Library
Shri Saryu Pareen Brah Man Vanshawali
Front matter
वाराणसेयसंस्कृत विश्वविद्यालये कृतन्यायशास्त्राध्यापनेन काशीस्थ- शास्त्रार्थमहाविद्यालयप्रधानाचार्येण प्रायःपञ्चाशद्ग्रन्थनिर्मात्रा घटिकाशतकशतावधान-संस्कृताशुकविचक्रवर्तिशास्त्रार्थ- कलावतार-भारतप्रसिद्धअष्टोत्तरशतग्रन्थप्रणेत- सरयूपारीणशुक्ल स्व. पण्डितराजश्रीवेणी- माधवशास्त्रितनूजेन श्रीराजमारा- यण शुक्ल न सम्पादिता श्रीसरयूपारीणब्राह्मग.वंशावली [अंस्य पुस्तकस्य पुनर्मुद्रणादिसर्वाधिकारः प्रकाशन स्वायत्तीकृतः] साच वाराणसेय 'संस्कृत बुकडिपो'ध्यक्षवरेण्यः मास्टर खेलाडीलाल ऐण्ड सन्स महोदयः 'हितचिन्तक' जाग्नि मुद्रणागारे मुद्रापयित्वा प्रकाशिता तृतीयं संस्करणम् ] [ सन १९६२ ई०
प्रकाशक:
मास्टर खेलाडीलाल ऐण्ड सन्स,
संस्कृत बुकडिपो,
कचौड़ीगली, वाराणसी-१
मूल्यं साधारण संस्करणस्य १%२५
विशिष्ट संस्करणस्य १५०
"
Ascesefon No...150956
Shantarakshita Library
Thbatan Institute-Sarnath
के० कृ० पावगी,
हितचिन्तक प्रेस,
रामघाट. वाराणसी
.
समर्पणम् स्वतन्त्रसरयूपारीणब्राह्मणवंशावली के आद्यलेखक, मामखोर शुक्लवंशावतंस, घटिकाशतकशतावधान-संस्कृनाशुकवि- चक्रवत्ति-शास्त्रार्थजगत्प्रसिद्ध-अष्टोत्तरशतग्रन्थ- कर्ता-पण्डितराज-पूज्यपादपितृदेव स्वर्गीय- आचार्य वेणीमाधवशास्त्री जी की सेवा में- श्री गुरुदेव! आप की ही कल्पना को साधारण परिवत्तेन एवम् परिबर्द्धन के साथ श्रद्धाकुसुमाञ्जलि के रूप में समर्पित करता हूँ। आपने आजीवन सरयू. पारीणसमाज के जिस गौरव का परिबर्द्धन किया था सम्भवतः उसका यह पोषक हो। समपेक :- श्रीचरणाशीर्वादभाजन- राजनारायणशुक्ल, मीरघाट, वाराणसी - है श्रीः सम्पादकीय आदरणीय महानुभाव ! सरयूपारीणब्राह्मणवंशावली का तृतीय संस्करण आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहा हूँ, वास्तव में यह इतना बड़ा समाज है कि जिसके सम्बन्ध में कितना भी लिखा जाय परिपूर्ण नहीं कहा जा सकेगा। इसका गौरव तो इससे अधिक क्या होगा कि जिसकी शिष्यता मर्यादा- पुरुषोत्तम भगवान् श्री रामचन्द्र ने भी परम श्रद्धा से ग्रहण की। यह सरयू- पारीणसमाज कहीं से उठ कर नहीं आया है, अनादिवर्णव्यवस्थाकाल से ही उक्त द्विजातियों की यह ऐनिहासिक पवित्र भूमि है। महर्षि वशिष्ठ, गौतम जैसे त्रिकालज्ञों से लेकर आज तक इस समाज मे लोकख्यात महर्षि, सदाचारी, त्यागी, तपस्वी, जितेन्द्रिय, महाविद्वान् होते आ रहे । इस शताब्दी में ही मिश्रकुलोत्पन्न, पण्डिनकुलसूर्य-भारतगौरव-सर्व- तन्त्रस्वतन्त्र-महामहोपाध्याय प० शिवकुमारशास्त्रीजी महोदय को कौन नहीं जानता ? युग के महर्षि सरयूपारीणकुलभूषण-भारतराष्ट्रपति- पूजित-सर्वतन्त्रस्वतन्त्र-चरकावतार-वैद्य- म्राट् प० श्रीसत्यनारायण- शास्त्रीजी महानुभाव के समक्ष कौन तमस्तक नहीं होता ? सभी शास्त्रों के, वेदों के, भारतीय संस्कृति के एकमात्र नेतृत्व करने वाल, भयङ्कर नास्तिकता के दुदान्त समय में भी धर्म तथा विश्वकल्याण का झण्डा उठाने वाले महाविद्वान् त्यागतपोमूर्ति अनन्तश्रीविभूषित जगद्वन्ध स्वामि श्रीकरपात्रीजी महाराज जैसे महापुरुष भी इसी वंश के प्रद प हैं। सर्वलक्षणलक्षित ब्राह्मणत्व, विश्वविदितवैदुष्य तो इस समाज का सनातन आदर्श है। यह सरयूपारीण समाज किसी की शाखा उपशाखा नहीं अपितु सर्वथा स्वतन्त्र है। कुछ ईर्ष्यालु महाशयों ने इसके महत्त्व को घटाने की दृष्टि से यह प्रवाद उठाया कि यह कान्यकुब्जों का एक शाखा है। वस्तुतः ऐसी बात नहीं, यह सम्भव है कि कुछ कान्यकुब्ज आदि ब्राह्मण प्रतिष्ठा की आकाङ्क्षा से इस समाज में आकर मिल गये, वे मिले भी इस तरह कि अब उनका विभेदक नाममात्र का इतिहास नहीं मिलता। गर्ग, गौतम, शाण्डिल्य प्रभृति महर्षियों का मुख्य कुल यही है । स्थान की सङ्कीर्णता तथा वंशवृद्धि की परम्परा परम्परा से कुछ लोगों ने अन्य स्थानों में जाकर अपना क्षेत्र बनाया। परिणामतः आज भी छत्तीस गढ़ मध्यप्रदेश, विहार, बंग देश आदि में सरयूपारीण समाज ( ख ) प्रचुर रूप से मिलता है। कई स्थानों पर तो ऐसा देखा गया है कि सरयूपारीण ही अशिक्षावश दूसरों के बहकावे में आकर अपने को कान्यकुब्ज कहने लग गये हैं। स्थानीय साधारण रहन-सहन में अन्तर होते हुये भी मुख्य आचरणों में वे अब भी सरयूपारीणता का अभिमान रखते हैं। शास्त्रीय दृष्टि से यह वही देश है जहाँ के लिये 'कृष्णसारस्तु चरित मृगो यत्र स्वभावतः। स ज्ञेयो यज्ञियो देशः' मन्वादि महर्षियों का ऐसा मत है। हमारे इस समाज का प्रधान केन्द्र विद्या एवं तपस्या के नाते वाराणसी क्षेत्र ही रहा है। आधुनिक परम्परा में भी हमारे वंशजों ने अपना आदर्श स्थान बनाया है, उदाहरणार्थ भारतीयस्वतन्त्रता के वीर सेनानी, प्रसिद्ध साहित्यकार उत्तमत्रिपाठिकुलप्रसूत, शील- सौजन्यमूर्ति माननीय प० श्रीकमलापति त्रिपाठी, गृह-शिक्षा-सूचनादि- मन्त्री उत्तरप्रदेश तथा श्रीमान् प० कन्हैयालालजी मिश्र एडवोकेट जनरल महोदय, १० श्रीसुरतनारायणमणि त्रिपाठी आई. ए. एस. गोरखपुर महोदय का नाम उपस्थित किया जाता है। हमारे लिये यह साधारण गर्व की बात नहीं कि भगवान राम जैसे यजमान का याजन- सामर्थ्य, पाण्डित्य, पूज्यता आदि इसी सरयूपारीण समाज को उपलब्ध हुई। उस समय के अन्य ब्राह्मणों ने ईर्ष्यावश इस समाज के प्रति विविध उपद्रव किया अन्ततः ज्ञान प्राप्त कर चुप हुये। कुछ उनके मानस पुत्र आज भी शेष हैं जो कि 'सरयूपारीणों ने रावणहन्ता राम को यज्ञ कराया' अतः वे निकृष्ट हो गये.' इत्यादि कह कर अपना पेट भरते हैं, परन्तु सरयू- पारीण समाज के विद्वान् 'तुष्यतु दुर्जन' न्याय से इनकी बातों पर ध्यान नहीं देते। इस प्रकार की अशास्त्रीय तथा तर्कहीन बातों पर विज्ञ समाज स्वयं विचार करे कि निन्दकों की बातें कहाँ तक उचित हैं ? सरयूपारीणब्राह्मणवंशावली के दो संस्करण मेरे पूज्य स्व० पिता श्रीपण्डितराज वेणीमाधव शास्त्रीजी के संग्रहानुसार प्रकाशित हुए थे। परन्तु उन संस्करणों को लोगों ने इस तरह अपनाया कि आज फाइल के लिये भी मेरे पास तथा प्रकाशकों के पास कोई कापी शेष नहीं। प्रति दिन लोगों की माँगे आ रही हैं। यद्यपि इसे बहुत बड़े रूप से संगृहीत कर निकालने की बात थी, तथापि इस तृतीय संस्करण को जिस त्वरा में निकाल रहा हूँ उसमें यह सम्भव नहीं। अत: वह विचार तो चतुर्थ संस्करण में ही पूर्ण हो सकेगा।
सरयूपारीणब्राह्मणवंशावली। तत्र पूर्वं सामान्यरूपेण ब्राह्मणत्वविचारो ज्यायानिति तदेवोपक्रम्यते । ननु किन्तावद् ब्राह्मणत्वमिति ? न च "स्नानं सन्ध्या जपो होमो देवता- भ्यर्चनन्तथा । आतिथ्यम्वैश्वदेवञ्च षट् कर्माणि सदैव हि ॥” इति स्मृति- वाक्यानुसारेण षट्कर्मसम्पन्नत्वम्ब्राह्मणत्वमिति वाच्यम् , निरुक्तषट्- कर्मसम्पन्नत्वस्य क्षत्रियवैश्ययोरबिगर्हितत्वेनातिप्रसरत्त्वात्। न च “मनु० अ० २ यः कश्चित्कस्यचिद्धर्मो मनुना परिकीर्तितः। स सर्वोऽभिहितो वेदे सर्वज्ञानमयो हि सः॥ मन्वर्थविपरीता या सा स्मृतिर्न प्रशस्यते" इत्यादिप्रतिज्ञावास्येन अध्यापनमध्ययनं यजनं याजनन्तथा । दान- म्प्रतिग्रहञ्चैव ब्राह्मणानामकल्पयदिति षट्कर्मसम्पन्नत्त्वम्ब्राह्मणत्वमिति वाच्यम, नित्यकर्मसन्ध्यादेः करणे फलन्नास्त्यकरणे प्रत्त्यवायश्रुतिरिति सार्वजनीनरीत्या बहिर्भूतत्त्वान्नित्यकर्मसम्पन्नत्वं कथङ्कारम्ब्राह्मणेषु स्या- दिति वाच्यम् ? श्रौतस्मातसकलकर्मसम्पन्नत्वम्ब्र ह्मणत्वमिति मन्वभि- प्रायसमर्थकलक्षणस्वीकारेणाऽदोषात् । न च द्विजत्वावच्छिन्नेषु ब्राह्मण- क्षत्रियवैश्येषु श्रौतस्मातकर्मसम्पत्तिदर्शनेन ब्राह्मणत्वलक्षणम्व्यभिचरित- मिति वाच्यम् ? पूर्वोक्त मन्वनुरूद्धाध्यापनाध्ययनयजनयाजनादिकर्मणान्नि- त्यकर्मसन्ध्योपासनादिकर्मोपलक्षणविधया बोधकत्वेन तत्संग्रहसौष्ठवात् । नित्यकर्मसन्ध्योपासनादिपुरस्सराध्यापनाध्ययनादिषट्कर्मसम्पन्नत्वमिति लक्षणान्तराच्च । अध्यापनाध्ययनादिषट्कर्मणा नित्यकर्मस्नानसन्ध्याजपा- दिषु लक्षणा "लक्षणा शक्यसम्बन्धस्तात्पर्यानुपपत्तित" इत्यभिधानाच्च । न च विशिष्टतपसो महर्षिप्रवरस्य विश्वामित्रस्यापि निरुक्त "शमो दम. स्तपरशौचं झान्तिरार्जवमेव च। ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभाव- जम्” इति पट् कर्मसम्पन्नत्त्वेन विश्वामित्रो ब्राह्मण्यमगादित्युपनिषत्प्रणीते जन्मसिद्धक्षत्रियेऽपि ब्राह्मणत्वमापतेदिति वाच्यम् ? ब्राह्मोऽजाताविति पाणिनीयसूत्रम् जातौ तु ब्राह्मणः कुमारीभार्यः कुमारभार्यः जातेश्चेति पुम्वद्भावाभावाभ्यां जातिलक्षणे नित्यत्वप्रवेशः सर्वमते । तथा चानादि- वासनाविशिष्टाया जातेनित्यत्त्वेन ब्राह्मणत्वलक्षणाक्रान्तरजोवीर्यसम्बन्ध- जन्मसिद्धाध्यापनाध्ययनयजनादिषट्कर्मसम्पन्नब्राह्मणत्वस्य जन्मसिद्ध- क्षत्रियत्वसम्पन्नविश्वामित्रे कथमप्यसम्भवात् । एवञ्च न केवलपटकर्म- सम्पन्नत्वम्ब्राह्मणत्वमपि तु ब्राह्मणत्वलक्षणाक्रान्तरजोत्रीय॑सम्बद्धजन्म- ?
१ नच रुढ- * सरयूपारीणब्राह्मणवंशावली * सिद्धाध्यापनाध्ययनादिषट्कर्मसम्पन्नत्वम्ब्राह्मणत्वमिति लक्षणं सिद्धम् । नच लक्षणकुक्षिप्रविष्टब्राह्मणत्वलक्षणाक्रान्तेतिविशेषणदर्शनेन ब्राह्मणत्वे सिद्धे लक्षणसिद्धिः, लक्षणज्ञानमन्तरेण ब्राह्मणत्वन्न सिध्यतीति आत्माश्रयदोष- स्तथाच विश्वामित्रे कथन्न लक्षणातिव्याप्तिरिति वाच्यम् ? चतुर्विधःशब्द:- रूढो योगरूढो यौगिक यौगिकरूढश्च, लक्षणकुक्षिप्रविष्टब्राह्मणत्वं रूढमा- दायात्माश्रयदोषपरिहारपूर्वकातिव्याप्तिवारणनिर्विवादात् । ब्राह्मणत्वमभिप्रीयमाणं स्याच्चेत्तर्हि किन्तावद् ब्राह्मणत्वमितिप्रश्नानु- पपत्तिः ? लक्षणस्य किमपि प्रयोजनन्नास्ति रूढत्वादेवाभीष्टसिद्धेः। अवयवार्थानरपेक्षत्वे सति समुदायार्थोपस्थापकत्वं रूढत्वमित्यभिसन्धेः। तथाच विश्वामित्रेऽतिव्याप्तिस्तदवस्थैवेति वाच्यम् ? ब्राह्मणत्वलक्षणा- क्रान्तेतिविशेषणमपहाय जन्माधिकारप्राप्तश्रौतस्मातकर्मोभयसाधनसम्पन्न- खं ब्राह्मणत्वमितिलक्षणाश्रयणात् । एतेन "जन्मना जायते शूद्रस्संस्काराद् द्विज उच्यते । वेदाभ्यासाद् भवेद् विप्रो ब्रह्मविद् ब्राह्मणो मतः॥" ब्रह्मज्ञानविशिष्टत्वं ब्राह्मणत्वमिति वदन्तो नव्यसुधारकाः परास्ताः । अस्य श्लोकस्य धर्मशानव्याजेन कपोलकल्पितत्वात् । “सदनकशाई शवरी- त्रिशक्यानिशूद्राणामपि केषाम्बिदनुक्तानाम्ब्रह्मज्ञानविशिष्टत्वश्रुत्या लक्षण- स्यानन्तदुर्दशापत्तेश्च । नच पूर्वलक्षणं कस्मिँश्चिद् ब्राह्मणे यदि गच्छेत् सर्वत्र ब्राह्मणे न गच्छेत्तावताऽपि ब्राह्मणत्वं युक्तमेवेति व्यापकत्वं लक्षण- स्य न स्यादिति वाच्यम् ? तत्तजन्माधिकारप्राप्तश्रौतस्मातकर्मोभयसाधन- सम्पन्नत्वं ब्राह्मणत्वमिति लक्षणकरणेनाऽदोषात् । तत्पदम्बुद्धिविशेषविषय- त्वोपलक्षिन जिज्ञासितधर्मावच्छिन्ने शक्तमितिन्यायशास्त्रीयशक्तिवादीय. पदार्थविचारानुसारेण दोषा अपहरणीयाः । [ मनु० अ० -भूताना- म्पाणिनःश्रेष्ठाः प्राणिनाग्बुद्धिजीविनः1 बुद्धिमत्सु नराः श्रेष्ठा नरेषु ब्राह्मणा मताः।। ब्राह्मणेषु च विद्वाँसो विद्वत्सु कृतबुद्धयः। कृतबुद्धिषु कर्तार:- कर्तृषु ब्रह्मवादिनः ।। २ ।।] इत्युक्त्या नरश्रेष्ठत्वमेव ब्राह्मणत्वम् दर्शितम् नतु ब्रह्मज्ञानविशिष्टत्त्वमिति । तपः श्रुतश्च योनिश्च ह्येतद्ब्राह्मणलक्षणम् । तपः अताभ्याम्विहीनो जातिब्राह्मण एव सः॥ इत्यप्यनुसन्धेयम् । न चोभयसाधनसम्पन्नत्वमिति लक्षणे [ अविद्यो वा सविद्यो वा ब्राह्मणो मामकी तनुः। अद्याऽपि श्रूयते घोषो द्वारकायाम्मुहुर्मुहः ॥ १॥ साचारो वा निराचारो जातिब्राह्मण एव चेति महाभारतीयभगवत्कृष्णवाक्येन जातिब्राह्मण एव सः, ब्राह्मणब्रुवः ( मनुस्मृतिः) अष्टवर्षम् ब्राह्मणमुपनयेत, * भाषाटीकासहितम् * ३ , ब्राह्मणस्यैव देहोऽयं क्षुद्रकामाय नेष्यत इत्यादि तु सँस्काररहितेऽपि देहे ब्राह्मणपदप्रयोगाजन्मनैव जातिः। जन्मना ब्राह्मणो ज्ञेय इति- वृहत्पारा० । ब्राह्मणत्वमारोप्य तत्र प्रयोग इति शुक्लाः। वस्तुतस्तु जन्म- कर्मभ्यान्द्वाभ्यां जातिरिति शुक्ला एतद्ग्रन्थकर्तारः। जन्मत एव वर्ण- व्यवस्था नतु कर्मतस्तथा चोभयसम्पन्नत्वन्न ब्राह्मणत्वमिति वाच्यम् , "एतद्देशप्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मनः । स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरन् पृथिव्यां सर्वमानवाः” इति मनुप्रमाणेनाग्रजन्मत्वम्ब्राह्मणत्वमिति परिष्कारः इति कापि दोषानवकाशात् । नच जन्मत एव वर्णव्यवस्थायां “शूद्रो ब्राह्मण- तामेति ब्राह्मणश्चैति शूद्रतामि"तिमन्वर्थविरोध इति वाच्यम् ? तस्य वाक्यस्य वर्णसङ्करविषयकत्वस्य पूर्वपरश्लोकार्थदर्शनेन सिद्धत्वात् । नचाग्रजन्मत्त्वम्ब्राह्मणत्वमिति लक्षणे विष्णोरपेक्षया सृष्टिप्रवत्तकस्य विष्णु- नाभिकमलजस्य ब्रह्मणोऽत्यग्रजन्मत्वेन ब्राह्मणत्वजातिक्रान्तत्त्वापत्तिरिति- वाच्यम् ? "प्रतिग्रहोऽधिको विप्रे याजनाध्यापने तथे” त्यग्रिममनुवाक्येन "स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरन्नि"तिपूर्वोक्तप्रमाणेन च प्रतिग्रहाश्रयत्वे सति याजनाध्यापनकर्तृवे सति अग्रजन्मत्वम्ब्राह्मणत्वमिति विधातुं शक्यत्त्वात् । अत एव प्रतिग्रयाजनाधिकाराऽभावाद् विश्वामित्रेऽपि न दोषः। अग्र- जन्मत्त्वाभावाच्च । नचान्येषाम्प्रतिग्रहाधिकागऽभावात् प्रतिग्रहाधिकारा- श्रयत्वम्ब्राह्मणत्वमिति लक्षणं कुतो न लावादिति वाच्यम् ? उपनय- नादिसंस्काररहितवालके ब्राह्मणपुत्रे दानयोग्यत्वाभावेन ब्राह्मणत्वानापत्तेः । न च "आत्मा वै जायते पुत्र इतिवेदप्रभाषितमिति प्रमाणेन पितृसमी- पवर्तिपुत्रे कस्यायम्बालक इति प्रश्नानन्तरं ब्राह्मणवालकोऽयमित्युत्तरम् । रजोबीय॑सम्बद्धपिण्डात्मकजन्मत एव जातिर्नतु कर्मत इति श्रौतस्मात- सिद्धान्तेन चानुपनीतब्राह्मणेऽपि ब्राह्मणत्वसत्त्वात् प्रतिग्रहयोग्यत्वाभावेन कथकारम्ब्राह्मणत्वमिति वाच्यम् ? संस्कृतेषु ब्राह्मणेषु भाविब्राह्मण- त्वमादाय वालकेऽपि प्रतिमहाधिकारयोग्यत्तसत्त्वादुपपत्तेः । ननु ब्राह्मणा- नामुत्पत्तिः कस्मादिति प्रश्नः। यजुर्वेद [ ॐ ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद्वाहू राजन्यः कृत ऊरू तदस्य यद् वैश्य पद्भ्याठशूद्रो अजायत ] ईश्वरमुखाद् ब्राह्मणोत्पत्तिः। नचअस्धातोस्सत्तार्थकत्वेनोत्पत्त्यर्थाभावा- त्कथम्मुखादुत्पत्तिरिति वाच्यम् ? वेदस्य धर्मब्राह्मणरूपत्वेन स्वतः प्रामाण्यादुत्पत्त्यर्थकत्वे बाधाभावात् । "रोहितो लोहितादासीद् धुन्धु- स्तस्य सुतोऽभवदि"त्यादिलौकिकवाक्येऽप्युत्पत्त्यर्थदर्शनाच्च । अत एव (मनु० अ० १) "लोकानान्तु विवृद्धयर्थम् मुखबाहूरुपादतः। ब्राह्मणं * सरयूपारीणब्राह्मणवंशावली * क्षत्रियं वैश्यं शूद्रश्च निरवर्त्तयदिति टीकारूपेणोक्तिस्सङ्गच्छते । सिद्धान्त- लक्षणन्त्वेवम्बिधं यदुक्तमीशाद्युपनिषदि ( वज्रसूचिकोपनिषदि ) यः कश्चिदात्मानमद्वितीयं जातिगुणक्रियाहीनं षडूमिषड्भावेत्यादिसर्वदोष- रहितसत्यज्ञानानन्तस्वरूपं स्वयं निर्विकल्पमशेषकल्पाधारमशेषभूतान्त- र्यामित्वेन वर्तमानमन्तर्बहिश्चाकाशवदनुस्यूतमखण्डानन्दस्वभावमप्रमे- यमनुभवैकवेद्यमपरोक्षतया भासमानं करतलामलकवत्साक्षादपरोक्षीक- कृतार्थतया कामरागादिदोषरहितः शमदमादिसम्पन्नो भावमात्सर्यतृष्णा- शामोहादिरहितो दम्भाहंकारादिभिरसम्पृष्टचेता वर्त्तते एवमुक्तलक्षणो यः स एव ब्राह्मण इति श्रुतिस्मृतिपुराणेतिहासानामभिप्रायः । अन्यथा हि ब्राह्मणत्वसिद्धिर्नास्त्येव । सच्चिदानन्दमात्मानमद्वितीयं ब्रह्म भाक्येदात्मानं सच्चिदानन्दं ब्रह्म भावयेदित्युपनिषत् । वस्तुतस्तु- ब्राह्मणशब्दस्संज्ञावाचको न तत्र लक्षणव्युत्पत्तिचर्चा, संज्ञाशब्देऽव- यवार्थो न भासते इति व्याप्तेरिति शुक्लाः। ननु ब्राह्मणत्वावच्छिन्नसरयूपारीणब्राह्मणानां केन कस्मात् क्वोत्पत्ति- रिति प्रश्नः। उत्तरम् -ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद्वाहू राजन्यः कृत इति श्रुत्यनुसारम् "एतद्देशप्रसूनस्य सकाश दग्रजन्मनः । स्वं स्वं चरित्रं. शिक्षेरन् पृथिव्यां सर्वमानवाः ॥ लोकानान्तु विवृद्धयर्थं मुखबाहू- रुपादतः । ब्राह्मणं क्षत्रियं वैश्यं शूद्रं च निरवर्तयदिति”। इनप्रमाणों से निःस्वार्थ सनातनवैदिकवर्णाश्रमधर्मप्रतिष्ठापनार्थ जीवमात्र को शिक्षा- पूर्वकउद्धारार्थ मोक्षमार्गप्रतिष्ठापनार्थ पवित्रशक्तिशाली ब्राह्मणों का जन्म ब्रह्मा शिव शक्ति की उत्पत्ति के अनन्तर "गर्गश्च गौतमश्चैव शाण्डिल्यश्च पराशरः। सावर्णः कश्यपोऽत्रिश्च भारद्वाजोऽथ गालवः ।। कौशिको भार्गवश्चैव वत्सःकात्यायनोऽङ्गिराः । शाङ्कृतो यामदग्न्यश्च षोड- शैते प्रतिष्ठिताः” ये सोलह गोत्र सरयूपारीण ब्राह्मणों में प्रसिद्ध हैं। कहीं २ दूसरा श्लोक इस प्रकार है । "कौशिको भार्गवश्चैव वत्सो वात्सायनस्तथा । अङ्गिराश्च्यवनश्चैव यमदग्निश्च पोडशः ।" एक हस्त- लिखित पुस्तक में "गर्गश्च गौतमश्चैव शाण्डिल्यश्च पराशरः । सावर्णिःकश्यपो वत्सो भारद्वाजश्च कौशिकः ॥ उपमन्युर्वशिष्ठश्च शांकृतो घृतकौशिकः । गायः कात्यायनश्चैव तथा स्याद् गर्दभी- मुखः ॥ अगस्त्यो भृगुभर्गश्च कुण्डिन्यश्च तथैव हि" इस प्रकार सब जोड़कर २६ छब्बीस महर्षि उत्पन्न हुये। इस संख्या में सोलह * भाषाटीकासहितम् * महर्षि प्रधान हैं। सोलह में भी गर्ग १ गौतम २ शाण्डिल्य ३ ये तीन प्रधान हैं । तेरह अप्रधान हैं। कौडिन्य को लेकर साढ़े सोलह प्रधान हैं उन में तीन अत्यन्त ही प्रधान हैं। तीन महर्षि आदिपुरुष गोत्रप्रवर्तक के सन्तान शुक्ल मिश्र त्रिपाठी आज तक भी ब्रह्मा के चाचा बन कर दूसरे महर्षि पराशर इत्यादि की सन्तान दूबे पाण्डेय उपाध्याय चतुर्वेदी इत्यादि को तुच्छ समझ कर दूर झिझकार शूद्रों के समान फेंकते हैं। अब इन तीन तेरह भेद करने वालों का उत्तम तीन मध्यम तेरह कहकर अपने भाइयों को कुचल कर विवाहादि कर्यों में खानपानादि में भाइयों का अपमान कर गला घोंटना कितना अन्याय है। उक्त २६ छब्बीस महर्षि सर्वप्रथम उत्पन्न हुये और उन्हीं की सन्तान सरयूपार में प्रथम उत्पन्न होकर सरयूपारीण कहलाते हुये देश क्या पृथिवी भर में सुप्रति- ष्ठित होकर ब्राह्मणों में उत्तम हुये। क्योंकि आचार विचार रीति रिवाज सरयूपारीण ब्राह्मणों से उत्तम अन्य देशीय ब्राह्मणों में आज भी नहीं पाया जाता। वेद-वेदाङ्गसम्पन्न उक्त महर्षियों के सन्तान सब उत्पन्न हुये तो किन कारणों से उत्तम मध्यम व्यवहार प्रचलित हुआ ? सब महर्षियों के सन्तानमात्र उत्तम ही हुये मध्यम कोई नहीं हुये। उत्तम मध्यम का व्यवहार किसी पुराण या धर्मशास्त्र या ऐतिहासिक ग्रन्थ में नहीं पाया जाता । बड़े २ प्रतिष्ठित सरयूपारीणब्राह्मणों से बड़ी २ सभाओं में हम स्वयं प्रश्न किये कि “तीन गोत्रवाले शुक्ल मिश्र त्रिपाठी गर्गगौतम- शाण्डिल्य उत्तम है, तेरह गोत्रवाले मध्यम हैं, इसमें कोई प्रमाण या युक्ति है या नहीं ? परन्तु उत्तम कहलानेवाले सब मूक होकर निरुत्तर हो गये। सब ब्राह्मण उत्तम हैं जन्म से मध्यम कोई नहीं। प्रत्युत निरा- चार मत्स्यमांसादिभक्षक वेदवेदाङ्ग-नित्यकर्मसन्ध्योपासनादिरहित अत्यन्तसांसारिकप्रपञ्चों में फंस कर पारलौकिकप्रवृत्ति-त्याग सांसारिक- मिथ्याभाषणपरदारहरणादि दोषों से युक्त ब्राह्मण ही मध्यम, निकृष्ट अथवा निन्दित हैं। “जातिब्राह्मण एव सः" ब्राह्मणब्रुवः' केवल जन्मसिद्ध ब्राह्मणनामधेय हैं यथार्थ ब्राह्मणत्व उनमें नहीं है। किन्तु ब्राह्मण नामधारी ही हैं। इसके अतिरिक्त उत्तम मध्यम होने का दूसरा उत्तर लोक, शास्त्र में नहीं है । बराबर दर्जे के महर्षियों से उत्पन्न ब्राह्मणों में जिसने कपोल- कल्पित मिथ्याजाल बढ़ा कर तीन गोत्रवाले शुक्ल मिश्र त्रिपाठी, तेरह- गोत्रवाले तथा छब्बिस २६ गोत्रवालों को मध्यम या निकृष्ट प्रसिद्ध कर ये लोग नीच, इनसे विवाह या खानपान का व्यवहार तीन गोत्रवाले न * सरयूपारीणब्राह्मणवंशावली * करें नहीं तो वे भी नीचसम्बन्ध से नीच हो जायेंगे" ऐसा घोर जात्यु- पद्रव करने वाला जाति का गला घोटनेवाला व्यक्ति ही सरयू- पारीणों में अत्यन्त मध्यम या निकृष्ट हो सकता है। अखिल वेद या वेदाङ्ग के वक्ता पाठयिता तथा चतुर्वेद के वक्ता होने से चतुर्वेदी उपाधि, अध्यापनवृत्ति अर्थात् शास्त्रवेद के पढ़ाने से उपाध्याय, शास्त्र, वेद के पढ़ाने से पाठक इत्यादि पदवियों से विभूषित ब्राह्मण कैसे मध्यम या निकृष्ट हो सकते हैं ? सरयूपारीण ब्राह्मणमात्र में उपाध्याय चतुर्वेदी पाठक इत्यादि यदि शास्त्र वेदसम्पन्न होकर कर्मारूढ हो अध्यापनवृत्ति या भगवद्भजन में लगे हैं तो हमारे विचारों से उनसे उत्तम नामधारी ब्राह्मण "हमारे पूर्वज घृत खाये हैं हमारा हाथ तूं घिये" ऐसा कहने या मानने वाले नहीं हो सकते, कभी नहीं हो सकते । तीन गोत्रवालों में कोई २ बड़े विद्वान् अध्यात्मशास्रवेत्ता आचारविचारसकलौतस्मातक- मसम्पन्न होकर तेरह गोत्र या २६ छब्बीस गोत्रों में ऐसी शक्ति न पाकर कहने लगे कि आप लोग ऐसी शक्ति का सम्पादन क्यों नहीं करते । उन महात्माओं की ऐसी इच्छा थी कि तीन ही गोत्र में ऐसे सिद्ध क्यों रहे, छब्बिस गोत्रवाले सब के सबही विचित्रशक्ति वाले हो जायँ केवल इस अभिलाषा से कहने लगे कि हम लोग उत्तम हैं "जब तक हमारी सी शक्ति आपलोग अपने में प्रादुर्भूत न करेंगे उत्तम न कहे जायँगे" इस शिक्षारूप उन्नतिशाली दबाव को सुनकर और भी तेरह या छब्बिसगोत्रवाले महर्षियों के सन्तान बड़े परिश्रम से आध्यात्मिकशक्ति को उत्पन्न कर वेदवेदाङ्ग को पढ़कर उपाध्याय, पाठक, चतुर्वेदी इत्यादि पदवी को प्राप्त कर प्रतिष्ठित हुये। तदनन्तर तीनगोत्र वाले महात्मा ने प्रसन्न होकर सब भाइयों को गले लगाया, देश में प्रतिष्ठा बढ़ायी। स जातो येन जातेन याति वंश समुन्नतिम् । परिवर्तिनि संसारे मृतः को वा न जायते ॥ जातिरक्षासमम्युण्यं जातिरक्षासमन्तपः । जातिरक्षासमो धर्मो भुवि नास्तीति निर्णयः॥ जात्युद्धारसमन्वेष्टा जातिचिन्तापरायणः । जातिगौरवसम्भाषी पुरुषो भुवि दुर्लभः ।। अश्मेधादियज्ञेषु दानोपदानयोः। यत्फलं शास्त्रनिर्दिष्टं तद्वजातिप्रसेवने ॥ इत्यादि नीतिवाक्यों के उदाहरण मिलते हैं। उक्त सन्नति शाली तथा * भाषाटीकासहितम् * भाइयों को सुप्रतिष्ठित बनाने वाला दबाव सुन कर तीन गोत्र वालों की साधारण विचारशील सन्तानों ने जातिद्रोहवश यह सोचा कि आओ मिल कर हल्ला मचा दें कि हम लोग सर्वोत्तम हैं। अन्य गोत्रवाले मध्यम हैं । आगे हमारे कुल के लोग सदा उत्तम कहलायेंगे। केवल इसी प्रसिद्धि वश आज भी भाइयों का गला घोटा जा रहा है। दृष्टान्त-एक सज्जन एक कुत्ता पाले थे। कुत्ते का बहुत ही प्यार करते थे। एक दिन पिता का श्राद्ध करने बैठे। कुत्ता बगल से उनकी जाँघ पर आ बैठा। अन्त में छू जाने के भय से जंजीर में बँधवा कर तब श्राद्ध किये। उनके लड़के निरक्षर भट्टाचार्य विचार किये कि हम लोग जब श्राद्ध करेंगे तो दो चार कुन्चे बँधवा देंगे। अन्त में पिता के मरने पर वैसा ही किया। उस. कुल में कुत्ते बाँध. कर श्राद्ध करने की रीति चल गई। वही गति तीन गोत्रवाले ब्राह्मणों की हुई। अपने पूर्वजों के अभिप्राय को उक्त रीति से न समझ कर अपनी जड़ या साधारण बुद्धि से उत्तम मध्यम का व्यवहार फैला कर झूठ मूठ अपने भाइयों का गला घोंटने की रीति सी चला दी। वह अविद्याग्रस्त. कुप्रथा आज के भाइयों को दबा कर कूटशक्ति से उथल पुथल कर रही है । प्रिय बन्धुओ ? निष्पक्ष होकर ढोंगबाजी छोड़ सरयू- पारीणत्वेन छब्बीस २६ गोत्रवाले ब्राह्मणों की विद्या, सदाचार, कर्मण्यता देख उन सबों के साथ विवाह खानपान व्यवहार को चला कर सब को अपनाकर सब को उत्तम बनाकर पूर्वज महर्षियों के समान कुल को प्रज्वलित कीजिये। सृष्टयारम्भे ब्राह्मणस्य जातिरेका प्रकीर्तिता। एवं पूर्व जातिरेका देशभेदादनेकधा ।। प्रकृतमनुसराम:- साक्षात् ब्रह्मा जी से हमारे छब्बीस २६ महर्षि उत्पन्न होकर ब्रह्मा जी से पूछे कि क्या आज्ञा है ? ब्रह्मा जी ने कहा कि जपतपोऽनु. ठानद्वारा वैदिकधर्म का प्रचार कीजिये। महर्षियों ने कहा कि हम लोग साक्षात् अखण्ड ब्रह्म का दर्शन करके सन्तोष पायेंगे। गर्ग पराशरादि हमारे राजषिगण निराहार परब्रह्म की तपस्या करने लगे। कई सहस्त्र वर्ष व्यतीत होने पर ब्रह्मादि देव चकित होकर विष्णु के पास गये । सब समाचार कह विष्णु भगवान् के सहित ब्रह्मा जी शिव सनकादि तपस्या करने वाले हमारे महर्षियों के पास आकर कहने लगे कि हम देवगण - * सरयूपारीणब्राह्मणवंशावली * प्रसन्न हैं। आप किस लिये कष्ट उठा रहे हैं। सरयूपारीण ब्राह्मणों के आदि पुरुष गर्गादि महर्षि (मुनि) कहे कि हम लोग तो आप का दर्शन कर कृतार्थ हुए। हमारी भावी संतान भी आप का दर्शन कर पाये। और ऐसी तपोयोग्य पवित्र भूमि हम लोगों के लिये दीजिए कि सानन्द आश्रमों का पालन कर भावी सन्तानों को भी सदाचारी बना सकें। इस प्रार्थना को सुन साक्षात् भगवान् ने वरदान दिया कि आप लोग सरयू नदी के तट पर जाकर आनन्द से भजन करें आपकी भावी सन्तान सरयूपार में उत्पन्न होने से सरयूपारीण ब्राह्मण कहलायेगी। सरयूपारीण उपाधि से विख्यात होगी । धर्म-मर्यादा-पालनार्थ हम त्रेता युग में इक्ष्वाकुवंशीय राजा दशरथ क्षत्रिय के यहाँ रामावतार लेकर रावणादि दुराचारियों के बधानन्तर अश्वमेध यज्ञ करेंगे वहाँ प्रत्यक्ष दर्शन देकर आप की प्रतिष्ठत सन्तानों को ही आचार्य बना कर यज्ञ करायेंगे। आप के ज्ञानी सन्तान दर्शन पावेंगे। इतना वरदान देकर ब्रह्मादि देवगण चले गये। सरयूपारीण ब्राह्मणों के आदिपुरुष गोत्रप्रवर्तक सरयू के तट आ कर सन्तानों को भी शिक्षित कर धर्मप्रचार करने लगे। मिथिला देश में उत्पन्न होने से मैथिल, सरस्वती नदी के तट पर जन्म .. होने से सारस्वत, कन्नौज में जन्म होने से कान्यकुब्ज, गुजरात में होने से गुर्जर, द्रविड देश में उत्पन्न होने से द्राविड, मालब देश से मालवीय, तत्तद्देश में उत्पन्न होने से तत्तन्नाम पड़ा। सरयूपार में प्रथम जन्म होने से सरयूपारीण नाम हुआ बहुत से सज्जन यह कहते हैं कि ब्राह्मण केवल दशविध हैं अधिक नहीं। श्लोक-सारस्वतः कान्यकुब्जो गौड़ो मैथिल उत्कलः । पञ्च गौड़ा इति ख्याता विन्ध्यस्योत्तरवासिनः॥ द्राविड़ाः पश्च विख्याता विन्ध्य- दक्षिणवासिनः। इन दशविध ब्राह्मणों में सरयूपारीणों का नाम ही नहीं है। इसपर केवल इतना ही कहना है कि ये दोनों श्लोक किसी भी आप्तग्रन्थ में नहीं, कपोलकल्पित हैं। किसीगौड़महाशय ने अपनी प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिये "यह पाँच ब्राह्मण गौड़ ही प्रधान हैं अन्य नहीं इस तरह की ऐसे भाव से रचना की कि "विन्ध्यस्योत्तरवासिनः विन्ध्यगिरि के उत्तर तरफ के वासी अर्थात् रहने वाले" शब्दार्थमर्यादा से यही अर्थ विन्ध्यदक्षिणवासिनः इसका भी है। उत्तर दक्षिण वासी लिखने से यह कदापि नहीं सिद्ध होता कि दशविध ही ब्राह्मण । विन्ध्यगिरि के पूर्व, पश्चिम, विन्ध्यगिरि की गुहा में, मध्य में रहने वाले ब्राह्मण किस प्रकार ब्राह्मण कहलायेंगे ? ।
है * भाषाटीकासहितम् * इतना कह सकते हैं कि विन्ध्यगिरि के उत्तर और दक्षिण अधिकसंख्या में सारस्वत, कान्यकुब्ज इत्यादि रहते हैं। संख्यानिश्चय किसी प्रकार नहीं हो सकता । साथ ही पुष्करणा ब्राह्मण, गुर्जर, शाकद्वीपीय, मालवीय, सनाढ्य, श्रीमाली इत्यादि ब्राह्मणों की गणना कल्पित श्लोकोक्त पाँच ब्राह्मणों में किस में होगी ? किसी में नहीं हो सकती। अत एव दशविध ही ब्राह्मण नहीं बल्कि तत्तद्देश में रहने वाले ब्राह्मण अनेक हैं। दशविध कहने वाले प्रमाणशून्य, स्वार्थी हैं। एक सज्जन ने "कान्यकुब्जा द्विजाः श्रेष्ठा इतरे नामधेयकाः" ऐसा श्लोक बना कर कान्यकुब्ज ही श्रेष्ठ ब्राह्मण हैं ऐसी लीला की है। वैसे ही किसी गौड़ सज्जन ने ही "पञ्चगौड़ा इति ख्याताः" ऐसा बना कर उड़ा दिया । और भी इसी प्रकार “सर्वे द्विजाः कान्यकुब्जा मागधम्माथुरम्बिना" मथुरा के चौबे और श्रीगयातीर्थ के पण्डों को छोड़कर भूमण्डलमात्र के ब्राह्मण कान्यकुब्ज ही हैं ऐसा लिख डाला “पञ्च गौड़ा इति ख्याताः ।" इस गौड़प्रवाद को देखकर कान्यकुब्जों ने “सर्वेद्विजाः कान्यकुब्जा" ऐसा बना कर नगाड़ा बजवा दिया। कान्यकुब्ज ही सर्वोपरि हो गये। ऐसी कन्था उड़ाते बनाते गौड़ों को और कान्यकुठजों को लज्जा और भय नहीं आया। न जाने बनाने वाले कान्यकुब्ज महाशय ने मथुरा के चौबे और गया जी के पण्डों को क्यों निकाल बाहर किया। जनअतियों वृद्धदन्तकथाओं से विदित हुआ है कि किसी राजा को एक कान्यकुब्ज पण्डित जी गया-श्राद्ध कराने के लिये ले गये। वहाँ जाकर राजा से "गुप्तदान गुप्त प्रतिग्रहीता को देने से पितरों को अक्षय स्वर्गलोक प्राप्त होता है। ऐसा कह राजा को समझा कर बहुत-सा धन सामग्री ले लिये और पण्डों का हाथ नहीं गरम हुआ। ठीक पता चलने पर पण्डों ने पण्डित जी का खूब दण्डासत्कार किया। उन्होंने कहा कि तुम हमारे कान्यकुब्जों में नहीं हो, नकली ब्राह्मग हो शेष सब ब्राह्मण कान्यकुब्ज हैं। इसी तरह राजा को मथुरा जी में जाने से गुप्तदान की पेच भरी गई। इसके दो कारण हैं। कान्यकुब्ज लोग प्रायः दान नहीं लेते यह सिद्धान्त है। गुप्तदानप्रतिग्राही होने से हमारे कान्यकुजों में भी निन्दा न होगी पण्डा लोग भी न जानेगें माल गठरी अच्छी कट जायगी। राजा सोचा कि जब कान्यकुब्ज दान नहीं लेते तो कान्यकुब्ज होकर दान गुप्त ही ले लेगें तो अच्छा है। इसलिये राजा ने स्वीकार किया। अत: से स्वार्थियों से सत्यासत्य निर्णय कैसे हो, किश्च "कान्यकुब्जा द्विजाः ने १० * सरयूपारीणब्राह्मणवंशावली * श्रेष्ठा ऐसी रचना भी निरर्थक हवा है, क्यों कि यह प्रमाण भी किसी आप्तग्रन्थ में नहीं पाया जाता और न इतिहासादि में कहीं लेख ही ऐसा है। केवल धूलिप्रक्षेप से ही ऐसी झूठी जनश्रुतियाँ उड़ाई गई हैं। सुनते हैं कि त्रेता में जब श्री रामचन्द्र जी ने रावणवधानन्तर अश्वमेध यज्ञ किया था तब ब्राह्मणवध के कारण किसी ब्राह्मण ने भोजन स्वीकार न किया। हनुमान जी ने कहा कि बिना ब्राह्मण- भोजन के यज्ञ पूर्ण न होगा। अतः कान्यकुब्ज प्रान्त से सोलह १६ ब्राह्मण बालक लाकर धोखा देकर अयोध्या में उसके उप- नयनादि संस्कार करा कर भोजन करा दक्षिणा देकर जब कान्य- कुब्ज देश में कपीश ने पहुँचाया तो लड़कों के माता पिता ने दान लेना देखकर घर से बाहर निकाल दिया। वे ही लोग अयोध्या में पुनः आये। तब उन्हें सरयू किनारे सरवार प्रान्त देकर अपने देश में बसाया गया इत्यादि इस प्रकार की अत्यन्त झूठी झूठी अनर्गल कथायें अत्यन्त स्वार्थी, ब्राह्मण-विरोधक कान्यकुब्जों की ही लीला है । क्योंकि अयोध्यापुरी-अयोध्या मथुरा माया काशी कांची त्ववन्तिका । पुरी द्वारवती ज्ञेयाःसप्तैता मोक्षदायिकाः ॥ इन सप्त पुरियों में है । इक्ष्वाकु क्षत्रिय की राजधानी, श्री महाराज रामचन्द्रजी ने अवतार धारण कर यही लीला की है। जब अयोध्या राजधानी के आस पास के रहने वाले ब्राह्मणों ने इन्कार किया तब हनुमानजी ने कन्नौज देशीय बालकों को ठगा। इससे अयोध्या वासी ब्राह्मणों की प्राचीनता सिद्ध होती है कि वे थे परन्तु भोजन दान न स्वीकार किये "अक्के चेन्मधु विन्देत किमर्थं पर्वतं व्रजेत् "वशिष्ठादि महर्षि यज्ञ कराने वाले थे, युद्ध यज्ञ मैं हिंसादोष नहीं होता, तो रामजी निष्पाप हो कर यज्ञ करते हैं केवल मर्यादापालनार्थ, नान्यथा, तब हनुमानजी ने दूर दौरा किया । सरयूतट वासी ब्राह्मण अति प्राचीन उक्त कथा से ही प्रतीत होते | क्या सरवार प्रान्त बाह्मणों से शून्य था ? अवश्य पहले ही से सरयूपारीण ब्राह्मण थे । यदि महाराज रामचन्द्र के समय पर सरयूपारीण ब्राह्मणों का आगमन होता तो महाराज इक्ष्वाकु के समय यज्ञदानादि किस ब्राह्मण ने कराये होंगे? वैदिक ब्राह्मण अवश्य थे। अतः पूर्व- कथा सर्वथा कपोलकल्पित है। किसी कन्नौजिया की फैलायी हुई है। यदि रामचन्द्रजी का दान, भोजन लेने से उनके घर वालोंने बालकों को निकाल दिया तो विदित होता है कि उन सोलह बालकों के पिता वगैरह Accession No. Shantarakshita Library * भाषाटीकासहितम् *Tibetan Institute-Sarnath ब्राह्मण नहीं थे। क्योंकि “दानम्प्रतिग्रहञ्चैव ब्राह्मणानामकल्पयत्" इन पूर्वोक्त प्रमाणों से ६ छ कर्मों में दान लेना भी ब्राह्मण के लिये शास्त्र वेद- सिद्ध है। यदि दान नहीं लेते तो कर्मभ्रष्ट होने से वे ब्राह्मण ही नहीं थे यही सिद्ध होता है 'विनायकम्प्रकुर्वाणो रचयामास वानरम्" का दृष्टान्त हो गया। मनु० अ०२ में कहा है कि-य कश्चित्कस्यचि- धर्मो मनुना परिकीर्तितः । स सर्वोऽभिहितो वेदे सर्वज्ञानमयो हि सः॥ मनु० अ० ४ श्रुतिस्मृत्युदितं कम निवद्धं स्वेषु कर्मसु । धर्ममूलनिषेवेत सदाचारमतन्द्रितः॥ इन प्रमाणों से दान लेना वेदशास्त्रसिद्ध है तो दान न लेने वाले कान्यकुब्ज ही थे । ब्राह्मण यदि दान न ले तो दूसरी किस जाति वाले दान ले सकते हैं ? दूसरी जाति के लिये दान लेने का प्रमाण कहीं भी न मिलेगा। अत एव पूर्वकथा निरर्थक और "वदतो व्याघात" के समान है। सरयूपारीण ब्राह्मण सृष्टि के समय से ही थे किसी की शाखा नहीं हैं, स्वतन्त्र वेदशास्त्र के ज्ञाता थे । सत्योपाख्यान नामक पुस्तक में वाल्मीकि मुनि ने स्वधर्मकर्मनिष्ठ अयोध्याप्रान्तनिवासी ब्राह्मणों की प्रशंसा की है। इससे भी सरयूपारीण ब्राह्मण अत्यन्त प्राचीन हैं किसी की शाखा नहीं हैं। सरयूनदी भी बहुत प्राचीन है सरयूपार शब्द से यद्यपि दक्षिण तट और उत्तरतट विनिगमनाविरह से ले सकते हैं तथापि पङ्कजशब्दादि की तरह सरयूपारशब्द योगरूढ होने से उत्तर तट का ही बोधक हैं। इसी का अपभ्रंश सरवार नाम भी है। किसी समय अयोध्या जी के राजा प्रसन्न हो कर ब्राह्मगों को भूमि दान देने लगे तो कहा कि जहाँ तक शर (वाण) जाय वहाँ तक की भूमि ब्राह्मण ले लें इससे शरवार नाम भी दन्तकथा से श्रुत है। सरयूपारीण शब्द से ब्राह्मणों का ही बोध होता है दूसरे का नहीं। जैसे मैथिल शब्द से यद्यपि सर्व का बोध हो सकता है तथापि योगरूढि होने से ब्राह्मणों का ही बोधक होता है उसी प्रकार सरयूपारीण शब्द से भी ब्राह्मणों का ही बोध शास्त्र्युक्तिसिद्ध है। सरयू- पारीण ब्राह्मणों में चिरकाल से ही पंक्तिपावन ब्राह्मण थे। आज भी उँन लक्षणों नहीं तो नाममात्र से ही पूजित हैं। पंक्तिपावन पंक्ति पँतिहा इत्यादि । और किन्हीं भी मैथिल दाक्षिणात्य ब्राह्मणों में यथार्थलक्षण- सम्पन्न या नाममात्र से भी पैंतिहा इत्यादि पदवी नहीं है। इससे 'विदित होता है पंतिहा पंक्तिपावन जिसमें हैं वे सरयूपारीण ब्राह्मण त्रेता के पूर्व से ही अतिप्राचीन हैं। किसी की शाखा नहीं हैं, पंक्तिपावनादि + १२ * सरयूपारीणब्राह्मणवंशावली * नाम सरयूपारीणों के लिये यौगिक नहीं हैं किन्तु जो कोई भी ब्राह्मण पंक्तिपावनलक्षण से सम्पन्न हों वे सब यथार्थ में पंक्तिपावन हैं। सरयू- पारीणों में अधिकांश पंक्तिपावनलक्षण सम्पन्न थे इसी से ज्यादा प्रसिद्धि पंक्तिपावनों की सरयूपारीणों में ही हुई। अन्य ब्राह्मणों में नहीं। ब्राह्मणों में पतितपावन ब्राह्मणों के लक्षण कौन हैं ? उत्तर-मनु. अ. ३ अग्यास्सर्वेषु वेदेषु सर्वप्रवचनेषु च । श्रोत्रियान्व- यजाश्चैव विज्ञेया पङ्क्तिपावनाः ।। त्रीणि चक्रे ततः पञ्चाग्निस्त्रिसुवर्णः षडङ्गवित् । ब्रह्मदेयात्मसन्तानो ज्येष्ठस्सामग एव च ।। वेदार्थवित् प्रवक्ता च ब्रह्मचारी सहस्त्रदः। शतायुषश्च विज्ञेया ब्राह्मणाः पक्ति- पावनाः॥ अर्थ-वेद जानने वालों में अग्रेसर षट् शास्त्रों के जानने वाले जिनके पूर्वज वेदज्ञ हुये हों स्वयं भी वेदज्ञ हों उन्हें पतितपावन कहते हैं। वेदके अध्वर्युभागके जाननेवाले, व्रतनियम जहाँ वर्तमान हो, प्रभात काल सायङ्काल पश्चाग्नि में हवन करते हों, त्रिसुपर्ण अर्थात् बह वृचों का वेद भी जानते हों, शिक्षादिषड्ङ्ग सहित वेदज्ञ हों, मनूक्त आठ विवाहों में ब्राह्मविवाह विधि से विवाहिता स्त्री के पुत्र, सामवेद को गानेवाले ऐसे ६ गुण सम्पन्न, वेदार्थ जानते हों, वेदार्थ को स्वयं जान लेते हों, प्रथमाश्रमी ब्रह्मचर्य धारण किये हों, सहस्र गोदान करने वाले हों, शतवर्ष जीने वाले हों ऐसे ब्राह्मण पङ्क्ति- पावन कहे जाते हैं। आज कल वैश्यों में जो विधवासे सगाई करे तो वह उनावा कहा जाता है, वह मध्यम है, जो वैश्यकुमारी से विवाह करते हैं वे उनाय कहे जाते हैं। वही दशा पंक्तिपावन पैंतिहा में है। जो त्रुटित भाइयों की कन्या से विवाह करते हैं उनको निकाल कर त्रुटित कहते हैं। वानरों के झुण्ड से निकले वानर यदि झुण्ड में पुनः आते हैं तो वानर लोग मार काट डालते हैं ठीक वही दशा हमारे भाइयों की है, क्या आश्चर्य है ? आज कल देखने में आता है कि कितने ही ब्राह्मण उक्त लक्षणों के विना ही अपने को पङ्क्तिपावन तथा अन्य भाइयों को श्रुटित कह कर घोर अपमान करते हैं। जा कोई पङक्तिपावन ब्राह्मण त्रुटित की कन्या से विवाह कर ले तो उसको भी अलग कर त्रुटित पङ्क्ति- टूट अपाङक्तेय कहा करते हैं। उससे खान पान नहीं रखते। इसी प्रकार तोड़ते २ अब थोड़ी संख्या में शेष पङ्क्तिपावन डा की चोटपर ।
