Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner

Hindi Rachna Prabodh

Sharma,rajhans · 2011/01

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हिन्दी-रचना-प्रबोध
परिवर्दित और सशोधित
: युक्त प्रदेशीय High School Examination
तया
धाव-यूनिवर्सिटी की Ifitel F 0 L और हिन्दी रन
काशी विश्व विद्यालय की प्रवेशिका (Admission)
यू० पी० डिपार्टमेण्टल एडवास हिन्दी परीक्षा और
वाक्यूलरफाइनल के टीनर्म व पटना-यूनिवर्सिटी
Matuculation sale format
साहित्य-सम्मेलन की प्रथमा
परीक्षा के लिय
पाठ्य पुस्तक
FL)
रत्नाश्रम, आगरा
सपत १६८६ वि०
गर्मा विशारद रणाश्रम फाइन आरस प्रिंटिंग बकस् आगरा
[मु० सजिल्द)

. ur विषय-सूची पहला अव्याय विषय पृष्ठ व्याजना विषय -एक शब्द के अनेक -हिन्दी भापा और उसका घाच्यार्थ शब्द-भण्डार ह-एक से पाच्याओं का भापा सूक्ष्म-भेद ३५ भाषाओं का शादि लोत १०-शन्दों का वर्गीकरण ३८ आर्यभाषाओं की शब्दसमता २ ११-कारक हिन्दी-भाषा की उत्पत्ति ३ द्वितीय अध्याय हिन्दी-भाषा का विकास हिन्दी की व्यापकता है वाक्य-विचार हिन्दी-मापायाशब्द-भण्डार ११ वाक्य २-शन्दव्युत्पत्ति -वाक्यांश उपसर्ग के योग में ३-वाक्य-खण्ड २५ सदित और कृन्दत से बने ४-चापय भेद सरल वाफ्य ४६ पुनरुत-पद जटिल शक्य समास द्वारा बने हुए शब्द यौगिक वाक्य अनुकरण-वाचक शब्द -वाक्य-विश्लेषण पून ३-हिन्दी में तत्सम प्रयोग २४ ६-कारक और उनकी ४-साधारण प्रयोग २७ विभक्तियाँ धू-धारची फारली के शब्द २% ७-चाक्य रचना ६-थग्रेजी श्रादि के शब्द ३१ ७-शन्दों में अर्थ शकि ह-रिक्त-पद-पूर्ति अमिधा ३२ / १०-विराम-चिह्न ३३ / ११ वाक्यों के आकार भेद७५ -पद परिचय " । पष्टता भाषण वैचित्र तृतीय अध्याय विषय दोप वाक्य-रचना सा अभ्यास गति- पिपय १-वायरों का विस्तार माधुय्य और सोच पद-प्रयोग की साधना ११% -पाक्य परिवर्तन चित्तापरता ३-चाच्चोग्याध्यान्तर मुयमारता है-अलस्त-वाक्य -घाइयों का रूपान्तर ६२ भाव प्रतिपादन ६-चाययाश और पदाश १२० पर पूरा वाक्य बनाना६५ गद्य १२१ ७-मुहाधिरों पर वाक्य रचना के लिये ज्ञातव्य रचना ६५ बात (२) -शन्दों पर अनुच्छेद- पचम अध्याय इचना --मुहाविरों पर श्रद्धेद १०४ पत्र लेसन- १०-कहावतों के प्रयोग १०१ शिष्टाचार १२५ ११-बाच्यार्थ, भावार्थ तात्पर्य और व्यारया १९१ पुगनी प्रथा का गमूना १२८ नवीन प्रथा का नमूना २२६ चतुर्थ अध्याय पप्ठम अध्याय रचना के लिये ज्ञातव्य प्रबन्ध रचना का प्रारमिक अभ्यास ११४ पाठ और कहानिया का १३/ १२५ मानी जान २०१ मुख्य विषय बातें (१) .8 सातवा अध्याय सम्राट अशोक प्रबन्ध रचना का अभ्यास विषय पृष्ठ विषय की अभिज्ञता प्रवन्ध-भेद १३५ वर्णनात्मर १३५ स्थात्मक १३५ व्यारपात्मक यालोचनात्मक प्रवन्ध का ढाँचा १३७ प्रारम्भ विस्तार समाप्ति शहर चॉदी ताजमहल विषय भगिनी निवेदिता ૨૫૨ महात्मा गोखले १५५ दिल्ली में अशोक स्तम्भ १५८ १६० व्याख्यात्मक-निबन्ध श्रावणी पूर्णिमा और रक्षामन्धन मुढा-यत्र १६४ नहर मा बाप कीश्रामा मानना १८ रामायण देशी-कारीगरी १७२ १७३ १७५ १७७ स्वार्थ १७६ ६७० १३६ | फलों का आहार १३६ विद्या १४० सन्ताप कुछ सूचियाँ १४३ | धीरज थागण घोडा १४३ १४५ १८२ पश्चात्ताप प्रसन्नता १८४ १४६१ मित्रता १८५ १७ काम एफ पहाडी दृश्य कथात्मक-निबन्ध कुछ सूचियों

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हिन्दी-रचना-प्रबोध
प्रथम अध्याय
हिन्दी-भाषा और उसका शब्द-भण्डार
भापा
भाषा यन्धन है । समाज विशेष को एक सूत्र में गॉधने का
साधन है। एक ही भाषा बोलने वाला समाज विशेष एक
जाति है। अपनी ही जाति के व्यक्ति अपनी भाषा द्वारा अपना
भाव आपस में एक दूसरे को समझाते है और दूसगै का
समझते हे। इस प्रकार अनेक मानव-समाजों की अनेक नापाएँ
है। भाषा-भेद से समान-भेद है, जाति भेद है।
भाषाओं का आदि स्रोत
परन्तु जय इन भिन्न भिन्न भाषाओं का सूक्ष्म विश्लपण
करते है तो प्रत्येक मापा के मुख्य मुख्य व्यवहारिक शब्दों में
एक अजीव समता पाई जाती है। भाषा विज्ञानियों ने बडे
परिश्रम से खोजबीन करके निश्चित किया है कि ससार की
सारी भाषाएँ तीन भागों में वॉटी जा सकती है
आर्य-मापाऍ-इसभाग में सस्कृत, प्राकृत ओर उसमे
निकली हुई हिन्दी, बॅगला, मराठी, गुजराती आदि प्रचलित
धाऱ्या मापा' तथा अगरेजी फारसी, यूनानी, लैटिन नादि हे ।

शामी भाषाएँ--इब्रानी, हबशी और अरवी आदि है। तूरानी-मापाएँ-मुगली चीनी, जापानी, तुर्को थोर दक्षिण भारतीय सापाएँ हैं। आर्य-भाषाओं की शब्द-समता . सस्थत मीडी फारसी यूनानी लैटिन अँगरेजी हिन्दी पितृ पतर पिदर पाटेर पेटर फादर पिता दुहित दुग्वर धिमाटेर डाटर धी माए मतर माटेर माता भ्रात मतर निरादर काटेर प्रटेर नाम नाम श्रोनोमा नामन नेम अस्मि ऐमी ददामि दवामि दिहम डिडोमा डो ऐम Mes इस प्रकार के हजारों शब्द है जो सिद्ध करते हैं कि इन भाषाओं के क्रम विकास के मूल में एक ऐसी भाषा अवश्य है जिसने इन सब का सामान्य सम्बन्ध है। सम्भव है वैदिक सस्कृत इन सब का उद्गम हो, या उससे भी परे कोई ऐसी भाषा हो जिससे इन सब का जन्म हुश्रा हो। इस विपर में यह निश्चित अनुमान होता है कि प्रारम्भ में श्रार्य-लोग अपने গাহিম খান ৪ দাগ যক্ষ্মীখ ঃী অবনী মাথায়ী को ले गये । पश्चिम में ग्रीक, लैटिन, अंगरेजी श्रादि भापानी की नीम पडी। फारम में मीडी द्वारा फारसी, ओर भारत में सस्टन का प्रचार हुथा। योगपीय विद्वानों का मत है कि आदिम स्थान हिन्दुकुश के पार मध्य एशिया है, और भारतीय अनेक विद्वानों का विचार है कि श्रादिम स्थान काश्मीर या उसका - उत्तरीय प्रदेश है, यहीं से आर्य लोग चारों ओर गये और अपनी सभ्यता तथा भाषा का प्रचार किया । हिन्दी भाषा की उत्पत्ति हिन्दी भाषा की उत्पत्ति के सम्बन्ध म विद्वानों की भिन्न भिन्न सम्मतियाँ है, किन्तु इसमें सर का एक ही मत है कि हिन्दी की मुख्य जननी प्राकृत भाषाए है । भेद इस बात में है कि इन परम्परागत प्राकृता की मुख्य जननी कौनसी भाषा है । कुछ लोगों का विचार हे कि वेदिक भाषा या पुरानी मस्कृत धीरे पीरे प्राकृत के रूप में बदलने लगी, अर्थात् आर्य लोग जन अपने आदिम-स्थान से दक्षिण पूर्व भारत की ओर बढने लगे तो यहाँ अनार्य लोगों की भाषा का उसमें समिश्रण सुश्रावही प्राकृत भाषा कहलाई। प्राकृत के भी कई भेद थे। उन्हीं में से एक का सत्कार करके उसे परिमार्जित किया ।वही परिमार्जित भापा सस्कृत हुई । किन्तु प्राकृत निरन्तर बदलती हुई धागे बढती गई, जिससे पाली श्रादि अन्य प्रारुतों का जन्म शुश्रा। इन बहुत सी प्राकृतों का भी अपभ्रश हुआ । इन्ही अपनी से प्राचीन हिन्दी का जन्म हुआ। अनेक विद्वानों का मत है कि वैदिक सस्कृत से प्रौढकालीन साहित्यिक सस्कृत का विकास हुअा। उसीसाहित्यिक सस्कृत से प्राकृता का क्रम विकास हुश्रा । कतिपय विद्वान यह भी कहते है कि एक ओर वैदिक भाषा से साहित्यिक सस्कृत, दूसरी ओर श्राप प्राकृत का जन्म हुआओर दोनों का प्रवाह फिर एक हो गया, जिससे अनेक प्राकृतों की जननी पाली नामक प्राकृत पैदा हुई, उससे मागधी, शौरसेनी, महाराष्ट्री आदि प्रारुते वनीं । शौरसेनी और माग पी के पीच में अर्द्ध मागत्री नामक प्रारुत का जन्म हुआ। .

। इन सब प्राकृता से अपनशमापा' वनीं । शोरसेनी मध्य- प्रदश (प्रजमण्डल) मागधी विहार, श्रर्द्धमागधी दोनों के बीच में बोली जाती थी। श्रावन्ती अवन्तिका (उजैन) की माया थी। इनसे जन्मी हुई अपभ्रश गुजरात से लेकर विहार तक व्यापक हो गई। अपभ्रश के तीन भेद थे नागर, उपनागर ओर याचड । सब में मुख्य शौरसेनी प्राकृत की नागर नामकनपनय भाषा (जो मध्यप्रदेश में बोली जाती थी) सारे उत्तरी भारत की साहित्यिक भाषा होगई । यही शोरसेनी अपनश हमारी हिन्दी का मूल स्रोत है। कुछ लोग इसे पुरानी हिन्दी भी कहते हैं, जिसकी झलक चन्दवरदायी के गमों में मिलती है। अनेक लोगों का मत है कि प्राकृत स्वय मूल भाषा है,उसी से अन्य प्राकृतों का जन्म हुआ। किन्तु यह मत अधिक युक्ति युक्त नहीं। नीचे लिखी शट-तालिकाओं से पता चल जायगा कि हमारी भाषा के अधिकाश शन्द (मुख्य मुख्य व्यावहारिक शब्द) सस्कृत के है, जो प्राकृत यन्ते हुए हिन्दी में पाये है अग्नि बुद्धि पोडस शिति दधि पुरानी प्राकृत पाली प्राकृत हिन्दी अग्गिा अग्गि अग्गी आग बुद्धि बुद्धि बुद्धी बुद्धि सोलस सोलस सोलह सोलह वीसा बीसति, बीसम् वीसा वीस दहि, दहिम् दधि दहि दहिम् दही प्रात हिन्दी हसति कपते युध्यते कॅप कॅपैकॉपे বু লুট हिन्दी रासे, रक्ने फाम काहिल सस्कृत নির फर्म कातर अन्त पुर अद्य भगिनी दुहिता प्रारुत रफ्पद कम्म काहल श्रान्डेउर श्राज पहिन धी वृक्ष प्रभूत विद्युत् शय्या तैलम् पहिणी धिया ग्यवो बहुत विज्नु सेजा तेल्ल यहुत चिजली सेज तेल कान्हा पीहर ढीला ग्यारह पर थामयासम्भ हाथ पितृगृह शिथिल एकादश मदिर स्तम पियघर सढिल पहारह पइर हिन्दी गहिरा हम, मे सस्कृत गम्भीरम् यहम् स्यम् यातुलत् उपाध्याय मृत्तिका घृतम् पाली गहिरम् अम्मि तुत्र पाउलो उपम्झयो मटिमा घियम् तुम, तू चावला श्रोमा मट्टी घी - बसन्त, इन उदाहरणों से यह सिद्ध हो जाता है कि सस्कृत प्राकृत और हिन्दी शब्दों का कितना घनिष्ठ सम्बन्ध है, साथ ही इस मत का खण्डन हो जाता है कि प्राकृत मूल भाषा है । प्राकृतों के शन्द-भण्डार का ही नहीं, व्याकरण का भी अनुशीलन करने से स्पष्ट हो जाता है कि इनको सस्कृत जननी है और प्राकृतो से हिन्दी का जन्म हुआ है । श्रत परम्परागत सम्बन्ध तो है ही, पर बहुत से ऐसे शब्द है जो सीधे सस्कृत से हिन्दी में आ है और नाज तक उनका वही रूप प्रचलित है, जैसे तन, मन, वन, जन, शूर, वर्षा, समुद्र, साधु, सन्त, दिन, काम, रात्रि, राजा, कवि, श्रादि । हिन्दी भापा का विकास -वीं शताब्दी से लेकर १२ वी शताब्दी तक अपभ्रशों का समय है। इसी समय में हिन्दी भाषा का प्रकुर जमा है। सन्धि काल की भाषा का कोई ग्रन्थ प्राप्त नहीं है। पहिले पहल इसकी झलक चन्द के पृथ्वीराज गसो में मिलती है । बहुत लोगों का अनुमान है, रासो उस अपभ्रश की हिन्दी में है जो आगे चलकर गजपूताने की भाषा बनी है।" अब भी रासो के प्रयोग राजपूताने में प्रचलित है । राजपूताने की कषिता की भापा डिंगल है। कुछ लोग डिंगल-भापा का ही इसे श्रादि ग्रन्य मानते हैं। ऐसा मानने पर भी सन्धिकाल की हिन्दी का बहुत कुछ पता इस ग्रन्थ से मिलता है। आदि में भाषा बहुत कुछ परिष्कृत होकर लाहित्य निर्माण के योग्य नती है। विशेष कर पद्य की भापा बनने में तो ओर भी ममय लगता है । रासो के साथ ही बुन्देलखण्ड में जगनिक कधि ने श्राला नामक ग्रन्थ लिपा, किन्तु असली ग्रन्थ का पना नहीं चलता। प्रान्तीय कवियों ने पीछे से यह ग्रन्थ अपनी 1

अपनी माग में कर लिया। इसके पीछे पद्य का पूर्ण विकास हुया।
यद्यपि खुसरा ने पडी गोली में कुछ रचनाएँ की, जायसी ने
अवधी में पावन लिखा, तुलसीदास ने वैसवाडी में
रामायण आदि अन्य रचे, नथापि वेष्ण कविया के प्रभार
से ब्रजभापा का पूर्ण भागाध हो गया । माय उत्तरी भारत
में काव्य को यह भवान भाषा पन गई। समाज में नयी
धारणा, नयो शिक्षा और नये विचागे से नया उत्साह हुमा
और कविता भी पोलचाल की भाषा में होने लगी । परन्तु
आज भी अवधी, विहारी, पजागा, मगठी आदि भाषाओं में
युछ प्रान्तीय कवि रचना करते हैं और करते पाये है, किन्तु
ब्रजभाषा का साम्राज्य एकदम उठ नहीं गया है। निहार,
अवध, प्रजमण्डल, गजपूताने आदि में अब भी अनेक फरियों
की कविता का माध्यम जभाषा है। धीरे धीरे पडी बोली
के पा का प्रचार बढ रहा है।जमाने की रफ्तार से आये हुए
नये मावों का पोल चाल की भाषा में व्यक्त करने में अधिक
सहुलियत हे । यह तो रही पद्य की रात गद्य का १३ वीं
शताब्दी से पहले कोई पता नहीं चलता ! मारवाड की उछ
सनदों म वहाँ की भाषा के नमूने मिलते है । २५ वी शताली
के प्रारम्भ में पाया गोरखनाथ जी की जभाषा रचना
मिलती है । १७ ची शनादी में गोस्वामी विठ्ठलनाथ, गगभाट,
गोगोकुलनाथ, महात्मा नामाटान तथा तटमल आदि ने
गद्य रचना की है। अधिकाश इन लोगों ने ब्रजभाषा गद्य में
ही लिखी। हॉगमगाट और जरमल ने प्रजभाषा गद्य म
खड़ी बोली का पुट दिया। १८ वी सदीग देव, सूति मित्र,
दास और ललितकिशोरी श्रादि ने भी नामापाशी गद्य ही में
रचना की। इसक पाट १६वीं शताब्दी के मध्य म राडी
बोली का उदय एमा।
--

यद्यपि लल्लूलाल जी से पहले कुछ गद्य लेखकों का पता चलता है तथापि सर्वसाधारण में प्रकाश पहुँचाने वाली उनकी कोई रचना सामने नहीं आई । लल्लूलाल को ही यह श्रेय मिला । उन्होंने १८६० में प्रेमसागर प्रागरे की बोली में लिखा । उन्ही के समकालीन सदल मिथ हुए। प्रजभाषा से खड़ी बोली पृथक् हो रही है, लल्लूलाल की रचना में इसका चित्र स्पष्ट दिखाई देता है। उन्होंने राजनीति अादि पुस्तकें शुद्ध व्रजभापा गद्य में भी लिखी है । इसके बाद राजा शिव- प्रसाद की सडी बोली में श्ररी फारसी क विशेष शन्दों का प्रयोग हुआ । परन्तु गजा सक्ष्मणसिंह की विशुद्ध हिन्दी भाषा में एक भी थरवी, फारसी का शब्द नहीं है। राजा लक्ष्मणसिंह की शकुन्तला का गद्य शुद्ध आगरे की खड़ी बोली में है। इसके बाद भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने हिन्दी को परिष्कृत किया। सस्कृत के अनेक शब्द इनकी भाषा में मिल गये, जिससे भाषा की व्यसकशक्ति बहुत बढ गई। श्राधुनिक हिन्दी की उन्नति का पूर्ण श्रेय हरिश्चन्द्र ही को है । बालकृष्णमह, अम्बिकादत्त व्यास, प्रतापनारायण मिश्र, बालमुकन्दगुप्त तथा महावीरप्रसाद द्विवेदी आदि अनेक महानुभावों की रचनाओं से हिन्दी गध का कलेवर पुष्ट हुश्रा । पश्चात् सैकडो गएय- मान्य लेखकों की लेखनी से भापा की वृद्धि हुई और हो रही है। अनेक अनुवादक प्रान्तीय तथा विदेशी भाषा के उत्कृष्ट ग्रन्थों का अनुवाद करके उसमें नये नये मुहाविरे और प्रयोगों की वृद्धि कर रहे हैं । आये दिन हिन्दी को उच्च शिक्षा का माध्यम बनाने का प्रयत्न भाषा की पूर्ण श्रीवृद्धि करेगा पेसा विश्वास है। हिन्दी की व्यापकता यह तो निश्चय हो चुका है कि उर्दू हिन्दी ही की एक शाया है, और मगठी, गुजगती तथा यगाली प्राठि हिन्दी की रहिन है। यगाली उसी भागधी के अपम्रग की प्रतिच्छाया है, जिससे बिहारी हिन्दी की कुछ उप भापायें निकली है । विद्या- पति की रचनाएँ हिन्दी और बगला का सम्बन्ध दिखाती है। पुराना गुजगती तो पुरानी हिन्दी से बहुत मिलती जुलती हे गुजराती की पुरानी कविता, ब्रजभाषा की कविता से टकर पाती है। गुजराती पर पारसी भाषा का जो प्रभाव पडा है, उससे उसके रूप में कुछ विशेष परिवर्तन हुआ है। हिन्दी मगठी, गुजराती ओर बगला का अधिकाश शब्द- भण्डार प्राकृतों और मस्कृत मे भिन्न भिन्न प्रवाहाँ द्वारा याया। अपने ही क्षेत्र में हिन्दी भी भिन्न भिन्न रूपों में घटी हुई है। बिहार में मैथिल, भोजपुरी, मगही आदि मागधी से उत्पन्न हुई है। यह व्यापक हिन्दी का एक भेद ही ह । यद्यपि इनकी उत्पत्ति के साथ उडिया और बगला का नाम लिया जाता है , पयोंकि यह भी मागणी के अपभ्रश से रनी है। इधर पुगने मध्य प्रदेश (ब्रजमण्डल ) और उसके आस पास म ब्रजभाषा और उससे मिलती जुलती बुंदेली, वघेली, कन्नोजी श्रादि भाषाएँ है जो धीरे धीरे सामान्य हिन्दी में बदल रही है। पजानी भाषा को कुछ लोग स्वतत्र मापा मानते हैं, परन्तु यह पश्चिमी हिन्दी से बहुत सम्बन्ध रपती है। हरि- यानी जो हिसार करनाल और रोहतक में बोली जाती है पजाची, मारवाडी ओर पश्चिमी हिन्दी का समिश्रण है। मारवाडी भापा भी हिन्दी का एक उपभेद है। ये सब प्रान्तिक हिन्दी भाषाएँ अपने अपने प्रान्तमें बोली जाती है-सामान्य

-
(१०)
हिन्दी का एक भेद है जो दिल्ली और मेरठ तथा उसके पास
पास चोली जाती है । श्रागरे की भाषा भी शुद्ध हिन्दी है,
जिसमें पहिले पहल लल्लूलाल ने प्रेमसागर लिखा था।
आगरे को शुद्ध बोली का ठीक रुप राजा लक्षमणसिंह कृत
अभिज्ञान शकुन्तला नाटक के गद्य में है। यही दिन प्रात
दिन बढती हुई शुद्ध और परिमार्जित हिन्दी है, जिसे खडीवोली
भी कहते है । साहित्यिक और शिक्षा की भाषा तो समस्त
उत्तरी भारत की हो गई है, पर मेरठ, दिरली, आगरा आदि
की ही भॉति अनेक उत्तर भारतीय नगरों की वोलचाल की
मापा बन रही है।
साधारणतया इस सामान्य हिन्दी के तीन भेद हे
१-विशुद्ध हिन्दी-जिसमें अधिकतर सस्कृत के
तद्भव शब्दों का प्रयोग होता है।
२-उर्दू-जिसमें सस्कृत के तत्सम और
तद्भव
शन्दों का स्थान थरवी फारसी के शब्दों ने ले लिया है।
असल में यह हिन्दी का ही एक भेद है, जिसे फारसी
अनरी में लिखते है।
३--हिन्दोस्तानी-जिसमें घोलचाल के साधारण
शन्दों का अधिक प्रयोग होता है, यह हिन्दी उर्दू के बीच का
रूप है।
हिन्दी का शब्द-मडार
प्राचीन काल से ही हमारी भाषा का कोई विशेष नाम न
होकर उसे केवल भाषा ही कहते है । वैदिक और साहित्यिक
सस्टत में भी भाषा ही का प्रयोग है । हिन्दी का भी पुराना
नाम भाषा ही है । तुलसीदास जी ने अपने काव्य में भापा
ही शब्द लिखा है।
तत्सम श्रोर

"भाषा न करप में सोई" "का भापा का सस्कृत प्रेम चाहिये साँच" "भापाजे हरि चरित खाने' एक पुराना श्लोक हे मस्कृत प्रारत चेच सूरसैन च मागरम् । पारसीक्मपभ्रशम् भापाया लक्षणानि पट । अर्थात् हिन्दी भाषा व है जिसमें सस्कृत, प्राकृत, शौर- सेनी, मागगी, अपन श और फारसी शब्द मिले हो। कविवर भिपारीदास जी ने कहा है 'ब्रजभापा भाषा रुचिर कहें सुमति सर कोय । मिले सस्कृत पारस्या पे अति सुगम जु होय ॥" अर्थात् हमारी हिन्दी का जो शब्द-समुदाय है उसम सस्कृत श्रादि देशीय भाषाओं के साथ फारनी, अग्ची श्रादि निदेशी भाषाला के शट भी मिले हुए है। कविवर भिसारीदास जी ने सस्कृत पारसी दो नाम गिनाये है । दासजी का अर्थ लक्षणापूर्ण है। उन्होंने सस्कृत से सस्तादि प्राकृत भापार ली है। और पारसी स पारसी, अरवी श्रादि भापाएँ ली है । किसी कवि ने कहा ह 'तुलसी गग दोऊ भये मुकथिन के सरदार । जिनकी काव्यन में मिलीभाषा विविध प्रकार ॥" आज कल इस विधि की सरया ओर मी रह गई है। इसमें अगरेजी, पोर्तगीज शादि के शन्द भी मिल गये है। इस प्रकार १-सस्कृत के शब्द २-प्राकृत के शब्द

(१०)
३-अरवी के शब्द
४-फारसी के शब्द
५-अँगरेजी श्रादि यूरोपियन भाषाओं के शब्द
६-प्रान्तीय भाषाओं के शन्द
-देशज शन्द (जो न सरकत से उत्पन्न हुए न किसी
दूसरी भाषानी से ) जिसमें अनुकरण याचक शब्द भी
सम्मिलित है।
सस्कृतादि से उसी रूप में आने वाले शट तत्सम कहाते
है, जैसे-हृदय, अग्नि, आकाश ।
सस्कृत से विकृत होते हुए प्राकृत के शब्द तद्भव कहाते
है, जैसे-काम, (कार्य), हाथ, ( हस्त), घर, (गृह)।।
अरबी-फारसी के शब्द भी तत्सम और तद्भव दोनों
रूप में आते है, जैसे
तत्सम-गाफिल, मजदूर, याजार, फिहरिस्त, नकल,
दारोगा।
तद्भव-मजदूर, बजार, फैरिस्त, नकल, दरोगा आदि ।
अगरेजी आदि के भी दोनों प्रकार के शब्द काम में
आते है।
तत्सम-फिटन, रेल, होरडर, टेबुल, चेयर ।
तद्भव-कलक्टर, लालटेन, अजन, लकलाट ।
प्रान्तीय भाषाओं के शब्द
मराठी-लाग, चाल वाडा आदि।
पगला--उपन्यास, मनुसघान, अध्यवसाय,
अनूदित, गल्प, मनुशीलन आदि ।
-

-
अनुकरण पाचक-जो किसी पक्षी की स्वाभाविक किया
महति को किसी स्वाभाविक हरकत अथवा किसी पदार्थ की
ध्वनि का अनुकरण हो जैसे--फरफर, पटापट, चटपट,
फॉरमॉन श्रादि ।
अभ्यास
--भाषा घोर समाज म क्या सम्बन्ध
२. योरो सिद्ध होता है शिप्रारभ में मापाभा क पहुन थाहे भेद थे ?
३-शार्य मापाएँ यौन कौन है ? यौन पहों योनी जाती हे"
४--हिन्दी को टपत्ति और विशस प्रकार नियो ?
५---दिगे भाषा में नि२ भाषा शब्द मिले हैं।
६-१० सस्कृत के सम ,और १० तद्भव शन्द लियो ?
--युध अरषी फारसी तथा अगरेजी के तद्भव शब्दों के नाम
गिनायो ?
देशा शब्द क्या कहते है १ कुछ देशज शन्दों पी नामावी
दिसायो
यागिक शब्द
हिन्दी भाषा में मुरयत शब्द तीन प्रकार से बनाये जाते
है, शदों के पूर्व उपसर्ग के योग से शब्दों के पीछे प्रत्यय
लगाकर और समास को रीति से। इनके सिवाय एक ही
शाद को दुहगने, दो समानार्थक वा विपरीतार्थक शब्दों के
प्रयोग में तथा किमी पदार्थ या प्राणी की ध्वनि या चोली के
अनुकरण में भी नये शब्द बनाये जाते है जिन्हें क्रम से पुन
रुक्त अथवा अनुकरण चाचफ शन करते है।
उपसर्ग के योग में
कुछ नन्यय धातु के साथ मिल कर खास खाम श्रर्थ
प्रकाशित करते है इस प्रकार के अव्ययों को 'उपसर्ग'

कहते हैं । उपसर्ग यातु के साथ मिलकर या तो किसी धातु के अर्थ को उलटा कर देते है, अथवा उसमें विशेषता पैदा करदेते हैं, जैसे प्रादान और प्रागमन में 'पा' उपसर्ग 'दा'और 'गम्'धातु के विपरीत अर्थ प्रकाशित करता है। परिदर्शन और परिभ्रमण से उपसर्ग द्वारा दर्शन और भ्रमण का अर्थ ही धोतित होता है। 'प्रदान' में 'प्र' उपसर्ग से किसी प्रकार का हर फेर नही होता। पद उपसर्ग धातु नर्थ आदान अन लेना प्रदान दा देना निदान नि दा हेतु उपादान दा कारण - प्रत्यय श्रा न अन उप अन उपसर्ग मूल पद अर्थ कार शाकार सूरत फार प्रकार भॉति वि कार विकार बुराई उप कार उपकार मलाई प्रति कार प्रतिकार गेक,बदला सम् कार सस्कार शोधन 'कृ' धातु से "अ" प्रत्यय के योग से कार पद चना है। इसी भॉति 'भू' धातु से-सभष, विभव पगभव, अनुभव, उद्भव प्रभव, प्रभाघ। 'ह'धातुसे-माहार, प्रहार, सहार, विहार, उपहार, व्यवहार। -

-1
।
। १५ )
- 'पद' पातु से-सम्पदा, आपदा, विपदा सम्पत्ति, निष्पत्ति,
उत्पत्ति, धापत्ति।
- 'स्था' यातुले-स्थान, सस्थान, अवस्थान अनुष्ठान, सस्था,
अपस्था, व्यवस्था।
'दिश्' धातुसे-श्रादेश, प्रदेश, विदेश, उपदेश ।
F 'कृ' धातु से--अधिकार, उपकार, प्रतिकार, विकार, आकार,
सस्कार दुष्कर।
'चर धातु से-उपचार, विचार, प्राचार ।
'क्रम'धातु से-अतिकम, विक्रम, थाक्रमण, उपक्रम, पराक्रम ।
'' धातु से-श्राशा, मज्ञा, प्रज्ञा, उपशा ।
कुछ अव्यय और विशेपण भी उपसर्ग का काम देते है।
अ-अभाव, अज्ञान, अनीति, अनेक ।
अधस्-अध पतन, अधोभाग।
पुन-पुनर्जन्म, पुनर्विवाह, पुनरुक्ति ।
स-सजीवन, सफल, सहित, सगोन ।
चिर-चिरकाल, चिरजीधि ।
सत-मजन, सत्कर्म, सद्गुरु आदि।
हिन्दी उपसर्ग
अ-अजान, अचेत, अलग, श्रधेर
अध-अधश्चा, अधपका,
औ-ौगुण, औघड।
नि-निकम्मा, निठल्ल, निडर ।
सु-सुडौल, सुधर, सुजान !
अधेड।

- उर्दू उपमर्ग सु-पुशदिल, खुशबू । गै-गैरमुमकिन, गैरहाजिर । ना-नाराज, नापनन्द नालायक। यद---बदनाम, बदमाश। वे-बेचारा, बेईमान घेतरह । सर--सरकार, सरदार सरताज ! हर-हररोज, हरसाल, हरघडी। प्रत्यय के योग में प्रत्यय दो प्रकार के होते हे, कृदन्त और तद्धित । कृदन्त-क्रिया या धातु के अन्त में प्रत्यय लगा र जो शब्द बनते है। सस्कृत कृदन्त ले बने विशेष्य 'अ' प्रत्यय के योग में.-- कृ वातु से कारक, नी से नायक, पौ से पावक, पाचन, गे से गायन, वा से दायर, जन ले जनक आदि कर्तृवाचक शब्द बनते हैं। 'अन' ( अनट ) प्रत्यय के योग में नीस नयन, लोच से लाचन, चर से चरण, ससे करण, साब से सायन, स्था से स्थान, शी ले शयन, भूसे भवन, पक् से पाफ त्यग से त्याग, श्रादि पद भाववाचक धातुश्रा के धागे 'अन' प्रत्यय के योग में.- गम् से गमन, भुज से भोजन, क्षा से ज्ञान, मा से मान, दा से दान, शी से शयन, पत् से पतन, कसे करण, तप से तपन, जल से जलन श्रादि बनते है। पच - बनते है।

- धातु क आगे 'क्ति' प्रत्यत्र के योग में भाववाचक शद-शुध् मे शुद्धि, गम् से गति, मन् मे मति, शम् से शान्ति, पुष् मे पुष्टि, दृश् से दृष्टि, ग्ल से तानि, ग्या से प्याति मा से मिति, स्था से स्थिति, नी से नीति, प्री में प्रीति भी से भीति शादि शन्द बनते है। मस्कृत कृदन्त से ने निशेपण । । धातु . पूजने योग्य। ब अपहरण (ह.) मे अपहन, उपकार (कृ) मे उपकृत, सतोष (तुए ) सतुष्ट, भय ( भी ; मे भीत । मयय विशेषण श्रर्थ तव्य कर्तव्य करने योग्य । दा तव्य दातव्य देने योग्य। गम् तव्य गन्तन्य जाने योग्य। नीय पूजनीय त (क्त) जित जीता हुश्रा। त (क्त) मृत मरा था। पू त (क्त) पूत शुद्ध श्रा। पत् इत (क्त) पतित गिरा हुना। विश्वास विश्वस इत (क्त) विश्वसित } मुर्ला इत (क्त) मृद्धित मर्जा प्राप्त। रोग प्रसित। रुज गम् णिन गामी चलने वाला। सह सहिष्णु सहने वाला। किया हुआ

हिन्दी कृदन्त से बने विशेष्य
.
भाववाचक शब्द:-
मारना से मार, दौडना से दौड, सोचना विचारना से
सोच विचार, उठना से उठान, उतरना से उतार, चढना स
चढाव, हँसना से हँसी बनना से बनाव, निकलना से निकाम,
पीसना से पिसान, रटना से रट, चिल्लाना से चिल्लाहट,
रुकना से रुकावट, मिलना ले मिलावट, पढ़ना से बाढ़, चढ़ना
से चढाई, लडना से लडई, लिखना से लिखाई ।
.
कर्मवाच्य
ओढ़ना से श्रोढनी, सूंघना से सुँघनी ।
करण वाच्य
कतरना से कतरनी, छानने से छननी, ढकना से ढकन,
बुहारना से बुहारी, सुमिरना से सुमिरनी, झलना से झूला,
ठेलना से ठेला, घेरना से घेरा आदि।
कत्र्तृव्याच्य में
जडना से जडिया, धुनना से धुनिया।
हिन्दी कृदन्त से बने विशेपण
टिकना से टिकाऊ विकना से विकाऊ, सुहाना से सुहा-
चना, लुभाना से लुभावना, उडना स उडाकू हसना से हॅसने
वाला, ढालना से ढलबॉ, जडना से जडाऊ, चलना से चाल
पीना से पीने योग्य,झगडना से झगडालू , समझना से समझ
दार, मिलना से मिलनसार होना से होनहार, लडना से
लडाक, गाना मे गवैया, खेलना से खिलाडी,मॉगना सेमॅगैनू,
तैग्ना से तैगक, अडना से अडियल, सडना से सडियल ।
,

( 8 )
संस्कृत तद्धित मे बने पिशष्य
मूल अर्थ में
-
बन्धु से बांधव, चोर से चौर, चण्डाल मे चाण्डाल
कुतूहल से कौतूहल, मरुत से मारुत, सेना से सैन्य, निलोक
से प्रैलाश्य, समान से सामान्य ।
मन्तान के शर्थ में
दशरथ से दाशरथि, सुमित्रा स सामित्र, वसुदेव स
वासुदेव, अदिति से प्रादित्य, पृथा मे पार्थ, मनु मे मानव,
गंगा से गागेर दिति से दैत्य ।
दूसरे श्रों में
तर्फ से तार्किक, मर्म से मार्मिक, न्याय से नयायिक,
व्याकरण से वैयाकरण ।
शिन से शैव, विष्ण से वैष्णव, शक्ति से शाक, गणपति से
गाणपत्य।
हिन्दी तद्वित से बने विशेप्य
लडका से लडझाई, लडकपन, वाप से बपोती बूढा म
बुढ़ापा, गाय से गैया, खाट से सटिया,मक्खन सेमस्पनियाँ,
सराफ से सराफा, जाज से रजाजा, भला स भलाई, बुरा
से बुराई, ऊँचा मे ऊँचाई, लम्बा से लम्बाई, चूरी से चुरि-
हारा, सोना से सुनार, मीठा से मिठास, पराठ से फराठी,
सट्टा से सटास, कडुवा ने कडुनाहट, तेल में तेली, मॉप से
सॅपेरा, काँसा से फमेरा, पहुँचे से पहुँची, काठ से कठौता,
सेवा से सेवक ।।
हिन्दी तद्धित से बने रिशेपण
भूख से भूपा, प्यास से प्याला, घर से घरेलू, श्रग्य
अरवी, बनारस मे बनारसी, भॉग मे भेंगेडी, बन से बनेला,
-

( २० ) गेरू से गेरुश्रा मामा से ममेरा, धूम से धुमेला, दुध से दुधैला, दया से दयावन्न, धन से धनवन्त, मति से मतिमान, ठएट से ठण्डा। पुनरुक्त पद . - एक ही अर्थ वाले पद श्रामोद-प्रमोद, हरा-भग, हृष्ट पुष्ट, देख-रेस, श्रद्धाभक्ति, चहलपहल, दानदक्षिणा, दौडधूप,वालचाल, घरद्वार, अनुनय विनय, जीवजन्तु, हाटबाजार, रीनिनीति, बन्धुवांधव, चोर डाकू, श्राहारविहार, सेवासुधूपा । विपरीत अर्य वाले पद प्राय विपरीत अर्थ वाले दो पद साथ साथ आते हैं घट बढ़, नीच-ऊँच, श्रागा पीछा, लैन दैन, सुख दुरा, पाप पुण्य, नया पुगना, स्वर्ग नर्क, उत्तर-दक्षिण, पूर्व पश्चिम, गुण-दोप, लाभ हानि, स्थावर-जगम, छोटे-बडे, जन्म मृत्यु, घटती-बढ़ती, जमा-खर्च, थाना-जाना, श्राय व्यय,भाग-पानी। आविर्भाव तिरोभाव, धनी-दग्द्रि, उत्ष्ट अपकृष्ट, जागृत- सुन, उत्थान पतन, घात प्रतिघात, मुलभ-दुर्लभ, स्वर्ग-नरक, चल अचल, निन्दा-स्तुति,जलचर-थलचर,पुण्य-पाप,सुख दुस्त, पण्डित-मूर्ख, उदय-अस्त, निद्रा-जागृति, शुभाशुभ क्रोध-क्षमा, सयोग-वियोग, लाभ-हानि, हर्ष-विपाद, वादी प्रतिवादी,साधु- असाधु, गहर-भीतर, धनी-निर्धन, उदय-श्रस्त जस अपजस, मार-असार याकाश पाताल, भूचर-खेचर,जय-पराजय, सधि- विग्रह सपद विपद्, पाय व्यय, हस्व दीर्ध, जीवन मरण । . . ..

