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Dhrmmakarmmadeepika

Shree Anndachran Tarkchudamani · 2009/09

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Stek HAT. I LIBRARY
BIRTP999DBB-DOSBBEDOSHg
आंतरसत्।
धर्मकर्मदीपिका।
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SOHAMTAREERSEEGREATOR
दशमहाविद्या सिद्ध सचानन्ददेव (सर्वविद्या) कुलोत्पन्न
महामहोपाध्याय महागहाध्यापक श्रीनगदाचरण
तर्फचुलामणि शम्मी द्वारा विरचित ।
s
DOGCeU9660063COCCSGO0606605CO066
Jam.net
भारतधर्मसिण्डिकेट लिमिटेडके
शास्त्रप्रकाशन विभाग द्वारा
प्रकाशित।
जयए.
শার অন্যান্য
#
HARDOSELIVas
काशी
संवत् १६१ विक्रमीयः।
All Rights Reserved.
प्रथमावृत्ति २०००] सन् १९२४९० [मूल्य ) आना।
DIYOOOO-OROADBEEN
rinted by Ir. N. Bagahi, at tho Bharat Dharma Prorsr Bongres,

भारतधर्मसिण्डिकेट लिमिटेड ।
यह संस्था हिन्दूजातिके सब प्रकारके अभ्युदयके लिये
दस लाख रुपयेके मूलधनसे स्थापित की गई है। इसके
हिस्से २५) ५०) और १००) रुण्यके रक्से गये हैं, जिससे यये
: लाभ होगा ऐसी घढ़ आशा है । हिन्दु नरनारी मात्रको
इसके हिस्सेदार बनकर देश और धर्मको सेवा योग देना
गचित है। विशेषतः वर्णाश्रम-संघके मेम्बर्गको तो अवश्य हाँ
इसके हिस्सेदार बनना चाहिये । हिस्सेदार बनने और
पत्रव्यवहार करनेका पता-
सेक्रेटरी-भारतधर्मसिण्डिकेट लिमिटेड,
जगतगंज, स्टेशनरोड, बनारस
भारतधर्म
-
.
महाशक्ति।
इन नामोमेसे प्रथम नामका हिन्दी साप्ताहिकपत्र
दूसरे नामका अंग्रेजी साप्ताहिकपत्र ये दोनों काशी
समस्त सनातनधर्मावलम्बियोंके मुम्रपत्ररूपसे प्रकाशित
हैं। इनको क्रमशः दैनिक करदेने का विचार है।
वार्षिक मूल्य ३) और महाशक्तिका वार्षिक मूल्य ६)
सहदय स्वदेशहितैपी हिन्दू नरनारी मात्रको इन पत्रोका प्र
होना उचित है । वाश्रम-संघके प्रतिनिधियों को तो
इनका ग्राहक बनना चाहिये, क्योंकि ये उस संघके
मैनेजर-सम्वादपत्रविभाग,
भारतधर्मसिण्डिकेट लिमिटेड,
जगतगंज. स्टेशन रोड.
.

मोतत्सत् । धर्मकर्मदीपिका। दानहाविनासित सानन्ददेव ( सविमा) पुलोत्पन- महामोपाध्याय महामहाध्यापक,सोनभदाचरण तर्फलामणि शर्मा द्वारा विरचित भारतधर्मसिपिटकेट लिमिटेड शाम्रप्रकाशन विभाग द्वारा प्रकाशित। 7 काशी। सं० १९१ विझमीय।

श्रीयुत एच. एन्. वागचीके प्रबन्धसे- भारतधर्मसिण्डिकेटके भारतधर्मप्रेसमें मुद्रित ।

विज्ञापन । - - वर्णाश्रमधर्मावलम्बी आर्यजातिमें इस कराल कलिकालमें भी कर्मकाण्डका प्रचार कम नहीं है। केवल विधिपूर्वक कर्म करनेसे कर्मका फल भवश्य हाता है, परन्तु कर्मकर्ता और कारयिता दोनों हीयदि कर्मविज्ञानको और धर्मविज्ञानको जानने वाले हो, तो फर्म धर्मपर आस्था दृढ़ हो जानेके कारण विशेष फलकी प्राप्ति हुमा करती है। विशेषतः आर्जकलके कर्मकाण्डी विप्रगण प्रायः न मंत्रार्थ जानते हैं और न कर्मविशानके माता होते हैं अतः वे यदि कर्म और धर्मका विधान कुछ जान सकेंगे, तो उनके द्वारा कराये हुए: कर्मका महत्त्व कुछ विशेष अवश्य हो जायगा इसीको लक्ष्यमें रखकर यह अन्य मेरे परमपूज्य गुरु महाराजने बनाया है। यदि आजकलके कर्मकाण्डी और अन्यान्य सनातनधर्मावलम्बी इससे लाभ उठावेंगे तो परिश्रम सफल समझा जायगा भारतधर्म सिण्डिकेट नामक कम्पनी जो दस साक्षके मूलधनसे रजिस्टरी होकर बोली गयी है वह वर्णाश्रम धर्मावलम्बियोंको स्वजातीय संस्था है, उसके शाख-प्रकाशन- . विभाग, प्रेसविभाग, बुकडिपोविभाग मादि का विभागों से i

( २ )
शास्त्रप्रकाशनविभागका यह प्रधान लक्ष्य है कि वर्णाश्रमधमा-
वलम्बियोंका कल्याण तया जगत्में शानज्योति विस्तारके लिये
प्रकाशित और अप्रकाशित वेद तथा वेदसम्मत शास्त्रीय ग्रंथों-
को नियमित प्रकाशित किया जाय। सिण्डिकेटके इस शुभ
उद्देश्यमें सहायता देनेके अर्थ श्रीगुरुमहाराज द्वारा प्रणीत
अनेक शाखीय प्रन्थ क्रमशः प्रकाशित होते रहेंगे।
इस ग्रन्थके रचयिता श्रीगुरुमहाराजकी आशानुसार
इस पुस्तकका खत्वाधिकार भारतधर्मसिण्डिकेट लिमिटेड
काशीके शाखप्रकाशनविभागको दिया जाता है।
..
निवेदक
गुरुपूर्णिमा
सं०१४-२ विक्रमीय
विन्ध्येश्वरीप्रसाद शास्त्री,
महामण्डल भवन काशी।

प्रस्तावना। कर्मोपासनामानात्मकेषु सत्स्वपि वेदस्य काण्डप्रयेषु कर्म- काएडेन महिएः सम्बन्ध पार्याणाम् । प्रागर्भाधानात् चिताऽऽरोहणं यावत् सर्वे एव संस्काराः कर्मकाण्डस्यैवान्तर्म- पन्ति । भार्यजातेरस्तित्वरक्षणदक्षाणां सदाचाराणाञ्चाधार भूतः कर्मकाण्ड एव । उपासनायां ज्ञाने वा विहितसमुचित- समुविशालिनोऽपि महात्मानः ऋते कर्मकाण्डाद क्षणमपि स्थातुं न शक्नुवन्ति। यथाऽभिहितं भगवता श्रीकृष्णेन गीतायाम् । नहि कश्चित् क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मछत् । कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः । इति । अनेन प्रमाणेन प्रत्यक्ष सिद्ध कर्मकाण्डमहत्वम्। किन्तु साम्प्रतं हिकालप्रभावेण अन्यकारणेन पा कर्मकाण्डविपश्चित्सु क्रिया- सिद्धांशक्षानमेव पथाकथञ्चित् समुपलभ्यते । किमिति कर्मणो वैज्ञानिक स्वरूपं, के वातस्य सञ्चालकाः, तेन धर्मस्य च कीदृशः सम्बन्ध इत्यादिविषयविधानविदां विरलत्वात् सम्प्रति केत्रन यथोचितं न श्रद्दधते तत् । अत एव मया देववचनं शरणीकृत्य हिताय कर्मकाण्डविदुषां प्रस्तुतमिदं पुस्तकम् । एतेन पदि मार्यजातेः प्राणभूतानां कर्मकारिखनामल्पोऽप्युपकारः सम्मषेत- दाऽहमात्मानं सफलपरिभसमवगच्छेयमिति शिवम् । प्रीमन्नदाचरण देव शर्मा।

धर्मकर्मदीपिका
की
विषयाऽनुक्रमणिका ।
विषय।
पूरसंख्या।
(१) मङ्गलाचरण।
...
(२) प्रस्तावना।
३
(३) सृष्टि उत्पादक तथा सृष्टिस्थितिलयकारक
कर्मका स्वरूपा
(४) साधारणतः फर्मके भेद और उनका स्वरूप ।
(५) संस्कारका लक्षण, संस्कारसे कर्मका सम्बन्ध,
संस्कारोके भेद और वैदिक संस्कारोंका रहस्य। १०-१६
(६) विविध कर्मका वैज्ञानिक खरूप ।
(७) जैवकर्माकी गतियोंका रहस्य ।
() कर्मयोगका स्वरूप और कर्मसम्बन्धसे मुक्ति
२७-३५
पद् प्राप्ति।

...
(8) कर्माके साथ धर्मका मिश्रसम्बन्ध' होनेपर भी
गुदामें निहित धर्मतत्वका स्वरूप वर्णन । ... ३६-४०
(१०) धर्मके भेद और धर्मकल्पद्रुमरूपसे साधारग्स
धर्मका विस्तृत वर्णन।
४०-४६
(११) मिलोक पत्रिनकर वर्णाश्रमधर्मकी महिमा और
उसका गूढ़ विज्ञान।
४०-५०
(१२).कर्म और धर्मको परमसहायक उपासनाका
५०-५५
(१३) कर्मकाण्ड और उपासनाकाण्डको मूलमित्ति-
स्वरुप अतिगोपनीय पीठ रहस्य वर्णन । પંદર
(१४) कर्म धर्म और यश शन्दोका यथार्थ तात्पर्य
और विशेषतः यक्षका वैज्ञानिक रहस्य । ६३-७१
(१५) उपसंहारमें सदावारका महत्व और विज्ञान । ७१-७४
...

ओतत्सत् । धर्मकर्मदीपिको मंगलाचरणम् । चम्यासि था समधिरुष रजोमृगेन्द्र तेनाहतं विजयले च तमासुरारिम् ।। हे धर्मधात्रि भयहारिणि कर्मरूपे ! मातस्त्वदीयचरणाम्बुजमानतोऽस्मि ॥१॥ शव गदाश्च कमलञ्च तथा रथाङ्गम् एतन्निजायुथचतुष्टयमादधाना ।।' मातस्त्वमेव विनताय यथाऽधिकारम् वर्गश्चतुर्विधमिह पूददासि नित्यम् ॥ २॥ हे धर्म-कर्म-कपिणि जगद्धात्रि! आपके चरण कमलोंमें बार बार प्रणाम है। श्राप तमोगुणरूपी असुरको अपने बाहन 'सिंह द्वारा वशीभूत करके रजोगुणमय पशुराजपर श्रानन्द पूर्वक प्रालीमा होकर काम, अर्थ, धर्म और मोक्ष रूपी गदा, शङ्ख, चक्र, पयमय चतुरायुधको धारण करती हुई अपने अनादि अनन्त सृष्टिप्रवाहको सदा धारण करती हैं ॥१-२॥

२ धर्मकर्मदीपिका। NNN सृष्टिपूवाहमखिलं तमनाद्यनन्तम् यत् त्वं जगज्जननि ! धारयसे चिराय ।। ज्ञातुं छपारमहिमानमनस्त्वदीयं देवा महर्षिपितरोऽपि न पारयन्ति ।। ३ ।। धर्मस्य कर्मण इहास्ति च यन्महीयो दुर्जेयमद्भुतमिदं निखिल रहस्यम् ।। चतोलयं नहि विधाय तवांघ्रिपद्ये कश्चित् पुमान्न जगदम्य ! विवोद्धमोशः ॥ ४ ॥ कुर्वन-विशुद्धचरणं शरणं वरेण्यं मावस्तवैव वचनानि समाश्रयंश्च ।। सृष्टि-स्थिति-पूलय-कारक-धर्म-कर्म- तत्त्वं हिताय जगतः परिवर्णयामि ॥५॥ . आपकी अपार महिमाको ऋपि, देवता और पितर कोई भी हृदयङ्गम करनेमें समर्थ नहीं हैं, इसका प्रधान प्रमाण यह है कि, कर्मरहस्य और धर्मरहस्य दुर्भय है ॥३॥ विना आपके चरणोंमें अन्तःकरण लीन किये कोई भी कर्मधर्मरहस्य हृदयङ्गम करनेमें समर्थ नहीं हो सकता है। आपके वचनोंका आश्रय लेकर जगत्-कल्याणकी वासनासे अगदुत्पा. दक कर्म और जगद्धारक धर्मका -रहस्य वर्णन करनेकी सद् वासनासे आपके चरण- मलोंमें शरणात्पन्न हुमा १५ ॥ .

धर्मकर्मदीपिका ३ aiwww प्रस्तावना श्रीगिरिजापतिपीठखरूपे पुण्यतीर्थे आनन्दवननामनि श्री- काशीधामनि 'अपारलोलायाः पुण्यसलिलायाः त्रितापहारिण्याः जाहल्यास्तीरे जगतकल्याणरताः'तपोनिरंता महात्मानो लोके कर्म- धर्म-रहस्य-पूचारार्थ परस्परमश्नोत्तरेण ग्रन्धरत्नमेतद् आवि- भांवयाश्चक्रिरे । ' समाधाता तु केवल भगवतूचनमेव शरणी- कृत्य सर्वानपि पश्नान् समादधदिति । - . ननु सृष्टि-स्थिति-पूलयानां हेतु- भूतस्य कर्मणः किं वैज्ञानिक स्वरूपमिति ? एक समय पुण्य तीर्थ आनन्दवन गिरिजापतिपीठस्व- कपिणी काशी नगरीमें पुण्य-सलिला प्रिताप-हारिणी जाहबीके तटपर कुछ निवृत्तिसेवी जगत्-हितार्थ तप-निरत महा- पुरुषोंने एकत्र होकर जगत्में कर्म और धर्मका रहस्य- प्रचार करनेके अयं परस्परमें प्रश्नोत्तरको रीतिसे इस प्रन्थ- रक्षका आविर्भाव किया था और उत्तरदाताने केवल भगवद्- पचनों के द्वारा ही सव प्रश्नों का उत्तर देना उचित समझा था। "धि-उत्पादक तथा अष्टि-स्थिति पकाका कर्मका बैज्ञानिक स्वरूप क्या है?

धर्मकर्मदीपिका
..
समाधानम्-
शक्तिगीतायां निजमुखेनैव जगज्जननी
ब्रह्ममधी महामाया देवेर्जिज्ञासिता कथयति-:'.
स्वभावात् प्रकृहिर्मे हि स्पन्दते परिणामिनी ।.,
स एव स्पन्दहिल्लोलः:खंभावोत्पादितो मुहुः ॥ :
सदैवास्ते भवन् देवाः ! स्वरूपे प्रतिविम्बितः ।
तस्मान्मम प्राकृतानां गुणानां परिणामतः ॥ .
अविद्याऽऽविभवेनूनं तरङ्गैस्तामसोन्मुखैः ।
सत्वोन्मुखैश्च तैर्देवाः ! विद्याऽऽविर्भावमेति च ।।
तदाऽविद्याप्रभावेण तरङ्गाणं.मुहुर्मुहुः ।
आघातप्रतिघाताभ्या. जलैःपूर्णे जलाशये ॥
• .
जगजननी ब्रह्ममयी महामायाने शक्तिगीतामें देवताओंके
पूंछुनेपर निज-मुखसे कहा है कि:-.
मेरी प्रकृति खभावसे होकर परिणामिनी होकर स्पन्दित
होती है। हे देवगणं ! वही खभावजनित स्पन्दनका हिलोल
सदाहीखरूपमें बार बार प्रतिफलित होने लगता है, अतः
मेरी
प्रकृतिके गुणपरिणाके कारण, तमकी ओरके तरकसे अविद्या
और सत्वकी ओरके तरङ्गसे विद्या प्रकट होती है। उस समय
अविद्याके प्रभाषसे बारम्बार तरङ्गोके आघात प्रतिघात दास,

M धर्मकर्मदीपिका। अंगण्यवीचिसकेषु नैकवैधववीचिवत् : चिजनप्रन्थिभिर्देवाः ! स्वत: उत्पद्य भूरिश जीवप्रवाहपुशोऽयमानावन्ती, वितन्यते॥...: ममैवास्ति स्वरूप: हि कर्म पीयूषपायिनः ।। वेदा वदन्ति कम्मास्ति ब्रह्मसारूप्यभागितिः॥ : सर्चद्वैतपूपच्चोऽयं कर्माधीनोऽस्त्यसंशयम् । आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तं दृश्यजातमथाखिलम् ।। ब्रह्माण्डान्तर्गतं सर्व वहते. कमनिघ्नताम् । अव्यक्ताया दशायाश्च देवाः व्यक्तदशोद्भवे ॥ कम्मैव कारणं वित्त कयित्तमतोऽखिलम् !---: अतः कर्माधिकारोऽस्ति सर्वमूर्धन्यतानितः ।। जलपूर्ण जलाशयके 'गणितं तरगो अनेक चन्द्रपिम्बई प्रकाशके समान, हे देवगण ! खतः ही अनेक चिजड़पतिय उत्पन होकर मनादि अनन्त जीवप्रवाहका विस्तार करती हैं। हैं देवतागणं कर्म मेरा ही खरूप है। कर्म ब्रह्म- स्वरूप है ऐसा वेद कहते हैं। समस्त दैतप और आमास्तम्बपर्यन्त. समस्त दृश्यसमूह निःसन्देह कर्माधीन है। ब्रह्माण्डान्तर्गत सब ही वस्तु कर्म के अधीन है। हे देवगण ! मध्यक दशाले व्यक होनेमें कर्म ही कारण है, कर्मके ही अधीन,सब कुछ है, इसलिये कर्मका अधिकार कम्मे मेद, साधारणतः किस प्रकारसे माने गये हैं। 'धर्मकर्मदीपिका । अहं ममेतिवझेदों यथा नास्ति दिवौकसः मन्मच्छयोस्तथा कर्म-मच्छक्क्योनास्ति भिमताला देवाः! उद्भावक सत्व-समसो. कर्म कथ्यते धर्मः सवपूधानवादधर्मस्तद्विपर्ययात् गूई रहस्यीं धर्मस्याऽधर्मस्या येतदेव हि ।. प्रभात सांधारणतो हिं कति विधा:: कर्मभेदाः किस्वरूपाश्चेति ! :: : :. 11... समाधानम्- जगज्जनन्या शक्तिगीतायां'देवान् प्रति इत्थमभिहितम्- सर्वोपरि है। हे देवगणं ! ' जैसे मुझमें और मेरी शक्तिमै 'अहं ममेतिवत् भेद नहीं है, उसी प्रकार मेरी शक्ति और कर्ममें भेद नहीं है।..हे देवगण ! कर्म..ही सश्व और तमका उद्भावक होनेसे सवप्रधानताले धर्म और तमः- प्रधानतासे अधर्म, कहाता है। धर्म और अधर्मका यही गढ़ रहस्य है। प्रश्न- :: . भेदीका स्वरूप क्या है? जगजननीने शकिंगीतामें देवासे इस प्रकार कही है कि धर्मकर्मदीपिका। जैवैशसहजाख्याभिस्त्रिधा कर्म विभिद्यते ॥ आश्रित्य सहज कर्म भुवनानि चतुर्दश । जायन्ते च विराट् सृष्टि: जङ्गमस्थावरात्मिका ।। देवासुराधिकारेण द्विविधन समन्वितम् । सजुष्टं नैकवैचित्र्यैर्भूतसङ्केश्चतुर्विधैः ।। सहजाख्यश्च कम्मैव ब्रह्माण्ड सृजते सुराः !। कर्मभू मर्त्यलोकं हि जैवं कर्म दिवौकसः ।। विविधानधिकारांश्च मानवानां यथायथम् । खनरकादिकान् भोगलोकाश्च सृजते पुनः ।। मन्निघ्नं सहज कर्म जैवं जानीत जीवसात् । जीवाः सन्ति पराधीनाः सहजे कमणि स्वतः।। कर्म साधारणतः 'जैव. ऐश और सहज रूपसे तीन भेदोंमें विभक्त है। चतुर्दश भुवन और उनमें स्थाधर- . जंगमात्मक विराट् सृष्टिका प्रकट होना सहज कमेके अधीन है। सहज कर्म ही चतुर्विध भूतसङ्घ और देवासुर रूपी द्विविध अधिकारसहित अनन्त वैचित्र्यपूर्ण ब्रह्माण्डकी सृष्टि करता है। पुनः हे देवगण ! जैवकर्मके द्वारा ही कर्म- भूमि मनुष्यलोक, मनुष्योंके यथायोग्य विविध अधिकार और खर्गनरकादि भोगलोककी सृष्टि हुप्रा करती है। सहज कर्म मेरे अधीन और जैवकर्म जीवोंके अधीन है.सो. जानो। सहज कर्ममें जीव-खंतःपराधीन हैं.और हे देवग!

धर्मकर्मदीपिका।
जैवे खाधीनता यान्ति जीवाः कम्मणि निर्जराः !
सन्त्यतो मानवाः सर्वे पुण्यपापाधिकारिणः ॥
आभ्यां विचित्रमेवेदमैशं कर्म किमप्यहो । :
साहाय्यमुभयोरेव कम्मैतत् कुरुते किल.॥
केवलं मम कम्मैतदवतारेषु जायते ।
देवाः ! ममावताराणां भेदान्नैकान्निबोधत ॥
आध्यात्मिकाधिदेवाधिभूतशक्तियुतास्त्रयः ।
शक्तिद्वयेन सजुष्टो युक्तः शक्तित्रयेण च ।।
एवं पञ्चविधा ज्ञेया अवतारास्तथैव-च!.
अंशावेशावतारौ हि तथा पूर्णावतारकः ॥
एवं बहुविधास्सन्ति ावतारा दिवौकसः ।
.एते सर्वे प्राप्नुवन्ति निघ्नतामैशकर्मणः ॥
.4
इन दोनोंके
जैवकर्मा, जीव -स्वाधीन हैं, इस कारण सव मनुष्य
पाप-पुरमके भोगके अधिकारी होते हैं।
अतिरिक्त पेश कर्म कुछ विचित्र ही है। ऐश-कर्म उभय
सहायक है, और वह कर्म केवल मेरे अवतारों में ही प्रकट
होता है। हे देवगण ! मेरे अवतारों के अनेक भेद जानो ।
मेरे. अध्यात्मशतियुक्त, अधिदेवशक्तियुक्त, अधिभूतशक्ति-
युक्त, इनमेसे दो शक्तियुक्त और इनमेसे. तीन शक्कियोसे.
युक.अवतार, इस प्रकारले पांच, प्रकारके अवतार जानने

धर्मकर्मदीपिका। 4NKAL दैवी शक्तिं पराभूय प्रभवत्यासुरी यदा । :: अन्यज्ञानं जगत्यत्र ज्ञानज्योतिविलुम्पति-।, असाधवो यदा साधून क्लिश्नन्ति सहसा सुराः !! धर्मग्लानिरधर्मस्य वृद्धधा च जायते यदा ।। जायन्ते तु यदा मां मां विस्मृत्य निरन्तरम् । विषयासक्तचेतस्का इन्द्रियासक्तिलोलुपाः ॥ जीवानां शं तदा कर्तुमवतीणी भवाम्यहम् । सुराः ! समष्टिसंस्कारो हेतुरेवाऽत्र विद्यते ।। . चाहिये और अंशावतार, आवेशावतार और पूर्णावतार, हे देवगण ! इस प्रकारले मेरे अवतारोके अनेक भेद हैं। येसब ऐश-कर्मके अधीन हैं। जब जब देवी शक्तिको परास्त करके मासुरी-शक्ति प्रबल होती है, जब संसारमें जानको आच्छन्न करके अज्ञान प्रबल हो जाता है, हे देवगण ! जब असाधुगण साधुओंको सहसा केश पहुँचाने लगते हैं, जब अधर्म बढ़नेसे धर्मकी ग्लानि होने लगती है और जब मनुष्यगण मुझको भूलकर विषयोन्मत्त और इन्द्रिय- परायण हो जाते हैं तव जीवोंके कल्याण करनेके लिये मैं अवतीर्ण होती हूँ हे देवगण ! -समष्टि संस्कार ही इसमें कारण है।

