Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner

Pt.jawahar Lal Nehru

Shri Indra · 2011/04

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पं0 जवाहरलाल नेहरू प्रामाणिक जीवन-चरित्र लेखक- श्री इन्द्र विद्यावाचस्पति प्रकाशक विजय पुस्तक भण्डार, अर्जुन कार्यालय, श्रद्धानन्द बाज़ार, देहली। द्वितीय सस्करण ] सं० १६६३ वि० [ मूल्य )

मुद्रक
अर्जुन इलेक्ट्रिक प्रिंटिंग प्रेस,
श्रद्धानन्द बाजार,
देहली
प्रकाशक:-
विजय पुस्तक भरावार,
अर्जुन कार्यायय,
देहली

विषय-सूची
पृष्ठ संख्या
or
१२
२६
विषय
(१) जन्म
(२) शिक्षा
(३) राजनीति में प्रवेश
(१) गांव की गहराई में
(५) स्वराज्य-मन्दिर में
(६) सार्वजनिक जीवन का विस्तार
(७) नाभा काण्ड
(S) सेल्स और मास्को में
(e) राष्टपति के पद पर
(१०) जेल के अन्दर और बाहर
फिर कांग्रेस की गद्दी पर
(११) लखनऊ को प्रेस
(१२) १६३६
तीसरी बार राष्ट्रपति
५३
१७
1
परिशिष्ट
(१) राष्ट्रपति प० जवाहरलाल का अभिभापणा
९६

धन्यवाद
इस सशिन जीवनी को पूरा करना अत्यन्त
कठिन होता, यदि ५० जवाहरलालनी मेरो प्रार्थना
को स्वीकार कर अपने प्रोजी आत्मचरित की
मुल कापी प्रदान करने की छपान करते । मेरे पास
उससे उपयोग लेने क लिये समय बहुत कम था
तो भी मैने यथाशक्ति सहायता लेने का यत्न
किया है। मैं सम्मानित पपिडतनी फी इस छपा
के लिये अत्यन्त आभारी हूँ।

दूसरे संस्करण की
प्रस्तावना
पहले सस्करण की सन कापियां हाथों हाथ बिक गई थीं।
इधर देश ने फिर प० जवाहरलाल जी को ही राष्ट्रपति की गद्दी
पर बिठाया है। १६३६ में प० जवाहरलाल जी ने बहुत से
इतिहास का निर्माण किया है। इस कारण और भी आवश्यक
हो गया कि उनकी जीवनी को परिवर्धित करके १६३६ के
अन्त तक पहुचा दिया जाय। इस दूसर सस्करण में देश के
लाडले राष्ट्रपति पे इतिहास को वर्तमान तक पहुचा दिया
गया है।
-लेखक

