Prakrit Bharati Academy, Jaipur

Prakritanand Granthank-10

Pt.raghunathkavi · 2010/08

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राजस्थान पुरातन ग्रन्थमाला
राजस्थान राज्य द्वारा प्रकाशित
सामान्यतः अखिल भारतीय तथा विशेषत: राजस्थानदेशीय. पुरातनकालीन
संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश, राजस्थानी, हिन्दी आदि भाषानिबद्ध
विविध वाङ्मयप्रकाशिनी विशिष्ट ग्रन्थावलि
प्रधान सम्पादक
पद्मश्री जिनविजय मुनि, पुरातत्त्वाचार्य
सम्मान्य संचालक, राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान, जोधपुर
प्रॉनरेरि मेम्बर ऑफ जर्मन ओरिएन्टल सोसाइटी, जर्मनी;
निवृत्त सम्मान्य नियामक ( ऑनरेरि डायरेक्टर ),
भारतीय विद्याभवन, वम्बई; प्रधान सम्पादक,
सिंघी जैन ग्रन्थमाला, इत्यादि
ग्रन्थाङ्क १०
पण्डित रघुनाथकवि विरचित
प्राकृतानन्द
प्रकाशक
राजस्थान राज्याज्ञानुसार
सञ्चालक, राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान
जोधपुर ( राजस्थान )

पण्डित रघुनाथकवि विरचित
प्राकृतानन्द
सम्पादक
पुरातत्त्वाचार्य मुनि जिनविजय
प्रकाशनकर्ता
राजस्थान राज्याज्ञानुसार
सञ्चालक, राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान
जोधपुर ( राजस्थान )
विक्रमाव्द २०१८
भारतराष्ट्रीय शकाव्द १८८३
प्रथमावृत्ति ७५०
ख्रिस्ताव्द १९६२
मुद्रक- निर्णयसागर प्रेस, वम्बई
मुख पृष्ठ आदि के मुद्रक-श्री हरिप्रसाद पारीक, साधना प्रेस, जोधपुर
छूल्य ४.२५

Parmare...
राजस्थान पुरातन ग्रन्थमाला
..
प्रधान सम्पादक
पद्मश्री मुनि जिनविजय, पुरातत्वाचार्य
द्वारा सम्पादित ग्रन्थ
१ त्रिपुराभारतो लघुस्तव - कर्ता-सिद्ध सारस्वत श्री लघुपण्डित
२ कर्णामृतप्रपा - कर्ता-महाकवि ठक्कुर सोमेश्वर
३ बालशिक्षा व्याकरण कर्ता-ठक्कुर संग्रामसिंह
४ पदार्थ रत्नमञ्जूषा - कर्ता-पं० कृष्णमिश्र
५ शकुनप्रदीप - कर्ता-पं० लावण्य शर्मा
६ उक्तिरत्नाकर - कर्ता-पं० साधुसुन्दरगणी
प्राकृतानन्द - कर्ता-रघुनाथ कवि
८ हम्मीरमहाकाव्य - कर्ता-नयचन्द्र सूरि
है राठौड़ारी वंशावली
१०
सचित्र राजस्थानी भाषा साहित्य ग्रन्थ सूची
११ मीरां वृहत् पदावली
१२ रत्नपरीक्षादि सप्त ग्रन्थ संग्रह - कर्ता-ठक्कुर फेरू
७
999999999999999

विषयविवरणम्
४-१२
१३-१७
१-प्रास्ताविक वक्तव्यम्
२-प्राकृतानन्दस्य सूत्रानुक्रमणिका
३-प्राकृतानन्द-प्राकृतप्रकाशयोः सूत्राणां भेदानुक्रमणिका
प्रथमे परिच्छेदे
४-अजन्तपुंल्लिङ्गप्रकरणम्
५-अजन्तस्त्रीलिङ्गप्रकरणम्
६-अजन्तनपुंसकलिङ्गप्रकरणम्
७-हलन्तपुंलिङ्गप्रकरणम्
८-हलन्तस्त्रीलिङ्गप्रकरणम्
६-हलन्तनपुंसकलिङ्गप्रकरणम्
१०-निपाताधिकार:
द्वितीये परिच्छेदे
११-धातुप्रकरणम्
परिशिष्टम्
क-प्राकृतशब्दानुक्रमणिका
१-१८
१६-२३
२३-२७
२७-३३
३४ वां
३५-३७
३८-५२
५३-७६
काज

प्रास्ताविक वक्तव्य - प्रस्तुत 'प्राकृतानन्द' ग्रन्थ प्राकृत भाषा का एक संक्षिप्त व्याकरण है। इसकी रचना पंडित रघुनाथ ने की है जो कवि-कण्ठीरव के विरुद से अपने आपको उल्लिखित करते हैं । ये ज्योतिर्विद् सरस के पुत्रं थे। इसके अतिरिक्त इनके समय और स्थान प्रादि के बारे में कुछ उल्लेख नहीं मिलता । इस ग्रंथ की एक पुरानी हस्तलिखित पोथी विद्वद्वर्य आगमप्रभाकर मुनिराज श्री पुण्य- विजयजी महाराज को शायद बीकानेर में मिली थी। जिस पर से उन्होंने स्वयं इसकी प्रतिलिपि की थी। यह प्रति जैसा कि इसके अन्त में लिखा मिलता है- संवत् १७२६ में लाभपुर अर्थात् लाहोर में लिखी गई थी। सन् १६५२ में जव मेरा वोकानेर जाना हुआ तो उन्होंने यह ग्रन्थ मुझे दिखलाया ! मैंने इसे राज- स्थान पुरातन ग्रन्थमाला में प्रकट करने का अपना विचार प्रदर्शित किया तो. उक्त सौजन्य-मूर्ति मुनिवर ने अपनी वह प्रतिलिपि बड़े अानन्द के साथ मुझे दे दी। मैंने उसको छपने के लिये वम्बई के निर्णय सागर प्रेस में दी। दोर्घकाला- वधि में यह ग्रन्थ प्रेस ने छाप कर पूरा किया। कुछ अन्यान्य कारणों से भी ग्रन्थ के प्रकाशन में और अधिक विलम्ब होता रहा । इस तरह प्रतिलिपि के प्राप्त होने के बाद कोई १० वर्ष अनन्तर अब यह ग्रन्थ पाठकों के कर-कमलों में उपस्थित होने का अवसर प्राप्त कर रहा है । 'प्राकृतानन्द' प्राकृत भाषा का एक छोटा-सा व्याकरण है। ग्रन्थकार का कहना है कि जो पण्डित के कुल में पैदा हुया है परन्तु अल्पवुद्धि है और कुछ साहित्य का रसास्वाद करना चाहता है उसके ज्ञान के लिये यह प्रयत्न किया गया है । संस्कृत की तरह प्राकृत भाषा में लिखित साहित्य-संपत्ति बहुत ही विशाल है । विविध विषय के हजारों ही ग्रंथ प्राकृत भाषा में लिखे गये हैं । यद्यपि ब्राह्मण-सम्प्रदाय में प्राकृत साहित्य का उतना अधिक संचय नहीं मिलता है, परन्तु जैन और बौद्ध संप्रदाय में प्राकृत भाषा ही का प्राधान्य रहा और इसलिये इन दोनों संप्रदायों में इस भाषा में लिखित साहित्य-संपत्ति की विशालता बहुत अधिक है । वौद्ध साहित्य की प्राकृत भाषा जो कि मूल रूप में 'मागधी' भाषा कहलाती है, अव 'पाली' के नाम से प्रसिद्ध हो गई है । परन्तु जैन साहित्य-संपत्ति मुख्य रूप से प्राकृत के व्यापक नाम से ही प्रसिद्धि प्राप्त करती रही है। भापा-विदों ने जैन साहित्य की प्राकृत भाषा को 'अर्द्धमागधी' ।

[ २ ] और 'महाराष्ट्री' प्राकृत के नाम से विभक्त किया है । प्राचीन जैन आगमों की भाषा अर्द्धमागधी संमिश्रित है और बाकी का सारा साहित्य प्रायः 'महाराष्ट्री' और 'शौरसेनी' संमिश्रित है। जैन सम्प्रदाय का मौलिक वाङ्मय प्रायः सारा इसी प्रकार की प्राकृत भाषा का अपूर्व भंडार है। द्रविड़ जाति के भारतीय जन-समूहों की द्रविड़कुलीन भाषाओं के अतिरिक्त समग्र आर्य जातीय जन-समूह की जो विद्यमान भाषायें हैं उनकी उत्पत्ति इस मूल पुरातन प्राकृत से है । शाक्य भगवान् बुद्ध और ज्ञात पुत्र तीर्थंकर महावीर के समय से लेकर वर्तमान काल तक की आर्य-भाषाभाषी व भारतीय जनता की मातृ-भाषा प्राकृत के नाम से संबोधित की जाती रही है । वह प्राचीन प्राकृत अब अनेक उपभाषाओं और देश-विशेष की बोलियों में विभक्त हो गई है। जैसा कि ऊपर कहा गया है जैन संप्रदाय का सारा ही मौलिक साहित्य प्राकृत में है। कई ब्राह्मण विद्वानों ने भी प्राकृत भाषा में कुछ विशिष्ट ग्रन्थों की रचना की है, जिनमें काव्य और नाटक ग्रंथ मुख्य हैं । गौडवहो, सेतुबन्ध, लीलावई, गाथा सत्तसई आदि उत्कृष्ट प्राकृत काव्यकृतियां हैं जो ब्राह्मण विद्वानों की देन हैं। इसी तरह कर्पूरमंजरी आदि अनेक नाटक कृतियां भी प्राकृत के प्रभाव को प्रकट करती हैं। जिस तरह संस्कृत भाषा का व्यवस्थित ज्ञान प्राप्त करने के लिये पाणिनी आदि अनेक प्राचीन-अर्वाचीन विद्वानों ने नाना प्रकार के व्याकरण-ग्रन्थों की रचनायें की हैं उसी तरह प्राकृत भाषा का व्यवस्थित ज्ञान प्राप्त करने की दृष्टि से वररुचि आदि अनेक विद्वानों ने प्राकृत व्याकरण ग्रन्थों की रचनायें की हैं । यों तो प्राकृत भाषा के बीसों छोटे-बड़े व्याकरण-ग्रन्थ उपलब्ध होते हैं पर उनमें वररुचि का 'प्राकृत-प्रकाश' सब से प्राचीन ग्रन्थ समझा जाता है। प्राकृत- भाषा का सर्वांग संपूर्ण व्याकरण ग्रन्थ हेमचन्द्र सूरि का है जो उनके महान् व्याकरण ग्रन्थ 'सिद्ध हैमशब्दानुशासन' का अष्टम अध्याय स्वरूप है । इस महान् व्याकरण ग्रन्थ के सात अध्यायों में संस्कृत भाषा का परिपूर्ण व्याकरण ग्रथित है और अष्टम अध्याय में प्राकृत भाषा का परिपूर्ण व्याकरण है। इसमें प्राकृतोत्तरकालीन अपभ्रंश भाषा का भी विस्तृत व्याकरण है जो उनकी मौलिक देन है । हेमचन्द्र सूरि के बाद अनेक छोटे-बड़े प्राकृत व्याकरण बनते रहे और उनमें से अनेक ग्रन्थ प्रकाशित भी हो गये हैं। वररुचिकृत 'प्राकृत-प्रकाश' हेमचन्द्रसूरि के 'प्राकृत व्याकरण' की अपेक्षा संक्षिप्त और अपूर्ण-सा है परन्तु प्राचीन होने के कारण उसका महत्त्व अवश्य है ।

-- प्रस्तुत 'प्राकृतानन्द' वररुचिकृत 'प्राकृत-प्रकाश' का हो एक प्रक्रियात्मक संकलन है । संस्कृत के लघुकौमुदी आदि प्रक्रियात्मक शैली के अनुकरण में रघु- नाथ कवि ने 'प्राकृत-प्रकाश' को इस प्रकार प्रक्रियात्मक रूप देकर इस प्राकृतानन्द का संकलन किया है। इसमें कुल ४१६ सूत्र हैं, इससे मालूम देता है कि मूल 'प्राकृत-प्रकाश' के कुछ सूत्र छोड़ भी दिये हैं । पर, साथ में कुछ ऐसे भी सूत्र दिये हैं जो 'प्राकृत-प्रकाश'की प्रसिद्ध पुस्तक में नहीं मिलते । चौखम्भाग्रन्थावलि में भामहकृत मनोरमाव्याख्या सहित जो प्राकृत प्रकाश छपा है उसमें कुल ४८७ सूत्र जिनमें के ८७ सूत्र इस प्राकृतानन्द में नहीं हैं। और साथ में इसमें २१ सूत्र ऐसे हैं जो प्राकृत-प्रकाश में नहीं मिलते । तुलना की दृष्टि से दोनों ग्रन्थों की सूत्र- सूचि इसके साथ दी जाती है । संशोधक विद्वानों को इसका कुछ उपयोग होगा। मुद्रित प्राकृत-प्रकाश के और प्राकृतानन्द के सूत्रों में कुछ पाठ-भेद भी दृष्टि- गोचर होते हैं । लिपिकर्ताओं के कारण ऐसे पाठ-भेदों का होना स्वाभाविक है। यह ग्रंथ अभी तक कहीं प्रकाशित नहीं हुआ है । ऑफट ने अवश्य ही इसका सूचन 'कॅटेलागस कॅटलॉगरम्' भा. १; पृ. ३६१ पर किया है । इस कृति का नाम सूचीकार को लाहोर के पण्डित राधाकृष्ण के 'पुस्तकानां सूचीपत्रम्' में मिला है, जो काश्मीर-निवासी पं० राजाराम शास्त्री ने लिखा था और एशिया- टिक सोसाइटी बंगाल के प्रोसीडिंग्स्, जून १८८० ई. में इसका उल्लेख हुआ है । प्रस्तुत पुस्तक की प्रेस-कॉपी जिस प्रति से तैयार की गई है वह भी सं. १७२६ वि में लाहोर में ही लिखी गई थी। सौजन्यमूर्ति विद्वद्रत्न मुनिवर श्री पुण्यविजयजी महाराज के प्रति हम अपना हार्दिक कृतज्ञभाव प्रकट करते हैं कि जिन्होंने स्वयं अपने हस्ताक्षरों में प्रस्तुत रचना की सुन्दर प्रेस कापी कर के हमको राजस्थान पुरातन ग्रन्थमाला में प्रकट करने के लिये प्रदान की। प्रेस की कठिनाई. के कारण इसके प्रूफादि संशोधन कार्य कार्यालय द्वारा ही किया. गया अतः कुछ अशुद्धियां भी रह गई हैं। विद्वज्जन उसे स्वयं शुद्ध कर लेंगे, ऐसी विज्ञप्ति के साथ कवि रघुनाथ ने स्वयं ग्रन्थ के प्रारंभ में इस विषय में जो बहुत ही सुन्दर उक्ति प्रकट की है उसी को हम भी यहां पुनः उद्धृत कर देना चाहते हैं। दोषदुष्टमिदमित्यवज्ञया हातुमिच्छत - न जातु साधवः । शैवलं किल विहाय केवलं निर्मलं किमु न पीयते जलम् ॥ जोधपुर -मुनि जिनविजय दि० २५-६-६३ प्राकृतानन्दस्य सूत्रानुक्रमणिका क्रमाङ्क सूत्राङ्क पृष्ठाङ्क . ३०० २०० १ अइ वले सम्भाषणे २ अंकोठे ल्लः अः क्षमा-श्लाघयोः ४ अक्ष्यादिषु छः २५ २१ ३ १७२ ११८ ३ अचि मश्च ar ३०६ ३२६ ३१८ اللي الله ७ ३६ ८ २ ३ १६५ २८१ ४५ १८६ ६ ૨૪ ४० ५ ५८ २६ ६ अज्ज आमन्त्रणे अत प्रा मिपि वा अत ए से ह अत प्रोत् सोः १० अतोऽमः ११ अत् पथि-हरिद्रा-पृथिवीषु. १२ अदसो दो मुः १३ अदातो यथादिषु वा १४ अद् दुकूले वा लस्य द्वित्वम् १५ अघो म-न-याम् १६ अन्मुकुटादिषु १७ अन्त्यस्य हलः १८ अपौ विः १६ अमि ह्रस्वः २० अम्हे जस्-शसोः २१ अम्हेहितो अम्हेसुत्तोभ्यसि २२ अम्हेहिं भिसि २३ अम्हेसु सुपि २४ अयुक्तस्य रिः २५ अलाहि निवारणे २६ अवाद् गाहेर्वाहः २७ अन्वो अम्मो दुःखा-ऽक्षेप-विस्मापनेषु २८ अव्वो दुःख-सूचना-सम्भावनेषु २६ असेर्लोपः ३० अस्तेरासिः ३१. अस्थिनि ३०.६ १५८ mr ow २६७ २७४ २७२ २७८ ६५ الله الله الله الله ८ २९६ ३५३ ३५ ३०१ २६८ ३७१ २७३ २१७ ४६ २७ [ २ ] क्रमाङ्क सूनाङ्क पृष्ठाङ्क २६५ ૨૨ २६६ २५६ ३२ अस्मदो हमहमहलं सौ ३३ अहम्मिरमि च ३४ प्राडि ते दे ३५ आङि मे ममाई ३६ प्राडो ज्ञादेशस्य प्राच्य गौरवे ३२ २७० १७० १६७ १५५ २३२ २५ आच्च सौ १८ २८ २३६ २९ १७४ २१ आदेरतः २७ ७ २२३ २८ २४६ २३८ २६ २०८ २१४ २६ ३१४ ४०२ '४६ या गो-गमोरङसि ४० प्रात्मनो अप्पागो वा ४१ प्रादीती वहुलम् ४२ ४३ प्रादेर्यो जः ४४ प्रापीडे म ४५ आमः एसि ४६ आमन्त्रणे वा विन्दुः ४७ आमि सि ४८ आमोणं ४६ आम्र-ताम्रयोः पालाने न लो: ५१ आल्विल्लोल्लालबत्तेत्ता मतुपः ५२ ग्रावेच आ समृद्ध्यादिपु वा ५४ आहे इया काले ५५ इअं भूते ५६ इच्च वहुपु ५७ इज्जस्-शसोर्दीर्घश्च ५८ इट्-मयोमिः ५६ इत एत् पिण्डसमेपु ६० इतेस्तः पदादेः ६१ इत् पुरुपे रोः ६२ इत् सैन्ववे इत्व-द्वित्ववर्ज राजवदनादेशे ६४ इदद्वित्वे ६५ इदम इमः ६६ इदम् एतत्-कि-यत्-तद्भयष्टा इणा वा ४३ ६ २७ २५५ ३२६ my ३२७ १८५ ३६ २३ ३२५ १२१ १४ ६ २४ ६४ १६४ २४०. २३७ २६ २९ २२६ २ JI २२० २७ [ ३ ] क्रमाङ्क सूत्राङ्क पृष्ठाङ्क १७ ७ से ७० ६ ३९ ४१६ ५२ २२ २४ ४० ४२ & ६७ इदीपत्-पक्व-स्वप्न-वेतस-व्यञ्जन-मृदङ्गाऽङ्गरेषु २८ ६८ · इदुतोः शसो हो १४०० ६६ इद् ईतः पानीयादिषु ५१ इद ऋष्यादिषु ४८ ७१ इद्भ्यः स्सा-से २८५ ७२ इर-किर-किला अनिश्चित्ताख्याने २९३ ७३ . इवे व्यः ३०८ ७४ ईअ भूते. ३२८ ७५ ईत् सिंह-जिह्वयोश्च ७६ ईत् स्त्रियाम् ७७ ईदूतोह स्व: १७७ ७८ ईद् धैर्य १६५ ७६ उत्त श्रोत् तुण्डरूपेषु ८० उत्तमे स्सा हा च ८१ उत्तरीया-ऽनीययोर्यस्य जो वा ८६ ८२ उत्समोलः ३४३ ८३ उत् सौन्दर्यादिषु ८४ - उदुम्बरे दोर्लोपः २०९ ८५ उदूखले द्वा वा १८७ ८६ उदूतो मधूके १८८ उदो विजः ३७६ ८८ उद् ऋत्वादिषु २९ ८९ उद्ध्मो धूमा १० उपरि लोपः क-ग-ड-त-द-प-ष-साम् उ: पद्म-तन्वीसमेषु.. १७४ १२ उर्जस्-शस्-टा-डस्-सुप्सु वा १५३ ६३ 'उलूहले ल्वा वा १८७A १४ उ-सु-मु-विध्यादिष्वेकस्मिन् ६५ ऋत पारः सुपि १५२ ६६ ऋतोऽत् १२० ९७ ऋतोऽरः ६८ ऋत्वादिषु तो दः ६२ ६६ एकाचो ही १०० एच सुप्यङि-ङसोः १४ १०१ . एच्च क्त्वा तुमन-तव्य-भविष्यत्सु ३३४ २६ २३ २३ ८७ ५ २२ १८ २३ १ १४ ४४ w w २ -- । ४ । क्रमाङ्क सूत्राक पृष्ठाङ्क ७ २४ १७ ४१. ५ १७ ह E ६ २ ८७ ११ १०२ एत इद् वेदना-देवरयोः १०३ एतद: सात्वोत्वं वा २४७ १०४ एत् नीडा-ऽपीड-कीदृगीदृशेषु ५२ १०५ एन्न पुरे १६० १०६ ए भ्यसि १४३ १०७ ए शय्यादिपु १०८ एषामामो ण्हं १४० ११० ऐत एत् १११ एरावते च ८२. ११२ यो च द्विधा कृजः ३१२ ११३ श्रोतोऽद् वा प्रकोळे कस्य वः ७२ ११४ प्रोदवा-ऽपयोः ११५ ओ बदरे देन १८६ ११६ अो सूचना-पश्चाताप-विकल्पेयु २६२ ११७ प्रोत्, प्रोत् ७३ ११८ फ-ग-च-ज-त-प-य-वां प्रायो लोप: १० ११३ कवन्वे बो मः १२० कार्षापणे १२४ १२१ कालायसे यस्य वा १२२ काशेर्वास : १२३ कि-यत्-तद्भ्यो उस पासः २२२ १२४ किलो प्रश्ने २९७ १२५ किम : क: १२६ किराते च: १२७ कुब्जे ख: १३. १२८ कृत्र : का भूत-भविष्यतोश्च ३६५ १२६ कृज : कुरगो वा ३६४ १३० कृ-दा-श्रु-वचि-गमि-रुदि-दृशि-विदिरूपाणां काहं-दाहं सोच्छं वोच्छं गच्छं रुच्छंदच्छं वेच्छं ३६७ १३१ कृष्णे वा १३३ १३२ कैटभ व: १३३ कौशले वा १३४ वते. ४१२ १३५ क्ते तुर: .१३६ तेन दिण्णादयः ४१३ ४३ २१ ३५ २७ ४८ ४८ ४४ ११ ६ ४२.१ ५१ . N [५ ] क्रमाङ्क सूत्राङ्क पृष्ठाङ्क १३७. क्ते .. १० ५१ ५१ २३ ४१५ १८१ ३६६ ३८५ ४८ ४७ . १७१ २३ ५४ २१ ३ ७ ४३ ६७ ३४० .४१ ५६ ७ ४१ ८४ १० ४०५ ११७ ३ ८० १० १३८ क्त्व ऊरण : १३९ कमस्य १४० क्रीन : किरण : १४१ क्रुधझूर : १४२ क्लिष्ट-क्लिष्ट-रत्न-क्रिया-शाङ्गेषु तत्स्वरवत् पूर्वस्य १४३ क्वचिद् असि ङयोर्लोपः १४४ क्वचिद् युक्तस्यापि १४५ क्वथेः १४६ क्षमा-वक्ष-क्षणेषु वा १४७ क्षियोझिज्जः १४८ ख-घ-थ-ध-भां-हः १४६ खादि-धाव्योः खा-धौ १५० गद्गदे रः १५१ गमादीनां द्वित्वं वा १५२ गर्तेडः १५३ गभिते णः १५४ गृहे घरोऽपतौ १५५ ग्रसेविसः १५६ ग्रहे दीर्घा वा १५७ ग्रहेर्गेण्हः १५८ घुणो घोल: १५६ घे क्त्वा-तुमुन् तव्येषु १६० सश्च द्वित्वं वाऽन्त्यलोपश्च १६१ १६२ ङसि तुमो-तुह-तुझ-तुम्ह-तुभा १६३ ङसे: प्रा-दो-दु-हयः १६४ डसो वा १६५ असो वा १६६ ङसौ तत्तौ तइत्तो तुमादो तुमादु तुमाहि १६७..' ए.म्मी १६८ . .हि १६६: डेस्सि-म्मि-त्थाः १७० ङौ च मइ मए . २१२ ३५२ ४३ ४०६ ४०० ४६ ३४८ ४१६ • - २६ ङसा से ३० २४५ २६१ ३ २० १४४ १७ २६२ “२५९ २२ ३ २२४ २७ - १३६ २७१ ३२.

क्रमाङ्क सूत्राङ्क पृष्ठाव ३२ २७ २२ ३ २०. . ४७ ४१ २५ २० ૪૨ २ २. १६ १७१ डी तुमम्मि २६२ १७२ चतुरश्चत्तारो चत्तारि २१८ १७३ चतुर्थी-चतुर्दश्यो स्तुना १७८ १७४ चतुर्थ्याः पष्ठी १८ १७५ चन्द्रिकायां मः १६७ १७६ चिन चेअ अवधारणे २६१ १७७ चिनश्चिरणः १७८ चिन्हे धः २०५ १७६ च्चो व्रज-नृत्योः ३४१ १८० चौर्यसमेषु रिग्रं २०२ १८१ छायायां हः १६८ १८२ जल्पेलों मः ૨૪૭ १८३ जस् शस्-ङसि-प्राम्सु दीर्घः १३ १८४ जस्-शस्-डसो गो २३१ १८५ जस्-शसोर्लोपः १२ १८६ जस ओ वो वाऽत्वं यूत्वं च १४० १८७ जस पोश्च यूत्वम् १३६ १८८ जसो वा १५७ १८९ जिव्रते: पा-पानी ३६२ १६० जभो जंभाग १९१ ज्ञो जाण-मुणी ३९८ १६२ ज्ञो गज्ज-गव्वौ वा ३०८ १६३ ज्यायामीत् १७३ १६४ झयि तद्वन्तः १६५ टाऽऽपोर्णः १६६ टा-ङस्-डीनामिदेददातः १६० १९७ टा-योस्तइ तए तुमए तुए २५५ १६८ टारगा १४१ १६६ टाणा २३५ २०० । टोड: २०१ ठा-झा-गांश्च-वर्तमान-भविष्यद्-विध्याद्य कवचनेषु ३६१ २२० ठोढः १६ २०३ १६८ २०४ २१५ २०५ रणवरि आनन्तर्य २६६ १४ ४४ ३४६ ૪૨ ४६ ५० २१ २ ३ । . १६ : १७ २८ ४३ २५ डस्य च २५. णवरः केवले ३५.