धर्मकर्मदीपिका।
कोऽसौ संस्कारः, तेन च कर्मणः कीदृशः सम्बन्धः, के च
तभेदाः, वैदिकसंस्काराणाञ्च किं रहस्यमिति ?
.: ..समाधानमः
एतस्योत्तरंतुब्रह्ममयी शक्तिगीतायां देवेभ्यः स्वयमेवामिधत्ते-
बोनश्च कर्मणो ज्ञेयं संस्कारो नात्र संशयः ।
मम पूभावतो देवाः ! व्यष्टिसृष्टिसमुद्भवे ।।
चिन्नड़मन्थिसम्बन्धाजीवभावः पूकाशते ।
स्थानं तदेव संस्कार-समुत्पत्तर्विदुर्बुधाः ॥
.
संस्कार किसको कहते हैं और संस्कारसे कर्मका क्या
सम्बन्ध है और संस्कारके भेद किस प्रकारसे माने गये हैं
तथा वैदिकसंस्कारोंका रहस्य क्या है ?
..
देवताओंसेबह्ममयी महामायाने शक्तिगीतामें कहा है
--
-- कर्मका बीज संस्कार जानो, इसमें 'सन्देह नहीं। हे
देवगण ! मेरे प्रभावसे व्यष्टिसृष्टि होते समय चित् और
जड़को प्रन्थिबंधनकर जीवभावका प्राकट्य होता है, वही
संस्कार-उत्पत्तिका स्थान है, ऐसा विक्षगण समझते हैं।

धर्मकर्मदीपिका सृष्टः संस्कार एवास्ति कारणं मूलमुत्तमम् ।। पाकृतोऽपाकृतश्चैव संस्कारो द्विविधो मतः ।। स्वाभाविको हि मो देवाः ! पाकृतः कथ्यते बुधैः । अस्वाभाविकसंस्कारस्तथाऽपाकृत उच्यते ।। .. खाभाविकोऽस्ति संस्कारस्तत्र मोक्षस्य कारणम् । अस्वाभाविकसंस्कारा निदानं वन्धनस्य च ॥ खाभाविको हि संस्कारस्त्रिधा शुद्धिं प्रयच्छति । . देवाः ! पोड़शभिः सम्यक् कलाभिर्मे पूकाश्यते ॥ मुक्तिपूदोऽद्वितीयोऽपि संस्कारः पाकृतो ध्रुवम् । साहाय्यात्योड़शानां मे कलानां कर्मपारगाः ।। ऋपयः श्रौतसंस्कारैः शुद्धि षोड़शसङ्ख्यकैः । आय॑जातेविशुद्धाया ररक्षुर्यनतः खलु ॥ संस्कार ही संष्टिका 'प्रधान मूलकारण हैं, संस्कार दो प्रकार- का होता है प्राकृत और अप्राकृत । हे देवगण ! विशलोग 'प्राकृतको खामाविक और अमाकृतको अखाभाविक कहते हैं। उनमें स्वाभाविक संस्कार मुक्तिका कारण और अखाभाविक संस्कार बन्धनका कारण होता है। खाभाविक संस्कार त्रिविध शुवि देते हैं। स्वाभाविक संस्कार अद्वितीय और मुक्तिपद होनेपर भी हे देवगण ! यह मेरी षोडशकलाओंसे मलीभांति निश्चय प्रकाशित होता है, मेरी पीडशकसानओको धर्मकर्मदीपिका। ............. अखाभाविकसंस्कारा जीवान बन्नन्ति निश्चितम् । अनन्तास्तस्य विज्ञेया भेदा वन्धनहेतवः ।। स्वाभाविकी यदा. भूमिः संस्कारस्य प्रकाशते !.... : यच्छत्यभ्युदयं नृभ्यो दद्यान्मुक्तिमसौ क्रमात ।। एतावच्छौतसंस्कार-रहस्यमबंधार्य्यताम् । वेद्या भवद्भिरप्येषा श्रुतिर्देवाः ! सनातनी ।। .... संस्कारेण्वहमेवास्मि वैदिकेष्वखिलप्वहो । स्वसम्पूर्णकलारूपैस्तन्नन् स्वाभिमुखं नये ॥ .... गर्भाधान पुंसवन सीमन्तोन्नयन तथा । जातकर्म तथा नामकरणश्चान्नाशनम् ॥ अवलम्बन करके कर्मके पारदर्शी पियोने वैदिक पोडश- संस्कारोंसे पवित्र आर्यजातिको यत्नपूर्वक शुद्ध.. रक्खा है। अखाभाविक संस्कार जीवोंको नियमित बांधा ही करते हैं, उनके बन्धनकारक भेद अनन्त हैं। स्वाभाविक संस्कारकी. भूमि जव प्रकट . होती है, तो वह क्रमशः मनोंको अभ्युदय-प्रदान करती हुई अन्त में मुक्ति देती है, हे देवतागण! आप-लोग यही वैदिकसंस्कारका रहस्य और.:.सनातनी. श्रुति समझे । सब वैविक: संस्कारों में ही, अपनी. पूर्णकलारूपूत विद्यमान है, अतः -अपनी ओर मनुष्योंको आकर्षित करती है। क. बोडश वैदिक संस्कारोके हे देवतागण । नाम ये है। गर्भाधान, पुंसवन,

धर्मकम्मदीपिका।
१
mmM
-
.
चूड़ोपनयने ब्रह्म-व्रतं वेदवतं तथा ।
समावर्तनमुवाहोऽग्न्याधानं विबुधर्षभाः!॥
दीक्षा महाव्रतश्चान्त्यः संन्यासः पोड़शो मतः । .
संस्कारा वैदिका ज्ञेया उक्तषोडशनामका: ।
अन्ये च वैदिकाः स्मार्ताः पौराणास्तान्त्रिकाश्च ये
एषु षोड़शसंस्कारप्वन्तमक्ता भवन्ति ते ।।
पूवृत्ते रोधकांस्तत्र संस्कारां अष्ट चादिमाः ।
अन्तिमा श्रष्ट विज्ञया निवृत्त पोपकाश्च ते ॥
अतो विवेकसम्पन्नः सन्न्यासी विमलाशयः ।
मानाधिपारगो देवाः ! श्रद्ध यो भवतामपि ।।
पूर्ण पूकाश्यं सन्न्यासे संस्कारः पाकृतो मम।
हेतुखं वहते मुक्तर्मोनवानीमसंशयम् ।।
सीमन्तोन्नयन, जातकर्म, नामकरण, अन्नप्राशन, चौलकरण,
उपनयन, प्रावत, देववत, समावर्तन, उद्वाह, अग्न्याधान,
दीक्षा, महाव्रतं और अंन्तिम अंत लोलहवाँ सन्न्यास है।
अन्यान्य वैदिक, स्मार्च, पौराणिक और तान्त्रिक संस्कार
इन्हीं सोलह संस्कारोंके: अन्तर्भुक हैं। उनमें प्रथम
"भाउ संस्कार प्रतिरोधक हैं। और अन्तिम आठ: संस्कार
निवृत्तिपोषक है। इसी कारणं हे देवतागण !: विवेक'
सिम्पन्न विमलालय और शामसमुद्रक पारंगामी सन्न्यासी
.आप.. लोगोंका भी....भंडास्पद है। मेरे खाभाविक
.
.

१
धर्मकर्मदीपिका
स्वाभाविकोऽस्ति संस्कारो मूले सहजकर्मणः !
मूले तथाऽस्ति जैवस्य संस्कारोऽपाकृतो मम ॥
संस्कारो द्विविधश्चास्ते मूल.ऐशस्य कर्मणः ।
जानीतैतद्गहस्यं भोः श्रौतसंस्कारोचरम् ।। ५२ ।।
निखिला एव संस्काराः साचन्ताः सम्पूकीर्तिताः ।
अतो जीवपूवाहेऽस्मिन्ननाद्यन्तेऽपि जन्तवः ।।
मुक्तिशीलास्तथोत्पत्ति-शालिनः सन्ति सर्वथा।
नैवान विस्मयः कार्यों भवद्भिरमृतान्धस: 1:..
शुद्धिः संस्कारजन्यैव मुक्तरास्ते सहायिका
यतः संस्कारसंशुद्धः कर्मशुद्धिं पूजायते ।।..
कर्मशुद्ध स्ततो मुक्तिर्जायते विमलात्मनाम् ।..
अतः संस्कारजां शुद्धि जगुः कैवल्यकारणम् ॥
संस्कारका पूर्ण विकाश,सन्न्यास आश्रम में होकर मनुशौकी
मुक्तिका कारण अवश्यः न जाता है... सहज कर्मके
मूलमें स्वाभाविक संस्कार, जैव-क्रमके मूलमें अस्वाभाविक
संस्कार और पेश-कम्मके मूलमै उभय संस्कार विद्यमान है
यही: श्रौत: संस्कारोंका रहस्य जानो। सब संस्कार
ही सादिःसान्त है, इस कारण जीतप्रवाह अनादि अनन्त होने
पर भी जोक सर्वथा उत्पत्ति और मुकिशीत है, हे देवगण :
इसमें:
::मार: विस्मय न करें। : संस्कारजन्य अधिः ही
मुक्रिकी सहायक है, क्योंकि संस्कारयुधिले कर्मिकोशुद्धि
.

धर्मकर्मदीपिका-1 -- बीजमुत्पद्यते वृक्षावृक्षो धीजात्पुनः पुनः । एवमुत्पद्यमानौ तौ बोजवृक्षो निरन्तरम् ।। सृष्टिक्रमानन्तभावमुभौ घोतयतो यथा । एव सृष्टिपवाहोऽयमनामन्तोऽस्ति निर्जराः ! ॥ यथा तु भजित वीजं नाङ्कुराय पूकल्पते । तथैव कामनानाशात् खलु भर्जितवीजवत् ।। संस्कारा अपि जायन्ते सर्वथा मुक्तिहेतवः । नान कथन सन्देहो विद्यतेऽदितिनन्दनाः ।। गुणत्रयास्मिका देवाः ! विद्यते प्रकृतिर्मम । तस्याः स्पन्दादभूत्कर्म सहजातमतोऽस्ति तत् ॥ और कर्मशुद्धिसे निर्मल चित्तचालौकी मुक्ति होती है, इस- लिये संस्कार-शुद्धिको फैवल्यका कारण कहते हैं। जिस प्रकार मीजसे वृक्ष और वृक्षसे पुनः पुनः घोज होते हुए योज और वृक्ष. सृष्टिक्रमकी अनन्तता निरन्तर प्रकाशित करते है, है देवगण। वैसेयी सष्टिप्रवाह अनादि अनन्त . है। परन्तु भर्जित योज जिस प्रकार अनुरोत्पत्ति करनेमें असमर्थ है, उसी प्रकार कामनाके नाश हो जानेसे संस्कारसमूह मी भर्जित योजके सदृश होकर ही सर्वथा मुक्तिके कारण बन आवे हैं, हे देवगण । इसमें कुछ सन्देह नहीं है। मेरी प्रकृति त्रिगुणमयी होनेके कारण और कर्म प्रकृतिस्पन्दनने B धम्मकम्मदीपिका संस्कारो वीजतुल्योऽस्ति कात्राकुरसग्निभम् । अतो नष्टे हि संस्कारे कर्मण: सम्भवः कुतः ॥ अन्यत्वात्प्रकृतेः साक्षात्सहर्ज कर्म कोविदाः । उत्पत्तरपि मोक्षस्य जीवानां कारणं विदुः। प्रातिफूल्येन जैवन्तु जीवानां कर्मवन्धनम् । यावज्जैवं न वै कर्म संस्कारै दिकैः शुभैः ।।.. पूर्ण शुद्ध सदानोति दशां स्वाभाविकी हिताम् । तावन्नूनं भवेत्पूर्ण जीवकैवल्ययाधकम् ॥ धर्मस्य धारिका शक्तिस्तस्य चाभ्युदयपूदः । क्रमः कैवल्यदश्चैव सहजे पाकृते शुभे । उत्पन्न होनेके कारण उसका सहजात है। संस्कार कर्मबीज मौर अङ्गुर सदृश हैं, इसलिये संस्कार नष्ट हान- पर कर्मका होना कैसे सम्भव है। सहज कर्म प्रकृतिसे. 'साक्षात् उत्पन्न होनेके कारण नीचोत्पत्तिका भी कारण है और जीवमुक्तिविधायक भी हैं, इस बातको पण्डितलोग जानते हैं। परन्तु जैवकर्म इससे विपरीत होनेके कारणं बन्धनका कारण है और जब तक वह शुभ वैदिक संस्कारोंसे परिशुद्ध होकर हितकारिणी 'खाभाविक दशाको नहीं प्राप्त होता, तब तक नीवको मुक्तिका निभयही पूर्ण बांधक रहता है। धर्मको धारिका शक्ति और धर्मका अभ्युदवं ७ ... Avina- . धर्मशम्मदीपिका। नित्यं जागर्ति संस्कार पाणिनां हितसाधके । विश्कल्याणदे नित्ये सर्वश्रेष्ठ,मनोरमे ।। संस्कारेश्वहमेवास्मि सर्वपूक्तेषु सन्ततम् । संस्थिता धर्मरूपेण निश्चितं विवुधर्षभाः !! नारीजातौ तपोमूलः सतीधर्मः सनातनः । स्वयमेव हि संस्कारशुद्धिं जनयते ध्रुवम् ॥ वर्णाश्रमाख्यधन्मल मर्यादा नितरां तथा। नृजातावपि सत्कार-शुद्धिं जनयतेतराम् ।। नाय्य पुरुपायच धर्मावुक्तावुभावपि । स्वाभाविकावतस्तातो सदाचारावनादिको ।। एतदद्वयसदाचारालम्वनादेव निर्जराः । लभन्ते च ना नार्यः कैवल्याभ्युदयौ क्रमात् ।। और निःश्रेयन प्रदानका क्रम प्राणियोंके हितसाधक, संसारके कल्याणकारका, नित्य, शुभ, सर्वश्रेष्ठ और मनोरम सहजात स्वाभाविक संस्कारमें नित्य बना. रहता है... देवगण ! उक्त पोडश संस्कारों में में हो धर्मरूपसे सदा ही विद्यमान है। नारीजानिके लिये · तपोमूलक सनातन सती-धर्म संस्कारशुद्धि अपने आप ही उत्पन्न करता है, यह निश्चय है। उसी प्रकार पुरुषजातिम .भी.. घर्णाश्रम- धर्ममर्यादा संस्कार-शुद्धिको निरन्तर उत्पन्न करती है। श्री. और पुरुषके लिये ये दोनों धर्म स्वाभाविक है अतः ये दोनों सदाचार अनादि. . है।.. हे देवगण,!

i धर्मकर्मदीपिका। v- उभावेतौ सदाचारौ शुद्धित्रैविध्यकारको। संस्कारस्य च सर्वस्य पाकृतस्य प्रकाशको ।। वद्ध को स्तश्च सत्त्वस्य कैवल्याभ्युदयप्रदौ । सतीधर्माश्रयान्नारी पत्यौ तन्मयतां गता ॥ नारीयोनेः सती मुक्ता भुक्त्वा वर्गसुखं चिरम् उन्नता पुरुषस्यैव योनि पाप्नोत्यसंशयम् ।। सम्यग्वर्णाश्रमाख्यस्य श्रौतधर्मस्य सेवया । विश्वेषां गुरखो मान्या निखिला आर्यपूरुषाः ।। आद्यनानगला खीयां प्रवृत्तिमवरुध्य ते । परिपोष्य निवृत्तिश्च परेणात्मप्रकाशिकाम् ॥ इन दोनों सदाचारोंके अवलम्बनसे ही यथाक्रम नारीमाति- • और पुरुषजाति अभ्युदय और निःश्रेयसको प्राप्त करती है। ये दोनों सदाचार विविध-शुद्धि-विधायक ई, सकल स्वाभाविक संस्कारोके प्रकाशक हैं । सत्त्वगुणवर्द्धक हैं और अभ्युदय और निःश्रेयसप्रद हैं। सतीधर्मके आश्रयसे नो पतिमें तन्मयता लाभ करके बहुकालतक खर्गसुख भोगती दुई नारीयोनिसे मुक्त होकर उन्नत पुरुषयोनिको. ही निश्चय प्राप्त हो जाती है । वेदविहित - वर्षाध्रमधर्मकी सुन्दर- कपसे सेवा करनेसे जगद्गुरु और मान्य समस्त भार्यपुरुष- गण प्रथमके द्वारा अपनी अनर्गल प्रवृत्तिको रोक कर और धम्र्मकम्मदीपिका। mam - अपवर्गास्पदं नित्यं परमं मङ्गलं चिरम् । पाप्नुवन्ति सुपर्वाणः ! स्यादेषोपनिषत्परा ।। प्रश्न:- त्रिविधकर्मणां कि वैज्ञानिक स्वरूपम् ? समाधानम्- सैव महामाया शक्तिगीतायां स्वयम् उवाच- स्वभावात्प्रकृति, हि स्पन्दते परिणामिनी। स एव स्पन्दहिल्लोलः स्वभावोत्पादितो मुहुः ।। सदेवास्ते भवन् देवाः ! स्वरूपे प्रतिविम्वितः । तस्मान्मम.प्राकृतानां गुणानां परिणामतः ॥ हमरेके द्वारी आत्मप्रकाशिका निवृत्तिको बढ़ाफर परमङ्गलमय और नित्य कैवल्यपदको निरन्तर प्राप्त कर लेते हैं, हे देवगण । यही श्रेष्ठ उपनिषद् है। - विविध कर्मफा वैज्ञानिक स्वरूप क्या है? जगजननी ब्रह्ममयी महामायाने शक्तिगीतामें निज मुखसे . मेरी प्रकृति'स्वभावसेही परिणामिनी होकर स्पन्दित होती है। हे देवगण ! यही स्वभानजनित स्पन्दनका हिलोल सदा ही स्वरूपमें पारम्वार प्रतिफलित होने लगता है, अतः मेरी प्रकृ-

धर्मशम्दीपिक्षा।
:
अविद्याऽऽविविन्नून तरङ्गस्तामसोन्मुखः ।
सत्वोन्मुखैश्च तैवाः! विद्याऽऽविनावमति च ।।
तदाऽविद्याप्रभावेण तरङ्गाणां मुहुर्मुहु ।
श्राघातप्रविघाताभ्यां जलैः पूर्णे जलाशये ।।
अगण्यवोचिसङ्खघु नैकवैवविम्बक्त् ।
चिजड़प्रन्थिभिर्देवाः ! खत उत्पच भूरिशः।
जीवप्रवाहपुतोऽयमनाद्यन्तो वितन्यते।
लदैवोल्द्य संस्कारो नूनं स्वाभाविकों मम ॥
कुमणा सहजेनैव विश्वविस्तारकारिण ।
आविर्भावयते सृष्टिं जङ्गमस्थावरात्मिकाम् ॥
तिके गुणपरिणाम के कारण तमकी ओरफे तसे विद्या
और सत्वको भोरके तरहसे विद्या प्रकट अवश्य होती है।
उस समय विधाके प्रभावसे वारम्वार तरह के बात
प्रतिघात द्वारा, जलपूर्ण जलाशयके भगणित तरहोम भनेक
चन्द्रबिम्बके प्रकाशके समान, हे देवगण ! स्वतः ही अनेक
विजडमनिय उत्पन होकर अनादि अनन्त जोजप्रवाहको
विस्तार करती है। उसी समय मेरा स्वाभाविक संस्कार
अवश्य उत्पन्न होकर संसारविस्तारकारी सहकर्मसे
ही स्थावर जंगमात्मक सृष्टिः प्रकट करता है।
जीवत्वकी पूर्णता मनुष्य शरीरमे प्राप्त होनेपर जैवकर्म उत्पत्र

२१ धम्मरमदीपिका। किन्तु मानवदेहेषु पूर्णे जीवत्व श्रागते । जैवमुत्पद्यते कर्म तत्र तत्तणमेव तु ॥ अस्वाभाविकसंस्कार-प्रवाहो वहते ध्रुवम् । जैवकर्मप्रभावात्स वैश्ववैविध्यसाकुलम् ।। त्रितापप्रचुरं रनेदावागमनचक्रकम् । जैवकर्मप्रभावाच तस्मादेव भवन्त्यमी ॥ नरपतपित्रादिभोगलोकाः स्वरन्विताः । मृत्युलोकात्मक कर्म-लोकश्च दिबुधर्षमाः !" उत्पद्यन्ते तधमानि मुवनानि चतुर्दश । विद्याऽऽरते मामकीना या पूर्णसत्त्वगुणान्विता ।। एतस्याः कारणत्वेन शक्तिशस्य कर्मणः । विचित्रास्ति तयोस्ताभ्यां कर्मभ्याच सहायिका ।। होता है और वहां उसी समय अस्वाभाविक संस्कारका प्रवाह प्रवाहित अवश्य होना है और वह जेब कर्म पलसे प्रहायडके पैचियसे युक्त और त्रितापमय आवागमनचक्रको स्थायी रसता है। उसी जैवफर्मक प्रभावसे स्वर्गलोक सहित नरक- लोक, मेतलोक, पितृलोकादि भीगलोक और मृत्युलोकरूपो कर्मलोक तथा हे देवगण | चतुर्दश भुवन उत्पन्न होते हैं। पूर्ण सत्वगुणमयी मेरी विधाके कारण ऐश फर्मको शक्ति- सन दोनों कमौकी सहायफ होनेपर भी उनसे विचित्र है।

२२
धर्मादार्मदीपिका
विद्यायां सत्त्वपूर्णायामविद्यायाः कथश्चन ।
नैवास्ते लेशमात्र हि विद्यासेवित ईश्वरः ।।
सर्वतोऽतस्तटस्थोऽपि सर्वेषामन्तरात्महक् ।
यथायथं पालयते सृष्टिस्थितिलयक्रमम् ॥
अतोऽहमेव सम्प्रोच्ये जगत्यां जगदीश्वरी ।
माहामान्या जगद्धात्री सर्वकल्याणकारिणी ॥
देवाः! प्रकृतिजन्यत्वादस्ति कर्म जडात्मकम् ।
अतः कर्मत्रयेऽपि स्यात्पूर्ण वस्सुसहायता ।।
सञ्चालने भवन्तो हि कर्मण. सहजस्य मे।
पूर्ण सहायकाः सन्ति तन्मे प्रकृतिसाद्यतः ।।
विद्यावस्थामै सत्वगुणकी पूर्णता होनेसे किसी प्रकारसे भी
प्रशानका लेशमात्र नहीं रहना, इस कारण विद्यासेवित ईश्वर
सबसे अलग रहकर भी सबके अन्तर्द्रा होकर सष्टि
स्थितिलयका क्रम यथावत् पालन कराते हैं। इसी कारण
मैं ही जगत्मे अगदीश्वरी विश्वकल्याणकारिणी जगद्धात्री
महामान्या कहलाती है। हे देवतागण ! कर्म प्रकृतिसात
होने के कारण जड़ है, इस कारण तीनों कर्मोमें आपलोगों-
की पूरी सहायता विद्यमान है। सहजकर्म सञ्चालनमें
आपलोग पूर्ण सहायक हो, क्योंकि सहजकर्म मेरी प्रकृतिके
अधीन है। हे. देवतागण ! जैवकर्मजीवप्रकृतिके अधीन

धर्मकर्मदीपिका।
२३
.
जैवं कास्ति जीवानामायत्तं प्रकृतेर्यतः ।
अतस्तत्रार्द्धसम्बन्धो वर्तते भवतां सुरा' ! ॥
भवन्तो मानवानां हि सन्ति प्रारब्धचालकाः।
पुरुषार्थस्य कर्तारः स्वयं जीवा न संशयः ।।
किन्त्वैशकर्मणो देवाः! श्राज्ञां लब्ध्वाऽथ मामकोम् ।
अवतीयं भवन्तो वै सम्पद्यन्ते सहायकाः ।।
ममावतारसाहाय्ये प्रवर्त्तन्तेऽथवा द्रुतम् ।
अत्यन्तमस्ति दुजें या गहना कर्मणो गतिः ॥
राजते कर्मराज्यञ्च नानावैचित्र्यसकुलम् ।
अनन्तपिण्डब्रह्माण्ड-कत कम्मैव विद्यते ।।
यो मे कर्मगतिं वेत्ति स मत्सान्निध्यमाप्नुयात् ।
न स्वल्पोऽन्यत्र सन्देहो विधेयो वित्मयोऽथवा ॥
होने के कारण उसमें आपका आधा सम्बन्ध है क्योंकि मनुष्यों
मैं प्रारब्ध सञ्चालक आपलोग और पुरुषार्थका जीव स्वयं
हैं। परन्तु हे देवतागण ! मेरी आशाको पाकर अवं-
तार ग्रहण करके तुमलोग ऐश 'कर्मके सहायक बनते हो।
अथवा मेरे अवतारोंकी सहायतामें शीघ्र प्रवृत्त होते हो।
कर्मकी गहन गति अतिदुईय है । कर्मराज्य नाना-
वैचित्र्यसे पूर्ण है और कम ही अनन्त पिण्ड और अनन्त ब्रह्मा-
एडोका कर्ता है। जो मेरे कर्मों की गतिको जानता है,
वह मेरे सान्निध्यको लाभ करता है, इसमें सन्देह और विस्मय.

