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Rajasthan Men Swatantrata Sanghrsha
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राजस्थान मे रवतंत्रता संघर्ष
मम्पादक
जहूरखा मेहर
जगदीशसिंह गहलोत शोध संस्थान
जगदीशसिंह गहलोत मागं, मेस्तो दरमामा, ओयपुर
प्रमुख वितरक
हिन्दी साहित्य मदिर
जगदीशसिंह गहलोत माग,
मेडती दरवाजा, जोधपुर-342 002
जगदीशसिंह गहलोत शोध संस्थान, जोधपुर
प्रकाशन वप 1991
मूल्य 6000 रुपये (साठ रुपये)
भारत प्रिण्टस (प्रेस)
जालोरी गेट बारी, जोधपुर
-- (1896 ई०-1958 ई०) राजस्थान के इतिहास, साहित्य एव सस्कृति को उजागर करने के लिए माखीवन सघर्षशील रहने वाले श्री जगदीशसिंह गहलोत की पावन स्मृति मे सादर समर्पित- जहूरसा मेहर रोहर, इतिहास विभाग, जोधपुर विश्वविद्यालय, जायपुर
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सम्पादकीय फनल जेम्स टाड तथा अय पाश्चात्य विद्वानो ने राजस्थान के इतिहास से सम्बन्धित शीय और वनिदान की प्रशमा कर पागे पाने वाले लेसको को एक विशेष माग को ओर अग्रसर कर दिया । यह दुर्भाग्य की बात है कि टाड जैसे पाश्चात्य विद्वानो के पदचिह्नो का अनुमरण कर हमने राजस्थान के इतिहास को फेवल मध्य युगीय वीरता और युखो वे घरे की उहापोह तक ही सीमित कर दिया है। स्वतत्रता प्राप्ति के पश्चात इतिहास लेखन की दिशा म पर्याप्त प्रगति हुई है किन्तु स्वतन्योत्तर तीन दशको तय भग्रेज विरोधी भावनामो का केद्र बिदु मान कर स्वतत्रता मादालन का इतिहास लिसन के उल्लेखनीय प्रयास नगण्य ही हुए। हाँ, जोधपुर, जयपुर व मवाड जस बडे राज्या म घटित घटनाग्रो का उजागर करने के प्रयास यदा कदा होत रहे, वितु समूचे वतमान राजस्यान को एक इकाई मान कर इस क्षेत्र में हुए स्वतन्त्रता सघय यी पार विशेष ध्यान नहीं दिया गय । इस दृष्टि से दो प्रयत्ना को अपवाद माना जा सकता है -एक नाथूराम बडगावत की पुस्तक 'राजस्थाम रोल इन दो स्ट्रगान आप 1857 तथा दूसरा सुमनेश जोशी लिखिा 'राजस्थान के स्वतत्रता संग्राम के सनानी । गत कुछ वर्षों स, विशेषत 1985 में कांग्रेस शताब्दी समारोह की आयोजना तथा सरकारी गर सरकारी सस्थाना की ओर से विशेष प्राग्रह के पश्चात विद्वानो ने इस दिशा में कदम उठाने प्रारम्भ किये हैं। पाश्चात्य विद्वानो द्वारा डाले गये भुलावे के साथ साथ राजस्थान में स्वनप्रता संग्राम के इतिहास के सम्बघ म अनेक अन्य कठिनाइया भी रही। विषम भौगालिर दशानो के कारण तुक, मुगल तथा अग्रेज भारत के अय भू भागा की तुलना म कई वर्षों पश्चात राजस्थान में पहुंच सके तो साथ ही स्वतत्रता संग्राम जसी महनी घटनाओं का सूत्रपात भी अपेक्षाकृत देरी से हुआ। अनक वारणा में यह क्षेत्र मीत्र दिगती पादालनकारिया क लिय उपयुक्त क्षेत्र था भी नही ।
- के प्रथम स्वाधीनता संग्राम में राजस्थान न भी अय भारतीय प्रदशा के माथ कधे से कधा मिलाकर ठोस तथा कारगर कदम अवश्य ही उठाये । स्वतत्रता प्रादोलन के दौर म देश के प्रभावशाली जन नेताना का राजस्थान म आगमन भी यदा कदा ही होता शिससे उनके व्यक्तित्व तथा विचार राजस्थान के जन मानम को भक्झोर पर वाछनीय प्रेरणा और बल प्रदान नहीं कर सके । नताजी सुभाषचन्द्र बोस वायुयान से जाते हुए एक बार जोधपुर हवाई अड्डे पर केवल कुछ समय के लिये रूके कितु उन इम आगमन के सम्ब ध म अनेक किवदतिया इस क्षेत्र में प्राज तक प्रचलित है। राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी सिंध जाने हुए लूणी रेल्वे स्टेशन स गुजरे तव ग्रामीण अचला तक के लोग हजारो की संख्या म 'गाधी बाबा के दशनाथ लूणी की पोर उमड पडे । जनता में असीम उत्साह विद्यमान था कि तु राष्ट्रीय पादोलन म उसका समुचित उपयाग नहीं किया जा सका। पश्चिम मे पमरे हुए मरूस्थल तथा दक्षिण पूर्व के पहाडी क्षेत्रा म विखरे हुए ग्रामीण अचला में निवास के कारण राजस्थान की अधिकाश जनता रूढिवादी, अशिक्षित और अनेक सामाजिक कुप्रथाओ से जकडी हुई थी। इस प्रकार के परम्परावादी लोगा में स्वायत्त शासन की इच्छा जागत करना अथवा उसे विदेशी दासता की जजीरें तोडन हतु प्रेरित प्रोत्साहित करना नि स देह अत्यत ही दुष्कर काय था। रेल, डाक तार व्यवस्था का समुचित विकास न होना, गावो का सडका द्वारा नगरो मे जुडा न होना ममाचार पत्रो का अधिक प्रभावी न होना प्रादि कारणो न जोधपुर जयपुर व उदयपुर जसे नगरा में यदा-बदा स्वायत्तता व स्वतयता प्राप्ति के उद्देश्य से घटित होने वाली घटनामा का व्यापक जन माधार न बनने दिया। सामती यातनायो अथवा जागीरी जुल्मा न भी अय प्रातो की तुलना म यहाँ के स्वतनता मेनानिया के लिये कई गुना अधिक कठिनाइया उत्पन की उपरोक्त परिस्थितियो के परिणामस्वरूप बहुघा यह प्रश्न उठाया जाता है कि अजमेर मेरवाडा को छोड़ कर शेष राजस्थान ब्रिटिश शासन के आधीन था ही नही तव यहाँ क्सा म्वतत्रता प्रादालन ? ब्रिटिश साम्राज्य के साथ सम्पन सघिया के पश्चात बहन मात्र के लिये दशी राजा अग्रेजो के मित्र थे। वास्तव म अग्रेज न केवल राज्यो के प्रशासन में हस्तक्षेप करत थे वल्कि दशी राजापा की स्थिति अधीनस्थ से अधिक नहीं थी। रियासता पर पूरा ग्रिटिश नियनण स्थापित था। इस प्रकार राजस्थान के स्वत मता सनानिया की कठिनाइया अय क्षेत्रा मे अपने समकालीनो को तुलना म मधिक थी। राजापा की सरक्षक ब्रिटिश हुकूमत निरकुश राजाना तया दमनकारी मामता का एक साथ ललकारने को सामथ्य रमने वाले ही यहा स्वतत्रता हतु जद्दा तहद मा शखनाद कर सकते थे। लाग बाग, वठ वेगार प्रादि के कारण हुए संघर्षों, सामती मयाय के विरुद्ध धावाज उठाने वालो के प्रयत्ना, निरकुश एव स्वेच्छाचारी शासन के स्थान पर स्वायत शासन की माग और अग्नेज विरोधी प्रयासो को ही व्यापर दृष्टि रग पर स्यताना हा सपप स्वीकार कसा अनुपयुक्त नहीं होगा। राजस्थान में स्वतपता सनानियो की भाति इम प्रादोलन के इतिहास लेखका पा माय भी अपेभारत अधिक उलमा हुअा है। देशी रियासता म प्राजादी के भागीवाना से किया सापों को सुरक्षित रमन के उद्देश्य से लिपिवद्ध यग की इच्छा वा नितात प्रभाव था। प्रत स्वतत्रता संग्राम का इतिहास लिखने के लिये विश्वसनीय साधना का प्रभाव स्वभाविक ही है। इस सघप के अतिम छोर के अनेक सेनानी अब तक विद्यमान है कितु उनके द्वारा बताये गये सस्मरणो मे यदा कदा भिनता नई जटिलताएँ उत्पन कर देती है। प्रस्तुत पुस्तक के चार अध्यायो म 1857 से 1947 तक राजस्थान म म्वतत्रता प्राप्ति हेतु की गई जद्दोजहद का प्रमाणिक विवरण प्रस्तुत करन या प्रयत्न किया गया है । प्रथम अध्याय राजस्थान में 1857 की क्राति मे सम्बधित है। श्री नाथूराम खडगावत तथा डॉ. प्रकाश व्यास ने इस दिशा मे उल्लेखनीय काय किया है। मैंन राजस्थान मे 1857 + स्वतत्रता संग्राम के कारणो को नई तरह से बताने का यत्न किया है और मुझे पूण विश्वास है कि इस क्राति मे हिंगल कविया न अत्यत ही महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी। द्वितीय अध्याय में मजे हुए इतिहास लेखक श्री सुखवीरसिंह गहलोत ने 'राजस्थान म स्वतत्रता प्रादोलन' म अपने वणन का केवल प्रजा मण्डल तथा राजस्थान सेवा सब की गतिविधियो तक ही सीमित नही रमा। कांग्रेस की स्थापना, गोलमेज सम्मेलन, बटलर कमीशन, साइमन कमीशन, नरेद्र मण्डल के निर्माण राजपूताना मध्य भारत सभा जसे राष्ट्रीय घटनाक्रम के साथ राजस्थान की घटनामो का तारतम्य स्थापित करन का प्रयास किया है। अपने विवरण के समथन मे श्री गहलोत ने जगह जगह प्रमाणिक साक्ष्या के हवाले भी दिये है । तीसरा अध्याय किमान आदोलन से सम्बघित है । प्रारम्भ स ही राजस्थान ग्रामीण अचलो मे विखरा हुआ है इसलिये प्रदेश की अधिकाश जनसरया भी गांवो मे निवास करती है। केवल घाटे छोटे धघो म व्यस्त कुछ लोगो को छोड कर शेष सभी की आजीविका कृषि पर निमर है। डॉ० रामसिंह सोलकी ने गहरी सूझ से किसानो की वास्तविक दशा का चित्रण किया है। आजादी पूर्व के किसानो की समस्यानो में ही बिजोलिया, शेखावाटी, अलवर, बीकानेर तथा मारवाड मे हुए किसान पादालनो के बीज निहित थे। विद्वान लेराक ने विश्वसनीय साधनो के बल पर कृपक प्रादोलना का प्रमाणिक पणन प्रस्तुत किया है। दक्षिण पूर्वी राजस्थान के पहाडी क्षेत्रो के नीलो की पठिनाइया, उनके जीवन से जुडी कुरीतियो तथा इन समस्यामो के निराकरण के प्रयत्ना का लेखा जोखा श्रीमती मजु जन ने अत्यात ही प्रभावशाली ढग से किया है। गोविंदगुरु तथा मोतीलाल तेजावत के नेतृत्व मे हुए भील आदोलनो के सम्बंध में अभी तक अधिक नहीं लिखा गया है प्रत मजु जन द्वारा किया गया भील प्रादोलनो का यह विश्वसनीय विवरण निश्चय ही महत्वपूर्ण है। वास्तविक मूल्य तो पाठक ही निर्धारित करेंगे वितु मैं भाशा रखता हूँ कि इस पुस्तक की सामग्री जिनासु पाठको तथा गम्भीर शोधकर्तामो के लिये एक समान रूचिकर सारगमित तया उपयोगी मिद्ध होगी। सिवाची गेट वे भीतर सिंधियो का बास, जोधपुर जहूरखां मेहर
अनुक्रमणिका
1-24 प्रथम स्वतनता सग्राम
1 जहूरसा मेहर
गैडर इतिहास विभाग
जोधपुर विश्वविद्यालय,
जापुर
2 सुखवीरसिंह गहलोत 25-103 राजस्थान मे स्वतत्रता प्रादोलन
मचिव जगदीशसिंह गहलोत
शाय सस्थान मेहती दरवाजा
जोधपुर
3 डॉ० रामसिंह सोलको 104-128 क्सिान आन्दोलन
प्रप्या राजनीति विज्ञान,
राजकीय याग (पी जी)
पनिज पासी
4 श्रीमती मनु जैन 129-156 राजस्थान में भील प्रादोलन
प्रयता, इतिहाग विभाग,
गोर बोगर (पी जी)
र पासी
प्रथम रवतत्रता सग्राम 1857 मध्यकाल में राजस्थान आन-वान वाला क्षेत्र रहा। यहा के सूरमानो ने शीय और बलिदान के नये नये कीर्तिमान स्थापित किए। आक्रमणकारी राजस्थान की ओर पाने से कतराते थे। इसलिये यह तथ्य महत्वपूर्ण हो जाता है कि इस बलिदानी प्रकृति वाले राजस्थान ने पेरामाउण्ट पावर का आश्रय क्यो लिया ? इस प्रश्न का हल ढूढने के लिये तत्कालीन परिस्थितियो का विश्लेपण करने पर कई तथ्य उजागर होते हैं। अठारवी शताब्दी के अन्तिम छौर तथा उनीसवी के प्रारम्भिक वर्षों में राजस्थान मे ऐसी उठक-पटक मची वि यहा के राजा-राणा हडबडा कर अग्रेजो की गोद मे जा बैठे। औरगजेब के पश्चात मुगल शासक निरन्तर निर्वल होते गये। राजस्थान पर भी मुगलो की निगलता का प्रभाव पडा। मर यदुनाथ सरकार ने लिखा "समस्त राजस्थान एक ऐसा अजायबघर बन गया जिसके पिंजरो के न तो कही दरवाजे ही थे और न ही पहरेदार मराठो के निरन्तर आक्रमण और जुल्म बढने लगे। उस समय यहाँ उत्तराधिकार के युद्ध भी बहुत अधिक हुए। कभी एक पक्ष मराठो को अपने समर्थन मे बुला लाया तो कभी दूसरे पक्ष ने पिण्डारियो का प्राश्रय लिया। मराठो की लगातार लूट से अधिकाश रजवाडो के कोप रिक्त हो गए। राज्य कोप की रिक्तता ने सैनिक निबलता को जन्म दिया। इस अव्यवस्था का लाभ उठाकर सामन्त भी स्वेच्छाचारी होने लगे। इस प्रकार की विपदापो से घिरे राजाओ ने अग्नेजो के आश्रय को धन्य भाग्य माना । 1818 ई० तक अधिकाश रजवाडो के अग्रेजो के साथ करारनामे हो गये। अग्रेजो से सधियो होने पर विशृखलित राजस्थान मे एक बार तो व्यवस्था स्थापित हो गई। अगले चालीस वर्षों मे लगभग सभी विपत्तिया दूर हो गई। कुछ तो 1761 के पानीपत युद्ध मे अहमदशाह अब्दाली ने मराठा स 2 ] शक्ति को कुचल दिया और कुछ रही सही क्सर अग्रेजो न निकाल दी। प्रकार कुचले जाने पर मराठे राजस्थान पर प्रारमण करने योग्य नहीं रह गये । उत्तराधिकार के लिये युद्ध भी समाप्त हो गए। अग्रेज जिसके पक्षधर धनते उसका शासन निश्चित । अग्रेजो से सन्धियो से पूर्व रजवाडो के बीच छाटी छोटी बातो को लेकर होने वाले युद्ध भी हर गये। सधिया के अनुसार अग्रेजो के मिनों के बीच सौहार्द बना रहना पावश्यक था। सामन्ता का प्रभाव भी धीमा पड गया। इस प्रकार सधियो से पूर्व की लगभग सभी समस्यामा का समाधान हो गया। प्रारम्भ में दिल्ली के रेजिडेंट को राजस्थान के रजवाडो की देख-रेख का काय सौपा गया। 1832 ई० मे राजस्थान म राजपूताना रेजिडेन्सी की स्थापना कर एजेन्ट टू गवनर जनरल (ए० जी० जी०) को काय भार सभलाया गया। 1857 मे राजस्थान मे 18 देशी रजवाडे, अजमेर का त्रिटिश जिला तथा नीमच की छावनी सम्मिलित थे। उदयपुर, जयपुर, जोधपुर, भरतपुर और कोटा पाच स्थानो पर पालिटिक्ल एजेट नियुक्त थे। नसीराबाद, नीमच, दवली और ऐरनपुरा मे फौजी मुकाम ये। इन फौजी मुकामा मे देशी सिपाही नियुक्त थे प्रिटिस अफसरो के आधीन छोटी छोटी फौजी टुर्काडया न्यावर तथा खेरवाडा मे नियुक्त थी जिनमे भील और मेर सैनिक थे। राजपूनाना में कुल पाच हजार के लगभग फौजी थे किन्तु केवल कुछ गिने चुने गोरो के अतिरिक्त सभी देशी सिपाही थे। 1857 की प्राति के समय मारवाड मे मेकमेसन, मेवाड में मेजर सावस और जयपुर मे कनल ईडन पालिटिक्ल एजेट थे तथा अजमेर मे जाज पेट्रिक लारस कार्यवाहक ए० जी० जी० के रूप मे काय कर रहे थे। भारत में 1857 की क्रान्ति का तात्कालिक कारण एफील्ड राइफल थी जो सव प्रथम तीनिया युद्ध मे परखी गई थी। इस राइफल में एक विशेष प्रकार का कारतूस प्रयोग में लिया जाता, जिस पर एक कागज चिपका रहता। कारतूस को राइफल मे डालने से पूर्व सिपाही को अपने दातो से यह कागज हटाना पडता। कहा जाता है कि इस कागज को चिक्ना रखने के उद्देश्य से इस पर गाय और सूअर की चर्वी लगाई जाती। भारतीय सनिको के मन मे यह बात घर कर गई कि जान बूझ कर उनका धम भ्रष्ट करने के लिये अग्रेज यह राइफल लाए है। 26 फरवरी 1857 को वहरामपुर मे 19 वी रेजिमेट ने बखेडा कर दिया। 29 मार्च को 34 वी रेजिमेट के मगल पाण्डे नामक एक ब्राह्मण सिपाही ने वारकपुर छावनी मे कुछ अग्रेज अफसरो पर हमला कर उन्ह जान से मार दिया। 10 मई को क्रान्ति की ज्वालाएँ मेरठ में भी पहुंच गई। मेरठ के क्रान्तिकारी सैनिक छावनी लूटने के पश्चात् दिल्ली की तरफ रवाना हो गए। देखते देखते समस्त उत्तरी भारत काति की चपेट में आ गया। 19 मई 1857 को राजस्थान के ए० जी० जी० पेट्रिक लारेंस के पास मेरठ की प्रान्ति के समाचार पहुंचे। उस समय वह राजपूताना के सभी पालिटिकल एजेटो से आबू मे विचार विमर्श कर रहा था 10 शिघ्रातिशीघ्र वचाव के उपाय मे उसने राजपूताना के राजापो के पास फरमान भेजे 11 अव प्रश्न यह सामने आता है कि अग्रेजो से करारनामे होने के कारण राजस्थान मे शान्ति स्थापित हुई, मराठो व पिण्डारियो की लूट और अत्याचारो से छुटकारा मिला तथा आपसी युद्ध भी समाप्त हो गए। बेचारे लारेम साहब ने समय रहते आवश्यक कदम भी उठा लिये। तब भी राजस्थान मे क्रान्ति की अग्नि क्यो प्रज्जवलित हो गई। सभी तथ्यो का विवेचन विश्लेपरण करने पर राजस्थान मे शान्ति के निम्न कारण दिखलाई पडते है- (1) भूगोल के विद्वानो ने राजस्थान को भिन्न भिन भौगोलिक क्षेत्रो मे विभाजित किया है 112 कुल 63 प्रतिशत भूमि रेतीली । अरावली से पूर्वी क्षेत्र मे स्वय अरावली शृखलाएँ दिल्ली से गुजरात तक फैली हुई । विषम भौगोलिक परिस्थितियो के कारण ही राजस्थान पात्रमणकारियो से सुरक्षित रह मका। दिल्ली सल्तनत के सुल्तान, मुगल और अग्रेज पहले भारत के अधिकांश क्षेत्रो को जीतने के पश्चात ही राजस्थान की ओर मुंह करने का साहस वटोर सके। अनेक वर्षों तक आक्रमणो से बचे रहने व जीवन यापन की कठिन परिस्थितियो के कारण यहा के नागरिको मे स्वतत्रता प्रेम और स्वाभिमान का विकास हुआ। इसलिये जव कभी आक्रमण होता यहा के लोग अधिक उत्साह से उसका सामना करते। अग्रेजी सत्ता को किसी ने भी हृदय से स्वीकार नहीं किया था। स्वतत्रता के लिये सहप सब कुछ न्यौछावर करने वाले राजस्थानी वीर अग्रेजी अकुश कब तक सहन करते। विरोध तो होना ही था। यह तो अन्य स्थानो को क्रान्ति ने तुरन्त कार्यवाही के लिये परिस्थितिया उत्पन्न करदी अन्यथा भी राजस्थान तो अपनी स्वतन्त्र प्रकृति के अनुरूप अग्रेजो का विरोध करता ही। इस प्रकार यहा के भूगोल ने लोगो मे 4 ] जिस स्वछन्द स्वतन्त्र प्रकृति का विकास किया उसके कारण अग्रेजो का विरोध तो निश्चित रूप से होना ही था। (2) प्रारम्भ से ही राजस्थान में कवियो का यह दायित्व था कि वे राजाओ को युद्ध करने व आक्रमणो का सामना करने के लिये प्रेरिन करे। दिल्ली सल्तनत और मुगलो के समय राजस्थान के साहित्यकारो ने सदैव राजाप्रो को मरने-मारने के लिये प्रेरणा और प्रोत्साहन दिया। वीर रस सदैव ही यहा के कवियो का प्रिय विषय रहा। इस प्रकार प्रेरित प्रोत्साहित करते करते यहा के साहित्य का एक विशिष्ट स्वरूप बन गया। पुरानी गजस्थानी कविताओ का गहराई से अध्ययन करने पर ज्ञात होता है कि कवि और उसको कविता जैसे युद्ध के घेरे मे बधे हुए थे। फौजो पलटनो के समुद्र उमड पडे, मतवाले हाथियो का चिंघाडना, तलवारो के प्रहारो से हाथियो की सू डो का चटाफ चटाक कटना, तोप-बन्दूक व घोडो की खुरतालो के प्रहारो से आभै मे गूज, झण्डो का फरफराना, तलवारो के टकराने से अग्नि की चिन्गारिया उछलना, काले नागो के समान योद्धानो की फुफकार, भालो-तलवारी के वार से शरीर के टुक्डे-टुकडे होना, शरीर से रक्त के फव्वारे छूटना, फेफडा के टुकडे विखरना, रक्तसनी आतो का पैरो तक लटकना, खून की नदिया बह जाना, बादलो की गडगडाहट के समान तोपो की गजना, कुँवारी सेना से ब्याह रचाना, सि यु राग के समुद्र का लहराना, युद्ध क्षेत्र की धूलि से सूर्य का ढक जाना अथवा उसका तेज क्षीण होना, युद्ध के वेग से कच्छप की पीठ का चरमराना, डाढाले की डाढ का बडकना, शेषनाग के फनो का टकराना, हडहडाहट से नारद मुनि का अट्टहास, रक्त से भरी जिह्वानो वाली यागिनो का तालिया पीट पीट कर उधगड करना, युद्ध के नगारो पर किलकारिया करती कालिका का नृत्य, यमदूतो का कबड्डी खेलना, युद्ध का दृश्य देखने हेतु सूय का रथ रुक्ना, महेश द्वारा मुडो की माला पहनना, योद्धानो के साथ शिव द्वारा ताडव नृत्य," योगिनो के खप्पर रक्त से भर जाना, अप्सराओ द्वारा वर मालाएँ लेकर योद्धानो का स्वागत करना, योद्धानो के ढिग लग जाना, शरीर के छोटे छोटे टुकड़े होकर तलवारो से चिपक जाना आदि आदि । युद्ध के वर्णन तथा योद्धापा का प्रेरणा देने की क्ला पर राजस्थानी साहित्यकारा का परम्परागत अधिकार। यहा साहित्यकारो के मान-सम्मान को भी पुष्ट परम्परा। साहित्य सृजन करो और लाख पसाव, गोड पसाव तथा जागीरी के पट्ट प्राप्त करो। अग्रेजा से सधिया के कारण साहित्यकार जुच्च [5 । हो गये। अग्रेजो को विदेशी बता कर विरोध करने पर स्वय राजाजी के कोप का भाजक बनना पडे । सामन्तो की प्रशसा करना भी व्यर्थ हो गया। सन्धियो से सामन्तो की दशा भी बिगडने लगी थी। अग्रेजो के मित्र रजवाडी में युद्ध पर सन्धि द्वारा प्रतिबंध लग गया। मुगल-पठान अथवा मराठे-पिंडारी निर्बल हो गये तथा उनके राजस्थान पर आक्रमण पूरी तरह रुक गये। युद्धो के वर्णन मे परम्परागत पारगतता निठल्ली होने लगी। कलमो पर काट चढने लगा तथा पोथी-पानडो के उदई का भख बनने की नौबत आ पहुँची। साहित्यकारो की दशा विगडने लगी। मन मे उहापोह मच गई। अनेक विचारवान साहित्यकारा को अपने वर्ग की इस हीन दशा का आभास हुआ। उन्होने अपने वर्ग को चेताया। इस स्थिति से छुटकारे का एक मात्र उपाय अग्रेजी शासन की समाप्ति दिखलाई पडा। अन्तत अग्रेजो के विरोध का अन्दर ही अन्दर खदबदता ज्वालमुखी फूटा। बाकीदास और सूरजमल मीसण जैसे बुद्धिमानो को अग्रेज मातृभूमि का शोपण करते हुए भी दिखलाई पडे। राजस्थानी क्लम सदैव ही तलवार से अधिक घातक धाव लगाने वाली रही है। साहित्यकारो ने एक बार अग्रेजो का विरोध करने की ठान ली तव उन्हे रोकना किसके वश मे था। जोधपुर महाराजा मानसिंह के काव्य गुरु वाकीदास द्वारा कहा गया गीत- पायो इगरेज मुलक रे ऊपर, पाहत लीधा खेचि उरा । धणिया मर न दीधी धरती, धणिया ऊभा गई धरा ।। फौजा देख न कीधी फौजा, दोयरण क्यिा न खला-डला । खवा साच चूड खावद रे, उण हीज चूड़ गई यळा ।। छत्रपतिया लागी नह छारणत, गढपतिया घर परी गुमी। बल नह क्यिो बापडा पोता, जोता जोता गई जमी ।। दुय चत्रमास वादियो दिखरणी, भोम गई जो लिखत भवेस । पूगो नही चाकरी पकडी, दीधो नही मरठा देस ।। वजियो भलो भरतपुर वालो गाजे गजर धजर नभ गोम । पहिला सिर साहब री पडियो, भड ऊभा नह दीधी भोम ।। महि जाता चीचाता महिला, अ दुयमरण तणा अवसारण । राखौ रे विहिक रजपूती, मरद हिद की मुसलमान, पुर जोधाण, उदपुर जैपुर, पह थारा लूटी परियाण । प्राकै गई पावसी आ, वाके असल किया-नवग्वाण ।।
6 ] ठीक बाकीदास के समान 1857 से पूर्व अग्रेजो का विरोध करने वाले बू दी के सूरजमल मीसण ने राजस्थानियो की नीद उडाने के उद्देश्य से वीर सतसई की रचना की। उन्होने देशी राजानो को अग्रेजो के विरोध हेतु कवित्त रच कर प्रेरित करने के प्रयत्न भी किये।” गीत-कवित्त लिखने के साथ ही सूरजमल मीसरण ने राजारो को अनेक पत्र भेजकर अग्रेजो से मातृभूमि को आजाद करने का आह्वान भी किया 118 जीवनपयन्त अग्रेजो या विरोध करने वाले जोधपुर के महाराजा मानसिंह ने अपनी लेखनी के द्वारा भी अंग्रेजो का विरोध क्यिा ।1° आढा जवानजी, वारहठ दुर्गादत्तजी पाढा जादूरामजी," प्रासिया वुधजी, , तिलोवदानजी पाढा चिमनजी, गोपानदानजी दधयाडिया लाळस नवलजी7 वरदान सामौर इत्यादि कितने ही साहित्य- कारो का उल्लेख किया जा सकता है जिन्होंने 1857 की क्रान्ति का अलख जगाने में अपनी कलम की करामात दिखलाई। फ्रासीसी राज्य क्रान्ति के समय स्मो, वाल्टयर, माटेस्क्यू, दिदरो और कोलीन जैसे विद्वानो तथा रूस की वोल्शेविक नान्ति से पूर्व माक्म, टालस्टाय, गोर्की व दत्तोव्हेस्की आदि विद्वानो ने जो काय किया ठीक वही काय राजस्थान मे 1857 की क्रान्ति से पूर्व यहा के साहित्यकारो ने सम्पन्न किया। राजा से रक तक के हृदय मे अग्रेजो के लिये विरोध के वीज वो कर 1857 की शान्ति के लिये वातावरण तैयार करने का सर्वाधिक महत्वपूर्ण कार्य करने का श्रेय इन माहित्य मनीषियो को ही प्राप्त है। दुर्भाग्य से फास व रूस के विद्वानो की प्रशसा में लगे इतिहासकारो ने राजस्थान के इन साहित्यविदो की उपलब्धियो की ओर अभी तक ध्यान नहीं दिया है। (3) कति जैसा महत्वपूर्ण कार्य साधारण जन के 'सहयोग के अभाव में कभी सफलतापूर्वक सम्पन नहीं किया जा सकता। राजस्थान में 1857 की क्रान्ति से पूर्व यहा के लोगो के मन टटोलने से ज्ञात होता है कि आम आदमी ने अग्रेज सत्ता का विरोध करने के लिये कमर क्स रखी थी। लोक गीत आम आदमी के मन का दपण माने जाते है। लोगो के मन पर अग्नेजी शासन की कैसी क्लुपित छवि अक्ति थी इसका साक्ष्य उस समय प्रचलित यह लोक गीत प्रस्तुत करता है मोडकी मगरी रो पारणी ढाळी ढाळ ढळियो रे आबू थार पाडा मे अगरेज बडियो रे 7 क काळी टोपी रो वा वा काळी टोपी रो देस मे छावणिया न्हाखी रे के काळी टोपी रो देस मे अगरेज आयो काई काई लायो रे फूट न्हाखी भाया मे वेगर लायो रे + काळी टोपी रो वा वा काळी टोपी रो घोडा रोवै घास ने टावरिया रोवै दाणे नै बुरजा मे ठकराणिया रोवै जामण जाया नै क रोळो वापरियो वा वा रोळो वापरियो इस लोक गीत से ज्ञात होता है कि राजस्थान अपने आप मे मगन मस्त था। अग्रेज न यहा बलपूर्वक घुसपैठ की और प्रसन्न-सन्तुष्ट गाव-ढाणियो को भभकती छावनिया बना डाला। यह अग्रेज रूपी 'कातरा' (कीडा) यहा के क्राचगे को कुतरने लगा। यहा की समृद्धि मे सेध लगा कर विलायत को समृद्ध करने में जुट गया। भाईयो को एक दूसरे के विरुद्ध भडकाने - लडाने लगा। यहा के बच्चे भूख से बिल-विलाने लगे। जानवरो के लिये घास-चारा तक नही वचा। सामन्त भी निर्वल हो गये। चारो तरफ अव्यवस्था फैल गई । निरन्तर युद्धो से मरने वालो की सरया प्रति दिन वढने लगी। मातम छा गया।29 जयपुर के राजा पर लोक गीतो मे व्यग-बाणो की वर्षा इसलिये की गई कि उसने साभर अग्रेजो को दे दिया। म्हारो राजा भोळी साभर तो दे दीनी अगरेज ने म्हारा टाबर भूखा रोटी तो मागै तीखै लूण री। जयपुर मे कप्तान ब्लैक की हत्या का कारण भी यही था कि अग्रेजो ने साभर हडप लिया। लोग अग्रेजो से इतनी अधिक घृणा करते थे कि उन्होने डू गजी जवाहरजी जैसे डाकूमो की लोक-गीतो में केवल इसलिये प्रशसा की कि उन्होने अग्रेजो की छावनी को लूट लिया ।1 बीकानेर के महाराजा रतनसिंह की गीतो मे इसलिये सराहना की गई कि उन्होने जवाहरसिंह को अग्रेजो को सौपने से दृढतापूवर मना कर दिया। जोधपुर के तखतसिंह की आलोचना का कारण केवल यह था कि उसने डू गजी को अग्रेजो को सौप दिया 132 इस प्रकार लोक गीतो से पता चलता है कि लोगो के हृदय मे अग्रेजो के प्रति घृणा के समुद्र हिलोरे ले रहे थे। घर घर में 8 ] 1857 से पूर्व राजस्थानी लोग परम्परावादी-रूढीवादी थे। धम को खतरे का आभास होने पर वे सवस्व न्यौछावर करने के लिये तत्पर हो जाते । अग्रेज, डच, और फ्रासीसियो ने राजस्थान व समस्त भारत में अपने धम का प्रचार-प्रसार करने के प्रयत्न प्रारम्भ कर दिये। अग्रेजी स्कूलो, अस्पतालो और अनाथालयो की स्थापना होने लगी थी। अकाल की चपेट में घिरे लोगो की सहायतार्थ अन्न-वस्त्र व अावश्यक वस्तुप्रो का वितरण कर पादरियो ने धर्म परिवतन का जाल फैलाना आरम्भ कर दिया था। इस प्रकार ईसाइयत के प्रचार से आम आदमी रुष्ट हो गया। सती प्रथा को समाप्त करने के अग्रेजी प्रयत्नो का भी उल्टा असर पडा। परम्परागत रीति रिवाजो पर प्रहार से रूढिवादी लोग अग्रेजो के विरोधी बन गये ।। इस प्रकार 1857 से पूर्व राजस्थान का आम आदमी अग्रेजो से घृणा करता था। जनमत ने स्वतन्नता सग्राम के सैनानियो को प्रावश्यक प्रेरणा और बल प्रदान किया। लिया। (4) राजस्थान मे अधिकाश रजवाडो के सस्थापन काल से ही मामनो की शक्ति बहुत बढी हुई थी और राजाप्रो को उनकी शक्ति पर अकुश लगाने के लिये अनेक प्रयत्न करने पडते थे 135 मारवाड मे तो यह कहावत प्रचलित थी 'रिडमला थाप्या तिकै राजा'। राज्य का वास्तविक फौज-बल सामन्त ही थे। अग्रेजो से राजाओ की सधियो के कारण साम तो की शक्ति-प्रतिष्ठा समाप्त हो गई। राजाओ के तस्त के पायो ने सामतो के कन्धे छोडकर अग्रेजो का आश्रय ले न तो बाह्य आक्रमणो का भय रहा और न ही रही सामतो को खुश रखने की आवश्यकता। राजाओ के सभी कप्टो की एक मात्र रामबाण दवा अग्रेज सरकार बन गई। स्वय राजाओ और सामन्तो के बीच झगडो का निवारण भी अग्रेज सरकार ही करती। सामत अपने कप्टो का कारण अग्रेजी सरकार को समझने लगे । बातो-गीतो मे प्रशसित अउवा ठाकुर खुशालसिंह अग्रेजो का महा बैरी । उसकी मा यता थी कि अग्रेजी सरकार उसके विरुद्ध महाराजा तखतसिंह के कान भरती है । उदयपुर का ताजिमी सरदार अजीतसिंह कनल जेम्स टाड और महाराणा दोनो का ही विरोधी था। जोधपुर के महाराजा मानसिंह ने अपने साम तो की दुरी दशा बना दी तथा अनेको को विप के प्याले पीने के लिये विवश कर दिया 17 सलू बर ठाकुर केसरीसिंह भी अपने सप्टोका कारण अंग्रेजो को मानता था ।
[ १ - सामन्तो की शक्ति कम करने के उद्देश्य से अग्रेजी सरकार ने अनेक प्रचलित प्रथाप्रो को समाप्त करने के प्रयत्न किये। मेवाड मे सलू वर रावत की सहमति से नये महाराणा का अभिषेक होता। यदि मेवाड के महाराणा क्सिी को गोद लेते तव भी अन्य खास सरदारो के साथ सलू बर रावत की स्वीकृति आवश्यक थी। अंग्रेजी सरकार ने सलू वर रावत के यह अधिकार समाप्त कर दिये। ठाकुरो को शरणागत की रक्षा का अधिकार प्राप्त था। अग्रेज सरकार ने 'शरणे का अधिकार भी समाप्त कर दिया। सामन्तो के न्याय सम्बन्धी अधिकार भी समाप्त हो गये। वीकानेर मे तो साधारण न्यायालयो को सामन्तो के मुकदमो की सुनवाई और उनके विरुद्ध कुडकी के फैसले के अधिकार तक मिल गये। विटिस हकूमत ने लोगो पर से मामन्तो का प्रभाव समाप्त करने के लिये और भी अनेक कदम उठाये। पहले जागीर के निवासी अपने ठाकुर की प्राज्ञा बिना किसी अन्य स्थान पर जाकर नहीं बस सक्ते थे। राजपूताना के ए० जी० जी० आरेंस को इच्छानुसार ठाकुरो का यह अधिकार भी छीन लिया गया। पहले व्यापारी वर्ग पर सामन्तो का दबदवा था। राहदारी और दानापानी जैसे पर सामन्तो द्वारा वसूल किये जाते थे सामता के नाम से आने वाला माल चुगी मुक्त होता था। अग्रेज सरकार ने सामतो के इन आर्थिक अधिकारी का खातमा कर दिया।" इस प्रकार अग्रेजो के कारण सामन्तगण भी आम आदमी की पगत मे प्रा पहुंचे। सभी वर्गों के सामन्त अग्रेजो पर खार खा रहे थे तथा किसी ऐसे अवसर की ताप मे थे जवकि वे अंग्रेजी राज को जड़ से उखाड फेक । (5) राजस्थान के राजाओ ने अग्रेजो से सधिया की तब उनके मन में मराठो, पिण्डाग्यिो और सामन्तो का डर बैठा हुआ था। अग्रेजो ने भी इन राजानो को सात्वना देकर समझा बुझा पर सधिया की थी। किन्तु धीरे-धीरे अग्रेज स्वामी बन गये। अनेक राजामो को प्राधीनता सटक्ने लगी। जिस राज्य की नीव को उनके पूवजी ने अपने रक्त से सीचा उस पर शासन करने मे अग्रेजो का सा हस्तक्षेप दैनिक कार्यों में अग्रेजो का वडता हुमा हस्तक्षेप राजानो ये लिये असह्य हो गया। जोधपुर के महाराजा मानसिंह जैसे कई राजा अग्रेजो से घृणा करने लगे। मानसिंह का शासन समस्त उत्तरी भारत में अग्रेज विरोधियो का शरण स्थल बन गया। सिंधी शाहजादे पोर नागपुर प्राप्पा साहब भोसले जमे अग्रेजो के शत्रुओ को मानसिंह ने अपने दरवार में पाश्रय दिया गवर्नर जनरल लार्ड विलियम बटिप ने राजपूताना ये राजा 10 ] को अजमेर मे आयोजित दरवार मे बुलाया विन्तु मानसिंह के बहिणार करने से ब्रिटिश हुकूमत ने स्वयं को अपमानित अनुभव किया। भरतपुर, कोटा, अलवर इत्यादि मे उत्तराधिकारी भगडी में अग्रेजो का हस्तक्षेप भी उनके प्रति घृणा का कारण वना । अनेर राज्यो के परम्परागत क्षेत्रो पर अग्रेजो के अधिकार के कारण वे अग्रेज विरोधी बन गये। अनेक योग्य शासको को अग्रेज शोपण करते हुए दिखलाई पढे। अपनी जनता तथा सामन्तो के अग्रेज विरोधी व्यवहार से भी अनेक शासक प्रेरित प्रोत्साहित हुए होगे। बुद्धिमान लोगो ने उलाहने भी दिये । सूर्यमल मिश्रण ने वि० स० 1914 मे पीपल्या ठाकुर फूलसिंह को तिखे पत्र मे राजापा को इस प्रकार लताडा "ये राजा लोग देसपति जमी का ठार छ जे सारा ही हिमालय का गळ्या ई नीसरया सो चाळीस से ल'र साठ सत्तर बरस ताई पाछा पटक्या है तो भी गुलामी कर छ । पर यो म्हारो वचन राज याद राखोगा व जे अयक अगरेज रह्यो तो ईको ही पूरी करसी। जमी को ठानर कोई भी न रहती। सब ईसाई हो जाती, तीसो दूरन्देसी विचार तो फायदो कोई के भी नहीं, परन्तु आपणो आछो दिन होय तो विचार और राज जिसो सुइत म्हारे होय तो वडाई तरीकै लिखी जावै, तीसू थोडी मे बहुन जाण लेसी।"43 यहा यह तथ्य उल्लेखनीय है कि अग्रेजो के विरुद्ध सशस्त्र क्राति का श्री गणेश हुअा तव राजागण या तो एक दम दुवक गए अथवा अग्रेजो के विशेष हिमायती सिद्ध होने के प्रयत्ना मे जुट गये। जो राजा अग्रेजो पर खार खा रहे थे वे अवसर आते ही क्यो दूर हट गये। इस प्रश्न की गम्भीरता से छानबीन करने पर दो वाते स्पष्टत सामने आती है। प्रथम तो यह कि देशी राजानो पर अग्रेजी की जबरदस्त धौंस जमी हुई थी और दूसरी यह कि वे क्राति की व्यापकता का अनुमान नहीं लगा सके। उन्हें इस बात का तनिक आभास भी न होगा कि समूचे देश मे जाति को आग लग चुकी है। अग्रेज उहं क्रान्ति सम्बधी सूचनाएं देते नहीं थे। स्वय राजाओ ने अपनी सडी गली गुप्तचर व्यवस्था के माध्यम से इस दिशा में कुछ भी जानने का भी प्रयाम तक नहीं विया । श्रान्ति के नेतानो ने भी राजाओ से सहयोग प्राप्त करने के प्रयत्न नही निये । कारण कुछ भी रहे हो यह निश्चित है कि राजामो की निस्कीयता देश के लिये हानिकारक सिद्ध हुई। यदि सभी राजा अपने सम्मान में छोडी जाने वाली तोपी की गिनती वढाने की आशा छोड अपने समस्त सैनिक बल सहित [ 11 आजादी के इस सघर्ष में सम्मिलित हो जाते तो अगरेजो को ऐसी दुगति होती कि उनके समाचार लन्दन पहुँचाने वाला भी न बच पाता । (6) ऐसा नहीं है कि राजस्थान मे 1857 मे होने वाली क्रान्ति का देश के अन्य भागो मे होने वाली क्रान्ति से कोई सम्बन्ध ही न हो। ब्रिटिश फौज के देशी सिपाहियो के साथ जो सौतेला व्यवहार किया जाता उससे राजस्थान की छावनियो मे स्थित देशी सैनिको के हृदय मे भी आग लगी हुई थी। साधू तथा फकीर वेप मे दिल्ली के असन्तुष्ट सैनिक राजस्थान पहुंचे और गाय-सूअर की चर्वी वाले कारतूसो की सूचना यहा के फौजियो के बीच छोड दी। राजस्थान की छावनियो में एक यह बात भी बहुत रग लाई कि फौज को जो पाटा सप्लाई होता है उसमे मनुष्य की हड्डिया पीस कर मिलाई जाती है। मेवाड के अजुनसिंह को तो सिपाहियों के सम्मुख बैठ कर इस पाटे से बनी रोटिया खाने के लिये बाध्य होना पड़ा। चर्बी के कारतूसो और आटे मे मिली हड्डियो ने देशी सिपाहियों के हृदय मे घाव कर दिये। उन्होने इसे अपना धर्म भ्रष्ट कर इसाई बनाने का कुचत्र समझा। 1857 के अमर शहीद रिसल- दार मेहरावखा," हरिसिंह और वन्दुक्ची गुल मोहम्मद जैसे आजादी के परवानो के हृदय में देश को अंग्रेजी आधिपत्य से मुक्त कराने की लालसा हिलोरे ले रही थी। । इस प्रकार राजस्थान मे 1857 की क्रान्ति की जड़ें कुरेदने पर दिखलाई पडता है कि आम जनता, साहित्यकार सामन्त, राजा और देशी सैनिक सभी ने शोपण करने वाली भूरी जौक से मुक्ति की ठान रखी थी। राजस्थान मे क्रान्ति आकस्मिक रूप से नहीं हुई। अग्नेजो के विरुद्ध आक्रोश का पहाड तो बहुत पहले ही सडा था, अन्य स्थानो पर मान्ति के समाचारो ने तो वारूद के उस ढेर मे अग्नि लगाने का काय ही किया। एक बार अग्नि प्रज्जवलित होने पर तो नसीराबाद, कोटा, उदयपुर, अलवर, देवली, अजमेर, जोधपुर (अउवा), भरतपुर टोक आदि स्थानो पर ऐसी धमचक मची कि अग्रेजी साम्राज्य की जड़ें हिल गई और वह पूरी तरह अव्यवस्थित दिखलाई देने लगा। ग्राबू मे पाराम करते ए० जी० जी० लारेस के पास 19 मई 1857 को मेरठ की क्रान्ति के समाचार पहुंचे तो एक बार तो वह सकपका गया । इस तथ्य से तो वह पहले ही अवगत होगा कि राजस्थान के लोग अग्रेजी शासन से तग पा चुके हैं और किसी सुअवसर की तलाश मे है। आने वाली कठिनाईयो के अनेक दृश्य स्वत ही उसे दिखलाई पडने लगे। अपनी ओर से सुरक्षा के 12 ] उपाय करने का विचार कर उसने राजाओं को पत्र लिखे कि वे अपने अपने रजवाडो में सुरक्षा के उपाय करले और बागियो को अपनी सीमा में प्रवेश न करने दे 150 इस घबराहट मे ए० जी० जी० साहब अजमेर की स्थिति पर विचार करन लगे। राज्य का सारा कोप और शस्त्र अजमेर में ही थे। राजस्थान मे अग्रेज सत्ता का केद्र अजमेर ही था अत यदि अजमेर मे ही वखेडा हो गया तो कुछ भी उपाय न हो सकेगा। साहब की बोखलाहट का विशेष कारण यह था कि अजमेर की सुरक्षा के लिये पन्द्रहवी नेटिव इन्फेट्री यी जो दो टुकडिया नियुक्त थी वे हाल ही मे मेरठ से स्थान्तरित होकर अजमेर पहुंची थी। प्रकार एक तो राजस्थान मे पहले ही अग्रेजो के प्रति घृणा की भावना विद्यमान थी और फिर मेरठ मे क्रान्ति के समाचार मिल गये तव बेचारे साहव का घवराना स्वभाविक ही था। हडबडाहट मे साहब न अजमेर की सुरक्षा के प्रथम उपाय के रूप में 15 वी नेटिव इन्फैन्ट्री की दोनो टुकडियो को अजमेर से हटा कर नसीरावाद भेज दी जहा इस इफैट्री के शेप सैनिक तैनात थे। इससे भी घबराहट दूर नहीं हुई तो छानवी मे तोपें लगवाकर अन्य पलटनो के वफादार सैनिको को मोर्चों पर नियुक्त कर दिया। साहब की अजमेर की सुरक्षाथ की गई व्यवस्था ने ब्रिटिश राज्य को अाफ्त मे डाल दिया । 15वी नेटिव इन्फैन्ट्री के सैनिक कोधित हो गये। वातावरसिंह नामक सैनिक ने अग्रेज अफसर प्रिचाई के पास जाकर पूछा कि "क्या यह सत्य है कि यहा यूरोपियनो की एक फौज बुलाई गई है।" 28 मई 1857 को मुशी मीर वापर अली ने प्रिचार्ड को बताया कि सभी फौजी इस बात से क्रुध है कि उन्हे जो आटा दिया जाता है उसमे हड्डिया मिला दी जाती है। प्रिचाट कोई सन्तोषजनक उत्तर न दे सका किन्तु उसने ब्रिगेडियर के पाम रिपोट भेज कर आवश्यक कायवाही का आश्वासन दिया। दुपहर दो बजे प्रिचाड भोजन करने के पश्चात हाथ साफ कर रहा था कि तोप छूटने की तेज आवाज से उसके कानो के पर्दे झना उठे। घर से बाहर देखने पर उसे जबरदस्त भगदड मची हुई दिखाई दी। पद्रहवी नेटिव इन्फंदी के सैनिको ने तोपखाने पर अधिकार कर लिया। पहले घुडसेना और बाद मे अन्य सैनिको को तोपखाने की ओर बढने के आदेश दिये गये किन्तु किसी ने इन आदेशो की अनुपालना नहीं की। तोपखाने से लगातर गोले दागे जा रहे थे। स्पोडिसवुड नामक एक मेजर तोपखाने की ओर बढा विन्तु चार कदम बढाते ही एक दनदनाती गोली ने ।
[ 13 उसका भेजा विखेर दिया। कर्नल न्यूवरी के भी टुकडे टुकडे कर दिये गये। छावनी के कनल सहित अनेक अग्रेज अफसर घायल हुए। घबराये हुए अग्रेज अफसर अत्यन्त ही कठिनाई से स्त्रिया व बच्चो को साथ लेकर छावनी से निकल सके। यह अदेशा था कि छावनी के विद्रोही सैनिक अजमेर की ओर बढ़ेंगे । अत छावनी से भगोडे अग्रेजो ने ब्यावर की राह पक्डी। छावनी के विद्रोही इच्छानुसार क्रोध प्रकट करने लगे। चर्च और अग्रेज अफसरो के बगलो को आग लगा दी। माल-असवाब कब्जे किया और कपडो व अन्य सामान को मैदान मे एकत्रित कर दिया। छावनी को तहस नहस कर यह सैनिक दिल्ली की ओर रवाना हुए 13 यहा यह तथ्य उल्लेखनीय है कि यह केवल असन्तुष्ट सैनिको का बखेडा अथवा कोई आकस्मिक घटना नही थी बल्कि पूर्व नियोजित विचार विमर्श के अनुसार अग्रेजी साम्राज्य को समूल नष्ट करने के उद्देश्य से की गई क्रान्ति थी। सव प्रथम तो इस क्रान्ति मे सभी धम-सम्प्रदाय के लोग सम्मिलित थे। फिर यदि छावनी लूटने के पश्चात यह सैनिक लूट के माल सहित अपने अपने घर की ओर चले जाते तब तो बात अलग होती। किन्तु सब ने दिल्ली की ओर प्रस्थान किया और मार्ग मे लडते-भिडते दिल्ली पहुँच गये। वहा पहुँच कर दिल्ली का घेरा डाली हुई एक अग्रेज पलटन पर टूट पडे । इससे यही निष्कर्ष निकलता है कि यह क्रान्तिकारी भारत भूमि को अग्रेजी दासता से मुक्त करना चाहते थे। यह लोग दिल्ली के अग्रेज विरोधी बादशाह बहादुरशाह जफर की सहायतार्थ दिल्ली पहुंचे थे। एक बहुत खटकने वाली बात यह है कि अग्रेज तो अजमेर की सुरक्षा के लिये बहुत ही चितित थे और नसीराबाद के कान्तिकारी सैनिको ने अजमेर की ओर देखा तक नहीं । जाते समय यदि अजमेर पर धावा बोल देते तो राजस्थान मे अग्रेजी शासन की कमर ही ट्ट जाती। उदयपुर मे पालिटिकल एजेट सावस ने लिसा कि दिल्ली के विद्रोहियो ने इहे दिल्ली पहुंचने का निमन्त्रण दिया था। यही कारण है वि नसीराबाद के सैनिक शिघ्रातिशिघ्र दिल्ली पहुँचने के लिये आतुर थे। इनके दिल्ली पहुँचने को आतुरता की जानकारी इस तथ्य से भी होती है कि शीघ्र दिल्ली पहुंचने की धुन मे अनेको ने लूटे हुए माल को मार्ग मे ही फेक दिया। भार कम कर जल्दी पहुचने के उद्देश्य से ही लूट का माल फेंका गया था। नसीराबाद के पश्चात् नीमच मे शान्ति को ज्वाला ने अंग्रेजी साम्राज्य की नीव हिलाई। नीमच की छावनी नसीराबाद से 120 मील की दूरी पर 14] स्थित थी। वहा मेरठ के समाचार पहुचने से पहले ही भयभीत कानल अवाट को नसीराबाद में क्रान्ति की सूचना मिलने पर वह प्रातपिन हो गया। देशी सिपाहियो को एकत्र कर अनुनय विनय करने लगा। उसने बाईबल पर हाथ रख कर सौगन्ध खाई कि वह देशी सैनिको पर पूर्ण विश्वास करता रहेगा।" फिर कुरान तथा गगाजल की शपथ दिलवाकर देशी सैनिको मे पाश्वासन लिया कि वे ब्रिटिश सरकार के प्रति वफादार वने रहेगे। 2 जून को घुडसवार मोहम्मद अली वेग ने कनल अवाट के सम्मुख जापर कहा "अग्रेजो ने सौग ध क्व निभाई । क्या अवध मे आप जवरदस्ती नहीं घुसे । फिर मेरा हिन्दुस्तानी ही सौगन्ध पर क्या अडे रह ?"58 उस समय तो ग्रेबाट ने जैसे-तैसे लल्लु-चप्पु कर मोहम्मद अली को शान्त कर दिया। विन्तु अगले दिन प्रात ही नसीरावाद को नाति के समाचार नीमच पहुच गये। दिन के ग्यारह बजते-बजते छावनी मे भचाभच मच गई। सैनिको ने तोपखाने पर अधिवार जमाया और छावनी को आग लगा दी। क्रोधित सैनिको ने एक अग्रेज साजेंट के बच्चो को आग मे फेंक दिया। छावनी के लगभग चालीस अग्रेज जान बचा कर मेवाड की ओर भागे। छावनी के वन्दियो को मुक्त कर, खजाना लूटा और छावनी को आग लगाने के पश्चात् इन देशी सैनिको ने भगोडे अग्रेजो का पीछा किया। डू गला नामक गाव पहुचने पर इन भागते हुए अग्रेजो को कप्तान सावर्स और वस्तावर सिंह के नेतृत्व में मेवाडी फौज का मरक्षण मिला तव इनकी जान बची।" नीमच के फौजी सूबेदार गुरेसराम को कमाण्डर, सूबेदार सूदेरोसिंह को ब्रिगेडियर और जमादार दोस्त मोहम्मद को मेजर नियुक्त कर वैण्ड-बाजो के साथ रवाना हुए। चित्तौडगढ, हमीरगढ और बनेडा के सरकारी वगलो को लूट कर आग लगाते हुए साहपुरा, निम्बाहेडा होते हुए देवली पहुचे। देवली मे भी छावनी थी जहा के अग्रेज तो पहले भाग गये और देशो सैनिक नीमच के इन सैनिको के साथ मिल गये । यहा से यह लोग टौंक पहुचे जहा जनता ने इनका स्वागत किया। यही कोटा से आए हुए अनेक मैनिक भी इनके साथ हो लिये । टोंक के नवाव के अनेक प्रयत्न करने पर भी वह असफल रहा और उसकी फौज के अनेक सैनिक भी नीमच के इन जातिकारियो के साथ मिल गये। टोंक से यह सम्मिलित सेना दिल्ली पहुची और वहा अग्रेजो से युद्ध करने वाली एक बडी सेना की सहायता मे जुट गई 160 1836 ई मे अग्रेजो ने जोधपुर लीजियन, नामक एक फौज बनाई। मारवाद मे 1857 की क्रान्ति का इस फौज से घनिष्ठ सम्बन्ध है। 18 अगस्त [ 15 को जोधपुर लीजियन की एक टुकडी रोवा ठाकुर के वखेडे के समाधान हेतु आवू की जडो भै बसे हुए गाव अनादरा पहुची। 21 अगस्त की रात्रि को लगभग पचास फौजी अनादरा से माउण्ट आबू चढे । प्रात लगभग सवा तीन बजे कोहरे से छाई हुई बुन्द के बीच यूरोपियन सोल्जरो की बैरेको तथा जोधपुर लीजियन के कप्तान हाल साहब के बगले पर गोलिया बरसने लगी। हाल साहब के बगले मे ए जी जी का पुत्र ए लारेन्स भी घायल हुअा।। यद्यपि आबू मे छुट-पुट वारदात ही हुई किन्तु इसकी सूचना जोधपुर लीजियन के प्रमुख केन्द्र ऐरनपुरा पहुंचने पर तो गजब हो गया। 22 अगस्त को ऐरनपुरा मे भी क्रान्ति का बिगुल बज गया और उसी दिन आबू मे गोलियां बरसाने वाले सैनिक भी ऐरनपुरा आ पहुंचे। क्रोधित सैनिको ने छावनी और स्टेशन को लूट लिया तथा मेहरबानसिंह को अपना जनरल नियुक्त कर अजमेर की तरफ रवाना हो गये। थोडी दूर जाने पर इन्ह समाचार मिला कि किलेदार अनाडसिंह के नेतृत्व मे आई हुई जोधपुर के महाराजा तखनसिंह की एक फौज पाली में डेरा डाले हुए है। इस सूचना पर ऐरनपुरा के सैनिको ने सेरवा का मार्ग पकडा और अउवा के पास एक गाव मे पहुँच कर डेरा डाला। अउवा ठाकुर खुशालसिंह चापावत के महाराजा तखतसिंह से अनबन । ठाकुर अग्रेजो को झगडे का कारण मानकर उनसे घृणा करता था। यह बात गाव की चौपालो मे आज तक प्रसिद्ध है कि खुशालसिंह दस सिर और चौपन हाथो वाली अपनी कुल-देवी सुगाली माता की मूर्ति के सम्मुख पूजा हेतु बैठा था तब उसे ऐरनपुर के सैनिको के आगमन की सूचना मिली। तुरन्त सामने जाकर ठाकुर इन सैनिको को गढ मे ले पाया। ठाकुर के चाकरो ने समझा कि देवी मा का आदेश होने पर ही ठाकुर क्रान्तिकारियो का स्वागत कर रहा है। आगे से आगे खुसर-पुसर होते-होते यह बात चौपालो तक पहुच गई। आसोप के ठा० शिवनाथसिंह, गूलर ठा० विशनसिंह और आलगियावास ठा० अजीतसिंह भी अपनी-अपनी सेनामो सहित अउवा आ पहुचे । इनके अतिरिक्त लाम्बिया, वाटा, भीवालिया, राडावास तथा बाजावास के ठाकुर भी खुशालसिंह के समथक थे। खेजडला तथा मेवाड के सलूम्बर, स्पनगर, लासारणी तथा ग्रासीद के ठिकानो को फौजें भी अउवा पहुच गई।" एक हजार सैनिक तया छ सो घुडसवार ऐरनपुरा से पाए ही थे। सब मिलाकर छ हजार के लगभग सैनिक सख्या हो गई। - 16 ] किलेदार अनाडसिंह के नेतृत्व मे प्राई हुई जोधपुर महाराजा की सेना के साथ ए जी जी का खास मर्जीदान ले हीथकोट भी था। आरम्भ में छोटी-छोटी मुठभेडो के पश्चात् विथोरा नामक गाव के निकट बडी लडाई हुई। अउवा ठाकुर तथा ऐरनपुरा के क्रातिकारियो ने इतना भयकर युद्ध किया कि जोधपुर की सेना पस्त होने लगी। कुशलराज सिंघवी तथा मेहता विजयसिंह युद्ध क्षेत्र से भाग खड़े हुए। कठिनाई से हीथकोट अपनी जान बचा सका। अनाडसिंह तथा उसके साथ दरबार की फौज के छीयत्तर सैनिक मारे गये । शेष फौज के पैर उखड गए तथा युद्ध क्षेत्र से भाग गई। दरबार की फौज का सामान खुशालसिह तथा उसके सहयोगियो ने लूट लिया। अनाडसिंह की मृत्यु और अपनी सेना की पराजय के समाचार से महाराजा तखतसिंह बहुत दुखी हुए। सुबह तथा साय दो वार दुग मे प्रतिदिन वजने वाली नौपत को केवल एक बार बजवा कर महाराजा ने अपना दुख प्रक्ट किया 166 ए जी जी लारेंस तो क्रान्तिकारियो की सैनिक सफलता की सूचना से वावला हो उठा। उसने तुरन्त ब्यावर से सेना साथ लेकर अउवा की ओर प्रस्थान कर दिया। जोधपुर से पालिटिक्ल एजेन्ट केप्टिन मैंक मैसन भी ए जी जी की सहायतार्थ पहुचा। 18 सितम्बर, 1857 को पुन भयकर युद्ध छिडा। ए जी जी की सेना बुरी तरह पराजित हुई। अग्रेजी सरकार पर जोरदार क्लक यह लगा कि मैंक मैसन कातिकारियो के हाथ पड़ गया। वेचारे मैंक मैसन को मारकर उसकी लाश को अउवा गढ के मुरय द्वार के सामने एक वृक्ष पर लटका दी। हताश ए जी जी को अजमेर लौटना पड़ा। बेचारे मैं मासन ने व्यथ ही जान गवाई। जनता के भय से महाराजा उसकी मृत्यु के शोक मे नीपत वजवाना भी बद न करा सके। अउवा के आजादी के प्रागीवानो का सम्पक दिल्ली से था और मारवाड की जनता की सद्भावना उनके साथ थी 17 गत दो वर्षों से खुशालसिंह का सहयोगी सिमरसिंह मारवाड-मेवाड के जमीदारो मे एक्ता स्थापित करने के लिए प्रयत्नशील था। एकजुट होकर मारवाड-मेवाड से अंग्रेजो का सफाया करने की ठान रखी थी। 10 अक्टूबर को जोधपुर लीजियन के फौजी और खुशालसिंह के कई सहयोगी ठापुरो ने दिल्ली की ओर प्रस्थान दिया। दिल्ली की ओर प्रस्थान करने का कारण यह था कि यह लोग वहादुरशाह जफर का फरमान प्राप्त कर उसकी मैनिक सहायता से मारवाड तथा मेवाड को अंग्रेजी प्राधिपत्य से मुक्त [ 17 करवाना चाहते थे। दिल्ली की ओर कूच करने वाली इस क्रान्तिकारी सेना में मरने मारने के लिए तत्पर लगभग चार हजार सैनिक थे। रेवाडी पर विजय के पश्चात दिल्ली मे अग्रेजो की विजय से खिन्न चित इस सेना की 16 नवम्बर को नारनोल मे ब्रिगेडियर गेरार्ड के नेतृत्व वाली एक विशाल अग्रेजी फौज से भिडन्त हुई। जोधपुर लीजियन की पराजय से मारवाड-मेवाड से अग्रेजी प्रभाव ममाप्त करने की लालसा की इति श्री हो गई। सव स्थानो की ओर से पूर्णतया प्रास्वस्थ हो जाने पर जव जनवरी 1858 में बम्बई मे नई कुमक भी आ गई तव अग्रेजो ने पुन अउवा की तरफ मुह करने का माहस किया। कर्नल होम्स की कमान मे वम्बई की पलटन और 12वी नेटिव इन्फेन्ट्री ने अउवा की घेराबन्दी की। जोधपुर महाराजा की फौज भी इम ब्रिटिस सेना की सहायता कर रही थी। 20 जनवरी को घमासान युद्ध हुआ। चार दिन तक दोनो पक्षो की तोपें आग उगलती रही। उस समय अउवा की रक्षा के लिये दुग मे बहुत कम सैनिक ही थे। 23 जनवरी की रात्रि को आकाश बादलो से ढक गया। निरतर वर्षा होने लगी। कामदार तथा सहयोगियो के अधिक प्राग्रह करने पर आजादी का यह दीवाना खुशालसिंह गोला-बारी के बीच से निकल कर, सैनिक सहायता की प्राशा से मेवाड पहुच गया। शेष लोगो ने दुर्ग की रक्षाथ जबरदस्त युद्ध किया किन्तु अग्रेजो की कई गुना विशाल सेना और जगी तोपखाना निर्णायक सिद्ध हुए। 24 जनवरी को दुर्ग पर ब्रिटिस सेना का अधिकार हो गया। फिर तो अग्रेजो ने वहा यातनायो का ताडव ही कर दिया।1 बाद मे अग्रेजो ने खुशालसिंह पर मुकदमा चलाने का दिग्वावा भी किया वितु सजा देने का साहस न जुटा सक्ने पर अन्त में परी पर दिया। 25 जुलाई, 1864 को आजादी के लिये अलस जगाने वाले इस श्रमा का उदयपुर मे स्वगवास हुना। युगो-युगो के लिये इस स्वतन्त्रता सेनानी के कृतित्त्व की छाप राजस्थानी जन मानस मे अकित रहेगी। कोटा में 1857 की क्रान्ति का महत्त्व अपेक्षाकृत इसलिये अधिव माना जाता है कि लगभग छ महीनो तक कोटा पर शान्तिकारियो या अधिकार रहा। सारी जनता क्रान्ति समर्थव वन गई। मारवाट भी अधिर दुई। मितम्बर मे वादशाह जफर कैद हो गया और लाल पिते पर अग्रेजी प्राधिपत्य स्थापित हो गया तब भी कोटा के प्रान्तिकारी पेपर अपन ही यर पर अग्रेजो मे लोहा लेते रहे। 1838 ई में कोटा महागय ये गरम निमित यो" 18 ] कटिजेट नामक ब्रिटिश सेना के देशी सिपाही मेरठ, नसीरावाद, नीमच इत्यादि मे क्रान्ति के समाचारा से व्याकुल हो गए। ऐसे में 'पायगा पलटन' में रिसालदार मेहरावसा के हस्ताक्षरो वाली एव अपील फौजिया के पास पहुची। इसमे चरबी वाले कारतूसो तथा पाटे में मिली हुई हडियो के उल्लेख के पश्चात् देश से अग्रेज प्राधिपत्य को समाप्त करने मे सहयोगी बनने का निवेदन किया गया था। 15 अक्टूबर को प्रात फोज ने बगावत कर दी। दो तोपो तथा दो घोमलो (ऊट पर लादी जान वाली छोटी तोप) सहित लगभग तीन हजार सैनिको ने महावखा के नतृत्व मै एजेसी हाऊस को घेर लिया। बगले को आग लगा कर कुछ सैनिक लकडे की सीटी लगाकर ऊपर के कमरे मे पहुचे जहा कोटा का पालिटिकल एजेन्ट मेजर वर्टन और उसके दो युवा पुत्र छुपे हुए थे। नोधित सैनिको ने तीनो के टकडे-टुकडे कर दिये । एजे सी हाऊस पर इस हमले के समय दो अग्रेज डॉक्टर भी मौत के घाट उतार दिये गए। मेजर बटन का सिर काट कर समस्त कोटा शहर मे घुमाया गया। छ माह तक मेहरावखा और जयदयाल के नेतृत्व मे फौज ने इच्छानुसार शासन चलाया। अग्रेजा के अनेक पिठ्ठो को तोपो के मुह पर वाध कर उडा दिया गया। - अग्रेजो के विरुद्ध कायवाही के पश्चात कान्तिकारी असमजस मे पड गये। ग्वालियर मे सम्भलगढ के शासक गोवि दराव विट्ठल को सहायता के लिये जो पन भेजा उसने वह पत्र अग्रेजो को सौप दिया 1 कोटा महाराव किले के भीतर दुवके हुए थे। इस कठिन परिस्थिति मे कौन सहायता करे? मार्च 1858 मे बम्बई से आई हुई विशाल ब्रिटिश सेना के साथ क्नल रॉवट कोटा पहुचा। महाराव को स्वामी भक्त सेना, करौली के शासक की फौज तथा गोटपुर शासक की फौज भी इस ब्रिटिश सेना के साथ मिल गई। जगह-जगह घमासान युद्ध हुए। अनेक लोग मारे गये। कई दिनो तक सामना करने के पश्चात् कातिकारी सेना पराजित हुई। नेतानो पर अग्रेजो ने जबरदस्त अत्याचार पिए। मेहरावखा और जयदयाल पर मुक्दमो के दिखावे के पश्चात् भारत के गवनर जनरल की इच्छानुसार उहे उसी एजेन्सी हाऊस मे फासी पर लटकाया गया जहा उहोन मेजर बटन और उसके पुगो को मारा था। एक बार कान्ति पर नियत्रण हो जाने पर तो अग्रजो ने अत्याचारी की सारी सीमाए पार करलो।"