[ ७ ] क्रमाङ्क सूत्राङ्क पृष्ठाङ्क ३०२ ४०१ ४६ ३८६ ४७ ३२ २६६ २५३ २४४ ३० ail ३७ २४३ ३१३ २०७ १४६ २६ २५२ ३० २६४ ३ ३ २५८ २५७ २६० १६६ २४ ४१७ ५. २०६ णवि वैपरीत्ये २०७ णिच एदादेरत आत् २०८ णुदेर्लोरणः २०६ णेशसि २१० तं वाऽमि २११ तद पोश्च २१२ तदेतदोः सः सावनपुंसके २१३ तल्-त्वयोर्दा-त्तणी २१४ तालवृन्ते ण्ठः २१५ तिण्णि जस्-शस्भ्याम् २१६ तुझे तुम्हे जसि २१७ तुझेसु तुम्हेसु सुपि २१८ तुझेहिं तुम्हेहिं तुन्भेहिं भिसि २१६, तुमाइ च २२० तुम्हाहितो तुम्हासुत्तो भ्यसि २२१ तूर्य-धैर्य-सौन्दर्या-ऽऽश्चर्य-पर्यन्तेषु रः २२२ तृन इरः शीले २२३ तृपस्थिम्पः २२४ ते तिपोरिदेती २२५ तो उसे: २२६ त्तो-त्थयोस्तो लोपः २२७ तो दो उसेः २२८. त्य-थ्य-द्यां च्च-च्छ-ज्जा: २२६ त्रसेर्वज्जः २३० त्रस्ती २३१ त्वरस्तुवरः २३२ . थास्- सिपोः सि से २३३ . दशादिषु हः. २३४ दाढादयो बहुलम् २३५ दिक्-प्र वृषोः सः २३६ दिवसे सस्य २३७ - दुहि-लिहि-वहां दुव्भ-लिब्भ-वभा २३८ दूङो दूमः २३६ शेः पुलअ-रिणअक्क-अवक्खाः २४० दैत्यादिष्वः ३३१ ४८ ३८ ३१७ २४८ २४६ ३० २२१ २७ 8 ७१ ३८० १५० ४६ १८ ४३ ३६ ३२४ १०० २१५: २८० १०३ २६ ३३ १२ ४०७ ܝ ܢܝ ५० ३८१ ४७ ४५ ७० [ ८ ] क्रमात सूत्रा पृष्ठाङ्क १६२ २४ १४ ११ ११ १०४ १२ २ १७ १४६ १४७ ३३३ १०७ १४२ १७ ४१ १२ १७ १ २२६ २८ २१६ २८७ ३४ १५ ११४ २४१ दैवे वा २४२ दोला-दण्ड-दशनेपु डः २४३ दोहदे रणः २४४ नेरो वा २४५ द्विवचनस्य बहुवचनम् २४६ दुवै दोणि वा २४७ द्वेर्दो २४८ धातोर्भविष्यति हिः २४६ ध्य-ह्योर्भः २५० न डि-उन्स्योरेदातो २५१ ननो हलि २५२ न त्यः २५३ न धूर्तादिषु २५४ न नपुंसके २५५ नपुंसके स्वमोरिदमिणमिणमो २५६ न विन्दु परे २५७ न र-होः २५८ न विद्युति २५६ न शिरो-नभसी २६० न-सोन्त-प्रादृट-शरदः पुसि २६१ न स्तम्चे २६२ नाऽऽतो ऽदातो २६३ नाऽऽमन्णे सावोत्व-दीर्घत्व विन्दवः २६४ नानेकाचः २६५ निपाताः २६६ निरो माङो मारण: २६७ नीडादिषु च २६८ नो गः सर्वत्र २६६ नोत्सुकोत्सवयोः २७० न्त-मारणौ शत-शानचोः २७१ न्ति-हेत्या मो-मु-मा वहुषु २७२ न्तु ह मो बहुपु २७३ न्मो म्मः २७४ पटे: फलः २७५ पत्तने २८. २४ ३४ २८८ २४२ १०६ २१ १६ ४ २५ ३२२ mr m २८६ ३७७ २४ 8 २ १२६ ४१८ ५२ ३२३ ३३२ ६६ ११ ४२ ३४५ २०४ २५ [ ] ३० ४७ २५० ३५२ ६३ २०३ १५४ १५६ २५ १८ १६ १० ७४ 8 ५ ९२ ११ ४१ ४२ १४ -- २२ २७६. पदस्य २७७ . पदः पाल: २७८ परुष-परिघ-परिखासु फ: २७९ पर्यस्त-पर्याण-सौकुमार्येषु ल्लः २८० पितृ-भ्रातृ-जामातॄणामरः २८१. पृष्ठा-ऽक्षि प्रश्नाः स्त्रियां दा २८२ पो वः २८३ पौरादिष्वउः २८४ प्रतिसर-वेतस-पताकासु : २८५ प्रथम-शिथिल-निषधेषु ढः २८६ प्रदीप्त-कदम्ब-दोहदेषु दोल: २८७ प्रादेर्भवः २८९ प्रादेर्मीलः २८४ पो भः २६० बाष्पेऽश्रुणि हः २६१ बिसिन्यां भः २६२ बुड-खुप्पो मस्जेः २६३ वृहस्पती ब-होर्भ-औ २६४ ब्रह्माद्या आत्मवत् २६५ भाव-कर्मणोर्वश्च २६६ भिदि-च्छिदोरन्तस्य न्दः २६७ भिन्दिपाले ण्डः २६८ भियो भा-बीही २६६ भिसो हिं ३०० भुजादीनां क्त्वा-तुमुन्-तव्येषु लोपः ३०१ भुवो हो-हुवी ३०२ भ्यसो हितो सुत्तो ३०३ मं मम ३०४ मज्झरणो अम्हं अम्हाणं अम्हे मामि ३०५ मत्तो मइत्तो ममादो ममादु ममाहि उसी ३०६ मध्यान्हे हस्य ३०७ मध्ये च ३०८ मन्मथे वः ३०६ मममि डी ३१० मयूर-मयूख-योर्वा वा ३११ मलिले लिनोरिलो वा ३४६ ६१ १२३. १८० ३६० १४५ २४१ ४०४ ४८. १७ २६ ३६३ १२८ १५ ४६ १७ ३ ४१४ ३८ ३. ३१६ २१ २६८ २७६ २७३ ३२ ३२ १०६ - १२ ३८ ३२१ ६५ २७७ ४२ २११ ६ [ १० ] H- ऋमाङ्क सूत्राङ्क पृष्ठा १८२ ४० ४५ ३७४ ४६ ३६६ २७५ १ २ ३३७ १२७ ४३ ४०३ २० १६६ १७६ १३४ २२ , १६ १ ४ ४७ ३१३ मातुरात् ३१४. मिना स्सं वा ३१५ मि-मो-मु-मानामधो हरच ३१६ मृजेनुंभ-पुसौ ३१७. मृदो लः ३१८. मे मम मह मज्भ ङसि ३१६ मो विन्दुः ३२०: मो-मु महि-स्सा-हित्था ३२१, म्न-ज्ञ-पञ्चाशतः पञ्चदशेपुणः ३२२. म्मिव-मिग्र-विना. इवार्थ ३२३: म्लै वा-वानी ३२४. यक ईअ इज्जो ३२५. यमुनाया मस्य. ३२६ यप्टयां लः ३२७. यावदादिषु वयं ३२८: युक्तस्य ३२६ युधि-बुध्योभः ३३० युष्मदस्तं तुम राज्ञश्च ३३२: . रुदेवः ३३३. . रुधेन्ध-माँ ३३४: रुपादीनां दीर्घः ३३५ रे अरे हिरे सम्भापरण-रतिकलहा-क्षेपेषु ३३६ . रो रा ३३७. त्स्य टः ३३८. . य-शय्या-ऽभिमन्युपु जः ३३६: लवण-नवमल्लिकयोर्वेन ३४० लादेशे वा ३४१: . लाहल लाङ्गल-लाङ्ग लेपु वा ए: ३४२ लतः क्लृप्त इलि. ३४३, लोपोऽरण्ये ३४४. वक्रादिषु ३४५:: वर्गपु युजः पूर्वः ३४६ वर्तमान-भविष्यदनद्यतनयोजः ज्जा वा ३४७, वसति-भरतयोहः ३४८ विद्युत्-पीताभ्यां वा लः. ३० २८ ३८३ २५१ २३० રેડ ३६२ ३८४ ४६ ४८ ४७ . २०४ ३४ १३.. १ १ ११५ ११२ १६४ १ २४ १८३ २३ ( ५ २ ५ ३७.. ३२० ८१. ३१५ १० [ ११ ] ४ १२९ १५ ६६ ३५५ '४३ . २६::. ४७ w .४३ “४६ ४२. .... - ३५४ ३६७ ३४२ २५४ २६३ ३८७ ३८८ ३५७ २७६ .४७ ४७ . : शषोः सः ४४ ६ २३४ २८ ३०७ ३७ .. ३४६ विप्रकर्षः ३५० विह्वले म्भ-ही वा ३५१ वृक्षे वेन रुर्वा ३५२ वृधेर्दः ३५३ वृन्दे वो रः ३५४ वृश्चिके छः ३५५ · वृष-कृष-मृष-हृषामृतोऽरिः ३५६ . वेः के च ३५७ वेष्टेश्च ३५८. वो च शसि ३५६ वो भे तुज्झाणं तुम्हाणमामि ३६० शकादीनां द्वित्वम् ३६१ शकेस्तर-च-तीराः ३६२. शद्नृ-पत्योर्ड: ३६३ शरदो दः ३६४ ३६५, शस एत् ३६६ · शेपः संस्कृतात् : ३६७ शेष:-ऽऽदेशयोद्वित्वमनादौ ३६८ः शेषारणामदन्तता ३६६ शेषोऽदन्तवत् ३७० श्च-त्स-प्सां छः ३७१ श्मश्रु-नमशानयोरादेः ३७२ . श्रदो धो दहः. ३७३ · श्रु-हु-जि-लू-धुवां पणोऽन्त्येह्रस्वः ३७४ वादीनां त्रिष्वप्यनुस्वारवर्ज हिलोपश्च वा ३७५ षट्-शावक-सप्तपर्णानां छः ३७६ क-स्क-क्षां क्खः ३७७, ष्टस्य ठः २७८ ष्ठा-ध्या-गानां ठाअ-माअ-गायाः ३७६ पस्य फः ३८० : एम-यक्ष-विस्मयेषु म्हः ३८१ . संख्यायां च ३८२. संज्ञायां वा ३८३. सटा-शकट-कैटभेषु ढः ३८४. “सन्धावचामज्लोपविशेषा बहुलम् ३८५ समासे वा ५ ४५ १३७. १६ १२५ २०१ : ३७५ ३५० १४ २५ ४६.. ४२ ४४ *- 88 १२ ७ ܀ ܀ २२, ४३ २५ : १७५ ३६० २०६ ११९ :. १०१ १०२ . .: ८९ १४ १२. :१२ : .१ १३१ । १६ ऋमाङ्क सूचाङ्क पष्ठाङ्क १२ १०५ ३४ १३५ ५ १६ ७६ १० ૨૪ ४ १६ ३०३ ११३ १३२ १३ १५ १८४ ११० ७ १५६ २८३ ४०० १९. १६३ १५१ ३८६ सर्वज्ञतुल्येपु अस्य ३८७. सर्वत्र लवराम् ३८८ सर्वादेर्जस एत्वम् ३८६ सीकरे भः ३६० सुपः सुः ३६१ सु-भिस् सुप्सु दीर्घः ३९२ सू कुत्सायाम् ३६३ सूर्ये वा ३६४ सेवादिषु ३६५. सोविन्दुर्नपुंसके ३६६ स्तम्भे सः ३६७. स्तस्य थः ३९८ः स्त्रियां शस उदोतो ३६६ स्त्रियामात् स्त्रियामात एत् ४०१ स्थाणावहरे ४०२० स्नुपायां ण्हः ४०३ स्नेहे वा ४०४. स्पस्य सर्वत्र स्थितस्य ४०५ स्फटिक-चिकुर-निकपेपु कस्य हः ४०६ स्फटिके ल: ४०७. स्फुटि-चल्यो ४०८ स्फोटके ४०६ स्मरतेभर-सुमरी ४१० स्स-स्सिमोर वा ४११. स्सो इसः ४१२. हन्तेर्मः ४१३ हरिद्रादीनां रो लः ४१४ हरच सौ ४१५. हुं दान-पृच्छा-निर्धारणे ४६६ हु-क्नु निश्चय-वितर्क-सम्भावनेषु ४१७ हृ-क्रोहीर-कीरो- ४१२, ह नः-स्नःण-क्षण-श्नां ग्रहः ४१६' हन-ल-ह्मपु न-ल-मां स्थिति-रूद्वम् २० १२२ ৩৬ १४ १० १०. ४२ ២១ ३४४ ४४ १११ ३६४ २२७ १६ ३७० ६० २८. ३ ४५ २८२ 8 २९ २६४ ५० w ४०६ ४६ १०८: १२ प्राकृतानन्दप्राकृतप्रकाशयोः सूत्राणां भेदानुक्रमणिका प्राकृतानन्दस्य सूत्राणि सूत्राङ्क क. प्राकृतप्रकाशस्य सूत्राणि सूत्राङ्क अंकोल्लः २०० X.XX १ अंपी वि अम्हेहितो अम्हेसुत्तो म्यसि अंकोले ल्ल: २२२५ १ अत इदेतो लुक् च ११११. २ अदीर्घः सम्बुद्धी ११११३ ३ अनादावयुजोस्तथयोदंधी १२। ३ X अम्हाहिन्तो अम्हासुन्तोम्यसि ६१४६ ४ अस्मदः सौ हके हगे अहंके ११९ ५ अस्मदोजसावअंच १२।२५ ६ अयुक्तस्यानादौ २।१ २७४ X X X २ अन्वो अम्मो दुःखाऽऽक्षेप- विस्मापनेपु असेर्लोपः X ३०१ २६६ अस्तेर्लोपः ७ अस्तेरच्छ १२।१६ X: X ३ अस्थिनि श्राङो ज्ञादेशस्य पाच्च सौ २१७ १७० प्राङो शस्य प्राच सो X X श्राम: एसि आमि सिं आल्विल्लोल्लालवत्तेत्ता मतुपः ३१४ २२३ २४६ XX ३५५ ५३५ ८ अात्मनि पः ३१४८ ६ आनन्तर्ये रणवरि ६८ आम एसिं ६.४ श्रामासि ६.१२ प्राल्विल्लोलवन्तेन्तामतुपः ४१२५ १० प्रावि:क्त कर्मभावेषु वा ७।२८ ११ आश्चर्यस्याच्चरि १२।३० X १२ इ गृध्रसमेषु १२।६ ७१३ १३ इत्सदादिषु १४ इ: श्रीह्रीक्रीतक्लान्तक्लेशम्ला- नस्वप्नस्पर्शहपहिंगहेषु ३१६२ १५ इवस्य पिवः १६ इवस विन १२।२४ ४ इनं भूते ३२९ इट् मयोमिः ३३५ इड् मिपोमिः X ०११ X X X १०१४ ...

[ १४ । प्राकृतानन्दस्य सूत्राणि सूत्राङ्क क्र. प्राकृतप्रकाशस्य सूत्राणि सूत्राङ्क ५ इवे व ईत् स्त्रियाम् ४१६ उत्तरीया-ऽनीययोर्यस्य जो वा ८६ उद्ध्मो धूमा ६ उदूखले हा वा १८७ उलूहले ल्वा वा १८७ A X X एच्च क्त्वातुमुन् तव्य- भविष्यत्सु ३३४ x श्रोत् प्रोत् X X ४ कुवेद्रः X X X ईच स्त्रियाम् ७१११ उत्तरीयाऽऽनीययो| वा २।१७ उद्ध्म उखुमा : ८।३२ X उलूरवलेल्वा वा १२१ १७ ऋरीति १६३० १८ लतः क्लुप्तः इलिः १।३३ एच क्त्वातुमुन् तव्यभविष्यत्सु ७।३३ १६ एवस्य जेव्व १२।२३ आत औत् ११४१ २० कन्यायां न्यस्य १०।१० २१ करेण्वां रणो: स्थितिपरिवृतिः ४१२८ २२ कृगृङ्गमां क्तस्य डः ११११५ क्रुजूरः का६४ २३ क्त्व इयः १२। २४ क्त्व स्तूनम् १०।१३ २५ क्तान्तादृश्च ११:११ २६ क्त्वो दारिणः १११६ ववचित्पृक्तस्यापि १!१ २७ क्षस्य स्कः २८ खिदेविसूरः ८।६३ २६ गर्दभसंभदंवितदिविदिपु दत्य ३१२६ घेत् क्त्वा तुमुन् तव्येपु ८.१६ X सि तुमो तुह तुज्भ तुम्ह ६।३१. X ३० असो हो वा दीर्घत्वञ्च.. ११११२ हु रेम्मी ५६ ३१ अंदन हः ६.१६ ३२ चश्चम्पः ८.६५ ३३ चवर्गस्य स्पष्टतया तथोच्चारण: १११५ X X क्वचिद् युक्तम्यापि ५४ X X घे पत्ता-तुमुन्तव्येषु ४१६ असि तुमो-तुह-तुझ-तुम्ह- तुमा इसो वा - तुम्हाः १६२ x देएम्नी २२ - X X ४ [ १५ ] क्र. प्राकृतानन्दस्य सूत्राणि सूत्राङ्क प्राकृतप्रकाशस्य सूत्राणि सूत्राङ्क २९१ ११।१४ १४० ६ चिमचे अवधारणे X १० जस ओ वो वाऽत्वं यूत्वं च X जस अोश्च यूत्वम् जस्-शस्-ङसो पो X ११ ज्ञो गज्ज-णवी वा X ३४ चिट्ठस्य चिष्ट: X ३५ जश्शस्ङसां को जसश्च प्रो यूत्वम् जश्शस्ङसां को ३६ जोयः ५।३८ १३६ . ५/३८ १११४ ४०८ x X ७ X १२ झयि तद्वर्गान्तः टा-ङस् ङीनामिदे ददातः टाङ्योस्तइ तए तुमए तुए X १६० २५५ ३७ ज्ञस्य जः १०१६ ३८ ज च १०।११ X टाङसिङसङीनामिदेददातः ५।२२ टाङ्योस्तइ तएतुमए तुमे ६।३० ३६ टामोर्णः ४० डुकृनः करः १२।१५ ५१४ X १३ गवरि प्रानन्तनये २६६ X X १२।११ ३८६ मा७ णुदेर्लोरणः णे शसि २६६ ४१ मिश्शसोर्वा क्लीबे स्वरदीर्घश्च गुदो गोल्ल गो शसि ४२ गो नः ४३ ततिपो रिदेतो ४४ तिपास्थि ६.४४ X १०१५ X ७/१ तु चामि १२।२० ६.२७ ६१३४ ४।२४ तुज्झेहिं तुम्हेहि भिसि तन इरः शीले तृगइरः शीले X तं वाऽमि २५३ तुझेहिं तुम्हेहिं तुम्भेहिं भिसि २५८ ४१७ १४ ते-तिपोरिदेती ३१७ वस्ती १५० X १५ दुहि-लिहि-वहां दुम्भ-लिब्भ वभा X त्रस्ति ४५ ददाते दइस्स लुटि x १२।१४ ४०७ X १२.१८ १६ दोहदे रणः १७ ४६ दृशेः पेक्खः X ४७ धातो वकर्तृकर्मसु परस्मैपदम् x १२।२७ [ १६ ] क. प्राकृतानन्दस्य सूत्राणि सूत्राङ्क क्र. प्राकृतप्रकाशस्य सूत्राणि .. सूत्राङ्क X नपुंसके स्वमोरिदमिणमिणमो २८७ नाऽऽमन्त्रणे सावोत्व-दीर्घत्व विन्दव २५ X X पदः पाल: २८३ पदेः पालः X परुष-परिघपरिखासु फ: X X ५३ पैशाची X X X १७ वाप्पेऽश्रुरिण हः १८ बृहस्पती व-होभ-यो X १२३ १४५ ४६ न लुटि १२।१३ नपुंसके स्वमोदिदमिण- मिणमो ६६१८ नामन्त्रणे सावोत्व- दीर्घविन्दवः ५.२७ ४६ नान्त्यद्वित्वे ७९ ५० नैदावे ७.२६ ८.१० ५१ पनसेऽपि २१३७ परुपपलितपरिखासु फ: २०३६ ५२ पुत्रेऽपि क्वचित् १२२५ १०१ ५४ प्रकृतिः शौरसेनी १०१२ ५५ प्रकृतिः संस्कृतम् १२।२ ५६ प्रकृत्या दोलादण्डदशनेषु १२॥३१ X X ५७ ब्रह्मण्यविज्ञकन्यकानां ण्यभ- न्यानां जो वा १२१७ ५८ भविष्यति मिपास्सं वा स्वर- दीर्घत्वञ्च १२।२१ ५६ भाजने जस्य ३४ X ६० भोभुवस्तिङि १२।१२ भ्यसो हिन्तो सुन्तो ५७ ६१ मागवी ११११ ६२ मिपो लोटि च રાર मृजेलभसुपौ કા૬૭ ६३ ययि तद्वर्गान्तः ४११७ यावादादिपु वस्य ४१५ ६४ राज्ञो राचि टाङसिङ्स्- ङिपु वा १०११२ रुपादीनां दीर्घता 5.४६ ६५ र्यस्य रिग्रः १०१८ ६६ र्ययोग्य १११७ x X १६ भियो-भाः वीही X भ्यसो हितो सुत्तो २१ X ३७४ X मृजेलुभ-पुसौ x यावदादिपु वस्य X १३४ रुपादीनां दीर्घः ३८४ X.X.

[ १७ ] प्राकृतानन्दस्य सूत्राणि सूत्राद्ध प्राकृतप्रकाशस्य सूत्राणि सूत्रा लाहल-लाङ्गल-लाङ्ग लेपु वा रणः ६८ X २० लतः क्लृप्तः इलि १९१ XXXXX ३९७ वे क्के च X शकेस्तर-च-तीराः X ३८ X X X षट्-शावकसप्तपर्णानां छः लाहले णः २१४० ६७ लिहेलिज्झ बा४६ X ६८ वर्गाणां तृतीयचतुर्थयोर- युजोरनाद्योराद्यौ १०१३ ६६ वाप्पेऽश्रुरिण हः ३१३८ ७० विश्वेन अवधारणे ६३ ७१ A विसिन्यां भः २।३८ ७१ B बृहस्पतौ वहेर्भाग्यो ४/३० वेक्वे च ८।३१ ७२ व्यापते डः १२।४ शकेस्तरव अतीराः मा७० ७३ शीकरे भः २।५ ७४ शृगालशब्दस्य शियाला शिमाले शियालकाः ११११७ ७५ शेषं महाराष्ट्रीवत् १२।३२ ७६ शौरसेनी १२।१ षट्शावकसप्तपर्णानां हूः २।४१ ७७ षसोः सः ११।३ ७८ ष्टस्य सटः १०॥६ प्टाध्यागानांठाझाअभायाः ८२५ सर्वज्ञतुल्येषु नः ३१५ ७६ सर्वज्ञङ्गितज्ञयोर्ण १२।८ ८० सर्वनाम्नां डे सित्वा १२।२६ ३१३७ X ३१३ ८३ स्थश्चिट्ठः १२।१६ ८४ स्मरतेः सुमर १२।१७ ८५ स्त्रियामित्थी १२२२२ ८६ स्नस्य सनः १०१७ हुदानपृच्छानिर्धारणेषु ६२ ८७ हृदयस्य हितकम् १०११४ ८८ हृदयस्य हडक्कः ११११६ हहह्मपु नलमां स्थितिरूव॑म् ३८ हस्रष्णरणश्नां पहः 88 X X ष्ठा-ध्या-गाना-ठान-माअ-गायाः ३६६ सर्वज्ञतुल्येषु अस्य १०५ X X X ८१ सिच २१ सीकरे भः ७६ X ८२ स्तम्वे X X X X हुंदानपृच्छानिर्धारणेषु २६० X. X हन-ल-ह्मपुनलमां स्थितिरूव॑म् १०८ ह,नः स्नः ष्णक्षणश्नां पहः ४३.

भाषा द्विधा संस्कृता च प्राकृता चेति भेदतः ।
कौमारपाणिनीयादिसंस्कृता संस्कृता भवेत् ॥ १
इयं तु देवतादीनां मुनीनां नायकस्य च
विप्रक्षत्रियविशूद्रमन्त्रिकञ्चुकिनामपि ॥ २
गार्यगालवशाकल्यपाणिन्याद्या यथर्षयः ।
शब्दराशेः संस्कृतस्य व्याकर्त्तारो महत्तमाः ।। ३
.
तथैव प्राकृतादीनां षड्भाषाणां महामुनिः ।
आदिकाव्यकृदाचार्यो व्याकर्ता लोकविश्रुतः ॥ ४
यथैव रामचरितं संस्कृतं तेन निर्मितम् ।
तथैव प्राकृतेनापि निर्मितं हि सतां मुदे ॥ ५.
+
.
1
पाणिन्यायैः शिक्षितत्त्वात्संस्कृती स्याद्यथोत्तमा ।
प्राचेतसव्याकृतत्त्वात्प्राकृत्यपि तथोत्तमा ।। ६

पण्डित-रघुनाथ-कवि-विरचित प्राकृतानन्द . ... www WM प्रेङ्खन्नखच्छविमिथश्छुरितेन यस्मिन् , रक्ताचलग्रथनकौतुकमन्वकारि। खेदोद्गमद्विगुणदानजलः स भूयान्, भूयात् करग्रहविधिः शिवयोः शिवाय ॥१॥ रचयति नृसिंहरत्यै रघुनाथः सरसदैववित्तनयः । रसिकानन्दनिमित्तं सानन्दं प्राकृतानन्दम् ॥ २॥ दोषदुष्टमिदमित्यवज्ञया हातुमिच्छत न जातु साधवः ।। शैवलं किल विहाय केवलं निर्मलं किमु न पीयते जलम् ? ॥३॥ ये पण्डितकुलोत्पन्ना रसवन्तोऽल्पबुद्धयः। तदर्थमयमारम्भः किमज्ञातं मनीषिणाम् ? ॥४॥ my .. सन्धावचामलोपविशेषा बहुलम् ॥ १ ॥ :- अचां सन्धावविशेषा लोपश्च वा स्युः। नदीस्रोतः णइसोत्तो। राम ओ इति स्थिते रामो, अकारलोपः। मो बिन्दुः॥२॥ मस्य अनुखारः स्यात् । कण्ह अम् इति स्थिते कण्हं । अचि मश्च ॥३॥ अचि परे मस्य म एव स्यात् । अनुस्खारापवादः। धणम् ओहरइ इति स्थिते धणमोहरइ । 'अनचि मो बिन्दुः' इत्येव सूत्रयितु- मुचितम् । नञो हलि॥४॥ नकार-कारयोः अनुस्वारः स्याद् हलि । अन्सः अंसो, अत्र नस्य अनुसारः । वचितः वंचिओ, अत्र अस्य । -- २ पण्डित-रघुनाथ -कवि-विरचित वक्रादिषु ॥ ५॥ एषु अनुखारागमः स्यात् । वक्रं वंकं । वक्र त्र्यन ह्रख अश्रु श्मश्रु गृष्टि मूर्द्धन् मनखिनी दर्शन स्पर्श वर्ण प्रतिश्रुत् अश्व अभिमुक्त वक्रादिः। मांसादिषु वा ॥ ६॥ एषु वा बिन्दुः स्यात् । संयोगेऽणो हस्खं इति वाच्यम् । मांसं मंसं मासं । आकृतिगणोऽयम् । झयि तद्वर्गान्तः ॥७॥ तद्वर्गान्तोऽनुस्खारो वा स्याद् झयि । शङ्का संका सङ्का । ॥ इति सन्धिः॥ * अत ओत् सोः ॥८॥ अकारान्तात् परस्य सोः ओत् स्यात् ।। नो णः सर्वत्र ॥ ९॥ यत्र कचित् स्थितस्य नस्य णः स्यात् । क-ग-च-ज-त-द-प-य-वां प्रायो लोपः ॥ १० ॥ कादीनां नवानामयुक्तानामनादिवर्तिनां प्रायो लोपः स्यात् । नारायणः णाराअणो । अयुक्तानामिति किम् ? शक्रः सक्को इत्यादि । अनादिवर्तिनामिति किम् ? कृष्णः कण्हो इत्यादि । द्विवचनस्य बहुवचनम् ॥ ११ ॥ सुपां तिङ च द्विवचनस्य बहुवचनं स्यात् । जसू-शसोर्लोपः॥ १२ ॥ अकारान्तात् परयोः जस-शसोः लोपः स्यात् । जसू-शस-ङसि-आमसु दीर्घः ॥ १३ ॥ एषु अतो दीर्घः स्यात् । ए च सुप्यङि-ङसोः ॥ १४ ॥ अकारस्य एत्वं स्यात् सुपि, न तु डि-उसोः। चाद् दीर्घोऽपि नारायणी नारायणाः णाराअणे णाराअणा। अडि-ङसोरिति किम् ? नारायणे णाराअणम्मि, नारायणस्य णाराअणस्स ।

प्राकृतानन्द ३ 7 4 m अतोऽमः ॥ १५॥ ': अकारान्तात् परस्य अमः अकारस्य लोपः स्यात् । नारायणं नाराअणं । ननु 'सन्धावचाम्' (१) इति अलोपेनैव भाव्यम् इति चेत्, न, तत्र बहुलग्रहणात् कचिदप्रवृत्तेरपि सम्भावनीयत्वात्। नारायणान् णाराअणा णाराअणे। टा-ऽऽमोर्णः ॥ १६ ॥ अकारान्तात् परयोः टा-ऽऽमोः णः स्यात् । नारायणेन णारा- अणेण । नारायणानां णाराअणाणं । भिसो हिं॥ १७ ॥ 2 . अकारान्तात् परस्य भिसो हिं इत्यादेशः स्यात् । नारायणैः णाराअणेहिं। चतुर्थ्याः षष्ठी ॥ १८॥ स्यात् । तथा हि। स्सो उसः॥ १९॥ अकारान्तात् परस्य उसः स्स इत्यादेशः स्यात् । नारायणाय णाराअणस्स । नारायणेभ्यः णाराअणाणं । डसेः आ-दो-दु-हयः ॥ २० ॥ अदन्तात् परस्य उसे आ दो दुहि इति प्रत्येक चत्वार आदेशाः स्युः । नारायणात् णाराअणा णाराअणादो णाराअणादु णारायणाहि। 'जस-शसू०' (१३) इति दीर्घः। भ्यसो हिंतो सुत्तो ॥ २१ ॥ अदन्ताद् भ्यसो हिंतो मुत्तो इत्येतो आदेशौ स्याताम् । नारा- यणेभ्यः णाराअणाहिंतो णाराअणासुत्तो । नारायणस्य णाराअणस्स। .: ए-म्मी ॥ २२ ॥ अदन्ताद ङि इति सप्तम्येकवचनस्य ए म्मि इत्येतौ स्याताम् । क्वचिद् ङसि-योर्लोपः ॥ २३ ॥ उसि-ड्योः परयोः कचिदतो लोपः स्यात् । नारायणे णाराअणे णाराअणम्मि। .

४ पण्डित-रघुनाथ-कवि-विरचित 4 2 सुपः सुः ॥ २४ ॥ :: : अदन्तात् परस्य सुपः सु इत्यादेशः स्यात् । ओत्वापवादः । नारायणेषु णाराअणेसु । 'ए च०' (१४) इति एत्वम् । नाऽऽमन्त्रणे सावोत्व-दीर्घत्व-बिन्दवः ॥ २५ ॥ सम्बोधने ओत्व-दीर्घत्वाऽनुखारा न स्युः। अन्त्यस्य हलः ॥ २६ ॥ [अन्त्यस्य हलः] लोपः स्यात् । हे नारायण हे णाराअण । रागः राओ। 'क-ग.' (१०) इति गलोपः। रागाः राआ राए, 'जस्-शसो' (१२) इति लोपः, 'जस्-शस्' (१३) इति दीर्घः । रागम् राअं। रागान् राआ राए । रागेण राएण । रागैः राएहिं । रागाय राअस्स । रागेभ्यः राआणं । रागात् राआ राआदो राआदु राआहि । रागेभ्यः राआहिंतो राआसुत्तो। रागस्य राअस्स । रागाणाम् राआणं । रागे राए राअम्मि । रागेषु.राएसु। आदेरतः ॥ २७ ॥ -इत्यधिकृत्य । इदीषत्-पक्क-स्वप्न-बेतस-व्यजन-मृदङ्गा-ऽङ्गारेषु ॥ २८ ॥ एषु सप्तसु मध्ये आदेः अतः इ: स्यात् उद् ऋत्वादिषु ॥ २९॥ एषु ऋतः उ: स्यात् । मृदङ्गः मुइंगो। ऋतु मृणाल पृथिवी वृन्दा- वन प्राट् प्रवृत्ति विवृत संवृत निवृत वृत्तान्त परभृत.मातृक जामा- तृक मृदङ्ग इत्यादि ऋत्वादिः। विप्रकर्षः ॥ ३०॥ -इत्यधिकृत्य। युक्तस्य ॥ ३१॥ -इत्यधिकृत्य। इः श्री-ही-क्रीत-क्लान्त-क्लेश-म्लान-स्वप्न-स्पर्श-हर्षा-ऽहं-गर्हेषु ॥ ३२ ॥ एषु एकादशसु युक्तस्य विप्रकर्षः स्यात्, पूर्वस्य इत्वम्, तत्ख- रता च । 'नो याः०' (९) इति णः । स्वतः सिविणो इत्यादि । 'उपरि०' (३६) इति वक्ष्यमाणेन पलोपः।

प्राकृतानन्द प्रतिसर-वेतस-पताकासु डः ॥ ३३ ॥ १५ एषु तस्य डः स्यात् । प्रतिसरः पडिसरो । 'सर्वत्रः' (३४) इति वक्ष्यमाणेन रलोपः। ननु पडिवआ पडिसिद्धि इत्यादौ तस्य ड: केन ? इति चेत्, उच्यते, प्रतिसर इत्यत्र प्रतिना सरति प्रतिपूर्वक इति यावद् इति व्याख्यानात्, 'प्रतिसर'शब्दस्यापि प्रतिनैव सरत्वा- दितिं । वेतसः वेडिसो। सर्वत्र लबराम् ॥ ३४ ॥ संयुक्तस्य उपर्यधःस्थितानां लकार-बकार-रेफाणां लोपः स्यात् । शेषा-ऽऽदेशयोईित्वमनादौ ॥ ३५ ॥ युक्तस्य लोपे जाते यः शेषः आदेशश्च तयोः अनादौ वर्तमान- योर्द्वित्वं स्यात् । पक्कः पिक्को। उपरि लोपः क-ग-ड-त-द-प-ष-साम् ॥ ३६ ॥ कादीनामष्टानां युक्तस्य उपरिस्थितानां लोप: स्यात् । भक्ता भत्तो। वर्गेषु युजः पूर्वः॥ ३७॥ 'शेषा' (३५) इति यस्य द्वित्वं क्रियते स द्वितीयः चतुर्थो वा चेत् तत्पूर्वः प्रथमः तृतीयो वा स्यात् । मुग्धः मुद्धो । खड्गः खग्गो । उत्पीतः उप्पीओ। सद्गमः सग्गमो। आप्तः अत्तो। वसिष्ठः वसिहो। स्नेहे वा ॥ ३८॥ अत्र युक्तस्य विप्रकर्षों वा स्यात् , पूर्वस्य अत्वं च । लेहः सणेहो णेहो। आदेखें जः ॥ ३९ ॥ शब्दस्य आदिभूतयकारस्य ज-आदेशः स्यात् । अधो म-न-याम् ॥ ४० ॥ युक्तस्य अधःस्थितानामेषां लोपः स्यात् । योग्यः जोग्गो। ... ए शय्यादिषु ।। ४१॥. एषु आदेः अकारस्य एत्वं स्यात् । उत्करः उकेरो । शय्या सौन्दर्य उत्कर त्रयोदश आश्चर्य पर्यन्त बल्ली शय्यादिः ।

