एकदृष्टिसे क्या देखकर क्या सोच रही हो? चन्द्राः-क्या सोच रही हूँ ? सोच रही हूँ कि, दो चार दिन बाद जब तुम्हारी विवाह हो जायगा तब कहाँ रहेंगे तुम्हारे राम, और कहाँ रहेगी तुम्हारा यह रामभक्ति? तब राम सुहागिन पति- सुहागिन बन जाओगी। रत्ना:-भला सखी ! तुम सदा मुझे यही बातें कहाकरती हो. अच्छा, क्या संसार में सिवाय विवाह के क्या कुछ काम ही नहीं है?

तुलसीदास
रामके संसारमें आकर रामका भजन करो-रामका नाम
करो रामका...
चन्द्रा:-बस रहन दीजिये पंडिताइनजी-रामका कुछ कार्य
अपने उन पतिदेवके लिये भी रख छोडिये नहीं तो वे बिचारे क्या
लेकर रहेंग?
रत्ना:-नहीं सखी ! सच कहती हूँ कि, जब कभी मैं अपने
विवाहकी बात सुनती हूँ तब न जाने किस कारण मेरा हृदय
भीतर ही भीतरसे उठता है-मानो कोई मेरा जीवन पतिके साथ
संसार करनेके लिये बना ही नहीं है।
चन्दाः-चाते बनाना तो खूब आगया है,अच्छा देखा जायगा.
समय आनेपर सब मालुम हो जायगा तुम मुझसे ही छिपाती हो
एक तो ठहरी मैं तुम्हारीभावज और उसपर सखी फिर भी अपने
हृदयफो मुझसे छिपाओगी?
रत्ना:-चुप ! चुप !! अम्मा आरही है।
(रत्नावलीके माका प्रवेश)
चन्द्रा:-माँ ! सखीके व्याहका क्या हुआ ?
रत्नाकीमाः-सब ठीक होगया है. बेटी ! बाबा नरसिंहदासके
शिष्य तुलसीदाससे संबंध ठीक हो गया है अब शीघ्र ही व्याहकी
तय्यारी होनेवाली है. वे गाँवके और घरों में संवाद देनेगये हैं अब
आते ही होंगे. मैं बेटी ! पूजा करनेजाती हुँ.तू जरा देखती रहना.
वे जब आवे तो पैर धोनेको पानी तानी देदेना ।
चन्द्रा:- अच्छा मां. (रत्नाके माका प्रस्थान)
लो सखी, भव तो तुम्हारे देवता आरहे हैं हृदयका आसन खूब
फूलोंसे सजाकर उनके लिये विछा रखो.

२८ तुलसीदास -- - (ग्राम्य बालिकाका प्रवेश) १ बालिका- क्यों सखी, अब काहेको बोलोगी? व्याहकी बात चीत तय होगई और हमसे कहा ही नहीं । दूसरी बालिका-क्यों सखी ! दो पूरी लड्डू खिलानेसे डर गई क्या? तीसरी बालिका-नहीं नहीं, इन्हे डर था कि, कोई रत्नाव- लीके रत्नको छीन न ले। सब सखियोंका गाना. उदय सखाके भाग्यगगनमें होवेगा अब नया तपन । उसी उषाकी मोहन रागसे रंग जायमा तारा गणन। उठो उठो बाला अब पहँनो नूतन नूतन आभूषन । हवा मृदु मृदु आयेगी-पपिया प्रभाती गायेगी फुले फूल सौरभसे व्याकुल होजावेगा सखीका चिकन । ओस लगी झरने चुमें रविकी किरणें कमलनेभी आंखे खोली पाकर उसका प्रियचुम्बन । तुम भी उसको देखो देखकर खोलो अपने कमल नयन॥ ( गाते गाते सब रत्नावलीको लेकर जाती ह) प्रथम अङ्क-अष्टम दृश्य. (पथ) ( लक्ष्मीका गातेहुए प्रवेश) गीत. तोडत कभी कभी बनावत नहीं कछु ठिकाना । फिरत साथ पथ विपथ पर पकडत हाथ तुम्हे न चीन्हा न जाना।

२९. तुलसीदास ललाटपट पर काल रेखा लिपि आखर किसने देखा। नहीं नामधाम चलत अविराम नित सुबह श्याम आना जाना। प्रथम अङ्क-नवम दृश्य. तुलसीदासका गृह.) ( रत्नावली और तुलसीदास) रत्ना:-अच्छा, तुम दिन रात मेरी मुखकी ओर क्या देखा करते हो ? जबसे व्याह हुआ है तबसे तो मैं एक दिनके लिये भी तुम्हारे पाससे कहीं गई नहीं फिर भी क्या मुझे देखनेकी लालसा तृप्त नहीं हुई ? तुलसी:- जाने तुम्हारे रूपकी क्या मोहिनीशक्ति है ? जितना मैं तुम्हे देखता हूं देखनेकीइच्छा उतनी ही बन्ध जाती है प्रत्येकबारही नूतन सौन्दर्य तुममें आविर्भूत होकर मुझे मुग्ध कर देता है। रत्नाः-छिः, ऐसी बातें अब मत कहा करो। हम कोई नवीन- दम्पति तो है ही नहीं कि, दिन रात आमने सामने होकर कपोत कपोतीकी भांति बैठे रहें । लोगवागोंको मालूम होनेसे वे निन्दा करेंगे-तुम्हारी हंसी उड़ावेंगे, तुम्हे बैण कहनेसे मुझे बड़ा कष्ट होगा। तुलसीः-लोगवागोंकी चिंता मुझे नहीं है रत्ना ! तुम मेरी आँखोंकी ओट मत हुआ करो. तुमको देखनेसे मैं सब भूल जाता हूँ । मेरा प्राण आनन्दसे नृत्य करता रहता है।

३०
तुलसीदाम,
रत्नाः-अच्छा जाने दो इन बातोंको. देखो मेरी एक मानो.
मुझे एक बार मायके भेज दो बहुत जल्दी लौट आऊंगी... बहुत
जल्दी...
तुलसी:--नहीं नहीं रत्ना ! ऐसी बात मत कहो यहाँ तो तुम्हे
कोई कष्ट नहीं होता है फिर क्यों ऐसी बात कहती हो क्यों मुझे
छोड जाना चाहती हो?
रत्नाः--ए यह क्या कह रहे हो, मैं तुम्हे छोड जाना चाहती
हूँ ? पिताजीको माताजीको बहुत दिन देखा नहीं है इसीलिये
एक बार मायके जाना चाहती हूँ. प्रभू ! मना न करो. केवल दो
दिनके लिये मुझे जाने दो. सच कहती हूँ दो दिनसे अधिक वहाँ
नहीं रहुंगी।
तुलसी:-मैं तुमसे विनय करता हूँ-रत्ना! मुझे छोड़कर तुम
मत जाओ तुमको न देखनेसे मेरी दशा बिगड जायगी। रत्ना !
तुमको सत्यही चाहता हूँ बहुत चाहता हूँ तुमको एक पल भरके
लिये छोड़ना मेरे लिये संभव नहीं! प्यारी' (हाथ पकडकर ) तुम मेरे
सामने कहीं जानेकी बात मत कहा करो। मुझे बड़ा कष्ट होता है।
अवगत नहीं है प्रिये, मेरे हृदयका भाव
इसी लिये कहती हो तुम बार बार
जाओगी पितालयको।
जानती नहीं हो सती बद्ध होकर मैं
प्रेम पाशमें तुम्हारे,
फिरता हूँ मैं दिनरात सम छायाके ।
आनन्द-दायिनी हो तुम,
अपार सौन्दर्यने तुम्हारे,

३१ तुलसीदास भेदकर यह नयन; स्थान लिया है अन्तःस्थलमें। सौन्दयर तुम्हारे देखो- भूमण्डल हुआ है आगार सुषमाका । जिधर फेरता हूँ नयन मैं उधर देखता हूं केवल बस, छवि तुम्हारे सौन्दर्य्यकी सौन्दर्यसे तुम्हारे मुग्ध है मन, स्तब्ध हो रहा है प्राण! सभी है सौन्दर्य आगार जब तक तुम हो सुन्दरी उपस्थित मेरे समीप। उज्वल है सब, मधुर सब है तुम्हारे सन्मिलनसे। विरहसे तुम्हारे बुत जायगा दाप जगत् संसार जायगा डूब सब अंधकार में। अन्धकार अन्धकारमय होजायगा मेरा हृदय- - प्राणहीन होजायगी देह तुम्हारे कंतकी।

३६ तुलसीदास चन्द्राः-अरी सखी ! यह सब मेरी करतूत थी. मैं जानती थी कि, दुबेजी तुमको नहीं भेजेंग-अब देखो ना ! जब दुबेजी घर लौट कर तुम्हे नहीं देखेंगे तो कैसा मजा होगा? रत्ना:-तब क्या सचमुच उनकी बिना आज्ञाके ही मुझे ले आये हैं। चन्द्रा:- ले आये हैं तोहुआ क्या? दो दिन रहकर चलीजाना। अच्छा जाऊं देखू. तुम्हारे भाई देवता क्या कर रहे हैं ? नहीं तो कहीं नाटक शुरू कर देंगे तो मुश्किल हो जायगी। (प्रस्थान ) रत्नाः-यह स्वामीका प्रेम है अथवा मोह... यह एक समस्या. यदि यह मोह है तो मैं उस मोहको दूर करूंगी मैं सहधर्मिणी हूं. मेरा कर्तव्य उनको सुमार्गपर चलाना है । अरे यह क्या ? यह तो वे ही आरहे हैं. ( तुलसीदासका प्रवेश) तुलसी:-रत्नाः तुमको इतनी बार मना किया कि, मुझे छोड़ कर कहीं मत जाना. फिर भी तुम चली आयी जानती हो रत्ना तुमको छोड़कर मैं एक पलभर भी नहीं रह सकता फिर क्यों मुद्दे कष्ट देती हो? चलो मेरे साथ घर चलो रत्ना ! रत्ना:-तुमको कुछ लाज भी नहीं आती क्या? अभी तो आ ही हूँ. छिः ! अभी जानेसे सब हंसी करेंगी. आज रहनेदो, कल घर चलूंगी। तुलसीः-रत्ना ! तुमको पाकर मैंने लजा धर्म कर्म सब त्या दियाह-सब जानेदो-कोई क्षति नहीं है-केवल तुम मेरे पास रह धस. उसीसे मुझे तृप्ति है चलो रत्ना! घर चलो। रत्ना:-क्या कहा मैं सामान्य रमणी, और मेरे लिये तुमनेध कम सब त्याग दिया। स्वामी, क्या सत्य ही यह तुम्हारा प्रेम नहीं नहीं नाथ ! यह केवल तुम्हारा एक मोह है। स्मरण करो

तुलसीदासे,
म्वामी : एक वह दिन था जब तुम दिन रात रामनामसे मन
होकर सबको रामगुणगानसे मोहित करते थे सर्वदा तुम रामके
भ्यानमें मग्न रहते थे, परंतु एक सामान्य रमणीके मोहमें पड़कर
मुम्हारी ज्ञान भक्ति सब तुम्हारे पाससे चलीगई और तुम एक
मिट्टीके बनेहुए देहके पीछे २ घूमकर अपना परलोकतक भूलनेको
उद्यत हो. स्वामी! यही प्रेम यदि तुम अपने रामको समर्पण करते तो
भब तक तुम्हे श्रीरामचन्द्रजीका दर्शन भी मिल गया होता.असार
संसारमै नाथ ! सार वस्तुका अन्वेषण करो. मेरा यह मिट्टीका देह
दो दिन बाद मिट्टीमें मिल जायगा.
तुलसी:-कौनहो तुम ज्ञानदात्री देवी ? हाय-मोहसे अंधा
होकर मैंने यह क्या किया?.गुरुदेव! गुरुदेव!! कहाँ हो तुम-रक्षा करो
मुग्ध होकर इतने दिन
मोहके कुहकमें पड,
था मत्त मैं छार रमणीके प्रेममें ।
अंध सम हाय
सोचा था मनमें,
भोगही है सरर जीवन का.
सार वस्तु, भोग बिन
कुछ नहीं संसारमें।
आया था किस कामसे
मैं कर बैठा हूँ क्या?
हे राम! हे कृपामय राम!!
गति हो तुम अगतिके,
क्षमा करो देव! त्राहि त्राहि

तुलसीदास
--क्षमा करो।
कर्मके दोषसे
हुआ नहीं रामदर्शन मेरा,
विफल गया यह जन्म
होगया मूल्यहीन यह प्राण ।
पतित-पावन हे राम
हो तुम सब गुणोंके धाम ।
अपराध क्षमाकर इस दासका,
पकडलो मेरे बाहोंकों,
लेचलो लेचलो
दिखाओ पथ मुझे ॥
( जाना चाहता है-रत्नावली पैर पकड लेती है)
रत्नाः--ठहरो नाथ ! मत जाओ, मत जाओ, दासीके रूक्ष
वाक्योंको क्षमा करो-मैंने तुम्हें संसार त्यागनेको नहीं कहा-तुम
ससारमें बैठकर ही रामका गुण गाओ. क्षोभ मत करो स्वामी
तुलसो:-तुम्हारे उपदेशसे मेरी आंखें खुलगई, मोह अन्धकार
सब कट गया कहाँ राम कहाँ राम ? जाऊँ रामको खोजें ।
रत्नाः-स्वामी ! मेरे प्रति निर्दयी न होओ.मैं तुम्हारे बिना कैसे
जीवन बिताऊगी? मेरा अपराध क्षमा करो. मैं अभी तुम्हारे साथ
चलती हूँ.
तुलसीः-रत्नावली! तुम्हारे निकट में चिरकृतज्ञरहूंगा. तुम्ही
मेरी यथार्थ सहधर्मिणी हो. देवी ! मेरे ज्ञानचक्षु तुमने खोलदिये हैं.
अब मुझे वृथा मोहमें आबद्ध करनेकी चेष्टा मत करो। (स्वगत )
चलो मन ! चल्लो नयन ! चलोरामके दर्शन करने चलो ( प्रस्थान )

तुलसीदास रत्नाः-एं चले गये. सत्य ही अभागिनको छोडकर चलेगये क्या करूं? जाऊं उनको पकडकर लौटा लाऊँ. राम ! मेरी छाती फटी जा रही है --मेरे स्वामीको मुझसे न छीनो-नहीं नहीं... जाओ नाथ- जाओ रामदर्शनको। सहधर्मिणी हूं मैं, नहीं होउंगी विघ्न पथमें तुम्हारे, दूगी बलिदान मैं क्षुद्र अपने स्वार्थको। आजसे होऊंगी निमम मैं ध्यानमें पतिदेवके रघुबीर-दयामय राम यदि होऊं मैं पतिव्रता, यदि सत्य ही हो तुम अवतार विष्णुके तो निश्चय ही पावेंगे दर्शन तुम्हारा मेरे पति, निज भक्तिके प्रभावसे। ( रत्नाको तुलसीदासका उज्ज्वल चित्र रामायण लिखते हुए दिखाई देना श्रीराम आशीर्वाद ) ड्राप.

