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Sanskrith Paath Mala Vol Vii
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देवत--संहिता
"
आज वेदकी जो संहिताएं उपलब्ध है, उनमें प्रत्येक देवताके मन्त्र
इधर उधर बिखरे हुए पाये जाते है । ए ही जगह उन मंत्रोंको इक्ट्ठा
करके यह दैवत-संहिता बनायी है। इस दैवत-संहिताके तीन विभाग है-
दैवत-संहिता, ( प्रथम-भाग)
१ आग्निदेवता मंत्र २४४३ पृष्ठसंख्या ३४६
२ इन्द्रदेवता
३ सोमदेवता
१५०
इस भागका मू. ६ रु.) तथा डा. व्य. १॥)
दैवत--संहिता, ( तृतीय भाग)
इस तृतीय भागमे कुल १२८ देवता हैं और कुल मंत्रमंख्या ३७५०
| मू.६) रु. डा. व्यय १ ) रु. है।
इनके पहिले २ भागोंमें प्रत्येक देवताके मूल-मंत्र, पुनरुक्त मंत्रसूची
उपमासूची, विशेषणमूची तथा अकाग नुक्रमसे मंत्रोको अनुक्रमणिकाका
समावेश तो है ही, परतु कभी कभी उत्तरपदमूची या निपात देवतासूची
उस भाँति अन्य भी सूचियां दी गयी हैं। इनस खाध्यायशील पाठकोंकी
बडी भारी सुविधा होगी। पाठक ऐसे दुर्लभ ग्रंथका संग्रह अवश्य करें।
देवता-परिचय-ग्रंथमाला
१ ऋग्वेदमे रुद्रदेवता मू० ॥2) डा. व्य..)
२ वैदिक आग्नविद्या
1)
शतपथ-बोधामृत
शतपथके बोध-वचनोका संग्रह । मू.। = ) डा. व्य.
२)
मंत्री-स्वाध्याय-मंडल, 'आनन्दाश्रम' किल्ला-पारडी (जि. सूरत)
अंक ७
संस्कृत-पाठ-माला।
(संस्कृत-भाषाका अध्ययन करनेका सुगम उपाय)
सप्तमो भागः
लेखक
पं. श्रीपाद दामोदर सातवळेकर
अध्यक्ष - स्वाध्यायमंडल, साहित्यवाचस्पति
सप्तम वार
संवत् २००७, शक १८७२, सन १९५१
नामोंके रूप।
नामोंके सातों विभक्तियोंके रूप बनानेकी रीति इस
पुस्तकमें देनेका प्रारंभ किया है। पाठक इसका ठीक अध्ययन
करेंगे, तो उनको संस्कृत वाक्य बनानेका उत्तम अभ्यासः
हो जायगा।
साथ साथ क्रियाओंके रूप भी बताये जाते हैं। इनके
अध्ययनसे पाठक स्वयं क्रियापद बनाकर उनका उपयोग,
कर सकते हैं।
आशा है कि पाठक इसका योग्य अध्ययन करके लाभ
प्राप्त करेंगे।
स्वाध्याय-मण्डल,
लेखक
किल्ला-पारडी (जि. सूरत)। श्रीपाद दामोदर सातवळेकर
मुद्रक भौर प्रकाशक-व० श्री. सातवळेकर, बी. ए.,
भारत-मुद्रणालय, किल्ला पारडी (जि. सूरत )
--
ॐ
संस्कृत-पाठ-माला।
-
सप्तम भाग।
पाठ १
.
संस्कृतमें "वचन" तीन हैं। भाषामें केवल दोही हैं।
एक संख्याको "एकवचन" कहते हैं, और अनेक संख्याको
अनेकवचन' कहते हैं, जैसे-
एक: अश्वः
= एक घोडा ( एकवचन)
बहवःअश्वाः = बहुत घोडे ( अनेकवचन)
परंतु संस्कृतमें इनके बीचमें और एक 'द्विवचन' भी
होता है, जैसा-
एक: गजः
= एक हाथी ( एकवचन)
द्वौ गजौ
= दो हाथी (द्विवचन)
बहवः गजाः = बहुत हाथी (बहुवचन)
हिंदी भाषाके व्यवहारमें और संस्कृत भाषाके व्यवहारमें
यह वचनोंका भेद ध्यानमें रखने योग्य है।
(४) इस समयतक पाठक एकवचनक रूप बनानेकी योग्यता प्राप्त कर चुके हैं, और वैसे रूप बनाकर कई वाक्य भी पाठक बनाने लगे हैं। इसलिये अब तीनों वचनोंके रूप बनानेकी रीति बतानेका विचार किया है। आशा है कि पाठक इस पाठका योग्य अभ्यास करके शब्दोंके रूप बनानेकी योग्यता प्राप्त करेंगे। अकारान्त पुल्लिंग शब्दोंके सातों विभक्तियोंके और तीनों वचनोंके रूप इस प्रकार होते हैं- गजः (हाथी) विभक्ति एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा गजः गजी संबोधन (हे) गज! (हे) गजौ ! (हे) गजाः ! द्वितीया गज गजौ गजान् तृतीया गजेन गजाभ्यां गजैः चतुर्थी गजाय गजेभ्यः पंचमी गजात् गजेभ्यः षष्ठी गजस्य गजयोः गजानाम् सप्तमी गजे गजयोः गजेषु इनके अर्थ निम्नलिखित होते हैं- १ गजः - एक हाथी प्रथमा २ गजौ - दो हाथी ३ गजाः = बहुत हाथी गजा: गजाभ्यां गजाभ्यां
(५)
१ गज- हे एक हाथी!
संबोधन २ गजौ- हे दो हाथिओ !
३ गजा:-- हे बहुत हाथिओ!
१ गज- एक हाथीको
द्वितीया २ गजौ-- दो हाथियोंको
३ गजान्-बहुत हाथियोंको
१ गजेन- एक हाथीने
तृतीया २ गजाभ्यां- दो हाथियोंने
३ गजै:-- बहुत हाथियोंने
१ गजाय- एक हाथीके लिये
चतुर्थी २ गजाभ्यां-दो हाथियोंके लिये
३ गजेभ्यः-बहुत हाथियोंके लिये
१ गजात्- एक हाथीसे
पंचमी २ गजाभ्या--दो हाथियोंसे
३ गजेभ्यः-बहुत हाथियोंसे
१ गजस्य-- एक हाथीका
षष्ठी २ गजयो:-- दो हाथियोंका
३ गजानां-बहुत हाथियोंका
१ गजे- एक हाथीमें
सप्तमी २ गजयोः--दो हाथियोंमें
३ गजेषु- बहुत हाथियों में
(६) पूर्वभागों में अकारान्त पुल्लिंग शब्द बहुत आगये हैं। उनके रूप पाठक स्वयं इस रीतिसे बना सकते हैं। एकव- चनके रूप तो पाठक स्वयं बना सकते ही हैं। द्विवचनके रूप- प्रथमा, संबोधन और द्वितीयाके समान- ही हैं। तृतीया, चतुर्थी और पंचमीके भी एकसे ही होते हैं। तथा षष्ठी और सप्तमीके भी एकसे होते हैं। पाठक इस समताको ध्यानमें धरेंगे तो द्विवचनके रूप बनाना उनके लिये सुगम हो जायगा। बहुवचनके रूप- प्रथमा और संबोधनके परस्पर समान हैं। चतुर्थी और पंचमीके भी समान हैं । यह समानता पाठकोंके ध्यानमें आनेके लिये एक और शब्दके रूप बताये जाते है- हस्तः (हाथ) विभक्ति एकवचन द्विवचन बहुवचन हस्तो हस्ताः सं० (हे) हस्त ! (हे) (हे) हस्तं हस्तान् हस्तेन हस्ताभ्यां हस्तैः हस्ताय हस्तेभ्यः हस्तात् हस्तस्य हस्तयोः हस्तानाम् हस्ते हस्तेषु १ " 6 M.WW " "
(७)
जो रूप ऊपरके रूपके समान होते हैं वहां (,,) यह
चिह्न रखा है।
वाक्यानि।
सःमनुष्यः पादाभ्यां गच्छति = वह मनुष्य (दो)
पैरों से जाता है।
अहं कर्णाभ्यांशृणोमि = मैं (दो) कानोंसे सुनता हूं।
गजेभ्यःजलं देहि = (बहुत) हाथियोंके लिये जल दो।
तत्र गजानां पंक्तिः अस्ति = वहां (बहुत) हाथियोंकी
पंक्ति है।
सः बालः शब्दानां प्रयोगं जानाति = वह बालक
(बहुत ) शब्दोंका प्रयोग जानता है।
अश्वानां शब्दं शृणु = [बहुत ] घोडोंका शब्द सुन।
सानराणां पालकः अस्ति = वह मनुष्योंका पालक है।
संधि किये हुए वाक्य।
स नराणां पालकोऽस्ति । गजेभ्यो जलं देहि ।
तत्र गजानां पंक्तिरस्ति । पंक्तिर्नास्ति तत्र गजानाम् ।
पालको नराणां सोऽस्ति । त्वां देहि जलं गजेभ्यः ।
अस्ति पंक्तिस्तत्र गजानाम् । तत्र नास्ति पंक्ति-
गंजानाम् ।
(८) १ २ नरैः ४ पाठ२ इस पाठमें भी पुनः अकारान्त पुल्लिंग शब्दोंके रूप बना- नकी रीति बताते हैं- नरः ( मनुष्य ) विभक्ति एकवचन द्विवचन बहुवचन नरः नरौ सं० (हे) नर ! (हे), (हे),, नरान् नरेण नराभ्याम् नराय नरेभ्यः नरात् नरेभ्यः नरयोः नराणाम् नरे नरेषु जो रूप समान होते हैं उन स्थानपर ["] यह चिह्न रख दिया है। पाठक इनको ठीक मननपूर्वक देखें और ध्यानमें रखें । यह स्मरण रखनेसे पाठक बहुतही सुगमतासे विभक्ति- योंके रूप बना सकते हैं। इनका अब उपयोग देखिये- "प्रथमा" एकः नरः तत्र अस्ति - एक मनुष्य वहां है। द्वौ नरौ तत्र न स्तः - दो मनुष्य वहां नहीं हैं। ६ ७
बहवः नराः अत्र सन्ति = बहुत मनुष्य यहां हैं।
"संबोधन"
हे नर ! त्वं किं करोषि? = हे (एक) मनुष्य ! तू क्या
करता है?
हे नरौ ! कुत्र गच्छथः ? हे (दो) मनुष्यो ! आप कहीं
जाते हैं ?
हे. नराः ! मद्वचनं शृणुत = हे (बहुत) मनुष्यो ! मेरा
वचन सुनो।
द्वितीया"
धनं पुरुषार्थिनं नरं आगच्छति = धन पुरुषार्थी मनुष्यके
प्रति आता है।
स पुरुषः नरौ प्रति गच्छति = वह मनुष्य[दो मनुष्योंके
प्रति जाता है।
त्वं तान् नरान् अत्र आनय = तू उन (बहुत)मनुष्यों-
को यहां ला।
तृतीया"
तेन नरेण इदानीं किं कृतम् ? = उस मनुष्यने अब
क्या किया?
नराभ्यां न किमपि कृतम् = (दो) मनुष्योंने नहीं कुछ
भी किया।
सर्वैः नरैः किं उक्तम् ? = सब मनुष्योंने क्या कहा?
(१०)
चतुर्थी"
स्वं तस्मै नराय किं ददासि ? = तू उस मनुष्यके लिये
क्या देता है?
नराभ्यां उदकं देहि = (दो) मनुष्योंके लिये जल दो।
सः नरेभ्यः अन्नं ददाति = वह (बहुत ) मनुष्योंके
लिये अन्न देता है
"पंचमी"
तस्मात् नरात् मया धनं लब्धं = उस मनुष्यसे मैंने धन
प्राप्त किया।
नाभ्यां नराभ्यां त्वं किं इच्छसि = उन (दो) मनुष्योंसे
तू क्या चाहता है ?
