Charan Sahitya Shodh Sansthan, Ajmer
Kalpbhashya
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कल्पभाष्य
अर्थात
भाषा कल्पसूत्र
भ
000-
त्रील बीयत राजाडालचन्दजी की आज्ञानुसार
कवि रायचन्द ने बनाया उनके प्रपौत्र
राजा शिवप्रसाद सितारे हिन्द
को नाजानुसार छापा गया ।
000
"धर्मंकुर धमकुरु धमकुरु प्रप्रय धर्म शंखम् प्रसारय धर्म
ध्वनाम प्रताडय धर्म दुन्दुभिम् ॥
"घड़ी न लवभै अग्गली । इंदह अरकै बोर ॥ हम जाणो जिउ धर्म
कारि । जां लग वहइ सरीर, ॥
KALPA SUTRA
Travslated into Bliashi by Kuri lasciand under the patronage
OF RÁJÍ DÁLCIA. 1).
Priated old published for his gr-at grandson
RAJ ASIA A PRAS ÁV, C. S I.
10)
लखनऊ
मुंशीनवनकिशोर के छापेक्षाने में आया
दितम्बरनन् १८८९ ईनवो
जसको चाहिये लखनज लिखकर मुंगनवनविभोर से नंगाले
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कुछ ग्यान जाने खानदान का कारगा इस गंय ले चपन म॥ पुराने काग़जों से मालूम होता है कि जयपुर को मन्नदारों में रणधीर के बीच जो एक बड़ा मशहूर ज़िला है संवत् १०४५ के दर्मियान परमार वंगी शाखेश्वरो प्रेष्ठि धांधल हुआ। उसके कोई लड़का न था जैन धर्म पानक पूज्य श्रीजय प्रभु सूरिगुरु के प्रतिबोध से छुप्ता देवी को आराधना को देवो ने स्वप्न में वरदिया देवोके हस्तपुट में पत्र पुप्प और गोखरू था इसी से जब लड़का हुआ उसका नाम गोखरू रखा और उसी से गोखरूगोत्र चला । सम्बत् १०६१ में देहरा बनाया नयप्रभु सूरिने प्रतिष्ठा कराई श्रोशत्रुञय का संय निकाला । उस का लड़का धर्मण उतका कर्म न उमका पुहपा उसका भग्गा उसका अका उसका तोला उसका मेहका उसकाहोरा उसका मेघा उसका भाणा । जबसंवत १३३५ में सुलतान अलाउद्दीन खिलजी ने रणथंभौर का किला तोड़ा भाणा अपने लड़के नायक समेत वादशाह के साथ चंपानेरचला आया। नायकका वेटा खीमा उसका जयवन्त उसका वीरा उसका गोरा संवत् १४८५में अहमदाबाद में आ बसा उसका बेटा अभयड़ उसका वासा उसका वस्ता उमका बहला उसका शिवसी उसका कर्मसी उसका रांका उसका श्रीवन्त उसका पदमसी । सम्बत् १४८४ में पदमसी साह खंभात मे आबसा। वहां उसने श्री क्ल्याणसागर मूरि से श्रोपाव- नाथ स्वामी का स्फटिकमयविम्ब प्रतिष्ठित कराया पांच मोने की कल्प मूत्र और चार मोतीले पूटे भेट किये शीशत्रुनय का नंघ निकालापुस्तक भंडारभरा । उसके दो बेटे धेशपति और अमरदन । अमरदन ने शाह जहांबादशाह को एक ऐमा होरा नज़र दिया कि वाद शाह ने प्रसन्न होकर राह को पदवी खशी और दिल्ली ले गया । उसके दो लड़के हुएराइउदयचन्द औरकेलरो सिंह । राइउदय चन्दने चार लड़ने राजगत मित्रमेन नभाचन्द फ़तहचन्द औरराय मह । मनचन्दने कहत्साली मे ग़ल्लासम्ता करनेकारण नुहम्मदशाह ने जगतमेट की पदवी पाई लेकिन अपनीवहबेटेनमेत मुर्शिदाबाद में अपने माम टमापिकचन्द नागौर वाले हीरानन्दसाले व्टे की गोदनावटे। होरानन्द साहकी बेटी धनबाई राइ उदय चन्दको व्याहो यो । राइसमाचन्दके राइमरचंद औरराजा चंदजेराहमुहकम सिंह और राजा डालचन्द । नादिरशाहो में घरके दो आदमीजतन होने के कारण राइ मुहकमसिंह और राजा हालचन्द दिल्लीछोड़कर मुर्शिदागद आदमे । निदान
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जग ( ३ ) वरन हेमिंगज़ को रिफाकत ने गाड़म नामारेबाने ---- भेजकर चुपचाप बुनवा लिया और अपने मकान में छुन किस के साथ दामही निभाता है और मातम करके नोचान हो हान्दा है। उनके बेटे राजा उत्तमचन्दने जिन्होने लखनउ वाले राज मोटो व्याही थी पुत्रही न होने के कारण अपनी बहन बोबो रव कुंके गोयो चन्दको गोद लिया और उन्हीं के वेटे राजा शिवप्रसाद सितारोहन्द पने दोनों पुत्र कुंवर सञ्चित्मसाद और कुंवर आनन्द प्रसाद को बहुएं और अपनी बहन योबी गोविन्द कुवर के ख़ातिर जोजनधर्म को निरन्तर अबलम्बी हैं इस ग्रन्थको कि जबसे राजा डालचन्द ने भापा में बनवाया था एकही प्रति घर में रहा था उद्धार करके अर्थात् छपवाके अमर किया जो पढ़ें सुनें दया करके असोस देंकि धर्म में रतिरहे परलोक सुधरे और कुबुद्धि कभो पास न फटकने पावे शुभंभूयात् ॥ इति .000.
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योवीतरानायनमः॥
अथ कल्पमाष्य लिख्यते।।
चौपाई॥
जै जै जैन धर्म हितकारी । संरचतुर्विधिजिहिअधिकारी ॥
साध्वी साधु श्राविका श्रावक । यहीचतुर्विधि संघ प्रभावक ।।
नराकार सो धर्म वखाना। जाके बारह अंग प्रधाना॥
वदन पंच प्रानरु हाथा। बुधिचित आतमपदसाथा ।।
दो० रत्नत्रय जासों कहें ज्ञान दरस चारित्र ।।
धर्म भए नररूप हौ । कहिये बदन पवित्र ॥
हिंसा मिथ्यावाद अरु। चोरी मैयुन वाध ।।
जोरपरिग्रह को तजन। पंच महाव्रत साध ॥
ये कहिये ता पुरुपके । पांचौ प्राण प्रमान ।।
दान सील तप भावना। दोनों हाथ बखान ।।
दान दया तीजोदमन । ये जे तीन दकार ।।
बुद्धि चित्त आतम हो । ता नर को आधार ॥
विनयविवेकविचारजुत । अरु निश्चयविवहार ।।
येई ता नर धनम के ! दरनवरन सुखसार ।।
धर्नसिरोमनिनुभसमय । पर्व रजतन जान ॥
ताकीनिति विस्तारती । माला सुना सुजान ॥
चारिमास दीनार के। दिवसकसी वीत ॥
उत्तम नध्यम सत्तर । अधमपचास दुधीस॥
अधिक नासजो होयतो । ताझी गिनती नाहिं।।
आसाढ़ी पून्यो हितें ! दिनगिनगिनतीमाहिं।
मा० ।
::समा किरहित । रातमी बिनुहोय ॥
7 जीवन उपजै । निर्जन थटिल सोय ॥
गगजभिन्मजहं । भिच्छा सुलभा होय ॥
काली गौखद सुलभ । जहां पाइये सोय ॥
गृहतिसघनसानजहं। सुजन समागमजान ॥
स्वाध्यायगोरस सुलभ । और रहित अपमान ॥
ऐसे लेग्ह गुन सहित । ओगुन रहितसुदेस ।
भूमि पाय सुख बासहवे। वसे साध धर्मेस ॥
भावासित तिरोदसी। आदि पाठदिनजोय ।।
सुदी पंचगी अंत दिन । पर्व पजूसन सोय ॥
नत्राठी दिन में जती । जिनजनसनमुखहोय ।।
कल्पमत्र को अर्थ सव। वरनि वखाने सोय ।।
पाठदवसविस्तारकरि। ग्रे गरथ निदान ।।
ममातिहासममेतअरु । सह दृष्टांत बखान ।।
आठ दिना में पंच कृत। करें करावें संत ॥
न चर्षिधि मंघ के। परंपरा को तंत ।।
मनविरपर नामकरि । दानसील तप भाव ।।
मनपाचग्नकार। यथाशक्ति चितचाव ॥
नके अंत में । कलप सत्र सिद्धांत ।।
नमोरह सहित । हितकारमनैनितांत ॥
मुवि पड़कमना। आपुममें सब लोक ॥
पिन बिमा परमपर बरसदीप तजिसोक ॥
में पस काल में ।नाग केत इतिहास ॥
चलाभाव जिनलयो। अचलपरम पदवास ॥
अथ नागकेत कया।
चौपाई॥
चन्द्रकांति नगरी इक राने। विजयसेनजहंतृपति विराजै ॥
क. भा०। ३ शांत दांत श्रीकांत सेठ जहं । धर्मसील गुनवंत वसे तहं ।। जाकी सुभश्री सखी सिठानी।गुन वय रूप सोलमनमानी । ताके गर्भ अर्भ इक भयो । परव पुन्य आय फल दयो । आनद मुदमय सेठ सिठानी । पर्व पजसन नियरौ जानी ।। आपुस मै मिलि भाखन लागे। पूरब पुन्य जगत के जागे ।। हमहूं अब अष्ठम तप धाएँ । जनसमरन कौ दुखनिरवारें । यहधुनिसुनिशिशुहूंचितधारयो ।जातिस्मरितपकरनविचारयो । पर्व पजसन दिन आयो जव । सेठ तिठानी व्रत कोनो तव ।। तज्यो मायौ पय वालकहूं। लखिदुखपायोपितुपालकहूं । सिसुन्दुतनतपताप न सहि । मुछिपरयोघरनोपर गिरिक। सेठ विकल वैद वुलायो । त्यो नहिं उपचार करायो ।। तव निरास हवालहिछाड्यो । पितादुखित ह मरनौमाड्यो। सोनिपुत्र घर भयो जानिए । अर्थ लैनको छडि दई कृप। क्रूर दूत धन लेन पठाये । ते सव सेठ द्वार पर आये। सिसु तपवल इन्द्रासनचाल्यो । अवधिज्ञान तवइन्द्रसभाल्यो । सिसु पूरवभव की सब जानो । सभा प्रमुखप्तो सबै वखानी ।। वनिक पुत्र हो यह पूरव भव । अपर मात के दुःख दह्योदव ॥ सोदुखतिन निजमित्रसुहृद । कोसोनहितिन भाखो यो । पूरव सुकृत न संचित तातें । यह दुख लहत अपर माताते । यहसुनितिनतपकरनविचारो। अतिसुभ ध्यानहिये में धारयो । पर्व पजसन नियरै आयो । ताकत्रत करिही मनमायो । धारिध्यान नृप गृह में सोयो । ए दृष्टि तिहि माता जोयो॥ दीपक वारन के मिस आई। ताहन ग्रह में आगि लगाई। सो जरि मरि श्रीकांत सेठ घर। पुत्र होय जनम्यौ सो नरवर ।। यह कहिसुरपति निजजन रे । राजदूत तिन किये अनेरे ॥ सुरपति हूं नरपति ढिग आये। आय कही क्यों दूत पठाये ।। राजनीति को नृप दै सारखी । सुरपतिसौं यह भाखर भाखी ॥
- 7 मा। मन चालक । ताकेवन को राजा मालक । ----मया माई । परब भयकी सब बतलाई ॥ का बालहिं जिवानो। नागकेत तिहिनाम नतायो । न सनि निज यानसिधारे। नृप हूं कापने जन निरवारे ॥ उनर क्रिया पिनुनी सुतकीनो । धरमपरन विधिसिररिलीनी। मां जीवन का प्रति मासा । पट ब्रत चातुर मास निवासा।। महा बन पालन लाग्यो । धर्म प्रभाव तास जसजाग्यो। क दिन राजा इक जनमारयो। सिर कलंक चोरीको धारयो। सो दुर्गति लहि व्यंतर भयो । अपनी वैर नृपति सी लयो। दमागोचर तिन निस चारी। लात एक राजा को मारी ।। नांवर वनकरिन्पप गिरयो।सभासदनलखिअचरजकरयो। निनिन तर तिला संवारी। नगरमान लांबी विस्तारी ॥ नामदायले नदिमि भाग्यो । नगर लोगपर पटकनलाग्यो। समग आंगने पर लोनी । तपबलरिफकितिहि दीनी ॥ दुए पहुं की कीनी । व्यंतरभाजि भयो बल हीनी ।। वह नाव मस्तप की लहिये। निश्चयकरितपकोपथगहियै॥ के घर ममन्मा पंचमी । अन्य मती हूं लोक ॥ मिति करता जगम होय ग्रामोक ।। ईवाहित । दिन पन्नासंबो जोय।। नाव दिन। बटनु घटती होय॥ यषिपंचमी कथा॥ मलाप दिया। पु-यवती थल पाय ।। नयानगगनय । पाय तात अरु माय ॥ नया में। एक सुनी एक वेल॥ भयो तुरन । गही आदको गैल ॥ सुस्त । म्वच्छ वनाई खीर ।। बादिदिबहिविषवमनाकरिसरक्योधरिधीर ।। - अटमोस
क. भा०।
५
सोनिहारि तिहिकूकरी । विपुलअनर्थविचारि ॥
दौरिजुठाई खीर सो । लखि द्विजदीनीमारि ।।
मारि तोरिताकी कमर । गोसाला मैं वांधि॥
विप्रजिवाये प्रीतिकरि । खीर दूसरी संधि ।।
ताही दिन तावैल कौं। तिहि द्विज तेली ऐन ।।
बहन हेत भाडै दयो । संबंदिनतिहिंदुखदैन ।
मुख मैं छींका वांधिकै । फेरयो कोल्हू साय ।।
सांझ भये आयोसदन । वदन मलीन अनाथ ।।
आपुसमैमिलिरपशुनो । निजनिविथासुनाय।।
कयासकलदुखकीकही। वेदन विपुल वलाय ।।
कटिटूटन की उनकही । सहन सूखइनप्यास ॥
लहि निरासता अन्नतें । दोऊ भये उदास ॥
सुन्योसकल संवाद यह । ताद्विजने धरि कान ।।
जान आपने मातपित । अतिपछताय निदान ।
भोजनदै तिनदुहुनौं । ऋपिनपासद्विजंजाय॥
कह्योसकलरत्तान्तजो । सुन्योसुअनसमुझाय॥
अरुपूछीकरजोरिप्रभु । जेहिविधिकुगतिनसाय।।
मातपितासदगतिलहैं। सो भापिये उपाय ।।
सुनिवेदनरिपिगनसकल । अनुकंपे लखिदीन ।
दयादीठ दृगभरि कहे । वचनसुधा रसलीन ।।
पूरवभवइनदुहुंनमिलि । कीनी केलि अकाल ॥
तातेपायो जनम इन । वृषभ शुनीको हाल ।।
अबभादी सुदि पंचसो ।ऋपिपंचमिजिहिनाम॥
तादिनसयम सनेह । व्रतकरि अाठी जाम ॥
अनखेड़ी हलकी धरा । तामैं अन्न जु होय ।।
आपहिं तें उपजै विपन । तादिन खये सोय ॥
तातें इनकीकुगतिमिटि । संगतिलहिहै जान ।।
"
का भा०।
सनिदिजन्याहींकरिपितर । पठयेसुरगनिदान ।।
ऐसे या सुभ दिवस में। औरोमति के लोक ॥
तपरिजगत्रयतापहरि। मुकतलइततजिसोक ॥
यातेंजे जिन घरमरत । साधु साधवी जोय ।।
हितकरिश्रावकश्राविकारावतकरिनिरमलहोय ॥
कल्पसूत्रको पाठअरु । अर्थसमझिसनिकान ॥
मरम घरमकोपायपद। परम लहे निरवान ।।
दृष्टांत कथा ॥
दो० तृतियरसायनगुनसकल। कलपसूत्र त्याजान ॥
ताहूकी विस्तार सौं । कह कयासुनिकान ।।
भयोलाखअभिलाखकरि। इकनृपके सताय ।
चही तास आरोगता । नृप त्रय वेदवुलाय॥
तिनम त इकबेद ने । निजोपधगुनमावि ।।
कयों मातरा एक में । हरों रोगयह सास्ति ।
पंअगेग नर जो भख । यह पतिहिकाल।।
नयमिम्बनमोनम्मकल। होय रोग में हाल॥
मुनि राजा ना बंद । तुरतं कियो विदाय ।।
यो दि जगावनी । भलो न यहहै गय ।।
ट लगे पुनिलयो । निजओपधगुनाय ॥
जग हर रोगीनु को बिरुजकछुनवसाय ॥
तहका कीनी विदा । च्यासमझिनरराय ।
नमाहिहविहोमिक्या। करनीभसमसुभाय ॥
नव प्रयोन्पनिज निकट । तीजावेद बुलाय ॥
निनिज ओपधोसुगुन। ऐसे दियो बताय॥
गेा हरे आरोग को । अधिकाष्टकरिदेय ॥
गरिन्पतिबहुधन दियो । वैदहिऔपध लेय ॥
जमी ओपधि तीसरी । कल्पसूत्रत्यामानि ॥
७ क. भा० । पाप हरै दुखण्य करें। पुन्य बढ़ावै जानि ॥ तीरथ शत्रुजय सकल । तीरथ में ज्यों सार॥ अभय दान ज्यों दान में। मंत्रन मैं नवकार ॥ ब्रह्मचर्य ज्यों व्रतनमैं । विनयगुननके माहिं ॥ नियमन में संतोष तप । छमा सरीखो नाहिं।। तत्वन मैं सम्यक्त त्यों । पर्व पजसन जान ॥ चिन्तामणिसुरधेनुज्यों । धेनु रत्न मैं मान ॥ सीतासतियनमाहिंअरु। गीतारयानन माहिं ।। छायाधर तहमांहि ज्यों। कल्परक्ष की छाहिं ।। त्योंही सव सिद्धांत में ! कल्प सूत्र सिद्धांत ।। सब आगमके सारको । सार निहारि नितांत॥ महा वीर निरवानतें । छठे पाठ सुख सार । भए वाहु स्वामी सुखद। चौदह पूरव धार ॥ नव में परव माहि तैं। कीनौ यह उद्धार । वरठयों अध्यन सुभ । दस श्रुतकंध मझार ॥ अथ दस कल्प वर्णन॥ दो० वल्प अर्थ श्राचारहै । सो दसविधिकोजान ।। प्रथम अलउदेस ह । सय्या तर त्रय मान ।। राजपिण्डकृतिकर्मव्रत । जेष्ट प्रति क्रम आठ॥ मास कल्प पर्जूशना । यह कल्प दस पाठ॥ आदि ग्रंत जिनसाधकों। दसों नियत ये कल्प ।। चारिनियतनिनमध्यको। छह अनियत वैकल्प ।। ते 'छह कहेअचेलअरु। प्रति क्रमन उद्देश । राज पिंड पर्जुसना । मासकल्प तजि शेश ।। शय्यातरबत आचरन । ज्येष्ठत्व क्रति कर्म ॥ वाइस जिनके साधको । चारिनियत यह धर्म॥
कामाः ।
चेल॥
को देव का पटान्द्रजी । जिन कांधधरि देय॥
सोगिरि पर पलतब। वन रहितकहितेय ॥
यात जीरन चल लहि। आदिअंतजिनसाध ॥
सेत बाला तनवरें। सोऊ साध अवाच ॥
अय उदेशका ॥
दो० साधु हेतु उठेश करि । करै गृही आहार ॥
आदि अंत जिनसाधकों । उचितनसोनिरधार ॥
एक साध विशेप हित । जो उद्देश अहार ॥
सो न लेय सव साधुलें । वाइस जिनबिबहार ॥
अथ शय्या तर॥
दो० जो श्रावक चौमासमें । साधु रहनहितवास ॥
दय ताहि पागम कहै। शय्यातर परकाश ॥
नागल्या तर मदनको। लेय न साधु अहार ॥
प्रिनियकल्पाचाग्यह। बोविमजिन विवहार॥
अथ गज पिगड ॥
दो नाप देगाधिय गदनका लय न माध अहार ॥
विर नजिन माधको । अतिअनुचितनिरधार॥
न्य कृति कर्म॥
दो दनामपडिकगन । नित्य कर्म यहहोय ॥
गुगलघुनामवमाधुकी । दिक्षा क्रमत जोय ।।
पर परम्पर बंदना । गुरुकाल घुसवसाध ॥
गुमलय माधस्मिाधवी । यह कृतकर्म अबाध ।।
अथवत ॥
दो. पंव महाव्रत आचग्न । आदि अंतजिनसाध ।।
मध्य जिने सरसाध के। चार भेद अवाध ।।
मानत मैथुनका सकल ।ते परिग्रह के माहः ॥
क. भा० ।
६
शणा ॥
चारे व्रतहीमें गिनत । ते मैथुन की छांह ॥
अथ ज्येष्ट॥
दो० अादि अंत जिन नाथके । साध सदिक्षा होय ।।
मासखिमन करिपंचत्रत । पालें जानौसोय ।।
मध्य जिनेसर साध सब। दीच्छाहीले फेर ।।
पंच महा दूत आचरें । जैनागम विधिहेर ।।
अथ प्रतिक्रमण
दो. आदिनाथ जिन वीरके। साधसांझ अरुभोर ।।
दुहूंकालपडिकमनकरि । ध्यावें आतम ओर ।।
मध्य जिने सरसाध ली। जब कछु लागे दोष ।
ताको संभव जानि के। करें पडिकमन पोप ।।
पy
दसों पर्व एजसना। प्रथम को विस्तार ।।
कल्प सूत्र जा, पढ़े' सुने संकल सुख सार ।
आदि अंत निननाथके । साध यया विधियाहि ॥
करैतथाविधि याजलों । साधाचरन ताहि ।।
आदि अंत जिननाथके । साध दोयविधिजान ।।
सरलमूढ़ अरुवक्र जड़ । होय सुभाव निदान ।।
वाकी जे बाईस जिन । तिन के साध सुछंद ।।
सरल प्रग्यते होयसव । तिन को ज्ञानसमंद ।।
अथसरल मूढ़ हष्टांत ।।
तहां प्रथम दृष्टांत सुनि । सरल मढ़ की एह ॥
समझिन सरलसुभावते । तिनको विनुसंदेह ।।
कोकण देशी साध इक । काउसरण तपलोन ।।
गुरुपूछोतिहिविमल की । वोल्योसाध अधीन ।।
दया चिन्तवन करत हो । जवहाँगृहको बास ।।
सब कारज हैंकरत हो । अवतो भयोनिरास ।
१० क. जा कृषिकरितवही परतहीं। सब कुटुम्बकोपेट ।। से के जियत है। नोमन बड़ोखखेट । गुरुतन बोले साधु से । यहचिन्तानप्रयोग। यही कर्म को चिन्तवना साधु जनन कोरोग॥ मिथ्या दुष्कृत बीजिये। कीजे शुभ परनाम ॥ तहत लानि सकियो । पायो मन विश्राम तरल मढ़ अरु पक्रजड़ । दोउन को दृष्टान्त ॥ अव भाषा विस्तारकरि । तिनकोभेदनितान्त ॥ बासरल मढ़ जड़ वक्रदृष्टांत ॥ शरल वक । साथ गोचरी हेत! गरी लिहरि तिरिरा। विभिगनिजखेत ॥ बलजीजा निलम की। कही राह में आज ॥ रनाक देशात भुगो । ए मिलापमान ।। जी मापको। जोगनियोगा। नया साइबल्योसांव।। यह तो गुरुकीतूक ॥ -यो तुमच्या करि कूक ।। नी ना में। उकनिरहलुभारा। मन न लगे। नाग अपनी राय ।। नातन । सनुचि जारि बहाद।। से तीन नाथ सनाच बारपीक जटा सपनी लानत न चूक | नाट ६च्याहगा नटी काही कर अब हमकधान्त। नियोक्ल जड़ वापर । नारी इक संवाद | को सीप । बह्मो याहिरखि याद॥ न कह सो कोजिये।और न दीजै मात्र ।। . क रिता क०मा० । १९ ॥ . वैव्योलखि सुत बोल्योसुतसुनि सनसिक । योही करिह दोष ॥ घरतें निकलत एक दिन । सुतसौं नमो सुनाय ।। तांत बंद करि राखियो ।बार कनाट लगाय॥ सुनि लगायं दीने तुरत । घरके द्वार शिवार !! सोय रह्यो सुख सदन में । जब आयो पितुवार ॥ रह्योपकारिपुकारि अति गरी फारिहियहार । सुनी तदपि बोल्योन सुत । खोले नाहिं किवार । तबसो पितु पहिलीतपर । बढ़ि कूको परवाह ।। क्रोध की। छई दृगनमें छह ।। सुत बोल्यो तुमही न तक । भापी सन्मुरू होय ।। गुरु नादान न दीजिये ! रितक्योंकीजतजोय।। चौधे सारे गांहि जे । वाइस जिनके साथ ।। सरल प्रत्यते होत । काल वनावनाघा समझिकरें सिगरीक्रिया। ज्ञानदंत ते हो। बिनपदन्त वलर तसद । धीरज वले सोय रहे दिरंदर विनय मैं । तन में नेकन नेहः । आतम सातनने रहें । वह भार ला देह ।। प्रजभर हटान्त ।। तिनहूं पै दृष्टान्त यह । नटनाटक को सांद ।। गुरु पुरखतें जब उनसुनी ! जोजन लखित्रो नाच । नटनाटकहू तिन तज्यो । नवी नाट्य हू फेर । नाचसान सद तजिदयो । मुल्वच सुनिरि सुहेर ।। उत्तम मध्यमहरम से। मादकाल वन चक्र । सरल मुलुप्रय । तीजी है न बक्र ॥ अथ मन्धानुक्रमण ॥ सो. प्रथम मंत्र नवकार । अर्घ सहित यापंथ ने । ता पाचै अधिकार । महावीर कल्यान कौ ।।
१२ क० भा० । पनि श्रोपारस नाथ । नेमनाथ अधिकारअरु ॥ कीन्हें ग्रन्थ सनाथ । आदिनाथ अधिकारकहि। अन्तराल विस्तार । ता पाछे थविरावली ॥ कही जैन मत सार । साध समाचारी बहुर ॥ कल्प सूत्र सिद्धान्त । ताकी ह्यांला पीठिका ॥ करन बखान नितान्त । अब निजग्रन्थारंभभनि। इति पीठिका समाप्तः॥ डों नमो रिहं ताणम् । नमो सिदाणम् ॥ नमो आयरियाणम् । नमो उज्मायाणम् ॥ नमोलोएसब्बसाहुणम्। एसो पंच नमुकारो ॥ सव्व पावप्पणा सणो । संगला पांच सब्जेसिं॥ पढमंहवय मंगलम् । मो. मंगलोक नवकार । चौदह परब सार यह। वन अमंगल भार । वरनमंगला चरनयन ।। मनी प्रथम अरि न। भागवत भगवंत प्रा॥ ट कम जय बंत । अटाना पगारहित ॥ 11 गाय । चामटातव्यजो ॥ ननाय । हाथ नोरिचंदन करी॥ - प्रसिद्ध । ज्ञानप्रबुद्ध प्रबोध कर॥ नब निट मिनहिं वन्दनाकीजिये ।। नदि पहमंद । और आठ गुनही बहुरि ॥ मटकरमको मंद । तजि दीनोतिनकों नमः ॥ दी जे आचार्य । त्रिकालग्य त्रय तापहर।। हनिमगुण के कार्य । कारण तारण की नमां ॥ चोहित उपाधि । उपाध्याड जपतप क्रिया ।। सकल असावहिंसाधि। सावधान तिनकों नमी ॥ ग्यारह अंग उपंग । बारह जे सब शास्त्र के । - " .
. . क० भा० । १३ पढ़ें पढ़ावें संग । द्वादल अंग अभंग वर ।। पुनि पंचम नौकार । नमस्कार जासौं कहें ।। सकलसाधुसुखसार । जिन कल्पीकल्पीथविर ॥ सत्ताइस गुनवान । जेते ढाई द्वीप में ॥ चारित ले सुजान । भये तिन्हें वंदन करौं । परमेष्टी नव कार । येई जिन जन शास्त्रके। सकल पाए संघार । होतजाप जाको किये ।। पथ पंच कल्यानक।। अव पचिों कल्यान । कहि वरनौ चितदै सुनो । परम घरमकी खान । भरम मिटत भवभवनुको ।। पंच कल्यानक सार । च्यवनजनमचारित्र पुनि।। ज्ञान नुत्ति आधार । चौविस तीरथ नाथ के ॥ महावीर तिहि माह । चरम तिथंकरकी अधिक ।। इक कल्यानक शंह । गर्भाकर्पण इन्द्र कृत ॥ बाप कालप्रमाया ॥ चौपाई रुंद ॥ काल विभाग जैन मत लानौ । छह सारे करि भेद बखानौ । पहिलौ सुखन सुखमकहिनाम। ताको अवधि सङ्घ विश्राम ॥ कोड़ा कोई चारि जे सागर । ताकी उपमा जोग उजागर ॥ अथ सागर प्रमाण ॥ दो० पल्योपम को मान अब । पहिलै करों वखान ।। लांबीचौड़ी भमि खनि । इक इक जोजन जान ।। तितनी ही चौड़ी खनौ । ऐसी खात वनाय ।। ठांसिभरौतिहिंजुगलिया। वाल वाल कतराय ॥ . चक्रवर्त के कटक त । दावें दर्ने नसोय ॥ सरित सलिलतापरवाँ । स्त्र न जलकणजोय ॥ वालय कोपरम अनु। प्रतिसौवरसनिकाल | ।
का मा० ॥ होवे रोतीखात जब । सो पल्योपम कमल ॥ पल्यु जुकोट्टाकोड़दस । सागर मान पसान ।। जनागम परमान- क । एतो सागर मान ॥ सागर कौडाकोड़ जव। बीस सुनौमिति होय । काल चक्रतव होयसो । परी जानो सो।। घोघाई॥ पहिल सुखमसुखम आरे के। कहा मकल नागा ता तारेके॥ जनें जुगलियातहं सब नारी । साथ िक वारो झकनारी ॥ पर्याप एक कूप तें उपजे । पैते दुलह कुलनि निपजे ॥ तीन कोसकी तिनकी काया । गल्योगग त्रय बाताया ॥ भख लगतीज दिन तिनको । भरे पेट इक जिनकों। उचान दिन पित अरु माता । तिन पाललालन राता।। कल्प टक्षफिरि तिनको पाप । यथा तिनको संताप ।। एकमा छप्पन पमुरी तान । पहिती. या में मो जग में ॥ दृजो आगे गुवमा नाग । कोका कोई तीन को धाम ॥ सागर ओपम ना गा मा तिन लिन की सुनि सा॥ कोन दोयता पलाय । दोय विम पाळं ते खायः केर मन बहार ममा । माता पिता मासठ दिन पालें ॥ सामानि तिरकोलाले । गिनकी पसुलीकोसुनि चालें। कनत अढाडम ने गग्वं । अब नोजो बारी सुनि साखें । सुममा दुबमा नाम अनूपं । कोड़ कोरसागर ओपं ।। कौनमानतननाम गुगलिया। पल्योयम इक यायु संवलिया। इक दिन अतर कर यहारा । मान चांवले के तिहिं, आरा ॥ उनिम दिवन मानु पितु पालें। कल्प रक्ष तिर तिनका. लाले ॥ चालठ पमुली तन में जानो । यो तीजो आरो परमानौ ।। दुखमा सुखमा चौथो साधा। काल मान तोजौ को आधौ ॥ प तान इतनों कम चहिये । सहस बयालिस बरसैं कहिये।
क... । जगल धर्म इहि या नाहीं। नित्य भवव्यापै तिहि माहीं॥ कल्प वृक्ष देवे .ते हैं। कर्महित जीवन निरबह ॥ पंचम चारा दुखमा नासा । जामें नेक न सुख विश्रामा ॥ सहसहकीस वरसजाकोरिति । वरस एकसौ बीस आयुगति॥ साढ़े तीन हाय तर लाना । दिनहु बेर भपः दुख नाना ॥ अंत समय इहि बारे माही । जन-धन थोरो रहि नाही। दुख संह नान्नादन नच्छेसा । नाम फाल्गुनी सादी वेसा ।। नागिलस्त्रावक और त्राधिका । नाम सत्यश्रीचरणमाविका ॥ घरस काल इहिसारे लहिये । चतुर संघ याही को कहिये ।। छठना दुखय दु:खमा नामा १ सहसह कीसवरसमितितामा।। एक हाथ तन मित चल जानें । सोरह बरस सरसेचयत्तामैं ।। लोक-कुरूप कुधर्म कुकामी । अगति अलज्जयलअदामी॥ नव वरसी तिय गर्भपकासी । घरविनजनगिरिगुहानिवासी॥ मत्स्या सी जनकुत्सित कर्या । छठवें मारे को यह धर्माः॥ छठवें पहले दूजे नारें। जैन धर्म नहिं तिनके वारें ॥ इतेहलौं कर करि चहिये। उत्सर्पिनी कालतिहिकहिये। फिरि छहते इकलों उलटोक्रन । अव सर्पिनीकाल कौआगम॥ दुहूं काल मिलि बारह झारे । सागर बीसकोड़ को- डारे ।। काल चक्र इक याको कहिये। जैनागम मत ऐसेलहिये ॥ चरम काल तीजे : पारे में । अरु. चौथे पूरे · वारे में । चौवीसी जिनवर अवतरे । ज्ञान योग तप वपु गुण भरे ॥ कुल इच्शक गोद लास्मपजे । इसजिनबर तामें निपजे ॥ अरु हरिबंश वंश के माहीं । गौतन गोतमाहितिहि ठाहीं ॥ दोय तिथंकर ओरौ भये । मुनिश्रीस्टत नेम छवि छये ।। बरस पछत्तर याके जवे । अठ मास साढ़े पनि सर्वे ॥ चौथे पारेके . जब . जब रहे । तेईसी जिनवर निरव ॥ चरम तिथंकर तब अवतरे। महावीर- स्वामी गुण भरे ।। दू .. 1.4.