पं. जवाहरलाल नेहरू के सम्बन्ध में कन्ध से कन्या मिना कर यात्रा करते दृष्टिगोचर होते हैं। हम कह सकते है कि इंगलैंड के प्रधानमन्त्री विशियम पिट की भांति, जवाहरलाल अपने समय और पिता दोनों के प्रया का परिणाम है । जवाहरलाल को समझने के लिये दोनों पर दृष्टि डालनी होगी। दोनों की परीक्षा करनी होगी। कहा जावा है कि महापुरुप समय ५ पुन भी होते हैं और पिता भी । ये समय की परिस्थियो फ परिणाम होते हैं और समय पर असर भी डालते हैं। जवाहरलाल के पारे में इसी स्थापना को हम यढ़ा कर यह सक्त है कि यह समय और पिता के प्रभावों का परिणाम है और उन्होंने समय और पिता दोनों पर ही प्रभाव हाला है। पहले पित्ताफ प्रमानको लीजिये। जवाहरलालजी का पूर्व- जीवन पिता की छत्रछाया में व्यतीत हुआ। ५० मोतीलालजी क व्यचित्ल को कौन नहीं जानता बह छा जाने वाला व्यक्तित्व था। यह नहीं हो सकता था कि वह अपने पड़ोसपडोस की किसी भी चीज़ को अपने प्रभाव से बचने दें। पुत्र को भी यह अपने बनाने की विशेष घस्तु समझते थे। बचपन में जवाहर- लाल को किसी स्कूल में नहीं भेजा गया। गवर्नेस और अध्यापक पर पर आपर ही उस रेशम के गदेलों में पलत हुये क्षाल को पढ़ाया करते थे। न कोई वाहर के दोस्त थे, और न साथी, न स्कूल की शरारतें थीं, और न बाहर का वातावरण | बचपन में प्रस्तावना ज जवाहरलाल का घर ही सब कुछ था। वहीं स्कूल था और वही मोतीलाल नेहरू उसके प्रिन्सिपल थे। प्रिन्सिपल भी कोई साधारण न ये, बड़े दयालु परन्तु सख्त थे। पुत्र पर प्रम की सदा वर्षा करते थे, परन्तु जब बिगड उठते थे तो चमडी उधेड कर रख देते थे। ऐसे प्रेमपूर्ण प्रिन्सिपल की देखरेख में जवाहर- लाल की चाल शिक्षा हुई। युवावस्था प्रारम्भ होने से पूर्व ही पं० मोतीलालजी अपने पुन को लेकर विलायत गये और वहां हैरो के प्रसिद्ध स्कूल में उसे भर्ती करा दिया। इसके पश्चात् जवाहरलाल की सारी शिक्षा विलायत में हुई और वह भी लगभग प० मोतीलालजी के पूरे नियन्त्रण मे हुई। इस सम्पूर्ण परिस्थिति के निर्माता प० जवाहरलालजी के पिता थे। जवाहरलालजी के व्यक्तित्व की बहुत-सी विशेषतायें इस परिस्थिति के ही फल हैं। उनकी तबीयत में अकेलापन है। वह सब में रह कर भी दिमाग्री तौर पर अकेले रह सकते हैं। यह प्रारम्भिक शिक्षा के प्रवलेपन का ही परिणाम है। इतना प्रफेलापन होते हुये भी वह परे नियन्त्रण में रह सकते हैं । वि. चारों में इतना मेद होते हुये भी वह १६ घर्प से महात्मा गांधी और कांग्रस के नियन्त्रण में रहे हैं, यह उसी प्रारम्भिक जीवन की शिक्षा का परिणाम है । जो मनुष्य युवावस्था तक प० मोनी- च प० जवाहरलाल नेहरू लाल जसे कठोर नियन्त्रक क नियन्त्रण में रह चुका हो, उस लिये शेष सब नियन्त्रणों का सहना मज़ाक है। इंग्लैंड की शिक्षा ने ५० जराहरलाल जी को दो वस्तुयें दी हैं । एक तो विचारों में स्पष्टता, दूसरे भग्रेजों के प्रति विद्रोह क भाव । यूरोप की शिक्षा मनुष्य को स्वाधीन और साहसपूर्य विचार करने के योग्य यना देती है। स्वतन्त्र देश की शिक्षा में यह विशेषता तो होनी ही चाहिये कि यह मनुष्य को स्वतन्त्र चिन्तन के योग्य बनाये । गुलाम देश का वातावरण गुलामी इतना पूर्ण हो जाता है कि मनुष्य की स्वाधीनतापूर्वक सोचने की शक्ति जाती रहती है । जवाहरलालजी की साहसपूर्ण भ्वाधीन चिन्तन शैली पर यूरोपियन शिक्षा का गहरा प्रभाव है। दूसरी चीज जो जवाहरलाल जी ने इंग्लैंड के चिर निवास के दिनों में प्राप्त की, वह यह थी कि उनके हृदय में अंग्रेजों की साम्राज्य-मद से उन्मत्त मनोत्ति पे प्रति विद्रोह का भाव मैदा हो गया। उन्होंने अंग्रेजों को बहुत पास से, उनपे नंगे रूप को देखा है और उस उपेक्षा और तिरस्कार का अनुमव किया है जो अप्रेज़ लोग भारतवासियों के प्रति रसत है। ५० मोतीलाल का पुत्र मला उपेक्षा और तिरस्कार को कैसे सह सकता था ? इगनेड में रहते हुये ही जवाहरजाज जी के हृदय में अग्रेजों की अभिमानी

