Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Muktak Kusumanjali
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मुक्तक-कुसुमांजलि
सम्पादक
डा० राधेश्याम शर्मा
सहायक आचार्य
हिन्दी विभाग, राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर
बुक लैण्ड पब्लिशर्स
लालजी सांड का रास्ता, जयपुर-3
प्रकाशक
राजेश अग्रवाल
बुर लण्ड पब्लिशर्स
सालजी सोड का रास्ता, जयपुर-3
प्रभम सस्करण
1990
॥ मूल्य 2000.
मुदर भजता प्रिन्टस
जयपुर।
आमुख 'मुक्तक कुसुमांजलि' स्नातकोत्तर कक्षा के पाठ्यक्रम को दृष्टिगत रखकर तैयार किया गया मुक्तक काव्य का सकलन है। इसमे अपघ्र श के कवि योगी दुदेव (छठी-सातवी शती) से लेकर दुष्यन्त कुमार तक के विशिष्ट कवियों को चुनी हुई रचनाएँ मगृहीत की गई हैं । रचनाओ के चयन मे गुणात्मकता और विविधता के साथ इस बात का ध्यान रखा गया है कि मुक्तक काव्य परम्परा का विकासात्मक स्वरूप स्पष्ट हो सके। भूमिका में मुक्तक के स्वरूप, वर्गीकरण तथा विकास के साथ सफलित मुक्तककार एव उनकी रचनाओं का परिचय दिया गया है। इस विवेचन मे मुक्तक- काव्य से सम्बधित सभी पहलुओ पर दृष्टिपात करते हुए विद्यार्थियो को स्वतत्र चिन्तन की दिशा दी गई है, जो काव्य वे मूत्यापन के लिए उपयोगी है। अन्त मे शब्दार्थ और टिप्पणी दिए गए हैं। योगी दुदेव के सभी सकलित दोहो का सरलाप भी स्पष्ट किया गया है। प्राशा है, यह सकलन विद्याथियों में लिए उपादेय होगा। --सम्पादक
विषय-क्रम
भूमिका
मुक्तक परिभाषा एव स्वरूप
2
सकलित मुक्तककार
योगी दुदेव
तुलसीदास
रसखान
सुन्दरदास
पद्मावर
मूर्यमल्ल मिश्रण
शमशेरवहादुर सिंह
दुप्यन्तकुमार
शाप टिप्पणी
3
भूमिका परिभाषा एव स्वरूप मुक्तक मुक्त शब्द मे समाथंक 'कन् प्रत्यय जोडन से 'मुक्तव शब्द बनता है जिसका अथ है--वह रचना जो अपना अथ व्यक्त करने के लिए पूर्वापर छद पर आश्रित न होकर अपने आप मे पूर्ण होती है। अग्निपुराण मे यहा है मुक्तक श्लोग एवंश्चमत्कारक्षम सताम्' अर्थात् मुक्तक एक ही श्लोक मे सहृदयो के हृदय म चमत्कार उत्पन्न करन में सक्षम होता है। प्रबध रचना के समान इसमे कथासूत्र एव प्रवाह नहीं होता । मुक्तक अथ की अभिव्यक्ति मे स्वत पूण हाने के साथ सहृदयो को आह्लादित करने मै भी समय होता है । इस लक्षण के अनुसार रसास्वाद मे सक्षम हाना, उसका एष आवश्यक गुण है। 'अग्निपुराण के उपरात ध्वयानोक के टीकाकार आचाय अभिनवगुप्त ने लिखा है 'मुक्तम येनाऽसिंगितम् । “पूर्वापर निरपेक्षेणापि हि येन रसचषणा क्रियते तदव मुक्तवम् । अर्थात् जिसका लगाव पूध और पर पद्यो से न हो तथा स्वतत्र रूप से अथ द्योतन तथा रसोद्रेक मे समय हो उसे मुक्ता कहते हैं । हेमच द्राचाय नै अनिबद्ध मुक्त्यादि कहकर सभी स्फुट रचनाओ को मुक्तक के अतगत बताया है। दण्डी और वामन ने मुक्तक को स्वतत्र काव्यरूप न मानकर उसे प्रबध वाव्य का अग माना है । दण्डी न 'मुक्तक काव्य' नाम तो नही दिया पर उन्होंने सगबद्ध या प्रबन्ध काव्य के समस्त रूपो का एक प्रकार का तथा उनसे भिन्न निबध रचनामा को अय प्रकार का बताया है । आचाय विश्वनाथ ने साहित्य दपण मे अनिद्ध काव्य का मुक्तक माना है- 'छ दोबद्धपद पद्य तेन मुक्तेन मुक्तकम् उपयुक्त विवेचन से स्पष्ट है कि अपने मे पूण तथा अय छद निरपेक्ष रचना को सभी आचार्यों ने मुक्तक कहा है । यह प्रबध काव्य का अग न होकर 2 स्वत व काव्यप है, जिसकी अपनी विशेषता है। मुक्तक काव्य की तीन प्रमुख विशेताए हैं-निय धता सक्षिप्तता और सरसता। मुक्तक में एक ही भाव स्थिति या विचार का गहरा वणन हाता है जीवन का विस्तृत चित्रण नही । अत मुक्तववार व रूप मे वही कवि सफल हो सकता है जिसम भावो को समटने तथा सारत अभिव्यक्त करने की क्षमता का अद्भुत समवय हो। आचाय शुक्ल के शब्दो म ' इसके लिए कवि को मनारम वस्तुओ और व्यापारो का एक छोटा मा स्तवक कल्पित परना पड़ता है। अत जिस कवि म कल्पना की समाहार शक्ति के साथ भापा को समास शक्ति जितनी अधिक होगी उतना ही वह मुक्तक की रचना मे सफल होगा। मुक्तक काव्यत्व की दष्टि से प्रवध की अपेक्षा विशिष्ट हाते हैं । रसध्वनि को श्रेष्ठ काव्य मानने वाले आचाय आन दवधन ने कहा है जमरक क्वेरेक श्लोर प्रबधशतायत अर्थात अमरुशता का एक एक श्लोर सैक्डा प्रबधौ से अधिक रमणीय है क्योकि उसके भीतर सरस प्रसगो की योजना इस कौशल स की गई है कि श्लोक को पढते ही पाठक भावमग्न हो जाता है । हिदी म सूरदास का सूरसागर तुलसीदास की पवितावली गीतावली आदि रचनाए तथा बिहारी सतसई आदि मुक्त काव्य परम्परा वै अनमोल रत्न हैं। मुक्तककार का कोशत अनावश्यक प्रमगो के त्याग एव सरम स्थितिया के चयन म निहित होता है। प्रध काव्य को विशिष्ट मानने वाले आचाय शुक्ल ने मुक्तक को चुना हुआ गुलदस्ता बताकर प्रकारातर से उसक महत्त्व को स्वीकार किया है। प पद्मसिंह शर्मा ने भी मुक्तक का मीठी रोटी के सदृश मधुर बताया है । वस्तुत मुक्तक रस से परिपूण ऐसी सम्पुटिका है जो भावो मेप के क्षणो मे पाठक को सहसा चमत्कृत कर उसक मन पर स्थायी प्रभाव छोडती है । डा रामसागर त्रिपाठी लिखते हैं मुक्तक का अथ होगा --ऐसा पद्य जो परत निरपेक्ष रहते हुए पूण अथ थी अभिव्यक्ति मे ममथ हो काव्य के लिए अपेक्षित चमत्कृति इत्यादि विशेषताओं मे युक्त हो अपनी काव्यगत विशेषतामा के कारण जो मानत देने में समय हो जिसका गुम्फन अत्यन्त रमणीय हो और जिसका परिशीलन ब्रह्मान द सहादर चवणा के प्रभाव से हृदय की मुक्तावस्था प्रदान करने वाला हो इस प्रकार मुक्तक शब्त को सार्थकता रूप की दृष्टि से निबध होने व प्रभाव की दप्टि हृदय को मुक्त दशा (आनदावस्या) में पहुचाने मे दखी जा सकती है। कवि कम की .
3 दृष्टि से मुक्तर रचना प्रबंध की अपेक्षा दुष्कर होती है । इसके अनेक कारण हैं--एक वात तो यह है कि प्रबध काव्य मे पाठक का मन क्था निर्वाह की राच क्ता से बँधा रहता है। आग को घटना और परिस्थिति को जानने के लिए वित्त इतना उत्सुक रहता है कि बीच मे जाये अनेक दोपो की बोर हमारा ध्यान ही नहीं जाता। अगर अनायास विसी दोप पर दृष्टि पड जाए तो हम कथा के परिणाम को जानने की प्राकुलना म तुरत आगे बढ जाते हैं। दूसरी बात यह है कि प्रवध के पात्रो से हम इस कदर जुड़ जाते हैं कि उनके क्रियाकलापा में हम गहरी रुचि लेने लगते हैं । पात्रो के सम्बध मे हमारी एक धारणा बन जाती है और हम प्रवधगत अ य दोषो का अनदेखा कर देते है। प्रवध अतगत क्था प्रवाह मे प्रसग से जुडकर नीरस रचना भी सरस हो जाती है । एक उदाहरण म यह बात स्पष्ट की जा सकती है। तुलसी के रामचरितमानस के अनेक नीरस दोहे उनके मुक्तक-सग्रह दोहावली म दिए हुए है । एक दोहा देखिए सरनागत रह जे तजहि निज अनहित अनुमानि । ने नर पामर पापमय तिनहिं विलोकन हानि । दोहावली में यह दोहा एक सामाय नीति कथन के रूप मे आता है जिसका अथ शरण में आये हुए व्यक्ति को शरण न दने वाला पापी है और उसका मुह भी नहीं देखना चाहिए । इस कथा में कोई रसात्मकता नहीं है। यह दोहा मात्र सूक्ति कहा जा सकता है । इसके विपरीत 'रामचरित मानस मे यह दोहा विभीषण की शरणागति के प्रसग मे उस समय कहा गया है जबकि राम के परामशदाता विभीषण का शत्रु पक्ष का बताकर उस शरण म न लेने की सलाह देते हैं । एसी स्थिति में यह दोहा पाठक के मन मे राम की शरणागतवत्सलता का भाव जगाने मे समथ होता है । यह प्रब धगत परिस्थिति का प्रभाव है कि एक सामा य सूक्ति भी भावव्यजक हो जाती है । मुक्तक के भेद सस्कृत के आचार्यों ने मुक्ता के अनेक भेद किये हैं। दण्डी के अनुसार मुक्तक के मुख्य भेद तीन हैं-मुक्तक कुलकोश और मधात । जान द वधन के अनुसार मुक्तक सदानितक विशेषक कलापक, कुलक और पयायवध-छह प्रकार के मुक्तक हैं । हेमचन्द्र ने मुक्तक काव्य के भेद इस प्रकार माने है-मुक्तक सदानितक, विशेषक क्लापर कुलक कोश प्रघट्टर विकोणक और सघात । विश्वनाथ ने साहित्य दपण मे मुक्तक काय के भेद इस पकार दिए हैं- 4 1 2 8 9 मुक्तप-अथ यी दृष्टि से अपने पाप में पूण एक श्लोक । युग्मय या सलानितर-दो लादो में पूर्ण अय व्यक्त करन वाली रचना । 3 विशेषम--यह रचना जिसका अय (अ वय) तीन पलोषा म पूर्ण होता है। 4 मलापर-चार श्लोको वाली रचना है। 5 युलर-पाच प्रलापो वाली रचना । हेमचन्द्र ने इस भेद म श्लाक-सख्या पाच से 'बौदह तक मानी है। 6 फोग-इराम मुक्तको या समूह होता है । आपाय हेमचन्द्र का मानना है पि पिसी एक पयि या अनेक पवियो की मूक्तियों के सह को कोग वहते हैं। 7 प्रघट्टप-एक कवि ये मुक्तप-सग्रहक प्रघट्ट या कहत हैं । जस गाथा सप्तशती बिहारी सतसई मादि। विषीणक- अनेक कवियो के लिसे हुए मुक्तको या सग्रह । सघात या पर्यायवध-एक कवि द्वारा एक विषय पर लिखे गय मुक्तको को यह नाम दिया गया है। उक्त वर्गीकरण से स्पष्ट है कि व ध की दृष्टि से मुक्तक काव्य का आवार केवल एक प्रलोक तक सीमित नही था। विद्वानो ने प्रलोक सध्या के सम्बध में विभिन्न मत व्यक्त किये हैं पर इस बात मे सभी एक्मत है कि मुक्तक रचना अथ की दृष्टि से स्वर में पूर्ण होती है। डा रामसागर त्रिपाठी ने विषय वस्तु की दृष्टि से मुक्तको वा चार भागो में विभक्त किया है- 1 रसात्मक मुक्तक-इनम रसचवणा या भावव्यजना कराने वाले सभी मुक्तक आ जाते हैं। 2 धार्मिक मुक्तक-देवता विषयक रति से सम्बध रखने वाले सभी मुक्तको का इस वग में समावेश हो जाता है। 3 प्रशस्ति मुक्तक-राजाओ की दानवीरता को आधार बनाकर लिखे गये मुक्तक इसम रखे जा सक्ते हैं। 4 सूक्ति मुक्तक-ऐसे मुक्तको म लोकनीति तथा चमत्कार आदि वण्य विषय होते हैं। इनमे भाव व्यजना न होकर मात्र तथ्य कथन होता है जो उक्ति वैचित्य के कारण चमत्कारपूर्ण होता है । माध्यम की दष्टि से भी मुक्तक काव्य के दो भेद क्येि जा सकते हैं - 5 1 पाठय मुक्तक-पाठय मुक्तव कवि को तरल अनुभूति को रूपायित करते है पर उनमे गेयता नहीं होती। 2 गीति मुक्तक-इन मुक्तका मे कवि की तीव्र अनुभूति का आवेग सगीतात्मक्ता लेकर बाहर फूट पड़ता है । संस्कृत काव्यशास्त्र में निरूपित मुक्तक काव्य क उपयुक्त भेदो को देखकर यह निष्प निकालना उचित होगा कि विषयवस्तु रूप सध्या आदि की दृष्टि से मुक्तक के अनत भेद हो सक्ते हैं। हिदी म मुक्तक काय के जितने रुप मिलते हैं वे सस्कृत काव्यशास्त्र में परिगणित नही है और जिनका उल्लेख संस्कृत में हैं उनमे से अनेक हिंदी में प्रचलित नहीं हैं। कारण स्पष्ट है प्रत्येक भाषा के साहित्य और का यरूपो के विकास का स्तम्भ इतिहास हाता है । देश, काल के अनुमार साहित्य का विकाम होता है अत परिवर्तित परिस्थितियो के अनुसार साहित्य की विषयवस्त व रूपमज्जा मे परिवतन होता है । फलत पुराने मानदण्ड बदलते रहते हैं और नये साहित्य के आधार पर साहित्य के निकप बनते रहते हैं । हिदी ने एक ओर लोकभापाआ मे प्रचलित मुक्तक के काव्यरूपो को ग्रहण किया है तो दूसरी ओर विदेशी काव्यरूपा को अपने ढग मे आत्मसात् किया है । इस दृष्टि से डा शभुनाथ सिंह ने हिदी साहित्य काश, भाग-1 मे हिदी मुक्तको का वर्गीकरण इस प्रकार किया है- 1 सख्याश्रित मुक्तक दाव्य- सग्रह के पद्यो को सख्या के आधार पर यह विभाजन किया गया है। जैसे एक हजार मुक्तका का सग्रह हजारा कहलाता है---इस निधि का रतन हजार । इसी प्रकार अन्य सख्याश्रित मुक्तका के नाम गिनाये जा सकते हैं--नीतिशतक (भतहरि) शिवा बावनी (भूपण) हनुमान चालीसा (तुलसीदास), देव पचीसी (देव) खटमल बाईमी (प्रीतम) आदि । 2 वणमालाथित मुक्तक काय- इसम प्रत्येक पक्ति घणमाला के अक्षर क्रम से प्रारम्भ होती है। उदाहरणाथ धरहरा (महाराज विश्वनाथ सिंह) अखरावट (जायसी)। 3 छदाथित मुक्तक-बहुत लोकप्रिय छन्दो पर आश्रित मुक्त इसम सन्निविष्ट होत हैं । जैस अपन श मे 'पाहुड दोहा, हिदी म ढोला मारू रा दूहा शृगार सोरठा (रहीम) कवितावली (ववित्त छद मे लिखो तुलसीदास की रचना) आदि। 4 रागाधित मुक्तक-संगीतशास्त्र या लोक्प्रचलित गीतो के प्रभाव मे लिखी हुई रचनाए इसमे आती हैं । अपनश और हिंदी के राससजक काव्यो 6 का प्रणयन रागाधित है ! लावनी' राग म लिखे 'रहस लावनी (नवलसिंह), देवीसिंह की लावनिया आदि काव्य इस कोटि के है। 5 ऋतु उत्सव आश्रित मुक्तक-ऐमे काव्यो म 'आदिनाथ फाग , नेमिनाथ फाग' होरी की माय फाग विहार (दानो नागरीदास रचित), आदि हैं। 6 पूजा धम-आश्रित मुक्तक-इसमे स्तोत्र साहित्य, साझी भजन आदि धामिक मुक्तक सनिविष्ट हो जाते हैं । जैस ऋपजिन स्तुति (दवसेन), शिव स्तोत्र (गिरिधरदास), साझी (नागरीदास) आदि । 7 लोकाश्रित~-मुक्रो, पहले, कहावत, ढकासला आदि मुक्तक इस वग मे आते हैं। 8 पारसी का यरूप~गजल, रुवाइया चतुष्पदी आदि । 9 अग्रेजी काव्यरूप- द्विपदी (कप्लेट) चतुदशपदी (सानेट), शोकगीति (एलेजी), गीति या प्रगीत मुक्तक (लिरिक)। 10 साहित्य शास्त्राश्रित-द रस ध्वनि आदि के लक्षण और उदा- हरण आदि के छद। 11 अप फुटकर काव्यरूप-अष्टयाम दूतकाव्य, मदश काव्य आदि । डा निमलाजन ने मुक्तक काव्य के भेदोपभेद इस प्रकार किए हैं जो हिदी के सदभ म उपयुक्त और सटीक है- (1) स्फुट मुक्तक-सस्कृत काव्य शास्त्र म मुक्तक वाच्य का जो लक्षण निर्धारित किया है उमके अतगत स्फुट मुक्तक रखे जा सकते है । ये पूर्वापर क्रम निरपक्ष स्वतत्र अथ की अभिव्यक्ति मे समय तथा रसपूण होत हैं। इसके उपभेद इस प्रकार हैं- (क) आत्मपरक--(1) भावात्मक और (2) विगरात्मक । (ख) वस्तुपरक (1) वणनात्मक और (2) पथाश्रित । (2) संयुक्त मुक्तक--एसे मुक्तका स आशय अनक छदो मे विरचित ऐसी रचना से है जिनमे प्रवध को भाति दूर तक क्या निवधन तो नहीं होता पर य छन्द भावाविति को दष्टि से सापेक्ष होत हैं । हा निमला जन के शब्दो म यह विधा मुक्तक इसलिए स्वीवार की जाती है क्यादि इसम कवि प्रवए की भाति विसी ऋमिक नही सणिव अनुभूति को व्यक्त करता है । सयुक्त यह इसलिए है वि व्यक्त अनुभूति क्षणिक हात हुए भी एक से अधिक छन्दो म प्रवाहित रहती है। इसके उपभेद इस प्रकार हैं- 7 सयुक्त (निवड) मुक्त आत्मपरब घस्तुपरक भावात्मक विचारात्मक वणनात्मक फ्थात्मक . सम्बोधन गीति (मोड) गीत शोर गीति (एलेजी) पत्रगीति (एपिराल) (साग) स्पुट मुक्तक तथा सयुक्त मुक्ता पे उपयुक्त उपभेदा म हिंदी में प्रयुक्त प्राय सभी मुत्तम काव्य म्पो या समावेश हो जाता है। उदू फारसी के प्रभाव मे गृहीत मुक्ता को भी इसम सम्मिलित लिया जा सरता है। मुक्तक-काव्य का विकास रसात्मक मुक्त परम्परा को निम्नलिखित काल खण्डा म विभाजित क्यिा जा सकता है- 1 प्राकृति काल--इसे प्रारम्भिर पाल या हाल (गाहा सतसई के रच यिता) से पूर्ववर्ती बाल कहा जा सकता है। इस काल की रचनाओम प्रकृति वणन की प्रधानता है अत इमे प्रकृति-काल नाम दिया गया है। इसमें वैदिक काल तथा वौद्ध जैन काल की रचनाए आती है। मुक्तक रचना की परम्परा का प्रारम्भ ऋग्वेद से होता है । जाज ग्रियसन की मा यता है कि 'मुक्तय काव्य धारा वा गोमुख निश्चय ही ऋग्वेद है । ऋग्वेद मूलत यनपरव रचनाआ का सकलन है, पर कलात्मक और रसात्मक मुत्तको का भण्डार भी है। उसमें प्रकृति सौदय के मरस चित्र राशि राशि विपर मिलत हैं । सूप चद्रमा, मेघ विद्युत् व्योम नक्षत्र उपा रात्रि आदि के दृश्या का मनोहारी वणन ऋग्वेद को काध्यमय बना देता है। प्रकृति चित्रण का सर्वोत्तम उदाहरण ऋग्वेद का उपस सूत है । वैसे तो जातीय संघप का चित्रण हाने के कारण वेद में वीर रस की प्रधानता है, पर उसमे शृगार हास्य वरुण, और 8 शान रम भी मिलते हैं। बलात्मक मुत्तका के अतिरिक्त ऋग्वेद में धार्मिक एवं नोति सम्बन्धी मुक्तक भी प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होते हैं । 'मेरी गाया - ऋग्वेद में याद इस बाल की सर्वाधिक महत्वपूण भावात्मक रचना है। इसमे बौद्ध सन्यासिया के जीवन का उपदेशात्मक चित्र मिलता है। नारियो द्वारा रचित होने से इनमे भाव की प्रधानता है। इनम जीवन के विविध अनुभवा का भावपूण वणन है धेर गाया'-मुक्तव कान्य परम्परा की अगली कड़ी है । ये गाथाए थेरो ने वही हैं । थेर बौद्ध संघ में प्रवेश करने से पूर्व गृहस्थ थे। ये गाथाए 264 थेरो की कही हुई हैं जो {279 पद्या म निबद्ध हैं। इन गाथाम्रो म नतिर उपदेशा तथा प्रकृति प्रेम का चित्रा हुआ है। विण्टरनिरज ने लिखा है इन धार्मिक कवि ताओ में प्रकृति के मनमोहक चित्र भारतीय मुक्तक परम्परा के बहुमूल्य - जैन साहित्य के मतगत नादी और अनुदार योग नामक दो महान् प्रथ मिलत हैं। इनम जैन धम सम्बधी वाता के साथ कास्य रस पर विस्तार से लिखा गया है और शृगार रस सम्बधी पद्य उदाहरण रूप में दिए गए है । 