धर्मषम्मदीपिका। दक्षाः कार्मगतिं ज्ञातु भक्ता ज्ञानिन एव में। ज्ञातु कर्मगतिं जीवा अन्यथेच्छन्त आत्मना ।। विद्याभिमानिनो मूढा मम भक्तः पराङ्मुखाः । विमार्गगाः पतन्त्याशु राज्यन्धा इव गहरे ॥ प्रश्न:- किश्च जैवकर्म-गति-रहस्यम् ? समाधानम- ब्रझमय्या भवतां प्रश्नस्थोत्तरमेवमभिधीयते- जैवस्यकम्र्मणे देवा ! द्वे गती स्तः प्रधानतः । जीवानेका गतिजैवी झधस्तान्नयते तयोः ॥", कुछ भी नहीं करना चाहिये। मेरे सानी भक्त ही कर्म- गतिवेत्ता हो सकते हैं। अन्यथा कर्मकी गति जानने की स्वयं इच्छा करनेवाले मेरी भक्तिसे विमुख विद्याभिमानी सूख जीव मूर्ख सध्यन्धफे समान विपथगामी होकर गड्ढे में शीघ्र गिर जाते हैं। प्रश्न- जैव कर्मकी गतियोंका रहस्य क्या है ? जगज्जननी महामयी महामायाने शक्तिगीतामें निज मुससे कहा है कि है देवगण] जैवकर्मकी प्रधान दो गतियाँ हैं। उनमें से एक गति जीवोंको अधापतित करती है और उनको जड़त्वको धर्मकर्मदीपिका। . . प्रापयेत जड़त्वं च देवाः ! साऽऽस्ते तमोमयी। यतयाधर्मसम्भूता वर्शतेऽसौ दिवौकसः ।। ऊर्ध्व प्रापयते जीवान् द्रुतं जैव्यपरा गतिः । स्वरूपं चेतनश्वासावभिलक्ष्य प्रवर्तयेत् ॥ धर्मस्य धारिकाशक्ति-युता सत्त्वमयी हि सा । इयं हि कर्मणो देवा' ! गतिः सेन्योर्गवगामिनी ॥ देवाः ! अवगते वकर्मणोऽस्याः कदाचन । विच्योतेरन कथञ्चिन्न भवन्तो भोगलोलुपाः ।। मार्गमालन्ध्य मे नूनमेनमेवोईवगामिन्म । . मामनायासमेवाशु भवन्तो लधुमोशते ।। ओर ले जाती है, वह तमामयी गति है. क्योंकि वह अधर्म- सम्भूत है। उसकी दूमरी गति जीवोंको शीघ्र ऊद्ध करती है. और उनको स्वस्वरूप चेतनकी ओर प्रवृत्त करती है, वह गति सत्रमयो है, क्योंकि वह धर्मको धारिका शक्तिसे युक्त है। हे देवगण ! कर्मकी यही ऊईश्वगामिनो. गति -सेवनीय है। हे देवतागण ! आपलोग कदापि भोगलाललाके वशीभूत होकर जैव कर्मको इस ऊध्व- गामिनी गतिसे : किमी प्रकार च्युत न होना। इसी ऊर्दू- म्वगामी मेरे मार्गको अवलम्बन करके आप मुझको अना- यास : शीघ्रही प्राप्त हो सकोगे। हे देवतागण !: मेरी बात सुनो, कर्म के साथ दो शक्तियों का सर्वथा सम्बन्ध है, .

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.
२६ .
धर्मकर्मदीपिका।
श्रूयतां मचा देवाः ! कर्मणा सह सर्वथा.।'
सम्बध्येतेऽथ शक्ती द्वे आकर्षणविकपणे ॥
दिवौकसः ! रागमूला शक्तिराकर्पणाभिधा ।
भवद्भिरवगन्तव्या समुत्पन्ना रजोगुणात् ॥
विकर्षणाख्या या शक्तिरपरा द्वेषमूलिका
अवधार्या भवद्भिः सा समुद्भूता तमोगुणत् ।।
आभ्यां द्वाभ्यां हि शक्तिभ्यां ब्रह्माण्डं निखिलं तथा ।
पिण्डं समस्तमाच्छन्नं सत्यमेतद्वदामि वः ।।
एतच्छक्तिद्वयं ह्यास्ते मयि नैवास्म्यहं तयोः ।
बलाच्छक्तिवयस्यास्य कर्मजातमधाखिलम ।।
सम्विभक्तं द्विधा देवाः ! उत्तरोत्तरवर्द्धकम ।
सृष्टेर्द्वन्द्वात्मिकाया मे प्रवाह वाहयत्यहो ।
एक आकर्पणशक्ति और दूसरी विकर्षणशक्ति। भाकर्ष
पशक्ति रोगपूरलक होनेसे रजोगुणसे उत्पन्न है, हे देवगण !
इसको भाप समझे। दूसरी विकर्षणशक्ति द्वेषमूलक
होनेके कारण तमोगुगसे उत्पन्न है ऐसा आप समझे।
इन्हीं दोनों शक्तियोंसे समस्त ब्रह्माण्ड और समस्त पिण्ड
आच्छन्न है, इसको अपलोगोंसे मैं सत्य कहती हूं। ये
दोनों ही शक्तियां मुझमें हैं, परन्तु मैं इन दोनों में नहीं हूँ।
इन दोनों शक्तियोंके प्रभाषसे सब कर्मसमूह द्विधा विभक
होकर मेरी द्वन्द्वात्मक दृष्टिका प्रवाह उत्तरोत्तर प्रवाहित
.

धर्मकर्मदीपिका। २७ 1- समता च द्वयोर्यत्र शक्त्योः संजायते शुभा । तत्रैव सत्त्वसंजुष्ट-ज्ञानानन्दस्थितिभवेत् ।। अहं तस्यामवस्थायां सत्वमय्यां सदा सुराः ! नन्वाविर्भावमापन्ना सन्तिष्ठे नात्र सशयः ।। काऽप्यवस्था बन्धहेतुः शक्तिद्वयसमन्विता । जीवानां सर्वथा देवाः ! जीवत्वस्यैव पोपिका ।। सत्वावस्था तृतीया या सैव मुक्तिप्रदायिका । एतच्छ्रौतरहस्य हि ज्ञायतां विवुधर्पभाः ! ॥ प्रश्न- किं स्वरूपः, कर्मयोगः तत्सम्बन्धन कथं वा निःश्रेयसा- धिगमः. करते रहते हैं। इन दोनों शक्तियोंकी जहां सुन्दर समना होती है, वहीं सत्वगुणमय ज्ञान और प्रानन्दका स्थान है। उसी सत्वगुणमय अवस्थामें मैं सदा प्रफट रहती हूँ, हे वगण ! इसमें सन्देह नहीं है। इन दोनों शक्तियोले युक्त बन्धन करनेवाली यह अवस्था सर्वथा जीवोके जीवत्वकीही पोषिका है। तीसरी सत्वगुणकी जो अवस्था है वही मुक्तिविधायिका है, हे देवगण ! यही वेदोंका रहस्य है सो आप जानें। . कर्मयोगका स्वरूप क्या है और कर्मसम्बन्धसे मुलिपदं कैसे.प्राप्त हो सकता है।

धर्मकम्मंदीपिका। - समाधानम्- शृण्वन्तु सावधानाः, एतदुत्तरितं जगजनन्या शक्तिगीता याम्- द्वन्द्वात्मिकाऽस्ति या शक्तिस्तन्मूलं विबुधाः! अतः । मुच्यतां सर्वदा कर्म रागद्वेषादिसलम ।। रागद्वपादिभिर्मुक्ता द्वन्द्वातीतपई गता. । निष्कामाः सत्त्वसम्पन्ना यूयं कर्त्तव्यकर्मणि ॥ कर्मयोगरताः सन्तस्तत्परा भवतामराः!। सर्वोत्तमफलं लब्ध्वा सानन्दा भवताप्यहो । भो देवाः ! कर्नयोगेऽस्मिन् प्रत्यवायो न विद्यते । काप्येतत्कृतं स्वल्पं त्रितापं हरते क्षणात् ।। उत्तर- जगज्जननी ब्रह्ममयी महामायाने शकिगीता निज मुखसे हे देवतागण ! इस कारण आपलोग द्वन्द्वात्मक-शक्ति मूलक और रागद्वपादिसंकुल फर्मका सर्वदा त्याग करें। हे देवगण ! रागद्वेषसे विमुक्त होकर द्वन्द्वातीत पदवीको नाम करते हुए निष्काम होकर और सत्वगुणसे युक्त होकर कर्मयोगी होते हुए दर्तश्यकम्मपरायण होवे और सर्वोत्तम फल पाकर आनन्दित हो। हे देवगण ! इस कर्मयोगमें प्रत्यवाय नहीं है और यह कर्म थोडासा किया हुमा -

धम्म्मदीपिका।
कर्मयोगोऽनमेवाशु कामनापिलयन हि ।
समुत्पादयते देवाः ! शुद्धिं संस्कारगोचराम् ।।
संस्कारशुद्धितो नूनं क्रियाशुद्धिः प्रजायते ।
अविद्यायाः क्रियाशुद्धया लयः सम्पद्यते ध्रुवम् ॥
अविद्यापिलयाद्विद्या साहाय्यानश्यति स्वयम् ।
चिन्नड़मन्दिरशानगृलिका नात्र संशयः ।
चिजन्यसनाशाजीयो वैजायते शिवः।
नैवान विस्मरः कार्यो भवद्विरमृतान्धसः ।।
प्रशासपिण्डरूपस्य बनायन्तस्य कोविदाः ।
देवाः ! सृष्टिप्रवाहस्य कर्मयोत्पादकं जगुः ।।
गी शीम पितापको दूर करता है। हे देवगण । यही
कर्मयोग कामनाके वियद्वारा संस्कारशुदि शीघ्र उत्पन
करता है। संस्कारशुद्धिसे ही क्रियाशुद्धि होती है और
बियाशुद्धिसे विधाका चिलय अवश्य होता है और उससे
দ্বিখান্ধী দ্বারা ক্লাহ অলিদুলঙ্গ নিকি
नाश स्वयं हो जाता है. इसमें सन्देह नहीं। और
निवन्धिके नाश होनेले ही जीव शिच होजाता है। हे
देवगण ! मापनोग इसमें विस्मय न करो। हे देवगणा !
कर्मही ब्रह्माण्ड ओर पिण्डात्मक शनादि अनन्त एंष्टि-

धर्मकर्मदीपिका।
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.
कर्मप्रयाहोऽनाद्यन्तस्ततस्तद्भोगलिप्सया ।
सक्तानां तन्न जीवानां कर्मनाशः सुदुष्करः ।।
अथवा मोचनं नूनं दुलभं कर्मवन्धनात् ।
वत्तते विवुधश्रेष्ठाः ! किमन्यद्वो अवीस्यहम् ।।
तत्कर्मवोजसंस्कारमुन्मूलयितुमात्मना ।
निष्कामनावतैः सर्भिवद्भिर्यत्यता सुराः !॥
तस्याहं सुगमोपायं वर्णये वः पुरोऽधुना ।
समाहितैर्भवद्भिश्च श्रूयतां मे हितं वचः ।।
मत्परायणतां पुण्यां गृह्णीताश्रयणं मम ।
मद्भक्ताः सततं कम मधुक्ताः कुरुतामराः ! ॥
प्रवाहका उत्पादक है, सुधीगण ऐसा कहते हैं। कम्म
प्रवाह अनादि अनन्त है, इस कारण कर्मके भोगको इच्छासे
कर्ममें नासक्त होकर कर्मका नाश करना अथवा कम्मके
फन्देसे मुक्त होना जीवोंके लिये असम्भव है. हे देवश्रेष्ठगण!
आप लोगोसे और मैं क्या कहूं। इस कारण हे देवगण !
आपलोग निम्काम व्रत होकर कर्मवीजरूपी संस्कार
के नाश करनेमें स्वयं प्रयत्न करो। इसका सुगम उपाय
मैं आपलोगोंके सामने इस समय वर्णन करती हूं, आपलोग
भी सावधान होकर मेरी हितकी बात सुने। हे देवगण !
आप मेरी पवित्र परायणताको ग्रहण करो, मेरा आक्षय ग्रहण
करो, मुभमेही भक्तिमान, हो और मुझमे युक्त होकर निरन्तर

धम्मकार्मदीपिका। ३१ मयुगे पलं फर्म यन्धनार प्रकल्पते । मयुक्तैर्विहितं तत्तु दत्ते कैवल्यमुत्तमम् ॥ संसारीऽतिविचित्रोऽवं जीवबन्धनकारकः । विफपहाफ शारय-न्दादेव प्रजायते।। संमिष्ठतेच जीवानां द्वन्द्वः सात् बन्धकारएम परवल्यकतत्वं हि मुक्तः कारणमुत्तमम् ।। तदाभयेण गद्रता द्वन्द्वातीता विमत्सराः। युक्तामरताः सन्तो निष्पापा मत्परायणा ॥ यदा भवन्ति मी देवाः ! निष्कामव्रतधारिणः । तव मोइतन्याजायन्ते तेऽधिकारिणः ॥ कम करो। सुझमें प्रयुक्त होकर किया हुमा फर्म वन्धन- दशाको उत्पन्न करता है और मुझने युक्त होकर किया दुमा कर्म उत्तम कै पत्यप्रद है। हे देवतागण ! पाक पा-विकपशु जनिन इन्द्रसे ही सधन करने वाला यह अनि विचित्र संसार उत्पन्न क्षेता है और स्थित रहता है, क्योंकि इन्द्र ही जीयोंके पन्धनका कारण है, परन्तु एकतत्व ही मुक्तिका उत्तम फारण है, उसके श्राश्रयसै द्वन्द्वातीत और विमत्सर होकर जब मेरे भक युक्त फर्ममें रत होकर निष्पाप मत्परा. गुश और निष्ताम-प्रतधारी होजाते हैं, तभी वे कैवल्य पद प्राप्तिके अधिकारी होते हैं। रजवीजरूपी जैवकर्म ३२ धर्मम्मदीपिका यदा संस्कारवीज स्यानिष्कामानलभजितम् । जैवं कम्म तदा रक्त-धीजरूपं प्रणश्यति ।। एवं सति स्वयं जीवा जैवी प्रकृतिमात्मनः । त्यक्त्वा मत्प्रकृति नूनमाश्रयन्ते शिव:दाम् ।। तदा मत्प्रकृतिविथा-रूपं धृत्वा मनोहरम् । साधकेभ्यो ध्रुवं तेभ्यो दत्ते कैवल्यमुत्तमम् ।। करमप्रतिक्रिया देवाः ! अदम्याऽस्ति न संशयः। तत्फलोत्पादिका शकिरफला नो कलाचन । प्रतो मुक्तेऽपि जीवेऽस्मिन् तत्ताः फर्मरारायः । निवजा निष्फला नैव जायन्ते विबुधपभाः!॥ सभी नाशको प्राप्त होते हैं जव संस्कारधीज निष्कामा श्रग्निसे भर्जिन कर दिये जायें। ऐसा होनेपर जीव स्वतः अपनी जैव प्रकृतिको छोड़ कर मेरी एरममलकर प्रक: तिका ही आश्रय ग्रहण करते हैं। मेरी प्रकृति तय मनो- हर विद्यारूप धारण करके उन्हीं साधकोंको उत्तम मुक्ति प्रदान करती है। हे देवतागण ! कम्मकी प्रतिक्रिया निस्सन्देह अदमनीय है और कर्मको फलोत्पादिका शक्ति कभी भी अफला नहीं होती। इस कारण हे देवगण जीव: मुक्त हो जानेपर भी उसके किये हुए कर्मसमूह निर्बीज और 'निष्फल नही होते हैं। मुक्तजीवोंके कम्ौको संस्कार- Por धर्मकर्मदीपिका। निर्जराः ! मुक्तजीवानां कर्मसंस्कारराशयः । ब्रह्माण्डस्य चिदाकाशमाश्रयन्तो निरन्तरम् ।। जायन्ते पोषिकाः सम्यकर्मणोः सहजैशयोः । सत्यमेतद्विजानीत निश्चितं वो वीम्यहम् ।। कर्म प्रायेण दुर्जेयं वर्तते नात्र संशयः । सन्त्येव निखिला जीवाः कम्मघवशवर्तिनः ।। यूयं भवन्तो भो देवाः ! विश्वेषां शासका अपि । महान्तोऽपि सुयुक्ताः स्थ सुहः कर्मबंधनैः ।। वाच्यं किमत्र गीर्वाणाः ! अवतीर्णा स्वतोऽपहम् । चद्धा करमसु वर्तेऽहं नात्र कार्या विचारणा जीवन्मुक्ता महात्मानो मद्भक्ता ज्ञानिनोऽमराः !! प्राप्ता जीवद्दशायां ये मत्सायुज्यमसंशयम् ।। राशि ब्रह्माण्डके चिदाकाशको श्राध्य करके निरन्तर सहजकर्म और पेशवर्मकी पोषक भली भांति बन जाती है,हे देवतागण.! इसको सत्य जानें, मैं ठीक कहती हैं। कर्म एक प्रकारसे दुर्जेय हैं इनमें सन्देह नहीं। सब जीवगण तो कम्मौके वशीभूत होते ही हैं और हे देवगण ! तुम लोग जगत्के नियामक और महान् होनेपर भी सुदृढ़ कर्मबन्धनसे 'युक्त हो। हे देवतागण ! इसमें क्या कहा जाय, यहां तक कि, मैं भी अपनी इच्छासे अवतार धारण करती हुई कर्ममें बंध जाती हूं; इसमें कुछ विचारने की बात नहीं है। है देवंगण ! मेरेशानी भक्त जीवन्मुक्त महात्मा जो.जीवित- ३

धर्मकर्मदीपिका।
तेऽपि नैव.विमुच्यन्ते ध्रुवं कर्मप्रभावतः ।
जीवन्मुक्तहिं मद्भक्तानिमिश्चापि भुज्यते ।
जैवकर्मस्वरूपं वै प्रारब्धं कर्म निश्चितम् ।
प्रारब्धकर्मभिर्गस्माद्भोगादेव प्रणश्यते ।
वासनासंक्षयान्नूनं करमणः सहजस्य वै।
निमतां यान्ति ते मुक्ताः परसौभाग्यशालिनः ।।
जीवन्मुक्ता महात्मानो यतः स्युमत्परायणाः ।
तत्ते किमप्यनिच्छन्तो विचरन्ति महीतले ।।
कर्मण: सहजस्यामी निघ्नाः सन्ति यतः सुराः!।
भववक्रियाणां ते केन्द्रीभूता भवन्त्यतः ।।
अहं यद्यपि भक्तभ्यो ज्ञानिभ्यो हि किमध्यणु ।
दशामें ही मेरी सायुज्य दशाको प्राप्त हो जाते हैं, वे भी कर्मक
प्रभावसे अवश्य ही बच नहीं सक्त। मेरे जीवन्मुकशानी
भकोको भी जैवकर्मरूपी प्रारब्धकर्मका भोग अवश्य ही करना
पड़ता है, क्योंकि प्रारब्धका भोगसे ही क्षय होता है। वासना-
नाश हो जानेसे उन परमसौभाग्यशाली मुक्तोंको सहजकर्मके
ही अधीन बनना पड़ता है, क्योंकि वे जीवन्मुक्त महात्मा
मत्परायण होनेसे इच्छारहित होकर पृथिवीपर विचरते हैं।
हे देवतागण ! वे सहजकर्मके अधीन होनेके कारण तुम्हारी
दैवी क्रियाओंके भो केन्द्र बन जाते हैं। हे देवगण.! यद्यपि
मैं कानी भकोंको कभी भी किसी प्रकारसे भणुमात्र भी क्लेश
.
-

धर्मकर्मदीपिका।
३५
-Furn m.
कदाचिदप्यहो कष्टं दातुं नैवीत्सहे सुराः ।।
तथापि रुचितस्तेषां तान् संयोज्यशकर्मणा ।
तैध्रुवं विश्वकल्याणं कारयेऽहमतन्द्रितैः ।।
माहात्म्यं कर्मणो देवाः ! सर्वश्रेष्ठत्वमाश्रितम् ।
कम्म भक्ता अपि त्यक्तुं प्रभवो ज्ञानिनोऽपि न ।।
यावदेह न कोऽपीशः कर्म त्यक्तुमशेषतः ।
कर्मयोगाश्रितैस्तस्माद्भवद्धिमत्परायणैः ॥
प्रतिभैवम्विधा शुद्धा नूनमुत्पाद्यतां सुराः!।
कर्मण्यकर्म पश्यन्तो ययाऽकर्मणि कर्म च ॥
फर्तव्यं कर्म कुर्वन्तो विमुक्ताः कर्मवन्धनात् ।
मत्सायुज्यदशामेत्य कृतकृत्यत्वमाप्नुत ।।
पहुंचाना नही चाहतो, परन्तु यदि उनकी रुचि अनुकूां होती
है, तो मैं उनको ऐशकर्मसे युक्त करके उन उद्यागियोंसे
जगत्का कल्याण निश्चय कराती हूं। हे देवतागण !
कम्मोको महिमा सर्वोपरि है, क्योकि भकको भी कर्मी
बनना पड़ता है और पानीको कर्मी बनना पड़ता है
और शरीर रहते हुए पूर्णरीत्या कर्मका त्याग असम्भव है. इस
कारण हे, देवतागण ! मापलोग कर्मयोगी और मत्परायख
होकर ऐसी शुद्ध प्रतिमा निश्चय ही उत्पन्न करो जिससे तुमलोग
कर्ममें. अकर्म और अकर्ममें कर्म देखते हुए और कर्तव्यकर्म
करते हुए कर्मबन्धनले मुक्त हो जामो और सत्सायुज्यको प्राप्त
होकर ऋतहत्य हो जानो।

धर्मकर्मदीपिका। MAmarri प्रश्न:- कर्मणा सह धर्मस्य मिश्रसन्बन्धसत्त्वेऽपि किं तत् गुहायां निहितं धर्मतत्त्वं ? तन्न्वरूपं जिज्ञासामहे, तस्य कृपया क्रियताम सविस्तरवर्णनम् । समाधानम्- सगुणब्रह्मरूपो भगवान् धीशः श्रीगणपतिः भवत्प्रश्न: सम्बन्धे ऋपीन् उद्दिश्य यदुवाच तदेव कथयामि- ब्राह्मणाः ! नयते नूनं सर्वलोकहितप्रदः । ब्रह्माण्डपिण्डरूपायाः सृनेश्च धारको महान् । मानवान् धर्म एवायं कैवल्या युदयप्रदः । - इच्छा है। फके साथ धम्मका मिश्रसम्बन्ध होनेपर भी धम्म- तस्व जो कि--गुहामें निहित है, उसका स्वरूप जानकी कृपया विस्तार पूर्वक वर्णन करें। उत्तर- श्री धीशगीतामें सगुणब्रह्मस्वरूप श्रीगणपति धीश भगवान्ने ऋषियोंसे जो आज्ञा की है, सो पाए लोगोसे कहा जाता है। हे ब्राह्मणों! सर्वलोक हितकर ब्रह्माण्ड पिण्डात्मक सृष्टिका धारक श्रभ्युदय और मुक्तिविधायक यह महान् धर्म ही मनुष्योंको अशान भूमियोंसे बचाकर ज्ञान भूमियोंमें निर- .