१६ क. भाः । नहीं की ऋकार विन्दामा प्रथम चबन अब कहीं मुहाग ।। अयश्रीमहावीर स्वामी चवन कल्यानक ॥ चौपाई॥ %D ग्रीपम ऋतु मितमास अमा। छठतिथि निगिनिशीयनहिंबा ॥ देवलोक तं च्यवनविचारयो। देव योनि तजियो निरधाग्यो । बीस मागरोपम बय मजिकै । शुभ विमान पुप्पोनर तजिक ॥ देवस्थित मव परगा करिकें । मनुप योनिको हित चित परिका जम्बूदीप भरथ छिति माहीं । बामगा मुगट प्राम निहिं ठाहीं॥ अपभदत्त हिजबर की घग्नी। देवानंदा मवग्न बरनी ॥ मनिश्रुतिअवधिज्ञानसंगलंक । ताके गर्भ चवे मुखदक । सकमचवनसमय नहिंजान्यो । करिक नवन मा पहिचान्यो। ताही निशि तिनि देवा नंदा। चौदह अपन लाने सुख कंदा॥ अति उदारान ग्रानदकारी । अदमन मगळीक हित चारी ।। मोलग्विलहि अति मोदितभई । मानद पत हवे पति पै गई। प्रयम जोगिकर विनय मनायो। पूनि अलि सी सीसछुवायो। पा, मा विवग्था कही । जा कछ मुपन मांह उनलही । कहि नाको फल पछन लागी । भागवत मुहि करो समागी।। तबनिनिजनिगनियमितकागतिनमपतनकाशचितधरि॥ अति हर्पिन आनंदित है के । माद मई हवे सुख सरसे के ॥ प्रागप्रियकाहि नियमामाख्यो । दईदयो चितको अभिलाख्यो। बड़ो अलभ्य लाभ तुहि हवहै । मुद मंगल आनद हित पैहै ॥ चारोवंद गनित गुण जेते । जोतिप केसब लहिहै तेते ॥ अफ इतिहाम पुगण ज्ञानगुन । वैदककाव्यछंद सिच्छापुन ॥ आगमगम निगम गुणज्ञानी । तर गर्भ अर्म में जानी ॥ पिर्याजयको तिय जवयों सुनी । मुदित्त भई इकतं सतगुनी ॥ ग्राम पाय पतिपाम न छंड्यो। हाम विलासभोगटत मंड्यो।
ल
मा।
अपभव वन।।
ची
तेही समय पतिहिकाला। इन देवतन को भूपाला ॥
वज़ जान्नु को नायकहिये।गत गज वाहन लहिये ।
जादी सना धन नामः । लाज वलील विमान सुधाला ॥
मुख्य पानवल विमानातील सहल देवगण नाना ।।
सात चलीश सेन समातिलगंधायचगनित अति ।।
लोक पाल सत्र मागे ठाने । वयो नाज सिंहासन गाड़े।
कुण्डलमुकुटाक उत्याला गदादि पय मणिजाला।।
चालर छक बीजना राजे । नाटक गीत लाय धुनि छाजे ॥
जिहि तपकरियहर्वेनव पाई। लो तो का देहुं वताई ॥
अथ कार्तिकस्ठकका।
मुनि सुरति स्वारी के का। टी पण नगर मझारें ॥
प्रजापाल दर ताबो राजा :जा सीलपरसुखद विराजा ॥
तापत एकतह पदि हायो । तिन तपबलसवका विरमायो॥
राजा भन त तापल घर । लोनावं नित उठकर ।।
कार्तिक ले एक एत धागे । दुबलावलें तिहि नगर मलारी ।।
सो पावक नहिं साकेगशे। ताते लपत देपित भयो ।।
पारनदिन पती तिन करो । कार्तिकलेठहिहम नहिलह्यो !!
सेठ पीठ पायस की धारी। तो हम पारन करें तुम्हारी ॥
सुनि र सेवहि के बुलायो । कीनी जो तापस मन भायो ।
सेठ पीठ पायत की थारी । गरमागरन लाय के धारी ॥
लाग्यो तापत पारन करने । लागी पीठ सेठ की जरने ।
तापस निज कर नाकाहि के। सेठहि न नैन की देके ।।
अति अपमान ठानि रदन्यो । जानि ले जनातिपम्तिायो ।
जौ पहिले नै चारित लहतो । तेइतनो कुखकाहे तहतो ॥
ऐसे बार वार चित माहीं। लोचि सेठजग जानि कृयाहीं ।
३
क. भा.
१८
निज अपमान सेठलहि मनमें । चारिततुरत लियोजिनजनमें ॥
तिहिसंगसहस अठोतरश्रावक। भोजती अतिपरम प्रभावक ।।
संथारा लेकै तन तज्यो । सेठ सधर्म इन्द्र पद भज्यो ।।
मरि तापस ऐरावत भयो । सुरपतिनिजवाहन करिलयो ।
तव तिन गज सस्तक कोने । इन्दौ दोय रूप धरि लीने ॥
ऐसे जेते सिर गज करै । सुरपतिहू तेते वपु धरै ॥
यो गज गर्म होनकरि दीनो । विवस होयतब भयो अधीनो।
सुईइन्द्र यह वइभव जाकी । सुर नर मुनि भयमानतताकी ।।
अवधिज्ञानकरितिनजवजान्यो। जिनवरचवमनुजोनिप्रमान्यो।
मुदित होय आनंदअति पायो। आसनले उठितिहि दिसधायो॥
सात पैझचलिकियो प्रनामा । नमोहंत यो कहि मिर नामा ॥
अथ इन्द्रस्तुति ॥
तुमही ज्ञान जोग के स्वामी । तप विराग करि पूरन कामी ॥
पुरुप प्रधान लोक हित कारी। क्या धर्म साकित परभारी॥
भुक्ति मुक्ति दायक भगवाना । सग्नद अभयदमगदसुजाना ॥
अप मेघ कुमार कथा॥
मेघकुमारहि ज्यों जिन स्वामी । मुमग दिखायो पूरन कामी ।।
ताकी कथा कही अति प्यारी। जिनजनगन की आनदकारी ॥
श्री जिनबरम्वामी भगवचना । एक समय विहरत जनसन्ता ।।
विचरत नेक सुत मा भेटे। बोधि ताहि भवदुःख खरखेटे॥
अंत द्वारपर थल निहिदीनी । रहन लग्योगुरु वचनअधीनौ ।
तहां साधु बहु का जाद। गमनागन संघट बढ़ावै ।।
मेरमा गजनक तुल । भयो गमनागमतें दुख युत ॥
तब उनशमनी भिब विचारो। सदालेज सुखमसि मुखनारी॥
हाव भाव भरभुनभरि भेटनि । सब विधिकोसुखप्तारसमेटनि।।
एते सुख तब नोद न आवत। सो अब ह्यां इतनौ दुखपावत ।।
यात शिरि अपनो घर लहिये । साधुपनो दुख अत्तहनसहिये ॥
कः भा।
तूं
१६
यहमतिचित धरिगा जाये। तुम बिन भावं मनकी पाये ।।
कह्योयलयहगुवनहिं सहिक । नन्तरयोतिरिगृहसुखलहिको।
ऐसी मति कबहुं नहिंमोज। यह केतो दुख जाहि न धीजै ।।
पूरब भर जैते दुख सहे। धन्य सरम हित जात न कहे ॥
सब विस्तारि कही गोला। पूरव जनन करमणुन तोला।
गिरि देतानाहिं कनिका तूं। भयो हजार करिन को वरतूं ॥
छहरदवारी मन पद धान । मेरु सान अति ऊंची भारी ।।
बायोनीपम भीपल काला । न लगोदवानल ज्वाला॥
दद डरततर तूं तहं नल्यो । निर्जल सर पंकिल मैं फस्यो ।।
तहाएक चरि कारवर यायो। तिन तुहिकरित्राघातदुखायो ।
सहनकियो त अति दुखताको । सातदिवमनहिलहि साताको
इक सतवीस वरस वयभरिक। विंध्याचल में जनम्यो मरिक ।।
पारि दांत को हाथी सरज्यो । बरु नवरनजातगिरिलरज्यो ।।
जाके और सात ले हारी । माघर हविरतिहिसायी ॥
पूरव भव दव दुल जो पाये । जातरकर सो तुधि आयो।
सोबिचारि चिल्धरितिनवरकरि । भिएकाखी गिनुलनकारि ।।
इकदिन वनघनफिरिदक्षलागी । जतु श्रेणि वनकोडरि भागी।।
मागि कहूं जव ठौर न पाई । तिहि पत्रिन वजाइसनाई ।।
गजवरहूं तिहि पलमजिवाशे । ज्यायों करितहलायतमायो ।
फरयो अनेक जीव संघट में । हलिपलितबयोनताक्टमें।
ता गज वो जस्तन सुजलायो ! हुनलावा जे घरनउठायो ।
सोपग थल सूनो नहिं पायो । सताएकामानितिहि थलबायो।।
ताहि देखि गजाति अनुकंप्यो । घरन धरन ने जैहै न्यो ।
जीव दया इत चितप्रतिपार्यो । फेरि नवरनरनिपै पार्यो ।
ढाई दिन ली त्योही रह्यो । जब लगि सोदावानल दह्यो ।
दव के शांत जब सस सरख्यो । पदपीडा गनहिय दरको।
मूख प्यात दुख तापर दाव्यो। निओ निगजवदुवडाच्यो ।।
॥ ॥ २० क. या परत करि सो बरसी आय । लागि दयो तनातिसतभाय॥ तिहितय स्नेनिकराजसदन में। नेशकुमार आय तुम जनमें ॥ तेही पुन्य साध पद पायो । अत्र क्योंकातर बै अकुलायो । एके जीव हेतु तब तेते। सूख प्यास बुख सहे अनेसे सो अब जगत पज्य साधनतें । दुखीगमन आगम बाधन तें। ऐसौ तोहि वत्स नहिं चहिये । जो तुहिचहत परनपदलहिये। यो गुरु वच सुनि मेघकुमारा। निहवलज्ञान लोनिरधारा ॥ हाथ जोरि गुरु पद सिरनायो। प्रभु चूड़त तुम सोहिं बचायो । अन जिहि माहिचित्त इतमेरी। रहै साधु सेवा में घेरी ।। दरस परस नित उनशै पाऊं। निप्तिदिन चरन सायुकेच्याऊं।। साधु चरन रज सिर परराखी । उनके बचन गुवारस चाखा ॥ ऐसी मति मोहिं देहु दयाला । सुनितोपे गुरु परम कृपाला ॥ एवमस्तु तासी गुरु भायो । रावते तिन तपश्त बढ़राख्यो । तप प्रभाव तन तजितिहिथामा। अमोनेव-लहि विजयविपाना ॥ पुनिविटेह एलडिछविकागो। तब प्रतापतेनुकि सिघायो । चाँगुप्त कुंवरहि पन्थ दिलायो । गाय पो गिरन न पायो ।। पात जीव दया नीलो । पाले सुजल जननता जीकौ ॥ ऐसे गुरु जन के हितकारी । नारनतरल परन भयहारी ॥ काम शोधलोमादिकलिने । गग पसरतादिक तितने ॥ जिन जीत कि नाई। तुम जोई चाही सोइ होई ॥ ऐमें कह सिमित नवालीअपने मन संकल्प बढ़ायो । मन- विनरहीं। ऐसो अवरज भयो न कवहीं । क - बलवा । चक्रवर्त श्रादिक वसुदेवा ।। निशुल नहिंउपकवहीं। राजादिक कुल मिलैनजवहीं । कब सो नानी । जोबिजकुलजननें जिनस्वामी ।। कालका इनामनात विनीत। उत सर्पनि अब सर्पनि वीते ॥ हंडक नाम का हक आवे जो ऐसे अचरज उपजावै ।।
क. भाः।
२१
ताही काल माहिं हन हेरें । उपजत ऐसे दसों अछरे ।।
सो यहि काल कार दरशाने । ऋति अद्भुत रसकरि सरसाने ।
आदिनाथ जिन आदि सुंदक । महावीर स्वामी लौ लक।
जिन जिन जिन वारे में जो जो । भयो अझेरौ वरनी सोसो॥
अय प्रथम अछेरा॥
एक काल इक छिनमें सोई । बहु जीवन की मुक्ति न होई ।।
होय कपापि तु चरज जानी । अपभ देव के वार मानौ ।।
एक ऊन सत जिनके साधू । आठ भरत सुत रहित उपाधू ॥
आपसहित इकसत बरुवाती । इकछिन मुक्ति गयेसुनिपाठा ।।
प्रथम नरौ यह जिर जानी । अब दुजे को सुनौ वखानौ ॥
अध दृजो ऋछेरा॥
जैन धर्म दोधे बारे में। जब विच्छ ता वारेमें ॥
प्रसंजती पूजेतव जन सब । पूछे धर्म विवस्था ते तव ।।
कहें कि तब जिन जनमोदीजी मन धन कायापजा कीजै ॥
साध बुद्धि तब उनकी पूजा । होन लगीकोउ ओर नदूजा ॥
दूजो यह ति अचरज नयो । सुबुधि नाथ के वार भयो ।
अथ तीजो अछरा ॥
नरक न जाइ जुगलिया कवहूं। जाय तु अचरज अवहूं तबहूं।
कोसंबी नगरी को राजा । सुमुखनामतिसुभगवि राजा ॥
नीरा कोली इक तहं बस । बनमाला ताकी तिय लसै।
इक दिन नृप तालो लखि लई। रूप देखि सव सुधिबुधिगई।
काम अन्ध वै कळू न जानी । छलकरिताहि महल मेंानी॥
भोग विषय तासौ हर संध्यो । वीरा कोली धीरज दंड्यो ।।
ढंढत जहं तहं दुखित विसाला । हा वनमाला हा वनमाला ॥
बिरहदुखिततिहिटपलखिलीनी । बड़ो खेद पछितावा कोना ।।
देवजोग नृप अरु तिय अपर । गाज परी ताही छिन दूपर ॥
दूजे भव मरि युगली भयो । ते हरिवर्प खेत सुरव च्यो ।
॥
R
क० मा.।
वीरा कट साधि मरि भयो। किल्विख नाम देवता भयो।
तबतिनयुगलिहिलखिदुखपायो। पूरब जनम वैर सुधि आयो॥
तिन युगलिहिं हांत लैं चल्यो। चम्पा नगर प्रजा तें मिल्यो ।
नृप हरिभद्र नाम कहि थाप्यो । रानीसहितताहिसखव्याप्यो ।
नगर प्रजा कौतिन सिखरायो । नृपहिमास मयभोग खवायो।।
ताही पाप युगलिया मरिकै । नरकगये अचरज जगकरिक।
कुल हरि वंस भयो तिनहीं तैं। हें प्रसिद्ध जगमें जिन हीत ।
यह ई तीजा भया अछेरा । जिनस्वामी सीतल की वेरा ।।
अथ चौथा अछेरा।।
चौथौ अचरज अबसुनि कहिये । अद्भुत रसताको पथ गहिये ।।
तीर्थकर नहिं तियह उपजे । जो उपजे तो अचरज निपज॥
मल्लिनाथ तिय हवै औतरे। जिन वरवपु अद्भुत रसभरे ॥
परव जनम करम यह वांध्यो । तातिय तनसों जिय साध्यो।
तिहि भव महा विदेह नगरम । शतवल नृपके सुखद नगरमें ॥
कुंवर महावल नामा जनमें । मातपिता अति मोदित मनमें ।
मित्त किये छह राज कुमारा । वय गुनसील रूप सम सारा ।।
अचल धर्म परन अभिचन्दा। वसवे श्रम छहनाम नरिन्दा॥
साता वाल मित्र मिलि परे । समपदवी प्रापत हित करे ॥
लैचारित सब तप को लागे। महाबली पैछिपि कछु जागे॥
छहत अधिक कपट तप कीना । तिहि प्रभावतं तियतन लीना॥
मिथला नगर कुंध नृपजा। प्रभावती तिय गर्भ सुताकै ॥
मल्लिकुमारी इहि सुभ नामा। रूप सील गुनपरमललामा ।
अगहन मुदि पकाइस दिना । जनमोजिन वरहवेतिहिछिना ।
छहों मित्रहं जब मरि गये। देसान्तर में राजा भये ।
सुनि गुन रूप मील मल्लीको । भयेभंवर सुनिगुन वल्लीकौ ॥
शाये तजि निज २ रजधानी। मल्लिकुमारीजिहिदिसजानी ॥
मल्ली अवधि ज्ञान करि जाने ! परम सनेही मीत पुराने ।
कामा
२३
तिन्हें देखि निज रूप लुभाने । विवसकामवसविकलपिछाने।
मल्लि स्वर्न पुतली सज कीनी । तामें निज विसवधरिदीनी ।।
रन भूपनन भूपित कीनी । कंचन में पुतली रस भीनी ।।
नित प्रति ताके मुख के माहीं। अन्न कोर इक २ धरि जाहीं ।
सोसडिअन्नअधिकजबविगर्यो । अतिदुर्गधभयो घरसिगर्यो ।
छहों जनन तब सो लहिलीनी । प्रतिक्गिन्ध घनघिनकीनी॥
तव मल्ली ते सर समझाये। अन मय तनके भेद वताये॥
अस्थिचर्म नस वस मज्जामय । रुधिररुमास मूत्रमलालय ।।
ऐसोयह अनतन धन घिनघर । सुनो सनेह जोग नहिंवरनर ॥
वोधि छहन को चारित दीनौ । जनममरन दुखतें करिहोनौ ।।
चौथो अचरज यह वखान्यो । अतिविसमयअद्भुतरससान्यौं।
अप पंचम अशेरा ॥
मिले न वासुदेव है जग में । जो पै मिलें तुअचरज मग में ।।
खंडधातुकी से इक नगरी । कंकाअमर नाम गुन अगरी ॥
वासुदेव इक कपिल सुनामा । तहां से सुभ लच्छन धामा।
इक दिन किहू हेत गुन मये । कृष्णसुवासु देव तहं गये ।।
ताको हेत कहीं सुन लीजै । एक समय नारद रस भोजै ॥
पंचाली के अविनर खोजे । खंड धातुको जाय पतीजै ॥
पद्मोत्तर राजा पै गपे । रूप द्रोपदी वरनत भये॥
तीन लोक में नाहीं ऐसी । सुन्दर तिया द्रोपदी कैसी ॥
सुनि गुन राजा मोहित भयो । देव अराधि सिद्धजप दियो ।
तिन
सुर नाय द्रोपदी हरी । लाय नृपति के आगे धरी ।।
पै द्रोपदी सील व्रत साधे । निस दिन रहे धर्म आराधे ॥
भोर भयो पांडव जव जान्यो । चश्तियक्तिहअतिदुखमान्यो।।
ढूंढ हारि जब कछु नवसाई । तव सुधि कीन यादव राई ॥
कुन्ती जाय कृष्ण ने लाई । आय कृष्ण सव विथामिटाई ।।
नारद मुनि ताकी सुधि पाई । तब हंसि यो पांडवन सुनाई ।।
२४ क. भा०। कहा करी तुम मिलि पांचौपिय। राखि न सके पांच मंडक तिय॥ सोरह सहस ठोतर से तिय । एकाकीराखत हम ज्यों जिय। या हंसि रिपु पे करो चढ़ाई। सहपांडव चलि गये कन्हाई ॥ पदमोत्तर राजा सों लरे । जीति ताहितिय लेकरिफिरे । तव जयसङ्घकृष्ण धुनि कोनौ । कपिल सुवासुदेव सुनि लीनौ ॥ कपिलतहां तब मिलनविचारी। मुनिसुत्ति जिनिवरजेभारी ॥ कह्यो न वासुदेव द्वै मिलें। मिलेंतुअचरजपतिजगरिखलें। जालौ कपिल सिंध तट आये। तौलौ कृष्णा सिंधु मधि पाये। सङ्ख नाद तब दुहुं दिस भये। नादहिं तो पिल निज ग्रहगये ॥ यह पांचवा अचमौ नयो । नेम नाथ के वारें भयो। अथ छठवों शेरा॥ चमदर धर्मेन्द्र लोक लो। जाय नहीं जो जाय अचंभो॥ परन नामा तापस एका । कियो घोर तपचरस अनेका ।। सब विधि साधि कष्ट मरिगयो । तप बल ते चमरेंदर भयो । अवधि ज्ञान करि जबउनदेखा। धरमेंदर पद निजसिर लेखा। लखिअतिक्रोधअगिनतनजाोधिरमें दरसा लरनविचार्यो । जोजनलाखबदनविस्तार्यो । सुरन उगवन लाग्यो भार्यो । मन में महाबीर की सग्ना । गहिरि काहू को जी उरना। तव धरमेंदर बज चलाना । चमरेन्दर भाजा भय पाया । प्रभुपदतर अनुतन धरि रह्यो । अवधिज्ञानकरिसुरपतिलह्यो। महवीर को सरना लोना । नव धरमेन्द्र छांडि तो दीना ।। कह्योवच्यो जिनवरती मरना । फेर न ऐसो कबहुं करना । दुहं परम्पर दोष छिनाये । अप अपने थल दुऊ सिधाये।। छटो नगे दुग्न भयो । अब आगे सुनि अचरज नयो।। अथ माटवी गरा॥ सतवा अचरज जित देसना। निफल न होय एकपल छिना॥ अरुजी होय तु अचरज होई । यह जग में जानै सब कोई ॥ - - -
5. भाः।
२५
महावर भगवंत सुजानो । जब भये प्रनु केवल ज्ञानी ।।
सनो नन्न सब मुग्न नचायो । महाबीर तब सब्द सुनायो ।
लोदेलना न मिनहू मानी । यह अचज सतयाँसुनिज्ञानी ।।
अब टया कहे।।।
मत भविष्य अरू तयहीं । ऐलो चरज भयो न कहीं।।
सोनम उपसर्ग त्याना । गोलालक तं जो भगवाना ॥
लोकलो सो मुनि चितलाई । सावनो नगरी सुखदाई ॥
तहां इस इक क्ल नवला गोलालक तपसी इस्पायुत ॥
लिल जिन वरनों बाद लाशे। उ प तेको लेस चलायो ।
सुनखत सरवस्त दोय जन । महाबोर के मुख्य सिन्य तन॥
साधु दोय ते नाड़े बारे । ते जल्स ते तुम्न जलाये॥
तिनहिं जारि वह तेनो हसा। गो जहां महवार जिनेसा॥
देशदन्झिा पाछे रिलो । गोतालकही तात जर्यो ।
पंजिनवर के तनके नाहीं । बरन दिह इकभयोतहाहीं ॥
काल पाइ लोऊ निटि गरेप जगने यह अचरज भयो ।
यह उप सर्ग जिने नहिं होई। या वयो अनने सोई॥
अर नवी मछेरा।
रवि लसिनिज विमानयुतत्रा। जाहि न शितहूं कबहुं कापै ॥
जो जाहिं तु अचरज होई । विदित बात जानत सब कोई॥
होतंबी नगरी के माहीं । महावीर स्वानी तिहि ठाहीं॥
समो सरन देकर तहं रच्यो । एजो सुख जाते नहिं बच्यो ।
तहां सूर तति अति वि पारे! निजदिनान देखन आये ।।
नवन उमेरी यह वखानी । अब दनवा हूं सुनो सुजानो ॥
अथ दत्तवों समेत ॥
अब दतवों अपरजतुनिमोऊ ! बिजलजिन जनमतहिकोऊ ।।
देवानन्दा
महारा। भगवन दिशेयतारा ॥
दस अवरन सुन्पति कहे। लेनाधिपहि बालि काहि रहे।
२६ क. भा.। अरहतादिक जिमजन सवहूं । भिच्छुककुल नहिं उपजे कवहूं। सो श्री महावीर जिन ईसा। द्विज कुल गर्भचबे जगदीसा॥ कुल अभिमान मान मन साध्यो। नीच गोत कुलयात वांध्यो। सो सब अब विस्तार वखानो। पिछले भव जिनवर के जानो। सत्ताइस भव महावीरके । वरनौ सुनि गुन परम धीरके। जाभव तें समकित मित जागी। मुक्त होनकी थित अनुरागी ॥ ताहि आदि दै महावीर ली। सत्ताइस भव भये स बरनी ॥ प्रथम भये नयसार थलीसा। जिन आतिथ हितचहेमुनोसा॥ भोजन सजि मग जोवनलाग्यो। मुनिआयेलखिमुद मनजाग्यो। सादर सनमाने विहराये । साध बिहरि अति आनंदपाये॥ मुनितव कृपा पात्र जन जान्यो। ताके अनमुख धर्म वखान्यो ॥ सोसुनि तिन समकितपदपायो । मुकुत जोग ताको भवभायो । यह पहिलो भव दूजो सुरको । तीजो सुनिश्व बरनो धुरको ॥ भरत चकवे घर अवतरे । नाम मरीच सकल गुत भरे ।। इक दिन भरत आदिस्वामी । पछयो माय नामि नामी त ॥ अहोजिनेमर पब इहिकाला। समोसरन थल परमविसाला ।। यामें और जीव कोउ तुमसौं । तीर्थकर है कही सो हमसी ॥ सुनि बोले श्री आदि जिनेसा । ममामरन में तो नहिं ऐसा ॥ पै तापस तुब मुअन मगैचा। लहि है पदवी परम अनोचा। चाविसवा जिनवर मह है। महावीर नामा जप्स पहै। चक्रवर्ति हूं ६ मोई नाम मित्र प्रिय ताको होई॥ महा विदेह खेत में उपज । मका नगरी में सो निपजे ॥ अरु विष्टष्ट नामा बमुदेवा। भरत खेत एका ॥ मे वचन भरतमुनि जिन तें: सुत मरीच पे आये नित टे पर दच्छन बन्दनकीन्हा । भागवन्त अपना सुत चीन्हा पनि सुत से उनऐमे भाख्यो । दे भगवन्त वचन की साल्यो। केंगे जीव तियङ्कर इन्हे । वासुदेव पद हूं सो पैहै ॥ है --
का मा० ।
२७
तु
चक्रवनि हूं है है सोई। कही बात ऐसे मुद मोई ।।
तोहि तियङ्कर पद समुहायो । यात हा तुहि बन्दन आयो ।
मुनि मरीच ऋतियानंद पाग्यो। विपुल हर्प त नाचन लाग्यो ।
फुलको गर्भ भयो अति भारी । मोसी सुकुल न जगत मझारी।
तेहो गर्भ नीच कुल संध्यो । तात पिच्छुक कुल भवसाध्यो।
कोड कोड़ सागर वय माहीं । सनाइस भव भयो तहाहीं ॥
तामें तीन प्रथम ये कहे । चौथे भव सुर तन धरि रहे ॥
पुनिग्यारह भवमाहि इकन्तर। इकतपसी इक विबुधनिरन्तर ॥
पन्द्रह भव जद ऐसे गये । राज कुमार सोरहें भये ॥
सत्तरवं सुर ठारह माहीं । वासुदेव पुनि भये तहाहीं ॥
भव उनीसवें नरक सिधारे । बीस जनम सिंह तन धारे ।
गये नरक पनि भव इक ईसें । धरयो जनम नृप को वाईसें ॥
चक्रवर्त पुनि है तेईसें । फेर देवता है चोवीसें ॥
राजा नन्द पचीसें भये । पुनि छवीसवं सुर गुन छये ।।
सत्ताइसवें भव भगवन्ता ।देवा नन्दा उदर वसन्ता ॥
यातें इन्द्रहि योग सुगौं । नृप कुल में सरजावे अर्भे ॥
हरि नगमेशिहि ऐसें कहिकें। फिरवोल्योसुरपतिमुखलहिक ।।
अब तुम वेग जाहु तिहिनगरी । देवा नन्दा जहं गुन अगरी ॥
ताके गर्भे वेग पुरावौ । छत्रियकुण्ड ग्राम में लावा॥
सिक्षारथ राजा जहं राजै । त्रिसला रानी जहं छवि छाजे ।।
ताके गर्भ माहिं है कन्या । ताहि तहां से लै गुन धन्या ।।
बदलिदेहु दुहुगर्भ परस्पर । त्रिसलाकूरख माहिंजिनवरधर ॥
हरिनग सीयहआयुससुनि । करिप्रणामतिहिदिसचाल्योपनि॥
करन वइक्रो रूप विचार्यो। सव रतननको सार निकार्यो।
वहुजोजन मितिदण्डरूपधरि । समुद घात ताकें पाछ करि ॥
लोकउचित निजरूपबनायो । सुर उत्कृष्टी गति करिधायो ।
अमिति द्वीप सागरमधि हेकै ! जंव्हीप मध्य छित छ्वके ।।
क ०भा० ।
२८
भरत छेत्र छित पर जब आयो। ब्राह्मनकंड ग्रामतव पायो ।
ऋपभदत्त द्विज बर लुम घरनी। देवा नंदा सुवरन बरनी॥
ताहि स्वापनी निना देके । पुदगल अशुभ सबैहरिलके॥
अय गर्भाकर्षण
सुभ पुदगल तहं दये मिलाई । गर्भ उदर तें लियो कहाई ॥
छत्रिय कुंड तुरत लैगयो । त्रिसिलाकू ख माहिं धरदयो ।
कार कृष्ण तेरस ससि बासर । उत्तर फागुनिनखत सुखदार ॥
निसि निसीथ वीतै तिहिवारा । कल्यानक यह गर्भ पहारा ॥
देवानंदा उदर सहायक । रहेवयासी निसिजिननायक ॥
तिहीं राति तिहि देवानन्दा। फेर सुपन देखे अति गन्दा ॥
चौदह सुपन प्रथम जे पाये। ते त्रिसला मनुलये छिनाये ॥
ऐसो सुपन . देखिके जागी। अतिसचिन्त मनसोचनलागी॥
तिही राति त्रिसला रानी ने । सिद्धारथ राजा मानी ने॥
सोवत तेई चौदह सुपने। लखे समात वदन मैं अपने ॥
सखद चित्रसाला जहं रानी। सरस सेज में रेन विहानी ॥
ताको वरनन कछुक बखानों । जहां सोय सुख सुपनो जानी।
कवित्त
नवल वदल धाम ललित ललाम जिन कीनी छाम छवि
पाकर को जो छाई
। रचित विचत्र चित्र खचित जरय
जाकी जार मगर होत जोत चहूं घाईहै। छोनी पै विछौना
छवि छाये से विछाये स्वच्छ छात चांदनी की चांदनी सी
छटकाई है। कोमल कमल दल रचितवि चित्र सेज कमला सी
तारे माई त्रिमला सुहार्डहै ॥ १॥ जागत कछुक पल लागत
अनक नींद पागतमग मृगौना से छिपाये हैं । उदितउदार
अद्भुत मजार परे ग क सोभा सार सुखद सुहाये हैं।
चौदही भुक्न ताको सिद्ध को सद्धि सिदि साधन विनाही