* भाषाटीकासहितम् * सब ब्राह्मणों को छोटा बना रहे हैं। बहुत से पैंतिहा ऐसे हैं कि जिनका मोजन मछली मांस झिंगवा मछली ( इसी को वे लोग जलतरोइया भी कहते हैं) के चूर्ण के विना दुर्लभ हो जाता है। घर के भीतर तथा बाहर खसी की हड्डी मछलियों के काँटे यदि न मिले तो पैंतिहा नहीं हैं। यद्यपि मांसभक्षण पङ्क्तिपावनों का लक्षण नहीं हैं तथापि शास्त्रमर्यादा को छोड़ कर मनमानी पङ्क्तिपावन बनते हैं। क्या मद्य मांसादि अभक्ष्य पदार्थों का सेवन करने वाला ब्राह्मण धर्मभ्रष्ट हो कर कभी पंक्तिपावन हो सकता है ? हमारे पूर्वज घृत खाये हैं हमारा हाथ टू घो यही कहावत घटती है। पहले बहुत दिनों तक मुसलमानों के शासन के पूर्व सरयूपारीणब्राह्मणों में मनूक्तलक्षणानुसार पतितपावन थे, जब तामसी वृत्ति धारण कर माँस भक्षण करने लगे तो वे कैसे पङ्क्तिपावन हो सकते हैं ? सृष्टि भरके लिये ब्रह्मा के यहाँ से पतितपावन पदवी की रजिष्ट्री नहीं हुई है किन्तु धर्मशास्त्रोक्त पङ्क्तिपावनों के लक्षण जिन ब्राह्मणों में पाये जॉय वे ही पङ्क्तिपावन हो सकते हैं हमारे सरयूपारियों में पंक्तिपावन प्रसिद्धि कतिपय सरवरिहों में है। मैथिल ब्राह्मणों में श्रोत्रिय की उपाधि कुछ लोगों की है। "श्रोत्रियश्छ- न्दोधीऽते" इति पाणिनीयसूत्रम् वेद पढ़ने वाला ब्राह्मण श्रोत्रिय कहा जाता है, सरयूपारीण भी वेद पढ़ने वाला भोत्रिय कहा जा सकता है। मैथिलों के यहाँ ही श्रोत्रिय पदवी की रजिष्ट्री नहीं है किन्तु ब्राह्मणों में वेद पढ़ने वालों को लिये श्रोत्रिय पदवी योगरूढ़ा है । अत एव वेद पढ़ने वाले क्षत्रियों तथा वैश्यों में श्रोत्रिय पदवी नहीं कह सकते। यौगिक श्रोत्रियपदवी क्षत्रिय, वैश्य में दे सकते हैं। देखिये मनु ३ अ० चोरी आदि नीच कर्म ब्राह्मणों के लिये वर्जित कर कहा "एतान् विगर्हिता- चारान् अपांक्तेयान् द्विजाधमान्। द्विजातिप्रवरो विद्वानुभयत्र बिवर्जयेत् ।” माँसमत्स्यादिभक्षण प्रभृति अपांक्तेय कर्मों को उत्तम ब्राह्मण त्याग दें। अपने मन से पंक्तिपावन ब्रह्मर्षि बन कर अन्य भाइयों को नीच कह कर उनका गला घोटना और उनके कन्या पुत्र के विवाहादि कर्मों में वाधा देना कितना अन्याय है ? श्रीमद्भागवते- ब्रामणस्यैव देहोयं क्षुद्रकामाय नेष्यते । कृच्छाय तपसे चेह प्रेत्यानन्तसुखाय च ।। । - रहो अब तो हमने प्रणाम * सरयूपारीणब्राह्मणवंशावलो* इतना ही नहीं बल्कि सरयूनदी से दूर बसनेवाले सरवरियों को कहते हैं कि ये ब्राह्मण नहीं किन्तु शूद्र हैं, सवालक्षियों में हैं। किसी समय काशी के राजा चन्द्रसेन घोड़े पर चढ़े जा रहे थे, कुछ शूद्र लोग तिलकमालाधारी मार्ग में मिले तो राजा ने प्रणाम किया । शूद्रों ने कहा कि राजन् हम लोग शूद्र है। राजा ने कहा कि चुप कर लिया तुम सवालक्ष शूद्रों को ब्राह्मण बना दिया। आज से शूद्र मत कहो वही सवालक्षी नकली ब्राह्मण हैं। सरवरिया ब्राह्मण सरयू के आसपास रहने वाले ही हैं दूर बसने वाले सब नकली हैं। देखिये यह बनाघात भाहयों के ऊपर करना कितना पाप है। हमारे भाई ही यदि हमारे गले पर छुरी चलाते हैं तो कान्यकुठजादि नीच कहते हैं तो क्या आश्चर्य है ? यदि हम कहें कि भेड़ी के सुकुल हैं, खखाइजखोर के शुक्ल हैं, पीड़ी के तिवारी हैं, पयासी गांव के मिश्र हैं, पिपरा मित्र हैं, भेड़ी खखाइज पौडी पयासी पिपरा इत्यादि ग्रामोफोन के नाम लें तो उत्तम। वेद शास्त्र अग्निहोत्रादि का नाम लें तो मध्यम होते हैं। डीह डेहवार की मिट्टी आज हमको उत्तम बनाती है। क्या कठिन जातिविद्रोह सरवरियों में आया कि फूट की धारा बह कर प्राचीन गौरव का नाश कर रही है। प्रिय सरयूपारीण भाइयों को कुचलने से प्रतिष्ठा न बढ़ेगी। बल्कि समय बदल गया। संशोधन करने वाले बड़े २ धर्मधुरन्धर विधान तैयार हो गये हैं सावधान होकर बर्ताव कीजिये । मनु० अ० १ भूतानाम्प्राणिनः श्रेष्ठा प्राणिनाम्बुद्धिजीविनः। बुद्धिमत्सु नराः श्रेष्ठा नरेषु ब्राह्मणाः स्मृताः। ब्राह्मणेषु च विद्वान्सो विद्वत्सु कृतवुद्धयः। कृतवुद्धिषु कर्तार कर्तृषु ब्रह्मवादिनः।। अर्थ. सबसे श्रेष्ठ जीवधारी, उनसे बुद्धि से काम लेने वाले, उनसे मनुष्य, उनसे विद्वान् , उनसे कृतबुद्धि, उनसे तदनुसार यथार्थ कर्म करने वाले, उनसे ब्रह्म के जानने वाले ब्राह्मण सर्वोपरि श्रेष्ठ हैं। वेद वेदाङ्ग का वक्ता कर्म करने वाला ब्राह्मण श्रेष्ठ है। कहने से कोई उत्तम या पैंतिहा नहीं हो सकता। प्रश्न:-द्रव्यदान, भूमिदान, शय्यादान लेने से ब्राह्माणों का तेज बुद्धि बल हीन हो जाता है। जब धर्मशास्त्र में गायत्र्यादि जपानुष्ठान दान लेने वाले प्रतिग्राही को लिखा है तो कोई २ कान्यकुब्ज यदि दान नहीं लेते तो अच्छा ही है, निन्दनीय नहीं है। तब कान्यकुब्जों की उत्तमता में क्या बाधा ? उनसे ब्राह्मण, , ३ * सरयूपारीणब्राह्मणवंशावली * उत्तर-अध्ययनाध्यापन यजनयाजन दान प्रतिग्रह ६ कर्म ब्राह्मणों के लिये शास्त्रविहित हैं। इनमें से यदि कोई अंश ब्राह्मण छोड़ दे तो वह विहितकर्मभ्रष्ट है, अवैदिक है नाममात्र का ब्राह्मण है। यदि साङ्गोपाङ्गकर्म करने वाला हो तो वह उत्तम ब्राह्मण है। यदि विहित कर्म को न करे तो ऐसे ब्राह्मण को राजा अपने राज्य से निकाल बाहर कर दे। मनु० अ० ७ स्वे स्वे धर्मे निविष्टानां सर्वेषामनुपूर्वशः। वर्णानामाश्रमाणाञ्च राजा सृष्टोऽभिरक्षिता ।। न जातु ब्राह्मणं हन्यात् सर्वपापेववस्थितम् । राष्ट्रादेनम्बहिः कुर्यात् समप्रधनमक्षतम् ।। योऽवमन्येत ते मूले हेतुशास्त्राश्रयाद् द्विजः । स साधुभिर्वहिष्कार्यो नास्तिको वेदनिन्दकः ॥ यदि वर्णाश्रमी श्रुतिस्मृतिविहितकर्मानुष्ठान न करे तो ऐसे कर्मभ्रष्ट ब्राह्मण को राजा राज्य से निकाल इत्यादि। अनेक प्रमाणों से दान को न लेने वाले कान्यकुब्ज को इस राज्य से निकाल देना चाहिये। अत एव विरक्त होकर दानो- पदानादि न ग्रहण कर स्वतन्त्र स्वेच्छाचारी बनकर भगवत्कैकर्य करे तो वह सर्वोत्तम है। अतएव दान लेने से यदि कान्यकुब्ज लोग सरयूगरीणों की निन्दा करते हैं। वे झूठे और निरपराध निन्दक छोड़ क्या कहे जा सकते हैं। प्रश्नः-रायबहादुर डाक्टर देवदत्त चारपानि पाण्डेय सरयूपारीण थे उन्होंने सरयूपारीणब्राह्मगवंशावली जो संग्रह कर के छपायी है उसमें तो कान्यकुब्ज की शाखा सरयूपारीणों को लिया है सो क्यों ? उत्तर-अन्धगोलागूलन्यायेन अन्धपरम्परा से सरयूपारीणों ने नहीं ध्यान दिया, कान्यकुब्जों ने बिना प्रमाण के ही हल्ला उड़ाया । इसमें कोई प्रमाणाभास भी नहीं है। सरयूपारीणों के विरोध से, कान्यकुब्जों की मित्रता से सम्भव है कि उक्त पाण्डेय जी ने गड़बड़ झाला छपवा दिया। विशेषतः अन्वेषण करने से ठीक पता चला कि धोकेबाजी से पाण्डेय जी ने भी नशे बाजी में फंसकर गड़बड़ मचाया। अत एव सरयूपारीणब्राह्मग स्वतन्त्र और निश्शाख हैं। सृष्टि के समय से ही सरयूपारीणों की जन्मभूमि सरयूतट है। वहाँ से बहुत से लोग दूर दूर बस गये हैं । हम औरों का क्या कहें हमारे सरयूगरीण भाई ५० ठाकुर- प्रसाद जी वैद्य प्रयाग.( दारागञ्ज ) ने सरवरियाविवरणनामक पुस्तक में कई जगह लिखा है कि अमुक २ ब्राह्मण पंक्ति कुल हैं अमुक २ ब्राह्मण पंक्तिकुल नहीं हैं। उनसे पूछना चाहिये कि पंक्तिपावन लक्षण में कुल * सरयूपारीणब्राझणवंशावली * का निवेश कहाँ लिखा है ? पंक्तिपावन लक्षण जिसमें हो वह पंक्तिपावन द्विज है कुल नहीं है। एक पुरुष कोई पंक्तिपावन हो गये तो कुल कैसे पंत्तिपावन हो सकता है। हमारे कुल में कोई कभी पंक्तिपावन-लक्षण- युक्त पूर्वज हो चुके हैं तो सदा के लिये पँतिहा कहलाने की रजिष्ट्री नहीं हुई। कहते हैं कि इनको क्या पूछना है ये तो पैंतिहा है और सब इनके मुकाबले में नीच नहीं तो और क्या हो सकते हैं ? पैंतिहा पंक्ति ग्राम की मिट्टी से उत्तम नहीं हो सकते। जिस किसी ब्राह्मण में पंक्तिपावन के लक्षण पाये जायँ वे ही पंक्तिपावन हैं। जिनमें उक्त लक्षण न पाया जाय वे ब्राह्मण हैं। जिनमें ब्राह्मणलक्षण न मिले वे कर्मभ्रष्ट ब्राह्मण या जातिब्राह्मण नामधारी हैं। जाति नित्य है जब तक अन्त्योष्ट संस्कार से शरीर भस्म न होगा तब तक ब्राह्मणत्व नहीं जा सकता। किन्तु कर्मभ्रष्ट ब्राह्मण या कर्मभ्रष्ट क्षत्रिय कह सकते हैं, यही धर्मशाखों का सिद्धान्त है। प्रश्न:-यतीन्द्रचरितामृतमहोदधिनामक संस्कृत पुस्तक में प्रकरणवश लिखा है कि सरयूपारीण कान्यकुब्ज की शाखा हैं सो क्यों ? उत्तर-वह प्रन्थ बहुत नवीन है। आप्तपुरुष का बनाया नहीं है अन्धपरम्परा से लिख दिये होंगे। मनु० ३ अ०-अपात्योपहता पंक्तिः पाव्यते यैर्द्विजोत्तमैः। तान् निवोधत कात्स्येन द्विजायान् पंक्तिपावनान ॥ पंकिपावन ब्राह्मण सरयूपारीणों में अधिक हुए हैं अब इस समय कोई २ होंगें। अनरकोश में “देविकायां सरवाञ्च भवेद् वाविकमार वौ” लिखा है। सरयूनदी के तट पर निवास करने वाला बतलाया है। इसी के आधार पर वाल्मीकिरामायण बाल का० में लिग्वा है कि "इतो हि सारवो देशस्सङ्गमोऽयं यतोऽवधि"। इस श्लोक में मारव शब्द है। सरवार उमी से प्रसिद्ध हुआ। मत्स्यपुराण में भी लिया है कि "अयोध्या दक्षणे यस्यास्स यूतटगः पुनः। सर- वागख्यदेशोऽयं सरयूपारजाग्रजाः" सरयू नदी के किनारे सरवार देश है सरयूपारीण ब्राह्मण वहाँ हैं। प्रश्न:-अंगरेज लेखकों ने एकसरेच इलियट २ मिस्टर शेरिङ्ग ३ इलियट ४ नार्थवष्ट्रन प्राविंश ५ पुर्क इत्यादि जाति के इतिहास लिखने वालों ने भी तो अपनी सप्लोमेन्टर ग्लासरी इत्यादि पुस्तकों में सरयूपारीण और कान्यकुञ्जों की एकता दिखाया है सो क्यों।
* सरयूपारीणब्राह्मणवंशावली * उत्तर-इन सब लेखकों को क्या पड़ी है अन्धपरम्परा से जो कुछ सुने सो लिख डाले। कोई प्राचीन प्रमाण नहीं खोजे इन लोगों के लेष का क्या प्रमाण है । अतएव सरयू गरीण और कनौजिहा से बिलकुल भेद है एकता नहीं हो सकती। रीति रिवाज आचार विचार गोत्र प्रवर आदि कुछ अंश मिलते हैं। इसी से अधिक प्रसिद्धि हुई। सरयूपाराण ब्राह्मग स्वतन्त्र हैं शाग्वा प्रशाख उपशाख किसी की नहीं है। गर्ग से लेकर भारद्वाज गोत्र तक पंक्त अपंक्ति यावत् सरयू गरीण ब्राह्मण हैं सब का कुलाचार सदाचार देखकर विवाह होने में कोई वाधा नहीं और शास्त्रविरोध नहीं है। हमारे सरयूपारीणों में यह कुप्रथा अधिक दिनों से चली आती है। अपने को ही उत्तम मानते हैं। कन्यादाता तथा कन्यापक्ष व लों को अत्यन्त नीच की दृष्टि से सदा देखते हैं। यह अन्याय है। शास्त्र और लोक दोनों से कन्यादानादि देने वाले ही उत्तम कहे जाते हैं। सब प्रकार के दान लेने वाले ही मध्यम हैं। ऐसी दशा में कन्यापक्ष वालों को मध्यम मानना कितना अन्याय है। अन्य देशो में कन्यारत्न के देने वालों को अत्यन्त मान सत्कागादि करते हैं। क्योंकि उसी कन्या से कुल की वृद्धि होती है। कन्याग्रहण करने वाले को या वरपक्ष वालों को उचित ह कि सच्चरित्र व पवित्र दाता की दृष्टि से वा दानवीर दृष्टि से कन्यापक्ष वालों का मान करना उचित समझें और कन्यापक्ष वालों का धर्म यह है कि हम उत्तम सदाचारी कर्मनिष्ठ को कन्यादान करते हैं। इस तरह दाता और प्रतिग्रह.ता दोनों का धर्म बना रहे तो परस्पर प्रेम की धारा बनी रहे। आज हमारे भारतवर्ष में अधिकांश ब्राह्मण क्षत्रियों में यह अपमानजनक व्यवहार कन्या पक्षवाले न सहने की इच्छा से कितने कन्या-वध कर डाले और कितने कर रहे हैं। इसी अपमान के कारण कन्या के उत्पन्न होने पर इतनी उदासी, मानगी और महाहानि समझकर कन्या की माता को दूध पैदा करने वाले पुष्टि कारक खाद्य. पदार्थ तक नहीं देते। और सब परिवार बैठ कर रोते हैं कि चाहते थे पुत्र और हो गई कन्या। पुत्र के पैदा होने पर गाना बजाना तमाशा आदि उत्सव मनाते हैं। कन्यापक्षवालों का अपमान करने वाला एक और भी दहेज रूपी राक्षस कन्यावध कराता है। दहेज पूग न देने के कारण हमारे बहुत से सरयूपारी ब्राह्मण कन्यादाता के द्वार पर खटिया उलट कर लेटते हैं और उपवास करते हैं। इस दहेज के कारण १८ । * सरयूपारीणब्राह्मणवंशावली * और अपमान के कारण कन्यावध और हानि दोनों होती है। अतः विचारशील भाइयों को उचित है कि दहेज की ठहरौनी न करें। और कन्या पक्षवालों का मान करें। हमारे देश की एक उक्ति है। "साठ भूत समधी के लागा बावन लागा घर के, बत्तिस भूत बरातिन ल गा बाइस लागा बरके” देखिए एक भूत के लगने पर झूठी मूर्खता ओझाई होती है। जब इतने भूत सवको पकड़ते हैं तो कन्यापक्ष का अपमान क्यों न करें ? दहेज देकर अधिक गहना जेवर मँगाना, उत्तम वन मगाना भी कन्याविक्रय के समान ही है। जेवर मगाने की इच्छा से ही दहेज देते हैं। कितनं तो वही जेवर अपने पुत्र के विवाह में भी ले जाते हैं, कितने बैंच खाते हैं, कितनें तो जेवर बेंच डालते हैं कहला देते हैं कि चोरी हो गई। यह सब व्यवहार कन्याविक्रय के बराबर ही है "न दहेज देना न जेवर मगाना" यह व्यवहार धर्मानुकूल है । दहेज की ठहरौनी एक प्रकार का पुत्रविक्रय है। जिस पुत्र के विवाह में दहेज का करार होता है वह पुत्र पितरों का श्राद्ध, तर्पण इत्यादि करने याग्य नहीं रहता क्योंकि वह पुत्र गाय, बैन इत्यादि के समान कन्या-पिता के हाथ बिक चुका है। कन्या-विक्रय और पुत्र-विक्रय बराबर समझा जाता है। प्रमाण "गोहन्ता देवभूहर्ता कन्याविनयकारकः । महापातकनो लोके चाण्डाला दधिकाऽधमाः” द्रव्य देकर खरीदी हुई चीज का दूसरा मालिक नहीं होता। अतः कन्या-विक्रय तथा पुत्र-विक्रय दोनों बराबर हैं। बेंची हुई कन्या और बेंचा हुआ पुत्र इन दोनों से जो सन्तान पैदा होते हैं वे भी पिण्डदानादि के अधिकारी नहीं होते। जब कन्या दूसरे के हाथ द्रब्य लेकर बेंची गई तो उनसे पैदा हुआ सन्तान अपने मातृकुल में मातामह प्रमातामह इत्यादि को पिण्डतपण दि नहीं कर सकता। उसी प्रकार कन्या का पिता दहेज देकर पुत्र को खरीद लिया तो वह भी पिता पितामह इत्यादि का श्राद्धतर्पण नहीं कर सकता। अत: विचार- शाल ब्रह्मणादि वर्गों को उचित है कि दहेज और कन्या विक्रय दोनों बन्द करा देवें। हमारे सरयूपारीणों में बालविवाह की प्रथा जोरों से नाश कर रही है। पहिले ब्रह्मचर्य पूर्वक साङ्गोपाङ्ग उपनयन वेदारम्भ- संस्कारानन्तर वेदाध्ययन करके गुरू की आज्ञा लेकर और गुरू से विद्या सफल करा कर विवाहादि संस्कार होता था "ब्रह्मचर्येण तपसा देवा मृत्युमुपाध्नत" इति श्रुतिः । अनभ्यासेन वेदानामाचारस्य च वर्जनात् । आलस्यादन्नदोषाच मृत्युर्विप्राजिघांसति ॥ भारतवर्ष में घोड़ा, ही,था ।
। * सरयूपारीणब्राह्मणवंशावली * ऊँट, गदहा, कुत्ता, बैल, पक्षियों के ब्रह्मचर्यपालन की प्रथा वर्तमान है। केवल मनुष्य का वालविवाहादि दोषों से ब्रह्मचर्य नष्ट होने पर अल्पायु आँख में चश्मा लगना, तपेदिक, गर्मी, सुजाक लकवा गठिया दुर्बल सन्तान पैदा करना इत्यादि अनेक रोग दोष पैदा होते हैं। अतएव सरयूपारीण ब्राह्मण भाइयो से प्रार्थना है कि कम से कम समयानुसार सोलह वर्ष के भीतर पुत्र का विवाह न करें, विवाह से तीसरे या पाँचवे वर्ष में वधूप्रवेश होने से ब्रह्मचर्य की व्यवस्था ठीक रहेगी । और कन्या का विवाह आठ से लेकर वारहवर्ष के भीतर होना नानाशाखसम्मत है। वाग्भट्टसंहिता में लिखा है कि "द्वादशाद्वत्सरा दूर्ध्वम पश्चात् समास्त्रियः । मासि मासि भगद्वारा प्रत्यैवातव स्रवत्' अत: रजोधर्म के पहले कन्याओं का ग्विाह हो जाना उत्तम धर्म है। रजोधर्म के बाद विवाह होने में वह युबतिदान है 'कन्यादान नहीं है। 'युवनीदान से जो सन्तान पैदा होते हैं वे भी पिण्डदानादि कर्मों के अधिकारी नहीं होते। अत: रजोधर्म के पहले कन्याओं का वित्र ह हाना परमधर्म है। वृद्धावस्था में विवाह भी अनर्थ कारक है। पुरुष को ४० चालीस वर्ष के ऊपर अपना विवाह न करना चाहिये। नहीं तो वह वृद्धविवाह कहा जाता है। व्यभिचारादि दोप बढ़ जाने से वर्णसङ्कर पैदा होते हैं। यदि कुलव्यवस्था चनाने वाली सन्तान न हो तो अपना हिस्सा एक किसी धर्मसंस्था में लगा देना चाहिये। वृद्धविवाह करके कुलाचार को भ्रष्ट करने से क्या लाभ होता है। अतः बालविवाह और वृद्धविवाह दोनों बन्द होना चाहिये। एक बात और है कि हमारे देश में गाँजा भाँग अफीम ताड़ी सुँचनी तम्बाकू इत्यादि जितनी मादक वस्तु हैं इन में पैसा खर्च करना महा अधर्म है तथा स्त्रियों के जेवर गहने इत्यादि में पैसा लगाना देश को चौपट करना है। त्रियों का धर्म है कुछ हिन्दी भाषा पढ़ कर रामायण वगैरह का पाठ करें. प्राचीन पतिव्रताओं का जीवनचरित पढ़ें, स्वच्छ वस्त्र पहिर्ने, खानपानादि में स्वच्छता रक्खें, सूत कातें और सिलाई का काम सीखें, वेला बूटा का काम सीखें, घर में तुलमी की स्थापना करके पूजा करें। छोटे बच्चे के हाथ पैर में जेवर पहना कर हाथ पैर की शक्ति को नष्ट करती हैं। बच्चों का हाथ पैर कमजोर हो जाता है। खियाँ जेवर के लोभ से नीचे और ऊपर दोनों जगह नाक कटा डालती हैं। कान में भी नीचे और ऊपर चार छ जगह वटाकर जेवर पहनती हैं। अपने हाथ पैर की शक्ति भी जेवर पहनकर ।
२० । है की है * सरयूपारीणवाझगवंशावली * कमकर देती हैं। और जेवर पहनने से शरीर में स्त्रियों के अनेक रोग उत्पन्न होते हैं। इसी रोग व्याधि के भय से बंगाल देश, महाराष्ट्र देश, गुजरात, तैलङ्ग, विलायत, अमेरिका, जापान इत्यादि देशों की स्त्रियों जेवर नहीं पहनतीं। सभ्यता से रह कर अपनी सन्तानों को भी शिक्षा देती हैं। हमारे देश का स्त्रियाँ वन की सफाई नहीं करतीं और बच्चों को भी गन्दा रखती हैं। केवल महरुआ से मिला हुई चाँदी, तांबे से मिला हुआ सोना, रांगा, कांसा, पीतल जो कुछ पाता हैं सब पहन कर घर के रूपये सोनार व्यापारी को दे कर घर को दरिद्र बनाती हैं। जलपान का ठिकाना नहीं परन्तु जमीन तक बेंच कर जेवर पहनती । अतएव एतद्देशीय स्त्रियों को उचित है कि दूर देश की लियों के समान जेवर का पहनना पाप व हानिकारक समझ कर परित्याग कर दें तभी देश की भलाई होगी। देश के ब्राह्मगों में परस्पर प्रीति उत्पन्न हो। हमारे सरयू गरीणों में तीन प्राणी तेरह चूल्हा, नौ प्राणी नव्वे चूल्हा कहावन । यह अन्याय नहीं तो और क्या है ? सरयूपारणों में सदाचारी सन्ध्यापासनसम्पन्न के हाथ का भोजन करने में क्या दोष है ? भोजन की एकता होने से प्रति भाव बढ़ता है । सग्यू नदी के उत्तरवासी ब्राह्मगों में कोई २ क्षत्रियों के घर जाकर स्त्रियों की बनाई पूड़ी साग खटाई अँचार और मछली इत्यादि घर भीतर खाते हैं तो अपने भाइयों का बनाया हुआ भोजन करने में क्या पाप लगता है ? धन्य है सरयूपार की ढकोसले बाजी संसार और शास्त्र से न्यारी। देखिये प्राचीन काल में ऋषि महर्षि लोग बड़े २ क्षत्रियादि सद्- गृहस्थों के घर जिस सभ्य जाते थे वहाँ पर गृहस्थ लोग तीन प्राणी १३ चूल्हा की कहावत के अनुसार नहीं चलते थे। किन्तु घर के अन्दर उपस्थित फल फूल दाल भात रोटी तरकारी बड़ा पकौड़ी से ही श्रद्धाभक्तियुक्त हो अतिथिमत्कार करते थे । उन्हीं की सन्तान सरयूपारीण भाइयों के घर चूल्हा चक्की डाल कर भाइयों का अपमान करते हुये एकता, प्रेम के एक सूत में बँधे हुये भाइयों को मध्यम, निकृष्ट सम्झ कर एकता का भण्डा फोड़ करते हैं। देखिये आजकल लोक में सरयूपारीण लोग कहते हैं कि हम विना विवाहादि किमी सम्बन्ध के दूसरे के घर, किसी के हाथ का भोजन नहीं करेंगे। यह कहते हुये भी मौसी के घर जाते * सरयूपारीणब्राह्मणवंशावली * हैं तो वहाँ सब प्राणियों के हाथ का बनाया हुआ भोजन करते हैं। साद के घर जाते हैं वहाँ भी सबका बनाया भोजन करते हैं। कहिए उन दानो जगह कौन सा सम्बन्ध है ? उन दोनों जगह बिना शास्त्रीय सम्बन्ध के भाजन करते हैं। यह कैसा अन्याय है ? अपने पूर्वज ऋषियों के सन्तान सरयूपारीणों का बनाया हुआ सरयूपारी न खायँ यह कितना बड़ा अन्याय और अधर्म है। हम लोग २६ छब्बिस ऋषियों के सन्तान हैं तो २६ ऋषियों का परम्पर बनाया हुआ भोजन करने में क्या पाप है और कहाँ लिखा है ? देखिये एक यह अन्याय कि पाँच सौ घर सरयूपारीण एकता करके आपस में विवाहादि संबंध करक संगठित व्यवहार आपस का ठाक करके मनमानी अपनी इच्छानुसार पंक्तिपावन की पताका लेकर घूमने लगे। अन्य भाइयों को पंक्तिटूट या धरकर या धाकर या नीच इन शब्दों से पुकारने लगे। श्रौतस्मात्तकमपरायण बेदवेदाङ्गवक्ता भी ब्राह्मण हो जिसमें पंक्तिपावन के लक्षण थयार्थ में पाये जाते हों उसे भी मध्यम व नीच की दृष्टि से आज कल देखते