तुलसीदास,
अंक दूसरा।
सीन १ ला.
( पथ-काशीप्रांत एक बेरका पेड )
(नारायण)
लक्ष्मीका गीत.
हे राम करुणामय !
तुम्हे कौन कहता दयामय.
किसीको बनाया धनधान्यसे है सौभाग्यवान ।
अनंत दुखसे भर दी छाती मेरी तृने हा ! भगवान ॥
क्या बिगाडा था मैंने तेरा हे राम महिमामय !
दुखकष्टसे श्रांतकर तू स्वयं बना पाषाणमय ।
(नारायणदास और गोवरधनदासका प्रवेश.)
गोवरधनः-भाई ! मुझे तो ऐसा मालूम हुआ था कि, अब
तुलसीदास सँसारमें फँसा ही रहेगा । सम्पूर्ण स्त्रैण होकर भी
गुरुदेवकी कृपासे वह पूर्ण विरागी हों गया.
नारायणः-भाई'गुरुदेवकी वाणी कभी मिथ्या नहीं होसकती.
चलो अब हम निश्चिन्त हो गये. सुना है तुलसीदास अभी काशीम
ही है। चलो, हो सके तो उससे साक्षात् करें ।
गोवरधनः-.चलो.
(तुलसीदासका गातेहुए प्रवेश.)
(हो तुम ) पवित्रताकी खान
हे राम हे राम हे राम हे राम
-

तुलसीदास अपवित्र मैं हे नाथ हूं तुम हो पवित्रता संस्पर्शसे तुम्हारे मोहे पवित्र करो रे पतित पावन हो तुम पतितोद्धारो रे गाऊं मैं तेरा गान तेरे गानमें करूं स्नान देओ २ दर्शन दान अब भी रह रहकर पूर्व स्मृतियां मनमें जाग उठती हैं। अभी भी वे पुरानी बात कभी कभी याद आजाती है। रघुनाथ ! नहीं जानता, किस प्रकार इस पापमन द्रारा तुम्हारी चिंता करने में समर्थ होऊंगा.? दयामय ' तुम्हारी दया न होनेसे मेरा कोई उपाय नहीं होगा। प्रभू अगतिके गति हो तुमः मेरा सर्वस्व लेकर भी मेरी रक्षा करो. देव, मेरा जीवन राम-मय बना दो । मैं तुम्हारी शरणागत हूं. भगवन् ! मुझे अब मायामें बद्ध न करना (बेरका पेड देखकर ) ए, आज तो बड़ी भूल गई । नित्यही शौचाविशिष्ट जल इस वृक्षके तलेपर डालता हूं, और आज शौचा- दिसे परागत होगया परंतु जल डालना तो बिलकुल भूल गया । से सामान्य कार्यका संकल्प करके भी जब भूल जाता हूं तब महत महत् कार्यका सम्पादन किस प्रकार करूंगा. (पेडसे एक प्रेतका आविर्भाव ) प्रेतः-गोस्वामीजी ! आज आप ऐसे चिंतित क्यों हो रहे हैं ? नित्य आप मेरे इस वृक्षतलपर जल सेचन करते हैं इस कारण भापपर में अत्यंत संतुष्ट हूं-आप अभीष्टवर प्रार्थना करिये. तुलसीः-कौन हैं आप ? यदि आप मुझपर संतुष्ट हैं तो मुझे रामदर्शन करा दीजिये। प्रेतः-यदि इतनी क्षमता मुझमें होती तो मैं आज प्रेत-- मोनिसे उद्धार पाजाता-और कोई करप्रार्थना करिये गोस्वामी !

४२ तुलसीदास, तुल:-नहीं मेरी और कोई भी इच्छा नहीं है। :-अच्छा, मैं आपको एक उपाय बतासकता हूँ जिससे आपका अभीष्ट पूर्ण हो । कर्णघण्टा घाटपर नित्य रामायण पाठ होता है. रामनाम सुननेके कारण भक्तचूडामणि महाबीर एक वृद्ध ब्राह्मणके वेशमै प्रत्यह वहां उपस्थित होते हैं. यदि आप उनक शरणागत हों तो आपकी मनोकामना अवश्य पूर्ण होगी। तुल:-परंतु मैं उन्हे कैसा पहँचानूंगा. वहां तो कितनही वृद्ध ब्राह्मण आते होंगे। प्रेत:-वे सबके पहले आते हैं और सबसे पीछे जाते हैं। (अन्तर्ध्यान ) तुल:--अब यहां बिलम्ब करनेका प्रयोजन नहीं। जाऊं कर्ण घंटा घाटकी ओर जाऊं । दयामय राम ! कृपा करो. प्रभू !'तुम्हारी कृपासे मैं तुम्हारे भक्तको पहँचानसकुँ-देखना देव, वे मुझसे कहीं छलना न करें । परमात्मा मुझे निराश न करना (प्रस्थान ) (सीन ट्रान्सपर) (पथ) ( महावीर वृद्ध ब्राह्मणके वेशम और पीछे पीछे तुलसी दास.) महावीरः -(स्वः) यह स्थान मेरा परम प्रिय है यहांका प्रत्येक रजकण भी मेरे लिये परम पवित्र है. यहां मेरा प्राणाराम राम- नाम होता है ( पीछे घूमकर ) कौन हो जी तुम-क्यों मेरे साथ साथ आरहे हो? तुलसी:-महात्मन् ! मुझपर कृपा करिये. मैं रामदर्शनका अभि- लाषी हूं। महा:-कल्याणहो वत्स ! परंतु मैं एक बूढ़ा ब्राह्मण, मेरे द्वारा किस प्रकार यह संभव है कि, मैं तुम्हें रामदर्शन कराऊ । देखो तुलसीदास को यहां अनेक साधू महात्मा पाओगे उनसे कहो तो कदाचित् कोई उपाय... तुल:-( पैरोंपर गिरकर ) देव ! मैं जान गया हूं-आप स्वयम महावीर हैं। मुझसे छलना मत करो प्रभ ! जबतक आप मुझपर कृपा न करेंगे मैं पैर नहीं छोडूंगा। मैं सबको देखनेके लिये अत्यंत व्याकुलहुआ हूं-आपके बिना कौन मेरी कामना पूर्ण करेगा? देव दिखाइये स्वामी एकवार वह नवजलधर श्याम रामरूप, एक बार नयन भरके देखू मेरी कामना पूर्ण करो महात्मन् ! महा:-(स्वमूर्ति धारणकर) आंहा कहांसे पाई है? तुमने ऐसी मनो हर कामना भाग्यवान् : किसने सिखाया है तुम्हें ऐसा व्याकुल आह्वान ? जो मेरे रामको चाहता है वह मेरा भी भक्तिका पात्र है-तुम मेरे रामको देखोगे. आओ वत्स! मैं तुम्हें शिवमंत्रसे दीक्षित करूंगा (कानमें मंत्रप्रदान) इस मंत्रका चित्रकूटपर जाकर साधन करो तुम्हारी कामना छः मासके भीतर ही पूर्ण होगी.जय सीताराम (अन्तर्ध्यान) तुलसी:-यह क्या, आनन्दसे मेरा सारा देह रोमाञ्चित हो रहा है। जिनके दर्शन पानेकी आशाम ही इतना आनन्द है न जाने उनके दर्शन प्राप्त होनेपर कितना आनन्द होगा ? हाय हाय ! म इतने दिन इस आनन्दसे वंचित होकर छार नारीके प्रेममें मग्न था । दयामय राम ! तुम्हारे भक्तकी कृपासे आज जो आनन्द मैंने प्राप्त किया है. देखना रघुवीर ! कहीं वह नष्ट न हो जाय । चलो मन ! श्रीराम पादस्पर्श पूत चित्रकूटको चलो। ( दण्डीरूपी महादेवका प्रवेश ) महा:-कहिये गोस्वामीजी ! इस प्रकार आन्दन मग्न हो पुल- कित चित्तसे कहाँ जा रहे हैं ? तुल:-नमो नारायण ! चित्रकूट जानेका विचार है प्रभू !

तुलसीदास ! महा:-पुण्यक्षेत्र काशीधाम त्यागकर चित्रकूट जानेका कारण? तुल:-रामदर्शनेच्छासे जा रहा हूं प्रभू स्वयम् महावीरने मुझे शिवमंत्रसे दीक्षितकर चित्रकूट जानेकी आज्ञा दीहै और कहा है छः मासके भीतरही (मु) तुझे रामका दर्शन मिलेगा। महा:- क्या कहा ? तुम्हें शिवमंत्रकी दीक्षा मिली है और तुम जा रहे हो रामदर्शनेच्छासे. महावीरजीने अवश्य छलना की है. रामका दर्शन तुम्हें नहीं मिलसकता, व्यर्थही चित्रकूट जानेसे कोई लाभ नहीं। तुलसीः--कौन हैं आप? मेरे गुरुवाक्यपर सन्देह कर रहे हैं । मुझे दृढ विश्वास है कि, शिवमंत्रसे अवश्य मेरा इष्ट पूर्ण होगा. जाइये महाशय ! वृथा वादानुवाद करनेकी मेरी इच्छा नहीं है, गुरुवाक्य कभी मिथ्या नहीं हो सकता। महा:-क्रोधित न होइये गोस्वामीजी : तुम्हारेही भलेक कारण कह रहा हूं। महावीरकी कृपासे शिवमंत्र प्राप्त कियाहै सो शिवधाम काशीजीमें बैठकर शिवनाम जप करो, शिवदर्शन मिलेगा. रामदर्शनका प्रयोजनही क्या है ? और इतना नहीं सम- अते कि, शिवमंत्रसे शिवही मिलेगा-राम कैसे पाओगे ? तुलसी:-महाशय! जानताहूं मैं कि, जो शिव है वेही राम हैं शिव और राम अभेद हैं तथापि कमललोचन रामरूप मुझे अधिक प्रिय हैं इसी कारण मैं रामदर्शनेच्छुक हूं। शिवकी कृपासे अवश्य मेरी वाञ्छा पूर्ण होगी। महा:-( स्वरूप धारणकर ) वत्स ! मैं तुमपर अत्यंत संतुष्टहूं. अच्छा, क्या अब भी मेरो बातोंका तुम्हें विश्वास नहीं होता ? तुलसी:-ए प्रभू : देवादिदेव ' स्वयम् दासका प्रणाम ग्रहण करिये. देव ! जब आपकी मुझपर कृपा है तब अवश्यही मेरी कामना पूर्ण होगी. श्रीरामकाही कथन है- 4. - तुलसीदास, जा पर कृपा न करें मुरारी। सो न पावे नर भक्ति हमारी॥ महा:-तुलसीदास : तुम्हारा शिव राम अभेदज्ञान देखकर यथार्थ ही मैं परम तृप्त हुआ हूं. जाओ वत्स ! तुम्हारी इच्छा शीघ्रही पूर्ण होगी. (अन्तर्ध्यान) तुलसी:-दीनदयालू देव! कितनी कृपा है तुम्हारी ? हूं मैं अकृति अधम! साधन भजन हीन होकरभी अनायाससे पाऊंगा दर्शन तुम्हारा, शीघ्र ही। कृपासे तुम्हारे होगा सफल जीवन मेरा। स्मरण कर करुणा तुम्हारी, हृदय हुआ है विगलित. विस्मय मन यह मन, मांग रहा है शरण- तुम्हारे अभय पद पंकज पर । दीनको दो शक्ति हे दीनानाथ ! जिससे गुणगाथायें तुम्हारी, सतत कर सकूँ जान । जय ! सिताराम । जय श्रीरामचन्द्र ( प्रस्थान ) --

तुलसीदास,
महा:-
(महावीरका प्रवेश)
अब होगी इच्छा पूर्ण,
होगा प्रचारित भुवनपर,
मेरा प्रिय रामायण-गान
.
अंक दूसरा-सीन २ रा.
( एक गांव दरिद्रब्राह्मण गरीबदासकी कुटिया )
गरीबदास,
गरीब:-नहीं अब परिवारवर्गको बचाना असम्भव है। आज
दो दिनोंसे बच्चोंको तोकिसी प्रकारथोडासा भोजन देकर बचारखा
है परंतु मेरे और मेरी स्त्रीके पेटम एक दाना भी नहीं पड़ा । इस
प्रकार भोजनविना और कितने दिन जीवित रहूंगा ? भगवन् !
यह मेरे कौनसे पापका दण्ड है. किस भीषण पापका यह परिणाम
यह दुर्गति है ? देव ! यदि सत्य ही मैंने कोई अपराध किया हो तो
मुझे दण्ड दो मैं हंसते हंसते सहूंगा परन्तु मेरे छोटे छोटे बच्चों और
मेरी स्त्रीको इस प्रकार उपवाससे न मारो ? अब नहीं सहाजाता
स्त्री पुत्रका यह अनशनक्लेश अब नहीं देखाजाता। पिता होकर
किस प्रकार संतानोंको भूखसे तड़प तड़पकर मरते देखूगा पति
होकर कैसे स्त्रीकी उपवासक्लिष्ट मृत्यू देखूगा ? क्या करूं ? कहां
जाऊ ! भिक्षा मांगकर भी उदरपूर्ति नहीं हुई, कोई भिक्षा नहीं
देता. बस अब मृत्यु ही प्रिय हैं।
(लीलादेवीका प्रवेश)
लीला:-क्या आप कुछ लाये हो? स्वामी! बच्चे भूखसे रो रहे हैं।
गरी:-रो रहे हैं- बहुत अच्छा रोनेदो. रोते रोते एकदम
नींदकी गोदम सोजाने दो.. वह नींद कभी टूट न पावे ।

तुलसीदास, लीला:-ऐसी अमंगलजनक बात मत कहो-जाओ नाथ ! कहींसे कुछ थोड़ासा भोजन लेआओ. उन्हें खिलाकर चलो आज यह गांव छोड़कर हम अन्यत्र चलंचलें । गरी:-वही करूंगा। लीला:-जाओ भाजके लिये कहींसे कुछ जुगाड़ करलाओ! फिर कहीं और देशको चल। गरीब:-ठीक कहा है लीला ! किसी और देशको चलगे ऐसे देशम चलेंग जहांसे कोई लौटकर नहीं आता। याद आरही आज उस समयकी बात जब पढ़ लिखकर विवाह किया था कितनी आशाओंसे भर रखा था इस हृदयको भविष्य गार्हास्थ्यसुखके स्व- प्रमें हम उस समय लीन रहा करते थे. वाह कैसे सुखकी गृहस्थी है आज मेरी. पिता होकर आज मैं संतानकी मृत्युकामना कर रहाहूँ। लीला:-तुम ऐस अधीर मत हो नहीं तो बच्चोंको बचाना कठिन होजायगा-- एक न एकदिन अवश्य भगवान् कृपा करेंगे। गरीबः-भगवान की कृपाका अन्न बाकी क्या है ? लीला ! शास्त्रज्ञ ब्राह्मण होकर भी आज मैं भीखकी झोली लेकर द्वारद्धार पर हा अन्न ! हा अन्न !! कहकर भीख मांगता फिररहा हूं फिर भी भीख नहीं मिलती अब और भी अधिक भगवानकी कृपा चाहती हो। जाओ भीतर जाओ कोई आरहा है। ( लीलाका प्रस्थान ) ( पडोसीका प्रवेश) पडोः-- :--क्या आज कुछ जुगाड़ हुआ ? गरी:-नहीं भाई ! आज बिलकुल निरुपाय हूँ. दो दिन अना- हारसे बीता है अब भिक्षाके लिये बाहर जानकी क्षमता ही नहीं है पडो:-फिर अब क्या किया जाय ?

" . तुलसीदाम, गरी:--अब और क्या करोगे ? भाई ! तुमने तो यथासाध्य सहायता कीहै । ज्ञातहोता है भगवान्की इच्छा नहीं है कि, हम जीवित रहें-अच्छी बात है उनकी इच्छा ही पूर्ण हो। पडो:- अधीर मत दो भाई : देखें कुछ जुगाड़की चेष्टा देखें । भगवान्ने मुझे भी तो ऐ..मार रखा है कि, अपने को ही पेट भर- कर खाने नहीं मिलता है। गरी:-रहन दो भाई : तुम अब हमारे लिये कष्ट मत झेलो। जब भूखों मरना ही निश्चित है तब दो एक दिनके आगे पीछेसे कुछ विशेष हानि नहीं होगी। पडोः-ऐसी बातें न कहो भाई : जबतक मुझ एक मुट्ठी खानेको मिलेगा तबतक तुम्हें भी उसमसे भाग दूंगा ( प्रस्थान ) गरी:-नहीं, नहीं अब और कष्ट मुझसे सहा न जायगा देख कहाँ है इस दुःखकी निवृत्ति ? अंक दृसरा-३ रा सीन. ( चित्रकूट, तुलसीदासका आश्रम ) तुलसीदास गीत । देहि हरिशरण मुझे तुम्हारि पङ्कजपद द्वय मैं हूं दीन नराधम तू है दीन दयामय । गयासुरचरणचिन्ह पितृलोक तारणजल तेरा स्वर्णभुवन धन्य सुरधुनिका सोहे पाय । तुलसीदास वा पद आश कोई पावे कोई निराश वा पद आश जो संन्यास संकटमें मिलाये।