धर्मकम्मंदीपिका। ------- सैरल्याऽज्ञानभूमिभ्यो ज्ञानभूमीनिरन्तरम् ।। दमाभ्युदयं सम्यक सम्प्रापय्यान्तिमा क्रमात् । ज्ञानभूमिं ततो दत्ते निःश्रेयसमहो परम् ॥ अहमेवास्मि धर्मस्य स्थितिस्थानं द्विजर्षभाः ।। धाकृतिममैवास्ते शक्तिरेव सनातनी ।। विराट्सप्टेः प्रवाहस्य धारणं कृतवत्यहो। ममैव सात्त्विकी शक्तिनूनं धर्मो महर्पयः ! ॥ नाऽत्र कश्चन संन्देहो विद्यते द्विजसत्तमाः!। विद्यते विप्रशार्दूलाः ! शकि त्रिगुणात्मिका ।। आकर्षणविशिष्टा या सा शक्ती राजसी मता। विकर्षणेन संसक्ता शक्ति तामसी तथा ।। न्सर ही पहुंचा देता है और क्रमशः अभ्युदयको सम्यक् प्रदान करता हुआ अन्तिम हानभूमिमें पहुँचाकर अहो ! तदनन्तर कैवल्य प्रदान करता है। हे वियों ! मैं धर्म कार्य में ही स्थिति स्थान हूँ और धम्म रूपा मेरी ही सनातनी शक्ति अहो विराट् सृष्टिके प्रवाहको निश्चय ही धारण किये हुए है। हे महर्षिगण ! निश्चय मेरी ही सत्वगुणमयी शक्ति धर्म है। हे ब्राहाण थेप्टो ! इस विषयमें कोई सन्देह नहीं है। हे विप्रपुनावों! मेरी शक्ति त्रिगुणात्मिका है। आकर्षण शक्तिविशिष्ट राजसिक शक्ति कहाती है और विकर्षण शक्तिविशिष्ट ताम- सिक शकि कहलाती है और इन दोनों शक्तियोंका इस

धर्मकर्मदीपिका।
सामञ्जस्यं प्रकुर्वाणा तयोः शक्त्योद्वयोरिह ।
सात्त्विकी सैवधर्मोऽस्ति शक्ति, नात्र संशयः ।।
परिव्याप्नोति धर्मस्य शक्तिरेपैव धारिका ।
परमाणुभ्य आ नूनं पूर्ण ब्रह्माण्डविस्तृतिम् ।।
शक्तः संघारिकाया मे धर्मस्यैव प्रभावतः ।
सूर्येन्द्रादियहाः सर्वे तथा नक्षत्रमण्डलम् ॥
उपमहादयोऽयेवं विराड्देहे ममानिशम् ।
स्वस्खकक्षामुपाश्रित्य भ्रमन्ते हि समन्तत. ॥
सृष्टरक्षाश्च कुर्वन्ति साहाय्यं ददतो मिथः ।
देवासुरेण युद्ध न दैव्याः सृष्टेः पवित्रताम् ।।
सम्पादयन्ती धर्मस्य धारिका शक्तिरुत्तमा ।
संसारमें समन्वय करनेवाली मेी जा साविक शाक है वही
धर्म है। इसमें सन्देह नहीं। यही धर्मको धारिका शक्ति
परमाणु से लेकर ब्रह्माण्डके विस्तार पर्यन्तमें परिव्य
धर्म की धारिका शक्तिके प्रभावसे ही सब सूर्य चन्द्रादि
अहं उपग्रहादि और नक्षत्रमण्डल मेरे विगट देहम चौतरफ
अंपनी अपनी कक्षामें निरन्तर परिभ्रमण करते हैं और
परस्परमें सहायता देकर सृष्टिको रक्षा करत हैं ।
धर्मकी उत्तम धारिका शक्ति देवासुरसंग्रामके द्वारा देवो
सरिकी पवित्रता सम्पादन करती हुई देवताओं और असुरोको
अपने अपने लोकों में सुप्रतिष्ठित रखता है। हे विशो! मेरी

धर्मकर्मदीपिका। Nm- प्रतिष्ठापयते देवान स्वखलोकेऽसुरांस्तथा । निश्चितं मातृभावेन विज्ञाः ! धर्ममयेन मे। प्रकृतेः पालिता नीवा पोषिताश्च निरन्तरम् ।। उद्भिजात्स्वेदजं गत्वा स्वेदजादण्ड तथा । ततोगच्छन्त्यहो विप्राः ! अण्डजाच जरायुजं ।। जरायुजाद्योनितो हि मर्त्ययोनि गता पुनः । भवन्ति मोक्षमार्गस्य नूनमेऽधिकारिणः ।। ज्ञानं हि धमाधर्मस्य मानवेभ्यो हि केवलम् । कृतास्ते मोक्षमार्गस्य पथिका ददता मया ।। धारिकाशक्तिरेवासौ धर्मस्य विप्रपुंगवाः !! क्रमादुन्नमयन्ती वै मानवानुचरोत्तरम् ।। प्रकृतिके धर्ममय मातृभावके द्वारा ही निरन्तर पालित पोषित होकर जीव हे विप्रो ! उद्भिजसे स्वेदज स्वेदजसे अण्डा अण्डजसे जरायुज और जरायुजयोनिसे मनुष्ययोनिमें पहुंच कर अवश्य ही घे कैवल्य मार्ग प्रर्थात मोक्षमार्ग अधिकारी बन जाते हैं। मैंने केवल मनुष्यों को ही धर्माधर्मका ज्ञान प्रदान करके चनको कैवल्यमार्गका पथिक बना दिया है। विप्र. श्रेष्ठो! यह धर्मको धारिका शक्ति ही मनुष्योंकी क्रमशः उत्सरो तर उन्नति करा कर ही और अहो! अन्त में बमको शाम भूमिका अधिकारी बनाकर शनैः शनैः कैवल्यपद प्रदान करती है। ।

धर्मकम्मदीपिका। कृच.ऽधिकारिणे ज्ञानभूमेरन्ते च तानहो । कैवल्यपदवी तेभ्यः प्रदत्ते च शनैः शनैः ॥ सर्वेषां रक्षको धर्मःसर्वजीवहितप्रदः । निखिलव्यापकश्चाऽस्ति सर्वेभ्योऽभ्युदयप्रदः ।। सर्वेषां मानसे नूनं मत्स्वरूपप्रकाशकः । साधकानां हि जीवानां शिवत्वस्य विधायकः ! प्रश्न कतिविधो धर्मः। समावानम्- पितृभिजिज्ञासितो भगवान् सदाशिवो यदवोचत् तदिह लोक. हितार्थ भवत उपदिशामि, दत्तावधानं श्रूयताम् । - धर्म सर्वव्यापक सर्घजीवहितकारी सर्वरक्षक सबको सभ्यु- दयप्रद और सबके हृदयमें मेरे स्वरूपका प्रकाश करने धाला एवं साधक जीवोंको शिवत्व प्रदान कारक है। प्रश्न:- धर्म कितने प्रकारका है उसका कृपापूर्वक वर्णन कीजिये- उत्तर- श्रीभगवान् सदाशिवने शम्भुगीतामें जो निज मुझसे पितरोंसे कहा है, सो जगत्कल्याण के लिये मैं आप लोगोसे कहता हूं। .

धम्मसमंदीपिका। -...-. समन्धिव्यष्टिरूपाभ्यां सृष्टेः सन्धारिका मम । शक्तिनियामिका सैव ध्रुवं धर्मः सनातनः ॥ . तत्सनातनधग्मत्य पादाश्चत्वार आसते । साधारणविशेपौ हि तथाऽसाधारणापौ।। स.वभौमो यतो धर्मः सर्वलोकहितप्रदः । ददात्यभ्युदयं नित्यं सुखं निःश्रेयसं तथा । शाश्वतस्यास्य धर्मस्य यावत्प्रादुर्भविश्यति । सार्वभौमस्वरूपं हे पितरो भाग्यशालिनः ! ।। जनानां क्षुद्रता लोके तावत्येव विनश्यति । साधारणस्य धर्मस्य तत्त्वतो हृदयङ्गमम् ।। सार्वभौमस्वरूपं हि कर्तुमी न संशयः । समष्टि और व्यष्टिरूपसे सृष्टिकांधारण करनेवाली जो मेरी पियामिका शक्ति है, उसीको सनातनधर्म कहते हैं। उस सनातन धर्मके चार पाद हैं, यथा साधारणधर्म, विशेषधर्म, असाधा- रणधर्म और आपद्धर्म। धर्म सार्वभौम और सर्वलोकहित. कर होनेसे वह निरन्तर अनायास अभ्युदय और निःश्रेयस प्रदान करता है। हे भाग्यशाली पितृगण ! इस सनातनधर्मका सार्वभौमस्वरूप जितना प्रकट होगा, संसारमें मनुष्यों- की क्षुद्रता उतनी ही नष्ट होगी । तत्वतः साधारण- धर्मका सार्वभौम स्वरूप निःसन्देह हृदयङ्गम करने योग्य है और उसी वर्णाश्रमधर्मसम्बन्धी विशेष प्रकार

.
४२
धर्मकर्मदीपिका
पालनीया. सदाचारा आर्यजातीयमानः ।।
वर्णाश्रमीयधर्मस्य विशेषस्य तथैव च ।
यत्तो वर्णाश्रमैर्धमैविहीना सर्वथा ननु ।
असौ सष्टिमानवानां कालिकायाः प्रभावतः ।
प्रकृतेर्मे लयं याति कुत्रचित्समये स्वतः ॥
अयि मुनिवर्साः ! ये च श्रीभगवता . सदाशिवेन चतुर्विधा
वर्णिता धर्मभेदाः, तत्र वर्णाश्रमधर्मः, नारी-पुरुषधर्मः, राज-प्रजा
धर्मः, आOनार्य्यधर्म इत्यादीनि विशेपधर्मोदाहरणानि सन्ति ।
द्रौपद्याश्च पञ्च पतिग्रहणं, जन्मान्तरमनुपलभ्यैव महविश्वा-
मित्रस्य प्राहाणवप्राप्तिः नन्दीश्वरस्य च देवत्वाधिगम इत्यादि असा-
धर्मके सदाचार भी आर्यजातीय मनुष्यांसे पालन कराने
योग्य हैं, क्योंकि वर्गाश्रमधर्मरहित यह मनुप्यसटि स्वतः
मेरी प्रकृति कालीके प्रभावसे किसी समयान्तरमै सर्वथैव
लयको प्राप्त हुश्रा करती है।
हे मुनिगण ! भगवान् सदाशिवने जो चार प्रकारका धर्म
वर्णन किया है उससे विशेष धर्मके उदाहरण में वर्णधर्म
प्राधमधर्म पुरुषधर्म नारीधर्म ब्राह्मणधर्म क्षत्रिय धर्म
वैश्यधर्म शूद्रधर्म प्रहाचर्यधर्म गाहस्र्यधर्म वानप्रस्थधर्म
सन्यासधर्म आर्य धर्म अनार्यधर्म राजधर्म प्रजाधर्म आदि
समझने याग्य हैं। असाधारण धर्मके विषय में द्रौपदोका
पञ्चपति ग्रहण, 'महर्षि विश्वामित्रका क्षत्रिय से ब्राह्मण होना

पानमंदोनिमा ४३ AR-A- धारणधमांदादरानवागन्तव्यम् । विभामित्रस्य सानमांसप्र- एमां, महाराज निन्द्रस्य चागडाल दासत्व येत्यादि आपद्धर्मो- दाहरण जानन्नु। परन्नु पन्तदेव हि पैचित्र्यं विद्यते साधारण- धमंन्य । एनन्य मजीवहिनकारक स्वरूप देवान प्रति महामायया शक्रिगीतायामंयमभिहिनम- अहवास्मि भी देयाः ! धर्म पल्पमम्य च । पीजं मूलं नधाऽऽधागे मात्र कश्चन संशयः ॥ मान्धस्तस्य इमस्याम्त धन्नों ये विचधारकः । मुग्न्यं शाग्णयधारय यो दानं तपतधा ।। मदोका कहो ममें देयमाना स्याट समझने योग्य है और ग्रागन, उदाहरण दुभिपके समय महर्षि विश्चा- मित्रका मुग्मान प्राण झरना, महाराजा हरिश्चन्द्र की चागमालमेघा मादि माना सचिन है: परन्तु माधारण- धर्मको विचित्रना कुछ और है, जिमका सवंजीव दिनकारी म्याप सगजननी महामायाने निजमुखसे धनुनके रूप दशामासे शक्तिगोतामें कक्षा .सो उनके यच कर जाते हैं। ई अमरगण ! मैं दी धर्मकल्पमका वीज भी है, मन भी हैं और भाधार भी हैं. इसमें कुछ सन्देह नहीं है । उस वृक्षका स्कन्ध विश्वधारक धर्म दी है। उसकी प्रधान तीन शाखाएँ है, यथा-यम,तप और दाना अर्थदान प्रदान और नमयदानके

धर्मकर्मादपिका।
त्रमार्थाऽभयदानानि देवाः ! त्रैगुण्ययोगत्तः ।
दानस्य प्रतिशाखाः स्युनवधा नात्र संशयः ।।
तपोऽपि त्रिविधं ज्ञेय कायवाणीमनोभवम् ।
त्रैगुण्ययोगेनास्यापि प्रतिशाखा नवासने ॥
प्रसिशाखा अनेकाः स्युर्यज्ञशाखासमुद्भवाः ।
काम्याध्यात्माधिदैवाधिभूतनैमित्तनित्यकाः ।।
कम्मयज्ञप्रशास्त्राया भेदास्त्रैगुण्ययोगतः ।
त एवाष्टादशास्या दि प्रतिशाखा मनोहराः ।।
पितृदेवर्पिवृन्दानामवतारगणस्य च ।
पञ्चानां सगुणवतरूपारण निर्गुएत्य च ।।
ब्रह्मणश्चासुरीघारणामुपास्तेः पञ्च मक्तित ।
त्रिगुणात्मक होनेसे दानकी नौ प्रतिशाम्बाएँ हैं, हे देवगण !
इसमें सन्देह नहीं है। शारीरिक तप, वाचनिक तर और
मानसिक ताके त्रिगुणात्मक होनेसे तपोधर्मकी नौ प्रति.
शाखाएँ हैं। यक्षशास्त्रासे उत्पन्न प्रतिशाखाएं अनेक हैं.!
नित्य नैमित्तक काम्य और अध्यात्म अधिदैव मधिमून, ये
कर्मयशपा प्रशाखाओंके भेद हैं, इनके त्रिगुणात्मक होनेसे
कर्मयक्षको मनोहर भाट्टरह पतिशाखाएँ हैं । उपासना-
यज्ञके आसुरी उपासना, ऋषि देवता ओर पितरोंकी उपासना,
अवतारोकी उपासना, पंच सगुणब्रह्मरूपोंकी उपासना और
निर्गुणब्रह्मोपासना, ये पांच भक्तिसम्बन्धी भेद हैं और योगके

४५
धर्मकर्मदीपिका।
मन्त्रो हलो लयो राज एते योगेन च ध्रुवम् ।।
अस्या भेदाश्च चत्वारो भेदा एवं नवासते।
एते भेदा नवैवाहो देवाः ! त्रैगुण्ययोगतः ॥
उपास्तेः प्रतिशाखाः स्युः सङ्ख्यया सप्तविंशतिः ।
श्रवणं मननचैव निदिध्यासनमेव च ॥
त्रयोऽमी ज्ञानयज्ञस्य भेदास्त्रैगुण्ययोगतः ।
नवधा सम्धिभक्ता हि प्रतिशाखा नवासते ॥
द्विसप्तत्या प्रशाखाभिः शाखाभिश्चैवनेव भोः ।
निजानां ज्ञानिभक्तानां धर्मकल्पद्रुमात्मना ।।
विराजे स्वान्तदेशेऽहं निर्जराः! नात्र संशयः।
धम्मकल्पद्रुमस्यास्य पत्रपुष्पात्मकान्यहो ।
अनुसार उपासमाके मन्त्र हठ लय राज ये चार भेद है,
इस
प्रकारले इन्हों नौ भेदोंके त्रिगुणात्मक होनेसे हे देवगण !
उपासनाकी सताईस प्रतिशाखाएँ हैं। ज्ञानयज्ञके शवण मनन
निदिध्यासन ये तीन भेद त्रिगुणसम्बन्धसे नवधा विभक्त होकर,
नौ प्रतिशाखाएँ होती हैं। हे देवतागण ! इस प्रकारसे मैं
ही यहत्तर शाखा और प्रतिशाखाओंमें धम्मकल्पद्रुमापसे
अपने शानी भकक दृदेशमें निःसन्देह विराजमान है। उस
धर्मकल्पदुमके पत्र-पुष्परूपी उपाझोंकी तो संख्या ही किसीसे
कमी नहीं हो सकी, वे अतिमनोहर और विचित्र हैं। इस रम्य

धम्मकम्मंदीपिका। उपाङ्गानि न संख्यातुमाणि कैरपि कचित् । विचित्राणि मनोज्ञानि सन्ति तानि ध्रुवं सुराः ! ॥ पक्षिणी द्वौ सदा तत्र जगतां मोहकारिणौ। मनोज्ञ वृक्षराजे स्तो वसन्ती शाश्वतीः समाः ॥. स्वादतेऽभ्युदयस्यैको ह्यपक्वे द फले तयोः । अपरश्वतुरः पक्षी सुपक्वं त्वमृतं फलम् ।। सुस्वाद्वास्वाद्य गीर्वाणाः ! नूनं निःश्रेयसं पदम् । ब्रह्मानन्दसमुल्लास-सार्थकत्वं प्रकाशयेत् ।। प्रश्न: हे ज्ञानस्वरूप महर्षिप्रवर ! सम्प्रति कृपया वर्णाश्रम- धर्मरहस्यं धर्यताम् । तत् किल श्रोतुम् अतीधोत्कण्ठतेऽरमार्क चेतः वृक्षराजपर जगन्मुग्धकारी दो पक्षी सदा अनन्तकालसे निवास करते हैं। उनमेंसे एक पक्षी अभ्युश्यके दो कच्चे फलोंका स्वाद ग्रहण करता है और दूसरा चतुर पक्षी निःश्रेयसपदरूपी सुपा और सुस्वादु अमृत फलका आस्वादन करके हे देवगण! ब्रह्मानन्द-समुल्लासको चरितार्थताको निधष ही प्रकाशित करता है। प्रश्न- त्रिलोक पवित्र कर वर्णाश्रमधमकी महिमा तथा उसका हद विधान कुछ पहननेकी इच्छा है कृ गपूर्वक वर्णन करें।

धम्कर्मदीपिका।
४७
RANA
AA
समाधानम्-
एनन्प्रश्नसम्बन्धे शम्भुगीतायां पुरतः पितृणं भगवता सदा-
शिवन यदुक्तम् , तदेवम् -
अत्रकोपनिषदृश्यमन्तिके वः खधाभुजः !।
गुह्यं पकाशयेऽत्यन्तमद्भुतं तत्पपश्यत ।।
श्यामायाः प्रकृतमत्तो वे रूपे परमाद्भुते ।
यतः सैव जंहा जीवभूता चैतन्यमय्यपि ।।
अज्ञानपूर्णरूपेण जरूपं धरन्त्यसौ ।
सृष्टिं पकाशयेच्छश्वन्नात्र कश्चन संशयः ॥
असौ चैतन्यपूर्णा च भूत्वा स्रोतखिनी मम ।
श्रीभगवान् सदाशिवने शम्भुगीतामें जो निजमुखसे
पितरोसे कहा है सो जगत् कल्याण के लिये मैं भापलोगोंसे
कहता हूँ।
हे पितृगण ! सम्बन्ध में उपनिषद्का एक अद्भुत
रहस्य पूर्ण दृश्य आपके सामने प्रकट करता हूं देखो। मेरी
श्यामा प्रतिके दो रूप हैं। वही जरूपा है और वही
जीवभूता चेतन भवी है वह भवान पूर्णरूपमें जरूप धारण
करके सदा सृष्टिको प्रकट करती है इसमें कुछ लन्देह नहीं है।

r-n.
धर्मकर्मदीपिका।
स्वस्वरूपात्मके नित्य पारावारे विशत्यहो ।।
सरिनिगत्य चिगृपा सा महाद्रेजंडात्मकात् ।
उद्भिज्जे स्वेदजे चैवमण्डजे च जरायुजे ॥.
सलीलं खातरूपेऽल पूवहन्ती स्वधाभुजः !
मत्यलोकाधित्यकायां निवाधं व्रजति ख्य ॥
तस्या अधित्यकाया हि निम्नस्थाश्चैकपाव॑तः ।
उपत्यका महत्यश्च विद्यन्ते गहरादयः ।।
यत्र तस्याः पवित्रायास्तरङ्गिण्या जलं स्वतः ।
स्थाने स्थाने वहन्नित्यं निर्गच्छति स्वभावतः ॥
अव्याहृतं च नीरन्ध्रमविच्छिन्नं निरापदम् ।
स्रोतस्तनितरां कृत्रा नदीधागं घरातले ॥
विधातुं सरला सौम्यामष्टबन्धाः स्वधाभुज !।
मैं ही चेतनमयो स्रोतखिनी हाकर मेरे ख स्वरूप पारावार में
प्रवेश करती हूं। वह चिन्मयी नदी जङ्गमय महापर्वतले
निकलकर प्रथम उधिन, तदनन्तर स्वेदज, तदनन्तर अण्डज,
सदनन्तर जरायुज नामधारी स्वादमें सरलतासे बहती हुई
मनुष्य लोकरूपी अधित्यकामें पहुँचती है। उस अधित्यकाके
नीचे महती उपत्यकाएँ और गह्वर आदि विद्यमान है। जिनमें
उस पवत्रि तरङ्गिणीका जल स्थान स्थानपर स्वतः ही वह
जाया करता है। हे पितृगण ! उस स्रोतको अप्रतिहत नीरन्ध्र
मौर अविच्छिन्नं रखकर नदीको धाराको धरातजपर सरल

धर्मकर्मदीपिका।
४६
धर्मा वर्णाश्रमा एव निर्मिता नाऽत्र संशयः ।।
त्रिलोकपावनी दिव्या सा नदी सुगम हितं ।
पन्थानमवलम्ब्यैव परमानन्दलब्धये ॥
मयि नित्यं प्रकुर्वाणा प्रवेशं राजतेतराम् ।
नैवात्र विस्मयः कार्यो भवद्भिः पितृपुङ्गवाः!॥
निर्जरा निखिलास्तस्यां नद्यामानन्दपूर्वकम् ।
सर्वदेवावगाहन्ते लभन्तेऽभ्युदयञ्च ते ॥
उभय स्तटयोस्तस्याः समासीना महर्षयः ।
ब्राध्याने सदा मन्ना यान्ति निःश्रेयसं पदम् ॥
यूयं दाढाय बन्धानां तेपाञ्चैव निरन्तरम् ।
रक्षितुं तान प्रवर्त्तन्ते पार्श्वमेषामुपस्थिताः ।।
रखनेके लिये वर्ण और आश्रमके आठ बन्ध रक्खे गये हैं।
इसी कारण वह अलौकिक त्रिलोकपावनी नदी सरल पथको
अवलम्बन करके मुझमें परमानन्द प्राप्तिके हेतु प्रवेश करती है।
है पितृगण ! इसमें माप लोग विस्मित न हो। देवतागण
उस नदी में 'आनन्दपूर्वक अवगाहन करके अभ्युदयको प्राप्त
होते हैं और ऋषिगण उस नदीके दोनों तटोपर समातीन
तथा 'ब्रह्मध्यानमें मग्न होकर निःश्रेयस पदको प्राप्त होते हैं।
आप लोग निरन्तर उन बन्धनोंको सुदृढ रखनेके लिये उनके
पास रहकर उनकी रक्षा करने में प्रवृत्त हो और आपके इस

५० reak घनकर्मदीपिका भक्तामनकार्ये च विश्वनङ्गलकार । सदाचारिद्विजाः सन्ति ससो नार्यः सदायिनः॥ धर्मकर्मबोरतिदुचरहन्यानि युवा क्यिन्त्रमानन्दनधिगन- वन्त इति न कथयितुं शक्नुम. ! सान्प्रतं हि धर्ममयोः परम- सहायिकाया उपासनाया रहस्यं आवएणय, नास्माक नगर महानुपकारः स्यादिदि । समाधानमः- गुरुगीता भगवता मोनहादेवन पवनभिहितम् । सगुणो निर्गुणश्वाऽपि द्विविधो भेद ईयते । उपासना विधर्देवि सगुणोऽपि द्विघा मतः ।। सकामोपासनायाश्च भेदा यद्यपि नेकशः । जगन्मङ्गलकर शुभ कार्य सदाचारी ग्राहगए भौर सती नारियां सहायक है। प्रश्न- और धर्म के अतिय रहत्वपमूह सुनकर बहुत ही आनन्दकी प्राप्ति हुई. अब कृपया कम धौर धर्म की परम सहायक उपासनाका कुछ रहस ऐसा वर्णन फरें कि, जिससे जगत्का पत्याए हो। उचर- श्रीगुरुगीतामें श्रीभगवान् महादेवने इस प्रकार कहा है- उपासनाके दो भेद है, यथा-निर्गुण उपासना और सगुश उपासना । सगुण उपासना दो प्रकारको है । यद्यपि धम्मकर्मदीपिका। परन्त्वनन्यभक्तानां जनानां मुक्तिमिच्छताम् ।। भेदत्रितयमेवैतद्रहस्यं देवि गोपितम् । वश्वे गुमरहस्यं तद्भवती भाग्यशालिनीम् । समाहितेन शान्तेन स्वान्तेनैवावधार्यताम् । पञ्चानामपि देवानां ब्रह्मणो निर्गुणस्य च ॥ लीलाविग्रहरूपाणां चेत्युपास्तिस्त्रिधा मता । विष्णुः सूर्यश्च शक्तिश्च गणाधीशश्च शङ्करः ॥ पञ्चोपास्याः सदा देवि सगुणोपासनाविधौ । एते पञ्च महेशानि सगुणो भेद ईरितः ॥ सचिदानन्दरूपस्य ब्रह्मणो नाऽत्रसंशयः । निर्गुणोऽपि निराकारो व्यापकः स परात्परः ।। साधकानां हि कल्याणं विधातुं वसुधातले । सकास उपासनाके और भी अनेक भेद हैं, परन्तु मुक्तिकी इच्छा रखनेवाले अनन्य भक्त के लिये केवल ये तीन ही भेद हैं। यह तुमसे मैं गुप्त रहस्य कह रहा हूं। सावधान होकर सुनो। निगुण उपासमा, सगुण पञ्चोपासना और लीला- विग्रह उपासना, इस प्रकारसे तीन भेद माने गये हैं। शिव- गणेश शक्ति सूर्य और विष्णु ये पञ्च उपास्य सगुणरूप पञ्च- सगुणोपासनाके माने गये हैं। ये पाँचो सच्चिदानन्दमय- प्रझके ही सगुण भेद है यह.निःसन्देह है। परमात्मा-निरा कार निर्गुण और व्यापक होनेपर भी :साधकके करयाणार्थ, धर्मकम्मंदीपिका। A.P- विभत्ति सगुणं रूपं त्वत्साहाय्यात्पतिव्रते ॥ यथा गवां शरीरेपु व्यानं दुग्धं रसात्मकम् । परं पयोधरादेव केवलं क्षरते ध्रुवम् ।। राधैव सचानोपि देवो व्यापकभावतः । दिव्यपोशदेशपु पूज्यते परमभरः ।। वश्यम्बुलिङ्गकुडयानि स्थगिद्धलं पटमण्डले । विशिखं नित्ययन्त्रश्च भावयन्न विग्रहः ।। पीठम्यापि विभूतिश्च हन्मू पि महेश्वरि । एते पोडश दिव्याच पेशा मोठा मयानधे । तुम्हारा सहायतासे समुरारूप धारण किया करते है। जिस सफार गायक सय शरीरमें रसरूपसे दुग्ध व्यास है, परन्तु संचल स्तनके द्वारा ही बह नि:सरण होता है उसी प्रकार परमात्मा सर्चयापक होनेपर भो सोलह विच्य देशों में पूजे जाते हैं। धन्हि अम्बु लिङ्ग स्थगिडल कुड्य पट मण्डल' विशिस्त्र नित्ययन्त्र भावयन्त्र पीठ विग्रह विभूति नामि हरय और मूर्या ये सोलह दिव्य देश कहाते हैं इन सोलह दिव्य * सनातनधर्मावलम्बी सूर्तिकी पूजा नहीं करते हैं। परन्तु इन सोलह दिव्य . वेशों में सर्वव्यापक परमात्माकी पूजा करते हैं। इन सोलह दिव्य देशोर्मेसे मूर्ति एक दिव्य देश है!