2 प्राकृत काल-मुक्तक वाव्य परम्परा का दूसरा चरण ईसा की प्रथम शताब्दी से प्रारम्भ होकर जयदेव (12वी शती) तक चलता है । महाधि हाल की गाहा सतसई इस काल की प्रथम और उत्कृष्ट रचना है। इस काल में लोक जीवन से सम्बद्ध प्राकृत भाषा की रचनाओ का बाहुल्य था, अत इस बाल को यह नाम दिया गया है। इस की रचनामा मे ऋतु सहार (कालिदास) अमर शतक अमरक) चौरपचाशिवा (विल्हण) उल्लेनीय हैं । विषयवस्तु को दृष्टि स इस काल की रचनाओ को दो भागो मे बाटा जा सकता है-प्रकृति काव्य और नर काव्य । इन दोनो मे प्रमुखता नर-काव्य की कही जिसके अन्तगत वियो में नारी-सौदय के चित्रण पर ही अपनी दष्टि केन्द्रित दी। इस काल में संग्रह अथ भी लिखे गये हैं जिनम सुभाषित ग्लभाण्डागार विशेष प्रसिद्ध है। इन संग्रह प्रयो में अनेक कवियो को कृतियों का उल्लेख मिलता है। कुछ कविया ने मेघदूत को पक्तियो को लेकर समस्यापूर्ति के रूप में माध्य लिसे जिनम शीलगत, नेमिदत, पाश्र्वाभ्युन्य सदेश रासक उल्लेखनीय है। इस काल में प्राकृत और अपनश भाषाओं में मुक्तक लिये गये पर इन दोनों भाषाओं के मुक्तता को प्रमबद्ध परम्परा नहीं मिलती। अपघ्रा में जैन पवि जपवल्लभ कृन वज्जलग एक प्रसिद्ध रचना उपलब्ध है जिसका काल 9 निश्चित नहीं है। इसम प्रेम सम्बधी पद्यो की बहुलता है । अपघ्र श के रसात्मक मुक्का का सकलन हेमचन्द्र कृत प्राकृत व्याकरण मे उदाहरणो के रूप में देखा जा सकता है। इन उदाहरणो मे शृगार रस के उत्कृष्ट पद्य मिलते हैं। 3 मध्यकाल-मुक्तक काव्य परम्परा के तृतीय चरण में हिंदी साहित्य के इतिहास के भक्तिकाल तथा रीतिकाल की रसात्मक रचनाए समाविष्ट हो जाती हैं। इस काल को प्रमुख रचनाए हैं--गीत गोविद (जयदव) विद्यापति की पदावली सूरसागर (सूरदास) तथा रसखान की सुजान रसखान , प्रेम वाटिका आदि है । प्रमुख मुक्तककार है-अप्टछाप के कृष्णभक्त पवि, मीरा, तुलसीदास, पद्माकर, सुदरदास गग रहीम सेनापति आदि । उल्लेखनीय है कि रीतिकाल में मुक्तक-नाव्य बलात्मक दष्टि से उत्तष पर पहुच गया था। 4 आधुनिक काल--इस काल खण्ड हिदी साहित्य के इतिहास के आधुनिक काल म लिसे गय मुक्तक काव्य के विकास का विवचन अपक्षित है । आधुनिक काल में मत्तक परम्परा रीतिकाल से होती हुई भारते दु काल तथा द्विवेदी युग तक चली आई । भारते दुकाल में मुक्तक परम्परा का विकास नही हो पाया। विवेच्य काल में इसका प्रारम्भ द्विवेदी युग से होता है। द्विवेदी युग मे वणन प्रधान मुक्तक अधिक लिखे गये । इन मुक्तको मे इतिवत्तात्मक्ता मिलती है। राय देवीप्रसाद न 'नवल नागरी सुनगरी वणन तथा अलका वणन , इसी प्रकार के मुक्तक लिसे । कवि शकर ने भारतोदय मे देश सुधार सम्बधी पटपदिया लिखी। नखशिख वणन को चमत्लारपूण जौली में रायकृष्ण दास ने कुछ दोहे लिखे । वणनात्मक मुक्तका मे प्रवृति वणन और मानवरूप का वणन हुआ है। आगे चलकर छायावाद के प्रवतन के साथ मुक्तक को विषयवस्तु और शैली दोनो मे ही प्रातिकारी परिवतन आया । विषयवस्तु की दृष्टि से ये रचनायें वस्तुप्रधान के स्थान पर हो गयी तथा स्फुट मुक्तक के स्थान पर सयुक्त मुक्तको का प्रचलन हुभा । अपवादरूप मे कुछ स्फुट मुक्तक भी लिस गये लेकिन इनकी सख्या बहुत कम है। इन मुक्तको मे प्रगीत रचना के तत्त्व अधिक मिलते है । निराला तथा अय छायावादी कविया ने संयुक्त मुक्तको की रचना की। बच्चन ने हलाहल, मधुशाला आदि चतुष्पदिया लिखवर भावनामा को अभिव्यक्ति के लिए मुक्तको का सहारा लिया। प्रगतिवादी कवियो ने वैयक्तिक भावना के स्थान पर सामाजिक चेतना को आधार बनाकर मुक्तक लिखे । नरेन्द्र शर्मा ने भी मुक्तका को परम्परा को आग बढाया।
10 प्रयोगवाद के कवि जीवन के यथार्थ का चित्रण वैयक्तिक भावनामा के आधार पर करने लगे। इन कविया ने वस्तु की आन्तरिक अथव्यजना का भावना का रंग चढाये बिना व्यक्त करना प्रारम्भ किया। नये कविया ने भी सयुक्त मुक्तक रचनायें लिखी। इन रविया पर उद् एव अग्रेजी मुक्तक शैली मा प्रभाव भी दिखाई देता है । आधुनिक काव्य में महापुम्पा के स्तवन और प्रशस्तिगान के व्य में भी कवितायें लिखी गई। इम काल म अंग्रेजी शैली के मुक्तका में सबोधन गीति, शोकगीति, गीत, चतुष्पदी विशेष रूप में लोकप्रिय हुये । उदु शैली के अवगत गजल, हमादया आदि हिन्दी में भी प्रचलित हुई।
संकलित मुक्तककार 1 योगीन्दुदेव (छठी सातवीं शताब्दी) योगी दुदव अपभ्र श साहित्य के सबसे प्राचीन कवि है । डा ए एन उपाध्य न इनका समय छठी सातवी शताब्दी के बीच माना है। इनके रचे हुए 'परमात्म प्रकाश तथा योगसार प्राध्यात्मिक काव्य हैं। इन दोनो कृतिया की रचना तत्कालीन लोकभापा अपभ्रश मे हुई है । 'परमात्म प्रकाश' में दो अधिकार (अध्याय) हैं। प्रथम अधिकार म 123 दोह तथा द्वितीय में 214 दोहे सग्रहीत हैं । प्रथम अधिकार मे आत्मा के स्वरूप जीव द्रव्य एव जगत् का तात्विक विवेचन है। दूसरे अधिकार मे मोक्ष का स्वरूप, मोक्ष प्राप्ति के साधन, मोक्ष का फल, समाधि आदि विषयो पर विचार किया गया है। योगसार मे 108 दोहे हैं । इममे आत्मतत्त्व पर प्रकाश डालते हुए अन्य पदार्थों से उसकी भितता प्रतिपादित की गई है। सकलित मुक्तका मे से प्रारम्भ के 21 ‘परमात्म प्रकाश' तथा शेष 5 योगसार उद्धत किये गये हैं । वतमान में योगी दुदेव के इन दोहो के अध्ययन की उपयोगिता दो दप्टियो से देखी जा सकती है। प्रथम, भाषा की दप्टि म जपन श हिदी तथा प्राचीन भापाओ के बीच की एक महत्त्वपूर्ण कडी है। संस्कृत पानि तथा प्राकृत भाषामो के श द अपभ श से हिदी मे आए है । आधुनिक हिदी के अनेक शब्दो को व्युत्पत्ति क अध्ययन में अपनश भापा और साहित्य के अध्ययन का महत्त्व असदिग्ध है। दूसरे ये रचनाए आज उच्च जीवन मूल्यो की चेतना से दूर होत हुए समाज को प्रगति की नई दिशा देकर उसे भटकाव में बचाने में सहायक हो सकती है । मालिक दृष्टि से चाहे हम कितना ही विकास करें अन्त करण की शुद्धि के विना समाज में शान्ति की स्थापना नहीं हो सकती। आज का मनुष्य मानसिक तनाव की यातनाआ स गुजर रहा है । असुरक्षा, अलगाव सनास अविश्वास आदि ने सम्पूर्ण विश्व म मनुष्य के अस्तित्व के लिए गहरा मस्ट उपस्थित कर दिया है। आध्यात्मिक साहित्य इन सब से त्राण दिला कर सुख और शाति की राह दिखा सकता है ।
इस संक्लन मे योगी दुदेव के 'परमात्म प्रकाश' तथा 'योगसार' से 26 दोह लिए गए है जो तत्त्व चितन से सम्बंधित होने के कारण विचार प्रधान हैं इनमें आत्मा और अनात्म पदार्थों का पहचानने के लिए सम्पक दृष्टि विकसित करने की आवश्यक्ता बताई गई है । ईश्वर किसी पूजा स्थान मे रहकर प्राणिमात्र के चित्त में निवास करता है जिसे समत्व भावना से प्राप्त किया जा सकता है। राग द्वैप आदि कपायो से मुक्त होने पर मोक्ष अर्थात् परमानद की प्राप्ति हा सक्ती है। पारिवारिक सामाजिक कत्तव्या का निर्वाह करते हुए व्यक्ति ज्ञान साधना द्वारा आनदपूण जीवन जी सकता है। इस रूप में ये दाह आचरण की शुद्धता द्वारा सामाजिक जीवन को समुनत करने का सदेश देते हैं। विचारो की प्रधानता से इन दोहो म अनुभूति-(भाव पक्ष) नगण्य है । शली उपदेशात्मक है। अप्रस्तुत विधान की दष्टि से उपमा रूपक जादि अलकारा का सुदर प्रयोग किया गया है। 2 तुलसीदास (1532-1623 ई.) तुलसीदास रामभक्ति धारा के प्रमुख कवि हैं । इनके लिखे हुए ग्रन्थ-राम चरित मानस गीतावली, विनयपत्रिका जानकी मगल, पावती मगल, रामलला नहछू दोहावली, कवितावली, रामाना, वराग्य सदीपनी, कृष्णगीतावली तथा वरवं रामायण हैं। इन सभी रचनामा म विविध भावी का सुदर वणन हुआ है । रामस्था के विविध प्रसगो द्वारा तुलसीदास ने बिखरते हुए हिदू समाज के समक्ष आदश प्रस्तुत किए हैं जो उहे लोरमायक के रूप में प्रतिष्ठित करते हैं। उनके आराध्य सगुण साकार अवतारी पुरुष राम हैं, जो प्राणिमात्र से हृदय मे ही नही ससार के कण-कण में व्याप्त है। समस्त मृप्टि में परमात्मा के स्वरूप का साक्षात्कार करने की भावना के कारण उनकी भक्ति एकान्त और लोक्वाह न होकर सामाजिक चेतना से अनुप्राणित है । तुनमी का वाव्य समवय का अनूठा उदाहरण है। डॉ हजारीप्रमाद द्विवेदी के गन्दा म 'उनम केवल लान और शास्त्र काही समवय नहीं है.गार्हस्थ्य और वैराग्य का भक्ति और मान का, भाषा और संसति का निगुण और मगुण या पुराण और वाय्य या भावावेग और अनासक्त चिन्तन रामचरितमानस ये मादि से अन तम दाहारा पर जानेवाली - 13 परा कोटियो को मिलाने का प्रयत्न है। भावो की विविधता के साथ शैली की विविधता भी गास्वामीजी की विशेषता है। उनके काव्य म छप्पय पद्धति, गीति- पद्धति कवित्त सबया पद्धति सूक्ति-पद्धति, प्रवघ पद्धति आदि काव्यशैलियो का सफल प्रयोग हुआ है। सकलित मुक्तक गोतावली' वैराग्य सदीपनी' जानकी मगल', कविता वली वरव रामायण' सथा 'दोहावली से उद्धृत किए गए हैं । 'गीतावली' के मुक्तक भावव्यजना तथा गयात्मकता की दृष्टि से उत्कृष्ट हैं । रामकथा के प्रसंगो मे सम्बधित ये मुक्तक जीवन की विविध भावदशाआ का मनोहर चित्र प्रस्तुत करत है । पराग्य सदीपनी के दाह सन्त स्वभाव तथा सात महिमा के वणन स सम्बधित है जो तिक्ता तथा शातरस की दृष्टि स पठनीय है। जानकी मगल' म से धनुर्भग प्रसग के सरस मुक्तका का सकलन किया गया है, जिनमे जनक, सीता राम तथा अ य राजाओ को मन स्थिति की व्यजना हुई है। कवितावली कवित्त छद मे लिखी सरस मुक्तक रचना है। यहा 'राम वन गमन के उस ममस्पर्शी स्थल को लिया गया है जिसमें ग्रामवासी राम सीता और लक्ष्मण को वन माग म जात हुए देखकर अपनी भोलीभाली प्रतिक्रियायें व्यक्त करते हैं । 'वरव रामायण से नाम महिमा का उजागर करने वाले कुछ दोहे मकलित है । 'दोहावली सरस मुक्तको वा सक्लन नहीं है सूक्ति भण्डार है। तुलसीदास ने इसमे लोकनीति एव लोकव्यवहार से सम्बंधित विषयो पर मुक्तक लिखे हैं 3 रसखान (1555-1618 ई०) हिदी कृष्ण नाय धारा में रसखान का योगदान महत्त्वपूर्ण है। उनका काव्य धर्म और सम्प्रदाय की सीमा से परे होने के कारण भारतीय सस्कृति की भावना का सच्चा प्रतिनिधित्व करता है । मुसलमान होते हुए उहाने कृष्ण के प्रति अनन्य अनुराग व्यक्त किया है जो धार्मिक समन्वय का उदाहरण है। रमखान को रचनाए है-सुजान रसखान दानलीला प्रेमवाटिका तथा स्फुट पद । ये सभी रचनाए मुक्तक काव्य रूप है।
14 इस मालन मे प्रथम तीन रचनामा से सामग्री संग्रहीत की गयी है। 'सुजान रसखान का मुख्य विषय कृष्ण लीला या वणन है, जो स्फुट मुक्तपा म अभिव्यक्त हुआ है। कृष्ण लीला के प्रतगत प्रेम, भक्ति, गोचारण रासलीला, दधिदान उपालम्भ मयोग वियोग, वृष्ण सौदय उद्धव उपदेश आदि प्रसगो का वणन है। दानलीला एक लघु रचना है, जिसम 11 वित्त सर्वया मग्रहीत हैं। यह रचना मयुक्त मुक्तक वे अतगत रखी जा सकती है। इसकी प्रामा णिवता के सम्बघ म पुछ विद्वानो या सदेह है पर रीतिकाल के विशेषन डा विश्वनाथ प्रसाद मिश्र ने इसे प्रामाणिव मानपर 'रमग्रान ग्रथावली मे सग्रहीत किया है। दानलीला मे गोपी कृष्ण या राधा कृष्ण के हासपरिहास का वणन है । रसान के मुक्तक का य का तीसरा सक्लन प्रेम वाटिका' है जिसमे 53 दोहे हैं। इसमे विशुद्ध प्रेम का निरूपण है। 'प्रेम वाटिका में प्रेम का स्वरूप, प्रेम की महिमा प्रेम पथ को कठिनता आदि बताते हुए प्रेम को ईश्वर का प्रतिस्प बताया गया है। 4 सुन्दरदास ( 1596-1689 ई.) निगुण काव्य धारा के अतगत दादूदयाल के शिष्य सात सुदरदास बडे प्रतिभाशाली कवि थे। उहोने 42 ग्रयो की रचना की जिनमे नान ममुद्र और सुदर विलास विशेष उल्लेखनीय है। उनके काय मे भक्ति योग और नीति सम्बधी विषया को स्थान मिला है । य शृगार रस की रचनामा के कट्टर विरोधी थे। उन्होन परिष्कृत व्रज भाषा का प्रयोग क्यिा है। सबलित अश में गुरु महिमा उपदेश काल की विकरालता देह एव जगद नश्वरता आशा तृष्णा आश्वासन, विश्वास देह की मलिनता, मूखता वाणी का महत्त्व व भजन न करने वाले, विपयो से सम्बधित मुक्तको को स्थान दिया गया है 15 5 पद्माकर (1753-1833 ई.) पद्माकर भट्ट रीतिकाल के अतिम चरण के यशस्वी पलाकार थे। अपने जीवन काल में उह ऊंचे स्तर का सम्मान प्राप्त था। देहावसान के उपरात तो उनका नाम और चमक उठा। रचनाए--पद्माकर की रचनाओ मे 1 हिम्मत बहादुर विग्दावली 2 जगद् विनोद 3 पद्माभरण, 4 रामरसायन (घोह चौपाई म लिपित रामचरित) 5 प्रवाध पचासा एव 6 गगालहरी आदि प्रसिद्ध है । काव्य सोप्ठव-मतिराम के रसराज के समान पद्माकर ने जगद विनोद प्राय लिखा । यह नायिका भेद का उत्कृष्ट उदाहरण नथ है। 'ललित ललाम के समान पदमाभरण' नामक अलकार अथ भी लिखा । पद्माकर ने वीररस का फडक्ता हुआ अथ हिम्मत विरावली लिखा है । भूपण की टक्कर का वीररम का प्रवाह यहा भी दृष्टिगत हाता है । शृगार रस के पदा मे पद्माकर की मधुर कल्पना और हाव भावपूर्ण मूर्ति विधान पाठको को प्रत्यक्ष अनुभूति कराने म समथ हैं । कल्पना और वाणी के साथ भावुक्ता का सयोग पद्माकर के काव्य म बहुधा मिलता है । उदयपुर के महाराणा भीमसिंह के दरवार मे रहते हुए पद्माकर ने 'गनगौर के मेले का ऐसा हृदयहारी वणन किया है जो जय काई कवि अाज तक नहीं कर पाया है। प्रजभाषा पर भी पद्माकर का असाधारण अधिकार था । अभिधा, लक्षणा एव व्यजना शक्ति के प्रयोग में भी इस कवि का समान कौशल दिखाई पडता है । कही तो इनकी भाषा स्निग्ध मधुर पावली द्वारा एक सजीव भावमयी प्रेम-मृति प्रस्तुत करती है और कही भाव या रस की धारा बहाती है, कही अनुप्रासों को झकार है तो कही वीररस भरी हु कार है । इनकी भाषा मे विषयानुकूल विविधता है परतु सवत्र सजीवता का गुण परिलक्षित होता है । पद्माकर कवि अनुप्रास प्रिय लगते है। वणनात्मक पदा मे अनुप्रास का प्रयोग शृखलाबद्ध रूप में दिखाई देता है । ऊहात्मक्ता का रूप वही भी नहीं मिलता है सवत्र हृदय की स्वाभाविकता प्रेरणा एव निष्कपटता मिलती है । बिब- विधान की दष्टि से भी पद्मावर का सफल कवि माना जा सकता है । दक्षिण भारतीय पद्मावर ने जिस निष्ठा एव विश्वास से हिंदी काव्य को गोरवावित किया है वह आज के दक्षिण भारतीय हिदी एव हि दी इतर लेखको 16 के लिए प्रेरणाप्रद हो सकता है। माज दक्षिण भारत के लोगो का पधार का कवि स देखना चाहिए कि हिंदी वाव्य परम्परा सारे देश के लोगा की सम्पत्ति है । उसमे प्रदेश एव जाति भेद के लिए वाई अवकाश नही है । सलित जश में पद्मावर के भक्ति, वीररस तथा गगा-स्तवन सम्बन्धी पद्यो को लिया गया है। 6 सूर्यमल मिश्रण (1815-1868 ई०) राजस्थानी भाषा में वीररस के अप्रतिम गायक मूयमल्ल मिश्रण का काव्य गुणात्मक एव विशिष्ट है। मूयमल मिश्रण ने निम्नलिखित अथो की रचना की-वशभास्कर, वीर सतसई भगवतविलास, रामरजार, छन्दोमयूख सती रासो फुटकल कवित, मवैये आदि तथा धातु रूपावली। इनमे वश भास्कर एक विशालकाय प्रथ है जिसमे इतिहास और काव्य का संगम हुआ है। इसमे मुख्यतया बूदी राज्य के इतिहास का वणन है साथ ही उसमे अनेक विषया का समावेश भी हो गया है यह ग्रथ अश्य त गूढ और विनष्ट है जिसका कारण विविध भाषाओ के अप्रचलित शब्दो का प्रयोग तथा कवि की पाण्डित्य प्रदशन की प्रवत्ति है। पविवर सूयमल मिश्रण की अक्षय कीति का आधार वीर मतसई है जिसके कुछ दाहे यहा समलित हैं। वीर सतसई के प्रमुख विषय हैं-धरती प्रेम, प्रतिशोध की भावना मरणपव तथा राजस्थान मे प्रचलित विभिन्न रीति रिवाज । इस काव्य मे धरती के प्रति प्रेम की भावना का विशद् चित्रण किया है। जो व्यक्ति धरती को छीनने का प्रयास करता है उसके प्रति प्रतिशोध की भावना स्थान स्थान पर व्यक्त की गई है। य भावना राजपूतो के जातिगत स्वाभिमान से भी जुडी हुई है । स्वामिभक्ति राजपूता के चरित्र की ऐसी विशेषता है जो उनमे अनुशासन को भावना भर देती है। कवि न वीर सतसई में इस भावना का स्वाभाविक चित्रण किया है। राजस्थान के वीरा की महिमा तथा वापरा को निदा कवि ने खुलकर की है। राजस्थान की वीर नारियो के चित्रण मै कवि ने अपने अद्भुत पोशल का परिचय दिया है। यह राजस्थानी वीर वीरागनाओ का ही स्वभाव था कि वे अपने पतियो को सहप युद्ध भूमि म विदा कर देती थी। युद्ध को 17 राजस्थानी वीर मरणपव की सज्ञा देते थे। इससे उनकी देशभक्ति तथा त्याग का परिचय मिलता है। सतसई में कवि ने राजस्थान के रीति रिवाजा का वर्णन कर राजस्थान के परम्परागत परिवेश को उजागर किया है। वीर सतसई' वीररस का काव्य है जिसमे भोजगुण की प्रमुखता होती है । कवि ने वीररस के अनुकूल भोजरूप के अनुरूप भाषा का प्रयोग किया है। कवि म भाषा की समाहार शक्ति विलक्षण है। वह छोटे से दोहे मे गम्भीर भावो को भरकर सामासिक शली में अभिव्यक्त कर देता है। इस रचना म शैली की विविधता के कारण रोचता निरन्तर बनी रहती है। कही सम्बोधन शैली है तो वही सम्वाद शैली, तो कही उद्बोधन शैली । सतसई की भाषा उत्तरकालीन राज स्थानी है। 