हैं। कहते हैं कि ये पंक्तिटूट हैं। शास्त्र तो इनको पक्ति टूट नहीं कहता परन्तु जो संगठितरूप मे आज कल अपनी प्रसिद्धि कर पात. पावनत्वेन सिका जमाये हुये हैं वे ही नाच पदवी से भाइयों का गला घोटतं हैं। जातिरेका हि विप्राणां क्रिया तत्र गरीयसी। यत्र यत्र क्रिया श्रेष्ठा तत्र तत्र कुलीनता ।। एक और भी अन्याय है-कहते हैं कि सरकार प्रान्त में रहनेवाले ब्राह्मण सरयूर राण उत्तम हैं। और सरयू नदी के दक्षिण दूरस्थान में रहनेवाले ब्राह्मण मध्यम हैं। सरवार प्रान्त में कन्या, पुत्र का विवाह करने वाले ब्राह्मग सरयूपाराण उत्तन हैं। सरवार से बाहर रहनवाल ब्राह्मणों के साथ विवाहादि करनेवाले सरयू मारीण ब्राह्मण मध्यम हैं इत्यादि । ऐसा कहने वालों को विचार करना चाहिये कि यदि उन्हीं ऋषियों के सन्तान होते हुये कलिकराल के दबाव से जीविकावश सरवार प्रान्त छोड़कर भारतवष ही में बसे हैं, समुद्र के देशों में नहीं गये हैं तो वे कैसे मध्यम हो सकते हैं ? अपने सदाचार कुलाचार के अनुसार २६ छब्बिस गोत्रवाले सरयूपारीण सब बराबर दर्जे के हैं। उत्तम मध्यम की कल्पना करना भ्रमूलक है। * यदि मनमाने ही उत्तम बनना है तो वेद, शास्त्र के पूण जा ने वाने बौलस्मात्तधर्मपरायण सदाचारी दो हजार चार हजार सरपूपारीण २२ * सरयूपारीणब्राह्मणवंशावली* । आपस में संगठन, दृढ़ प्रतिज्ञा (खानपानादि विवाह के लिये उत्तम प्रीति हो करके) मनुस्मृति में जो पंक्तिपावनों के लक्षण मनुभगवान ने कहे उनके यथाथ संघदित होने से हम लोग पाक्तपावन नहीं बल्कि महापंक्तिपावन का झंडा लेकर अपने को पंक्तिपावन मानने वालों के ऊपर खूब दबाव डालें तो क्या यह हमलोगों का अन्याय नहीं होगा ? वस्तु सरयूगरीण २६ गाववाले जिस किसी में पंक्तिपावन का लक्षण घटे वही पंक्तिपावन है। मनमानी पंक्ति भवन कोई नहीं बन सकता । यदि कहिये कि हमारे पितामह प्रपितामह वृद्धप्रपितामह पंक्तिगवन के लक्षण से सम्पन्न थे, हम उन्हीं के कुल के हैं तो पंक्तिभावन क्यों नहीं कहे जायं ता ऐसा भी कहना शास्त्रविरुद्ध है। क्योंकि पंक्तिपावनों का सरयूपारीणों में कोई कुल नहीं है। किन्तु मनुस्मृति के अनुसार जिन सरयूपारीण २६ गोत्र वालों में पंक्तिपावों के लक्षण घटें उन्हों को पंक्तिगवन कहते हैं। आज कल बहुत से मस्यू गिगों से यदि कोई पूछना है कि आप कौन ब्राह्मण हैं तो बड़े जोर से चौंक झिझक कर वारता का रस भर कर बोलते हैं कि "हम सोहगौरा के तिवारी अहीं जी, मामखोर के शुक्ल भहीं जी, पीड़ी के तिवारी अहीं जो, पिपरा के मिश्र अहीं जा" इतना कह कर बृहस्पति के चाचा बन बैठते हैं। विचार करना चाहिये कि सोहगौरा मामखोर पिपरा पाड़ी ये सब गाँव के नाम हैं। इन ग्रामों के रहने वाले यदि सर्वोपरि हों तो उन गाँवों के पशु पक्षी मिट्टी इत्यादि भी उत्तम कहे जा सकते हैं। डीह की प्रधानता इसलिये मान सक्ते हैं कि मामखोर इत्यादि गांवों में हमारे पूर्वजों का जन्म था उसी की शाखा हम हैं। कोई पूछता है कि आप कहाँ के शुक्ल हैं ? तो उत्तर देना चाहिये कि हम मामखार, साहगोग गाँव के शुक्ल व तिवारी हैं। अर्थात् हमारे पूर्वजों का जन्म उसा गाँव में हुआ था। ग्रामों का नाम पिपरा, मामखोर. सोहगौरा । कोई वेद या धर्मशास्त्र नहीं है कि उस प्राम के रहने वालों को उत्तम बना दे। किन्तु श्रतिस्मृतिपुराणप्रतिपादित चिरन्त नसदाचार-उपासनाकाण्ड-कर्मकाण्ड-ज्ञानकाण्डोक्त वेदविहित- कर्मानुष्ठान करने वाला ही उत्तम सरयूपारण ब्रह्मा है । अत एव २६ गोत्र वाले सव सरयूपार ण ब्राह्मणों का सब सरयूपारीणब्रह्मणों के साथ भोजन, विवाह का व्यवहार होना कुलाचारमयोंदा से विरुद्ध नहीं है। और शास्त्र का भी कोई विरोध नहीं है। इस विषय में जिसको कुछ ४ * सरयूपारीणब्राह्मणवंशावली * शंका उत्पन्न हो पत्रद्वारा या प्रत्यक्ष आकर हम से शास्त्रार्थ कर सकते हैं। शास्त्रार्थ करने के लिये हम स्पष्ट सूचना या घोषणा करते हैं। हम आशा करते हैं कि मेरे इस उद्दण्ड व सप्रमाण लेखको सरल हृदय से ग्रहण करके टूटे फूटे सब साधारण सरयूपारीण भाइयों को मालाकार. वत् एक सूत्र में खानपान विवाहादि व्यवहार से बांधकर कल्पित उत्तम मध्यम व्यवहार को छोड़ कर समान व पवित्र दृष्टि से छिटके भाइयों को मिलाने का प्रयत्न करेंगे। और पूर्वोक्त प्रमाणों से हमलोग किसी की शाखा उपशाखा नहीं है किन्तु स्वतन्त्र सरयूपारीण ब्राह्मण सृष्टि के समय से ही गर्ग वशिष्ठादि ऋषियों की सन्तान हैं। ब्राह्मणोत्पत्ति-मार्तण्ड नामक ग्रन्थ में जो सरयूपारीणोत्पत्ति लिखी है वह बिलकुल प्रमाणशून्य मिथ्या है, किसी पुराणादि में लिखी नहीं है तथा अन्धगोलागूलन्यायेन "अन्धस्येवान्धलग्नस्य विनिपातः पदे पदे" न्यायेन रायबहादुर डाक्टर देवदत्त चारपानि पाण्डेय सरयूपारीण ने जो वंशावली लिख के छपाई है वह भी उत्पत्त्यंश में बिलकुल प्रमाण- शून्य होने से झूठी है। अतः भाइयों को विचार करना चाहिये कान्य- कुब्जों की कल्पितलीला पर । यह भी पता चला है कि उक्त पाण्डेय जी कान्यकुब्जों के मित्र भी थे। इस स्वतन्त्रता में इस पुस्तक को पढ़कर जिनको सन्देह हो वे इच्छानुसार हमसे शास्थार्थ कर सकते हैं । अभी तक सरयूपारीण ब्राह्मण वंशावली रायबहादुर देवदत्त पाण्डेय तथा और भी कई ऐक सञ्जनों ने जो छपाई है सो अन्धपरम्परा से प्रमाणशून्य तथा झूठी है। अतः इस पुस्तक में जो प्रमाण व व्यवस्था है सब सत्य । ३-घर-गर्ग १ गौतम २ शांडिल्य ३ (शुक्ल, मिश्र, तेवारी) १३-घर-पाराशर १ गालव २ कश्यप३ कौशिक ४ भार्गव५ भरद्वाज सावर्ण्य ७ अत्रि ८ कात्यायन ९ अङ्गिरा १० वत्स ११ शांकृत्य १२ जमदग्नि १३ कौडिन्य १ वाशिष्ठ २ उपमन्यु ३ मौनस ४ कर्ण ५ वर्तत ६ भृगु ७ अगस्त ८ कौसल्य ९ उदबाह, १० कृष्णात्रि, घृतकौशिक, गार्गेय, ये मिश्रित गोत्र हैं।
गोत्रप्रवरविवेकः। आर्यजातीयसंस्कृतौ गोत्रप्रवरपरिज्ञानं नितान्तमहत्वपरिपूर्णमङ्गी- कृतमास्ते। सनातनधर्मावलम्बिन्या आर्य जातेः संरक्षणकृते निर्धारितेषु चतुर्ध्वपि दुर्गेषु प्रथम गोत्रप्रवरपरि ज्ञानमेवास्ति, येन स्वस्वकुलपरम्परा- पवित्रतायाः संरक्षणं क्रियते । द्वितीयं किल रजोवीर्य शुद्धिमूलकं वर्णव्यव- स्थापनमवगन्तव्यम् , यत्र जन्मना वणे निर्धारणव्यवस्था स्वीकृता, तपः स्वाध्यायनिरतानां वेदशास्त्रतत्वमर्मज्ञानां तत्रभवतां भूसुराणां नेतृत्वेन समाजमश्चालनपद्धतिश्च निर्धारिता वर्त्तते । तृतीयमाश्रमधर्मव्यवस्थापन- मवधेयम् , येन हिन्दुजातिरियं सुव्यवस्थितरूपेग धर्ममूलकं प्रवृत्तिमार्ग- माश्रयन्ती निवृत्तिमार्गस्य परां काष्ठां प्राप्य परमानन्दमनुभवति । चतुर्थ किल सतीत्वमूलकनारीधर्मसाहाय्येन हिन्दुजातिपवित्रतापरि- रक्षणम् । आर्य जातिरक्षकेषु चतुष्वपि दुर्गेषु गोत्रप्रवरविज्ञानं नाम प्रथम दुर्म कीदृशमावश्यकमिति नूनं विवेचनीयमवगम्यते । सम्प्रति तत्प्रकाश- नमप्यत्यावश्यक प्रतिभाति । मोत्रप्रवरमाहात्म्यमजानन्तो राजनीतिज्ञमानिनः केचन पुरुषपुङ्गवाः प्रजावर्ग विपथी कुर्वन्तो विलोक्यन्ते। अज्ञानान्धतमसे निमनाच ते प्रवरान् विस्मरन्तः समोत्र विवाह मपि विधानद्वारा परिचालयितुम- च्छन्ति । महायुगमन्वन्तरादीनां का कथा, कल्पमहाकल्पादिसृष्टि- प्रारम्भत एव गोत्रप्रवरसम्बन्धेनेयमार्यजातिः सुसम्बद्धा विद्यते । ब्रह्मणः समुत्पत्तिसमयानन्तरं तदीयमानसपुत्ररूपतः प्रादुर्भूतेभ्य ऋषिभ्य एवं गोत्रप्रवरविचार आर्यजातिषु प्रवर्त्तमानो निभाल्यते। गोन प्रवरमाहा. म्येनैव हिन्दु जातिरियं सृष्टिकालत इदानीं यावत् स्वरूपे तिष्ठन्ती जीवति । तत्कालादिदानी यावत् संख्याताता जातयः समुत्पद्यमाना गोत्रप्रवरसम्बन्धशून्याः कालकवलिता अभूवन् । दैवेषु जगत्सु विश्वास कुर्वन्त्याः, वर्णाश्रमशृङ्खलय सुरक्षिताया, गोत्रप्रवरपवित्रपरिपाटीमङ्गी- कुर्वन्त्याः, सनातनधर्मावलम्बिन्या आर्यजातेरस्तित्वरक्षणं दैवाधीन- मवधेयम् । यत्र मनुष्यजातौ वर्णाश्रमबन्धसम्बन्धो गोत्रप्रवरव्यवस्था च नास्ति, न तत्र नित्यपितृणामर्यमादीनामनुकम्पा भवितुमर्हति, न च तया बिना कापि जातिश्चिरं जीवितुं शक्नोति । वेदेषु, वैदिककल्पसूत्रेषु, स्मृतिषु, पुराणेषु चापि गोत्रप्रवरप्रवर्तकमहर्षीणां वंशपरम्पराया निर्देशो निभाल्यते । गोत्रप्रवरमर्यादयैव हिन्दुजातिश्चिराय सुरक्षिता तिष्ठति ।
. * सरयूपारीणब्राझणवंशावली * २५ धर्मशास्त्रेषु गोत्रप्रवरविज्ञानस्य प्रयोजनीयत्वं प्रायशः सर्वत्रैव प्रति- पादितं दृश्यते। समानगोत्रेषु समानप्रवरेषु च समान एव रक्तप्रवाहो विज्ञायते । यत्र कुत्रापि निवसत्सु समानार्षगोत्रसमुत्पन्नेषु द्विजश्रेष्टेषु एक एव रक्तप्रवाह इत्यत्र नाऽणीयानपि संशतिलशः। सुतरां धर्मकायंषु विवाहादिषु च गोत्रप्रवरविज्ञानमत्यावश्यकमिति सर्व एव धर्मशास्त्र- प्रवर्तको महर्षयः समामनन्ति । तथाहि भगवानापस्तम्ब :- धर्माधिकारः सर्वेषां गोत्रप्रवरहेतुकः। विवाहश्चेति मन्वानः प्रवरानाह सूत्रकृत् ।। गोत्रप्रवरविज्ञानं स्वधर्मफललिप्मुभिः । सम्पाद्यमाहुर्धर्मज्ञाः प्रत्यवायजिघांसया ।। इति । भगवान् शातातपोऽपि- आदौ गोत्रविशुद्धिः स्यात् ततः सप्तमपञ्चमम् । राशिकूटं ततश्चैव त्रेधा सम्बन्धलक्षणम् ।। इति । गोत्रविशुद्धिरसमानगोत्रत्वेन भवति । गोत्रमिति प्रवरस्याप्युपलक्षणं विज्ञातव्यम् । "ब्रह्मचारी वेदानधीत्य उपहृत्य गुरोरनुज्ञाता दारान् कुर्वीत असगोत्रान् मातुरसपिण्डान् ननिका तु श्रेष्ठा ।" इति गोभिल- गृह्यएत्रम् । अनागतातवा ननिका प्रोच्यते । मनुस्मृतावपि- असपिण्डा च या मातुरसगोत्रा च या पितुः । सा प्रशस्ता द्विजातीनां दारकर्मणि मैथुने ।। इति । योगी याज्ञवल्क्योऽपि- अरोगिणी भ्रातृमतीमसमानार्षगोत्रजाम् । पञ्चमात्सप्तमादूर्व मातृतः पितृतस्तथा ॥ इति । महर्षिासोऽपि स्नात्वा समुद्वहेत् कन्यां सवर्णा लक्षणान्विताम् । यवीयसी भ्रातृमतीमसगोत्रां प्रयत्नतः ।। इति । विष्णुधर्मोत्तरेऽपि- नैकगोत्रां च वरयेन्नैकायां च भार्गव । पितृतः सप्तमादूर्व मातृतः पञ्चमात्तथा । घरयेल्लक्षणोपेतां सदा लोकद्रयेच्छया ॥ इति । गृहस्थः सदृशी भार्या विन्देत अनन्यपूर्वा यवीयसीम्', असमान- प्रवरैर्विवाहः, अवं सप्तमात् पितृबन्धुभ्यो बीजिनश्च मातृबन्धुभ्यः - ! - २६ * सरयूपारीणब्राह्मणवंशावली * पश्चमादिति” महर्षिगौतमः। यवीयसी-वरस्यावस्थातः शरीरप्रमाणतश्च लध्वीमित्यर्थः। विस्तरभयात्प्रमाणान्तराणि नोपस्थाप्यन्ते । विवाहो नाम संस्कारविशेषजनिता क्रिया, तया च देवर्षिपितृसंवर्धन हिन्दुजातिलक्ष्यभूतमनुष्ठीयते ! न च सगोत्रायां वैवाहिको धार्मिकः संस्कारः समुत्पद्यते श्रुतिस्मृतिविरोधात् । ज्ञानतोऽज्ञानतोपि वा सगो- त्रायाः समानप्रवरायाश्च परिणयने को दोष इत्यधो निर्दिश्यते । तथाहि भगवानापस्तम्ब :- परिणीय सगोत्रां तु समानप्रवरां तथा । कृत्वा तस्याः समुत्सर्ग पालयेज्जननीमिव ॥ इति । महर्षिः शातातपोऽपि- समानगोत्रप्रवरां कन्यामूढबोपगम्य तस्यामुत्साद्य चाण्डालं ब्राह्मण्यादेव हीयते ।। कामाद् विवाहमात्रे वा प्रजाऽनुत्पादनेऽपि वा। तस्य चाण्डालवासः स्याद् व्रतं प्राणान्तिकं चरेत् ॥ इति । मदनपारिजातेऽपि- परिणीय समानप्रवरां तथा। त्यागं कृत्वा द्विजस्तस्यास्ततश्चान्द्रायणं चरेत् ।। इति । सगोत्रप्रवरां ज्ञात्वा गच्छंस्तु गुरुतल्पगः। चाण्डालमुत्पाद्य ब्राह्मण्या देव हीयते।। सगोत्रायां प्रजां जातां चाण्डालेषु विनिक्षिपेत् । गुरुतल्पव्रत कृत्वा तां रक्षेजननीमिव ।। इति त्रिकाण्डमण्डनः। स्मृत्यर्थसारेऽपि- यदि कश्चिज्ज्ञानतस्तां कन्यामूढ्वोपगच्छति । गुरुतल्पव्रताच्छुद्धिर्गर्भस्तज्जोऽन्त्यता व्रजेत् ॥ भोगतस्तु परित्यज्य पालयेजननीमि। अज्ञानादैन्दवैः शुद्धिखिभिर्गर्भस्तु काश्यपः ॥ इति । एवं हि चान्द्रायणातिकृच्छ्रप्रायश्चित्तं सगोत्रप्रवरायाः परिणयनमात्र एव, तदुपगमनापत्योत्पादनयोस्तु ब्राह्मण्यहानिरेवेत्यापस्तम्बः । त्याग- श्योपभोगधर्मकार्ययोर्नतु तस्या एव । अज्ञानतः सगोत्रादिषूत्पन्नानां जनकप्रायश्चित्तोत्तरं काश्यपगोत्रेण व्यवहारः कार्यो न तु त्यागः। ज्ञानतस्तु सगोत्रप्रवरायाम् उत्पन्नानां चाण्डालत्वमेव । तथाहि यमः- सगोत्रां तु - - २७ - * सरयूपारीणब्राह्मणवंशावली * आरूढपतितापत्यं ब्राह्मण्यां यस्तु शूद्रजः। सगोत्रोढासुतश्चैव चाण्डालास्त्रय ईरिताः ॥ इति । समानगोत्रप्रवरया कन्यया विवाहं कृत्वा ब्राह्मणो गुरुतल्पगप्रायश्चि- तादिना शुध्यति । ताशकन्यातः समुत्पन्ना सन्ततिश्चाण्डालतां गच्छति । अज्ञानतश्चेत्समानगोत्रप्रवरां कन्यां यदि कश्चिदुद्वति, तस्यां च सन्तान. मुत्पादयति, तर्हि विवाहकत्तु स्त्रिभिश्चान्द्रायणैः शुद्धिः सन्तानश्च काश्यप- गोत्रीयः स्यात् , काश्यपगोत्रेणोपनेयो भवेत् “सर्वेयं काश्यपी प्रजे" ति निर्देशात् । सुतरां समानगोत्रप्रवरासु कन्यासु भार्यात्वमेव नोत्पद्यते, तथात्वे तु सर्वश्रौतस्मातकर्मसु तदधिकाराभावः, विवाहसंस्कारस्य वैयापत्तिश्चेति गोत्रप्रवरविवेकोऽयमभिनवमाधवप्रोक्तबोधायनमतमनु- मृत्य बालानामपि सुखबोधाय प्रस्तूयते- ब्राह्मवर्षमानेनैकस्य ब्रह्मणः शतवर्षात्मकमायुः, तद्धि महाकल्पमभि- धीयते । ब्रह्मणो दिनमेकं कल्पम् इत्युच्यते । तत्र चतुर्दश मनवो व्यति- गच्छन्ति । श्वेतवाराहकल्पेऽत्र स्वायम्भुव-स्वारोचिषोत्तम-तामस-रैवत- चाक्षुषाख्याः षण्मनवो व्यतीताः । सम्प्रति बैवस्वतो मनुः । एकत्र कल्पे मनुसहशा इन्द्रा अपि चतुर्दश भवन्ति । तेऽपि षडतीताः। अस्मिन् वैवस्वतमन्वन्तरे पुरन्दराभिधान इन्द्रो वर्तते। एकस्मिन् मन्वन्तरे.परिवर्त्तमाने सर्वेऽपि देवा ऋषयः पितरश्च परिवर्तन्ते । अत्र मन्वन्तरे सप्तर्षिपदाधिष्ठिताः सप्त ऋषयोऽगस्तिश्चेत्यष्टौ गोत्रकृतः समाम्नाताः, विष्णुपुराणे तृतीयांशे प्रथमाध्याये वर्तमानमन्व. न्तरीयसप्तर्षीणां नामानि प्रोक्तानि । तथाहि- वशिष्ठः कश्यपोऽथाऽत्रिर्जमदग्निश्च गौतमः । विश्वामित्र-भरद्वाजौ सप्त सप्तर्षयोऽत्र तु॥ इति । श्रीमद्भागवतेऽष्टमस्कन्धे त्रयोदशाध्यायेऽपि- कश्यपोऽत्रिर्वशिष्ठश्च विश्वामित्रच गौतमः। जमदग्निभाद्वाज इति सप्तर्षयः स्मृताः ।। इति । वैवस्वतमन्वन्तरेऽत्र विश्वामित्रजमदग्निभरद्वाजगौतमात्रिवशिष्ठकश्य. पागस्तयो बौधायनादिभिगोत्रकृतः प्रकीर्तिताः। स्मृत्यर्थसारसंगृहीतः श्लोको यथा- जमदग्निर्भरद्वाजो विश्वामित्रात्रिगोतमाः। वशिष्ठः कश्यपोऽगस्त्यो मुनयो गोत्रकारिणः ॥ इति । । - २८ * सरयूपारीणब्राह्मणवंशावली * भृगुरङ्गिराश्चेति द्वौ वशिष्ठकश्यपादिवद् गोत्रकृतौ नोक्तौ । तत्कारणम् मग्रे वक्ष्यते । एतेषामगस्त्यष्टमानां मध्ये यस्यापत्यं ( सन्तानः ) ऋषित्वं ( मन्त्र- द्रष्टुत्वं ) भजते, तदपत्यं तस्य ऋषेर्गोत्रमिति बोधायनादिभिरभिहितम् । सप्तानाम् ऋषीणामगस्त्यष्टमानां यदपत्य तद्गोत्रमित्याचक्षते" इत्याश्वलायनसूत्रेऽपि प्रमाणितम् । “अपत्यं पौत्रप्रभृतिगोत्रम्" इति पाणिनीयसूत्रमपि व्याचष्टे । माधवस्तु- ऋषयो दश तेषां तु सन्ततावृषितां गताः। यज्ञे प्रतीयमाणास्ते प्रवरा इति कीर्तिताः ॥ इति । सप्तर्षयोऽगस्तिश्चेत्यष्टौ गोत्रकृतो मुनयः, भृगुर गिराश्चेति द्वौ मिलित्वा दश । एतेषां दशमुनीनां · सन्ततिपरम्परायां ये समुत्पन्नास्ते च यज्ञे प्रत्रीयमाणाः प्रवरा इति बोधायनादिभिरङ्गीकृताः गोत्रभूतस्य ऋषेः पितृपितामहप्रपितामहादय एव प्रवराः, पित्रादीनामपि मन्त्रकृतामेव प्रवरत्वमिति प्रवरदर्पणकारः। गोत्राणां तु सहस्त्राणि प्रयुनान्यर्बुदानि च । ऊनपञ्चाशदेवैषां प्रवरा ऋषिदर्शनात् ।। इति बोधायनमते ऊनपञ्चाशदेव प्रवराः सन्ति । तथाहि-शुद्धभृग वश्चत्वारः, जमदग्नयत्रयः, एते सप्त भृगुगणा भवन्ति । गौतमाः सप्त,- भरद्वाजात्रयः, शुद्धाङ्गिरसः सप्त, एते सप्तदश अङ्गिरोगणाः सन्ति । अत्रयश्चत्वारः, विश्वामित्रा दश, कश्यपास्त्रयः, बशिष्ठाश्चत्वारः, अगस्त- यश्चत्वारः। इत्यूनपञ्चाशत् प्रवराः कथिताः । प्रवरे एको वा, द्वौ वा, त्रयो वा, पञ्च वा, ऋषयो भवन्ति । न चत्वारो न षडाद्या भवन्ति । “एकं वृणीते, द्वौ वृणीते, त्रीन् वृणीते, न चतुरो वृणीते, न पञ्चाति घृणीते” इति श्रुतौ नियमितत्वात् । भृगुगणे यास्कस्य, विदस्य, आर्टिषेणस्येति त्रयाणां पञ्चायप्रवरः । अङ्गिरोगणे कौमण्डस्य, दीर्घतमसः, काक्षायणस्य, गर्गस्येति चतुर्णा पञ्चायप्रवरः । गर्गस्य ज्यायप्रवरोऽपि भवति । विश्वामित्रगणे पूरणाख्यस्य द्वयाः- यप्रवरः। शुनकानां वशिष्ठानां च एकार्षेयप्रवरः । इतरेषां न्यायप्रवर इति संक्षेपः। एक एव ऋषिर्यावत् प्रघरेष्वनुवर्तते । तावत्समानगोत्रत्वम् ऋते भृग्वाङ्गिरोगणात् ।। इति बोधायनः। - - * सरयूपारीणब्राह्मणवंशावली * अस्य भावार्थः-आङ्गिरसो भृगोश्चान्यत्र, भृग्व ङ्गिरोगणौ विहाये- त्वर्थः, इतरेषु प्रवरेषु एक ऋषिर्यावद् वर्तते तावत्समानगोत्रत्वं भवति । भरद्वा जो जमदग्निरत्रिविश्वामित्रो वशिष्ठःकश्यपोऽगस्त्यश्चेत्यष्टौ गोत्र- कर्तारः, भृगुरङ्गिराश्चापि द्वौ गोत्रकर्त्त वदवगन्तव्यौ । एवं दश गोत्रहवः समाम्नाताः। तत्र शुद्धभृगुगणं शुद्धाङ्गिरसं. च विहायेतरेष्वष्टसु गणेषु एकऋष्यनुवर्त्तने समानगोत्रत्वम् । भृष्वङ्गिरोगणयोस्तु एकऋष्यनुवर्तने- ऽपि न समानगोत्रत्वम् । यथाजमदग्निप्रवरे च भृगुरनुवर्तते, तथापि जमदग्नेः शुद्धभृगूणां च न समानप्रवरत्वम् , भृगोर्गोत्रकर्तृत्वाभावात् । एवं गौतमप्रवरेषु शुद्धाङ्गिरोगणेषु च अगिरोऽनुवर्त्तनेऽपि गौतमानां भरद्वाजानां शुद्धाङ्गिरसां च मिथा वित्रा होऽस्ति, अङ्गिरसा गावकर्तृत्वा- भावादिति । अपिच माधवीये- द्वधायसनपातान्न व्यायाणां करग्रहः । च्यायसन्निपातान्न पञ्चायकरग्रहः। भृग्वाङ्गिरोगणेष्वेवं शेषेष्वेकोऽपि वार्यत ।। इति । अस्य तात्पर्याों यथा-भृग्यङ्गिरोगणेषु वधूवरयोस्त्र्यायप्रवरयो- मध्ये द्वौ ऋषी यदि समानौ स्यातां तदा न विवाहः। पसायप्रवरयो- मध्ये व्यायसन्निपाते न विवाहः। भृष्वङ्गिरोगणेषु वधूवर प्रवरयोरर्धा- धिकऋषिसाम्ये न करग्रह इत्यर्थः। सुतरां व्यायप्रवरसन्निपाते ऋषि- द्वयसाम्ये न करग्रहः, पञ्चायसग्निपाते प्रवरस्थऋषित्रयसाम्येऽपि न करग्रहः । फलतः एकस्य पश्चार्जेयत्वे व्यायत्वे चे प्रवरस्थऋषीणाम् अर्धाधिकसाम्ये न विवाहः । अयं नियमो रङ्गिरोगणेषु बाद्धव्यः, इतरत्र एकऋषिसाम्यऽपि न करग्रह इत्यर्थः । एतत्सिद्धान्तसमर्थक प्रमाण माधवाये स्मृत्यन्तरेऽपि । तथाहि- पञ्चानां त्रिषु सामान्यादविवा हस्त्रिषु द्वयोः । भृग्वाङ्गरागणेऽवंबं शेषेत्रकोऽपि वारयेत् ॥ इति । बोधायनप्रदर्शिताः पूर्वोक्ताः के त ऊनपश्चाशत् प्रवरा इति निर्णी यते, तथाहि-यास्कार, मित्रयवः वैनाः, शुनकाश्चेति चत्वारः शुद्ध भृगवः यास्क मौन-मौक-वाधूल-संकृतीनां भागेववैतव्यसावेदसेति व्यायप्रवरः । वैनानां भार्गव-वैनपार्थेति व्यायप्रवरः। शुनकानां शौन- केति वा गार्समदेति वा एकायप्रवरः। भृगोर्गोत्रकर्तृत्वाभावाद् यास्कादिषु त्रिषु प्रवरेषु भृगोरनुवर्त्तनेऽपि न समानगोत्रता, व्यायेषु - सन्ति ।