नीचेभ्यः नरभ्यः त्वं अत्र आगच्छ = नीच मनुष्योंसे
तू यहां आ।
षष्ठी
तस्य नरस्य प्रशस्तं रूपं अस्ति = उस मनुष्यका
प्रशस्त रूप है।
तयोः नरयोः इदानीं युद्धं जातं = उन (दो) मनुष्योंका
अब युद्ध हुआ।
इदानीं तत्र नराणां महान् समूहः संमिलितः = अब
वहां (बहुत) मनुष्योंका बडा समूह संमिलित हुआ है।
(११)
सप्तमी"
तस्मिन् नरे कः विशेषः?-- उस मनुष्यमें क्या विशेष है ?
तयोः नरयोः न कः अपि विशेषः-- उन (दो) मनुष्यों में
कोई विशेष नहीं है।
नरेषु विद्वान् पुरुषः प्रशस्यते-- मनुष्यमें विद्वान् पुरुष
प्रशंसित होता है।
अकारान्त पुल्लिंगी 'नर' शब्दके सातों विभक्तियोंके रूप
वाक्योंमें इसी प्रकार प्रयुक्त किये जाते हैं । पाठक इसी
प्रकार रूप बनाकर उन रूपोंसे अनेक संस्कृतके वाक्य
बनानेका अभ्यास करें।
अकारान्त पुल्लिंग शब्द ।
स्वाध्याय:- अपना अध्ययन कोविदः= ज्ञानी
सज्जनः- सत्पुरुष
त्यागः = दान
आर्यः = आर्य
जयः = विजय
वर्णः
: = रंग
आश्रमः% आश्रम आचार्यः
यागः - यज्ञ
उपवासः - उपवास
वाक्यानि।
त्वं किं स्वाध्यायं न करोषि ?- तू क्यों स्वाध्याय नहीं
बुधः% विद्वान्
- आचाय
करता है?
तव गुरुः सज्जनः अस्ति-तेरा अध्यापक सज्जन है।
(१२) आर्येण किं अधीतम् ?-- आर्यने क्या अध्ययन किया ? शास्त्रेषु कोविदः अत्र न कः अपि अस्ति--शास्त्रोंमें ज्ञानी यहां कोई भी नहीं है। यः धनस्य त्यागं करोति स एव त्यागी इति उच्यते- जो धनका दान करता है, वही त्यागी कहा जाता है। अहं जयाय यत्नं करोमि-- मैं जयके लिये यत्न करता हूं। अद्य अहं उपवासं करोमि-आज मैं उपवास करता हूं संधि किये हुए वाक्य । आर्येण किमधीतम् ? किमधीतमार्येण ? किमार्य- णाधीतम् ? आर्येणाधीतं किम् ? शास्त्रेषु कोविदोऽन न कोऽप्यस्ति । अत्र न कोऽपि शास्त्रेषु कोविदोs- स्ति। कोविदः शास्त्रेष्वत्र न कोऽप्यस्ति । कोऽपि नास्त्यत्र कोविदः शास्त्रेषु । अद्याहमुपवासं करोमि । करोम्युपवासमद्याहम् । अहमद्य करोम्युपवासम् । उपवासमहमद्य करोमि । करोम्यहमद्योपवासम् । यो धनस्य त्यागं करोति स एव त्यागीत्युच्यते । यः करोति त्यागं धनस्य स एवोच्यते त्यागीति । त्यागीति स एवोच्यते यस्त्यागं धनस्य करोति । उच्यते स एव त्यागीति यः करोति धनस्य त्यागम् । करोति यो धनस्य त्यागं स एवोच्यते त्यागीति ।
(१३)
पाठ ३
पूर्व दो पाठोंमें शब्दोंके तीनों वचनोंका थोडासा विचार
किया है। नामोंके वचनोंके साथ साथ क्रियाओंका भी विचार
होना आवश्यक है, इसलिये इस पाठमें क्रियाओंका विचार
थोडासा किया जाता है। जिस प्रकार नामोंके विभक्तिरूपोंमें
एकवचन, द्विवचन और बहुवचन ऐसे तीन वचन होते हैं,
ठीक उसी प्रकार क्रियाओंमें भी तीन वचन होते हैं । जैसा-
,
वर्तमान काल।
उत्तम पुरुष
तृतीय पुरुष
वद्" (बोलना)
पुरुष
एकवचन
द्विवचन बहुवचन
वदामि
वदाव: वदामः
मध्यम पुरुष
वदसि वदथः वदथ
वदति वदतः वदन्ति
१ वर्तमान काल = उसको कहते हैं कि जो वर्तमान
समयका वर्णन करता है। वर्तमानकालके ये रूप हैं। जैसा-
'वदामि' का अर्थ ' मैं इस समय बोलता हूं।'
२ भूत काल = वह होता है जो भूत अर्थात् गत
कालकी स्थिति बताता है
३ भविष्य काल = वह होता है जो आगे आने-
वाला होता है।
.
(१४) . वर्तमान कालके रूप ऊपर दिये हैं, भूत और भविष्य- कालके रूप पीछेसे दिये जायेंगे। ऊपर तीन पुरुष दिये हैं, उनका अर्थ यह है- उत्तम पुरुष- 'मैं' यह अर्थ बतानेवाला । इसको भाषामें 'प्रथम पुरुष' भी कोई कहते हैं । मध्यम पुरुष-तू' यह अर्थ बतानेवाला । इसको भाषामें 'द्वितीय पुरुष' भी कहते हैं । तृतीय पुरुष-- 'वह' अथवा 'तीसरा' यह अर्थ बतानेवाला । इसको संस्कृतमें 'प्रथम पुरुष' कहते हैं और भाषामें ' तृतीय पुरुष' कहते हैं। वाक्य बनानेके पूर्व (अहं) मैं तथा (त्व) तू के तीनों वच- नोंके रूप जाननेकी आवश्यकता है । इसलिये वे रूप यहां देते हैं- एकवचन द्विवचन बहुवचन (उत्तम पुरुष) अहं आवां वयं प्रथमा (मैं) (हम दो) (हम सब) (मध्यम पुरुष) त्वं युवां यूयं प्रथमा (तू) (तुम दो) (तुम संब) (तृतीय पुरुष) सः तो ते (वह) तृतीय पुरुषके स्थानपर किसी भी नामका उपयोग किया जाता है, परंतु उत्तम और मध्यम पुरुषोंके स्थानपर प्रथमा (वे दो) (वे सब)
(१५)
--
उक्त सर्वनामोंके शब्दोंका ही प्रयोग होता है । उक्त
क्रियाके रूपोंके साथ एक एक शब्द उत्तम, मध्यम और
तृतीय पुरुषके लगकर वाक्य बनते हैं। उत्तम पुरुषकी
क्रिया के साथ क्रमशः वचनोंके अनुसार उत्तम पुरुषके
सर्वनाम तथा अन्योंके साथ अन्य लगते हैं। देखिये-
"उत्तम पुरुष"
१ अहं वदामि-मैं बोलता हूं।
२ आवां वदाव:-- हम (दो) बोलते हैं।
३ वयं वदामः- हम (सब) बोलते हैं।
"मध्यम पुरुष"
त्वं वदसि-तू बोलता है।
२ युवां वदथ:- तुम (दो) बोलते हो ।
३ यूयं वदथ- तुम (सब )बोलते हो।
तृतीय पुरुष"
१ सः वदति- वह बोलता है।
२ तौ वदतः-वे (दो) बोलते हैं।
३ ते वदन्ति-वे (सब) बोलते हैं।
-किंवा--
१ रामः वदति- राम बोलता है।
२ रामलक्ष्मणौ वदता-राम-लक्ष्मण बोलते हैं।
३ मनुष्याः
वदन्ति-(सब) मनुष्य
बोलते हैं।
--
(१६) - यही रीति ठीक समझमें आनेके लिये और थोडे वाक्य यहां देते हैं- १ अहं गच्छामि-- मैं जाता हूं। २ आवां गच्छाव:-- हम (दो) जाते हैं। ३ वयं गच्छामः-- हम ( सभी) जाते हैं। १ त्वं गच्छसि-तू जाता है। २ युवां गच्छथः-- तुम (दो) जाते हो। ३ यूयं गच्छथ-- तुम ( सब) जाते हो । १ सः गच्छति-- वह जाता है। २ तो गच्छत:- वे (दो) जाते हैं। ३ ते गच्छन्ति-वे ( सब )जाते हैं। --किंवा-- १ मनुष्यः गच्छति- मनुष्य जाता है । २ मनुष्यौ गच्छतः-(दो) मनुष्य जाते हैं। ३ मनुष्याः गच्छन्ति- (सब) मनुष्य जाते हैं । प्रत्येक वचनके रूपके साथ ही क्रियाका उसी वचनका रूप प्रयुक्त होता है । भाषामें क्रियाके भी दो वचन ही केवल हैं, परंतु संस्कृतमें तीन वचन हैं। पाठक इनका उप- योग विशेष विचारसे देखें और स्मरण रखें, ताकि आगे अशुद्धि होने न पाय | यह विषय अत्यंत महत्त्वका है, इसलिये विशेष मननसे स्मरण करना चाहिये। -- .
पाठ ४
पर्वतः = पहाड
मार्ग, रास्ता
अब इस पाठमें कुछ अकारान्त पुल्लिंग शब्द देते हैं ।
उनके रूप पूर्व लिखे नियमके अनुसार ही कीजिये-
शब्द ( अकारान्त पुल्लिंग)
ग्रामः- गांव
अपूपः = पूआ, बडा
आपणः = बाजार सूपः = दाल
लेखकः = लेखक ओदनः = (पके) चावल
रथः = रथ, गाडी
मार्गः =
अर्भकः = लडका
चरणः- पांव
प्रसाद: = कृपा
मूषक: - चूहा
रक्षकः = रखवाला
वत्सः = बछडा
सेवकः = नौकर
अहं ग्राम गच्छामि-- मैं ग्रामको जाता हूं।
सः ग्रामात् आगच्छति-वह गांवसे आता है।
तौ ग्रामं गच्छतः--वे (दो) गांवको जाते हैं।
ते मनुष्याः प्रामात् आगच्छन्ति-- वे मनुष्य
ग्रामसे आते हैं।
सेवकः आपणं गच्छति-नौकर बाजार जाता है ।
सेवको आपणं गच्छत:--(दो) नौकर बाजार जाते हैं।
२ (सं. पा. मा. भा. ७)
(१८)
सेवकाः आपणं गच्छन्ति-( अनेक ) नौकर बाजार
जाते हैं।
तव लेखकः कदा आगमिष्यति-तेरा लेखक कब आयेगा ?
अधुना
आगमिष्यतः- मेरे (दो) लेखक
अब आयेंगे।
ते सर्वे पुरुषाः श्वः आगमिष्यन्ति- वे सब पुरुष कल
मम लेखको
आयेंगे।
हिमपर्वतस्प मार्ग त्वं जानासि किम् ?- हिमपर्वतका
मार्ग तू जानता है क्या ?
तव वत्सः किं करोति ?-- तेरा बछडा क्या करता है ?