( २१ )
समाम द्वारा बने हुए पद
मस्कृत समस्तपद।
-
(१) द्वन्द्व समास-माता और पिता, माता पिता।
सद और मूल और फल, कद मूल-फल ।
मन और क्रम और वचन, मन क्रम बचन ।
शहन ओर निशा, अहर्निश । शहन पोर
रात्रि, अहोरात्रि।
(२) तत्पुरुष-(फर्म कारक मे) शरण को श्रागत, शरणात।
कारण-शोक से आकुल, शोकाकुल ।
मोह से अध, मोहाध।
(अपादान में)-शाप से मुक्त शापमुक।
यादि से अन्त, प्राद्यन्त ।
(सम्बन्ध में)-गगा का जल, गगाजल ।
गुरु का उपदेश, गुगेपदेश ।
(अधिकरण में -रथ में श्रारूढ, रथारूढ ।
सेवा में निग्त, सेवानिरत ।
कर्मधारय--परम हे जो ईश्वर, परमेश्वर ।
पग्म है जो सुन्दर, परमसुन्दर
दुष्टा है जो मति, दुष्टमति ।
अरप (अरपा) हे जो युद्धि, अरपबुद्धि ।
साध्वी है जो कामना, लाधुफामना ।
कम्पित हे जो लता कम्पितलता।
बहुनीहि-अप है वुद्धि जिसफी, अल्पबुद्धि ।
स्वच्छ हे तोय जिसका, स्वच्छतोया जल
नष्ट हे मति जिसकी, नएमति ।

( २०) हत होगई पाशा जिसका, हताश । नत हुई शाखा जिसकी, नतशाख । नहीं हे भय जिसे, निर्भय। कमल से नयन है जिसके, कमलनयन। क्रिया विशेषण के भाव में समस्त-पद अव्ययी भाव-कूल के उप ( समीप में ) उपकूल (समीपता के अर्थ में) गृह गृह में, प्रति गृह, प्रतिदिन, अनुकूल धर्म के अभाव में अधर्म, इसी प्रकार अपाप, असुर, निर्विघ्न, दुर्भिक्ष । विधि को यथा (अतिकम न करके) यथाविधि, इसी प्रकार यथायोग, यथामाध्य । थति के प्रति (सामने) प्रत्यक्ष । द्विगु--( सरया-पूर्वक कर्मधाग्य ) धि है जो भुवन, त्रिभुवन। चतु. है जो पद, चतुष्पदी । चार है जो युग, चतुर्युग। - हिन्दी समास मामका रस श्रमरस फूली हुई बरी फुलौरी कान फटे हे जिसके कनफटा माता और पिता मातपिता डर के अभाव में निडर घडक के अभाव में निधडक (तत्पुरुष) (कर्मधारय) (घहुबीहि) (द्वन्द्व) (अव्ययी भाव) ( २३ ) (अव्ययीभाव) " " जानने के अभाव में पेट भरने के भाव में ठीकवीचके भावमें नीली है जोगाय दही की हॉडी दई (देव)मे मारा बन का मानुप राजाओं के पूत मीठा है चोल जिसका अनजान भरपेट वोचोचीच नीलगाय दहेंडी दईमारा नमानुप राजपूत मिठनोला (कर्मधारय) (तत्पुरुप) (तत्पुरुष) (तत्पुरुप) (तत्पुरुष) (बहुव्रीहि ) अनुकरण वाचक खट खट होने से पटाखट खडाऊँ पहन कर खटाखट करते हुए चले। पड पड होने से पडपडाहट थोड़ी ही देर में दल हो पाया पडपडाहट मच गई। सन सन होने से सनसनाहट कुनेन साने से कानों में सन- सनाहट मच गई। चहचहाने से चहचहाहट चिडियों का चहचहाना कैसा मनोहर है। सोयल कुह कुह करती है । कॉव कॉव कोआ की कॉप काँच क्सि भाती है। y में में करते हुए भारेउडरहेथें। चिडिया फुर फुर करती हुई उड गई। धडधड करना रड पडाना एक्दम तापें धडधडाने लगीं।

(२४ )
अभ्यास
1-हिन्दी में शब्द तिने प्रकार से बाते ह ।
-बताइये नीचे लिखे शब्द किस प्रकार के है और किस प्रकार
--
-
नौशन, भान्त, पैतृक, नैतिक, क्रोधित, धुमैला, पार्थिव, धनारसी
दिहलवी, मौसेरा, मार्मिक, धनी, विहार, उसार, श्राचार, अजान, श्रचेत,
निडर, औघट उपसार, भोजन, माधन, पतन, मानव, दैत्य, दलवा,
लुभावना रथारूढ, सन्धिविग्रह, पुण्यपाप, साधुधासाधु, शोशकुल,
चतुप्पदी, त्रिभुवन, कनफटा, हतकरहे, अनजान श्रादि ।
३-हर प्रकार के पाँच पाँच शब्द बनायो-
संस्कृत कृदन्त से बने हुए, हिन्दी कृपन्त से बने हुए, सस्कृत तद्धित
से बने हुए, हिन्दी तद्वित से बने हुए, उपसर्ग से बने हुए, दो शब्दों के
योग से बने हुए तथा अनुकरण से बने हुए ।
हिन्दी में तत्सम प्रयोग
यो तो सहनों रूप हिन्दी में तद्भव रूप में प्रयुक्त होते है
जो हिन्दी की खास सम्पत्ति है, गृह के स्थान पर घर ही
अधिक मौजूं है । "हिये माथे" की फूट गई की जगह "हृदय
और मस्तिष्क" की फट गई, लिखना कैसा जजाल मालूम
पड़ता है। किन्तु जो शब्द तत्सम रूप में प्रचलित है उनको
उसी रूप में लिखना चाहिये ।
तत्सम शन्दों के प्राय समास और सन्धिगत प्रयोगों में
भूल रहती है । शन्दयोजना के समय इन बातों का ध्यान रखना
चाहिये । जहाँ तक हो, शब्दों का प्रयोग सरल रीति पर होना
चाहिये । तद्धितान्त शब्दों में जब तक ठीफ निश्चय न हो उसे
सरल गति पर लिखना चाहिये । शक्ति के उपासक शाक्त कहः
लाते है-जाना लेखक को ठीक ठीक निश्चय न होजाय तर तक

( २५ ) । - 'शाक्त' के बजाय 'शाके के उपासक' ही लिप तो हानि नहीं परन्तु 'शाक्त्य' इत्यादि लिखना ठीक नहीं । वैधव्य की जगह विधन या नव न लिपकर विश्वापन लिखना बुरा न रहेगा । पारिश्रमिक ठीक न हो सके तो परिश्रम का फल ही लिपना काफी होगा । मुजन का भार सौजन्य है । कोई ता प्रत्यय का असध पोझ भी सुजन की पीठ पर लाद कर अपनी याग्यता का परिचय देते है। सोजन्यता की जगह सुजनता अधिक ठीक रहेगा। इसके सिवाय, श,स,प, के प्रयोगों तथा व और य के प्रयोगों में पड़ी भूल रहती है। नीचे की तालिका में साधारण भूलों का दिग्दर्शन कराते है । - शहानी গg अशुद्ध शुद्ध शूद्रा निर्दोषी निदोष निर्धनी निर्धन राजागण राजगण अहोरात्रि अहोरात्र दुगवस्था दुरवस्था निरर्थ निरथक श्रीनस्थ अधीन महाराजा महाराज एकत्रित एकत्र घर्षागत्रि वर्षारात्र सन्मान सम्मान विश्वमिन विश्वामिन मलज्जित सतजन लजिन उपरोक्त उपर्युक्त वाढ याद दरिद्धता दारिद्रय याण चारण सावधानपूर्वक मावधान बानर वान पार्वतीय पर्वतीय घामदेव वामदेव असहनीय श्रमद्य वायु वायु झानमान ज्ञानवान यासर वामर कृतघ्नी कृतघ्न विघ्न विन ( २६ ) शुद्ध घनिष्ट दुश्तर 4 घनिष्ठ दुस्तर सीट उच्छास श्रत्योक्ति पत्रिक प्रथक विद्यमान् सोस्ट उच्छ्वास अत्युक्ति पेतृक पृथक् विद्यमान अशुद्ध विश विद्या विराट विष विशेष फाल्गुण शस्कार सम्वाद सस्य सास सत्य सर सनिश्चर सकुन सकट बहत घलि भुजगी व्याकुलित ब्रह्म ब्राह्मण वहुधा बन्धु चालक चर्या चसन यहि अभिसेक विसम चनोवास भुजा व्याकुल ब्रह्म ब्राह्मण बहुधा वधु बालक पर्या वसन घह्नि अभिषेक विषम चनवास प्रत्युपकार महार विज्ञ विद्या विगट विप विशेष फाल्गुन सस्कार सवाद शस्य शाख शल्य शर शनिश्चर शकुन शफट वृहत यलि वसन्त वस्त्र वादान निषिद्ध सुषुप्ति पित्रनुमति किंवा सवत् बसन्त वस्त्र यादान निसिद्ध सुसुप्ति पितृनुमति किम्वा सम्वत् प्रत्योपकार सघार

( २७ )
नोट-जहाँ पर ठीक तत्सम शब्दों का व्यवहार हो, वहाँ
'ब', 'घ' और 'श', 'प', 'स' के प्रयोगों का ध्यान रखना
चाहिये । पुराने पद्यों में तो अधिकाश 'व' की जगह 'व' और
'श' की जगह 'स' का प्रयोग हे। उन्धारण की सुविधा के
विवार से ही उनका प्रयोग चढा है । “दसमुख मे न सीठी
आयो" शीटो युक्त 'श के बजाय दन्त्य 'स' का उच्चारण अति
सहज हे।
माधारण प्रयोग
अकार, इकार और यकार
एक ही उच्चारण के शन्द प्राय कई प्रकार से लिखते है,
जैसे-लिये लिए, आई अायी, गये गए, सोए सोये, खाये
गये, साए गये, खाये गए, पाए गए, पाश्री श्रागो, गायो
गावी, भाये भाए, किये किए श्रादि ।
ऐसे अनेक प्रयोग जिसे मनुष्य कई कई प्रकार ने लिग्नते
है । हिन्दी इतिहास के रचयिता प्रसिद्ध साहित्य-सेवी श्री
मिश्रवंधुओं की सम्मति तो यह है कि शमी हिन्दी का विका-
सकाल हे इसमें जो जिस प्रकार से लिखे, लिखने दीजिये,
ठीक है।
कुछ लोगों की राय है कि जब स्वर से ही काम निकल
जाय तर व्यञ्जन की शावश्यकता ही नहीं है।
अनेक लोगों का मत है कि जर गया होता है तो गये जरूर
होना चाहिये । साया साये, पाया पाये, पिया पिये परन्तु
खायी, पियो, गया, में पियी नहीं होता । मेरी समझ में
पुश्रा
गये गई
आये भाई
गया
प्राया

-
(२८)
सोया सोये सोई
पिया
पिये पी
श्रादि का प्रयोग एक ही ढंग से इस प्रकार हो तो ठीक है।
अरबी फारसी के शब्द
जब से हिन्दी भाषा का विकास शुरू हुआ, नरवी फारसी
के शब्द भी उसमें पाते गये। 'भाषाया लक्षणानि पट्' तथा
'मिले संस्कृत पारस्यो' उसी समय का लक्षण है। परन्तु उन
भाषाओं के शन्दों के अधिकाश प्रयोग अपभ्रश है। बोलने की
सुविधा के अनुसार प्रारम्भ में चन्द प्रादि कवियों ने उसी
रूप में उनका प्रयोग किया जिस रूप में साधारण लोगों की
चोली में श्रागये थे। फारसी का एक प्रयोग है जाय (ए)
जरूर अर्थात् जरूरी जा आवश्यक जगह, आवश्यकता पूरी
करने की जगह, पाखाना । जाय की 'य' विभक्ति (इजाफत)
लुप्त हो गई । जरूर के ज का खराद होने पर 'ज' रहा, अर्थात्
'जाजरूर' एक कवि ने इसका प्रयोग इस प्रकार किया है-
"अपनी जरूर जाजरूर आइयतु हे ।" प्रारंभ में ठीक जिस
प्रकार सर्व साधारण में प्रयोग चल पडे वैसे ही लोग बोलने
लिखने लगे । कवियों ने उन प्रयोगों को और मॉज दिया। एक
बानगी और देखिये
"देसि देखि कागद तवीयत समादी भई,
सादी कहा भई वरवादी भई घर की।"
इस पद्य में फागद (कागज , तवीयत (तवीश्रत) समादी
(सो+मादो) सो (पाद पूर्ति) मादी (पीमार) सादी (शादी)
भूषण की रचना भी देखिये.
"मारिफर पातशाही साकशाही कोन्हीं जिन,
जेर कीन्हों जोर सो लै
हद्द सर मारे की "

( २४ )
इल प्रकार एक पोर लोक भाषा शब्दों का मांजगूंज क
उन्हें अपने अनुकूल बनाती गई, दूसरी बार फारसी अरवी
के चोलने वाले शासका म छन छाया में प्रती
फारली को शिक्षा का क्रम जारी हुश्रा। फारसी को अदालतो
में श्राश्रय मिला । शानका से सम्बन्धित शिक्षित समुदाय की
भापा फारसी हुई । तत्सम रूप ने अरजी फारसी के शब्द
बोले और लिखे जाने लगे। इधर अपनश लोक माया को
तालीममाफ्ता (शिक्षित ) मँवारू या गॅवारी जुगान कहने
और शीन फाफ की दुरुस्ती का सभ्यता का चिह समझने
लगे। यहाँ तक हिन्दो पद योजना का ढॉचा 'फसे कौम'
'भय्यागेगर्दिश' 'दास्तानेहसारलथुत' 'शाहजहाँ' 'कलामे-
अाजाद,' 'अजदफ्तर डिस्ट्रिक बोर्ड अागा' श्रादि में बदल
गया । हजारों भरनो फारसी के तत्सम शन्द हिन्दी में भर
गये । शायस्ता कहलाने वाले लोग ठीक अरन की तरह
उच्चारण करने में सफल हुए या न हुए, किन्तु उसे ऊँचा
आदर्श अवश्य ही समझने लगे । इस प्रकार ठीक गॅवारू
श्रोर शायस्ता लोर्गा के बीच में एक और भाषा हुई, जिसे
बाजारू पाली समझिये। श्राज भी कमख्खाव की जगह कोम.
सान, ख्वाहनख्वाह की जगह सामपा आदि चाजर में
अपभ्रश रूप बोले जाते है-श्रादमी, शादत (श्रादत) अरजी
(अरजो) धाराजी (पाराजी), अलबत्ता, ईजा (ईज़ा), इस्तहार
(इश्तहार), कसूर (फुसूर), उजर ( उज), वायदा (घाश्रदा)
बारिस, पालिद, कदरदान ( दरदा, कद्रदा), कैद (द),
कलम (कलम), कानून (कानून), काबिज ( कारिज), किता
(कित), खरर (सबर), खातिर (गातिर ), जुम्मामहजत
(जामश्रमसजिद), खारिज (मारिन), गाफिल (गाफिल), जुलम
(जुल्म ), तसदीक ( तसदीक), तमस्सुक , तमाम, ता!
.

( ३० ) - . नरफ, तहसील, तारीफ(तअरीफ),तालीम (तअलीम) दफा (दफत्र), दावा (अवा),दुनिया,नकल (नकल), नजर (नजर), नजीर (नजीर), नमूना, नावालिग, (नाबालिग), नामजूर (नामजूर), नायय, नाराज (नाराज), फतै (फतह) फायदा (फायदा), फुरसत (फुरसत), फौजदार (फौजदार), वकसीस (वशिश), बाकी (यानी), बेनामा (वश्रनामा), बेईमानी, मस्यूल (मशगूल), माफ (मुश्राफ) मामूली (मश्रमूली), माल गुजारी (मालगुजारी), म्यादी (मिश्रादी, साम (शाम), बयान, वेगम (बेगम), बेचाग, वेजा (वैजा), वरावर, मगज (मगज), मुहल्ला, बुनियाद, मुनाफा (मुनाफा), रग, रसद रफा (रफट), राजीनामा (राजीनामा), रोज (रोज) रोजगार (रोजगार', रोजनामचा (रोजनामचा), शैतान, शादी मजा (मजा), हाजिर (हाजिर), हिस्सा, मुलतवी, मुसाफिर (मुसा. फिर), मुहरिर, मौजा (मौजश्न), मौरूसी राष, लायक (लायक), स्यात (शायद), सरीक (शरीक), सामिला (शामिल), सरनामा,सुलहनामा,हकदार,हलफ (हलफ), हासिल,अफसोस (अफसोस), श्रावरू, आमदनी, यार, इमारत (अमारत) इलाका (इलाका), इजाफा (इजाफा), कवूल (फुल), कावू (कावू) कायम (कायम), कारखाना (फारखाना), कारीगर, किस्मत (किस्मत), कुश्ती, किताब, खरीद (ख़रीद),खामखा (ख्वाहम- ज्वाह), सूब (सूय), खुराक (खुराक), गुम्बज (गुम्नज), गैरहा- जिरी (गैरहाजिरी), गुस्सा(गुस्सा),चस्म (चश्म), चाकु (चाकू) चीज (चीज), चिराग(चिराग),चहरा, अबरदस्त (जबरदस्त), जमावन्दी (जमश्रवन्दी), जागीर, जाहिर (जाहिर), जेरवार (जेग्गार), तकिया, तखत (तख्त), तलाश, ताज्जुव (ताज्जुब', ताजा (ताजा), तिजारत, दरकार, दस्तूर, दुश्मन, दिमाग (दिमाग), दिन, पैदा, परवाना, पोशाक, वन्दोवस्त । - ।

( ३१ )
इन प्रयोगों में अधिकाश तत्व है, तत्सम् उनके साथ
कोष्टक में दिये हुए हैं। कचहरी के मुशी, वकील, मकतनों के
नास पास का वायु मण्डल, अरची फारसी की शिक्षा पाये
हुए नागरिक, मुसलमानी शासन से जिनका अधिक सम्बन्ध
रह चुका है ऐसे खास घराने, लपनऊ, आगरा, दहली आदि
शहरों के विशेष निवासी तत्सम् शन्द अधिक बोलते है ।
नागरी प्रचारिणी सभा काशी ने तो अधिकाश फारसी भोर
अरवी के शब्दों के नीचे से चिन्दीभी उडादी है । जरूरत, फरि
याद, फतह, फरस, फरमाइश, फरमान श्रादि चिना चिंदी के
लिखे पढ़े जाने लगे हैं । सच बात तो यह है कि अरची फारसी
के साहित्यक ओर उनसे लम्पक रखने वाले लोग भले ही
नत्सम् प्रयोगों के आदी हो परन्तु साधारगा हिन्दी भाषा
भाषी जनता प्रकृति नियमानुसार इसके लिये वाध्य नहीं है।
अगरेजी श्रादि भापाओ के शब्द
यही हाल युरोपियन भाषा के प्रयोगों का ह । पहिले पहल
जय पुर्तगात पोर झास वालों से काम पडा तो उनसरी भाषा
के अपभ्रश शब्द हिन्दी में भाने लगे। श्रृंगरेजी ऐंजिन का रूप
हिंदी में प्रसन, समन का सम्मन, लोगताथ का लकलाट,
लैनटर्न का लालटेन,फ्लैनिल का फलालन, टिकिट का टिस्ट,
माइल का मोल, बौटल का यातल, टरपेन्टाइल का तारपीन,
थियेटर फा थेटर, वैकोट का वास्कट, वेक का चक, वोक्स
का वक्त, डॉक्टर का डाक्टर, गोडाउन का गोदाम श्रादि
तद्भव और नोटिस, रेल, स्कृता, बटन, घेच, कलस्टर, इच,
हारमोनिश्म, स्टेशन, टाइम, इन्सपेक्टर, फार्म, इन्नीनियर,
.
--

" . . , . नरफ, तहसील, तारीफ (तअरीफ),तालीम (तअलीम) दफा (दफत्र), दाया (दया),दुनिया,नकल (नकल), नजर (नजर), नजीर (नजीर), नमूना, नाचालिग, (नाबालिग), नामजूर (नामजुर), नायब, नाराज (नाराज), फतै (फतह) फायदा (फायदा), फुरसत (फुरसत), फौजदार (फौजदार), चकसीस (वखुशिश), बाकी (पानी), वेनामा (वअनामा), बेईमानी, मस्गूल (मशगूल), माफ (मुश्राफ) मामूली (मनमूली), माल गुजारी (मालगुजारी), म्यादी (मियादी), साम (शाम), बयान, वेगम (बेगम), वेचारा, बेजा (बेजा), वरावर, मगज (मगज), मुहल्ला, बुनियाद, मुनाफा (मुनाफा), रग, रसद रफा (रफर), राजीनामा (राजीनामा) रोज (रोज) रोजगार (रोजगार', रोजनामचा (रोजनामचा), शेतान, शादी मजा (मजा), हाजिर (हाजिर), हिस्सा, मुलतवी, मुसाफिर (मुसा फिर), मुहर्रिर, मौजा ( मौजश्न), मौरसी, राथ, लायक (लायक), स्यात (शायद), सरीक (शरीक), सामिल (शामिल), सरनामा,सुलहनामा,हकदार,हलफ (हलफ), हासिल,अफसोस (अफसोस), श्रावरू, आमदनी, यार, इमारत (श्रमारत) इलाका (इलाका), इजाफा (इजाफा), कबूल (कुबूल), कावू (कावू) कायम (कायम), कारखाना (कारखाना), कारीगर, किस्मत किस्मत), कुश्ती, किताब, खरीद (खरीद),खामया (ख्याहम- ख्वाह), खूब (पूर्व), खुराफ (खूराक), गुम्बज (गुम्बज), गेरहा- जिरी (गैरहाजिरी),गुस्सा(गुस्सा),चस्म (चश्म), चाकु (चाक) श्रीज (चीज), चिराग (चिराग), चहरा, अपरदस्त (जबरदस्त), जमावन्दी (जमश्यन्दी), जागीर, जाहिर (जाहिर), जेरबार (जेरगार), तकिया, तखत (तहत), तलाश, ताज्जुब (तज्जय', ताजा (ताजा), तिजारत, दरकार, दस्तूर, दुश्मन, दिमाग (दिमाग), दिल, पैदा, परवाना, पोशाक, बन्दोवस्त । -

(३१)
इन प्रयोगों में अधिकाश तद्भव है, तत्सम् उनके साथ
कोष्टक में दिये हुए है। कचहरी के मुंशी, वकील, मकतयों के
श्रास पास का वायु मण्डल, अरची फारसी की शिक्षा पाये
हुए नागरिक, मुसलमानी शासन से जिनका अधिक सम्बन्ध
रह चुका है ऐसे खास घराने, लखनऊ, आगरा, दहली श्रादि
शहरों के विशेष निवासी तत्सम् शब्द अधिक पोलते है।
नागरी प्रचारिणी सभा काशी ने तो अधिकाश फारसी और
अरबी के शब्दों के नीचे से पिन्दी भी उडादी हे ! जरूरत, फरि
याद, फतह, फरद, फरमाइश, फरमान श्रादि विना हिंदी के
लिखे पढ़े जाने लगे है । सच बात तो यह है कि अरवी फारसी
के साहित्यक और उनसे लम्पक रसने वाले लोग भले ही
नत्सम् प्रयोगों के श्रादी हो परन्तु साधारगा हिन्दी भाषा
भाषी जनता प्रकृति नियमानुसार इसके लिये वाध्य नहीं है।
अगरेजी आदि भापाओ के शब्द
यही हाल गूरोपियन भाषा के प्रयोगों का ह । पहिले पहल
जब पुर्तगात और फ्रास वालों से काम पटा तो उनकी भाषा
के अपभ्रश शन्द हिन्दी में श्राने लगे। श्रृंगरेजी ऐजिन का रूप
हिंदी में श्रन, समन का सम्मन, लोगस्लाय का लकलाठ,
लैनटर्न का लालटेन,फ्लैनिला का फलालैन, टिकिट का टिस्ट,
माइल का मील, यौटल का यातल, टरपेन्टाइल का तारपीन,
थियेटर का थेटर, वैस्कोट का वास्कट, बैंक का वक, बोक्स
फा यक्स, डोक्टर का डाक्टर, गोडाउन फा गोदाम थादि
तद्भव और नोटिस, रेल, स्कृता, यटन, वैच, कलक्टर, इच,
हारमोनियम, स्टेशन, टाइम, इन्सपेक्टर, फार्म, इजीनियर,

.
(३०)
स्लेट, मास्टर, पेंसिल, दिन, पिन, बूट, शूट, चेन, गात,
स्तीपर, आदि शादिश तत्सम् रूप में वाले जाते है।
पादरी, गिरजा, इस्पात, कमग, आलमारी, नीलाम,
श्रादि पद पोर्तगोज भाषा के हिन्दी में काम आते है।
.
नाज मल अगरेजी के शिक्षित समुदाय के द्वारा हजाग
शन्द हिन्दी में प्रवेश कर रहे हैं। कौलेज या स्कूल के
घायु
मडल की नापा के धाज्य तो बिना अंगरेजी शब्दो की
सहायता के पूरे ही नही हा लकते। ठीक उर्दू की भॉति
एक वावू-हिंदी भी वन रही है। परन्तु उसका वृत अभी
अधिक नहीं है । अच्छी रचना के लिये आवश्यक है। कि
विदेशी भाषा के वही शब्द काम में लि जाँय जो अपनी
सापान तत्सम् या तद्भव रूप में प्रचलित हो गये हा या
जिनकी सहायता बिना हम अपना भाव ही व्यक्त न कर
सकते हो।
शब्दों में अर्थ शक्ति
शब्दों में तीन प्रकार की शक्ति है, उन्ही शक्तियो के द्वारा
पद वा वान्य श्रादि का अर्थ जाना जाता है। प्रथम अभिधा
दूसरी लक्षणा, तीसरी व्यञ्जना है। अाभिधा, जिस शक्ति ने
शन्दों का मुरय (सीधा साधा , अर्थ जाना जाता है,
उसको अभिधा कहते है। अभिधा द्वारा जिस नर्थ का ज्ञान
सो उसे वाच्यार्थ कहते है।
पर्याय या प्रतिशब्द तथा शब्द-व्युत्पत्ति वाच्यार्य जानने
के प्रधान साधन है।

-
पर्याय या प्रनिशद
एकशन के परिवर्तन में अन्य गन्द का प्रयोग करना
'प्रनिशन्द' कहलाता है। प्रनिशद' द्वारा स्मिी सदार्थ
करना रडा सुगम ए, किन्तु जिस शद का पर्याय लिखना हो
उसले सरल शब्द लिखना चाहिये जैसे
प्रश्न के लिये घोड़ा योर गज के लिगे हाथी ।
वातु के साथ प्रत्यय के योग में, अथवा सढि रग वातु के
अर्थ में नया समासों में पाये नुए पदों में जो अर्थ होता है,
उसे व्युत्त्वार्य कहते हैं। रोगिक भार योगस्ट पदों के
व्युत्पत्यार्थ का बहुत शीव बोध होता है, .
मेघ के समान द हे जिनकी लो मेघनाद, लम्बी हे हनू
(छोडी) जिसरी सोहनूमान, शर का प्रासन है जिस पर, सो
शरासन, नहीं गेग हे गिले, सो निरोग,नग्ग उरती है जिसमें,
लो तरगिनी (नदी), शिप है इष्टदेव जिरके सो शव ।
-
লম্বী
जहाँ शो का सीधा लीपा श्रधन तगार प्रयोजन
की रुदि के कारण कोई निकट सम्बन्ध रपने वाला दृमरा
अर्थ लिग जाय वहाँ 'लक्षणा' होती हे । लक्षणा के द्वारा
जो अर्थ आना जार वह 'लक्ष्यार्थ' कहलाता है, जैसे
गावासी पद में 'गंगा' पद का पाचार्य जल प्रमाद है,
उसमें पान करना अएम है, इसलिये गगा-तीर-वामी
অর্থ ছবি। তিন লয? না না ঘা বিবি স্ব
समझा जाय उसे 'विपरीत लक्षणा' कहेंगे जेसे -क्सिी क्षीण
काय व्यक्ति को देख कर कहा जाए कि 'फितना मोटा
-
श्रादनी है।

( ३४ )
व्यञ्जना
चाच्या या लत्यार्थ को छोड़ कर जिसके द्वारा एक और
अर्थ जाना जाया उसे 'व्यअना' कहते हैं। व्यजना द्वारा
अर्थ घटित होता है वह 'व्यगार्थ' कहलाता है।
गेंद खेलने में किसी खिलाडी ने कहा 'श्रर तो अंधेग
हो गया' इसका अर्थ यह है कि खेल बन्द कर देना चाहिये।
सुनने वालों की पुथक्ना के कारण एक वाक्य के कई
गार्थ हो सकते है
कभी एक ही शब्द के अनेक वाच्यार्थ होते है-
पत्र-पत्ता, चिट्ठी।
पृष्ठ-पीठ सफा।
पय-पानी दूध, अमृत।
तात-माता, पिता भाई, मित्र, कोई भी यात्मीय ।
गुस-रस्सी, हुनर, सतोगुण, रजोगुण, तमोगुण, शान,
विनय, सच, लाभ (गुण नहीं किया) ज्या,महत्व
रस-कडा, खट्टा श्रादि छै रस, करुणा श्रादि हरस,
पारा, स्वर्ण श्रादि भस्म।
छन्द-इच्छा, पद्य।
मेलाकटोरा, एफ बाजा, समय, फूल विशेष ।
कर हाथ, किरण, सूंड।
अक्षर-ब्रह्म, तपस्था, मोक्ष, नित्य, ककारादि वर्ण ।
शङ्क-चिह्न, गोद, रेखा, सख्यासूचक चिह्न, नाटक का परिच्छेद ।
अचल-गति हीन, दृढ, स्थिर, अविचलित, क्रियाहीन, पर्वत,
अचला (पृथिवी)।
.
-

--- ( ३५ ) अच्युतकृष्ण, विष्णु, स्थिर, अविनाशी । अज-ईश्वर, ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर, गजा दशरथ के पिता, बफरी, मेढ़ा। अनन्त-विष्णु, सपों का राजा, ब्रह्म, याकाश, अविनाशी, अतहीन । अन्तर-अवकाश, मध्य, चित्र, अपसर, अनधि, अन्तर्धान, व्यवधान, तारतम्य । श्रम -देवता, पारा, पटवृक्ष। - अमृत-जल, पारा, दूध, अन्न, स्वर्ण अमृता (गिलोय)। अरुण-सूर्य, सूर्य का साग्धी रक्तवर्ण । अर्क-पाक का पोधा, सूर्य, तान, इन्द्र, विष्णु, जेष्ठ नाता। श्रात्मा-स्वरूप, ब्रह्म, परमात्मा, सूर्य, अग्नि । उदय-उदयाचल पहाड, उत्पत्ति, उद्ध, उत्यान, फलमिद्ध । धर्म-पुण्य, स्वभाव,रीति, शास्त्र के अनुसार प्राचार-विचार । अर्थ-अभिप्राय, प्रयोजन, धन । हरि-विष्णु चानर, सर्प, किरण, सिंह । एक से वाच्यार्थों का सक्षम भेद यहुन से ऐसे शब्द है जिसका मोटी रीति से एकसा अर्थ प्रतीत होता है, परन्तु उनके अर्थों में वास्तव में अन्तर होता -अशोर मूर्व- अज्ञ-जड बुद्धि। मूर्स-जिसे कुछ शान न हो। दया और कृपा-- द्या-पर दुख दूर करने की स्वाभाधिक इच्छा। कृपा-छोटों के प्रति दया प्रकाशन ।

( ३६ ) अलौकिक और प्रस्वाभाविक- अलौकिक-लोक और समाज में पहिले न देखा गया हो। अस्वाभाविक-जो सृष्टि-नियम के विरुद्ध हो । अलौकिक अस्वाभाविक हो सकता है किन्तु अस्वाभा विरु अलौकिक नहीं हो सकता। भ्रम और प्रमाद- भ्रम-असावधानी से जहाँ भ्रान्ति हो । प्रमाद-मूर्पता शोर मचतारो जहाँ भ्रान्ति हो। अज्ञान और अनभिज्ञ- अज्ञान-जिनमें स्वाभाविक बुद्धि' ही न हो। अनभिज्ञ-जिसे समझने का अवसर ही न प्राप्त हुआ हो। इप और ई- उप--किसी कारण रो एक मनुष्य दूसरे से वृणा करने लगे। श्रम की ई-निष्कारण दूसरे की बढती पर जलन । धनी से निर्वन और ज्ञानी से ईर्पा करता है। श्रम, आयास, परिश्रम- शरीर के अक्षों (हाय पॉच प्रादि) से काम करने को श्रम कहते है। मन की शक्ति लगाने में आयास, विशेषता परिश्रम है । श्रम से शाति और परिश्रम से शांति होती है। उत्साह, उद्योग, उद्यम, प्रयास, चेष्टा- कार्य करने की उमग होना उत्साह है। काम में लग पडने का नाम उद्योग हे । उद्योग की स्थिरता उद्यम है । सफलता के समीप उद्यम का नाम श्याम है । किली कार्य का गहिरी प्रयन चटा है।

- , पुक्ति, तर्क, वाद, वितण्डा, गरप- र कार्य का हेतु दिपलाना युक्ति है। युक्ति की पसौटी तक है। - केसी निर्णय पर पहुँचाने के लिये युक्ति-प्रत्युकि वाद है। नवपक्ष स्थापना ओर परपद निराकरण-कथाविरोप वितएडा और गल्प है। हो प्रेम, श्रद्धा, भक्ति, स्नेह, प्रणय- नाधारणत हृदय के भाषण का भाव प्रेम है । बडों में जो प्रेम हो वह श्रद्वा है । देवता में जो प्रेम हो वह भक्ति है । छोटों में जो प्रेम हो वह स्नेह है। सी में जो प्रेम हो माउसका नाम प्रणय है। शान, बुद्धि, घी, मति- किसी विषय का भली प्रकार सानना है। मन की ठीक वृति का नाम बुद्धि है। विचाग्ने की शक्ति धी है इच्छा करने की शक्ति मति है। मन, चित्त, मानस, उदय, अन्त करण-- स्मरण रसने की शक्ति (शानेन्द्रिय) का नाम मन हे। ना जानने वाली ( चेतन ) ज्ञानेन्द्रिय को चित्त कहते है। इच्छा- मय छानेन्द्रिय का नाम मानम है। अनुभव करने वाली माने न्द्रित्र का नाम हृदय है। घास इन्द्रियों से सम्बन्ध न रहने पर अन्तःकरण है। । दुख, शोक, क्षोभ, सेद, विपाद- मन में दुइस होता है। चित्त को व्याकुलता शोक है। इष्ट का लाभ न होने पर क्षोभ होता है। निराशा में सैद होता है। दुख की विशेषता में कर्तन्य ज्ञान नष्ट होना पिाद है। "

(३८)
अभ्यास।
.
N
-
१-तत्सम और तद्भव शब्द किसे कहते हैं ?
२-नीचे लिखे शब्दों में बताइये कौन तद्भय हैं और कौन तत्सम !'
तद्भव शब्दों के तत्सम, तत्सम के तद्भव रूप बताओ?
हृदय, कोमल, फरुणा, सिंघ, हाथी, पानी, सूत्रा, पितृ, गृहिणी,
धरी, विरह, दुति, जोगी, पीठ, घी, धी, पट्टी, प्रान्त, शान्ति, पीटर,
उपहार, थान, गाय, भैंस, स्वभाव,
मर्जाद।
३-दश तद्भव और दश तत्सम शब्द बतलाभो ?
अरबी, फारसी शौर अगरेजी के दश दश ऐसे शब्द लिखो जो
तद्भव रूप में हिन्दी में बोले और लिखे जाते है ।
-अरबी, फारसी और अगरेजी के शब्दों का प्रयोग तत्सम स्प में
होना चाहिये या तद्भव में, युक्ति सहित लिखो ?
६-इन भापायों के कुछ ऐसे शब्दों के नाम बतानो जो तत्सम रूप
में प्रयुक्त हैं?
७-शब्दों में के प्रकार की अर्थ शक्ति है ? कुछ ऐसे शब्द लिसो
जिनका अर्थ लक्षणा से जाना जाय ?
८-व्यङ्गार्थ और वाच्यार्थ म क्या भेद है १ वाच्यार्थ जानने के को
कौम प्रधान साधन है ?
शब्दों का वर्गीकरण
व्युत्पत्ति की दृष्टि से शन्दों के तीन भेद है.-रुद्ध यौगिक
और 'योगरूद' । 'रुद' वह शब्द जो दूसरे शब्दों के योग से
बने हो, जैसे-नाक, हाथ, गत, रोटी, हाथी आदि
यौगिक, वह शब्द है जो दो शब्दों के योग से अथव
किसी शब्द में प्रत्यय लगा कर धनते है, जैसे-गुणी,त्यागी
राजकोप, विश्वामित्र श्रादि ।

(३६) योगरूढ़, वह शद हे जो बने तो योगिक शन्दा की भॉति हो परन्तु वह रूढ़ शब्दों ही की भॉति किसी विशेष अर्थ में प्रत्युक्त होते हो, जैसे -पक+ज (पक से है जन्म जिसफा) व्युत्पत्ति के अनुसार पक (फोच ) से पैदा होने वाली सर वस्तुओं को पकज फह साते है, परन्तु फेवल 'कमल' के अर्थ रही में उसका प्रयोग होता है। पायों में प्रयोग के अनुसार शब्दों के पाठ भेद हे वस्तुओं या प्राणियों के नाम बताने वाले शन्द सक्षाओं का कुछ होना या उनका करना बताने वाले शद, किया। सशाओं की विशेषता बताने वाले शन्न विशेषण। क्रियाओं की विशेषता बताने वाले शब्द किया विशेषण। सहायों के बदले में श्राने वाले शब्द सर्वनाम। किया से नामार्थक शब्दों का सम्बन्ध सूचित करने वाले शब्द सम्बन्ध सूचका दो शन्दों या पापों को मिलाने वाले शब्द मनोधिकार सूचित करने वाले शद विस्मरादिबोधक। उदाहरण । १--अरे देव ! तेरी लीला अपार है। अरे-विस्मयादिबोधक अन्यर, इसमे मनोधिकार प्रगट होता है। देव-सक्षा (विशेष्य ) एक नाम चित होता है । तेरी-सर्वनाम, दैव सा के बदले में पाया है। लीला देव के फर्तव्य का नाम अपार-लीला का विशेषण है। है-क्रिया, यह देव की लीला का होना बताती है। २-राम बोर लक्ष्मण एक सुन्दर पहाडी पर चढ़ कर नक्षिण की ओर बडी गम्भीर ष्टि से देगने लगे। समुच्चय योधक। सिका, ।

--
४०
--
1
'गम' लक्ष्मण' सशाओं का जोडने वाला 'ओर' पद
'समुच्चयबोधक है।
'एक' और 'सुन्दर' दोनो पद पहाडी के विरोपण है।
'पर' पहाडी समा का कारक प्रत्यय है।
'नढर' क्रिया है, राम लक्ष्मण का चढना बताती है।
'दक्षिण' सज्ञा है क्योंकि एक दिशा का नाम है।
'की' प्रत्यय है।
'चारों ओर का विशेषण है।
'और' सम्पन्ध वाचक पद है, क्योंकि चाय के दक्षिरा
पद से क्रिया का सम्बन्ध दिखाता है।
'डा' और 'गभीर' दृष्टि के विशेषण है।
'यडी गमीर दष्टि से', क्रिया विशेषण हे पर्याकि देवा
किया की निशेयता बताता है।
'देसा' किया है, क्योंकि राम लक्ष्मण ने उसे किया।
इनमें सशा, क्रिया, सर्वनाम ओर विशेषण का वाक्य में
रूपान्नर होता है इसतिये इन्हें निकार कहते है और 'क्रिय
विशेषण' सम्बन्ध-नाचक' 'समुच्चय बोधक' भोर 'विस्मयानि
योधक' के रूप सदैव एक ने रहते है, इसलिये इन्हें अधिकार
अथवा अव्यय कहते है।
सक्षा का लिङ्ग, वचन और कारक के कारण रूपान्तर होत
है। सर्वनाम में वचन और कारक से विकार होता है।
क्रिया में काल पचन और लिन के कारण विकार होता है।
विशेषण जर श्रयेला सझा की भॉति थाता है तो सः
पी तरह विसन होता है।

-
जर पिस्तेपण सशा प्रात् अपने विशेषण के साथ प्राता
हे तर केवल लिंग भोर काही कहीं नचन का उसमें विकार
होता है।
कारक
सशानों की उस अवस्था को कारक कहते है जिससे
चाक्य में सभाओं का क्रिया या मर्ग नशाश्या से सम्बन्ध
जिाना जाता है।
सतात्रों की अवस्था अर्थात् फारकां के शाट खेद है
(१) कर्ता-सहा के जिस कर ले फिया के व्यापार का
। होना या करना पारा जार, उस रूप का 'फर्चा करते है
जेरो -हीर खेलना है।
(0) कर्न-समा के किस रूप पर मिया या फल रहे,
जैसे -हरि को बुलायो।
(३) फरण-जिसके द्वारा कर्ता क्रिया को सिद्ध करे,
जसे -हरि से भिजवाया।
(४)सम्प्रदान-जिसके लिये किया की जाय अथवा
- जिसको कुछ दिगा जाय, जमे हरि के लिये लाया।
(५) अपादान-क्रिया के विभाग की अवधिको अपादान
- कहते हैं, जैसे-हरि से लागा।
(६) सम्बन्ध-वाक्य में किनी सक्षा का रिसी सदा से
ठीक ठीक सम्बन्ध प्रतीत हो, जेते -हरि का घोडा है ।
(७) प्रधिकरण-क्रिया के आधार को अधिकरण कहते
1 है, जैसे -हरि में गुण हैं।
(3)राम्बोधन-सझा के जिस रूप में किसी के द्वारा
। चेताने या पुकारने का भार हो, जेसे हे हरि!
कारको अर्थात् सक्षाओं के रुपान्तरों का प्रयोग 'कारक'
और विभक्ति' वाले शीर्षक में देखिये।
स

४२ )
-
अभ्यास
१-नीचे लिखे वाक्यों के शब्दों का वर्गीकरण करो
मैं धर्म के लिये प्राण दे सकता है।
घोडा से बढकर कोई सवारी नहीं।
'हानि नाम जीवन मरन जस अपजस विधि हाथ।
'पामर प्रान न जाय अभागे।
२-ौन फौन पद विकारी हैं और कौन से अविकारी और क्यों ?
३-धारक के भेद बताओ और ऐसे कौन से फारक हैं जिनका क्रिया से
मम्वन्ध नहीं होता।
४-क्या इन कारकों में कोई ऐसा भी है जिसका वाक्य में किसी दूसरे
पद से सम्बन्ध नहीं होता ? ( सम्बोधन )
J

द्वितीय अध्याय
वाक्य-विचार
वाक्य
जिस पद-समूह के योग से कोई पूग भाव प्रकाशित हो
'जाय, उसे 'वाय' कहते है । गाय के पदों में परस्पर अपेक्षा
होती है। किसी भाव को प्रकाशित करने के लिये पटत पट
"समूह में परस्पर सम्बन्ध होना चाहिये, नहीं तो पाय फा
अर्थ समझ में नहीं श्रावेगा । वाक्य ५ अन्तर्गत पदों के
सम्बन्ध को 'आकांक्षा' 'योग्यता' अोर 'क्रम' कहते है।
श्राफांक्षा-मतलब समझने के लिये एक पद को नुन
कर दूसरे पद को सुनने की इच्छा होती है, उने 'आफाक्षा'
कहते है, जैसे -'पेड से' इसकपीछे यह सुाने की इच्छा
होती है 'पत्ते गिरते है । ' सर चले गये इसके पीछे यह
काहना पड़ेगा-'जो रात को यहाँ ठहरे थे।
योग्यता-याय के पदों का अन्वय करने के समय
अर्थ समाधी वाधा न हो, जैसे रेत पर तेग्ने लगा। यहाँ
गोग्यता के अनुसार पद विन्यास नहीं है, रेत पर कोई नही
तैरता, पानी पर तेरते है।
-योग्यता और आकाक्षा-युक्त पदों के ठीक रीति
से स्थापन करने को 'म' कहते हैं, जैसे -'पानी' इसके
पीछे ही "परसता " लिसना पड़ेगा।

(४८) 'पिता की' बड़ा धर्म है 'श्राशा नानगा। इनमें कम नहीं है, श्रत बानाय नहीं है। चाय यह है "पिता की शाम मानना धडा धर्म है । अतः दूसरे रूप में वाक्य की परिभाषा इस प्रकार पुई-"किसी नासाक्षा, योग्यता, कन माहित पद-समूह को 'वाश्य करते हैं।' প্রয়া -- - कागज मैला (१) नाक्य किसे कहते है? (२। दारों में विश किन बातो का यान रना चाहिये ? (३) नीचे लिये पाक्यों में क्या दोप है? उन्द हर यरक शुद्ध वाक्य पानी। () बढई वसूले से पटा सोता है। (1) मैं भाग रोटी सारण भागरे को । (स) जाम से गिरता है पेड । (६) नदी में भाग बहती है। (a) नीचे से वापयों में भारावा मिताकर राक्य बनामों नदी पार करणे गये धारी की तान रेलवी पटली घोडे की सँग दूकान निर्मल भाका वाक्यांश जिन सब पर्दा से मन का पूरा भाव प्रकाशित न हो क फेवल भाव का कुछ भाग प्रकाशित हो, उसे 'चाफ्याश' कह -'महाराज घड़ौदा ने कहा 'कल रात को महार गाधी'। कहीं कहीं एक पद भी वाक्यांश हो जाता है,जेसे गये में दोनों पद घाययाश है। 'वह कार्य करना है, जो कल फहा था। इसमें दोनों पाश्य वाक्यांश है। - मेरी पुस्तक प्रचण्ड वायु - .