7 शमशेर बहादुर सिंह (जन्म 1911 ई०) हिदी के नये कवियो मे शमशेर बहादुर सिंह को कविता खास अहमियत रखती है। शमशेर की कृतिया इस प्रकार है-दूसरा सप्तक के सात कवियो मे से एक, कुछ कवितायें 1959 में कुछ और कवितायें, 1961 मे, चुका भी हूँ नही में 'उदिता 1980 (इसम कवि की प्रारम्भिक कवितायें है। इस रूप में प्रथम सकलन), 'इतने पास अपने , 1980 बात बोलेगी, 19811 शमशेर सच्ची सवेदनाओ को बिम्बो के माध्यम से अभिव्यक्त करने की क्षमता मे बेजोड हैं। उनकी कवितायें सवेदनात्मक बिम्बों के सीधे चित्र प्रस्तुत करती हैं । लगता है कि कोई कवि चित्रकार अपने चित्रो म शब्दा को दूलिका से रंग भर रहा है। उनकी कवितायें चित्र और कविता को मिली जुली स्थितिया का दस्तावेज है। शमशेर सीधे और सपाट चित्रो की अपेक्षा जीवन की विमगति या द्वद्वमयी स्थितियो के कवि बनकर आते हैं । इस दष्टि से 'एक आदमी दो पहाडी को कुहनियो से ठेलता और घिर गया है समय का रथ जसी कवितायें उदाहरण के रूप में ली जा सक्ती हैं। शमशेर में माक्सवादी चिंतन परम्परा का प्रभाव भी परिलक्षित होता है किन्तु उनका माक्सवाद कोरा चितन नहीं है। शमशेर में व्यक्ति और समाज को 18 - पर सघप छिडा रहता है। वे व्यक्ति और समाज के बीच रास्ता योजते हुए मानवतावादी बन जाते हैं। समाजवादी संवेदनाआ के साथ साय शमशेर में रोमानी सवेदाय भी मिलती हैं। उनरी रविता म सौन्दय को प्यास प्रणपी की प्रामाक्षाय, प्रेमजनित माया और निरामा से उपजी पीडा यादि के चित्र मिलते हैं। प्रणय के प्रसग म प्रातिय दृश्यो को रमणीयता के चित्र भी पीचे गये हैं। प्रेम को विभिन्न स्थितियो का चित्रण करने वाली पवितायो म बिम्ब योजना कुछ बिखर गई है विन्तु भावो की दृष्टि से अविति बनी रहती है। सक्षेप में कहा जा सकता है प्रणय जीवन के प्रसंगा के पवि हैं उनकी संवेदनाओ की पकड बडी मजबूत है । भाषा बडी सशक्त और तीखी है तथा अप्रस्तुत विधान के मतगत उपमा जीवन से जुड़ी हुई हैं। किशमशेर मूलरूप 8 दुष्यन्त कुमार हिंदी मे उद् की गजल शैली को लोकप्रिय बनाने का श्रेय दुष्यन्त कुमार का है। दुष्यन्त कुमार एक आस्थावादी सघष, अनिश्चय, पीडा आदि उपस्थित होना विभाविक है। धप जीवन को अनिवारता है किन्तु जीवन के प्रति मास्या और विश्वास लेकर आगे बढा जा सकता है। प्रास्था यह सबल है जो व्यक्ति को सधों में टूटन नहीं देता और उसके भीतर दढ आत्मविश्वास बना रहता है। जीवन के प्रति इस दष्टिकोण ने उनके काव्य मे आशा का सदेश भर दियाहै। उनकी मान्यता है सूर्योदय से पहले अप्रकार होता ही है~~ 'मगर इससे भयभीत होने की जरूरत नही दिन निकलने से पहले ऐसा हुआ ही करता है। इस प्रकार कहा जा सकता घि दुष्यन्त कुमार की मूलभेतना आस्था वाली है। सन 1933 में जमा यह प्रतिभा पुत्र यदि कुछ वष और रह गया होता तो हिदी साहित्य को अधिक समृद्ध करता। नई कविताओं के अच्छे कवियो मे दुष्पत कुमार की गिनती की जाती है। उतर काव्य में अनुभूति की तीव्रता और अभियक्ति की सुस्पष्टता समान स्प से मिलती है। उनकी गजलो का एकमात्र सकलन 'साये में धूप' प्रकाशित 19 इनकी प्रकाशित कृतिया है--सूय का स्वागत (कविता), आवाजा के घेरे (कविता) जलते हुए वन का वसन्त (कविता), एक कण्ठ विषपायो (काव्य नाटक), छोटे छोट सवाल (उपयास), आगन मे एक वृक्ष (उपयास), मन के कोण (एकाकी) और मसीहा मर गया (नाटक), कुछ आलोचनात्मक पुस्तकें । विषम परिस्थितियो में रहते हुए भी मौज मस्ती और आन द उल्लास के साथ जीवन व्यतीत करना दुष्यात की कविता का एक अय प्रतिपाद्य है। वे निराशा और मायूसी स थककर बैठ जाने में विश्वास नहीं करते। पराजय के कारण उनमे सकोच और निराशा के भाव उत्पन नहीं होते । वे एक सक्ल्पशील की तरह कमक्षेत्र में निरन्तर प्रियाशील रहते हैं।
योगीन्दुदेव देह विभिषणउ पाणमउ जो परमप्पु णिएइ । परम-समाहि-परिट्ठियउ पडिउ सो जि हवेह ॥1॥ जासुण कोठुण मोहु मउ जासु ण माय न माणु । जासु न ठाणु ण झाणु जिय सा जि निरजणु जाणु ।।2।। देहे वसतु वि पवि छिवद णियमे देह जो जि। देह छिप्पई जो वि णवि मुणि परमप्पउ सो जि 31 जो सम-भाव परिटठियह जोइहें कोई फुरेइ । परमादु जणन्तु फुड सो परमप्पु हवेइ ।।4।। अत्यि न पुण्ण ण पाउ जसु भत्यिन हरिसु विसाउ। अस्थि न एक्कु वि दोसु जसु सो निणिरजणु साउ॥5॥ जीवा जीव म एक्कु करि लक्षण भएँ भेउ । जो परु सो परु भणमि मुणि अप्पा अप्पु अभेउ ॥6॥ देहह पेविखवि जर मरणु मा भउ जीव करेहि । जो अजरामरु बभु परु सो अप्पाणु मुणेहि ॥7॥ अषु अप्पि मुणतु जिउ सम्मा दिट्टि हवेइ । सम्मा इटठिउ जीवडउ लहु कम्मई मुच्चेई 1180 हर गोरउ हउँ सामलउ हउँ जि विभिण उवष्णु । हउँ तणु-अगउँ' थूलु हउँ एहउँ मूढउ मण्ण ॥9॥ काल लहेविण जोइया जिमु जिम भोह गलेइ । तिमु तिमु दसणु लहइ जिउ णियम अपु मुणेइ ॥10॥ अप्पा णिय मणि हिम्मलउ णियमे वसइ ण जासु । मत्थ पुराणई तव चरण मुक्खु वि करहिं वितासु गएँ रगिए हिमवउए देउ ण सइ सतु । दप्पणि भइलए विबु जिम एहउ जाणि निभतु 11211 21 देउ ण देउले णवि सिलए णवि लिप्पड जवि चित्ति । अखउ गिरजणु णाणमउ सिउ सठिउ मम चित्ति ।।1311 जाणवि मण्णवि अप्पु पर जो पर-भाउ चएइ । सो णिवु सुद्धउ भावउउ णाणिहिं चरण हवेइ ।।14। जावइ जाणिउ उपसमइ तामइ सजदु होइ । होइ कसायहं यसि गयउ जीव असजदु सो॥15॥ णाण विहीणहँ मोक्ख पउ ओघ म कासु विजोइ । चहुएं सलिल विरोलियई क्रु घोप्पउउ ण होइ ।।16।। भुजतु वि णिय कम्म फलु जो तहिं राउण जाइ। सो गवि बधइ कम्मु पुणु सचिउ जेण विलाइ ।।17। राय-दोसवे परिहरिवि चे मम जीव णियति । ते सम भावि परिट्ठिया लहु णिब्वाणु लहति ॥18॥ भल्लाह वि णासति गुण जहँ ससग्ग पलेहिं । वइसाणरु लोहहँ मिलिउ ते पिटिपइ घणेहि ।।1।। जिणि वत्यि जेम वुहु देहु ण मण्णइ जिष्णु । देहि जिणि पाणि तहँ अप्पु ण भण्ण जिण्णु ॥20॥ भिण्णउ वत्यु जि जेम जिय देहहँ भण्णइ णाणि । देहु वि भिण्णउँ णाणि तह अप्पह भण्णइ जाणि ॥21॥ 0 (परमात्म प्रकाश से) ति-पयारो अप्पा मुहिं पर अतर बहिरप्पु । पर जापहि अतर-सहिउ बाहिरु चयहि णिभतु 1220 मिच्छा-दसण मोहिपउ परु अप्पा न मुणेइ । सो बहिरप्पा जिण-भणिउ पुण ससार भमेइ ।।231 गिहि-वावार-परिटठिया हेयाहेउ मुणति । अणुदिणु झाहि देउ जिणु लहु णिबाणु लहति ॥24॥ जह सलिलेण ण लिपपियइ कमलणि पत्त पानि । तह कम्मेहिं ण लिप्पियइ जइ रइ अप्प सहावि 1251 राय रोस वे परिहरिवि जो समभाउ मुणेइ । सो सामाइउ जाणि फुडु केवति एम भणेइ ॥26॥ (योगसार से) 22 तुलसीदास रघुवर बाल छवि वहीं बरनि । सरल सुखको सीय पोटि मनोज सोभाहरनि ॥1॥ यसी मानहु चरन कमलनि अरुनता तजि तरनि । रुचिर नूपुर विपिनी मन हरति रुनझुन करनि ॥ 2 ॥ मजु मेचक मृदुल तनु अनुहरति भूपन भरनि । जनु सुभग सिंगारसिसु तरु फौं है अद्भुत फरनि ।। 3 ।। भुजनि भुजग सरोज नयननि, वदन विधु जित्यो लरनि । रहे कुहरनि, सलिल, नभ, उपमा अपर दुरि हरनि ॥ 4 ॥ लसत कर प्रतिबिम्ब मनि-आंगन घुटुरुवनि चरनि । जनु जलज सपुट सुछवि भरि भरि धरति उर घरनि ॥ 5 ॥ पुयफल अनुभवति सुतहि बिलोकि दसरथ घरनि । बसति तुलसी हृदय प्रभु क्लिवनि ललित लरखरनि । 6 ।। ( 2 ) रगभूमि आए दसरथ के किसोर हैं। पेखना सो पेखन चले है पुर नर नारि, बारे बूढ़े अध-पगु करत निहोर हैं ॥1॥ नील पीत नीरज कनक मरकत धन दामिनि बरन तनु रूपके निचोर हैं। सहज सलोने राम लषन ललित नाम जमे सुने तसेई कुवर सिरमौर हैं ।। 2 ।। घरन सरोज चारु जपा जानु करु कटि, कघर बिसाल, याहु बडे बरजोर हैं । नीक निपग क्से करकमलनि लस बान विसिपासन मनोहर कठोर हैं। 3॥
23 काननि कनक फूल, उपबीत अनुकूल, पियरे दुकूल बिलसत आछे छोर है । राजिव नयन, बिधुबदन, टिपारे सिर नख सिख अगनि ठगोरी ठोर ठौर हैं ।। 4 ।। सभा-सरवर लोक-कोकनद-कोकगन, प्रमुदित मन देखि दिनमनि भौर हैं, 11- 5A अबुध मसैले मन मैले महिपाल भये, कछुक उलूक कछु कुमुद चकोर है । 5 ।। भाईसा कहत बात, कौसिकहि सकुचात, बोल घन घोर बोलत थोर थोर है। सनमुख सवहि, बिलोकत सबहि नोके कृपासो हेरत हैसि तुलसीकी मार हैं । 6 ।। ( 3 ) दूलह राम, सीय दुलही री! धन दामिन बर बरन, हरन मन सुदरता नखसिखनिबही, री॥1॥ ब्याह विभूपन-बसन विभूषित, सखि अवलि लखि ठगि सी रही,री । जीवन जनम लाहु, लोचन फल है इतनोइ लह्यो आजु सही री ॥2॥ सुखमा सुरभि सिंगार छीर दुहि मयन अमियमय कियो है दही, मथि माखन सिम राम सँवारे, सकल भुवन छवि मनहु मही री ।। 3 ।। तुलसिदास जोरी देखत सुख सोभा अतुल न जाति कही री रूप रासि बिरची विरचि मनो सिलालवनि रति काम लही री ॥4॥ ( 4 ) बिलोरे दूरितें दोउ बीर । उर आयत आजानु सुभग भुज, श्यामल-गोर सरीर॥1॥ सीस जटा, सरसीरुह लोचन बने परिधन मुनिचीर । निक्ट निषग, सग सिय सोभित करनि धुनत धनु-तीर ।। 2 ।। मन अगहुँड तनु पुलक सिथिल भयो नलिन-नयन भर नोर। गडत गोइ मानो सकुच पक महे कढत प्रेम-बल धीर ।।3।। बूशत चित्रकूट कह' जेहि तहि, मुनि बालपनि बतायो । तुलसी मनहुँ फनिक मनि दूढत निरखि हरपि हिय धायो।।4।।
24 ( 5 ) तुम्हरे चिरह भई गति जोन । चित दे सुनह राम परनानिधि ! जानों कछु पै सको गहि हौं न ।। नोचन और कृपिनये धन ज्या रहत निरतर लोचनन मान । हा' धुनि-यगो लाज पिंजरी महे राखि हिये बडे बधिक हठि मौन । जेहि वाटिका यमति तहँ खग मृग तजि-तजि भजे पुरातन मौन । स्वास समोर भेंट भइ भरि. तेहि मग पगु न धर्यो तिहुँ पनि । तुलसिदास प्रभु ! दशा सोयरी मुख करि कहत होति अति गोन । दीज दरस, दरि वीजे दुख हो तुम्ह आरत-आति-दोन 141 ( 6 ) हृदय घाउ मेरे पीर रघुवीरें। पाइ सजीवन जागि बहत या प्रेमपुलकि विसराय सरीर ॥1॥ मोहि कहा यूझत पुनि पुनि जस पाठ-अरथ चरचा वीरें । साभा सुख छति लाहु भूपह, मैवल काति मोल हीरं ॥ 2 ।। तुलसी सुनि सौमिनि वचन सब धरि न सक्त धोरी धीर । उपमा राम लखन की प्रीतिकी क्यो नीज खोर नीर 13॥ गीतावली से) सत स्वभाव-वर्णन दोहा सरल बरन भाषा सरा सरल अथमय मानि। तुलसी सरल सतजन नाहि परी पहिचानि ।। 1 ।। तुलसी ऐसे कहूँ कहूँ घय धरनि वह सत परवाजे परमारथी प्रीति तिये निवहत ॥ 2 ॥ बोल बचन विचारि के लोहे सत सुभाव । तुलसी दुर दुवचन क पथ देत नहिं पाँव ।। 3 ।। मत्रु न काहू करि गर्न मित्र गर्न नहि काहि । तुलसी यह मत सतको बाले समता माहि ।। 4 ॥ मुख दीखत पातक हरे परसत कम बिलाहिं। बचत सुनत मन मोहगत, पूरुव भाग मिलाहि ॥5॥ .
25
सोतल बानी सत फो, ससिहू ते अनुमान ।
तुलसी कोटि तपन हर जो कोउ धार कान ॥6॥
कोमल बानी सत की, स्रवत अमृतमय आइ ।
तुलसी ताहि कठोर मन सुनत मैन होइ जाइ ।। 7 ।।
अति कोमल अरु बिमल रुचि मानस मै मल नाहि ।
तुलसी रत मन होइ रहै, अपने साहिब माहिं ।। 8 ।।
जावे' मन ते उठि गई तिल तिल तृप्ना चाहि ।
मनसा बाचा कमना, तुलसी बदत ताहि ।। १ ।।
वचन वाचहि सम गर्ने कामिनि काष्ठ पपान ।
तुलसी ऐसे सतजन, पृथ्वी ब्रह्म समान ॥ 10 ॥
सत-महिमा वर्णन
को बरन मुख एक तुलसी महिमा सत की।
जिन्ह के बिमल विबेक सेस महेस न कहि सक्त ।। 11 ।।
धय ध य माता पिता धय पुत्र वर सोइ ।
तुलसी जो रामहिं भजे, जस्हुँ कमेहुँ होइ॥ 12 ।।
महि पत्री परि सिंधु मसि, तर लेखनी बनाइ ।
तुलसी गनपति सातदपि, महिमा लिखी न जाइ ।। 13।।
तुलसी जावे बदन ते धोखेहुँ निवसत राम ।
ताव पग की पगतरी, मेरे तन को चाम ।। 14 ।।
अति ऊंचे भूधरनि पर भुजगन के अस्थान ।
तुलसी अति नीचे सुखद, ऊख अन्न अरु पान ।। 15 ॥
तुलसी भगत सुपच भली भजे रन दिन राम ।
ऊँचो कुल वेहि काम को, जहाँ न हरि को नाम ।।16।।
('वैराग्य-सदीपनी से)
धनुभङ्ग
देखि सपुर परिवार जना हिय हारेउ ।
नृप समाज जनु तुहिन बनज बन मारउ ॥1॥
यौसिक जनहि बहेउ देह अनुसासन ।
देखि भानु कुल भानु इसानु सरासन ॥2॥
26 राम मुनिवर तुम्हरें वचन मेरु महि डोलहिं । तदपि उचित आचरत पांच भल बोलहि ।। 3 ।। बानु चानु जिमि गयउ गवहिं दसकधरु । को अवनी तल इन सम बीर धुरधरु ।। 4 ।। सब मल विछोहनि जानि मूरति जनक कौतुक देखहू । धनु सिंधु नप बल जल बढ्यो रघुबरहि कुभज लेखहू ।।5।। सुनि सकुचि सोचहि जनक गुर पद वदि रघुनदन चले। नहिं हरप हृदय विपाद पछु भए सगुन सुभ मगल भले ।। 6 ।। बरिसन लगे सुमन सुर दुदुभि बाजहि । मुदित जनक पुर परिजन नृपगन लाजहिं ।।7।। महि महिधरनि लखन वह बलहि बढावनु । राम चहत सिव चापहि चपरि चढावनु ॥ 8 ॥ गए सुमार्य जब चाप समीपहि। सोच सहित परिवार विदेह महीपहि ॥9॥ कहि न सकति कछु सकुचति सिय हिय सोचइ । गौरि गनेस गिरीसहि सुमिरि सकोचइ ॥10॥ प्रेम परखि रघुवीर भजे। जनु मृगराज पिसोर महाराज भजे ॥11॥ गजेउ सो गर्जेउ घोर धुनि सुनि भूमि भूधर लरखरे । रघुवीर जस मुकता विपुल सब भुवन पटु पेटक भरे ।। 12 ॥ हित मुदित मनहित रदित मुख छवि बहत पवि धनु जाग को। जनु भार चव चकार करव मधन वमल तडाग की।। 13॥ प्रभुहि माल पहिराइ जानपि हि ल चली। सपी मन विधु उन्य मुदित बैरव क्ली ॥14॥ वरपहि विवुध प्रमून हरपि यहि जय जए। सुग सनेह भर भुवन गम गुर पहें गए॥15॥ ('जानी मगल म) सरासन 27 कामु से प प्रताप दिनेसु से सोमु से सील गनेसु से माने । हरिचदु से साचे बडे विधि से मघवा से महीप, विष सुख साने ॥ सुक से मुनि, सारद से वक्ता, चिरजीवन लोमस ते अधिकाने । ऐस भए तो कहा 'तुलसी , जो पै राजिवलाचन रामु न जाने || रानी मैं जानी अयानी महा पवि पाहनहू ते कठोर हियो है । राजहुँ काजु अकाजु न जायो, वह्यो तियको जेहिं कान किया है। ऐसी मनोहर मूरति ए, विछुरे से प्रीतम लीगु जिया है । जाखिनमे सखि ! राखिबे जोगु इहे किमि के बनबासु दियो है ।।2।। सोस जटा उर बाहु बिसाल विलोचन लाल तिरछी सी भौहैं । तून सरासन यान धरें तुलसी बन मारगमे सुठि सोहै । सादर वारहिं वार सुभायें चित तुम्ह त्यो हमरा मनु माहै । पूछति ग्रामवधू सिय सो कही सावरे से सखि रावरे को है ।।3।। सुनि सुदर बैन सुधारस साने सयानी है जानकी जानी भली । तिरछे परि नन द सैन ति हैं समुझाइ कछू मुसुवाइ चली। तुलसी तेहि औसर सोहैं सबै अवलाकति लोचनलाहू अली । अनुराग तडाग मे भागु उदै विगसी मना मजुल कजक्ली ॥4॥ धीर धीर वह चलु देखिन जाइ जहा सजनी! रजनी रहिहैं । कहिहै जगु पोच न सोचु कडू फलु लोचन आपन तो लहिहैं । सुखु पाइहें कान सुनें बतिया कल आपुममे छुप कहिहैं । तुलसी अति प्रेम लगी पलक, पुलकी लखि रामु हिय महि हैं ।15।। सावरे गोरे सलोने सुभायें मनोहरतो जिति मैनु लियो है। चान कमान, निपग क्स सिर सोहैं जटा, मुनिबेषु क्यिो है ।। सग लिएँ विधुबनी बघू रतिको जेहि रचक रुपु दिया है। पायन तौं पनही न पयाहिं क्यो चलिहैं सकुचात हिया है ।।6।। बनिता बनी स्यामल गौरवे बीच, बिलोकह, री सखि । मोहि सी ह। मगजोगु न कोमल, क्यों चलिहै सनाति मही छवै॥ पनपकज
28
सब
तुलसी सुनि ग्रामवधू विथकों,
पुलकी तन नौं चले लोचन छ ।
भौति मनोहर मोहनरूप,
अनूप हैं भूपवे बालक हूँ॥7॥
("पवितावली से)
चित्रकूट पप तौर सो सुरतरु वास ।
लखन राम सिय सुमिरहु तुलसीदास ॥ 1 ॥
तप तीरथ मख दान नेम उपवास ।
सब ते अधिक राम जपु तुलसीदास ॥ 2 ॥
माय बाप गुर स्वामि राम कर नाम ।
तुलसी जेहि न सोहाइ ताहि विधि बाम ।। 3 ।।
जान आदि कवि तुलसी नाम प्रभाउ ।
उलटा जपत कोल ते भए रिपि राउ॥4॥
महिमा राम नाम में जान महेस ।
देत परम पद कासी करि उपदेस ॥5॥
क्लसजोनि जियें जानेउ नाम प्रतापु ।
कौतुक सागर मोखेउ करि जिय जापु ॥6॥
तुलसी सुमिरत राम सुलभ फल चारि ।
वेद पुरान पुकारत कहत पुरारि ॥7॥
दोप दुरित दुख दारिद दाहक नाम ।
सकल सुमगल दायक तुलसी राम ॥ 8 ॥
केहि गिनती मह गिनती जस बन घास ।
राम जपत भए तुलसी तुलसीदास ॥9॥
कामधेनु हरि नाम वामतरु राम ।
तुलसी सुलभ चारि फल मुमिरत नाम ॥ 10॥
(वरवं रामायण स)
ग्यान कहै अग्यान विनु तम विनु कहे प्रकास ।
निरगुन है जो सगुन विनु सो गुरु तुलसीदास ॥1॥
29 ग्यानो तापस सूर ववि कोविद मुन आगार । यहि लोभ विडवना कोहि न एहिं ससार ॥ 2 ॥ मान रासिबो मौगिबो पिय मा नित नव नेहु । तुलसी तीनिउ तब फब जो चातय मत लेहु ॥ 3 ॥ तसी चातक मांगनो एक एक घन दानि । देन जो भू भाजन भरत लेत जो घटक पानी ।। 4 ।। नहि जाचत नहिं मनही सोस नाइ नहिं लेइ । मे मानी मागनेहि वो वारिद विन देइ ।। 5 ॥ सुजन सुतर बन ऊख सम खल टक्किा रुखान । परहित अनहित लागि सव सांसति सहन समान ॥ 6 ॥ पिअहिं सुमन रस अलि विपट काटि कोल फल खात। तुलसी तरुजीवी नुगल सुमति कुमति की बात ॥7॥ अवसर कोडी जो चुकं बहुरि दिएँ का लाख दुइज न चदा देखिऐ उदो कहा भरि पाख ॥ 8 ॥ उत्तम मध्यम नीच गति पाहन सिक्ता पानि । प्रीति परिच्छा तिहुन को बैर बितिक्रम जानि ॥9॥ पुय प्रीति पति प्रापतिउ परमारथ पथ पांच । लहहिं सुजन परिहरहिं खल सुनहु सिखावन साच ॥ 10 ।। नीच निरादरही सुखद आदर सुखद बिसाल । वदरी बदरी बिटप गति पेखहु पनस रसाल ।। 1।।। बसि कुसग चह मुजनना ताकी आस निरास । तीरथहू को नाम भो गया माह के पास ।। 12 ॥ राम कृपा तुलसी मुनम गग सुसग समान । जो जल पर जो जन मिले कीजे आपु समान ॥ 13 ।। जड चेतन गुन दोष मय विस्व कीह करतार । सत हस गुन गहहि पय परिहरि बारि विकार ॥ 14 ।। भलो हहि विनु जानेहूँ बिनु जानें अपबाद । ते नर गादुर जानि जिये परिय न हरप विपाद 1 151 पर सुख सपति देखि सुनि जरहिं जे जड बिनु अागि । तुलसी तिन के भागते चलें भलाई भागि ॥ 16 30 दरा माल परता परम घधन बिचार बिहान । ते सुरतरु तर दारिदो गुरसरि तोर मलीन || 17॥ बोर न मोटे मारिरी माटी राटी मारु । जोति सहग राम हारिवो जीत हारि निहारु ।। 181 रोप न रसना हालिऐ वर पोलिम तरवारि। सुनत मपुर परिनाम हित बालिम वचन विचारि॥19॥ मधुर बचन षटु चोलियो विनु धम भाग अभाग । बुर मुहू पलक्ठ रव का का पररत काग ।। 2011 मिधु तरन पपि गिरि हरा पाज साई हित दोउ । तुलसी समयहिं सव बडो बुझत कई काउ कोड 121 ।। तुलसी असमयरे मखा धीरज धरम विवय । साहित माहरा सत्यव्रत राम भरामो एक 11 22 ॥ दीरप रोगी दारिदो कटुवच लोनुप लोग। तुलसी प्रान समान तउ होहिं निरादर जोग ॥ 23 1 पाही खेती लगन वट रिन कुब्याज मग खेत । वर बडे मो आपने किए पाच दुख हेत ।। 24 ॥ रीपि आपनी बूझि पर बीसि विचार विहीन ! ते उपदेस न मानही मोह महोदधि मीन ॥ 251 वरपत हरपत लोग सब करपत लखै न कोई । तुलसी प्रजा सुभाग ते भूप भानु सो होइ ।। 26 ॥ (दोहावली मे)