[ 19 नवाव के मामू पालमखा के नेतृत्त्व में टोक की फौज ने भी बगावत कर दी। नवाब को स्वामी-भक्त सेना से लडता हुया पालमसा तो मारा गया किन्तु टोय के लगभग छ सौ क्रान्तिकारी मैनिक लडते-भिडते वहादुरशाह जफर की सहायतार्थ दिल्ली जा पहुचे। भरतपुर, धौलपुर, अलवर, मेवाड तथा जयपुर सभी स्थानो पर 1857 मे कुछ न कुछ क्रान्तिकारी घटनाए अवश्य ही हुई। उस समय अग्रेजो के एक प्रवल विरोधी के रूप में राजस्थान की प्रसिद्धी समस्त भारत में फैल गई। तात्या टोपे जैसा अग्रेजो का शत्रु राजस्थान को अपने लिये उपयुक्त शरण-स्थल मानकर अलीपुर मे चार्ल्स नेपियर मे पगजित होने के पश्चात् गजस्थान प्रा पहुंचा। इस प्रकार 1857 की क्राति के समय राजस्थान के कोने-कोने में ज्वालाऐ धधकने लगी। जैसे-तैसे अंग्रेजो ने इस प्राग को बुझा तो दिया कि तु फिर भी इससे वह धुनी चेतन हो गई जिसकी राख मल कर अर्जुनताल सेठी, गोपालसिंह खरवा, विजयसिंह पथिक और जोरावरसिंह बारहठ जैसे क्रातिकारियो ने पुन आजादी का अलख जगाया। असफल होकर भी प्रथम स्वाधीनता संग्राम आगे पाने वाले अाजादी के मतवालों के लिए एक प्रेरणा पुञ्ज बन गया। -- टिप्परिपया- (अ) शमा एव व्यास, राजस्थान का इतिहाम, 342 (ब) यदुनाथ सरकार मुगल साम्राज्य या पतन, 1, 127 2 (म) सूयमल मिश्रण, वश भास्कर, 3096 3100 (4) जाधपुर मे बसतसिंह- रामसिंह सघप 3 मलीमन, द इण्डियन म्यूटिनी अाफ् 1857, 294 + टी पार होम्स, ए हिस्ट्री ग्राफ दी इण्डियन म्यूटिनी, 149 5 पारन पानिटिकल क्सल्टशन, 16 अप्रैल 1832, न 22 6 प्रादश शर्मा, 1857 और राजस्थान, कथा प्राति की । 7 शर्मा एव व्याम राजस्थान का इतिहास, 3978 टर्की की समस्या के कारण 1855-6 म यूरोप मे भयकर युद्ध हुआ। एक पक्ष म इगलड, प्रास तथा इटली की मम्मिलित मेनाएँ थी व दूसरी ओर अकेला स्म । युद्ध में रूस बुरी तरह पराजित हुमा डा प्रकाश व्यास, राजस्थान का स्वाधीनता संग्राम, 10 (अ) एजे सी रिकाड, लेटर वुक न 13, पृ 430 (ब) सावस, ए मिसिंग चेप्टर साफ द इण्डियन म्यूटिनी, 8 8 । 9 20 ] (अ) फारेन पालिटिक्ल क सल्टसन्स, 26 जून, 1857, न 113 116 (ब) वही, 31 दिसम्बर, 1858, न 31467 12 (अ) अमल कुमार सेन, ज्योग्राफिकल रीज म ग्राफ राजस्थान, ट्राजेक्शन आफ द इण्डिया कासिल ग्राफ ज्योग्राफ्स, स्पेशल पाई जी यू वोल्यूम, 99 104 (ब) धमपाल, इण्डिया लण्ड द पीपल, राजस्थान, 17 (स) बी सी मिथ, ज्याग्राफ्किल रीज स पाप राजस्थान, दी इण्डियन रनल आफ ज्योग्राफी 1 1, 1966, पृ 35 48 (द) इरफान मेहर, राजस्थान का भूगाल, , 13 वी सी मिश्र, राजस्थान का भूगोल, 23 14 (अ) जहूरसा मेहर राजस्थानी सस्कृति रा चितराम, 92 (ब) धमपाल, इण्डिया लण्ड एण्ड द पीपल, राजस्थान, ! 15 (अ) जहूरखा मेहर, राजस्थानी सस्कृति रा चितराम, 96 (1) फरिश्ता, 228 16 डॉ नारायणसिंह भाटी, परम्परा, गारा हट जा, 37 38 17 जिण बन भूल न जावता, गैद गवय गिडराज । तिण बन जबुक ताखड उधम माट अाज ।। 18 डा नारायणसिंह भाटी परम्परा गोरा हट जा 141 42 19 राणिया ततेटिया उतर राजा भुगत रस । गढ ऊपर गारा फिर सरग गया सगतम ।। 20 हुव 21 22 फ्ल घरण हक्प हुव चढ तुरा राख कुरण खाग चाळो । गढपति आज दूसरा नमिया घणा र रह्यो अनम गुमान वाळो ।। यह जोधपुर के लोळावास गाव के निवासी तथा सूयमल मिश्रण के निकट मित्र 4 । डाकर कर फ्रिग पर गिर दाळा ठाकर देम भल । ऊभा भागर बलू अभनमो भापर ढाणी कम भळ 1 यह रविराजा बाकीदास चार भाइया म सबस छोट भाई थ । महाराजा मानसिंह के समकालीन प्रसिद्ध कवि । पाचेटिया में निवासी । मानसिंह के समय व प्रसिट पनि । 23 24 25 [ 21 धीग । ne 26 फिर फिरगी के हका काज सुधार हकार फौजा धू कळी उवार रका मार बका सबादी भभीत होय नगारा धुरावे मारे माझी थार भरोस नचीता मानसीग ।। 27 आया लाट रा सलीता बाचता धक लाय ऊभो धर हाथ मूछा प्राय ऊभी प्रोष धोग । प्रापर भरास राग जागडा दिराय ऊभौ साथ ऊभौ जनबा खागडी भानसीग ।। 28 जहूरखा महर घर मजला घर कामा, 105-6 29 डा प्रकाश व्यास, राजस्थान का स्वाधीनता संग्राम, 67 30 जगदीशसिंह गहलोत, राजस्थान का इतिहास, 3, 149 50 31 (अ) निमला गुप्ता, राजस्थान अराजकता से व्यवस्था की प्रार, 117 (ब) अजमेर के सुपरिटेंडेट सी जी डिक्सन का ए जी जी मदरलण्ड का पत्र, दि 1 मई, 1848, एन्क्लोजर न 2, करस्पोण्डन्स 26 अगस्त, 1848, न 101, एफ एण्ड पी (म) परम्परा, डू गजी जवाहरजी री पड लोक काव्य परम्परा, 125 35 32 (अ) नाथूराम सडगावत, राजस्थास रोल इन द स्ट्रगल आफ 1857, 123 (ब) राजस्थान हिस्ट्री काग्रेस प्रोसीडिंग्स, VII, 118 33 (अ) निमला गुप्ता, राजस्थान अराजकता से व्यवस्था की प्रार, 179 (ब) डा प्रकाश व्यास, राजस्थान का स्वाधीनता संग्राम, 61 (स) वि स 1814 मे सूयमल मिश्रण ने पीपल्या ठा फूलसिंह को यह पत्र लिखा "य राजा लोग देसपति जमी का ठाकर छ जे सारा ही हिमाळयं का गळ्या ई नीसरया, सा चालीस स ले'र साठ सत्तर बरस ताई पाछा पटक्यिा छ तोई गुलामी कर छ । पर यो म्हारो वचन राज याद राखागा क जे अबक अगरेज रह्यो ता इको गायो ही पूरो करसी। जमी का ठाकर काई भी न रहसो । मब ईसाई हो जासी।" परम्परा, गोरा हट जा, 141 34 मुशी ज्वाला सहाय, लायल राजपूताना, 278 80 35 (अ) टाट, एनल्स एण्ड एटीक्वीटीज आफ राजस्थान, 1, 560 (ब) श्यामलदास, वीर विनोद, 806 (स) तवारीख जोधपुर, बडल 40, अथ 7 (पुरातेखागार, बीकानेर) (द) तबकात ए नासीरी, 465 (घ) जी एन शर्मा, सोसियल लाइफ इन मैडाईवल राजस्थान, 512 (ई) जहूरया मेहर, राजस्थानी सस्कृति रा चितराम, 97 20 1 15 ३१ (अ) फारेन पातिटिक्ल क मल्टस स, 26 जून, 1857, न 113 116 (ब) वही, 31 दिसम्बर, 1858, न 31467 12 (अ) अमल कुमार सेन, ज्याग्राफिकल रीजन्म प्राप राजस्थान, ट्रांजेक्शन आफ द इण्डिया कौसिल आफ ज्योग्राफ्स, स्पेशल पाई जी यू वोल्यूम, 99 104 (ब) धमाल, इण्डिया लपड द पीपल, राजस्थान, 17 (स) वी सी मित्र, ज्याग्राफ्रिल रीजस आफ राजम्यान, दी इण्डियन रनल पाप ज्याग्राफी, 1,11966, 3548 (द) इरफान महर, राजस्थान का भूगाल 5 13 वी सी मिथ राजस्थान का भूगाल, 23 14 (अ) जहूरसा महर, राजस्थानी संस्कृति रा चितराम, 92 (4) धमपाल, इण्डिया लण्ड एण्ड द पीपल, राजस्थान, ! (अ) जहूरखा मेहर, राजस्थानी सस्कृति रा चितराम 96 (1) परिश्ता, 228 16 डा नारायणसिंह भाटी, परम्परा, गारा हट जा, 37 38 17 जिण बन भूल न जावता गद गवय गिडराज । तिरण बन जबुक ताखड, उधम मार अाज ।। 18 डा नारायणसिंह भाटी, परपरा, गोरा हट जा 141 42 19 राणिया तलेटिया उतर, राजा भुगत रेस । गढ ऊपर गारा फिर सरग गया सगतम ।। 20 हुव धरण हक्प हुव चढ तुरा राखै कुण साग चाळो । गढपति आज दूसरा नमिया घणा श्रेष रह्यो अनम गुमान वाळो । 21 यह जोधपुर के लोळावास गाव के निवासी तथा सूयमल मिश्रण के निकट मिल थे। 22 डाकर पर फिरग पर गिर दाळा ठाकर केभ भल। ऊभा भासर 'वलू अभनमो द्वायो 23 यह वविराजा बाकीदास के चार भाइया म सबस छाट भाई थ । 24 महाराजा मानसिंह के समकालीन प्रसिद्ध कवि । 25 पाचटिया में निवासी । मानसिंह के समय के प्रसिद्ध कवि । फल ज खग भापर भळ॥
[ 21 ma साथ 26 फिर फिरगी के हका काज सुधार हकार फौजा धू कळी उबार रवा मार बका धीग । सबादी भभीत होय नगारा धुराव सार मामी थार भरोस नचीता मानसीग ।। 27 माया लाट रा खलीता वाचता धक लाय ऊभी धरै हाथ मूछा प्राय ऊभी प्रोध धीग । प्रापर भरास राग जागडा दिराय ऊभौ ऊभी जनेवा खागडी मानसीग ।। 28 जहूरखा महर, घर मजला घर कामा, 105-6 29 डा प्रकाश व्यास, राजस्थान का स्वाधीनता संग्राम, 67 30 जगदीशसिंह गहलोत, राजस्थान का इतिहास, 3, 149 50 31 (अ) निमला गुप्ता, राजस्थान अराजकता से व्यवस्था की ओर, 117 (ब) अजमेर के सुपरिटेंडट सी जी डिक्सन का ए जी जी मदरतण्ट को पर दि 1 मई, 1848, एन्क्लोजर न 2, करस्पोण्ड स 26 अगस्त, 1848, न 101, एफ एण्ड पी (स) परम्परा, डू गजी जवाहरजी री पड, लाय काव्य परम्परा, 125 35 32 (अ) नाथूराम खडगावत, राजस्थास राल इन द स्ट्रगल आफ 1857, 123 (ब) राजस्थान हिस्ट्री काग्रेस प्रासीडिंग्स, VII, 118 33 (अ) निमला गुप्ता, राजस्थान अराजक्ता स व्यवस्था की प्रार, 179 (व) डा प्रकाश व्याम, राजस्थान का स्वाधीनता संग्राम, 61 (स) वि स 1814 मे सूयमल मिश्रण ने पीपल्या ठा फूलसिंह को यह पन लिखा "य राजा लोग देसपति जमी का ठाकर उ जे सारा ही हिमाळय का गळ्या ई नीसरया, सा चालीस से ले'र साठ सत्तर बरस ताई पाछा पटकिया छ ताई गुलामी कर छ । पर यो म्हारो वचन राज याद राखोगा क ज अबक अगरेज रह्यो तो इको गाया ही पूरा बरसी। जमी को ठाकर काई भी न रहमी । मब ईसाई हो जासी ।" परम्परा, गारा हट जा, 141 34 मुशी ज्वाला सहाय, तायल राजपूताना, 278 80 35 (अ) टाड, एनल्स एण्ड एटीक्वीटीज आफ राजस्थान, 1, 560 (ब) श्यामलदास, वीर विनोद, 806 (स) तवारीख जाधपुर, बडल 40, अथ 7 (पुरालेखागार, बीकानेर) (द) तबकात ए नासीरी, 465 (घ) जी एन शर्मा, सोसियल लाइफ इन मेडाईवल राजस्थान, 512 (६) जहूरसा महर, राजस्थानी संस्कृति रा चितराम, 97 20] 14 (अ) फारेन पालिटिकल व सल्टमस, 26 (ब) वहीं, 31 दिसम्बर, 1858, न 3148 12 (म) अमल कुमार सेन, ज्योग्राफिक्त रोज। इण्डिया कौसिल ग्राफ ज्योग्राफ्स, स्पश (ब) धमपाल, इण्डिया लण्ड द पीपल, राज (स) वी सी मिथ, ज्याग्राफिकल रीजम' पाप ज्योग्राफी 1, 1, 1966, पृ 3 (द) इरफान मेहर, राजस्थान का भूगोल, 13 वी सी मिश्र राजस्थान का भूगोल, 23 14 (अ) जहूरखा महर राजस्थानी सस्कृति रा (ब) धमपाल, इण्डिया लण्ड एण्ड द पीपल 15 (अ) जहूरखा मेहर, राजस्थानो सस्कृति । (1) फरिश्ता, 228 16 ग नारायणसिंह भाटी, परम्परा, गारा है 17 जिरण उन भून जावता गैद गवय गिरा तिण वन जबुद तासड उधम माड अ 18 डा नारायणसिंह भाटी, परापरा, गोरा 19 गणिया तलेठिया उतर, राजा भुगत रस गढ़ ऊपर गारा फिर सरग गया सगतम 20 हुव फैल घरण हकप हुव चट तुरा राव कुरा खाग चाळी । गढपति आज दूसरा नमिया घणा अंक रह्यो अनम गुमान बाळो । 21 यह जोधपुर के लोळावास गाव के निवार 22 डाकर कर पिरग फेरे गिर दाळा खग ठाकर वेभ झल। अभा भावर 'वलू मभनमा ढाणी केम 23 यह विराजा बाकीदास के चार भाइया 24 महाराजा मानसिंह के समकालीन प्रसिद्ध पाचटिया निवासी। मानसिंह के समय - भासर भळा 25 [ 23 51 (म) जी एच ट्रेवर, ए चेप्टर ग्राफ द इण्डियन स्यूटिनीन-1-43 (ब) टी पार होम्स, ए हिस्ट्री आफ दी इण्डियन म्यूटिनीज, 34 52 (अ) नाथाम गडगावत, राजस्थान्म रोल इन द स्ट्रगल आफ 1857, 17 (ब) आई टी प्रिचाड, द म्यूटिनीज इन राजपूताना, 39 53 फारस्ट, हिस्ट्री आफ दी इण्डियन म्यूटिनी, 3, 450 54 (अ) टी आर हाम्म, ए हिस्ट्री ग्राफ द इण्डियन म्यूटिनी, 151 (ब) पाई टी प्रिचाड, द म्यूटिनीज इन राजपूताना, 89-90 (स) फारेन पानिटिकल क्न्मल्टमन, 27 जुलाई, 1858, न 31467 55 (अ) जी एच ट्रेवर, ए चेप्टर ग्राफ द इण्डियन म्यूटिनी, 5 (ब) मु शी ज्वाला सहाय, लायल राजपूताना, 200 1 56 एजेसी रकाड, मेवाड, 1857, न 88, कप्तान सावस का ए जी जी के नाम पत्र, 25 माच, 1858 57 (अ) प्रिचाड, द म्यूटिनीज इन राजपूताना, 121 128 (ब) नीमच के केप्टन लायड की ए जी जी को रिपोट, 16 जून, 1857 58 मी एन मावस ए मिसिंग चेप्टर आफ द इण्डियन म्यूटिनी, 27 59 वहीं, 27-29 60 राजस्थान का स्वाधीनता संग्राम टा जबरसिह, द ईस्ट इण्डिया कम्पनी एण्ड मारवाड, 120 62 हकीकत बही, 18, 384 63 (अ) ढोलिया रा कोठार, न 59 तथा 63 (ब) जोधपुर राज्य रेकाडम, सनद बही 126 पृ 546 (म) डा जबर्गमह द ईस्ट इण्डिया क एण्ड मारवाड, 126 64 मारवाड म सन् सत्तावन की चिंगारी, 2 65 हीथकोटस रिपाट आफ दी प्रासीडिंग्स अगेस्ट द म्यूटिनीयय ग्राफ जाधपुर लिजियन, 13 सितम्बर, 1857 66 (अ) हकीकत टही, 18, 284 (ब) खडगावत राजस्थास रोल इन द स्ट्रगल आफ 1857 180 67 (प्र) फारन पालिटिक्ल क्सल्टेसन, 27 दिसम्बर, 1857 (ब) खडगावत, राजस्थान्स राल इन द स्ट्रगल आफ 1857, 152 (स) डा प्रकाश व्यास, राजस्थान का स्वाधीनता संग्राम, 107 68 नाथूराम सडगावत, वही, 153 54 61 221 37 41 36 (अ) निमला गुप्ता, राजस्थान अराजक्ता से व्यवस्था की पोर, 176 (ब) श्यामलदास, वीर विनोद, 2, 1815 टाड, एनल्स एण्ड एटोक्वीटीज प्राफ राजस्थान, 2, 121 38 श्यामलदास, वीरविनाद 2 प्रकरण 18 39 (अ) डा प्रकाश व्यास, राजस्थान का स्वाधीनता संग्राम, 54-55 (ब) मेहता सगामसिंह क्लेक्शन हवाला न 28 40 (अ) डा श्याम, गज का म्वा स , 54 (1) पा पो म मल्टस म, 31 अक्टूबर, 1833, न 37 44 (स) मेहता सगासिंह क्लेक्सन, हवालान 787 (द) एजे मी रेवाड, हिस्टोरोक्ल रेकाड 215 जोधपुर पाल न 5 बड 1, मा 1834, पृ 19 डा व्याम, राज का म्वा स, 56 42 (अ) 1857 और राजस्थान, क्या प्राति की, 3 (ब) डा भाटी, परम्परा, गोरा हट जा, 145 43 डा भाटी, परम्परा, गारा हट जा, 141 44 (अ) पाई टी प्रिचाङ, द म्यूटिनीज इन राजपूताना, 19 20, 29 30 व 99 (ब) जी एच ट्रेवर, ए चेप्टर ग्राफ इण्डियन म्यूटिनी 4 45 (अ) प्रा टी प्रिचाड, द म्यूटिनीज इन राजपूताना, 29 पार 99 (च) सावस, 48 85 46 मावस, ए मिसिंग चेप्टर आफ द इण्यिन म्यूटिनीज, 4885 47 वोटा में 1857 को प्राप्ति के नेता महराबखा का जम करौली म हुआ। कोटा ये एजेन्सी हाऊम म मजर बटन व उसरे दो पुत्रो को मारने वाले मेहरावखा को 1860 में फासी हुइ। 48 मेहरावया के सहयोगी हरिसिंह का जम कोटा के नाता गाव म हुआ। एजे सी हाम पर हम में विशेष योगदान । नवम्बर 1857 मोटा म अमेजी सेना से लड़ते हुए मारा गया। यदूरची गुलमाहम्मद जातिवारी मना माथ लडते हुए दिल्ली तक जा पहुचा । वहा प्रजा र विस्व युद्ध करते हुए माग गया । 50 (प) राजम्यान का स्वाधीनता सग्राम, 72 87 (५) पो पा र सल्टेसन (गुप्त), 26 जून 1857, न 113-116 (ग) यही, 31 दिसम्बर, 1858, न 31467 49 [ 23 51 (अ) जी एच ट्रेवर, ए चेप्टर ग्राफ द इण्डियन म्यूटिनी-3-4 (ब) टी पार होम्स, ए हिस्ट्री आफ दी इण्डियन म्यूटिनीज, 3-4 52 (अ) नाथूराम खडगावत, राजस्थान्स रोल इन द स्ट्रगल आप 1857, 17 (ब) आई टी प्रिचाड, द म्यूटिनीज इन राजपूताना, 39 53 फारेस्ट, हिस्ट्री आफ दी इण्डियन म्यूटिनी, 3, 450 54 (अ) टी पार होम्म, ए हिस्ट्री आप द इण्डियन म्यूटिनी, 151 (ब) आई टी प्रिचाड, द म्यूटिनीज इन राजपूताना, 89 90 (स) फारेन पालिटिकल क मल्टेसन, 27 जुलाई, 1858, न 31467 55 (अ) जी एच टेवर, ए चेप्टर ग्राफ द इण्डियन म्यूटिनी, 5 (व) मु शी ज्वाला सहाय, लायल राजपूताना, 200 56 एजे सी रेकाड, मेवाड, 1857, न 88, कप्तान सावस का ए जी जी के नाम पत्र, 25 माच, 1858 57 (अ) प्रिचाट, द म्यूटिनीज इन राजपूताना, 121-128 (ब) नीमच के केप्टन लायड की ए जी जी को रिपोट, 16 जून, 1857 58 सी एल मावस, ए मिसिंग चेप्टर माफ द इण्डियन म्यूटिनी, 27 59 वहीं, 27 29 60 राजस्थान वा स्वाधीनता संग्राम 61 डा जबरमिह, द ईस्ट इण्डिया कम्पनी एण्ड मारवाड, 120 62 होक्त बही, 18, 384 63 (अ) ढोलिया रा कोठार, न 59 तथा 63 (ब) जाधपुर राज्य रेकाडस, मनद वही 126, पृ 546 (म) डा जपरमिह द ईस्ट इण्डिया क एण्ड मारवाड, 126 मारवाड म सन् मत्तावन की चिंगारी, 2 65 हीथवोटग रिपाट माप दी प्रासीडिंग्स अगेम्ट द म्यूटिनीयय माफ जाधपुर लिजियन, 13 सितम्बर 1857 66 (प्र) हनीपत रही, 18,284 (4) मडगावत राजम्यास रोल इन द स्ट्रगल माफ 1857, 180 67 (म) पारन पापिटिरल र सल्टेसन, 27 दिसम्बर, 1857 (ब) खडगावत, राजस्थानस राल इन द स्ट्रगल माप 1857, 152 (स) डा प्रकाश व्यास, राजस्थान का स्वाधीनता सग्राम, 107 68 नाथूराम सांगावत, वही, 153 54 64 24 ] 69 दिल्ली की ओर कूच करने वाला म शिवनाथसिंह ग्रामोप, विशनसिंह गूलर, अजीत मिह पालगियावाम, जोधसिंह बाजावास, चादमिह मिनाली इत्याद ठाकुर तथा अउवा की तरफ मे पहाडमिह व सलू वर को प्रोर म मगतसिंह के नाम विशेप उल्लेखनीय है । 70 डा पार पी व्याम, रातमाफ नोविलिटी इन मारवाड, 138 71 वही, 139 72 पारेस्ट, हिस्ट्री ग्राफ द इण्डियन म्यूटिनी, 3, 5556 73 (अ) जी एच ट्रेवर, ए चेप्टर आफ द इण्डियन म्यूटिनी, 12 (१) खडगावत राजम्यास रोन इन द स्ट्रगत श्राफ 1857,67 74 (अ) डा प्रकाश व्यास, राजस्थान का स्वाधीनता संग्राम, 131 (ब) पो पो क्सल्टेसन, (मीक्रेट) 28 मई, 1858, न 136, 39 (स) गवनर जनरल का सीक्रेट कमटी को डिस्पेच, 1858, न 14 (अ) नाथूराम खडगावत, राजस्थान राल इन द स्ट्रगल ग्राफ 1857, 66 8 (ब) वीर सतसई (सहल), 77 78 (स) कोटा महाराव की सलामी की तोपा की सख्या घटा दी, विराज की रकम बहुत बढ़ा दी तथा कोटा पलटन म सनिका की सरया बहुत कम कर दी। 75 an राजस्थान मे रवतंत्रता आन्दोलन ई. सन सन् 1857 का विद्रोह एक अत्यन्त महत्वपूर्ण घटना थी। यह विद्रोह अग्रेजो पर पहला मर्मान्तक प्रहार था जिससे उन्हें काफी पीडा हुई। भारतीय नरेशो के कारण ही वे वच मके। अग्रेजी जनता समझ गयी कि अब ईस्ट इण्डिया कम्पनी भारत के विजित प्रदेशो पर अच्छी प्रकार नियन्त्रण नही रस सकती है अत अग्रेजी पालियामेट ने कम्पनी के प्रदेशो को अपने प्रत्यक्ष नियन्त्रण मे लेना उचित समझा। सन् 1858 के अधिनियम द्वारा भारत की सत्ता ईस्ट इण्डिया कम्पनी से ब्रिटिश ताज को हस्तान्तरित कर दी गयी। 1858 की पहली नवम्बर को इगलण्ड की महारानी विक्टोरिया ने एक घोषणा- पन प्रकाशित किया जिसमें कहा गया था- "हिन्दुस्तान पर शासन करने का अधिकार ईस्ट इण्डिया कम्पनी से इगलैण्ड की महारानी अपने हाथ मे लेती है। कम्पनी की रियासतो से जो सन्धिया हुई थी उनका पूरी तरह से पालन किया जावेगा। महारानी का राज्य विस्तार करने की कोई इच्छा नहीं है। वह राजाओ के अधिकार, सम्मान और प्रतिष्ठा को बनाये रख कर देश मे शाति और स्वराज्य स्थापित करने में राजापो से सहायता की इच्छुक है। प्रत्येक प्रजाजन से, चाहे वह ब्रिटिश भारत का हो अथवा देशी रियासत का, समान व्यवहार किया जावेगा। सभी धर्मो के अनुयायियो को कानून की दृष्टि से समान व निप्पक्ष रूप से मरक्षरण प्राप्त होगा। सरकारी नौकरियो के लिये धम का आधार नहीं माना जावेगा। शिक्षा, योग्यता और चारित्रिक निष्ठा के आधार पर ही उत्तरदाई पदो पर नियुक्तिया की जायेगी। हिदुस्तानियो की पूर्व परम्परामो, रीतिया तथा प्राचीन रूढिया की पूरी रक्षा की जावेगी। देश मे शाति स्थापित होते ही उद्योग-धो को प्रोत्साहित किया जायेगा। सावजनिक उपयोग के काम प्रारम्भ किये जायेगे। शासन का उद्देश्य प्रजा का हित ही माना जायेगा।"
26 ] शिक्षित भारतीयो ने इस ऐतिहासिक घोपरणा को अपने अधिकारी का महत्वपूर्ण चिठ्ठा माना। यह घोपणा-पत्र अत्यन्त आर्दशवादी एव उच्च विचारो से परिपूण तथा दूरदर्शी मालूम होता है लेकिन वास्तव मे यह घोपणा ब्रिटिश सरकार की एक चाल मात्र थी। इसके पीछे न तो ईमानदारी थी और न इसमे दिये गये आश्वसनो को पूरा करने की इच्छा थी। एक दूसरी रानी अवध की बेगम हजरत महल ने इस घापरणा को सच्चाई मे तब ही म देह प्रक्ट कर दिया था। वेगम ने प्रश्न दिया कि कम्पनी और रानी के शासन मै अन्तर ही क्या रहा, जबकि कम्पनी का प्रबन्ध पहले की तरह कायम है और कम्पनी के नौकर, गवर्नर जनरल और कम्पनी का न्यायिक प्रशासन सब कुछ अपरिवर्तित रूप मे बना हुअा है। इस घोषणा के बाद इगलैण्ड की महारानी के नाम से वहा का मन्त्रिमण्डल भारत पर शामन करने लगा। भारत स्थित गवनर जनरल "वायसराय" (महारानी का प्रतिनिधि) भी कहलाने लगा। इगलैण्ड की महारानी और देशी राजानो के बीच के सम्बन्धा मे कोई कानूनी तथा वैधानिक परिवर्तन नही पाया, लेकिन राजनैतिक व्यवहार आदि में अवश्य ही काफी परिवतन आया। अग्रेजो ने बडी चालाकी से इन अर्द्ध-स्वतत्र राज्या को पूर्णतया अपने आधिपत्य मे ले लिया। या ये राज्य पहले भी मुगला के आधीन रह चुके थे अत इनको अग्रेजो की ग्राधीनता स्वीकार कर लेने में कोई हिचक नहीं हुई। 1857 के विद्रोह के समय अग्रेजा की सहायता करने के कारण राजाना को पुरस्कृत भी किया गया। जयपुर नरेश को कोट-वासीम या परगना दिया गया। अय कुछ नरेशो को प्रशसा के प्रमाणपत्र दिये गये । अग्रेजो ने ई० सन् 1857 के विद्रोह से दो महत्वपूर्ण बाते सीखी थी- (1) रियासतो की भावना के विरुद्ध जाना, समझदारी नही है चाह भले ही वे वतमान प्रगति मे कितनी ही पिछडी प्रतीत होती हो। (2) उनकी शक्ति को देखते यह प्रावश्यर था कि उन रियासतो को एक दूसरे से सगठिन होकर शक्तिशाली होन से बचाने के लिये राजनैतिक, सैनिक तथा अय उपाय वाम में लिये जायें। अत एव और उहोने उदारता की भावना दियाई तो दूसरी मोर उनको शने शनै शक्तिहीन भी किया गया । वास्तव में ईस्ट इण्डिया कम्पनी से ताज के हायों में प्रभुसत्ता जाते ही देशी रियासतो पी सवधानिक स्थिति बदल गयी। वे अव स्वतत्र मित्रो के स्थान पर ताज ये सरक्षित सामन्त बन गयी। ग्यिामतें अव मसग इकाइया नही रही तथा उनने शामव - [ 27 ताज के सामन्तो के समान हो गये। वे भारतीय साम्राज्य के भाग वन गये । राजाओ को प्रमन करने के लिये महारानी का घोषणापत्र काफी था । जिसके अनुसार राजापो को विश्वास दिलाया गया कि उनके राज्यो के साथ की गई सन्धियो का आदर किया जायेगा। उनके वशानुगत विशेषाधिकारो को भी चालू रखे जाने वा विश्वास दिलाया गया। दूसरी और राजानो को बतना दिया गया कि वे अग्रेजी साम्राज्य की एक राजनीतिक इकाई मात्र है। भारत की मर्वोच्च सत्ता इगलैण्ड के राजमुकुट में निहित है। भारतीय नरेश उनके सामन्त ही है। ई० सन् 1862 में यहा के राजाग्रो को गोद लेने की सनदे दी गई जिनके अनुमार राजाओ और उनके उत्तराधिकारियो के निस्मन्तान होने पर गोद लेने का अधिकार मान लिया लेकिन साथ मे यह शर्त भी रखी गई कि उन राजघरानो को इगलैण्ड के बादशाह का राजभक्त रहना तथा भारत मे अग्रेजी राज्य के प्रति सधि, समझौते आदि के अनुसार अपना कर्तव्य पूरी तरह निबाहना होगा। ई० सन् 1884 मे अग्रेज सरकार ने यह आदेश भी जारी किया कि किसी देशी राज्य का उत्तराधिकार अवैव होगा जब तक वह अग्रेज सरकार द्वारा किसी न किसी रूप में स्वीकृत न हो जाये। इस आदेश का जव राज्यो ने विरोध किया तो ई० सन् 1891 मे स्पष्ट निणय दिया गया कि भारत सरकार का यह अधिकार तथा कर्त्तव्य है कि देशी राज्यो का उत्तराधिार तय करे। इस प्रकार गोद की सनद के नाम पर अग्ने जो ने राजाओ को पूर्णतया अपने अधीन कर लिया। वे अब भारत के किसी राष्ट्रीय साम्राज्य के अग या स्तम्भ बन कर नहीं रह सके। यह रियासतें भारत भर में फैली हुई थी अत अग्रेजो ने यह फैलाव अपने हित मे अच्छा माना एक प्रकार से यह उनके मित्रो के दुर्ग थे जो किसी भी सकट मे अग्रेजो के विरुद्ध विद्रोह के समय मे उनकी सुरक्षा के काम आ सकते थे। अत सन् 1860 मे लाड केनिंग ने इस बात पर जोर दिया कि भारत मे अग्रेजी शासन को बनाये रखने के लिये इन रियासतो को राजननिर शक्ति के विना ही बने रहने दिया जावे। ई० सन् 1876 मे राज्यो व राजघरानो की महत्ता के अनुसार राजापा की तोपो की सलामी तय की गई। अग्रेज सरकार को प्रसन्नता या अप्रसनता के अनुसार तोपो की संख्या घटती बढ़ती रहती थी। कोटा के महाराव रामसिंह, जोधपुर के महाराजा तस्तसिंह व टोक के नबाब इब्राहीम अलीखा की तोपो की सलामी अप्रसन्न होने पर घटा दी गई। राजाओ की बैठको का क्रम भी निश्चित 28 ] दिया गया। इसमे विभिम नरेशो म पापी प्रतिस्पर्धा प्रारम्भ हा गई। ई० सन् 1870 में अजमेर दरवार मे जोधपुर नरेण तरतमिह ने उदयपुर के महाराणा शम्भूसिंह के बाद बैठना अस्वीकार पर दिया। इमी शरण अग्रेज मराार न तस्तसिंह की तोपो की सलामी 19 से 17 कर दी थी। ई० मन् 1875 में बम्बई मे उदयपुर के महाराणा सज्ज मह द्वारा हैदरावाद निजाम के बाद यन ग मना कर देना पारस्परिक स्पर्धा या एक उदाहरण है। वे राजा जा अठारवी शताब्दी तय मूलत सव सत्ताधारी थे लेकिन विधित प्राधित थे र अर नास्तर मे प्राश्रित हो गये जबकि उनपे माय यो गई मधिया के प्रामार उन्ह विधिवत सर्व सत्ताधारी मायता प्राप्त थी। ई० सन 1861 से राजापाको प्रमन्न करने व उनकी गजभक्ति को प्रोक्ने के लिये उनको गिताव भी दिये जाने लगे। इनमें मुग्य "स्टार प्रॉफ इण्डिया" (सितारे हिन्द) था। उल्लेखनीय यह है कि "हिंदुना मूरज" महाराणा उदयपुर को भी "सितारे हिन्द" की पदवी दी गई। व 'सूरज' से केवन मात्र "सितारे" रह गये। इस प्रकार रियासतो में की गई मधियो, उनके माथ विये गये इकरारनामा तथा उनको दी गई मनदा के आधार पर, भारत सरकार द्वारा दिय गये निर्णया तथा भारत सचिव द्वारा किये जान वाले व्यवहारा से अव अग्रेजी ताज की सर्वोच्च शक्ति स्पष्ट दिखाई देने लगी। मर्वोच्च शक्ति होने के कारण रियासता के विदेशी तथा आन्तरिक मामलो मे हस्तक्षेप क्यिा जाने लगा। विदेशी मामले भारतीय रियासतें तथा उनकी जनता अग्रेजी भारत के प्रान्ती तथा वहा की जनता की भाति ही मानी जाने लगी। भारतीय रियासतो का कोई अन्तर्राष्ट्रीय महत्व नही था। भारत सरकार ने 21 अगस्त 1891 को ही एक विज्ञप्ति द्वारा स्पष्ट कर दिया था कि "अन्तर्राष्ट्रीय कानून के सिद्धात सम्राज्ञी की प्रतिनिधि भारत सरकार तथा महारानी के अधीनस्थ भारतीय रियासतो के वीच के सम्बन्धा पर लागू नही होते है । पूर्ववर्ती का परमोच्च अधिपत्य पश्चातवर्ती पर भी लागू होता है तथा माना जाता इस कारण परमोच्च शक्ति को अतराष्ट्रीय आश्वासनो को लागू करने की जिम्मेवारी थी और राजानो को परमोच्च शक्ति द्वारा किये गये अन्तराष्ट्रीय क्रारो का पालन करने को बाव्य होना पड़ा। अग्रेज सरकार अब राज्यो के प्रातरिक मामला में ज्यादा ही हस्तक्षेप करने लगी। कुप्रशासन व अव्यवस्था के नाम पर जव तब राजाओं के हाथ से प्रशासन लिया जाने लगा। ई. सन् 1870 मे लाड मेयो ने अजमेर मे [ 29 एक दरवार किया तब उसने उपस्थित नरेशो को कहा था-"हम आपको आपके द्वारा लाई गई भेटो से नही आकते है और न आपके ठाठवाट से बल्कि आपके द्वारा अपनी प्रजा से किये गये वर्ताव से । यदि हम आपके अधिकारी और विशेषाधिकारो को स्वीकार करते है तो आपके लिये यह अत्यावश्यक हो जाता है कि पाप भी अपने अधीन प्रजा के अधिकारी व विशेषाधिकारो का पूरी तरह पालन करें। यदि हम आपकी सत्ता की सहायता करते है तो उसके बदले में हम आपके शासन को मुव्यवस्थित देखना चाहते है। हम चाहते है कि सम्पूर्ण राजस्थान मे शाति बनी रहे और वहा सवत्र न्याय-पूर्ण शासन हो। आप विश्वास रखे कि और किसी के नही बल्कि आपके भले के लिये ही यह सब कुछ करने के लिये आग्रहपूवक आपसे यह अनुरोध किया जा रहा है । इसके बाद ई० सन् 1874 मे जो कुछ बडोदा राज्य के मामले मे कहा गया वह राजस्थान के राज्यो के लिये भी लागू होता है-"यदि शासकीय कत्तव्य नहीं निभाये जाते है, यदि कुशासन चलने दिया जाता है, यदि प्रजा को न्याय प्राप्त नहीं होता है, यदि जनता के जान व माल का बचाव नहीं किया जाता है, और यदि जनता के कल्याण का ध्यान नही दिया जाता है तो अग्रेज सरकार अवश्य हस्तक्षेप करेगी।"13 सर्वोच्च सत्ता ने इस प्रकार कुशासित राज्यो के लिये स्पष्ट नीति बतला दी। पडोदा नरेश को राजगद्दी से उतार दिया गया। इस प्रकार राजगद्दी पर मे उतारा जाना स्पष्ट बतलाता है कि अग्रेजी सरकार भारतीय रियासतो के पातरिक मामलो में हस्तक्षेप करने पर तुली हुई थी और कोई रियासत सुरक्षित नही थी। राजाप्रो को यह बहुत बुरा लगा और उनमे असतोप फैल गया। इसी समय दिल्ली में एक दरवार ई० सन् 1877 में किया गया जिसमें राजापो की उपस्थिति मे महारानी को "केसरे- हिन्द "भारत की साम्राज्ञी" घोषित किया गया। राजाओ के हृदयो मे अब यह वात जम गई कि मुगल बादशाहो की भाति ही अव अग्रेज बादशाहत चलेगी। इसके बाद अग्रेज सरकार न स्पष्ट रूप से राजाओ की अवाय सत्ता और अधिकार छीन लिये और उनके विरुद्ध जब भी आवश्यक समझा गया हस्तक्षेप किया गया। राज्यो की वैदेशिक नीति अग्रेजो के हाथ मे आ गई और परिस्थितियों के अनुसार उनके प्रातरिक प्रशासन मे हस्तक्षेप क्यिा जाने लगा। अग्रेज सरकार उनके गोद के मामलो मे रोडे अटकाने लगी। राजा के अव्यस्क होने पर उसका नियन्त्रण रहने लगा, और कुशासन होने पर वह राजा को राजगद्दी से हटाने तक लग गई। साम्राज्य व देश की सुरक्षा के लिये राजापा से सैनिक सहायता ली जाने लगी। आर्थिक मामलो में भी मनमानी की जाने 300 लगी। इस प्रकार राज्य के वास्तविक अधिकार नरेशो से छीने जाकर अग्रेज सरकार ने अपने हाथ में ले लिये। अग्रेज सरकार का प्रतिनिधि राज्यो में रहता था। उसकी इच्छा के अनुसार ही शासक राजगद्दी से उतारे जाने लगे या यश पाने लगे। अग्रेज रेजिडेन्ट या अग्रेज राजनैतिक एजेण्ट रियासत का वस्तुत शासक बन गया राजाप्रो को आदेश देने लगा और गजायो को उह मानना आवश्यक हो गया। हस्तक्षेप की ऐसी ही नीति के कारण ई० सन् 1867 म टोक के नवाब को राजगद्दी से हटाया गया। उसने अपने अधीन लाना ठिकाने के राजपूत जागीरदार के कावा की हत्या करवा दी। ई० सन् 1868 में जर जोधपुर नरेश तस्तमिह तथा उसके जागीरदारो के बीच ज्यादा विवाद बढ़ गया तथा गृह-युद्ध की आशका हो गई तो अग्रेजो ने उसे वाध्य किया कि वह शासन काय मन्त्रियो की एक परिषद् को सौंप देवे। महाराजा के अधिकार भी मीमित कर दिये गये 116 ई० मन् 1870 मे अनवर नरेश शिवदानसिंह के शासन काल में अव्यवस्था फैल गई तथा वहा मुसलमान मत्रियो के विरुद्ध तीव्र विरोध उठ खडा हुआ तव अग्रेज अधिकारियो को हस्तक्षेप कर शिवदानसिंह के प्रशासनिक अधिकार लेकर एक मत्री परिपद नियुक्त करनी पड़ी। तब लाई मेयो ने --"यदि किसी देशी रियासत मे पातय, भ्रष्टाचार, फिजूलखर्ची अधिक वढ गई हो तो सर्वोच सत्ता के लिये आवश्यक हो जाता है कि वह हस्तक्षेप करे। दूसरी और यदि शासप अपने राज्य का प्रशासन ठीक करना चाहता हो लेकिन उसके जागीरदार, सैनिक या राजद्रोही विरोध करे तो हमारा क्त्तव्य हो जाता है कि हम उस सत्ता और शक्ति का समथन करें। हम किसी भी परिस्थिति में किसी राज्य मे गह युद्ध नहीं होने देना चाहते है ।"18 इन तीन मुरय आधारो पर हो अग्रजो ने अपनी नीति रियासतो के प्रति बनाये रखी। ई० मन् 1903 में जोधपुर नरेश सरदारसिह के भी अधिकार उसकी फिजूलखर्ची के कारण अस्थायी रूप से ले लिये गये तथा उमे पचमढी भेज दिया गया और शासन एव मत्री परिषद के अधीन कर दिया गया। ई० सन् 1905 मे उसे वापस राज्य में आने दिया गया लेकिन उसको सीमित अधिकार दिये गये। उसे पूर्ण अधिकार बाद मे 1908 मे ही कुछ शर्तों के अधीन दिये गये। राजानी की स्थिति और भी ज्यादा तव बिगडी जब वायसराय लॉर्ड वर्जन 1898-1905 के समय में साम्राज्यवादी सिद्धान्त अपनी चरम सीमा पर बतलाया- [ 31 पहुँच गये। वह राजानो को ताज का केवल एजेण्ट मानता था जिनका काम अपने क्षेत्रो पर केवल शासन करना था और उनके स्वय के कोई मूल अधिकार नही थे। उसके विचार से ताज की प्रभुसत्ता मवन बिना विवाद स्पष्ट है। उसने स्वय अपने परमाधिकार की सीमा बाध रखी थी। अत राजा लोग वश परम्परागत अधिकारी मात्र रह गये। उन्हे सौपे गये अधिकारो का दुरुपयोग न कर अपनी उपयुक्तता प्रमाणित करना अत्यावश्यक हो गया। उसके मसय में राजा लोग बिना अनुमति लिये अपना राज्य तक नही छोड सकते थे। राजनैतिक अधिकारी तथा रेजीडेण्ट मनचाहे जव हस्तक्षेप करने लग। रियासतो मे अप्रत्यक्ष रूप से अपनी सरकार चलाना नग्न रुप से दिखाई देने लगा। इसके परिणाम स्वरूप राजानो मे असतोप फैल गया। फिर भी वे राजाओ पर सुधारो के लिये पूण दवाव न डाल सके। ऐसा प्रतीत होता है कि अग्रेज लार्ड डलहोजी द्वारा अपनाई सुधारो की नीति के परिणाम नही भूले थे। अत उन्होने आर्थिक कारणो व सुरक्षा के लिये आवश्यक सुधारो को करके ही सन्तोष कर लिया। यो जनता में भी इतनी जागृति नही आई थी कि वे अपने राजा को सुधारो के लिये विवश करते। अग्रेजो ने अपना रौब जमाने व राजभक्ति का प्रदर्शन कराने के लिये ई० सन् 1903 मे सम्राट एडवड के राज्यारोहण के उपलक्ष मे दिल्ली मे दरवार किया जिसमे राजस्थान के समस्त नरेशो को आमत्रित किया गया । उदयपुर नरेश महाराणा फतहसिंह भी इस समय दिल्ली पहुंचा। लेकिन महाराणा ने दरबार की बैठक मे हैदराबाद, बडौदा और मैसूर के बाद चौथा स्थान रखने के कारण दिल्ली पहुँच कर भी दरबार मे भाग नहीं लिया । लाड वजन जैसा कठोर प्रशासक यह सर कुछ देख कर भी महाराणा को कुछ न कह सका। इसकी प्रतिक्रिया अन्य नरेशो मे भी हुई और जन साधारण मे भी साहस का संचार हुआ। भारत मे अव राष्ट्रीय भावना तेजी से पनप रही यी प्रत अग्रेज सरकार ने यही उचित समझा कि राजानो से सहयोग लेना ही उचित है। जिस प्रकार भारतीय सैनिक विद्रोह ने अंग्रेजो को रियासतो के प्रति नीति बदलने के लिये बाध्य क्यिा उसी प्रकार भारतीय राष्ट्रीय काग्रेस की बढती लोकप्रियता ने उन्हे पुन नीति बदलने को विवश कर दिया। अग्रेजो ने अग्रेजी भारत मे राष्ट्रीय आन्दोलनो के बढते प्रम को रोकने के लिये राजाम्रो को सुरढ दीवार के रूप में देखा। अग्रेजो को प्रतिक्रियावादी के रूप मे देशी नरेश बहुत ही अच्छे लगे। अत लाड वजन वाली नीति को आगे चलकर 32 ] । नरम कर दिया गया जिसके वारण नरेणा में अग्रेज विरोधी भावना जागृत न हो सकी, लेकिन जनसाधारण मे जो गष्ट्रीय भावना उदय हुई यह वगवर बढती ही गयी। सर्वोच्च सत्ता की नीति का विकास किसी मीमा तय राज्यों के लिये हितपर सिद्ध हुआ। यदि हम तत्कालीन परिस्थितियों पर गौर करें ता यह प्रतीत होगा कि उस समय राजस्थान के राज्यो का प्रशासन याफी मीमा तब अव्यवस्थित हो गया था। जोधपुर व उदयपुर जैसे बडे राज्या में भी जागीरदारो के झगदी व उत्तराधिकार के मामला पाकर पापी प्रध्यवम्या फैल गई थी। ऐमी दशा म अग्रेज मरवार जमी मत्ता ही यहाँ शाति व सुव्यवस्था स्थापित कर सकती थी। ऐसी ही मता अग्रेजी-प्राता व देशी राज्यो के बीच की खाई को पाट कर भारत में एकता ला सकती थी। प्रत अग्रेज सरकार ने राज्यो मे शाति व सुव्यवस्था स्थापित पर भारत के प्रशासनिक जीवन में एक्ता लाने का प्रयत्न किया। इसमे कोई सदेह नहीं कि अग्रेजी प्राता व देशी राज्यो के बीच भेद-भाव भी लाने या प्रयत्न रिया गया ताकि दोनो एक दूसरे के मामलो मे अलग रह । सुधारो की ओर नये राजनैतिक परिवर्तनो के वारण रियायतो को भी मुधारो के विषय मे सोचना पड़ा। चालू प्रशासनिक पद्धति को यदि परिवर्तित नहीं किया जाता तो परिवर्तित आधुनिक युग के साथ चला नहीं जा सकता था और न वे रह ही सकती थी। अग्रेजी भारत के परिवर्तनो को नरेशो तथा उनकी जनता ने पहले तो पसन्द नहीं किया तथा उन्हे सन्देह की दृष्टि से देखा लेकिन अब जव अग्रेज भारत के सर्वेसर्वा हो गये तव उनके पाश्चात्य विचार तथा उनकी सस्कृति पूर्वी विचारो तथा संस्कृति को धीरे-धीरे प्रभावित करने लगी। अत नई प्रशासनिक पद्धति तथा राजनैतिक सस्थाये, जो पाश्चात्य विचारा पर आधारित थी, अपनाई जाने लगी। सभी रिसायते अब अग्रेजी सरकार की सलाह तथा निर्देशन पर प्रशासनिक तथा राजनैतिक सुधार करन लगी। अग्रेजी भारतीय प्रातो मे जो भी कायवाही की गयी उसी को आवश्यक परिवतना के साथ यहा भी अपनाया गया। परमोच्च शक्ति की नीति के अनुसरण में अग्नेज सरकार ने भी देशी राज्यो मे शाति, व्यवस्था, सुरक्षा व कुशल प्रशासन लाने के लिये सुधारो की ओर कुछ ध्यान दिया। इस काल में भारत के मुरय केन्द्र रेल द्वारा जोडे गये और इस कारण यहा के , [ 33 राज्यो मे होकर भी 'रेल की लाइने निक्ली। ई० सन् 1884 के बाद के वर्षों मे अहमदाबाद को आगरा से मिलाने के लिये मारवाड जकशन, अजमेर व जयपुर होकर रेल की पटरी बिछाई गई। जयपुर राज्य के वादीकुई से एक और पटरी बिछा कर अहमदावाद को अलवर व दिल्ली से भी जोड दिया गया। एक दूसरी रेल पटरी को नीमच से चित्तौड व आगे अजमेर तक पहुंचा दिया गया। जोधपुर व बीकानेर राज्यो ने मिलकर ई० सन् 1889 मे अपनी ही रेल लाइनें चलाई। इसके फलस्वरूप मारवाड जकशन से जोधपुर, मेडता, बीकानेर, भटिण्डा (पजाब) तक रेल लाइने बनाई गई। एक लाइन मेडता से कुचामरण रोड व फुलेरा'तक तथा दूसरी लाइन लूणी से हैदराबाद (सिन्ध) तके खोली गई। इन लाइनो के बनने में लगभग 14 वर्ष लगे लेकिन इससे दोनो राज्यो के व्यापार को काफी वढावा मिला व अच्छी ग्रामदनी होने लगी। ई० सन् 1895 मे उदयपुर राज्य ने चित्तौड तक तथा जयपुर राज्य ने ई० सन् 1906 मे सागानेर से मवाई माधोपुर तक रेल की लाइन बनवाई। इन रेलो के इजन, पटरिया, डिब्बे आदि इगलण्ड से हो पाये और इस कारण अप्रत्यक्ष रूप से इगलैण्ड को काफी आर्थिक लाभ हुआ। प्रारम्भ मे यह रेले, यहा के निवासिया के धन, उनके कई धन्धो और उनके स्वास्थ्य के लिये विनाशकारी और अनेको गावो को उजाड देने वाली सिद्ध हुई। लेकिन इनसे आगे चलकर लाभ कम नही हुए। रेन पटरियो के अलावा आगरा से जयपुर, अजमेर व डीसा (पालनपुर राज्य) तक तथा नसीरावांद से चित्तौड होकर नीमच तक मडके बनी। इससे यातायात व व्यापार की बडी सुविधा हो गई तथा अकाल के समय अन्न व चारा लाने ले जाने मे भी सुविधा हो गई। यहां के लोगो के धार्मिक प्राचार विचार पर भी रेलो का महत्वपूर्ण प्रभाव पडा और राजस्थानी समाज के सास्कृतिक दाचे मे प्रातिकारी परिवर्तन ला गया। इस काल मे विभिन्न राज्यो की डार पद्धति का भी एकीकरण किया गया और प्रत्येक राज्य मे डाकघर व तारघर खुले जो के द्रीय मरवार के नियन्त्रण में रहे । यो,जयपुर, उदयपुर आदि राज्यो मे उनके डाकघर चलते रहे। ई० सन् 1880 तक सम्पूण राजस्थान में अग्रेज सरकार के डाकघर स्थापित हो गये। राजस्थान मे तार की सर्वप्रथम लाईन ई० सन् 1864 में भागरा से प्रजमेर तर चालू की गई। । -- 1- 34 ] राजस्थान में अनेक तरह के सिक्को का प्रचलन था। प्रत्येक राज्य के, सिवाय सिरोही राज्य के, अपने पृथक सिक्के थे। ई० सन् 1859 से ही यहा के सिक्को पर मुगल बादशाह का नाम लिखा जाना बंद हो गया था। इगलैण्ड की महारानी विक्टोरिया के सिक्के चलने लग गये थे। ई० सन् 1873 के बाद चादी के रुपये की कीमत घटने लगी तब ई० सन् 1893 मे अग्रेज सरकार ने अपनी टकसालो मे रुपया ढालना वद कर दिया जिमसे अग्रेजी रुपये की दर कुछ बढ गई। अब इस दर को स्थायी रसने के लिये उन्होने राजामो को फुसलाकर उनकी टकसाले बद कर दी और उनकी टक्सालो के सिक्के चादी के भाव खरीद लिये। केवल मात राज्यो-जयपुर, उदयपुर, वू दी, जोधपुर आदि ने फिर भी अपनी टकसाले चालू रखी। इनके सिक्को का प्रचलन उन राज्यो की सीमा तक ही रह गया । अग्रेज सरकार यह नहीं चाहती थी कि यहा के राज्यो की सनिक शक्ति वढे अत यहा की सेना का पुन मगठन किया गया। ई० मन् 1870 मे लाड मेयो ने लिखा-"देशी राजाओं के पास काफी सेनाये है। वे राजा अपने मित्र हो सकते है, लेकिन इनके सैनिको पर विश्वास नहीं किया जा सकता है।" वे अभी तक यह नहीं भूले थे कि तात्या टोप को देशी राज्यो के विद्रोही सैनिको से ही सहायता मिली थी अत उहोने ई० सन् 1889 में जयपुर, जोधपुर, बीकानेर व अलवर राज्यो मे नई सेनाएँ सगठित कराई जो "इम्पीरियल सर्विस टुप्स" कहलाई। ये सेनाएँ रियासता के निवासिया का भर्ती कर बनाई गयी और इनके अधिकारी भी भारतीय थे लेकिन इनका प्रशिक्षण व नियत्रण अग्रेज अधिकारिया द्वारा किया जाता था। इन सेनामा के कारण अग्रेज सरकार को भरोसा हो गया कि इन राज्यो की सेना से अब कोई खतरा नहीं है तथा भारत की एकता के लिये यह कहा जान तगा कि भारत की सुरक्षा के लिये इनका होना आवश्यक है। अग्रेजी प्राता मे राजस्थान के नमक का निर्यात रोक्ने के लिए प्रारम्भ में अग्रेज सरकार ने काफी चौक्यिा स्थापित की लेकिन इसमे उनको काफी धन सच ारना पडता था इससे समस्या सुलभी नहीं थी अत अव साम्भर झील, पचपदरा भील आदि के नमक का एकाधिकार अंग्रेजो ने ई० सन् 1869- 70 में जयपुर व जोधपुर राज्य से सघि कर ले लिया। अब अग्रेज सरकार ही नमक का निर्यात करने लगी तथा वेचने लगी। ई० सन् 1879 तथा 1882 ये वीच नमक न बनाने तथा नमव पर कोई चु गो या राहदारी वसूल न करने [ 35 के लिए अन्य राज्यो से भी सन्धिया की गई 14 ई० सन् 1900 मे किशनगढ़ राज्य को बाध्य किया गया कि वह साम्भर झील से लगे रूपनगर तहसील के इलाके मे सिंचाई के लिए कोई बाध न वाधे तथा कुए न ग्वोदे । इन राज्यो को नमक की आमदनी के बदले मुआवजा दिया जाने लगा। इससे यहा के राज्यो को आमदनी को ठेस तो लगी ही यहा के काफी लोग बेकार भी हो गये। केन्द्रीय सरकार के नमक विभाग को खरी आमदनी ई० मन 1903 के अन्त तक एक करोड ग्यारह लाख हो गई, जिसका अर्थ हुअा कि राज्यो की इतनी ही आमदनी समाप्त हो गई। दूसरी ओर नमक तीन गुणा अधिक महगा हो गया जिसका भार जनता पर पडा। निरकुश व विलासी नरेश कुछ राज्यो में सुधार किये जाने से यह नहीं समझा जाना चाहिये कि राजस्थान की रियासतो के प्रशासन मे सामा यत सुधार कर दिये गये थे। उनमे अभी तक पुराने ढग यी मध्यकालीन व्यवस्था चली आ रही थी। राजा पूर्णतया स्वेच्छारी थे और उसकी दमनकारी शक्तियो पर कोई रोक नहीं थी। कानून से शासन करने का कम ही विचार किया जाता था। निरकुश राजा मनचाहे टग मे शासन चलाते थे। मेयो कालेज में शिक्षा प्राप्त राजा केवल दिसावे के लिये आधुनिक ढग के नरेश बन गये । उहोने केन्द्रीय सरकार के राजनैतिक विभाग द्वारा चयन रिये गये दीवाना व मग्रियो को नियुक्त किया। इन्होने अग्रेजी प्राता के सुधारो की नकल करना प्रारम्भ किया, लेकिन वे सुधार केवल नाम के थे। अव तक अग्रेजी प्रातो में विधान सभामो के निर्माण के लिये कानून बन गये थे। अत यहा भी जनतात्रिय सम्थानो के निर्माण के लिये प्रयत्न किये गये लेकिन वास्तव मे यहा के राजा निग्यश ही रहे। उनके अपनी प्रजा को दवाये रखने के अधिकारों पर कोई रोक नही थी। अग्रेजी प्रान्तो में प्रत्येक व्यक्ति की जान व माल की रक्षा के निये कानून या प्रथा द्वारा वई गेमें लगी हुई थी, और यदा कदा इनके विरुद्ध विभिन्न लोगो को अपमानित करने व नुकसान पहुंचाने नया यहा तक कि हत्या करवा देने की शिवायते सुनी जाती रहती थी। कई वार स्त्रिया की इज्जत ले लिये जाने की भी शिकायतें हुई। कई राजा अपने विनासी जीवन के लिये बदनाम थे। उनके रनिवासो मे अनेक स्त्रियां भरी पड़ी थी। कई राजामों ने तो वैश्यामो वे पीछे राज्य के लासो रुपये उडा दिये। जोधपुर नरेश द्वितीय जसवन्तसिंह या एर वश्या नन्ही जान से इतना लगाव या दि म्वामी दयानद सरस्वती को 36 ] इसके लिये महाराजा की काफी भत्सना करनी पडी, लेकिन महाराजा पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा। इसके विपरीत उस वैश्या ने स्वामीजी के रसोइये को अपने पक्ष मे कर जहर दिलवा दिया जिसके कारण उनकी ई० सन् 1883 मे मृत्यु हो गई। जोधपुर के ही एक दूसरे नरेश सरदारसिंह अपनी शान शौकत बनाये रखने के इतने इच्छुक थे कि ई० सन् 1901 को 17 अक्टूबर को जोधपुर नगर मे ढिढोरा पिटवाया कि महाराजा जिस दिन इगनण्ड से लौटे तव दीपावली की जाये वरना 100) म्पये जुर्माना किया जायेगा। इन्ही महाराजा से ई० सन् 1903 मे फिजूल खच के कारण अधिकार छीन लिये गये और पचमढी भेजा गया। ई० सन् 1905 मे पचमढी से लौटने पर सीमित अधिकार भी दिये गये। ० सन् 1908 मे इन्ह शासन के पूर्ण अधिकार कुछ शों के अधीन ही दिये गये। इसमे कोई सन्देह नही कि ज्यादातर नरेश अग्रेजो के कुचक्र मे फस गये थे और उनके इशारो पर ही शासन चलाने लगे थे लेकिन कुछ नरेश फिर भी स्वतन्त्रता पूर्वक शासन चलाने का प्रयत्न करते थे। ऐसे राजाओं के लिये भी अग्रेज अधिकारियो का विरोध करना आसान नहीं था। झालावाड नरेश द्वितीय जालिमसिंह ने जव विरोध करने का साहस किया तो उसे ई० सन् 1896 मे राजगद्दी से उतार दिया गया।