क. भाः । २६ पाई मोद मन चाये हैं। चीवहीं सुपर एक एक तें निपुन ऐसे अनुभव अपने श्री त्रिसला ने पाय हैं ॥२॥ अथ चौदह सपन--प्ररस गज बरनन ॥ देखि दिरा दुरद विगत नद होत जातं चारि रदवारौ ऐसी मत मददारी है। मंदर सो रब मुखकंदर सो जाम लुठसुन्दर उमंद मंद गति अति भाग है ॥अगल कालाल विमल वरन स्वच्छ सानो जिन जस पुजनंजुउजियारीहै । ऐसौ गजराजन कोराजसिरताजत्रालपहिले सुपनरानीत्रिसलानिहारयोहै ॥३॥ द्वितीय रपवर्नन ॥ उन्नत विपान दिवान को व वानिलके कंवरधु विधि को प्रवल वलवारी है । कोमल विमल रोग्य सोमके वरन तमतोम को हरन हार रूप निरधारो है ॥ रुट तन पट जामें एको तुन दुष्ट नाहि तुष्टता मिलत लखि ललित सुढारयो है । ऐसो पराजन को राज सिरताज बाज दूसरे सुपन रानी त्रिसला निहारी है॥४॥ तृतीय सिंह वर्नन ॥ केसर लिरीख के सरीवेकेसकेसरके कोनलविमलबर वरन पियारी है। तीछन तिरछे नख ताल तल जोम लाल दीपसे दिपत हग दीह देहवारौ है ॥ दंतुरित दंतनि की पंति छवि वंत स्वच्छ तुच्छ कटि तटि पच्छ उन्नत उधार्योहै । ऐमौमृग राजनको राज सिरताज आज तीसरे सुपनरानी त्रिसला नि- हार्योहै ॥ ५ ॥ चतुर्थ लक्ष्मी वर्नन ॥ हिमगिर मांहिसरसर में सरोज बन वनजलज एक परन सुहायोहै । वारिज मैं दिव्य गेह गेहमें कनक बेल वेलनेकमक एक एक तें सुहायो है। सोइनै बदन नैन मोहनै चरनकरनाभि उर उरज कमल व्यूह छायो है । कोमल कमल सुखी कमला क. भा० ॥ : ३० विमल देवी ऐसो चौथौ सुपनो श्री त्रिसला ने पायो है ॥ ६॥ पञ्चम फूलमाला वर्नन॥ चंपक चमेली बेल मालती सुमिल मेलि परि मलझेल गुन गंथी मन भाई है । सेवती गुलाब कुंद केतको मदनवान जुही सोनजुही पुहीसोहोसुखदाईहै। मधु मकरन्दछके तुन्दिलमलिंद वृन्द गुंजिगुंजि रंजमन मंजु मुद् छाईहै । फूली फूलमालसोभा सौरभकी जाल बाल त्रिसला की पांचवें सुपन दरसाई है॥७॥ पष्ठम चन्द्र वर्नन ॥ राकापति रैनपति रतिपतिप्रति मित्र उडपति प्रोपधी को पति मन भायोहै। रोहिणीरमनराट रूपको सुमन तीनो ताप को समन सुमनन करि ध्यायो है ॥ द्विजराजजाको पद को- विद कला को भलो भाईहै रमाको मुद कुमुदन छायोहै । पूरन अमंद चन्द अानद को कंद ऐसी छठेवा सुपन रानी त्रिसला ने पायो है॥८॥ सप्तम रवि वर्नन॥ तेज पुंजरासी सुत्रकामी तमनामी देव वरस छमासी दिन छिन प्रगटायो है । कोमल कमल कलकुल मोदकारी भारी कोक सोकहारी लोक लोचन महाया है। प्रबल प्रताप पैहरत तीनों ताप तात तीन कालताका तीन रूप करि ध्यायो है। मारतंड मंडल अग्बंडित प्रचढ एसोसांतवों सुपन रानी त्रिसला ने पायो है।ह ॥ अष्टम ध्वज वर्नन॥ उमर अकान ला सकाम दम दिस मांह छांह जाकी जौन्ह मालकित करने लहरत पोन फहरात फरहर जाम चित्रित विचित्र हिचित्र बीच ठारमें। कंचन रचित दंडखचित अनेक नग जग मग होत जग मांहि जोति जोर में। दिव्यतेज क० भा० । ३१ मई ऐसौ ध्वज रानी त्रिसला ने आठवें सुपन देखि लीनौ हग दौर में ॥ १० ॥ नवम क्लस वर्नन॥ कंचन रचित मनिमानिक खचित मरकत पुपराग हीरामोती जडि धारो है। फलन की मालरें विसालरें लपेटी गरें भार पुंज गुंजन ते लागै अति प्यारो है ।। मंगलीक द्रव्यजग जेते तेते तामें सब सुखद सुभग मोद भाजन सुढार्यो है। ससर सरस परिपूरन कलस ऐलो नवयं सुपन रानो त्रिसला निहा- र्यो है ॥ ११॥ दसम सरोवर वर्नेन ॥ परन सलिल स्वच्छ अच्छपरतच्छतामें लच्छ मच्छकच्छन को के लयल प्यारो हैं। कंजरुक मोदवन घन जामै फूलि रहे झूलि रहेमार झोर सोभारि ढार्योहै ॥ हंसराज हंसकुंज सारस दलाक कोक सोक तजि रमत चहूंघां सुक सार्यो हैं। ऐसो सरवर वर सर मानसर नाहिं दसा सुपन रानी त्रिसला निहार्यो है ।। १२ ॥ ग्यारा छीरसागर वर्नन ॥ पूरन अपार पारावार जे उदार सिंधु तुच्छ से लगत ऐसो स्वच्छ सोभा भार्यो है। तरल तरंग अति तुंग के अभंग भंग भौरन की भीर तें गंभीर नीर वारो है। तिमि से तिमिंगल से नक्रवक्रदन्त जामै दीसत दिगंत लों न अंत पार पार्यो है। ऐसो छोरसागर उजागर अनन्त वन्त ग्यारवें सुपन रानी त्रिसला निहार्यो है॥१३॥ वारवों विमान वर्नन ॥ मध्य दिन दिनमनि गन को सो तेज तेज-मनि गन चित्र तें विचित्र चित्र कारयो है। झझरी झरोखा गोख मोखा अगनित जामै दीपमान दीपमान हूंतें विस्तार्योहै । विविधि विबुध वधू ३२ क० भा० । नाटक निपुन गन गंध्रपन गान तान मन मोद भारयोहै । ऐसो सो विपान कविमान कवजानि सकै बारवें सुपन रानीत्रिसला निहार्यो है ॥ १४ ॥ तेरा रत्न रास वर्नन॥ हीरन को हीर मानौ मानिक को मन पपराग के पराग पानी पननको गार्यो है। लील की लुनाई लालड़ो की ललि- ताई चन्द्र कान्ति की चमक लैक अतर निकार्यो है ॥ ताही को बनाय ढेर कंचन सुमेर को सो हगन खुलत तीखे तेज को पसार्योहै। ऐसो रत्नरास के उजास को प्रकास आज तेरा सुपन रानी त्रिसला निहर्यो है ॥ १५ ॥ चौदवा निर्धूम अग्नि वर्नन । जोत की घटासी तेज एंज को छटासी सीमलटा की जटा सो जाकी दीपति उज्यारी है । बनमें बवासी नीर निधिवाड़ वासी सुद्ध दाहक हवासी यो अरूप रूपवारीहै। हवि वीज भूमि निकलङ्क निरधूप जाकी तिहूं लोक धूम झूमि रही दुति कारी है । उन्नत उदोत ऐसी मल अगिन जोति चौदह सुपन रानी त्रिसला निहारी है ॥२६॥ चौपाई॥ एस गज टप मिंघरु ग्मा। फूलमाल उड़पति अर्नुमा ।। ध्वज घट सरवर छोनिधाना । बर विमाननिचयदुतिवाना ।। निधूमानल चौदह मुपने । लपे जबै त्रिमला हग अपन।। ते मव मुख में आइ मनाने । एसे जब त्रिसला ने जाने । जो भाग सोवत तं जागी। अति आनन्द हरप रस पागी। अति उत्साह मोदमय भई । अपने भानि की वलि गई। उतर सेन ते आनंद भारी । गज गतिढे पतिपास सिधारी।। देखि दरस अतिमरस ललामा। जोरिदुहूं करकियो प्रनामा ॥ पियप्रति अधर सुधारस खोले । मधुर वचन अमृत से बोले ।। - 33 -- पहिले मुफ्त व्यकता हो। कि पनि मनी लही। इन सपनाका ल हाय लार इन पुनि जसो॥ सो प्रभु मोरे वेग बहन । उतारिनोलोजानों। सुनिपियनिय रदको त्रियवान में उतरविन करि जानो ॥ हरखित ईतिपसी तय की। वह ऋति आन्दजातनसह्यो । अलम लाभ तुनको सु हैं। तीन लोकनहिं सुजससने है। धर्मधानधन तत बनजानुन्छ । नवनिलिहै निटिहसिंगरौदुख । अति उत्तम गुन निधि तय हो । जाने प्रति अानंद सुख लहो । कुलदीपककुललौलनुमुदचनः ननरविकुलकमलविमलवन॥ अति सुशुनार उतार चार नना पसील गनवान बिनलनन ॥ सुन्दर सुदर मुद मुखसागर । धर्मदली जन्य उजागर । सूर वीर नर वीर धीर गति । वान वीर पर पीर हरनमति ।। जो तुरभारशे अल्लो लवनी ! ताल ऐसो सुत निपुनो! गन सौ धीर वलीप जैसो। सिह प्रताप धनः श्री केली ॥ फूलमाल तो सौरन सालो । सलिसनसन सुनसुजसविलाली॥ रवि प्रताप परसिद्ध ध्वजासी।नंगल रंगल गल प्रभाती ॥ सुन्दर विमलकालसर वरसो। अति गंभीर र सागरसी। रत्न रासि समगुनगनसालो । गमलनगिननमोल विनाली। यह संक्ष सुमन गुरु जानी । यति सहल लहतगुन मानी ॥ वा पिय - तिरजब तुनि पायी। रोमरोम प्रति मानद छायो । अम्ब कदम्ब फूल जिमि पूले। पुलकि रोमतन मुद अनुकूले ।। प्रनाविन्यकरिपियहिनिहोत्यप्रकारकरनी करतिरोर्यो । विदाहोय रंग नहल पधारी। गजगारिनिमामिनिपिपयारी। का कुरम सुख सेजपिधारी । अपने मन तब यह विवारी ॥ मति हिर आ नींद हगन में । नति मनलागै अनुनसुपनने ।। यातें अब जागतही रहिः । गुरु पद देव ध्यानसुख लहिरै ।। ह्यां रानो ग रेन बिताई। हां नृप अपने मन । ठाई॥ Y
क. मा० ।
अधिकारी सब विधि के बोले । तिनसी मधुवयन नृपखोले।
अथ सभा वर्नन।
सभा सदन सद सजकरलोज । सभासदन का सजन कहीज॥
प्रथप पृहुमि सब झारिबुहारों । छोनि विहीन विद्यावतंवारो॥
जे अतिमदुल मनोज्ञननोहर । मोलनमोल विचित्रविविधवर॥
दर दर पर दर परदा बांधौ । दिध्यकनगनगुनितसुनायो।
कनक सलाका नीना कारी। प्रतिपरता किल्हु सवारी ॥
छितत छात छाद्य पट रूरी । मोलन महंगो नालन परो॥
जाके चहूं किनार किनारी । चपला ज्यों चमके जरतारी ।।
ताके चहूं कोर दुति दमक । झीनी झुनड़ो मालर अमकै ॥
मनिमय दिव्य सिंहासनलायो । सभा सदन के मध्य विशवो ॥
ोग आठ स्वच्छ मद्रासन । विस ईसान घरो गमसासन ।
जीने चित्र भोट पट माहीं । एक सिंहासन धरी तनांहीं ।
चन्दन अगर नलागिर मागे । किविकोनिशोरभविस्तारो॥
हप दान भरि मुनगरपो । विनिधि सुगंधिताधूप नधूपो ।
सुरभिमुमन दमदिमनि जिपरी । अलिअवलो जलहि बसेरौ॥
से जब राजा कुम्मायो । अधिकारिनकमालुदछायो ।
जना निर्धाः तुरत मिधारे । अब अपने अधिकार सुधारे ।
मकाज कई लोगः विधिक नो । मिविविक्षिभिमसर लात भोनी ॥
हमें में निनि निन्टी सारी। प्रात पर्व पहारी पारी ॥
अब सात बर्मन।
पनि नमान के तरकारी लिपरी दनदिजदुतवारी ॥
शिकलनोट महायो । भोदिजननिलिमोरमवा॥
का निभान मुभि सम.र मन्दसियरानी ॥
नन कडावन लागे ।नव सन्या ते नृपबर जागे ।।
प्रभम नंग के नदन सिबारे अनित होय शिर श्रमनिरवार।
मंगल अनल कनल करवान्न ! अंग अभंग करे सुकुमारन॥
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सन गुन परे ।। ३५ पुनि उप्णोदक सज्जन कीनी । सम्जनकरितन सम्जनकोनो॥ कटितट जान वरनधान्यो । उनर पट दुउकंबन डार्यो॥ चरन कटक कर चा हरे । रहे रतन मय फवि छवि परे ।। हार हमेल कल्ठ का वि । बाजबन्द रहे वाज फत्रि ।। माथं मुकुट जड़ित मनि नजे जनन कुण्डलअतिछविछाजे सुन्दर मुंदरी तुरिन सोहै । पहुंचन पहुंची अति मनमोहै। वसना भरन दिव्यपुर लारक सत्र पहर फवे नर नायक ।। जब सबै सज नजि नर नाह। रंगमहल निकसे बाहर ॥ छत्र वनर राहिलये रखवासनाय जटित सिंघासन ॥ मंत्री सेनाधिए गन नारक । दृत मंडारी सब तुन लायक ॥ गनक चिकित्सक कविजन रे । एकएक सब कर जोरै सन्मुख ठाहे । सवति प्रीतभीत भय गाड़े ॥ तहं नृप सुश्यन अजा दीनी । जेसुपनस्य प्रग्य अति बोनी।। लावौ देगि सुरय सुनि धाये । काठ चतुर पाये ते लाये ॥ श्रीपल करले पलों भेटे । नृप दरसन सब दुख मेटे । नृपहूं कौते अति मन माने । सत्र सत्रीत सादर सनमाने । प्रथम सजे वसुभद्रातन है । आठों बैठे नृप सासन ते ॥ त्रिसला दिव्य चोट पद माहीं। वैठि बरासनयों इवि छाहीं॥ दोऊ कर फल फलन भरिक । द्विज तुल्यन के आगे वरिके। विनयत्रनयतिसपक्तिवार्यो। शिर सिंघासन अंगीकार्यो ॥ तव नृप सुपन विवस्था कहो । शिर तोफल पछ्यो तही ।। चिन्तन करितिनसवन परस्पर। यथा शान्त्रवोले सब द्विजवर ।। सुप्रनागन द्वासप्तति सुपने । तिनमें तौल कहेअति निमुने ।। ताहू मैं चौदह कहे । जिन नाता विन और न लहे ।। चक्रवर्त माता हूं पेपै । अति मन्द वरन सो देपे । वासुदेव जो गर्भं आवै । सात सुपन तिहि जननी पावै ।। अरु वलदेव मंडलिक नाता। चार एक देखे सुख दाता ॥
---- . : कः भा० । यह निहले हम जाने। जिन वर त्रिसला गर्म प्रमाने॥ मी सत नहिं भयो न होई। कई देहगो तुम को सोई ॥ गर्भ सास नव सास व्यतीते। साढ़े सात दिवस पनि वीते ॥ अंग उपंग संग जुन पूरो। मान प्रमान सुभग अंगरूरो॥ मन रुजव्यञ्जनलच्छन युत । तुमलहिही ऐसो अद्भतसत ॥ चक्रवर्त दस दिस में है । जन धन जन अवनीनसम्है।। जुनि राजा रानो अति हर्षे । धन मन गन सुग्यनपर वर्षे ॥ बहु बस्तु बास रासि तिहि दीने । आस पुराय बिला ते कोने ॥ निसलाई पति आयसु पाई। मुदमय अपने सदन सिधाई। जिन अवतार जानि सुरराई। धन नाधिकारी लये बुलाई। तिर्यक जम्भक देव सुनाया। तिनसे जोड़न्द्र मुखधामा। जहं जहं में है धन भारी । स्वापी सत्ता रहित उज्यारो॥ लो सब नहा निधान लियाबो। निवारय नृप घर पहुंचावो । जो अन्ना सुरपति ने दीनी । उनगिरवार यथाविधि कीनी।। नधनजनअननादिमागधि । विविधिभांतिकीरिदिनवोनिधि। ग: हम ग्यगय मना भारी । नाधिगत्रागिनित अधिकारी। निज सम्पति बाधिताः । दम्पति नृप नृपतिय घरछाई॥ न मितिमा निधारें। जो अब सत होय हमारें। - 'धर नाम बुलावें । लग्वि अतिमङ्गलानंद पावें ॥ -::मधि पर विचारी पति दुख पावै भात हमारी ।। :: साल्टतम्बमातहि । मुहिविशेषचहियतयहिभातहि॥ चिंत अचन हव रहे। सो लहि मातपितदुखसहे ॥ काम मातन लह्यो । रोय तबै यो अलिली कह्यो। ई निधिनी चित गई। कहा करो अब कैसी भई ।। दिन : न्लिीना गर्भ हमारी। जीव प्रानके जीवन प्यारो॥ बनशिश यह आड़ी भई । गर्भ चेतना जिन हरिलई । योर बटोर विषय रस पागे। कर्म पाळले भक्के जागे। - . M -- ॥ ति जैसे॥ ॥ क० माः । ३७ ऐले विन्टपति तलति गनी । निछिनकलपसमानवितानी। नधिज्ञानकारि श्री जिनजाना । जननीनननरनसम माना ।। तब भगवान ऋचलनत तनिक । फरकनलगे मातहित मजिकै।। जब च्ह नाल गर्म के भये। पंद्रह दिन ता ऊपर गये। जिन वन में तब निह, कोनी । मात पिता हितहढ़नतलीनौ ॥ गह नाहिं गुरु दिच्छा ताला । मात पिता जगजीवें जोली ॥ गर्भ चेत जर जननी जान्यो । भयो गोद मंगल मनमान्यो। तुख सोबत जागत हित पागी । रक्षा करन गर्भ को लाग । विपन ब्रहार विहार जिनेका । सब तजिदने एकतें एका ॥ जिन जिनवस्तनसनचामिलाप । ते सब परिपरन करि राप ॥ इक दिन मनसा उपनी ऐस । इन्द्रानी कुण्डल दिव्य गलौक्षिकसुरमन गनमें । जो पाऊं तो करी करन में । सुरपति शवधिज्ञान करिजानी । जिनजननोहित यहमनठानी ॥ खत्रियकुराड पाल सुखदाई । इद्रपुरी इक इन्द्र वसाई ॥ तहां बसे लुरपति सम्पति लै। सुरतरु गोमनि परिपूरन के ॥ नृप सिद्धारथ जब यह जान्यो । सेन साजि चढ़िसंगर ठान्यो॥ सुरपति नरपति लो भय नाना । दुसह युद्धलहि भयमपराना ॥ सब वैभव सेना भट लूटा । सुरपतितिय श्रुतिभूपनछूटा ।। सो त्रिसलाढिग भट ले आये। ताहि पहिरि मनमोद बढ़ाये ॥ अथ महावीर जन्म कल्यानक ॥ गर्भ वास वासर जब वीते। सुभ नव मास आय परतीते साढ़ेसात अधिक दिन तापै। चैत सुदी तेरस तिथि आप नखत उत्तरा सुभ फागुनो । मुद मंगल में सुरनर मुनी ।। सातों ग्रह निज उच्चस्थाना जनमसमयजिहिसुभफलनाना। दोप रहित सुभ समयसुहायो । जो जिनजन्म जोगजगजायो। जिन श्रीमहावीर भगवाना । जनमलियोगुनरूप निधाना ।। जिहिनिसिमहावीर जिनजनमे । देवी देव मुदित ह मनमे ।।
३८ क. भा०॥ देव लोक तें भू पर आये। सब देवन के भये बधाये ॥ दसदिविमलप्रकासनकास्यो। व्योमविमाननतें तम नास्यो। द्वान्द मगन सकल सुररन्दा । व्यापककहकहसबदअमन्दा ॥ धनद निदेसित अनुचर धाये। कनक रजित की रासें लाये॥ वतन अाभरन रतन अनोले। सुरभिफूलफल अमलातोले ॥ च दन चूर कपूर धूर ले। परिर र्यो नृपनगर दृष्टि के॥ सुरभिसुसीतल सुगति बयारी । रारस परस इन्द्रियसुखकारी ।। थल जलरुह बनउपवन फूले । अलिकुलकलनवरव गनुकूले । कोकिल केको कूकन लागे। तरुफरभर धर झंकन लागे। चेत अचेतन तन मुद छायो । छिनक नारकिनहू सुखपायो। मम्यौ भई भार भय हीनी । वसु बमुमती प्रकटकरिदीनी ॥ अध ऊरध दिस विदिसा वारी। पाठ पाठ प्रति दिसाकुमारी॥ अध उरधारुविदिसाको सब । चारिचारिसबमिलिछप्पनतव। दसा दिसा ते अद मय धाई। मिवास्थ नृप आले आई। प्रथम प्रनत निवर पागी । जग अपने पुनि कारजलागीं। अथ छप्पन विग देवीकृत उत्सव ॥ एकल करिता पलक बुहाग। बहुदिप पहुगी झारि बुहारी सदर जलाल जारी। मन माबी पुहुमी सारी ।। एक बच्छर दापन लेने। उकबोजन करमें कर दीने ॥ पर छत्र चामर कर धारी । इक स्नान नीर अधिकारी। न चक दीप कर लोनो। एकन नाल वधारन कीनो। मालवधानिधान मुग भीतर । रन राति राखी ता ऊपर ।। पोर मान कर गान परपर । गई अप्सीसत अप अपने घर ॥ हेलो अनव गुगल मय । छप्पन दिगदेविन कोनौजय ॥ अथ चांसठ इन्द्र उत्सव॥ का चांसठ इन्द्रन मिलि जैसी। कियो महोच्छो वरनौ तैसौ ॥ जिहिछिनजननेंजिनवर स्वामी। जिन जन गनके पूरन कामी ॥
का माः।
३६
सुर इनके झालन डोले । हरित गरेसी तुरतें बोले ॥
घोप सुघोप घण्ट को कोनी । वर्गवलान जिसाजनबीनी ॥
जोजन लाप जासु विस्तान। तार लुरपति होय सवारा ॥
पटरानी सन्मुख तिन बाठा। दिव्याभरन वसनठठि ठाठा ।
वांये सामानिक सुर नायक । देवी देव दाहिने लायक ।।
पाछे सात सेनपति सोहैं । सुर समूह नुदमय नन लोहैं !!
अप्सर गंप्रप किन्नर के गन। नृत्य गान गुन ज्ञान जानजन ॥
सिगरे सुर तमूह संग सुरफ्त । खत्रिय कुण्ड नगर पहुंचेतत॥
प्रथम प्रनाम नानि सिरकीना । सबन वाइजिनवरकरलीना॥
ले सुमेर को निशे पयानो । तछिन तिहिंथल पहुंचेमानौ ।।
देवलोक गृहपति व्यन्तर के। ौंसठ इन्द्र मिले सुरवर के ।
मिलि रचना कलसनकोकीनी । कनक रजित गनिमरसभीनी॥
एक कोट इक लाख तवाई। तिनकी संख्या तहां बताई ॥
सत्र नीर और निविरिलर । वसठ इन्द्र लिये अपनेकर ॥
उद्यत भये स्नान हित लिगरे । हापालिये जड़ित मनिगगरे ।
पंचम पारा आगम के गुन । संसय सरज्यो सुरपति केमन।
लिसुतनतिसुकुमार सुभापन ।क्योसहि वहभार अपितयन ।।
सो सब सनकी जिनवर जानी । अतिगतिवधिज्ञानज्ञानी॥
चरन गंगूठा धरनी चाप्यो । मेरुधेर तह पुहमी कांप्यो ।
जलयलयनल निलनमसारी हलचलखलम हमच्योपतारो।
देवि देव अहिगन गंधर्वा । भये सबै विसनय मय सर्वा ।।
अवधि ज्ञान तत्र सुरपतिदेखा । जिप्रताप अपने नन लेखा।
निज अचान जानि तुरनायक। जिनवर चरनगहे सुखदायक ।।
अहो नाथ अपराध छनोज । मो निशनदुई लीजै॥
वार वार विनये जिन स्वानी । इमारी जिन पूरनकानी ।।
लियो उठ य अंगूठ अवनि तें। मिव्योछुयोसव कन्यधरनिते।
पुनि प्रनाम सुरपति तहकोना । स्नानक्रिया फिर चितदीना॥
का भा०॥
४०
अच्युतंन्द्र पहिले जल ढारे । जान इन्द्र र पुनि पयपारे ।
पनि ईसान इन्द्र निज कारें । जिनवर को बैठाय निहोरे ॥
चारि उपभ तनधरि देविन्दा । आठ शृङ्गकरिसुभग तुरिया ॥
निरमल जल जिन वरपर ढारें । करि अभिषेक भरें सुखधारें ।
एनि निरमल कोमल पटण्यारे । जिनतनपछि अंगोळिसुवारें ॥
पुनि कपूर कस्तूरी केसर । चन्दनले जिन तन लेपन कर ॥
नव अंगनि की पूजा साजे । चरन जानु कर कुहनी राजें ॥
कन्ध सीसभालरु हिय कृपें । येई जिनवर आंग अरें ॥
तिनमें तिलक देइनव वारी । कुसुमांजलिप्रतितिलक सबारी ॥
पुनिवर सुरतरु कुसुम समहन । पजैअतिहितकारीजनवरतन॥
अमलकमल कोमलकलदलसे । पट पहराये निरमल जलते॥
पुनि कल कनकरचितचितवहने! रतन खचित पहराये गहने ।
फूल माल तापर पहिराई । सुरभि धूप धू, सुम्वदाई ।।
पुनि नवेद निवेदन कीनो । घाट म करि नाद नवीनौ ।
अष्ट मङ्गलिक सन्मुख अरचे । स्वस्तिक घट भद्रासनचरचे ॥
श्री वन्मास न द आना ।संपुट मन्म युग्म सुख की
और पाठवा दग्पन जाना। एटमंगलिक ये परमानी ॥
वर मनि मानिकहीग मौनी । जिनकी जगजगमग जोती।
नविधिपतनातन रितिनके । रवे मंगलिकसमुख जिनके ॥
श्रीरल पग यादि जल नीक । समुख रिश्री जिनवरजीके ।
नृत्य नात्य गन गान तुरंमा ।ग मृदंग उपंग अभंगा ॥
नि भारती उतार वारं । तापर राई लोन उतारे ॥
गल दीप वारि पनि जिनकी । मत्रह भेदी पूजा तिनझी ॥
जिनयर मन्जन सम्जन कारक । लायेजहं वितलासुखभरिके॥
प्रथम न्वापनी निद्रा हरिके। पुनित्रनाम जिनजननिहिकरिक।
काग्नि कंचन बरपा भरिक। कोरिअसीस जोरि करकरिकै॥
सुरपति मव मदन सिबारे। मंगल मोद भरेमन भारे ॥
॥
क. भा०।
४१
अथ नृप मिद्वारय कृतोत्सव ।।
मोर भये चाहीं नृप जागे । पत्र जनम आनंद रस पागे ।।
अधिकारी सब लये बुलाई । तिनसा नृपति कहे समुझाई।
वंदीरान वंद सब छोगे। संगत मन्ते मुख मति मोरो ॥
जेतो जो मांगे तिहि तेती । विन पई दीजी धन वेतौ ।।
खारी पाली गज अरु बटरवर । तोल प्रमान सबै वढ़ती कर ।।
वीथी वगर अगर नगरी के। चौपथ चार चौक सिगरीके ।।
चंदन नगर परगना घोरी । सीचि सींचि सब साधै वोरौ॥
धुजा पताका घर घर वांधा । दर दर मंगल तोरन साधौ ॥
चन्दन चरचित कलस धरावी । कदली खंभन ते छवि छावो ॥
कुसुम समूह माल फूलन की । मत्त मधुप मन अनुकूलनकी ॥
ठोर ठौर सत कोरि बखेरी। धूप द्रव्य धूपो सत वेरौ ॥
नरतकनट मट भाडभगतिया । गनिकादिक जह सुभगतिया।
अप अपने गुन गन विस्तारै । जिहि लखिक रीरिझवाएँ ।
तंत्र वितंत्र सुपिरघन आवज । वीन वेनु कठताल पखावज ॥
तालतान गुन गान मान सुन । होहिं मोदमयसवजनपदजन ॥
प्रज्ञा लहि अधिकारी धाये । सजि सब सोज खबर लगाये।
नृप सुनि जगेभाग लैंी अपने । सफल भये रानी के सपने ॥
सैन ऐन तजि स सदन में । श्रमकरिहरिप्रति आनंदमनमैं ।
उवटि अरगजा वासित तेलन । करि अभ्यंग अंगसुख झेलन ।।
न्हायअंगोछिपोंछितनकोमल। अमलनमोलबसन पहिरेकल ॥
पहिने गहने पहने जियके । सुकता हार चार छवि हियके ।
मुकटकटककुण्डलकटि मेखल। कयठी कराठलसत मुकताहल ।।
पहुंची मुंदरी छला विराजे। अंग अंग अतिफविवि छाजे ।।
मंत्रि मुसाहिब सेनप साथा । सभा सदन आये नर नाथा ॥
वार भंडारन के सब खोले। दान जाचकन दये अतोले ॥
जातें प्रथम खबर सुनि पाई । सवालाख विहिं दई वधाई ।।
६
HI क० मा०। साल में कुल व्यवहारा । जाति कर्म शादिक विभारा॥ से दिन कोनोति आनंद रंग रस भीनी ॥ तो सनक दिन बीत । गोते यात लोग करि प्रगत। बनलीसजन वितारा वन लगे नगर जन सारा ॥ गधु वा पकवान पिठाई। जो जाके मन भाई पाई । वर वानर खुरपा खाजा । कहें परम्पररुचि सों खाजा। खुप चुप रा सेव इपरती । मधुर जलेबी अमरित झरती । वन पोति कचोरी गरी । रूपन रूरी स्वादन पूरी ॥ वो अतिरिक्त को । कवि जन वरनि न पावें पारा ॥ विधिसंतिकेजन लीके। पर मिले भावते जीके।। कचरी कर करोद वहाना रखनी विविधि लयाना ॥ घ ६हीक कही मासन रुमवर लाई जोर कहांला अधिक की रम जल पा पसीजे।। नि लब जिवनार नि । बर ब.ग पनि दये खवाई ।। मा तुसाती पार पर कपर शुमेला ।। --- माना जा तर करि सामानी।। -:'. -नजन जुलसन सबनी ।। TE:- नानीकोनी जो जाके मनमानी ।। 1. सातिय सो लागी कहने ।। :: चिनधनजनदिनदिनअधिकारे। ल । वर्दमान हम अवत धारो॥ लिन बदन लगैदिनजैसो । पास मारो । लालन पालन त निकसे तव ॥ नयमावकामनाये जदरम परसके । - सामान लिनुव धरि आये अनुहारन । नयोजदी। जिन संगजिनवररमतसदाहीं॥ गया- पारस हिडपलो तझसारिके। ८८ -- . । ܙ,;