रसखान
भक्ति
मानुप ही तो वही रमयान यसौ ग्रज गोकुल गाँव के ग्वारन ।
जो पशु हा तो कहा बस मरो चरी नित नद की धेनु मझारन ।
पाहन हों तो वही गिरि को जो धो कर छत्र पुरदर धारन ।
जो खग हों तो बसेरौ करी मिलि वालिदो कूल क्दब की डारन ।। 1।।
जो रसना रस ना बिलसे तेहिं देहु सदा निज नाम उचारन ।
मो पर नीकी पर करनी जु पै कुज कुटीरन देहु चुरारन ।
सिद्धि समृद्धि सबै रसपानि लहों प्रा रेनुका-अग सँवारन ।
साख निवास मिल जु प तो वही कालिंदी कूल कदव को डारन ॥ 2 ।।
या लकुटी अफ वामरिया पर राज तिहूं पुर को तजि डारी ।
आठहु सिद्धि नवौ निधि को सुख नद को गाइ पराइ बिसारी ।
ए रसखानि जवै इन नैनन तें व्रज के बन वाग तडाग निहारों।
कोटिक हूँ कलधौत के धाम करील के कुजन ऊपर धारी ।। 3 ।।
बैन वही उनको गुन गाइ ओ शान वही उन सो सानी ।
हाथ वही उन गात सर अरु पाइ वहीं जु वही अनुजानी।
जान वही उन आन के सग और मान वही जु - मनमानी।
त्या रसपानि वही रसखानि जु है रसखानि सो है रसखानि ।। 4 ।।
सेस सुरेस दिनेस गनेस प्रजेस धनेस महेस मनावो ।
कोऊ भवानी भजो मन की सब आस सब विधि जाइ पुरावो ।
कोऊ रमा भनि लेहु महाधन, कोऊ हूँ मनबौछित पावो ।
प रमखानि वही मेरो माधन और मिलाक रही कि नमावी ।। ।
गुज गरें सिर मोरपखा अरु चाल गयद की मो मन भाव ।
सौवरी नदकुमार सर्व ब्रजमडली मे ब्रजराज बहाव ।
साज समाज सब सिरताज और छाज की बात नही कहि आवै ।
ताहि अहीर की छोहरिया छछिया भरि छाछ पै नाच नचाव ।। 6 ।।
32 रापति सा सयुगाइ दुबैरहिं प सा दीनी विनीती अनगहि । भोग में फै ललचाइ पुर दर जोग गग लई धरि मगहिं । ऐसे भयो तो यहा रमपानि रस रसना जो जु मुक्ति-तरगरि । दैचित तान रग रखयो जु रह्यो रचि राधिया रानी के रहि ॥7॥ धन-लीला गोरम गांव ही में विचिवो नही नद मुखानल झारन । मेल गह चलिये रसपानि तो पाप बिना हरियै विहि कारन । नाहि रीना भटू क्या करि क वन पठन पाइबी लाज सम्हारन । बजनि नदकुमार बस तहां मार बस कचनार को डारन ॥8॥ गोरम-लीला बारही गोरस बेंचि री आजु तू माइ वे मूर पट क्त मौंडी । आवत जात हो हामी साँझ भटु जयुना मतरोड लौं बौडी। पार गएँ रसडानि पहै अंखिया कहूँ होहिंगो प्रेम कनौडी। राधे वलाइ ल्यो जाइगी वाज अवै ब्रजराज यनेह की डौंडी ॥9॥ दान-लोला छौर जो चाहत चीर गह एज लेउ न दे कि चीर अहो । चाउन के मिस मापन मांगत खाउन माखन केतिक हो। जाति हौ जिय की रसखानि सु काहे को एतिक बाउ बढही। गोरस घे मिग जो रस चाहत सो रस का हजू ने न पैहो ।। 10 ॥ दधिदान एक ते एक लो कानन में रहें ढीठ सखा सब लीने कन्हाई । आवत ही हो लो यही कोउ कसे सह अति की अधिकाई। खायो दही मेरो भाजन फारयो न छोडत चीर दिवाएं दुहाई। सौह जसोमति को रसखानि ते भागे मर करि छूटन पाई ।। 11 ॥ उलाहना काहू को मासेन चावि गयो अप काहू को दूध दही ढरवायो। पाह को चीर ल रुख चढयो बरु काहू का गुनहरा छहरायो । मान नहा बरजे रसवानि सु जानिय राज इह घर आयो । आव री बूडा जसोमति सा यह छोहरा जायौ कि मेव मंगायो ।। 12 ।। - - 33 ग्वालिन द्वैक भुजान गहें रसखानि को लाई जसोमति पाहैं । लूटत हैं कहै ये बन मे मन मैं कहैं ये सुख लूट कहां हैं । अग ही अग ज्यों ज्यों ही लगै त्यो त्यों ही न अग ही अग समाहै । वै पछलें उलटें पग एक तो वे पछलें उलटें पग जाह ।। 13 ।। सपत्नी-भाव का कहूँ सजनी सग की रजनी नित बीत मुकुद को हेरी। आवन रोज वह मनभावन आवन की न क्बौं करी फेरी। सौतिन भाग बढयो व्रज में जिन लूटत हैं निसि रंग घनेरी । भो रसखानि लिखी विधना मन मारि के आपु बनी हौं अहेरी ।। 14॥ मिलन बक बिलोकनि हसनि मुरि, मधुर बन रसखानि । मिले रसिक रसराज दोऊ हरखि हिये रसखानि ।। 15 ॥ एक मम इक ग्वालिनि को ब्रजजीवन खेलत दृष्टि परयो है । बाल प्रबीन सक करि क सरकाइ के मोरन चीर धरयो है । यौं रस ही रस ही रसखानि सखी अपनो मनभायो करयो है । नद के लाडिले ढाकि दै सोस हहा हमरो वरु हाथ भरधौ है । 16 ।। वियोग काह कहूँ रतिया की क्था बतियां कहि आवत है न कछू री। आई गोपाल लियो भरि अक क्यिो मनभायौ पियो रस कू री। ताही दिना सो गडी अखियाँ रमखानि मेरे अग अग म पूरी । पैन दिखाई पर अब बावरी द के वियोग विथा की मजूरी ॥17॥ प्रिय को रिझाना देखिहो आँखिन सो पिय को अरु कानन सा उन बैन को प्यारी । बारे अनगनि रगनि की सुरभीनि सुगधनि नाक म डारी । त्यों रसखानि हिये म घरो वहि मांबरी मूरति मन उजारी । गाव भरी बाउ नाव धरो पुति सांवरी हो बनिहीं सुकुमारी ॥ 18 ।। मानिनी जो कबहू मग पाँव न देत सु तो हित लालन प्रापुन गौन । मेरो कहा करि मौन तजी कहि मोहन सों बलि वोल सलोन । सौंहैं दिवावत हो रसखानि तू मोहैं कर विन लाखनि लौने । अनीषीतू मानिनि मान करपो किन मान वसत म कीनी है कौने । 19 ।।
34 क्रियाविदग्धा खेल अलीजन के गन मे उत प्रीतम प्यारे सो नेह नवीनो। वननि वोध कर इत को, उत सननि मोहन को मन लोनो। नननि की चलिवी कछु जानि सखी रमखानि चितवे कों कीनो। जा लखि पाइ जभाइ गई चुटकी चटकाइ विना कर दोनो।। 20 ।। वशी जल की न घट भर मग की न पग धर घर की न कछु रै बैठी भर सांसुरी। एक सुनि लोट गई एक लोट पोट भई एकनि के दगनि निकसि आए आंसुरी। कहै रसखानि सो सबै ब्रज बनिता वधि बधिक कहाय हाय भई कुलहांसुरी करिये उपाय बांस डारिय क्टाय नाहिं उपजगो बांस नाहिं बाज फेरि बाँसुरी।। 21 ॥ काल्हि परयो मुरली धुनि मे रमखानि न कानन नाम हमारो। ता दिन तेन धीर रह्यो जग जानि लयो अति कीनी पवारो। गांवन गांवन में अब तो बदनाम भई सब सोक किनारो। तो सजनी फिरि फेरि कहीं पिय मरो वही जग ठोकि नगारो ॥ 2 ॥ ब्रज की बनिता सब घेरि कह तेरो दारो विगारो यहा कम री। अरी तू हमको जमकाल भई नेक काह गही तो वहा रस री। रसखानि भली विधि आनि बनी बसिबो नहिं देत दिना दस गे। हम तो ब्रज को वसिबोई तजी वम री बज परिन तु बंसरी।। 23 ॥ चद सो आनन मैन मनोहर वन मनोहर मोहत है मन । बक बिलोपनि लोट भई रसयानि हियो हित दाहत न तन । मैं तय तें तुलनानि को मैंड नती जु सखी अव डोलत हों बन । बेनु बजावत आश्त है नित मेरी गली ब्रजराज को मोहन ।। 24 11 बेनु बजावत गोधन गावत ग्वालन मग गली मधि आयो । बांसुरी मे उनि मेरोई नाव सुग्वालिनि ये मिस टरि मुनायो ए सजनी मुनि सास के पागनि नद ये पाम उमास न मायो। पसी परी रसवानि नही हित घन नही पितचोर चुरायो।। 25 ।। - 35 मोहन की मुरली सुनि के वह बौरी हूं पानि अटा चढि झांकी। । गोप वडेन को डीठि बचाइ के डीठि सो डोठि मिली दुहे घों को। देखत मोन भयो अखियान को को कर लाज कुटुम्ब पिता की। से छुटाई छट अंटकी रमयानि दुह की बिलोकन बाँकी ।। 26 ।। होलो खेलत फाग सुहाग भरी अनुरागहि लालन को धरि के । मारत कुकुम केसरि के पिचकारिन मे रंग को भरि के । ओरत लाल गुलाल लली मन मोहनि मौज मिटा करि के । जात चली रसखानि अली मदमत्त भनी मन को हरि क ।। 27 ।। फागुन लाग्यो सखी जब तें तब तें अजमडल धूम मच्यो है । नारि नवेली वचै नहिं एक बिसेख यहै सब प्रेम अच्यो है । साझ सकारे वही रसखानि सुरग गुलाल ले खेल रच्यो है । का सजनी निजलो न भई अरु कौन भटू जिहिं मान बच्यो है ।। 28 ।। जाहु न कोऊ सखी जमुना जल राकें खडो मग नद को लाला । मैन नचाइ चलाइ चित रमखानि चलावत पेम को भाला। मैं जु गई हुती वरन गाहर मरी करी गति टूटि गो माला । होरी भई के हरा भए लाल के लाल गुलाल पगी ब्रजबाला ।। 29 11 भ्रमरगीत जोग सिखावत प्रावत है वह, कौन कहावत को है कहाँ को। जानति हैं बर नागर है पर नेकहु भेद लह्यो नहिं हां को। जानति ना हम और कछू मुख देखि जिय नित नदलला को। जात नहिं रखानि हमे तजि, गखनहारो है मोरपणा को ।। 30 ।। लाज के लेप चढाइ क अग पची सव सोख का मत्र सुनाइ क । गाडरूह बन लोग थक्यो करि औषद बेसक सौह दिवाइ क । ॐो भो को रमणानि कह जिन चित्त धरौ तुम एते उपाइ के। वारे विसारे को चाहे उतारचौ गरे विष बावरे राख लगाइ वै ।।31 ।। वा रसखानि गुनों मुनि हियरा सत टूक ह फाटि गयो है । जानति है न अछू हम ह्या उन वा पढि मन कहा घो दगी है । साँची रहैं जिय म निज जानि जानति है जस जसो लयो है । लोग लुगाइ सब ब्रज मोहिं कहैं हरि चेरी को घेरा भयो है ।। 32 ॥
36 आने कहा हम मूढ सय समुझो न त जवही बनि आई। सोचति हैं मन ही मन री अब फौज कहा रतियां जु गंवाई ! नीचो भयो प्रज को सब सीस मलीन भई रसपानि दुहाई। चेरी को घेटव देवहु री हरि चैरी कियौ धौ बहा पढि माई ॥ 33 ॥ भेती जु पं कुबरी हां सम्बी भरी लातन मूका बनोटती लेती। लेति निमारि हिये की सब, ना छेदि क कोडी पिराइ फ देती। देती नचाइ नाच वा डि कों, लाल रिझायन को फल सेती। सेती सदा रसखानि लिये कुबरी के करेजनि सूल सी भेप्ती ।। 34॥ ('सुजान-रसखान' से) 2 दान लीला श्रीकृष्ण- एरी कहा वृषभानपुरा की तो दान दिये बिन जान न हो। जो दधिमाखन देव ज चाखन झूमत लाखन या मग ऐदी। नाहिं तो जो रस सो रस ल हो जु गोरस बेचन फेरि न हो। नाहक नारि तू रारि बढावति गारि दिये फिरि आपहि देही। 351 श्रीराधिका- गारी के देवया बनवारी तुम कहाँ कौन हम तो बृषभान की कुमारी सब जानो है। जोर तो करोगे जाइ जासो हर पाइ आई मुरही ते आजु मो सो कसो हठ ठानो है । बूझि देखो मन माहि अरुझत मग जात बुझिही निदान काह जौन कहो मानो है । मैरे जान कोऊ मीरखान आव दही छीन तू तो है अहीर मोहिं नाहि पहिचानो है। 361 श्रीकृष्ण- एरी तोहू पहचानौं वृषभान हूँ को जानो नेकु काहू को न सका मानों हो अहीर ऐसो हो। मीरन को मारि मान तोरिही गुमान लेहों आज तोसों दान लहों देखिये जु जैसो हो।
फोरिहौ मटूकी माट ले दही करोगी लूट, जैही कोने सु तो घाट बाट रोकें बसो हो। कहा कही राधे तोहिं अजहूँ न ची है मोहिं मेरी ओर देखि नेकु दानी काह कैसा हो। 371 पौराधिका- जोहो तिहारी मोर नदगाव के किसोर माखन क चोर तुम गोकुला के बासी हो, जसुदा तिहारी माइ असल सौं बाधौ जाइ, दानी १ कहाए आइ भए कामरासी हो। कस सो कहोगी जाइ मागिहो तुमै धराइ रहोगे कहां छिपाइ जो बडे मवासी हो। गोरस को दान हम अजहूँ न सुने कान माहे लाल हम सो परत रोज हासी हो। 38 । भोकृष्ण- दान प न कान सुन लेही सो गुमान भजि, हासी पर हासी परहासो आज करौंगा। जेती तुम ग्वालिन तितेक सब राकि राखी जमुना को ओटि मे जु सबै काम सरौंगा । जाको तू कहति कस ताहि को करौं विधस, हो तो जदुबस बोर काहू सो न डरोगो । भूषन उतारि चीर फारि चीर डारि दही, नन्द की दुहाई खात टेक सो न टौंगो। 39। श्रीराधिका- नद की न दासी हम जातिहू मे नाही कम, एक गाव बसौ स्याम भोर भए वादी हो । जमुना के तीर तुम चीर हू चुराइ रहो ताहू की न लाज आई और के फसादी हो। रोकत हो टोकत हो बाट माहि साट खाह, माट फोरि चाटो दही यही गुन आदी हो । जो कहूँ बैठारिही न पारिहौ रुआब माहि, नोन की न गोन लीहे आदी हू न लादी हा । 40 ।
38 श्रीकृष्ण- मरो को कर नियाव हाँ तो तोनि लोक राव, हमै धेरो याही चाव दाव भलो पायो है। विदावन वृज माह कदम वी शाह चलो अब भरि भेटि लही जमो मन भायौ है। हीरा मनि मानिक की काच और पातिन की मातिन की गात की जगात ही लगायी है। गोरस तो देर ढेर साह पीयो वेर बर दखहु सलोना रूप दानी वाह आयो है । 411 श्रीराधिका--- नौ लख गाय सुनी हम नद के तापर दूध दही न अधान । मागत भीख फिरी बन ही बन झूठ ही बानन के मन माने । और की नारिन के मुख जोवत लाज गही क्छु होहु सयान । जाहु भले जु भले घर जाह चले बस जाह विदावन जाने 1 42 । ('दान लीला स) 3 प्रेम प्रेम ययनि श्रीराधिका प्रेम बरन नदन द । प्रेमवाटिका के दोऊ माली माविन द्वद ॥1 प्रेम प्रेम सब कोउ बहत, प्रेम न जानत कोइ। जो जन जान प्रेम तो, मर जगत क्यो रोड़ 1211 प्रेम अगम अनुपमा अमिन सागर-सरिस यवान । जो आवत यदि दिग बहुरि जात नाहिं रसखान 11311 पेम-वारनी छानि के, बग्न भए जलधीस । प्रेमहि ते विषपान करि पूजे जात गिरोस 11411 प्रेम पदपन महा र अजूचो खेल । या म भपनो रूप पा लधि परिहै अनमल 158 कमल ततु सो छीन अरु पठिन पहा की धार । अति सूधो टढ़ो बहरि प्रेमपथ अनिवार ॥6॥ मोर वेद मरजाद सब लाज वाज सदेह । देत बहाए प्रेम करि विधि निषध को नेह 17॥
39 कबहुँ न जा पथ भ्रम तिमिर रहै सदा सुख चद । दिन दिन बाढत ही रहत होत कबहुँ नहिं मद ।।8। भलें वृथा करि पचि मरौ ज्ञान गरूर बढाय । विना प्रेम फोको सबै कोटिन किये उपाय ॥9॥ स्रति पुरान आगम स्मृतिहि प्रेम सबहि को सार । प्रेम बिना नहिं उपज हिय पेम बोज अंकुवार ||1|| आनंद अनुभव होत नहिं बिना प्रेम जग जान । क वह विषयान द क ब्रह्मान द बखान || ज्ञान कम रु उपासना, सब अहमिति को मूल । दृढ निश्चय नहिं होत बिन क्यि प्रेम अनुकूल ।।12।। सास्त्रन पढि पडित भए के मौलवी कुरान । जुप प्रेम नायो नही कहा क्यिो रसखान ॥13॥ काम क्रोध मद मोह भय लोभ द्रोह मात्सय । इन सब ही ते प्रेम है परे कहत मुनिवय ॥14॥ बिन गुन जोबन रूप धन बिन स्वारथ हित जानि । सुद्ध कामना ते रहित प्रेम सरल रस यानि ।।15। अति सूछम कोमल अतिहि अति पतरो अति दूर। प्रेम कठिन सब तें सदा, नित इकरस भरपूर ।। 1611 जग में जब आयो पर अरु सव कहै कहाइ । प जगदीश र प्रेम यह दोऊ अक्थ लखाइ 170 जेहि बिनु जान कछुहि नहिं जा यो जात विसप। सोइ प्रेम, जेहि जानि के रहि न जान कुछ सप ।।18।। दपति मुख अरु विषय रस, पूजा निष्ठा ध्यान । इन तें पर यखानिय, सुद्ध प्रेम रसघानि 11911 मित्र कला सुब यु मुत, इनमे सहज सनह । सुद्ध प्रेम इनमे नहीं, अकय क्या सविसह ।।2011 इअगी पिनु वारहिं इरस सदा समान । गन प्रियहि सबस्व जो, सोई प्रेम प्रमान ||21|| Tv डर सदा चाहै न कछ, सहै सबै जो होइ। रहे एकरस चाहि के, प्रेम बखानी सोइ ॥22॥ प्रेम प्रेम सब कोउ कहै कठिन प्रेम की फास । प्रान तरफि निकर नही, क्वल चलत उसास ।।23।। प्रेम हरी को रूप है त्यों हरि प्रेम सस्प । एक होइ ६ यो लस, ज्यो सूरज औ धूप ।।24।। ज्ञान ध्यान विद्या मती, मत बिस्वास बिबक । विना प्रेम सब धूरि है अगजग एक अनेक 1251 ('प्रेम वाटिका से) काहू सों न सन्दरदास गुरु-महिमा (1) काहू सा न रोप तोप काहू सा न राग दय काहू सो न बैर भाव काहू सा न घात है वकवाद काहू सो नही विषाद काहू सो न सग, न तो काहू एच्छपात है ॥ काहू सो न दुष्ट बन काहू सो न लेन देन ब्रह्म को विचार कछू और न सुहात है । सुदर कहत सोई ईसन को महा ईस सोई गुरुदेव जाके दूसरी न बात है ॥ (2) गुरु बिन ज्ञान नही गुरु बिन ध्यान नही, गुरु बिन आतम विचार न लहतु है । गुरु बिन प्रेम नहीं गुर बिन नेम नही, गुरु बिन सीलहु सन्तोष गहतु है। गुरु बिन ग्यान नहिं बुद्धि का प्रकास नहीं, नास नहि ससैइ रहतु है । गुरु बिन वाट नहिं कौडी बिन हाट नहीं सुन्दर प्रकट बेद या कहतु है। न भ्रमहू को (3) गुरु के प्रसाद बुद्धि उत्तम दसा को गहे, गुरु के प्रसाद भय दुख विसराइये । गुरु के प्रसाद प्रेम प्रीतहु अधिक बाढे गुरु के प्रसाद, राम नाम गुण गाइये ।
42 गुरम प्रमाद गर जाम पी जुगति जाा गुरु ये प्रसाद गूय म समाधि साइय । सुदर कहत गुग्नेय जो कृपालु हाइ तिन प्रमाद तत्व शान पुनि पाइये। (4) गुर मात गुरु तात गुर वधु निज गात गुरदव नखसिप, सरल सवारयो है। गुर लिय दिव्य नन गुरु दिये मुघ वैन गुरदय मरवण दे मरद उवारया है। गुरु दिग हाथ पांव गुर सोस भाव गुरदेव पिंड माहि प्राण आइ डारिया है। मुदर पहत गुरदेव जो कृपालु होइ फिरि घाट घडि करि मोहि निस्तारयो है। उपदेश (5) बार बार यहा तोहि सावधान क्यू न हो। ममता की पोट सिर काहे को धरत है । मेरो धन मेरो धाम मेरो सुत मेरी वाम मेरे पसु मेरे ग्राम भूल्यो ही फिरतु है। तू ता भयो यावरो विकाइ गई बुद्धि तरी। ऐसो अध कूप गेह ताम तू परतु है । सुदर क्हत तोहिं नेह न आवे लाज बाज को बिगार के अकाज क्यो करतु है। (6) पायो है मनुष्य दह औसर बयो है गेह ऐसी दह बार बार कहो कहा पाइप । भूलत है वावरे । तू अब सयानो होइ रतन अमोल सो तो काहे कु ठगाइये ॥
42
समुझि विचार वरि ठगन को सग त्यागि,
ठगिवाजी देखकर मन न हुलाइये ।
सुदर कहत ताते सावधान क्यू न होइ
हरि को भजन कर हरि म समाइये ।
काल की विकरालता
(7)
मन्दिर महल दिलायत है गज
ऊँट दमामा दिना इक दा है ।
तातहु मात तिया सुत बाधन
देख धु पामर हात विछा है ।
झूठ प्रपच सू राचि रह्यो सठ
काठ को पूतरि ज्यू पपि मोहै ।
मेरि हि मरि है नित सुन्दर
औखि सगे कहि कौन कू को है।
(8)
के यह देह जराई के छार
किया कि किया कि क्यिा कि रिया है ।
* यह देह जमी महि गाडि
दिया कि दिया कि दिया कि दिया है ।
+ यह देह रहे दिन चार
जिया कि जिया कि जिया कि जिया है
सुदर काल अचानव आइ
लिया दि लिया कि लिया कि लिया है।
(9)
दह सनेह न छाडत है नर
जानत है पिर हैं यह दहा ।
छोजत जाइ घट दिन ही दिन
दीसत है घट को नित छेहा !