* सरयूपारीणब्राझणवंशावली* त्रिषु प्रवरेषु ऋषिद्वयानुवर्तनाभावात् समानप्रवरताऽपि नास्ति । शुनकानां यास्कादिभित्रिभिन समानगोत्रता। अतो यास्कादीनां चतुणां गणानां विहाय स्वं स्वं गणमितरैत्रिभिर्विवाहो भवितुमर्हति । अत्र स्मृत्यर्थसार- वचनं यथा- यास्का मित्रयवो वैन्याः शुनकाः प्रवरैक्यतः । स्वं स्वं हित्वा गणं सर्वे विवहेयुः परस्परम् ।। इति । वत्सा विदा अर्टिषेणा इत्येते त्रयो जामदग्न्याः सन्ति । मार्कण्डे- यमाण्डव्यदार्भायणपौलस्त्यकाशकृत्स्नपाणिनिवाल्मीकि रजतवाहप्रभृतयो वत्साः। तेषां मार्गवच्यावनाप्रमानौर्वजामदग्न्येति पञ्चायप्रवरा भान्ति । विदप्रभृतीनां भार्गवच्यावनाप्नवानौर्ववैदेति पञ्चायप्रवराः। आर्टिषेण- प्रभृतीनां भार्गवच्यावनाप्रधानार्टिषेणेति पश्चार्षेयप्रवरा भवन्ति । एषु प्रवरेषु भार्गवच्यावनाप्रवानेति ऋषित्र यसाभ्येन "च्यायसन्निपातान्न पञ्चायकरग्रहः” इतिन्यायात् वत्सविदार्टिषेगानां त्रयाणां परस्परम- विवाहः । एतेषां स्वस्वगणैरितरगगाभ्यां च न विवाहः। एतेषां त्रयाणां पूर्वोक्तानां चतुर्णा भृगुगणानां च न समानप्रवरत्वं भृगोर्गोत्रकर्तृत्वा भावात् । इत्थं सप्त भृगवो व्याख्याताः। इदानी भृगुगणविवेचनानन्तरम् अङ्गिरोगणाः कथ्यन्ते । तत्र गौतमाः सप्तविधाः-आयास्याः, शरद्वन्तः, कौमण्डाः, दीर्घतमसः, करेणुपातयः, वामदेवाः, औशनसाश्चेति। तत्रायास्यगौतमानाम् आङ्गिरसायास्य- गौतमेति यायप्रवरः । शरवतगौतमानाम् आङ्गिरसशारद्वन्तगौतमेति व्यायप्रवरः । कुमण्डगौतमानाम् आङ्गिरसौचिथ्य काक्षावातगौतमको म- ण्डेति पञ्चायः प्रवरः। दीघतमागौतमानाम् आङ्गिरसौचिथ्यकाक्षीवात- गौतमदैर्घतमसेति पश्चार्षेयप्रवरा कारेणुपालगीतमानाम् आङ्गिरस- गौतमकारेणुपालेति यायप्रवरः। वामदेवगौतमानाम् आङ्गिरसवाम- देवगौतमेति व्यायप्रवरः। औशनसगौतमानाम् आङ्गिरसौशनस- गौतमेति यार्षेयः प्रारः । एषु सप्तसु प्ररेषु गोत्रकर्तुगौतमस्यानुवृत्तेः "एक एव ऋषिर्यावत् प्रवरेष्वनुवर्तते तावत् समानगात्रत्वम्" इति परिभाषया सप्तानामपि समानगोत्रत्वम् । अत एषां सप्तानामपि परस्परम- विवाह इति। अथ भारद्वाजास्त्रयः - शुङ्गा, गर्गाः, रौक्षायणाश्चेति । शुङ्गानाम् आङ्गिरसचार्हस्पत्यभारद्वाजेति व्यायप्रवरः। गणाम् आङ्गिरसबार्हस्पत्यभारद्वाजगायशैन्येति पश्चायो वा. आङ्गिरसगार्य- -- * सरयूपारीणब्राह्मणवंशावली * सैन्येति वा, आपस्तम्बमते भारद्वाजगार्यशैन्येति वा व्यायोऽपि वा प्रवरः। रौक्षायणानाम् आङ्गिरसबार्हस्पत्यभारद्वाजवान्दनमातवचसेति पञ्चार्षेयः प्रवरः । एषु त्रिष्वपि गोत्रकर्तु भैरद्वाजस्यानुवर्त्तनात् “एक एव ऋषिर्यावत्" इति परिभाषया त्रयाणामप्येतेषां समानगोत्रत्वादविवाहः । अन्यच्च-भरद्वाजगोत्रोत्पन्नेन शुङ्गाख्येन मुनिना विश्वामित्रगोत्रोद्भवस्य कतमुनिसुतस्य शैशिराख्यस्य मुनेर्भार्यायां तन्नियोगेनोत्पादितः शुङ्गस्य शैशिरेश्च सुतत्वाद् द्वयामुध्यायणत्वेन शौङ्गशैशिरिरिति संज्ञामलभत । अयं शौङ्गशैशिरिः भरद्वाजविश्वामित्रयोः सन्तानत्वाद् द्विगोत्रो भवति । अतः शौङ्गशैशिरिजातानां विश्वामित्रैर्भरद्वाजैश्च न विवाहः। मतान्तर- श्लोकोऽप्यालोच्यते । तथाहि- भारद्वाजाश्च कपयो गगो रौक्षायणा इति । चत्वारोऽपि भरद्वाजा गौत्रैक्यान्नान्वयुर्मिथः ।। इति । अस्मिन् अर्थे दीपिकायां- कपी प्रसिद्धावुदिताविह द्वौ स्वतन्त्र एकस्त्वपरोऽस्वतन्त्रः । कपेर्विवाह मिथो भरद्वाजकुलस्य चाहुः ।। इति । अस्वतन्त्रकपीनाम् भरद्वाजगर्गरौक्षायणैः सह न विवाहः । स्वतन्त्र- कपिगणस्य तु भवत्येवेति । अथ शुद्धाङ्गिरोगणाः सप्त-विष्णुवृद्धाः, कण्वाः, रथीतराः, हरिताः, मुद्गलाः, संकृतयः, कपय इति । तत्र विष्णु- वृद्धगणस्य आङ्गिरसत्रासदस्यपौरुकुत्से ति व्यायप्रवरः। कण्वगणस्य आङ्गिरसाजमीढकाण्वेति व्यायप्रवरः। रथीतरगणस्य आङ्गिरसवैरूप- रथीतरेति वा, आङ्गिरसवैरूपपार्षदश्चेति वा व्यायः प्रवरः। हरित- गणस्य आङ्गिरसाम्बरीषयौवनाश्वेति व्यायः प्रवरः । मुद्गलगणस्य आङ्गिरसभाम्यश्वमौद्गल्येति व्यायः प्रवरः। संस्कृतिगणस्य आङ्गि- रससाङ्कृत्यगौरिवीतेति व्यारेयः प्रवरः। स्वतन्त्रकपिगणस्य आङ्गि- रसामहीयोरुक्षय्येति व्यायः प्रबरः। तत्र विष्णुवृद्धकएवरथीतरहरित- मुद्गलानां पञ्चानां स्वतन्त्रकपिगणस्य च स्वं स्वं गणं हित्वा इतरैः सह विवाहोऽस्ति । संकृतयो द्वयामुध्यायणाः, कश्यपाः वसिष्ठाश्च । अतः संकृतीनां कश्यपैर्वसिष्ठैश्च विवाहो निषिद्धः। एवं हि गौतमगणाः सप्त, भरद्वाजगणास्त्रयः, शुद्धाङ्गिरोगणाः सप्तेति सप्तदशाङ्गिरसः सम्यगविवे. चिताः। अथ चत्वारोऽत्रयो निरूप्यन्ते-अत्रिः, गविष्ठिरः, बाहूदका, स्वतन्त्रस्य १ * सरयूपारीणब्राह्मणवंशावली * मुद्गलश्चेति । तत्रात्रीणाम् आत्रेयार्चनानसश्यावाश्वेति व्यायः प्रवरः। गविष्ठिराणाम् आत्रेयार्चनानसगाविष्ठिरेति व्यायः प्रवरः । बाहूदकानाम् आत्रेयार्चनानसबाहूदकेति व्यायः प्रवरः । मुद्- गलानाम् आत्रेयार्चनानसपौर्वातिथेति घ्यायः प्रवरः । एषु चतुर्ष अत्रेरनुवर्त्तनात् “एक एव ऋषिर्यावत्" इति परिभाषया सगोत्रत्वान्न विवाहः। वैश्वामित्रबीजादात्रेयक्षेत्र उत्पन्नत्वाद्धनञ्जयः शौङ्गशैशिरिवद् द्विगोत्रो भवति । अतस्तस्य सन्ततेश्च विश्वामित्रैरत्रिभिश्च न विवाहः । अथ च- अभ्रातृकां प्रदास्यामि तुभ्यं कन्यामलकृताम् । अस्यां यो जायते पुत्रः स मे पुत्रो भविष्यति ।। इति नियमपूर्वकं दत्तायामत्रिगोत्रकन्यायां वैश्वामित्रबीजादुत्पन्नत्वाद् वालरथ्यादयो द्वयामुष्यायणाः। तेषामपि विश्वामित्रैरत्रिमिश्च नान्वयः। एवं जातूकऱ्यांश्च द्वथामुध्यायणत्वाद् वसिष्टैरत्रिभिश्च नोद्वाह्याः इति । अथ दश विश्वामित्राः कथ्यन्ते---कुशिकाः, रौहिताः, रौक्थकाः, काम- कायनाः, अजाः, धनञ्जयाः, कताः, इन्द्रकौशिकार, अघमर्षणा, पूरणा- श्वेति । तत्र कुशिकानां वैश्वामित्रदैवरातौदलेति व्यायः प्रवरः। रोहि- वानां वैश्वामित्राष्टकरौहितेति व्यायः प्रधरः। रौवथ कानां वैश्वामित्र- रोक्थकरैवतकेति व्यायः प्रवरः । कामकायनाना वैश्वामित्रदेवश्रवसदैव- तरसेति व्यायः:प्रवरः। अजानां वैश्वामित्रमाधुच्छन्दसाजेति व्यायः प्रवरः । धनञ्जयानां वैश्वामित्रमाधुच्छन्दसधानञ्जयेति व्यायः प्रवरः। कतानां वैश्वामित्रकात्याक्षीलेति व्यायः प्रवरः। इन्द्रकौशिकानां वैश्वा- मित्रैन्द्रकौशिकेति व्यायः प्रवरः। अघमर्षणानां वैश्वामित्राघमर्षण- कौशिकेति ज्यायः प्रवरः । पूरणानां वैश्वामित्रपौरणेति द्वयार्षेयः प्रवरः । मा दशसु प्रवरेषु गोत्रकत्तुं विश्वामित्रस्यानुवर्त्तनात् 'एक एव ऋषिर्यावत्' इति परिभाषया सगोत्रत्वादविवाहः । अथात्र विशेषः कथ्यते-देवरातः पनसश्चेति द्वौ जामदग्न्यौ, विश्वामित्रेण पालितत्वाद् वैश्वामित्रौ चापि स्तः । अतस्तयोर्जामदग्न्यविश्वामित्रैश्च न विवाहः। तौ विहाय विश्वा- मित्राणां जमदग्नीनां च मिथो विवाहः । तथा च धनञ्जय वामरथ्य विहाय विश्वामित्रगणस्य अत्रिगणस्य च मिथो विबाहः। धनञ्जयवाम- रथ्यादीनां विश्वामित्रैरत्रिभिश्च न प्रिवाहः । मतादिकान् शौजशैशिरीन् कपिलांश्च विहाय विश्वामित्राणां भरद्वाजानां च मिथो विवाह इष्टः! अथ कश्यपास्त्रिविधा:-निध्रुवाः, रेभाः, शण्डिलाश्चेति । निध्रुवाणां काश्यपा- RAL memom * ভৰষুণৰীকান্ধলী * वत्सारनैध्रुवेति व्यायः प्रवरः। रेभाणां काश्यपावत्साररैभेति व्यायः प्रवरः। शण्डिलानां काश्यपावत्सारशाण्डिल्येति वा, काश्यपावत्सारासि- तेति वा शाण्डिल्यासितदैवलेति वा व्यायः प्रवरः! दैवलासितेति द्वथा- र्षेयप्रवरोऽपि वा। एषां त्रयाणां गोत्रकत: कश्यपस्यानुवृत्तेः 'एक एव ऋषिर्यावत्' इति परिभाषया समानगोत्रत्वान् मिथो नाऽन्वयः । शण्डिल- गोत्रस्य चतुर्थे प्रवरे कश्यपानुवृत्त्यभावेऽपि शण्डिलगोत्रस्य पूर्वोक्त. प्रवरत्रये कश्यपस्यानुवृत्तेविद्यमानत्वादनुवृत्तिरस्ति । अतस्त्रिविधानामपि कश्यपानां मिथो न विवाहः। अथात्र विशेष उच्यते, लौगाभिर्नाम कश्यपसन्तानो वसिष्ठेनोपनीतः अहर्वसिष्ठो रात्रौ कश्यपो जातः । उप- नयनं द्वितीयं जन्म, तस्य दिवा विहितत्वात् , निषेकः प्रथमं जन्म, तस्य रात्रौ विहितत्वात् । अतो लौगाक्षिगणस्य कश्यपैर्वसिष्ठैश्च न विवाहः । लौगाक्षीणां द्वयामुध्यायणत्वात् काश्यपावत्सारवासिष्ठेति वा वासिष्ठ- काश्यपावत्सारेति वा व्यायः प्रवरः । भिन्नगोत्रे ह्युपनीतस्याऽहरुपदेष्टू रात्रौ निषेक्तुरिति द्वषामुष्यायणत्वम् । अत एव निध्रुवरेभशण्डिललो. गाक्षीणां मिथो नान्वयः । तथा च प्रयोगपारिजाते ह्यापस्तम्ब :- कश्यपो रेभरैभौ च शण्डिलो देवलोऽसितः । संस्कृतिः पूतिमाषश्चावत्सारो निध्रुवो दश । गोत्राणि कश्यपगणाः, अन्योन्यं न करग्रहः । अस्याः-संस्कृतिपूतिमाषौ बोधायनसूत्रे शुद्धाङ्गिरोगणे कश्यपगणे च पठितौ । आपस्तम्बसूत्रे वसिष्ठगणे पठितौ। अतस्तयोरशुद्धाङ्गिरोभिः कश्यपैर्वसिष्ठेश्च नान्वयः। लौगाक्षिगण आपस्तम्बे पठितः । तथाहिः अनष्टयोऽराकुलयस्तातयो शैराश्च क्षीरजाश्चापि वाहवस्तदनन्तरम् ।। तथा चाशुचयः प्रोक्तास्सरन्ध्रयो राजसेवकाः । खापुलिङ्गाश्च लौगाक्षिस्तथैव शरदम्बराः ।। एते त्र्ययोदश प्रातर्वसिष्ठा निशि कश्यपाः। गायत्रीयोनिसम्बन्धावङ्गीकृत्य तेषां गोत्रद्वयं मुक्त्वा वसिष्ठं कश्यपं तथा । सर्वत्रापि विवाहः स्यादिति वेदविदो विदुः। अस्यार्थः-त्रयोदशानामेतेषां गायत्रीसम्बन्धादहसिष्ठत्वं, योनि- सम्बन्धान्निशि कश्यपत्वम् । तेषां वसिष्टैः कश्यपैश्च नान्वय इति । अथ वसिष्ठगणाः कथ्यन्ते-केवलवसिष्ठाः, कुण्डिनाः, उपमन्यवा, पराशराश्चेति । राजवारयः। प्रवर्तकाः॥
३ . * सरयूपारीणब्राह्मणवंशावली * तत्र केवलवसिष्ठानां वासिष्ठेत्येकाणेयः प्रवरः। कुण्डिनानां वासिष्ठ- मैत्रावरुणकौण्डिन्येति व्यायः प्रवरः। उपमन्यूनां वासिष्ठेन्द्रप्रमदाभर- द्वराव्येति व्यायः प्रवरः । पराशराणां वासिष्टशाक्त्यपाराशयेति व्यायः प्रवरः। एतेषां चतुर्णा गोत्रकत्तु वसिष्ठत्यानुवृत्तेः समानगोत्रत्वान्न मिथो विवाहः। जातूको विवाहात्पूर्वम् अत्रे पुत्र्यां वसिष्ठवीर्योत्पन्नाः । कन्यकानां दानेनान्यगोत्रं, दानाभावे जनकगोत्रमेव । अतो जातूकर्ण्यः अत्रिगोत्रो वसिष्ठगोत्रश्चेति द्वयामुध्यायणः, अतस्तत्सन्ततेस्तस्य च वसिष्टेत्रिभिश्च न विवाहः। अथेदानी चत्वारोऽगस्तयो निरूप्यन्ते-इध्मवाहाः, शाम्भ- वाहाः सोमवाहाः, यज्ञवाहाश्चेति। तत्रेध्मवाहानाम् आगस्त्यदाय: च्युतध्मवाहेतिघ्यायः प्रवरः। शाम्भवाहानाम् अगस्त्यदान्य च्युत- शाम्भवाहेति व्याय प्रवरः। सोमवाहानाम् आगस्त्यदायच्युतसौम- वाहेति व्यायः प्रवरः। यज्ञवाहानाम् आगस्त्यदायच्युतयाज्ञवाहेति व्यारेयः प्रवरः । एषां चतुर्णा गोत्रकर्तुं रंगस्तेरनुवृत्तेः समानप्रवरत्वात्समान- मुनिभूयस्त्वाञ्च न विवाहः इति । इत्थम् ऊनपञ्चाशत् प्रवरा बोधाय- नमतेन प्रदर्शिता अस्माभिः । एतेषां प्रत्येकस्यावान्तरगणविभागाः प्रवर- मञ्जरीप्रवरदर्पणादिषु द्रष्टव्याः। विस्तरभयानात्रास्माभिः प्रकाशिता इति । क्षत्रियाणां मनुगोत्रं, वैश्यानां च भालन्दनगोत्रमस्तीति निर्दिष्टम् । क्षत्रियवैश्यादीनां स्वस्वपुरोहितगोत्रप्रवरौ भवत इत्यपि व्यवस्थितम् । अयमेव' - द्वितीयपक्षो विज्ञानेश्वराधनुमतः। “स पुरोहितप्रवरस्त्येवं न्यायेन" इत्यापस्तम्बोक्तेः। सर्वेषां क्षत्रियाणां मनुगोत्रत्वेन वैश्यानां भालन्दनगोत्रत्वेन च सगोत्रत्वाद् विवाहाप्रसङ्गः प्रसज्येत । तस्मात् क्षत्रियवैश्यादीनां पुरोहितगोत्रेणैव सगोत्रता सर्वसम्मता। अज्ञातगोत्राणां पुरोहितगोत्रम् , आचार्य ग.नं वा विज्ञेयम् । यत्तु "गोत्रस्य त्वपरिज्ञाने काश्यप गोत्रमिष्यते” इति, तदाचार्यगोत्रज्ञाने श्राद्धादिविषयमवधेयम् । गोत्राणां तु सहस्राणि प्रयुतान्यर्बुदानि च। ऊनपञ्चाशदेवैषां प्रवरा ऋषिदर्शनात् ।। इति बोधायनेन प्रवरगणे संख्या प्रोक्ता। किन्तु कात्यायनापस्तम्या. श्वलायनबोधायनसत्याषाढलौगाक्षिप्रभृतिश्रौतसूत्राणां मत्स्यादिपुराणानां च समालोचनेन गोत्रप्रवराणां गणसंज्ञास्वरूपसंख्याक्रम-प्रवरविकल्पादि- भिविसंवादो दृश्यते। अतोऽऽत्रास्मत्प्रकाशितां सर्वशास्त्रसम्मता गोत्रप्रवरसूची निभाल्य विवाहादिधर्मकार्यनिणयोऽनुष्ठातव्य इति ।
आश्वलायनापस्तम्बबोधायनकात्यायनलौगाक्षिसत्याषाढमत्स्योक्ताः प्रवरदर्पणकारदर्शिताश्च गोत्रप्रवरर्षयः । गोत्राणामने ग्रन्थप्रमाणविषये साङ्केतिकाक्षराणि लिखितानि तेषामाशयः निनभागे द्रष्टव्यः । woments प्रमाणग्रन्थाः लौगाक्षिः साङ्केतिक- लौ. प्रमाणग्रन्थाः आश्वलायन: आपस्तम्बः बोधायन: कात्यायन: साङ्केतिकं- आ. आप. बो. का. सत्याषाढ़ स. * सरयूपारीणब्राह्मणवंशावली * मत्स्यः म. संख्या गोत्रषयः प्र०स० प्रवरषयः आप. १ आगस्त्यः १ २ अगस्ति: अगस्तिः बो. ३ आगस्त्यः दायच्युतः माहेन्द्रः ऐध्मवाहः मायाभुवः ३ ३ आगस्त्यः ४ अगस्त्यः अघमर्षणा जः म. बो. कौशिकः वैश्वामित्रः वैश्वामित्रः आघमर्षण माधुच्छन्दसः का. लो. आज:
संख्या गोत्रर्षयः प्र० स० प्रवरर्षयः आप. ३ ८ म. बो. ३ का. लो. आजमीढः आर्चनानसः आप्रवानः आष्टिषेणः आप्रवानः और्वः म. ११ का. लो. आयास्यः काण्वः श्यावाश्वः आनूपः जामदग्न्यः गौतमः पाराशर्यः ऐध्मवाहः श्यावाश्वः बो. म. आजमीढ़ः अत्रिः अनूपः अनवान: अयास्य:- अरुणपराशरः आगस्त्यः आत्रेयः आपस्तम्बः आपस्तम्छिः आयास्यः अष्टिषेणः आष्टिषेणः ३ १४ ३ का. बो.म. आङ्गिरसः आन्त्रयः भार्गवः च्यावनः भागवः च्यावनः आङ्गिरसः वासिष्ठः आगस्यः आत्रेयः आङ्गिरसः भार्गवः च्यावनः आङ्गिरसः भार्गवः च्यावनः भार्गवः भार्गवः वासिष्ठः वासिष्ठः आङ्गिरसः ३ * सरयूपारीणब्राह्मणवंशावली * भारद्वाजः १६ लौ. का. ३ शाक्त्यः दाढयच्युतः आर्चनानसः वार्हस्पत्त्यः आप्नावनः आर्टिषेणः आयास्यः आप्नवानः आर्टिषेणः आष्टिषणः वाध्यश्वः ऐन्द्रप्रमदः बो. बो. आप. म. आप. १८ १९ २० ३ ३ आनूपः गौतमः आनूपः आनूपः दैवोदासः आभरद्वसव्यः आश्वलायनः लो. का. आप. " बा. २२ २३ उच (त)थ्य: १ ३ औच (त) थ्यः औशिजः संख्या गोत्रर्षयः प्र०स० प्रवरर्षयः २४ उच (त) थ्यः आ. का. ३ आ. " २६ ३ उद्वाहा उद्दालकः उपमन्युः और्वः औशिजः म. बो. म. २८ २९ म. ३ कण्वः आप. बो. का. लो. म. २ आङ्गिरसः औच (त) थ्यः गौतमः आङ्गिरसः औच (त) थ्य: गौतमः औशिजः काक्षीवतः वासिष्ठः ऐन्द्रप्रमदः आभरद्वसव्यः आत्रेयः आचनानसः श्यावाश्वः वासिष्ठः ऐन्द्रप्रमदः आभरद्वसव्यः भार्गव: च्यावनः आप्तवानः और्वःजामदग्नयः आङ्गिरसः औशिजः काक्षीवतः आङ्गिरसः आजमीढ़ः काण्वः आङ्गिरसः आ (सा) महीयवः औरुक्षयः आङ्गिरसः घौरः काण्वः वासिष्ठः ऐन्द्रप्रमदः आभरद्वसव्यः आङ्गिरसः वार्हस्पत्यः भारद्वाजः वान्दनः मातवचसः काश्यपः आसितः दैवलः काश्यप: आवत्सार: नैध्रुवः काश्यपः आसितः दैवल (शाण्डिलः) काश्यपः आवत्सार: आसितः भार्गवः वैतहव्यः सावेदासः * सरयूपारीणब्राह्मणवंशावली * ३२ आ. म. काण्त्रः कर्णः ३ ३ ३५ म. कद्दमः म. बो. आप. कश्यपः ३ ३ ३ ३८ ३९ ४० आ. ३ ३ कश्यपिः संख्या गोत्रर्षयः प्र०स० प्रवरर्षयः ३ ४१ ४२ क्रतुः कात्यायन: म. म. लौ. का. आप.का. ३ ४४ बो. का. माहन्द्रः आ (सा) महीयवः कात्यः आप्नावानः आष्टिषेणः आर्टिषेणः आर्चनानसः दैवरातः वैतहव्यः ४५ ३ " ४६ आप. बो. आप. ३ ४७ ર ४८ ४९ आगस्त्यः आङ्गिरसः वैश्वामित्रः भार्गवः च्यावना भार्गवः आत्रेयः वैश्वामित्रा भार्गव काश्यपः वासिष्ठः आङ्गिरसः आङ्गिरसः वैश्वामित्रः वैश्वामित्रः वासिष्टः काविष्टिर: कावेपाव काश्यपिः काश्यपेयः कुण्डिनः कुत्सः * सरयूपारीणब्राह्मणवंशावली * ३ मायोभुवः औरुक्षयः आक्षील: आनूपः आनूपः श्यावाश्वः औदलः रैवसः नैध्रवः कौण्डिन्यः यौवनाश्वः कौत्सः औदलः कौशिकः पाराशर्यः श्यावावः भारद्वाजः म. बो. आ. आ. ३ ५२ ३ कुशिक: आप. बो. का. लो. मैत्रावरुणः आम्बरीपः मान्यात्रः देवगतः आघमर्षणः शाक्त्यः आर्चनानसः वाहस्पत्त्यः आप. ३ कृष्णपराशरः कृष्णात्रेयः कौण्डिन्यः बा.म. बो. आत्रेयः आङ्गिरसः संख्याः गोत्रर्षयः प्र०सं० प्रवरर्षयः ५८ आङ्गिरसः वाहस्पत्त्यः भारद्वाजः वान्दना मातवचसः का.ली. कौथय। कौथुमः कौशिकः गर्गः ५९ ६० ६१ " म. का. लो. को. " आ. आ. वाघुलः गायः शैन्यः गायः आनूपः वासिष्ठः काण्वः ६४ ६५ " गदभ्यः गर्दभीमुखः गर्दभः का. लो. का. ली. WWWWWWWKWKWRF वैश्वामित्रः आश्मरथ्यः आङ्गिरसः बार्हस्पत्यः भारद्वाजः शैन्यः आङ्गिरसः वार्हस्पत्त्यः भारद्वाजः गायः आङ्गिरसः शैन्यः भार्गव: च्यावनः आप्नवानः आष्टिषेणः काश्यपः आवत्सार: आङ्गिरसः आजमीढ़ः आङ्गिरसः घौरः काश्यपः आसितः शाण्डिलः आसितः आत्रेयः आर्चनानसः आत्रेयः गविष्ठिरः आत्रेयः आर्चनानसः वैश्वामित्रः गाधिनः भार्गवः वैतहव्यः * सरयूपारीणब्राह्मगावंशावली * आ. काण्वः ६८ (गर्दभीमुखः का. लो. म. ६९ का. लो. ७० गविष्ठिरः आप. वो. म. का. लो. ७१ दैवलः दैवलः पौर्वातिथिः पौर्वातिथिः गविष्ठिरः रैवणः रैवसः आप. आप. गाधिनः गार्गीयः ७४ संख्या गोत्रर्षयः प्र०सं० प्रवरर्षयः गायः ३ ७६ ५ कापिभुवः गायः गायः " " ३ बो. आ. बी. बा. गासमदः १ गार्दभ्यः ५ ७९ ८० ८१ ८२ भार्गवः च्यावनः आनूपः जामदग्नयः ५ का. लो. औदलः ३ ३ * सरयूपारीणब्राह्मणवंशावली * गृत्समदः आङ्गिरसः तैत्तिरः आङ्गिरसः बार्हस्पत्त्यः, भारद्वाजः शैन्यः आङ्गिरसः शैन्यः शौनकः गासमदः आप्नवान: आर्टिषेणः भार्गवः च्यावनः आप्नवानः और्वः वैश्वामित्रः दैवरातः भार्गवः शौनहोत्रः भार्गवः गासमदः गार्क्समदः काश्यपः आसितः आङ्गिरसः आयास्यः आङ्गिरस: औच (त) थ्यः आङ्गिरसः औच (त) थ्यः वासिष्ठः शाक्त्यः आत्रेयः आर्चनानसः आ. लो.का.म. गात्समदः ८४ २ लो. का. गोमिल: गौतमः ३ ३ ६ . ८८ दैवल: गौतमः औशिजः गोतमः पाराशर्य: पौर्वातिथि: ८९ ९० गौर पराशरः का. बो. म. बो. गौरिवीतः २ ३ आ. बो. ३ वैश्वामित्रकापातरस: आङ्गिरसः घौरः आङ्गिरसः वासिष्ठः भार्गवः च्यावत: काण्वः गौरवीतः ऐन्द्रप्रमदः आप्रवान: आव: का. लो. ३ ९२ घृतकौशिकः ९३ | घोर ९४ चान्द्रायणः ९५ ९६ च्यवनः ९७ जमदग्नि (वत्स) (अवत्सः) ९९ जातुकर्ण्यः १०० जातूकर्ण्यः सात्त्यः आभरद्वसव्यः जामदग्नयः ५ म. लो. का. म, " आमवानः २ ३ च्यावनः आत्रेयः जातूकयः म. बो. काः लो. आप. भार्गवः वासिष्ठः वासिष्ठः वासिष्ठः बासिष्ठः वैश्वामित्रः * सरयूपारीणब्राह्मणवंशावली * ३ आत्रेयः ऐन्द्रप्रमदः दैवरातः जातूकण्यः आभरद्वसव्यः औदला " का. लो. ३ बो. १०२ जाबाल १०४ जाबालिः १०५ १०६ १०७ / जामदग्न्या ३ ३ है वैतहव्यः रैवसः म. बो. भार्गव भार्गवः च्यावनः ५ आप्रवानः और्वः और । भागव: आप. m ३ नामदग्नयः संख्या: गोत्रर्षयः प्र०सं० प्रवरर्षयः आ. ३ का. लो. ३ १०९ / जैमिनिः ११० | दक्षः १११ / दत्तात्रेयः ११२ | दाढच्युतः ११३ | दालभ्यः भार्गवः आत्रेयः आत्रेयः बो. ३ का.लो. का.ल. " ३ ३ ३ ११५ | दिवावसिष्ठः ११६ दिवोदासा २१७ | दीर्घतमसः वो. वैतहव्यः गाविष्ठिरः आर्चनानसः दाव्यं च्युतः आम्बरीषः आम्बरीषः आवत्सारः वाध्रयश्वः औच (त) थ्यः काक्षीवतः गौतमः औच (त) ध्यः दैवरातः देवश्रवसः माधुच्छन्दसः माधुच्छन्दसा आवत्सारः आसितः शाक्त्यः सावेदासः पौर्वातिथि: श्यावाश्वः ऐध्मवाहा यौवनाश्वः यौवनाश्वः वासिष्ठः दैवौदासः दैर्घतमसः दैर्धतमसः औदलः दैवतरसः धानञ्जयः आघमर्पणः शाण्डिल्यः दैवलः पाराशर्यः * सरयूपारीणब्राह्मणवंशावल * आङ्गिरसः मान्धात्रः काश्यपः भार्गवः आङ्गिरसः आङ्गिरसः वैश्वामित्रः वैश्वामित्रः वैश्वामित्रः वैश्वामित्रः काश्यपः शाण्डिल: वासिष्ठः आ. ११९ / देवरातः आ.प. का. लो. आप.स. ३ १२० १२१ धनञ्जयः १२२ १२३ | धन्वन्तरिः १२४ १२५ / धूम्रपाराशरः बो. बो. बो. म.