धर्मकर्मदीपिका ३ यद्यच्छरीरमाश्रित्य भगवान् सर्वशक्तिमान् । वतीर्णो विविधा लीला विधाय वसुधातले.॥ जगत्पालयते देवि लीलाविग्रह एव सः ।, उपासनानुसारेण वेदशास्त्रेषु भूरिशः। लोलाविग्रहरूपाणामितिहासोपि लभ्यते 1 , तदुपासनकश्चापि सगुणं परिकीर्तितम् ।। विष्णोः सूर्यस्य शक्तश्च गणेरास्य शिवस्य च । गीतासु गीता ये शब्दा विष्णुसूर्यादयः प्रिये ।। ब्रह्मणश्चाद्वितीयस्य साक्षात्ते चापि वाचकाः । भक्तिस्तु त्रिविधा ज्ञेया वैधी रागात्मिका परा । देश में जैसा गुरूपदेश हो, साधक परमात्माकी पूजा करके मुक्तिपद लाभ करता है। जिन अवतार शरीरोंको धारण करके सर्वशक्तिमान् भगवान् तुम्हारी सहायतासे नाना लीला करके संसारकी रक्षा करते हैं. वे रूप ही लीला विग्रह कहाते हैं। पञ्चोपासनाके अनुसार वेद और शास्त्रों में अनेक लीला- विग्रह धारणके इतिहास पाये जाते हैं, उनकी उपासना भी सगुण उपासनाही जाती है। शिवगोता (शम्भुगीता) गोशगीता (धोशगीता) देवीगीता (शक्तिगीता) सूर्य- गीक्षा और विष्णुगीताके प्रतिपाद्य शिव गणेश देवी सूर्य और विष्णु,ये सब एक ही अद्वितीय परब्रह्मके ही पाचक हैं। मकिके तीन भेद हैं, यथा-वैधी भक्ति, रागामिकाभकि, ५४ धर्मफम्मंदीपिका। AAPart- देवे परोनुरागरंतु भक्तिः सम्प्रोच्यते युधः ॥ विधिना या विनिर्णीता निपधेन तथा पुनः । साध्यमाना च.या घोर सा वैधी भक्तिरुच्यते ॥ यथास्वाद्य रसानभर्भाव मजति साधकः । रागात्मिका सा कथिता भक्तियोगविशारदः ।। परानन्दप्रदा भक्तिः पराभक्तिर्मता वुधः । या प्राप्यते समाधिस्थैर्योगिभिर्योगपारगैः। त्रैगुण्यभेदातत्रिविधा भक्का वै परिकीर्तिताः । आत्तों जिज्ञासुरर्थार्थी तथा त्रिगुणतः परः। पराभक्तयधिकारी यो ज्ञानिभक्तः स तुर्यकः ।। उपासकाः स्युखिविधास्त्रिगुणस्यानुसारतः । और पराभक्ति । अपने इष्टदेव में प्रकान्तिक अनुरागको धीर पुरुप भक्ति कहते हैं। विधिनिषेध मारा निति और साध्यमान भक्तिको वैधी कहते हैं, भक्तिरसका पाखादन करा.' कर साधकको भावविशेष निमन करानेवाली भक्ति रागा. त्मिका कही जाती है। परमानन्दप्रदा भक्ति परा भक्ति कहाती है, जो योगमें कुशल योगिगणको समाधि दशामें प्राप्त होती है। भक्त त्रिगुणमेदसे त्रिविध होते हैं, यथा-मातं, जिज्ञासु अर्थार्थी और चतुर्थ शानी जो त्रिगुणातीत है ।शानी भक ही पराभक्तिका अधिकारी हो सका है। त्रिगुणभेदसे .उपासक तीन प्रकारके होते हैं। पासक सयमें श्रेष्ठ

धर्मकर्मदीपिका
५५
ब्रह्मोपासक एवात्र श्रेष्ठः प्रोक्तो मनीषिभिः॥
प्रथमा सगुणोपास्तिरवतारार्चनाश्च याः ।
विहिता ब्रह्मबुद्धया चेदत्रैवा तभवन्ति ता
सकामबुद्ध्या विहितं देवर्षिपितृपूजनम् ।
मध्यम मध्यमा ज्ञेयास्तकारस्तथा पुनः ।।
अंधमा वै समाख्याता क्षुद्रशक्तिसमर्चकाः ।
प्रताद्युपासका श्चैव विज्ञया ह्यधमाधमाः ।।
सर्वोपासनहीनास्तु पशवः परिकीर्तिताः ।
ब्रह्मोपासनमेवाऽत्र मुख्यं परममङ्गलम् ।।
निश्रेयसकर झयं सर्वश्रेष्ठं शुभावहम् ।
हैं, ऐसा विद्वद्गगणने कहा है। ब्रह्मबुद्धिसे प्रथम सगुणो.
पासक अर्थात् पञ्चदेवोपासक और ब्रह्माबुद्धिसे द्वितीय
सगुणोपासक अर्थात् अवतारोपासक इसी श्रेष्ठ श्रेणी में
हैं। सकाम बुद्धिसे ऋषि देवता और पितरोंकी उपासना
करनेवाले द्वितीय श्रेणी ( मध्यम श्रेणी ) के हैं और क्षुद्र
शक्तियोंकी उपासना करनेवाले तृतीय श्रेणी (अधम श्रेणी.)
के हैं। उपदेवता प्रेतादिकी उपासना इसी निम्नश्रेणी
(अधमाधम श्रेणी) की समझी जाती है। जो किसी उपा-
सनाको नहीं करते हैं, वे पशु हैं। प्रथम श्रेणीकी उपासना
अर्थात् ब्रह्मोपासना ही परम कल्याणप्रद और निःश्रेयसकर
होनेके कारण सर्वश्रेष्ठ जानने योग्य है.। .

धर्मकर्मदीपिका। प्रश्नः- - कर्मोपासनयोर्मूलभित्तिस्वरूपमतिगोपनीयं पीठरहस्यं प्रकाश- यतु भगवान्, यतों हि पीठस्यावलम्वनेनैव यज्ञकर्माणि उपासनाच साधक साध्यन्त इति । समाधानम्- श्रीभगवता सदाशिवेन शम्भुगीतायामित्वं व्याजह- जीवसृष्टिरहस्येषु मानवानाञ्च किंविधम् । जन्ममृत्युगत गुषं वैलक्षण्यं हि वर्तते ।। पितरस्तद्ब्रवीम्यद्य श्रूयतां सुसमाहितः । कोषः प्राणमयोऽन्त्यस्य साहाय्यात् पितरो ध्रुवं ।। दैव्याः शक्तविकाशस्य देवानामासनस्य वा । उपयोगी जायतेऽसावावतः पीठ उच्यते ॥ घर- कर्मकाण्ड और उपासनाकाण्डकी मूलमितिसम्प अति गोपनीय पीट रहस्य जानेकी इच्छा है, तो कृपा करके - वर्णन करें क्योंकि पीठके अवलम्बनले ही यागयज्ञादि किये जाते हैं और पीठके अवलम्बनसे ही उपासना की जाती है। श्रीभगवान् सदाशिवने शम्भुगीतामें जो भाशाकी है, सो इस प्रकार है। हे पितृगण ! :जीवसृष्टिरहस्यों में मनुष्योंके जन्ममृत्युकी कैसी गुह्य विचित्रता है, सो अभी कहता है, सुसमाहित हों :

धर्मकर्मदीपिका। स्वाभाविक्यखभावा वा पीठस्योत्पादनाय या । विधीयते क्रिया सम्यक् सत्सुकौशलपूरिता ॥ चक्रं तदेव सम्प्राहुर्योगतत्त्वविशारदाः । नाऽत्र कञ्चन सन्देहो विद्यते विश्वभूतिदाः ! ।। पीठोत्पादकसामर्थ्य मर्त्य पिण्डो बिमर्त्यसौ । श्रीवागमनचक्रस्याश्रयः स्वाभाविकस्य हि॥ अनेकभेदसत्त्वेपि पीठस्यास्ति प्रधानतः । भेदश्चतुर्विधो योऽसौ प्रोच्यते वः पुरोधुना ।। प्रथम स्थावरं पीठं यथा तीर्थादिगोचरम् । द्वितीयं सहज पीठं दम्पती सङ्गमे यथा ॥ पीठं तृयीय दैवमिन्द्रलोकादिकं यथा । कर सुनो। हे पितृगण ! प्राणमय कोषकी सहायतासे हो देवी शक्तिके विकाशके अथवा देवताओंके आसनके उपयोगी जो आवर्त बनता है, उसको पीठ कहते हैं। पीठके उत्पन्न करनेके लिये जो स्वाभाविक सत्सुकौशलपूर्ण क्रिया सम्यक्- रुपसे की जाती है, उसीको योगतत्त्वक चक कहते हैं। हैपितृगण ! इस विषयमें कोई सन्देह नहीं है। यह मानव- पिण्डपीठ उत्पन्न करनेका सामर्थ्य रखता है और यह मानव- पिण्ड खाभाविक आवागमन चक्रका भाश्रय दी है। पीठके भेद अनेक होनेपर भी प्रधानतः पीठ जो चार श्रेणी में विभक है,..सको अभी आप लोगोंके सामने कहता हूं। प्रथम धम्मदीपिका चतुर्थ यौगिक पीठं भगवद्विग्रहोद्भवम् ॥ अथवा यन्त्रसम्भूतं पितरो वर्त्तते यथा। अनेकभेदसत्त्वेपि चक्रध्दास्ते चतुर्विधम् । आवागमनचक्रादि तत्राद्यं सहज जगुः । द्वितीय कीर्तितं चक्रं तद्ब्रह्माण्डनामकम् ॥ ग्रहोपमहभादीनामधिकारस्थितियथा । ज्ञेयं स्वाभाविकं चक्रमेतद्वयमसंशयम् ।। सगर्भस्यात्तृतीयं तद्ब्रह्मचक्रादिकं यथा । अगर्भनामकं चक्रं चतुर्थ समुदाहृतम् ॥ मन्त्रशुद्धया क्रियाशुद्ध्या रहितश्चैव यद्भवेत् । इति वः कीर्तितं चक्ररहस्यं परमामृतम् ।। स्थावर पीठ, या तीर्थादि, द्वितीय सहज पीठ, जैसा कि, नारीके सनम समयमें उत्पन्न होता है। तृतीय दैवी पीठ यथा-इन्द्रलोकादि और चौथा यौगिक पीठ, यथा हे पितृगण । भगवधिप्रह और यन्त्रांदिमें होता है। चक्र भी बहुत प्रकारके होने पर भी उनकी चार श्रेयर हैं। प्रथम सहज चक वह कहाता है, जैसा आवागमन चकादि। द्वितीय ब्रह्माण्डचक, यथा-ग्रह उपग्रह नक्षत्रादिका अधिकार, स्थान !::ये दोनों निःसन्देह स्वाभाविक चक्र कहाते हैं.।,तृतीय चक्र सगभंजक महाता। है । यथा-ब्रह्मचक्र शक्तिचक्रादि। और चतुर्थ चक्रका नाम अगर्भ है जो मन्त्रशुद्धिः और क्रियाशुद्धिसे रहित होता है। यह मैंने आप लोगोको परम भाद्भुत चक्रका रहस्य नर-

'धर्मकर्मदीपिका।
५
यायाानुष्ठितं चक्रं सगर्भ मुक्तिदं भवेत् ।
अगर्भ पितरः स्तद्वन्नूनमभ्युदयप्रदम् ।।
परन्त्वेवं विधायां हि दशायां चक्रसाधकैः ।
भवितव्यं ध्रुवं सम्यगवश्यं मत्परायणैः ।।
एनच्चक्रद्वयं जीवैः सत्सुकौशलपूर्णया ।
क्रिययाऽनुष्टितं यस्मादतोऽस्वाभाविक जगुः ।।
उत्तरोत्तरमुक्तासु सप्तसु ज्ञानभूमिपु।
क्रमारोहणकृत्यैव जायते पितरो ध्रुवम् ।।
श्रावागमनचक्रस्याध्यात्मशुद्धिन संशयः ।
वर्णाश्रमाख्या खाधिकारानुसारत. ।।
कहा है। सगर्भ चेक यथार्थरूपसे अनुष्ठित होनेपर मुक्तिप्रद
होता है और हे पितृगण ! अगर्भ चक यथार्थरूपले अनु-
टित होनेपर ही अभ्युदयप्रद होता है; परन्तु ऐसी दश में
चक्रकारी साधकोंको अवश्य ही अच्छी तरह मत्परायण होना
उचित है। ये दोनों चक्र सस्सुकौशलपूर्ण क्रियाले जीवोके
द्वारा अनुष्ठित होनेके कारण अस्वाभाविक कहाते हैं।
हे पितृगण ! उक्त सप्त शानभूमियों में उत्तरोत्तर क्रमशः
प्रारोहण करते रहनेसे ही आवागमन चक्रकी अध्यात्मा.
शुद्धि सम्पादित होती है इसमें सन्देह नहीं ही है।
अपने अपने अधिकारानुसार वर्णाश्रम धर्मके पालन
द्वाराही उस चक्रकी अधिदैव शुद्धि हुमा करती है और

६०
धम्मकम्मंदीपिका।
जायते पालनेनाऽस्य शुद्धिः खल्वाधिदैविकी ।
पितरो वो दयालध्या शुद्धया शोणितशुक्रयोः ।।
सहजस्यापि पीठस्य क्रमोन्नत्या निरन्तरम् ।
आधिभौतिकशुद्धिहि नूनमस्य प्रजायते ।।
चक्रमेतद्भवन्तो हि कर्तुमुन्नामि सत्वरम् ।
सन्ति चक्रेश्वरा नूनं स्मरणीयं सदेति वः ।।
एवं सर्वेषु चक्रपु शुद्धिविध्यमुत्तमम् ।
श्रावश्यकं भवत्येव नात्र कार्या विचारणा ॥
आवागमनचक्रस्य साहाय्येनैव वोधुना ।
निर्मितस्यास्य संशद्धि वर्णयित्वा पितृवजाः।।
पीठशुद्ध रहस्यं वो ब्रवीमि श्रूयतामिति ।
हे पितृगण ! आप लोगोंकी कृपा प्राप्त करनेसे, सहज पीठकी
निरन्तर क्रमोन्नतिले और रजवीर्यकी शुद्धिसे भी आवागमन
चक्रकी आधिभौतिक शुद्धि निश्चय सम्पादित हुभा करती
है। इस चक्रको शीघ्र उन्नतिशील करनेमें माप लोगही
निश्चय चक्रेश्वर हैं। यह सदा आप लोगोंको स्मरण रखनी
चाहिये। सय चक्रों में इसी प्रकार उत्तम त्रिविध शुद्धिकी
आवश्यकता होती है। इसमें विचार करनेकी आवश्यता
नहीं है। आपकी सहायताले ही निर्मित इस आवागमन
चक्रकी शुद्धिका वर्णन करके है पितृगण! भव.पीठ शुद्धिका
रहस्य आप लोगोंसे कहता हूं, सुनों। नानाप्रकारके पीठों में
५
।

धर्मकर्मदीपिका।
नानाविधेषु पीठेषु विधायोपासनां मम ।।
निजपिण्डस्थिते पीठे भक्ता नानाविधा यदा ।
विभूतीमें लभन्तेऽन्ते तेजो मे सर्वथा तथा ॥
रक्षितुं पारयन्तेऽलं तदा पीठस्य जायते ।
आधिभौतिकसंशुद्धिर्नात्र कश्चन संशयः ।।
यदा तु क्रमशो दैवी शक्किं लब्धं ममेशते ।
साधका पीठसंशुद्धिस्तदा स्यादाधिदैविक्री ॥
तस्वज्ञानस्व पुण्यस्य विकाशेन यथाक्रमम् ।
पीठस्याध्यात्मसंशुद्धिर्जायते च खधामुजः ।।
देशकालमनोद्रव्यक्रियाशुद्धिर्हि पञ्चधा।
मेरी उपासना करके जब मेरे भक निज पिएडस्थित पीठमें
नाना विभूतियों को प्राप्त करते हैं और उस दशामें वे मेरे
तेजकी सर्यथा रक्षा करने में अच्छी तरह समर्थ होते हैं तब
पीठकी आधिभौतिक शुद्धि होती है इसमें कोई सन्देह
नहीं है, और क्रमशः जब साधक मेरी दैवीशक्तियों को
लाभ
करने में समर्थ होते हैं हे पितृगण ! तब पीठको प्राधि-
दैविक शुद्धि सम्पादित होती है और पवित्र तत्वज्ञानके
यथाक्रम विकाश द्वारा पीठकी आध्यात्मिक शुद्धि हुआ करती
। पीठ शुद्धियोंके विषयमें निःसन्देह देशशुद्धि, कालशुद्धि
मनकी शुद्धि, क्रियाको शुद्धि और द्रव्यरद्धि, ये पांच प्रकारको

धर्मकर्मदीपिका।
शुद्धिमुंख्या समाख्यावा पीठशुद्धिध्वसंशयम् ।।
तत्रापि द्रव्यसंशुद्धिः प्राधान्यं चहते खलु।
असौ योगोपयोगित्वाद्देहस्य जायते ध्रुवम् II ,
एवं मे ज्ञानिनो भक्ताः संशुद्धिं चक्रपीठयोः ।
समासाद्य लभन्तेऽन्ते मत्सायुज्यं न संशयः ॥
किन्वेवं पितरो यावजीवपिण्डे न संभवेत् ।
चाक्रिकी पैठिकी शुद्धिस्तावन्नैव त्रितापतः ।।
निस्तरेयुरहो जीवा कदाचिद्वै कथंचन ।
तावत्कालं च ते जीवा आवागमनचक्रके ॥
भ्रमन्तः खलु तिष्ठन्ति नास्तिकोऽन्यत्र संशयः ।
मनुष्याः पञ्चकोपा समासाचापि पूर्णताम् ।।
शुद्धियां ही मुख्य कही गई हैं। उनमेंभी दृव्य शुद्धिही प्रधान
है क्योंकि देहके योग-उपयोगी होनेसे ही वह होती है।
इस प्रकार से मेरेशानी भक्त चक्र और पीठ शुद्धिको प्राप्त
करके अन्तमें निःसन्देह मत्सायुज्यको प्राप्त करलेते हैं, परन्तु
हे पितृगण! जब तक जीवपिण्डमें इस प्रकार चक्रशुद्धि
और पीठ शुद्धिकी सम्भावना न हो तब तक अहो त्रितापसे
जीव कभीभी किसी प्रकार निस्तार नहीं हो सकते हैं और
तब तक वे जीव आवागमन चक्रमें घूमते ही रहते हैं। इसमें
कोई भी सन्देह नही हैं। मनुष्य पञ्चकोषौकी पूर्णताको

धर्मकम्मदीपिका। आवागमनचक्रेऽस्मिन विभ्रमन्तो निरन्तरम् । पिण्डेश्वरा भवन्तोपि भुखते दुःखमुल्वणम् ॥ प्रश्न:- धर्मकर्मयज्ञशब्दानां यथार्थतात्पर्य यज्ञम्स ब वैज्ञानिक खरूपं श्रावस्तुभवान् । समाधानम्- भगवान महाविष्णुः विष्णुगीतायां स्वयमेवमाह । धर्मावारा स्थिता सृष्टिः स एवास्या नियामकः । केवलं धर्ममेवैफमाश्रित्य जीवजातयः ॥ प्राप्त करके भी और पिण्डेश्वर हो जाने परभी इस आवागमन चक्रमें निरन्तर परिभ्रमण करते हुए असहनीय दुःखोंको मोगा करते हैं। प्रश्न- कर्म धर्म और यश इन तीनों शब्दोंका यथार्थ तात्पर्य सुनने की इच्छा है और विशेषतः यशका वैज्ञानिक रहस्य कृपा करके सुनावें। श्रीभगवान् महाविष्णुने विष्णुगीतामें निजमुखले इस प्रकार कहा है:- सृष्टि धर्मके आधारपर स्थित है। सृष्टिका नियामक धर्मही है और एक मात्र धर्मकोही अवलम्बन, प.रके ये ६४ धर्मकर्मदीपिका। अग्रेसराभवन्तीमा मा प्रत्येव न संशयः। ममानुशासनं धम्म इतितख विदो विदुः ॥ जगन्नियामिका शक्तिधर्मरूपास्ति या मम । तया हनन्तब्रह्माण्डा हनन्ता लोकराशयः ।। ऋपयः पितरो यूयं स्वस्वस्थाने स्थिताः सदा । रक्षन्ति सृष्टिमखिलामिति जानीत सत्तमाः ।। धर्मे धारणरूपा था शक्तिरति दिवौकसः । तयैव स्वस्वकक्षायामिमे सर्वे स्थिता सदा ॥ प्रहनक्षत्रप्रमुखा लोका ब्रह्माण्डकानि च । तयैव पितरो यूयमृपयश्च तथासुराः ॥ जीवगण मेरी धोरही अग्रसर होते हैं। इसमें सन्देह नहीं। मेरा अनुशासन धर्म है ऐसा तत्व समझते हैं। मेरी जगनि. यामिका शक्तिरूप धर्मसे अनन्त ब्रह्माण्ड समूह अनन्त लोक समूह और ऋषि देवता पितृगण अपने सपने स्थान पर सदास्थित रहकर सम्पूर्ण सृष्टिकी रक्षा करते हैं। है श्रेष्ठ- देव गण इसको जानों। हे देवगण ! मेरी धर्मको धारिवा शक्ति द्वारा ही सय ब्रह्माण्ड और लव ग्रह नक्षत्र आदि लोक समूह अपनी अपनी कक्षामें सदा स्थित रहते हैं और उत्तीको द्वारा ऋषि पितृ आपलोग और अडरगण भी अपनी भपगी पदमर्यादाकी रक्षा करते हुए संसारको रक्षामें भली