का भा। १३ व सुटमाल किन निनु लय लय लय भरे पाने.हि नहि क्यो बीर सहाने ।। करत रहय नगर को किस कर कि मोहन कोनी ।। मदलिबलकारोबारी दिनयोजिनकवलगायो त पर चाय छना। देवलोक को तुन्त सिवायो। विलाये। जहिया निधि लिनाये गनशनल कलोल पिन्हाये। उकयार के पाउ लगाये। नव निधि नहीं जातयंजन बन ममहीं । र विया जगनती जिन जानती ।। मामा पनि हिज देहाका यो कनि संदेहा। जित सो को हो । कानाच इंजस्यो न सोन्ही कहनुपखिमिनारमहिना। मुनिकासोनाली नहिना । जबर च्याय गुरु राई । दाल गिप्यके पकरे पाई। दिलानुनिनुत छ ! निजानंद जयमविचन्छन । जोनकाय जय जिनेसा। शहे राज कुमार नुढेसा जरदानाय बाल सुकुमारी। तालीदिपन भोग सुख सारो ! वईमान जिहि नारयोमाता । महाबीर जगतननविख्याता !! जिबारर राजा पितु जाको । त्रिललानास जामु नाताको । भाई बहोद लईन कहि। तुपारख नामा दादा लहि । जिहि सुदर्सनानान वहिनको । दिदरतना सुताहासन। अरु जित दर पुत्रीको पुत्री । तासु नाम जलती दुहिनी । ऐसे ही धर्म अनुसारके । वर संपति संत तुकारले !! जबहाइस वरस जिनेसा । मरे लातपितु सुर लोकेसा ।। अनजाता स तवभाख्यो । मई अतिः पन्न पारमो॥ मवइच्छा दिच्छा को सनत कुनडी परत रहत नहिं तनत ॥ वेग नार अब प्रज्ञा दीजै । जाते जनमत्तल करिलीज ॥ तयाज माता की वोले हलधुर वदन राहतो तोले ॥ सब तोपता तरु साताको । जियते दुसपहमिलोनाकतो।। । .-
१२
क० भा।
केतक दिन अब धीर धरीजै। पाछे मन भावे सो कोज।
मानी प्रज्ञा जिनवर स्वामी । जिन जनगन के परन कामी ।।
दोय वरस तब औरों रहे । तीस बरस परे निरबहे ।।
अथ दीक्षा कल्यानक।
देवलोक तें देव पधारे । चारित समै जतावन वारे ॥
कहन लगे जयजयजिनस्वामी । छत्रिय धर्म नृपन में नामी ॥
आतम तत्व बोध अब लीजै । जिन जनजीवनकौहित कोज ।
सुनि संसारिक सुख सब जेते। जनधन अन उपवन घनतेते ॥
वाज ताज गजराज राज सब । तजिदीने सुखसाजकाजसब ॥
कछु कुटुंब कछु दासन दीने। दान छमछरी में जे कोने ॥
ते अब कहाँ घरी छह माहीं । एक कोटि बसुलाख सवाहीं ।
तीन अरव अरु व्यासी कोरा । अस्सी लाख दान सब जोरा ।।
उत अग्रज भ्राता है राजा । दिक्षा समय महोच्छो काजा॥
नगर झगरसव बगर सिंगारे । धुज तोरन कलसादि संवारे॥
पनि जिन को अस्नान कराये। सहस अठोतर कलस ढराये ॥
भूपन बमन मरम पहिराये । अतरअरगजनिकरि सुरभाये ॥
चन्द्रप्रभा पालकि बैठाये। विविधि भांतिवाजनवजवाये ।
चौमठ इन्द्रन कब चढ़ापे । खत्रिय कुंड ग्राम मझि आये।
नगर लोग मव दंग्यन धाये। यो जव नगर वाहर आये।
उपचन नजिवन घन नियगये। न्यातखण्ड वन घननवाये ।।
अति ननद मोद माछाये । तरु अमोकतर सोक मिटाये॥
पालक ने पहनी का धार। तन तें भूपन वसन उतारे ॥
रंजन ले च म करिक । हे उपवास धीर चित धरिकें।
मननियदिन । नखतउत्तराफागुनितिहिछिन ।
- शाबर बामर । बिजे मुहरत में ता तरु तर ॥
देवकपट धाग्यो । सवजिचारित अंगीकारयो ।।
मन नजान नई पायो । चीयोजान आनि मन छायो ।
क०मा० । -- ४५ सुर कुल कुल कुटुम्ब जन जेते । जिन पद बंदि विदा भयेतेते ॥ पुनि अग्रज सं प्रज्ञा लेक । जिनवर विहरे बिरहा देकें । सांझ समय इक गांउकुमारा । तहां जाय पहुंचे सुकुमारा ।। काउसग्ग करि ठाढ़े रहे। अातम तत्व ध्यान धुनि गहे ॥ ग्वाल एक तह पावत भयो । वल एक तिहियल धरि गयो। वगरि गयोसो चरत विपिनमें । ग्वाल आय पछी वर जिनते ।। मौन दसा जव व्याव नपायो । जान्योचोर क्रोध अति छायो। वहुताड़न तरजन तिन कोनो । सहनसी जनसवसहिलीनौ । मनुतनु धरि सुरपति तहंआयो । तिनग्वालहिंसमुझाइछुड़ायो॥ सिदारथ नामा इक देवा । शांडि करन जिनवरको सेवा ॥ सुरपति आप सुधाम सिधाये । द्विजवहुलालय जिनवराये ।। । पायस पारन को नो जिहिं घर । कुसुम दृष्टि कोनो सबसुरवर ।। • ऐसें आठ मास तप धारा । करि सुमसुच्छाहारविहारा ॥ । दोयझंत नामा तापस घर । पावस आदि पधारेजिनवर ।। सुहोमित्र नृप सिद्धारथ को । अति सनमाने जिनतीरथको ।। । भरि चौमासा रहिवे कारन । विनयोमान लियोजिन तारन ।। तहं जिनतप करिध्यानलगायो । सुरन आय चन्दन तन लायो ।। : ताकौ सौरभ दस दिस छायो । अलिकुलचहुंदिसायलुभायो। पर तरुनी सौरभ रस पागीं। जिन सी चन्दन मांगनलागी । जवजिनवर । तियनसुतनजिनतनघसिलीनो। तिहीं वरस बरसात नवरस्यौ। तव सब लोगतहां कोतरस्यो । कह्यो साध यह किततें आयो । जातै भयो सकल अनभायो । लोक अहिततापसहूं मनधरि । भयो बिमनतापप्तहूंजियकरि ।। सोजियजानिजानि जिननायक । पांच अविग्रह लोने लायक ।। विनाप्रीति कहं रात न रहनो । काउसग्गतपकरि निरवहनो । करतल भोजन मोनी रहनौ । नहीं जुहार गृही सी कहनौ ।। ऐसी पांच प्रतिज्ञा गहिके। दुस्सह लोग अविज्ञा सहिकै ।। कछुवावनदीनौ
कः भा॥
१६
र माहि ते थलतज्यो। विहरि अस्यि नामाथल भन्यो।
उपानितह जानुपतिगति । अस्थिरचितमठमाहिदुष्टपति ।।
है दान व भव कया । लुनो ताहि वरनों मति बना।
धन सारथ बाहू बिहवारी । ताको वेल थायो गतिहारी।
तय तिन साह बेल सानो ले। यानाधिन को दियो साति।
और बहुत धन ताको दोनो । उपरच्छाहित सो तिन लोनी ।।
पता चपकी सार न कीगी। धन सत्र खाय करीमति हीनी ॥
भख कष्ट सहि उप मरिगयो । सोई सालपानि जइ भयो ।
परव बैर तहां तिन सुधि कर । मरीकरी पसुनरकी घरबर।।
तुपद चारि पद अगिनित करे। लोक उपद्रव तें सब जो
तब इक गनकतहां चलिआयो । नगर लोग सवपूटन धायो।
तब तिन एक उपाय बतायो । मन जितेनर नार न पायो।।
तिन सबहन के अस्थि मगायो । पाकार इक मठ वनवालो ।।
सकल जा मिलित्याहीकोनो । भयो सुदेस उपद्रव हीनो॥
तादिन त तामठ के माहीं । रह न सके कोऊ निषिताहीं॥
तहां बसे निसि जिनवर नामी। जबप लोगन वर स्वामी।।
तहं तिन जच्छ बड़ो भयदीनी । गगहि बोलीवपुरिलोनी ॥
निफलमयोबलछलकरिथाक्योोजिनपदपरयोकुमतिमदछाश्यो।।
जोरि हाय अपराध छमायो । ताहि प्रबोधिचाप अपनायो ।
चरम रेन कछु रहत सवारे । दस सुपने जिन नाथ निहारे।
प्रथम पिसाच दुष्ट इक मारा । सितकोइलपुनिअसितनिहारा ।।
फूलमाल गो वरग सुहायो। पदन सरोवर सिंधु सुहायो ।
दिनकर मेरु शांत तरु लिपटी । योदससुपन नींदलखिञ्चटी ।।
जनपद जन जिन महिमाजानी । सब मिलि वंदेपुरन ज्ञानी ।
अम्धि ग्राम चौमासा रहे। मीन वृत्त सब असहन सहे ॥
गनक कजिन सनमुख आयो । तिन विवादकरि सोरमचायो ।
मोनिप्रतिन जानि सिद्धारय । जिनतन पट्यो सायोस्वारथ ॥
॥
का 50 - मात्र करि विवाद सो जनम हरायो । हारिन ह विनय सुनायो । स्याग्नी गधन में नानी । जा रही तहं परन कामी । पलोको यह पर नज कोउनलाल कोउ न पज॥ यह नुनिलिनाछ करना । जाति जोकि बिहारे तहत ॥ सोमन हिल चित्र पिता को . दहा लिले मारन से ताको । हाल बिहाल निहारि जिन्सा। कृपा किन तुम वेसा ॥ तब उन अपनी दारिदमाला । जाते तियान नहिंगख्यो ।। अनुनि लोचे गिनवर बयान । हालिय यहार्थी कामो ॥ हि पल याहि कहाधा दो साल निगली मे कीजै!! देव पटकावीमास्यः । दाग्नि हिये तकाच्यो॥ ताकी कोर सुधारन हिजबर । बन गले तांती के घर ।। लिन हाती लाल कहि साथी । जो बाघो॥ ऐसी साधि देहुं में तो पटा लाख मोल राचेलो नहिंघट ॥ लोभ लागि सोहिमलिरिध.यो। जिनवर ल्यामी मनुहायो॥ चति लोच सकोदा पायो । नांगितकनहिलालचलाग्यो । निहिं छिन टकच्चनमाहीं। उसहरको देवप पट ताहीं॥ जिनदरतिहिलिरिलखितहत्यारोतिहिलीनदिजलाल चलाग्यो लोमतबल जिनका योदुरघट । क्यानदियोपहिललिगरोपट ॥ पंचम कारी निकट संभाल्पो । जिहिंकुतलयगुनमोननचाल्यो।। यो विचारि जिनवर जियजाने। ऋगम काल साथ पहिचाने ॥ कर लोभनय होहिं कालबस । मोननलोभ वन्त्र कण्टक फस ।। कंटक दूर दिव्य पट धार्यो। लोभ परिग्रहकरन विचर्यो ।। तेरह मास दिव्य पट सोई। जिनवर तन आच्छादन होई ।। तदनन्तर भगवन्त जिन्सा। लगे रहन विन वसन सुवेसा ।। करतल इन आहार विहारा । काय नेह तजि आतम धारा ॥ सह सहन सहन उपसर्गा। जोक्षियतिय पसु ननुसुरवर्गा ॥ पुनि जिन विहरि तहातै भागे। कनकवालुका भुव तट लागे। . -
क. भा.॥
८
डाकखलाढिगजिनवग्जे। पहुंचे तहं के लोगन वरजे॥
मागे रहें हट विष विपधर । दीठ विपहिं तंजो मारतधर ॥
बंड कोश ता अहि को नामा। कालकराल क्रोधको धामा ।
याहू की पूरव भव भाबी । भाखोजिनअहितन उरझावी ।
इक दिन काहू नगर मझारी । पावसरितुमुनिजिन व्रतधारी ॥
गये गोचरी हेत गृही घर। मरी मेड़की दवि मुनिपगतर ॥
शिष्यःखि सोबोल्यो गुरु सों । देहु स्वामि मिच्छामदुकड़ो॥
गुरुन मानिजवनिज थलाये। फिर चेला सुइभाव चिताये ॥
फिरि संध्या पड़कमन समैहू । गुरुन कही मिच्छामिदुक्कड़े ॥
तीन बेर चेला वर गुरुसी। भाखिरह्यो नहिं मानीधुरसी ॥
अरु तापरअति क्रोधपसार्यो। मुनि चेला ओघालै मार्यो॥
वच्यो भाजि चेला गुरु क्रोधी । मरि तीजे भव भयो विरोधी ॥
तापस है इक बाग बनायो । सो फल फूलनतें अधिकायो।
इकदिन गजकंअर तिहिंवारी। आय एक फल तोर्यो भारी॥
तापम लखिअति तामसछायो । ल फरमातिहिं मारन घायो॥
क्रोध काय हा अंध सुकर्यो । अंध कूपमें सो गिरि मर्यो ।
मरि इह भव सो तापम तयो । चंड कोश हग विपधर भयो।
अनद निर्भय के जिननाथा । ताही पे गये करन सनाथा ॥
तहं नप करि जिनवितईनोमा। अहि घरतकढिजिनतनडसा ॥
दृया भर के बदले निकमा। बदनकमलजिनवरकरविकसा॥
ताजा अहिका जिन दीनातिनसुनिसमझिचरनगहिलीना।।
पान नदिन करि संयारा । देव लोक आठवें सिधारा ।।
नागमठ घर पुनि जिननाथा । करिपारनतिहिंकियो सनाथा ॥
पनि भगवत तहां त विहरे। श्वेतंबिका नगर में ठहरे।।
नपनि प्रदेमी नाम तहां तिन। महिमा मानी जानिनाथजिन ।।
आगे विहरि मुरभि पुर पठे। उतरन गंग नाव पर बैठे ।।
वैर भाव सुरनाग कुमारा । लग्यो आय तहबोरन वारा ॥
क० भा० । ॥ ४६ परब भव तिन सिंह संभाग। वासदेव हवे जेहिजिन मारा ॥ सम्बल कम्बल देवन ताकी । वरजिजताईजिन महिमाकों ॥ तिनहूं को पूरव भव करनी । सुनि बरनी जो आगमबरनी ॥ मयुगपुर जिनदास महाजन । तिननिजपजोरीइकदिनछन ।। किहूं मित्र को मांगे दोनो । तिन तिवाहिकरीबलहीनो ॥ मरन वार नवकार सुनायो । मरि सुभ ध्यान देवपदपायो॥ संवल कंबल तिनको नामा । सब देवन में भये ललामा ॥ पुनि जिनवर जग विहरनलागे। पांच सुमतिमितिकेरस पागे॥ क्रोध मान ममतादिक त्यागे। स्वच्छच्छतजिविहरनलागे। निरालंब जैसे पाकासा। निस्त्रेही ज्यों पवन विलासा ।। सारदजलकी नाई निरमल । मरजादानतजतजिमिनिधिजल॥ खड़ग विपान मान एकाको । ससि सम ताप नजामें वाकी॥ गुपत सकलइन्द्रिय कछुवाला। चारित भर वाहक वरदा लौं । हव्य न देसन भाव नकाला। प्रति वन्येनहिंजिनजनपाला॥ से जग विचरैं जिन स्वामी । जिनजन गन के परन कामी । पंचरात नगरी में बसे । इकनिसिगांव मांझ वसिनसें ।। विष चन्द्रनतन मनिसमजा । जीवन मरन समान सुताकें ।। ऐसैं जिन जन पारंगामी । महावीर वर भगवत स्वामी ॥ विहरें विचरें विपन नगरमैं । अमल अचल अबोल डगरमैं ।। घनाभरी॥ मानको न मान अपमान अपमानको न राग हूं सौं राग न विरागहै विराग से । सूरजसे सूर परे सोमजेसे सोम रूरेधूरेहूं अधरे हे सहन जाकोजाग सों ॥ धराधर जैसेघोर वीरवलबार जसे छीर नीरनिधि से गंभीर चीरत्याग सौं। ऐसँविहरत वीत राग महावीर स्वामीजाको यों महातम है बातमको लागी । चौपाई॥ तदनंतर दूजे चौमासे । राज ग्रही नगरी मैं थासे ॥
का मा०।
- नमरू वामा दीना। पारन विजयसेठ घर कोना।
नमलसुनगोमालकाहिंलां जिनगोहनलाग्योलखिहितां ॥
जिनवर तबनिहियोभागे। तिनभाल्यो हैं। शिप्यतुम्हारो॥
गर्न बन्लका पुर जिन आये। नंदन द्विज पारन करवाये।
हो उपनंद ताग को माई । गोतालक तहं भिच्छा पाई ॥
पतान्न लाह कोप अधीनो । स्त्राप ताहि ऐसो कहि दीनो।
जो मो धर्माचारज सांचौ । तो तुबवर जारे अगिनाची ॥
बाप देत ताको घर जर्यो। क्रोध शान ऐसो नल करयो ।।
बनवलमुनिजकृत अभिमानी । भयोछयो मद गरव गुमानी ॥
चम्पा हर गांव में पाये। चोभी वरगा तहां निताये॥
जरिन सेठ निमंत्रन दीना । अभिनय के घर पारन कीना ।।
लाठ देम में पति जिन आये। काउगण का ध्यान लगाये।
ननलिम्किाल ग्वालदक गई। जिन नगगितीर रंधाई।
बम्ला ाि तहां ना । पनिर नरवा जब साई ॥
परी भटिका जामिछा। बाठमान रितु नहांविताई ॥
मां बहन गई TIतुर जान मातवें पुनितिन ॥
डान नगर्गः । भागमालक उपमर्ग बढ़ाये ॥
नदर समय काली। साना व्यंतरी गन त॥
27 बर। गज ग्रहो पुनिगये नगरको ।
- यह 'नाई। तवग बनारज थल में छाई ॥
--: का। गांउ कर रन देख्यो एका ॥
का पतन भाग जटा संस पर बांधे ।।
बाद हो । नापतिहिहिरिमिर परधरे ।।
माकन नपानी बरामी नवमी ताऊपर तरज्यो ।
मनीले चन्लाई नाप! जग्न लग्यो गोसालक जाते।
महामजिनामयाला। न तोलंग तजीतिहिं काला ॥
गंगालाको मात बसायी । तब गोमाल चत चित पायो ।
व
M..
क० मा । ॥ ५१ सितारय सा पंछितब उन । साधो सिद्धि तेज लेशा पुन ।। पुनि सावस्ती नगरो गाई । दसई घरखा तहां बिताई ।। पनि पोढाल नगर में जिनवर । कासग तय करिठाढ़े घर ।। जिन बल प्रवलप्रसंस प्रसंगा।इन्द्र सभा में भयो अभंगा। तहं अपव्य संगम सामानिक । चही परिचा करन अचानक । तिहं थलवायएकनिसितिन । बोस किये उपसर्ग सहेजिन ।। अहि गजसिंहमादितनुधार । अमित उपायकियेतिनडरिके। डग भर डिगेनहींजिन स्वामी । भवभय जलनिधि पारंगाली ॥ योछयास ला सहि उपसगा । चके नेक नहीं तप वर्गा॥ तवतिहिंइन्द्र कायअतिदुख्यो । सोनिजदोप मानिमुखरख्यौ । नीत रोत हित तिहिं सुरराई । मेरदल को दियो पठाई ।। रद गुवाल तहां इक आयो । एत छ मास पारनौ करायो । सुसमापुर पुनियाये जिनवर । चातुरमास ग्यारहौतहं कर ।। चमरुत्पात भयो ताही थल । कोसंबी में रहे महावल ।। तहां पास वदि पड़िवाके दिन । जिनवरलियोअविग्रहसो सुन । उड़द वाकला सूप कोन में । इक पग बाहर एक भौन में । राजकुमारी मंड़ मुड़ायें । पग वेडो अरु नागे पायें । दासी हरोक्त मधि दिनमैं । तीन उपास तासु पारन मैं । जो ऐसे हमको विहरावै। भाव भगति करि तो मनभावै॥ कृत प्रतज्ञ है जिनवर । पारन हित नित विचरै घरघर ॥ दैवजोग तें नृपति सथानिक । दधिवाहन नृप तिन कीनौ दिक ॥ मारि तासु की चंपानगरी। बन्द लूट कीनी सो सिगरी ॥ परो एक भट कर तिहि रानी । गही विकल हबै जात परानी ॥ तिहिंभटतिहिवदननरनिहार्यो। काटिजीभतिनमरतप्तुधार्यो ।। वची तासु कब चंदन वेटी। चंदमुखो गुन रूप लपेटो ॥ ताहि मढ़ भटी वैचन लाग्यो। धनासेठतिहिलखि अनुराग्यो । मुहु माग्यो ताकी धनदै। बाल चंदना मोल सुलेको । ऐसैं । ५२ क० भा० । आयो घर लाय तिहिं राखी । हितमित वानी तासी भाखी ॥ मूल कुमला सेठ सिठानी । अतिकलहातिहिलखिअनखानी॥ कोपि तासु को मुड मुड़ायो । पग बेड़ो दै कैद करायो ! तीन दिना ली भूखी प्यासी। केदै माहिं रही सो दासी ॥ दौथे दिनतिय अनत सिधाई । सेठ खवर दासी की पाई ॥ काढ़ि बंद ते बाहिर आनी। आद्यासितकरि कहिमृदुबानी ॥ उड़द बाकला प्रस्तुत पाये। सूप कोन में ताहि दिवाये ॥ आप लुहारहि बोलन घायो। बेड़ी काटन हित मगवायो । ऐसे में जिनबर तहां आये। दोरि चंदना दरसन पाये ।। अपनौ भाग्य बिचारि सभागी। उड़द जिने बिहगवन लागी ॥ तव जिन निज परतज्ञ विचारी। सब पाई जो चित में धारी ॥ देस काल ज्यों के त्यो पाये।रुदन विना सब भावसुभाये ॥ यह चित धरि जिनफिरेविरागो। वाल दुखित हरोवन लागी। तवफिर फिर जिन पारन लीना। चंदन तिहिं कृतारथ कीना ॥ वेडी पगन आपही आपही टूटी। बेनी सिर पर लांबी छूटी ॥ सकल देव गन हिसख हरखे। बारह कोटि सोनया बरखे ॥ सो धन राजा लन विचारी। देव गिरा तहं प्रगटी भारी ॥ यह धन तेरे काम न आये। जब चंदन तिय दिच्छा पाये। ताको होय महोच्छव जवहीं । यह धन खरच होयगो तवहीं ॥ मृगावती राजा की रानी । सो चंदन की मासी जानी ॥ तिन चंदन की लई बुलाई। अपने ढिग राखी सुख पाई ॥ चातुरमास बारव जिनवर । चंपानगरी पहुंचि रहेकर ।। माम तेग्वं वन तप कोना। परब भव वैरी तिन चीना । जाके कान माहिं तिहिं भव में। तपत धात डारीही दव मैं । अथ कथा ॥ ताकी कथा कहीं विस्तारी । वासुदेव भव जिन अरिहारी ॥ एक समय नटनाटक सुनत। पावनलगी नींद सुख गुनतें ॥
क. भा०॥ ५३ सेजपाल सा तब उन भाखा । इनका व नाटक तें राखा ।। यों कहि सोये नरबर स्वामी । पं वरजे नहिं उन निकामी ॥ नाटक धुनि त प्रभु जब जागे। जालोर लेखि रिस पागे । ताके कान माहिं तिहिं काला। चातु बाटि डारी नरपाला ॥ अव तिनतन ग्वालाको धरि । वर पाहिली सुमिर कोपकार ।। तीखी मेख काठ को गहिक । जिन तपसमयायतिनबढ़िक ।। कानमाहिं गहि बल करिठोको। वर वलसवज्यों की त्योंको ।। तिन पापी ऐसो दुख दोनौ । तिन वेदन कोनो तन छीनो !! तहत जिनवर विहरि सिधाये। वैद खरक नामा घर आये तिनप्रतिवल कारकीली काड़ी। जातें अधिक वेदना वाढ़ी ॥ काढ़त सवद कियो जिन भारी। गिरि दरके धर धरकी सारी॥ ह्याली सब उपसर्ग वदे जे । भरे संपूरन ते जिनवर के ।। अथ महाबीर के बलज्ञान कल्पानक ।। वरस पुराये। ता ऊपरछह मास बढ़ाये ॥ पंद्रह दिन ता ऊपर बीते । तीन पहर हूं तहां वितीते ॥ दसमी सुदि वैसाख मास तिन । विजयनुहूरतसुत नामदिन ॥ उत्तर फागुननरखत जोगमसि । गांउजिनकातिहिंबाहरवसि ॥ साल तरु त” रिजसरिता तट । आतम तत्त्व ज्ञान पूरन घट ।। ई उपास उत्तर तरु हेटे। चौविहार करि उकडू वैठे ।। तहं अति उत्तम जानन माहीं । केवलज्ञान लह्यो तिहिं ठाहीं । ता. दिन ते अरिहंत कहाये । सुरमुनिमनुमन जान सुहाये ॥ भीत ओट की नहिं कछु शनी । ऐसे जिनवर केवल ज्ञानी ।। जीव गतागत भव कायाथित । मनवचकायकरमको परिमित ॥ गुपत प्रगट सब जानन हारे । यों विचरें जिनवरभयडारे ॥ अथ समो सरन वर्णन ॥ जब भये जिन केवल ज्ञानी । सब जीवनकी छानी जानी ॥ तब जिभक नगरी में आये । सब देवन के भये वधाये ॥ ऐसे बारह 12 क० मा । चामठ इन्द्र चारि विधि के सर । महिमा लागे करनजानगर ।। समासान जिनवर हित रच्यो । एको सुख जान नहिं बच्यो॥ आदि जिनेसर हित हूं ऐमें । सुरन रच्या ही बना तग। वाह जोजन मिति ही ताकी। कोस ऊन की बाकी। वाईमा जिन ला या क्रम सा । रचयो गमोमरन अनपण। तईसा पारस जिन तारन । पांच कोस को चितिनकारना महावीर स्वामी जिन हेता। चार कोरा कोलियोनिता ।। सथल समानम्वच्छ बातिनीको । गरिघाकार भावती जी की। पनि वैमानिक सुर तहं पाये । विहि थल गर्ग नवनाये ॥ प्रथम जिन जो कंत्राको। ताजो गीत गई मनन की। रजित दुर्ग में गजल लिने । बर भावना वम नित। जे कंचन नगरी । मामा,ना कल बिकारी ।। गनमती नगर नाम मार्ग निहिलाहीं।। कार: गिधि । जागिरमा बारह भाव । !! ..., माना। नामित्र तानि विस्तारी॥ नाप करता । अनि बाविधिगुरवर ॥ नानागागाध गावां श्रत धारी।। श्रावर्तिमानमव । भई परवदा बारह तह तक॥ माट; माही। अप अपोथट म तहांहीं ॥ माय मालियामश्राव भावतियदिनविय ।। -- नयनर नाज। तिनकी शिव चौथी दिमघोज ।। सदा मिगरी। मनः दुर्ग वम गुन अगरी ।। 'नमम गाजा । वारिचारिचईदिमि दरवाजा ।। * ; ' ' न माह माह । मुम्नुनि मन गन के मनमोह। माननग मानती। बचपदन मनि मानिकमाती॥ मग ली जल यागे । पचग्गग्गनिचरतिसी क्यारी ।। मदना मम भार उमदी । चहुदिसितंअलिअवलीझुमड़ी ॥ - 7 न क०मा० । ५५ । वर सरवर नरवर घन माहीं। ठोन्ठौर सुठि स्वच्छ तंहाहीं ।। चहुं दिसिजाके मनि सोपाना । फूले विमलकमल कुलनाना ।। भारझार जिनके रस गते । मधु मकद के मदमाते ।। राजहंस के बंस अनेका । कुंज पुंज संगुल सल भेका ।। अच्छप्रत स्वञ्चालमाहीं । सन्छन् परत दिखाहीं॥ निसिदिनदिनमनिगतिवहिके। कोक्सोकछाइतसुखलहिकै॥ यो अनेक जलचर जलपच्छी । बरबलाक सारस छवित्रच्छी ।। सरवसनाज कारज जग जेते । नृत्य नाट्य ध्रर गुन तेते ॥ विबुध वधू जप्सर किन्नरवर । मिलि नाचतगावत मधुरे सुर ।। तंत्र वितंत्र सुपिर घन प्रारज । वीन वेनु कठ ताल पखावज ।। इन्हें आदि दे जेजे वाजे । ते अगिनत तहं वाजिविराजे॥ और कहां लौं कवि जन बरने । होयन अमितगुनन कोनिरनै ।। सुरन रच्यौ ऐसो सुखदायक । थल अनूपजिननायकलायक ।। जिन जिनके ऋतिस चांतीसा। सोवरनों अब विस्वा वीसा॥ तन विन सेद विमलविनाया। सुरभि सुरुमसुउच्छनकाया। छोर वरन नोनितरंग जिनको । सनचतुरस्त्रसंस्य तन तिनकौ ॥ अमितवीर्यअतिप्रिय हितवानी । वन नराच रिपभ तनमानी ।। छेम सुमिच्छ आठ सकोसा । गगनगामि जनमित्र अदोसा ।। चतुरानन सवजिय वध बारक । सवउपसर्ग रहितजिनतारक ।। वरविदेश केश नख समता। कवलहाररहित जिनगमता॥ अनमिख अरध मागवीभाखा । फूलि फलेसव रितु तरुसावा ॥ दर्पनसम व जन मुदकारी। वहै सुरभि अनुकूल वयारी ॥ भुवकंटक रज कांकर होनो । सुरभि सलिलबरसनरसभोनी ॥ कनककमलरचनाजिनपगतर। नमितसकलअनतरुवरकरमर ॥ अमलप्रकास और दसआसासुरगन आकारन गुन खासा ॥ धर्म चक्र आणु चलि राज। अष्ट मंगलिक सन्मुख छाजै ॥ चौतीसौं अतिसय ये जिनके। कहीं अष्ट प्रतिहारज तिनके । ॥
क. भा. करूनगोक त्रय छत्रविराजनि । भामंडलसुर दुन्दुभि वाजनि ॥ चंबर सिंघासनदिव्यधीग्वनि । कुसुमष्टिसुर करत तहांपुनि ॥ गई काठ कहे प्रतिहारज । चारि अनंत सुनो सुखकारज ॥ जान अनंत अनंते दरसन । वल अनंत त्याहीसुखवरसन ॥ ऐसे जिन जिनके हैं ये गुन । तिनकी महिमावरनों सोसुन ।। समासरन को मध्य मही में। जाकी महिमा प्रथम कहीं में ॥ कनड मनिखचित विराजे । जोजन सहस उच्चबि छाजे ॥ तापर पंचरंग धुजा विराज । इन्द्रधनुष जाको लखि लाजै॥ तहं अशोक अम शोक निवारें। निहिं तररतन सिंघासन ढारें ॥ छत्र नीन सिर ऊपर मोहै। बदन प्रभा भामंडल मोहै । ना धन महावीर जिनस्वामी । नरें कनक सिंघासन नामी। चाग्यो दिम करि चार बदन । मेघगिग गंभीर सघन ॥ धर्म नमान बनाने जाने । गत्र मममें अपनी भाखामें ॥ में यः धर्म मना बानी । मुनी गवन पे किहूं न मानी ।। में' मा अवती भयो । प्रथम प्रग्न में मो को ।। निकामी यतीनविचारया । पानापरी नाम तिहिं धारयो । मनन । । म यम पाप मेन बनठहरे ॥ नह काला । गोमल बजक्रतुकियो विसाला ॥ 27 टन बिछानाकाप्य अनेक मुलच्छन ॥ :- दहनामा। विद्या मागर गुनगन धामा । 3. अगर पाग। अर अपने अधिकारन लागे॥ मह मिल । नमामजिनवरतवतिहिथिल ॥ 77 गट । मिली परम्बदा बारहवर बढ़ ॥ न लगे। मुग्गन मब आये गुन पागे । हिनबिचानी इहां जन आवत असुरारी ॥ र अनद मिवार । हिजबर कोपभरे अति भारे ॥ इदा र बंद. के. भागे । जिन बंचे अनगन असुरारी ॥ . . . .