( ४५ - - Pms अभ्यास नीचे लिखे वाक्यागों में गेप पद मिनावर पूरे वाक्य बनायो 7-पुस्ता रक्खी रस्ती ५-पादन -मैं ठोकर साकर । ६-सूर्य क प्रचण्ड नाप मे E-नोहर वाटिका में जाते ही ७-मोहनप्रसा --कोयन की मधुर ध्वनि सुनते हो। हरिहर ने वाक्य सड़ा । वायु वेग से बह रही है। पुण्य खिल रहे है। भारतवर्ष हावना प्रदेश हे । मोहन परोपकारी वालफ है। इन वाफ्यों में 'पुष्प 'वायु' 'भारतवर्ष' र 'मोहन' के मि है। हर एक वाक्य में किसी नाम के सम्बन्ध में कुछन कि कहा गया है। चाफ्य में जिस पदार्थ श्रयमा प्रागी के सम्बन्ध में कुछ चर्चा की जाती हे उसे उद्दश्य कहते है। किसी पदार्थ या पणी के बारे में जो कुछ वर्णन होता है उसे विधय कहते हैं। पर के वाक्यों की उद्देश्य विधेय तालिका नीचे दी जाती है - उद्देश्य विधेय पुष्प सिल रहे है वेग में बहती है भारतवर्ष मोहन परोपकारी पालक ह उद्देश्य ओर पिधेय मिलकर पूरा वास होता है। अभ्यास मीचे हे याक्यों में से श्य गौर विषय पर प्रथा रो यमुना मद मद यह रही है। वर्ग होने की सभाता है। घायु सुहावा प्रदेश है - सत्य ही सब से बड़ा धर्म है। अन्याय नहीं करना चाहिये। भारत कृषि प्रधान देश है। विज्ञान की शिक्षा का प्रबन्ध नहीं है। नीचे लिखे उद्देश्यों के साथ विषय मिलाओ हिमालय परमात्मा प्रेम उपवार स्वास्थ्य नीचे के विधयों के साय उद्देश्य जोडो शक्ति बढ़ती गाया जाता है। सया हितैपी है। है वाक्य भेद (१) सरल वाक्य सरल वाक्य में एक उद्देश्य या कर्ता और एक विधेय समापिका क्रिया अवश्य होती है ।प्राय उद्देश्य और अन्य नाना प्रकार के पदों के मिलने से बढ़ जाते है, इसरि एक वाक्य में दो से अधिक पद होते है। वाक्य में उद्देश्य श्री विधेय के अतिरिक्त जितने पद हो उनमें से कुछ तो उद्देश्य सहकारी होंगे और कुछ विधेय के । सहारी पद सी मुख्य उद्देश्य, उद्देश्य के अन्तर्गत और सहकारी पद सस मुस्यविधेय, विधेय अश के अन्तर्गत समझ जाते हैं । य फिया सकर्मक होगी तो उसका कर्म भी विधयघाच्य होग जैसे-घोडा घास पाता है'-इसमें धास सहित खाता पद विधेय होगा। उद्देश्य और विधेय जिस प्रकार सहका पदों के मिलने से बढ जाते है उसी प्रकार कर्मादि भी अ पदों से घडते हैं, जैसे --"मुझे एक पका फल मिला" इस 'फल' कर्म 'एक' और 'पा' दो चिशेपणों द्वारा बढा हुन है। विशेष्य, (सक्षा) सर्वनाम और विशेष्य रूप से आया हुन

( ४७ )
माययाश, विशेषण और क्रियार्थफ सज्ञा, यह उद्देश्य और धर्म
अप में आते हैं,
जैसे
विशेप-राम प्रदर्शिशी देखता हे।
सर्वनाम-वह मुझे प्यार करता है।
रिशेप्य रूप में पाया विशेषण-शिक्षित, अशिक्षितों को
दृणा से देखते हैं।
क्रियावाचक सशा-पाना कहने से भोजन करना समझा
जाता है।
वाक्याश-विना पूछे ले जाना चोरी करना कहाता है।
जिन पदों के नीचे रेखा हे वह उद्देश्य और जिनके ऊपर
रखा हे वह कर्म है।
मिशेषण, विशेषण भाव वाले विशेष्यादि पद और वाफ्याश
के मिलने से उद्देश्य व फर्म वढना है, यथा
विशेषण द्वारा सुन्दर वालक उत्तम पुस्तक पढता है।
सम्बन्ध पद द्वारा-गम फा मित्र हमारी बात सुनता था।
विशेष्य द्वारा--राजारामचनपुरोहित वशिष्ठले कहने रागे।
वायाश डारा-मत्री ने विद्रोह का सम्बाद पापर
उसमें लिप्त सब को पकडधा लिया।
नीचे की रेखा वाले पदों से विशेष्य और ऊपर की रेखा
पाले पदों से फर्म चढ़ाया गया है।
उक्त प्रकार के दो वा यहुत से पदों की सहायता ने भी
उद्देश्य और कर्म बढ़ाया जा सकता है, यथा
-

- वीस वर्ष की आयु वाला राम का पुत्र मोहन, अत्यन्त लाभदायक दो सौ पन्न की पुस्तक लिख रहा है। विधेय एक ही क्रियापद पूरा अर्थ प्रकाशित करे उसे 'सरल विधय' कहते है। यथा-मै पुस्तक लिखता हूँ। इस वाक्य में लिखता है एक ही क्रिया, पद के द्वारा वक्ता का सम्पूर्ण प्राशय प्रकागिन हो नाता है इसलिये यह सरल विधेय है। विधेय यदि अपूर्ण अर्थप्रकाशक क्रिया हो और उसके साथ पूर्ण अर्थ प्रकाशक सहकारी पद हो तो उस विधेय को 'जटिल विधय' कहते है, जैसे -आकाश परिष्कृत हुआ, सूर्य उदय हुआ, यहाँ परिष्कृत ओर केवल हुआ से पूरा अर्थ प्रकाशित नहीं होता, इसलिये 'उदय' 'परिष्कृत' पद 'हुआ' सहित जटिल विधेय है। क्रिया विशेषण वा क्रिया विशेषण भाव वाले पद या चाफ्याश द्वारा विधेय परिवर्द्धित होता है, यथा -राम शीघ्र श्राया है, उसने बहुत समय बिता दिया । तुम स्पष्ट करके कहो । यत्नपूर्वक कार्य करो। कारण, अपादान और अधिकरण पद भी विधेय को परि चर्द्धित करते है, यथा.-में ऑखों से देखता हूँ । हृदग से चाहता है। लाठी से मारता है। आकाश से पानी गिरता है । पक्षी याकाश में उड़ता है । वह कल रात को भाया था। सूर्योदय से अन्धकार दूर हुआ। उदय पद न होने से । - 1 - AAR ( ५ ) * असमापिका क्रिया द्वारा भी विधेय परिवदित होता है, स्था -दोडते दोडते कहने लगा, में सुन्दर दृश्य देखते देसते अवाक रह गया। श्रर्य के विचार से विधेय वर्द्धक छ भेद होते हैं, जैसे कालवाचक-कल पाऊँगा, उमा उत्तर प्रान तक ठहरूँगा। अतिवाचफ-धीरे धीरे ज्ञान होता है , शान्ति से सोचो। रिमाणवाचफ-थोड़ा सोचना भी चाहिये । कारण वाचरु-तुम्हारे दर्शन से प्राण बच गये। कार्यवाचक-मेरे लिये ऐसा क्यों करते हो । त्यान पाचक-मेरे पास यह आया, यहाँ से चला गया। (२) दिल वापर जिस एक उद्देश्य और एक विधेय मुरय हो शोर सफी सहायक एक या कई क्रियाएँ हो उस को जटिल साक्य कहते हैं, यथा-माता हउसने बडा अन्याय किया ' किस प्रकार ऐसा हुआ यह मे नहीं समझ सकता।' जटिल पाक्य का जो श्रश प्रधान उद्देश्य नोर प्रधान वधेिय है, उसको प्रधान अश, श्रीर अन्य भाग को श्रानुपङ्गिक हते हैं । पहले उदाहरण में 'मैं जानता हूँ' प्रधान अश श्रोर उसने बडा अन्याय किया' यह इस प्रश का भानुषङ्गिक थानुपङ्गिक अश दो प्रकार का होता है-एक विशेष्य- नाम मास दुसरा विणेपणा भाव प्राप्त । चाफ्य

-
।
(५०)
जो भानुपङ्गिक वाक्य विशेष्य भाव वाला हो उसे ।
भावापन्न वाम्य' कहते है, जैसे .--उसने जो साहस का
किया या मुझे सब मालूम है, अर्थात् उसका साहस
मुझे मालूम है । 'मैं देख कर श्राया है उसकी फैली दशा है
अर्थात् मैं उसकी दशा देखकर आया हूँ 'मे इच्छा करता
कि, सर सुखी हो' अर्थात् मै सब के सुख की इच्छा करता हूँ।
जटिल वाक्य में "विशेष्य भावापन्न श्रानुपतिक
उद्देश्य और कर्म दोनों हो सकते हैं। पहले उदाहरण में श्रानु
पगिक अश उद्देश्य और दूसरे व तीसरे में कर्म रूप से आया
हुधा है।"
.
जो श्रानुपगिक वाक्य किसी विशेष्य व सर्वनाम की क्रिय
का गुण प्रकाश करे उसे विशेषण-भावापन-वाक्य' कहते हैं
'जा मनुष्य केवल स्वार्थ देखता है सो प्रकृत-सुखी नही होत'
अर्थात् स्वार्थी मनुष्प सच्चा सुखी नहीं होता । 'उन्होंने
घात कही थी मुझे भली प्रकार याद है', अर्थात् , उनकी कई
हुई बात मुझे भली प्रकार याद है।
भानुषङ्गिक-विशेषण-भावापन्न वाक्य, उद्देश्य और कर्म
और निधेय विशेपण भी हो सकता है, यथा -'श्राज जा
वृष्टि हुई है, उससे विशेष उपकार होगा', अर्थात् , अाजक
वृष्टि से विशेष उपकार होगा। उन्होंने जो रुपया भेजा था
मुझे मिल गया' अर्थात् उनका भेजा हुआ रुपया मुझे मित
गरा। इस औपच को जब तुम सानोगे नभी लान
,

( ५१ ) पहुँचायगी, अर्थात् यह औरधि साते ही लाभ पहुंचायगी। = प्रथम उदाहरण वाक्य में, आनुपङ्गिक वाम्य उद्देश्य फा, दूसरे में कर्म का, तीसरे में विधेय का विशेषण है । इसलिये प्रथम दो 'विशेषण' और अन्तिम भानुपतिक वाक्य क्रिया विशेषण भाव वाला है। (३) यौगिक वाक्य जिसमं अनेक व कुछ सरल और कछ जटिल वाक्यों का मेल हो उसे 'यौगिक वाक्य कहते है , जेसे -राम तौ प्राये है पर हरि नहीं आयेंगे। गम जायगे अथवा हरि जॉयगे। यहाँ भिन्न भिन्न सरल वाक्य 'श्रोग' 'अथवा 'किन्तु' योजकों द्वारा मिल कर योगिक वाक्य होते है। अभ्यास । १-नीचे लिखे वाफ्या के कारण सहित प्रकार बतायो । मुझे तुम से यह कहना था कि कभी पर तो भेग दिया करो। शीतन मन्द-मुगन्ध वायु बहती है। पीली गाय को देखकर मेरा चित्त प्रसन हुआ। मुझे हिन्दी-साहित्य-सम्मेनन की बैठक में सम्मिलित होता है । जापन पथ- प्रदीप जैसा अन्या छपा है, रचना प्रमोध मी वैसा ही छपा है । भाषा व द्वारा मनुष्य अपने विचार दूसरों पर प्रगट धरता है और दूसरों के समझता । वही भाग्यवान है जिसे सब प्यार करते है । स्वास्थ पो सोर विरा प्राप्त करने से क्या होता है। धर्म ही मनुष्य का सथा मित्र है । जो रिया- शील वही सब कुछ कर सकते हैं। है २-सरन- यात और जटिन-वाक्य म क्या शन्तर हैं दोनों प्रकार के पाँच पाँच वाक्य लिखो।

{ ५० )
३.उद्देश्य और विधय किन किन पदों द्वारा बन सकते ह नाव
लिये वाक्य के दश्य यो चिरा प्रभार से बढ़ानो।
"मोहन ने पारितोपिक पाया"
"मोहन" कर्ता को विरोपण द्वारा, विशेष्य द्वारा, समकारक द्वारा
और सर्वनाम द्वारा बढ़ायो।
"पारितोषिक पाया" विधेय को, करण, श्रधिकरण सम्बन्ध अपादान,
द्वारा बढानो।
1
वाक्य विश्लेषण
सरल वाफ्यों का विश्लेपरण इस प्रकार होगा
F-पहले उद्देश्य-पद निर्देश करना पड़ेगा।
२-जिन जिन पदों के द्वाग उद्देश्य वढाया हे उनका
निर्देश करना पड़ेगा।
3-विधेय पद का निर्देश । यदि विधय पद पूर्ण अर्थ
प्रकाशक नहीं है तो पूर्ण-धर्थ प्रकाशक अश भी उसी के साथ
निर्देश करना पड़ेगा।
४-यदि विधेय सकर्मक क्रिया है तो उसका फर्म निर्देश
करना पड़ेगा।
५-कर्म पद जिन पदों के द्वारा बढ़ाया गया है उनका
निर्देश करना पड़ेगा।
६-विधेय पद जिन सब पदों के द्वारा बढ़ाया गया है
उन सबका निर्देश करना पड़ेगा।
विश्लेषण चित्र
(१) धन्दर की टॉर्गे मजबूत होती है ।
(२) कल से पानी बरस रहा है।

( ५३ ) (३) धीरजवान मनुष्य काठिनाइया से नहीं धरडाता। (8) चरित्र ही मनुष्य का सर से बढ़ कर गहना है। (५) हिन्दी-भाषा का इतिहास अभी तक नहीं मिला। (२) राम ने सुन्दर पुस्तक दान की। उद्देश्य अंश । कर्म मुख्य श्य विषय विषय सदश्य विस्तार भ विधेय अश - पुस का रिशेपण विधेय पिस्तार येंगे होती है। मगन्त पानी यरस पल से ३. मनुष्य धीरजवान घबडाताहै। नही रठिनाइयों से ४ चरित्रही he गाना मनुम्परा सब मे बदतर अभी ता मिला नहीं तिहास | हिन्दी भापाका की पुस्तक दान जटिल वाक्य पहले जदिल वाक्य में कौन अश प्रधान है और कौन आनुपगिक है, यह ढूँढना पडेगा । फिर श्रानुपतिक वादय को 'पद विशेष समभ कर, समग्र वाक्य का विश्लेषण करना पडेगा। फिर भानुपतिक वाक्य का पृथक् रूप से विश्लेषण करना पडेगा, यथा ।

कहा था । -- ५४ ) वाक्य-"आज वह न श्रावेंगे, मैने पहिले ही कहा था। इस जटिल वाक्य में 'मैने पहिले ही कहा था' यह प्रधान' अश और 'वह बाज नहीं पायेंगे' आनुपङ्गिक अश है।" (१) मैंने उद्देश्य विस्तार विधेय कर्म रूप वाक्य श्राज हरि नहीं पायेंगे। विधेय विस्तार पहिलेही (काल वाचक) (0) 'श्राज हरि नहीं श्रावंगे' इस वाक्य में- उद्देश्य-हरि विधेय-नहीं भावेंगे विधेय विस्तार-आज यौगिक वाक्य जिन सव वाक्यां से मिलकर 'योगिक वाक्य' बना है, उनका अलग २ विश्लेपण कर के पीछे जित योजकों द्वारा यह मिले हैं उनको दिखाना चाहिये । और यदि यौगिक वाक्य सरल वाक्यों से बना हो तो सरल पाक्य की रीति के अनु सार और यदि जटिल वाक्यों से बना हो तो जटिल वाक्य की रीत्या नुसार विश्लेषण करना चाहिये। अभ्यास नीचे लिये धापयों का विश्लेपण करो (१) राजा महानन्द एक दिन हसते २ जनाने में आरहे थे। (0) "शफ्टार शूद और राक्षस प्रादण था जो दोनो अत्यन्त पुद्धिमान् ओर महा प्रतिभा सपन्न थे।" (३) अन्त में पारागार की पीड़ा से एक एक करके उसके परिवार फे सय नोग मर गय ।

{ ५५ ) "किसी फर्तन्य के न परो अथवा किसी अनुचित कार्य क करने के पश्चात् जो हृदय में वेदना होती है उसे पशात्ताप रहते है।" "जो सदा धारापरते रहते है उनका भी किसी समय हादिक- वेदना, अपने अपने अनुचित पायों पर होती है।" पश्चात्ताप क्वउ बाहरी नहीं, किन्तु हार्दिक हाना चाहिये।" "यह पहले ही कहा जा चुरा लि साश में महारतों पा हर पहलू डीक नहीं होता।" कारक और उनकी विभक्तियाँ पद-स्थापन प्रणाली समझाने से पहले कारक और उनकी विभक्तियों के व्यवहार का पूगशान हो जाना चाहिये । सस्त व्याकरण में विभक्तियों और कारकों को पृथक माना फितु हिन्दी के वैयाकरणों ने प्राय कारक और उनकी विभक्तियों को एक ही रूप दिया है। मस्कृत में एक ही विभक्ति में कई कारकों का प्रयोग होता है। हिन्दी में भी यह बात है परन्तु बहुत कम । सस्कृत में ७विभक्तियॉ ओरछ कारक माने जाते है, मम्मन्य कोकारकनहीं मानते,पयोंकि क्रिया से उसका फाई सीधा सम्बन्ध नही हे और सम्बोधन में प्रथमा विभक्ति मानते है । किन्तु हिन्दी में पाठ कारक है ओर उनकी - चिमक्तियाँ हैं । हिन्दी में विभक्तियॉ स्वतत्र नहीं है । फर्ता के अधिकाश प्रयोगा में कोई विभक्ति नहीं हाती । हिन्दी प्राकारान्त पुलिंग शन्दों को छोड शेर पुर्मिग शन्दों का मूल रूप हो उस कारक फे दोनों पचनों में शाता है। परखी. लिंग शन्दों ओर आकारान्त पुलिंग शन्दों के यहुवचन में रूपान्तर होता है। हिन्दी में फर्ता कारक फी को 'ने' विभक्ति पाती है यह कर्तृवाच्य के प्रधान पर्ता के माध थानी है।

.
( ५६ )
फर्मोर सम्प्रदान की विभक्ति 'को' है परन्तु बहुधा कर्म में
'को' लोप हो जाता है। कहीं २ सर्वनामों में 'ए' 'ए' रूपान्तर
हो जाता है।
करण और अपादान की विभक्ति से' हे अर्थ के बल से
इनके रूप का निश्चय किया जाता है।
सम्बन्ध की विभक्ति 'का', 'के', 'को' सर्वनामों में
'ना', 'ने' 'नी' व 'रा' 'रे', 'री' हो जाती है ।
सम्बोधन के चिर 'हे', 'थरे श्रादि है जो सम्बोधन पद के
पूर्व पाते है । कभी २ सम्बोधन का चिह्न लुप्त रहता है।
उदाहरणों के लिए कारकों में सजा और सर्वनाम का
प्रयोग नीचे दिया जाता है।
का (प्रथम कारक) में
'विद्यार्थी पढता है। 'अश्विनी', 'भरणी' आदि नक्षत्र है
पात' कही जाती है हरि 'पागल होगया है।
'गीत' गाया गया। मैं तुम्हें विद्वान्' समझना था ।
"घर' बन गया।
'करन' 'सुनन' होगई।
'धडा भर' दुध है।
हमारा 'जीवन' वृथा है।
'आध सेर' 'घी' है।
यह 'ससार' मिथ्या है।
मान' सय से उत्तम धन है। दशरथ नाम का 'राजा' था।
'मोहा' 'घोडा' तुमको 'भाई' समझता हूँ,
कर्मकारक
को समझाया।
'उसे' ( उसको) बुतायो।
। पढ़ी।
'दो पहर को छुट्टी हो जावेगी।

'तुम्हें (तुमको) क्या हुना। 'तुमको शार प्राप्त होगा।
'खेलने को चला गया। 'गाय को दाना पिलाया।
हरि 'श्रागरे (को) गया। 'लडकोको पुस्तक नहीं मिली।
'कितना को ठगा है। 'स्नान' 'संध्या' 'पूजा' करा।
"साथियों को भगा दिया। 'गोकुल को पुकारो।
'गुरुका दयालु होना चाहिये । 'मुझे जाना होगा।
'कहानी' कहे ता 'करनी' करे। 'तुमको' रन्य है।
'मोहन को धुलाया।
करण कारक म
पैरों से चलते है। 'रई से' धन पनते हैं।
'सड्ग से' प्राण लिये। 'प्रयत्न से फल मिलता है।
'विद्या से धन मिलता है। 'नाल स' पहचान लिये।
उसने 'माय ने देखा। 'कानों' सुनी थानों देसी बात है
सारी शक्ति से सहायता की।
किम भाव सें' वेचते हो। 'धन से प्रयोजन है।
'चाव से पढा।
'रोने पाने से क्या हुआ?
भगॉ'पहनने से साधुसमझा। शरीर से' स्वस्थ है।
पॉच सोरुपया से क्या होगा।
मम्प्रदान में
ने दरिदिया को' भोजन दिया। 'राम को यह
योग्य नहीं था। में स्नान को जाता है।
"आपको यह उचित हे। 'पण्डित जी को नमस्कार।
'युद्ध को चल दिया।

(५८)
शिष्यों को गुरु जी की आज्ञा भेट को लाया है।
माननी चाहिये। 'उनको' क्या भेजना चाहिये।
अपादान
गम 'घोडे से गिर पडा। बुढापे में मनुष्य 'चलने फिरने
गिरीशआज 'दिल्लीसे आया है। से रहित हो जाता है।
उससे' यह ढग ही जुदा है। मूर्स'विद्यासे' अनभिज्ञ होते है।
यह पुस्तक 'उससे' भिन्न है। माता पिता से अधिक पूज्य है।
उन्हें 'राम से परिचय है। हिमालय 'भारतसे' उत्तरोर है।
श्रीमान् 'गिरधर शर्मा से मेरा 'मथुरासे'वृन्दावन पॉचमील हे
साक्षात् हुश्रा। 'तन-मन धन से सेवा करो।
बन से विद्या उत्तम है। जाडे के दिनों में 'दश वजेसे चार
'दिल्ली से' श्रागरा दूर है। बजे तक स्कूल खुला करते है।
हैदरावाद 'मव्य प्रान्त से परे है। यह सिंह से' डर गया।
यह व्यक्ति 'वुद्धि से' हीन है। राम 'घर से भाग गया।
.
1
सम्पन्ध कारक
'महात्मा का का उपदेश है। भाई की प्रतीक्षा की।
'पण्डित का' पाण्डित्व नहीं रहा । सिर बाल सफेद होगये।
'बालू की' भीत हे।
'काठ की' नाव है।
'सुवर्ण फे' श्राभूषण बने हैं। 'विहारी की सतसई पढो।
'राजा फे' समान मन्त्रीदयालुनहीं। 'राजा की पुत्री चली गई।
'घाम फे सदृश फल नहीं।
तीन हाथका डण्डा'लायो।
'गजा की' श्राक्षा के अनुसार। 'जमुनाका' पाट बढ़ गयाहै।
'दश कोस का फर्क है।

'बीस वर्ष का पुत्र होगया। वीस घर्प फी' गाय ।
'दोवर्प की पात है। एक 'पाने का' चाकू लायो।
यह कहने के योग्य है।
उसको 'टपफे का डर है।
'खेत का खेत' नाश हो गया। सुदामा 'जन्म दरिद्री थे।
'घर के समीप।
सव के सर चले श्राये।
में 'उनके साथ घर जाता हूँ।
'रोटी का खानग।
'मेग' काम 'उसका नाम ।
'गॉव की सडक।
'तुम्हारा रुपया ईश्वरका ध्यान
नोट-समास में सम्पन्ध की विभक्ति लोप होजाती है।
अधिकरण
"जल में मछली रहती है। 'चैत्र में गुलाची जाडे पडते है।
'नदी के तीर पर' वृक्ष हे ।
रस्सी में गॉठ लगी है।
वह 'कम्पल पर' सोता है। राये मेरे कहने में नहीं।
उसकी शान में प्रवृत्ति है। दश 'रुपये में गाय बेची।
चह अपनी 'ध्वनि में मस्त है । चिडिया 'हाथ' न थाई ।
ईश्वर 'सय में व्याप्त है। दिन भर प्रयत किया परन्तु
'धातुओं में स्वर्ण श्रेष्ठ है। टका 'हाथ' न पाया।
ऐसा करो 'जिसमें' यह हो। हमारे निकट 'पुस्तक' रफ्पी है।
दुशाला 'देसने में सुन्दर है । वह पुस्तक 'टेसने में लगा है।
श्रभ्यास
-नीचे लिखे वाक्यों में पडे अक्षरों के पद किन कारका में
प्रयुक्त है ।
हाथ से रुपया दिया था । बुद्धि से पाम नहीं किया । मुझसे
नहीं होता। तुम्हें प्रणाम है । मेरे पास से मिल गया। सुधार

( ६० ) 리 क्या जाता है अर्थ है । तुम्हारी बात नहीं समझा । दूध न दही । दूध । रात होने को है। न्यायालय क्या है ? प्रादर्श प्रेस एक बात में तो नादर्श ही है। मोहन की अपेक्षा सोहन चतुर है । घर ऊँचा है। उसका नामकरण सस्कार होगा। कारन करन नाथ मोहि मारा। २--नीचे गिरो हुए पदों को वाक्यों में प्रयुक्त करो'- प्रभार, कर्म और अधिकरण में शान्ति, दया, प्रेम, अपादान और करण में धृष्टता, विद्वता, पैथ्य, फर्ता और सम्पदान में ३---कुछ ऐसे वाक्य लिसो जिसमें अधिक से अधिक कई कारका का प्रयोग हो सके। वाक्य रचना भाषा की रीति के अनुसार वाक्य के पद-समूह जोडने का नाम 'वाक्य रचना' है। वास्य गद्य और पद्य भेद से दो प्रकार के होते है। छन्दोबद्ध पाक्य को पद्य कहते हैं । जिसमें फारक और क्रिया आदि का नियमपूर्वक स्थापन हो, उसे गद्य कहते है। इस पुरतक में गद्य-वाक्य-रचना पर ही विचार किया जायगा । वाफ्य-रचना के साधारण ओर स्थूल नियम फर्ता और समापिका क्रिया वाक्य के प्रधान श्रग है, इस लिये वाक्य रचना में पहले कर्ता और पीछे समापिका क्रिया लाते हैं, जैसे -फूल खिला है, धूप पडती है । यटि क्रिया सकर्मक हो तो, कर्म पद क्रिया के पूर्व प्राता है, द्विकर्मक होने से पहले गौण-कर्म और पीछे मुख्य-कर्म रहता है, जैसे -चह पुस्तक पढ़ता है , पहश्यामा को खेल दिखाता है , .

~
पूर्णकालिक-क्रिया समापिका-क्रिया के पहले आवेगी, जय
कि दोनों का कर्ता एक हागा। श्रोर जिस क्रिया के जो कर्म,
करण आदि पद होंगे वह उस से प्रथम श्रावेंगे जैसे -उसने
हाथ से हार बनाकर गले में पहना दिया ।
प्राय विशेषण पद अपने विशेष्य से प्रथम रहता है। यदि
दो वा अधिक विशेषण पद एक साथ श्रावै, तो उनके चीत्र में
। सयोजक अव्यय नहीं रहता, जेसे
-
कर्मनीर गोखले की मृत्यु से भारत कीबहुत बडी हानि हुई।
सर्वनाम पदों के विशेषण-प्राय पीछे नाते है, जैसे
वह बुद्धिमान कहने लगा-'श्रमी उहा।'
जिस स्थान पर दो वा अधिक विशेप्य पद उद्देश्य-विधेय
भाव से जुड़े हों, उस स्थान पर विधेर पद पीछे और उद्देश्य
पद पहले लिखा जायगा, जैसे -धर्म ही सच्चा मित्र है।
विद्या अमूल्य रत है, भारतवर्ष हमारी जन्मभूमि है।
विशेषणी भूत सर्वनाम अपने विशेष्य से पूर्व रहता है, जैसे
जो मनुष्य अपना कर्तव्य पालन करता है, वह पूजनीय
।जो स्वार्थवश दूसरों को दुप पहुँचाते है, वे मनुष्य
घृणित है।
सम्बोधन पद, यास्य के प्रारम्भ मे रहता है और उसके
चिह्न 'हे' 'अरे' 'हा' अव्यय, ठीक सम्बोधन पद के पूर्व रहते
है । कभी २ ये चिह लुप्त भी रहते है,जैसे -सीते, तुम यहाँ
है

.
कहते है,
( ६२ )
हो, अरे अभागियो ! तुम अब तक सोये पडे हो, वसन्त का
कुछ खवर ही नहीं।
सम्बोधन पद के ठीक पीछे मध्यम पुरुष-सर्वनाम रहता
है। सम्बोधन-पद जिस वचन का हो, उससे पीछे श्राने वाला
सर्वनाम भी उसी वचन का होगा । श्रादर व गौरव-स्थल पर
सम्बोधन से परे 'पाप', समानता, यन्धुता और स्नेहादि स्थल
पर "तुम" और अनादर आदि के स्थल पर 'तू' यह सर्वनाम
श्राता है। कहीं 'तू' को भी वरावर वाले और छोटे लोगों के
लिये वोलते है, कहीं भक्त लोग ईश्वर के लिये भी 'तू'
जैसे
हे ईश्वर! आप हमारी रत्ता करो, हे नीच! तू क्या
करता है ? चन्द्र, तुम कहाँ जानोगे ? हे परमेश्वर तू कहाँ है ?
विलापादि के लमय 'हा' 'हे' अव्यय बोले जाते हैं, जैसे -
"हा ईश्वर ! तेरी क्या मर्जी हे ? हे सती साध्वी जानकी!
तुमने ससार के सामने पतिव्रत धर्म का कितना बडा आदर्श
खडा किया है।"
सम्बन्ध-पद से परे उसके सम्बन्धी-पट का प्रयोग होता
है,जैसे -"यह राम की
पुस्तक
है।" यदि सम्बन्धी पट का
कोई विशेषण हा तो वह सम्बन्धी पद स पूर्व ही रहता है।
जसे -"उसका निर्मल हृदय छार छार होगगा।"
जहाँ सम्बन्धी पद का उद्देश्य-विधेय रूप से अन्वय हो,
यहाँ विधेय-पद वाक्य में पहले ही श्राता है, जैसे – 'दूसरों को
हानि पहुंचाना ही दुष्टों का काम है।" "देश की भलाई
करना ही सजनों का धर्म है"।

प्रश्नोत्तर के सिलसिले में कमी २ सम्बन्धी पद पीछे आता
ह. जैसे -यह पवित्र काम किमका है ?
फरण पद कर्तृपद के पीछे और कर्म से प्रथम प्राता है,
और उसफा विशेषण उससे पूर्व रहता है, जैसे ---उन्होंने रडे
परिश्रम से इस कार्य का सामा किया , उमने और
पवित्र प्रेम द्वारा अपने हृदय को विकसित किया।
जिस सम्पूर्ण अर्थ में अपादान कारक होता हे उसी
-| सम्पूर्ण अर्थ-बाधक पद से पूर्व अपादान पद रहता है,
जैसे
E. "वह तुम्हारे इस काम से असन्तुष्ट है, यह कल दो पहर घर
से चल पड़ा हुया वह अपने पापों से भयभीत हाकर त्राहि
' माहि करने लगा।"
विशेषण सहित कर्म, और अधिकरण पद अपादान से
पीछे बात है, किन्तु करण शोर मिरा-विशेषग अपाटान से
पहिले ही पाते है,
"उसने हमारे कधे से दुशाला उतार लिया।"
मेने मातृभूमि के नक्षस्थल से ग्ज उठा पर सिर पर
पारण की। उन्होंने अपने पवित्र उपदेश द्वारा भत्तों के हृदय
किरा । यह यत्नपूर्वक अपने मार्ग से विना
को दूर करता गया।
प्राय अधिकरण पद अपने श्राय के पूर्व स्थापित होता
स्वार्थ त्याग ही में श्रम चह, उसने हमारी
, छाती पर ही यह अनर्ध किया।"
जेसे
से अन्धकार दूर
-

(
६४ )
प्राय कालवाचकाधिकरण वाक्य में पहले ही आता है,
जैसे .-'रात में बडी ओस पडती है निशीथ में निस्तन्धना
का साम्राज्य स्थापित होता है।"
जहाँ पर कालवाचक और स्थानवाचक दानों एक कात
में अधिकरण हो, वहाँ पहिले कालवाचक पीछे स्थानवाचक
पद पाते है, जैसे :- ईश्वर प्रति समय प्रति स्थान में हैं।"
एक शब्द के दो बार साथसाथ थाने को वीप्ता कहते है।
चीप्सा द्वारा सम्पूर्णता, बदुत्त्व, प्रकार, एक कालीनता, निर
टता, केवलता, आदि अर्थ प्रकाशित होते है, जैसे-
घर घर में यह चर्चा फैल गई, हमारे जगल में बडे बडे
-
-
वृक्ष है।
वह धीरे धीर जारहा था, गीता पढ़ते पढते उसके माण
पखेरू उड गये । कानोंकान यह खबर चारों ओर फैल गई।
बहुत से श्रापेक्षक-श्रव्यय वापयों में साथ राते , जैसे
जव तक, तब तक, यद्यपि तथापि, जो औरतो, श्रादिश्रादि।
प्रश्न-चाचक सर्वनाम उस पद से प्रथम भाता है, जिस के
विषय में प्रश्न हो, जैसे यह कौन पुस्तक है?
यदि पूरा वाक्य ही प्रश्न हा तो वह वापय में पहले ही
आता है,जसे
क्या आप यह पुस्तक पढेगे जो कल लाये थे।
कमी कभी वाक्य में प्रश्न वाचक सर्वनाम नहीं होता केवल
प्रभ-याचक चिह्न ही अन्त में रहता है, जैले वह गया?

( ५ )
.
पद-परिचय
वाक्य के पदों का पारस्परिक सम्बन्ध तथा व्याकरण
सम्बन्धी विशेषताओं का जहाँ कथन किया जाय उसे पद
परिचय, पद-व्याख्या या पदान्वय कहते है।
भनेक वैयाकरण वाफ्य में पॉच प्रकार के पद मानते हैं,
विशेष्य (सहा), विशेषण, सर्वनाम, क्रिया घोर अन्यय ।
विशेष्य के परिचय में-प्रकार, भेद-जाति-वाचक आदि,
लिग, वचन, पुरुष, कारक, विभक्ति, किस क्रिया के साथ
अन्वय है। किया पाचक विशेष्य में लिङ्ग, वचा, पुरुष नहीं
लिखा जाता।
सर्वनाम-किस विशेष्य का है, उसी विशेष्य के अनुसार लिक
वचन होता हे पुरुष और कारक में भेद हो सकता है।
विशेषण--प्रकार भेट, और किसका विशेषण हे।
क्रिया-पूर्व-कालिक या समापिका, सकर्मफ, अकर्मक,द्विकर्मक,
कर्तृघाच्य वा भाववाच्य, काल, पुरुष, वचन, कर्ता,
यदि सकर्मक हो तो कर्म ।
एक ही शब्द का भिन्न भिन्न पदों में प्रयोग
कभी २ विशेषण पद स्वतन्त्ररूप से विशेष्य की भाँनि पाते
हे और उनमें विशेष्य के लिपचन होते हैं, जमे -पडितों
को बुलाया है।
,

कुछ गुणवाचक विशेष्य कभी विशेष्य और कभी विशेषण
हो जाते हैं। सुवर्ण-मदिर में 'सुवर्ण' विशेषण है ओर
मदिर विशेष्य।
कुछ सख्या वाचक शब्द जन केवल १०, १२, १५ सख्या
हो तो, सरचा वाचक विशेष्य भोर अन्य पद के सरया-बोपत्र
हो तो, सरवावाचक विशेषण होते हैं, जैसे ३घोडे, गाय।
कभी जाति-वाचक शब्द विशेष्य और कभी विशेषण होता
है, विद्या पढना ब्राह्मण का धर्म है' -यहॉ ब्राह्मण विशेष्य है।
और "ब्राह्मण कुल में जन्म लेकर"-यहाँ ब्राह्मण विशेषरा है।
सर्वनाम भी विशेषय-रूप में नाता है-यह वही रणक्षेत्र है,
यहाँ "यह" सर्वनाम विशेष रूप में श्रागा है। सर्वनाम कमा
कभी विशेषणरूप में भी आता है, जैसे -"यह मनुष्य
"सा" धातु
कभी कभी किया-पद भी विशेष्य-रूप में प्राता है, जैसे-
के आगे 'ना' प्रत्यय लगाने से 'खाना' पद बनता
है। यहाँ 'साता विशेष्य है।
परिचय करते समय गद्य का एक एक पद लेते है और
पद्य का गद्य-क्रम (अन्वय ) कर लेते हैं, फिर यथाक्रम परि-
चय करते जाते है।
उदाहरण
कुवलय-कुल में से, तो अभी तू कढा है,
यहु विकसित प्यारे पुष्प में भी रमा है।
अलि, अर मत जा सू कुज में मालती की,
सुन मुझ अकुलाती ऊरती की व्यथाएँ ॥
-

[हे ] अलि, तू कुम्लर कुल में से तो अभी निकला है [और बहु विलित प्यारे पुप्पो में भी रमा है [ इसलिये] अब तू मालतो की कुज में मत जा [योर ] मुझ अलाती ऊयती की व्यथाएँ सुन । अलि--जाति वाचक,संशापद पुलिङ्ग एक यन्त्रन, मध्यम- पुरुष, सम्बोधन कारक। तु-सर्वनाम पुष्पपाची, मध्यमपुरुष पुलिह, एक वचन फर्ता, मिश्रित वायर फी दो क्रियाएँ "निस्ला है" और "ग्मा " का। कुवलय-जाति या० सज्ञापद एक नगन, पुलिस अन्य पुरुष, कुल का सम्पन्न-पात्रक विशेषण । कुल में ले-जाति-जावक सज्ञापद, एक वचन, पुलिस, श्रपादान कारक। अभी-कालवाचफ किया विशेषण "निकला हनिया का निकला है--क्रियापद, अकर्मक, कर्तृप्रधान, श्रामन्न भूत. काल, पुलिह, एक वचन, निकला से बना है, इसका कर्ता'तू'। और-समुद्यायिक अव्यय पद 'तू कुत्रलय कुल में से अभी निकला है और [तू अभी ] यहु-विकसित प्यारे पुणा में भी रमा है"। इन दो सरल वाक्यों का योजक है। यहु-विशेषण (विकसित विशेषण पा) विकसित-विशेषण (पुरा विशेष का। ) पुप्प में-जाति पाचक विशेष्य (समा ) पद, एक यवन. पुल्लिङ्ग, अन्य पुरुष, अधिकरण (व्याप्ताधिकरण ) 'ग्मा है' क्रिया का प्राधार। भी-निश्चय योर अन्यय ।

--
रमा है-क्रिया-पद अकर्मक, पत्तप्रधान,आसन्नभूतकाल,
पुल्लिङ्ग, एक वचन रमना धातु की, इसका कर्चा 'तू' इसका
श्राधार 'पुष्प।
तू-उपर्युक्त सम्पूर्ण तू का परिचय, (मत ) जा और सुन
क्रियाओं का कर्ता।
श्रय-क्रिया-विशेषण,कालवाचक (मत) जा क्रिया का!
मालती काजाति वाचक सहापद, एक वचन, स्त्रीलिङ्ग
अन्य पुरुष सम्बन्ध पद, कुस से सम्बन्ध, (सम्बन्ध-योधक
विशेषण ) कुल है विशेष्य का ।
कुज में जाति वाचक सज्ञापट, एक वचन,
स्त्रीलिङ्ग,
अन्य पुरुष, अधिकरण कारक, ( मत )जा क्रिया का श्राधार।
मत-भाव-वाचक क्रिया-विशेषण, ( जा क्रिया का)
जा-क्रिया पद, अकर्मक कर्तृवाच्य, विधि एक, घ०,
पुल्लिङ्ग, कर्ता 'तु।
मुझ-सर्वनाम, उत्तम पुरुष, एक वचन, स्त्रीलिङ्ग,
क्योंकि राधिका का कथन है।
अकुलाती-(अकुलाती हुई ) क्रिया द्योतक लक्षा।
अकुलाना, ऊपना क्रियाश्रों की द्योतक।
ऊवती-क्रियाद्योतक-संज्ञा ।
व्यथाएँ-जातिवाचक समापद बहुवचन स्त्रीलिङ्ग,
अन्य पुरुष कर्म कारक की अवस्था, 'सुन' क्रिया का कर्म ।
सुन-क्रिया पद, सर्मक कर्तृवाच्य, विधिक्रिया,इसका
सम्बन्ध पद
-
कर्म 'व्यथाएँ पर्चा 'तू''
भाव-वाचक-सज्ञाएँ पहुवचन में जानि-याचा हो जाती है।

(६६)
अभ्यास
-
-मीचे लिखे हुए शब्दों को यथा-म्यान रम र वाक्यपनायो
() मैंने 'सदा के 'मरे 'लिये 'बहिन' 'धारण 'ब्रह्मचर्य
प्रत', "किया।
(7) 'देवमत' 'सन्यासी को 'शान' 'भून जाओ' 'दवि' ।
(ग) 'क्या' 'परन्तु 'महानत 'मर' 'त्याग का 'ध में' 'पहिली'
'परीक्षा के ही' 'घर' 'ही जायगा ।
(घ) 'पुस्तक' 'मनोहर' 'मोहन' "लिन पर' 'पहुँचा देना' 'प्रेस में ।
(८) 'सुस है 'शान्ति हो में मत भूलो' 'इसे' 'भाई' 'कि' ।
(च) 'उठ गया है 'सौभाग्य' 'इस ससार में' 'एर दम' ।
(छ) 'हरघड़ी' हर जगह' पर करने याल को' 'याद
रमयों 'भपने।
२-नीचे लिखे थापेपन पदों या वाक्यों में प्रयोग परो
'जो' 'सो' 'यद्यपि' 'तथापि' 'यदि''तो' 'जहो''यहाँ"जो' 'यही'
३-नीचे लिखे वाक्यों में प्रभ, आय, सम्बन्ध और सम्योपन जोडो
मक्खन क्या है उमे
पिशेषण जोड़ो
मनुष्य
तू कैसा कामपरा है।
नीचे लिखे पाक्यों का पद परिचय करो
१-जैसी अधिक शाति में पाराम की निदा श्रासी है वैसी ही
अधिर शक्ति मालूम पड़ती है।
२-"क्य साना, क्या माना किस प्रकार से राना"-अब हम
रन पर विचार कोंगे।
घरद थायो
वह पुरुप गोला है

( ७० )
रिक्त पदों का पूरा करना
पद स्थापन प्रणाली के नियम और अर्थ की अपेक्षा ध्यान
में रप कर रिक्त पदों को पूरा करना चाहिये । रित-पद-पूर्तिक
लिये कोई मुख्य नियम नहीं है । साधारणतः विशेष्य से पूर्व
विशेषण और क्रिया से पूर्व क्रियाविशेषण व अधिकरण और
श्रापेक्षक पदों में सहयोगी पद यथास्थान पर आते हैं
(धनुर्धारी) अर्जुन के जिस गाडीव (धनुप) से (अनेक)
राक्षसों का प्राणान्त हुश्रा, (वह) चेकाम हुश्रा ।
.
अभ्यास
रीते स्थानों को पूरा करो
१-तप से ( ) शुद्ध होता है।
२-सत्य से जीवन ( ) होता है।
३- व्यायाम मे स्वास्थ्य ( ) है।
५-शिक्षा वह है जिससे ( ) हो ।
४-लोक-परलोक बनाने वाले ( ) की वृद्धि हो।
६--हमारे देशी भाषा के अध्यापकों में ( ) पर पढ़ने में रुचि
बहुत कम ( ) जाती है।
७-हमारे देश ( ) जनता ( ) अभी सवाद-पनों का उतना
( ) नहीं है जितना ( ) चाहिये ।
--भूख ( ) या अधिष गर्मी लगने से टससे पचने की इच्छा
हमारे ( ) हो जाती है।

विराम-चिह
पद, धारयाश या चार गेलते समय ग्रीन पीचर्मकुछ देर
के लिये ठहरना पडता हे, इन उहगव को दिराम कहते हैं।
जर हम पद, वाक्यांश च वाक्य लिखते है तो विराम की
जगहों पर कुछ चिद लगाते है उन्हें विराम चिह्न कहते है।
विराम-चिहों के बिना लगाये हमारे फहं हुए सपा के अर्थ
समझने में सुविधा नहीं होती। चाश्य रचना के अभ्यास क
साथ ही विराम-चिह्ना के लगाने का अभ्यास करना चाहिये।
आज कल साधारणत हिन्दी में नीचे लिपे हुए निगम चिला
का प्रयोग करते है
()
श्राप धिगम या झोमा
अविराम या मेमीकालान
पूर्ण विगम या पाई
प्रदर-सूचक
चिस्मयादिबोधक
फोलन और डेस
सम्मोचन
विभाजन
अल्प विराम
वाषय पढ़ते समय जिस स्थान पर थोडी और टहरना
पडे, घहाँ अल्प विराम लगाते है, जैसे
Poचतुर कारीगर मोती, पुखराज, नीलम हीरा गा
आदि की जाँच करते हैं।
-

( ७२ )
२---इसके लिये प्राण जाये तो हर्ज नहीं, क्योंकि आत्मा
अमर है।
३-वह जानता है, में पास हो जाऊंगा।
2-मै कलमदान को देखूगा, जो घर रक्खा है।
आई विराम
प्रत्प-विराम से जहाँ कुत्र अधिक ठहरते है और जहाँ पर
दो वाक्यों के प्रों में पास पास का सम्बन्ध होता है उनको
पृथक करने के लिये अर्द्ध-विराम लगाते है; जैसे
"हम अपने शरीर को किस तरह रखें, हम अपने मन को
किस तरह रक्खें, हम अपने कारोवार का किस तरह प्रवन्ध
करं, हम अपने बाल बच्चों का किस तरह पालन करें ये सब
बातें जानना जरूरी है।'
पूर्ण विराम
जहाँ पर एक वाक्य पूरा हो जाता है वहाँ पूर्ण विराम (1)
लगाते हैं, जैसे
एक और दिल्लगी सुनिये । आपके एक मित्र है मास्टर
उमाप्रसाद । वे सयुक्त प्रदेश के लखनऊ नगर में मास्टर थे।
श्रागरे को अपनी तवदीली चाहते थे।
एक पूर्ण वाक्य के बीच में अल्प विराम, अर्द्ध विराम
आदि चिह्न भी यथाअवसर पाया करते है
इसी तरह इस दुनियों की जुदी जुदीऋतुओं काजुदाजुदा
असा तो होना ही है और जुदे जुदे आदमियों का जुदा जुदा
स्वभाव तो रहेगा ही, ये सब हमारे लिये अभी के अभी
बदलने के नहीं।
-
-

अभ्यास नीचे निवे याश्यों में जहाँ जहाँ कोमा माना पावरपर है लगा- "मुदामाजी के पैर दिवाइयों से फट रह हैं उनके पैरा में दो चार दश वीस काँटे नहीं रल्लि काँटों के साल के जाल गडे हुए है।" “जहों शब्दों का सीधासादा अर्थ लगाकर प्रयोजन रीदिक कारर कोई निकट सम्बन्धी अर्थ लगाते हैं यहाँ लक्षणा होती है।" "मयय चार प्रकार के होते र विभक्ति-प्रत्यय, तद्वित प्रयय, निया- प्रत्यप और वृन-प्रत्यय ।" नीचे लिये हुए अश में जहाँ जहाँ अस्प-विराम, भई विगम, पूषा- विराम आदि चिों, पी जम्नत हो लगानी समम वा सम्कृत शब्द ( ) स्कृन की प्रथमा विभक्ति के एक वचन के हीरूप होत है ( ) जैसे ( ) राजा ( ) माता ( ) तद्भर शब्द संस्कृत शब्द से उत्पना होते है ( ) जैसे ( )म( ) भगत ( ) देशी गद प्रदेश विशेप पे है ( ) जैसे डोंगी ( ) डाभ ( ) निशी शब्द अय भाषाओं के है ( ) जैसे ( ) सरगोश ( ) शेर ( ) ऐन ( ) गिरजा। प्रश्न-योघर चिह्न जहाँ पर किसी से कोई प्रश्न किया जाता है यहाँ यह (१) चिह्न प्रश्न सूचफ धाश्य के पीछे लगाते है. तुम क्या कर रहे हो ? विस्मय सूचक चिह्न हर्ष, पाश्चर्य, भय श्रादि मनोविकारों के प्रशशित करते समय पद या धापय के अन्त में यह चिह लगाते हैं, जैसे धन्य धन्य ! वाह वाह ! मूर्ष तुम क्या करते हो! m - ( ७८ ) " बिह - - उद्धरण चिह्न दूसरे के पास्य को उद्धरण करते समय यह " लगाते है, इसे उद्धरण चिह कहते है, जेसे कहावत है --"सॉच न लागे पाँच"। आप लिखते हैं 'मैं फिकर न कियाफाँ"। श्रादेशक किसी विषय के समझाने के लिये उदाहरण देने है या व्यारया करते हैं तो यह (-) चिह्न काम में लाते है इसे फोलनडैस कहते हैं। कहीं कहीं खाली डैस (-) ही काम में लाते है तुलसी के दो भेद हैं -रामा ओर श्यामा । वापय तीन प्रकार के होते है -सरल, यौगिक और जटिल। सम्बोधन किसी को चेताकर या वुलाकर जब कोई बात कही जाती है तो साधारणत कौमा लगाते है । जर चेतना और बुलाना विशेष मना विकार के साथ हा तो विस्मरका चिह्न लगाते है मोहन, स्कूल क्यो न गरे? हे हरि, गगा-स्तान के लिये कर जानोगे ? अरे मूर्ख ! सावधान ! दुष्ट ! तुझे अपने कुकर्मों का शीघ्र ही फल मिलेगा। दो वा दो से अधिक पदों के योग से जव एक पद बनता है तो बीच में () लगाते हैं, इसे विभाजन चिह्न कहते है, जैसे तट पर पहुंचे तो अनेक ऋषि-मुनि इस अानन्द-समाचार "रघुवंश-मणि भगवान रामचन्द्र जव सुर-सरि के पवित्र . u- - ? को पाकर वहाँ उपस्थित हुए।

.
-
नीचे लिये वाक्यों में 'मम', 'उद्धररा', 'आदेश', 'विस्मय' और
*विभाजन-चिट यथा स्थान पर लगायो
"जैसा प्रसाद गुण ! ) कालिदास पे काव्यों में भरा पड़ा है वैमा
ही श्रीज गुण ( ) पूण ध्वयात्मक नई नई उक्ति ( ) युक्ति भवभूत की
कविता में अधिकतर उत्तर ( ) रामचरित में हैं।"
"हे पतित पावनी माता सुरपनी ( ) भागीरथ पिस पुण्य-यल
मे तुमको ( ) स्वर्ग की मदाकिनी को ( ) मयं नोक में पाच लाये
थे ( ) इस मैरु (य में उसी भक्ति का उल्लास ( ) मा ( )
एक वार उपन्न फर दो।"
भगवति वसुन्धरे ( ) दो हक हो जात्रा ( ) आपण ( ) जड
नुल्य खडा हा और क्या देख रहा है ( ) ससार तेरी हसी करता है
( ) एश्वर्य यालों के द्वारों पर भिक्षा मांगते हुए तुझे लजा नहीं पाती
( ) यदि शक्ति हो तो छ ( ) कपिल के तेज की अग्नि वपा करके
'नीच का धमण्ड चूर करद ( ) और यदि यह नहीं हो सकता तो शुद्ध
और घृणित ( ) अरे पद-दलित ( ) पर महत्व के कपाल ( ) भर
वजले में मुंह न दिखलाना ( ) रसातल को बना जा।
वाक्यों के आकार भेद
२ निधि वाचर-जिससे किसी बात का विधान पाया जाय,
जैसे -'भागराएक महर है।' 'पत्थर एक
चातु है।''वह शान्त पुरुष हे ।'
निषेध चाचक-जिसमें किसी विषय का अभाव प्रकट हा,
जैसे यदि तुलमीदाम जी रामायण न
लिखते तो आजकल धर्म नाम को भी नहीं
रहता। धर्म यिना सखा कोई नहीं।

( ७६ )
३ श्राशार्थक-जिसमें श्राशा, निवेदन, उपदेश,अनुमति आदि
हों, जैसे.-'गुरु की आज्ञा मानना शिष्य का
परम कर्तव्य है।' 'प्रातः सायँ घूमना चाहिये।'
'मेरा निवेदन है कि इसको आप दण्ड दें।
४. प्रश्नार्थक-जिसमें किसी प्रकार का प्रश्न किया गया हो,
जैसे -'ऐसा धापने क्यों किया?' 'क्या आप
इसको लिख सकते हैं?' 'मैं इस अवस्था में
स्मा की
५ विस्मयादि योधक-जिसमें आश्चर्य, कोतुक आदि भाव
सूचित हो,जैसे-'मोटर कितनी बढ़िया
है।' 'ग्रहा' 'मोर कैसा नाचता है !'
६ इच्छावोधक-जिसमें इच्छा व आशीर्वाद का बोध हो,
जैसे -'ईश्वर इस दुखी भारत की भी
सुने।' 'भगवान् श्रापमोचिरस्थायी बनायें।'
७ सन्देहसूचक-जिसमें सन्देह पाया जाय,
जैसे -'कदा
चित् आज पिताजी मथुरा से पाजावें।'
'टीवार गिर न जाय ।
- सकेतार्थक-जिसमे सकेत या शर्त पाई जाय, जैसे
'यदि श्राज मेरे पास विद्या होती तो मैं इस
प्रकार भटकता न फिरता।' 'यदि पानी वर्षा
तो धान पैदा होंगे।
'परिश्रम से सुख मिलता है।'
'पया परिश्रम से सुख मिलता है ?'
(विधि वाचक)
'मुमकिा है कि परिश्रमसे भी सुख नहीं मिले।' (सदेह वाचक)
(प्रक्ष वाचक)
(यवाफहा-) परिश्रम से सुख नहीं मिले!' विस्मय योवक)
.

)
( ७७
मे परिश्रम करूंगा, सुख मिलेगा। (इच्छा गंधक)
सोपरिश्रम नहीं करता, उसे सुख नहीं मिलता।( निपे वाचक)
परिथम फरो सुप मिलेगा।
(आधा बोधक
यदि परिश्रम करोगे तो सुख मिलेगा। (सकेत वाचक)
-
अभ्यास
नीचे के वाक्या को यथा शक्ति अनेक प्रकार के पारयों में पदनो।
१--शान से मुहिमिल होती है।
-सभ्यता से अपना समय मेन जोज भोर शानद में व्यतीत होता है।

1
तृतीय अध्याय
वाक्य-रचना का अभ्यास
[१]
वाक्यों का विस्तार और सकोचन
कर्ता, कर्म और किया पदों से बने हुए छोटे छोटे वाक्यों
को, सम्मोधन विशेषण, निर्धारण (निश्चय) हेतु, सम्बन्ध, अनि
करण, अपादान, करण, असमापिका क्रिया आदि द्वारा बढ़ा
सकते है।
कर्ता कर्म क्रिया-राम ने लका को विजय किया।
करणराम ने 'वीरता से लका को विजय किया।
सम्प्रदान-राम ने 'सीता के लिये पीरता से लका को विजय
किया।
पूर्वकालिक क्रिया-राम ने सीता के लिये वीरता से 'चढाई'
करके लका को विजय किया।
अपादान-राम ने सीता के लिये वीरता से चढ़ाई करके समुद्र
से पार' लका को विजय किया।
अधिकरण-राम ने सीता के लिये वीरता से चढाई करक
समुद्र से पार लका को 'युद्ध में विजय किया!
सम्बन्ध-राम ने सीता के लिये पोरता से चढाई करके
'दैत्यों की' लका को युद्ध में विजय किया ।
सम्बोधन-हे पार्वती, राम ने सीता के लिये चीरता से
चढ़ाई फरके समुद्र से पार दैत्यों की लका को
युद्ध में विजय किया।

।
( 8 )
कर्ता विशेषण-'सूर्यवशावतश' 'भगवान्' गम ने
कर्म विशेषण-सुदृढ़ लका को
करण विशेषण-'अपूर्व पीरता से
सम्प्रदान विशेषण-'सती साची' सीता के लिये
अपादान विशेषण-'अगम्य' समुद्र से पार
अधिकरण विशेषण-'भीषण' युद्ध में
सम्बन्ध विशेषण-'दुर्जेय' दैत्यों की लंका
क्रिया विशेषण-दृढता पूर्वक विजय किया
अन्त में वाक्य सुना।
हे पार्वती,
सूर्यवशावतश भगवान् गम 'ने' सती-साधीसीता के लिये
अपूर्व वीरता से चढाई कर के अगम्य-समुद्र से पार दुर्जेय दैत्यों
की सुदृढ़ लका को भीपण युद्ध में दृढता पूर्वक विजय किया।
अर्थ की अपेक्षा रसते हुये वाक्य में आये हुए पद और
वाक्याश को बढा कर वाक्य विस्तार करते हैं।
शानी मनुष्य ही सच्चा सुसी है।
जिसने शान प्राप्त किया है वही मनुष्य सन्चा सुखी है।
नीति धर्म पालक मनुष्य ही चारों फल प्राप्त करता है।
जिसने नीति और धर्म का पालन किया है वही मनुष्य
धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष नामक चारों फल प्राप्त करता है।
चास्य के उद्देश्य तथा विधेय श्रशों को विशेषण और
गुणवाचक पदों के योग से बढ़ा सकते हैं।
महाराणा प्रताप ने प्रण पालन किया।
'परम प्रतापान्वित भारत केशरी मेवाडाधिपति' महाराणा
प्रताप ने 'पवित्र वीरोचित, प्रण का'सम्यक प्रकार से' पालन
किया।

-
-
सकोचन
किसी विस्तीर्ण वाक्य के अर्थ की रक्षा करते हुए उसके
भीतर दो एक समापिका क्रियाओं को असमापिका यनार
और विशेष्य वर्थ-बोधक वाक्यांशॉकोविशेष्य-अर्थ बोधक पद,
तथा विशेषण अर्थ-बोधक वाक्याश को विशेषण-पद बना कर
वाक्य का श्राकार सकुचित किया जाता है, जैसे-
१-जिसने शान और भक्ति को प्राप्त किया है, जिसने
फर्तव्य-कर्म का चिन्तन किया है, जिसने सयम सहित विराम
धारण किया है, वही जीवन सफल कर सकता है।
कर्तव्य फर्म का चिंतक मानी और भक्त विरक्त ही
जीवन सफल कर सकता है।
---दर्शन को समझने वाले. विज्ञान को जानने वाले,
सन् विष्णु के उपासक, ऐसा नहीं हा सफता कि किये हुए
को न माने।
दार्शनिक, विज्ञानी और सच्चे वैष्णव कृतघ्ननही हो सकते।
३-जिन्हें नीति का ज्ञान है, जिनक हृदय में साहस हे,
अयोध्या के राज्य पर जिनका अधिकार हे, जानु तक की जिनकी
लम्बी चाहु है, ऐसे राम, इन्द्र के जीतनेवाले दैत्य पर क्यों न
विजय प्राप्त करें?
'नीता साहसी' और आजानुबाहु अयोध्याधिपति राम,
दैत्य इन्द्रजीत पर क्यों न विजय प्राप्त करें।
४-मैने स्वामीजी को देखा और आनन्द में डूब गया।
कहने लगा कि,धन्य है यहमाता, जिसने ऐसा पुत्र पैदा किया।
मैं स्वामीजी को देखते ही आनन्द से मग्न होकर फहने
लगा "स्वामी के सदृश पुत्र पैदा करनेवाली माता को धन्य है।"
५-मैं बाजार गया, इधर उधर घूमा और धोती लाया ।
इधर उधर घूम कर बाजार से धोती लाया।
.

ELL - ६-जहाँ पाय या नाव-समूह में उद्देश्य अनेक प्रकार के हो और निधेय एक प्रकार का हो, तो उद्देश्यों का सयोजक- अव्ययों द्वारा मिला देते है और क्रिया का एक ही बार उल्लेय करते हैं, जैसे "प० श्रीकृष्णदत्त जी का व्यारवान होगा, चतुर्वेदी विश्वे - शरदयालु घोलेंगे और स्वामी डालचन्द की घक्तता होगी" जिसके बदले में-"प० श्रीकृष्णदत्त चतुदी विश्ववरदयालु थोर स्वामी डालचन्द के व्यारयान हाने" 'कर सस्ते है। कमी २ अर्थ की और दृष्टि रज कर पाय का नकोचन किया जाता है, जैसे "जिस प्रकार प० रामप्रसाद सरल । स्वभाव है उसी प्रकार टा० लालसिह भी सरल स्वभाव हैं। इसका सकोच इस प्रशर शेगा प० रामप्रसाद की भाँति ही डा० लालसिंह भी सरल स्वभाव है। अलकृत धाययों में से अलमार सिफाल कर साधारण चाक्य रचना में उसका सकोचन हो जाता है। वाक्य-रचना का अभ्यास - वाक्य-परिवर्तन चाफ्य-रचना क अभ्यास के लिए एक प्रकार के चाका को दूसरे प्रकार के चाय में बदल लेना चाहिए। सरल वाक्य से जटिल-वाक्य बनाना विधेप पूरक और विशेषण-योधक वाक्याश को पाक्य यता र, अथवा विधेय बढ़ाने वाले पद को पापप बनाकर अथवा इश्य-बर्द्धक विशेषण-पद को घायर बनाफर, 'जो,यह, 'यदि,

तो' आदि नित्य-सम्बन्धी अव्ययो द्वारा जोड देते हैं, कहीं
नित्य सम्बन्धी पद लुप्त रहते है।
सरल चाय-भारतवासियों के सम्राट् आज हमारे बीच
में नहीं है।
जटिल-'जो' भारत-सम्राट् थे, 'वह' आज हमारे बीच
में नहीं है।
सरल-उसके दुराचारों को तुमने कैसे जान लिया।
अटिल-उसके जो'दुराचारथे, उन्हें 'तुमने कैसे जानलिया।
सरल-सजन मनुष्य कटु वचन नहीं कहते ।
जटिल-जो' सजन मनुष्य है, वे' कटु वचन नहीं कहते।
सरल-उसकी नीति को मैं जानता हूँ।
जटिल उसकी 'जो' नीति है, 'उसे' मैं जानता हूँ।
जटिल-वाक्य को सग्ल-वाक्य बनाना
किसी जटिल वाक्य के अन्तर्गत सहायक वाक्य को पर
या वाक्यांश के रूप में लाकर सम्बन्ध-योधक दोनों पदो के
हटा देना चाहिये, सरल-वाक्य बन जायगा, इसमें अर्थ श्री
काल का विशेष ध्यान रसना चाहिये।
जटिल वापर--'जब तक मैं अपना कार्य साधन न के
लूँगा, 'तन तक' विवाह न करूंगा।
सरल वाक्य-अपना कार्य माधन न करने तक विधा
न करूँगा।
जटिल-तुमने मुझसे 'जिस प्रकार' कहा था, 'उसी
अनुसार कार्य कर रहा हूँ।
-तुम्हारे कथनानुसार कार्य कर रहा हूँ।
जटिल-तुमने ऐसी रात कही, जो सर्वथा असम्भव
.
सरल
1

सरल-तुमने सर्वथा असम्भर घात कही।
इन दोनों प्रकार के परिवर्तनों में पाय-सकोचन नियमों
का विशेष ध्यान रखना चाहिये।
सरल-वाक्यों को यौगिक-वाक्य बनाना
सरल-बायर के किसी वाक्याश को स्वतन्त्र यायय बनाकर
'एच'यथया' 'किन्तु' 'इसलिए' श्रादि अन्धयों के प्रयोग से
यौगिक वाक्य बना लेना चाहिए। कहींकहीं पूर्वकालिक क्रिया
को समापिका क्रिया कर लेने से यौगिर-चाया बन जाता है।
सरल-स्नानादि से निवृत्त हो कर, गीता रहस्य या
अध्ययन किया।
यौगिक-स्नानादि से निवृत्त हुआ और गीता-रहस्य का
अध्ययन किया।
सरल चाफा के स्नानादि से निवृत्त होकर" इस बापाश
यौगिक-वाक्य का "स्नानादि से निवृत्त हुना" यह स्वतन्त्र
पाक्य बना लिया।
सरल-पढने में शिथिलता करने से दुप होता है।
योगिक-पढने में शिथिलतामत करो,इससे दुख होता है।
सरल-दुर्बलतावश उपस्थित नहीं हो सका।
यौगिक यह दुर्घल था इसलिए उपस्थित नहीं हो सका।
यौगिक-वाक्य को सरल वाक्य में बदलना
यौगिक वापय के एक स्वतन्त्र-याश्य का धायाश में घदत
कर कहीं कहीं समापिका क्रिया को पूर्वकालिक क्रिया करने से
योगिक चाय का साल पाश्य हो जाता है।यौगिक वायों से
अध्यय पद सरल-धापय हो जाने पर लुप्त हो जाते है।
योगिक-वाक्य-हरिाया और चला गया।

.
-
सरल-वाक्य-हरि श्राफर चला गया।
यौगिक वाक्य-आम पका लिये और खा लिए ।
सरल वाक्य-आम पका कर खा लिए।
यौगिक-वाक्य-अपने दोष को मुक्त कण्ठ से स्वीकार
कगे, नहीं तो निस्तार नहीं होगा।
सरल-अपने दोषों को मुक्तकण्ठ से स्वीकार किये बिना
निस्तार नहीं होगा।
यौगिक भगवान् रामचन्द्रजी को लोकापवाद का भय था
इसलिए उन्होंने सती साध्वी सीता का परित्याग कर दिया।
सरल-भगवान् रामचन्द्रजी ने लोकापवाद के भय से
सती-साध्वी सीता का परित्याग कर दिया।
जटिल-वाक्य से यौगिक-वाक्य
जटिल-वाक्य के प्रधान वाफ्य को स्वतन्त्र पाक्य बनाना
पडता है और उसके नित्य-सम्बन्धी दोनों पदों को छोडकर,
'नहीं', 'तो', 'किन्तु', 'अथवा' और आदि सयोजक और
विभाजक अध्यय पद लाने पड़ते है।
जटिल-चाक्य--उसने जो कहा था वह नहीं किया।
यौगिक वाफ्य-उसने कह तो दिया परन्तु किया नहीं।
जटिल वाफ्य-यद्यपिवह विद्वान् है तथापिसमझतानहीं।
यौगिक चाफ्य-यह विद्वान् है परन्तु समझदार नहीं ।
योगिक-वाक्य से जटिल-वाक्य
यौगिक-धाक्य के दो स्वतन्त्र वाफ्यों में से पहले वाक्य के
प्रारम्भ में यदि' आदि अव्यय और सयोजफादि अव्यय के
म्थान में नित्य-सम्बन्धी पदों के प्रयोग करने से जटिल वाक्य
पन जाता है।
m N

यौगिक-वाक्य-निफाम-कर्म करो, तुम्हारा मन पवित्रता
से भर जायगा।
जटिल-चाय-यदि निष्काम कर्म करोगे नो तुम्हारा मन
पवित्रता से भर जायगा ।
यौगिक पाय-यह विहार नहीं है, परन्तु घुजिमान है।
जटिल-वायय-यद्यपि यह विद्वान नहीं है, तथापि बुद्धि-
-
थभ्यास
नीचे लिखे वाक्यों म यतालाना रिस प्रकार वाक्य हैं और क्यों ?
अर्थ की रना करते हुए यथासभर इन्ह दूसरे प्रकार के पाक्या में
परिवत्तित करी
१.---'आपको यह समझ लेना चाहिये कि भापके ऊपर कान,
श्राप और आपके परिवार के कामों का ही भार नहीं है, परन्तु इस
जननी-जन्म-भूमि के प्रति भी भापक यहत स पतन्य है।"
२-"आप पढ़ लिय जाने पर मातृभूमि श्राप से बहुत कुछ
आशा रखती है।"
३-"यह दिन भी निकट ई, मन श्राप सिधा पार नागरिकों
का मार और जवाबदेही अपने उपर लेंग।"
४-व्य-कर्म का पालन करना ही मनुष्य का धर्म है।"
५-~"याजाल प्राय सब नक्युपक्षों में जो युरी पादत पाई जाती
है उनसे शरीर के सम्पूण अवयवों का मन ही मष्ट नहीं होता बलि उनसे
मानसिक बल का भी वास होता है।"
६-"मित्र और साथी भन्छे होने चाहिये ।" यदि अच्छे साधीन
मिल तो चुरों का साथ न करना चाहिये । युवा का शुद्ध पाणी योननी
चाहिये । यदि उसके सामने कोई दुषित पात कहे तो उससे पुणा
करनी चाहिये।
.

( ६ ) वाक्य-रचना का अभ्यास . वाच्य और वाच्यान्तर वाच्य के अनुसार वाक्य के तीन भेद है, कत्तुं, कर्म और भाव। जिस वाक्य में कर्ता अपनी अवस्था (प्रथमा) में हा. और कर्म अपनी अवस्था ( द्वितीया ) में, क्रिया पद स्वतन्त्र ने हो, उरो कर्तृवाच्य कहते हैं, जैसे. 'बालक गमायण पढता है 'लडका गीत गाता है।' जिस वाक्य में कर्ता करण की अवस्था (तृतीया) में, कर्म ( कर्ता की अवस्था ) प्रथमा में प्रयुक्त हो और क्रिया कर्म के अनुसार हो, उसे कर्मवाच्य कहते है, जैसे:-लड़के से गीत गाया जाता है 'फपड़ा सीया जाता है।' जिस वाक्य में फर्म नहीं होता, कर्ता तृतीया में होता है, क्रिया स्वय प्रधान होती है, उसे भाववाच्य कहते हैं, जैसे श्याम से पढा नहीं जाता। फर्म-कर्तृवाच्य-जिस वाच्य में कर्म-पद हो कर्ता की भॉति हो अर्थात् विना कर्ता के स्वय सिद्ध हो उसको कर्म फत्तू वाच्य कहेंगे, जैसे दीवार बन रही है ।' 'घडी ठीक हो रही है।' सकर्म किया के प्रयोग में कर्तृवाच्य से कर्मवाच्य और कर्मवाच्य ने कत्र्तृवाच्य और अकर्मक क्रिया में कर्तृवान्य से भाववाच्य और भाववाच्य से फत्तृवाच्य में परिवर्तन करने फा नाम वाच्य परिवर्तन है। फर्तृवाच्य में कर्म होता भी है और नहीं भी, में फर्म अवश्य होता है, किन्तु भाववाच्य में कर्म नहीं होता । फर्तृवाच्य से कर्मवाच्य - कर्मवाच्य कर्तृ-मोहन ने मेरी कलम चुराली। ,

--
कर्म-मोहन से मेरी कलम चुराई गई।
कर्तुः
०-५० अयोध्यानाथ ने काग्रेस स्थापित की।
कर्म०-प०अयोध्यानाथ द्वारामाग्रेस स्थापित की गई।
कर्तृ-महात्मा पेण्ड्य ज ने अकाल पीडिता की सहा
यता की।
कर्मo-महात्मा ऐण्ड्य ज द्वारा अकाल पीडिता की सहा-
यता की गई।
कर्तृवाच्य -प० गोविन्दसहाय ने फिजी की रिपोर्ट लिपी
कर्मचाच्य-40 गोविन्दमहाय द्वारा फिजी की पिोर्ट
लिखी गई।
- फतवाच्य-चौकीदार ने चोर पकड लिया।
कर्मवाच्य-चौकीदार से चोर पकडा गया ।
कर्मवाच्य से कर्तृवाच्य
कर्मवाच्य-साधू से कैसा गाया जाता है।
कर्तृवाच्य-साधू कैसा गाना गाता है।
कर्मवाच्य-भगवान कृष्ण द्वारा उपदेश दिया गया।
कर्तृवाच्य-भगवान् कृष्ण ने उपदेश दिया।
कर्मवाच्य वेदव्यास द्वारा महाभारत रचा गया।
कर्तृवाच्य-वेदव्यास ने महाभारत रचा।
फर्मवाच्य-मुझ से पुस्तक पढी जाती है ।
कर्तृवाच्य-मै पुस्तक पढ़ता हूँ।
कर्तृवाच्य से भाववाच्य
कर्तृ-मैं नहीं उठता है।
भाव०-मुझसे नहीं उठा जाता।
फर्तृ-मैं रात भर नहीं सो सकता।
भाव०-मुझसे रात भर नहीं सोरा जाता।

P
कर्तृ-रात भर कोई नहीं जागा ।
भाव-रात भर किसी से नहीं जागा गया।
भाववाच्य से कर्तृवाच्य
भाववाच्य-गाय से चला नहीं जाता।
कर्तृवाच्य-गाय नहीं चलती।
भाववाच्य-तुमसे खाया जायगा।
कर्तृवाच्य-तुम खानोगे।
भाववाच्य-राम से सोया नहीं जाता।
कर्तृवाच्य--राम नहीं सोते।
अभ्यास
नीचे लिये वाक्यों में उनका भेद बताफर वाच्य परिवर्तन करो-
चढ़इ ने किवाड वनाये है । राम ने व्रत किया है। दर्जी से कपड़ा कारा
गया । घोडे से चला नहीं जाता । मै रात को नहीं पढ़ेगा। वह पर
नहीं था सकता । तुम हिन्दी में विज्ञान के कई ग्रन्थ लिखोगे । तुम सच
नहीं बोले ।
वास्य-रचना का अभ्यास
( ४ )
अलंकृत वाक्य-रचना
अच्छी रचना के लिए वर्णनीय विपय का परमार्जित ज्ञान,
रस्पना-शक्ति की सजीवता और भाषा पर पूर्ण अधिकार होने
की परम आवश्यकता है । जिस मापा में अलकारों का प्रयोग
किया जाता है उसे अलकृत रचना कहते है। हिन्दी में अलकारों
के दो विभाग किये हैं।-शब्दालकार और अलकार । जव
रचना में शब्द-सम्बन्धी चमत्कार होता है तो उसे
कहते है । ' उस सहज सौंदर्य को देख कर मन-मयूर मत
शब्दालकार
होकर नृत्य करने लगा" इस घायय में और म के प्रयोगों
में शब्द चमत्कार है।

होता है,
शब्दालकारों के कई भेद है -
एक से अक्षरां की श्रावृत्ति म अनुप्रास होता है,
जैसे
मन मयूर-मत्त में 'म' की, चतुर चितेरे में 'च' और
'त' की, योध और सोध में 'ध' की समता हे शोर एक ही
अर्थ में पद व पद-समूहों की समता में लाटानुप्रास
जैसे - 'फरि करुणा करुणा-यतन' में फरुणा की आवृत्ति
एक ही अर्थ में है । जब पद खण्ड, पद वा पद समूह
की आवृत्ति भिन्न भिन्न अर्थों में होती है, वहाँ यमक अलकार
होता है, जैसे -'सरन सरन चरन गनपति के' में की
श्रावृत्ति भिन्न भिन्न अर्थों में होती है । जव एक ही शब्द दाया
दो से अधिक प्रों में आता है तो श्लेप होता है, जसे
'मतवाले आपस में लडते है।' यहाँ मतवाले के दा अर्थ है-
उन्मत्त और मत के (मजहषी लोग)
जहाँ अर्थ सम्बन्धी चमत्कार होता है, वहाँ अर्थालंकार
होता है।
अर्थालकार १०० से ऊपर है। हर एक के अनेक सूक्ष्म
भेद है । इनर्म उपमा ( तुलना ) मर में मुख्य है।
उपमा-किसी के सोन्दर्यादि का परिचय देने के लिये
- किसी ऐसी घस्तु से तुलना करनी पडती है जिससे सोन्दर्यादि
गुण की लोक में प्रसिद्धि हो। जिस वस्तु को समता दी जाती
है वह उपमेय ओर जिस वस्तु से समता दी जाती है उसे
उपमान कहते है । यह गुण जिस से दोनों में समता हो जाती
है समान धर्म कहलाता है।
उपमा-उपमान और उपमेय का एक ही धर्म कथन
किया जाता है, जैसे -मुस चन्द्रमा के समान उज्ज्वल है।

(६० )
रूपक-समान-धर्मी उपमेय उपमानों का अभेद कहा
जाता है, जैसे:-मुख चन्द्र है।
उत्प्रेक्षा-उपमेय में उपमान को सभावना की जाती है।
जैसे -मुख मानो चन्द्र है।
प्रतीप-उपमान की उपमेय से समता की जाती है,
जैसे .~-मुख सा चन्द्र है।
अपह्नुति-उपमेय का निषेध करके उपमान का पाराप
किया जाता है, जैसे -~-मुख नहीं चन्द्र है ।
परिणाम-उपमेय उपमान मिल कर काम करते हैं,
जैसे ---मुख-चन्द्र श्रानन्द देता है।
स्मरण-उपमान को देखकर उपमेय याद आता है,
जैसे:-चन्द्रमा को देखकर मुख याद आता है ।
सन्देह-उपमेय उपमान में सन्देह रहता है , जैसे-
मुख है या चन्द्र।
इन्ही भिन्न भिन्न अलकारों को गद्य और पद्य के वाक्यों में
प्रयोग करते हैं तो उस रचना को अलकृत फहते हैं ।
अभ्यास के लिये साधारा यायोको अलगत करनाचाहिये
ओर अलकृत वाक्यों को साधारण भाषा में लिखना चाहिए
साधारण वाक्य
अलकृत वाक्य
मवार श्राता हे
विद्युत-समान चचल घोडे
पर चकाचौध सा करता हुआ
सवार आता है (उपमा अलकार

(६१ ।
लिया।
'राम शगसन की ओर चले दिनकर कुल-कमल दिघाफर
राम शिष शरामन की ओर मत्त.
गज गति से चले (रूपक अलफार)
सध्या हो गई
सूर्य भगवान् ने अस्ताचल की
शिसग पर आगेहन किया।
गगवान् पानी नायक ने दिन
भर के परिश्रम से व्याकुल हो
विश्राम के लिए अलाचल पर्वत
का आश्रय लिया।
गमचन्द्र ने शिव धनुष चढ़ा सूर्यवशावतश रामचन्द्र ने
फर सीताजी को मोहित कर अनायास ही शिव नुप पर,
ज्यागेपण रवैदेही के दृदयको
सहसा पार्पित कर लिया।
यह पक्षी उनको देने आई है। यह पक्षिरत उनके चरण
कमल में अर्पण करने आई है।
सूर्योदय से श्राफाश में लाली सूर्य के उदय होने से गगन
धागई और अंधेरादूर होगया। मण्डल रक्त वर्ण होरहा था और
श्राकाश स्थित अन्धकारसपी
धृल सूर्य की किरण रूप मासे
परिष्कृत होगई।(रूपक अलकार)
उनका रूपडाभयकर था।
उनको देखकर साक्षात्भूत
मध्यस्थ मैग्य अथवा दुत-सयुक्त
कालान्तक का स्मरण होता था।
(स्मरण)
,

)
PAR
(६०
रूपक-समान-धर्मी उपमेय उपमानों का अभेद बहा
जाता है, जैसे:-मुख चन्द्र है।
उत्प्रेक्षा-उपमेय में उपमान को संभावना की जाती है।
जैसे --मुख मानो चन्द्र है।
प्रतीप-उपमान की उपमेय से समता की जाती है,
जैसे
-मुख सा चन्द्र
अपह्नुति-उपमेय का निषेध करके उपमान का श्राराप
किया जाता है, जैसे:-मुख नहीं चन्द्र है ।
परिणाम-उपमेय उपमान मिल कर काम करते हैं,
जैसे :-मुस-चन्द्र श्रानन्द देता है।
स्मरण-उपमान को देखकर उपमेय याद आता है।
जैसे.-चन्द्रमा को देखकर मुख याद आता है।
सन्देह-उपमेय उपमान में सन्देह रहता है , जैसे --
मुख है या चन्द्र।
इन्हीं भिन्न भिन्न अलकारों को गद्य और पद्य के वाक्यों में
प्रयोग करते है तो उस रचना को अलकन फहते हैं ।
अभ्यास के लिये साधारण वाक्यों को अलकृत करना चाहिये
और अलकृत वाक्यों को साधारण भाषा में लिखना चाहिए।
साधारण वाक्य
अलकृत वाक्य
सवार आता है
पर चकाचौध सा करता हुआ
सघार आता है ( उपमा अलकार)
विद्युत-समान चंचल घोडे

६१) लिया। राम शगसन की ओर चले दिनकर कुल-कमल दिघाफर राम शिव शरासन की ओर मत्त. गज गति से चले (रूपक अलकार) सध्या हो गई सूर्य भगवान् ने अस्ताचल फी शिखरों पर आगेहन किया। भगवान् पानी नायक ने दिन भर के परिश्रम से व्याकुल हो विथाम के लिए अस्ताचल पर्वत का पात्रय लिया। गमचन्द्र ने शिव धनुप चढ़ा सूर्यवशावतश रामचन्द्र ने कर सीताजी को मोहित कर अनायास ही शिव पनुप पर ज्या गेषण कर वैदेही के दृदयको सहसा श्राकर्षित कर लिया। यह पक्षी उनको देने आई है। यह पक्षि रत उनके चरण कमल मं अर्पण करने आई है। सूर्योदय से आकाश में लाली सूर्य के उदय होने से गगन छागई और अँधेरादूर होगया। मण्डल रक्त वर्ण होरहा था और श्राकाश मियत अन्धकार रूपी धूल सूर्य की किरण रूप झाडु से परिष्कृत होगई। (रूपक अलकार) उनका रूपडा भयकर था। उनको देखकर साक्षात्भूत- मध्यस्थ भैरव अथवा दूत सयुक कालान्तक का स्मरण होता था। (स्मरण )

(४२)
वाक्य-रचना का अभ्यास
(५)
वाक्यों के रूपान्तर
सरल वाक्यों को विशेषणों, अलकारों तथा दूसरी भौति
के विविध कौशलों द्वारा रूपान्तरित कर सकते है।
सधेरा हो गया।
प्रभात हो गया । सूर्योदय हो गया । रात्रि का अवसान
हो गया। रात बीत गई । भगवान् कमलिनी-वलम उदयावल
पर अपनी प्रभा दिखाने लगे । भगवान सूर्य ने ससार का
थधकार दूर कर दिया । भगवान् भास्कर भासमान हुए।
ऊपा की किरणें प्रस्फुटित हुई। अरुणोदय हुआ। भगवान
अशुमाली ने रश्मिगशि फैला दी।
सुस हुश्रा।
हृदय मे श्रानन्द भर गया। हृदय की कली पिल गई ।
हृदय फलिका प्रस्फुटित हुई । अानन्द-तरङ्गों में गोते लगाने
लगा । आनन्द-समुद्र उमड पडा । सुख-समुद्र में उत्ताल तरंगे
उठने लगीं । आनन्द का पारावार नहीं रहा । सुख की सीमा
न रही।
चन्द्रमा उदय हुआ।
चन्द्रोदय हुआ । चन्द्रमा ने अपनी किरण फेला दी।
सुखद-चन्द्रिका छिटक गई। चाँदनी फैल गई। चन्द्र दर्शन
सुप । कुमुदिनी घालभ की आभा प्रस्फुटित हुई । मन-कुरङ्ग को
फैमाने के लिए शशि-किरण जाल विस्तृत हुआ ।

.
शान होगया।
शानोदय हुआ । अज्ञान दूर हागया । माया का परदा ह
गया । मोह-तम टल गया। याशानाधकार मिट गया। हदय में
प्रकाश हा गया । शान-रूपी-सूर्य की किरणासे शाशानाधकार
'चिलीन हो गया।
पतित हो गया।
पधम्रष्ट हो गया। उद्देश्य से गिर गया। लक्ष चूक गया।
स्थिर न रह सका। अपने को सम्हाल न सका।
दिन काटता है।
फालक्षेप करता है। दिन व्यतीत करता हैं । समय का
का देता है। दिन काटता है। दिन निकालता है।
दुपी हुए।
शोकान्वित हुए । शोक-सागर उमड पड़ा । शोकाभिभूत
हुए। शोक में मन्न हो गये। शोक में अधीर हो गये। शोकातुर
गये। शोकाकुल हुए । शोक से दृदय अधीर हो गया।
खका यारापारन रहा।
मर गया।
परलोक वास हो गया। कैलास पास हो गया। स्वर्ग
परे । पञ्चच प्राप्त किया। अनार ससार को छोड़ दिया।
से चल बसे । हम से चिर विदा ली। भर यधन से छूट
नसार परित्याग किया। उनके प्राण पखेरू उड़ गये।
दीप निर्वाण हुआ। गत कवल हुए । मानन लीला
की । श्रमर लोक सिधारे श्रादि ।
से फहना है 'चले जानो लम्बे पडो, पीठ दिखायो,
1, काम देखो, रास्ता पकडी, रास्ता लो, शादि
।

'जमना' क्रिया-पद का व्यवाहर साधारणत. द्रव वस्तु क
ठोस रूप होने के अर्थ में श्राता है, जैसे----पानी जम गया।
परन्तु जव अन्य स्थान पर लाते है तो विशेष चमत्कार हो
जाता है, "दुकान जम गई । हाथ जमा दूंगा। कैसा रग जमा
है। रोव नहीं जमा। मामला जमता नहीं नजर आता ! जड
जमती जाती है । वडी भीड जमी। जूश्रा डट के जमा हुआ ह"।
यह पक्षी उनको देने आई हूँ।
यह पक्षी उनकी भेंट के लिये लाई हूँ, यह पक्षि-रत्न उनकी
मेंट के लिये लाई है। यह पक्षी उनके कर-कमलों में समर्पण
करने के लिये लाई हूँ। यह पति-रल उनके चरण कमल में अपरा
करने के लिये लाई हूँ।
वाक्य रचना का अभ्यास ।
वाक्य का कोई पद अथवा अंश दिया हुआ
हो तो वाक्य पूरा करना ।
'स्वास्थ्य हैं-उसका अच्छा 'स्वास्थ्य' है ।
'परोपकार से मनुष्य की 'परोपकार से' वडी कीर्ति
फैलती है।
'धन्य है-तुम्हारी करनी को 'धन्य है।'
'पुल पर से'-मैने 'पुल पर से' नगर को देखा।
'गीति काव्य'-मिश्रजी की गीति-काव्य' अच्छी रचना है।
'मानव-जीवन-'मानव-जीवन' पवित्र होना चाहिये।
'भगवद्भक्ति-भगवद्भक्ति' ही मनुष्य जीवन का सार है।
'झान और भक्ति'-पान और भक्ति दोनों कल्याणकारी हे।

'राम और कृष्ण'--'राम कृष्ण के उपासकोंकी यह दशा हे।
'सत्सगति'-'सत्ससंगति' से बढ पर कौन सा लाभ है।
'धन और धर्म-अभिमान से 'धन और धर्म' टानों नष्ट
होते है।
'आहार-विहार'-उचित'पाहार-विहार' ही स्वास्थ्य लाभ
के मूल है।
'दीन-दुखियो'--'दीन दुखियों' को देखकर उनकी उपेक्षा
नकरा।
श्रभ्यास
नीचे लिखे पद वा पद समूहों को वाक्य में लायो-
"हिनालय के 'शक्तिहीन', 'चिरवियोग' 'धर्महीन' 'कर्तव्यच्युत'
'प्राणपन से' 'प्रोपपूर्वप' 'मान मय्यादा छोड पर ।
'पण भर के लिय', 'मरा रेवाप कदरर' ने महा महिम' ।
मै माता, भोर तुम ।' नदी की लहराया ।''दय में
साहस ।'
'नस नस में शूरता
।' 'परम प्रतापी राणा प्रताप
'बसुन्धरा वीरा के ।' मा हिमालय के
कन्या कुमारी अन्तरीप
सूर्यादय होते ही ।' शरद-चन्द्र मनाहारिणी योमुदी
वाक्य-रचना का अभ्यास
( ७ )
मुहापिरों पर वाक्य रचना ।
मुहाविरा-ऐसे पद य वाश्याश का जहाँ प्रयोग हा, जिस
में शदार्थ न लेकर, लाक्षणिक अथवा कोई और ही अर्थ

-
लिया जाता हो, उसे मुहाविरा कहते हैं। मुहाविरेदार भाषा
वह भाषा है, जिसमे मुहाविगे का प्रयोग हो।
मुहाविरो का वाक्यों में प्रयोग।
-
,
मुहाविरा मर्थ
उनका वाक्यों में प्रयोग ।।
हाथ धो बैठना = सो देना, वह पुस्तक से हाथ धो बैठा ।
हाथ डालना = काम छेडना, इस काम में हाथ डालूँगा।
हाय खींच लिया = सम्बन्ध नहीं रक्खा, मेने उधर से हाथ
सोच लिया।
हाथ उठाना =माग्ना, बच्चों पर हाथ उठाना अच्छा नहीं।
हाय मारना= शर्त करना, हाय मार कर कहे देता हूँ।
हाथ चलाना छेडना, हाथ चलाना अच्छा नहीं ।
हाथ होना = कृपा होना, उसके ऊपर राजा का हाथ है।
हाथ फटाना = काबू न रखना, वह अपने हाथ कटा बैठा।
हाथ पर हाथ बरे बैठे रहना कुछ न करना, वह हाथ प
हाथ रख कर बैठा है।
हाथ खाली होना- कुछ न रहना, मे पाली हाथ जाकर 4
करूँगा?
हथियाना = लेना, उसने मेरी पुस्तक हथियाली ।
हाथ धो कर पीछे पडना लगातार पीछे पडना, वह हा
धोकर मेरे पीछे पड़ा है।
हाथ दया है = फायू है, मेग हाथ दवा हे।
हाथ निकलना कायू निकलना, अय क्या ह हाथ निकल गय
हाथ मलना = पछताना, हाथ मल रहा है।
हाथ थाना- पिलना, तुम्हारे क्या हाथ यायेगा।

(६७ )
सिर
मूडना - ठगना, किसका सिर मूडा।
सिर लेना-जिम्मेवारी लेना, उसे अपने सिर क्यों लेते हो।
सिर हिलाना-मना करना, उसने तो सिर हिला दिया।
सिर देना = बलिदान होना, वर्म पर उसने अपना सिर दे दिया।
सिर पर चढ़ाना-धादत बिगाडना, उसने सिर पर चढालिया है।
सिर पटकना-किसी दूसरे पर डालना, उसने मेरे सिर पटक
दिया।
सिर डालना = हठात् सौंपना, राम के सिर डाल दी।
पानी उडना =श्राव बिगडना, तलवार का पानी उड गया ।
पानी पडना = शर्म श्राना, लाखों मन पानी पडा।
पानी ढलना- वेशर्म हाना, उसकी श्रॉखों का पानी ढल गया।
पानी पी जाति पूछना = काम करके पीछे सोचना ।
खाक उडना = घरवाद होना, वहाँ खाक उडती है।
खाक उडाना बदनामी करना, किसी को साफ उडाना
अच्छा नहीं।
साक डालना= छिपाना, सैर हुया सो दृश्रा श्रय याफ डालो।
खाक चाटनातवाह होना, वह साक चाट गया।
खाक छानना बहुत हुँढना, तुम्हारे पीछे म्याक छान डाली।
साक में मिलना-नाश होना, यह पाक में मिल गया ।
खाक परसना-नाश होना, वहाँ बाक परमती है।
सून सूपना= डरना, देखते ही मेग सून सूप गया ।
खून विगडना = कोढ या और कोई खून का रोग होना,
उसका खून बिगड गया।
- खून बहाना = मारकाट करना, सून यहा दूँगा ।
खून उयलना-क्रोध थाना, एक दम पून उयल श्राया।
खून का प्यामा जान का गाहक,वह मेरे खून का पासा है।
.
--

१ भर आया। (६८) मुंह फिरना = घमण्ड होना, उसका मुँह फिर गया । मुँह फटना = लोभी होना, आजकल उसका मुँह फटा है मुँह ही मुंह देना=जवाब पर जवाब देना, क्यों मुँह ही देते हो मुंह बनाना चेटा विशेष करना, कैसा मुंह बनाया है। मुँह गिगाउना उलटा जवाब देना, उसका मुँह बिगाड दिया। मुँह फक होना- घबडाना, उसका मुँह फक हो गया। मुँह में पानी भरना = इच्छा होना, देखते ही मुँह में पाना मुंह काला होना = क्लक लगना, उसका मुंह काला होगया। मुंह मॉगी मोत मिलना चाही हुई यात पूरी होना, मुँह माँगी मौत नहीं मिलनी। श्रॉप माग्ना = इशारा करना, उसकी ओर ख मार दी। श्रॉस मटकाना= सेन चलाना, क्यों आँस मटकाता है ? आँख मूंदना-विचार न करना, श्रॉप मूंद कर काम करता है। आँख मिचना=मरना, उसकी आँख मिच गई । शॉप खुलना-समझ पाना, बडे दिनों में प्रॉखे खुली। आँख दिखाना = धमकाना, जब वह आँख दिखाने लगा। आँख लगना प्रेम होना, सोना । उससे आँख लग गई, उसकी श्रॉख लग गई चार आँपे होना-सामने होना, ज्यों ही उनकी चार आँखें हुई। आँख बदलना = मन फिरना, उसको ऑखें यदली दिखाई देती है। ऑखों में चर्स छाना = घमण्ड होना, उसकी प्रॉपों में चर्चा छागई है। आँप नीली पीली करना=नाराज होना, ऑमें नीली पीली क्यों करते हो । . - .

( 8 ) आँख उठा कर देखना = सामना करना, उसकी तरफ कोई आँख भी नहीं उठा सकता। आँखों में खून उतरना - क्रोध से बॉर्ख लाल होना। पानी काबुलबुला क्षणभगुर, यह जीवन पानी का बुलबुला है। पानी के मोल-यहुत मस्ता, पानी के मोल विक गया। पानी चढना = रग श्राजाना, सोने का पानी चढा है। पानी पानी होना = अत्यन्त शामिन्दा हाना लज्जा से पानी पानी होगया। पानी पी पी कर - लगातार, पानी पी पी कर कोस रहा है। पानी बुझाना- कोई गर्म वस्तु पानी में डालना, पानी उभा कर पिलायो। पानी भरना=फीका पडना, उसके सामने पानी भरता पानी मरना=कसूरवार सारित होना, उसकी तरफ पानी मरता है। पानी में आग लगाना-असम्भव बात करना, पानी में भाग % है लगाना है। पानी भरी खाल =क्षणिक जीवन, पानी भरी खाल है। - अभ्यास (१)अर्थ लिखो और वाक्यों में प्रयोग करो। दण्ड डालना, दण्ड भरना, दण्ड पड़ना, दएड भोगना, दण्ड सहना दम भरला, दम मारना, दम मसना दम के दम में, दम लगाना, दम उसड़ना, दम खींचना, दम देना, दम घुटना, दमपट्टी देना, दम में माना दुख पाना, दुय चटाना, दुख देना, दुख पडना, दुख भरना दुनिया- दारी करना दुनिया की हवा लगना, दुनिया भर की याते मारना दुनिया ( १०० ) . -- . भर का बडा ठाना, दुनिया से उठ जाना, दुनिया भर का सामान लादना, दुराई देना, दुहाई मारना, दुहाई फिरना, दिन काटना, दिन दहाड लूटना, सिर पर चढ़ कर II, नाच नचाना, नाच कूद करना, नाच रंग होना, सिर पर मौत नाचना, तीन तेरह होना, तीन पाँच काना, चुटी पाना, छुट्टी होना, छुट्टी रहना, दील डालना, दील देना, दोष छोडमा, शान फिरफिरी होना, शान वधारना, शान मारना, शान पर चढ़ना, हवा बँधना हवा उसडना, उलटी हवा चलना, हवा का रस देखा हवा खाना, हवा लगना हया चलना, हवा बदलना, हवा में उड़ना, हवाई महल बनवाना, साँस खींचना, साँस निकलना, सांस भरना, साँस मेना, गहरी वात, गहरी मार, गहरी चाल, गहरी चोट, टेढ़ी खीर, टेढी यात, टेढी चाल । - 1 । (२)अर्थ लिखो और वायों में प्रयोग करो.- - 'मूसलाधार पानी बरसता है' 'किंकर्तव्यविमूढ़ होगया' 'कुछ सूझता नहीं' 'रातों रात आगरे पहुँचा' 'तीन तेरह हो गया' 'तीन पाँच क्यों फरते हो' 'पानी के बताशे है' 'हवाई महल है। 'अन्धाधुन्ध मच रही है' 'खेना एक न देना दो' 'ज्यों का त्यों रुवा' 'डोबाँडोल हो गया' 'भाँधी के श्राम है' 'सावन का अन्धा है' 'हरे में फूटी है' 'वचक क्यों मचाई है। 'चलता हो' 'क्यों गुनगुना रहा है' 'सॉप फुसकारता है' गाय भाती है' 'मोर फूकता है' 'कोयल फुट फुट करती है' 'कौना काँव काँव कर रहा है 'सरी मैं मैं करती है। 'चोर गिडगिडाता है' 'वादल उठ रहा है 'घटा छा रही है। कमल खिल रहा है। चाँदनी छिटक रही है। 'निस्तब्धता पा रही है' 'मसमली फसे हो रहा है 'परिन्दा पर नहीं मार सकता' 'ऊपर की साँस ऊपर नीचे की नीचे 'चील झपट्टा मारती है' "चिड़िया चहचहाती है' 'बड़े जोर की वर्षा होती है' 'टकटकी धुंध गई' 'दिन दहाडे लूट मच गई 'छाती धक् धक् करने लगी' 'पसीने

( १०१ )
पसीने हो गया' 'दिल की बली सिल गई' 'मन बाग वाग हो
गया' 'पानी भरा यचुला है' 'पानी की आग है' पैंतरा बदल रहा है
'
तिरी फट गई? 'तिउरी पलट गई' 'चाल न चल सका' 'चात पाड
ली गई गत का मामला है ज़िन्दगी भारी पड गई' वे दिन न
है 'मान का पान ही घन्छा' 'माँ फटी की फटी रह गर'"मन मयूर-मत्त
हो गया' 'अन्ततोगत्या 'प्रापिरवार।
वाक्य-रचना का अभ्यास
अनुच्छेद-रचना
"चाय पदों फा यह नियमबद्ध सगठन है-जिसमें एक
पूरा विचार प्रकट करने की शक्ति हो।"ऐसा चाय समूह जिसमें
एक ही भार प्रकट हो, अनुच्छेद कहलाता है, अर्थात् सापेक्ष
वाक्य समूह ही अनुच्छेद हे । अनुच्छेद रचना के समय एक
वास्य के ठीक पीछे ही दूसरा ऐमा पाय आता हे जिससे
विचारों का तारतम्य नष्ट न हो और जो कुच हम कहना चाहते
हे उसका क्रम विकास होता जाय । जब तक यह पूरा भाव
स्पष्ट न हो जाय जिसे हम व्यक्त करना चाहते है चाफ्यों का
सिलसिला गयर चला जायगा । अनुच्छेद के पाक्यों में
आकाक्षा, योग्यता और क्रम रहता है । इसलिये नीचे कुछ
पद समूहों पर अनुच्छेद रचना फरफे दिपाते हे
मज्ञा पद :-
-
(२) मसार, सदाचार, शरियों, पवित्र, प्रेम, परमात्मा मन ।

-
३-पतमाना, रमणीय स्थान, अनुपम छटा, विनोद, स्वास्थ्य
संसार में उसी को दुप होता है जो सदाचार का पालन
नहीं करता । सदाचार से शरीर को शक्तियों को बल मिलता
निर्मल होता हे, हृदय पवित्र होता है। लोग परमात्मा
परमात्मा पुकारते हैं परन्तु, जिनके शरीर और मन शुद्ध नहीं है
यह परमात्मा से प्रेम नहीं कर सकते । परमात्मा के प्रेम का
साधन ही सदाचार है।
(२) जल, वायु, भोजन, श्वास, जीवन (जिन्दगी ), प्राण ।
मनुष्य-जीवन के लिये जल, वायु और भोजन की
आवश्यकता है। वायु के बिना श्वास नहीं ले सकते । थोड़ी
देर भी श्वॉस क्रिया को रोक ले तो प्राण छटपटा ने लगते हैं।
जल का तो नाम ही जीवन है । और बिना भोजन के मनुष्य
कुछ दिन तक जी सकता है पर दिन पर दिन निर्बल होता
जाता है।
अभ्यास
नीचे लिखे हुए प्रत्येक पद-समूह को अलग अलग अनु
च्छेदों में लिखो
१-शाकुन्तल फालिदास, रचना, अनुपम, संसार, कवि मुल-मुकुर
तुलना ।
२--विनय, मनुप्पता, शिष्टाचार, जीवन, पवित्र ।
पारियों, अमय।
Vशरप, अहिल्या, राम, मनरपुर विश्वामित्र, सोभा, गदगद ।
x-~-गोरसारिका, सीता, हनुमान, नका, मुंदरी ।

-
।
विशेषण पद:-
(१) भगवती, पवित्र, पुण्य, कार्तिकी, रडा, मनोहर, वृहत्काय, दर्शनीय ।
भगवती मागीरथी के पवित्र अञ्चल में हरिहर क्षेत्र
नामक पुण्य स्थान हे यहाँ कार्तिकी पूर्णिमा के अवसर पर
अनेक दिनों तक बडा मेला लगता है, जिसमें मनोहर घोडे
वृहत्काय हार्थी, दर्शनीय पल आदि पशु सहस्त्रों की सया
में इकटे होते है।
(क) धैर्यवान्, पर्तव्यशीन, एर,
विचित्र ।
धर्यवान व्यक्ति ही समार में सफलता पा सकता है ।
फैसा ही कर्तव्यशील मनुष्य क्यों न हो पिना धीरज के एक
फदम भी आगे नहीं बढ़ सकता। जीवन में कमी की विचित्र
अवसर पाते हैं उस ममय मनुष्य उनावला दृश्या और गया ।
कहा है "उतावला सोपावला योग सो गम्भीरा"
अभ्यास
नीचे की पद-समष्टि पर अनुच्छेद रचना करो
१-निर, मतापशाली हितारो, शान्ति और दूरदर्शो ( दुर को
सोचने वाला)
२-पूजनीय, पतित, पिरसित, धैर्यवान शोर ज्ञानी ।
३-गाल, हरा, मोग, पन का टूटा हुआ ।
५-~-ग-विरगे, मनोहर, उँची नीची, शान्ति-दायर ।
क्रिया विशेषण :-
(१) हापोहाय, दिनभर, धरत्यर, उसकभी, भगनक, अवश्य ।

( १०४ )
मैं सोनपुर के मेले में जो पुस्तकें ले गया था हाथों
हाथ
निकल गयी। फिर दिन भर इधर उधर घूमता रहा
अचानक स्वामी दयानन्द जी के दर्शन होगये। उन्होंने कहा
"जब कमी आश्रोमिल तोलिया करो।" मैंने कहा "क्षमा
कीजिए, मेला देखकर साधकाल को प्रापके दर्शन अवश्य करता।"
(२) एकाएक, अकस्मात, कदाचित, बहुधा, प्य, दिनभर ।
मैं कल एकाएक मथुरा पहुंच गया । अकस्मात्
चौधरी
कृष्ण गापाल मिल गये। कदाचित श्रावणी तक वहीं टेहरे रहे।
बहुधा
ऐसा ही किया करते है। मैंने श्रागरे पाने के लिये कहा
किन्तु व्यर्थ हुथा। उनके पास दिन भर ठहर कर यहाँ से
चला आया।
नीचे लिखे क्रिया विशेषण समूहों पर अनुच्छेद रचना करो'---
१.शान्ति पूर्वक, प्रशिदिन, कथनानुसार, सर्वथा ।
२-निरन्तर, पलमात्र, स्वभावत , नाममात्र, नियमानुसार।
३-इसलिये, अचानक, सहज, मुख्य फरके,
क्रमानुसार
४-~~-निदान, दौडते दौडत, जहाँ तक, लगातार, कदापि ।
वाक्य-रचना का अभ्यास
मुहाविरो पर अनुच्छेद-रचना
१-रात दना, सनाटा या जाना, हाथों हाय, मानमता, मो दो
ग्यारह ।
गत ढल चुकी थी, सन्नाटा छाया हुआ
था हाथों
हाथ कुछ दिखाई नहीं देता था, चुपके से चोर आया और
मालमता
लेकर नौ दो ग्यारह हुना।

२-मनमानी घरजानी, प्रधाधुन्ध, दग रह गाना, अपना सा मुंह
सेकर लोटना।
यहाँ तो मनमानी घरजानी हो रही है, कोई किसी की
नहीं सुनता । इस अन्धाधुन्ध का भी भला कहीं ठिकाना है !
मैं तो यह दशा देखते ही दक्ष रह गया। किससे कहे और
किस को सुनें। अपना सा मुंह लेकर उसी दिन लौटाया।
३-चलता पुरजा, हवा का रुन देखना, नाक मुँह मिकोड़ा, दाल र
गलना लैक्चर फटकारना।
मोहन बडा चलता पुरजा मनुष्य है, हवा का रुख
देस कर बातें करता है। कल तक तो यह समाज सुधार के
नाम से नाक मुंह मकोडता था फिन्तु जर देगा कि
श्रय दाल नहीं गलने की, नो अछूनोद्धार पर एक लम्या
लैक्चर फटकार दिया।
५-जैसे तैमे, यवविञ्चित, हाथ लगना, घट पर जाना, लम्बी सानना ।
मे अत्यन्त दुर्वल हो रहा था। जैसे तैसे दो चार घण्ट
पर्वत शिखर तक जा पहुँचा । भृग्य जोर से सता रही थी।
किञ्चित् सामान हाथ लगा। चुपचाप चट कर गया
छ ऐसी लम्बी तानी कि पता भीनचलागत कवयीत गई।
श्रभ्यास
हर एक समूह पर सापेक्ष वाक्य-समूह लिखो
-दिन दहाडे, दुहाई देना, दम सुरु होना, दएड भोगना ।
---डाट यता, नाचाद करना, दम में श्राना, टप-बी बंधना ।
-तिसी बदलना, दाल न गनना, चाल चतना, मनमानी परना
हाथ मलते रहना।
-कुछ कुछ करना चहचहाना, क्षा, पीउपौर चिल्दा, मनकारना,
परना।

-
वाक्य रचना का अभ्यास
(१०)
कहावतों का प्रयोग
कहायतें ऐसे मुहाविरेदार वाक्य (उक्तियाँ) है जो एक
स्वतन्त्र अर्थ रगती है और मनुष्य अपने कथन की पुष्टि में
अथवा अपने पक्ष में फैसला लेने के अभिप्राय से, अथवा
किसी वात को फिसो श्राड से कहना हो उस समय, अथवा
किसी के प्रति उपालम्भ देना हो, अथवा जब किसी को
चेतावनी देनी हो, तो उनका प्रयोग किया करते हैं। उन्हें
'कहावत' या 'लोकोक्ति' अथवा 'जन-श्रुति' कहते हैं।
उलटा काम करने वाले को अच्छा फल न मिले तो वहाँ
स्पष्ट यह कह कर "तुमने युग किया प्रत. बुरा हुआ" एक
लोकोक्ति कह दी 'जैसी करनी पार उतरनी" असर निकल जाने
के बाद सम्हलने वाले से "अब पछताये होत का चिड़ियाँ चुग गई
खेन ।" "का परसा जब कृषी सुखाने ।" आदि ।
इस प्रकार सहसा कहावतें जनता में कहीं और सुनी
जाती है। उन कहावतों का भावार्थ समझ कर वाफ्यों में
प्रयोग करने से वाक्य रचना का अच्छा अभ्यास होता है ।
जव पृथक् ? कहावतों का प्रयोग करते हे तो सापेक्ष वाक्य
समूह का कहावत पर निचोड हाता है, जैसे
देखिये ऊँट किस करवट बैठता है।
अभी परिणाम विदित नहीं हुअा। उद्योग तो खूब
किया
पर ठीक नहीं कह सकता कि "ऊँट किस करवट बैठे।"
एक का इलाज दो और दो का इलाज चार ।
भाई, फल रात को एक दुर्घटना हो गई। जव मै घर आ
रहा था दो चोरों ने घेर लिया यद्यपि मैंने बहुत साहल
--

( १०७ )
विया, तथापि श्राप जानते ही है कि "एक का इलाज दो और
दो का चार।" वह कपडे लत्ते लेकर लम्बे बने।
सॉई घोडनि के अच्छत गदहन पायो राज।
यहाँ तजुरुरेफार पुराने लोगों को कोई पूछना ही नहीं
पेचारे सच्चे सीधे एक कोने में पड़े है ! परन्तु कुछ चालराज
लोगों ने अपना पेमा गुह बनाया है कि उनके सामने किसी
को नहीं चलती । यह दशा देख कर हमें यह ममल बाद
आती है "सॉई थोडनि के अखत गदहन 'प्रायो राज।"
फरा सी भरा और यरा सो उताना ।
जो आर्य-जाति किसी समय सभ्यता के शिखर पर पढ़ी
थी, जो एकता और प्रेम के मद में मस्त थी, आज वही
अभान, उप, कलह और फूट का शिकार बन रही है। सदेव
एक सी दशा किसी की नहीं रहती। यह ईश्वरीय नियम है,
"फरा सो भरा और घरा सो धुताना।"
अपनी अपनी ढापुली अपना अपना राग।
अविद्या के अंधेरे ने एकता सूम का तोड मोड डाला। पह
हिन्दू जाति अनेक सम्प्रदाय और अनेक वर्गों में घट कर अलग
अलग हो गई । कोई किसी को पात नहीं मानता है, "अपनी
अपनी ढापुली अपना अपना गग" वाली रात हो रही है ।
हाथी चले ही जाते ह कुत्ता भुंफते ही रहते है।
ससार में सबकी बुराई भलाई होती है परन्तु बुद्धिमान
पुरुष मूखों की यात पर कभी ध्यान नहीं देते, वह अपने मार्ग
तिल भर भी नहीं हटते, वह जानते हैं कि "हाथी त्रले ही
जाते हैं और कुत्ते भूकते ही रहते है !"
।

A भ क ( १०० ) यडे लोगों के फान होते है, आँख नहीं । हमारे देश में बडे लोग लड़कपन से ही कुछ खुशामदी लोगों के हाथ के सिलौने बन जाते हैं। यही बनावटी भक उनके विचारों और व्यवहारों के विधाता बन चैठते हैं। जो कुछ इन्होंने कह दिया, जो कुछ समझा दिया यह वेदी के लोटे की तरह इधर उधर लुढकते फिरे । तभी तो कहते हैं, 'पडे लोगों के प्रॉसें नहीं होती, कान होते है।" एकार्थक अनेक कहावतों को जब एक अनुच्छेद में प्रयोग करते हैं तो किसी मुख्य भाष की पुष्टि होती। नीति सम्बन्धी कहावतें- मनुप्य स्वार्थ वश हो कर नीच से नीच कर्म करने पर उतारू हो जाता है । स्वार्थ भरी सकीर्ण दृष्टि से संसार के सारे कामों को दखता है। उसके हृदय में गीति-धन के तत्वों के लिये कोई भी स्थान नहीं रह जाता । उसे तो यार की यारी से काम उसके फैलो से क्या काम ? ससार में "मुख्य है दाल रोटी और सभी बात खोटी" होने के कारण “मतलन से मतलब" है । न किसी के अन्यायों पर होम है न किसी के न्याय पर हर्ष । उसके द्वारा "साठ गॉच का चौधरी बहत्तर गाँव का राव, अपने काम न आवे तो माड जाय" की प्रशीप पाता है। वह भी भली प्रकार समझ लेता है कि "स्वारथ के सव ही सगे दिन स्वाग्थ कोउ नाहिं" उसके लिये "स्वारथरहित सखा सब ही" कथा के भय है "वह मीठे के लिये दूसरों की जूठन पर लार टपकाना है" ऐसी ही परिस्थिति में में फंस फर नीति तख का यह मप्र- "रहिमन पानी रापिये चिन पानी सब सून । पानी गये न ऊबरै मोती मानुष चून " (१०६ ) - - . उनकी निगाहों में क्या मुख्य रस साता है । उसक निस्ट 'तिरिया तेल हमीर हट' निरी मूर्खता और 'सत मत छोडे सूरमा सत छोडे पति जाय' पागलों का प्रलाप है। परन्तु जन भाग्य-चर घूमत्म है, पुद स्वार्थ-चकरों से मनुष्य छुटकारा पाकर उपर उठता है तब "पर स्वारथ के कारने सजन धरत सरीर' या महत्व देखने गता है और 'निज कारन दुख ना सहे सह पराये काज' का तत्व समझ पड़ता है 'तुलसी सन्त सुश्रम्पतरु फूलि फले पर हेत' अथवा 'परोपकाराय सता विभूतय' पा स्वत्व छिपा नही रह सामना । उस समय 'घर मरे कि कन्या मुझे तो पीरे टका से काम' वाला नर पशुओं का समुदाय देखकर त्रास होता है । बेती सम्बन्धी कहावतें उनके हृदय में यह 'उलट वेद' की यात जम जाती है 'खेती करे न बजे जॉय, विद्या के बल येठे सॉय ।' विद्या क्या हुई ठगी तुरं । विना कुछ रिये पैठे चैठे साना क्या कोई नीरता है ? पेनी के लिये तो 'बाँध कुदारी सुरपी हाथ, हँसिया लाठी राखे साथ । काटे घास निरावै पेत, वही किसान करें निज हेत ॥' व किसान 'छोडे साद जोत गहराई तर खेती का मजा उठाई।' और यदि 'जोते खेत घास ना टूटै, ताका भाग साँझ ही फुटै।' अनेर पिसान खर्च तथा स्वेत की कमी के कारण दूसरों के साझे में ती करते हैं । यहुत से लोगों को ऐसी अवस्या में लाभ भी हो जाता है र बडे पुढे कहते आये है 'काँटो वुगै करील को अरु बदरी की धाम । सौति बुरी है चून की अरु साझे को काम ॥' - - । साझे के काम म बडे बडे झगडे हो जाते हैं। मैं-मै तुतु में ठीक यह पर काम नहीं होता। कहा यह है-अगसर खेती अगसर मार घाघ कहें ये कबहूँ न हार । इससे साझा बहुत सोच समझ कर करना चाहिये । आपाद में पहले ही पेत की मेड बाँधकर ऐसा बनाना चाहिये कि उसका पानी न निकलने पाये । इसी से नीचे में खेत अक्षा होता है। उसम पानी की रोक हो सकती है 'जिसका ऊँचा बैठना, जिसका खेत निचान । उसका धैरी क्या करे, जिसका मीत दिमान ।' गे? के लिये तो निधान खेत ही चाहिये, थोडा भी पानी उसमें पहुंचे तो बाहर न निकले । 'गे आये वाल, पेत बनाओ ताल और धान का तो पानी ही प्राण है 'काले फूल न पाया पानी, धान मरा अधवीच जवानी' कहाँ तक कह खेती के शान भरे हजारों मन्त्र है, मचका साराश यही है 'धूल पानी धूल पानी ।' . अभ्यास नीचे लिखी कहावतों का अर्थ करो और वाक्यों में लाओ :-- "घर में भूजी भांग नहीं" "घर घर मटियाले चूल्द है ।" "चन्ती का नाम गाडी" "चार दिन की चाँदनी फेर अधेरी रात" सुनी कहे मुझे पी से सा" "छछ्दर के सिर में चमेली का तेल" "टी या दुष जवान पर भागया "जय तक साँस सब तक पास "जमात से करामात "जन्म के दुखी नाम चैनसुख" "जन्म के अन्धे नाम नेनसुन" "जाओ एत दक्थिन यही कर्म के लक्सिन" "जैसे कन्या पर रहे तो गमे विदेश "जैसे नाग नाथ तैसे साँप नाथ जो धन दीस जात तो पाया प्लीने बॉट" "जोगी जोगी नई सम्परा को हानि" "तलर की आँच धुरी होती है" "तन पर नहीं लत्ता पान खाय अवयता"

वाक्यरचना का अभ्यास
बाच्यार्थ, भानार्थ, तात्पर्य और व्याख्या
गद्य पद्य वाक्यों के वाच्यार्थ, तात्पर्य,भावार्थ और उनकी
व्याख्या लिखने में वाक्य-रचना का अच्छा अभ्यास होता है।
वाच्यार्थ-चाफ्य के कठिन शन और मुहाविरो को सरल
बाच्यार्थ में बदल कर, सुयोध वापर में उस परिवर्तित फर
देते हैं, उसे चाय का सरलार्थ कहते है, जैसे
"धनि रहीम जल पफ को लघु जिय पियत अधाय ।
उदधि बडाई कौन है जगत पियामो जाय ॥"
गद्यान्वय-रहीम, पक को जल धन्य (जेहि ) लघुजिय
अधाय पियत, उदधि (की) फोन बदाई (ह) (जिससे) जगत
पियासी जाय।
रहीम कहते है कीच का जल धन्य है। जिसे छोटे छोटे
जीव भरपेट पी लेते हैं, समुद्र की या बाई है जिसके
पास से ससार प्यासा जाता है।
भावार्थ-पाय शब्दों के द्वारा किये हुए अर्थ का
कर केवल भाव पर स्वतन्त्र पापयों में जो अथ किया जा
वह भावार्थ है। ऊपर के दोहे का भाव या "
की अपेक्षा जिससे किसी का कार्य न मधे उस गुम गा
को धन्य है जो दूसरों के हित में गे।"
तात्पर्य-पता यी इलाको तात्पर्य हh kinary
निर्णय के समय अर्थवाद (विपयातरी पान
जाती है । "हाथ कमल के समान सुन्दर"TTrenit
अगद है।तापय्यं यह नदी कोमल और Tri)
।

चतुर्थ अध्याय
रचना के लिये ज्ञातव्य बातें
से पाठक
--
काय, रस, गुण, दोप, रीति, छन्द और गद्य भाषा
रसात्मक वाक्य का नाम 'काव्य' है। जिस रचना के पढने
के
हृदय में एक अनिर्वचनीय आनन्द का उदय हो
उसझानाम'काव्य' है । जिस व्यक्ति को आधार मानकर किसी
काव्य की रचना की जाती है, वह उस काव्य का 'नायक'
कहलाता है और नायक का प्रतिद्वन्द्वी प्रतिनायक,जैसे.-रामा
यण में राम नायक और रावण प्रतिनायक है । नायक और
प्रतिनायक के सिवाय गौणरूप से अन्य पुरुषों का वर्णन भी
रहता है।
काव्य के दो भेद है-श्रव्य और दृश्य । पढ़ने और सुनने
योन्य काव्य 'श्रव्य' कहलाता है, जैसे -रामायण । प्रार
जिसका अभिनय किया जा सके वह 'दृश्य' काव्य है, जैसे
नाटक, प्रहसन आदि । श्रव काव्य के दो भेद है-महाकाव्य
और खण्डकाव्य।
महाकाव्य-क्सिी देवता या प्रसिद्ध पुरुप के चरित्र के
आधार पर की हुई जिस रचना में सम्पूर्ण रस और भावों का
विस्तृत वर्णन हो, शान्त, वीर और शृद्धार में से कोई रस
प्रधान हो। उसे महाकाव्य कहते है। महाकाव्य में १८ से लेकर
सर्गतक होते है, जैसे -महाभारत,रामायण,प्रियप्रवास आदि।
खण्डकाव्य-जिस काव्य में काव्य के थोडे से अङ्गों का
वर्णन हो उसे खण्डकाव्य कहते है, जैसे-जयद्रथ वध ।
-

{ ११५ ) -- किसी वर्णन को सुनकर या पढ़कर अथवा नाटकादि का अभिनय देखकर हृदय में जो एक स्थायी ओर अपूर्व भाव पैदा होता है उसे 'रस' कहने है । रस नो प्रकार के होते है (१) शृङ्गार-नायक-नायिका के अनुराग विषयक माय के नाम को हार कहते है। (0) चीर-दया, वर्म, दान, देशभक्ति और सग्राम में उत्साह- विषयक भाव के वर्णन में वीर रम होता है। (३) करुणा-प्रिय वस्तु के वियोग और अप्रिय वस्तु के सयोग में जो शोक होता है, उसे करुणा कहते है। (8) अद्भुत-आश्चर्यजनक चिपय को देख कर, सुन कर, पढ़ कर जो पाश्चर्य का भार उत्पन्न हो उमे अद्भुत रस कहते है। (१) रौद्र-क्रोध उत्पन्न करने वाले को रोद्र रस कहते है। (६) भयानकजिससे मन में भय हो उसे भयानक रम कहते है। ७) यीमत्म-जिमके द्वारा मन में घृण उत्पन्न हो, वह घीभत्स रस है। ८) हास्य-हमी का भाव जहाँ पैदा होयहाँहास्य रस हाता है। ६) शान्त-तत्व शान आदि से मन में जहाँ शान्ति उत्पन्न हो वहाँ शान्त रस होता है। सरस रचना में इन्हीं रसों में से एक या कई रस होते है।

( ११६ ) - - . गुण रस को बढाने वाले धर्म को 'गुण' कहते हैं। गुण के तीन भेद है -माधुर्य, ओज और प्रसाद । माधुर्य--जिस रचना को सुनकर चित्त द्रवीभूत हो जाय उसे माधुर्य्य गुण' कहते हैं। रोज-जिस रचना से चित्त में उत्तेजना, वीरता और साहस बढ़े वहाँ 'पोज गुण होता है। प्रसाद---जिस रचना को सुनते ही उसके श्रर्थ का भान हो जाय वहाँ 'प्रसाद गुण' होता है। रीति रचना के लिये पद योजना करने की पद्धति को रीति घ शैली कहते हैं । मिन भिन्न लेखकों की भिन्न भिन्न शैली है। इसी लेसन-शैली के उत्कर्ष के अनुसार रचना की सुन्दरता बढती है । उत्कर्ष-शैली के लिये स्पष्टता, माधुर्य, पद प्रयोग की सार्थकता, चित्ताकर्षकता, भाषा वैचित्रर और भाव प्रति- फलन का ध्यान रखना चाहिये। (१) स्पष्टता-चना के पढ़ने से शार्थ बोध में कठिनता न हो । स्पष्टता को गुण विशेष कह सकते हैं। विना स्पष्टता के रचना के अन्य गुण व्यर्थ हो जाते है । लेख के भावों को सर- लतापूर्वक पाठक समझ सके इसका ध्यान रखना परम आवश्यक है। रचना-गौरव के लिये कभी कभी लेखक इस प्रकार पद-विन्यास करते है जिससे यह नहीं समझ सकते कि किस पद का सम्बन्ध किससे हे । काई कोई कठिन और अप्रचलित शब्दों का प्रयोग करते है। अनेक लेखक थोडे से शब्दों में व्यक्त होने वाले भाव को बड़े बडे वाक्यों में प्रकट फरते हैं, ऐसे स्थान पर भाव की जटिलता यढ जाती है। ग्चना को स्पष्ट करने में इन दोपों का परिहार करना चाहिये। (०) माधुर्य-दृदय के भाव प्रकाशन में जो स्वाभाविक धाक्य मुंह से निकालते हैं, उन्हीं सर वास्यों के साधारण विन्यास द्वारा रचना में सरलता लाने की चेष्टा करनी चाहिये। प्रसग के प्रतिकूल वात्य विन्यास द्वारा रचना का माधुर्य नष्ट होना है। शान्त भोर करुणा रम के व्यक्त करने वाली पदा बली कोमल होनी चाहिये न कि दुर्गोत्र और बहु-समास- सम्पन्न । धर्म और नीति मूलक रचना में सजीवता तथा भाव- गाम्भीर्य की रक्षा होनी चाहिये, नहीं तो सोदयं नष्ट हो जायगा । जसा गभीर वियय हो उसी प्रकार उसमें गोरख भी आना चाहिये । वीर, रौद्र ओर वीभत्स श्रादि रसा में जटिल और समास युल भापा द्वारा प्रोज बढता है। (३) पद-प्रयोग की सार्थकना-जिन वाक्य-समूह व पदों का प्रयाग करें वह अप्रासगिक होगे तो व्यजकता+में जस्लिता ना जायगी योर अर्थ का स्फुरण ४ ठीक न हो सकेगा। निरर्थक शब्दों के प्रयोग से रचना फीकी हो जाती है। अनेक लोग एक ही भार को अनेक वाक्यों में भिन्न तरह से दिसाकर उसे व्यर्थ रढ़ाते हैं । थोडी सी बात का यह मतलव नहीं है कि वह सहज ही में न समझी जा सके। (४)चित्ताकर्षक्ता-लेखक की पदावली ऐसी गौरवशालिनी हो जो पढ़ते ही पाठकों के चित्त को अपनी ओर खींचले। लेम्बक । । प्रसर के बाहर के ।+भार प्रसार करने की शक्ति । मुग्ना।

जहाँ दुःख और शोक प्रकाशित करे, पढते ही पाठक भी उसे
अनुभव करने लगे। किसी विषय को पढ़ कर, देख कर या
सुन कर, पाठक दर्शक और श्रोता के मन में उस अनुभव के
कारण एक अनिर्वचनीय विकार' उत्पन्न हो उसे भाव' कहते
है। रचना विशेष के पढने आदि से उत्साह, शोक, विस्मय
क्रोध, भय, स्नेह, हास्य, घृणा और विरति उत्पन्न होती है।
पाठकों के मन को उसका पूरा अनुभव करा देना ही रचना
की प्रशसा है । सुलेखक को पद विन्यास का गौरव भली
प्रकार जान लेना चाहिये।
सुकुमारता-भाषा का एक गुण और है। लालित्य विहीन
हाने पर सारयुक्त भाषा भी पाठकों का चित्ताकर्षण नहीं कर
सकती। मापा की रीति का हर एक लेखक को ध्यान रखना
चाहिये । कर्कश शब्दा के प्रयोग से बचना चाहिये, इससे
'श्रुति-कटु दोष पैदा होता है और भापा की कोमलता नष्ट
हो जाती है । नीचे दर्जे की भाषा में ग्राम्य दोप होने से श्रुति
मधुरता नहीं होती । श्रर्थागम में सन्देह, अप्रसिद्ध, अर्थ में
अनेक अर्थ वाले शब्दों का प्रयोग, किसी अर्थ वाले शब्द का
दुसरे अर्थ में प्रयोग, कष्टार्थक कल्पना, अनावश्यक पद
प्रयोग
ओर श्रावश्यक पदों के अभाव का ध्यान रखना चाहिये।
परस्पर अपेक्षा रखने वाले पर्दा अथवा वाक्यों की अर्थ
समता पर ध्यान रखना चाहिये । कभी भी एक वाक्य को
हटात् दूसरे वास्य के भीतर लाने की चेष्टा न करनी चाहिये।
अव्यय पदों के ठीक ठीक प्रयोग में भापा का सौदर्य
बढता है।
भाषा वैचित्र्य-भाषा का एक विशेष गुण है। वर्णित विषय
को ऐसे सुन्दर भावों से सजाना चाहिये जिससे उसका सौदर्य
और श्राकार स्पष्ट दीखने लगे । साधारण भाव वाले पदों से

विन्यास में यह स्पष्टता नही होती । अर्थालकार और दृष्टान्तों से विषय फा सौन्दर्य पार याकार प्रत्यक्ष होता है । भाषा में जितनाचित्र्य होगा,भार में सौदर्य का उतना ही उदय होगा। 'वायर स्पान्तर' प्रकरण में भाषा चैचित्र्य के कुछ उदाहरण दिसा चुके है। भाव प्रतिफलन-जिस प्रकार सूसे काट में अग्निशीघ्र प्रवेश करती है उसी प्रकार भाषा म को हुए भाव भी शीघ्र प्रति- फलित हो, अर्थात् पढते ही भार समूह पाठकों के चित्त में व्याप्त हा जायें । 'परोपकार', जन साधारण में ज्ञान की वृद्धि और 'मन का विकास', यही रचना के मुख्य उद्देश्य है। वह पापय जिसमें वर्ण वा मामा की गणना के अनुसार विराम आदि का नियम हो 'छन्द' कहलाता है। यह दो प्रकार का होता है -वर्णिक और मात्रिक । जिस छन्द के प्रतिवरण में अक्षर की सत्या ओर लघु-गुरु के कम का नियम होता है यह 'वर्णिक' या 'वर्णवृत्त' भोर जिसमें अक्षरों की गणना और लघु-गुरु के ग्राम का विचार नही, केवल मात्राओं की संख्या का विचार होता है वह 'मानिक' छन्द कहलाता है, रोला,प माला, दोहा, चोपाई इत्यादि मात्रिक छन्द है, यशस्थ, इदरजा, उपेन्द्रवजा, मालिनी, मन्दामान्ता इत्यादि वर्गवृत्त है । गद्य वह लेस जिस में माना और वणों की सख्या और स्थान आदि का कोई नियम न हो और जिसमें कर्ता और नियादि पद यथा स्थानों पर स्थिति हो।

( १२० )
१५-अनुमास, यमक आदि शन्दालकारों की भरमार में
रचना को जटिरा नहीं बनाना चाहिये।
१५-अनेक सम-कारक पद पम पापर में श्रानो अन्तिम
पद के पूर्व सयोजक या वियोजक अध्यय लाना चाहिये और
प्रथम पो छोडकर गेर पदों के पूर्व सरपनिगम ।
--
-

पञ्चम अध्याय
पत्र-लेखन
पत्र-लेसन रचना का मुख्य अङ्ग है। लेख, निबन्ध और
पुस्तकादि लिखने वालों की मख्या तो परिमित होती है
किन्तु प्राय पत्र लिखने लिपाने का काम तो समाज के हर
एक सदस्य को पढता ही है । गाईस्थिक सामाजिक, नैतिक
तथा धार्मिक ऐसी अनेक आवश्यकताएँ होती है जिनके लिये
हमें दूरस्थ मित्रों, सम्बन्धियों, सम्पादों, शासकों तथा
आत्मीय जनों को पत्र लिखना पडता हे अथवा डाके पत्रों का
उत्तर देना पड़ता है। पनों में कामकाजी साधारण नातों से
लेकर बडे बडे ऐतिहासिक, दार्शनिक, सामाजिक और नैतिक
निपयों का उल्लेख करना पड़ता है। उच्च श्रेणी के पन योग्य
लेखक ही लिख सकते हैं, उन्हें नियन्ध रचना के सम्पूर्ण
नियमों की जानकारी आवश्यक है। किन्तु साधारण योग्यता
तो हर एक अक्षराभ्यासी के लिये अपेक्षित है, इसलिये मुख्य
मुख्य बातें नीचे लिखी जाती है।
पर लिखते समय दो प्रकार कीवातोंपर ध्यान देना चाहिये
१-पत्र-सम्बन्धी सभ्यता अर्थात् शिष्टाचार।
२-मुख्य विषय।
शिष्टाचार
१-शिष्टाचार के लिये यह देखना चाहिये कि हम जिनको
पत्र लिख रहे है वह पूज्य, मान्य, आत्मीय, सम्बन्धी वा
परिचित है । प्रचलित नियम के अनुसार उसके लिये वसी ही
प्रशस्ति (सरनामा) लिखना चाहिये।
2-हिन्दी में प्रचलित प्रणाली के दो भेद है, प्राचीन
और नवीन।
1
1

( १२४)
पुराने ढग के व्यापारी, जमींदार, पडित तथा अन्य लोग
श्रय भी पुरानी प्रथा के अनुसार पत्र लिखते है और नये
विचार के लोग नये ढग से शिक्षा पाये हुए अथवाउनसे सम्पर्क
रखने वाले लोग-नवीन परिपाटी से पत्र लिखते हैं।
नवीन परिपाटी में व्यर्थ की बहुत सी बातें न लिख कर
मुरय भुरय बातों को सक्षेप में लिख देते है। आजकल इसी
का अधिक प्रचार हो गया है और होता जा रहा है
पुरानी प्रथा के सरनामे इस प्रकार के होते है
सबसे प्रथम किसी देवता या ईश्वर को नम लिखते है,
जैसे -श्रीकृष्णायनम , रामायनमः । वडों को सिद्धथी सरो
पमा विराजमान सकलगुण निधान श्री शुभस्थान
योग्य लिखी
की नमस्कार, प्रणाम,
दण्डवत् , (आदि प्रणाम वाची शब्द ।
नाम से पहले पदवी,अवस्थायोग्यता अथवा केवल नम्मान
के लिये विद्यानिधि', वयोवृद्ध, 'विद्वद्धृन्द-शिरोमणि', 'परम
प्रतापान्वित' श्रादि एक वा कई विशेषण और जोड देते हैं ।
पुरानी प्रधा में नाम के साथ श्री श्री श्री लिपने की भी
प्रथा है । पृथक् पृथक न लिख कर एक बार 'श्री' लिखकर
उसक श्रागे जितनी श्री लिखनी योग्य हो उतने का अङ्क बना
देते है, जैसे.-श्री ५.।
श्री लिखने का नियम यह है गुरू को ६, बडों को ५ शत्रु
को ४, मित्र और वरायर वालों को 3, सेवक को २, और
स्त्री को।
'अत्र कुशलम् तत्रास्तु' अथवा 'आपकी कृपा से,
'भग
घान् श्री कृष्णचन्द्र भानन्दकन्द की कृपा से 'श्री गगा जी

. ( १२५ । फी कृपा से 'यहाँ फुशल है' आपकी कुशल सदैव चाहते लिसकर 'भागे ममाचार यह है, अथवा 'समाचार एक वचना जी' अन्त में पत्रशीन भेजिये 'उत्तर शीघ्र दीजिये तथा शुमभूयात्, शुभमस्तु, इति शुभम् और तिथि। छोटो पोरगवर चालों को सिद्धी' की जगह स्वस्तिश्री' तथाप्रणाम की जगह 'श्राशीवाद','अशीय', 'जैरामजी की जैश्री कृष्ण जी की 'जै गगा जी की' तथा राम गम' आदि लिखते है। नवीन प्रथा में देवता अथवा ईश्वर के प्रणाम के पीछे पत्र लिखने के कागज की दाई ओर कोने पर वह स्थान लिखते हैं जहों से पत्र लिखाजाताहै, फिर उमरठीक नीचे तिथि चतारीख। पडों को-'पूज्यपाद', 'पूज्यचरणेपु','महामहिम', 'मान्य- वर', 'महामान्यवर', 'श्रद्धास्पद', 'श्रीचरणेपु', प्रशस्ति में लिसकर अन्त में 'कृपापात्र , रूपैपी', 'प्रगत , 'स्नेह भाजन 'दास', 'सेवक', 'कृपाभिलापी', श्रादिलिप फर अपना नाम लिख देते है। घरावर बालों को-'प्रियवर', 'प्रियमित्र','मियरधु', 'प्रिय- वर मनेही जी', प्रियकर विद्यार्थी जी', 'प्रियर चर्मा जी' थादि उपनाम भी साथ में लिम्ब देते हैं, कोई कोई नाम मा 'प्रियवर मत्यव्रत जी' लिख देते है। नीचे श्रापका स्नेही' 'मित्र' या फेल 'श्रापका' या 'भवदीय' लिख कर अपना नाम लिप देते है। छोटी को-'चिरजीव', 'मायुष्मान् , स्नेहास्पद', श्रादि लिखकर अन्त में हितैषी', शुभचिन्तक', श्रादि शन्द लिखते है। स्त्री अपने पति को-'प्राणपनि, 'प्राणनाथ', 'माणाधार' आदि पदालिसकरनीचे केवल 'दासी', 'सेविका'यादिलिखती है। सरनामा के पीछे यदि पत्र का उत्तर देना हो तो "यापका पत्र मिला श्रानन्द दुवा" : "आपसा पत्र पद पर , - .

( १२६ )
श्रानन्द हुआ" । "पत्र पढते ही आँखों मे आनन्दाश्रुओं की
धारा यह निकली।" यदि कोई आश्चर्य की बात हो 'पत्र पढ़ते
ही दग रह गया।' आश्चर्य का पारावार न रहा।' और
यदि कुछ चिन्ताजनक या दुखद बात हुई तो 'पत्र पढ़ कर
बडी चिन्ता हुई।' 'दु प का पारावार न रहा ।' 'बहुत दुःख
हुआ' आदि लिख कर पत्र के विपय से वाक्य रचना को
मिला देते है।
पथ स्पष्ट और सुन्दर अक्षरों में लिखना चाहिये।
पता लिखना
पता-लिखना' पत्र-लेखन फला का मुरय अङ्ग है। यों तो
कुल पत्र ही स्पष्ट और सुन्दर अक्षरों में लिखना चाहिये,
परन्तु पता लिखने में बड़ी सावधानी रखनी चाहिये । पत्र
लिख कर लिफाफे में बन्द कर देते है और लिफाफ़े के ऊपर
स्पष्ट अक्षरों में ठीक रीति से पता लिखते हैं। पुराने ढग के
लोग पन्न के ऊपर भी बहुत बडा सरनामा लिख देते हैं। नाम
के साथ पदवी श्रादि के अतिरिक्त और कुछ न लिखना चाहिये।
नाम के नीचे स्थान लिखो । यदि पत्र डाक से भेजना है तो
जिला और डाकसाना भी होना आवश्यक है यदि कार्ड पर
सुला हुभा पत्र हो तो उसके पीछे पता लिखना चाहिये।
श्रीयुत प० गमजीलाल शर्मा
हिन्दी प्रेस, प्रयाग।
टिकट
प्रयाग UP
1
श्रीयुत प० लक्ष्मीधर वाजपेयी
c/o साहित्य कार्यालय,
दारागज, प्रयाग।

मुख्य विषय पूरा करो। -पत्र लिखने से पूर्व सोचना चाहिय कि हमें क्यों पत्र लिसना है। पत्र में जितनी चात लिखनी है उनका सकेत एक कागन पर लिख ला। 2-अदि दूसरे के पत्र का उत्तर देना है तो देखो वह क्या या पातं आपसे जाननाचाहता है अथवा उसकी पिना इच्छा के क्या क्या रता देनाचाहनेहो।यहसरसफेत कागज पर लिमलो। ३-हर एक सर्कत के साथ का सापेक्ष वाश्यों में लिखकर ४-हर यात क्रमवद्ध लिग्या । एक बात पूरी 7 करलो तर तक दूसरी पारस न फगे। जो लोग बिना सफेतों के एक- दम लिपना प्रारभ कर देते है कोई यात जरा सी कहली, भर दूसरी शुरू भग्दी, वह भी पूरी नहीं हो पाती हि पहिली चात का एक पौर श्रश याद माया-लिखने लगे। ऐना फरने वे अपने मन की बात ठीक ठीक दूसरे के पास नहीं पहुंचा सकते है और पन्न पढ़ने वाला घडी अडवन म पट जाता है। "-पत्र की भाषा अनावटी नहीं होनी चाहिये । यथाशकि अपने भाव को सरल वाक्यों में कमवद्ध प्रकाशित करते जानो। ६-पत्र लिखते समय सोचलो कि जिसको तुम पत्र लिख रहे हो वह मामने उपस्थित है और तुम उससे बात करते जा रहे हो। ऐसा करने से तुम्हारी भापा और क्रम में स्वाभा. विकता रहेगी। ७-पन समाप्त करने से पहले अपने सकेता और पत्र को मिला लो। कोई आवश्यक बात छूट गई हो तो उसे पूग फरलो। फिर उचित शन्दो के साथ उसे समाप्त फगे। :-पत्र में कोई उपदेश, कहानी या निषध लिखना हो तो उसे इस नरह जोडो जिमले यह न पना चले कि यह व्यर्थ ही आडम्बर लाद दिया है।

ह-कहानी या लेख के विभाग-निवध रचना के निमा- नुसार-करके उसे पूरा करो। कोई उपदेश नीति या सार निकलता हो, उसे फिर इन शब्दों के साथ 'साराश यह है' 'भाव यह है' 'तात्पर्य यह है लिख कर फिर उस पर उसका ध्यान ले जाया जिसको पत्र लिख रख रहे हो। १०-उचित गति से पत्र को समाप्त करदो। पुरानी प्रथा के पत्र लिखने का नमूना श्री हरि सिद्धि श्री सर्वोपमा विराजमान सकल गुण-निधान शुभ- स्थान घाडी विन्दशिरोमणि पूज्य मामा जी को योग्य लिखी श्रागरसे रामरत,चन्द्रहस,नारायणप्रसाद,श्यामाचरण, प्रभूदयाल तथा शिवशकर का अनेक प्रणाम बचना जी। शत्र कुशलम् तत्रास्तु । अपरन हाल यह है कि पत्र श्रापका पाया। समाचार जाने । आपने लिखा है कि श्राम पक रहे है। इन दिनों में काई श्रानो,प्रचार के लिये भी आम लेजात्रो । निवे- दन यह है कि श्रापकी आशातो माननी हीचाहिये परन्तु कार्य बहुत है । एक पल को भी फुरसत नहीं । मौका लगने पर जरूर कोई न कोई पावेगा। आपके दर्शनो की भी बडी इच्छा है । आपने कहा था कि सावन में हम दाऊजी के दर्शन करने जायेंगे तभी आगरे पायेंगे। श्राशा है अवश्य पवारंगे । पत्र भेजते रहिये । पत्र न आने से चिन्ता बढ जाती है। अधिक क्या लि । इति शुभ मिती प्रासाद शुझा र्णिमास०११८० विक्रमी। श्रीयुत प० वासुदेव जी वाडी टिकट पो० गाडी, गज्य धौलपुर । पिता, गु, मामा प्रादि पूज्य लोगों का पत्र के भीतर जाम नहीं देते हैं।

( १६ )
नवीन प्रथा के पत्र का नमूना
श्रोम्
रत्नाश्रम आगरा।
तिथि
श्रीयुत वर्मा जी
बहुत दिन स आपका कोई पत्र नहीं मिला। न मेने ही
काई पत्र लिखा । नहीं मालम या कि सासारिक पचडों ने
फॅन फर हम लाग एक दूसरे से इतने विलग हा जायंगे । वह
दिन क्या हुए ! उस समय भाज की दशा की फरपना भी नहीं
की जाती थी। आपसे मिलने की पडी प्रवल इच्छा है।
साम्मारिक झगडां से भरकाश मिलते ही कभी कभी दिन म
एक दो बार अवश्य थापका स्मरण हा पाता है। घण्टों तक
अनुताप की वेदना बनी रहती है । समुद्र की उत्ताल तरगों
में पड़े हुए तिनके की भाँति, बायु के थपेडॉ से अनिच्छित
दिशाओं में रहता फिरता है। बहुतेरा सोचा कि इन्हीं राहगे
म किसी समय उस तट पर भी पहुँच जाऊँ 'दरिद्राणा
मनोरथ" वाली कहावत चरितार्थ हुई । स्थिरता थाते ही
सेवा में उपस्थित हूँगा, अधिक पया लिखू।
।
प्रापका-
गमरन
श्रीयुत पा० घृन्दावनलाल वर्मा
वी ए, एल एल नी धकील हाईफार्ट
झाँसी (यू० पी०)

( १३० ) अभ्यास १-अपने भाई को एक पत्र लिम्बो जिसमें तुमन कोड मेला देखा हो उसका वर्णन हो। २-अपने मित्र को एक पत्र लिखो जिमम पिसी विवाह में तुम्हारे मम्मिलित होने की चर्चा हो । ३-अवगार के सम्पादक को एक पत्र लिस्तो जिसमें आपके शहर का कोई समाचार छपने के लिये दो। ४---अपनी मा को एक पत्र लिखो जिसमें वोर्डिङ्ग में तुम्हारी रहन- सहन का वर्णन हो। ५-अपने पिता को गम पत्र लिखो जिसमे परीक्षा म पास हो जाने की चर्चा हो। ६-अपने किसी साथी का एक पन लियो जिसम यालचर (बाल- स्काउट्स ) दल में सम्मिलित होने की उत्तेजना हो। -अपनी छोटी बहिन को 'पाक विद्या' नामक पुस्तक भेजी जाय, उसके साथ जो पन भेजोगे उसका विपय लिसो। मनीचे लिरो श्राशय वाले पत्रों का उत्तर लिखी (१) किसी विवाह में सम्मिलित न होने की शिकायत आई हो। (२) किसी की पढ़ने को माँगी हुई पुस्तक को ठीक समय पर न दो की शिकायत हो। (३) उधार लिये रपये भेजने के साथ चिट्ठी का नमूना । (४) हैडमास्टर के पूछने पर स्कूल से अनुपस्थित रहने का कारण । ७ 1 षष्टम अध्याय प्रबन्ध-रचना का प्रारम्भिक अभ्यास किमी भाषा के व्याकरण और मुदाविरे के अनुसार पद- योजना या पाश्ययोजना को 'रचना' कहते है । और जर किसी मुख्य विषय को लेकर हम हमश बार और धनुच्छेदों ( पंग- माफ) डाग रचना करते है तो उसे 'अनन्ध रचना' कहते हैं। यह रचना दो प्रकार में होती है, पक बना द्वारा दूसरी लेप द्वारा । इस पुस्तक में चल 'लेखनी बद्ध रचना पर ही विचार किया जाता है। पिछले कई अपायों में ग्चना सम्बन्धी प्रानुपतिक रिपयों का वर्णन है। धीरे २ रचना का अभ्यास करके अन्त में कोई मनुष्य ऐसा लेग्यफा न जाय जो रचना-शास्त्र के नियमों के अनुसार एन, कहानी, लेप, पुम्नक श्रादि लिखने में पूर्ण सफलता प्राप्त करें। जब रोषक अपने कार्य में कुशा हो जाता है तो उसे किसी प्रकार की शिक्षा की थावश्यकता नहीं, किन्तु कुशलता प्राप्त करने के लिये ही उस पूर्ण अभ्यास की आवश्यकता है। तभी यह अच्छे निग्य आदिलिप मकेगा। मकर रचना के लिये कहानियों तथा पाने का सार और स्थतन्त्र कहानिया लिखने का अभ्यास होना चाहिये। पाठों और कहानियों का सार पाप्य पुस्तकों के पाठों व पहाशियों का सार स्त्र भाषा में शिक्षने मे शिवधनचा पा असा अभ्यास होता है। पहले पाठ को ध्यानपूरंक पदार उस पर सत-पाक्य निधि लेने चाहिये और उन मत- बाराको महापरतत्र स्प मे दूसरी भाषा में उस पाठ को गिरा सेना चाहिये और यदि कोई यहानी या उपदेश पच में है तो उसका भाशय समम पर अपर सकेत-शमय बना लेने चाहिएं, शिरगम में विधवा वाहिये।

( १३२ ) असत्य भापण का दुष्परिणाम एक लडका भेड चराया करता था। उसका स्वभाव था कि वह कभी-कभी खेल खेल में ही भेडिया । भेडिया!! भेडिया!!! चिल्ला उठना था। सैकड़ों बार उसने ऐसे ही चिल्ला चिल्ला कर यादमियों को चकर में डाला, क्योंकि जैसे ही वह चिल्लाता या मनुष्य अपना अपना काम छोड कर सहायता देने को दोड थाते थे। परन्तु जब उनको यह पता लग गया कि वह हँसी में झूठ मूठ चिल्ला उठता है तो आना बन्द कर दिया। एक समय एक भेडिया था ही गया, बस लडका बडे जोर जोर से चिल्लाया, परन्तु कोई भी पहली तरह झूठ समझ कर नहीं हिला चिगा। अन्त में यह हुथा कि भेडिये ने लटके को मार दिया और कई भेडों को भी मान्फर खागया । सच है-'भूठे का कोई विश्वास नहीं करना।' सकेत-वाक्य (१) लडके की क्या प्रादत थी-झूठ-मूठ भेड़िया भेडिया चिल्लाता था। (२) उममे क्या होता था- लोग व्यर्थ परेशान होते थे। (३) अन्त में क्या हुआ-लोगों ने उसकी बात पर विश्वास करना छोड दिया। (४) कहानी का सार क्या है झूठे का कोई विश्वास नहीं करता। स्वतन्त्र भाषा में कहानी लिसना मेड चराने वाला एक लडका जगल में चिल्ला उठता था 'भेडिया आया! भेडिया प्राया !' उस लडके की चिल्लाहट सुनकर लोगों को दया आ जाती थी और उसे बचाने के लिये दौडकर उसके पास पहुंचते थे। तर वह उनसे कहता-मैने तो दिल्लगो की थी, यहाँ कोई भेड़िया नहीं श्राया। लोग उसकी बुद्धि पर तरस माते थे। उसके ऊपर से सब का वि दिन सचमुच भेडिया आ A .

( १३३ )
होकर बडे जोर से चिल्लाने लगा-बचाओ! पचाओ!
भेडिया आ गया।" यासिरकार "काठ की हाँडी दो बार नहीं
चढ़ती" कोई उसकी रक्षा के लिये नहीं पाया।भेडिये न उसको
मार डाला और कई भेड़ों की चीड फाड कर चट कर गया ।
भला कोई झूठे का भी विश्वास करता है।
अभ्यास
२--नित्य अपनी पुस्तक के गद-पाठ यो सकन-वाक्यों में लिख कर अपनी
भाषा में दुवारा लिया और व्यापक को दिपायो ।
२-पय पार्टी का भार, सकत-वाया म लिख पर गय में टमका सरलार्थ
लियो।
-
कहानी-लेसन
कोई परिणाम व विषय रा सार देकर छोटी छोटी कहानियाँ लिरान
का अभ्यास करना चहिय । एमी पहानियोण मापा बडी सरल होनी
चाहिये। कहानियाँ लिखने मे कल्पना शक्ति जागृत होती है।
हाथी में बदला लेने की बुद्धि -
एक हाथी रोज तालार में पानी पीने जाता था। रास्ते में
एक दर्जी की दुकान थी। दर्जी हार्थी का गेटी दिखाता नो
हाथी पिडकी में सूंड डाल कर उसे खा लेता था। एक दिन
राटी के बदले उसने लॅड में सुई चुभो दो । हाथी उधर मे
सँड में कीचड भर लाया और चुपचाप मिडफी में सूंड डाल
कर उसके कपड़े विगाड दिये ।
लालची मारा जाता है-
एक कुत्ता मुँह में रोटी लिये हुये नदी में तैरता जाता था
अपनी परछाई देख कर समझा कि दूसग कुत्ता भी गेटी लिये
हुए जा रहा है। जैसे ही उसकी रोटी छीनने के लिये उसने
मुँह खोला तो गाँठ का टुकडाभी चला गया। सच है-सालव
में आदमी मारा जाता है।
।

कौए की बुद्धिमानी
एक कौया प्यास के मारे मरा जाता था। एक पानी का
घडा देख कर उस पर बैठ गया। परन्तु पानी तक उसकी
चौच नहीं पहुँची । उसने एक उपाय सोचा । बहुत से कंकड
घडे में डालना शुरू किये । जब पानी ऊपर चढ़ पाया तो पेट
भर कर पी लिया । यदि वह बुद्धिमानी से काम न लेता तो
प्यासा मरता रहता।
अभ्यास
--एस ऐसी कहानी लिखो जिसका यह सार निवले-'साँच न
लागे यांच'।
२.-एक ऐसी कहानी लिखो जिसको पढ़ कर विद्यार्थी आपस में एक
दूसरे से प्रेम करना सीखें।
3-एक ऐसे लड़के की कहानी लिखो जो 'इसरों की सेवा करके सव
का प्यारा बन गया हो।
५---एक ऐसी कहानी लिखो जिमम वेनीवारी की उन्नति की विध बताई
गई हो।
५-- ऐसी कहानी लिखो 'जिसमें फिसी धनी ने किसी देश के काम
के लिये अपना मर्वस्व लगा दिया हो।
६-एक ऐसी कहानी वनानो 'जिसमें कोई गरीच लडका अपनी मेहनत
से पदा हो और विलायत जाकर डाक्टर बना हो। फिर भारत में
थाकर बडा नाम पैदा किया हो ।
७-एक बालसी लडके की कहानी लिखो।
--एक ऐसी कहानी लिखो जिसके अन्त में यह दोहा आ सके-
"गगा-तट गिरवर गुहा, कहा वहाँ नहीं ठौर ।
क्यो एते अपमान से, सात पराये पौर ॥"
J

सप्तम अध्याय निबन्ध रचना का अभ्यास विषय की नमिलता विविध विषयों की नियन्ध्र रचना के लिये विविध विषया की अभिशता आवश्यक है । विषय की शुद्ध जानकारी निना रचना का फैसा ही अभ्यासी हो, लेस नहीं लिख सकता। यह छोटी पुस्तक संसार भर की बातें न बता कर, रचना का आदर्श और विपय अभिशता का मार्ग दिखा सकती है। विषय-अभिशता के लिये पुस्तकाध्ययन, सत्सग, देशाट व्यवहार-कुशलता और अनुभव-शक्ति निरीक्षण शक्ति, विचार शक्ति, करपना-शक्ति, विवेचन शक्ति का ठीक ठीक उपयोग प्राटि अनेक व्यापार है । टेवो भालो, सुनो समझो, पढो लिखो, सोचो-विचारो, अनेक विषयों की अभिधता प्राप्त होती जायगी। जाने हुए विषय को या विषय को जानकर नियन्त्र- रचना की रीति के अनुसार रचना का अभ्यास करो। प्ररथ भेद यो तो विषय-भेद से प्रत्येक नियन्य एक दूसरे से पृथ ही होता है, परन्तु सामान्यत वर्णनात्मक, कथात्मक व्याख्या स्मक और आलोचनात्मक, चार प्रकार के मोटे भेद है। वर्णनात्मक किसी वस्तु का सामान्यरूप में वर्णन करना-जिसे कि आँखों से देखा है, कानों से सुना है अथवा और पिसी रीति से जाना है, जैसे-'ताजमहल', 'नीम का पर्ड' 'लोहा', 'नागरे का किला', 'झाँसी का रेलवे स्टेशन', 'जनकपुर की शोभा', 'मीतानी का सुन्दरता 'प्रयाग की प्रदर्शिनी, यमुना की छा।

( १३६ ) कथात्मक . . - . जिसमें किसी ऐतिहासिक व सामयिक, पौराणिक अथवा किनी काल्पनिक जीवनचरित्र का वर्णन हो, जैसे. हरिश्चन्द्र, शिवाजी महात्मा गाँधी, हकीकत पा एक धर्मवीर । अथवा किसी ऐतिहासिक, पौगणिक, सामयिक तथा काल्पनिक घटना का वर्णन हो, –'हरिश्चन्द्र का फाशी में विकना' 'प्लासी का युद्ध' '१६१२ का देहती दरयार', 'विसूनियस का भभकना' ट्रेडला में नो की टकर', 'स० १६५६ का अकाल' । उपाख्यान, पचतन्त्र की कहानी', 'राजा भोज का सपना' । यदि घटना और चरित्र इतिहास से सम्बन्ध रखते हैं तो उन निवन्धों को ऐतिहासिक निबन्ध भी कह सकते है । किन्तु काल्पनिक घटना और चरित्रों के लिये इतिहास न स्थान नहीं मिलता, इसलिये ही घटनात्मक और चरितात्मा नियन्धा का भेद कर दिया गया है। इतिहास में घटना, चरित्र और बस तीनों का समावेश होता है। व्यारस्यात्मक किसी अमूर्त-विषय, जसे-चिन्ता, आशा, क्रोध, धेर्य दया आदि की व्याख्या की जाती है । वर्णनात्मक निवन्ध एक व्यक्ति के विषय में होता है, जैग्ने.- "श्राधी चलना' यह व्याख्यात्मक है और ११ जून की आधी" वर्णनात्मक है। 'भूचाल आना' व्याख्यात्मक है, कल का भूचाल वर्णनात्मक है। 'वाग लगाना' व्याख्यात्मक है और 'गमसहाय का वाग' वर्णनात्मक है। वैशानिक प्रबन्ध इसी भाग में आते है इन प्रयन्धों में कल्पना और विचार को अधिक काम करना पड़ता है। किसी कहावत तथा 'मूलसूत्र' की व्याख्या पर जो लेख हो, इसी पिभाग में होते है। 1 (१३७ । मालोचनामक सद असद् विवेफनी बुद्धि तथा युक्ति (नई) द्वारा मन्या मत्य का निर्णय, अच्छे बुरे का निर्णय अनुकूल ओर प्रतिकूल सम्मतियों का निर्णय, सार-प्रसार का निर्णय जिन लेयों में किया जाय, वह आलोचनात्मक या विवेचनात्मक प्रथा तार्फिकप्रबन्ध कहलाते है । किसी ऐतिहासिक घटना का नर्क पर तोल कर उसकनत्यासत्य का निर्णय इसी भेद में श्रा जाता है । 'मनुष्य की युरार क्या ? 'रामायण से क्या नाम है " 'विवाह पर होना चाहिये ? 'मरना ही जीना है।' मष्टि से उत्पन्न होती है ?' 'गाँव में रहना अच्छा है या शहर में दो विरुद्ध विचार तथा मिलते जुलते विचारा की तुलना भी इसी विभाग में होती है, जैसे -म्बत प्रता और स्वेच्छाचार व म्वत बना और परतन्त्रता आदि । यदि ये नियन्ध त पर न तोले जाय क्वल पारया ही रहे, तो यह व्याव्यात्मक ही कहलागे। यह पृथक पृथक् भेद पतलाए गये है, किन्तु श्राप पटे लेखकों के तेलों में तो दो,तीन या सम्पूर्ण भेटा का मिश्रण देखेंगे। प्रन्धका ढाँचा किसी प्रकार का प्रान्ध लिसना हो, लिसने से पहिले उसे उचित भागों में बाँट लेना चाहिये । इन प्रकार विषय को बॉटने से बडे बडे लेखकों कोभी वडी सुविधा हो जाती है, पर नौसिखिया लेराक तो इसके रिना ठीक लिख ही नहीं सकते। ऐसा करने से लेखक सीमाभीतर रहेगा और विषय के अन प्रत्यङ्ग पर प्रकाश डाल सकेगा । ठीक समय के मीतर उचित पक्ति और पृष्ठों में निवन्ध का पूरा कर देगा और क्रमभी ठीक बैठ जायगा। लिखने से प्रथम लेख के विषय पर गहरी दृष्टि डाल कर उसके सम्बन्ध में जितनी बातें ध्यान में आवे, एक कागज पर नाट करलो और ठीक ठीकसिलसिले से जमा कर का , ( १३:) "कम बॉलो । किसी वस्तु के सम्बन्ध में मोटे मोटे तीन शीर्षक हो सकते हैं, दिसावट, गुण और उपयोग । जीव पर लिखना हो तो किस प्रकार का जीय है, उसका प्राकार और गठन, स्वभाव और भोजन, यहाँ पाया जाता है और उसका उपयोग । धीरज पर लिखना हो तो धीरज क्या है ? फिन में होता है ? धीरज का महत्व, यह गुण अभ्यास से वढ सकता है। किसी के चरित्र के विभाग उसके चरित्र की विशेषता के अनुसार पृथक् २ हो सकते है, पर मोटी रीति से, जन्मकाल और माता पिता, बाल्यावस्था (पालन-पोपण और शिक्षा) जीवन की मुख्य मुख्य घटनाएँ और मृत्यु । विपय का प्रारम्भ जब तुम्हारे प्रान्ध की सूची बन जाय तो देखो कि कितने समय भोर कितने स्थान में प्रवन्ध लिखना है। मानलिया एक घरटे में लेस सम्गप्त करना है। उसमें से १५ मिनट तोसोचने और ढॉचे के लिये गये । रहे ४५ मिनट, उनको तुम्हारे प्रबन्ध के ५ उपशीर्षक है-उन पर वॉटातोप्रत्येक शीर्षक को मिनट मिले । अत सामान्यत. एक शीर्षक मिनट में समाप्त होना चाहिये । उपशीर्षक के छोटे बडे होने के अनुसार समय भी कम वढ हो सकता है । रही स्थान की बात, मान लिया कि५०पक्ति में लेख पूरा करना है, एक शीर्षक में सामान्यत.१० पक्ति होनी चाहिये । उपशीर्षक के छोटे बड़े होने के अनुसार एक उपशीर्षक न्यूनाधिक पक्तियों में लिया जा सकता है। इन सब बातों पर विचार करके लिसना प्रारम्भ करो। प्रारम्भ करने का कोई मुख्य नियम नहीं है । विभिन्न लेसक एक ही लेख को विभिन्न प्रकार से प्रारमा करते है । कोई विषय की भूमिका वाँध कर, कोई परिभाषा कह कर, कोई किसी कहावत या कविवाक्य को कह कर, कोई विषय का सार कह कर और कोई घटना का मध्य पकड कर लेख प्रारम्भ कर देते है। 1 - ( २३६ ) विन्नार आरम्भ करने के पीछे सूची के प्रत्येक उपशीर्षक को लक्ष करके पापय-समूह या अनुच्छेद (पैराग्राफ) की रचना होनी चाहिये । एक वास्य-समूह के वाक्यों में पारस्परिक भोर आनुपूर्व सम्बन्ध होना चाहिये । पफ वाफ्य समूह में वर्णित भायों के लघुत्त्य गुरुस्य के अनुसार अनुच्छेद छोटा श्रोर बडा होता है । भाव गुरुच के कारण कभी कभी एक भाव एक से अधिक अनुच्छेदों में लिया जाता है। इसी प्रकार सूची के हर एक उपशीर्षक पर अनुच्छेद रचना करो और जिस प्रकार एक अनुच्छेद के सब वाक्यों में पारस्परिक आनुपूर्व- सम्बन्ध होता है, उसी भॉति एक विषय सर अनुच्छेदों में पारस्परिक श्रानुपूर्व-सम्बन्ध होता है। किसी भाव की पुष्टि में कोई कहावत, फिली कवि का वचन अथवा कोई उदाहरण लिसना उचित हो, लिग्य देना चाहिये। परन्तु उदाहरण मतिप्त हो और विषय से पूग सम्बन्ध रसता हो। समाप्ति समाप्ति होने पर उसे यो ही एक दम मत छोड दो। सक्षेप में या तो अपने निवन्ध का सार कह दो, या कोई शिक्षा मिलती हो उसे दिखादो, या कोई उससे अप्रत्यन परिणाम झलकता हो, स्पष्ट कर दो और एक बार फिर पढ़ जानो। जहाँ जहाँ पर विगमादि चिह्न छूट गये हों अथरा कोई व्याकरण ओर मुहागिरे की भूल हागई हो, ठीक करलो । शहद प्रयन्ध की सूची क्या है ? पैसे फटा होता है ? स्वाद, रग कहीं मिलता है ? गुगए और उपयोग। -

-
( १५० )
सूची का विकास
श्र-फूलों का रस जिसे मधु मक्खी इकट्ठा करती हैं
'शहद' कहलाता है । मक्सियाँ फलों पर बैठ कर ग्स को चूस
लेती है, फिर अपने छत्तों में जमा करती रहती है। जव बहुत मा
शहद जमा हो जाता है, तो बहेलिया अथवा और कोई मनुष्य
छत्ते को तोड कर उसमें से शहद निचोड लेता है।
ब-ममिखयाँ झाडी, पेड की खोतर, डाली तथा घरों में
कहीं अपना छत्ता रख लेती हैं।
स-शहद लाल रग का वहने वाला लसदार पदार्य है।
ठण्ड से जम जाता है। स्वाद मीठा हाता है।
द-लोग दूध या पानी में डाल कर पीते हैं। औषधि के
साथ खाया जाता है।
चॉदी
प्रवन्धका सार
१ प्रसार-खनिज पदार्थ ।
२ दिखावट-सफेद चमकीली धातु है।
३ गुण-खिंचने वाली, फुटने वाली, भारी,नरम, गलने वाली पारदर्शी है।
५ उपयोग-सिक्के और वर्तन बनते तथा इसकी भस्म को वैद्य दवा के
काम में लाते है। इसके वक्री भी दवाई के काम आते है।
प्रपन्ध का विस्तार
चॉदी एक प्रकार की धातु है जो मिट्टी तथा दुसरी
धातुओं के साथ मिली हुई ग्यान से निकाली जाती है । यन्त्रों
द्वारा इसे शुद्ध करते है।
कची चॉदी का रंग मटमैला होता है, यन्त्रों और अग्नि
के प्रयोग से शुद्ध कर लेते हैं तो इसका रंग बहुत स्वच्छ,
सफेद और चमकीला निकल आता है।

( १४१ )
पहिले कारीगर शुद्ध चाँदी की सलाई बना लेते हैं, फिर
मजबूत धातु के छेदों में डाल कर उसका तार खींचते है ।
पहले बडे चिद्र में, फिर छोटे छिद्र में, फिर उससे भी छोटे
छिद्र में डाल कर खींचने से बहुत ही पतला तार बन जाता है।
फूटने से चॉदी टूटती नहीं हे घरन् फैलती जाती है।
यहाँ तक कि कृटते कुटते बहुत ही हलके वर्क बन जाते हैं।
पानी की अपेक्षा यह धातु यहुत मार्ग होती हे तभी पानी में
छोडते ही डूब जाती है । इसकी घमुत मोटी सलाई को हाथ
से नवा लेते है, किन्तु लोहे का कडा हाथ से नहीं नवता।
तारे को मिलाकर के एक लम्बी मलाख बनाते हैं, उससे
छोटे छोटे टुकड़े काट कर यन्त्र की सहायता से सिक्के नाते
है। धैध लोग अन्य पोषधियों के सहारे मे इचफी भस्म बना
कर दवाई के काम में लाते है। चॉदी के गहने और रर्तन
नाये जाते है । इसी प्रकार तथा साना, पारा थादि
धातुओं पर लेख लिग्यो।
ताजमहल
सार
क्या है ? कहाँ है ? विस्तार यनावट उसका सौंदर्य ।
विस्तार
युलपोश का आगरा एक प्रसिद्ध नगर है। यह यमुना
नदी के दाएँ किनारे पर बसा हुया है । आगग फोर्ट-स्टेशन
से दो मील पूर्व एक अन्य इमारत बनी हुई है, लोग इसे
ताजमहल कहते है।
यमुना जी के किनारे एक मील लम्बे घेरे में यह स्थान
यना हुआ है। वाहर लाल पत्थर का कोट है। आगरा-फोर्ट से
मेकडानल पार्क में होकर जाते है, नो एक विशाल दरवाजा
-
-

- , (१४२ ) देख पडता है। दरवाजे पर कुछ दूकाने हैं, जिनमें सगमरमर चा दूसरे सफेद पत्थर तथा सेलमसडी के बने हुए ताज- महल के नमूने, तश्तरी तथा अन्य चीजें मिलती हैं। दरवाजे के भीतर जाते हुए दोनों ओर कुछ दूकानें वनी है, शायद यहाँ कभी बाजार लगता होगा। यह ताजमहल का बाहरी घेरा है। ऐसा ही एक दरवाजा दुसरी ओर दृष्टि श्राता है, जिस पर कुरान की श्रायते बडी कारीगरी से जडी हुई हे दरवाजे के भीतर जाते ही, सामने सुन्दर भवन दृष्टि श्राता है, जिसकी अद्भुत छटा को देखकर मन में बडा आनन्द होता है । दरवाजे से नीचे उतरते ही महल तक फब्बारों की एक फर्लाग से भी लम्बी कतार लगी हुई है। बीच में एक सगमर- भर का चबूतरा है। इसके ऊपर एक छोटा मा तालाव है, जिसमें रग-बिरगी मछलियाँ तैरती रहती है। चागे ओर रग विरगे पुष्पों की क्यारियाँ लगी हुई है। हरी घास का मख. मली फर्श विछा हुआ है। सुपारी-इलायची आदि के बड़े बडे वृक्ष हैं । साथ ही अशोक वृक्ष बड़े सुहावने मालूम होते हैं । यमुना के ठीक तट पर एक विस्तृत चबूतरा है, जिसके चारों किनारों पर चार ऊँची ऊँची मीनारें है। इसके बीचों-बीच एक सगमरमर का विशाल भवन बना हुआ है। इसमें प्रवेश करते हुए शाहजहाँ और उसकी बीवी की नाली कवर नजर आती है, जिन पर बहुत अढिया पत्थर का जडाक काम हो रहा है। जरा जरा से फलों में ३०-३० से भी अधिक पत्थर के टुकडे जडे हुए है । एक अगुल स्थान भी चेल-बूटों से साली नहीं है । इन नकली कवरों के ठीक नीचे ही शाहजहाँ और उसकी धोबी की असली कवरें हैं। यहाँ वडा अन्धकार रहता है। मोमबत्ती या लालटेन के सहारे से यहाँ का शान्त और श्रद्भुत दृश्य दिखाई देता है । इन क्वगे पर भी जडाऊ वेल 1

बूटे बने है जो अनेक रग के कीमती पत्थर्ग के बनाये गये है।
इमारत के बाहरी योग सगमरमर पर काले पत्थर के टुकडे
बडे हुए हैं. उन पर जर चन्द्रमा का प्रकाश पटता हे तो तारों
की भाँति चमकने लगते है । इसके ठीकनीचे ही यमुना बहती
हुई दिखाई देती है। इसे शाहजहाँ ने अपने जीवन काल में ही
अपनी सी मुमताजमहत पे लिये बनाया था भग्ने के पीछे
शाहजहाँ की समाधि भी यहीं बनवाई गई।
पक्षी विषेश के लिये
(१) नस्ल । (२) यहाँ पाया जाता है ? १३) र (४) समाव ।
(५) भाजन । (६) लाभ ! (७) आयु । (6) विशेष विवरण।
किसी देश के निवासियां पर
(१) गान। (२) श्राकार और गठन । (३) भोजन । (५) रीति-
रिवाग और धर्म । (५) सामाजिया-स्थिति और शिक्षा । (६) तीन
निवाह का दग। (७) उनी सभ्यता पर विदशी सभ्यता का मभार ।
(C) विशप विवरण।
मयुरा का निधाम घाट
(१) यनावर । (६) यात्रियों का स्नान । (३) सायकान को भारती।
१४) उस समय यमुना पारय ।
किसी स्थान विशेष पर रह शीर्पक होंगे।
५-~-उस स्थान या नाम भोर स्थिति, एतिहासिक वा।
२-नलवायु और श्रास पास की पैदावारी।
३-आधार, विस्तार पड़ी सड़ा और जन-सम्या ।
५~-अपभ, शासा और पाप।
५----शिक्षा का प्रबन्ध
६--व्यापार और शिल्पा
-तिहासिक व सामधिक दर्शनीय यातुएं ।

आगरा ---यहाँ की जलवायु १--यह नगर युक्त प्रदेश में यमुना नदी के किनारे पर घसा हुआ है । पुराने समय में इसे अर्गलपुर कहते थे, मगर अकबर बादशाह ने इसका नाम अकारावाद रक्खा । हिन्दू राजस्व-काल का अधिक हाल नहीं मिलता । परन्तु अकार ने दिल्ली छोडकर आगरे को अपनी राजधानी बनाया और यमुना के किनारे लालपत्थर का एक घडा और दृढ किला बनवाया । शाहजहाँ के राज्य-काल तफ आगरा मुगलों की राजधानी रहा। गर्म और खुश्क है । यमुना के खादर को छोड फर पास पास की शेष भूमि चौरस और उप- जाऊ है, जो उत्तर की भोर गगा की नहरों से और पश्चिम और दक्षिण की ओर यमुना की नहरों से सींची जाती है । ३-यह नगर १२ कोस के बीच में बसा हुआ है जिसके चारों कोनों पर ४ महादेव जी के मन्दिर बने हुए है । कुछ टोले अलग रवसे हुए है, परन्तु बीच में बहुत धनी वस्ती है। एक मुहल्ले से दूसरे तक सड़कें बनी हुई है । ठण्डी सडक पहत चौडी है जिस पर सायकाल को लोग वायु-सेवन के लिये घूमा करते है। इसके अतिरिक्त सिटी और मेकडानल पार्कों से भी बहुत श्राराम मिलता है। यहाँ की जन-सख्या दो लास के लगभग है। ४-दुल शहर का प्रवन्धएकम्युनिसिपैलिटी के अधिकार में है । रोगियों के लिये कई औषधालय और चिकित्सालय बने हुए है । पानी के लिये यमुना से जल-बालों का प्रबन्ध किया गया है । प्रकाश के लिये जगह जगह पर बिजली, गैस तथा सामान्य लेम्पों के सम्भे लगे हुए है। शासन मैजिस्ट्रेट और ।

( १४५ )
पुलिस के अधिकार में है। न्याय के लिये दीवानी, फौजदारी
और जजी को श्रदालतें है।
५--जगह जगह पर प्रारम्भिक शिक्षा के लिये पाठशालाएँ
बनी हुई हैं। अनेक हाई-स्कूल कालेज तथा छात्र निवास बने
हुए हैं, जिनमें बाहर के विद्यार्थी भी धाकर शिक्षा पाते और
रहते है । श्रागग कालेज युक्तप्रदेश का सर से पहिला कालेज
है । इसके अतरिक्त सेएटजोस, सेण्टपीटर्स और ट्रेनिंग
कालेज भी है । श्रागरे में यूनीवर्सिदी भी खुल गई है।
६-नागरे में "जी आई पी" "ई श्राई श्रार" "पीपी
एण्ड सी भाई भार" और "धार एम भार" रेलवे छाग
चारों ओर से माल पाता है और जाता है । इससे पहिले
यमुना के द्वारा नावों पर व्यापार होता था। लाल पत्थर व
सगमरमर की बनी चीजें बहुत दूर तक जाती है। दरी और
गलीचे बहुत अच्छे बनते है।
७-बादशाही समय की इमारतों में ताजपीनी का रोजा,
अकार बादशाह को कनर, एतमादुद्दौला च जुम्मा मसजिद
तथा प्रागरे से १२ कोस पश्चिम फतहपुर सीकरी घे महल
देखने योग्य है।
--मेकडानलपार्क में महारानी विकोरिया का स्मारक
देखने योग्य है। यहाँ का अस्पताल बहुत बडा है। पागलखाना
ओर थकार का बनाया हुश्रा नागरेका किला देखने योग्य हे।
नोट~याह साधारण विवरण हे इसे विस्तृत और भाव
मयी भाषा में लिस सकते है।
जानवर
(१) श्रापार और उसका गठन ।
(३) व्यवहार गौर लाम।
(२) स्वभाव और भोजन ।
(४) कोई विशेष भात ।

( १४६ ) - - ( कहते है। घोडा १-घोडा विना सींग का चार पैर वाला जीव है जो मा के स्तनों से दूध पीता है । यह देखने में बड़ा सुन्दर होता है। इसका शरीर दृढ और गठीला होता है। शरीर पर छोटे छोटे चमकीले बाल होते हैं । वडा घोडा, सुम के नीचे से लेकर श्रयाला तक प्रायः ५ फीट ऊँचा, और कानों के बीच से लेकर पूंछ की जड तक ७ फीट लम्बा होता है। छोटे घोडे फो घोडे के कान तेज और ऑखें बडी तया दृष्टि प्रबल होती है, नथुने सुल हुए निरे मांस के बने होते हैं, इनमें हड्डी नाम को भी नहीं होती । सूंघने की शक्ति वडी प्रबल और टॉगे दृढ होती है, और सुर चिरे ठुए नहीं होते। २–घोडा बडा मिलनसार होता है। जगल के घोडे टोल वॉय कर रहते है । पालतू दशा में और जानवरों से स्नेह कर लेते हैं । इनकी स्मग्ण-शक्ति बडी प्रबल होती है अपने रक्षक और स्थान को कभी नहीं भूलते । यह बडे स्वामिभक्त और चुद्धिमान होते है, इसके बहुत प्रमाण उपस्थित है । महागना प्रताप के चेतफ घोडे ने अपने स्वामी को बचाने के लिये अपने प्राण तक दे दिये थे यह केवल घाम, जौ, चने आदि का भूसा तथा चना जौ और मोट श्रादि का दाना खाता है । इसके होठ इतने लचक्दार होते है कि छोटी से छोटी घास को धरती से पकड कर फतर लेता है। ३-जीवित घोडा सवारी के काम में -याता है, गाडी और इकों में जोता जाता है। कहीं कहीं घोडों से हल भी चलाये जाते है । मृत्यु के पश्चात् इसका प्रत्येक भाग काम में आता है । बालों का गही-तकियों में भरते है और उनसे

युरश भी बनाये जाते है । खाल से जूतों के तले और घाडी
फा सामान तथा रगा और पुट्ठों से सरेस वााते है हड्डिया
से चाकुओं के घंटे, सुरों से बटन पोर. डिपिया आदि
बनाते है।
थभ्यास
१-घाडे पर एक स्वतत्र निमय नियो।
२ --गाय, भेस, वारी भेड़, गधा, खबर, वैत, हाथी उँट पर एक
पर शिवन्ध लियो।
वृक्ष
यदि किसी वृक्ष पर निरन्ध लिपना हो तो
१-उमकी ऊँचाई श्लोर फैलाय ।
२-यहाँ पाया जाता है।
३-उसकी जड, पेडी, डाली, पत्ते, पूल और फल का वर्णन ।
४---उपयोग और लाभ ।
५--किसी श्रायु होती है?
६-यदि पाइ शिरोपना हो।
-
नीम का वृक्ष
२-जीम का पेड चालीस फीट के समीप ऊँचा होता
है। इसकी पत्तियाँ पडी ही सघन श्रोर छाया बहुत ही शीनल
होती है इसलिये गर्मी के दिनों में गॉव के मनुष्य नीम की
छाया के नीचे बैठते शोर सोते हैं।
२-यह पेड़ उत्तरीभारत के मैदानों में रात पाया जाता है।
३-पेटी-११ फीट तक लम्बी और १० फीट तक मोटी
होनी हे । ऊपर की छाल खुरदरी होती है। पेड में से बड़े घडे
गुद्दे और गुद्दों में से बडी बडी टहनियाँ निकलती है।
पत्ते-लम्बे और नोकदार होते है। उनके किनारों पर
दोनों ओर दाँते यने रहते है।

.
( १४६ )
घोडा
१-घोडा विना सींग का चार पैर वाला जीव है, जोमा
के स्तनों से दूध पीता है । यह देखने में बड़ा सुन्दर होता है।
इसका शरीर दृढ और गठीला होता है। शरीर पर छोटे छोटे
चमफीले वाल होते है । बडा घोडा, तुम के नीचे से लेकर
श्रयाला तक, प्राय. ५ फीट ऊँचा, और कानों के बीच से
लेकर पूँछ की जड तक ७ फीट लम्बा होता है। छोटे घोडे
फो टटू कहते हैं।
घोडे के कान तेज और ऑखें पडी तया टष्टि प्रबल होती
है, नथुने खुते हुए निरे मास के बने होते हैं, इनमें हड्डी नाम
को भी नहीं होती । संघने की शक्ति वडी प्रपल और टॉर्गे दृढ
होती है, और खुर चिरे हुए नहीं होते।
२-घोडा वडा मिलनसार होता है । जगल के घोडे टोल
वॉय कर रहते है । पालतू दशा में और जानवरों से स्नेह कर
लेते हैं। इनकी स्मरण-शक्ति बडी प्रवल होती हे अपने रक्षक
और स्थान को कभी नहीं भूलते। यह बडे स्वामिभक्त और
चुद्धिमान होते है, इसके बहुत प्रमाण उपस्थित है । महागना
प्रताप के चेतक घोडे ने अपने स्वामी को बचाने के लिये अपने
प्राण तक दिये थे।
यह केवल घास, जौ, चने आदि का भूसा तथा चना,
जौ और मोट थादि का दाना खाता है। इसके होठ इतने
लचकदार होते है कि छोटी से छोटी घास को धरती से पकड
कर कतर लेता है।
३-जीवित घोडा सवारी के काम में धाता है, गाडी
और इको में जोता जाता है। कहीं कहीं घोडों से हल भी
चलाये जाते है । मृत्यु के पश्चात् इसमा प्रत्येक भाग काम
में आता है । वालों का गही-तकियों में भरते है और उनसे

( १४७ )
युरुश भी बनाये जाते हैं । खाल से जूतों के तले और घाडॉ
का सामान तथा रगों और पुट्ठों से सरेस बनाते है हडियो
से चाकुओं के घंटे, खुर्रा से पटन और डिरिया आदि
नाते है।
अभ्यास
१-घोडे पर एक स्वतन्त्र निवन्ध लिस्रो।
२-गाय, भैंस, यारी भेड़, गया, सचर, वैल, हाथी ऊँट पर पर
रविन्ध लिखो।
वृक्ष
यदि किसी वृक्ष पर निरन्ध लिपना हो तो
१-उसकी ऊँचाइ पोर फैलान ।
२-यहाँ पाया जाता है।
३-उसकी जड, पेडी, डाली, पत्ते, फूल और फल का वर्णन ।
४---उपयोग और लाभ ।
५--कितनी श्रायु होती है ?
६. यदि कोई विशेषता हो।
-
नीम का वृक्ष
-नीम का पेड चालीस फीट के समीप ऊँचा होता
है। इसकी पत्तियों बडी ही सघन और छाया यहुत ही शीतल
होती है इसलिये गर्मी के दिनों में गॉव के मनुष्य नीम की
छाया के नीचे बैठते और सोते हैं।
२-यह पेड उत्तरीभारत के मैदानों में बहुत पाया जाता है।
३-पेडी-११ फीट तक लम्बी और १०फीट तक मोटी
होती है। ऊपर की छाल खुग्दगे होती है। पेड म से बडे बडे
गुद्दे और गुद्दों में से बडी बडी टहनियाँ निकलती है।
पत्ते-लम्बे श्रार नोकदार होते है। उनके स्निारों पर
दोनों ओर दॉते बने रहते है।

(२४)
फूल-छोटे छोटे स्वत रग के फूल बहुत ही सुगन्धित होते
है। जिस समय नीम फूलता है अपनी चारी दिशाओं को
सुगन्ध्र से भर देता है।
फल-इसका फल, रूप और श्राकार में खिन्नी के बराबर
होता है, जिसको निवौली कहते है।
४-इसकी छाया आरोग्य वर्द्धक होती है । श्वास के
साथ मनुष्य के फेफडो से जो हानिप्रद-वायु निकलती है,
उसे खीचकर प्राणप्रद-वायु छोडता है रुधिर-विकारों को
नष्ट करने की इसमें बड़ी शक्ति है । लोग इसका अर्क निकाल
कर काम में लाते है । छाल को घिस कर फोडे-फुन्सिया पर
लगाते है। लकडियों को मकान के काम में लाते हैं और
छोटी छोटी टहनियों को दॉतीन वनाते हैं।
अभ्यास
१---तीन के वृक्ष पर अपनी भाषा में एक निवन्ध लिखो।
२-पीपल, तुलसी, वटवृक्ष, आम अमरुद, पपीता, खजूर, वाँस और
फेला पर एक एक निवन्ध लिस्रो।
नोट-वर्णक-प्रपन्धों में हरएक वस्तु के विभाग करके इसी प्रकार
लिन सकते है । वस्तु पाठगे से इनमें बहुत सहायता मिल सकती है।
वर्णनात्मक-निवन्धों के कुछ दॉचों को बढ़ा कर ऊपर दिखाया गया
है । कुछ नमूने के निवन्ध दिये हैं, कुछ केवल ढाँचे। इसी प्रकार बहुत
ढाँचे तैयार किये जा सकते हैं और उन पर रचना की जा सकती है।
दक्षिणी-भारत का एक पहाडी-दृश्य
भूमण्डल में सबसे अधिक सुन्दर प्राकृतिक दृश्य भारत
के बर्फ से ढके हुए हिमालय पर्वत में है। हिमालय पर्वत की
चोटी एवरेस्ट पृथ्वी की सब पर्वत-चोटियों से ऊँची है ।
भारत के पश्चिमी भाग में इतने ऊँचे पर्वत नहीं है, परन्तु तिल
पर भी यहाँ प्राकृतिक शोभा की कमी नहीं है। यदि हम
.

। । १४८ ) चम्बई से रेल द्वारा जबलपुर की भोर चलें तो पहिले पचास या साठ भील तफ दोनों ओर मैदान दिखाई देते है । परन्तु इसके बाद हमें पश्चिमी घाट के पर्वतों में घुसना पडता है। यह पर्वत श्रेणी समुद्र के मिनारे से लगभग तीस मील की दूरी पर है । इसकी शाखाएँ भारत के पश्चिमी किनारे के निकटवर्ती कोकन श्रादि प्रदेशों में फैली हुई है। इन पर्वत • श्रेणी के पूर्व की ओर जमीन की ऊँचाई क्रम कम से कम होती गई है और उस पर से भीमा कृष्णा ओर गोदावरी श्रादि नदियाँ यही है । जब वर्षा नातु में यात्री पश्चिमी घाट के पर्वतों पर चढ़ते हैं तो, उ हे भिन्न भिन्न ग्गों के बादलों की शोभा बहुत ही सुन्दर दिखाई देती है। उस समय पर्वत, हरे रग की पत्तियों और घास से ढके रहते है। और उस हरि याली के बीच में चमकीली चट्टानों से गिरते हुए और सूर्य की किरणों के पड़ने मे चाँदी के समान चमकते हुए नाला तथा नदियों की शोभा घडी मनोहारिणी होती है । परन्तु इस रश्य की शोभा देखने का पूरा श्रानन्द रेल के यानियों को नहीं मिलता, क्योंकि गेल अपनी सडक पर पेग से चली ही जाती है। कई यात्री इस दृश्य को देखकर मुग्ध हो जाते है और उनका मन रेल से उतर कर पर्वत की शोभा को नेत्र भर देखने के लिये ललचाने लगता है। यदि पश्चिमी घाट के पर्वतों की प्राकृतिक शोमा का पूरा आनन्द लेना है तो रेल से उतर कर एक या दो पत उन्हीं पर्वतों में रहना चाहिये, और पर्वत के भिन्न भिन्न स्थानों में भ्रमण कर, नेत्रों को तृप्त करना चाहिये । इस काम के लिये इगतपुरी स्टेशन पर रेल से उतरना सर स अच्छा हागा। इगतपुरी से कुलसीवाई, जो दक्षिण में सय से ऊँचा स्थान है, पास पडना है, और उसी के समीप ऐसी कई एक छोटी 7 .

( १५४ ) - । सेवा-समिति हमारे देश की स्त्रियों की तो दशा हो और है। उनके जीवन का अमूल्य समय, "मैं-मैं तू-तू" ही में व्यतीत होता है। प्लेग के दिनों में भगिनी निवेदिता ने मुहल्ले की सफाई ग्सने से लोगों की वडी मदद की। अपने हाथों से रोगियों की सेवा की। युवकों के साथ मिलकर इसी काम के लिये एक मण्डली बनाई, जिसने प्राणों पर सेल-कर उस समय अच्छा काम किया। अमाल पीडितों की सहायता मन् १६०७ में बाकरगज में घोर छाकाल पडा । देशभक्त लोगों के साथ मिलकर वहाँ के अनाथ और दुखियों को बहुत सहायता दी। उनके लिये घर घर भीख मॉगी और अन्नदान दिया । अन्य प्रकार की सेवा-सुश्रूपा करके उनकी प्राण-रक्षा की। इस काम में इनको बडे बडे कष्ट भुगतने पडे, परन्तु उनकी जरा भी परवाह न की। विधवाश्रम बङ्गाली-विधवाओं के दुःखों को देख कर इनके हृदय में भागे ठेस लगी। उनकी महायता के लिये एक थाश्रम बनाया। एक पाठशाला खोली, जिसमें छोटे छोटे घालकों को किण्डर गार्डन से शिक्षा देने लगीं। और आप बडी सुलेखिका थीं। व्यारयान देने की शक्ति भी अच्छी थी। स्त्रियों के साथ उनके पतियों का असभ्य वर्ताव देखकर उन्हें बहुत क्लेश होता था। लोगों को समझाया कि स्त्री, पुरुष के जीवन की एक सहायक है न कि दासी । स्त्रियों को भी विदुषी बनाकर पुरुषों की सहायता करने के लिये प्रोत्साहित किया। स्वभाव ( १५५ ) अहकार इनको छु तक नहीं गया था। श्राप भक्ति और प्रेम की साक्षात् मूर्ति थीं । स्वभाव यडा ही कोमल ओर सीधा था । आपने आजन्म कुमारी रहकर भारत की सेवा की । लण्डन में सम्पूर्ण जातियों की जो महासभा हुई थी, उसम भगिनी निवेदिता ने भारत की भलाई के लिये, एक निवन्ध लिखकर मेजा था। श्राप काम करते करते अचानक बीमार हुई नौरदार्जिलिङ्ग के पहाड पर स्वर्ग-यात्रा की भारत शोर इदलैण्ड में इनके लिये नडा शोक मनाया गया। धन्नदेवी ! तुझे शतश धन्य है। वह कोनसा दिन होगा जर इस भारत में भी ऐसी देवियाँ उत्पन्न होकर देश, जाति और समाज का कल्याण करेंगी। महात्मा गोखले जम और शिक्ष महात्मा गोखले का जन्म सन् १८६७ ई० में कोल्हापुर के निकर कागल ग्राम में हुया था। इनके पिता सामान्य स्थिति के ब्राह्मण थे। यह एफ ए तफ कोरहापुर में ही पढ़े थे। १८ वर्ष की आयु में बम्बई के एलफिन्स्टन कालेज से जी ए पास किया । श्रापकी बुधि जितनी प्रखर और स्मर्ण शक्ति जितनी तीव्र थी, वैसे ही थाप अध्यवसायी भी थे। पार्यक्षेत्र म प्रदेश घर वाले चाहते थे कि गोपातगव गोपले इजीनियर होकर बहुतसा रुपया कमायें और हमारी बहुत दिना की आशा पूरी हो। परन्तु कालेज ही से आपके हृदय में देश भक्ति की ज्योति जगमगाने लगी थी। वहाँ से निकल कर आप दक्षिण- शिक्षा समिति में सम्मिलित हो गये। ७५) २० मासिक पर फर्गुसन कालेज में नौकरी कर ली। कुछ दिनों तक श्राप गणित एव भजी के अध्यापक रहे,

( १५६ )
फिर इतिहास और अर्थ शास्त्र पढ़ाते रहे, अन्त में उनी
कालेज के प्रिंसिपल भी हो गये । छुट्टियों में शिक्षा समिति की
उन्नति के लिये उद्योग करते थे एक बार मापने द्वार द्वार धूम
फर उसके लिये दो लाख रुपया मागे। कालेज में तो श्राप
अधिक परिश्रम करते ही थे,साथ ही साथ न्यायाधीश रानाडे
के समीप यहुत दिनों तक धर्मशास्त्र और गजनीति का
अध्ययन फिया रानाडे ने इन्हे उपयुक्त पात्र पाकर परिश्रम
करने में किसी प्रकार की फसर नहीं की।
सार्वजनिक सेवा
उस समय पूने में एक सार्वजनिक सभा थी, जिसके द्वारा
एक प्रेमासिक-पत्र निफलता था । पहिले इस पत्र के सम्पादक
थे जस्टिस रानाडे । इस पत्र में सरकारी अर्थनीति की थालो-
चना रहती थी सन् १८-७ में मि० गोसले इसके सम्पादन
हुए । यडी योग्यता से काम किया । राजा और प्रजा में
सद्भाव पैदा करने की चेष्टा की। साथ ही सरकारीभूलों की
आलोचना भी मुई । थोड़े ही दिनों में मत भेद होने के कारण
डेकन्स सभा के नाम से एक नई सभा खुली, जिसके आप
मत्री चुने गये।
इसके सिवाय आप पूने के 'सुधारक' पत्र के भी सम्पादक
रहे, जो एंग्लो-मराठी में निकलता था । २२ वर्ष की आयु में
प्रातिक-परिषद् में आपका ऐसा भाषण हुआ, जिसे सुनकर
मि० मुधोलकर ने इनके लिये एक दिन राष्ट्र-सभा से सभापति
होने की भविष्यवाणी की थी। १७ वर्ष पीछे सन् १९०५ में
यह बात सत्य हुई।
विलायत-यात्रा
आपने कई बार विलायत यात्राफी। इङ्गलैण्ड में १-६७ ई०
में वेलची-कमीशन के सामने आपकी बड़ी महत्त्वपूर्ण गवाही
हुई। सन् १६०५ में दूसरी बार विलायत गये।भारत की भलाई

{ १५७ )
के लिये बहुत व्यारयान दिये, जिनका इडल्लेण्ड की जनता पर
अच्छा प्रभाव पडा । १६० ओर १६०८ में फिर इङ्गलैण्ड गये
और लार्ड मार्ले से मिलकर बहुत सी हित की पाते की । श्रन्त
में श्राप ११३-१४ में पब्लिक सर्विस कमीशन में भारत की
ओर से सम्मिलित हुए। सन् १९१० में दक्षिण अफ्रीका
जाकर भारतवासियो के दुख दूर करने का यत किया
और उसमें बहुत कुछ सफलता हुई।
भारत सेम-समिति
अपने उद्देश्यों की सफलता का प्रयत सदैव जारी रखने
के लिये आपने 'भारत सेवक समिति' स्थापित की। समिति
के उच्च शिक्षा प्राप्त अनेक श्रान्मत्यागी योग्य युवक सगासद्
है, जो नाममात्र बेतन पर अपना निर्वाह कर देश का काम
करते है। अकालो तथा हरिद्वार-कुम के समय समिति की
पोर म जो कार्य दुना है, राजा पोर प्रज्ञा दानों उसका
कीर्ति-गान करते है । अभी इस ममिति को सहस्रों नहीं नग्न
खावों आत्मत्यागी युवकों को आवश्यकता दीरा पड़ती है।
मृत्यु
इस प्रकार ३८ वर्ष को घायु तक महात्मा गोपले न
भारत वर्ष की भलाई के लिये प्राणपण में चेष्टा की। काम फी
अधिकता से इनका स्वास्थ्य भी रदुन दिनों से बिगड़ गया
था, परन्तु उसकी कुछ परवाह नहीं की । १६ फरवरी सन्
१६१५ ई० को दिन के एक १ बजे इनकी तबीयत यहुन गिड
गई । गत १० बजे राजा प्रजा ओर ममिति की बात करते
करते आपने इसशसार ससारकोछोड,स्वर्गधाम की यात्रा की।
देश भर में हाहाकार मच गया। राजा और प्रजा दो ही में
शोक का पारावार न रहा। भारत के प्रत्येक नगर श्रीर
सम्था ने उनकी मृत्यु पर हार्दिक शोक तथा उनके युटुम्र के
साथ समवेदना प्रकट की।

( १५८
आपके उत्तराधिकारी
मृत्यु
के समय आपकी दो अविवाहिता कन्याएँ थीं, जो
उम समय १६ व ११ वर्ष की आयु मे मैट्रिक और बी० ए०
की परीक्षा में सम्मिलित हुई। यालिकाओं की सहायता के
लिये लोगों ने लिखा पढी को परन्तु प्रात्मत्याग की मूर्ति इन
देवियों ने धन्यवाद-पूर्वक उसे अस्वीकार किया।
जन्म लेना ऐसे ही पुरुषो का सार्थक है, अपना पेट नो
कुत्ता भी भर लेता है।
अभ्यास
1-भगिनी निवेदिता और महात्मा गोसले के चरित्रों पर एक
स्वतन्त्र निनन्ध जिलो।
२–इनके जीवन से तुम्हें जो शिक्षाएँ मिलती है उनकी विस्तृत
प्यारया करो।
३----ईश्वरचन्द्र विद्यासागर, राजा राममोहन राय, स्वामी रामतीर्थ,
स्वामी विवकानन्द पर एक एक निवन्ध लिसो।
दिल्ली में अशोक-स्तंभ
दिल्ली भारतवर्ष का बडा पुराना नगर है। उसके पुराने
खेडहर और ध्वमावशेपर अनेक गजकीय परिवर्तनों की
याद दिलाते हैं। उसके एक एक खेडहर की एक एक इंट
इतिहास प्रेमियों को-ऐतिहासिक खोज करने वालों को-
बडे महच्य की चीज है। आज हम वहीं के एक २.०० वर्ष
पहले बने हुए स्तभ का उल्लेख करते हैं। यह स्तम्भ ईसा से
कई शताब्दी पहले महाराज अशोक ने बनवाया था । दिल्ली
के पास फीरोजाबाद के कोटला दुर्ग में स्थापित है। महाराज
*पुराने मकानों के चिह।

- (१५६) अशोक ने इसकी स्थापना यहाँ नहीं की। फीरोजशाह तुगलक इमे अम्बाला जिले के शिवलिक पर्वत क पास तोपहर गाँव से लाया था। इसकी गोलाई नीचे फीट भोर चोटी पर फीट है । इसकी जड में एक चबूतरा हे उससे स्तम्भ की ऊँचाई ३७ फीट है, ऐसा निशाल म्नम्भ इतनी दूर से- 'दिल्ली में नाया गया यह प्रश्न सरके जी में उठता है। जियाउद्दीन पनी ने अपनी पुस्तक में लिखा है कि फीरोजशाह ने अपनी सेना और श्रास- पास की प्रजा को इकट्ठा किया। हुन सी मेमल की गई मंगा कर उसके बडे बडे मोटे गद्दे बनवाये और रहुन नी रुई स्तम्भ पर लपेटी गई । उसकी जड को धीरे २ ग्वोदकर उसे रई पर गिरवा दिया और रुई अलग कगदी।फिर लरपताश्रार चमडा लपेट कर कोई १० हजार प्रादमियों ने एक पहिये की गाटी में रस्सा ओर यमुना जी पर ले गये । वहाँ बडी बडी जुडी हुई नायों के द्वारा दिल्ली ले आये और कोटला नामी दुर्गम उसे स्थापित किया। म्तम्भ पर प्राचीन लेख इस पर वोहों के चार अनुशासन (प्रामाएं। ईसा से ३०० वर्ष पहिले की अकित हे ! इसक सिवाय राजा पिशालदेव चौहान के स० १००८ दो ओर लेप है परन्तु इतिहासज्ञ इन लेखों को अधिक महत्व नहीं देते है इस स्तम्भ के चबूतरे से काटला दुर्ग के आसगल के धश ओर सँडहर तथा हिमायूँ के मकारे श्रादि मनाहर दृश्य दिखाई देते है । अभ्यास १-आगरा, भरतपुर और ग्वालियर म किना पर एक नियन्धलियो। २-पानिपुर (पटना) व ऐतिहासिक सहहरा पर निबन्ध लियो। ३-ताजमहल पर एक निवन्ध नियो।

(६०) अशोक बौद्धों के कथनानुसार अशोक अपने पिता की मृत्यु के समय उज्जैन का शासक था। बोद्ध लेपका का मत है कि वह युवाकाल में बडा निर्दयी और कठोर हृदय था । उसने गज-पद अपने अट्ठानवे भाइयों के माग्ने पर पाया। परन्तु ये वाते असत्य जान पडतो है, क्योंकि अशोक के शिला लेखों से ज्ञात होता है कि अशोक के भाई और बहन उसके सम्राट होने पर भी जीवित थे और अशोक को सदा इस बात कीफिक रहती थी कि उनको कोई कष्ट न पहुँचे । आशाक के समय का सच्चा इतिहास शिला लेखों से ही जान सकते हैं। राजतिलक हाने के पाठ साल बाद अशोक कलिंगराज से युद्ध करने गया । घार युद्ध होने पर उसने शत्रुओं को हराया और उनका देश जीत लिया। परन्तु जो मनुष्यों का सहार उसमे हुआ था उसे देख कर अशोक को अपने किये पर रहुत सताप हुआ। अशोक ने अपने लिखे हुए 'कलिंगयुद्ध' के वर्णन में बहुत शोक प्रकट किया है। उसने फिर कभी युद्ध नहीं किया । जीवन का शेष काल अहिंसा और पवित्र पाच- रण महित रहकर पिताया । अशोक के मानसिक भावा में परिवर्तन होने का कारण एक चौद्ध सन्यासी का उपदेश या। इसी समय से अशोक ने बौद्धमत ग्रहण किया और फिर उस मत का पक्का अनुयायी होगया । यहाँ तक कि वह बौद्धभिनु का पीला कपडा पहिनने और सन्यासी बनने के लिये भी तैयार था। अशोक ने अपनी राजधानी में बौद्ध भिक्षुओं की एक सभा भी कराई।सभाका उद्देश्य बौद्ध-मत के भिन्न भिन्न सप्रदायों को - ( १६१ । पक करना ओर योद्ध धर्म के अन्यों की अशुद्धियाँ जो काल यश उनम श्रागई थीं उनका दुर करना था। अशाफ ने मनुष्य को सच्चरित्र बनाने के लिये अपने राज्य भर में पत्थर पर जुटे हुए उपदेश गढवाये । इन शिला लेसों का अनुसन्धान गत सत्तर वर्ष म हुना हे और होता जाता है। ये शिला लेख मेंसूर, पजार, बम्बई और उडीसा में पाये जाते हैं। उनस विदित हाता है कि भारत के दक्षिण के काने का छोड कर सारे देश में अशोक का साम्राज्य था। अशोक के एक शिला-लेख में यह उपदेश है-"माता पिता मी नाज्ञा मानना चाहिये, माणियों पर दया करना चाहिये, सच बोलना चाहिये, गुरु की सेवा करना चाहिये ओर कुटु- म्बिया से सव्यवहार करना चाहिये"। प्रजा से इन उपदेशों का पालन कराने के लिये राज कर्मचारी नियत थे। अशोक ने बौद्ध मत का प्रचार कराने के लिये मिश्र, यूनान, फारस, तिन्नत और लेका श्रादि देशों में बौद्ध भिक्षु भेजे थे, और उन्हाने बौद्ध-मत का यूर प्रचार किया । यहाँ तक कि कुछ समय के लिये बौद्ध- मत ही पृथ्वी का प्रधान धर्म होगया था। यह सर अशाक के ही प्रयतों का फल था और इसी कारण से यह प्रसिद्ध सम्राटा और धर्म-प्रचारकों में गिने जाने याग्य है। अभ्यास १-इस लेख पर रक्त-वास्थ बनाकर अपनी भाषा म निवन्ध लिखो। २-चन्द्रगुप्त, विक्रमादित्य, पृथ्वीराज, पापर, प्रताप, शिवाजी, प्रापर, शाहजहां, पर एक क निरन्ध लिखा। लिखा जा चुका है फि विशेष चरित्र व विशेष घटनात्रों की सूची विशेष गति पर होती है पर मामान्यत किमी घटना की सूची इस प्रकार होती हे

घटना
(१) यहाँ और किस ममय हुई।
(३) सामान्य वर्णन।
(२) कारण।
(४) परिणाम ।
व्याख्यात्मक निबन्ध
किमी विषय के इस प्रकार खोल कर वर्णन करने को जिस
से साधारण मनुष्य भी उसके रहस्य को भली भॉति समझ
सके,व्याख्या कहते है। इस विभाग में भावात्मक विषयों तथा
व्यापक निया की व्यारया होती है अथवा किन्ही सिद्धान्तों
का स्पष्टी करण होता है। व्याख्यात्मक निवन्धो को प्रायः
परिभाषा से प्रारम्भ करते है। उसकी विशेषताओं की क्रमश
व्यारया और श्रावश्यकतानुसार उदाहरणों से उसे पुष्ट करते
हे । बहुन से विषय ता ऐसे है कि निना उदाहरणों के उनकी
व्यारया पूर्ण हो ही नहीं सकती, जैसे किसी गणित वा
व्याकरण के नियमों की व्याख्या चा कोई भूगोल श्रादि
की परिभाषा।
श्रावणी पूर्णिमा और रक्षा-बन्धन
श्रावण महीने को अन्तिम तिथि, श्रावणी कहलाती है, इस
दिन प्राय श्रवण-नक्षत्र होता है ।
यो तो चारी बडे त्यौहार ममस्त हिन्दु जाति के है, परन्तु
मुख्य कर श्रावणी ब्राह्मणों की, विजयादशमी क्षत्रियों की,
दिवाली वैश्यों की और होली शूद्रों की कही जाती है।
प्राचीन समय में ऋषि लोग एक विशाल यज्ञ करते थे,
उस में राजा तथा अन्य यजमान लोग भी सम्मिलित होते थे।
चेद के मन्त्रों द्वारा इस यज्ञ में द्विजातिमात्र यज्ञोपवीत धारण
करते थे। यज्ञ के प्रारम्भ में आशीर्वादात्मक मत्र पढ़ कर हाथ
में एक ग्गीन सूत्र बाँधते थे।
.

.
धीरे धीरे ब्राह्मणों की श्रश्नति हुई । वह एफ एफ पैसे के
लोम से द्वार द्वार, घर घर जाकर एक रगीन सूत्र लोगों के
हाय में गॉधने लगे।
काल क्रम मे यह लडकियों का मुख्य त्यौहार हो गया।
लडकियाँ अपने भाई, चाचा, मतीजे नादि सम्बन्धियों को
भुजरियाँ याराखी देने लगी। ऋपि लोग यज्ञ के स्थान में जो श्रादि
अन्न गो देते थे और यज्ञ के अन्त में छोटे पोधों को सिर पर
धारण करते थे,क्दाचित् यह भुजरियाँ उसी का रूपान्तर हो।
मध्यम काल में इस राखी ने घडी शक्ति धारण की जिस
लड़की ने किसी के हाथ में एरुवारगसी नॉदी, वह श्राजन्म
के लिये भाई हो गया। ग्रामों में श्रापणी के दि। लडकियाँ
इकट्ठी होकर गाँव के नाते से जो भाई, चाचा, नाऊ भतीजे
है उनके राखी गॉधती है । सामाजिक पवित्रता की रक्षा के
लिये इसने पडा काम किया है । यवन शासन-काल में कोई
अत्याचारी, असमर्थ हिन्दू महिला पर अत्याचार करने का
विचार करता तो यह किसी ग्लान राजपून के पास गती
मेज कर उसे अपनाभाई घनाती थीयोर वह अपनी धर्म बहिन
के सतीत्व की रक्षा में अपने प्राण तक दे देते थे। चित्तौड
पर जब गुजरात के गदशाह बहादुरशाह ने चढाई करने की
नेयारी की तो रानी करणारती ने हिमायूँ गादशाह के पास
राखी भेजी।हिमायूँ उन दिना अफगानों से लड़ने की तैयारी कर
रहा था। सर को छाड छाड इसधर्म-पहिन की रक्षा के लिये
चित्तोड दौडा। किन्तु दुर्ग के कारग देर से पहुँचा तब तक
यहादुरशाह ने चित्तोड जीत लिया। गनी २००० सहेलिया
महित अग्नि में जल मगे। हिमायू ने यहादुरशाह को मार
भगाया ओर गनो के पुत्र, अपने धर्म भानजे को चित्तौड की
गही फिर से दी।

सारांश यह है कि इस समय वाही अत्याचार तो कम दिखाई देते हैं, पर अभी सामाजिक अत्याचागं की बडी भरमार है, जिनके कारण स्नेहलता श्रादि देवियों ने अपनी बहिनों की रक्षा के लिये प्राणों की गसी भेज कर, नवयुवक भाइयों से सहायता की आशा की है। श्राशा है हमारे होनहार युवक प्राणपन से इन सामाजिक अत्याचारों की जड खोदन की चेष्टा करेंगे। याभ्यास अपनी भाषा में श्रावणी पर एक निवन्ध लिखो। -~-दशहरा, विजयादशमी, होली दीपावली, रामनवमी कृष्णाष्टमी पमद्वितीया गणेश चतुर्थी, श्रादि पर एक एक निवन्ध लिखो। मुद्रा-यन्त्र यूरोप में सारे काम फलों से होते है । वह सत्र कलें अभी भूमिका . हमारे देश में नहीं आई है। परन्तु बहुत से काम यहाँ भी कलों की सहायता स किये जाते हैं उसमें छापे की कलों का प्रचार बहुतायत से हो रहा है। हर एक जिले में एक दो अथवा उससे भी अधिक छापेखानेखुल गये है। मनुष्यो के बनाये हुए बहुत से शिल्प-यत्रों में "मुद्रा-यत्रों" के तुल्य उपकार करने वाला और कोई यत्र नहीं है। ईसा की नवीं शताब्दी के अत में पहिले पहल चीन देश सृष्टि और में छापे की कल का आविष्कार हुभा । उस समय क्रमोन्नति काठ के पट्टे पर अक्षर खाद कर छापे का काम लिया गया । इस समय यूरोप में इस विषय की नई सृष्टि हुई है । सन् १८३६ और १८३४ ई० के बीच में गनवर्ग और कोस्टेर नामक दो आदमियों ने पृथक् पृथक् छापे की विद्या का आविष्कार किया । वह यूरोप में काठ के पट्टे पर बहुत मे शब्द

-
( १६५ )
खोद कर एक पृष्ठ छापने लगे। धीरे धीरे इस विद्या की
बहुत उन्नति हुई।
ईसा की ३५ वीं सदी में जर्मनी के एक विद्वान ने धातु
के अक्षर बना पर पच्छा नाम प्राप्त किया । बहुत
भाप रो दिनों पीछे स्टनहोपेर नामक एक नामी शिल्पी ने
सहायता लोह-यत्र या कर ज्ञान प्रचारक-पथ को विस्तृत कर
स छपना दिया। १६ वीं शताब्दी के प्रारम्भ में इङ्गलेण्ट
में भाप की सहायता से चलने वाला मुसा यत्र
तयार हुश्रा, जिस म प्रति घटा १८०० कागज एक ओर उपने
लगे विज्ञानिक उन्नति के साथ मुद्रा यत्र की भी यथेष्ट उन्नति
होती गई।
इस समय अनेक जगह बिजली की सहायता से छापेखाने
विजनी से चलते है, जिस से थोडे ही समय में बहुत मा
परिचालन काम छप जाता हे अक्षर ढालने के काम में भी
वर्णनातीति उन्नति होगई है।
घर्तमान समय में इस विद्या की उन्नति सुन कर हमारे
अद्भुत देश के लोगों को अवश्य आश्चर्य होगा। किसी किसी
उन्नति यत्रालय में १६ पृष्ठ वाले पिरयात सवाद-पन की
५५००० कापी एक घटे में छप जानी है।
पहिले किसी विषय के प्रचार के लिये हस्त लिखित पुस्तको
से काम लिया जाता था। इसमें परिश्रम और व्यय
हुन होता था और काम कम । ५० वर्ष से अधिक
समय में एक बडी पुस्तक कठिनता से लिखी जाती थी और सौ
चप में भी समाज में उसकाप्रचार होना कठिन था, परन्तु इस
परमोपकारीयत्र की सहायतामे थोडे ही दिनों मजोशान और
धर्म का प्रचार हुआ, अकथनीय है । दो महीने नहीं यीसने पाने
कि भूमण्डत के एक प्रान्त में छपने याली पुस्तकें दूसरे प्रान्त में
उपकार

पहुंच जाती है। कोई नया आविष्कार नया तर और नई यात किसी विद्वान ने निकाली कि शीघ्र हो दूसरे देश के पडितों के सामने आजाती है। राज्य के सब प्रकार के समाचार शीघ्र ही प्रजाके सामने श्राजाते है, रात्रि की घटनायें रात्रि ही में मुद्रित होकर सवेरे सर्व साधारण के हाथ में पहुँच जाती है। वास्तव में इस यन्त्र से ससार को बहुत लाभ पहुंचा है । भूमडल पर शार और शिक्षा के विस्तार का प्रधान सहायक है। धर्म और नीति के प्रचार में इसीका सहारा है। मनुष्य के सुखस्वछन्दता का प्रधान कारण है। सच बात तो यह है कि इस कला के उप- फार गिनाने में गिरा अनयन नयन बिनु बानी" कहना पड़ता है अभ्यास १-मुदा-यन्त्र पर एक निरन्ध स्वतत्रत रीति मे लिखो। २-'चरखा और फरघा' पर नियध लिसो। ३-मिल द्वारा सूत कातने और वस्त्र बुनने पर एक निबंध लियो। ४-एक निवन्ध लिसो जिसम हस्तशिल्प कौशल' और 'यन्त्र शिल्प फौशल' की तुलना हो? ५-पृथक् पृथा व्याख्या करो --यान्त्रिक-ज्ञान (रेल, मोटर, हवाई जहाज, श्रादि) का देश की परिस्थिति पर प्रभार । ब-विज्ञान से शासन कार्य में मुविधायें । नहर पाश्चात्य शिक्षा और सभ्यता से हमारा सम्बन्ध होने पर महरों की यहाँ भी बहुत से यान्त्रिक सुधार हुए है। इनसे गज पानश्यकता कार्यों में बड़ोउन्नति हुई है, शिक्षा आदि के प्रचार से लोगों को अपनी हीनता का पता चलता है और वे अनेक प्रकार के सुधारों के लिये प्रयत्न कर रहे है। भारतीय जनता का अधिकांश भागखेनीसे अपना निर्वाह करता है। अब

कृषि की उन्नति के लिये भी प्रयत्न हो रहे है । खेती के मुख्य
थाधार जलाशय । जिस वर्ष पानी नहीं परमता खेती का
काम बिलकुल नहीं होना । मन की महंगी हाजाती है। लाखों
आदमी भूख से तडफ तडफ कर मर जाते है । चारों ओर
पानी के प्रभार से करोडों उपयोगी पशुओं का नाश हो जाता
है। इन डगे के मिटाने के लिये नहरा, तलावों, और झोला
फे बनाने की बड़ी जरूरत है।
प्रकाल का भय दृर हाजाता है, खेती म बहुत कुछ उन्नति
हो जाती है । अनेक प्रकार की चीजें श्रन, तर
महरा से नाम कागे, पास लकडी तथा फल आदि पेदा
होने लगते है। पशुओं को जल तथा तृण का
अफाल नहीं होता। नहा के द्वारा यात्रा तथा व्यापार में बड़ी
सहायता मिली है । नावां पर चढ़ा कर एक स्थान से दूसरे
स्था पर माल ले जा सकते ह ओर यात्रा कर सकते है।
सरकार का बहुत सा रुपया जल कर से मिल जाता है और
करोटा रुपये की लकड़ी तैयार होजाती है । हजारों बीघा
जमीन जो बजर पड़ी रहती उपजाऊ हो जाती है।
सरस पहिले फीरोजशाह तुगलकने हरिद्वार के पास गगा
नहरों का प्रचार जी स एक नहर निकाली थी । बहुत दिनों
और उनकी तक वह बुरी अवस्था पडी रही। पीछे से
उन्नति अंग्रेजो ने उसे ठीक किया। इसके सिवाय
सतलज आदि पजार की नदियों तथा गगा,
यमुना और उसकी सहायक नदियों से उत्तरी हिन्दुस्तान में
रहुत सी नहरें बनाई गई है । इमी प्रकार दक्षिण में भी झीलों
तथा नदियों से नहरें निकाली गई है। परन्तु जिस देश में -५
करोड के लगभग किसान, यसते हो, यहाँ दस-यीम नहरों से
-

( १६८),
यूग थोडा ही पड सकता है, नदी, झील तथा गहुत बडे बडे
बाँध बना कर उनसे नहर निकालनी चाहिये।
अभ्यास
क
१-नहार-विभाग पर स्वतन्त्र नियन्ध लिखो।
----रेल, तार, डाक विभाग श्ादि पर एकएकम्यतन्त्र निवन्ध लिखो।
३--कोई बन्ध चाँध कर सिंचाई का प्रबन्ध किस प्रकार करना
चाहिये, इस पर एक लेख लियो।
मा-बाप की आज्ञा मानना
मा चाप ने जबसे जन्म दिया, उसी दिन से हमारे लिये उन्होंने
अनेक प्रकार के कष्ट उठाये । जिस समय जन्म हुआ हम उस
समय मा प्रकार से असमर्थ थे। मा ने दुध पिला कर पाला
पोपा और बडा किया। कुछ बडा होने पर खाना-पीना
सिसलाया। मा गीले में सोई, हमें सूखे में सुलाया। हमारी
चीमारी के डर से यह अपना स्वादिष्ट भोजन नहीं करती थी।
और कडवी कडवी औषधियों पीती थी। मा चाप ने बोलना
मिसाया और पढा लिसा कर चतुर किया । कैसा ही युग
पालक हो, मा बुग नहीं कहती। कहावत है-"पूत कपूत हो
पर माता कुमाता नहीं होती। परन्तु क्या पुत्रों को कपूत
होना उचित है । जिस माता ने अनेक कष्ट उठाये उसके प्रति
नमक हरामी करके पया घोर पाप से बच सकते है ! मा बाप
की आशा मानने में सन्तान कोई विशेष बात नहीं करती।
मा बाप के उपमार्ग का बदला हम जन्म भर नहीं दे सकते।
काशी प्रयाग, जगन्नाथ, हरिद्वार मका श्रादि तीर्थों से
मा याप की आज्ञा बढ़ कर घर बैठे मा-याप की आज्ञा पालन
मानना उत्तम धर्म है। करना परमोत्कृष्ट धर्म है।

। (१६) उपर्युक्त यात्रा में कष्ट उठाना पडता है, व्यय हाता है. परन्तु मा-बाप को सेवा रूपी यात्रा में यह नहीं होता । मसार के समस्त धर्मो म मा-चाप की सेवा करना सर्वोपरि धर्म समझा गया है। अधिक म पधिक पुण्य इसी का है । श्रमण की पितृभक्ति का उदाहरण पुगणों में प्रसिद्ध है। उसकी ही तरह मा पाप की भक्ति मनको करनी चाहिये। उसके मा चाप अन्धे थे। उसने उनकी प्राशानुसार भारत के भिन्न भिन्न स्थानानीयों की यात्रा कामरी में लाल कर फगई थी। मा-बाप क इतने अधिक गुणों का न विचार कर जो मनुष्य अपने मा-बाप का सामना करता है, मा-बाप की अाशा ओर उनकी वृद्धावस्था में उनको दुख देता हे, उल्नघन करना उसकी कितनी अधिक मूर्यता, कितनी निर्दय पाप है। ता भोग कितनी अधिक दुष्टता है। हे प्रभु! ऐसे प्राणी को पत्थर बनाया होता तो कसा अच्छा होता, यह कपडे गोने के काम मे श्राता और दूमरों के विगाडने का श्रादर्श न बनता । शिक्षित मनुष्यों को मा राप के प्रति विशेष भक्तिवान होना चाहिये । बय प्राप्त मनुष्या का मा पाप की भाशा पालन करना चाहिये । उनका पुत्र उनमें दृष्टान्त से उनका अनुकरण परे, जिससे पिचली अवस्था में यह दु स न पाव, परन्तु धर्म तथा कर्तव्य पालन के विरुद्ध श्रामा का पालन भी अच्छा नहीं। अभ्यास १-अपनी भाषा म निवन्ध लिसो, गिसम रद्ध और पूज्य सम्ब- धियों के सम्बन्ध में कैसा व्यवहार होना चाहिये-इमरी चचा हो। -~-मित्र तथा समाज + अय व्यक्तियों के साथ हमारे क्या कर्तव्य है।

( १७० )
३-विद्यार्थियों और शिक्षको के साथ कैसा व्यवहार होना चाहिये ।
५- हम किस प्रकार की रहन-सहन बनावें, जिससे लोकप्रिय हो सकें।
५- सभ्यता पर एक निवन्ध लिखी जिसमें इन सस्त वाक्यो को
चढ़ाया गया हो-
'व्यु पत्ति और व्याख्या' 'ससार में इस गुण की श्रावश्यकता' 'सभ्यता
पी भिन्न भिन्न पहिचान' 'सभ्यता ढोग नहीं हैं' 'सभ्यता भित्र भिन्न देश व
ममाजो के कारण भिन्न भिन्न होती हे "सभ्यता से लाभ"माराश और चोध'।
रामायण
१ रामायण का गौरव, २ रामायण का काम, ३ समाज का चित्र
४ उसके चरितो में शिक्षा ।
हिन्दू समाज में रामायण का जो स्थान है, जैसी उमकी
पूजा है जैसा उसका मान है, दूसरे किनी प्रय का नहीं ।
गजा से लेकर रङ्क तक पण्डित से लेकर सामान्य अक्षरा-
भ्यासी तक सब रामायण को पढ कर अपनी अपनी रुचि के
अनुसार श्रानन्द प्राप्त करते हे । हर जगह पण्डितों के द्वारा
उसकी क्या कहलाते है।
महात्मा तुलसीदास के समय में धार्मिक सम्प्रदायों में
रहुत मत-भेद बढ गया था । हर एक सम्प्रदाय, एक दूसरे के
मान्यदेवों की घोर निन्दा करते थे। आन्तरिक कलह हिन्दृ-
समाज को बहुत ही कमजोर बना रहा था। तुलसीदास जी
ने जनता के सामने यह श्रादर्श रस्खा
सिब वैरी मम दास कहावै, सो नर मोहि सपनेहुँ नहिं भावै।"
उन्होंने सामाजिक दशा का भी अच्छा चित्र खींचा है
"ढोल गेवार सूद्र पसु नारी, ये सब ताडन के अधिकारी।"
"नारि-स्वभाव सत्यकवि कहहिं, अवगुन पाठ सदाउर रहहिं।"
"कोउ नृप होउ हमें का हानी, चेरी छॉडि न होउच रानी।"
श्रादि वाक्यों से उस समय की हिन्द-समाज केमीतरी

(१७१ ) रहस्यों का पता चलता है। भगवान् रामचन्द्र का चरित्र अनग्श अनुकरण करने याग्य है । भाई भरत और लक्ष्मण से म्वार्थत्यागी होने चाहियं । राजा दशरथ के समान प्राण और पुत्रों को देकर भी अपने रचनों का पालन करना चाहिये। कृवर्ग जसी दुष्टा स्त्री किस भॉनि घर में फूट डलवा कर नाग कर देती है । दुष्टो और धूर्ती की बातों में श्राफर कोई जैसी बुद्धिमान स्त्री भी बहक जाती है। सती-सीता का फैसा पवित्र चरिन ह । श्रीराम का विभीषण और सुग्रीव के माथ मित्रता करना राजनीति का 'प्रच्छा उदाहरण है। कुमार्ग में चलने वाला नया अपने भाइयों का सनाने वालों को वालि योग गरण के चरित्र से पाठ लना चाहिये। भगवान् रामचन्द्र का गीलनी क हाथ मे र पाना, भील के माथ घनिष्ठ मित्रता करना, गत दिन नीच ऊँच की चिन्ता में रहने वालों को अच्छी शिक्षा देता है । इसके अतिरिक्त "ईश्वर श्रम जीव अविनामी" श्रादि घाययों का अभिप्राय है कि किसी जीव के साथ में अत्याचार नहीं करना चाहिये, क्योंकि ईश्वर का श्रश है । यदि मनुप्य माया (प्रज्ञानता) के पर्द को हटा दे तो यह ब्रह्म ही (समीपस्थ ) हो सकता है। यहाँ तक गिनावे घेदान्त, भक्ति, शान, धर्म, नीति श्राचार व्यवहार श्रादि सिखाने को पर रामायण ही पर्याप्त है । जहाँ पर धम शिक्षा देने का विधान हा, एक गमायण में ही उसका यहुन कुछ काम निस्ल सफता है। अभ्यास १-इस रामायण के छोटे से लसपा बढ़ार बड़े भागार में रिसा। २~ीता, फोशिश्या, मुमित्रा, कर, भरत, लमण, दशरप हनुमान पर प्रथा थर निबन्ध निगे। ३-महामाग्न की कथा का सार लिया। ५-रामायण में क्या २ शिधार मिनती हैं, इन पर एनिम लियो।

देशम फलायौशल ही साथ पडे बड़े शहरों में श्रादर्श कार्यालय दशी-कारोगरी इतिहास देपन से बात होता है कि किसी समय अपना देश विद्या और कला में पृथ्वी के और देशा से प्राचीन बालम बहुत यहा चदा था । यहाँ से बहुत सा माल देशवी कारीगरी अग्य तुर्किस्तान और मिश्र होता हुश्रा यूरोप जाता था । भॉति भॉति का सूती और रेशमी कपडा बनता था। आज भी सूरत का जरो का काम, नागपुर के धोती दुपट्टा और काश्मीरी शाल दुशाले यहाँ की प्राचीन कारीगरी का गौरव दिखाते है। अ-अपने देश के कारीगरों में अज्ञानता, आलस्य और निर्धनता होने के कारण यह नवीन सभ्य देशों श्रवनति का के कारीगरों की बगवरी नहीं कर सके। कारण समय की गति के साथ उन्होंने अपने विद्या, कला और हुनर में सुधार नहीं किया। च-यूरोप के लोग उद्योग, साहस और चतुराई मे बड़ गये । अपनी शारीगरी में उन्होंने बडा सुधार किया। अनेक प्रकार के यन्त्र बनाये। दूसरे देशों से फचा माल मॅगा कर यन्नों की सहायता से सस्ता और माफ माल तैयार किया उसके सामने हाथ से बना हुआ देशी माल तेज पडा । उतनी सफाई भी न दिखाई दी, इससे उसकी सपत कम हो गई। श्रकला विद्या की पुस्तकें अपनी भाषा में प्रकाशित फरके सस्ते मूल्य पर घेचनी चाहिये । साथ की रदि खोलने चाहिये जिनमें कारीगरों को कलों से काम करना सिखाया जाय ।

( १७३ )
य-यूरोप, अमरीका और जापान श्रादि में काम सीखने
के लिये विद्याथी भेजे जायें; वह लौट कर देशी कारीगरों को
उसी ढग पर काम करने के लिये तैयार करें।
-पनी लोग देश में दियासलाई, कागज, सूती व ऊनी
कपडे, होरडर, निव, कपि यत्र श्रादि श्रावश्यकीय वस्तुओं के
पनाने के लिये कारखाने खोले और सहकारी समितियाँ यनावे।
यह है कि देशी कारीगरों की दशा को सुधारना जरूरी है।
सारारा राई, रेशम, सन और ऊन यादि पदार्थ यहाँ से यूरोप
जाते है । यहाँ से कपडा बनकर यहाँ श्राता है। अगर वह
यहीं पर्ने तो करोडौं श्रादमियों की रोजी चले और देश में धन
की बढती हो । अकाल का डर कम हो जाय । इस समय देव
योग से जर्मनी का माल भारत में कम पा रहा है, परन्तु
अमेरिका और जापान कुल व्यापारी मैदान को हथियाने की
कोशिश में है। हिन्दुस्तानियों को भी सचेत होने का मौसा
हाथ से न जाने देना चाहिये और भारत की समृद्धि के लिये
तन, मन, धन, लगा देना चाहिये।
अभ्यास
१-रा लेस को पढकर एक स्वतन लेख लिखो।
२-'स्वदेशी वस्तुओं का आदर करना चाहिये इस बात पर २५ पक्ति में
सुन्दर भावपूर्ण रचा रो।
३-'देश म क्ला-ौशल की वृद्धि से अमाल का डर नहीं रहता इस
विषय पर एक छोटा सा निनन्ध लिस।
फलों का आहार
औषधियों का सामान्य गुरा' यह है कि वह बातों को ठीक,
रक्से और अजीर्ण न होने दे। यदि जीर्ण हो जाय तो उसे
दूर करे। परन्तु अोपधियों की अपेक्षाफल अधिक लाभदायक है।

. , ( १७४ ) यो ता सेय, नारङ्गी, नासपाती, फेला, सिमरी, शहतूत और अनार में अजीर्ण दूर करने का गुण ई ही, परन्तु अओर, अगूर, खुवानी, किशमिश और मजूर में यह गुण बहुतायत से पाया जाता है। हृदय का कार्य धीमा हा या उन्नमें गर्मी श्रा गई हो तो फलों से हृदय फलों का नमक और खटाई उसे लाभ पहुँचाती को लाभ होता है है। फलों की चीनी को हृदय श्राराम से पचा लेता है। मेदे में भोजन पचाने वाला रस हे, वह यदि दूपित हो जाय फल मेदे के रस तो फल उसे शुद्ध कर देते हैं। फलों का हलका को शुद्ध करते हैं भोजन आठ-दश दिन में अजीर्ण दूर करता है। उबले हुए चावल और तले हुए मेन, अथवा दो भाग केले के गूदे में एक भाग मलाई मिला कर बहुन ही लाभदायक है । नारगी और सरबूजे का रस, गुरदे का मेल दुर करके उसे बलगन बनाता है और चित्त प्रसन्न करता है। गठिया थे रोगी को भी खट्टे फल लाभदायक है। जिसके शरीर में मॉस साने से जो रक्त-विकार उत्पन्न हो, उसे नीबू और तर- बूज का अधिक व्यवहार करना चाहिये। जो आलस्य से जीवन निर्वाह करते हैं उनकी पाचा निर्यल हो जाती ह । प्रॉत ठीक काम नहीं करतीं । मल तरह बाहर नहीं निकलता। अप शरीर में

.
( १७५ )
रक्त की कमी फलों के थाहार से दूर होती है । फेला इम
रोग के लिये विशेष उपकारी है।
यदि शरीर में मोटाई अधिक हो तो ऐसे रागी को फल
अधिक देने चाहिये । नीऔरनारगी श्रादि सट्टे फला का रस
पीना बहुत लाभदायक है। निर्वलना में अगर और पेचिस के
रोग में
सजूर
और अजीर अधिक ताभ पहुँचाते है।
जैतून का तेल कमजोरी दूर करता है। कॉडलिवर पायल
के बदले इसका साना बहुत ही उपयोगी है।
बच्चों को मास घ मिठाई 7 देकर फल ही देना चाहिये।
फलों को यह पसन्द भी करते है।
जो मनुष्य भोजन के साथ त्यि फल पाता है, वह बहुत
कम रोगी होता है । इन के भोजन से पाचन शक्ति बढती है,
रल पहुंचता है और शरीर के अन्य विकार दूर हो पर यह
पुष्ट होता है।
प्रभ्यास
२-फानों के श्राहार पर एक म्यतप्र नियन्ध लिखा।
२--'अधिन प्रौपथ सपन से स्वास्थ्य नष्ट होता है।' २० पक्तिमम
की व्यारया करो।
३-म्वाम्ग्य और भोजन' इस पर सफ्त वाक्य निय फर इद बढ़ाया।
५-इन यायों की एस निगन्ध म व्याख्या परो-
अ-मनुष्य-जीवन के लिये जल,वायु और भोजन आवश्यक है।
व-स्वास्थ्य मा के लिये व्यायाम श्रावश्यक है।
म-व्यायाम के प्रकार और उनत शिप लाभ ।
विद्या
जिस के द्वारा कुछ जाना जाता ह उसे विद्या कहते है।
"विद्या दाति विनयम् निनयात् याति पात्रताम्" विद्या ही से

( १७६ ) मनुष्य बनता है। अन्या जिस प्रकार दिन-रात क भेद को नहीं जान सकता है, विद्याहीन मनुष्य भी उसी प्रकार नीति और कर्तव्य को नहीं जान सकता। जान मायभाव ही इसका कारण है। ज्ञान किसी के साथ साय जन्म नहीं लेता, विद्या-शिक्षा से ही ज्ञान मिलता है। अभ्यास से शिक्षा की उन्नति होती है। उन्नति से शान का झम-विकास हाता है। क्रम विकास का परिणाम मनुष्य का विधान बनाता है । विहान का श्रादर राजा से अधिक होता है, "स्वदेशे पूज्यते राजा विद्यान सर्वत्र पूज्यते ।" राजा भी विद्वान का सम्मान करता है। विषयों के अनुसार विद्या के कई भेद है-कृषि, शिल्प, नीति श्राचार, विज्ञान, श्रादि। 'पुस्तक बिना पढे विद्या नहीं पाती है' यह वात झूठ है। विना पुस्तक पढ़े भी मनुष्य विद्वान हो सकता है । पुस्तक से शिक्षा में राहायता मिलती है-विद्या भाषा मयी है। बिना भापा के हम अपने भावों को न तो दृसरों पर प्रगट कर सकते है न दूसरे के भावों को समझ सकते है। अच्छी भाषा सीखने के लिये प्रारम्भ से ही पुस्तक पढ़ने का नियम है । धैर्य, क्षमा, सयम, अहिमा, शान्ति, पवित्रता आदि गुण विद्या से ही उत्पन हो सकते हैं । विद्या से चित्त की शुद्धि होती है। कर्तव्य-प्रकर्तव्य, मत्-असत्, झूठ सच का ज्ञान होता है। "भूग, पडा है ? आकाश के चमकते हुये तारे कया हैं बाते हैं, पर विना विद्या के mms "शरीर को स्वस्थ किस पोषण कैसे करें। किस विधा ही सचा पर आज यूरोप व नि - ?

( ७७ )
ही से जापान इतना ऊँचा उठ गया है। रेल,नार, हवाई जहाज,
चिना तार का तार, मॉनि मोति को फ्ले विद्या ही ने
नायी गई । विद्या ही मे वह अरबों-खरगों का व्यापार कर
रहे है । हमारी भारत भूमि भी विद्या की पानि और विद्वानो
की जगनी है | व्यास, वारमीकि, पातअलि, शकर, दयानन्द,
विवेकानन्द, गोसले आदि ने इसी की कोख से जन्म लिया।
समय के फेर स यहाँ से विद्या का सूर्य अस्त हुश्रा । प्रशान
का अँधेरा चार्ग श्रोर फैल गया । पर श्रर काल-चक्र के
प्रभाव से फिर पौ फटने लगी, गारगकाश में लालिमा
दिखाई देने लगी है। श्राशा है कि विद्या-सूर्य उदय होगा और
हम उसके प्रकाश में उन्नति प्राप्त करेंगे।
अभ्यास
१-विद्यासम्बन्धी निवध पर सूची ( सकेन दाक्य ) लिखो भोर वम
सूची पर स्वतन लेरा लियो।
२-नीचेनिग विषयों पर पहले सकेत याश्य निराकर फिर निवन्ध
पूरा परो।
-पुम्तयायनोका, इ-पुस्तकालय, उ-समाचार पर, - -तिहास
का पान, १-भूगोन का ज्ञान, घ-साहित्य पाशा ग-चित्रकारी (दाग
मीसने का लाभ)।
मंतोप
सतोप मन के सार निभा है असतोपी कमी मुषी नहा होता ।
पतोपी थोडे ही में मुगी हो जाता है । मनुष्य अपने अच्छे काम करने ही
पर सतोप कर सकता है। कहीं कहीं सतोष भी चुरा।
सतोप मनुष्य के मन के ऊपर निर्भर है।धा मे मनुष्यको
कभी सतोप नहीं हो सकता जर तक कि वह स्वभार से ही
सतोपी न हो। सतोपी मनुष्य कभी कभी फहा करता है कि
मुझे अपने पड़ोसी के बगर धन मिल जाय तो सतोष होगा,

रहता है ( १७०) यदि उसे उतना धन मिल जाग तो सतोष नहीं होता और वह श्रधिक धन की इच्छा करने लगता है। इसका कारण उसका स्वभाव से ही असतापी होना है। इच्छित वस्तु के पाने पर भी मनुष्य के सन्तुष्ट न होने का कारण यह है कि उसकी इच्छाओं का कभी अन्त नहीं होना । प्रत्येक नमय मनुष्य के मन में इच्छाएँ उत्पन्न हुआ करती है। सर से पहिले एक गरीव मनुष्य कुछ रुपयों की इच्छा करता है, जब वे उसे मिल जाते है तो वह और भी अधिक धन की इच्छा करने लगता है । इसी तरह से घह समय कभी नहीं पाता जर उसे कोई इच्छा न रहती हो, परन्तु सत पी मनुष्य थोडे धन पर ही श्रानन्द से सतोपी मनुष्य चाहे जिस स्थिति में हो, आनन्द से रहता है। यदि कोई मनुष्य बहुत गरीब हो नो उसे इसी बात पर भान- न्दित रहना चाहिये कि उसका स्वास्थ्य-धन, धनवान मनुष्य से जो मनुष्य, मित्र हीन और कुटुम्य हीन है, उसे शोक न करना चाहिये, वरन् अपना समय पुस्तकों के पढने तथा ओर ऐसे कामों में लगाना चाहिये, जिससे कि उसका तथा समाज का भला हो । जो मदा से रोगी रहते है, उनका अपने मित्रों नथा सम्बन्धिया की प्रीति में ही प्रसन्न रहना चाहिये । मनुष्य का सब से अधिक मतोप का वह समय है-जब उसे किमी अच्छे कार्य में सफलता प्राप्त होती है। यदि कोई मनुष्य किसी सत्कार्य के फरने में पूरा परिश्रम करता है तो भी उसके हृदय को सतोप होता है। मनुष्य चाहे कितनी ही बुरी अवस्था में हो, परन्तु जब वह अपना कर्तव्य अच्छी तरह से कर लेता है तो उसकी आत्मा को पूरा आनन्द मिलना है। सतोप तो एक अच्छी वस्तु है, परन्तु कभी कभी सतोप करना सराहनीय नहीं है। अपने जीवन-श्रादर्श को उच्च न बनाना और सदा श्रवनत-दशा में मतोष करना ठीक नहीं है। अच्छा है। .

,
( १७६ )
किसी गरीव भाई को चुरी दशा में देखकर उसकी दशा
सुधारने का उपाय न करना, किसी मनुष्य के किये हुए
अत्याचार को सह लेना और उसे उचित पदला न देना भी
अपने कर्तव्य से विमुख होना है।
स्मार्थ
स्वार्थी मनुष्य का चरित्र, ऐतिहासिक उदाहरण, म्यार्थी मनुष्य को
सदा सुख नहीं मिलता, स्वार्थी दया पात्र नहीं है।
स्वार्थी मनुष्य सदा अपने सुप की इच्छा रखता हे शोर
दूसरे मनुष्यों के सुख की निरल परवाह नहीं करता। यह
सटा अपने उद्देश्य पूर्ति के प्रयत्न म लगारहता है और चाहता
है कि जितनी भर पृथ्वी पर नच्छी वस्तुएँ है, वे सय मुझे ही
मिल जावे । जन उसके सुख की वस्तु मिल जाती है तो वह
उसका उपयोग करता है और इस बात को नहीं सोचता कि
उसके साथी सुन में हैं या नहीं । यदि किसी को दुप देने
पर भी उसे कोई वस्तु मिलती है तो वह उसका विचार न
कर के उस वस्तु को ले लेता है। इतिहास में ऐसे कई राजाओं
के उदाहरण मिलते है,जोप्रजा का धन लूट कर अपने स्वार्थ के
लिये लगाते थे। जिनको अपने विलास के सिवाय प्रजा के
सुख
की बिलकुल परवाह न थी।रोम में भी ऐसे कई वादशा-
ह हुए है, जो कि अपना जीवन, सुस ओर विलासपूर्वक
रिताने के लिये ही गज्य का काम अपने हाथों में लेने का
प्रयत्न करते थे। उसके लिये बडे बडे युद्ध करने थे, जिसमें
बहुत से मनुप्यों का सहार होता था। ऐसी स्वार्थपरता
केरल राजाओं में ही नहीं किन्तु साधारण मनुष्यों में भीपाई
जाती है। पृथ्वी के प्राय प्रत्येक भाग में ऐसे मनुष्य है जो
अपने सुम्य के लिये दमरों के अधिकार छीन लेते हैं। ये इम
-

- ( १७८ ) यदि उसे उतना धन मिल जाय तो सतोय नहीं होता और वह अधिक धन की इच्छा करने लगता है। इसका कारण उसका स्वभाव से ही असतापी होना है । इच्छिन वस्तु के पाने पर भी मनुष्य के सन्तुष्ट न होने का कारण यह है कि उसकी इच्छाओं का कभी अन्त नहीं होता । प्रत्येक समय मनुष्य के मन मेंइच्छा' उत्पन्न हुना करती है । सर से पहिले एक गरीव मनुष्य कुछ रुपयों की इच्छा करता है, जब वे उसे मिल जाते है तो यह और भी अधिक बन की इच्छा करने लगता है । इसी तरह से यह समय कभी नहीं पाता जर उसे कोई इच्छा न रहती हो परन्तु सत पी मनुष्य थोडे धन पर ही श्रानन्द से रहता है। सतोपी मनुष्य चाहे जिस स्थिति में हो, आनन्द से रहता है। यदि कोई मनुष्य यहुत गरीब हो तो उसे इसी बात पर आन- न्दित रहना चाहिये कि उसका स्वास्थ्य धन, बनवान मनुष्य से अच्छा है। जो मनुष्य, मित्र होन और कुटुम्ब हीन है, उसे शोक न करना चाहिये, वरन् अपना समय पुस्तकों के पढ़ने तथा और ऐसे कामों में लगाना चाहिये, जिससे कि उसका तथा समाज का भला हो । जो सदा से रोगी रहते हैं, उनको अपने मित्रो तथा सम्बन्धिया की प्रीति में ही प्रसन्न रहना चाहिये । मनुष्य का सब से अधिक सतोप का यह समय है-जव उसे फिमी अच्छे कार्य में सफलता प्राप्त होती है । यदि कोई मनुष्य किसी सत्कार्य के करने में पूरा परिश्रम करता है तो भी उसके हृदय को सताप होना है। मनुष्य चाहे कितनी ही दुरी अवस्था में हो, परन्तु जब वह अपना कर्त्तव्य अच्छी तरह से कर लेता है तो उसकी आत्मा को पूग श्रानन्द मिलना है। संतोप तो एक अच्छी वस्तु है, परन्तु कभी कभी सतोप करना सराहनीय नहीं है। अपने जीवन-श्रादर्श को उच्च न बनाना और सदा श्ररनत-दशा में सतोष करना ठीक नहीं है। - ।

( १७६ )
किसी गरीच भाई का पुरी दशा में देखकर उसकी दशा
सुधारने का उपाय न करना, किसी मनुष्य के किये हुए
अत्याचार को सह लेना और उने उचित पदला न देना भी
अपने कर्तव्य से विमुख होना है।
स्वार्थ
स्वार्थी मनुष्य का चरित्र, ऐतिहासिक उदाहरण, स्वार्थी मनुष्य का
सदा सुख नहीं मिलता, म्याधी दया पात्र नहीं है।
स्वार्थी मनुष्य सदा अपने सुप की इच्छा रखता है और
दूसरे मनुष्यों के सुख की रिकुल परवाह नहीं करता। वह
सदा अपने उद्देश्य पूर्ति के प्रयत्न म लगा रहता है शोर चाहता
है कि जितनी भर पृथ्वी पर चल्ली वस्तुएँ हैं, वे सथ मुझे ही
मिल जावें । जब उसके मुख की वस्तु मिल जाती है तो यह
उसका उपयोग करता है और इस बात को नहीं सोचता कि
उसके साथी सुप में है या नहीं। यदि किसी को दुप देने
पर भी उसे कोई वस्तु मिलती है तो वह उसका विचार न
कर के उस वस्तु को ले लेता है। इतिहास में ऐसे कई गजाओं
के उदाहरण मिलते है, जो प्रजा का धन लूट कर अपने स्वार्थ के
लिये लगाते थे। जिनको अपने विलास के सिवाय प्रजा के
मुख की बिलकुल परवाह न थी।रोम में भी ऐसे कई वादशा-
ह हुए है, जो कि अपना जीवन, सुग और विलासपूर्वक
बिताने के लिये ही गज्य का काम अपने हाथों में लेने का
प्रयत्न करते थे। उसके लिये रडे बड़े युद्ध करते थे, जिसमें
बहुत से मनुष्यों का सहार होना था। ऐसी सार्थपरता
केवल राजाओं में ही नहीं किन्तु साधारण मनुष्यों में भीपाई
जाती है। पृथ्वी के प्राय प्रत्येक भाग में ऐसे मनुष्य हे जो
अपने सुम्य के लिये दूसरों के अधिकार छीन लेते है। वे
-

( १८० )
बात को ओर विल्कुल ध्यान नहीं देते कि उनके अधिक सुख
भोग के कारण कई गरीबों को बहुत दुःख सहना पडता है।
स्वार्थी मनुष्य अपने मित्रों और बन्धुओं के हक भी छीन लेता
है, इस कारण से वह सारे फुटुम्ब और मित्रों की घृणा का
पात्र बन जाता है, तो भी वह अपनो स्वार्थपरता नहीं छोडता।
जय लव घृणा से देखते हैं तब उसे हार्दिक शान्ति नहीं
मिलती। मनुष्य को शान्ति तो तब मिलती है जब उसके
समाज के मनुष्य उससे प्रसन्न रहें इसलिये अपने समाज के
मनुप्यों को प्रसन्न रखना अत्यावश्यक है। सच पूछा जाय तो
मनुष्य को स्वार्थ त्याग में ही सुख है ! जब कोई मनुष्य अपनी
समाज के लिये कोई मला काम करता है तर समाज को सुख
तो होता ही है, परन्तु उसे भी सुख होता है। इसके सिवाय
वह समाज की प्रीति का पात्र बन जाता है। परन्तु स्वार्थी
मनुष्य को इस आनन्द ले वचित ही रहना पड़ता है। समाज
की घृता के कारण उसे जो हार्दिक वेदना होती है, उससे यह
अपनी सुख-सामग्री का भी उपभोग नहीं कर सकता । यदि
चही मनुष्य स्वाथपरता छोडकर अपनी समाज का हितेच्छु
बन जाय तो उसे सुम श्रोर शान्ति दोनों मिल सकते है।
चित्त की स्थिरता वा धीरज
क्या है ? किन में होती है। उसका महत्त-१ सैनिकों को,
२ व्यापारियों को। ३ सम्बन्धियों को। यह गुण अभ्यास से यह सकता है
हो समय कैसा ही कठिन, रढ़ चित्त होकर मत डगे,
पड जॉय लाखों विघ्न पर, कर्त्तव्य तुम अपना फरो,
कहते न तुम घर घर फिरो, बाधा हरो बाधा हरो,
निज बाहुबल से नाव खेकर, दुख का सागर तरो।
स्थिरचित्त वाला मनुष्य कठिनाई के आने पर विचलित
नहीं होता, किन्तु धैर्य के साथ बात समझता है और समय
-
-

.
के अनुसार उचित काम करता है । जो मनुष्य किली समाज
के नेता रहते है, उनके चित्त का स्थिर होना एक स्वाभाविक
गुण है । जब कोई मनुप्य किसी धापत्ति के माने पर हिल
होजाता है श्रोर यह नहीं सोन सकता कि उचित कार्य क्या ह,
तर शान्त चित वाला मनुष्य, उन्हें धैर्य से उस प्रापत्ति का
सामना करते और उसके निवारण करने का उपार तलाता
है । उच्चपद पर स्थिर चित्त बाले मनुष्य का ही नियत करना
चाहिये, क्योंकि केवल यही माहन पारण फरक विपत्ति का
सामना करता है। वह अपनी स्थिति का अच्छी तरह से जान
कर समयानुकूल चाल चलने की अपने साथियों को सलाह
देता है। ऐसा मनुष्य जल्दी बात समझ लेने वाला भी हो,
जिससे कि वह मोका हाथ से न जाने और उचित कार्य
करले । जो मनुष्य शान्त चित्त होकर समानुकूल काम नहीं
पता, वह किसी काम का नहीं।
ऐमा प्राय देखा गया है कि प्रसिद्ध पुरुष भी जर कठिन
काम शाजाता है तो धर्य खो देते है और ऐमा काम कर बैठते
है, जिसके कारण उनकी जग में हँसी होने लगती है। उसका
कारग चित्त की स्थिरता का अभाव है। वे फिर यह नहीं
सोच सकते कि क्या करना चाहिये । ऐसे मनुष्या को उच्चपर
पर कभी रियत न करना चाहिये । यदि कोई मेनापति युद्ध के
समय में धैर्य छोड देवे तो वह सब काम निगाड देता है । यह
चाहे कितना ही ईमानदार और राजभक हो, परन्तु उस समय
वह किसी काम का नहीं-सेनापति के पद के लिये अयोग्य है।
व्यापारी, जो युद्ध की भूठी खबर सुनफर और याजार के भाव
की परवाह न करके अपनी भाव तेजयामदा कर देता है-टोटे
में पड़ता है। जो मनुष्य बहों की स्थिति का पूरा शान न करके
वे
रुपया पींच लेते है अथवा उमफे हिस्से मोल से लेते है,
।

(१२)
भी अपनी और दूसरे की हानि करते हैं। इससे मनुष्यको कोई
भी काम विना अच्छी तरह से सोचे और उसका अच्छी
तरह से ज्ञान प्राप्त किये नहीं करना चाहिये । फायदे में वे ही
मनुष्य रहते है जो गिना समझे जन-समूह का अनुकरण नहीं
करते, किन्तु किसी भी काम को नोच विचार के हाथ में
लेते है।
'चित्त की स्थिरता' एक स्वाभाविक गुण है, परन्तु प्रयत्न
और अभ्यास में भी मनुष्य स्थिरचित्तवाला हो सकता है।
जिस मनुष्य की मानसिक शक्तिया का विकास धुद्धि द्वारा हो
गया हे पोर जो मनुष्य बलवान और स्वस्थ शरीर घाला है
वह हर कठिन समय पर बुद्धि के साथ काम करता है और
मौके पर अपना काम निकालने से नहीं चूकता । परन्तु जिस
मनुष्य में मानसिक और शारीरिक बल नहीं होता वह तुरन्त
ही विचलित हो जाता है,वह यह नहीं सोनसकता कि क्या करना
चाहिये । जिस विषय का मनुष्य को पूरा ज्ञान रहता है, उससे
सम्बन्धित किसी काम में बहुत कम भूल करता है, क्योंकि
वह जानता है “उस में कौनसी भूलों की अधिक सभावना है"
वह उन भूलों से पचाव के उपाय भी सोच लेता हे। दि सेना-
पति को लडाई के विषय की सब पात मालम हो, तो वह शीघ्र
ही समयोचित काम करेगा और कभी विचलित न होगा। इसी
तरह यदि माता को बच्चों की सय वीमारियों का मान हो तो
वह अपने बालक को बीमार देख कर घबडायगी नहीं, वरन
उस यीमारी के लिये उचित औषधि देने का प्रबंध करेगी।
पश्चात्ताप
क्या है ? उनति के लिये पश्चात्ताप की श्रावश्यक्ता ।
भविष्य में उन्नति की सभावना । पश्चात्ताप ही दण्ड
पश्चात्ताप में

( १८३ । किसी कर्तव्य के न करने अथवा किसी अनुचित कार्य के करने के पश्चात् जो हृदय में चेटना होती है उसे पश्चात्ताप कहते हैं । श्रात्मोन्नति के लिये पहले पश्चात्ताप के ज्ञान की प्रा- घश्यकता है। मनुष्य को चाहिये कि प्रत्येक अनुचित काम करने पर पश्चात्ताप करे, क्योंकि पश्चात्ताप करने वाला मनुष्य दुसरी वार उस अनुचित काम को न करेगा जिसके ऊपर कि उसने पश्चात्ताप दिया है। यदि चोर को चोरी करने पर लज्जा नही पाती तोवह फिर चोरी करेगा। यदि किसी मनुष्य काझूठ पालन पर पश्चात्ताप नहीं होता तो वह सदा झूठ ही गोला करेगा। जो सदा अपराध करने रहते है, उनको भी किसी समय हार्दिक वेदना, अपने अनुचित कार्यों पर होती है । जो मनुष्य अपने किये हुये अपगों पर पश्चात्ताप प्रक्ट करता है, वह मानों अपने अपराधों क लिये ईश्वर से क्षमा मांगता है। यदि पश्चात्ताप सच्चा हो ता वह फिर सा काम भी नहीं करना। जो मनुष्य स्वभाव से ही अपराधी हो उसको सच्चरित्र बनाने का पक ढग यह भी है कि उसके अनुचित कार्यों पर पश्चात्ताप कराया जाय, क्योंकि पश्चात्ताप से अपने किये हुये अपगधों पर शोक प्रकट करना ही नहीं प्रत्युत आगे अपराधों का न करना भी होता है । पश्चात्ताप मनुग्म तर ही करेगा जर उसे इस बात का निश्चन हो जायगा कि जो काम उसने किया है यह हर तरह से बुरा है। यदि किये हुए काम में उसे कुछ भलाई दीसेगी तो उन पर वह पश्चात्ताप न करेगा। पश्चात्ताप केवल बाहरी ही नहीं किन्तु हार्दिक होना चाहिय यदि कोई लडका सजा से बचने के लिये अपने शिक्षक से काई अपराध न करने की प्रतिमा कर दे तो वह पश्चाताप नहीं है। पश्चात्ताप होगा ता, जर स्वय अपना अपगध स्वीकार कर और उसके कारण दण्ड को उद्यत हो । मे . में पश्चात्ताप करने वाले को दण्ड देना उचित नहीं क्योंकि पश्चात्ताप द्वारा मनुष्य को हार्दिक-वेदना होती है,उसका दुख दण्ड के दु स्य से भी बढ कर होता है। प्रसन्नता १-मसन मनुप्प का चरित्र, २-असुनता सुख की जड है, ३-मनुष्य श्रम्बम्ध होने पर भी प्रसन्न रह सकता है, ४-प्रमन्न चित्त मनुष्य अपना काम अच्छी तरह फरता , ५-वास्थ शियम-पालक अपने चित्त को प्रसन रख सकता है। प्रसन्न चित्त बाला चाहे जिम दशा में हो-उदास नहीं हाना । विपत्तियाँ साधारण मनुष्य को विलकुल उदास कर देती है, वे प्रसन्न चित्त वाले पर कुछ असर नहीं कर सकतीं। वही मनुष्य सुख से रह मकता है जो आपत्तियों का सामना करता है और विचलित नहीं होता । प्रसन्नता ही मनुष्य के सुख की जड है, क्योंकि मनुष्य युग अपस्था में होकर भी यदि प्रसन्न रहे तो वह सुखी है और अच्छी स्थिति के होने पर भी उदास रहे तो वह दुखी है । जो मनुष्य धनहीन होने पर मी प्रसन्नचित्त रहता है, यह एक धनिक और उदास मनुष्य से अच्छा है । सम्पत्ति से वह सुख प्राप्त नहीं हो सकता जो कि प्रसन्नता ले होता है। मनुष्य के सुख और दुरा का कारण उसका मन होता है, बाहिरी वस्तुएं नहीं । यही कारण है कि जो मनुष्य मन से प्रसन्न है वहीं मुसी है। प्रसन्नचित्त वाला मनुष्य अपना काम भी अच्छी तरह से कर सकता है, क्योंकि कैसा ही काम कयों न हो, वह उसे करने से नहीं हिचकता और उसे कष्टसाध्य देख कर निराश नहीं होता । उसे प्रत्येक फठिन काम करने में सफलता प्राप्त करने का रहस्य मालम है और वह प्रसन्नता है । वह उसे ससार के प्रत्येक काम में सहायता देती है और सफलता प्राप्त कगती है।

( ५ )
जो मनुष्य दिन भर रोता हुया काम करके और उसी पर
सोचता हुआ उदास रहा नाता है,उम कमी मुख नहीं हाना।
प्रसन्न चित्त वाले मनुष्य का उसी काम के करने में विशेष
श्रानन्द आता है । वह अपना काम पूरा कर लेता है ता सदा
उसी को नहीं सोचता, किन्तु जो काम उसके आगे रहता है
उसकी ओर ध्यान देता है और दत्तचित्त हो उसे करने लगता
है। इससे उसका काम भी अच्छा होता है और उसे अधिक
व्यथा भी नहीं मालूम पड़ती। इसी से कहा है कि प्रसन्नता
सफलता का साधन है।
प्रसन्नता ईश्वर को दैन नहीं है, वह प्रत्येक मनुष्य में हो
सकती है। प्रसन्न मनुष्य का तो श्रानन्द सा ही है, परन्तु
उसकी प्रसन्नता से उसके साथियों को भी आनन्द होता है।
जिस तरह उदास मनुष्य की सूरत सर को दुरी मालम होती
है, उसी तरह प्रसन्न पुरुष का मुस सबसे अच्छा मालूम
होता है।
मनुष्य को अपना म्वास्थ्य अच्छा रसने के लिये भी
प्रसन्नता की श्रावश्यकता है। जो मनुष्य प्रसन्नचित्त होते है
वे अच्छे स्वास्थ्यबाले होते है और उदास मनुयां का स्वास्थ्य
सदा निगडा हुया रहता है । यह वैद्यों का मत है कि उदान
रहने से पाचन-शक्ति घट जाती है, जिसके घटने से सब
प्रकार के रोग उत्पन्न होते है।
मित्रता
मित्रता से सुरु बढ़ता है। विपत्ति में दुख कम होता है। आपत्ति म
धीरज धता । जुरे मित्रा मे हाति है।
मित्रता करने से मनुष्य के सुखों की वृद्धि भोर दुखों का
नाश होता है। किसी मनुष्य को किसी काम में सफलता
प्राप्त होती है तो उसको और उसके मित्रों को श्रानन्द होता
।

परन्तु मित्रवाला { १८६) है । यदि किसी कारण स उस दुख होता है तो उसके मित्र महानुभूति दिखाते है और धैर्य दिलाते है, जिल से उसे अधिक सुख मालूम होता है । जिस मनुष्य का मित्र नहीं है, उन सुस क समय में पूरा आनन्द नहीं पाता और समर दुख दूना मालूम होता है। मित्रहीन मनुष्य को धन, वभव और मान से काई लाभ नहीं होता,क्योंकि इनका उपभोग मनुष्य अच्छी तरह से तर ही कर सकता है जब उसके मित्र हो। यदि मनुष्य अपनी सपत्ति द्वारा मित्रों का भी कुछ भला करता है तो उसे विशेष श्रानन्द होता है। जब हम कोई नया काम हाथ में लेते हैं, तब हमें मित्रों की आवश्यकता होती है। मित्र हीन मनुष्य बिना सलाह के नये काम में हाथ लगाने से हिचकता है, मनुष्य अपने मित्र द्वारा उत्साहित होकर साहस से नये काम में हाय लगाता है और उसे उसमें सफलता भी मिलती है । प्रत्येक मनुष्य अपने काम के विषय में यह भी जानना चाहता है कि वह जन समुदाय को अच्छा मालूम होगा या पुरा । यह बात वह मित्रों छातही जान सकता है, क्योंकि चाप- लूस झूठी तारीफ कर देते ह और अवसर निकलने पर बडी निन्दा करने लगते है। मित्रा को सच्ची अलोचना से मनुष्य को अपनी भलाई ओर चुरा मालुम हो जाती है और वह अपने दुर्गुणों को दूर करने के प्रयत्न में लग जाता है । मित्रों से सबसे अधिक लाभ आपत्ति के समय में होता है । जब मनुष्य को पटुत सी आपत्तिया श्राकर घेर लेती है पोर वह हताश हो जाता है तो आपत्ति ने बचाने वाले व धेर्य बॅवाने वाले मित्र ही हुया करते हैं । सच्चे मित्र अपने मित्रों को बडी कठिनाइयों से बचा लेते हैं। मित्रहीन मनुष्य को विपत्ति के समय कोई सहारा नहीं रहता है। . VA

।
मित्र यनाते समय प्रत्येक मनुष्य को मिन बना लंना भूल
ह । उगने वाले और मीठे वचन बोलने वाले बहुत मिलते है,
परन्तु ऐसे मित्रों से मनुष्य का सदा सावधान रहना चाहिये ।
ऐसे मित्र यडे स्वार्थी होते हैं और सिवाय लूटने के कोइ लाम
नहीं पहुंचाते । मित्र चाहे थोडे हो, परन्तु सच्चे होने चाहिये।
किनी अपरिचित व्यक्ति को कभी एका एका मित्र नहीं बना
लेना चाहिये । सद्व्यवहार तो सर ही से होना चाहिये,
परन्तु मित्र उसी का बनाओ जिसकी परीक्षा कर ली हा ।
काम
१ भावार्थ, २ काम सुस की जड है, ३ यिना बाम क उन्नति नही
होती, ४ काम से सफलता होती है।
किसी अर्थ साधन के हेतु मानसिक अथवा शारीरिक परि-
श्रम को काम कहते है । आजकल जीवन निर्वाह के हेतु जो
उद्याग किया जाता है, उस काम कहते हैं। जब कोई काम
कठिन होता है और उसमे अधिक परिश्रम की आवश्यकता
होती है तो उसे मनुष्य बुरा कहने लगते है, परन्तु उसे बुग
नहीं कहना चाहिये । काम कोई भी हो, उसे घृणित नहीं कह
सकते, यदि वह ईमानदारी के साथ किया जावे। किसी भी
नरसाग को नीच कहना भूल है।
मनुष्य का जीवन-निर्माह क लिये काम अवश्य ही करना
चाहिये । जिन मनुष्या के पास रहुत पन रहता है, वे प्रार
कोई काम नहीं करते । परन्तु पेने मनुष्या की कोई प्रशमा
नहीं करता। प्रत्येक मनुष्य को कोई न काई काम अवश्य
करना चाहिये, जिससे उसका नथा ममाज का भला हो।
धारयाम्था से ही किसी काम करने का निश्चय कर लेना
चाहिये और उसी के अनुसार शिक्षा ग्रहण करनी चाहिये । जो
मनुष्य अपना जीवन बिना कोई काम किये श्रालस्य में रिताते

प्राता है, उनकी मानसिक और शारीरिक अवस्थाधुरी रहती है और वे अपना जीवन सुस से नहीं व्यतीत कर सकते।जो मनुष्य किसी काम में लगा रहता है और उसीके द्वारा धन कमाकर शपना निर्वाह करता है वह अपना जीवन सुख से निताता है। प्रत्येक मनुष्य का किसी काम के पारने में विशेष प्रानन्द । मनुष्य कोचही काम करना चाहिये जोउसको अच्छा लगे, क्योंकि यह मनुष्य उसी काम के करने में अच्छी सफलता पा सकता है । नित्य के काम के सिवाय मनुष्य को चाहिये कि यह ऐ.मा भी कोई काम चुनले जो नित्य के काम ने भिन्न प्रकार का हाजिव किसी समय मनुष्य अपना मामूली काम करते करत थक जाता है तब दूसरा काम करना बहुत अच्छा मालूम होता है। कई मनुष्य गाना बजाना इत्यादि सील लेते है, जो देनिक काम के परिश्रम की व्यथा को दूर कर उनके चित्त को प्रसनकर देताहै। जो मनुष्य अपना निर्वाह मानसिक परिश्रम द्वारा करते है. उन्हें दिन में एक बार शारीरिक परिश्रम करना बहुत सुखप्रद ओर लाभकारी होगा। इसी तरह जो मनुष्य सदा शारीरिक परिथम करते हैं, उन्हें प्रतिदिन एक या दो घटे कुछ पढने लिखने में बिताना चाहिये । यदि मनुष्य सदा एक ही काम को करता रहता है तो उसे जीना भी कठिन मालम होता है इससे कामों में कुछ मिन्नता होनी चाहिये। ाभ्यास १-हर एस निषध को पढ़कर उन पर स्वत न सकेत वाक्य लिखो। २-हर एक सूची पर एक एम निषध लिसो । ३-गोध, ईपी, द्वेष, ज्ञान, भक्ति, सत्य, मिथ्या, प्राचार, दम, छल प्रेम पर एक एक निबंध लिखो। . २ 4

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Hindi Rachna Prabodh

Author
Sharma,rajhans
Title
Hindi Rachna Prabodh
File name
Hindi Rachna Prabodh
Text
OCR done
Citation
1906
Published
2011/01
Publisher
Ratna Aasharam Agra
Language
Sanskrit
Pages
194
Library
Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Classification
Literature
DLI number
546273
Barcode
4990010024765.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
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