28 वाद मे उसके उत्तराधिकारी न होने से झालावाड राज्य के दो टुकडे कर दिये गये। केवल मात्र चौमहला और झालरापाटन छावनी के परगनो को मिलाकर झालावाड राज्य की पुनर्स्थापना की गई तथा शेष भाग को पुन कोटा राज्य में मिला दिया गया और प्रथम जालमसिंह झाला के ही सम्बन्धी के वशज को नये झालावाड राज्य का शासक बना दिया गया। इस काल में जब भी कोई अल्पवयस्व राजा राजगद्दी पर चंठा अग्रेजो ने अपनी रोजेसी परिपद् उस राज्य मे स्थापित कर दी। बीकानेर कोटा, अलवर प्रादि राज्यो मे ऐसा ही किया गया। दयानद सरस्वती का जागृति स देश अव तक न केवल राजस्थान बल्कि भारत में भी एक राष्ट्र का स्पष्ट रूप नहीं था। अपना प्रात या राज्य ही जनता के लिये सब कुछ था। हिन्दू मुसलमान, मराठा, जाट, राजपूत आदि भेद, इनके एक राष्ट्रीय हाने मे रोष लगाये हुए थे। अव नई शिक्षा के प्रभाव से लोग एक राष्ट्र के विषय में सोचने लगे। जब विदेशी विद्वानी ने यहा के प्राचीन ग्रयो का अध्ययन करना प्रारम्भ रिया तथा यहां के प्राचीन गौरव के विषय में लिखने लगे तब यहा के शिक्षितो [ 37 - ने भी इस ओर ध्यान दिया। इससे उनमे राष्ट्रीय चेतना तथा प्रात्म-विश्वास जगा तथा अपने राष्ट्रीय स्प को पहचानने का प्रयत्न किया। इस समय भारतीय जनता और विशेषकर राजस्थान की जनता को जागृत करने वालो मे स्वामी दयानन्द प्रमुख थे। वह भारत को उन्नत, स्वतन्त्र, स्वावलम्बी तथा शक्तिशाली बनाना तथा स्वतन्त्र देखना चाहते थे। इसके लिये उसने धर्म और समाज सुधार को प्राथमिकता दी। उसने राष्ट्रीय शिक्षा पर भी अपने ग्रन्थो मे काफी लिखा । स्वय गुजराती होते हुए भी हिन्दी को सामान्य जनता की भापा के रूप मे अपनाया और इस कारण न केवल हिन्दी मे ग्रथ लिखे बल्कि भापण भी दिये। धौलपुर, परौली, भरतपुर, जयपुर, उदयपुर, आदि राज्यो में रहकर उसने न केवल राजघरानो बल्कि सामान्य जनता मे जागृति उत्पन्न की। स्वामी दयानन्द ही पहला व्यक्ति था जिसने यह भावना जागृति की-“कोई कितना भी करे पर तु स्वदेशी राज्य सवश्रेष्ठ होता है । माता पिता के समान कृपा, न्याय और दया रखते हुए भी विदेशियो का राज्य सुखदाई नहीं हो सकता है।" अपने इन अनुभवो का प्रचार उसने राजस्थान के विभिन्न राज्यो मे किया। ये विचार शीघ्र ही भारतीय भाषा के समाचार पत्रो द्वारा भारत भर मे फैल गये । अग्रेज सरकार ने प्रेस के काले कानून बनाकर ऐसे विचारो को रोकने का प्रयत्न भी किया लेकिन विफल रही। स्वामी दयानन्द ने अछूतोद्धार, स्त्री शिक्षा, राष्ट्रीय शिक्षा आदि पर काफी जोर दिया जिसका प्रभाव न केवल राजस्थान बल्कि अन्य प्रान्तो पर भी पडा। स्वामी दयानन्द के ही शिष्यो, श्यामजी कृष्ण वर्मा, केसरीसिंह बारहट आदि ने स्वतन्त्रता प्राप्ति के लिये सशस्त्र काति के वीज बोये। स्वामो दयानन्द के अलावा स्वामी विवेकानन्द ने भी राजस्थान मे रहकर लागो मे जागृति पैदा की। उसने हिन्दू धर्म की श्रेष्ठता बतला कर लोगो मे आत्म विश्वास जगाया। राष्ट्रीयता का उदय पश्चिमी शिक्षा के प्रसार के कारण सबसे बड़ा लाभ भारतीयो को राजनैतिक जागृति का मिला। इस शिक्षा को प्राप्त कर भारतीयो मे राष्ट्रीयता, देशभक्ति, राजनैतिक अधिकार प्राप्ति के लिये चेतना पाई। इसके कारण देश के विभिन्न प्रान्तो मे राजनैतिक सस्थाए स्थापित हुई जिनमे 'इण्डियन एसोसियेशन' मुख्य है। ब्राह्मसमाज तथा आय समाज ने तो व्यक्तिगत स्वतन्त्रता व समाज मे समानता की भावना भरने में कोई कसर नहीं रखी। आर्य समाज ने सम्पूर्ण भारत के लिये एक ही धम तथा सस्कृति स्थापित करने ।
38 ] वा उद्देश्य बनाया। स्वामी दयानन्द ने ही सबसे पहले 'स्वराज्य' शब्द का प्रयोग किया। उन्होने विदेशी वस्तुग्रो का बहिष्कार करने व स्वदेशी वस्तुमा को अपनाने पर जोर दिया। उन्होने ही सबसे पहले हिन्दी को भारत की राष्ट्र भापा बतलाया। इस प्रकार भारत में राष्ट्रीयता की लहर तेजी से फैलने लगी। उनीसवी शदी के उत्तराद्ध में अग्रेजा को मुसलमाना पर पूरा भरोसा नहीं था। वे मुसलमानो का रुख 1857 के महान् विद्रोह में देख चुके थे। अत उहोने हिन्दुप्रा पर भरोसा करने की ठानी ताकि आपतिकाल में ये काम आ सके लेकिन साधारण लोग अज्ञानता व गरीबी के कारण खुद ही परेशान थे शिक्षित मध्यम वर्ग राजनैतिक रूप से सत्रिय या लेकिन उस पर निश्चित रूप से भरोसा नहीं किया जा सकता था क्योकि उनमें सामाजिक व आर्थिक कारणो से काफी अस तोप था। यह देखकर उहे यहा के राजाओ, बडे जमीदारो, जागीरदारी प्रादि की महायता लेन का सोचना पडा। राजाप्रो के साथ की गई सन्धियो की शतों की व्याग्या इस प्रकार अग्रेजी सरकार करती रही कि वे प्रिटिश सरकार के नियत्रण में आते ही गये। इसी से उनकी मर्यादा भी घटती चली गयी। जब भी कोई नया राजा गद्दी पर बैठना था तब उसे मान्यता देना या न दना इगलैण्ड के वाहशाह या उसके प्रतिनिधि वायसराय पर निभर था। यदि किसी नाबालिग को राजा या उत्तराधिकारी बनाया जाता तो ब्रिटिश सरकार नावालिगी के दौरान उस राज्य का शामन भार अपने ऊपर ले लेती थी। सामान्यत किसी राज्य में अव्यवस्था फैलने पर राजा को गद्दी से हटा देती थी। इस अधिकार को ब्रिटिश प्रभुसत्ता का नाम दिया गया। प्रभुसत्ता को आपत्ति काल मे रियासतो के सारे साधनो पर असीमित अधिकार प्राप्त थे। रियासतो की सेना पूर्णतया ब्रिटिश सरकार के निर्देशन मे ही काम करती थी। इसी प्रकार सवार के सारे साधन-रेल, तार, डाक आदि भी ब्रिटिश सरकार के नियंत्रण में रहते थे। अव तक अग्रेजी शासन के प्रति जनता मे असन्तोप वाफी फैल गया था। सरकार द्वारा गोरो व कालो के बीच भेद-भाव न केवल सरकारी नौकरियो बल्कि याय करने में भी रखना, मार्थिक नीति मे इगलैण्ड के हितो को भारत के विरुद्ध प्राथमिकता देना, आदि के कारण जनता समझने लग गई थी कि इन [ 39 बुराइयो का प्रत अग्रेजी साम्राज्य को समाप्त कर पूण स्वाधीनता प्राप्ति पर ही हो सकता है। अग्रेज भी यह समझने लगे कि इस असन्तोप के कारण कही यहा विप्लव न हो जाये, जिससे सरकार के अस्तित्व को ही खतरा हो जाये। अत ऐसी कोई सस्था का होना आवश्यक है जो सरकार की कमियो तथा उनको सुधारने के विषय मे सुझाव दे सके तथा जनता को भी यह बता सके कि सरकार उनके लिये क्या काम कर रही है। यो इस समय भारत में "इण्डियन एसोसियेशन" नामक संस्था सुरेन्द्रनाथ बनर्जी की अध्यक्षता मे राजनैतिक कार्य कर रही थी लेकिन अग्रेजो को उसके विचार ज्यादा प्रगतिशील तथा उग्र लगे। अत एक नई सस्था की स्थापना की और उनका ध्यान गया 12 काग्रेस की स्थापना अग्रेजी साम्राज्य की छत्र-छाया मे भारत के लिए औपनिवेशिक स्वराज्य की प्राप्ति के लिए प्रयत्न करने के उद्देश्य से भारतीय प्रशासनिक सेवा के अवकाश प्राप्त अग्रेज अधिकारी ए ओ ह्य म ने 'इण्डियन नेशनल काग्रेस' की स्थापना ई० सन् 1885 मे की। इसकी स्थापना पर तत्कालीन वायसराय लाड डफरीन ने पाशीर्वाद दिया तथा कई अधिकारियो ने इसके सम्मेलन मे भाग लिया। इसका प्रथम अध्यक्ष डब्ल्य्० सी० बनर्जी को बनाया गया जो अग्रेजी सभ्यता मे पूर्णतया रगा हुआ था तथा राजनैतिक आदोलनो से दूर रहने मे ही काग्रेस का हित समझता था। काग्रेस के पहले सम्मेलन में भारत के विभिन्न प्रान्तो के 72 प्रतिनिधियो ने भाग लिया जिनमे दो मुसलमान थे। इम अधिवेशन में भापण बादशाह के प्रति आदर दिखाते दिये गये लेकिन फिर भी इगलण्ड की जनता ने काग्रेस की स्थापना को अग्रेजी सरकार के लिए एक वडा खतरा बतलाया । भारत में कांग्रेस की स्थापना से जनता मे राजनैतिक चेतना और भी ज्यादा बढी। उस समय की चालू राजनैतिक सस्थाएं इसके सामने बौने जैसी लगने लगी। अब काग्रेस ही भारत की मुन्य राजनैतिक सस्था बन गई जिसके इद-गिद रहते अय सस्थानो और व्यक्तियो ने राजनैतिक प्रगति मे योग दिया जिसके फलस्वरप आगे चलकर भारत स्वतन्त्र हुआ। प्रारम्भ से ही भारतीय राष्ट्रीय काग्रेस देशी रियासतो के मामलो मे कोई दिलचस्पी नही लेती थी। अपने प्रारम्भिक तीस वर्षों में केवल एक बार ही काग्रेस ने देशी राज्यो के मामले मे दिलचस्पी ली। ई० सन् 1896 मे जव भालावाड नरेश जालिमसिंह को पदच्युत किया गया तब काग्रेस ने यह प्रस्ताव पारित किया कि अग्रेज सरकार को न्यायिक जाच किये बिना किसी भी 40 ] . नरेश को राजगद्दी से नही हटाना चाहिये। इस प्रस्ताव की ओर सरकार ने कोई ध्यान नही दिया । अग्रेजो की ही प्रेरणा से स्थापित काग्रेस वाद के तीस वर्षों तक अग्रेजो की आँखो मे खटकती रही। सरकार द्वारा काग्रेस के द्वारा पारित प्रस्तावो की कोई परवाह नहीं की जाती थी। ई० सन् 1897 तक काग्रेस भी केवल प्रस्ताव पास करना ही अपना मुख्य धम समझती रही। ई० सन् 1898 मे वाल गगाधर तिलक का काग्रेस मे प्रवेश हुआ। उसी वर्ष नार्ड कर्जन भारत या वायसराय बनकर पाया। तिलक के हृदय मे देश के लिए कुछ करने की लालसा थी और लाड कजन के हृदय में भारत को पूणतया दवा रखने की इच्छा थी। तिलक ने अपना नारा दिया-"स्वराज्य हमारा जन्म-सिद्ध अधिकार है और वह म अवश्य प्राप्त कर रहूँगा।"6 लार्ड वर्जन के विचार थे-"भारत एक पिछडा देश है। वह किसी भी दशा में पश्चिमी राष्ट्रा की बराबरी नहीं कर सकता है। अत यहा की नई राजनैतिक चेतना को समाप्त कर रहूँगा।"37 तिलक ने देखा कि काग्रेस ने केवल प्रस्ताव पाम कर सरकार को भेजने का उद्देश्य बना रखा है, जो ठीक नहीं है। केवल पत्र भेजने से भारत का कोई भला नहीं होने का है। भारत का मुरय उद्देश्य स्वराज्य प्राप्त करना है और उसकी प्राप्ति के लिये शिवाजी जैसे वीरा के पथ का अनुगमन करना पडेगा। अत्याचार के सामने झुकना अपनी निबलता है। अत्याचार का सामना शक्ति से ही करना पडेगा। तिलक के ऐसे ही विचारा से प्रभावित होकर पूना के चापेकर भाइयो ने पूना के कलक्टर रैण्ड को मार डाला क्योकि उसके अग्रेज सैनिको ने पूना की जनता को काफी परेशान कर रखा था। सरकार ने इसका अप्रत्यक्ष अपराधी तिलक को माना और उसे राजद्रोह के अपराध मे 18 माह की सन्न सजा दे दी। तिलक को इस प्रकार सजा दिये जाने के कारण भारत में राष्ट्रीयता की लहर और तेजी से फैली। अव लेस लिखने व भापरण देने से ज्यादा त्याग व कष्ट सहने को सराहा जाने लगा। अब तप पांग्रेसी यही मोचते थे कि भारत में अंग्रेजी राज ईश्वर की देन है और हमे प्राशा है कि उनके सरक्षण मे सवैधानिक ढग से भारत एक दिन स्वराज्य पा लेगा। तिलक जैसे नये राष्ट्रवादी कहने लगे कि "यदि इस प्रकार भाशा विये बैठ रहे तो म्वराज्य भी प्राप्त नही होगा। विदेशी तो और ज्यादा जमा रह्ने या प्रयल करेगा। मत सर्वधानिक ढग से आदोलन करना ।
[ 41 व्यर्थ है क्योकि भारत में कोई मविधान है ही नहीं। जो कुछ हो रहा है वह प्रशासनिक अधिकारियो की मनमानी से हो रहा है। अंत हमारे लिये उनके आदेशो की पालना करना आवश्यक नहीं है।" काग्रेस के कई नेताओं ने इन राष्ट्रवादियो के विचार को वेकार व भयानक बतलाया। । ई० सन् 1905 से नये राष्ट्रवादियों के विचारो व कार्य-प्रणाली से उनका काफी मनमुटाव हो गया। अत महत्त्वपूर्ण राजनैतिक प्रश्नो व समस्याग्रो में भी यह बात देखी जाने लगी। हिन्दू मुस्लिम भेद-भाव लगभग 700 वर्षों तक हि दुनो व मुसलमानो के साथ-साथ रहने के कारण उनके आपसी भेदभाव काफी कम हो गये थे। अग्रेजो द्वारा भारत पर साम्राज्य स्थापित कर लिये जाने के कारण मुसलमान अग्रेजो के ज्यादा विरुद्ध थे जबकि हिदू मुसलमानो के अत्याचारो से छूट जाने के कारण अग्रेजो के प्रति शत्रुता नही रखते थे बल्कि उन्हे अपना हितपी समझते थे। इसी कारण हिन्दुनो ने अंग्रेजी शिक्षा को शीघ्र अपनाया लेकिन मुसलमानो ने अग्रेजी शिक्षा की ओर ध्यान नहीं दिया। हिन्दू अग्रेजी शिक्षा प्राप्त कर राजनैतिक दृष्टि से जागृत हो गये और अव स्वराज्य प्राप्त करने का प्रयत्न करने लगे। अग्रेजो ने इसमे सतरा ममझा और अव इस कारण वे हिन्दुओ के प्रति सशक रहने लगे तथा मुसलमानों को, जो अब तक पूर्णतया जागृत नही हुए थे, हिन्दुओ के विरुद्ध भडकाने लगे कि यहा स्वराज्य हो गया तो बहुसरयक हिन्दू अल्प-सस्यक मुसलमानो को गुलाम बना देंगे। उनके नेता सैयद अहमद ने ई० सन् 1888 मे एक भाषण में कहा था कि "हिन्दुओ तथा मुसलमानो के दो राष्ट्र होने चाहिये क्योकि यदि कभी अपेज भारत छोडकर चले गये तो दोनो एक समान राजनैतिक जीवन नही बिता सकेंगे। दोनो मे से कोई एक विजयी होकर दूसरे को दबा कर ही रह सकेगा।" उसने यहाँ तक कहा कि ''यदि बहुसम्यक हिंदुओ की सरकार बन गई तो अल्प-सरयक मुसलमान तलवार के जोर से अपनी मरकार स्थापित करने का प्रयत्न करेंगे।"39 इस प्रकार प्रारम्भ से ही मुसलमानो ने काग्रेस का विरोध करना शुरू कर दिया। अग्रेजो ने हिन्दुनो व मुसलमानो के अलगाव को और ज्यादा वढावा दिया। उन्होने अपने हितो के लिये इस अलगाव का प्रयोग किया और उसी के फलस्वरूप आगे चलकर पाकिस्तान की माग ई० सन् 1930 से की जाने लगी कि "हमारा धर्म, संस्कृति, इतिहास, रीति-रिवाज, साहित्य, आर्थिक पद्धति, ।
42 1 उत्तराधिकार, विवाह आदि के नियम हिन्दुनो से पूर्णतया भिन्न हैं। मोटे स्प से ही नही बल्कि सूक्ष्म रूप से भी भिन्न है। हिन्दुप्रो व मुसलमानो मे खान-पान व विवाह का भी सम्बन्ध नहीं है।" लाड कजन ने यही देख कर राजनैतिक दृष्टि से सर्वाधिक जागृत बगाल प्रान्त को विभाजित कर दिया ताकि एक भाग मे मुसलमान बहुसख्यक हो जावे और दूसरे भाग मे हिन्दू वहुसरयक । इस प्रकार भारत के प्रमुख धर्मावलम्बियो को विभाजित कर एक दूसरे के विरुद्ध उकसाने की पहली बार चेप्टा की गई। वग भग की यह योजना 16 अक्टूबर, 1905 के दिन लागू की गई। इस योजना को देश-घाती समझकर तव सम्पूरण भारत ने इसका विरोध किया । उस दिन हडताले हुई तथा लोगो ने व्रत रखे। महात्मा गाधी ने इस विषय मे लिखा था--"भारत का वास्तविक जागरण बगाल के विभाजन के पश्चात् हुआ और वह दिन अग्रेजी साम्राज्य के विभाजन का दिन माना जा सकता है। बगाल मे जो जागृति पाई वह शीघ्र ही उत्तर मे और दक्षिण मे केप कमोरीन तक फैल गयी।" बग भग के बाद बग मग के बाद भारत मे अग्रेजी सरकार के विरुद्ध आन्दोलन प्रारम्भ हो गया। जनता को यह पक्का विश्वास हो गया कि अंग्रेजो के भारत में रहते उनकी स्थिति सुधरने की नही है। अत जनता मे अंग्रेजी माल का बहिष्कार करने तथा स्वदेशी माल को अपनाने तथा राष्ट्रीय शिक्षा लेने की भावना जागृत हुई। अपनी आर्थिक, सामाजिक व राजनैतिक स्थिति सुधारने के लिये इससे अच्छा और कोई तरीका था भी नहीं। काग्रेस ने इस आन्दोलन की स्वीकृति दे दी यद्यपि फिरोजशाह मेहता, गोपाल कृष्ण गोसले प्रादि नम दलीय नेता इसके विरद्ध थे। उनके विचार से ऐसे अग्रगामी तरीको से काग्रेस के नष्ट होने का सतरा था लेकिन वास्तव में ऐसा कुछ न हुआ। इसी समय जापान ने इस पर विजय प्राप्त कर ससार को बतला दिया कि पश्चिमी राष्ट्र अजेय नहीं है। अत भारतीय भी अग्रेजो को शक्ति का प्रयोग कर देश से वाहर कर सकते है। राष्ट्रवादी यह सोचकर सशस्त्र प्रान्ति का सोचने लगे। राजस्थान मे भातपवादी गतिविधिया (1905-1914) राजस्थान में स्वामी दयानद व स्वामी विवेकानद ये उपदेशा या नवयुवरी पर यापी प्रभाव पड़ा था। उनके हृदयों में जातीय ग्रात्माभिमान [43 पुन जागृत हो चुका था। श्यामजी कृष्ण वर्मा जैसे क्रान्तिकारियो ने यहा रहकर उनको स्वतन्त्रता प्राप्ति के लिये प्रयास करने को उक्साया। बाद में भारत के स्वदेशी आन्दोलन का भी राजस्थान पर प्रभाव पड़ा। यहा भी स्वदेशी माल व राष्ट्रीय शिक्षा का प्रचार हुआ। सिरोही राज्य मे तब ही "सम्प सभा" स्थापित हुई। जनता ने इस सभा के कार्यक्रमो मे बडी रुचि बतलाई। पिछडे वर्गों में इससे बडी चेतना आई। इसकी प्रगति देखकर अग्रेजी सरकार चौकी और ई० सन् 1908 मे सैनिक कारवाई कर इस सभा को ही समाप्त कर दिया। व्यावर मे दामोदर दास राठी कान्तिकारी विचारो का व्यक्ति था । वह सशस्त्र क्रान्ति मे विश्वास करता था। अत उसने कातिकारियो को सहायता देना प्रारम्भ किया। कई क्रान्तिकारी उसके घर में शरण लेने लगे। अग्रेज सरकार ने जब गर्म दल वालो तथा क्रातिकारियो का दमन आरम्भ किया तव कई कान्तिकारी राजस्थान में विशेषकर व्यावर व अजमेर नगर मे आ छिपे। इसी कारण दामोदर दास राठी के घर की तलाशी भी ली गई। ई० सन् 1907 मे जयपुर मे अजुनलाल सेठी द्वारा जैन वर्द्धमान विद्यालय की स्थापना की गई। इस विद्यालय में राष्ट्रीय शिक्षा प्राप्त कर यहा के छात्रो मे देश-भक्ति व बलिदान की भावना जागृत हुई। कई क्रान्तिकारी यहा वरावर आया जाया करते थे। अत यहा नाति के लिये एक अच्छा दल वन गया जिसमे शाहपुरा का केसरीसिंह बारहठ, खर्वा का गोपालसिंह, व्यावर का दामोदरदास राठी व जयपुर का अजुनलाल सेठी मुरय थे। नातिकारियो के लिये यह आवश्यक था कि वे शस्लो को इक्ट्ठा करे या वनाये। अस्त्र-शस्न राजस्थान के राज्यो में ही प्राप्त हो सकते थे क्योकि यहा तव तक शस्त्र कानून लागू नहीं हुआ था। प्रत क्रान्तिकारियो ने शस्यो का संग्रह करने के लिये एक गूजर नवयुवक भूपसिंह को ई० सन् 1912 मे अजमेर भेजा। यहा रहते भूपसिंह ने न केवल शस्त्रो का सग्रह किया बल्कि वदूको की मरम्मत करना, कारतूस वनाना व भरना भी सीख लिया। उसने ई० सन् 1913 मे "वीर भारत समाज" नामक संस्था प्रान्ति का प्रशिक्षण देने के लिये स्थापित की। ऐसी ही संस्थाए भारत के अय प्रान्तो मे भी स्थापित हुई थी। यथा बम्बई प्रात मे "अभिनव भारत", मध्य भारत मे "प्राय बांधव समाज", बगाल मे "अनुशीलन समाज" अादि । राजस्थान के कुछ नरेश-बीकानेर के गगासिंह, उदयपुर के फतहसिंह व कोटा के उम्मेदसिंह, - 44 ] . इस गुप्त सैनिक संगठन से छिपे तौर पर सहानुभूति रखते थे तथा सहायता देते रहते थे। उनके विचार से यह सशस्त्रक्रान्ति सफल होने को थी। अत वे आशा लगाये बैठे थे कि अग्रेजो के जाते ही वे पुन स्वतन्य हो जायेगे तया प्रान्त की बागडोर उनके हाथो मे आ जायेगी। क्रान्तिकारियो को अपना कायम चलाने के लिये धन की आवश्यक्ता होती तो कई बार वे डकैती करके अपना काम चलाते थे। ई० सन् 1913 मे अजुनलाल सेठी के चार छात्रो-मोतीचन्द्र, माणकचन्द्र, जयचन्द तथा जोरावरसिंह (केसरीसिंह का भाई) ने बिहार प्रान्त के पारा जिले के निमेज गाव के एक महन्त की हत्या कर दी। इसके पूर्व सन् 1912 मे जोधपुर के प्यारेराम साधु की हत्या कोटा मे कर दी गयी। हत्या करने वालो मे लक्ष्मीलाल, हीरालाल, केसरीसिंह, नारायणसिंह, जोरावरसिंह और निवेणी दास उपनाम 'लहेरी' थे। इस साधु को फुसला कर कोटा ले गये और वहाँ लहेरी ने कटार भोक कर हत्या कर दी। वहा राजपूत बोडिंग मे मारकर लाश गाड दी गयी। लगभग 6 माह वाद लाश निकाल कर जला दी गई । जोरावरसिंह की पारा (बिहार) वाले मुकदमे मे भी जरूरत थी 13 आरा निमेज के साधु की हत्या (20 मार्च, 1913) का मुकदमा चला उसमे भी यही अभियुक्त था। जोरावरसिंह के भाई केसरीसिंह को कोटा केस मे आज म कारावास की सजा हुई। इन्हें हजारी बाग जेल भेज दिया गया। बाद में यह सजा 20 वर्ष की सजा मे परिवर्तित कर दी गयी। और सन् 1919 मे उसे 5 वर्ष की सजा भुगतने के बाद कारावास से मुक्त कर दिया गया। जोरावरसिंह बिहार के पारा केस मे आजन्म फरार रहे। इनके मझले भाई किशोरसिंह के बडे पुत्र प्रतापसिंह को वनारस षडया केस में 5 वप का कारावास दिया गया। वह 22 वप की अल्पायु मे वरेली जेल में शहीद हो गया। भारत सरकार के गुप्तचर विभाग के निदेशक ने उसके लिये लिखा था कि "मैंने आज तक प्रतापसिंह जैसा वीर तथा विलक्षण बुद्धि का युवक नही देखा। उसे सताने मे हमने कोई कसर नही रखी परन्तु वह टस से मस नही हुआ।" अग्रेज सरकार को राजस्थान के कुछ लोगो पर सदेह था अत प्रान्तिकारयो पर कडी प्टि रखती थी लेकिन फिर भी इनकी कारवाइया चलती रही। भूपसिंह खर्वा के गोपालसिंह का कामदार बन गया। एक यान्तिवारी बालमुकुद जोधपुर के महाराजा सुमेरसिंह का शिक्षक नियुक्त हो गया तथा एक अन्य प्रान्तिकारी बीकानेर राज्य को सेवा में नियुक्त हो गया।
[ 45 इनकी क्रान्तिकारी गतिविधिया और ज्यादा चलती लेकिन ई० सन् 1913 के लाहोर वमकाण्ड के सिलसिले मे जब अर्जुनलाल सेठी का एक छात्र शिवनारायण पकडा गया तो उसने सब भेद खोल दिया। तत्काल केसरीसिंह, हीरालाल जालोरी, लहेरी व रामनारायण पकडे गये और उन्हे 20 वर्ष की सख्त कैद की सजा दे दी गई। उनकी कुल सम्पति जब्त कर ली गई। जयपुर राज्य द्वारा तग किये जाने व आर्थिक अभाव के कारण अर्जुनलाल सेठी ने अपनी जैन पाठशाला इन्दौर स्थानातरित कर दी। वहा वह 1914 मे कैद कर लिया गया और उसके विरुद्ध कोई अपराध प्रमाणित न होने पर भी उसे पाच वर्ष तक नजरवन्द ही रखा गया। अत बाद मे वह 1920 के प्रारम्भ मे जेल से छोडा गया। इस कारण 1914 के बाद के वर्षों में राजस्थान मे मान्तिकारियो का सगठन टूट गया। प्रथम विश्व युद्ध ई० सन् 1914 की 4 अगस्त को यूरोप मे इगलण्ड का जमनी से युद्ध विड गया। भारत को अग्रेजी साम्राज्य का ही एक भाग होने के कारण इस युद्ध में भाग लेना पड़ा। जमनी को ऐसा विश्वास था कि जब इगलैण्ड विपदा मे पडेगा तब भारत मे उसके विरुद्ध विद्रोह हो जायेगा लेकिन इसके विपरीत भारत के सभी वर्गों के लोगो ने अग्रेजो के प्रति स्वामी-भक्ति बतलाई। स्वय अग्रेजो को भारत से इतनी सहायता की आशा नहीं थी। महात्मा गाँधी जैसे राष्ट्रवादी नेता ने सैनिक सेवा मे जाने का विचार प्रकट किया। ई० सन् 1914 के काग्रेस अधिवेशन मे वडे धमड से अध्यक्ष ने कहा-"अपनी इज्जत, स्वतन्त्रता व न्याय के लिये भारतीय अग्रेजो के साथ अपना सून बहा रहे है।" अगले वर्ष 1915 मे कायेस अधिवेशन मे पुन कहा गया कि-"विश्व की इन सकटमय घडियो मे, भारत को अंग्रेजी राष्ट्र को यह बतलाना है कि पिछले 150 वर्षों में उनके शासन के अन्तगत उन्हे जो शाति तथा समृद्धि मिली है उसके उपलक्ष मे हम यह बलिदान कर रहे है।" इस युद्ध मे हजारो भारतीय जवानो ने भाग लिया व अपना खून दिया। उस समय सभी भारतीय युद्ध की परिस्थितियो को भारत की राजनैतिक प्रगति हेतु मोडना चाहते थे। गाधीजी ने युद्ध के बाद वायसराय को लिखा था-"यह सत्य है कि हमारा सहयोग देने का कारण यह था कि हम आशा करते थे कि हम अपने उद्देश्य को शीघ्र ही प्राप्त कर लेंगे। इसी विश्वास से ज्यादातर सदस्यो ने सरकार को खुले हृदय से सहयोग दिया | राजस्थान का भी इस युद्ध मे कोई कम योगदान 46] नहीं रहा। यहा के राजायो को पता था कि यदि अग्रेज हार गये तो उनकी काफी दुगति होगी। अत उन्होने अग्रेजो का पक्ष खुले हृदय से व उदारता से लिया 15 सभी नरेशो ने युद्ध मे स्वय जाने के लिये अग्रेज सरकार को लिखा । उन्होंने अपने राज्य की सेनाए धन आदि देने की इच्छा प्रकट की। इनमे बीकानेर नरेश अग्रगामी था। जोधपुर के प्रतापसिंह, जो उस समय लगभग 70 वर्ष का था, ने भी युद्ध में भाग लिया। वायसराय ने जोधपुर, बीकानेर व किशनगढ के नरेशो को युद्ध में भाग लेने के लिये चुना। भारत की इन सैनिक सेवाप्रो को देखकर ई० सन् 1915 मे इगलंण्ड के प्रधानमयी ने भारत की सेवायो की सराहना की और इसके फलस्वरूप भारत के भावी राजनैतिक प्रश्नो को सहानुभूति-पूवक निपटाने का आश्वासन दिया युद्ध के अत तक बीकानेर के 2592, किशनगढ के 38, जयपुर के 1181, डूगरपुर के 100 व क्रौली के 400 सैनिक भर्ती किये गये। राज्यो ने काफी धन भी दिया। जोधपुर ने 35,96,095 रुपये, बीकानेर ने 42,08,865 रुपये, जयपुर ने 1,65,000 रुपये, धौलपुर ने 1,21,000 रुपये, झालावाड ने 3,25 375 रुपये, किशनगढ़ ने 27,000 रुपये, कोटा ने 1,40,572 रुपये तथा बूदी ने 1,82,700 रुपये दिये। कई प्रकार के युद्ध-ऋण भी विभिन्न राज्यो ने दिये। इस प्रकार राजस्थान ने अंग्रेजी साम्राज्य के प्रति पूर्ण निष्ठा वतलाई । विभिन्न नरेशो से सहायता प्राप्त कर अग्रेज जमनी पर 1918 में विजय प्राप्त कर सके। राजस्थान के कई जवान युद्ध में मारे गये तथा लासो रुपये अग्रेजो के हितो की रक्षा के लिये खर्च किये। इनका भार राजस्थानी जनता पर ही पड़ा। इस युद्ध में भाग लेने के कारण राजस्थान को अप्रत्यक्ष रूप से लाभ भी प्राप्त हुआ। राजस्थानी सैनिको के अन्य भारतीय मनियो के साथ युद्ध में भाग लेने तथा युद्ध काल मे प्रशासन को ठीक ढ रखने के लिये एक समान प्रशासनिक कायवाइयो ने अंग्रेजी की जनता को काफी निकट ला दिया। विदेशो से लौटे सनिक की भावना को देख चुके थे। गत व वे भी यहा स्वतन्त्रता प्राप्ति की सो' . वैसी ही [ 47 वडी रियासतो का भारत सरकार से सीधा सम्बन्ध कर दिया जायेगा। राजाओ के शासन में कोई गडबडी होने पर इसकी जाच एक कमीशन द्वारा कराई जायेगी।"० इस प्रकार के आश्वासन पाकर राजा लोग फूले न समाये। वे और ज्यादा अंग्रेजी साम्राज्य के भक्त बन गये। अब तक राज्यों की प्रजा अपने अधिकारो के लिये कोई माग नहीं कर पाती थी। यो उनका स्याल कर भारत सरकार ने राजानो को आदेश दिया कि वे अपना निजी सर्चा राज्य वी आमदनी का दस प्रतिशत तक रखे। उनके अन्य अधिकारी को भी कम किया गया। यह सब कुछ करते भी राज्यो की प्रजा के अधिकारो व स्वतन्त्रता के लिये कुछ नहीं किया गया। अत यहा की प्रजा मे असन्तोष बना ही रहा। यह भी सत्य है कि यहां के राजानो को यह भान नहीं था कि भारत मे राजनैतिक जागृति तेजी से आ रही है और अब राज्यो के लिये आवश्यक हो गया है कि वे अपने शासन को जनहित के लिये सुधारे लेकिन फिर भी उन्होंने कोई परवाह नहीं की। जन आन्दोलन लार्ड कर्जन की उन नीति के कारण अग्रेजी प्रान्तो मे जो राजनैतिक हलचल तथा तीव्र विरोध की भावना फैली उससे घबरा कर अग्रेजो ने भारतीय नरेशो को अपने पक्ष मे करने के लिये उन्हे शासन के मामलो मे काफी छूट दे दी। अव राज्यो के आन्तरिक मामलो मे कम ही हस्तक्षेप किया जाने लगा तथा उन पर अनुचित दवाव डाला जाना भी बन्द कर दिया गया। उनके प्रति विश्वास और सहयोग की नीति बरती जाने लगी। ई० मन् 1911 मे बादशाह पचम जाज ने दिल्ली में राजदरवार किया तव भारतीय नरेशो ने भी अपनी राजभक्ति का प्रदशन किया। उदयपुर के महाराणा फतहसिंह भी वादशाह से मिले लेकिन वह न तो शाही जुलूस मे सम्मिलित हुए और न दरवार मे ही उपस्थित हुए। कई नरेश अब यह समझने लगे कि जनता अब उत्तरदायित्व पूण शासन की स्थापना की माग करेगी। अग्रेजी प्रातो में चल रही राष्ट्रीय स्वत नता की लहर से यहाँ की जनता खूब प्रभावित होने लगी। प्रत बीकानेर नरेश गगासिंह ने अपने शासन काल की रजत जयन्ती के अवसर पर ई० सन् 1912 मे बीकानेर राज्य में "प्रतिनिधि सभा" स्थापित करने की घोषणा कर दी। इस सभा मे 27 नामजद सदस्य (19 कमचारी, 8 गैर सरकारी), 5 ताजीमी सरदार और जागीरदार व 3 अन्य सदस्य, 18 निर्वाचित 48 ] सदस्य (11 नगरपालिकामो से, 3 सरदारो से व 4 जमीदारो से) रखे गए 17 नगरपालिकाओ, सरदारो व जमीदारो की ये सस्थाएँ राज्य के द्वारा निर्मित सस्थाएँ थी। अत इस सभा को जनता की प्रतिनिधि सस्था कहना केवल धोखा देना मात्र था, फिर भी उस समय को देखते हुए यह एक प्रगतिशील कदम या। स्वतन्त्रता प्राप्ति की लातसा अब धीरे-धीरे गावो मे भी फैल रही थी। नवजागरण को यह किरण ई० सन् 1916 मे उदयपुर गज्य के जागीरी ठिकाने बिजोलिया में दिखाई दी, जहा के काश्तकारो ने ठिकाने की अनुचित लागवागी तथा अत्याचारो के विरुद्ध प्रादोलन प्रारम्भ कर दिया। उन्होने उस वप मे ठिकाने का लगान देना वद कर दिया और काश्त करना छोड दिया। उनके इस आन्दोलन का मुरय नेता साधु सीताराम था। प्रथम महायुद्ध के प्रारम्भ के कुछ समय बाद ही भारत के कुछ जातिकारी-हरदयाल, महेद्रप्रताप आदि जमन सम्राट से मिले और भारत मे सशस्त्र क्रान्ति की योजना बनाई। उस समय भारत मे बहुत कम अंग्रेजी सेना थी तथा जो सैनिक थे वे पूर्णतया प्रशिक्षित नहीं थे प्रत उनसे आसानी से निपटा जा सकता था। यह सोचा गया कि यदि क्रान्तिकारी एक वर्ष तक जम सके तो अग्रेजो के शत्रु उनकी सहायता कर देगे और यहा युद्ध मे लगे रहने के कारण भारत को आसानी से स्वतन्त्रता मिल जावेगी। अत कान्ति प्रारम्भ करने की तिथि सन् 1915 की फरवरी 21 निश्चित की गई जबकि भारत के सबसे बडे शस्त्रागार फिरोजपुर पर कब्जा किया जाना था। उसके बाद अन्य स्थानो पर क्राति होनी थी। राजस्थान मे गोपालसिंह तथा दामोदरदास राठी को व्यावर तथा भूपसिंह को नसीरावाद पर कब्जा करने का भार सौपा गया। सव प्रकार से तैयारिया हो गई लेकिन निर्धारित तिथि के पूर्व ही एक भेदिये ने सब बातें सरकार को वतला दी। अत इन क्रातिकारियो को गिरफ्तार कर लिया गया। राजस्थान के इन प्रातिकारियो को मेवाड व मेरवाडे की सीमा पर स्थित टाडगढ मे नजरवद कर दिया गया। लगभग एक पखवाडे तक नजरबद रहने के बाद ये लोग वहा से भाग खड़े हुए।18 भूपसिंह अव विजयसिंह पथिक के नाम से बिजोलिया में जाकर रहने लगा। उसने किसानो के अान्दोलन को और वढावा दिया। ई० सन् 1917 मे राज्य की पुलिस की सहायता से लगान के अलावा युद्धकोप के लिए धन वसूल किया जाने लगा। पथिय का नेतृत्व पापर उन्होने कुछ भी देने से इकार कर दिया।
[49 उदयपुर के अग्रेज रेजीडेट को जब यह पता चला तो उन्होने पर्थिक की, गिरफ्तारी का आदेश दे दिया लेकिन पथिय भेष बदलकर वहा से दूदी होकर नोटा चले गये। अब किसानो का नेतृत्व एक दूमरे नेता मारणकलाल वर्मा ने मम्भाल लिया। उसके सहायका मे जयसिंह धाकड, भवरलाल सुनार, प्रेमचन्द भील व घनश्याम जोशी थे। ई० मन् 1916 मे वहा वर्षा के प्रभाव से फमलें कम हुई लेकिन फिर भी काश्नाग को लगान के लिए तग किया जाने लगा। उदयपुर के महाराणा ने काश्तकारो को राहत देना उचित समझा लेकिन अग्रेज अधिकारिया ने, इसमे काश्तकारो को बढावा मिलेगा की प्राशका बताकर मना कर दिया और दमन करने के लिए पुलिस भेज दी। ग्रामीणो पर गोलिया चलाई गई तथा गावो को लूटा व जलाया तक गया लेकिन विमानो ने सव यातनाएँ सह ली। उहोने अपने क्षेन मे पचायती राज्य स्थापित कर लिया और चर्ये व वर्षे का घर-घर प्रचार कर गृह उद्योगो यो वटावा दिया। उनकी आत्म-निभरता व सगठन क्षमता के कारण राज्य वो झुनना पड़ा। ई० सन् 1922 मे ठिकाने से किसानो का राजपूताना के ए०जी०जी० की मध्यस्थता से 1922 मे समझौता हुआ। इसके अनुसार अधिमाण कर माफ कर दिये गये, वेगार उठा दी गयी और लगान घटा दिया गया। किसानो की पचायत को मायता दे दी गयी।50 बिजोलिया किमान आ दोनन की भाति ही उदयपुर राज्य के एक और ठिकाने वेगू मे भी किसान आदोलन हुआ ।1 आन्दोलनो की यह लहर और भी जागीरी गावो मे फैलने नगी। आन्दोलनकारी नेतामो का तर खूब महत्व बढ गया। जनता को यह विश्वास हो गया कि यदि वे मगठित हो जावेंगे तो वे अपनी मागो को मनवा भी सकते हैं। प्रथम महायुद्ध के पश्चात् सन् 1917 की 20 अगस्त को भारत सचिव माटग्यू ने घोपणा की कि भारत में उत्तरदायी सरकार बना दी जावेगी और इसके लिये यथा शीघ्र आवश्यक कार्यवाही की जावेगी। भारतीय नेता वहुत ही प्रसन हुए लेकिन शीघ्र ही उहे निराश होना पडा। महायुद्ध के समाप्ति के बाद ही प्रधानमत्री लायड जार्ज ने 22 नवम्बर 1918 को स्पष्ट कर दिया कि अग्रेजी सरकार की यह नीति है कि "धीरे-धीरे भारत में उत्तरदायी सरकार स्थापित की जावे इसके लिये हम कायवाही कर रहे है।" अत अग्रेजी सरकार की मशा अब स्पष्ट हो गई। इस प्रकार प्रथम महायुद्ध मे अग्रेजो की हार्दिक सहायता परो 50] - के बाद भी भारत के संविधान में नाम-मात्र के सुधार किये गये। काग्रेस ने इन सुधारो को अपर्याप्त तथा व्यथ माना। कागेस ने अब पुन अपना उद्देश्य "शान्तिपूण ढग से स्वराज्य की प्राप्ति" दोहराया । इसकी प्राप्ति के लिये काग्रेस ने अहिंसात्मक असह्योग आन्दोलन चलाया। भारत सरकार ने इस प्रान्दोलन को दवाने के लिये नये कानून बनाये जिनमे रोलेट एक्ट मरसे ज्यादा दमनकारी कानून था। उस समय काग्रेस का नेतृत्व मोहनदास कमच द गावी कर रहे थे। उन्होने विरोध प्रदशन के लिए 6 अप्रल 1919 को गाम हडताल करने की घोपणा की। इस कारण उस दिन भारत भर में हडताले, सामूहिह प्रदर्शन व साथ में कई स्थानो पर दगे भी हुए। सरकार ने इस आन्दोलन को और ज्यादा सरती से दवाया। गाधी 8 अप्रैल को गिरफ्तार कर लिये गये। सरकार ने सबसे ज्यादा अत्याचार अमृतसर में किया जहा 13 अप्रैल 1919 को जलियावाला बाग मे एक शातिपण सभा पर गोलिया चलाकर सैक्डा स्नी, पुरुषो व बच्चो को मात के घाट उतार दिया। पजाव मे सैनिक कानून लागू कर दिया। भारतीय जनता मे ऐसे अमानुपिक अत्याचारो के कारण अग्रेजी सरकार के प्रति तीव्र घृणा फैल गई तथा गाधीजी का अहिसात्मक अान्दोलन लोकप्रिय हो गया ।3 राजस्थान की जनता पर भी इसका काफी प्रभाव पड़ा। यहा भी राजनैनिक विभाग द्वारा नियत्रित राजानो के शासन के प्रति असन्तोप फैलने लगा तथा उसका विरोध किया जाने लगा। राजपूताना मध्यभारत सभा ई० सन् 1918 के दिल्ली काग्रेस अधिवेशन म राजस्थान के कई व्यक्तियो ने भाग लिया। इससे यहा के नेताना का अंग्रेजी भारत तथा अय राज्यों के नेताओ से सम्पन हुआ। इस अधिवेशन के वाद गणेश शक्र विद्यार्थी, विजयसिंह पथिक, जमनालाल बजाज, चादकरण शारदा, गिरवर शर्मा, स्वामी नरसिंहदेव सरस्वती आदि के प्रयत्लो से 'राजपूताना मध्यभारत सभा" नामक एक राजनैतिक सस्था की स्थापना दिल्ली के चादनी चौक में स्थित मारवाडी पुस्तकालय मे हुई। इस सभा का मुख्य उद्देश्य रियासतों में उत्तरदायी सरकार स्थापित करना तथा रियासत के लोगा को वाग्रेस का सदस्य बनाना था। इस सस्था का मुख्य कार्यालय कानपुर रखा गया जो उत्तरी भारत में मारवाडी पूजीपतियो व मजदूरा का सबसे बडा केद्र था । यहा से गणेश शकर विद्यार्थी, के सम्पादकत्व मे 'प्रताप' नामक साप्ताहित भी प्रकाशित होता था। यह पत्र इस क्षेत्र का प्रमुख राष्ट्रीय पत्र था। राजस्थान के राजनैतिक जीवन [51 के निर्माण में इस पत्र ने अभूतपूर्व कार्य किया। सभा के सदस्यो ने इस सभा यो काग्रेस की सहयोगी सस्था बनाने की पहले कोशिश की लेकिन वे विफल रहे। बाद में कांग्रेस के नागपुर अधिवेशन (सन् 1920) के ममय यह काग्रेस की महयोगी मस्था मान ली गयी।55 मन् 1920 में काग्रेस का 35वा अधिवेशन नागपुर में हुआ तब राजपूताना मध्य भारत सभा का भी अधिवेशन 29 दिसम्बर को हुआ। या अध्यक्ष नरसिंह चितामणी केलपर चुने गये थे लेकिन कुछ कारणवश वह नही पा सके। अत जयपुर के गणेश नारायण सोमानी को सर्व सम्मति से सभापति चुना गया । इस सम्मेलन में रियासतो के प्रतिनिधि काफी सस्या मे थे। सम्मेलन में प्रस्ताव पारित किया गया कि रियासतो के शासको को अपनी-अपनी रियासत में शीघ्र उत्तरदायी सरकार बनाने का आग्रह किया जावे। यह भी माग की गयी कि काग्रेस के संगठन में ऐसा परिवर्तन किया जाये वि जिससे देशी रियासतो की जनता को भी उससे प्रतिनिधित्व मिले। फरवरी सन् 1920 में मरकार ने महात्मा गाधी के चलाये आन्दोलन से तग आकर देश के राजनैतिक वातावरण को शात करने के लिये काफी गजबदियो को छोड दिया। भूपसिंह, जो नाम बदलकर विजयसिंह पथिक के नाम से प्रसिद्ध हो गये थे, का गिरफ्तारी वारण्ट रद्द कर दिया गया। राजस्थान के अन्य प्रान्तिकारी-अर्जुनलाल सेठी, केसरीसिंह बारहठ, गोपालसिंह आदि छोड दिये गये। इन लोगा ने अजमेर मे मार्च सन् 1920 मे 'राजपूताना मध्य भारत सभा' का अधिवेशन जमनालाल बजाज को अध्यक्षता में किया। बजाज वर्धा में व्यापार करते थे तथा वहा एक राष्ट्रीय पाठशाला चलाते थे। अत वहा से राजस्थान मे राजनैतिक प्रचार के लिए "राजस्थान केसरी' नामक पन ई० सन् 1920 की अक्टूबर 22 से निकाला जाने लगा। इसका सम्पादक विजयसिंह पथिक तथा प्रकाशक एक दूसरा राष्ट्रीय कार्यकर्ता रामनारायण चौधरी वनाये गये । इस पत्र के लिए आर्थिक सहायता मुरय रूप से जमनालाल बजाज ने की। 'राजस्थान केसरी' ने प्रारम्भ से ही किसानो व मजदूरो के ममयन की नीति अपनाई। इसको मारवाडी पूजीपतियो ने पसन्द नहीं किया। राजस्थान के जन आदोलन के नेतृत्व पर भी जमनालाल बजाज आदि पूजीपतियो से पथिक की नहीं वनी । अत वह ई० सन् 1921 मे राजस्थान लौट आये और अजमेर से उसने 'नवीन राजस्थान' नामक पर निकालना प्रारम्भ .
52 ] किया। बाद में इस पत्र का नाम 'तरण राजस्थान' रख दिया गया 158 राजपूताना मध्यभारत सभा 1920 के पश्चात् सक्रिय नही रह सकी। ई० सन् 1920 मे सेवर की सधि के कारण तुर्की का साम्राज्य छिन- भिन्न हो गया। इस सधि मे अग्रेजो का मुख्य हाथ था। भारत के मुसलमान तुर्की साम्राज्य की समाप्ति का मुरय दोष अग्रेजो पर डालकर अग्रेजो के विरोधी हो गये और यहा इनके विरुद्ध खिलाफत आन्दोलन चलाया। सितम्बर 1920 में काग्रेस के एक विशेष अधिवेशन मे, खिलाफत व पजाब के मामला में अग्रेजो द्वारा कोई पश्चाताप न किए जाने के कारण राष्ट्रीय इज्जत को बनाये रखने के लिए, स्वराज्य प्राप्त करना आवश्यक मानकर, अग्रेजी सरकार के विरुद्ध अहिंसात्मक असहयोग आन्दोलन चलाने का कायक्रम अपनाया। काग्रेस व खिलाफत समिति ने सयुक्त रूप से तय किया कि माटग्यू चेम्सफाड मुधारो के अन्तगत होने वाले चुनावो का बहिष्कार किया जावे तथा अग्रेजो द्वारा दी गई पदविया को लोटाया जावे, सरकार तथा उसकी मस्थानो का, उसके कर्मचारियो, छानो, वनीलो आदि द्वारा बहिप्यार किया जावे। इस प्रकार हिन्दुओ व मुसलमानो ने पहली बार एक होकर ई० सन् 1921 के इस महान आन्दोलन में भाग लिया। इसके कारण अग्रेजा को भय हो गया कि कहीं उनका भारत से साम्राज्य ही समाप्त न हो जावे। अग्रेजो ने उस अान्दोलन को बुरी तरह से दवाया। 'राजद्रोह वैठक अधिनियम' लागू कर हजारा व्यक्तिया को गिरफ्तार किया गया तथा उन्ह सस्त मजाए दी गई। प्रथम महायुद्ध के पश्चात् रियामतो के राजनैतिक वातावरण म परिवतन आया। अब अप्राकृतिक सीमाबन्दी समाप्त होने लगी। जनता में अस तोप व्याप्त हो गया। अब वे सवैधानिक सुधारो की माग करने लगे तथा नागरिक अधिकारों की भी माग करने लगे। कम से कम अग्रेजी भारत में जनता द्वारा उपभोग क्येि जाने वाले अधिकारो को तो चाहने ही लगे। अब भारतीय राष्ट्रीय काग्रेस के अधिवेशनो के साथ देशी रियासता की प्रजा के भी सम्मेलन होने लगे। सन् 1924 मे भारतीय रियासतो की प्रजा के सम्मेलन मे, जो वेलगाय में एन०सी० केलकर की अध्यक्षता मे हुअा अध्यक्ष ने काग्रेस को देशी रियासतो के मामलो मे पूर्ण रूचि लेने की अपील की। सन 1927 मे देशी रियासतो के कुछ प्रतिनिधियो ने बम्बई मे इक्ट्ठे होर अखिल भारतीय प्रजा परिपद का अधिवेशन 17 दिसम्बर 1927 को क्यिा। लगभग 1500 प्रतिनिधियो ने इसमें भाग लिया। इस अधिवेशन की अध्यक्षता रामचन्द्र राव ने की।
[53 । अग्रेजी भारत के जन आन्दोलनो से भारतीय नरेश घबरा गये। वे यह कहने लग कि यह असह्योग आन्दोलन आगे चलकर हिंसात्मक आन्दोलन हो जायेगे । जनता के हाथो मे सत्याग्रह रूपी हथियार घातक सिद्ध होगा।63 तब ही मोतीलाल नेहरू ने राजपूताना मध्यभारत तथा अजमेर मेरवाडा के राजनैतिक सम्मेलन मे अध्यक्षता करते हुये राजाम्रो से कहा था कि "वे असहयोग आन्दोलन से घवराये नही क्योकि यह उनके विरुद्ध न होकर केवल अग्रेजी सरकार के विरुद्ध चलाये जा रहे है। देशी रियासतो की प्रजा व राजामो के बीच आपसी सह्योग बना ही रहना चाहिये और इसी मे दोनो का भला है। यदि असहयोग आदोलन रियासतो मे चलाया जायेगा तो इसे जनता का ही अनिष्ठ होगा।" यह सब कुछ होते हुये भी रियासती जनता पर इन आन्दोलनो का प्रभाव पडा और जनता अब अपने अधिकारो के प्रति जागरूक हो गयी। राजस्थान भी इस आन्दोलन से प्रभावित हुए विना न रहा। जोधपुर मे एक सत्याग्रही भवरलाल सर्राफ हाय मे तिरगा भण्डा लेकर फिरा जिसके एक ओर 'महात्मा गाधी' तथा दूसरी ओर 'स्वराज्य' लिखा था। उसने वाजार मे व्याख्यान भी दिया जिसे जनता ने वडे प्रेम व उत्साह से सुना । टोक राज्य की जनता ने एक सभा कर काग्रेस से पूण सहानुभूति प्रदर्शित की और असहयोग आन्दोलन का अनुमोदन किया। वहा के अग्रेज पुलिस अध्यक्ष ने उनके नेताम्रो-मौलवी अब्दुल रहीम, सैयद जुवेर मिया, सैयद इस्माइल मिया, काजी महमूद अय्यूब आदि को गिरफ्तार कर लिया। लगभग 70 अय व्यक्ति भी गिरफ्तार किये गये लेकिन शीघ्र ही छोड दिये गये ।66 जयपुर राज्य के जमनालाल बजाज ने अपनी रायवहादुर' की पदवी लौटा दी तथा एक लाख रुपये 'तिलक स्वराज्य फण्ड' मे दिये और उसी समय मुस्लिम लीग को 11,000 ० तथा खिलाफत समिति को 10,000 रु० भी दिये । वजाज, असिल भारतीय काग्रेस कमेटी की 15 सदस्यो वाली कार्यकारिणी समिति के सदस्य भी बनाये गये। उसके बाद तो वह गाधीजी के बहुत ही निकट आ गये । बजाज की देखादेसी राजस्थान के दूसरे मारवाडी व्यापारियों ने भी इस आदोलन मे काग्रेस का साथ दिया। इसमे काँग्रेस को काफी आर्थिक सहयोग मिला। वीकानेर में राजनैतिक जागृति का प्रारम्भ सन् 1920 के लगभग इस रियासत में जनता को अपने विचार प्रकट करने की कम ही स्वतत्रता थी। अपने मालिक अधिकारो कि माग करना यहाँ अपराध माना हुमा। .