क० मा०। ७ यात याके तट र जये। विद्या बाः विवाद हरये । देतं कहि तहं न हिल नायक । कलाप सो सरह पल पहुंग भाई। जहां लिले सत्र र सनुवाई : जिनकन्महिमा लम्भिरपाये । ललितादभुतासाये ॥ तवंत हिज नन यह विचारे । जो जन मन स्देह निवारे । तो हाल इनकी महिला जान। जिनवर महावीर कर मान ।। ऐसे जव उन हिय विचारी। जिनवर सन की जानी सारी ॥ पहिले स्वागति करि सतकार । निसन्तानि नान दे भारे ॥ लह्यो तुमारे उर अंतर जो। तो हम सब जान सुनियेसो ।। तीन दकार चहत तुन भाख्यो । करप तासुको पूछन राख्यो । तो हल तुमौं देहि वताई। दया दान दम तीनो भाई ॥ इन्द्रमति सुन विस्ति भयो। चकित होय अदभुतरस थ्यो । जिन हिमा उन निहच जानी। जैनी दिकाल सनमानी।। चारों दसा विश जे रहे। शिष्यन सहित जन पथ गहे। भये चारही गनधर नानी। सवपतिबोधे जिनवर स्वामी। एक मुहूरत नाहिं पढ़े सत्र । बादत अंगी चौदस पूरव ।। तिनमें इन्द्रभूति जो रहैं । तिनही की गोतम जिन कहें। सो गोतमल्वामी महिना सुन । अदभुत रूप उदार चारगुन । जावजीव जिन छठतप कीना। लब्ध अठाइस जिहिं आधीन ।। पाठसिदिऋरु चार ज्ञानजत।इक केवल विन सवगुन संयुत ।। इकदिन जिनतों पछ्यौ गोतन । क्योंकरि केवलमिले महातम ।। वीतराग भाख्यो गोतम साँ। करीअष्टपद तीरथ क्रमसौं ।। तद्भव सिद्धि तुम्हें तहं मिले। सुनि गोतम अष्टापद चले ॥ । अपनी लब्धन के बल बढ़े। पहुंदितुरत तिहिं ऊपर चढ़े !! प्रथम जुहारि साल पल सोधे। तिशम्भक सुर प्रतिबोधे ।। जब उत तें उतरन चित दीने। पंद्रहसे तापत सिख कने। निहिं जिहिंगोतनदिजनो। तिनलिनसकहानवयचंन्ही ।। - ८ तक जान । क. भा गोम होई। तन जिनवर सो पछ्यासोई॥ को भोजन का माल्यो ! तुम सोपत्रति राग जुरायो । न की तो उपजे जाना । विन त्यागेकछुवर न जाना । कम गोतम भायो बर्गजनौं । छुटे न राग तुपारी मनसा ।। जननाति को गांव मे । तुमहूं अंत होय हो हम से ।। म कहि कहि ति हित पोखे । गोतम स्वामीहूं संतोखे ॥ चाकरमान जिने जहं जिनवर । रहे म अब भाख इकठेकर ॥ अन्यगांव पहिलं तमामे। महावीर जिनवर तह थामे। चंपा टटि प चित दीने । तहां तीन चौमाने कोने ॥ यानिज गांव विगाले माहीं । नारह वरना रहे हाहीं॥ राजमही नागे तर आये। चौवह नातग्माम बिताये॥ मिबिया में छा नहीने म्यागी । दीय भत्रि का पुगे मधामी ॥ मामिका में मानक नितई बरना। म माना मा..रोगामा भाग रहे तहांगी। हमारपान नपामा गाएक बररावा बमि ताम। ..मगाटाकल्पानक। - कविको पाग्य मातवा बीत ॥ ": :: ::मादबारह चारित लहिक ॥ 7 :::दादा कवन बसर नीम बितायो । । सबनी काल वय मये।। : बारा माड़ा कोड़ एक बारे के ॥ उन । । नः बग्म चोमाम इन में। . 'दन उन । पावानगरी माहिं निवहतं ॥ दर पर मटटी में च.ति खत संगम मसिहीमें । र कानन नं। चंद्र नाम संवत्सर कहते ॥ कि नना जर मामा। पाव नंदवहन कहि खासा॥ मन देवानंद तिहीं निमा को नाम अमंदा ।। -- T - * : न 7 - । 1 -
क. भा०॥
६
चौ बिहार है वास सुवारे । सूर उदय ते प्रथम सकारे ॥
पदमासन सुन शासन ठाने । चंपावन अध्यन बखाने।
सुख विपाक मंगल फल भावें । पंचावन अध्यन सुसाई ॥
दुखविपाकताको फल कहते । यत्तिस ध्यनन पछै वहते ॥
तिहि छिन ताही काल वसता। जिनवर महावीर भगवंता ।।
दुर्ति जानको सुसमय लह्यो । तब तहं इन्द्र आन यों कह्यौ ।
ज क्याहू करि यह छिन वति । घरी दोय यह काल वितीत ।
ना तरु दुष्ट भस्मयह छहै । सकलअसुभफलबल दलसैहै।
याको पल सहस बरसलों । साध साधवी जती सतीकों।
अधिक मान सनमान न होई । जगली वरस न वीतै सोई॥
सुनिबोले सुरपति सॉजिनवर । सुरगिरचलनसौधरनिपर॥
यह समौ न टाल्यो जाई। जोकरमनथिति वांधि वनाई ।।
यो कहि सब बंधन तजि दीने । नाठी कर्म तजे स्वाधीले।
सिद्धिबुद्धि जुत मुक्ति सिधारे । सकलमीम भवभय निरवारे ॥
तब सुर चंदनमय श्य कोना । गिनकुमारागिनरचिदीना ।।
वायकुमार अगिन परजारो । मेघ कुमार सींचि चय डारी ।।
उत्तर संसकार वरजिन कौं। ऐसैं भयो भयो दुख जन की।
नव मल्ली नव लच्छ आदिदे। मिले अठारह नृपता धलपे॥
तनतव तिहिंनिरवानर नदिन । पोसालरिक्तियोलोदिनछिन ।।
ज्यान जोतजिन सिद्ध सिधारे । फेलिगये जग में तम भारे ।।
तब सब लोगन दोदा बारे । नाम दिवारी तनत पारे ।
पुनि भगवंत नुक्ति तदनंतर । सुच्छम जीवकयुना धरपर ।।
उपजेतिहिं लखिप्राय साधुजन । त्यागिनापअन त्यागिदयेतन ।।
। शिप्यन तो गुरु कहनलगे यौँ । अबचारितदुस्साध्यभयोक्यों ।
मुक्ति तमॆनिजलहिजिन उत्तम । दिच्छा हित पठये हैगोतम ॥
तिन निरवान समें देवन तें। पूछयौतुम कितजातसदन ते ॥
देवन जिन निरवान सुनायो। सुनि गौतमऋतिसैदुखपायो।
17. भा। - - ::-नमा जिन मतगगतगजिनगेनमा ----- रन से जाट महाल ।। मास्न निन को । मनि वग्वानियाही बरनरनी॥ नगम नर चिो प्रगाने । तामें एक पान दिन हीन ।। दी नव दोष तिगामी। दमाम लह मागी। तरह डे माति तब काना । नाम जान ग्रामीनपुहोला । शाह पार पाप हात घारा। उनत्तीग माग तिला भर लोग दिन कीने। महाभद्र दिन नारि मनाने ।। ममतो दिन दमा कीने। उकदिन जिरिदिनालीने ॥ ज. दिन उन तीनो साले। पारन दिन गर्वागनतीबाई ॥ को नहलनाममा दिन। माने वाहन भत्रगिल ॥ यनिक प्रगती नाका गाय॥ साना, मापी मानसिलीना।। - मामाची पाककाचारि हजाग। - मागचा नमानजनमानक परमानो। -: मा. अनगन जम्माबिका गिनाऊं।। - माजगायटमजिवजनघनगरिवार।। का घाव. नानिमात स वरनर ।। - हम मानी । वयत्रीय सं मात वखानी।। ' र ' म पांचा। मन मनमा सम जे सांचा ॥ नहाने घर वादी संचार॥ ननलिकालही । मुक्त गधे सु सातस सही ॥ माधी जित हाथा । चारित लके भई सनाथा ॥ अन्नग्य आठ में भये। जिन परिवार कहे सुख कये। भूमि मनात कह काग । कहियत जिनवरके अवतारां ॥ उक गलत भनि कहाव । वृज परिया यान्त वतावै॥ मुक्त नन्तर तीन पाटो । चल्योमुकतपयकहियुगांतली ।। , 1 ..
क. भाः । ६१ चारि वरस केवल यानन्तर । चन्योनकतमारगतदनन्तर ।। सु परियांत का भूमि कही। भूमि जितवरहि पतीजै ।। नदनन्तर नासा असो लन । भयो कड़ीदुर्गभन्छ भयावन ।। सवविच्छेदनयोलखिजिनजन । लियन लो पुस्तक तवतेधन ।। नौसे नवति का त्रय वीन। कई कहें तब लिखे सपोते ।। इक वाचन बलभी नगरी है। देवहन छल समन करो है ।। दूजी वाचन सघरा नगरी । करी कन्दला चारज सिगरी । इति श्री महावीर स्वामी अधिकान्संपूर्ण । भीपारसनाथ अधिकार ॥ दोहा॥ चव श्रीपारसनाथकेपांचीजे कल्यान । वनजनन चारित्र अरु पाल स्थान निरवान॥जब जब इन पांचोन को भव भयो स- जोग। तब तब नरखत विलाखही नांहि रह्यो ससिजोग॥ पारस परब दस जनय जेजे गये निदान! तिनतिनो वरनन करों कछु संझेर वखान ॥ पोतनपुर अरबिन्द नृप विप्रपुरोहित तासु । क- मठ और मरुभूत हे पुत्र पुरोहित जासु ॥ मरुसुन्दरी वन्सुंधरा नाम वाम छवि जाल । तास कमठकुपूतने करीकुरीतकुचाल । सो सुनि मरु मरु भनि लो भयो प्रोति रस हीन । करोकठिन- ताउन भयो मन करि कमठ मलीन ॥ सकुषितोचि संसारतजि तिन तप कीनोजाय। सहज सरल मन मरुगयो तिहि तट दोप खिमाय। पैतिन तापस केसठ ने मारयो मरु करिक्रोध । यहै वित्र सुत दुहुन को भयो प्रथम भवबोध ।। सो मरु मरि हाथी भयो कमठ भयो मरि सर्प । वैर सुमिर ता दुरद को डस्यो सर्प करि दर्प ॥ यह दूजो भव फेर गज मरि सुर भयो सुजान। कमठ जीव अहि मरि भयो नरक निवाडि निदान ॥ यह तीनो चौथो भयो मरु विद्याधर रूप । निसि नरक तें कमठ फिरि भयो मुजङ्गमभूप ॥ इसिविद्याधर को वहुरनरकनिवास्योसोय। ॥
क. भा.॥ -- ॥ ६२ विायर मरि वारवें सुरपुरको सुर होय ॥ भयोप. पति मरु मरि नृप होय। ज नाभि नामा लियो चा। मल धोय ॥ भयो भील भव कमठ तिन नृपहि मारि मरिक नरक गयोभव सातवें नृप सूर भयो सुसील ॥ चक्रवर्तमरुजी नि भयो भये भव आठ। कमठ जीव हे सिंघ पुनि हन्योताहि मुनि पाठ॥ पुनि मरु सुर है कमठ लहि नरक नवें भवोर । मरु जिय पारसनाथ के प्रगट्या दसवें हर।। अय श्री पारसनाथस्वामी चवन क्यानक ।। जंबु दीप थल भरत में पूरी बनारस धाग। अस्वसेन नृप राज घर रानी वागा नाम ॥ तास कूप में चैतनदि चोय भने बाध- गत दगम देवता लोकतें मरु जिय चे विख्यात ॥ नृपतिय यामा निहि रागय कछ सोबत कछु नाग । नाखा विसाख जोग मगि सपन बौदही लाग॥ सुरगम्बधी साउ तजिलजि अहार किया। गर्भप त्रयम्यानजत भयो गर्भाधार ॥ चवनसाय - चीन । चधि जान्यो जिन जान । वामा सो मुभ सुमन फल व्य मजानन आन । बाम मापन फल गनि समुझिनोदानन्द घटाया कानन्दती नि गर्भको कहा अति सम्व पायगर्भवास कमामय गयेमवानव बीत । एम अप्सित तिथिदाम को नखत किरान॥ अयश्री पागनाथ जन्म कल्यानक । ननियनविदिन श्रीन पारसनाथ । प्रगटि जन्म ले F की दानी रूप न गय॥पन दिमा कुमारि अरु चासठ इन । महावीर जिन लोकियो जनम महोनछी चाय ॥ मन नप किया मगर मोद बद्राय । जसे सिद्धारथ नृपति : किमहोच्छ्य चाय ॥ गुनयविद्यादिन्यवररूपसील घराय। : जून पाग्ननाय जिन प्रगट भनुम भाय॥ तीनग्यान करि सहित जिनश्रुति मति अवधि अधार । हरित बरन नव हाथ ।
क. भा. । ६३ वपु भक्ति मुनि दातार ॥ सिमुपगंडकुमार वय क्रमक्रम भई वितीत । तब बनाई तरनि की भई रदय परतीत ॥ नगर कु- शस्य प्रसेनजित यति लुता सुभजासु।नभावती इहिं नामजिन पारसयाहीतात्तु॥ दम्पतिसुरवसम्पतिभरे कारगृहस्थविवहार। विषय भोग सुरल भोगिसक चारित पर मन धार ॥ इक तापस पंचाग्नितप साधत लरित जिन जान । ताहिक्ह्योरे मढ़ क्योंसा- धत तप अग्यान ।। यो कहिगाह ता ऋगिनतें जरत निकासेदोया सर्प सर्पिनी अपनर सरन लगेखि सोय॥ नादि पांचनोकार के पांचो वरन सहेत । असि आउसा विचारि चित तुरत उता- यल हेत॥ दीने तिन्हें सुनायते बोधि देवपद पाय । धरनइन्द्र अहि मरि भयो पदमावति तिय चाय ॥ सो तापस हो कमठ जिय लज्जित है सकुचाय । मेघमालिसुरमरिभयोधारिवैरहिय भाय। दिन समय चितारने नव लोकान्तकदेव । आयजिने- सर की करी जैनन्दा कहि सेव ।। चथ श्री पारसनाथ दिक्षा कल्यानक ।। तबजिनबर संसार तजि दीने वरसीदान । धन पूरन पुहमीकरी अर्थी रह्यो न मान ॥ पुनिएकादस पूस वदि दुपहर दिन तजि राग। दिव्य पालकी चढ़ि पहरि भपन वसन सभाग॥चौसठ इन्द्रन आदि दै विबुध विविध को भीर । नर नारी सव नगरके संगचले धरिधीर ॥ पुरी बनारस बीच हवै निकसि विपिन घन पाय । उतरि ऋजेक सुतरु तरै दीनों सोक मिटाय ॥ चौविहार उपवास है सकल सिंगार उतार । पाय विसावा जोग ससि तजि सब सुख संसार ।। सहित अहित बर तीनसै उत्तम राज- कुमार । देवदूर पटयुत लियो चारित पद निरधार !॥ रहे फेर छदमस्त दिन रैन असी अरु तीन । देव मनुप पशु कृत सहेअति उपसर्ग नवीन ॥ दिच्छाकै दिन दूसरै कियो विहार अहार । पंचद्रव्य वरषा करी देवन महिमा भार ॥ पुनि जिन देसकलिङ्ग . 2 क० मा० । उमगर बार । रहे गुहा गिर को गहें यातम तत्व नि- रङ्गनामा तहां एक महाग राजासुगड सलिलकर बजे जिन सिरताज ॥ लैंगनसन पुनि मरिभयो मर काल लेल । पहिले पब मो गनहुनो वम्बावनी नस ॥ मुनि निनवर तहन क्रियो नछिन देस बिहार । तापस थल बट वृक्ष र सांज काउलगधार ॥ साय मेघ मालो तहां कमठ जीव विवार। करन लग्यो उपसर्ग अतिारच वर विचार ॥ अहि कि वशाल गनसिंगरूप धरितुष्ट। वविधिजिनमगवतगों की दुछताछ ॥ तोऊ जिन छह ध्यानको छुटी न महज रा- माधि सो लाल पुनि कोप्यो अधि बाधनलगा अमाध॥ प्रलय य ना भरि लल्यावरगनमाल चार । भयोधनो घनघिर नीना प्रबार ॥का लागी वो जली तरकनलागो मला म नभ धम ॥ नदीकृप HTTER जा) काटउदर उर काठ : गण मगन महातम मप। Tir गमतबधरंद्रगना- 7...|| Arifiगजनों कंधचवाय जिन दिनतीन । रहि H; नहीन ॥ गाव हारिविचारि ". । जय नायतचाय जिय लीने दोप कालिका नगर एकमुधाम। सुबमबसी 7. '' सत्रानान ॥ पनि जिन गुपत सुतोन अरु 'न्टमाय । माघमा विरचनलगे जिनजन करेसना- माकन्यानही अमतीनदिन रंन । चारासीवी रत मानन भर श्रीप ग्मनाय ग्यान कल्यानक ॥ निविथ सम नखत विमाखापाय । लहिअपरान F . . , - । - .. + न ॥ .
"ह पाहता तर समाधि लगा पायो : व्ह राजप्रत इन जिनके कोयगतबर साट, पुनरु घीप कति पनि त्र सोनाको सुजल गनयन आठ अजोला साथ रदा तुम तहः सोलहत- हत बखान । सहल माठ मुल तीन व मुलगतावको मान ।। एक लाख चासठ सहन निकलनायक जान । तीनलाख सुभ श्राविका सहस अठावनमान ॥ संचालन सत सातयत चौदह परब जान । अवधियान जानी गने चौदह से सुज्ञान ॥ केवलम्यानी सहस इक इसे वइक्रोवान । साध मुक्तिगामी सहसदूनी साध्वी जान । विपुल सुमतिधर आठौ वादीस सुजान । सारथ सिधिजे गये बारहले ते मान ॥ दुहुँ विधि भूमी अन्तकृत इक जुगान्तकृत होय । दूजी है परयान्तकृत प्रधम कही सब सोय ॥ तीस वरस ग्रह वास दिन त्र्यासी निस छदमस्त । कछुकम सत्तर वरस कुल केवल स्थान समस्त ॥ सरव आयु सीवरस की पूरन करि जिन जान । ललोपरमपद सोख को सोनव कहानिदान ॥ अथ श्रीपारतनाथ मोक्ष कल्यानक ।। तिथि सावन सुदि अष्टमी निसि निसीथ जिन नाथ । परवत तिघर समेत पर तेइस साधन साय ।। नखत विसाखा जोग ससिचौविहारतताधाकासम्गतर लय लपायोमुक्तिअवाधा। अथ श्रीनेननाथ अधिकार ॥ अब चरनी श्रीनेम के पांचों वर कल्यान । चवन जनन चारित्र अरु परम स्थान निरवान ॥ इन पाचों कल्यान को जब जन भयो सजोग। तवतत्र चित्रा नखतही नाहि भयो ससि जोग ।। अथ चदन कल्यानक। कातिक वदि वारस सुतिय नेमनाथ अरिहन्त । सुरसंबंधी आयु तिथ तजि सो जिय जयवन्त ॥ सनुद विजय यादव पति १ ६६ क० भा०॥ सोरी पुरके मांह। सिवादेवि ता नृपतिकी रानी अति छविछोह। निसिनिसीय में चत्रि कियो गर्भ माहिं तिनवास ाक्रमक्रम करि बीते जब गर्भ सवानव मास ॥ सुपनादिक जैसे प्रयम जिनज- ननी जे पाय । बरनि बखाने ते सकल त्योंही भये सहाय।। अथ श्रीनेमनाथ जन्म कल्यानक ।। सावन सुदि तिथि पंचमी सिवादेवि के कूप । जिन जन्मे श्रीने- म प्रभु सुन्दर सगुन अनूप ॥छप्पनदिमा कुमारि अरु चौसठ इन्द्रन आय ।त्योंहीं गङ्गल मोद मय कियो महोच्छो चाय ॥ समुठ विजय जयवन्त हूं मोद उझान वहाय । सिद्धारथ नृप लो कियो जनम महोन्छो चाम॥क सगा जिन जोर की नामा सपनि गरः । होन सुनी वर मात तिन करी परिश लनिशिन पोरे गालने माग भरि तास । सबाला- गाजा उदयो उनी चली पनाग मानिजान जिन ग्यान पर करिमार्गअष्ट । गोजोजन घर में धयोम्योदेव सो पटना माग काय हि पारान पारि ग्यिमाय । ले अप. यो भयो माद जायसपद विजय जिनके पिता मोगर। ग्रांगन पशुगनि तिनके गीती भायातिन इक कानावग्यायो मारन हतान्योति भलिबरी कियोसो 'नयाम मि मानकी प्रकृत दुष्टकरिदीनागर्भ मापन मन अनि भय मलीनापि सुतहि संदूपमें । द बतुना जल बोरि तिहिं दीनामथुरानाथ ॥ में पातिकमुभद। खोलिदेविमुन्दर सुमन ॥ मो माया बसुदेव को उग्रसेन सुतकंस। ककोज मो यादव प्रतंत ॥ राजनहीनगरी ह विमान जाव यादीप्रवल तानगरीको मदन यादयान मत सहित बासुदेव पदपाय । भयोसु- जना रनावादन को या जीवनसा ताकी सुता कामाः । ६७ वृधि गुन रुप प्रमंल । व्याहि ई ता पिताउनदेन सुतकंसा व्याहि ताहि तिन पायवल करि निज वापहि बन्द । मयुरापति पिनु रान पर वैठि भयो स्वच्छन्द तिन देवकन्न्पको सुता नाम देवकी जासु । व्याहिदई बसुदेवको ति हित चितकारि ता- सु । लघु भाता इक कंतलो डसत इहि नाम । तजि ग्रहवा- स प्रवास सुख भयो साध अभियान ॥ तिन इकदिन नि. ग्यान करि होन हार की जान । जीवजसा मामी निकट कही वात यह मान ॥ गर्भ देवकी वहिनको होय सातवों जो- व । सो तेरे भरतारको नारनहारो होय ।। यह सुनि उनपति पास चलि विथा सुनाई जाच । सुनि सचित्त है कंस तब लै वसुदेव दुलाय ।। वंचि बचन कहि कपटक्के वाचा लेदै सारित । सात गरम तुम बापने देहु हमें यहभाखि ॥ सत्य संधि वसु- देव तहं वचनबंध नीठ । दए गर्म साता नहीं दई वचन को पीठ ।। जवजव प्रसवी देवकी तक्तव लेसो गर्भ । सिला पटकि नारे सकल एक भांति इलवर्न ।। भयो सातवेंगर्ष में जव श्रीकृन्ण निवास । सुपन सात लखिदेवकी पूरीनासाथास। सिंहसूर ससि अगिन गजधुज विमानविख्याता बासुदेव माता लखत एई सुपने सात ।। गर्भकाल पूरन भयो भादी बदि बुध वार । तिथि ना अधरात को लियो कृणगवतार ॥ सोइ गये सब पाहरू खुलि गये सकल शिवार । कृष्णहि ले वसुदेव तवउतरे यमुना पार ॥ नन्द गोप घर ताली घरनि ज- सोदा नाम । जनमी पुत्री तिहि समै ताले अति अभिराम ॥ पहुंचतहां वसुदेव धरि सुतलै सुता उठाय। फिरे उतरि इहिवार पुनि निज घर पहुंचे आय ॥ भोर भये पहरू जगेन्द्रपतिसुनाई जाय । नृप सुनि त्योंही सोसुता लोनी तुरत मगाय ॥ देखि सुता ताके तवै छेदे नाक कान । भयो कस मुदवन्त अति है निहिचिन्त निदान ॥ वासुदेवश्रीकृष्ण अवनन्दलहन केमांश ।
६८ क. भा नवसति लां नितान्त निपट बहन लगे दिन सांस ॥ बालचरित अभुत करत हरत मात मित नित्त । लखि हग हि- से सिरात अति वारत तन मन बित्त । इक दिन इक सरवग्य को पूछो कंस सुचाहि । कहि कोमेरो शत्रुहै जात मुहिमय याय ॥ उन भाखी खरमेव अरु केसी मन अरिष्ट । जो इन सब को मारिहै मारै तोहि सपट । सुनि नृप त्योंही तुरत तेड इकक दये पठाय । तेसवगारे सहजही बालचरित यदुराय ॥ जानि कंत जिय संस बढ़ि भयो सोच गय सोय । अनहोनी होनी नहीं होनी होयसो होय ।। बहन सुभद्रा कंस की ताको रच्यो विवाह । दिस दिसते आये नृपति जानि स्वयम्बर चाहि ।। सुनि सुदमय श्रीकृष्णहूं मधुराचलेडताल। जद्यपिवलि बजे विफल रहे नाहिं नन्दलाल ॥ चलत बाट काली उरग नाम पनि गारि । सुक्षिकादियानर सबमारे गल्लपारि ॥ निकापामारको पति कंल । रातमामा ताकी या बापानमै नामवय सोरहा बरसी का पति अति अभिराम ॥ सत्र मिटाने प्रयाग। सबसेवा धर्मपर - जमानिन कंपकी तब ति कि लि गई सहित परिवार ॥ कमी काय कालकुमारन --उतिहटरहू गुरको कहि का । अहित सही अनुकुल देवि कि हरिछार। पुरातनि मनसंगठन भारदहां बताई वारिका धनद ना लाल ति जिगनाई भई सुपुरी वरिष्ठ ॥ भी जनता नीर तहसम्पति सतत J - . ohan.' "मन
संतत वाढ़ी जादव भीर ।। रतन वनलनको तहां व्यापारी इक
आय । देच कछुक कछु लंगयो राजग्रह में लाय ॥वचन लाग्यो
लखिलयो जीव जसा ललचाय । मोल पछि विसमितभई
सेवालाख सुनि भाय। उन जो वे द्वारिका सो सवकही सु-
नाय ।सुनिपरत्व दुख जगि उठ्योपितुसोकोदुखाय ॥ सोपितु
सब भटकटकले गजरथ तुरंग पदात । अमित फोजकी मोजसों
कोपिचढ्यो विख्यात ।। उनहूं तं श्रीकृष्णसुनि जदु कुल कटक
समेत । चढ़ि पहुंचे मिलि परसपर रच्यो मच्यो नर खेत ।। सैन
रेनु है एक तह भुव उड़ि नभ करि बास । आप हौनि छह
रहि गई कोने आठ भकास ॥ किधों सैनखुर रैनु उड़ि भई
द्योस की रैन। कृष्णचन्द मुखचंद तहं मनिगन उड़गनऐन ॥
किधों धूरि धुंधर घने घन घुमड़े चहुंवारें। असि लरंजन
तरजन तडित गज गरजन घन घो। सरसपरसपर वान वर
वरसन अमित अपार । सोअरवराड जलधार की झरी भरीभय
सार । सोनित सरिता कढ़ि बड़सर मरि उड़ि अपार । रुण्ड
मुण्ड मण्डितरुधिर जल जलचर अनुहारं ॥ प्रवल वली वलि
वीर लखि जरासन्धि करि क्रोध । जरानाम विद्याप्रवल प्रेरित
करी प्रबोछ ।सो विद्या कारनभई रुधिर वमन कहेत । कृष्ण
अनीक अनकननजादवये श्वेतानमनिदेशित कृष्णतवाष्टम
तपाराधि । प्रतिमा पाय महेन्द्र तिहिं अकाल जलसाधि ।।
सेधन करि सेना सकल लीनी मरतजिकच । अतिउछाह करि
कृण तब दीनो सङ्ख बजाय:तहासङ्घ तीरथमयोप्रतिमा थापी
सोय। फेरपरस्पर युद्धहित सजिसन्मुख हुदोय। चक्र चलायो
जोर करि जरासन्धिहरि ओर । कृष्णवचायसुताहिफिरि अरि
मारयोदर जोरदारि कोटि जदु नृपसहस बत्तिसमहलसमेत ।
महाराजश्रीकृष्णयोबसे द्वारिका खेत ॥ एकसमंजिनअतुलवल
चरच सुरपतिलोक । चलोपलीसुर एकसुनिदई परिच्छाझोक ।।
७० क. भा०। 1 -- वायोगिर गिरनार दिगपुर धारापुर एक करनलग्यो सोबसि तहांअति उतपात अनेक ॥बारवती के द्वारतेंनिसि वाहर जाया जाय ताहिरावे पकरि जकरिदेवता सोय ।। एक समें बलभद्र अल ऋणहि राखे घेरा मत्र्यो कुलाहल नगर में बगर बगरभय हेर ॥ तब रुकमिनि श्रीनेम सौभास्यो सन मुख हेर । कहा भयो कलो सुन्यो कौन करत यहझेर ॥ तुमसे पुरुख अनंत बल छत उपन्य एह । होय बडो अचरज यह छुटै न मन संदेह ॥ सुनि श्रीजिन रथ चढि चले पहुचि नगर गढतोरि । जुटे जुद्ध तादेव के सनातुन आयुध जोरि । अनिल अनल जल प्रबल सर दुई और तंगीरि । अनमोहसर मारिके सुरमोह्यो बरजोर ॥ सुरपति पाय पिपास तत्र पाय पारि सो देव । बिदा भयो सो विधयर विनित गांव करि रोव॥ तव श्रीजिन भगवंतबर नेमनाथरि नीना नरम कपक्रम वनिमगवंतातऊन तितकेजीय में व्याहनवाज । गातपिता करि सोचनव अति विनये गः ॥गत भामा आज कमिनी तिन निपटनिहोरि । संगी मनी नाम सगाई जारि ॥ मावनदिछठ सुभ हमाराला टट गय। चढी जान जादामई मथुग पहुंचीजाय कान मान मन फलवाग वर ख्याल । कल कोतक र म चटी विनाल ॥नामबास वासे अतर भपण नाम.. महन मंगल उग्रमेन के बार ॥ तहं माध्यानमा । बोल्यो वह तुम व्याहके । गो व हित पापुंजको घात तहां जिनहेर किननर यि दया यानि मति फेर ॥ मनिभूपण । नाटके दम प हि छाय। तोरन हात फिर फिरे सब , मिटरमोद मई गनीमती गांप चढ़ी यह देप। खाय पर मनी लह मुग्ला विसप ॥ अलिन आयकरि बीज- नाक गुगललगायकरि सदेत झपकेतकी दई आगि भ -- . 1 .