44
काल अचानव प्राइ गहै कर
ढाहि गिराइ करे तनु खेहा ।
सुदर जानि यहै निहचे धरि,
एक निरजन सू कर नेहा।
(10)
साइ रह्यो कहा गाफिल है करि
ता सिर ऊपर काल दहार ।
धामस धूमसि लागि रह्यो सठ,
आइ अचानक तोहिं पछार।
ज्यू बन मे मृग कूदत फांदत
चित्र गले नख सू उर फार।
सुदर वाल उरै जिनके डर
तो प्रभु कू कहू क्यू न संभारे।
(11)
जब ते जनम 'लेत, तब हो ते आयु पटै
माई सो कहत मरो बडो होत गात है।
आज और काल और दिन दिन होत मोर
दौर्यो दौरया फिरत सेलत अरु खात है ।
बालपन बीत्यो जब जीवन लगो है आइ
जोबनहु बीते बूढो, ढोकरो दिखात है ।
सुन्दर कहत ऐस देखत ही बुझि गयो
तल घटि गये जसे दीपक बुझात है।
देह एव जगत की नश्वरता
{12)
कोन भौति करतार क्यिो है सरीर यह,
पावर 2 माहि देखो पानी को जमावनी ।
नासिका सदन नन, बदन रसन बैन,
हाय पांव बग नष, सीस को बनायना।
A
अजब अनूप रूप चमक दमक ऊप,
सुन्दर सोभित अति, अधिक सुहावनो।
जाही छिन चेतन, मति लीन होई गइ,
ताहि छिन लागत है सबको अभावो।
(13)
मातु तो पुकार छाती, कूटि कूटि रोवति है
बापर कहत मेरो नदन कहाँ गयो।
भैया हू कहन मेरो बाँह माजु दूरि भई
वहिन कहत मेरो, वीर दुख दै गयो।
रामिनी कहत मरो सीस सिरताज कहां
उहे तत्काल रोइ, हाथ मे धोरा लया
सुन्दर कहत काऊ, ताहि नहिं जानि सक
बोलत हुतो सो यह, छिन में कहाँ गया।
प्राशा-तृष्णा
नैनन की पल ही पल मे छिन,
आधि धरी घटिका जु गई है।
जाग गयो युग याम गयो पुनि,
सांझ गई तब रात भई है।
माज गई अरु काल्ह गई
परसो तरसो वा और ठई है।
सुन्दर ऐसहि आयु गई
तृष्णा दिन ही दिन होत नई है।
(15)
क्न ही कन कू चिल्लात फिर
सठ याचत है जन ही जन कू ।
तन ही तन · अति सोच कर
मर खात रहे अन ही मन कू ।
46
-
मन ही मन को तृस्ना न मिटी,
पुनि धावत है धन ही धन
छिन ही छिन मुदर आयु घटी
कबहू न गयो यन ही बन यू।
(16)
जा दस बीस पचास भये सत
होइ हजार तू लाख मगगी।
कोटि अरबब गरयव अमख्य
पृथ्वीपति होन को चाह जगंगी।
स्वग पताल को राज वरी
तृस्ना अधिकी अति आग लगेगी।
सुदर एक स तोप बिना सठ
तेरी तो भूख कधी न भगंगी ।
प्राश्वासन
(17)
पांव दिये चलने फिरने कह
हाथ दिये हरि कृत्य कराया।
कान दिये सुनिये हरि को जस
नन दिये तिन माग दिखायो।
नाव दिये मुख सोभत ता करि
जीभ दई हरि को गुण गायो।
सुदर माज दिया परमेसुर
पेट दिया बड पाप लगायो।
(18)
होई निचित दर मत चितहि
चौच दई सोइ चित करेगो।
पाउ पसार परयो किन सोक्त
पेट दियो सोइ पेट भरंगा ॥
47 जीव जिते जल के थन वे पुनि पाहन मे पञ्चाय घरंगो। भूखहि भूख पुकारत है नर सुदर तू क्ह भूख मरगा । (19) भाजन आप घडे जितने भरि भरिहैं भरिहैं भरिहैं । गावत है जिनके गुण - दरिहैं ढरिहैं ढरिहै दरिहैं जू ।। सदा हरिहैं हरिहैं हरिहै हरिहै ।। सुन्दरदास सहाय सही करिहैं वरिहैं करिहैं करिहैं जू ॥ आदिह अतहु मध्य विश्वास (20) कहि कू दौरत है दसहू निसि तू नर देख क्यिो हरज का । बैठि रहे दुरि क मुन्न मूदि उवारत दात खवाइ है टूका ।। गभ थवे प्रतिपाल क्री जिन होइ रह्यो तबही जे मूका । मुदर क्यो बिल्लात फिर अव राख हृदय विश्वास प्रभू को ।। (21) खेचर भूचर जे जल के चर चराचर पोखै। वे हरि जो सबको प्रतिपालत ज्यू निहि भाति तिहि विधि तोख । देत प्रहार
तू अप क्यू विश्वास न रामत
भूलत है क्ति धापहि घाख ।
तोहिं तहां पहुँचाय रहे प्रभु
सुदर बैठ रहैं विन ओवं ।।
देह की मलिनता
(22)
देह तो मलिन अति बहुत विकार भरी,
ताहू माहि जरा व्याधि, सब दुख रासी है।
कबहुँक पेट पीर कबहुँ सिर बाय
कवक आंख कान मुख में विथा सी है।
औरह अनेक रोग नख सिर पूरि रहे
रबहुँक स्वास चले क्वक खांसी है।
ऐमो ये शरीर ताहि अपनो के मानत है
सुदर कहत यामे कौन सुख वासी है ।।
(23)
जा सरीर माहि तू अनेक सुख मानि रहयो
ताहि तू विचार या मैं कौन बात भली है।
मेद मज्जा मास रग रग मे रक्त भर्यो
पेटहू पिटारी सी मैं और ठौर मली है ।।
हाडन सो भर्यो मुख हाडन के नैन नाक
हाथ पांउ सोऊ सव हाडन को नली है।
सुन्दर रहत याहि देखि जनि भुलै कोई
भीतर भंगार भरी ऊपर तौ कली है।
मूखता
(24)
अपन न दोष देखे पर के औगुण पेखे
दुष्ट को स्वभाव, उठि निदा ही करतु है।
जैसे कोई महल संवारि राख्यो नी पर
कीरी तहा जाय छिट ढूढत फिरतु है ।।
49 भोर ही ते साय लग माझ ही त भोर लग, सुदर बहत दिन ऐसे ही भरतु है। पाव के तरे की नहीं सूझ आग मूरख । और सू कहत तेरे मिर पै बरतु है ।। मन कूपा। ( 25 ) जो मन नारि की और निहारत, तो मन होत है ताहि को रूपा । जो मन पाहू सु क्रोध करै पुनि, तो मन है तब ही तद रूपा । जो मन मायहि माया रटै नित, तो मन त माया के सुदर जो मन ब्रह्म विचारत तो मन हात है ब्रह्म स्वस्पा ।। ( 26 ) मनही पे भ्रम ते जगत यह देखियत मनही वे ब्रम गय जात बिलात है। मनही के भ्रम जेवरी म उपजत साँप, मन के विचारे साप जेवरी समान है ।। मनही के भ्रम तें मरीचिक पूजन है मनही भ्रम सीप स्पो सो दिखात है । सुदर मयल यह दीस मनही को भ्रम, मनही को नम गये ब्रह्म हाई जात है ।। वाणी का महत्त्व ( 27 ) वचन ते दूर मिल बचन विगय बचन तें राग यद दपत्र - बचन तें ज्यान उठ यपर 24 वचन तें मुरिण, rra
50
वचन तें प्यारो लाग, वचन तें दूर भगं,
बचन तें मुरझाय वचन तें पोप जू ॥
सुन्दर बहत यह वचन का भेद एसा
बचन तें वध होत बचन तें मौच्छ जू ॥
भजन न करने वाले
(28 )
कर
एक जू सबही व उर अतर
ता प्रभु क कह काहि न गाव ।
सफ्ट माहिं सहाय
सो अपना पति क्यू विसरावं ॥
चार पदारथ और जहाँ लगि
आठहु सिद्धि नवो निधि पाव ।
सुदर छार परी तिन के मुख
जो हरि कू तजि आन कू घ्याव ।
( 29 )
पूरण काम सदा सुख धाम
निरजन राम मिरञ्जन हारा।
सेवक होई रह्यो सब वो नित
कोटहि कुजर देत अहारा।।
भजन दुख दरिद्र निवारण
चित्त रे पुनि साँझ सवारा।
ऐसे प्रभू तजि पान उपासत
सुदर है तिनको मुख कारो ।
(सुदर विलास मे)
पद्माकर
भक्ति
(1)
ह्व पिर मदिर मे न रह्यो,
गिरि क्दर मन तप्यो तप जाई।
राज रिझाए न के पविता
रघुराज कथा न यथामति गाई ।
यो पछितात कछू 'पद्माकर
का सा कही निज मूरखताई ।
स्वारथ है न कियो परमारथ
यो ही अकारथ बस विताई।
(2)
भोग मे रोग वियोग सयोग म
योग म काय कलेस कमायो।
यो पद्माकर वेद पुराण पढयो,
पढि के बहु वाद बढाया ।
दौरयो दुराम मे दास भयो प
वहूँ विसराम का धाम न पायो ।
खाया गमायो सु ऐसे ही जीवन,
हाय 4 राम को नाम न गाया
(3)
पेर कि चारे चपेट सही
परमारथ स्वारथ लागि बिगारे ।
यो
पद्यावर भक्ति भजी
सुनि दभ के द्रोह के दोह नगारे ।।
.
52
जो गुरु
जज्ञ जपातप जाल
विहाल परे कलिकाल के मारे ।
कौन के प्रासरे आम तजो
सुधि लेत न क्यो दसरत्य दुलारे ॥
( 4 )
द्यौस को रात करे जा चहै अरु,
रातिहु को करि द्यौस दिखावै ।
त्यो पद्माकर सील क सिधु
पिपीलिका के वल पोल फिरावे ।
यो समरत्थ ते ते
दसरस्थ को
सोइ करे जो कछू न मन भाव ।
चाहे सुमेरु को राइ पर, रचि,
राह को चाहे सुमेरु बनाव ।।
(5)
ऐ ब्रजचद गुबिंद गुपाल ! सुयो क्या न एते धमाल किए मैं ।
त्यो पाकर
प्रानद थे नद हो नद नदन ! जानि लिए मैं ।
माखन चोरि क खोरिन ह चले भाजि क्यू भय मानि जिए मैं ।
दूर न दौरि दुरयो जु घही तो दरी पिन मेरे अधेरे हिए मैं ।
देधि पपावर गुविंद की अमित छवि,
सकर समेत विधि यानद सो यात्रा है।
मिभक्त मूमत मुदित मुमुवात गहि
अपत को छोर दोऊ हापन मा आको है।
पटरत पाय हात पजनी मनुए प
नर-नयना म नीर बनाना।
मागे नारानी निर पय पीर
नौन मोर टार मा दनान टाा है।
53
(7)
आइ सग आलिन वे ननद पठाई नीठि
सोहत सोहाई सीस इडरी सुपट की।
कहै 'पद्माकर भीर जमुना
के तीर
नागी घट भरन नवेली नेह अटकी।
ताही समय माहन जू बांसुरी बजाई ताम
मधुर मलार गाई जोर बसीबट की।
ताने लागे लटकी रही न सुधि घूघट की,
घरको न घाट की, न बाट को न घट की।
(8)
फाग के भीर अभीरनि त्यो गहि गीविंद ल गइ भीतर गोरी ।
भाय करी मन की पद्माकर ऊपर नाय प्रबीर कि झारी ।।
छोनि पितम्बर कम्मर त सु विदा दइ मीड कपोलन रोरो ।
नन नचाय कही मुसुक्याय- लला फिर आइयो खेलन होरी ।।
(9)
व्याध हू ते बिहद असाधु हो अजामिल ते
ग्राह ते गुनाही कहो तिन म गनाआग ।
स्योरी हौ न सूद हों न कवट पहूँ की त्या न,
गौतम तिया हो जाप पग धरि आआगे।
राम सो बहत पद्माकर पुकारि तुम
मर महा पापन को पारहू न पाओगे ।
झूठोई कल सुनि तजीही सीता-सी सती,
साचोई कलकी ताहि कैस अपनाओग ।
(10)
पातकि पावन हो तुम राम, रह हम पातक म मदमाते ।
दीन के बधु दयाल इक तुम ही हम दीन दसान ही पाते ॥
54
पालम ही तुम विप्रन , हम 'पपारर विध रहात ।
या ते रटी न हटो प्रभ पास ते, हैं तुम ते हम त बट नात ।
(11)
जोग जप सध्या साधु माधन सबई तज
पोह अपराध ते अगाध मन भायत ।
तेते तजि औगन अनत पवारर' तो
फोन गुन ल पं महाराजहिं रिक्षावते ॥
जसे अब तसे पै तिहार बड़े काम के हैं
नही तो न एत बन ववहूँ सुनावते ।
पावते न मो-सो जो प अधम पहूँ तो राम
बस तुम मधम उधारन कहावत ।
( 12 )
जाट हूँ धना स सदना के सद साथी भये
हाथी हू उबारत न वार मन लाये हैं ।
कहै पगार कहे न परे ते ते जग
जे ते कपि रिच्छन के विरद बढाये है।
साधन के हेत पन पाल्यो प्रहलाद हू का
याद करी जाय सेवरी बेर खाये हैं ।
राखत हैं राखये रखैया रघुनाय, जन
आपने की बात सदा राखतेई आय हैं ।
(13)
ए रे जड जीव, जानि राख्न वेद भेद यहै
समृत पुराण राखी यहै ठहराय है ।
कहे 'पद्माकर सु माया परपचन का
पेखि परपच देखने का सब भाय है।
या ते भज दशरथ नद रामचद जू को
आनद को कद कोसलेस रघुराय है !
जा दिन परेगो काम जम के जम्सन सो
ता दिन तिहारो काम राम नाम आय है ।
( 14 )
साप हर पाप हर बलि के कलाप हर
तोखन त्रिताप हर तारक तरैया को ।
कहै पद्माकर त्यो प्रगट प्रवासमान
पापर पियूप ऐसा जसे कामगैया को।
मुख सुखदायक महायक सवन सूधो,
सुलभ सर य सरनागत अवैया का।
मीठो, भर कठवति परत न फीको नित
नीको निरदीप नाम राम रघरैया को ।।
(।)
आयो मन हाथ तव आइबा रह्यो न कछु
भायो गरु पान फेरी भाइवो कहा रह्यो।
कहै पद्माकर' सुगध की तरग जैसे
पायो सतसा फेरि पाइबो कहा रह्यो।
दान बल बानबल विविध बितान बल,
छ्यो जस पुज फेरी छाइबो कहा रह्यो
घ्याया राम रूप तव ध्याइबाक्छू ने रह्यो,
गायो राम नाम तब गाइवा कहा रह्यो ।
( 16 )
और सब सग सापनो है, जग आफ्नो एक हितू रघुराया।
ताहि न भूनिहु भूलियो तु पद्माकर पखनो पेख पराया।
न मुदे प जहाँ कि तहां कि-सी रहि जाति जमाति भौ माया।
माया चलाय चले क्यो चल, चल आपने सग न अपनी काया ।।
56 (17) यो मन तालचो लालच में लगि, लोभ तरगन मे अवगाह्यो। त्यो 'पद्यावर गेह दह के नेह के काज न काहि सराह्यो । पाप किये प पातक्-िपावन जानि क राम वो नेह निबाह्यो । चाह्यो क्छू कबहूँ जमराज हुँ सौ वृथा वर विसाह्या ।। भयो ( 18 ) एक्न सा वैर करि प्रीति करि एक्न सौं एक्न सो वैर है न प्रीति क्छू गाढी है। कहै पद्माकर न होत चित चाही बात बात करिव को अनचाही बीच ठाढी है । ऐते प न चेत फेरि देते बाध बाधत है दत लाग हिलन सपेद भई दाढी है। बाढी कहूँ भगति न राम की हिय म देखी तृसना विसासिनि या विलई ते बाढी है ।। (19) या जग जीवन वा है यहै फल जा छन छोहि भज रघुराई। सोधि व सत महतन हूँ 'पपार बात यह ठहराई॥ ह रहि हानि प्रयास विना, अनहानि न ह सक वाटि उपाई।
57
जो विधि माल ग लीकि लिखी
सो वढाइ वढे न घट न घटाई ।।
(20)
काहे को बघम्बर का ओढि करु अडम्बर,
काहे को दिगम्बर ह दूब खाय रहिय ।
कहै पदमार त्यों काय के क्लेस नित,
सीकर सभीत सीत बात ताप सहिये ।
काहे हो जपोगे जप काहे वो तपोगे तप,
काहे को प्रपच पचपावर मे दहिये ।
रन दिन पाठो जाम राम राम राम राम
सीताराम सीताराम सीताराम कहिय ॥
(21)
रे मन साहसि साहम राष सु साहस सो सब जेर फिरैगे।
त्या पदमाकर या सुख म दुख त्यो दुख में सुख मेर फिरगे।
वैस ही वेणु बजावत श्याम सुनाम हमारि हु टेर फिरैगे।
एक दिना नहिं एक दिना क्वह फिर वे दिन फेर फिरगे।
(22)
आवत गलानि जो वखान परी ज्यादा यह
काया मल मून और मज्जा की सलीती है।
कहै पदमाकर जरा भी जागि भीजी तब
छोजी दिन रन जैसे रेनु हो की भीती है ।
सीतापति राम के सनेह वश बीती जो प
तो तो दिव्य देह जम जातना ते जीती है।
रोती गम नाम त रही जो बिन काम तो या
खारिज खराब हाल खाल की खलीती है।
58
(23)
कहै
आस बस डोलत सु या को बिसवास कहा
सास बस वोले मल मास ही को गोला है ।
पदमाकर
छनभगुर सरीर यह
पानी कसो फेंक जसे फलक फफोला है।
करम करोरा पच तत्त्वन बटोरा फेरि
ठोर ठौर जोला फेरि ठौर ठौर पोला है।
छोड हरिनाम नहीं पैहैं विसराम अरे,
निपट निकाम तन चाम ही को चोला है।
(24)
को किहि को सुत को किहि को पितु
को किहि को पति कौन की कोती।
कौन को को जग ठाकुर चाकर,
को पदमाकर कौन को गाती ।
जानकी जीवन जानि यहै
तू सब धन धाम औ धोती।
हो तो न लाटत लोभ लपेट में,
पेट कि जो प चपेट न होती ॥
तजि दे
प्रकृति-यणन
।
पात दिन बीह ऐसी भावि गन बसन
परत न पीहे जे ये सजरत सुस्ज हैं।
महै 'पदमारर विसामी या बरात
एम उतपात गात गापिन 4 मुन्न हैं।
व्या यह मूधा सा सगो रहि दाजो मनो
हरि यों हमारे हा न पूल यन यूज है।
59
किंशुक गुलाव वचनार औ अनारन को,
डारन पं डोलत अगारन के पुज है ।।
(2)
वूलन में केलि म कछारन में कुजन म
क्यारिन में कलिन क्लीन किलकत है ।
कहै पदमावर परागन म पौनहू म,
पालन मे पिक मे पलासन पगत है।
द्वार मे दिशान में दुनी मे देश देशन मे,
देखो दीप दीपन म दीपत दिगत है ।
वीथिन मे ब्रज मे नवेलिन में बेलिन म
बनन मे बागन में बगरो बसत ॥
( 3 )
ऐ प्रज चद्र चलो किन वा ब्रज लूक बस त की ऊकन लागी।
त्यो पदमाकर पेयी पलासत पावक सी मनो फूकन लागी ।
वै बजनारि विचारि वधू बन बावरि लौ हिय हूकन लागी ।
कारि कुरुप कसाइन पं सु कुहु ववलिया कूक्न लागी ।
(4)
मल्लिकान मजुल मलिन्द मतवारे मिले
मद मन्द मारत मुहीम मनसा की है।
कहै पदमाकर त्यो नादत नदीन नित,
नागर नबलिन की नजर निशा को है।
दौरत दररे देत दादुर सुदूदै
दीह
दामिनी दमर नि दिसनि मे दशा की है।
बहलनि दुदनि विलोको वगुलानि बाग
बगलानि बेलिन वहार बरसा की है ।
वीर रस (1) सोहै अज ओढे जे न छोडे सीम सगर की लगर लगूर उच्च ओज के अतका म! कहै पदमावर त्यो हुकरत फकरत फ्ला मलात पाल वाधत फलका में। आगे रघुवीर के समीर के तने के सग, तारी द तडाक तडातड तमका सादै दमानन का ढवा द सुबका वीर उका द बिज को कपि कुद पर्यो लका मे ।। (2) जाही ओर मोर पर घोर धन ताही भोर जोर जग जालिम को जाहिर दिपात है। वहै 'पदमावर अरीन की गाई पर मार गवाई को पलाई सहरात है । परिष प्रयह चमू हरपिन हापी पर दयत बात सिंह मायव पा गात है। उन्न प्रमिल जुस नीति ही मौदा हिम रोदा ठनगरि तन हौदा म न मान है। (3) सोग तगमाही ने गिमाही पा पान म्याही प, अमिन परिपन पी एमप। है पदमारत निगगन का दापिन 4 पूरि पार पारगागन + ।। गारि गुण चमू गर.. हिम्मा हा पर
61
लाली पढे मुख पं, वहाली च वाहन प
काली चदै गिह प बगानी चढे वन प॥
दानवीर
सम्पति सुमेर वी कुबेर की जु पावै ताहि
तुरत लुटावत विलय उर धारै ना।
कहै पदमावर सुहेम हय हाथिन के
हलो हजारन के वितरि बिचार ना।
गज गज वक्स महीप रघुनाथ राव
याही गज धोखे कहूँ काहू देइ डार ना।
याही डर गिरिजा गजानन को गोई रही,
गिरि गरे तें निज गोद तै उतार ना।
(2)
यकमि वितु ड दर झुण्डन के झुण्डु रिपु
मुण्डन की मानिका दई ज्यो त्रिपुरारी को।
कहै पदमाकर करोरन को काप दय
पोडम हू दीह महादान अधिकारी को।
ग्राम दये धाम दये अमित अराम दये
अन्न जल दीहे जगती र जीवधारी का।
दाता जयसिंह दोय बात तो न दीन्ही क्हू
बरिन का पीठ और डोठि परनारी को॥
गगा-स्तयन
विधि के कमडल की मिद्धि है प्रसिद्ध यही
हरि पदपकज प्रताप की लहर है।
62
कई 'पदमावर' गिरीस सीग मडन के,
मुडन पी माली ततवाल अपहर है।
भूपति भगीरप के रथ की सुपुण्य पथ,
जह जप जाग फन फैल की पहर है ।
छेम को छहर गगा रावरी लहर
पलियाल को कहर जमजान को जहर है ।।
(2)
कंधा तिहू लोक की सिंगार की विसाल माल
कधों जगी जग मे जमाति तीरयन की।
कहै 'पदमाकर विराजे सुर सिघु धार
वों दूध धार कामधेनुन के थन की।
भूपति भगीरथ के जम की जलूस केघौ
प्रगटी तपस्या कंघा पूरी जन्हु जनकी ।
कंधो कछू राख राका पति सा इनाका भारी,
भूमि की सलाना क पताका पुयगन की।
(3)
जम को न जोर जब पापिन प चल्यो तव
हाथ जोरि गगा जू सो चुगली करे खरे ।
बडेन प ढरी प ना ढरो देखि तुच्छन प
कहै पदमावर सुनावत हरे हरे।
बडेन 4 ढरे बडी पाइय बडाई देखो
इस प ढगे तो नुम्हे ईस सीस प ढरें।
तुच्छन को देती जैसो नारायन स्प तसौ
तुच्छ तुम्है तुच्छ करि पापन तरे घर ॥
{4 )
करम को मूल तन तन मूल जीव जग
जीवन को मूल अति मानद ही घरियो।
कहै 'पदमावर ज्यो आनद को मूल,राज।
राजमूल केवल प्रजा का भौन परिवा।
प्रजामूल अन मब
अनन को मूल मेध,
मेधन को मूल एक जज नुसरिया ।
जज्ञन को मूल धन धन मूल धम अरु
धम मूल गगा जल विदु पान करिबो॥
(5)
आस करि आयो हुता मैया पास रावरे मैं,
गाढ हू के पास दुख दूरि बुटि बुटिंग ।
कहै पदमाकर पुरोग से सघाती तेऊ
गल मे चलत धृमि धूमि धुटि धुटिगे ।
दगादार दोष दीह दारिद बिलाइ गये
फिदिर पे फद बिन छार छुटि छुटिगे ।
जो लो आउँ-आउँतरे तीर पर गगा तो लौं,
बीच ही में मेरे पाप पुज लुटि लुटिगे ।।
(6)
जमपुर द्वारे लगे तिनम देवारे कोऊ,
हैं न रखवारे ऐस वन के उजारे हैं।
कहै पदमाकर तिहारे प्रन धारे तेउ,
करि अघ भारे सुरलोक मे सिधारे हैं ।
सुजन सुखारे करे पुण्य उजियारे अति
पतित ६ तारे भव सिधु ते उतारे हैं ।
काहू ने तारे तिहे गगा तुम तारे, और
जेते
तुम
तारे तेते नभ मे न नारे हैं ।।
wata
64
सुखद सुहाई मन भाई मुनि देवन के
निखिल निकाई रूह वेदन मे गाई है ।
कहैं पदमाकर' वहां लो साघुनाई कही
सब ही 4 एक्सी दया-सी वगराई है
पुयताई भारत उधारत जघमताई
नीक ठकुराई की ठसक ठहराई है ।
जहा जहा जम की जमाति की ही परामाति
वहा तहा फिर देखि गगा की दुहाई है ॥
(गगालहरी से)
सूर्यमल्ल मिश्रण
वीर के प्रतीक
1 सिंह
१
निधाहक, सूतो केहरी, तो भी विमुहा पाव ।
गज-गडा धीर न घर, बच पड़ वध-वाव ।।
२
पग पाछा, छाती धडक, कालो-पीलो दीह ।
नेण मिच साम्हो सुरणे कवण हकाल सीह ?
३
हे ली ? घर घर को हुव, पूचा छक पंगाम ?