प्रस्तावना
अ
मनोवृत्ति के प्रति ऐसा विद्रोह पैदा हो गया कि वह भारत में
आकर भी मिट न सका, प्रत्युत और प्रचड हो गया।
इस प्रकार हम देखते हैं कि प० जवाहरलाल जी क चरित्र
की बहुत सी विशेषतायें उनके प्रारम्भिक शिक्षण का परिणाम है,
और वह प्रारम्भिक शिक्षाण उनके पिता की पनाई हुई परिस्थि-
तियों का परिणाम था।
पिता नेहरू की पुत्र नेहरू को सीधी देन भी कुछ कम
नहीं। मानी स्वभाव, अटूट साहस, 'नेतृत्व और निर्भयता से
सब गुण जवाहरलालजी को अपने पिता से ही प्राप्त हुए हैं।
'पिता ने जिस जवाहरलाल को तैयार किया, वह एक कोट,
सूट म विभूपित, विलासिता की सम्पूर्ण सामग्री से पला हुआ,
बिलकुल अपडेट वैरिस्टर था । परन्तु समय को किसी और ही
जवाहरलाल की जरूरत थी। उसने अपने हथोडे से ठोक-पीट
कर अपडेट पैरिस्टर को खइरधारी विद्रोही बना दिया) जल
का समूह तो इकट्ठा हो ही चुका था, समय ने उसे नया मार्ग दे
दिया, जिसमें होकर वह जल का समूह बडे बैग से यह घला ।
१६१६ से प्रारम्भ होने वाली घटनाओं ने भारत के वातावरण
को विकम्पित कर दिया। सारे वायुमण्डल में मानो एक
निजली सी दौर गई, जिस का जवाहरलालजी पर भी
असर हुआ।

ज प० जवाहरलाल नेहरू इस प्रकार पिता और समय ने जवाहरलाल जी को बनाया -और, साथ ही हम यह भी कह सकते हैं कि जवाहरलाल जी ने पिता और समय दोनों पर प्रभाव डाला। कौन नहीं जानता किप० मोतीलाल जी प्रचयह व्यक्तित्व के प्रवाह पर जवाहर- जाज जी का गहरा असर था। उनके सीन अन्तिम १५ वषों मे, उस प्रमाह की दिशा का निधय प्राय जवाहरलालनी ५ मान- सिक रुकाव से होता था। १६१६ में मोतीलालजी नरमदल के कामेसीधे । जराहरलालजी कार्य देव में आने य माय मोतीलालजी काराजनीति का रगपलटन लगा! पुत्र की भावनाओं ঈম হাঙ্গী জা সলক সমান বিন বৰ বৰ স্যসমৰ प साथ-साथ वह प्रभाव बढ़ता गया, यहाँ तक कि अन्तिम दिनों में मोतीलाल जी और जराहरलाल जी का मार्ग प्राय एक हो गया था। अपने समय पर जमाहरलालजी जो प्रभाव डाल रह है, यह भासों क सामने है। धीरे २ वह कांग्रेस को एक विशेष दिशा की ओर ले जा रहे हैं। बहुत से लोग उस दिशा को पसन्द नहीं परत, परन्तु फिर भी न टलने वाले भाग्य का तरह जवा- हरलाल का व्यक्तित्व कांग्रेस पर अपनी छाप लगा रहा हैं। कोई चाह या न चाहे, यह तो मानना ही पडेगा कि निकट भविष्य में कुछ समय के लिये देश को जवाहरलालजी का नेतृत्व स्वीकार करना ही पड़ेगा।

प्रस्तावना
.
जनाहरलाल जी के विचारों और जीवन के विकास की
कहानी सुनाने का यह सर्वथा उचित समय है। मेरे सौभाग्य
से मुझे निर्वाचित राष्ट्रपति का जीवन चरित्र लिखने की ऐसी
र उत्तम सामिप्री प्राप्त हो गई, जिस के निना यह प्रयासकमी सफल
न होता । यह जीपनी केवल कहानी नहीं है, यह एक मनोवैज्ञा-
.निक विश्लेषण भी है।

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जन्म नहरूओं के पूर्व पुरूष, २०० से कुछ अधिक वर्ष हुए, काश्मीर मे रहते थे। मुपनों के राज्यकाल में आजीविका की तलाश में वे दिल्ली पहुचे। काश्मीर के ब्राह्मण सदा से ही प्रतिभासम्पन्न और काम काज में अन्डे समझे जाते रहे हैं। मुगलों के दरबार में भी उन्हें गुजारे योग्य वृत्ति मिलने में देर न सगी । बादशाह फरुससियर के जमाने में प० राजकौन शाही अध्यापक की हैसियत से राजधानी में रहते थे। राज दरबार में घका अच्छा मान था। पं० रामकोज का परिवार कुद्र ममय