मम द्वौ वत्सौ धावतः- मेरे दोनों बछडे दौडते हैं।
तस्य पुत्रः तत्र धावति-- उसका लडका वहां दौडता है।
मम सर्वे पुत्राः इदानीं धावन्ति- मेरे सब पुत्र अब
दौडते हैं।
वाक्य।
यदि इन सब वचनोंका पाठ आपकी समझमें आगया
हो, तो आपको निम्नलिखित वाक्य विना आयास ममझमें
आसकते है।
त्वं कुत्र गच्छसि ? युवां का गच्छथः ? यूयं कदा
अब आगच्छथ ! अहं तन्त्र बगच्छामि । आतत्र
न गच्छावः। वयं कदापि तत्र न गच्छामः।
(१९) तत्र त्वं किं न गच्छसि तत्र युवां किं न गच्छथः? तत्र यूयं किं न गच्छथ ? यत् अहं पठामि, तत् त्वं किं न वदसि ? यत् अहं न पठामि, तत् युवां किं वदथः ? यत् अहं पठामि, तत् यूयं किं वदथ ? रामः इदानी उद्यानं गच्छति । रामलक्ष्मणौ इदानी उद्यानं गच्छतः। रामलक्ष्मणभरताः इदानीं उद्यानं गच्छन्ति । अद्य सः मनुष्यः आपणं गच्छति । अद्य तौ मनुष्यौ आपणं गच्छतः। अद्य ते मनुष्याः आपणं गच्छन्ति। श्वः अहं तत्र नैव गमिष्यामि । श्वः आवां तत्र नैव गार्मष्यावः। श्वः वयं तत्र नैव गमिष्यामः । कदा तौ पाठशालां गच्छतः ? कदा ते ग्राम गच्छन्ति ? कदा सः नगरं गच्छति ? स सर्वश नगरात् नगरं किं गच्छति ? तौ सदा प्रामात् यामं किंगच्छतः १ ते सर्वदा ग्रामात् ग्राम किगच्छन्ति? बालकः उद्यानं का पच्छति? बालकौ उद्या गावात आपणं गच्छतः । सर्षे बालकाः अध्य- यनस्थ पश्चात आणाय गच्छन्ति ।
(२०) त्वं सायंकाले कुत्र गमिष्यसि ? युवां प्रातःसमये कुत्र गमिष्यथा ? यूयं मध्याह्नसमये अत्र किंन आगच्छथ? अहं रात्रौ गुरोः गृहं गच्छामि। आवां दिनसमये पाठशालां गच्छावः। वयं अनध्यायसमये कुत्र अपि न गच्छामः। यथा अहं तत्र गच्छामि, तथा त्वं अपि तत्र आग- च्छसि किम् ? अहं तत्र कथं गन्तुं शक्नोमि? यदि त्वं आगमिष्यसि, तर्हि अहं अपि आगमिष्यामि । पाठक इन वाक्यों में नामों और क्रियाओंके वचनोंका सम्बन्ध देखें। एकवचनके नामोंके साथ एकवचनकी क्रिया आती है, द्विवचनके साथ द्विवचनकी और बहुवचनके साथ बहुवचनकी क्रिया आती है, यह स्मरण रखना चाहिये। संधि किये हुए वाक्य। यदहं पठामि तयूयं किं वदथ ? यदहं पठामि तदेव यूयं किं वदथ ? राम इदानीमुद्यानं गच्छति । गच्छतीदानीमुद्यानं रामः। रामो गच्छतीदानीमुद्या- नम् । गच्छत्युद्यानमिदानीं रामः । इदानीं रामो गच्छत्युद्यानम् ।
(२१) पाठ ५ इस पाठमें अकारान्त नामोंके कुछ प्रत्यय देते हैं, इनको नामोंके साथ लगानेसे विभाक्तिके रूप सुगमतासे बनाये जा सकते हैं- विभक्तियोंके प्रत्यय । विभक्ति एकवचन द्विवचन बहुवचन -औ सं० अन् -आभ्यां १ २ आय " -आत् -स्य योः --अनां ७ " १ इन प्रत्ययोंको अकारान्त पुल्लिंग नामोंके साथ लगाकर विभक्तियोंके रूप कीजिये- मोदकः मोदकौ मोदकाः सं० (हे) मोदक (हे) (हे) मोदक मोदकान् मोदकेन मोदकाभ्यां मोदकैः ४ मोदकाय मोदकेभ्यः " २ ३ ६ ७ -- (२२) मोदकात् मोदकाभ्यां मोदकेभ्यः मोदकस्य मोदकयोः मोदकानां मोदके मोदकेषु पाठक इन नामोंमें प्रत्ययोंका अनुभव करें और इस प्रकार प्रत्ययोंका स्मरण रखके नामों के रूप बनानेका प्रयत्न करें। एक बार यह विधि ठीक समझमें आगई तो फिर कोई कठिनता नहीं रहेगी। अब कुछ अकारान्त पुल्लिंग शब्द कंठ कीजिये और उनके रूप पूर्ववत् बनाइये-- अकारान्त पुल्लिंग शब्द। आम्रः - आम वृक्षः = वृक्ष वेदः = वेद मन्त्रः :: मंत्र दण्डः = सोटी धूम्रः % धूआं लोभः = लोभ कुमार:- लडका वासः = रहना समुद्रः = सागर स्वर:- आवाज जन: 23 मनुष्य इन्द्रः = राजा, प्रमुख वाक्यानि। अहं आनं खादामि-- मैं आम खाता हूं। आवां आम्रौ खादाव:-(दो) हम (दो) आमोंको खाते हैं। वयं आम्रौ खादामः- हम (सब) दो आम खाते हैं।
(२३)
पाठक इसमें एक विशेष बात देखें। प्रत्येक वाक्यमें
"कर्ता" होता है । क्रियाका करनेवाला कर्ता होता है ।
उक्त वाक्योंमें खानेकी क्रिया करनेवाला शब्द का है।
प्रथम वाक्यमें " अहं" यह कर्ता है। कर्ताके वचनके
अनुसार ही क्रियाके वचन होते हैं। प्रथम वाक्यमें कर्ताका
एकवचन है, इस कारण क्रिया भी एकवचनी हो गई।
द्वितीय वाक्यमें कर्ताका द्विवचन है, इसलिये क्रिया द्विवचनी
हो गई और तृतीय वाक्यमें कर्ता बहुवचनी है, इसलिये
क्रिया भी बहुवचनी हो गई है । इस प्रकार कर्ताके वचनके
अनुसार क्रियाका वचन होना ही चाहिये ।
कर्ता और क्रिया इन दो पदोंको छोडनेसे उक्त गक्यों में
जो तीसरा शब्द है, उसको " कर्म" कहते हैं। कर्ता जो
कार्य करता है, उस कार्यका परिणाम जिस पदार्थपर होता
है, उसका नाम 'कर्म' होता है।
कई क्रियाएं कर्मके साथ होती ह, उनको 'सकर्मक क्रिया-
पद' कहते हैं। तथा कई क्रियाएं कर्मके विना होती हैं, उनको
'अकर्मक क्रियापद' कहते हैं । इन दोनोंके उदाहरण देखिये-
सकर्मक क्रियापद ।
रामः आनं भक्षयति- राम आम खाता
विष्णुः विश्वं धारयति-विष्णु विश्व धारण करता है।
कृष्णः युद्धं करोति- कृष्ण युद्ध करता है।
Bar
(२४) मनुष्यः जलं पिबति- मनुष्य जल पीता है। सः पुस्तकं नयति- वह पुस्तक ले जाता है। त्वं पाठं पठसि-- तू पाठ पढता है । ये क्रियापद सकर्मक हैं, क्योंकि इन क्रियाओंको कर्मकी अपेक्षा रहती है । यदि केवल "सः पठति " इतना ही कहा जाय तो प्रश्न हो सकता है कि "क्या पढता है?" इस प्रश्न- के उत्तर आने अर्थात् 'कर्म' बताने तक समाधान ही नहीं होता। इसलिये ये क्रियापद सकर्मक कहलाते हैं। अब "अकर्मक क्रियापद ” देखिये । अकर्मक क्रियापद। सः अस्ति-वह है। अहं धावामि-- मैं दौडता हूं। सः तिष्ठति-वह ठहरता सः भवति-- वह होता है। ये क्रियापद अकर्मक हैं, क्योंकि किसी भी अन्य कर्मकी अपेक्षा इन क्रियाओंको नहीं है। " धावति" कहने मात्रसे क्रियाका पूर्ण अर्थ ज्ञात होता है । " खादति" उस प्रकार नहीं है, क्योंकि इस क्रियाके उभारणके साथ खानेका पदार्थ- भी कहना आवश्यक होता है। पाठक इस बातका अच्छी प्रकार विचार करें और समझें कि ये क्रियाओंके भेद कैसे हैं। और आगे इस विषयकी गलती न हो। han
(२५)
--
"थ:
-
गच्छाव:
गच्छामः
पाठ ६
इस पाठमें क्रियापदोंके प्रत्यय देते हैं, उनको लगाकर
क्रियापदोंके रूप पाठक बना सकते हैं-
पुरुष एकवचन द्विवचन बहुवचन
उत्तम० -मि
मध्यम-सि
तृतीय-ति
-अन्ति
जिन प्रत्ययोंके प्रारंभमें 'म' अथवा 'व' होत ह, उनके
पूर्वके अकारका आ होता है । जैसा--
गच्छामि
गच्छसि गच्छथः गच्छथ
गच्छति गच्छतः गच्छन्ति
वाक्यानि ।
अहं गच्छामि । आवां गच्छावः । वयं गच्छामः।
त्वं गच्छसि। युवां गच्छथः । यूयं गच्छथ । सःगच्छति ।
तो गच्छतः। ते गच्छन्ति । पुरुषः गच्छति । मनुष्यो
गच्छतः। देवाः गच्छन्ति। अहं वदामि । आवां न
वदावः । वयं कथं वदामः १ त्वं वदास किं ? युवां किं
वदथः ? यूयं शब्दान् वदथ । जनः मुखेन वदति ।
अश्वौ न वदतः । मयूराः वदन्ति ।
१
२
(२६) ले जाना ५ पठ् ७ धाव अब कुछ क्रियायें दी जाती हैं उनके रूप पूर्ववत् कीजिये- স্বান্ত अर्थ रूप १ गम (गच्छ) जाना गच्छति २ भक्ष् खाना भक्षयति ३ दृश् (पश्य) देखना पश्यति ४ नी (नय) नयति पढना पठति ६ स्था (तिष्ठ) ठहरना तिष्ठति दौडना धावति ८पा (पिव ) पीना पिबति बोलना वदति १० क्रीड् खेलना क्रीडति इन धातुओंके वर्तमान कालके रूप बनानेके प्रत्यय इस पाठमें दिये हैं। मूल धातुके जो भिन्न रूप बनते हैं, वे कंसमें ( ) दिये हैं। वाक्यानि। अहं पुस्तकं पठामि = मैं पुस्तक पढता हूं। आवां पुस्तकं न पठावः = (दो) हम पुस्तक नहीं पढते हैं। वयं ग्रन्धं पठामः = हम (सब) ग्रंथ पढते हैं। रामः लेखं नैव पठति = राम लेख नहीं पढता । ९ वद् -
(२७)
बालको पुस्तकं किं न पठतः = (दो) बालक पुस्तक
क्यों नहीं पढते?
बालकः ग्रन्थं इदानीं पठन्ति = (बहुत) बालक ग्रंथ
अब पढते हैं।
अहं अत्र क्रीडामि = मैं यहां खेलता हूं।
आवां अत्र न क्रीडावः = हम (दोनों) यहां नहीं
खेलते।
वयं अत्र एव क्रीडामः = हम (सब) यहां ही खेलते हैं।
त्वं कुत्र क्रीडसि? = तू कहां खेलता है ?
युवां स्वगृहे क्रांडथः -तुम (दोनों) अपने घरमें खेलते हो।
यूयं मम गृहे न क्रीडथ -- तुम ( सब ) मेरे घरमें नहीं
खेलते हो।
सः पुस्तकं कुत्र नयति ?- वह पुस्तक कहां ले जाता है ?