541 जाता था। धीरे धीरे जब यहा भी अग्रेजी प्रातो से असहयोग प्रादोलनो की हवा आने लगी और जनता मे रियासती शासन के प्रति असतोप फैनना आरम्भ हुमा तो महाराजा ने बीकानेर सावजनिक सुरक्षा अधिनियम 4 जुलाई 1932 से लागू कर दिया जो मार्शल लॉ की भाति ही कठोर या । यो उस समय बीकानेर में कोई सोचता ही नही या कि यहा कोई हिंसात्मक आदोलन होगे। यहा का प्रेस एक्ट बडा कठोर या जो समाचार पत्रो तया पुस्तका के प्रकाशन पर काफी प्रतिबंध लगाता था। यहा की सस्थानो के रजिस्ट्रेशन के अधिनियम के अनुसार अनाथालयो, विधवाश्रमो प्रादि का भी पजीयन होना अनिवार्य या। राजनैतिक संस्थाओ के पजीयन का तो कोई प्रावधान ही नहीं था। जनता मै यह ग्राम धारणा थी कि उहे किसी प्रकार की स्वतनता नहीं है और वे एक जेल मे रहते है । सन् 1921 मे बीकानेर मे मुक्ताप्रसाद वकील आदि ने विदेशी कपडो की होली जलाई तथा शुद्ध खादी पहनने का व्रत लिया। बीकानेर में खादी भण्डार भी खोला गया। अनेक स्थाना पर पुस्तकालय तथा वाचनालय खोले गये ताकि जनता कुछ जागत हो। चुरू, राजगढ, रतनगढ, सुजानगढ आदि मे सव हितकारणी सभा, विद्या प्रचारणी सभा आदि नाम से समाज सेवा के लक्ष्य को सामने रखकर सस्थाये स्थापित की गयी। इन संस्थानो की ओर से राजनैतिक साहित्य के पर्चे आदि प्रचारित किये गये । बीकानेर के महाराजा गगासिंह अपने को ज्यादा ही प्रगतिशील समझते थे। उन्होने शिवमूर्तिसिंह, सम्पूर्णानन्द व भानद वर्मा को सरकारी नौकरी से हटा दिया क्योकि वे स्वदेशी वस्त्र धारण करते थे और उन्होने राष्ट्रीय सप्ताह मे कुछ चन्दा 'तिलक स्वराज्य फण्ड' के लिये जमा कराया था। जोधपुर मे महाराजा के सरक्षय प्रतापसिंह इस आदोलन के कारण इतने बौखला उठे कि उन्हाने विदेशी माल को प्रोत्साहन देना प्रारम्भ कर दिया जब कि इससे पूर्व वह दयानद के उपदेश मान कर हिदी भाषा व स्वदेशी माल के प्रचार के लिये काफी प्रयत्न करते रहे थे। अजमेर मे भी अजु नलाल सेठी, चादकरण शारदा आदि ने असहयोग आदोलन मे खूब भाग लिया व विदेशी माल को नष्ट किया। उदयपुर के महाराणा फतहसिंह इस आदोलन के प्रति छिपे छिपे सहानुभूति रसते थे। भारत सरकार के राजनैतिक विभाग को महाराणा के प्रति पहले ही से शका बनी हुई थी। इस समय सरकार ने उन्ह आदेश ।
[ 55 दिया कि वह या तो उनके कहे अनुसार मन्त्रीमण्डल का पुनर्गठन करे या युवराज को शासन के अधिकार सौप कर स्वय राजकाज से अलग हो जावे । महाराणा ने विवश होकर अपने युवराज भूपालसिंह को 28 जुलाई 1921 को शासनाधिकार सौप दिये। युवराज ने नया मन्त्रिमण्डल अग्रेज सरकार की मर्जी के अनुसार बना लिया । राजस्व विभाग जैसा महत्वपूर्ण विभाग एक अग्रेज अधिकारी ट्रैच को सौप दिया गया। स्पष्ट रूप से अब ऐसा कोई राजा नही था जो अग्रेजो की हा मे हा नही मिलाने वाला हो । अग्रेजी सरकार की भारत के प्रति ऐसी दमनकारी नीति को देख कर पहली फरवरी 1922 मे "सरकारी अव्यवस्था तथा अत्याचार" के विरुद्ध नागरिक अवज्ञा आन्दोलन चलाने की सूचना गाधी ने सरकार को दी। अव गाधी केवल जनता का नेता ही नहीं रहे बल्कि वह महात्मा बन गये थे। अत जागरुक भारतीय जनता गाधी के इस प्रस्तावित आदोलन में पूर्ण जोश के साथ भाग लेने को तैयार हो गई। अग्रेज यह देखकर घबरा गये और वे यह सोचने लगे कि भारत उनके हाथ से जाने वाला है। वे कहने लगे कि "हिन्दुनो में माता के स्थान पर गाधी की पूजा होने लग गयी है ।"72 आन्दोलन की तैयारी जोर पकड ही रही थी कि उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले के चोरी- चोरा स्थान पर 5 फरवरी को एक हिंसात्मक घटना हो गई जिसमे प्रादोलल- कारियो की एक कुद्ध भीड ने पुलिस थाने पर ग्राममण पर 21 पुलिसमेना व एक थानेदार को जला दिया। अत महात्मा गाधी ने जनता को अहिसात्मक आदोलन के लिये तैयार न मानकर इस आदोलन को वाद करा दिया। जनता में इससे गाधीजी के प्रति काफी रोप फैल गया और कई नेता गाधी के विरद्ध हो गये। यह देख कर सरकार ने माच 13 को गाधी को गिरफ्तार कर लिया और उन्हे छ वप की सजा दे दी। बाद मे अस्वस्थता के कारण उन्ह फरवरी 1924 मे छोड दिया गया 173 इस आन्दोलन ने जनता को राजनैतिक सघप का एक नया तरीका वतलाया और लोगो को अहिंसात्मक कान्ति के लिये तैयार कर दिया। लोगो मे आत्मविश्वास जगा। अब उनके हृदया से अंग्रेजी सरकार की अपार शक्ति का भय जाता रहा। स्वदेशी वस्तुओ को अपनाया जाने लगा। खादी राष्ट्रीय देशभक्तो का पहनावा हो गया। काग्रेस जनता की सस्था बन गई। इसके साथ ही इस आदोलन के समाप्त होते होते हिंदू-मुस्लिम वैमनस्य भी ज्यादा वढ गया। तुर्की के जिस खलीफा के लिये मुसलमान अग्रेजो के 56 ] ग्रत आदोलन कर रहे थे, वही तुर्की के कमानपाशा द्वारा अपने देश मे भगा दिया गया और उमने अग्रेजो की शरण ले ली। अत मुमलमानो के सरकारपरस्त नेता राष्ट्रवादी मुसलमानो व काग्रेमियों के विरुद्ध प्रचार करने लगे कि ये आन्दोलन हिदू साम्राज्य स्थापित करने के लिये किये जा रहे है। अग्रेजी मरवार हिन्दू-मुस्लिम विरोधी भावना भडकाने मे ही अपना हित समझती थी। अनेको स्थानो पर हिन्दू-मुस्लिम दग हुए जिमसे अापमी मोहाद भार बिलकुल समाप्त हो गया। अजमेर मे 1923 मे भीपण हिदू-मुस्लिम दगा हुआ जिसमे कई हिन्दू मारे गये। रवाजा माहर की दरगाह पर भी सेना को गोली चलानी पडी। अजु नलाल सेठी घायल हो गये और चांदारण शारदा को अजमेर छोडना पड़ा। राजस्थान सेवा संघ फरवरी 1921 मे राजस्थानिया मे सगठन एव राष्ट्रीयता के भावो की वृद्धि करने तथा राजनैतिक यायकलापो को और वढावा देने के लिये राजस्थान मे विजयसिंह पथिक, रामनारायण चौधरी व हरिभाई किकर के प्रयत्नो से "राजस्थान सेवा सघ" की स्थापना की गई। पथिक इमके अध्यक्ष तथा चौधरी मत्री बने । इस सघ के सदस्य वही हो सकते थे जो अपने कुल समय तथा शक्ति से राजस्थान की सेवा करने का व्रत लेते थे। प्रत्येक सदस्य अपने तथा अपने प्राधितो के लिये एक सी स्पये मासिक से ज्यादा खर्चा नहीं ले सक्ता था। विजयसिंह पथिक ने तो अपना खर्चा काफी समय तक आठ रुपये मासिक तक ही सीमित रखा था। इसके मुरय कार्यकर्ता श्रीमती अन्जनादेवी, माणकलाल वर्मा, नानूराम व्यास, शोभाराम गुप्त, लादूराम जोशी आदि थे जो सामा यत तीस रुपये मासिक खर्चा लेते थे। मघ की शाखायें-जयपुर, बीकानेर, जोधपुर, सीकर, कोटा, खेतडो आदि स्थानो पर स्थापित हुई। जोधपुर मे 'मारवाड सेवा सघ' के अलावा 'मारवाड हितकारिणी सभा' ई० सन् 1915 से काम कर रही थी। इसका सगठन चादमल सुराणा ने मारवाड के लोगो के सामाजिक तथा आर्थिक हितो के रक्षार्थ क्यिा था। ई० सन् 1920 से इसका सचालन जयनारायण व्यास के हाथो मे आया । उनके समय मे इसकी सदस्य सरया 10,000 तक पहुच गई । राजनैतिक क्षेत्र मे तव से ही वह प्रसिद्धी पा गये और 'लोकनायक' कहलाने लगे। भील प्रादोलन इसी समय उदयपुर राज्य के भोमट क्षेत्र मे मोतीलाल तेजावत ने भील लोगो मे सेवा कर उनको जागृत किया। सन् 1922 मे उसके नेतृत्व मे वढे + लगान को कम करने, वेगार न लिये जाने, महाजन, गोहरो आदि द्वारा अनुचित व्याज न लिये जाने के विरुद्ध जो अान्दोलन चला वह शीघ्र जोधपुर, सिरोही,' दांता, पालनपुर व ईडर तक फैल गया। सरकार ने इसको दवाने में कोई कम प्रयत्न नही दिये। जोधपुर राज्य के सुमेरपुर के आसपास के गाँवो मे भीलो व गिरासियो को दबाने के निये 7 फरवरी 1922 को जोधपुर मे मरदार रिसाले के दो दल भेजे गये। भीलो व गिगमियो ने सेना के डर से लगान देने का इगर लिग्व कर दे दिया। उदयपुर राज्य के अग्रेज सेना अधिकारी मेजर सटन ने भोमट व कोटडा मे भीली पर गालिया चलवाई जिमसे लगभग 200 व्यक्ति मारे गये। भीलो ये दो गांव-भूला व वालोलिया (सिरोही राज्य) जला दिये गये। मोतीलाल तेजावत को अज्ञातवास में जाना पड़ा और 7 वप वाद जब वह देशी राज्य नोव परिपद् की बम्बई मे होने वाली बैठक मे उपस्थित हुए तव अपने साथियों की सलाह से उन्होने उदयपुर राज्य को प्रात्मममर्पण कर दिया। इसके बाद उह 7 वर्ष जेल मे तथा 1947 तक नजरबन्द के म्प में रहना पड़ा। किसानो का आन्दोलन उदयपुर राज्य के वेगू ठिकाने में तथा बून्दी गज्य के कुछ गावो में भी उग्र रूप से फैला। वेगू मे तो माल अधिकारी ट्रेच स्वय गाव जलाने के लिये मिट्टी के तेल के पीपे, पुलिस आदि को लेकर गया और गाँवो मे आग लगवा दी। पुरपो के साथ स्त्रियों को भी नगा कर पीटा गया। लगभग 500 व्यक्तिया, जिनमे लगभग बच्चे थे, बुरी तरह सताये गये। जनता से तग पावर 4 जुलाई 1923 को ठिकाने को समझौता करना पडा। किसान आदोलन के फ्लस्वस्प बेगू राव को लगभग 3 वप तक उदयपुर मे नजरबन्द रहना पडा। 1 मई 1926 मे उसे पुन अधिकार मिले तर वह 2 मई को बेगू गये ।78 मेवाड के किसान पादोलन के कारण पथिक व वर्मा के अलावा हरिभाई किंकर को जेल जाना पडा। रामनारायण चौधरी, सीताराम दास साधु, प्रेमच द भील पर मुकदमे चले। पथिक, चौधरी, हरिभाई दिनकर व हरिभाऊ उपाध्याय मेवाड से निर्वासित किये गये। इससे उदयपुर राज्य के अलावा बून्दी, कोटा, सिरोही आदि राज्यो के किसानों में काफी असतोप फैल गया। राजस्थान के बाहर के समाचारपत्रो ने इस असतोप व अमानुषिक्ता का खूब प्रचार किया। यह देखकर सरकार ने राज्यो मे ऐसे प्रचार को रोकने के लिये सितम्बर 1922 मे 'भारतीय राज्यो मे असतोप विरोधी अधिनियम' लागू 58 ] इस कर दिया। इस अधिनियम को लागू करने का अंग्रेज मग्वार का मुख्य उद्देश्य राजाओ के हाय मजबूत करना था तथा उनकी इज्जत बनाये रखना था । अधिनियम से राजानो के विरुद्ध बुध भी छापना या प्रकाशित करना अपराध माना गया। जिसकी सजा 5 वर्ष तक की वंदनीयो। इस अधिनियम के वारे में अंग्रेजी पालियामेट में भी काफी विरोध हुना। भारतीय नेतामा व समाचार पत्रों ने भी इसका विरोध किया। इसी वप विजोलिया ये पिसाना के सगठित सत्याग्रह की सफलता तथा उसरा प्रभाव पडोसी राज्या म बटता देसकर, भारत सरकार के राजनैतिक विभाग के दशारे से उदयपुर राज्य ने किसानो व ठिकाने के वीच पट पर समझौता करा दिया। विमानो की अधिक्तर मागे मान ली गई। किसान आन्दोलना के कारण राजस्थान मेवा सघ के ज्यादातर कार्यकर्ता दिसम्बर 1923 तक गिरफ्तार कर लिये गय । ज्यादातर गिरफ्तारिया उदयपुर राज्य में की गई। मुकदमा चलान के बाद मेवाड प्रवेश निषेधाज्ञा लगाकर उनको वहा से बाहर निकाल दिया गया । विजयसिंह पथिक पर वेगू आदोलन के सिलसिले में राजद्रोह का अपराध लगाया गया और उसका मुकदमा साटे तीन वप तक चलता रहा। इस कारण लगभग साढे तीन वप तक नजरबन्द रहने के बाद वह ई० मन् 1927 मे छोडा गया ।80 1द की ओर - ई० सन् 1924 मे यहा के राज्यो को आर्थिक स्थिति सराव होने लगी। राजाग्रो के निजी सच तथा शामन प्रवर के खन काफी बढ गये थे। व्यापार में मन्दी चल रही थी। अत विभिन राज्यो में भूमि कर लगान बढाया जाने लगा। पशुधन वाहर भेजे जाने लगा। इससे किसानो व जनता मे असतोप वढ गया और आदोलन किये जाने तगे। इस वप जन मारवाड में मादा जानवरो (गाय, भेड व वरी) की निवासी ज्यादा ही होने की तव वहा की जनता ने निकासी रोकने के लिये गाडियो के सामने धरना दिया। इस 15 अगस्त 1924 से मादा पशुओ की निको की आर्थिक स्थिति ठीक न होते हुए भी साथ 1925 में इग्लैण्ड, सरकार ने इस आटो व्यास, चादमल सुराणा जयनारायण व्यास तब नी सक से ५वा [ 59 सम्पादक बन गये जिसके माध्यम से राज्य प्रशासन के विरुद्ध प्रचार अभियान चलाया। बाद मे दिसम्बर 1925 मे सभी राजनैतिक कार्यकर्ताओं को माफी दे दी गई। ई० सन् 1925 को 14 मई को अलवर राज्य के निरकुश शासन के विरुद्ध उमके एक गाव नीमूचारणा के विमानो ने विराट प्रदर्शन किया। अलवर नरेश जयसिंह अग्रेजो वा वडा भक्त बना हुआ था। उसने अग्रेज सरकार से इशारा पाकर वहा के ग्रामीणो को गोलियो से भुन दिया। पचास स्त्री-पुरुप मारे गये व सैक्डो भोपडे जला दिये गये। राज्य की ओर से पीडितो की कोई महायता नहीं दी गई। महात्मा गाधी ने इस काण्ड को जलियावाला बाग काण्ड से भी अधिक वीभत्स बतलाया। सभी भारतीय समाचार पनो ने इस वाण्ड की घोर निन्दा की।82 जयपुर राज्य के शेखावटी व खेतडी के जागीरी क्षेत्रो में भी किसानो ने जागीरदारो मे तग पाकर ई० सन् 1925 मे प्रदशन किये लेकिन उनका निर्दयतापूर्वक दमन किया गया। किसानो को घोडो की पूछो से वाध कर दौडाया गया। किसान नेतानो को राज्य से बाहर निकाल दिया गया। बेगार व ऊची नगान दरे व लाग नागे ली जाती रही।83 अप्रेल 1926 मे जोधपुर राज्य के तत्कालीन प्रधानमनी सुखदेवप्रसाद के स्वेच्छाचार तथा चरित्रहीनता से तग पावर जोधपुर की जनता ने जयनारायण व्यास तथा भँवरलाल सर्राफ के नेतृत्व मे एक आन्दोलन किया। यह माग की गई कि प्रधानमनी को हटाया जावे तथा शासन में सुधार किये जावे। इस आदोलन के कारण भंवरलाल जेल में डाल दिया गया लेकिन अन्त मे राज्य ने प्रधानमनी को हटा दिया और प्रशासन मे सुधार किये। जयपुर राज्य में भी अस तोप काफी फैला हुआ था। यह असतोप तव फूट पडा जब वहा के एक तागे वाले को एक पुलिसमेन ने पीट दिया। इस पर वहा की जनता न पहली सितम्बर 1927 को विशाल प्रदर्शन किया तथा 5 दिन तक हडनाल रखी। जनता पर लाठियो की वर्षा की गई लेविन जनता ने परवाह नहीं की। इस अवसर पर उन्होने अपराधी पुलिस कर्मचारियो को सजा देने, राज्य की मनी परिपद मे जनता के दो प्रतिनिधि लेने तथा राज्य की आर्थिक स्थिति की जाच करने के लिये एक ममिति म्यापित करने की माग की। , 60 ] । उदयपुर राज्य मे नया भूमि बन्दोवस्त (1926) हो जाने पर भूमि का लगान वटा दिया गया। पुरानी लाग वागे पहले की तरह ही चलती रही। उदयपुर राज्य का प्रधानमनी अव सुखदेवप्रसाद बन गया था। जोधपुर की तरह ही वह यहा भी किसानो को दबाने लगा। विजोलिया मे समझौते के अनुसार किसानो की मागे पूरी नहीं की जा रही थी। अत यहा के लगभग 800 किसानो ने भूमि से स्तीफा दे दिया। राज्य ने ये जमीने महाजनो, हरिजनो और जागीरदारो को नीलाम कर दी। ई० सन् 1927 मे पथिक छुट गये थे लेकिन उसे उदयपुर राज्य मे घुसने की मनाही थी। अत वह ग्वालियर राज्य से किसान आन्दोलन चलान लगे। राज्य ने बिजोलिया के किसानो का पुन दमन किया। इस सत्याग्रह मे मारणकलाल वर्मा, शोभालाल गुप्त, अचलेश्वरप्रसाद शर्मा आदि बुरी तरह परेशान व अपमानित किय गये। अत मे जमनलाल बजाज ने अजमेर के काग्रेसी नेता हरिभाऊ उपाध्याय का उदयपुर राज्य व बिजोलिया के किसानो के वीच समझौता कराने भेजा । उमने राज्य से मिलकर ई० सन् 1929 मे समझौता करा दिया। यह ध्यान देने की वात है कि 1927 मे ही रामनारायण चौधरी, शोभालाल गुप्त, विजयासह पथिक व माणिक्यलाल वर्मा के बीच कुछ निजी कारणो मे मतभेद हो गये ये । इस कारण इस समझौते से किसानो को कोई विशेप लाभ नहीं हुआ। आपसी मतभेद के कारण राजस्थान सेवा सघ जैसी तजस्वी सस्था का विघटन हो गया । इसके बाद ही बिजोलिया का खादी उत्पादन केद्र जयपुर राज्य मे गोविन्दगढ ले जाया गया। अब तक चर्खा सघ द्वारा खादी उत्पादन केन्द्रो को स्थापना राजस्थान के कई गावो मे भी हा चुकी थी। अत इसके साथ ही राष्ट्रीय भावना का प्रचार भी बरावर होता रहा । ई० सन् 1929 मे जयनारायण व्यास तथा उसके साथिया न गावा में राजनतिक चेतना लाने के लिये मारवाड हितकारिणी सभा का एक मम्मेलन बुलाने के लिये व्यावर के आसपास के जागीरी गावो-चलुन्दा, बगडी, रायपुर आदि में प्रचार प्रारम्भ किया। महाराजा को जब यह पता चला तो उन्होन 12 सितम्बर का परिपद पर रोक लगा दी। व्याम ने इस कारण 'तरुण राजस्थान' में एक लेस निखकर जोधपुर के महाराजा उम्मेदसिंह वे विद्ध काफी लिखा और इस लेख की प्रतिया जोधपुर भेजी जिनको भंवरलाल मर्राफ ने नगर में वाटा। सितम्बर 10 को जयनारायण व्याम व पान दगज मुगणा ने व्यावर में एक सभा बुलावर महाराजा के विरुद्ध भापण भी दिये।
[61 - तर ही एक पुस्तक "पोपांवाई की पोल" नाम से बटवाई गई जिसमे महाराजा के शासन के विरद्ध काफी व्यग्य था। अत जयनारायण व्यास, आनन्दराज सुराणा व भंवरलाल मर्राफ के विरुद्ध राजद्रोह का अपराध लगाया जाकर उन्ह राज्य की जेल में डाल दिया गया।88 नई राजनैतिक सस्थायें सन् 1927 मे विभिन्न राज्यो के कार्यकर्तामा ने मिलकर 'अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिपद' के नाम से एक सस्था स्थापित की। इसका प्रथम अधिवशन 16 व 17 दिसम्बर 1927 को बम्बई में किया गया जिसमे भारतीय प्रान्तो व देशी राज्यो को मिलाकर एक भारतीय संघ राज्य की स्थापना कर, सघ परिपद मे देशी राज्यों के निर्वाचित प्रतिनिधि लेने की माग की गई। इममे नेनूराम (कोटा), शकरलाल शर्मा (अजमेर), जयनारायण व्यास व कन्हैयालाल क्लयत्री (जोधपुर), रामदेव पोद्दार व वा नकिशन पोद्दार (बीकानेर) और प्रिलोकचन्द माथुर (करौली) कायकारिणी के सदस्य लिये गये। विजयसिंह पथिक को उपाध्यक्ष और रामनारायण चौधरी को राजस्थान और मध्यभारत के लिये प्रान्तीय सचिव बनाया गया। इस परिपद की स्थापना से राज्यो मे राजनीतिक चेतना की प्रगति पर बहुत प्रभाव पडा। ई० सन् 1924 मे पथिक की गिरफ्तारी के बाद 'राजस्थान सेवा सघ' का काय मन्द पड़ गया था। काग्रेस में अब तक दो दल हो गये थे जिनमे एक दल गाधीवादियो का था जिसका नायक जमनालाल बजाज था। उसका स्थानीय प्रतिनिधि हरिभाऊ उपाध्याय था। काग्रेस के दूसरे दल का नेतृत्व अजुनलाल सेठी कर रहा था। उसकी अजमेर व ब्यावर की शाखा मे कुछ काम हो रहा था लेकिन पुष्कर, केकडी, कोटा, करौली, जोधपुर आदि की शाखा नाम-मात्र को थी। इन दोनो दलो मे पारस्परिक सहयोग का अभाव या। ई० सन् 1927 मे कैद से छूटने पर पथिय को महात्मा गाधी ने साबरमती बुलाया। गांधीजी की इच्छा थी कि पथिक जमनालाल बजाज के पथ-प्रदशन मे राजस्थान मे काम करे लेकिन पथिक नहीं माने। वह केवल सहयोग रखने को तयार थे। अत दोना दलो मे भीतरी मत-भेद बढता ही गया। सेवा संघ शीघ्र ही समाप्त हा गया। अर्जुनलाल सेठी तथा हरिभाऊ उपाध्याय के बीच मे भी दल का चुनाव युद्ध छिड़ गया। दोनो पार से कई प्रकार की अवाछनीय कार्रवाइया हुई। अन्त मे सेठी को हार खानी पड़ी। उसका राजननिक जीवन ही समाप्त हो गया। प्रान्तीय काग्रेस मे गाधीवादी दल की प्रधानता 62 ] हो गई लेकिन फिर भी पारस्परिक मतभेद समाप्त नहीं हुए। अत काग्रेस मगठन उतना शक्तिशाली न हो सका जितना कि होना चाहिये था । नरेन्द्र मण्डल वायमगय लॉड लीटन का प्रस्ताव था कि सरकार की महायता के लिये भारत के पडे-बडे राज्यो के नरेशो की भारतीय प्रिवी शामिल बनाई जाने लेकिन उसके ममय म यह नहीं हो सका। वाद म लॉड कर्जन ने यह घोपणा की कि भारतीय माम्राज्य संगठन में देशी नरेशो का महत्वपूर्ण स्थान है। प्रत देशी नरेशा की कोसिल स्थापित की जावे लेकिन वह भी अपने विचार सराय-म्प म परिगित नहीं कर सका। इसी प्रकार लॉड मिण्टो ने भी एक शाही मनाहकार परिषद बनाने का प्रस्ताा रखा था। प्रथम विश्व युद्ध के समय यहा के गजानो ने इतना दिल खोल कर अग्रेजो की सहायता की थी कि त्रिटिश मरकार न यह उचित समझा कि गजायो की आवाज बुल द करने के लिये कोई मम्था हो। अत उमके आदेश से वायसराय लॉर्ड चेम्सफोड ने ई० मा 1916 मे नरेशो का सम्मेलन बुलाया। युद्ध के बाद साम्राज्य की पहली युद्ध परिपद तथा बाद मे वाईि की सन्धि परिपद मे भारतीय नरेशो के प्रतिनिधि के रूप मे बीकानेर नरेश गगासिंह को भेजा गया । “म प्रकार भारतीय गजनैतिक क्षेत्र मे नरेशो का महत्व बढने लगा। ६० मन् 1919 मे माटेग्यू-चेम्सपाद रिपोट में रतलाया गया कि नरेगा पसी पर परिषद होना आवश्यक है क्यानि "ऐसे अनेक प्रश्न पा जाते हैं जो या तो मामा यत देशी राज्यों से सम्बन्धित होत है या ममम्न साम्राज्य और यग्रेजी भारत एव देशी राज्यो पर समान अमर डालने वाले होते है । यायगराय एगे मामा यो मामिल ये पास भेजे और राजाओं के विचारपूण वाद विवार ग मग्रार लाभ उठाये ।" हमी वप देशी नरेशो का एर सम्मेव- उपयुक्त प्रगावो पर विचार पर ऐसी तासित का नाम 'नरे पा प्रताप पारित किया गया। इस प्रस्ताव को मिति पर रिया। प्रत 1921 मी 8 फरवरी को । जिसमे हमा ।' नरेट मण्यार म पुर 120 गदम्य- पापा पर 12 दितीय धरणी में 127 नरे कार। मप 327 गग्या मा पोई प्रतिनिधि मशाग पाग, साया प..
[ 63 18 राज्य प्रथम श्रेणी में आ गये थे। इसका अधिवेशन प्रतिवप जनवरी या फरवरी में दिल्ली मे होता था। इसकी अध्यक्षता वायसराय करता था लेकिन उसमी अनुपस्थिति में चासलर करता था जो प्रतिवर्ष नरेन्द्र मण्डल द्वारा चना जाता था। मण्डल द्वारा उन्ही विषयो पर विचार किया जाता था जिनकी वायसराय स्वीकृति देता था। ई० सन् 1927 तक इसका अधिवेशन वन्द कमरे मे होता था लेकिन 1928 से खुला अधिवेशन होने लगा। मण्डल द्वाग एर स्थाई समिति, जिसमे चार मदस्य होते थे, चुनी जाती थी। इनमे राजस्थान, बम्बई, म यभारत तथा पजाब के राज्यो का एक-एक सदस्य होता या। स्थाई समिति की बैठक वर्ष मे दो या तीन बार होती थी। नरेन्द्र मण्डल के क्त्तव्य व अधिकार, नरेन्द्र मण्डल की स्थापना के समय सम्राट की ओर से की गई शाही घोपणा मे बतला दिये गये थे- "वायसराय नरेन्द्र मण्डल से उन मामलो पर सलाह लेगे जो सामान्यत देशी राज्या से सम्बधित होगे और जिनका प्रभाव देशी राज्यो तथा अंग्रेजी भारत या मेरे साम्राज्य के अन्य भागों पर मम्मिलित रूप से पडता हो । क्सिी राज्य विशेप अथवा देशी राज्यो के नरेशो के व्यक्तिगत मामलो या किसी राज्य विशेष और मेरी सरकार के सम्बधो से इसका कोई सम्बध नही होगा। राज्या के वर्तमान ढग और उनके काय की स्वतन्त्रता मे इससे कोई वाधा नही पडेगी।" नरेद्र मण्डल में कठिनाई से 50 सदस्य ही भाग लेते थे और ये सदस्य भी मभा भवन में कम ही बैठते थे। राज्यो की प्रजा का न तो प्रतिनिधित्व या ओर न उनके हितो के लिये कोई बात ही की जाती थी। कोई भी पारित प्रस्ताव उपस्थित या अनुपस्थित सदस्यो पर विना उसकी स्वीकृति के लागू नही हो सकता था । अत यह केवल सलाहकार सस्था बन कर रह गया। इस प्रकार नरेन्द्र मण्डल की स्थापना के कारण 562 राज्य आपस मे बँट गये। बड़े राज्य छोटे राज्यो से अलग हो गये। अत नरेन्द्र मण्डल के कारण राजामो मे सगठन होने के बदले विघटन हो गया । भारत के पाच राज्यो के नरेश ही नरेन्द्र मण्डल में ज्यादा रुचि लेते थे जिनमे बीकानेर व अलवर नरेश मुग्य थे। इस समय जन आन्दोलन तेजी से चल रहे थे जिनका मुख्य उद्देश्य स्वराज्य प्राप्त करना था। अत नरेन्द्र मण्डल का इस ओर विशेप ध्यान गया और उसने यह प्रयत्न किया कि देशी राज्यो का भारत सरकार तथा त्रिटिश 64 ] भारत में मसार गे गाम्नय में पगे गीITT गम्पप है :गा गुजागा हो जाय । यो गजामा मे अपनी याग्नपित शि दिसी ही थी शिग सगे गजनंतिय प्रादोरनापा विगार पर ये गुड नाम उठाशा मारा थे। प्रत लिने ही नरेगा ने यह मांग मी पि गर्योग गत्ता गे माय नो गया या युनामा होगा प्रायश्यम है और जगगे पागारही यागारमा पायि । राजामा यो गी:च्छापा ग्यान पर यायमाय न गजामा प्रतिनिधिया पी एप बंटर मई 1927 म नाई। गठा म या पिणय लिया गया नि ममिति राजामा में भारत मगार या प्रिटिश मगर गे गम पानी जाच ये निये नियुक्त पी जार।" बटलर जाच समिति देशी राज्यो तथा प्रिटिश गग्गार पपी पपा गमध थे, माग हमे पायमराय लॉर्ड रोहिंग ये 27 माच 1926 में पत्र में मिलता है जो उमा हैदरावादी निजाम को लिया था 198 उमम यहा गया है-' निटिश ताज की प्रभुमत्ता मर्वोच्च है मार इम पारण पोई भी नरेश ग्रिटिंग सरयार मे समानता पर बातचीत परोपा अधिकार नही पर गश्ता है । उमयी सर्वोच्चता येवल मनद और गधियों पर ही प्राधारित नहीं है पनि उनसे म्वतत्र है। विदेश नीति और विदेशी राष्ट्रो ये विषय में हस्तक्षेप की बात छोडवर भी, ब्रिटिश सरकार का यह अधिाार और पत्तव्य है कि यह ममस्त भारत में देशी राज्यों से दिये गये समझौता प्रार मधिया या मम्मान करते हुए शाति और सुव्यवस्था बनाये रमे । देशी राज्या थी प्रातरिय व्यवस्था में हस्तक्षेप करने का ग्रिटिश सरकार का अधिकार ब्रिटिश ताज के सर्मोच्च सत्ता से मम्बघित है। जहा साम्राज्य के हितो या प्रश्न हो या रिसी राज्य की जनता के सामाय वल्याग में उसकी मरवार के कार्यों से बाधा पडती हो तो उसके लिये कार्रवाई करन का उत्तरदायित्व सर्वोच्च सत्ता पर आ पडता है। प्रातरिक व्यवस्था या अधिकार जो देशी गज्यो को प्राप्त है वह सर्वाधिकारी सरकार के इस उत्तरदायित्व को शत पर ही निर्भर है। सर्वोच्च सत्ता का यह अधिकार है कि वह दो राज्यो के भगडो का अथवा उसके तथा एक राज्य के बीच विवाद का निरणय कर दे। यद्यपि कुछ मामलो मे मध्यस्थ अदालत नियुक्त की जाती है पर उसका कार्य स्वतत्र रूप से भारत सरकार को केवल परामश देना है, जिस पर निणय करने का अतिम दायित्व है। मुझे यह स्मरण कराने की आवश्यकता नही कि इस अधिकार को देशी [ 65 नरेशो ने सम्मिलित रूप से माटग्यू चेम्सफोर्ड रिपोर्ट के पैरा 208 मे स्वीकार पर लिया है। यह व्यर्थ है कि जिस विषय में निणय हो चुका है उमको दोनो दलो मे वाद-विवाद के स्प मे चलाया जाये ।"99 यह पत्र देशी राज्यो तथा ब्रिटिश सरकार के सम्बधो को स्पष्ट करता है। इसी कारण इसका ऐतिहासिक दृष्टि से बड़ा महत्व है। इस पन के कारण राजायो मे काफी असन्तोप फैल गया और वे अपने तथा भारत मरकार के वीच के सम्बन्धा के खुलासे के लिये बरावर माग करने लगे। अत ब्रिटिश सरकार ने हरकूट बटलर की अध्यक्षता मे 'देशी राज्य जाच ममिति' की 1927 मे नियुक्ति की, ताकि वह भारत सरकार व देशी राज्यो के बीच के सम्बन्धा की जाच करे तथा उनके सन्तोपजनक सामजस्य के लिये यावश्यक मलाह दे । यह केवल समिति थी। इसे कोई निर्णय लेने की शक्तिया नहीं दी गयी थी। इस समिति को परमोच्च शक्ति के साथ रियासतो के चालू सम्बधो की जाच करना या तथा इसे यह सिफारिश नहीं करनी थी कि भविष्य में कैसे सम्वन्ध हो या कैसे उनका नियमन किया जावे। फिर भी इस समिति ने अपनी रपट के द्वितीय भाग में भारत सरकार तथा भारतीय रियामतो के बीच के वित्तीय तथा आर्थिक सम्वन्धो का उल्लेख करते भविष्य मे इस क्षेत्र मे क्या-क्या काम किया जावे के लिये सुझाव दिये थे। इस ममिति ने जाच कर निम्नलिखिति सिफारिशे की- । (1) वायसराय, न कि गवर्नर जनरल ताज के प्रतिनिधि के रूप मे गज्यो से सम्बन्ध रखें । (2) ताज तथा नरेशा के सम्बध विना राजानो से सहमति लिये, अग्रेजी भारत की कोई नई उत्तरदाई सरकार को हस्तातरित नहीं किये जायें । (3) राज्यो की परिपद वनाने की योजना रद्द कर दी जाये। (4) किसी राज्य के प्रशासन में हस्तक्षेप वायसराय के निणय के अनुसार ही हो। (5) राज्यो तथा अग्रेजी भारत के वीच कोई विवाद उठ खडे होने पर विशेष समिति नियुक्त कर जाच कराई जाये। (6) देशी राज्यो तथा अग्रेजी भारत के बीच आर्थिक सम्बन्धो की जाच के लिये एक समिति नियुक्त की जाये।
66 ] (7) इगलैण्ड के विश्वविद्यालयों से निकले छात्रों को अलग से भरती कर व प्रशिक्षण देकर राज्यो मे राजनैतिक अधिकारी के पद पर नियुक्त किया जावे। (8) सर्वोच्च शक्ति रियासता की प्रभुसत्ता में सम्पूर्ण भारत के आर्थिक हित हेतु हस्तक्षेप कर सकती है। (9) रियासतो मे सवैधानिक परिवर्तना हेतु किये जाने वाले जन आन्दोलनो के मामले में सर्वोच्च शक्ति ऐसी मागो के पूरा करन हेतु कार्यवाही करने के लिये सुझाव दे सकती है । इस प्रकार वटलर समिति न केवल राजाओं के विषय में बहुत मी सिफारिशे की लेकिन वहा की जनता के विषय मे कुछ नहीं कहा। इसकी सिफारिशी ने अग्रेजी भारत तथा देशी राज्यो के बीच की खाई और ज्यादा चौडी कर दी। भारतीय नरेश समिति की इस सिफारिश से अवश्य प्रसन हुए कि जब भी भारत सरकार भारतीयो के हाथ मे दी जायेगी तब वे उसके नियत्रण से बाहर रखे जायेगे। समिति की रिपोट से यह भी स्पष्ट हो गया कि ब्रिटिश सरकार राज्यो मे किसी प्रकार के सुधार नहीं चाहती थी। उसने कभी यह नहीं सोचा कि राज्यो में उत्तरदायो या लोकप्रिय शासन हो । राजाप्रो को अब यह भी ज्ञात हो गया कि उनके साथ की गई सन्धिया, शतनाम आदि रद्दी कागज है और वे पूर्णतया ब्रिटिश सरकार के अधीन है। इस प्रकार इस समिति की रिपोर्ट से न तो यहा के नरेश मतुष्ट हो सके और न राज्या की जनता ही। इस रिपोट को न केवल राजाओ वरिक जनता ने भी अपने लिये हितकर नहीं माना। अत बटलर समिति की रिपोर्ट का सवय बहिष्कार किया गया तथा उत्तरदायी सरकार की स्थापना के लिये बराबर माग की जाती रही। साईमन कमीशन जनता में बढते असन्ताप तथा अविश्वास की भावना को कम करने के लिये ब्रिटिश सरकार ने एक कमीशन ई० सन् 1927 में जॉन साईमन की अ यक्षता में नियुक्त कर भारत भेजा। इसके सभी सदस्य अग्रेज थे जबकि भारतीयों की माग थी कि इसके कुछ सदस्य भारतीय भी हो। अत भारतीया ने इस कमीशन का प्रारम्भ से ही वहिप्कार किया 1100 यह कमीशन फरवरी 3 से 31 मार्च 1928 तक तथा 11 अक्टूबर 1928 से 13 अप्रेल 1929 तक भारत मे रहा। भारत में जहा भी यह कमीशन गया जनता ने हडताले कर [ 67 इमका विरोध किया। अत काफी स्थानो पर लाठी के प्रहार भी किये गये तथा गोलिया चली। दिमम्बर 1928 मे काग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में यह प्रस्ताव पारित किया गया कि ब्रिटिश सरकार एक वप के भीतर उपनिवेशिक स्वराज्य दे देवे अन्यथा काम पूर्ण स्वराज्य की माग करेगी। ई० सन् 1929 के अन्त तक सरकार की ओर से कोई प्राश्वासन नहीं दिया गया। सरकार ने केवल एक गोन मेज सम्मेलन बुलाकर उपनिवेशिक सविधान का प्रारूप तैयार करवाने का कहा लेकिन भारतीय नेता इससे सन्तुष्ट नहीं हुए और 31 दिसम्बर 1929 को यानेस ने घोपणा की कि उसका उद्देश्य पूर्ण स्वतन्यता प्राप्त करने का ही है। उसी रात के 12 बजे पूर्ण स्वतन्त्रता का झण्डा फहरा दिया गया। 31 अक्टूबर 1929 को वाइसराय लॉर्ड इरविन ने घोषणा की कि अग्रेजी सरकार की नीति है कि भारत को डोमेनियम म्टेटस दिया जावे। काग्रेस ने तय किया कि धारा सभा के सभी काग्रेस मदस्य स्तीफा दे देवे तथा सम्पूण भारत में 26 जनवरी को पूर्ण स्वराज्य दिवस (स्वतन्त्रता दिवस) मनाया जावे। उस अवसर पर गाधीजी द्वारा तैयार की गयी घोपणा भारत भर में नगरो व गावो मे जनता के समक्ष पटी जावे तथा हाथ उठवाकर श्रोताओ की सहमति ली जावे। इस प्रकार प्रत्येक भारतीय को पूण स्वतन्त्रता यी उद्घोपणा करनी थी तथा भारतीय राष्ट्रीय काग्रेस के प्रति निष्ठा तथा भारतीय स्वतन्त्रता के लिये लडने का प्रण लेना था। तदनुसार सम्पूर्ण भारत मे 26 जनवरी 1930 को स्वत त्रता दिवस बडे धूमधाम से मनाया गया तथा म्वत त्रता की घोपणा सभानो मे पढी गई। जनवरी 30 को महात्मा गाधी ने सरकार के सामने 11 मागे रखी और सरकार को सूचना दी कि यदि ये मागे पूरी नहीं की गई तो वह नागरिक अवज्ञा आन्दोलन प्रारम्भ करेंगे। सरकार ने कोई ध्यान नहीं दिया। गाधीजी 12 माच को अपने 78 साथियों के साथ नमक कानून तोडने के लिये डाण्डी से रवाना हुए। इस सत्याग्रह का सन्देश तत्काल सम्पूर्ण भारत मे फैल गया। गाधीजी ने अप्रेल 6 को समुद्र के किनारे से नमक उठाकर सत्याग्रह प्रारम्भ किया। अब तो नमक ने जनता में शक्ति भर दी। लगभग 75000 व्यक्तियो ने सत्याग्रह मे भाग लिया और गिरफ्तार हुए। उनको सख्त सजायें दी गई तथा उनकी सम्पत्ति जन्न कर ली गई। स्त्रियो ने शराब की दुकानो तथा विदेशी वस्यो की दुकानो पर धरना देकर तथा चर्खे का प्रचार करके सत्याग्रह में भाग लिया। उनको भी गिरफ्तार किया गया तथा सजायें दी गई।101 68 ] राजस्थान में सत्याग्रह का केन्द्र अजमेर रहा। अजु नलाल मेठी, विजयसिंह पथिक, हरिभाऊ उपाध्याय, जीतमल लूणिया, रामनारायण चौधरी, अचलेश्वरप्रसाद शर्मा आदि कई सत्याग्रही गिरफ्तार किये गये । अय राज्या वे व्यक्तियो ने भी अजमेर पाकर सत्याग्रह में भाग लिया पार गिरफ्तार हुए। व्यावर मे अजमेर से भी अधिक जोश दिसाई दिया। ऐसे ही वातावरण में साईमन कमीशन की रिपोर्ट प्रिटिश सरकार को पश की गई जो 7 जून 1930 को प्रकाशित की गई। इसने देशी राज्यों के लिये लगभग वही वाते कही जो बटलर कमीशन न यतलाई थी। माईमन कमीशन ने यह सुझाव दिया कि 'भारत को एक सघ राज्य बनाया जाए जिसम देशी राज्या व अग्रेजी प्रातो को सम्मिलित किया जाये। उनको प्रातरिक मामलो में स्वतयता दे दी जाये। देशी राज्यो के मामला की देखरेख वायसराय के मप में तथा अग्रेजी प्राता का काय गवनर जनरल के रूप में एक ही व्यक्ति करता रह ।'10' इस प्रकार का सघ बनाने से ब्रिटिश सरकार देशी राज्यो को अपने वश मे रख सक्ती थी तथा उनको अग्रेजो प्रातो के विरुद्ध एक रोक भी बनाये रख सकती थी। उन्होने जनता को आवाज तथा समय को नही पहनाना । उनके सामने ही रूस के वादशाह जार तथा जमनी के बादशाह केमर को जनता द्वारा हटाये जाने का उदाहरण था फिर भी उहोन इस पहलू पर कतई ध्यान नहीं दिया। ऐसा कर उहोने अनायास ही जनता को अपना प्रवल विरोधी बना लिया। गोल मेज सम्मेलन ब्रिटिश सरकार ने अव भारतीयो को ललचाने के लिये साईमन समिति की सिफारिशो के आधार पर भारत का नया सविधान बनाने के लिये अग्रेजी लोकसभा के 16 सदस्यो तथा अग्रेजी प्राता व देशी राज्या के 73 व्यक्तियो को भारत का प्रतिनिधि बनाकर, लन्दन मे एक गोल मेज सम्मेलन बुलाया जो 12 नवम्बर 1930 से 19 जनवरी 1931 तक लन्दन में चलता रहा। इस सम्मेलन में राजामओ ने बडी देशभक्तिपूण बाते की। उन्होने इस शत पर सघ शासन मे पाना स्वीकार किया कि उनके सर्वि अधिकार सुरक्षित रखे जावेग । मुस्लिम लीग ने भी सघ शासन स्वीकार कर लिया। सम्मेलन के अन्तिम दिन त्रिटिश प्रधानमत्री ने नये शासन विधान की भावी योजना की रूपरेखा इस पकार बतलाई -'भारत का भावी केन्द्रीय शासन एक संघीय विधान सभा के प्रति जिसमे अग्रेजी प्रातो और देशी राज्यो के भी प्रतिनिधि सम्मिलित होग, [69 अशत जिम्मेवार होगा क्योकि सामरिक, विदेशिक और आर्थिक मामलो मे सघ सभा का नियत्रण नहीं रहेगा। प्रातो को शासन के आतरिक मामलो में पूण स्वतत्रता दी जावेगी।103 इस सम्मेलन की समाप्ति के 6 दिन बाद ही 26 जनवरी 1931 को काग्रेस की कायकारिणी के सदस्यो को जेल से छोड दिया गया। महात्मा गांधी ने 17 फरवरी को वायसराय लार्ड इरविन से मुलाकात की और उससे समझौता 5 मात्र को किया। इसके अनुसार भारत को केन्द्रीय शासन मे कुछ सुरक्षित विपया को छोड पाशिक उत्तरदायी शासन और प्रातो मे पूर्ण उत्तरदायित्वपूर्ण शामन मिलना था। इस समझौते पर 5 माच को हस्ताक्षर हुए और तव ही सत्याग्रह और अंग्रेजी माल का वहिप्कार बद कर दिया गया 1101 समझौते के अनुसार सभी सत्याग्रही छोड दिये गये लेकिन अय क्रान्तिकारियो व तोड-फोड करन वाले गिरफ्तार सत्याग्रहियो के लिये कोई समझौता नहीं किया गया। इसी कारण इस समझौते के बाद ही 23 माच को प्रसिद्ध कातिकारियो- भगतसिंह, सुसदेव व राजगुरु को फासी दे दी गई और उनकी लाशे गुप्त रीति से नष्ट कर दी गई 1105 जव जनता को इसका पता चला तो उन्हे बहुत दुख हुअा। राष्ट्रवामियो और नवयुवको मे गाधीजी के नेतृत्व के प्रति गहरा असन्तोप फैल गया। फिर भी काग्रेस के कराची अधिवेशन मे यह तय किया गया कि काग्रेस का प्रतिनिधित्व गोल मेज मे केवल गाँधीजी करे जबकि वायसराय ने काग्रेस के 16 प्रतिनिधि लेने की स्वीकृति दे दी थी। देशी राज्य लोक परिपद ने भी रियासती प्रजा का प्रतिनिधि गाधीजी को ही बनाया। ई० सन् 1931 की 7 सितम्बर से शुर होने वाले द्वितीय गोल मेज सम्मेलन मे गाधीजी ने भाग लिया लेकिन मुस्लिम सम्प्रदायिक नेताओं और विशेष हितो के हिमायतियो ने गाधीजी की नहीं चलने दी। राजानो के प्रतिनिधियो, जिनमे बीकानेर नरेश गगासिंह मुग्य थे, ने प्रस्तावित मघ परिषद मे जनता के चुने हुए प्रतिनिधियो को लिये जाने की माग का बहुत विरोध दिया। इस सम्मेलन में ज्यादा वाद-विवाद विधान सभायो के निर्माण के सम्बध में, अर्थात् अल्प सरयको के विषय मे ही हुआ। लगभग चार माह तक सम्मेलन चला। गाधीजी के भारत में आने के बाद ही सरकार ने नये दमनकारी कानून बनाकर काग्रेस को गैर-कानूनी घोपित कर दिया। गाधीजी तथा कई प्रय नेता शीघ्र गिरफ्तार कर लिये गये 1108 राजस्थान में भी काग्रेस तथा इमसे सम्बद्ध नौजवान भारत सभा, भारतीय सेवा दल प्रादि 70 ] सस्थानो के कायकर्ता एकदम गिरफ्तार कर लिये गये। इन मस्थानो की सम्पति भी जब्त कर ली गई। ब्रिटिश प्रधानमत्री मेक्डोनल्ड ने शीघ्र ही मुसलमानो, सिक्खो, ईसाईयो, यूरोपियनो, एग्लोइण्टियनो, अछूनो तथा मराठो के लिये अलग निर्वाचक मण्डल होने की घोपणा की ताकि इन अल्प सग्यको के अधिकार सुरक्षित रह सके। इनको जनस या के अनुपात से ज्यादा म्यान दिये। गाधीजी ने अछूता को हिन्दुओ से अलग मानने का विरोध किया और इस कारण जेल मे रहते आमरण उपवास दिया जिसके कारण एक समझौता किया गया कि उनके अलग मतदाता नहीं होगे लेकिन उनको काफी ज्यादा सीटे दे दी जावेगी। अछूतो के लिये तव से हरिजन शब्द का प्रयोग किया जाने लगा। छूआछूत निवारण तथा हरिजनो की उनति के लिये हरिजन सेवा संघ की स्थापना की गई।107 ब्रिटिश सरकार ने दिखावे के लिये गोलमेज सम्मेलन का तीसरा अधिवेशन 17 नवम्बर से 24 दिसम्बर तक दिया। यह सम्मेलन सविधान के सिद्धान्तो को निश्चय करने के लिये बराबरी के लोगो का नहीं था। इसमे कायेस तथा मुस्लिम नेताओं को नहीं बुलाया गया। रियासतो को इसकी कार्यवाहियो के प्रति कोई रूचि नही थी। इस कारण किसी नरेश ने इसमे भाग नहीं लिया। उनका प्रतिनिधित्व उनके मनियो व अधिकारियो ने किया । ब्रिटिश मजदूर दल ने भी सम्मेलन में भाग लेने से मना कर दिया। गोल मेल सम्मेलन की समाप्ति के बाद 15 मार्च 1933 के ब्रिटिश सरकार ने श्वेतपन प्रकाशित किया जिसमे प्रस्तावित सविधान की पूरी रूपरेखा दी हुई थी। इसमे साइमन आयोग की प्राय सिफारिणे थी परन्तु इसके दूसरे भाग मे केद्र की सघीय भारत की योजना थी जो कुछ शर्ते पूरी जाने पर कार्यरूप मे आनेवाली थी। शर्त यह थी कि राज्यो की एक निश्चित सख्या इस सघ के पक्ष मे हो 1108 भारत सरकार अधिनियम 1935 यह अधिनियम पहली अप्रैल 1937 से लागू कर दिया गया। इसका एक भाग केन्द्रीय सरकार के गठन से सम्बघित था और उसे लागू करने के लिये यह शर्त थी कि पहले पर्याप्त सस्या मे देशी राज्य सघ में सम्मिलित हो जाए लेकिन यह शर्त पूरी नहीं हुई। इस कारण संघीय विधान स्थगित रहा। अधिनियम के एक प्रावधान के अनुसार सारे भारत का एक संघ बनना था जिसमे अग्रेजी भारत के प्रान्त और भारत के देशी राज्यो को भी सम्मिलित ।
-- [Ti होना था। वह शर्त पूर्ण न होने पर 1919 का भारत सरकार अधिनियम कुछ सशोधनो के साथ लागू रहना था। अधिनियम 1935 के अनुसार सघीय सभा के दो सदन बनाए गए थे। ऊपरी सदन मे 260 प्रतिनिधि होने थे जिनमे से 104 राजानो द्वारा मनोनित होने थे। शेप 156 में से 75 साधारण, 6 अनुसुचित जाति, 4 मिक्ख, 49 मुसलमान, 6 स्त्रिया व 10 अन्य (6 एग्लो- इडियन, यूरोपियन व भारतीय ईसाई) व 6 गवनर जनरल द्वारा नामाक्ति होने थे। इस प्रकार बहुसख्यक हिन्दुओ के केवल 31 प्रतिशत सदस्य लिये जाने थे। अधिनियम के निर्माता चाहते थे कि शासन मे रियासतो का विशेष हाथ हो ताकि सामाजिक बदलाव और राजनैतिक प्रगति मे वे रोडे अटकाते रहे। इसी कारण रियासतो को जनसख्या भारत की कुल जनसस्या का 24 प्रतिशत होते भी उनको 40 प्रतिशत स्थान दिया गया। या राजस्व में भी खर्च का दसवा भाग देने वाले राज्यो को 4/10 भाग दिया जाना था। संघ की विधान सभा में भी 375 सदम्यो मे से 125 सदस्य राज्यो के होते अर्थात 24 प्रतिशत आवादी एक तिहाई प्रतिनिधित्व करती 1100 इस प्रकार राजापा के पक्ष में यह अधिनियम बनाने पर भी राजाओं ने अपनी पूर्व प्रतिष्ठा व सम्मान का बने रहने का आश्वासन चाहा। वे चाहते थे कि उनके सवैधानिक अधिकार, आतरिक स्वायतता और सावभौमिकता पूर्व जैसी ही बनी रहे। जब उन्हे इसका आश्वासन नहीं मिला तो उन्होने सघ में मिलने से मना कर दिया। ऐसा कर वे अपनी जनता की दृष्टि से गिर गये और साथ ही भारत के राष्ट्रीय नताओ की दृष्टि मे भी। अग्रेजी सरकार राजानो से आशा करती थी कि वे सघ में सम्मिलित होकर राष्ट्रीय तत्वा का विरोध करते रहेगे तथा गतिरोधात्मक भूमिका निभाते रहेगे। सप मे सम्मिलित न होकर वे उनकी दृष्टि में भी महत्वहीन हो गये। वायसराय लिनलिथगो ने अधिनियम लागू होने के बाद भी राजाओ को सघ मे मिलाने के प्रयत्न जारी रखे। मार्च 1939 में नरेन्द्र मडल के वार्षिक अधिवेशन में अध्यक्षता करते हुये वाइसराय ने यहा तक कहा कि रियासतो ने जो भी प्रश्न उठाये थे उनका निणय कर दिया गया है और सशोधित अधिमिलन प्रलेख हस्ताक्षर के लिये नरेशो के पास भेज दिया गया है। वाइसराय ने रियासतों को आश्वासन दिया कि राज्यो मे सवैधानिक और प्रशासनिक परिवर्तन करना पूर्ण रूप से नरेशो के ही अधिकार में होगा और सरकार उन पर किसी भी प्रकार का दवाव नही डालेगी। इस पर 10 जून 1939 को नरेशो व उनके 72 ] प्रत . मत्रियों ने पुन विचार किया लेकिन उहे नया अधिमिलन प्रलेस और फडरेशन की शर्ते असतोषप्रद तथा अस्वीकारीय जान पडी अत कोई अतिम निणय नहीं लिया जा सका। पुन वार्ता चली लेकिन कोई समझौता नहीं हो सका। अग्रेजो का उनपर विश्वास न रहा । तब ही द्वितीय विश्व युद्ध प्रारम्भ हो गया और सघ योजना पटाई में पड़ गई 1110 अब राजाओं व उनकी जनता के बीच कटुता बढती ही गई। प्रजा मण्डलो की स्थापना ई० सन् 1930 के नागरिक अवज्ञा आदोलन ने राजस्थान की जनता को नई जागृति दी। ब्रिटिश सरकार ने गोल मेज सम्मेलना मे गजामा को आश्वासन दिया कि उनके साथ की गई सधियो के अनुसार राज्यो म होने वाले पादोलना से उनकी रक्षा की जावेगी लेकिन जनता के मूल अधिकारा की रक्षा के लिये कुछ भी नहीं किया। जनता। न केवल ब्रिटिश सरकार वल्कि अपने राजामो के प्रति भी अपनी परम्परागत श्रद्धा भावना को छोडने लगी। अब वह उत्तरदाई शासन की वरावर माग करने लगी। लाहोर के काग्रेस अधिवेशन में यह निणय लिया गया कि राज्यो म जनता के पथ प्रदर्शन तथा राजनैतिक जागृति के लिए वहा भी मगठन बने । इसके फलस्वरूप कुछ राज्यो मे प्रजामण्डल स्थापित हुए। जयपुर में नवयुवक संघ तथा वाल भारत सभाएँ स्थापित हुई। नवम्बर 1931 मे पुष्कर मे चादकरण शारदा के सभापतित्व मे मारवाड राज्य लोक परिपद का प्रथम अधिवेशन हुा ।12 ई० सन् 1930 मे जव भारत में नागरिक अवज्ञा आन्दोलन प्रारम्भ हुमा तब जोधपुर के जयनारायण व्यास, गणेशलाल व्यास, अचलेश्वरप्रसाद शर्मा, मानमल जैन, अभयमल मेहता आदि युवक कायक्र्तानो ने अजमेर जाकर सत्याग्रह किया और गिरफ्तार हुए। अजमेर मे हरिभाऊ उपाध्याय, स्वामी कुमारानन्द आदि गिरफ्तार कर लिये गये। जनवरी 26 को राष्ट्रीय झण्डा फहराने के कारण जोधपुर मे छगनलाल चौपासनीवाला पुलिस द्वारा बुरी तरह पीटा गया ।113 सन् 1932 मे वीकानेर मे सीताराम सर्राफ, स्वामी गोपालदास आदि पाठ काग्रेसी नेतानो पर राजद्रोह एव पडयन के मुकद्दमे चलाये गये और सत्यनारायण सर्राफ को 7 वर्प, सूबराम सर्राफ को 5 वप, स्वामी गोपालदास को 4 वप, च दनमल बहड को 3 वप तथा शेष चार को दो वष से तीन माह [ 73 . तक की सजाये दी गई। इस प्रकार की कठोर सजाये देने में राज्य का एक- मान उद्देश्य सारे राज्य मे आतक पैदा कर जनता को भयभीत करना था। फिर भी यहाँ के निवासियो ने कलकत्ता मे ई० सन् 1935 मे प्रजा मण्डल की म्थापना की तथा वहाँ से लोगो मे प्रचार किया। अगले वर्ष बीकानेर नगर मे भी प्रजा मण्डल की स्थापना की गई। महाराजा ने शीघ्र ही उसके कार्य- कर्तामो को गिरफ्तार कर लिया।115 यो बीकानेर नरेश गगासिंह अपने को अत्य त प्रगतिशील व सुधारक नरेश वतलाता था। वह साम, दाम दड व भेद की नीतिया मे पारगत था। ई० सन् 1937 मे तत्कालीन जोधपुर राज्य के प्रधान मनी क्नल फिरड को जयनारायण व्यास को सहायता देने के विषय में, एक पत्र लिखकर वह अपने को राष्ट्रीय नेताओं का हमदद बनने का प्रयत्न भी कर चुका था।116 लेकिन अपने राज्य की जनता के राजनैतिक व नागरिक अधिकारी को कुचलने मे उसने कोई कसर नहीं रखी। जोधपुर मे 1934 मे मारवाड राज्य प्रजामण्डल स्थापित हुआ । ई० सन् 1934 मे रणछोडदास गट्टाणी की अध्यक्षता मे नागरिक स्वतता सघ स्थापित हुया तायि नागरिक स्वतन्त्रता के लिये आदोलन किया जा सके। इन मस्यायो की राजनैतिक गतिविधियो को देखकर राज्य सरकार ने दोनो मम्थानो को ई० मन् 1936 मे ही गैरकानूनी घोपित कर दिया। जोधपुर प्रजा मण्डल के कुछ कार्यकर्ता नजररद कर दिये गये। अगले वप कुछ और गिरफ्तारिया राज्य को भारत सघ मे मिलने के मामले को लेकर की गई। प्रजामण्डल तथा नागरिक म्वतन्त्रता मघ की समाप्ति पर एक नई सस्था मारवाड लोक परिपद मई 1938 मे महागजा की छत्रछाया में उत्तरदाई सरकार स्थापित करने के उद्देश्य से स्थापित की गई ।। सिरोही राज्य के कुछ लोगो ने बम्बई में ई० सन् 1935 मे प्रजा मण्डल की स्थापना कर वहा से ही राज्य में चल रही धाधली का विरोध करना तथा उत्तरदाई सरकार की स्थापना करने की माग करना प्रारम्भ किया। इनमे गोवुलभाई भट्ट, भीमशवर शर्मा, टेकच द सिंघी, वृद्धिशकर त्रिवेदी, भबूतमल सिंघी आदि मुग्य थे। ई० सन् 1939 यी जनवरी 22 को जब कायरर्तायो ने एक राजनैतिक सभा सिरोही नगर में वो तव सात व्यक्तियो-गोकुन भाई भट्ट, पुखराज सिंघी आदि को गिरफ्तार कर लिया गया। इसका जनता ने वडा पिरोध किया। पाच दिन तक विरोध चलता रहा अत राज्य सरकार को उहे पिना गत छोडना पड़ा। उस समय ही यहा प्रजा मण्डल की स्थापना हुई।
74 ] इसको गतिविधियो को देखकर राज्य ने इसे नवम्बर 1939 मे गैरकानूनी सस्था घोषित कर दिया तथा इसके प्रमुख नेतामा को गिरफ्तार कर लिया। भरतपुर राज्य मे ई० सन् 1928 मे प्रजा मण्डल की स्थापना सच्चिदानन्द व गोपीलाल यादव ने की। उस समय तक यहा के प्रगतिशीन नरेश कृष्णसिंह को उत्तरदाई सरकार बनाने के प्रयत्न को विफल करने हेतु राजगद्दी से हटाया जाकर प्रशासन अग्रेज अधिकारी मेके जी के हाथा मे प्रा गया था। प्रजा परिपद इसी के कारण समाप्त हो गई। उसरी निरखुशता के विरुद्ध देशराज, गोकुल वर्मा, जगनाथ क्याड, हरिश्चन्द्र शर्मा आदि ने आदोलन किया। छात्रो मे राष्ट्रीय भावना को जागृत करन के कारण यहाँ के अध्यापक प्रादित्येन्द्र को त्यागपत्र देना पडा। ई० सन् 1939 म यहा प्रजा परिषद की स्थापना हुई। इसका पजीयन नहीं किया गया। इसका विरोध करने पर लक्ष्मण स्वरूप त्रिपाठी, कुजविहारीलाल मोदी, शोभाराम, रामजीलाल अग्रवाल, मास्टर भोलानाथ, अब्दुल गफूर, हरिनारायण किंकर, सुशीला त्रिपाठी आदि गिरफ्तार कर लिये गये 1119 जयपुर राज्य के झु भनू क्षेत्र में किसानो ने भी अपनी मागो के लिये अान्दोलन प्रारम्भ किया। ई० सन् 1930 मे झु झनू के 2,000 किसान अपने अधिकारो हतु महाराजा से बातचीत करने के लिये जयपुर भी गये लेकिन कोई सतोषजनक परिणाम नहीं निकला। ई० सन् 1934 मे सीकर में एक जाट प्रजापति महायज्ञ किया गया जो दस दिन तक चला। इसमे लगभग 80,000 किसान इकट्ठे हुए। ऐसे वृहत सम्मेलन को देखकर राज्य सरकार घबरा गई और किसानो का दमन करना प्रारम्भ किया। संक्डो व्यक्तिया को गिरफ्तार किया गया। नरसिंह, मास्टर रत्नसिंह, किशनलाल जोशी आदि को राज्य से निकल जाने का आदेश दिये गये। नरसिंहदास व किशनलाल जोशी ने राज्य से बाहर जाने से इकार कर दिया। अत उनको गिरफ्तार कर सख्त कैद की सजा दी गई। सीवर ठिकाने के अत्याचार चल रहे थे कि सिहोर के ठाकुर ने कुछ किसान स्त्रियो का अपमान कर दिया-कुछ स्त्रिया को वाल पकड कर घसीटा और पीटा। इस पर लगभग 10,000 स्त्रियो ने सम्मिलित होकर माग रखी कि इस प्रकार अपमान करने के कारण ठाकुर को सजा दी जावे, किसानो की मागे स्वीकार की जावे तथा वदोबस्त जयपुर रियासत की देखरेख में कराया जावे। किसानो ने लगान न देने का विचार करते अपनी मागे जयपुर के दीवान के समक्ष रखी। जयपुर दरवार ने 1 [ 75 . ऐसी परिस्थितियो मे सीकर मे केप्टन वेव को नियुक्त कर दिया ताकि वहा किसानो के हित में सुधार कर सके ।120 फिर भी किसानो के हित मे कोई नाम नहीं हुआ और उनमे असन्तोप व्याप्त रहा। सन् 1939 मे जमनालाल बजाज के प्रयत्नो से जयपुर मे प्रजा मण्डल की म्यापना हुई। इसका राज्य ने पजीयन नही किया। बजाज द्वारा विरोध करने पर उसे राज्य की सीमा में घुसने से मना कर दिया गया। इसके विरोध स्वरूप जमनालाल बजाज ने फरवरी 1939 मे जयपुर राज्य में घुसने का प्रयास तीन वार किया। दो वार वह राज्य की पुलिस द्वारा पक्डा जाकर जयपुर राज्य की सीमा के बाहर ले जाया जाकर छोडा गया। अत मे तीसरी वार 12 फरवरी को उसे नजरबन्द कर दिया गया। इस विरोध मे प्रजा मण्डल ने सत्याग्रह चलाया जिसके कारण हीरालाल शास्त्री, कपूरचद पाटणी, चिरजीलाल मिश्र, हरिश्चन्द्र शर्मा, हस डी० राय आदि लगभग 600 व्यक्ति गिरफ्तार हुए। यह मत्याग्रह 18 मार्च तक चला। अन्त मे राज्य सरकार का प्रजा मण्डल से समझौता हो गया। अगस्त 7 को जमनालाल बजाज व अन्य मत्याग्रही छोड दिये गये 1121 जैसलमेर राज्य मे जन जागृति का प्रारम्भ रघुनाथसिंह मेहता ने किया। महाराजा को उसका यह काय खटना और उसको गिरफ्तार कर लिया। उसके बाद जीवनलाल कोठारी ने कुछ काम किया लेकिन वह भी जेल में डाल दिया गया। इसके विरोध में प्रवासी जैसलमेरियो ने वडा आन्दोलन किया ।122 सागरमल गोपा, जो नागपुर मे बैठा जैसलमेर राज्य के जुल्मो के विरुद्ध आवाज बुलद करता रहता था, जैसलमेर आया। वह भी 25 मई ई० सन् 1941 में गिरफ्तार कर लिया गया। वह ई० सन 1946 को 4 अप्रेल को जेल मे ही जीवित जला दिया गया। रियासत के अत्याचार की यह पराकाष्ठा थी। उदयपुर राज्य में कुछ नये करो तथा अधिकारियो के द्वारा जनता के साथ दुव्यवहार करने के कारण जनता ने राज्य के विरद्ध एक प्रान प्रदर्शन किया। पुलिस द्वारा जनता पर लाठी के प्रहार किये गये। अत जनता ने नगर मे सात दिन तक हडताल रखी। अन्त में सरकार को जनता के सामने झुकना पडा और महाराणा को उनकी शिकायतो को दूर करने का आश्वासन देना पडा । जब काग्रेस ने रियासती जनता को मलाह दी कि उसे राजनैतिक अधिकार प्राप्त करने के लिये अपने पावो पर खड़ा होना चाहिये तब यहा भी अप्रेल 1938 में पलवन्तसिंह मेहता की अध्यक्षता में प्रजा मण्डल पी 76 ] स्थापना हुई लेकिन वह शीघ्र ही राज्य द्वारा गैर कानूनी घोषित कर दिया गया। अत अक्टूबर 1938 मे वहा सत्याग्रह किया गया गया। भूरेलाल वया, रमेशचन्द्र व्यास, वलवन्तसिंह मेहता, दयाशकर श्रोत्रिय, नरेन्द्रपालसिंह चाधरी आदि लगभग 213 सत्याग्रही गिरफ्तार किये गये जिनमे से 35 को सजा दी गई। सत्याग्रह का जोर उदयपुर के अलावा नाथद्वारा व भीलवाडा मे विशेष रहा । इस पादोलन के सचालक माणकलाल वर्मा उदयपुर से निर्वासित कर दिये गये। वह प्रजा मण्डल का कार्यालय अजमेर ले आये पार वहा से कार्य चालू रखा । 2 फरवरी 1939 मे उदयपुर राज्य पुलिस ने उन्हे देवली से जवरदस्ती उडा लिया और अपने राज्य में ले जाकर जेल में बद कर दिया। महात्मा गाधी के आदेश से 3 माच को सत्याग्रह बद कर दिया गया। सभी कायकर्ता 1940 मे रिहा किये गये लेविन प्रजा मण्डल से प्रतिरध 1941 मे हटा ।125 विभिन राज्या मे इस प्रकार से राजनैतिर चेतना बढती देखकर वम्बई मे नवम्बर 1938 में विभिन्न राज्यो के नरेशो व मत्रियो ने बीकानेर नरश गगासिंह की अध्यक्षता में एक सम्मेलन किया। इस सम्मेलन मे यह तय किया गया कि रियासतो मे बाहरी आन्दोलनकारियो को घुसने नहीं दिया जाव तथा प्रजा मण्डलो आदि नाम वाली राजनैतिक सस्थाओ को समाप्त कर दिया जावे। यह भी तय क्यिा गया कि स्थानीय प्रादोलनकारियो की शिकायता को जहा तक हो सके जाच कर दूर कर दिया जावे तथा उनका ध्यान कुछ और प्रवृतियो-हरिजन सुधार, ग्रामीण विकास आदि की ओर लगा दिया जावे । उसी वप राज्यो मे जन सुरक्षा कानून व सावजनिक सस्था कानून लगा कर प्रजा मण्डलो की स्थापना करने में बाधायें डाली गई। इस प्रकार स्पाट रूप से राजाओ व जनता के बीच सम्बध बिगडते ही गये। जनता अब राजामो को निरकुशता सहने को कतई तैयार नहीं थी। विभिन्न रियासतो की जनता को विश्वास हो गया कि जब तक भारत स्वतन्त्र नहीं होगा तब तक उहे राजनैतिक अधिकार प्राप्त नहीं होगे। द्वितीय विश्वयुद्ध भारत सरकार अधिनियम 1935 के अन्तगत अग्रेजी प्रान्तो मे जो चुनाव 1936-37 मे हुवे उसमे काग्रेस को अपूर्व सफलता मिली। उहे अब विश्वास हो गया कि यदि देशी राज्यो में भी चुनाव होते तो वे अवश्य सफलता प्राप्त [ 77 । करते। काग्रेस और देशी राज्यो में उसकी प्रतिरूप सस्थानो-लोक परिपद व प्रजा मण्डल-ने उत्तरदायी शासन की माग के लिये आन्दोलन तेजी से प्रारम्भ कर दिये। तब ही 3 सितम्बर 1939 को यूरोप मै अग्रेजो का जमनी से युद्ध शुरु हो गया। द्वितीय महायुद्ध के शुरु होने के पहले ही युद्ध की आशका से ब्रिटिश पालियामेट ने भारत सरकार (सशोधन) अधिनियम 1939 पारित कर युद्ध की स्थिति में भारत सरकार को प्रान्तीय सरकार तथा प्रान्तीय विषयो के प्रशासन के लिये ज्यादा अधिकार दे दिये। काग्रेस ने इस सशोधन को प्रान्तीय स्वशासन को नष्ट करना व तानाशाही स्थापित करना बतलाया। महायुद्ध के प्रारम्भ होते ही वायसराय ने भी भारत को युद्ध मे रत घोषित कर दिया। काग्रेस ने इस घोपणा का विरोध क्यिा व माग की कि ब्रिटिश सरकार भारत के भावी शासन के लिये भी घोषणा करे लेकिन वायसराय ने 17 अक्टूबर 1939 के वक्तव्य मे यही बतलाया कि युद्ध के बाद ही सव दलो से राय लेकर भारत सरकार अधिनियम में परिवतन करेगी तथा उसका अन्तिम ध्येय डोमिनियन पद देना ही है। काग्रेस ने इस घोषणा की निंदा की तथा 8 काग्रेसी मत्रीमण्डलो ने नवम्बर 1939 मे स्तीफा दे दिया काग्रेस का इस प्रकार विरोध स्वरुप मत्रीमण्डल से त्यागपत्र दे देना कोई बुद्धिमानी का काम नहीं था। उसका यह कदम आगे चलकर देश के लिये अत्यत घातक सिद्ध हुआ। अब तक काग्रेस का देश के आधे भाग-पाठ प्रातो पर शासन होने से वह बहुत ही शक्तिशाली बनो हुई थी। इस कारण वह आगे किसी भी समझौते मे बहुत ही महत्व रख सकती थी। इस प्रकार अपने आप मत्रीमण्डल से अलग हो जाने पर वह शक्तिहीन हो गई। तब से अग्रेज हिन्दू-बहुसरयक काग्रेस को अपना शत्रु तथा मुसलमानो को, जिन्होने इस समय युद्ध प्रयत्नो मै अग्रेजो को सहायता देना स्वीकार कर लिया था, अपना मित्र समझने लगी। अत ब्रिटिश सरकार अब काग्रेस को मुस्लिम लीग, जो यद्यपि कही भी अपना मत्रीमण्डल नही बना सकी थी, के वरावर ही मानने लगी। इसी कारण अमेजो के पक्षपात व कूटनोति के कारण आगे चलकर भारत का विभाजन हुआ। एक ओर जहा काग्रेस ने प्रारम्भ से ही अग्रेजो को युद्ध मे महायता देने से इकार किया वहा भारतीय नरेशो ने युद्ध प्रारम्भ होते ही न केवल स्वय वल्कि अपने राज्यो के पूरे साधनो से युद्ध में सहायता देने के लिये, वायसराय 76 ] स्थापना हुई लेकिन वह शीघ्र ही राज्य द्वारा गैर कानूनी घोषित कर दिया गया। अत अक्टूबर 1938 मे वहा सत्याग्रह किया गया गया। भूरेलाल वया, रमेशचन्द्र व्यास, बलवन्तसिंह मेहता, दयाशकर श्रोत्रिय, नरेन्द्रपालसिंह चौधरी आदि लगभग 213 सत्याग्रही गिरफ्तार किये गये जिनमे से 35 को सजा दी गई। सत्याग्रह का जोर उदयपुर के अलावा नाथद्वारा व भीलवाडा में विशेष रहा । इस आदोलन के सचालक मारणक्लाल वर्मा उदयपुर से निर्वासित कर दिये गये। वह प्रजा मण्डल का कार्यालय अजमेर ले आये और वहा से कार्य चालू रखा। 2 फरवरी 1939 मे उदयपुर राज्य पुलिस ने उन्हे देवली से जवरदस्ती उडा लिया और अपने राज्य में ले जाकर जेल मे वन्द कर दिया। महात्मा गाधी के आदेश से 3 मार्च को सत्याग्रह बन्द कर दिया गया। मभी कार्यकर्ता 1940 मे रिहा किये गये लेकिन प्रजा मण्डल से प्रतिवध 1941 मे हटा। विभिन राज्यो मे इस प्रकार से राजनैतिक चेतना बढती देखकर बम्बई मे नवम्बर 1938 मे विभिन राज्यो के नरेशो व मत्रियो ने बीकानेर नरेश गगासिंह की अध्यक्षता में एक सम्मेलन किया। इस सम्मेलन में यह तय किया गया कि रियासतो मे वाहरी आन्दोलनकारियो को घुमने नहीं दिया जाव तथा प्रजा मण्टलो आदि नाम वाली राजनैतिक सस्थानो को समाप्त कर दिया जावे। यह भी तय क्यिा गया कि स्थानीय आन्दोलनकारियो की शिकायता को जहा तक हो सके जाच कर दूर कर दिया जावे तथा उनका ध्यान कुछ पार प्रवृतियो-हरिजन सुधार, ग्रामीण विकास प्रादि की ओर लगा दिया जावे । उसी वप राज्यों में जन सुरक्षा कानून व सावजनिक संस्था कानून तगा कर प्रजा मण्डलो की स्थापना करने मे बाधाये डाली गई। इस प्रकार स्पष्ट रूप से राजाओं व जनता के बीच सम्बन्ध विगडते ही गये। जनता अब राजाओ की निरकुशता सहने को कतई तैयार नहीं थी। विभिन्न रियासता की जनता को विश्वास हो गया कि जव तक भारत स्वतत्र नहीं होगा तब तक उन्हे राजनैतिक अधिकार प्राप्त नहीं होंगे। द्वितीय विश्वयुद्ध भारत सरकार अधिनियम 1935 के अन्तर्गत अग्रेजी प्रातो मे जो चुनाव 1936-37 मे हुवे उसमे काग्रेस को अपूर्व मफलता मिली। उह अब विश्वास हो गया कि यदि देशी राज्यो मे भी चुनाव होते तो वे अवश्य सफलता प्राप्त [ 77 करते। काग्रेस और देशी राज्यो मे उसकी प्रतिरूप सस्थाओ-लोक परिपद व प्रजा मण्डल-ने उत्तरदायी शासन की माग के लिये आन्दोलन तेजी से प्रारम्भ कर दिये। तब ही 3 सितम्बर 1939 को यूरोप मे अग्रेजो का जर्मनी से युद्ध शुरु हो गया। द्वितीय महायुद्ध के शुरु होने के पहले ही युद्ध की आशका से ब्रिटिश पालियामेट ने भारत सरकार (सशोधन) अधिनियम 1939 पारित कर युद्ध की स्थिति में भारत सरकार को प्रान्तीय सरकार तथा प्रान्तीय विषयो के प्रशासन के लिये ज्यादा अधिकार दे दिये। काग्रेस ने इस सशोधन को प्रान्तीय स्वशासन को नष्ट करना व तानाशाही स्थापित करना बतलाया। महायुद्ध के प्रारम्भ होते ही वायसराय ने भी भारत को युद्ध मे रत घोषित कर दिया। काग्रेस ने इस घोपणा का विरोध किया व माग की कि ब्रिटिश सरकार भारत के भावी शासन के लिये भी घोषणा करे लेकिन वायसराय ने 17 अक्टूबर 1939 के वक्तव्य मे यही बतलाया कि युद्ध के बाद ही सव दलो से राय लेकर भारत सरकार अधिनियम में परिवतन करेगी तथा उसका अतिम ध्येय डोमिनियन पद देना ही है। काग्रेस ने इस घोषणा की निंदा की तथा 8 काग्रेसी मत्रीमण्डला ने नवम्बर 1939 मे स्तीफा दे दिया । काग्रेस का इस प्रकार विरोध स्वरूप मत्रीमण्डल से त्यागपत्र दे देना कोई बुद्धिमानी का काम नही था। उसका यह कदम आगे चलकर देश के लिये अत्यत घातक सिद्ध हुआ। अव तक् काग्रेस का देश के प्रावे भाग-पाठ प्रातो पर शासन होने से वह बहुत ही शक्तिशाली बनी हुई थी। इस कारण वह प्राग विसी भी समझौते मे बहुत ही महत्व रस सक्ती थी। इस प्रकार अपने श्राप मत्रीमण्डल से अलग हो जाने पर वह शक्तिहीन हो गई। तव से अग्रेज हिन्दू-बहुसत्यक काग्रेस का अपना शत्रु तथा मुसलमानो को, जिन्होने इस समय युद्ध प्रयत्नो मैं अग्रेजो को सहायता देना स्वीकार कर लिया था, अपना मित्र समझने लगी। अत ब्रिटिश सरकार अव काग्रेस को मुस्लिम लीग, जो यद्यपि कही भी अपना मत्रीमण्डल नही बना सकी थी, के वरावर ही मानने लगी। इसी कारण अग्रेजो के पक्षपात व यूटनीति के कारण आगे चलकर भारत या । विभाजन हुआ। एक ओर जहा काग्रेस ने प्रारम्भ से ही अग्रेजो को युद्ध में सहायता देने से इकार रिया वहा भारतीय नरेशो ने युद्ध प्रारम्भ होते ही न वेवन स्वय वन्धि अपने राज्यों में पूरे माधनो से युद्ध में सहायता देन के लिये, वायसराय
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[ 79 के प्रतिनिधि-बीकानेर, नवानगर व पटियाला नरेश-रिप्स से मिले और यह तय किया गया कि अपनी रियासतो की अखण्डता और प्रभुसत्ता के अनुरूप राजा लोग देश के हित मे सभी सम्भव महयोग देने को तैयार है। क्रिप्स ने काग्रेस तथा मुस्लिम लीग के नेतानो से विचार विमश किया लेकिन उन्होने उन प्रस्तावो को अपने-अपने दृष्टिकोण से अस्वीकार कर दिया। क्रिप्स वापस लौट गया। जून 1942 मे जापान के सहयोग से अंग्रेजी सेना के साथ वन्दी हुए कप्तान मोहनसिंह ने 16,000 भारतीय सैनिकों की आजाद हिन्द सेना, भारत के सुप्रसिद्ध क्रातिकारी रासबिहारी बोस की प्रेरणा से, गठित की। सुभाषचन्द्र बोस ने जर्मनी से सिंगापुर पहुँच कर वहा के भारतीयो का नेतृत्व और आजाद हिन्द सेना की बागडोर 4 जुलाई 1943 को सम्भाल ली। उसके प्रभाव ने पूर्वी एशिया के भारतीय प्रवासियो मे नई जान फूक दी। ई० सन् 1943 की 21 अक्टुवर को एक अस्थाई आजाद हिन्द सरकार की स्थापना की गई जिसको जापान, जर्मनी, इटली आदि देशो ने मान्यता दे दी। अब यह सेना भारत के पूर्वी सीमान्त पर आक्रमण करने लगी 1120 निप्स के लोट जाने पर भारत मे काग्रेस ने यह तय किया कि देश के लिए तथा महायुद्ध का सक्ट टालने के लिये आवश्यक है कि अग्रेजो का भारत से साम्राज्य समाप्त हो जावे। अत गाधीजी के नेतृत्व मे काग्रेस ने "अग्रेजो भारत छोडो" प्रस्ताव पारित किया। 8 अगस्त 1942 को यह प्रस्ताव पारित होते ही गाधीजी तथा काग्रेस के सभी बड़े नेता 9 अगस्त को गिरफ्तार कर लिये गये। जनता पर यह एक वडा वज्रपात था। उनमे इतना रोप भर गया कि उन्होने तोड-फोड तथा हिंसात्मक कार्यवाइया बहुत बडे पैमाने पर की जिसके कारण अग्रेजी सरकार को शासन चलाना कठिन हो गया। सैकडो व्यक्तियो को सेना व पुलिस की गोलियो का शिकार होना पड़ा। हजारो को जेलो में बन्द होना पडा ।130 अग्रेजो ने इस राष्ट्रीय प्रादोलन को इम प्रकार घडी क्रूरता से दवाया। अब उन्हें पाशमा हो गई पि टस दश को गुलाम बनाये रखना सम्भव नहीं है। ई० सन् 1945 की अगस्त तक अमरीकी सहायता से अग्रज महायुद्ध मे विजय पा गये। 'पाजाद हिन्द सेना' या काफी बडा भाग बन्दी बना लिया गया। अग्रेजा ने यही ठीक समझा कि वे भारत की जनता का सह्योग लेकर ही यहा या शासन चलाये । 14 जनवरी 1945 को काग्रेम 78 ] . को लिया। चीकानेर नरेश गगासिंह इनमें सबसे आगे रहे । उमने सितम्बर 6 को ही वायसराय को तार भेजकर युद्ध कार्यों म लगाने के लिये सम्राट को डेढ लास रपये और 1000 पाड भेंट किये। गज्य मी पापी सेना-मुतर सेना (गगा रिसाला), मादू ल नाइट इन्फेन्टी, विजय वेटरी प्रादि को यूरोप में उड़ने को भेजा। इसके अलावा बीकानेर म एप युद्धवादी शिविर तथा युद्ध मे घायलो और वीमारा के लिये दो मैनिक अम्पताल गोले गये । छोटे टैंक और वायुयान खरीदने, भारतीय और अंग्रेज सैनिको को मुविधा दन, लन्दन की जनता को महायता करने तथा रडग्रास जमे अन्य महायता कायों के लिये महाराजा ने निजी कोप और रियासत की ओर से 15,19,063 रुपये, छ पाना दो पाई की आर्थिक सहायता दी। इसी प्रकार एक दूसरी रियासत अलवर की जय पल्टन नगभग 6 वप तक युद्ध में रही। यहा के 14,000 रगम्ट भारतीय सेना में तथा 2,000 रगस्ट राज्य की मेना में भर्ती किये गये। राज्य के लगभग 4500 व्यक्ति विदेशो मे युद्ध लडने रहे जिनम मे 400 युद्ध वदी हुए। गज्य ने 1,42,000 २० ये दो लडायू हवाई जहाज दिये तथा युद्ध प्रयोजना के लिये 6,68 000 रुपये दिये गये। इसके अलावा 1,25,000 रुपये अय कार्यों के लिये दिये गये। लगभग साठ लाय पिये युद्ध ऋणो मे दिये गये। इस प्रकार अय राजस्थानी नरेश भी अग्रेजा को युद्ध सहायता देने में एक दूसरे से होड लगाते रहे। कई नरेश-बीकानेर, जोधपुर, जयपुर, बून्दी आदि स्वय युद्ध क्षेत्र मे भी गये । महायुद्ध शीघ्र ही यूरोप के अलावा एशिया में भी प्रारम्भ हो गया। ई० मन् 1941 के अन्त मे जापान के युद्ध मे प्रवेश करने पर युद्ध भारत की मीमा तर पहुँच गया। अग्रेजी मेना जापान से बराबर हारती जा रही थी। अत अनेजा ने भारतीय नेताग्रो से समझौता करना चाहा ताकि वे किसी न किसी प्रकार उनके युद्ध प्रयत्नो में समथन देने लग जावें। अत माच 1942 मे सर स्टफर्ड रिप्स को ब्रिटिश सरकार ने इन प्रस्तावो के साथ भारत भेजा कि महायुद्ध के समाप्त होते ही भारत को डोमीनियन पद दे दिया जावेगा तथा भारतीय अपना सविधान बना सकेगे तथा फिलहाल, सिवाय प्रतिरक्षा विभाग के, समस्त विभाग भारतीयो को सौप दिये जावेगे और इस प्रकार केद्र म राष्ट्रीय सरकार बना दी जावेगी। ये प्रस्ताव भारतीयो को सम्पूर्ण रूप से स्वीकार या अस्वीकार करने थे। रियासता के मामले में इन प्रस्तावो मे पहले के समझौतो पर पुनर्विचार करने की बात भी कही गई थी 128 राजानी [ 79 के प्रतिनिधि-बीकानेर, नवानगर व पटियाला नरेश-त्रिप्स से मिले और यह तय किया गया कि अपनी रियामतो की अखण्डता और प्रभुसत्ता के अनुरूप राजा लोग देश के हित में सभी सम्भव सहयोग देने को तैयार है। किप्स ने काग्रेस तथा मुस्लिम लीग के नेताओं से विचार विमर्श किया लेकिन उन्होने उन प्रस्तावो को अपने-अपने दृष्टिकोण से अस्वीकार कर दिया। क्रिप्स वापस लौट गया। जून 1942 मे जापान के सहयोग से अंग्रेजी सेना के साथ बदी हुए कप्तान मोहनसिंह ने 16,000 भारतीय सैनिको की आजाद हिन्द सेना, भारत के सुप्रसिद्ध क्रान्तिकारी रासबिहारी बोस की प्रेरणा से, गठित की। सुभाषचन्द्र बोस ने जर्मनी से सिंगापुर पहुँच कर वहा के भारतीयो का नेतृत्व और आजाद हिंद सेना की बागडोर 4 जुलाई 1943 को सम्भाल ली। उसके प्रभाव ने पूर्वी एशिया के भारतीय प्रवासियो में नई जान फूक दी। ई० सन् 1943 की 21 अक्टुवर को एक अस्थाई आजाद हिन्द सरकार की स्थापना की गई जिसको जापान, जर्मनी, इटली आदि देशो ने मान्यता दे दी। अब यह सेना भारत के पूर्वी सीमान्त पर आक्रमण करने लगी।129 क्रिप्स के लोट जाने पर भारत मे काग्रेस ने यह तय किया कि देश के लिए तथा महायुद्ध का सक्ट टालने के लिये आवश्यक है कि अग्रेजो का भारत से साम्राज्य समाप्त हो जावे । अत गाधीजी के नेतृत्व मै काग्रेस ने "अग्रेजो भारत छोडो" प्रस्त पारित किया। 8 अगस्त 1942 को यह प्रस्ताव पारित होते ही गाधीजी तथा काग्रेस के सभी बडे नेता 9 अगस्त को गिरफ्तार कर लिये गये। जनता पर यह एक बडा वज्रपात था। उनमें इतना रोप भर गया कि उहोने तोड-फोड तथा हिंसात्मक कायवाइया बहुत बड़े पैमाने पर की जिसके कारण अग्रेजी सरकार को शासन चलाना कठिन हो गया। संक्डो व्यक्तियो को सेना व पुलिस की गोलियो का शिकार होना पड़ा। हजारो को जेलो मे बन्द होना पड़ा 1130 अग्रेजा ने इस राष्ट्रीय आन्दोलन को इम प्रचार बडी क्रूरता से दवाया। अब उन्हे प्राशया हो गई पि इस देश को गुलाम बनाये रखना सम्भव नही है । ई० सन् 1945 पी अगस्त तक अमरीकी सहायता से अंग्रेज महायुद्ध मे विजय पा गये। 'प्राजाद हिन्द सेना' का काफी वडा भाग वदी बना लिया गया। अग्रेजो ने यही ठीक समभा कि वे भारत की जनता का सहयोग लेकर ही यहा या शासन चलायें। 14 जनवरी 1945 को पाग्रेम 80 ] कायकारिणी के सदस्य जेलो से छोड दिये गये। तत्कालीन वायसराय लॉड वैवेल ने भारतीय नेतामो का एक सम्मेलन शिमला मे बुलवाया ताकि वायसराय को कायकारिणी समिति का पुनर्गठन हिन्दुप्रो व मुसलमाना के समान प्रतिनिधित्व के आधार पर किया जा मके। काग्रेस किसी हद तक ममझौता करने को तैयार हो गई लेकिन मुस्लिम लीग ने प्राड लगा दी ग्रत कोई ममझौता नहीं हो सका 131 काग्रेस द्वारा प्रजामण्डलो को सहयोग काग्रेस के नागपुर अधिवेशन (ई० सन् 1920) मे यह प्रस्ताव पारित किया गया था कि कार सभी नरेशो से अपील करती है कि वे अपने राज्यो मे तत्कात उत्तरदायी सरकार स्थापित कर देवे 1132 इस अधिवेशन के पाद राज्यो की प्रजा को काग्रेस का सदस्य बनाया जाने लगा और राज्यो को भारत मे काग्रेस के प्रातीय मण्डलो के साथ जोडा गया। कोई भी राज्य निकटवर्ती जिला काग्रेस मण्डल के साथ जोड़ा जा सकता या और वे अखिल भारतीय काग्रेस समिति के सदस्य बनकर अपना काग्रेस अधिवेशन में भी प्रतिनिधित्व कर सक्ते थे। यह सब कुछ करते हुए भी काग्रेस राज्यो के प्रातरिक मामला म कोई हस्तक्षेप नही करती थी। काग्रेस के लखनऊ अधिवेशन (ई० सन् 1935) मे यह घोषणा की गई कि 'उसकी सम्मति मे भारत के प्रत्येक नागरिक को एक ही प्रकार के राजनैतिक, नागरिक व प्रजातनात्मक अविवार मिलने चाहिये। यो राज्यो की प्रजा को अपने अधिकागे के लिये स्वय प्रयास करना चाहिये ।"133 इस प्रकार काग्रेस राज्यो के मामलो मे केवल सहानुभूति रखती रही लेकिन उसने कभी सुले रूप से उनकी सहायता नहीं की। इसी पारण बटलर समिति के सामने तथा गोल मेज सम्मेलन मे ज्यो की जनता को अपनी आवाज बुल द करने का कोई अवमर नहीं दिया गया। काग्रेस के अलावा अन्य राजनैतिक दलो-हिन्दू महासभा, मुस्लिम लीग श्रादि ने भी गज्यो की प्रजा को कोई महायता नहीं दी। अत राज्यो की जनता को वरावर ब्रिटिश भारत के राजनीतिनो के प्रति रोप वना रहा । जन काग्रेस की, राज्या की जनता के प्रति भावना की, ज्यादा ही पालोचना होने लगी तब काग्रेस के हरिपुरा अधिवेशन में 5 मार्च 1938 को यह प्रस्ताव पारित किया गया कि 'याग्रेस रियासतो वो भारत का ही एक भाग मानती है जिह उसमे कभी अलग नहीं किया जा सकता है। प्रत शेष भारत म जिम प्रकार की राजनैतिक, सामाजिव और माथिव म्वतप्रता [ 81 वह चाहती हे वैसी ही रियासतो के लिये भी वह चाहती है, ऐसा उसका मत है। पूण स्वराज्य अर्थात सम्पूर्ण स्वाधीनता काग्रेस का ध्येय है। यह रियासतो सहित सम्पूर्ण भारत के लिये है। चू कि रियासतो और शेप भारत की स्थिति अलग-अलग है, इसलिए काग्रेस की नीति रियासतो के लिये सामा यत ठीक नही जचती है। वह शायद रियासतो की स्वतत्रता की हलचल के स्वाभाविक विकास के लिये वाधक भी हो। आज की परिस्थिति मे रियासतो मे स्वाधीनता की लडाई का भार वहा की जनता को ही उठाना चाहिये । काग्रेस की शुभ कामनाये और समर्थन ऐसे शातिपूर्वक और उचित तरीके पर चलाये जाने वाले संघर्षों को सदा मिलते रहगे लेकिन काग्रेस सगठन की यह सहायता वतमान परिस्थितियो मे केवल नैतिक समर्थन और सहानुभूति के रूप मे ही होगी। राज्य की जनता द्वारा कोई भीतरी आदोलन काग्रेस के नाम से नही उठाना चाहिये। इसके लिये राज्यो मे स्वतन्त्र सगठन स्थापित किये जावे और यदि पहले से ही हो तो उनको जारी रखना चाहिये ।"134 उपरोक्त प्रस्ताव का रियासतो की जनता पर बहुत अच्छा प्रभाव पड़ा। इसके कारण राज्यो में जागृति और क्रियाशीलता की अपूर्व लहर आई। राज्यो के आन्दोलनो को और भी ज्यादा बल मिला जब अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिपद की अध्यक्षता ई० मन् 1938 मे जवाहरलाल नेहरू ने मम्भाली। तव नेहरू ने कहा था- 'कई लोग काग्रेस के रियासतो के प्रति रुख को पालोचना करते है लेकिन यह काग्रेस व भारत की जनता को तय करना है कि कब और कैसे वे हस्तक्षेप करेंगे तथा कौनसी नीति अपनायेगे ताकि हस्तक्षेप प्रभावशाली व सफल हो ।"135 नेहरूजी के नेतृत्व मे देशी राज्यो की जनता शायद कोई ज्यादा प्रभावशाली क्दम उठाती लेकिन तव ही (ई० सन् 1939 सितम्बर) दूसरा महायुद्ध छिड गया। अत मभी का ध्यान उस ओर चला गया। अव तक राजस्थान के विभिन राज्यो मे प्रजा मण्डल आदि नामो से नये राजनैतिक संगठन स्थापित हो गये थे। इन सगठनो ने वहा की जनता मे अपूर्व जागृति ला दी थी। यह देखकर वहा के शासकों ने इस जागृति को कुचलने के उद्देश्य से जाब्ता फौजदारी सशोधन कानून तथा जन सुरक्षा कानून जैसे दमनकारी कानून बनाकर समस्त राजनैतिक सस्थाओ को सरकारी मान्यता प्राप्त करने के लिए बाध्य किया। सरकारी मान्यता प्राप्त करने के लिए 82 ] उन्होने ऐसी शर्त रखी कि कोई भी स्वाभिमानी नागरिरा उनको स्वीकार करने को तैयार नहीं था। अत वहा को जनता ने अपने स्वेच्छाचारी शासको के विरुद्ध सघप छेड दिया। ऐसे सघर्प ई० सन् 1939 से 1948 तक वरावर चलते ही रहे। इस सघर्पो की मुख्य मागे उपरोक्त दोनो कानूनो को रद्द करने तथा अपने नरेशो की छनछाया में उत्तरदाई सरकार स्थापित करने की थी। इन मागो के मनवाने के लिए जितने संघर्ष किये गये वे अग्रेजी प्रान्तो म किये गये संघर्षों से किसी भी प्रकार से कम नहीं थे। सैकडी व्यक्तिया को जेल जाना पडा, पुलिस के अत्याचार सहने पडे, स्त्रियो को वेइज्जत होना पडा तथा काफी लोगो को अपनी सम्पति खोनी पडी। कुछ व्यक्तियो को अपने प्राण तक देने पडे। उनमे से जोधपुर के वालमुकन्द विस्सा, जैसलमेर के सागरमल गोपा, भरतपुर के रमेश स्वामी, बीकानेर के बलवीरसिंह, कोटा के नेनूराम शर्मा, शाहपुरा के प्रतापसिह बारहठ, बून्दी के नानकजी भील, बेगू के स्पाजी धाकड व किरपाजी धाक्ड, धोलपुर के छत्रसिंह व पचमसिंह, डूगरपुर के मानाभाई स्वाट व काली वाई, लाडनू के चुन्नीलाल शर्मा व रूपाराम चौधरी, कुचामरण के अल्वाराम चौधरी व डाबडा के पन्नाराम चौधरी आदि-आदि के नाम लिये जा सकते है ।136 1 जन प्रादोलनो की चरम सीमा जोधपुर राज्य में मारवाड लोक परिपद की स्थापना महाराजा की छत्रछाया मे उत्तरदायी सरकार को स्थापना करने के उद्देश्य से मई 1938 मे की गई लेकिन राज्य सरकार ने इसे समाप्त करने के प्रयत्न तत्काल प्रारम्भ कर दिये। तब ही राज्य सरकार के ईशारे से स्थापित की गई 'श्री राजभक्त देश हितकारिणी सभा' मारवाड लोर परिषद के विरोध में काफी प्रचार करने लगी। इसी कारण जव विजयलक्ष्मी पण्डित जोधपुर आई तब वह भापण देने भी जनता के बीच उपस्थित नहीं हो सकी। सुभाषचन्द्र बोस, जो तत्कालीन काग्रेस अध्यक्ष थे, ने दिसम्बर 1938 में कहा था कि जोधपुर राज्य में नागरिक स्वतन्त्रता तथा उत्तरदाई सरकार स्थापित करने के लिये परिस्थितिया निगडती ही जा रही है। ई० सन् 1938 म जर जोधपुर राज्य में सलाहवार वोड बना तव वह बोड पूणम्प से ढकोसला था। जयनागयरण व्याम उसके सदस्य बन गये और प्रत्येक मामले में, जो वहा लाया गया, प्रशासन को सुधारने के लिये सुभाष दिये तथा राज्य र पिरो की पालोचना की। इसी कारण लार परिपद लो - [83 अवसर मिल गया। जब राज्य सरकार से जयनारायण व्यास को सुधारो के लिये कोई प्राशा नहीं दिखलाई दी तब उसने इस्तीफा दे दिया । लोक परिपद ने ई० सन् 1940 मे पुन उत्तरदायी शासन के लिये आन्दोलन छेड दिया। मार्च 28 को जयनारायण व्यास, अचलेश्वरप्रसाद शर्मा, किशोरमल मेहता आदि गिरफ्तार कर लिये गये तथा लोक परिपद को अवैध घोषित कर दिया गया। महाराजा ने इस आन्दोलन को पूर्णतया आधारहीन आन्दोलन तथा लोक परिपद को नादान नवयुवको, जिन्होने जीवन मे कही सफलता प्राप्त नहीं की, की जमात बतलाया। अप्रेल मे जव देशी राज्य लोक परिपद के प्रतिनिधि द्वारकादास कचरु ने राजनैतिक समझौते के लिये जोधपुर के प्रधानमत्री से मिलने की कोशिश की तव प्रधानमत्री ने उससे मिलने से इन्कार कर दिया। बाद मे जोधपुर सरकार को आदोलन के सामने झुक कर, लोक परिपद से समझौता कर, जयनारायण व्यास आदि राजनैतिक कार्यकर्ताओ को छोडना पड़ा। लोक परिपद कितनी लोकप्रिय थी इसका अनुमान राज्य को तब हुआ जव 1941 के नगर पालिका चुनावों में लोक परिपद ने वहुमत प्राप्त किया। व्यास नगरपालिका के अध्यक्ष निर्वाचित हुए 1137 अब लोक परिषद के कार्यकर्ताओं ने गावो में किसानों को उनके अधिकारी और जागीरदारों के अत्याचार के सम्बध मे जानकारी देना प्रारम्भ कर दिया। इस पर महाराजा और जागीरदारो ने इनके प्रभाव को समाप्त करने हेतु कायवाहिया शुरू कर । इस कारण लोक परिपद और सामन्ती तत्वो के वीच सघप की स्थिति आ गई। बढते-बढते ई० सन् 1942 के प्रारम्भ मे क्सिानी व जागीरदारो के वीच लागवाग, लगान आदि के मामलो को लेकर काफी मनमुटाव हो गया। किसानो मे और ज्यादा जागृति लाने के लिए लोक परिपद ने लाडनू, नीमाज, चण्डावल आदि जागीरी गावो मे सभायें की जिनके कारण किसानो मे काफी जागृति आई। मार्च 28 को जब चण्डावल गाव में उत्तरदायी शासन माग दिवस मनाने की कोशिश की गई तव गावो मे जाते समय लोक परिषद के मुख्य कार्यकर्ता मीठालाल त्रिवेदी व उनके साथियो को जागीरदार के आदमियो ने बिना किसी कारण वेरहमी से पीटा। राज्य सरकार ने फिर भी जागीरदार व उसके आदमियो के विरुद्ध कोई कायवाई नहीं की। लोक परिपद ने पुन सत्याग्रह आरम्भ कर दिया 1138 जून 9 को जयनारायण व्यास, अचलेश्वरप्रसाद शर्मा, वालमुकन्द विस्सा, मथुरादास माथुर, छगनराज चौपासनीवाला, मीठालाल निवेदी आदि 9 - 84 ] कार्यकर्ता गिरफ्तार कर लिये गय। जेल मे पुछ राजनैतिय बदिया द्वारा भूय- हडताल की गई। कुछ कारणा से बालमुक द विम्मा की 19 जून को मृत्यु हो गई। इससे जनता मे काफी रोप फैल गया । यह रोप बढ़ता ही गया और अगस्त 1942 के आदोलन के समय तो कुछ लोगा ने मशस्य अान्दोलन तक की तैयारी कर ली। ग्यारह नवयुवरी न विदशी सैनिका की हत्या करने के लिये बमो तक का प्रयोग किया लेकिन यह ज्यादा नहीं चल सका। मई 1944 म जव राजनैतिक वातावरण कुछ शात हुअा तर राज्य सरकार ने समस्त राजनंतिक कैदियो को, जो भारत सुरक्षा अधिनियम के अतर्गत नजरपद थे, छोड दिया । बम काण्ट के कैदियो-जोरावरमल आदि को नहीं छोडा गया 1140 24 अक्टूबर 1945 को जब देशी राज्य लोक परिपद के अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू जोधपुर पाये तब यहा की जनता ने अभूतपूर्व स्वागत किया। राज्य सरकार ने भी पहली बार एक राष्ट्रीय नेता के स्वागत मे हार्दिक सहयोग दिया तथा सावजनिक अवकाश घोपित रिया 11 महाराजा ने भी नेहस्जी से मिलकर जनता की सद्भावना ली। ई० सन् 1947 मे जोधपुर राज्य मे जागीरदारी व काश्तकारो के बीच विवाद ज्यादा ही बढ गये । राज्य सरकार जागीरदारा का ही पक्ष लेती रही। माच 13 को जव किसान सभा का एक विशेष सम्मेलन जागीरी गाव डावडा में हुअा तव जागीरदारो द्वारा युनाये गये शेखावाटी के 22 ऊट सवारी ने किसान सभा के सम्मेलन को भग क्यिा तथा ऊट सवारो ने नेताओं पर गोलिया चलाई पार तलवारो से वार किये। इस काण्ड 5 व्यक्ति मारे गये। 12 नरसिंह कछवाहा, राधाविशन, मथुरादास माथुर, द्वारकादास पुरोहित, छगनराज चौपासनीवाला आदि बुरी तरह घायल हुए। जले पर नमक छिडक्ने को राज्य ने इन कायकर्तानो पर ही अशाति फैलाने का मुकदमा चलाया लेकिन 1948 मे यह मुकदमा वापस ले लिया गया 143 ई० सन् 1947 में जोधपुर राज्य ने अपने प्रतिनिधि केन्द्रीय सविधान सभा मे भी भेजे। यो जोधपुर महाराजा ने मई 1944 मे सवैधानिक सुधारो हेतु एक सदस्यी सुधालकर समिति वनाई थी लेकिन उसकी रिपोट मे लोक प्रतिनिधियो को सत्ता हस्तान्तरित करने की कोई योजना नहीं थी। जो सभा वनने को थी उसमे सभा के सदस्यो को तीन श्रेणियो में बाटा गया -क्षेनीय 37, आरक्षित 15 और मनोनीत 9 तथा राज्य के 8 मत्री पदेन सदस्य होने थे। स्पष्टत यह सभा नाम की जन प्रतिनिधि सभा होती तथा उत्तरदायी सरकार की स्थापना न हो पाती। लोक परिपद ने 1946 नावा अधिवेशन मे इसकी आलोचना की। जोधपुर नरेश उम्मेदसिंह शायद कुछ या- [ 85 और प्रगतिशील कदम उठाते लेकिन जून 1947 में उनका देहान्त हो गया । उनके नवयुवक उत्तराधिकारी हनुवन्तसिंह को उनके सलाहकारो ने ऐसा गुमराह किया कि वह जोधपुर राज्य को पाकिस्तान में सम्मिलित करने तक का सोचने लगे। सौभाग्यवश वह ऐसा न कर सके और जोधपुर राज्य को भारत सघ मे 11 अगस्त 1947 को सम्मिलित होना पड़ा। महाराजा हनुवन्तसिंह का पाकिस्तान में मिलने के इरादे को वदलवाने मे वायसराय माउण्टबेटन का प्रमुख हाथ था। केद्रीय राज्य मत्रालय के सचिव वी० पी० मेनन ने प्रयत्ल कर 11 अगस्त 1947 को माउण्टबेटन और हनुव तसिंह की भेंट करवा दी थी अयथा भोपाल का नवाव महाराजा को पाकिस्तान में सम्मिलित होने के लिये वरावर उकसा रहा था |145 स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद भारत मे लोकतन्त्रवाद की एक नई लहर देश में दौड गई। राजस्थान की प्रत्येक रियासत में जन आन्दोलनो ने और भी उग्र रूप धारण कर लिया। अत यहा की कई रियासतो के राजाम्रो ने अपने राज्यो की लोक परिषदो को सत्ता सौपनी प्रारम्भ की। जोधपुर नरेश तब भी प्रतिक्रियावादियो से घिरा हुआ था। अत उसने अक्टूबर 1947 मे अपने मत्री मण्डल को पूर्णतया सामन्तवादी बना दिया 1146 जनता मे अस तोप ज्यादा ही फैल गया। यह देखकर महाराजा ने 5 फरवरी 1948 को घोषणा की कि शीघ्र ही लोकप्रिय मारवाडी मनीमण्डल सरकार वनाई जावेगी तथा शीघ्र ही राज्य के लिये नया सविधान बनाने के लिये वालिग मताधिकार से सविधान सभा वनाई जावेगी। इसको मारवाड लोक परिषद के अध्यक्ष जयनारायण व्यास ने एक ढकोसला बतलाया और महाराजा को चेतावनी दी कि वह वर्तमान सामन्ती मत्री मण्डल को 8 माच तक समाप्त कर देवे अन्यथा लोक परिपद उतरदायी सरकार स्थापित करने के लिये सघप शुरू कर देगी।147 तव ही भारत सरकार ने हस्तक्षेप किया और जोधपुर नरेश को कुछ फेरवदल करने को विवश होना पड़ा। ऐसी परिस्थितियो मे जोधपुर नरेश ने प्रथम लोकप्रिय मिलीजुली सरकार का निर्माण 3 मार्च 1948 को कर दिया। उसके वाद मनी मण्डल का पुन निर्माण 17 जून की आज्ञा द्वारा किया गया और अत मे महाराजा ने 31 अगस्त 1948 की घोपणा द्वारा राज्य के शासन सम्बन्धी कामो के प्रति जिम्मेवार मत्री मण्डल की स्थापना कर दी। तव मुस्यमत्री जयनारायण व्यास को तथा दीवान पी०एस० राव को बनाया गया ।
86 ] - यह मत्रीमण्डल राजस्थान के निर्माण तर (30 मार्च 1949 ता) चना जबकि जोधपुर राज्य वृहत राजस्थान में विलीन हो गया। जीकानेर राज्य की जनता में राजनैतिक चेतना लाने तथा उत्तरदायी प्रशासन की स्थापना के लिये ई० सन् 1942 मे रघुवरदयाल गोयल ने वहा प्रजा परिपद की स्थापना की लेकिन राज्य ने उसे गैरकानूनी घोषित पर दिया और रघुवरदयाल को राज्य से निर्वासित पर दिया। कुछ माह तक कानपुर में रहने के बाद जब वह पीकानेर लौटा तब वह अपने साथियो-गगादाम कोशिक, दाऊदयाल प्राचार्य प्रादि के माथ गिरफ्तार कर लिया गया। अगले चप जनवरी 26, ई० सन् 1943 को स्वतयता दिवम मनाने पर मघाराम वैद्य, भिखालाल, रामनारायण आदि गिरपतार कर लिये गये जो महाराजा गगासिंह के देहात के बाद ही छोडे गये 10 ई. सन् 1943 की फरवरी 2 को बीकानेर नरेश गगासिंह या देहान्त हो गया। वह एक महान व्यक्तित्व का नरेश तथा आधुनिक बीकानेर का निर्माता था। उसकी गणना राजस्थान के महत्वपूर्ण प्रभावशाली शासका में ही नही बल्कि भारत के महान राजनीतिज्ञो मे की जा सकती है। उसने न केवल भारत वरिक अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र मे भी ख्याति प्राप्त की। वह घोपरगायें, भाषण व वक्तव्य देने मे वडे कुशल थे। महाराजा ने अपने शासनकाल मे प्रगतिशील राज्यो की भाति ही अपने राज्य में न केवल धारा सभा वरिक नगरपालिकायें, जिला वोड व पचायतें भी स्थापित वी। निजी खच की सीमा बाधी और वजट के रूप मे राज्य का प्राय एव व्यय का विवरण धारा सभा में पेश करने लगे तथा बीकानेर नगर में प्राथमिक शिक्षा को भी अनिवाय कर दिया था। ये सब कुछ करते भी ये सब ढकोसला बन कर रह गये। राजनैतिक, आर्थिक व सामाजिक दृष्टि से बीकानेर अन्य राज्यो से किसी भी प्रकार से ज्यादा प्रगति नहीं कर सका। उसके शासक के अन्तिम 20 वर्ष, जवकि देश में अपूर्व जन जागति आई तब वीकानेर मे जनता का दमन, उत्पीडन व शोपण ही किया गया। यदि बीकानेर राज्य ने कुछ ममृद्धि प्राप्त की तो वह राज्य के उत्तरी भाग में गगा नहर लाकर की, जिसके लिये न केवल बीकानेर बल्कि राजस्थान भी उनका चिर ऋणी रहेगा। गगासिंह के उत्तराधिकारी सादूलसिंह ने भी अपने पिता की ही दमनात्मक नीति अपनाई। ई० सन् 1945 मे जागीरदारो के अत्याचारो के विरुद्ध दूधवाखारा के विसानो ने सत्याग्रह किया तब उसे कठोरता से दवाया .
[87 । या। इस समय चौधरी कुम्भाराम आर्य पुलिस सवइस्पेक्टर की नौकरी छोड कर प्रजा परिषद मे सम्मिलित हो गये। ई० सन् 1946 की मई मे नव किसानो ने बीकानेर व राजगढ मे जुलुस निकाले तव भी किसानो को बुरी तरह से पीटा गया तथा कई कार्यकर्तामो को गिरफ्तार किया गया। गरफ्तार होने वाली मे रघुवरदयाल गोयल, गणपतसिंह, कुम्भाराम आर्य, हीरालाल शर्मा आदि मुख्य थे। जून 30 को रायसिंहनगर मे बीकानेर राज्य का प्रथम राजनैतिक सम्मेलन किया गया। राज्य ने इस सम्मेलन में लाठी प्रहार कराये। इसमे वीरवल शहीद हुआ। इस सम्मेलन का सयोजक रामचन्द्र जैन तथा स्वागताध्यक्ष चौधरी रयालीसिंह था। इस सम्मेलन में भाग लेने के कारण कई नेता गिरफ्तार किये गये। इस सम्मेलन से राज्य में काफी जागृति आई। यह जागृति देखकर ही महाराजा ने 26 जुलाई को शीघ्र ही उत्तरदायी सरकार स्थापित करने की घोपणा की। जुलाई 27 को सभी राजनैतिक बन्दी, सिवाय हीरालाल, जिसे हिंसावादी माना जाता था, के छोड दिये गये। सितम्बर 13 को बीकानेर मे एक कार्यकर्ता सम्मेलन हुआ लेकिन सरकार ने अकारण ही रामचन्द्र जैन, रामलाल, मालचन्द्र निसारिया आदि को सम्मेलन मे ही गिरफ्तार कर लिया। कुम्भाराम के नाम भी वारण्ट जारी कर दिया गया। अक्टूबर 29 को प्रजा परिषद ने अपना दूसरा कार्यकर्ता सम्मेलन अपनी नीति स्पष्ट करने को बुलाया लेकिन उस समय भी हरदत्तसिंह, जो न्याय विभाग में मुसिफ के पद को छोड कर प्रजा परिपद का सदस्य बन गया था, मनोहरसिंह, गुरुदयालसिंह आदि को गिरफ्तार कर लिया गया। इसी समय बीकानेर राज्य के जागीरी गाव कागट मे जागीरदार द्वारा अनुचित लाग वागे तथा लगान लेने का किसानो ने विरोध किया। इस पर जागीरदार के आदमियो ने गाव मे लूटमार को और स्त्रियो को बेइज्जत किया। किसान बीकानेर गये लेकिन वहा उनकी कोई सुनवाई नहीं की गई। तब प्रजा परिपद ने सात व्यक्तियो-स्वामी सच्चिदानद, केदारनाथ, हसराज, दीपचन्द, माजीराम, रगा व रूपराम को जाच के लिये भेजा। जागीरदार को जव यह ज्ञात हुआ तब उसने इन सात व्यक्तियो को गढ मे बुलवा वर नगा कर इतना पीटा की वे बेहोश हो गये। काफी तग करने के बाद इनको गाव से बाहर निकाल दिया 1150 केदारनाथ (उर्फ प्रो० केदार) अव राजस्थान सरकार में मनी है। इस प्रकार जागीरदारो का आतक बढता ही गया। राज्य सरकार चुप ही बैठी रही। ई० सन् 1947 मे जब देश स्वतन्त्र हुअा तर भी यहा राष्ट्रीय ध्वज का अपमान किया गया।
88 ] इस विधान पहले लिखा जा चुका है कि बीकानेर राज्य में प्रतिनिधि सभा 1913 मे स्थापित की गई थी जिसमे 35 सदस्य होते थे। ई० सन् 1917 मे यह सख्या 45 कर दी गई-6 कार्य कारिणी परिषद के, 15 चुने हुए तथा 19 मनोनीत । ई० सन् 1917 से यह विधान सभा कहलाने लगी। सभा को अब लोकप्रिय बनाने के लिये इसके पुनगठन की घोपणा महाराजा ने 1946 मे को और 1947 मे बीकानेर अधिनियम लागू किया जिसके अनुसार महाराजा के सरक्षण मे कार्य करते हुए जनता के प्रति उत्तरदायी सरकार बननी थी। व्यवस्थापिका दो सदन वाली होनी थी जो व्यस्क मताधिकार द्वारा चुनी जानी थी। सम्पूर्ण शासन एक परिपद को सौपा जाना था जो व्यवस्थापिका के प्रति उत्तरदायी होना था। महाराजा ने घोषणा की कि अप्रेल 1948 मे उत्तरदायी सरकार बना दी जावेगी लेकिन यह घोपणा ही रह गई। चुनाव होने तक के लिये एक अतरिम मनी मण्डल 10 माच 1948 को बनाया गया। इसमें प्रधान मनी के अलावा 9 मनी लिये गये जिनमे से 4 प्रजा परिपद के तथा शेप राज्य के विभिन वर्गों के प्रतिनिधियो से मनोनित किये गये। प्रजा परिषद के हरदतसिंह को उपप्रधान मनी तथा गौरीशकर प्राचाय, मस्तानसिंह और कुम्भाराम को मत्री बनाया गया ।11 प्रजा परिपद इस प्रकार के मिले जुले मत्री मण्डल से संतुष्ट नहीं हो सकी और इस कारण काग्रेसी मनियो ने त्याग पत्र दे दिया। अत अतरिम मत्री मण्डल भग कर दिया गया। अगले वष बीकानेर राज्य राजस्थान सघ में सम्मिलित हो गया। भारतीय सविधान सभा में भाग लेने तथा भारत के माथ मिलकर एक शक्तिशाली केद्र के निर्माण मे बीकानेर नरेश सादु लसिंह का विशेष महयोग रहा । उही के कारण बीकानेर, जोधपुर, जयपुर आदि के प्रतिनिधियो ने सविधान सभा में अपना स्थान ग्रहण कर लिया। यो महाराजा वीकानेर ने राज्य के ध्वज के विषय में विवाद उठाया था कि उस ध्वज को वैसा ही सम्मान मिलना चाहिये जैसे राष्ट्रीय ध्वज को लेकिन यह माना नहीं गया 112 शासक भारत के स्वतत्र होने के बाद भी राष्ट्रीय और राजकीय ध्वज मे अतर नहीं समझ पाये थे। यह अन्तर उनको अपनी रियासत के 30 भाच 1949 को राजस्थान में सम्मिलित होने के बाद समझ मे पाया। जयपुर के शेखावाटी क्षेत्र मे जागीरदारो व किसानो के वीच सघप द्वितीय महायुद्ध काल मे भी चलता रहा। हरलालसिंह, नेतरामसिंह व [ 89 नरोत्तमलाल जोशी किमानो मे अच्छा प्रभाव रखते थे तथा उनके नेतृत्व में ही आन्दोलन चला रहे थे। जयपुर राज्य प्रजा मण्डल किसानो की वरावर महायता कर रहा था। जून 1942 मे, मिर्जा इस्माईल ने प्रधान मनी वनने के बाद इस पान्दोलन के प्रति उदार दृष्टिकोण अपनाया और किसानो की मागो को स्वीकार कर लिया। अगस्त 1942 के 'भारत छोडो' आन्दोलन के समय यहा का प्रजा मण्डल दो दलो मे वट गया । एक पक्ष--वावा हरिश्चन्द्र, प्रोमदत्त वैद्य रामकरण जोशी, दौलतमल भण्डारी, वी एम देश पाण्डे लादूराम शर्मा, रामेश्वरलाल अग्रवाल आदि-आन्दोलन के पक्ष मे रहे लेकिन प्रजा मण्डल के कुछ अन्य सदस्यो ने भाग ही नही लिया। मिर्जा इस्माईल ने प्रजा मण्डल की समस्त कारवाइयो को विफल कर दिया। कुछ नेता गिरफ्तार हुए लेकिन वे शीघ्र ही छोड दिये गये 1163 ई० मन् 1944 मे जयपुर में निर्वाचित नगरपालिका स्थापित हुई । उसी समय जयपुर राज्य मे विधान सभा व प्रतिनिधि मभा के चुनाव हुए। प्रतिनिधि सभा में 125 सदस्य तथा विधान मभा मे 51 मदस्य निर्वाचित होने थे। इन मभामो का 5 सितम्बर 1945 को विधिवत अधिवेशन हुआ। गमकिशोर व्याम प्रतिनिधि सभा में तथा दौलतराम भण्डारी धारा सभा मे प्रजा मण्डल दल के नेता बने। मई 1946 मे प्रजा मण्डल के देवीशकर तिवाडी को मनी पद दिया गया। अगले वर्ष प्रजा मण्डल के दौलतमल भण्डारी तथा मरदार दल के नेता कुशलसिंह को भी मत्री पद दिये गये। भारत स्वतन्त्रता प्राप्ति के वाद 27 माच 1948 को अतरिम सरकार की स्थापना की गई। दीवान वी टी वृपणमाचारी को मत्री मण्डल का अध्यक्ष, प्रजा मण्डल दल के नेता हीरालाल शास्त्री को मुरय मत्री व टीकाराम पालीवाल को राजस्व मत्री बनाया गया। यह मनी मण्डल मयुक्त दायित्व के आधार पर काम करने लगा। • सन् 1949 की 30 माच को जव सयुक्त राजस्थान का निर्माण हुआ तब यह मत्री मण्डल समाप्त हो गया तथा जयपुर राज्य का विलयन राजस्थान मे हो गया। इस प्रकार जयपुर राज्य को अय गज्यो की तुलना मे म्वतन्त्रता प्राप्ति के लिये बहुत कम सघर्ष करने पडें ।15। उदयपुर राज्य मे प्रजा मण्डल से प्रतिवध 1941 मे हटा। अगले ही वप जर 'भारत छोडो' आदोलन प्रारम्भ हुआ तव प्रजा मण्डल ने एक प्रस्ताव पास वर महाराणा को अग्रेजी साम्राज्य से सम्बध विच्छेद करने को 20 अगस्त को लिखा। पत्र मिलते ही महाराणा ने प्रजा मण्डल के कायर्तानों को 90 ] गिरफ्तार कर लिया। अगस्त 23 को जुलूस निकालने पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया। लगभग 500 व्यक्ति गिरफ्तार किये गये जिनमे 7 महिलायें भी थी। इस आन्दोलन मे मारणकलाल वर्मा, मोहनलाल सुसाडिया, नरेन्द्रपालसिंह चौधरी, रुपलाल सोमानी, भवानीशकर नन्दवाना, उमरावमिह टावरिया, गणेशीलाल, जयसिंह राणावत आदि का विशेष योगदान रहा। इनको फरवरी 1944 मे रिहा किया गया। ई० सन् 1945 के अन्त मे उदयपुर मे असिल भारतीय देशी राज्य परिपद का अधिवेशन जवाहरलाल नेहरु की अध्यक्षता में हुआ। देशी रियासत मे पहली बार यह अधिवेशन होने के कारण यहा के प्रजा मण्डल को वहुत वत मिला 1155 ई० सन् 1947 में राज्य के कमचारियो ने उचित वेतन दिये जाने की माग मनवाने के लिये यहा आन्दोलन किया। राज्य ने आदोलन को दवाने की बहुत कोशिश की। एक बार तो कर्मचारिया के जुलूस पर गोली तक चलाई गई लेकिन राज्य को झुकना पडा व कमचारियों से समझौता करना पड़ा। ई० सन् 1947 मे राज्य ने वैधानिक सुधारो के लिये एक समिति के एम मु शी की अध्यक्षता में नियुक्त की जिसमे प्रजा मण्डल को बहुमत दिया गया। रिपोट तैयार होने पर उस पर राज्य ने अमल नहीं किया और एक नया ही विधान वनवाया जिसके अनुसार प्रजा मण्डल का एक ही प्रतिनिधि मत्री मण्डन में लिया गया। जागीरदारा को प्रजा मण्डल की अपेक्षा अधिक अधिकार दिये गये। अत प्रजा मण्डल इस मविधान के विरुद्ध था। इस प्रकार यहा कोई लोकप्रिय मत्री मण्न्ल नहीं बन सका |156 स्वतनता प्राप्ति के बाद महाराणा ने उदयपुर का भी भारतीय सघ मे शामिल करने की घोपणा की। माच 1948 में राजपूतान की कुछ रियासतो का एक सघ बना तब 18 अप्रेल 1948 में उदयपुर भी उसमें सम्मिलित हो गया और इस प्रकार 10 रियासतो का राजस्थान मघ स्थापित हुआ। इस सघ का नाम युनाइटड स्टटस् ऑफ राजस्थान रखा गया तथा इसकी राजधानी उदयपुर रखी गई। वाद मे यह सघ वृहत राजस्थान राज्य में मिल गया । हाडौती क्षेत्र (कोटा, बूदी व झालावाट राज्य) मे जन-जागृति लाने वालो में अभिन्न हरि, गोपाललाल कोटिया, नित्यान द नागर, ऋषिदत्त मेहता प्रादि मुग्य थे। बाद के वर्षों में वृजसुदर शर्मा, इद्रदत्त स्वाधीन, क्वरलात जेलिया, मास्टर रामचद्र, मागीलाल भव्य आदि न भी राजनैतिक जागृति मे काफी योगदान दिया 1113 [ 91 बून्दी राज्य में मन् 1931 मे स्थापित प्रजा मण्डल मे महाराव ईश्वरसिंह के समय में ज्यादा पनप नहीं सका। ई० सन् 1944 मे यहा लोक परिपद की स्थापना हुई। इसका अध्यक्ष हरिमोहन माथुर तथा सचिव वृजसुन्दर शर्मा था। इसका मुग्य उद्देश्य राज्य में उत्तरदायी शासन स्थापित करना था। लोक परिपद अान्दोलनो के द्वारा 1946 की अक्टूबर मे महाराव से यह घोपणा करा मकी कि शीघ्र ही कुछ लोकप्रिय नेता मनी मण्डल मे लिये जावेगे। महाराव ने राज्य के लिये एक मविधान बनाने की भी घोषणा की। लोक परिपद पूर्णतया लोकप्रिय मत्री मण्डल चाहती थी अत राज्य से समझौता नहीं हो मका। माच 1948 मे बून्दी राज्य राजस्थान संघ में सम्मिलित हो गया । झालावाड राज्य मे गिरधर शर्मा, रामनिवास शर्मा आदि राष्ट्रीय विचारो के व्यक्तियो ने राजनैतिक जागृति फैनाई। यहा के अय प्रमुख कायकर्तामो मे भैरवलाल कालाबादल, मागीलाल भव्य, मास्टर रामचद्र आदि ये। प्रजा मण्डल के 1947 में स्थापित होने पर यहा उसे राजरारणा का महयोग व सरक्षण प्राप्त हुआ। ई० मन् 1947 मे महाराज राणा स्वय प्रधानमनी तथा कहैयालाल मित्तन और मागीलाल भव्य मत्री बने लेकिन शीघ्र ही, 1948 की 18 अप्रेल को यह राज्य राजस्थान मघ में सम्मिलित हो गया।180 कोटा मे राजनैतिक जागृति का श्रेय नयनूराम शर्मा, अभिन्न हरि, इन्द्रदत्त स्वाधीन, नाथूलाल जैन, गजेद्रकुमार, विमलकुमार जोलिया, तनमुमताल मित्तल आदि को है। ई० सन् 1938 मे यहाँ प्रजा मण्डल की स्थापना हुई तव से यहा राजनैतिर जागति बढी। ई० मन् 1942 के 'भारत छोटो' आन्दोलन के ममय यहा की जनता ने तीन दिन तक सम्पूर्ण शासन अपने हाथो मे ले रखा। अान्दालन के प्रारम्भ मे ही यहा के कायकर्ता जेल में डाल दिये गये थे। अन जनता ने कोटा नगर के दरवाजो पर कब्जा कर लिया। कोतवाली पर भी कब्जा कर लिया और सरकारी भवना पर तिरगा भण्डा फहरा दिया। पुलिस को वैरको मे वद कर दिया गया। बाद में कोटा महाराव द्वारा यह आश्वासन दिये जाने पर कि जनता का कोई दमन नहीं किया जावेगा शासन वापम सौप दिया गया।161 ई० सन् 1945 में भी यहा राष्ट्रीय कायकर्तामो को शाति भग न करने सम्बधी काले कानून का शिकार होना पड़ा। बाबूलाल 'इन्दु' को यह बतलाने पर कि उसका पेशा मोटा राज्य की 92 ] गैर जिम्मेवार सरकार को उखाट फेकना है, सरत वद की सजा दी गई। भारत के स्वतन होने पर यह राज्य संयुक्त राजस्थान में सम्मिलित हो गया । भरतपुर राज्य मे ई० सन् 1938 मे प्रजा मण्डल की स्थापना की योजना के बाद ई० सन् 1939 मे प्रजा मण्डल और राज्य शासन के बीच सघप चला और 1940 मे राज्य से समझौता होकर उमका पजीयन हुआ और इसका नाम भरतपुर राज्य प्रजा परिपद रखा गया। ई० सन् 1942 के प्रादोलन के समय यहां के कई कार्यकर्ता युगलकिशोर चतुर्वेदी, आदित्येन्द्र आदि गिरफ्तार कर लिये गये। उसी वप राज्य में बाढ आ जाने के कारण यह आन्दोलन स्थगित हो गया और प्रजा मण्डल का राज्य से समझौता हो गया। ई० सन् 1943 में प्रजा मण्डल ने व्यवस्थापक सभा, व्रजजया प्रतिनिधि सभा के चुनाव में 37 मे से 27 स्थान जीत लिए। विधान सभा मे प्रमुख विरोधी दल प्रजा परिषद का बना। इसका नेता युगलकिशोर चतुर्वेदी तथा उपनेता आदित्येन्द्र चुने गये। बाद मे इन सदस्यो ने व्यवस्थापक सभा का बहिष्कार कर दिया। ई० सन 1947 मे वेगार के विरोध मे जनता ने आदोलन किया। इसको वडी क्रूरता से दवाया गया। एकत्रित भीड पर घुडमवार सैनिक दौडाये गये जिसके कारण काफी लोगा को चोटे आई। कुछ दिन बाद जब महाराजा दौरे से लौटे तव जनता ने फिर सत्याग्रह किया। पुलिस ने एक वस सत्याग्रहियो पर चला दी जिसके कारण कई सत्याग्रही घायल हुए। रमेश स्वामी की नव ही मृत्यु हो गई। कई कायकर्ता गिरफ्तार कर लिये गये ।152 भारत के स्वतन होने के वाद दिसम्बर 1947 मे महाराजा ने अन्तरिम सरकार बना कर चार लोकप्रिय मनी लिये लेकिन तब ही यहा का शासन के द्रीय सरकार ने अपने हाथो मे ले लिया क्योकि यहा तव साम्प्रदायिक दग ज्यादा ही हो रहे थे। अलवर राज्य मे ई० सन् 1933 मे काग्रेस समिति की स्थापना हुई। कई लोग काग्रेस के साधारण सदस्य बने । राज्य ने ऐसे कई सदस्यो को राजद्रोह कानून के तहत गिरफ्तार कर सजाये दे दी। ई० सन् 1938 मे काग्रेस समिति ने अपना नाम बदल कर प्रजा मण्डल रख लिया। प्रजा मण्डल के लिये पहले राज्य सरकार न यह गेव लगा दी कि न तो प्रजा मण्डल अपना भण्डा लगा सकेगी और न वह अखिल भारतीय काग्रेम से सम्बद्ध हो सकेगी लेकिन इन शर्तों को प्रजा मण्डल ने बनने के वाद नहीं माना। ई० सन् 1942 के "भारत छाडो" आदोलन का प्रभाव इम राज्य पर भी पड़ा। उस समय प्रजा मण्डल के शोभाराम, रामचद्र उपाध्याय व कृपादयाल ने वकालत छोड दी।