तुलसीदास ४९ कहाँ प्रभू? तुम्हारा दर्शन तोअभी भी नहीं मिला । दिनके बाद दिन महिनेके बाद महिने निकलगये, परंतु कहां मेरी बासना तो पूर्ण नहीं हुई । मैं तो बड़ी आशासे तुम्हारी राह देख रहा हूं. प्रभू! राम ! मैं गुणहीन हूं परंतु तुम तो गुणनिधि दयामय हो । तुम तो सबकोकामना पूर्ण करते हो. देव ! गुरुदेवने तो कहा था छः मा- सके भीतर ही तुम्हारा दर्शन पाऊंगा वह छः मास भी तो भव समाप्त होने चले तब भी तुमने दर्शन तो नहीं दिया. राम ! देखना देव! तुम्हारे भक्तकी वाणीकहीं मिथ्या न हो? आओ प्रभो! आओ तुम्हारे दासकी सेवा ग्रहण करो। (शिकारी बालकोंके वेशमें राम और लक्ष्मणका प्रवेश) रामः--इधरसे ही तो हिरन दौड़ गया है। साधूजी ! इधरसे किसी हिरनको जाते देखा है ? तुलसी:-नहीं तो ( स्वगत ) आहा कौन हैं ये दो बालक ? देख कर हृदय पुलकित होरहा है। आंखें इनपरसे हटानेकी इच्छा नहीं होती। नहीं अब इन्हे नहीं देखूगा । एकबार इन आंखोंने मुझे नारीके रूपमें फंसा दियाथा. अब क्या ये मुझे बालकोंके रूपमें फंसाकर मेरे रामको भुला देगी ? परंतु कैसा सुन्दर है ? यह श्यामला बालक और यह गौर वर्ण...नहीं नहीं अब नहीं देखंगा राम ! राम !! मेरी रक्षा करो (चिन्तानिमग्न ) ( दोनों बालकोंका प्रस्थान ) (महावीरका प्रवेश) महाः वत्स तुलसीदास ! तुलसी:-कौन हैं आप-आहा देव स्वयम् कहां प्रभू मेरे राम कहां हैं? छःमास तो प्रायः समाप्त होने आये परंतु मेरा राम दर्शन तो नहीं हुआ? महा:-यह क्या कह रहे हो वत्स ! दयामय राम तो तुम्हारे निकट आये थे, तुमने तो उनका दर्शन प्राप्त किया है।

तुलसीदास तुलसी:-नहीं प्रभू ! मुझे उनका दर्शन नहीं मिला। महा:-अवश्य तुमने उनका दर्शन किया है। प्रभू मेरे मृगयाके वशसे लक्ष्मणके साथ तुम्हारे समीप अभी तो आये थे तुलसीः-ऐं वे ही मेरे राम लक्ष्मण थे ? हाय अन्धे नयन ! तुमने देखकर भी नहीं पहचाना? देव ! अब मेरा क्या उपाय होगा? मैं तो अन्ध हूं प्रभू! हाय राम! महा:-दुःख न करो तुलसीदास ! मैं तुम्हें वर देता हूं तुम फिर राम दर्शन पाओगे । जाभो वत्स ! मन्दाकिनीके तीर राम- घाटपर जाओ वहां तुम्हारी अभिलाषा पूर्ण होगी। ( तुलसीदासका प्रस्थान) अंक दूसरा-४ था सीन. (चित्रकूट मन्दाकिनीतीर-रामघाट-ध्यानमग्न तुलसीदास-संतगण विराजमान. विमानपर देवता और देवीगण- देव! सौन्दर्यमय परम रमणीय, प्रकृतिकी लीलाभूमि पूण्य क्षेत्र चित्रकूट देवतागणोंका बड़ा ही प्रिय स्थान है। त्रेतामं जब भगवान् श्रीरामचन्द्रजीने नरदेहसे चित्रकूट में अवस्थान किया था उस समय देवतागण उनकी लीला देखने के लिये पशुपतिके रूपसे यहां विचरण करते थे। आज वही भक्तवत्सल भगवान् नवदू- दिल श्याम रामरूपसे अपने प्रियभक्त तुलसीदासको दर्शन देने आरहे हैं। भक्तके भगवानकी मधुर लीला सन्दर्शनकी आकांक्षासे श्रीरामपादस्पर्शपूतपवित्र चित्रकूटमें हम समागत हुए हैं। चलो सब श्रीरामगुणगान करते करते अंतरिक्षमें अवस्थान कर हम भगवतलीला दर्शन करें। देवीयोंका गीत । राम नाम गाओरे देव देवीगण, नरनारीगण, पशूपक्षीगण राम नाम गाओ रे तुलसीदास, बीना बिनन्दित सुरसे या अपनी अपनी डटसे बाहरसे हो या घरसे उच्चतान लगाओ रे राम नाम गाओ रे लीलामयकी, श्याम रामकी, मधुरनामको गुण गाथायें सुनाओ रे राम नाम गाओरे । तुलसी:--कहां हो करुणामय राम ! साक्षात् दर्शन देकर दासकी पूजा ग्रहण करो. नाथ ! भुवनमोहन श्याम दूर्वादलरूपसे आकर एकबार मेरे सन्मुख खड़े हो प्रभू ! मैं चन्दन तुलसीसे तुम्हारे श्रीचरणकमलोकी पूजा करके जीवन कृतार्थ करूं । (श्रीराम आविर्भाव) आही आगये ! आगये !! देव आगये !!! मेरे हृदयराज्यके सम्राट. उहरो उहरो दयामय ! मैं निर्वाक होकर तुम्हें देखू तुम्हारे देहको चन्दनचर्चित कर । (१ देवीका प्रवेश) एक देवी--( १ देवतासे ) स्वामी देवेन्द्र क्या कारण है कि, आप अमरधाम छोडकर अभीतक मर्त्यलोकम अवस्थान कररहे हैं. देवेन्द्रः- मर्त्यलोक भूल रही हो? इन्द्राणी यह इस समय मत्यलोक नहीं अमरलोक भी नहीं इस समय केवल यहएक अद्- भुतलोक अपूर्वलोक चमत्कारलोक भक्तलोक है वह देखो- चित्रकूटके घाटपैं, भई संतनकी भीड । तुलसीदास चन्दन घिसें, तिलक करें रघुवीर ॥ रामः-बस बस भक्त तुलसीदास ! अब और चन्दनकी आव- श्यकता क्या है ?तुम्हारे चन्दनके एक प्रलेपमें ही तो मैं आजी- वनके लिये बंध गया. वर प्रार्थना करो भक्त!

"
तुलसीदास
तुलसी-क्या वर प्रार्थना करूं देव ! मेरे सन्मुख ही मेरे
साक्षात् वर दण्डायमान है.
रामः-तुलसीदास! तुम संसारके मंगलके हित भाषामें रामा-
यण रचना करो.
( अन्तर्ध्यान)
तुलसी:-आहा क्या सुन्दर रूप है? देखकर आशा मिटती नहीं
है । इसीरूपसे सारा भूलोक सौन्दर्यमय हो रहा है । यह राम
वह राम चारों ओर राम पृथ्वी आनन्दनिकेतन हो रहा है ।
स्थावर जङ्गम सब आनन्दसागरमें मग्न हैं । धन्य हैं राम ! जै
राम! जै सीताराम !!
(प्रस्थान)
अंक दूसरा-५ वां सीन,
( मन्दाकिनीतीरके निकटस्थका श्मशान
गरीबदास--दरिद्र ब्राह्मण चिता प्रस्तुत कररहा
( पडोसीका प्रवेश)
पडोः यह तुम यहां क्या कररहे हो भाई ! ऐं! यह क्या? क्या
आत्महत्या करोगे?
गरीबः-फिर तुम क्यों इस समय मुझे बाधा प्रदान करने
आये हो ? अनेकवार अनेक उपकार किये हैं इस अंतिम समय
एक अंतिम उपकार करो. मुझे मरने दो, तुम यहांसे चलेजाओ।
पडोः-शांत हो भाई ! आत्महत्या न करो।
गरीबः-अनाहारसे मरना भी तो एक प्रकार आत्महत्या ही
है। तुमसे अनुरोध करता हूं अब मुझे कुछ न कहो।
पडोः-अभागे ब्राह्मण ! इस प्रकार आत्महत्या करनेसे
तुम्हारे स्त्रीपुत्रोंकी क्या दशा होगी ?
गरीब:-चुप रहो, चुप रहो. उनकी याद मत दिलाओ. मुझे
मरने दो-वे तो मरेंगे ही, परंतु मैं क्यों उलको अनाहारसे धीरे
है

तुलसीदास करो। धीरे मृत्युके ग्रासमें जातेहुए देखनेके लिये बचा रहूं । मुझे विरक्त मत करो-जाओ। पडोः-भगवन् ! दया करो, मेरे इस अभागे मित्रके प्रति दया (प्रस्थान) (तुलसीदासका प्रवेश) कौन है आप महापुरुष? किसी प्रकार इस ब्राह्मणकी रक्षा करिये यह आत्महत्या करनेपर उद्यत हुआ है। कृपा करिये महाराज ! नहीं तो इसकी स्त्री और संतानोंकी बड़ी दुर्दशा होगी। तुलसी: ब्राह्मण ! क्यों तुम आत्महत्या कर रहे हो ? क्या तुम्हें ज्ञात नहीं है कि,आत्महत्यासे बढ़कर और कोई पाप नहीं है। गरीब-कहांसे आखडे हुए आप, मुझे विरक्त करनेके कारण? आप साधू हैं संसार त्यागी हैं। आप संसारके दुःख कष्टोंको क्या अनुभव कर सकते हैं । निष्ठुर विधाता! अनाहार और उपवासका कठिन क्लेश देखकर भी तुम्हारी साथ अभी मिटी नहीं ? मरने आया हूँ उसमें भी तुम्हें हँसी करनेकी सूझी है। ( तुलसीसे ) जाइये साधू! आप अपनी रास्ता देखिये-मैं अपना संकल्प पूरा करूं मुझे भय दिखाना व्यर्थ है । मैं पापका भय नहीं करता। तुलसी: :- क्या तुम्हें अपने परिवारकी चिंता नहीं है । तुम्हारे आत्महत्या करनेपर उनकी क्या दशा होगी? गरीबः उसी चिन्तासे तो आज मरने आया हूं देव, नहीं तो क्या कोई शौकसे अपनी चिता अपने हाथसे सजाता है। तुलसी:-पवित्र ब्राह्मण कुलमें तुम्हाराजन्म,उस कुलकी अम- र्यादा मत करो ब्राह्मण सामान्य क्लेशसे पीडित आत्महत्याका महा- पातक मत करो. भगवान्के शरणागत हो. दयामय राम रघुवीरका सुमिरण करो. सब दुःख सब कष्ट सब क्लेश दूर हो जायेंगे. रामना- मके गुणसे परमशांति लाभ करोगे। आत्मविस्मृत मत हो ब्राह्मण .

तुलसीदास, गरीब:-क्षमा करना साधूजी ! ये सब बातें बचपनसे सुनता आया हूं । भगवान् दयामय कल्पतरु वे सबपर कृपा करते हैं । ये सब बातें पुस्तकोंमें ही भलीप्रकार शोभित होती हैं, परंतु कुछ कामकी नहीं. मैंने कातर होकर कई बार उनको बुलाया अनेक बार उनका विश्वास किया परंतु देव ! उसका क्या फल हुआ जानते हैं आप ? आज मैं अनाहारसे स्त्री पुत्रीसहित मरने बैठा अपनी चिता आज मैं स्वयं रच रहा हूँ। क्या सुन्दर नियम है भगवान्की अपार दया है उनकी हा ! हा हा !! हा !!! तुलसी:-क्या कहरहे हो उन्माद ! भगवान् सत्य ही दयामय हैं । सत्य उनकी दया अपार है । सामान्य अर्थके लिये उनके दया- मय नामपर कलङ्कारोप मत करो ब्राह्मण ! गरीब:--सामान्य अर्थ ! संसार त्यागी विरक्त संन्यासीअर्थका. गुण आप क्या समझगे ? जिसके पास अर्थ नहीं है उसके लिये संसार एक व्यर्थता है उसके लिये संसार है केवल यंत्रणाभूमि । साधू ! यदि कभी तुम्हारी प्राणापेक्षा प्रियतमा पत्नीअनशन क्लिष्ट मुखसे व्यथित हो नीरव हो तुम्हारे मुखकी ओर देखती होती. यदि कभी तुम्हारे छोटे छोटे आंखोंकी पुतलीसे भी प्रिय बच्चे क्षुधासे कातर हो " बड़ी भूख बड़ी भूख लगी है बडी भूख लगी है पिता" कहते कहते आंसूओंसे तुम्हारे पैरोंपर मानो जान्हवीकी धारा बहादेते तब समझते तुम साधू कि,सामान्य अर्थ कितना अ- सामान्य है । महापुरुष ! अर्थके कष्टसे आज मैं जर्जरित हो रहा हूं, आदरके प्रिय स्त्रीपुत्रोंको छोडकर आज मैं भाग आया हूं. यहां देखें चिताकी अनल मेरे चित्तके दावानलको शांत करता है या नहीं? जाइये साधूजी ! मैं आज चितासुंदरीका आलिंगनकर मेरे सामान्य अर्थका कष्ट दूर करूं। तुलसी:- आहा ब्राह्मण ! तुम सत्य ही दुःखी हो। मैं भी देखू तुलसीदास सत्य ही राम दयामय हैं. या राम ! राम ! पुकारो एकवार भक्ति- गदगद चित्तसे रामका ध्यान करो। गरीब:-अच्छा देखू एकवार बस यही शेष चेष्टा (बैठकर) राम! राम!! जय सीताराम !! (अकस्मात् श्मशानका अतिमनोरंजक बागमें बदलजाना) (सीता-रामका बालक बालिकाके वेशमें दौड़कर गातेहुए प्रवेश) द्वैत संगीत- रामः-चलो प्रिय चलो जल्दी कोई भक्त बुलारहा । सीता:-कहाँ कहाँ कहाँ कौनो (मेरी)छाती दहलारहा। रामः-क्यों प्रिय.क्यों हृदय तुम्हारा द्रवित क्यों हुआ, सीता:-कानमें कुछ कातर रव राम रमगया । आकर्षणमंत्रं कोई भक्त चला रहा दोनों 2. नाम सीतारामसे पत्थर जलारहा । सीता:-सब लेते रामनाम, रामः- पहले सीता फिर राम, सीताः-वाह वाह सीतापतिराम, रामः- या प्रेमिकाका राम, उभयः-रव फिर वही सीताराम कहीं कौन अकुलारहा रामः- चलो प्रिय चलो जल्दी कोई भक्त बुलारहा ॥ (प्रस्थान ) तुलसी:-आंखें खोलो वत्स ! गरीब:-ऐं यह क्या? यह क्या नन्दन कानन है अथवा अथवा... तुलसी:-वत्स! यह रामका कृपाकानन है ( एकपत्थर उठाकर ) यह लो वत्स ! यह दरिद्र-मोचन शिलाग्रहण करो,बोलोसीताराम ५६ तुलसीदास गरीबः-जयसीताराम ! जैसीताराम। महात्मन् ! महात्मन् !! अब मुझे शिला नहीं चाहिये. उससे मूल्यवान् रत्न मुझे आज मिल गया। तुलसीः-वह क्या ? गरीबः-वह नाम सीताराम. चलिये देव ! अब मेरा सब दुःख दूर होगया. जै राम ! जै सीताराम । अंक दूसरा-६ ठवां सीन. (आंगन.) (चन्द्रिकाप्रसाद) चन्द्रिका:-यह तो अच्छी आफतमें फंसगया; इधर रत्ना वि. चारी तड़प रही है उधर वह वेवकूफ़ तुलसीदास लंगोटी लगाये राम राम करता फिररहा है । अरे लंगोटी अगर लगाई तो फिर रामके क्या दरकार ? जब संसार त्यागदिया, भोग विलासभी तिलांजली देदी, कुछ मांगना वांगना है ही नहीं फिर रामसे क्या सरोकार ? इससे तो लंगोटी लगाकर अपनी प्रियतमांका ध्यान करना ही अच्छा है कि, लोगवागोंको सुनने में भी मजा आयें और देखने में भी अच्छा लगे। अरे आज कलके ज़मानेमें कहीं लोगोंको रामनाममें थोड़े ही मज़ा आता है ? आज कल तो कहीं प्रेमिक-प्रेमिकाका विवरण हो लगातार प्रिय-प्रियतमे प्राणवल्ल भोंकी आवाज हो कुटिल नयन चितवन नयनाकटारी-तीरे निगाह सरीखे अस्त्र हों दीर्घश्वासकी हवा प्रेमिकाके आंसूओंकी नदी पपियाका तान कोयलकी कुहक हो और उसपर बसन्त वर्षाका वहार हो धुंघराले बाल हों जुल्फ हों फिर तो कुछ लोगवाग जाने कि, हां साहब कुछ होरहा है नहीं तो भक्त भगवान् दयामय राम लंगोटा चिमटी कमंडल, अरे छिः छिः छिः, इतना समझाया तुल- सीदासको, परंतु कौन किसकी सुनता है ? लगे वही जै सीता- राम! जै सीताराम !! करने, चलो एक पत्र तो रत्नाके लिये दिया है सो न जाने उसमें क्या लिखदिया है ?