तौ वस्त्रं अत्र आनयतः -वे (दोनों) कपडा यहां लाते हैं।
ते अन्नं न नयन्ति-के (सब) अन्न नहीं ले जाते ।
मनुष्यः मार्गे तिष्ठति- मनुष्य मार्गमें ठहरता है ।
नरौ मन्दिरे तिष्ठतः- (दो) मनुष्य मंदिरमें ठहरते हैं ।
जनाः वने न तिष्ठन्ति - (सब) मनुष्य वनमें नहीं ठहरते।
एकः जनः जलं पिबति- एक मनुष्य पानी पीता है ।
द्वौ पुरुषौ दुग्धं पिबत:- दो पुरुष दूध पीते हैं।
सर्वे मानवाःरसं न पिबन्ति-सब मनुष्य रस नहीं पीते हैं ।
(२८) यथा त्वं वदसि, तथा तौ न वदतः-जैसा बोलता है, वैसे वे (दो) नहीं बोलते। यथा तौ धावतः, तथा अहं न धावामि- जैसा वे (दो) दौडते हैं, वैसा मैं नहीं दौडता हूं। तो किं भक्षयतः ? - वे (दो) क्या खाते हैं ? युवां कुत्र क्रीडथः ? - तुम (दो) कहां खेलते हो आवां अत्र पठावः - हम (दो) यहां पढते हैं। वयं रूपं पश्यामः- हम (सब) रूप देखते हैं। पाठक इस प्रकार नामोंके वचन तथा क्रियाओंके वचन इनका ठीक प्रकार सम्बन्ध देखें और समझें ताकि इसमें कोई गलती न होने पावे । यहाँ इतने उदाहरण दिये हैं, इनको विचारपूर्वक देखनेसे सब बातका पता लग जायगा। संधि किये हुए वाक्य सर्वे मानवा रसं न पिबन्ति। न पिबन्ति रसं सर्वे बालका इमं ग्रन्थमिदानी पठन्ति । पठन्तीदानी वालका इमं ग्रन्थम् । ग्रन्थमिममिदानीं पठन्ति बालकाः । पठन्ति बालका इदानीमिमं ग्रन्थम् । ग्रन्थं पठन्तीम बालका इदानीम् । स मनुष्य- स्तेन मार्गेण गच्छति । मानवा: ।
(२९) पाठ ७ संस्कृत-वाक्यानि । राजा दशरथः उवाच-हे कैकेयि! रामात् अन्य: मे त्वत्तः प्रियतरः कः अपि नास्ति । २ तेन राघवेण एव शपे । ३ अतः इदानीं तव मनसेप्सितं ब्रूहि, तत् अधुना करिष्यामि। ४ तेन हृष्टा कैकेयी महाघोरं खाभिप्रायं व्याजहार । ५ अत्र अयं सत्यसंघः सत्य- वाक् राजा दशरथः मे वरं ददाति । ६ अनेन एव रामस्य अभिषेकसमारम्भेण मे भरतः राज्ये अभि- षिच्यताम् । ७ रामःच चीराजिनधरः चतुर्दशवर्षाणि दण्डकारण्यं आश्रितः तापसो भवतु । भाषा वाक्य। १ राजा दशरथ बोला-हे कैकेयि! रामसे भिन्न मेरा तेरेसे अधिक प्रिय कोई भी नहीं है। २ उस रामचन्द्रकी ही शपथ लेता हूं। ३ तेरे मनका (इप्सितं ) ईष्ट कह, वह अब करूंगा। ४ उससे संतुष्ट हुई कैकेयी बडा क्रूर अपना अभिप्राय बोलने लगी । ५ यहां यह सत्यप्रतिज्ञ सत्यभाषणी राजा दशरथ मुझे वर देता है । ६ इसी रामके अभिषेक- समारंभसे मेरे भरतको राज्यमें अभिषिक्त कीजिये । ७ और राम वल्कल और चर्म धारण कर चौदह वर्ष दण्डक अरण्य. का आश्रय कर तापसी होवे ।
(३०)
संस्कृत-वाक्यानि।
८ एष मे परमः कामः । त्वया दत्तं एव वरं वृणे ।
अद्य एवं रामं वने प्रयान्तं पश्यामि ।९ इति एवं
दारुणं वचः श्रुत्वा महाराजा दशरथः सद्यः नि:-
संज्ञः इव वभूव ! १० पुनः संज्ञां प्राप्य, असंवृतायां
एव भूम्यां आसीनः, दीर्घ उष्णं च निःश्वस्य, भूयः
अपि मोहं आपेदिवान् । ११ चिरेण तु संज्ञा प्रति-
लभ्य क्रुद्धः राजा कैकेयी इदं अब्रवीत् । १२ पापे !
किं ते रामेण अपकृतं ? १३ सदा तव विषये जननी.
तुल्यां वृत्तिं रामः वहति।
भाषा वाक्य ।
८ यह मेरी परम इच्छा है । तूने दिया हुआ ही वर
( वृणे ) स्वीकार करती हूं। आज ही राम वनमें चला हुआ
देखूगी। ९ इस प्रकार यह भयानक भाषण सुनकर महाराज
दशरथ ( सद्यः) तत्क्षण (निःसंज्ञ) मूर्छितसा हो गया।
• पुनः (संज्ञा) चेतना प्राप्त कर, ( अ-संवृतायां) न
आच्छादित भूनियर ही बैठा हुआ, दीर्घ और उष्ण श्वास
छोडकर, पारंवार ही मोहको प्राप्त हुआ। ११ देरसे फिर
चेतना प्राप्त कर कुद्ध राजा कैकेयीसे यह बोला। १२ हे
पापी स्त्री ! क्या तेरा रामने अपराध किया ? १३ हमेशा
तेरे विषय में माताके समान वृत्ति राम धारण करता है।
"
(३१) संस्कृत-वाक्यानि । १४ तीक्ष्णविषा सर्पिणी इव मया त्वं आत्मवि- नाशाय एव स्वभवनं निवेशिता। १५रामं अपश्यतः तु मम चेतनं नष्टं भवति । १६ तत् अलं । त्यज्यतां एष निश्चयः । अपि एषः अहं ते चरणो मूर्ना स्पृशामि, प्रसीद । १७ अथ कैकेयी रौद्रात् रौद्रं प्रत्यु- वाच । १८ हे राजन् ! यदि वरौ दत्त्वा पुनः अनु- तप्यसे तर्हि पृथिव्यां धार्मिकत्वं कथं कथयिष्यसि ? १९ अहं तव अग्रतः अद्य एव मरिष्यामि विषं पीत्वा, यदि रामः अभिषिच्यते ।२० ऋते राम- विवासनात् अहं न तुष्येयम् । भाषा-वाक्य १४ तीखे विषवाली सोपनीके समान मैंने तुमको अपने विनाशके लिये ही अपने घरमें प्रविष्ट कराई। १५ रामको न देखनेपर तो मेरी चेतना ही नष्ट होती है। १६ तो बस, छोडा जाय यह निश्चय, अब यह मैं तेरे चरणोंको सिरसे स्पर्श करता हूं, प्रसन्न हो । १७ अर कैकेयी भयानकसे भया- न बोलने लगी। १८ हे राजा ! यदि दो वर देकर फिर पश्चाताप करता है, तो पृथ्वीपर धार्मिक कैसा कहलायमा १९ मैं तेरे सामने आज ही मरूंगी विष पीकर, यदि समका अभिषेक होगा । २० रामके बनासके (ते) बिना मैं नहीं संतुष्ट होऊंगी। , (१२) समास १ रामविवासनं- रामस्य विवासनं (रामका वनवास) २ स्वाभिप्राय:- स्वस्य अभिप्रायः ( अपना अभिप्राय ) ३ सत्यसन्ध:- सत्या सन्धा प्रतिज्ञा यस्य सत्य है प्रतिज्ञा जिसकी) “४ सत्यवाक्-सत्या वाक् वाणी यस्य ( सत्य है वचन जिसका ) ५ अभिषेकसमारम्भः- अभिषेकस्य समारम्भ:- ( आभिषेकका समारंभ) ६ चीराजिनधरः-चीरं च अजिनं च चीराजिने । चीराजिने धरति इति चीराजिनधरः ( वल्कल और चर्म धारण करनेवाला) पाठक इन समासोंका अच्छा अभ्यास करें। तथा इस पाठके वाक्योंका भी उत्तम अध्ययन करें। और यदि हो सके तो इन वाक्योंके संधि बनाकर सरल संस्कृत वाक्य बनाकर लिखकर रखें। संधि किये हुए वाक्य । अहं तवाग्रतोऽद्यैव मरिष्यामि विषं पीत्वा यदि रामोऽभिषिच्यते । रामो यद्यभिषिच्यते तद्यहं विषं पीत्वाऽद्यैवाग्रतस्तव मरिष्यामि । मरिष्याम्यग्रतस्त- वाद्यैवाहं विषं पीत्वा यदि रामोऽभिषिच्यते ।
पाठ८ तथा तान्दुःखितान्दृष्ट्वा पाण्डवान्धृतराष्ट्रजः । क्लिश्यमानां च पाश्चाली विकर्ण इदमब्रवीत् ॥११॥ (म. भा. सभा. ६८) (तथा ) एवं प्रकारेण तान् पाण्डवान् दु:खितान् दृष्ट्वा (धृतराष्ट्रजः) धृतराष्ट्रात जातः पुत्रः विकर्णः (क्लिश्यमानां) क्लेशैः पीडितां दुःखितां (पाश्चाली) द्रौपदी च दृष्ट्वा इदं (अब्रवीत् ) अवदत् । याज्ञसेन्या यदुक्तं तद्वाक्यं विबूत पार्थिवाः । अविवेकेन वाक्यस्य नरकः सद्य एव नः ॥१२॥ हे (पार्थिवाः ) नृपाः! (याज्ञसेन्या) द्रौपद्या यत् (उक्तं ) कथितं (वाक्यं ) वचनं तत् (विबूत ) विशे- पेण बूत कथयत । द्रौपद्याः प्रश्नस्य उत्तरं दातव्यं इति अर्थः । वाक्यस्य (अविवेकेन) अविचारेण (नः) अस्माकं सर्वेषां (सद्यः) तत्क्षणं एव नरकः भविष्यति । भीष्मश्च धृतराष्ट्रश्च कुरुवृद्धतमावुभौ। समेत्य नाहतुः किञ्चिद्विदुरश्च महामतिः ॥१३॥ भीष्मः च धृतराष्ट्रः च (उभौ) द्वौ अपि (कुरु- वृद्धतमी) सर्वेषु कुरुषु अत्यन्तवृद्धौ। तौ द्वौ अपि (समेत्य ) संगत्य किंचित् न ( आहतुः) न उक्तवन्तौ ३ (सं. पा. मा. भा. ७) (३४) ते (महामतिः) महाबुद्धिमान् विदुरः च किंचित् अपि न आह । भारद्वाजश्च सर्वेषामाचार्यः कृप एव च । कुत एतावपि प्रश्न नाहतुर्द्विजसत्तमौ ॥१४॥ ( भारद्वाजः ) द्रोणः च सर्वेषां कुरूणां आचार्यः । (कृपः) कृपनामकः एव च सर्वेषां कुरूणां आचार्यः । एतौ द्वौ अपि आचार्यों (द्विजसत्तमौ) द्विजश्रेष्ठौ (कुतः) किमर्थं प्रश्नं न आहतुः ये त्वन्ये पृथिवीपालाः समेताः सर्वतो दिशम् । कामक्रोधौ समुत्सृज्य ब्रुवन्तु यथामति ॥१५॥ ये तु अन्ये (पृथिवीपालाः) भूपाः सर्वतः दिशं (समेताः) संगताः प्राप्ताः ते कामक्रोधौ ( समुन्सृज्य ) यक्त्वा परित्यज्य यथामति (ब्रुवन्तु ) कथयन्तु । यदिदं द्रौपदी वाक्यमुक्तवत्यसकृच्छुभा । विमृश्य कस्य कः पक्षः पार्थिवा वदतोत्तरम् ॥१६॥ शुभा द्रौपदी ( असकृद ) अनेकवारं यद् इदं वाक्यं उक्तवती । हे (पार्थिवाः) नृपाः ! ( विमृश्य ) विचार्य कस्य का पक्षः इति उत्तरं ( वदत) कथयत । इस पाठमें संस्कृत श्लोकोंका अर्थ सुगम संस्कृतमें ही दिया है । पाठक ध्यानपूर्वक इसे वारंवार पटेंगे तो उनकी (३५) - समझमें सब अर्थ आ जायगा । श्लोकके कठिन शब्द ( ) ऐसे कोठेमें रखे हैं और आगे उनका अर्थ दिया है। यदि यह अर्थ विना आयास पाठकोंके मनमें आगया, तो समझिये कि अच्छी प्रगति हो चुकी है। अब यहां श्लोकोंके समास देते हैं। १ धृतराष्ट्रजः धृतराष्ट्रात जातः । (धृतराष्ट्रसे उत्पन्न हुआ) २ कुरवृद्धतमौ- कुरुषु वृद्धः कुरुवृद्धः। अत्यन्तं कुरु- वृद्धः कुरुवृद्धतमः तौ कुरुवृद्धतमौ । ( कौरवोंमें अतिवृद्ध ) ३ महामतिः-- महती विशाला मतिः बुद्धिः यस्य । (विशालबुद्धिवाला) ४ द्विजसत्तमः-द्विजेषु ब्राह्मणक्षत्रियवैश्येषु सत्तमः श्रेष्ठः द्विजसत्तमः। (द्विजोंमें श्रेष्ठ) ५ पृथिवीपाल:- पृथिव्याः पालः पालकः। (पृथिवी- का पालनकर्ता) ६ कामक्रोधौ कामः च क्रोधः च कामक्रोधौ । (काम और क्रोध) ७ असकृत्-न सकृत् असकृत् (नहीं एकवार- अनेकवार ) पाठक इन समासोंका ठीक ठीक अध्ययन करें। इस अध्ययनसे समासोंका उत्तम ज्ञान हो सकता है।