HP--- शोभाराम ने 13 दिवसीय अनशन भी किया ।1 ई० 4943 मे रामजीलाल अग्रवाल के प्रजा मण्डल मे मा जाने से इसका चलने लाम मास्टर भोलानाथ का भी प्रजा मण्डल मे काय प्रशसनीय रहा। फरवरी 1946 में जब प्रजा मण्डल का एक सम्मेलन जागीरी जुल्मो के विरुद्ध सेडा मगलसिंह मे हो रहा था तब उसको सरकार विरोधी मान कर प्रजा मण्डल की कार्य- कारिणी के सव सदस्य गिरफ्तार कर लिये गये। इन गिरफ्तारियो का जनता ने प्रवल विरोध किया तथा 8 फरवरी को दमन विरोधी दिवस मनाया। अलवर नगर मे एक सप्ताह तक हडताल रही। राज्य ने काफी गिरफ्तारिया की। अन्त मे हीरालाल शास्त्री के प्रयत्यो से प्रजा मण्डल तथा महाराजा के वीच समझोता हो गया। सभी गिरफ्तार व्यक्ति छोड दिये गये। अगस्त माह मे यहा उत्तरदायी शासन के लिये अान्दोलन हुया जिसके कारण अलवर नगर तथा राज्य के सभी स्वो मे पूर्ण हडताले हुई। यह आन्दोलन 11 दिन तक चला तथा 600 व्यक्ति गिरफ्तार हुए।1 अक्टूबर 1947 मे महाराजा ने मत्री मण्डल में तीन लोकप्रिय मत्री लेने की घोषणा की लेकिन यह घोपणा टकोसला मात्र थी। अत प्रजा मण्डल ने इसे स्वीकार नहीं किया। ई० सन् 1947 में यहा ज्यादा ही साम्प्रदायिक दगे हुए, अत 7 फरवरी 1948 को केन्द्रीय सरकार ने यहा का शासन अपने हाथो मे ले लिया। मार्च 18 को यह राज्य मत्स्य सघ में सम्मिलित हो गया। धोलपुर राज्य प्रजा मण्डल की स्थापना 1936 मे हुई। इसके अध्यक्ष कृष्णदत्त पालीवाल व सचिव मूलचन्द्र चुने गये। राज्य ने ऐसी राजनैतिक सस्था को बिल्कुल पसन्द नहीं किया और मण्डल की सम्पत्ति जब्त कर ली। सन् 1938 में प्रजा मण्डल ने सरकार को आवेदन पत्र पेश किया कि गज्य में उत्तरदायी सरकार की स्थापना की जावे लेकिन सरकार ने कत्तई ध्यान नहीं दिया। ई० सन् 1940 मे पूर्वी राजपूताना की रियामत के एक सम्मान में पुन उत्तरदाई सरकार की माग की गई लेकिन फिर भी माने नी माग करने वालो का दमन किया। ई० सन् 1947 में उय नमानी पाद में कुट लोगो ने एव राजनैतिक सम्मेलन रिया नुर दोन्टामिद व पत्रमसिंह पुलिस की गोली के शिकार हुए 115 उननात दिनमान्दावन चलाये ग्री अन्त मे रियासत को झुक्ना पडा या त दुग की पाउना घोपित करनी पडी लेकिन गीत मात्र 1940 का विनयन मन्य नम हो गया।
94 ] करौली राज्य में राजनैतिक जागृति का सूत्रपात कु वर मदनसिंह प्रोकारसिंह, चिरजीलाल शर्मा आदि ने किया। ई० सन् 1938 में प्रजा मण्डल की स्थापना होने के बाद जनता को संगठित किया गया और मपोटरा आदि स्थानो पर जागीरी जुरमो के विरुद्ध सम्मेलन किये गये। नवम्बर 1946 मे पडौसी रियासती के राजनैतिक कार्यक्त्तत्रिो ने उत्तरदाई सरकार की माग उठाई। अत महाराजा ने जुलाई 1947 मे सवैधानिक सुधारो हेतु एक समिति बनाई। समिति काम करने लगी ही थी कि ई० सन् 1948 में यह राज्य मत्स्य संघ में सम्मिलित हो गया।165 किशनगढ राज्य अजमेर के अत्यन्त निकट होने के कारण वहा काफी जागृति आई। यहा के प्रजा मण्डल के मुरय कायकर्ता कातिच'द्र व पुस्पोतम- लाल शर्मा जमालगाह आदि थे 1167 टोक मुसलमानी राज्य था। यहा ज्यादातर धार्मिक आदोलन हुए। टोक म ही लाया ठिकाना या जहा के महेन्द्रकुमार जैन ने राष्ट्रीय कायमो मे बडे उत्साह से भाग लिया ।168 शाहपुरा राज्य मे प्रजा मण्टल की स्थापना ई० सन् 1938 मे हुई। इसने बेगार वन्द करने, नगरपालिका स्थापित करने आदि के लिये काफी प्रयत्न किये। ई० सन् 1942 के अान्दोलन में यहा के कार्यकर्ता परडे जाकर अजमेर जेल में रखे गये। यहा के प्रमुख कायकर्ता गोकुललाल असावा, लादूराम व्यास, रमेशचन्द्र, लक्ष्मीदत्त आदि थे। ई० सन् 1947 मे गोकुललाल असावा के प्रधान मत्रीत्व में लोकप्रिय सरकार और विधान निर्मात्री परिषद वनी और उसे मविधान बनाने का पूरा अधिकार दिया गया। इस प्रकार या प्रगतिशील कदम उठाने वाली यही रियासत थी। 1948 में यह रियासत मयुक्त राजस्थान मघ मे मम्मिलित हो गई। सिरोही राज्य में प्रजा मण्डल 1939 में स्थापित हुआ लेकिन इसरा पजीयन 1940 की मई मे हो मा। ई० सन् 1941 मे पुन कुछ गडवडी हुई और मभी मुन्य कायकर्ता जेल म दाल दिये गये। अगस्त 1942 में "भारत छोडो" आदोलन के ममय यहा तीसरा बडा पादोलन हुआ। यहा के प्रमुस वायकर्त्ता गोकुलभाई भट्ट राजपूताना प्रानीय काग्रेस कमेटी के प्रथम सभापति थे। भारत के स्वतत्र होने पर मिरोही राज्य भारतीय संघ में शामिल हो गया तथा वहा प्रजा मण्डल के प्रतिनिधि लेकर मत्रीमण्डल भी बन गया जिसमें मुख्यमत्री गोकुलभाई भट्ट थे। कुछ पारणो से मरदार पटल ने [ 95 वाद में सिरोही या प्रशासन 8 नवम्बर 1948 को भारत सरकार के हाथो मे लेकर 5 जनवरी 1949 को बम्बई सरकार को सुपुद कर दिया। जिसके विरोध में न केवल सिरोही बल्कि राजस्थान में भी घोर आन्दोलन हुआ। 1956 की नवम्बर 1 से यह क्षेत्र पुन राजस्थान में सम्मिलित कर दिया गया। प्रतापगट राज्य के उदयपुर राज्य के निक्ट होने के कारण वहा की हलचलो का काफी प्रभाव पड़ा। यहा के कार्यकर्तायो ने पिछड़ी जातियो व भीला को जागृत करने का काफी प्रयास किया। सन् 1936 मे ठक्कर बाप्पा ने हरिजनोत्थान हेतु यहा हरिजन पाठशाला स्थापित की। सादी प्रचार सभा, पाठशाला आदि द्वारा यहा जनजागरण हुआ। यहा अमृतलाल पायक ने 1946 मे प्रजा मण्डल की स्थापना की। डूगरपुर राज्य में भीलो की पावादी ज्यादा होने तथा उनके अत्यन्त पिछडे होने के कारण सबसे बड़ी समस्या उनका सामाजिक व आर्थिक उत्थान करना था। अत भोगीलाल पडया, शोभालाल गुप्ता, मारणकलाल वर्मा अादि ने यहाँ भील सेवा संघ स्थापित किया। उसकी ओर से यहा अनेक पाठशालाये सोली गई। इस कारण यहा राजनैतिक जागृति हुई तथा राज्य से भी सघप हुअा। यहा के मुख्य कायकर्तामो मे भोगीलाल पड्या, हरदेव जोशी व गौरीशकर उपाध्याय थे। ई० सन् 1944 मे प्रजा मण्डल स्थापित हुआ। उत्तरदायी सरकार की भाग करने के कारण प्रजा मण्डल को राज्य सरकार से सघर्ष करना पड़ा जिसके कारण भोगीलाल पड्या को काफी जुत्म सहने पडे । तव ही एक साथ 35 कायकर्ता गिरफ्तार किये गये। भारत के स्वतन्त्र होने के वाद यहा भी लोकप्रिय मत्री मण्डल बना। मनी मण्डल मेरीशकर उपाध्याय व भीखाभाई प्रजा मण्डन के प्रतिनिधि के रूप में थे। ई० सन् 1948 की 18 अप्रैल को सयुक्त राजस्थान सघ का निर्माण होने पर यह रियासत उसमें सम्मिलित हो गई। वासवाडा राज्य में भी भोलो की अधिकता थी। गुजराज व उदयपुर की जन जागृति का यहा पर भी प्रभाव पड़ा। यहा 1943 मे प्रजा मण्डल की स्थापना हुई। यहा के कार्यकर्तामो-पन्नालाल, भूपेन्द्रनाथ त्रिवेदी, धूलजी भाई भावसार, मणीशकर जानी, ध्यानीलाल चिमनलाल मालोत, नटवरलाल भट्ट, मोहनलाल त्रिवेदी आदि ने भीलो की स्थिति सुधारने के काफी प्रयास किये। भारत के स्वत न होने पर यहा लोकप्रिय मनी मण्डल बना तब 96 ] भूपेद्रनाथ निवेदी मुर यमनी बने। सयुक्त राजस्थान मघ का निर्माण होने पर यह रियासत उसमे मिल गई 103 कुशलगढ वासवाडा राज्य का ही एक अग माना जाता था लेकिन यह उपरियासत अग्नेजी शासनकाल मे बना दी गई थी। अप्रेल 1942 म भवरलाल निगम की अध्यक्षता मे यहा प्रजा मण्डल की स्थापना हुई जिसने लाग बागो के विरुद्ध पादोलन चलाये। भीलो का भी सगठन किया गया। ई० मन् 1948 मे यहा गाधी प्राथम की स्थापना की गई। अजमेर मे काग्रेस भगठन ई० मन् 1938 के भगटो के नारग काफी कमजोर हो गया था। इसी वप ब्यावर मे एक राजनैतिक सम्मेलन भूलाभाई देसाई के सभापतित्व मे हुआ तब यह प्रस्ताव पारित किया गया कि अजमेर मरवाडा को यू०पी० (वतमान उत्तरप्रदेश) मे मिला दिया जाये ताकि इस जिले को प्रातीय स्वशासन आदि के लाभो से वचित न रहना पडे । सरकार ने इस प्रस्ताव की क्तई परवाह नहीं की। द्वितीय महायुद्ध के समय जन गाधीजी ने व्यक्तिगत सत्याग्रह चलाया तब वहा के प्रमुख कायकर्तामो मे से कुछ ने इसमें भाग लिया। अगस्त 1942 के 'भारत छोडो' आन्दोलन के समय यहा भी काफी सरगर्मिया रही। अगस्त 9 को अजमेर, व्यावर, केण्डी आदि स्थानो के 37 मुख्य कायकर्ता गिरफ्तार किये गये। सभी काग्रेस कमेटिया को अवैध घोपित कर दिया गया। यादोलनकारी छात्रो को भी गिरफ्तार किया गया । रमेश व्यास, लेगराज प्राय, शकरनाल वर्मा, मूलचन्द असावा, गोकुललाल असावा, मुकुट बिहारीलाल भागव, रामनारायण चौधरी, चन्द्रगुप्त वार्ष्णेय, बालकिशन कौल, व्रजमोहन शर्मा आदि को गिरफ्तार कर उहे सजायें दी गई। ई० सन् 1944 मे ज्वालाप्रसाद शर्मा व रघराजसिंह जेल अधिकारिया की आखो मे धूल झोक कर जेल से भाग गये। बाद में सन 1945 तक सभी बदी नेता छोड दिये गये। भारत के स्वतन्त्र होने पर राजपूताना एजे सी समाप्त कर दी गई। अब अजमेर राजस्थान की राजनैतिक गतिविधियो का केद्र नहीं रहा। अजमेर में राजस्थान की रियासतो के नेताग्रो का पाये दिन रहने वाला जमघट समाप्त हो गया। ई० सन् 1951 मे 'मी' श्रेणी के राज्य बनाने सम्बन्धी अधिनियम के लागू होने पर अजमेर अलग से एक राज्य वन गया तथा यहा विधान सभा भी बना दी गई। स्वतन्त्रता पश्चात् लोकतान्त्रिक सरकार राजस्थान मे वन गई। वह तथा अखिल भारतीय देशी राज्य नोक परिपद की राजपूताना प्रान्तीय सभा - ।
[ 97 अजमेर को राजस्थान मे मिलाने की माग करने लगी कि 'भौगोलिक, सास्कृतिक घ भापायी सप्टि से वह राजस्थान का ही एक भाग है। अग्रेजा ने अपनी मुविधा के लिये उसे एक अलग उपप्रात बना रखा था। यह एक अलग छोटा राज्य-केवल 2417 वर्ग मील व सात लाय पावादी वाना-है जो भारत मरकार की राज्य निर्माण नीति के अनुसार अलग स्वतन्त्र राज्य नही बना रह सकता है। अत जव भारत के राज्यो का पुनगठन हुआ तव अजमेर राज्य को राजस्थान में मिलाने की सिफारिश की गई।15 ई० सन् 1956 की पहली नवम्बर को अजमेर राजस्थान का एक भाग वन गया और उसमे पूर्ववर्ती किशनगढ रियासत का क्षेत्र मिलाकर एक नया जिला अजमेर बना दिया गया।116 इस प्रकार राजस्थान निर्माण की जो प्रनिया 18 मार्च 1948 को प्रारम्भ हुई थी वह 1 नवम्बर 1956 को पूर्ण हुई। राजस्थान म राजाशाही का अन्तिम चिह्न राजप्रमुख का पद भी समाप्त कर दिया गया। अब राजप्रमुख के स्थान पर राज्यपाल राज्य का प्रमुख होने लगा। यह स्पष्ट है कि राजस्थान की जनता को स्वतन्त्रता प्राप्ति हेतु काफी सघप करने पडे । अग्रेजी प्रान्तो मे वहा की जनता को केवल अग्रेजी सरकार से सघप करना पड़ा लेकिन यहा अग्रेजी सरकार के अलावा, निरकुश राजाओ व प्रतिक्रियावादी सामन्तो से भी लोहा लेना पटा। इन सघर्पो मे पचासो वीरगति को प्राप्त हुए, सैकडो को जेल जाना पड़ा और हजारो को पुलिस की लाठियो के प्रहार झेलने पटे। जागीरी गावो मे हजारो किसानो को अपने मूल अधिकारो के लिए मार सानी पडी, सैक्डो को सेतो से वेदखल होना पड़ा तथा उपज का 90 प्रतिशत तक अनाज लगान व लाग बागो मे देकर व वेगार निकालकर दयनीय अवस्था में रहते बराबर सघप करना पड़ा। अत में वे सफल हुए व जागीरदारी प्रथा समाप्त होकर रही। प्रत्येक रियासत मे ये सघर्प अनग-अलग कारणो व अलग-अलग कालो मे हुए । प्रत्येक राज्य के अलग अलग नेता थे। अत यहा कोई एक वेद्रीय सगठन नहीं बन सका ताकि इन पर नियंत्रण र सके तथा आवश्यकतानुसार सहायता व सलाह दे सके। इस कारण यहा व्यक्तिवाद ज्यादा ही पनपा और नेताओं में भी पारस्परिक मधप हुए। जमनालाल बजाज, विजयसिंह पथिक, रामनारायण चौधरी व अजुनलाल सेठी के वीच द्वितीय महायुद्ध के पहले तथा उत्तर-म्वत नता काल में हीरालाल शास्त्री, जयनागयण व्याम, । ।
98 ] मारणकलाल वर्मा व गोकुलभाई भट्ट के वीच सघप इसके उदाहरण है। इन नेताओं के सघर्पो के कारण प्रान्त का अहित ही हुमा । राजस्थान के निर्माण के वाद स्वत अता अान्दोलन के नेता राज्य के अत्यन्त महत्वपूरण व्यक्ति बन गये। कई मत्री पद पा गये तो कई विधायक बन गये। कई बडे पू जीपति बन गये तो कई उद्योगपति । राजाशाही को समाप्ति के बाद सामन्तशाही का अन्त हो गया लेकिन कई नये बडे भूमिपति हो गये जो काश्त न करते भी वडे काश्तकार बन गये और वास्तविक काश्तकारो का शोषण करने लगे। जनता को काफी सीमा ता सामाजिक व आर्थिक मूल अधिकारी की प्राप्ति हुई है लेकिन फिर भी वहुमरया ग्रामीणो का अभी भी सामाजिक व आर्थिक शोषण हो रहा है। अत सामाजिक व आर्थिक सघप अभी तक समाप्त नही हुआ है। टिप्परिणया- ए वी कीथ, स्पीचज एण्ड डाक्यूमेटस पान इण्डियन कास्टीटयूसन (192147), भाग 1, 320 2 (अ) पी मुखर्जी, इण्डियन कास्टीटयूम्नन डाक्यूमेटम, 123 (ब) पार सी मजूमदार, ब्रिटिश परामाउण्टेसी एण्ड इण्डियन रिनासा, भाग 1,745 रमेश दत, द इकानोमिक हिस्ट्री आफ इण्डिया इन द विक्टोरियन ऐज, 232 35 4 (अ) फतहसिंह चापावत, ए ब्रीफ हिस्ट्री प्राप जयपुर, 184 (ब) एचीसन, टिटीज, एगेजम टस एण्ड सनद्स, भाग 3 103 4 थामसन एण्ड सरद राइज एण्ड फुलफिलमेण्ट आफ ब्रिटिश स्ल इन इण्डिया 469-70 6 पंण्डल मून, स्ट्रेजर इन इण्टिया, 631 7 एलेक्जेण्डर केम्पबेल इट इज योर एम्पायर 173 8 डोडवत, केम्ब्रिज हिस्ट्री आप इण्डिया, निल्द 6, 492 वाइट पपर आल इण्डियन स्टेटस 22 10 के पार शास्त्री, इण्डियन स्टटस, 81 ए सी बनर्जी, इण्डियन कास्टीटयूसनल डाक्यूमेट्स, जिल्द 2, 37 (भूमिका) 12 सरिंग, हिस्ट्री आफ मेया कालेज, जिल्द 1 10 12 13 (4) डिस्पेच स 89 दिनाक 3 जून, 1875 (ब) आर सी मजूमदार, वही पृ 966 14 ए सी बनर्जी, वही पृ 35 (भूमिका) 15 (अ) डोडवल वही 498 (1) राजपूताना एजेसी रिपोट 1867-68, 98 3 5 9 11 [99 16 फारेन एण्ड पालीटीक्ल फाइल, दिसम्बर 1870, न 4256 17 पार सी मजूमदार, वही, 964 18 वही, 964 19 जगदीशसिंह गहलोत, जोधपुर राज्य का इतिहास (हस्तलिवित), पृ 208 20 (प्र) टी रेले, लाड क्जन इन इण्डिया, 236 (ब) बी बी कुलकर्णी, द फ्यूचर प्राफ इण्डियन स्टट्स, 17 21 पार सी मजूमदार, वही, 970 22 विजयसिंह पथिक, डायरी (अप्रकाशित) 23 एचीसन, वही, पृ74-78 तथा 147-151 24 वही, 4-7 25 वही, 108 110 26 वही, 74 27 जगदीशसिंह गहलोत, वही, 209 28 एचीसन, वही, 224 29 वहीं, 270-272 30 हरविलास शारदा, शकर एण्ड दयान द, 122 31 ताराचद, भारतीय स्वतत्रता प्रा दोलन का इतिहास, भाग 2, 455-57 32 बी पट्टाभि सीतारमय्या, पाग्रेस का इतिहास, भाग 1, 8 33 वेडरबन बायोग्राफीक्ल स्केच आफ हयूम, 53 34 मार सी मजूमदार, वही, भाग 2, पृ 538 35 पी एन माथुर, प्रासोडिंग्स ग्राफ राजस्थान हिस्ट्री काग्रेस, 1969, 160 36 पार सी मजूमदार, वही, भाग 2 586 37 वहीं 4078 38 वी पट्टाभि सीतारमय्या वही, 68 73 39 (अ) लाल बहादुर, मुस्लिम लीग, 43 (ब) राम गोपाल, इण्डियन मुस्लिम्स पालिटिकल हिन्दी, 83-84 40 मोहनदास करमचद गाधी, हिद स्वराज्य, 15-18 41 पार सौ मजूमदार, स्ट्रगल पार फ्रीडम, 2 42 विजयसिंह पथिक की डायरी (प्रप्रकाशित) 43 पाटलीपुत्र दैनिक, दिनार 4 जुलाई, 1914 6 44 एम के माघी, एन ऑटोग्राफी, 547 45 इण्डियन एयुल रजिस्टर 1919 17 2, 14 46 बटलर कमेटी रिपोट का साराश 47 बीकानेर स्टेट एडमिनिस्ट्रेटिव रिपोर्ट, 1913-14, 34-39 48 पृथ्वीसिंह मेहता, हमारा राज यान, 323 49 वही, 332 100 ] 50 मायक्लाल वर्मा मेवाड का वतमान शामन 28 51 (अ) नवीन राजस्थान, अजमर 9 जुलाई 1922 (ब) पृथ्वीसिंह महता वही 360 52 पृथ्वीसिंह महता वही, 344 53 वही 341 54 राजपूताना मध्यभारत सभा का वार्षिक विवरण, 1924 पृ 55 पृथ्वीसिंह मेहता वही 347 56 पायानियर दनिक 30 दिसम्बर 1920 57 टाइम्स आफ इण्डिया 30 दिसम्बर 1920 58 रामनारायण चाधरी, बीसवा सदी का राजस्थान 42, 67 तथा 86 59 आर सी मजूमदार, म्टगल पार फ्रीडम 350 51 60 रिपोट आफ द इण्डियन स्टटम पीपल्स का फ्रेंस, 1927, पृ 1 61 मित्रा, द इण्डियन क्वाटरली रजिस्टर, जुलाई स दिसम्बर, 1924, पृ 494 98 62 रिपाट आफ द इण्डियन स्टट्स पीपल्स का फ्रेंस, 8 63 इण्डियन रिव्यू, जनवरी, 1921 पृ 59 तथा अप्रेल 1921, 267 64 वहीं 65 बाम्ब कानोक्ल 25 माच, 1931 66 जगदीशसिंह गहलात टाक राज्य का इतिहास (अप्रकाशित) पृ 46 67 वी पट्टाभीसीतारमय्या, पृ 222 68 सारंगधर दास बीकानर का रापनतिक इतिहास 113 69 पृथ्वीमिह मेहता, वही 318 70 वही 320 71 महात्मा गाधी, द मन एण्ड हिज मिशन, 82 85 72 एकाथिल द लास्ट टामीनियन 271 व 276 73 पार सी मजूमदार स्ट्रगल फार फ्रीडम, 413 74 रामनारायण चौधरी वही 86 75 वहीं 58 जयनारायण व्यास मारवाड म जाति और उस रोक्न के उद्योग 58 77 मोतीलाल तेजावत की प्रारम क्या (यप्रकाशित) 78 तरण राजस्थान, 16 मई, 1926, पृ 4 79 जी मार अभ्यकर प्राबलम्म आफ इण्डियन स्टेटस,9-11 80 रामनारायण चौधरी वही, 85 81 माभाग माथुर, स्ट्रगल फार रस्पो सीबल गवर्मेट इन मारवाड 23 24 82 रामनारायण चौधरी वही 9596 83 पेमाराम, एप्रेरियन मूवमेट इन राजस्थान पृ 150 51 76 [ 101 84 (अ) विशनपुरी, मेमायस आफ द मारवाड पुलिस, 125 (व) द प्रिस्ली इण्डिया 19 अक्टूबर, 1928 85 जगदीशसिंह गहलात कच्छवाहो का इतिहाम 173 86 रामनारायगा चौधरी वही 102 87 शकर सहाय सक्सेना, जो देश के लिए जिए, 53 88 (अ) यग राजस्थान, सितम्बर अक्टूबर 1929 (ब) द हिन्दुस्तान टाइम्म 4 अक्टूबर 1929 89 पृथ्वीमिह मेहता, वही पृ 381 90 वही पृ 376 385 91 पार सी मजूमदार स्ट्रगल फार फीटम 804 92 वाइट पेपर पान इण्डियन स्टेट्स, 20 93 जगदीशसिंह गहलात भारत के देशी राज्य 47 94 वही 48 95 एस एस अय्यर, इण्डियन कास्टीटयूस्नल रिफोम्स 210 96 जी पार अभ्यकर वही, 273 97 ग्रार सी मजूमदार, स्ट्रगल फोर फ्रीडम 454 98 रिपोट आफ द इण्डियन स्टेटस कमेटी 1928-29 परिशिष्ट 2 99 वही 100 इण्डियन एयुअल रजिस्टर 1921, भाग 2 98-102 101 आर सी मज्मदार स्ट्रगल फोर फ्रीडम 4724 102 वही, 477 103 वही 481 104 वही, 4824 105 वही 488 106 वही, 492 3 107 बी पार अम्बडकर वाट पायस एण्ट गाधी हव डन टू द अनटचेबल्स, 12630 108 तारानद, वही, 1778 109 वही, 197 110 भार सी मजूमदार स्ट्रगल फार फोडम 617 111 बी पट्टाभिसीतारामय्या वही पृ 364 112 हिन्दुस्तान टाइम्स, 14 नवम्बर 1931 113 पृथ्वीसिंह मेहता, वही 410 114 राजस्थान राज्य मभिलेखागार बीकानर, फाइल स 7/1934 तथा 105/1934 115 जहूरगां मेहर, राजस्थान म माजादी रो भादोलन, पृ 32 102 ] 116 महाराजा गगामिह या मर डानाल्ड फोल्लमा पत्र, म मा म 201, प्रा मे 54/37 दि 21 फरवरी 1937 117 मोभाग माथुर यही 39 4 59 118 पूणिमा नवीन लाल, राजस्थान अनुशी17, 218 119 यही 217 120 पमाराम यही 162 121 जहूरमा मेहर वही, 35-36 122 पूणिमा नवीनलाल, वही 216-217 123 वही, 226 124 वही 125 बी एन पानगडिया, राजस्थान म स्वत प्रता संग्राम, 47 126 जगदीपसिंह भारत के देशी राज्य, 57 127 वी पट्टाभि सीतारामय्या, वही, भाग 2 147 128 (प्र) बी पी मेनन, द्रास्फर यांफ पावर, 126 (ब) ए के मजूमदार, एडवेट माफ मोहम, 172 129 ए सी चटर्जी, इण्डियाज स्ट्रगल फोर पीडम 38 130 बी पट्टाभि सीतारमैय्या वहीं, भाग 2 376 131 पआर सी मजुमदार, स्ट्रगल पोर फ्रीडम 718 132 बी पट्टाभि सीतारमैय्या, वही भाग 133 वही, भाग 2, 80 134 वही, पृ80 135 सुखवीरसिंह गहलोत, राजस्थान का सपिप्त इतिहास, पृ 248 136, पूर्णिमा नवीनलाल, वही 147 48 137 जहूरसा मेहर, वही 43 138 वही, 44 139 वहीं 140 वही 141 (अ) प्राकारसिंह, महाराजा, 29 30 (ब) पानगडिया, वही, 7778 142 पूणिमा नवीनलाल, वही 225 143 वही 144 जगदीशसिंह गहलोत, जोधपुर राज्य का इतिहास (प्रप्रकाशित) 301 145 वही,307 146 वही, 309 147 वही ३09 148 वहीं 309
[ 103
149 पूर्णिमा नवीनलाल वही, 225
150 सुखवीरसिंह गहलात, वही, 248
151 पूणिमा नवीनलाल, वही, 226
152 वी एल पागडिया वही पृ 85
153 वही 65 66
154 वही, 63 66
155 वही 61 63
156 वही, 74
157 वही, 76
158 पूणिमा नवीनलाल वहीं, 220
159 वही
160 बी एल पागडिया, वही 95
161 डी डी गोड क्स्टीटयुशन डवलपमण्ट प्रॉफ ईम्टन राम
162 बी एल पानगडिया, वही, 55
163 वही, 40 41
164 वही 88
165 बी एल पानगडिया 67
166 बी एल पानगडिया वही, 39 व 55
167 वहीं, 56
168 जगदीशसिंह गहलोत, टार रानाम:
169 बी एल पानगडिया, वही, 95
170 जहूरपा मेहर आजादी रा मा
171 पूणिमा नवीनलाल, राम्य प्रमाण
172 जहरखों मेहर, वही, 67
173 वही 67 68
174 गाविद सहाय, 19423
175 रिपाट ऑफ दम-in
176 अजमेर गजेटियर 22
किसान आन्दोलन राजस्थान मे गजनैतिा चेतना एव स्वाधीनता मग्राम की पृष्ठभूमि का निर्माण रियासतो के किसान वग के आन्दोलना ने किया। सामतवादी व्यवस्था मे जागीरदार और किसानो के हितो मे अन्तविरोध पाया जाता है । इस अविरोध की प्रथम सशक्त अभिव्यक्ति मेवाट के विजोनिया किसान आन्दोलन मे हुई। अत विजोलिया आन्दोलन के गभ से भावी राजस्थान की राजनैतिक चेतना ने जम लिया ।। विमान वर्ग के अान्दोलनो को इस बात का श्रेय है कि उन्होंने सवप्रथम राजस्थान मे राजनैतिक-भामाजिक चेतना का सूत्रपात क्यिा, राष्ट्रीय आन्दोलन के भावी नेतृत्व का निर्माण किया और रियासतो मे उत्तरदायी शासन की स्थापना के लिए संघर्ष करने वाले प्रजामण्डलो के संगठन मे मूल प्रेरक तत्व की भूमिका प्रस्तुत की। सामतवादी व्यवस्था के प्रतिमान म्वत त्रता से पूर्व राजस्थान मे निम्नलिखित बडी छोटी कुन 22 रियासते थोर अलवर, भरतपुर, धौलपुर, करौली, बासवाडा, बूदी, डूगरपुर, झालावाड, किशनगढ, कोटा, मेवाड, प्रतापगढ, शाहपुरा, टाय, जयपुर, जैसलमेर, बीकानेर, जोधपुर, सिरोही, और लावा, कुशलगढ नीमराना। रियासतो एव उनके अधीनस्थ ठिकानो (जागीर क्षेत्र) मे सामतवादी व्यवस्था के प्रतिमान प्रचलित थे। इसके अतर्गत नरेश रियासत का सम्प्रभु शासर होता था। उसके अधीन अनेक सामत जागीरदार होते थे । जागीरदार अपनी जागीर के अर्धस्वतन्त्र शासक होते थे। उहे अपने राज्य के स्वामी को रेख (जागीर के कुल राजस्व का वार्षिक कर), चावरी (घडसवार, ऊँट सवार और पैदल सैनिक नरेश की सेवा मे प्रस्तुत करना), हुक्मनामा अथवा तलवार बधाई (उत्तराधिकार कर), नजर नजराना और छटूद [ 105 (मेवाड मे प्रचलित चाकरी कर) देना पडता था, यपि इनको मात्रा और राशि प्रत्येक रियासत में भिन्न भिन्न थी।' प्रत्येक रियासत मे भूमि का बन्दोवस्त दो प्रकार का था। एक खालसा भूमि, जिस पर शासक का प्रत्यक्ष नियन्त्रण होता था और दूसरा जागीर क्षेत्र जिस पर जागीरदार का प्रत्यक्ष प्रशासन होता या। जागीरदार अपने ठिकाने मे सवोच्च शक्ति होने के कारण कार्यपालिका (प्रशासनिक एव पुलिस शक्तिया) एव न्यायपालिका की शक्तियो का उपभोग प्रयोग करते थे। जागीर और रियासत की आय की वृद्धि के लिए भू-राजस्व (भूमि का लगान) के अलावा अनेक प्रकार की लाग वेगार (उपकर एव बलात् श्रम) किसानो से जबरन वसूल की जाती थी। 1941 मे जोधपुर राज्य द्वारा गैर कानूनी लाग-बाग की जाच के लिये गठित जाच ममिति के सामने मारवाड किसान सभा ने जोधपुर के प्रधानमत्री को 136 अवैध लाग बागो की सूची दी थी। जयपुर रियासत मे जब शेखावटी के ठाकुर ने मोटरकार खरीदी तो प्रजा पर एक नई मोटर लाग थोप दी गई, जबकि वे पहले से ही 30 से ज्यादा लागें दे रहे थे। 1922 मे क्सिान पचायत बिजोलिया ने ए०जी०जी० हालैड को 74 लाग वागो की सूची दी थी। बीकानेर राज्य के जागीरदारो ने 1940 मे 37 लागो मे से 29 को समाप्त करने का प्रस्ताव किया था। जोधपुर रियासत के बिलाडा परगना मे विभिन्न प्रकार की 142 लाग बागे किसानो से वसूल की जाती थी। सामतवादी व्यवस्था मे सालसा और जागीर दोनो मे ही बेगार प्रथा प्रचलित थी। विभिन्न जातियो को वेगार देनी पड़ती थी। जैसे-चमार-भावी (गाव के जागीर कर्मचारियो का प्रतिनिक सेवक बन्धुआ मजदूर के समान), कुम्हार (मिट्टी के बरतन, खपरैल और पानी की आपूर्ति करना), नाई (मुफ्त मे हजामत बनाना, कपडे धोना, वतन माजना, झाडू देना, स्नान कराना तथा मालिश करना), माली (फल फूल सब्जी आदि मुफ्त मे देना), बढई (ठिकाने के फरनीचर की मरम्मत करना), सरगरा (सरकारी घोडो की सेवा और प्रासामियो को बुलाने की बेगार देना), ढोलो (जागीरदार की सवारी के पीछे गाते हुए चलना), भील (पत्रवाहक का कार्य करना), महाजन (रियासत अथवा जागीर के कर्मचारियो की याना के समय पाई, बिस्तर, वर्तन और भोजन सामग्री की व्यवस्था मुफ्त मे करना) और साधारण कृपको को तो सबसे अधिक वेगार देनी पडती थी। । . .
106 ] किसानो को रियासत और जागीर दोना के घोडो के लिए मुफ्त में हरी घास और जो की आपूर्ति करनी पडती थी। जागीर परिवार में विवाह, मृत्यु-भोज के अवसर पर मुफ्त मे घी, दूध, दही देना पड़ता था। शामक या जागीरदार की यात्रा के समय मुफ्त में बैलगाडी अथवा ऊँट की व्यवस्था करना और ठाकुर की भूमि पर मुफ्त में खेती करनी पडती थी। जय ठिकाने के कर्मचारी गाव मे पाते तो उनके लिए भोजन और आवास की व्यवस्था नि शुल्क करनी पडती थी। लाग-वागों के अतिरिक्त जागीरदार रेप, तलवार-बधाई, छटूद और नजराने की राशि भी किसानो से बलात् वसूल करते थे। किसान लाटा किए विना फसल मे से अनाज की एक सिट्टी (वाली) भी नही तोड सकता था। इस सन्दभ में किसानो के घरो और औरतो की तलाशी लेकर उहे अपमानित किया जाता था। अनेक ठिकानो मे किसानो की बहू बेटियो मा जागीरदार अथवा उनके क्मचारी शील भग करते थे। इस प्रकार सामतवादी व्यवस्था में अवैध लाग-बागें किसान के प्राथिक एव सामाजिक शोपण के सया होते थे, जिनके परिणामस्वम्प विमान के पास दोनो समय पेट भर खाने को भी नही वचता था। किसानो के शोपण और उत्पीडन के चरमोत्कर्प की अभिव्यक्ति 1942 मे राजपूत सभा जोधपुर मे पारित उस सकल्प से होती है जिसमें कहा गया कि किसी भी किसान को अय जागीर मे वसने की स्वीकृत नहीं दी जाएगी। सामन्तवादी व्यवस्था मे किसानो के पार्थिक-सामाजिक शोपण एव उत्पीडन की पृष्ठभूमि ने राजस्थान में किसान आदोलन एव राजनीतिक चेतना का सूनपात किया और किसान पादोलन के जनक विजयसिंह पथिक इतिहास के अमर हस्ताक्षर बन गए। मेवाड मे किसान पादोलन भारत मे सवप्रथम अहिंसात्मक नीति पर आधारित सामतवाद के विरुद्ध किसानो का सगठित आन्दोलन मेवाड के विजोलिया ठिकाने मे प्रारम्भ होता है। विजोलिया को ऊपरमाल भी कहते हैं। यह मेवाड के प्रथम श्रेणी के 19 ठिकानो मे से एक था, जिसमे 96 गाव थे। अधिक भू लगान, लागत तथा वेगारो को जबरन लेना और जागीरदार के अत्याचार विजोलिया ठिकाने मे किसान भादोलन प्रारम्भ होने के प्रमुख कारण थे। ठिकाना छटून्द कर के [ 107 वार्षिक 4500 रुपये और तलवार-बधाई लाग के प्रजा से 60 हजार रुपये तक वसूल करता था, जबकि महाराणा मेवाड को केवल 40 हजार रुपये देने पडते थे। बिजोलिया किसानो ने ए० जी० जी० सर रॉवर्ट हालैंड को जून 1922 मे 74 लाग वागो की सूची दी थी 110 आ दोलन का सूत्रपात प्रथम चरण (1897--1916) सामन्तवादी शोपण के विरुद्ध बिजोलिया किसानो के प्रथम विरोध की अभिव्यक्ति 1897 मे धाकड जाति के एक किसान के मृत्युभोज के अवसर पर हुई ।। राव कृष्णसिंह ने 1903 मे एक नई लाग चवरी कर (पुत्री के विवाह पर 13 रुपये ठिकाने को लागत देना) लगाया। इसके विरोध में किसानो ने दो वर्षों तक अपनी पुत्रियो के विवाह नहीं किए। राव द्वारा चवरी लाग समाप्त नहीं करने पर 1905 मे किसानो ने ठिकाने की जमीन पडत रख दी और विजोलिया छोडकर ग्वालियर राज्य की सीमा मे चले गए। राव पृथ्वीसिंह ने 1913 मे तलवार-बधाई की लागत प्रजा पर थोप दी। किसानो ने साधु सीतारामदास, फतहकरण चारण और ब्रह्मदेव के नेतृत्व मे राव की कार्यवाही का विरोध किया। परन्तु सुदृढ सगठन और योग्य नेतृत्व के अभाव मे विजोलिया के किसानो का प्रतिरोध असफल रहा 11 आन्दोलन का द्वितीय चरण (1916-1929) विजयसिंह पथिक युग इस कालखण्ड मे भाग्यवश विजोलिया के किसानो को विजयसिंह पथिक के रूप में एक महान क्रान्तिकारी, प्रतिभासम्पन्न, विलक्षण सगठनकर्ता, राजनीति मे निपुण नेता मिल गया, जिसकी वाणी और लेखनी मे प्रोजस्विता थी। उहोने किसानो का एक शक्तिशाली सगठन ही खडा नही किया, बल्कि लोकनायक मारिणक्यलाल वर्मा तथा साधु सीतारामदास जैसे सक्रिय कार्यकर्ता और प्रभावशाली सहायक तैयार किए, जो किसानो को स्थानीय नेतृत्व प्रदान कर सके। उनके द्वारा स्थापिन किसानो के संगठन "उपरमाल पच वोड" ने विजोलिया किसान आन्दोलन का नेतृत्व किया और मार्ग-दर्शन पथिकजी ने दिया। असहयोग आदोलन का प्रारम्भ पथिकजी के परामर्श से गावो के किसानो ने प्रथम महायुद्ध का चन्दा, ऋण तथा लाग-बेगार देने से इन्कार कर दिया। विजोलिया किसान आन्दोलन की ओर देश का ध्यान आकर्षित करने के लिए 'प्रताप' (कानपुर) के यशस्वी सम्पादक गणेशशकर विद्यार्थी ने 'प्रताप के पृष्ठ अान्दोलन के लिए खोल दिये। - 108 ] लोकमान्य तिलक ने अपने पन 'मराठा' मे अान्दोलन के समथन मे मम्पादकीय लेख लिखे । ठिकाने ने अपना दमन-चक्र चलाते हुए लाग-बेगार जबरन लेना शुरु किया और पथिकजी साधु सीतारामदाम, माणिक्यलाल वर्मा, प्रेमच द भील और गणपतिलाल माथुर पर राजद्रोह के अपराध मे गिरफ्तारी वारट निकाला। भूमिगत होने के कारण पथिकजी पाडे न जा सके । लागते तथा बेगार न देने के अपराध मे ठिकाने ने 51 व्यक्तियो को गिरफ्तार कर लिया। विजोलिया किसान आदोलन की यह प्रथम सामूहिक गिरफ्तारी थी। वर्माजी और साबुजी को बदी वनाकर उनके पावो मे बेडिया डाल दी गई। जाच पायोग विजोलिया आन्दोलन को राष्ट्रव्यापी सहानुभूति मिलने और प्रान्दोलन की व्यापकता के कारण महाराणा मेवाड ने दो जाच आयोग (प्रथम, अप्रेल 1919 मे, और द्वितीय, फरवरी 1920) नियुक्त किए, परन्तु रियामत और ठिकाने के असहयोग के कारण किसानो के क्प्टो का अत नही हुआ। पुन आदोलन द्वितीय जाच आयोग का भी कोई परिणाम नही निक्लने से विजोलिया पच बोड ने पुन असह्योग आन्दोलन प्रारम्भ कर दिया और गाव गाव मे ऊपरमाल पच वोर्ड की समानान्तर सरकार स्थापित कर दी। उस समय पथिक्जी वधारणा गाव (ग्वालियर राज्य) से प्रादोलन का भाग-दशन कर रहे थे। उनके निर्देश से किसान पचायत ने ऊपरमाल की समस्त भूमि को पडत रख दिया और किसान बिजोलिया ठिकाना छोडकर सीमावर्ती राज्यो मे खेती करने चले गये। पथिक्जी ने गाधी माग हिजरत का प्रथम परीक्षण विजोलिया में किया। वस्तुत इस आदोलन ने ठिकाने की सत्ता और प्रतिष्ठान को गम्भीर नुक्शान पहुचाया। दिसम्बर 1920 मे पथिक्जी ने राजस्थान सेवा सघ (वर्धा) के मत्री रामनारायण चौधरी को किसान पादोलन का माग दशन करने के लिए बिजोलिया भेजा।18 पथिकजी पर मेवाड राज्य में प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। ए०जी०जी० द्वारा मध्यस्थता, 1922 अव बिजोलिया आन्दोलन का प्रभाव मेवाड के अय ठिकाना पर भी पड़ने लगा था। भारत सरकार को इसमे अग्रेज सत्ता विरोधी चिगारी दिखाई देने लगी। अत राजपूताने के ए०जी०जो सर रॉवर्ट हालैंड के नेतृत्व में एक उच्च सता सम्पन्न शिष्ट-मडल भेजा गया। इस बार किसानो का प्रतिनिधित्व राजस्थान सेवा संघ की ओर से रामनारायण चौधरी ने किया और किसान पचायत की ओर से वर्माजी आदि ने भाग लिया।१० ए०जी०जी० हालैड के प्रयत्नो से ठिकाने और किसानो के बीच सम्मानपूर्वक समझौता हो गया। 35 लागते वेगार समाप्त कर दी गई। किसानो पर चलाए गए मुकदमे उठा लिये गये। तीन साल की अवधि मे जागीर का बन्दोवस्त (सैटलमैट) करने का आश्वासन दे दिया गया। बिजोलिया किसान आदोलन की यह गौरवशाली विजय थी। मालभूमि का समपरण भूमि वन्दोवस्त में ऊँची लगान दर रखने के विरोध मे पथिक्जी के परामर्श से किसानो ने 20 मई, 1927 को ठिकाने को अपनी मालभूमि समर्पित (सरैडर) कर दी। यह महान् भूल थी। किसानो द्वारा अपनी जमीनो से इस्तीफे देने के प्रश्न पर पथिक्जी और वर्माजी में मतभेद हो गये। अत पथिकजी ने 1929 मे किसान पचायत के नेतृत्व से त्यागपत्र दे दिया ।22 आन्दोलन का तृतीय चरण (1929-1941) हरिभाऊ उपाध्याय का नेतृत्व माणिक्यलाल वर्मा के अनुरोध पर विजोलिया किसान आदोलन वा नेतृत्व सेठ जमनालाल बजाज और हरिभाऊ उपाध्याय ने किया। आदोलन का मुख्य लक्ष्य समर्पित मालभूमि को पुन प्राप्त करना था। काफी प्रयत्नो और 1931 के किसान सत्याग्रह के बाद, अत मे सेठ जमनालाल बजाज और मेवाड के नये प्रधानमन्त्री टी० विजयराघवाचार्य के सहयोग से पुराने खातेदारो को अपनी मालभूमि पुन प्राप्त हो सकी। इस प्रकार एक दीर्घकालील सघप (1897-1940) के वाद 1941 मे विजोलिया किमान पादोलन का पटाक्षेप हुआ। मूल्याकन विजोलिया किसान पादोलन राजस्थान में विसानो का प्रथम दीघकालीन अहिंसात्मक, अग्रणी असहयोग आदोलन था। इसके परिणाम बहुत दूरगामी हुए। इसने मेवाड के अय ठिकानो में भी किसानो को सामतवादी व्यवस्था के गोपण के सयमो के विरत सगठित प्रतिरोध एव असहयोग आदोलन करने
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[ 111 किसान वर्ग के आन्दोलनो के कारणो तथा घटनामो का पृथक् पृथक् विवेचन नही करके केवल नेतृत्व वर्ग का उल्लेख किया गया है। सिरोही राज्य में किसान आन्दोलन मेवाड से मोतीलाल तेजावत जनवरी, 1922 मे सिरोही आए। सिरोही राज्य मे क्सिान-आदोलन दो चरणो मे हुआ। प्रथम चरण मे, मोतीलाल तेजावत ने भील और गरासियो मे एकी की व्यवस्था (वन्धुत्व एव सगठन की भावना) स्थापित की। उसने भीलो को राज्य को भू लगान लाग वेगार देने से मना कर दिया। 6 मई, 1922 को राज्य ने दमन चत्र चलाया। भीलो के 640 घर जला दिए गए, 29 भील मारे गए और 80 हजार की सम्पत्ति नष्ट कर दी गई 126 भीलो गरासियो की अनेक मागे मान लेने के कारण यह आन्दोलन 1928 मे समाप्त हो गया। 1929 मे महात्मा गाधी की सलाह पर तेजावत ने अपने आपको ईडर पुलिस के सुपुर्द कर दिया। दूसरे चरण मे, गोकुल भाई भट्ट ने प्रजामडल के नेतृत्व मे किसान आदोलन का सचालन किया। राज्य ने किसान जाच समिति की स्थापना की। उसके सुझावो के अनुसार जुलाई 1941 मे बेगार प्रथा समाप्त कर दी गई। किसानो को कुछ रियायते दो गई परन्तु जागीर क्षेत्रो मे किसानो का शोपण न्यूनाधिक रूप से होता रहा 128 बूदी में किसान आदोलन बिजोलिया और वेगू के किसान आन्दोलन से प्रेरित होकर बू दी के किसानो ने निम्नलिखित कारणो से बू दी के सामन्तवादी प्रशासन के विरुद्ध आदोलन प्रारम्भ क्यिा (क) बू दी का प्रशासन भ्रष्ट एव अकुशल था, जिसके कारण चोर-डाकुप्रो से किसानो के जीवन एव सम्पत्ति को खतरा बना रहता था। (ख) भू-राजस्व के अतिरिक्त लगभग 25 प्रकार की लागते (उपकर) एव अनेक प्रकार की बेगार किसानो को देनी पड़ती थी। (ग) दबाव के कारण राजकीय अधिकारियो को कृषि उत्पादन नि शुल्क देना पडता था, और (घ) युद्ध कोप के लिए किसानो से जवरन वसूली 129 राजस्थान सेवा सघ के मार्गदशन मे वरड के किसानों ने सवप्रथम अप्रैल, 1922 में भादोलन प्रारम्भ किया। 1 मई 1922 को वूदी नरेश ने 110] की प्रेरणा और तकनीक प्रदान की। परिणामस्वरूप पहले बेगू, वस्सी, भसरोडगढ, धागडमऊ, नीमली, पारसोली, अमरगढ और भीडर मे तथा वाद मे सम्पूर्ण मेवाड मे किसान आन्दोलन प्रारम्भ हो गए। बेगू में विजयसिंह पथिक को 10 सितम्बर 1923 को राजद्रोह के आरोप में गिरफ्तार किया गया। उन्हे 27 अप्रैल, 1927 को रिहा किया गया। विजोलिया किसान पादोलन और महात्मा गाधी द्वारा संचालित असहयोग आदोतन (1920-22) के प्रभाव के कारण राजस्थान की समस्त रियासतो मे भी किसान वग के आन्दोलन प्रारम्भ हो गए। भील गरासियों मे आन्दोलन डूगरपुर, बासवाडा, दक्षिण मेवाड, सिरोही, ईंडर, गुजरात और मालवा के बीच के तमाम पहाडी प्रदेश में मुख्यत यावादी मील, मीणो और गरासियो की है। भीलो का नेतृत्व गोविन्द गुरु (1858-1920) ने किया। उहोने भीलो मे सगठन और समाज सुधार के लिए सम्पसभा की स्थापना की। गोविन्द गुरु के प्रयत्नो से भीलो ने राज्य को लाग बेगार देना बद कर दिया। अन्त में मानागढ की पहाडी (गुजरात) के वार्षिक मेले पर 7 दिसम्बर 1908 को भीलो के विरुद्ध सैनिक कायवाही की गई। इस भीषण नरसहार मे 1500 भील मारे गए तथा गोविद गुरु को बदी बना लिया गया । गुरु गोविद के बाद भीलो को सगठित करने का काय मोतीलाल तेजावत (1886-1963) ने किया। इसी उद्देश्य से उन्होने 1921 मे झाडोल ठिकाने (मेवाड) की नौकरी छोडी। तेजावत ने बैठ बेगार और लाग बाग समाप्त करने सम्बधी भागो को लेकर आस पास की रियासतो के भीलो का एक विशाल सम्मेलन नीमडा गाव (विजयनगर राज्य) मे प्रायोजित किया । सम्मेलन के विरुद्ध सैनिक कार्यवाही की गई। इस नरसहार मे 1200 भील मारे गए। घायल भील नेता तेजावत भूमिगत हो गए और पुलिस उहे वदी नहीं बना सकी। अन्य रियासतो मे किसान भादोलन राजस्थान की अय रियासतो मे क्सिान वग के अान्दोलनों के (4) सामा य कारण, (स) प्रकृति, (ग) सामन्तवाद के विरुद्ध असहयोग आदोलन की तकनीक और (घ) रियासतो तथा ठिकानो के दमन चक्र के प्रतिमान विजोलिया विमान प्रादोलन के समान रहे हैं। अत रियासतो के [ 111 . किसान वग के आदोलनो के कारणो तथा घटनाओ का पृथक् पृथक् विवेचन नही करके केवल नेतृत्व वर्ग का उल्लेख किया गया है। सिरोही राज्य में किसान पादोलन मेवाड से मोतीलाल तेजावत जनवरी, 1922 मे सिरोही पाए। सिरोही राज्य में किसान-आदोलन दो चरणो मे हुअा। प्रथम चरण मे, मोतीलाल तेजावत ने भील और गरासियो मे एकी की व्यवस्था (बधुत्व एव सगठन की भावना) स्थापित की। उसने भीलो को राज्य को भू लगान लाग बेगार देने से मना कर दिया । 6 मई, 1922 को राज्य ने दमन चन चलाया। भीलो के 640 घर जला दिए गए, 29 भील मारे गए और 80 हजार की सम्पत्ति नष्ट कर दी गई। भीलो गरासियो की अनेक मागे मान लेने के कारण यह आन्दोलन 1928 मे समाप्त हो गया। 1929 मे महात्मा गावी की सलाह पर तेजावत ने अपने आपको ईडर पुलिस के सुपुर्द कर दिया ।" दूसरे चरण मे, गोकुल भाई भट्ट ने प्रजामडल के नेतृत्व मे किसान आन्दोलन का सचालन किया। राज्य ने किसान जाच समिति की स्थापना की। उसके सुझावो के अनुसार जुलाई 1941 मे बेगार प्रथा समाप्त कर दी गई। किसानो को कुछ रियायते दी गई परन्तु जागीर क्षेत्रो मे किसानो का शोपरण न्यूनाधिक रूप से होता रहा 128 बूदी मे किसान प्रादोलन विजोलिया और वेगू के किसान आन्दोलन से प्रेरित होकर बू दी के किसानों ने निम्नलिखित कारणो से वू दी के सामतवादी प्रशासन के विरद्ध आन्दोलन प्रारम्भ क्यिा (क) बूदी का प्रशासन भ्रष्ट एव अकुशल था, जिसके कारण चोर-डाकुओ से किसानो के जीवन एव सम्पत्ति को खतरा बना रहता था। (ख) भू-राजस्व के अतिरिक्त लगभग 25 प्रकार की लागते (उपकर) एव अनेक प्रकार की वेगार किसानो को देनी पडती थी। (ग) दवाव के कारण राजकीय अधिकारियो को कृपि उत्पादन नि शुल्क देना पडता था, और (घ) युद्ध कोष के लिए किसानो से जबरन वसूली। राजस्थान सेवा संघ के मार्गदर्शन मे वरड के किसानो ने सवप्रथम अप्रेल, 1922 मे आदोलन प्रारम्भ किया। 1 मई, 1922 को बू दी नरेश ने 112 ] - सावजनिक सभाओ पर प्रतिवध लगा दिया। परन्तु प्रतिवध-आदेश का उल्लघन करते हुए किसानो ने मोरारी, डायो, गुडा लावासोह ौर नीमाना मे सभागो का आयोजन किया। नोमाना की सभा (30 मई) मे स्त्रियो सहित 4,000-5,000 व्यक्ति एकत्रित हुए। पुलिस अधीक्षक ने राजस्थान सेवा संघ के भवरलाल सुनार को बन्दी बना लिया, परन्तु 300 स्त्रियों की भीड ने उसे छुडा लिया । किसान आन्दोलन को दवाने के लिए प्रशासन ने दमनचक्र का सहारा लिया । जून, 1922 मे अनेक किसानो को वदी बनाया गया और उह छुड़ाने के प्रयास मे पुलिस ने औरतो पर लाठिया तथा भालो से प्रहार किया। पुलिस अत्याचारो की जाच के लिए राजस्थान सेवा संघ ने रामनारायण चौधरी और सत्यभक्त को डाबी गाव भेजा तथा 'वू दी राज्य मे स्त्रियो पर अत्याचार' शीपक से एक पैम्पलेट 30 जून, 1922 को प्रकाशित किया। राजस्थान सेवा सघ अजमेर और हाडौती तथा टोक के पोलिटिकल एजेण्ट के हस्तक्षेप के कारण वू दी प्रशासन ने जुलाई 1922 मे अनेक बेगारो को समाप्त करने की घोपण की, परन्तु किसान उनसे संतुष्ट नहीं हुए और उहोने आन्दोलन जारी रखा। किसानो ने भूराजस्व देना बन्द कर दिया, प्रारक्षित चारागाहो पर अतिक्रमण शुरु किया तथा पारस्परिक विवादो को ग्राम पचायतो मे हल करने का निश्चय क्यिा 12 आन्दोलन की गति को रोक्ने लिए प्रशासन ने सितम्बर, 1922 मे नवीन राजस्थान (अजमेर) और प्रताप (कानपुर) पर राज्य मे प्रतिवध लगा दिया । अक्टूबर, 1922 में किसान पादोलन बरड जिले से खेराड जिले में भी फैल गया। 2 अप्रैल, 1923 को डावी गाव मे एक सभा हुई जिसमे किसानो ने निश्चय किया कि वे खाद्य सामग्री राज्याधिकारियो को नहीं देंगे। इस सभा को भग करने के लिए पुलिस ने गोलिया चलाई जिससे नानक भील और देवीलाल गूजर स्थल पर ही मर गए और अनेक किसान घायल हुए। 14 नवम्बर को पुलिस ने किसान आदोलन के नेता नेनराम शर्मा को बन्दी वना लिया और उहे चार वर्ष की सजा दे दी गई 133 जून 1923 मे बूदी प्रशासन ने राजस्थान सेवा संघ के विजयसिंह पथिक, रामनारायण चौधरी, हरिजी ब्रह्मचारी, सत्यभक्त, अजना देवी आदि पर बून्दी प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया। परन्तु इसके साथ-साथ किसानो को कुछ [ 113 रियायते देने की घोषणा की और नेनूराम शर्मा को 24 सितम्बर, 1924 को रिहा कर दिया। 1925 26 मे नेनूराम शर्मा ने किसानो की शिकायता को दूर करने के लिए अनेक आवेदन पत्र वूदी नरेश को भेजे। अन्तत राजस्थान सेवा संघ मे फूट पडने मे दूदो प्रादोजन 1927 मे मन्द पड़ गया। दम वर्षों के अतराल के बाद यूदी मे गूजरो का आदोलन (1936- 1945) प्रारम्भ हुआ। 5 अक्टूबर, 1936 को गूजर एव मीणामो की एक मभा का आयोजन हिडोली नगर मे हुना। इसमे 90 गावो के 500 व्यक्ति एकत्रित हुए। ममा म मुग्यत अधिर भू-राजम्य, गैर कानूनी नाग-बाग तथा अधिर चराई करके विरुद्ध या दोनन करने का निश्चय किया गया। पूदी मे गूजरो का पादोजन 1945 ता चलता रहा, परतु नेतृत्वविहीन होने के कारण इमे सफलता नहीं मिली। 5 निम्स देह किमान पादोलन एव गृजर अान्दोलन दोनो ने ही बूदी मे राजनैतिक चेतना के प्रचार-प्रमार मे योगदान दिया। अलवर राज्य अनवर राज्य में माम तवादी व्यवस्था के विरुद्ध प्रतिरोध की प्रथम सगठित अभिव्यक्ति जगली सूअरो के उत्पात के कारण हुई। सूअर किसानो की पडी फमला को नष्ट कर देते थे, परतु प्रतिबन्ध के कारण वे सूअरो को मार नहीं सकते थे। अत 1921 मे पिसाना ने आदोलन प्रारम्भ किया। अन्तत महाराजा ने जगली सूअरो को मारने की किसानो की माग स्वीकार कर ली । मई 1925 मे अलवर राज्य की दो तहसीलो वानसूर और थाना गाजी मे सरकार द्वारा लागू की गई भू राजस्व की ऊँची दरो के विरोध में अान्दोलन प्रारम्भ हुआ। 14 मई 1925 को नीमूचाणा (तहसील मानसूर) गाव म एकत्रित किसानो की सभा पर गोलियो की चौछार की गई, जिसके परिणामस्वरूप 353 घर जला दिए गए, 95 व्यक्तिया की गोली काण्ड से मृत्यु हो गई, 250 व्यक्ति घायल हुए और महिलामो का अपमान किया गया । महात्मा गावी ने इस दमन चक्र को “यग इण्डिया" मे "दोहरी डायरशाही" कहा था । जयपुर राज्य जयपुर राज्य में किसान आदोलन के केन्द्र शेखावाटी, तोरावाटी, साभर तथा सीवर एव खेतडी के ठिकाने थे। वस्तुत मीवर शेखावाटी का कृपक 114] आदोलन "जाट किसान पार राजपूत जागीरदारो के संघर्ष की कहानी है। किसानो मे वहुसरयक लोग जाट थे और जागीरदारो मे बहुसरयक राजपूत थे।"39 , जयपुर राज्य मे सीकर ठिकाना एक अद्ध-स्वत न राज्य था, जिसमे 436 गाव थे। सीकर ठिकाने का प्राधा भू भाग खालसा तथा प्राधा भू-भाग जागीर क्षेन, जिसमे छोटे-छोटे जागीरदार यानी भोमिया का शासन था। कृपक आन्दोलन का सम्बध सालसा तथा जागीर दोनो ही क्षेत्रो से था। किसान आन्दोलन के प्रमुख कारण ये- लगान मे अत्यधिक वृद्धि, अनुचित टग से लागते (उपकर) बढाना, जबरन वेगार लेना और जागीरदारा द्वारा पिसानो का सामाजिक-आर्थिक उत्पीडन वरना । 1921 में महात्मा गाधी भिवानी पाये थे। उस समय शेखावाटी के अनेक नेता उनसे मिले। युवक हरलालसिंह ने महात्मा गाधी और असहयोग आन्दोलन (1920-22) की प्रेरणा से क्सिान पचायतो की स्थापना का काय प्रारम्भ करके किसान संगठन और किसान-चेतना का कार्य प्रारम्भ किया 140 सीकर मे किसान आदोलन 1922 मे प्रारम्भ हुअा जबकि नये ठाकुर कल्याणसिंह ने 25 से 50 प्रतिशत ता भू राजस्व इस आधार पर वढा दिया कि पूरी ठाकुर के दाह सस्कार तथा उनके उत्तराविकार उत्सव पर अधिक खर्च हो गया था। किसानो की शिकायत पर रावराजा क्त्यारणसिंह ने अगले वर्ष लगान मे छूट देने का वचन दिया, परतु रावराजा ने अपन बचन का पालन नहीं किया। 1923 1925 तक सीकर के किसान जयपुर राज्य परिपद् को शिकायत करते रहे, परतु रावराजा ने किसानो की शिकायते दूर करने के बजाय मार्च 1925 मे 16 किसान नेतानो को विना वारण्ट के गिरफ्तार कर लिया और राजस्थान सेवा संघ के सचिव रामनारायण चौधरी पर फरवरी 1926 मे मीवर प्रवेश पर प्रतिवन्ध लगा दिया। इसके अलावा उनके पत्र 'तरुण राजस्थान' को भी सीकर तथा जयपुर में प्रतिबन्धित कर दिया गया। सीकर पादोलन की गूज भारत की केन्द्रीय असेम्बली एव ब्रिटेन की लोक्सभा तक पहुँचने के परिणामस्वरुप रावराजा ने भू-लगान की दर निर्धारित करने के लिए एक कमीशन नियुक्त किया। मई 1925 मे ठिकाने एव [ 115 किसानो मे यह समझौता हुआ कि लगान की माना कृषि उत्पादन के अनुसार प्रतिवप निर्धारित की जाए। समझौते के बाद रावगजा द्वारा वन्दोवस्त से पूर्व छोटी जरीब के भूमि- सर्वेक्षण कराने पर पुन कृपक असन्तोष ने उन रूप धारण कर लिया। 1931 से भरतपुर के जाट नेता देशराज ने सीकर शेखावाटी के किसानो का मार्ग-दर्शन करना प्रारम्भ किया। उनके नेतृत्व में जनवरी 1934 मे सीकर मे 'प्रजापति जाट महायज्ञ का आयोजन किया गया। यह महायज्ञ जाट किमानो के संगठन एव जागीरदारो के विरद्ध प्रतिरोध क्षमता का प्रतीक या। 18 फरवरी, 1934 को 200 जाट किमानो के शिष्ट-मण्डल ने जयपुर प्रशासन को अपनी शिकायतो का स्मरण पत्र दिया। परिणामस्वरुप सीकर के रावराजा ने दमन-चत्र का सहारा लिया। कई पिसाना को वन्दी बनाया गया। उनके साथ अमानवीय व्यवहार किया गया। सिहोट-ठाकुर ने तो औरतो के वात पकडकर घसीटने एव उन्ह वैतो मे मारकर अपनी निर्दयता का परिचय दिया। इसके विरोध मे 25 अप्रेल 1934 को जाट महिलामो का एक सम्मेलन हुया। जिसमे लगभग दस हजार महिलाओं ने भाग लिया । अव किसानो ने ठिकाने को लगान नहीं देने का आदोलन प्रारम्भ कर दिया। अन्तत 23 अगस्त, 1934 को सीकर के वरिष्ठ अधिकारी वैव और किसानो के मध्य ममझौता हो गया, जिसके अनुमार कतिपय लागते और बेगार व द कर दी गई। लगान मे रियायत दी गई। यह समझौता सीकरवाटी जाट पचायत की महान् मफलता थी। रावराजा सीकर द्वारा समझौते का पालन नहीं करने पर तथा शेखावाटी के पच पाने ठिकानो द्वारा दिसम्बर 1934 मे वर्ग के अभाव में 25 प्रतिशत लगान कम करने पर पुन जाटो ने मधर्प प्रारम्भ कर दिया। उन्होने ठिकाने को लगान देना बद कर दिया। ठिकाने ने जाट नेतापो को वन्दी बनाया और स्नियो पर अत्याचार किए, फिर भी रावराजा लगान वसूल नहीं कर सका। अन्त मे रावराजा ने 4 लाय 16 हजार 300 रुपये की नगान की काया राशि माफ करने तथा बन्दोवस्त विभाग स्थापित करने की घोपणा जून 1935 मे की। परन्तु कुदान काण्ड (अप्रेल, 1935) मे बन्दी बनाए गए 23 जाटा को मजा देने के कारण या दोलन पुन भडक उठा । अतत जयपुर प्रशासन के हस्तक्षेप के कारण रावराजा सीकर को झुकना पडा। खालसा क्षेत्र मे भूमि बदोबस्त कर दिया गया। अनेक लागतो 116 ] और बलात वेगारो को समाप्त कर दिया गया। परन्तु जागीर क्षेत्र मे भू- बन्दोवस्त कराने तथा खातेदारी के अधिकार प्राप्त करने के लिए जनवरी 1939 मे पुन किसान आन्दोलन प्रारम्भ हो गया। जागीर क्षेत्रो के किसानो ने लगान देना बन्द कर दिया। किसान ग्रान्दोलन के दवाव के कारण सीकर ठिकाने न दिसम्बर 1946 मे जागीरी गॉवो मे वन्दोवस्त करने की घोषणा की। अन्त मे, सीकर के इस दीघकालीन किसान सघप का पटाक्षेप मार्च 1947 मे जयपुर मे हीरालाल शास्त्री के नेतृत्व में लावाप्रिय मत्रीमण्डल की स्थापना के साय हुमा । राजस्व मनी टीकाराम पालीवाल ने गैर खालसा क्षेत्रो मे व दोवस्त करने के तुरन्त आदेश जारी किए। इस आन्दोलन में अनेक व्यक्तियों ने महत्वपूर्ण भूमिका अभिनीत की। उनमे से सरदार हरलाल सिंह, नेतरामसिंह गोरीर, चीवरी घासीराम, लादूसिंह, ताडकेश्वर शर्मा, नरोत्तमलाल जोशी, चौधरी ईश्वरसिंह, हरदेवसिंह पृथ्वीसिंह, गणेशराम, पनेसिंह और मास्टर च द्रभानसिंह प्रमुख थे। भरतपुर के जाट नता देशराज ने सीकर के किसाना को सगठित करने मे 1931 से महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। शेखावाटी क्षेत्र मे किसान प्रादोला जयपुर राज्य के शेखावाटी क्षेत्र के अन्तर्गत चार भू भाग शामिल है- उदयपुरवाटी, सिंधानीवाटी, नरहरवाटी और अ भुनुवाटी। सम्पूण क्षेत्र म छोट-बडे जागीरदारो का आधिपत्य था। इस क्षेत्र मे पाच ठिकाने प्रमुस थे- विसाऊ, डुडलोद, मलमीसर, मण्डावा पार नवलगढ । इहे १चपाना सरदार ठिकाने भी कहा जाता था। शेखावाटी भू भाग का कृषक प्रादालन सीकर या दोलन का ही विस्तार मात्र था। इस क्षेत्र के अधिकाश कृपक जाट थे। 1924 मे उहोने जागीरदारो वे सामाजिक आर्थिक उत्पीडन के विरुद्ध जयपुर प्रशासन से शिकायत की। पचपाने के जागीरदारो के अत्याचारो का विरोध किसानो ने लगान न देने के अभियान से प्रारम्भ पिया। यहा के जागीरदार सीकर का तुलना मे अधिक यूर तथा अमानवीय थे। काफी सघप और कुर्वानियों के बाद 1946 मे शेगावाटी क्षेत्र के विमानो को लगान मे कुछ रियायतें मिली, परन्तु उन दुखा या प्रत जयपुर मे माच 1947 मे हीरालाल शास्त्री के नेतृत्व मे लोकप्रिय सरकार बनन पर ही हमा।
[ 117 . सीकर और शेसावाटी क्षेत्र के किसान आन्दोलन को जाट नेताओ के अतिरिक्त 1935 से जयपुर प्रजा मण्डल के नेताओं का भी सक्रिय मागदशन प्राप्त हुआ। जोधपुर राज्य सामन्तवादी व्यवस्था का विरोध करने वाले और किसानों के हितो की रक्षा के लिए जोधपुर मे जून 1924 मे ‘मारवाड हितकारिणी सभा' की स्थापना हुई। इस सभा के प्रमुस सदस्य निम्नलिखित थे--- जयनारायण व्यास (जोधपुर), दुर्गाशकर श्रीमाली (जोधपुर), मीठा- लाल पुष्करणा ब्राह्मण (जैसलमेर), जगदम्बा प्रसाद सेवक (सोजत) और जोधपुर के हरिराम जोशी। सवप्रथम, मारवाड हितकारिणी सभा ने जयनारायण व्यास के नेतृत्व मे राज्य से मादा पशुओ गाय, वक्री और भैसो के अजमेर, नसीराबाद, अहमदावाद और वम्बई के साईखानो मे भेजे जाने के विरुद्ध आन्दोलन प्रारम्भ किया और उन्हे 1 सितम्बर 1924 मे सफलता मिल गई, जब राज्य प्रशासन ने मादा पशुयो के निर्यात पर प्रतिबन्ध लगा दिया 12 जागीर क्षेत्रो मे आदोलन 1929 मे मारवाड हितकारिणी सभा ने जोधपुर राज्य की लगभग 1300 जागीरो मे रहने वाले किसानो को जागीरदारो के साम तवादी शोपण से मुक्ति दिलाने के लिए आदोलन करने का निश्चय किया। जागीर क्षेत्रो मे किमानो की सामाजिक आर्थिक स्थिति शोचनीय थी। कुल उपज का प्राधा भाग नो लगान के भुगतान में ही व्यय हो जाता था। इसके अलावा विमानो को 136 प्रकार की लागतें एव बलात वेगार देनी पडती थी 143 12 मई 1929 को मारवाड हितकारिणी सभा की मीटिंग जयनारायण व्याम की अध्यक्षता में हुई। इसमे निश्चय किया गया कि लगान की उच्च दरे बलात् वेगार एव अनेक लागतो (उपकर) तथा जमीदारा के सामाजिक-आर्थिक शोपण के विरुद्ध किसानो म चेतना उत्पन की जाए। इस सन्दभ में 9 व्यक्तियो वी समिति बनाई गई। जयनारायण व्यास के अलावा प्रमुस व्यक्तियो के नाम इस प्रकार थे-पानदराज सुराणा, भवरलाल सर्राफ, हेमचद्र छगानी। जयनारायण व्यास ने 'तरण राजस्थान के 25 मार्च तथा 16 सितम्बर, 1929 के अक मे विमानो की दयनीय दशा पर प्रकाश डाला। उन्होने किसाना से 118 ] अपील की कि उहे जागीरदागे के सामतवादी अत्याचारो का विरोध करने के लिए अहिंसात्मक आन्दोलन प्रारम्भ करना चाहिये तथा जागीरदारो को भू राजस्व और लाग-बागो को नहीं देना चाहिए। उन्होने किमानो की दुर्दशा का चिमरण दो पम्पलेटो · मारवाड की अवस्था और पोपागाई की पोल" मे किया, जिनका प्रकाशन मारवाड हितकारिणी सभा द्वारा किया गया था । अहिह्मात्मा सिान पादोलन के प्रमुख केन्द्र रायपुर, बगडी और चलूदा के ठिकाने थे। जोधपुर-प्रशासन ने आदोलन का दमन करने के लिए 'तरण राजस्थान' पर प्रतिवन्ध लगा दिया और 20 जनवरी, 1930 को जयनारायण व्यास अानन्दराज सुगणा तथा भवरलाल मर्राफ को वदी लिया। जयनारायण व्यास को 5 वप के पठोर कारावास नया अानन्दराज मुगरणा, वरलान सर्राफ पा 44 वप के कठोर कारावास की सजा दी गई। गये अलावा तीना नेताना पर 1000-1000 रपये का जुर्माना भी लिया गया, जिमया भुगतान नहीं करने की दशा म एम एप वपनी कठोर मजा या प्रावधान मिया गया। पन म ब्रिटिश भाग्न म गविनय मापादन में भाग लेने वाले वदिया पी रिहाई के मदर्भ में जोधपुर मराार न पी सीना नेतामा 7 विना गत १ मा, 1931 7 मुक्तार दिया। गासमा क्षेत्र मे भादोसा 1930-31 म मायाम प्रगत पने घोर विश्वव्यापी प्रापिामा पारण गाजमा भेष मा गग्य पी निगोड़ी (T गाा)ोग पगमथ गए। ५ तुलाई, 1917 मागार गे पाग एर गौर म मानी जानि । रिगी पटाई जिगा या नियरिया गया fr50 प्रतिमा विगोडी (मगान) मागये निरा गा प्रजागा पा पारा TT प्रा frमा जापे ।" पोर पापा को गुमाई TIपर रिमा मगन 1931THITTIrमा ur-प्रारमिा।
मारवाड हितकारिणी सभा और मारवाड युवा संघ को 5 मार्च, 1932 को गैर कानूनी घोपित कर दिया । राज्य प्रशासन की इस दमनात्मक कार्यवाही का किसानो पर कोई प्रभाव नही पडा। अन्त में, राज्य सरकार ने प्रति एक स्पये पर तीन पाने की लगान में कटौती करने की घोपणा 16 जून, 1934 मे की। इस घोषणा से किसानो का असन्तोष दूर हो गया । मारवाड लोक परिषद् तथा मारवाड किसान परिषद् 1934 मे जयनागयण व्यास तथा उनके सहयोगियो ने जोधपुर प्रजा- मण्डल की स्थापना की थी। जोधपुर प्रशासन द्वारा 20 नवम्बर 1937 को प्रजामण्डल को अवैध घोपित किए जाने पर जयनारायण व्याम ने 26 मई 1938 को मारवाड लोक परिपद् की स्थापना की। 7 सितम्बर, 1939 को लोक परिषद् के नेतृत्व मे किसानो ने लाग-बाग के उन्मूलन हेतु जागीरदारों के विरुद्ध आदोलन प्रारम्भ किया। इन लाग-बागो मे जोधपुर महाराजा द्वारा अवैध घोपित की गई 119 लाग-बागे भी थी जिनकी जबरन वसूली जागीरदार निरन्तर कर रहे थे।48 लोक परिपद् की गतिविधियो को प्रभावहीन करने के लिए जोधपुर प्रशासन ने 28 माच, 1940 को उसे अवैध घोषित कर दिया। परन्तु इससे जागीर क्षेत्रो मे क्सिान पा दोलन का दमन नही किया जा सका। जून 1940 मे जोधपुर प्रशासन द्वारा लोक परिपद् को मा यता देने पर आन्दोलन पूर्ण आत्मविश्वास और तीव्र गति से पुनर्जीवित हो उठा। मारवाड लोक परिषद् की कार्य समिति ने फरवरी 1941 मे जागीर क्षेत्र मे लाग बाग एव थोपे गये अत्यधिक लगान हेतु एक जाच समिति की नियुक्ति की। लोग परिपद् के अनुरोध पर किसानो ने जागीरदारो को अनुचित लाग- वाग देना बन्द कर दिया। परिणामस्वरूप जागीरदारो ने दमन-चक का सहारा लिया। किसानो को निदयतापूर्वक मार पीट कर गाव छोडने के लिए बाध्य किया गया, फसल की लटाई वद कर दी ताकि किसानो का अनाज खेत में ही नष्ट हो जाए। मारवाड लोक परिषद् के प्रभाव को कम करने के लिए जोधपुर प्रशासन के आशीर्वाद से बलदेवराम मिर्धा के नेतृत्व मे जून 1941 मे मारवाड क्सिान सभा की स्थापना हुई। ।
120 ] मारवाड लोक परिपद् के अान्दोलन का दमन करने के लिए जैतारण, बिनाटा एव सोजत परगने के जागीरदारो ने अपनी बैठक मे निश्चय किया कि गाव मे पाने पर लोक परिपद् के कार्यकर्तामो को पीटा जाए, गाव से खदेडकर उनकी मीटिंग सग पर दी जाए। मारवाड किसान सभा ने अत्यधिक लगान और लाग-बाग के कारण किसानो की दयनीय दशा पर अनेक बुलेटिन जारी किए। परिणामस्वरूप जोधपुर सरकार ने 16 अक्टूबर, 1941 को 'लगान और लाग-बाग विशेष ममिति" की स्थापना की। उसका मुरय काय किसान सभा के वुलेटिनो में उल्लिखित शिकायता की जाच करना था। पर तु, लाग-बाग उ मूलन के सदम मे विशेष ममिति कुछ नहीं कर सकी। मारवाड किसान सभा और जाट सुधारक सभा ने जनवरी 1942 में रामदेवग तथा नागौर मेतो में बैठक आयोजित करके पिसानो से, जागीरदारा को लाग बाग नहीं देने की अपील की। मारवाड लोक परिपद् ने भी 7-9 फरवरी 1942 को लाडनू मे रणछोडदास गट्टानी की अध्यक्षता मे सम्मेलन आयोजित किया। मम्मेलन मे लाग-बाग उन्मुलन और 28 मार्च को 'उत्तरदायी शासन दिवस' मनाने पर बल दिया गया । चण्डावत ठाकुर ने लोक परिपद् को 28 माच को उत्तरदायी शासन दिवस मनाने की अनुमति नहीं दी और ठिकाने की पुलिम तथा लठनो ने 28 मार्च को लोक परिषद् के कायकर्तानो पर ताठियो तथा भाला से प्राणघातक हमले किए। चण्डावल दुखान्तिका जोधपुर राज्य मे स्वतत्रता आदोलन का एक दुखद अध्याय है। इसी प्रकार 29 माच 1942 को निमाज ठाकुर के लगभग 200 व्यक्तियो ने लोक परिपद् के कायकर्ताओं को पीटा। जोधपुर राज्य मरकार इन घटनामो के प्रति तटस्थ रही। इस स्थिति मे राजपूत सभा ने लोक परिपद् की सभाओ को भग करने के लिए प्रत्येक जागीरदार से कहा। जागीर क्षेत्र के किसानो की समस्या को हल करने में जोधपुर राज्य की उदासीन नीति के विरोध में जयनारायण व्यास ने मई 1942 मे सत्याग्रह आदोलन प्रारम्भ किया। उहोने जोधपुर राज्य की स्थिति पर प्रकाश डालने हेतु दो पत्रक प्रकाशित किये-(क) मारवाड मे उत्तरदायी शासन, और (स) जोधपुर की स्थिति पर प्रकाश । मारवाड किसान सभा ने भी 9 जून, 1942 को एक बुलेटिन प्रसाशित किया, जिसमे किसानो की समस्याग्रो को दूर करने के लिए जोधपुर दरवार से कहा गया।
[ 121 । जोधपुर राज्य के किसानो पर जागीरदारो के अत्याचार और आतक की निन्दा महात्मा गाधी के 'हरिजन' पत्र के 9 अगस्त 1942 के अक में छपी और अ भा जाट सभा, अलीगढ को बैठक मे 26 जुलाई, 1942 को राजपूत ठाकुरो के जाटो पर अत्याचारो को निन्दा की गई। अन्तत दिसम्बर 1943 मे मारवाड के जागीरदारो ने भूमि वन्दोवस्त का विरोध किया, परन्तु राज्य सरकार की कठोर कार्यवाही के कारण उन्हे झुकना पड़ा। अब जागीरदार किसानो पर और अधिक अत्याचार करने लगे। परिणामस्वरूप क्सिानो ने जागीरदारी प्रथा के उमूलन के लिए बल देना प्रारम्भ किया। जागीरदारो के पाशविक अत्याचारो की पराकाष्ठा डाबरा गाव में हुई। 13 मार्च, 1947 को डाबरा गाव मे लोक परिषद और किसान सभा के लगभग 800 900 कायवर्तामो के जुलूस पर ठिकाने के लगभग 500 600 लठतो ने तलवार, लाठियो और बदनों से हमला कर दिया। इस जुलूस मे लोक परिपद के नेता-मथुरादास माथुर, द्वारकादास पुरोहित, सी पार चौपासनीवाला, राधाकिशन बोहरा, किशनलाल शाह, नरसिंह कच्छवाहा, वशीधर, हरीन्द्र कुमार चौधरी आदि उपस्थित थे। सभी नेताओ को ठाकुर के लठतो ने वबरतापूर्वक पीटा। डावरा काण्ड की क्टु निदा वन्दे मातरम् (बम्बई), लोकवारणी (जयपुर), प्रजासेवक (जोधपुर) और हिदुस्तान टाइम्स (दिल्ली) ने की। म्वत नता के पश्चात् मार्च, 1948 को जोधपुर महाराजा ने जयनारायण व्यास को राज्य का प्रधानमत्री नियुक्त किया परतु निरकुश राजतन्न और साम तवाद का अन्त 30 मार्च, 1949 को राजस्थान के निर्माण के बाद ही हुआ। 6 अप्रैल, 1949 को मारवाड काश्तकारी अधिनियम पास हो जाने से जागीरक्षेत्रो मे किसानो की स्थिति मे आधारभूत अन्तर हो गया। अब वे अपनी जमीन के मालिक बन गए, खातेदार काश्तकार बन गए और इसके साथ साम तवाद के विरुद्ध उनका दीघकालीन सघष समाप्त हो गया। इस सदभ में उल्लेखनीय है कि जागीरदारो के किसानो पर वर्वर एव अमानवीय अत्याचारो ने जागीरदारी प्रथा के उमूलन को काफी पृष्ठभूमि निर्मित की। बीकानेर राज्य गगानहर क्षेत्र में सिक्ख किसानो की कतिपय असुविधानो के कारण बीकानेर गज्य मे किसान असन्तोष की प्रथम अभिव्यक्ति 1929 मे हुई। सिक्ख ' 122 ] जमीदारी (नहर क्षेत्र मे भूमि के सरीददार) ने 20 अप्रैल, 1929 को जमीदार सभा की स्थापना की। जमीदार सभा ने 10 मई, 1929 को अपनी बैठक में निम्न प्रस्ताव पास किए (1) नहर क्षेत्र मे सिंचाई हतु पर्याप्त पानी उपलब्ध न होन के कारण तगान की राशि में कटौती होनी चाहिये। (2) पूरा पानी उपलब्ध नहीं हो रहा है, फिर भी पानी पर (प्रावियाना) पूरी दरो से लिया जा रहा है । अत पानी दर में कमी हो । (3) जमीन के मूल्य की किश्तो को चुकाने की अवधि बढायी जानी चाहिए तथा किश्तो पर व्याज की दर कम होनी चाहिए। महाराजा गगासिंह गगानहर क्षेत्र के विकास मे व्यक्तिगत रुचि रखते थे। अतत किसानो के शातिपूण सवैधानिक आन्दोलन की समाप्ति 30 सितम्बर, 1941 को हुई जब महाराजा गगासिंह ने उनकी मागे स्वीकार कर ली। जागीर क्षेत्रो मे आदोलन वीकानेर राज्य मे कुल 2917 गाव थे, जिनमे से 1393 गाव खालसा क्षेत्र में थे। सीमावर्ती क्षेत्र सीकर और शेखावाटी के जाट किसान आदोलनो का प्रभाव बीकानेर राज्य के बहुसख्यक जाट किसानो पर भी पडा। परिणाम- स्वरूप उनमे सामन्तवाद के विरुद्ध प्रतिरोध करने की राजनीतिक चेतना उत्पन्न हुई। सवप्रथम 18 दिसम्बर, 1934 को जाट किसानो ने अपने कप्टो को दूर करने के लिए एक आवेदन पत्र महाराजा गगासिंह को दिया। किसानो ने कहा कि उनकी शिकायतें दर नहीं करने की स्थिति में वे लगान तथा लाग बाग जागीरदारो को नहीं देगे। 11 अप्रैल, 1935 को बीकानेर प्रशासन ने घोषणा की कि लगान का भुगतान नही करने वालो के विरुद्ध कठोर कार्यवाही की जाएगी। सर्वप्रथम 1937 मे उदरासर गाव में जीवन चौधरी ने प्रजामण्डल नेताओं के सहयोग से अवैध लाग बाग के विरुद्ध आवाज उठाई, परतु ठिकाने एव राज्य अधिकारियो ने किसान नेताओ को निदयतापूर्वक मार पीटकर उनकी आवाज को कुचल दिया।
[ 123 महाजन ठिकाने मे अान्दोलन इसके बाद किसानो ने मई, 1938 मे महाजन ठिकाने के विरुद्ध राज्य के राजस्व आयुक्त को शिकायत की। उनकी मुख्य शिकायते थी कि जागीरदार 1927 से लगातार लगान, चराई कर और अन्य लागतो (उपकर) मे वृद्धि कर रहा है। किसानो के निरन्तर प्रयास के बाद उनमे तथा जागीरदार के बीच जून, 1939 मे समझौता हो गया। परन्तु बाद मे जागीरदार ने समझौते का पालन नहीं किया, फलस्वरूप किसानो ने जागीरदार को भू-राजस्व नहीं देने का आदोलन पुन प्रारम्भ कर दिया। अब ठिकाने के कामदार ने दमनचक्र का सहारा लिया। तीन वर्षों (1938 40) के बकाया लगान नहीं चुकाने पर कामदार जगन्नाथ जोशी ने किसान नेताओ की चल सम्पत्ति जब्त कर ली और राज्य पुलिस की सहायता से किसानो का दमन करने के असफल प्रयत्न किए। अन्तत माच, 1942 मे बीकानेर सरकार ने किसानो की पशु चराई कर तथा लगान मे कटौती की माग स्वीकार कर ली। दूधवा सारा पा दोलन बीकानेर मे किसान आन्दोलनो की शृसला मे दूधवा खारा गाव का आन्दोलन किसानो पर पुलिस अत्याचारो की दृष्टि से उल्लेखनीय है । 1944 के अन्त मे ठाकुर सूरजमलसिंह ने बकाया लगान को वसूल करने के बहाने से किसानो के खेत जब्त कर लिए और उनके मकान लूट लिए । ठाकुर के अत्याचारो का विरोध किसान नेता हनुमानसिंह प्राय ने अटूट सकल्प और निर्भिकता के साथ किया। उन्हे राज्य प्रशासन ने जून अगस्त, 1945 तक, 20 माच-27 जुलाई 1946 तक और 7 अप्रेत, 1947 से 4 जनवरी 1948 तक जेल में रखा तथा उन पर अमानुषिक अत्याचार किए गए, परन्तु वे टूटे नहीं । उन्होने अपने तृतीय कारावास के दौरान 65 दिन तक उपवास किया । हनुमानसिंह और उनके परिवार के क्प्टो ने किसानो मे संगठन और राजनैतिक चेतना के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका प्रस्तुत की। प्रजामण्डल के नेतृत्व मे आदोलन 1946 के प्रारम्भ में अनेक जाट नेताओं ने बीकानेर राज्य प्रजा परिपद की सदस्यता ग्रहण कर ली। परिपद ने लाग-बाग के विरुद्ध आदोलन प्रारम्भ किया। 1 मई, 1946 को कु भाराम आय को बदी बना लिया गया। प्रजा परिपद ने 2 जून को ललाना गांव मे मीटिंग की जिसमे 5000 किसानो ने भाग लिया।
124 ] रायसिंहनगर मे एक मित मिसानो की भीड पर 1 जुलाई, 1946 को गोलिया चलाई गई जिसमे अनेक घायल हो गए तथा क्सिान वीरबलमिह की मृत्यु हो गई। कांगड गाव काण्ड 1946 मे अकाल के कारण फसल नष्ट हो जाने की वजहसे किसानो ने लगान और लाग बाग देने मे असमथता व्यक्त की, परतु जागीरदार लगान और लागतें वसूल करने पर बल देता रहा । क्सिानी द्वारा विरोध करने पर ठाकुर ने किसानो, उनके बच्चो और औरतो के साथ मार-पीट की तथा औरतो का अपमान किया। , इस अत्याचार के बाद किसानो के अनुरोध पर प्रजा परिषद ने जांच के लिए स्वामी सच्चिदानद केदारनाथ, हसराज आय, दीपचद, मौजीराम, गगादत्त रगा और स्पराम को गाव मे भेजा। ठाकुर ने उन्ह 1 नवम्बर, 1946 को गाव मे निदयतापूर्वक पीटा । उनमे से 6 व्यक्ति बेहोश हो गये। उनको अपमानित करने के लिए ठाकुर ने उन्हे निर्वस्त्र करके नग्न अवस्था मे ही गाव मे घुमाया । बीकानेर दरवार ने सभालो पर तथा भरतपुर से प्रकाशित 'किसान' पत्र पर प्रतिबध लगा दिया । इस प्रकार सामन्तवाद के अत्याचारो ने किसानो में प्रतिरोध क्षमता और राजनैतिक चेतना उत्पन की। अतत 1948 मे बीकानेर मे लोकप्रिय मत्रिमडल के निर्माण से किसानो के कप्टो का अन्त हुआ। भरतपुर राज्य स्वतत्रता से पूर्व भरतपुर रियासत मे केवल 17 छोट-छोटी जागीरे थी, उनमे से 14 गाव वाली वल्लभगढ की जागीर सबसे बडी थी। जागीर क्षेत्र के किसानो की स्थिति खालसा क्षेत्र के किसानो के समान थी। जागीरदार को प्रशासनिक एव न्यायिक शक्तिया प्राप्त न होने के कारण यहाँ की सामतवादी व्यवस्था राजस्थान के अय राज्यो से सवथा भिन्न थी। नवम्बर, 1931 मे भरतपुर राज्य मे सन् 1900 के पुराने वन्दोवस्त को सशोधित करने नवीन बदोबस्त मे लगान की माना कुल उपज की 66 प्रतिशत कर दी गई। पानी कर मलवा और पटवार कोप की वसूली अलग से होती थी।
[ 125 नये वन्दोवस्त मे लगान की उच्च दरो के विरुद्ध गाव के मुखियाग्रो ने लगान नहीं देने का आन्दोलन प्रारम्भ किया। 23 नवम्बर, 1931 को लगभग 500 किसानो ने भोजी नम्बरदार के नेतृत्व मे भरतपुर में प्रदर्शन किया। राज्य प्रशासन ने 24 नवम्बर को भोजी नम्बरदार को वन्दी बना लिया। अन्तत क्सिानो मे बढते हुए असन्तोष से बाध्य होकर राज्य प्रशासन ने नए वन्दोवस्त को 5 वर्ष के लिए स्थगित कर दिया, फलस्वरूप आन्दोलन बन्द हो गया । भरतपुर राज्य की पहाडी और नगर तहसीलो मे मेव मुसलमान बहुसख्यक थे। उन्होने अलवर के मेव आन्दोलन की भाति भरतपुर मे भी आन्दोलन प्रारम्भ किया । अप्रेल 1933 मे भरतपुर के मेव गावो ने लगान देना बन्द कर दिया क्योकि रबी फसल का लगान अधिक था। मई 1933 मे उहोने भारत सरकार को एक आवेदन पत्र राज्य सेवाप्रो मे मुसलमानो को जनसरया के अनुपात मे नौकरियाँ देने के सम्बन्ध मे लिखा। कुछ दिनो बाद भरतपुर प्रशासन ने रवी फसल का लगान काफी कम कर दिया और एक मुसलमान को भी राज्य कौसिल मे नियुक्त कर दिया। वास्तव मे मेव आन्दोलन का मार्गदर्शन राज्य के बाहर से हो रहा था। स्वाधीनता संग्राम मे योगदान राजस्थान मे स्वाधीनता संग्राम का विकास चार चरणो मे हुआ। प्रथम चरण मे, रियासतो के किसान वर्ग द्वारा सामन्तवादी व्यवस्था के शोपरण के सयत्रो का ग्राम पचायतो के नेतृत्व मे सामूहिक प्रतिरोध एव सगठित सघप किया गया। द्वितीय चरण मे, रियासतो मे उत्तरदायी शासन की स्थापना के लिए प्रजामण्डलो की स्थापना हुई। इस चरण मे किसान पचायतो एव प्रजामण्डलो ने सयुक्त रूप से सामन्तवादी व्यवस्था के विरुद्ध अहिंसात्मक सघर्ष किया, क्योकि दोनो का समान लक्ष्य शोपण एव अन्याय का विरोध करना था। तृतीय चरण मे, रियासतो के भारत सघ मे विलय के लिए और चतुर्थ चरण मे, सामन्तवाद के अन्तिम अवशेष जागीरदारी प्रथा के उन्मूलन के लिए पादोलन किए गए। इस प्रकार राजस्थान मे स्वाधीनता संग्राम के लिए राजनैतिक जन- जागरण का श्रेय सर्वप्रथम बिजोलिया किसा आदोलन को है और जागीरदारी - 126 ] प्रथा के उन्मूलन के माथ म्वाधीनता संघर्ष की गौरव गाथा का समापन होता है। राजस्थान में किसान वग के अान्दोलनो का स्वाधीनता संग्राम में योगदान निम्नलिखित है- (1) सवप्रथम विजोलिया किसान आन्दोलन ने राजस्थान में ब्रिटिश सत्ता विरोधी वीज बोए । उदयपुर के प्रिटिश रेजीडेंट ने ए जी जी राजपूताना को 1923 मे पत्र लिखा---'मेवार अव्यवस्था और कानून विरोधी गतिविधियो का स्थल बन गया है। आन्दोलन मुख्यत महाराणा के विरुद्ध है, परतु यह शीघ्र त्रिटिश क्षेत्रो मे फैल सकता है।' बिजोलिया किसान आदोलन के परिणाम दूरगामी हुए। धीरे-धीरे इस किसान आन्दोलन की चिन्गारी भयकर दावानल का स्वरूप ग्रहण करके समस्त राजस्थान मे फैल गई। (2) किसान आन्दोलन के जनक विजयसिंह पथिक थे। उन्होने राजस्थान सेवा सघ (अजमेर), 'राजस्थान केसरी' (वर्धा) और 'नवीन राजस्थान' (अजमेर) के माध्यम से राजस्थान में राजनैतिक चेतना का अभियान छेड़ा। (3) राजस्थान के किसान आन्दोलन के गर्भ से ही राजस्थान के भावी स्वतन्त्रता सेनानी उत्पन्न हुए। जैसे, माणिक्यलाल वर्मा, रामनारायण चौधरी, हरिभाऊ उपाध्याय, भील नेता मोतीलाल तेजावत, गोकुलभाई भट्टा हसंगन प्राय, कु भाराम आय, जयनारायण व्याम, द्वारकादास पुरोहित, मथुरादास माथुर, हीरालाल शास्त्री, बलवन्तसिंह मेहता आदि। (4) क्सिान आदोलन की प्रारम्भिक मफलतापो से प्रेरित होकर राजस्थान मे प्रजामण्डलो की स्थापना की गई, जिनके नेतृत्व मे उत्तरदायी शासन की स्थापना हेतु सामतवादी व्यवस्था के विरुद्ध संघर्ष किया गया । (5) किसान आदोलनो के कारण ही देशी राज्यो की समस्यानो की ओर अ भा राष्ट्रीय कांग्रेस का ध्यान आकर्षित हुा । सर्वप्रथम विजोलिया आन्दोलन की जानकारी लेने हेतु महात्मा गाधी ने फरवरी 1918 मे पथिकजी को बम्बई बुलाया और महादेव भाई देसाई को जाच हेतु विजोलिया भेजा। काग्रेस ने सवप्रथम 1938 में रियासतो में उत्तरदायी शासन की स्थापना की माग की।
[ 127 1 (6) किसान आन्दोलन ने पचायत राज की अवधारणा दी। पचायतो ने लोकतन्न की प्राथमिक पाठशालाओ की भूमिका प्रस्तुत की। (7) बिजोलिया के किसान आन्दोलन ने गाधी मार्ग पर आधारित स्वाधीनता सग्राम के लिए समरनीति विकसित की। (8) किसान वर्ग के आदोलनो ने राजनीतिक सुधारो के साथ साथ सामाजिक- आर्थिक सुधारो पर भी बल दिया। सक्षेप मे, राजस्थान के स्वाधीनता संग्राम की कहानी रियासतो के किसान वग के अान्दोलनो की कोख से उत्पन्न हुई है। टिप्परिणया- शकरसहाय सक्सना विजोलिया प्रादालन का इतिहास, (बीकानर, राजस्थान राज्य अभिलेखागार, 1972), पृ 202 2 वी डी माथुर, स्टेटस पीपुल्स का फरेंस, (जयपुर, पब्लिकेशन स्कीम, 1984), पृ 183 3 ब्रिटिश सरकार की परमाच्च शक्ति के अनुसार रियासता के शासक सम्प्रभु शासक नही होते थे । वे प्रातरिक मामलो म भी सीमित सम्प्रभुता का प्रयोग करते थे। 4 पेमाराम, एग्रेरियन मूवमट इन राजस्थान, (जयपुर, पचशील प्रकाशन, 1986), 2-3 5 उपयुक्त, पृ 10 6 शकरसहाय सक्सेना, पूर्ववणित, 24 25 7 पेमाराम, पूववणित, पृ 10 8 उपयुक्त पृ 12 9 मारवाड लोक परिपद बुलटिन, जुलाई 1942 10 शकरसहाय सक्सेना, पूववणित, पृ 10 तथा 28 एव लाग बेगारो की सूची पृ 36 39 पर देखें। 11 उपयुक्त, पृ41 12 उपयुक्त, पृ4647 13 बी एल पानगडिया राजस्थान म स्वत त्रता सग्राम (जयपुर, हिदी ग्रथ अकादमी 1985), 8 14 शकरसहाय सक्मेना, पूर्ववणित, 82 84 15 उपयुक्त, पृ83-84 एव 93 16 उपयुक्त, पृ 103 107 17 उपयुक्त, पृ 109 रामनारायण चौधरी, वीसवी सदी का राजस्थान (अजमेर, कृष्णा नदस, 1981), 48 19 पेमाराम, पूववरिपत, पृ 26 शवरसहाय सक्सेना, पूवरिणत पृ 137-39 18 20 128 ] एव 38 . 21 पमाराम, पूवणित, पृ 28-32 पर समझौत का विस्तृत विवरण देखें। 22 उपयुक्त, पृ 36 23 शयरसहाय सक्सेना, प्रवरिणत, पृ269-70 24 सुमनेश जाशी, राजस्थान क स्वत ता सनानी (जयपुर, गगानगर, 1973), पृ 1-7 25 बी एल पानडया, पूणित, पृ 30 26 नवीन राजस्थान, 11 जून, 1922 27 सुमनेश जोशी, पूववणित, 178 28 पेमाराम, पूवरिणत, विस्तृत विवरण पृ 113 18 पर अवित है। 29 उपयुक्त, पृ 120 30 उपयुक्त, पृ 121 122 31 उपयुक्त, पृ 123 124 32 उपयुक्त, पृ 124-129 33 उपयुक्त, पृ 129 132 34 उपयुक्त पृ 133 35 उपयुक्त, पृ 136 144 36 बाबूलाल पानगडिया पूववणित, पृ 27 37 के एस सक्सेना, द पालिटिकल मूवमेट एण्ड अवेनिग इन राजस्थान (नई दिल्ली, एस चांद एण्ड कम्पनी, 1971), 188 38 रामनारायण चौधरी पूवरिणत, पृ 96 39 रतनलाल मिथ, शेखावाटी का इतिहास, (मडावा झु झुनू 1984), पृ240 40 राम पाण्ड, एग्रेरियन मूवमट इन राजस्थान (दिल्ली यूनीवसिटी पब्लिशस, 1974,) पृ 67 41 सीकर ठिकान के किसान प्रा दालन का विवरण मुग्यत पेमाराम + शोध ग्रंथ (पूरिणत) पर आधारित है। 42 दि मारवाड गजट 6 सितम्बर, 1924 43 मारवाड किसान सभा द्वारा दिनाय 18 फरवरी, 1943 को जाधपुर राज्य की लाग बाग जाच समिति को प्रस्तुत की गई सूची में 136 लाग नागें अक्ति थी। 44 पमाराम, पूर्ववणित, पृ 210 45 उपयुक्त, पृ211 46 उपयुक्त, पृ 212-213 47 उपयुक्त, पृ216-17 उपयुक्त, पृ 217 18 उपयुक्त, 298 302 50 उपयुक्त, 304 306 51 उपयुक्त, पृ259 52 उपयुत, 260 53 उपयुत पृ260 61 48 49 राजस्थान मे भील आन्दोलन अनादि काल से भील जाति राजस्थान के दक्षिणी तथा उससे जुड़े मालवा तथा गुजरात के क्षेत्र मे रह रही है। राजस्थान मे स्वतन्त्रता से पूर्व भील मुख्यत मेवाड, डूगरपुर, बासवाडा, प्रतापगढ और कुशलगढ को रियासतो मे रहते थे। वर्तमान मे वे भीलवाडा, चित्तौडगढ, उदयपुर, डूगरपुर और बासवाडा क्षेत्र में बसे है। इससे पूर्व कि राजस्थान में भील आदोलन की विवेचना की जाय, उनके बारे मे सक्षिप्त जानकारी इस प्रकार है। भील-एक परिचय भील भारत की प्राचीनतम जातियो मे से एक है, अनुमान है कि भारत में उनकी जनसरया सन् 1891 में 6,12,459 थी। 1981 की जनगणना के अनुसार 38,38,002 थी। भारत की जनजातियो मे भीलो का स्थान दूसरा है । उत्पति भीलो की उत्पति के बारे मे विभिन्न किवदतिया प्रचलित है। वारण भट्ट कृत 'कादम्बरी' के अनुसार भील शब्द का प्रयोग प्राचीन संस्कृत और अपभ्र श साहित्य में भी मिलता है। 'क्था सरित सागर, जिसको रचना ई सन् 600 मे हुई थी, मे भील शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग मिलता है जिसमे भील मुखिया द्वारा एक दूसरी जाति के राजा की प्रगति का विंध्य पर्वत मे विरोध किया गया है।" मनु ने निशाद (भील का पर्यायवाची) को ब्राह्मण पिता व शूद्र माता की सतान माना है। वेदो मे निशाद उन लोगो को कहा गया है, जो मध्य भारत के वनो मे रहते थे। नृवश शास्त्र के अनुसार भोलो की उत्पत्ति विवादग्रस्त है। कुछ विद्वान उह भारत का प्राचीनतम निवासी मानते हैं। जबकि कुछ उन्हें विदेशी स्वीकार करते है। पर्नल टॉड, जिसने उन्ह वनपुत्र लिखा है, का विश्वास है कि - 128 ] 21 पमाराम, पूर्वागत, पृ28 32 पर समझौते का विस्तृत विवरण देखें । 22 उपयुक्त पृ 36 एवं 38 23 शकरसहाय सक्सेना, पूववणित, पृ 269-70 24 सुमनश जोशी, राजस्थान येम्वतता सनानी (जयपुर, गगानगर, 1973), पृ 1-7 25 वी एल पानगडिया, पूर्ववरिणत, पृ 30 26 नवीन राजस्थान 11 जून, 1922 27 सुमनेश जोशी, पूववरिणत, पृ 178 28 पेमाराम, पूर्ववरिणत, विस्तृत विवरण पृ 113 18 पर अक्ति है । 29 उपयुक्त, पृ 120 30 उपयुक्त, पृ 121 122 31 उपयुक्त, पृ 123 124 32 उपयुक्त, पृ 124-129 33 उपयुक्त, पृ 129 132 34 उपयुक्त पृ 133 35 उपयुक्त, पृ 136 144 36 बाबूलाल पानगडिया पूवरिणत, पृ 27 37 के एस सक्सना, द पालिटिक्स मूवमेट एण्ड अवेनिंग इन राजस्थान, (नई दिल्ली, एस चाँद एण्ड कम्पनी, 1971), पृ 188 38 रामनारायण चौधरी, पूववर्णित, पृ 96 39 रतनलाल मिश्र, शेखावाटी का इतिहास (मडावा, झु झुनू, 1984), पृ240 राम पाण्डे, एनेरियन मूवमेट इन राजस्थान, (दिल्ली यूनीवर्सिटी पब्लिशस, 1974), पृ 67 41 सीकर ठिकान के किसान आ दोलन का विवरण मुख्यत पेमाराम के शोध प्रप (पूरिणत) पर आधारित है । 42 दि मारवाड गजट 6 सितम्बर, 1924 43 मारवाड किसान सभा द्वार दिनाक 18 फरवरी, 1943 को जोधपुर राज्य की लाग बाग जाच समिति का प्रस्तुत की गई सूची में 136 लाग नागें अक्ति थी। पमाराम पूववरिणत, पृ 210 45 उपयुक्त, 211 46 उपयुक्त, पृ212-213 47 उपयुक्त पृ 216-17 48 उपयुक्त पृ 217 18 49 उपयुक्त पृ 298 302 50 उपयुक्त, पृ 304 306 उपयुक्त पृ 259 52 उपयुत, 260 53 उपयुक्त पृ 260 61 40 44 51 राजस्थान मे भील आन्दोलन अनादि काल से भील जाति राजस्थान के दक्षिणी तथा उससे जुड़े मालवा तथा गुजरात के क्षेत्र में रह रही है। राजस्थान मे स्वतन्त्रता से पूर्व भील मुख्यत मेवाड, डूगरपुर, बासवाडा, प्रतापगढ और कुशलगढ की रियासतो मे रहते थे। वर्तमान मे वे भीलवाडा, चित्तौडगढ, उदयपुर, डूगरपुर और वासवाडा क्षेत्र मे बसे है। इससे पूर्व कि राजस्थान मे भील आदोलन की विवेचना की जाय, उनके वारे मे मक्षिप्त जानकारी इस प्रकार है। भील-एक परिचय भील' भारत की प्राचीनतम जातियो मे से एक है, अनुमान है कि भारत मे उनको जनसख्या सन् 1891 मे 6,12,459 थी। 1981 की जनगणना के अनुसार 38,38,002 थी। भारत की जनजातियो मे भीलो का स्थान दूसरा है । उत्पति भीला की उत्पति के बारे में विभिन्न किवदतिया प्रचलित है। वारण भट्ट कृत 'कादम्बरी' के अनुसार भील शब्द का प्रयोग प्राचीन संस्कृत और अपभ्र श साहित्य में भी मिलता है। 'क्था सरित सागर,' जिसकी रचना ई सन् 600 मे हुई थी, में भील शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग मिलता है जिसमे भील मुखिया द्वारा एक दूसरी जाति के राजा की प्रगति का विध्य पवत मे विरोध किया गया है। मनु ने निशाद (भील का पर्यायवाची) को ब्राह्मण पिता व शूद्र माता की सतान माना है । वेदो मे निशाद उन लोगो को कहा गया है, जो मध्य भारत के वनो मे रहते थे। नृवश शास्त्र के अनुसार भीलो की उत्पत्ति विवादग्रस्त है। कुछ विद्वान उन्हे भारत का प्राचीनतम निवासी मानते हैं। जबकि कुछ उन्हे विदेशी स्वीकार करते हैं। कनल टॉड, जिसने उहे वनपुत्र लिखा है, या विश्वास है कि .
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[ 131 । भीलो का प्रारम्भिक विद्रोह सन् 1818 में दक्षिणी राजस्थान के पाचो राज्यो (मेवाड, डूगरपुर, बासवाडा, प्रतापगढ और कुशलगढ) ने ईस्ट इण्डिया कम्पनी के साथ सधि कर ली। सधि से इन राज्यो को विदेश नीति तो अग्रेजो के हाथ मे आ ही गई किन्तु कुछ मामलो मे अग्रेज इनके आतरिक मामलो मे भी हस्तक्षेप करने लगे थे । इस प्रकार अग्रेज ही इस क्षेत्र के वास्तविक स्वामी बन गये । 1818 मे सवप्रथम मेवाड मे भीलो ने विद्रोह किया। मेवाड मे भीलो के विद्रोह के कई कारण थे। प्रथम, 1818 की सधि के द्वारा स्थानीय सेना भग कर दी गई। राज्य की व जागीरदारो की सेना में भील भी कार्यरत थे जो सेना के समाप्त होने से वेकार हो गये। दूसरा, सधि के तुरत बाद मेवाड का आतरिक प्रशासन त्रिटिश रेजीडेट कनल जेम्स टॉड ने सभाल लिया। उसने भीलो को नियान मे रखने का प्रयास किया। तीसरा, कनत टॉड ने भीलो का वोलाई व रखवाली कर वसूलने का अधिकार समाप्त कर दिया और यही विद्रोह का तत्कालिक कारण बना । 1823 का अभियान भीलो को दबाने के लिये कनल लूचे के नेतृत्व में एक सेना भेजी गई जिसने भीलो को समर्पण के लिये विवश कर दिया। अग्रेजो की मध्यस्थता से भीलो व महाराणा के मध्य एक सधि हो गई, जिसके अनुसार--- (1) प्रत्येक पाल के गमैती (पाल का मुखिया) ने महाराणा की सर्वोच्चता स्वीकार की। (2) महाराणा पहाडी क्षेत्र मे थाने स्थापित कर सकेंगे। (3) भील अपने समस्त हथियार महाराणा को सौंप देगे और भविष्य में भी क्सिी प्रकार के हथियार अपने पास नही रखेंगे। (4) भील अपनी कृषि उपज का एक चौथाई लगान के रूप मे देंगे। (5) वे भील रखवाली कर वसूल नहीं करेंगे। (6) भील राहजनी, चोरी, डकैती, आदि अपराध नहीं करेंगे और यदि कोई करेंगे तो गर्मती को उन्ह राज्य को सौंपना होगा। (7) सभी मामलो मे भील महाराणा और पोलिटिकल एजेण्ट या निणय स्वीकार करेंगे। (8) वे कन्या वध तथा गौ वध नहीं करेंगे।
130 ] आर्यों ने उन्हे जगल मे रहने को विवश कर दिया। राजपूत भी उन्हे यही का निवासी मानते हैं। जहा तक राजस्थान का प्रश्न है, भीलो ने मेवाड के गुहिल शासको की अविस्मरणीय सेवाए की है। यही कारण था कि मेवाड के राजविह्न मे राजपूत के साथ एक धनुर्धारी भील का चित्र भी अकित था। डूगरपुर, बासवाडा, देवलिया' आदि शहरो के नाम कुछ भील मुखियाप्रो के नाम पर रखे गए थे। प्रकृति से भील एक स्वतन, नियमो मे न बधने वाली युद्धप्रिय जाति है । इनके मुरय हथियार तीर व कमान है। आर्थिक दृष्टि से यह बहुत ही पिछडा वर्ग है और इनके आर्थिक साधन भी बहुत कम है। प्रारम्भ मे ये भोजन की खोज मे इधर उधर भटका करते थे, किन्तु बाद मे वे 'झिमतो' विधि से (जगल जला कर खेती करना) सेती करने लगे। खेती के अतिरिक्त वे लकड़ी काटना, घासफूस, फल, जडी बूटी, शहद, गोद एकत्रित करना, मछली पकडना, जगली जानवरो का शिकार करना भी उनका पेशा है। वे 'बोलाई' कर यात्रियो की सुरक्षित यात्रा के बदले मे तथा रखवाली कर गाव वालो से गाव की रखवाली के बदले मे लेते थे। उन्नीसवी शताब्दी में इस क्षेत्र में कई अकाल पडे अत भूख से बचने के लिये उनमे से कई ने चोरी व डकैती का पेशा भी अपना लिया। भील बहुत अधविश्वासी होते है और भूतप्रेत से बचने के लिये अपने हाथो पर गोदने गुदवाते है तथा गडे तावीज वाधते है। धार्मिक रूप से वे चुडेल या डाक्न के जादू टोने में विश्वास करते है और भोपो के माध्यम से दूर करते है। यदि किसी स्त्री पर चुडल होने का सदेह हो तो उसे अनेक प्रकार को सत्य परीक्षा मे गुजरना पडता है। यदि विना विसी नुवमान के वह इस परीक्षा में उत्तीण होती है तो उसे छोड दिया जाता है, अन्यथा उसे अपराध स्वीकार करने के लिये पेड की शाखा से लटका दिया जाता है। यदि वह अपराध स्वीकार कर लेती है तो उसे या तो मार दिया जाता है या पाल मे बाहर निकाल दिया जाता है । कप्तान ग्राह्य का भीलो के बारे मे क्थन है- "The Bhils are the most urciuilized of all the wild tribes, with intellect barely sufficient to understand and totally uncqual to comprehend anything beyond the most simple ommunicatio and with fornis stunned by hardships, the bad climate and the bitter poverty in which they are stecpcd' [ 131 - भीलो का प्रारम्भिक विद्रोह सन् 1818 मे दक्षिणी राजस्थान के पाचो राज्यो (मेवाड, डूगरपुर, वासवाडा, प्रतापगढ और कुशलगढ) ने ईस्ट इण्डिया कम्पनी के साथ सघि कर ली । सधि से इन राज्यो की विदेश नीति तो अग्रेजो के हाथ मे आ ही गई वितु कुछ मामलो मे अग्नेज इनके आतरिक मामलो मे भी हस्तक्षेप करने लगे थे। इस प्रकार अग्रेज ही इस क्षेत्र के वास्तविक स्वामी बन गये । 1818 मे सर्वप्रथम मेवाड मे भीलो ने विद्रोह किया। मेवाड मे भीलो के विद्रोह के कई कारण थे। प्रथम, 1818 की सधि के द्वारा स्थानीय सेना भग कर दी गई। राज्य की व जागीरदारो की सेना में भील भी कार्यरत थे जो सेना के समाप्त होने से बेकार हो गये। दूसरा, सधि के तुरन्त बाद मेवाड का आतरिक प्रशासन ब्रिटिश रेजीडेट कनल जेम्म टॉड ने सभाल लिया। उसने भीलो को नियनण मे रखने का प्रयास किया। तीसरा, कर्नल टॉड ने भीलो का बोलाई व रखवाली कर वसूलने का अधिकार समाप्त कर दिया और यही विद्रोह का तत्कालिक कारण बना। 1823 का अभियान भीलो को दबाने के लिये कर्नल लूवे के नेतृत्व मे एक सेना भेजी गई जिसने भीलो को समर्पण के लिये विवश कर दिया। अग्रेजो की मध्यस्थता से भीलो व महाराणा के मध्य एक सधि हो गई, जिसके अनुसार- (1) प्रत्येक पाल के गमैती (पाल का मुखिया) ने महाराणा की सर्वोच्चता स्वीकार की। (2) महाराणा पहाडी क्षेत्र मे थाने स्थापित कर सकेगे। (3) भील अपने समस्त हथियार महाराणा को सौप देगे और भविष्य मे भी क्सिी प्रकार के हथियार अपने पास नहीं रखेंगे। (4) भील अपनी कृषि उपज का एक चौथाई लगान के रूप मे देंगे। (5) वे भील रखवाली कर वसूल नहीं करेंगे। (6) भील राहजनी, चोरी, डक्ती, आदि अपराध नही करेंगे और यदि कोई परेंगे तो गमती को उन्हें राज्य को सौंपना होगा। (7) सभी मामलो मे भील महाराणा और पोलिटिकल एजेण्ट या निर्णय स्वीकार करेंगे। (8) वे क्या वध तथा गौ वध नही करेंगे। + 132 ] (9) यदि कोई भील उपरोक्त शर्तों का उल्लघन रेगा तो वह अपराधी माना जायेगा और राज्य के कानून के अनुसार उसके विरद्ध मार्यवाही की जा सकेगी। उपरोक्त शतें सभी पाल के गमैतियो द्वारा स्वीकार कर ली गई, किन्तु जैसे ही अग्रेजी सेना नायक कप्तान कोय ने ऋपभदेव की पोर प्रस्थान किया, आसपास के भील पुन पशुमा की चोरी और डक्ती के कार्यों में लिप्त हो गए। वस्तुत भीलो ने उनके क्षेत्रो मे थाने की स्थापना, अस्त्र समपरण, भूराजस्व कर, क्या वध निषेध नादि नियन्त्रणो को स्वीकार नही किया। ये सभी प्रतिवध उनकी परम्परा, सामाजिक रीति-रिवाजो और सभी अथ व्यवस्था पर आघात करने वाले थे। कप्तान कोव ने भी उनकी परम्पग व रीति-रिवाजो पर कोई ध्यान नहीं दिया और न ही उनको अथ-व्यवस्था को सुधारने का कोई सुझाव दिया था। अत एक सैनिक टुकडी पुन उस क्षेत्र मे शाति स्थापित करने के लिए भेजी गई। महाराणा के एक प्रतिनिधि को नियुक्ति भीलो से कर एकत्रित करने और उससे निपटने के लिए कर दी। - डूगरपुर और वासवाडा के भीलो के विरुद्ध कारवाही 1823 के अनियान के पश्चात् भी स्थिति में सुधार नहीं हुआ । ज्योही सेना हटाई जाती, भील और गरासिये पुन उस क्षेत्र मे उपद्रव प्रारम्भ कर देते। भीलो के नेता दौलतसिंह और गोविन्दा ने भीलो और कुछ भाडे के सिपाहियो की एक फौज एकत्रित कर ली। उहे डूगरपुर और ईडर की स्थानीय जनता का समथन भी प्राप्त था। इधर महाराणा अपनी प्रातरिक उलझनो मे पसे रहने के कारण इस क्षेत्र मे शाति स्थापित करने के लिए कोई ठोस कार्यवाही नहीं कर सके । स्थिति बिगडने पर महारावल की प्रार्थना पर मैक्डोनल्ड के नेतृत्व में राज्य के खर्चे पर भीलो के विरुद्ध सेना भेजो गई। 1825 मे डूगरपुर और वासवाडा के गावो के अनेक गमैतियो ने हथियारो का समर्पण कर दिया। उन्होने चोरी व डकैती से जो क्षति पहुची थी, उसकी भरपाई करने का भी वायदा किया। उन्होने समस्त राजकीय कर चुकाने व ब्रिटिश जनता को उस क्षेत्र मे सुरक्षित गुजरने, शासको व कुलीना को प्रातकित नही करने का भी वायदा किया। कप्तान ने भील प्रमुखो को उस क्षेत्र मे शाति बनाए रखने तथा महाराणा की सर्वोच्चता स्वीकार करने की सलाह दी। भोलो ने उसके परामश [ 133 को स्वीकार किया और महाराणा का एक एजेन्ट विभिन्न भील प्रमुखो के क्षेत्र मे रखा गया।18 दौलतसिंह द्वारा प्रतिरोध सन् 1826 मे दौलतसिंह व गोविन्दा ने जवास और जूडा (Joora) के थानो को नष्ट कर दिया। जूडा मे उन्होने 100 सैनिक मार डाले। अगले ही महीने उन्होने विभिन स्थानो पर लगभग 250 व्यक्तियो को मार दिया। उन्होने खेरवाडा को घेर लिया। महाराणा ने विद्रोह दवाने में असमथता जाहिर की और कप्तान कौव से विद्रोह दवाने की प्रार्थना की। कौव व वायट ने सेना के साथ खेरवाडा प्रस्थान किया। साथ ही उसने भीलो के असन्तोप के कारणो की जाच कराने का प्रस्ताव किया 118 उसने भीलो को शात रखने के भी अनेक उपाय सुझाए। उसके विचार मे उपद्रव का कारण स्थानीय अधिकारियो का दुर्व्यवहार, थाने मे सिपाहियो की अनियमित नियुक्तिया आदि था। ब्रिटिश अधिकारी भी भील आदोलन को पूणतया दवाने मे असमथ रहे, क्योकि एक तो दौलतसिंह व गोविन्दा को स्थानीय जनता का समर्थन प्राप्त था, दूसरे ब्रिटिश सेना को उस क्षेत्र की पूर्ण जानकारी नहीं थी तथा महाराणा की जो सेना ब्रिटिश अधिकारियो के साथ थी वह भी जानकारी नही रखती थी। चहुमुखी अव्यवस्था उपरोक्त अभियान की असफलता के पश्चात् अग्रेज अधिकारियो ने एक पैदल सेना व कुछ घुडसवार सैनिक कप्तान ब्लैक के नेतृत्व मे मेवाड की सहायता के लिए भेजी। ब्लैक को उस क्षेत्र मे पूण सैनिक व नागरिक अधिकार दिए गए। उसे विद्रोह और गडवडी के मूल कारणो को भी ज्ञात करने के लिए कहा गया और उस क्षेत्र मे स्थायी शाति स्थापित करने के लिए भी सुझाव मागे गए 10 फरवरी 1827 मे कप्तान ब्लैक खेरवाडा पहुचा और वहा से जवास । यहा दौलतसिंह ने हरनाथ सिंह मोघिया की सहायता से उसे काफी परेशान किया। इसके पश्चात् मेवाड, डूगरपुर और वासवाडा के क्षेत्र मे चारो ओर अव्यवस्था फैल गई। अब एक सशक्त सेना कर्नल बर्ग के नेतृत्व मे नीमच से खेरवाडा भेजी गई। कप्तान ब्लैक भी वग की सहायता हेतु गया, किन्तु मार्ग में ही उसकी मृत्यु हो गई। मृत्यु के पूर्व ब्लैक ने भीलो की बोलाई एकत्रित करने का अधिकार दे दिया था, जिससे इस क्षेत्र मे कुछ शाति स्थापित हुई। स्पीयस की व्यवस्था दौलतसिंह ब्रिटिश सेना का मुकाबला न कर सका और उसे वार्ता के लिए वाध्य होना पड़ा। लम्बी वार्ता के पश्चात् दौलतसिंह ने समर्पण कर 1341 । दिया, उसे बवूलवाडा नामक गाय अपने गुजारे के लिए दिया गया। स्पीयस ने जवास का गाव उसके मुसिया को वापम देने की भी सिफारिश की, साथ ही उसके द्वारा दिया जाने वाला पर भी निर्धारित किया गया। तत्पश्चात स्पीयर्स ने पुनुर्वा पोर जूडा के प्रमुखो को भी समझौते पर हस्ताक्षर के लिए मना लिया। इस समझौते के द्वारा उन्होंने उस क्षेत्र मे शाति बनाए रखने, प्रवाहित कर एकत्रित न करने, राहजनी और डकैती की क्षतिपूर्ति परने तथा अग्रेजो की प्राज्ञा मानना स्वीकार किया। उस क्षेत्र के अन्य अनेक मुसियालो ने भी इस प्रकार के इकरारनामे पर हस्ताक्षर किए। तत्पश्चात् इस क्षेत्र मे अनेक थाने स्थापित किए गए और 1828 के अत तर क्नल वग की सेना इस क्षेत्र से हटा ली गई। व द्वारा 'बोलाई' एकत्रित करने का अधिकार," मेवाड के महाराणा जवानसिंह के शासन मे भीलो के प्रति मानवीय व्यवहार ने कुछ अश तक भीलो को प्रभावित किया। ब्रिटिश सेना के हटने के पश्चात् भी महाराणा ने उन्हे वोलाई' एरमित करने का अधिकार दिया, जिससे उन्ह दुभिक्ष मे विना चोरी, डकैती किए जीवन निर्वाह मे सहायता मिली ।२० कुछ छुटपुट घटनाप्रो के अलावा दक्षिणी राजस्थान के पहाडी क्षेत्रो मे शाति बनी रही। मेवाड भील कोर की स्थापना दक्षिणी राजस्थान मे निरन्तर भौल विद्रोह तथा यहा के भीलो द्वारा निरन्तर महीकाठा क्षेत्र मे उत्पात मचाने के कारण प्राउट्रम ने एक अग्रेज अधिकारी की अधीनता मे मेवाड़ भील कोर की स्थापना का परामर्श दिया । उसका सुझाव या कि बिना नियन्त्रण के कोई स्थानीय समाधान नहीं निकलेगा। उसका यह भी मानना था कि ये व्यवस्था मेवाड राज्य के लिए भी लाभदायक रहेगी । उसने ए जी जी (राजपुताना मे गवर्नर जनरल के एजेट) से प्राथना की कि वह मेवाड महाराणा को मेवाड भील कोर का व्यय वह्न करने के लिए मन। ले 18 उसके सुझाव की कनल पाल्वर्स ए जी जी ने भी विशेप सिफारिश की। उसने महाराणा से इसका सर्च वहन करने को भी सलाह दी। सन् 1838 मे मेवाड महाराणा ने मेवाड भील कोर की स्थापना की प्रयोग की दृष्टि से 10 वर्ष के लिए मजूरी प्रदान की। अत मे 1841 मे गवनर जनरल की काय- कारिणी ने मेवाड भील कोर की स्थापना की अनुमति दे दी और विलिमय हटर को उसका कमाण्डेंट बनाया गया। गवनर जनरल की कायकारिणी ने कप्तान हटर को सेरवाडा से अच्छे चरित्र वाले भीलो की भर्ती के आदेश दिए। मेवाड [ 135 भील कोर मे खेरवाडा से 7 गमेतियो और जवास से 12 गमेतियो को लिया गया। इन गर्मतियो को अपने कर्तव्य पालन के लिए रेजीमेन्ट मे नही पाना या, बल्कि उनका वेतन उन्हे घर बैठे ही दिया जाना था। उनसे उनके गावो मे शाति बनाए रखने की अपेक्षा की जाती थी। इस व्यवस्था को 1861 मे बन्द कर दिया गया 130 ब्रिटिश अधिकारियो की राय मे भील कोर की स्थापना दक्षिणी राजस्थान मे शाति और व्यवस्था बनाए रखने मे बहुत लाभदायक थी। उनके अनुसार 1841 के अन्त तक खेरवाडा के आसपास के क्षेत्र में काफी अनुशासन आ गया था ।1 1843 से सदरलैंड ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि हटर की व्यवस्था ने उस क्षेन के भीलो के व्यवहार मे काफी परिवर्तन ला दिया। उसके विचार मे यह व्यवस्था उदयपुर के शासक के लिए भी लाभदायक थी, किन्तु इससे भीलो के चरित्र मे पाए परिवर्तन अधिक समय तक नहीं बने रहे । नवीन सुधार और भील प्रतिरोध 1881 से 1883 के बीच मेवाड के भीलो ने पुन त्रिटिश व महाराणा की प्रभुसत्ता को चुनौती दी। उनके विद्रोह के कारण निम्न थे-- 1857 के स्वतनता सग्राम के पश्चात् ब्रिटिश सरकार ने ईस्ट इण्डिया कम्पनी से सत्ता सभाल ली। उन्होने भारतीय राज्यो मे ब्रिटिश पद्धति के अनुसार अनेक सुधार लागू किए। नवीन सुधारो ने भीलो के अनेक अधिकारो पर रोक लगा दी। वे बिना कर दिए कृषि उपज तथा जगल से लाई वस्तुप्रो को नहीं ले जा सकते थे। नागरिक अधिकारी भीलो से क्रूरतापूर्ण व अमानवीय व्यवहार करने लगे ये और जवरन उनसे धा वसूल करते थे। उनके भ्रष्ट होने की शिकायत भी निरन्तर मिल रही थी। मेजर मैक्सन ने 1868 में महाराणा मेवाड की लिखा कि उस क्षेत्र मे शाति और व्यवस्था स्थापित करने के लिए प्रशासन मे सुधार को आवश्यक्ता है ।36 हकीम रघुनाथ सिंह व उसके मातहत मोतीमिह भीलो से क्रूरतापूण व अयायपूण व्यवहार कर रहे हैं। ये अधिकारी भीलो से दुगना कर व भारी जुर्माना जबरदस्ती वसूल रहे हैं।" अभी तक भील क्षेत्र मे वनिए व महाजन नहीं थे, किन्तु नई व्यवस्था द्वारा वे लोग भी आ गए और अशिक्षिन व भोले-भाले भीलो का शोषण करने लगे। नवीन प्रशासनिक सुधारो ने भीलो पर नए नए कर लगा दिए। भील क्षेत्र मे चु गी चौकीया स्थापित कर दी गई जिससे उपभोक्ता वस्तुप्रो के मूल्य 136 ] । बढ गए। तम्बाकू, नमक व अफीम पर नए कर लगा दिए गए। भीलो द्वारा शराव बनाने पर भी प्रतिवन्ध लगा दिया गया । अग्रेजो द्वारा भीलो के सामाजिक कायकलापो मे हस्तक्षेप ने उन्हे उत्तेजित कर दिया। सन् 1840 से 1880 तक भील क्षेत्र मे अनेक चुडैल वध की घटनाए घटित हुई थी। जिस कारण अनेक भीलो को राज्य ने दडित क्यिा तथा चुडैल वध पर प्रतिबन्ध लगा दिया। चुडेल वध पर प्रतिबन्ध को उन्होने अपने धार्मिक विश्वास पर अतिक्रमण माना । इन सुधारो को लागू करने का अर्थ युग-युगातर से चली आ रही भील परम्परानो का उल्लघन करना था। मेवाड में 1881 की जनगणना ने भी भीलो मे उत्तेजना फैला दी। जनगणना के कारण भील समाज मे अनेक प्रकार की अफवाहे फैल गई। कुछ लोगो का विचार था कि जनगणना के माध्यम से अग्रेजी सरकार अफगान युद्ध के लिए धन एकत्रित करना चाहती थी, जबकि कुछ भीलो का विचार था कि स्वस्थ व्यक्तियो को लडने के लिए काबुल भेजा जाएगा । कुछ लोगो का अनुमान था कि जनगणना के द्वार मोटी स्त्रिया मोटे युवको तथा पतली स्त्रिया पतले युवको को दे दी जायेगी। यह भी सोचा गया कि जनगणना भील जाति को समाप्त करने का एक प्रयास है 141 भीलो पर पुलिस अत्याचार ने भी भील विद्रोह को उभाड दिया। 1881 मे माच के प्रथम सप्ताह में पदोना गाव (उदयपुर-खेरवाडा मार्ग पर स्थित) की एक घटना भील विद्रोह का तत्कालीन कारण बन गई। श्यामलदास के अनुसार बड़े पाल के थानेदार ने इस गाव के गमती (भीलो का मुखिया) को किसी भूमि विवाद सम्बधी मामले में गवाही देने के लिए बुलाया। थानेदार ने गर्मती को बुलाने के लिए सवार भेजा, किन्तु गमती ने जाने से इन्कार कर दिया। जब सवार ने उसे जबरदस्ती ले जाना चाहा तो भीलो ने उसे मार दिया। इस पर थानेदार अपने सिपाहियो के साथ गाव पहुचा और गमैती को गिरफ्तार कर थाने ले गया। थाने में उसे अमानवीय यातना दी गई, जिससे गमती की मृत्यु हो गई। 2 एक अय कथन के अनुसार गर्मती को शराच बनाने से रोकने के लिए बुलाया गया था, क्योकि इससे शराव के ठेकेदार को नुकसान होता था, जो कि बडे पाल के थानेदार का मित्र था । इस घटना से भील उत्तेजित हो उठे। तगभग तीन हनार भोलो ने बडे पाल के थाने को घेर लिया और थानेदार सहित सोलह व्यक्तियो को मार डाला। उन्होने बडे पाल के थाने और समस्त वनियो की दुकानो को जला दिया ।
[ 137 उन्होने उदयपुर-खेरवाडा माग को भी काट दिया। कोटडा व टिड्डी के भील भी इस विद्रोह में सम्मिलित हो गए। कुछ ही समय में यह विद्रोह मेवाड भर में फैल गया। सूचना मिलने पर मेवाड राज्य की ओर अग्रेजी सेना को विद्रोह दवाने के लिए भेजा गया, किन्तु उह सफलता नहीं मिली, क्योकि भील वनो मे भाग गए, जिससे सेना उनका कुछ भी विगाड नहीं सकी। समझौते के लिए वार्ता अव महाराणा ने भीलो से वार्ता करने का निर्णय लिया। उन्होने भीलो के प्रतिनिधियो को सुरक्षा का आश्वासन दिया तथा उन्हे वार्ता के लिए उदयपुर चुलाया, किन्तु भीलो ने ऋपभदेव को वार्ता का स्थल चुना। महाराणा ने श्यामलदास को अपना प्रतिनिधि नियुक्त किया और उसे भीलो के माथ उदार तथा नरम शर्ते लागू करने को कहा। समझौते की वार्ता नपभदेव मन्दिर के पुजारी खेमराज भण्डारी की मध्यस्थता में 18 अप्रेल 1882 को प्रारम्भ हुई। करीब 6-7 हजार भील ऋषभदेव मे एकत्रित हो गए। ब्रिटिश अधिकारी श्यामलदास का प्रभाव भीलो पर नहीं वढने देना चाहते थे, इसलिए उनके प्रतिनिधि कनल ब्लेयर एव विंगेट भी श्यामलदास को परामश देने के लिए वहा पहुच गए। मेवाड पोलिटिकल एजेण्ट ने महाराणा से आवश्यक्ता पड़ने पर श्यामलदास की जगह कनल ब्लेयर को अपना प्रतिनिधित्व करने को कहा 145 वार्ता मौहादपूर्ण वातावरण मे प्रारम्भ हुई किन्तु ज्योही श्यामलदास ने हाथ उठा कर भीलो की भीड को पीछे हटने को कहा, भोलो ने इसका गलत अथ निकाला। एक भील ने अपनी वदूक दाग दी और भीलो ने इसे युद्ध प्रारम्भ होने का सकेत समझ लिया। किन्तु कनल ब्लेयर के वर्णन के अनुसार सब कुछ ठीक ठाक चल रहा था कि श्यामलदास ने अचानक भीलो से पूछा-"तुम लोग समझौता क्यो नही कर लेते " और इसके तुरन्त बाद राज्य के सिपाही अपनी बदूके भरने लगे। यह देखकर भील भाग छूटे और भागते हुए भीलो पर राज्य के सिपाहियो द्वारा गोलावारी की गई। श्यामलदास भीलो को पुन वार्ता के लिये मुशिल से ही तैयार कर पाया। इस बार वार्ता के लिये अकेला ही भीलो के पास गया। अतत मेवाड राज्य व भीलो मे एक समझौता हो गया। समझौते मे 21 धाराए थी और उसकी मुख्य शर्ते इस प्रकार थी 48 138 ] -- भीलो के गावो मे जनगणना का कार्य नही किया जायेगा। 2 भील पुरुषो व स्त्रियो या वजन नहीं लिया जायेगा। 3 वडे पाल व वधुना हत्याकाड के लिये उन्हे क्षमादान दिया जायेगा। 4 भील क्षेत्र मे थानो की बढोतरी नही की जायेगी। 5 भीलो की भूमि की माप नहीं किया जायेगा। 6 विना मूल्य दिए उनसे घास और लकडी नहीं ली जायेगी। 7 अफीम, नमक व तम्बाकू का ठेका नहीं दिया जायेगा। 8 उन तीर्थयात्रियो से जो ऋपभदेव व थीनाथजी के दर्शन के लिये जा रहे हैं, पुरानी प्रथा के अनुसार भोलो को वोलाई कर लेने का अधिकार होगा। 9 राज्य के पहाडी क्षेत्रो मे घास व लकडी ठेके पर नहीं दी जायेगी। 10 उन भोलो को जो पिछले तीन वर्षों से जेलो मे वद है, जुर्माना देने पर छोड दिया जायेगा। 11 भीली के गावो से जोगियो और घोवियो से फूटा नहीं लिया जायेगा कि तु वे राज्य के कार्य पुरानी प्रथा के अनुसार करते रहेगे। 12 भीलो से पाम व महुआ की पत्तियां एकत्रित करने पर किसी भी प्रकार का कर नही लिया जायेगा। 13 उन सडको की चौकियो पर सवार नही रखे जायेगे जिसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी भीलो पर है। इस प्रकार भीलो के प्रारम्भिक विद्रोह नवीन पद्धति की प्रतिनिया स्वरूप थे। ब्रिटिश सरकार ने भविष्य मे भील विद्रोहो को रोकने के लिये अनेक उपाय किए। एक तरफ उन्होने भीलो को कुछ रियायते प्रदान की तथा दूसरी तरफ उन पर प्रभावशाली सैनिक व नागरिक नियनण स्थापित किया। इन उपायो के द्वारा भील क्षेत्र में काफी समय तक शाति बनी रही। गोविद गुरु द्वारा भीलो मे समाज सुधार का प्रयास व भील आदोलन भीलो मे समाज सुधार का कार्य श्री गोविन्द गुरु ने प्रारम्भ किया था। उन्होने भीलो के नैतिक और भौतिक जीवन को सामाजिक और धार्मिक शिक्षामो के आधार पर सुधारने का प्रयास किया। गोविन्द गुरु की शिक्षाप्रो ने भीलो मे नवीन जागृति उत्पन्न की और उनका धम व समाज सुधार आदोलन राजनीतिक व आर्थिक विद्रोह मे परिणित हो गया।
[ 139 गोविन्द गुरु का जन्म 1858 मे डूगरपुर राज्य के बेदसा ग्राम मे एक बनजारे के घर मे हुआ था उन्होंने गाव के पुजारी की सहायता से अक्षर ज्ञान प्राप्त किया। वह स्वामी दयानन्द सरस्वती की प्रेरणा से युवावस्था मे ही जनजातियो की सेवा मे जुट गए। उन्होने धूनी और निशान वासिया ग्राम मे स्थापित किया और आसपास के भीलो को आध्यात्मिक शिक्षा देनी प्रारम्भ की उनकी मुख्य शिक्षा उनके स्वय के शब्दो मे इस प्रकार थी----- 'मैंने जब भीलो के मध्य रहना प्रारम्भ किया तब उन्हे सृष्टिकर्ता का कोई ज्ञान नही था। जो भी भील मेरे पास आए, मैंने उन्हे धर्म और सत्य के मार्ग पर चलने तथा ईश्वर की आराधना करने को कहा । मैंने उनसे कहा कि वे नफरत की भावना न रखे किन्तु सभी को एक ही परमात्मा को सतान समझे और दूसरो के साथ शाति से रहने का प्रयास करें। वे भूत, प्रेत चुडैल आदि पर विश्वास न करे बल्कि उनको भगाने के लिये धूनी और निशान की पूजा करें उहोने भीलो से मास व मदिरा सेवन न करने का भी आह्वान किया ।1 अपनी शिक्षा व कल्याणकारी कार्यों से वे भीलो मे लोकप्रिय हो गए। धीरे धीरे उनका प्रभाव भीलो मे बढता गया। भीलो को एकत्रित करने के लिये 1905 मे उन्होंने सम्प सभा की स्थापना को इस सभा के माध्यम से उन्होने मेवाड, डूगरपुर, ईडर, गुजरात, विजयनगर और मालवा के भीलो को सगठित किया। उन्होने एक ओर तो उनमे व्याप्त सामाजिक बुराईयो और कुरीतियो को दूर करने का प्रयत्न किया तो दूसरी ओर उनको अपने मूलभूत अधिकारो का अहसास कराया। भीलो मे बढती जागृति से आसपास की रियासतो के शासक सशक्ति हो उठे। राज्य अधिकारियो ने अपने क्षेत्र से गोविद गुरु व उनके पथ को उखाडने का प्रयास किया। भीलो से बहुत बुरा व्यवहार किया जाने लगा व उन्हे पथ छोडने को विवश किया जाने लगा। कुछ मामलो मे उन्हें जवरन मद्यपान के लिये विवश किया गया 13 जागीरदार और राज्य ने गोविन्द गुरु को डूगरपुर छोडने के लिये विवश किया गया। राज्याधिकारियो के कार्यों ने भीलो के मन मे घृणा उत्पन्न कर दी तथा उन्हे राज्याधिकारियो के विरद्ध राजनैतिक आदोलन छेडने को विवश कर दिया। इस समय भीलो के विद्रोह के कारण जानना अनुचित न होगा। ये कारण थे- प्राचीन काल मे पुराने समय मे भील जगल से एकत्रित वस्तुओं पर निर्वाह करते थे, किन्तु अव उन्हे कृषि क्म के लिये विवश कर दिया गया।
140 ] - प्रकार वे सीधे अग्रेजो, देशी राज्यो और जागीरदारो के नियन्त्रण मे आ गये, क्योकि वे अब तक स्वच्छद थे । उहोने निय प्रण में रहना पसन्द नही किया । राज्य और जागीरदार उनसे भारी कर लेते थे। बटाई प्रथा के अन्तर्गत वे उनसे भारी लगान वसूलते थे। यदि वे न दे पाते थे तो राज्याधिकारी उनसे धूर व निमम व्यवहार करते थे। कृषि भूमि पर उनका कोई अधिकार नहीं था। वे सिफ सेती करने वाले दास थे, वे अव जगली वस्तुए बिना कर दिए नही ले जा सकते थे। भील क्षेत्र मे बैठ बेगार प्रथा भी सामान्य थी। भील राज्य और जागीरदारो के लिये बेगार करने को विवश थे। वे बिना वेतन के जागीरदार की जमीन मे सेती करने, उसके मकान बनाने आदि काय करने को विवश थे। राज्याधिकारी उनसे माल ढुलवाने, रखवाली आदि की वेगार कराया करते थे। ये जागीरदार और राज्याधिकारी के घरो मे भी काय करते थे। राजपूनाना के ए जी जी ने एक पन मे लिखा, "वतमान परिस्थितियो मे भीलो पर करो का वोझ बहुत ज्यादा है, उनमे वेगार का प्रातक इतना अधिक है कि गाव के गाव साली हो गए है और भूमि पडत पडी है ।"58 भील लम्बे समय से बेगार कर रहे थे, कि तु गोविन्द गुरु की शिक्षा ने उनमे जागृति उत्पन्न कर दी। अब भील यह महसूस करने लगे कि उनके निम्न सामाजिक स्तर के कारण उनका शोपण किया जा रहा है। गोविन्द गुरु के सामाजिक, धार्मिक मुधार आन्दोलन ने उनमे सामाजिक अन्याय के विरुद्ध लडने की जागृति उत्पन्न की। राज्य की दोपपूण श्रावकारी नीति ने भी भीलो को उद्वेलित कर दिया। वे छोटी छोटी रियासते (सू थ, ईडर, बासवाडा, डूगरपुर, कुशलगढ) जिसमे भील जनसरया अधिक थी, के राजस्व का मुरय श्रोत शराब की बिक्री थी। राज्य में अवैध शराव बनाने पर प्रतिवध लगा दिया गया। भीलो को देशी शराब बनाने का अधिकार लम्बे समय से प्राप्त था। वे महुआ के फूलो से शराब बनाते थे, जिसे अव राज्य ने प्रतिबंधित कर दिया। भीलो मे इसमे बहुत रोप पैदा हुआ, कि तु सुधार आन्दोलन के प्रभाव से उन्होने शराब पीना वद कर दिया। इससे राज्य और ठेकेदारो को भारी नुकसान होने लगा। उदाहरण स्वरूप बासवाडा मे अक्टूबर 1913 मे शराव की वित्री 18470 गैलन से 5154 गैलन रह गई। अासपास के राज्यो की स्थिति भी इसी प्रकार की हो गई 157 वासवाडा और कुशलगढ का कुल राजस्व क्रमश दो लाख पचास हजार रुपये तथा 86,000 रु था, जिसमे से 56,000 वासवाडा को शराव से 31,000 कुशलगढ को शराव से प्राप्त होता था, 8 राज्य के ठेकेदारो ने उसे जबरदस्ती [ 141 - . शराव पिलाने का प्रयास किया। अत शराब का प्रश्न भीलो के लिये वडा मुद्दा बन गया। 1913 के भील आन्दोलन का तात्कालिक कारण गुरु गोविन्द गुर के नेतृत्व मे धार्मिक आन्दोलन था। उनके प्रयासो से राजपूताना के दक्षिणी भाग के पहाडी इलाको के भील पूरी तरह से सगठित हो गए थे। उनमे जागरण की नई लहर आ गई थी। वे राज्य के दमन, शोपण और अत्याचार का मुकाबला करने को हर प्रकार से तैयार हो रहे थे। सिरोही, वासवाडा, डूगरपुर, मेवाड के राजा इससे चिंतित हो उठे। उन्होने भीलो को कुचलने और उनकी शक्ति को छिन-भिन करने के हर सभव प्रयास किये, किन्तु वे सफल नहीं हो सके । अप्रेल 1913 मे डूगरपुर राज्य की पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया और उनके परिवार को भी पुलिस निगरानी में रखा गया। उन्हे तीन दिन बाद छोड दिया गया, लेकिन डूगरपुर राज्य से बाहर चले जाने को कहा गया। वह गुजरात के ईडर राज्य मे चले आए,60 किन्तु वहा के शासक ने भी उन्हे वहा से भगाने का प्रयास क्यिा। गोविद गुरु और उनके शिष्यो को जिस प्रकार राज्य द्वारा पानात किया गया, उससे उन्हे भील राज्य बनाने तथा सामतवाद के पजो से मुक्त होने को विवश कर दिया। ईडर से वह अपने माथियो सहित मानगढ की पहाडी (वासवाडा और सू थ राज्य की सीमा पर स्थित) पर चल दिये।" पहाडी घने वन से घिरी हुई थी और इस प्रकार प्राकृतिक रूप से सुरक्षित थी। गोविन्द गुरु ने अक्टूबर 1913 को भीलो को मानगढ ने एकनित होने के लिये चारो ओर सन्देश भेज दिए । भील अपने साथ रसद व हथियार काफी मात्रा में ले पाये। यह भी अफवाह फैली कि भील दिवाली से चार दिन पूर्व सू थ राज्य पर प्राप्रमण करेंगे। वस्तुत गोविद गुरु के कट्टर अनुयायियो से केवल मानगढ पहुचने को कहा गया था, ये समथर चलते वक्त भील पालो को अधिकारियो के विरुद्ध सैनिक कार्यवाही के लिये तैयार रहने को कह गए । 30 अक्टूबर 1913 को पुलिस थानेदार ने दो सिपाहियों को यह देखने के लिये कि वहा क्या हो रहा है, मानगढ भेजा। इन सिपाहियो को भीलो ने पकड लिया। इनमें से एक सिपाही को मार डाला गया व दूसरे को बुरी तरह पीटा गया और वदी बना लिया गया ।3 1 नवम्बर को युछ भीनो ने प्रतापगट के सूथ क्लेि पर भी प्रायमरण क्यिा, किन्तु असफल होरर लौट आए 11 नीलो पी इस पार्यवाही ने सू थ, वासवाडा, डूगरपुर और ईडर राज्य को चोरना 142 ] कर दिया। उन्होने ए जी जी से प्रार्थना की कि गोविन्द गुरु को गिरफ्तार किया जाय और भीलो के इस हिंसक संगठन को समाप्त किया जाय । 6 से 10 नवम्बर 1913 के बीच दो कम्पनी मेवाड़ भील कोर, एक कम्पनी 104 बैलेजली राइफल्स, एक कम्पनी राजपूत रेजीमेट और एक कम्पनी जाट रेजीमेट मानगढ पहाडी पर भीलो को तितर बितर करने के लिये पहुच गई 165 8 नवम्बर को फौजी पलटनो ने मानगढ की पहाडियो पर अन्धाधुध गोलियो की बौछार शुरु कर दी । सैनिको ने मानगढ की पहाडो को चारो ओर से घेर लिया और चारो ओर से गोलिया वरसाई जाने लगी। करीब 1500 भील मारे गए और उनके नेता गोविन्द गुरु को गिरफ्तार कर लिया गया। उन्हे अहमदावाद की जेत मे भेज दिया गया और इस प्रकार भीलो के आन्दोलन को निर्दयतापूर्वक कुचल दिया गया । । गोविन्द गुरु पर मुकदमा चलाया गया और उहे फासी की सजा सुनाई गई, जिसे बाद मे 20 वप की सजा में परिवर्तित कर दिया गया। गोविद गुरु की लोकप्रियता को देखते हुए इसे 10 वर्ष के कठोर कारावास मे परिवर्तित कर दिया गया 18 सन् 1930 मे उन्हे इस शर्त पर रिहा कर दिया गया कि वे सूथ, डूगरपुर, बासवाडा, कुशलगढ एव ईडर राज्य की सीमानो मे प्रवेश नही करेंगे। भीलो का गोविन्द गुरु के नेतृत्व मे आन्दोलन असफल रहा, किंतु इसके महत्व को कम करके नही पाका जा सकता। इसके परिणाम दूरगामी सिद्ध हुए। इस आदोलन ने भीलो मे चेतना जागृत कर दी और उहे अपने अधिकारो के प्रति सजग कर दिया। इस आदोलन ने न केवल भीलों में वरन् दक्षिण राजस्थान के दूसरे समाज के लोगो मे भो चेतना उत्पन्न कर दी। इससे कृपक आदोलन राजस्थान मे स्वतनता आदोलन को काफी प्रोत्साहन मिला। आन्दोलन के तुरन्त पश्चात् अग्रेज अधिकारियो ने राजस्थान, मध्य प्रदेश व गुजरात के भीलो की दशा के बारे में काफी पूछताछ की। उन्होंने कुछ हद तक उनके जगल के अधिकारो को स्वीकार कर लिया। उनके लिये जाने वाले भू-राजस्व, ताग-बाग तथा वैगार में भी कमी की गई। इस प्रकार यह भादोलन भीलो की मुक्ति का प्रतीक बन गया।
[ 143 परवतों भील पान्दोलन 1917 मे मेवाड के बिजोलिया आन्दोलन से प्रेरित होकर भीलो ने पुन आन्दोलन प्रारम्भ कर दिया। इस समय गरासियो ने भी भीलो का साथ दिया। गरासिया एक वनवासी जाति है, जो उदयपुर, डूगरपुर, सिरोही राज्यो मे बसी है। ये मुख्यत अरावली की पहाडियो मे रहते हैं । सामाजिक दृष्टि से यह जाति भीलो के समान है। इनकी ज्यादा सरया सिरोही जिला के आबू रोड व पिण्डवाड तहसीलो मे है। प्राचीनकाल मे यह एक शासकीय जाति थी, जिसे विजेतानो ने उनसे राज्य लेकर उन्हे जीविका के लिये ग्रास के लिये कुछ भूमि दे दी। इसी से ये गिरासिने कहलाने लगे। ये पहले मुख्यत मेवाड मे बसे थे। उससे परे सिरोही मे, जव सिरोही का यह भाग मेवाड मे ही था। इनके गोत्र भी राजपूतो की भाति परमार, चौहान, राठौड आदि है, जिससे यह अनुमान किया जाता है कि ये राजपूतो की भील स्त्रियो से उत्पन है। इनका मुरय पेशा कृपि है, लेकिन आर्थिक दृष्टि से हीन है। अत जगली उत्पादनो-गोद, शहद, वास प्रादि को इकट्ठा कर काम चलाते है। ये लकडी का कोयला भी । बनाते है। इस जाति ने भी भीलो का साथ दिया और दोनो ने जागीरदार द्वारा दमनकारी साधन अपनाने का विरोध क्यिा । उन्होने जागीरदार द्वारा बेगार अत्याधिक लगान और अवैध लाग बाग लगाने का बी विरोध किया। कृपको ने 1917 मे महाराणा से भारी कर व वेगार के विरुद्ध अपील की। महाराणा ने स्थिति की जाच करके और यह जान कर कि कर वास्तव में ही बहुत अधिक है, 16 नवम्बर 1918 को निम्न निर्णय लिये -70 1 कुल उत्पादन का 1/5 भाग कू ता के रूप मे लिया जायेगा। 2 गृहकर हर दूसरे वर्ष आसामी को देना होगा। कुल राशि गाव के मुखिया की सलाह से तय की जायेगी। यह जिन्स या नक्द दोनो मे दी जा सकेगी। 3 पेटिया कर नी नकद (रुपया) कूता के ममय ही देना होगा। 4 कूता मुखिया की सलाह से तय किया जाएगा और मू कडी लाग के समय ही वसूल किया जाएगा। 5 वेगार के विरद्ध शिकायत पेश होने पर जाच की जाएगी । कुछ कारणो से भील और गरासियो, दोनो ने ही महाराणा के निर्णय को अस्वीकार कर दिया। खेरवाडा के पोलिटिक्ल अधीक्षक एव मेवाड के अग्रेजी रेजीडेंट के प्रयास भी भीलो को समझाने में असफल रहे और पहाडी 144 ] जागीर के क्षेत्रो में गडवडी और अव्यवस्था बनी हो रही 11 वाद मे ये आदोलन मेवाड के समस्त भील क्षेत्र मे फैल गए। मई 1921 मे भील भी मेवाड राज्य के प्रय कृपको के साथ मिल गए और उसे दुस-दर्द लेकन महाराणा के माथ उपस्थित हुए। उनके दुसरे कारण वेगार, अनेक लागो, भारी कर, करो मे भेदभाव और जागीरदारो का तानाशाह का रवैय्या था। महाराणा से सतोपजनक उत्तर प्राप्त न होने पर सा नसा भूमि पर रहने वाले भोलो ने झाडोल, कोलियारी, मगरा और मेवाड के अय भील गावो में सदेश भेजे कि वे तब तक भू राजस्व, लागें व वेगार न दें, जब तक कि उनके क्प्टा पा निवारण नहीं किया जाता। यह भी चेतावनी दी गई कि जो इन आदेशो की अवहेलना करेगा, उसे 12 वप के लिए जाति बाहर कर दिया जाएगा। मोतीलाल तेजायत के नेतृत्व मे भोल प्रादोलन 8 जुलाई 1921 को मेवाड को सालसा क्षेत्र के भीला की प्रेरणा से मादडी पट्टा के भीलो ने कर व लाग-बाग देने से इकार कर दिया । ३ इसी समय भीलो को मोतीलाल तेजावत का नेतृत्व प्राप्त हुअा, जिसने भीलो को किसी भी प्रकार का जागीरदारो को कर न देने का आह्वान किया। उनका यह आन्दोलन एकी आन्दोलन के नाम से विरयात है, क्योकि उन्होने सभी भील व अय जातियो को सगठित (एकी) करने का प्रयास किया था। यह प्रथम अवसर था कि समस्त भील मोतीलाल तेजावत के नेतृत्व मे राज्य और ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध उठ खडे हुए। भील उसे अपना मसीहा समझने लगे थे, जो उनकी मुक्ति के लिये अवतरित हुआ था। मोतीलाल तेजावत का ज म ईस्वी सन् 1887 (विक्रम संवत् 1944 को ज्येष्ठ शुक्ला 1) को कोलियारी नामक गाव, जिला उदयपुर मे ओसवाल परिवार मे हुआ । विवाह पूर्व वह झाडोल ठिकाने मे स्थानीय जागीरदार के यहा कामदार का काय करने लगे। इस नौकरी के दौरान ही उहे मेवाड महाराणा श्री फतहसिंह जी के दौरे मे जहाजपुर, नाहर मगरा, जयसमद आदि स्थानो पर जाने का मौका मिला। इस दौरे मे उहोने देखा कि जहा महाराणा का मुकाम होता था, वहा कई कोस चलकर उनका सामान घोडो, ऊटो, बैलो पर लाद कर लोग ले जाते थे, कि तु मजदूरी मे उन्हे चार पैसे भी नहीं चुकाए जाते थे। इसी प्रकार भील, गरासिए एव अय काश्तवार लोगो को कई दिन पहले पपडा जाता उनसे बेगार में काम लिया जाता था, किन्तु मजदूरी के नाम पर [ 145 एक पाई भी नही चुकाई जाती थी। यदि काय मे कुछ कमी रह जाती तो उन्हे बुरी तरह पीटा जाता । इस प्रकार का जुल्म उनसे देखा नहीं गया, अत झाडोल आकर उन्होने ठिकाने की नोकरी छोड दी और चित्तौड जिले में सर्वप्रथम मेवाड राज्य के जुल्मो के खिलाफ एकी आन्दोलन का श्री गणेश किया। मोतीलाल की सलाह से भीलो ने कर देने से इन्कार कर दिया। 13 जुलाई 1921 को जवास के कामदार ने गाव के गमती से कर उगाने के लिये सिपाही भेजे, किन्तु उन्होंने तब तक कर देने से इन्कार कर दिया जब तक कि खालसा भूमि के भीलो के क्प्ट महाराणा सुन नही लेते 14 डू गरपुर के महारावल ने यह सोच कर कि कही आदोलन उनके राज्य मे भी न फैल जाए, जुलाई 1921 को सभी प्रकार की वेगार हटा दी। जुलाई 1921 के प्रथम सप्ताह मे ही मेवाड के महाराणा ने भी भीलो तथा सालसा भूमि के अन्य कृषको के लिये कुछ रियायते घोपित की। अत मेवाड के खालसा गावो मे तो आन्दोलन नही फला, किन्तु जागीरदारो ने किसी भी प्रकार की रियायत कृषको को नही दी थी, इसलिये यह आन्दोलन कोलियारी, झाडोल मादडी आदि जागीरो मे फैल गया । 19 अगस्त 1921 के झाडोल के ठाकुर ने मोतीलाल को भीलो को भडकाने तथा उन्हे कर व वेगार न करने देने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया। किन्तु शीघ्र ही पट्टा, जवास, पहाडा मादडी आदि 65 गावो से करीब 7 हजार भील एकत्रित हो गए और उहोने मोतीलाल को छुडवा लिया। इससे प्रोत्साहित होकर मोतीलाल ने भीलो को सगठित किया और उन्हे जागीरदार को प्रव और अधिक राजस्व व लाग न देने के लिये ममझाया। इस प्रकार सितम्बर 1921 तक उनका प्रभाव समस्त भूमट क्षेत्र में फैल गया। मोतीलाल तेजावत ने भील प्रतिनिधियो के साथ उदयपुर महकमा साम को उनके मुरय क्प्ट वताए। ये राजकीय क्मचारियो के भ्रष्टाचार, वर्तमान राजस्व नीति, बेगार, सुअरा के सेत चर जाने आदि के बारे में थे। महामा खास ने राजस्व के बारे मे शीघ्र समझौता कराने तथा सुअरो को नष्ट करने के बारे मे आश्वासन दिया। 8 नवम्बर 1921 मे जूडा जागीर के किसानो ने भी राजस्व कर देने से इकार पर दिया। भील पिसानो ने बिना पा के सुपरी यो मार दिया तथा भारक्षित वन मे अपने पशु चराने लगे।' मादडी जागीर के भील किमानो ने अपने कप्टो का विवरण लिपपर मादडी के रावत पो 1921 मे दिया, किन्तु अधिकारियों ने उनके पप्टो पर कोई ध्यान नहीं दिया, 146 अत आन्दोलन चलता रहा। दिसम्बर 1921 तक भील आन्दोलन मेवाड की सीमानो से ईडर राज्य तक फैल गया 10 मेवाड राज्य के भीलो ने जागीरदार को किसी भी प्रकार की वेगार, बरार तथा भू-राजस्व नहीं दिया। दिसम्बर 1921 मे पुनर्वा के राणा, जूडा तथा अोधना के राव ने मेवाड के रेजीडेट से मोतीलाल को तुरन्त ही गिरफ्तार करने की प्राथना की 11 मोतीलाल का भील क्षेत्र मे प्रभाव उल्लेखनीय था। भीलो का यह विश्वास था कि मोतीलाल गाधी वावा का पवित्र दूत है। दिसम्बर 1921 मे मोतीलाल की सलाह से भील मुखियो ने कोटडा के सहायक पोलिटिकल अधीक्षक को निम्न अर्जी दी।" "हम पचो ने सर्व सम्मति से निणय लिया है कि रवी फसल पर कर एक रुपये में चार पाने और खरीफ पर 15 सेर मक्का देंगे और किसी भी प्रकार की बेगार नहीं करेंगे।" जब झाडोल जागीर के अधिकारी लगान एकत्रित कर रहे थे, मोतीलाल 200 भीलो के साथ वहा पहुच गए। उन्होने तीन अधिकारियो को पीटा और जो राजस्व उहोने एकनित किया था, उसे छीन लिया। मोतीलाल तेजावत के बढ़ते प्रभाव को देख कर मेवाड महाराणा ने कोटडा तथा खेरवाडा भूमट में 50 से अधिक भीलो के एकत्रित होने पर प्रतिबंध लगा दिया, साथ ही मोतीलाल की गिरफ्तारी पर 500/- का इनाम घोपित कर दिया। जनवरी 1922 को मोतीलाल तेजावत सिरोही राज्य चले गए। उनकी अनुपस्थिति मे नए बेगार व सरबराह नियम जवास, थाना पहाडा, मादडी आदि जागीर मे लागू किए गए। कुछ लागो मे भी कमी की गई और साथ ही बेगार मे भी ढील दी गई। मेवाड मे ग्वालसा भूमि पर 20 से 25 प्रतिशत रियायता की घोपणा की गई और वहा भी बेगार मे ढील दी गई। धीरे धीरे सिरोही के भीलो व गरासियों में भी अस तोप फैल गया। मोतीलात तेजावत 1 जनवरी 1922 मे सिरोही जिले में पाए। वे 12 से 20 जनवरी तक वहा ठहरे और उहोने भोलो और गरासियो की अनेक समानो को सबोधित पिया। उहोने भीलो और गरासियो को कोई भी कर या वेगार राज्य को तव नक न देने को कहा जब तक कि उन पर से करो व वेगार का भारी बोझ कम न किया जाय। मोतीलाल ने उनसे देवी भवानी की शपथ लेकर एकी बनाए रखने को कहा । भीलो ने यह भी शपथ ली कि यदि राज्य उनकी मागे स्वीकार नहीं करता तो वे सघप जारी रखेंग। 24 जनवरी 1922 को भीलो और गरासियो ने तिल की सारी फमल बिना लगान दिए हटा ली।
[147 उन्होने आबू से अबाजी जाने वाली सडक की रखवाली करना भी बद कर दिया जिसकी पूर्व मे वे यानियो की सुरक्षा के लिये करते थे। गरासियो ने मुगथला के थाने को तोड़ दिया और राजस्व अधिकारी के घर को भी लूट लिया। उन्होने उन मालियो की फसल को भी नुकसान पहुँचाया जिन्होने राज्य को लगान दिया था। उन्होने उन लोगो को भी डराया व धमकाया जो राज्य की सेना के लिये ईधन लाते थे तथा वेगार करते थे।85 परिस्थितियो को देखते हुए सिरोही राज्य के मुख्यमत्री ने राज्य के अन्दर सार्वजनिक सभाए करना निपिद्ध कर दिया किन्तु भील और गरासियो ने इसकी उपेक्षा की। और दूसरे राज्य (मारवाड) के भील और गरासियो को भी सगठित करने की शपथ ली। उन्होने हासील न देने तथा वेगार न करने का भी निणय लिया।87 फरवरी माह के प्रारम्भ मे मोतीलाल पुन सिरोही आये । इस समय तक वे काफी प्रसिद्धि पा चुके थे और मेवाड के गाधी नाम से लोकप्रिय हो गए। वे करीव चार हजार भीलो के साथ सिरोही पाये और राज्य के अनेक भील मुसियामओ से मिले उहोने भीलो व गरासियो से पुन एक रपये मे चार पाना तथा 5 मन अनाज प्रति वुवाई से अधिक राज्य को देने से मना किया 188 स्थिति को बिगडते देख सिरोही के मुख्यमत्री ने विजयसिंह पथिक, अध्यक्ष, राजस्थान सेवा संघ, अजमेर की सहायता मागी। 12 फरवरी 1922 को करीब 15 हजार कृपव, गोपेश्वर में एकत्रित हुए। विजयसिंह पथिय व मुख्यमत्री ने उन्हे समझाने का प्रयास किया। साथ ही उनके कप्टा या निवारण करने का भी आश्वासन दिया कि तु समस्या सुलझी नही और भील व गरासिये निरन्तर राज्य के प्रादेशो का उल्लघन करते रहे। 23 माच 1922 यो रोहीडा के तहसीलदार ने सूचना भेजी वि भील अपने खेतो से बिना राज्य को हासील दिए सारी पसल ले गए हैं । अगले ही दिन प्रावूरोड के मजिस्ट्रेट ने सूचना दी वि चदेला, गिरवर और प्रामपास के गाव के गरासिये सरसो और चने की फ्मल विना हासील दिए ले गये हैं। ऐमी स्थिति में सिरोही के मुग्यमत्री ने राज्य की सेना को भीलो के गाव भेजने या निर्णय किया पितु इसमे पूब मिरोही राज्य की सरपार ने सियावा ये मुखिया व अय गरामियो के गाव के मुखिया से बातचीत करने का प्रयास किया वितु उनका प्रयास विपन रहा । 12 अप्रेल 1922 को मियावा पर सिरोही राज्य की सेना व मेवाड भील कोर ने 148 ] आक्रमण किया जिसमे तीन गरासिये मारे गए व एक बुरी तरह घायल हुआ। 40 गरासियो के घर व वडी मात्रा मे एकत्रित किए गए चने जला दिए गए। इस कार्यवाही के पश्चात् सातपुर तहसील मे कुछ शाति स्थापित हो गई किन्तु पिण्डवाडा, भाकर, रोहिडा के परगने मे स्थिति विल्कुल नहीं सुधरी। यह प्रतीत होने लगा कि रोहिडा तहसील के वालोरिया, भूला, नया वास आदि गाव भी विद्रोह की मुद्रा अपना चुके है। उन्होने रवी और सरीफ फसल मे से राज्य का भाग देने से इन्कार कर दिया। सिरोही के मुरयमनी ने तहसीलदार से भीला व गरासिया को समझाने का कहा मितु वह असफल रहा । तव सिरोही राज्य की सेना व मेवाड भील कोर ने वालोरिया गाव मे सैनिक कायवाही की। गाव का अधिकाश भाग जला दिया गया व 11 भील और गरासिए मार डाले गए91 राज्य मे भूला और नयावास के मुखिया तथा गाववासियो को यह चेतावनी दी कि यदि वे एकी खत्म नहीं करते है तथा राजस्व सदा की तरह नहीं देते हैं तो उनके गाव को जला दिया जायेगा किन्तु गाव के लोगो ने उत्तर दिया कि न तो वे एकी तोडेंगे और नहीं जितना राजस्व उन्होने तय किया है, उससे एक पाई भी अधिक राजस्व देगे। उनके इस जवाव पर राज्य ने उनके विरुद्ध 13 मई 1922 को सैनिक कार्यवाही की तथा गाव के अधिकाश झोपडे जला दिए गए।" राजस्थान सेवा संघ ने इसे गम्भीर घटना माना और उसन रामनारायण चौधरी तथा सत्यभक्त को घटना की जाच पडताल करने तथा रिपोट देने को कहा । उहोने अपनी रिपोट 'सिरोही राज्य में दूसरी भील दुघटना' के नाम से प्रकाशित की जिसमे उन्होने भूला और वालोरिया गाव के नुकसान का आकलन किया। राजस्थान सेवा संघ को रिपोर्ट के अनुसार 640 भीलो के घर रास कर दिए गए। 29 भील मारे गए व अनेक घायल हुए । लगभग 90 हजार की सम्पत्ति या तो लूट ली गई या जला दी गई। रामनारायण चौधरी ने लिखा कि भील और गरासियो का क्सूर सिर्फ इतना था कि उहोने सरकारी लगान तब तक न देने को कहा जब तक उन पर से गैर कानूनी बेगार व अय कर न हटा लिए जाय। संघ की सूचना को सही माना जाय तो 325 परिवार के 1800 स्त्री पुरप मारे गये थे, 640 घर या तो जला दिए गए या भूमिसात कर दिए गए थे, संकडो मन अनाज नष्ट कर दिया गया था, 600 गाडिया नष्ट पर दी गई 100 पशु या तो मार दिए गए थे अथवा साथ में ले जाये गए थे और क्रोव 149 96 हजार रुपये की सम्पति नष्ट कर दी गई थी भील-दुर्घटना ने लोगो को जागरुक बना दिया और उन्हे अनेक राजनीतिक, अधिकारों के सारे मे जगा दिया। राज्य की इस कार्यवाही से डर कर भूला, नयावास, बालोरिया और आस-पास के गांवो के मुखिया राज्य के मुख्यमनी से मिले और उनकी उपस्थिति मे एको तोडने की प्राथना की। एकी सरकार को आश्वस्त करने के लिये तोडी गई कि वे भविष्य में राज्य के विरुद्ध कोई कार्यवाही नही करेंगे। सिरोही के महाराव स्वय रोहिडा गए और भूला, वालोरिया, नयावास के कृपको मे स्वय मिले, उनके कप्ट सुने तथा उहे कुछ रियायतें प्रदान की जिसमे मुख्य इस प्रकार है । 1 सभी विद्रोहियो को आम माफी प्रदान की गई। 2 उन कृपको को लगान चुकाने से मुक्त कर दिया गया जिनके घर जल गये थे। 3 खरीफ फसल का लगान उन नावालिग पुत्रो से नही वसूल किया जायेगा जिनके पिता मारे गए थे। 4 खरीफ फसल पर अलग से सूकडी लाग वसूल नही की जायेगी। 5 स्वय की झोपडिया बनाने के लिये भीलो और गरासियो को जगल से लकडी व घास लाने की अनुमति दी गई। 6 चार व्यक्तियो की एक समिति बनाई गई जिसमे एक भील, एक गरासिया एक महाजन व एक ब्राह्मण नियुक्त किया गया जो कि चोरी गए पशुयो के बारे में विचार करते थे। इस प्रकार भीलो और गरासियो द्वारा प्रारभ किया गया आदोलन कुछ समय के लिये दव गया। मोतीलाल तेजावत ने यह जानकर कि भील और गरासियो की एकता कमजोर पड़ गई है, 1923 मे पोसीना और सिरोही के भीलो व गरासियो मे नया एकी आदोलन प्रारभ किया। उन्हाने आदोलन का नेतृत्व देलवाडा के निकट छोछर से किया ऐसा प्रतीत होता है कि पोसीना के मुखिया ने ईडर राज्य के प्रजामडल से सम्पर्क किया। ईडर प्रजामडल भी भील आदोलन में रुचि रखने लगा और इसने भीलो यो प्रजामडल का सदस्य बनने के लिये समझाया। इस विषय मे वे मोतीलाल की सेवाए भी लेना चाहते थे 126 उनको इस कायवाही ने देशी रियासतो व ब्रिटिश सरकार को नाराज कर दिया। महीकाठा के पोलिटिकल एजेंट, मेवाड महाराणा तथा वबई राज्य की पुलिम 150 ] । उन्हे गिरफ्तार करने का प्रयास करने लगी, जबकि मोतीलाल का यह कहना था कि उसने कोई अपराध नही किया है। वह तो केवल भीलो के सामाजिक और धार्मिक उत्थान के लिये काय कर रहा है। राज्य कमचारी स्वय भ्रष्ट है, इसलिये वे उन्हें गिरफ्तार करना चाहते हैं। उन्होने ए जी जी से प्राथना की कि उन्हे सत्याग्रह आश्रम जाने दिया जाय। किंतु बबई और ईडर सरकार ने इस वात का कडा विरोध किया कि तेजावत को स्वतनता पूर्वक घूमने दिया जाय। अत उनकी गिरफ्तारी के वारट जारी कर दिए गए और ईडर के खेडब्रह्मा ब्रह्माजी के मदिर से उन्हें गिरफ्तार कर लिया जहा वह भीलो की एक सभा को सबोधित कर रहे थे । उसे मेवाड राज्य के सुपर्द कर दिया गया। (जुलाई 1929) मेवाड राज्य ने उसे केद्रीय कारागार मे 9 वप तक विना किसी यायिक जाच व विना किसी अभियोग के गिरफ्तार रखा । उहे छुडाने के कई प्रयास किए गए किंतु कोई फल नही निकला। 3 नवम्बर 1935 को मोतीलाल तेजावत को छुडाने के पुन प्रयास शुरू किए गए। मणीलाल कोठारी, महाराणा मेवाड व रेजीडेंट कनल बथम से मिले व मोतीलाल को छुडाने की प्राथना की100 किंतु मेवाड राज्य उहे विना शर्त रिहा करने को तैयार नहीं था। राज्य चाहता था कि मोतीलाल वचन दे कि वे किसी भी राज्य विरोधी गतिविधियो मे भाग नही लेंगे, महाराणा की अनुमति के बिना मेवाड राज्य नही छोडेगे। । .
[ 151 4 यदि राज्य उन्ह कोई नौकरी प्रदान करता है तो वे उसे स्वीकार करेंगे। 5 उहे उन लोगो के विरद्ध मुकदमा चलाने की अनुमति दी जाय जिहो उन पर झूठे आरोप लगाए हैं । 25 अप्रेल 1936 को मोतीलाल तेजावत वो केन्द्रीय कारागार से रिहा कर दिया गया। जेल अधीक्षक ने उन्ह ये प्रमाण पत्र प्रदान किया कि वे 6 अगस्त 1929 से 23 अप्रेल 1936 तक राजनीतिक बदी थे तथा जेल मे उनका व्यवहार एव चरिम सतोपजनक था 1103 1942 में भारत छोडो आदोलन के दौरान उन्ह पुन गिरफ्तार कर लिया गया । करीब डेढ वर्ष तक उन्हें जेल में बंद रखा गया। 1946 मे मोतीलाल ने महानिरीक्षक यो मूचित किया कि भीलो मे गौवध और चोरी की घटनाए बहुत बढ़ गई है इसलिये वे उनके मध्य रना चाहते है और उनका हृदय परिवर्तन करना चाहते हैं वितु मेवाड पुलिम ने उन्ह उदयपुर छोडने की अनुमति नहीं दी तथा वाद मे उहे गिरफ्तार कर लिया०1 1 3 फरवरी 1947 को उन्ह पुन रिहा किया गया। उदयपुर की जनता ने उनका भावभीना स्वागत किया ।105 वनवासी सेवा संघ - भारत में ब्रिटिश राज्य की स्थापना के साथ ही ईसाई संगठन के पादरी भी पा गए थे । उहोने वासवाडा, डूगरपुर, सिरोही आदि राज्यो मे जहा भीलो को सख्या अधिक थी, गिर्जाघर स्थापित किए तथा उन लोगो के मध्य काय करना प्रारम्भ किया जो बहुत गरीब व पिछडे हुए थे । उहोने भीलो की अकाल व प्राकृतिक दुर्घटनाओ के समय नक्द व जिम मे सहायता करनी प्रारम्भ की और सरलता से उनका धर्म परिवर्तन करना प्रारम्भ किया। धम प्रसार के लिये जगह-जगह गिरजाघर व स्कूल सोले गए । उनकी इन कायवाहियो से जनता में असतोप पैदा होने लगा । परिणाम स्वरूप ए जी जी ने धर्म परिवर्तन की पादरियो की कार्यवाही को बद कर दिया 1106 दूसरा मुख्य सगठन वनवासी सेवा संघ या। इसकी स्थापना मुख्यत भीलो के कल्याण के लिये की गई थी ताकि उनमे सामाजिक और राजनीति चेतना जागृत हो । सघ अपने उद्देश्य और कार्यकलापो मे सफल रहा। बडी मस्या मे भीलो ने मदिरापान और अफीम न खाने की सौगध खाई107 1 1940 मे "पर के वनवासी सेवा संघ ने एक प्रदशनी आयोजित की जिसमे अनेर भील 150 ] उन्हे गिरफ्तार करने का प्रयास करने लगी, जबकि मोतीलाल का यह कहना था कि उसने कोई अपराध नही किया है। वह तो केवल भीलो के सामाजिक और धार्मिक उत्थान के लिये काय कर रहा है। राज्य कर्मचारी म्वय भ्रष्ट है, इसलिये वे उन्हें गिरफ्तार करना चाहते हैं। उन्होने ए जी जी से प्राथना की कि उन्हे सत्याग्रह आश्रम जाने दिया जाय । किंतु बबई और ईडर मरकार ने इस बात का कडा विरोध किया कि तेजावत को स्वतनता पूर्वक घूमने दिया जाय। अत उनकी गिरफ्तारी के वारट जारी कर दिए गए और ईडर के खेडब्रह्मा ब्रह्माजी के मदिर से उहे गिरफ्तार कर लिया जहा वह भीलो की एक सभा को सबोधित कर रहे थे। उसे मेवाड राज्य के सुपर्द कर दिया गया। (जुलाई 1929) मेवाड राज्य ने उसे केन्द्रीय कारागार में 9 वप तक बिना किसी यायिक जाच व विना किसी अभियोग के गिरफ्तार रखा । उन्हे छुडाने के कई प्रयास किए गए किंतु कोई फल नहीं निकला। 3 नवम्बर 1935 को मोतीलाल तेजावत को छुडाने के पुन प्रयास शुरू किए गए । मणीलाल कोठारी, महाराणा मेवाड व रेजीडेंट कनल वैथम से मिले व मोतीलाल को छुडाने की प्राथना की100 किंतु मेवाड राज्य उन्ह बिना शर्त रिहा करने को तैयार नहीं था। राज्य चाहता था कि मोतीलाल वचन दे कि वे किसी भी राज्य विरोधी गतिविधियो मे भाग नहीं लेगे, महाराणा की अनुमति के बिना मेवाड राज्य नहीं छोड़ेंगे। मणिलाल कोठारी मोतीलाल से मिले व उहे महाराणा की शर्तों के बारे मे बताया। मोतीलाल ने सशत रिहा होने से इकार कर दिया। मेवाड राज्य सरकार ने पुन उन्हे सशर्त रिहा करने की ही शत रखी, तब मोतीलाल ने भी अपनी दो शर्ते राज्य के सामने रखी 1 यह प्रमाणित किया जाय कि वो किसी अपराध के लिये दोपी नहीं है। 2 उन्हे उन लोगो के विरुद्ध मुक्दमा चलाने का अधिकार होगा जिहोने उनके विरुद्ध पडयन्त्र रचा और उन्हे बदनाम करने की साजिश की101 । राज्य सरकार ने उनकी यह मार्ग स्वीकार कर ली और मोतीलाल ने भी यह लिख कर दिया कि 103.--- 1 वो राज्य की अनुमति के विना मेवाड नही छोडेगे। 2 उहोने राज्य के विरद्ध कुछ नही किया है और नहीं वे आगे ऐसा करेंगे। 3 उन्ह यह प्रमाण पत्र दिया जाय कि वे निर्दोप थे और जेल में उनका चरित्र अच्छा रहा।
[ 151 4 यदि राज्य उन्हें कोई नौकरी प्रदान करता है तो वे उसे स्वीकार करेगे। 5 उन्हे उन लोगो के विरुद्ध मुकदमा चलाने की अनुमति दी जाय जि होने उन पर झूठे आरोप लगाए हैं । 25 अप्रेल 1936 को मोतीलाल तेजावत को केन्द्रीय कारागार से रिहा कर दिया गया। जेल अधीक्षक ने उहे ये प्रमाण पत्र प्रदान किया कि वे 6 अगस्त 1929 से 23 अप्रैल 1936 तक राजनीतिक बदी थे तथा जेल मे उनका व्यवहार एव चरित्र सतोपजनक था।103 1942 में भारत छोडो आदोलन के दौरान उह पुन गिरफ्तार कर लिया गया । करीव डेढ वर्ष तक उहे जेल मे बद रखा गया। 1946 मे मोतीलाल ने महानिरीक्षा को सूचित किया कि भीलो मे गौवध और चोरी की घटनाए बहुत बढ़ गई है इसलिये वे उनके मध्य रहना चाहते हैं और उनका हृदय परिवतन करना चाहते है किन्तु मेवाड पुलिस ने उन्हे उदयपुर छोडने की अनुमति नहीं दी तथा बाद में उन्हें गिरफ्तार कर लिया04 1 3 फरवरी 1947 को उन्हे पुन रिहा किया गया। उदयपुर की जनता ने उनका भावभीना स्वागत किया 1105 वनवासी सेवा सघ भारत मे ब्रिटिश राज्य की स्थापना के साथ ही ईसाई सगठन के पादरी भी पा गए थे । उहोने वासवाडा, डूगरपुर, सिरोही आदि राज्यो मे जहा भीलो की सरया अधिक थी, गिर्जाघर स्थापित किए तथा उन लोगो के मध्य कार्य करना प्रारम्भ किया जो बहुत गरीब व पिछडे हुए थे। उन्होने भीलो की अकाल व प्राकृतिक दुर्घटनाग्रो के समय नक्द व जिन्स मे सहायता करनी प्रारम्भ की और सरलता से उनका धम परिवतन करना प्रारम्भ किया। धर्म प्रसार के लिये जगह-जगह गिरजाघर व स्कूल खोले गए । उनको इन कायवाहियो से जनता में असतोप पैदा होने लगा। परिणाम स्वरूप ए जी जी ने धम परिवतन की पादरियो की कायवाही को बद कर दिया 1106 दूसरा मुख्य सगठन वनवासी सेवा सघ था। इसकी स्थापना मुख्यत भीलो के कल्याण के लिये की गई थी ताकि उनमे सामाजिक और राजनीति चेतना जागृत हो। सघ अपने उद्देश्य और कायकलापो में सफल रहा। बडी संख्या में भीलो ने मदिरापान और अफीम न खाने की सौगध खाई107 1 1940 मे डूगरपुर के वनवासी सेवा संघ ने एक प्रदर्शनी प्रायोजित की जिसमे अनेक भील 152 ] लडके और लडकियो ने देश की सामाजिक और आर्थिक प्रगति की झाक्यिा प्रस्तुत की। - भील आदोलन-एक नजर भीलो मे जो चेतना गुरु गोविन्द व मोतीलाल तेजावत ने जगाई, उससे वे अपने अधिकारो के लिए वरावर सघर्ष करते रहे। भोलो की सम्पति लूटी व नष्ट की गई। उनकी, निमम हत्यायें की गई व उन्हे अनेको क्प्ट दिये गये । फिर भी वे घबराए नहीं। भारत के स्वतत्र होने तक उनमे नाममान की शिक्षा का प्रचार हुआ व उनको नाम मात्र के भूमि अधिकार मिले । इसी के फलस्वरूप उन्हे अभी तक वनवासी अनुसूचित जनजाति का माना जा रहा है । पिछले चालीस वर्षों में भी उनका कोई विशेष विकास नही हुआ है । यह देश का दुर्भाग्य ही है। टिप्परिणया- कुछ इतिहासकारा के अनुसार भीला की उत्पति द्रविड शब्द बील विल्लु या भील से हुई है जिसका अथ धनुप है और धनुप भीला का प्रमुख हथियार है । कुछ विद्वाना का अनुमान है कि यह सस्कृत शर है जिसका अथ है वेघना या मारना। इस किन राजपूताना गजेटियर, मेवाड रेसीडेंसी 1908 जिल्द द्वितीय ए 227 3 2 एथावन ट्राइस एड कास्ट ऑफ बोम्ब, वोल्यूम I मनु-सस्कृत टक्स्ट, वोल्यूम प्रथम, पृ 481 । 4 वदिक इडक्स II नि 5 राजपूताना गजेटियर, पेज 227 6 इस सदभ मे कनल टाड लिखते हैं कि किस प्रकार गुहा (सिसोदिया राजपूता का आदि पुरूप) न गुरात स्थित ईडर का राज्य भीलो मे ले लिया या । टाड एनाल्स एण्ड एटीक्वीटी आफ राजस्थान जिल्द I पेज 184 । 7 प्रतापगढ की पुरानी राजधानी। 8 मेवाड के कालियावास भील पाल म चुडल वध की घटना राजनतिक एव बदेशिक विभाग, जनवरी 1883 पृ 51-58 अ भारतीय राष्ट्रीय अभिलेखागार । चाल्स एचीशन-ट्रोटीज एगेजमैंट्स एण्ड सनद भाग III पृष्ठ 2 । 10 वही, भाग II पृष्ठ 6। 11 चाल्स एचीशन, ट्रीट्रीज, एगेजमेट एण्ड सनद भाग II, पृष्ठ 9। 12 वही भाग III, पृष्ठ 2 1 13 चाल्म मैटवाफ का पोलिटिकल एजेंट मेवाड के नाम पर 13 मई 18271 14 पौरन पोलिटिक्ल 8 जून 1827, 40 15 वही। 9 [ 153 16 डूगरपुर राज्य का सक्षिप्त इतिहास, पृ 108 1 17 फोरेन, 5 मई, 1826, पृ 1-4 । 18 वही। 19 वही। 20 पोरेन, 19 फरवरी 1827, पेज 17-18 1 21 ब्लंक का उत्तराधिकारी। 22 जे कोलक का पत्र, 5 जून 1828 । 23 सचिव, भारत सरकार का जे कोलवक को पत्र 8 अगस्त 1 828 । 24 मेवाड रजीडेंसी उदयपुर फाइल 1, 1827, जे ब्रुक सहायक पोलिटिक्ल एजेंट मेवाड का एस पी लोरेस, पोलिटिक्ल एजेट मेवाड को पत्र, 6 दिसम्बर 1856,561 25 ब्रक्स मेवाड का इतिहास, पृष्ठ 78 । 26 मेवाड प्रेसीज प्रथम भाग 10 परा 101 27 फौरेन कन्सलटेशन, 7 अगस्त 1837, 70 711 28 वही, 8 अगस्त 1838, 63 29 वहीं, 28 मई 1841, 44 45 । 30 फोरेन इटरनल ए, फरवरी 1904, 51-56 । 31 वहीं, 23 नवम्बर 1842, 17-191 32 राजपूताना म गवनर जनरल के एजेंट । 33 सदरलैंड का सचिव विदेश विभाग, भारत सरकार को पत्र, 12 नवम्बर 1843 (मुख्य प्रायुक्त, अजमेर मेवाड रिकाड) श्यामलदास, वीर विनोद, पृष्ठ 21921 35 मेवाड भीलकार के अधीक्षक एव काय वाहक पोलिटिकल अधीक्षक । 36 मेगर मैक्सन का मेवाड महाराणा शभूसिंह को 20 अप्रैल 1868 का पर बरशीखाना, उदयपुर । 37 वही। 38 श्यामलदास, वीर विनोद, पृष्ठ 2192 । 39 भारतीय राष्ट्रीय अभिलेखागार, विदेश विभाग, पालिटिक्ल अप्रोसीडिंग्स, 1881, व्रमाक 25-371 40 फोरेन एण्ड पोलिटिकन ए अप्रेत 1881, नम्बर 2539, एन ए माई । 41 वहीं, 1881, 313-34 1 42 श्यामलदास वीर विनोद, पृष्ठ 2220 27 । 43 फोरेन एण्ड पोलिटिकन ए, अगस्त 1881, पृष्ठ 31334 । 44 वही। 45 फोरेन पोलिटिक्ल प्रभप्रेल 1881,137791 46 श्यामलदास, वीर विनोद, पृष्ठ स 2220 271 34 1341 47 मेयरमा 18 On 18. श्रीपत्र, कोरा पामिरियम म पस 1881, AIR 13779, राष्ट्रीय पमिपमानार, गई मी। 48 पोरस, पालिटिमस प. मग 1581,31334 49 भारतीय राष्ट्रीय प्रभितगार .fir far विभाग, प्रामाटिग प्रम 1916, समर 3847, पृष्ट ।।। 50 यही। 51 (4) यहो, प्रामाणि, मरस 1914 TAIN 1822। (पा) जागो महर, राजपामारी रो पोदामा, 8।। 52 (4) गोप पत्रिरा, भाग १, मर गया 2014 (1951) पृष्ठ 67 । (पा) जागा मेहर, पापाटी uth, 1201 53 भारतीय राष्ट्रीय पभिमगागार, नई दिलो प-गिर गय रामगि विभाग, प्रासीहिरा माप 1914 मार 8, 29671 54 यही, इटरनम पासीटिग पप्रम 1916,rमार 38 47 । 55 पही। 56 यही पत्र सम्बर 3342, पाव, fir IT तिम्बर 1914। 57 भारतीय राष्ट्रीय पभिसागार पदगिर प राममि विभाग, इटरनरा प्रागोडिग माप 1914 प्रमाप 8671 56 यही पृष्ट 33 341 59 गुमनश जाशी, राजस्थान म स्यरातसा रामाम र सानी पृष्ठ 6 । 60 भार राभि प रा पिटरनल प्र प्रामीगि मगरा 1914 प्रमा 18 22, पृष्ठ 34। 61 पही प्रोसीटिंगरा, माघ 1914, अमार 867, पृष्ट 29 । 62 पही, भगस्त 1914 मार 18 522, पृष्ठ + । 63 इटरनल प्रोसीडिहग्स, यदेगिम एय राजनतिम विभाग, माच 1914, मान 8 67 1 64 वहीं, अगस्त 1914, प्रमांक 18-821 65 भा रा प्रमि इटरनल प्रासोडिम्स माग 1914 मार 8671 66 सुमनेश जोशी, राजस्थान ये स्वतत्रता सनानी पृष्ठ।। 67 (म) नवीनतम शोध स यह प्रकट होता है वि वरीय 3000 भील मार गए थे पौर यह हत्याराड जलियावाला बाग से किसी भी प्रकार यम नहीं था। (मा) जहरखा मेहर, राजस्थान म प्राजादी रोप्रादोलन, पृ 831 68 (म) भा रा भभि अप्रोसोहिग्स अगस्त 1914 प्रमा: d 221 (मा) जहरखा मेहर, मजुन पाळी ग्रास, पृ 1241 69 उदयपुर रेजीडेंसी जागीर रिवाड फाइल न 19 वन 60 1917, ए डी पार एस ए बी, 70 वही। 71 वहीं, वदेशिक एव राजनतिक विभाग फाइल न 1276 प्रथम । 72 26 जून 1921 का सेरवाडा मे पोलिटिकल सुप्रीटेडट का मवाड रेजीडट को पत्र, उदयपुर रेजीडट जागीर रिकाड प्राइल नम्बर 91 बस्ता नम्बर 65, 192 । 73 मादही के रावत की दिनार 6 जुलाई 1921 की पोलिटिकल सुप्रीटे डेंट खेरवाडा को रिपोट, उदयपुर रेजीडे सी जागीर रिवाड पाइल नम्बर 91 बस्ता न 65, 19211 [ 155 74 (म) कामदार जवास की दिनाक 13 जुलाई 1921 को पोलिटिकल सुप्रिटडट सेरवाडा को रिपाट उदयपुर रेजीडे सी जागीर रिकाड, फाइल नम्बर 91 वस्ता न 65, 1921 एच डी आर एस ए वी । (प्रा) जहूरखा मेहर, राजस्थानी ग आजादी रो मादालन, पृ 84 । 75 राजनतिक एव वैदेशिक विभाग, फाइल नम्बर 428 पी (गोपीनाथ) 1923 भा रा अभि । 76 मेवाड वकील की दिनार 25 अगस्त एव 27 अगस्त 1921 की पोलिटिकल सुप्रीडेट, सेरवाडा को रिपाट, उदयपुर जागीर रिकाड, फाइल न 91, बस्ता न 65, 19211 77 मादडी के रावत रणजीत सिंह का दिनाक 8 सितम्बर 1921 का पोलिटिकल सुप्रीटेंडेट सेरवाडा का पत्र, उदयपुर रेजीड सी जागीर रिकाड फाइल नम्बर 91 वस्ता नम्बर 65, 1921 । 78 31 अक्टूबर 1921 तक का पाक्षिक स्मरण पन क्रमाक 55, व रा विभाग फाइल न 428, (गोपनीय) 1921, भा रा अभि । 79 15 नवम्बर 1921 तक का पाक्षिक स्मरण पत्र न 56, व रा विभाग, फाइल न 428, (गोपनीय) 191, भा रा अभि । 80 ईडर राज्य मे महाराज कुमार का पोलिटिकल एजेट, महाकाठा का गोपनीय पत्र न 263 दिनाक 20 दिसम्बर 1921, उदयपुर रेजीड सी रिकाड, फाइल न 87, 1921-22 मार एस ए बी । 81 22 दिसम्बर 1921 का पानडवा के राणा जूडा तथा अोधना के राव का मेवाड रेजीडेट का पत्र उदयपुर रेजीडे सी जागीर रिकाड फाइल न 87, बम्ता न 65 सहायक पोलिटिकल अधीक्षक कोटडा का दिनाक 23 दिसम्बर 1921 का पोलिटिक्ल अधीक्षक खेरवाडा का पत्र, उदयपुर रेजीड सी जागीर रिकाड फाइल न 87, बस्ता न 65 1921 । 83 दिनाक 31 दिसम्बर 1921 अ मेवाड रजीडेंट का पोलिटिक्ल सुप्रीटेडट खेरवाडा को पत्र, उदयपुर रेजीडेंसी जागीर रिकाड, फाइल न 87, बस्ता न 65, 84 एजेंट गवनर जनरल राजपूताना का दिनाक 7 माच 1922 का मणिलाल काठारी को 1922 का पत्र गोपनीय रिकाड, फाइल नम्बर 125, क्रमाक 13, 1922 । 85 दिनाक 31 जनवरी 1922 का पाक्षिक ममोरडम प 61, युद्ध होम पौष्टिक डिपाटमेट, फाइल न 18, 1922 भा रा अभि सिरोही सदर आफिस रिकाड, फाइल न 367 1921-221 86 इश्तिहार न 250 दिनाक 28 जनवरी 1922 सिरोही सदर कार्यालय रिकाड, फाइल न 367, 1921-22 । 87 सिराही सदर कार्यालय रिकाड, फाइल न 367, 1921 22 । 88 पुलिस महानिरीक्षक श्री एम पार कोटावाला का दिनाक' 5 फरवरी 1922 को पोलिटिकल मेम्बर जोधपुर राज्य परिषद का गोपनीय पत्र, गोपनीय रिकाड फाइल न 106, 1922 1 1921-22 । 82 1921221 156 ] 89 23 माच 1922 का रोहीडा के तहसीलदार का मुख्यमत्री सिरोही को दिया गया तार, सिरोही सदर कार्यालय रिकाड फाइल न 367, 1921-22 । 90 मजिस्ट्रेट आबूरोड या दिनाप 24 माच, 1922 का मुख्यमत्री सिरोही को पत्र सिरोही सदर कार्यालय रिवाड फाइल न 367 1921-221 91 प्रेस विनप्ति शिमला, दिनाक 7 मई 1922 भारत मरवार, वैदेशिक एव राजनतिक विमाग, पाइल न 428 (गोपनीय) 1923 मा रा अभि । 92 भारत सरकार की 7 मई 1922 की प्रेस विज्ञप्ति, वैदेशिक एव राजनतिर विभाग, पाइल न 428, (गापनीय) 1923, मा रा अभि । 93 लोगों की मृत्यु के बारे मे भिन्न-भिन्न विचार हैं । प्रिचड के अनुसार 50 व्यक्ति मारे गए तथा 50 पायल हुए। दुभाग्यवश राजस्थान सेवा सप की रिपोट खो गई। 94 सिरोही के मुरयमत्री का 25 मई 1922 का पत्र (पत्र न 9840) का गवनर जनरल एजेंट राजपूताना या पत्र वदेशिव एव राजनतिक विभाग फाइल न 428 पी (गोपनीय) 1923, भा रा अभि । 95 खान बहादुर फ्रेमरोज एस मास्टर अध्यक्ष ईडर राज्य परिपद का 10 जून 1929 (पत्र न 821 या 1928 29 गोपनीय पत्र) महीकाठा के पोलिटिकल एजेट को, भा रा प्रमि । 96 मोतीलाल तेजावत के पास से गिरफ्तारी के समय मिला पत्र जिसमे दिनाक नहीं हैं फाइल न 276, 1929, वदशिक एव राजनतिक विभाग, भा रा अभि । 97 बम्बई सरकार का भारत सरकार को 7 जून 1925 का पत्र (पत्र न 29 बी) वदेशिक एव राजनतिक विभाग, फाइन न 185 पी 19251 98 ईडर राज्य परिषद के अध्यक्ष का 1928 29 का पत्र न 821 (गोपनीय) महीवाठा के पोलिटिक्ल एजेंट को पत्र भा रा अभि । 99 राजस्थान दिनार 18 नवम्बर 1955। 100 राजस्थान दिनाक 18 नवम्बर 19551 101 राजस्थान दिनाक 4 मई 19361 102 वही दिनाक 12 मई 1936 1 103 राजस्थान दिनाक 4 मई 1936 मोतीलाल की रिहाई मे डा सगनानी ने मध्यस्थ की भूमिका निभाई। 104 नव जीवन, दिनाक 18 फरवरी 19461 105 वही, 3 फरवरी 1948 । 106 वदेशिक एव राजनतिक, एजेंट गज के नोट फाइल नम्बर 233 पी (5) 19,6 भारा अभि । 107 केला, भगवानदास देशी राज्यो म शासन, अध्याय 47, पृष्ठ 382 83 1
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जहरखा मेहर जाम 20 जनवरी 1941, सिवाची गेट, जोधपुर प्रकाशित पुस्तकें राजस्थानी सस्कृति का चितराम (1981) घर मजला घर कोसां (1984) राजस्थान में प्राजादी रौपादोलन (1986) टाळवा निवध (1986) ऊजळ पस (1990) अर्जुन माळी पास (1990) राजस्थान म स्वत यता सपप (1991) राजस्थान के इतिहास, साहित्य एव सस्कृति मे सम्बन्धित दो सौ से भधिक निबध प्रकाशित । एक दजन से अधिक शोध जनलो, स्मारिकामो तथा अभिनदन ग्रथा का सम्पादन । एक सौ से अधिक वार्ताएँ विभिन्न प्राकाशवाणी के दो से प्रसारित । सम्मान पुरस्कार * महेद्र जाजोदिया पुरस्कार, 1981 राजस्थान रत्नाकर, नई दिल्ली * अकादमी पुरस्कार, 1981-82 राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर * राजस्थानी ग्रेजुएट्स नेशनल सर्विस एसो. शियेसन, बम्बई के रजत जयन्ती समारोह (30 नवम्बर, 1982) के अवसर पर भाव, भापा व कथ्य की दृष्टि से सवश्रेष्ठ लेखन पुरस्कार * पृथ्वीराज राठौड पुरस्कार 1982-83 राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर * रामेश्वर टॉटिया पुरस्कार, 1986 भारतीय भाषा परिपद, कलकत्ता * जिला प्रशासन, लायस क्लब, राटरी क्लब, युवा साहित्यकार परिपद आदि द्वारा सम्मानित-पुरस्कृत साहित्य अकादमी, नई दिल्ली, राजस्थानी भाषा, साहित्य एव सस्कृति अकादमी, बीकानेर (दो सत्र तक सदस्य), जगदीशसिंह गहलोत शोध सस्थान, अमृतम भारतीय विद्या शोघ सस्थान व अनेक ऐतिहासिक साहित्यिक सस्थामो की सदस्यता। सम्प्रति रीडर, इतिहास विभाग जोधपुर विश्वविद्यालय, जोधपुर