Adarsh Library, Jaipur
Vishay Vish Nai
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विषय विष नहीं
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विषय विष नहीं
विमल मित्र
राजपाल एण्ड सन्ज, कश्मीरी गेट. दिल्ली
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हम. तुम, सभी जब अपने-अपने जीवन को लेकर अत्यन्त व्यस्तता में वे रहते हैं, हमारे चारों तरफ इस धरती पर कितने काव्य, कितने नाटक, कितने उपन्यास लिये जा रहे हैं, इसका हिसाव किताब कौन रोगा? जिस प्रकार यह दुनिया छोटी नहीं है, आदमी भी उसी लिहाज से इतने अधिक हैं कि गणना नहीं हो सकती। किसको केन्द्र मानकर लिवू, किसके बारे में मोचूं. समझू, कितने व्यक्तियों की कितनी समस्याओं के कारण मायापच्ची करता रहूं? बीच-बीच में जब मैं सड़क पर चहलकदमी करता हूं, आसपास के तमाम लोगों के चेहरे-मोहरे की ओर गौर से ताकता हूं तो सभी व्यस्त दीखते हैं. सभी हतमन-मभी समस्याओं में उलझे हुए। हालांकि किसी सड़क के मोड़ पर आदमी का जत्था जव भीड बन जाता है, सभी भादमी एक-दूसरे से अपनी- अपनी बातें बताने को वचन दीखते हैं। कभी-कभी देखने में आता है कि एक आदमी भागती भीड़ की तरफ चुपचाप ताफ रहा है, फिर वह सिगरेट का करा लेता है और आगे की ओर बढ़ जाता है । मैं हर मादमी की तमाम बातें जानना चाहता हूं, हर किसी की समस्या से अवगत होना चाहता हूं। यात ऐसी नहीं है कि हरेक को तमाम बातों को जानकारी से भैरा बहुत ही उपकार होगा या मैं सभी की समस्याओं का निदान खोज निकालूंगा। Cइनल में निदान किसी के वश की बात नहीं है। इस विश्व के सृष्टिकर्ता जय किसी मनुष्य को दुनिया में भेजते हैं, भेजने के साथ ही मन नामक एक वस्तू उसके अन्दर डाल देते हैं और कहते है, "अब जाकर संपप करो"" डेन के साथ अगर यह मन न होता तो झनट की कोई बात नहीं थी। लेकिन यह हुआ नहीं दुनिया में जितनी भी.संझटो गुरुआत होती है, उसका कारण यह मन ही है। यह मन ही आदमी के सभी विनानों की इसी तरह की एक समस्या को बातें आपको बताने जा रहा हूं।
२ हर रोज सवेरे नींद खुलते ही सड़कों पर घूमने के लिए निकलना मेरी आदत में शुमार हो गया है। इसका कारण आंशिक तौर पर स्वास्थ्य के प्रति सजगता है और आंशिक तौर पर देखना-परखना । और न केवल देखना बल्कि देखने के साथ-साथ सुनना भी । देखना और सुनना मेरी प्रकृति है। देखते-देखते, सुनते-सुनते ही कितने आदमियों को मैंने जाना-पहचाना है, कितनों की समस्याओं से मैं खुद जड़ित हो गया हूं, इसकी कोई सीमा नहीं। लेकिन बहुत बार ऐसी भी बातें हुई हैं जबकि बहुत अधिक जान नहीं पाया, बहुत अधिक सुन नहीं सका। कभी-कभी सड़क के किनारे दो-चार लड़के आपस में गपशप करते दिखते हैं । बगल से गुजरता हूं तो उनकी वातों की भनक कानों में पहुंचती है। उनकी वातचीत का सिलसिला या तो सिनेमा, या लड़की या कि किसी घर की कलंक- जनित कहानी के गिर्द चक्कर काटता है। वगल से गुजरते वक्त वातों के जो टुकड़े कानों में पहुंचते हैं, उन्हीं से उनके चरित्न का आभास मिलता है। परन्तु जब पार्क में चक्कर काटता हूं तो और ही दृश्य दृष्टि-पथ में आते हैं, और ही तरह के वहस-मुवाहसे सुनने को मिलते हैं। सात से आठ और आठ के बाद नौ बजने-वजने को हैं। पार्क के बंधेरे कोने में लड़के और लड़कियों के जोड़े अन्तरंगता में बातचीत करने में मशगूल हैं । वगल से गुजरते वक्त उनकी वातचीत के जो टुकड़े मेरे कानों में आते हैं, उनसे उनके वहस-मुवाहसे की कोई झलक नहीं मिलती। लेकिन मन ही मन मुझे दुख का अहसास होता है। अहा, वेचारे गरीब हैं। कहीं किसी ड्राइंगरूम के एकांत में बैठकर बातचीत कर सकें, ऐसा आथय- स्थल उन्हें नसीव नहीं। कोई गाड़ी भी उनके पास नहीं है। गाड़ी ड्राइव करते हुए गंगा या लेक के किनारे वीरान में जाकर, जन-साधारण की आंखों की मोट में बैठकर दो हृदय आपस में वार्तालाप कर सकें, ऐसा भी स्थान उनके लिए नहीं है। wa इन्हीं अभियानों के दौरान एक दिन पेशव वायू से मेरा परिचय हुवा। केशव वाबू कहते, "असल में जीवन नाटक नहीं है साहब, जीवन एक यातना है । नाटक और यातना एक ही वस्तु नहीं हुआ करते.." में पूछता, "क्यो ? आप ऐसी बातें क्यों कह रहे हैं ?" "यही देखिए न," केशव वाबू कहते, "जिन्दगी-भर मैंने कभी किसी काम से जी नही चुराया, वचपन से होमन लगाकर लिखा-पढ़ा। सोचा या, अच्छा स्टूडेंट होने पर ही मान-सम्मान मिलेगा। मगर नतीजा क्या हुआ ? वी० ए०, एम० ए० में फस्ट करने से मुझे क्या हासिल हुआ?" केशव वाबू के मन की बात जानने के ख्याल से मैं कहता, "मगर गलती तो आपकी ही है केशव वाबू, सिर्फ मन लगाकर लिखने-पढने से, वी० एम० ए० में फस्ट करने से ही क्या होता है ? उसके साथ निष्ठा को जरूरत पड़ती है।" "निष्ठा? निष्ठा के बारे में कह रहे हैं ? जानते हैं, तीस बरसों तक मैंने लगातार काम किया है, उस बोच एक भी दिन गैरहाजिर नहीं रहा, एक भी दिन लेट नहीं । जिस दिन मेरी पत्नी की मृत्यु हुई." कहते-कहते केशव बाबू को आवाज एक क्षण के लिए जैसे रुक गई थी। असल में केशव वायू से मेरो जो जान-पहचान हुई, एक ही दिन में वह जान-पहचान घनिष्टता में परिवर्तित नहीं हुई थी। गुरू-शुरू में मैं उन्हें वाली. गंज के बहे पार्क में चुपचाप बैठा देसता पा। आमतौर से बूढे लोग शाम के वक्त जमात में बैठते हैं और व्यतीत की स्मृतियों दोहराते हैं। एक दिन का पूरा वक्त वे अपने-अपने घरों में किसी तरह गुजार देते हैं। हर किसी का परिवार बढ गया है । उग्र बढने पर सभी वैसे ही हो जाया करते हैं। तव परिवार में जिनकी उम्र कम होती है, उन्हीं के प्रभाव और ख्याति-सम्मान को मभिवृद्धि होने लगती है और जो परिवार के स्वामी होते हैं उनका प्रभाव और ख्याति-सम्मान उसी अनुपात से कम होने लगता है। पम यही है। पही वजह है कि उम्र ढराते हो वृद्ध गृह-स्वामी विलकुल एकाकी पड जाते है। यात-चीत करने के लिए कोई संगी-सापी नहीं मिलता। जो उनकी बातें सुन सके, ऐसा प्रोता उन्हें नहीं मिलता। तब एकमात्र अवलंब होते हैं पार्क, । - ७ । । - सुबह-शाम को पार्क में बैठने वाले हमउम्र लोग। और वे बूढ़े न तो दोस्त- मिन्न हुआ करते हैं और न ही सगे-सम्बन्धी । उन लोगों से ठीक से सुख-दुख की बातें नहीं हुआ करतीं। किसी से भी संवेदना के शब्द सुनने को नहीं मिलते। एक का दूसरे से केवल श्रोता और वक्ता का ही सम्बन्ध रहा करता है। यह मैं बहुत दिनों से अनुभव करता आ रहा हूं। लेकिन केशव बाबू की वात अलग ही है। उनके न तो कोई संगी-साथी ही दीखते थे और न वे किसी से बातचीत ही करते थे। चुन-चुनकर वे ऐसे एकान्त कोनों में जाकर बैठते थे, जहां कोई नहीं जाता था। हर रोज इसी तरह हुआ करता था। यह देखकर मुझे हैरानी होती थी। दुनिया में, दुनिया की राह बाट में, दिलचस्पियों के इतने साधन हैं और यह बुड्ढा यहां अकेले बैठकर अपना वक्त कैसे गुजारता है ? एक दिन मौका देखकर मैं उसी बेंच की खाली जगह पर जाकर बैठ गया। मेरे बैठने का उद्देश्य यही था कि उनसे जान-पहचान हो सके। लेकिन उन्होंने मेरी ओर कोई ध्यान ही नहीं दिया। मैं कोई जीवित व्यक्ति उनकी वगल में हो सकता हूं, इस बात को उन्होंने सोचा तक नहीं। एक दिन मेरे मन में हुआ कि उनसे बातचीत करूं। यानी उनसे परिचित होऊ । बहुत देर तक चुपचाप बैठे रहने के बाद मैंने कहा, "वता सकते हैं कि अभी वक्त क्या हो रहा है ?" केशव बाबू ने तटस्थ भाव से कहा, "मेरे पास घड़ी नहीं है।" घड़ी नहीं है तो मत रहे। मगर उन्हें कुछ-न-कुछ कहना तो चाहिए। फिर कोई बात करूं, इसका सून मुझे खोजने पर भी न मिला। + ३ पहले दिन इसी प्रकार परिचय हुआ। उसके दूसरे दिन वाद थोड़ा और । उसके बाद थोड़ा और । अन्ततः जव सातेक दिन व्यतीत हो गए, वे वोले, "आप हर रोज भाया कीजिए"" 1 . "मैं हर रोज आता हूं।" मैंने कहा । 'हां, हर रोज आया कीजिए," उन्होंने कहा, "इस मुक्त आकाश के तले, स्वच्छन्द वायु में, जहां हरी-भरी पास है। ये पेड़-पौधे । इनकी ही कीमत है करोड़ो रुपये।" "सो तो है ही।" मैंने कहा। भले आदमी ने कहा, "आपकी उम्र कम है, अभी मेरी बात की कीमत आपको समझ मे नही आएगी, किसी दिन बत्तीस से वयालीस होगी, बयालीसा से बावन, वावन से वासठ-तव आपकी समझ में आएगा कि इस मुक्त आकाश, स्वच्छन्द वायु की कीमत क्या है । आपको तरह जव में कम उम्र का पा, तब बात मेरी भी समझ में नहीं आती थी। अब समझ रहा हूं." उसके बाद एक क्षण चुप रहने के बाद बोले, "कभी ज्यादा बातचीत मत करें। श्यादा बातचीत करने का मतलब है-आयु-क्षय।" मैं उनकी बातें मन लगाकर मुना करता था। और ये आहिस्ता-आहिस्ता, रुक-सा कर, बातचीत किया करते थे। "देखिए," वह कहते, "मैंने जिन्दगी-भर कभी काम से जी नहीं चुराया, वचपन में मन लगाकर लिखा-पढ़ा, लेकिन वी० ए०, एम० ए० मे फस्र्ट होने से ही क्या आता-जाता है ?" मैंने कहा, "जरूरत है..." "किसी दिन यह सब आपको समझाऊंगा। एक दिन में आप सब कुछ समझ नही सकेंगे। मिसाल के तौर पर मही लीजिए, कि मैंने जिन्दगी भर नौकरी की है। जिन्दगी के आखिरी वक्त मे, नौकरी की एक-एक करता हुआ, मैं ऊचे-से-ऊचे पद पर पहुच गया । उस वक्त मेरे बास बनकर जो मिनिस्टर साहब आए, वे थे इंटरमिडियट-फेल । और मैं उनके अण्डर काम करता था। मैं यानी जो एम० ए० मे फस्र्ट क्लास-फल्टं आया था। इसीलिए जब मेरी पत्नी की मृत्यु हुई..." रोज-रोज यही सिलसिला चल रहा था। कुछ बातें बताते थे और कुछ मन के अन्दर दबाकर रख लेते थे। सव कुछ जाहिर करने में उन्हें जैसे किसी बाधा का अनुभव होता था।' फिर भी मैंने निराशा को अपने पास फटकने नहीं दिया । किनी से उसकी सीही तय ६ कहानी जाननी हो तो निराश होने से काम नहीं चल सकता है । इसके लिए धर्य जरूरी है, तितिक्षा और अध्यवसाय की जरूरत पड़ती है। और धैर्य, निष्ठा तथा तितिक्षा के अर्जन के लिए इसी तरह मुक्त आकाश के नीचे, हरे पेड़-पौधों के तले, एकाकी वैठकर आत्मचिन्तन करना बहुत ही आवश्यक है। वातें उन्होंने बड़ी-बड़ी कही थीं। लेकिन सिर्फ रूखी-सूखी बातों से कहानी नहीं लिखी जा सकती। खैर, कहानी चाहे न हो, चरित्र तो है। यह भी क्या कम लाभ है । एक बार चरित्र की सृष्टि हो जाए तो कहानी गढ़ने में वक्त ही कितना लगता है। एक अच्छी कहानी के लिए मैं अनन्त काल तक प्रतीक्षा कर सकता हूं। उसी प्रतीक्षा में मैं हर रोज़ पार्क जाया करता हूं, वहां बेंच के एक किनारे बैठा करता हूं सो एक दिन एकाएक कहानी मिल गई। ४ उस दिन जाने पर केशव बाबू को बैठे हुए पाया। मैं और-और दिनों की तरह उनकी बगल में जाकर बैठ गया। उस दिन भी उसी तरह की बातचीत चली। वहीं चेहरा-मोहरा । वे सामने की ओर ताक रहे थे। मुझे अपनी वगल में बैठते देखा, लेकिन एक शब्द भी नहीं बोले। मैंने ही वात की शुरुआत की, "आज बेहद गरमी है, केशव बाबू..." लगा, मेरी मौजूदगी के कारण केशव बाबू की चेतना वापस चली आई वै वोले, "ओह, आप भी आए हैं ? आकर आपने अच्छा ही किया है, वाहे गरनी का प्रकोप हो या सरदियों का, आना अच्छा ही होता है।" "आज वारिश हो सकती हैं..." मैंने कहा। केशव बाबू ने आसमान की योर देखा। "बारिश होने से डरने की कौन-सी बात है," उन्होंने कहा, "मेरा घर नकट ही है । इसके अलावा ऐसी गरमी है कि बारिश होना ही अच्छा है।" १०
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"आपका घर निकट ही है ?" मैंने पूछा।
केशव यायू बोले, "हां, वो रहा."
यह कहकर उंगली से उन्होंने पूरब के एक दोमंज़िले मकान की ओर
इशारा किया।
एकाएक झमाझम बारिश की बूदें वरसने लगीं।
लोग पार्क में वायु-
सेवन के ख्याल से आए थे, भागने लगे। केशव बाबू भी उठकर खड़े हुए।
क्या करूं, मेरी समझ में नहीं आया। मेरा डेरा बहुत दूर है। साथ में
छाता या वाटरप्रूफ नहीं है कि बैठा रहूं।
केशाय याबू ने उटते हुए कहा, "आप इस वारिंश मै कहां जाइएगा, मेरे
घर पर चलिए।"
अन्ततः वही करना पड़ा।
जल्दी-जल्दी कदम बढाते हुए वे अपने घर के पास पहुंचे और सदर दरवाजे
की कुंडी सटखटाने लने।
"मिलू, बिटिया मिलू, दरवाजा खोलो बेटा..."
मैं उनकी वगल में घडाघड़ा भीग रहा था। कुछ देर के बाद जब एक
आदमी ने दरवाजा पोला तो मेरी निगाह नौकर-जैसे एक ऐसे व्यक्ति पर
पड़ी, जो देह पर जनेऊ लटकाए था।
केशव बाबू बोले, "मूमे हुए दो तौलिए ले मायो..."
यह कहकर उन्होंने मेरी ओर देसा और कहा, "आइए, इस सोफे पर
बैठ जाइए।"
५
मकान आरामदेह है, सजा-सजाया। दीवार पर कुछ किताबें । उस वक्त
वे मुझे बिठाकर चले गए थे।
दुक-केम के सामने जाकर मैंने किताबें देखी 1 सबको सब क्लासिक स्तिावें
पों। जिन पुस्तकों का रिसी भी काल में क्षय नहीं होता, वैसी ही पुस्तकें ।
बंकिमचन्द्र-ग्रन्थावली, माइकेल मधुसूदन दत्त की पुस्तके, भूदेव मुसोपाध्याय
११
. की रचनाएं, दीनवन्धु मित्र का नीलदर्पण । उन्हीं की बगल में शेक्सपीयर, मिल्टन, गिब्बन, रसेल की रचनाएं। एकाएक कमरे के अन्दर आकर केशव बाबू ने कहा, "वह सब आप क्या देख रहे हैं ?" मैं बोला, "आप तो बहुत बड़े पाठक हैं, सवकी सब पढ़ने के लायक हैं।" "अरे, नहीं-नहीं, ये पुस्तकें मुझे प्राइज़ में मिली थीं। बचपन से ही स्कूल- कालेज में फर्स्ट आता रहा हूं, प्राइज़ मिला है, स्कालरशिप मिला है। स्कालर- 'शिप के पैसे से लिखना-पढ़ना जारी रखा है, फिर भी कितावों को सजाकर रख दिया है। बचपन में ही इन कितावों को पढ़ा था, उसके बाद इन्हें छुआ तक नहीं है।" "क्यों ?" मैं बोला, "आपके लड़के-बच्चे तो पढ़ सकते हैं।" "लड़के-बच्चे ? आप क्या कह रहे हैं ? आजकल के लड़के-बच्चे ऐसी कितावेंगे पढ़ेंगे ? 'उल्टा रथ', 'प्रसाद', 'सिनेमा-जगत', 'देश' वगैरह पढ़कर समझते हैं कि वे साहित्य का अध्ययन कर रहे हैं । जानते हैं, लिखना-पढ़ना इस देश से विदा हो चुका है । मुझे इसी बात का दुख है। एक ही चीज़ में वे लोग 'ध्यान लगाते हैं और वह है सिनेमा। सिनेमा-हाउस के सामने आपने लाइन. देखी है ? चावल की दुकान के सामने की लाइन से भी बड़ी लाइन रहती है..." केशव बाबू तब तक बैठ चुके थे, मैं भी बैठ चुका था। उस समय भी बारिश का समां बंधा था। केशव बाबू का कथन जारी था, "मैं पुराने जमाने का आदमी हूं, हो सकता है इसीलिए मुझे यह सब अच्छा नहीं लगता। हो सकता है, गलती में मैं , ही हूं और वे लोग सही हैं । लेकिन मैं कहूं, सारी दुनिया जिस ओर दौड़ रही है, वह दिशा ही गलत है। इससे आदमी का भला नहीं होगा, यह बात मैं आपसे भी कह रहा हूं." मैं बोला, "आप ठीक ही कह रहे हैं। इस देश में जिस तरह का सिनेमा चल रहा है, उससे आदमी की हानि ही होगी। सरकार साहित्य के लिए कुछ भी नहीं करती, मगर सिनेमा के लिए करोड़ों रुपए खर्च करती है।" एकाएक केशव बाबू ने पूछा, “सोचा था, आपसे एक वात पूडूं, पर पूछ . , १२ नहीं पाया था। पूछना भूल ही जाता या । आप क्या करते हैं ?" "मैं लिखता-विखता हूं," मैंने कहा। केशव बाबू के लिए लेगन का मूल्य क्या हो सकता है. इसकी मुझे जान- कारी नहीं थी। क्योंकि बहुत-से जानकार लोग लेखन को किसी कार्य के रूप में नहीं लेते हैं। उन्होंने उत्सुकता के साथ पूछा, "लिखने-दिखने का मानी ?" मैंने अवहेलना के साथ इस बात को नजर-अन्दाज करने के साल से पाहा, "सो वैसा कोई महत्वपूर्ण नहीं है, काम-धाम न रहने के कारण ही यह सब करता हूं। कुछ-न-मुछ करना ही है, बेकार जो टहरा।" केशव बाबू ने पूछा, "सो तो है, मगर उससे गृहस्थी चल जाती है ?" "बिल्कुल नहीं।" मैंने कहा। केशव वायू बोले, "चल ही नहीं सकती। जितनी भी अच्छी पुस्तकें हैं, प्राचीन काल में ही लिखी जा चुकी हैं। ये समकी सब नष्ट हो चुकी है." मैं इसके बाद क्या कहूं ! क्स, इतना ही कहा, "आप ठीक ही कह रहे उम समय वारिश कुछ कम हो गई थी। मैं बोला, "अब चलू"" यह कह मैं वहां से चला पाया। ६ मादमी को पहचानने से लिए धैर्य को जरूरत पड़ती है। कोई भी आदमी दूसरे के सामने अपनी कमजोरी जाहिर नहीं करना चाहता है। परिन की गोपनीय दुर्वलता को वह बढ़ी सजगता के साथ अपने हृदय के निभूत कोने में छिपाकर रखता है, लोगों की निगाह से बचाकर रखना चाहता है। शीघ्रता करने से आदमी सतर्क हो जाता है। स्वयं को सहेज-समेट कर, एक छम भावरण से अपनी दुर्वलता को ढंककर रख लेता है। इसीलिए इन मामलों में दीघ्रता करने से ही मुसीबत का सामना करना पढ़ता है। सारी मेहनत व्यर्थ साबित होती है।
क्या यही वजह है कि केशव बाबू से घनिष्ठता बढ़ाने के लिए मैंने अधिक उत्सुकता प्रकट नहीं की। दो-चार दिन पार्क नहीं गया- इसलिए कि वे यह समझ नहीं सकें कि मैं उनकी इस नि:संगता के कारणों का पता लगाना चाहता हूं। दो-चार दिनों के बाद मैं जब पहुंचा तो केशव बाबू को बहुत ही गम्भीर पाया। यों उनके चेहरे पर हमेशा गम्भीरता छाई रहती है। यह कोई नई बात नहीं। लेकिन उस दिन उनके चेहरे पर गम्भीरता ही नहीं थी, बल्कि एक उदासी भी तैर रही थी। उनके पास जाकर मैंने पूछा, "क्या बात है, आपकी तबीयत खराव है ?" मेरी वात सुनकर उनकी चेतना वापस आई। वे वोले, "ओह, आप हैं ! मेरी नज़र आप पर गई ही नहीं बैठिए..." मैं उनके पास बैठ गया । बोला, "आज आप कुछ और ही तरह के दीख रहे हैं।" "कैसा?" "लगता है, किसी बात पर आप गहराई से सोच रहे हैं।" मैंने कहा। "सोच रहा हूं?" मानो, उन्होंने अपने-आप से प्रश्न किया। बोले, "आदमी में चिंता रहना स्वाभाविक है। जीवित रहने का अर्थ ही है, कुछ-न-कुछ सोचना । लेकिन मेरी चिन्ता कुछ और ही तरह की है।" मैंने अधिक उत्सुकता नहीं जाहिर की। कहीं ऐसा न हो कि वे स्वयं को और अधिक समेट लें। किन्तु नहीं, अवकी उन्होंने स्वयं को कुछ खोला। शायद अपने प्रति मेरी आसक्तिहीनता उन्हें अच्छी लगी। वे बोले,"चिन्ता के लिए मेरे पास है ही क्या ! नौकरी से रिटायर हो चुका प्रोविडेण्ट फंड के रूप में मोटी रकम मिली है। बालीगंज में अपना एक मकान भी वनवाया है। वाहरी तौर पर बहुतों के दिल में मेरे प्रति ईर्ष्या का भाव है । जानता हूं कि उनके सामने मैं ईर्ष्या का ही पान हूं। इसके अलावा न तो मैं डयवटीज़ का मरीज़ हूं, न ब्लड प्रेशर का। इस उम्र में हर कोई जिससे तकलीफ पाता है, मैं उससे मुक्त हूं। रात में मुझे नींद आती है । अब भी, अगर मिले तो, मैं एक सेर मांस खाकर पचा सकता हूं। अभी भी इस वक्त उन्होंने पूछा, । १४ मैं आपसे बातचीत करते-करते चार-पांच मील पैदल चलकर जा सकता हूं। कही एक क्षण के लिए बडूंगा नही, हाणूंगा नहीं, आराम तक नहीं करूंगा। मेरा हर्ट बिलकुल ठीक है, म्लड-मुगर नामल है. कालस्ट्रल एक सौ सत्तर, प्लसबीट छिहतर । इससे बेहतर स्वास्थ्य और क्या हो सकता है ?" "सो तो है ही.." मैं बोला। 'लेकिन अपने एक माई के चलते मुझे कठिनाई का सामना करना पर रहा है..." "माई के चलते ? अपने सगे भाई के कारण ?" मैंने पूछा। "हाँ, मेरा सगा भाई, सहोदर भाई, वहीं भाई मेरे जीवन की सबसे बड़ी समस्या बन गया है।" "यापसे छोटा है या बड़ा?" केशव बाबू बोले, "मुझसे छोटा है, उम्र में मुझसे यहुत छोटा। अभी उसकी उम्र यही उनतीस-तीस होगी। मेरे पिताजी का देहान्त हो चुका है, मा भी विदा हो चुकी है । पिता ने मरने के समय उसे मेरे हाथों मे सौंपकर यहा था, "केशव, वासव की देखरेख करना। वासव को तुम्हारे हाथों में सौंपकर ही मैं निश्चिन्तता के साथ भर पाऊंगा। वासव आदमी नहीं बन सका, आखिरी घड़ी में यही दुख मेरे मन मे रह गया" उस समय पिता की बाषिरी घड़ी चल रही थी। सांस लेने में उन्हें तकलीफ हो रही थी। पिता का हाथ पकड़कर मैंने कहा, "पिताजी, चाहे मुझे लाख तकलीफ क्यो न झेलनी पड़ें, वासव और मैं हमेशा एक साय रहेगे, उसके तमाम सुख-दुप को मैं अपना सुख-दुख समभुंगा । तुम निश्चिन्त रहो..." मैं कहानी सुनने में तल्लीन था। पूछा, "उसके बाद ?" केशव वाबू सम्भवतः पुरानी स्मृतियों की बातें महते-कहते भाव-विभोर हो गए थे। उससे मुक्त होने में थोड़ा समय लगा। उसके बाद पुछ क्षणों तक हम दोनों में कोई वातचीत नहीं हुई। वे खानोसी में हूये रहे। मैंने ही पहले-पहल चुप्पी तोड़ी, "वे करा आपके साथ एक ही मकान में रहते हैं ?" केशव वायू बोते, "कहान, पिता की मृत्यु के समय मैंने उनसे वादा किया पा कि मैं उसको देख-रेख करूंगा। अब भी उसकी देख-रेख कर रहा हूं। जब, " तक जिन्दा रहूंगा, देख-रेख करता ही रहूंगा। चाहे मेरी जितनी ही हानि करे, जितनी भी बदनामी फैलाए, जितनी ही वेइज्जती करे, मैं हमेशा बरदाश्त करता रहूंगा। मैं कभी उसे घर से नहीं निकालूंगा-क्योंकि मृत्युशय्या पर पड़े पिता को मैंने वचन दिया था कि मैं वासव की देख-रेख करूंगा." यह कहकर केशव बाबू चुप हो गए। यह समझने में मुझे कठिनाई नहीं हुई कि भाई के व्यवहार से केशव बाबू को मानसिक आघात पहुंचा है, नहीं तो उनके-जैसा एक गम्भीर-अल्पभापी मनुष्य इस तरह एक अल्पपरिचित व्यक्ति के सामने जवान क्यों खोलता? दूसरों के पारिवारिक मामलों में अपनी ओर से किसी तरह की उत्सुकता या मंतव्य प्रकट करना ठीक नहीं होता है। ज्यादा-से-ज्यादा हम संवेदना के दो शब्द प्रकट कर सकते हैं। इसलिए मैंने संवेदना के तौर पर ही कहा, "कम- उम्र रहने से आदमी में दायित्व-बोध नहीं हुआ करता। उम्र बढ़ते ही सुधार आने लगेगा।" केशव वाबू वोले, "सुधर जाए तो जान में जान आए." "आपके भाई की शादी हो चुकी है ?" मैंने पूछा। "शादी ?" केशव वाबू बोले, "शादी वह करना ही नहीं चाहता । उसकी शादी करने की मैंने बहुत ही कोशिशें की हैं । कलकत्ते की खानदानी खूबसूरत लड़कियों को देख-सुनकर शादी करने की कोशिशें की हैं। लेकिन वह शादी करने को राजी नहीं है।" "शादी नहीं करेगा ? क्यों? शादी करने में आपत्ति क्या है ?" "आपसे कहा न, स्वभाव । मेरे भाई का स्वभाव-चरित्न ही खराव है..." वातचीत समाप्त होने के पूर्व ही एक आदमी दौड़ता हुआ आया और केशव बाबू के पास खड़ा हो गया। "मालिक, छोटे वावू आये हैं और आते ही उन्होंने शोर-शराबा मचाना शुरू कर दिया है। हम लोगों को जो-सो गाली-गलौज कर रहे हैं..." केशव वावू वेचैन हो उठे। बोले, "तुम्हारी दीदी जी कहां हैं ?" नौकर ने कहा, "दीदी जी अपने कमरे में हैं, आपको यहां से बुला लाने के लिए भेजा है।" केशव वावू के चेहरे पर उदासी तिर आई - मेरी समझ में कुछ भी नहीं आया। वे इतने शांत-शिष्ट, गम्भीर आदमी है। देखने से लगता है कि सुखी यादमी हैं, कहीं किसी तरह की मशांति नहीं है। केशव वायू उठकर खड़े हो गए और बोले, "चलो.." मैं उनकी बगल में बैठा है, उन्हें इस बात का ख्याल ही नहीं रहा। नियमतः उन्हे. मुझमे विदा लेनी चाहिए थी, किन्तु इस बात का भी उन्हे चाल न रहा। वे घर की ओर चल दिए। उनका नौकर पीछे-पीछे जाने लगा । देवा, ये पाक को कोलतार को सड़वा पर पैदल चले जा रहे हैं। उसके बाद पार्क से बाहर जाने के लिए लोहे का फाटक है। उस फाटक से बाहर जाने के बाद वै बाई ओर मुड़े और सामने के बहुत- मे मकानों में से एक मकान के सदर दरवाजे के पास जाकर अन्दर की ओर चले गए। उनका पीछे-पीछे उनका नौकर भी अन्दर चला गया केशव बाबू के जाने के बाद भी मैं बहुत देर तक सोचता रहा। जिनके पास इतने रुपये-पैसे हैं, जो इतनी सम्पत्ति के मालिक हैं, उन्हें ऐसी कौन-सी अशांति हो सकती है ? फिर यह छोटे बाबू कौन हैं ? वासव नाम सुनने मे थाया था। यासव कौन है ? उनका लडका पर आकर शोर-गुल मचा रहा है ? भगर दीदी भी? दीदी जी का मतलब ? केशव बाबू को वहन ? अगर केशव वायू की बहन ही हो तो उसकी क्या अब तक शादी नहीं हुई है ? वह अविवाहिता है ? एकाएक मुझे लगा कि मैं यह सब क्यों सोच रहा हूँ ? केशव बाबू मेरे कौन होते हैं ? कुछ दिनों और कुछ घंटो का ही परिचय है, सो भी बाहर ही बाहर। फिर उनके प्रति इतनी उत्सुकता क्यों ? थोड़ी देर बाद मैं उठकर पड़ा हो गया और दूसरे-दूसरे दिनों की तरह घर की ओर चल दिया। ७ यही है शुरमात, यानी आरम्भ ! साहित्य के इतिहास को देखने पर मुझे इस बात का पता चला है कि . उपन्यास की शुरुआत एक ऐसे शुरुआत एक ऐसे ही छोटे विन्दु से होती है। मेरे बहुत-से कहानी- उपन्यासों की शुरुआत इसी तरह के छोटे विन्दु से होती है। शुरुआत यद्यपि एक छोटे विन्दु से होती है लेकिन अन्ततः वह रचना पल्लवित-पुष्पित होकर एक विशाल वृक्ष के रूप में परिणत हो जाती है। लोगों ने मेरे उपन्यासों को पढ़ा है, अव भी पढ़ते हैं । मेरा उपन्यास आकार में जितना ही मोटा होता है, लोग उसे उतना ही ज्यादा पसन्द करते हैं। 