(३६) संधि। १ विकर्ण इदं-विकर्णः इदं। २ यदुक्तं- यत् उक्तं । ३ तद्वाक्यं- तत् वाक्यं । ४ सद्य एव-सद्यः एव । ५भीष्मश्व-भीष्मःच। ६ कृप एव-कृपः एव । ७ एतावपि- एतौ अपि । ८ नाहतुर्द्विज०- न आहतुः द्विजः । ९ त्वन्य-तु अन्ये। १० सर्वतो दिशं-सर्वतः दिशं । ११ उक्तवत्यसकृच्छुभा- उक्तवती अ-सकृत शुभा। पाठक इन संधियोंको ध्यानसे देखें। संधि किये हुये वाक्य । व्याधो वाणैमृगं विध्यति। विध्यति मृगं बाणै- व्याधः । बाणाधो विध्यति मृगम् । विध्यति व्याधो मृगं बाणैः । बाणभृगं व्याघो विध्यति। किं व्याधस्तत्रवाणगं विध्यति ? कदा खलु बाणैर्विध्य- ति मृगं व्याधः ? एष व्याधोऽत्र विध्यति मृगं बाणैः ।
(३७) , पाठ ९ पूर्व दो पाठोंमें जो संस्कृत वाक्य दिये हैं, उनकी संधि करके सरल संस्कृत इस पाठमें दी जाती है- राजा दशरथ उवाच-हे कैकेयि ! रामादन्यः मे त्वत्तः प्रियतरः कोऽपि नास्ति । तेन राघवेणैव शपे। अत इदानी मनसेप्सितं बहि, तदधुना करिष्यामि। तेन हृष्टा कैकेयी महाघोरं स्वाभिप्रायं व्याजहार । अनायं सत्यसन्धः सत्यवारराजा दशरथो मे वरं ददाति । अनेनैव रामस्याभिषेकसमारंभण मे भरतो राज्येऽभिषिच्यताम् । रामश्च चीराजिनधर- श्चतुर्दशवर्षाणि दण्डकारण्यमाश्रितस्तापसो भवतु । एष मे परमः कामः। त्वया दत्तमेव वरं वृणे । अद्यैव रामं वने प्रयान्तं पश्यामि । इत्येवं दारणं वचः श्रुत्वा महाराजो दशरथः सद्यो निःसंज्ञ इव बभूव । पुनः संज्ञां प्राप्य असं- वृतायामेव भूम्यामासीनो, दीर्घमुष्णं च निःश्वस्य भूयोऽपि मोहमापेदिवान् । चिरेण तु संज्ञा प्रतिलभ्य क्रुद्धो राजा कैकेयी- मिदमब्रवीत् । पापे !किं ते रामेणापकृतं ? सदा तव विषये जननीतुल्यां वृत्तिं रामो वहति । तीक्ष्णविषा सर्पिणीव मया त्वमात्मविनाशायैव स्वभवनं (३८) निवेशिता । राममपश्यतस्तु मम चेतनं नष्टं भवति । तदलं, त्यजतामेष निश्चयः। अप्येषोऽहं ते चरणौ मूर्ना स्पृशामि, प्रसीद। अथ कैकेयी रौद्राद्रौद्रं प्रत्युवाच । हे राजन् ! यदि बरौ दत्त्वा पुनरनुतप्यसे, तर्हि पृथिव्यां धार्मिकत्वं कथं कथयिष्यास ? अहं तवाग्रतोऽद्यैव मरिष्यामि विषं पत्विा, यदि रामोऽभिषिच्यते । ऋते राम- विवासनादहं न तुष्येयम् । समप्त पाठके संस्कृत वाक्योंकी यह संधियुक्त संस्कृत है। यदि इसमें कोई कठिनता प्रतीत हुई, तो सप्तम पाठ देखनेसे निवृत्त हो सकती है। अब पूर्व पाठम दिये श्लोकोंकी सरल संस्कृत यह है, देखिये- तथा तान्पाण्डवान्दुःखितान्दृष्ट्वा धृतराष्ट्रजो विकर्णः क्लिश्यमानां पाञ्चालीं च दृष्ट्वेदमब्रवीत् । हे पार्थिवाः ! याज्ञसेन्या यद्वाक्यमुक्तं तद्विबूत । वाक्यस्य अविवेकेन सद्य एव नरकः। भीष्मश्च धृतराष्ट्रोभौ कुरुवृद्धतमौ समेत्य किंचिन्नाहतुः, महामतिः विदुरश्च किंचित् नाह । भारद्वाजः सर्वेषामाचार्यः कृप एव चैतावपि द्विज- सत्तमौ कृतं प्रश्नं नाहतुः। ये त्वन्ये पृथिवीपालाः सर्वतो दिशं समेतास्ते
(३९)
कामक्रोधी
समुत्सृज्य
यथामति ब्रुवन्तु।
शुभा द्रौपद्यसकृद्यदिदं वाक्यमुक्तवती । हे पार्थि-
वाः ! विमृश्य कस्य का पक्ष इत्युत्तरं वदत ।
ये संधियुक्त वाक्य हैं । इनके मूल श्लोक पूर्व पाठमें हैं।
संदेहके स्थानपर वहीं पाठक देखें और संदेह निवृत्त करें।
सूचना-इन वाक्योंमें पूर्व श्लोकोंकी अपेक्षा किसी किसी
स्थानपर कुछ शब्द अधिक भी रखे हैं । अर्थका ज्ञान
सुगमतासे होनेके लिये ऐसा करना आवश्यक हुआ है।
संधि ।
।
१ दशरथ उवाच- दशरथः उवाच ।
२ रामादन्य:--रामात अन्यः।
३ कोऽपि-- कः अपि ।
४ राघवेणैव-राघवेण एव ।
५ तदधुना-- तत् अधुना ।
६ स्वाभिप्रायं-- स्व अभिप्रायम् ।
७ सत्यवारराजा-- सत्यवाक् राजा।
८ अद्यैव- अद्य एव ।
९ इत्येवं-- इति एवं ।
१० क्रुद्धो राजा-- क्रुद्धः राजा ।
११ सर्पिणीव-- सर्पिणी इव ।
पाठक इन संधियोंका अभ्यास करें और अन्य संधि
खोलनेका भी अभ्यास करें।
(४०) अर्थः-- पैसा, धन दैत्यः- राक्षस पाठ १० इस पाठमें निम्नलिखित अकारान्त पुल्लिंग शब्द याद कीजिये। उद्यमः- उद्योग वानरः-बंदर कुक्कुरः- कुत्ता छात्र:- शिष्य समाज:- समाज दण्ड:-- सोटी मृग:--हिरन पाठ:- पाठ स्तन:- चोर ब्राह्मण:- ब्राह्मण द्विरेफः भ्रमर शक्रः- इंद्र व्याधः-शिकारी पान्थः- मुसाफिर लेख:-- लेख अलंकारः-जेवर कर:--हाथ स्नेहः- मित्रता प्रवाह: प्रवाह विचार:-विचार वाक्य। सः अर्थ वांच्छति = वह धनकी इच्छा करता है। वानरौ वृक्षस्य उपरि भवतः = (दो) वानर वृक्षके ऊपर होते हैं। छात्राःगुरोः समीपं पठन्ति = (सब) शिष्य गुरुके समीप पढते हैं। दण्डं धरात इति दण्डधरः = दंड धरनेवाला दंडधर ( होता) है।
(४१)
तौ द्वौ दण्डौ अत्र आनय--वे दो सोटियाँ यहां ला ।
व्याधः दण्डेन एव मृगान् ताडयति--शिकारी डंडेसे ही
(सब) मृगोंको ताडन करता है।
स्तेनाय दण्डं देहि -- चोरको दंड दो।
सः हस्ताभ्यां भारं नयति - वह (दो) हाथोंसे बोझ
ले जाता है।
व्याधः बाणैः मृगं विध्यति-शिकारी बाणोंसे हिरनको
बींधता है।
द्विरेफः शब्दं करोति - भ्रमर शब्द करता है।
लेखकः लेखं न लिखति -लेखक लख नहीं लिखत ।।
यः न लिखति स लेखकः भवितुं न योग्यः--जो नहीं
लिखता, वह लेखक होनेयोग्य नहीं।
अहं कराभ्यां मुखं आच्छादयामि -- मैं (दो) हाथोंसे
मुख आच्छादित करता
इदानी अत्र जलस्य महान् प्रवाहः अस्ति
अब यहां
जलका बडा प्रवाह है।
उद्यमेन हि कार्याणि सिद्धयन्ति, न मनोरथैः
उद्योगसे ही कार्य सिद्ध होते हैं, मनोरथसे नहीं।
व्याधः कुक्कुरैः व्याघ्र अन्वेषति - शिकारी कुत्तोंसे
शेरको ढूंढता है।
(४२)
यदा मनुष्याणां महान् समाजः भवति, तदा
तस्मिन् बहु बलं अस्ति -- जब मनुष्योंका बडा समाज
होता है, तब उसमें बड़ा बल होता है ।
दैत्यः मनुष्यं भक्षयति--राक्षस मनुष्यको खाता है।
अद्य त्वं कं पाठं पठसि ? -- आज तू किस पाठको
पढता है ?
प्राज्ञःब्राह्मणः वेदं पठति-ज्ञानी ब्राह्मण वेद पढता है।
स्वर्ग शकः राज्यं करोति- स्वर्गमें इंद्र राज्य करता है।
पान्थाय जलं देहि- मुसाफिरके लिये जल दो।
मूर्खः अलंकारः देहं भूषयति - मूढ मनुष्य जेवरोंसे
देहको सजाता है।
स्नेहेन सुखं लभते-मित्रतासे सुख प्राप्त होता है।
वाचनपाठः।
यदा त्वं जलं पिबसि तदा एव अहं दुग्धं पियामि।
यदा त्वं तत्र आगमिष्यासि तदा अहं एतत्पुस्तकं
पठिष्यामि । अहं रात्रौ बहिः न गमिष्यामि । अहं
इदानीमेव गृहं गत्वा आनं भक्षयामि । दुग्धेन सह
आम्रस्य भक्षणं अतीव मधुरं भवति । आकाशात्
द्विरेफः पतति । सः पुरुषः किमर्थं पुस्तकं आनयति ?
अहं यदा तत्र गतः तदा सः तत्र नासीत् । अहं वनं
(४३) गत्वा पुष्पमालां शीघ्रं कृत्वा अत्र आनयिष्यामि । त्वं उद्यानपुष्पाणां मालां इच्छास वा वनपुष्पाणां मालां वांच्छसि ? यत्र यज्ञदत्तःगच्छति तत्र देवदत्तः न गच्छति। परंतु यज्ञदत्तदेवदत्तौ सदा अत्र भवतः। त्वं मम वस्त्रं गृहीत्वा शीघ्रं अत्र आगच्छ, मम रक्तं वस्त्रं एव अन्न आनय, न श्वेतं वस्त्रम् । पाठक इस प्रकार अनेकानेक वाक्य बनाकर अपना अभ्यास बढावें । वाक्य बनाने के समय एकवचन, द्विवचन और बहुवचनका ख्याल अवश्य करें, नहीं तो वाक्य अशुद्ध बनेंगे। ऊपर जो वाक्य दिये हैं, उनका मनन करनेसे यह अभ्यास सुगमतासे हो जायगा। संधि किये हुए वाक्य। यत्र यज्ञदत्तो गच्छति तत्र देवदत्तो न गच्छति । न गच्छति तत्र देवदत्तो यत्र गच्छति यज्ञदत्तः । गच्छनि यत्र यज्ञदत्तस्तत्र न गच्छति देवदत्तः। त्वं मम वस्त्रं गृहीत्वा शीघ्रमत्रागच्छ । आगच्छ त्वमत्र शीघ्रं गृहीत्वा मम वस्त्रम् । मम वस्त्रं शीघ्रं गृही- स्वागच्छ त्वमत्र । मम रक्तं वस्त्रमेवात्रानय । आन- यात्रैव मम रक्तं वस्त्रम् । अत्रैवानय मम रक्तं वस्त्रम् । कोऽसौ यज्ञदत्तो यो न जलं पिबति ?