चहुंओर ते अलि
भड़काय ॥ बिरह विथा वाड़ी विपुल बितन बान विपवाय । रोम
रोम सब रमिगई रोय रोय विललाय ॥ नीरहीन जिमि मीन
अति दोन छीन बिललात । तलफि तलफि विलपति विपुल
नेसप्रेम उतपात । तजिम्पण दूपण दये चीरे चीर अधीर।
छट पटात लोचत लान हिये उटत नहिपीर । अलिअवली
अम्बुज कभाय। घरिसमुझावत कुअरि को
क्यों ऐसे अकुलाय ॥ अज्यों अरंभन व्याह को क्वारीकन्या
तोहि । कहाइतो दुख दूसरौ दूलहला- जोहि ॥ यह सुनिधुनि
सिर फिरि कह्यो ऐलेफेरन मारिख । मनबचक्रम मोपतिवहै हि
भव रबि ससि साखि ॥ जो उन छाड़ी मोहि तौ छाडॉकहा
बिचार राहों नहिं तिनको छाडिहीं मनवचक्रम निरधार ॥ उत
श्रीनेम उदासह ज्यों पहुंचे निज गेह । नव लोकान्तक देवता
दिच्छा समयो जेह ॥ आये ताहि चितावने मधुर वचनकरि
सोय । कहन लगे कल्यान मय जयजयवन्ता होय.॥ सुनत
सुमिरसमयोतुरत कीनै वरसीदानामुव ऊरिन पूरनकरी भरी
सककधन धान ॥
अथ श्रीनेसन्दाथस्वामी दिक्षाकल्यानका :,
सावन सुदि छठ तिथि सुदिन दुपहर चढ़ि सुखपाल ।
चौसठ सुरपति सुर सकल सहित जिनेस दयाल॥ पुरोद्वारिक
वोचढू निकसि वाह!आय। पहुंचे गिरिगिरनार पै रेवत टूक
हिंपाय।। निकट धनी गंवराई तहं तरु असोक तर आय । उत्त
रि तहां सुखपाल ते ससि चित्रा में पाय ॥ भूषन वसन उतारि
सव पंच मुष्टि करि लोच । चौविहार उपवास है करि घरि
आतम सोच ॥ देवदूपपट राखि इक छोडि सकल ग्रह साज।
राजकुमार सहस्र संग लिय चारित जिनराज ॥
अथ श्रीनेमनाथ स्वामी ग्यानकल्यानक ।
चव्वन निसि चारित्र पद पालि पचपनी रात । सिन
कभा १२ नदि माव नभए निसि नि-पीथ बिल्यांत ॥ वरगिरनार पहार त रमतर जाय । चित्रा ससि उपवास दै चौविहार फरिचाय ॥ परम ज्यान कल्यान में पायो केवल ग्यान। चौदह गज समान जन मन परनामहिं जान॥ राजमती हूं आय तह दिग्छालेजिनहाय । तजिसंसार असार सब वृत ले भई सनाथ। तब पछ्यो श्रीकृष्ण यह एकओरकोप्रेम । कैसो सो भाखनलगे श्रोजिननायक नेन ॥ आठजनमको प्रोतयह अब क्योंळूटे भ्राता देवलोक चारि भव चारि और सुनि वात ॥ नृप घनभूत रु धनती प्रिय मति अपराजीत । सङ्घ यशोमति चित्रगति रन बनी समप्रीत ॥ नोमे भव राजीमती नेम नाथ के साथ । जनम सनम को बन्ध क्यों छुटे छुटाये हाथ ॥ अब इनको परिवार सा गनधर गच्छ अठार । सहस अठ रह साधु की सम्पति र निरधार ॥ चालिम सहस सुसाधवी बरावक इकलाख। नापर उनहतर सहस अब श्रावक तिय भाप ॥ तीनलाख उमा महम वनिमगनती जान । चौदह परव धरि कहे ते नौचारि बग्वन ॥ पन्द्रह ग्यानी अवधितिते वइक्रोधार । महम विपुटमति मानमें वादी बड़े विचार ।। डेढ़ सहस बर माधु अरु गुममाम्बी में नीन । जिन कर दिच्छा पायके भये मुक्तपद लीन ॥ दुहं अन्तकृत मनि ते इक युगान्तकृत जान । अरु जी परिवान्तकृत नेमनाथ परिमान ॥ अाउमान जिननाय को अवगन की बाबान । बग्म तीनत नेमजिन रहे कुमार मुजान ॥ दिन ऊन हे मास पनि रहेनाय छदमस्त । ग्म मातम तिननाहित बल ग्यान ममन्त ॥ अपनीनेननाय मोक्ष कल्यानक ॥ बग्म नहन नव गाउ के पुग्न करिजिनराय । तिथि असा- मुदि अष्टमी चित्रानुन ननि पाय ॥ मध्यरात गिरनारपर उम्र तक गिट्टक । चबिहार उपवास जुत परिसुम ध्यान . - का भाः। ७३ अचूक ॥ नुकत पधारे नेमप्रभुतदनन्तर तहं जान । सहलगानी अरू चार पर नहावीर निरवान ॥ सहन पचासो वरन पर नवस वग्त बितीत । और उसी कीते लिख्यो कल्पसूत्र कारि नीत॥ नेम चरित पूरन भयो छठे वाचना मूल। होहु सकल कल्यानल जिन्न मन अनुकूल ।। जय सातनी वाचना॥ चौबिस तीरथ नाथ केयुक्तान्तर को बाल । सोबरना संछेय करि परम पुच को जाल । अरु तिन जिन चोवीस तातनातको नाउं।। चिन्हकार मित तनबरन उमजनम चितगावं ॥ पित पांदो कल्यान की सुकत धान कुल गोत । बिजासु सुरलोकत ताको नांव सजोत ॥ साध साधवी सकल अरु गनघर देवी ज- न्छ। चोवीस जिननाथ के कहीं प्रथम परतन्छ । नेननाथ सुनि सुस्तको कुल जदु कुल हरिवंत । गोतमगोतसजोतयेनगटे कुल अवतंस अरू तवको इक्ष्वाक हुलकश्यप गोती जान मुक्तथान जिन वीसलो लिपर समंत बखान ॥ शेपचारिके मुक्ति थल प्रयक प्रथक सुनि सार । महावीर पावा पुरी नेमनाथ गिरनार । वास पूज चल्यापुरी अष्टापदशुभयान । आदि जि- नेसर सार वर रिपन देव निरवान ॥ अव सबको संक्षेपक रि सुनिये सब विस्तार । वरन चिन्ह परिवार वपु थित थल अन्तर सार ॥ तहां प्रथम बरनी विदित महाबोर अधिकार । परम पुनीत प्रताप जुत बागम मत अनुतार ।। अयनहावीरअन्तराला॥ चरल तिथंकरस्वामिवर महावीरभगवान। वर्षमानजिनतीक हो त्रितला मात निदान । सिद्धारथ जिनके पिता हाथ सात नितिकाय । सुबरन वरन बखान तन लमण सिंह सुनाय ॥ वरस वहत्तर आउ पित तजिकै विजय विमान । खत्रिपुराड चवि औतरे कश्यपगोत निधान ।। पवन तासित छ असित ૧૦
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का भा० । ७५. और साधवो सार । जैन धरम के मरम करि कहि चालीस हजा. र देवजिनकी चन्धिका गोमेघ जन्छ । रथारह गनधानेमके पागम कहे प्रतच्छ॥ अथ श्री नमिनाथ अत्तराला ।। श्रीनमिको जिननेसते प्रथम परमनिशानापांशापरोकझो वरागम परस्माना। विजयतात नमिनायो विहानाला जाना मल लचन पन्द्रह धनम काया मानववानास सहस थित सारय सिंविधान। तजित सुनिकिता चार श्रोतरे सुजाना सापित यो च्व जनन ताबन नाम असाद नवमी सितचारितदिनभर गहननितएकादशी सयेयान साधार।ललो मोखरेलालबादिदनामोनिलरमार वीस सहल नमिनाथ साथ साधो फेर । बिनती इक तालिस सहस जरनागन विधिहर ॥ एगधाई देवीलही जिनके मृगुटो लच्छ । गनदर श्रीनमिनायके लतरह लगतच्च ॥ जय श्री मुनिसुव्रतस्वानी अन्तराला ॥ श्रीजिनवर नमि तें प्रथम नुनि तुरत निरवान । बर बागम अनुमित कह्यो छहलख पूरौ जान । त.त सुनित्र सुत्न पन्ना वती सुमाय । कच्छप लमन स्याम तन बीस धनुर की काय ।। तीससहस वर उमर तजि प्रान तनो सुरलोक । राजारही हरि वंस कुलचवि जनरें अशोक ॥ सावन दि न्यो पका जनम जेठ वदि आठ । फागुनकी शादती सितासिता क्रम पाठ ।। चारित स्थानत जेठ वदि नीमीपायो कोखा क.नो सिखर समेत पर भवभय तजि संतोख ॥ जानो नुनि मुनिसुव्रतले तेत सहस विस्तारासहस पचासै साध्वीयह जनमत सारानरदन्तादेवीक- हीवरुननामजहजच्छागनधर श्रीमुनिसुनतके अहारहपरतच्छ -अथ श्रीमल्लिनाथ अन्तराला ॥ तिनहूं तैं पहिलैग्नुकति मल्लिनाथ कीजानालाको मितिआगम सितबारस बहुर ७. क०मा० । भगित चडवन लाख बखान ॥ मल्लिनाथ पितु कुंपनृप प्रभा- ती तिहिमाय । हरित वरण लच्छन कलप्स धनु पचीस मिति काय बरस सहस पचपन सुषिततजि अपराजित लोक। मिथिला पुर चविकोतरे कुल इक्ष्वाक असोक ॥ चबन चौथसित जानी जनपचारितरु ग्यान । अगहन सित एकादसी ए तीनों कल्यान।। फागुन प्तिपर समेत सुखेत । लह्यों परम् निर्वान पद पातमतत्व समेत ॥ मल्लिनाथके साध सत्र कहे सहस चालीस । पचपन सहस सुसाधवी जानि लेहु बुधि हल ॥ धरनप्रया देवीजहां कहि कुवेर वर जच्छ। मल्लिनाथ गन्धर कहे डाढाइस परतच्छ ।। अथ श्री अरहनाथ अन्तराला॥ नवलख कम इक कोटि मिति वरसप्रथम परवान | मल्लिनाथ में शक्तियन अरहनाथ कीजान ॥ अरहनाथ की माय श्री देवि अर्जनाजान। पिता सुदरसनचिन्हजिहिं नन्दावर्त बखान ॥ कनक गवतु तीस वपु चौरासी सहसाय। छोडि. जयंत विमान निधि गजपुर प्रगटे आय ॥ चवि फागुन सित दूजसित कातिक बारम स्थान ! अगहन सुकला दसभि को जनम और निरबान । माम अगन नुकलतज्यो गृहस्थावास। सिगरप्तमेतीमुकत शल पुलस्याको तात ॥ अरहनाथ के साधु सुभ कहे पचास हारनामनाम निहिं साधवी जैनागम अनुसार ॥ वरनी दीवानीमराज शाहं जच्छ। अरहनाथ जिननाय के गन निमग्छ अययनाय अतराला ! अरहनान में प्रथम धनानिर्वान । लप इक्यानवे वर- कर पाव पल्य में जान ॥ पल्योपम सागर प्रमित पहिले कह बामना आग्न के अधिकार में काल मान परवान ॥ श्रीर्मा कांना मानके कुंगनाथ सुत जान । सूरसेन जिनके पिता छा H: .1. :, M. . क. भा० चिन्ह पहिचान ॥ पतिस धनु कंचन बरन तन हजार सत मत । पांच सहम कम पायित छोडि सर्वसिध शंह ॥ हस्तनपुरवि जोतरे कुल इक्याज सझार । सावन कृणा नवमि तिथ चवन तानुनिग्धामापहिली बदि वसाप को पंचमदस फेगक्रमकरि नोए बापान अरु दिच्छा जनम सुहेर ।। च्यातर्चत सुदि तीजकों पायो केवल जान । पांची तिध कल्यानकी ये जान सुजान ॥ साठ सहस नुनि कुंथके और साधवीसार । जानो साढ़े तीनसे साठरु पांच हजार ॥ वालादेवी भापिये अरुगंधर्व सुजन्छ । कुंयनाथ गनघर कहे सुभ पेंतीस प्रतन्छ । ऋथ श्रीशांतनाथ स्वामी अन्तराला॥ कुंथनाथ ते प्रयन श्री शांतनाथ निरवाना पल्योपम को अई मिति ताही के परमान ॥ विश्वसेन जिनके पिता अचिरा मात वखान । सा लंन चालीस धनु कनक काय पहिचान ॥ लाख वरस थित ग्राउ की तजि सर्वारय सिद्ध । हरतनपुर चवित्रीतरे कुल इक्ष्वाक प्रसिद्ध ॥ असित सनमी भादवी वन जंठ बदि फोर । तेरस जनम वरखान सुनि मोपी तामहेर ॥ जेठ बदीचौदस लियो चारिततापरवानामयोपोतसुदिनवमिकोजाससिपर निर वान॥शांत साध वासठसहस और साधवो सार । इकसठमहस रुदोयले जनागम अनुसार ।। वानी देवो जासुको गरुड़ नामवर जच्छ । शांतनाथ गनघर कहे तीसरु छ परतच्छ॥ जय श्रीधर्मनाथल्वामी अतराला !! शांतनाथ हैं जयन श्री धर्मनाथ निरवान । पान पल्य मिति उनकार सागर तीन वखान ॥ धर्मनाथ श्री भानु पितु जासु सु- उत्तामाय । वज चिन्ह कंचन बरन पंतालिस धनु काय ॥ आउ वरस दसलाख यित तजि सर्वारथ सिद्ध । रतनपुरी चविनोतरे कुल इक्ष्वाक प्रसिद्ध ।। सित सातै वसाख चवि जनम माघ सुदि तीज । ताही की तेरस रहे सुभ चारित रसभीज ॥ केवल पून्यो : ..... वाल ही म ज्ञान .५८ क. भा० । पास पित जेठी पंचव मोख । सुभ समेत गिरि सिखर पे पायो म संतोख ॥ धर्मसाव चांस सहम नोर साधवी सार । वा- सरसहस रुचारिस जैनागर विस्तार ॥ जहं देनी कदाकिनी कनकिार जनक। गनघर जान नखानियेतेंतालीसात !! जय श्रीमतलनायअन्तराला ॥ नाम पनि जिन पनन्त भगवान् । गुक्तिमान किनकी नागर चारित्रनान ।। शिवसेन जिनकेपिता पुतला निरमाय । निह सिवानरु कनक तन धनु पनारा गित साय॥नीस लाख नरसो उपर लोक सोलही त्याग। अवधि सदश्याक में चविनोतरे सभाग! अमितासतिगाननीगवन जमीनमान । तेरस चौदसरुगे तीनों क्रम साख ॥प्रथमजनम हर तीज केवल ग्यान । बहु र चैत गित पंचमी सिखर नया, निरवान मुनिअनन्त छामठ महम और साधवी सार। कामगरम रुचारिस जैनागम निरधार ॥ जिनकी देवीकाशा पानामा निहिं जच्का गनधर नाथ प्रान्तके कहे पचामनतव्छ।। का भी बाल नाराअन्तराला किन सनन्नने जिमल जिन गुस्यतर पाणान । नव नागर फोकलो लागि मानविमलपिताकृतः अरु स्यामा बा कर लताठ धना नितिकाम माला काम करलोक बारही त्याग। कपिलपुर अब बालक ने नवागत बैसाख चविणास मुदी घटाना वीज दोन मिन माघ को जनमत चारित जान ॥ न कानध्यायपाचलुखम्बान । सुलगिरि हिर मत्र पर पायो पद सिग्यानाविमल साध अडसठ सहस गार माधवीनार लाब परी कही जैनागम अनुसार । विदिता देवीदनिये पनाव जिनके जच्छ। विमलनाथ गनधर बिमल । कहिपचपन परतच्छ॥ ज मामा . . 47
का माल ।
७६
व
अथ श्रीवासजरबाली लगा।
विमलनार ने प्रपन नि बालजनिम्बान । तर दोनों
कुशन को लागर तीस बवान । वासराज वनुपनि पिनु जया
माय रङ्गलाल। धनु सनर तन थिन बन्न लाख कहतर काम।
महिप चिन्ह चंपा पुगे छांडिदसम सुरलोक । जेठ सुकल नीनो
चवे हरे जनन के सोक । फागुन वदिचीदस जनस नावसदिच्छा
तोप । न्यान माघ सुदि दूज सित साड़ी चौदस मोप ।। चंपापुर
म साथ सुभ सत्तर दोय हजार । तीनसहस अरु एकलप सुभग
साधवीसार ।' चन्दा देवी वरनिये अरु कुमारजहं जच्छ। वास
पज मनधर कहे वर छासठ परतच्छ ।।
श्य श्रीश्रीयांस यंतराला ॥
वासपूज तं प्रथम पुनि जिन श्रेयांस सुजान । नुक्तान्तर इन
र को चोवनलागर जान ॥ विष्णुसेन जिनके पिता बिष्णो
जिनही माय। खडग चिह कंचन बरन अासो धनु को काय ॥
चौरासीलप वरस थित तजि सुरगांतकलोक। सिंघपुरी चवि
सौतरे कीने लोक असोक ।। जेठ बदी छठ चव जनम असिता
वारसफागाताही की तेरस तहांचारितलह्योसभागामाघी माव
सन्यानवदि तीज सावनीमोप । सिपर समेतहि में भयो जनम
करनसंतोप। कहे साध श्रेयोतके अस्सीचारहजारं । छहहजार
इकलख कहीसुभगसाधवी सार ॥ वरनी देवी मानवी जच्छे
राजजहं जच्छ। सतहत्तर गनधर कहे जिनश्रेयांस प्रतच्छ॥
अथ श्री सीतलनाथ अंतराला ।।
अव श्रेयांसजिनेसतेश्रीसीतल निरवान । घटबढ़ करि संख्या
कहीं सो तुनिलेहुतुजान । छासठल्प छब्बिसतहसतीस वरस
चसुनासा पनदिन गनि जोरि संव दससागरमें तासु। सव
संख्या यह ऊन करि सागरकोटि मझार। सो सोतल श्रेयांसको
मुक्त्यन्तर निरधार ।। सीतल के हैदरथ पिता नन्दाजिनकी माया
4. ~ -- . - क० भा०। श्रवन्सी लंन कनकतन धनुनब्बेकाय॥ एकलाख पूरब उमर ननिमुरगांता लोक । भालपुर चव गौरतेहरे जननके सोक॥ चन की बजाजनगमवातिया नावादी वारसहि को सुतिर एकही गोग! कानाको कोज बन्दी बै- मान। निस्लान महान T-रख परेब मीनल नाराकहिये । पायो उसलाल महतार ॥ को साकार जिनकश्री मी, नगर को इपासी पराक सवाशाना सतराला ॥ रितात प्रथम गवति निरमान । कहि सागर मागम परमान ॥ राधिनात सुमोव अरु iii मा ।।र नि गिनिन तर गो धनु उनी .. . . If 11 परत दिल ना बात ग्लोका काकन्दो 1) मा गोकन बाद नोमी चवन -माजाप्रजिअगर मालीनी दिल्या न । मालिक मकवा वीज गीगी भाग्यमाग । ज्यान समान पर पाया कम करि लागु ॥ लावदायपुनि सुधि समाधी मार। नीनलाम्ब कही नागम अनुहार ।। देई मनात अजित नागजहं म । सुधिनाथ गन- काही अटोमः पानच्छ । कावयवदा मनु अंतगला ॥ मा बना सकतंच दा प्रनिग्यान । सागर नब्बेकोटि वह मन्यन्तर परमान । महामेन जिन पिता और लछमना । माय ममलंनितारन अरुधनुरुडे संकाय ॥ दमटप रब । सारथित नजि जयन्त मुग्लोक। पुगे चन्देरी और हरेजनन । केनोक॥ चवन चेतवदि पंचमी पोमबदी के माह। वारस तेरस जनम चारित की कमळांह । फागुन अरु भादो बदी असित - - ॥ ..
~~ पा. . 17 सनसी जोय । रगत र निर्यन को कम कान निधि लोहोरा सहम पत्रास दोयलप चन्दाप्रम के साथ। तीनलाख सल्लो सहल तुम सावत्री त्राय । कुटि देत्रि जिनकी कही विजय नाल बग्जन्छ । गनवर कहे तिराणने चन्दाप्रभु परतन्छ ।। अर श्रीसुपासनायचानी अंतराला ॥ चंदाप्रभु को मुक्ति तं प्रथम सुपारसनाथ ।सागर नक्सशोटि रिति नुत्यन्तरोगाय । प्रतिष्ठ जिनपिता प्रथ्वीसेनामाय । कनक वरन स्वस्तिक लछन है स धनु की काय ॥ वीसलाप पूरव उलर पंचोव तजि लोक। पुरीबनारस ओतरे हरे सकल जन लोक ॥ सादादि का चक्न जेठनदीले माह । वारसतेरस जनम अरु दिक्षाको कर छांहाठमांत फागुन बदी ज्यानोर निरवान । यथासंल्य कल्पानकी क्रम करि लाज जान ॥ साध सुपारसनाथ के तीनलाख मिति जान । तीन सहस रु चारि लप सुभ साधवो बखान ॥ वरनी देवी शानता अरू मातङ्गतु- जच्छ । र रानधर पंचानवे जिनके परम प्रतच्छ । अथ श्रीपद्मनाथ स्वामी अंतराला।। मुकत सुपारसनाथ तैं पदमनाथ निरवान। नकहजार जेको- टि मित सागर पहले जान ॥ पापिताश्रीधर कहे और सुसी- मामाय । अरुन वरन पंकज ला धनुदाई ते काय ।। तीसलाप परव उमर अन्तीव तजि लोक । कोसंबी छवि औतरे हरेजन- नके सोक ।। नायवदी छठ चवन अल कातिक वदिके माह। वारस तेरस जनस अरु दिच्छाक्षीक्रम शंह ॥ ऐतीप-योग्यान यदि ग्यारसऋगहन मोए। सुभगिर तिपरसमेत पर बह्मोपना जिनतोप ॥ तीस तहस अरु तीनलख पद्म साय निरधार । वीस सहस तीनलप कही सायमीलार यानादेवी वरनियेकुस- ननाम जहं जच्छ । गलथर बनिसकेकदसतत परतच्छ ।। ॥ ܙܕ A -- ૧૨ ८२ का मा० । पर अनुमतिनायबामी अंतराठा॥ पचनाने सुर्तिजन क्तिनान गरपान । सहसकोटि गये नगलान । सुमिनान पितु पेवस्य ओर मंगला माय नन्हवतवरन धनुर तीनकाय ॥ चालिग लख न्य उनियंत यपान । गवारो चधि अवतरे ग्यान नक भयान । दज मुदीगावन चवन सुकलपच्छ बैसाख । नमी जनम नातिकी क्रमशाख ॥ ग्यारस नोमी चैत र नाग । गमनिनाय भगवानको परमग्याननिर- म गमग-कह सुमतिनाथके साध । तीससहस • सात गायनो माध॥महाकालिदेवी कही तुम्बर ... मनाथ गनधरकहे सतदम छह परतन्छ । श्री अभिनन्दनम्वामी अंतराला । ...नारायन अभिनन्दनानन्द । सागरनवलख .:'23 परमानदाय ॥ मुमतिनाथ ने आदिदे ह्याला माय । छः जिननायक को को दमदस गुनकी चाल ।। मदन पिता मिटाग्थामुपाय । कनकवरनकपि चिन्ह जाटनीनम काय लवपचाम परव उमर तनिके विजय मिताली अयोध्या आतर अभिनंदन भगवान ॥ चवनचीय साकार मांह। न और बारम जनम दिच्छा कम । बान पोम चादन मिता आंठं सित बैसाख । कारमंतर माग्यपरमपदमाव ॥ अभिनन्दन मुनि पल मीनार । कलिलाख कनिससहम जैनागम या देवीकालीन जच्चनायकस जच्छ। अभिनंदन पर तीन प्रतच्छ॥ अग श्रमभवनाथ अंतराला॥ मदन प्रथमपट संभव जिनको जान । सागर कोटि श्रीमनग्य नामन्यामान ॥ मंभवनातजितारिनृपोरसुसेना 7 क. या० । । ॥ ८३ माय । हय लंकन कंचनवग्न धनुर चारिसे काय॥ नाठ लाख पूरव सुयित बांड़ि आदिगोवेक । सावसती चवि जोतरे गद्धि धग्म की टेक ॥ पागन सित चवन अगहन मित के नह। चौदन पांच जनम अरू चारितकी क्रमशंह ॥ कातिकवादि अरु चैतसुदि सुतियपंचमोजोय । लह्यो ग्यान निरवान यह संभव क्रमहरिसोय ॥ जिन संभव मुनि दोचलख और साधवी सार । तीनलाख छत्तिमसहस जनागमनिरधार ॥ वरदेवी दुरितारिका औरत्रिनुख जहंजच्छ। जिनसंभवगनधरकहें पांचरसतपरतन्छ। अथ श्रीजितनाथ स्वामी अंतराला ।। संभवते जिन अजितहूँ तिन की अंतरकाल । कह्यो तितोई वीसलख कोटि सागरहाल ॥ अजित तातजितसत्रु अरु विजया देवीमाय । कनकरंग गज चिन्ह धनु साठ चारिस काय लाख वहत्तर पूर्वथित तजिके विजय विमान । पुरी अयोध्या औतरे अजितनाथभगवान ॥ तेरस सितवैलाव चव नाघसुदीके मांह। आ नोनी जनम अरु दिक्षाको क्रमह ॥ ग्यारस सुक्ता पोस सितवंतपंचमीजोय । लह्योग्यान निरवानपद अजितनाथ जिन सोय ॥ अजितनाथ मुनि एकलख और साधवीसार। तीनलाख आगम कहे तापर तीस हजार ।। देवी वाला अजित जहं और महाजस जच्छ । अजितनाथ गनधरको नब्बे परम प्रतच्छ॥ अथ श्रीआदिनाथस्वामीअंतराला ।। अजितनाथ ते प्रथम अब अपवदेव जिननाथ । सागरकोटि पचासलख लरिलिखि होहुसनाथ ।। एई प्रयमजिनेसते चौवि- स जिनली सार । सुत्यंतर भारखे सकल प्रयक प्रयकविस्तार । चरमतिथंकर लों को जो सबको परमान। प्रतिजिन इक इक जोरिक लेहु सुजानि सुजान ॥ ऐसें जो सब जोरिये अंतरकाल निदान । रिपवदेवनुक्तादितनहावीरनिरवान॥कोटिकोटिसागर अवधिमांह ऊनकरितातु । सहस बयालिस त्रयबरस अरु साढ़े • ० । -- - । . : T साजोरिजां लेहु । कलपसूत्र }} नाभिगा जिनके पिता अरु निरन धन पांचसै काय ।। :- सिधि लोक। छोडि गायोध्या पित गसाढी चोथ चव जनम जा भयो दोनों को संजोग। असिता पताश्यामा लहाो उगान निरवान क्रम चिौरामीलारु सुपग माधवीसार। दिनाजरिवार ॥ देवी बार चक सरी , नागनबर को चौरासी परतच्छ । नागस्वामी अधिकार लियते पानी कल्मान । तीजे आरे करहे आननकोतवायोगिभगोतार। 7 अधिकार जिनके चारि मांचकल्यानक पुर थित विवहारा नाम : नाम वापनि जोकाल -कोर बानी मुखम दुःखमां 5. गुलकुल उपजे नाना ये दोनांनीति - जबाजे पार ॥ इन दोउन कि पाटला यह कहीं नीत ..!"::जित पाया असल्या मरुदेवानाभ तीन कर्मक नीति कहो धिकारनी धनुप गुरुलको वहीं सकल विवस्था एह ॥नाभ गुफाल विमादेवी की कृप । निप्तिनितीथ के काल श्री मनपा , . ३ , . , - '. :
क० मा । ८५ अथ श्रीमदिनाथ चक्न कल्यानक । सुरसंबंधों वायु जि अरुहार विवहार । शडियो सुरलोक तँ गर्भवात आधार ॥ अब इन जिन श्रीऋषभ के तेरह भव वपू नाम । बरनि बखानप्रियमधनसारथवाहुललाम ॥ भये जुगलिया दूसरे तोजे सुरवर फेर । चोये राजालहावल फेर पांचवें हेर । मये देवललितांग पुनिवजजंघप फेर। छठे सातवें जुगलिया पुनिसुर गव्य हेर ॥ जीवनदायक नाल पुनि वैच नवें भवसोया दसवें भववरदेवताजनम होय सुरव मोय ।। चक्रवत्त पनि ग्यारबैं वजनास इहिं नाम । सर्वारथ सिधि वारवें भये परम अभिराम। जनम तेर रिपद प्रभु आदि जिनेसर सार । तिन जिनके अधि कार अब कहीं सकल विस्तार ॥ तीन ग्यानसह चक्न जिन कोनो गर्भ निवास । कुंजरादि चौदह सुपनमरुदेवीलखि तासु॥ ऐसे ही वाईस जिन जननि प्रथम गज देखि । और लखै नहि व्रख लप प्रयम रह्यो या लेखि ॥ रहै नहीं तिहि काल में जे पण्डित तुपनन्य । यात सुपनविचारतहकियो नाभि सरवग्य ।। अथ श्री आदिनाथ जन्मकल्यानक । गर्भकाल बीत्यो जवै सकल सवानव मास । चैतबदी आठे नखत उत्तरवाढ प्रकास ।। मरुदेवीकोकूरख आजनमें श्रीभगवाना खबदेव भगवंत वर आदि जिनेसर जाना आदितिथंकरआदि नृप भिक्षाचर पुनि आदि । आदि केवली ऋखव ए पांचों नाम अनादि ॥ छप्पनदिसा कुमारि अरु चौसठ इन्द्रन आय। कियो नहाच्छ प्रथमवत वन वरखा वरपाय॥ तोलन तोला सेर मन म बाटन गज तिहिं काल । रोति जाति करमादि नहिं और दसू. उन चाल । ते तब अव नवरीत करि सब अचार विवहार।करें हरे दुखदुद सब श्रीजिनराज कुमार ॥ दोन दुखीदारिद्र जुत हीनन लोतिहिं काल । बंदन कोऊ वंदिमैं सव अनन्दसुखहाल॥ एक वरस के जब भये आदिनाथ भगवान ।इन्द्र श्राय इक rrty i" क० भार । - ८ उ तहं लायो जिन हित जान ।। अरु जिन करअंगठ में अमृत कियों संचार । चारित समयावधि लियोसुरसंबंधि अहार ॥ एक समयनर जुगलियालहि फलतालअबात। मर्यो तासुकीजुगल नियल नाभिनृप तात ॥ले राखी निजमहलमें अखभब्याह के इत। पति सुंदरि मरि जरि मनी रति छांडी अखकेत ॥ कोटि लाख सत्तर वरससहस छपनकेमान॥ संख्या परबकोकही इने ऋग्स पहिचान ॥ बीसलाख के चंकमा गुनि यह अंक सुजान। योग लाग्न परब ऋपभ रहे कुमार सुजान ॥जोवन वय मय गमय नर विषय भाग रस मार जोग भये जिननाथ जब तिहि नामार ॥ इन्द्रतियधारिचित जिनवर व्याहविचार । गावामहित रचो व्याह विस्तार ॥ धज तोरनमंगल . . . FT विनान । नानिमुनममंगायके चौरी रचीसुजान। की ममगठा दोय । जुगलधर्म करि मतिमाय ॥ पठो उवटि न्हवा यानि काममा पिनाय विन चोरी माहिं पठी उपांट नहाय । तास प्रतिमा मममहगवनाथ मनि 7. यजिगवार चुदवाय विख्यात।। मानरम दुलाय । मिल इन्द्रानी इन्द्र 'मगलगाय मनि मानिकचोक नाति वाग. गिय । सकल कर्म ६.२यक्त व्याह कर य। पाय मकल सुख सुर - मान मात्र विदाय ॥ छहलवा व अवधि लग विषय गया। बिल मनुन बाके भयो प्रसव जुलियाजास॥ । म. नाननि अझ सुमंगला नारि । जनी वाहुबल सुन्दन प्रयाः लिया मार ॥ पुनिजनमी यह जुगलसुत दोइ । ऊन चास। यह मन्तत.भगवंतकी भई गृहस्यावास ॥ तीने मे . . 1 द 7 h ८७ ॥ क.०भा० । पारेके रहे जब थोरे दिन आय । कल्पच्छ थोरे रहे भर में जुगलि नयाय ॥ लग्न लगे ते परसपर इक तरु तर वठि । हक मक्क धिकार ले तिहुं तोनि में पठि ॥ तिनकेन्याव निबेरहीं नाभि नृपति चितचाहि । च्ह्यो राजके पाट पर सुतहि विठावन ताहि ॥ गाय इन्द्र सुरलोक तेंकियो नहाच्छो चाय । राजपाट अभिषेक की साज समारी चाय ॥ पुरी अजोध्या आय के धनद करी नृपकाज । राजसाज सुरपति सजे वाजि ताज गजराज ।। सठलख परववरस यमदेव करिराज। सकल कला तिनहीं करी प्रगट जगत के काज ।। लिखनपढ्न अरुगिनन पुनि सुगुन सुपन को ग्यान । शस्त्रशास्त्र धनुवानकी विद्या आदि सुजान ।। गान ग्यान गुन मान मिति तानताल के भेद । नृत्य नाट्य अरु वायके चारों भेद अखेद ।। कामकला रसरसगितासोरह सजन सिंगार । वसीकरन मोहन कला आदि अमित परवार ॥ जोतक वैतक अश्व गज रथ आरोहन ग्यान । चित्रचितेरन चतुरई अरु विचित्रता जान ।। सकल सिल्पकी स्वल्पता सूछम थूल प्रकार। सब सिखराई जनन को सजितिनकेहथियार ॥ त्रेसठलख परव वरस जव यों भये वितीत । दिक्षासपय चितावने आये सुर करि प्रीति ॥ अथ नादिनाथस्वामी दिक्षाकल्यानक ॥ जैजनंदा कहि कह्यो भद्रा जिन जान । कोउन लें तिहिं- काल पै दियो समछीदान ॥ चैत वदी ना सुदिन पहिरपाछ- ले पाय । वैठि सुदरसन पालकी सुर मनु सह समुदाय ॥ पुरी विनीता बीच के निकत्ति वाहाय । तरुअसोक सर सोकतजि भूपन वसन वढाय ॥ सुरपतिहित इक मठ तजि चारि मुष्टि करिलोच । चौविहार के वासजुत तजि संसारो सोच ॥ उत्तर पाढ़ा जोग ससि चारि सहस नरसाथ । देवदूप पटजुतलियो बारित जिन जननाथ ॥ तदनन्तर जिन आदि प्रभु लागे करन S rwa 17 T . -- को -- M , - - . -2 || 13 देना गोचरी मा कलंगाह मग चार जार राहि सपना नाम एग्गरी तीर तन । पागमा गलो तपस्या --"नात नात किती निहार । पालकरात नलिलिमार ॥ पर पान गुन शनानिलगे जि- मागायतन कमो रन केटेगा। नवराज । गोर आदि बिया । म साज लाल लियावर मी छगे महा !! श्रीगने पती धनगर ॥ पुरगता- ini: गच्या तिगासा गान करि रहे ।।। ftir it P" नया कन्या पवको उदय । H: ॥ पिलर भव कवरद .:: : . कि उसे जब- ...नाना राय रे ........ महाग साधक ': पारिवाहित भर॥ सब जा मानवजाप मालासोकहने ...मानदि जोग । यातंतही १. ने मां करने लग्यो मुनि बायाँ बनन। तज्वारी का माहि पी भज हाही राखी ....कायम बोलेनन । भलीन जिन मगन यान तुम दोऊ मिलो मिलि । मुनि जिन दोऊ कर मिले सनमुख दये ॥ विहाय उम्बनम श्रेयं मसजिनेस । सुर दुंदुभि १ , .. - . . .
८६ नमवजिने गतिोि साहो दिन त यहभयो मलय तोज तिहिवार । विहरावन लागे त जिन को याहार ॥ सममिला नगी गरे विहात नादि जिन्म । जाउसग तण क िहे तहां परन्शनेल ॥ वहां बाहुबल जिनसुवनायो वंदन हेत। करो धापना प्रीत करि जिनपद की तिहिं खेत ।। पतंकी जिन जननि जमिरे जितके हाल । भूख प्यास तप कट की सहन होय वेहाल! शेयकहे सुत सरत सा राजकाज बन तात। क्यामलीधितात को सली नहीं यह बात ॥ रोय रोचा रेनदिन दीन ना खोय । होत जात छिनछीन तन मरु देवी दुखसोय ॥ सहस बरस तहिसहि सकल सुरमनुकृत उप सर्ग । तशे जिनेसर येह अरु देहनेह सुखवर्ग ।। अथ श्रीमादिनाथस्वानी रयानकल्यानक । फागुनवदि एकादशी नरूत उत्तरासाङ । तीन वास पानी रहित चौविहार करि गाढ ॥ दुपहर दिन पुर तें निकसि वन दसि वटतरु हेरे । पायो केवल स्यान पद परम सिद्ध में पेठ ।। दरत करो महिला महत शादिनाथ कोयाय । पुनि मरुदेवीमाय का हाथी पर वयठाय । तिन पूछी तर भरत सों देववाद्य सुनि कान । भरत सुनायो लाभवर आदिनाथ लो ज्यान ॥ सुनिअति यो सोद नन समोदी के तोय। उघरि गये गपटल जे खोये दुख करि रोय ॥ नरुदेवी को तहां उपज्जे केवल यान । एक मुहूरत मांहि पुनि पायो पद नित्यान । सुरन आप तहं सदुदने दीनी काय वहाय । भरत कियो तिलोक पुनि हरनोदबढ़ाय॥ भरत जाय छह दंड में राजनीत दरसाय! चक्रवर्तकी रिकि ले फिरे अजोध्या नाय ॥ भन्त बात अट्ठान तेज बोधहिं पाय। चारित लोनो तिन सदन पबदेव ते चाय ॥ सुन्दरियादि कतियनहूंपुनिलीनीदारित्र । एकबाहुबल बिनसकल सेवकलये पवित्र ।। तुमुख नाम इक दूत तह भाव पठायो जा८ । ना Ins6 ६२ ''- न . - कमा किसन राना लो बुलायो प्रोत :--: । मिलन सेवा उतकंठ अनि श्री. २८ गो चाहना हो गहु बल जोर । -- कल काम मात्र गारोहिगार गाता ह्यां बात को हाधि। नसो वा पनि होड कहुँ उठि है यानि किन हालाहजिजिर कहीं सुनाय। को बनाने सारा समुदाय । चलो बञ्चों चतु- राजाय । नहरु बाहुनल बदि चाल "; f: ममग धुऊ जर जाहाम। भट निगोह धामगोचार मंत्राम प्रति ... होना बरस बारहलवी न कोय ।। मग बाण दोउन भाईन में करानि हिना समायोउभाय । .. बनाय ॥ पांचव हे रनि कही पांचवीं मदरसामा पर पांचा ।।श्री Tब नारन हितबाहुबल विकागो मुह -: किमोनाहापागो पन्छ- ..... चारित होनो तुम्न तत्र परि पार निन्दाप खिपाने काम। महानुभाई पग ।मदनगमानन काउमरग :: . बोली ठोर ॥ आदि पाटनका वादा को मान । भनी वामी सुन्दरी महिन ब दिन नगन किन कन्यो कु साधवी व मनि निनय निति मनानन सोच्यो चाय ॥ -. 7 . -- -- २ नम . - ॥
६१ मा यहदिन बने गहना ननन । मानरतंगलोकहि अवलोलसझना हान हसनल बक्षिा में यह नो मान । माता पाना चल्यो मितिहि काल मान तिहिं पल वल्रयान लिहि पोलह झंह । आदिनाचग पनि कबसे क्षेत्रलन : ऋकाधि जितेको कहा सकल परिसार मानीनय लिने लाय सहन निरधार!! तीनलाख वर लाधो धात्रकला तीन पंचल स चवनसहरू लुभ श्राविका प्रयोग चारि सहल कर लात गेलाई पूरबजाना अवधियान स्थानीय नवहतार परमाना दीसमहल पहले वली लवध ववक्री वा पीतलहस त भये मतिरयान ॥ साढ़े छह सहल बारह संख्यालोर । ततः वादी भरे साध संस्य पह सोच ॥ साधयुक्ति पदो गरे कोल सहस लहि बोव । लसावी हूंत चालित्तसहस को- था। ऐसें आदि जिन्स लो साध संपदा मान । कुहुँ प्रकार भुव जिन कहै एक अंतकृत जान रुदूजी परिशंतकृत नुकताह निरवाह । रौ अस्ख्या पाटली जिनवर पाछे वाह! श्वसन साउ जिनेत को कहें सुनौ दिश लाब। बील लास्य परख रहे पदकुमार मेंछाय ।। रेसठ पूरव लासपुनि दरसराजयल भोग। यसी पूरव लाख कुल ग्रह सुख भोग जोग ।। एक सहा छ्न्यस्त अरु सहस रूनइशलाख । पूरब केवल ध्यान पड़ पाय बहुर विक ॥ रहे निज साख। जय श्रीआदिनाथ स्वानी मोक्ष कल्यान ।। चौरासी पूरव सकल बायु मान प्रतिपाल । माला बरस तीन तो जबकाल । तीजे शारे के रहे माह नाहकह। सुभ तिथ ग्रसिततिरोदसी अभिजित तसिसीई, परबत तहां दस हजार संगताध। वह उपास पानी हार व्रतसाध ॥ दुपहर दिन पहले लो नादिनः निः- , 1 -- . कर तीन ॥ मानिमिनार -.---:--:-- नासा सहित इनकी ---- :: मेट गाधिकार यह तात। मा बनारस - गासु ॥ सा गाजे बात मानसोपान । बरस यह ग्रन्थ तब कल्पसूत्र - . - न - मा प्रतिसानली मानिन रह गनयर सार। जे चोयह परब नागांमधार : गिन शिष्य नहिं नवहीं को मोवहीं मार के बार ॥ ते सजना- विमान नाशिक जिर .. अनि मान ! न TATTो : गोपाल जीवन न गत नीती मा तीन माननी "नि जाना श्रीवर 71 विर स्वार गौतम वाचन अनिचाता नयापहानी के पाट TE. वरस दितीत नीत भई वानववरस बानी भये तिनके पाट नकन पुनिल गहा प्रा ध -- 1 ६३ कः मा० । वीर सेवा करीबारह गोतमलोस ॥ पाठबरस पद केवली पालि पाय निरवान । शतंजोन मुक्तिपद परम लह्यो सुख्यान ।। शिप्यनही इन दुहुन के रहे तवै तिहि पाट । जंबूस्वामी तें तहां रही धरम को बाट । रिपभदत्तत्रिवहारिया तिया धारिनी तासु। जिन त जननें नाम सुभ जंबूस्वामी जासु ॥ सुनि सुधर्म बानी लह्यो सब संसार असार । पाठ तिया ताके तऊ राग रहित विवहार ।। इक दिन ताके सदन में प्रभव नाम इकचोर। प्राय पांचसे जन सहित चोर बिपुल धन जोर ॥ चल्योगह चलिनहिं सक्यो सासन देव प्रभाव । तब जंवके पग परयौ सो तस्कर को राव ॥ कह्यो स्वापनी सीखिये हमसे, विद्या सार । अपनी हमें सिखाइये थंभन विद्या चारु ॥ तब जंबू ता चोर को सब चोरन के साथ। घरमकथा उपदेश कहि बोधे सब मुनिनाथ ॥ आय आठ तियो सहित अरु उनके पितुमात। सवतस्करमिलि पांचसे सत्ताइस जनजात ।। इन सब मिलि चारित लियो अति अगिनित धनवान । महावीर ते साठवें बरस जंबु निरवान ।। मये तहां तिहिं सलवते ये दस बोल विछेद । मनपरजाई ज्यान इक परमावधि पुनि वेद । लब्धपुलाकी तीसरी आहारक तन फेर । पुनि चारित त्रय भांति को कह्यो पांचवा हेर । इकपरिहार विशुद्धता ताजे पहिलो भेद । संपराय सूछम बहुर यथा प्यात पुनि वेद ॥ छक्कनेन छह पुनिकही उपत्नम स्त्र नोसात। जिन कल्पी कहि आठ नव केवलम्यान विख्यात ।। दसवा मोप पया रनौ ये दसोलदखान। कहभयेविच्छेद ये जिनजंब निरवान ।। जिनजंवू के पाट पुनि प्रभवस्वामि थिर होय । यो विचारचित में किया पाट जोग नहिं कोय ॥ तव सिय्यंभव विप्र इक रान गृहीके मांह । जग्य करत लखि तासु मैं साध जोगता ह ।। तिहिंपर मोदि प्रबोधि सबदिज कर्म छुड़ाय दई गांतिजिन नाथक्षी प्रतिमां ताहि दिखाय ।। गुरु लुख सुनि उपदेन नि RAN . - . -- -निपाट पर पाट पर , मो नग्माना सोनिया गाधान । ताद को लग र ------ जान । पनीर निगान प्रभाव मेटनरल म्यान जा बोने तिमि हाल ॥ पनि तर भानमा जिन दाबाच्न गोश । जनोभर गागनीमा कर नितिन शिष्या गाढर गोलोजोय। मा ... नरनिवाहिनीन बाहुभारजमावर जा जागतिक मूलभमाधीनापाटन पर ----- बोनी गारि । शाह । भत्रबाहु ता अनुज गाव न । .:. अनि गनुरु दीनाअपनोपाट। काम काट जोतिम वल जोको मनमानमा गई साठी ताकी . . . . . fitoriग्वामगरी करी ....... मागुरु माक्तिकरण ....... किन होमनिटाय ।। भूक वाया। जिन विजय शं iiiiiकगतीने का।। नान का शिकार नमामिग्यालान! । यो पनि जननिकाली होती :: कोकिलायला दाहिनन जगको वात न हो नलागंह मकानकोस निहिं :: : - या विमय बिसथाम।' साडे । बन हर खव-पाय । वन कीनीही विवस बमबार वल्या हंगामापाय पर नृपचहन की पहंच्यो . 4 .
क० मा०॥ 1516 । ६५ राजहजूर । पहुंचिसोचिक्छु समझि पुनि भयो विरति भरपूर ॥ ल: विजयसंभूति चारित दिक्षाजान । सिरिया पुनिम्त्री भयो नृप वाग्यापरमान ॥ बोवन गणिनाकोतका थूलमन्तहं जाय। चतुरमासतिहिंपर रह्यो जल जलजनके न्याय॥भाच्यौसाढ़ेतोन करहमतें रहि का दूसि। मन आवै भावे सुकर सरत भाव रस पशितिसें ही ओरौ तवै तिहिंगुरुभाई तन । लगकरन तपतीन थल अप अपने मति लीन ॥ सिंघसदन मुखइक वस्यो एककूप सुख आय । इक अहिगृह मुख सबन यो वरपा दई विताय ।। पल भद्र कीनो कठिन पै सब तें तप जान । खड़गधार तीछन बनी घनी बनी दुरखान इक बरषा रित रस भरी घनघुमड़नि चहुं ओर । सरसनि वरसनि परसपर कल कूकान पिक मोर ।। मनकनि चमकनि चंचला गरजनि सरजनि काम । महोमहा माज्ञास सब भयो उदीपन धाम । अरू युवती नवजोवना भूपन वसन वनाय । हावभाव हगाह के अरू अनुभावविभाव॥ नृत्य नाट्य पुणगान केतान ताल मिति मान । वाजनिवीनप्रवीनकर सुर लैलोन निदान। एते सब बाधक अधिक साधकसाधनसार। डिग्यो न डरा मरि अचल मति थलभद्र निरधार ॥ वरपा बीते गुरुनिकट निपटविनयजुत सोपास्वायो गनिका बोधि संग क्रपा वोठ गुरु जोय ॥ कही अहो दुक्करदुलभ तुव तप या देवेर । एक देर तिन सौं वह्यो तीन शिष्य तन हेर॥ तेनन में दुख पाय प्रति कोप गोप मुख वासी जती दूजी वर्षा और ॥ उपकोड्या वेस्या सदन पावस करन निवासायास धारि मन चही अज्ञा वर शुरु पास ॥ ज्वाव न दीनो गुरु जब जती सुतव तिहिं काल । दिनुही गुरु प्रज्ञा गयो गणिशागेह सभाल।। धर्नलाभ तासी कह्यो तिन चाह्यो धनलाभ । वसीकरन मोहन भरयो गुनमय गनिका गाम ।। चितवतही तनमन लियो धन विन सर्यो न काम । नृपनेपाल सुदेस तव गयोसाध्यनवाद।। फेर । सिंघ गुप्ता 2 + ॥ - भा० । नाशिको विवरा नस काम। नदी जोलोलन -सका नातला जाग जायो नपति तिन स- --- माघ । रियो स्तनाल सुले बायो विय पे धाय ॥ -------कोश निन्ट किमो निनवन सोय। तिन लै पगसी यो मन मोय ॥ उभागोतासाधसा आपनी । लिगा दस पात्र अतिकहना लग्यो सनिसरा॥ माबह लहो तुन हित लागोजाना । गति नात्याग्यो --- : नः गोल गजान ॥ नि गगिका लागी कहन सुनरे ।., जल बह पोल ते मायो जान्यो गढ़ ॥ अति ....यब जान परेरा चारित्र । हाय गवाये आपने क्यों ... मि.नि गनको शिकार करि विरति भयो सो : गा तो तुगत गहि मेराग अबाध ॥ वेग जाय मावलाय । गोज्यानपथपरमपद लह्यो . : HTR। गाका गमकिता चारनी कोस नाम अभि- 12चाधिदलायेगा नामसभा पाहिं नकारावधाकर यांनकल दियो : ; नरामा निशाना भार कीया दिममा जान निर्सि नतिपचिपहिवाहिय हित , नताबीची विदित या कल बड़ीन बात। होबटन कामादिक जिनानामनि यह गजा य'ज.नट के माय हब भवाहपंजाय महा। माय । वारि पई पनि सूत्र :: हार. मुक्ति धनभद्र पग्लोक । इसे 'न अमोद प्रभवनियंभवजसोभत्र --:-.-नागलवल पन ॥ थूलभद्र कामय प्रभाबिक गतिजिहि एला 1 . . ।" का . - 1. H * कमा० । ६७ ह पुन्य विवेक । हन्तिर बजे बरी जिन वासिष्ट सुगोतातिनको पत्र संहर छु जहा नियन्या हेत ॥ इक दिन तुरी उजैन में एहदि गोचरीहताशिय गये तिनके तहांकिजन हेतनिकेत। लरिख भोजन मिटान्न तह रंक एक लगिसाथ।नायो उत्तमजीव तिहिं जान्यो पुरु लखि हाथ ।। रटीर पाएंड कौ तिहिं दियो भो जन प्रति भरपर । खोय करि करि वमन सो मत्यो कट लहि भर ।। मरि फिर जनभ्यो नृपतिघर जातिसुभरह लोय । गुरुसों माखो विनय त अन्या दीजै जोय॥ सोई हो साथे धरौं इक चारित नहिं हाय । सुनि गुरु ताके हेत जिन धर्म विचार्यो सोय ।। सुनि गुरु श्रावक धर्म स्म तिहिं कोनौ उपदेस । तिन नृप संपत नाम सोमा यो गुरु यादेस। सवां कोटि प्रतभाकरी सवालाख प्रासाद! जोरन उद्वारे सकल तेरह से अवि खाद ।। करो दान साला विपुल मिति सत सात सुधार। कर छुड़ायसवं देस के सुखी किये नरनार ।। स्वस्थित और सुवृत्त वुध हस्तिसूर शिए दोध । कोटिक गछ काकंद पर वासी जानौ सोय ।। तिनके शिज्य सु इन्द्रदिन गोतम गोती जान । तिनहूंके पुनि सिंघगिर गोतम गोत निधान ।। तिनहूं के पुनि शिप भये वइर गोतमी गोत। तिनको कछु विस्तार करि कहाँ विवस्था पोत ॥ धनगिर इक विवहारिया तासु सुनंदा तीव। तासुगर्ममैं चवि बस्योतिर्यक जमल जीव ॥ धनगिर साधतंजोग त चारित लीनौ जायापार तिनके सुत भयो जननी को दुखदाच ॥ इज टिन धनगिर निज घरैकरन गोचरी माय । तियसुत दुखत लखि कह्यो यह आपनी बलाय ॥ लेहु मोहि दुख देत अति रोय रोय दिन रात । प्रांति लगी नं छमास ते जागत भयो प्रभात ॥ जहां गये तुम शायतह याहू को लेजाये । यह कहि झोली में दियो सुअन हलो लाय ॥ लैआये गुरु निकट तिहिं गुरु भाप्यो हो जोय । सचित अचित जोई मिल जाय विहरियोसोय ॥ सार सामुह सिंघगिरि १३ ... कमा। इन । मानल गप नानि निहिं रिकह्यो गर- नननन नहि एक आविताहाय । गरु दोनों नयनिग्यो 'जयकेवाय॥तहां पालने माहिं तिन सनि ससस । बहन मानवी वदन त सीडयो गयो न व्यर्थ।। की बरस अब जब भई सुमिर पुनन्दा माय । खेलत लखि सुत नावन गाईघाय॥ वालक माग्यो गुर निकट गुर नहि की गोय। लाय पकारी नृपति पे सोधन गरि की जोय॥ नामनिनन गुरु गोलि सुनि सिगरी पिछली बात । कह्यो वस्तु यो या नीताकी मान॥ नाना विधि के मात तब धरे खि- या। उन पो मोना छुघो ओघा लियो उठाय ॥ नृप कामप्र गाय हारि पछताय । ले चारित गुरु तेरहो ::::कायापाठ बग्ग कोजवभयो बैर भयो तब साधा E बाहर गये अवाध ॥ पाछे सत्र मावन .: वाम देन । प्राय जान गम, गनि चहगो देन पाट If I दीनापरयो गाना गमता टिपाटगुरु- समान मालकान पर एक मुर तहं प्रायो या जाय वह गवा बाहिं एंठ पाक अबाधि॥प नवदा लिद बिहाया नशिलहि मोय। रीमि होय वई सबध बढक्री जाय ॥ रवध महानमहूं दई लई हाम' द ह । तर मंत्र दुर्गमक्ष ने लय बचाय निवाहि ॥ राउ निजानि पनि कानमन करन विचारा बनामेननिज गिन्य मामाच्या निवार ॥ रह्यामठ जिनदतटक श्रावक पाई जय । चढ़े ग्मोई नाम की लाग्ब द्रव्य जब होय ॥ मोया काल अकाल में मिले न नित इहि काज । मग्न चहत तिहिं जाय तुम बग्नी आनी बाज ॥ वनसेन मुनि गुरुवचन बलिपहुं- म्यो तिहिं देस। मिल्यो मेठ जिनदन सा भाख्या गुरु उपदेस। तिन मन में चिंतन कियो नो इहिं काल दुकाल । लह भन्न दुर: . - -- :- , कार - क. भा। के ६१ भिन न बचेंट जंजाल । नो चारित हमलेहिं यह चिंतन आई ज्वार । नाज समाज जहान बहु भारि भरिमारे द्वारा भयो सुमिनसुदेन सब सुखी भये नरनार । सोचि प्रतिग्या आपनी मन में करि निरधार ॥ चारों पुत्र कलत्र जुत सो श्रावक जिनदन। चारित र संनार तजि साध यो छदमत्त । तिनकी साग्वा चारित तीन गई विच्छेद । एकरही तिन चारिमें साखा इन्द्रसुवेद ।। वैरस्वसि बहु साध संग करिकै तप संथार । देह त्यागि गिरमूलतट लह्यो सुर्ग निरचार ।ग्रही रहे वहुवर्प अरु जती चवालिस बर्ष । नित नुरु पद पाय पुनि सुर्ग गये जुत हर्प ॥ मनपर नाईज्ञानअरू चर्बन राच सघन । गये भयेविच्छे- दये तवहीं त जगऐन॥चारि शिन्य तिनके भये तागिल पोमिल फेर । तापस और जयंत तें साखा चारि सुहेर ॥ भगवाह चारि शिर एक विर गोदासु। अग्निदत्त पनि जन्हदत सोम- दत्त पुनि जासु !! भये विर गोदास के चारि शिष्य वर फेर। चार साखतिन तेंचली इक तामलसो हेर ॥ दुतिय कोडवरसी ही पंडवर्धनातीन । दासीपव्वडिका बहुरभूतविजय गुरुपीन ॥ निके बारह शिष्य भये नंदभद्र तह एक। भद्र कह्यो उपनंद नि तीलभद्र सविवेक ॥ पांडभद जसभेद अरु सुमनिभद्रकहि र। पर्नपूल दोउभद जुत सयलमतोपुनि हेर ॥ जंबूदीह सुभद्र नि सूरभदू इहि नाम । भये वारहे। शिप्य ये इनको संख्यत- म ।। भई शियनी सात पुनि मतविजयकीऔर। थूलभद्रकी हिन हैं ते सातौ इकठोर ।। जस्खाजश्व दिनारु पुनिभूताभूत सु। सेना अरु बेना बहुर रतना सता पास ॥ थविर महा रि साधके आठ शिष्य पुनि जान । उत्तर वल सहधनढ पुनि हिति रिद्धि मन मान ॥ पनि कौडिन्नरु नाग कहि नागमित्र जान । छलुक रोह नुप्ता कहेाठी शिप्यवखान ॥ अंतरं- का नगर में थविर महागिरि अाय । तहां एक दंडी मिल्यो ना न 700 - . १ . . कमा का राजे र काल । -: मंगा - नाकामिनो तिर काठ॥ महा- . नो जान उपम जत्र विना कानन मोर मागि नौल मम जार । मृग मगार निधार । धक गहिं वादिनै में न न न । जो मानने ऐला रिणादीन ॥ राज मा नानातिरोहगन तिहि काल । जील्यो वंडो सो तहां - ' मिलान के जाल गिगाद सुयोगने कोनोग्यानपिचार । नीयको निग्तार। रोगातन तीसरी तिन :...:::ोनोलोनीकहां अमला करकन कोय। ::::":.::रिमाना मिलन लगीसो डोर ii.::किसी वादकार रोहगुप्ततिहिं ..!; माल ! जीति जाय गुरु म 11; मानो भगवन्नाके बचा :: " पर गन्य पे मोय । मालिनीमा निको नानक महतंभई चार .:: Tीडवानी जान । चंद्र - या जनमुथिविर मुहस्तके - 1 पद पनि हनित गारु साना। तभीगत नाम नितिविनितसोमबारह। क ल, सामा चार ॥ उदंवरोका, पर उतपत्रिका ताख चारि इन दो मिनि निजान । उल्लगच्छ हवामान ॥ नदिया पुनि पांचवा परि म छह बन्छ। हरि गीत ने चारन नामा गच्छ॥ . , M . , . . - . - 77 रन . . +-- ::. नाना क H क०मा० । १०१ ॥ ॥ प्रकटे तात सात कुल साखा चारि प्रतच्छ । पविर भद्रजस ते कन्यो उड़बाइक लभ गच्छ ॥ साख चारि अरु तीन कुल ताके प्रकटे फेराएक भदजत नाम कुल मनगुप्त पुनि हेर ॥ तोजी है जसभद्रपुनि चारण साखाजान । चंपचान इजिकाकाकंदिका प्रमान ॥ मिहिलजिका बौथो कहा अब कामका तासु । गच्छ वेस वाटिक कन्यो चारि चारि पुनि जासु॥ सारखा अम कुल नीपजे सावस्थिक तहं एक। राज पालका दूसरी अंतरंजिका टेक॥ चौथो खेमम लियका एकगणित कुल फेर । मेहक कामईक बहुर इन्द्रमुरग पुनि हेर । ईसगुप्त तें पुनि भयो वरमा नवगन गच्छ । चार साख कुलतीन पुनितिन के भये प्रतच्छ । कास वर्तिका गोतमी वातिस्थित एतीन ॥ सारखा चौथो सोरठी सुनि कुल तीन प्रवीन ऋपिगुप्तरु ऋपि दत्त पुनि अभिजयंत कुल स्वच्छ। सुस्थित सुप्रति बुद्ध ते भयो कोटि गन गच्छ । चारि साख कुल चारि पुनि तातेप्रगटेजाना उच्च नागरी एक अरु विद्याधरी बखान । तीजीवच्ची मध्यमा चौधो साखा जान ! ब्रह्मन एक दशल्य वानिज तीजो जान॥ प्रश्र वाहना तासुझौ चौथो कुल पहिचान । येई चार्यो साख अरु चारों कुल परमाल ।। अरु सुस्थित प्रतिवद्ध केपांचमुशिप्य सुचाल । इन्द्र दिन्न प्रियग्रंथ अरु विद्याधर गोपाल दत्त ऋषिदत्तये पांचो शिय सुचालाविद्याधर ते साखपुनि विद्याधरी विसाल ॥ इन्द्रदिन्न के शियदिन तिनशिपपुनिदोय। संतसेन अरु सीहरिग संततेन सोय उच्चनागरी नाम तहं साखा निकसी जान । संतसेन हूं तें भये चारि शिन्य पहिचान।आज सेनता पद्म अरु थविर कुबेर बखान । ऋषिपाली चाये यहीसा खाचारित्रमान ॥ इनहींचारानारहमतलाखाचाग्विखानाथविर सोहगिर केभये धनगिरि शिष्य प्रधान वर स्वामि दृजे भये सुमतिसूर पुनि जान । और अरहदिन सुमति पुनिगोतन गीतो ।
। क० मा० । == गिरतापम भये तिन ने निकसो साख । ब्रह्मदीप महिं जाकी जग में सास ॥ जयदीपत्रासी तहां ता- समायाक । पानी पर गति जासु को ऐमो देखि विसेक । र लंक श्रावक मकल भए तासु के दास । एकरन श्रावक को गयो मुर्मान गुरु पास ॥ तापस की करनीकही गुरु सुनि को सुनाय । नहीं तपस्या शक्तियह लेपशक्ति सुनि भाय ॥ मनापम को भयो कपट शिष्य घर ल्याय। चरनोदकताको गीय वारि ने पाय॥ पुनि जल पर चालन कह्यो तपसिहि पनामा पेठिबार बूदन लग्यो करगहि लियो बचाय ॥ -: प्राय के उतरन चात्यो वार ।नदी फाटि :::.: पार त पार॥ऐमो अचरज देखिसब भये ': । तापप गो थल तज भज्यो भयो भरि भय .: मानक और पनि तीनशिप्य त्रय साख । वजन 1.:, "मारन ग्य गम माग्न ॥ आरजग्थ के पूगिर छ । निक शिला शिस्य पनि तिनकं नागल नभनिनवानववान । तिनहुंके कालिक किमान कति त भन पनि तिनके सेवक ये तिनके हस्त मागह ॥ तिनकं धर्मरु का माना नाम नभय गोतम गीतांजाना। 2-2 कारक गो-नमगीत । गौतम गाँतीसी ::: वाहन तर प्रधत्रिय जंबनंदमुत्री- = देवंद्र च यो उनम जय ॥ कमा मननि 17: वन्नान । वा गोला थिरपत धर्म ::: | वटा महान जिन गायी जान बिछेद । के कग टन तन मन बंद ॥ पनि साखाविद्या कई नाम को गिन्यनि सिंहमनमविवेका भयकाका नियंत्रव मंक कल्यान । जिनपर बोधेबोध - । 1:25/- སད་ क. भा०। १०३ दैविक्रम नृपति सुजान ।। महावीर तैं चारसै सत्तर बरसबिती- ता भये भये ते विरजिन लहीजनमकी जोत ॥ वरसपांचसे अरु असी पांच औरहूसोय । विक्रम तैं हरिभद्र मुनि सूर भये पुनिजोय ॥ फेर शिप्य तिनके भये हंस और परहंस। जैनागम गुरु तें सवे पढ़े जोग परसंस॥ पुनि छल करिके भेष घुरिबोधु न की तिहिंकाल । जाय देस तिनके पड़ी तिनकी विद्याहाला सो वोधन जान्यो कपट लहि भाजे तजि देस । मग मेंपा आय उन मारे करि निःसेस ।। गुरु सुनि कोपे कोपि पुनिकीनी छमा छमाल । मानतुंग आचार्ज पुनि प्रगटे तेही काल ॥ जिन भक्ता मर तवन वरकर्यो हर्योअग्यान । बरसाठसैतवगये विक्रम नपतें जान ॥ पादलिप्त आचार्जहूं भये तिही दिन अाघ । पगलेपन करि करत जे तीरथ पंच वनाय ।। तीन कालकाचार्ज पुनि भये थविर गन नांह ।प्रथक प्रथक तिनको कथा सुनिये अति दुति शंह ॥ प्रथम कालिका चार्य के शिष्य प्रमादी होया गुरु अग्या मानी नहीं गुरु तजि गये विगोय ॥ आन देस में शिष्य इक सागर चन्द्र सुजान। तहां गये गुरु तिनहु नहिंजाने गुरु पहिचान ।। वाद कियो करि हारि पुनि जान्यो वड़ो प्रभाव। पाछे तैं सब शिष्य तहं पहुंचे ढूंढ़त पाव । तव उनहूंपहिचानिक सब मिलि पकरे पाय । चक आपनी मानिकै लीनेदोपखिमाय॥ एक समै सुरपति सुन्यो सीमंधर उपदेस । सुनि पूछ्यो ऐसो कोऊ सुग्य भरत थल देस ॥ दियो कालिकाचार्य तव श्रीमंधर बतलाय । इन्दूरद्ध वपु धरि तहां पहु च्यो करि चित चाय ।। प्राय पूछि संदेह सब पाय यथारथ ज्वाव । मुदित होयानन्द पति ओपी अानन आव ॥ पुनि पछी निज आरवल सुरपति हाथ दिखाय । बैसागर कीजानि कहि सुरपति दियो वताय । उब सुरपति निजरूप धरि प्रगट होय गुरु पास । मांगि सीख वह तँ गयो अपने सुर पुर बास ।। महाबीर जिननाय ते सवा;
. . + 7 मा० । ---नानि जगम भयो गहर्प ॥ --------- -- दीगो शान । वैरिसिंघ नर- ::--:--निभाना नाकी गा कानिकलींगरसता करमाशो एक दिन तन खेलन नागान। ::-:--:- दिगो उपननों मिश्राम ।तरु छाया तर - ना माग करत बग्नान तहां सुने गुणकर. न। गाय किन चारित निधी निमान ॥ : -- गोकानार चारित्र । कंगारे जा यो जोग ::नत्र विक्रम करि बिहरन गयो गगे उजनी :: THE राज करे कवि काहि ॥ गई सुर- .iन नरपति ः। म तिहिं देखाप . if घरगति ना बाहर गईन .15 द ग्याT | गफ मन ..': 'a', 'मयामिकमारदेशिय गिर के गये गानी नृप के '..: न गिरताका सानी ....... रियो कप में गल तहां १. :.-": करि गक्र नहीं वान बान मा मंड वान ।। बांधि ।। नृग मनि मकीनी भर । विप्लमान सनगान जानकार नृप पे कोप्यो , र उग्थ्यो नन्नाह ॥ सोच नामबारद । माह लिख्या सोसव होमन अपनी मिरदगि के त्यागिदेहि यह मानना हा गनि ग्रह यह संदेस ॥ धी-isi मान्य मा यी नंकन कर मंकाच । रजनी राज तुहिक दे ले कति मोच ।। यह कहि जोरि अनीक गुरु चढ़े नृपहिया 7 1 . -- १०५ क० भाः । लंसंग। मारग में ग्रीपम बदलि बरखा कोनो रंग ॥ घरपरसाही घन भये अर बरसाह मेह । घर दर साह पथिक हग करिसर साह नेह॥ घिरेघुमड़िधन घोर घर रैन बोस को ग्यान ।कुनु दकमल त पाइयत के चकवो चकवान ॥ झकिझपकि अमर घरी लपकि लपकिलपि वीज । टपकि टपाक ओली करैपकि छपकि मग भीज ॥ दंपति अंक निसंक भरि लूटत धनज्या रंक । माननि तज्यो अतंक अरु मारग छायो पंक॥मारग रित अवरोध ते नृपति रहे तहं छाय। भई छावनी कटक की रितु सुहावनी पाय ।। चतुरमास वीत्यौ जवै सरद भागनन आय । अमल अम्भआकाश हवै मारग दियो वताय ॥ तऊकटक विन धन नहीं चल्यो रह्यो तहं आया तव कालिक गुरु जान यह कीनी पीन उपाय । करि सुदृष्ट की दृष्ट तैं सव इटका पजाया करि दीने सुवरन मई छई रिद निधि आय॥ साजि वाज गज राज वर संगर साजि निनाद । जुरे जंग दुहुं ओर तेरे न ससर विवाद ॥ मची घुमडियमसान अति वची नएको मार। तोप तीर तरवार के वार भये तनपार ॥ रुधिर नदिन के परत भरे कूप सर कुंड । जामें जलचर ज्या जगे रुंड झुंडगज सुड।। भाज्यौ गईभसन भजि गही कोटिको वोट। परन लगीता कोट पर सकल कटक की चोट ॥ साधी विद्या गर्दभी गईभ सेन बनाय । सो लखिलीनी ग्यानवल गुरुस्वामी सुखदाय ॥ बोलि एकसौ आठ भट सक्दवेध जिहिं साख । रहो धातकरि सकल मिलि यों तिनसी गुरु भाख ।। कयो जवै सो गईभी सवद करें मुख फार । सब मिलि त्यागौ वान तुम सवद रोध अनुसार ॥ त्योंही कीनौ सवन मिलि गई गद्द भी भाग । गमनृप मुख पकियो गधीमूत्र मल त्याग ।। वांधिलियो गईभ नृपति दुर्ग तोरि तिहिं काल । जीव दयापुनिपालितिहिंदीनो देशनिकाल।। रु साखी नृप को दियो नगर उजेनी राज । सरसुतिबहिनहि १४ क. मा.॥ 28 नतिजामा उनि गज॥ दुनियकालिका चार्जको कयों । प्रालिका नार्ज गनकाहिबे को गबदावा 'चात कमरिजरत निहार। आगे भरवन नगा -::न मित्र मिग्वार ॥ सो गुरु को भरनेज गरु बाल कान। गरु गागममहिमा महतकियो मान सनमान।। - नया कर रु नरन रास्ते भर चोमास । पै ताकें विहर नीने सरु नरम उदास ॥ तातें नृप दुख पाय निज प्रोहित -नमय । तासा सब मन की कया दीनी विथा सनाय ॥ न माग गी कहतो सब आवक बुलाय । देहु विनिधि 2. गनि नर बिहर जाय ॥ त्योंहीं कीनी नृप सकल ....: भोजन नाना भांति के दीने तिनहिं जातोला .:. शिम राव नित पिलरें सब जाय । नानाविधि ...राव गावं वाय ॥ तब गुरु पूछो नित्य प्रति कोन कातिनकात घर कोनकं शियन कन्यो निदान ॥ :: प्रभु आज पछि गव बान । प्राय निबंद -:मी मान ।। वृज दिन मियन गक्ल पको कल्या पाच एक मा सफल मुन्यो शांत प्रभु " अचिन रम्या विनुही भाग्ने गाय । थल 'एर पठान है जाय ॥ जहं सालवाहन की बाम । भयो पलमन पर्व मित पंचमि चांद नहीं नाही दिन विवहार । सो :: नमक कौन विचार ॥ पोस करी तो नाम । कग रह नहिं पोस विधि करा ' टहोमपंचनो कटका पोसहि धार। रही 7::" अग्या व निग्धार ॥नय भावो गुरु हायनहि बदर करिय। अधिक पंचमी दिवस ते पर्व पजू - मन माय ।। नव नृप भावी होय नो अग्या प्रभु की आज । 14 ..
क०भा०। १०७ चौथ युतिय पोसह करों कालि महोछौसाज ॥ यह सुनिगुरु राजी भये दीनी अख्या मानाथापी ताही दिवसात चौथ पज- सन जान ॥तात ऊन दस सौ बरस महाबोर तें जोय। बीत प्रगटे कालिका चारज जग में सोय ॥ भई आठवीं वाचना संपू रन यह जान । समाचारिकी वाचना नवमी सुनो निदान॥ अथ नवमी वाचना॥ कहियत नवमी वाचना अब सब सो सुनि येह। साध समा चारी सकल अट्ठाइस गनि लेह ॥खानपान संचार अरु रहनि चहनि दे नदि । अनुचित उचित विचार सो नेते विवहारादि । चतुरमास बरसात में क्रिया विवेक विचार । सदाचार जे साध के समाचार निरधार ॥ वरषा रितु आरंभ मैं छाड़ि सकल प्रारंभ। चारि मास के नेम गहि साध अलोभ अदंभ ॥ रहे एक थल माहिं को मिति अहार विवहार । सो थल तिनके हित सजे ग्रहवासी साचार । स्वच्छ सुद्ध मृदु भूमि करि लोपि पोति धव- लाय । छात छौनि त्रिन छान करि छाय विछौनि विचाय ।। नाल प्रनालन की निपट सुचि करि गच ढरवाय। साध साधी की ग्रही ऐसें थल पधराय॥ रहे साध तिहि स्वच्छ थल भर चौमासाशय। सुमन सुवच सुभ कर्मको स्वच्छ सुसोल सुभाया तहां प्रथम इक मास पर जब वीतै दिन बीस। भादों तुला पंचमी सकल तिथन मनि सीस ॥ असाढी पन्यों हित दिन पचासा जोय । बढ़े न तामें एक दिन घट तो घटती होय ॥ ता दिन पर्व पजूसना महावीरजिन कोन। गोतमादि गनधन त्याहीं कियो प्रवीन ॥ त्या शिप्यन आचारजन विरन मिलि सर्व । उपाध्याय कीनौ करें त्यों हमहूं सो पर्व ।। अथ जी समा चारी॥ औषध अरु आहार हित गमनागमन विचार । सब दिन हाई कोस मिति साधन का संचार ।। पेनिस अपने ठीरहीयाय हूँ 2011
० मा ।
को मारमा जनमिमि रहन होत साथ काबाधा
पर नाजियसमानारी।
कर जोननी जल सन काल प्रवाह। साध गमन
गनु नत नवगाह। होय जानु ते हेठ जल
'- गोय। नागगडगमग मांहिं जिम अध उरब
- में जो जन चलि सके सधो पाय उठाय । अल्प
मात्र मा जान सके तो जाय ॥
गय चतुर्थ समाचारी॥
जाद कजवको दोय भांति के साध । तिनसागुरु जिहि
निविवाद उपाध ॥ ग्लान साध आहार ग्ररु
..." : आग॥ अथवा निज-माहार हित विहरैग्रहपति
पर नाकई घटनर चहै न सोय। लेनदेन
TE बचानत होया ग्लान साध निज हित
या। गुरु निदेशक तनकह न्यूनाधिक
.
+--
..
जगपंचम मगाचारी॥
-7-7 अमाघतिन्हें इहि काल । चम्पा में
दु
म बच पाल ।। दृधदही नवनीत घृत तिल
मद नाम । माघ ग्वान में उचित नहिं जा ला तन
7 !
अाथ छठी ममाचारी॥
कान दुखी हित नावनो ग्रही गेह चलि जाय । लेडतितोई
है गमो अरु जो वाय ॥नदापि नही दे अधिक अरु कहै
जर तुम लेहु । उबर तो तुम बिहरियो अथवा औरन देहु ॥
तक उक्त नहिं माध का लेनाअधिक अहार । ग्लान साहि-
नहं न ले बिना कह ग्रहार ।।
१०६ ॥ क. भा० । अथ सातवीं समाचारी॥ थविर कल्पिश्रावक सुखद साध सेव परवीन । चौरासीगर तासमें भेद न माने दीन ।। सब साधन सायों कहै जो चाही सो लेहु । तदपि अनलखी वस्तुको कहै न तिनसा देहु ॥ अति उदार दातार घर जो न होय सो वस्त । कट होय दोवो चहे जिंहकिंह भांति ग्रहस्त ॥पै जो अनदेखोचहैवस्तु कृपनपैजाय । तौ कछु तसौ दोष नहिं जैसौ कह्यो सुनाय॥ अथ आठवीं समाचारी॥ प्रति दिन लेत अहार जो साथ निरन्तर कोय । एकै वार ग्रहस्त घरकरै गोचरी सोय ।। पाधातपी अचार जरु ग्लानवाल हित जोय । ग्रही गेह है वारई जाय न अनुचित होय ॥ व्रतो इकंतर जो जतीताहिगोचरी हेत । अनुचित नहिं द्वैवार जोजाय ग्रही ग्रह खेत ।। एक विहरन मांहिं सोजो जानै संतोप । घोय पोंछि के पात्र फिर चहै न जाचन दोष ॥ नाहीं तोते पात्र सब अन धोये ही फेर । लैग्रहस्त घर जायकैजादूजीवेर। उपास साधन करै जे पारन दिन सोय । दोय वेर जाचे तऊ अनुचित तिन्हें न होय ॥ साधक तीन उपास के ग्रही गेह त्रय वार। जाचे तौ अनुचित नही एही क्रम निरधार॥ पांच सात दिन पारख केवास करें जे कोया तिन्हें नमनहिंजव चहै चहँ ग्रही घरसोय।। प मद माया कोप अरु लोभ मान तजि साध । प्रही गेह में गोचरी विधवत करें अवाध ॥ अथ नवमीं समाचारी॥ नित मितभोजी साधकों सब विधि को जो वार। विधवत ले अनुचित नहीं योभाख्यौ निरधार। एकंतर वासी जती त्रय विधि को जल लेय । कर धोवन अरु पात्र को भात मांड़ पुनि जेय ॥ तिल तुस जब धोवन सलिल तीन भांति कोजोय । दो- पासीसाध को उचित कहावै सोयातीन उपासी साधकांतीन । कर मा० । भकर । कांजी मांडकाउन्नजल पीचि विचार ।। नक्ता कर नहाल साध । दिनहू को केवल उचित अनेक वाच ॥ मन निकनई हिना जलतोन उवालि उवा 'रतिहिनि पनि स्व पात्र वालि अधिक ना करीतमित जल ग्रेसोजोय। साथ यमौ नियमी व्रती नसाचे सोय॥ अथ दसमी समाचारी॥ हो जनी के पात्र में दे प्रहार निहिं काल : कोर गिर कदान नाम तो हाल ॥ ऐर, जोली पात्र । टटेनहि कार।एक नदना घंटक सो जल दात विचार ॥ भोजन १. :का नेग कर नित गाघ । चार पांच अधिक # ! ... प्रवाच ॥ नेग को तेतो च. न्यून अधिक मोगाव फिर जाय न जाचन सोय ॥ अय ग्यारही गमाचारी। '.. काजमं जहां मिले नग्नागि। भीउहाय बटनामविचार॥मोमबपासालने सातमदन :-:यहांना लिहि मदन उचित नमानांहि ॥ अमबारी समाचार्ग। 'बाप' का पातरी माध मह के मांहि । उचित -:. उन ग्रही गहन जहि ॥ गानांतर अथवा तहां विहानमम प्रहार। ना बग्मे बरमान महानी बड़ी फुहार ।। कब कब का हाथ मा दापि अहार छिपाय । कानि छात छित महतराय बचाय मुखाय ॥ वर कल्पिजे पात्र घर ते गरि दम्बा स्नुि महि । कार चादर मटि ने अल्प वृष्टि में दो जाहिं ।। अही हमें पहुं चि जाबरमत खुल न मेह। नहीं नरहनी माघको उचित विना संदेह ॥ बानयान वाम तर वा अपने बल पायारह रह नहि पै तहां माथ ग्रही ग्रह छाय। in न 에
जा कदापि
र बिहाव
साध को प्रीत पूरवक सोय ॥ साध पहुंचि पहिले जितौ जो
अन सोझयो होय । सोई विहरे अरु न ले पा सोझ्यौ सोय।।
अरु जो विहरनकाल में खुलेन क्योहूं मेह । पहर पाछल जाय
के खाय तहां पुनि तेह ।। धोय पोंछिकै पात्र तव रवि रह घर
आय । रहे रहै नहिं रात तहं ग्रही गेह मैं छाय॥
अथ तेरहवीं समाचारी॥
मेह अछेह न देह जौ जान साध को आय । ग्रहीगेह तेंतो
तहां ठाढ़ी रहै सुभाय ।। एक साध इक साधवी के द्वे के इक
दोय । त्योही साधरु श्राविका मिलि नहिं ठाढ़े होय॥संगवाल
वा वालिका जऊ पांचवों होय। तऊ एक थल मिलि रहन अ.
नुचित जानौ सोय ॥ जौ वा घर के दर बहुत अरु बहु नरकी
दीठ । निकट दृद्ध रद्धा किधी तौ नहिं अनुचित डीठ॥ पै तिहि
घर निसि नहिं बसै उठावै निज गेह। सांझ समय लौं राह
लखि वरसैं मेह अछेह ।।
अथ चौदहवीं समाचारी॥
खान पान स्वादिम असन चारि भांति आहार । आन साध
हित हेतजो साधै साध विहार ।। ताकी रुचि पहिचानि के पछि
सुभाव विचार । तातें अधिक न ऊन सो विहरै साध अहार ।
अथ पन्द्रहीं समाचारी।
तनको तनके अंग सब जो जल भीजे होय । भोजन चार्यो
भांति को साधन कल्प कोय ॥ तिन मैं तन मैं सातये अंगप्राय
जहं वार । चिर थिर रहि नहिं सूकई ताको अधिक विचार ।।
कर कारेखा दोय ये नख नख सिखा सुचार । माह अधर अरु
वोठ ये सातों जल आधार ।।
अथ सोलहीं समाघरी॥
प्राननील बीजरु हरित फूल अण्डजये नेह । उत्तेजवारिष
.. . J क. मा० । गनदे।। प्रान जीव साम जिते बिंद्री तिही देह। पां. नानक ने पब मानिदेह ।नील पोत मित श्याम नम्न बरन व जोयातिनमें मछम कन्युग्राउबरेजायनसोय कारन बालनताको नजरनपावे कोय । ग्यानदीठलहि नजर --- म उचारे मोय। पात्र गादि उपगरन सब यात बार- इस हि पदलेह हरि राखे साध विचार ॥ नीलसूक या बाहो पचग जान। पडलेहे उपगरन सब जैनो समान । त्यो अन्नादिक बीजमैसवरंग मछपजीय।जानि गि गा हि लाह परलेहनकीय ॥ हरित जीवमछम नरग होय । तिनहूं ते उगरन सबन पडलहन TOP जीव सम्म सकल पचरंग हुं तिहि रीत । ..::कट पदलेहो करि प्रोत॥पुनिपिपीलिका मन मितानिनई ते पटलेहिये उपगरनादि तिते या भावभकर निवास। तिनहुं ते पडलेहिये 3. F, HIT || वाम कहे हिमकर काल योग नाटा जान मत दोग ॥ गुमत पांच जे :--- -- 'दु। मगपग धाव मांहि जो रच्छाजीव ": "करदन निहि. दया गति पिकानि । लेन :: नम आची कजानि ॥ उपनाई मेटकीपग ::यज होय के प्रेग्न कोनी धाय ।। -':--' का यो माथ उठाय अकाम । फिर भय नायो जीव विनास ॥सव मन के परनाम या पानाय । गयो पापने सदनकामवअपराध दृमरी गिन कही भाखा मुमति बखान । हिं भापत मुमति मुनानातहां एक दृष्टांत नाएर योगिय काय । माय एक निहि नगर त बाहर निकाल्यो वाया कर लोग तामा लगे पछन सुनो सुजान । . - - क०भा० ११३ या पुर में केतिक कटक हमसी कहो वखान । सुनि मन अनु- चित जानके बोलनि बोल्यो सोय । कटक सुभट पछ्यो जिनन तिनके सनमुख होय ॥ सुननहार देखत नहीं लखें सुन नहिं तेह । सुन लवं बोल नतेकहि गुप कियो अछेह ॥ जानिबावरी ताहि तब लोगन तज्यो निदान । वाक विवेकी साध की भापा समति पिशन ।। तीजी कहिये ईपणा साध भक्ति चितधार । चिनजिनके सन सहि रहै सुमतिईपणासार ॥ नंदपेन द्विज सु- वन तिन साध समागम पाय । चारित लै तप आदरयौ अमर एक तहं आय ॥ लेन परिच्छा साधकी मन मैं कपट वढाय । साध रूप अनुरूप तिन धरे देह वै चाय ॥इक रोगी बनि रहि तहां दूजहिं प्रेर्यो जाय। कहीं बात नंदपेन सौताको विथा सु- नाय॥ लो सुनि संगहार लै वन में पहुच्यौ जाय । धरित्तन- मुख मो साध के बोल्यौ विनय सुनाय॥ पूज नगर मैं आइये सेवा नी होय । उन सारखी मो पगन मग सकें चलन गति खोय।। नंदपेन सो साध तव लीनों कंध चढाय । मारग मल मत करि दीनौ ताहि न्हवाय ॥ नंदप्न मनतनकहूं मान्यो नाहि सुखेद । तन चन्दन लेप तेजान्यौ नान नभेदा धन्य भाग्पनिज जानि अरु तन पवित्र अनुमान । अमर ग्यान करि जानि धरि दिव्य रूप सुखदान ।। नंदपेन के पारपरि सवनपराध विमाय । जप्त गावत भाक्त चल्यो सुर पुर पहुज्यौ जाय ॥ चोयी सुमति नि खेवनी वधन सहत प्रतिकूल । करी साध पडलेह पैगयो समय तहां भूल ॥ जव घन से निकर्यो लर्यो रवि तव जानो चक । फिरि पडलेहन शिष्य की कह्यो पूजनै कूज्ञ ॥ शिप्यवक्र वोल्यो कहा झोली में हैं सांपि । सुनि सहि चुप रहि मौन गहि रहे अोठ मुख ढापि ॥ शिप्य गोचरी हेत जव झोली लई उठाय । दोय सांप तामै लखेरह्यौ चकित में पाय ।। करन गुरन के वचन को सांचौ सासन देव । झोली मैं अहि असित उपजाये तब ૧૩ 5. भा० । iܐ 772 संजयजय गाय के चार नार पकताय । अति दीनता कमोमिमा ॥ गा उच्चार सुपासवन सुमति ना नानीको सुमति त होय तुकिंचित होयासुर- + :- . गिभग पाना मारजाहेत । कोसो नहिं ति- निपट गवनेत ॥ नित प्रति कैसी मारजन कहा न्य । एक गुरुना करि सुनि रहे शासन सुर लहि सो- 7. लालो पात्र गुरुनच सत्य निमित्त । शिष्य देखि मा महिमां धरि चित्त ॥ पांचसुमति येई कहीं साथ गोराहें उचित ऐप्ती रहनिसहनिचहनि बरसोय ॥ अप रातरहीं रामायारी॥ ;.. लिये प्रही गेट जो जाय । विन अग्या गुरु ... IIT आय॥ दिक्षा गुरुवय गुरु बहुर विद्या विधि मा जाय अरु नहिता जाय न ": "T; गित मायके गबनानेगुरुदेव । यात तिनके 7 व बानपानापतपमकल मलमत्रा- यार माल जातितो कही काय वाटारदीगमानाग। कनय दमन न ल । आनत गमन चाहे न । गान गाय थल माहिं जो पाछे '--..:. . -- कान मत पाकरे पयान ॥ डाट हानेग कम्त। कह अनेरे साध सी ब बह भाव बन कर हम लखि हैं ::":: : अ यन्त नजि क नाय न आन उपाउ ॥ र उनीम ममाचारी॥ मानतावितिहिं माघ । ग्रहीसाधअग्या मायने नहीं अयाय वनामा पछि जाकी है सो वस्त ॥ बाई गई थप गये ताह समन्त ।। विन पडलेहें जो पडे +- . गुरु मर्म॥ ॥ 7 क० मा। ११५ खटमल ग्रादिक जोर । त्याच्या संजम नहिं पले लागे दोप अतीव ॥ यात नाहींअतिवड़े नहिं अति छोटे लेय । तखतपादि पडलेहि यै सहजे मांही जेय ।। अथ वीसवीं समाचारी॥ मल मूत्रादिक त्याग कौ चतुर सासमें साथ। नेमकर थल को तहां निसदिन मांहि अवाध । तीनतीन मंडल करे स्वच्छामि दिन देखि । तहं त्यागै मल मंत्र का साध साधवी लेख ॥ अथ इकीसरी समाचारी ।। साध साधवी मूत्रमलकफत्यागत कै काज। तीन पात्रराखै निकट अपने अपने साज ॥ अथ वाईसवीं समाचारी॥ साध शीस गोलोम के मान नराखें केस । रहें लोचकीने सदा यहीजती को भेस। जोन सतोमास प्रतिकतरै प्रति है मास । मुंडन करि छहमास प्रति करें लोच आयास ॥ छठे मास हूं जो जती सके न करने लोच । करें अवश्य पजूसना माहिं लोच तजि सोच ॥ अथ तेईसवीं समाचारी॥ रोस न राखै साध मन भबै न बोल कुबोल । क्रोध विरोध करै न कछु बाहू सी अनडोल ॥ जो जैन संजोग करि काह सो दुख पाय । रोस आन उपजै तऊ ताते लेड खिमाय ॥ बा- रहमासरु दुगुन पख दिवस तीन से साठ। कयौतुन्यौ कीन्यो जु कछु होय दोप को ठाठ ।। सो सब अवनो चक कहि सरसों ६ कर जोरि । करि निहोर सिर ढोरि के लेखिनास निज पोर।। भादों सुकला पंचमी तदनंतर जो कोय । त.ध सामाविका श्रावक जिन मतहोय ॥ तजै न मनवचकाप व विनय विचार । अनाचारि तासों कहें तनि तालविवहार में प्रद्योत तें उद्दायन नरराय । खिमत खामना की ।
-- ॥ m - 1 ' . . -: क० मा०॥ "मग का संग करि बरनो सनिये सोय। नंगापुर में होय ॥तिय ता सो पांच सो ----लोलान । हाम प्रहास बि तिहिंदईदिखाई आन| में नाहि तिनको चहै जो मोहि। बीप पंचसली -:ो निहिती तोहि ॥मह कहि चहि हगकोर ते निजयुर -नारानको विरह ता विषल सुवरननंदि सुनार ॥ बरू करि बदललाहिक पाय । चल्यो नाबढिचाय मानविकारा ।। मधिजलनिधिवट यच्छटटतटन लगी गाणाहिताशार स्वनकार हि दाव ॥ पंछोएक भारंशव नाम। ताके पग गहि रहिगयो सो ले मगच रोलीतहां उतोचोगाहेत । स्वर्ननंदि मोतिया निकेत॥हास प्रहासा तह लखीतिन हा देवी ते मनुज पहनने मंजोग न गढ ॥ जो नोपदेवनारूप । तो तोमा मोसों बनजोग । उन नाच्यो है प्रिये मकान निज थल जाय। का विमोचनापुर पहनाय ॥ तहां जाय तिन विर- :::::नह । नांगल नामा मित्र तत तिहिं बरज्यो :: टान का काम बमनकांमानी मीरव । बिरहमाल 3. 'नानी नीव ॥ सब तन वा लपेटि अरु -:-:-: । ननभर भयोमरो जारि सब देह ।। -2ी मन मनध्यान लगाय। भयो देव सुर वाय॥ इंद्रनमा में एक दिन नृत्यनाट्य 77 गोबन डाग्यो दोल॥ जदपि :: मनमानि अगिह। फिरफिग्ले डारबोगरें " कहकद नागल देव तब सब पिछली सधि वई चंदन को बनवाय॥ नीलकालतिहिं पनि मानिन। नाब चढ़ायपठायसोदई तहां सुनि - ११७ ॥ क० भा० । कान। संघ देस सौवीर नगर वोतिभय नाम निपति उदायन निकटसो प्रतिमागईललाम ॥प्रभावतीनृप तियतहांतबसोप्रति- मा पाय । लहि देवाधिप देव सोंलीनी सीस चढाय ॥ तीनकाल विध तवसकल पूजन अरचन साज । साजिभक्ति सुभ भावकरि पजैजिनवरराज ॥ रानी सांग्यो एकदिनदासीसौंसितवास । तिन देख्यो भ्रमद्दष्टि करि पंचरंग वसन सुपास ॥ तबरानीनिजत्राउ कोजानिधेत अनियास। चारितलेवौधारि चितगईन्पतिकपास ॥ नृपति कही तेरौ तहां हाहै देवीरूप । मम सहाय कीजो सु- कहि आज्ञा दीनी भूप ।। तब तिन चारित पालपुनि मरिघरि देवीरूप । नृपन जतिन तपसीन को वोधन लगीअनूप ।। कुबजा दासी पुनि करे ता प्रतिमा को सेव । तहां देस गंधार तश्रावक प्रायोएवा दुखी पर्योसो आइकैहोन्हीं कुवजासेव । हर्वे अरोग गुटिका दए हुदै दासी कोएव ॥ एक भखै तो नारि कौहायकुरूप सरूप । दूजे इष्ट अभिष्ट तिहिं मिले अदोप अनूप ।। यह कहितो श्रावक गयो दै गुटिका निज देस। तानैं दासी खाय इक भई कनकरंग भेस ॥ ता दिन तैं ताकौपड्यो सुवरन गुटिका नाम । नृपति चण्डिप्रद्योतपुनि चितौं चिन्ति सुवाम । । दूजो गुटिकाहूं भख्यौ मन मैं होय सकाम। आयो चढ़ि गज अनल गिर सोनप ललित ललाम॥दासो की प्रतिमा सहित गयो लेय निजदेस। दूजी प्रतिमा धरि तहां चण्डप्रचोत नरेस ॥ नृपति उदायन जानि सो कोपि सेनलै संग । चढ्यो लड्यो पर तै बढ्यो रढ्यो क्रोधअंग पंग ॥ उततेचण्डप्रद्योत नृप चढि धरि धायो आय । मारग में सन्मुख दुहूं मिले परस्पर धाय ॥ मच्यो जुद्ध अति घोर करि सोर सुभट दुहुँ ओर। लरे मरे पै नहिं मुरे जुरे जंग करि जोर ।। अंत उदायन लही सही पराजय आनि । जीवत लीनी बांधि नृप चंडयोत वलवान ॥ प्रतिमा लोप भई वहां शिवाय देस । मगमैं वरपा काल के रितु को भयोप्रवेत निव- ॥
- १८ क०मा०॥ नीटकिनकि निहिं टोर। जसकर लकसरपरिगयो योतिौर ॥ नहीं पजसन पर्व नपचाहो करन पास। मानदेन नमन गयो लोगनगडन्नपपास ॥उन विचसंकाभी- किती जनन सो नान । मह जोनों साज तभले भखान माना जामनमूनिम्न निहि साधर्गीजान। खिमतसामना मदमन कर कोनी तजि मान ॥ मग निगढ़ कुद्रायतिहिं भखन कमन पिन्हाय। नव निधि रिधि सिधिसंग दीनौ देस पठाय ॥ कमाविका साथसाधवी जोयाछांडिकपटमिल परसपर सामान गोय॥ गुरुजन त शिष्यप्रति दोप खिमा जान। मा सुनिलीजै कान ॥ सोको संबीनगरि जह :: भागमानववार पाये तहां चढिनिज मलबिमान ॥ वदना गुगग साधवी सार ।जे जिनवानी सुनि आपगधार ॥ तंवसर निज थलगये प्रथम सांझ • "faiमिनाका हरि गहिरही तहं जोय ॥ गईगे- Pारही नाम न माय । मृगावती हूं चेति पुनि गई -- बायोमीकोनी नत रही तहां चितलाय । - ::पक कालीनी ग्वारि विमाय ॥ तातंतत -- .: 7:या नरमान । सम्यो चन्दनानिकट अहि -'.-:'-पान का निवारन ताहि तब पछयोचंद- कान किट कमी भयानक व्या ल॥ --- पश्यों कान विधि दीठ । भाख्यो केवल कयों पायो मोट। दोपारीएन तुम कियो बिना मायामह कह निज चक कर जोरि खिमायो । प्राय परम पदयह केवलग्यान । सुनि चन्दना निहलय निदान ॥ में की जे मुह मन खिमत करकट युट नदि राम्विये ज्यां गुरुणिय कुमार पुलिंग माय को बाल शिन्य इक जाय । नित फोडे घट . . 1 - -
क० मा०॥
११६
तासुकेकुंभकार दुखपाय ॥वरजै तरजे तासुकीपनहिंहारे सोया
नित्त रिखमा दोप पुनि नित अपराधीहोय ॥ ऐसो कपटरिखमा-
यवो कोन कामको होय। सासु जमाई ज्यों कियो त्या मिलि
कीज सोय ॥ इक तिय विधवा लोभिनी कृपनि वडीधनवंतातिहिं
संतत एकसुता व्याही सुंदरकंत॥ जमीजमाई निधिनसो कृपन
जमाई हेत। तनक लेसहूं देयनहिं वडीप्रकतकोप्रेत ॥लोगन
बहु
दोपी तवे एक दिना धरिधीर । आमंत्र्योजमायहै जानि
जमाई वीर । पीर खांड तिहिं परसि पुनिघीउ तनकसौडारि ।
आप गई कछु काजको तिन लोनी सबढारि॥ आयसासदुखपाय
रखि वैठी जैवन संग । आपअपने मनसेदुहूंभरेकपट रसरंग।
सासकहे जामात सौ बलिमो वेटी हेत। कबहुंबसनभूपनन तुम
लायेकरि हितहेत ॥ कहत जात यों वात अरु बैंचे घृतनिज
गोर । वहऊ ऐसी वातकहि निज दिस लेय बहोर ॥ तुम काहू
तिहिवार मैं मोहितन्यौतौ माय । यो कहि बँ, दुऊघतनिज
निज कहि दिस चाय ॥ जामाता तव समझिके लीनै दोप
खिमाय । भलियाालयाकहि दयो सिगरो घीव मिलायाखीर
खांड घृत एक करि थाली सुकर उठायागयो पीय मुंह तकिरही
सास हिये पछिताय ॥ ऐसें जिहिकिहि भांति करि कपट छांडि
तजि क्रोध । अलियागलिया करि तजे कै तब कूड विरोध ॥
चौवीसवीं समाचारी
ही गुरुदेव ते शिष्य खिमावै दोष । थविर साध संसाध
ही लेय सतोष ॥ षिमै षिमावै और सी करै न क्रोध
सहै उपसमै सवन सौं जिनवरवचन प्रबोध ।।
पचीसवीं समाचारी॥
काल पोसालनिज पूजै करि पडलेह । दोयगार पने
य साध के गेह ।।
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. 16 - ० मा० । गनी समानारी ॥ कामनन जोमाहिहोयजसर। ग्रानजातीति -- नयनकट के दरबाकि कदानित साधमोतप कार मग में गिर सोधि साधसोलेहा। सत्ताउगनी ममाचारी। विगाकार तदहोत जोसाय। जाय थाननजिवधि -: न पन पवाच ॥ तहां जाय या बहुर अपने हीथल ।नगन मगम रहें हवानरहें निसबर ।। पठारावी सगाचारी॥ नाहीं रानावरातिनमांह । जे विचार आचारसत्र '......॥रात्र जिनवर वचन जिहि विधि कियो .. | IT पावर औरको निनाद करावे जान । दुहं लोक ..:.मावर अपार । अंत मुक्ति तदभव लह करेसुन वाजे मधव अधिक मानत नाह। करम बध ....... महिती छानबर श्रीश्रमनमहा- वर्ग हागिरीमा मुसंत ॥माध प्रावतीचा माय गमा गभ मजितहां 17 गान पर्व के मरताके आचार। महा- '- भाव किनार॥ कर कमात्र रचना॥ जबरमनियंकर मार। महावीर भगवंत ':- 'दाधिक ॥ विन पायो निरवान पद तब है ---- । नबनमानी वरमनवमय बितीत निदान ॥ भयो कद बह कर पसूत्र मा जान । बग्म पांचसे दश तक 7नमानी मंदत डावयाज लाविक्रमनृप अवनीस म रहन बग्म अनापरग्रहतीसः॥ दोयमहस अरुतीन में अट बग्न पम्मान। महावीर्गनरबान तभयो आजलाजान क० मा० । १२५ लपसूत्र को कल यह प्राकृत वानी मांह । लोक अस्कृत ताहिपड़ियाहूं समननांह ।। तैसीटीक्षा संस्कृतभई नसमझन जोग । अरुणनेकताएर करे टम्वा जिनजन लोग ॥ एकदेस की भाप सो गुरजर देसी जान । आनदेसके जनतिन्हें समभि न सकें निदान ॥ यातं यह मापा करी जिहिं सव देसीलोग सुखसा सव समझे पढ़ें व. पुन्य सुख भोग ॥ ऐसी मतिउर प्रानि श्री जिनजन कुल परसंस।गोत गोरखरू जैनमत ओस वंस अवतंस ।। समाचंद नरराय के अमरचंद वरराय। तिन के सुत दुलच्दन्डए डालचंद सुखदाय ।। सुघराईके रघर अरु सोहद सुहृद सूवान। सुभसौभाग्य सुभाग्य अरु सुठ सौजन्य सुजान्॥ गुनगाहक गूनवान पै निर्गुनस्यानिधान। समीदमी नियमी चमी हमी तमी अलमानादानदसनमानद सुखद आन दयानद पीन । नरमानद मैं मगन मन परमानंद लयलीन ॥ तिन जिनजन सुखहेत अरु धर्म उयोत विचाराको रायचंदहि चतुर उपकारी सत धार ॥ कलपसूत्र कलिकलपतरु भापा टीका ते । सो अनुसरि जिनयशवचन सिर धरलई सहेत ॥ निज मति अनुमित करि रच्यो बच्यो न एकप्रकार । सौ क- छु समझौ सुन्यौ पढ्यो चब्यो चितसार । जिन आगम सरमग्य जे सद्गुन सुद्ध सुजान । करत बीनती दीन हवे तिनसी हो अनजान ॥ न्यूनाधिकगुनदोपजो पड़े पढ़तकहुं दीठ। लीजै चूक सुधारि घरि हियै न हाँसय ईठ ॥ हाँ न हैंकवि और मुहि कविता को नहिंजोस । यह लहिक की कृपा जे जन्मन सम सोम ॥ संवत ठारह सै वरस सरसञ्चार अड़तीस । विक्रमन्टप वीभई टीकाप्रशघीस ॥ तचांदनेपासकी सुभ नौमी अभिराम। पुप्य खत त जोगवर मंगलवारललाम ॥ , जनम सपारसपरसथल परीवनारस नाम । जन्मभमि यानध - .
11. -- -:: : ----- नाग जिल, मुक्तपदांह ॥ -::----- हल । जाके जिन । महावीर वर जस जहां सुर ----। माता सरस सुस्त शांति रसभा " हलममाप्य जिहि नाम । ता तर 7:- मन विभामा भवतापांराप दुसह दु जिन ऐसी छांह के माहि रहेसुरत इति। fo.in अपग्यान मकाम लाएनज में छप- नियात्रा १.00 --- : 7:27बहकी इस छापेवाने