संख्या गोत्रर्षयः प्र० सं० प्रवरर्षयः ३ काश्यपः आवत्सारः नैध्रुवः ३ का. लो. आत्रेयः १२६ निध्रुवः १२७ नैध्रवः १२८ पतञ्जनः १२९ पतञ्जल: १३० पराशरः १३१ | पाणिनिः १३२ ३ का. लो. बो. आप.बो. म. बो. स. का. लो. ५ आङ्गिरसः वासिष्ठः भार्गवः च्यावनः वैश्वामित्रः वैश्वामित्रः ३ आर्चनानसः आ (सा) महीयवः शाक्त्यः आप्रवानः और्वः माधुच्छन्दसः माधुच्छन्दसः पौर्णमासः वैन्यः याप्तवान: और्वः श्यावाश्वः औरूक्षयः पाराशर्यः जामदग्नयः घानञ्जयः आघमर्षणः पारणः पार्थः बैदः मायोभुवः ३ * सरयूपारीणब्राह्मणवंशावली* १३४ १३५ पार्थः १३६ पुलस्तिः ३ भागवः बो. बो. का.म. भार्गवः च्यावनः आगस्त्यः " ३ माहेन्द्रः म. पारण: १३७ १३८ पुलहः १३९ पौर्णमासः १४० पौलस्तिः १४१ पौलस्त्यः १४२ आगस्त्यः आगस्त्यः पाणमासः माहेन्द्रः लो. का. मायोभुवः म. भार्गवः च्यावनः आप्रवानः संख्या गोत्रर्षयः प्र० सं० १४३ / पौलस्त्यः १४४ पौलहः १४५ | विदः लो. का. म. म. ३ और्वः का. लो. प्रवरर्षयः भार्गवः और्वः आगस्त्यः माहेन्द्र भार्गवः च्यावन आपत्रान: भार्गवः च्यावनः आङ्गिरसः बाहदुक्थः आङ्गिरसः बार्हदुक्थः वासिष्ठः आत्रयः भार्गवः च्यावनः आपत्रानः आङ्गिरसः वार्हस्पत्त्यः भारद्वाजः आङ्गिरसः वार्हस्पत्त्यः भारद्वाजः आङ्गिरसः वार्हस्पत्यः ३ ३ ३ ५ का. नो. बो. जामदग्नयः मायोभुवः बैदः आप्रवानः गौतमः वामदेवः जातूकण्यः बैदः शैशिरः आत्मभुवः भारद्वाजः औबा शौङ्गः बृहदुक्थः १४८ १४९ / बोधायनः १५० बौधायनः १५१ भरद्वाजः १५२ भरद्वाजः १५४ भरद्वाजाग्निवेश्यः १५५ भागः भारद्वाज १५७ / भारद्वाजायनिः भारद्वाजायन: १५९ । भृगुः * सरयूपारीणब्राह्मणवंशावली * का. लो. ५ बो. आप. ३ आ. " ५ ५ भार्गवः च्यावनः आप्नवानः आङ्गिरसः वाहस्पत्यः भारद्वाजः श्रात्रेयः आचनानसः आवः जामदग्न्यः मौग्दल्यः शशिरः श्यावाश्वः ३ बो. बो. ३ लो. का. ५. भार्गवः आनवानः जामदग्न्यः संख्या: गोत्रषयः प्र०सं० प्रवरर्षयः ३ लो. का. म. और्वः १६० । भृगवः १६१ मयोभुवः १६२ | माण्डव्यः १६३ / माधुच्छन्दसा १६४ माध्यन्दिनिः १६५ मान्धाता बो. का. लो. बो. काश्यपः आगस्त्यः भार्वका च्यावनः वैश्वामित्र: वासिष्टः मान्धात्रः आङ्गिरसः आवत्सारः माहेन्द्रः आप्नवानः माधुच्छन्दसः मैत्रावरुणः आम्बरीषः आम्बरीषः नैध्रुवः मायोभुवः जामदग्न्यः স্বাভ: कौण्डिन्यः यौवनाश्वः यौवनाश्व आ. ३ ३ . " ३ * सरयूपारीणब्राह्मणवंशावली * नैध्रुवः म. बो. आवत्सारः आप्तवानः और्वः ५ १६७ मान्धातुः १६८ मारीचः १६९ मार्कण्डेयः १७० माहुलः १७१ / माहुलिः १७२ मित्रयुः १७३ | मित्रावरुण: जामदग्नयः ३ साहुला ३ काश्यपः भार्गवः च्यावनः वैश्वामित्रः आत्रेयः भार्गवः वासिष्ठः आङ्गिरसः आर्चनानसः बो. बो. का. लो. म.आ. बो, वाघ्यवः मैत्रावरुणः माहुल. श्यावाश्वः दैवोदासः कौण्डिन्यः मौग्दल्यः पौर्वातिथि: रैभ्यः आत्रेयः भायंश्वः आर्चनानसः आवत्सारः १५६ मैत्रेयः ४५ का. काश्यपः संख्या: गोत्रर्षयः प्र०सं० प्रवरर्षयः १७७ / मौग्दल लो. का. लो. का. ३ २ वैतहव्यः भायेश्वः सावेदासः मौग्दल्यः कौण्डिन्यः जामदप्रयः लो. का. २ मैत्रावरुणः भार्गवः आङ्गिरसः वासिष्ठः भार्गवः च्यावनः वासिष्टः भार्गवः आप. ५. आपवानः और्वः १८० मौग्दल्यः १८१ यज्ञवल्क्यः १५२ यस्कः याज्ञवल्क्यः १८४ / याज्ञवल्क्या म. सावेदासः ३ १ ३ आप. आप. का. लो.बो. आप. वासिष्ठः वैश्वामित्रः भार्गवः आङ्गिरसः आङ्गिरसः * सरयूपारीणब्राह्मणवंशावली ३ का. लो. ३ वैतहव्यः वासिष्ठः ऐन्द्रप्रमदः देवरातः वैतव्यः वैरुपः वैरुपः राहूगण्यः गौतमः गधिनः आवत्सार आवत्सारः " १८६ यास्क: १८७ रथीतरः १८८ १८९ रहूगणः १९० रहूगणः १९१ रेणुः बो. आभरद्वसव्या औदलः सावेदासः रथीतरः पार्षदश्वः गौतमः शारद्वन्त: रैणवः रेभ्यः बासिष्ठः ३ २ बो. आ. का.आप.आ. बो. आंगिरसः वैश्वामित्रः ३ ३ ३ काश्यपः १९३ । लोगाक्षिः गोत्रर्षयः प्र०सं० प्रवरर्षयः 6 १९४ लौगाक्षिः ३ आवत्सार का.लो. का. लो. औच (त) थ्यः वासिष्ठः गौतमः जामदग्न्यः जामदग्यः १९६ वत्सः आप. आप. ३ ५ औवः आप्रवानः और्वः वसिष्ठः आ..म. बो. काश्यपः आंगिरसः भार्गवः भार्गवः च्यावनः वासिष्ठः वासिष्ठः भार्गवः भार्गवः च्यावनः १९८ १९९ १ ३ म. वात्सायनः ३ आत्रेयः और्वः आप्रवानः जातूकर्ण्यः जामदग्न्यः जामदग्न्यः ५ आप. बो. बो. का.लो. औः * सरयूपारीणब्राह्मणवंशावली * " बात्स्यः ३ २०१ २०२ २०३ २०४ २०५ २०६ २०७ २०८ का. लो. भार्गवः आंगिरसः मान्धात्रः काश्यपः च्यावनः आम्बरीषः आम्बरीष: आवत्सारः आप्तवानः यौवनाश्वः यौवनाश्वः नैध्रुवः लो. का. ६ का. ३ वात्स्यायनः भागवः च्यावनः आप्रवान: औः ५ ३ काश्यपः काश्यपः आवत्सार आवत्सारः जामदग्नयः शाण्डिल्यः दैवलः बो. ३ ४७ संख्याः गोत्रयः प्र०सं० प्रवरर्षयः ३ २११ वात्स्यायन: २१२ वाच्यः आसितः दैवलः बा. बो. आप. आ. बो. ३ ३ आप. देवोदासः सावेदासः बाहदुक्थः औदलः जामचन्मयः औवः २१५ | बाधूलः २१६ वामदेवः २१७ / वालखिल्यः २१८] वाल्मीकिः २१९ / वासिष्ठः २२० २२१ विदः २२२ २२३ विश्वामित्रः २६४ २२५ २२६ | विष्णुवृद्धः २२७ बो. बो. आप. बो. काश्यपः आवत्सार शाण्डिल्यः आसितः वाध्या भार्गवः वाध्रयश्वा भार्गवः वैतहव्यः आंगिरसः वामदेवः वैश्वामित्रः दैवराता भार्गवः च्यावनः आप्रवानः वासिष्ठः वासिष्ठः ऐन्द्रप्रमदः भार्गव च्यावनः आप्रवाना भार्गवः और्वः वैश्वामित्र: दैवरातः वैश्वामित्रः माधुच्छन्दसः वैश्वामित्रः आश्मरथ्यः आङ्गिरसः पौरुकुत्सः आशिरसः पार्षदश्वः * सरयूपारीणबामणवंशावली* ३ आभरद्वसव्यः और्वः वैदः जामदग्नयः औदलः लो.का. का, लो. बो. आजः का. म.ग्रा. का.लो. वाघुलः त्रासदस्यवः राथीतरः " गोत्रर्षयः प्र०स० प्रवरर्षयः आष. ३ वैतहव्या म. २२८ | वीतहरूपः २२९ २३०/ बेणुः २३१ वैन्यः २३२ | वैरूपः २ आ. बो. वो. बो. ३ ३ ३ ३ भार्गवः भार्गवः च्यावनः वैश्वामित्रः भार्गवः आङ्गिरसः आंङ्गिरसः आष्टादंष्ट्र: आङ्गिरसः शाक्त्यः काश्यपः २३४ आप. २३३ / शक्तिः का. लो. ३ आप्नवानः औषः गाधिनः वैन्यः वैरूपः पार्षदश्वः पार्षदश्वः आ (सा) महीयवः गौरवीत: श्रावत्सारः आवत्सार: आवत्सारः आसितः आसितः गौतमः * सरयूपारीणब्राह्मणवंशावली * था. सावेदासः जामदग्न्यः वैणवः पार्थः राथीतरः वैरूपः वैरूपः औरुक्षयः सांकृत्यः शाण्डिल्यः दैवलः आसितः दैवला दैवलः शारद्वन्तः वासिष्ठः आसितः २ ३ २३७ शाण्डिल ३ बो. काश्यपः काश्यपः ३ ३ आ.बो. १४२ शरदन्तः ३ वो. बो. का. बो. काश्यपः शाण्डिल्यः आङ्गिरसः काश्यप काश्यपः आवत्सार: आवत्सार संख्या गोत्रर्षयः प्र०स० प्रवरर्षयः आ. आप.म. आप. सांकृत्यः दैवलः २४५ शाक्त्यः २४६ शाण्डिल्यः २४७ २४८ शाण्डिलि २४९ / शिशिरः २५० शुङ्गशैशिरः २ ३ २ १ " बो. ३ आक्षीला आक्षीलः २९१ | शुनकः १ शाक्त्यः गौरूवीतः काश्यपः आसितः आसित दैवलः वासिष्ठः वैश्वामित्रः कात्यः आङ्गिरसः वाहस्पत्त्यः भारद्वाजः कात्त्यः गासमदः भार्गव शौनहोत्रः शौनका आङ्गिरसः वाईस्पत्त्यः आङ्गिरसा वाईस्पत्त्यः भारद्वाजः शौङ्गः आपत्सार: वासिष्ठः शाक्त्यः बो. आप. आ. वो. मो. ३ गार्समदः * सरयूपारीणामणवंशावली * १ २५३ " शृङ्गः २५५ शैशिरः का. लो. ५ ३ भारद्वाजः शैशिरः वासिष्ठः বায়হা: म. बो. म. बो.म. ३ २५७ श्यामपराशरः २५८ | श्वेतपराशरः २५१ सस्कृतिः २६० सास्कृत्यः २६१ । सावर्णिः का. लो. बो. आङ्गिरसः साकृत्या गौरवीतः लो.का. ५ भार्गवः च्यावनः आप्नवानः औः जामदग्नयः बो. ५ " प्र०स० प्रवरषयः आ. ३ भार्गवः सावेदासः माहुल: संख्या योत्रर्षयः २६२ सावर्णिः २६३ साहुला २६४ सुवर्णरेतसः २६५ सोमवाहः २६६ | सोमराजका २६७ हरितः २६८ २६९ २७० हरितयः २७१ [ हरित्यः २७२ हिरण्यः ३ २ ३ ३ बो. आप. वैश्वामित्रः वैश्वामित्रः आगस्त्यः आङ्गिरसः आङ्गिरसः वैतहव्यः साहुलः कापातरस: दाढ्य च्युतः सौमराजः आम्बरीषः बाम्बरीषः वासिष्ठः बो. सौमवाहः गौतमः यौवनाश्वः यौवनाश्वः ३ मान्धाधः or का. लो. बो. * सरयूपारीणब्राह्मणवंशावली * १ ३ ३ ३ काश्यपः आत्रेयः आत्रेयः वैश्वामित्रः काश्यपः नैध्रुवः गाविष्ठिरः पौर्वातिथिः का. २७४ | हिरण्यरेतसः २७५ | होता आर्चनानसः गाविष्ठिरः हैरण्यरेतसः आवत्सारः २ बो. २ नैध्रुवः पूर * सरयूपारीणब्राझणवंशावली * अत्यावश्यक-धर्मशास्त्रकारों ने- असपिण्डा च या मातुरसगोत्रा च या पितुः । सा प्रशस्ता द्विजातीनां दारकर्मणि मैथुन । अर्थात् माता की असपिण्डा (मातृतः पञ्च-माता की पाँच पीढ़ी के भीतर की न हो)साथ ही पिता की असगोत्रा (पितृतः सप्त पिता की सात पीढ़ी के भीतर न हो (पिता के समान गोत्र की न हो) ऐसी कन्या से ही द्विजातियो को विवाह करना चाहिये । इसी प्रकार समान गोच प्रवर में भी विवाह सम्बन्ध नहीं करना चाहिये अन्यथा वह सम्बन्ध बड़ा ही गर्हित होगा इस प्रकार के वचन अनेक मिलते हैं। बड़ा ही खेद होता है कि आज इसका विचार विवाह के समय लोग नहीं करते । शास्त्रकार तो यहाँ तक लिखते हैं कि- आरूढ़पतितापत्यं ब्राह्मण्यां यश्च शूद्रजः । सगोत्रोढासुतश्चैव चाण्डालास्त्रय ईरिताः ।। अर्थात् समान गोत्रवाली विवाहिता में उत्पादित सन्तान चाण्डाल होती है। गोत्र तथा प्रवर का विचार एवं शालार्थ हमने स्वतन्त्र रूप से सङ्कलित कर दिया है जिससे विज्ञजन लाभ उठा सकते हैं। आज सम्पूर्ण भारत में अपनी सुविधा के अनुसार निवास करने वाले सरयूपारीण ब्राह्मणों की संख्या का पता लगाना पड़ा ही कठिन कार्य है। सन् १८९१ ई० की उत्तरप्रदेशीय शासन द्वारा एक तालिका सरयपारीण महासभा प्रयाग को मिली थी उसे हम प्रकाशित कर देते हैं। परन्तु इस वीच लगभग ७० वर्ष के भीतर यह संख्या कहाँ तक पहुँची होगी इसका अनुमान पाठकजन स्वयं करेंगे। साथ ही अन्य प्रदेशों की संख्या पृथक होगी। जिला संख्या লিকা संख्याः देहरादून २९१ बरेली २३५ मुजफ्फरनगर १०८ वदायूँ बुलन्दशहर शाहजहाँपुर २१८ मथुरा २०० कानपुर फरुखावाद बाँदा ५७३९२ इटावा १०४ इलाहाबाद ८०७ * सरयूपारीणब्राह्मणवंशावली* ५३ संख्या ઉપક संख्या २८ ७७१९६ १४६३४५ १२६३० १८५०८६ जिला जालोन बनारस जौनपुर बलिया बस्ती तराई उन्नाव सीतापुर खीरी गोंडा सुलतानपुर बारावी शहारनपुर मेरठ अलीगढ़ जिला पीलीभीत फतेपुर हमीरपुर झांसी ललितपुर मिर्जापुर गाजीपुर गोरखपुर आजमगढ़ लखनऊ रायवरेनी हरदोई फैजावाद बहराइच प्रतापगढ़ २५१ ६४ १५२३४१ २९९३६ २४१७९१ १०३७२८ १९३२ २३१४४ ५२७ १९९९३७ ४१३२२ १२३०३९ १९७९३२ १५५५३४ १८५६५ २५५ ६१५ mom मैनपुर २३९ पूर्णयोग- एटा १९०९२७७ विजनौर १२० उन्नीस लाख नौ हजार दो सौ मुरादाबाद सतहत्तर हमारे समाज में जिन ग्रामों अथवा स्थानों के नाम से वंशो की प्रसिद्धि है वे ही प्रास्पद कहे जाते हैं, जैसे मामखोर ग्राम के पुरातन निवास से मामखोर के शुक्ल आदि । यहाँ पर हम उपलब्ध वंशों आस्पदों तथा उनके गोत्रों की तालिका दे रहे हैं। शुक्ल वंश आस्पद अजनौरा गोत्र गर्ग गोत्र गर्ग अमचाना पाक्तेय भास्पद कनैल कुरमौल कोहाली गढ़ कौण्डिन्य गर्ग ककनाही ५४ * सरयूपारीणबामणवंशावली. गर्ग गंगौली पंक्ति चान्दागढ़ अकोहरिया उचहरिया " एकला पंक्ति गर्ग | जिनवा जंजन झौथा पंक्ति ढडोबा গান্ধী नगवा নী पारसडीह पिकौरा पिपरा पंक्ति वनकटा वन गाँ पंक्ति वरहुषिया कटार करञ्जही कोल्हुवा खखाइजखोर पंक्ति गौर धोरहटा पंक्ति पराशर गर्ग " " ८ छितहा " बसौड़ी पंक्ति छिलहर छिवरा पंक्ति जोरहरिया ठांडर तुकौलिया धरहर नमरहा नइफरिया वांसपार " परसा पंक्ति " परिगाँवा, पिछौरा बकवा बकरुया वनगाई बयपोखरि पंक्ति बभनी बहेरी बहिड़ा बागापार विलोड़ी बुड़हरी वेलौड़ी वेलपोखरि भरौलिया भेड़ी पंक्ति कृष्णात्रि मेलौजी गर्ग मझगवाँ पंक्ति महसों महरिया मलेन मुड़फेकरा मुड़ेरी पंक्ति रामनगर ". रुद्रपुर पंक्ति " छीछापार सथरी ५५ गौतम सरोष छोटा पंक्ति सत्यकर विहरा बुहट मामखोर *सरयूपारीणब्राह्मणवंशावली * गर्ग कटगैयों कपाल गौतम करीडीह कोटवा खरडरगाँव खेसी गाना पंक्ति गोषड़ौरा गौतम चकौडा पंक्ति " वशिष्ठ बेवा पंक्ति भखनौरा भादी भेलखा पंक्ति मगहरिया मामखोर पंक्ति मटियारा महुली महुलियार वत्स गौतम वत्स गौतम मेहरा " अघेता पंक्ति उमरी कविसा कारीगाँव पंक्ति कोहाली खेउसी खोली गैती गोपालपुर पंक्ति रुदायन लखनलोरि लखनौरा सरॉव बड़ा कौण्डिन्य वशिष्ठ सरदहा पंक्ति चकदहा ॥ गौतम चतरी कश्यप चम्पारन सियरापार सिरसा पंक्ति सुकरौटी सरदापार सिलहटा पंक्ति सुकलपुरी सुकरौली धमुखा पंक्ति गर्ग चमुभा ॥ " चचाई " कश्यप जिगिना वत्स पिपरा ढलिहा डोमराव पंक्ति गौतम दियावती घरममऊ मियवंश अखरचन्दा अमिहा गौतम वत्स " " मिसिरमऊ रतनपुर पक्ति ५६ * सरयूपारीणबामणवंशावली धौरहा पराशर वाँसगाव पंक्ति गौतम नगरहापयासी वत्स | विजरा वशिष्ठ पड़रहा कश्यप वेइसी गौतम पयासी पंक्ति वत्स भभया प्रमानिका भार्गव पंक्ति पिपरा गौतम गौतम | भैरवपुर फरियैयाँ मंझरिया पंक्ति भारद्वाज बखरियों मझौलिया पयासी पंक्ति वत्स वहोपुर वशिष्ठ | मधुवनी पंक्ति गौतम बनकटा पयासी वत्स महावन वसन्तपुर गौतम ममिआरी चारडीह मामखोर गर्ग छपिया पयासी पंक्ति वत्स पराशर टिउटा गौतम डुमरी पंक्ति घृतकौधिक धर्मपुरा घृतकौशिक सिसई सावण्ये धोती गाँव गौतम | ऐंदुरिया पंक्ति गौतम नगवा वत्स हरदिया घृतकौशिक नवापार वालेडीहा. गौतम नरईपुर पंक्ति पतिलाड पंक्ति कश्यप वेलडरा पयासी वशिष्ठ परसौनी वत्स भजया गौतम प्योली भरौलिया पंक्ति पिडियापयासी गौतम | भिटहा वत्स फरिया भौरहा भारद्वाज बधौरा पंक्ति मझौनी घृतकौशिक बढ़नी वशिष्ठ | मदियारी गौतम वनपखा पिपरा वत्स मठिया पंक्ति बस्ती पंक्ति वत्स परई पार पंक्ति मलपुरा पंक्ति बाजडीह महुई पंक्ति गौतम गौतम | रामपुर लगुनी तिलकपुर गौतम ब्रह्मपुर " गौतम मड़कढ़ा गर्ग गर्ग सिंहपुर पंक्ति | शाण्डिल्य भारद्वाज असमन पार उपमन्यु " * सरयूपारीणब्राह्मणवंशावलो* मार्जनी मधुवनी वशिष्ठ | वरौली मिश्रौलिया पंक्ति गौतम अड़सार रतमाला पयासी पंक्ति रायमऊ राल्ही कश्यप रेवली पयासी सुगौटी लमकुरा गौतमहत्यरवा पिपरा सोनाखार दीक्षित वंश- हथियाखार कीलपुर उपाध्याय वंश- ओझा वंश- खोरिया गौर ककुवा चौखरि पराशर खैरी जोरहरिया गर्ग निपनियाँ दषयों वेनुआँ टीकर नहफरिया मंगा मजावे गर्ग लगुनी पीपरडीहा पंक्ति आझोपली विष्णुपुर करेली मसौली निमेंज वारीगाँव लखिमा रामडीह हड़गड़ी हरजनपुर पकड़ी हरैया गजिपुरिहा द्विवेदी वंश- चिकनियाँ अमघा चौमुख पराशर कुचेला बेसवा-टोसवा भारद्वाज करेझ्या जयपुरा फोड़बरिया निपनियों शु.गर्ग | कंपनियों गुर्दवान " काश्यप कश्यप उपमन्यु " भारद्वाज | भैसदिया गर्ग भारद्वाज कृ०अ० गार्गेय गौतम पत्या द्वार ॥
५८ * सरयूपारीणनाझणवंशावळी * कश्यप वत्स मौनस । वत्सपार गर्ग ब्रह्मी ब्रह्मपुर कृष्णात्रि वेनौरा गौतम मझौवा पंक्ति महुलिया मीठावेल गर्ग रमलपुर पंक्ति गौतम लठियाही करण समदरिया भारद्वाज सभारी कश्यप सहुआ भारद्वाज सौरी रथ वर्ग गर्ग वत्स भारद्वाज गौतम भारद्वाज शाण्डिल्य छपवा कठकुओं कटुरिहा खरखदियां गौरा पंक्ति जलालपुर कोड़रिहा तिवती तेलौरा नकाही पंक्ति परवा बड़गों बड़ागाँव बरपार ब्रह्मसारी बेलवा मानघटी पंक्ति मरसडा मुडहा रजठा रुपहुलिया लेजुरिहा सरारि पंक्ति सझवा हड़गड़ी सिंगेला तिलसरा धाराधरी पंक्ति नीवी पड़रिहा पुंछेला बढ़यापार पंक्ति . " कपालग पंक्ति गौतम त्रिपाठी वंध- कश्यप अगोरी भारद्वाज उनवलिया पंक्ति भरहिया करवन पशि कपालगढ़ कसिहारी गौतम कुकुरगढ़िया वत्स सोहगौरा भारद्वाज कोल्हुवा कौहाली खमरौनी कश्यप गुरम्ही भारद्वाज गोंगिया गोन्डलिया परथरि चिउदहा चौका.पंक्ति भारद्वाज! चौधरी पट्टी काश्यप शाण्डिल्य भारद्वाज शाण्डिल्य * सरयूपारीणब्राह्मणवंशावली * ५९ शाण्डिल्य वत्स " शाण्डिल्य " चन्द्रौटा पंक्ति छितिउनी अतरौली उकिना कलानी कटियारी कान्धापार कोठा कौलिहा खजुली खोरमा गुरौली गोरखपुरिया चरणारि चेतिया पंक्ति चौरिहा चौसा छपरा जोगिया झकही दांडा पंक्ति शाण्डिल्य परतावल पंक्ति पीडी पुहिला पौरिहा वदरा वसन्तपुरा पंक्ति वसडाला झुनियों झुडिया, डारी डीहा वत्स डेहरासमार्जनी शाण्डिल्य तुरहापट्टी भार्गव दुगौलिया शाण्डिल्य देवरिया पंक्ति " भार्गव शाण्डिल्य भार्गव | धतुरा शाण्डिल्य धर्मपुर पंक्ति नदौनी निर्मोहिया वर्तन्त शाण्डिल्य नैनसार : नौसड़िया परसौनी पहिला पिपरपांति पंक्ति पुरैना वकिया डाइन वारी वशिष्ठ शाण्डिल्य बलुवा पंक्ति तिवारीपुर दीसापार देउरवा पंक्ति देवा धर्महरि धानी पंक्ति निदिया नेवास छोटाबड़ा वसावनपुर, वर्तन्त पाला शाण्डिल्य वांसगाँव विसुहिया बूढीवारी पंक्ति वेदौलिया भरवलिया सांकृत्य शाण्डिल्य कौशिक আত্তি नैया पार परसा पंक्ति ६० भरुहिया पंक्ति भार्गव भाटी भैंसहा " मकदूमपुर पंकि R मणिकण्ठ मदनपुर-पंक्ति मुजौना रणौली ग " रुद्रपुर पंक्ति A लोना पार" * सरयूपारीणब्राह्मणवंशावली * शाण्डिल्य इटिया गगं सेमरी रथवर्ग शाण्डिल्य सोनाई सोनौरी पंक्ति सोपरी सोदाचक शङ्कराचार्य दुर्गौलिया गजपुरीहा धुरियापार विष्णुपुर गर्ग मसौली कश्यप तुलापुर उद्वाह दलीपपुर सावये साङ्कृत्य धर्महरि প্তি शाण्डिल्य धवरहरा पति पाराशर नकद ঘাষ नदुला पंक्ति नाथपुर त्रिफला इटाढ़ी पंक्ति सावय भृगु | इमलडीहा वन्स शाण्डिल्य सेंवई सोनाला सोहगौरा पंक्ति साहरना सौरेजी शेकनहाँ चौमुखा नयपुरा सांकृत्य मसोंढ़ कश्यप हड़गड़ी तुकौलिया उद्वाह दुमटेकारी सावय सरया सितिया वारीडीहा विनवलिया पं० वेदुवा भठवा भरमहा भाटपार भार्गव पर सौनी भिटहा भाटी भौआपार मगराइच पंक्ति महुलवार माटे पंक्ति रखुवाखोर " भूग " " " लखनापार लोनाखार पंक्ति सिर्जम सिसवा " " वसन्तपुर पंक्ति ६१ वत्स भारद्वाज कश्यप सावण्य सांकृत्य शाण्डिल्य सावर्ण्य वत्स सावये वत्स । ककेदा बुढ़ परिया * सरयूपारीणब्राह्मणवंशावली धमौली पाराशर | मरिहा नई सांकृत्य! मचइयाँ नरहरिया सावर्ण्य अधुर्य्य नागचौरी वत्स | आसापुरी नाउर देउर सांकृत्य | भट्टाचारी परसिया कश्यप भयुरहा पिपरागौतम भारद्वाज, मझरिया बनहाँ वत्स मलाव वधवा सावर्ण्य | मैनलियाँ बड़हरिया कौण्डिन्य रकट वारहगाँव कश्यप सरया धामपुर सनफेरखा विनछनैया गौतम कोनी फरेंदा सावर्ण्य | चमरूपट्टी बतगैयाँ जोरवा भरद्वाज वशिष्ठ बशिष्ट खुदवा वारहशेनी पंक्ति तुरोया कश्यप वांसपार त्रिफला पंक्ति वत्स विष्टवल साहुकोल सिसई चतुर्वेदी (चौबे) वंश लहसड़ी कुसौरा कात्यायना सखरुआ एकौना सावय कटयाँ कोहड़ा पाण्डेय वंश- गुंडेगाँव अगस्तिया अगस्त चारपानी अष्ट कपाल अ० सा जगदीशपुर भटगवा पंक्ति गौ तरयापार मसमा सावर्ण्य सावर्ण्य टिकरा मेलौरा सांकृत्य शिला कश्यप | जामडीहपिछौरा कश्यप उद्वाह कश्यप सावण्य " सांकृत्य सावये सावर्ण्य पाराशर सावर्ण्य पराशर ६२ * सरयूपारीणबाझगवंशावली- " हरदही सांकृत्य | मगहरिया भरद्वाज मिनहरी वत्स सोनौरा धमौली पराशर | देउवापार पाठकवंश- बूढ़ीपार खरहटिया कश्यप लखनापार विजोर मसोढ़ इत्यादि सरयूपारीण ब्राह्मण कुल में ही पंक्तिपावन मिलते हैं जिनके सम्बन्ध में भगवान मनु ने तृतीयाध्याय में- अपात्योपहता पंक्तिः पाव्यते यैर्द्विजोत्तमैः । ताग्निवोधत कात्स्न्येन द्विजापान् पंक्तिपावनान् ।। इस श्लोक के द्वारा चर्चा की है। सरयूपार का ही अपभ्रंश सरवार शब्द से व्यवहृत होता है जिसके प्रमाणस्वरूप मत्स्यपुराण में- अयोध्या दक्षिणे यस्याः सरयूतष्टगः पुनः । सारवावारदेशोऽयं गौडास्तदनु कीर्तिताः॥ अर्थात् अयोध्या वही नगरी है जिसके दक्षिण भाग में सरयू नदी है, उससे सम्बद्ध भूखण्ड सरवार कहा जाता है, उसके, अतिरिक्त गौड़ देश गौड़ ब्राह्मणों की निवास भूमि है। सूरयूपारीणों में परम्परावश- गर्गश्च गौतमश्चैव शाण्डिल्यश्च पराशरः। सावयः कश्यपोऽत्रिश्च भरद्वाजोऽथ गालवः॥ कौशिको भार्गवश्चैव वत्सः कात्यायनोऽगिराः। शाकृतो यामदग्न्यश्च षोडशेते प्रतिष्ठिताः ।। कहीं पर-कौशिको भागवश्चैव वत्सो वात्स्यायनस्तथा। अङ्गिराश्च्यवनश्चैव यमदग्निश्च कहीं पर- गर्गश्च गौतमश्चैव शाण्डिल्यश्च पराशरः। सावणिः कश्यपो वत्सो भरद्वाजश्च कौशिकः ।। उपमन्युर्वशिष्ठश्च साकृतो घृतकौशिकः । गार्ग्यः कात्यायनश्चैव तथा स्याद् गर्दभीमुखः॥ अगस्त्यो भूगुभौ च कुण्डिन्यश्च तथैव हि। षोडश ।।