(४४) पाठ ११ इस पाठमें निम्नलिखित धातु कंठ करके उसके रूप पूर्व- वत् बनाइये- धातु अर्थ १ आगम् (आगच्छ्) आना आगच्छति २ आनी ( आनय्) लाना आनयति ३ भू (भव ) होना भवति गिरना पतति चलति घूमना चरति ७ लिख लिखना लिखति ८ स्था (तिष्ठ) ठहरना तिष्ठति २ उपविश बैठना उपविशति पकाना पचति रहना वसति १२ । ढोना वहति बोना वपति बोलना रटति शब्द करना रणति बोलना भणति ४ पत् ५ चल ६ चर १० पच् ११ वस् वह् १३ व १४ रट् १५ रण १६ भण
(४५)
पाठक इन धातुओंके रूप पूर्व वतायी हुई रीतिके अनुसार
करके वाक्य करें
वाक्यानि।
पुरुषः आगच्छति-- पुरुष आता है।
मनुष्यौ आनयतः- (दो) मनुष्य ले आते हैं ।
बालकाः तत्र भवन्ति-- बालक वहां होते हैं।
हे मनुष्य ! त्वं पतसि-हे मनुष्य ! तू गिरता है ।
हे वीरौ ! युवां चलथ:- हे वीरो ! तुम (दो) चलते
हे मानवाः ! यूयं चरथ- हे मानवों ! तुम (सब)
घूमते हो।
अत्र अहं लेखं लिखामि-- यहां मैं लेख लिखता हूं।
आवां अन तिष्ठाव:- हम (दो) यहां ठहरते हैं।
वयं तत्र उपविशामः-- हम (सब ) वहां बैठते हैं ।
सूदः अन्नं पचति-- रसोइया अन्न पकाता है।
परिचारको तत्र वसत:-- (दो) सेवक वहां रहते हैं
अश्वाः रथं वहन्ति-- घोडे रथको चलाते हैं।
कृषीवलः बीजं वपति- किसान बीज बोता है।
बालको तत्र किमपि रटतः- (दो) बालक वहां कुछ
भी बोलते हैं।
(४६) घंटाः रणन्ति - घंटाएं शब्द करती हैं । त्वं किं इदानी भणसि ?- तू क्या अब बोलता है ? वाक्यानि। अहं आगच्छामि।त्वं आगच्छसि । स आगच्छति। आवां आगच्छावः। युवां आगच्छथः। तो आगच्छ- तः । वयं आगच्छामः । यूयं आगच्छथ । ते आगच्छन्ति। अहं फलं आनयामि। आवां जलं आनयावः। वयं धान्यं आनयामः। त्वं पात्रं आनयसि । तो अश्वं आनयतः। ते अश्वं आनयन्ति । वृक्षः भवति । वृक्षौ भवतः। वृक्षाः भवन्ति । त्वं भवसि । युवां भवथः। यूयं भवथ । अहं भवामि। आवां भवावः । वयं भवामः। बालकः पतति । बालकौ पततः।वालकाः पतन्ति। त्वं पतसि । युवां पतयः । यूयं पतथ! अहं पतामि । आवां पतावः। वयं पतामः । अहं ग्रामं चलामि । आवां नगरं चलावः । वयं देशान्तरं चलामः । त्वं कदा चलसि! युवां कुत्र चलथः ? यूयं किं न चलथ ? सः इदानी न चलति। तो इदानीं न चलतः । ते इदानी एव चलन्ति ।
(१७)
अश्वः वने चरति। अश्वौ वने चरतः। अश्वाः
वने चरन्ति । त्वं कुत्र चरस ? युवां कुत्र चरथः ?
यूयं कुत्र चरथ ? सान चरति । तो तत्र चरतः । ते
न चरन्ति ।
गंगाधरः लिखति । विश्वामित्रभरद्वाजौलिखतः।
छात्राः लिखन्ति । त्वं किं न लिखसि ? युवां लिखथः ।
किं यूयं लिखथ ? अहं अत्र लिखामि । आवां अत्र
लिखावः । वयं अत्र न लिखामः।
धातुओंके रूप बनानेका अभ्यास इस पद्धतिसे पाठक
करें। कर्ताका वचन और क्रियाका वचन एक होना
चाहिये । थोडे ही शब्दोंसे प्रत्येक धातुके रूप जोडकर इस
प्रकार अनेक वाक्य हो सकते हैं । यदि पाठक इस रीतिसे
प्रतिदिन अभ्यास करेंगे, तो उनको संस्कृत वाक्य बनाना
सुगम हो जायगा।
संधि किये हुए वाक्य ।
अश्वो वने चरति।चरत्यश्वो वने। वनेऽश्वो चरति।
गंगाधरो लिखति । वयमत्र न लिखामः । अत्र न
लिखामो वयम् । न वयं लिखामोऽत्र । तो तत्र
चरथः । चरथस्तत्र तौ। तत्र चरथस्तौ । आवामन
लिखावः।
- (४८) पाठ १२ इस पाठमें आप निम्नलिखित शब्द स्मरण कीजिये- अकारान्त पुल्लिंग शब्द । कूप: - कूआ यवः - जौ दुर्जनः : 3 दुष्ट मनुष्य लोभः = लोभ विनयः = नम्रता ओष्ठः = होंठ शुकः - तोता मयूरः = मोर मार्जनलेपः = साबून , सुजन: - सज्जन देहः = शरीर काम:- काम, इच्छा ओदनः- पके चावल पेटकः = पेटी, संदूक प्रश्न: - प्रश्न, सवाल प्रकाश:- प्रकाश, उजाला जड: = जड, मूढ काचः = शीशा नागः = सांप, हाथी जनक: 3D पिता इदाना तव कूपस्य जलं पिबामि = अब तेरे •एका जल पीता हूं। दुर्जनं दूरतः परित्यज्य = दुष्ट मनुष्यका दूरसे परित्याग कर। विद्वान् विनयेन शोभते विद्वान् नम्रतासे सुहाता है। शुकः वृक्षस्य उपरि वसति % तोता वृक्षके ऊपर वसता है। मार्जनलेपेन जलेन च शरीरं निर्भलं कुरु-- साबुनसे तथा जलसे शरीर निर्मल स्वच्छ कर।
(४९) अश्वस्य देहः मनुष्यस्य शरीरात् बलिष्ठतरः अस्ति घोडेका शरीर मनुष्यके देहसे अधिक बलिष्ठ है। त्वं कथं ओदनं पचसि ?- तू कैसे चावल पकाता है ? सः इदानी प्रश्नं पृच्छति- वह अब प्रश्न पूछता है । जडःज्ञानेन हीनः भवति-- मूढ ज्ञानसे हीन होता है। नागः विषयुक्तः भवति-- सांप विषयुक्त होता है। तव जनकः किं लिखति ?-तेरा पिता क्या लिखता है ? काचः त्वया दृष्टः किं ?-शीशा तूने देखा है क्या ? इदानीं शुभ्रः सूर्यस्य प्रकाशः अस्ति-- अब सूर्यका शुभ्र प्रकाश है। तव पेटके मम पुस्तकं अस्ति-तेरी संदूकमें मेरी पुस्तक है। यथा कामः तथा एव लोभ:- जैसा काम वैसा ही लोभ है। सुजनं नमस्करोमि- सुजनको नमस्कार करता हूं। मयूरः अतीव शोभनः भवति-- मोर अति सुंदर है ओष्ठः कथं रक्तवर्णः न भवति? होंठ क्यों लालवर्ण- वाला नहीं होता है? वाक्यानि। त्वं मुद्रं किं न पचसि ? मुद्गमिश्रितः ओदनः मधुरः भवति । मुद्गानां अन्नं मधुरं भवति । तस्य (सं. पा. मा. भा. ७ )
(५०)
हिमपर्वतस्य शिखरं अतीव रमणीयं अस्ति । एकस्य
बालकस्य पुस्तकं अन्यः नयति । तदा द्वौ अपि
बालको युद्धं कुरुतः। यस्य बालकस्य मुखं मलिनं
भवति सः मूढः भवति।
सः बालकः इदानीं किं भक्षयति स इदानी आनं
भक्षयति, दुग्धं च पिबति।आम्रस्य भक्षणानंतरंजलं
न पिब । तस्मै मार्ग देहि । सः अंधःबधिरः च अस्ति ।
आचार्यः धर्मस्य वचनं उपदिशति । त्वया तत्
किं न श्रुतम् ? उपदेशकः धर्मवचनस्य अमृतं ददाति।
तत् यथा इच्छसि तथा पिब ।
नृपतिः चोरं ताडयति । राजा यदा नगरात् बहिः
गच्छति, तदा एव चोरः अत्र आगच्छति ।
त्वं अत्र कुमारं किमर्थं ताडयसि ? किं तेन कृतं?
सः शोभन: छात्रः अस्ति । तं न ताडय । सः इदानीं
स्वपाठं करोति।
स्वादु दुग्धं मिष्टं भवति। तथा फलानां रसः अपि
मिष्टः अस्ति । अस्य कूपस्य जलं मधुरं नास्ति, तत्
अतीव क्षारं अस्ति । अस्य कारणं किं अस्ति?
विष्णुमित्रः कदा स्नानं करोति ? त्वं कदा भोजनं
करोषि ? तव पुत्रः कदा पठति ? त्वं कुत्र वससि ? युवा
.
(५१) कुत्र वसथः ? अहं प्रातः वनं गतः, इदानीं एवं गृहं आगतः। पाठक इस प्रकार छोटे छोटे वाक्य बनाकर बोलनेका यत्न करें । जो जो शब्द इस समयतक पाठकोंको कंठ हो चुके हैं, उनका उपयोग करके अनेकानेक वाक्य पाठक बोल सकते हैं। इस प्रकार छोटे छोटे वाक्य बनानेका अभ्यास समय समयपर पाठक करेंगे, तो उनको सैकडों वाक्य बनानेका अवसर मिलेगा और उनको विश्वास भी हो जायगा, कि अपनी प्रगति संस्कृतमें इतनी हो गई है। संधि किये हुये वाक्य मुगमिश्रित ओदनो मधुरो भवति।भवति मधुरो मुद्गमिश्रित ओदनः । यस्य बालकस्य मुखं मलिनं भवति, स मूढो भवति । भवति स मूढो बालको यस्य- मुखं मलिनं भवति।स बालकोऽत्र किं भक्षयतीदा- नीम् ? स इदानीमानं भक्षयति दुग्धं च पिबति । पिबतीदानीं स दुग्धमानं च भक्षयति । सोऽन्धो बधिरश्वास्ति। सोऽस्त्यन्धो बधिरश्च । अहं प्रातर्वनं गत इदानीमेव गृहमागतः।गृहमिदानीमेवागतोऽहं प्रातश्च वनं गतः। तथा फलानां रसोऽपि मिष्टोऽस्ति । अस्ति मिष्टः फलानां रसः।
(५२) पाठ १३ संस्कृत-वाक्यानि । १ श्रुत्वा तत् कैकेयीवचनं राजा दशरथः निःश्वस्य छिन्नः तरुः इव अपतत् । २ दीनया वाचा च कैकेयीं अपृच्छत् । ३ केन त्वं एवं उपदिष्टा? ४ नानादिग्भ्यः समागताः राजानः किं मां वक्ष्यन्ति १५ रामं वनं गच्छन्तं, सीतां च रुदतीं दृष्ट्वा चिरं जीवितुं न आशं- से । ६ हे कैकेयि ! सर्वान् अस्मान् नरके प्रक्षिप्य सुखिता भव । ७ मयि मृते, रामे वनं गते च, त्वं विधवा भूत्वा एव राज्यं करिष्यसि । ८ तथा विलपतः दश. रथस्य सूर्यः अस्तं गतः। रजनी च अभ्यावर्तत । प्रभातकालः अपि जातः । भाषा-वाक्य १ सुनकर वह कैकेयीका भाषण राजा दशरथ श्वास छोड- कर काटे हुए वृक्षके समान गिर पडा ।२दीन वाणीसे कैक- यीसे पूछने लगा । ३ किसने तुझे इस प्रकार उपदेश किया? ४ नाना दिशाओंसे आये हुए राजा लोग क्या मुझे कहेंगे ? ५ रामको वनमें जात और सीताको रोते देखकर देरतक जीनेकी आशा नहीं है। ६हे कैकयी ! हमको नरक में फेंक- कर सुखी हो जाओ । ७ मेरे मरनेपर और रामके वनको जानेपर, तू विधवा होकर ही राज्य करेगी । ८ इस प्रकार विलाप करते हुए दशरथके, सूर्य अस्त हो गया । रात्रि हो गई। और प्रातःकाल भी हुआ।
(५३) संस्कृत-वाक्यानि । ९ प्रभाते एव आशु वसिष्ठः संभारान् उपगृह्य राजमंदिरं प्रविवेश। १० सचिवं सुमन्त्रं आहूय प्रोवाच । ११ मां आगतं नृपतेः क्षिप्रं आचक्ष्व । १२ तथा त्वरस्व, यथा पुष्यनक्षत्रे रामः राज्यं अवाप्नु- यात् । १३ एवं श्रुत्वा सः अपि प्रविवेश अन्तःपुरम्। १४ राज्ञः अवस्थां अज्ञात्वा एव तं अभिष्टोतुं प्रचक्रमे। १५ धार्मिकः राजा दशरथः रामं प्रति भग्नहृदयः शोकरक्तेक्षणः तं उवाच । १६ एतैः वाक्यः खलु त्वं मम मर्माणि कृन्तसि । १७ सुमन्त्रः अस्य वाक्यस्य अर्थ न अन्वबुध्यत। भाषा-वाक्य सबेरे ही शीघ्र वसिष्ठ सामग्री लेकर राजमंदिरमें प्रविष्ट हुआ । १० मंत्री सुमंत्रको बुलाकर बोला । ११ मैं आया हूं, यह राजाका शीघ्र कह दो। १२ वैसी त्वरा कर कि जिससे पुष्यनक्षत्रमें राम राज्यको प्राप्त होवे । १३ यह सुनकर वह भी प्रविष्ट हुआ अन्तःपुरमें । १४ राजाकी अव- स्था न जानकर ही उसकी स्तुति करनी प्रारंभ की। १५ धार्मिक राजा दशरथ रामके प्रति छिन्नहृदय होकर शोकसे लाल (ईक्षण) नेत्र होकर उससे बोला। १६ इन वाक्योंसे तो तू मेरे मर्म ही काट रहा है । १७ सुमन्त्र इस वाक्यका अर्थ नहीं समझा।
(५४) संस्कृत-वाक्यानि। १८ यदा दशरथः दैन्यात् न वक्तुं शशाक, तदा मन्त्रज्ञा कैकेयी सुमंत्रं प्रत्युवाच । १९ हे सुमन्त्र! राजा रजनी प्रजागरपरिश्रान्तः निद्रां गतः, अतः त्व- रितं रामं अन आनय । भाषा-वाक्य १८ जब दशरथ दीनताके कारण नहीं समर्थ हुआ बोल- नेके लिये तब विचारका भाव समझनेवाली कैकेयी सुमंत्रसे बोली। १९ हे सुमंत्र ! राजा रात्रिमें जागरणके कारण का हुआ निद्रित हुआ है । इसलिये शीघ्र रामको ही यहाँ ला। समास । १ कैकेयीवचनं- कैकेय्याः वचनं कैकेयीवचनं (कैके- बीका भाषण) २ विधवा-विगतःमृतःधवः पतिः यस्याः सा विधवा पतिहीना मृतपतिका स्त्री । (जिसका पति मर चुका है।) ३ राजमंदिरं-- राज्ञः मंदिरं राजमंदिरं (राजाका भवन) ४ भग्नहृदय:- भगं हृदयं यस्य सः भग्रहृदयः।(जिसका हृदय छिन्नभिन्न हुआ है।) ५ मंत्रज्ञा- मंन्त्रं जानाति इति मन्त्रज्ञा (विचारका भाव जाननेवाली)
(५५)
६ प्रजागरपरिश्रान्तः, प्रकर्षेण अतिशयेन जागरः
जागरणं प्रजागरः । परितः सर्वतः श्रांतः परिश्रांतः ।
प्रजागरेण परिश्रांतः प्रजागरपरिश्रांतः। (जागरण
करनेके कारण थका हुआ।)
पाठक समासोंका भी अभ्यास अच्छा करें । तथा
इन पाठके वाक्योंका भी अच्छा अभ्यास करें और जब
सम्पूर्ण पाठ हो जाय, तर केवल वाक्य ही वारंवार अनेक
समय पढते रहें।
संधि किए हुए वाक्य।
श्रुत्वा तत्कैकेयीवचनं राजा दशरथो निःश्वस्य
छिन्नस्तरुरिवापतत्। दीनयावाचा च कैकेयीमपृच्छत् ।
केन त्वमेवमुपदिष्टा ? नानादिग्भ्यः समागता
राजानः किं मां वक्ष्यन्ति ? रामं वनं गच्छन्तं, सीतां
च रुदतीं दृष्ट्वा, चिरं जीवितुं नाशंसे । हे कैकेयि! सर्वा-
नस्मान्नरके प्रक्षिप्य सुखिता भव। मयि मृते, रामे च
वनं गते, त्वं विधवा भूत्वैव राज्यं करिष्यासि । तथा
विलपतो दशरथस्य सूर्योऽस्तं गतः। रजनी चाभ्या-
वर्तत । प्रभातकालोऽपि जातः । प्रभात एवाशु वसि-
ठः संभारानुपगृह्य राजमन्दिरं प्रविवेश । सचिवं
सुमन्त्रमाहूय प्रोवाच । मामागतं नृपतेः क्षिप्रमाचक्ष्व ।
(५६) पाठ १४ भीमकर्णयोर्युद्धम् । रणे ज्वलन्तं पावकं इव क्रद्धं भीमसेनं कर्णः वातेन उद्धृतः अर्णवः इव अन्यं रथं आस्थाय अभ्ययात् । क्रुद्धं कर्णं दृष्ट्वा सर्वे भीमसेन हुताशने हुतं इव अमन्यन्त। ततः घोरं चापशब्दं कृत्वा राधेयः भीमसेनरथं प्रति अभ्यद्रवत् । ततः तयोः भीमकर्णयोः घोरं युद्धं प्रारब्धम् । परस्परवधेच्छया लोचनैः दहन्तौ इव अन्योन्यं ददर्शतुः, परुषाणि च वाक्यानि ऊचतुः। ततः कर्णः नवभिः शितैः शरैः महाबलं भीमं विव्याध । भीम और कर्णका युद्ध । लडाईके अन्दर जलती हुई आगके समान क्रोधित भीम- सेनको देखकर कर्ण हवासे तरंगोंको उछालते हुए समुद्रके समान, दूसरे स्थपर चढकर आया। गुस्से में आये हुए कर्णको देखकर सब भीमसेनको अग्निमें होमा हुआ समझने लगे। तब घार धनुष्के शब्दको करके कर्ण भीमसेनके रथकी तरफ दौडा। इसके बाद उन भीम और कर्णका भयानक युद्ध हुआ। एक दूसरेको मारनेकी इच्छासे आखोंसे जलाते हुए एक दूसरेको देखने लगे; और कठोर वचनोंको कहने लगे । तब कर्णने नौ तेज बाणोंसे महाबलवाले भीमको बींध डाला।
(५७)
..
भरतशार्दूल: भीमसेनः तु हेमपृष्ठं महत् धनुः
रथे निक्षिप्य करे गदां गृहीत्वा कर्णरथं प्रति वेगात्
अभ्यधावत् । तं पाण्डवर्षभं तथा वेगेन आपतन्तं
विलोक्य कणः अपि मत्तः द्विपः मत्तं द्विपं इव
युद्धाय प्रत्युद्ययौ । तौ तथाविधौ दृष्ट्वा उभये अपि
बले सर्वे च महारथाः कौतुकपरवशाः चिनं इव
तस्थुः। तस्मिन् समये तयोः जयपराजयौन व्यक्तं
अलक्षयताम् । ततः तौ अन्योन्यं तीक्ष्णैः बाणैः जि-
घांसन्तौ वष्टिमन्तौ अम्बुदौ इव प्रेक्षणीयतरौ
आस्ताम् । ताभ्यां मुक्ताः गृध्रपत्राः शराः आकाशे
शरदिमत्तानां सारसानां श्रेण्यः इव चकाशिरे।
भरतकुलमें व्याघ्रके समान भीमसेन सोनकी पीठबाले
महान् धनुषको स्थमें डालकर हाथमें गदा लेकर कर्णके
रथकी ओर वेगसे दौडा। उस पाण्डवोंमें श्रेष्ठको उस प्रकार
वेगसे आ पडते हुए देखकर कर्ण भी मत्त हाथीके प्रति मत्त
हाथीकी तरह युद्धके लिये सामने गया। उन दोनोंको इस
प्रकार देखकर दोनों ओरकी सेना तथा सब महारथी-गण
कौतुकवश हुए हुए चित्रकी तरह ठहर गए । उस समय
उनका जय और पराजय स्पष्ट नहीं दिखाई देता था। तब
वे दोनों एक दूसरेको तेज बाणोंसे मारनेकी इच्छा करते हुए
वर्षा करते हुए दो बादलोंकी तरह दर्षनीय थे ।
(५८) एवं प्रवृत्ते भीमः कर्णस्य धनुः त्रिभिः विशिखैः चकर्त, रथात् च सारथि अपातयत् । तदा महाबलः कर्णः निःश्वसन उरगः इव जीवितस्य अन्तकरी महाशक्ति उत्क्षिप्य भीमसेनाय चिक्षेप । ततः सूत- नन्दनः राधेयः शक्तिं पुरन्दरः अशनि इव विमृज्य सुमहानादं ननन्द । तस्य नादं निशम्य कौरवाः अत्यन्तं मुमुदुः। तां कर्णेन निर्मुक्तां अर्कप्रभा शक्तिं भीमः आशुगैः शरैःवियति एव चिच्छेद । उनसे छोडे हुए गीधके पंखवाले बाण आकाशमें शरद् अतुमें मत्त सारसोंकी पंक्तियोंकी तरह शोभायमान होने लगे। इस प्रकार युद्ध छिड जानेपर भीमने कर्णका धनुष् तीन बाणोंसे काट डाला और रथसे सारथीको गिरा दिया। तब अति बलवान् कर्णने फुकारते हुए सांपकी तरह जीवनका अन्त करनेवाली बडी शक्तिको उठाकर भीमसेनकी तरफ फेंका । इसके बाद सूतनन्दन कर्ण इसको इन्द्रके वज्रकी तरह छोडकर बडा शब्द करता हुआ आनन्द मनाने लगा। उसके शोरको सुनकर कौरव अत्यन्त प्रसन्न होने लगे। उस कर्णसे छोडी हुई सूर्यके समान तेजवाली शक्तिको भीमने तेज गतिवाले बाणोंसे आकाशमें ही काट डाला।
(५९)
एवं अन्योन्यं प्रजिहीर्षन्तौ गोष्ठेषु महर्षभौ इव