धर्मकर्मदीपिका।
६५.
."
रक्षन्तः पदमर्यादा स्वीयाँलोकानवन्त्यलं ।' :-
यदा स्वधर्माच्च्यवथ विप्लवो जायते तदा ॥
अत्यन्तं येन लोकेषु नित्यं सीदन्ति प्राणिनः।
अनन्तकोटिब्रह्माण्डयुक्तसृष्टिप्रवाहकः !!:::
मस्थितः केवलः धर्ममेवैकमवलम्ध्य हि ।
वर्तते धर्म एवाऽतो विश्वधारक ईरितः ।।
अनन्ता ये प्रहाः सर्वे गथोपग्रहराशयः ।.."
ब्रह्माण्डशब्दनिर्वाच्यास्तथैवामरपुङ्गवाः ॥
नाना वैचित्र्यसंयुक्ता उद्भिजस्वेदजाण्डजाः ।
जरायुजा इमे नून भूतसङ्काः समीरिताः ॥
सर्वानेतान् विनिर्दिष्टे नियमें परिचालयन् ।
'एक एवास्ति धर्मोऽतो जगतां स नियामकः ।।
+ -
भांति प्रवृत्त रहते हैं। श्राप लोग जब स्वधर्मसे च्युत होते
हो तभी जर्गत्में विसव उपस्थित होता है जिसले. लोकोंमें
-प्राणिमात्र नित्य अत्यन्त केश पाते हैं। मुझमें स्थित
अनन्तकोटि · ब्रह्माण्डयुक्त सृष्टिप्रवाह . एकमात्र धर्मको
अवलम्भन करके ही स्थित है इसी कारण धर्म विश्वधारक
कहा गया है। हे देवधेष्ठगण! अनन्त प्रहं उपग्रहमय ब्रह्माण्ड
'और 'अनन्त विचित्रतापूर्ण इद्भिज संदज अण्डज और
जरायुंजरूपी चतुर्विधभूतसङ्घ इन लवको निर्दिष्ट नियम.
•पर, चलाने वाला. एकमात्र धर्म है इस कारण धर्मको
५

धर्मकम्मदीपिका प्रकृतेमें वशं याता मूढा जीवगणा हिये। क्रमशो'मा समायान्ति निश्चिवं विबुधोत्तमाः ॥ विशिष्टचेतना जीवास्तद्वन्मामेव चाश्रिताः। मां प्रत्यमेसराः सन्तो मामेकं यान्ति वै क्रमात् [... अतः क्रम द्विधा मुख्यं सहज जैवमेव च। तस्मात् कर्मविदो धीरा धर्म कर्मेति संजगुः ॥ एवं यज्ञस्तथा धर्म उमौ पर्यायवाचकौ । कथिती वेदनिष्णातैः शास्त्रज्ञैः शास्त्रविस्तरे।। सहयशाः प्रनाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः । . जगभियन्ता कहते हैं। हे देव श्रेष्ठगण ! मेरी प्रकृतिके अधीन रहकर मूढ़ जीवगण क्रमशः मुझको निश्चित ही प्राप्त करते हैं और उसी प्रकारसे मुझे ही आश्रय करके विशिचेतन जीवगण क्रमशः मेरी ओर अग्र- सर होते हुए मुझको ही प्राप्त करते हैं। इसी कारण कर्म सहज और जैव रूपले प्रधानतः दो प्रकारकां कहाता है। कर्म- के जानने वाले महापुरुषगण इसीसे धर्मको कर्म नामसे. अभिहित करते हैं। इसी प्रकार यश और धर्म दोनों पर्याय चाचक शब्द हैं, इस बातको वेदनिष्णात शास्त्रशोने शाख. विस्तारमें कहा है। सृष्टिके भारम्भसे यक्षके साथ ही साथ प्रजाओंको उत्पन्न करके प्रजापतिले कहा इससे जीवगण भारा

पार्मकर्मदीपिका
१७
अनेन जीवा राध्यन्तामसावस्त्विष्टकामधुक् ॥
भावयन्तु हि वोऽनेन भवन्तो भावयन्तु तान् ।
परस्परं भावयन्तः भयो देवा अवाप्स्यथ ॥
दृष्टान् भोगान् भवन्तो हि दास्यन्ते यज्ञमाविताः ।
अदत्त्वा वो भवदत्तान्यो भुंक्त स्तेन एव सः ।।
यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो. मुच्यन्ते सर्व किल्विपैः ।
भुञ्जते ते त्वचं पापा ये पचन्यात्मकारणात् ।।
अन्नाद्वन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः ।
यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञाः कर्मसमुद्भवः॥
धना करें। यह उन लोगोंका अभीष्ट प्रदान कारी होग।
हे देवगण | जोधगए इसके द्वारा आपलोगोंको सम्पादित करें
और प्रापलोग उनको सम्पादित करें इसी प्रकार परस्पर
सम्वद्धित होकर सब ल्याण प्राप्त करेंगे। थाप लोग यशसे
सम्पर्शित होकर उनको अभिलपित भोग प्रदान करेंगे इस
लिये आपके दिये भोगोको आप लोगोंको अर्पण किये विना
ही जो भोगता है वह चोर है। यशका अवशिष्ट भोजन
करने वाले सज्जन गए सब पापोंसे मुक्त हो जाते हैं। किन्तु
जो अपने लिये ही भोजन बनाते हैं वे प्राधिगण पापको ही
भोजन करते हैं। जीवसमूह अनसे उत्पन्न होते हैं, अन्न
धि होनेसे उत्पन्न होता है और यझसे वृधिहोती है एवं पर

धर्मकर्मदीपिका।
कर्म ब्रह्मोद्भवं वित्त ब्रह्माक्षरसमुद्भवम् ।
तस्मात् सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम् ।।
एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः ।
अधायुरिन्द्रियारामो मोघं देवा स जीवति ।
दैवमेवा परे यज्ञ योगिनः पर्युपासते ।
नझामावपरे यज्ञ यज्ञेनैवोपजुह्वति ।।
श्रोत्रादीनिन्द्रियाण्यन्ये संयमामिषु जुह्वति ।
शब्दादीन्त्रिपधानन्ये इन्द्रियाग्निषु जुह्वति ॥
सर्वाणोन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे ।
फर्म द्वारा सम्पन्न होता है। कर्मको ब्रा (वेद) द्वारा उत्पन
समझो और ब्रह्म (वेद) अक्षर (ब्रह्म) से उत्पन्न है इस
लिये लथ्यापी ब्रह्म यज्ञमें नित्य प्रतिष्ठिन है।
इल लोकमें
जो इस प्रकार प्रवर्तित चकका अनुसरण नहीं करता है, हेर
देवगणं' इन्द्रियासक पाप जीवन वह व्यक्ति व्यर्थ जीमा है।
'कितने योगिगण देवयज्ञको ही उपासना करते हैं, कोई काई
.यश कप उपाय द्वारा ब्रह्मरूपी अग्निमें यचको सम्पन्न करते हैं।
और कोई कोई योगी संयमपी अग्निमें अपनी श्रवण आदि
इन्द्रियों का हवन करते हैं। और कितने योगिमण इन्द्रियरूपी
मग्निमें शब्दं आदि विषयोको हवन करते हैं। कितने यौगिगण
'झानके द्वारा प्रज्वलित. आत्मसंयमरूप योगाग्निमें सम्पूर्ण
'इन्द्रिय कर्म और प्राण कमौका हवन करते हैं। कोई कोई द्रव्य

धर्मकर्मदीपिका। MARW आत्मसंयमयोगाग्नौ जुलति ज्ञानदीपिते ।। द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथापरे । खाध्यायज्ञानयज्ञाश्च यतयः संशितव्रताः। अपाने जुह्वति प्राणं प्राणेऽपानं तथापरे। प्राणपानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः॥ अपरे नियवाहाराः प्राणान् प्राणेषु जुवि । सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मशाः ।। यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्राह्म सनातनम् । नायं लोकोस्त्ययज्ञस्य कुतोऽन्यनिदिवौकसः ।। - दानरूपी यक्ष, कोई तपोयज्ञ और कोई योगयज्ञक अनुष्ठाता हैं- तथा नियममें दृढ़ रहने वाले यतिगण स्वाध्याय और ब्राह्मशान- की यशका अनुष्ठान करते हैं। अन्य कोई कोई अपानमें प्राण और प्राणमें अपानका हवन करते हैं और इस प्रकारलै प्राण 'अानकी गतिको जय करके प्राणायाम परायण हो जाते हैं। अन्य कोई कोई नियताहारी हो कर प्राणमें प्राणको हवन करते हैं। यज्ञके द्वारा निष्पाप, यक्षका अवशिष्ट अमृत भोजन करने वाले, सब यशवेत्ता सनातन ब्रह्मो-ही प्राप्त होते हैं। हे देषता गण ! ओ लोग यशानुष्ठानसे रहित है न उनका इह लोक है और न उनका परलोक ही है। ब्राके जानने वालों के मुतसे. इस प्रकारसे बहु प्रकारके योंका विस्तार हुआ है।

७० धम्मफम्र्मदोशिका। एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे । कर्मजान वित्त तानसर्वानेवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यते ॥ श्रेयान्द्रव्यमलायज्ञाजज्ञानयज्ञोऽमृतान्धसः । सर्व कर्माखिल देवा ज्ञाने परिसमाप्यते।। अश्रद्दधाना ज़ीवा वै धर्मस्यास्य सुघाशनाः । अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्यु संसारवमनि ॥. त्रैविद्या.मां सोमपाः पूतपापा यहरिष्ठा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते। ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोक- भनन्ति दिव्यान दिवि देवभोगान् ।। उन सबको कर्मसे उत्पन्न जानो ऐसा जान कर मनुष्य मुक्तिको प्राप्त होंगे। हे अमृतभोजी देवतागण । द्रव्यमय यज्ञसे शान यक्ष श्रेष्ठ है.क्योंकि शानमें ही सय काँकी पूर्ण रूपसे परि- समाप्ति हुआ करती है। हे सुधाके पान करने वाले देवता. गण ! इस धर्ममें अश्रद्धा करने वाले जीवगण मुझको न प्राप्त करके मृत्युमय संसार मागमें लौट आते हैं। वेदत्रयके अंनुसार कर्मकाण्ड परायण अर्थात् सकाम, कर्मागण यज्ञ द्वारा मेरा यजन-करके (यश शेषरूपी) सोमपान करते हुए .और निष्पाप होते हुए स्वर्ग गतिकी प्रार्थना करते हैं वे.लोग पुण्यस्वरूप, इन्द्रलोकमें पहुंच कर वहाँ दिव्य देवभोगसमूह

.
धमाकर्मदीपिका
ते तं भुक्त्वां स्वर्गलोकं विशाल..
क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति ।
एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना
'गतागत कामकामा लभन्ते ।।
अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च ।
न'तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्चर्वन्ति ते ir---
भवद्भिर्लोककल्याणकारिणो यावतः: प्रश्नायकिरे, तो
सहाचारस्य घनिष्टसम्वन्धत्वादुपसंहारे तस्यैवावश्यक
वाया विज्ञानस्यं च विपये विष्णुगीतायां भगवान श्रीमहा-
विष्णुर्दैवान् यदुपदिदेश तदेव जगत्कल्याणार्थ प्रका-
भोग करते हैं. उन विपुलं स्वर्ग सुख समूहको भोग करने के
अनन्तर पुण्य क्षीण होनेपर मृत्यु लोक में लौट आते हैं। और
घेदत्रय विहित धर्मोंका अवलम्बन करके भोगकी इच्छा करते
हुए (आवागमन 'चक्रमे) आया आया. करते हैं। मैं ही
'सबयझोंका भोका और प्रभु हूं परन्तु वे लोग मेरे यथार्थ
खरूपको नहीं जानते हैं इस कारण उनकी पुनरावृत्ति होती है।
आप लोगोंने जितने लोककल्याणकर प्रश्न किये हैं, उनसे
भाचारका घनिष्ठ सम्बन्ध है, इसलिये उपसंहारमें भाधारको
'मावश्यकता और श्नांचारके विशानके विषयमै 'विष्णुगीता
भीभगवान महाविष्णुने निजमुखसे देवताओं के प्रति जो उपदेश

धर्मकर्मदीपिका। श्यते । एतेषां भगवद्वचनानां, मङ्गलमयानि शुभ- फलानि सांसारिकाश्चिरमास्वादयन्तु । सदाचारच्युता यूयं भवथ स्म दिवौकसः । स्वकर्तव्यं स्वधर्मश्च भवन्तो व्यस्मरन्च्छुभम् ।। अत एव समाक्रामचित्तं वो मोहज भयम् । तापोऽयोग्यप्रवृत्त्युत्योऽभावो मत्स्मृतिनाशतः ।। यूयमाचारमाजश्चेत्स्वकर्तव्यपरायणाः । स्वधर्मनिरताश्चाऽपि भवितुं खलु शक्ष्यथ ।। मच्चित्ताश्चेत्तदा यूयं भयात्तापादभावतः । -विमुक्ताः सर्वकल्याणं लप्स्यध्वे मत्प्रसादतः ॥ 3 - किये थे, वे उपदेश समूह जगत्कल्याणार्थ विवृत किये जाते हैं। इनं भगवद्वचनोंका मनलमय शुभ, फल जगजीवगण प्राप्त करें। तुमलोग सदाचार भ्रष्ट हो गये हो, इस कारण तुम मंगल- मय निजकर्तव्य और स्वधर्मको भूल गये हो.। इसीसे तुम्हारे चित्पर.मोहजनित भय, अयोग्य प्रवृत्ति जनित ताप और मेरे :विस्मरणजनित अभाव इन सोने. अधिकार कर लिया है। यदि तुम भाचारवान् होनेसे कर्तव्यपरायण खधर्मनिरत और मद्गतचित्त हो सकोगे, तय भय और ताप मुक्त होकर सत्र :प्रकारके अभाषको दूर करते हुए मेरी कृपासे यावन्मंगल लाभ

६५.
धर्मकर्मवीपिका
रक्षन्तः पदमर्यादा स्खीयोलोकानवन्त्यलं ।
यदा खधम्माच्च्यवथ विप्लयो जायते तदा ।।
अत्यन्तं येन लोकेषु नित्यं सीदन्ति प्राणिनः ।
अनन्तकोटिब्रह्माण्डयुक्तसृष्टिप्रवाहकः ।।
मस्थितः केवलं धर्ममेवैकमवलम्न्य हि ।
वर्तते धर्म एवाऽतो विश्वधारक ईरितः ।।
अनन्ता ये प्रहाः सर्वे थोपनहराशयः ।
ब्राह्माण्डशब्दनिर्वाच्यास्तथैवामरपुङ्गवाः ॥
नाना वैचित्र्यसंयुक्ता उद्भिज्जस्वेदजाएडजाः ।
जरायुजा इमे नूनं.भूतसङ्काः समोरिता ।।
सर्वानेतान् विनिर्दिष्टे नियमे परिचालयन् ।
एक एवास्ति धर्मोऽतो जगतां स नियामक्रः ।।
मोति प्रवृत्त रहते हैं। आप लोग जब स्वधर्मसे ध्युत होते
हो'तमी जगत्में विप्लव उपस्थित होता है जिससे लोकोंमें
प्राणिमात्र नित्य अत्यन्त लेशं पाते हैं। मुझमें स्थित
अनन्तकोटि ग्रह्माण्डयुक्त सृष्टिप्रवाह एकमाघ धर्मको
अवलम्बन करके ही स्थित है इसी कारण धर्म विश्वधारक
कहा गया है। हे देवश्रेष्ठगण! अनन्त प्रह उपग्रहमय ब्राह्माण्डः
और अनन्त विचित्रतापूर्ण इद्भिज खेदज अण्डज.और.
रायुजरुपी चतुर्विधभूतसचं इन सपको निर्दिष्ट नियम
पर चलाने वाला एक मात्र धर्म है इस कारण धर्मकों
५

धर्मकम्मदीपिका प्रकृतेम वशं याता मूढा जीवगण दिये। क्रमशो मां समायान्ति निश्चितं विवुधोत्तमाः ॥ विशिष्टचेतना जीवास्तद्वन्मामेव चाश्रिताः । मां प्रत्यग्रेसराः सन्तो मामेकं यान्ति वै क्रमात् ।। अतः कर्म द्विधा मुख्यं सहज जैवमेव च । तस्मात् कर्मविदो घीरा धर्म कर्मेति.संजगुः ।।. एवं यज्ञस्तथा धर्म उमौ पर्यायवाचकौ । कथितौ वेदनिष्णातैः शास्त्रज्ञः शास्त्रविस्तरे।।. सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः । : : न जगनियन्ता कहते हैं। हे देव श्रेष्ठगण ! मेरी प्रकृति के अधीन रहकर भूद जीवगण क्रमशः मुझको निश्चित ही प्राप्त करते हैं और उसी प्रकारसे मुझे ही आश्रय 'करके विशिष्टचेतन जीवगण क्रमशः ,मेरी ओर अग्र- सर होते हुए मुझको ही प्राप्त करते हैं। इसी कारण कर्म सहज और जैव रूपसे प्रधानतः दो प्रकारका कहाता है। कर्म- के जानने वाले महापुरुषगण इसीसे धर्मको कर्म नामसे अभिहित करते हैं। इसी प्रकार यह और धर्म दोनों पर्याय पाचक शब्द हैं, इस घातको वेदनिष्णात शास्त्रज्ञाने शाल विस्तारमें कहा है। सृष्टिके प्रारम्भमें यक्षके साथ ही साथ प्रजामोको उत्पन्न करके प्रजापतिने कहा इससे जीवगण भारा-

धर्मकर्मदीपिका।
अनेन जीवा राध्यन्तामसावस्त्विष्टकामधुक् ॥
भावयन्तु हि वोऽनेन भवन्तो भावयन्तु तान् ।
परस्परं भावयन्तः श्रेयो देवां अवाप्स्यथ ।।
दृष्टान् भोगान् भवन्तो हि दास्यन्ते यज्ञमाविताः ।
मदत्त्वा वो भवदत्तान्यो भुक्के स्तेन एव सः ।।
यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्व किल्विषैः ।
भुखते ते त्व पापा ये पचन्त्यात्मकारणात् ॥
अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः ।
यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञा कर्मसमुद्भवः ।।
.
धना करें। यह उन लोगोंका अभीष्ट प्रदान कारी हो"।
हैं देवगण ! जोधगण इसके द्वारा आपलोगोको सम्पादित करें
और आपलोग उनको सम्पति करें इसी प्रकार परस्पर
सम्बद्धित होकर संवे कल्याण प्राप्त करेंगे। आप लोग यवसें
सम्वति होकर उनको अभिलषित भोग प्रदान करेंगे
लिये आपके दिये भोगोंको आप लोगोंको अर्पण किये विना
हो लो भोगता है यह चोर है। यक्षका अवशिष्ट भोजन
करने वाले सज्जन गण सब पापोंसे मुक्त हो जाते हैं। किन्तु,
जो अपने लिये ही भोजन बनाते हैं वे पापिंगण पापको ही
मोजन करते हैं। जीवसमूह अनसे उत्पन्न होते हैं, असं
परि होनेसे उत्पन्न होता है और यासे वृष्टिहोती है एर्षय

धर्मकर्मदीपिका।
कर्म ब्रझोद्भवं वित्त प्रक्षाक्षरसमुद्भवम् ।
तस्मात् सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम् ॥
एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः ।।
अधायुरिन्द्रियारामो मोघं देवा स जीवति ॥
देवमेवा परे यज्ञ योगिनः पर्युपासते ।
प्रझानावपरे यज्ञं यनेनैवोपजुह्वति ।।
श्रोधादीनिन्द्रियाण्यन्येसंयमानिपु जुहति ।
शब्दादीन्त्रिपपानन्ये इन्द्रियाग्निपु जुह्नति ॥
सर्वाणीन्द्रियकमोणिं प्राणकमोणि वापरे ।
इस लोकमें
कम द्वारु सम्पन्न होता है। कर्मको ब्रह्म (वेद) द्वारा उत्पन्न
समझो और ब्रह्मवाद अक्षर (ब्रह्म ) से उत्पक्ष है इस
लिये सर्वव्यापी ब्रह्म यसमें नित्य प्रतिष्ठित है।
जो इस प्रकार प्रवर्ति चक्राका अनुसरण नहीं करता है, हे
देवगण इन्द्रियासक पाप जीवन वह व्यकि व्यर्थ जीना है।
कितने योगिगण देवयशकी ही उपासना करते हैं, कोई कोई
घश रूप उपाय द्वारा ब्रहारूपी अग्निमें यवको सम्पन्न करते हैं
और कोई कोई योगी संचमरूपी अनिमें अपनी श्रवण आदि
इन्द्रियोका हवन करते हैं। और कितने योगिगण इन्द्रियरूपी
मग्निमें शब्द आदि विषयोको हवन करते हैं। कितने योगिगलं
ज्ञानके द्वारा प्रज्वलित आत्मसंयमरूप योगाग्निमें सम्पूर्ण
इन्द्रिय कर्म और प्राण कर्मों का प्रवन करते हैं। कोई कोई द्राप.

. धर्मकर्मदीपिका। 8 आत्मसंयमयोगाग्नौ जुलति ज्ञानदीपिते ।। इव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथापरे । खाध्यायज्ञानयज्ञाश्च यतयः संशितव्रताः ।। अपाने जुह्वति प्राणं प्रापेऽपानं तथापरे । प्राणपानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः ।। अपरे नियताहाराः प्राणान् प्राणेषु जुइति । - सर्वेऽप्येते यज्ञविदो चक्षपितकल्मशाः ।। यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्तिं ब्रह्म सनातनम्।। नायं लोकोस्त्ययज्ञस्य कुतोऽन्यत्रिदिवौकसः ।। दानरूपी यज्ञ, कोई तपोयश और कोई योगयज्ञक अनुष्ठाता हैं तथा नियममें बढ़ रहने वाले यतिगण खाध्याय और ब्रह्मशान- की यज्ञका अनुष्ठान करते हैं। अन्य कोई कोई अपानमें प्राण और प्राणमें अपानका हवन करते हैं और इस प्रकारसे प्राण अगनकी गतिको जय करके प्राणायाम परायण हो जाते हैं । अन्य कोई कोई नियताहारी हो कर प्राणमें प्राणको हवन करते हैं। यज्ञके द्वारा निष्पाप, यक्षका अवशिष्ट अमृत भोजन करने वाले, सब यशवेचा सनातन ब्रह्मको ही प्राप्त होते हैं। हे देवता गण ! जो लोग यशानुष्ठानसे रहित हैं न उनका इह लोक है और न उनका परलोक ही है। ब्रह्मके जानने वालों मुझसे इस प्रकारसे बहु प्रकारके यहाँका विस्तार हुआ धर्मकर्मदीपिका एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे । कर्मजान् वित्त तानसर्वानवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यते ॥ श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ञानयज्ञोऽमृतान्धसः । सर्व कर्मास्त्रिलं देवा ज्ञाने परिसमाप्यते। अश्रद्दधाना जीवा वै धर्मस्यांत्य सुधाशनाः। अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्यु संसारवमनि ॥ विद्या मां सोमपाः पूर्तपापा: यरिष्ठा स्वर्गति प्रार्थयन्ते। 'ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोक- मनन्ति दिव्यान् दिवि देवभोगान् ।। उन सबको कर्मसे उत्पन्न जानो पेमा जान कर मनुष्य मुक्तिको प्राप्त होंगे। हे अमृतमोजी देवतागण ! द्रव्यमय यक्षसे शानं यश श्रेष्ठ है क्योंकि शानमें ही सत्र कोकी पूर्ण रूपले परि- समाप्ति हुआ करती है। हे सुधाके पान करने वाले देवता गण ! इस धर्ममें अअदा करने वाले जीवगए मुझको ने प्राप्त करके मृत्युमय संसार मार्ममें लौट आते हैं। वेदत्रयके अंनुसार कर्मकाण्ड परायण अर्थात् सकाम कांगण यह द्वारा मेरा यजन करके ( यक्ष शेषरूपी ) सोमपान करते हुएं और निष्पाप होते हुए वर्ग गतिकी प्रार्थना करते हैं वे लोग मुएयखरूप -इन्द्रलोकमें पहुंच कर वहाँ दिव्य देवभोगसमूह