८ पण्डित -रघुनाथ-कवि-विरचित हरिद्रादीनां रो लः॥ ६०॥ एषामयुक्तस्य रेफस्य लादेशः स्यात् । युधिष्ठिरः जहिटिलो । हरिद्रा चरण मुखर युधिष्ठिर करुण अङ्गुरी अङ्गार किरात परिखा परिघ हरिद्रादिः । चरणः चलणो । मुखर मुहलो । अङ्गारः इंगालो, 'इद् ईषत् (२८) इति इत्वम् । किराते चः॥६१॥ अन आदेः चः स्यात् । ऋत्वादिषु तो दः ॥ ६२ ॥ एषु तस्य दः स्यात् । किरातः चिलादो। ऋतु रजत आगत निर्वृति आकृति संवृति सुकृति हत संयत विवृत सञ्जात सम्प्रति प्रतिपत्ति ऋत्वादिः। परुष-परिघ-परिखासु फः ॥ ६३ ॥ एषु आदेः फः स्यात् । परुषः फरुसो । परिघः फलिहों । आगतः आअदो। हतः हदो । संयतः संजदो, 'आदेखें जः' (३९) इति जः। सम उपसर्गत्वाद् यत इति यकारस्य आदिस्थत्वम् । इत् पुरुषे रोः॥६४॥ अत्र रोः उत इत् स्यात् । पुरुषः पुरिसो। रोरिति किम् ? पका- राद् उकारस्य मा भूत् । अयुक्तस्य रिः॥६५॥ वर्णान्तरेण अयुक्तस्य ऋकारस्य रिः इत्यादेशः स्यात् । ऋद्धः रिद्धो। वृक्षे वेन रुर्वा ॥ ६६ ॥ वृक्षशब्दे वशब्देन सह ऋकारस्य सः वा स्यात् । व्यवस्थित- विभाषेयम् , तेन च्छत्वपक्षे न भवति, खत्वपक्षे तु स्यादेव । क्षमा-वृक्ष-क्षणेषु वा ॥ ६७ ॥ एषु क्षस्य वा च्छः । पक्षे 'एक-स्कर (५६) इति खा, 'ऋतोऽत्' (१२०) इति वक्ष्यमाणेन अकारः । वृक्षः वच्छो रुक्खो।

11 प्राकृतानन्द एत इद् वेदना-देवरयोः ॥ ६८ ॥ अनयोः आदेः एत इर्वा स्यात् । देवरः दिअरो देअरो, “क-ग' (१०) इति वलोपः। ऐत एत् ॥ ६९॥ आदेः ऐतः ए: स्यात् । शैल: सेलो। कैलासः केलासो। दैत्यादिष्वइः ॥ ७० ॥ दैत्यादिषु ऐकारस्य अइः इत्यादेशः स्यात् ॥ त्य-थ्य-द्यां च-च्छ-जाः॥ ७१ ॥ त्रयाणां क्रमेण त्रयः स्युः । दैत्यः दइच्चो । चैत्रः चइत्तो, 'सर्वत्र' (३४) इति रलोपः। भैरवः भइरवो । वैदेशः वइदेसो । वैदेहः वइ- देहो । कैतवः कइअवो । वैशाखः वइसाहो, 'ख-घ०' (५९) इति हः। वैशिकः वइसिओ। वैशम्पायनः वइसंपाअणो। दैत्य चैत्र भैरव स्वैर वैर वैदेश वैदेह कैतव वैशाख वैशिक वैशम्पायन दैत्यादिः । ओतोऽद् वा प्रकोष्ठे कस्य वः ॥ ७२ ॥ प्रकोष्ठशब्दे ओतः अद् वा स्यात्, कस्य च वः स्यात् । प्रकोष्ठः पवट्ठो, 'सर्वत्र' (३२) इति रलोपः, 'उपरि०' (३६) इति षलोपः, 'शेषा' (३५) इति द्वित्वम् । पक्षे पओहो, 'क-ग' (१०) इति कलोपः। औत ओत् ॥ ७३ ॥ आदेः औकारस्य ओत् स्यात् । पौत्रः पोत्तो। पौरादिष्वउः ॥ ७४ ॥ एषु औकारस्य अउः इत्यादेशः स्यात् । ओत्वापवादः । पौरः पउरो। कौरवः कउरवो। कौशले वा ॥ ७५॥ कउसलो कोसलो। आकृतिगणोऽयम् । उत् सौन्दर्यादिषु ॥ ७६ ॥ एषु औकारस्य उत् स्यात् । मौजायनः मुंजाअणो। शौण्डः सुंडो। कौक्षेयकः कुक्खेअओ, 'वर्गेषु०' (३१) इति कः, 'क-ग. (१०) इति य-कोर्लोपः । सौन्दर्य मौञ्जायन शौण्ड कौक्षेयक दौवारिकादयः सौन्द- यादिः। २ .. पण्डित-रघुनाथ-कवि-विरचित मयूर-मयूख-योर्खा वा ॥ ४२ ॥ अनयोः यूशब्देन सह आदेः अत ओत्वं वा स्यात् मयूरः मोरो। मयूखः मोहो । पक्षे 'क-ग' (१०) इति यलोपः, मऊरो मऊहो । आ समृद्ध्यादिषु वा ॥ ४३ ॥ अविभक्तिको निर्देशः । 'सविसर्गः पाठः' इति केचित् । एषु आदेः अकारस्य आकारो वा स्यात् । समृद्धि प्रकट अभिजाति मनस्विनी प्रतिपत् सहक्ष प्रतिस्पर्द्धि प्रसुप्त प्रसिद्धि अश्व । आकृति- गणोऽयम्। शषोः सः॥४४॥ सर्वत्र शस्य षस्य च सः स्यात् । अश्वः आसो अस्सो। अदातो यथादिषु वा ॥ ४५ ॥ एषु आतः स्थाने वा अत् स्यात् । प्रहारः पहरो पहारो "सर्वत्र (३४) इति रलोपः । हालिका हलिओ हालिओ। यथा तथा प्राकृत तालवृन्त उत्खात चामर प्रहार चाटु दावाग्नि खादित संस्थापित मृगाङ्क हालिक यथादिः। उद् इक्षु-वृश्चिकयोः ॥ ४६ ॥ अनयोः इत उत् स्यात् । वृश्चिके छः ॥ ४७ ॥ युक्तस्य स्यात् । वक्ष्यमाण'श्व-त्स-प्सां छ:' (१२४) इति च्छत्वापवादः । इद् ऋष्यादिषु ॥ ४८ ॥ एषु ऋकारस्य इत् स्यात् । वृश्चिकः विञ्छुओ। ऋषि वृषी गृष्टि सृष्टि दृष्टि शृङ्गार मृगाङ्क भृङ्ग भृङ्गार हृदय वितृष्ण बृंहित कृशरा कृत्या वृश्चिक कृपा शृगाल कृति कृत्ति कृषि ऋष्यादिः । शृङ्गारः सिंगारो । मृगाङ्कः मिअंको, यथादित्वाद् आत अः। भृङ्गः भिंगो । भृङ्गारः भिंगारो। ह-स्त्र-ष्ण-क्ष्ण-श्नां पहः ॥ ४९ ॥ एषां पहादेशः स्यात् । वितृष्णः वितिण्हो। शृगालः सिआलो। .

प्राकृतानन्द ईत सिंह-जिह्वयोश्च ॥ ५० ॥ अनयोः इत ईत् स्यात् । सिंहः सीहो । इद् ईतः पानीयादिषु ॥ ५१ ॥ एषु ईत इत् स्यात् । करीषः करिसो । पानीय अलीक वीडित व्यलीक गृहीत तदानीम् करीष द्वितीय तृतीय गभीर पानीयादिः । एत् नीडा-ऽऽपीड-कीहगीदृशेषु ॥ ५२ ॥ एषु ईत एत् स्यात्। आपीडे.मः ॥ ५३ ॥ - पस्य मा स्यात् । लोपं बाधित्वा प्राप्तस्य 'पो वः' (८५) इति वक्ष्यमाण-व-त्वस्यापवादः । आपीड: आमेलो। कचिद् युक्तस्यापि ॥ ५४ ॥ वर्णान्तरेण युक्तस्यापि ऋकारस्य कचिद् रिः स्यात् । 'क-ग' (१०) इति द-लोपः । कीदृशः केरिसो । ईदृशः एरिसो। उत ओत् तुण्डरूपेषु ॥ ५५ ॥ संयुक्तवर्णपरोकारेषु उत ओत् स्यात् । क-स्क-क्षा क्खः ॥ ५६.॥ एषां क्खादेशः स्यात् । पुष्करः पोक्खरो। स्तस्य थः ॥ ५७ ॥ स्यात् । 'उपरि लोप:०' (३६) इत्यस्यापवादः। पुस्तकः पोत्थओ। लुब्धकः लोद्धओ। 'उत ओत्' (५५) इत्यस्य प्रायिकत्वात् लुद्धओ। अत्र 'सर्वत्र' (३४) इति ब-वयोरक्या लोपे शेषस्य धस्य 'शेषा (३५) इति द्वित्वे दपूर्वी धकारः। अन्मुकुटादिषु ॥ ५८ ॥ एषु आदेः उतः अत् स्यात् । मुकुट मुकुल गुरु गुर्वी युधिष्ठिर सौकुमार्य मुकुटादिः । आदेयों जः' (३९) इति जः, 'उपरि० (३६) इति पलोपः, 'शेषा' (३५) इति द्वित्वम् । ख-घ-थ-ध-भां हः ॥ ५९॥ एषां पञ्चानामयुक्तानामनादिवर्तिनां हादेशः स्यात् ।। . .

१० , पण्डित-रधुनाथ-कवि-विरचित स्फटिक-चिकुर-निकषेषु कस्य हः ॥ ७७ ॥ एषु ककारस्य हादेशः स्यात् । 'क-ग.' (१०) इति कलोपापवादः । स्फटिके लः ॥ ७८ ॥ अत्र दस्य लः स्यात् । 'टो डः' (८८) इति वक्ष्यमाणस्यापवादः । 'उपरि०' (३६) इति सलोपः, स्फटिकः फलिहो । चिकुरः चिहुरो । निकषः णिहसो, 'नो णः०' (९) इति णत्वम् , 'शषोः०' (४४) इति सः। सीकरे भः ॥ ७९ ॥ अन कस्य भः स्यात् । 'क-ग.' (१०) इत्यस्यापवादः । सीकरः सीभरो। गर्भिते णः ॥ ८० ॥ तस्य णः स्यात् । गर्भितः गम्भिणो। वसति-भरतयोहः॥ ८१॥ अनयोः तस्य हः स्यात् । लोपापवादः । भरतः भरहो। ऐरावते च ॥ ८२॥ अत्र तस्य णः स्यात् । लोपापवादः । ऐरावतः एरावणो, 'ऐत एत् (६९) इति एत् । प्रदीप्त-कदम्ब-दोहदेषु दोलः ॥ ८३ ॥ एषु अनादिभूतस्य दस्य लः स्यात् । कदम्बः कलंबो। दोहदः णोहलो। अनेति (अनादीति) किम् ? आद्यस्य मा भूत् । 'दोहदे णः' (९७) इति, वक्ष्यमाणेन णः । गद्गदे रः॥ ८४ ॥ अत्र अयुक्तस्य दस्य ः स्यात् । 'उपरि०' (३६) इति दलोपः, गद्गदः गग्गरो। पो वः ॥ ८५॥ पस्य अयुक्तस्य अनादिभूतस्य वः स्यात् । शपथः सवहो, 'ख-घ०' (५९) इति हः । ननु पस्य लोपोक्तेः कथं पस्य वविधिः ? इति चेत्, उच्यते, लोपविधौ ‘प्रायः' (सू० १०) इत्युक्तेः यत्र लोपाभावस्तत्रैव अस्य प्रवृत्तिः। -- प्राकृतानन्द.. ११ उत्तरीया-ऽनीययोर्यस्य जो वा ॥ ८६ ॥ उत्तरीयशब्दस्य अनीयप्रत्ययस्य च यो यकारः तस्य जो वा स्यात् रमणीयः रमणिज्जो। कबन्धे बो मः ॥ ८७ ॥ अत्र बस्य मः स्यात् । लोपापवादः । कबन्धः कमंधो। टो डः॥ ८८ ॥ टस्य अयुक्तस्य अनादिभूतस्य डः स्यात् । विटपः विडवो। सटा-शकट-कैटभेषु ढः॥ ८९ ॥ एषु टस्य ढः स्यात् । डापवादः । शकटं सअढो। कैटभे वः ॥ ९० ॥ भस्य वः स्यात् । कैटभः केढवो, 'ऐत एत्' (६९) इति एत् । फो भः ॥ ९१ ॥ स्यात् । सफलः सभलो। प्रथम-शिथिल-निषधेषु ढः ॥ ९२ ॥ एषु थ-धयोः ढादेशः स्यात् । हापवादः। प्रथमः पढमो । शिथिलः सिढिलो । निषधः णिसढो। कुब्जेः खः ॥ ९३ ॥ अत्र आदेः वर्णस्य खादेशः स्यात् । कुनः खुजो। दोला-दण्ड-दशनेषु डः ॥ ९४ ॥ एषां आदेः डः स्यात् । दण्डः डंडो । दशनः डसणो। मन्मथे वः ॥१५॥ अन आदेः वः स्यात् । न्मो म्मः ॥ ९६ ॥ स्यात् । मन्मथः वम्महो, 'ख-घ०' (५९) इति हो। दोहदे णः ॥ ९७॥ अत्र आदेः णः स्यात् । दोहदः णोहलो। लाहल-लाङ्गल-लाङ्गुलेषु वा णः ॥ ९८ ॥ एतेषु शब्देषु आदेर्वर्णस्य णो वा स्यात् । लाहलः णाहलो। लाङ्गला पांगलो।

१२ , पण्डित-रघुनाथ -कवि-विरचित षट्-शावक-सप्तपर्णानां छः॥ ९९ ॥ एषु आदेः छः स्यात् । षण्मुखः छम्मुहो। शावकः छावओ। सप्त- पर्णः छत्तवण्णो, 'पो वा' (८५) इति वत्वम् , 'सर्वत्र' (३४) इति रलोपः। दशादिषु हः॥ १०० ॥ एषु शस्य हा स्यात् । सङ्ख्यायां च ॥ १०१ ॥ सङ्ख्यावाचिशब्दसम्बन्धिदकारस्य र स्यात् । एकादशः एआरहो । द्वादशः बारहो । त्रयोदशः तेरहो, शय्यादित्वाद् एत् । संज्ञायां वा ॥ १०२॥ संज्ञायां दशादेः शस्य हो वा स्यात् । दशमुखः दहमुहो दसमुहो। दशरथः दहरहो दसरहो। दिवसे सस्य ॥ १०३ ॥ हः स्याद् वा । दिवसः दिअहो दिअसो। द्रे रो वा ॥ १०४॥ द्रशन्दे रेफस्य लोपो वा स्यात् । इंद्रः इंदो इंद्रो। द्रुतः दुओ द्रुओ। सर्वज्ञतुल्येषु अस्य ॥ १०५ ॥ सर्वज्ञ इत्येवमाकृतिषु अस्य लोप: स्यात् । सर्वज्ञः सबजो। अन ज्ञे जकारजकारयोर्मध्ये अकारलोपे 'शेषा' (३५) इति द्वित्वम् । जानाते- यानि सोपपदानि रूपाणि तत्राय लोपः। मध्याह्ने हस्य ॥ १०६॥ लोप: स्यात् । वक्ष्यमाणोद्धस्थितेः (१०८) अपवादः ॥ ध्य-योझः॥ १०७ ॥ स्यात् । मध्याह्नः मज्झण्णो। ह्न-ह-मेषु न-ल-मां स्थितिरूध्दर्वम् ॥ १०८ ॥ एषु त्रिषु अधःस्थितानां नकार-लकार-मकाराणां त्रिभ्य उपरि स्थितिः स्यात् । प्रह्लादः पल्हादो। अत्र हग्रहणं चिन्त्यम् , 'ह-स्न-ष्ण' (४९) इति पहादेशे नस्य स्वयमेव उपरिष्टाद् (१०६) भूतत्वात् कौस्तुभः कोत्थुहो, 'औत ओत् (७३) 'स्तस्य था' (५७) 'ख-घ०' (५९) इति हः।

प्राकृतानन्द १३.. न स्तम्बे ॥१०९॥ स्तस्य थो न स्यात् । 'उपरि०' (३६) इति सलोपः। तैः इति पाठा- न्तरम् । स्तम्बः तंबो। स्तम्भे खः ॥ ११०॥ स्तस्य खः स्यात् । थापवादः । स्तम्भः खंभो। स्फोटके ॥ १११॥ अत्र युक्तस्य खः स्यात् । स्फोटकः खोडओ, 'टो डा' (८८) इति डः। र्य-शय्या-ऽभिमन्युषु जः॥ ११२ ॥ र्य इत्येतस्य शय्या-अभिमन्युशब्दयोश्च युक्तस्य जः स्यात् । कार्यः कजो। र-जौ सूर्ये वा ॥ ११३॥ सूर्यशब्दे युक्तस्य वा स्याताम्। न र-होः ॥ ११४॥ रेफ-हकारयोर्द्वित्वं न स्यात् । सूर्यः सूरो सुज्जो। तस्य टः ॥ ११५॥ स्पष्टम् । कैवतः केवट्टो, 'ऐत एत्' (६९) इति एत् । न धूर्त्तादिषु ॥ ११६ ॥ तस्य टो न स्यात् । धूतः धुत्तो, 'सर्वत्र' (३४) इति रलोपः। आवतः आवत्तो । संवत्तः संवत्तो। निवतः णिवत्तो। आतः अत्तो। धूर्त कीर्ति वर्तमान वर्त्त आवर्त संवर्त निवर्त्त वर्तिका आर्त कर्तरी मूर्ति धूर्तीदिः। गर्ने डः ॥ ११७॥ तस्य डः स्यात् । गतः गड्डो। एषु १ मनायमाशयः- यथा “न स्तम्बे" इति सूत्रपाठो दृश्यते तथा प्रत्यन्तरेषु "तः स्तम्" इत्यपि सूत्रपाठो दृश्यत इति ।

. १६ पण्डित-रघुनाथ-कविविरचित यावदादिषु वस्य ॥ १३४ ॥ लोपः। अनुवर्तमानः अणुअत्तमाणो । यावत् तावत् पारावत अनु- वर्तमान जीवित एवं एव अवट देवकुल यावदादिः।-आकृतिगणोऽयम् । सर्वः सहो। सर्वादेर्जस एत्वम् ॥ १३५ ॥ स्पष्टम् । सर्वे सन्वे । सर्व सवं । सर्वान् सन्वा । सर्वेण सत्वेण । सर्वैः सधेहिं । सर्वस्मै सबस्स । सर्वेभ्यः सबाणं । सर्वस्मात् सवा सव्वादो सवादु सवाहि, 'उसे' (२०) इत्यादेशाः । सर्वेभ्यः सचाहिंतो सवासुत्तो । सर्वस्य सबस्स । सर्वेषाम् सचाणं । ङः स्सि-म्मि-स्थाः ॥ १३६ ॥ सर्वादेः परस्य : इति सप्तम्येकवचनस्य सि स्मि त्थ इति त्रय आदेशाः स्युः। सर्वस्मिन् सबस्सि सबम्मि सव्वत्थ । सर्वेषु सवेसु । विश्वः विस्सो । उभौ उहे । उभशब्दस्य द्विवचनान्तत्वाद् द्विवचनस्य बहुवच- नादेशः। संस्कृते प्रसिद्धः सर्वादिः॥ शेषोऽदन्तवत् ॥ १३७ ॥ शेषस्तु विधिः अदन्तवत् स्यात् । तेन आकारान्तादपि 'अत ओत सोः' (८) इत्यादि विधिः प्रवर्तते । विश्वपाः विस्सवो इत्यादि। सु-भिस्-सुप्सु दीर्घः ॥ १३८ ॥ इदुदन्तयोः दीर्घः स्याद् एषु परेषु । 'अन्त्यस्य हलः' (२६) इति सोर्लोपः, अग्निः अग्गी । 'अधो' (४०) इति न लोपः। जस ओश्च यूत्वम् ॥ १३९ ॥ इदुदन्तयोः परस्य जस ओ इत्यादेशः स्याद् णो च, पूर्वस्य ईकारो- कारौ च स्याताम् । अग्नयः अग्गीओ अग्गीणो। पाठान्तरे तु- जस ओ वो वाऽत्वं यूत्वं च ॥ १४० ॥ इदुदन्तयोः शब्दयोर्जसः ओ वो इत्येतावादेशौ स्याताम् , अत्वम् ईत्वम् अत्वं च विकल्पेन स्यात् णो च । पक्षे अदन्तवत् । अग्नयः अग्गीओ अग्गीवो अग्गीणो अग्गओ अग्गवो अग्गी। हे अग्ने हे अग्गि। अग्निं अग्गिं । , १७ प्राकृतानन्द इदुतोः शसो णो ॥ १४० ॥ इदुदन्तयोः शसो णो स्यात् । अग्नीन् अग्गिणो । टाणा ॥ १४१ ॥ इदुदन्तयोः टाया णा इत्यादेशः स्यात् । अग्निना अग्गिणा। न डि-डस्योरेदातौ ॥ १४२ ॥ इदुदन्तयोः परयोः ङि-ङस्योः एत् आत् इत्येतौ न स्याताम् । अग्नेः अग्गीदो अग्गीदु अग्गीहि । डि-उस्योरिति किम् ? समृद्ध्या समिद्धीए समिद्धीआ। 'टा-डग्स-डीनाम्' (१६०) इति एत्-आती। ए भ्यसि ॥१४३ ॥ इदुदन्तयोः भ्यसि एत्वं न स्यात् । अग्निभ्यः अग्गीहितो अग्गीसुत्तो। डसो वा ॥ १४४ ॥ इदुदन्तयोः उसो णो वा स्यात् । पक्षे 'शेषो (१३७) इत्य- तिदेशात् 'उसः स्सः' (१९) इति स्सः। अग्नेः अग्गीणो [अग्गिस्स]। अग्नीनाम् अग्गीणं । अग्नौ अग्गिम्मि । अग्निषु अग्गीसु । ऋषिः इसी, 'इद् ऋष्यादिषु' (४८) इति इत्वम् । बृहस्पतौ ब-होर्भ-औ॥ १४५ ॥ अत्र बकार-हकारयोः क्रमेण भकाराकारी स्याताम् । बृहस्पतिः भअप्पई, 'उपरि०' (३६) इति सलोपः, 'शेषा' (३५) इति द्वित्वम्, 'क-ग' (१०) इति तलोपः, 'सु-भिस' (१३८) इति दीर्घः । गृहपतिः, गहवई, 'पो वः' (८५) इति वः ॥ द्विशब्दो नित्यं द्विवचनान्तः। द्वेर्दुवे दोणि वा ॥ १४६ ॥ द्विशब्दस्य जसा शसा च सह दुवे दोणि इत्येतावादेशौ स्याताम् । द्वौ दुवे दोणि। द्वेः॥ १४७ ॥ द्विशब्दस्य दो अयमादेशः स्यात् सुपि । द्वाभ्याम् दोहिं । द्वाभ्याम् दोहिंतो दोसुत्तो। एषामामो हं॥ १४८ ॥ द्वि-त्रि-चतुरामामो ण्हं इत्यादेशः स्यात् । णापवादः। द्वयोः दोण्हं। द्वयोः दोसु । त्रिशब्दो नित्यं बहुवचनान्तः। .

पण्डित -रघुनाथ-कवि-विरचित - -- अक्ष्यादिषु छः॥ ११८ ॥ एषु क्षस्य छः स्यात् । क्षुब्धः छुद्धो । उत्क्षिप्तः उच्छित्तो। 'उपरि०' (३६) इति पलोपः। सदृक्षः सरिच्छो, 'क-ग.' (१०) इति दलोपः, ऋ रिः। ऋक्षः रिच्छो । अक्षि लक्ष्मी क्षुण्ण क्षीर क्षुब्ध उत्क्षिप्त संदृक्ष इक्षु उक्षा क्षार ऋक्ष लक्षिका क्षुर क्षुत क्षेत्र वक्ष उदक्ष कुक्षि कक्षा रक्षा अक्ष्यादिः।क्षणः छणो खणो। प्म-यक्ष्म-विस्मयेषु म्हः ॥ ११९ ॥ म इत्यस्य यक्ष्म-विस्मययोश्च युक्तस्य म्हादेशः स्यात् । विस्मयः विम्हओ । लातः पहाओ, 'ह-ल.' (४९) इति बहादेशः। ऋतोऽत् ॥ १२० ॥ ऋत आदेः अत् स्यात् । कृष्णः कण्हो । प्रश्नः पण्हो। इत एत् पिण्डसमेषु ॥ १२१॥ एषु इकारस्य एत्वं स्यात् । समग्रहणं संयोगपरमुपलक्षयति। विश्नः वेण्हो। स्पस्य सर्वत्र स्थितस्य ॥ १२२ ॥ फा स्यात् । स्पन्दः फंदो। निस्पन्दः णिफंदो। बाष्पेऽश्रुणि हः ॥ १२३ ॥ वाष्पशब्दे पस्य हः स्यात् , अश्रुणि वाच्ये । बाष्पः बाहो, 'न र-होः' (११४) इति द्वित्वनिषेधः । अश्रुणि किम् ? बाष्पः बाफो ऊष्मा, वक्ष्यमाणः 'पस्य फा' (२०६)। कार्षापणे ॥ १२४ ॥ युक्तस्य हादेशः स्यात् । कार्षापणः कहावणो, 'पो वा (८५) इति वः। श्वस-प्सां छः ॥ १२५ ॥ त्रयाणां छः स्यात् । पाश्चात्यः पच्छत्तो । वत्सः वच्छो । ईप्सितः इच्छिओ। नोत्सुकोत्सवयोः ॥ १२६ ॥ अनयोः त्सस्य छादेशो न स्यात् । उत्सुकः ऊसुओ । उत्सवः असवो। , प्राकृतानन्द १५ , न-ज्ञ-पञ्चाशत्-पञ्चदशेषु णः ॥ १२७ ।। म्न-ज्ञ इत्येतयोः पञ्चाशत्-पञ्चदशशब्दयोश्च युक्तस्य णः स्यात् । प्रद्युम्नः पजुण्णो, 'त्य-थ्य' (७१) इति जः । यज्ञः जण्णो। भिन्दिपाले ण्डः ॥ १२८ ॥ युक्तस्य ण्डः स्यात् । भिन्दिपालः भिंडिवालो, 'पो वः' (८५) इति । विह्वले म्भ-हौ वा ॥ १२९ ॥ युक्तस्य एतौ वा स्याताम् । विह्वलः विभलो विहलो। न बिन्दुपरे ॥ १३० ॥ अनुस्वारात् परस्य द्वित्वं न स्यात् । सङ्कान्तः संकेतो। समासे वा ॥ १३१ ॥ समासे शेषा-ऽऽदेशयोवा द्वित्वं स्यात् । 'शेषा' (३५) इत्यत्र 'अनादौ' इत्युक्तेः अप्राप्तविभाषेयम् , अन्तर्वतिनी विभक्तिमाश्रित्य पदादित्वात् । छायाग्रामः छायाग्गामो छाहागामो, 'छायायां हः' (१६८) इति वक्ष्यमाणेन हः । सेवादिषु ॥ १३२ ॥ एषु अनादौ स्थितस्य हलो द्वित्वं वा स्यात् । निहितः णिहित्तो णिहिओ, 'न र-होः' (११४) इति निषेधाद् न हत्य द्वित्वम् । तूष्णीकः तुहिको तुण्हिओ, 'ह-न' (४९) इति पहः । दुःखितः दुक्खिओ, पक्षे 'ख-घ०' (५९) इति हः, दुहिओ। द्वित्वपक्षे 'वर्गेषु' (३९) इति कः। विश्राम: वीसामो विस्सामो। निःश्वासः णिस्सासो णीसासो । पुष्यः पुस्सो पूसो। सेवा एक नख दैव अशिव त्रैलोक्य निहित तूष्णीक कर्णिकार दीर्घरात्रि दुःखित अश्व ईश्वर विश्राम निःश्वास रश्मि मित्र पुष्य सेवादिः । उभ- यत्र विभाषेयम् , सेवादीनामप्राप्ते दीर्घादीनां शेषा०' (३५) इति प्राप्ते । कृष्णे वा ॥ १३३ ॥ अत्र युक्तस्य विप्रकर्षों वा स्यात्, पूर्वस्य तदचकता च । कृष्णः किसणो कण्हो। व्यवस्थितविभाषेयम् , तेन वर्णवाचके विप्रकर्षः, भग- वति न इति। , 1.

पण्डित-रघुनाथ-कवि-विरचित , , । तिण्णि जस-शस्भ्याम् ॥ १४९ ॥ जसा शसा च सह त्रिशब्दस्य तिणि इत्यादेशः स्यात् । त्रयः तिपिण। त्रेस्ती ॥१५॥ त्रिशब्दस्य ती इत्यादेशः स्यात् सुपि । त्रिभिः तीहिं । त्रिभ्यः तीहिंतो तीसुत्तो। त्रयाणाम् तीण्हं त्रिषु तीसु । सखा सही । सखायः सहीओ सहीणो । हे सहि । सखायम् सहिं । सखीन् सहिणो इत्यादि । पतिः पई । 'इत एत्' (१२१) इति एत्, विष्णुः वेण्हू । जहुः जण्हू । इक्षुः उच्छू, 'उद् इक्षु०' (४६) इति उत्वम् , अक्ष्यादित्वात् छः । ऋतुः उदू, 'उद् ऋत्वादिषु (२९) इति उत्वम्, 'ऋत्वादिषुः' (६२) इति दः। स्थाणावहरे ॥ १५१ ॥ युक्तस्य खादेशः स्यात्, न तु हरे अभिधेये । स्थाणुः खाणू । हर- वाचके तु थाणू, 'उपरि०' (३६) इति सलोपः, विष्णुवत् । 'य-शय्या' (११२) इति जा, अभिमन्युः अहिमन्जु । करेणुः सूर्यः करेणू सुनो। ऋत आरः सुपि ॥ १५२ ॥ ऋकारस्य आरः स्यात् सुपि । भर्ता भत्तारो॥ उर्जस्-शस्-टा-ङस्-सुप्सु वा ॥ १५३ ॥ जसि शसि दायां उसि सुपि च ऋकारस्य स्थाने उर्वा स्यात् । आरापवादः। भर्तारः भत्तारा भत्तूओ भत्तुणो, 'जस ओ०' (१३९) इति ओत्वं णो च । हे भतः हे भत्तारा। भर्तृन भत्तुणो, 'इदुतोः' (१४०) इति णो । भर्ना भत्तुणा भत्तारेण । भर्तृभिः भत्तारेहिं । भर्तुः भत्तुस्स भत्तारस्स । भर्तृणां भत्ताराणं । भरि भत्तारम्मि। भर्तृषु भत्तुसु भत्तारेसु। पितृ-भ्रातृ-जामातृणामरः॥ १५४ ॥ एषाम् ऋत अरः स्यात् सुपि । आरापवादः । आच्च सौ ॥ १५५॥ पित्रादीनाम् आत स्यात् सौ परे । पिता पिआ पिअरो इत्यादि। भ्राता भाआ भाअरो। जामाता जामाआ जामाअरो इत्यादि। इत्यजन्ताः पुंल्लिङ्गाः॥ .' ।- क प्राकृतानन्द पृष्ठा-ऽक्षि प्रश्नाः स्त्रियां वा ॥ १५६ ॥ पक्षे यथालिङ्गम् । प्रश्नः पण्हा । शय्या सेजा, 'ए शय्यादिषु' (४१) इति एत्वम्, 'र्य शय्या' (११२) इति जः। जसो वा ॥ १५७ ॥ स्त्रियां तिष्ठतो जस उ ओ इत्येतावादेशौ वा स्याताम् । शय्याः सेज्जाउ सेज्जाओ सेजा। अमि हवः ॥ १५८ ॥ स्त्रीवाचकस्य हखः स्याद् अमि परे । शय्याम् सेजं । स्त्रियां शस उदोतौ ॥ १५९ ॥ स्त्रीलिङ्गे वर्तमानस्य शस उत् ओत् इत्येतावादेशौ स्याताम् । शय्या: सेन्जाउ सेजाओ। टा-स्-डीनामिदेददातः ॥ १६० ॥ स्त्रीवाचकात् परेषां टा ङस् ङि इत्येतेषां इत् एत् अत् आत् एते आदेशाः स्युः। इति चतुर्वपि प्राप्तेषु - नाऽऽतोऽदातौ ॥ १६१ ॥ स्त्रीवाचकादाकारान्तात् शब्दात् परेषां टा-ङसू-डीनाम् अत्-आतौन स्याताम् । शय्यया सेजाइ सेजाए। शय्याभिः सेन्जाहिं। शय्यायाः सेजा सेज्जादो सेजादु सेजाहि । शय्याभ्यः सेन्जाहिंतो सेज्जासुत्तो। ङसो वा ॥१६२ ॥ उसः स्त्रियाम् उ ओ इत्येतावादेशी वा स्याताम् । शय्यायाः सेन्जाउ सेन्जाओ सेजस्स (2) सेजाइ सेजाए। शय्यानाम् सेजाणं । शय्यायाम् सेन्जाइ सेन्जाए। शय्यासु सेज्जासु । स्त्रियामात एत् ॥ १६३ ॥ सम्वुद्धौ स्त्रियाम् आत एत्वं स्यात् सौ। हे शय्ये हे सेन्जे, 'अन्त्यस्य' (२६) इति सोर्लोपः। लवण-नवमल्लिकयोर्वेन ॥ १६४ ॥ लवण-नवमल्लिकयोः आदेः अतो वकारेण सह ओकारः स्यात् । नवमल्लिका णोमल्लिआ । मल्लिका इत्येतदुपलक्षणम् , तेन नवफलिकाः .................... Ari-Ja २० पण्डित-रघुनाथ-कवि-विरचित णोभलिआ इति सिद्धम् । निद्रा णेद्दा णेद्रा, 'द्रे रो वा' (१०४) इति वा रलोपः, 'इत एत०' (१२१) इति एत्वम् । हे णेद्दे इत्यादि । अत् पथि-हरिद्रा-पृथिवीषु ॥ १६५ ॥ एषु इतो अत् स्यात् । हरिद्रा हलद्दा हलद्रा, 'हरिद्रादीनां' (६०) इति रेफस्य लः । जिह्वा जीहा, 'ईत् सिंह' (५०) इति ईत्वम्, "सर्वत्र०" (३४) इति वलोपः। भुक्ता मोत्ता, 'उत ओत्' (५५) इति ओत्वम् । घृणा घणा, 'ऋतोऽत्' (१२०) इति अत् । कृशरा किसरा । कृत्या किचा, 'त्य-थ्य०' (७१) इति चः। कृपा किवा, 'पो वः' (८५) इति वः । त्रिष्वपि 'ऋतोऽत्' (१२०) इति अत्वे प्राप्ते ऋष्यादित्वाद् इत्वम् । वेदना विअणा वेअणा, 'क-ग' (१०) इति दलोपः, 'नो णः' (९) इति णः। यमुनाया मस्य ॥ १६६ ॥ लोपः स्यात् । यमुना जउणा, 'आदेर्यो जा' (३९) इति जः। चन्द्रिकायां मः॥ १६७ ॥ कस्य मः स्यात् । चन्द्रिका चन्दिमा, 'सर्वत्र०' (३४) इति रलोपः। पताका पडाआ, 'प्रतिसर०' (३३) इति तस्य डः, 'क-ग' (१०) इति कलोपः। छायायां हः ॥ १६८ ॥ यस्य हः स्यात् छाया छाहा। रमणीया रमणिजा, 'उत्तरीया०' (८६) इति जा, 'शेषादेशः' (३५) इति द्वित्वम् । सटा सढा । राधा राहा । सभा सहा । शोभा सोहा । परिखा फलिहा, हरिद्रादित्वाद् लः, 'परुषः' (६३) इति फः, 'ख-घ०' (५९) इति हः । दोला डोला, 'दोला-दण्ड०' (९४) इति डः। निशा णिसा। स्नुषायां ग्रहः ॥ १६९ ॥ पस्य पहः स्यात् । स्नुषा सोण्हा, तुण्डरूपत्वाद् उत ओत्वम् । उल्का उका, 'सर्वत्र' (३४) इति ललोपः। वार्ता वत्ता, 'तस्य टः' (११५) इति प्राप्ते धादित्वान्न वर्तिका वत्तिआ, पूर्ववत् । सन्ध्या संझा, 'ध्य-योझ' (१०७) इति झः । सत्या सचा, 'त्य-थ्य' (७१) , प्राकृतानन्द २१ १ --- : इतिचः । मिथ्या मिच्छा । विद्या विजा । क्षुणा छुणा । उक्षा उच्छा । मक्षिका मच्छिआ। कक्षा कच्छा । रक्षा रच्छा । पञ्चखपि अक्ष्यादित्वात् छः 'वर्गेषु०' (३७) इति चः। क्षमा छमा खमा, 'क्षमा-वृक्ष' (६७) इति छत्ववैकल्प्यात् पक्षे 'एक-स्क०' (५६) इति खः ।. 'श्व-त्स-पसां च्छः' (१२३) पश्चिमा पच्छिमा। विवत्सा विइच्छा (?)। लिप्सा लिच्छा। जुगुप्सा जुउच्छा, 'प्रायः' (१०) इत्युक्तेर्लोपाभावपक्षे जुगुच्छा । मूर्छा मुच्छा, “वर्गेषु०” (३७) इति चः । आङो ज्ञादेशस्य ॥ १७ ॥ 'म्न-ज्ञा' (१२७) इति जातो यो णादेशः तस्य आङः परस्य द्वित्वं न स्यात् । आज्ञा आणा । सेवा सेव्वा सेवा, सेवादिषु' (१३२) इति द्वित्वम् । क्लिष्ट-श्लिष्ट-रत्न-क्रिया-शाङ्गेषु तत्स्वरवत् पूर्वस्य ॥ १७१ ॥ एषु युक्तस्य विप्रकर्षः स्यात् । विप्रकर्षितव्यस्य विप्रकर्षे जाते यः पूर्वो वर्णो निरर्थकस्तस्य विप्रकर्षितव्यस्वरता स्यात् । क्रिया किरिआ। अः क्ष्मा-श्लाघयोः॥ १७२ ॥ युक्तस्य विप्रकर्षः स्यात्, पूर्वस्याकारः तत्वरता च । क्ष्मा खमा । विप्रकर्षितव्यस्य दीर्घत्वादीर्घत्वे प्राप्त हखो अकारो विधीयते । 'एक-स्क० (५६) इति खः । श्लाघा सलाहा, 'श-षोः०' (४४) इति सः, 'ख-घ.' (५९) इति हः। ज्यायामीत् ॥ १७३ ॥ युक्तस्य विप्रकर्षः स्यात् , पूर्वस्य ईकारः।ज्या जीआअत्राप्याकारे प्राप्त ईकारो विधीयते । ज्येत्यत्र विप्रकर्षकरणात् पूर्वम् 'अधो म-न-याम्' (४०) इति यलोपः, ततो घचेत् 'कग०' (१०) इति । माला माला । शाला साला। आदीतौ बहुलम् ॥ १७४ ॥ स्त्रियामकारान्तादातः स्थाने आत् ईत् इत्येतौ बहुलं स्तः। सहमाना सहमाणा सहमाणी । वेपमाना वेवमाणा वेवमाणी । हरिद्रा हलद्रा(द्दा) हलद्दी । सूर्पनखा सुप्पणहा सुप्पणही । छाया छाहा छाही । का की। जा जी । ता ती। प्रश्नः पण्ही । समृद्धिः समिद्धी सामिद्धी, 'आ समृद्ध्या (४३) इति वा आकारः, ऋष्यादित्वाद् इः, 'सु-भिसू० (१३८) इति दीर्घः । अभिजातिः आहिआई अहिआई, 'ख-ग' (५९) इति हः, 'क-ग०' (१०) इति जलोपः।

२२ पण्डित-रघुनाथ-कवि-विरचित ष्टस्य ठः ॥ १७५ ।। ष्ट इत्यस्य ठकारः स्यात् । गृष्टिः गिट्टी । दृष्टिः दिट्टी । सृष्टिः सिट्ठी। चतुर्वपि ऋष्यादित्वाद् इत्वम् । आकृतिः आइदी; ऋष्यादि- त्वाद् इ.; आउदी, ऋत्वादित्वाद् उः। सुकृतिः सुइदी, ऋष्यादौ कृति- शब्दपाठात् । संवृतिः संवुदी । प्रतिपत्तिः पदिवत्ती, 'प्रतिसर' (३३) इति तु न, ऋत्वादिपाठेन बाधात् । वसतिः वसही, 'वसति-भरत०' (८१) इति हः। यष्टयां लः ॥ १७६ ॥ आदेलः स्यात् । 'आदेयों जः' (३९) इति जापवादः । यष्टिः लट्ठी। कीर्तिः कित्ती, 'तस्य टः' (११५) इति टे प्राप्ते धूर्त्तादित्वाद् न । मूर्तिः मुत्ती । वितर्दिः विअड्डी । विच्छर्दिः विच्छड्डी । उभयत्रापि 'गर्दभ०' (१) इति डः, 'शेषा-ऽऽदेश' (३५) इति द्वित्वम् । कुक्षिः कुच्छी; अक्ष्यादित्वात् छ। स्थिति थिई । मनखिनी मणंसिणी, समृद्ध्या- दित्वाद् वा आकारः, वक्रादित्वादनुसार। ईदूतोर्हस्वः॥ १७७ ॥ सम्बुद्धौ। [हे मनखिनि] हे माणसिणि । मनस्विनीम् माणंसिणिं, 'अमि हवः' (१५८) इति हखः । वल्ली वेल्ली, शय्यादित्वाद् एकारः । चतुर्थी-चतुर्दश्योस्तुना ॥ १७८ ॥ अनयोस्तुशब्देन सह आदेः अतः ओत्वं वा स्यात् । चतुर्थी चोत्थी चउत्थी । चतुर्दशी चोदही चउद्दही 'दशादिषु०' (१००) इति हः । पृथिवी पुहवी, ऋत्वादित्वाद् उः, 'अत् पथि०' (१६५) इति । उः पद्म-तन्वीसमेषु ॥ १७९ ॥ पद्मशब्दे तन्वी इत्येवंरूपेषु च युक्तस्य विप्रकर्षः स्यात्, पूर्वस्य उकारः । गुर्वी गरुई, मुकुटादित्वाद् । शफरी सभरी, 'श-षोः सः' (४४). फो भः' (९१) । अङ्गुरी अङ्गुली, "हरिद्रादीनां' (६०) इति रेफस्य ल। बिसिन्यां भः ॥ १८० ॥ आदेः। विसिनी भिसिणी । स्त्रीलिङ्गनिर्देशः किम् ? विसं । षष्ठी छट्टी, 'पंट्-शावक' (९९) इति छः । सप्तमी सत्तमी । कर्तरी कत्तरी, "तस्य टः(११५) इति प्राप्ते धूर्त्तादित्वाद् न । लक्ष्मी लच्छी, अक्ष्या दित्वात् छः। , .. .

प्राकृतानन्द क्मस्य ॥.१८१ ॥: प: स्यात् । रुक्मिणी रुप्पिणी । श्रीः सिरी। हीः हिरी, 'इ: श्री-ही.' (३२) इति विप्रकर्ष-यौ । लध्वी लहुई, 'ख-घः' (५९) इतिः हा, 'उ. पद्म' (१७९) इति विप्रकर्षः। तन्वी तणुई । नदी नई। हे नइ । पृष्ठं पुट्ठी। अक्षि अच्छी। वधूः वहू । हे बहु इत्यादि । मातुरात् ॥ १८२ ॥ मातृशब्दसम्बन्धिन ऋकारस्य आत् स्यात् । माता माआ।हे माए इत्यादि। ॥ इति अजन्ताः स्त्रीलिङ्गाः ॥ लोपोऽरण्ये ॥ १८३ ॥ आदेतः। सोर्बिन्दुर्नपुंसके ॥ १८४ ॥ नपुंसके तिष्ठतः सोः अनुखारः स्यात् । अरण्यं रणं । इज्जसू-शसोदीर्घश्व ॥१८५॥ नपुंसके वर्तमानयोः जसू-शसोः इदादेशः स्यात्, पूर्वस्य दीर्घश्च । अरण्यानि रपणाइं । अरण्यं रपणं । अरण्यानि रण्णाई। अरण्येन रण्णेण । पुंवत् । हे अरण्य हे रण्ण, 'नाऽऽमन्त्रणे' (२५) इति निषेधाद् विन्दुन, किन्तु 'अन्त्यस्य' (२६) इति सोलापः। ओ बदरे देन ॥ १८६ ॥ अब दकारेण सह आदेरत ओत्वं स्यात् । बदरं बोरं इत्यादि । उदूखले द्वा वा ॥ १८७ ॥ अन दूशब्देन सह आदेः ओद् वा स्यात् । उदूखलं ओखलं उदूहलं। उलूहले ल्वा वा ॥ १८७A ॥ उलूहलशब्दे लू शब्देन सह आदेः उकारस्य ओकारो वा स्यात् । उलूहलंओहलं । इति पाठान्तरम् । उदूतो मधूके ॥ १८८ ॥ अत्र मधूकशब्दे ऊकारस्य उत् स्यात् । मधुकं महुअं।

पण्डित-रघुनाथ-कवि-विरचित अद् दुकूले वा लस्य द्वित्वम् ॥ १८९ ॥ दुकूलशब्दे जकारस्य अकारो वा स्यात् , तत्सन्नियोगेन च लस्य द्वित्वम् । दुकुलं दुअल्लं दुऊलं । एन्नूपुरे ॥ १९० ॥ नूपुरशब्दे ऊकारस्य एत् स्यात् । अत्र 'आदेः' इति प्रयोजनाभा- वादु नानुवर्तते । नू पुरं णेउरं । ऋणं रिणं, 'ऋ रि' (१) इति रि । हृदयं हिअयं, ऋष्यादित्वाद् इः। वृन्दावनं बुंदावणं, 'ऋतोऽत्' (१२०) इति प्राप्त ऋत्वादित्वाद् उः। लतः क्लृप्त इलि ॥ १९१ ॥ स्तृप्तशब्दे लकारस्य इलिः स्यात् । क्लृप्तं किलित्तं । त्रैलोक्यं तेल्लोक, 'ऐत् एत्' (६९) इति एत्, सेवादित्वात् द्वित्वम् , द्वित्ववैकल्प्यात् पक्षे तेलोकं । शैवं सेत्तं । स्वैरं सइरं । वैरं वरं । द्वयोरप्यैकारस्य 'दैत्यादिषु' (६८) इति अः। दैवे वा ॥ १९२॥ दैवशब्दे ऐकारस्य अइरित्यादेशो वा स्यात् । नीडादिषु च ॥ १९३ ॥ एषु अनादौ तिष्ठतो हलो वा द्वित्वम् । दैवं देवं देवं दइवं । नीड स्रोत प्रेम व्याहृत जनक यौवन दैव इत्यादयः नीडादिः। इत् सैन्धवे ॥ १९४ ॥ अत्र एकारस्य इकारः स्यात् । एत्वापवादः । सैन्धवं सिन्धवं । ईद धैर्ये ॥ १९५ ॥ अन एकारस्य ईत् स्यात् । एत्वापवादः। तूर्य-धैर्य-सौन्दर्या-ऽऽश्चर्य-पर्यन्तेषु रः॥ १९६ ॥ एषु यस्य रः। धैर्य धीरं। तूर्य तूरं । सौन्दर्य सुन्दरं, 'उत् सौन्द- र्यादिषु' (७६) इति उः। आश्चर्य अच्छेरं, 'श्च-त्सा' (१२५) इति छः। पर्यन्तं परंतं । त्रिष्वपि शय्यादित्वाद् एत्वम् । यौवनं जोवणं, 'औत ओत्' (७३) इति ओत, 'आदेखें जः' (३९) इति जा, नीडादित्वात् द्वित्वम्, 'नो ण. (९) इति णः। -- प्राकृतानन्द २५ आच्च गौरवे ॥ १९७ ॥ गौरवशब्दे आ अउ ओ इत्येते स्युः। गौरवं गारवं गउरवं गोरवं इत्यादि । गर्भितं गभिणं, 'गर्भिते णः' (८०) इति णः। डस्य च ॥ १९८॥ डकारस्यायुक्तस्य अनादिभूतस्य ल: स्यात् । दाडिमंदालिमं । 'प्रायः' इत्यनुवृत्तेः कचिद् दाडिमं इत्यपि । ठो ढः॥ १९९ ॥ अयुक्तस्य अनादिभूतस्य ठस्य ढः स्यात् । जठरं जढरं । कठोरं कढोरं । अंकोठे ल्लः॥ २०॥ अत्र ठस्य लः स्यात् । अंकोठं अंकोल्लं । सफलं सभलं, 'फो भः' (९१) इति भः । सुखं सुहं, 'ख-ग' (५९) इति हः । करुणं कलुणं, हरिद्रादित्वाद् रेफस्य लः। श्मश्रु-श्मशानयोरादेः ॥ २०१ ॥ अनयोरादेर्वर्णस्य लोप: स्यात् । श्मशानं मसाणं । चौर्यसमेषु रिअं ॥ २०२ ॥ एषु यस्य रिअं इत्यादेशः स्यात् । चौर्य चोरिअं । शौर्य सोरिअं। 'औत ओत् (७३) इति ओत् । वीर्य वीरिअं। पर्यस्त-पर्याण-सौकुमार्येषु लः ॥ २०३ ॥ यस्य ल्ल: स्यात् । पर्यस्तं पल्लत्थं, 'स्तस्य थ' (५७) इति था, 'शेषादेश' (३५) इति द्वित्वम् । पर्याणं पल्लाणं । सौकुमार्य सोअमल्लं, मुकुटादित्वाद् । पत्तने ॥ २०४॥ युतस्य दः । पत्तनं पट्टणं । क्षीरं छीरं, अक्ष्यादित्वात् छः । श्लक्ष्णं सण्हं । तीक्ष्णं तिण्हं । 'ह-ल' (४९) इति बहादेशः। चिह्ने धः॥ २०५॥ युक्तस्य धः स्यात् । पहापवादः। चिह्न चिन्धं,प्रायिकमेतत् , चिण्हं । प्पस्य फः ॥ २०६॥ स्पष्टम् । पुष्पं पुष्पं । शष्पं सफं। 1 ४ २६ पण्डित-रघुनाथ-कवि-विरचित तालवृन्ते ण्ठः ॥ २० ॥ युक्तस्य ण्ठः स्यात् । तालवृन्तकं तालवेण्ठअं तलवेण्ठ। आम्र-ताम्रयोर्बः॥ २०८॥ अनयोरनादेः वः स्यात् । आनं अंवं । तानं तवं । क्लिष्ट किलिहूं। रत्नं रअणं । 'क्लिष्ट-श्लिष्ट' (१७१) इति विप्रकर्षः तत्खरता च । उदुम्बरे दोर्लोपः ॥ २०९ ॥ . अत्र दु इत्यस्य लोपः स्यात् । उदुम्बरं उंवरं । कालायसे यस्य वा ॥ २१ ॥ अन यस्य वा लोपः स्यात् । य इति विशिष्टग्रहणम् । कालायसं कालासं कालाअसं, लोपाभावपक्षे 'क-ग.' (१०) इति यकारमात्रलोपः। मलिने लिनोरिलौ वा ॥ २११ ॥ मलिनशब्दे लि इत्यस्य इः स्यात्, न इत्यस्य लः स्याद् वा। मलिनं मइलं मलिणं। गृहे घरोऽपतौ ॥ २१२ ॥ गृहशब्दस्य घर इत्ययमादेशः स्यात्, न तु पतौ परे । गृहं घरं । अपताविति किम् ? गृहपतिः गहवई । पीतं पीअं। धनं धर्ण । वृन्दे वो रः॥ २१३ ॥ वृन्दशब्दे वात् परः खार्थे रो वा स्यात् । व्रदं वंदं । आलाने न-लोः॥ २१४ ॥ अन्न नकार-लकारयोः स्थितिपरिवृत्तिः स्यात् । आलानं आणालं । दाढायो बहुलम् ॥ २१५ ॥ दाढा इत्यादयः शब्दाः बहुलं निपात्यन्ते । चातुर्य चाउलिअं । पृष्टं पुढं । इदानी एहिं । दुहिता दिद्धी । मण्डूकः मण्डूरो । कमलं कंदोहो। गोदावरी गोला । ललाट लडालं णिडालं । आकृतिगणोऽयम् । 'सु-भिसू०' (१३८) इति दीर्घ प्राप्ते- न नपुंसके ॥ २१६ ॥ क्लीवे प्रथमैकवचने दी? न । वारि वारिं । वारीणि वारीई । पुनस्त- द्वत् । शेषं पुंचत् । .

प्राकृतानन्द २७ अस्थिनि ॥ २१७ ॥ युक्तस्य ठः स्यात् । अस्थि अहिं । सक्थि सत्थिं । अक्षि अछि । गुरु गरुअं, मुकुटादित्वाद् अः। श्मश्रुः मंसू, "श्मश्रु-श्मशानयोः' (२०१) इति शकारलोपः अश्रु अंसू , वक्रादित्वाद् अनुस्वारः। मधु महुं। ॥ इत्यजन्ता नपुंसकलिङ्गाः ॥ अनड्वान् अणडओ, विष्णुवत् । चतुर्शब्दो नित्यं बहुवचनान्तः । चतुरश्वत्तारो चत्तारि ॥ २१८ ॥ चतुःशब्दस्य जसा शसा च सह एतावादेशौ स्याताम् । चत्वारः चत्तारो चत्तारि । चतुरः चत्तारो चत्तारि । चतुर्भिः चऊहिं । चतुर्यः चऊहिंतो चऊसुत्तो। चतुर्णा चउण्हं । चतुषु चजसु । किमः कः ॥२१९॥ स्पष्टम् । कः को। के के, 'सर्वादेः' (१३५) इति एत्वम् । इदम्-एतत्-किं-यत्-तद्भयष्टा इणा वा ॥ २२० ॥ एभ्यः परः टा इणा इति वा स्यात् । केन कइणा केण । तो दो उसेः॥ २२१ ॥ किं-यत्-तद्भयो ङसेः त्तो दो इत्येतावादेशौ वा स्याताम् । कस्मात् कत्तो कदो का कादो कादु काहि । केभ्यः काहिंतो कासुत्तो। किं-यत्-तद्भयो डस आसः ॥ २२२ ॥ एभ्यः परस्य डस आस इत्यादेशो वा स्यात् । कस्य कास कस्स । आम एसिं ॥ २२३ ॥ इदम्-एसत्-कि-यत्-तद्भ्यः परस्य आम एसिं इत्यादेशो वा स्यात् । केषां केसि काणं। डेहि ॥ २२४॥ किं-यत्-तड्यो डेः सप्तम्येकवचनस्य हिं इत्यादेशो वा स्यात् । कस्मिन् कहिं कस्सि कम्मि कत्थ । आहे इआ काले ॥ २२५ ॥ किं-यत्-तद्भ्यः परस्य • काले वाच्ये आहे इआ इत्येतावादेशौ वा स्याताम् । कदा काहे कइआ कहिं कस्सि कम्मि कत्थ । केषु केसु ।

૨૮ पण्डित-रघुनाथ-कवि-विरचित इदम इमः॥ २२६ ॥ इदम्शब्दस्य इम इत्यादेशः स्यात् सुपि। अयं इमो । इमे इमे । इमं इमं । इमान् इमा। अनेन इमेण इमिणा, 'इदमेतत्' (२२०) इति इणादेशः। एभिः इमेहिं । अस्मात् इमादो इमादु इमाहि । एभ्यः इमाहितो इमासुत्तो। स्स-स्सिमोर वा ॥ २२७ ॥ इदम्शब्दस्य अ इत्यादेशो वा स्यात् स्से स्सिमि च । अस्य अस्स इमस्स । एषां इमेसिं इमाणं । डेदन हः ॥२२८॥ इदम्शब्दस्य दकारेण . ह इत्यादेशो वा स्यात् । पक्षे यथाप्राप्तम् । न त्थः ॥ २२९ ॥ इदमः परस्य डे स्थ इत्यादेशो न स्यात् । अस्मिन् अस्सि इमस्सि इह इमम्मि । एषु इमेसु। राज्ञश्च ॥ २३०॥ राजन्शब्दस्य आ इत्ययमादेशः स्यात् सौ । राजा राआ, 'अन्त्यस्य०' (२६) इति सोर्लोपः। जस्-शस्-डसो णो ॥ २३१ ॥ राज्ञः परेषामेषां णो इत्यादेशः स्यात् । आ णो-णमोरङसि ॥ २३२ ॥ णो-णमोः परयोः राज्ञो जस्य आ स्यात् । राजानः राआणो। आमन्त्रणे वा बिन्दुः ॥ २३३ ॥ राजनशब्दस्यामन्त्रणेऽनुस्वारो वा स्यात् सौ। हे राजन् हे राअं हे राअ । राजानं राअं । 'शेषो०' (१३७) इति अदन्तवद्भावः । शस एत् ॥ २३४॥ राज्ञः परस्य शस ए इत्यादेशः स्यात् । राज्ञः राए राआणो। टा णा ॥ २३५॥ राज्ञः परस्य तृतीयैकवचनस्य णा इत्यादेशः स्यात् ।

२९ प्राकृतानन्द ङसश्च द्वित्वं वाऽन्त्यलोपश्च ॥ २३६ ॥ राज्ञः परस्य ङसादेशस्य टादेशस्य च द्वित्वं वा स्यात् अन्त्यस्य च लोपः। राज्ञा रण्णा । पक्षे- इदद्वित्वे ॥ २३७ ॥ ङसादेशस्य टादेशस्य च द्वित्वाभावपक्षे राज्ञ इत्वं स्यात् । राइणा। राजभिः राएहिं 'शेषो' (१३७) इत्यदन्तवद्भावः । राज्ञः राआ राआदो राआदु राआहि । राजभ्यः राआहितो राआसुत्तो। राज्ञः रण्णो राइणो। आमो णं ॥ २३८॥ राज्ञ उत्तरस्य आमः णं इत्यादेशः स्यात् । राज्ञां राआणं । राज्ञि राअम्मि राए । राजसु राएम् । आत्मनो अप्पाणो वा ॥ २३९ ॥ आत्मनः अप्पाण इत्ययमादेशो वा स्यात् । इत्व-द्वित्ववर्ज राजवदनादेशे ॥ २४० ॥ आत्मनः अनादेशे राजवत् कार्य स्यात्, [इत्व-द्वित्वे वर्जयित्वा]। आत्मा अप्पाणो अप्पा । 'राज्ञश्च' (२३०) इति आकार उक्तः सोनापि स्यात्। आत्मनः अप्पाणो । आत्मानं अप्पं । आत्मनः अप्पणो । आत्मना अप्पणा । आत्मभिः अप्पेहिं । आत्मनः अप्पा अप्पादो अप्पादु अप्पाहि । आत्मभ्यः अप्पास्तिो अप्पासुत्तो। आत्मनः अप्पणो। आत्मनां अप्पाणं । आत्मभिः (त्मनि?) अप्पे अप्पम्मि । आत्मसु अप्पेसु। ब्रह्माद्या आत्मवत् ॥ २४१ ॥ ब्रह्मन् युवन् इत्यादयः शब्दाः आत्मवत् साधवः स्युः। ब्रह्मा बह्मा बह्माणो । युवा जुवा जुवाणो । अध्वा अद्धा अद्धाणो । एवमादयो लक्ष्यानुसारतो ज्ञेयाः। न-सान्त-प्रावृट-शरदः पुंसि ॥ २४२ ॥ नश्च सश्च न-सौ अन्ते यस्य इति विग्रहः । एते पुंसि प्रयोक्तव्याः। कर्म कम्मो । जन्म जम्मो । चर्म चम्मो । आत्मयुक् अप्पजू ।

३० पण्डित-रघुनाथ-कवि-विरचित तदेतदोः सः सावनपुंसके ॥ २४३ ॥ अलयोर्यः तकारः तस्य लकारः स्यात् सौ । सः सो। ते ते । तं तं । तान् ता । तेन तइणा तेण । तैः तेहि। तद ओश्च ॥ २४४॥ तदः परस्य डलेः ओ इत्ययमादेशो वा स्यात् । तस्मात् तओ तत्तो तदो तादो तादु ताहि । तेभ्यः ताहितो तासुत्तो। ङसा से ॥ २४५॥ तदो डसा सह से इत्यादेशो वा स्यात् । तस्य से तास तस्स । आमि सिं ॥ २४६॥ तद आमा सह सिं इत्यादेशो वा स्यात् । तेषां सिं तेसिं ताणं तस्मिन् तहिं तस्सिं तम्मि तत्थ। तदा तहे तइआ। तेषु तेसु । एवं यः जो। एतदः सावोत्वं वा ॥ २४७ ॥ एतद ओत्वं वा स्यात् लौ। एषः एसो एस, नित्यप्राप्तविभाषेयम् । एते एते । एतं एतं । एतान् एता । एतेन एदिणा एदेण । एतैः एदेहिं । तो उसेः ॥ २४८॥ एतदः परस्य डन्सेः त्तो इत्ययमादेशो वा स्यात् । त्तो-त्थयोस्तो लोपः॥ २४९ ॥ एतच्छब्दस्य तकारस्य लोपः स्यात् त्तोत्थयोः परयोः। एतस्मात् एत्तो एदादो एदादु एदाहि । एतस्मिन् एत्य एतस्सि एतम्मि । पदस्य ॥ २५० ॥ - इत्यधिकृत्य । युष्मदस्तं तुमं ॥ २५१॥ युष्मदः पदस्य तं तुम इत्यादेशौ स्यातां सावा सह । त्वं तं तुम । तुझे तुम्हे जसि ॥ २५२ ॥ युष्मदः पदस्य तुझे तुम्हे इत्येतावादेशौ वा स्तः जसा सह । यूयं तुझे तुम्हे। तं वाऽमि ॥ २५३ ॥ युष्मदः पदस्य त्तं इत्यादेशो वा स्यात् अमा सह । त्वाम् तं तुमं।

प्राकृतानन्द वो च शसि ॥ २५४ ॥ युष्मदः पदस्य वो तुझे तुम्हे इत्येते आदेशाः स्युः शसा सह । युष्मान् वो तुझे तुम्हे ॥ टा-ङयोस्तइ तए तुमए तुए ॥ २५५ ॥ युष्मदुत्तरयोः टा ङि इत्येतयोः तइ तए तुमए तुए इत्येते आदेशाः स्युः प्रकृत्या सह । त्वया तइ लए तुमए तुए। आडि च ते दे॥ २५६ ॥ युष्मदः पदस्य आङा सह ते दे इत्येतावादेशौ स्तः। आङ् इति टासंज्ञा प्राचाम्। तुमाइ च ॥ २५७॥ अयमपि स्यात् । ते दे तुमाइ । तुज्झेहिं तुम्हेहिं तुब्भेहिं भिसि ॥ २५८ ॥ युष्मदः पदस्य एते आदेशाः स्युः भिसा सह । युष्माभिः तुज्झेहिं तुम्हेहिं तुन्भेहिं । अत्र 'तुज्झे तुम्हे तुम्भे' इति सुवचम् 'शिषो.' (१३७) इत्यनेन 'भिसो हिं' (१७) इति हिमादेशस्यातिदिष्टत्वात् । ङसौ तत्तो तइत्तो तुमादो तुमादु तुमाहि ॥ २५९ ॥ युष्मद एते आदेशाः स्युः उत्या लह । त्वत् तत्तो तइत्तो तुमादो तुमादु तुमाहि। तुम्हाहितो तुम्हासुत्तो भ्यसि ॥ २६० ॥ युष्मद एतौ आदेशौ स्यातां पश्चमीबहुवचनेन सह । युष्मत् तुम्हाहिंतो तुम्हासुत्तो । अत्रापि 'तुम्हा भ्यसि' इत्येव सुवचम् । एवम- [स्मत् ]शब्देऽपि ज्ञेयम् । ङसि तुमो-तुह-तुज्झ-तुम्ह-तुब्माः ॥ २६१ ॥ युष्मद एते आदेशाः स्युः ङसा सह । तव तुमो तुह तुज्झ तुम्ह तुम्भ। वो भे तुज्झाणं तुम्हाणमामि ॥ २६२ ।। युष्मद एते स्युरामा सह । युष्माकम् वो भे तुज्झाणं तुम्हाणं ।

पण्डित-रधुनाथ-कवि-विरचित ङौ तुमम्मि ॥ २६३ ॥ युष्मदः तुमम्मि इत्यादेशः स्यात् ङ्या सह। त्वयि तुमम्मि तइ तए तुमए तुए। तुझेसु तुम्हेसु सुपि ॥ २६४ ॥ थुष्मद एतौ स्यातां सुपा सह । युष्मासु तुज्झेसु तुम्हेसु । अस्मदो हमहमहअं सौ ॥ २६५ ॥ अस्मद एते स्युः प्रथमैकवचनेन सह । अहम् हं अहं अहों। अहम्मिरमि च ॥ २६६ ॥ अस्मदः प्रथमैकवचन-द्वितीयैकवचनाभ्यां सह आदेशः स्यात् । अहं अहम्मि। अम्हे जस्-शसोः ॥ २६७ ॥ अस्सदः अयमादेशः स्याद् जसा शसा च सह । वयं अम्हे । मं ममं ॥ २६८ ॥ अस्मद एतावादेशौ स्याताम् । माम् अहम्मि में मम । 'अहम्मि- रमि च' (२६६) इत्यतो 'अमि' इत्यनुवर्तते । 'चानुकृष्टं नोत्तरत्र' इति परिभाषया चानुकृष्टानां हं-आदीनां नानुवर्तनम् । णे शसि ॥ २६९ ॥ अस्मदो णे इत्यादेशः स्यात् शसा सह । अस्मान् अम्हे णे । आङि मे ममाइ ॥ २७०॥ अस्मदः एतौ स्तः टया सह । मया मे ममाइ । डौ च मइ मए ॥ २७१ ॥ अस्सदः एतौ स्तः डि-टाभ्यां सह । मया मइ मए । अम्हेहिं भिसि ॥ २७२ ॥ अस्मदः अयं स्याद् भिसा सह । अस्माभिः अम्हेहिं । मत्तो मइत्तो ममादो ममादु ममाहि उसौ ॥ २७३ ।। अस्मद एते स्युः ङस्या सह । मत् मत्तो मइत्तो ममादो ममादु ममाहि। -- प्राकृतानन्द अम्हेहिंतो अम्हेसुत्तो भ्यसि ॥ २७४ ॥ अस्मद एतौ स्यातां भ्यसा मह । अस्मत् अम्हेहिंतो अम्हेसुत्तो। मे मम मह मज्झ ङसि ॥ २७५ ॥ अस्मद एते स्युः ङसा सह । मम मे मम मह मज्झ । झस्य धत्वमपीच्छन्ति केचित्, मद्ध । मज्झणो अम्हं अम्हाणं अम्हे आमि ॥ २७६ ॥ अस्मद एते स्युरामा सह । अस्माकम् मज्झणो अम्हं अम्हाणं अम्हे। ममम्मि ङौ ॥ २७७ ॥ अस्मदः अयं स्याद् ड्या सह । मयि ममम्मि मइ मए अम्हेसु सुपि ॥ २७८ ॥ अस्मदः अयं स्यात् सुपा सह । अस्मासु अम्हेसु । शरदो दः॥ २७९ ॥ अत्रान्त्यहलो दः स्यात् । लोपापवादः। शरत् सरदो, 'नसान्त' (२४२) इति पुंवद्भावः। दिक्-प्रावृषोः सः ॥ २८ ॥ अनयोरन्त्यस्य सः स्यात् । लोपापवादः । प्रावृट् पाउसो । रत्नमुट रअणमू। अदसो दो मुः ॥ २८१ ॥ अदसो दकारस्य मु इत्यादेशः स्यात् सुपि । हश्च सौ ॥ २८२॥ अदसो दस्य हः स्यात् सौ । असौ अह अमू । हादेशोऽयं ओत्व- आत्व-बिन्दून् परत्वाद् बाधते । अमी अमुए अमुणो । अमुम् अमुं। अमून् अमूओ। अमुना अमुणा। अमीभिः अमूहिं । अमुष्मात् अमूदो अमूदु अमूहि । अमीभ्यः अमूहिंतो अमूसुत्तो । अमुष्य अमुस्स। अमीषाम् अमुणं । अमुष्मिन् अमुस्सि अमुम्मि अमुत्थ । अमीषु अमूसु। तपः तवो। यशः जसो । सरः सरो। ॥ इति हलन्ताः पुंलिङ्गाः ॥

" . ३४ पण्डित-रघुनाथ-कवि- विरचित स्त्रियामात् ॥ २८३ ॥ स्त्रियां वर्तमानस्य अन्त्यस्य हलः आत् स्यात् । उपानत् उपाणआ। द्यौः दिआ। रो रा ॥ २८४ ॥ स्त्रियामन्त्यस्य रेफस्य रा इत्ययमादेशः स्यात्।धूः धुरा । गीः गिरा। चतस्रः चत्तारो चत्तारि । का काआ की। इद्भ्यः स्सा-से ॥ २८५ ॥ इकारान्तेभ्यः किं-यत्-तद्भ्यो उसः स्सा ले इत्येतावादेशौ वा स्याताम् । कस्याः किस्सा कीले । पक्षे कीइ कीए की कीआ, 'टाङसू०' (१६०) इति आदेशाः । "आदीती०' (१७४) इति आकारपक्षे काइ काए । इयं इमा । युष्मदरसदोलिङ्गनये सदृशं रूपम् । या जा जी । याः जाउ जाओ जा । यस्याः जिस्सा जीले जीइ जीए जीअ जीआ जाइ जाए। वाक वाआ। न विद्युति ॥ २८६ ॥ अन्त्यस्य हल आकारो न स्यात् । विद्युत् विजू । दिक् दिसा, ' दिप्रावृषोः०' (२८०) इति सः । असौ दिक् अमू दिसा। अमू: अओ । मूशेषनूकारस्त्रीलिङ्गवत् । ॥ इति हलन्ताः स्त्रीलिङ्गाः ॥ नपुंसके स्वमोरिदमिणमिणमो ॥ २८७ ॥ क्लीवे सविभक्तिकस्येदमः इदं इणं इणमो इत्यादेशाः स्युः खमो. परयोः । इदम् इदं इणं इणभो । इमानि इमाई । पुनस्तद्वत् । शेष पुंवत् । किम् किं । कालि काई । पुनरपि । शेषं पुंवत् । तत् तं, 'अनपुं- सके (२४३) इत्युक्ते न सादेशः । तानि ताई। एतत् एर्द। यत् जं। यानि जाई । अदः अह असुं। अमूनि अमूई । 'न सान्त०' (२४२) इति प्राप्ते- न शिरो-नभसी ॥ २८८ ॥ एतौ पुंसि न स्याताम् । शिरः सिरं, 'अन्त्यस्य' ( ) इति. सोर्लोपः। ॥ इति हलन्ता नपुंसकलिङ्गाः ।। ri *** प्राकृतानन्द निपाताः ॥ २८९॥ अधिकारोऽयम्। हुँ दान-पृच्छा-निर्धारणे ॥ २९० ॥ हुमित्ययं निपातसंज्ञः स्याद् दाने पृच्छायां निर्धारणे च। चिअ चेअ अवधारणे ॥ २९१ ॥ चिअ चेअ इत्येतौ निपातसंज्ञौ स्तः निश्चये। ओ सूचना-पश्चात्ताप-विकल्पेषु ॥ २९२ ॥ ओ इत्ययं निपातः सूचनायां पश्चात्तापे विकल्पे च । इर-किर-किला अनिश्चिताख्याने ॥ २९३ ॥ त्रयो निपाताः संशयाख्याने । हु-क्खु निश्चय-वितर्क-सम्भावनेषु ॥ २९४ ॥ हु क्खु इत्येतौ निपातौ निश्चये वितर्के सम्भावनायां च । णवरः केवले ॥ २९५ ॥ निपातः केवलेऽर्थे । णवरि आनन्तर्ये ॥ २९६ ॥ णवरि इति आनन्तर्ये निपातः। किणो प्रश्ने ॥ २९७ ॥ किणो इत्ययं पृच्छायां निपातः। अबो दुःख-सूचना-सम्भावनेषु ॥ २९८ ॥ अव्वो इत्ययं निपातः दुःखे सूचनायां सम्भावनायां च । अलाहि निवारणे ॥ २९९ ॥ अलाहि इत्ययं निपातः निषेधे । अइ वले सम्भाषणे ॥ ३०० ॥ अइ वले एतौ निपाती वचने । अबो अम्मो दुःखा-ऽऽक्षेप-विस्मापनेषु ॥ ३०१ ॥ ... एतौ निपातौ दुःखे आक्षेपे विस्मापने च। अत्र 'अब्वो दुःख-सूच- ना-सम्भावनेषु' 'अम्मो च दुःखाऽऽक्षेप-विस्थापनेषु' इति सूत्रयितुं युक्तमिति केचित् । वयं तु तत्रापरसूत्रे 'दुःख' शब्दमपि त्यजामा, पूर्वसून्ने दुःखशब्दस्य खरितत्वेनानुवर्तनात्, स्खरितेनाधिकार' इति पाणिनीये . : । , MMM . ३६ पण्डित-रघुनाथ-कवि-विरचित परिभाषितत्वात् समस्तपदादेकदेशानुवृत्तिस्तु 'क्डिति च' इत्यत्र 'न धातुलोपः' - इत्यतो धातुग्रहणानुवृत्तिवत् । णवि वैपरीत्ये ॥ ३०२ ॥ अयं वैपरीसे निपातः। सू कुत्सायाम् ॥ ३०३ ॥ सू इत्ययं निपातो निन्दायाम् । रे अरे हिरे सम्भाषण-रतिकलहा-ऽऽक्षेपेषु ॥ ३०४ ॥ रे अरे हिरे इति त्रयः क्रमेण सम्भाषणे रतिकलहे आक्षेपे च निपा- ताः । अत्र च 'यथासंख्यमनुदेशः समानाम्' इत्युक्तत्वाद् यथासंख्यम् । म्मिव-मिअ-विआ इवार्थे ॥ ३०५ ॥ म्भिव मिअ विअ इत्येते इवार्थे निपातसंज्ञकाः। अज्ज आमन्त्रणे ॥ ३०६ ॥ अन्ज इत्ययं निपातः आमन्त्रणेऽर्थे, सम्बोधने इत्यर्थः। शेषः संस्कृतात् ॥ ३०७ ॥ उक्तादन्यः संस्कृतादवगन्तव्यः। इवे वः ॥ ३०८ ॥ इवशब्दे व्व इति निपात्यते । स इवायम् सो व्व इमो। विअ इति वक्तव्यम् , सो विअ इमो। अपौ विः ॥ ३०९ ॥ अपिशब्दे व्विः इति निपात्यते। सोऽपि देव इव सो वि देवो व्व । ओदवा-ऽपयोः ॥ ३१॥ अव अप इत्येतयोः ओ इत्यादेशो वा स्यात् । अवगाहः ओगाहो अवगाहो । अपनयः ओणओ अवणओ, 'पो वः' (८५) इति वः। इतेस्तः पदादेः॥ ३११ ॥ पदादेः इतिशब्दस्य यः तकारः ततः परस्य इकारस्य अ इत्यादेशः स्यात् । इति विलपन् इअ विलअंतो। त इति किम् ? आदेरिकारस्य मा भूत् । पदादेरिति किम् ? इलेलिरिति वक्तव्यम् (१)। प्रिय इति हसति पिओ त्ति हसइ। .

प्राकृतानन्द ३७ ओ च द्विधाकृञः॥ ३१२ ॥ कृञ्परो यो द्विधाशब्दः तस्य आदेः इकारस्य ओकारः स्याद् उश्च । द्विधाकृतम् दोहाइअं दुहाइअं। एवम् एअं एवं, एव एअ एव, यावदादि- त्वाद् वा वलोपः। ) तल्-त्वयोर्दा-तणौ ॥ ३१३ ॥ पाणिनीये भावार्थे [यौ] तल्- त्वौ विहितौ तयोः क्रमेण दा त्तण इत्येतावादेशौ स्याताम् । कृष्णता कण्हदा, 'तलन्तं स्त्रियाम्' ( इति लिङ्गानुशासनबलात् स्त्रीत्वम् । कृष्णत्वम् कण्हत्तणं, 'त्वान्तं क्लीबम्' ( ) इति षण्डत्वम्। आल्विल्लोल्लालवत्तेत्ता मतुपः॥ ३१४ ॥ तदस्यास्त्यस्मिन्नित्यर्थे विहितो मतुप् तस्य आल इल्ल उल्ल आल वत्त इत्त इति षडादेशाः स्युः। निद्रावान् णिद्दालू । मालावान् मालाइल्लो। विकारवत् विआरुल्लं। धनवान् धणालो। गुणवान् गुणवत्तो। मानवान् माणइत्तो, 'सन्धावचा०' (१)। विद्युत्-पीताभ्यां वा लः ॥ ३१५ ॥ आभ्यां लप्रत्ययः स्यात् । विद्युत् विजुली, विद्युच्छब्दस्य स्त्रीलिङ्ग- त्वात् स्त्रीत्वम् , पक्षे विजू । पीतं पीअलं पी। ॥ इति श्रीज्योतिर्वित्सरसात्मजरघुनाथकविकण्ठीरव- विरचिते प्राकृतानन्द प्रथमः परिच्छेदः॥१॥ * .. .

[अथ द्वितीयः परिच्छेदः ।। भू सत्तायाम्। भुवो हो-हुवौ ॥ ३१६ ॥ भूधातोः हो हुव इत्येतावादेशौ स्याताम् । ते-तिपोरिदेतौ ॥ ३१७ ॥ धातोः परयोः ते तिप् इत्येतयोरिदेतो स्याताम् । यथासंख्यं नेष्यते । अत ए से ॥ ३१८ ॥ नियमार्थं वचनम् । त-तिपोः सि-थालोर्यों ए से इत्येतावादेशौ विहितौ तावकारान्तादेव स्याताम् , नान्यस्यात् । लादेशे वा ॥ ३१९ ॥ लकारादेशे परे अत एत्वं वा स्यात् । भवति होइ हुवइ हुवए हुवेइ हुवेए। वर्तमान-भविष्यदनद्यतनयोर्ज जा वा ॥ ३२० ॥ त्तमाने भविष्यदनद्यतने च विध्यादिषु चोत्पन्नस्य प्रत्ययस्य ज जा इत्येतावादेशौ वा स्याताम् । होज होजा। लि-लो-लुट्-लविध्यादयः । मध्ये च ॥ ३२१ ॥ वर्तमान - भविष्यदनद्यतनयोर्विध्यादिषु च धातु-प्रत्यययोर्मध्ये ज्ज जा इत्येतावादेशौ वा स्याताम् । भवति- होजइ होजेइ होजाइ, पक्षे पूर्व- मुक्तम् । नानेकाचः ॥ ३२२ ॥ वर्तमान-भविष्यदनद्यतनयोर्विध्यादिषु चानेकाचो धातोः परतो मध्ये ज जा इत्येतावादेशौ न स्याताम्। भवति हुवज्ज हुवेज हुवजा हुवेजा। एवमग्रेऽपि पूर्वोक्तलेषुप्रथम-द्वितीय-तृतीयेषु पुरुषेषु एकवचन-द्विवचन- वहुवचनादावप्यवगन्तव्यम् । न्ति-हेत्था-मो-सु-मा बहुषु ॥ ३२३ ॥ तिङो बहुवचनानामेते आदेशाः स्युः। प्रथमपुरुषबहुवचनस्य न्ति, मध्यमस्य ह इत्था एतौ, उत्तमच मोसुल एते इति विवेकः। भवतः भवन्ति होन्ति हुवन्ति हुवेन्ति हुबज हुवेज हुवजा हुवेजा होज होजा होजन्ति होजेन्ति होजान्ति ।

प्राकृतानन्द ३९ थासू-सिपोः सि से ॥ ३२४ ॥ धातोः परयोः थासू-सिपोः सि से इत्येतावादेशौ स्याताम् । यथासंख्यं न । भवलि होलि हुवसि हुबेसि हुवले हुवेले । भवथः भवथ- होह होइत्था हुवह हुवेह हुवइत्था हुवेइत्था हुबित्था, 'सन्धा०' (१) इत्यकारलोपो वा। इट्-मयोर्मिः ॥ ३२५ ॥ इट् मि इत्येतयोः मिः स्यात् । अत आ मिपि वा ॥ ३२६ ॥ अकारस्य आकारो वा स्याद् मिपि परे। भवामि-होमि हुवामि हुवेमि हुवमि। इच्च बहुषु ॥ ३२७ ॥ मिपो बहुवचने परे अत इः स्याद् आ च । भवावः भवामः = होमो होम होम हुवामो हुविमो हुवेमो हुवमो हुवामु हुविमु हुवेमु हुवमु हुवाम हुविम हुवेम हुवम । इति लट् । अथ लिट्- ईअ भूते ॥ ३२८ ॥ भूते काले धातोः परस्य प्रत्ययस्य ईअ इत्यादेशः स्यात् । बभूव- हुवी। इअं भूते ॥ ३२९॥ भूते काले धातोः परस्य प्रत्ययस्य इअं इत्यादेशः स्यात् । बभूव- हुवि। एकाचो हीअ ॥ ३३० ॥ भूते काले एकाचो धातोः परस्य प्रत्ययस्य हीअ इत्यादेशः स्यात् । बभूव होहीअ । त्रीण्यपि रूपाणि प्रथम-मध्यमोत्तमैकवचन द्विवचन- बहुवचनेष्ववगन्तव्यानि । उ सु मु विध्यादिष्वेकस्मिन् ॥ ३३१ ॥ विध्यादेरेकवचनस्य क्रमेण उ सुमु इत्येते आदेशाः स्युः। बभूव: होउ हुवेउ हुवउ। न्तु ह मो बहुषु ॥ ३३२ ॥ विध्यादेवहुवचनस्य क्रमेण न्तु ह मो इत्येते आदेशाः स्युः। बभूवुः= होन्तु हुवेन्तु हुबन्तु । बभूविथ - होलु हुवेतु हुवल्लु-बभूव= होइ हुवेह ४० पण्डित-रघुनाथ-कवि-विरचित हुवह, हविधानं इत्य(त्था)वाधनार्थम् । बभूव-होम हुवेमु हुवम् । बभू- विम- होमो हुवेमो हुवलो। मोविधानं मु-सयोर्वाधार्थम् । इति लिट् । अथ लट्- धातोभविष्यति हिः॥ ३३३ ॥ भविष्यति काले धातोः परे हिः स्यात् । भविता होहिइ हुवेहिइ हुवहिए। एच क्त्वा-तुमन्-तव्य-भविष्यत्सु ॥ ३३४ ॥ एषु अत एत्वं स्यात् , चादिश्च । हुविहिइ हुवेहिए हुवहिए हुविहिए होज्ज होज्जा हुवेज हुवज हुवज्जा होजहिइ होजेहिइ होजाहिइ होउ हुवेड हुवउ । भवितार: होहिंति हुवेहिंति हुविहिंति हुवहिंति होन्तु हुवेन्तु हुवन्तु । भवितासि होहिसि हुवेहिसि हुवहिसि हुवेहिसे हुवहिसे होसु हुवेसु हुवसु । भवितास्थ होहिहा हुवेहिह हुवहिह होह हुवेह हुवह । उत्तमे स्सा हा च ॥ ३३५ ॥ भविष्यत्युत्तमे परे धातोः परौ स्सा हा इत्येतौ स्याताम् । चात् हिः । मिना स्सं वा ॥ ३३६ ॥ भविष्यति मिना सह धातोः परः स्सं वा स्यात् । भविष्यामि होस्सामि हुवेस्सामि हुवस्सामि होहामि हुवेहामि हुवहामि हुवाहामि होहिमि हुवेहिमि हुवाहिमि हुवहिमि होस् हुवेस्सं हुवस्सं होमु हुवेमु हुवामु हुवमु। मो-मु-मैहि-स्सा-हित्था ॥ ३३७ ॥ भविष्यति मो-मु-मैः सह हिस्सा हित्था इत्येतावादेशौ वा स्याताम् । भवितास्मः= होहिस्सा हुवेहिस्सा हुविहिस्सा हुवाहिस्सा हुवहिस्सा होहित्था हुवेहित्था हुविहित्था हुवाहित्था हुचहित्था होस्सामो हुवेस्सामो हुविस्सामो हुवस्सामो होहामो हुवेहामो हुविहामो हुवाहामो हुवहामो होहिमो हुवेहिमो हुविहिमो हुवाहिमो हुवहिमो होमो हुवेमो हुविमो हुवामो हुवमो। इति लुट्। अथ लट् । भविष्यति होहिइ हुवेहिह हुवहिय हुवेहिए हुवहिए। भविष्यन्ति = होहिन्ति हुवेहिन्ति हुवहिन्ति । भविष्यसि होहिसि हुवेहिसि हुवहिसि हुवेहिसे हुवहिसे । भविष्यथ होहिह हुवेहिह- हुवहिह होहित्थ हुवइत्थ हुवित्थ । भविष्यामि होस्सामि हुवेस्सामि हुवस्सामि होहामि हुवेहामि हुवाहामि हुवहामि होहिमि हुबेहिमि प्राकृतानन्द हुवाहिमि हुवहिमि होस्सं हुवेस्सं हुवस्सं । भविष्यामः = होहिस्सा हुवे- हिस्सा हुविहिस्सा हुवाहिस्सा हुवहिस्सा होहित्था हुवेहित्था हुविहित्था हुवाहित्था हुवहित्था होस्सामोहुवेस्सामो हुविस्सामो हुवस्सामो होहामो हुवेहामो हुविहामो हुवाहामो हुवहामो होहिमो हुवेहिमो हुविहिमो हुवाहिमो हुवहिमो होस्सामु हुवेस्सामु हुविस्सामु हुवस्सा होहामु हुवेहामु हुविहामु हुवाहानु हुवहामु होहिमु हुवेहि हुविहिमु हुवाहिन्छु हुवहिमु होस्साम हुवेस्लाम हुविस्साम हुवस्साम होहाम हुवेहाम हुविहाम हुवाहाम हुवहाम होहिम हुवेहिम हुविहिम हुवाहिम हुवहिम । इति लट्। अथ लोट् - भवतु-होउ हुवेउ हुवउ। भवन्तु = होंतु हुवेन्तु हुवन्तु । भव = होसु हुवेसु हुवतु । भक्त=होह हुवेह हुवह। भवानि होनु हुवेल हवामु हुवमु। भवाम=होमो हुवेमो हुवामो हुविमो हुवमो। इति लोट् । लोवद् लडू-लिङाशीर्लिङः । अथ लुङ्-अभूत्-हुवीअ हुविअं होहीअ, एवं पुरुष-वचनेषु । लङ लट्वत्। प्रादेर्भवः ॥ ३३८॥ प्रादेः परस्य भुवो भव इत्यादेशः स्यात् । प्रभवति = पभवइ पभवए पभवेइ पभवेए । उद्भवति उन्भवइ । प्रतिभवइ पडिभवइ, 'प्रतिसर०' (३३) इति तस्य डः । खा भक्षणे । खादि-धाव्योः खा-धौ ॥ ३३९ ॥ अनयोः खा धा इत्येतो क्रमेण स्यातां वर्तमाने भविष्यति विध्या- दीनामेकवचनेषु च । खादति खाइ । चखाद खाहीअ । खादिता खाहिइ । खादिष्यति खाहिंइ । खादतु खाउ । एवं लङ्-लिङाशीर्लिङः । अखादीत् खादीअं खादीअ । लडू लड्वत् । क्षियो झिजः॥ ३४० ॥ 'क्षि क्षये' अस्य झिज इत्यादेशः स्यात् । क्षयति झिज्जइ झिजए । छिन्न-भिजावप्येके । व्रज गतौ। चो ब्रज-नृत्योः॥ ३४१॥ अनयोरन्तस्य चः स्यात् । व्रजति वच्चइ वच्चेइ वचए । ब्रजिता वच्च- हिइ वचहिए। वेष्ट वेष्टने ।

n ४२ पण्डित-रघुनाथ-कवि-विरचित वेष्टेश्च ॥ ३४२॥ अन्तस्य ढः स्यात् । ठापवादः । वेष्टते वेढइ वेढए वेढेइ वेढेए। 'कथेदः' (३५८) इति पूर्वसूत्रान्तर्गतं न कृतम् , 'उत्समोलं' (३४३) इत्युत्तरसूत्रेऽनुवृत्त्यर्थम् , अन्यथा कथिरपि ल्लविधानेऽनुवर्तेत । उत्समोलः ॥ ३४३ ॥ एतयोः परस्य वेष्टेरन्तस्य ल्ल: स्यात् । उद्वेष्टते उवेल्लइ । संवेष्टते संविल्लइ । स्फुट विकसने । स्फुटि-चल्योर्वा ॥ ३४४ ॥ अनयोरन्तस्य द्वित्वं वा स्यात् । स्फोटते फुइ फुटइ, भौवादिक- तौदादिको गृह्येते स्फुटि - चली इह । पट गतौ । पटेः फलः ॥ ३४५ ॥ स्पष्टम् । पति फलइ । जुभि गात्रविनामे । जुभो जंभाअ ॥ ३४६ ॥ जुभि इत्यस्य जंभाअ इत्यादेशः स्यात् । जृम्भते जंभाअइ जंभाएइ जंभाअए जंभाएए । जृम्भिताजंभाअहिइ जंभाएहिइ जंभाअहिए जंभा एहिए। जल्प व्यक्तायां वाचि । जल्पेर्लो मः॥ ३४७ ॥ जल्पेलस्य मः स्यात् । जल्पति जंपइ । घुण भ्रमणे । घुणो घोलः ॥ ३४८ ॥ घुणे?ल इत्यादेशः स्यात् । घूर्णति घोलइ घोलए, भ्वादि तुदादि। मील निमेषणे। प्रादेमीलः ॥ ३४९॥ प्रादेः परस्य नीलो लल्य द्वित्वं वा स्यात् । प्रमीलति= पमिल्लइ पमी- लइ पमिल्लए पमीलए पमिल्ले पनीलेइ पमील्लए पमीलेए । जि जये। श्रु-हु-जि-लू-धुवां ण्णोऽन्त्ये ह्रस्वः ॥ ३५० ॥ एषामन्ये पणः स्यात्, दीर्घस्य हस्खश्च स्यात् । जयति जिण्णइ जिगाय जिपणी। धावु गति-शुयो। धावति धावते धाइ । दधाव दधावे धाहीअ । धाविता धाहिइ । धावतु धावतां धाउ । कास शब्दकुत्सायाम् । [.

प्राकृतानन्द. . काशेर्वासः ॥ ३५१॥ अवात् परस्य काशेर्वास इत्यादेशः स्यात् । अवकासते ओवासइ । अवादिति किम् ? कासते कासइ । असु ग्लम् अदने । ग्रसेर्विसः ॥ ३५२ ॥ अस्य विस इत्यादेशः स्यात् । असते विसइ । गाह विलोडने । अवाद् गाहेर्वाहः ॥ ३५३ ॥ अवात् परस्य गाहेर्वाह इत्यादेशः स्यात् । अवगाहते ओवाहइ । अवादिति किम् ? गाहते गाहइ । वृषु मृषु सेचने । वृष-कृष-मृष-हषामृतोऽरिः॥ ३५४ ॥ एषां ऋतः अरिः इत्ययमादेशः स्यात् । वर्षति वरिसइ । मर्षति मरिसइ । कृषि विलेखने इति भौवादिकस्यैव ग्रहणम् , न तौदादिकस्य, वृषादिसाहचर्यात् । हृषु अलीके । हर्षति हरिसइ । वृधु वृद्धौ । वृधेढः ॥ ३५५ ॥ अन्तस्य स्यात् । वर्धते वहुइ, 'ऋतोऽद्' (१२०) इत्यकारः। जित्वरा सम्भ्रमे। त्वरस्तुवरः॥ ३५६ ॥ स्पष्टम् । त्वरते तुवरइ तुवरए । चल कम्पने । चलति चल्लइ चलइ, 'स्फुटि-चल्योवा (३४४) इति वा द्वित्वम् । पत्ल गती। शल-पत्योर्डः ॥ ३५७ ॥ अनयोरन्तस्य डः स्यात् । पतति पडइ। शदल शातने । शीयते सडइ । कथे निष्पाके। क्वथेः ॥ ३५८ ॥ अन्तस्य स्यात् । कथति कढइ । मलै हर्षक्षये । ग्लै वा-वाऔ ॥ ३५९ ॥ अस्य वा वाअ इत्येतावादेशौ स्याताम् । म्लायति वाइ वाअइ । ध्यै चिन्तायाम् । ष्ठा-ध्या-गानां ठाअ-झाअ-गाआः ॥ ३६० ॥ एषामेते क्रमेण स्युः ठा-झा-गाश्च वर्तमान-भविष्यदू-विध्यायेकवचनेषु ॥ ३६१ ॥ एषु ष्ठा-ध्या-गानां ठा झा गा इत्येते आदेशाः स्युः। चात् पूर्वोक्ताः।

- दृष्ट पण्डित-रघुनाथ-कवि-विरचित ध्यायति-झाअइ झाइ । दध्यो-झाइअं झाहीआध्याता-झाअहिइ झाहिए। एवं लट् । ध्यायतुझाअउ झाउ । अध्यासीत् =झाइअं झाईअ । अत्र 'ठाझा-गाश्चालुङि' इत्येव सूत्रयितुं युक्तम् । गै शब्दे । गायति गाअइ गाइ, पूर्ववत् । घा गन्धोपादाने । जिघ्रतेः पा-पाऔ ॥ ३६२ ॥ अस्य पा पाअ एतौ स्याताम् । जिघ्रति पाइ पाअइ । जघौ पाहील पाईअ पाइअं। ध्मा शब्दा-ऽग्निसंयोगयोः। उद्ध्मो धूमा ॥ ३६३ ॥ उदः परस्य धमतेः धूमा इत्यादेशः स्यात् । उद्धमति उद्भूमाइ । ष्टा गतिनिवृत्तौ । तिष्ठति ठाअइ ठाइ, ध्यावत् । स्मृ चिन्तायाम् । स्मरतेर्भर-सुमरौ ॥ ३६४ ॥ अस्य भर सुमर इत्येतौ स्याताम् । स्मरति भरइ सुमरइ । मृ गतौ। ऋतोऽरः॥ ३६५ ॥ धात्वन्तऋकारस्य अरः स्यात् । सरति संरइ । श्रु श्रवणे । शृणोति सुण्णइ । शुश्राव सुण्णीअ सुण्णिअं। वादीनां त्रिष्वप्यनुस्खारवर्ज हिलोपश्च वा ॥ ३६६ ॥ श्रु वचि नमि रुदि दृशि विदि इत्येतेषां प्रथम-मध्यम-उत्तमपुरुषेषु परेषु सोच्छं वोच्छं गच्छं रुच्छं दच्छं वेच्छं इति क्रमेण आदेशाः स्युः, अनुस्खारवर्ज हिलोपश्च वा । श्रोता सोच्छिहिइ सोच्छिइ सोच्छ। सोच्छहिइ सोच्छेहिइ सोच्छेइ सोच्छिहिए सोच्छिए सोच्छए सोच्छ- हिए सोच्छेहिए सोच्छेए । श्रोतारः = सोच्छहिंति सोच्छिति सोच्छति सोच्छिहिंति सोच्छेहिंति सोच्छेति। श्रोतासि सोच्छिसि सोच्छिहिसि सोच्छेसि सोच्छेहिसि सोच्छसि सोच्छहिसि सोच्छिसे सोच्छिहिसे सोच्छेसे सोच्छेहिसे सोच्छसे सोच्छहिसे । श्रोतास्थ-सोच्छिहिह सोच्छेहिह सोच्छहिह सोच्छिह सोच्छेह सोच्छह । कृ-दा-श्रु-वचि-गमि-रुदि-दशि-विदिरूपाणां काहं दाहं सोच्छं वोच्छं गच्छं रुच्छंदच्छं वेच्छं ॥ ३६७ ॥ एपामेते क्रमेण स्युः भविष्यत्युत्तमैकवचने । श्रोतास्मि-सोच्छं सोच्छिस्सामि सोच्छेस्सामि सोच्छस्सामि सोच्छिहामि सोच्छेहामि सोच्छाहामि सोच्छहामि सोच्छहिमि सोच्छिमि सोच्छेहिमि सोच्छेमि ४५ - प्राकृतानन्द सोच्छाहामि सोच्छामि सोच्छहिमि सोच्छमि सोच्छेस्सं सोच्छस्सं । श्रोतास्मः सोच्छिहिस्सा सोच्छेहिस्सा सोच्छाहिस्सा सोच्छिहित्था सोच्छेहित्था सोच्छाहित्था सोच्छहित्था सोच्छिस्सामो सोच्छेस्सामो सोच्छस्सामोसोच्छिहामो सोच्छेहामो सोच्छाहामो सोच्छहामोसोच्छि हिमो सोच्छिमो साच्छेहिमो सोच्छेमो सोच्छाहिमो सोच्छामो सोच्छ- हिमो सोच्छमो। श्रोष्यति सोच्छिहिइ इत्यादि । प्रथमे मध्यमस्यैक- वचने च लुड्वत् । बहुवचने तु श्रोष्यथ सोच्छिहिह सोच्छिह सोच्छे- हिह सोच्छेह सोच्छहिह सोच्छह सोच्छिहित्थ सोच्छित्थ सोच्छे- हित्य सोच्छेइत्थ सोच्छहित्थ सोच्छइत्थ । मिपि लुट्वत्, मवि च । मु- मयोस्तु यत्र मो इति तत्र मु-मौ प्रत्येकं प्रयोज्यौ । शृणोतु सुण्णउ । श्रृण्वन्तु सुणंतु । शृणु सुणतु । शृणुत सुणह । शृणोमि सुणमु । शृण्मः सुणमो । हशिर प्रेक्षणे । इर् इत् । दृशेः पुलअ-णिअकं-अवक्खाः ॥ ३६८ ॥ त्र्यक्षरा आदेशाः स्युः। पश्यति पुलअइ णिअकइ अवक्खह । दद्रष्ट पुलईअ णिअक(की?)अ अवक्खीअ । द्रष्टा दच्छिहिइ इत्यादि वोच्छवत् । कृषि विलेखने । कर्षति करिसइ । गम्लु गतौ गच्छति गमइ । गन्तामि गच्छं इत्यादि । इति भ्वादिः । अद भक्षणे। शेषाणामदन्तता ॥ ३६९॥ लुप्तानुबन्धानां शेषाणामकारान्तत्वं स्यात् । अत्ति अअइ । हन हिंसा-गत्यो। हन्तेमः ॥ ३७० ॥ हन्तेर्नस्य म्मः स्यात् । हन्ति हम्मइ । वच परिभाषणे । वक्ति व- अइ। वक्ष्यामि वोच्छं इत्यादि सोच्छवत् । विद ज्ञाने । वेत्ति वेद वेअइ । वेत्स्यामि बेच्छ । अस भुवि । अस्ति अस्थि । सन्ति असन्ति । असेलोपः ॥ ३७१॥ असो लोप: स्यात् थास्-सिपोः परयो । असि सि ।थासोऽनुवृत्ति- भाव-कर्मणोः सफला । स्थ त्थ । मि-मो-मु-मानामधो हश्च ॥ ३७२ ॥ . अस्तेः परेषां मि-मो-मु-मानामधो हः स्यात् , अस्तेश्च लोपः। अस्मि म्हि । स्मः म्हो म्ह म्हु।:. ..

४६ पण्डित-रघुनाथ-कवि-विरचित अस्तेरासिः ॥ ३७३ ॥ भूते निपातः । बखूब आसि । मृजूपू शुद्धौ । सृजेलुंभ-पुसौ ॥ ३७४ ॥ यक्षरौ स्याताम् । मार्टि लुभइ पुसइ 'सुप' इति पाठे सुपइ । रुदिर अश्रुविमोचने। रुदेवः ॥ ३७५ ॥ रुदेर्दस्य वः स्यात् । रोदिति रुवइ । रुदिष्यामि रुच्छं, वोच्छवत् । इत्यदादयः। हु दानादनयोः । जुहोति हुण्णइ, 'शु-हु-जि०' (३५०) इति पणः । अिभी भये। भियो भा-बीहौ ॥ ३७६ ॥ भा बीह इत्येतावादेशौ स्याताम् । बिभेति भाइ वीहइ । पृ पालन- पूरणयोः। पिपर्ति परइ । डुभृञ् धारण-पोषणयोः। विभार्ति भरइ । माङ् माने। निरो माङो माणः ॥ ३७७ ॥ निरः परस्य माङो माण इत्यादेशः स्यात् । निर्मिमीते णिम्माणइ । निरः किम् ? मिमीते माइ । डुदाल दाने । ददाति दाइ । दातास्मि दाहं । डधाञ् धारण-पोषणयोः । श्रदो धो दहः ॥ ३७८ ॥ श्रदः परस्य धो दह इत्यादेशः स्यात् । श्रद्दधाति सद्दहइ । श्रद इति किम् ? धाइ । विजिर पृथग्भावे । उदो विजः ॥ ३७९ ॥ उदः परस्य विजेजस्य वः स्यात् । उद्वेविक्ते उद्वेवेक्ति उविब्वइ । ऋ स्मृ गतौ । इयर्ति अरइ । ससर्ति सरइ । इति हादयः । दिवु क्रीडा-विजिगीषा-व्यवहारद्युति-स्मृति-मोद-मद-खान-कान्ति- गतिषु । दीव्यति दिवइ । नृती गानविनामे । नृत्यति णचइ। बसि उद्वेगे। बसेर्वजः ॥ ३८० ॥ स्पष्टम् । त्रस्यति वजा । ब्रीड चोदने लज्जायां च । ब्रीड्यति वीलइ। पूङ् प्राणिप्रसवे । सूयते सूइ । दू परितापे ।

- प्राकृतानन्द .. दूङो दूमः ॥ ३८१ ॥ स्पष्टम् । दूयते-दूमइ दूमए दूमेइ दूमेए । शो तनूकरणे । श्यति सोइ । दो अवखण्डने । यति दोइ । जनी प्रादुर्भावे । जायते जणइ । पद गतौ। पदः पालः ॥ ३८२ ॥ आदेशः स्यात् । पद्यते पालइ । बुध अवगमने। युधि-बुध्योः ॥ ३८३ ॥ एतयोधस्य झः स्यात् । वुध्यते बुज्झइ । युध सम्प्रहारे । युध्यते जुज्झइ । सृज विसर्गे । सृज्यते सज्जइ । शुष शोषणे । रुषादीनां दीर्घः ॥ ३८४ ॥ रुषादीनां दीर्घः स्यात् । शुष्यति सूसइ । तुष प्रीती। तुष्यति तूसइ । दुष वैकृत्ये । दुष्यति दूसइ । क्रुध कोपे। क्रुधे रः ॥ ३८५ ॥ स्पष्टम् । क्रुध्यति झूरइ । रुष रोषे । रुष्यति रूसइ । गृधु अभि- काङ्क्षायाम् । गृध्यति गधइ । इति दिवादयः। घुञ् अभिषवे । सुनोति सुअइ । चिञ् चयने । चिञश्विणः॥ ३८६ ॥ चित्रः चिण इत्यांदेशः स्यात् । चिनोति चिणइ । शक्ल शक्तौ। शकादीनां द्वित्वम् ॥ ३८७ ॥ शकादीनां द्वित्वं वा स्यात् । शक्नोति सकाइ । पक्षे- शकेस्तर-चअ-तीराः ॥ ३८८ ॥ अस्य यक्षरास्त्रय आदेशाः स्युः। शक्नोति तरइ चअइ तीरइ । अशू व्याप्ती सङ्घाते च । अश्नुते असइ । जिघृणा प्रागल्भ्ये । धृष्णोति धसइ । इति खादयः। तुद व्यथने । तुदति तुअइ । णुद प्रेरणे। गुदेलॊणः ॥ ३८९ ॥ णुदेलोण इत्यादेशः स्यात् । नुदति लोणइ । 'णोल्लं' इति पाठे णोल्लइ । कृष विलेखने । कृषति कसइ, 'वृष-कृष-०' (३५४) इति अरिस्तु न, वृषसाहचर्याद् भौवादिकस्यैव ग्रहणात् । ओविजी भये । उद्विजति उब्बिवइ, 'उदो विजः' (३७९) इति वः। टुमस्जी शुद्धौ।। . 1 .

पण्डित-रघुनाथ-कवि-विरचित बुड-खुप्पो मस्जेः ॥ ३९० ॥ [मस्जे: वुड खुप्प इत्येतावादेशौ स्याताम् । मजति वुडइ खुप्पम् । तृप तृप्तौ। तृपस्थिम्पः ॥ ३९१॥ तृपेः थिम्प इत्यादेशः स्यात् । तृपति थिम्पइ । घुण भ्रमणे । घूर्णति घोलइ । पृडू व्यायाले । प्रियते परइ । मृङ प्राणत्यागे। नियते मरइ । सृज विसर्गे । स्मृजति सअइ । कृती छेदने । कृन्तति कतइ । खिद परि- घाते। खिंदति विसूरइ । पिश अवयवे । पिशति पिसइ । इति तुदादयः। रुधिर् आवरणे। रुधेन्र्ध-म्मौ ॥ ३९२ ॥ रुधेः धस्य न्ध म्म इत्येतावादेशौ स्याताम् । रुणद्वि रुन्धइ रुम्मइ। भिदिर विदारणे। भिदि-च्छिदोरन्तस्य न्दः ॥ ३९३ ॥ अनयोः दस्य न्दः स्यात् । भिनत्ति भिंदइ । छिदिर द्वैधीकरणे । छिनत्ति छिंदह। खिद दैन्ये । खिनत्ति विसूरइ। ओविजी भय-चलनयोः। विनक्ति विअइ । उद्विनक्ति उबिवह । इति रुधादयः। तनु विस्तारे । तनोति तण्णइ । षणु दाने । सनोति सपणइ । क्षणु हिंसायाम् । क्षणोति खण्णइ । क्षिणु च-क्षिणोति खिण्णइ । ऋणु गतौ।। ऋणोति अण्णइ । तृणु अदने । तृणोति तण्णइ । घृणु दीप्तौ । घृणोति घण्णइ । वनु याचने । वनोति वण्णइ । मनु अवबोधने । मनोति.मण्णइ । हुकृञ् करणे। - . कृञः कुणो वा ॥ ३९४ ॥ कृनः कुण इत्यादेशो वा स्यात् । करोति कुणइ करइ । कृञः का भूत-भविष्यतोश्च ॥ ३९५ ॥ एतयोरर्थयोः क्त्वा-तुमुन् -तव्येषु च कृतः का इत्यादेशः स्यात् । चकार काहीअ कम्भं (2) [करिष्यति ?] काहिइ । कर्तासि काहं, दावत् । इति तनादयः। डुक्रीज् द्रव्यविनिमये। क्रीञः किणः॥ ३९६ ॥ स्पष्टम् । क्रीणाति किणइ ।

प्राकृतानन्द वे के च ॥ ३९७॥ वेः परस्य क्रीणातःक्के इत्यादेशः स्यात् । चात् किणः। विक्रीणाति विकेइ विकिणइ । लूज छेदने । लुनाति लुण्णइ, 'श्रु-हु-जि०' (३५०) इति अन्त्यस्य णः पूर्वस्य हखश्च । कृन हिंसायाम् । कृणाति करइ । धूज् कम्पने । धुनाति धुण्णइ । हिंसायाम् । शृणाति सरइ । पू पालन-पूर- णयोः। पृणाति परइ । मृ हिंसायाम् । मृणाति सरइ । ज्ञा अक्बोधने । ज्ञो जाण-मुणौ ॥ ३९८ ॥ यक्षराचादेशौ स्याताम् । जानाति जाणइ सुणइ । बध बन्धने । बध्नाति बंधई । वृक सम्भक्तौ । बृणीते वरइ । हद क्षोदे । मृदो लः ॥ ३९९ ॥ मृदातेः दस्य लः स्यात् । मृद्गाति मलइ । अश भोजने । अनाति असइ । पुष पुष्टौ । पुष्णाति पूसइ । ग्रह उपादाने । ग्रहेर्गेण्हः॥ ४०० ॥ स्पष्टम् । गृह्णाति गेण्हइ । इति ज्यादयः। चुर स्तेये। णिच एदादेरत आत् ॥ ४०१ ॥ धातोरकारस्य आत् स्यात्। आवे च ॥ ४०२ ॥ णिचोऽयमपि आदेशः स्यात् । चोरयति चुरेइ चुरावेइ । चिति स्मृत्याम् । चिन्तयति चिंतेइ चिंतावेइ । लक्ष दर्शना-ऽङ्कनयोः। लक्षयति लाखेइ लखावेइ । भक्ष अदने । भक्षयति भाखेइ खावेइ । गज शब्दे । गाजयति गाजेइ गजावेद । शठ श्लाघायाम् । शाठयति साठेइ लठावेइ। इति चुरादयः। भू-हेतुमद् णिच् । भावयति होएइ होआवेइ हुबेइ हुवावेइ । पट- पाटयति फालेइ फलावेइ । जल्पयति जंपेइ जंपावइ । प्रसीलयति पनि- ल्लेइ पमिल्लावेई । अवकाशयति ओबासेइ ओवासावेइ । ग्रासयति बिसेइ विसावेइ । अवगाहयति ओगाहेइ ओगाहावें । रोषयति रूसेइ रूसा- वेइ । वर्षयति वरिसेइ बरिसावेइ । वर्धयति बड्लेइ बड्डावेइ । त्वरयति तुवरेइ तुवरावेइ। चलयति चल्लेइ चालेइ चल्लायेइ चलावेइ । स्मारयति N णिच एत् स्यात्, ७ पण्डित-रघुनाथ-कवि-विरचित भारेइ भरावेइ सुमरेइ सुमरावेइ । सारयति सारेइ सरावेइ । श्रावयति सुण्णेइ सुपणावेइ । गमयति गामेइ गमावेइ । रोदयति रुवेइ रुवावेइ । पारयति पारेइ पारावेई । नर्त्तयति णचेइ णचावेइ । त्रासयति वजेह बजावे । ब्रीडयति वीलेइ वीलावेइ । शुष्यति सूसेइ सूसावेड् । क्रुध्यति झूरेइ झुरावेइ । चिनोति चिपणेइ चिण्णावेइ । शक्नोति सकेइ सकावेइ, तारेइ तरावेइ, चाएइ चआवेइ, तीरेइ तीरावेइ । घूर्णयति घोलेइ घोला- बेइ । सन्धयति रुंधेइ रंधावेइ, रुस्भेइ रुम्भावेइ । कारयति कारेइ करावेइ, कुणेइ कुणावेइ । काययति किणेइ किणावेह । इति हेतुमपिणचप्रकरणम् । यक ईअ-इज्जौ ॥ ४०३ ॥ यको बक्षरावादेशौ स्याताम् भूयते होईअइ होइज्जइ हुवीअइ हुविजइ। भाव-कर्मणोर्वश्च ॥ ४०४॥ श्रु हु जि लू धू एषामन्ते वः स्यात्, णश्च भाव-कर्मणोः । जीयते जिबइ जिण्णीअइ जिणिजइ। गमादीनां द्वित्वं वा ॥ ४०५॥ एषां द्वित्वं वा स्याद् आव-कर्मणोः । हस्यते हस्सइ हसीअइ हसिज्जइ । रम्यते रस्मइ रमीअइ रमिजइ । ह-कोहीर-कीरौ ॥ ४०६ ॥ हज-कृतोः ऋमाद हीर कीर इत्येतौ स्यातां भाव-कर्मणोः । हियते हीरइ । श्रूयते सुबइ सुपणीअइ सुणिज्जइ । गम्यते गम्मइ गमीअइ गमिजइ । दुहि-लिहि-वहां दुभ-लिब्भ-वब्भाः॥ ४०७ ॥ एषां क्रमेण यक्षरा आदेशाः स्युः भाव-कर्मणोः । उह्यते वभइ । दुयते दुभइ । लिह्यते लिव्भइ । हूयते हुवइ हुण्णीअइ हुणिजइ । क्रियते कीरइ । लूयते लुबइ लुण्णीअइ लुणिजइ । धूयते धुवइ धुण्णीअइ धुणिज्जइ। ज्ञो णज-णवौ वा ॥ ४०८ ॥ ज्ञाधातोः यक्षरावादेशौ वा स्यातां भाव-कर्मणोः । ज्ञायते णजइ णवइ । पले जाणीअई जाणिजइ, मुणीअइ मुणिजइ॥ , प्राकृतानन्द . " . ग्रहे दीर्घो वा ॥ ४०९ ॥ स्पष्टम् । गृह्यते गाहिजइ । पक्षे गेण्हिजइ । ॥ इति भावकर्मप्रकरणम् ॥ इति तिङन्तम् ॥ ते हुः ॥ ४१० ॥ भुवो हुरादेशः स्यात् क्ते । भूतं हुअं। ते तुरः॥ ४११॥ त्वरतेः तुर इत्यादेशः स्यात् क्ते। ते॥४१२॥ धातोरन्त्याकारस्य इ. स्थात् क्ते । त्वरितं तुरिअं। पटितं फलिअं। तेन दिण्णादयः ॥ ४१३ ॥ दिण्ण इत्यादयः शब्दाः क्तेन सह निपात्यन्ते । दाञ् दत्तं दिण्णं । रुदिर रुदितं रुपणं । त्रसी त्रस्तं हित्थं । दह भस्मीकरणे दग्धं डहूं। रज्ज रक्तं रत्तं । दंश दष्ट डटुं । रुधिर रुद्धं रुई इत्यादयः । भुजादीनां क्त्वा-तुमुन्-तव्येषु लोपः ॥ ११४ ॥ एषामन्तस्य लोपो वा स्यात् । क्त्व ऊणः ॥ ४१५ ॥ त्वाप्रत्ययस्य ऊण इत्यादेशः स्यात् । भुक्त्वा भोऊण । भोक्तुम् भोउं । भोक्तव्यम् भोअछ । विदित्वा देऊण । वेत्तुम् वेडं। वेत्तव्यम् वेअवं । एवं रुदिर। घे क्त्वा-तुमुन्-तव्येषु ॥ ४१६ ॥ ग्रहः धे इत्यादेशः स्याद् एषु परेषु । गृहीत्वा घेऊण । ग्रहीतुम् घेउं । ग्रहीतव्यम् घेअछ। कृत्वा काऊण । कर्तुम् काउं । कत्र्तव्यम् काअच। तृन इरः शीले ॥ ४१७ ॥ शीलाथै तृन इर' इत्यादेशः स्यात् । गन्ता गमिरो, गमनशील इत्यर्थः।

५२ . + पण्डित-रघुनाथ-कवि-विरचित न्त-माणौ शत-शानचोः॥ ४१८ ॥ शतृ शानच् इत्येतयोः क्रमेण न्त माण इत्येतावादेशौ ल्याताम् । भवन हुबंतो। यजमानः जअमाणो। ईत स्त्रियाम् ॥ ४१९॥ शत-शानचो ईदादेशः स्यादन्त-माणौ च । वदन्ती बदई । यज- माना जअमाणी । पक्षे वदंती जअमाणा। इति श्रीज्योतिर्वित्सरसात्मजरघुनाथकविकण्ठीरवविरचिते प्राकृतानन्दे द्वितीयः परिच्छेदः। '. ॥ समातःप्राकृतानन्दः।। [॥ संवत् १७२६ अश्विन मुदि १२ रविदिने लिखितं लासपुरनग- रमध्ये शुभं भवतु ।॥ श्री॥॥छ॥]

परिशिष्टम् प्राकृतशब्दानुक्रमणिका प्राकृतशब्द: संस्कृतरूपम् सूत्राणि प्राकृतशब्द: संस्कृतरूपम् सूत्राणि श्र अस्थि २१७ २१७ अनड्वान् प्रस्ति ३७० अट्टि अणडुनो अस्थि अत्तो प्रत्तो प्रद्धाणो अप्पजू प्रप्परगा अप्पणो प्राप्तः प्रातः प्रद्धा, प्रध्वा प्रात्मयुक नात्मना ११६ २४१ २४२ २४० २४० श्रात्मनः प्रपणः नात्मनः २४० श्रप्पा प्रात्मनः २४० २४० २४० अंग्रह अत्ति ३६९ अयो अमूः २८६ अग्गो, अगवो अग्नयः १४० अरिंगणा अग्निना १४१ अग्गिणो अग्नीन १४०A अग्गिम्सि अग्नो १४४ अग्गि अग्नि १४० अग्गी नंग्निः १३८ अग्गी अग्नयः १४० अग्गोश्रो अग्नयः १३६,१४० अग्गीणो (अग्गिस्स) अग्नेः १४४ अग्गीणो प्ररत्तयः १३६,१४० अग्गीदु, अग्गोंदो अग्नः १४२ अग्गीवो अग्नयः १४० अग्गीहि पाने: १४२ अग्गीणं अग्नीनाम् १४४ अग्गीसु अग्नीषु अग्गीसुत्तो. अग्गीहितो अग्निभ्यः १४३ १७६ अच्छि अक्षि २१७. अच्छी श्रक्षि १८१ अच्छेरं प्राश्चर्य अण्णइ. ऋणोति ३९३ अणुअत्तमाणो अनुवर्तमानः १३४ २३६ २४० २४० २४० २४० २४० प्रप्पा प्रात्मा अप्पादु, अप्पादो प्रात्मनः अप्पाणो प्रात्मनः अप्पाणं प्रात्मना अपाहि प्रात्मनः अप्पेहि प्रात्मभिः अप्पं प्रात्मानं अप्पम्मि प्रात्मनि अप्पासुत्तो, अप्पाहतो प्रात्मभ्यः अप्पे प्रात्मनि अप्पेसु प्रात्मसु अम्हे घयन् अम्हे अस्मान् प्रस्माकम् अम्हेसु अस्मासु २४७ अङ्ग ली नङ्ग री २४० २४० २६७ २६६ २७६ २७७ अम्हे [ ५४ ] प्राकृतशब्दः संस्कृतरूपम् सूत्राणि प्राकृतशब्दः संस्कृतरूपम् सूत्राणि २७४ अस्सि २२६ अस्मत अस्माभिः अस्मिन् असो २७२ २८२ २७४ २८७ २७६ २७६ अहम् अहम् २६५ २६६ २८२ प्रह अह अहवं अहम्मि अहम्मि अहिआई अहिमज्जु अहं अहं माम् २६८ १७४ २८२ २८२ १५१ अभिजातिः अभिमन्युः अहम् अहम् २६५ अस्मत् अस्माकम् अस्माकम् अमी अमुष्मिन् अमुना अमी अमीषाम् अमुष्मिन् अमुष्य अमुष्मिन् अमुम् प्रदः प्रसौ प्रमूनि अमून २८२ २८२ २८२ श्रा २८२ २८२ २८२ २८७ नाग्रदो पाइदी पाउदी अम्हेसुत्तो अम्हेहि अम्हेहितो अम्हें अम्हाणं अमुए अमृत्य अमुणां अमुणो अमुणं अमुम्मि श्रमुस्स अमुस्सि अमुं अमुं अमू अमूई अमूओ प्रमूदिसा अमूड अमूदो अमूसु अमूसुत्तो प्रमूहि अमूहि अमूहितो रह श्रवक्खा अवकावी अवगाहो प्रदो प्रागतः प्राकृतिः प्राकृति: १७५ १७५ १७० २१४ प्राणा प्राज्ञा २८२ २८७ पालानं श्रापीडः प्रावत: असो दिक् प्राणालं पामेलो श्रावत्तो पासि श्रासो, प्रस्सो अहिपाई. अहिराई २८२ २८६ २८२ २८२ २८२ २८२ ३७३ बभूव अश्वः ४४ अभिजातिः १७४ प्रमुष्मात अमुष्मात अमीषु श्रमीभ्यः अमुष्मात प्रमीभिः प्रमीभ्यः इयत्ति पश्यति इ २८२ २८२ २८२ ३७६ १२५ इच्छिो इणमो इणं २८७ २८७ दद्रष्ट ३१० इमम्मि ईप्सितः इदम् इदम् इदम् इह नस्य अस्मिन् इमान् इयं इमानि २८७ २२९ २२६ ० प्रवगाहा अपनयः प्रश्नुते प्रश्नाति सन्ति इमस्त इमस्सि असह इमा २२६ २२६ २८५ प्रसई प्रसन्ति ३७० २२६ इमा इमाई. २८७ [ ५५ ] प्राकृतशब्दः संस्कृतरूपम् सूत्राणि संस्कृतरूपम् सूत्राणि प्राकृतशब्दः इमाणं २२७ २२६ २२६ उसुमो उहे उंबर उत्सुकः उभौ उदुम्बरम् १२६ १३६ २०४ ए २२६ २२६ २२६ २२६ इमादु इमादो इमासुत्तो इमाहि इमाहितो इमिणा इमे इमेण इमेसि इमेसु इमेहि इमो एषां प्रस्मात अस्मात एभ्यः अस्मात एभ्यः अनेन इमे अनेन एषां एषु एभिः प्रयं इमं एव एकादशः एवम् इदानी २२६ २२६ २२७ २२६ ऋषिः २२६ २२६ २२६ १४४ ६० १०४ १०४ इसी इंगालो ३१२ १०१ ३१२ २१५ २४९ २४९ २४६ २४६ २४७ २४७ २४७ . २४६ २४६ २३६ २४७ अङ्गारः इन्द्रः एम एप्रारहो ए एहि एत्तो एत्थ एतम्मि एतस्सि एता एते एतं एदादु एदादी एदाहि एदिणा एदेण एदेहि एवं एरावणो एरिसो एव एवं एस एसो इन्द्रो इंद्रो एतस्मात एतस्मिन् एतस्मिन् एतस्मिन् एतान् एते एतं एतस्मात एतस्मात एतस्मात एतेन एतेन एतैः एतत् ऐरावतः ईदृशः इन्द्रः उ उक्केरो उत्कर: २४७ उक्षा २४७ उत्क्षिप्त उच्छा उच्छित्तो उच्छू उद्धमा ४१ १६६ ११८ १५० ३६३ २८७ इक्षुः उद्धमति ८२ ५४ १५० १८७ उदहलं उप्पीयो ३१२ ३१२ एव एवम् एषः एषः २४७ उब्भवइ २४७ उवाणा २८३ ऋतुः उदखलम् उत्पीत: उद्भवति उपानत उद्वविक्ते, उद्वेवेवित उद्विजति उद्विनक्षित उद्वेष्टते यो उम्विन्वय -- ३७६ ३८६ ३९३ '.३४३ १२६ अोखलं श्रोगाहावे श्रोगाहेइ प्रोगाहो ओणम्रो उटूखलम् अवगाहयति अवगाहयति अवगाहा अपनयः १८७ ४०२ ४०२ उज्वेल्लइ उसवो उत्सवः ३१० [ ५६ ] प्राकृतशव्दः संस्कृतरूपम् सूत्राणि प्राकृतशब्द; संस्कृतरूपम् মুখাবি कस्स कत्य कस्मिन् करिस कस्सि कदा नोवास अोवासावेह पोवासे अोवाहइ पोहलं अंकोल्लं ग्रंवं अंसू अवकासते अवकाशयति अवकाशयति अवगाहते उलूहलम् अंकोठं श्रानं अश्रु क , ४०२ ४०२ ३५३ १८७A २२२ २२४ २२५ ३८६ २०० कृपति करण फसई कलणं कलंबो कहावणो २०० ८३ २०८ कदम्वः कापणः स्मिन् ૬૨૪ २१७ कहि २२४ २२५ २२१ ४१६ कइयो कैतवः ७१ का कस्मात् कर्तव्यम् काअनं দঙ্গা फदा २२५ कजरको ७४ कामा २८४ कौरवः कोशल: कउसलो २८५ कच्छा कज्जो का झाई काउं काति कर्तुम कृत्वा २८७ ४१६ ४१६ काऊण २८५ कढई कढोरं कण्हो कण्हं कण्हत्तर्ण कण्हदा कतई कत्तरी काए कानु काणं कारे कालाप्रसं कालासं कास कत्तो कक्षा १६६ कार्यः ११२ क्वति ३५८ कठोरं १३६ कृष्ण: १०,१२०,१३३ कृष्णम् २ कृष्णत्त्वम् कृष्णता ३१३ कृन्तति कर्तरी १८० कस्मात २२१ कदा २२५ कस्मात २२१ करिष्यति (?) ३६५ कदा २२५ कर्म २४२ कवन्धः करोति .३६४ कृणाति ३६७ कारयति ४०२ कर्षति करेणुः कत्थ कदो कम्भ (?) कम्मि कम्मो कर्मधा . कस्मात २२१ केषां २२३ कारयति ४०२ कालायसं २१० कालायसं २१० कस्य २२२ कासते केभ्यः २२१ कस्मात २२१ केभ्यः २२१ करिष्यति (?) ३६५ फदा २२५ कास्मि ३९५ कृत्त्या १६५ कोत्ति: १७६ क्रीणाति काययति ४०२ काययति ४०२ कासह कासुत्तो काहि काहितो काही काहे काहं फिच्चा कित्ती किणइ किणावेइ किरोड कर कर करावे करिसद करेणू . [ ५७ ] प्राकृतशब्दः संस्कृतरूपम् सूत्राणि प्राकृतशब्दः संस्कृतरूपम् सूत्राणि खमा क्षमा समा १६६ १७२ ३३६ ३३६ खहिइ खाइ खाऊ खादिता खादति खादतु स्थाणुः अखादीत अखादीत् खादिष्यति १५१ ३३६ , खाणू खादी खादी वाहिह खाहीन खिण्ण खुज्जो सुप्प खोडो खंभो प्वखाद क्षिणोति ३६३ कुब्जा सज्जति स्फोटक: ३६० स्तस्भः ११० किरिया किलिट्ठ किलितं किवा किसणो किसरा किस्सा कि की की फोप्रा कोई कीए फीरइ फीसे फुक्खेश्रो कुच्छी कुण कुणावे कुणेह के केढवो केरिसो केलासो केवट्टो केसि केसु को कोत्थुहो कोसलो कंदोट्टो क्रिया क्लिष्ट ..२०८ चलुप्तं १६१ कृपा १६५ कृष्णः (भगवति) १३३ कृशरा १६५ कस्याः २८५ किम २८७ का १७४,२८४ फस्याः २८५ कस्याः २८५ फस्याः २८५ कस्याः २८५ क्रियते ४०७ फस्याः २८५ कौक्षेयकः कुक्षिः १७६ करोति ३९४ फारयति ४०२ फारयति ४०२ के २१६ कैटभः कीदृशः ५४ कैलासः ६६ कैवतः केषां २२३ केषु २२५ कः २१६ कौस्तुभः १०८ कौशलः कमलं २१५ ७६ गौरवं १६७ गद्गवः गन्तास्मि गाजयति गउरवं गरगरो गच्छ गजावेद गड्डो गधा गम्भिणो गभिणं गलः ४०२ ११७ ३८५ ९० १६७ गम्म गृध्यति गभितः गभितं गम्यते गच्छति गमयति गम्यते ३६० ४०२ ४०६ गमई समावेइ गमिज्जा गमिरो गमी गरु गन्ता गम्यते ४०६ ख. - खग्गो खङ्गः क्षणोति पहवई गाप्रद गुरु गुर्षी गृहपतिः गायति गायति २१७ १७६ १४५, २१२ ३६१ ३९३ खण्ण खणो क्षणः गाइ . [ ५८ ] प्राकृतशब्दः संस्कृतरूपम् सूत्राणि प्राकृतशव्दः संस्कृतरूपम् सूत्राणि ४०२ चत्वारः गाजेइ गामेइ गारवं ४०२ चतुरः चततः २१८ २१८ २०४ १६७ चत्वारः २१८ २८४ गाजर्यात गमयति गौरवं गाहते गृह्यते गष्टि: गोः गुणवान् गृह्णाति गृह्यते गौरवं गोदावरी चत्तारि चत्तारि चत्तारि चत्तारो चत्तारो चत्तारो चन्दिमा चम्मो गाहा गाहिज्जा गिट्ठी गिरा गुणवत्तो गेहद गेण्हिज्जा गोरवं गोला २८४ चतुरः चतलः चन्द्रिका चर्म चलति चलति २४२ ३१४ ४०० चलभइ ४०६ १६७ दरणः ६० २१५ ४०२ चलइ चलणो चल्लावे चलावे चल्लेइ चाउलियं घ ૪૦૨ घण्ण २१५ घणा ४०२ २१२ ४६२. ४१६ घृणोति घृणा गृह ग्रहीतव्यम् गृहीत्वा ग्रहीतुम् घूर्णति घूर्णति घूर्णयति घूर्णयति घरं घनघं घेऊण घेउं घोल घोलए घोलेइ घोलावे ४०२ ४१६ ४१६ ३४८,३६१ ३४८ ४०२ चलयति चलयति चलयति चातुर्य शक्नोति चलयति चिनोति चिनोति चिनोति चिन्तयति चिन्यति चिह्न किरातः चिकुरः चोरयति चोरयति चतुर्थी चतुर्दशी चौर्य ४०२ ४०२ चाए चालेइ चिणइ चिण्णावे चिण्णेइ चितावेइ चिते चिन्छ चिलादो चिहुरो चुरावेइ चुरेइ चोत्थी चोदही चोरिनं ४०२ २०५ ४०२ ૬૨ ७८ ४०२ ४०२ ४०२ ७१२ १७८ १७८ २०२ चनई चावे चइत्तो चउत्यो चउद्दही चउण्हं चऊतु चउसुत्तो चऊहि चउहितो शश्नोति शक्नोति चैत्रः चतुर्थी चतुर्दशी चतुर्णा चतुएं चतुर्व्यः चतुभिः चतुर्थ्य: १७८ २१८ २१८ छ. सप्तपर्णः षष्ठी छत्तवण्णो छट्ठी छणो R १८० २१८ २१८ क्षणः २१८ क्षमा १६६ [ ५६ ] प्राकृतशव्दः संस्कृतरूपम् सूत्राणि प्राकृतशब्दः संस्कृतरूपम् सूत्राणि ४०४ षण्मुखः छायानामः ९६ १३१ ३५० जीयते जिगाय जीयते जीयते । ४०४ शविकः ४०४ यस्याः २८५ . छम्मुहो छायाग्गामो छवो छाहा छाहागामो छाही छिदइ छोरं छुद्धो छुणा जा १७५ छाया १६८, १७४ छायाग्रामः १३१ छाया १७४ छिनत्ति ३६३ क्षीरं २०४ क्षुब्धः ११८ क्षुणा १६६ या २८५ यस्याः जिणिज्जइ जिण्णीय जिण्णी जिम्वर जिस्सा जी जी जी जीपा जीपा जी जीए जीसे जीहा जुउच्छा जुगुच्छा जुज्झइ २८५ १७३ ज्या यस्याः २८५ २८५ ज यस्याः यस्याः यजमाना ४१६ ४१६ जप्रमाणा जप्रमाणी जप्रमाणो यस्याः २८५ २८५ १६५ यजमाना यजमानः ४१८ १६६ जउणा जढरं जण्णो यमुना जठरं १६६ १२७ जिह्वा जुगुप्सा जुगुप्सा युध्यते युवा १६६ १६६ ३८३ २४१ २४६ यज्ञः जुवा, जुवाणो जह्नः जायते जण्हू जण जम्मो जसो जहिटिलो १५० ३८१ २४२ ४० जन्म २८२ यश: १६६ युधिष्ठिरः या ६० २८५ २८७ ३४७ ४०२ जा या. २८५ जाउ ४०२ २८५ याः जो जोग्गो जोवणं जं जंप जंपावेइ जंपेइ जंभाई जंभाअहिइ जंभाअहिए जंभाए जंभाएइ जंभाएए जंभाएहिए जंभाएहिइ यस्याः .जाइ जाई २८५ २८७ यानि योग्यः यौवनम् यत् जापति जल्पयति जल्पयति जृम्भते जृम्भिता जृम्भिता जृम्भते ज़म्भते जम्भते जम्भिता जृम्भिता भ ध्यायतु ध्यायति यस्याः २८५ ३४६ ३४६ ३४६ ३४६ ३४६ ३४६ २८५ जाए जामो जाण जाणिज्जइ जाणीव जामामा जामाप्रारो जिण्णइ या: जानाति ज्ञायते ज्ञायते ४०८ ४०८ ३४६ जामाता १५५ १५५ ३६१ जामातार: जयति झाप्रउ झाइ ३५० [ ६० ] प्राकृतशब्दः संस्कृतरूपम् सूत्रांरिण. प्राकृतशब्दः संस्कृतरूपम् सूत्राणि २० झाअहिइ भाइ झाइ झाइ झाइ . २० ध्याता ध्यायति दघ्यो अध्यासीत् अध्यासीत् ध्यायतु दध्यो ३६१ ३३१ १६ १६ झाउ ३६१ २० ध्याता ३६१ झाहीन झाहिइ झिज्जा झिज्जए झूरावेइ ३४० १५ ३४० १४ ४०२ क्षयति क्षयति व्यति अध्यक्ति क्रुध्यति ठ तिष्ठति तिष्ठति भूरेइ ४०२ २४ १७ ठाइ १० ३६२ ३६३ ठाह mm दष्टं दछ ३६८ णाराप्रणा नारायणात पारानणादु नारायणात् णाराप्रणादो नारायणात णाराप्रणाणं नारायणेभ्यः णाराणाणं नारायणानां णाराप्रणासुत्तो नारायणेभ्यः णाराणाहि नारायणात नारायणहितो नागायणेभ्यः णाराणे नारायणान् णारात्रणे नारायणी णारायणे नारायणे पारामण नारायणेन पारायणेसु नारायणेषु पारायणेहि नारायणः पाराप्रणो नारायणः जाहलो लाहलः णांगलो लाङ्गलः णिक पश्यति णिप्रयक की?] अ वद्रष्ट णिडालं ललाटं णिद्दालू निद्रावान् णिफंदो निस्पक्ष: णिम्माण निर्भिमोते णिवत्तो निवर्तः णिसढो निषधः णिस्तासो निःश्वासः णिसा निशा णिहिरो निहितः णिहित्तो निहितः णिहसो निकषः णीसासो निःश्वासः ण अस्मान् णेउरं नूपुर णेद्दा निद्रा णेद्रा निद्रा डट्ठ उड्डं डसणो होला डंडो ४१३ ४१३ ६४ २१५ दशनः दोला दण्ड: ६४ १२२ ३७७ ण ११६ ११६ १ ६२ हाम्रो इसोत्तो णच्च णच्चावे णच्चे ३७६ १३२ १६८ स्नातः नदीस्रोतः नृत्यति नयति नर्तयति ज्ञायते ज्ञायते नारायणे ४०२ ४०२ १३२ णज्ज ४०८ ४०८ ७८ णव्वा णाराअणस्मि णाराप्रणस्स नारायणाय १४, २३ १६ १४.२१ १४ २६९ १६० णाराणस्स नारायणस्य नारायणा: - णाराप्रणा णाराणा नारायणान् १५ १६४ [ ६१ -] -- प्राकृतशब्दः संस्कृतरूपम् सूत्राणि प्राकृतशब्दः संस्कृतरूपम् सूत्राणि , तारेड तालवण्ठ णेहो णोभलिपा णोमल्लिना णोल्ला शोहलो ४०२ २०७. २४४ तास स्नेहः नवफलिका नवमल्लिका नुदति . दोहदः स्थ. शक्नोति तालवृन्तकं तस्य तेभ्यः तस्मात् तीक्ष्णं २४४ तह त्वया त्रयः ता तइ तइमा त्वयि तदा तेन तहणा तइत्तो तए त्वत् त्वया त्वयि तए तो ३८. १६४ १६४ ३८६ ५३.६७ ३७१ २५५ २६३ २४६ २४३ २५६ २५५ २६३ २४४ ३६३ ३६३ १८१ २४६ २५६ २४४ २४४ २४६ ३८८ ४०२ २०७ २८२ २४५ २४६ तासुत्तो ताहि तिण्हं तिणि तो तीण्ड तीरइ तीरावेइ तीरेइ तीसु तीसुत्तो तीहि तीहितो तुई तुए तुए तुझ तुज्झाणं तुझे २४४ २०४ १४६ १७४ १५० ३८८ ४०२ ४०२ १५० १५० १५० १५० ३८८ २५५ २६३ २६१ त्रयाणाम् शक्नोति शक्नोति शक्नोनी त्रिषु त्रिभ्यः त्रिभिः त्रिभ्यः तुदति स्वया त्वयि तण्ण तस्मात् तनोति तृणोति तन्वी तस्मिन् त्वत् तस्मात् तस्मात् . तस्मिन् शक्नोति शक्नोति तालवृन्तकं तव २६२ २५२ तण्ण तणुई तत्थ तत्तो. तत्तो तदो. तम्मि तरह तरावे तलयेण्ठ तवो तस्स तस्सि तहि तहे ता. ताई ताणं तादु तादो २५४ युष्माकम् यूयम्, युष्मान् युष्मासु युष्माभिः तूष्णीकः तूष्णीकः तव युष्माभिः तव २६४ २५८ १३२ १३२ तपः तस्य २६१ तस्मिन् तस्मिन् २४६ तुझसु तुझेहि तुहिनो तुहिको तुम तुन्भेहि तुम्ह तुम्हाणं तुम्हासुत्तो तुम्हाहितो तुम्हे तुम्हे २५८ तदा . २४६ २४३ ૨૪૭ २६१ २६२ .२६० तान्. तानि तेषां तस्मात् तस्मात् युष्माकम् युष्मत युष्मत यूयं युष्मान् २४६ २४४ २४४ २६० २५२ २५४ [ ६२ ] प्राकृतशब्दः संस्कृतरूपम् सूत्राणि प्राकृतशब्दः संस्कृतरूपम् सूत्राणि २६४ देवं १६३ २५८ Fष्टा दशमुखः दहारथः १०२ १०२ २६२ युष्मास युष्माभिः त्वया स्वयि त्वयि त्वत् त्वत् त्वत् तव २६३ २५६ १०२ ཟླ ཟླ ཟླ तुम्हेसु तुम्हेंहिं तुमए तुमए तुमम्मि तुमादु तुमादो तुमाहि तुमो तुमं तुमं तुरिनं तुवरावेद तुवरेइ तुह तुरं तूस २५६ १९८ त्वाम् त्वं त्वरितं स्वरयति स्वरयति २५६ २६१ २५३ २५१ ४१२ ४०२ ४०२ १०३ १०३ २८३ दशमुखः दशरथः. ददाति दाडिम दाडिम दातास्मि देवरः दिवसः दिवसः धोः दृष्टिः दत्त दुहिता दीव्यति दिक दूकूलं दुकूलं द्रुतः दुःखितः दुह्यते २६१ १७५ ay Va ३८४ २४३ २४३ दइवं दच्छिहिद दसमुहो दसरहो दहमहो दहरहो दाइ दाडिम दालिम दाह दिधरो दिप्रतो दिग्रहो दिया दिट्ठी दिण्णं दिद्धी दिव दिसा दुअल्लं दुऊलं दुओ दुक्खियो दुभा दुवे दुहिरो दूम दूमए दूमेइ दूमेए दूसइ देअरो देवं दो दोण्हं दोणि तव तूर्य तुष्यति ते तेन त्रयोदशः त्रैलोक्यं तेषु तेषां तः त्वाम् तम् त्वं ४१३ २१५ ३७४ २८६ १८६ १८६ १०१ तेण तेरहो तेलोरकं तेसु तेसि तेहि १६१ २४६ २४६ २४३ १३२ ४०७ १४६ १३२ २४३ 3. २५१ तं तं तंवो तवं १०६ स्तम्बः तानं २०८ थ दुःखितः दूयते दूयते दूयते दूयते दुष्यति देवरः देवं द्यति द्वयोः ३८१ ३८१ १८४ चाणू थिम्प स्थाणुः (हरवाचके) १५१ तृपति - १६३ द द्रुयो दइच्चो .. १०४ द्रतः दैत्यः १४८ १४६ [ .६३ ] प्राकृतशब्द: संस्कृतरूपम् सूत्राणि प्राकृतशब्दः संस्कृतरूपम् सूत्राणि प्रतिभवति प्रतिसरः दोसु दोसुत्तो दोहि दोहितो प्रथमः ९२ पडिभव पडिसरो पढमो पहा पण्ही पण्हो पदिवत्ती प्रश्नः प्रश्नः १५६ १७४ १२० १७५ mr घणमोहर घणालो घणं पभवह ३३८ ३३८ घसह घाइ द्वयोः १४८ द्वाभ्याम् १४७ द्वाभ्याम् १४७ द्वाभ्याम् १४७ ध धनमाहरति धनवान् ३१४ धनम् २१२ धृष्णोति ३८८ धावति, धावते ३५० धावतां, धावतु .. ३५० धाविता ३५० दधावे, दधाव ३५० धंयं १६६ धुनाति ३६७ धूयते ४०७ . धूयते धूर्तः ११६ धूः धूयते. ४०७ ३३७ घाउ पभवए पभवे पनवेए पमिल्ल पमिल्लए पमिल्लावा पमिल्लेइ ३४६ ३४६ ४०२ .३४६ ४०२ धाहिइ धाहीन धीर धुण्ण धुणिज्जा धुण्णीनइ धुत्तो धुरा धुवनइ : .. ४०७ ३४.६ ३४६ २८४ पमीला पमीलए पमीलेइ पमीलेए पमील्लेए ३४६ प्रश्न: प्रतिपत्ति प्रभवति प्रभवति प्रभवति प्रभवति प्रमीलति प्रमीलति प्रमीलयति प्रमीलति, प्रमीलयति .प्रमोलति प्रमीलति प्रमीलति प्रमोलति प्रमीलति पिपति प्रियते पृणाति प्रलादः पर्यस्तं. पर्याण प्रकोष्ठः जिघ्रति जिघ्रति जत्रो प्रावट पारयति पारयति पद्यते . ३४६ ३४६ नदी... पर नई नारायण .१८१ १५ नारायणं पर ३७६ ३६१ -३६७ १०८ प प्रतिभवति प्रकोष्ठः पति: जनौ पौरः परह पल्हादो पल्लत्थं पल्लाणं पवठ्ठो पाह २०३ २०३ ७२ १५० ३६२ ७२ ७४ प्रतिभव पग्रहा पई पईन पउरो पच्छत्तो पच्छिमा पज्जुण्णो पट्टणं पडइ पडाप्रा. ३६२ पाश्चात्यः पश्चिमा १२५ १६६ १२७ २८० प्रद्युम्नः पाइ पाइ पाउसो पारांवेइ पारेइ पाल २०४ पत्तनं पतति पताका ४०२ ४०२ ३५७ ३८२.

[ ६४ ] प्राकृतशब्द: संस्कृतरूपम् सूत्राणि प्राकृतशब्दः संस्कृतरूपम् सूत्राणि वाफो वाप्यः (आमा) (१९३ द्वाददा: वारहो वाहो वोहद बुज्झा बुडइ वोरं बंध बाप्पः (श्रुणि) १२३ विभेति बुध्यते ३८२ मज्जति बदरं वघ्नाति पाहीन जत्रो १६२ पिनरो पितरः पित्रा पिता पिनो त्ति हसइ प्रिय इति हसति ३१२ पिक्को पववः पिस पिशति ३६१ पीपलं पीतं ३१५ पी पीतं २१२,३१५ पुट्ठी पृष्ठं १८१ पुट्ठ पुष्टं २१५ पुष्फ पृष्पं २०६ पुरिसो पुरुषः ६४ पुलप्रह पश्यति ६६८ पुलईन दद्रष्ट पुस्सो पुष्यः १३२ पृथिवी पूस पुष्णाति पूसो पुष्यः १३२ पेरंतं पर्यन्तं १६६ पोक्खरो पुष्करः पोत्यत्रो पुस्तकः ५७ पोतो पोत्र: ७३ a १४५ भअप्पई भइरवो भखावे भत्तारम्मि ४०२ बृहस्पतिः भैरव: भक्षयति भतरि भर्तुः भारः १५३ भत्तारस्स पुहवी १७८ भतणां भर्ता भर्तृषु भर्तृभिः भत्ताराणं भत्तारेण भत्तारेषु भत्तारेहि भत्तारो भत्तुणा भत्तुणो भत्तुस्स भत्त १५२ १५३ भत्ता भी भत न भत्त: भर्तृघु भारः परुषः १५३ १५३ फरसो फलावे फलि फलिहा फलिहो फैलिहो फाले भत्तो ६३ ४०२ ४१२ १६८ ६३ पाटयक्ति पटितं परिखा परिघः स्फटिकः पाटयति भत्तो भर भरतः स्मरति विर्भात ६६४ ४०२ भरतः स्मारयति ४०२ फर फंदो स्फोटते स्पन्दः व ३४४ १२२ भर भरहो भरावे भारो माइ भायो भाखे भ्रातार: विभेति ब्रह्मा, ब्रह्मागो त्राता भक्षयति : ब्रह्मा २४१ ४०२ [ ६५ ] प्राकृतशब्दः संस्कृतरूपम् सूत्राणि प्राकृतशब्दः संस्कृतरूपम् सूत्राणि ४०२ स्मारयति बिसिनी १८० ममादो ममाहि ममं २७३ २७३ २६८ भृङ्गारो ४८ ४८ मरइ मरह भारे भिसिणी भिगारो भिगो भिडिवालो भिदड भे भोव्वं भो भोऊण १२८ ३९३ मत् मत् माम् म्रियते मृणाति मर्षति मृद्नाति मलिनं श्मशानं ३९७ ३५४ २६२ भृङ्गः भिन्दिपालः भिनक्ति युष्माकम् भोक्तव्यं भोक्तुं भुक्त्वा म ३६६ मरिस मलइ मलिणं मसाणं ४१५ ४१.५ ४१५ मम मधूकं मधु मिह अस्मि ३७२ २११ २०१ २७५ १८८ २१७ १८२ ३७७ ३१४ १६३ ३१४ माता मिमीते स्मः - म्हो मह मयि मानवान् माला मया ६४ मइ मइत्तो मइल मऊरो मऊहो मए मए मच्छिमा मज्झ मज्झण्णो मज्झणो मत् मलिनं मयूरः मयूखः मया मयि मक्षिका मह महुअं महुं मात्रा माइ माणइत्तो माला मालाइल्लो मांसं मिश्रको मिच्छा मुइङ्गो मुच्छा मुजाणो मुण मुणिज्जइ मुणीअइ मुत्ती मुद्धो मुहलो मे. १६६ २६ ३७२ ३७२ २७७ २७१ २७३ २११ ४२ ४२ २७१ २७७ १६६ २७५ १०७ २७६ ३६३ १७७ १७६ २७३ २७५ २७५ १६६ मालावान् मांसं मृगाङ्कः मिथ्या मृदङ्गः मूर्छा मौजायनः जानाति ज्ञायते ज्ञायते मूत्तिः मुग्धः मुखरः सया सम ४०८ ४०८ मध्याह्न अस्माकम मनोति मनस्विनीम् मनस्विनी मण्णा मणंसिणि मणसिणी मंत्तो १७६ ३७ सत् २७० मम मम २७५ ममम्मि मयि ४२ २७७. २७० सोता. मोरो मोहो मंडरो मया मुक्ता मयूरः मयूखः मण्डूक: ममाइ ममाएं ४२. मत २७३ २१७ [ ६६ ] संस्कृतरूपम् प्राकृतशब्द: सूत्राणि प्राकृतशब्द संस्कृतरूपम् सूत्राणि २१७ रानेभ्यः मंसू संसं श्मश्रुः मांसं ६ राजभ्यः २२७ २०८ रत्रणं रमणम् रागात राज्ञः रागेभ्यः रापासुत्तो रामासुतो रानाहि राग्राहि रावाहितो रावाहितो राइणा राइणो २८० रत्नम् रत्नमुट रक्षा रक्तं २६ : १६६ ४१३ २३६ १८५ राज्ञः २३७ राज्ञा अरण्यानि अरण्येन राए २६ १८५ २६ रत्तं रणा তা रणेण रणो रणं रमणिज्जा रमणिज्जो . २३७ १८४ राए २३४ १६८ रागान्, रागाः, रागे राज्ञः, राशि रागण रागेषु राजसु रागः राजभिः २३८ २६ ८६ राज्ञः अरण्यं रमणीया रमणीयः रम्यते रम्यते रम्यते रागे राज्ञि ४०५ २६ २३८ रम्म रमिज्जा रमी राप्रमि रामम्मि ४०५ ४०५ २३७ २६ २३८ राग: राप्रस्म रागाय, राजानं रागम् रामः २६ २३३ २६ रागस्य १ रात्रा राजा राधा रात्री राज्ञः ११८ रागाः राएण राएसु राएसु राएहि राएहि राम्रो रानं रात्रं रामो राहा रिच्छो रिणं रिद्धो रुक्खो रुच्छं रुड्ढं रुण्णं एप्पिणी रम्भावेइ तम्भेद रुम्मई रुवइ स्वावे ऋक्षः ऋणं “१६० रागान् रागात् राज्ञः ऋद्धः राप्राणी २६ २३० २३७ २६ २६ २६ २३४ २३२ २३८ २६ २६ २६ २३७ २६ ६७ राजानः ३७५ ४१३ राप्राणं रात्राणं राज्ञा रागेभ्यः, रागाणाम् रागात् वृक्षः रुदिष्यामि रुद्ध रुदितं रुक्मिणी रुन्धयति रुन्धति रुणद्धि रोदिति रोयदति ४१३ १८१ ४०२ ૨૦૨ ३३२ ३७५ ४०२ राप्रादु राप्रादु रामादो राग्रादो राज्ञः रागात् राज्ञः २३७ [ ६७ ] संस्कृतरूपम् सूत्राणि प्राकृतशब्दः संस्कृतरूपम् प्राकृतशब्दः सूत्राणि ४०२ बच्चे वच्छो ३६२ ४०२ ३४१ ६७ १२५ ३८० ४०२ ४०२ ४०२ ३८५ ४०२ ४०२ ४०२ ४०२ १८० १७६ २१५ १८१ ४०२ वज्ज बज्जावेद घज्जेइ वड्ढावेइ घड्ढेइ घण्ण वत्ता वत्तिा वदई वनभइ षम्महो वरह वरिसइ वरिसावे वरिसेइ यसही वसिट्ठो वहू' वाग्रह ४.०२ ३६३ १६६ १६९ ४१६ ४०७ १६६ ३९८ ३५४ ४०७ रुवेइ रोयदति रुघड़ रुणद्धि रंधावेइ रुन्धयति रु'धे रुन्धयति रूस रूष्यति रूसावे रोषयति रूसेइ रोषयति ल लखावेइ लक्षयति लच्छी लक्ष्मी लट्ठी यष्टिः लडाल ललाई लहुई लध्वी लाखे लक्षयति लिच्छा लिप्सा लिभ लिह्यते लुद्धो लुब्धक: लण्ण लुनाति लुणिज्जइ लूयते लुण्णीअइ लूयते लुव्वा लूयते लोणइ नुदति लोद्धनो लुब्धकः व वप्रय वक्ति वइदेसो वैदेशः वइदेहो वैदेहः वइरं वैरं वइसाहो वैशाखः. वइसिनो वैशिक: वइसंपामणो वैशम्पायन: वच्च व्रजति वच्चए व्रजति वच्चहिई वजिता वच्चाहिए वजिता. व्रजति वृक्ष, वत्सः त्रस्यति त्रासयति त्रासयति वर्द्धयति वद्धयति चनोति वार्ता वत्तिका वदन्ती उह्यते मन्मथः वृणीते वर्षति वर्षांत वर्षयति वसतिः वसिष्ठः वधू म्लायति वाक् स्लायति वारि वारीणि विनक्ति विदिः वेदना विकारवत् विवत्सा विक्रीणाति विक्रीणाति विच्छदिः ४०२ ४०२ १७५ ४०७ ४०७ ४०७ १८९ ३५६ ३८६ वापा २८५ २१६ ३७० ७१ १७६ १६१ ७१ ७१ वाइ वारि वारी विप्रा विप्रड्डी विप्रणा विप्रारुल्लं विइच्छा विक्किण विक्के विच्छड्डी विज्जा ३१४ १६९ ३९७ ३४१ ३४१ ३४१. ३४१. विद्या:

६८ ]: प्राकृतशब्दः संस्कृतरूपम् सूत्राणि प्राकृतशब्दः संस्कृतरूपम् सूत्रारिण २८६,३१५ १२१ १७७ १७४ १७४ ४८ ८८ ४६ विजुली विजू विञ्छुप्रो विडवो वितिण्हो विम्हरो बिलअन्तो विसई विस्सवो विसावे विस्सामो विसूरइ वेण्हो वल्ली वेवमाना वेवमाणी वो वो वोच्छं वंक वंचित्रो वंद विश्नः बल्ली- वेपमाना वेपमाना युप्मान् युष्माकम् वक्ष्यामि वर्क वञ्चित: वन्दं २६२ ३७० ११६ ३११ ३५२ १३७ ४०२ १३२ २१३ ३६१ सप्रह सत्रहो सइरं '८६ ४०२ सृजति शकट स्वरं शक्नोति शक्नोति विद्युत् विद्युत् वृश्चिक्षः विटपः वितृष्णः विस्मयः वलपन् प्रसते विश्वपाः ग्रासयति विश्रामः खिनत्ति, खिदति ग्रासयति হিৰ; विह्वल: विह्वलः वीयं वीडयत्ति वीडयति वीडयति विश्रामः वृन्दावन वेद वेत्ति वेदना वेत्तव्यम् वेत्तं विदित्वा वेत्स्यामि वेष्टते वेष्टते वेष्टते वेष्टते विष्णुः सवका सक्के सक्को सगमो १२६ १२६ २०२ ३८० शक्रः १६१ ३८७ ४०२ १०. ३७ १६६ सच्चा ४०२ ४०२ सज्जा सठावेइ सडइ ४०२ विसे विस्सो विहलो विभलो वीरित्रं वीला वीलावे वीलेइ पीसामो बुंदावणं वेइ वेद वेत्रणा वेअन्वं वेडं वेऊण वेच्छं वेढ वेढए वेढे वेढेए सदा १३२ १६० ३७० ३७० ३९३ २०४ सद्गमः सत्या सृज्यते शाव्यति शीयते सटा सनोति মংলা स्नेहः सप्तमी तक्थि श्रद्दधाति ম शफरी सफलः सफलं समृद्धिः ३८ १८० ४१५ ४१५ ४१५ सण्ण सहं सणेहो सत्तमी त्यि सद्दहइ साफ सभरी सभलो सभलं समिद्धी समिद्धीमा, समिद्धीए २१७ ३७८ २०६ १७६ ३४२ ३४२ ३४२ ३४२ २०० १७४ वेण्हू समृवध्या १४२ ६६ ] प्राकृतशब्दः संस्कृतरूपम् सूत्राणि प्रांकृतशब्दः संस्कृतरूपम् . सूत्राणि साला १७३ शाला प्रसि ४६ १७५ . शृगालः सृष्टिः शिथिलः श्रीः .९२ १८१ १७२ ३२ २४६ १६४ ३८५ १७५ १५१, ११४ ३६७ सर सरति सर संसति ३७९ सर शृणाति ३६० सरावे सारयति ४०२ सरिच्छो सदृक्षः ११८ सरो. सर: २८२ सलाहा श्लाघा सवहो शपथः ८५ सम्वज्जो सर्वज्ञः १०५ सव्वस्त सर्वस्य, सर्वस्मै .१३५ सवसि, सब्द- म्मि, सवत्यः सर्वस्मिन् १३६. सव्वा सर्वान्, सर्वस्मात् १३५ सवाणं सर्वेषाम्, सर्वेभ्यः १३५ सव्वादु सव्वादो सवाहि सर्वस्मात् सवासुत्तो. सवाहितो सर्वेभ्यः १३५. सवे. सर्वे १३५. सवेण सर्वेण १३५ सन्वेसु सर्वेषु १.३६ सम्वेहिं सर्वेः १३५ संवो सर्वः १३४ सव्वं सर्व सहमाणा, सहमाणी सहमाना १७४. सहा १६८ सहिणो सखीन् १५० सखायम् १५० सही सखा सहोश्रो, सहोणो सखायः १.५० साठे शाठयतिः ४०२ सारे सारयति ४०२ सि सिमालो सिठ्ठी: सिढिलो सिरी सिविणो सि सिंगारो सिंघवं सीभरो सीहो सुग्रह सुइदी सुज्जो सुण्णइ सुण्णा सुण्णावेइ सुण्णि सुणिज्जा सुण्णी सुण्णीअइ सुण्णेइ सुणमु सुणमो सुणसु सुणह सुणंतु सुप्पणहा सुपण्णही सुमरइ सुमरावेइ. सुमरेइ सुनवाई सुहं स्वप्नः तेषां . शृगार: सैन्धवं सीकरः सिंहः सुनोति सुकृतिः सूर्यः शृणोति शृणोतु . श्रावयति शुधाव श्रूयते : মুহ্মান श्रूयते श्रावयति शृणोमि शृण्मः शृणु शृणुत शृण्वन्तु सूर्पनखा ४०२ ३६५ ४०६ ४०६ ४०२ ३.६७ ३६७ सभा है ३६७ सहि स्मरति.. स्मारयति ४०२ ४०६ श्रूयते -सुखं'. २०० .

[ ७० ] प्राकृतशब्दः संस्कृतरूपम् सूत्राणि प्राकृतशब्द: संस्कृतरूपम् मूत्राणि सुंडो सुंदेरं सूई सूरो सूसइ सूसावेइ सूसेइ २४३ शौण्ड: सौन्दर्य सूयते सूर्यः शुष्यति . शुष्यति ७६ १६६ ३० ११४ ३८४ ४०२ से तस्य २४५ शव्याया: सेज्जत सेज्जा शय्या: १५७ " शय्याया: १६१ १६२. शय्यायाः शय्यया " सेज्जा सेज्जाइ सेज्जाइ सेज्जाए शय्यायाम् शय्यया १६१ शय्याया: " १६२ १६२ शय्यायाम् सेवा सेवा १७० सेवा सो सोअमल्लं सौकुमायं २०३ सोइ यति सोच्छई श्रोता. सोच्छए सोच्छहिइ सोच्छहिए सोच्छिा सोच्छिए सोच्छिहिइ सोच्छिहिए सोच्छेद सोच्छेए सोच्छेहिइ सोच्छेहिए सोच्छहिति प्रोतारः सोच्छति सोच्छिहिति सोच्छिति सोच्छति सोच्छसि श्रोताति सोच्छसे सोच्छहिसि सोच्छहिसे सोच्छिसि सोच्छिले सोच्छिहिसि सोच्छिहिसे सोच्छेसि सोन्येसे सोच्छेहिसि सोच्छहिले सोच्छइत्य श्रोत्यय ३६६,३६७ (बहुवचने) सेज्जाउ शय्या: शय्यायाः १६२ सेज्जायो शय्याः १५७ " 13 शय्यायाः शय्यानाम् " " शाय्यायाः १६१ " १६२. " शय्यात शाय्याभ्यः सेज्जाणं सेज्जादु सेज्जादो सेज्जाहि सेज्जासु सेज्जासुत्तो सेज्जाहिता सेज्जाहिं सेज्नं सेज्या सत्तं सेलो १६१ " १५८. शव्याभिः शय्याम् *शय्या त्यं १९१ शल: ६६ [ ७१ ] प्राकृतशब्द: संस्कृतरूपम् सूत्राणि प्राकृतशब्दः संस्कृतरूपम् सूत्राणि श्रोतास्मः ३६७ " सोच्छह श्रोष्यथ २६७ सोच्छहिह " सोच्छिह सोच्छिहिह सोच्छेह सोच्छेहिह सोच्छहित्य श्रोष्यथ (बहुवचने) ३६७ सोच्छहिह सोच्छित्थ सोच्छिह सोच्छिहित्य सोच्छिहिह सोच्छेह सोच्छेहित्य सोच्छेहिह सोच्छिहिइ श्रोष्यति ३६७ " " " " " सोच्छस्सामो सोच्छहामो सोच्छहित्या सोच्छहिमो सोच्छामो सोच्छाहामो सोच्छाहित्था सोच्छाहिमो सोच्छाहिस्सा सोच्छिमो सोच्छिस्सामो सोच्छिहामो सोच्छिहित्था सोच्छिहिमो सोच्छिहित्था सोच्छेमो सोच्छेस्सामो सोच्छेहामो सोच्छेहित्था सोच्छेहिमो सोच्छेहिस्सा सोण्हा सोरिनं सोहा संका संङ्का संकतो संजदो -संझा संवत्तो संविल्लइ संवुदी " " इत्यादि ३३७ " " . " १६६ २०२ : स्नुषा शौर्य शोभा शङ्का १६८ " ७ सोच्छमि श्रोतास्मि सोच्छस्सामि सोच्छस्सं सोच्छहामि सोच्छहिमि सोच्छामि सोच्छाहामि सोच्छिमि सोच्छिस्सामि सोच्छिहामि सोच्छेमि सोच्छेस्सामि सोच्छेस्सं . सोच्छेहामि सोच्छेहिमि सोच्छं सोच्छमो श्रोतास्मः १३० ६२ १६६ ११६ संक्रान्तः संयतः- संध्या संवतः संवेष्टते संवृत्तिः ह हतः हन्ति ३४३ १७५ हदो हम्मद ३६७ - ३७० [ २ ] प्राकृतशब्दः संस्कृतरूपम् सूत्राणि प्राकृतान्द. संस्कृतरूपम् सूयारिणः :५४ भवामि हुवमि ក្តីទី १७४ हरिस हलद्रा हलद्दा(द्रा) हलद्दा हलद्दी हलियो हविधान १७४ ४५ हुक्मो ४०५ ४०३ mr बभूव भवामः ३२७ : भवावः, ३२७ भविष्यामि भवानि भविष्यामः ३३७ भावाम. ३३७ भवामः . ३२७ स्वावः ३२७ वभूविम भविष्यामः भविष्यामि ३३६-३३७ भविष्यामः भविष्यामः भयसि ३२४ बभूविथ ३३२ भवितासि ४५ हर्षति हरिद्रा हरिद्रा हरिद्रा हरिद्रा हालिकः बभूव हस्थते हस्यते हस्यते हालिकः हृदयं त्रस्तं ही: ह्रियते भूतं जुहोति हूयते हूयते हूयते भवन् भवति भविष्यथ हसिजइ हसिना हलियो हिनयं हित्यं हिरी हीरइ हुधे हुण्ण हुणिज्जा हुण्गीअइ हुन्न हुन्वंतो हुवा हुवइत्य हुवइत्या हुवउ १६० ४१३ १८१ ४०६ ४१० हुवस्साम हुवस्सामि हुवस्साम हुवस्सामो हुवति हुधसु ३७५ ४०७ ३३४ ४०७ सव. ४०७ ३२४ ४१८ हुवसे. हुवस्स हुवह भवसि भविष्यामि बभूव भवयः ३३२. ३२४ भवय, भवथः ३२४ मावण ३३७ भवतु वभूव भवति भवति भवन्ति भवत भवितास्थ भविष्यामः भविष्यामि हुवए हुवज्ज हुवहाम हुवहामि ३२२ ३३७ भवतः भवति ३३७ हुवज्जा हुवज्जा भवन्ति. ३२३ : ३२२ ३२३ ३२३ ३२७ ३२७ हुवहामु हुवहामो हुवहिद हुवहिए हुवहित्या हुवहित्था भविष्यामः भाविष्यामः भविता भविष्यति भविष्यामः भविष्यामः भवतः भवामः हुवम. ३३० भवाव: ३३७ [ ७३ ]] प्राकृतशब्दः संस्कृतरूपम् सूत्राणि प्राकृताब्दः संस्कृतरूपम् सूत्राणि ३३७ हुदाहिमि अविण्यामि हुवहिम. हुवहिमि भविष्यामः भविष्यामि ३३७ ३३७ ३३७ ३३७ हुवाहिम हुवाहिमो हुवाहिस्सा hos हुवहिम हुवहिमो हुवाहिय हुबहिस्सा भविष्याम भविष्यामः भवितास्मः भविष्यामः ३३७ ३३७ ३३७ ३३७ ३३७ ३३७ ३२६ हुवि अभूत बभूव भूयते भाविष्यथ हुवहिसि ३३७ भविष्यामः भविष्यामः भविष्यति भवितास्मः भविष्यामः भविष्यसि सवितासि भविष्यसि भवितासि भवितारः भविष्यन्ति भविष्यथ भवितास्थ ४०३ हुवहिसे भवण:, भवथ हुविज्जा हुवित्थ हुवित्था हुविम हुविमु हुविमो ३३७ ३२४ ३२७ भवामः, भावावः हुवर्हिति ३३४ ३३४ ३३७ ३३७ ३३४ भविष्यामः भवाम ३३७ हुवहिह हुवाम भवामः ३२७ हुविम्साम हुविस्सामु हुविस्सामो हुविहाम हुविहामु हुविहामो ३२६ भवाव: भवामि भविष्यामि भवानि हुवामि हुधाम भवामः भवाव: हुविहित्था हुवामो भवामः ३२७ ३२६ ३२७ ३२७ ३३७ भवाव: भवाम भविष्यामः भावयति भविष्यामः भविष्यामि हुविहिति हुविहिम हुविहिम हुविहिमो भवामः, भावः ३२७ भविष्यामः ३३७ भविष्यामः ३३७ भविष्यामः भविष्यामः ३३७ भविष्यामः ३३७ भविष्यामः ३३७ भविष्याम भविष्यामः ३३७ भविष्याम भवितार: ३३४ भविष्यामः ३३७ भविष्यामः भविष्यामः भविष्याम भावितास्मः ३३७ भविष्यामः ३३.७ बभूव ३२८ अभूत ३३७ भूयते ४०३ भवति ३१६ ४०२ हुवावे हुवाहाम हुवाहामि ३३७. हुविहिस्सा हुवीन हुवाहामु हुवाहामो हुवाहित्था हुवाहिम भविष्यामः भविष्यामः भविष्यामः भविष्यामः ३३७. ३३७ हुवीप्रह हुवेइ ३३७ [ ७४ ]. प्राकृतशब्दः संस्कृतरूपम् सूत्राणि प्रांकृतशब्द: संस्कृतरूपम् सूत्राणि भावयति ४०२ ३३४ lico हुवेउ ३३७ हुए हुवेज्ज हुवेज्जा भवतु वभूव भवति भवति भवन्ति ३ भवतः भवति ३१६ ३२२ ३२३ ३२३ ३२२ ३२७ ३२७ ३२६ ३३२ ३२७ हुवेमः भवामः भवावः भवामि ३ हुवेमि हुवेमु वभूव भवामः ३२७ भवावः भवानि भविष्यामि भविष्यामः हुवेमो ३३७ भवाम भवितास्थ हुवेहाम भविष्यामः ३३७ हुवेहामि भविष्यामि ३३७ हुवेहामु भविष्यामः हुवेहामो भविष्यामः ૨૩૭ हुवेहिइ भविता '. भविष्यति हुवेहिए भविष्यति ३३७ हुवेहित्या भविष्याम ३३७ भविष्यामः ३३७ हुवेहिमि भविष्यामि ३३७ हुवेहिमु भविष्यामः ३३७ हुवेहिमो भविष्यामः ३३७ हुवेहिस्सा भवितास्मः ३३७ भविष्यामः हुवेहिसि भविष्यसि भवितासि ३३४. हुवेहिसे भवितासि ३३४ भविष्यसि ३३७. हुवेहिह भविष्यथ ३३७ भवितास्थ ३३४ हुवेहिति भविष्यन्ति. भवितारः ३३४. हुर्वेति भवन्ति, भवत: ..३२३ हुवेंतु : भवन्तु ३३७ बभूवुः ३३२ भवितारः ३३४ हुवंति भवतः, भवन्ति ३२३ हुवंतु भवितारः ३२४ भवन्तु 339 बभूवुः ३३२ है अगि १४० णारायण : हे नारायण. भवामः, भवानः ३२७ वभूविम भविष्यामः भविष्यामि हुवेस्साम हुवेस्सामि ३३७ हुवेस्सामु हुवेस्सामो हुवेसि हुवेतु भविष्यामः भविष्यामः भवसि भवितासि वभूविय ३२४ ३३४ ३२४ हुवेसे हुवेस्सं भवसि भविष्यामि , ३३७. हुवेह अनूव भवयः भवय ३२४ भवत [.७५ ] प्राकृतशब्दः संस्कृतरूपम् सूत्राणि प्राकृतशब्दः संस्कृतरूपम् सूत्राणि १५३ होस्साम होस्सामि भविष्यामः भविष्यामि हे भर्तः हे. मनस्विनि हे अरण्य हे राजन् !. १७७ १८५ २३३ हे भत्तारा. हे मणंसिणि- हे रण हे रानं हे राम हे सेज्जे होआवेइ होड ३३७ होस्सामु होस्सामो होसि होसु है शय्ये. भविष्यामः भविष्यामः भवसि बभूविथ भवितासि ३३७ ३२४ ३३२ ३३४ ४०२ भव होस् भविष्यामि होइज्जइ होइत्या होईप्रह होउ ३३७ ३३६ ३३४ ३३४ होह । १६२ भावयति भवति ३१६ बभूव भूयते ४०३ भवथः, भवथ ३२४ भूयते ४०३ बभूवः ३३१ भवतु भावयति ४०२ भवन्ति, भवतः ३२३ भवति ३२१ भवन्ति. भवतः ३२३.. भवति ३२१ भवन्ति, भवतः ३२३ ह भवथ, भषथः भवितास्थः होहाम होहामि भवत भविष्यामः भविष्यामि ३३७ ३३७ ३३६ होहामु होहामो होहिइ ३३७ ३३७ ३३३ होए होज्ज होज्जा होज्जा होज्जाइ होजंति, होज्जांति होज्जेइ होजेति होम होमि होम ३३७ भविष्यामः भविष्यामः भविता भविष्यति भविष्यत भविष्यामः भविष्यामः भविष्यामि ३३७ + होहित्थ होहित्था होहिम होहिमि ३३७ ३३७ ३३६ ३३७ ३३७ भवति ३२१ भवन्ति, भवतः ३२३ भवावः, भवामः ३२६ भवामि ३२६ भविष्यामि ३३६ भवानि ३३७ भवाव: ३२७ भवामः ३२७ बभूव ३३२ भवावः ३२७ भवामः. ३२७ बभूविम ३३२ भवाम ३३७ भविष्यामः ३३७. होहिमु. होहिमो होहिस्सा ३३७ ३३७ होहिसि होमो भविष्यामः भविष्यामः भविष्यामः भवितास्मः भवितासि भविष्यसि भविष्यत भवितास्थ भवितारः भविस्यमित ३३७ ३३४ ३३७ ३३७ '.३३४ ३३४ २२10 होहिह होहिहां ' होहिति .

७६. ] ..
प्राकृतशब्दः
संस्कृतरूपम्
सूत्राणि
प्राकृतशब्दः
संस्कृतरूपम्. सूत्राणि..
होहीन
३३०
३३४
वभूव
अभूत
भावन्ति
भवितारः
भवन्तु
अहम
३२३
"lto
होंति
होतु
बभूवुः
३३२
सानन्दं प्राकृतानन्दे शब्दानामनुसूचिका । मुनीनां प्रीतये सेयं जिनविजयसरीणाम् ।।
दृगिन्दुनभनेत्राब्दे मासे भाद्रपदे शुभे । कृष्णाष्टम्यां गुरौ वारे कृता गोपालशर्मणा ॥ २
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JAIN
राजस्थान सरकार
राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान
(Rajasthan Oriental Research Institute )
जोधपुर
रीत्र
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बाल
सूची-पत्र
-
राजानमा मसिनक माला
प्रधान सम्पादक - पद्मश्री जिनविजय मुनि, पुरातत्त्वाचार्य
अक्टूबर १९६३ ई०

मूल्य-१.७५ मूल्य-२.०० राजस्थान पुरातन ग्रन्थ-साला प्रधान सम्पादक-पद्मश्री मुनि जिनविजय, पुरातत्त्वाचार्य प्रकाशित ग्रन्थ १. संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश १. प्रमाणमंजरी, तार्किकचूड़ामणि सर्वदेवाचार्यकृत, मीमांसान्यायकोसरी पं० पट्टाभिरामशास्त्री, विद्यासागर । मूल्य-६.०० २. यन्त्रराजरचना, महाराजा-सवाईजयसिंह-कारित । सम्पादक-स्व० ५० केदारनाथ ज्योतिर्विद, जयपुर। ३. महपिकुलवैभवम्. स्व० पं० मधुसूदनोझा-प्रणीत, भाग १, सम्पादक-म० म० पं० गिरिधरशर्मा चतुर्वेदी। मूल्य-१०.७५ ४. महषिकुलवैभवम्, स्व० पं० मधुसूदन ओझा प्रणीत, भाग २, मूलमात्रम् सम्पादक-पं० श्रीप्रद्युम्न सोझा। मूल्य-४.०० ५. तर्कसंग्रह, अन्नंभट्टकृत, सम्पादक-डॉ. जितेन्द्र जेटली, एम.ए., पी-एच. डी., मूल्य-३.०० ६. कारकसंबंधोद्योत, पं० रभसनन्दीकृत, सम्पादक-डॉ० हरिप्रसाद शास्त्री, एम. ए., पी-एच. डी.। मूल्य-१.७५ ७. वृत्तिदीपिका, मोनिकृष्णभट्टकृत, सम्पादक-स्व.पं. पुरुषोत्तमशर्मा चतुर्वेदी, साहित्याचार्य ८. शब्दरत्नप्रदीप, अज्ञातकर्तृक, सम्पादक-डॉ. हरिप्रसाद शास्त्री, एम. ए., पी-एच.डी.। मूल्य-२.०० ६. कृष्णगीति, कवि सोमनाथविरचित, सम्पादिका-डॉ. प्रियवाला शाह, एम. ए., पी-एच. डी., डी. लिट् । मूल्य-१.७५ १०. नृत्तसंग्रह, अज्ञातकर्तृक, सम्पादिका-डॉ. प्रियबाला शाह, एम. ए., पो-एच. डी., डी. लिट् । ११. शृङ्गारहारावली, श्रीहर्षकवि-रचित, सम्पादिका-डॉ. प्रियवाला शाह, एम. ए., पी-एच.डी., डी.लिट् । मूल्य-२.७५. १२. राजविनोदमहाकाव्य, महाकवि उदयराजप्रणीत, सम्पादक-पं० श्रीगोपालनारायण बहुरा, एम. ए., उपसञ्चालक, राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान, जोधपुर । मूल्य-२.२५ १३. चक्रपाणिविजय महाकाव्य, भट्टलक्ष्मीधरविरचित, सम्पादक-पं० श्रीकेशवराम काशीराम शास्त्री। मूल्य-३.५० १४. नृत्यरत्नकोश (प्रथम भाग), महाराणा कुम्भकर्णकृत, सम्पादक-प्रो. रसिकलाल छोटा- लाल पारिख तथा डॉ. प्रियवाला शाह, एम. ए., पी-एच. डी., डी. लिट् । मूल्य-३.७५ १५. उक्तिरत्नाकर, साधसुन्दरगरिणविरचित, सम्पादक-पद्मश्री मुनि श्रीजिनविजयजी, पुरा- तत्त्वाचार्य, सम्मान्य संचालक, राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान, जोधपुर । मूल्य-४.७५ १६. दुर्गापुष्पाञ्जलि, म०म० पं० दुर्गाप्रसादद्विवेदिकृत, सम्पादक-पं० श्रीगङ्गाधर द्विवेदी, साहित्याचार्य । १७. कर्णकुतूहल, महाकवि भोलानाथविरचित, इन्हीं कविवर की अपर संस्कृत कृति श्रीकृष्ण- लीलामृत सहित, सम्पादक-पं० श्रीगोपालनारायण बहुरा, एम. ए., १८. ईश्वरविलासमहाकाव्य, कविकलानिधि श्रीकृष्णभट्टविरचित, सम्पादक-भट्ट श्रीमथुरा- नाथशास्त्री, साहित्याचार्य, जयपुर । स्व. पी. के. गोड़े द्वारा अंग्रेजी में प्रस्तावना सहित । मूल्य-११.५० १६. रसदीपिका, कविविद्यारामप्रणीत, सम्पादक-पं० श्रीगोपालनारायण बहुरा, एम.ए. मूल्य-२.०० २०. पचमुक्तावली, कविकलानिधि श्रीकृष्णभट्टविरचित, सम्पादक-भट्टश्रीमथरानाथ- शास्त्री, साहित्याचार्य। मूल्य-४.०० २१. काव्यप्रकाशसंकेत, भाग १ भट्टसोमेश्वरकृत, सम्पा०-श्रीरसिकलाल छो० पारीख, अंग्रेजी में विस्तृत प्रस्तावना एवं परिशिष्ट सहित मुल्य-१२.०० मूल्य-१.७५ मूल्य-४.२५ मूल्य-१.५० - [ २ . ] मूल्य-४-०० . " " २२. काव्यप्रकाशसंकेत, भाग २ भट्टसोमेश्वरकृत, सम्पा०~श्रीरसिकलाल छो० पारीख, मूल्य-८.२५ २३. वस्तुरत्नकोष, अज्ञातकर्तृक, सम्पा०-डॉ० प्रियवाला शाह । २४. दशकण्ठवधम्, पं० दुर्गाप्रसादद्विवेदिकृत, सम्पा०-पं० श्रीगङ्गाधर द्विवेदी । मूल्य-४.०० २५. श्रीभुवनेश्वरीमहास्तोत्र, सभाष्य, पृथ्वीधराचार्यविरचित, कवि पद्मनाभकृत भाष्य- सहित पूजापञ्चाङ्गादिसंवलित । सम्पा०-पं. श्रीगोपालनारायण बहुरा । मूल्य-३.७५ २६. रत्नपरीक्षादि-सप्तग्रन्थ-संग्रह, ठक्कुर फेरू विरचित, संशोधक-पद्मश्री मुनि जिन- विजयजी, पुरातत्त्वाचार्य । मूल्य-६.२५ २७. स्वयंभूछन्द, महाकवि स्वयंभूकृत, सम्पा० प्रो० एच. डी. वेलणकर । विस्तृत भूमिका (अंग्रेजी में) एवं परिशिष्टादि सहित मूल्य-७.७५ २८. वृत्तजातिसमुच्चय कवि विरहाङ्करचित मूल्य-५.२५ २६. कविदर्पण, अज्ञातकतक, मूल्य-६.०० ३०. कर्णामृतप्रपा, भट्टसोमेश्वरकृत सम्पा०-पद्मश्री मुनि जिनविजयजी । मूल्य-२.२५ ३१. त्रिपुराभारती लघुस्तव, लघुपण्डितविरचित, सम्पा० मूल्य-३.२५ ३२. पदार्थ रत्नमञ्जूषा, पं० कृष्णमिश्रविरचिता, सम्पा० मूल्य-३.७५ ३३. वृत्तमुक्तावली, कविकलानिधि श्रीकृष्णभट्ट कृत; सं० पं० भट्टश्रोमथुरानाथ शास्त्री। मूल्य-३.७५ ३४. इन्द्रप्रस्थप्रबन्ध, सम्पा०-डॉ. दशरथ शर्मा। मूल्य-२.२५ ३५. प्राकृतानन्द, रघुनाथकवि-रचित, सम्पा०-पद्मश्री मुनि श्रीजिनविजयजी। मूल्य-४.२५ २. राजस्थानी और हिन्दी ३६, कान्हडदेप्रबन्ध, महाकवि पद्मनाभविरचित, सम्पा०-प्रो० के.बी. व्यास, एम. ए.। मूल्य-१२.२५ ३७. क्यामखां-रोसा, कविवर जान-रचित, सम्पा०--डॉ. दशरथ शर्मा और श्रीनगरचन्द नाहटा। मूल्य-४.७५ ३८. लावा-रासा, चारण कविया गोपालदानविरचित, सम्पा०-श्रीमहताबचन्द खारैड़। मूल्य-३.७५ ३६. वांकीदासरी ख्योत, कविराजा वांकीदासरचित, सम्पा:-श्रीनरोत्तमदास स्वामी, एम. ए., विद्यामहोदधि । मूल्य-५.५० ४०. राजस्थानी साहित्यसंग्रह, भाग १, सम्पा०-श्रीनरोत्तमदास स्वामी, एम.ए.। मूल्य-२.२५ ४१. राजस्थानी साहित्यसंग्रह, भाग २, सम्पा०-श्रीपुरुषोत्तमलाल मेनारिया, एम. ए., साहित्यरत्न । मूल्य-२.७५ ४२. कवीन्द्र कल्पलता, कवीन्द्राचार्य सरस्वतीविरचित, सम्पा०-श्रीमती रानी लक्ष्मी- कुमारी चूंडावत । मूल्य-२.०० ४३. जुगलविलास, महाराज पृथ्वीसिंहकृत, सम्पा०-श्रीमती रानी लक्ष्मीकुमारी चूंडावत । ४४. भगतमाळ, ब्रह्मदासजी चारण कृत, सम्पा०-श्री उदराजजी उज्ज्वल । मूल्य-१.७५ ४५. राजस्थान पुरातत्व मन्दिरके हस्तलिखित ग्रंथोंकी सूची, भाग १ । मूल्य-१.७५ ४६. राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठानके हस्तलिखित ग्रन्थोंकी सूची, भाग २। मूल्य-७.५० ४७ मुंहता नैणसीरी ख्यात, भाग १, मुंहता नैणसीकृत, सम्पा०-श्रीबद्रीप्रसाद साकरिया। मूल्य-१२.०० मूल्य-८.५० २, , ४६. रघुवरजसप्रकास, किसनाजी पाढाकृत, सम्पा०-श्री सीताराम लाळस । मूल्य-९.५० ५०. राजस्थानी हस्तलिखित ग्रन्थ-सूची, भाग १, सं० पद्मश्री मुनि श्रीजिनविजय । मूल्य-४.५० मूल्य-८.२५ ५१. राजस्थानी हस्तलिखित ग्रन्थ-सूची, भाग २-सम्पा०-श्री पुरुषोत्तमलाल मेनारिया एम.ए., साहित्यरत्न ५२. वीरवाण, ढाढ़ी बादरकृत, सम्पा०-श्रीमती रानी लक्ष्मीकुमारी चूंडावत मूल्य-४.५० मूल्य-२.७५ . ४८.

२ ३ .. [ ३ ] ५३. स्व० पुरोहित हरिनारायणजी विद्याभूपण-ग्रन्थ-संग्रह-सूची, सम्पा.- -श्रीगोपालनारायण बहुरा, एम. ए. और श्रीलक्ष्मीनारायणगोस्वामी दीक्षित । मूल्य-६.२५ ५४. सूरजप्रकास, भाग १-फविया करणीदानजी-त, सम्पा०-श्री सीताराम लाळस । मूल्य-5.०० मूल्य-६.५० ५६. मूल्य-६.७५ ५७ नेहतरंग, रावराजा बुधसिंहकृत-सम्पा०-श्रीरामप्रसाद दाधीच, एम.ए. मूल्य-४.०० ५८. मत्स्यप्रदेश की हिन्दी-साहित्य को देन, प्रो. मोतीलाल गुप्त,एम.ए.,पीएच.डी. मूल्य-७:०० ५६. वसन्तविलास फागु, अज्ञातकर्तृक, सम्पाo-श्री एम. सी. मोदी। मूल्य-५.५० ६०. राजस्थान में संस्कृत साहित्य की खोज-एस. पार. भाण्डारकर, हिन्दी-अनुवादक श्री ब्रह्मदत्त त्रिवेदी, एम. ए., साहित्याचार्य, काव्यतीर्थ मूल्य-३.०० ६१. समदर्शी प्राचार्य हरिभद्र, श्रीसुखलालजी सिंघवी, मूल्य-३:०० प्रेसों में छप रहे ग्रंथ संस्कृत १. शकुनप्रदीप, लावण्यशरिचित, सम्पा०-पद्मश्री मुनि श्रीजिनविजय । २. बालशिक्षाव्याकरण, ठक्कुर संग्रामसिंहरचित, सम्पा०-पमत्री मुनि श्रीजिनविजय । ३. नन्दोपाख्यान, अज्ञातकर्तृक, सम्पा०-डॉ० वी.जे. सांडसरा । ४. चान्द्रव्याकरण, आचार्य चन्द्रगोमिविरचित, सम्पा०-श्रा बी. डी. दोशी । ५. कविकौस्तुभ, पं० रघुनाथरचित, सम्पाo-श्री एम. एन. गोरे । ६. एकाक्षर नाममाला-सम्पा०-मुनि श्रीरमणिकविजय । ७. नृत्यरत्नकोश, भाग २, महाराणा कुंभकर्णप्रणीत, सम्पा०-श्री आर. सी. पारिख और डॉ. प्रियवाला शाह। ८. हमीरमहाकाव्यम्, नयचन्द्रसृरिकृत, सम्पा०-पद्मश्री मुनि श्रीजिनविजय । ६. स्थूलिभद्रकाकादि, सम्पा०-डॉ० यात्माराम जाजोदिया । १०. वासनदत्ता, सुबन्धुकृत, सम्पा०-डॉ० जयदेव मोहनलाल शुक्ल । ११. आगमरहस्य, स्व० पं० सरयूप्रसादजी द्विवेदी कृत, सम्पा-प्रो० श्रीगङ्गाधर द्विवेदी । राजस्थानी और हिन्दी १२. मुंहता नैणसीरी ख्यात, भाग ३, मुंहता नैणसीकृत, सम्पा-श्रीबद्रीप्रसाद साकरिया । १३. गोरा बादल पदमिणी चऊपई, कवि हेमरतनकृत सम्पा०--श्रीउदयसिंह भटनागर; एम.ए. १४. राठौडारी वंशावली, सम्पा०-पद्मश्री मुनि श्रीजिनविजय । १५. सचित्र राजस्थानी भाषासाहित्यग्रन्यसूची, सम्पा०-पद्मश्री मुनि श्रीजिनविजय । १६. मीरां-वृहत्-पदावली, स्व० पुरोहित हरिनारायणजी विद्याभूषण द्वारा संकलित, सम्पा०-पद्मश्री मुनि श्रीजिनविजय । १७. राजस्थानी साहित्यसंग्रह, भाग ३, संपादक-श्रीलक्ष्मीनारायण गोस्वामी। १८. रुक्मिणी-हरण, सांयांजी झूला कृत, सम्पा०. श्री पुरुपोत्तमलाल मेनारिया, एम.ए.,सा.रल १६. सन्त कवि रज्जन : सम्प्रदाय और साहित्य, डॉ० ब्रजलाल वर्मा ! २०. पश्चिमी भारत की यात्रा, कर्नल जेम्स टॉड, हिन्दी अनु० श्रीगोपालनारायण बहुरा; एम.ए. २१. बुद्धिविलास, वखतराम शाहकृत, सम्पा०-श्रीपनवर पाठक, एम. ए. २२. प्रतापरासी, जाचीक जीवण कृत, सम्पा०-प्रो. मोतीलाल गुप्त, ए. ए., पीएच. डी. अंग्नेजी 23. Catalogue of Sanskrit and Prakrit Manuscripts Part I, R.O,RI. (Jodhpur Collection ), ed., by Padamashree Jin vijaya Muní,. Puratattvacharya. 24.. A List of Rare and Reference Books. in the RO.R.L. Jodhpur, compiled by P.D. Pathak, M.A. विशेष-पुस्तक-विक्रेताओं को २५% कमीशन दिया जाता है। +----

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Prakritanand Granthank-10

Author
Pt.raghunathkavi
Title
Prakritanand Granthank-10
File name
Prakritanand Granthank-10
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OCR done
Citation
1962
Published
2010/08
Publisher
Jodhpur, Rajasthan Oriental Research Institute
Language
Sanskrit
Pages
106
Library
Prakrit Bharati Academy, Jaipur
DLI number
326543
Barcode
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