२
५० जवाहरलाल नेहरू
दिल्ली में पूजता फलता रहा। उसी यश में प० गंगाधर उत्पन्न
हुए, जो दिलीप कोतवालय।
रहरू परिवार का दिल्ली से सम्बन्ध उस घटना के कारण
ना, जिसे सन् सचावा का विद्रोह कहा जाता है। नाम मात्र
फा मादशाह बहादुरशाह पहले मिपाहियों के जोश का शिकार
घना और फिर अंगना के मोध का शिकार घनफर दिल्ली मे
निर्वासित कर दिया गया। पं. जवाहरलाल दादा ५० गहा
धर जी को भी उसी जल प्रवाह साय दिल्ली से या
जाना पड़ा।
पं० गङ्गाधर जर दिल्ली से जान बचापर भागे, तय उन
साथ उनकी छोटी वहिन और दो लड थ५० मोतीलाल जी
अभी पैदा नहीं हुये थे। अकस्मात् यह परिवार गोरों के हाथ
पड गया । ५० गङ्गाधर की यहिन बहुत गोरी और सुदर थी।
गोरों ने समझा कि यह लोग क्सिी मेम को भगाये लिये जा
रहे है । भाग्यवश दोनों लडके थोड़ी बहुत अमेज़ी जानत थ,
उन्होंन गोरा को असली पान मममा दी। अन्यथा सारा परि
वार उन नर पशुओं की गोली का शिकार हो जाता तो फोह
पाश्चर्य नहीं।
परिवार कुछ दिनों तक आगरा में रहा । सन् १९६१ क मई
मास की ६ तारीस के दिन पं० मोतीलाल जी का जन्म हुआ।
मोतीलालजी के पिता उनके जन्म से दो मास पहले ही मर गये

अध्याय १ थ, इस कारण इस होनहार पालक का पालन-पोपण और शि- क्षण माता श्री जियो वीवी और दोनों घडे भाइयो की देसरेग्म में हुआ। दोनों घडे भाइयों के नाम नन्दराम और बन्सीधर कहा जाता है कि पहले यह परिवार दरिया कौल कहलाता था, परन्तु दिल्ली में चांदनीचौक की नहर के किनारे रहने के कारण नहरू नाम से पुकारा जाने लगा। मोतीलालजी अपने परिवार में सर से छोटे और लाडले पञ्चे थे। बडे होनहार चचल और वीप्रमुद्धि थे, परन्तु स्कृत में पढ़ने की ओर उनका ध्यान नहीं था। वह अधिक समय खेल- फूद और शरारतों में गुजारा करते थे । नटरसटपन के कामों मे वह अपनी मण्डली के मरदार समझे जाते थे। सीधे-सादे लडकों और अध्यापकों से छेडसानी करना और उन्हें धनाना मोती- लालनी को बहुत प्रिय था। हर एक शरारत में आगे रहत थे। अगुआ बनकर रहना उनके स्वभाव का अङ्ग था। शरीर पे खून हष्टपुष्ट और कुश्ती के शौकीन थे । इस कारण शरारत के परि णामों से नहीं डरते थे । जो दिल में आता कर डालते, फिर क्या होगा, इस श्राशङ्का से घबराते नहीं थे। इतना होत हुये भी पढने में बुरे नहीं थे। जो एक यार पढ लेते, ससे अपना बना लेते। पहले फारसी और फिर अमे- जी देने वाले प्रध्यापक उनकी धारणा शक्ति पर ४ ५. जवाहरलाल नेहरू मोहित रहत ये। या तो पढत नहीं ध और जप पढते तो सारी कसरीकाल लत थे। इस प्रकार विधार्थी फाज मोनीलालनी नापत, जाहीन, तेज़ और होनहार लडके समझे जाते थे। इस प्रकार शिक्षा की नगरी में झूमती झामती मोतीमालनी की किश्ती घी० ०० किनार 4 पास पहुंच गई, परन्तु यही जारर डगमगा गई । खेल में अधिक समय व्यतीत फरने के कारगा मोतीलालजी उरते थे कि पास न होंगे, इसलिय पहरो तो इम्तिहान की फीस दन से ही इन्कार कर दिया । इसमे मोती- लामनी प्रोफेसर को पड़ा दुप हुआ, क्योंकि यह लड़प से प्यार करते थे। प्रोफेसर ने नन्दलालजी को लिसा कि मोती- जाल नरूर पास होगा, उसे परीक्षा में बैठने के लिये मजबूर करो। फीस शासित की गई और मोतीलाल ने पहला पर्चा कर दिया, परन्तु फिर दिल उचाट हो गया और हजरत ने परीक्षा के शेष दिन ताजमहल की मैर में व्यतीत किये । बी०ए० की परीता रह गई। फुछ वर्ष पीछे मोतीलालजी वकालत की परीक्षा में बेटे और प्रथम रहे और वर्णपदक प्राप्त कर लिया। उस समय उनके विचारा में और रहन-सहन में दो विशेष- सायें थी। उनके विचारों में धार्मिक्ता का प्रवेश नहीं था। यह १६वीं शताब्दी के चालू सिद्धान्त-हतुवाद या वृद्धिवाद के मानने अध्याय १ वाले थे। योरोप उस समय (Agnosticism) के प्रवाह में यह रहा था। मोतोलालजी उसी के अनुयायी य और धार्मिक्ता का मजाक किया करते थे। उनके रहन मन में श्रमजीपन की गहरी बू थी। वह योरोपियन ढग को पसन्द करत थे। यद्यपि भारत में रहने वाले अंग्रेजों की अकड मे वह बहुत जलते थे, और उसे नहीं सह सकते थे, परन्तु रहन-सहन की पाश्चात्य शैली के वह भक्त थे। मोतीलालजी के सबसे बड़े भाई नन्नलालजी पहले जय- पुरान्तर्गत ग्वेतडी नामक रियासत में नौकर थे। उनके जीवन का एक बडा भाग वहीं व्यतीत हुश्रा | उन्हें मोतीलालजी पिता की तरह मानते थे । खेतडी से आकर नन्दलालजी हाईकोर्ट में वकालत करने लगे थ । जब हाईकोर्ट आगर में था, तन वह लोग भागर में रहते थ, परन्तु जन हाइकोर्ट उठकर इलाहाबाद चला गया, तब नन्लालनी भी वहीं पहुंच गये। तब से नहरू परिवार इलाहाबाद का निवासी बन गया। मोनीनाराजी न कानपुर में वकालत की उम्मीदवारी भारम्भ की। तेज तो थे ही, अपने पशे में एक दम चमक उठे। उम्मीद पारी के वर्ष कानपुर मे विना पर श्राप लाहाबाद चले गये, और अपने भाइ नन्नलालजी के साथ मिल कर जूनियर के तौर पर विकालत करन जग । न दलालजी की विकालत भी अच्छी घलती थी। मोतीलालजी को होनहार प्रारम्भ करने का श्रव-

६
२० जवाहरलाल नेहरू
सर मन मया । यह को गत भी किनिग काम में मना
पर जोर से लग जान ली मतद पर गहना पान
पापमान में मोनोमी मानकी विशेष सय
भुला दिया । इपर इनादावादमा फ व पादही नन्दा
जी फायदान दो गा! सनी को गोगीमालती रिता
की तरह मारत ! माई को मृत्यु मे भाप पटत दुनिया दुये।
जो भारी फर्नत्य मा पड़ा था, हम समान पास काम दी
था। सार परिवार का पोम युपर मोतीशानमी के कन्धों पर
भा पड़ा, परन्तु यह पभ फमजोर भी हथे। मोतीलालनी
सर इन मुषा कर कमाई में लग गये।
{ मोतीलालजी ने विकासय में कमाया भौर जी बोलकर
'फमाया ! पुराने पुराने वसीला पोरही यो म मानकरमाप
शादाया के मूर्धन्य यकीन पा गये । ममीनध्यापपरजी पोल
पर कृपा की, और साथ ही यश और मार भी प्राप्त हुए और
उन्ही के साथ प्राप्त हुआ एक भामोन जवाहर।।
१४ नवम्बर १८८६ को मोतीमालानी के घर में जवाहरलाल
नाम के मालक ने जन्म लिया।

(२)
शिक्षा
जवाहरलाल के प्रारम्भिक जीवन की यह निशेपता थी कि
उसके चलने के लिये मार्ग पहले से बन चुका था। वृक्षों की
छाया से शीतल राजमार्ग पहले से तैयार हो चुका था, बालक
जवाहरलाल को तो उस पर कदम उठाते हुये चले जाना था।
मोतीलालजी का भाग्य-सूर्य उदयोन्मुग्य था। धन और मान
घरस रहे थे। जवाहरजाल का वाल्यकाल रेशम के गदेलों और
फूलों की सेज पर व्यतीत हुआ। मोतीक्षामजी उन सारथियों
में से न थे जो घोडों की लगाम को ढीले हाथों से पकडते
हो । वह सम पर शासन करत 'थे, उन पर हावी होकर