धम्र्मकर्मदीपिका
ते तं भुक्वा. स्वर्गलोक विशालं
क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोक विशन्ति ।
एवं त्रयोधर्मसनुप्रपन्ना
गतागर्त कामकामा लभन्ते ॥
अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च ।
न तु सामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्ववन्ति ते ॥
भवद्भिर्लोककल्याणकारिणो यावत: प्रश्नाश्चकिरे, तैः
सहाचारस्य घनिष्टसम्वन्धत्वादुपसंहारे तस्यैवावश्यक
ताया विज्ञानस्य च.विषये विष्णुगीतायां भगवान् श्रीमहा-
विष्णुर्दैवान् यदुपदिदेश तदेव जगत्कल्याणार्थ प्रका-
भोग करते हैं वे उन विपुल खर्गसुख समूहकों भोग करने के
अनन्तरःपुण्य क्षीण होनेपर मृत्यु लोकमें लौट आते हैं। और
वेदत्रय विहित धोका अवलम्बन करके भोगकी इच्छा करते
हुए.(भावागमन. चक्र.):आया जाया करते हैं। मैं ही
सब योंका भोका और प्रभु हूं परन्तु वे लोग मेरे यथार्थ
खरूपको नहीं जानते हैं इस कारण उनकी पुनरावृत्ति होती है।
आप लोगोंने जितने लोककल्याणकर प्रश्न किये हैं, उनसे
प्राचारका घनिष्ठ सम्बन्ध है, इसलिये उपसंहारमै भाचारकी
मावश्यकता और आचारके विज्ञान विषयमें विष्णुगीतामें
श्रीभगवान् महाविष्णने निजमुखसे.देवताओंके प्रति जो उपदेश

धम्मम्मदीपिका श्यते। एतेषां भगवद्वचनानां मङ्गलमयानि शुभ- फलानि सांसारिकाश्चिरमास्वादयन्तु । सदाचारच्युता यूयं भवथ स्म दिवौकसः। स्वकर्तव्यं स्वधर्मश्च भवन्तो व्यस्मरखच्छुभम् ॥ अत एव समाक्रामचित्तं वो मोहज भयम् । तापोऽयोग्यप्रवृत्त्युत्थोऽभावो मत्स्मृतिनाशतः ॥ यूयमाचारमाजश्चेत्स्वकर्तव्यपरायणाः । स्वधर्मनिरताश्चाऽपि भवितुं खलु शक्ष्यथ ।। मच्चित्ताश्चत्तदा यूयं भयात्तापादभावतः । विमुक्ताः सर्वकल्याणं लपस्यध्वे,मत्प्रसादतः ॥.. ८ . . किये थे, वे उपदेश समूह जगत्कल्याणार्थ षिवृत किये जाते हैं। इन भगववचनोंका मङ्गलमय शुभ फल जंगज्जीवगण प्राप्त करें। तुमलोग सदाचार भ्रष्ट हो गये हो, इस कारण तुम मंगल- मय निजकर्तव्य और स्वधर्मको भूल गये हो। इसीसे तुम्हारे चिचपर मोहजनित भय, अयोग्य प्रवृत्ति अंनित ताप और मेरे विस्मरणंजनित अभाव इन सोंने अधिकार कर लिया है। यदि तुम भाचारवान होनेसे कर्तव्यपरायण स्वधर्मनिरत और मगतचित्त हो सकोगे, तब भय और ताप मुक्त होकर सब प्रकारके प्रभाषको दूर करते हुए मेरी कपासे यावन्मंगल लाभ

धर्मफरमंदीपिका
wware
आचारः सर्वकल्याणमूलं नूनं दिवौकसः.!
शक्ष्यन्त्याचारवन्तो हि प्राप्तुं कल्याणसम्पदः ।। .
आचारमूला जातिः स्यादाचारः शास्त्रमूलकः ।
वेदवाक्यं शाबमूलं वेदः साधकमूलंकः ।।
साधकच क्रियामूलः क्रियाऽपि फलमूलिका ।
फलमूलं सुखं देवाः ! सुखमानन्दमूलकम् ॥
आनन्दो ज्ञानमूलस्तु ज्ञानं .वै ज्ञेयमूलकम् ।
तत्त्वमूलं ज्ञेयमात्रं तत्त्वं हि ब्रह्ममूलकम् ।।
ब्रह्मज्ञानं वैक्यमूलमैक्यं स्यात् सर्वमूलकम् ।
ऐक्यं तद्धि सुपर्वाण: भावातीतं सुनिश्चितम् ।।
करोगे। हे देवगण ! माचार ही सय कल्याणोका मूल है,
प्राचारवान् , हा सब कुछ प्राप्त कर सकते हैं। जाति
माचारमूलक होती है, प्राचार शास्त्रमूलक होता है, शास्त्रका
भूल वेश्याय है, वेषका मूल साधक है, साधककी
मूल किया है, क्रियाका मूल फल है, हे देवगण ! फलका मूल
मुक्ष है, मुखका मूल आनन्द है, आनन्दका मूल पान है,
धानका मूल क्षेय है, सकल शेयोंका मूल तत्व है, तत्वका मूल
प्राहा है, ब्रह्मशानशा मूल ऐप है और ऐक्य लवका सूख है।
हे देवगण ! वही ऐक्य भावातीत है यह निश्चित है। यह

धर्मकर्मदीपिका। 'भावातीतमिदं सर्व प्रकाश्ये भावमात्रकम् । नास्त्यत्र संशयः कोऽपि सत्यं सत्यं वदाम्यहम् ।। इति श्री दशमहाविद्यासिद्ध सर्वानन्ददेव (सर्वविद्या) कुलोत्पन्न महामहोपाध्याय महामहाध्यापक श्रीमन्नदाचरण तर्कचूडामणि शर्म- विरचिता धर्मकर्मदिपिका समाता। सकल संसार प्रकाश रूपसे केवल मावमय है परन्तु वस्तुतः भावातीत है इसमें कोई भी सन्देह नहीं है। मैं सत्य सत्य कहता हूं। इस प्रकार दशमहाविद्यासिद्ध सर्वानन्ददेव (सर्वविद्या) कुलोत्पन्न महामहोपाध्याय महामहाध्यापक श्रीअन्नदाचरण तर्कचूडामणि शर्मा विरचित धर्मफन्मदिपिका समाप्त हुई।

वाराणसीविद्यापरिषद् । श्रीमारतधर्ममहामण्डलका एक धार्मिक विश्वविद्यालय स्थापन करनेका उद्देश्य प्रथमसे ही था। उसी उद्देश्यकी तिके लिये महामण्डलके सशालकोने यह परिषद् स्थापन की है, इसके द्वारा निम्नलिखित परीक्षाएं ली जायेंगी, जिनके पाव्य ग्रंथ भारतधर्मसिण्डिकेट लिमिटेड काशीके निगमागम पुस्तक-भण्डार द्वारा प्राप्त हो सकते हैं। परीक्षा प्रतिवर्ष पैत्र मास में होगी। (१) उपाध्याय परीक्षा। (२) महो. पाध्याय परीक्षा । पौरोहित्य परीक्षाके दो नाम रक्खे गये हैं, यथा--(३) भौतकर्म विशारद परीक्षा और (४) स्मा. कम्मविशारद परीक्षा। गुरु और आचार्यसम्बन्धीय परीक्षा, यथा-(५) धर्माचार्य परीक्षा और (६) उपदेशक परीक्षा: हिन्दीभाषा इस समय भारतवर्षकी राष्ट्रभाषा समझी जाती है अतः उसकी उन्नतिके लिये जो परीक्षा होगी उसका नाम (७) राष्ट्रभाषा विशारद परीक्षा है। इसके सिपाय (2) स्कूल के छात्रों के लिये एक परीक्षा (E) कालेज- के छात्रों के लिये एक परीक्षा और एक (१०) धर्मप्रवेशिका परीक्षा होगी। 4 मन्त्री, वाराणसी विद्या परिषद् महामण्डल भवन, जगत्गल, काशी।

भारतधर्मसिंडिकेट लिमिटेड
भारतधर्म प्रेस ।
:-*:-
मनुध्योंकी सर्वाङ्गीण उन्नति लिखने पढ़नेसे होती है।
वर्तमान समय में शिक्षा वृद्धिके जितने साधन उपलब्ध हैं.
इनमें प्रेस ' सबसे बढ़कर है। सनातनधर्मके सिद्धान्तोंका
और वर्णाश्रममंधके उद्देश्शेका प्रचार करने के लिये भी इस
साघमझा अवलम्बन करना उचित जानकर सत्त कम्पनीने
मारतधर्म नामक प्रेस सोल दिया है। इसमें हिन्दी, अंग्रेजी
और बंगलाका सय प्रकारका काम उत्समत्ताले होता है।
पुस्तक, पत्रिक्षाएं, इंडबिल, लेटरपेपर. घालपोस्टर्स, चेक,
बिल, हुएडी, रसीद, रजिस्टर, फार्म आदि छपवाकर इस
प्रेसकी छपाईकी सुन्दरताका भनुभव कीजिये। इलको एक
श्रादर्श प्रातीय प्रेस बनानेका आयोजन हो रहा है।
-
मैनेजर:-
भारतधम्म प्रेस,
भारतधम्मसिण्डिकेट लिमिटेड भवन,
जगत्गल स्टेशनरोड, बनारत (शहर)

+
'भारतधर्मसिंडिकेट लिमिटेड
का
शास्त्रप्रकाशन विभाग।
इस : विभागले सब प्रकारको धार्मिक और जातीय
। पुस्तकें प्रकाशित होगी और ओ पोप ग्रन्थरचयिता धना-
मावसे अन्य प्रकाशित नहीं कर सकेंगे, उनको भी पुस्तके
लेकर प्रकाशित की जायेगी।
सेक्रेटरी:-भारतधर्मसिण्डिकेट लिमिटेड
सिण्डिकेट भवन, स्टेशन रोड, जगत्गंज, वनारस (शहर)
',
भारतधर्मसिंडिकेट लिमिटेड
बङ्क विभाग।
यह विभाग सिण्डिकेटले हिस्सेदार, वर्णाश्रमसंघ के प्रति
निधि तथा मध्यवृत्ति के सदगृहस्थोंको धनकी श्रावश्यकता
होनेपर सहायता देनेके विचारसे बोला गया है ।
सेक्रेटरी:-
भारतधमलिपिडकेट लिमिटेड,
सिएडकेट भवन, स्टेशन रोड,
जगतगंज, बनारस (शहर)

भारतधर्मसिंडिकेट लिमिटेड ।
एजेन्सी विभाग।
यह विभाग देशी शिल्पके प्रचार और स्वदेशी वाणिज्यको
मदद देनेके लिये खोला गया है।
सेक्रेटरी-भारतधर्मसिण्डिकेट लिमिटेड,
सिण्डिकेट भवन, स्टेशन रोड,जगत्गंज, बनारस (शहर)
भारतधर्मसिंडिकेट लिमिटेड ।
का
इन्फर्मेशन बोरो विभाग।
स्वदेशोन्नति तथा वाणिज्यादिके विषयमें जो कोई कुछ
सम्वाद जानना चाहेंगे सो इस विभागकेद्वारा पहुँचाया जायगा।
जिससे देशके शिल्प वाणिज्य और मार्थिक उन्नतिमें सहायता
पहुँच सके।
सेक्रेटरी
भारतधर्मसिण्डिकेट लिमिटेड,
सिण्डिकेट भवन, स्टेशन रोड,
जगतगंज, बनारस (शहर)

वर्णाश्रमसङ्घ । भारतवर्षकी वर्तमान राजनैतिक परिस्थितिके विचारसे स्वधर्माभिमान, स्वजातीय अभिमान और स्वत्वरक्षापूर्वक वर्णा- श्रमधर्मावलम्बी हिन्दूजातिका राजनैतिक अभ्युदय करना इस सबका उद्देश्य है। भारतवर्षके प्रति नगर तथा प्रति ग्राममें इस स्वजातीय सड़की सभ्यसंख्या वृद्धि करके भारतवर्ष के प्रत्येक प्रान्तमें एक पक प्रान्तीय केन्द्र स्थापन करनेका विचार है। उद्देश्यपत्रपर हस्ताक्षर करके वर्णामधर्म माननेवाले स्त्री-पुरुष मात्र ही इसके सभ्य हो सकते हैं। अभी संधक सायोसे संघका फार्म भरवाया जायगा और उनके पास वर्णा- श्रमसंघ नामक पुस्तिका पहुंचाई जायगी। संघके जो मुखपत्र हिन्दी और अंग्रेजी में मारतधर्मसिण्डिकेट लिमिटेड, बनारससे निकलते हैं, उनमेंसे एकका लेना संघके प्रतिनिधियोंके लिये आवश्यक होगा। मंत्री-वर्णाथमसंघ- भारतधर्मसिण्डिकेट लिमिटेड, सिण्डिकेट भवन, स्टेशन रोड,जगतगंज, बनारस (शहर) महामहोपाध्याय महामहाध्यापक पं० श्रीअन्नदाचरण तर्कचूडामणि महाशय प्रणीत बङ्गाक्षरकी पुस्तकें । ܐܘ - (१) बृति और कल्पनिका, विमला टीको सहित (२) धातुसूत्र, (सूत्र, वृत्ति, पखिका कस्खाप चन्द्र) कौमुदी टीका सहित (३) षटकारकविवेक (सूत्र, वृत्ति, पत्रिका कलाप- चन्द्र) कौमुदी टीका सहित (४) नमस्कार विवेक (पजिका कलापचन्द्र ) कौमुदी टीका सहित (५) सर्वनाम सूत्र (ति, खिया कलापचन्द्र परिशिष्ट, गोपीनाथ ) कौनुदी टोका साहन (६) परिशिर धातु (दृनि गोरीगाथ) कौमुदी टीशा सहित (७) परिशिष्ट नसाधन्तकारक (त्र ति गोपीनाथ) कौमुदी टीका सहित (3) परिशिष्ट (नान्नां कारिफा, गापामाथ) कौमुदी टीका सहित (६) धातुसंग्रह (प्रगम भाग) (विनास भाग) (११) व्युत्पत्तिकल्पतर.. (१२) फाबचान्द्रको सरल टोका सहित (भलंकार) " (१३) श्रीरामाभ्युदय (महाकाव्य) (१४) Kामस्थान ( (৫৪) মুনাবির (१६) तुचिथ " iose (१७) जाम प्रत्यय विवेक (१८) सुपरहस्य HI) (१६) धातु प्रत्यय विवेक दर्शन,-. (२०) सांख्य रहस्य । शारखाचरण भट्टाचार्य- प्रान-सोमपाड़ा, पो० खिलपाड़ा, जि० मोयाखाली। (पंचाल) .. ।

सनातन धर्मकी पुस्तकें।
धर्मकल्पगुम ।
श्रीस्वामी दयानन्द विरचित ।
यह हिन्दूधर्मका अद्वितीय और परमावश्यक ग्रंथ है।
हिन्दू जातिकी पुनरुन्नतिके लिये जिन जिन आवश्यकीय
विषयोंकी जरूरत है, उनसे सबसे बड़ा भारी अरु-
रत एक ऐसे धर्मग्रन्धकी थी कि, जिसके अध्ययन अध्या.
पनके द्वारा सनातनधर्मका रहस्य ओर उसका विस्तृत
समय तथा उसके अङ्ग उपांगोला यथार्थ ज्ञान प्राप्त हो
सके और साथ ही साथ वेदों और सव शास्त्रोका
प्राशय तथा वेदों और लव शास्त्रोंमें कहे हुए विज्ञानका
यथाक्रम स्वरूप जिज्ञासुको भलीभांति विदित हो सके। इसी
गुरुतर अमावको दूर करनेके लिये भारतके प्रसिद्ध धर्मवक्ता
और श्रीमारतधर्म महामण्डलस्थ उपदेशक महाविद्यालयके
दर्शनशाखके अध्यापक श्रीमान् स्वामी दयानन्दजी महाराजने
इस ग्रन्थका प्रणयन करना प्रारम्भ किया है। इसमें वर्तमान
समयके आतोच्य सभी विपय विस्तृतरूपसे दिये जायेंगे।
अबतक इसके छः खण्डोंमें जो श्रध्याय प्रकाशित हुए हैं, वे
ये हैं:-धर्म, दानधम्, तपोधर्म, कर्मयज्ञ, उपासनाया,
कानयन, महायश, वेद, वेदांग, दर्शनशास्त्र ( वेदोपांग)
स्म्रतिशास्त्र, पुराणशास्त्र, तन्त्र..म उपवेद, ऋषि और पुस्तक,
साधारण धर्म और विशेष सात वर्णधर्म, आश्रमधर्म,
जारीधर्म (पुरुपधर्मसे नारीधर्मकी विशेषता), शार्यजाति

समाज और नेता, राजा और प्रसाधन, प्रवृत्तिधर्म और निवृत्तिधर्म, पापद्धर्म, भक्ति और योग. मन्त्रयोग, हठयोग, लययोग. राजयोग, गुरु श्री. दीक्षा. वैराग्य और साधन, मात्मतत्व, जीवतस्व, पाप और पीउत्तत्व, सृष्टिस्थितिप्रलय तत्व, अपि, देवता और पितनत, अदनारतत्व, मायातस्त्र, त्रिगुणतस्व, विभावतत्त्व, कर्मवत्व मुक्तितत्त्व. पुरपार्थ मौर वर्षाधमसमीक्षा. दर्शनसमीक्षा, धर्नसन्यदायसनीक्षा. धर्म: पन्यसमीक्षा और धर्ममतसमीज्ञा। इस ग्रंथसे माअालके भशास्त्रीय और विमानरहित धर्मग्रन्धों और धनमचारके द्वारा जो हानि हो रही है. वह R८ कुर होकर यथार्थलपसे सनातन वैदिक धर्मका प्रकार होगा! इस ग्रंथ रनमें साम्प्रदायिक पक्षपातका लेशमात्र भी नहीं है और निष्पक्षरूपले सब विषय प्रतिरादित किये गये हैं. जिससे सफल प्रकारके अधिकारी सल्याए मात कर सकें। इसमें और भी एक विशेषता यह है कि, हिन्दुशाम्के अभी विज्ञान शास्त्रीय प्रमाणों और युक्तियाँके सिवाय, भाजकतको पदार्थ विद्या ( Science ) के द्वारा मो प्रतिपादित किये गये हैं, जिससे प्राजक्तके नवशिक्षिन पुन्य मी इसने लान उठ सके। इसके छः खण्ड प्रकाशित हा कुके हैं। प्रथम खण्डका मूल्य २). द्वितीयका ॥).कृतीया, चतुर्थकार),पंचमका २) और षष्ठका ॥) है। इसके प्रयन हो खण्ड यढ़िया कागज पर सो छापे गये हैं और दोनों से एक बटुन सुन्दर जिल्दम बाँधे गये हैं। मूल्य ५) है। तानवाँ अण्ड यन्त्रस्य है ! प्रवीण दृष्टिमें नवीन भारत । श्रीखानी दयानन्द सम्पादित । इस प्रथम मार्यज्ञातिका प्रादिका वास स्थान, उत्नतिजा - मूल्य १) मादर्श निरूपण, शिक्षादर्श, ओर्यजीवम, वर्णधर्म आश्रम- धर्म आदि विषय वैधानिक युक्ति नथा शास्त्रीय प्रमाणों के साथ वर्णित किये गये हैं। यह पन्ध धर्मशिक्षाके अर्थ बी. ए. क्लासका पाठ्य है। मूल्य २)। नवीन दृष्टिमें प्रवीण भारत । श्रीस्वामी दयानन्द सम्पादित । भारतका प्राचीन गौरव और पार्यजातिका महत्त्व जाननेके लिये यह एक ही पुस्तक है। इसका द्वितीय संस्करण परि पति और सुन्दर होकर छप चुका है। यह अन्य भी बी०ए० क्ता पक्रा पाठ्य है। साधनचन्द्रिका। श्रीस्वामी दयानन्द विरचित । इसमें मन्त्रयोग. देठयोग, रोग और राजयोग इन चारों योगोंका संक्षिप्त अति सुन्द्र वर्णन किया गया है। यह अन्य पथम वार्षिक एफ. ए. क्लासका पाठ्य है। शास्त्रचन्द्रिका। श्रीस्वामी दयानन्द विरचित । यह ग्रन्ध हिन्दुशास्त्रोकी बातें दर्पणवत् प्रकाशित करने घाला है। यह ग्रन्ध द्वितीय वार्षिक एफ. ए. क्लासका पाठ्य है। [यन्त्रस्य। धर्मचन्द्रिका। श्रीस्वामी दयानन्द विरचित । एन्ट्रेस क्लासके बालकोंके पाठनोपयोगी उत्तम धर्मपु- स्तक हैं। इसमें सनातन धर्मका उदार सार्वभौम खरूपवर्णन, मूल्य १)

मूल्य १)
या वान, तप आदि धर्माङ्गोका विस्तृत वर्णन, वर्णधर्म, प्रा.
मधर्म, नारीधर्म, आर्यधर्म, राजधर्म. तथा प्रजाथर्मके विषय में
बहुत कुछ लिखा गया है। विज्ञान, सन्ध्या, पञ्चमहाया
प्रादि निस्यकर्मीको वर्णन, षोडश संस्कारोंके पृथक् पृथक
वर्णन और संस्कारशुद्धि तथा क्रियाशुद्धि द्वारा मोक्षका यथार्थ
मार्ग निर्देश किया गया है। इस ग्रंथके पाठसे छात्रगण.
धर्मतस्य अवश्य ही अच्छी तरहसे जान सकेंगे।
आर्य गौरव ।
श्रीस्वामी दयानन्द विरचित ।
आर्यजातिका महत्त्व जानने के लिये यह · एक ही पुस्तक
। यह ग्रन्थ स्कूलकी 8वीं तथा १० वीं कक्षाको पाठ्य
। मूल्य ।) है।
आचारचन्द्रिका ।
श्रीस्वामी दयानन्द विरचित ।
यह भी स्कूल पाठ्य सदाचार सम्बन्धीय धर्म पुस्तक है !
इसमें प्रातःकालसे लेकर रात्रि निन्द्राके पहले तक क्या क्या
सदाचार किस लिये प्रत्येक हिन्दुसन्तानको अवश्य ही पालने
चाहिये, इसका रहस्य उत्तम रीतिसे बताया गया है और
आधुनिक समयके विचारसे प्रत्येक आचारपालनका वैज्ञानिक
कारण मी दिखाया गया है। यह ग्रन्थ, बालकों के लिये
अवश्य ही पाठ करने योग्य है। यह स्कूलकी - वीं कक्षाका
नीतिचन्द्रिका ।
श्रीस्वामी दयानन्द विरचित ।
मानवीय जीवनका उन्नत होना नीतिशिक्षापर ही अंब
चाटय है। मूल्य)

बाधित होता है। कोमलमति वालफोके हृदयोपर नीतितत्व
अचित करनेके उद्देश्यसे या पुस्तिका लिखी गई है। इसमें
मोतिकी सव यात ऐसी सरलतासे समझाई गई है कि, इस
एकही पाठसे नीतिशास्त्रका ज्ञान हो सकता है। यह स्कूल.
को ७ वी कक्षा का पाठ्य है । मूल्य ।)
चरित्रचन्द्रिका ।
सम्पादक पं० गोविन्दशास्त्री दुगवेकर।
इस अन्य पौराणिक ऐतिहासिक और माधुनिक महा-
पुरुषोंके सुन्दर मनोहर विचित्र चरित्र वर्णित है। यह प्रन्थ
स्कूलकी ६ठी कक्षाका पाठ्य है। प्रथम भागका मूल्य १)
धर्मप्रश्नोत्तरी ।
श्रीस्वामी दयानन्द विरचित ।
सनातनधर्मके प्रायः सय सिद्धान्त अति संक्षिसरूपसे
इस पुस्तिका लिखे गये हैं। प्रश्नोत्तरीकी प्रणाली ऐसी.
सुन्दर रखी गई है कि. छोटे बच्चे भी धर्मतत्वोंको भली-
भांति इदयङ्गम कर सकेंगे। भाषा भी अति सरल है । यह अन्य
स्कूलकी ४ थी कक्षाका पाक्ष्य है। कागज और छपाई बढ़ियाँ
होनेपर भी मूल्य फेघल 1) मात्र है।
परलोक
रहस्य।
श्रीमान् स्वामी दयानन्द विरचित ।
मनुष्य मर कर कहाँ जाता है, उसकी क्या गति होती है,
इस विषय पर वैज्ञानिक युक्ति तथा शास्त्रीय प्रमाणों के साथ
विस्तृतरूपसे वर्णन है। मूल्य)

चतुर्दशलोक रहस्य
हमारे इस
श्रीमान् स्वामी दयानन्द विरचित ।
वर्ग और नरक कहाँ और क्या वस्तु है, उनके साथ
मृत्युलोक का फ्या सम्बन्ध है. इत्यादि
विषय शास्त्र और युक्तिके साथ वर्णित किये गये हैं।
आजकल खर्ग नरक आदि लोकोंके विषयमें बहुत संशय
फैल रहा है। श्रीमान स्वामीजी महाराजने अपनी स्वाभाविक
सरल युक्तियों के द्वारा चतुर्दश लोकों का रहस्य वर्णन करते हुए
उस सन्देह का अच्छा समाधान किया है। मूल्यं ।)
सती-चरित्र-चन्द्रिका।
श्रीमान् पं० गोविन्द शास्त्रो दुगवेकर सम्पादित ।
इस पुस्तकमै सीता. सावित्री. गार्गी, मैत्रेयी आदि ४४
सतो स्त्रियोंके जीवन चरित्र लिखे गये हैं । मूल्य २)
नित्य कर्म चन्द्रिका।
इस ग्रन्धमें प्रातःकालसे लेकर गवि पर्यन्त हिन्दुमात्रके
अनुष्ठान करने योग्य नित्य कर्म वैदिक तांत्रिक मन्त्रों के साथ
भली भांति वर्णित किये गये हैं। मूल्य !)
धर्मसोपान ।
यह धर्मशिक्षा विषयस बड़ी उत्तम पुस्तक है। बालकोंको
इससे धर्मका साधारण ज्ञान भलीभांति हो जाता है। यह
पुस्तक क्या वालक वालिका, क्या वृद्ध स्त्री पुरुष, सबके लिये
बहुत ही उपकारी है। धर्मशिक्षा पानेकी इच्छा करनेवाले.
सज्जन अवश्य इस पुस्तकाको मंगावै। यह स्कूलकी ५.वी
कक्षाका पाठ्य है । मूल्य ।) आना

सदाचारसोपान । यह पुस्तक कोमलमति बालक बालिकाओं को धर्मशिक्षाके लिये प्रथम पुस्तक है। यह स्कूलकी तीसरी कक्षाका पाठ्य है। मूल्य) एक आना। कन्याशिक्षासोपान। कोमलमति कन्याओंको धर्म शिक्षा देने के लिये यह पुस्तक बहुत ही उपयोगी है। मूल्य ) ब्रह्मचर्यसोपान। ब्रह्मचर्य व्रत की शिक्षाके लिये यह प्रन्ध बहुत उपयोगी है।सच ब्रह्मचारी प्राश्रम, पाठशाला और स्कूलों में इस ग्रंथकी पढ़ाई होनी चाहिये। मृल्य।) चार ग्राना। राजशिक्षा सोपान। राजा महाराजा और उन कुमारीयो धार्मिक शिक्षा देनेके लिये यह ग्रंथ बनाया गया है। परन्तु सर्वसाधारणकी धर्म- शिक्षाके लिये भी यह ग्रंथ बहुत ही उपयोगी है, इसमें सना- तन धर्मके अंग और उसके नव अच्छी तरह बताये गये हैं। मूल्य) तीन श्राना। साधनसोपान । यह पुस्तक उपासना और साधनशैलीकी शिक्षा प्राप्त करने में बहुत ही उपयोगी हैं। इसका चंगला अनुवाद भी छप चालक बालिकाओंभी पहलेसे ही इस पुस्तकको पढ़ना चाहिये। यह पुस्तक ऐसी उपकारी है कि. बालक और वृद्ध समानअपसे इससे साधनविषयक शिक्षा लाभ कर सकते हैं। मूल्य 1) चार नाना । चुका है।

शास्त्रसोपान ।
'सनातनधर्म शास्त्रोका संक्षेप सारांश इस ग्रंथम वर्णित :
है । सब शास्त्रोका कुछ विवरण समझने के लिये प्रत्येक सना-
तन धर्मावलम्बीके लिये यह ग्रंथ बहुत ही उपयोगी है।
मूल्य 1) चार श्राना।
धर्मप्रचारसोपान ।
यह अन्य धर्मोपदेशक देनेवाले उपदेशक और पौराणिक
पण्डितोके लिये बहुत ही हितकारी है। मूल्य ) श्रीना.!
उपदेशपारिजात ।
यह संस्कृत गद्यात्मक अपूर्व ग्रंथ है। सनातनधर्म क्यो:
है, धर्मोपदेश किसको कहते हैं, सनातनधर्म सष शास्त्रोमें
क्या २ विषय हैं, धर्मवक्ता होने के लिये किन २ योग्यतोओके
सोनेको आवश्यकता है, इत्यादि अनेक विषय इस अन्ध
हैं। संस्कृत विद्वान्मात्रको पढ़ना उचित है, और धर्मधता,
धर्मोपदेशक, पौराणिक गरिडत्त श्रादिके लिये तो यह
ग्रंथ सव समय साथ रखने याग्य है। मूल्य ॥) बाउ आना !
कल्किपुराण
कल्किपुराणका नाम किसने नहीं सुना है ? इस कलियुग
में कल्कि महाराज अवतार भाररण कर दुष्टोका संहार करेंगे,
उसका पूर्ण वृत्तान्त हैं। वर्तमान समयके लिये वह बहुत
हितकारी गन्ध है । विशुद्ध हिन्दी अनुवाद और विस्तृत
भूमिका सहित यह अन्य प्रकाशित हुआ है। धर्मजिज्ञासुमार
को इस ग्रंथको पढ़ना उचित है।' मूल्यं १॥)

. योगदर्शन। हिन्दीभाष्यसहित । इस प्रकारका हिन्दी भाष्य और कहीं प्रकाशित नहीं हुआ है। सब दर्शनोंमें योगदर्शन सर्ववादि- सम्मत दर्शन है और इसमें साधनके द्वारा अन्तर्जगत्के सव विषयोका प्रत्यक्ष अनुभव करा देनेकी प्रणाली रहने के कारण इसका पाउन और भाष्य एवं टोका निर्माण बही सुचारुम्पसे कर सकता है, जो योगके क्रियासिद्धांशका पारगामी हो । इल भाध्यके निर्माणमें पाठक उक्त विषयकी पूर्णता देखेंगे। प्रत्येक सूत्रका भाष्य प्रत्येक सूत्रके आदिमें भूमिका देकर ऐसा क्रम- वड बना दिया गया है कि, जिससे पाठकोको मनोनिवेश- पूर्वक पढ़नेपर कोई असम्बद्धता नहीं मालूम होगी और ऐसा: प्रतीत होगा कि, महर्षि सूत्रकारने जीवोके कमाभ्युदय और पिसके लिये मानो एक महान् राजपथ निर्माण कर दिया है। इसका द्वितीय संस्करण छपकर तैयार है, •भापको और भी अधिक सुस्पष्ट, परिवर्द्धित और सरल किया गया है। मूल्य २) दो रुपया। श्रीभारतधर्ममहामण्डलरहस्य । .. इस ग्रंथमें सात अध्याय हैं। यथा-पायजातिकी दशाका परिवर्सन, चिन्ताका कारण, व्याधिनिर्णय, औषधिप्रयोग, सुपथ्यसेवन, बीजरक्षा और महायज्ञसाधन। यह ग्रन्धरल- हिन्दूझातिकी उन्नतिके विषयका असाधारण ग्रंथ है। प्रत्येक सनातनधर्मावलम्बीको इस ग्रन्थको पढ़ना चाहिये। द्वितीया- त्ति छप चुकी है, इसमें बहुतसा विषय बढ़ाया गया है । इस अन्यका आदर सारे भारतवर्ष में समानरूपसे हुआ है। धर्मको एह तत्व भी इसमें बहुत अच्छी तरहसे बताये गये हैं। इसका कंगना मनुवाद भी छप चुका है। मूल्य ११)

निगमागमचन्द्रिका।
प्रथम और द्वितीय भागकी दो पुस्तकें धर्मानुरागी सज्जनों
को मिल सकती हैं। इन दोनों भागोमें बनानधर्मके अनेक
गूढ रहस्यसम्बन्धी ऐसे ऐसे प्रवन्ध प्रकाशित हुए हैं कि,
माज तक धैसे धर्मसम्बन्धी प्रबन्ध और कहीं भी पकाशित
नहीं हुए हैं। जो धर्मके भनेक रहस्य जान र तृप्त होना चाहे,
ये इन पुस्तकोको मंगा। प्रत्येकका मूल्य )
भक्तिदर्शन
श्रीशाण्डिल्य सूत्रोपर बहुत विस्तृत हिन्दी भाष्यमाहित
और एक मति विस्तृत भूमिकामहित यह ग्रंथ प्रणीत
हिन्दीका यह एक असाधारण
ऐसा भक्तिसम्बन्धी अन्य हिन्दी में पहले प्रकाशित नहीं
हुश्री था । भगवद्भक्तिके विस्तृत रहस्थौका झाम इस
ग्रंथके पाठ करनेसे होता है। भक्तिसारके समझने की इच्छा
रखनेवाले और श्रीभगवान्में भक्ति करनेवाले धार्मिक मात्रको
इस ग्रन्थको पढ़ना उचित है। मू०१) एक रुपया।
मन्त्रयोगसंहिता।
भाषानुवादसहित। योगविषयक ऐसा अपूर्व ग्रंश प्रा।
सक प्रकाशित नहीं हुया है। इसमें मन्त्रयोग के १६ मङ्ग
और क्रमशः उनके लक्षण. भाधनप्रणाली आदि सब अच्छी
तरहले वर्णन किये गये हैं। इसमें मंत्रोंका स्वरूप और उपास्ये
निर्णय बद्भुत अच्छा किया गया है और अनर्थकारी
साम्प्रदायिक विरोधके दूर करने के लिये यह एक मात्र ग्रंथ है।
इसमें नास्तिकोंके मूर्ति पूजा, मन्त्रसिद्धि प्रादि विषयों में जो
प्रश्न होते हैं, उनका अच्छा समाधान है ।-मूल्य १) एक ०

हठयोग संहिता।
भाषानुवादसहित । योगविषयक ऐसा अपूर्व अंध भाज
'तक प्रकाशित नहीं हुआ है। इसमें इठयोगके ७ अन.और
कम उनके लक्षण साधनपगालो श्रादि सब अच्छी तरहसे
वर्णन किये गये हैं। गुरु और शिष्य दोनों ही इससे पूरा
लाभ उठा सकते हैं। मूल्य 1) मा.
तत्त्ववोध ।
भापानुवाद और वैज्ञानिक रिस्परसीलहित ।. यह मूल
घेदान्त पन्थ श्रीशंकराचार्यकृत है। इसका वंगानुवाद भी
प्रकाशित हो चुका है। मूल्य = दो श्राना।
स्तोत्र
कुसुमाञ्जला ।
इसमें पञ्चदेवता, अवतार और ब्रह्मकी स्तुतियों के साथ
साथ आजकलकी आवश्यकतानुसार धर्मस्तुति गंगादि पवित्र
तीर्थोकी स्तुति, वेदान्तप्रतिपादक स्तुतियां और काशीके
प्रधान देवता श्रीविश्वनाथादिकी स्तुतियां हैं। मू०) प्रामा
देवीमीमांसादर्शन प्रथम भाग ।
वेदके तीन काण्ड हैं। यथा:-कर्मकाण्ड,
और शानकाण्ड । शानकाण्डका वेदान्तदर्शन, कर्मकाण्डका
जैमिनीवदर्शन और भरद्वाजदर्शन और उपासनाकाण्डका यह
भकिरादर्शन है। इसका नाम दैवीशीमालादर्शन है । यह
ग्रंथ आज तक प्रकाशित नहीं मुबा-था। इसके चार पाद हैं, .
:. यथा-प्रथम रसपाद, इस पादमे भक्ति का विस्तारित विज्ञान
वर्णित है। दूसरा सृष्टिपाद. तीसरा स्थितिपाद और चौथा
गायपाद, इन तीनों पादोंमें दैवीमाया, देवताओंके भेद खा.
-
उपासनाकाण्ड

सनाका विस्तारित वर्णन और भर्ति तथा उपासनासे मुकि- 'की प्राप्तिका लय कुछ विज्ञान वर्णित है इस प्रथम भागमें इस दर्शनशास्त्रके प्रथम दो पाद हिन्दी अनुवाद और हिन्दीमाप- सहित प्रकाशित हुए हैं। मूल्य १) डेढ़ रुपमा । श्रीमद्भगवद्गीता प्रथमखण्ड । थोगीताजीका अपूर्ख हिन्दी-भाष्य यह प्रकाशित हो रहा है जिसका प्रथम स्वराड, जिसमें प्रथम अध्याय और द्वितीय अध्यायका कुछ हिस्मा है, प्रकाशित हुआ है। भाज तक भीगीताजीपर अनेक संस्कृत और हिन्दी-भाष्य प्रकाति हुए हैं, परन्तु इस प्रकारका माथ आज तक किसी भाषामें प्रकाशित नहीं हुआ है। गीताका अध्यात्म, अधिदैव, अधि- भूतरूपी त्रिविध स्वरूप, प्रत्येक श्लोकका त्रिविध अर्थ और सब प्रकारके अधिकारियोंके समझने योग्य गीता-विज्ञानका विस्तारित विवरण इस भाप्यमें मौजूद है । मूल्य एक रुपया सप्त गोताएँ। पञ्चोपासनाफे अनुसार पाँच प्रकारके उपासकों के लिये पांच गीताएं-श्रीविष्णुगीता, श्रीसूर्यगौना, श्रीशक्तिगीता, श्रीधीशगीता और श्रीशम्भुगीता एवं संन्यासियोंके लिये संन्यासगीता और साधकोंके लिये गुरुगीता भाषानुवाद- साहित छप चुकी है। श्रीभारतधर्म महामण्डलने इन सात गीताओका प्रकाशन निम्नलिखित उद्देश्योंसे किया है:-१म, जिस साम्प्रदायिक विरोधने उपासकोंको धर्मके नामले अधर्म सञ्चित करनेकी अवस्था में पहुंचा दिया है, जिस-साम्पः दायिक विरोधने उपासकोको नहकार त्यागी होनेके स्थानमें भोर सम्प्रदायिक अहंकारसम्पन्न बना दिया है, भारतकी, वर्तमान दुर्दशा, जिस सम्प्रदायिक विरोधका प्रत्यक्ष फल है, और जिस साम्प्रदायिक विरोधने साकार उपासनोंमें धोर देषदावानल प्रज्वलित कर दिया है, उससाम्प्रदायिक विरोधका समुल जन्मूलन करना और र य. उपासना के नामसे जो अनेक इन्द्रियासक्तिको चरितार्थताके अनर्थकारी कार्य होते हैं बनका समाजमें अस्तित्व न रहने देना तथा ३५ समाजमें 'बधार्थ भगवद्भक्तिके प्रचार द्वारा इहलौकिक और पारलौकिक अभ्युदय तथा निः श्रेयस-प्राप्तिमें अनेक सुविधाओंका प्रचार करना। इन सातो गीताओंमें अनेक दार्शनिक तस्व, अनेक पासनाकारटके रहस्य और प्रत्येक उपास्य देवकी उपासनासे सम्बन्ध रखनेवाले विषय सुचारुरूपसे प्रतिपादित किये गये ये सातो गीताएँ उपनिषद्प हैं । प्रत्येक उपासक अपने पोस्वदेवकी गीतासे तो लाभ उठावेगा ही, किन्तु अन्य चार गीताओंके पाठ करनेसे भी वह अनेक उपासनातत्त्वोंको तथा अनेक वैज्ञानिक रहस्योंको जान सकेगा और उसके अन्त:- करणमें प्रचलित साम्प्रदायिक ग्रंथोसे जैसा विरोध उदय होता है पैसा नहीं होगा,वह परम शान्तिका अधिकारी हो सकेगा। संन्यासातामै सर्य सम्प्रदायोंके साधु और संन्यासि. योंके लिये सब जानने योग्य विषय सन्निविष्ट है। संन्यासिंगसा इसके पाठ करनेसे विशेष शान प्राप्तकर सकेंगे। गृहस्थों के लिये भी यह अन्य धर्म शानका भण्डार है। श्रीमहामण्डल- प्रकाशित गुरुगीताके सदृश अन्य आज तक किसी भाषामें प्रकाशित नहीं हुआ है। इसमें गुरु शिष्यलक्षण, उपासनाका . रहस्य और भेद, मन्त्र हठ लय और राजयोगोंके लक्षण और प्रा.एवं गुरुमहात्म्य; शिष्यकर्तश्य, परम तत्वका स्वकष और गुरुशम्वार्थ प्रादि सब विषय स्पष्टरूपसे हैं । मूल, स्पष्ट खरल है " मौर सुमधुरभाषानुवाद और वैज्ञानिक टिप्पणी सहित यह ग्रंथ छुपा है। गुरु और शिप्य दोनोंके लिये यह उपकारी ग्रन्थ है।.. चुकी है। विष्णुर्माताका मूल्य १) सूर्यगीताका मूल्य ॥) शक्तिगीताका मूल्य १) धीशगीताका मूल्य 1) शंभुगीताका मूल्य १) संन्यासगीताका मूल्य ॥) और गुरुगीताका मूल्य) । इनमेसे पञ्चोपासनाकी .पांच गीताप्रोमें एक एक तीन- रंगा विष्णुदेव, सूर्यदेव, भगवती और गणपतिदंष तथा- शिवजीका चित्र भी दिया गया है । शम्भुगीतामें वर्णाश्रमबन्ध नामक चित्र भी देखने योग्य है। 5. THE WORLD'S ETERNAL RELIGION A Unique work on Hinduism in Ode Tolome, containing 24 Chapters with tri-colour illustrations, glossary, eto. No work has litharta appeared in Eoglish that gives in s soggestive manner the real exposition of the Hindu religion in all its phases. The book bas parkeotly gopplied this long-felt want. The names of the chapters fllows:-1, Foreword. 2. Universel Religion, 3. Classification of Religion, 4. Law of Karwa, 5 Wor ship in all its phases, 6._Pratice of Yoge through sntras, 7. Practice of Yoga through physical exer. sise, s. Prrotire of Yoga through finer forceni Narurat 9. Yoge through power of reaosoning, 10 The Mystic Circle, 11. Logo and Devotion. 12. Blanes of Krowledge, 13. Timo, space, creation. 14. The Occult world, 15. Evolution snd Reincarnation. 15. Hindu Philosophy. 17. lke System of Castes and Stages of Life, 18, Woman's Dhorms. 19. Image Forship, 20. The great Sacrifices. 28 Hindu Scriptures, 22. Liberation. 3. Education, 24. Reconciliation of all Religons. The Eollowers of all religions in the world will profit by the light the pork is intended to give. Price cloth bound, superior edition Rs. 5, Ordinary edition Rs. 3, POBIRSO extra, are as 4 । usse se . अन्यान्य पुस्तकें। बन्देमातरम् वारेनहेस्टिंगस মশ্বৰ वैष्णव रहस्य भारतकी जागती हुई आत्मा)ोत्सवचन्द्रिका (हिन्दु वीरवाला (बपन्याल) 1) गीता रहस्य (तिलकका) त्यौहारोका शास्त्रीय विद्यार्थी और राजनीतिक विवेचन) आन्दोलन शास्त्रीजीके दो व्याख्यान ॥ सिद्धान्त कौमुदी असभ्य रमणी सार मरी- मानन्द रघुनन्दन नाटक ॥) क्षत्रिय हितैषिणी इश्क दोहावली ) भूदेव चरित्र उपन्याम कुसुम वाचार प्रवन्ध कार्तिकप्रमादकी जीवनी ) पारिवारिक प्रवन्ध कृषि विद्या m)/ कल्पलतिका बाल चिकित्सा।) गावंश-चिकित्सा 1) संक्षिप्त भूदेव चरित्र गोमाताकी जय रामगीता रायल दुर्गेश नन्दिनी २ भाग Lotus Leaves 2-8-0 देवपूजा प्रयोग Hindu Philosophy3-0-0 English Grammar 0-4-0 धनुचंद संहिता Tilak's Messnge 0-12-0 प्रयाग माहात्म्य National Education0-12-0 मानस मञ्जरी Swadeshi (bs Anbatma प्रवासी Gandhi) बारहमाली Five Patriots on Home मालदेव पराजय Rule मेगास्थनीजक्षा भारतवर्षीय | Home Rule Questions घर्णन & Ansters रागरताकर २) Bureaucratic Liln -1- रसिक विलास Tilak's Grent Speech - 1. रामगीता (छोटी) Warship of the mother, वसात ङ्गार land 0-60

८
(१) इनमेंसे जो कमसे कम ४) मूल्यकी पुस्तके पूरे मूल्यमे
खरीदेंगे अथवा स्थिर ग्राहक होनेका चन्दा १) भेज देंगे,
उन्हें शेष और भागे प्रकाशित होनेवाली सव पुस्तके पौने
। ल्यमें दी जायेगी।
.' (२) स्थिर ग्राहकों को मालामें प्रकाशित होनेवाली हर एक
पुस्तक खरीदनी होगी। जो पुस्तक इस विभाग द्वारा छापी
मायगी, वह एक विद्वानोकी कमेटी द्वारा पसन्द करा ली
नायगी।
(३) हर एक ग्राहक अपना नम्बर लिखकर या दिखा कर
हमारे कार्यालयले अथवा जहाँ वह रहता हो वहाँ हमारी
शास्त्रा हो, तो वहाँसे स्वल्प मूल्यपर पुस्तके खरीद सकेगा।
(४) जो धर्मसभा इस धर्मकार्यमै सहायता करना चाहे
और जो सज्जन इस ग्रन्धमालाके स्थायी ग्राहक होना चाहें, वे
नीचे लिखे पते पर पत्र भेजनेकी करें
4
कृपा
मैनेजर, निगमागम बुक्डीपो,
भारतधर्म सिण्डिकेट लिमिटेड स्टेशन रोड्, बनारस सिटी।

आर्यमहिला महाविद्यालय। तथा विधवाश्रम । आर्यमहिलाओंको सुशिक्षित करके योग्य धर्मोपदेशिका, शिक्षयित्री और वालप्रतिपालिका प्रस्तुत करनेके लिये यह महाविद्यालय काशीपुरीमें स्थापित है। छात्रियोको योग्य वृत्ति दी जाती है। नियमावली प्राप्त करने तथा पत्रादि लिखनेका पता- अध्यक्ष-मार्यमहिला महाविद्यालय, महामण्डल भवन, जगत्गंज, बनारस। --- महामंडल मैगजीन। तथा निगमागमचन्द्रिका। प्रथम अंग्रेजी मासिकपक्ष और दूसरा हिन्दी मासिकपत्र श्रीमारतधर्ममहामण्डलके मुखपत्ररूपसे प्रकाशित होते हैं, और श्रीमहामण्डलके सभ्य और सभ्यानोको विना मूल्य मिलते हैं। सभ्य तथा सभ्या होनेके लिये केवल शा साल देना होता है। सभ्य और सम्यागपके वारिसोको समाज- हितकारी कोषस यथेष्ट धार्थिक सहायता भी मिलती है। पत्र व्यवहार करनेका पता- जनरल सेक्रेटरी, श्रीभारतधर्ममहामण्डल, जगदगज, बनारस . T एजेण्ट तथा. उपदेशकों की आवश्यकता । वर्णाश्रम-संधके मेम्बर पढ़ाने तथा भारतधर्मसिण्डिकोट लिमिटेडके अन्यान्य कार्य करने के लिये प्रत्येक नगर और बड़े ग्रामों में एजेएटीको आवश्यकता है, यधेष्ठ कमीशन दिया जायगा, उनके लिये . पनेक मुविधा यी गई जिससें. उनको याधिक लाभ यथेट होगा। देशभरमें भ्रमणं पारके उक्त कार्य करने के लिये योग्य उप- देश तथा भ्रमणकारी एजेएटोकी आवश्यकता है। योग्य मासिक वृत्ति और उचित कमीशन दिया जायगा। कार्यमा/ . निम्नलिखित पतेपर पत्रव्यवहार करें। मैनेजर सम्बादपत्र विभाग:- भारतधर्मसिण्डिकेट लिमिटेड, जंगलूगंज, स्टेशनरोड, बनारस। आर्यमहिला। इस नामसे आर्यमहिलाओं की सेवा और उन्नतिके लिये सचित्र मासिकपत्र..नियमितं. निम्नलिखित पतेसे प्रकाशित ' होता है। यार्य महिला कार्यालयः श्रीमहामण्डल भवन, जगतगंज, बनारस। निगमागम पुस्तक भण्डार । '. इस नामसे अखिल, सनातनधर्मावलम्बियोंके खजातीय पुस्तक भण्डाररूपसे-यह वुकडीपो खोला गया हैं। इसमें सब प्रकारकी हिन्दूजातिकी धार्मिक राष्ट्रीय तथा सब प्रकारको खजातीय पुस्तके मिलती हैं। मैनेजर निगमागम बुकडीपो, भारतधर्मसिण्डिफोर लिमिटेड, जगतगंज स्टेशनरोडवनारस. "

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Dhrmmakarmmadeepika

Author
Shree Anndachran Tarkchudamani
Title
Dhrmmakarmmadeepika
File name
Dhrmmakarmmadeepika
Text
OCR done
Citation
1924
Published
2009/09
Publisher
Kashi
Language
Sanskrit
Pages
118
Library
Sanmati Library, Jaipur
Keywords
Sanskrit Sahitya
DLI number
322437
Barcode
99999990252912.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
YavrPQjZV8M
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