परस्परं अभिवीक्षन्तौ तदा सायकान् व्यसृजताम् ।
ततः कर्णः भीमस्य शरैः आहतः अश्रुभिः पूर्णाक्षः
विह्वलः रणं हित्वा महाभयात् जवनैः अश्वैः
प्राद्रवत् । एवं कर्णे रणात् अपगते भीमः धृतराष्ट्रा-
त्मजान यमालयं निन्ये। तान् तथा पतितान् दृष्ट्वा
प्रतापवान् कर्णः महता क्रोधेन आविष्टः पुनरपि
युद्धाय कृतनिश्चयः समरभूमि समाययौ । पुनः च
तयोःप्रारब्धे युद्धे कर्णः सायकैः भीमसेनस्य कवचं
पाध्यामास।
इस प्रकार एक दूसरेको हरानेकी इच्छा करते हुए,
गौशालाओंमें बड़े दो सांडोंकी तरह एक दूसरेको देखते हुए,
तब बाणोंको छोडने लगे। तब कर्ण भीमके बाणोंसे ताडन
किया गया, आंसुओंसे भरी हुई आंखोंवाला, दुःखीहुआ हुआ
रणको छोडकर बडे भयसे वेगवाले घोडोंसे भाग निकला। इस
प्रकार कर्णके रणसे भाग जानेपर भीम धृतराष्ट्रके पुत्रोंको
यमपुरी पहुंचाने लगा। उनको इस प्रकार गिरे हुए देखकर
प्रतापशाली कर्ण बडे गुस्समें भरा हुआ फिर भी युद्धके
लिये निश्चय करके लडाईके मैदानमें आया। और फिर
उन दोनोंके युद्धके शुरू हो जानेपर कर्णने बाणोंसे भीमसेनके
कवचको तोड डाला।
(६०)
भीमसेनः तु कर्णस्य हयान् हत्या, सारथिं च
विनिहत्य प्रजहास । तत् दृष्ट्वा कर्णः तस्मात् रथात्
अवारोहत, गदां च गृहीत्वा रुषा भीमाय प्राहिणोत्।
महागदां आपतन्ती भीमः आलक्ष्य स्वनिशितैः
शरैःसर्वसैन्यस्य पश्यतः एव अवारयत् । एवं पुनः
अपि विफलमनोरथः कर्णः पदातिः एव भीमसेनात्
पराङ्मुखः अभवत् ।
भीमसेन कर्णके घोडोंको और सारथिको मारकर जोरस
हंसने लगा। यह देखकर कर्ण उस रथसे उतर पडा, और
गदा लेकर क्रोधसे भीमकी ओर फेंककर मारा । उस बड़ी
गदाको आती हुई देखकर भीमने अपने तेज बाणोंसे सारी
फौजक देखते ही रोक दिया। इस प्रकार फिर भी असफल
मनोरथ कर्ण पैदल ही भीमसेनसे मुख मोडकर चला गया।
समास।
१ चापशव्द:-चापस्य शब्दः ।
२ हुताशन: हुतं अश्नाति भक्षयति इति हुताशनोऽग्निः।
३ भीमकर्णी- भीमश्च कर्णश्च ।
४ परस्परवधेच्छा- परस्परस्य वधेच्छा। वधस्य
इच्छा वधेच्छा।
(६१) पाठ १५ काकशृगालौ। एकदा एकेन काकेन इतः ततः पर्यटतां एक मांस- खण्डं समासादितम् । तत् चञ्चुना गृहीत्वा सः कस्मिंश्चित् तुङ्गशाखिनः शिखरे भक्षणाय यावत् तिष्ठति तावत् केनापि शृगालेन अदृश्यत । शृगालः असौ वुभुक्षातः आसीत् । सकलं अपि दिनं पर्यटता तेन न प्राप्तं आसीत किं अपि बुभुक्षात्राणाय इति । अतः तं वायसं दृष्ट्वा तेन चिन्तितं यत् येन केन प्रकारेण अपि अस्मात् इदं मांसखण्डं हरणीयं, नोचेत् प्राणयात्रा अपि दुष्करा भविष्यति इति । कौवा और गीदड। एकवार एक कौएको इधर उधर घूमते हुए एक मांसका टुकडा मिला । वह उसे चौंचमें लेकर किसी ऊंचे वृक्षकी चोटीपर खानेके लिये ज्योंही बैठने लगा कि इतने में उसे एक गीदडने देख लिया । वह गीदड भूखा था। सारा दिन घूमकरके भी उसे भूख मिटाने के लिए कुछ भी न मेला । अतः उसने उस कौएको देखकर सोचा कि जिस किसी प्रकारसे यह मांसका टुकडा छीन लेना चाहिये, नहीं तो जीना भी कठिन हो जायगा ।
(६२) इत्थं मनसि संप्रधार्य असौ उपायं क्षणं चिन्त- यामास । उपायं संचिन्त्य असौ प्रसन्नवदनः काकं सम्बोधयन् पाह- अहो नु खलु अदृष्टपूर्वः विलक्षणः भवान् विहगः। मन्ये किल भवान् विहङ्गमराजः। सौन्दर्यातिशयं तु भवतः नूनं वचसा वर्णयितुं न शक्यते । अहो नु खलु तव गतिः । मन्ये हंसमपि प्रत्यादेष्टुं सृष्टः भवान् । इत्येवं सर्वाङ्गसुन्दरत्वात् भवतः स्वरेण अपि अतीव सुमधुरेण भाव्यम् । यदि च सत्यं एतत् तर्हि अवश्यं अय भवान् मे श्रवण- सरणिं स्वमधुरेण आलापेन कृतार्थयिष्यति इति । इस प्रकार मनमें सोचकर वह थोडी देर उपाय सोचने लगा। तरीका सोचकर वह प्रसन्नमुखवाला कौएको संवोधन करता हुआ बोला कि, ओहो ! आप जैसा विचित्र पक्षी तो कहीं नहीं देखा ! मैं समझता हूं, आप पक्षियोंके राजा हैं। आपकी सुन्दरताका तो वाणीसे वर्णन भी नहीं किया जा सकता । अहो ! क्या कहना आपकी चालका! मेरी समझमें तो हंसको भी सिखानेके लिए आपको बनाया गया इस प्रकार सर्वाङ्गसुन्दर आपका खर भी अवश्य मधुर होना चाहिए । और यदि यह बात सत्य है तो जरूर आज आप मेरे कर्ण मार्गको अपने मीठे आलापोंसे कृतार्थ करेंगे।
(६३) कामः वायसःतु इमां कपटस्तुतिं आकण्य विस्मृत्यात्मनः स्वरूपं नितरां मुमोद। स्वरमाधुर्यं च प्रदर्शयितु- " इत्येवं नितान्तं कर्णकटुनादं यावत् कर्तु आरभते तावत् तत् मांसखण्डं अध:- स्थितस्य शृगालस्य मुखे न्यपतत् । जम्बुका तु तत् भक्षयित्वा वायसमुपहसन् तारस्वरेण प्राह, अलं आलापेन । किमर्थं व्यर्थ कर्णविवरं विदारयसि कर्ण- कटुना अनेन आलापेन ? तत् अन्यत्र गत्वा स्वैरं कुरु आलापमिति। कौआ इस कपटपूर्ण प्रशंसाको सुनकर अपना स्वरूप भूलकर अत्यन्त खूश हुआ। और अपने स्वरकी मिठास दिखानेकी इच्छासे "का का" इस प्रकार कानोंको अत्यन्त काटनेवाला शब्द ज्योंही करने लगा कि इतने में वह मांसका टुकडा नीचे बैठे हुए गीदडके मुंहमें जा पडा । वह गीदड उसे खाकर कौएपर हंसता हुआ जोरसे कहने लगा कि आलाप मत करो । क्यों व्यर्थमें कानोंको कडवा लगने- वाले अपने आलापसे कानोंको फाड रहा है ? कहीं और जाकर यथेच्छ आलाप कर। --
(६४)
यः पुरुषः स्वगुणान् सम्यक् इह न परीक्षति सः
खलु मिथ्याऽभिमानेन परितुष्यन् वायसदशां लभते
इति अत्र नास्ति संशयः ।
जो पुरुष अपने गुणोंकी संसारमें अच्छी तरह परीक्षा
नहीं कर लेता वह मिथ्याभिमानसे फूला हुआ कौए जैसी
हालत प्राप्त करता है, इसमें बिलकुल संदेह नहीं है।
समासा
१ काकशृगालो-काकश्च शृगालश्च (कौआ और गीदड)
२ मांसखण्ड-मांसस्य खण्डम् । (मांसका टुकडा)
३ बुभुक्षात: -बुभुक्षया आर्तः। ( भूखसे पीडित)
४ प्राणयात्रा-प्राणानां यात्रा। (जीवनयात्रा)
५ प्रसन्नवदना-प्रसन्न वदनं यस्य सः (प्रसन्नमुखवाला)
६ अदृष्टपूर्वः-- न दृष्टं अदृष्टं । अदृष्टं पूर्व यस्य ।
७ विहङ्गमराजा-विहङ्गमानां राजा। (पक्षिराज)
८ सौंदर्यातिशयः-सौंदर्यस्य अतिशयः (अति सुंदरता)
९ सर्वांगसुदरत्वं सर्वाणि च तानि अंगानि सर्वांगानि,
सर्वाङ्गानां सुंदरत्वं । सुंदरस्य भावः सुंदरत्वं ।
१० कपटस्तुतिः कपटयुक्ता स्तुतिः ।
११ तारस्वर:-- तारश्चासौ स्वरथ । ( ऊंचा स्वर )
१२ कर्ण विवरं--कर्णस्य विवरं । ( कानका छेद )
गीताका राजकीय तत्वालोचन लेखक-पं. श्री. दा. सातवळेकर, ' गीतालंकार' - । भगवद्गीताकी आलोचना धार्मिक तथा आध्यात्मिक दृष्टि करनेकी रीति सुप्रसिद्ध है। आजतक भगवद्गीताकी आलोचना धार्मिक तथा आध्यात्मिक दृष्टि से बहुतोंने अनेक बार की है। इस पुस्तक गीताकी आलोचना राजनैतिक दृष्टि से की है। भगवद्गीता अध्यात्मशास्त्रका ग्रंथ है, इसमें संदेह नहीं है । परन्तु अध्यात्म- शास्त्र केवल परलोकका ही विचार करता है, ऐसा कहना अशुद्ध है। वैदिक धर्मकी परंपरासे सब शास्त्रोंका आधार अध्यात्मशास्त्र है। इसलिये राजनैतिक विचारों का आधार अध्यात्मशास्त्र कैसा है, यह बात आजकल के दिनोंमें अधिक स्पष्ट होनी चाहिये । इस हेनुसे ही इस पुस्तकमें यह बताने का यत्न किया है और बताया है कि भगवद्गीता का सिद्धान्त वैदिक राज्यशासनके लिये किस दृष्टिसे अनुकूल है। इस पुस्तकमे अन्यात्मशास्त्र के आधारपर राज्यशासन किस तरह चल सकता है, इसका विचार दिया है । आगा है कि यह लेखमाला भगवद्गीतापर नया प्रकाश डालेगी और हमारे आर्यशास्त्रोंके अन्दर जो गुह्य विद्या है, उसका प्रकाश करेगी। इसमें निम्नालेखित लेख है-(१) कुरुक्षेत्रकी घोषगा, (२) भगवद्गी. ताकी कुछ संज्ञाओका पारिभाषिक अर्थ, (३) सब विश्व एव ही अखण्ड जीवन है, ( ४ ) ईश्वर के विश्वरूपदर्शनका मनुष्यके व्यवहारपर परिणाम, (५) अनन्य. योग, (६) भागवत राज्यशासन, (७) कर्मयोग, (८) क्या कर्म- फलत्यागसे व्यवहार हो सकता है ? (९) योग और व्यवहार, (१०) श्रीमद्भू- गवद्गति का ध्येय क्या है ? पृष्ठसंख्या २२० मू. २) रु. तथा डा. व्य. ॥) . मंत्री-स्वाध्याय-मण्डल, ' आनन्दाश्रम ' किल्ला-पारडी, जि. सूरत
सचित्र
वाल्मीकि रामायण
वालकांड, अयोध्याकांड ( पूर्वा तथा उत्तरार्ध ),
सुंदरकांड और अरण्यकांड ये ५ पुस्तक तैयार है
किष्किन्धाकांड छप रहा है।
रामायणके इस संस्करणमें पृष्ठके ऊपर श्लोक दिये हैं, ष्ठके
नीचे आधे भागमें उनका अर्थ दिया है और• आवश्यक
स्थानों में विस्तृत टिप्पणियां दी हैं। जहां पाठ के विषयमें सन्देह
है, वहां सत्य पाठ दर्शाया है।
इन काण्डोंमें रंगीन चित्र हैं और कई साद चित्र हैं।
जहांतक की जा सकती ह, वहांतक चित्रोंसे बड़ी सजावट
की है।
इसका मूल्य- सात काण्डोंका प्रकाशन १० भागों में
होगा। प्रत्येक भाग करीब करीब ५०० पृष्ठोका होगा। प्रत्येक
भागका मूल्य ४) रु. तथा डा. व्य. रजिस्ट्रीसमेत ॥3)
हागा। मह सब व्यय ग्राहकोंके जिम्में रहेगा। प्रत्येक भागका
मूल्य ४) रु. है, अर्थात् सब दसों भागोंका मूल्य ४०) रु.
और सबका डा. व्यय ६) रु.
मंत्री- स्वाध्याव-मंडल, किल्ला-पारडी (जि. सूरत)
हैं
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