९ * सरयूपारीणब्राह्मणवंशावली * इस प्रकार प्रधान रूप से १६ गोत्रों की चर्चा मिलती है। परम्पराषश हमारे समाज में यह तीन तथा १३ का भेद चला आ रहा है। परन्तु आज ऐसा समय नहीं है कि हम अपने चतुर्वेदी, पाठक तथा उपाध्याय बन्धुओं को शुक्ल, मिश्र, त्रिपाठी आदि की अपेक्षा नीच ब्राह्मण कहें। ये सभी अपने २ ब्राह्मकर्मानुसार, आचारानुसार, विद्यानुसार योग्य हैं। सबका परस्पर व्यवहार उचित है । उच्चता तथा नीचता स्वकर्मानुसार ही बन सकती है। इसमें किसी प्रकार का प्रमाण नहीं कि ये ब्राह्मण जन्मना उच्च हैं और ये नीच हैं। अतः उस मूर्खतापूर्ण ईयां द्वेष के जनक व्यवहार को छोड़कर समान रूप से व्यवहार ही उचित है। गोत्रों के सम्बन्ध में गर्ग-इस गोत्र के लोग शुक्ल कहे जाते हैं, इनका यजुर्वेद, माध्यन्दिनी शाखा, कात्यायनसूत्र तथा आङ्गिरस, बाईस्पत्य, भारद्वाज, सैन्य, गाम्य, ये पाँच प्रवर हैं। इनका उपवेद धनुर्वेद, शिखा दाहिनी, पाद दाहिना एवम् उपास्य देवता शिव हैं। सरवार में इनके मूल स्थान- भेड़ी, मामखोर, बकरुआ, कराही, कनइल, मझगवाँ, महसों, बहेरी, बरहुचिया, लखनौरा में पांक्तेय तथा महुलियार, असौंजा, नगरहा, शुक्लपुरा में अपाक्तेय हैं। गार्य तथा गार्गेय भी इसी के अन्तर्गत हैं। इन स्थानों में भी बढ़ते बढ़ते एक गांव के कई भेद हो गये हैं जैसे- मामखोर से सीयर-खखाइजखोर, सराँव, रुदाइन, परसा, भन्टोली, छोटा सोराँव, कनइल, तनहा आदि । महसों से-मुंडेरा कैना, बसौढ़ी, कटारि, झौवा, रुद्रपुर, अकौलिया, खोरीपाकर, गोपालपुर, बेहरा, सिलहटा आदि। लखनौरा से--मेलावा, तुर्कहिथा, कसैला, हटवा, आमचौरा, वाईखोर, लोहरौली, जिगिना, जिगनी, सिटकिहा, गोवरहिया, झरकटिया, चिनगहिया, भादी, छोटकी, हथरसा, नवा- गाँव, पेंड़ो आदि । महुलियार से-वरहट, नेवारी, मुदफेकरा, नगरता गौरा, छीछापार, दीक्षापार, जरहरिया, तोरापार, ठांठर, बनगाई, फकाही, मलेंदद, इर्वहा आदि। गौतम-इस गोत्र में मिन तथा द्विवेदी लोग हैं। इनके शाखा सूत्र सभी शुक्लों के समान, इनके भाजिरस, बार्हस्पत्य तथा गौतम ये ६४ * सरयूपारीणब्राझणवंशावली. . . तीन ही प्रवर होते हैं। मिश्रवंश-वइसी, कारीडीह, मधुवनी, मटियारी, पिपरा, भी, वऊहीह, ममया, रापतपुर, जिनिना, मिश्रौलिया इन में पंक्ति तथा चम्पारन, पतिलाड, नरईपुर, बाँसगाँव, व्यहसी, चचाई, डलिहा, खदरा, हत्यरवा, भभया, वालेडीहा, कपिशा, खगपुर, रेउहा और भरसी में अपंक्ति। द्विवेदी लोगों के स्थान-वरपार, महुवा, बढ़यापार, गोपालपुर, गड़री, रजहटा, कांचनी, गुर्दवान, धनौली, मझौरा तथा लटियाई । इनमें पंक्ति नहीं होते। इन्हीं के गोत्र में सुरसती उपाध्याय भी आते हैं शाण्डिल्य-इसके दो भेद हैं १ श्रीमुख २ गर्धमुख । इनका सामवेद, कौथुमी शाखा, गोमिलसूत्र, उपवेद गन्धर्व, शिखा वाम, पाद वाम तथा देवता शिव हैं। शाण्डिल्य, असित तथा कश्यप ये तीन प्रवर होते हैं। यह गोत्र अधिकांशतः त्रिपाठी लोगों का है। श्रीमुख शाण्डिल्य गोरखपुर से सरया, सोहगौरा, झुड़िया, देउरवा, मलुवा, सिरजम, धानी, सोपरी, चेतिया और परतावल में पंक्ति हैं। इनके उपनाम राम, कृष्ण, नाथ, तथा मणि शब्द से सम्बद्ध व्याहत होते हैं। सरया, सोहगौरा, उनवलिया, अतरौली, रुद्रपुर, झडिया, बहुवारी मरुहिया, कोडा, वररा, मऊ, गहना, तुलसी, भलुवली आदि ग्रामवासी, रामशब्दान्त, वारीपुर, बसावनपुर, चुटिहा, बसडिला के निवासी कृष्णशब्दान्त, चेतिया, परतावल, मिलौनी तथा निगुहिया के निवासी नाथ शब्दान्त तथा देवरवा, पचरुखिया, धानी, हदी, बलुवा, बुढ़ियावारी, तलिवाबाद, बँधना, सिरजम, सेमरी स्थवर्ग, देवरिया, नरपखा, उद्धवपुर, हथिया परास, सुपरी, यमुना, कपरगढ़, गुरौली, सोनौरा, कुठौली, सिसवा, और लेदवा के निवासी मणिशब्दान्त नाम से पुकारे जाते हैं। कदहा, गोपीकान्ध, यंगेरा और घोड़नर ग्राम में भी शाण्डिल्यगोत्री तिवारी मिलते हैं। इनके प्रवर शाण्डिल्य, कौल्य तथा वाल्मीक हैं। देउरिया, खोरमा, गानौरा, नेवास, नकौझा, बुढ़िया- वारी, धतुरा, पाला, सेमरी, चौरा, गुरोली, हथियापरास में त्रिपाठी लोग हैं, जिनके शाण्डिल्य, असित एवं कश्यप ये ३ प्रवर हैं। इस गोत्र में जिरासों, लालमनि पिपरा, पड़रहा, कमित आदि प्रामवासी मिश्रवंश भी मिलते हैं।
६५ * सरयूपारीणब्राह्मणवंशावली * गर्धमुख शाण्डिल्य गोत्रवाले त्रिपाठी वंश के शाण्डिल्य, असित तथा देवल ये तीन प्रवर हैं। शेष सभी बातें श्रीमुख की तरह। इनका आदि स्थान नरौली कहा जाता है यहीं से पिण्डी स्थान भी सम्बद्ध है। अन्तर केवल इतना ही है कि नदौली के लोग नाथ शब्दान्त तथा पिण्डी के पति शब्दान्त नामों से कहे जाते हैं। इसी गोत्र में कीलपुर के दीक्षित लोग भी हैं परन्तु उनमें पंक्ति नहीं है। पराशर-इस गोत्र में पाण्डेय, उपाध्याय तथा शुक्ल मिलते हैं। शक्ति, पराशर तथा वशिष्ट ये तीन प्रवर हैं। सिलासत, वामपुरा, धमौली, सोहन हार ग्रामों में पाण्डेय, धनैती, नदुवा चौखरी में उपाध्याय, परसा, बूढा, परहंसा कन्तित तथा नगवा वरौछा में लोग रहते हैं। भरद्वाज-इस गोत्र के ब्राह्मणों में द्विवेदी, पाण्डेय, चतुर्वेदी, पाठक तथा उपाध्याय मिलते हैं। इनकी शाखा माध्यन्दिनी, सूत्र कात्यायन, शिखा दाहिनी, पाद दाहिना, वेद यजुर्षेद, उपवेद धनुर्वेद, देवता शिव तथा अङ्गिरस, बहिस्पत्य एवम् भारद्वाज ये तीन प्रवर हैं। द्विवेदी लोग मुख्यतः बड़गों, शरारि, बढ़या, रमवापुर, बरगदी, मझौवा, जलालपुर, बड़गैयाँ, पटवरिया, कुडवरिया, बेलवा, सारी, सेंधवा, टन्टनेवापुर, गुदमापुर, पारा, चरई पट्टी, विनवेदीवाले, लेजरुआ, बड़हरा, उचेला और छपहा में मिलते हैं। पाठक लोग सोनौरा, देउआपार, बूढीपार, विजौरा, गोपालपुर, मैसोना, मसोढ़, चापतारा तथा रहटौली में मुख्य निवास मानते हैं। उपाध्याय लोग खोरिया, हरैया, लखिना, खौरवरिया, पापरडाँड, राईमऊ, मोनिछ, जैयिहा, दुधौरा, रिवरहवा ग्रामों को अपना मुख्य मानते हैं। पाण्डेय लोगों में-सिसवा, पुरैना तथा कौसड़ ये मचैयों के अन्तर्गत हैं। बलुवा, पाचू मठियारी तथा पढ़गों के लोग अध्वर्यु (अधुर्य) कहे जाते हैं। 'बलुवा वावू और मलौली में इसी गोन के चतुर्वेदी लोग भी मिलते हैं। कश्यप-सामवेद, उपवेद गन्धर्व, कौथुमी शाखा, गोभिल सत्र, वामपाद, वाम शिखा, विष्णु देवता, कश्यप असित तथा देवल ये तीन प्रवर हैं। यह गोत्र पाण्डेय, दुबे, चौबे, उपाध्याय, मिश्र तथा ओझा लोगों का मिलता है। पाण्डेय डोग त्रिफला, वनगाँव, फरेदा, जगदीशपुर * सरयूपारीणब्राह्मणवंशावली. नाथपुर, विसनैया गौरा तथा नदुला में मिलते हैं। द्विवेदी लोग-काश्चनी (परवा कन्तित ) में मिलते हैं। चौवे लोग सोनवर्ष विष्णुपुर (नैपुरा कन्तित ) में, उपाध्याय लोग पकड़ी बरौली तथा भरसांड में तथा मिश्र लोग राढी मिश्रौलिया, परमेश्वरपुर तथा रमोली में मिलते हैं, इसी प्रकार ओझा लोग खैदी निपनिया, वितुवा टीकर, निमेज तथा ककुवा रजौली में मिलते हैं। अत्रि (कृष्णात्रि) गोत्र-वाले ब्राह्मणों का अग्वेद, उपवेद आयुर्वेद, शाकल्य शाखा, आश्वनायन सुत्र तथा अर्चि, अचनिनस एवं श्यावाश्व ये ३ प्रवर होते हैं। शिखा वाम, पाद वाम तथा देवता ब्रह्म है। इस गोत्र में केवल दुबे तथा शुल मिलते हैं। डुमरीगंज तहसील में डुमरिया के दुबे लोग एवम् पिछौरासत्यकर कन्तित में शुक्र लोग मिलते हैं। बत्सगोत्र-का सामवेद, उपवेद गन्धर्व, कौथुमी शाखा, गोभिल- सूत्र, वाम शिखा, वामपाद, विष्णु देवता तथा वत्स च्यवन-आप्रधान- और्व एवं जमदग्न्य ये पाँच प्रवर होते हैं। इस गोत्र में पाण्डेय, दुबे. मिश्र, तिवारी तथा ओझा लोग मिलते हैं। पाण्डेय लोग नागचौरी, वेलवा, सोनफेरवा, वनहा, परसिया तथा विठौला में मिलते हैं द्विवेदी लोग समदरिया, भरौली, बकुलारी तथा विमटी में मिलते हैं। मिश्र लोग मुख्यतया पयासी रतनमाला, नगरहा, वनकटा, करिहैया, मणिकटा, वाना, वेलौरा तथा दोगारि में मिलते हैं। पयासी में रतनमाला, भरवलिया, गोपालपुर, वीजापुर, जिगना, भिटहा, छपिया विजरा, कतरारी, बैरिया, परसिया, भुड़िसा तथा रानीपुरी है। बनवटा या नगरहा में-अधैला, संखुई, तिलकपुर सलेमपुर, रेवली तथा चैनपुर पड़ते हैं। करिहैयाँ में--करिहाँव, दियावाती तथा मेंहदायत हैं। इसी प्रकार मणिकढ़ा में खुदिया, वधौरा, चिमखा तथा बैनुवा है। गाना में-गाना, त्योंठा, बरवरिया, बैरिया तथा चकदहा सम्मिलित हैं। वेलौरा में-पानन, चिनरवा, बँधौरा, मझौलिया, सुलजागपुर तथा पकरिया सम्मिलित हैं। दोगारी में पंक्ति रहते हैं। कूड़ा गाजर, धुरियापार, विरई तथा पोहिला में इस गोत्र के तिवारी तथा कछुवा, रजौली तथा खैरी में ओझा लोग मिलते हैं। - * सरयूपारीणब्राह्मणवंशावली * अगस्त्य -इस गोत्र का यजुर्वेद, माध्यन्दिनी शाखा, उपवेद धनुर्वेद, शिखा दाहिनी, पाद दाहिना, देवत्ता शिव, सूत्र कात्यायन तथा अगस्त्य, माहेन्द्र एवम् मायोभुव ये ३ प्रवर हैं। मुख्यग्राम अगस्तपार है। इस में त्रिपाठी तथा पाण्डेय दो प्रकार के ब्राह्मण मिलते हैं। तकिया, धरहरा तथा धन्धवार में त्रिपाठी एवम् मौवापार, महसों तथा वेदौली में पाण्डेय मिलते हैं। वात्स्यायन-यह गोत्र केवल चतुर्वेदी-ब्राह्मणों का है। नैपुरा तथा कुसौरा ग्राम इनके मुख्य हैं। इसका वेद यजु, शाखा माध्यन्दिन, सत्र कात्यायन, पाद दाहिना, शिखा दाहिनी, देवता, शिव हैं। इनके विश्वामित्र, किल, कात्यायन ये ३ प्रवर हैं। साकृत-इस गोत्र में पाण्डेय, चतुर्वेदी तथा त्रिपाठी लोग आते हैं। सांस्कृत, साङ्ख्यायन तथा फिल ये ३ प्रवर होते हैं। शेष शिखा वेद आदि कात्यायन के समान है। पाण्डेय लोग मुख्यतः मला में, तिवारी लोग नारदेडर, मिलौरा सरया में मिलते हैं। चौबे लोग मौनापार, नगवा, उनवलि, देडगर, सरसैया, तेलियाडीह तथा सिधैया प्रामों में मिलते हैं। सावर्ण्य-इस गोत्र के लोगों का सामवेद कौथुमी शाखा गोभिल सूत्र, वाम शिखा, वाम पाद, विष्णु देवता तथा भार्गव, च्यवन, आमवान और्व, सावण्यं ये ५ प्रवर होते हैं। इसमें प्रायः पाण्डेय मिलते हैं। इनके इटारि, रैकहट, पट्टीदिलीपपुर, वंशीधरपुरवा, मझगवाँ, धार- पानि, लसेहरी, साहुकोल तथा भसमा ये मुख्यस्थान हैं। सखरुश्रा, इमली डांड, भरोसा के पटखपांडे, इन्द्रपुर, वारघाट, भट्टाधारी, जर वा सावर्ण्य तथा टिकरा के पाण्डेय भी इसी गोत्र के हैं। सिसैया के मिश्र भी इसी गोत्र में हैं। मार्गव-गोत्र केवल तिवारी लोगों का होता है, इनके स्थान भार्गवपुर, मदनपुर, सोदा चक्र, सिंहन जोरी, रखुवा खोर तथा चार इनके मुख्य स्थान है। भार्गव, च्याय, आप्रवान, और्व तथा जामदग्न्य ये पंच प्रवर हैं। शेष शिखा वेद आदि सावयवत् होता है। उपमन्यु-गोत्र के प्रशिष्ट, इन्द्रप्रमद तथा उपमन्यु ये ३ प्रवर होते हैं, शेष वेद आदि कात्यायन गोत्र की तरह होता है। ये प्रायः .
* अथ यज्ञोपवीतव्याख्या * सुकुलोपाधिकेनैव वेणीमाधवशम्मणा। यज्ञोपवीतसंस्कारस्तन्यते सुधियाम्मुदे ॥१॥ सज्जनास्तुष्टिमेतेन जातिदेशहितैषिणीम् । दुर्जना दौष्ट्यमाप्यास्यु गतिमें जगदम्बिका ॥२॥ मान्य महोदय ! हमारे इस देश में संस्कार की व्यवस्था बहुत ही हीन हो गई है। यज्ञोपवीत सभी द्विजवंशावतंस धारण करते हैं परन्तु यज्ञोपवीत के किस सूत्र में किस देवता का आवाहन होता है ? और किस प्रन्थि में किस देव का आवाहन होता है ? किस के आवाहन में कौन मंत्र है ? कौन विनियोग है ? प्राचीन यज्ञोपवीत का विसर्जन किस मंत्र से होता है इत्यादि विषयों को विना ठीक २ समझे यज्ञोपवीत को पहिनना ही निरर्थक है। केवल सत्रमात्र के धारण करने से क्या लभ होता है । सज्जनों ! हम लोगों के यहाँ १६ पोडश संस्कार होते | आज कैसी दशा आ गई कि तीन ताग सूत्र ग्रहण किये हैं परन्तु उसके स्वरूप को नहीं जानते। आलस्य के समुद्र में पड़े हुए अहो- रात्र व्यतीत करते हैं। प्रिय ब्रह्मसन्तानों ! जाति के अभिमान को छोड़कर जिससे उत्तम जाति बने हो उसपर दृष्टि दो मेरी यही प्रार्थना है। अङ्गुजी के किस पोर पर यज्ञोपवीत का चावा करना चाहिये इत्यादि समस्त बातें नीचे के लेख से समझिये। अङ्गुल्यने तु विप्राणम्मध्यपर्वणि भूभुजाम् । मूलपर्वणि वैश्यानां ब्रह्मसूत्रमिति स्मृतम् ॐ ॥१॥ गृह्यसूत्रम् । ॐ आपोहिष्टेत्यादिमन्त्रैय्यझोपर्वातम्प्रक्षाल्य १० दशगायत्रीमन्त्रैरमि- मन्त्रय तन्तु देवतानामावाहना कुर्यात् । प्रणवस्य ब्रह्मा ऋषिः परमात्मा देवता गायत्रीच्छन्दः प्रथमतन्तौ ॐ काराषाहने विनियोगः, प्रथमतन्तौ काराय नमः ॐद्वारमावाहयामि । अग्निन्दूतमितिमेधातिथि ऋषिर- निर्देवता गायत्रीच्छन्दो द्वितीयतन्तावन्न्यावाहने विनियोगः। द्वितीय- तन्तावन्नये नमः द्वितीयतन्तावग्निमावाहयामि । तृतीयतन्तोस्सा देवा- स्तेभ्यो नमस्तृतीयतन्तौ सर्पानावाहयामि । चतुर्थतन्तोस्सोमा देवा- स्त्रेभ्यो नमः चतुर्थतन्तौ सोमानावाहयामि । पन्नमवन्तौ पित्रावाहने * सरयूपारीणब्राह्मणवंशावली * विनियोगः पितृभ्यो नमः पितृनावाहयामि । षष्ठतन्तोः प्रजापतयो देवा- स्तेभ्यो नमः प्रजापतीन् षष्ठतन्तावावाहयामि । सप्तमतन्तावनिलावाहने विनियोगः अनिलेभ्यो नमस्सप्तमतन्तावनिलानावाहयामि । अष्टमतन्तो- यंमा देवास्तेभ्यो नमः अष्टमतन्तौ यमानावाहयामि। नवमतन्तौ विश्वेषान्देवानामावाहने विनियोगः। विश्वेभ्यो देवेभ्यो नमः नवमतन्तौ विश्वान्देवानावाहयामि। यज्ञोपवीतग्रन्थिदेवावाहनम् ब्रह्मजज्ञानमित्यस्य प्रजापतिऋषिब्रह्मा देवता त्रिष्टुप्छन्दो प्रन्थि- मध्ये ब्रह्मावाहने विनियोगः। ब्रह्मजज्ञानम्प्रथमम्पुरस्ताद्विसीमतस्सुरुचो वेन आवस्स बुध्न्या उपमा अस्यब्बिष्ठाः सतश्च योनिमसतश्चन्धिवः । इदम्बिष्णुरित्यस्य मेधातिथि ऋषिर्विष्णुर्देवता गायत्रोच्छन्दो प्रन्थिमध्ये विष्ण्वावाहने विनियोगः । ॐ इदम्विणुर्विचक्रमे त्रेधा निदधे पद समूढमस्यपाठ सुरे स्वाहा । अम्बकमित्यस्य बसिष्ठ ऋषिः रुद्रा हेवता विराट् ब्राह्मो अनुष्टुप्छन्दो प्रन्थिमध्ये रुद्रावाहने विनियोगः । त्र्यम्बक यजामहे सुगन्धिम्पुष्टिवर्धनम् उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् यज्ञोपवीतग्रन्थिदेवताभ्यो नमः प्रन्थिदेवता आवाहयामि । प्रणवाचा- वाहितदेवताभ्यो नमः यथास्थानमहन्न्यसामि । विविधसामग्रीभि- स्सम्पूच्य ध्यानकुर्यात् । प्रजापतेयंसहजम्पवित्रङ्कार्पाससूत्रोवब्रह्मसूत्रम् । ब्रह्मत्वसिद्धयै च यशःप्रकाशञ्जपस्य सिद्धिकुरु ब्रह्मसूत्रम् ॥१॥ एत- दनन्तरं यज्ञोपवीतम्परमम्पवित्रम्प्रजेतिप्रसिद्धतरमन्त्रैर्धारणम् । आयन्त- योराचमनम् । प्राचीनयज्ञोपवीतत्यागमन्त्रः॥ एतावदिनपर्यन्तम्ब्रह्म त्वं धारितम्मया । जीर्णत्वाचस्परित्यक्तङ्गच्छ सूत्र यथासुखम् ।। अनेन मंत्रण प्राचीनयज्ञोपवीतं शिरोमार्गेण निस्सायं यथाशक्ति गायत्रीमंत्र- जपकुर्य्यात् । लक्षन्तु वेदाश्चत्वार इत्युक्त्या चतुर्ष वेदेषु लक्षसंख्याका मन्त्राः कर्मोपासनाज्ञानकाण्डभेदात् तत्राशीतिसहस्रतिभिः कर्मकाण्डः षोडश- सहनश्रुतिभिरुपासनाकाण्डः चतुस्सहस्रश्रुतिमिर्जानकाण्डः तत्रशिखा. सूत्रयोन व्यवहारः। अतएव ९६ चावा निर्माणम् । किश्च द्विजाना कायं षण्णवत्यङ्गुस्नात्मकमितिधर्मनिर्णयार्थ ९६ चावा निर्माणम् । स्वहस्ताभ्यां सूत्रनिर्माय चावा निर्माणेन यज्ञोपवीतरचना कार्या यथा सरयूपारीणब्राझणव्यबहारः। तन्तुवायादिकृतसूत्रेण न यज्ञोपवीतरचना:- * सरयूपारीणनाक्षणवंशावली* न्यथा हिन्दुत्त्वधर्महान्यापत्तेः । ९६ छानवे चावा का प्रमाण प्रामण, क्षत्रिय, वैश्य तीनों वर्ण का है कम नहीं है । अत्र विशेषः विना यज्ञोपवीतेन तोयं यः पिबते द्विजः। उपवासेन चैकेन पञ्चगव्येन शुद्धयति ।। १।। विना यज्ञोपवीतेन विणमूत्रोत्सर्गकृयादि । उपवासद्वया- कृत्वा दानैहोंमैस्तु शुष्यति २ उपाकर्मणि चोत्सर्ग गते मासचतुष्टये। नवयज्ञोपवीतानि धृत्वा जीर्णानि सन्त्यजेत् ३ विच्छिन्नम्याप्यो यातम्भु- स्त्वा निर्मितमुत्सृजेत् । स्तनादूर्ध्वमधोनाभेन धाय॑न्तत्कथञ्चन ॥४॥ पृष्टवंशे च नाभ्याश्च धृतं यद् विन्दते कटिम् । तद्धार्थ मुपवीतं स्या- मा तलम्वनचोच्चितम् ॥५॥ गोभिलीय कात्यायनपदवाच्यानामिति । दिवा सन्ध्यासु कर्णस्थब्रह्मसूत्र उदङ्मुखः । कुन्मूित्ररीषे तु रात्री चेहक्षिणामुखा। पवित्रं दक्षिणे कर्णे कृत्वा विण्मूत्र मुत्सृजेत्। इति- हारीतोक्तेः। अथातश्शौचविधिम्ब्याख्यास्यामो दूरंगत्वा दूरतरं गत्वा यज्ञोपवीत विशति रसिद कर्णे धृत्वेति कात्यायनसूत्रम् त्रिकृता अन्थिनैकेन त्रिभिः पञ्चमिरेव ३ युक्तेन्धिसंख्या सन्तानविशेषरूपार्थक प्रवरानु. रोधिनी कर्तव्येति । स्वदेशेयकापाससूत्रेण यज्ञोपवीतनिर्माण युक्तम् । यज्ञोपवीते कुचीत्यादिग्रन्थने महापाप , पिप्पलीरचनायामपि पापम् । कृते पद्ममयं सूत्रन्त्रेतायाङ्कनकोदवम् । द्वापरे राजतम् प्रोक्तङ्कलो कार्पाससंभवम् ॥ ५ ॥ इति कौमुदीकल्पतिका परिष्कारदर्पण-व्युत्पत्तिवादशास्त्रार्थ कलादिक वैयाकरणशिरोमण्याचनेकपदवीभृत् संस्कृतामुकविचक्रवर्ति पण्डितराज-सर्वतन्त्र स्वतन्त्र- -सरयूपारीणशुक्लश्रीवेणी- माधवशाबिकृता यज्ञोपवीतव्याख्या समाप्त
अवश्य मननीय
सर्वतन्त्रस्वतन्त्र, गणतन्त्रभारतराष्ट्रपतिप्रधानचिकित्सक, विश्वविश्रुत-
कीर्ति-चरकावतार-सरयूपारीणब्राह्मणकुलगौरव, धमौलीपाण्डेयवंशरत्न,
काशीविद्वत्समाज के सर्वमान्यनेता, काशीविद्वत्परिषत् के संरक्षक,
त्यागतपोमूर्ति, महर्षिकल्प, पूज्यपादवैद्यसम्राट् प० श्रीसत्यनारायण-
शास्त्रीजी महोदय के भाषण का वह मार्मिक अंश जिसे सरयूपारीण-
ब्राह्मणमहासभा प्रयागमहाधिवेशन के अध्यक्षपद से प्रसारित किया
गया था।
मङ्गलाचरणम्-
अन्तःप्रसूतविततान्धतमस्समूहो,
विघ्नश्च शाश्वतिकसाधुविधाननिघ्नः ।
देवस्य यस्य महसा सहसाऽस्तमेति,
धीनायको मम स एव विनायकोऽस्तु ॥१॥
महामहिमशालिभिः सकलशास्त्रबोधोद्भवे.