.
.
तुलसीदास,
(चन्द्रावलीका प्रवेश)
चन्द्राः-अरे आगये तुम, कब आये, क्या वे मिले थे क्या
कहा. उन्होंने लोट आयेंगे क्या तुम्हें देखते ही?
चन्द्रिकाः-उहरो ठहरो. तुम्हारे प्रश्नोंको लिख लूं. नहीं तो
याद नहीं रहेगा सब । धीरे धीरे बोलो. हां पहले क्या ?
चन्द्राः-जाओ तुम बहुत छेड़ते हो।
चन्द्रिका:-और तुम्हारा इरादा क्या है कि, मैं भी लंगोटा
बांधू ?
चन्दाः-रहन दो साधूजी ! अब कहो क्या कर आये ?
चन्द्रिका:-पहले पहल तो तुमको याद करते करते गये ।
चन्दाः-फिर वही?
चन्द्रिका:-अच्छा तो तुम्ही पूछो, बोलो क्या पूछती हो ?
चन्द्रा:-तुलसीदाससे मिले थे ?
चन्द्रिका:-नहीं, वह साधू होगये अब उनसे कोई गले नहीं
मिल सकता परंतु देखा तो उनको जरूर है।
चन्द्रा:-क्या देखा?
चन्द्रिका:-तुलसीदासको देखा।
चन्द्रा:-कैसा देखा?
चन्द्रिको:-मजेका।
चन्द्राः--देखो हाथ जोड़ती हूँ तुम्हारे सब हाल कहो रत्ना
बेचारी बड़ी उत्कण्ठित हो रही है ।
चन्द्रिका:-बात यह है कि, तुलसीदास अब पूरे बाबाजी बन
ये हैं । रामनाम करते हैं, बहुतसे चेला चपेटी भी इकट्ठे करलिये
दिनरात मस्त रहते हैं उन्हीके साथ ।
-

तुलसीदास
चन्द्रा:-तुम्हें देखकर क्या कहा ?
चन्द्रिका:-कहा- सीताराम ! बस उनके विचारसे तो
उसीमेमानो उन्होंने विश्वब्राह्मण कह डाला फिर इतना जरूर
कहा था कि, वे मुझे उस दशरथ राजाके कपूतोंसे मिलादेंगे ?
हाँ एक बात कहना भूल गया था, वे आजकल रामका जीपन
चरित्र लिख रहे हैं, जिसे महाभारत या गीता क्या कहते हैं न ? वहीं
वही उसमें जाने ग्यारह कि, तेरह सांड कि, कांड क्या रहेंगे।
चन्द्राः-तुम आजकल क्या पूरे नास्तिक हो गये ?
चन्द्रिका-नास्तिक काहेका ? मैं तो शीघ्र ही साधु बननेवाला
हूं उस महाभारतके सांड रामसे एकबार साक्षात अवश्य करूंगा
और कहो तो तुम्हारे आंचल में लाकर बांध दूंगा. सुबह शाम एक
एक बार देख लिया करना- बस रोटीका फिकर तो कमसेकम
रहेगा ही नहीं, उस सांडके साथ में भी सांड बनकर.घूमा करूंगा
ही यह लो तुलसीबाबाने एक पत्र लिख दिया रत्नाके लिये.
(पत्र प्रदान.)
चन्द्रा:-तुम उन्हे लौटाल नहीं सके ?
चन्द्रिका:-उसके पास एक चिमटा धरा था, इसीलिये आ
बढ़नेका साहस न हुआ. कहीं बाबाजी क्रोधान्ध हो लपद
पडते तो बस चन्दाकी चन्दी उड जाती। अच्छा चलो! अब कप
बदल डालूं. बाप रे बाप ! चलते चलते मेरे श्रीचरणकमलोंने ते
बिलकुल हडताल करनेकी ही ठान लीनी परंतु तुम्हारी आंख
देखते ही शायद डरकर शांत होगये हैं।
चन्द्राः-अच्छा चलो, अब तुम्हारे उन हडतालियोंको जर
खान करादें.

तुलसीदास मृणालोंको पकड लो और खींचते खींचते ले चलो. (तथाकरण ) चन्द्रा ! तुम्हारा स्पर्श तो मानो मलाईका लड्डू होरहा है. ( दोनोंका प्रस्थान.) (रत्नावलीका गातेहुए प्रवेश.) गीत- व्यथित हैं यह प्राण । पति विरहमें, मन न मनमें, धीरज न माने जान ॥ रामपदपर चित् समर्पण था किया मैंने मनन आशा थी जापूंगी जीवन करूंगी उनका ध्यान ॥ आंखें अपनी, मूंदती जब नैन उनके ना जानूं कब मेरे नैनोंमें मिल जाते हैं तब खोदेती मैं ज्ञान ॥ दिन रैन पल २ निकट दूर आती करुण मधुर स्वर व्याकुल चित चूर चूर (हे ) राम दो अब त्राण ॥ क्या करूं राम ! किसी प्रकार भी मन शांत नहीं होता। सर्व पूर्वस्मृतियां मनमें जाग उठती हैं और मेरी छाती फटने लगती है। जब याद आती है कि, इसी अभागिनके दृढ़ वाक्योंको सुनकर मेरे स्वामी गृहत्यागी हो संन्यासी बनकर घर घर भीख मांग रहे हैं उस समय अनुपातसे मेरा हृदय विदीर्ण हो जाता है। पत्नी होकर भी मैंने पतिको गृहत्यागी किया है । सोचा था जिस श्रीरामचन्द्रजीक ध्यानमें पतिदेव निमग्न हैं उसी अभय रन पार्ट । नित

५८
तुलसीदास
चन्द्रा:-तुम्हें देखकर क्या कहा ?
चन्द्रिका:-कहा- सीताराम ! बस उनके विचारसे तो
उसीमें मानो उन्होंने विश्वब्राह्मण कह डाला फिर इतना जरूर
कहा था कि, वे मुझे उस दशरथ राजाक कपूतोंसे मिलादेंगे ?
है। एक बात कहना भूल गया था, वे
आजकल रामका जीपन
चरित्र लिख रहे हैं, जिसे महाभारत या गीता क्या कहते हैं न ? वहीं
वही उसमें जाने ग्यारह कि, तेरह सांड कि, कांड क्या रहेंगे।
चन्द्रा:-तुम आजकल क्या पूरे नास्तिक हो गये ?
चन्द्रिका-नास्तिक काहेका? मैं तो शीघ्र ही साधु बननेवाला
हूं उस महाभारतके सांड रामसे एकबार साक्षात अवश्य करूंगा
और कहो तो तुम्हारे आंचल में लाकर रांध दूंगा. सुबह शाम एक
एक बार देख लिया करना- बस रोटीका फिकर तो कमसेकम
रहेगा ही नहीं, उस सांडके साथ में भी सांड बनकर.घूमा करूंगा
हाँ यह लो तुलसीबाबाने एक पत्र लिख दिया रत्नाके लिये.
(पत्र प्रदान.)
चन्द्रा:-तुम उन्हे लौटाल नहीं सके ?
चन्द्रिका:-उसके पास एक चिमटा धरा था, इसीलिये आगे
बढ़नेका साहस न हुआ. कहीं बाबाजी क्रोधान्ध हो लपक
पडते तो बस चन्दाकी चन्दी उड जाती। अच्छा चलो अब कपडे
बदल डालूं. बाप रे बाप ! चलते चलते मेरे श्रीचरणकमलोंने तो
बिलकुल हडताल करनेकी ही ठान लीनी परंतु तुम्हारी आंख
देखते ही शायद डरकर शांत होगये हैं।
चन्द्रा:-अच्छा चलो, अब तुम्हारे उन हडतालियोंको जरा
स्नान करादें.
चन्द्रिका:-या
:-वात कुछ बुरीभीनहीं है,परंतु पहले मेरे इन भुज

तुलसीदास ! मृणालोंको पकड लो और खींचते खींचते ले चलो. (तथाकरण ) चन्द्रा ! तुम्हारा स्पर्श तो मानो मलाईका लड्डू होरहा है. ( दोनोंका प्रस्थान.) (रत्नावलीका गातेहुए प्रवेश.) गीत- व्यथित हैं यह प्राण । पति विरहमें, मन न मनमें, धीरज न माने जान ॥ रामपदपर चित् समर्पण था किया मैंने मनन आशा थी जापूंगी जीवन करूंगी उनका ध्यान ॥ आंखें अपनी. मूंदती जब नैन उनके ना जानूं कब मेरे नैनोंमें मिल जाते हैं तब खोदेती मैं ज्ञान ॥ दिन रैन पल २ निकट दूर आती करुण मधुर स्वर व्याकुल चित चूर चूर ( हे ) राम दो अब त्राण ॥ क्या करूं राम ! किसी प्रकार भी मन शांत नहीं होता। सर्व पूर्वस्मृतियां मनमें जाग उठती हैं और मेरी छाती फटने लगती है। जब याद आती है कि, इसी अभागिनके दृढ़ वाक्योंको सुनकर मेरे स्वामी गृहत्यागी हो संन्यासी बनकर घर घर भीख मांग रहे उस समय अनुपातसे मेरा हृदय विदीर्ण हो जाता है। पत्नी होकर भी मैंने पतिको गृहत्यागी किया है । सोचा था जिस श्रीरामचन्द्रजीके ध्यानमें पतिदेव निमग्न हैं उसी अभय पदोंमें मैं भी आश्रय लूगी परंतु समय नहीं हुई । पतिकी चिंता पल भरके लिये भी अलग नहीं होती । मन प्राण सब पतिमयही

तुलसीदास
लौट
हो रहा है रामको कहां स्थान दूंगी. ऐ ! यह क्या तुम
आये. भैय्या कहो क्या उनका दर्शन मिला ?
(चन्द्रिकाप्रसादका प्रवेश)
चन्द्रिकाः हां दर्शन तो मिला है.
रत्नाः- वे कुशलसे तो हैं?
चन्द्रिका:-कुशल तुशल तो नहीं जानता, परंतु हां गेरुमा
पहन लिया, सिरपर जटा रख लिया है किसी ओर ध्यान नहीं,
दिनरात रामनाममें मत्त हैं।
रत्ना:-मेरा पत्र उनको दियाथा ?
चन्द्रिकाः-हां दिया था और उसका उत्तरभी दिया है (पत्रदान)
(प्रस्थान)
रत्नाः-(पत्र पढती है)
काट एक रघुनाथ सिर, बांधि जटा सिर केश ।
हम तो चक्खा रामरस, पत्नीको उपदेश ॥
आहा ! प्रभू! तुमने मेरी सब चिंता दूर कर दी. अबसे तुम्ही
मेरे जीवनके साथी हो। तुम्ही मेरी सान्त्वना और तुम्ही मेरे सब
कुछ हो प्रिय पत्र तुम्हीको छाती पर रख छाती शीतळ करूगी।
नाथ ! स्वामिन् !! इतनी दया है तुम्हारी दासी पर ? अभागिनीने
तुमको घर छुडाया और फिरभी उसपर क्रोधित न हो कृतज्ञता
प्रकाश कर रहे हो। इतने प्रेममय हो तुम इतने सुन्दर हो तुम ।
धन्य हूँ मैं कि, मैं तुम्हारी पत्नी हूँ-दयामय रघुवीर ! देखना
देव ! मेरे पति तुम्हारे प्रेमसे कहीं वंचित न हों ?
(चन्द्रावलीका प्रवेश
चन्द्रा:-यह क्या रत्ना ! तुम रोरही हो-तुम्हारे दुःखसे मेरी
भी छाती फट जाती है. रत्ना ! मैं अभागिनी हूं-मैंने ही तुम्हारे

तुलसीदासः सर्वनाशका कारण हूं। मुझे नहीं मालूम था कि, हँसी करके मिथ्याका आश्रय लेकर तुम्हे मायके में बुलानेसे इतना अनर्थ होगा। रत्नाः-दुःख न करो चन्द्रा ! मेरे दुःखकी रात अब बीत गई. आज मैं सम्पूर्ण सुखीहूँ-आज मेरे स्वामीने मुझे पत्र दिया है। चन्द्रा--परंतु कैसे कटाओगी देवी ! तुम्हारा दीर्घ जीवन ? तुम्हारा यह म्लानमुख देखकर पत्थर भी दुःखसे पिघल जाता है नारीजीवनमें पति ही सर्वस्व हैं-पति विना नारीके लिये संसार श्मशान है। जो तुम कभी भी पतिके आंखोंकी ओट नहीं हुई थी जो पति तुम्हारे क्षणिक अदर्शनसे उन्माद होजाते थे वही तुम और वही पति. परंतु आज कितना अंतर है बहन ! कितने दिन बीतगये तुमने उन्हें देखा नहीं, कितने दिन व्यतीत होगये तुमने उनका स्नेह' पुकार नहीं सुना। रत्नाः--नहीं सखी ! अब मुझे कोई कष्ट नहीं है। मेरे प्राण उनके साथ साथ फिररहे हैं. मैं उनके मुखसे मानो मधुर रामनामकी ध्वनि सुन रहीहूं। यह देखो उनका नाम लेनेके साथही मेरा सारा शरीर पुलकित होरहा है । मेरी भांति सौभाग्यवती और कौनसी रमणी है सखी : आज मेरे स्वामीकी प्रशंसासे सारा भारतवर्ष गूजरहा है। चन्द्राः--जाओगी सखी ! एकबार उन्हें देखने ? रत्नाः-परंतु कौन लेचलेगा। चन्द्रा:-तुम्हारे भाई ! रत्ना:--हां चलूगी एकबार उनका यथार्थ प्रेममयस्वरूप देखेंगी. पहले उनको केवल रत्नामय देखा था, अब उन्हे राम- मय देगी।

तुलसीदास, अंक दूसरा--७ वो सीन. (तुलसीदासका आश्रम-ध्यानमग्न तुलसीदास-समय रात्रिकाल ) (भैरवका प्रवेश) भैरव:-आज गुसाईजीको भय दिखाकर कुछ मजा आया. जिसे भीषण मूर्तिसे आज में यहाँ आया हूं. तुलसीदास तो तुल- सीदास तुलसीदासके चौदह पीढी भागजायें। ध्यानमें इस समय यह मग्न है. अच्छा अभी ध्यान व्यान सब भगादेता हूँ. (महावीरका प्रवेश) महाः-(स्वगत ) भैरवजी विचाररहे. हैं-तुलसीदासको भय दिखाकर मजा लूटेंगे अच्छी बात है देखू. कौन मजा लूटता है। एकबार मेरी ओर इनकी आंख पड़जाय तो बस रामभक्तको भय भीतकरनेका फिर कभी स्वप्नमें भी साहस न करेंगे। भैरव:-आज तो गुसाईजी बड़े एकाग्रचित्त हो ध्यान कररहे हैं (महावीरको देखकर स्वगत ) अरे बाप रे बाप! स्वयम् यह विकटदेव कहांसे आगये ? एं! अब तो आस्ते आस्ते भागनेका विचार करना चाहिये। महाः--कहिये भैरवजी ! अकस्मात् इतनी रातको अपना यह मनोहररूपलेकर यहां किस कारण आनाहुआ ? भैरव:--नहीं, ऐसे ही कुछ विशेष कार्य नहीं था.अच्छा तो अब चलू ( स्वगत ) भागना ही श्रेष्ठ उपाय है। महा:--ठहरिये भी-कहिये क्या संबाद है ? भैरवः-संबाद । हाँ पर वह धीरे धीरे बड़ा बिकट होता जा रहा है। अच्छा अब आज्ञा दीजिये मैं स्वस्थानको प्रस्थान कर महा:--कहो भैरवजी ! गुसाईजीसे मिलोगे नहीं ?

६३ तुलसीदास, भैरव:- नहीं प्रभु! क्षमा करिये,अब यदि कभी आऊं तो रक्तकी सौगंध (स्वगत ) बाबाजान बची लाखों पाये. (प्रस्थान ) तुलसी:-(ध्यानमग्न हो ) जय सीताराम ! ए यह कौन आप हैं देव! आज मैं अत्यंत सौभाग्यवान् हूं,दासपर आपकी बड़ी कृपा है. महिमासे आपके मिला है दर्शन मुझे श्रीरामका हुई है कामना पूर्ण। फिर एक कठोर आदेश- कर्तव्य कठोर सम्मुख है मेरे- प्रचार करना भाषामें लिपिबद्धकर रामका गुणगान ॥ चिंता नहीं है बत्स ! कृपासे श्रीरामके अवश्य होगी प्रचारित-- लीला उनकी भूमण्डलपर। भक्तचूडामणि हो तुम जीवनाधिकप्रिय मेरे बचनबद्ध हूं मैं करूँगा तुम्हारा काम आवश्यक जब कभी होगा । उसपर-- कार्य श्रीश्रीरामका । विघ्न न होगी कभी तुलसीदास ग्रन्थ-रामायण तुम्हारा- धरापर रहकर अमर पुलकित करेगा विश्वको। (अन्तान) तुलसी:-- समागत है निशा लेऊंगा अब विश्राम जै सीताराम जै जै राम जै राजा राम (कुटियामें प्रवेश). (चोरका प्रवेश.) चोरः-सुना है तुलसीदासके पाससे जो कोई भी.कुछ मांगता है वे उसे वही देते हैं। अवश्यही इनके पास बहुतधन है। आजकी रात भी खूब अंधेरी है, सुयोग भी अच्छा है. गोसाईजी सो रहे हैं, धीरे धीरे भीतर घुस पडूं और सब माल लेकर यहांसे चल हूँ । चलूं भीतर चलूं ( अकस्मात् दरवाजेपर धनुर्बाण हाथमें राम- लक्ष्मणको देखकर ) अरे बाप रे बाप ! यह तो धनुषबान लिये मारने भा रहा है, भागू बाबा : (जिधर भागता है उधर रामलक्ष्मण ही दिखाई पडते हैं ) हत तेरा सत्यानाश हो । अच्छी चोरी करने आया था कि, चारों ओरसे यह धनुषधारी मुझे मारने दौडने रहें हैं । बाणोंके चोटसे कहीं यह मेरे प्राण न उलटे चुराले । अब मैं चारोंभोर दौड़ता कब तक फिरूं. कोई चौकीदार भी तो कहीं नज़र नहीं आता कि, मुझे पकडकर थाने ले चलें। ऐसे उल्लूस- रोखे दौडनेसे तो थानेमें जाकर बैठना भी अच्छा है। क्या करूं? खुद ही बुलाऊँ क्या चौकीदारको ? ऐ चौकीदार ! ऐ चौकी- दार !! इधर आओ बाबा-उधर आमो-देखो हम चोर हैं. अरे फिर तुलसीदास ६५ आरहा है इधर धनुषधारी. भागू । बाप रे बाप ! अब तो दौडा भी तो नहीं जाता. अरे यह आरहे हैं गुसाईजी। देखू शायद मेरी कुछ व्यवस्था करके थाने में पहुँचा दे तो अच्छा है। अच्छे दो लडकोंको चौकीदार बना रहा है । देखने में भाई ! यह बडे सुन्दर हैं पर पह- लवान कुछ अधिक हैं। (तुलसीदासका प्रभाती गातेहुए प्रवेश.) जागिये रघुनाथ कुँवर पंछी वन बोले । हिमकर दुर्गति मन्द भई चकई पिया मिलन गई, विविध मन्द चलत पवन पल्लव दुम डोले । प्रात भानु प्रगट भयो रजनीकी तिमिर गयो, भुंग करत गुंज गान कमलन दल खोले। ब्रह्मादिक धरत ध्यान सुर नर मुनि करत गान, जागनकी बेर भई नयन पलक खोले । तुलसीदास अतिअनंद निरखिके मुखारविन्द, दीननको देत दान भूषण बहु मोले ॥ चोर:-जै हो महराज! तुलसीः-जै सीताराम ! कौन हों भाई ! तुम इस प्रकार चक्कर क्यों लगा रहे हो? चोरः-और महाराज चक्कर ? तुम्हारे वे धनुषधारी चौकी- दारोंके चक्करमही ये चक्कर लगा रही हैं सो भी रातभरसे। तुलसी:-रातभर ? क्या कह रहे हो तुम ? कुछ प्रयोजन था क्या, मुझे बुलाया क्यों नहीं. जगाया क्यों नहीं? चोरः-हमारे प्रयोजनमें किसीको बुलाने जगानेका नियम

६६
तुलसीदास
नहीं है. कारण, बुलाने और जगानेसे हमारे प्रयोजनमें विशेष
बाधाय पहुंचती है
तुलसी:-आहा ! तुझको तो बडा कष्ट हुआ होगा. बैठो बैठो
विश्राम करो भाई !
चोरः-( स्वगत ) बापरे बाप ! इतने खन बाद विश्राम मिला.
साधूजी अवश्यही महात्मा हैं इनसे झूठ बोलकर कुछ लाभ नहीं।
(प्रकाश ) महाराज! मैं असलमें चोर हूं. कुछ चोरी करनेकी इच्छा-
सेही आपके कुटीमें मेरा आगमन हुआ. परंतु महाराज ! आपके उन
दो धनुषधारी बालक चौकीदारोंने न तो मुझे भीतर जानेदिया
और न कहीं भागनेदिया। अलबत्ता कुटी नारोतरफ चक्कर खूब
दिलाई, जिससे मैं भी चक्करमें आ गया और मेरा शिर भी खूब
चकरा गया।
तुलसी:-धनुषधारी बालक चौकीदार ?
चोरः-हां महाराज ! हां । अब ज्यादा नाम वाम मत करो
नहीं तो कहीं फिर आखडहुए प्राण भी घन चक्कर हो जायेंगे ।
तुलसी:-क्या कहरहे तुम ? दो बालक ?
चोरः-हां साधूमहाराज! एक तो सांवलासा और दूसरा गोरा
गोरा, वे तो देखनेमें कुछ बुरे नहीं थे परंतु उनके वे जो यों टेड़े
टेड़े वे धनुषबान ! अरे वाप! रे बाप!! सच कहनेको तो महाराज
अगर उनके हाथम वे भयानक अन्न न होते तो जरा उनको अच्छी
तरह देख भी लेता।
तुलसी:-एक सांवला और दूसरा गौर ? कहां गये वे बालक
चोरः--बस आपके उठते ही आपके कूटियामें घुसगये ।
तुलसी:-यह तुमने क्या किया प्रभू ! तुम्हारे दासकी सामान्य
कुटि रक्षा करनेके लिये तुम दासका दासत्व करते हो ? भाग्य
?

में - ! तुलसीदास ६७ वान् चोर ! नाचो गाआ क्षिप्त हो जाओ मुझे अपने परीकी धूल धो ! तुम बड़े भाग्यवान् हो बड़े भाग्यवान् हो! ! तुमने रातभर साक्षात् श्रीराम लक्ष्मणका दर्शन पाया है ! यह लो भाग्यवान् ( दौडकर कुटियासे सव सामान ले आता है ) यह लो तुम सब ले जाओ यह तुम्हाराही है. चोरः--यह तो अच्छे चक्करमें डाल दिया तुमने देवता.अब तो कुछ नहीं लंगा यह सब आप अपने कुटियामें ही रख दें। हा! हा! हा! हा! महाराज ! मैं पक्का चोर हूं. जब मैं बड़ा माल पाता हूं तब छोटी छोटी चीजें नहीं लेता। बस अब मैं रोज रोज रातको आपका सामान चुराने आऊँगा और उससे भी अधिक मूल्यवान् रामलक्ष्मणका मनोहर रूपका दर्शन चुराकर ले जाऊँगा । हा ! हा ' हा ! हा ' महाराज ! आज मेरा चोरी करना भी सार्थक है। ससार : चोर बनो-सब चोर बनजाओ और आओ रातभर चक्करमें पड़कर चक्रधरका चकराताहुआ रूप चोरी करो (तुलसी- दासके चरणोंमें गिरकर ) देव ! तुम संसारके सबसे बड़े चोर हो. मैंने तो केवल उनका दर्शन चुराया है परंतु तुमने चोर देव ! साक्षात् उनकोही चुराकर बांध रखा है. तुम आजसे मेरे गुरू हो.जै सीता- राम ! जै सीताराम !! तुलसी:-जै सीताराम ! अंक दूसरा-आठवाँ सीन. (पथ-नदीतीर-रत्नावली.) जा रही हूं आज मैं पति दर्शनके लिये, हृदयम व्याकुलता भरी है। इसी पथपरसे वे भी एक दिन राम राम करतेहुए गये हैं. राम- नामकी अमृतधारासे उन्होंने यहांके रत्ती रती रजको भी सिक्त कर दिया है । परमतीर्थ है मेरे लिये यह स्थान । परंतु न जाने वे इस समय कहां हैं ? न जाने कितने दिनबाद उनका राममय स्वरूप देगी.

तुलसीदास
(चन्द्रिकाप्रसादका प्रवेश)
रत्ना:-भय्या ! अब कबतक यहां विश्राम करोगे?
चन्द्रिकाः--जबतक इस नदीसे कोई पार उतारनेवाला नहीं
मिले । देखो ना, नदीने क्या भीषणरूप धारण किया है।
रत्ना:-क्या कहीं भी कोई नाव नहीं है ?
चन्द्रिका:-कहीं क्यों नहीं है ? इतना बडा संसार है, नाव भी
हजारों होंगे परंतु यहां अवश्य एक भी नहीं है ।
चन्द्रावली:-( प्रवेशकर ) कबतक यहां खड़ी रहोगी रत्ना !
चलो विश्राम करो।
रत्ना:- विश्राम ? पति-चिंता पतिध्यानमें में तन्मय होगई हूँ.
इतना मधुर है यह ध्यान, इतनी सुंदर है यह चिंता कि, विश्राम
करनेको जी चाहता ही नहीं ( स्वगत ) राम ! भक्तवत्सल प्रभू !!
शीघ्र मुझे अपने भक्तके पास लेचलो। मुझसे अब धीरज नहीं
धराजाता है राम!
(बालकवेशी रामका नाव लेकर गान करतहुए प्रवेश)
पथिक ! कोई जाओगे क्या पार ।
मैं हूं माझी बृहत् नदीका (मेरी) नैयावहे मझधार॥
उस पारके उस काननमें
नव.खेल मचा नवजन जनमें
तिमिराच्छन्न इस पार बनमें मचत केवल रार ।
मैं डरत नहीं तूफानको
भय करत नाहीं लहरानको

६९
तुलसीदास
मेरी नैया ऐसो बाढको पार करै कईबार ।
भोले पथिक तुम काहे डरो मैं छोटो माझी इशियार।।
चन्द्रिका:-क्यों भाई ! तुम्हारे पिता कहां हैं ?
माझी:-तुम्हें उनसे क्या काम है ?
चन्द्रिकाः- हमें पारजाना है।
माझी:-तो क्या मेरे पिताके सिरपर बैठकर पार होओगे ?
चन्द्रिका:-नहीं भाई ! हम तीन जने हैं, तुम्हारे पिताका
शिर कुछ इतना बड़ा तो होगा ही नहीं कि, तीनों लदजायें । पर
मतलब यह है कि, तुम्हारे भरोसेपर इस नावपर कैसे बैठें। कहीं
डुवा उवा दिया तब ?
माझीः--नहीं महाशय ! आपको कुछ भय नहीं है । मैं हजारों
आदमियोंको पार लगादेता हूँ। जो मेरे भरोसेपर नदीमें उतरतेहैं
वे कभी डूब नहीं सकते।
चन्द्रिका:-अच्छा तो क्या तुम ही एक संसारमें माझी
रहगये हो?
माझी:-मैं सदासे ही वही कार्य करता आया हूं।
चन्द्रिकाः-अर
:-अच्छा चल भाई ! तेरे ही भरोसे सही।
रत्नाः-आहा ! यह माझीका बालक कैसा सुंदर है ? रूपसे
मानो संसारको रंजित कररहा है ( प्रगट )क्यों बालक! तुम कहां-
रहते हो?
माझी:-मैं तो सब जगहपर ही जायाकरता हूँ । विशेष कर
जो मुझे बुलाते हैं वहीं मैं पहले पहुँचता हूं । मैं बड़ा प्रेमका
भूखा हूँ।

तुलसीदास
रत्नाः आहा ! तुम्हारी मा नहीं है क्या ?
माझी:--मेरी मा ही तो मुझे घुमाया करती है, उनका नाम
प्रकृति देवी है. अच्छा चलो तुझे शीघ्र पार पंहुचादें. मुझे अभी
कई जगह जाना है। ( सबका प्रस्थान )
अंक दूसरा-नवां सीन.
( काशी विश्वेश्वरका मन्दिर )
विद्याभूषण कविरत्न-और नागरिकगण.
विद्या:-देखो भाई कविरत्नजी ! यह तुलसीदास सरासर
अन्याय कररहे हैं । प्रथम तो रामायण जैसा पवित्र ग्रन्थ नागरीमें
प्रचार करना देवभाषाका अपमान करना है और उसपर हत्यारे
चोर इत्यादियोंको भी वे संन्यास देनेलगे है,क्या यह शास्त्रसम्मत
बिधि है ?
एक नागः-भक्तचूड़ामणि गोस्वामीजीका कार्य कभी अन्याय
नहीं हो सकता-वे बड़ेभारी भगवद् भक्त...
विद्याः-अरे बस रहने भी दो तुम. यह भक्तिकी बात नहीं है
यह शास्त्रकी बात है। गोस्वामीजी शास्त्रका भी अपमान कररहेहैं-
एक नाग:-परंतु...
विद्या:-तुम चुप रहो, तुम क्या समझते हो जी ? शास्त्रका जो
बारबार बोल उठरहे हो यह तुम्हारी अनधिकार चर्चा है । तुम
शास्त्रका कुछ नहीं समझते समझे ?
एक नाग:-जी हां समझगया-भगवत्कृपाके बिना शास्त्र
अध्ययन भी व्यर्थ है।

तुलसीदास, ७१ कविरत्नः-वृथातर्कसे कुछ लाभ नहीं । गोस्वामीजीको बुलवा भेजा है- उनसे हम निर्णय करलेंगे कि, चोरको संन्यास देनेका उन्हे क्या अधिकार फिर बिना प्रायश्चित्तके ? ( तुलसीदास और चोरका प्रवेश) तुलसी:-विप्रगण ! किस कारण आपने मुझे बुलवाभेजा था? विद्याः--महाशय ! जो व्यक्ति हत्यारा और चोर है उसको आपने किस शास्त्रके नियम विना प्रायश्चित्तकराये संन्यास दियाहै. तुलसी:-आप किस प्रकारका प्रायश्चित्त कराना चाहते हैं ? विद्याः-तप्तघृतपात । एक नागः-नियनम्तो बुरा नहीं है, रोग और रोगी दोनों आराम। तुलसी:-देखिये आपके मनमें किसी प्रकारका कष्ट पहुँचाना मेरा अभिप्राय नहीं है, परंतु मैं जानना चाहता हूं कि, क्या विश्वे- श्वरके दर्शनमात्रसे ही सब पाप धुल नहीं जाते ? कविरत्नः-परंतु शास्त्रका आदेश । तुलसी:-सुनिये, मेरेलिये केवल एक शास्त्र राम-नाम है। उस नामसे भीषणसे भी भीषण पाप मुहूर्तभरमें धुलजाते हैं। यदि कोई व्यक्ति अनुतापके तृषानलमें जलकर रामके शरणागत हो तो उसके सब पाप दूर होजाते हैं। सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज । अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥ (गी० ) यह भी शास्त्रकी वाणी है, ठीक इसी प्रकार यह धनीभी परम- साधू है. कारण ये राम-नाम करते हैं। विद्या:-परंतु इसका प्रमाण क्या कि, यह व्यक्ति अब सम्पूर्ण निष्पाप हैं।

७२
तुलसीदास
तुलसी:-आप क्या प्रमाण चाहते हैं ?
विद्याः-यदि शिवसहचर नन्दी स्वयम् इसके हाथसे भोग
ग्रहण करें तब हमें विश्वास होगा।
तुलसी:-( चोरसे ) जाओ भाग्यवान् ! परम शैव नन्दीको
निवेदन करो और श्रीरामका नाम लेकर प्रार्थना करो जिससे वे
स्वयम् आविर्भूत होकर तुम्हारे हाथसे भोगग्रहण करे। लाओ
भोग लाओ।
(चोरका प्रस्थान)
नागरिक:-बड़े ही पुण्यफलसे गोस्वामीजीका दर्शन पाया था।
कविरत्न:-अभी सब निकला जाता है,बड़े भक्त बने फिरते हैं।
विद्याः-पत्थरका नन्दी अगर कहीं भोग खालें तो फिर बात
ही क्या है ?
तुलसी:-पहलेसे तर्क करनेसे लाभ ही क्या है-पहले राम
नामका प्रमाण प्रत्यश करिये ।
(चोरका भोगलेकर प्रवेश)
तुलसी:-आशीर्वाद करता हूँ वत्स! रामकी कृपासे सफल हो।
कृपासे जिनके
पाया था दर्शन
श्रीरामका मैंने
यत्नसे जिनके
नाशहुआ अज्ञान,
करुणाके अवतार
उन्हीं गुरुवरके
चोर:-

७३
तुलसीदास
आदेशसे यह दीन दास
लाया है भोग
निवेदन हित
हे देवदेव ! सहचर
हे अनन्त गुणधाम!
कृपालू नान्दी देव !
तुम राखो उनका मान
करता करुण मिनति
यह दास ।
(नेपथ्यमें नन्दी-)
गुरुभक्त तुम है वत्स!
हो निर्मल
हो अब पूर्ण निष्पाप
तुम्हारा भोग प्रेम उपहार
अति आदर सहित
करता ग्रहण। (आविर्भाव)
( सब आश्चर्य चकित होजाते हैं तुलसीदास और चोर
प्रणाम करते हैं- टेबल)
ट्राप.

तुलसीदास अंक तीसरा . १ ला सीन. ( बादशाह जाहांगीरका महल बेगम सोफेपर बैठी हैं बांदियोंका नाच और गाना. दो खोजा दरवाजेपर खडे हैं.) आओ आओ सखियाँ ! हम सब नाचें गावें हिलमिलियाँ। बसंतकी' इस मधुर हवामें, आओ आओ सब जनियाँ । अपने यौवनके कुलबनमें अलियोंकी मीठी गुंजनमें पपिया रागकी 'पीपी' पगमें, खिलगई देखो कलियाँ ॥ (एक लौंडीका प्रवेश) लौंडी:-खुदा आपका भला करें । बेगमसाहिबा ! बादशाह सलामतने खबर भेजी है कि, आपके हुक्मके मुताविक तुळसी- दास नामका साधू गिरफतार करलिया गया. बेगमः-अच्छा जाओ। ( लौडीका प्रस्थान ) अच्छा हुआ-बहुत अच्छा हुआ। बेगम यमुनाबाईकी खूब तौहीन हुई. कफिरिनने बाद- शाहसे काफिर साधूके लिये शिफारित की थी कि, उसका कोई बेइज्जत न करे। खूब हुआ है. बादशाहने उसकी बातपर कान नहीं दिया. मेरी ही बात रक्खी है। बांदी:-देखिये देखिये बेगमसाहिबा ! महलमें कितने बन्दर घुसआये हैं। ऐं ! खोजा भगा दो न, बन्दरोंको बिना हुक्म लिये उन्हें क्यों आने दिया? खोजाः-हमने नहीं आने दिया बीबीसाहब ! वे अपने आप ही विना हुक्म लिये ही घुस आये हैं ! .

तुलसीदास बांदी:-मर कमबख्त ' खडे क्या देख रहा है ? जाओ भगाओ जाकर। ( खोजा जाते हैं) बेगमः-यह क्या बात है ? इतने बन्दर घुस रहे हैं और कोई भगाता नहीं-बाँदी ! जाओ और हुक्म दो कि, यदि सब बन्दर फौरन महलके बाहर न करदिये जायंगे तो सबकी गर्दन जायगी. (खोजाका प्रवेश) खोजाः-हम उनको क्या भगायें बेगम साहिबा ! वे ही उलटे हम भगा रहे हैं. बेगमः-जाओ जल्दी जाओ, जहांपनाको मेरा सलाम देकर कहो कि, सिपाही भेजकर सब बन्दर कतल करा दें। खोजा:-(स्वगत ) जाऊँ कैसे ? कहीं इन ससुरके पूतोंने मेह- मानी शुरू कर दी तब तो होगये बहीं ठण्ढे । (प्रस्थान ) बाँदीः--देखिय बेगम साहिबा ! झुण्डके झुण्ड बन्दर इधर आ रहे हैं. भागिये बेगम साहिबा ! नहीं तो इन बन्दरोंके हाथसे बचना मुश्किल हो जायगा। (जाहांगीरका प्रवेश) जाहांगीरः--क्या बेगम ! महल में भी बन्दरोंकी हुज्जत शुरू होगई । बडे ताज्जुबकी बात है, कहाँसे इतने बन्दर अचानक दिल्ली में आ हाजिरहुए ? तुलसीदास जिस कैदखाने में कैद था बन्दरोंने उस कैदखानेको तोड़कर सब कैदियोंको खलास कर दिया और भी ताज्जुबकी बात है कि, गोलियाँसे भी ये बन्दर मरते नहीं है। (यमुनाबाईका प्रवेश) यमुना:--जहांपनाह! उसी वक्त मैने आपसे कितना मना किया कि, साधू तुलसीदास कहीं सताया नहीं जाय । आप न समझा था । ७६ (तुलसीदास मैं हिन्दू हूँ इसलिये हिन्दुसाधुकी तरफदारी कर रही हूँ। साधू तुलसीदास परम रामभक्त है और रामभक्तकी अवमानता रामके अनुचर ये बन्दरगण कभी नहीं सह सकते । अब भी यदि दिल्लीको बन्दरोंके उपद्रवसे दिल्लोकी रक्षा करना चाहें तो तुलसी दाससे क्षमा प्रार्थना करिय। जाहांगीर:-ठीक कह रही हो तुम यमुनाबाई ! यह मेरो ही गलती है. हिन्दू साधूको तौहीन करनेका ही यह नतीजा है. मैं अभी उस फकीरके पास जाता हूँ। (प्रस्थान ) यमुनाः-(बेगमसे ) बहन् ! साधू चाहे हिन्दू हो या मुसल. मान; उसका अपमान नहीं करना चाहिये (प्रस्थान ) बेगमः-चलो तो बाँदियों देखें, कितना असबाब बरबाद हो गया है ऐसा बन्दरवाला साधू भी तो कभी नहीं देखा (ऑदियोंके साथ बेगमका प्रस्थान) (दो खोजाओंका प्रवेश) एक खोजाः-बाप रे बाप ! बन्दर क्या हैं मानो? कजाके सिपाई हैं। दूसर, खोजाः-खुदा खैर करे, अब ये कहीं दो चार घण्टे और रहें तो तो बस समझलो सारे शहरही वीरान बन जायगा। एक खोजाः-मैंने तो भाई ! डस्के मारे हिन्दू देवताका नाम आम आम" करना शुरू कर दिया था। दूसरा खोजा:-आम क्या ? एक खोजा:-आम नहीं जानते! आम है हिन्दू देवताका नाम जिन्होंने बंदरोंकी फौज लेकर कुतुबुद्दीन शाहसे लडाई की थी। दूसरा खोजाः-कुतुबुद्दीनशाहसे नहीं, शेरशाहसे लड़ाई की थी-मेरे नाना भी उस लड़ाई में मौजूद थे। चल चले भाग, वे बाद- शाह सलामत आ रहे है। ( दोनोंका प्रस्थान ) तुलसीदास ७७ जाहांगीर-(प्रवेश कर ) भोफ़-अब जरा दिलमें तसल्ली हुई है। फकीर साहबका पता लग गया-वे यहीं आ रहे हैं-अरे कहते कहते ही आप आगये. (तुलसीदासका प्रवेश) जाहांगीरः--सलाम फकीर साहब ! आज मैं समझ गया कि, दिल्लीके बादशाह किसी फकीरके बादशाह नहीं है । आप मुझे माफ करिये। तुलसी:- आप दुःख न करें जहाँपनाह!सब रामकी इच्छा है। आपका कोई अपराध नहीं है। मैं अभी इन वानरोंको हटा देता हूँ। स्तव- मङ्गलमूरत मारुतनन्दन सकल अमङ्गल नून निकन्दन पवनतनय सन्तनहितकारी हृदयविराजत अवधविहारी माता पिता गुरु गणपति शारद शिवसमेत शम्भु शुकनारद चरण वन्दि विनवों साकाहू देहि रामपद भक्ति निबाई बन्दौं रामलषण वैदेही जे तुलसीके परमसनेही । देव महावीर ! दासके सन्मान रक्षाके हित तुमने बड़ा कष्ट उठाया है. प्रभू ! नगरवासी सब भयभीत हो रहे हैं. उनका भय दूरकर दो देव ! ( जाहांगीरसे) जहाँपनाह ! अब आपको कोई भय नहीं है आप निश्चित रहिये । अंक तीसरा-२ रा सीन. (प्रांतर) रना और चन्द्रा. रत्ना:--स्वामी इस समय बृन्दावन में हैं । न जाने कब उनका दर्शन मिलेगा ? सोचा था काशीजीमें उनका दर्शन मिलेगा, परंतु मनोरथ सफल नहीं हुआ।

७८
तुलसीदास,
"
"
चन्द्रा:--अवश्य ही शीघ्र तुम उनका दर्शन पाओगी क्यों
इतनी व्याकुल होती हो रत्ना!
रत्ना:-व्याकुल क्यों होती हूँ ? चन्द्रा ! मैं केवल एकबार
उन्हें देखना चाहती हूँ. एकबार उनका वह पवित्र राममयरूप
देखकर अपना जन्म सफल करूंगी. हाय ! अभागिनी हूं मैं कि,मेरे
लिये मैं तुम्हे और भय्याको भी इतना कष्ट देरही हूं ।
चन्दाः-छीः छीः बहन् ! यह तुम क्या कहरही ? हो यह तो
तुम्हारे ही कृपासे हमारा तीर्थ भ्रमण होरहा है । अच्छा तुम यहां
योड़ी देर विश्राम करो, मैं देखू कुछ भोजन बनानेका प्रबंध करूं।
(प्रस्थान)
रत्नाः-बडा ही स्नेह करुण हदय है न्द्राका, और मेरे भैया
तो मेरेलिये सब कुछ त्याग सकते हैं। उह, वर्षों बीत गये उनका
वह प्रेममयस्वरूप नहीं देखा-राम ' दयामय राम !! शीव मुझे मेरे
पतिदेवके पास पहुँचा दो-देव ! मुझसे अब रहा नहीं जाता देखो
मेरी छाती फटी जारही है. उह करुणावतार ! करुणा करो.दयाकरो.
(रोती है)
( बालक रामका गातेहुए प्रवेश)
रोती क्यों तू माता मेरी रोती क्यों तू माता
क्या व्याकुलता है तेरी।
दुःखसे तेरे पत्थर पिघला पिघला प्रेमी विधाता
आँखों में छा गई अंधेरी।
तेरे आंसूओंकी धारा
सिक्त करत संसारा।
कंदनसे तेरे देखो जननी छाती मेरी फटती माता
छाती फटती मेरी ॥

तुलसीदास ७९ रत्नाः--कौन हो तुम बालक ! आहा तुम्हे देखकर मेरा मातृ- हृदय पिघलने लगता है। अच्छा बेटा ! तुम तो नाव चलाते थे अबय हां कैसे आगये? रामः- मैं अपन एक मित्रक पास जारहा हूँ। रत्नाः--कौन है वह तुम्हारा मित्र ? रामः- वह सदा राम-राम किया करता है. मैं उसीके पास जा रहा हूँ। रत्नाः--"राम-राम" स्वामी भी रामनामम मग्न रहते हैं । अच्छा तुम्हारे वे मित्र इस समय कहां हैं ? रामः-वृन्दावन में। रत्नाः-(स्वगत ) वे भी इस समय बृन्दाबनमें रहते हैं। राम:-तुम कहाँ जाओगी? रत्ना:-बृन्दाबनको। रामः-वृन्दावनको ? वाह ! वाह !! वाह !!! तब तो खूब आनन्द आयगा एकसाथ ही हो लेंगे। ( चन्द्राका प्रवेश) चन्द्राः-अरे ! तुम तो फिर आगये माझीके बालक । राम:-हां! आ तो गया--अगर कहो तो चलाजाऊं। चन्द्रा:-नहीं नहीं, जानेकी क्या प्रयोजन ? रामः-तुम वृन्दावन जारही हो और मैं भी वहीं चलूंगा इस- लिये एक साथ चलनेका ही विचार है। चन्द्रा:-अच्छा तुम्हारा नाम क्या है ? रामः-मेरा नाम-मेरा नाम राम-लल्ला है। रत्नाः-रामलल्ला ! आहा बड़ा सुंदर नाम है। !

--- तुलसीदास रामः-अच्छा (चन्द्रासे ) तुम्हारे वे कहां गये ? चन्द्रा:-वे ! वे!! वह तुम जिनपर बहुत कृपा करती रहती हो वे. समझी नहीं। (चन्द्रिकाका प्रवेश) चन्द्रिकाः-क्यों अकस्मात् उनके "व" से तुम्हें क्या प्रयोजन आपड़ा? १ रामः-अरे तुम आगये चलो अच्छा हुआ। चन्द्रिका:--अच्छा अच्छा कैसा ? राम:-यही कि, एक रामभक्त मिला. थोड़ी देर उसके साथ जी बहलायंगे। ( रत्ना और चन्दाका प्रस्थान) चन्द्रिकाः-देख भाई ! मैं रामभक्त भी नहीं हूँ और सांडभक्त भी नही हूँ जो कुछ हूँ सो योंहीं सादासीधा हूँ। मतलब यह है कि, भक्ति वक्ति करना अपनेको चुबाता नहीं है । रामः-क्यों? चन्दिकाः-इन देवताओंपर मुझे कुछ विशेष क्रोध है और विशेषकर राम ! देखो न, उसने अपने पत्नीतकको न छोड़ा. एं! सीतादेवी जो एकनिष्ठराममय, उनपर भी उन्होंने हाथ सफाई दिखादी. १४ वर्षका वनबास. पति पत्नीका जोड़ संसारमें आदर्श जोड़ है परंतु उनके भक्तको तो पत्नीसे संबन्ध विच्छिन्न करना ही पड़ेगा और यह तो अत्यंत स्वाभाविक बात है कि, जब उन्होंने स्वयं ही अपने पत्नीसे संबन्ध नहीं रखा तो अपने भक्तसे क्यों रखायें ? यही देखो न, हमारे बहनोई तुलसीदास जबतक संसारी थे किसीपर विशेष भक्ति वक्ति नहीं थी तबतक तो रत्नासे कितनी प्रेम रखते थे; पर जहां उन्होंने रामका नाम लिया नहीं रत्नाको बतायाधता । मैं इसलिये तो जरा उनसे दूर ही रहताहूं कि, कहीं मैं भी न उनके फेरमें पड़कर चन्द्राको अलग न कर दूं, भयाकी बातें।

तुलसीदास
८१
राम:-क्यों जी! फिर तो तुम रामपर बड़े क्रोधित हो।
चन्द्रिका:-नहीं नहीं, क्रोधित तो ठीक नहीं हूँ.कारण कि,कहीं
वे सुन लेंगे तब तो हमारा सत्यानाश ही होजायगा. परंतु बात
यह है कि, मैं उन्हें बुलाता उलाता नहीं हूँ और एकबात यह है
कि, देखो कहीं किसीसे कह मती देना.मैं हृदयके भीतर ही भीतर
दो एकबार वर्षमें नाम लेलिया करता हूँ. बस उसीम मुझे पूर्ण
शान्ति रहाकरती है और फिर क्यों उन्हें वृथा बुलाकर कष्ट दिया
जाय?
"
रामः-अच्छा, तुम्हें उनके कष्टका भी ख्याल है।
चन्द्रिका:-ख्याल नहीं तो क्या ऐसेही आखिर भीतर ही
भीतर तो में भी उन्हें भक्ति कियाकरता हूँ।
रामः-अच्छा, क्या सत्य ही तुम उन्हें भीतर ही भीतर
भक्ति किया करते हो, तुमने यह बात किसीसे अबतक कहीं भी
है, या नहीं?
चन्द्रिका:-नहीं, कही तो किसीसे भी नहीं है।
रामः-तो मुझसे क्यों कही?
चन्द्रिकाः-ऐ ! तुमसे कहदी क्या ? छिः छिः छिः ! बड़ी
गलतो होगई । प्रगट ) अजी मैं तो तुमसे हंसी करताथा ।
रामः-(धनुषधारी रामरूपसे )
ज्ञात है मुझको
वार्ता तुम्हारे प्रेमकी।
आदर्श है युवकश्रेष्ठ !
हो तुम मेरे नीरव भक्त ॥ (अन्तर्ध्यान )
चन्द्रिका:-दुष्ट राम! तुम क्या मुझपर जादू करना चाहते हो?
(दूरपर बालकवेशी राम ) ऐ बालक ! सुनो सुनो एक बात सुनो।
६

तुलसीदास रामः-क्यों जी ! तुम तो मुझे चाहते नहीं होन? चन्द्रिकाः-अच्छा, आओ तो इधर ( पीछे पीछे दौडता है-एक पत्थर उठाकर ) देखो अब भागोगे तो इस पत्थरसे तेराशिर ही फोड़ डालूंगा हाँ ( राम अन्तर्ध्यान ) ओ! यह तो गायब हो गया-अच्छा, फिर कभी देखाजायगा. चलो, तबतक भोजन करले। दौड़ते दौड़ते भूख तो बडा ही ली है। अङ्क तीसरा-रा सीन. ( कैलास ) (महादेव और पार्वती.) पार्वः-प्रभू ! इतने निविष्टचित्त हो क्ण देखरहे हैं? महा:-श्रीरामचन्द्रजीकी अपूर्वलोला। भक्त और भगवान्में आंखमिचौनीका खेल देख रहा हूं और देखते ही देखते तन्मय हो जाता हूं । धन्य है तुलसीदास ! आज तुम्हारे ही कारण ऐसी मधुर लीला देखनेका अवसर आया-धरापर एक एक भक्तके जन्म- ग्रहण करनेपर ही देवतागणोंको कुछ नवीन रस आस्वादन कर- नेको मिलता है । वह देखो देवी ! ब्रह्मा इन्द्र आदि सब देवतागण भी एकाग्रचित्त हो भगवान्की इस भुवनमोहनलीलाका सन्द- र्शन कररहे हैं। पार्वः-अच्छा देव ! वह जो वहाँ उस पथपरसे मुक्तकेशा एक रमणी चली जारही है वह तो तुलसीदासकी ही स्त्री ज्ञात होती वह इस प्रकार पति-विरहसे दुःखित क्यों विचरण कररही है? महा:-महालक्ष्मी सीता, प्रेममयी राधिका, सतीशिरोमणि दमयन्ती, कहो किसने इस विरहयातनाको नहीं भोगा है ? प्रेममें विरहका रूपही कविलोग बड़े उत्कण्ठासे वर्णन करते हैं. उसपर आदिकवि वाल्मीकिके अवतार कविशिरोमणि तुलसीदासका पत्नीका यह अखण्ड प्रेम उसमें यदि विरह न होगा तो उनका गाई- तुलसीदास ८३ स्थ्य प्रेम काव्य असम्पूर्ण न रहजायगा। विरह ही प्रेमको अधिका- धिक चमकताजाता है। मिलनका सारा सौन्दर्य और प्रेमका सारा माधुर्य इस विरहमें ही है । रत्नतुल्य है रत्नाकर पत्नी रत्ना- वलीका रत्नमय पवित्र निर्मल प्रेम ! पार्वः-देव ! संसार अवश्य ही रत्नावलीसे ही विशेष उपकृत है. कारण-इन्हीं देवी तुलसीदासके हृदयमें भक्ति बीजका वपन किया है। महा:-यह भी कोई नवीन बात नहीं है देवी ! संसारमें प्रत्येक महत्कार्यके मूल तो नारी ही है और तो क्या?यही देखो ना, संसा- रकी शक्ति सर्वोच्चदेवी स्वयं प्रकृतिदेवी तुम ही हो । विश्व केवल नारीके हाथोंका ही खिलौना है। वेतामें रामने राक्षसकुलका विनाश किया उसका मूल कारण भी सीतादेवीका हरण,वे नारीही थी, महाभारतके विशाल युद्धका कारण यदि यथार्थ देखाजाय तो द्रौपदीका अपमान ही था; वे भी नारी ही थीं। दक्षयज्ञके नाशका कारण भी हे देवी! तुम्हारा ही देहत्याग था. प्रकृतिको ही नारीका रूप दियागया है । संसारकी दुर्गति मिटानेकेलिये लोग सर्वप्रथम "दुर्गति विनाशिनी” कहकर तुम्हारी ही आराधना करते हैं. इसी कारण तुम्हारा नाम दुर्गा पड़ा है। मृत्यु-काल-ज्वर-संहाररूपी महि- षासुरको दमन करनेके लिये भी केवल तुम्ही समर्थ हो. तुम्हारे ही कृपासे हे भुवनमोहिनी ! मैं देवादिदेव महादेव हूं.अच्छा,चलो अब चलकर स्वर्गमें महामुनि बाल्मीकिकी आगमन प्रतीक्षा करें। अंक तीसरा-४ था सीन. (गरीबदासका प्रासाद,) रत्नावली-चन्द्रावली-चन्द्रिकाप्रसाद-गरीबदास और लीला. दण्डायमान. गरीवः-माता ! आप निःसंकोच आज यहाँ अवस्थान करिये कल्ह हम सब एक साथही यात्रा करेंगे। मेरे परम सौभाग्य है कि, तुलसीदास, आज आप सबके पादधूल से मेरा गृह पवित्र हुआ. मेरा ये धन एश्वर्य ये सब प्रभू गोस्वामी तुलसीदासजीके ही कृपाका फल है. नहीं तो मैं तो संसारसे वीतश्रद्ध होकर आत्महत्या करनेपरही उद्यत हुआ था, परंतु उसी समय उन्होंने करुणापरवश हो श्रीरा- मनामक अद्भुत उदाहरण मेरी आंखोंके सामने खोल दिया और मैं भी समस्त विस्मृत हो राम राम' कहकर नृत्य करने लगा। घर आकर देखा-मेरी स्त्री लीला उद्विग्नचित्तसे मेरी प्रतिक्षा कर- रही है और मेरे लिये एक घुड़सवार पत्र लिये खडा हुआ है। पत्र खोलकर देखा. मैं महाराजकुमारका शास्त्राध्यापक नियुक्त किया- गया हूं, इसी प्रकार मेरी अवस्थाका परिवर्तन हो गया। लीला:--( रत्ना और चन्द्रासे ) देवी ! आजके लिये यहां स्थान ग्रहण करो. हमारा यह गृह आज पवित्र करो बहन् ! कर हम भी तुम्हारे साथ चलेंगे. रत्ना:-तुम क्यों हमारे लिये कष्ट करोगी देवी ! घरद्वार छोडकर कहां हमारे साथ मारी मारी फिरोगी. लीला:-मारी मारी क्यो फिरूंगी बहन् ! तीर्थदर्शन ही मुख्य उद्देश्य है। रत्ना:-अच्छा जैसी तुम्हारी इच्छा. चन्द्रा! आज इनका ही आतिथ्य ग्रहण कियाजाय । चन्द्रिका:-( स्वगत ) चलो, चरणदेव कुछ निश्चित हुए. अब शीघ्र ही कुछ भोजन वोजनकी व्यवस्था होजाय तो ठीक हो। चरणदेवके साथ ही उदरदेव भी निश्चिन्त होजाय । लीला:-आओ देवी! तबतक भीतर चलकर विश्राम करो. (लीला रत्ना गरीवदासका प्रस्थान ) चन्द्रिका:-तुम क्यों खडी रही ? चन्द्राः-तुम जिस लिये खडे रहे ?

तुलसीदास
८५
चन्द्रिका:--मैं तो तुम्हे देखने के लिये खड़ा रहा.
चन्द्रा:--मैं तुम्हे देखनेके लिये खडी रही.
चन्द्रिका:-ठीक !
चन्द्रा:-ठीक क्या?
चन्द्रिकाः-ठीक यही कि, चलो, थोडी देरतक आपुसमें देखा
भाली करलें । मिलामिलीका तो विशेष वख्त मिलता ही नहीं।
चन्द्राः-देखो ! तुम सब समय हँसी मत किया करो.
चन्द्रिका:-तो-किस किस समय किया करूं?
चन्द्राः-फिर वही ? अच्छा मैं चली.
चन्द्रिकाः-अच्छा अच्छा ! ! कहो क्या कहती हो ?
चन्द्राः-उस बालकको तुमने कहां भगादिया ?
चन्द्रिकाः-मैं क्यों भगाने लगा, वह खुद ही भागगया।
चन्दाः-बडा सुन्दर वालक था वह । आहा उसकी बातोंसे
हृदय मुग्ध हो जाता था.
चन्द्रिकाः-छी छी छीः ! उसकी बात मुँहपर भी मतलाना.
वह बड़ा धोखेबाज है । मीठी मीठी बातोंसे वह सारे दुनियाँको
ठगले सकता है, ऐसे ठग फेरमें कहीं न पड़जाना.नहीं तो फिर
सिवाय शिर पीटनके और कुछ हाथ नहीं आयगा. अच्छा ! जाओ
इस लमय भीतर जाओ. देखो-रत्ना अकेली होगी. मैं भी अभी
आता ही हूं।
( दोनोंका दो ओर प्रस्थान.)
( लक्ष्मीका गातेहुए प्रवेश.)
विधाता) कैसा नितुर तुम्हारा शेल ।
कराल कालसे तुम दुनियाँको बार बार रहे पेल ॥

८६ तुलसीदास करुण कंदन किसी व्यथितका आर्तनाद कभी किसी मथितका कहीं नीरव रोदन किसी पथिकका तुम्हाराही है खेल। मोहे बतादो काहे तुम्हारा दुखसे इतना मेल ॥ अंक तीसरा--५ वा सीन. (वृन्दाबन-यमुना तीरका पथ,) ब्रजबालाओंका गीत- निपट कपट तू बंशीधारी काहे न सम्हारो तेरे लागि मरे बजकुमारी । धरम करम लाज शरम' सौंप दियो उन चरणन तब हूं न कीन कृपा मिली न संग तुम्हारी। घबडाबत हम ब्रजबाला आओ पास हमारी । (दो वृन्दावनवासियोंका प्रवेश) एक बृन्दाः-क्या कहूं भाई ! घरबार छोड़कर यहां बृन्दावनको आया. सोचा था-कि, मजेम दिन कटेंगे.किंतु यहां बानरप्रभुओंके उपद्रवसे तो ठहरना ही कठिन होगया है। जहां कभी भी जाओ, आगे पीछे आपलोग अरदली बनके चलते हैं और जहां जरा भी इधर उधर देखने में लगगये तो एक न एक चीज गायब । दूसरा वृन्दाः-अरे भाई ! इन्हींके उपद्रवोंके मारे तो त्यागनेका विचार कररहा हूँ। इन कुटुम्बियोंकी दया तो बिनमांगे ही बरषने लगती है। और तो और भोजन करनेके पहले थाली सामने रखकर जहां थोडासा भगवान्को निवेदन करनेके लिये आंख मून्दी नहीं कि, थालीकी थाली निवेदन होजाती है और फिर दिनभर प्राण भोजनवेदनसे ही व्यतीत । -- ८७ तुलसीदास, एक वृन्दाः-बचनेका कहीं उपाय ही नहीं है, इन ब्रजवासि- योंके मारे । स्थलपर तो ब्रजवासीवानरदेव और जलमें जाओ तो ब्रजवासिनी नागिनीसुन्दरियोंका चुम्बन; अब रहा शून्यका तो भगवान्ने पर तो दियाही नहीं है। दूसरा बृन्दाः-पर होता तो क्या, वहां चील्ह कब्बे ही खाजाते! (हरिप्रसादका प्रवेश.) अरे यह एक बाबाजी भी आरहे हैं. हरिप्रः-देखू महात्मा तुलसीदास यदि मुझपर कृपा करें तो.शायद चित्तका मालिन्य दूर हो । एक वृन्दाः-बाजीका कहाँ गमन हो रहा है ? हरिप्रः-महापुरुष तुलसीदास गोस्वामी यहां रामघाटपर अवस्थान कररहे हैं. मैं उन्हीके दर्शनेच्छासे वहां जारहा हूँ। एक वृन्दा:- तुलसीदास गोस्वामी; वे कौन है ? हरिप्रः-हाळमें ही वे दिल्लीसे यहां आये हैं । दिल्लीके बाद- शाहको भी उन्होंने खूब निहाल किया था। दूसरा वृन्दाः-कैसे कैसे ? महाराज ! हरिप्रः-बादशाहने उन्हे कारागारमें कैद करलिया था, परंतु तुलसीदास ठहरे परम रामभक्त, उनका अपमान देखकर रामके अनुचर वानरोंने दिल्लीमें भीषण उपद्रव शूरू करदिया और महलतक वहस नहस करदिया, तब बादशाहने उनसे क्षमा प्रार्थना की. तब वे निरस्त हुए। एक वृन्दाः-ऐ ! गोस्वामीजीके साथ भी क्या बन्दर फिरा करते हैं? दूसरा वृन्दाः-, दादा ! बात तो बड़ी भयानक है, एक तो इन ब्रजवासियोंके आदरसे ही प्राण वाहि त्राहि कररहे हैं और -

-
८८
तुलसीदास
उसपर कहीं अयोध्यावासियोंने बिरादरी शूरू करदी तो-तो यहां
किष्किन्धाकाण्ड आरम्भ होजायगा।
एक वृन्दाः-चलो चलो. आज ही यहांसे प्रस्थान करो।
दूसरा वृन्दाः-हां! हां! ! मेरा भी यही मत है ।
हरिप्र: क्या आप भी चलेंगे उनके दर्शनको ?
दूसरा वृन्दा: हाँ ! हाँ !! आप आगे आगे चलिये, हम अपना
बोरा बिस्तर बांधकर आते हैं पीछे पीछे । ( दोनों का प्रस्थान )
हरिप्रः जै सीताराम ! (प्रस्थान )
अंक तीसरा-छठवां सीत.
( मदनमोहनका मन्दिरमें उनकी भूति)
पण्डागण-महन्त परशुराम-यात्रीगण, ब्रजबालागण.
ब्रजबालाओंका गीत.
रङ्कभक्तसे आओ नन्दलाला।
व्याकुल होय बुलावत तुम्हें सब बजबाला ॥
वंशी तानसे नूपुरगानसे मधुर-आनसे
मिटादो हमरे चितकी जाला ॥
तुम निष्ठुर श्याम मुरारी
तुम मोहन मुरलीधारी
तुम्हारी बजबालायें प्यारी तुम्हे पहनायें वरमाला ॥
(तुलसीदासका प्रवेश)
परशुः--आइये आइये भक्तवर ! आज हमारा अतीव सौभाग्य
है कि, आपके दर्शन आपकी भक्तिकी बात आज चारों ओर
गूंजरही है ?
तुलसी: यह आप क्या कहरहे हैं. मैं रामका दास हूँ।

तुलसीदास ८९ परशु:- अच्छा महाराज़ आप दिन रात रामनाममें मग्न रहते है. कृष्णनाम ही कभी भी नहीं करते । वृन्दावन में आकर भी कभी वृन्दावनचन्द्र कृष्णका नाम आप नहीं लेते, यह तो बड़े ही आश्च- यकी बात है. शास्त्रमें भी कहा है भगवान् कृष्ण सोलह कलासे पूर्ण अर्थात पूर्ण भगवान हैं। राम तो केवल १४ कलामें पूर्ण हैं। तुलसी:-अनादि अनंत भगवान् उनके अंशकणाका निर्णय करेगा कौन? सुदबुद्धि है असमर्थ ज्ञप्ति नहीं है वार्ता अनंतकी। पूर्ण है कौन कला कला कौन है अपूर्ण कैसे विचारूं मैं उनका नहीं है विचारक मैं भक्त के मनरंजन हित धरापर ये धरनि भूप दिखात रूप अनेक हैं होत मम,कोई रूपमें श्रीकृष्णके कोई पात आराम श्रीराम प्राणाराममें मैं भी जानता था राम!

९० तुलसीदास लल्लाराम कुँअर राम है राजाराम पर धन्य हैं आप दिया है ज्ञान आज आपने हैं राम पूर्ण चौदह कलामें धन्य हूं मैं धन्य है जीवन मेरा मैं उपासक हूँ मेरे श्रीरामका । अभेद है वे न भेद है कुछ राममें श्रीकृष्णमें तथापि मैं जब निहारत हों रूप मुरलीधर श्याम देखत हूं मैं मूरत उसीमें धनुषधारी श्यामका फिर कैसे कहूँ हे देव! कुछ और नाम जब नाम राम है मेरा बस मंत्र एक? परशु:-आश्चर्य है भापकी रामभक्ति ! अच्छाप्रभू! अव मद- नमोहनका दरवाजा खुलरहा है।प्रणाम करके कुछ प्रसाद पाईये। ( द्वारउद्घाटन, तुलसीदासके व्यतीत सबका प्रणाम) परशुः--यह क्या गोस्वामीजी ! आपने प्रणाम नहीं किया? भो ! ठीक है आप रामभक्त हैं-

तुलसीदास
अपने अपने इष्टको, नमन करें सब कोय ।
परशुराम बिन कष्टके, नमैं सो मूरख होय ।।
तुलसी:-(स्वगत ) यह क्या चतुराली मेरे साथखेल रहे हो ?
व! यह नहीं होगा राम ! मुझे यहां भी तुम्हारा वही रामरूपही
देखाना पडेगा ! सावधान देव ! (प्रगट)
काह कहों छवि आपकी, भले बने ब्रजनाथ।
तुलसी मस्तक जब नवे,धनुषबाण ले हाथ!( प्रणाम )
(मदनमोहनका रामरूपधारण)
वाह वाह देव ! वाह देव !! वाह वाह !!! देखिये महंतजी !
क्रीट मुकुट गाथे धन्य, धनुषवाण लिये हाथ ।
तुलसी जनके कारणे, नाथ मये रघुनाथ ॥
जाओ महाराज ! प्रसाद लाओ।
परशुः-धन्य प्रभू तुलसीदास-अलौकिक है तुम्हारी क्षमता।
ब्रजबालाओंका गीत।
चमत्कार! चमत्कार !! चमत्कार !!!
देव ! तुम्हारी लीला अपूर्व है अपार !!
तुम हो मुरलीधारी
तुम हो धनुषधारी
तुम हो अवधविहारी तुम सुनते बजमें गारी ।
तुम्हे निर्विकार ! निर्विकार !! निर्विकार !!!
अनंत हो गुणधाम
तुम कृष्ण तुम राम
सीतापति राम तुम राधिकाके श्याम
तुम्हे नमस्कार ! नमस्कार ! नमस्कार !!!