'पसन्द करते हैं' का मतलब यह है कि वे चाहते हैं कि उनके आनन्द का सिलसिला ज्यादा-से-ज्यादा दिनों तक चलता रहे। परन्तु मेरी सामर्थ्य की भी एक सीमा है। न केवल मेरी सामर्थ्य की ही, पाठकों के आनन्द की भी कोई-न-कोई सीमा है । मिठाई में कितनी ही मिठास क्यों न हो, मगर उसका भी एक परिमाण होता है । वह परिमाण कहां है, उसकी क्या सीमाएं होनी चाहिए, यह बात लेखक के लिए जानना ज़रूरी है। सूर्य आकाश में पूरव की दिशा में उगता है लेकिन उसकी सीमा पश्चिम दिगंत में जाते ही समाप्त हो जाती है। वहां पहुंचते ही उसके अस्त होने का समय आ जाता है । दिन-भर पूरे आकाश की परिक्रमा करने के बाद ही उसके कर्तव्य की इतिश्री होती है। यह कहानी एक सामयिक पत्रिका के एक ही अंक में पूरी-की-पूरी प्रकाशित हुई थी। पत्र-पत्रिका में भी एक सीमावद्ध स्थान हुआ करता है । और न केवल सीमावद्ध स्थान, वल्कि एक निर्दिष्ट तिथि और क्षण भी निश्चित रहता है। . उसी दायरे में मुझे केशव बाबू की कहानी समाप्त करनी थी-चाहे वह कहानी पूरे तौर पर समाप्त हो, चाहे न हो। पाठकों को चाहे अच्छी लगे, चाहे न लगे। यह कहना मेरे लिए कोई ज़रूरी नहीं होता, अगर यह कहानी किसी पत्रिका में धारावाही प्रकाशित होती। चूंकि यह पूरा उपन्यास है, विज्ञापन में इसे पूरे उपन्यास के तौर पर ही प्रचारित किया जाएगा। पाठक इसी उम्मीद में पत्रिका खरीदेंगे कि उन्हें सम्पूर्ण उपन्यास पढ़ने को मिल रहा है। मेरी जिम्मेदारी कितनी कठिन है, आप इसका अनुमान सहज ही लगा सकते हैं। खैर, केशव बाबू की कहानी अब फिर से शुरू कर रहा हूं। दूसरे दिन मैं फिर पाई गया । उम वेव पर बहुत देर तक बंटा रहा। मगर केशव दाबू पाए ही नहीं। निराश होकर मैं घर लौट आया। उमा दूसरे दिन भी में पार्क में जाकर हाजिर हुआ। उस मकान की ओर एकटक से ताकता रहा, निर्धारित वेंच पर फाफी देर तक वैठकर प्रतीमा करता रहा । लेकिन उस दिन भी केगव वावू के दर्शन प्रान न हुए। मी तरह जब गात दिन यों ही बीत गए तो मैं अधीर हो उठा । मुझ में एक भय ममा गया। नंदेह होने लगा। सकोच ने धर दवाया। और एक दिन मचमुच मेरा धैर्य मेरे वग में नहीं रहा। उम मकान को अपना लक्ष्य बनाकर मैं एक-एक पग आगे बढ़ता गया। जाकर क्या कहूगा, मन-ही-मन इसकी कल्पना करने लगा। विना जान- पहचान के किसी के घर के अन्दर चला जाना अशिष्टता कहलाता है। अगर वे मेरा स्वागत नहीं करें? अगर नोकर भेजकर कहला दें कि अभी मुलाकात नहीं हो सकेगी, मेरे पास वक्त नहीं है, तो? लेकिन सोचा, में किमी स्वार्यवश नहीं जा रहा हूँ। मैं उनसे भीख मागने नहीं जा रहा हूं। यह तो सौजन्यसूचक साक्षात्कार मान है। मदर दरवाजे की कुंडी खटपटाते ही नौकर ने आकर दरवाजा खोला। "केशव बाबू है ?" मैंने पूछा। उनने मेरी ओर गौर से देखा । शायद पहचान गया। "बाबू की तबीयत गराव है, बीमार पड़ गए हैं।" में एक क्षण अवार रह गया । इस उम्र में ज्वर आना ठीक नहीं। मैंने पूछा, "क्र मे ज्यर ना रहा है ?" "मालिक सात दिनों से वुधार में पड़े हैं।" उसने बताया। इनके बाद क्या कहूं, यही सोच रहा था, तभी पता नहीं, उसने क्या मोच- कर कहा, "जाकर मालिक को सबर पहुंचा भाऊं।" में वोला, "अगर तुम्हारे मालिक को कोई अमुविधा न हो तो पदर पहुंचा दो।" "फिर आप थोड़ी देर बैठ जाइए यह कहकर वह मुझे कमरे मे बैठाकर अन्दर चला गया।
- - - थोड़ी ही देर के बाद वापस आकर उसने मुझसे कहा, "आइए"... मैं उसके पीछे-पीछे जाने लगा। कमरे से बाहर निकलते ही घिरा हुआ वरामदा है । वरामदे की वगल में वाई ओर ऊपर जाने की सीढ़ी। मामूली सीमेण्ट की सीढ़ी। न उसमें कोई कारीगरी है, न कोई खूबसूरती । लगा, यह सीढ़ी कभी धोई-पोंछी नहीं जाती है। सीढ़ियां तयकर दोमंज़िले पर पहुंचा। उसके बाद एक बरामदा तय कर आखिरी छोर के कमरे में पहुंचा। मुझे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि तमाम मकान में महिला तो दूर की बात, किसी आदमी का चिह्न तक नहीं है। सोचा, किसी दूसरे कमरे में कोई-न-कोई होगा ही। केशव वावू जिस कमरे में लेटे थे, नौकर मुझे उसी कमरे में ले गया। कमरे में केशव बाबू विस्तर पर पीठ के बल लेटे थे। लगा, मुझ पर नज़र पड़ते ही वे कुछ संकुचित हो उठे हैं। "आइए, आइए, "उन्होंने कहा, "यह खुशी की बात है कि आप मेरी खोज-खवर लेने आए हैं। जानते हैं न, आजकल दुनिया में कोई किसी का नहीं होता।"... मैं बोला, "आपको कई दिनों से न देखकर मैं चिन्ता में पड़ गया था.." केशव बाबू बोले, "आपने बहुत ही अच्छा किया। दिन-भर मैं अकेला ही पड़ा रहता हूं। लगता है, कल से बुखार थोड़ा कम रहा है।" "एकाएक बुखार कैसे आ गया ?" मैंने पूछा, "सरदी-वरदी लग गई थी क्या?" केशव वाबू की आवाज़ में भारीपन उतर आया। वे वोले, "सरदी-वरदी नहीं लगी है, उम्र हो गई है, अव तो मौत ही आए तो अच्छा। अब जीने की कोई ख्वाहिश नहीं रही।" उसके बाद पता नहीं क्या सोचकर पूछा, "तारक कहाँ गया ?" फिर वे पुकारने लगे, "तारक, ओ तारक..." नौकर का नाम तारक है। वह इस बीच कमरे से निकलकर चला गया था। केशव बाबू की पुकार सुनकर वह दुबारा कमरे के अन्दर आया। उन्होंने तोशक के नीचे से रुपया निकाला । तारक की ओर रुपया बढ़ाकर वोले, "अरे, बाबू के लिए कुछ खाने की चीज़ ले आ..." "नहीं, यह नहीं हो सकता," मैंने कहा, "अगर मुझे यह मालूम रहता तो - २० मैं यही नहीं आता। मेरे लिए पाने की चीड लाना जरूरी नहीं है। अगर माने की चीज मंगाइएगा नो में अभी उठकर चना आझंगा।" अंगर वायू मुनने को तैयार नहीं थे, मैं भी मानने को तैयार नहीं था। बोले, "ठीक है, आप जब इगना नाराज हो रहे है तो मैं माने की चीजें नहीं मंगाऊंगा।" यह कहकर उन्होंने सये को फिर गे तोशक के नीचे रग दिया। मैंने चंन की गाम मी। में बोला, "आप अगर इस तरह लौकिकता निभाएगे तो मैं आपके पास नही बागा, केशव वाचू।" केशव बाबू बोले, "आप आज पहले-पहल आए हैं, इमो में मैं तनिक लौकियता का निर्वाह करने जा रहा था, दरअसल इसे लौकिकता नहीं पहा जा सकता। मेरा यह हमेशा का नियम रहा है कि घर पर आने पर मैं किसी को विना दिलाए नहीं छोड़ता। रोविन वक्त बदल गया है। कमा वक्त था और अब कमा आ गया। देखते-देखते ही बहुत-कुछ बदल गया। हालाकि जम मेरी पत्नी जीवित थी..." रहते-कहते वे एक गए। मापद केराव बाबू को व्यतीत की बातें याद हो आई। स्यादा उम्र हो जाने पर मभी के साथ ऐसा होता है। मैं बोला, "मैं दलि किसी दूसरे दिन आकर याना सा लगा, माप पहले अच्छे हो जाएं। माग हो तो कोई मासिरी दिन नहीं है।" में टटने-उठने को पा । अचानक एक पाड पटित हो गया। एक महिला कमरे के अन्दर आई। उसके चेहरे पर बेहद ऊब तैर रही महिला का रूप रणचंडी जैसा था। कमरे के यन्दर आते ही बोली, "बाबूजी, बापने तारक को कितने रपए दिए हैं ?" केराव वायू इस घटना से जैसे संकुचित हो उठे। ग्रास तौर से मेरे जमे एक अजनवरी के मामने अपनी लड़की का कमरे के अन्दर आकर इस तरह बोलना उन्हें अच्छा नहीं लगा। फिर भी अपनी कर उन्होंने होने दी।
पूछा, "क्यों बेटा?" . . । महिला बोली, "मैंने आपसे बार-बार कहा है कि उसे घर से निकाल दें। फिर भी आप मेरी बात नहीं मानते हैं। जानते हैं, वह चोर है ! बाज़ार करने जाता है तो आपका पैसा चुराता है।" केशव बाबू वोले, "तुम बेटा, इतना चिल्ला क्यों रही हो? मेरी तबीयत अभी खराव है, अच्छा हो लूं तो ये सब बातें सुनूंगा। अभी तुम जाओ। देखः रही हो न, मैं अभी इनसे बातचीत कर रहा हूं।" महिला बोली, "आपको उसे अभी तुरन्त निकालना होगा। या तो वह इस घर में रहेगा या मैं। नहीं तो मैं आपकी गृहस्थी चलाने से बाज़ आई, सब-कुछ वरवाद हो जाए, मैं किसी चीज़ पर निगरानी नहीं रखूगी..." केशव वावू के चेहरे पर दयनीयता की छाया मंडराने लगी। "दो दिन के लिए धीरज धरो वेटा," उन्होंने कहा, "दो दिन के बाद ही पथ्य लेना है, तब थोड़ा-बहुत स्वस्थ होकर इसका फैसला करूंगा..." "आपसे फैसला हो चुका। आपने तूल दे-देकर नौकर को सर पर चढ़ा लिया है, वह मेरी परवा ही नहीं करता; मैं हिसाब मांगती हूं तो कहता है, मालिक को हिसाब दूंगा । उसकी यह हिम्मत ! नौकर है तो नौकर की तरह रहे, सो नहीं, मुझे आंखें दिखाएगा। मैं जैसे कोई नहीं, मालिक ही सब- कुछ हैं।" - वाव।" अंत में ऊबकर केशव बाबू ने कहा, "अच्छा, तुम तारक को मेरे पास भेज दो, मैं उसे डांटता हूं। कह दूंगा कि अब से वह सारा हिसाव तुम्हें दिया करे।" महिला चली गई । शायद तारक को बुलाकर लाने ही गई थी। इस मौके से लाभ उठाकर मैंने कहा, "अच्छा, मैं अव चलूं, केशव केशव बाबू भी इस घटना से कुछ-कुछ लज्जा का अनुभव कर रहे थे । वे वोले, “जा रहे हैं ?" "हां, चलूं, अभी आपकी सेहत ठीक नहीं है, बातचीत करने में आपको तकलीफ हो रही है।" असल में केशव वाबू की पारिवारिक गोपनीयता के बीच अपनी उपस्थिति मुझे खुद ही असहनीय लग रही थी। मैं विना कुछ और बोले कुरसी छोड़कर - २२ उठने लगा । लेकिन उन्होंने कहा, "बेटिए, आपने जव कि आने का फष्ट किया है तो थोड़ी देर और बैठ जाइए। देखते जाइए कि मैं क्या सुगी जी रहा हूं, क्यों में पार्फ जाकर एकांत में वक्त गुजारता हूं." तभी तारक कमरे के अन्दर आकर अपराधी को तरह पड़ा हो गया। "मुझे मापने बुला भेजा है बड़े मालिक ? दीदी जी ने कहा केशव वायू बोले, "तू दीदी जी से क्यो झगड़ता है तारक? तू मुझे आराम से मरने भी नहीं देगा? तुम लोग मभी मिलजुल कर इस युढापे में परेगान करके मारना चाहते हो? दीदीजी जो कहती हैं, तू उम पर ध्यान क्यों नहीं देता?" तारक ने कहा, "आप तो सिर्फ मेरा ही दोप देने हैं बड़े मालिक । आप से रुपया लेकर में बाजार जाता था और लौटकर आपको हिमाच दे जाता पा। जितना खया-पैसा वचता था, आपको लौटा देता था। मगर आपने ही तो कहा था कि दीदोजी को हिसाव समझा दिया करो।" "सो तो ठीक ही है। लेरिन दीदी जी से झगडा-रटा क्यो परता है ? ठीक से बाजार कर और ठीक से हिसाब दे दिया कर-चम, कोई संझट हो नहीं। इसमें झगड़ने की कौन-मी यात है?" तारक ने कहा, "अगड़ा मैं नहीं, दीदीजी करती हैं। आपको जव हिमाव देता या तो कभी कोई गड़बड़ी हुई थी?" वेशव वाबू समवत. इस बात का उत्तर देने जा रहे थे, पर उसके पहले हो केशव वायू को तहको कमरे के अन्दर चली आई। उसका चेहरा पहले की तरह ही रपटी-शा पा। कमरे के अन्दर आते ही तारक से बोली, "अयं, यह बात ! गहा में करती हूँ ? तू पैसा चोरी करेगा और मैं कुछ कहूं तो अगड़ा हो गया ? तेरी यह हिम्मत ! अभी इस घर में निकल जा, अभी तुरन्त केशव वायू अब चुप न रह सके, उनके मुंह से एक आह याहर निकन भाई। "उफ, तुम लोग चुप रहो न । जरा आहिस्ता-आहिस्ता योतो, मेरी सबीयत यराय है। तुम लोग मुझे वगर मार नहीं छोड़ोगे।" केशव याबू के इस पारिवारिक झगड़े के बीच में एक मान योता के अति- २३ रिक्त हो ही क्या सकता था? लेकिन यह स्थिति हम दोनों के लिए चिन्त- नीय थी। अव मैं उठकर खड़ा हो गया। उस समय मेरी ओर ध्यान देने के लिए केशव वावू के पास वक्त नहीं था। लड़की की ओर देखते हुए वे बोले, "निर्मला, तारक को भगा देने से ही तुम्हें चैन मिले तो मैं यही करूंगा, मैं उसे भगा दूंगा..." निर्मला बोली "क्यों भगाइएगा वह ठहरा आपका लाड़ला नोकर । वह रहे, मुझे ही भगा देने से आपको चैन मिलेगा, इसलिए मैं ही चली जाती हूँ। आप अपने नौकर को लेकर घर-गृहस्थी चलाइए। लीजिए, यह रही आपके भंडारघर की चाभी..." और आंचल से चाभी का गुच्छा खोलकर झन से बिस्तर पर पटक दिया। उसके बाद एक भी शब्द वगैर वोले कमरे से वाहर चली गई। केशव बाबू पुकारने लगे, "अरी ओ निर्मला, सुनो, सुनती जाओ, ओ ? निर्मला... ..." निर्मला ने जवाब नहीं दिया। मानो उसने पिता की आवाज़ सुनी ही नहीं। तारक उसी तरह चुपचाप खड़ा था। केशव वावू अपना गुस्सा तारक पर उतारने लगे। "तू क्यों खड़ा है, तू भी निकल जा.." तारक फिर भी उसी स्थान पर ज्यों-का-त्यों खड़ा रहा। केशव वाबू ने कहा, "तू खड़ा है ? जा, मेरे सामने से चला जा, निकल जा यहां से..." "आपको अभी दवा देनी है, दवा दे लूं तो फिर मैं चला जाऊंगा। मैं नहीं पिला जाऊंगा तो आप क्या अपने-आप पी सकेंगे?" "दवा कहां है ? कहां है दवा ? देखू !" "वहीं, आपके सामने ही तो है।" तारक ने केशव बाबू के बिस्तर के पास तिपाई पर रखी दवा की वोतलों की ओर इशारा किया। २४ केराव वाबू ने अपने दुवंत हापों से उन्हें ठेलर नीचे गिरा दिया नोगे गिरते ही बीतते टूटकर चूर-चूर हो गई। देशव बाबू ने हांफते हुए कहा, "डाए. सब टूट-कूटकर पूर-पूर हो जाए, अब मुझे दवा की जरूरत नहीं, अब जीने की जरूरत नहीं, गुजे विमी को भी सरल नहीं, मैं बिना घर-नार के भी महंगा तो यही असा, मगर किती या चेहरा नहीं देगा..." यह कहकर उन्होंने निराशा और पवान से जड़ होकर जायें बन्द करनी और पीठ के बल लेटे-लेटे अपने-आपरोमात करने की कोशिश करने लगे। केशव बाबू के घर में मैं एक ऐसा व्यक्ति था जिनका इन तीनो व्यक्तियों से भी कोई संबंध न था। एकाएक यह परिस्थिति मुझे जराहनीय-जैसी गगने ‘लगी । “चलू, फेशव बाबू ।" मैंने कहा। मानो, केशय वाबू को मेरी मौजूदगी का अहमाग हुआ हो। मेरी पाते सुनकर उन्होंने आय गोली। "मेरी यह हालत तो आप अपनी आगो से देख रहे हैं. इसके बाद अगर आप सभी आएगे तो हो सकता है. पता पो कि मैं इस दुनिया में नहीं रहा। अभी मैं छिहत्तर साल का हूँ, फिर भी भगवान मुझे इस दुनिया से भी नहीं उठा लेता है !" केशव बाबू को आंखें छलछला आई। मैं अब वहां का नहीं। रोदियां उतरने लगा। तारक रास्ता दिदाता हुआ मुझे सदर फाटक तक पहुंचा गया। में सड़क पर पहनूं कि इसके पहले ही सारक ने कहा, "फिर आइएगा मालिया। मेरे मालिक के पास कोई नहीं आता, आपके आने से मालिक को योड़ी पांति मिलती है।" तारक की बातें सुनकर मैं अवाक हो गया। मैंने "मैं आऊंगा, मगर सुम? तुम सो भय रहोगे नहीं। तुम्हारी नौकरी माज छूट गईन ?" तारक हंग दिया। यह हंसी आत्मप्ति की हंसी थी। "मैं ? आप मेरे बारे में कह रहे ? इसके पहले भी मेरी नोकरी चुकी है। इस मकान में मैं न रहमा सो को घोगा ?"
तारक की बातों ने मुझे आश्चर्य में डाल दिया। "मालिक में इतनी हिम्मत है कि मुझे भुला दें ? मैं न रहूंगा तो मालिक मौत के मुंह में समा जाएंगे। या मालिक के भाई आकर जो-तो गाली-गलौज करेंगे, मारेंगे, शोर-शरावा मचाएंगे, कुरसी-मेज़ तोड़ डालेंगे, रुपए-पैसे की मांग करेंगे..." "भाई ? भाई का मतलब ?" तारक बोला, "छोटे बाबू, मालिक के छोटे भाई।" "और यह दीदीजी? दीदीजी की मांग में तो सिंदूर देखा। वह अपने वाप की बीमारी की खबर सुनकर मायके आई है ?" एकाएक ऊपर से केशव वावू की आवाज़ आई। तारक का ध्यान उस ओर खिच गया। वह बोला, "बड़े वावू बुला रहे हैं, मैं चलूं। दवा देने का वक्त हो चुका है।' "तुम्हारे बड़े बाबू ने दवा की तमाम बोतलें तोड़ डाली हैं, अव दवा कहां से लाओगे?" मैंने पूछा। तारक बोला, "अव उस कागज़ को लेकर दुकान जाऊंगा जिसमें दवा का नाम लिखा है। दुकान में फिर से दवा खरीदनी पड़ेगी।" अन्दर से दुवारा उसी तरह की आवाज़ आई, "तारक, ओ तारक ! तारक अब वहां रुका नहीं, सदर दरवाजा बंद कर अन्दर चला गया। मैं बहुत देर तक हतप्रभ-सा मकान की ओर ताकता रहा। बाहर से कुछ समझ में नहीं आता है। पार्क के चारों तरफ के दूसरे-दूसरे मकानों की तरह यह मकान भी साफ-सुथरा और एकांत है--और-और मकानों की तरह ही वाहर से निस्तब्ध । लेकिन किसे पता है कि उसके अन्दर इतने दोष, इतना कोलाहल, इतना कलंक है । यही सब सोचते-सोचते उस दिन मैं अपने घर की ओर चल दिया। केशव बाबू का यह जीवन आजकल के संदर्भ में केशव बाबू का ही जीवन नहीं है, मेरा, आपका, हर किमी का जीवन याज के केगव बाबू में जीवन- जैसा ही है। मैं खुद कितने ही परिवारों से हिलमिल कर उनके अंग-जमा हो चुका है। कितने ही करोड़पति, कितने ही गरीबों की हत्या में अपने-आपको एकाकार कर चुका हूं। सब कुछ देखने-सुनने के बाद मुझे यही लगा है कि सभी परिवार एक ही जमे हैं। शाति का यदि वही वास हो सकता है तो वह किसी के मन के ही भीतर हो सकता है। अपने मन को शान्त किए बिना इस संसार में कही भी मवेदना प्राप्त नहीं हो सकती है। उस दिन केशव वायू के विषय में मुझे उतना ही पता चला । अधिक जानकारी हामिल कर मकू, इसका कोई उपाय न था। एक तो मुममे बहस कम जान-पहचान है, फिर बिना बुलाए रोज-रोज उन्हें देखने के लिए जाना मुझे नशोभनीय-सा लगा। वे सोचेंगे, मैं उनके निजी मामलों के प्रति उत्सुकता प्रकट कर रहा है। ऐसा करना सचमुच शोभनीय नहीं है। दूसरी बात है, ये घर में अकेले नहीं हैं। हालाकि ये घर के मालिक हैं, फिर भी वहा उनकी लड़की है, मगा भाई है । वे लोग मेरे विषय में नया मोचेंगे ! मेरो धारणा थी कि दो-चार दिनों के बाद ही वे बीमारी में अच्छे हो जाएंगे। तब हो सकता है कि वे पार्क में आकर अपनी निर्धारित वेंच पर बैठे। तभी उनने वातचीत होगी। चहलकदमी के लिए पाकं जाना मेरे लिए रोजमर्रा का काम है। केशव वाबू चाहे पार्क मे भाएं या नहीं जाए, अपनी सेहत के लिए पूमना-फिरना मेरे लिए अनिवार्य है। यों केशव वाबू गे मुनाकात होना एक सयोग हो या। उन्ही केशव बाबू मे मुलाकात करने के लिए उस दिन के बाद से मैं रोज पार में जाकर बैठने लगा। मैं उमीद्यालो बैंच पर जाकर घंटता था। किमी बूढ़े पर आ जाती तो मोचता, केशव थाबू आ रहे हैं। अधर में ठीक-ठीक पता नहीं चलता था। लेकिन उस आदमी के निकट आते ही मुझे अपनी गलती का अहसास होता था। इसी प्रकार कितने दिन गुजर गए, इसकी कोई गिनती नहीं। अंतत: एक दिन मेरी तबीयत पराय हो गई। यों बीमारी मामूनी ही यो। यो रपादा दिनों तक तकलीफ अलना नहीं पड़ी, मगर पर पर ही रहना पड़ा। - . एक दिन मैं घर पर अपने कमरे में लेटा था। शाम होने को थी। पुस्तकों को पढ़ा, दवा खाई, सोया; पर वक्त गुज़रने का नाम ही नहीं ले रहा था। तभी सूचना मिली कि एक बूढ़ा आदमी मुझसे मिलने आया है बूढ़ा आदमी ! कौन बूढ़ा आदमी है जो मुझसे मिलने आया है ! मैंने अपने लड़के से कहा, "नाम पूछकर आओ।" यानी अगर कोई अन्तरंग व्यक्ति होगा तो उसे अपने शयन-कक्ष में बुला लूंगा। और अगर ऐसा न हुआ तो उसे सूचना भेज दी जाएगी कि मैं अस्वस्थ हूं, अभी मुझसे मुलाकात नहीं हो सकेगी। क्योंकि मेरे लिए दोमंज़िले से उतरकर एकमंजिले में जाना असंभव है। लेकिन जब यह पता चला कि बूढ़ा आदमी और कोई नहीं, बल्कि केशव वाबू हैं--केशवचन्द्र वन्द्योपाध्याय-तो मैंने कहा, "उन्हें तुरन्त ऊपर ले -आओ।" केशव बाबू आए। साथ में तारक था। मैं उठकर बैठने जा रहा था। केशव बाबू ने मुझे रोका। "आप उठिए मत।" उन्होंने कहा। "आपने इस गरीब के घर आने का कष्ट किया है-मैं ठहरा एक गरीब लेखक, आपका कैसे स्वागत करूं, यही सोच रहा हूं।" केशव बाबू हंस पड़े। लेकिन वह हंसी हंसी-जैसी नहीं थी, बल्कि जैसे कोई अभिमान हो । एक किस्म की रुलाई उस हंसी में उभर आई थी। "गरीव" ? वे वोले, "पैसे की कमी होने से ही कोई गरीब होता है विमल वावू ? आप क्या कह रहे हैं ? मैं भी गरीव हूं, आपसे ज्यादा गरीब । मेरा उतना ‘वड़ा मकान देखकर आप सोच रहे हैं कि मैं बड़ा आदमी हूं।" थोड़ी देर रुकने के बाद वे फिर बोले, "आपको मालूम नहीं है, इसीलिए आप ऐसा कह रहे हैं। मेरा वह मकान मोर्टगेज है-~-यानी गिरवी रख दिया है।" यह कहकर वे रुके। हो सकता है, यह बात कहते ही उनका गला रुंध गया। मैंने अवान्तर प्रसंग छेड़ दिया। "मेरे मकान का आपको कैसे पता चला ?" मैंने पूछा। केशव बाबू ने अपने पास खड़े तारक की ओर इशारा करते हुए कहा, २८ "" + "तारक ने पता लगाया है। मैंने उगे ढूंढ़ने के लिए भेजा था।" तारक बोला, "तीन दिनों से आप मकान का पता सगा रहा था। किगी को भी मालूम नहीं था। अत में जब एक नाई फेगलून में पूछताछ की तो उमी ने पता बताया। माप उसके संखून मे.बाल कटाने हैं।" पंशय यायू बोले, "कलकत्ता, साहय, कितनी गराब जगह है, यहां अगल- बगल मकान है लेकिन हमें किगी के बारे में कोई गयर मालूम नहीं है। हालांकि हर किसी का कहना है कि हम आदमी हैं। हम लोग अपने-आपको यादमी माह- फर गर्व करते हैं।" मैं बोला, "आप कमजोरी की हालत में क्यों आए ?" फेशय यायू ने जवाब दिया, "क्या यारू, अपने मकान में ज्यादा देर तक टिक नहीं पाता है। घर मेरे लिए बियाबान है, यही वजह है कि पार्क मी उस बॅच पर अफेला बेटा रहता था। मगर यगर किसी गे गातचीत विए यमागे गुजारा जाए? यह तारक ही है जिगमे दो-चार यारों पर लिया करना ह। मगर यो-यो भी अब वैसा हो गया है, वह गिर्फ निर्मला से झगडता रहता है। में उससे जय जाने को कहता है, यह कहता है : मैं चला जाऊगा तो आपकी देख-रेख कौन करेगा? मैं पाहता ह : मेरी देखभाल की जरूरत ही क्या है ? मेरी उम्र रिहत्तर माल की हो गई, पर जिन्दा रहना ही पाप है। जब तक जिन्दा रहंगा तब तक मगाति का सामना करना पड़ेगा। वचपन में ही बगाति का सामना करना पड़ रहा है, आदमी और कितना अधिक अशाति होल गकता है? अशाति सहने की भी तो कोई-न-कोई सीमा होती है." एकाएक तारक ने बीच में ही टोक दिया, "अब चलिए बड़े वायू । अब छोटे बाबू या चले..." छोटे वायू का नाम गुनते ही येशव यावू का चेहरा चुग गया। "छोटे बाबू को माने दो। मैं अभी नहीं जाऊंगा।" उन्होंने कहा। तारक बोला, "मगर छोटे वायू ने मुमसे कहा था कि बाज ये थाएंगे, उन्हें पैसा चाहिए, थापको याद दिलाने के लिए मुझगे कह गए थे।" फेशय यावू अपने बाप बुदबुदाने लगे, "मिर्फ पंगा और पैमा! इगये गिया छोटे बाबू को कोई काम नहीं, पैसे की जरूरत पड़ने पर ही मेरे पाम याएंगे। मेरे पास कोई पैसे का पेड़ है ? तू उससे कह नहीं गाता कि मेरे पाग पंमा, - एक दिन मैं घर पर अपने कमरे में लेटा था। शाम होने को थी। पुस्तकों को पढ़ा, दवा खाई, सोया, पर वक्त गुज़रने का नाम ही नहीं ले रहा था। 'तभी सूचना मिली कि एक बूढ़ा आदमी मुझसे मिलने आया है। बूढ़ा आदमी ! कौन बूढ़ा आदमी है जो मुझसे मिलने आया है ! मैंने अपने लड़के से कहा, "नाम पूछकर आओ।" यानी अगर कोई अन्तरंग व्यक्ति होगा तो उसे अपने शयन-कक्ष में बुला लूंगा। और अगर ऐसा न हुआ तो उसे सूचना भेज दी जाएगी कि मैं अस्वस्थ अभी मुझसे मुलाकात नहीं हो सकेगी। क्योंकि मेरे लिए दोमंजिले से उतरकर एकमंज़िले में जाना असंभव है। लेकिन जब यह पता चला कि बूढ़ा आदमी और कोई नहीं, बल्कि केशव वावू हैं-केशवचन्द्र वन्द्योपाध्याय-तो मैंने कहा, "उन्हें तुरन्त ऊपर ले -आओ।" केशव बाबू आए। साथ में तारक था। मैं उठकर बैठने जा रहा था। केशव बाबू ने मुझे रोका। "आप उठिए मत।" उन्होंने कहा। "आपने इस गरीब के घर आने का कष्ट किया है-मैं ठहरा एक गरीव लेखक, आपका कैसे स्वागत करूं, यही सोच रहा हूं।" केशव बाबू हंस पड़े। लेकिन वह हंसी हंसी-जैसी नहीं थी, वल्कि जैसे कोई अभिमान हो । एक किस्म की रुलाई उस हंसी में उभर आई थी। "गरीव" ? वे वोले, "पैसे की कमी होने से ही कोई गरीव होता है विमल वाबू ? आप क्या कह रहे हैं ? मैं भी गरीव हूं, आपसे ज़्यादा गरीव । मेरा उतना बड़ा मकान देखकर आप सोच रहे हैं कि मैं वड़ा आदमी हूं।" थोड़ी देर रुकने के बाद वे फिर बोले, "आपको मालूम नहीं है, इसीलिए आप ऐसा कह रहे हैं। मेरा वह मकान मोर्टगेज है-यानी गिरवी रख दिया है।" यह कहकर वे रुके। हो सकता है, यह बात कहते ही उनका गला रुंध चाया। मैंने अवान्तर प्रसंग छेड़ दिया। "मेरे मकान का आपको कैसे पता चला?" मैंने पूछा। केशव वावू ने अपने पास खड़े तारक की ओर इशारा करते हुए कहा, .
"तारक ने पता लगाया है। मैंने उसे ढूंढने के लिए भेजा था।" तारक बोला, "तीन दिनों से आपके मकान का पता लगा रहा था। किसी को भी मालूम नहीं था। अंत में जब एक नाई के सलून में पूछताछ की तो उनी- ने पता बताया। आप उसके सैलून मे.दाल कटाते हैं।" केशव वाबू बोले, "कलकत्ता, साहब, कितनी खराव जगह है, यहा अगल- बगल मकान है लेकिन हम किसी के बारे में कोई खबर मालूम नहीं है। हालांकि हर किसी का कहना है कि हम आदमी हैं। हम लोग अपने आपको बादमी कह- कर गर्व करते हैं।" मैं बोला, "आप कमजोरी की हालत में क्यो जाए?" कैशव दाबू ने जवाब दिया, "क्या करूं, अपने मकान में ज्यादा देर तक टिक नहीं पाता हू । घर मेरे लिए बियावान है, यही वजह है कि पार्क को उस बेंच पर अकेला बैठा रहता था। मगर बगैर किसी से गतचीत किए वक्त कैसे गुजारा जाए? यह तारक हो है जिससे दो-चार यातें कर लिया करता हूं। मगर वो-वो भी अब वैसा हो गया है, वह सिर्फ निर्मला से झगड़ता रहता है । मैं उससे जव जाने को कहता हू, वह कहता है . मैं चला जाऊंगा तो आपकी देख-रेख कौन करेगा? मैं कहता हूँ • मेरी देखभाल की ज़रूरत ही क्या है ? मेरी उम्र छिहत्तर साल की हो गई, अब जिन्दा रहना ही पाप है। जब तक जिन्दा रहूंगा तव तक अशाति का मामना करना पड़ेगा। बचपन से ही अशांति का सामना करना पड़ रहा है, सादमी और कितना अधिक अशांति क्षेल सकता है ? अशाति सहने को भी तो कोई-न-कोई सीमा होती है." एकाएक तारक ने बीच में ही टोक दिया, "अव चलिए बड़े वायू। अब छोटे वाबू आ चले.." छोटे बावू का नाम सुनते ही केशव बाबू का चेहरा बुझ गया। "छोटे बाबू को आने दो। मैं अभी नहीं जाऊंगा।" उन्होंने कहा। तारक बोला, "भगर छोटे बाबू ने मुझसे कहा था कि आज वे आएंगे, उन्हें पैसा चाहिए, आपको याद दिताने के लिए मुझसे कह गए थे।" केशव वाबू अपने आप बुदबुदाने लगे, "सिर्फ पैसा और पैसा ! इसके सिवा छोटे बाबू को कोई काम नहीं, पैसे को जरूरत पड़ने पर ही मेरे पास आएंगे। मेरे पास कोई पैसे का पेड़ है ? तू उससे कह नहीं सकता कि मेरे पास पैसा .
" नहीं है ? अवकी आए तो कह देंना, अब पैसा नहीं मिलेगा। इतना-इतना पैसा देने से भी जिसकी ज़रूरत पूरी नहीं होती, उसका अभाव कभी दूर हो ही नहीं सकता।" तारक बोला, "मैं तो हर रोज़ यही बात कहता हूं।' "तो फिर वह क्यों आता है ? तू उसे ठीक से समझा नहीं पाता है । यह मामूली काम भी अगर तुझसे नहीं होता है तो तुझे रखने से फायदा? तू नौकरी छोड़कर देस चला जा, इससे तेरी भी झंझट दूर होगी और मुझे भी चैन मिलेगा..." तारक भी वैसा ही है । वोला, "मैं तो चला ही गया था, आपने ही चिट्ठी लिखकर मुझे देस से बुला लिया।" केशव वाबू को गुस्सा हो आया, "तुझमें यही सबसे बड़ा दोप है, बहुत बहस करता है । तू यहां से चला जा । अव मैं मित्तिर जी का घर पहचान गया मैं अकेले ही लौट जाऊंगा। यहां खड़े रहकर बड़बड़ाने की ज़रूरत नहीं है।" तारक बोला, "छोटे वावू अगर आकर पूछे कि बड़े वाबू कहां हैं, तो मैं क्या बताऊंगा?" "कहना कि मैं यहां हूं। यहां आकर डांट-फटकार सुनाने की उसमें हिम्मत नहीं है।" तारक बोला, "यहां आकर डांट-फटकार न सुनाएं मगर मुझे तो डांटेंगे जरूर। और, अगर उस दिन की तरह मेज़-कुरसी, थाली-बरतन तोड़ना शुरू कर दें तो? तव मैं क्या करूंगा? तव दीदी जी आपको ही बुला लाने को कहेंगी।" केशव वावू ने उत्तर दिया,"तोड़े-फोड़े तो तोड़ने दे, मैं ही क्या कर सकता हूं? और तोड़ेगा भी तो कितना? कोई भी चीज़ घर में साबुत हालत में है ? मेरी खाट थी, उसे भी तोड़-फोड़ डाला। अब मैं फर्श पर सोता हूं। अब वह मेरा मकान तोड़ना चाहे तो तोड़ डाले । वही क्यों वाकी बचे ?" तारक सब सुन रहा था। वह बोला, "मैं चला जाऊंगा तो आप इस अंधेरे में अकेले घर लौट सकेंगे?" केशव बाबू बोले, "सकूँगा, जरूर सकूँगा। तू जा तो सही." - ३० अब मैंने कहा, "नहीं-नहीं, अब आप कप्ट मत करें केशव बाबू, आप घर चले जायें।" "आप ही बताइए," तारक ने कहा, "एक बार इसी तरह अंधेरे मे जा रहे ये कि गिर पड़े, छिहत्तर साल की उम्र हो गई है, अब क्या अकेले रास्ते में पाव-मैदल चलना अच्छा है ?" अब केशव दावू ने किसी प्रकार की दुविधा प्रकट नहीं की, इच्छा न रहने के बावजूद वे उठकर खड़े हो गए। "इस तारक के चलते ही मेरे लिए अब जिन्दा रहना मुस्किल है, तारकर ही आखिर में मुझे मार डालेगा।" केशव वाबू ने कहा। मैंने कहा, "अब आप रही ज्यादा आया-जाया मत करें। घूमना-फिरना आपके लिए उचित नहीं है।" फिर वे रुके नहीं । तारक उन्हें अपने साथ लिए घर की ओर चल दिया। & इसी तरह कई वार भेंट-मुलाकात होते-होते में केशव बाबू से अतरंगता के मूत्र में बंध गया। केशव बाबू से जितनी ही मुलाकातें होती गई, मेरी समझ में यह बात स्पष्ट होती गई कि उनके समान दुखी व्यक्ति कोई दूसरा नहीं है। वै मन लगाकर नौकरी करते थे। नियमपूर्वक दफ्तर का काम संभालते थे। दफ्तर के काम से उन्होंने कभी जो नही चुराया। कभी-कभी दफ्तर से फाइल घर ले आते थे। काफी रात तक जागकर फाइल का काम करते थे। पत्नी ने बहुत धार मना किया था। वह कहती, "इतना काम क्यों करते हो? तुम्हारी सेहत खराब हो जाएगी।" केशव वाबू कहते, "इसे खत्म कर लू तो फिर जाऊंगा। काम नहीं किए बगैर चल सकता है ? इतनी बड़ी गृहत्यी है, लड़की की गादी देनी है, छोटा भाई है। इतना कहां से आएगा?" पत्नी बड़ी ही सीधी-सादी थो । सचमुच ऐसी ही औरतें लक्ष्मी कही जाती हैं । केशव बाबू ज़िन्दगी-भर आफिस के कामों में ही व्यस्त रहे। सुबह छह बजे ही उठकर फाइल देखना शुरू कर देते थे, फिर नौ बजते-न-बजते माथे पर दो लोटा पानी ढालकर जल्दी-जल्दी कौर निगलते थे और आफिस की ओर चल देते थे। सीधे आफिस । वह आफिस आजकल के जैसा आफिस न था। उन दिनों ओवर-टाइम का भत्ता नहीं मिलता था। किसी तरह आफिस पहुंचकर अपनी मेज पर जो वैठते, तो फिर उन्हें कोई होश ही नहीं रहता था। घर से चार अदद सूखी रोटियां और आलू की सब्जी ले जाते थे, उसे ही खाकर दोप- हर की भूख शांत करते थे। तव मकान नहीं बना था, रुपये-पैसे जमा नहीं कर पाए थे। पत्नी, लड़की, अपने खुद और एक नाबालिग भाई-बस इतने ही जने थे उनके परिवार . में। । केशव बाबू हर महीने दफ्तर से पैसा लाकर अपनी पत्नी के हाथ में थमा देते थे । शुरू में उनकी तनखा चालीस रुपये थी। उसमें से मकान-किराये की वावत दस रुपये निकल जाते थे। बाकी बच जाता था तीस रुपया । उन्हीं तीस रुपयों से एक-एक पैसा बचाकर उनकी पत्नी ने काफी पैसे जमा कर लिए थे। पत्नी कहती, "मछली वगैरह खाना ज़रूरी नहीं है, दाल और आलू का भुर्ता ही खाकर यह महीना किसी तरह गुज़ार दो, अगले महीने की पहली तारीख में मछली खरीदी जाएगी।" केशव बाबू दफ्तर संभालते थे और उनकी पत्नी घर । इसी में लोक-लौकिकता का निर्वाह करते हुए, गृहस्थी का भार संभालते हुए, जमीन खरीदना कितना कष्टदायक होता है, यह वात या तो वह स्वयं जानते थे या उनकी पत्नी ही यह जो पार्क है और पार्क के चारों ओर बड़ी-बड़ी इमारतें, उन दिनों किसी का नामोनिशान तक न था। चारों तरफ कीचड़ ही कीचड़ था। इस जमीन की कीमत इतनी ज्यादा हो जाएगी, उन दिनों किसी ने यह बात कहां सोची थी? उस तरफ जो लैंसडाउन रोड और हाजरा रोड के मोड़ हैं, वहां से इस तरफ आने में कपड़े को घुटनों तक समेटकर आना पड़ता था। शाम होने के बाद यहां रहना मुस्किल था। उस समय चारों तरफ गहरा अंधेरा फैल जाता था। एक मी आदमी यहां नज़र तक न माता था। यह वही जमीन है। गहिणी ने कलकत्ते में मकान बनाने के ख्याल से खाने और पहनने में कतर-ज्योत करके एक-एक पैसा जमा किया था। वह कहती, "भगवान न करे, किराये के मकान में किसी को रहना पड़े।" किरायेदार होकर कलकत्ते में रहने का कष्ट उसने भोगा था, इसीलिए वह मकान बनाने के लिए उतनी आग्रहशील थी। और निर्मला? उसकी शादी देनी है। यह दुश्चिन्ता भी उसके मन में हमेशा बनी रहती थी। उन दिनों लड़की कम उम्र की थी। मगर बच्चे मां की तकलीफ नहीं समझते। किसी फेरी वाले को रास्ते से गुजरते देखकर निर्मला वहती, "मां, मैं दाल-पूरी खाऊंगी।" दालपूरी से शुरू करती थी, फिर मूगफली, आलू का दम-~-कुछ भी उसके ध्यान से हट नहीं पाता था। हर फेरीवाले को वह बुलाकर ले आती थी। फेरीवाले भी वैसे ही थे। बच्चों को देखते ही चिल्लाना शुरू कर देते थे। उन लोगों के मकान के सामने ही आवाज लगाना शुरू कर देते थे; 'मूगफली, मालूदम, घुधना" दिन भर काम करने के बाद ही केशव बाबू राहत की सांस ले पाते थे। बचपन में उन्होंने पढ़ा था : "लिखते पढते जो, वे चढ़ते गाडी-घोड़े पर।" इम बात पर उन्हें पूर्ण आस्था थी। वासव सगा भाई था। मरने के समय बाप ने कहा था, "अपने भाई की देखरेख करना केशव, उसे योग्य नहीं बना सका, योग्य बनाने का भार तुम्ही पर छोड़ जाता है." दुनिया में कौन किसको योग्य बना सकता है? जिसने प्रतिज्ञा की है कि मैं मनुष्य नहीं बनूंगा, उसे मनुष्य बनाने की मामध्यं किसमे है ? एक तो दफ्तर में ही केशव वावु को जी-तोड़ परिश्रम करना पड़ता था, उस पर घर आने से भी उन्हें शांति नहीं मिलती थी। लाते ही वासव के काले कारनामे सुनने को मिलते थे। गृहिणी कहती, "अपने भाई के कारनामों का है ?" देह का पसीना सूखते-न-मुखते वासव की करतूतें सुननी पड़ती थी।
- - "आज कौन-सी शरारत की ?" "यह देखो"."और उसने अलमारी के कांच की ओर इशारा किया। पूरी अलमारी का कांच तोड़कर चूर-चूर कर दिया था। दो-चार कांच के टुकड़े लकड़ी में जड़े रह गए थे। ऐसी हालत थी कि अगर थोड़ा हिलाया- डुलाया जाए तो अलग होकर नीचे गिर पड़ें। "किसने तोड़ा?" गृहिणी बोली, "तुम्हारे लाडले भाई के सिवा कौन तोड़ेगा? सिनेमा देखने के लिए पैसा मांगा, मैंने नहीं दिया, बस गुस्से में आ गया और मुक्के मार-मारकर पूरे कांच को तोड़ डाला।" "कहीं उसका हाथ तो नहीं कट गया ?" गृहिणी वोली, "कैसे बताऊं? कांच तोड़कर घर से भाग गया है।" केशव बाबू ने घड़ी की ओर देखा। तब घड़ी में रात के नौ बज रहे थे। अब तक घर से बाहर है, कहां चला गया ? केशव वावू दफ्तर से फाइल ले आए थे। सोचा था, रात में बहुत देर तक जगकर सारा काम खत्म कर डालूंगा। लेकिन उस दिन काम में मन नहीं लगा। लड़की ने आकर कहा, "बाबूजी, मां आपको खाने के लिए बुला रही है।" केशव बाबू ने फाइल से आंखें उठाई। पूछा, "तुम्हारे चाचाजी लौटे या नहीं ?" निर्मला तब छोटी थी। गृहस्थी के बारे में उसे कोई ज्ञान न था, अपने पिता के दफ्तर के कामों के महत्त्व के बारे में उसे कोई जानकारी नहीं थी। बोली, "जानते हैं वावूजी, चाचाजी ने आज मां से झगड़ा किया है । मां को मारकर घर से भाग गए हैं। कह गए हैं कि अव इस घर में वापस नहीं आएंगे।" "यह क्या, तुम्हारी मां ने मुझे तो कुछ बताया नहीं।" यह कहकर वे फाइल वगैरह रखकर सीधे रसोईघर में गए। उस समय गृहिणी थाल में खाना परोस रही थी। चेहरे पर गंभीरता तैर रही थी निकट जाकर बोले, "वासु ने तुम्हें मारा है जी?" गृहिणी बोली, "तुमसे कहकर ही क्या होगा? तुम क्या उसे पीटोगे या खरी-खोटी सुनाओगे ? उसने मुझे पीटा है, इससे तुम्हारा क्या बिगड़ता है ? उसने तुम्हें तो कुछ किया नहीं ?" - ३४ "नहीं-नहीं, गुस्सा क्यों कर रही हो? क्यों मारा, यही वताओ न.." गृहिणी तव खाना परोस चुकी थी। दोनों हाथों में पति और लड़की के लिए थाल लिए उठकर खड़ी हुई चोर बोली, "चलो हटो, रास्ता रोककर पहें मत रही। दिन-भर खटने के वाद थोड़ा आराम करूं, इसका भी उपाय नहीं। चलो हटो .." मानो, वासव ने अलमारी का काच जो तोड़ दिया या भाभी को जो पीट दिया, इसके लिए केशव बाबू ही गुनहगार हैं । खाने बैठे तो पली के चेहरे की ओर देखते हुए बोले, "तुम्हें कहां मारा, बताओ न । मुह मे या हाथ में ?" गहिणी गुस्से में आकर बोली, "चाहे मुह में मारे या हाथ में, तुम्हें तो नहीं मारा है। तुम अपने दफ्तर का काम लेकर मगन रहो, घर की बातें सोचने की तुम्हे जरूरत ही क्या है ?" और वह रसोईघर की ओर चली गई। इतनी देर के बाद जब गृहिणी के चेहरे पर रोशनी पड़ी तो केशव बाबू ने देखा कि उसकी आखों के नीचे नीला दाग है। निर्मला ने मा के बदले जवाब दिया, "मा ने सिनेमा देखने के लिए नहीं दिया तो चाचा जी ने आलमारी का काच तोड़ दिया। इस पर मा डांटने लगी।" "फिर?" कम उम्र होने से क्या होगा, निर्मला तब काफी चालाक-चतुर हो गई थी। बोली, "चाचा जी मां की ओर दौड़कर आए और मुह पर तमाचे-पर- तमाचे जड़ने लगे। उसके बाद मां जब जमीन पर गिर पड़ी, चाचा जी घर से भाग खड़े हुए " उसके बाद सास चेष्टा करने के बावजूद गृहिणी ने केशव बाबू के एक शब्द का भी उत्तर नहीं दिया। केशव वाबू का न तो दफ्तर का ही काम हो सका और न उनकी मांखो में नीद ही उतरी। उन दिन रात-भर वे जगे रहे। बार- बार उन्हें वासव की वात ही याद आती रहीं। वह कहां है, उसने क्या खाया, पुलिस उसे पकड़कर ले गई क्या-यह सब सोचते सोचते ही सुबह हो गई। ३५ ? रात के पहले पहर में एक बार पत्नी के पास जाकर वोले, "उस जगह जरा टिंचर नाइडिन लगा दूं ?" "चुप रहो, मुझे सोने दो.." यह कहकर पत्नी ने करवट ली और फिर बिलकुल खामोश हो गई। इसके बाद भला किती को नींद ना सकती है ? केशव वाबू ने अधजगे रहकर तमाम रात गुजार दी। लेकिन सोचते रहने के बाद भी उन्हें कोई कूल- किनारा नज़र न आया। एक बार सोचा, मुहल्ले के थाने में जाकर पता लगाऊं। लेकिन वहां के लोगों को ही कौन-सी जानकारी हो सकती है ? हो सकता है वह किसी दोस्त मित्र के घर जाकर रात गुजार रहा हो। लेकिन अगर वह लौटकर घर नहीं जाए केशव बाबू का मन भाई के लिए छटपटाने लगा। वह कहां है, किस हालत में है ? गुस्से में कहीं गंगा में जाकर कूद न पड़े। इतना गंवार लड़का है कि उसके द्वारा कुछ भी होना असम्भव नहीं। बड़की से नाकाश दिखाई पड़ रहा था। अंधेरे में डूबा आकाश आहिस्ता- माहिस्तानीलाहोता जा रहा था। जब वे विछावन पर लेटे नहीं रह सके। विछा- वन ठोड़कर उठ खड़े हुए । उठकर कमरे के बाहर आते ही उनकी आंखें वासव पर गई जो दीवार लांघकर चुपचाप घर के अन्दर घुस रहा था। वासव के कूदते ही वे उस पर झपट पड़े और बाएं हाथ से उत्तका एक हाथ पकड़कर दाहिने हाथ से तडातड़ पीटना शुरू कर दिया। "हरामजादे, तुम फिर घर आएं हो?" थप्पड़ जमाते जाते थे और साथ ही चिल्ला-चिल्लाकर गाली-गलौज भी करते जाते थे। वासु भी वैसा ही था। मार पड़ते ही 'वाप रे, वाप रे' कहकर ज़ोर-ज़ोर से रोना शुरू कर दिया। "फिर रोना शुरू किया? रोते हुए शर्म नहीं आती?" मगर वासव बचपन में ही शरम-हया ताक पर रख चुका था। वह आवारा होने के लिए ही पैदा हुआ था, इसलिए उसमें शर्म-हया होना शायद जरूरी नहीं था। वरना जो अपनी भाभी को थप्पड़-मुक्का मारकर घर से भाग गया था, रात बीतते-न-बीतते उस घर में माता ही क्यों? केशव बाबू उस वक्त शायद गुस्से से पागल हो गए थे। वे लगातार घूसा- मुक्का, थप्पड-तमाचा जमाए जा रहे थे। "तुम इस मकान में फिर क्यों आए ? यताओ, तुम इस मकान में क्यों बाए?" वासु भी रोता-कलपता जा रहा था और वेरोक-टोक कह रहा था, "मुझे मार डाला, मार डाला, मेरी हत्या कर डालेगा.." केशव वावू एक ही बात दोहराए जा रहे थे, "मरो, हा मर जाओ, मैं यही चाहता हूं, तुम्हे मरा हुआ देखकर ही मुझे शान्ति मिलेगी, मरो, हो मर जाओ..." इसी बीच शोर-गुल सुनकर गृहिणी की नींद टूट गई। बाहर आते ही वहां का कांड देखकर अवाक रह गई। देवर की वैसी हालत देखकर वह अपने आपको रोक नहीं सकी। केशव बाबू के हाथों को जोर से पकड़कर बोली, "क्या कर रहे हो, मर जाएगा !" उस समय केशव वावू की देह में जैसे दानव का बल आ गया था। वे बोले, "तुम मुझे छोड दो, आज मैं इसे जान से ही मार डालूगा, इसकी हत्या कर डालूगा और थाने में जाकर सारा अपराध कबूल कर लूगा। हराम जादा इतना बड़ा हो गया, फिर भी मेरी नाक में दम कर रहा है। आदमी के सहने की भी कोई सीमा होती है। मुझे छोड़ दो, आज मैं इसे मार ही डालंगा।" भाखिर में गृहिणी वासु को अपनी बाहों में भरकर एक कोने में ले गई। केशव वा उस वक्त आक्रोश से उबल रहे थे और गृहिणी ने डाट-फटकार शुरू कर दी थी। वह बोली, "गुस्से में आने पर तुम होश मे नही रहते ' अगर यह कर जाता तो फिर क्या होता? तब तुम्हारे हाथो मे हथकडिया पडतो। केशव वाबू ने कहा, "हायो मे हथकडी डाली जाती तो.अस्या हो । मैं चैन की सांस लेता, मुझे हर रोज मृत्यु-यातना नहीं सहनी को से ज्यादा फांसी की सजा दी जाती। मुझे फांसी पर बाहिर ३७ है, कम से कम इस यातना से मुक्ति तो मिल जाएगी। फिर मन ही मन बुड़बुड़ाने लगे, "एक ओर दफ्तर में साहब की डांट- फटकार । मन लगाकर काम करो। फिर भी चैन नहीं और उस पर घर लौट- कर दो घड़ी आराम करूं, इसका भी कोई उपाय नहीं अचानक याद हो आया कि वक्त हो रहा है, उन्हें अभी हाट-बाज़ार करना है और जल्दी-जल्दी दो कौर मुंह में डालकर दफ्तर जाना है। याद आते ही वे हाथ में झोली थामे बाज़ार की तरफ भागे। दो कौर तो खाना ही है, घर और दफ्तर में चाहे कितनी ही अशान्ति क्यों न रहे, पेट तो मानेगा नहीं। वाज़ार से लौटने पर उन्हें दूसरा ही कांड देखने को मिला। गृहिणी बोली, "अजी, वासु को क्या हुआ है, जाकर देखो। उसका हाथ-मुंह वेहद सूज गया है।" "देखू, कहां..." यह कहकर वह ज्यों ही कमरे के अन्दर गए, वासु को बेहोशी की हालत में पाया। उसके मुंह से खून टपक रहा था। केशव बाबू की पत्नी उसके माथे पर जल की पट्टी रख रही थी। देह छूते ही लगा कि बुखार से सारा शरीर जल रहा है। पास जाकर केशव बाबू ने धीरे से पुकारा, "वासु, अरे वासु, बहुत तक- लीफ हो रही है भैया ?" वासु के मुंह से उत्तर के तौर पर एक भी शब्द नहीं निकला। केशव वाबू में भय समा गया। उन्हें अभी दफ्तर जाना है और वासु की यह हालत है। गृहिणी बोली, "मुझे लक्षण अच्छा नहीं लग रहा है। अगर अभी उसका बुखार बढ़ जाए तो? तुम दफ्तर चले जाओगे तो मैं फिर क्या करूंगी..." "आज दफ्तर में बहुत काम है।" गृहिणी बोली, "मान लो किसी दिन मेरी मौत हो जाती है तो ऐसी हालत में तुम दफ्तर जाओगे ? किसी की जान बड़ी है या दफ्तर ?" "फिर जाकर डाक्टर बुला लाता हूं।" केशव बाबू उस दिन दफ्तर नहीं जा सके । दफ्तर में फोन करके उन्होंने घर की विपत्ति की सूचना बड़े साहव को दे दी। उसके बाद डाक्टर आया। खुद दुकान जाकर वासु के लिए दवा खरीद लाए। उस वक्त घर में दूसरा ही कांड मच गया था। ३८ वासु के स्वस्थ होने में एक महीने का अरसा लग गया। उस एक महीने के दरम्यान कितनी बार डाक्टर बुलाए गए, दवा और डाक्टर में कितने पैसे होम हो गए, इसका कोई लेखा-जोया नहीं। उस पर चिन्ता-फिक, सेवा-सुश्रूषा अलग। कई दिनों तक रात के समय कोई सो तक नहीं सका। मामूली सिनेमा देखने के लिए सवा रुपये की बात थी। उनके कारण हो केशव वाबू कई दिनों तक दफ्तर नहीं जा सके, इसके अतिरिक्त घर से पाच सौ रुपये भी निकत गए। झंझटो के बारे में कुछ कहना ही वेकार है। १० केशव बाबू के आरम्भिक जीवन की यही कहानी है । पिता ने दफ्तर में नियुक्त करा दिया था। उन दिनों चालीस रपये की तनसा से ही वे गृहस्थी का खर्च चलाते थे। और गृहस्थी जो चल रही थी, उसका श्रेय था उनकी पत्नी को । जीवन में उस तरह की पत्नी मिली थी, इसी- लिए उसी रकम से उन दिनो साना-कपडा, मकान का किराया--सबका खर्च पूरा हो जाता था। हरेक की मागो की पूर्ति करते हुए, लौकिकता का निर्वाह करते हुए, नौकरी भी अच्छी तरह से चला रहे थे। नौकरी न केवल कर रहे थे, बल्कि नौकरी के दौरान काफी तरक्की भी की थी। वेवजह कभी दफ्तर से गैरहाजिर नहीं रहते थे, जी-जान से बड़े साहब के आदेशों का पालन करते थे। साहब भी उनके कन्धो पर दस्तर का काम सौंप कर निश्वित-जैसे हो गए थे। लड़की के जन्म के समय किन कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, कहा से जमीन खरीदी गई-यहा तक कि रुपये-पैसों का कैसे इन्तजाम किया गया-उन्हें किसी भी बात की जानकारी न रहती थी। जमीन की रजिस्ट्री करानी थी, पर हाय विलकुल खाली या। महीने का अन्तिम सप्ताह चल रहा था। चावल और बालू का भुरता खाकर ही पूरा सप्ताह गुजार दिया था। पली कभी-कभी कहती, "मछली खाना जरूरी नहीं हैं। marat उसके बाद जी-भर मछली खाते रहना।"
. निर्मला आना-कानी करती । कहती, "आज मछली नहीं है मां"," मां कहती, "नहीं है, रोज़-रोज़ मछली होना जरूरी नहीं है, विना मछली के खाया नहीं जाता? जो लोग गरीव हैं, जिनके पास मछली खरीदने के लिए पैसा नहीं है, वे क्या जिन्दा नहीं रहते ? मारवाड़ी मछली नहीं खाते, इससे क्या उनका पेट नहीं भरता है ?" लेकिन वासु के कारण कठिनाई का सामना करना पड़ता था। पहली बात तो यह थी कि वासु कब खाएगा, कब घर लौटेगा, इसका कोई ठीक नहीं रहता था सुवह ग्यारह बजे उसका स्कूल शुरू होता था। सवेरे ही वह कहां निकल जाता, इसका पता लगाना मुश्किल था। मुहल्ले में अड्डेबाज़ी कर जब वह लौटता तो उस समय घड़ी पौने ग्यारह वजाती थी। तभी वह आकर कहता, "भाभी, खाना दो।" 'खाना दो' कहने से ही क्या तुरन्त खाना आ जाएगा ? परिवार की जो गृहिणी होती है उसके कामों का कोई अन्त नहीं रहता। घर पोंछना, कपड़े- लत्तों में सावुन लगाना वगैरह बहुत सारे काम रहते हैं। इसके अलावा बालीगंज में धीरे-धीरे मकान भी बन रहा था। राजमिस्त्री आता था, बढ़ई आता था। कोई कहता, "एक बोरा और सुर्थी चाहिए या एक गाड़ी वालू और, इसके अलावा दस वोरा सीमेण्ट ।" कहते ही ज़रूरत पूरी करनी है, वरना राजमिस्त्री, हो सकता है, आराम से वक्त गुज़ार दे, तभी अलमारी खोलकर रुपया निकालकर देना पड़ता था। उस पर हिसाब-किताब रखने का काम । दुनिया में किसी के भरोसे काम हो जाए, ऐसा मुश्किल है। गृहस्वामी अपने दफ्तर के कामों में ही व्यस्त रहते थे। दफ्तर के काम में थोड़ी-सी चूक हो जाए तो फिर आफत । उन दिनों केशवबाबू ही सबसे ज़िम्मे- दार कर्मचारी थे। तनखा चालीस रुपये से बढ़ते-बढ़ते तीन सौ तक पहुंच गई थी। जब तक वे कमाएंगे तभी तक परिवार का खर्च चल सकेगा, तभी तक किसी तरह खाने-पीने का खर्च चलाते हुए मकान बनवा सकेंगे। रसोईघर में जल्दी-जल्दी खाना परोसकर भाभी पुकारती, "अरे वसु, कहां हो, चावल परोस दिया है, खा लो।" - . - ४० लेकिन तव वहां वासु मौजूद नहीं रहता था। गृहिणी पुकारते-पुकारते हैरान हो जाती, मगर वासु नहीं मिलता। अंत मे वही चावल सड़क के भिषारियों को दे देती थी। जब वासु स्कूल से लौटता, उसका चेहरा लटका रहता था, आंखें गड्ढे में घंसी हुई। दिन-भर खाना न खाने की वजह से उसके पांव लड़खड़ाते थे। "कहा चले गए थे ? चावल क्यों नहीं साकर गए शुरु मे वासु ने इस बात का जवाब नहीं दिया। कमरे के अन्दर जाकर तकिए में मुह छिपाकर लेट गया। गृहिणी ने दुवारा प्रश्न किया, "तुम्हे क्या हो गया है ? तुमने चावल मागा और मैं चावल परोसकर तुम्हें बार-बार पुकारती रही, लेकिन तुम्हारी कोई आहट ही नही मिली । तुम कहा चले गए थे ?" फिर भी वामु ने कोई उत्तर नहीं दिया। जिस तरह लेटा था, उसी तरह लेटा रहा । अव गृहिणी ने उसे हिलाया-डुलाया । "उठो, उठो, दिन-भर तुमने खाया-पिया नहीं है, दो कौर कुछ खा लो।" अव वासु ने जवान खोली। भाभी का हाथ झटककर पहले की तरह ही सलिए मैं मुह छिपाकर कहा, "मैं नहीं खाऊगा, बिना खाए-पिए ही मैं मर जाज फिर भी तुम खाने के लिए कहने वाली नहीं हो .." मुह घुमाकर वह उसी सरह पड़ रहा। निर्मला ने भी वार-बार आकर कहा, "चाचाजी, माप खाना नहीं खाएंगे? आपके कारण मां ने भी मुह मे एक दाना तक नहीं डाला है।" भतीजी की भी बातें वासु नै अनसुनी कर दी। आखिर में काफी रात बीतने पर केशव बाबू आए। गृहिणी से सारी बातें सुनकर वे वासु के पास गए । वासु तब सो चुका था। "तुमने माज भात क्यो नही खाया ?क्या हुआ है ?" केशव वावू नै पूटा। वासु संभवतः केशव दाबू मे थोड़ा-बहुत डरता था। वह बोला, "अब मैं इस घर मे खाना नहीं खाऊंगा।" "क्यो? क्यों नही खाओगे ?" वासु वोला, "मेरा अपना कोई नहीं है। ऐसी हालत में मैं खाऊं ही क्यों?"
उसकी बात सुनकर केशव बाबू अचंभे में आ गए। छोटा मुंह बड़ी वात ! "इसका मतलव ? इस घर में तुम्हारा कोई नहीं है-इसका मतलब? कोई तुम्हारी देख-रेख नहीं करता है ? तुम जहां-तहां अड्डे जमाओगे, स्कूल नहीं जाओगे, इम्तहान में फेल होगे-ऐसी हालत में हर कोई तुम्हारे पीछे ही लगा रहे ? तुम्हारी भाभी ने तुम्हारे चलते दिन-भर खाना नहीं खाया है, यह कुछ भी नहीं है ? तुम क्या सोचते हो ? मैं दफ्तर में जी-तोड़ मेहनत कर जो पैसा कमाकर लाता हूं, वह तुम्हारे पीछे गंवाता रहूं ? तुम्हारे लिए पच्चीस रुपये महीने पर मास्टर रखा था। मास्टर हर रोज़ आकर लौट जाता था, तुम्हारा कोई अता-पता ही नहीं रहता था। फिर बड़े होकर तुम क्या करोगे? भाड़ झोंकोगे?" इस पर भी जव वासु ने कोई उत्तर न दिया तो केशव वाबू उसका हाथ पकड़कर खींचने लगे, "उठो, उठो, चलो, खाना खा लो।" "नहीं, मैं नहीं खाऊंगा।" "क्यों नहीं खाओगे?" अव वासु के मुंह से असली बात निकल गई, "जिसकी मां जिन्दा नहीं है, उसे विना खाए-पिए ही मर जाना चाहिए।" अव केशव बाबू अपना गुस्सा संभाल नहीं सके । वासु के मुंह पर एक तमाचा जड़ दिया। "हरामजादे, तुममें यह अक्ल पैदा हो गई है ? तुम्हारे पेट में इतना पाप भरा है ? ठहरो, मैं तुम्हें सही रास्ते पर लाता हूं." यह कहकर वे निर्मला से बोले, “ज़रा मेरी छड़ी तो ले आओ। आज मैं इसे ही मार डालूंगा।" एकाएक गृहिणी कमरे के अन्दर आ गई। "तुम पागल हो गए हो, लोगों के बीच हंसी उड़वाओगे? वह जव तक घर में है, मैं उसे छूने भी नहीं दूंगी। वदनामी फैलेगी तो तुम्हारी नहीं, मेरी ही फैलेगी। तुम इस कमरे से बाहर चले जाओ। जाओ"." गृहिणी बोली। यह कहकर केशव बाबू को खींचकर कमरे से बाहर ले गई। वरना क्या कांड हो जाता, पता नहीं। यों केशव बाबू सीधे-सादे, शांत-प्रकृति के आदमी हैं। लेकिन भाई के इस व्यवहार से उनके जैसे आदमी भी रुद्र-मूर्ति धारण कर सकते हैं, देखकर इसकी कल्पना नहीं की जा सकती। - - ४२ उसके बाद एक दिन केशव बावू का मकान बनकर तैयार हो गया। पहले एकमजिला, उससे बहुत दिनों के बाद दोमंजिला बना था। उस एकमंजिले के खर्च का धक्का संभालने मे ही केशव बाबू को दफ्तर से कई हजार का कर्ज लेना पड़ा था। कजं को किस्तों में महीने-महीने चुकाने के वाद जो पैसा वचता था, उससे घर का खर्च चलना मुश्किल था। परन्तु इस असंभव को भी सभव बनाने का श्रेय एकमात्र उनकी पत्नी को ही था। गृहिणी की मूझ-बूझ के कारण ही केशव बाबू नौकरी में उतनी तरक्की कर सके थे और मकान भी वनवा सके थे। केशव बाबू कहते, "आजकल नौकरी करने वालों को दो घंटा ज्यादा काम करने से ओवरटाइम का भत्ता मिलता है, लेकिन उन दिनो बात ही अलग थी।" तव कब तीसरे पहर के पाच-छह बज जाते। कब शाम होती, कब रात उत्तर आती, काम करते-करते इस बात का ध्यान ही नहीं रहता था। जब रात हो जाती तब वे मेज छोड़कर उठते थे। जो काम सत्म नहीं होता था, उसे घर ले आते थे और मच्छरदानी में बैठकर मुत्म करते थे। उसी के दरमियान कर मकान की नीव खोदी गई, राजमिस्त्री ने कितना काम किया, सीमेण्ट की खरीद किस दर पर हुई, इन सारी बातों की निगरानी गृहिणी ही करती थी। उन दिनों गृहिणी ने अपनी कार्य-कुशलता का आश्चर्यजनक परिचय दिया था। एक ही साड़ी को सावुन से फीचकर पहनती थी, सी-साकर उससे महीनों तक काम लेती थी। एक ही सावुन को दो टुकड़ों में वाटकर इमलिए उपयोग में लाती थी कि कही ज्यादा खर्च न हो जाए। इसी असाधारण अध्यवसाय के फलस्वरूप यह मकान बनकर तैयार हुआ। योग्य पात्र देखकर निर्मला की शादी दी गई। दफ्तर के को-आपरेटिव बैंक से जो कर्ज लिया था, उसे भी चुकाया। आदमी जीवन मे जो चाहता है, वह सब ४३ . हो गया । इस मुहल्ले के चारों तरफ जिस किस्म की बड़ी-बड़ी इमारतें हैं, केशव वावू का मकान भी उसी किस्म का है। एक दुनियादार आदमी इसके अतिरिक्त और किस चीज़ की चाहना कर सकता है ? और केशव बाबू भी तो दूसरे-दूसरे लोगों की तरह साधारण ही आदमी हैं। जो व्यक्ति असाधारण होते हैं, वे अमरता चाहते हैं, परमार्थ की कामना करते हैं, दुनिया के कल्याण के निमित्त अपने प्राणों को उत्सर्ग कर देते हैं। किंतु जो साधारण मनुष्य हुआ करते हैं वे स्वस्थ रहकर जीवन जीना चाहते हैं, बढ़िया खाना-पहनना चाहते हैं, घर और गाड़ी खरीद कर यथार्थ जगत में उन्नति के शिखर तक पहुंचना चाहते हैं। केशव वाबू भी शिखर पर पहुंच गए. थे। चालीस रुपये से बढ़ते-बढ़ते अंत में उनकी तनखा डेढ़ हजार तक पहुंच गई थी। उन दिनों डेढ़ हज़ार रुपये की कीमत कोई कम न थी। लेकिन उसके लिए उन्हें बहुत बड़ी कीमतें चुकानी पड़ी थीं। उस बात को सोचते ही केशव बाबू अव भी सिहर उठते हैं। निर्मला तव बड़ी हो चुकी थी। उसमें समझदारी आ चुकी थी। उसने मां की तकलीफें देखी थी, बाबूजीको जी-तोड़ मेहनत करते देखा था । चाचाजी के अत्याचारों से साक्षात्कार किया था। तब वह शादी के लायक हो चुकी थी। गृहिणी रसोई पकाती थी, कपड़ा फींचती थी, बरतन मलती थी, इसके अतिरिक्त इतनी दूर आकर मकान के कामों की निगरानी रखती थी, राज- मिस्त्री से काम लेती थी, सीमेण्ट, बालू-चूना सुर्थी का हिसाब रखती थी वाज़ार से दर-दाम का पता लगाकर लोहा-लक्कड़ वगैरह सामानों के बिलों का भुगतान करती थी। इसलिए ऐसा करती थी कि कलकत्ते में उसे अपना एक मकान बनवाना था। चाहे जैसे हो, अपना एक मकान होना ही चाहिए। मकान जव बनकर करीव-करीब तैयार हो चुका, उसी समय लड़की की शादी का पैगाम आया। यह बात सोचते ही केशव वावू का दिमाग अब भी गरम हो जाता है यही वक्त है कि लड़की की उम्र शादी के लायक हो जाए ? दो दिन बाद ही होती तो कौन-सी क्षति हो जाती ? - । ४४ ठीक उसी वक्त दफ्तर मे कामो का दवाव वढ गया। वह दबाव भी क्या साधारण दवाव था? उन दिनों की विलायती कंपनी थी। शेर चाहे क्षमा कर दे, पर उन दिनो की विलायती कपनी क्षमा या करुणा का नाम तक नहीं जानती थी। अपने खून-पसीने की कमाई से केशव वाबू ने भाई के खाने-पहनने का खर्च संभाला था, घर के हर तरह के खर्च की पूर्ति की थी, लड़की को पढ़ाया लिखाया था। उन दिनो चावल दस रुपये मन की दर से मिलता था, फिर भी पसारी से उधार लेना पड़ता था। एक ही साड़ी से काम चलाया जाता था और सो भी तीन रुपये की साड़ी से ही। ऐसी साडी भी वर्ष में दो से ज्यादा खरीद कर पत्नी को नहीं दे पाते थे। सस्ती के उन दिनों में भी मेदनीपुर में हर वर्ष अकाल पड़ता था, वाढ़ आती थी और कल्याण समितियों का मजमा कतकत्ते में इकट्ठा होता था। वे लोग हारमोनियम बजाते हुए गीत गाते थे और मुहल्ले- महल्ले मे घूमकर चावल, कपडा, पैसा मांगते चलते थे। उसी चावल को ले जाकर कलकत्ते के बहूबाजार मे होटल खोलते थे और मालामाल हो जाते थे। उसके बाद निर्मला के विवाह के दिन एक कार घटित हो गया। केशव बाबू ने योग्य पान देखकर ही शादी दी थी। असल में यह रिश्ता एक घटक ने तय किया था। कलकत्ते के बड़े-बड़े खानदानों के लड़के-लड़कियो की शादी उसने कराई थी। इसलिए उसने जो कुछ व्यौरा प्रस्तुत किया, उससे गृहिणी बहुत ही प्रसन्न हुई। लड़का सरकारी दफ्तर में काम करता है। तनखा कितनी है ? तनखा जितनी है, उससे पेट नहीं भर सकता है । मान तीस रुपये। उससे विवाह करने से लड़के बच्चो का पालन हो सकता है ? वही तीस रुपये की तनखा बढ़ते-बढ़ते रिटायर करने के वक्त नब्बे तक पहुंचेगी। फिर भी उन दिनो तीस रुपये की भी कीमत कोई कम न थी। आजकल के हजार रुपये के बराबर । आजकल जिस तरह डेढ हजार रुपये से भी किसी का निर्वाह नहीं हो पाता है, यहा तक कि नमक-तेल की कमी हो जाती है, उन दिनों तीस रुपये की वही हालत थी। घटक बोला, "तीस रुपये में गृहस्थी चलाना मुश्किल है, यह बात हर कोई जानता है । मगर सरकारी नौकरी रहने के कारण ऊपरी आय हो जाती है।
ऊपरी आय के तौर पर खासी अच्छी रकम मिल जाती है।" सुनकर गृहिणी प्रसन्न हुई। ऊपरी आय होती है तो लड़की अवश्य ही सुखी रहेगी । “लड़के का वाप क्या करता है ?" गृहिणी ने पूछा। घटक बोला, "लड़के के मां-बाप, भाई-बहन कोई नहीं हैं। बिलकुल अकेला है।" मां-बाप, भाई-बहन, कोई न हो, ऐसे पान विरले ही मिलते हैं । लड़की ससुराल जाते ही घर की मालकिन बन बैठेगी। उसे किसी की तावेदारी नहीं करनी होगी। लड़की का भाग्य अच्छा है वरना इस तरह का छोटा परिवार कितनी लड़कियों को नसीव होता है ! पान दोस्त-मित्रों के साथ लड़की देखने आया। छुट्टी का दिन था। केशव बाबू कभी बाज़ार दौड़ते थे तो कभी घर । पांच व्यक्ति देखने आएंगे । उनके नाश्ते-पानी का इन्तज़ाम करना है । गृहिणी और वावू दोनों व्यस्त थे । वासव से घर पर ही रहने को कहा था। कहा था, "आज तुम कहीं मत जाना, घर पर ही रहना, समझे ? नया रिश्ता कायम होने जा रहा है, उस वक्त चाचा का रहना जरूरी है।" वासव बीच-बीच में बिल्कुल शांत, शिष्ट बनकर रहता था। बड़े भाई का कहा मानता था। वह बोला, "आप चिन्ता मत करें । मैं रहूंगा।" "हां, रहना । अब तुम अकलमंद हो गए हो, उम्र भी हो गई है, अब तुम छोटे बच्चे नहीं हो । मुन्नी के विवाह के बाद तुम्हें ही तो हर चीज़ की निग- रानी रखनी है। जानते ही हो कि वालीगंज में हम लोगों का मकान वन रहा । वहीं हमें चले जाना है। उस समय घर में रहेंगे,तुम, मैं और तुम्हारी भाभी हो..." कुछ देर रुककर फिर वोले, "मैं भी नौकरी से रिटायर होने जा रहा हूं, किसी दिन इस दुनिया से भी विदा हो जाऊंगा । तुम्हारी भाभी की सेहत जिस तरह चल रही है, लगता है, वह भी ज्यादा दिनों तक जीवित नहीं रहेगी। मेरी तमाम विपय-सम्पत्ति, रुपया-पैसा, जो कुछ है, उसका उपभोग तुम्हीं करोगे। मुन्नी की शादी हो जाए तो फिर कोशिश-परवी कर तुम्हें भी किसी दफ्तर में रखवा दूंगा। मरने के पहले मुझे सारा इन्तजाम कर देना है।" । - , ४६ .... जव-जब वक्त मिलता, वासव से यही सब कहा करते थे । बामु हमेशा घर पर नहीं रहता था, इसीलिए मौका मिलने पर ही यह सव कहते थे। "दोस्त-मिन सुख के दिनों के ही साथी होते हैं, यह वात गाठ में बांध लो। ज्यो ही उन्हें पता चल जाएगा कि तुम्हारे हालात खराब हो गए हैं, कोई भी तुम्हारे पास फटकने नही आएगा। जानता हूं,मैं जो अभी कह रहा हूं, तुम्हें सुनने में अच्छा नहीं लग रहा है लेकिन मैं जब नहीं रहूंगा तो तुम्हें पता चलेगा कि मैंने कितनी सही बातें कही थी।" वासव जव तक भैया के सामने रहता, उनकी बातें धैर्यपूर्वक सुनता था। लेकिन तुरन्त ही आवारा दोस्त-मित्रों की टोली पुकारती, "वासु " तत्काल वासु और ही तरह का हो जाता था। अब तक केशव वाबू ने जो कुछ कहा था, उसे दूसरे कान से बाहर निकाल देता। फिर उसका अता-पता ही नहीं चलता था। गृहिणी पुकारती, "अरे वासु, खाना खालो, अब तक तुमने मुह में एक दाना तक नही डाला है।" लेकित उस वक्त कौन किसकी बात सुनता है । दोस्त-मित्र उसे अपने साथ लेकर गायब हो जाते थे । कहा से उसके इतने दोस्त-मित जुट जाते, इसका भी कोई पता नही चलता था। दोस्त अगर अच्छे होते तो बात ही कुछ अलग थी। जितने भी थे सबके सब कंगले । जैसी उनकी पोशाकें हुआ करती थी, वैसे ही उनके चेहरे-मोहरे । उनका चेहरा देखते ही समझ में आ जाता था कि सब-को- सब घर से निकाले गए हैं। सर पर कौए के खोते की तरह जुल्फ, बदन पर पच्चीकारी की हुई बुशर्ट और पहनावे के रूप में बोतलनुमा पैट। उन पर नजर पड़ते ही केशव बाबू की देह में आग लग जाती थी। एक दिन केशव वावू ने पूछा,"ये लोग कौन हैं जो? क्या करते हैं ?" वासु ने भया के इस सवाल का कोई जवाब नहीं दिया। फिर भी केशव वाबू ने पिंड नहीं छोड़ा। पूछा, "उन लोगों के वाप क्या किया करते हैं ?" वामु ने बताया कि वे लोग बड़े-बड़े आदमियों के लड़के हैं। "बड़े-बड़े आदमियों के लड़के -~का मतलव ? लखपति या करोड़पति ? अगर लखपति के लड़के । इस तरह वंडों की तरह मारे-मारे क्यों फिरते;
- । ऊपरी आय के तौर पर खासी अच्छी रकम मिल जाती है ।" सुनकर गृहिणी प्रसन्न हुई। ऊपरी आय होती है तो लड़की अवश्य ही सुखी रहेगी । “लड़के का वाप क्या करता है ?" गृहिणी ने पूछा। घटक बोला, "लड़के के मां-बाप, भाई-बहन कोई नहीं हैं। विलकुल अकेला है।" मां-बाप, भाई-बहन, कोई न हो, ऐसे पात्र विरले ही मिलते हैं। लड़की ससुराल जाते ही घर की मालकिन बन बैठेगी। उसे किसी की तावेदारी नहीं करनी होगी। लड़की का भाग्य अच्छा है वरना इस तरह का छोटा परिवार कितनी लड़कियों को नसीव होता है ! पात्र दोस्त-मित्रों के साथ लड़की देखने आया। छुट्टी का दिन था। केशव वावू कभी बाज़ार दौड़ते थे तो कभी घर । पांच व्यक्ति देखने आएंगे। उनके नाश्ते-पानी का इन्तजाम करना है । गृहिणी और वाबू दोनों व्यस्त थे। वासव से घर पर ही रहने को कहा था। कहा था, "आज तुम कहीं मत जाना, घर पर ही रहना, समझे ? नया रिश्ता कायम होने जा रहा है, उस वक्त चाचा का रहना ज़रूरी है।" वासव वीच-बीच में बिल्कुल शांत, शिष्ट बनकर रहता था। बड़े भाई का कहा मानता था। वह बोला, "आप चिन्ता मत करें । मैं रहूंगा।" "हां, रहना । अब तुम अकलमंद हो गए हो, उम्र भी हो गई है, अब तुम छोटे बच्चे नहीं हो । मुन्नी के विवाह के बाद तुम्हें ही तो हर चीज़ की निग- रानी रखनी है। जानते ही हो कि बालीगंज में हम लोगों का मकान बन रहा है। वहीं हमें चले जाना है। उस समय घर में रहेंगे, तुम, मैं और तुम्हारी भाभी ही..." कुछ देर रुककर फिर वोले, "मैं भी नौकरी से रिटायर होने जा रहा हूं, किसी दिन इस दुनिया से भी विदा हो जाऊंगा। तुम्हारी भाभी की सेहत जिस तरह चल रही है, लगता है, वह भी ज्यादा दिनों तक जीवित नहीं रहेगी। मेरी तमाम विषय-सम्पत्ति, रुपया-पैसा, जो कुछ है, उसका उपभोग तुम्ही करोगे। मुन्नी की शादी हो जाए तो फिर कोशिश-पैरवी कर तुम्हें भी किसी दफ्तर में रखवा दूंगा। मरने के पहले मुझे सारा इन्तजाम कर देना है।" । ४६ .." जब-जब वक्त मिलता, वासव से यही सब कहा करते थे। वासु हमेशा घर पर नहीं रहता था, इसीलिए मौका मिलने पर ही यह सब कहते थे। "दोस्त-मित्र सुख के दिनों के ही साथी होते हैं, यह वात गाठ में बाध लो। ज्यो ही उन्हें पता चल जाएगा कि तुम्हारे हालात खराव हो गए है, कोई भी तुम्हारे पास फटकने नहीं आएगा। जानता हूं, मैं जो अभी कह रहा हूं, तुम्हें सुनने में अच्छा नहीं लग रहा है लेकिन मैं जब नहीं रहूगा तो तुम्हें पता चलेगा कि मैंने कितनी सही बातें कही थी।" वासव जब तक भैया के सामने रहता, उनकी बातें धयंपूर्वक सुनता था। लेकिन तुरन्त ही आवारा दोस्त-मित्रों की टोली पुकारती, "बासु " तत्काल वासु और ही तरह का हो जाता था। अब तक केशव बाबू ने जो कुछ कहा था, उसे दूसरे कान से बाहर निकाल देता। फिर उसका यता-पता ही नहीं चलता था। गृहिणी पुकारती, "अरे वासु, खाना खालो, अब तक तुमने मुह मे एक दाना तक डाला है।" लेकित उस वक्त कौन किसकी बात सुनता है ! दोस्त-मिन उसे अपने साथ लेकर गायब हो जाते थे। कहां से उसके इतने दोस्त-मित्र जुट जाते, इसका भी कोई पता नहीं चलता था। दोस्त अगर अच्छे होते तो बात ही कुछ अलग थी। जितने भी थे सबके सब कंगले । जैसी उनकी पोशाकें हुआ करती थी, वैसे ही उनके चेहरे-मोहरे । उनका चेहरा देखते ही समझ में आ जाता था कि सब-के- सब घर से निकाले गए हैं। सर पर कौए के खोते की तरह जुल्फें, बदन पर पच्चीकारी की हुई बुशर्ट और पहनावे के रूप में बोतलनुमा पैट। उन पर नजर पड़ते ही केशव बाबू की देह मे आग लग जाती थी। एक दिन केशव वाबू ने पूछा,"ये लोग कौन हैं जो ? क्या करते हैं ?" वासु ने भैया के इस सवाल का कोई जवाब नहीं दिया। फिर भी केशव वाबू ने पिंड नहीं छोड़ा। पूछा, "उन लोगों के बाप क्या किया करते हैं ?" वासु ने बताया कि वे लोग बड़े-बड़े आदमियों के लड़के हैं । "बड़े-बड़े आदमियों के लड़के ---का मतलब? लखपति या करोड़पति ? अगर लखपति के लड़के हैं तो इस तरह वंडों की तरह मारे-मारे क्यों फिरते हैं ? उनके मां-बाप क्या डांटते नहीं हैं ? कुछ भी नहीं कहते ?" ये सब बातें वासु के कान में जैसे पहुंचती ही नहीं थीं। मुद्रा ऐसी होती जैसे वह बूढ़ा व्यर्थ ही बुड़बुड़ा रहा है । व्यर्थ की बातें करके वुड्ढा अपना मुंह खराब कर रहा है। उसकी मुद्रा वैसी रहती जैसे वह कह रहा हो कि तुम लोग मुझे चाहे जितना भी क्यों न पीटो, मैंने पीठ पर सूप बांध लिया है और कानों में रुई ठूस ली है। एक दिन केशव बाबू बस पर चढ़कर दफ्तर से लौट रहे थे । एकाएक धर्म- तल्ला के एक कोने की ओर आंखें जाते ही वासु दीख पड़ा। वासु सिगरेट सुलगाकर धुएं के छल्ले उड़ा रहा था। उसके साथ एक लड़की थी। लड़की ! लड़की पर नज़र पड़ते ही उसे अच्छी तरह से देखने के ख्याल से आंखों पर के चश्मे को नाक के ऊपरी हिस्से में ठीक से अटका लिया। सचमुच लड़की ही है। वासु की हम-उम्र-लंबा-दुबला चेहरा । लड़की के सिर पर भी वासु के जैसे रुखड़े वालों की जुल्फें हैं । शायद तेल नहीं लगाया । वासु उसकी बगल में खड़ा सिगरेट का धुआं उगल रहा है और लड़की उससे बातें कर रही है। केशव वावू की आंखें चौंधियाने लगीं। अब तक वे इतना ही जानते थे कि छोकरा दोस्त-मित्रों के साथ अड्डेवाज़ी करता है और सिनेमा देखने में ही पैसा उड़ाता है। लेकिन अब तक उन्होंने इस बात की कल्पना तक न की थी कि वासु छोकरियों के पल्ले पड़ गया है। यह देखकर उनका मन बड़ा ही खराव हो गया। उन लोगों के वंश का लड़का होने पर भी वासु इस तरह बरबाद हो गया। मन में सोचा था कि साहब से कहकर कोई नौकरी दिला देंगे। इसके बाद उन्हें भरोसा ही नहीं हुआ। नौकरी में घुसने के बाद अगर इसी तरह की करतूतें कर बैठे तो वे मुंह दिखाने के लायक नहीं रह जाएंगे। घर आने पर उन्होंने चारों तरफ ध्यान से देखा कि निर्मला वहां है या नहीं। उसके बाद अपनी पत्नी को सारी घटना से अवगत कराया। सव-कुछ सुनने के बाद गृहिणी बोली, "मैं पहले ही जानती थी कि वह उसी किस्म का लड़का है। वह खुद तो डूवेगा ही, तुम्हें भी डुवोएगा।" - यह बात किसी को मालूम न हो, इसके लिए केशव बाबू ने अपनी पत्नी से आग्रह किया। उसके बाद फिर बोले, “सौभाग्य की बात है कि पिताजी जीवित नहीं हैं, जीवित रहते तो उनके मन में बेहद चोट पहुचती। मर कर वे कम-से-कम चैन से तो हैं." गृहिणी को यह बात किसी से कहने से मना किया था तो जरूर, मगर वे खुद दफ्तर के धाबुओं से कह बैठे। एक-एक कर सभी को आगाह कर दिया कि दूसरे को मत बताएं, वरना लोग क्या सोचेंगे । दोस्तों ने वायदा किया कि यह बात वे किसी से नहीं कहेगे । लेकिन बात पूरे दफ्तर में फैल गई। सभी कहने लगे, "इममे केशव बाबू की पत्नी का दोप है । अनाथ लड़का है, देखने-सुनने वाला कोई नहीं है, ऐमी हालत मे वह लड़का खराब हो ही जाएगा." कुछ दिनो तक केशव बाबू का मन वडा ही व्याकुल रहा । एक दिन उन्होंने अपनी पत्नी से कहा, "तुमने वासु से कुछ कहा ?" गृहिणी बोली, "मैं क्यो कहने गई ? कहना मेरे लिए जरूरी नहीं है। तुम्हारा लाड़ला भाई व्हरा, खराव रास्ते पर जाएगा तो तुम समझो।" केशव बाबू बोले, "अहा, तुम बुरा क्यो मान गई ? एक ही भाई है, वह अगर खराव रास्ते पर चला जाएगा तो तकलीफ नही होगी? मरने के ममय बाबूजी कह गए थे : केशव, नाबालिग भाई की देखरेख करना गृहिणी बोली, "तुम दिन-भर दपतर में रहकर नाबालिग भाई की देख- रेख कैसे करोगे?" केशव बाबू बोले, "अगर मैं दफ्तर में काम न करू तो घर का खर्च कैसे चले? तुम क्या यही चाहती हो कि आफिस-दफ्तर छोड़कर मैं अपने भाई को लेकर घर में ही बैठा रहूं?" गृहिणी बोली, "मैंने ऐसा कद कहा है ?" "पुमा-फिराकर तुम यही कहना चाहती हो," केशव बाबू ने कहा, "मैं मगर पैसा कमाकर न लाऊं तो तुम लोग खाओगे क्या ? और इतना-इतना रपया खर्च करके तुम जो यह मकान बनवा रही हो, वह कैसे पूरा होगा?" गृहिणी बोली, "तुम क्या सोचते हो कि में यह घर अपनी सुख-सुविधा के " YE लिए वनवा रही हूं? मैं उस घर में पैर पर पैर रखकर मौज मनाऊंगी? दुनियादारी का सुख मेरे भाग्य में नहीं है। जिस दिन ससुर जी इस शूल को रखकर चल बसे, उसी दिन यह बात मेरी समझ में आ गई थी कि मेरे भाग्य में सुख नाम की चीज़ नहीं है। मैं वेचूंगी ही कितने दिन। यों भी मेरी हड्डी- पसली ढीली हो चुकी हैं, मैं नव ज्यादा दिन वत्र नहीं सकती। एक लड़की है जो मेरे गले का कांटा है। उस लड़की को कूल-किनारे लगाते ही मैं निश्चित हो जाऊंगी, उसके वाद अपने लाडले भाई को लेकर तुम जी-भर ऐश-मौज रहना." गृहिणी भी वैसी ही है। क्या कहना चाहती थी और क्या तो कह बैठी। सारा दोप केशव वाबू के मत्थे पर मढ़ दिया। वे जो नौकरी कर रहे हैं, नौकरी करके पैसा ला रहे हैं। भाई जो आवारा निकल गया, लड़कियों के साथ मौज उड़ा रहा है, सिगरेट फूंक रहा है, उनके पैसे से कलकत्ते में जो पक्का नकान वन रहा है यह सव दोष उन्हीं का है। - १२ केशव वाबू का सारा जीवन इसी तरह व्यतीत हुआ है। इसी तरह महीने- पर-महीना, वरस-पर-बरस गुजारते हुए उन्होंने नौकरी कर अपने परिवार का खर्च चलाया है। परिवार की यातनाओं को जीकर वे सोचते कि बव यातना का अन्त आ चला। इसके बाद ही अच्छा वक्त लाने वाला है। लेकिन आदमी का अच्छा वक्त कभी बाता भी है ? लड़की के निरीक्षण के सन्दर्भ में एक दिन पान दल-बल के साथ नाया। वह दल कई तरुणों का था। सभी वासु के समवयस्क थे। केशव बाबू ने उनके लिए कीमती नाश्ते का प्रबन्ध किया था। पान के एक मित्र ने निर्मला से पूछा, "आप रसोई पकाना जानती हैं ?" निर्मला ने सिर हिलाकर हामी भरी। "क्या-क्या रसोई पका सकती हैं ?" निर्मला जिस तरह सिर झुकाकर बैठी थी, उसी तरह बैठी रही। केशव
वाबू ने निर्मला के बदले जयाय दिया, "पह हर तरह की रसोई धागा जाती
है-भात, दाल, मछली का गालिया, पटनी, सम-तुरा."
"चाप-कटलेट?"
फेगव वायु बोले, "यह सम हर गृहस्प मेपर में भगता तो महीने
पर यह सब भी बना लेगी। यही हो अामद गसीर गोजकसी भीगार
पडती है तो यही सब कुछ परती-धरसी है। दार जागे पग गुगात
बनाकर खिताती है, इसके पापाजी जय मारोग जाते है, महोती.
पिलाती है।"
"चाचा? आपो भाई भी हैं ? उहण गहीं रहा है।"
केशव यावू कठिनाई में पड़ गए। उन्होंगे पागुग मापामा ft
वह घर पर ही रहे, फिर भी अय तमा उगमा नहीं गया है।
"वह जरा बाहर निकला है, अगी या पाला।" व पाम |
इसके अलावा ये कह ही पया अपने गम्मानमी TET Summy
का महारा लेना पड़ा। मगर झूठ योलो या गावापा,
पहुंचा।
टमके वाद लेनदेन की बात हुई। सड़की का पालन मार
होना । जमे थे चोरी के अपराध में पकर गए।
पटक वहीं मौजूद था। टगीने गागफैगवा लिया। क पा चना
गृहिनी के कमरे में जाता था और दूसरी बार याप्टर कमान !
गृहिणी पदक में बोली, "एक बार मालिक को दी।"
बैंगद बाक माने पर पर गृहिती ग्राी,"नुमनfaniy४
मत कहना। दो कुछ कहना होगा, परमार Traitr"
दनी दह की व्यवस्था की गई। पायी *
माय चला गया। कहा गया कि सोमबाहीमा
१३ यही है केशव वाबू के जीवन का मध्यपर्व । मध्यपर्व में ही इकलौती बेटी का व्याह सम्पन्न हो गया। केशव बाबू ने सोचा, अव उनके जीवन की असली जिम्मेदारी खत्म हुई। दामाद भी मोटे तौर पर अच्छी ही नौकरी करता है। पहले असिस्टेंट हेडक्लर्क था। तनखा तीस रुपये होने से क्या होगा, ऊपरी बाय के रूप में महीने में करीवं तीस रुपये सलग से मिल जाते हैं। इसके अलावा साग-सब्ज़ी, मछली वगैरह उसे खरीदना नहीं पड़ता है। जो लोग बुकिंग कराने आते हैं, मुफ्त में दे जाते हैं। लेकिन काशीकांत उससे खुश नहीं था। वह निर्मला से कहता, "ताले की नौकरी में छोड़ दूंगा, अब इसमें कोई रस नहीं रहा।" निर्मला अपने पति की बातें सुनकर डर जाती थी। दो कमरों का छोटा- सा क्वार्टर था। खिड़की से बाहर की ओर ताकते ही खुला आसमान नज़र माता था। जन्म से कलकत्ते में मायके की गली के अन्दर के मकान में रहने के वाद जब वह एकाएक वाहर आई तो उसे बड़ा ही अच्छा लगा। किन्तु कुछ दिन बीतते-न-बीतते उसे महसूस होने लगा कि उसका पति कुछ और ही तरह का है। वह गृहस्थी के खर्च की तालिका देखते ही झुंझला उठता था। निर्मला बड़ी ही मितव्ययिता से गृहस्थी का खर्च चलाती थी। अपनी मां से उसने सीखा था कि किस तरह कम खर्च में गृहस्थी चलाई जाती है । अत्रा- नक सरसों का तेल जब खत्म हो जाता तो काशीनाथ से कहना पड़ता था। काशीकांत कहता, "यह क्या? अभी तो उस दिन तुम्हें एक सेर तेल खरीद दिया था। इसी बीच सारा तेल खत्म हो गया ?" निर्मला कहती, "खत्म हो गया तभी न कह रही हूं। एक सेर तेल से कहीं एक महीने तक चलाया जा सकता है ?" काशीकांत कहता, "नहीं, यह सब मैं नहीं जानता। तुम न हो तो सामन्त बाबू की पत्नी से तेल उधार मांगकर ले आओ।" ५२ यह वात सुनते ही निर्मला हतप्रभ हो गई। सामन्त पावू बड़े बाबू हैं, यानी मालदादू । उनका क्वार्टर बगल में ही है। थोड़ी-बहुत जान-पहचान है। ऊपरी आय की मात्रा बहुत अधिक है इसलिए उनके परिवार में भी शान- दशौकत ज्यादा है। परिवार के सदस्यों की संख्या जिस तरह अधिक है, उस अनुपात में गाय भी अधिक है और खचं भी अधिक । मास-मछली खाने का प्रचलन भी उनके यहा ज्यादा है। अगल-बगल के पवार्टर में रहने के कारण आने-जाने का थोड़ा-बहुत सिलसिला है। मगर यह सब रहने पर भी निर्मला, क्या वहां सरमों का तेल उधार मागने जाए ? पाशीकांत बोला, "इमसे क्या विगड़ता है ? अगल-बगल में रहने से आदमी यमा पास-पडोस से उधार नही लेता?" "नहीं, लोग चाहे जो करें, मेरे लिए शर्मनाक काम है। मुझसे यह काम नहीं हो सकता। अगर तेल उधार लाना है तो जाकर तुम्ही ते आओ।" निर्मला ने कहा। काशीकात गुस्से में आ गया, "फिर उबला हुआ ही खाकर काम चलाओ। इस महीने में अब मैं पैसा नहीं दे सकूगा। मेरे पास उतने पैसे नहीं हैं।" "उवाला हुआ भले ही खा लूगी, परन्तु दूसरे के घर से सरसो का तेल उधार मागकर मैं नहीं ला सकती।" निर्मला का टका-सा उत्तर सुनकर काशीकान्त का पारा चढ़ गया। वह बोला, "अगर तुम उधार मांग ही नहीं सकती हो तो मुझ-जैसे गरीब से शादी ही क्यों की थी ?" “मैंने तुममे शादी की है या मुझे देख-परख कर तुमने ही मुझसे शादी की है ?" निर्मला ने प्रत्युत्तर दिया। काशीकात ने कहा, "देखो, मैं खरा-खोटा कहने वाला आदमी हूं। मैं तुम्हारी वदी-बड़ी बाते नहीं सुन सकता हूं। बड़े आदमी की लड़की होने के नाते अगर तुममें मान-अपमान का इतना बोध है तो अपने वाप के घर से ही तेल खरीदने का पैसा ला सकती हो।" "क्या कह रहे हो?" "हा-हां, ठीक ही कह रहा हूं। तुम्हे रगोन धागा वा - ने मेरे कंधे पर तुम्हारा वोझ लाद दिया है। हालांकि अन्दर-ही-अन्दर वाली- गंज में लाख रुपये की इमारत खड़ी की है। इस काम के लिए तो उन्हें पके की कमी नहीं होती है।" यह कहकर काशीकांत वहां रुका नहीं, क्वार्टर से निकलकर ड्यूटी करने चला गया। उस समय उसे नाइट-ड्यूटी वजानी थी। उस रात निर्मला की आंखों से नींद दूरही भागती रही। कलकत्ते ने इतनी दूर नाकर पति के घर की गृहस्थी संभालने के संदर्भ में उसे जो अनुभव प्राप्त हुए, इससे उसमें जीवन के प्रति वितृष्णा का भाव पैदा हो गया। किसी तरह रात गुजारकर सुबह जब वह सोकर उठी, तो काशीकांत ड्यूटी से वापस ला चुका था। इस समय वह औरही तरह काबादमी था। कल शाम जिन व्यक्ति ने इतना झगड़ा-संज्ञः किया था, इस समय वह जैसे कोई दूसरा ही व्यक्ति था। निर्मला समझ गई कि आजकाशीकांत को बतौर धूत मोटी रकम हासिल वह बोला, "आज मांस खरीद लाता हूं, आज मांत बाऊंगा। बहुत दिनों से मांस नहीं खाया है।" निर्मला जानती थी कि जिस दिन इस लादमी के हाथ में रुपया जाएगा, उसी दिन मांस-मछली-अंडे सव-कुछ एक साथ जाएगा और अकेली निर्मला को ही रसोईघर में बैठकर सव-कुछ पकाना होगा। काशीकांत खाने में भी उस्ताद था। एक तो वह खुद लालची आदमी था, वाहर के नादमी ते जिस तरह रिश्वत लेता था, वहुत-से वहाने बनाकर उनसे पंसा वसूलता था, उसी तरह खर्च भी वह खुले हाथों करता था। उसके बाद जद नाय नहीं होती तो वह और ही तरह का नादमी हो जाता था। तव उसका दिमागगरम रहता था। वह चिल्ला-चिल्लाकर दोलता था, सबसे गड़ा-झगड़ा करता था। उस बरले में निर्मला के लिए जीना हराम हो जाता था। निर्मला पहती, "तुम इतना चिल्लाते क्यों हो ? चिल्लाने की बात ही क्या है ?" काशीकांत कहता, "चिल्लाऊं नहीं? दाल में नमक न रहे तो बादमी कही खाना खा मकता है ? तमाम रात खटने के बाद बाराम से खाना माऊं, यह भी तुम नहीं होने देती हो।" यह कहकर चावल की पाली अलग हटाकर खड़ा हो जाता था। ये सब रोजमर्रा की बातें थी। निर्मला के दाम्पत्य जीवन की शुरुआत इसी तरह हुई। मा कलकत्ते से यत लिखती : बेटी निर्मला, वहुत दिनों से तुम्हारा समाचार नहीं मिला है। तुम और काशीकांत कैसे हो, इसकी सूचना देते हुए सत लिखो। तुम्हारा समाचार न पाने के कारण मन यड़ा ही घबराता रहता है, इत्यादि मा का खत मिलता तो निर्मला उसे बार-बार पढ़ती, पढ़कर उमे फाड़ डालती थी। मां का खत काशीकात पढ़े, निर्मला यह नहीं चाहती थी। मां के सत में परिवार के विषय में बहुत-मारी बातें रहती थी, "चाचाजी जिस तरह दिन-दिन विगढते जा रहे हैं, पैसे के लिए वाबूजी पर कितना जोर-जुल्म करते हैं"चाचा जी के अत्याचार मे बाबूजी किन तरह घबराहट मे रहते हैं, इस बात का उल्लेख रहता था इतना कर्ज करके मकान बनाना शुरू किया, तक काम खत्म नहीं हुया है । सीमेण्ट की कीमत दिन-दिन बढ़ती जा रही है, राजमिस्त्री की मजदूरी पहले से बहुत अधिक बढ गई है। नये निरे से दुबारा कर्ज लिए वगैर मकान का काम पूरा नहीं हो सकेगा। तुम्हारे बाबूजी के रिटायर होने का वक्त भी करीब आ चुका है। अब क्या करू, यही सोचती रहती हू । र अब १४ केराव बाबू का जीवन इसी डर पर चल रहा था। सवेरे दफ्तर जाते थे और ढेर सारी फाइलें साथ लिए घर लौटते थे। सुबह से शाम तक अथक परि- श्रम करके वर्ज चुकाने की जी-जान से कोशिश करते थे। सोचते थे, लड़कों के विवाह मे लिया हुआ कर्ज तथा मकान बनवाने के सिलसिले में इंट, सीमेण्ट और से लिए हुए उधार का जिस दिन भुगतान हो जाएगा, उस दिन वे मुक्ति की सास ले सकेंगे, अपने बालीगंज के मकान में जाकर आराम से जीवन जियगे।
गृहस्वामी को खिला-पिलाकर जव विदा कर देती, गृहस्वामिनी अधवने मकान के पास रिक्शे से पहुंचती थी। अव मकान की छत किसी तरह बन चुकी थी। स्वयं खड़ी होकर मिस्त्री वगैरह कामगरों के कामों की निगरानी करती थी अपनी पसंद की योजना थी, अपनी चेष्टा से बनवाया हुआ मकान । घर न होकर स्वर्ग हो जैसे। उसी स्वर्ग को अपने हाथों से तैयार करने में गृहिणी को बड़ा ही सुख मिलता था। दिन-भर उसी ख्याल के इर्द-गिर्द चक्कर काटने में उसे बड़ा ही अच्छा लगता था। तीसरा पहर माते-न-आते घर लौट आती थी। आते ही रात की रसोई का प्रबंध करती थी। गृहिणी को सारा प्रबंध अपने हाथों से ही करना पड़ता था। पहले फिर भी एक लड़की थी। वह मां की थोड़ी-बहुत सहायता करती. थी। मगर निर्मला के विवाह के बाद से वह सहायता भी नहीं मिल रही थी। जूते की सिलाई से चंडी-पाठ तक उसे अकेले ही करना पड़ता था । लौटते वक्त वह बाजार होकर आती थी। आलू, प्याज, साग जो कुछ भी सामने दीख जाता, खरीदकर ले आती थी। केशव वावू की पत्नी बड़ी ही कुशल गृहिणी थी। केशव वावू को चूंकि उस तरह की पत्नी मिली थी इसलिए वे उस यात्रा में टिक गए, अन्यथा क्या होता, कुछ कहा नहीं जा सकता। उन दिनों दफ्तर के कामों का दबाव भी इतना बढ़ गया था कि इधर-उधर ताकने की भी फुर्सत नहीं मिलती थी। जव वह घर लौटते तो थकान से चूर-चूर हो जाते थे। गृहिणी भी उनकी तुलना में कम थकी-मांदी नहीं रहती थी। किन्तु जव तक आंखों में नींद नहीं उतरती, तव तक वह मकान, इंट, लोहा, सीमेण्ट के बारे में बातें करती रहती थी। गृहिणी कहती, "जानते हो, दस बोरे सीमेण्ट और चाहिए." केशव बाबू कहते, "तुम जब कि कह रही हो, सीमेण्ट खरीदना ही होगा।" गृहिणी कहती, "इतने सीमेण्ट की जरूरत नहीं पड़ती, मिस्त्रियों ने कहा था, पिछला हिला यों ही छोड़ दें, सिर्फ इंटों को गूंथनी कर देने से काम चल जाएगा । मैंने कहा, जव इतना-इतना खर्च हो ही चुका तो दस वोरा सीमेण्ट , । ५ कम करने से ही पौन-सी वचत हो जाएगी? इसके अलावा वहां एक चाल बना दी जाए तो सरो-सामान रखने में सुविधा होगी। टोकरी, कुदाल, उपले, कोयला वगरह रखने के लिए एक कमरा चाहिए न.." केशव वाबू कहते, “सो चाहिए हो।" "हा, और जब दोमजिला बन जाएगा तो वह कमरा किरायेदार के काम मे आएगा। किरायेदार को आलतू-फालतू सामान रखने के लिए कोई जगह चाहिए न?" सचमुच केशव बाबू की गृहिणी कितनी ही तरह की योजनाएं बनाया करती थी। बादमी कितना सपना देखता है ? उमी सपने को सार्थक बनाने के लिए लोग कितनी माधना करते हैं ? लेकिन केशव वाबू की पत्नी का एकमान संपना वही था। चौबीस घंटा मकान बनवाने के लिवा मोचने के लिए जैसे कोई दूसरी वात थी ही नहीं। नीद मे भी शायद घर के ही वारे में सोचती रहती थी। सोचती, छत की कंत्रीट की ढलाई हो चुकी है, कही दरार तो नही पड़ जाएगी। या सोपती थी, हो सकता है कल सुबह ही ईटवाले को तीन सौ रपमा देना पड़े। उन दिनो ईट की दर यी तीस रुपये हज़ार । मकान बनवाने के कारण पूजा के अवसर पर कपड़े तक नहीं खरीदे थे। आलू के भुर्ते के माथ चावल खाकर या महीने मे दो दिन दो-चार आने की शीगा मछली खाकर यह सधवा की मर्यादा का पालन करती थी। अगर केशव वावू उस सन्दर्भ में कोई बात करते तो गृहिणी उत्तर देतो, "पहले मकान बन जाए, कर्ज चुक जाए, तब फिर जी-मर कलिया-पोलाव खाना । अभी थोड़ी तकलीफ उठाओ हाय रे घर ! इस घर को एक-एक ईंट में गृहिणी के प्राण थे । इसकी हर ईट की खुद परख करने के बाद ही मिस्त्रियो को इंट गूथने दी थी। वंशाव- जंग की तीखी धूप योर सावन-भादों की मूमलाधार बारिश को गृहिणी ने अपने माथे पर झला था। स्वामी-देवर को खिला-पिलाकर, उन्हे माफिन-कालेज भेजकर, तेज कदमों में धूल और कीचड़ के बीच पैदल चलती हुई वह बालीगज के जलमय जगल में मकान बनवाने जाती थी। ।
उन दिनों बालीगंज में जलमय जंगल ही था। एकाध मील के दायरे में किसी का भी मकान नज़र नहीं आता था। एक रिक्शा तक उधर नहीं दीखता था। इसलिए धूल-कीचड़ लांघते हुए जाने के अतिरिक्त कोई दूसरा विकल्प नहीं था। केशव वावू कहते, "तुम अकेली मिस्त्रियों से काम कराने जाती हो? मुहल्ले वाले इस पर कानाफूसी तो नहीं करते ?" गृहिणी कहती, "मुहल्ले वालों की मैं परवा नहीं करती। मुझे अगर भूखों रहना पड़े तो मुहल्ले वाले मुझे खाना देंगे?" वासु का उत्पात दिन-दिन बढ़कर सारे किए-कराए पर पानी फेर रहा था। स्कूल का नाम कहकर वह कहां जाता है, स्कूल की फीस लेकर वह जमा करता है या नहीं, इसका भी कोई ठीक नहीं रहता। पूछने पर भी वह कुछ नहीं बताता था। वासु मैट्रिक की परीक्षा में दो बार फेल हो चुका था, तीसरी बार किसी तरह पास हुआ। वासु की सफलता की बात सुनकर केशव वाबू अवाक् हो गए थे। एक दिन मुलाकात होने पर पूछा, "क्यों जी, तुम कहां रहते हो ? तुम्हारा चेहरा तो मुझे नज़र आता ही नहीं। क्या करते हो ? कहां का चक्कर लगाते रहते हो?" उस बात का जवाब दिये विना वासु वोला, "मैं कालेज में दाखिला लूंगा। आई० ए० में नाम दर्ज कराऊंगा।" "आई० ए० पढ़ने से क्या होगा?" "आई० ए० पास करने के बाद बी०ए० का कोर्स पड़ेगा। वी० ए० पास करके ग्रेजुएट बनूंगा । ग्रेजुएट होने से नौकरी मिलेगी।' केशव वावू बोले, "मैट्रिक पास करने में ही तुमने तीन वरसों का अरसा गुज़ार दिया। इसके बाद कितने वरसों में आई० ए० पास करोगे या ग्रेजुएट ही कितने वरसों में होगे ? व्यर्थ ही पैसा वरवाद करने के बजाय कुछ दूसरा ही काम करने के बारे में सोचो। तुम अगर कहो तो कोशिश-पैरवी कर तुम्हें किसी कारखाने में रखवा दूं।" मगर वासु एक ही बात पर दृढ़ था। वह छोड़ने वाला जीव नहीं था। वोला, "पहले ग्रेजुएट हो लूं, उसके बाद विलायत जाऊंगा।"
"विलायत जाओगे ?" वासु की बातें सुनकर केशव बाबू विस्मय से अभिभूत हो गए। वासु तो कम महत्त्वाकांक्षी नहीं। रात मे गृहिणी से बातें की, "उसमे बड़े बनने को जब इतनी इच्छा है तो पसा दे दो न । वासु अगर योग्य हो जाए तो हम लोगों के ही वंश का मुघ उज्ज्वल होगा।" गृहिणी बोली, "तुम पागल हो गए हो? वह दुश्चरित लडका किसी दिन आदमी बन सकता है ? व्यर्थ ही तुम्हारी गादी कमाई का पैसा बरबाद होगा." केशव दादू वोले,"नही नहीं, उसका कहना है कि पास करके वह विलायत जाएगा। अगर ऐसा कर सके तो अच्छा ही रहे।" गृहिणी बोली, "पैसा तुम्हारा है, उसे तुम अपने भाई के लिए खर्च करोगे, इसमे मेरे लिए कहने की बात ही क्या है । पैसा मैं दे देती हू । रुपये की जरूरत । "तुम नाहक ही इतना विगड रही हो। मरने के समय वाबूजी उसकी देख-देख करने को कह गए थे। वे स्वर्ग में बैठे-बैठे सब कुछ देख रहे हैं।" गृहिणी ने किसी प्रकार को दुविधा जाहिर नहीं की। नोटों का एक बडल झट से पटककर रसोईघर की ओर चली गई। गृहिणी को क्रोध में पाकर केशव बाबू उसके पीछे-पीछे वही चले गए। "अजी, तुम विगड क्यों रही हो?" उन्होंने कहा, "अगर वह आई० ए० पास नहीं कर सके तो उसके बाद पंसा मत देना..." गृहिणी तब वेहंद झंझटो के बीच घिरी थी। उसी दिन मिस्त्री को खासी मोटी रकम देनी थी। वह रकम कहा से आएगी, इसकी चिन्ता तव उसके मस्तिष्क को जकड़े हुई थी। बोली, "जानते हो, तीन-तीन बार कोशिश करने के बाद वह किसी तरह पास हुआ है । तुम्हारा यह भाई अगर कभी आई०ए० पास कर जाए, तो मैं अपनी गलती स्वीकार कर इस घर से चली जाऊगी। मैं यह कहे देती हूं." पता नहीं क्यो, केशव बाबू के अन्तर के किमी कोने में काम के लिए असीम मोह-ममता और स्नेह छिपा हुआ था । अहा, मां अगर जिन्दा रहती तो वासु इस तरह का नहीं होता। गृहिणी गृहस्थी की देख-रेस करेगी या घर के -- , मिस्त्रियों से काम लेगी या कि वासु की देख-रेख करेगी? इसलिए उसे ही कैसे दोषी माना जाए? और केशव बाबू स्वयं अपने दफ्तर के कामों में ही व्यस्त रहते हैं। फिर घर में उसकी देख-रेख करने के लिए है ही कौन ? अन्तत: वासु कालेज में दाखिल हुआ। कालेज में दाखिला तो हुआ ज़रूर, किन्तु दाखिला होना ही सव-कुछ नहीं है। किताबें खरीदनी हैं और उसके लिए पैसे चाहिए। जव जब पैसे की जरूरत पड़ती, वासु मांग लेता था। केशव वावू बीच-बीच में जाहिर करने लगते थे, "दो दिन बाद अगर किताव खरीदोगे तो काम नहीं चल सकता है ?" वासु कहता, "क्लास में पढ़ाई शुरू हो गई है। विना कितावें खरीदे प्रोफेसरों का लेक्चर फालो नहीं कर सकूँगा।" और न केवल किताव ही खरीदने के लिए पैसा चाहिए, उसके साथ ही कापी, नोटबुक, टिफिन, ट्राम-बस का किराया, लाइब्रेरी का चन्दा, कालेज का मासिक शुल्क-कुल मिलाकर काफी पैसे चाहिए। गृहिणी आक्रोश से उवलती रहती थी। "गोवर में घी ढाला जा रहा है, यह बात मैं तुमसे कह देती हूं." केशव वाबू सांत्वना के स्वर में कहते, "दो ही साल की तो बात है, दो साल किसी तरह तकलीफ उठाकर गुजार दो, उसके बाद अगर पास करे तो देखा जाएगा।" गृहिणी विना खाए, विना पहने केवल ईंट, लकड़ी और सीमेंट के पीछे पैसा खर्च करती थी। उसके चौबीसों घंटे का एक सपना था-घर और घर ! मकान के लिए जीवन न्यौछावर करने में भी गृहिणी जैसे पीछे पांव नहीं रखेगी। मकान जव करीब-करीब तैयार हो गया, अचानक एक दिन घर लौटने पर केशव वाबू ने अपनी पत्नी को विस्तर पर लेटा हुआ पाया। देखते ही वे भय से सिहर उठे । 'पूछा, "क्या हुआ ? सोई हुई क्यों हो?" शुरू में गृहिणी ने कुछ भी नहीं बताना चाहा। हमेशा से वह चुप्पा किस्म की औरत रही है। अपनी किसी तकलीफ को कभी भी जाहिर नहीं होने दिया है । ज्वर होने से भी कभी अपने मुंह से नहीं कहती थी कि ज्वर है। - ।
। लेकिन अब गृहिणी को भी न हो चुकी है। एक हाय में रसोई वगरह का काम करना और दूसरे में मकान का काम करना का सामान है ? गृहिलो महीनों से यही करतो काई है। शान वे पान केरबान ने भी भी अपनी पत्नी को विछादन पर लेटे हुए नहीं देना सामोचा.हो जाता है या कोई काड कर बैठा हो" पूछा, "वासु कहां है ? कालेज से लौटकर आया है या नही?" गृहिणी उसी तरह आस मूदे पड़ी रही और बोली, "मुझे मालूम नहीं है." "आज खाना खाकर कालेज गया था या मुबह से घर लौरा नहीं है ?" गृहिणी बोली, "तुम्हारे भाई को सदरें मुझे कैसे मालूम हो सकती है ? कहां रहता है, क्या खाता है, कालेज जाता है या नहीं -यह सब मुझसे क्यों पूछते हो?" केशव बाबू ने सोचा कि गृहिली गुस्से में है। उसके बाद गृहिणी के माथे को छूकर देखा। गरम-गरम जैसा लग रहा है। "डाक्टर साहब को बुला लाऊं?" काव बाबू ने पूछा। गृहिणी ने सिर हिलाकर कहा, 'नहीं-नही, मेरा पैसा इतना सस्ता नही है । उसी पैसे से बल्कि मैं एक बोरा सोमेट परीद लूगी।" उस रात योगव वावू दुवारा कुछ नहीं बोले। लेकिन रात किसी तरह बिताकर सवेरे नीद टूटते ही पत्नी के पास आए। "अभी कैसी हो?" उन्होंने पूछा। गृहिणी ने कुछ उत्तर नही दिया। फिर उन्होंने देर नहीं की। मुहल्ले के एक डाक्टर को जाकर तुरन्त बुला लाए। डाक्टर ने अच्छी तरह जाच की और प्रिस्क्रिप्शन लिय दिया। केशव बाबू प्रिस्त्रिप्शन लेकर सीधे दवा की दुकान की तरफ भागे। डावटर की बात सुनने में उसे अच्छी नही लगी। उनकी पत्नी को माराम करना होगा। लेकिन माराम करे तो फिर चले करो ? उन्हें माफिरा और यामु को कालेज जाने के समय चावल बनाकर कौन दिलाएगा? मिस्तियों के यकाए का भुगतान कौन करेगा? घाष्ट्रवटर की चोरी यौन पकड़ेगा? वे गृहिणी के पास आकर बोले, "जानती हो, डाक्टर साहब ने तुम्हे कई दिनो तक लेटकर रहने को कहा है।" ।
यह भला लेटकर रहने वाली औरत है ! उसी ज्वर की हालत में एक दिन विछावन छोड़कर उठ बैठी, और और दिनों की तरह चूल्हा सुलगाकर उसने सबके लिए रसोई वनाई और खुद भी खाना खा लिया। और ठीक उसके दूसरे ही दिन तापमान बढ़कर हो गया एक सौ तीन । सो जो ज्वर बढ़ा तो फिर कम होने का नाम ही नहीं लिया। यहां तक हालत हो गई कि प्रलाप करने लगी। उसके बाद जो भी डाक्टर सामने मिला, उसी से दिखाकर केशव बाबू ने आखिरी कोशिशें की। लेकिन तब रोग असाध्य हालत में पहुंच चुका था। लड़की और दामाद को तार भेजा गया। वे भी आए। लेकिन तब तक सब समाप्त हो चुका था। आखिरी घड़ी में वह निर्मला को वह एक वार देख भी नहीं सकी। गृहिणी विदा हो गई। अपनी उत्कट अभिलापा की गृहिस्थी, खून-पसीने से सींच-सींच- कर बनाया हुआ मकान-सव कुछ छोड़-छाड़कर, मांग में सिंदूर लिए वह विदा हो गई। ३ १५ यही है मकान बनने के पूर्व का इतिहास ! केशव बाबू बचपन से ही स्कूल-कालेजों में फर्स्ट-सेकंड-थर्ड होते आ रहे हैं। उन्हें हमेशा इनाम मिलता रहा है । अपने गुणों के बल पर ही उन्हें नौकरी मिली है। जीवन में उन्नति करने के लिए किसी की खुशामद नहीं करनी पड़ी। सिवा आफिस के बड़े साहब के वे जीवन में किसी से डरते भी नहीं थे। यहां तक कि कभी पैसा भी बरवाद नहीं किया। कहीं आखिरी समय में अधिक दुरवस्था का सामना करके दूसरे के सामने हाथ न पसारना पड़े, यह सोचकर बहुत ही संभलकर खर्च करते आए हैं। नौकरी की ज़िन्दगी में जो होने का हो, लेकिन रिटायर होने के बाद उन्हें स्वस्थ जीवन जीने का अवसर प्राप्त हो, यही सोच रखा था। वे शुरू से ही नियम के पावन्द रहे हैं। पान-बीड़ी, सिगरेट, चाय, सुंघनी, तम्बाकू वगैरह कभी इस्तेमाल नहीं । करते थे। बचपन मे विद्यासागर की पुस्तक में जो कुछ पढ़ा था, उसका अक्षरश पालन किया था। जीवन में वे कभी झूठ नहीं बोले। दफ्तर पहुंचने मे किमी भी दिन देर न की, कभी गैरहाजिर भी नहीं रहे। दफ्तर के बड़े साहब से शुरू कर चपरासी तक को यह पता था कि केशव बाबू के जैसे आदमी विरले ही हुआ करते हैं। बड़े साहव हर काम के लिए मुखर्जी को बुला भेजते थे। मुखर्जी से बर्गर पूछे बड़े साहव एक भी काम नहीं करते थे। मुखर्जी से परामर्श किए बिना वे एक भी पन पर हस्ताक्षर नहीं करते थे। कितने अज्ञात, अनजाने और अजनवी आदमियों की इन्होंने कितनी भलाई की थी, उसकी भी भायद कोई गिनती नहीं है। उसके बाद उनके सामने मकान की समस्या थी। वह समस्या कितनी जटिल थी, दफ्तर में मिलने-जुलने वाले इसकी कल्पना तक नहीं कर सकते हैं। मुखर्जी माहब शांत-शिष्ट व्यक्ति हैं। उनमें गुस्सा नाम की चीज नहीं है, वे जल्दीबाजी मे नही रहते, कभी ऊबते तक नहीं हैं। चाहे बड़ा हो या छोटा, सबसे एक जैसा बर्ताव करते हैं। लोग कहते, "मुखर्जी साहब सचमुच एक आइडियल आदमी हैं।" लेकिन उनके अन्दर कितनी अशाति थी, बाहर से उसका किसी को पता तक नहीं चलता था। किसी को पता भी नहीं था कि उनके घर के अन्दर एक बियावान है । कभी उन्होंने अच्छा कुरता नहीं पहना, अच्छा खाना नहीं पाया, कभी सिनेमा-थियेटर देखने में पैसा बरबाद नहीं किया। फिर भी जो कुछ प्राप्त हो सका और मना लगाकर जो नौकरी की, उसका श्रेय उनकी पत्नी को ही है। पत्नी के कठोर मध्यवसाय, अमानवीय थम और मितव्ययिता के परिणाम- स्वरूप ही सव-कुछ मंभव हो सका था। पत्नी ने एक ही मपना देखा था और वह यह कि बालीगंज मे उन लोगों का अपना एक मकान हो। अन्ततः वह मकान बनकर तैयार भी हो गया, लेकिन उसमे उमका गृह- प्रवेश नहीं हो पाया । गृह-प्रवेश के पूर्व ही उसे पृथ्वी के ग्रह से विदा होना पड़ा। यो होना था, हुआ। उसके लिए दुनिया बैठो नहीं रहेगी। दुनिया किमी के भी मुख-दुख की परवा किए बिना आगे बढ़ती रहती है । वह अपने ही रास्ते पर आगे बढ़ती जाती है, अपने मन से ही चलती है। ६३ . इसलिए पत्नी के देहावसान के बाद भी केशव बावू को जिन्दा रहना पड़ा। इतना जरूर था कि जिन्दान रहना ही उनके लिए अच्छा होता। लेकिन मादमी आत्महत्या तो करने नहीं जाएगा। इसीलिए एक दिन पुरोहित बुला- कर गृह-प्रवेश का कार्य भी उन्होंने सम्पन्न कर लिया। नया मकान, विल्कुल अव्यवहृत । उस दिन घर के अन्दर जाते ही केशव वावू रो दिए। लेकिन किसी के देखने के पूर्व ही आंखों को हाथ से पोंछ लिया। सचमुच, बूढ़े आदमी को रोना नहीं चाहिए। रोना उसके लिए अपराध है। जिस दिन पत्नी की मृत्यु हुई, उस दिन भी वे रोए नहीं थे। पत्नी ने जब उनके सामने आखिरी सांसें लीं, उस वक्त भी वे रोए नहीं। उनकी लड़की निर्मला फूट-फूटकर रो दी थी। उसके रोदन से मुहल्ला जैसे कांप उठा था। उन्होंने निर्मला को रोने से मना नहीं किया था। सोचा था, रोने दो। उनके बदले लड़की ही अगर रोती है तो पत्नी को, हो सकता है, स्वर्ग में सांत्वना मिले। उसके बाद श्मशान । सारा काम वासु ने ही किया। पता नहीं, कहां से लंबे-लंबे बालों वाले अपने दोस्त-मित्रों को ले आया सौर वे लोग 'राम नाम सत्य है' कहते हुए 'भाभी' को श्मशान ले गए। वहां भी केशव वाबू को कुछ नहीं करना पड़ा । पैसा खर्च करके वे जिम्मे- दारी से मुक्त हो गए और गंगा के किनारे चुपचाप बैठे रहे। अतीत की तमाम बातें जैसे-तैसे उन्हें याद आने लगीं। इतनी उत्कट अभिलापा का घर। उस घर में वह एक रात भी नहीं रह सकी। हालांकि जव शादी हुई थी, उसी समय से एक-मात्र यही बात कहती आई थी कि मैं कलकत्ते में-वालीगंज में--एक मकान बनवाऊंगी" कलकत्ते में मकान बनवाने के प्रति उनके मन में इतना आग्रह क्यों था, केशव बाबू यह बात समझ नहीं सके थे। कलकत्ते में जिन लोगों का अपना मकान नहीं है, जो किराए के मकान में रहते हैं, वे लोग क्या आदमी नहीं हैं ? पूछने पर कहती थी, "मकान बनवाऊंगी तो तुम्हीं लोगों के उपयोग में ६४ आएगा, तुम लोगो की सुविधा के लिए ही यह मकान बनवा रही हूं..." केशव बाबू कहते, "मकान बनते ही झंझटी की शुरुआत होगी। आज इसे हटाओ, कल इमे मरम्मत कराओ, यही सिलमिला चलता रहेगा। किराए के मकान में ही अच्छी तरह से हूँ।" "नहीं। गृहिणी के बाप-भाई किराएदार है, सगे-सम्बन्धी किराएदार हैं। शायद उन्ही लोगो पर रोय गालिय करने के स्थाल से गहिणी में यह व्ययं की इच्छा जगी थी।" लेकिन गृहिणी को यह पता नही था कि केशव बाबू के जीवन की शेष अवधि में यह मकान ही उनके लिए काल सावित होगा । यह मकान ही उनके जीवन की सबसे बड़ी अगाति होगी। एक दिन अचानक लड़की ने कमरे के अन्दर आकर कहा, "बाबूजी, मैं जा रही हूं।" केशव वावू क्या कहे । बोते, "जा रही हो? अच्छा, तो जाओ ." बात तो सही है, लड़की को इसलिए व्याहा है कि पराया घर सभाले। अतः वह अपनी गृहस्थी छोड़कर यहां कब तक पड़ी रहेगी। जाते वक्त निर्मला ने पूछा, "आप इस मकान में अकेले कैसे रहिएगा?" केशव बावू बोले, "तुम इसके लिए मत सोचो। मुझे कोई कष्ट नहीं होगा। मेरे कष्ट को बाबत सोचकर तुम कब तक यहां पड़ी रहोगी ?" "मगर आपकी देख-भाल कौन करेगा?" "तारक । तारक है, वही मैरी देखभाल करेगा।" केशव वायू ने कहा। तारक तब नया-नया था। यह भी शायद ईश्वर का एक तरह का दान ही है। नहीं तो जिस समय उन्हें अपनी देखभाल करने के लिए आदमी को कमी हुई, ठीक उसी समय उनके जीवन में वह कहा से आकर उपस्थित हो जाता? निर्मला बोली, "इससे अच्छा तो यही होगा कि आप इस मकान को किराये पर लगाकर हम लोगो के साथ चलें।" केशव बाबू तब रिटायर हो चुके थे। उस समय उनके लिए कलकत्ता या नीमपुरा एक जैसा ही था। निर्मला के पास जाने की इच्छा भी थी। जोवन भर कलकत्ते से कहीं बाहर नहीं गए थे। उनके लिए नौकरी ही ध्या जप-तप सव कुछ था। लड़की इस तरह कह रही है, चलना चाहिए। शायद मन में ऐसी इच्छा जगी भी थी। लेकिन इसी बीच वासु कहीं से आ टपका। आते ही निर्मला ने उससे कहा, "चाचा जी, बाबू जी को मैं अपने साथ लिए जा रही हूं।" वात सुनते ही वासु चिहुंक उठा, "क्यों ? भैया चले जाएंगे तो घर पर निगरानी कौन रखेगा? इतनी बड़ी प्रोपर्टी की देख-रेख कौन करेगा?" निर्मला वोली, "क्यों, आप.." "मैं ? लगता है जैसे मुझे अपना कोई काम नहीं है ! दिन-भर बैठे-बैठे मैं घर की रखवाली करता रहूंगा? फिर मेरा काम कौन कर देगा?" कुछ देर चुप रहने के बाद भतीजी की ओर देखता हुआ वोला, "देखो, इस मकान पर नज़र मत गड़ाओ। क्या सोचा है कि भैया को अपने साथ ले जाकर इस मकान को हथिया लोगी? लगता है, काशीकांत ने तुम्हें यह सब पाठ पढ़ाया है।" केशव बाबू ने देखा कि अभी दोनों में झगड़े की शुरुआत हो जाएगी। उसके पहले ही उन्होंने वासु को टोका। "तुम यह सब क्या कह रहे हो? मेरी यह हालत देखकर ही ऐसी बातें कर रहे हो ?" "याप नहीं जानते हैं भैया, आप सीधे-सादे आदमी हैं, अभी आपको मंत्रणा देकर अपने पास ले जाना चाहती है, जिससे कि काशीकांत आपका रुपया-पैसा और मकान हथिया सके, ये लोग सोचते हैं कि मैं जैसे कुछ समझ ही नहीं रहा हूं।" काशीकांत अव तक खड़ा होकर सब सुन रहा था। अब वह चुप नहीं रह सका। "देखिए चाचाजी, हम लोग बाबू जी की भलाई की ही खातिर उन्हें ले जाना चाहते थे, अब आप आपत्ति कर रहे हैं, तो फिर हम नहीं ले जाएंगे। वावू जी यहीं रहें, आपकी मनोकामना पूर्ण हो." इतना कहने के बाद काशीकांत वहां रुका नहीं । पत्नी से बोला, "चलो.." केशववादू स्तंभित रह गए। उसके बाद जब अंदर कमरे की ओर जाने को तैयार हुएतो वासु ने कहा, "भैया, आपने मुझे अभी तक रुपया नहीं दिया।" - -
केशव यावू रुपए की बात सुनकर चौंक पड़े।
"रुपए किसलिए?
बासु बोला, "वाह, आप तो भुला ही बैठे। मैंने आपसे कहा था न कि
मुझे हजार पाच के रुपए चाहिए।"
"हजार पाच के रपए !!!"
केशव बाबू जैसे आकाश से गिर पड़े। "अभी मैं पांच हजार रुपए कहां
से गाऊ ? रपए किसलिए चाहिए ?"
अब की वासु ही जसे आसमान से गिर पड़ा हो।
बोला, "वाह, भाभीजी के मरने के पहले से ही आपसे कह रहा हूं, आपने
कहा कि अभी तुम्हारी भाभी बीमार हैं, वे अच्छी हो लें तो फिर तुम्हे दूगा।
यह बात आप बिलकुल भुला ही बैठे?"
केशव बाबू ने पूछा, "रुपया लेकर तुम क्या करोगे?"
"आपसे तो कितनी ही वार बता चुका हू," वासु ने कहा, "फिर भी आप
एक हो वात को दुहरा रहे हैं।"
केशव धावू को यह बात याद आई। वोले, "हां-हो, तुमने कहा था कि
दुकान खोलोगे। किस चीज की दुकान ?"
"स्टेशनरी की दुकान। पहले पाच हजार रुपए से स्टार्ट करूंगा, उसके
बाद माल बेचने पर जो पैसा आएगा, उसी पूंजी से फिर नया माल
खरीदूगा।"
केशव बाबू ने पूछा, "इसमे महीने में कितनी आय होगी ?"
"मैंने हिसाब किया है, पहले महीने में प्रोफिट के तौर पर तीन सौ रुपए
मिलेंगे । वही याद मे हजार रुपए तक पहुच जाएगा।"
"दुकान का किराया कितना होगा?"
वासु बोला, "अगर आपको मुझ पर इतना संदेह हो रहा है तो पैसा मत
दीजिए। फिर मुझे पते की जरूरत नहीं। मैं अपने मन में सोचूंगा कि मेरे मां-
बाप या भाई-बहन कोई नही है."
इतना कह वह गुस्से में आकर तत्क्षण बाहर निकल गया।
केशव बाबू ने पीछे से पुकारा, "अरे, क्रोध में मत माओ, सुनो, ओ वासु,
सुनते जाओ...
- -- . लेकिन वासु वड़ा ही अभिमानी लड़का है। बचपन से ही इसी तरह का है। कुछ कहने पर क्रोध में आकर तुरन्त घर से निकल जाता है। गुस्से में आकर खाना तक नहीं खाता है। केशव वाबू को उसके लिए जगकर कितनी ही रातें वितानी पड़ी हैं। गृहिणी कितनी ही वार कह चुकी थी कि तुम्हारा यह भाई ही अन्त में तुम्हें परेशान करेगा" केशव बाबू गृहिणी को समझाते, "नहीं-नहीं, बात ऐसी नहीं है, बचपन में हर आदमी इसी तरह का क्रोधी होता है, मैं भी मां से विगड़कर कितनी ही बार बिना खाए रह चुका हूं." पर ये सब सांत्वना के ही शब्द थे। केशव वाबू यह सब कहकर अपने ही मन को सान्त्वना देते थे । महाहा, छुटपन में ही जिसकी मां मर गई है, वैसा भाई है, मां क्या वस्तु होती है इसकी जानकारी नहीं है। यही वजह है कि थोड़ा-बहुत अभिमानी है । वड़ा होते ही ठीक हो जाएगा" गृहिणी जव चल वसी तो वासु की देखरेख करने वाला कोई भी न रहा। वे दफ्तर से लौटने के बाद तारक से पूछते, "अरे तारक, भैया जी कहां हैं ?" तारक कहता, "वाहर निकल गए हैं।" केशव वाबू पूछते, "किधर निकला है ?" तारक कहता, "मुझसे कुछ कहकर नहीं गए हैं।" "कव निकला है ?" तारक कहता, "आपके दफ्तर जाते ही तुरन्त निकलकर चले गए।" "खाकर गया है या विना खाए ही ?" तारक कहता, "विना खाए ही।" केशव वाबू कहते, "यह क्या रे ?विना खाए ही सुवह के वक्त निकल गया और अव तक वापस नहीं आया ? ज़रा पता लगाओ न।" लेकिन इतने बड़े कलकत्ता शहर में वह कहां है, इसका पता कैसे चले। प्रायः हर रोज़ इसी तरह का सिलसिला चल रहा था--कभी वह खाना खाता था और कभी विना खाए ही चला जाता था। कब वह घर से निकलता और कब वापस आता, इसका कोई ठीक नहीं रहता था। अंत में वह किसी भी हालत में आई० ए० पास नहीं कर सका । एक दिन केशव बाबू वासु के लिए जगकर बैठे रहे । तब रात के बारह बज रहे थे । ज्यों - ६८ हो उसने मदर दरवाजे की कुडी सटखटाई, केशव बाबू ने खुद ही दरवाजा खोल दिया। शुरू में बासु यह समझ नहीं सका । माई पर नजर पडते ही सिर झुकाकर अन्दर घुम गया। लेकिन केशव बाबू ने छोड़ा नहीं । • इतनी रात तक तुम कहा थे ?" उन्होंने पूछा। वासु ने शुरू में कोई उत्तर नही दिया । अत में बार-बार तकाजा करने के बाद वह बोला, "दोन्तो से गपशप कर रहा था." "दोस्तों से ? दोस्तों से गपशप कर रहे थे ? मुनू तो सही, इतनी रात तक दोस्तो से तुम क्या गप्पें लडाते हो ? दिन मे गप करते रहने के बावजूद गप खत्म नहीं हुआ? और, इतने गपशप हो ही क्या सकते हैं, यह बात मेरी समझ में नहीं आती है । हम भी भैया, कभी तुम्हारी तरह ही छोटे थे, तुम्हारी जैसी ही हमारी भी उम्न कम थी, लेकिन कभी हम गप करते-करते रात के चारह नहीं बनाते थे। ममय पर पाना खाते थे, समय पर सोते थे और पढने के लिए समय पर कालेज भी जाते थे। गपशप में वक्त जामा करने से कोई हाथी-घोड़ा मिल जाता है ? काम न रहने पर मुहल्ले की लाइब्रेरी मे अगर किताव पढ़ा करो तो इससे कम-से-कम ज्ञान तो हासिल होगा। कितने ही महान पुरुषों की जीवनियां हैं, उन्हें पढ-गुनकर बहुत-कुछ सीख सकते हो..." वामु केशव वाबू को इस तरह की बातें एक कान से सुनता और दूसरे कान से निकाल देता था। उसके बाद वासु जव खाना साने बैठना, केशव बाबू भी उसकी बगल में बैठ जाते थे। कहते, "क्यों, साना क्यों नहीं खा रहे हो घोडा-ना नावल और है, खालो।" पामु गरदन नीची करके कहता, "मुझे भूस नहीं है ।" "भूख नहीं है-~का मतलब ? कुछ खाकर आए हो? क्या पाकर याए हो?" बासु किसी भी हालत में बताने को तैयार न था। आखिर में बहुत दवाव डालने के बाद बताया कि उसने घुपना और भालू का दम खाया है। "घुपना और आलू का दम " सुनते ही केशव याबू को गुम्मा हो बाया। "छि -छिः, बाजार की ये सब गंदी-वाहियात चीजें भी कोई खाता है भला? जानते नहीं हो कि ये सव चीजें ६६ कितनी गंदी हुआ करती हैं, उनमें कितने कीटाणु रहते हैं ? गांठ से पैसे खर्च कर यह सब कोई खाता है ? चारों तरफ इतना हैजा और पेट की बीमारी फैली है यह जानते हुए भी तुम ये सब चीजें खाते हो? तुम्हें डर नहीं लगता? घुधना और आलूदम खाने के लिए पैसे तुम्हें किसने दिए ?" "मेरे दोस्तों ने।" केशव बाबू का मन नफरत से भर गया। "ये दोस्त ही तुम्हारा सर्वनाश कर डालेंगे। जब तुम बीमार पड़ोगे, कोई दोस्त देखने तक नहीं आएगा । इस तरह के बहुत-से दोस्त हैं जिन्हें मैं देख चुका हूं। अच्छे वक्त में बहुत-से दोस्त मिलते हैं लेकिन बुरे वक्त में हाय-हाय, कोई किसी का नहीं होता। यह वात. गांठ बांध लो..." वासु अगर भैया की बात सुने तो उसका जीवन सुखमय हो जाए । लेकिन जिसके भाग्य में सुख नहीं है, वह सुखी हो तो कैसे ? उसी वासु में सुमति का उदय हुआ या कुछ और ही विचार जगा, पता नहीं। एक दिन उसने कहा, "मैं स्टेशनरी की दुकान खोलूंगा।" "स्टेशनरी दुकान का मतलव ? जहां कागज, कलम, लाउजन्स, विस्कुट, पावरोटी वगैरह मिलते हैं ?" "हां।" "कितने रुपए लगेंगे ?" वासु ने कहा, "दुकान के लिए पांच सौ पगड़ी देनी है और किराए के रूप में माहवार वीस रुपया है । माल खरीदने में हज़ार पांच के रुपए लगेंगे।" वात बड़ी अच्छी है। कम से कम वासु में व्यवसाय करने की सुमति तो जगी है, यही शुभ लक्षण है। पांच हजार रुपया देने से ही वासु यदि जीवन में खड़ा हो जाए तो बुरा क्या है ! उन दिनों केशव वाबू रिटायर हो चुके थे। प्रोविडेण्ट फंड से कर्ज लेकर मकान बनवाया था। सो भी उन्होंने नहीं, बल्कि उनकी पत्नी ने वन- वाया था। इसकी वजह से ही गृहिणी को सोने के अपने तमाम आभूपण वेचने पड़े थे। लेकिन जिसने मकान बनवाया, वह स्वयं उसका उपभोग नहीं कर सकी। दुनिया में बहुत-से आदमियों के भाग्य में यही घटित होता रहता है। किन्तु - । इसके लिए दुख करने से कोई लाभ तो होता नहीं। किसी की मृत्यु या किसी के अभाव की यह दुनिया परवाह नहीं करती है। वह अपने दावे को पूरा कर ही लेगी, चाहे कोई कितने ही कष्ट के दौर से क्यों न गुजर रहा हो। केशव वाबू के साथ भी यही घटित हुआ था। वासु को उन्होंने पांप हजार रुपए दिए, इसके अतिरिक्त दुकान की पगड़ी के तौर पर पांच गो अलग से। और केशव बावू अगर न दें तो देगा ही कौन? वासु के अपने और है कौन ? रुपया देने के बाद केशव बाबू ने सोचा, अच्छा ही हुआ। अब ये हो और कितने दिनों तक जिन्दा रहेगे । तब यह मकान वासु का ही होगा, वायु ही सव-कुछ का उपभोग करेगा। उसके पहले वाम का व्याह करना है। हमेशा यह अकेला तो रहेगा नही । उसकी भी अपनी गृहस्थी होगी। उसकी गृहस्थी बसाने की जिम्मेदारी केशव बाबू पर ही है। उन दिनों केशव वाबू मन-ही-मन बहुत सपने देखा करते थे। दूसरे-दूसरे लोग जिस तरह सपने देवा करते हैं, वे भी उमी तरह के सपने देख रहे थे। वे सपना देखते कि वाम की दुकान और भी बड़ी हो गई है--विशाल । दस-बारह आदमियों को नियुक्त कर वह मव का मालिक बन बैठा है। ढेरों पैसा, ढेर सारी संपत्ति का उसने उपार्जन किया है। दुनिया मोर समाज के बीच भले आदमी-जैसा वह भी एक यादमी हो गया है। मगर तय उन्हें इस बात का पता कहा था कि एक दिन उनके सारे सपने चूर-चूर हो जाएंगे! १६ तारक गुरू से ही या। एक दिन माकर उसने बताया, "मालिक, एक भने आदमी मापसे मिलने बाए हैं।" "मले आदमी ? मुझसे मिलना चाहते हैं ? कौन हैं ?" "मालूम नहीं। दूढे आदमी हैं, मैं उन्हें नीचे के कमरे में विटा आया है।"
, आश्चर्य की बात है। उनसे मिलने के लिए कौन बाएगा? सोचने पर वे कुछ स्थिर नहीं कर सके। नीचे लाने पर देखा कि एक विलकुल ही अजनवी व्यक्ति है। पूछा, "किससे मिलना चाहते हैं ?" "जी, आप ही केशव बाबू हैं ?" "हां," केशव बालू ने कहा। "लापके नाई वासव मुखोपाध्याय ने मुझसे किराये पर मकान लेकर दुकान खोली थी-मनिहारी दुकान । मापको इस बात की जानकारी है ?" केगव बाबू ने कहा, "हां, पता है।" "वासव वायू कहां हैं ?" केशव बाबू ने जवान होकर पूछा, "क्यों?" "साहब, आपका परिचय देकर मुझसे किराये पर दुकान लेने आया था, इसीलिए मैंने किराये पर लगाया था। लेकिन दो बरसों से आपका भाई मेरे किराये का पता नहीं चुका रहा है।" कहते-कहते उस बादमी का चेहरा तम- - तमा गया। "दो बरसों से किराया नहीं दिया है ?" केशव बाबू आश्चर्य में डूबने- उतराने लगे । “मुझे तो इसके विपय में कुछ भी जानकारी नहीं है, मेरे भाई ने मुझे कुछ बताया भी नहीं है।" केशव बाबू ने कहा । "मैं जानता था कि आपका सगा भाई है, यही वजह है कि मैंने किराये पर मकान दिया था। पगड़ी के तौर पर एक भी पैसा नहीं लिया था। किराया भी वोस पये से कम कर दस पया कर दिया था। आखिर में वे मुझे इस तरह व्ग लेंगे, मैंने यह सोचा तक नहीं था।" भलेमानम ने कहा। केशव बाबू के सिर पर जैसे आसमान टूटकर गिर पड़ा हो । पगड़ी के पैसे बुकाने के लिए वासु को उन्होंने पांच सौ रुपये दिये थे। इसके अलावा दुकान के माल की बाबत पांच हजार रुपये अलग से दिये थे। फिर वे रुपये कहाँ । गए? "अजी साहब, दुकान फैले चले ? माघे दिन तक तो दुकान ही नहीं खोलता है। रात में भी दुकान में लड़कियां ले जाता है। उसके बाद दरवाजा वन्द करके व्य करता है, ईश्वर जाने !" नले मादमी ने कहा। ७२ वाहते-कहते भले आदमी का चेहरा गुस्से से लाल हो गया। "यही कारण है कि मैंने मोचा कि एक बार आपको इत्तिना कर दूं। इसके बाद जो करने का होगा, मैं करूंगा। मैं आपके भाई के नाम कचहरी में मुकदमा दायर करूंगा, यह कहे देता है, उरूरत पड़ी तो दुकान का मान-अम- बाय, जो कुछ भी मिल जाएगा, कुर्क करा सूगा । इसके चलते मेरा चाहे जितना भी पर्व जाए यह कहकर भले आदमी जाने लगे। केशव वायू ने जोर-जबरन उन्हें बिठाया।"देखिए, आप भले आदमी हैं और मैं भी भला आदमी ही हूं। एकाएक मामला-मुकदमा दायर मत कीजिए। 'मैं अपने भाई से बात करूगा। देखिए, वह वा करता है। फिर मैं तो है ही. मैं वादा करता हूं कि आपका सारा बकाया मैं चुका दूगा। आप दो-चार दिनों के चाद दुवारा माने का कष्ट करें।" केशव बाबू ने कहा। भले आदमी के चले जाने के बाद केशव बाबू का मन वहा ही उदाम हो उठा। छिः छिः, वासु अत में यह काड कर बैठेगा, इसकी उन्होंने कल्पना तक नहीं की थी। उन्होंने तारक को पुकारकर पूछा, "छोटे बाबू हर रोज घर आते हैं ? हर रोज खाना खा जाते हैं ?" तारक बोला, "कभी-कभी घर में खाना खा जाते हैं और कभी-कभी नहीं खाते हैं।" केशव वावू ने गुम्से मे आकर कहा,"फिर मुझे इतने दिनो से तुमने बताया क्यों नही ? मुझे तो यह सब-कुछ मालूम नहीं था।" तारक अब क्या कहे ! वह चुपचाप खड़ा रहा। केशव याबू चिन्तित हो उठे। घर में गृहिणी नहीं है। उनकी देखरेख करने के लिए कोई नहीं है । पूरा मकान खाली है । तमाम दिन सोए रहते है फिर भी उनका वक्त नहीं कटता है । उमी तरह उनकी समस्याओं का भी कोई अन्त नहीं है । बिजली का बिल ठीक समय पर चुकाना, कारपोरेशन के दफ्तर में टोक समय पर पंसा दे आना-ये सब भी तो उनके-जैसे बूढ़े यादमी के लिए समस्या ही है। उस पर बाजार से सरो-सामान खरीदकर ले आना। साथ ही साय खर्च के दारे में भी सोचना पड़ता है। उनके पास रपये का कोई अशेप तो है नहीं। मकान किराय पर लगा देने से बच्छा होता, मगर किराये- कहीं परेशान करने लगे तो फिर क्या होगा? इसके बजाय शान्ति कहीं छी चीज है। यही कारण है कि मकान किराये पर नहीं लगाया है। सोचा दो दिन बाद ही वासु की शादी होगी, तब उन्हें अकेले जीना नहीं पड़ेगा। इवहू लाकर उनकी देख-रेख करेगी। लेकिन उनके सारे सिद्धान्त मटियामेट हो गए। उस दिन वे वासु के लिए रात में जगकर प्रतीक्षा करते रहे। बहुत रात बीतने के बाद जब वासु जाया, उन्होंने खुद जाकर दरवाजा खोल दिया। वासु ने कल्पना तक न की थी कि भैया उसके लिए इतनी रात तक जगे रहेंगे। भैया को देखकर वह शर्मिन्दा हो गया। केशव बाबू ने तय किया था कि नाज वे कुछ-न-कुछ फैसला करके ही छोड़ेंगे। "इतनी रात तक तुम कहां थे?" उन्होंने पूछा। वासु ने पहले सिर झुका लिया। फिर झूठी बातें बताई, "दुकान में..." "दुकान में-का मतलब ? अब तक तुम्हारी दुकान है ?" "हाँ," वासु ने कहा, "क्यों नहीं रहेगी, है.." केशव बाबू बोले, "झूठ मत बोलो, तुम्हारी दुकान नहीं रही। तुम्हारी दुकान में माल भी नहीं है। तुम कभी दुकान खोलते भी नहीं हो। मुझे त मालून हो गया है। मकान-मालिक को बतौर सलामी पांच सौ रुपये देने हैं- यह कहकर तुम मुझसे जो रुपये ले गए थे, वह भी नहीं दिया है। तुम हो." । से इतनी बातें एक साथ कहने के वाद केशव वावू हांफने लगे। वासु ने किसी भी अभियोग का उत्तर नहीं दिया। केशव वा बोले, मेरो वातों का जवाब क्यों नहीं दे रहे हो? जवा विना लाज तुम्हें खाना नहीं मिलेगा। मेरी वात का जवाब दो। वताको मकान का किराया नहीने-महीने क्यों नहीं चुकाया? झूठ बोलकर गा? तुम्हारी दुकान के मालिक बाज नुझे सब-कुछ-बता गए हैं। का जवाब दिए बगैर बाज तुम्हें घर में खाना ही नहीं मिलेगा।" ७४ ? - फिर भी वासु की उबान से एक शब्द न निकला। वह जिस प्रकार चुप होकर खड़ा था, वैसा ही रहा । "अब चुपचाप खड़े हो ? अब भी मेरी वात का जवाय न दोगे? फिर चले जाओ, मेरे घर में चले जाओ।निकलो.." वासु अब एक क्षण मो न सका। जिस दरवाजे से आया था, उसी दरवाजे से बाहर चला गया। केशव वाबू हतप्रभ होकर उमी ओर ताकते रह गए। उसके बाद तारक की बात से उनमे चेतना वापस आई। तारक मंभवत: दोनों भाइयों का वार्तालाप छुपकर सुन रहा था। "छोटे दादू को जाकर बुला लाऊं, मालिक ?" उसने पूछा। केशव बाबू ने कहा, नही, "बुलाने की जरूरत नहीं। वह जहां मी हो, जाए। उसके प्रति मेरी कोई जिम्मेदारी नहीं है । जाएगा कहा ? देखना, उसे कही गैर न मिलेगा। वह फिर घर लौट आएगा। तुम खा-पीकर सो रहो यह कहकर वे दोमंजिले के अपने कमरे में जाकर लेट गए। लेकिन बहुत देर तक नोंद ही नहीं आई। रात के अतिम पहर में तंद्रा-मी आई। किन्तु किसी आवाज मे उनकी नीद टूट गई। वे हड़बड़ाकर उठे और विद्यावन पर बैठ गए। मन उदास हो गया। वायु की याद आने लगी। गुस्से के मारे उन्होंने उसे घर से निकाल दिया। पता नहीं, वह कहा चला गया, वहां रात गुजारेगा, कहा किसके घर में किसके बिस्तर पर सोएगा, क्या साया है। हो सकता है कहीं जगह न मिलने पर किसी पार्क की बेंच पर सो गया हो। हो सकता है, बहुत ही भूखा हो। लेकिन दूसरे ही क्षण उन्हें महसूम हुआ कि उन्होंने जो कुछ भी किया है, ठीक ही किया है । वाम को सबक मिलना चाहिए। जीवन-भर वामु उन्हें परे- शान हो करता आया है। वासु हमेशा उनका पैसा ही उड़ाता रहा है, हालाकि बन वह बच्चा नहीं है। वामु की जो अभी उम्र है, केशव वायू उस उम्न में नौकरी कर पैसा कमाते थे। पंना कमाना क्या मासान बात है ? पंमा उड़ाना आमान है, उड़ाने में किसी अजल की जरूरत नहीं पड़ती है। लेकिन पैमा कमाते हुए, सहयोगियों से आगे निकल जाना कितने कप्ट से होता है, केशव याबू से अधिक यह वात पिसी को मालूम नहीं। साक्षी था तो एक ही व्यक्ति, । ।
- गृहिणी ! सिर्फ उसे ही यह मालूम था, उसने ही देखा था, को समझती थी। वह जानती थी इसीलिए उनसे कुछ कहती न थी। उन दिनों परिवार की म परेशानियों और झंझटों से उन्हें दूर रखकर सारा वोझ उसने अपने थे पर उठा लिया था। गृहिणी गृहस्थी की देखभाल करती थी और वे मन गाकर एकमात्र नौकरी का ही काम करते थे। नींद टूटते ही उन्होंने तारक को पुकारा। पूछा, "छोटे वाबू पिछली रात फिर आए ही नहीं?" तारक वोला, "कल आपने खुद ही उन्हें भगा दिया था।" केशव बाबू वोले,"सो तो किया, मगर रात भर वह कहां रहा, क्या खाया, यह सब सोचना होगा न? तुम सड़क पर जरा जाकर देखनाओ न, अगर कहीं मिल जाए." तारक ने कहा, "सड़क पर उन्हें खोजूं ? छोटे वावू क्या सड़क पर मिलेंगे ? हो सकता है किसी दोस्त के घर पर चले गए हों और रात में वहीं ठहर गए हों।" 'अगर उसके किसी दोस्त को पहचानते हो तो वहीं चले जाओ। कहना कि मैं उसे बुला रहा हूं। यासु के किसी मित्र के मकान को पहचानते हो?" तारक उसके दोस्तों को ही नहीं पहचानता, फिर उनके मकानों को कैसे पहचानेगा? फिर भी केशव वाबू ने कहा, "जो हो, तुम एक बार कोशिश करके देखो छोटे बाबू ने जो दुकान खोली है, उसी दुकान में जाकर एक वार देख आओ हो सकता है कि उसी दुकान में जाकर उसने रात गुजारी हो। कुछ कहा न जा सकता।" तारक चला गया। एक घंटे के बाद लौटकर उसने बताया, "नहीं, नहीं।" "मिले नहीं-का मतलव ? वह दोस्तों के घर पर नहीं मिला?" तारक वोला, "उनके दोस्तों को मैं पहचानता नहीं हूं। छोटे व मनिहारी दुकान ही गया था। वहां कोई नहीं है। दुकान में ताला लटक अब क्या किया जाए ? जव कहीं है नहीं तो क्या किया जा सकत
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दे दी है। आपको यह सूचना नहीं मिली है ? आपको तो मैं सव कुछ खुद जाकर बता आया था, साहव !" केशव वावू का विस्मय दुगना हो गया। "आपने उसे निकाल दिया है ?" "हां, मुकदमा दायर करके निकाल दिया है। कोर्ट से आर्डर पाकर पुलिस की मदद से दुकान पर कब्जा किया। इसे हुए एक साल का अरसा गुजर चुका केशवबाबू कुछ देर तक वहां स्तब्ध बैठे रहे। उसके बाद वोले, "अव क्या होगा ?" मकान-मालिक ने कहा, "देखिए, आपको सब कुछ साफ-साफ बता रहा । आपके भाई से व्यवसाय नहीं हो पाएगा। यह बात मैं आपसे साफ कह रहा हूं। इतने दोस्त-मित्रों के साथ रात-दिन दुकान में बैठकर अड्डेवाजी करने से कहीं दुकान चलती है ? माप सुनकर चकित हो जाइएगा, साहव, कि आपका भाई यार-दोस्तों के साथ दुकान के अन्दर बैठकर शराव पीता था।" "दुकान में बैठकर शराब पीता था ?" "हां साहव ! फिर मैं आपसे कह ही क्या रहा हूं? आपके जैसे सज्जन भलेमानस का सगा भाई कैसे इस तरह का शैतान हो गया, यही समझ में नहीं आता। मैंने बहुत दिनों तक बरदाश्त किया। लेकिन अब कान पकड़ता हूं साहब । अव नहीं। अव कोट-पैंट और गोरा-चिट्टा देखकर मैं चंगुल में फंसने नहीं जाऊंगा । गोरा-खूबसूरत चेहरा देखकर ही मैंने सोचा था कि भला आदमी है । लेकिन मुझे सवक मिल चुका, साहवं । अव नहीं । अवको जिसे किराये पर मकान दिया है, उससे नकद दस हजार रुपये सलामी के तौर पर वसूल लिया है। एक बार बेवकूफी कर चुका हूं, अव उसे दुहराने नहीं जा रहा हूं। अवकी मुझको बहुत बड़ा सवक मिल चुका है..." केशव वाबू ने कहा, "आपने जो कुछ किया है, अच्छा ही किया है। मैंने भी उसे घर से निकाल दिया है।" मकान मालिक ने कहा, "अच्छा ही किया है, साहव । वहुत ही अच्छा। अव उसे घर के अन्दर मत घुसने दें। उसी की भलाई की खातिर उसे घुसने नहीं देना चाहिए। मैं होता तो ऐसे भाई को काटकर दो टुकड़े कर देता। मैं साहब, साफ-साफ कहना जानता हूं, मैं साफ-साफ बातें पसन्द करता हूं। - ७८ जो अन्याय करेगा, उसके प्रति मुझमे दया-माया नहीं है। मेरे विचार से उसे सजा देनी ही चाहिए।" केशव बाबू अव वहां रुके नही । उठकर खड़े हो गए। उसके बाद सीधे नीचे उतरकर अपने घर लौट आए। साथ मे तारक भी आ रहा था, मगर उससे एक भी बात तक न की। केशव बाबू का मन उसी दिन से व्याकुल था। एक ही भाई है, उसे भी आदमी नहीं बना सके । उनका इतना बड़ा यह दुःख कभी दूर नहीं होगा। १७ एक दिन अचानक वासु घर लौट आया। रूसे बाल । बहुत दिनों से खाना नहीं मिला। कमीज़ फटी हुई। चेहरा दाढी-मूछों से भरा हुआ। देह सूखकर लकड़ी हो गई थी। केशव वायू बोले, "अयं, तुम हो। तुम्हारा चेहरा कैसा हो गया? इसने दिनो तक कहां थे?" उसने एक बात का भी उत्तर न दिया। नहीं दे। केशव बाबू ने तारक को पुकारा और उससे कहा, "खाने का कोई सामान है ? नहीं है तो दुकान से कुछ खरीदकर ले आओ।" यह कहकर उन्होंने उसे पांच रुपये दिए । उसके बाद वासु से कहा, "जो होने को था, हो चुका, तुम इसके लिए दुखी मत होओ। अभी बाथरूम जाकर नहा-धो लो और कपड़े बदलकर आओ। तारक तुम्हारे लिए खाने का सामान लाने गया है। पाकर सो रहना । उसके याद चावल बन जाएगा तो तुम्हे जगा दूंगा।" अन्त में ऐसा प्रतीत हुआ जैसे कुछ हुआ ही नहीं हो। मानो घर का लड़का लौटकर घर चला आया है। वामु ने शान्त-शिष्ट वालक की तरह खाना खाया। खाकर सो गया। केशव बाबू ने उसके लिए बाजार से मांस-मछली मंगवाया। मानो वहुत दिनों के बाद घर में किसी उत्सव की धूमधाम हो रही हो । नीद टूटने के बाद वासु ने भरपेट चावल खाया । केशव वाबू ने बार-बार ७६ दे दी है। आपको यह सूचना नहीं मिली है ? आपको तो मैं सब कुछ खुद जाकर बता आया था, साहब !" केशव वाबू का विस्मय दुगना हो गया। "आपने उसे निकाल दिया है ?" "हां, मुकदमा दायर करके निकाल दिया है । कोर्ट से आर्डर पाकर पुलिस की मदद से दुकान पर कब्जा किया। इसे हुए एक साल का अरसा गुजर चुका . केशवबाबू कुछ देर तक वहां स्तब्ध बैठे रहे । उसके बाद बोले, "अव क्या होगा ?" मकान-मालिक ने कहा, "देखिए, आपको सव कुछ साफ-साफ बता रहा हूं । आपके भाई से व्यवसाय नहीं हो पाएगा। यह बात मैं आपसे साफ कह रहा हूं। इतने दोस्त-मित्रों के साथ रात-दिन दुकान में बैठकर अड्डेवाजी करने से कहीं दुकान चलती है ? आप सुनकर चकित हो जाइएगा, साहव, कि आपका भाई यार-दोस्तों के साथ दुकान के अन्दर बैठकर शराव पीता था।" "दुकान में बैठकर शराब पीता था ?" "हां साहब ! फिर मैं आपसे कह ही क्या रहा हूं? आपके-जैसे सज्जन भलेमानस का सगा भाई कैसे इस तरह का शैतान हो गया, यही समझ में नहीं आता। मैंने बहुत दिनों तक बरदाश्त किया। लेकिन अब कान पकड़ता हूं साहब । अब नहीं । अब कोट-पैट और गोरा-चिट्टा देखकर मैं चंगुल में फंसने नहीं जाऊंगा । गोरा-खूबसूरत चेहरा देखकर ही मैंने सोचा था कि भला आदमी है। लेकिन मुझे सवक मिल चुका, साहवं । अव नहीं । अवको जिसे किराये पर मकान दिया है, उससे नकद दस हजार रुपये सलामी के तौर पर बसूल लिया है। एक बार वेवकूफी कर चुका हूं, अव उसे दुहराने नहीं जा रहा हूं। अवकी मुझको बहुत बड़ा सवक मिल चुका है..." केशव वाबू ने कहा, "आपने जो कुछ किया है, अच्छा ही किया है। मैंने भी उसे घर से निकाल दिया है।" मकान-मालिक ने कहा, "अच्छा ही किया है, साहव । बहुत ही अच्छा । अब उसे घर के अन्दर मत घुसने दें। उसी की भलाई की खातिर उसे घुसने नहीं देना चाहिए। मैं होता तो ऐसे भाई को काटकर दो टुकड़े कर देता। मैं साहव, साफ-साफ कहना जानता हूं, मैं साफ-साफ बातें पसन्द करता हूं। ।
जो अन्याय करेगा, उसके प्रति मुझमें दया-माया नहीं है। मेरे विचार से उसे सजा देनी ही चाहिए।" केशव बाबू अब वहां रुके नही । उठकर खड़े हो गए। उसके बाद सीधे नीचे उतरकर अपने घर लौट आए। साथ में तारक भी आ रहा था, मगर उससे एक भी वात तक न की। केशव वावू का मन उसी दिन से व्याकुल था। एक ही भाई है, उसे भी आदमी नहीं बना सके । उनका इतना बड़ा यह दुःख कभी दूर नहीं होगा। एक दिन अचानक वासु घर लौट आया। रूसे वाल । बहुत दिनो से खाना नहीं मिला। कमीज़ फटी हुई। चेहरा दाढी-मूछों से भरा हुआ। देह सूखकर लकड़ी हो गई थी। केशव वाबू बोले, "अयं, तुम हो। तुम्हारा चेहरा कैसा हो गया? इतने दिनो तक कहां थे?" उसने एक बात का भी उत्तर न दिया। नहीं दे । केशव बाबू ने तारक को पुकारा और उससे कहा, "खाने का कोई सामान है ? नहीं है तो दुकान से कुछ खरीदकर ले आओ।" यह कहकर उन्होंने उसे पांच रुपये दिए। उसके बाद वासु से कहा, "जो होने को या, हो चुका, तुम इसके लिए दुखी मत होओ। अभी बाथरूम जाकर नहा-धो लो और कपड़े बदलकर आओ। तारक तुम्हारे लिए खाने का सामान लाने गया है। खाकर सो रहना । उसके बाद चावल बन जाएगा तो तुम्हे जगा दूंगा।" अन्त में ऐसा प्रतीत हुआ जैसे कुछ हुआ ही नही हो । मानो घर का लड़का लोटकर पर चला आया है। वासु ने शान्त-शिष्ट वालक की तरह खाना खाया। खाकर मो गया। केशव वाबू ने उसके लिए बाजार से मांस-मछली मगवाया। मानो बहुत दिनों के बाद घर मे किसी उत्सव की धूमधाम हो रही हो । नींद टूटने के बाद बासु ने भरपेट चावल खाया। केशव वावू ने बार-बार न . - कर मांस-मछली खिलाया। वासु सव-कुछ साफ कर गया । भैया के एक ब्द का उसने प्रतिवाद न किया। केशव वावू ने निश्चिन्तता की सांस ली। T, माहा, बच्चा है, गलती कर बैठा। इस तरह की गलती सभी करते हैं। के लिए सजा देने से लाभ ही क्या है ? वासु के अलावा उनका अपना है ही न? लड़की की तो शादी हो चुकी है। उसके लिए उन्हें अब कोई चिन्ता हों है। चिन्ता है तो सिर्फ अपने इस भाई के लिए। वे मर जाएंगे तो यह मकान वासु को ही मिलेगा। वे जव न रहेंगे तो वासु के अलावा कोई भी इस जायदाद की देखभाल करने वाला नहीं रहेगा। अत: वे मरने के पहले यह देखकर जाना चाहते हैं कि वासु कम-से-कम आदमी हो जाए। कुछ दिनों के बाद उन्होंने वासु को फिर अपने पास बुलाया। वोले, "अव. बहुत दिन हो चुके, कुछ न कुछ काम शुरू करो। हमेशा वैठे रहने से चल नहीं सकता। क्या करोगे, इस पर सोचा है ?" वासु बोला, "सोच रहा हूं कि टैक्सी का लाइसेन्स ले लू "टैक्सी का लाइसेन्स? टैक्सी चलाओगे?" वासु ने हामी भरी। केशव वावू अचकचा उठे । अन्त में कुछ सोचकर बोले, "अच्छी बात है। अपनी चीज़ खुद ही चलाना अच्छा रहता है। और सम्मान ? सम्मान की बात सोचने से जीवन में कुछ भी नहीं कर सकोगे। बहुत ही अच्छी लाइन के बारे में सोचा है। मगर लाइसेंस मिल जाएगा?लाइसेंस मिलना क्या इतना आसान है ?" वासु बोला, "मेरे एक मित्र ने कहा है कि वह लाइसेन्स का इन्तज़ाम कर देगा। उसे हजार-एक रुपया देना पड़ेगा।" अच्छी बात है। केशव बाबू ने सोचा, आदमी गलती करता है, फिर ए दिन अपनी गलती को सुधार लेता है। एक वार गलती कर बैठे तो जीवन- उसे सजा दी जाए, यह ठीक नहीं। और, वासु तो अभी लड़का है, गलती क उसके लिए स्वाभाविक है। आखिरकार यही हुआ। केशव वावु को जो प्रोविडेण्ट फण्ड के रुपये थे, उन रुपयों में से गिनकर तीन हजार वासु को दिए। वासु उन रुपयों से टैक्सी खरीदकर चलाने लगा। ८० केशव बाबू ने निश्चिन्तता की सांस ली। सोचा, खैर, इतने दिनों के बाद इसकी बुद्धि में जो सुधार आया है, यही शुभ लक्षण है। - १८ निमंला अब तक अपने पति के घर में सुख से ही थी। बचानक एक दिन वह कलकत्ता आई। साथ में काशीकान्त या। काशीकान्त अजीब आदमी है । जैसा पेटू वैसा ही घूमखोर । यो कहा जाए तो दुनिया में हर कोई पेटू और घूसखोर है । सभी खाने के लिए ही जिन्दा रहते हैं, जिन्दा रहने के लिए कितने लोग खाते हैं ? और घूम ? कोई नकद लेता है और कोई सरो-मामान के तौर पर। मुना है, गांव के दरोगा को घूस में अगर नकद रुपया नहीं मिलतातो बत्तख के अंडे, मचान पर के लौकी-कुम्हड़ा, तालाब की मछलियां-यह सब भी लेता है। लोग तो उसे भी घूस ही कहते हैं । उस ज़माने में लोग वस्शीश देते थे, लेकिन मन में यह जानते थे कि घूस ही दे रहे हैं। काशीकान्त के चरित्र मे एक बहुत बड़ा दोप था। वह दोप बहा ही खतर- नाक था। और यह था उसकी महत्त्वाकांक्षा । यह महत्त्वाकाक्षा ही सारे बनों की जद होती है। काशीकांत की इसी महत्त्वाकांक्षा के कारण निर्मला को बहुत बड़ा मूल्य चुकाना पड़ा। निर्मला को यानी उसके पिता को। काशीकान्त बहुत दिनों से निर्मला से कहता आ रहा था कि नौकरी करने से कुछ भी नहीं पाएगा। निर्मला कहती, "नोकरी न करोगे तो करोगे क्या?" काशीकान्त कहता, "क्यों, नौकरी के अलावा दूसरा कोई रास्ता नहीं है ? में व्यापार करूंगा।" निर्मला कहती, "व्यापार ? किस चीज़ या व्यापार करोगे?" काशीकान्त कहता, "किसी भी चीज का व्यापार क्यों न किया जाए, लाम ही होगा। दो-तीन सौ रुपये माहवार को नौकरी से वह कही अच्छा है । उसमें ८१ नी से मेरी जेब में दो-तीन सौ रुपये आ जाएंगे। तब तुम जितना गहना- चाहो, ले सकती हो । आराम से मोटर पर धूम सकती हो।" निर्मला कहती, "व्यापार करने के लिए बहुत पैसे की ज़रूरत पड़ेगी ना पैसा तुम कहां से लाओगे?" काशीकान्त कहता, "यही वजह है कि तुमसे कह रहा हूं। तुम अपने पताजी से कहकर कुछ हज़ार रुपये का इन्तज़ाम करा दो। तुम्हारे पिताजी की इतनी बड़ी जायदाद है, वालीगंज-जैसी जगह में इतना बड़ा मकान है, प्रोविडेण्ट फण्ड से भी ढेर-सारा पैसा मिला है । दामाद की भलाई के लिए वे कुछ हज़ार रुपये नहीं दे सकते ?" निर्मला कहती, "मैं वावूजी से पैसे नहीं मांग सकती हूं।" काशीकांत कहता, "तुम मांग नहीं सकती हो, मगर तुम्हारे चाचा कैसे मांगते हैं ? तुम्हारे चाचाजी ने स्टेशनरी की दुकान के पीछे वाबूजी के वारह हज़ार रुपये गंवा दिए थे। अव टैक्सी का लाइसेन्स लेकर टैक्सी चला रहे हैं। सुनने में आया है कि उसके लिए भी तुम्हारे पिताजी ने तीस हजार रुपये दिए हैं। उनके लिए जव इतने-इतने रुपयों का इन्तज़ाम हो सकता है तो तुम तो उनकी एकमात्र सन्तान हो, तुम्हारे लिए कुछ हज़ार रुपयों का इन्तजाम क्यों नहीं हो लता ? हालांकि अपने पिता की सारी संपत्ति की हकदार तुम्ही हो।" रोज़-रोज़ यही वात सुनते-सुनते निर्मला के कान पक गए थे। काशीकान्त की वात असत्य नहीं है। पिता के सारे पैसे की उत्तराधिका- रिणी तो एकमात्र निर्मला ही है। अतः उस पैसे का हिस्सा चाचा को क्य मिले ? चाचा जी ही अगर सारे पैसे ले लें तो पिताजी की मृत्यु के बाद उस हिस्से में आएगा ही कितना? लड़की-दामाद को देखकर केशव वाबू प्रसन्न हुए। वीरान मकान में के वावू अकेले ही रहते हैं। लड़की-दामाद के आ जाने से घर में फिर से चल पहल छा गई। लोगों के आ जाने से मुझमें ज़िन्दगी आ गई में अकेले रहना अव अच्छा नहीं लगता, वक्त काटे नहीं कटता है।" काशीकांत ने कहा, "वाबूजी, आप एक बार हमारे यहां चलिए बोले, "तुम केशव वाबू ८२ काफी खुली हवा मिलेगी। यहां का पानी बड़ा ही अच्छा है, आपकी सेहत ठीक हो जाएगी, तबीयत बुम हो जाएगी।" "मेरे भाग्य में यह कहा है, बेटा। तुम्हारी मान यह मकान बनाकर मेरे निगर्वनाश का बीज वो गई है। मकान किमरे हायों में सौंपकर जाऊं, यही मौवना हु। यह मकान ही मेरे लिए काल हो गया है।" मचमुच, अगर यह मकान न रहना तो जब वहां चाहते थे डामकाये। किराये का मकान रहतातो वे किसी की परवा नहीं करते । धनपर कहां पानी जमा हो गया है, दीवार की रेत कहां झड़ गई है यह सब उन्हें नहीं देखना पड़ना । राज-मिस्त्रियों की सुनामद नहीं करनी पड़ती, वे लोग ओयों में पून झान रहे हैं या नहीं यह सब उन्हें नही दैनना पड़ता। मान-मालिकको डाटने पटकारने से ही बेखटके मारा इन्तजाम हो जाता। उन बाद है टैन । पत्रकता-कारपोरेशन के दस्तर में जाकर टेश्म की वारत मोटी रकम रिश्वत के तौर पर भी नहीं देनी पड़ती। उसके बाद पार पानी है, मो कल नहीं है । मकान के सामने का काम-कबरा नियमपूर्वक हाया नहीं जाता है। अपना मकान न होना तो यह सब वान मोचने की जरूरत हो नधी। गरिन अब इस वुढारं में यह मर मोचन में कोई काम नहीं। उनकी गृहिनी गृहलक्ष्मी यो। मलाई हो, इसी के लिए दह मकान बना गई थी। उन्हान जब मकान बनवाया, तर उन्हें इसकी जानकारी नहीं योकि वह उनका उपमान नहीं कर पाएगी। बगर नानी तो जिन्दगी-नर आधा पेट पाकर, खचं से कटौती कर, तरुनी झंलकर यह मान का दनवाती ? निर्मला ने ही बाल पहले छड़ी, "बाळ, इनका कहना है कि नौकरी छोड़करदेवासार करेंगे।" कंगन बाब चिक में, "यापार? का कह रही हो?" और उन्होंने भागलकीवीर ताका। बागीकान बौना, "हां वानी, भारको सड़की ठीक ही कह रही है। आनकल नौकरी में कोई रन नहीं रहा। पहले के माहब भी ची गर योर उनके जाने के बाद नौकरी कीसव मी विदा हो गई।" "नुमकिन धीज का कारोबार करना चाहते हो?" - . . "पांच हजार काशीकान्त ने उत्तर दिया, "मछली का। मछली का कारोबार करूंगा।" "कह रहे हो कि मछली का कारोबार करूंगा, मगर इसके पहले कभी किया है ?" काशीकान्त ने कहा, "मैंने नहीं किया है, लेकिन मेरा एक मित्र मछली का कारोबार करके मालामाल हो गया है। वह राजस्थान से मछली खरीदकर लाता है और उसे कलकत्ते के बाज़ार में वेचकर हर रुपये में दो रुपया फायदे के तौर पर कमाता है। तव हां, शुरू में पूंजी के रूप में मोटी रकम लगानी पड़ती है। मेरे सामने इसी पूंजी की कमी है।" केशव वाबू ने पूछा, "शुरू में कितनी पूंजी लगानी है ?' "पांच हजार रुपया होने से ही काम चल जाएगा?" में ही हो जाएगा?" "शुरू में पांच हजार लगाऊंगा, उसके बाद और रुपयों की जरूरत पड़ी तो आपसे मांग लूंगा।" इसके बाद में काफी वहस-मुवाहसा चला ! काशीकान्त दो-तीन दिनों तक ससुराल में ही रहा। केशव बाबू ने बहुत समझाया-बुझाया। आज के दिनों में एक बार नौकरी चली जाए तो फिर मिलना मुश्किल है। और काशीकान्त नौकरी छोड़ना चाहता है ! अन्त में सोचा, उन्हें कोई लड़का तो है नहीं। जो है, लड़की ही है। चाहे लड़का कहो, चाहे लड़की, एक निर्मला ही है। उनके मरने के बाद निर्मला ही इस मकान की मालकिन होगी। तब सारी जायदाद की उत्तराधिकारिणी वही होगी। आखिरकार उन्होंने कहा, "ठीक है, तुम्हें पांच हजार रुपये दूंगा। तुम अगर सोचते हो कि मछली का कारोबार कर तुम पैसे वाले हो जाओगे तो वही करो, बेटा ! मुझे अव कितने दिनों तक जीना है ! मैं अब ज्यादा दिनों तक जिन्दा नहीं रहूंगा। तुम्हें तरक्की करते देखूगा तो मैं सुखी हूंगा।" काशीकान्त विचारवान व्यक्ति है। वोला, "शुरू में आप पर ज्यादा भार नहीं डालंगा। यों शुरू में मुझे ज्यादा पैसे की ज़रूरत है भी नहीं। पहले आप दो हजार रुपये ही दें, मैं इसी से शुरूआत करने की कोशिश करूंगा। उसके बाद जव देखूगा कि अच्छा फायदा हो रहा है तो ज़रूरत पड़ने पर आपसे मांग लूंगा।" , - ८४ केशव वादूने सोचकर देखा, प्रताद बुरा नहीं है। दोने, "ठीक है, मैं तुम्हें दो हजार सौ देता है. नुन नोचित समझो, करो।" कामीकान्त ने अत्यन्त उल्लास के साय नोकरी छोड दी, सोनोव के हवाले किया और रावस्यान रवाना हो गया। सरकारी कार्टर साली कर निर्मला को गव बाबू के पास रख गया । रानन्यान से वह कलकते के बाजार में मनीभेजेगा। तीन-चार माये किलो की दर में मनो खरीद कर करते के बाजार में चीन सये किलो की दर से वैमा। देहद लाभ होगा। दो बार मान में ही लसपती ही जाऊगा। तब जितनी इच्छा हो, गहना-नाड़ी खरीदो, तब तुम्हें मना नहीं करूंगा, रोगा नहीं। निर्मला इसी भरोसे पर वार के पान आकर रहने लगी। इससे वाप-बेटी दोनों को सुविधा हुई। वल्कि देवरेल करने के लिए वार को एक सादनी मिल गया। तब ने निर्मलाही घर की मालकिन बन बैठी। हाम रैमनुष्य और हाय री उसकी निति ! किन बुरे क्षणों में केशव वाबू की पत्नी ने यह मान वनवाया पा, पठा नहीं। अपने गौक-शान को तिलांजलि देकर, सभी को मुन मुविधा के लिए एड़ी चोटी का पसीना एक कर, माथे पर धूप-बारिश-आंधी झेलकर उमने यह मकान बनवाया या। लेकिन अन्ततः उसकी परिमित क्या हुई? मगर उन्हें पही ने ही इस बात का पता रहता तो दय केगव दा को भी पता नहीं था कि जीवन भर साहद की खुशामद कर नौकरी करने के बाद उनकी यह हालत होगो ! उनी ममय एक बार घटित हमा। अचानक पाने में एक आवस्यक पत्र ८१ आया। उनके पते पर वासव मुखोपाध्याय के नाम से जो टैक्सी है, उस टैक्सी से एक दुर्घटना घटी है। तीन व्यक्तियों को कुचलकर टैक्सी लापता हो गई है। टैक्सी के मालिक को अमुक तिथि के वीच पुलिस-कोर्ट में हाजिर होना है वरना उचित कार्रवाई की जाएगी। पत्न मिलते ही केशव वाबू के माथे पर जैसे वज्रपात हुआ हो। जिसके नाम से पत्र है, वह कहां है। मालूम नहीं। लेकिन पत्र उन्हीं के पते पर भेजा गया केशव वाबू तत्क्षण थाने में जाकर हाज़िर हुए। पत्र दिखाते हुए कहा, "देखिए, यह पत्र जिसके नाम से है, मैं उसका बड़ा भाई हूं। उसका कहीं पता नहीं है ऐसी हालत में मैं अभी क्या करूं?" मामला एक ही दिन में खत्म नहीं हुआ। आदमी शेर के फेर में पड़ जाए तो अठारह घाव और पुलिस के फेर में पड़ जाए तो छत्तीस घाव । और रुपया ? रुपयों का श्राद्ध होने लगा। वकील और कचहरी के चप- रासी से लेकर पेशकार, क्लर्क तक की पूजा करनी पड़ी। केशव वावू को छह महीने तक कोर्ट-कचहरी और थाने में दौड़-धूप करनी पड़ी। देह थककर चूर-चूर हो गई। केशववावू जब कचहरी से घर आते, निर्मला बाप को खरी-खोटी सुनाती, "ठीक हुआ है, चाचाजी को और रुपया दीजिए, और देखिए, आपको उचित सबक मिला है..." केशव वाबू कहते, "वताओ, मैं क्या करूं! सगा भाई है, विपत्ति में अगर मैं सहायता न करूं तो कौन करेगा? सिवा मेरे उसका है ही कौन ?" निर्मला कहती, "मैं होती तो ऐसे भाई का गला घोंट देती।" केशव बाबू कहते, "ऐसा मत कहो। मरने के समय पिताजी तुम्हारे चाचा को मेरे हाथों में सौंप गए थे। कहा था, 'केशव, इसे तुम्हारे हाथों में सौंपकर जा रहा हूं, इस पर नज़र रखना..' जिस तरह आदमी के जीवन में सुख हमेशा नहीं रहता, दुःख के साथ भी यह बात लागू होती है । दुःख की भी एक सीमा होती है। पुलिस को मोटी रकम देने के बाद मामला दव गया, लेकिन इसी वजह से लड़की से झगड़े की शुरुआत हो गई। - 1 निर्मला ने कहा, "अगर चाचाजी को कभी इस घर में कदम रसने दिया तो फिर में देख लूगी। आप जीवन-भर माई के लिए अब मारते रहिएगा, इसके वाद अगर चाचा घर आए तो में गले मे फन्दा लगा सूगो। मैं आपसे यह कहे देती हूं." केशव बाबू ने सोचा, गुस्से में आदमी ऐसी बातें बोलता ही है। लेकिन मचमुच निर्मला ऐसा काण्ड कर बैठेगी, इसका पता किसे था? एक दिन बासु एकाएक फिर मे आ धमका। कराव बावू ने अचकचाकर कहा, "तुम इतने दिनों तक कहां थे?" वामु ने उत्तर नहीं दिया । अपराधी की तरह सामने चुपचाप घडा रहा। केगव बाबू ने दुवारा सवाल किया, "तुम्हारा चेहरा कैसा हो गया है ! कुछ खाया नहीं है ? तुम्हारी टैक्सी कहा है ? तुम इतने दिनों नफ पाहा पे' तुम्हारे कारण मैं कचहरी की धूल छानता रहा, ढेर सारा पैसा भर आया और तुम्हारा कोई पता ही नहीं।" वासु ने इस बात का भी कोई उत्तर न दिया। केशव बाबू ने तारक को पुकार कर कहा, "अरे डोरे वायू लौट आए हैं। उनके लिए चावल पकाओ, वाजार जाकर अच्छी मन्छी ले आओ।" यह कहकर बाजार के लिए पैसा दिया। निर्मला बुडबुढाने लगी। हालांकि उसने गले मे फन्दा लगाने की यात कही थो, पर ऐसा किया नहीं। उसके बाद एक ही मकान में भतीजी और चाचा दिन-दिन जैगा जैसा काण्ड करने लगे, जिस भाषा में एक-दूसरे को गाली-गलौज करने लगे कि चोच- बीच में गव बाबू को अंगुलियो से कान बन्द कर लेना पड़ता था। और जब यात बरदाश्त के बाहर हो जाती, सामने के पार्क में एकांत बेंच पर जाकर बैठ जाते थे। केशव बाबू के मन की जिन दिनों गह हालत थी, उन्ही दिनों हम दोनों में जान-पहचान हुई। इसी परिचय के संदर्भ में उनके जीवन को वासदी का मुझे पता चला। पैसे के अमाय का दुःख समझा जा सकता है परन्तु पैसा या जायदाद रहने पर 7। उनके पते पर वासव मुखोपाध्याय के नाम से जो टैक्सी है, उस टैक्सी एक दुर्घटना घटी है। तीन व्यक्तियों को कुचलकर टैक्सी लापता हो गई टैक्सी के मालिक को अमुक तिथि के बीच पुलिस-कोर्ट में हाजिर होना है रना उचित कार्रवाई की जाएगी। पत्र मिलते ही केशव वाबू के माथे पर जैसे वज्रपात हुआ हो। जिसके नाम पन्न है, वह कहां है। मालूम नहीं। लेकिन पत्र उन्हीं के पते पर भेजा गया ह। केशव बाबू तत्क्षण थाने में जाकर हाज़िर हुए। पन दिखाते हुए कहा, "देखिए, यह पन्न जिसके नाम से है, मैं उसका बड़ा भाई हूं। उसका कहीं पता नहीं है ऐसी हालत में मैं अभी क्या करूं?" मामला एक ही दिन में खत्म नहीं हुआ। आदमी शेर के फेर में पड़ जाए तो अठारह घाव और पुलिस के फेर में पड़ जाए तो छत्तीस घाव । और रुपया ? रुपयों का श्राद्ध होने लगा। वकील और कचहरी के चप- रासी से लेकर पेशकार, क्लर्क तक की पूजा करनी पड़ी। केशव बाबू को छह महीने तक कोर्ट-कचहरी और थाने में दौड़-धूप करनी पड़ी। देह थककर चूर-चूर हो गई। केशववाबू जब कचहरी से घर आते, निर्मला बाप को खरी-खोटी सुनाती, "ठीक हुआ है, चाचाजी को और रुपया दीजिए, और देखिए, आपको उचित सवक मिला है..." केशव वाबू कहते, "वताओ, मैं क्या करूं! सगा भाई है, विपत्ति में अगर सहायता न करूं तो कौन करेगा? सिवा मेरे उसका है ही कौन ?" निर्मला कहती, "मैं होती तो ऐसे भाई का गला घोंट देती।" केशव वावू कहते, "ऐसा मत कहो। मरने के समय पिताजी तुम्हारे चाचा को मेरे हाथों में सौंप गए थे। कहा था, 'केशव, इसे तुम्हारे हाथों में सौंपकर जा रहा हूं, इस पर नज़र रखना..' जिस तरह आदमी के जीवन में सुख हमेशा नहीं रहता, दु:ख के साथ भी यह बात लागू होती है । दुःख की भी एक सीमा होती है। पुलिस को मोटी रह देने के बाद मामला दव गया, लेकिन इसी वजह से लड़की से झगड़े की शुरू हो गई। मैं ~ - ८६ केशव वावू ने कहा, "वह मेरे मकान पर नजर गड़ाए है ! क्या कह रही हो तुम?" । "आपसे जो कह रही हूं, सच ही कह रही है। आप पार्क में जाकर बैठे रहते हैं। आपको कुछ पता ही नहीं रहता। चाचाजी मुझमे क्या कहते हैं । आपको पता है ?" "क्या कहता है ?" "कहते हैं कि मुझे आपका मकान मिलेगा। इसीलिए मैं उनसे झगड़ती रहती हूं. मैं उन्हें वरदाश्त नहीं कर पाती हू । चाचाजी की यह हिम्मत कि मुझे यह मब कहें ?" केशव बाबू ने कहा, "तुम इन बातो का जवाब ही क्यो देती हो चुप- चाप रह सकती हो। मकान तो मेरा है, जब तक मैं जिन्दा हूं, इस बात का जिक्र ही क्यों छिडता है ? इस मकान का मालिक मैं हू या यह ? जिसको भी मर्जी होगी, मैं उसे ही यह मकान दे जाऊगा । इमने तुम्हे या वामु को मतलब?" । निर्मला चिल्ला उठी, "यह बात आप चाचा से नहीं कह सकते हैं ? मुझने कह्न से फायदा ? चाचा मे कहने की आपमें हिम्मत नहीं है ?" केशव बाबू ने कहा, "वह कहा है ? उसको तो देख ही नहीं रहा हूं। उससे मुलाकात हो, तब न कहूं।" "मुलाकात होगी कैसे ? बाप घर पर रहे तब न मुलाकात हो । थाप जब नही रहते हैं तो चाचाजी माते हैं, आकर मुझ पर रौब गालिय करते हैं। चाचा बी चाहते हैं कि मैं इस मकान को छोड़कर चली जाऊं।" "अच्छा तो फिर आज मैं पार्क नहीं जाऊगा," केशव बाबू ने कहा, "दिन भर घर पर ही रहूंगा । जब तक वह नहीं आ जाता है, मैं बैठा रहूंगा।" उन दिन केशव वावू घर से बाहर नहीं निकले। दोपहर बीत गई, तोमरा पहर बीत गया, गाम उतर आई, फिर रात के बारह बज गए, लेकिन वास नहीं आया। तारक ने आकर पूछा, ''मालिक, खाना परोस दू?" केशव वायू चिल्ला उठे, "नहीं, तू मेरे सामने से चला जा!" निर्मला ने आकर कहा, "आप हम पर क्यो झुंझला रहे हैं वाबूजी ? जब ८६ । - मर्जी होगी, चाचाजी आएंगे । आप उनके लिए विना खाए-पीए क्यों रहिएगा? मापकी भी तवीयत ठीक नहीं, कहीं आप भी चल वसे तो फिर क्या होगा?" केशव वाबू ने कहा, "मेरी तबीयत खराब होगी, होने दो । इससे किसी का क्या आता-जाता है ? मैं नहीं खाऊंगा । देखना है कि वह घर कब लौटता है ! निर्मला ने कहा, "और चाचाजी अगर कभी आएं ही नहीं तो? तो आप हमेशा-हमेशा के लिए विना खाए-पिए रहिएगा ?" "हां-हां, रहूंगा। मैं विना खाए-पिए ही मरूंगा। तुम्हारी मां ही मेरा यह सर्वनाश कर गई है। अगर तुम्हारी मां यह मकान न वनवाती तो मेरी यह दुर्दशा क्यों होती ? मैं अपने ही मकान में एक क्षण के लिए शांतिपूर्वक वास नहीं कर. पाता हूं । पूर्वजन्म में मैंने क्या इतना पाप किया था ? तुम्हारी,मां मकान क्यों वनवा गई ? ज़िन्दगी-भर आफिस में खटता रहा, अव बुढ़ापे में एक पल के लिए घर में बैठकर आराम करूं, तुम लोग मुझे यह आराम भी नहीं करने दोगे? इस मकान की वजह से ही मुझे इतनी अशांति का सामना करना पड़ता है। इस संपत्ति पर ही आकर तुम लोगों को इतना लोभ है तो यह मकान तुम्ही लोग ले लो, मैं राह-वाट में रहकर जी लूंगा." निर्मला ने कहा, "आप क्या कह रहे हैं ? मुझे आपके मकान पर लोभ है ?" केशव बाबू ने कहा, “लोभ नहीं तो और क्या ? इसी मकान के कारण वासु को घर छोड़ना पड़ा, इसी मकान के करण ही मेरा दामाद लापता हो गया और इसी मकान के चलते तुम मेरी इतनी दुर्गति कर रही हो। मेरे लिए यह मकान ही पाप हो गया है." "अगर आपके मन में यही है तो कहिए, मैं अभी तुरन्त इस घर से चली जाती हूं। मुझे इस मकान की ज़रूरत नहीं है। अपने गुणी भाई के नाम आप अपना यह मकान वसीयत कर दीजिए। आप अपना मकान चाहे जिसको दे दें, मुझे कौन-सी आपत्ति हो सकती है ? आपकी लड़की होने के बावजूद अगर मुझे दर-दर की ठोकरें खानी पड़ें और इससे आपके गौरव में वृद्धि हो तो वहुत ही खुशी की बात है । मैं ही घर छोड़कर चली जाती हूं।" यह कहकर निर्मला वहां रुकी नहीं । वात समाप्त कर वह आधी रात के वक्त ही निकलकर जाने लगी। ।
" " व वा भयभीत हो गए । जोरों से पुकारा, 'बरी निर्मला, कहां जा रही हो? सुनो. मुनो लेकिन तब उनकी बात कौन सुने ? निर्मला उस समर विना रिनो मरो- सानान केही जल्दी जल्दी सीढ़िया उतर रही थी। केशव वादू के कानों में निर्मला के पांवों की आहट पहुंची। वे भयभीत हो गए । क्या सचमुच निर्मला इतनी रात में घर से निस्तार चली जाएगी? वैचिल्ला-चिल्लाकर आवाजें लगाने लगे, "अरे तारस, तारक, दोदीत्री को पकड़ो, दीदीजो घर से निकलकर चली जा रही हैं । तारक तेजी से नीचे उतरा। लेकिन केशव बाबू निश्चिन्त होकर बैठ नहीं सके। ये भी अम्वन्ध हालत में ही नीचे उतरने लगे। माप ही साय पिल्ताने लगे "अरी ओ निर्मला, मत जाओ, नोट आओ, वुढापे में किसके सहारे जिन्दा रहूंगा? इतनी रात में बाहर मत जाओ" बसावधानी के कारण उनका पैर फिसल गया और वे नीचे गिर पडे। गिरते ही देहोश हो गए। मुझे ये भव वार्ते मालूम नहीं थी। कई दिनों से उन्हें पार्क में देख नहीं रहा था। मैंने सोचा, वे पारिवारिक झंझटों में फंसे होंगे। मैं भी बहुत-सी झंझटों में उलझा हुआ था। केशव वाव मुझे हमेशा याद आते रहते थे। दूर से मैं उन मकान को सरल की ओर तारता और सोचता था कि उसमे जो इसनी अगाति है, इतनी इतनी झंझटों और परेशानियों का वास है, बाहर रहकर कोई क्या इसकी कलना पर सकता है | मरान देने में कितना खूबसूरत है। घिडकी के अन्दर नोले प्रकाश का वृत फैला दीखता है। दनादन पंधा चर रहा है। बाहर ग्रीन रेलिंग है। हर धिड़की पर नीले परदे टंगे हैं। देखते होईया का वोध होता है। तारक अगर मुझे अन्दरूनी बातें नहीं बताता तो दूसरे-दूसरे व्यक्तियों की तह मुझे भी उन मकान के मालिक केशव वायू से रश्क ही होता। मैं भी कामना करता-काग, मुझे भी ऐसा ही एक मकान होता। किन्तु लोग-बाग इसके लिए दोपो नहीं हैं । आम लोग आमतौर से किसी वस्तु की बाहरी चमक-दमक को ही देखकर उसको असली कोमत मारते है। किसी को साज-पोशाक देखकर ही आदमी उसकी इजात या सम्मान करता उसके प्रति श्रद्धा व्यक्त करता है। लेकिन उस साज-पोशाक की नोट में बड़े व्यक्ति को कोन पहतानता है ? उस व्यक्ति को कोन समझ पाता है ? मैं अब केशव बाबू के घर पर जो नहीं जाता था, उसका एक कारण था। सोचता था, क्यों उनकी परेशानियों के बीच पहुंचकर उन्हें शामिन्दा करूं ! उनकी गृहस्थी के अन्दर महल की बातों को अगर किसी को जानकारी हो जाती है तो उनकी लज्जा की मात्रा बढ़ेगी ही; कम होना मुश्किल है, मैं उनके जीवन में किसी प्रकार की शान्ति नहीं ला पाऊंगा। मैं उनका कोई भी उपकार नहीं कर सकूँगा। । एक दिन एकाएक तारक मेरे घर पर आया ।म तारक को देखकर अवाक् हो गया। 'क्यों तारक, क्या खवर है ?" मैंने तारक ने कहा, "मालिक, बड़े बाबू ने एक बार आपको बुलाया है। वे पूछा। बहुत बीमार है।" मैं आश्चर्य में ला गया। "बीमार हैं ? कौन-सी बीमारी है ?" मैंने पूछा तारक बोला, "वे सीढ़ी से गिर पड़े थे। खून से लथपथ हो गए थे। यह वाकया हुए तीन-चार महीने हो गए। अव तक वे अस्पताल में थे। अब घर लौट आए हैं लेकिन लगता है बव चिन्दा नहीं रहेंगे। यही वजह है कि आखिरी 'घड़ी में लापने एक बार मिल लेना चाहते हैं।' "बब तक तुनने मुझे सूचित क्यों नहीं किया था ?" "सूचना देने का वक्त ही कहां मिलता था, मालिक ? अब तक यम लोर आदनी के बीत्र जींचतान चल रही भी। कभी मैं अस्पताल जाता था तो कभी 'घर जाता था।" "एकाएक सीढ़ी से कैसे गिर पड़े?" मैंने पूछा। तारक ने कहा, "उसके पीछे बहुत-सी बातें हैं, मालिक ।" १२ 1 और उसने उस घटना के बारे में विस्तार से बताया, "दीदीजी वारह बजे रात में मालिक मे झगड़कर बाहर निक्ल रही थी। मानिक नन्हे मना करने के स्याल से सीढ़ियां उतरने लगे। उतरते ही वक्त मिलार गिर पड़े और उनका सिर फूट गया। उसी रात उन्हें अस्पताल ने वाया गया।" मैंने पूछा, "अब तुम्हारे मालिक कुछ बच्चे हैं न?" "नही," तारक ने कहा, "अच्छे रहे तो कैमे ? अब जमाई वायु इतने दिनों के बाद अचानक लौटकर चले जाए हैं । जों ही सुना कि मालिक बीमार हैं कि तुरन्त आ धमके।" "और उनका मरतीका कारोबार?" तारक ने कहा, "मछली का कारोबार चौपट हो चुका है । व्यर्थ ही मालिक के कई हजार रुपये वरवाद हुए। अब यहा आराम के गाय याते-पीते हैं और मुझ पर रौब गालिब करते हैं। मैं परेशानियो के दौर से गुजर रहा है, मालिक । इघर मालिक की सेवा और उपर जमाई बाबू की विदमत । वह इस पात को अच्छी तरह जानते हैं कि मालिक की मौत हो जाने पर जायदाद दीदीजी को ही मिलेगी।" केशव वादू की दुरवस्था की बातें सुनकर में बड़ा ही दु.पो हुआ। जीवन-भर विना खाए-पिए रहकर, तकलीफ उठाकर उन्होंने व्यर्थ ही यह मकान बनवाया। वरना लड़की, दामाद और छोटे भाई के हाथो उनकी यह दुर्गति नहीं होती। २२ सब सुनने के बाद में जाने के लिए प्रस्तुत हुआ। "चलो।" मैंने कहा। यह कहकर मैं सड़क पर निकल आया और केशव बाबू के पर की ओर चल दिया। केशव बाबू के घर के निकट जव पहुचा तो मैं विस्मय से अभिभुत हो गया। देखा, एक विशाल गाड़ी मकान के सामने यही है। जिस तरह की विशाल गाड़ियां सड़को पर चलती दीखती है वह उस तरह की गाड़ी नहीं दी।
गाड़ी कितने लाख रुपये की हो सकती है, इसकी कल्पना करना मेरे जैसे मध्य- वर्ग के लिए संभव नहीं है। गाड़ी की चारों खिड़कियों पर कीमती परदे टंगे हैं। वर्दी में लैस ड्राइवर स्टीयरिंग पर बैठा है । पास ही दरवारनुमा एक और आदमी जरीदार पगड़ी पहने खड़ा है। मैंने तारक से पूछा, "तुम्हारे घर पर कौन आए हैं, तारक ?" यह बात तारक की भी समझ में न आ रही थी कि किसकी गाड़ी मकान के सामने खड़ी है। उसने हैरत में आकर कहा, "मेरी भी समझ में कोई वात नहीं आ रही है।" सचमुच, ऐसा तो होता नहीं है। तारक घर से जव निकला था तो यह गाड़ी वहां नहीं थी। इसके अलावा कभी इस तरह की गाड़ी इस मकान के सामने आकर खड़ी नहीं हुई है। तारक ने गाड़ी के सामने जाकर पूछा, "ड्राइवर साहव, यह किनकी गाड़ी है ? हम लोगों के मकान में कोन आए हैं ?" ड्राइवर ने अवहेलना और गर्व से मिले-जुले स्वर में कहा, "नाहरगढ़ के राजा साहब की" ...."यानी नाहरगढ़ के राजा साहब की गाड़ी है । "नाहरगढ़ ? नाहरगढ़ कहां है ?" न तो तारक को और न मुझे ही मालूम था कि नाहरगढ़ कहां है । मयूर- भंज का नाम सुना है, वर्धमान का नाम सुना है । कितनी ही स्टेटों का नाम सुना है। नाहरगढ़ स्टेट का नाम कभी सुना ही नहीं। और अगर नाहरगढ़ नामक कोई स्टेट है भी तो वहां के राजा साहव आज केशव बाबू के पास क्यों आए हैं ! तारक और मैं घर के अन्दर घुसने जा रहे थे। अचानक एक कोट-पैट- टाई पहने साहवनुमा बंगाली सज्जन मुंह में चुल्ट दवाए अन्दर से बाहर निकले । उनके निकलते ही दरवान और ड्राइवर दोनों ने उन्हें सैल्यूट किया और मटेंशन की मुद्रा में खड़े हो गए। उस मोर बिना कोई ध्यान दिए राजा साहब ज्योंही गाड़ी की ओर बढ़े, दरवान अदव के साथ दरवारा खोलकर खड़ा हो गया। उसके बाद राजा साहब गाड़ी पर ज्यों ही चढ़कर बैठ गए, दरवान ने फिर से दरवाज़ा बन्द कर दिया। उसके बाद वह गाड़ी की सामने की सीट पर ड्राइवर की बगल में जाकर वैठ गया।
ड्राइवर ने तत्क्षण गाडी स्टार्ट कर दी। पेट्रोल और चुस्ट की तीसी गंध हमारे नयनो में आकर ममा गई। हम लोग छोए-सोए उस ओर ताकते रहे । हमारे विस्मय या दौर कुछ देर के बाद खत्म हुआ। जब दौर खत्म हुआ, तारक ने कहा, "यह तो हमारे छोटे बाबू हैं।" मैंने पूछा, “छोटे वायू ? छोटे वाबू यानी ? केशव वाबू के भाई! वासु ? वह नाहरगढ का राजा साहब कब मे हो गया ? विस तरह हुआ ?" तारक बोला, "मैं सब से यही बात सोच रहा हू, मानिक जी। ये हमारे छोटे याबू के अलावा कोई हो ही नहीं सकते।" उसके बाद कहा, "चलिए, ऊपर चलें।" और वह दोमजिले पर पहुंचने के लिए सीढ़िया तय करने लगा। मैं भी उसके पीछे-पीछे जाने वगा। दोमंजिल पर जाते ही देखा, एक भला आदमी गजी और लुगी पहने याराम से सिगरेट का कशखीच रहा है । तारक पर नजर पड़ते ही उसने कहा, "ए तारक के वच्चै, अब तक तू कहा था? पढें, तुझे कब से ढढ़ रहा हूँ । मेरी चाय कहा है ?" तारक ने कहा, "अभी ले आया जमाई या ।" "ले आया जमाई वाबू तारकः को बातो को दुहराकर भले आदमी ने अपना मुंह विचकाया। "तुझे यह पता ही है कि याथरूम जाने के पहले मेरे लिए चाय जरूरी हो जाती है। काम में तेरा मन ही नहीं लगता है। बैठे-बैठे तनखा ले रहा है ? ठहर, तेरी तनखा रोकवा देता हूं।" समझ गया कि आप ही हैं केशव वाबू के दामाद-काशीकात । वही काशीकांत, जिसने कहा था कि मैं मछली का कारोबार करूगा और ससुर से हजारों रुपए लेकर फूक झाला या। अब समुर की बीमारी की बात सुनकर संपत्ति हडपने के रूपाल से चील की तरह आकर जमकर बैठ गया है। तारक जल्दी-जल्दी मुझे केशव बाबू के कमरे में ले गया। देखा, केशव बाबू के माथे पर पट्टी बंधी है और वे एक खाट पर लेटे हैं। मुझे देखते ही उन्होंने अपनी करुण आंखें फैला दी। में उनके पास जाकर कुर्सी पर बैठ गया।
केशव वाबू वाबू ने कहा, "आपको तारक की मारफत बुला भेजा है। आपने तारक से सव सुन लिया होगा ?" "हां, सुन लिया है।" मैंने कहा । केशव वाबू ने कहा, "इतने दिनों तक लापता रहने के बाद मेरा दामाद भी लौट आया है, यह भी सुना होगा ?" "हां, यह भी सुन चुका हूं।" केशव बाबू कहने लगे, "मेरी बीमारी की खबर सुनकर आया है । सोचा है, अव मैं मरने जा रहा हूं। मरने पर संपत्ति कहीं हाथ से निकल न जाए। कहीं यह मकान कोई हथिया न ले। इन्हीं कारणों से आया है। बीमारी में वह मेरी सेवा करने नहीं आया है, आया है तो जायदाद के लोभ में। कहीं मेरा भाई वासु यह मकान दखल न कर ले । समझ रहे हैं न?" मैं क्या उत्तर देता? मैंने सिर्फ इतना ही कहा, "आप ज्यादा बातचीत न करें, चुपचाप पड़े रहा कीजिए। आप इतनी बड़ी बीमारी के दौर से गुज़र चुके हैं । भाग्य की बात यह है कि आपकी जान बच गई।" अवकी केशव बाबू की आवाज़ तेज़ हो गई । “आप क्या कह रहे हैं ! मेरी जान बच गई है ? अब मैं जिन्दा नहीं रहना चाहता, यह दुनिया. जिन्दा रहने के लायक नहीं है । मैं पहले ही क्यों न मर गया--यही सोचता हूं।" मैंने कहा, "आप उत्तेजित न हों, केशव वाबू । तारक ने बताया था कि डाक्टर ने अव भी आपको लेटे रहने को कहा है।" केशव बाबू ने कहा, "इसीलिए आपको बुलवाया है, विमल बाबू । आपसे वगैर कहे चैन नहीं मिल रहा है। अच्छा, आप यह बता सकते हैं कि आदमी किसलिए संपत्ति उपार्जित करता है ? मेरी गृहिणी कितना कष्ट झेलकर यह मकान वनवा गई थी, यह तो आपको बता ही चुका हूं। मगर जब वह चल बसी, तो यह संपत्ति उसके साथ गई ? और दो दिन बाद में भी विदा हो जाऊंगा। आप ही बताइए, मेरे साथ ही क्या यह सब जाएगा?" यह कहकर उन्होंने एक सांस ली। उसके बाद फिर से कहना शुरू किया, "जानते हैं, मेरी सगी लड़की है, कितने लाड़-प्यार से मैंने उसे पाला था। अब । . PE वह मेरे कमरे में झांकने तक नहीं आती है। एक बार पाकर यह नहीं पूछतां कि यादूजी, बाप कैसे हैं।" 'सोडिए, अभी इन बातों को जाने दीजिए।" मैंने कहा। "क्यों जाने दूं, दिमल बाबू," केशव बाबू ने अपना कथन जारी रया, "अभी ये सब बातें न कहूं तो फिर कब बहूगा? मेरा है ही कौन ? रही मेरी यह संपत्ति मेरा भाई दखल न कर ले, इसी साल से वह जमकर बैठी है। मन- ही-मन सोचती है कि कब मेरी मृत्यु होगी। लड़को होकर वापरी मौत की कामना कर रही है । आप इस बात की कल्पना कर सकते हैं!" कुछ देर रककर फिर कहने लगे, "और मेरे दामाद का बार देखिए । सरकारी दफ्तर में स्थायी नौकरी में या। लहका चरित्रवान है और ससारी नौकरी कर रहा है --यही देखकर मैंने उसे अपना दामाद बनाया था। मगर ज्यो ही उसे गंध लग गई कि ससुर को प्रोविडेन्ट फंड के रूप में देर मारे रुपये मिले हैं, और उन्होंने अपने भाई को कारोबार करने के लिए सपा विका है, तत्वान उसने मुझसे कहा, 'मैं भो कारोवार कगा। सो मैंने उमे भी राय दिए। रुपये लेकर अगर वह सचमुच कारोबार करता तो कोई बात नहीं थी। मगर उन रुपयों को लेकर यह लापता हो गया और मेरे पैसे फूल हाने .." में मामोश होकर केशव वाबू की कहानी सुन रहा था। इसके अलावा मेरे लिए उस समय करने को था ही क्या ? उसके बाद उसी तरह हांफते-हारते कहने लगे, "योर देखिए, अचानरः इतने बरसों के बाद वही दामाद मेरे घर में आकर बैठ गया है, मगर काम करने का नाम तक नहीं लेता । महां बैठे- सिर्फ समुर को रोटी तोड़ रहा है और हर पल सिगरेट का कश ले रहा है।" 'हां, अभी देशा, तारक से चाय मांग रहा था। मैंने कहा। "बस चाय-दिन भर चाय और सिगरेट चाहिए । अवेना वेचारा तारक मेरी सेवा करे या दामाद के लिए चाय बनाए ?" मैने कहा, "जब मैं आपके मकान के अन्दर घुमने जा रहा था, सामने एक विशाल अमरीको गाडी दीख पड़ी । नाहरगढ या पहों के रामा माहद बाये हुए थे। वे क्या आपके वही छोटे भाई हैं जिनके बारे में आपने बताया पा? वह मावान ही था?"
अवकी केशव बाबू ने अपने हाथों से मेरा एक हाथ कसकर पकड़ लिया। उनकी आंखें छलछला आई। वे बोले, "आपने देखा? वासु को आपने देखा? देखा न, उसका चेहरा कैसा हो गया है। देखो न, कैसा कुरता-पैंट पहना है ? देखा कि किस तरह चुरुट का कश ले रहा है ? आपने देखा है ? सचमुच आपने देखा है ? गाड़ी आपको कैसी लगी ?" मैंने कहा, "देखा-सव-कुछ देख लिया है। देखकर लगा कि बहुत बड़े आदमी हैं। बहुत बड़ा आदमी न हो तो इस तरह के कोट-पैंट-टाई नहीं पहन सकता है। चाहे दरवान कहिए, चाहे ड्राइवर-हर व्यक्ति कितनी भड़कीली पोशाक में था। और गाड़ी देखने पर लगा कि आजकल के बाजार में उसकी कीमत चार-पांच लाख रुपये से कम न होगी। पूरी गाड़ी ही एयर-कंडिशण्ड थी। वह अगर आपका भाई वासु है तो उसे अचानक इतने रुपये कहां से मिल गए?" . केशव वाबू ने उत्तर दिया, "मैंने उससे भी यह वात पूछी कि तुम्हारे पास इतने पैसे कहां से आये ? पता है, उसने क्या कहा कहा ? कहा कि उसने किसी नाहरगढ़ स्टेट की रानी से शादी की है." "नाहरगढ़ ? यह स्टेट कहां है ?" केशव वाबू वोले, "मुझे भी इसका पता नहीं था, साहव । त्रिपुरा या आसाम या मणिपुर का कोई नेटिव स्टेट है। वहां की विधवा रानी से उसे मुहब्बत हो गई। उस आवारे बंडे को रानी ने क्या देख-सुनकर पसन्द किया है, पता नहीं। औरतों को अपने हाथ में करने की कला में संभवतः वह बहुत ही दक्ष है। हमेशा से यही सव करता आया है। रानी उससे उम्र में बड़ी थी। अव रानी मन चुकी है। विधवा रानी के कोई सन्तान न थी। रानी की करोड़ो रुपये की सम्पत्ति का अव वही मालिक हो गया है । देखिए, ज़िन्दगी-भर ईमान- दार रहकर, मेहनत-मशक्कत कर मैं कुछ नहीं कर सका ! शराब पीकर, नशे- बाजी कर, अड्डेवाज़ी कर, आवारागर्दी कर उसने मुझसे लाखों गुना अधिक मान-सम्मान, प्रतिष्ठा हासिल कर ली!" वात सुनकर मैं हतप्रभ हो गया। "बहुत ही आश्चर्य की बात है !" मैंने कहा। ६८ । केशव बाबू ने कहा, "आपको आश्चर्य हो रहा है। मगर जब से यह बात मुझे मालूम हुई है, मेरा माथा चकरा रहा है, छाती धड़क रही है। लगता है, अभी तुरन्त मेरा हार्ट फेल कर जाएगा। फिर मेरा लिख-पड़कर ईमानदारी की जिन्दगी जीना कौन-सा मानी रखता है ? विद्यासागर, परमहंस देव, चैतन्य देव, युद्धदेव, दांकराचार्य और ईसामसीह जो कुछ कह गए हैं, वह सब क्या असत्य ही है। आज के युग मे क्या असत्य का ही जयजयकार किया जाता है ? सचाई, सत्यवादिता, निष्ठा, ब्रह्मचर्य-इन सब को कोई कीमत नही? फिर ईश्वर भी असत्य ही है ? इतने दिनो तक जिन महापुरुपो ने इस धरती पर जन्म लिया है, वे सब क्या घोसेबाज ही ये ?" वात करते-करते केशव वाबू उत्तेजित हो उठे। वे हाफने लगे। अचानक वे उठकर बैठने लगे. मैंने उन्हें पकडकर लिटा देना चाहा, किन्तु उन्होंने किसी भी हालत मे मेरी बात नहीं मानी । तब ये बैठे-बैठे चिल्लाने लगे-~~ "मैं आपसे कह दू, विमल वायू, कि यह अन्याय है, अविचार है, यह बरदाश्त करने लायक नहीं | जिन्दा रहकर मैं यह अन्याय वरदास्त नहीं कर सकता । मानव-समाज भी इसे वरदाश्त नहीं करेगा। घरदाश्त करना भी नही चाहिए। अगर यह टिक गया तो हमारा देश रसातल में चला जाएगा, समाज ध्वस्त हो जाएगा, आदमी जानवर बन जाएगा। आप तो पुस्तकें लिया करते हैं। उसमें लिखिए कि यह अन्याय अगर और कुछ दिनो तक चलता रहा तो इस घरती पर वहीं दूंढने पर भी मनुष्य नहीं मिलेगा-धरती पर फिर से वही आदिम युग लौट आएगा." कहते-कहते उनकी आंघो को पुरालियां स्थिर हो गई। उनके मुह से फिर कोई शब्द न निकला । वे एकाएक बेहोश होकर बिस्तर पर लुढ़क पड़े। केशव बाबू की चीख सुनकर तारक भागता हुआ कमरे के अन्दर आया। केशव बायू की बंसी हालत देखकर वह चिल्लाने लगा, "मालिक, मालिक लेकिन जो होना था, हो चुका था। तब उनमे चेतना का नामोनिशान तक न था । तब वे तमाम पाप-पुण्य, न्याय-अन्याय अच्छ-युरे के परे जा चुके थे। " Re इस बात को हुए काफी दिन बीत चुके हैं । अव भी शाम के वक्त टहलने निकलता हूं। चहलकदमी करता हुआ उस मकान की ओर ताकता रहता हूं। अब भी वह मकान पहले-जैसा ही है । अन्दर विजली की नीली रोशनी जलती रहती है, खिड़कियों पर उसी तरह के रेशमी परदे टंगे हैं । बाहर से उसमें कोई परिवर्तन नहीं आया है । एकमात्र केशव वावू ही उस मकान में नहीं हैं। केशव बाबू के न रहने पर भी घर की शोभा में कोई कमी नहीं आई है। उसका उत्तराधिकारी है। उनकी लड़की निर्मला है, उनका दामाद काशीकांत है। और हैं उनके बाल-बच्चे । वे लोग आराम से ही रह रहे हैं। केशव बाबू के अभाव के कारण उनकी शान्ति की दुनिया में कोई बाधा नहीं पहुंची है। मेरे अलावा कोई नहीं जानता कि यह मकान किसके द्वारा, कितने कष्टों को सहकर बनवाया गया है और अभी कौन उसका उपभोग कर रहा है। कोई जानने को उत्सुक भी नहीं है । और लोग-वाग जान भी जाएं तो उनके रोजमर्रा की, सुख- दुःख की दुनिया में किसी भी तरह की हलचल नहीं मचेगी। बीसवीं शताब्दी की यंत-सभ्यता अपना निष्ठुर स्टीम-रोलर चलाती हुई सब-कुछ पीस-पास कर वुरादे में बदल डालती है और फिर उसे समतल भूमि में परिणत कर मनमाने तौर-तरीके से आगे बढ़ती जाती है। और वासु ? ~~-नाहरगढ़ का वह राजा साहब ? वह विशाल वातानुकूलित गाड़ी चलाता हुआ तमाम विश्व का भ्रमण कर रहा है। कभी इंगलैंड जाता है, कभी अमेरिका, कभी जर्मनी और कभी रूस । नाहरगढ़ के राजा साहब के लिए यह पृथिवी अपनी समस्त सम्पदा, अपना समस्त ऐश्वर्य बड़े ही आदर के साथ उनके हाथों में निवेदित कर कृतार्थता का अनुभव कर रही है। सचमुच, कौन कहता है कि विषय विष है ? वह असत्य कहने वाला कोन है ? मुद्रक : मॉडर्न प्रिण्टर्स, नवीन शाहदरा, दिल्ली 1129
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