हाथी हाथल पाहण, नाहर जिण रो नाम ||
४
खोयो मैं पर मे अवट, कायर जवुक काम ।
सीहा केहा देसडा, जेय रहै सो धाम ।।
जिण बन भूल न जावता, गैद गवय गिडराज ।
तिण वन जबुक ताखडा, ऊधम मड आज ॥
w ur
डोह गिड वन वाडिया, द्रह ऊहा गज दीह ।
सोहण नेह सकक तो, सहल भुलागो सोह ।।
66 2. वराह- तुडो गज, फेटा तुरी, डादा भई प्रोफाइ । हेकण कवल दिया, फौजा पाथर पाड ।। ८ पूरा प्राकुल पाठडा, माला पडता भार । हैकरण स्वता बाहिरा, झाडा झाडा हार ॥ सुहडा और सिकारसो, मन में या न समाय । भाला अगि भाजमी, डाडा प्रलय दिपाय ।। 3नाग- बीबी भीतर पोढियो, कालो दबक काय ? पूगी पर साधरो प्राव भोग उठाप" 4 पवल (बल) धवल पयप रे धणी ! को दुमग्गो पण भार ओडे घर रो प्रावगो, पेरु पहाहा पार ॥ वीर के लक्षण १२ चल खोध जण जरा है, केस बधि करवाल । परसभ डा अर कायरा, बाहियां रवाल कर हुवा जी जिके, सदा न हेर साथ । सोहा र गत सारल, मड धान हाय ।। रण पासे दु-मनो रहै, साजन नरण समाय । पा मार पाया दियण, सो वानत नहाप ।।
67
बिण माय वाद दला, पोद करज उतार ।
तिला मूरा रो नाम ले, मह वाघे तरवार ।।
सीह न बाजो ठाउरा ! दोन गुमारो दोह ।
हापल पाई हापिया, मो भद वाम सीह ।।
सूता नाहर-मारवा, साल न छोड सूर ।
पत । विणा पाच-सा, दो ही विलसा दूर ॥
घोर और मातृभूमि
१८
मूता घर-घर बारा वैम् ।
सग धारा सपा-
नगदमा,
१६
पारी रीगोयाणा, नेप पर पर नीं।
रसा कयारी रायता ! बरती को ही दी।
०० २४ वोर माता हूँ बलिहारी राणियो, भ्रूण सिसावण भाव । नालो बाढण री धुरी, भपट जणियो साव । २५ हूँ बलिहारी राशियां, साचा गरम सिम्बाय । जाचा हदै तापणं, हरख धी द्विग साय ॥ २६ हूँ बलिहारी राणिया, जाया वस छतीस । सर सलूणो घूण न, मोल समर ५ सीस ।। २७ है बलिहारी राणिया, थान बजारण दीह । वीद जमी राजे जण, सारल टोढा सीह ॥ २८ इला न देणी आप री, रण-खेता भिड जाय । हालरिया हुलराय, मरण-वडाई माय॥ २६ बाला । चालम वीमरे, मो थरण जहर समाण । रीत मरता हील की, कठ, थियो घमसाण ॥ वीर सास ? 7 माज परे वहू बलेवा ३० सासू कहे, हरस अचानक काय हूलस, पूत मरेवा जाय । सुण मरियो सुत हेकलो, सासू प्रभण धार । मो जारिणयो कायर पयो, बेटी ! बलण निवार ।। सुत धारा रज रज थियो बहू बलेवा जाय । लखिया डू गर लाज रा सासू उर न समाय ।।
69
घोर पत्नी
मह पडोस कायर नरा, हेली । घास सुहाय ।
बलिहारी जिण देमा, माथा मोल विकाय॥
पण नू मालगसी धगी । सुणिया वागो मार ।
हालोज उग देसड, प्राणा-रा व्यापार ।।
३५
मायर-नारा मौक-दुख, रोक वालम गेह ।
धारा मजको मो धणी, मला लगाह देह ।।
। सखोज दोय ल, नयी फिरती पाह ।
मुडियो मिलसी गीदवो, मिल न घरी बाह ।।
पूजाणो गज मोतिया, मोहागो पर मूझ ।
बीजाणो पण पामरा है मूडो पम झ ।
सन दुरग, मर जीव तन को भरा हर।
पीर विट्ठो दे दो. नाम रहीजे ने ।।
३६
बसप परे रिम वण जोर सगर जीर।
निको पापर वतो, पोहर भेजो पीय ।
माम! मात्र में मारपण, ६ मुली जग।
पारी
मागे ने धो, ar
पर
पिपरिपारितोरिया पार पाम ।
पर-पम पूरी पास हो तो राम ॥
70
वीर बालक
४२
रण सेती रजपूत री, वर न भूल बाल ।
यारह वरसां बाप-रो, लहै वर लकाल ।
४३
और मुवा सुरण मोहडे, बरसा पाच विद्याल ।
घर-मे मायड पातियो, बटर पूचा बाल ।।
कुल पारो रण-पोटण, मोनू कहती माय ।
प्राणा गाह्न पेखिया, पजियो वरज काय
7
।
४५
मन सोचे जाणे मतो मोनू बालक माय ।
घर पराया वाइड, जठ ने घर-रा जाय
४६
बाप गयो ले माहेरो काको जात कडू व ।
तोय मचायी छोकर, वरी र घर बू ब ।।
४७
भोला जाणे मूलिया, वरसा प्राठा बाल ।
प्रेष घराणं सिरणी, कवर जणं सो काल ।।
वीर पति
४८
माक-पलासा झू पडो, देव कोष म हत ।
हि न तो भी उतर कोस लुमाव कत !
४६
टोट सरका मोतडा, घाते ऊपर घास ।
वारीज मड-पडा, अधिपतिया पावास ॥
इसह टोट हूँ सषी । वारी पार पनत ।
पोत जणी मे मातियां चूढो मेंगल दत ।।
71
विण दार्मा विपस मदा, दामा दुरलभ नाग ।
याय महा पर नारिया, चूहोपात सुहाग ।।
7
पहल मिले घण पूछियो रिण कोघा किरण हत्य
वीजड साहे बारिया, इया
हाकण भ
अस्प।
पेटी मोर छिपाविया, जा ण घाव न नीव ।
हेलो । दिवसा पाहुणो, पडव दीठो पोय ।।
गोरण दिन सूती सखी , वागा टोल विरणास ।
वोह उसोसो सोचियो, जागी पटव निसास ॥
काय कमाली ! एन दियो, सज गुमावण रग ।
फूल दुगार छापिया घोत चौगुण जग ॥
मद लेता भामं मती, भौनी। पाक मौत।
परियो साया घागसी, साती हाल सात ।।
-
किणनि देग वारहो पात परवे तूझ
पाव परत पाय गो वीना जावरा मुझ
५८
हेलो। पीवर देगिया, कप रान मुहाग ।
पर मामा परा आलिया इस दुहाग ।।
for: देश सो, निम धागा पसाप ।
रोमोगरा,हेमी!मपर धार !!
12
६०
पहर चवत्य पौढियो, गिणतो फौज गरोय ।
मेर घडी भय जोभन, बरा मारण नकोय ।।
भाभी ! देवर नीद-वस, योलीन न उताल ।
घगतो पावा वैषसी, ज सुरणसी बवाल ॥
૬૨
धोरपिया सूतो धणी, फुरल चकवी ! काय ।
देखीज मुख दीह र, सुप दो जाम सवाय ।।
वरी-वाड वासडी, सदा खरगक खाग।
हेली क दिन पाहुणो ऊढा भाग सुहाग ।।
६४
मतवालो जोवन सदा तुझ जवाई माय ।।
पडिया यण पहली पड़े बूढी घरप न सुहाय ॥
घर-घर घर विसाविया दिन दिन लू बै धाड ।
हेलो ! मो घव टेक्लो, जड न घाम किंवाड ॥
युद्ध भूमि को प्रस्थान
६६
झडा मोछाड गमण, वसुधा पाड वाह ।
तो भी तोरण-वीद तिम, धीरोपीरो नाह।
६७
वाज कुमत विसासतो, धीम वेग घपाय ।
भाभी ! तोरण वीद जिम, जोवी, देवर जाय ।।
देवर भाभी ! देखरगो, ढाहण गज-नीसाग ।
सोकरडा रा सिधु म, पूगो पवन प्रमाण ।
73 ६६ क दौठो हय भावतो, के दौठो पर-फौज । हसी! कवरण सिखावियो, उहणो उडपो मोज॥ 7 युद्ध का प्रारम्भ सपैसे वाल्हा सगा, मिल गल-बध्या मार । पहली वाहण पाहुणा, मडीज मनुहार ।। नोपा पर दरजा पडे, मड गिरा मिर झाट । जाण सागर सीर---रे, मदर रो मरहाट । 1शेषनाग ७२ नाग! द्रमा की पड? नागण घर मचाय । इण रा मागणहार जे, माज भिडाणा माय ।। 2 ककणी ७३ पाय उतानी परणी । जे मद पौवण जेज ! पत समणं हेमतो कटका ढाहि क्लज ॥ 3योगिनी जोगण ! पहली पाय पल, पर उतावल काय? । भर मप्पर वाहै हघिर, देमी मत पपाय !! ७५ । सामी ! पीत राह मे, कोरापरतो हप्प ? हे साप पपाहतो, माये दा गा मप्य ।। 4 महारेष मागता, तो सीज गिर दोर। भरतपय रोपणा, परमा बर वहो ।।
72
६०
पहर पयरप पौनिया, पिणतो पोज गरीव ।
प्रेर परीवा जीभ-न. परा माण नरो ।।
भाभी । देवर नीद-यम, योतीन ने उतास ।
घगत पायो चासो, ज सुरणपो बयाल ।
६२
घोरपियो मूतो धणो, कुरस पकवी ! काय'
देसी मुस दोह र, सुम दो जाम सवाय ।।
६३
वरी-वाह वासडी, सदा पराव खाग।
हेली क दिन पाहुणो, ऊहा माग सुहाग। ।।
मतवालो जोवन सदा तूझ जवाई माम ।
पाया पण पहली पहै, बूढी पण न सुहाय ।
६५
घर घर वर विसाविया, दिन दिन लू बै धाड ।
हेली ! मो पर टेग्लो, जड न घाम निवाड ।।
युद्ध भूमि को प्रस्थान
झडा मोछाड गयण, वसुधा
पाड
वाह।
तो भी तोरण-वीद तिम, धीरो धोरो नाह।।
६७
वाज कुमत विसासतो, धीम वेग धपाय ।
मामी ! तोरण वीद जिम, जोवो, देवर जाय"
देवर भाभी । देखणा, दाहण गज नौसाए ।
सोकरडा रा सि धु मे, भूगो पवन प्रमाण ॥
73
के दौठा हय प्रावता, 2 दीठा पर फोज ।
हेलो ! कवण सिखावियो, उहणो उडणो भाज' ॥
युद्ध का प्रारम्भ
सखे पाल्हा सगा, मिल गल-पप्पा मार ।
पहली वाहण पाहुणा, मढीज मनुहार ।।
तोपा पर दरजा पडे, मई गिरा मिर झाट ।
जाणं सागर पीर-रे, मदर से परहाट ।।
1 शेषनाग
७२
नाग ! द्रमका को पड़े ? नागण ! घर मचकाप ।
इस रा मागणहार जे, माज मिसपा प्राय ।।
2 ककणी
७३
काय उताली करणी। जे मद पीवण जेज)
मत समप्पं हेक्सो फटका ताहि फलेज ॥
योगिनी
७४
जोगरण' पहली साप पस, बरं नायम साय।।
मर गप्पर याद रपिर, दमो पार॥
७५
पामो ! पोत गह से, यो एप्पर तोहाय ।।
हैसाप पपाहतो, माय दस गर मध्य ।।
4 महादेय
ईम' पार भागता, तो मारमा और।
पाल परा रो पता, परमी बरबहोर ॥
74
युद्ध वर्णन
देख सखी! होली रम, फौजा में घव अंक !
साजर मदर सारखो डोहै अनह प्रनेक ॥
७८
देख सहेली! मो घणी, अजको वाग उठाय।
मद-रयाला जिम मेकतो, फौजा पीवत जाय ।
७६
पग पग थटिया पाहुणा, खागा सहणी खांत ।
पीव पल्स पात-मे, दुमात
मूल केन
६०
सेजा मे घर घर सखी । आरण घजर प्रजाण ।
धारा मे राख धजर, सो कुरण कत समाण ॥
मूझ मच भो हे सखी कत बखाण कोस ।
विण माथ वाढ दला, प्रांख हिये क सीस।
॥
५२
१
की हेलो । अचरज कहूँ कत घणी र काज
मच अधूरे मावतो, प्राख न माव प्राज ॥
करडरो कुच नू माखता पहवा हदी सोल ।
पव फूला जिम आगम, सेला री धमरोस ।
वीर द्वारा शत्रुओ का विनाश
होव पर घर हाय रे ! रोवं वर-वर नार।
भाभी देवर-नू कहो, अब तो रोस उतार |
.
भाभी । हेवण वर मे, बोलविया दस-बीस । ---
भव तो देवर मोहदो, सच मार न सोस ।
माटो सासू ? माप रो सो सेरो फुल मार ।
जायो घरजो, जगत रा, माटा लिपप उघार ।।
८७
ईसो, पर-पर कतर, चूडा भूराण चौर ।
दया न मान दोयगो, वाई ! था रो वीर ।।
शयुमो को पराजय
८९
पेस सहेली । पार रा, भरा पिणन रहाय ।
कण मारण उतारिया, जाग सिमडी जाय ।।
८६
दीपा दिस दिस म चिया, कठे मत भजाय ।
भकरण रा मारिया, जाणं वदर जाय ।
विनयी पति का आगमन
होल दरज मय भेज पर घर मानर मुधाम ।
पावा स धारिया पोया हत प्रणाम ।।
• ('योर मतमा से)
x
X
x
76
शमशेर बहादुर सिंह
उपा
प्रात नभ था वहुत नीला शख जसे
भोर का नभ
राख से लीपा हुमा चौका
[अभी गीना पडा है]
बहुत काली सिल जरा से लाल पेसर से
कि जसे धुल गयी हो
स्लेट परया लाल खडिया चाक
मल दी हो किसी ने
नील जल मे या किसी को
गौर झिलमिल देह
जसे हिल रही हो
मोर
जादू टूटता है इस उपा का भब
सूर्योदय हो रहा है।
सींग और नाखून
सीग और नाखून
लाह के वक्तर क्यों पर।
सोने मे सूराख हटी शो
मांसों मे पास-काई नमी।
एक मुर्दा हाथ
पाव पर टिका
उलटी कलम यामे।
तीन तसलो मे कमर का घाव सड़ चुका है।
जडो का भी कहा जाल
हो चुका पत्थर
भुवनेश्वर
न जाने कहां फिस मोय मे माज, जाने पिस
सदायत का हिमाव बैठे तुम लिख रहे होगे (अपनी
भवो मे')-जहाँ पता नही प्राप्त भी होगा
तुम्हें पोरी चाय या एक हरी पुडिया का बत
भी ?....हिसाव, मसलन साठी स्तिन
की-क्तिने पो देसी ?-और, रम ।
रितनी प्रपिर-म-अधिन, स्तिनी कम से-
पम पितनी असती, पितनी
(सान रोटी पर ही जिदा नही इस
सम्पाईगो पोर पिसने अपनी पहई मुम्मुरास्ट
मरी भूमरे मदर महमूस रिया होगा
एप तपते परपर की तरह, भुवनेश्वर
जितना कि तुमने )
78
गजल
(1)
जी को लगती है तेरी बात खरी है शायद
वही शमशेर मुजफ्फरनगरी है शायद
प्राज फिर काल से लौटा हूँ बडी रात गये
ताक पर ही मेरे हिस्से की धरी है शायद
मेरी बातें भी तुझे खाबे-जवानी सी है
तेरी आंखो मे अभी नीद भरी है शायद
x
x
एक कलम है और सो मजमून ह,
एक कतरा खूने दिल तूफान है ।
79
(2)
वही उम्न का एक पल कोई लाएं
तडपती हुई सी गजल कोई लाए
हकीकत को लाए तवं युल से बाहर
मेरी मुश्किलो का जा हल काई लाए
कही सद खू मे तडपती है बिजली
जमाने का रद्दोबदल कोई लाए
उसी कम निगाही को फिर सौंपता हूँ
मेरी जान का क्या बदल कोई लाए
दुबारा हमे होश पाए न पाए
इशारो का मौका महल कोई लाए
नजर तेरी दस्तूरे फिरदौस लायी
मेरी जिंदगी मे अमल कोई लाए
80
(3)
मूए वाम
जहा मे अब तो जितने रोज
अपना जीना होना
तुम्हारी चोटें होनी हैं
हमारा सीना होना है ।
वो जल्वे लोटते फिरते हैं
खाको खून इस
में
तुम्हारा तूर पर जाना
मगर माबीना होना है ! *
कदमरजा है
एक शोखी कयामत की
मेरे खूने हिना परवर से
रगो जीना होना है ।
वो कल मायेंगे वादे पर
मगर कल देखिए कब हो!
गलत फिर हजरते दिन,
मापका तरू मोना होना है।
यग ऐ शमशेर, पल पर,
अब कही उनसतगजी हो जा-
हिर गोशे को महपिस में
गदाए मीना होना है।
.
*यह मिसरा मेसर रे मामा व यापूस'
81
(4)
ईमान गडबडी मे है दिल के हिसाब मे ।
लिक्खा हुआ कुछ और मिला है किताब मे।
दिल जिनमे टूढता था कभी अपनी दास्ता
वो सुखियाँ कहाँ है मुहब्बत के बाब मे !
ए दिलनेवाज | पहलू ही जब दिल के भौर हो,
क्या खिलवतो मे लुत्फ, धरा क्या हिजाब मे !
उस मास्तां तक हमको बहारो मे ले के जाओ,
जिस पर कोई शहीद हुमा हो शवाव मे ।
82
प्रमन का राग
सच्चाइयाँ
जो गगा के गोमुख से मोती की तरह बिखरती रहती हैं
हिमालय की बीमो चोटी पर चांदी के उ मुक्त नाचते
परो मे झिलमिलाती रहती है
जो एक हजार रगो के मातियो का खिलखिलाता समदर है
उमगो से भरी फूलो की जवान कश्तियाँ
कि बसत के नये प्रभाव सागर मे छोड दी गयी है ।
ये
पूरब पश्चिम मेरी आत्मा के ताने बाने हैं
मैन एशिया की सतरगी किरनो को अपनी दिशाप्रो के
गिद
लपट लिया
और मै यूरोप और अमरीका को नम आंच की धूप छांव
पर
बहुत हौले हौले नाच रहा हूँ
सब सस्कृतियां मेरे सरगम मे विभोर हैं
क्योकि में हृदय की सच्ची सुख शाति का राग हूँ
बहुत मादिम, बहुत मभिनव ।
('कुछ मौर कविताएं से)
83 बात बोलेगी बात बोलेगी, हम नहीं। भेद खोलेगी बात हो। सत्य का मुख झठ की प्रांखें क्या देखें । सत्य का रुख समय का रुख है अभय जनता को सत्य ही सुख है, सत्य ही सुख ।। दैत्य दानव, भीपण, क्रूर स्थिति, कगाल बुद्धि, घर मजूर । . 7 सत्य का क्या रग है पूयो एक सग । एक-जनता का दुख एक। हवा में उडती पताकाएं भनेक । दैत्य दानव । क्रूर स्थिति । गाल बुद्धि मजूर घर भर । एक जमतामा-अमर वर एकता का स्वर। -मयया स्वतत्र्य-इति ।
84
प्रेम की पाती
(घर के यसाता के नाम)
1
कौन के पीतम, कौन की पाती !
पास लगाये दीया न बाती!
मो मेरे साई मोर मेरे ईश्वर
तेरा ही नाम मब प्रानो की पाती।
होली का भय, दीवाली का मातर
ईद मुहरम, एक ही भांति !
पव के दिन और ऐसे भयानक
छलनी छलनी रे देश को छाती।
प्रेम के सगी, घम के साथी
केघ गये सब सम-सगाती ।
काले बाजार मे घम की दुल्हन
से ये दूल्हा ! कसे बराती ।
हिदू कि मुस्लिम सिख कि इसाई
भारतवासी कौन एक जाति ।
2
कौन पठायी किने रे बांची
प्रेम को पाती सांची रे सांची।
में तो न जानू' उ कि हिदी
प्रेम की वानी सांची रे सांची।
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86
तीन शेर
लिखा है मुकद्दर मे दर-दर की दुआ मांगो।
सय्यर मह प्रो मह र ओ ग्रस्तर की दुआ मांगो।
मे रूठा है
इसान के पर्दे
खुदा हमसे
इस घर की दुमा मांगो, उस घर को दुप्रा मांगो।
फिर सुख निशा बनकर कांधे पे उठे तनकर
जो सर है हथेली पर उस सर की दुआ मांगो।
('उदिता' से)
87
प्रो मेरे घर
मो मेरे घर
यो है मेरी पृथ्वी
सौस के एवज तूने क्या दिया मुझे
--मो मेरी मां?
तूने युद्ध हो मुझे दिया
प्रेम हो मुझे दिया क्रूरतम कटुतम
पौर क्या दिया
मुझे भगवान दिये कई-कई
मुझसे भी निरीह मुझसे भी निरीह ।
और अद्भुत शक्तिशाली मकानीकी प्रतिमाएँ ।
ऐसी मुझे जिदगी दी
मोह
प्राखे दी जो गीली मिटटी का बुदबुद सी हैं
मोर तारे दिये मुझे अनगिनती
सांसो की तरह
अनगिनती इकाइयो मे
मुझसे लगातार दूर जाते
मौत की व्यथ प्रतीक्षामो से।
मोर दी मुझे एक लम्बे नाटक की
हसी
दशकशाला के इस छोर से उस छोर तक
लहराती कटु क्रूर
88
फिर मुझे जागना दिया, यह कहार कि
लो और सोप्रो।
पौर वही तलवारें मधेरे की
प्रतिम लोरिया के बजाय !
11
इसान के खोटे में डालकर
सब-कुछ तो दे दिया,
जब मुझे मरे कवि का बीज दिया कटु तिक्त ।
---
फिर एक ही जम मे और क्या क्या
चाहिए।
-
('इतने पास अपने स
-
89
अकाल
भूख
भनाज
मुनाफाखोर का
अनाजखोर का
बिलकुल छिपा सा, निजन मे,
अंधरा बाजार
जिसके चारो मोर गवरमेट
ककरीले पे लिये दान समितियों
मौर भूखी लाशो से दूर,
सूने-सूने से खिचडी-रसोइयो वाले,
हम तुम, वे, सब
इस मौनताडव के चारो मोर
असहाय से चक्कर लगा रहे हैं,
समझ नहीं पा रहे हैं
कुछ सोष तक नहीं पा रहे हैं,
केवल कुछ कर पा रहे हैं ऐसे
कि मानो कुछ कर पा नहीं रहे हैं
।
मृत्यु का यह नया रूप है स्पष्ट
हमारे जीवन के बीच
लय ध्वनि स्वर-सक्त और सज्ञा से हीन
बभूतपूर्व ।
90 दुश्मन के सोने में विजया निश्चित भी तोर हम, पुलो-सुली सोसली माला के द्वार पर प्रहरी, धोबी की रस्सियों पर लटकी सूखती पोलियो के-से स्तनो की साज रखने वाले हम तेल की दुकान पर बंधी लटकी मिल्ली की धुप्पियो के से रुड मुह छोटे छोट प्रसस्य बाल-समूहो के पापक हम, उनत मस्तक भारतवासी अपने ही दोघ निर्घोपों से मानो मारवाह का मरुवातावरण कपित कर देंगे हम, माय मरना सीख रहे हैं इस मूक शात युद्ध मे, अपनी शत्रु भयविहीन सडको और गलियो मे जहा कुत्ता का जीवन भी दोघनर लगता है, स्पृहणीय, केवल अपना ही दयनीय । . क्यो जमा था मनुष्य बीसवी सदी के मध्यान्ह मे 1 यो मरने के लिए? झुनसा सा पतझड का पत्र चिथटो का बादन सा धूमिल सध्यानों मे, हवा का निरीह कप केवल । वीर बलिदान की सदी है यह। हमी उठेंगे क्या? वोर बलिदान की सदी है यह
91
२
नानाविध पूरण शक्तिशाली
समृद्ध
स्वरण इतिहासो के स्रष्टा
हमीं बनेंगे क्या
अखिल उत्पादन के अमर अधिकारी
विश्व राष्ट्रो के सा साभिमान
हमी बढेंगे क्या
7
('चुका भी हूँ नही मे' से)
दुष्यन्त कुमार
पुगने पड गए डर, फेंक दो तुम भी,
ये कचरा प्राज बाहर फेंक दो तुम भी।
लपट भाने लगी है, अब हवालो में,
पोसारे और छप्पर फेंक दो तुम भी।
तुम्ह भी
यहाँ मासूम सपने जी नही पाते
इहें कुकुम लगाकर फेंक दो तुम भी।
इस बहाने याद कर लेंगे,
इधर दो चार पत्थर फेंक दो तुम भी।
ये
बोल सकती है भगर चाहो,
अगर कुछ शब्द कुछ स्वर फेंक दो तुम
भी।
किसी सवेदना के काम आएंगे,
मही टूटे हुए पर फेंफ दो तुम भी।
93
ये धुए का एक घेरा कि मैं जिसमें रह रहा हूँ,
मुझे किस कदर नया है, मैं जो दद सह रहा हूँ।
ये जमीन तप रही पी, ये मकान तप रहे थे,
तेजा इतजार था जो मै इसी जगह रहा हूँ ।
म ठिठक गया था लेकिन
तेरे साथ-साथ या मैं,
तू अगर नदी हुई तो मैं तेरी सतह रहा हूं।
तेरे सर पे घूप आई ता दररूत बन गया मै,
तेरी जिगदी मे प्रक्सर में कोई वजह रहा हूं
,
कभी दिल में मारज -सा कभी मुह में बदुप्रा सा,
मुझे जिस तरह भी चाहा, मै उसी तरह रहा हूँ।
मेरे दिल पे हाय रक्खो, मेरी बेबसी को समझो
मै इघर से बन रहा हूँ मैं उघर से ढह रहा हूँ।
पहाँ कौन देखता है, यहाँ कौम सोचता है,
कि ये बात ३ या हुई हैजो मैं शेर कह रहा हूं।
94
माज सडका पर मिसे है सको नारे न देख,
घर पधरा देख तू, आकाश के तारे न देख ।
एक दरिया है यहाँ पर दूर तक फैमा हुमा,
आज अपने बाज मा को दस, पतवार न देस ।
अप यकीनन ठोस है धरती हकीकत की तरह
यह हकीरत ख, लकिन साफ क मारे न देख ।
वे सहारे भी नहीं प्रब, जग लडनी है तुझे,
क्ट चुके जो हाथ, उन हापा मे तलवारें न देख ।
दिल को बहला ले, इजाजत है, मगर इतना न उड,
रोज सपने देख, लेकिन इस कदर प्यारे न देख ।
त घुघलका है नजर वा, तू महज मायूस है
रोजनो को देख दीवारा मे दीवारें न देख ।
राख, क्तिनी राख है, चारो तरफ बिसरी हुई,
राख में चिनगारियां ही देख, अगारे न देख ।
95
कही पे धूप की चादर बिछा के बैठ गए,
कहीं पे शाम सिरहाने लगाके बैठ गए ।
जल जो रेत मे तलुवे तो हमने
देखा,
बहुत से लोग वही छटपटा के बठ गए।
खडे
हुए थे अलावो की माच लेने को,
सब अपनी अपनी हथेली जलाके बैठ गए।
दुकानदार तो मेले मे लुट गए यारो ।
तमाशबीन दुकानें लगाके बंठ गए ।
महू-लुहान नजारो का जिक्र आया तो,
शरीफ लोग उठे दूर जाक बैठ गए।
य सोचकर दररू तों म छांव होती है,
यहाँ बबूल के साए मे प्राके बठ गए।
96
भूत है तो सब कर, रोटी नही तो क्या हुमा,
माजकल दिल्ली में है जरे बहस ये मुद्दमा ।
मौत ने तो धर दबोचा एक चीते की तरह,
जिदगी ने जब छुमा तब फासला रखकर छुपा।
गिडगिडाने का यहा कोई असर होता नहीं,
पेट भरकर गालियां दो, माह भरकर बददुआ ।
क्या वजह है प्यास ज्यादा तेज लगती है यहाँ,
सोग कहत हैं कि पहले इस जगह पर था कुर्मा।
आप दस्ताने पहनपर स रहे हैं पाग को,
मापके भी सून का रग हो गया है सांवला ।
इस अंगीठी तर गली से कुछ हवा माने तो दो,
तब तलक खिलते नहीं, ये कोपलें देंगे धुमा ।
दोस्त, अपने मुख को विस्मत पे रजोदा न हो,
सना हापो में है पिजरा, उनके पिजरे मे गुमा।
इस महर में वो कोई बारात हो या वारदात,
पश्मिी भी बात पर शुमती नहीं हैं सिरपियो।
97
देव, दहलीज से काई नहीं जाने वाली,
ये खतरनाक सचाई नहीं जाने वाली ।
कितना अच्छा है कि सांसो की हवा लगती है,
माग अब उनसे बुझाई नही जाने वाली ।
एक तासाब सी भर जाती है हर बारिश मे,
मैं समझता हूँ ये खाई नहीं जाने वाली ।
चीख निकली तो है होठो से, मगर मद्धम है,
मद कमरो को सुनाई नहीं जाने बानी ।
तू परेशान बहुत है, तू परेशान न हो,
इन खदानों की खदाई नहीं जाने वाली ।
माज सडको पे चले पामो तो दिल बहलेगा,
पद गजलों से तन्हाई नहीं जाने वाली ।
96
भूल है तो सब कर, रोटी नही तो क्या हुमा,
प्राजक्ल दिल्ली में है, जेरे बहस ये मुद्दमा ।
मौत ने तो घर दबोचा एक चीते की तरह,
जिंदगी ने जब छुमा तब फासला रखकर छुप्रा ।
गिडगिडाने का यहा कोई असर होता नहीं,
पट भरकर गालियां दो, माह भरकर बददुमा ।
क्या वजह है प्यास ज्यादा तेज लगती है यहाँ,
लोग कहते हैं कि पहले इस जगह पर या कुओ।
आप दस्ताने पहनकर छू रहे हैं भाग को,
प्रापके भी खून का रग हो गया है सांवला ।
इस अंगीठी तक गली से कुछ हवा प्राने तो दो,
तब तलक खिलते नहीं, ये कोयलें देंगे धुमा ।
।
दोस्त, अपने मुल्क की किस्मत पे रजीदा न हो,
उनके हाथा में है पिंजरा, उनके पिंजरे मे
सुमा
इस शहर मै वो कोई बारात हो या वारदात,
अब किसी भी बात पर खुलती नहीं हैं खिडकियाँ ।
97
देख, दहलीज से काई नहीं जाने वाली,
ये खतरनाक सचाई नही जाने वाली ।
कितना अच्छा है कि साँसो की हवा लगती है,
माग अब उनसे बुभाई नहीं जाने वाली ।
एक तालाब सी भर जाती है हर बारिश मे,
मैं समझता हूँ ये खाई नही जाने वाली ।
चीख निकली तो है होठो से, मगर मदम है,
मद कमरो को सुनाई नही जाने वाली ।
तू परेशान बहुत है, तू परेशान न हो,
इन सदामो की ख दाई नहीं जाने वाली ।
माज सडको पे पते भाभो तो दिल बहलेगा,
पद गजलों से तन्हाई नहीं जाने वाली ।
98
ये सारा जिस्म झुककर बोझ से दुहरा हुमा होगा,
में सजदे में नही पा, आपको पोखा हुमा होगा।
यहाँ तक माते-पाते सूख जाती हैं नई नदियो,
मुझे मालूम है पानी कहां ठहरा हुमा होगा ।
गजब ये है कि अपनी मौत की आहट नहीं सुनते,
वो सबके सब परीशा हैं यहां पर क्या हुपा होगा ।
तुम्हारे शहर मे ये शोर सुन-सुनकर तो लगता है,
कि इसानो के जाल में कोई होका हुआ होगा ।
पई फा बिताकर मर गया जो उसके बारे में,
वो सब कहते हैं प्रव, ऐसा नहीं, ऐसा हुअा होगा ।
यहाँ तो सिफ गूगे मोर बहरे लोग बसते हैं,
खुदा जाने यहां पर किस तरह जलसा हुआ होगा।
पलो, अब यादगारो को अंधेरी कोठरी खोलें,
कम-प्रज-कम एक वो चेहरा तो पहचाना हुआ होगा।
99
रोज जब रात को बारह का गजर होता है,
पातनाओ के अंधेरे मे सफर होता है।
कोई रहने की जगह है मेरे सपनो के लिए,
वो घरौदा सही, मिट्टी का भी घर होता है ।
सिर से सीने में कमी, पेट से पांवो मे कभी,
एक जगह हो तो कहे दद इधर होता है।
ऐसा लगता है कि उडकर भी कहाँ पहुँचेंगे,
हाथ में जब कोई टूटा हुआ पर होता है ।
सर के वास्ते सडको पे निकल पाते थे,
अब तो माकाश से पथराव का दर होता है।
100
जिदगानी का कोई मकसद नहीं है,
एक भी कद आज आदमकद नहीं है।
राम जाने किस जगह होंगे कबूतर,
इस इमारत मे कोई गुम्बद नही है।
प्रापसे मिलकर हमे अक्सर लगा है,
हुस्न मे अब जज व ए अमजद नही है ।
पेड पौधे हैं बहुत
बौने तुम्हारे,
रास्तो में एक भी बरगद नहीं है।
अब भी
खुला है,
मंकदे का रास्ता
सिफ मामदरपत हो जायद नहीं है।
इस पमन को देखकर किसने कहा था,
एक पछी भी शायद यहीं नहीं है।
101
वो निगाहै सलीव हैं,
हम बहुत बदनसीब हैं।
मूद लें,
माइए माख
ये नजारे मजीव हैं।
जिंदगी एक खेत है,
मोर सांसें जरीब हैं।
सिलसिले खरम हो गए,
यार भव भी
रकीब हैं।
हम कही
घाट मौ'
के नही रहे,
घर करीब हैं।
मापने लो छुई नहीं
माप कसे मदीव हैं।
उफ नही की उजड गए,
सोग सचमुच गरीय हैं।
जिदगानी
एक भी व
राम जाने
इस इमारत
मापसे मिल
हुस्न मे मव
पेड पौधे हैं
रास्टो में एक
मैकदे का रास्ता
सिफ मामदरपत
इस चमन को देस
एक पछी भी।
103
प्राज बीरान अपना घर देखा
तो कई बार झाक कर देखा।
पांव टूटे हुए
नजर पाए,
एक ठहरा हुमा सफर देखा ।
होश मे मा गए कई सपने,
प्राज हमने वो खंडहर देखा ।
रास्ता काटकर गई बिल्ली,
प्यार से रास्ता अगर देखा ।
नालियो
गालियों में बड़ा
में हयात देखी है
मसर देखा।
उस परिदे को चोट बाई तो,
मापने एक-एक
पर देखा।
हम खडे थे कि ये अमी होगी,
चल पड़ी तो इधर उधर देखा।
102
तुमको निहारता हूँ सुबह से ऋतम्बरा,
अब शाम हो रही है मगर मन नहीं भरा।
खरगोश बन के दौड रहे हैं तमाम रूवाब,
फिरता है चादनी मे कोई सच इरा डरा।
पौधे झुलस गये हैं मगर एक बात है,
मेरी नजर मे अब भी चमन है हरा भरा।
लबी सुरग-सी है तेरी जिंदगी तो बोल,
मैं जिस जगह खडा हूं वहाँ है कोई सिरा।
माथे पे रखके हाथ बहुत सोचते हो तुम,
गगा कसम बतामो हमें क्या है माजरा ।
103
प्राज वीरान अपना घर देखा
तो कई बार झाक कर देखा ।
पांव टूटे हुए
नजर आए,
एक ठहरा हुमा सफर देखा।
होश मे मा गए कई सपने,
माज हमने वो खंडहर देखा ।
रास्ता काटकर गई
प्यार से रास्ता मगर देखा ।
बिल्ली,
नालियो में हयात देखी है
गालियों में बडा
मसर देखा।
उस परिदे को चोट आई तो,
मापने एक-एक
पर देखा।
हम खडे थे कि ये बमी होगी,
चल पड़ी तो इधर उधर देखा।
104
मरना लगा रहेगा पहा जी तो लीजिए,
एसा भी क्या परहेज जरा-सी तो लीजिए।
भव रिद दर रहे हैं जरा तेज रस हो,
महफिल से उठ लिये हैं नमाजी तो लीजिए।
पत्तो से चाहते हो बजे साज की तरह
पेडो से पाप पहले उदासी तो लीजिए।
खामोश रह के तुमने हमारे सवाल पर
कर दी है शहर भर में मनादी तो सीजिए।
ये रोशनी का दद ये सिहरन ये पार,
ये वीज जिंदगी में नहीं पी तो लीजिए।
फिरता है कैसे-कसे सयाल के साथ वो,
उस पादमी को जामावलाशी तो लीजिए।
105
हो गई है पीर पवत सी, पिघलनी चिाहए,
इस हिमालय से कोई गगा निकलनी चाहिए ।
भाज यह दीवार, परदो की तरह हिलने लगी
शत लेकिन पी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए।
हर सडक पर, हर गली मे, हर नगर, हर गांव मे,
हाय लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए।
सिफ हगामा खड़ा करना मेरा मकसद नही,
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए ।
मेरे सीने में नही तो तेरे सीने मे सही,
हो कही भी भाग, लेकिन आग जलनी चाहिए।
106
अपाहिज म्यथा को वहन कर रहा हूँ,
तुम्हारी कहन थी, कहन कर रहा हूँ।
ये दरवाजा खोलो तो खुलता नही है,
इसे तोडने का जतन कर रहा
अंधेरे में कुछ जिंदगी होम कर दो,
उजाले मे भब ये हवन कर रहा हूं।
वे सम्बध पर तक बहस मे टंगे हैं,
जिन्हें गत - दिन स्मरण कर रहा
तुम्हारी थकन ने मुझे तोड डाला
तुम्हे क्या पता क्या सहन कर रहा हूँ।
मैं अहसास तक भर गया हूं लबालब,
तेरे मांसुओ को नमन कर रहा हूँ।
समालोचको की दुपा है कि मैं फिर,
सही शाम से आचमन कर रहा हूँ।
107
इस नदी की धार मे ठही हवा पाती तो है।
नाव जजर ही सही, लहरों से टकराती तो है ।
एक चिनगारी कही से ढूढ लामो दोस्तो,
इस दिए मे तेल से मोगी हुई बाती तो है ।
एक खंडहर के हृदय • सी, एक जंगली फूल सी,
प्रादमी की पीर गूगी ही सही, गाती तो है।
एक चादर सांझ ने सारे नगर पर हाल दी,
यह अंधरे को सडक उस भोर तक जाती तो है।
निवचन मैदान में लेटी हुई है जो नदी,
पत्थरो से, प्रोट में, जा जाके बतियाती तो है ।
दुख नही कोई कि अब उपलब्धियो के नाम पर,
और कुछ हो या न हो, प्राकाश सी छाती तो है।
108
कसे मजर सामने प्राने लगे हैं,
गाते गाते लोग चिल्लाने लगे हैं।
भब तो इस तालाब का पानी बदल दो
ये केवल के फूल कुम्हलाने लगे हैं ।
वो सलीबों के करीब पाए तो हमको
कायदे
कानून
समझाने लगे हैं
एक कब्रिस्तान मे घर मिल रहा है,
जिसमे तहखानो से तहखाने लगे हैं ।
मछलियो मे खलबली है, अब सफीने,
उस तरफ जाने से कतराने लगे हैं।
मौलवी से शट साकर अहले मक्तब,
फिर उस पायत को दोहराने लगे हैं ।
पम नई तहजीब के पेशे • नजर हम,
पादमी को भूनकर खाने लगे हैं।
109
फिर धीरे धीरे यहा का मौसम बदलने लगा है
वातावरण सो रहा था अब आँख मलने लगा है।
पिछले सफर फी न पूछा, टूटा
हुमा एक रथ है,
जो एक गया था कही पर, फिर साथ चलने लगा है।
हमको पता भी नही था, वो प्राग ठडी पडी पो
जिस भाग पर आज पानी सहसा उबलन लगा है।
जो भादमी मर चुके थे, मौजूद हैं इस सभा मे,
हर एक सच कल्पना से आगे निकलने लगा है।
ये घोषणा हो चुकी है, मेला लगेगा यहा पर,
हर प्रारमी घर पहुंचकर, कपडे बदलने लगा है ।
बातें बहुत हो रही हैं, मेरे तुम्हारे विषय मे,
जो रास्ते में खडा था पवत पिघलने लगा है।
110
घटियो की गूज कानो तक पहुंचती है,
इक नदी जसे दहानो तक पहुंचती है ।
अब इसे क्या नाम दें ये बेल देखो तो,
कल उगी थी आज शानो तक पहुंचती है।
खिडरियां नाचीज गलियो स मुखातिब हैं,
भव लपट शायद मकाना तक पहुंचती है।
माशियाने को सजाओ तो समझ लेना,
बक कसे माशियानो तक पहुंचती है ।
तुम हमेशा बदहवासी में गुजरते हो,
बात अपनो से बिरानो तक पहुंचती है।
सिफ प्रांखें ही बची हैं च द चेहरो में,
बेजुर्गा मूरत जुबाना तक पहुंचती है।
अब मुअज्जन की सदाएं कोन सुनता है
चीख चिल्लाहट प्रजानो तक पहुंचती है।
एक कबूतर, चिटठी लेकर, पहली पहली बार उडा
मौसम एक गुलेल लिये या पट से नीचे पान गिरा।
बजर घरती झुलसे पौधे, बिखरे कांटे, वेज हवा
हमने घर बैठे-बैठे ही सारा मजर दस लिया ।
पटटानी पर खडा हुआ तो छाप रह गई पोवा की,
सोचा कितना बोझ उठाकर मैं इन राहो से गुजरा।
सहन को हो गया इकटठा इतना सारा दुख मन में,
कहने को हो गया कि देखो भव मैं तुमको मूल गया ।
धोरे धोरे भोग रही हैं सारी ईटें पानी मे,
इनको क्या मालूम कि मागे चलकर इनका क्या होगा।
('साये मे धूप से)
शब्दार्थ-टिप्पणी योगीन्दुदेव - 4 विभिण्णऊ-भिन्न । परमप्पु परम+अप्पु-परमात्मा । परिउ-पडित (ज्ञानी) प्रथ-जो देह से भिन्न परम समाघि मे ठहरे हुए परम पारमा को जानता है, वही जाग्रत (ज्ञानी) होता है। 2 कोहु-क्रोध | मउ-मद । माणु-मान । ठाणु-स्थान । झाणु-ध्यान । निरजनु-निरजन । अथ-जिसमे न कोष, न मोह, न मद, न माया, न मान, है तथा जिसका न कोई (विशेष) स्थान तथा ध्यान (स्वरूप) है, वही निरजन (निष्क्लक) पात्मा है । 3 वि-भी। वि-नहीं । छिवइ-खना है । रिणय में-अनिवायत । अथ-जो देह मे रहता हुआ भी अनिवायत देह को भी बिल्कुल ही नहीं सता तथा जो देह के द्वारा भी नही छुना जाता है, वह परमात्मा है । परिटठियह-स्थित फुडु-वास्तविक रूप मय-समता भाव में ठहरे हुए योगियो के (हृदय से) परमानद उत्पन्न करता हुमा जो कुछ प्रकट होता है, उसे ही परमात्मा समझो । अस्थि-है । घिसाउ-विपाद । प्रथ-जिसमे न पुण्य है, न पाप न हप, न विपाद तथा जिसमे एक भी दोष नहीं है वही अवस्था निर्दोष (सहम) है। म-मत । लक्षण-लक्षण । परु-पर, दूसरा । मणमि-रहता हूँ। मुणि-मनुष्य । भेउ-भेद । प्रय-है मनुष्य जीव (मात्मा) और मजीद (मनात्मा) को एक मत समझ । इनम लक्षगा भेद है। प्रभेदरूप मात्मा को जान और जो इससे मय है वह मय हो है (ऐसा) मैं कहता हूँ। पोक्विवि-देखकर । मा-मत । वमु-ब्रह्म। मय-हे जीव देह क जरा मरण को देखकर तू भयभीत मत हो। मात्मा परा और मृत्यु से रहित परम ब्रह्म है, ऐसा जान । 5 6 7 113 9 . 1 10 8 सम्मादिटठि-सम्यक दृष्टि । कम्मई-कर्मों से । लहु-शीघ्र । मुच्चाई हो जाता है। अथ-मात्मा से आत्मा को जानता हुआ व्यक्ति सम्यकदृष्टि (ज्ञानी) होर ऐसा व्यक्ति शीघ्र कर्मों से छुटकारा पा जाता है । विमिण्णउ वण्णु-विभिन्न वण । चितक-बुरा रग । भण्णु-समझो । तणु-दुबल । थूल-स्थूल । मथ - मैं गोरा हूँ. काला हूँ, चितकबरे रंग का हूँ। पतले शरीर वाला हूँ शरीर वाला हूँ', ऐसा सोचने वाले को मूढ समझो। लहेविणु-पाकर। गलेइ-नष्ट होता है। जिमु जिमु-जैसे जसे । जो योगी (साधक)। अथ-हे साधक, जैसे जैसे मोह नष्ट होता वसे-वैसे समय पाकर मनुष्य जागृति (पूणतान) का प्राप्त करता है । (इस तरह मनुष्य) अनि मात्मा को जान लेता है । 11 रिंगमल्लउ-निमल । सत्थ पुराण हूँ-शास्न पुराण । तव चरणु-तप (तपस्या)। कि-क्या। अथ-जिनके निज मन म निमल मात्मा अनिवायत नही बसता है उनन शास्न पुराण (का ज्ञान) तथा तपस्या मोक्ष प्रदान कर सकते हैं ? नहीं। गएँ-गग । हियवडए-हृदय । दप्परिण-दपण । मइलए-मलिन । प्रतिबिब । प्रथ - जसे मल पण मे प्रतिबिंब नही दिखाई देता है वम ही राग (मामा रगे हुए हृदय मे समत्वयुक्त प्रात्मा नहीं दिखाई देता है। यह सदेह है, इसे समझ। 15 देउले-देवालय (मदिर) सिलए-शिला (पत्थर)। लिप्पइ-मूर्ति । । चित्र । अखउ-अखण्ड । पारणमउ-ज्ञानमय । सिवु-शिव (मगलमय) । अथ-परमात्मा न मदिर मे है, न पत्थर मे, न (गढी हुई) मूर्ति मे, न चिः प्रखड निरजन ज्ञानमय तथा मगलमय आत्मा समत्व भावना से युक्त में बसा हुआ है। 14 जाणवि-जानकर । भणवि-समझकर । भावउउ-भाव । धरणु-पाच 12 114 18 19 15 जांवइ-जब तक । उपसमई-शात रहता है। सजदु-सयमी। सामह- कपाय (मनोविकार)। मथ-शानी तब तक शान्त चित्त रहता है जब तक वह सयमी (जितेन्द्रिय) बना रहता है । कपायो (मनोविकारो) के वश मे गया हुमा जीव असयमी हो जाता है। 16 णाण-ज्ञान । विहीणह-विहीन । बहुएं-बहुन । विरोलियई-विलोडन । पोत्पउउ-चिकना । प्रथ-हे जीव, ज्ञान विहीन व्यक्ति के लिए तू मोक्ष (परम शाति) की स्थिति को मत मान । बहुत मधे हुए पानी के द्वारा हाप पिकना नही होता है । 17 मुजतु-भोगता हुमा । पुणु-पुन (फिर) मचिठ-सचित । प्रथ-अपने कम फल को भागते हुए मी जो उसमे आसक्त नहीं होता उसे कम फिर नही बांधता और उसके मचित कम भी नष्ट हो जात हैं। राय भोस-राग प । परिटिठया-स्थित । परिहरिवि-त्याग कर । प्रय-रागप को छोड कर जो जीवो को समान दृष्टि से देखते हैं वे सम भाव मे स्थित हुए निर्वाण (परम शाति) प्राप्त करते हैं । मल्लाह-मले लोग । पासति-नष्ट हो जाते हैं । खलेहि-दुष्ट । वइसाराउ- वश्वानगर (अग्नि) । लोहह-लोहा । धणेहि-हथोडों से । प्रथ-दुष्टो के ससग से भले लोगो के गुण भी नष्ट हो जाते हैं । (ठीक हो है) लोहे के साथ मिली हुई अग्नि हपोडो से पीटो जाती है । पत्थि-वस्त्र । जिष्णु-जोए । प्रथ-जिस प्रकार ज्ञानी जीण वस्त्र (धारण करने) से देह को जीरा नही मानता उसी प्रकार क्षीण देह से प्रात्मा को क्षीण नहीं मानता। 21 णाणि-ज्ञानी । अथ-हे जीव जिस प्रकार ज्ञानी वस्त्र को देह से भिन मानता है उसी प्रकार मात्मा से देह को अलग ही मानता है। 22 ति पयारो-तीन प्रकार । णिमतु-नि सदेह । प्रथ-मात्मा तीन प्रकार की होती है -परम आत्मा (पूण मात्मा) अतरात्मा (जाग्रत प्रात्मा) और बहिरात्मा (मूर्छित प्रात्मा)। तू नि सदेह बहिरात्मा को छोड कर अन्तरात्मा के द्वारा परम आत्मा को प्राप्त कर । 23 मिच्छा-मू । मुणेइ- जानता है । भमेइ-चक्कर काटता है। प्रथ - मूर्छा (मज्ञान) से मूढ बना हुमा व्यक्ति परम आत्मा को नहीं जानता। जिसे जितेन्द्रिय व्यक्तियो द्वारा बहिरात्मा कहा गया है वह निश्चय ही ससार मे चक्कर काटता है । 20 115 24 गिहि-वावार--गृह व्यापार (गृहस्थ के काय)। ह याहेउ-त्याज्य प्रत्याज्य (त्याग करने योग्य व ग्रहण करने योग्य) अणुदिनु-अनुदिन । झायहि-ध्यान करते हैं । लहु-शीन। प्रथ--गृहस्थ के कार्यो मे लगे हुए (भी) जो त्याज्य प्रौर ग्राह्य (बातो) को समझते हैं तथा प्रतिदिन जितेन्द्रिय दिव्य आत्मा का ध्यान करते हैं वे शीघ्र निर्वाण प्राप्त करते हैं । लिप्पिय इ-लिप्त होता है। कमा वि-कदापि (कभी भी) अप्प सहावि- 25 प्रात्मस्वभाव । प्रथ-जिस प्रकार कमल पत्र जल से कभी भी लिप्त नहीं होता उसी प्रकार आत्म स्वभाव रमण करने वाला (व्यक्ति) कमों (कमफल) से लिप्त नही होता। 26 रोस-क्रोध या द्वेष । सामाइउ-(रागद्वेप रहित) समभाव । केवलि-मुक्ति का अधिकारी साधु । एम-इस प्रकार । अथ-पासक्ति और क्रोध दोनो को छोडकर जो समभाव का अनुभव करता है, उसे साम्यावस्था मे समझो, इस प्रकार वह केवली (मुक्ति का अधि कारी) है।
114 15 जावइ-जब तक । उपसमई-शान रहता है। सजदु-सयम अपाय (मनाविकार)। मथ-मानी तब तक शात चित्त रहता है जब तर वह सयमी (' रहता है । कपायो (मनोविकारो) के वश मे गया हुमा जी जाता है। 16 गाण-ज्ञान । विहीणह-विहीन । बहुएँ-बहुन । विरोलि चोत्पउउ-चिकना। प्रथ-हे जीव, गान विहीन व्यक्ति के लिए तू मोक्ष (परम शाति मत मान । बहुत मथे हुए पानी के द्वारा हाय चिकना नही 17 भुजतु-भोगता हुमा । पुणु-पुन (फिर) मचिठ-सचित । प्रथ-अपने कम फल को मागते हुए भी जो उसमे आसक्त नह . पिर नही बाघता और उसके सचित कम भी नष्ट हो जा 18 राय टोस-रागढ प । परिदिठया-स्थित । परिहरिविन्त्याः प्रथराग-रेप को छोड़ कर जो जीवो को समान दृष्टि से दे में स्थित हुए निर्वाण (परम शाति) प्राप्त करते हैं । 19 मल्लाह-पले लोग । णासतिनष्ट हो जाते हैं । सलेहि- वश्वानगर (मग्नि) । लोहह-लोहा । घणेहि हयोडों से प्रथ-दुष्टो के ससग से भले लोगो के गुण भी नष्ट हो जा लोहे के साथ मिली हुई अग्नि हपोडो से पीटी जाती है 20 वत्थि-वस्त्र । जिष्णु-जीए । प्रथ-जिस प्रकार ज्ञानी जीण वस्त्र (धारण करने) से देह ६ उसी प्रकार क्षीण देह से प्रात्मा को क्षीण नही मानता जाणि-ज्ञानी। अथ-है जीव जिस प्रकार ज्ञानी वस्त्र को देह से भिन्न । मात्मा से देह को अलग ही मानता है । 22 ति पयारो-तीम प्रकार । णिमतु-नि सदेह । मय-मात्मा तीन प्रकार की होती है -परम आत्मा । (जाग्रत भात्मा) मोर बहिरात्मा (मूछित मात्मा) । को छोड कर मन्तरात्मा के द्वारा परम भात्मा को प्रा 23 मिच्छा-मूर्छ । मुणेइ-जानता है । भमेइ-चाकर 4 मथ - मूर्या (प्रगान) से मूढ बना हुमा व्यक्ति परम आ जिस जितेन्द्रिय व्यक्तियो द्वारा बहिरात्मा कहा ससार में चक्कर काटता है। 21 - घोहावली 6 सुतरु-कपास । किका-टोकी। रुखाम-रुखानी (बढइयो का लोहे का एक औजार) | सासति-कष्ट । 11 कदरी केला । बदरी-बेर । पनस-कटहल । 12 मगह-मगध । गया-एक तीथ का नाम (तथा गया बीता)। 15 गादुर-चमकादड । 18 मोटी रोटी मारु-रोटी की मोटी मार मारो। (पेट भर खिलाकर उसे वश मे करो)। 24 पाही खेती-जिस गाव मे रहते हो उसस दूर जाकर दूसरे गाव मे खेती करना। लगन-प्रासक्ति । राहगीर । मग-रास्ते पर । 25 रीझि-प्रेम । खोझि-रोष । करपत-खीचता है। बट- 26 तुलसीदास गीतावली 1 2 3 फरनि-फल । लरनि-प्रतिद्विता, होड । लरखरनि -लडखडाना। कधर-कधे । उपवीत-यज्ञोपवीत । सुखमा दही-कामदेव रूपी ग्वाले ने शोमा रूपी सुरभि से शृगार रूपो दूध दुहकर जो अमृतमय दही तयार किया था। मथि मासन महोरी-उसे मथकर ही मक्खन रूप राम प्रौर सीता रचे हैं तथा सारे लोको की शोभा उस बचा हुमा मट्ठा है । अगहुड-आगे बढ़ने के लिए उताघला। गडत गोड सकोच रूप दलदल में गडे जाते हैं । फनिक-साप । गौन-प्रप्रयान, महत्त्वहीन । आरत-प्रारति-दीन-दुखी का कष्ट दूर करने 4 पक-पर मानो 5 वाले । 6 कीर-तोता । छति-लाहु-हानि लाभ । खीर नीर-दूध-पानी । वैराग्य-सदीपनी 5 विलाहि-नष्ट हो जाते हैं । 11 मसि-स्याही । 14 चाम-चमड़ा। 15 सुपच-श्वपच, (निम्न जाति का व्यक्ति)। जानकी मगल बनज-कमल । 2 कौसिम-विश्वामित्र । 4 दस कम-रावण । 5 भज- अगस्त्य मुनि । 13 करव-कमल । 15 विवुध-देवता । कवितावली मधवा-इद्र । लोमम-लोमस-ऋपि । 2 अयानी-मूख 1 3 सुठि-प्रत्य त सुदर 6 पनही जूता। बरवै रामायण मख-या। 4 कोल-एक जगली जाति भील । कलस-जोनि-मगरस्य 2 ऋषि 117 घोहावली 6 सुतरु-कपास । टकिका-टॉकी। रुखाम खानी (बढइयो का लोहे का एक मोजार) | सासति-कष्ट । 11 कदरी केला । बदरी-बेर । पनस-कटहल । 12 मगह-मगध । गया-एक तीथ का नाम (तथा गया बीता)। 15 गादुर-चमकादह। 18 मोटी रोटी मारु-राटी की मोटी मार मारो । (पेट भर खिलाकर उसे वश मे करा)। 24 पाही खेती-जिस गाव मे रहते हो उससे दूर जाकर दूसरे गाव मे सेती करना। लगन-प्रासक्ति । राहगीर । मग-रास्त पर । 25 रोभि-प्रेम । खोझि-राष । 26 करपत-खीचता है। बट- रसखान 1 पुर दर-इद्र । कालि दी-यमुना नदी। 3 कलधौत-सोना चादी। 6 छाज-छाजन, मूप । अछिया-छांछ (मटठा) नापने या रखने का बतन। बनलीला के मार-कामदव । गौरस लीला 9 बारही-इस पर । मौंडी-लडकी। भतराड- मयुरा व दावन के बीच का एक स्थान । क्नौडी-वशीमूत कृतज्ञ)। डोडी-मुनादी । दधिदान 11 भाजन-वतन । सौ-सौगध । मरु करि-कठिनाई से । उलाहना 12 मेव-लूटमार करने वाली जाति विशेष। मिलन 16 बक-तिरछी। वशी 21 वनितानि-स्त्रिया। हासुरी-हंसी। 22 पारो-दूर हटाना । 23 ढारी-ढग । जमकाल- मृत्यु । 24 मन-कामदेव । भ्रमरगीत 31 गाडरु-गारुडी, साप का जहर उतारने वाला। कारे विसार-विप वाला काला सप। 34 भेती- होती । बकोटती-नाखूनो से नोचना । रिझावन को-रिझाने का। दानलीला 36 मुरही तें-प्रात काल से ही/प्ररझत-झगडते हो । मीरखान-उच्च अधिकारी । 38 मवासी-किलेदार, नायक । 40 बादी-झगडालू । फमादी-झगडा करने वाला। साट खाह-दूसरो का धन लुटना । मादी-- अम्यस्त । 41 नियावन्याय । राव-राजा । प्रेम 12. अहमिति-महकार ।
सुन्दरदास गुरु महिमा 1-4 घात-अहित । ससेइ-सशय । प्रसाद-प्रस नता (कृपा)। उपदेश 5-6 मोट-गठरी। वाम-पत्नी । काल की विकरालता 7-11 विलायत-नष्ट होना । दमामा-नगाडा | छेहा-अत । सेहा धूल, राख । निहवे-निश्चय | निरजन-निराकार ब्रह्म । घामस धूमस-घूम धाम (ससार का जजाल)। देह एव जगत की नश्वरता 12-13 करतार-जगत् का कर्ता, ईश्वर । अमावनो-मप्रिय । नदन-पुत्र । हाथ मे घोरा लया-सफेद वस्त्र धारण किए। माशातहणा 14-16 बिल्लात--विलाप करना । कधी-कभी । अन-अय। प्राश्वासन 17-19 पाहन-कुछ नहीं खाक (लाक्षणिक प्रथ) पाहन में पहु चाय परेगो- नष्ट कर देगा। विश्वास 20-21 खेचर-पक्षी । पोखे-पालन पोषण करता है। तीख-सतुष्ट । पोय- दुखी, उदास । मूखता 24-26 कोरी-चोटी । मरीचिक-किरण । वाणी का महत्व चार पदारप-धम, मथ, काम मोर माक्ष। पाठ सिद्धि-आठ सिद्धियर्या । अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व वशित्व । नवोनिधि-कुबेर को नो निधिया। पदम, महापद्म, शख मकर, कच्छप मुकुद, कुद, नीस, सव ।
-उमर पद्माकर भक्ति थिर-स्थिर । कदर-गुफा । अकारथ-व्यथ, बिना किसी काम के । बैस- दुरास-दुराशा (न पूरी होने वाली माशा) । कायो-शरीर । चौरे--चारो मोर से । लागि के लिए, लगकर । दोह-दीघ, बडे बडे । द्यौस-दिन । पिपीलिका- चिऊदी। पील-हापी । तन-तनप, पुत्र । क्लाम-वचन, प्राथना पुकार | खोरिन -तग गलियों में । दुरी-छिप जाओ। मादा-माड म, बीच म हो गया है । रच-अल्प, स्वल्प । नेकन्नेक-महेनहे। ईडरी-घडा रखने के लिए सिर पर रखा हुमा कपडे का वतु लाकार भेडरा (ईनू बिना) । मलार-एक राग का नाम । फाग-होली 1 नाय-उडेलकर, गिराकर | अबीर-गुमाल, लाल रग की बुक्नी । रोरी-रोरी, लाल रंग का चूरा या बुक्नी जिसका तिलक भी लगाते हैं । बिहद- बेहद, बहुत, असीम, अधिक । स्यौरी-शवरी भीलनी (रामजा ने जिसमें वेर खाए पे) गौतमतिया-गौतम की पत्नी, महल्या घना-धना नाम का एक जाट भक्त । सदना-इस नाम का एक ईश्वर भक्त कसाई जिसका भगवान ने उद्धार किया। हाथी- गजराज । साधन-साघु लाग, भक्त लाग । सवरी-शबरी, भीमनी जिसके बेर भगवान राम ने प्रेम से खाये थे । वेद भेद-वेद का रहस्य । सुमृत-स्मृतिग्र प । ठहराव-निश्चित किया है, ठहराया है । जसूनन-दूतो से । कामगया--कामधेनु, स्वग की एक गो जो सब कामनामो को पूरा करती है । कठवति-सूखकर कडा हो जाना । माइवो-माने को, माने योग्य । पाइवा--प्राप्त करने योग्न, प्राप्तव्य । नेन मुदे पै-प्रांख बद होने पर, (मर जाने पर)। जकि-सी-विस्मित भोचक्की सी । काया-शरीर । मीच-मृत्यु मौत । चेत-सावधान होना हाश सम्भालना, बोध हामा। बिसासिनी-विश्वासघातिनी। विलई-प्रलय मौत । प्रयास-यत्न परिश्रम । लीकि-लोक, लकीर, भाग्यरेखा। बघम्बर-मगछाला। दिगम्बर- नगा । दूब-दूर्वा घास । पचपावक-पचाग्नि । साहस-हौसला, उत्साह । वणु- बासुरी । सलीती-थमी। छोजी-क्षीण हुई नष्ट हुई। रेनु-बालू रेत । भीती- दीवार । रीती-रिक्त, खाली । खलीती-खरीता, चमहे वा थला, जेब बटुमा । छन भगुर-क्षण भर मे नष्ट हो जाने वाला। करोरा-क्टोरा। ती-तिया स्त्री पत्नी । गोती-सगोत्री रिश्तेदार । प्रकति वरान लरजत-हिलते हैं । विसासी-छली, कपटी विश्वासघाती। पगत-पगना। वीषिन -गलियों से । बगरो-छाया हुआ, विस्तीण, व्यापक । क्वैलिया-कोयल 1 मारत- वायु । नादत-शब्द करती है। दरेरे-धक्के, तेजी से भागे ढकेलना ।
121 वीर रस सीम-सीमा । सगर-युद्ध । फलका-~-प्राकाश तारी-वाली। तमका-तमतमाहट, तीव्रता, क्रोध की तेजी, जोश | जाहिर-प्रकट । रोदा-धनुष की डोरी । सिलाही- सैनिक, क्वच पहने हुए सिपाही। ऐल-इलाका, प्रदेश | निसान-युद्धपनाका, नगाडा । पाकसासन-इद्र (उत्तर दिशा)। बिहाली-फिर से नई आभा, ताजगी । दानवीर सुहेम--सुवण । गिरिजा-पावती । गजानन-गणेश | गोई-छिपाकर । वितु ड- हाथी। गगा स्तवन विधि-ब्रह्मा । गिरिस-शिव । अघहर--पापनाशक । छेम-क्षेम, कल्याण । सुरसिंधु-गगा । राका-पूर्णिमा की रात । पताका- झण्डी । भौन-भवन, घर । रावरे-पापके । विन छारे-क्षरण दिए बिना, बिना छुदाए । पापपुज-पाप समूह । नभ-माकाश। गौतमतिया महल्या गौतम ऋषि की पत्नी पो, जिसे इद्र के दुराचार के कारण एव गौतम के शाप के कारण पत्थर बनना पड़ा था। इस अहल्या का उद्धार श्री रामचन्द्रजी के चरणो की धूल के स्पश के कारण हो गया था।
सूर्यमल्ल मिश्रण 1 2 3 4 5 विमुहा-विमुख । वधवाव-बाघ की गध । की-क्या । छक पगाम-बल मे मस्त । हाथल-हस्त प्रहार । पाहण-मार डालता है प्रवट-पायु । केहा -कमा । जेथ -जहा। गय द-गजेद्र । गवय -गडा । गिडराज-शूकरराज । ताखडा-मुस्तद । मड- मचा रहे हैं। डोहे - ध्वस कर रहे हैं । द्रह-जलाशय । ऊँडा-गहरा । दोह-दीघ । सोहण-सिंहनी । सहल-सर । सक्क-शायद । तु डा-मुख के अग्रमाग से। हेक्ण-अला। घू दिया-रौद डाला। पाथर-विस्तर। पाठडा-सूअर के नौजवान बच्चे । कवला-मूअर । झाडा भाडा-तितर 6 7 8 बितर। 9 10 11 12 13 14 15 सुहडा--सुभट । सिकारसी--सिकार कर लेंगे। माजसी-तोड डालगा। पाधरौ-सीधा। पूगी--सपेरा का वाद्ययन । घवल-बल । पयप-करता है । मावगी-सपूरण । करवाल-तलवार । डाहहिंया-बजने पर । जबाल-नगाडे । शाकल-” खला। जिके--जो । घाल-डालते हैं । पाख-विना। दुमनौ-उदास । बाढ-काट डालता है। पौढे-सोता है। बाजी- कहलामो । हाथल-हाथ का पजा । पाड-नष्ट कर देता है । सारखा-समान | विण्डा-नष्ट हो गये । बेस-प्रायु । अजका-चचल उद्धत । खाटी-कीति । नेप-वद्धि पर है। कोही-किमी ने ही। माण-लाते हैं । कुबगा-शत्रुनो को। पटल-छत । मपराय-अपना सरता है। किसी-कोन, मौनसा । 16 17 18 19 20 21 123 22 23 24 ठीणी -~-उपाल म । ईपो-देग्रो । सूरी महल-~वीर महिला। सहरगी-सहन करने वाली । लजाण-लज्जित करने वाला। भ्रूण-गम को । साव~बच्चा । वाण री-काटने की। जाचा-जच्चाओ । हद-के । तापण-तापने की अगीठी । सलूगो-नमक सहित । समप्प-~समर्पित करते हैं । साखल धीठा- खला से खुले हुए। वीर जमीरा-भूमडल के अद्वितीय 25 26 27 वीर। 28 इला--पृथ्वी । पालण-पलने मे। हालरिया-झले के गीत । 29 यण-स्तन । ढोल-दर । थिया-हुप्रा । बाला-हे पुत्र । 30 काय-क्या । बलेबाजलने के लिए । मरेबा--मरन के लिए। 31 प्रभरण-कहती है । धार-विचार करके । बलण- सती होना । 32 धारा-~-तलवारो की धारा स । डूगर-पवत । 33 नहनही । बास -निवास । 34 पालगसी-सुहावगा । सुणिया--सुनने पर । सार बागी-तलवार बजी। 35 सोक-~-सपत्नी । लगाड-~लगाव । मला-अच्छी तरह । 36 नयी-नही । मुडिया--युद्ध से पीठ दिखान पर । गीदवो-तक्यिा। 37 पूजाणी--पूजित । मीडाणी-मदन किया हुआ। बीजाणौ--दुलाया हुआ। घण-अधिक। 38 दुरग-किला । कढणी-निकसना । 39 बलण-सती होना । बरणं-हो । व-उस । बो-बनो। 40 माह-महावर लगा । धारा लागीज-तलवार के घाट उतरे । 41 पाछटू-फोड डालू । रावत-सरदार । जाम-लडकी। 42 लकाल-सिंह । लहै-प्राप्त करता है। 43 पोहड-पीछे हटते है। विचाल-बीच । बटक- दातो से काटता है। मायड-माता । पूचा-क्लाइयो को । 44 प्राणा गाहक-प्राणो के ग्राहक, अर्थात् शत्रु । कसियो-कटिबद्ध । 45 बाहुड-वापिस ले लिए जाते हैं । जठ-जहा । 46 माहिरो~भात भरते की रस्म । कडूब-कुटुम्ब । बू व-हाय तोवा । 47 एथ-यहा । जग-उत्पन्न करती है । 48. देव-देखने । कोष-किया। कीस-से। ।
124 - -- 49 टाट-दरिद्रता के कारण टोटे से । सरका-सरवडो को बनी हुई। प्रघपतिया-राजाआ के । 50 -ऐस । टोटे-नुकसान पर । जणी मे-जिसमे । पोत-कठाभरण । 51 बिमस-विलाम करते हैं । तामा-कीमत से । 52 वीजह-तलवार । माहे-पकडकर । प्रत्य-अय, लिये। 53 भोड-सहरा । पडव-शयनागार । छिपारिया-छिपाते समय । 54 गोरण दिन-विवाह के दूसर दिन । बागा-बजे । उसीसो-तरिया ! 55 काय-मया । चीत चितन करता है। 56 डाहल-शासा। छागसी-काट डालेंगे। खांत-रुचि । छकियो-मदमस्त । 57 बाटडी-राह । पडव-रंगमह । मावगौ--सपूण । 58 एकण-एक । दूरगादूण-दुगुना । 59 बरहाय-प्रलाप करता है। 60 जक-विधाम । चउत्थ-चौथे । 61 बाभी-भाभी । चवाता-~चूते हुए । ववाल-युद्ध का नगाडा । 62 कुरल-चोदाती है । धीरपिया-धय । दोहर-दिना । 63 बाड-घर के पास । वासडा-निवास । 64 तूझ-तुम्हारा । पहिया पहली-गिरने से पहले। 65 वर बसाविया-बर मोल ले लिये । पाड लूब-पाश्रमण हात हैं । हेली-सखो। 66 प्रोछाड ढा गया है । वाह-धोडा । बीद-वर । गयण-आकाश । 67 बिसासतौ-धीरज बंधाता हुप्रा । बेग-चाल । वाज-घोडा। 68 सौकरडा-वाणो की बौछार । प्रमाण-तरह । ढाहण-गिराने वाले । 69 सिखावियो-सिखलाया। ओज-बल कौशल । 70 सपेखे-दसे । गलबस्थामार-गाढालिंगन करके । बाहण-बार करने के लिए। । 1 बाल्हा-प्रिय 71 दरजा-दरारें । भाट-प्रहार 1 अरराट-घोर म यनरत । 72 दुमका-धमाका । मचकाय-मचा रही है । 73 जेज-देर । कटका-सेनामो का । ढाहि-नष्ट करके । 74 पल-मास को। वाल्हे-प्यारे । देसी-देगा | धपाय-तृप्त कर। 75 फील-हापी । हेके-एक साप 1 पाउही-तृप्त करेंगे।
125
76 प्राखता-उगवला । बहोड-वापिस लेकर ।
77 धव-पति । मारखो-समान । अनड-उद्धत । डोहै-विलोडित करता है ।
78 मजको-उद्धत-चचल । बाग-लगाम ।
79 परिया-हटे हुए । केम-कैसे । दुभात-पक्ति भेद भिन्न बर्ताव ।
80 घजर प्राण-शेखी बघारते है। प्रारण-लाते है।
81 मूझ-मुझे । विग्ग-माथ बिना मस्तक के ।
82 मच-पलग । मावती-समाता।
83 करडो-कठोर । कुचनूस्तन को। हैदो-का। चोल-पानद विहार का
समय । घमरोल-प्रहारो को वर्षा ।
वर बर-भली भली, बार बार ।
85 औहनो-रोको । सच-सचय करे ।
86 पाटा-बर । सार-धम । लिया-लेने के लिए।
87 दाया-शनुप्रो पर। इखो-देखा ।
88
पार रा-शनुओ के । खिण-क्षणमर । मियडी-महाभारत का कायर पात्र,
मोर । जाण-मानो।
89 लविया-झुके हुए । मजाय दीधा-भगा दिये । ऊठे-उठ कर।
90 धर-रक्खो।
सुघाम-यथास्थान । पावा हूत-चरणो मे बरज-च द
कर दो।
84
शमशेर बहादुर सिंह
सींग और नापून
वरूतर-कवच।
गजल
गजल
। मजमून-लेप आदि का विषय ।
गजल 2 हकीकत-ययाथ । सरयु युल-कल्पना । बम निगाही ।-उपक्षा । दस्तूरे-
फिरदौस-स्वगिक सविधान ।
3 जल्वे-दीदार प्रदशन । तूर-सीरिया का एक पहार, जिस पर हजरत
मूसा ने ईश्वर का जलवा देखा या। नावीना-अधा । कदमरजा-
क्दम रखना, पदापण । सूए चाम-छत को तरफ। शाखो-चुल
बुलापन । हिना-मेंहदी। परवर-परवरिश करने वाला । तरू मीना-
प्रदाज। उजलत गजी-कोन मे या तनहाई में बठ जाना ।
पकौर । मीना-शराब की बोतल ।
4 बाव-अध्याय । सुसियां-शोषक । दिलनेवाज-दिल को लुभाने वाली ।
खिलवतो-एका त तनहाई । हिजाब-छिपना, पर्दा करना। भास्ता-
घर । शबाव-जवानी।
तीन शेर
सय्यार-गृह । मह -चांद । महर--सूरज । पख्तर---सितारे ।
गदा-
दुष्यत कुमर
2
3
4
7
हवालो~सदर्भो । ओमारे--सायबान, बरामदे । मासूम-निर्दोप ।
मारजू इच्छा, विनती।
दरिया-नदी, । खौफ-~-मय । मायूम-~-उदाम । राजनी-सुराखो।
प्रलायों-तापने क लिए जलाई हुई आग ।
सजदे-~-नमाज पढ़ते हुए जमीन पर सर रख कर ईश्वर को प्रणाम करना ।
भादमकद--मनुष्य के कद जितना। भामदरफ्त-~माना जाना । जायद---
ज्यादा। मैकदे -शराबवाना।
सलीव--सूली। जरीव नापने का फीता । रकीब-दुश्मन । भदीब---
साहित्यकार।
9
10
11
ऋतम्बरा--1माजरा--मामला।
17
19
मजर--दृश्य।
माशियान-पासले । मुखातिब-बोल रही है। मुअज्जन-~~-अजान देने
वाला । सदाएं-~भावान । अजानो--नमाज लिए बुलावे।
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