१२
तुलसीदास
अंक तीसरा-७ वां सीन.
(पथ)
लक्ष्मीः-गीत)
(तुलसीदास वीचमें आकर गीत सुनने लगते हैं)
सुख निमग्न वे रहते थे
हरषित हुलसित अंतरसे
राम कथा वे कहते थे ।
पति-पत्नीकी वह जोडी, मुझे आती याद थोडी थोडी
इस राम अभागेने फोडी
वे रामके द्वारे जाते थे ॥
एक बच्चा मांगा था उनने
दिया प्रकृतिरूपी वाघिनने
कुछ जन्मसमयके फेरनमें
जहाँ शास्त्र न सीधे फलते थे।
मुख न देखा उस. बालकका
( उसे) पथमें डाला, तारा पलकका
भरोसा था बस उस मालिकका
जो भाग सदासे लिखते थे ।
उन्मादिनी होगई वह. माता-
दुनियाँसे बन्द किया खाता-
मुंह पर था रामनाम सुहाता
वे राम दूरसे हँसते थे।

तुलसीदास
९३
पिया-शोकसे पछाड खाकर
हाथ जानसे अपनी धोकर
विप्र गिरे निठुर धरापर
जहाँ शास्त्रपाठ वे करते थे।
तुलसी:-कौन हो तुम माता ! किसकी सुनारही हो तुम
यह करुण वार्ता ? जिसे सुनकर मेरा मन न जाने क्यों इतना
चम्बल हो रहा है ?
लक्ष्मी:-कौन हो तुम ! ऐ ! ए !! यह क्या आत्माराम अथवा
अथवा उन ब्राह्मणकी प्रेतात्मा ?
तुलसीः-देवी ! मेरा नाम तुलसीदास है।
लक्ष्मी:-तुलसीदास ! तुलसीदास !! परन्तु यह तो वही
मुख वहीं आंख-वही सब !! यह क्या मैं क्या स्वप्न देख रही हूँ.
तुलसीः-तुम किसकी बात कह रही हो देवी !
-लक्ष्मीः-मैं-मैं कह रही हूं, एक ब्राह्मणको बात-परम निष्ठा-
वान् शास्त्रज्ञ ब्राह्मण थे. वह-आहा ! हा !! हा !!! उनकी स्त्रीको
दुःख था कि, उनके कोई सन्तान नहीं थी. बड़ी कठिनाईसे एक
बच्चा
हुआ, वहभी अभुक्त मूल नक्षत्रमें ।
तुलसी:-अभुक्तमूल समयमें ?
लक्ष्मीः-हां! हाँ !! फिर उस लड़केको उन्होंने क्या जाने
कहां पथपर डाल दिया।
तुलसी:--पथपर डाल दिया. गुरुदेवने भी यही कहा था
फिर फिर...
लक्ष्मी:--फिर पुत्रशोकसे उन्मादिनी होकर 'राम राम
कहतीहुई अभागी उन पुत्रकी माता परलोक सिधारगई और
साथ ही उस अभागे ब्राह्मणकी भी मृत्यु होगई ।
१

-- तुलसीदास ! तुलसीः- मृत्यु होगई ? लक्ष्मीः-हाँ ! रामकी दयासे उस निष्ठुर कपटी... (क्रोधसे कांपती है.) तुलसी:- उनका नाम क्या था ? लक्ष्मीः-उनका नाम ! उनका नाम था आत्माराम और... तुलसी:- आत्माराम ! भात्माराम !! पिता पिता !! लक्ष्मी:-और उस अभागिनका नाम था हुलासी। रामके निष्ठुरविचारसे रामके इस भयानक संसारसे.... तुलसी:-रामका क्या दोष है मा! अपने अपने कर्मोंका फल है. गम दयामय है। लक्ष्मीः क्या राम दयामय, हाः ! हाः !! हाः !!! तुमपर भी शीघ्र उनकी दया होगी हाः ! हाः ! हाः ! (प्रस्थान ) तुलसीः-उन्मादिनी है यह नारी. रह पितृदेव- मातृदेवी !! मेरे लिये ही तुमको संसार त्यागना पड़ा. देखना देव राम ! उनकी आत्माको कोई कष्ट न हो। अंक तीसरा-८ वाँ सीन. (वृन्दावन--पाय) रत्ना-चन्द्रा और लीला. रत्नाः--यहां आना भी तो व्यर्थ ही हुआ सखी ! वे फिर काशीकी ओर चले गये। हाय! अब मेरे अदृष्टमें उनका राम-मय मूर्तिका दर्शन नहीं है। चन्द्रा:-दुःख न करो सखी! चलो. यहाँसे ब्रजनाथके दर्शन कर हम फिर काशीजीकी यात्रा करें। रत्नाः काशीजीकी यात्रा ? परंतु अब कहीं ये प्राण किसी और महातीर्थ की यात्रा न कर जांय ? (प्रस्थान)

तुलसीदास
चन्द्राः-छीः, ऐसे अमङ्गलकी बातें न कहो!
रत्ना:-अमङ्गल नहीं चन्द्रा ! उसीमें ज्ञात होता है स्वामीका
मङ्गल है, न जाने हृदयके अन्तस्थलसे कौन ये बातें मुझे सुना
लीला:--देवी ! धैर्य धरो. राम करुणामय हैं,वे अवश्य तुमपर
करुणा करेंगे-तुम अवश्यही उनका दर्शन पाओगी।
रत्ना:--राम करुणा करेंगे; राम ! राम !! करुणा करो देव !
शीघ्र करुणा करो देव !!
(नेपथ्यमें गीत)
आदि कालके आदि कविने गाया था जो गान ।
उस महागानेकी स्वरलहरीमें गूंज उठाथा राम ॥
रत्नाः-आहा ! कैसा मनोहर संगीत है ?
(फिर गित)
कविकी रस कल्पित आकर्षणमें
त्रिभुवन क्षिप्तहुआ आनंदमें
आर्यवर्तमें त्रेतायुगमे सत्यहुआ वह गान ।
चन्द्रा:--बड़ा ही हृदयग्राही है यह संगीत ।
(फिर गीत)
भक्तोंका था वही सुअवसर
पापियोंके पाप खलनतर
रचना कविकी वसुन्धरापरथा एक अनुपम दान ।
लीला:-.प्राण शीतल होगये, कान धन्य होगये,
(फिर गीत)
कालकी अविरामगति
कलियुग आया मन्दमति

९६
तुलसीदास
सब पापकर्ममें लिप्त अति हुश्रा देवीका अवसान
आर्यपुत्रगण भूल गये उस अनुपम गांवी नाक
(जब) व्यथित हुआ वह विश्वकवि
(फिर) आर्यवर्तमें आय तभी
विश्वप्रेमकी मधुरछविमें वही पुराना गान
भाषामें गाने लगा वे कविभक्त भक्तिमान ।
( बाहर आकर बालकवेशी राम गाने लगते है)
रत्ना:--(स्वगत) ऐ ! यह तो उनकी ही कथा है (प्रगट ) बालक
नहीं नहीं. पहचान गयी प्रभू ! पहचान गयी आज तुमको देव !
दयामय राम ! मेरा प्रणाम ग्रहण करो।
( राम चतुर्भुजमूर्ति प्रगट
चन्द्राः लीला:--ए ए ! यह क्या चारों ओर उज्वल क्यों
दोरहा है?
रामः--त्रेता काव्य सहस चौवीस रामायण
इक अक्षर उच्चरे ब्रह्महत्या परायण
अब भक्तन सुखहेतु बहुलीला विस्तारी
राम चरित रस मत्त अटल निशि दिन व्रतधारी
संसार पावके पार कहाँ सुगमरूप नौका लयो
कलिकुटिल जीवहित बाल्मिकी तुलसी भयो ।
रत्ना:--मेरा क्या होगा प्रभू ?
रामः-तुम तो उनसे अलग नहीं हो देवी ! तुम और वे तो
दोनों अभेद एकात्मा हो. आओ देवी ! तुम्हारी और उनकी आत्मा-
को मिलाकर में दिखादेता हूं. तुम ही तुलसी हो, तुम ही रत्ना
हो. आंखें खोलो देवी! (अन्तान)
(रत्ना अवाक् होकर देखने लगती है )

राम!!! तुलसीदास ९७ चन्द्रा:-ऐ ! यह क्या हुआ सखी ! चारों ओर फिर अन्ध- कार । सखी! यह क्या तुम्हें क्या हुआ? रला:-चन्द्रा ! आशीर्वाद करती हूँ, सुखीरहो. मैं चली.दुःख न करना बहन् ! इसका प्रयोजन आपड़ा है. राम ! राम !! राम (मृत्यु) लीला:-यह क्या ! यह क्या ? अभी तो भली चंगी थी, अक. स्मात् यह क्या अनर्थ हुआ? चन्द्राः हाय रत्ना! रत्ना ! ! दौड़ो दौड़ो, देखो मेरी सखीको क्या होगया? (चन्द्रिका और गरीबदास दौड़ते आते हैं) चन्द्रिकाः- क्या है क्या है ? ऐं ! यह क्या रत्ना ! रत्ना !! अ- भागी रत्ना !! उह,सब शप!! राम ! क्या यह भीतुम्हारा विचार है? चन्द्रा:-रत्ना ! इस प्रकार मुझे धोका देकर चलीगई देवी ! प्रेममयी पवित्रताकी छवि आओ एकबार फिर मुझे'चन्द्रा' कहकर पुकारो रत्ना ! उत्तर दो रत्ना ! तुमने कभी मेरे आह्वानकी उपेक्षा नहीं की थी। सखी ! कहां हो ? राम ! मेरी सखीको जिला दो। लीला:-देवी ! अब दुःख करनेसे क्या होगा ? पुण्यमयी पुण्यलोकको चलीगई। चन्द्रिका:-बाह रत्ना ! एकबार तुमने मेरीओर तुम्हारे स्नेह- मय भ्राताकी ओर नहीं देखा. छाती पर मेरे पत्थरका बोझ रखकर चली गई. अच्छा जाओ चलो चन्द्रा ! चलो देखें वह पाषाण तुलसी कहां है?उसको कहेंगे कि, उसकी निर्वासिता सीता भी देह- त्याग गई.चलो देखें कहां है वह पाषाण राम चलो ? शीघ्र चलो। गरीवः-उतावले न हों भाई ! अभी इस देहका अग्निसंस्का- रका प्रयोजन है। चन्द्रिकाः -हाँ हाँ, ठीक कहरहे हो.जिन हाथोंसे आदरसहित छुटपनमें उसके मुख में मिठाई उठा देता था उन्ही हाथोंसे उसके

तुलसीदास
मुखमें आग भी उठादेना पड़ेगा. यह सुवर्ष देहको दो मुट्ठीभस्म में
परिणत करना पड़ेगा, ठीक है. अच्छा चलो संस्कारका आयोजन
करो।
अङ्क तीसरा-९ वो सीन.
(असितीर, सामने सीता राम लक्ष्मणकी मूर्ति)
तुलसीदास (ग्रंथ हाथमें )
रामरामति रामेति रमे रामे मनोरमे ।
सहस्त्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने ॥
(महाबीरका प्रवेश)
महाः -तुलसीदाल !
तुलसी:--प्रमाण देव ।
महा:- भक्ति आए ज्ञानसे तुम्हारे
भुवनपर भाषामें प्रचारित होगया
नाम प्राणारामका
ग्रन्थ तुम्हारा हो गया सम्पूर्ण ।
अब दुःखसे धराके
पाकर त्राण
चलो नित्यधामको
विहारो वहां स्वरूपसे ॥
तुलसी:-समय भागत रुद्रावतार ! थोड़ीदेर ठहरिये में
शरीर त्यजूं ।
महा:-तुम्हारे पास ही रहूंगा पुरि-परंतु अलक्षित होकर।
( अन्तान)
(शिष्यगणोंका प्रवेश)
एक शिष्यः-प्रभू ! आज आप हम सबको छोड़कर अकेले
क्यों यहां चलेआये?

'तुलसीदास तुलसी:-वत्स! अब इस जराजीर्ण देहसे रानका कार्य करना असम्भव हो गया है। तुमलोग मेरी संतानसे भी अधिक प्रिय हो. इसलिये अब मेरे ग्रन्थका भार लेकर मुझे अनुमति दो मैं राम- धाममे जाऊं। दूसरा शिष्यः-ऐसी निदारुण वार्ता न कहिये प्रभू! हम सब आपको देखकर ही जीवित हैं। तीसरा शिष्यः-हमलोगोंको अनाथ करके कहां जाओगे देव ! और यदि जाना ही है तो हमसबको साथ ले चलिये। तुलसी:-तुम्हारे लिये अभी बहुत कार्य बाकी है. शिष्यगण ! अभी प्रत्येक घर २ मे रामनामका प्रचार तुम लोगोंको करना पड़ेगा। नहीं तो मेरा वत असम्पूर्ण रहजायगा। शिष्यः-हमारा एकमात्र कार्य आपकी सेवा करना ह प्रभू! तुलसी: मैं कौन हूँ ? सब राम हैं-रामही सबके प्रभु हैं. पदि मुझे गुरु मानते हो तो यत्नसे मेरा भादेश पालन करो. • रामनाम यश वरणिके, भयहुँ चहत अब मौन । तुलसीके सुख दीजिये, अब ही तुलसी सौन ॥ (समाधि लगानेके साथ ही सीतारामका प्रगट होना) रामः-हुआ कार्य अवसान मुनि क्लांत हो तुम अब आकर निजधाममें सुखसे लवी विश्राम ॥ ( एक ज्योतिसी निकलकर आकाशमें लीन होजाती है) (चन्द्रा और चन्द्रिकाका प्रवेश) चन्द्रिका:-तुलसीदास ! तुलसीदास ! ! यह क्या यह क्या?

१०० तुलसीदास एक शिष्यः- संवत सोलह सौ असी, आसिगंगाके तीर । श्रावण शुक्ला सप्तमी, तुलसी तज्यो शरीर ।। चन्द्रिकाः--राम ! तुमने किसीको नहीं छोड़ा। दूसरा शिष्यः--आओ भाई-चन्दन काष्ठ इत्यादि सब ले आयें और सबको संवाद दें ( चन्द्रिकासे ) आप थोड़ी देर यहीं ठहरिये । ( चन्द्रा और चान्दकाके सिवाय सबका प्रस्थान ) चन्द्रिका:-चन्द्रा ! देखी तुमने रामकी करतूत. वह है सीता रामकी मूरती। मैं आज उसे गंगाजीम बिसर्जन ढुंगा. रत्ना और तुलसीको मूर्ति... ( सीतारामकी मूर्ति उठाने जाता है- महावीरजी आकर हाथ पकड कर) महा:-क्या कर रहे हो उन्माद ! कौन रत्ना और कौट तुलसी ? वह देखो. ( सीताराम झांकी अचानक प्लाट फटकर गोलोकमें बदल जानी रत्नाका छायामूर्तिका तुलसीदासके पास आना ) तुलसी:--रत्ना! ? रत्नाः-तुलसी! (दोनोंका मिल जाकर वाल्मीकिके रूपमें बदल जाना) राम:-वाल्मीक! वाल्मीकः- प्रभू कार्य हुआ अवसान. (प्रगाम) डाप पुस्तक मिलनेका ठिकाना- गडाविष्णु श्रीकृष्णदास, "क्ष्मीवेंकटेश्वर" स्टीम् प्रेस, " श्रीवेंकटेश्वर" स्टीम प्रेस, कल्याण--बंबई. खेतवाडी-बंबई. खेमराज श्रीकृष्णदास,

Tulsidas Natak

Author
Mukhopadhyaya,krishna Kumar
Title
Tulsidas Natak
File name
Tulsidas Natak
Text
OCR done
Published
2005/01/12
Publisher
Gangabishnu Shrikrishnadas, Bombay
Language
Sanskrit
Pages
99
Library
Natya Sodh Sansthan, Kolkata
Classification
Drama. Plays
Keywords
Drama
DLI number
292721
Barcode
4990010202609.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
Rights
In Public Domain
VMLT id
YSAnkZGDVWM
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