महोभिरखिला बुधा जगति यस्य घृकायिताः ।
दिगन्तविसरत्प्रभं गुरुवरं निजं व्याकृते-
जनैर्नुतपदाम्बुजं शिवकुमार मिश्रं भजे ॥२॥
अमुष्मिन् विश्वस्मिन् सकलकलया यो विहरते,
सतां शुद्ध स्वान्तं रहति न कदाचित् क्षणमपि ।
अये विद्वद्धीराः! सदसि भवताम् प्राप्तविदुषां,
नृणां सर्वेषां वः शिव इह शिवाय प्रभवतु ॥३॥
विशेषः-
यत्राद्यापि नरान् न मुञ्चति कदाप्यामरं मार्दवं,
सत्यं धीविनयस्तपस्सुचरिताचारादि लोकोत्तरम् ।
विप्रान्सार्थकपंक्तिपावनपदं धैर्यादरिद्रानपि,
स्वाचारानविमुञ्चतो धनयशोलाभेऽपि तीव्रव्रतान् ।।१।।
जीवानां हितकारिताम् प्रकटयन् शुभ्रश्चरित्रनिजैः,
पूर्णः श्रीपरमेश्वरवरोऽप्यविकलम पूर्णावतारं दधौ।
अत्रैषा सरयूजलाप्लुततटा यागादिधर्मोचिता,
मन्बाद्यैः कथिता चिरंजयति मा साकेतभूः पावनी ॥२॥
AN * सरयूपारीणब्राह्मणवंशावली ७३ सरयूपारीण ब्राह्मण बन्धुओ! भगवान् के परमानुग्रह से आज तीर्थराज प्रयाग की निवेणी-परिपूत भुवनत्रयविलक्षण स्थली में समाज के जागरूक- व्यक्तियों द्वारा आयोजित इस सरयूपारीणमहासभा के अधिवेशन में मुझे भी सम्मिलित होने का जो अवसर आप महानुभावों ने दिया एतदर्थ हम आप सबके आभारी हैं। यद्यपि शरीरनैर्बल्यात् विगत कई वर्षों से मैंने काशी के बाहर न जाने की प्रतिज्ञा-सी कर ली थी, कहीं भी आता-जाता नहीं, तथापि समाज के प्रमुख तथा मेरे परमस्नेही प० कन्हैयालाल मिश्न ( एडवोकेट जनरल उत्तर प्रदेश), ५० श्री सुरतनारायणमणि निपाठी आई. ए. एस., प० श्री बलराम उपाध्याय जी (जस्टिस प्रयाग हाईकोर्ट) प्रभृति महोदयों के विशेष आग्रह को न टाल सका। सृष्टि के आरम्भ से ही ब्राह्मण जाति का सम्मान सर्वप्रथम रहा । ब्राह्मणत्व का लक्षण क्या है ? इस सम्बन्ध में कुछ विचार करना आवश्यक प्रतीत हो रहा है। इस प्रसङ्ग में यह कहना अत्युक्ति नहीं कि यह जाति त्यागतपःप्रधान रही है। तपोमूलक विद्याबल भी इस जाति का प्रधान लक्षण था। अत-एव पातञ्जल-महाभाज्य में स्पष्ट लिखा है कि 'ब्राह्मणेन निष्कारणो धर्मःषडङ्गो वेदोऽध्येयो शेयश्च । लक्षणप्रकरण में- तपः श्रुतं च योनिश्च हयेतद् ब्राह्मणलक्षणम् । तपः श्रुताभ्यां हीनस्तु जातिब्राह्मण एव सः॥ अर्थात् तपस्या, वेदाध्ययन तथा योनि ये तीन ही ब्राह्मणत्व परिचायक हैं, जो तपस्या एवम् स्वाध्याय न कर ब्राह्मणाद् ग्रामण्यां जायमानमात्र है वह जात्या ब्राह्मणत्वधारी होता है। महषि याज्ञवल्क्य ने अपनी स्मृति में लिखा है कि- न विद्यया केवलया तपसा वापि पावता। यत्र वृत्तमिमे चोभे तद्धि पातम् प्रकीर्तितम् ।। अर्थात् केवल विद्या या तपोमात्र से सत्पात्रता नहीं अपितु दोनों ही जहों साथ हों वही सत्पात्र ब्राह्मण कहा जायगा। महाभारत कादि- पर्व में गरुड़ को सदुपदेश करती हुई विनता ने कहा है कि- नच ते. ब्राह्मणं हन्तुं कार्या बुद्धिः कवचनं ।. अवध्यः सर्वभूतानां ब्राह्मणो झनलोपमः॥
* सरयूपारीणब्राह्मणवंशावली क्यों कि- अग्निरकों विषं शस्त्र विप्रो भवति कोपितः । गुरुर्हि सर्वभूतानां ब्राह्मणः परिकीर्तितः ॥ एवमादिस्वरूपैस्तु सतां वै ब्राह्मणो मतः। स ते तात न हन्तव्यः संक्रुद्धेनापि सर्वथा ॥ ब्राह्मणानामभिद्रोहो न कर्तव्यः कथंचन । नद्येवमग्निर्नादित्यो भस्म कुर्यात्तथानध । यथा कुर्याद भिक्रुद्धो ब्राह्मणः संशितव्रत्तः । तदेतैर्विविधैलिंङ्गैस्त्वं विद्यास्तं द्विजोत्तमम् ॥ भूतानामप्रभूविप्रो वर्णभेष्टः पिता गुरू। इतने लक्षणों के बाद भी विनता ने गरुड को उपदेश किया कि- यस्ते कण्ठमनुप्राप्तो निगीणं बडिशे यथा । दहेदकारवत् पुत्रं तं विद्या ब्राह्मणर्षमम् ॥ इतना ही नहीं, सनत्सुजातीय शाकरभाष्य द्वितीयाध्याय में पाख्यानपन्चमैवेदै भूयिष्ठं कत्थ्यते जनः। तथा चान्ये चतुर्वेदास्त्रिवेदाश्च तथापरे । द्विवेदाश्चैकवेदाश्च अनृचश्च तथापरे। एतेषु मेऽधिकं ब्रूहि यमहं वेद ब्राह्मणम् ॥ इसके उत्तर में ब्राह्मण का लक्षण विशेष रूप से बतलाया कि- विद्याद् बहु पठन्तं तु बहुवागिति ब्राह्मणम् । य एव सत्यानापेति स शेयो ब्राझणस्त्वया ॥ विपापो विरजोऽविचिकित्सो ब्राह्मणो भवति (श्रुतिः) आगे चलकर जोरदार शब्दों में यह भी कहा कि- यो वेद वेदान् सच वेदवेन न तं विदुर्वेदविदो न वेदाः । तथापि वेदेन विदन्ति वेदं ये ब्राह्मणा वेदविदो भवन्ति ।। अभिजानामि ब्राह्मणमाख्यातारं विचक्षणम्। एवं योऽभिविजानाति स जानाति परं हितम् ।। आय मनु ने नवम अध्याय में कहा है कि- पामयापद प्राप्नो माहाणान् न प्रकोपयेत् । से सरिता इत्युः सद्यः सबलवाहनम् ।। - * सरयूपारीणब्राह्मणवंशावली. ७५ यैः कृतः सर्वभक्षयोऽग्निरपेयश्च महोदधिः। क्षयी चाप्यायितश्चन्द्रः कोन नश्येत् प्रकोप्य तान्।। लोकानन्यान् सृजेयुर्ये लोकपालाश्च कोपिताः। देवान् कुर्युरदेवाश्च कक्षिण्वस्तान् समृनुयात् ।। यानुपाश्रित्य तिष्ठन्ति लोका देवाश्च सर्वदा । ब्रह्म चैव धनं येषां को हिंसेत्तान् जिजीविषुः ।। अविद्वाश्चैव विद्वाश्च ब्राह्मणो दैवतं महत् । प्रणीतश्चाप्रणीतश्च यथाग्निदैवतं महत् ॥ एवं यद्यप्यनिष्टेषु वर्तन्ते सर्वकर्मसु । सर्वथा प्राह्मणाः पूज्याः परमं दैवतं हि तत् ।। श्रीमद्भागववे-अविद्यो वा सविद्यो वा ब्राह्मणो मामकी तनुः। महाभारत में भी ब्राधण जाति का उत्कर्ष देखिये- एषा विप्रमयी नौका भवसागरतारिणी। अधोलग्नास्तरिष्यन्ति पतिष्यन्त्युपरिस्थिताः ।। विश्वामित्रजी ने भी कहा है कि- धिग्चल क्षत्रियवलं ब्रह्मतेजोबलं बलम् । एकेन ब्रसादण्डेन शस्त्रास्त्राणि हतानि मे ।। महाभारत के दूसरे प्रसङ्ग में- नाहं विशके सुरराजवनाव्यक्षशूलान यमस्य दण्डात् । नान्यर्कसोमानिलवित्तपोशाच्च भृशं ब्रह्मकुलापमानात् ॥ - - अन्यत्र भी- - गोभिर्विश्व वेदैश्च सतीभिः सत्यवादिनिः। अलुब्धैर्दानशीलैश्च सप्तभिषांपर्यवे मही ।। इत्यादि वचनों से माह्मणजाति के महत्व का वर्णन वेदों, स्मृतियों तथा शास्त्रों में प्रमाणरूप से प्राप्त होता है। ब्राह्मणवर्ग के कर्तव्यों का निर्देश- सनत्सुजातीय शाङ्करभाष्य द्वितीयाध्याय में- मानं च सत्यं च दमः श्रुतं च अमात्सर्य हीस्तितिक्षानसूया। यज्ञश्च दानं च धृतिः शमश्च महाव्रता द्वादश ब्रामणस्य ।। श्रीमद्भगवद्गीता अ० १८- शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिराजवमेव च । ज्ञानं विज्ञानमास्तिस्य ब्रह्मकर्म स्वभावजम् ॥
* सरयूपारीणब्राह्मणवंशावली. marate - अध्यापनमध्ययनं यजनं याजन तथा । दानं प्रतिग्रहश्चैत्र षट्कमोण्यमजन्मनः ।। मनु० १० १० श्रीमद्भागवत में- ब्राह्मणस्य च देहोऽयं क्षुद्रकामाय नेष्यते । कृच्छ्राय तपसे चेह प्रेत्यानन्तसुखाय च ।। सारांशत. वेदवेदांगस्मृत्यादिशास्त्रों का अध्ययन, त्याग, तपस्या, त्रिकालसन्ध्या, अग्निहोत्र, वलिवैश्वदेव ( पचमहायज्ञ ) गासेवा ही ब्राह्मण का आवश्यक कर्तव्य है। अतएव मनुस्मृति में- विद्या ब्राह्मणमेत्या शेवधिस्तेऽस्मि रस प्राम । असूयकाय मां मादास्तया स्यां बीयबस्तमा । यमेव तु शुचिं विद्यानियतब्रह्मचारिणम् । तस्मै मां ब्रहि विप्राय निधिपायाप्रमादिने । इनसे विद्या पर ब्राह्मणों का एकमात्र अधिकार सष्ट होता है। वेदाध्ययन के सम्बन्ध में यद्यपि द्विजाति (ब्राह्मण, क्षत्रिय वैश्य । मात्र का अधिकार- योऽनर्धत्य द्विजो वेदमन्यत्र कुरुते श्रमम् । स जीवन्नेव शूद्रत्वमाशु गच्छति सान्वयः ।। स्त्रीशूद्रद्विजबन्धूनां त्रयो न श्रुतिगांचरा। इत्यादि शास्त्रीय प्रमाणों से निर्विवाद है तथापि अध्यापनाधिका केवल ब्राह्मणों को हो है-मनु०१० अ० अधीयीत्रयो वर्णाः स्वकर्मस्था द्विजातयः । प्रत्याद् ब्राह्मणस्तेषां नेताविति निश्चयः ।। सर्वेषां ब्राह्मणो विद्याद् वृत्त्युपायान् यथाविधि । प्रवयादितरेभ्यश्च स्वयं चैत्र तथा भवेत् ॥ वैशेध्यात् प्रकृतिश्रेष्ठ्याग्नियमस्य च धारणात् । संस्कारस्य विशेषाञ्च वर्णानां प्रामणः प्रभुः॥ द्विजाति की परिभाषा-मनु० १० अ० ब्राह्मणः क्षत्रियो वैश्यत्रयो वर्णा द्विजातयः। चतुर्थ एकजातिस्तु शूद्रो नास्ति तु पश्चमः॥
Dine , E- * सरयूपारीणब्राह्मणवंशावली * वेदाभ्यास पर अधिक बल देते हुये शास्त्रकार लिखते हैं कि- वेदाभ्यासो ब्राह्मणस्य क्षत्रियस्य च रक्षणम् । वार्ता कमैव वैश्यस्य विशिष्टानि स्वकर्मसु ।। इस तरह उपर्युक्त शास्त्रीय वचनों से नियमित रूप से वेदशास्त्रा- ध्ययन, अध्यापन, सत्य, सदाचार, यज्ञ कराना, यज्ञ करना, शम, दम, तपस्या, तितिक्षा, आर्जव, स्वाभाविक परोपकारशीलता, त्याग, दान, प्रतिग्रह आदि गुण ही ब्राह्मणों के आदर्श सिद्ध होते हैं। 'अहरहः सन्ध्यामुपासीत' इत्यादि श्रौतवाक्यानुसार- नोपास्ते यस्तु वै पूर्वा नोपास्ते यश्च पश्चिमाम् । स शूद्रयद् बहिष्कार्यः सर्वस्माद् द्विजकर्मणः ।। अर्यात् सन्ध्या, गायत्री जप आदि से विमुख द्विजन्मा विशेषकर ब्राह्मण पतित हो जाता है, उसे सम्पूर्ण द्विजकों से शूद्र की तरह निकाल देना चाहिये। ब्राह्मणवंश की तपस्या के अनेक प्रत्यक्ष उदाहरण जगत्-प्रसिद्ध हैं। महाराज परीक्षित् के लिये ऋषिवालक का वह शाप-- दङ्ख्यतिस्म कुलाङ्गारं तक्षकस्सप्तमेऽहनि । जिसका निवारण साक्षाद् धन्वन्तरि भी न कर सके। ब्राह्मणों में तपोबल के साथ ही शारीरपुरुषार्थ तथा आत्मबल भी इतना प्रकृष्ट था कि 'शापादपि शरादपि' को कौन नहीं जानता ? देवीभागवत में महर्षि गौतम की गायत्री-समुपासना एवम् लोका- तिशायी दिव्य प्रभाव का वर्णन मिलता है- किसी समय पूर्ण विश्व में घोर दुर्भिक्ष पड़ गया ऐसे समय समस्त ब्राह्मणों के यज्ञयागादि कर्म बन्द हो गये, हाहाकार मच गया, सभी शरणार्थी के रूप में श्री गौतम जी के आश्रम पर गये। सबके दुःख सुनकर महषि ने भगवती गायत्री का ध्यान कर निवेदन किया, माता गायत्री ने प्रत्यक्ष होकर एक पूर्ण पत्र दे कहा कि जो भी चाहोगे इसके द्वारा प्राप्त करते रहोगे। फिर क्या था ? कारुणिक महर्षिवर ने विश्व के खाद्य, द्रव्य, कव्य आदि के पहाड़ लगा दिये। १२ वर्ष तक सब आनन्द किये, देवराज इन्द्र भी इस प्रभाव को देख कर महर्षि गौतमको साक्षात् कल्पवृक्ष कहने लगे। परन्तु कुछ कृतघ्न ब्राह्मण गौतम जी की इस प्रतिष्ठा से द्वेष करने लगे। सामूहिक रूप से एक कल्पित माया की गौ बनाकर D * सरयूपारीणब्राह्मणवंशावली गौतम जी के अग्निहोत्र के समय यज्ञशाला में खड़ी कर दी। जब गौतम जी ने गौ को हुँ हुँ हुँ ऐसा कह कर वहाँ से हटने का सङ्केत किया इतने में ही उसके प्राण निकल गये, नीच विद्रोहियों ने हल्ला मचा दिया कि गौतम को हत्या लगी। पुण्यश्लोक तपोमूत्ति गौतम जीने ध्यान कर देखा तो उन्हें इस षड्यन्त्र का पूरा पता लगा, उन्होंने तत्काल उन ब्राक्षणों को शाप दिया कि तुम लोग कलि में मूर्ख, दुराचारी, लम्पट, विद्यातपोविहीन, दुःखी, दरिद्र अप्रतिष्ठ ब्राह्मण होकर रहोगे। यह स्थिति वास्तव में आज देखी जा रही है, जहाँ कि मनुने स्पष्टतः कहा है- अनभ्यासेन वेदानामाचारस्य च वर्जनात् । आलस्यादन्नदोषाच मृत्युर्विप्राञ्जिघांसति ।। अर्थात् वेदाध्ययन, तपोबल तया आचारसम्पत्ति से विहीन, आलसी एवम् भक्षयामध्यविचार-शून्य भी ब्राह्मग को मृत्यु मारने की इच्छा करती है किन्तु मारना उसके लिये सरल नहीं। वहाँ आज ब्राह्मणसमाज अपने कर्तव्यों के पालन में कहाँ तक सफल हो रहा है यह कहने को बात नहीं। आज लोगों को यह आक्षेप का अवसर मिल रहा है कि लोकगुरु ब्राह्मणों का नेतृत्व कहाँ गया... इत्यादि। मैं दुखितचित्त से इस ओर समस्त ब्राह्मण वर्ग का ध्यान आकृष्ट करता हूँ ब्राह्मणों में विद्याबल, तपोबल तथा आचारबल के साथ ही साथ शासनबल नैतिक विज्ञान आदि की भी एक सत्ता थी। चकाती नरेश महाराज दशरथ का राज्य-संचालन गुरुदेव श्री वशिष्ठ की आज्ञा से होता था। इतना ही नहीं, असुरलोक के साम्राज्य का भी संचालन एकमात्र ब्राह्मण शुक्राचार्य जी ने किया था। अस्तु इस सम्बन्ध में अब अधिक न कहकर प्रकृत विषय की ओर आता हूँ-इस जगद्विस्तृत ब्राह्मणसमाज के स्थान, आचारपम्परा, कालप्रभाव आदि से धीरे-धीरे अनेक प्रकार के भेद हो गये। जैसे कान्यकुब्ज, मैथिल, गौड़, उत्कल, सारस्वत आदि । पुण्यसलिला सरयूनदी के साकेत राजधानी के पार्श्ववर्ती भूखण्ड के निवासी ब्राह्मण सरयूपारीण शब्द से सम्बोधित होते आये। जैसा कि मैं पहले ही कह चुका हूँ कि औपाधिक रूप से सभी ब्राह्मणों के स्थानानुकूल हैं ११ * सरयूपारीणब्राह्मणवंशावली ७६ आचारादि में कुछ न कुछ विशेप परम्परा सी बन गई । तथा यह स्मरण रखना चाहिये कि कोई किसी की शाखा उपशाखा नहीं। महर्षि गर्ग, गौतम, शाण्डिल्य आदि की इस आदिभूमि के निवासी सरयूपारीण ब्राह्मण समाज में आज भी शास्त्रोक्त पंक्तिपावन आदि ब्राह्मण ज्यों के त्यों उपलब्ध । अतः इस विचारधारा में मैं सरयूपारीणों का पक्षपात कर रहा हूँ, यह कोई भी विवेकशील कह नहीं सकता। ब्राह्मग कोई भी हो किसी देश समाज का वासी क्यों न हो पर वह अपने कर्मों ( विद्या, तपस्या, आचार त्याग, ब्रह्मनिष्ठा आदि) से ही प्रधान कहा जायगा । हमारे सरयूपारीणों में भी शास्त्रोक्त मुख्यरूप से रथीतर, भृगु, कण्व, अंगिरा, मुद्गल, शंकृति, भरद्वाज, पराशर, हरित, अत्रि, विष्णु विश्वामित्र, मरीचि, काश्यप, च्यवन, वत्स, कौत्स, उपमन्यु, अगस्त्य, वीद, सावर्णि, आटिषेण, यष्क, शाठर, माठर, कौण्डिन्य, दीर्घतमस, उशना, यमदग्नि, वीतहव्य, मित्रयु, सुनक, वेन, गर्ग, गौतम तथा शाण्डिल्य ये गोत्र प्राप्त हैं। इसी परम्परा में शालीन तथा यायावर दो प्रकार के ऋषि मिले हैं। उंछवृत्ति ब्राह्मणों की भी आदर्श परम्परा थी। इनमें भी स्थलभेद अच रपरम्परा आदि से अनेक भेद प्राप्त होने लगे। इस औपचारिक भेदा- नुसार ही शुक्ल, पाण्डेय, मिश्र त्रिपाठी, द्विवेदी, पाठक, उप ध्याय, दीक्षित आदि आस्पद, भी प्रसिद्ध हुये। 'सघे शक्तिः कलौ युगे' सिद्धान्तानुसार सरयूपारीण ब्राह्मणसमाज का भी संघटन आवश्यक था, जिसकी पूति समाज के कुछ प्रगतिशील व्यक्तियों ने सरयूगरीणमहासभा के की । यह साधारण प्रसन्नता की बात नहीं। कई पत्र-पत्रिकाएँ भी निकाली गई। जिनका एकमात्र लक्ष्य था लोगों में उत्साह सम्पादन । इस सभा के द्वारा आज समाज में आई हुई अनावश्यक भ्रान्तियों एवम् त्रुटियों का माजेन होना चाहिये । युग के प्रवाह में बह जाना सर्वथा अनुचित होगा। आज अन्य जातियाँ भी यत्रतत्र ब्राह्मण बनकर आप में प्रविष्ट होने का उपाय कर रही हैं, ऐसे समय विशुद्ध बीजरूप से हमारे सरयूपारीण-समाज को अपनी चिरन्तन परम्परा एवम् आचार-विचार-सीमा को अधिक से अधिक सुदृढ़ बना रखना चाहिये, इसी में हमारा गौरव रहेगा। हमारे यहाँ कभी भी सहमोज, विधवोद्वाह, हलप्रवहणादि कार्य नहीं हुए हैं, सर्वथा वेदशास्त्र विरुद्ध इन कार्यों का हम समर्थन नहीं कर सकते। हमें इन परम्पराविरुद्ध कार्यों को हाथ में लेकर वोट नहीं बढ़ाना है, एक लाख द्वारा वर्तमान * सरयूपारीणब्राह्मणवंशावली* अन्धों के वोट की अपेक्षा एक आँख वाले का वोट अधिक महत्त्व का होगा, यथा-चत्वारो वेदधर्मज्ञाः पर्षत् । यह शास्त्रोक्ति वैध है। हमें तो कुलपरम्परा की रक्षा के लिये अपनी अगली पीढ़ी को वेद-शास्त्रों के अध्ययन तथा प्राचीन आदर्श, आचार की ओर प्रवृत्त करने के लिये सर्वप्रथम स्वयम् भी अपने को उस साँचे में ढालना होगा। हाँ इतना तो अत्यन्त आवश्यक है कि हम में परस्पर ईर्ष्या, द्वेष, उच्चावच भाव की निकृष्ट कल्पना जो आज काम कर रही है उसे दूर करना होगा। हम सभी एक हैं किसी प्रकार की घृणा, ईर्ष्या का भाव भयंकर भूल होगी। शास्त्रों के अनुसार पूर्वोक्त महर्षियों की मुख्यभूमि आर्यावर्त ही है। इसके सम्बन्ध में मनु ने कहा है- आसमुद्रात्तु वै पूर्वादासमुद्रात्त पश्चिमा तयोरेवान्तरं गिर्योरार्यावर्त विदुर्बुधाः ।। आर्यावर्तः पुण्यभूमिमध्यं विन्ध्य हिमालयात् । कृष्णसारस्तु चरति मृगो यत्र स्वभावतः ।। स ज्ञेयो यज्ञियो देशस्तत्रैवासन् महर्षयः । इस प्रकार हिमगिरि के दक्षिण तथा बिन्ध्याचल के उत्तर की पूर्ण भूमि आर्याणाम् आवतः षष्ठीसमासः आर्यावर्त्तः = आर्यदेश है। इसे ही परमपवित्र यज्ञिय देश भी कहा गया है । इसी देश में हमारे ये महातपा महर्षिगण प्रादुर्भूत हुये थे। अतएव एतद्देशप्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मनः । स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरन् पृथिव्यां सर्वमानवाः ।। यह उद्घोष इस भूखण्ड की सर्वमान्य विशेषता है। इस देश के भी केन्द्रीभूत मर्यादापुरुषोत्तम भगवद्रामचन्द्र परिपालित सरयूपार देश में सृष्ट्यारम्भ से प्रतिष्ठित ब्राह्मण कुल को अपनी सार्बभौम प्रतिष्ठा पर ध्यान रखते हुए मर्यादानुकूल षोडश संस्कारों के परिपालन में सावधान होना चाहिये। क्योंकि आज कालवशात् संस्कारों का प्रायः लोप सा हो गया है। संस्कारहीनता के कारण बुद्धिमालिन्य हो जाने से अपनी प्राचीनता की ओर भावी पीढ़ी का आकर्षण न होकर अन्यथा हो रहा है। उनकी शिक्षादीक्षा भी - * सरयूपारीगबाह्म गवंशावली * आरम्भ में संस्कृत हो, बाद में आवश्यकतानुसार उन्हें अन्य भाषाओं की व्यवहारौपयिक शिक्षा भी दी जाय, वे सन्ध्यावन्दनादि करते हुए अपने आचार-विचार को परिनिष्ठित रखते हुये आगे बढ़े तो कोई भी हानि न होगी। किबहुना- यस्मिन् देशे य आचारः पारम्पर्थक्रमागतः । वर्णानां सान्तरालानां स सदाचार उच्यते।। येनास्य पितरो याता येन याताः पितामहाः । तेन यायात् सतां मार्ग तेन गच्छन्न रिष्यते ॥ अर्थात स्वदेश-स्वपरम्परानुकूल पितृपितामहाचरित मार्ग से चलना ही सर्वथा उचित है। धर्मराज युधिष्टिर ने भी यक्ष से कहा है कि- श्रुतिविभिन्ना स्मृतयो विभिन्ना नैको मुनिर्यस्य वचोऽप्रमाणम् । धर्मस्य तत्त्वं निहितं गुहायां महाजनो येन गतः स पन्थाः॥ अर्थात् विविधभेदभिन्न होती हुई भी श्रुतियां एवं स्मृतियां कोई भी अप्रामाणिक नहीं, नाना मुनियों, महषियों में से किसी एक का भी वचन अप्रामाणिक नहीं, धर्म का तत्त्व वास्तव में दुरूह है, तथापि बड़े, लोग जिस मार्ग से चले हों उसे अपना मार्ग बनाना प्राणी के लिए श्रेयस्कर होता है । भगवान् भूतभावन विश्वनाथ सभी सामाजिकों में सद्बुद्धि-सद्भावना तथा परस्पर प्रेम का बर्द्धन करें। यह चिरन्तन सरयूपारीणब्राह्मग-समाज पुनः अपने स्वरूप एवं गौरव की रक्षा करने में समर्थ हो, इस आशीर्वाद के साथ ही एकबार पुनः आप महानुभावों के प्रति आभारप्रदर्शन करता हुआ अपने भाषण से आप लोगों का अधिक कालक्षेप न कर मंगल की कामना करता हुआ निम्नलिखित शब्दों के साथ अपना भाषण समाप्त करता हूँ--- भूयाद्भूमिरियम पुनर्मधुमती द्राक्षारसोद्भाविनी, ह्यापो वै मधुसम्भृताश्च किरणा भानोश्च मध्वन्विताः। वाता मध्वमृतं क्षरन्तु सकलं मध्वन्तरिक्षं भवेत् , सर्व वो मधुमद् भवत्विति वयं सम्प्रार्थयामो विभुम् ।। नधासम्प्रवहन्त्वनारतमिमाः पीयूषरम्यं रसम् , शैला ओषधिसंयुताश्च विविधान् रोगान् विधुन्वन्तु वः।
८२
* सरयूपारीणब्राह्मणवंशावली *
सर्वे वृक्षरुहाश्च त भवतां स्युः कल्पवृक्षोपमाः,
युष्माकं सकलं जगत् प्रभवतात् सम्मानसम्बर्द्धकम ।।
विप्रा मोक्षरतास्तु धर्मनिरता ऊर्जस्वलाः क्षत्रियाः,
व्यापारे कुशला भवन्तु वणिजः शूद्राः कलाकौशले ।
स्वं स्वं धर्ममुपेयुषोऽत्र भवतः सर्वानहम् प्रार्थये,
प्राचीनेन पथा नयन्तु सततं सद्गौरवं भारतम् ।।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः