Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai

Savayadhammadoha Vol-ii

Jain,hirala · 2012/08

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Front matter

Sāvayadhammadoha
.
An Apabiramsa work of
the 10th century.
Critically edited
With Introduction, Translation, Glossary,
Noles and Index
By
Hiralal Jain, A., LL, E.,
Asstt Professor of Sansknt,
King Edward College, Amraoti;
Soinotiate Rosorrch Scholar, Aldabrd University,
1932.

asos
एहु धम्मु जो आयरइ भणु सुदु चि कोइ ।
सो सावउ किं सावयहं अण्णु कि सिरि माण होइ ॥७६।।
ISRO

प्राक्कथन प्रस्तुत ग्रन्थ के दर्शन प्रथम वार मुझे सन् १९१४म काज के सेनगण भण्डार में हुए थे और उस प्रति पर से इस प्रथ का परिचय सन् १९२६ में प्रकाशित Catalogue of Sanskrit and Pra krit Mss in CP & Berar में दिया गया था । उस परिचय से कई विद्वानों का ध्यान इस ग्रन्य की ओर आकर्षित हुआ और उसे प्रकार शित कराने के लिये मुझ पर आग्रह होने लगा। किन्तु एक ही प्रति परसे इस का सम्पादन करने का मुझे साहस नही दुआ, इसे टहरना पडा । अगले वर्ष इस ग्रन्थमाला की नींव डाली गई और तपसे प्रन्थ की अन्य पोयियों की खोज में विशेषरूप से प्रयत्नशील होना पडा। सन् १९३० में हिन्दु स्तानी एकाडेमी, यू पी, के अध्यक्ष युक्त डॉ ताराचन्दजी एम.ए, डी. पिल , ने इस माय को देखने की इच्छा प्रकट की। किन्तु उस समय तक हमारे हाथ में इसकी उपर्युक्त एक ही वहीं प्रति थी और उसकी प्रथम कापी तयार की जा रही थी इससे यह भेनी नही जा सका। धरे धरे अन्य प्रतियों का पता चला और उसी अनुघार इसका सधन हेता गया। अबतक हमें इसकी ग्यारह पोथियों का पता चला है जिनका परिचय 'सशोधन सामग्री में कराया गया - पहले हमारा विचार अन्धमला के अन्य अन्यों के सारा इसका सम्पादन मी अग्रेजी में करने का था । किन्तु अनेक मिनों व प्रथमाला के सहायकों का आग्रह हुआ कि अपभ्रश भाषा के कुछ अन्य हिन्दी में भी सम्मादित होना चाहिये ता कि हिन्दी संसार में उक्त दोनों भ'पाओं का सम्बन्ध स्पष्ट रूप से झलक जये। तदनुसार इस ग्रन्थ का सम्पादन हिन्दी में करने का निश्चय हुभा । भागे प्रकाशित होने वाले अन्यों में भी अनेक अन्यों का हिन्दी में सम्पादन करने का विचार है ।

- इस प्रन्य के सम्पादन में हमे हमारे मिन्न धीयुक्त ए.एन.उपाध्ये एम. ए , अर्धमागधी प्रोफेसर, राजाराम कालेज, कोल्हापूर, से बहुत सदायता मिला है। उन्होंने द. प्रति प्राप्त होने के पूर्व मुझे उस प्रति को अपने लिये कराई हुई एक कापी देखने के लिये भेजने की कृपा की तथा पत्रों द्वारा भण्डा- रकर इन्स्टट्यूद पूना, की तीन पोथियोंका परिचय कराया। सन् १९११ Annals of Bhandarkar Oriental Research Institate errat' Joindu and his Apabhramsa Works' शीर्षक लेख प्रकाशित हुआ है। हमने उस लेख से भी सहायता ली है । अन्य के कुछ शंकास्पद वस्यों को हमने आपके पास विचार के लिये भेजा पा उनपर भी आपने पन द्वारा मत प्रकट करने की हा की । इसका हमने टिप्पनी में उपयोग किया है। इस सर सहायता के लिये हम IITES बहुत उपकार मानते हैं। हमारे मिन डाक्टर पी. एल. वैद्य, पम्. प., डी. लिट., प्रोफेसर, पाडिया कालेज, पूना, ने भण्डारकर इंस्टीट्यूट, पूना, की म. प्रति हमारे अवलोकनार्थ मिलकाने की कृपा की। तद हम भापका भाभार मानते है। घीयुत पन्नालालजी अग्रवाल, सहायक मंत्री, जनमित्रमण्ल दिली, ययुक्त महन्द्रजी, सम्पादक ' परियनरेश ' आगरा, ने हमें क्रमश: ६.धौर प. प्रतियां भिजवाने की कृपा को इसके लिये दम आपके कम हैं। गुहार डॉ. ताराचन्दजी गंगवाल, एम. बी. बी. एव , पैलेस सर्जन, जयपुर, व श्रद्धय मास्टर मोतीलालजी संघी, संस्थापक, सन्मति पुस्तालय, जयपुर,ने हमें जयपुर की पोषियो देखने में बड़ी सहायता पहुंचाई। ए हम आपके सामारी है। इस प्रन्ध के सम्पादन व अन्यता का निर्णय करने में हमें फ. प्रति से सिर सहायता मिली है। इस प्रति के लिये दम •मारक महारान श्री पारसनजी स्वामी, सेनगण, कारमा के ऋणी है। इस प्रन्य.

. माला को सफल बनाने में पाप बहुत कुछ कारणीभूत हुए हैं जैसा कि हम प्रथम ग्रंथ की प्रस्तावना में कह चुके है। मान्यवर गोपाल अम्बादासजी चवरे, कारंजा, इस प्रन्य. माला के जीवनाधार है। आपकी प्राचीन जैन साहित्य को उत्तम ढंग से प्रकाशित देखने की बड़ी उत्कण्ठा है। आपको ही प्रेरणा से हमें इस कार्य में विशेष उत्साह हुमा है। भारका उरकार चिरस्मरणीय है। सरस्वती प्रेस अमरावती, के मैनेजर श्रीयुक्त टी. एम. पाटील तथा प्रेत के अन्य कर्मचारियों ने इस ग्रन्थ को छापने में बड़ी रुचि और सावधानी दिखाई है इसके लिये में उन्हे हृदय से धन्यवाद देता हूं। इस ग्रन्थमाला का प्रधान उद्देश्य प्राचीन जैन साहित्य को इस ढंग से प्रकाशित करने का है कि जिससे साहित्यिक छानबीन व ऐतिहासिक खोज में विशेष सहयता पहुंचे । यह हम माला के प्रथम अन्य में ही प्रकट कर चुके हैं। यदि उस उद्देश्य की प्रस्तुत प्रन्य द्वारा किसी अंश में पूर्ति हुई तो हम व हमारा मण्डल अपने प्रयास को सफल समझेंगे । उसी दिशा में किसी प्रकार की कमी व त्रुटि की पूर्ति के सम्बन्ध में हमारे विद्वान् पाठक जो सम्मति प्रदान करने की कृपा करेंगे उसका हार्दिक स्वागत किया जायगा। किंग एडवर्ड कालेज, भमरावती अनन्त चतुर्दशी, वि. सं. १९८९ हीरालाल

भूमिका
१ संशोधन सामग्री।
चार पोथियों
-
अश्तक सावयधम्मदाहा की प्राचीन हस्तलिखित नौ पौषिया हमारे
देखने में व दो सुनने में आई है। इनमें से चुनी हुई
( क ज द ) का अक्षरश मिलान करके प्रस्तु व सतरण में उनके पाठ
भेद क्ति किये गये हैं व शेष से यन तन सहायता ली गई है। इन
प्रतियों का परिचय इस प्रकार है-
अ.प्रति मौतीक्टरा,आगरा, दिगम्बर जैन मंदिर की है।पन संख्या-१८,
हाकार ९४९", पत्तियां प्रति पृष्ठ -७ से ९ तक, वर्ण प्रतिपंक्ति-
लगभग ३०, होसिया ऊपर नीचे- १", दोये 4 ये ११" प्रारम्भ का एक
और अन्त के दो पत्र दूसरे हाथ के लिखे हुए हैं। अनुमानत पहले पत्र
बहुत जीर्ण होजाने मे उनकी नकल करके ये पन जोड़ दिये गये हैं। जोग
पत्रों का अब पता नहीं है।
,
प्रारम्भ-ॐनम सिद्धभ्य ।
अंत-इति श्रावकाचारदोड्डा जोगेन्द्रदेवकृत संपुर्ण ॥ सुभं भवतु ।।
इस प्रति में कुल दोहों की संख्या २२५ है । अधिक दोहा परिशिष्ट
में देखिये । १० वे दोहे के प्रथम चरण का पाठ कुछ मिन है। पाठभेदों में
देखिये | इसके पाठ क. प्रति से अधिक मिलते हैं।
क. प्रति कारंजा के सेनगणमंडार की है। पत्रएया- १६,
भाकार-११°४५", पंकियो प्रतिपृष्ठ- १, वर्ण प्रतिपकि- लगभग ३.,
होसिया कार नीचे-3", दीये बाय-१

सावयधम्मदोहा
प्रम-ॐनम श्री पार्श्वनाथाय दी धरणेन्द्रमावतीसहिताय ।
अन्त-इय दोइ पदवयधामं देवसेनै उकदिटु ।
अक्खरमत्ताहीयमो पय सयण खमंतु ॥
इय दोद्दाबद्धसावयधम्मसम्मते लिपिमिन जगतहतिण संवत्
१७०० पुवार वदि १४ हृदयनप्रमध्यान् लिपितमिनै ।
इसमें कुल दोहों की संख्या २३५ है और एक संस्कृतीक उत्तच'
रूप से उन्हत किया गया है (परिशिष्ट देखिय)। इसके पाठ म. प्रति से
भधिक मिलते है।
ज. प्रति जयपुर के तेरापी मंदिर की है। पत्र संख्या- ११%
आकार- १.३"x४३", पंक्तियां प्रतिपृष्ठ- १३; वर्ण प्रति पंकि- लगभग
३५, होसिया ऊपर नीचे-", दोय याये-१४.
प्रारम्म-थी जिनाय नम ।
अन्त-- इति श्रीश्रावकाचारदोहक समाप्तं ।
इसमें कुल दोहों की संख्या २२३ है। दोहा २१९ नहीं है। नंबर
देने में त्रुटि के कारण प्रति के अन्तिम दोहे पर नं. २२१ भाया है।
द.प्रते पंचायती दिगम्बर जैन मदिर, देहली, की है। पत्रख्य
१३, म कार-११३४५" ; पंक्तियां प्रतिपृष्ट-९ से ११ तर; वर्ष प्रत.
पंति-लगभग ३२, होसियार नीचे-", दौरे बोये- १". देशों को
संख्या १२४.
प्रारम्भ- ऊं नमो वीतर गाय ।
अन्त-दति श्रावकाचारदोहक समाप्तम् ।
अथ संवत्सरेऽस्मिन् श्री विक्रमादित्यराज्य संवत् १६०१
घर्षे 1 धावण षदि ११ शुभदिने । मृगाशरनक्षने। व्यापत.

संशोधन सामग्री नामयोगे । मानस उपजोगे। श्रीपथासुभस्थाने । श्रीमादि असमसाहिरराज्यप्रवर्त्तमान | श्रीजैन सधे नमदीप तत् शिष्यणी शीललोयतरगिणी बई देवललिसापितं भामर्थे । ज्ञानवान् शनदानेन इलादि चार रोक इस प्रशस्ति से हमें ज्ञात होता है कि यह प्रति विक्रम संवत् १६०३ तदनुसार सन् १५४६ ईस्वी में लिखी गई थी और उस समय दित्री के तख्त पर साह असलेमसाह (शेरश ६ सूर का बेटा सलीमशाह सूर ) था। यह उल्लेख मुगल व शावंश के इतिहास के लिये महत्वपूर्ण है। प. प्रति जयपुर के पाटोदी जैन मंदिर की है। पन संख्या-३९, दोहों की संरया- २२४ हाँसिये पर टिप्पण है। अन्त- इति उपासकाचारे आचार्य श्री रक्ष्मीचन्द्र विरचित दोहक सूणि समामानि । स्वस्ति संवत् १५५५ वर्षे कार्तिक सु १५ सोमे श्रीमूलसधे सरस्वतीगछे बला- सारगणेऽभय वेद्यानदिप? म विभूषण सत्शिष्य पं लक्ष्मण- पठनार्य दोहाधावसाचार। यह प्रति वि सं १५५५ तदनुमार रा १४९८ ईस्वी की लिखी हुई है। अत प्राप्त पोथियों में जिनमें लिराने का समय पाया जाता है उन सब में प्राचीन है। दुर्भाग्य से इस प्रति का पूरा २ मिलान करने की मुझे सुविधा न मिल सकी। प. २ यह प्रति भी उपर्युक्त प टोदी मदिर की है। पत्र संख्या- ११, देदों की संख्या- २२४ लिखने का समय नहीं दिया गया। प. ३. यह प्रति भी उपर्युता पाटोदी मंदिर की है। पर सख्या- १४, दोहों की संख्या- २२५, लिसे जाने का प्रमय- संवत् १६१२ वैसाख मु ११.

- - - सावयधम्मदोहा प. ४ यह प्रति मी उपयुक्त पाटोदा मदिर की है। पर सदया- ८, दोहों की संख्या- २२७, लिये जाने का समय नहीं दिया है। भ. प्रति भाडारकर रिसर्च इन्स्टीट्यूट, पूना, को न १३०८) १८९१-९५ की है। पन सख्या-१.०, आसर-१. x ५", पक्कियां प्रतिपृष्ठ-४, वर्ण प्रतिपकि- लगभग २८, होसिया ऊपर नाचे-", ये पाये- १३". इसमें दोहों की संख्या २२५ है। दोहा न. २०० व २१९ नदी है तथा तीन देहे अधिक है [ परिशिष्ट देखिये ] किन्तु नवर देने में श्रुटि के कारण अन्तिम देहे का न, २२६ आया है। यह प्रति सटीक है। इसके पाठों वका का उपयोग प्रस्तुत अन्य की टिपनी' में हिया गया है। टीका का विशेष परिचय भागे दिया जायगा। प्रारम्भ-अथ प्राकृत दोधवध उपासमाचार लिष्यते । अन्त- इति श्रावकाचादे हक क्षमीचन्दकृत अमाप्त । श्री। मूल योगीन्द्र देवस्य लक्ष्मीचन्द्रस्य परिका। वृत्ति प्रभाचन्द्रमुनर्मती तत्त्वापिका ॥ ॥ भ. २. यह प्रति भी उपर्युक्त भण्डारकर इस्टीट्यूट की है। और सवत् १५९३ की लिपी हुई है। देहों की संख्या २२४ है तथा प्रय का नाम 'भावकाचार दोहडा दिया गया है। भ ३ यद प्रते भी उपयुक्त मामारकर ट्यूट की है। इसमें दोहों की संख्या २२४ है। १. दोहे का पाठ अ प्रति के समान है (पाठभेद देखिय) व सक्त् १५९९ कारिखी हुई है। अर- इति उपासकाचारे आवारा रचित देवक- सूत्राणि समातनि। उपर्युस दोनों प्रतिमा रत्नति के शिय आर्य व प्रा महोत्रा के लिये लिखी गई है। उपर्युल इस्टीट्यूट के न ९९/1८४५.९१ के एर मत्यता में सन्देह उपस्थित हो जाता। इसमें दोहों के वो स्पष्ट से रक्ष्मीचन्द्र या रक्ष्मीधा कहे गये है-' तथा चोक आवश्यकता नहीं कि ये दोनो नाम एक हो व्यक्त के द्योतक है। तया चोक्तं रक्ष्मीधरेण भगवना कहने की इससे भी उक्त प्रतियों के कथन की पुष्टि होती है। प्रामृत टीका की प्रकाशित पुस्तक की भूमिका में जो भुतसागर का परिचय दिया गया है उससे ज्ञात होता है कि लक्ष्मीचन्द्रजी उनके समसान विक थे तथा उनकी चेली ने आशधात 'महाभिषेत्रभाष्य' को अपने हाथ से लिराकर सन् गुरुपरम्परा इमप्रकार थी- विधन- मलभूएम- र चन्द्र। उनकी एक चन्द्रनी ही प्रस्तुन ग्रन्थ के कर्ता थे, तथा व ११३१५८२ के लगभग हुए है। चिन्नु भ प्रत में जो अन्तिम उससे इस चयन प्रन्थकर्ता ही गुटके में बंधी हुई हैं। इन प्रतियों को हमने नही देख पाया। उनका परिचय हमें हमरे मित्र युक्त ए. एन. उपध्ये, एम ए , अर्धमागधी प्रो. सर, राजाराम कालेज, कोरहापुर, के एक पन से प्रा हुआ है। २ ग्रन्यकर्ता यह अन्य किसका बनाया हुआ है यह प्रश्न पडा जटिल है । अन्य के मूल भाग में कर्ता २' कहीं, के ई, किसी प्रकार का भी उल्लेख नहीं पाया जाता । किन्तु जिन हस्तलिखित प्रतियों का ऊपर परिचय दिया गया उनमें से अनेक के अन्त में मन्यसमाप्तिसूचक व क्यों में प्रन्यार्वा का नाम देख किया गया है। हम यहा इन्दी उलेखों की सूक्ष्म जांच कर सच्चे प्रन्यकर्ता के पता लगाने का प्रयत्न करेंगे। तीन पोथियाँ (प; म, म. ३ ) में यह ग्रन्थ एक्ष्मीचन्द्रकृत या विराचित कहा गया है। विद्यानन्दि के शिष्य श्रुतसागर कृत पदनामृत टीम में इस ग्रन्थ के आठ देहे उध्दत किये गये हैं और दो स्थानों पर उन लक्ष्मीचन्द्रण गुरुमा', . - केवाय सावयधम्मदोहा तीन नामों का सम्बन्ध बतलाया गया है-मूलमन्थकार योगीन्ददेव, पंजिका- कार लक्ष्मीचन्द्र और प्रतिकार प्रभाचन्द्र मुनि । इसो कथन के साथ साथ प. प्रति के अन्तिम वाक्य पर विचार कीजिये । उस वाक्य में कहा गया है कि संवत् १५५५, कार्तिक सुदि १५, सोमवार को विद्यानान्द के पत्र पर अधि. हिन मलिभूषण के शिष्य पं लक्ष्मण के पठनार्थ दोहकश्रावकाचार लिखा गया { हमारा अनुमान है कि लक्ष्मण लक्ष्मीचन्द्र का दीक्षित होने के पूर्व का नाम है और उन्ही की शिष्यावस्था में उनके पठनार्थ वह प्रति तैयार हुई थी। इससे निश्चय होगया कि लक्ष्मीचन्द्रजी इन दोहों के मूलकती नहीं है। उनकी बनाई हुई 'पंजिका' कौनसी है इसपर आगे चलकर विचार किया जायगा । ए प्रति में जो 'लक्ष्मीचन्द्रविरचित' वाक्य भागया उसी से पीछे के लिपिकारों ने तथा श्रुतसागरजी ने धोखा खाया। यथार्थ में वहाँ श्री लक्ष्मीचन्द्रलिखित ' या श्रीलक्ष्मीचन्द्रालिसिते' पाठ होना चाहिये था । लक्ष्मीचन्द्रन अन्य के ई संस्कृत, प्राकृत २ अपभ्रंश अन्य हमारे देखने सुनने में नहीं आया। मन्थकर्ता की खोज में अब हमारी दृष्टि योगीन्द्रदेव पर जाती जो भ. और भ प्रति में इस ग्रन्थ के कर्ता कहे गये हैं। योगीन्द्रदेव के अबतक चार अन्य प्रकाशित हो चुके है-पामामप्रकाश, योगसार, अमृताशीति और निजात्माटमम् । इनमें से प्रथम दो प्रस्तुत अन्य के समान ही अप- भ्रंश दोह। में रचे गये है। तीसरा ग्रन्थ संस्कृत व चौथा प्राकृत में हैं। श्रीयुक्त उपाध्ये में एक अंग्रेजी लेख में प्रस्तुत प्रस्य व परम मप्रकाश का मिलन का यह मत प्रकट किया है कि इन दोनों की रचना में एक दो जगह साधारण सभ्य को छोड़ कोई स्मरणीय सादृश्य नही है। हमने अन्धकार के सभी प्रन्थों को इसी हेतु से देखा । तीन ग्रन्थों में से तो कोई सादृश्य नहीं मिला किन्तु परमात्मप्रकाश में निम्न लिखित उक्तियों पर दृष्टि अटकी। मिलान की सुविधा के लिये हम प्रस्तुत अन्य के अवतरणों के साथ साथ इन्हे यहाँ .

प्रन्यकर्ता परमात्मप्रकाश साययधम्मदोहा ८ भावे पणविवि पंचगुरु १ पदेपा भावें पंचगुरु २०३ मरगउ जेण वियाणियउ २ जिम मरगळ करण तहिं करिंच कउ गण्णु। २१८ खोला लग्गिवि ते जि मुणि १०६ देउल लग्गिय खिल्लियाई देउलु देउ ईति। किंण पलोहइ मुस्खु । २२१ अस्य कहिं मि कुडिल्लियाई ११२ जाम ण देहकुडि लियाई २३९ रवि पयंगा सदमिय १२६ स्वासत्त पयंगडा ... २४१ लोहर लग्गिवि हुयवह १३४ लोहमुक सायरु तरह पिर पड़तउ तोडु । पेक्खु परोहण तेम। २६० मूलविणटुई तरुवरहं भवसई ४५ अह दलि उप्पाडियई वेलिहे मुहि पण्ण। पत्त समत्त । २९१ तुइ मोह १०० फुट्रिवि जाइ तहत्ति अब प्रश्न यह है कि क्या भ. और भ, प्रति के कथन तथा उपर्युक्त सादृश्य पर मै यह अन्य योगीन्द्रदेवकृत कहा जा सकता है । सूक्ष्म दृष्टि से विचार करने पर इन सादृश्यों में हमें ऐसा एक भी नहीं दिखता जो आकस्मिक न है। सकता हो । फिर, भाषा को छोड़ कर जब हम विषय पर भात है तो योगीन्द्र के शत ग्रन्थों तथा प्रस्तुत ग्रन्थ में बड़ा अन्तर मिलता है। योगीन्द्र यथार्थ नाम योगीन्द्र ही थे। उनके सब प्रन्थ अध्यात्म तत्त्वों से ओतप्रोत हैं। उनका उपदेश आदि से अन्त तक यही है कि बाह्य क्रियाओं प आडम्बरों में कुछ तथ्य नही है । अपनी आत्मा में लीन होने से ही सच्चा सुख मिल सकता है। योगीन्द्र को सृष्टि आत्ममय दिखती थी उनके विचार वेदान्तियों कैसे थे । वे देव, शास्त्र, गुरु की पूजा के बहुत परे थे। उनके विचार से- तत्ति तसु ।

U सावयधम्मदोहा देउलु देउ वि सत्धु गुरु तित्यु चि चे वि कम्यु। पत्थु जु दीसइ कुसुमियउ इंधणु होसह सब्बु ॥पर २५७॥ कासु समाहि करउ को अंच। छोपु अछरेषु शारिधि को पंचउँ । हल सह कलाह फेण सम्माण। जदिहि जोवताह अप्पाणउँ योग. ३९ ॥ इन विचारों को लेकर यह संभव नहीं जान पड़ता कि उन्होने दान, पूज , उपवासादि के महत्व के प्रतिपादक प्रस्तुत प्रन्थ की रचना की होगी। यह हो सकता है कि उन्होंने योगीन्द्र होने से पूर्व गृहस्थावस्था में ही इस प्रन्थ की रचना की हो। किन्तु एक तो इस अन्ध में उनकी भावी अध्यात्मिकता के कोई विशेष लक्षण नहीं पाये जाते । दूमरे कवित्व की दृष्टि से प्रस्तुत अन्य योगेन्द्र के अन्य प्रन्यों ये भधिक प्रौढ जन पडता है। भत एक ही प्रकार की कृति मानने पर उसे इन प्रन्यो से पूर्व रचित कहना उपपन्न नही जचता । अन्धकार के सम्बन्ध में हमें जो तीसरा सकेत मिलता है यह क प्रति के अन्तिम दोहे में है। उसमें यह प्रन्य देवसेने उपदिष्टु' अर्थत देवरेन द्वारा उपदिष्ट कहा गया है । दिगम्बर जैन प्रन्थकारों में देवसेन एक मुप्रसिद्ध प्रकृत कवि हुए हैं। उनके प्रकाशित प्रन्य दर्शनधार, आराधनासार, तलवार, नमक, माप पद्धति र भावसह-समय हमारे यन्मुस हैं। आलापपद्धति को छोड शेष सब प्रथ प्रकृत म या में रखे गये है। दर्शन- सार को छोड़ शेष सब माणिकचन्द्र प्रन्यमाला में प्रकाशित हुए है। प्रस्तुन अन्य में साम्य की खोज में हमनें इन सब को देख हाला । मात्रसंग्रह में हमें हमारे अन्य से कुछ विशेष सादृश्यतायें मिली है। उन्ह हम यहां उन - Ju साउयधम्मदोहा । ८६ दाणु युपत्त दोराहा पालिमा हुमत। पत्थर पत्यरणाव कहि दीसह उतारत्ति ॥ ५४७ पत्यरमया वि दोषी पत्थरमप्पणय च पद। जह तह कुच्छियपत्त सारे चव घोले। १७२ गमणट्ठियह तर८३ वि भहद पावइ पार। १८५ मा पाहाणना लम्गो पुरसो हुवारणी तोए चाइ विषयापारी २२१ रोहनि दुत्तरतरणि णाल विद्यारिय तेण। ५४९ टोहमए कुतरहे यो पुरखो हु तोरणीवाद। ८९ का बहुसद सायद जद किशह परि हो। ५५९ किविण सचमा गहोर उवयारिय जहा सरस। ९३ जा पर हुतइ धगणद मुणिहि कुमोया दे। जम्म जम्म दारिदाउ पतहु सोद॥ ५६ उत्तमाः मोयवणिहि ९५ घरपी दपकपया जाहिं ते पूहि अहिल गु। ५१ जो पुणता पण मुमिहिमायण देह। अम्मि जम्म दाथि पट्टिण तहो छ। ५.७ पुग्णवरेणुगना कदमविपुरिसोय मायभूम भुप्रेश सय भए दाकापातरम्मरे दिये। ५० पायव दसप्पयारा वितिय दिन मनुषण। १५ मार जण गुधि को दबोण गुगार २१ तारित पदा २४ दिन 111 रहाणे मुन्नार मता हिता पालेगा ३.

१७० सूरुग्गमणि तलाउ १८६ सह सरवरि पइसारिणई पनिउ होइ अगाहु । प्रन्थकर्ता JI ३९२ जद्द गिरिणई तलाए अणवरयं पविसए सलिल- परिपुणं। ३१९ गिरणिग्गउ गवाहो पविसइ सरम्मि जहाणवरयं । १८३ जलधारा शिणपयगयउ स्यहं पणासह पामु। ४७. पसमद रयं असेस जिगपरकमलेमु दिण्ण जल. धारा। इन अवतरणों में भाव, भाषा व उक्ति विशेष का सादृश्य विचारणीय है। इसके अतिरिक्त कुछ शब्दों का साम्य भी उल्लेखनीय है-- कप्पर (सा ५६, भा. ५७३ ), छड या छा (सा. ३९ आदि, भा २११ आदि), तलाम (सा. १७०, भा. ३९२), एव (सा. १७९, भा. ४१५), चहाफड (सा, १२४,१५८, भा. ४५), तरंद (सा. १९२, भा. ५४९ ), कंज (सा. १२५, भा ४४९). ४१ वे दोहे का पुष्टिमंस संभव है १७३ वी गाथा के 'पिठर' का हो बोक्क हो (देसो ४१ दोहे की टिपनी)। यथार्थ में पाक्यधम्म के २२४ दोहे व भावसंग्रह की ३५० से ५९९ तक की २५० गाथाओं के विषय, भाव व भाषा में असाधारण सदृश्य है। वहीं एक ही विषय दोनो में एकही प्रकार से भाया है, जैसे- १. पान और दान का विवेक- सा ७९ आदि, भा ४९७ भादि. २. घृतादि सर्वरसाभिषेक - सा. १८१ आदि, भा. ४३८ आदि. २. अष्टद्रव्यपूजा और फल – सा. १८४ आदि, मा. ४७१ आदि ४. धर्म से स्वर्गादि सुष और मौल-सा.१६३ आदि, गा. ४८४ आदि.

D सारयधम्मदोहा किसी किसी विषय का एक अन्य में उल्लेख माम तथा दूसरे में उसका पूरा विवरण मिलता है, जिससे ये दोनों अन्य एक दूसरे के परिपूरक से ज्ञात १. अष्टमूलगुण व बारह व्रत का भवसंग्रह की ३५२ ५ ३५६ पौं गाथाओं में उलेख मान है। सारयधम्म के १० से ५२ तक के ४३ दोहों में इन्ही का सविस्तर वर्णन है। २. भावग्रह की ३७५ वी गाथा में तीर्थर के अट प्रतिहार्य का उल्लेख माम है । घावयचम्म में उन बाठों का भाठ दोहों (१७.-१७७) में काव्य की रीति से वर्णन है। ३ सावधम्म के २१२३ दोहे में सिद्धचक्र की स्थापना का बहुत सूक्ष्म उल्लेख है । इसी विषय का भावसंग्रह को ४४३ - ४५६ गयाओं में बहुत विशद वर्णन है - इस प्रकार इन दोनो अन्यों में एई ही या का हाय दिखाई देता । विशेषत सावयधम्म का जो ९५ यो देहा भव संग्रह के ५१६ नं. पर जैसा का तसा पाया जाता है उससे इस विषय में बहुत कम सन्दह रह जाता है । भावसंग्रह जिन दो हस्तलिखित प्रतियों पर से छाया गया है उनमें से एक प्रति में यह दोदा 'उक्त च 'ससे पाया गया है। अधिक पुरनी प्रति में 'उस च 'शब्द नहीं है । यदि 'च' पद कही म न लिये जाय तो इससे यही सिर होता है कि सवपघम्म की रचना भावसमा से पूर्व हो चुकी थी भार कर्ता ने उपदे को यो प्रसमे पयोगी जाग उन पर दिया। ऐसी दिसत देवसेनी के अन्य प्रन्यों में भी १६ गती है। इसी भावसंग्रह में उनके दर्शनसार की अनेक ग यथई । रख दोहे को पं. का प्रशित मानने न तो ईमान है और नई कारण एक और यात बी प्रस्तुत प्रन्यपी वीरता करने में पहायता पहुंचाता है। देवसेनकन जिन अन्यों का उपदम जार कर अन्यकर्ता नयघना हुआ है। 1 आये हैं उनमे एक 'नयचक्र' भी है । माणिकचन्द्र ग्रन्थमाला में यह रघु नयचक के नाम से पा है और उसी के साथ एक और वृहत् नयचक छपा है जो माहादेवकृत है। मिलान करने से ज्ञात हुआ है कि वृहत् नयचक्र में रघु पूरा गुया यदि हम पहले को दूसरे का परिवर्धिन रूप या दूसरे को पहले का संचिताए करें सो अनुचित न होगा । इस परिवर्धिन रूप के अन्त में निम्नलिखित चार गायायें पाई जाती है- गुणिऊण दोहरत्थं सिग्य हसिऊण सुइको भणइ । पत्थ ण सोदइ त्यो गाहायंधेण तं भाद ॥४१८॥ लियसद्दसुणयदुग्णयदणुरेहरिदारणेजवरसीरं । तं देवसेनदेयं जयचकायर गुरं णमद ॥ ४२१ ।। दवसह वपयासं दोहयवंधण आसि जे दिट्ट। गाहायधेप पुणो रइयं मारलदेवेण ॥ ४२२ ।। दुसमीरण पोयम्पेरिय संतं जह तिर गहुँ (१)। सिरिदेवसेगापिणा तह पयः पुणा रइय ॥ ४२३ ॥ इन गयाओं का अर्थ की दृष्टि से मटी नहीं उन पहता तया ४२३ वी ग था का पाठ कुछ भ्रट है अतएव उसका भार भी कुछ अपर हैकिन्तु मेरी समम में इनमा भव यह पता है कि कोई प्रयोग नयचर भसिर दोया था उसमा पुरुद्धार करने की हर से देवसन ने फिरसे उपकी रचना दी। यह रचना दोहाबंध में हुई जिसे सुनार एक शुभंकर महाशय ने इस दिया और कहा कि यह अर्थ इस में नही हता, इमे गथयर परो। तदगार उनके शिष देव ने उसे गाय थों में परिवर्तन किया। देवजी को प्रचंग रचनामा यो रोजवर उनके पुनमा दो पाई रशियी। दर्शनसार में उन्होने पर कहा है कि पुरानी गाय ओं का चाकरउन्मोन उसको रचा।

सावयधम्मदोहा यदि उफ गायाओं का यही हक भावार्थ हो तो हमें उससे दोपते ज्ञात होती हैं। एक तो यह कि दोहाद का साविष्कार उस समय संमयत नया था और परित-मली में वह हेय दृष्टि से देखा जाता था। दूसरी यह कि देवसेन को इस छंद में प्रत्यरचना करने की रवि थी। उनके भावग्रह में ही पांच पच अपभ्रंश भाषा के रस के पाये जाते हैं और शेष भाग में भी अपभ्रंश भाषा का अधिक प्रभाव दिखता है। नयचा का विषय पाटि सपूर्ण न्याय या| भत शुभकर 'के युवक से उसका दोहामन रूप नष्ट कर दिया गया। किन्तु साययधम्म साधारण गृहस्यों के लिये लिखा गया या इससे यह उप कुचक से पच गया। सौभाग्य से देवसेनजी के समय व देश के सम्बन्ध में कोई अनिधय नहीं है। उन्होंने अपने दर्शनसार अन्य के अन्त में स्पष्ट रूप से कह रक्सा है कि उन्होंने उम अन्य की रचना धारा नगरी के पार्थनाथ मंदिर में घटकर संवत् १९. को माघ मुदिवा को समाप्त की। यथा- 'पुष्पायरियकया गावाई सचिऊण पयस्थ सिरिदेवसेणगणिणा धाराए संवसंतेण ॥४९॥ रहओदसणसारोदारो मन्राण पयसर पथए। सिरि पासपाहगेहे सुविसुद्ध मादसुद्धदसमीप ॥ ५० ॥ धारा नगरीष मारया अन्त में सदर विकम संवा का प्रसार रक्षा तथा दर्शनसार में मन्यन जहाँ जा सकर का सोप भाया पहा पता ने सत 'विमघालरस मरणासस्य ' एसा है। इuो उर. वोस सक्त् के मी विक्रम संवत् होने में कोई संदेह को रयान नहीं है । धारा- नगा विद्वानों जुटाव के लिये प्राचीन कम में प्रसिद्ध हो रही है। मारत भपा का भी यहा भरटा पटन होता रहा 1 उपलम्प प्राचीनतम प्रगत पोरवायलाठी-नाम- मालाकी रचना मी जैन की मनमाने प्रचार, टीकाटिप्पनी व परम्परा विक्रम संवत् १०२९ में यहीं की थी र यहा के निवासी प्रमाचन्द्र पडित ने विक्रम संवत् १११२ के आसपास पुष्पदन्त के अपभ्रश काव्यों पर टिप्पण लिखे थे। ( देखो गायकुमारचरिउ, भूमिका)। भत सिद्ध हुआ कि प्रस्तुत सावयधम्मदोहा के कर्ता देवसेन ह, उसकी रचना विक्रम संवत् ९९. के लगभग मालवा प्रान्त की धारा नगरी में हुई है तथा यह अन्य दोहा छद का एक प्राचीनतम उदाहरण है। ३ ग्रन्थ का नाम, प्रचार, टीकाटिप्पनी व परम्परा. इस प्रन्य का विषय भावकों का धर्म व आचार है। इस विषय के जैन अन्यों का नाम प्राय प्रावकाचार व उपासकाचार ही रखा जाता है। तदनुसार ही प्रस्तुत अन्य अधिकाश पोथियों में 'श्रावकाचार दोहक' या उपासकाचार' कहा गया है। किन्तु मूल प्रथ में यह नाम कहीं नहीं पाया जाता। श्रावकाचार' शन्द तक मूल प्रन्थ में कहीं नही आया । अन्य कर्ता ने प्रथम ही दोहे में इसे 'सावयधम्म' कहा है व अन्त में ( २२२ चा दोहा ) इसे 'धम्मधेणु सदोहयह ' ' दोहों की धर्मधेनु ' कहा है। क प्रति में अन्य का नाम ' दोहाबद्ध सावयधम्म' दिया गया है। यही नाम कर्ता को अभीष्ट ज्ञात होता है । तदनुसार ही प्रस्तुत प्रन्य का नाम ' सावयधम्म- देहा' रखा गया है। जान पड़ता है गत शताब्दियों में इस ग्रन्थ का कुछ अच्छा प्रचार रहा है, इसी से इसकी हस्तलिखित प्रतिया दिल्ली, भागरा, जयपुर, बशर व पूना में पाई गई हैं। कई प्राचीन लेखकों ने इसके सुदर दोहे अपनी कृतियों में उहत किये हैं। 'दोहा पाहुड' में इसका एक दोहा ( २१३) पाया जाता है। श्रुतसागर ने अपनी पत्प्रामृत टीका में इसके आठ दोहे (१०५, १०९- यह अन्य मी अपभ्रश दाहों में है। इसे भी इस मन्यमाला में प्रकाशित करने का प्रबन्ध हो रहा है। .

साययधम्मदोहा ११२, १३९, १४८ और १५६) उत किये ह जगा कि कार पर भाये है। प्रन नमिदत्त पृत प्रीतिकरचरित में इसके दो देहे (२८,६७) पाये गये है। सूक्ष्म परिशीलन से भोर अनेक प्रन्य में इन दोहों के पाये जाने की सम्भावना है। भ प्रति के अन्तिम श्लोक ये हमे ज्ञात हुआ है कि इस पंथ पा रश्मीचन्द्र ने एक 'पंजिका तथा प्रमाचन्दमुनि ने एक 'सत्त्वदीपिका' नामक 'पृत्ति रिसी। किन्तु उस पायी पर से यह नहीं शात हो सका कि उसपर को टीका इनमें से कौन सा है। इस प्रति के येशन पर मारकर इन्स्टीटयूट के धर्मचारियों ने 'दोधक अवकाचार रमीचन्द्र ही पत्रिका सहित 'ऐसा लिए रया है जिससे शात होता है कि उनकी समससे यही टीका रक्ष्मीचन्द्र पृत पजिया है । इसके लिये उनका भाधर उफक अतिरिक और बुछ नही दिखता। इसके निर्णय के लिये और के प्रमाण नपा हमारा ध्यान 'पंजिका' व 'पृति के अर्थ व भेद पर जाना है। हेमचन्द्राचार्य ने काय पडिका की परिभ पा इस प्रकार की है 'टीफा निरन्तरख्याएया पतिका पदाधिका' धार इसको रोया है 'सुगमाना विपम गोप निम्ता व्याख्या गायो का टीका विपमध्येव पदानि भनकि पदमक्षिका। हमसे हमे त हुया कि सतार प्याख्या का नामरीश और केरल कटिन शन्दों की व्याख्या का नाम पाहै। हम 'पृति' का गी कई प्राचान परिभ ना जानना चाहते ५ किन्तु यह हमें फिर हाल फही मिरी नही । पर 'वृत्ति 'का हम यह भयं मने भाये। जिउममें मूल का परल शब्दों में अनुाद दिया जाना ६ जिन अग्रेडा में paraphrase यह सरते है। म. प्रति कोई काम नी प्रकार शत हता है। उसे हम उपर्युज पोगापा के अनुसार पत्रिका नाम । उसमें फेम रिश्म पद के पक्ष्या नही है कि पूरे कार्य देने का प्रयत्न किया गया है। मारा अनुमान है कि यह मांगीली 'पशिका' नहीं किन्न प्रमानन्द्रमुगे को ' महती पदविका पनि ।

प्रचार, टीकाटिप्पनी व परम्परा । इय वृत्ति में अन्तिम यात दोहों का अर्थ नहीं समझाया गया। हमनें इस वृत्ति का उपयोग अपनी टिपनी में किया है। दो चार स्थानों पर इस वृत्ति से दोहों के अर्थ पर अच्छा प्रकाश पड़ा है और इसलिये हम इसके कती का उपकार मानते हैं। किन्तु इस वृत्ति से कर्ता अपने लक्ष्य में कहा तक सफल हुए हैं यह टिप्पनी में स्थान स्थान पर उध्दत अंशों से पाठकों को ज्ञात हो जायेगा । लेखक का साहस तो अवश्य प्रशंसनीय किन्तु सल के नाते हमे कहना पड़ता है कि उनकी यह चेटा अधिकांश अनधिकार ही थी। उनके सन्मुख ने तो मूल अन्य को शुद्ध कापी ही थी और न उनमें उसे शुद्ध कर सकने की शक्ति थी। वे अपभ्रश भाषा के कुछ अच्छे जानकार ज्ञात नहीं होते । हो, विषय के जानकार अवश्य थे। उसी के सहारे बहुत कुछ अटकल पच्चू लिखते गये हैं । एकाध जगह तो उनका घटकल भी अटक गया ( देखो दोहा नं. १३५ की टिप्पनी)। उनका संस्कृत का ज्ञान भी बहुत अधूरा था। वे लिह, वचन, तिबन्त कृद- न्तादि के सब नियमों के परे थे । हम यह ऐसी त्रुटियों पर से नही कह रहे है जो लिपिकारकृत हो। उनकी भाषा में ऐसी घुटयां हैं जो लिपिमान के भमाद से नहीं हो सकती। वे कवित्व से भी सर्वथा हीन थे। मूल की सुन्दर सुन्दर उपमाओं व सूझौं पर उन्होंने अपनी वृत्ति द्वारा पानी फेर दिया है। सारे ग्रन्थ में कठिनाई से दसवीस दोहे ऐसे होंगे जिनका पूरा भाव और शब्दार्थ उनकी वृत्ति में भागया हो । पूर्णत शुद्ध संस्कृत तो शायद किसी एक दोहे की वृत्ति में मी न मिलेगी। पहले विचार हुआ था कि इन नमूने यहाँ उदृत किये जांय भार इस हेतु कितने ही दोहों को वृत्तियो लिख भी डाली यो । किन्तु पीछे उन्हे अनावश्यक जान छोड़ दिया । इस वृत्ति के विषय में हमने जो बात यहाँ कही हैं उनके यथेट प्रमाण टिपनी में उभत अंगों में ही पाठ को मिल जायगे। ये वृत्तिकार कर कहां हुए इसके न तो कोई प्रमाण हमारे सम्मुख है मौरन इसकी कुछ बाच पाताल करने की इच्छा ही होती। हां, इतना । वृत्तियों के सावयधम्मदोहा कह देना आवश्यक प्रतीत होता है कि यदि इसके कर्ता प्रभाचन्द्र नामधारी ही थे तो वे पुषदन्त के अपभ्रश काव्यों पर टिप्पण लिखने वाले धे प्रमाचन्द्र नही हो सकते जिनका हम ऊपर उल्लेख कर आये हैं। प्रभाचन्द्र नामके अनक मुने और कर्ता हुए हैं (देखो 'रत्नकरण्ड प्रावकाचार भूमिका पडत जुगलकिशोर मुरतार छत, च जैनशिलालेखसग्रह भाग १)। बहुत प्राचीन शत नही होती। अब प्रश्न यह है कि इन दोहों की रक्ष्मीचन्द्रकृत 'पणिका' कौनसी है । हमारा अनुमान है कि जो टिप्पण प प्रति पर पाया जाता है चही यह पत्रिका है । उपर्युक्त परिमापा के अनुसार टिप्पण और पत्रिका में कोई बडा भेद ज्ञात नही होता। यह कृति कोई भय हम पूर्वाफ पोथियों का विशेषताओं पर से इस प्रन्थ को परम्परा का युछ अनुमान कर सकते हैं। देवसेनकृत मूल अन्य वि स ९९० के लगभग तैयार हुआ । आगामी पांच सौ वर्षों में इसकी तीन प्रकार को प्रतिया प्रचलित होगई । एक में कर्ता का नाम देवसेन पाया जाता था इसलिये हम इसे दे. प्रति कहेंगे । इसी पर से ह अर्थात् हृदयनगर की वह प्रति तैयार हुई जिसमें ग्यारह दाहे और जुड़ गये तथा जिसपर से सवत् १७८० में हमारी क प्रत तैयार हुई। दूमरा प्रति में परमात्मप्रकाश की भाषा य के साम्य पर से अन्य क कर्ता का नाम योगीन्ददेव जुड़ गया था। इसमें दोहों की संख्या २२४ थी। इये हम यो कहेंगे। इसी पर से हमारी म प्रति तयार हुई होगी । हम कह चुके हैं कि म. प्रति के पष्ठ क से बहुत कुछ मिलते हैं अतएव इसका ह. से भी कुछ सम्बन्ध ज्ञात होता है। तीसरी प्रति में दोहों की सख्या २२३ या २२४ थी शिन्तु कर्ता का नाम कोई भी नहीं पाया जाता था रे हम वि प्रति कहेंगे। इस पर से हमारी पांच प्रतियां (ज, प, ६, ५२ और म २) तयार हुई प्रतीत होती है। प प्रति गुजरात में मलभूषण के शिष्य लक्ष्मण ने स १५५५ में लिखाई। आगे चलकर ये ही लक्ष्मण लक्ष्मीचन्द्र के नाम पे मविभूषण के उत्तराधिकारी

प्रचार, टीकाटिप्पनी व परम्परा
हुए । भ प्रति के अनुसार उन्होंने इस प्रथ की पपिका बनाई जो प. प्रति
पर का टिप्पण ही ज्ञात होता है।
हमार! अनुमान है कि भ प्रति घाले तीन अधिक दोहे भी
स्मीचन्द्रजी के ही बनाये हुए हैं । इस प्रकार उनकी तैयार की हुई (ल.)
प्रति में २२७ दाहे होगये, जिस पर से २२७ दोहों वाली हमारी तीन
प्रतिया [भ ३, ५ ३, ४] तैयार हुई । म प्रति में तीन अधिक दोहे
हैं, योन्द्रिदेव मूल अन्धकार कहे गये है तथा २१९ वां दोहां नहीं है।
अत: उसका सम्बन्ध ल अ और ज तीन प्रतियों से था। इस परम्परा
को हम वृक्ष द्वारा और भी स्पष्टता से व्यक्त कर सकते हैं। जिन प्रतियों के
नाम के साथ * यह चिन्ह है ये अबतक मिली नहीं है।
मूल [वि. स ९९.]
यो
वि*
--
।
।
अ
ज
प (१५५५) द
ल*(१५७०)
भ२(१५९३)
भ३(१५९९)
प३(१६१२)
क(१७८०)

सारयधम्मदोहा एक प्रश्न और है जिस पर भी यहा कुछ विचार कर लेना भाव- श्यक प्रतीत होता है। दोहा नं. १२२ में जो कुछ कहा गया है उससे ज्ञात होता है कि उसके ऊपर के दोहों की संख्या मूलत २२० यद्यपि भ. प्रति में ' विमुत्तरई की जगह 'व'वीमुत्तरइ' पाठ है पर वह स्पष्टत कल्पित है। सब प्रश्न यह है कि वह कौन सा दोहा है जो मूल में नहीं था तथा जिसके कारण हमारे दोहों की संख्या २२० की जगह २२, होगई है । जैसा उपर कह आये हे, ज. और म, प्रतियों में दोहा न २१९ नहीं है । क्या वही दोहा पंछ का जोड़ा हुआ है ? वह दोहा इतना सुन्दर तथा प्रथकार की शैली के इतना अनुकूल है कि उसे प्रक्षिप्त मानने को जी नहीं चाहता यद्यपि दोहा न २२१ की प्रथम पनि प्राय वही होने से यह भी सभव जान पडता है कि यह प्रक्षिप्त हो । इसका यथार्थ निर्णय घर निकालना बड़ा कठिन है और इसकी कोई पड़ी आवश्यकता मी प्रतीत नही होती । भर्तृहरि आदि कृत शतकों में प्राय सौ से अधिक है। दोहे पाये जाते हैं। ४ भाषा और व्याकरण, प्रस्तुत अन्य धार्मिक उपदेश तथा सूक्ति की ह से तो मुन्दर है ही पर उसका और भी विशेष महत्व उसकी भाषा में है। जन भतारों की सूचियों में इस भाषा के अन्य प्रय 'मागधी भपा के नाम से दर्ज किए हुए मिलते हैं किन्तु यह भाषा न तो मागधी है और न अन्य शैरसेनी मादि प्राचीन प्रत । किन्तु इन प्रारतों ने प्रचलित देशी भाषाओं के पूर्व जो रूप धारण किया था वही इन अन्यों में पाया जाता है। यह उनका विकसित या अपघट एप है और इसी से इस भाषा का नाम सपा या अवहटा पडा । प्राकृत व अपभ्रश भपये समय समय पर जनसाधरण की भाषायें रही है और इसीलिये वे अपने अपने समय में सस्त से भी अधिक मधुर भार प्रिय गिनी जाती थी। गमगरी के पर्ना राशेिगर

भाषा और व्याकरण
को संस्कृत और प्रायन की रचना के माधुर्य में उतना ही धन्नर दिसता या
जितना पुस्खों को करना और त्रियों की मुरमारता में । उन्होने कहा है-
परसा सयामयंधा पाउसयंधा यि होर सुउमारो।
पुरसमदिलाणे चिममिदंतर तेत्तिमिमाणम् ॥
[कर-१,८]
विद्यापति ठर को देशी भयंत अपभ्रंश गया मधुर्य में संत
यात दोनो की चटी दिसने लगी थी। उन्होंने भानो 'कातिलता
में कहा है-
समाभयाणी पाहुध न भायह
पाउमरस फो मम्म न पाया।
देसिलपथना सय जन मिट्टा
से तैसन जमओ अवहट्टा
१०. व ११ वी शताब्दि के गमग यही गापा समस्त उत्तर
भारत में प्रचलित पी किन्तु देश भेद के अनुसार उसमें भेद थे। प्रमुत
ग्रन्थ मालवा प्रन्त में लिया गया है अतएव इसमें पश्चिम देश की अपनश
भाषा पाई जाती है जिसका व्याकरण हेमचन्दाचार्य ने अपनी प्राकृत व्या-
रण में बच्ची तरह, गूप उदाहरणों यदित, दिया है। हमने 'पाययुमार.
चरत' की भूमिका में इस भाषा के व्याकरण या रायस्तर परचय कराया
किन्तु प्रस्तुत प्रन्थ के पठन पाठन की सुविधा के लिये इसी मन्ध पर से
युछ व्याकरण यहां भी दिया जाता है।
हिन्दी भाषा के साहत्य य इतिहास में इस भ'पा के ग्रन्थों का
क्या स्थान है यह सुरराय करने के लिये हिन्दी साहित्य के तीन प्राचीन ग्रन्थों
-पृथ्वीराजरायो, धागल्देवरायो और कीर्ति बता- से इसकी मुछ स्थूल रूप
से यहा तुलना की जाती है-
-

lan सापयधम्मदोहा १ कीर्तिलता में मैथिल देश का अपभ्रश है जो मागधी प्राकृत से निकला हुआ है अत उसमें य, श और ष, वर्ण तथा प्र, द्र आदि संयुक्ताक्षर पाये जाते हैं । साश्यम्म का अपभ्रश महाराष्ट्री प्राकृत का है गत उसमें इन वण का दामाव है। २ कीर्तिलता में शब्दों के बीच में आये हुए अल्पप्राण ध!-के, ग, च, ज आदि- का बहुधा लोप नही हुआ। सावयधम्म में अधिकत हुआ है और उनके स्थान पर कहीं कही य श्रुति पाई जाती है। ३. कीर्तिलता में परसर्गों का यहुत सूक्ष्म प्रादुर्भाव हुआ दिखाई देता है और प्रकृत विभक्तियां प्राय उड गई है। वीसलदेवरामोव पृथ्वीराजरासो में कहीं मही परसर्ग और कहीं कहीं अयोगात्मक विभक्तिरूम, प्राय दोनों अवस्थायें पाई जाती है। सावयधम्म में विभाकिया कायम है यद्यपि उनकी जट उसद चली है । किन्तु परसर्ग का विकाश केवल पठी के साथ 'तण', व सप्तमी के घोष के लिये 'मसि' में पुछ २ दिखाई देता है। ४ उक्त तीनों अन्यों में मुसलमानी भाषा के संसर्ग का प्रभाव है जैसा कि चन्द वरदाई ने पटप से स्वीकार किया है- पट भाषा पुराणं च कुरानं कथितं मया।' प्रस्तुत अन्य में मुसल्मानी सबर्ग की गप तक नही है । उसमें पुराण एब है कुरान बिल्कुल नही। अपभ्रंश भाषा के अन्य का अनुवाद करने में मुझे एक और वात का अनुभव हुआ रिसे यहा प्रकट कर देना उचित जान पड़ता है। सरत के अनेक क्रियाद ऐसे हैं जो अपनश में पाये जाते है और प्रजमाया भादि पुरानी हिन्दी में भी बहुत युछ प्रचलित थे किन्तु जो प्रचलित सही बोली में से लुप्त होगये है। उनका अर्थ व्यक करने के लिये सब हमें उनके भूनक रिक कृदन्त व विशेषण या सशाय बनाकर ' होना'' करना 'लिया के साथ उनका उपयोग करना पड़ता है। उदाहरणार्थ- संस्कृत नमता है नमति नश्यति प्रकाशते मलिनायते भक्षति चारयति प्रकटयति व्याकरण tej अपभ्रंश पुरानी हिन्दी प्रचलित रुप मह नमन करता है पासइ नसता है नष्ट होता है पयासह प्रकाशता है प्रकाशित होता है मइलेइ मैलता है मैला होता है भक्खइ भखता है भक्षण करता है धार वारता है वारण करता है पयड प्रस्टता है प्रकट होता है। ऐसे उदाहरण अनन्त हैं। यह मुझे भाषा में उन्नति की जगह अवनति का लक्षण दिखता है। क्रियाओं का क्षेत्र घटना नहीं बढना चाहिये या । मेरी समझ में ऐसे क्रियापदों का हिन्दी में प्रयोग प्रारंभना चाहिये। व्याकरण - १. सावयधाम की अपनश भाषा में देवनागरी वर्णमाला के स्वरों में ऋ, ऐ व ओ तथा व्यञ्जनों में क, प, श और प को छोड़ कर शेष सब वर्ण पाये जाते हैं। न की स्थिति कुछ अनिश्चित सी दिखती है। अधिक्त उसके स्थान पर न ही मिलता है । प्रस्तुत संस्करण में सर्वन ण ही रखा गया है। उपयुक्त वर्गों के स्थान में निम्न लिखित आदेश होते हैं । ऋ के स्थान में अ, इ उ या रि। यथा, कय-कृत, घय-घृत, अमिअ-अमृत, किविण-कृपण, घिय-घृत, मुभ-मृत, रिखि-ऋषि इत्यादि. ऐ के स्थान में इ, यथा, विजाबच्च-वैयाल्स. औ के स्थान में भी या भउ । यथा, भोसह-औषध, चोर-चौर, मउण-मौन ।

सावयधम्मदोहा प व श के स्थान पर स । यथा, सोह-शोभा, काय-कषाय, देस-देश। हवन के स्थान पर सर्वन अनुस्वार का उपयोग किया जाता है सस्कृत भाषा के शब्द यहा प्राय विकृत अवस्था में पाये जाते है। शब्द के मध्यवर्ती व्यअनों में निम्न प्रकार विकार होते हैं- अल्पप्राण व्यवन का लोप व कहीं कहीं उसके स्थान पर य अथवा व का आदेश । यथा, वयण- वचन, पयासम-प्रकाशित, सखेव- संक्षेप, छेय- छेद, घाय- घात. महाप्राण व्यवनों के स्थान पर ह आदेश होता है । यथा, सुह- सुख, मह- अघ, उदय- भय, दाहमाअ- दक्मिथित, महु- मधु, मुत्त हल-मुक्ताफल, कहीं कही म के स्थान में घ और व के स्थान में म पाया जाता है। यया, रामण-रावण, सुवण- मुमनस् । य. के स्थान में पाया जाता है। यथा, जुय-युग, जस-यश, जाण-यान। सयुक्ताक्षर से प्रारम्भ होने वाले शब्दों म सयोग के दूसरे धर्ण का लाप कर दिया जाता है । यथा, वय- प्रत, तिहुयण-त्रिभुवन, बसण-व्यसन खावय-श्रावक, साइ-स्वाति । शब्द के शेष भाग में असवर्ण सवैग सवर्ण सयाग में परिणत कर दिया जाता है । यथा, दुद्ध- दुग्ध, कप्पयरु- कल्पतरू, कस-कश, मुर-गुष्क, जुत्त- युक, निप्पल-निष्पल, अण्ण- सन्य। कुछ सयुत्ताक्षरों के स्थान पर विशेष वर्गों का आदा होता है । यथा- क्ष-क्स, स या छ, पच्चरव-प्रयक्ष, पेसण-प्रेक्षण, सम- क्षमा, छण-क्षण। ग्घ-स, ज्झ-दग्छ ।

व्याकरण स्थ-छ, मिच्छरा- मिथ्याल । त्य-रच, सच्च- सत्य, चत्त- त्यक, विजमावच्च-पैयारत्य। ध-उज, सावन सावध, मज्ज- मय, जूअ-धूत। ध्य- उस, मजिदाम- मध्यम, भन्समाग- अध्ययसाय, सज्शाय-स्वाध्याय । घ-शु, शुणे- धनि । प्स-उछ, अच्छर-अप्सरम् । स्थ- 3, ठाइ- स्थाति, अदि- अस्थि । ख-ह, हाण-स्नान २. संशा भधिकाश संशायें अकारान्त पाई जाती है। हलन्त संज्ञाओं के अन्तव्यजन का लोप करके वे अकारान्त बना ली गई हैं, यथा, जग जगत्, तगतमम् । द्विवचन बहुवचन में गर्मित हो गया है। कारकरचना एकवचन बहुवचन विभक्ति उदाहरण कत्ती गर, सप्प, क्य, तस. म विभक्ति उदाहरण ३ दुन्णु, अमित, वाखर वज्जु, सुनु, दुलहु, कंचणु, उ धम्मु, पंचगुरु, दस, गेहु, ऐं संखेचें, सम्मत्ते, समें, पाई. एण पचेग, सग्गासेण, पविण. हैं मग्गइ, उवएसई कारणई इण तमिश, मित्तहण, पदइण, दायार,णर, मुर, - सापराधम्मदोहा राम्प्रदान हु परयह, गोत्तहु. णि गाणह. पतइ, चौरह जागह हिं मुणिहिं अपादान हु रा यह ह पचुपरह सम्बन्ध हु यदु तिमिाह ह चौरह, वयरह, हिहिं सूरिदि, समिर ६ स सहि. पपई, वरह. अधिकरण इ अगि, मण्यत्तणि, अंधारय, ६ सरवरहगुपह लोइ, परि. सम्बोधन अ त्रिय, वड, गिरम आकारान्त य ईरान्त सालिंग पर पहुधा हस्वान्त कर दिये जाते है, यथा, दय-या, कइ-कथा, वेयण-वेदना, भेर-भेरी किन्नु बेसा, चोरी इत्यादि भा पाये जाते है । कर्ता व कर्म कारक में ये प्रकृतरूप हा रहते हैं। शेप कारकों में पुगि से कोई नही विशेषता नही पाई जाती। नपुमर लिंग काले ? सा हेता हुआ दिखता है। शेष कारकों में तो इनका कोई विशेष चिह्न दिखाई नही पड़ता पर कहीं कहीं कती यहुवचन में ये पहिचान पड़ते हैं, यथा, परागह, सिरसावयह ३. सर्वनाम कर्ता हउ (अहम्, मैं हु ), कोइ, सद, सो, ज त ( नपु) एद, हु, एउ कर्म करण सम्प्रदान धम्पन्ध पद ( त्वया, तूने), जंग, तेश पद ( तुभ्यम्, नसो), सहु. बम, तास, वाह, व्याकरण INI ४. संख्यायाम पूरमार्थक प:मउ, पहिउ. बीयर, मिदे. तिउजउ २णि hिin ३ निणि ४ गारि ५प अY पंचमु सत्तम ८ भट्ट भट्टा णाम दसमउ ११ एयारह एयारहग १२ यार ५, क्रियापट रियामों में परस्मैपद आत्मनेपद व मादि पदादि का कोई भेद नही रहा । द्विवचन बहुवचन में गभत हो गया है। वर्तमानकाल पक्षचन यावचन प्रत्यय उदाहरण प्रसय उदाहरण उत्तम पु. मि, उ अवखीम, करडं. मध्यम पु. हि, सि महिलहि, हरदि, चाहदि, होमि अन्य पु होइ, पिंट, घाइ, करद, अति, जीत, विपति, वद, पालक, रिया, हुते, हवति हणह. गिति, भणति. मह उप्पज्ज ... ...

॥
सावययम्मदोहा
भूतकालिया किया का कार्य प्राय भूतकालिक कान्तों में
निकाला जाता है । क्रिया का उदाहरण के एक मिल सका है, खांसी-
आसीत् ।
भविष्यत्काल की क्रियाओं के उदाहरण भी पहुत पोरे मिलने
है, जाहि- यास्यसि ( तू जायषा), फलदि- फलिष्यन्ति (फलेंगे), उदि-
करिष्यन्ति ( करेंगे), होसि- भविष्यसि.
भादेश सूचफ मध्यम पु हि देहि, गोवदे, छह, णिवारहि
हु संसह
६ फरि, छोडे, परिहार, गुणि, भगि, म बोलि,
उ पिश्तु
अन्य पुउ अच्छउ, माउ, जाउ
विधिसूचक- करेइ, हणे
कर्मणि प्रयोग-दिमइ, भुजिलद, हविनर, रविसम्जद
प्रेरणार्थक- फारयद, उदाव.
वर्तमानकालिक सदान-मन- हसत, सिंचत, करत. लिंग-उतारति.
भूतमालिक कृदन्त-भ, इअ, इय- हुम, मुक, गालिग, भरिसम,
कहिय, छीय, उपशादिय ।
पूर्वकालिक अन्यय-एपिपु- पापिणु ( प्रणमकर ),इस-दछेय गणिय,
विग्ग सिय, इवि-फुटिवि, सावि, भुजिवि, विहा वि.
क्रियार्य क्रिया-(तुमुन् ) दव-कदियि ण याकथयितुं न समति ।
६. अव्यय
समयसूचक-अज्ज, कमि, सपद, जाम।
स्थानसूचक- इयु, अंतरि, बाहिरउ, अहि-तहिं ।
प्रकार सूचक- जह-तह, जेम, फेम।
न्य- ग. गड, इ, विशु, जा, सई, गिरिठ, महता, पुगादि।

सावयधम्मदोहा गमकारेपिणु पंचगुरु दूरिदलियदुहकम्म । संसे पयडक्सरहिं अक्समि साययधम्मु ॥ १ ॥ दुजणु सुहियउ होउ जगि सुयणु पयासिउ जेण । अमिउ निसें वासरु तमिण जिम मरगउँ कच्चेण ॥ २॥ जिह समिलहि सायरंगयहिं दुल्लहुँ जूय? रंधु । तिहं जीवहं भाजलगयेह मणुयत्तणि संधु ।। ३ ।। सुहु सारउ मणुयत्तणहं त सुहु धम्मायतु । धम्मु तिरै जिय तं करहि जं अरहतई युत्तु ॥ ४ ॥ अरहंतु वि दोसहि रहिउ जसें पुणु केवलणाणु । णाणेमुणियकालत्तयहं पयशु वि तारों पमाणु ॥ ५॥ १द अक्सिय २ क जमह; ज द तमहि. ३ द मरगय. ४ ज जह. ५ क ज द समिला. ६ में सायरे. दुल ६. ८ क जूबंद, द जूआई ९ज तद्द १०ज "गयहि. ११ क मणुपत्तणु १२ अ द. अरि. १३ ज यरहि १४ अ द अरहते. १५२ द जासु वि. १६ अज पाणु. १७ क द तस्स.

हिन्दी अनुवाद
१.
नगरकार
दु.सकर्मों का नाश करने वाले पंचगुरु को नमस्कार
करके मैं संक्षेप में, प्रकट शद्रों द्वारा, श्रावक-धर्म
का व्याख्यान करता है।
२.
दुर्जन संसार में सुखी हो जिसने सजान को
दुर्जन को अशी प्रसिद्ध किया है, जिस प्रकार अमृत चिपसे,
दिन अंधकार से, च मरकत मणि कांच से
[प्रकाशित होता है।
३. जिस प्रकार सागर में गिरे हुए सैले के लिये जुवा
माम जन्ग का छिद्र दुर्लभ है उसी प्रकार भव-जल में पढ़े
एए जीवों का मनुष्यत्व रो सम्बन्ध दुर्लभ है।
मनुष्यत्व का सार सुप है। वह मुग्म धर्म के
अधीन है। धर्म भी, रे, जाय, यह पाल जो भरत
फा कहा हुआ है।
अरहंत भी यह है जो दापों से रहित होय जिन
प्रामाणिशा फेरल शान हो । शान द्वारा निकाल को जानने
पाले उन पचन भी प्रमाण है।

00 सावयधम्मदोहा तं पायडु जिणवस्वयषु गुरुउवएसइ होड । अंधारई विणु दीपडइ अन कि पिछइ कोइ ॥ ६॥ (संजमु सील सउच्चु तउ जसु सरिहि गुरु सोइ । दाइछेयकसघायसमु उत्तमु कंचणु होइ ॥ ७॥ मगगई गुरुउवएसियई पर सिवपट्टणि जति । तं विणु वग्यहं वणयरहं चोरहं पिडि पिपडंति ॥८॥ एयारहविहु त कहिउ रै जिय सापयधम्म । सत्तिए परिपालंतयहं सहलउ मगुसजम्मु ॥९॥ पंचुंनरहं णिनित्ति ज, चमणु ण एफु वि होइ । सम्मत्तें सुविसुद्धमई पढमउ सावउ सोइ ॥ १० ॥ पंचाणुब्बय जो धरइ णिम्मल गुंणनय विणि । सिक्सावयई चारि जसु सो बीयउ मणि मणि ।।११।। चउरहहं दोसह रहिउ पुयाइरियकमेण । जिणु वंदइ संझइ तिहि मि सो तिजउ णियमेण ।। १२ ।। अ विसणु १ अ ज द उवएसें २द दीवण ३ जद ति ४ज द अरे. ५ अट्टउ पालइ मूलगुण ६ ७ अ क जो सम्मतविमु, ८ ज णु ९ द धय गुण १०द णियमपिण

अनुवाद
६. यह जिनवर का वचन गुरु के उपदेश से प्रकट
गुरु होता है। अंधकार में चिना दीपक के क्या कोई
कुछ पहिचान सकता है?
७. जिस सरि में संयम, शील, शौच और तप है वहीं
गुरु के गुण गुर है। दाह, छेद और कश घात के योग्य ही
उत्तम कंचन होता है।
गुरु के उपदिष्ट मार्ग से नर शिवपुर को जाते है।
गुरुपदेश उसके बिना वे व्याघ, वनचर और चोरों के पिंड
में पड़ जाते है।
वह श्रावकः धर्म, हे जीच, ग्यारह प्रकारका कहा
श्रापक धर्म गया है । शक्त्यनुसार उसका परिपालन करने
वालों का मनुष्य जन्म सफल है।
जिसके पंच उदुम्बर से निवृत्ति है, व्यसन एक
दर्शन भी नहीं है तथा जिसकी मति सम्यक्त्व द्वारा
सुविशुद्ध है वह प्रथम श्रावक है।
जो पांच अणुव्रतों को धारण करता है और जिस
के तीन निर्मल गुणनत और चार शिक्षावत है
उसे मनमें दूसरा [श्रावक ] मानो।
१२. जो पूर्वाचार्यों के क्रमानुसार बत्तीस दोषों से रहित
सामायिक होकर तीनों संध्याओं में जिनोच की वन्दना
करता है यह नियम से तीसरा [श्रावरु] है।
व्रत

६ सायिधम्मदोहा उहयचउद्दसिअहमिहिं जो पालइ उपवासु । सो चउत्यु सावउ भणिउ दुक्यिकम्मविणासु ॥ १३ ॥ पंचमु जसु कचासणहं हरियह पाहि पनित्ति । मणवयकायहिं छठ्यहं दिघमहि णारिणिवित्ति ॥ १४ ॥ चंभयारि सचमु भणिउ अहमु चत्तारंभु । मुक्परिग्गहु जाणि जिय णमउ पन्जियदंॐ ॥ १५ ॥ अणुमइ देइ ण पुच्छियउ दसमउ जिणउवह । एयारहमउ तं दुविहु णे वि मुंजइ उद्दिष्टु ॥ १६ ॥ एयवस्थु पहिलउँ निदिउ कयकोषीणपवित्ति । कतरिलोयणिहियचिहुर सई पुणु भोजणिवित्ति ॥ १७ ॥ ए ठाणई एयारसेंई सम्मा मुक्काहं । | हंति ण पउमई सरवरहं पिणु पाणिय सुक्काहं ।। १८ ।। अत्तागमतचाइयहं जं णिम्मलु सद्धार्यु । संकाइयदोसह रहिउ त सम्मतु नियाj ॥ १९ ॥ ote १ ज द डेभु २ ३द उ, ४द पहलउ. ५ ज.द पयारह नि. ६ क. प. जिम्मलु सद्दद्धाणु ७ अ क चियाण.

অনুশা
७
त्याग और
जो दोनो चतुर्दशी और अष्टमी को उपवास पालता
प्रोषधोपवास रे वह दुष्टत-कर्मों का विनाश करने वाला चोथा
श्रावक कहा गया है।
पाचवा [श्रावक] यह है जिसकी कच्चे भोजन
सचित्तत्याग व हरी शाक में प्रवृत्ति नहीं है। छटवे [श्रावक]
की दिन में मन वचन और काय द्वारा नारी से
निवृत्ति रहती है।
सातना [श्रावक] ब्रह्मचारी कहा गया है ।
ब्रह्मचर्य आरभ आठया आरम्भत्यागी है। हे जीच, परिग्रह से मुक्त,
दम्भ से वर्जित रहने वाले को नयमा [श्रावक ]
परिग्रहत्याग जानो।
जो पूछने परभी अनुमति न दे उसे जिन भगवान ने
अनुमतित्याग
और
दशवा [श्रावक ] कहा है। ग्यारहवा दो प्रकार
उद्दिथ्य ग का है जो उद्दिए भोजन नहीं करता।
पहिला एकवस्त्रधारी, दूसरा कोपीनमानधारी।
क्षुल्लक और ऐलक वह कैंची या उस्तरे से केशों को क्टवाता है और
स्वय भोजन नहीं बनाता।
ये ग्यारह स्थान सम्यक्त्व से रहित जीवों के नहीं
सम्यक्त्व होते। विना पानी के सूखे सरोवरमै कमल नहीं
फूलते।
आप्त, आगम और तत्वादियों में जो शादिक
सम्यक्त्व लक्षण दोपों से रहित निर्मल श्रद्धान है उसे ही सम्यमत्व
जानो।

८ सापयधम्मदोहा संकाइय अट्ट मय परिहरि मूढा तिणि । जे छह कहिय अणायतण दंसणमल अवणि ॥२०॥ सुणि दंसणुं जिय जेण पिणु सावयगुणु ण हुँ होइ । जह सामग्गिविवजियहं सिज्झइ कजु ण कोड ॥ २१ ॥ मजु मंसु महु परिहरहि करि पंचुंबर दूरि । आर्यहं अंतरि अटुंह मि तस उप्पजई भूरि ॥ २२ ॥ महु आसायउँ थोर्डउ नि णासड पुण्णु बहुत्तु । वइसाणरहं तिडिकंडउ काणणु डहइ महंतु ॥ २३ ॥ अॅण्णुरइट्टई मष्णियई महु परिहरियउ होइ । ज कीरइ तं कारियइ एहु अहाणउ लोइ ॥ २४ ॥ सेवई कुसुमैई छंडियइं करि पंचुंबरचाउ । हुंवि विमुकई मंडणई जइ मुकर अणुगउ ॥ २५ ॥ १अ क प परिहर. २ जदंसणि, अ क द सपा. ३ अ क वि. ४ द आयहि. ५ अ क गट्टमि हि ६ अज द उप्पजहि. ७ अ क आसादर. ८ अ क थोरड वि. ९ज द तिडिकउ घि. १० अ द अणु उवाई: प भणउवरट्टर. ११ अ क ज द सग्गई. १२ द. कुसुमिय. १३ अ क जद पंचुवरपरिचाउ.

अनुवाद
९
२० मामादिक आउ (दोष),आठ मद ओर तीन मूदता
दाप मद मृदा का परिहार करो। जो छह अनायता पहे गये ह
और मायनन उन्हे (सम्यम् ) दर्शन के मैल जानो।
२१ दे जीव, ( सम्यग् ) दर्शन को सुनो जिसके बिना
सम्यग्दर्शन शावक का गुण नहीं होता। जैसे सामग्री से विव
र्जित मनुप्य का कोई भी कार्य नहीं सधता ।
२२ मद्य, मास, मधु का परिहार करो, पच उदुम्मर
अगुल्गुण दूर करो। इन आठों के अन्दर घत नस (जीय)
उत्पन्न होते हैं।
२३
मधु
मधु थोडासा भी साया हुआ बहुतसे पुण्य का
नाश कर देता है। अग्नि का छोटासा तिलिंग भी
चढ़े भारी वन फोदा देता है।
२५
मधु याग
दूसरों को उपदेश देने व स्थय मानने से मधु या
परिहार होता है । जैसा (स्वय) करता है
यदी (दूसरों से कराता है यह अहाना रोक में है।
२५ सय फूलों को छोडकर पच उदुम्बर का त्याग कर।
उदुम्पर-साग यदि अनुराग छूट गया तो थल्कार [भापही ]
छूट जाते है।

सापयधम्मदोहा अढई पालइ गृलगुण पियइ जि गालिउ णीरु । अह चित्तें सुविमुद्धइण मुचइ सयु सरीरु ॥ २६ ।। जण अगालिउ जलु पियउ जाणिजइ ण पाणु । जो ग पियइ अगालियउ सो धीररहं पहाणु ॥ २७ ॥ आमिससरिसउ भासियउ सो अधउ जो साइ। दोहि मुहुत्तहं उप्परहि लोणिउ सम्मुच्छाइ ॥ २५ ॥ सगे मज्जामिसरयहं मइलिजइ सम्मत्तु । । अंजणगिरिसंगें ससिहि किरणई काला हुंति ॥ ९ ॥ अच्छउ मायणु ताई घरि सिहं ययणु ण जुतु । ताहं समउ में कारणई मेइलिज्नइ सम्मतु ॥३०॥ तामच्छउ उमंडयह पासणीलत्ताह । हुति ण जुग्गइ सावयहं वह भोयणु पत्ताहं ॥ ३१ ।। चम्मच्छइ पीयइ जलई तामच्छउ देरण । दसणसुद्धि ण होइ तसु सद्ध घियतिल्लेण ॥ ३२ ॥ रुहिरामिसचम्महिसुर पचक्खउँ बहुजतु । अंतराय पालं भविय सणसुद्धिणिमिन ॥ ३३ ॥ १ अ. श्रइ. २ ज.द.जु, ३ क, द. सन्न. ४ अ.ज. द तं. ५ क. मयलिजइ. ६ ज तह तंडयह, अ.फ द तर भंडयहं. ७ अ.क.दौति. ८ ज.द पञ्चविउ ९ज.द पालदि. १.क. "महतु.

अनुवाद
२७.
मासन
२६. पाठों मूलगुणों का पालन करे और गाला (धाना)
चित्तशुद्धि हुआ जल पिये। चित्त के विशुद्ध होने से सब
शरीर शुद्ध हो जाता है।
जिसने चिना छना पीना पिया उसने प्रमाण नहीं
पिशा छगा पानी जाना। जो विना छना पीता है वह धीपरों में
प्रधान है।
२८. दो मुहर्त के ऊपर लोनी (मत्सन) में सम्मृर्छन
जीव उत्पन्न । जाते है। ( इसलिये) वह मांस
सदा कहा गया है। यह अंधा है जो साय ।
२९. मद्यमांस में रत रहने वालों के संग से सम्यमत्व
मयमामभोगीरा मेला हो जाता है। अंजनगिरि के संग से चन्द्र की
रांग किरणें भी काली हो जाती है।
३०. उनके घर में भोजन करना तो रहा शिए लोगों
मयमास भाभियों को उनसे बात भी नहीं करना चाहिये, पयोंकि
मारहार उनके संग से सम्पनत्य मेला हो जाता है।
पक भोजन करने वाले तप से मंडित (मुनि) तो
दूर रहे सगरा भोजन पान भागों के भी योग्य
नहीं है।
३२. जो चर्माच्छादित जल पीना है उसी तो दूरकी
चर्गाच्याति पात है, दर्शन शुद्धि तो उसके भी नहीं होती जा
पर, लि (से) धी-तल सहित साता है।
३३. रधिर, मांस, चर्म, अस्थि और सुरा ये प्रत्यक्ष मेंही
राग येग पान तुपूर्ण ।। भय दर्शनशुद्धि के निमित
पानु
नका भतराय पालो।

१२ १ सापयधम्मदोहा मूल उणाली-मिरो-लहसुण-तुंबड-करड-कलिंगु । सूरण फुलत्याणयहि भावणि दसणभंगु ॥ ३४ ॥ अण्णु जि मुललिउ फुलियउ सायडे बलियउ जंजि । दोदिगंसियड दहिमहिउ हु भुजिअइ तजि ॥ ३५ ॥ वेदलासिउ दहिमहिउ जुत्तु ण सावय होइ । खद्ध दमणभंगुं पर सम्मत्त दि मइरेइ ।। ३६ ॥ तंबोलोसहु जलु मुइवि में अत्यमियई सरि । भोग्गासणे फलु अहिलसिर तें किउ दंगशु दूरि ।। ३७ ।। जूऐ धणहु ण हाणि पर वयह मि होइ विणासु । लग्गउ कह ण उहइ पर इयरह डहइ हुयासु ॥ ३८ ॥ जइ देसवउ छव्हिय ता जिय छोडेउ जू । अह अगिगहि उल्हावियई अप ण उट्ट धृ ॥ ३९ ॥ । दय जि मूलु धम्मंघिबहु सो उपाडिउ जेण । दलफलकुसुमहं करण कह आमिसु भक्सिरण ।। ४० ॥ १ अ क विस. २ क भक्खु पा ३ ज दंसणि ४ अ ज.द अणु. ५ ज.द सुललिउ. ६२ क साय.७६ दिणि. ८ ज द. जो ९ अ भुगासणु, क. द. पुग्गासणाल. १० ज, द अहिलसइ. ११ अर्व १२ अ क जई घडिउ पड देखिवउ १३ क ता छडि तु उ. १० अ 4 अरमि.

अनुराद
मूग, उनारी (१), विस (कमलतन्तु ), लहसुन,
मूरी आदि तुया, करड, कलिंग, सूरण व फूलस्थानों के भक्षण
अभश्य से दर्शन भा होता है।
अन्य भी जिसमें नई निवल आई हो, य फूल
अ य अभय आगये हों व जोन्याद से चलित होगया हो, दो
दिन का वासा दही मही भी नहीं पाना चाहिये।
द्विदमिश्रित दी मही श्रावकों पे योग्य नहीं
दिल होता। इसके गाने से दर्शन का भक धोर
सम्यस्त्व मैला होता है।
ताम्बूल, औषध और जल को छोडकर, सूर्यास्त के
रानिभाना पश्चात् जिसने भोजन या फ्लाहार की अभिलाषा
की उसने दर्शा को दूर कर दिया।
३८ जुवा से धा ही पी हानि नहीं होती पर प्रतों का
भीविनाश होता है। अगि केवल जिस फाट में
रगे उसे ही नहीं जाती भिन्तु दूसरों को भी
ढा देनी हे।
३९ यदि देखना तर छोड दिया तो, हे जीव, धूत
घून याग सचमुच छूटा। अग्नि के जलसे शमन कर देने पर
अवश्य धुआ नही उठता।
दयाही धर्मवृक्ष का मूल है। इसे जिसने उपाट
डाला उसो दल, फल, कुसुम की कौन क्या
मास भक्षण पर पिया।
द्यन
दया

सारयधम्मदोहा पुहिमंसु जइ छडियउ ता जिय छडिउ मंसु । जहे अप्पत्थे चारियई वारिउ बाहिपमेसु ॥ ४ ॥ मुटु वि लिहिवि सुत्तउँ सुणहु ए? जि मजहु दोमु । पत्तउ बहिणिहिँ अहिलसइ तें तहुँ णरयपवेमु ॥ ४२ ॥ मजु मुई मुकहं मयहं अण्गु जि वेसा मुक । जह वाहिहिं विणियारियहि वेयण होइ ण इथा ॥ ४३ ॥ बेमहि लग्गइ धणियधगु तुट्टई बंधउ मिर्नु । गुच्चइ पर सव्यहं गुणहं साधार" पइसंतु ।। ४४ ॥ कामाई परिचत्तियइं जिय दारिय परिचत्त । अह कंदई उप्पाडियई वेल्लिहिं पर समत्त ॥ ४५ ॥ पारद्धिः पराणिघिणउ हणई णिरारिउ जेण। भयभग्गा जियगहियतण णरय गच्छइ तेण ।। ४६ ।। गुमसुणहमंजरपाह जइ मुमी पारद्धि । पीपई रुदई पाणियई रुद्धी अंकुरलादि ।। ४७ ॥ १ का.ज.द. जहिं. २ अ. के. द. मुत्ता. ३ अ.ण ह ४६. पहिणक्षिा अ.ज.वहिणि शि ५. मा. सह.६७, क. मन मुक. ७क द. ६.८६, तुटर. ९ अ.क.पंधवामित. १० अ.क.दे. "गिदि. ११ अ.क. कापकदा १२ ज.पारिदिउ. १३.६णि १४ अ. क. मिरयद.

अनुवाद
१५
४२
पृष्ठमांस यदि छोड़ दिया तो, हे जीव, मास
मासत्याग छोड़ा जेसे अपथ्य के निवारण से व्याधिप्रवेश का
निवारण हो जाता है।
बार बार लिस हिरा कर इस सून को सुनो ।
मयदोष मद्य का यह दोय है कि मत्त (पुरुष) अपनी वहिन
पी भी अभिलापा परने रगता है इससे उसका
नरक में प्रवेश होता हे।
४३ मद के छोड देने से मद्य भी छट जाता है और
मद्यत्याग वेश्या भी छूट जाती है, जिस प्रकार कि व्याधि
के निवारण हो जाने से एक भी वेदना नहीं रहती।
धनिकों का धन वेश्या में रगता है। वधु मित्र
व यादेप सब छट जाते है। वेश्या के घर प्रवेश करन
पाला नर सव गुणों से मुक्त हो जाता है।
फामकथा के परित्याग से, हे जीव, दारिका
वेश्यात्याग (वेश्या ) का भी परित्याग हो जाता है। पद के
उपाट देने पर चेला के पन समाप्त हो जाते है
(स्य सूग जाते है)।
४६
शिकारी यदा निर्दयी हे जो भय से भागे हुए, जीभ
आसे-दोष में तृग दवाये हुए (मृगों) का वध करता है।
इससे यह नरक को जाता है।
यदि शिकार खेलना छोड़ दिया तो कुत्ता दिल्ली
आसेग्य ग आदि भी छूट गये । चीज में पानी की रोर कर
देने से अपुरलधि का अपरोध हो जाता है।
४७

६ বধাবী। चोरी चोर हणेइ पर पहुयकिलसहं साणि । देइ अणत्यु कुडुबह मि गोत्तहुँ जसधणहाणि ॥ ४८ ॥ मुकहं कूडतलाइयहं चोरी मुकी होइ । अह व वणिजई छडियई दाणु ण मगइ कोइ ।। ४९ ॥ परतिय पहुबंधण ण परे अण्णु वि गरयणिसेगि। विसकंदलि पारइ णं पर करइ वि पाणहं हाणि ॥ ५० ॥ जइ अहिलासु णिवारियड वा वारिउ परयार । अह गाइके जित्तदणे जिनउ रायल संधारू ।। ५१ ॥ यसणई ताँबई छडि जिय परिहार वसणारा । मुबह संसागें हरिय पेसह तरु उज्झते ॥ ५२ ।। मूलगुणा इय एताई" हियवद यह जाम् । धम्मु अहिंसा देउ जिणु रिशि गुरु देसणु वासु ॥ ५३ ॥ १.६. फुद्धयह. २ अ, क. गोत्तिटु. ३क छमिया. ४'या पंधणणयर' भी पा जा सकता है । ५ फ. पिरयः, ६ज. जि. ७ अ. का. इक राय जित्तियदं. ८ ज.द. ताय जिय. १. परिदर १. अ.क.प, घसणासत्ति. १५ अ.क. सुयां. १२ क.दे. इहोति.१३ म.द, इराउ, फा. उत्तर. १४ क. पकाउ, १५५६.दसण.

अनुसाद ४८. चोरी चोर का तो हनन करती ही है पर और भी चौरी दोष बहुत से लेशों की सानि है। यह वुटुम्य का भी अनर्थ करती है और गोर के यश और धन का नाश कर देती है। कूट तुलादि के छोड देने पर चोरी छूटती है। घोरा-त्याग वाणिज्य के छोड देने पर कोई दान नहीं मांगता। ५०. परस्त्री बहुत इन्धन ही नहीं परंतु यह नरक- परस्त्री दोष नसेनी भी है। विप-कंदली मूडित ही नहीं करती, किन्तु प्राणों की भी हानि फर डालती है। यदि अभिलाप का निवारण होगया तो परदारा परस्त्री त्याग का त्याग हुआ । नायक के जीत लेने पर समस्त स्कंधावार (सेना) पर विजय होजाती है। ५२. व्यसन तब छूटेंगे, हे जीव, जब व्यसनों में आसक्त ध्यमनी मनुष्यो ( मनुष्यों ) का परिहार करे। सूखों के संसर्ग से, का परिहार देखो, हरे वृक्ष भी ढा जाते हैं। ५३. इस प्रकार ये मूल गुण जिसके हृदय में वास सम्यग्दर्शन की करते हैं, व जिसका धर्म अहिंसा, देव जिन और पूर्णता गुरु ऋषि है उसीका [ सम्यग् ] दर्शन है।

सारयधम्मदोहा 'जम दंसशु नसु माणुसह दोस पणासंई जैति । जैहि-पएंसि णित्रसइ-गरुड तहि किं विसहर ठति ॥५४॥ दसणरहियं जि तउ करहिं ताहं वि णिफल णिष्ट । विणु वीर्यई कणभरणमिय भणु किं खेती दिट्ट |॥ ५५ ॥ दसणसुद्धिए सुद्धयहं होइ सयल पणि । अह कप्पडि अणतोरियई किम लग्गइ मंजिट्ट ॥ ५६ ॥ दंसणभूमिहिं बाहिरउँ जिय वयरुक्ख ण हुंति । पिणु क्यरुक्सहं सुक्खफल आयासहु ण पडंति ॥ ५७ ।। छैड दस गड्डायरउ हिपडई णिचल जाउ, ययपासाउ समीदव चंचलु घणु जिय आउ ॥ ५८ ॥ अणुच्यगुणसिपसाययई ताई मि" चारह इंति । मुंजाइवि परसुरसुहई जिउँ णिवागड णिति ।। ५९ ॥ १ अ.का. वड. २ ज माणु सुहु द माणसुदु ३ . पणासिधि; द. पणासवि. ४ अ. का.जिदि.५ अ. जंति. ६. 'रहिउ. ७ क. करइ. ८ ज, वीजद ९ ज. द. पादिरा. १० अ.'मोपत्रफल ११ अ.क.सुणु, १२ ज.दसण. १३ हियडर :४४ द. पासा,उपसमि ठयछु; क. पासष्टु च साठयह, ज. पासउ चि समाढयहु..१५ज.जि..११ क, जिय.

नाश
अनुवाद
जिसके दर्शन है उस मनुष्य के दोष नाश को
दर्शन से दोप- प्राप्त होजाते हैं । जिस प्रदेश में गरुड निवास
करता है वहां क्या विषधर ठहर सकते हैं ?
दर्शन से रहित होकर जो तप करते हैं उनकी
दर्शन के बिना निष्ठा निष्फल है । विना वीज के, कहो, कहीं अन्न
तप निपल है. के भार से शुफी हुई खेती देखी गई है ?
जो दर्शनगुद्धि से शुद्ध हुए है उनके सय व्रतों की
दर्शनशुद्धि से निष्ठा होती है । विना तुरटी (फिटकरी)- लगायें
बनिया कपड़े पर जटा का रंग कैसे चढ़ सकता है ?
दर्शनभूमि से वाहिर, हे जीव, पतरूपी वृक्ष नही
दर्शन के विना होते, और विना प्रतवृक्षों के सुसफल आकाश से
सुरा नहीं. तो पड़ेंगे नहीं।
५८. यदि दर्शन रूपी फलक हृदय में निश्चल होगया,
दर्शन और तो उसपर व्रत रूपी पांसों को ढालो। फिर, हे
धनागम. जीय, चंचल धन को आने दो।
अणुव्रत, गुणमत और शिक्षारत सब मिलकर
बारह बतों से वारद होते हैं। घे मनुष्य और देवलोक के सुग्वेद
मोक्ष प्राप्ति का उपभोग फगकर जीव को निर्वाण तक पहुंचा
देते हैं।

सायधम्मदोहा १ मणययकार्यहिं दय करहि जैम ण दुबइ पाउ । उरि सण्णाहें बद्धइण अबसि ण लग्गइ घाउ ॥६॥ अलिय कसायहिं मा चयहि अलिएं गर वसुराउ । जहिं णिविठ्ठ साखं? वह डालह होइ पमाउं ॥ ६१ ॥ पासइ धणु तमु घरतणउ जो परदन्नु हरेइ । गेहिं कईउ पेमियउ काई ण काई कोइ ।। ६२ ॥ माणइं इंछिय परमहिल रामणु सीय विण? । दिविहिं मारइ दिद्विविसु ता को जीनइ दह ॥ ६३ ॥ पसुधणधण्णई सेत्तियई करि परिमाणपविति । अलियई पहुयई पंधणइं दुक तोडहुँ जति ।। ६४॥ मोगह करहि पमाणु जिय इंदिय म करि सदाप । हुति ण भल्हा पोसिया दुर्दै काला सप्पै ॥ ६५ ।। १ अ क काय. २द कर. ३ अ ज द अवस. । अ. कणिविट्ठ साखंड, प भाखंड, ५ क द. तदि. ६ क द पपाउ, पसाउ.. कवड. ९ ज रावण : रामणसीय १० अ विणट्टि. ११ क ज करहि. १२५ कर तोडई, अ क तोडई. १३ ज करिसि दापु १४ ज पप्पु.

अनुवाद
२१
६०.
मन, वचन और काय से दया कर जिससे पाप न
आये। उर में कवच यांधने से अवश्य घाव नहीं
दया
लगता।
कपाय से असत्य मत बोल । असत्य से वसुराजा
गया। जिस शाखा पर शाखारंड (द्रोही) बैठा
असत्य
उस शापा का सत्यानाश हुआ।
चौरी
परवी
जो परद्रव्य का हरण करता है उसके घर का धन
भी नष्ट हो जाता है। गृह में कपट का प्रवेश
कराया। वह पया क्या नहीं करेगा।
मान के कारण पराई स्त्री, सीता, की इच्छा करने
से रावण का नाश हुआ । राष्टिविष (सर्प)
दृष्टिमान से मार डालता है, उसे जाने पर तो कौन
जीसकता है।
पशु, धन, धान्य, रोती इनमें परिमाण से प्रवृत्ति
कर । बन्धनों में बहुत बल (आर्ट) होने से उनका
तोडना दुप्फर हो जाता है।
हे जरव, भोगों का भी प्रमाण रस । इन्द्रियों को
यहुन अभिमानी मत बना । काले सांपों का दुग्ध
से पोषण करना अच्छा नहीं होता।
परिग्रह
भोगों का
प्रमाण

२२ सामयधम्मदोहा दिसि विदिसिहिं परमाणु करि जियपहु जायेइ जेण ।' मोकलियई आसागयई संजमु पलिउ तेण ॥ ६६ ॥ लोहुँ लक्स विसु सणु मयणु दुहृभरणु पसुभारु । छडि अणत्यहं पिडि पिडिउ किमि तरिहहि संसारु ॥६७॥ संझा विहि मि समाइयई उप्पाइं बहुपुष्णु । कालि वारिट्टई भति कउ जंइ उप्पाइ घण्णु ॥ ६८ ।। चिरकियकम्महं संउ करइ पत्र्यदिणेहि उववासु । अहया सोसहासरसलिलु भति ण गिमि दिणेसु ॥ ६९ ॥ पत्तई दिजइ दाणु जिय कोलि विहाणई तं पि । अह निहिविरहिउ वाचियउ घीउ वि फलइ ण कि पि ॥७०।। सण्णासेण मरंतयह लब्भइ इच्छियलद्धि । इत्यु ण कायउ भंति करि अहिं साहसु सहि सिद्धि ॥७॥ १ जाइय. २ अद: मोकलियहि आसागया. ३ अ. लोह लाख. ४ अ क तरिहसि; ज.तरिसदि. ५ ज. समाइयह. ६ अ. परिट्ठउ; क. परिट्टउ. ७ अ.क.द जहि. ८ उपजइ बहुधम्मु, अ धम्मु. ९ ज.फय. १० अ के. पयः पद. ११ अ क दिणहः जे दिणइं. १२ अ.क ज. कालविहाणे. १३ क. द इतिय. १४ नह साहस तह सिद्धि.

अनुगद
२३
६६.
दिमन
दिशा-विदिशाओं (में जाने) का भी प्रमाण कर।
इससे जीववध होता है। जिसने आशाओं
मैं जाना छोड़ दिया उसने संयम का पालन
किया।
लोहा, लास, विप, सन, मैन, दुएभरण और
अनर्थत्याग पाभार इन छोड़ । अनों के पिंड में
किस प्रकार संसार को तरेगा?
६८.
तीनों संध्याओं में सामायिक करने से बहुत पुण्य
सामायिक उत्पन्न होता है। यदि समय पर वर्षा
उत्पन्न हो तो इसमें भ्रान्ति क्या है?
७०,
पर्व के दिन का उपवास चिरकाल के किये हुए
पर्वापवास कर्मों का क्षय करता है। ग्राम में सूर्य सरोवर के
जल को मुसा देता है, इसमें भ्रान्ति नहीं।
हे जीव, पात्रों को दान देना चाहिये, वह भी समय
पर और विधि सहित । विना विधि के बोया
हुआ
धीज फुछ भी फल नहीं देता।
सन्याम से मरण करने वालों को यथेच्छ लाम
गन्यायमरण होता है, इसमें कुछ भी भ्रान्ति.न फर। जहां
साहस तहां सिद्धि।
নুন

२४ साथयधम्मदोहा ऐ बारह पय जो काइ सो गच्छइ सुरलोउँ । सहसणयणु धरणिंदु जहि वष्णइ ताहं विभोः ॥ ७२ ।। आउसंति सग्गहुँ चइवि उत्तमचंसह हुँति । मुंजिवि हरिखलचकिमुहुँ पुणु तक्यरणु करति ॥ ७३ ।। उकिटइं चिहिं तिहिं भवहिं मुंजिवि सुरपरसोपएँ । जति जहण्णई धुणियरयं भवि सत्तमि मोक्खु ॥ ७४ ॥ संगचाउ जे करहिं जिय ताहं ण वय भजति । अह किं लग्गहिं चोरडा जे दूरे णासंवि ॥ ७५ ॥ एहु धम्मु जो आयरई भणु सुदु वि कोइ । सो सावउ किं सावयहं अण्णु कि सिरि मणि होई ॥७६।। मजु मंसु महु परिहरई संपइ साप सोई । णीरुषसह एरंड वणि किं ण भवाई होइ ।। ७७ ॥. १२ १ क.ज. एयारह. २ ज सुरलोइ. ३ ज, विभोर. ४ अ. क. सम्गद. ५ क.गुह. ६ द. तवयरणि. ७ क. द सुक्खु. ८ द. धणियरया. ९ अ. क. भवसत्तट्टई. १० अ.क.द. अहव कि लग्गर्हिः फ. लग्गह. ११ क. आयरहि. १२ क.द सिरमाण. १३ क. द. परिहरहु ज. परिहरहि. १४ के. सावय.

अनुनाद
२५
७२.
ये बारह मत जो करता है वह सुरलोक को जाता
प्रतपालग है जहां सहस्त्रनयन [इन्द्र] और धरणेन्द्र भी उसके
भोगों का वर्णन करते है।
का फल
आयु के अन्त में स्वर्ग को छोड़कर उत्तमयंश में
दूसरे जन्म उत्पन्न होते है, और हरि, वलभद्र व चक्रवर्ती के
सुस भोगकर पुनः तप करते हैं।
के सुस
७४.
उत्कृष्ट ( भन्य ) दो तीन भव में सुरनर-सुख भोग
कुछ भवों के कर, घ जघन्य सात आठ भव में, फर्मरज को दूर
पश्चात् मोक्ष करके मोक्ष को जाते हैं।
जो जीव संगल्याग कर देते है उनके व्रत भङ्ग
रोगत्याग नहीं होते। क्या उनको चोर लग सकते हैं जो
दूर से भाग जाते है ?
इस धर्म का जो आचरण करता है, ब्राह्मण चाहे
श्रावकलक्षण शुद्र, कोई भी हो, यही श्रावक है । और क्या
धावक के सिर पर कोई मणि रहता है ?
आजकल
जो मद्य, मांस और मधु का त्याग करे आजरल
वही श्रायक है। क्या बड़े वृक्षों से रहित एरण्ड
धन में छांह नहीं होती?
धावक

२६ सापयधम्मदोहा सावयधम्महं सयलहं मि दाणु पहाणु सुवुत्तु । तं दिजइ विणएण सहुं युझिवि पत्तु अपतु ॥७८ ॥ उत्तमपत्तु मुर्णिदु जगि मज्झिमु सावउ सिटु । अविरयसम्माइहि जणु पमणिउ पत्तु कणि? ॥ ७९ ।। पत्तहं जिणउवएसियहं तीहि मि देई जु दाणु । कल्लाणई पंचई लहिवि मुंजइ सोक्खणिहाणु ॥ ८ ॥ दसणरहियपत्ति जइ दिण्णइ ताह कुमोउ । खारघई अह णिवडियउ णीरु विखारउ होइ ॥ ८१ ।। हयगयसुणहहं दारियहं मिच्छादिहिहिं मोय । ते कुपत्तदाणंघियहं फल जाणहु पहुभेय ॥ ८२ ॥ तं अपत्तु आगमि भणिउ पर पथदंसर्ण जासु । णिप्फलु दिग्णउ होइ वसु जैह ऊसरि कर सासु ॥ ८३ ॥ हारिउ ते धणु अप्पणउ दिण्णु अपत्तहं जेण । उप्पहिं चौरह अप्पियउ खोजु ण पत्तउ केण ॥ ८४ ॥ १६. उत्तिम'; ज. उत्तिमु. २ ज.तहे मि. ३ क. देउ. ४ अ. ज. कुपत्त. ५ अ.क. घडे. ६ क.द. तहमेय. ७ के. आगम'. ८ अ. क. ज. "दंसणु. ९ अ. क. द. जाहि. ससुः ५. सस्सु. ११ द.चोरहि.

अनुवाद
२७
७८
श्रावकों के सब धर्मों में दान प्रधान कहा गया
दान की प्रधानता है। इसे पान अपात्र का विवेक करके, विनय
सहित देना चाहिये।
जगत् में उत्तम पान मुनीन्द्र और मध्यम थापक
कहा गया है। अविरत सम्यग्दृष्टि पुरप कनिष्ठ
पान कहा गया है।
तीन पान
का पल
का पल
जिन भगवान द्वारा उपदिष्ट तीनों प्रकार के पात्रों
पानदान
को जो दान देता है वह पंच कल्याण का लाभ
करके सुसनिधान का उपभोग करता है।
दर्शन रहित कुपान को यदि दान दिया जाता है
कुपानदान तो उससे कुभोग प्राप्त होता है। सारे घड़े में
डाला हुआ जल भी सारा हो जाता है।
८२. घोड़े, हाथी, कुत्ता व वेश्याओं के भोग मिथ्या
दृष्टियों के भोग हैं। इन्हें कुपात्रदान रूपी वृक्ष,
क्ष
नाना प्रकार के फल जानो।
आगम में उसे अपान कहा है जिसके व्रत व
अपानदान दर्शन नहीं है । उसे दिया हुआ दान निष्फल होना
की निषरता है, जैसे ऊसर जमीन की रोती।
जिसने अपात्र को दान दिया उसने अपना धन
सोया । उपत कर चोरों को दिये हुए धन का
खोज किसने पाया है?

२८ सायधम्मदोहा इस वि तारइ भवजलहि बहु दायार सुपतु । सुपरोहणु एफ वि बहुय दीसह पारहु गितु ।। ८५ ॥ दाणु कुपत्तहं दोसडइ बोल्लिजइ ण हु भति । पत्थर पत्थरणाय कहिं दीसइ उत्तारंति' ॥८६॥ जह गिहत्थु दाणेण विणु जगि पमणिजह कोइ । ता गिहत्थु पंखि वि हवई जे परु ताह वि होइ ॥ ८७ ॥ धम्मु करें जइ होइ घणु इहु दुबयणु म बोल्लि । हयगरउ जमभडतणउ आयइ अनु कि कल्लि ॥ ८८॥ 'काई बहुत्तई संपर्यई जई किविणहं घरि होइ । उवहिणीरु खारें भरिउ पाणिउ पिर्यंइ ण कोइ ।। ८९ ।। पत्तहं दिण्णउ थोवडेउ रे जिय होइ बहुत्तु । वडह बीउ धरणिहि पडिउ वित्थर लेइ महंतु ॥९० ॥ धम्मससे परिणयइ चाउ वि पत्तहं दिण्णु । साइयजल सिपिहिं गयउ मुनिउ होइ रवण्णु ॥११॥ १द तारह तीर. २ क में यह दोहा नही है ३ अज द यहि. ४ क. करहु. ५अ क संपदई. ६ ज, द. बा. ७जद सायरणीर खारे भरिए. ८ अ पिवइ ९ अ द धोगडउ. १० ज ६. वियरिय ११ क सरूप.

अनुपाद
एक ही सुपान अनेक दातारों को भवसमुद्र
से
मुषानदान तार देता है। अच्छी एक ही नौका बहुतों को पार
की महिमा लगाती देखी जाती है।
कुपान का दान दोप पूर्ण कहा गया है इसमें
फुपरानदान भ्रान्ति नही। पत्थर की नाच पत्थर को पार
फा दोष उतारती फहीं देखी गई है ?
यदि दान के विना भी जगत् में कोई गृहस्थ
दान के विना कहलाये तो पक्षी भी गृहस्थ होगया क्योकि घर
गृहस्थ नहीं तो उसके भी होता है।
'यदि धन होजाय तो धर्म करूं' ऐसे दुर्वचन मत
मौत का योल। यमदूत का हल्कारा आज आजाय
अनिध्य कि कला
यदुत सम्पत्ति से भी क्या यदि वह रुपण के घर
कृपा की हुई । समुद्र का जल पार से भरा है। उसका
सम्पत्ति पानी तक कोई नहीं पाता।
-
८८.
९०. हे जीव, पात्र को दिया हुआ थोड़ा भी यहुत होता
पत्रदान थोडा है। यट का बीज भूमि में पड़कर भारी विस्तार
भी पहुन है ले लेता है।
पानको दिया हुआ दान धर्म स्वरूप परिणमित
होता है। सातिजल सीप में पड़कर रमणीय
मोती यन जाता है।

सायधम्मदोदा जं दिजइ तं पावियइ ऐउण वयणु विसुद्ध । गाइ पंइण्णइ खडभुसई कि ण पयच्छइ दुदु ॥ ९२ ॥ जो घरि हुंतई घणकणई मुणिहि कुमायणु देइ । जम्मि जम्मि दालिद्दडउ पुष्टि ण वहु छेडेइ ॥ ९३ ॥ कहिं भोयण सहुँ मिडी दिण्णु कुमोयणु जेण । हुँतई बीयई घरि पउर वविय चवूलई तेण ॥ ९४ ॥ जं जिय दिजइ इत्थुभवि तं लब्भइ परलोइ । मूलें सिंचइ तरुवरहं फलु डालेंह पुणु होइ ॥ ९५ ॥ पत्तई दाणई दिण्णइण मिच्छादिहि विजीत । उत्तमाई भोयाणिहि इच्छिउँ भोउ लहंति ॥ ९६ ॥ कम्मु ण खेत्तिय सेव जहिं पाउ वाणिजपयासु । घरिघरि दस कप्पयर जहिं ते पूरहिं अहिलासु ॥ ९७ ॥ किं किं देइ ण धम्मतरु दाणसलिलसिंचंतु । जइ मिच्छत्तयारणहु रक्सिजइ डझंतु ॥ ९८ ॥ १ भ. क. पहउ ययणु विरादु. २ ज. पयणई. ३ ज.द. सि. अ. क भेटडी. ५ क डालहु ६ क. दिण्णां दाणण, ७ ज. दि. ८ अ.या मोयणि चि. ९क इच्छिय भोय. १० अ.क फम्म. ११ कपूर ज. पूरिदि.

१
३
अनुवाद
९२. जो दिया जाता है वही प्राप्त होता है। यह
वचन उपयुक्त नहीं है। गाय को घास-भुसा
सिलाया जाता है तो क्या यह दूध नहीं देनी ?
९३. जो घर में धनधान्य होते हुए भी मुनि को
कुभोजन-दान कुभोजन देता है, जन्म जन्म दारिद्य उसका पीछा
नहीं छोड़ता।
उसकी भोजन से भेंट कहां जिसने कुभोजन
दिया। घर में अच्छा चीज होते हुए भी उसने
का फल
घवूल चोये।
में मुख
हे जीव, जो कुछ इस भव में दिया जाता है वही
दान से परलोक परलोक में प्राप्त होता है।
वृक्ष की मूल सींचने
से ही डाल में फल लगता है।
पात्रों को दान देने से मिथ्यादृष्टि भी उत्तम
पात्रदान से भोग भोगभूमि
को जाते हैं और इष्टभोग
भूमि के सुस पाते हैं।
जहां (भोगभूमि में)न सेती व सेवा का काम है
और न वाणिज्य का प्रयास है । जहां घर घर दश
फल्पवृक्ष हैं जो अभिलापाओं को पूरी करते हैं।
दान सलिल से सींचे जाने पर धर्मतरु क्या क्या
दान धर्मवृद्धि नहीं देता, यदि मिथ्यात्वरूपि अग्नि से उसे जलने
सार इलाम से बचाया जाय ।

३२ सावयधम्मदोहा . धम्मु करंतहं होइ धणु इत्यु ण कायउ मंति । जलु कडूंतहं कूवयह अवसई सिाउ घडति ॥ ९९ ॥ धम्महु घणु परिहोइ थिरु विम्यई पिहाडिविति । अह सरवरु अविणेई रहिउ फुट्टिवि जाइ तडचि ॥ १० ॥ धम्में सुहु पावण दुहु एउँ पसिद्धउ लोइ । तमा धर्मु समायरहि में हियइंछित होइ ॥ १.१ ।। धम्म जाणहिं जंति पर पावे जाण वहति । घरयर गेहोवरि पदहि वखणय तलि जति ॥ १०२ ।। धमें इस वि बहु मरइ सई मुक्खियउ अहम्मु । बड्डु पहुयेहं छाया करइ ताल सहइ मई घम् ॥ १०३ ।। काई बहुत्तई जंपियई जं अपहु पडिकल । फाई मि परहु ण ते करहि एहु जि धम्महु मूल ॥१०॥ सत्यसपणे वियाणियहं धम्मु ण चढेई मणे वि । दिणयरसउ जइ उग्गमई ध्येंदु अंघउ वो पि ॥ १०५॥ - १ अ.क.काईम मंति, द.का मणति, २ . पतिः ६. यइंति. ३ म. क. परदोर. ४. भविणप. ५ अ.क.पा. क. धम्म समायरह जिदहियाधिय, ७ अ.क.द, जापा दाण. टुंति.९ क. सणे. १० अ.क.६. यदुयई. १९ ज.धुम्मुः १२ज. सपदि.१३६.पा.१४. उागमदि. १५१.क.पा.

अनुवाद
३
.
,
धर्म करने वालों के धन होता है इसमें भ्रान्ति
धर्म से धन प्राप्ति न करना चाहिये । कृप से जल काढने वालों के
सिर पर अवश्य घड़ा होता है।
१००. धर्म से धन स्थिर होता है और विन विघट
धर्म से धन जाते हैं। पार से रहित सरोवर तइ से
मी स्थिरता जाता है।
१०१.
धर्म से सुस, पाप से दुख' यह लोक में प्रसिद्ध
धर्म से मुस है। इसलिये धर्म फर जिससे मनोवाञ्छित
प्राप्त हो।
१०२. धर्म से नर यानों द्वारा जाते हैं और पाप से यानों
धर्म वा सुपल, का वहन करते हैं। घर बनाने वाले घरके ऊपर
पाप या दुष्फल चढते हैं और कुआ खोदने वाले नीचे को जाते हैं।
१०३. धर्म से एक ही बहुतों का भरण पोषण करता है
धर्म की शक्ति और अधर्मी स्वयं भूपा रहता है । घट बहुतों पर
छाया करता है और ताल स्वयं धाम सहता है।
१०४. यहुत
कहने से क्या, जो अपने प्रतिकूल हो उसे
धर्म का मूल कभी दूसरों के प्रति भी मत करो। यही धर्म का
१०५. सौ शास्त्रों को जान लेने से भी विपरीत शान वाले
विपरीत ज्ञानी के मन पर धर्म नही चढता। यदि सो सूर्य भी ऊग
आयें तो भी घुग्घू अंधा ही रहेगा।

३ सारयधम्मदोहा पोट्टहं लम्गिवि पारमइ करइ परतहं दुफ्यु । देउले लग्गिय सिल्लियेई किण्ण पलोट्टई मुक्षु ॥ १०६ ।। छुड सुविसुद्धिय होइ जिय तणुमणक्यसामगि । धम्मु पिढप्पइ इत्तियई धणहं विलग्गउ अग्गि ॥१०७॥ मुणि वयण झायहि मणई जिणु भुषणत्यनंधु । कार्यई करि उपवासु जिय जे सुट्टइ भवसिंधु ॥ १०८ ॥ होइ पणिमु ण पोटैलिहिं उवासहिं पंउ धम्मु । एहु अंहाणउ सो चवइ जसु कउ भारिउ कम्मु ॥ १०९ ॥ पोलियई मणिमोत्तियई पशु किनियहि ण माइ । पोरिहि भरिउ चलद्दडा वं णाही जं साइ ॥ ११० ।। उपवासहु इकहु फलई संबोहियपरिवार । णायदत्तु दिवि देउ हुउ पुगरवि णायकुमारु ॥ १११ ।। ते कनें जिय पई भषिउ कार उपवासम्भारे । जाम ण देहकुडिल्लियई दुकइ मरणहयामु ॥ ११२ ॥ १अ देउलि २ जलग्गिवि. ३जकीलियहि.४५ पट्टइ. ५ अ क ज सुविमुद्धा ६ द 'वयणे समग्गि. ७१ क तित्तिय ८ ज.द चयर्णि. ९ कक्षादय मणद. १० ज पायह. ११ ज पोझिलिहि. १२ ज ययाणउ. १३२ रित्तयहि १५म के चोरिय. १५ ज पर, १६ में उपचार सपाट.

३ . Ls 425120 HBESTOm अनुराद 12| Undertaking[212 13 313 ये भी पापमति दूसरों को दुख पहुंचाना PATN में लगी हुई गोलियों को मूर्य क्यों 15 टिता? 115 515 16 LISSUED SUBIECL.1016/16 UNDERTAKINGS RULES 17 AND RECULATION! HOURS . 19 117118119120121 BEUPTrue |WEOTHAPA|SATATE. Oowg 2017 जीव, तन, मन और वचन की सामग्री hamal Om Baतो इतने से ही धर्म बढता है । धन |12|131141510 919 लगने दे। 1120MSUNKONION शुचन-बन्धु जिन भगवान् का वचनों से कीर्तन ध्यान ,आर्तन कर, मन से ध्यान कर, और फाय से उपवास और उपवास कर, जिससे, हे जीव, भवसिंधु खुटै । १०९, वाणिज्य पोटली से नहीं होता। उपयास से धर्म उपवास पी नहीं होता। यह अहाना वह कहता है जिसने भारी पाणिग्य से उपमा ( दुप् ) कर्म किया है। ११०. मणि और मोतियों की पोटली में धन कितना है इसका मान नहीं रहता। बैल भरे येरों का तो कोई खाने वाला भी नहीं है। १११. एक ही उपवास के फल से परिवार का सम्बोधन उपवास-पलया करके नागदत्त स्वर्ग में देव हुआ और फिर उदाहरण नागकुमार। ११२. इसीलिये, हे जीय, तुझसे कहना है कि उपवास उपधारा का का अभ्यास कर, जवतक कि देह रूपी बुंट में अभ्यास मरण की आग नही पड़ी।

सावयधम्मदोहा धम्मु विसुद्धउ त जि पर जं किजई कारण । अहवा तं धणु उञ्जलउ जं आवइ णाएण ॥११३॥ णिद्धणमणुयह कठडा संजमि उपेणय दिति । अह उत्तमपइ जोडिया जिय दोस वि गुण हुंति ॥११४॥ णियमविहूणह णिट्ठणी जीवह णिप्फल होइ । अणमोल्लियेउ कि पावियइ दमकलंतरु लोइ ॥ ११५ ।। जो वयमायणु सो जि तणु किं किनइ इयरेण । तं सिरु जै जिणमुणि गवह रेहई भत्तिभरण || ११६ ॥ दाणचणविहि जे करहिं ते जि सलक्सण हत्थ । जे जिणतित्थह अणुसरहिं पाय नि ते जिं पसत्य ।।११७॥ जे सुणति धम्मक्सरेई ते हउं मण्णमि कण्ण । जे जोयहिं जिणवरह मुहु ते पर लोयण धण्णा ॥ ११८ ।। अवरु वि जं जहिं उपयर तं उपयोरहि तित्थु । लइ जियें जीवियलाहडउ देहु म लेहुँ णित्यु ॥ ११९ ।। १ अ.क संजमियउणय. २ अ चिहणा, कविही. ३ नं. पोलिउ. ४ क दवफलंतर. ५ज जि.६ असोदर. ७ अ.ज. "तित्थाद. ८ अंक ण ९ अ क. हिं, ज. ६. १० अ.या. "दि. ११ , उययारिदि. १२६.जीविय जियलाइड,

अनुवाद
३७
धर्म वहीं विशुद्ध है जो अपनी पाय से किया
काय से धर्म, जाये, और धन वही उन्चर है जो न्याय से
न्याय मे धन आये।
११४. निर्धन मनुष्य ये पट सयम में उमति देते है।
निधनता उत्तम पद में जोड़े हुए दोष भी गुण हो
और सयम जाते है।
नियम विहीन मनुष्य
की निष्ठा निपल होती है।
नियम और विना बोलाये क्या कोई लोक में दाम वा टुकड़ा
पिटा भी पाता है?
जो प्रत भाजन हो वही तन है, अन्य किस काम
सया तन, फा? यही मिर है जो जिनमुनि को तमस्कार परे
सया मा क और भक्तिभार से मुशोभित हो।
१७ जो दान और पूजाविधि पर ही मुरक्षण हाथ
सपे हाथ, है। जो जिनतीर्थों का अनुसरण करें ये दी पाप
गये पार प्रशसनीय हैं।
जो धार्मिक शन्दों को सुनने है उन्ही पो म या!
राये पाा, मानता जो निनवर का गुग दप ये ही परम
सबै नेत्र रोया धन्य है।
और भी जो (ग) जैसा उपसार पर मये
धागे देह की उसमे पैसा उपसार पराया। हे जीर, जीपा-
राम रेगर देव को निरर्थ मत पगे।
राधार

३८ सापयधम्मदोहा घरु पुरु परियणु धणियधणु बंधवपुत्तसहाई । जीवें अंतें धम्पु पर अण्णु ण सरिसउ जाइ ॥ १२० ।। देहि दाण चंउ कि पि करि मण गोवहिणियसत्ति । जं कड्डियई वलंत्यहं व उपरइ ण भंति ॥ १२१ ॥ जइ जिय सुक्संह अहिलसहि छंडहि विसयकसाय । अह विग्इं अणिरारियहं फलहिं कि अज्झवसाय ।। १२२॥ फरसिंदिउ मा लालि जिय लालिउ ए जि सत्तु । करिणिहिं लग्गंउ हस्थियउ णियलंकुसदुई पतु ॥ १२३ ॥ जिभिदिउ जिय संचरहि सरस ण भल्ला भक्स । गालई मच्छु चडफडिवि मुडे विसहइ थलदुक्स ॥१४॥ पाणिदिय घड वास करहि रक्सहुँ विसयकसोउ । गंधहं लंपड सिलिमुह वि हुउ कंजई पिच्छाउ ॥ १२५ ।। रूबहु उप्परि र म कार णयण णिवारहित । सैलासत्त पयंगडा पेक्सहि दीपि पंडत ॥ १२६ ।। १६ सयाई. २अ.ज.घउ. ३ अ.क. मणि. ४क पाढिया घरवरतय. ५ जद सुपपदि. ६ क.वि. ७ रग्गि3. ८ द युद. ९ अ.मुद्द. १० का रफ्नउ. ११ज. पमाउ. १२६ मा १३ ज रूप लागि १४ क पेपद.

अनुवाद । कात्याग १२०. घर, पुर, परिजन, धनिकों का धन, पुन, यांधय जीव का मचा और सहायक ये जाते समय जीव के साथ नहीं माथी केवल धर्म जाते । धर्म ही एक साथ जाता है। १२१. कुछ भी कर के चार दान दे। मन को निजशक्ति दान और के अनुसार गोप। जो खींच लिया चलते समय मनोगुदिन वही उपकारी होगा इसमें भ्रान्ति नहीं। १२२. हे जीव यदि तूं सुस चाहता है तो विषय कपाय विषय-कपाय छोड़ दे। जिन्होंने विनों का निवारण नहीं किया उनके क्या अध्यवसाय फलीभूत होते हैं ? १२३. हे जीय, स्पर्शन्द्रिय का लालन मत कर । लालन स्पन्द्रिय करने से यह शनु बन जाता है। कारिणी से लग कर हाथी जंजीर और अकुंश के दुख में पड़ा है। १२४. हे जीव, जिद्धेन्द्रिय का संचारण कर। रसपूर्ण जिहेन्द्रिय भक्षण भला नहीं होता । गल से मछली थल के दुप सहती है और तड़फड़ा कर मरती है। १२५. हे मूद, घ्राणेन्द्रिय को वश में कर और विषय- प्राणेन्द्रिय कपाय से यच । गंध का लोभी शिलीमुख (भ्रमर) कमल में फुसला कर पड़ा है। १२६. रूप के ऊपर रति मत कर । उधर जाते हुए नयनों नेन्द्रिय को भी रोक । रूप में आसक्त पतंग को दीपक पर पड़ते हुए देस। ।

सारयधम्मदोहा मणगच्छह मणमोहहं जिय गयह अहिलासु । गेयरसें हियकाणडा पत्ता हरिण विणागु ॥ १२७॥ एकाहिं इंदियेमोकलउ पावइ दुक्ससयाई । जम पुणु पंच चि मोकला उसु पुच्छिाई काई ॥१२८ ॥ दिल्लर होहिं म इंदियहं पंचहं विणि णिवारि । इक णिवारहि जीहंडी अण्ण पराई गारि ॥ १२९ ।। संचहि गुरुपयशंकसहि मेल्लि मदिल्लउ तमं । मुह मोडइ मणहस्थियउ संजांभरतरु जेम ।। १३० ।। परिहरि कोहु समाइ करि मुचहि कोहमलेग । पहाणे मुज्झइ भविक छित्तउ चंडालेग ॥ १३१ ।। मउयत्तणु जिय मणि धरहि माशु पणामइ जेण । अहवा तिमिरु ण ठाँहरइ मूरह गयणि ठिएण ।। १३२ ।। माया मिट्टही थोडिय पि गइ चरिउ विमुदु । कंजियपिंदुई वि नुडई सुद्ध वि गुलिये दुदु ॥ १३३ ॥ १ज. मोदण. २भ.गीयद. ३.या.एफ पि. ४९. इंदिउ. ५अ.क.६. छोरः ६.जीयही ज.जाहिय. ७ क. तेन ८ ज. प. जह. ९. संजग मद. १० अ. का. सन. ११. मुंचा. १२.ज.द्वार परा. १३ अ.क. बिपि घर पा. १४ अ.क. गलियर.

अनुवाद
१२७. कुछ अच्छे, मनमोहक गीत की, हे जीय, अभिलापा
कर्णन्द्रय (मत कर)। कर्णहारी गीत के रस से हरिण
विनाश को प्राप्त हुए।
एक ही इन्द्रिय के स्वच्छन्द होने से सेकड़ों दुख
पचेन्द्रिय प्राप्त होते है। जिसकी पांचों इंन्द्रिय मुक्त
उसका तो पूछना ही क्या है।
१२९. पाचों इंद्रियों के सम्बन्ध में ढीला मत हो । दो या
बिहा निवारण कर । एक जीभ को रोक और दूसरे
और परस्त्री
पराई नार।
१३०. गुस्वचन रूपी अकुश से खीच, जिससे मट्ठापन
मन रुपी हाथी, को छोड़कर मनरूपी हाथी संयम रूपी हरे भरे
सयमरूपी वृक्ष वृक्ष की ओर मुख मोड़े।
१३१. शोध को छोड़ और क्षमा धारण कर | शोध रूपी
सची शुद्धि मैल से मुक्त हो । भ्रान्ति में पड़ा हुआ मनुष्य ही
चडाल से छुआ जाकर स्नान से शुद्ध होता है।
१३२. हे जीव, मृदुता को मन में धारण कर जिससे
मार्दव मान का प्रणाश हो । सूर्य के गगन में स्थित होने
पर तिमिर नहीं ठहर सकता।
१३३.
माया को छोड़ जो थोड़ी भी विशुद्ध चरित्र को
माय त्याग दूपित कर देती है । काजी के बिन्दुमात्र से शुद्ध,
गुडीला दूध भी फट जाता है।

सावयधम्मदोहा लोहु मिल्लि चउगइसलिलु हलुवउ जायइ जेम । लोहमुक्छु सायरु तरह पेक्खि परोहणु तेम ।।१३४ ।। मोहु शु छिजउ दुबलउ होइ इयरु परिवारु । हलुबउ उग्घाडतयह अह व गिरग्गल वारु ॥ १३५ ।। मिच्छत्ते गरु मोहियउ पाउ वि धम्मु मुणेइ । भंति फवण धरियउ वेलु वि सुवण्णु भणेइ ॥ १३६ ॥ जइ इच्छहि संतोसु करि जिय सोक्सहं विउलाहं । अह वा गदु ण को करह रवि मेल्लिवि कमलाहं ।। १३७॥ मणुयहं विणयविवजियहं गुण सयल वि गाति । अह सरपरि विणु पाणियई कमलई केम रहति ॥ १३८ ।। विजायचे विरहियउ वयणियरो वि ण ठाइ । सुकासरहु किं इंसउलु जंतउ धरणहं जाइ ॥ १३९ ॥ सज्झाएं णाणह पसरु रुज्झइ इंदियगाउ । पच्चूसें सूरुग्गमणि घूयडकुलु णिच्छाउ ॥ १४० ।। १ क परोहण. २ द. मोहुण छिनई. ३ अ. क. द. गिरग्गल. ४ अ.क.डेलु वि सुण्णु. ५ अ. ज. द. मच्छहि. ६ ज.कु वि.७ अ. क. धूपहा

अनुवाद
१३४. लोभ को छोद जिससे चतुर्गति रूपी जल हलका
लोगयाग हो जाय । देय, लोहमुक्त प्ररोहण (नौका) सागर
को तर जाती है।
१३५. मोहका क्षय हो जाने से अन्य परिवार ( आपही)
मोदस्याग दुर्बल हो जाता है। अगला रहित हार उघाड़ने में
हलका होना है।
१३६. मिथ्यात्य से मोहित नर पाप को भी धर्म मानता
मिथ्यात्व है। धतूरे से मत्त पुरुष दल को भी सुवर्ण कहे
इसमें पया भ्रान्ति है।
१३७. यदि गूव सुप की इच्छा है, तो, हे जीव, सन्तोष
सन्तोष कर । फमला यो आनन्द सूर्य को छोड़कर और
फोन करेगा?
१३८. विनय से विवर्जित मनुष्यों के सफल गुण नष्ट हो
विनय जाते है। विना पानी के सरोवर में कमल किस
प्रकार रह
सकते है?
१३९. घेयावृत्य से घिरहित प्रतों का समूह भी नहीं
वयावृत्य ठहरता। सूगे सरोवर से जाना हुआ हमाल
पश धरा (रोसा) जा सकता है ?
१४०. साधाय से ज्ञान का प्रसार भर इंद्रिय-ग्राम
स्वाध्याय का अवरोध होना। है प्रातःकाल के सूर्योदय में
घुग्यू-फुल्ल निष्प्रभ दोजाना है।

४४ सापयधम्मदोहा गुणवंतह सह संगु कार मल्लिम पावहि जेम । सुवणमुंपत्तविवजियउ भरतरु बुइ केप ॥ १४१ ॥ सत्तु वि महुरई उनसमइ सयल वि जिय यसि हुँति । चौइ कवित्त पोरिसई पुरिसहु होइ ण फित्ति ॥ १४२ ॥ भोयणु मैउणें जो करइ सरसइ सिज्झइ वासु । अहं वा बमइ समुदि जिय लच्छिम करहुँ णिवासु ॥१४३॥ विसयकसाय बसणणिबहु अण्णु जि मिच्छामाउ । पिसुणत्तणु कासवयणु मिलंहि सयल अणाउ ।। १४४ ॥ अण्णाएं आवंति जिय आवइ घरण ण जाइ । उम्मग्गे चलतयह कंटई भाइ पाउ ॥ १४५ ।। परिहरि पुत्तु वि अप्पणउ जसु अण्णायपवित्ति । अप्पणियई लालई मरइ एसियारउ पउ भति ॥ १४६ ।। अण्णाएं गलियहं वि सउ किं दुलह में जाइ । पहिवाएं यचंति गय नहिं कि सूर्णी ठाइ ॥ १४७ ।। १ज द सवण २का सपञ्च. ३ घुमार घाउ चाड.. अ मोणिद थदध पसादः वगाग. ७१ क ज पर.८क पसारी पसाए पिसगमय. . थक ६ मिलिपि.१० अ ज फंटउ १८ पलिया उ. १२ अ.काज मुम्पलउ. १३ ज. द म १४ फ.ज सिद्ध अनुवाद ४५ । १४२. शनु १४१. गुणवतों का संग कर जिससे भलाई पाये । सुवन सुगगति और गुपनों से घिनर्मित उत्तम वृक्ष कैसे पदा जा सकता है? भी मधुरता से शान्त हो जाता है और सभी माधुर्य, सा जीव घश में हो जाते है। त्याग, कवित्व और। और पौष पौरुष से पुरुप की कीर्ति होती है। १४३. जो मौन से भोजन करता है उसे सरस्वती सिद्ध मीन मोना होती है। लक्ष्मी समुद्र में निवास करती है इसलिये समुन्द्र ( स्व+मुद्रा) में उसका निवास बनाओ। विषय कवाय, व्यसनसमूह, पिशुनत्व, कर्फशवयन साध्य भाव और सरल अन्याय इनको छोड़। अन्याय से (लक्ष्मी) आती तो आजाती है पर अयाय धरी (रोकी) नहीं जा सकती। उन्मार्ग से चलने घालों या पाच कोटे से भग्न होता है। । जिसकी अन्याय में प्रवृत्ति हो उसका परिहार कर भयागी कारखा चाहे यह अपना पुत्र भी हो। एसियारा अपने ही लाल (कर) से मरता है, इसमें भ्रान्ति नहीं। अन्याय से परमानों यामीसय हो जाना है, अयाग से नाश दुर्बल फान होगा? जहां वायु से गज भी उड़ जात या यया पुत्ती ठहर सरनी है? क्या सावयधम्मदोहा अगाएं दालिदियह रे' जिय दुहु आपग्गु । लकडियह विशु सोडयहं मग्गु सचिक्सल दुग्गु ॥ १४८॥ अण्णाएं दालिद्दियह जोहट्टइ णिनाहु । लुग्गउ पायपसारणई फाइ को संदेहु ।। १४९ ॥ ता अच्छउ जिय पिसुणमइ संगु जि नाह विरुद्ध । सप्पहं संगें कट्टियउ चंदणु पिक्खं सुयंधु ।। १५० ।। विहडावह हु संघडइ पिसुणु परायउ गेहु । टालइ रयइ ण उत्तिडउ उंदरु को संदेहु ॥ १५१ ॥ धम्म विणु जे सुक्खड़ा तुट्टा गया विचार । जे तरुवर संडिवि खुडिय ते फल इक जि वार ।। १५२ ।। सुहिय उ हुवउ ग को वि इह रे जिय गरु पावेण । कद्दमि ताडिउ उहियउ गिदु दिउ केण ॥ १५३ ॥ रे जिय पुषण धम्मु फिड एवहिं करि संसार । मंति करण रिणु पानिय सडहाड पिडइ पार ॥१५॥ १ ज द रे २ ज द रुपयां. ३ क सचिक्विटु अ ज प ५ अ पिक्नि.६ करगिदि उत्ति३.७ इंदुर ८३ पदोमा दिलिय यो पायेण ९ जछिदुद हिंदु.

अनुगद
१४८ हे जीव, अन्याय से दरिद्रियों का दुरा बढ़ता है।
अयाय से विना एकड़ी के सोड़े के मार्ग कीचड़मय और
दुसवृद्धि दुर्गम हो जाता है।
१४९ अन्याय से दरिद्रियों का निर्वाह भी टूट जाता
अ याय से हे। जाण पत्र पाच पसारने से फटेगा ही
निर्वाह हानि इसमें क्या सन्देह है।
१५० इसलिये, हे जीव, पिशुनमति को अलग रहने दे ।
पशु य
उसका सग भी विरद्ध (बुरा) होता है। सर्प के
सग से, देय, सुगन्धी चन्दन भी काट डाला
जाता है।
पिशुन पराये स्नेह को तोड़ता हे जोडता नहीं।
उदीर (मूपक) उत्तरीय ( वस्त्र) को काटता है,
रचता नहीं।
१५२ धर्म के विना जो सुख भोगे हे वे विचारलं कि
धर्मरहिन मुख टूट गये। जो वृक्ष को काटकर खोटे गये है ये
फल एक बार के ही है।
१५३ हे जीव, पाप से यहा कोई नर सुखी नहीं हुआ।
पाप स सुख कीचड़ में मारी हुई गेंद उठती हुई किसने
नहीं देखी है?
१५४ हे जीव, 'पूर्व में धर्म नही किया' इसका सताप
धर्म नाविक है कर । विना नाविक के नाच चट्टानों पर जा पड़े
तो इसमें क्या भ्रान्ति है।

सापयधम्मदोहा जेण सुदेउ सुणरु हासि सो पई फियउ ण धम्मु । विण्णि वि छत्तें चौरियहि इकु पाणिउ अरु घम् ॥१५५॥ अभयदाणु भयभीरुयह जीनहं दिण्णु ण आसि । चार वार मरणह डरहि केम चिराउंमु होसि ॥ १५६ ॥ विजापच्चु ण पइ कियउ दिण्णु ण ओसहदाणु । एवहिं वाहिहिं पीडियउ कंदि म होहि अयाणु ॥ १५७ ॥ संघह दिण्णु ण चउविहंह भत्तिए भोयणदाणु । रे जिय काई चडफडहि दूरीकयणिमाणु ॥ १५८ ॥ पोत्थय दिण्ण ण मुणिवरहं विहिय ण सत्यहं पुज। मइ पडियउ कवितुं गुणु चाहहि केम णिलज्ज ॥ १५९ ।। पाउ करहि सुहु अहिलसहि पर सिविणे वि ण होइ । माइणि बाईयइ अब कि चक्खइ कोइ ।। १६० ॥ गुरुआरंभैइ गैरयगइ तिव्यकमाय हवति । इकछिद्दिय पाहणमरिय युड्डइ णाव ण भंति ॥ १६१ ।। १ज, बिरयादि. २ अ भीतयह. ३ ज. चिराय ४ अ संपहं ५अ क.द विहां ६ ज, फयित्त'. ७ क द परि. ८ज मायइ. ९ अ ज पापिया. १० अ ६ 'भारंभ. ११ अ.क.णिरय'.

अनुवाद
१५५. जिससे सुदेव और सुनर होता है उस धर्म को
धर्म के विना तूने नहीं किया। दोनों का छन से निवारण कर
देवत्व नहीं सकेगा, एक पानी और (दूसरा) घाम ।
१५६. भयभीरकों को कभी अभयदान नहीं दिया। अब
चिरायु क्यों चार बार मरने से डरता है। चिरायु कैसे हो
न हुआ सकता है।
१५७. तूने न यावृत्य किया, न औषधदान दिया,
व्याधियों से इसलिये व्याधियों से पीडित हुआ है । हे अनानी,
पीडित क्यों हुआ? कठोर मत हो।
१५८. चतुर्विध संघ को भक्ति से भोजनदान नहीं दिया।
निर्वाग से दूर रे जीय, निर्वाण को दूर करके अव क्यों
तड़फड़ाता है।
१५९. मुनिवरों को पोथी नहीं दी, न शास्त्रों की पूजा
मति आदि की। मति, पाण्डित्य, कवित्व व गुण किस प्रकार
गुण क्यों न हुए चाहता है, निर्लज?
१६०. पाप करता है और मुस चाहता है, पर वह स्वप्न
पाप से गम में भी नहीं होता। माईफल व नीम बोने से क्या
पोई आम चख सकता है ?
१६१. बड़े आरम्भ से तीन कपाय और नरक गति होती
भारम्भ से है। पापाणों से भरी नाव एक ही छिद्र से डूब
मरक गति जाती है इसमें भ्रान्ति नहीं।
यया हुआ

सापयधम्मदोहा केंडतुलामाणाइयह हरिफारिसरनिरामेस । जो णचइ पेडपेसणउ सो गिण्हइ बहुवेसे ॥ १६२ ।। हेलुभारंभहं मणुयगइ मंदकसायहं होइ । छुहु सावउ धणु पाहुडइ लाहड पुणरनि होई ॥ १६३ ॥ सम्म सारयनयहं उप्पञ्जइ गरराउ । जो गविणि छडियइ सो वारइ किम जाउ ॥ १६४ ॥ धम्म ज ज अहिलसइ तं तं लहइ असेमु । पा पाई पापियउ दालिदु नि सकिलेसु ॥ १६५ ॥ धम्में हरिहलचकरइ कुलयरु जायइ कोइ । भुषणत्तय दियचलणु कु वि वित्थंकरु होइ ।। १६६ ।। जासु जणणि सम्गागमणि पिच्छइ सिविणयपति । पहतेएं संभानियइ सूरुग्गमणु ण भंति ॥ १६७ ॥ जो जम्मुच्छवि हापियउ अमियघडहिं सफेण । किम हायिजइ अतुलनलु जिणु अह वासकेण ॥ १६८ ॥ पुडतुल्ला पुडमाणयहं. २ ज णदु. ३ अक भेस ४ अ क लहुआ. ५ क कोई ६ क योगविणट्ठा अ द णिट्ठिउ. ७ अ जाइ. ८ क द पावह. ९ ज "णि.

अनुवाद
१६२ फूट तुला, मानादि (झूठे तराजू, बाट आदि)
कार-व्यापार रखने वाले सिंह, हाथी, गधा, विपवाले व मेय
(यारा) होते है । जो नट का तमाशा करता
है वह बहुत वेप धारण करता है।
या पल
लघु आरम्भ और मन्दक्पाय बालों को मनुष्य
मनुष्य गति गति प्राप्त होती है। यदि थापक धन का व्यापार
की प्राप्ति करता है तो फिर लाभ होता ही है।
१६४ सम्यक्त्व सहित श्रावक के प्रतों से सुरराज
इत्र प्राप्ति उत्पन होता है । जो इन्द्रियों की निष्ठा को छोड़
देता है यह जाने से कैसे रोका जा सकता है?
धर्म से जो जो अभिलाषा करता है सो सब पाता
योर प्राप्ति है। पाप से पापी हे शमय दारिन्ध पाता है।
धर्म से कोई हरि, हर, चमवर्ती व कुलकर उत्पन
तप्रर्थकर होता है और कोई तार्थफर होता है जिनके चरणों
पद प्राप्ति की तीनों रोक चन्दना करते है।
स्वर्ग से आगमन के समय उनकी जननी स्वाम
गर्भर याण पटि देखती है । सूर्योदय प्रभा के तेज से
सभावित होता है इसमें भ्रान्ति नहीं।
जन्मोसव के समय उनका स्नान शन' अमृन ये
जग ल्याण घड़ा से करता है। अतुरवरी जिन भगवार
द्वारा
वैसे नहाये जा सकते है।
भशाके

सारयधम्मदोहा सुरसायरि जसु णिक मंणि घल्लइ चिहुरे सुरिंदु । अह उत्तमकजहं हवइ ठाउ जि सीरसमुदु ॥ १६९ ॥ गाणुग्गमि जसु समसरणि पत्तामरसंघाउ । होइ कमलमलियभसलु मुरुग्गमणि चलाउ ॥ १७० ।। जसु पत्त्तमराइयउ चिलुलतो वि असोउ । अइदुरुज्झियपरियणहं किम उप्पजइ सोउ ॥ १७१ ॥ पारिउ तिमिरु जिणेसरहं भामंडलु अइदिनु । यतमु होइ सुहारणउ इत्यु ण काई विचिन्तु ॥ १७२।। माहउसरणु सिलीमुहउ कुसुमासणि थिप्पंदि । सुमणस अलियनिनजिया जिणचलणहं णिवडंति ॥१७३|| धवलु वि सुरमउडकियउ सिंहासणु बहु रे । अह वा सुरमणिमंडियउ जिणरास होइ ॥ १७४ ॥ सहमिसिण दुंदुहि रडई छंडहु जीवहं सेरि । हकारह पर तिरिय सुर एरिस होइ सं भेरि ॥ १७५ ।। १द णिक्खयणि २ज चितुर ३ ज का ४ ज ६ तमि. ५ ज रोत ६ अदर, ज 'दरि, द वरि. ७ अमु (सु), दम

अनुगद
निष्पमण के समय सुरेन्द्र उनके केशों को
तप कल्याण सुरसागर में घालने (टालते)। उत्तम कार्य
का टांय भी क्षीरसमुद्र होता है।
१७०. ज्ञानोदय के समय उनके समवशरण में देयों का
ज्ञान कन्याग समूह प्राप्त होता है । सूर्योदय के समय तलाव
कमलों पर मुकुलित भ्रमरों से मुक्त होता है।
१७१. उनके ऊपर उत्तम पत्रों से पिराजित अशोक
अशेर लहलहाता है। जिन्होने परिजनों का बहुत दूर
से परित्याग कर दिया उन्हे कैसे शोक उत्पन्न हो
सकता है?
१७२. जिनेश्वर का अंधकार दूर हुआ है, अतः उनका
भामल भामण्डल अतिदीप्तिमान, तम का नाश करने
वाला और सुहावना होता है इसमें कुछ विचित्र
नहीं है।
१७३. माधवशरण शिलीमुख कुसुमासन पर तृप्त हो
पुष्पवृदि जाते है और अलीकविवर्जित सुमनस जिन
भगवान् के चरणों में पड़ते हैं।
१७४. सुरमकुटांक्ति धवल सिंहासन भी बहुत सीमा.
निहासन यमान है। जिनवर का आसन मुरमणि मंदित
होता है।
१७. शब्द के मिप से दुंदुभि रटनी है 'जीवों के प्रति
उप छोड़ो'। यह नर, निर्यश्च और सुगेको
धानी है। यह मेरी ऐनी होती है।
दुगि

५४ सावयधम्मदोहा चामर ससहरकरधवल जमु चउसहि पडंति । हरिसिय जिणपासट्टिया अह सचामर हुंति ॥ १७६ ॥ छत्तई छणससिपंडुरई सुर पर णाय धरति । विसहरसुरचकिहिं गहिय जिणपुंडरिय हवंति ॥ १७७ ॥ झुणिअक्खियसंपुण्णहल जीवा सासणि जासु । अमियसरिसे हियमहुर गिर यह च ण वल्लह कासु ॥१७८० एह विहूइ जिणेसरह हुन धम्में एवई । वणसइ णयणाणंदयरि होइ यसते मंड ॥ १७९ ।। एवंविहुँ जो जिणु महइ वंछिउ सिज्झइ तासु । चीजें अह वा सिंचियइं खेत्तिय होइ ण कासु ॥ १८ ॥ जो जिणु पहावइ घयपयहि सुरहिं पहविज्जइ सोइ । सो पावइ जो जं करइ एहु पसिद्धर लोइ ॥ १८१ ॥ गंधोएण जि जिणवरहं पहावियं पुण्णु बहुत्तु । रोलह बिंदु वि विमलजलि को पारइ पसरंतु ॥ १८२ ॥ १ . ई. २ अ.धुणि; ज. मुणि. ३ ज सहिय. ४ अ क इचवडु, ५ अ.क. "विह. ६ ज.द. विजें. ७ ज. संघियएं ८ ज. पदापिदि. १६ तेलहे. १० ज. जलिदि.

. अनुनाद १७६. चन्द्रकिरणों के समान धवल चौसठ चमर उनके चमर ऊपर दुलते है। एप से जिन भगवान् के पास स्थित होने वाले सञ्चामर (सचे अमर) होते है। १७७. पूर्णचन्द्र के समान श्वेत छत्र सुर नर और नाग धारण करते है। जिन भगवान् के पुंडरीक (छत्र) विषधर, सुर और चक्रवर्तियों द्वारा गहे जाते हैं। उनके शासन में ध्वनि द्वारा जीयों के सम्पूर्ण दिव्यध्वनि फलों का व्याख्यान होता है। अमृत के सदृश, हृदयमधुर गिरा किसे प्यारी नहीं लगती? यह जिनेश्वर की इतनी विभूति धर्म से ही हुई है। नयनानन्दकारी वनश्नी वसन्त से ही मण्डित होती है। इस प्रकार के जिन भगवान् की जो पूजा करता जिन पूजा है उसका वाञ्छित सिद्ध होता है। बीज के सीचने से किसकी सेत्ती ( समृद्ध) नही होती? जो जिन भगवान् को घृत और पय से स्नान कराता है उसे सुर नहलाते हैं। 'जो जैसा करता है तैसा पाता है। यह लोक में प्रसिद्ध ही है। १८२. जिनवर के गधोदक स्नान से बहुत पुण्य होता गोदक है। विमल जल में पड़े हुए तेल के विन्दु को फैलने से कौन रोक सकता है? वृत पय प्रक्षाल । प्रक्षाल सापयधम्मदोहा जलधारा जिणपयगयउ रयह पयासंह यागु । सराहरकिरणकरालियहं विमिरहु फित्तिउ थामु ॥ १८३ ।। जो चच जिणु चंदणई होइ सुरहि तसु देहु । तिजह दीवहं गयई उजोइजइ गेहु ॥ १८४ ।। जिशु अञ्चइ जो अक्सयहिं तस परवंसपमूह । अह विडियई सुयपचमिहि होइ नि चरिविहूइ ॥ १८५ ॥ खुट्टइ भोउ ण तमु महइ जो कुसुमहिं जिणणाहु । अह सरवरि णइसारिणइ पाणिउ होइ अगाहु ।। १८६ ।। णेयजइं दिण्णई जिणहु जिय दालिद्दहु गामु । दुरिउ दुकाइ नहुँ परहु लच्छिहि होइ म मासु ११८७१ दीवई दिग्णई जिणनरहं मोहहुँ होइ ण ठाउ । अह उपवासहिं रोहिणिहिं सोउ पिपलयहु जाइ ॥१८८॥ धूवउ सेवइ जिणवरहं तसु पमरइ मोहग्गु । इत्थु म कायउ भति करि तें पडिबद्धर सग्गु ॥ १८९ ॥ १ क पयासह २ क उजायजा ३अ क द सरयर, ज सरवण सारण. ४ अदतहो; जतसु ५द मोदद.

अनुवाद
पल
१८३. जिनदेव के चरणों पर की जलधारा रज का नाम
जल-प्रक्षाल तक नष्ट कर देती है। चंद्रकिरणों से करालित
तिमिर का कितना सामर्थ्य है ?
१८४. जो जिन भगवान् की चन्दन से पूजा करता है
चन्दन पूजा उसका शरीर सुगन्धित होता है, जैसे कि दीप में
डाले तेल से घर में उजेला किया जाता है।
१८५. जो अक्षतों से जिनदेव को पूजता है उसका उत्तम
अक्षत पूजा, वंश में जन्म होता है, और श्रुतपंचमी के विधान
भुत पंचमी फल से चक्रवर्ती की विभूति होती है।
१८६. जो पुष्पों से जिनदेव को पूजता है उसका कभी
पुष्प पूजा भोग नही खुटता। सरोवर में नदी की नहर
मिला देने से पानी अगाध हो जाता है।
१८७. जिनदेव को नैवेद्य चढाने से, हे जीव, दारिद्य का !
नैवेद्य पूजा नाश होता है, उस मनुष्य को पाप नहीं लगता
और लक्ष्मी का विनाश नहीं होता।
१८८. जिनवर को दीप चढाने से मोह को स्थान नहीं
दीप पूजा, मिलता, और रोहिणी के उपवास से शोक भी
रोहिणी उपवास
प्रलय को पहुंच जाता है।
१८९. जो जिनवर को धूप रोता है उसका सौभाग्य
धूप पूजा फैलता है । इसमें कुछ भी भ्रान्ति मत कर कि
उसने स्वर्ग बांध लिया।
फल

सावयधम्मदोहा देई जिणिदहं जो फलई तसु इच्छियई फलंति । मोयघरहं गय रुक्खडा सयल मणोर, दिति ॥ १९० ॥ जिणपयगयकुसुमंजलिहिं उत्तमसियसंजोउ । सरगयरविकिरणावलिए गलिपिहिं लच्छिम होई ॥१९१॥ जिणपडिमई काराधियई संसारहं उत्तारु । गमणहियहं तरंडउ वि अह व ण पावइ पारु ॥ १९२ ॥ जिणभवणइं कारावियई लन्मइ सम्गि विमाणु । अह टिकई आराहणेहँ होइ समाहिहि ठाणु ॥ १९३ ॥ जो धवलावइ जिणभवणु तसु जसु कहि मि ण माइ । ससिकरणियरु सरयमिलिउ जगु धवलणहं बसाइ ॥१९४॥ जो पइठावइ जिणवरह-तसु पसरइ जगि फित्ति । उपहिवेल छणससिगुणई को वारइ पसरंति ॥ १९५ ।। औरतिउ दिण्णउ जिणहं उज्जोयई सम्मनु । भुवणुभासइ सुरगिरिहिं सूरु पयाहि ण दितु ॥ १९६ ॥ १ दमणोहराहुति. २ ज.द, होउ. ३ का. " द. हो."जाराहणई दाराहमिहि. ५ ज. ससिहर. ६ क. गुणहं. ७ ज.दीयद दिण्णउ जिणवरहं. ८ फ. द. उजोश्य.

अनुवाद
फल
१९०. जो जिनेन्द्र को फल चढाता है उसको यथेष्ट फल
पल पूजा प्राप्त होता है । भोगभूमि के वृक्ष उराके सब
मनोरथों को पूरा करते हैं।
१९१. जिनदेव के पद पर चढाई कुसुमाञ्जलि से उत्तम
युमुमावलि श्री का संयोग होता है। सरोवर में पड़ी रवि की
किरणायलि से कमलों में लक्ष्मी आती है।
१९२. जिनप्रतिमा कराने से संसार से उतार होता है।
जिन प्रतिमा गमन के लिये उद्यत पुरुष को तरंड (डॉगा) ही
कराने का पल पार लगाता है।
१९३. जिन मंन्दिर धनवाने से स्वर्ग में विमान मिलता
जिनमंदिर है, और आराधना की टीका करने से समाधि में
निर्माण पल स्थिति होती है।
१९४. जो जिन-मन्दिर को धवल करवाता है (सफेदी
जिनमंदिर की करवाता है) उसका यश कहीं नहीं माता।
सोदी कराने शरत्काल से मिलकर चन्द्रकिरणों का समूह
का पल जगत् भर को धवल यना देना है।
१९५. जो जिनयर की प्रतिष्ठा करता है उसकी जगत्
जिन प्रतिष्ठा में फीति फैलती है। पूर्णचन्द्र के गुणों से प्रसार
करती हुई उदधि की घेला (तरंग) को फोन
रोक सकता है?
१९६. जिनदेव को दी हुई आरती सम्यक्त्व का उद्योग
भारनी पल करती है। सुरगिरि पर पदार्पण करते ही सूर्य
भुवन फो उदामित कर देना है।

सावयधम्मदोहा विलयई दिण्णइं जिणवरहं जगि अणुराउ माइ । चंदकंति चंदहं मिलिउ पाणिय दिग्ण ण ठाई ।। १९७ ॥ चंदोवई दिण्णइं जिणहं मणिमंडविय विमाल | अह संबंधो ससहरहं गहेंतारायणपाल ॥ १९८ ।। भन्धुच्छाहणि पावहरि जिणहरि घंट रसति । कुमुयाणंदणि वमहरणि छणजामिणि ण हु मति ॥ १९९ ।। चिंधचमरछनई जिणहं दिण्णइं लेभइ रजु । अह पारोहहिं णिग्गयहिं बड्ड विस्थाइ ण चोजु ॥ २० ॥ जिणहरि लिहियई मंडियई लच्छि संमीहिय होइ । पुष्णु महंवउ तासु फल कहिषि पं सफाइ कोइ ॥२०१॥ जंयूदीउ समोसरणु गंदीसरे लोयाणि । जिणवरभवणि लिहावियई सयलहं दुक्खहं हाणि १२०२॥ दिग्णई वत्थ सुअभियहं दिव्यंबर लमति । पाणिउ पेसि पउमिणिहि पउमई देइ मंति ॥ २०३॥ १ज. उदउ कि दित्ती ठार. २द, मदि. ३ अ.ज. संयंधी. ४ज. गय'. ५ क. पर; द."हर, ६ ज. उत्तदं. ७ का. द. मध्यर. ८. समादिय. .ज.कि.१० ज, द. गंदीसरि. ११ क दिण्णा ज.द.दिपणा. १२ अ.का.ज.पोसिउ.

अनुवाद
और पापहारी
१९७. जिनवर को तिलक चढाने से जगत् में अनुराग
तिएप पर नही माता। चन्द्रकान्त ( मणि) चन्द्र से मिरफर
पानी देने से नहीं पता।
१९८. जिन भगवान् को चढाये हुए मणि मंडित
चदेवा और विशाल चदेवा (पेसे शोभायमान होते है)
पढाने की जैसे ग्रह और तारागणों की माला चन्द्र से
शोभा सम्बद्ध हुई हो।
१९९ जिनगृह में बजता हुआ घंटा भव्यों का उत्सारफ
जिनगृह में
होता है। पूर्णिमा की रात्रि
पापी महिमा पुमुदानन्ददायिनी और भन्धकारहारिणी दोनी
है इसमें भ्रान्ति नहीं।
२००. जिन भगवान् को ध्वजा, चमर और छम चहाने
था,चमर, स्त्र से राज्य मिलता है। प्रारोहों ये निपटने मे चट
सगो या पल या विस्तार यदे तो क्या आश्चर्य है।
२०१ जिनगृह में माडना लिपने से यथेष्ट रमी प्रास
माना रियो होती है और महापुण्य होता है जिसका फल योई
यह नहीं सकता।
२०२. जम्मूदीप, समोसरण, नन्दीश्वर य रोको को
अम्मदीपादि जिनमन्दिर में लिपयाने से साल दुगों पी
हिमोपा पर हानि होती है।
अजियाओ यो यन देने से दिश्य यस्त्रों की प्राणि
गाजिया को सोता है। पासपेपर में पानी का प्रवेश परी
पायापर यह पर देगा, इसमें धान्ति नही।
का पर
।

सावयधागदोदा सारंभई ण्हवणाइयहं जे सायजे भणंति । दसणु तेहि पिणासियत इत्थु ण कायउ मंति ॥ २०४ ॥ पुग्गल जीवई सदु गणिये जो इच्छइ धणचाउ । इणि सम्पते तसु तणई किम सम्मनु म जाउ ॥ २०५॥ सम्म विणु वय वि गय वयहं गयहं गउ धम्मु । धम्में जैतें सुक्षु गउ वें विणु जिप्फलु जम्मु ॥ २०६ ॥ पुण्णरासिण्डवणाइयई पाउ लहुँ वि फिउ वेण । विसकणियई बहु उपाहिजलु णउ सिआइ जेण ।। २०७॥ ते सम्मत्तु महारयणु हिययंचलि थिर्स पंधि । बसहु जहिं जहिं जाहि जिय दहि वहिं पार्वहि सिद्धि॥२०॥ दाणचणविहि जो करइ इच्छिये भोयणिपंधु । विकई मुमणि पराडियई सो जाणहु जाचंधु ॥ २०९ ॥ ते कम्मरखड मरिग जिय णिम्पल घोहिसमाहि । एवणदाणपूजाइयेई जे सासयपद जाहि ॥ २१० ॥ १ अ. द. सावजु. २ क.पुग्गल जीविसुदु. ३ भ.क. द गणित, ज.गणियड. ४ अ.क.णिसमारं. ५ भ.द.ला पिउ. ६ अतुटुं. ७ क. जाद. ८ क.पाया. जे. द. इच्छा १. अ. विकिपि, ११ अ. फ. पूजादयदं.

अनुवाद ६ दोष नहीं २०४. जो अभिपकादि के समारम्मों को सावध ( दोष- अभिषेक मे पूर्ण ) कहते है उन्होने दर्शन का नाश कर दिया, इसमें कोई भ्रान्ति नहीं। जो पुद्गल को जीच का साथी गिनवार धन- के निर्विवेक से त्याग की इच्छा करता है उसकी ऐसी सम्मति से सम्यस्त्वनाश सम्यक्त्व कैसे नहीं जायगा? २०५. जो २०६. सम्यक्त्य के विना प्रत भी गये। प्रतों के जाने से सम्यक्त्वनाश धर्म गया। धर्म के जाते ही सुख भी गया जिसके से सुखनाश बिना जन्म निष्फल है। २०७. अभिषेकादि की पुण्यराशि में यदि किसी ने लघु पुण्यराशि में पाप भी कर लिया तो विष के एक कण से पापविन्दु समुद्र भर का जल दूषित नहीं हो सकता। २०८. इससे सम्यनत्व रूपी महारत्न को हृदय रूपी मम्याव से अंचल में स्थिरता से बांध । उसके साथ,हे जीव, सिद्धि जहां जहां जायगा, तहां तहां सिद्धि पावेगा। २०९. जो मोगबंध की इच्छा से दानार्चन घिधि करता भोंगों की इच्छा है, यह जन्म का अंधा, जानो, उत्तम-माणको से धर्म कौड़ी मोल येचता है। २१०. इसलिये, हे जीव, अभिषेक, दान, पूजादि से की वाञ्छनीय पल के क्षय और निर्मल योधि समाधि की मांग कर जिससे शाश्वत पद पर जाये।

साययधम्मदोहा पुण्णु पाउ जसु मणि ण समु तसु दुत्तरु भवसिंधु । कणयलोहणियलई जियहु किं ण कुणहिं पयवंधु ॥२१२॥ ण हु विग्गासिय दलकमलु ससरु सबिंदु सरेछ । पंछिन्नई इय कप्पयरु कामिउ को संदेहु ॥ २१२ ॥ हियकमलिणि ससहरधवल सुद्ध फलिहसंकास । भाइय पडिम जिणेसरह तोडइ चउगइपास ॥ २१३ ।। जासु हियइ असि आ उ सा पाउ ण दुफाइ ताह । अह दावाणल किं करइ पाणियगहिरठियाह ॥ २१४ ।। जिय मंतई सक्सरई दुरियई दरहु जति । अह सोहहं गुंजारियइं हरिणउलई कहिं ठंति ॥ २१५ ॥ विगिरायई असि आ उ सा जंपासरि पालु दिति । इबासएम पि जि फल सत्तरखरहण भति ॥ २१६ ॥ गरुडहं भावई परिणयइ रे जिय जाप हि मति । वाय हिणरु विसपारियउ उहाइ ण हुभति ॥ २१७ ।। जिणु गुणु देइ अचेपणु वि चंदिउ णिदिउ दोगु । इउ णियभावहं तणउ फलु जिगह ण रोमु ण वोमु ॥२१८॥ १५. करहिं. २ म. फामलदल. ३ अ. शिपिना. ५.कि.५८.६.जादि. ६ क.ज.द. उट्ठापति

अनुवाद
२११ जिसके मन में पुण्य और पाप समान नहीं है उसे
पाप पुण्य की भवसिन्धु दुस्तर है। क्या बनय या लोहे की
ममता गे माग निगड (शरारा) माणी का पादवन्धन नहीं करती?
२१२ स्वर, विन्दु और मात्रा सहित सपन कमल का
पमाशार विकाश दिये बिना यदि कोई कल्पवृक्ष की चान्छा
सिद्ध कशी पूना करे तो यह कामी है इसमें क्या सन्देह है ?
हृदयप मल में भाई हुई चन्द्रधवल, साटिय के
जिनप्रतिमा की समान शुद्ध, जिनेश्वर की प्रतिमा चतुर्गति के पाश
भावना का फट (यन्धन) को तोड़ती है।
૨૪ जिसके हृदय में असि आ उसा है उसे पाप
असिखा उसा नहीं लगता। जोगहरे पानी में स्थित है उसका
(पच परमेष्ठी ) दावानल क्या कर सकता है ?
२१५ हे जीय, इस सात अक्षरों के मन से सर पाप
पापनाशा दूर भागते है । सिंह की गुजार में यहीं हरिण
मन-- पुल ठहर सकते है?
२१६ असि आ उ सा का प्रतिदिन दो सी (जप) जो
फल देता है यही पल सी में भी होता है और
सात अक्षरों से भी। इसमें भ्रान्ति नहीं।
२१७ हे जीय, जय मात्रिक गरड़भाव में परिणत हो
जाता है उसी समय यह विप से मूच्छित मनुष्य
विषनाग फो उठा देता है। इसमें भ्रान्ति नहीं।
अचेतन भी जिन (प्रतिमा) यन्दने से गुण और
स्वभावानुसार निन्दा करने से दोष देती है। यह अपने भावों का
ही फल है। जिन भगवान को न रोष है नतोष।
जप
गयगे
पत्र

६ साययधम्मदोहा गणुयत्तणु दुलाहु लहिवि भोयह परिउ जेण । इंधणक कप्पयरु मूलहो संडिउ तेणे ।। २१९ ॥ दुलहु लहिवि परचयणु विसयह तोसिउ जेण । पट्टोलयतगंथियहं सुरयणु फोडिउँ तेण ॥ २२० ॥ दुल्लहु लहि मणुयचणउ भोयह परिउ जेण । लोहकलि दुत्तरतरणि णाव बियारिय सेण ॥ २२१ ॥ दुण्णि सयई सुित्तरई पहियई सिवगई दिति । धम्मधेणु संदोहयहं वरपउ दिति ण भंति ॥ २२२ ।। गयेसुरसेहरमणिकिरणपाणिय पयपोमाई । संघहं जौह समुल्लसहि ते जिण दितु सुहाई ॥ २२३ ।। दंसणु णाणु चरिनु तउ रिसिगुरु जिणवरदेउ । घोहिसमाहिए सहुँ मरणु भपि भनि हुन एउ । १२४ ।। श्य साधयधम्मदोहा समत्ता। १ज.म. में यह दोहा नहीं है.२ क.फेडिउ. ३ म.पायी. सुत्तर. ४ ज.सियमुहु. ५ फ.णय. ६ क. पाणियपोमा दै. पतिपाणियपोमाई. ७ भक. ज. द. आर. ८ अरोण जि णुत्त सहार. ९ म..सिरि १० क. दिनउ प.

अनुवाद
६७
२१९. दुर्लभ मनुजत्व को पाकर जिसने उसे भोगों में
माध जन्म का प्रेरा उसने इन्धन के लिये कल्पतर को मूल
दुरुपयोग
काट डाला।
से
२२०. दुर्लभ नरत्व का लाभ पाकर जिसने विषयों में
संतोष माना उसने छत्रपट में गांट देने के लिये (१)
उत्तम रत्न को फोड़ डाला।
२२१. दुर्लभ मनुजत्य को पाकर जिसने उस्ने भोगा में मेरा
उसने दुस्तरतरणि नाव को उसका लोहा निकालने
के लिये तोड़ डाली।
२२२. ये चीस ऊपर दो सो दोहे पढने से शिवगति देते
इस प्रब के हैं। धर्मधेनु अच्छे दोहका (दुहने वालों) को
पढने स पल उत्तम पय (दुग्ध या पद) देती है इसमें भ्रान्ति
नही।
२२३. ' नमस्कार करते हुए देयों के मुकुटमणिया के
सुरा की प्रार्थना किरणरूप पानी के संसर्ग से जिनके कमलरूपी
चरण प्रकाशमान ६ घे जिनदेव सुस प्रदान करें।
२२४. दर्शन, शान, चरित्र, तप, नापि गुरु, जिनवर देव
अन्तिम विननि और योधिसमाधि सहित मरण,ये भव भव में हो।
इति धावरुधर्मदोहा समात्र ।

परिशिष्ट
किसी विमी पोधी में कुछ दोहे अधिक पाये जाते है जो प्रक्षिप्त
ज्ञात होते हैं। वे यहां
उद्धृत किये जाते हैं।
दोहा नं. २१ और २३ के बीच म प्रति में-
मजहु तिजहु भन्वयणु जेण मई विपरीय।
हीणकुलेसु य जोय कही तसथावर उवर्जति ।।
परिहरि मांसद्ध अरि जिय पंचेहि शासी एसेहि ।
तस्तु वि थावर धाइही सम्मोछिय यदु होइ ।।
अनुवाद-हे भव्यजन मद्य को त्यागो जिससे मति विपरीत हो
जाती है । वह हीनकुलवालों के योग्य कही है। उसमें बम और स्थावर
जीव उत्पन्न होते हैं।
रे जीव, मांस का परिहार कर । वह पंचन्द्रिय जीवों के नाश से
प्राप्त होता है । उममें भी प्रस, स्थावर व सम्मूर्छन जीव बहुत होने हैं।
दोहा नं २८ र २९ के बीच क. प्रति में-
चउप इंदिय विणि छह अट्टह तिषिण हचंति ।
दह चडरिदिय जीवडा यारह पंच हवंति ॥
इसमें जीवमेदों की संख्या दी है। इसके लिये ' तत्वार्थाधिगगसूत्र
देखिये।

परिशिष्ट
-
दोदा नं. ३६ और ३७ के बीच क. प्रति में-
उक्तं च-सामान्यतो निशायां च जलताम्बूलमौषधम् ।
गृहातु चैव गृखन्तु नैव ग्राह्य फलादिकम् ॥
यह दोहा नं. ३७ के भाव की पुष्टि के लिये अन्य अन्धसे उदृत
किया गया है।
दोहा नं. ७६ और ७७ के बीच भ प्रति में--
भरहे पंचमकालहिं ण स्सणी महव्ययधारी ।
अस्थि अणुब्वयधारी कोहिहिं लक्खेतु कोई ॥
अनुवाद-भरतक्षेत्र में, पंचमकाल में, श्रेणीबद्ध महावनधारी (मुनि)
नहीं होते। व्रतधारी भी लाखों करोड़ो में कोई होता है।
दोहा नं. १८१ और १८२ के बीच के प्रति में-
जिणु पहावइ उत्तमरसहिं सकरअम्मभवेहि।
सो नरु जम्मोवहि तरहि इत्थु म भंति कोहि ॥
जो घियकंचनवण्णड जिणु पहाघद धरि भाउ ।
सो दुग्गइ गइ अयहरइ जम्मि ण दुक्का पाउ ॥
दुद्धे जिणवरु जो ण्हवइ मुत्ताहलघवलेण ।
सो संसारि ण संभवइ मुच्चइ पावमलेण ॥
दुझाडाढि उत्तरइ दडपड दहिउ पडति (तु)।
भवियहं मुच्चइ कलिमलहं जिणदिट्टर विहसतुं ॥
मन्वोसहि जिणण्हाहियई कलिमलरोय गलंति ।
मणपंछियसय संभवहिं मुणिगण पम भणति ॥

सावयधम्मदोही
अनुवाद-जो जिन भगवान् को शकर और आम्रकै उत्तम रसी।
नहलाता है वह नर जन्मोदधि को तरना है इसमें भ्राति मत करो
जो कंचनवर्ण से जिन भगवान को भाव धारण कर
नहराता है वह दुर्गति गति को दूर करता है और जन्मभर उसे पाप
नहीं रगता
जो मुत्तापल के समान धवल दूध जिनपर को स्नान कराता है वह
संसार में उत्पन्न नहीं होता और पापमल से मुक्त होजाता है।
दुध की धार के पश्चात् दधे पडता हुआ तथा जिन भगवान्
को देखकर प्रसन्न होता हुआ भव्यों को पलिगल से मुक्त कर देता है।
सावधि से जिन भगवान् को गहराने से परिमल के रोग दर
हो जाते हैं और सक्डों मनोवाञ्छित सिद्ध होते है। ऐसा मुनिगण करते हैं।
घोहा नं २०६ और २०७ के बीच अप्रति में-
पारंभर पहरणाइयइंजे सायय जि भणति ।
दसण नेह विणासियउ पत्थु ण काय मंति ॥
(यह दोहा न. २०४ से मिलता है)
हा न, २२३ और २२४ के बीच प्रति में-
जो जिण सासण मासियउ सो मई कहियउ सार ।
जो पालेसर भाउ करि सो तरि पापा पार ॥
पटु धम्म जो आयरह चउवण्णदं मह कोह ।
सोणरणारी भव्ययणु सुरयइ पाया सोह ॥

परिशिष्ट
काई यहुल्लई झंसियई तालू सूपर जेण ।
यह परमस्वरु चेर लइ फम्मरपउ हुइ तेण ॥
भव्चयलग्गा सुवयण सुग्गइ गच्छद तेण ।
जह दिविउ भवगयह कहिउ ण कियउ तेण ॥
अनुवाद-जो जिनशासन में कहा गया है वही सार मैने कहा है।
जो भाव करके इसको पालेगा वह तैर के पार पावेगा।
इस धर्म का चतुर्वर्ण में से कोई भी जो आचरण करेगा वह नरनारी
भव्यजन मुरगति पावेगा।
बहुत प्रलाप करने से क्या जिससे तालू, सूखे । इसी परमाक्षर को
चिरकाल तक लेओ जिससे कर्मक्षय होवे ।
भव्यों के जो सुवचन है उनसे मुगति को जाता है। जिसमे भवगति
को देखना पडे ऐसे क्थन को नहीं करना चाहिये ।
दोहा नं. २२४ के पश्चात् क प्रति में-
इय दोहापद्धवयधम्म देवसेनै उपदिष्ट ।
लहु अक्खरमत्ताहीयमोपय सयण समंतु ॥
अनुवाद-इति देवसेन द्वारा उपदिष्ट दोहावन व्रतधर्म | लघु अक्षर
माना से हान जो पद हों उन्हे सजन क्षमा करें।

शब्दकोश इम कोष में सज्ञायें विना विभक्ति क तथा क्रियायें यथाप्रयोग सम्मिलिन की गई है और उनके माकृत रूपान्तर दिये गये है। जो सस्कृत शब्द हिन्दा म उपयुक्त नही हाते उनके हिदा रूपान्तर या समानार्थ शद दे दिये गये हैं। जो शद कईदार एक ही अब में आया है उसका एक ही दाहा नबर दिया गया है। । निम्नलिखित सकेताक्षरों का प्रयोग रिया गया है - पुरव, म मराठी मार - मारवाडी, हेम - गु - गुजरात हेमचन्द कृत प्राकृत व्याकरण अ आदित्त - अतिदान, १७२ अइदूरझिय - अतिदूरोक्षित, १७१ अक्खमि-माध्यामि, कहताह १ अक्खय-अक्षत, १८५. अक्खिय-आख्यात, १७८ अगालिय- अगालित, विनाछना, अचेयण - अचेतन, २१८ अचर- अचयति, पूजता है, १८५ अच्छउ आस्ताम्. दूर रहे,३. - अप, आज, ८८ अज्झवसाय-अध्यवसाय,१२२ अट्ट-अट, आठ, २. अट्ठम - अरम, पाठवा, १५ अट्ठमि - थटमी, १३ अणतारिय-अ+सुवरित, ५६ (नुवरी- फिटकरी, म तुरटी, alum) अगाह - अगाध, १८६ अग्गि- अग्नि, आगी, ३९ शब्दकोश ७३ अत्यमिय - अस्तमित, सूर्यास्त, अणस्थ - अनर्थ, ४८. अणा अन्याय, १४४, अणवोल्लिय - अनुक्त, विना बुलाया,११५. अणायतण - अनायनन, (गुरु, देव, कुशास्त्र, तथा इन तीनों के पूजने वाले ये छह अनायतन पहलाने है.) अणियारिय - अनिवारित, १२२ अगुमइ - अनुमति, १६. अणुराअ-अनुराग, २.. अणुचय - अणुजन, ५९ ( हिंसा, चोरी, इल, कुशील और परिग्रह इनका गृहस्थ के सघने योग्य अणुरूप त्याग को अणुव्रत कहते है) अणुसरहिं - अनुसरन्ति, अनुस- रण करते है, ११७. अण्ण- अन्य, ३५. अपणा अन्याय, १४५, अण्णायपवित्ति-अन्याय+प्रवृत्ति 4 अपत्त अपान, ७८. अप्पण आत्मन,अपना,८४. अप्पणिय- आत्मीय, अपनी,४६ अप्पत्य अपव्य, ४१, . अप्पिय - अर्पित, ८४. अभयदाण - अभयदान, १५६. अमिश्र - अमृत, २ अमियघड - भगृह घट, १६८. अमियसरिस अमृतसदृश १७८ अयाण -- अजानत्, अजान १५५. अरहंत - अहंत, ४ अलिय - अलीक, असत्य, ६१ अलिय - अलि (भ्रमर), अलीक (असत्य), १५३. अवमणि - अवगणय, गिनो, २. अचर - अपर, और, ११९. अवस अवशम्, अवश्य, ३९ अवसि- अवशम्, अवश्य, ... अविण - अविन, पार, १०.. अविरय - अविरत, व्रतरहित, ७९ असक - अशक्त, १६८. अण्णुवाट्ट - अन्य+उपदिष्ट, २४. अत्तागम -झाप्त + आगम, देव और शास्त्र, १९.

सावयधम्मदोहा - असि आ उसा- अहं ,सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय, खाध, इन पच परमेष्टी का अल्पाक्षर मन,२१४ असेस - अरोष १६५ असोअ - अशोक (वृक्ष), ११ अह - अथ, २६ अहय क्षथ वा,६ अहम्म - अधर्म अधर्मी, १०१ अहाणअ-भाभाणक, महाना,२४ अहिलसह - अभिल्पते, इच्छा करता है, ४२ अहिलसिअ अमिलपित, ३७ अहिलास- अभिलाप, ५१ अंजणगिरि- अजनगिरि २९ अतरि - अन्नरे, अन्दर, २१ अधार अषकार,६ अंब - अत्रआम, १६.. आयह - एषाम्, इनके, २२ आयास आकास, ४ आरत्तिअ - आरानिक, आरती, १९७ आराहण - आराधना, १९३ (भगवनी भाराधना नाम का प्रथविशेष) आयर-आयाति, आवे, ८८ आवग्ग- अारून, बडा,१४८. आयनि-आया ता, आती, १४५ आसागय - भाशागत, दिशाग मन, ६६ आसाय - आस्वादित, २१. आसि आसीन्, १५६. आ ३ दछिदिय एकालिदिन, ११ इक-एक, ४३ इसस-एकश1, २१६ इच्चिय -३१, १.. इच्छियलद्धि - P+रधि, " इणि- अनेन, इस से, २०५. इत्तिय - इसन् , इतना, १.७ इत्यु - अत्र, इसमें, . इपर-इतर, भय, ३८ आड आयानु, अवे, ५० आउसत-सागुम् अत, ७३ आमिस आमिर, मास, २८ थायरह दाचरति, भाचरण करता है,.. - शब्दकोश उत्तारनि उत्तारयन्ती, उतारती इंछिय - इया, इच्छा करके, ६३. इंदियगाअ - इन्द्रिय+ग्राम, १४० धण इन्धन, २१९. उत्तिडअ - उत्तरीय, वस्त्र,.१५१. उदिट्ट - उद्दिष्ट, १६. उप्पजद- उत्सयते,उपजता है १७१ उप्परि- उपरि, ऊपर, १२६. उप्पहिं - आत्मना, उपतकर ८४. उपाडिअ - उत्पाटिन, उपाड़ा, उकिट्ट - उत्कृष्ट, ७४. उग्गमद - उदच्छति, उदय हो, उग्घाईत - उद्घाटयत् , उघा- हने बाले, १३५. उज्जल- उज्वल, ११३. उजोरजद - उद्+ायते, उजाला किया जाता है, १८४ उन्जोयह - उद्द्योतयनि, उजाला करता है, १९६. उट्ठा उत्तिष्ठति, उरता है, ३९ उद्यावह - उत्थापयति, यता है, - उम्भासह - उद्+भासयति, उपल करता है १९६ उम्मग्ग - उन्मार्ग, १४५ उर - उरम्, उर, ६. उरहाविअ- अदित, आला (गीला) किया, ३९ उयइट्ट- उपदिष्ठ, १६. उपस - उपदेश, ६. उपएसिय • उपदिष्ट ८. उपयरई - उपकरोति, उपकार करता है, ११९ उययारहि - उपकारय, उपकार कराओ, ११९. उपवास- उपवास, १३. उपवासम्भास-उपास+अभ्यास ११२. उट्ठिय - उस्थिन, उटा हुआ,१५३. उणाली - शावविशेष उण्णय - उन्नति, ११४. उत्तमपइ - उत्तमपदे, “पदपर, ११४. उत्तार- उत्तरण, उतार, १९२.

सावयधम्मदोहा एवड - एतावत् , इतनी १७९. एवंविह एवंविध, इस प्रशर, १८.. पह उपसमइ उपशाम्यति, शांत होता है, १४१. उवहि- उदधि, २०७० उहिणीर - उदधिनीर, ८९. उपाहवेल - उदधि+वेला, १९५ उच्चरह - उपकरोति, उवारता है, या,उद्वर्तते, यचता है,१२१ उय- उभय, दोनो, १३ उंदर- उंदुरु, मूपक, १५१. एपा, यह, १७९ एप, यह, २४. - ओ ओसहदाण - आपदान, १५७ ओहइ - अपभ्रश्यते, टूटना है, . ऊसर - ऊपर, ऊसर (अनुपजाऊ) ए - एते, ये, १८. पउ एतत् , यह, २२४. एक,१०. पत्तड एतावत् , इतने, ५३. एयवत्थ एकवन, १७ पयारस एकादश ग्यारह, १८. एयारह - एकादश, ग्यारह, ९ एयारहम-एमादशम, ग्यारहवा क क कृत, क्यिा, ८३. कउ - का, क्या, ६८ ककसवयण-पश+वचन,१४४ कञ्च-काच, काच, २. कचासण अपनाशन, कवा भोजन, १४ फन - कार्य, २१ कट्टिय - वृत्त, काटा गया, १५.. फट्ट -काट काट३८. कट्ठडा- 2, ११४. फडूंत - त्,ि पाइनेगरा, ९९. फड़िय - भूटा, पाटा या सींचा, १२१. - परिस- ईदृश, ऐसी, १७५.

शब्दकोश ७७ कणय-चनका २११. फणि? - कनिष्ठ, रासे छेदा ७९. कण्ण - क, कान, ११८. कत्तरि- की, वैची, १७. कद्दम - कर्दम, कांच, १५३. कप्पड - कर्पद, कपड़ा, ५६. कप्पयर-कल्पतरू,९७ कप्पयर- क्त्पतरु, २१२. कम-क्रम, १२. कम्म - कर्म, १०९. कम्मक्खभ - कर्म+भय, २१० कय - कृतं १७. करई - करोति, करता है, १८१. कर - रोमि, करू, ८८. फरड - शाकविशेष परडा, ३४. फरहि - कुरु, कर, करहि - कुर्वन्ति, करते है, ५५ करालिय - करालिन, १८३ करि- कुरु, कर, २२. करिणि - करिणी, हस्तिनी,१२३ करेइ - कुर्यात्, करेगा, ६२. कलंतर का+अन्तर, एक भाग ११५ कलिंग - पलविशेष, क्लीदा, ३४. फलाण- क्त्याण, ८०. [ तीर्थकर के गर्भ, जन्म, तप, शान और निर्वाण के उत्सव पंच कल्याण कहे जाते हैं।] कल्लि - श्व , क्ल, ८८. कवण का, कौन, ४०, कवित्त- कवित्व, १४२. कवेडअ - कपट, ६२. कस-क्श, ७. कसाय क्पाय, ६१. फह-कथा, ४.. कहिअ - कवित, ९. कहिधि - कथयितुम् ,कहने,२०१. कहिं - पुन, कहीं, २१५. कंज-(तत्सम), कमल, १२५. कंजिय - काजी, (Butter. milk,) १३३. कंटश - केटक, १४५. कंदि-रून, शुष्क, सूखा, १५५. का - काय, शरीर, ११३. काई - किम् , क्या, ६२. काणण - कानन, वन, २३. कामकह-काम+स्था, ४५, कामिय • कामिक, २१२. - - सावयधम्मदोहा फायउ - कापि, यदि भी, १८९. काराधिय - कारित, राई, १९२. कारियर - कार्यते, कराया जाता है, २४, - कालत्तय पार+प्रय, ५. कातु 'वस्थ, क्मेि, १७८. कि-किम् , क्या,६ कि- कृत, क्यिा, ३७. कित्ति-कीर्ति, १४२. कित्तिश्र वियत् , क्तिना,१८३. कित्ति पियत्ता, क्तिनापन, कुभोयण - कुभोजन ९३. युमुयाणदिणि - कुमुदानन्दिनी, १९९. फुलयर-फुलपर, १६६. कुसियार - कोशकार, कुसियारा, (रेशम का पीडा) १४६. कुसुमंजलि - कुमुमाअलि, १९१. कृड-बूट, ४९. कृडतुला- कूटतुला, कपटानराज, १६२. वपणय - कूप सनरु, १.१. कृपय -धूप+क, कुआ, ९९, फेम - किम्, से, १३८. केपदणाण - विज्ञान ( रा. ना)५ कोर-चोऽपि, कोई, ६. फोीण - कोपीन, १५. कोहमल-जोध+मल, १११. किम - किम् , मे, ५६. किमि - किम् , से, ६५. किय - कृन, छिया, १५५. फिलेस -केश ४८ किविण - कृपण, ८९. फोरर - कियते, किया जाता है,२४, कुडिल्लिय - कुण्ड, ११२. कुटुंय- पुटुम्ब, ४८. कुहि - कान्ति, वरनी, २११. फुपत्त-पुपान, ८१. कुभोभ - कुभोग, ८१ प - क्षय, १९. बडभुस-धारा+युष, पारामुसा, पटहड-शिला+घटा, चहानगमूह म. सरक-चहान, १५४. .

शब्दकोश ७ ९ राधा - मादति, साता है, ३२. खद्धई-खादितन, खानेमे, ३६. सम-क्षम, योग्य,७ खंचहि - कर्ष, खेंच, १३०. खंडिय-संहित, काटा, २१९, संडिवि - खंडयित्वा, वाटर, १५२. खंधार - स्कधावार, सेना, ५. खाइ- खादति, साय, २८. खाण-खानि, ४८. खार क्षार,खार, खारघड क्षार+घट, खारा घड़ा, - गअ गत, गया, ६४ गच्छद - गच्छति, जाता है, ४६. गडायरअ - गर्नक, ५८. (a table for playing dice, Apte Dic.) गणिय - गणयित्वा, गिनार,२०५ गमणट्टिय - गमन+स्थित, १९२ गय-गत, ३ गय-गज, १४५. गयण गगन, १३२ गविणि?- गवि+निछा, इन्द्रिय+ आसक्ति, १६४. गह - ग्रह, १९८ गहिय - गृहीत, १४. गहिर - गभीर, गहिरा, २१४ गंधोअ- गधोदक, १८४. गाइ - गौ, गाय, ९२. गाल - गल, मछली पकड़ने का काटा, १२४, गालिअ - गालित, गाला या छाना हुआ, २६. गिण्हइ - गृण्डाति, गहना है,१६२, गिर - गिर, गिरा, वाणी, १७८. सिल्लिय - कालिका, खिली, १०६ सीरसमुद्द - क्षीरसमुद्र, १६९. खुट्टइ - खुज्यते, खुटै, १०८, खुडिय - खुडित, खोटे गये,१५२ खोत्तय-क्षेत्रिता, खेती, ६४ खेती - क्षेत्रिता, खेती, ५५. खेरि-द्वेष, १७५ वह - क्षिपति, खेता है, १८९, खोज- अन्वेषण, खोज, ८४. सोडय- खुडित, खोड़ा लगी, १४८ सावयधम्मदोहा घरयर - गृहकर, पर बनाने वाले, गिहन्थ - गृहस्थ, ८७. गिंदुअ-पंदुक, गंद, १५३. गिंभ- ग्रीष्म, ६९. गुणवय -गुणवत, ११ (दिशाओं व देश प्रदेश में जाने का प्रभाग, तथा अनर्य दण्ड का त्याग, ये तीन गुणनत कहा - घल्ला - लिपति, पालना है,६९. घंट-घंटा, १९९ घाअ घात, पाव, (.. घाणिदिय प्राणेन्द्रिय, १२५. घाय पात, ७. घारर - मूच्र्छयनि, ग1ि करती है, ५०, म. घेरी मूडी. घिय -११,पी १२. घूयड - गुग्गुल, शुग्धू, १०५. गुणवंत - गुगवा. गुणवान,१४१. गुलिय - गुलिन, गुटीला (मोटा) च चाधि - प्यावा,चयार मा एमग गुंजारिय - गुंजारित, गुंजार, २१५. गेय - (स्सय), गीत, १२५. गेहावरि - गेह+उपरि, १.२. गोत - गोल, ४८. गोधहि - गोपय, गोप या गुप्तररा, १२१. घ घडंति - पनयन्ते, पट्युफ हैते चउगा - चतुर्गन, ४. चउरथ - चतुर्थ,.. चउदसि - चतुर्दशी, ३. चउरद्ध- चनुष्य, (पतीय),२. चउविह- गर्षिध, १५८ चउसहि- चतुःपट, चौगट, १७१ चाम-चपिन्, चम, १७७. चश्मा - याति, समता.. चधा - अर्चयति, पूरा ८४ चढणडदि-परतुति, सह- फदात है, 1८४. घम्म - धर्म, पाम, १.३. घयपय-तपयम, पो दूध, घर - गृह ..

शब्दकोश घडापडिवि- परिपूर्ण, तर प,१२४. चढहिं - आरोहन्ति, चाले है, चिहुर -चिप, श, १५. चिंध-चिव, पत्र, २... घोज-आश्चर्य, चीज, २... चोरडा - चार, चोर, ७५ चतारंभ-स्यक भारम्भ, बार- मगत्यागी, १५ चम्मच्छन- चाचादिन, ११. चम्महिपुर - चर्म + अधि+पुरा, चयारि- पारि, चार, " चरिश-चरित, १५ चरित्त- चरित्र, २१४. घरण-(रमम), धरण, ११ परिय-चरित, १५. चलन- मला, गलनेवाग,४५ घपदि-मीद, पास (धातु-बर) छट्ठय - पाम, एटयां - एहिय - दित, गेड़ा, १९. छणजामिणि - यामिनी, पूर्णिमा रात्रि, १९९. छणससि - क्षग+शश, पूर्णिमा चद्र, १७.. छन,१७७. छद-पद.२. छा-एर्दय, खेडी, १७५. छह-य, रोड ६५ उडिय-दित, मेरा, २५ छडर-येर, मेरे, ९१. टिम-सीपत्रम्, यह चंदाल- यााल, . चंदपंति - परमन (मी), टिस-एर तुभा, ११. हुर-पति,५० चदण-परन, १५.. पंदोष - चमेरा, देसा, १५८, चाभ-पग २५. याददि-सपना५९ चिराउस-चिरथुम, रिययु. प-ड. ज मा-२९, २५ ८२ सायपधम्मदोहा जग - जगत् , जग, १९४. जणाण-जननी, १६५. जममड- यग भद, ८. जम्म-जन्म, १३ जम्मुच्छय - अन्मोत्सव, १६८, जलहि - जलधि, ८५. यम्, यस, ४० जसु - यस्य, जिसका, ५. जह - यथा, जैसा, २१. जहपण - जपन्य, ४, जाहिं - यग्र, जहा, ५४. ज-यन् , जो, ४. जति - यान्ति, जाते है,८, जैपिय- अल्पित, कथिन, १०४, जंदीम - जम्बूदीप, ३०२, जाम-यातगया, ५८. जाउ-यात जाय, २.५. जाच्चंध-जात-अंध, २.९ जाण जाण-जानाहि, जानो, २.५. जाणि-जानीहि, जानो, १५. जाणिजद-शायने,जाना जाता है, जाहि - यासि, जाय, २०४. जिन जीब, ५९. जिणणाह - जिननाथ, १८६. जिणतित्थ-जिनतीर्थ, ११७. शिणहर-जिनगृह, १९९. जिणिंद - जिनेन्द, १९०. जिणेसर - जिनेश्वर, १७२. जित्त - जित, जीरा, ५). जिभिदिय - जिलेन्द्रिय, १२.. जिम - यथा, जैसे, २, जिय - जीब, . जियगहियतण - मिहा+गृहीत यान, १.२. जिययह-जीवधि, ६.. जिह - श्या बरो, ३. जीरियलाइड - जीवित + लाभ, ११. जीहडी- निहा, जीम, १२. जुग - योग्य, ३१. जुत्त-युक्त, 1.. जूध-पूत, वा, जूय - युग, कुँवा (Yoke),.. जे- ये ओ, २.. जेण-देन, जिगने, २, जापर - भारते, होता.

হাবীহ ८३ डहर - दहति, ढा देता है, २३ डाल - शाखा, बाल, ६१९५. हुए,११४ जम-यथा, जैसे, १३४. जोडिय - योजित, जोडे जोयहि - पश्यन्ति,जोहते है, ११८ झ झायहि - ध्याय, ध्य न कर,१०८ झुणि - घनि, १७८. दिल्ल- शिथिल, दीरा, १२९ दुकह - दीयते, आये, ६.७११२, १८७. ट टालद- टारयति, मन करता है, १५१. टिका - टोरा, १९३. टेति-रिक्ति, पदरते है,५४, टाअ-स्थान, टाव,१६९ टाइ-तिनि, टदरता दे, १९७ ठाण स्थान, १८. टाइरर - सिष्टति, टहरता, १३.. टिभ-स्थित, १३२ टिय-स्थिा, २१४. - ण न, १०. ण - नु, ननु (निश्यार्थवाचर अन्यय)४, १३५,१४२, १९२, १९६ पइसारिण नदी+सारण,१८६. णच्चइ - नृत्यति, नाचना है, १६२ णडप्रेसण नट+प्रेक्षण, परस तमाश, १६२ णमकारपिणु - नमस्कृत्य, नगा करके, १. मिय - नमन, नत्री हुई, ५५. णय-नत, २२३. गयणापंदयार नयानन्दवा- रिणी, १७९. पर-गर,.. परत्तयण-मरत्व, २२०. परय - नरक,४२. णयग नरकगनि, १६१. टन - दापमान, दाते हुए,५२ मरदि-परयसि, भरता है, 1५९. उल-दल, पीपल आदि नीत - पन, १३६.

सावयधम्मदोहा णयह - नमति, नवता है, ११६. जयम - नवन, नवम, नामां, १५. -ननु, २५. शंद-नन्द, आनन्द, ११५. गंदीसर- नन्दीश्वर (द्वीप) णाही - नहि. म. नाही, 11. णिकमण-निपमण, १६९. णिग्गय - निर्गत, २... णिञ्चल - निचल, ५८. णिच्छाभ-निसाय, निष्प्रभ, - जाअ-न्याय, ११३. माइक-नायक,५१. माण जाणुगम - सानोदम, १७.. णाय-नाग, १७७. णायकुमार-नागामार, पु, . जायदत्त -नागदत्ता पु.११ पारि-नारी, १४. णाय-नी, नाव, १५४. विय - नाविक, १५४. पास नार,१८७ सर- नाशयनि, ना करता है, णि?- निष्टा, ५५. णिट्टडी निष्टा, ११५. णिण - निर्घन, १४. णिफल - निपल, ५५. जिम्मल -निमंत्र, . णिय-निज, २१८. गियर - निकर, सह, १९४. णियल - निगड,मंगला, २१. णियलंकुम - निम:+अंश, १२३. णियसति-निजाति, ११. गिरगल-निर्गल, ११५. पिरत्थ-निरर्थ, ३९. पिरारि-निधयेन, १. मिलन-निलंच, १५.. णियहर निपाति,मिरगी, 1५४. पियनि-निरशि, मरते हैं, संति - नश्यन्ति, भाग जाते है, संनि - नसन्ति, 2 होते, ११८. तदिन, १४. णियदिप - नियमिन, ..

প্রায় ८५ - णियसइ - निवसति, बसता है, पहाविजइ - साप्यते, महराया जात है, १६८. णिवारहि - निवारय, शिवार, पहाविय-मापिन,नहलाया गया, १२६ ૧૬૮ णिवास निवास, १४३. पहाविय - स्नापयित्वा, नहलाकर, णिचिट्ठ- निविष्ट, बैटा, ६१ 1८२ णिवित्ति-नित्त, १०. त णियाण - निर्वाण, ५९ तपस्, तप, ७ णिव्याह - निर्वाह, १४९ तउमडय - तपोमदिन, ३१ णिसेणि-नि प्रेणी, नसे, ५. तग्गथिय - तद् + प्रन्थि, गार, णिहाण - निधान, ८०. २२०. ले जाना हुआ,८५ तच्चाइय - तत्व+आदिर, १८ मिति - नयन्ति, ले जाते हैं, ५९ Vतडत्ति - तर इति शनि, तद् से, मिदिअ - निन्दिन २१८ णीर-नीर, पानी, २६. तण - (सम्बध सूचर), २.५ पारस्प - निश,७७ तणु - तनु, शरीर, १.५. णेह - मेह, १५१ तमहराणि - तमोहारिणी, १९९ ऐवज नैवेध १८७ तमिण - त्ममा, तम रो, २ पहवणाइय- मपनादिर, २०४, तर -- तरति, ररता है, १३४, पहविजद मप्यते, नहलाया तरिहदि - तरिष्यसि, रेण६५ जाता है, १८१ तरड - (तत्सम), डॉगी, १९२ पहाण -सान, १३१ नत्य - तटाग, तलाव, १७. तवयरण- तपकरण, ७३ पहावा - सापयति, नहाता है, १८१ तम - स (जगम जीव ), २२, णित- यत्, ६ सादयधम्मदोहा त्रिससे १.१ - रत्, ४४ तसु - तस्य रिसके ३२ तह्मा तस्मात्, तहिं ता रहा, ५४ त रिसे १९ तपोलोसह ताम्बूल अंपय ३७ ता-ताई से ३९ ताइ-तानि ते ५९ ताटि-ताडित १५३ तामच्छउ तावन् भारताम्, તો तिह - तथा, तैसे, ३ तिहिं मि-अपि तीनों में, १२ तिहिं - निभ्याम् तीन से, ७४. तुट्ट - घटित हटे, १५२ तुट्टा -प्रत्यति टूटता है तुडइ - त्रुप्यते, विग- जाता है १३३ तुलाइय - तुला+आदिक, ४९ तुवड - तुम्बाफल तूबा ३४ तोडइ-नोटयति तोटती है २१३ तोडहु - नोटयितुम् , ताडने को - तारह परयति तारता है ८४ तारायण रागण १९८ तार विशेष १.३ तालु- त्स्य ५ ताह -त्पम् तिनके ३० तिजा तृतीय है ना, १२ तिडिक - पुलिंग तिलगा २३ निष्णि - तान, २. तित्यु-तत्र त्हा ११९ तित्थर तार्यकर, 10 निरिय तिर्यर पशु १७५ तिच्य - तिला १९७ तिल्ल - 17 ३२ गिरफसाय - तानसपाय १११ तोस-तैष २१० तोसिस - तोपित, २१० थ थकई- तिष्टीत, टहरत है, ५३ थरदुक्य स्थल+दुख १०४. थाम -स्थामन् बल,१८३ धिपति - तृप्यति तृ त हते हैं या विगर "त १७ ( हेम ४, १३८ १७५) धिर- स्थिर, २०० थोडउ चि-स्तोत्रमपि, योग भा, २३ धोडिय स्तोका घोडा, १३३ योवड - स्तोर, थान ..

शब्दकोश ८७ द दट्ठ-दर, दशा हुआ, ६३ दम्म - दाम, एक सिका, ११५ दय-दया, ४.. दसम- दशम, दशका, १६. दहिमाह -- दधि + मयित, दही मही, ३५ दसण - दर्शन ( सम्यग्दर्शन, धर्म- श्रद्धा), २० दसणसुद्धि - दर्शन+शुद्ध, ३२. दाण-दान, .. दाणचण - दान+भर्चन, ११५ दाणघिय-दान अधिप, दानयक्ष, ८२. दायार- दात, दाता, ८५ दारिय - दारिका, लाडी, ४५ दालिद्द - दारिद्य, १८५. दालिद्दड - दारिम, ९३ दालिदिय - दरिदिन्, दरिद्री, १४८ दावाणल-दावानल,०१४. दिना- दीयताम् , देना चाहिये, दिट्टि -2, ६३ दिविविस - दृष्टिविष (सर्प विशेष), ६३ दिणयरस - दिर+शन, सी सूर्य, १.५ दिणेस - दिनेश सूर्य, ६९ दिण्ण - दत, दिया हुआ, ८३. दिण्णइ - दीयने, दिया जाय, ८१ दिति - ददति, देते है, १९. दिवि - (तत्गम) स्वर्ग में, १११ दिवंबर - दिव्य+अम्बर, २०३ दिस-दिशा, ६६ दीप-दीप, १८८. दीवड - दीपक, ६. दीसह-दृश्यने, देसी जाती है ८५ दुकर- दुष्पर, ६४. दुकिय - दुष्कृत, १३ दुग्ग- दुर्ग, दुर्गम, १४८ दुजण - दुर्जन, २. दुद्दभरण-दुष्ट+भरण, ६५ दुण्णिसयई - द्वि+शन, दो सौ, दुत्तर- दुस्तर, २१ दुत्तरतरणि ~ दुस्तर+तारिणी, दिट्ट-टा, देसी गई,५५ পাখানা - ध धण-पन,३८. धणश्य-धाम, दुबल -दुत, ३५ दुरिभ - रा, पाप, tan. दुलह दुलंग, दुविद - विविध, ६. दुध्ययण - दुवंगन, दुद-दुम, १२५ दुदकम्म-शुप,.. इंदुहि-नि, ४५ दूरि - एम् , दर, २२ दरिदलिय - सुनित दुर्गाय - मन, १५८. दुमा-तिरसिया, धणया-पनग, १.५ पणिप-पनिक, ४. घण्ण - धान्य, ६४. भय110 धारिय - Rs. मग पो धम्मार - HAR धम्मधेषु - Him, m धम्मंघिय - instani मित्रा - भूपी, हा होणे धम्मायन • Hir पाप-पर, गैस . दे:- दे, ५. . पा1 गरम - दरम्म, देशमा १९ दो-दो, २५० दोम-११.१९. दोगदा- धरणिंद - प. घपला,५ धपाटाणा 110 rrr-(RTI). भुनियाय -gort, AR - शन्दकोश धूम-धूप, धुआ, ३५. धूय - धूप, १८९. पडिफूल-प्रतिकूल, १०४. पडियद्ध-प्रतिवद्ध बांध लिया, प पाटायर - प्रतिष्ठापयनि, प्रतिया कराता है, १९५ पहण्णा - दीयो, दिया जाता है, १२. पसंत-प्रविशन्, प्रवेश करता हुआ,४४. पई-तुभ्यम्, तुसको, ११२ पई - वया, तूने, १५५ पउम-पप, कमल, १८. पउमिणि -पक्रिनी, २.३. पउर-प्रवर ( उत्तम), या, प्रनुर (बहुत १४. पपस -प्रदेश, ५४. पकासण पारान, ३१. पथराउ-प्रसा,१३ पच्चूस- प्रत्यूर, प्रातकाल, पडिम- प्रतिमा, १९२ पढम-प्रथम,... पदिय- परिन, २२२. पणास-प्रणाश, ५४, पणासा-प्रयाशयत्ति नष्ट करती है, १८३. पत्त-पात्र,३. पत्त-पत्र, पत्ता,४५ पत्त पत्तामरसंघाम-प्राप्त समर+ संपात, देवों का समूहमाया, प्राप्त, ४ पतुत्तम पत्रोतम, 101. पमणिम-प्रमाणित, कहा गया, - पमाणिजा-प्रमण्यते, कहा जाय, - पहोलप पोच, कपरेन १, २१.. पति - पन्ति, पाने, ५७, परिभ-पति. पमाभ पमाण-प्रमा, ५. पमुह-प्रमुग,४७. पय-पर,१८१. पप पहिरम, सापयधम्मदोहा परिपालत - परिपालया, पालने वाला,. परियण - परिजन, १२०. परिहह - परिहरति, परिहार करता है, परिहरहि - परिहर, परिहार कर, ७७ पयच्छइ - प्रयच्छति, देनी है,९२ पयडक्सर प्रकट प्राकृत चा+ अमर १ पयपोम- पद+पम, २२३. पयपध-पद चन्ध, २११ पयगडा-पतग, १२६. पयास-प्रयास, ९७. पयासिभ - प्रकाशित, २ परणिग्धिण - पर+निपुण, बडा निर्दयी, ४६ परातिय - परस्त्री,५. परत्त पर+आत्म, दूसरों का १०६ परिहार - परिहर, परिहार कर,२० परिहरिय- परिन, २४. परिहोइ - परिभवति, होता है, परोहण -प्रवहण, नाका, १३४ पोहइ - प्ररोग्यति, पाता, मात्मा, परदव्य-पदव्य, ६२ परमहिल-पर+महिरा (घी)६३. परमाण-प्रमाण, ६६ परयार-पर+दारा, ५१ पराई - परकीया, पराई, १२९. पराय- परवीय, पराया, १५, परिग्गह - परिग्रह, १५ परिचत्त- परित्यक, ४५० परिचत्तिय - परित्यक्त, ४५. परिणयह- परिपमति, परिणमना पयाण प्रमाण, २७ पवित्ति-प्रवृत्ति, १४ पवेस - प्रवेश," पन्यदिण - पदिन, ६९ पसत्य-प्रशाल, ११७ पसर-प्रमर, पवार, १४. पसरह - प्रसरनि, पसरता है,१८९ परंत-प्रमरत्, पगरता हुमा, पसिद्ध - प्रसिद्ध, १.१. पसु-4], ६४.

शब्दकोश पायपसारण पाद प्रसारण, पाव पसारना, १४९. पारद्धि - पापदि, शिकार, ४७ पारद्धिय - पापर्द्धिक, पारधी, ४६. पारोह - प्ररोह, २... पालि पालित, ६६. पाव-पाप, १०१. पावद - प्रामति, पाता है, १८१. पावमइ - पापमति, १०६. पावहरि - पापहारिणी, १९१, पाविय - पापिन् , पापी, १६५. पावियइ - प्राप्यते, पाया जाता है, यसुमार- पशुभार, १७. पसूइ - प्रसूति, १८५. पहतेअ - प्रभा+तेज , १६५. पहाण-प्रधान, २७. पहिल प्रथम, पहला, १७. पति-पक्षिन् । ७. पंचगुरु - अर्हत , सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय और साधु,ये पंचगुरु या पंचपरमेष्ट्री कहलाते है, पंचाणुव्यय पंच+अणुनत, ११. (गृहस्थों के पालने योग्य अहिंसा, अचीर्य, सत्य, प्रह्मचर्य व परिग्रहप्रमण) पंचुंवर - पचाउदुम्बर, १० (वट, पीपल, पाकर, ऊमर और कटूमर) पंडिय- पाटिल, १५९. पंडुर - पाण्डुर, वेत, 10७, पाअ-पाद, पांव, १४५. पाअ पाप, २०७. पाण प्राण, ५.. पाणि-पानीय, पानी, ८९, पाणिय - पानीय, पानी, १८. पाय पाद, पांव, ११.. पायड-प्रकट, ६. पास - पाश, खेलने के पांसे, ६८. सास - पाश, रन्धन, २१३, पासट्टिय - पार्वस्थित, १७६० पिच्छद-प्रेक्षत, देखती है, १६५. पिड - पिण्ड, ८. पिय--पीत, पिया, २७. पियह - पिवति, पीता है, पिसुण - पिशुन, १५१. पिसुणत्तण - पिशुनत्व, १४४. पिसुणमइ - पिशुनमति, १५.. पिंछइ - परिछिनत्ति, पहिचानना सावयधम्मदोहा ९२ पीय-पौत, पिया, १२. पोट्ट- उदर, पेट, म. पोट, १०६० पुग्गल-पुद्गल, शरीर, २०५. पोहलि - पोटलिक, पोटली, १.९, पुच्छिजर - पृच्छयने, पूछा जाय, पोत्थय - पुस्तक, पोधी, १५९. १२८. पोरिस-पौरुष, १४२. पुच्छिय - पृट, १६. पोसिय- पोषित, ६५. पुज-पूजा, १५९. फं पुट्टि - पृष्ट, पीठ, ५१. फरसिदिअ - स्पन्द्रिय, १२३. पुट्टिमंस - पृष्टमांस, ४१. फलइ - फलति, फलता है, ... पुणु-पुनः ५. फलिहसंकास स्फटिक+पहरा, पुण्ण -पुण्य, २३. पुण्णरासि - पुण्यराशि, २०७ फाटर - स्फुटति, फटता है, १४१ पुत्त-पुन, १२.. पुरिस-पुरुष, १४२. फुट्टिवि- स्फुटित्वा, फूटार,... फुल्लिय- पुष्पित, पृष्टाहुआ, ३५, पुष्य - पूर्व, पहले, १५४, फुलत्याण -पुष्पस्थान, ३४. पुयारिय- पूर्वाचार्य, १२. फोडिअ - मोटित, पोड़ा, २२०. पुंडरिय - पुण्डरीक, एत, १७५. .पूजाइय-पूजादिक, २१.. प पूरदि-पूरयन्ति, पूरा करते हैं, पद्धरण - पद्धेन, बांधने से ६.. पवूल - पर्बुर,बपूर (T विशेष९४) पेक्पद - पश्य, देसी, ५२. पलद्दडा - बलीवर्दल, ".. पेक्सि- पश्य, देखो. ११४, यलिय - वीयम् यली, 1. पेरिम-प्रेरित, २१९. यहिणि- भगिनी, बहिन, ४२. पेसिअ-प्रेषित, २.३. यहुत्त - यह बहुत, २३. पेसिय-प्रदेशित ६२. पहुभेय - बहुभेद, १२.

शब्दकोश . पहुय- पहु+7,बहुन, ४८, बहुवेस बहुवेष, १६२. बंधा-वाधव, ४४ चंधण - बन्धन, ६. यधि-बधान, बाघ, २०८. यंभण - माझण, ७६. यंभयारि- ब्रह्मचारिन् , १५. यारह - द्वादग, बारह ५९. चाहिरउ - पहिर् , बाहिर, ५५. विपिणसयह - द्विशत, दो सौ, २१६ विदिअ -- दिनीय, १५. विहिं - द्वाभ्याम् , दो से, ५४, पी-बीज, ७. चीय-बीज, ४७. यीय-द्वितीय, गुन योओ,११ धुज्झिवि - बुध्या, बूझकर, ७८. बोरि-बदरीफल.बोर या वेर,१९० योलि-प्रूहि, कह, ८८. योलिजर - उच्यते, बोरा जाता है, या युच्यते, डाया जाना भसण भक्षण, ३४. भक्पि - भक्षित, .. भग- भम, भगा हुआ,४६ भजइ-भग्यते, भन्न होता है,१४५. भजति - मन्यन्ते, भा होते है,७५ भणिअ - मणित, कहा गया, १३. भणु - भण, कहो, ५५. भणे- भागेत , कहे, १३६. भत्ति-भक्ति, १५८ भत्तिभर - भकि+भर, ११६. भरद - भरति, भरता है, १०३. भरिअ - भूत, भरा, ८९ मल-भद्र, मल्ल, ६५. मल्लिम - भद्रिमन् , मलाई, १४१, भवाई - (१) ज्या इति टिपणम्, में ५७ ५ भविय- भव्य, ३३. भव्युच्छाहाणि - मण्योत्साहिनी, १९९. भसल भ्रमर, १७.. भंति - भ्रान्ति, ६८. भतिक- भ्रान्तिक, भ्रान्तिकारा, योहि-बोधि, शान, २१.. म भाइय - भावित, २११. भारिश - भारित, भारी, १.१. भफ्र-भक्षण, १२४.

साययधम्मदोहा भासिय- माणित, २८ मिटी - साक्षात्कार, भेद, १४. भिस-विस, दिस (कमल्नाल) भायावाण- भोग + भवनि, भोग- भूमि, ९६. म भुक्पिय - बुभुक्षित, भूसा,१०३, भुवणचय-मुवन+त्रय, १०८. भुंजइ - भुत, भोजन करता है, म-मा, मत, १७५. मह-मति, १.. मइलिज - मलिनीक्रियते, मरा होता है, २९. मइलेह - मलिनायते, मला होता . भुंजाइवि -भोजयित्वा मोगवा कर, भुजिजह भुजीत, भोजन करे, भुंजिवि - भुक्त्वा, भोगकर, २३ भूरि-(तसम) अदुत, १२ भरि - भेरी, १७५ भोथ - भोग, १८६ मोग्गासण-भोग्यजन भोजन ३७. मोय - भोग, ८१. मोयण - भोजन, ३० मोयणिबंध- भोग+निबन्ध, मउडकिय - मुकुटाक्ति, १७४ मउण- मौन, १४३ मउयत्तण - मृदुत्व,१३१ मउलिय-मुकुलित, १७., मग्ग-मार्ग, मग्गइ - मार्गयति, मागता है,४९ मग्गि - मार्गय, माग, ११०. मच्छ-मत्स्य, मच्छ, १२४ - मय, २२ मजामिसरय मद्य + आभिय +त, १५ मज्झिम - मध्यम, ७९ 'मदिल - मादि, मण - मनस, मन, १४, मोयधर - भोगपरा, भोगभूमि, मट्टापन, १३..

शब्दकोश ९५ मणगच्छ-मनाग् + बच्छ, कुछ अच्छा, या, मण+ गच्छ, मत जा, १२७ मण्णमि - मन्ये, मानता ११८. मपिण - मन, मान, (धातु-ना), मान, ६३ मणिय -मानित, २४ मणुय-मनुज, ११४, मणुयगइ-मनुज + गति, १६३ मणुयत्तण - मनुजस्व, ३. मणोरह - मनोरथ, १९.. मय-मद, २०. मयण-मदन,मैन (boe s wax), मंडिय-मण्डित, माडना, २०१. मत मन, २१५. मति - मनिन्, मात्रिक, २१५, मंदकसाय - मद+कपाय,१६३. मंस-मास, २२ माइ - माति, माता, ११० माइणिय - माइफल + निम्ब ( वृक्षविशेष) १६.. माण माणाइय - मान+आदिक, १६२ माणुस - मनुष्य, ५४ माणुसजम्म - मनुष्यजन्म, ९. मारह - मारयति, मारता है, ६३ माहउसरण माधवशरण ( वम तानुगामी व विष्णुभक्त), १७३. मि - अपि, भी, ५९ मिच्छत्त - मिथ्यात्व, १२६. मिच्छादिहि - मिथ्यादृष्टि, ८२ मिच्छामा -मिप्याभाव, १४४. मित्त - मिन, ४४. मिलिभ मिलित, मिला, १९४. मिल्लहि - मुच, छोड, १४४ मिलि-मुच, - मुघ, मेल या छोड १३४ मिस-मिप, १७५. - मरइ - नियते, मरता है, १४६, मरगअ मरकत,२ मरत-नियमाण, मरता हुआ," महइ - महति, पूजता है, १८० महंत - महत्, २३. महारयण महारत्न, २०८ महु-मधु २२ महुर- मधुर, १४२ मंजर - मार्जार, बिल्ली, ४७ मजिट्ट - मजिष्ठा, मंजीटा, ५६ मंड - मण्डित, १७९. - सावयधम्मदोहा 1- मिश्रित, ३६. मृत, पुआ या गरा, १२४. - मुक्त्वा, छोड़कर, ३५ मोतिय - मौक्तिक, मोती, १९.. मोहिय - मोहित, १३६. मुक्त, १५, र रह - रति, २६. रस्खहु - रक्षा रखाओ, ११५ रविवजा - श्यते, रखाया जाय, ९८ प - मूर्स, १०६ - मुव्यते, मुक्त होता है,४४ - मन, स्तुतिकर (धातु प्रा, या मुण्) १.८. -मुनित, हात कथित का, (धातु-गुण प्रतिज्ञाने)५ - मुनीन्द्र, ७९. -मन्येत, माने, १३६ न-मौकिक, मोती, ९१. - मूलित, मूलयुक्त, ३५. मुख, मुह,११८, -मुहु, बार बार ४२ -- महतं, २८ - मूढता, २०. -मुवा, छोडकर, १३० चे-मुत्तवा, मलकर या छोडकर, १३५. लिय -मुरु, ६६. व - मोक्ष, ७४. 1-मुंडयेत् , मोड, १३०, . रखइ रति,स्टती है, १५५. रज, रज, १८३. रयह - रमयति, रचता है, १५१ रवण - रमणीय, ११.. रसंति - रसन्ती, प्रगती हुई, १९९ रहंति - रक्ष्यन्ते, रहते हैं, १३८. रहिअ - रहित, ५. रंध-स्त्र, छिद्र २ राइय-राजित, १५१. रामण - रावण ३,६३. रिति-ऋपि,५३. रक्खड़ा-वृक्ष, स, १९०. रुज्झाइ - रुध्यते, रोका जाता है १४०. रहिरामिस- रुधिर+आमिर,१३ रूव-प, १२६.

शब्दकोश लित्त - लिप्त, ३१ लिहाविय - रेखित, लिखाया, रयासरा- पासक्त, १२६, रेह - रातो, पिराजता, है, १७४ रेहह - राजने, विरानना है, ११६. रोस - रोप, २१८ रोहिणि रोहणा (उपवास विशेष) १८८ - लिहिय - लिखित, २०१. लिहिनि - लिसिवा लिखकर, ४२ लुग्ग- भग्न, जोर्ग, मार लूगा, ल लेद- लाति, लेना है, ... लेहु - लाहि, लेओ (करो) ११९ लोइ - लोके, लोक में, ११५ लोणि नवनीत, मासन, २८, म लोना लगाडिय - लाग, लफनी,१४८ लस्स- लक्षा, लास, ६७ एग्ग-लम,लगा, ३८ रग्गड - लगति, लगना है, ४४ लच्छि- रक्ष्मी, १८७. एच्छिम - लक्ष्मी, १४३, १९१ लद्धि - लब्ध, राम, ४७. लभा - लभ्यते, राम होता है, रभति - लभते, पाते हैं, २०३ लहति - लभन्ते, पाते है, ५६ लहिवि - सम्वा, रेकर, ८० लहु-लघु, २०७ रपड - रम्पर, १२५ लाल-लाला, सर, १४६ रालि - लालय, लाइकर, १२३ रालिम- लालित, १२३ लाह-राभ,१६३ लोय - लेक २०२ लोयण - लोचन, ११८ रोयणि - लवनी, लुमना पा (उस्तरा ) १५ लोह - (तत्सम ), लोहा, ६५ लोह - लोभ, १३४ लोहफजि लोह+कार्ये, लोहे के लिये, २२१ हसुण-रशुन, रहमुन, ३४. 4 परसागर - वैश्वानर, आ सापयधम्मदोहा घरिटु-या, बरसा, ६८. चरत अन्न, जल हुए,२१ चरिय - वरित आ दिया हुआ, घग्य व्याघ्र ८ वञ्चति -- वात, जाने है 1४७ यजिय-वजिन, १५ घड • वर (य), ९.. यड -- मूर्स, १२५. यणयर-वनचर,.. यणसइ- बनधा, १७९ यणिज - वाणिज्य, ४१ यण्णइ - वर्गयति, वर्णन करता है, यल्लह-वगम, १७८. घनिय - उप्त माये, ९४. घस- वरा, १४२ घसण व्यगन, १. वसणणिवह - व्यगा + नियम, घत्य वन, २.३ पय-वचस्, वचन, १४ यय-वन, १८ घसणासत्त प्पसमासक, ५१. घसाइ - वासयत्ति, वसाना है,१९४ घसि- वो, परा में १२० यसिय - उपित, वसा, १५ घरा-घरान पु" पहति - यहाँ त, पहले ६, १.१. घाउम- वाडिस, १८. पछिन्ना-यापते, चाहा जाना +- घयण-वचन, ५ घयणपुस- वचन+अन,.. घयणिट्ट- मन+निय, ५९ चयणियर घनमनिकर, १३९ घयदसण यत+दर्शन, ८३ घयपासा-मनपारा, पासे,५८ घयमायण-प्रत+भाजन, ११६. ययस्यस म+म, स्व ५७ घरपर - वर+पद या पय (प) २२२ घराहिम - पराटिका, काडी,२०९ - यदिन परिन, २१८ यस-1,१८५ घाम-पात, १४७ पाय यापित, यया, 1. पार-बार, १३५.

शब्दकोश पिणासि - विनिशित, २०४ विणियारिय विनिवारित, ४३. विणु - विना, ६. नित्थर- पिस्तार, ९०. वित्थरइ - विस्तृणोति, विस्तरता है, २००. विदिस विदिशा, ६६ विपति- वि + पतन्ति, पटते पारिय-वारित, ४१. वारियहि-पारयसि, गिरेगा, १५५ पाविय - पापित, बोपाया, .. पासर -(तत्गम), दिश, २. वाहि-व्याधि, ४१ चाडह - व्यापृणोति, वापरत है, १६३. वि-अपि, भी, १० विउल - विपुल, १३७ विकर - विहे गाति, बेचना २०९. विग्गासिय - विकासिन, २१२ निग्य - विध, 1.0 चिचित्त-विचित्र, १७२ विच्छाभ-विधाय,निष्प्रभ,१२५ विजायच-यापन (मुनिरा), है, विपलय - वि+प्रलय, १८८ विभोअ - विभाग, ७२, विमुक - विमुक्त, २५ चियाणिय - वि + ज्ञानिन्, पिप रीत ज्ञान वाले, १०५ चियाणु - विजानीहि, जानो, १९ चियार-विचारय,विचारवर,१५२ वियारिय - विदारित, २२१ विरहिय - विरहित, १३९ विलग्गउ - वि + लग्नु, लगे, पिदापर विधी, पड़ता है, १.७ विणभ-विनय,७४ रिण? - विराट, ६३ चियपिनिय - पिय+व विदुरत- विलन्त, रहलहाता पिवनिय - शिक्ति, २१. चिस-विर, २ पिसरणिय -nिiti,३.५ विणाम- ३ - , १०० सावयधम्मदोहा विसकंदाल --विध+कन्दली,५०. घुइ - बुडति, इयती है, १६१, विसधारिय-विष+मूर्छित,११७ खुत्त ( देखो घारह). चेदल - द्विदल, दात, ३६. विसमेस-विप + मेप, १६२, चेयण -वेदना, ४३. विसप-विषय, १२०, घेल्लि - बल्ली, वेरी, ४५. विसहइ - विषहते,सहना है,१२४, घेसा - वेश्या, ४३. विसहर - विषधर, सर्प, ५४, साधर - वेश्या+गृह, ४४, विसाल - विशाल, १९८. विसुद्ध-विशुद्ध, ९१. सई- स्वयम् , 10. विह - विध, .. सउद्य-शौच,७. विडायद विघटयति, विगाड़ता सकिलेस-स+श,१६५ है १५१. समक, इन्द्र, १६८. विहडिवि - विपश्य, विषटकर, सकाइ - शरसि, सकता है, २०१ १०.. सग - वर्ग,४५, विहाण - विधान, ७०. समागमण - स्वर्ग + आगमा, विहि - विधि, २०९. विहिय - विहित, १५९. सचिम्पल - स+कदम, धीचड विहिविरहिय-विधि+विरहित, यु, १४८,मसिल सामर-सन + चामर, या, सय + अमर, १६. विहर - विभूति, १७९० सज्झा-वाध्याय, १४०, विहण -विहीन, ११५ सण - (सम),रान (hemp), वियुत्तर- विशद उत्तर, वीस उपर, २१२. सण्णास गन्यास,१. सुधर - उच्यते, कहा जाता है, सम्णाद समाद, पाच,६ सम्पर-समाभर, २१५ 802 १०१ হাহা सम्माइट्टि - सम्यग्दृष्टि, ७९. सम्मुच्छाह सम्मुच्यते, सन्मू- छन जीवों से युक्त होता है, सकल, ५.. - सत्तट्टम- सप्त+अष्टम, .. सत्तम - सप्तम, १५, सरि-शक्ति, ९. सत्तु-शन, १४२. सत्थ-शास्त्र, १५९, सत्थस शाख+शत, १०५ सदप्प- सदर्य, ६५. सद्द - शब्द, १७५. सद्धाण- श्रद्धान, १९ सप्प - सर्प, ६५. समउ समम् , साथ में, ३० समत्त समाप्त, ४५. समसरण - समरशरण, 100. समाइय - सामायिक, ६८ समायरहि - रामाचर, आचरण पर,१०१ समाहि- समाधि, १९३. समिला-शम्या,, सैला,(Yohe pin) ३ (शम्या युगगील. अमर ) समोठयहु - (१) गमीरय,राम्हारो . - सयल- सकल, सर - सर, सरोवर, १९३. सरय - शरद्, १९४. सरवर - सरोवर, १८. सरस - रत्सम ), रसयुक्त, १२४. सरसह - सरस्वती, १४३. सरसलिल - सर +सलिल, ६९ सरिस सदृश, २८ सरिस- सदृश, १२०. सरूव स्वरप,९१. सरेह - स+रेफ, २१२, सलखिण - सर जग ११७ सच - सर्व, २५. ससर-स+स्वर, २१२ ससहर - शशधर, चद, १७६. ससि - दाशिन् , चन्द्र, २९. सहइ - सहते, सहता है, १०३. सहल सहसणयण - राहवनया, इन्द, रपल, समीहिय - सर्म हि, २०१ समुद्द - समुद्र, स्व+गुद्रा, १४३. सम्मत राम्यत्व, १..

सावयधम्मदोहा विसकंदाल - विष+कन्दली,५०. विसधारिय-विष+मूर्छित,२१७ ( देखो घारइ). विसमेस-विष + मेप, १६२, चिसय-विषय, २२०, विसहइ-विषहते,सहता है,१२४. विसहर - विषधर, सर्प, ५४. विसाल - विशाल, १९८. विसुद्ध - विशुद्ध, ९२. विह विध, ९. विहडावद विघटयति, विगाडता है.१५१. विहडिवि विषय, विघटकर, युड - नुडति, डूबती है, १६१. युत्त उक्त,४. वेदल - द्विदल, दाल. ३६. वेयण - वेदना, ४३. वेल्लि- वाली, वेली, ४५. वेसा- वेश्या, ४३. सायर - वेश्यागृह, ४४. स सई- स्वयम्, सउच्च -शौच, ५. सकिलेस- स + लेश, १६५. सक-शक्र, इन्द्र, १६८. सकइ - शनोति, सकता है, २०१ सग्ग - स्वर्ग, ५३, सग्गागमण - स्वर्ग + भागात, , विहाण -विधान, ७०. विहि - विधि, २०९. विहिय - विहित, १५९. विहिविरहिय विवि+विरहित, सचिम्सल - साकर्दम, वीया युक, १४८, म चिखल सचामर- रात् + चामर, या, सय+अमर, १७६. सज्झाथ स्वाध्याय, १४.. सण - (राम),सन (hemp), , विद्द - विभूति, १७९. चिहण - विहीन, ११५. विमुत्तर विशद उत्तर, बीस स.पर, २२२. सुघड़ -- उच्यते, कहा जाता है, - सम्णास - सन्यास,७1. सप्ताह - रानाह, काच, ६.. सत्तरसर-मनाभर, २१५.

शब्दकोश सिवपट्टण - शिवपत्तन (मोक्ष), ८. सुाण - ण, सुनो, २१. सुत-सून, ४२. सुदेअ - सुदेव, १५५ - सिविण - स्वप्न, १६.. सिविणयपति - स्वप्न + पक्ति, १६७ सिंच: - सिधति, सींचना है,९५. सिंचंत-सिच्यमान, सीचा गया, सुपत्त - सुपाल,८५ सुपरोहण -सु+प्रवहण, नीका सिंचिय - सिरत, १८० सीय - सीता, स्त्री, ६३. सील शैल, ५ सीह- सिंह, २१५ सुअज्जिय - सु + आर्थिका, २०३ लुक-शुष्क, सूसा, १८, सुकसर-शुष्क+सर, १३९ सुस्स-सुस, २०६ सुम्सडा-मुस, १५२ सुच्चइ - गुच्यते, शुद्ध होता है, सुमणस सुमनस, पुष या शुद्धमन, १७३. सुयण-सुमन, २ सुयपंचमि - भूतपयमी (उपवास) १८५ सुयंध- सुगध, १५०. सुरयण-सुरत्न, २२० सुरराथ - सुरराज, १६४ सुरलोभ - मुरलोक, ७२. मरहि - सुरभि, संगधित, १८४ सुरिंद - सुरेन्द्र, १६९. सुवण - सुमनम्, सुमन, पुरुष, १४१. सुवण्ण - सुवर्ण, १३६. सुमुत्त-सु + उक्त, ७८. सुह-मुख,४ सुहावण- मुखापन, सुहावना, १५२. सुज्झइ - शुध्यते, १३१ सुण -श्वन् , कुता, ७, ८२ सुणहु - शृणु, सुनो, ४२ सुणति - वन्ति, मुनते है, ११८ १०४ सावयधम्मदोहा - - सुहिय - मुखिन् , सुखी, २ सूणी - शुना कुनी, १४७ सूर - सूर्य, ३५ सूरण-दविशेष सूरा, ३४. सूरि -(सम), सूरमगमण - सूर्य दम, १४० सेहर - शेपर, २२३. सो- म , वह २८ सोम-शोक, ११ सोह- सोऽपि,७ साम्प - सौरय,४, सोसर - शोषयति, मासना है,६९ सोहग्ग - सभाग्य, १८९ ह हड - अहम्, ह (मैं), ११८. कार- आह्वान, हल्कार या हाक, हरे हरेत, हरेगा, . हलुय- लघुरू, १३४, १३५. (हेम २, १२२ ) हवर - भवति, हैता है, ८० हवास - भवति, होता ह, १५५ हमति - भवन्ति, हेते है, १५७ हसउल हसकुल, १३९ हारिम- हारित हराया, ८४. हिय-हुन, १७. हियाइछिभ-हदय+इट, १.१. हियरपणडा- हत+कर्ण, १२५ हियकमलिणि -हदय + कमले, २१३ हियडा - हृदय, ५८. हियमहुर - हृदय+मधुर, १७८ हिययचल - हदय अयल, २०८ यिवश - हृदय, ५३. हुजउ - भवतु, होवे, २२४, हुयास- हुताश, अग्नि, २८ हुयासण-हुताशन, १८ हुव- भूना, हुई, १७९ हुवम- भूत, हुआ, १५२ झुति - भवन्ति, होते है, १४. होइ - भवति, होता है, ६. होउ - भवतु, होवे, २ होसि - मवस, होता है, १५६. होहि - भत्र, हो, १२९. , हकारह - हो, इति शद्वेन आद्वयक्ति, हाका र गाता है १७५ हणा-हन्त, हनता है, ४६ हणे- हयात् , हनेगी, ४८, हत्थ-हस्त, हाथ, ११७ हत्थिय – हस्तिन् , हाथी, १२३ हयतम-हन+त्मस्, १७२ हरिणउल - हरिण+कुल, २१५. हरिय- हरित, हरा, १४. हरिसिप-स्ट, १४६

टिप्पनी
५. वृहनिघण्टुरत्नाकर में उत्तम सुवर्ण की परीक्षा इस प्रकार
परलाई गई है-
दाहे रक्तं सितं छदे निकपे कुंकुमप्रभम् ।
तारं गुल्वोज्झतं स्निग्धं कोमलं गुरु हेम सत् ॥
तच्छेतं कठिनं रूक्ष विवर्ण समलं दलम् ।
दाहे छेदे सितं श्वेतं कपे त्याज्यं लघु स्फुटम् ॥
पृ.३९३.
८. घोरहं पिडि विपति- हिन्दी का महावरा भी यही है-
चोरों के पिंड में पड़ना या पाले पड़ना | भ. प्रति की टीका में 'पिडि'
का अर्थ 'पथि' अर्थात् मार्ग में किया गया है ।
९. भावक अर्थात् जैन गृहस्थ के संयम की वृद्धि के अनुसार
ग्यारह बजे है जिन्हे श्रावों की ग्यारह प्रतिमा कहते है। देहा में १० से
१७ तक इन्ही प्रतिमाओं के लक्षण बदलाये गये हैं।
१.. 'पंच उदुम्नर' कोप में देखिय । व्यसन सात माने गये
है, जो इस प्रकार है-
द्यूतं मांसं सुरा पेक्ष्याखेट चौर्य पराङ्गना ।
महापापानि सप्तानि व्यसनानि त्यजेद् बुधः ।।
इनके त्याग का उपदेश दोहा नं. ३० से ५१ तक पाया जायगा।

सावयधम्मदोहा सम्मत्त- सम्यक्त्व- का शब्दार्थ शुद्धता या यथार्थना है। जैन धर्म में इस शब्द का प्रयोग सम्यग्दर्शन अर्थात् सच्ची दृष्टि के अर्थ में दिया जाता है । सम्यग्दर्शन की परिभाषा यह है- श्रद्धानं परमार्थानामाप्तागमतपोभृताम् । त्रिमूहापोढमांग सम्यग्दर्शनमस्मयम् ॥ (रत्नकरण्डश्नावसाचार, ४) 'परमार्थ अर्थात् जैन सिद्धान्त के सात तत्वा तथा देव, शास्त्र और मुनियों में तीन मूढता और अष्ट मद से रहित, प्रधान को सम्यग्दर्शन कहते है । इस सम्यग्दर्शन के आठ अंग है।' यही लक्षण दोहा नं १९.२० में कह गये हैं। दोहा में ५३ भी दसिये। सम्यग्दर्शन के बाद मंगों के लिये दसिये रत्नकरण्डवावकाचार' ११-१८. ११ पंचागुब्बय- पंच अणुनत- कोष देखिये। पांच अणुप्रत, तीन गुणवत और चार शिक्षाबत, इन बारह व्रत का उपदेश दोहा नं. ५९ से ७१ सक पाया जायगा। १२. सामायिक- के अनानादि बत्तीस दोषों के लिये देखिये मुलाचार 'गाथा ६.३-६०७. १७ 'कत्तरिलोयणिहियचिहुर' - कर्तर्या लवन्या का हलाः चिपुरा येन 'भ.प्रति की टीका में लोयाण' का अनुवाद 'लौचनि' से किया गया है जिसका अर्थ या तो लौचन काश उत्तरादि हो सकता है या हस्तौंच । १९. जैनियों के सात तत्वों के निरुपग के लिये देखिय बरिस्तर चम्पतरायकृत ' Practical Path." ३०. सम्यक्तव के शंकादिक आठ दोष ये हैं-शंको, कांक्षी, जुगुप्तौ (पृणा) टिप्पनी १०७ मूढष्टि (मिध्यामत में श्रद्धान), तथा उपहनें, स्थिरिकरण, वात्सल्य और प्रभाव! का अभाव फुले आति, राज्ये, रूपे, बलें, त, सम्पत्ति और विधा इनके अभिमान को मद कहते हैं। कुगुरू, कुदेव और कुशास्त्र की श्रद्धा का नाम मूढता है। इन तीनों तथा इन तीनों के उपासकों को जो मानता है वह अनायत्न कहलाता है। २३. उपर्युक्त दोहे में कहे हुये मद्य, मास और मधु में से प्रथम दो या वर्णन न कर इस दोहे में एक्दम सिरे का प्रसग छेटा गया है। इसी क्मी की पूरा करने के लिये भ प्रति में दो दोहे जोडे गये हे (देयो परिशिष्ट ) कवि ने समवत उन्हे यहा इसलिये छोड़ दिया है कि उनमा वर्णन आगे सप्त व्यसनी में आने वाला है (देखो दोहा ४१-४३)। २४ इस दोहे का प्रथम चरण भ. प्रति में इस प्रकार है 'अणुवय अट्टइं मणियई। इसका अर्थ होता है 'डाठों' अणुत्रों के मानने से (मधु का परिहार होता है। किन्तु यह पाठ उपयुक्त नहीं जाग पडला क्योंकि एक तो अणुव्रत आट नहीं है पाच है जो मधु के स्याग सहित अणुव्रत नही मूलगुण कहलाते हैं । और दुसरे इस अर्ध से दूसरी पति की कुछ सार्थकना नही बरती। २५ 'सम्बई पाठ केवल प प्रति में है शेष सब प्ररियों में 'सग्गई। पाठ है । भ. में भी ' सग्गइ है और उसक अर्थ में कहा गया है 'सहिज- णादिकुसुमानि अपि त्यागं करोति'। यदि इसका अर्थ हम शक (साग) रे ते अच्छा होगा । तदनुसार प्रतम चरणमा अनुवाद होगा 'शाक और पलों को छोड़ देने से' इत्यादि। २५. प्रथम पति का अर्ध भ प्रति की टीम में इस प्रकार किया गया है- 'येन (य.) अगालितजलं हे जीय, अधं मास्या यदि न प्रयाद निन्दा द्यूत, मास और १०८ साययधम्मदोहा फरोति स घृती न किन्तु मूल के शो पर से यह भाव निकारना पटिन है। २८. कुछ पदार्थों में उनकी आन्तरिक गर्मी से जो पीटाणु उत्पन हो जाते है उन्हे जैन सिद्धान्त में सम्मूर्छन जीव कहते है। १.. म. प्रति में, ताहं समाज कारणई' के स्थान पर 'ता सम भुंजइ जविणरो' पाठ है, और यह दोहा नं. २९ से पहिल रखा गया है। ३.. 'तउमंडय' पाठ किसी भी प्रति में नहीं है, किन्तु उपयुक्त अर्थ बटाने की दृष्टि से 'म' के स्थान पर 'म' पाठ रस दिया गया है। भी अर्थ बहुत संतोषजनक नहीं निकला। भ, प्रति में' तहं भंडयह' पाट है और दोहे का अर्थ इस प्रकार दिया गया है-'इच्छापि कृते तं धर्म भांडयति लाजयति । यदि चेत् पकमशनादिकमपि मास्वादयति तस्य भवन्ति (भवति) न दर्शनम्रतप्रतिमा' इससे मूल के शब्दार्थ समझने में मुझे कोई सहायता नहीं मिली। भीयुक्त ए एन. उपाध्ये, अर्धभागधी- फैगर, राजाराम कालेज, कोल्हापूर ने दोहे का अर्थ सूचित किया है-'किसी को उनके पके भोजन से लिप्त 'भाडों (पानों ) में भोजन करने के लिये नही चैटना चाहिये माण्ड धावकों के योग्य नहीं हैं उन पानों में का भोजन भी (अशुद्ध है)। इस अर्थ में 'अच्छउ' से भोजन करने बैना, त्या भंड' और 'पत्त' से भाइ और पार का अर्थ लिया गया है। मेरे ध्यान से 'ई भंडय' पाठ को लेकर होहे का निन्न अर्थ अच्छा होगा ।" उनमें पके भोजन रोलिंग माई (में भोजन बनाना) तो रहने ही दो उनके पत्रोंमें भोजन करना भी भाव' के योग्य नही है" इस अर्थ के लिये 'भायणु' (एक वचन) के स्थान पर भोयण (बहुवचन) पाठ रखना आवश्यक है क्योंकि उससे सम्बद्ध

टिप्पनी
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रियापद ' हुँति' और विशेषण 'जुग्गई' यहुवचन में है। अ. द.
और भ. प्रतियों में ' भोगणं' ही पाठ है ।
३४ 'मूलउ णाली' पटना टीक होगा। म प्रति की टीका में
इसका अर्थ 'मूल हरिद्रादि कमलनालिका' ऐसा किया गया है । इस
पक्ति का दोलरामजीकृत कियारोप की इस पतिसे मिलान के जिये-
'तजि केदार तूंबद्दी सदा सानु म नाली दिस तुम कदा।
पप्रति में बिस को जगह हिस पार है। कमरनाल की शाम को
को जगह दिस या ढेस अबभी दहते हैं। भ. प्रति में मिस पर टिप्पण
है 'कमला' तथा 'त्थाणयहिं ' की जगह 'छाणयहि ' पाठ है और
दूसरी पक्ति की टीका है 'सूरण-कंद-फल-शाणकं एतेषां सादिते
सति सम्यक्त्वं मलिनं भवेत्। 'अत्यागय ' से सभवन अथाना
(अचार Pickles ) या तात्पर्य हो ।
३५. म प्रत में 'मुललिउ रे स्थान पर 'सुलिउ ' पाठ है और
उसपर टीका है 'अन्यं यत् सूलितं फूलसंयुक्तं' इत्यादि । शृहित
से संगरतः आरित वा तय है। मुललिउ' से मरन या मुकुरित
( चौंडी) का तात्पर्य भी कदाचिन् हो सका है।
४१ 'पुष्टिमंस' से यहां कवि का यया याभिप्राय ६ यह स्पट समझा
में नही भान । परा पीट का मारा बहुत स्वादिट होता है इससे मास भौजियों
यो उपका या करिन है। पृथ्माम का एक अर्थ मस्त में पशुय अर्थात्
मुगाबोरी भी होता है, यथा-
प्राक पाइयो. पतति यादति पृष्ठमांसं ।
फर्ण घर किमपि रीति शनैधिचिनम् ।
छिदं निरूप्य सहसा प्रविशत्यशंकं।
सर्व पलस्य चरितं मकरोति।

साययधम्मदोहा भ प्रति में 'युट्टिममु ' के स्थानपर ' पिटिममु ' पाठ है और टीकाकार ने उसका अर्थ 'धान्य की पारी निसर्म मास की कल्पना की गई हो' ऐमा किया है (धान्यचूर्णपीटगमपि मांस इति विकल्पे जाते सति सा पेठी त्यज्यते)। देवसैन कृत भावसाह में कहा गया है कि गुड चौर धारकी (के योग से पने पिर में मदिरा की शक्ति पानाती है । 'जह गुडधादइजोप पिठरे जाएह मजिरासत्ती (१७३। इन रीन अधा में सलगू तो कोई भी किया जा सकता है पर पूर्ण सतोषप्रद मुझे उनमें से एक भी नही ज्ञात होता । दूसरी पक्कि में जो कवि ने अपथ्य और व्याधि की उपमा दी है उससे ज्ञात होता है कि उनकी समर में पुष्टिमम' मासभण का मूल है । . ४२. इम दोहे के प्रथम चरण का अर्थ कुछ अस्पट है। 'सुत्ता' पाठ मेर। करिपत है। पोधियों में 'मुत्तह' या 'मुत्तउ' है । भ. प्रति का पाठ इस प्रकार है-'मजहु पिलित्तिहि विमुत्तई मुणहु हु मजाहु दोसु' भीर इसका अर्थ यह दिया गया है-मदिरालिप्तमुख यस्य तस्य मुखे ध्यानो (भ्या) मूनं क्रोति । यदि यह अर्थ अभीष्ट हो तो हम प्रथम चरण को इस प्रकार पड़ सकते है-'मुह विलिहिवि मुत्तर सुणहु' (मुग त्रिलिय मूलपति श्वा)। ५८. इस दोहे का पाठ निधत करने तथा अर्थ बैगने में बहुत करिनाई का अनुभव हुआ है। फिर भी 'समीदवहु ' पाठ सन्दिग्ध है। सट्ठों के अर्थ चोप में देखिये । भ प्रति की टीका में दोहे का अर्थ इस प्रकार किया गया है 'शुद्धदर्शनं कदाभवेत् यदा गता दूरीस्ता अरयो मिथ्यात्वशनवः। एतादृशं सम्यस्त्वं हृदये मुनिश्चलं यस्य प्रतोपवासादिनां'समाट.' प्राप्तीभर (१) यह नि, हे जीव, चपलानि जीवितव्य धनानि आयुपमपि । प्राथुक्क ए. एन. उपाध्ये इस दोहे का अर्थ ऐसा करते हैं - क्षुद्र या मिथ्या दर्शन, जो (अबक) हृदयमे निश्चल था, को छोड़ो। व्रत के पाश समाऐ । हे जीव, धन और आयु घयल है।

टिप्पनी , ये गायर'मा शुद्ध' अर्थ मम्मटाचार्य कृत काव्यप्रसाश, ९,८३, में प्रयुक्त 'के आधार पर करते हैं। (तदेवाव्यान्तर्गभूतामिति मास्य भेद- लक्षणम् । ६१. वसुराजा की कथा इस प्रकार है। वसु स्वस्तिकावती का राजा या। वह एक ब्राह्मण पुन नारद और गुरुपुन पर्वत के साथ क्षीरकदम्ब उपा ध्याय के पास विद्या पहा था । गुरु की मृत्यु के पश्चात् एक्वार नारद और पर्वत में 'अर्जयटव्यम् ' इस श्रुति के अर्थ पर विराद खड़ा होगया। पर्वत अज का अर्थ या करता था और नारद कहना था कि गुरुजी ने अज का अर्थ उन्हे ' तीन वर्ष के पुराने धान जो ऊग न सके ' यह बताया था । अन्त में उन्होंने इसके निर्णय के लिये वसु को मध्यस्थ चुना। पर्वत की माता ने वसु से अपने पुत्र के पक्ष करनेरा वचन ले लिया। और तदनुसार वसु ने असत्य जानते हुए भी पर्वत के अर्थ की पुष्टि की । इस घोर असत्य के प्रभाव से वसु राजा अपने सिंहासन सहिन पृथ्वी में धस गया और फिर मर कर नरक को गया ।( देखो नेमिदत कृत आराधना क्थाकोय)। 'शासारण्ड' वैदिक काल में उसे कहते थे जो अपनी शासा को छोड़ कर दुसरी शाखा को स्वीकार करे । दाल का अर्थ भी शाखा है पर इस शब्द का उपयोग वृक्ष की शाखा के अर्थ में ही बहुधा देखा जाता है। सभव है 'साखंड ' या 'भाखंड ' किसी एमे पक्षी व कीड़े को कहने हो जिसके डाल पर बैठने से उस डाल को हानि पहुचे । ६३. इंछिय-इष्वा, इच्छा करके, देखो दोहा २०९ ६६ भ. प्रति में 'पालिउ' के स्थान पर 'पाडिउ' 43 है और उस पक्ति की टीका इस प्रकार है-'येन मुकुलिते सति आसा तृष्णा वर्द्धते एव, तेन संयम उत्पाटितम् । टीकाकार 'मोकलियई' के अर्थ को न समझने के कारण भ्रम में पड़ गये हैं। ७७. 'भाई' का सर्थ टीक समझ में नहीं आया । प.प्रति में इस शब्द पर 'छांह' ऐसा टिप्पण है उसीके आधार पर मैने अनुवाद किया है।

११२ सावयधम्मदोहा म प्रति मैं दोहो की दूसरी पंक्ति का पाठ इस प्रकार है णिकरसई एरं- इवणे किम अण्णा भवर' और इसकी टका है 'यथा निकपये सति एरंडवनानि धान्यानि न भवेत् । (भवेयुः ) ' प्रथम पक्ति की टीश है 'मद्यमांसमधुपरित्यागे सति संपद्यन्ते श्रावस्यतानि । टीकाकार का अर्थ यह ज्ञात होता है ' मद्य, मास और मधु के परि याग से आपकवत होते है । एरड के वन को विना पद्वारा साफ किये अन्न नही उत्पन्न हो सकता। श्रीयुक्त उपाध्ये का अनुमान है कि 'भवाई 'भू + आदि ' का क्षपभ्रश रूप है और तदनुसार वे दोहे का अर्थ इसप्रकार बैठाते है- “ो मय, मास और मधु का परित्याग करता है वही (शुद्ध) भावर होता है । एरण्डवन में से जब दक्ष निकाल दिये जाते है त्भी (शुद्ध) भूमि आदि रहते हैं ' इन दोनो अथों में 'खाइ' सम्पद्यते के समस्प लिया गया है और मेरे अनुवाद में 'सपह। सम्प्रति ' के बराबर लिया गया है। १२ इम दोहे की देवसेनत भावसंग्रह की निनलिखित गाथा रो तुरना कीजिये-- केई पुण गयतुरया गेहे रायाण उपपई पत्ता। दीसंति मञ्चलोए कुच्छियपत्तस्स दाणेण ॥ ५४४ ॥ उप्पहि' का अर्थ अनुवाद में 'आत्मना' आत्मना' हिंदी-उपतकर किया गया है । म प्रति की टीम में उसका अर्थ 'इक्षिप्यते' दिया है। ८६. ' दोसडा बोल्लिजइ' का अर्थ जनुनाद में ' दोपैन कथ्यते' ऐसा लिया गया है । 'बोल्ड' धातु अपभ्रश में बुलान के अर्थ में अनेक जगह आई है (देसो देहा ८८, ११५)। किन्तु देवसनकन 'भावसग्रह' म बोल (वोल) धातु कई वार 'ध्रुड्', हिंदी-बुडना या इयना के अर्थ में प्रयुक्त हुई है (देखो गाथा ५४४, ५४८, आदि)। तदनुसार प्रस्तुत दोहे की प्रथम प्रा - E भी हो_RA TIm . , पति टिप्पनी डपाता है, इसम प्रान्ति नही। यह अर्थ अधिक अच्छा प्रतीत होता है और इससे पापाण की नाव की उपमा बहुत उपयुक्त हो जाती है। ९९ 'घडति' का अर्थ अनुवाद में 'घटायन्ते' अर्थात् 'पटयुक्त होते हैं, 'ऐसा लिया गया है। भ. प्रति में ज प्रति के समान "वहति पाठ है, और टीका है 'यथा जलं निकासिते (जले निष्कासिते) कूपके नूतनसीरं (क्षीरं) आगच्छति । अर्थात् · जैसे कूप से जल निकालने पर उसमें नवीन जल आजाता है'। १००, अविण-अविन का अर्थ मैने पालिका या पार किया है। अवि का अर्थ संस्कृत में दीवाल या पर्वत और 'अविन' का अर्थ पुरोहित ( अवति रक्षति यामिति, अव् + इनच्, है) होता । इसी के अनुसार भवनि पृथ्वी का नाम है । म प्रति को टीका में भी यही अर्थ किया गया है-'सडागनीरबंधनपालिकया विना स्फुटति नीरं न तिष्यति'। १०६ योगीन्द्रदेवकृत' परमात्मप्रकाश' में एक यह दोहा है- लाहहं कितिहि कारणिण जे सियसंगु चयति । सीला लग्गिवि ते जि मुणेि देउल देउ उहति ॥ अर्थात् कीस्लिाम के कारण जो शिव (मोक्ष) का सप छोडते हैं वे मुनि खोलों के लिये देवालय और देव को ढाते हैं। इसी के अनुसार यदि हम प्रस्तुत दोहे का यह अर्थ करें तो अच्छा होगा 'पेट के लिये जो पापमति दूसरों को दुख पहुचाता है वह मूर्ख क्या सीलों के लिये देवालय नही पलोटता ( तोड़ता) ' इसी प्रकार के भाव के लिये देखिये दोहा २१९-२२१. १०९-११. इन दोहों का भावार्थ यह प्रतीत होता है। कोई अधी यदि प्रश्न को कि जिस प्रकार पोटलीमान विक्रेय द्रव्य से वा वाणिस्य नही हो सकता उसी प्रकार छोटे से उपवास से कोई वडा धर्म नही इसका उत्तर यह है कि वाणिग्य का थप्पन द्रव्य के परिणाम पर नही किन्तु - 2 सकता, साययधम्मदोहा उसके मूल्य पर निर्भर है । माणिक और मोतियों से भरी पोग्ली के घन का पारावार नहीं और बेलभरे वेरों का कुछ भी मूल्य नहीं। इसी प्रकार उत्तम उप वासमान से ही बड़ा पुण्य होसम्ता है । इसका उदाहरण आगेरे दाहे में दिया गया है । टीकाकार का अर्थ कुछ सार्थक नहीं जचता'पोट ग्रंथि स्वमस्त- कोपरि लन्धे सति मणिमुक्तानामपि, तथापि धनं किं तस्य भवेत् अपि तु न भवेत् । किमिव यथा चोरीणां भारं वहति वलीयदः तथापि चोरीणा मध्ये तनास्ति यत्वादति' । १११. नागकुमार जनपुराणानुसार वाइस कामदेव हुए है । पूर्वनन्म में उन्होंने धीपचमी उपवास का विधि सहित पालन किया था उसी के पल स्वरूप उन्हे वह कामदेव का अनुपम सौन्दर्य और बल प्राप्त हुवा था । विशेष जानने के लिये 'णायकुमारचरिउ' दसिये । ११५ यदि बोल्लियड' दोहा न ८६ के नोट के अनुसार 'बुडित' का समरूप माना जाय तो अर्थ यह हो सकता है कि 'बिना डुबी लगाये क्या कोई लोक में एक छदाम भी पा सकता है। इसका तात्पर्य समवतः उन पनडुवों से होगा जो तीर्थस्थाना पर जल में पके हुए सिकों को दुबकी लगाकर निकालते है। उन्हे कोई यानी साधा दाम नहीं देता। १२१ अनुवाद में मण से मन और बलत से चात् का अभिप्राय लिया गया है किन्तु दूसरी पंक्ति का अर्थ कुछ सपननक नही गाम प्रति की टीका में मग से मा का और वरन से ज्यरत् का अर्थ लिया गया है और तदनुमार दोहे का यह अर्थ हेता है 'कुछ भी करके चार दान दे। अपनी शक्ति का मन छुपा । जरते हुए ( घर में से ) जो कुछ निकाल लेगा वही हाथ रहेगा इसमें भ्रान्ति नही'। यह अर्थ अधिक अच्छा है 1-उन्वरह. उदन्ते, रहता है या बचता है । देखो हेमचन्द व्याकरण ८।४।३७९- महु कटहो ये दोसडा हेलि म झसहि थाल । देंतहो हउ पर उव्यरिश जुझनहो करवाळ ।।

टिप्पनी १२५. अनुवाद में मणगच्छ का अर्थ मनाम् + अच्छ, कुछ अच्छे, रिया गया है और इस कारण ' मत कर' यह भाव उपर से मिलाना पड़ा है। किन्तु दोहा नं. १२१ के नोट के अनुसार मग पा 'मा' अर्थलेर प्रथम पंति का यह अर्थ कर सरने है ' हे जीव मनोमोहनस्य यस्य सभिलमा गच्छ' हे जीव मनमोहक गीत की अभिरापा में मन जा ।म प्रति में 'मग' के स्थान पर' मा पार ही है। १३०. अनुवाद में मटिल-मादि-दन्य ( Sadness, deyection ) या समरूप लिया गया है। यदि हम इस दो शदी में- म बिउ विभाजित करदें तो दोहे का यह अर्थ भी किया जा सकता है 'गुरु ये वचनरूपी अंकुश से सींच । ऐसा ढीला मत छोड़ कि यह मनरूपी हाथी संगमरूपी हरे मरे वृक्ष को म्यर्थ ही तोड़ मोड़ डाले। यह भई अधिक अच्छा प्रतीत होता है। मुहका यहा अर्थ मुधा-व्यर्थ लिया गया है। १३४ लोह शब्द पर्थ हे लोम और लोह, ( लोहा)। भावार्थ यह है कि जिस प्रकार लोहे से भरी नार के दबने का भय रहता है किन्तु लोहा निकाल डालने से यह सुलभता से पर लगती है उसी प्रकार लोभ का भार निसल पैरने से मनुष्य की ससार याना मुलभ होती है। इस दोहे की देव. सनात भावसंग्रह की नित लिविन गाथा से तुलना कीनिये- लोइमए कुतरंडे लगो पुरिसोद तीरणीयाहे । घुडा जह तह युदर फुपत्तसम्माणओ पुरिसो ॥ ५४९ ॥ ११५. अन्य परिवार से तार्य क्रोध, मन, माया आदि दोनों से है जो मौह फे सीन होने से आप ही क्षण हो जाता है। मोह मानों द्वार को भगंग जो इन राप दोषों को मनरपी गृह में रोके हुए है। भ. प्रति में 'मेंदुप' पाठ है और प्रया पंक्ति की टांका है • यम मोदो दुर्वलो नास्ति तन इतरपरिवाराणि कथं धीणानि भयन्ति । इसरी पकि का अर्थ काकार नहीं लगा सके । वेरिस है .

सावयधम्मदोहा 'द्वयोः पदानां ( पदयोः ) भावार्थ न शात अतो मया न लिखितम्॥ १४२. चार' शब्द 'त्यागेन' में समम्प लिया गया है और 'क' 'नुके (ण के इस अर्थ के लिये देखो कोप) । यदि उसके स्थान पर चाड , पाठ लिया जाये और यह फविते' के साथ जोड़ दिया जाये तो यह अर्थ हो सकता है कि * चाटु (चापलूसी) कवित्तों द्वारा पारूप ( का वर्णन करने ) से किसी पुरुष की कीर्ति नही हो सकती।' तात्पर्य यह होगा कि शत्रु को भी मीठे और उसकी प्रशसा भरे वचनों से प्रसन करो। केवल वचनमान से उसकी कुछ कीर्ति तो हुई नही जाती इसकी निन्नरिसित श्लोक से तुलना कीजिये- प्रियवास्यप्रदानेन सर्वे तुप्यन्ति जन्तवः । तस्मात्तदेव दातव्यं चचने का दरिदता ॥ १४३ इस देहे में 'सरसइ' और 'समुदि' द्वयर्थक प्रतीत होने । सरसह सरस्वती व सरम या स्वरस, समुद्द-समुद्र व स्वमुद्रा, या स+मुद्रा । अर्थात् मौन से भोजन करने वाले को भोजन के रसों का आनन्द मिलता है, सरस्वती भी सिद्ध होती है, तथा लक्ष्मी भी प्राप्त होती है क्योंकि वह समुद्र (मुद्रित मुख ) में निवास करती है । सभव है कि ' लच्छिम करहु णिवामु ' में मरहु भिवास [ मकर ( मगर ) का निवास ] के अर्थ का भी समावेश हो। किन्तु दोहे की रचना में इसे यथोचित रूप से योजित करना कटिन प्रतीत होता है। इस दोहे का सस्कृत रूपान्तर में इस प्रकार करता हू- भोजन मानेन य क्रोति सरस्वती [ स्वरसेन वा सिध्यति तस्य । अथवा वसति सनुदे ( उदधी मुद्रासहिते मुखे वा) जीव रक्ष्मी., कुरु निवासम् सस्या भ प्रति को टीका में यह कुछ अर्थ नहीं बताया गया । टीका है यः पुरुषः भोजने मौनं पुर्यात् तस्य सरसावाध्याय (?) भवन्ति । अयया ये पुरुषा स्वाध्यायेपु समुदिता भवन्ति ते लक्षय. निवासा (?) भवन्ति। . .

टिप्पनी १४६. यहा'लाल' शब्द में लप है। लाल-लाला (लार) या पुन । कुसियारा-कोशकार या रेशम का बीड़ा जो अपनी शर से रेशम बनाता है और उसी के कारण मारा जाता है । भ. प्रति की टीका का अर्थ इससे मिभ है । दूसरी पंक्ति पी टीका है-क इव । श्वतकीटकं तस्यैव अंगजातस्यैव हदयं सादान्त ( सादति) लेफेजुंजाला मृत्तिकायाः कीटकं मोच्यते । टीकाकार के मत स मिट्टी के कीड़े, केंचुए, अपनी संतान का भक्षण करते है । यदि यह टीक भी हो तो भी यह अब यहा लागू नहीं होता। १४८. प्रामों के कच्चे रास्ता के आरपार वरस त में लोग लकड़ी के डूंडे (खोड़े। लगा देते हैं जिससे रास्ता और आधिक न विगढने पाये । न्याय के सोडे लगाये बिना दरिद्री पुरुषों की दशा और बिगड़ती ही है। म प्रति के टीकाकार ने यह अर्थ नहीं ममदा । उनका अर्थ कुछ विचित्र ही है- 'कं इव, यथा काप्टेन चिना पादवंधनचिद्रकीलि. कासहितपोडे ति लोके न भवेत् । तस्य पुरुषस्य पवित्रो ऽपि मार्गामकटेन दुराग्रहो भवति (?)। १५०. चन्दन के पास सर्प रहते हैं इस डरसे यह मुगन्धी वृक्ष पर के पाम व बगीचों में नहीं लगाया जाता। यदि हो तो काट डाला जाता है। १५५ जिस प्रकार छन से पानी और धाम का निवारण होता है उसी प्रकार इस लोक म तिर्यञ्चादि नीच गति और परलोक में नरक धर्म से ही रोके जा सकते है। ऐसा ही अर्थ लेने से दृष्टान्त की सार्थकता हो सकती है। १५६. 'इरहि' का पनसि' पडता है, भी अर्थ हो सका है। तदनुमार अर्थ यह होगा कि ' इसीसे वार यार मृत्यु (के मुख में) परता है, चिरायु कम हो सकता है। हिन्दी दरा गिरा १५७. मुनि आदि धरद्ध पुरु की सेवाशुभ्रूया का नाम वय तय है। • पदि' की व्युत्पत्ति मैने ' स्कन्दिर गतिशोपगयो ' धातु से लगाई ६, सानयधम्मदोहा अतएव बंद [स्कदिन J-सूखा । अनुवाद के अय के लिये 'अयाणु की जगह ' अयाण ' पाठ चाहिये । अयाणु पाठ से टक शब्दार्थ यह होगा अज्ञानी और सूना मत हो। भ. प्रति की टीका कुछ और ही है और उसमें कंदि का अर्थ क्धं लगाया गया है- 'अमुना प्रकारेण व्याधि- पीडितयुक्तानां दातव्यगुणेमु अज्ञातो कथं भवसि। १६०. भ. प्रति में तासरे चरण का पाठ भ्रट है 'मेदनी मेइणि चंपथियई' और टीका है 'यथा चंबूलवृक्षविपने ( वपने) सति मात्रफलं कथमासादयति। १६२. प्रथम पंक्ति की रचना कुछ क्लिष्ट है । विस से विषाले प्राणी का जो अर्थ किया है वह पूर्ण सतोषप्रद नहीं है। भ. प्रति को टीका में उस चरण का कुउ अर्थ ही नहीं आया। टीम है 'ये प्राणिनः कृटतुलया मानोपमान कुर्वन्ति तथा हस्वदीर्घवाटफेन हीनाधिकं क्रय- विझयं करोति स नती थापको न । तस्य धर्मः कीदृशो यथा नाट्यशालायां नृत्यकारिणी बहुवेपं धारयति तत्परेपां रजनं करीत्यव। १६४. दूसरी पक्ति का अर्थ कुछ सन्दयुक्त है । भ. प्रति की टीका इस प्रकार है 'सम्यक्तेन सह श्रावकस्य व्रतानि भवंति तेन व्रतेन स्वराधिपो भवति । यदि सम्यक्तं न भवेत् तर्हि श्रावकस्यापि व्रतानि न भवेत् [ भवेयु 'इम अर्थ का मूल के दान्दों से कोई सम्बन्ध ही नही दिखाता । भीयुक्त उपाध्ये दोहे का संस्कृत रूपान्तर इस प्रकार करते हे 'समाते श्रावरूतानां उत्पद्यते सुरराजा योगविनष्टःक्षिप्यते, जातः यन कुत्रापि कि वार्यत'। यहा इंडियइ 'क्षिप्यते' के समरूप लिया गया है और 'सो' का कोई सम्बन्ध-वाचक सर्वनाम नही रस्खा गया। अनुवाद में गविगिट्टा का पवि+निटा ( अक् समास ) इन्द्रियनिष्टा, अर्थ लिया गया है। ११. यहां असोउ [भशोफ ] और सोउ (शोक का यम उत्तम है। 1 टिप्पनी १५३ यह दोहा लेपपूर्ण है। पुष्पदृष्टि के वर्णन के साथ साथ कवि ने यहा विष्णु और जिन के भक्तों में अन्तर बतलाया है। माहउशरण-माधवशरण (बसन्तऋतु अवलम्बी, विष्णुभक्त) थिप्पंति-पतन्ति, तृप्यन्ति ( पड़ते है या तृप्त होते है) सुमणस-सुमनस (अच्छे पुष्प, शुद्ध मनवाल) अलियविवज्जिय-अलिविवर्जित ( भ्रमररहित ), अलीक विवजित ( असत्यरहित) १५४ रेइ-राजते, विराजना है। तुपबदी की दृष्टि से रोइ-रोचते ही टीक होगा। १८५ श्रुतपचमी का उपवास आषाढ, कार्निक और फाल्गुण मास के शुक्लपक्ष की पचमी को माना जाता है (देसो गायकुमारचरिउ ९, २०, ४ ) १८८. रोहिणी उपवास प्रत्येक मास में रोहिणी नक्षत्र के दिन माना जाता है (देखो जैनवतकथासग्रह पृ ३६ ) । ग-नु ( देसो कोप)। १९३. दर्शन, नान, चारिन और तप, ये चार आराधना कहलाती है इस विषय का प्राकृत में अति प्राचीन ग्रथ भगवती-आराधना है जिसका दिग म्बर समाज में बडा मान हैं। यहा उसी की टीका करने का उपदेश जान पड़ता है। १९७ चदकति से चन्द्रकान्त मणि का तात्पर्य लिया गया है जो चद्र की किरणों के सयोग से द्रवित होता है। यदि हम दूसरी पाक्त को ऐसी प. चंद्रकति चंदहं मिलिय पाणियदिपण ण ठाइ ' तो इसका अर्थ यो कर सकते हैं. 'जब चकान्ति चन्द्र (पूर्णिमाचन्द्र) स मिलती है तब पानी का दैन्य (दीनता) नही ठहर सकता' । पूर्णिमा चद्र के उदय से समुद्र में ज्वारभाटा भाता है यह प्रसिद्ध ही है। २०५. प्रथम पक्ति का भावार्थ कुछ अस्सट है। म. प्रति की टीका का अर्थ हैक नहीं जंचता हे जीय, यदि त्याग कर्तुमिच्छसि तर्हि जीवपुद्गलयोः येन सुखं प्राप्यते तत्यागं श्रेष्ठं कथितं । तस्य इदमेव सम्यकं कथं न जातम्।

सापयधम्मदोहा २१२, इम दोहे में कमलाकार सिद्धचक बनाकर उसकी पूजा करने का उपदेश है । सिद्धचक को बनाने का पूर्ण विवरण देवसेनकृत भावसंग्रह की ४४३ से ४६८ गाथाओं में है। इनमें की दो गाथायें ये हैं- सोलदलकमलमग्झे अरिहं विलिहेह विंदुकलसहियं । वंभेण वेढइत्ता उरि पुणु मायवीएण ॥ ४४४ ॥ सोलससरेहि घेढदु देहवियप्पेण अट्टबग्गा वि ॥ अट्टहिं दलहिं सुपयं अरिहंताणं णमो सहियं ॥ ४४५ ॥ ( वसुनन्दी श्रावकाचार को ४७. आदि गाथायें भी देखिये)। २१.. ये पाच वर्ण प्रम से अर्हत , सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय और साधु के द्योतक है। यह जपमत्र है। २१५ यह सप्ताक्षर ( यथार्थत सप्तमात्रिक ) मन कहलाता है। उसमें दो वर्ण दीर्घ होने से कुल सात मानायें हैं। २२० पट्टोलयतम्गंथियहं ' का टीक अर्थ समझ में नहीं आया । अधिक अच्छे अर्थ के अभाव में अनुवाद में वह अर्थ दे दिया है। पट्टोलय-पट डाहोच (वितान), जिसे हिन्दी में कपड़े का छत कहते हैं। कमरे में इस छत को तानने के लिये जगह जगह उसके किनारों पर एक पत्थर का टुकडा देवर गाठ दे देते हैं। इस नुच्छ कार्य के लिये जो एक बड़े बहुमूल्य रत्न के टुकडे करे उससे बडा मूर्ख और कौन होगा आप्टे के सस्कृत अग्रेजी पोप में पटोल वा अर्थ भी एक प्रकारका वस्त्र ( a kind of cloth) दिया है । शुक्ति अर्थात् सीप जिसमें से मोती निकलता है, को भी सस्कृत में पटोरक कहते हैं । म प्रति में अन्त के सात दोहों की टीका नहीं है। २२२ द्वितीय पंक्ति में आप है। जैसे दोहनेवालों को धेनु उत्तम दूध देती है उसी प्रकार यह उत्तम दोहों की धर्मधेनु ( पढ़ने वालों को ) उत्तम पद देगी। धर्मधेनुः संदोहकेभ्यः संदोहकानाम् या, घरपयः घर- पदं वा ददाति न भ्रान्तिः ।

दोहों की वर्णानुक्रमणिका अच्छउ भोयणु साह घरि ३०. अटुइ पालइ मूलगुण २६ अणुमइ देइ ण पुच्छियउ १६ अणुवयगुणसिक्सापयद ५९. सगाए आवति निय १४५ अण्णाए दारि यह ओहइ १४९ अण्णाए दानिदियह रेनिय १४८, अण्णाए बरियह विराउ १४७ अण्णु जि मुरलिउ पुष्टियउ ३५ अण्णुवइट्टइ मचिगयइ २४. अतागमतचाइयह १९. अभयदाणु भयभीरुयह १५६ अरहतु वि दोसहि रहिउ ५. अलिय पसायमा चाहि ६१ अब वि ज जहिं उवयरइ ११९ आउसति सग्ग? अभिससरिसउ भासियर २८ आरसिङ दिपण जिणह १९६ देकर विरइ भवतलहै ८५ उपिट विहं तिहि भाहिं ७४ उत्तमपत्तु मुमिंटु जगि ७९. उपवासह व पर. १११ उदयचउभिटामिहि १३ एकहिं इदियमोकलउ १२८. एटाणइ एयारसइ १८ ए बारह वय जा करइ २. एयवत्थु पहिल्उ बिदिउ १७, एयारहविहु त कहिउ १, एवविहु जा निणु महइ १८०. एह विहइ निसरह १७९ एहु धम्मु जो आयरइ ७६. कम्मु ण सत्तिय सब जहिं ५७ कहिं भोयण सहु भिट्टनी ९४ काइ बहुतइ जपिय १०४. काइ बहुत सपयइ ८९ कामरहद परिवत्तिय ४५. किं किं दे ण धम्मतह ९८ कूतुलामाणाइयह १६२ सयहि गुरुवयणकुसहि १३० गई भाउ ण रसु महई १८६. गडह भावह परिणवइ २१५ गधाएपनि निगवरह १८२ गुणवतह सह सगु करि १४१ गुरुवारभई णरयगइ१६१ यह पुरू परियणु पणियघणु १२. चइवि ७३ पादिय वह वसि रहि १५५. चउरद देसह रहिट १२.

१२२ सावयधम्मदोहा चम्मच पीयई उसइ ३२. चदोवइ दिगइ जिण १९८. चामर ससिहावरपाल १७६ चिरश्यिकम्महं सउ करइ ६९ चिंधचमरछत्तइ डिह २०. चोरी चोर हणेइ पर ४८ छतई घणससिपहुरइ १७७ छुडु दसणु गहायरउ ५८ छुड सुविसुद्धिय होइजिय १०७ जइ अहिलामु निवारियउ ५१ अइ इच्छहि संतोनु की १३७ जइ गिहत्यु दाणेण विणु ८७. जइ जिय मुक्सइ अहिलसहि १२२. अइ देखेरउ हिड ३९ जलधारा जिणपयगयउ १८३ जमु दसणु तमु मासह ७४ जसु पत्तत्तमराश्य : १७१. ज जिय दिज्जइ इत्थु भवि ९४ ज दिग्नात पावियर ९२. अंबूदा समोसरणु २०२ आयु जणगि समागमणि १६५ आमु हियइससि आ द सा २१४ जिणपडिमइ कारावियर १९२ निणपयगाकुसुमारिहिं १९१. विणभवणइ कारानियइ १९३. बिगहरि लिहिया मडियइ २०१ जिशु अवई जो अबसयहि १८५ जिणु गुगु दे सचयणु वि २३८, जिभिदिउ जिय संवरहि १२४. जिय मंन्द सत्तस्यरइ २१५ जिह समिरहिं सायर गयहि ३ जुएं धगह प हागि पर ३० जे अगालि जपियउ २७ मुदेउ मुगद हवापि १५५. जे मुणति धम्मस्परइ ११८. जो घरि हुन्द धग गई ९३. जो चच जिणु चदंगइ १८४, जो जम्मु उरि हाषियउ १६८, जो जिगु पहावर घयपय हे १८१. जो धवरावइ जिगभवणु १९४. जो पद्यावइ जिगवरह १९५ जो वयभायणु सा जित ११६ झुणियसंपुगहाल १७८ टि-3 होहि म इदियह १२९ जमकर पिशु पंचगुरु १. गय मुरसहरमणिकरण २२३. गहु विग्गासिय दरकम २१२. पाणुग्गमि नतु समसराणे १७० णास घातमु घरतपउ ६२. गिद्धशमणुयह शियम देहुणह मिटडी ११५ पारद दिगद जिगनु १८७ त अपनु अगमि मगर ८३ नपायड्ड जिणारवयाँ तबोरोसह नऊ मुइदि ३७. कटुडा ११४.

दोहों की वर्णानुक्रमणिका १२३ घरें इस धम्म मुहु ता अच्छउ जिय पिमुगमइ १५० तमच्छउ तउमठयह ३१. रिलयइ दिनई जिगरह १९७. ते बचें जिय पइ भणिउ ११२. ते कम्मराउ मग्गि जिय २१०. ते सम्मनु महारयणु २.८. दय जि मृत धम्माधिबहु ४०. दसम्भूमिहिं शाहिरड ५५. दंसगरदियपत्ति जद ८१. दंसगरहिय जि तउ करहिं ५५ दसणसुदिए मुद्धय ५६. दंराणु पाणु चरितु तउ २२४ दाणवणविहिजे करहिं ११५. दाणचणविहिजो करइ २०९ दाणु युपतह दोसडइ ८६. दिगई पत्य सुआनियई २०३ दिसि विदिसहि परिमाणु परि ६६ दीयई दिगई जिगवरई १८८ दुबशु मुहियउ होउ अगि ३ दुति सय विमुत्तरई १२२. दुहु हिमणुयत्तगउ २२१ दुलहिदि परतय २२० दे जिगिदह जो फ्लई १९. देहिदाण च किंपिकरि १२.. धम्मराहचे परिणरह ९१. धम्म धणु परिहोइ थि... धम्मु कार्ड जद होह पशु ८८, धम्मु करतहं होइ घणु ५९. धम्मु विमुदउ तं जि पर ११३. वि बहु भरइ १.३. धमें महिलसइ १६५. धम्में जाणहि जति गर १.२. धम्म विषु जे सुक्खडा १५२. प'वेण दुहु १.१. धम्म हरिहलवावई १६६० धवल वि सुरमउड़वियउ १७४ धूवर सेवइ जिणवरदं १८९. पतई दाणई दिण्णइण ९६ पत्तइ दिनइ दाणु जिय ५० पत्तह जिणउवएसियई ८.. पत्तई दिण्गउ धोबडउ.. परस्यि बहुवधश ण पर ५०. परिहरि कोहु समाद करि ११ परिही पुत्तु वि अप्पणउ १४६. पसुषणधगइ रोत्तियइ ६४ पचमु जसु क्यासाह १४. पचाणुव्यय जो घरइ ११ पंचुंबरह णिवित्ति जतु १.. पाउ करहि सुहु अहिलसहि १६. पारदिउ परणिरिषणउ ४६. पुग्गल जीवइ सहु गणिय २०५. पुट्टिमंसु जर यिउ ४१ पुणरासिण्डवणादयई २०५. पुण्णु पाउ जमु माणि ण समु ११.

१२४ सापयधम्मदोहा पोलियइ मणि तिया 10 पोह का वि पावमद १०६. पौत्थय दिग्ग ण मुणिवरह १५९ फरसिंदिउ मा रालि जिय १२३ बभयारि रासमु भाणिउ १५. विगि सयइ असि या उसा २१६ भवुच्छाहणि पावहीर १९९. भोगह करहि पमाणु जिय ६५ भायणु मउणे जो करह १४३ मउयत्तणु जिय मणि घरहि १३२ मग्गा गुरुटवएसियह ८ मजु मसु महु परिहद ७७ मञ्ज मसु मैहु परिहरहि २२ मग्नु मुमुकह मयह ४३ मण गच्छद मणमोहण १२७ मणवयकायहिं दय करहि ६. मणुयत्तणु दुल्हु रहिवि २१९. मणुयह विणयविवनियह १३८ महु आसायउ थोडउ वि २३ माणइ इछिय परमहिल ६३ माया मिणहि योडिय वि १३३ माहउसरणु सिलीमुहउ १७३, मिच्छतें गह मोहियउ १३६ मुक मुणहमजरपमुह ४७ मुबह कूडतुराइयह ४९ मुणि वयणइ शायहि मणइ १०८ मुहु विलिहिवि मुतइ सुगहु ४२ गूरउणाली भिसहमुण ३४. मूल्गुणा इय एसइइ ५३. माहुपु हिजउ दरउ १३५. राहरामसचम्मट्टिमुर ३३ स्वहु उपरि रहम करि १२५ रेनिय पुन्ध प धम्मु फिउ १५४. रोहु मिल्ल चउगइसलिल १३४. लेहु यस विमु सणु मयणु ६५ वसणइ रावइ उहि जिय ५२ चारिउ तिमिरु निणेसरह १५२. विग्नावच्चु ण पर कियउ १५७ विनाय विरहियउ १३९. विसय कसाय वसणाणिवहु १४४ विहडावइ ण हु सघडइ १५१ वेदरमीसिउ दहिमहिः ३६. बेसहि रगइ धगियधगु ४४ सन्याए णाणह पसरु १४० सण्णासेण मरत्यह ७१ सत्तु वि महुरइ उवसमई १४३, सत्थसएण वियाणियह १०५ सद्दामसिण दुदुहि रइ १५५ सम्मतें विणु वय वि गय २०६ सम्मतें सावयवयह १६४ सम्वइ कुममइ उदियइ २५ सकाइय भट्ट मय २० सगचाउ ने करहिं निय ७५. सगें मजामिसरयह २९.

दोहों की वर्णानुक्रमणिका
१२५
सरह दिण्णु ण चउविहह १५८
सनम सीलु सउच्चु तउ ७
सझातिहिं मि समाइयइ ६०
सारभइ न्हवणाइयह २०४
सावयधम्मद सयलह मि ७८
सुरी दसणु जिय जैण विशु २१
सुरसायरि जसु शिवमणि १६९
मुहियउ हुवउ ण को वि इह १५३
सुहु मारउ मणुयत्तगह ४
हयगयसुणहह दारियह ८२
हवारमह मणुयगर १६३
हारिउ ते धणु अप्पमउ ८४
हियकमरिणि रासहरधवल २१३
होइ वणिजु ण पोलिहि १०९
HIS
Y

शुद्धिपत्र.
अर्थ की दृष्टि से दोहों के पाट व अनुवाद में जो सुधार
किये जा सकते है वे टिप्पनी में तलाये गये हैं। यहां केर
प्रेस की अशुद्धियों का शोधन किया जाता है।
दोहा न.
अशुद्ध
९
६७
मणुसजम्मु
पलिउ
पिडित
उप्पजई
घम्मु
णिट्टणी
मिल्लही
माणुसजम्मु'
पालि
पडिउ
उप्पल
घम्
मिट्ठडी
मिलहि
१३३

कारंजा से दो ग्रन्थगालाएं प्रकाशित हो रही हैं
जिनमें निस लिखित अपभ्रंश भाषा के ग्रन्थ
प्रकाशित हो चुके हैं-
जसहरचरिउ पुष्पदन्त कृत
सावयधम्मदोहा
णायकुमारचरिउ पुष्पदन्त कृत
निम्न लिखित अपभ्रंश अन्य शीघ्र ही क्रमश प्रकाशित होने वाले है-
...
करकंउचरिउ - कनकामनुनि रुत.
पाहुड दोहा
सुईसणचरित - नयनन्दि छत
अपभ्रंशकथासंग्रह
पासचरिउ - पानन्दि कृत
सम्बसागि चरिउ - वीर कृत
महापुरापा-पुष्पदन्त हात
फयाकोप-श्रीचन्द्र कृत
पउनचरिउ - स्वयंभू एन
हरिवंशपुराण -
मिउनका पता-मोतीलाल बनारसीदास,
पंजार संस्थान पुकडिपो, लाहोर.

I runt 1 from type LT I Pall at the Samarali
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A
Pahuhed by Seti Gopal Ambajas Cunwire,
Kanna Besar (Indon)

Savayadhammadoha Vol-ii

Author
Jain,hirala
Title
Savayadhammadoha Vol-ii
File name
Savayadhammadoha Vol-ii
Text
OCR done
Citation
1932
Published
2012/08
Publisher
Berar.,karanja Jaina Publication Society
Language
Sanskrit
Pages
160
Library
Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
DLI number
313161
Barcode
99999990321876.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
YsqaRF2kjUl
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