Lr
५० जवाहरलाल नेहरू
रहते थे, तप बच्चा ही उनए व्यचिव के प्रभाव से कैसे बच
जावा । उन्होंने अपने एक मात्र पुन फो, अपनी सरता में
भपन पनाये हुये वातावरण में ही पान-पोस कर पढ़ा किया।
इसफ दो फल हुये। जवाहरलाल का पालपन पाहिर फे वा
मकोरों से प्राय सुरक्षित था और घटना रहित था ।
घटना रहित का यह अभिप्राय नहीं कि उसमें कह्न योग्य
घटना हुई ही नहीं। समार में सुगन्धित पूल म फाटे हुआ ही
करत हैं। सुसी से सुनी जीवन में भी दुख पे कण रहत हैं।
इसी प्रकार जवाहरलाल ६ सुमायष्टिव पाल्यकाल में भी विक्षोम
धेपण आते रहते थे।
एक बार की बात है। तर जवाहरलाल की आयु छ या
सात साल की होगी। याजक ने एक दिन अपने पिता की मेज
पर दो फौपटेन पैन पडे हुये दस तो विचार किया कि पिता
दो पैन क्या करेंगे, एक फालतू है, उस पर पुन का कजा
होना चाहिये । एक पन उठाकर जेय मे डाल ली । जन मोतीलाल
जी ने एक पैन गायब देखा तो जोरदार तलाश हुई, चोर पक्डा
गया और मोतीलाल के सामने हाजिर हुश्रा । मोतीलालजी
को इतना क्रोध श्राया कि उन्होंने मारत मारते लड़ये को घायल
पर दिया। घायल होने पर जवाहरलाज अपनी मां की गोद में
इलाज और विश्राम के लिये मजा गया। बहुत दिनों की मरहम
पट्टी के बाद उसके धार लीक हुये।
१.

अध्याय २
।
माता की गोद पालक जवाहरलाल के लिये मानो शीतल
पेड़ की छाया थी, और उसकी यालक को बहुत कुछ आवश्यक्ता
भी थी, क्योंकि पिता की प्रासें उसके लिये सूर्य के तीन आतप
के सदृश थीं। जवाहरलाल पचपन से ही अपने पिता का पडा
श्रादर करता था, उसे मनुष्यता का आदर्श समझता था, परन्तु
साथ ही उससे डरता था, आंखों पर हाथ की ओट क्येि पिना
उसकी ओर नहीं देख सकता था, और कभी-कभी उसकी तेजी
से परेशान हो जाता था, उस समय माता की गोद की शीतक्षता
मे ही आश्रय मिलता था । जवाहरलाल को अपनी माता, बडी
ही सुन्दर अन्यन्त मधुर और दया की मूर्ति दिखाई देती थी।
घचपन में जवाहरलाल को स्कूल में पढ़ने के लिये नहीं
भेजा गया। घर पर ही पढाई होती थी। अच्छे योग्य प्रया-
पक और शिक्षिकाओं की देख रख मे विलायती ढंग पर उस की
शिक्षा हुई। याहिर के समाज से बालक का सम्पर्क बहुत ही कम
होता था।
११ वर्ष की उम्र मे एक ध्यासोफिस्ट अध्यापक, जिसका
नाम मि० एफ० टी० ब्रुक्स था, जवाहरलाल को पढ़ाने के लिये
नियत किया गया । प० मोतीलालजी धार्मिक दृष्टि से
नास्तिक ही थे। वह धार्मिक विषयों में उदासीन रहा करते
थे। यदि कभी धर्म की चर्चा श्राती भी तो उसका मज़ाक ही
होता साहित बड़े कट्टर थ्यासोफिस्ट येन-उन्हों

पं० बवाहरलाल नेहरू ने धनी याक्षक पर हाथ फेरना शुरू किया, और शीघ्र ही ध्यासोफ्रिस्ट बना लिया । १३ साल की आयु में ध्यासोफिकल सोसायटी की अध्यक्ष मिसेज़ वेसेपट के हाथों से जवाहरलाल का अभिपेक-संस्कार हुआ। इस प्रकार भारतवर्ष की शिक्षा समाप्त कर १६०५ में जवाह- रजाल को लेकर पं० मोतीलालजी इग्लैंड के लिये रवाना हो गये। 'हैरो' का स्कूल इग्लैंड के प्रसिद्ध शिक्षणामयों में से है। उसमे धनी नयीक वामक शिक्षा पाते हैं। जवाहरलाल को इसमें दाखिल किया गया । दो वर्ष तक उसमे शिक्षा पाने के पश्चात् १६०७ में, युवक, कैम्ब्रिज के प्रसिद्ध विश्वविद्यालय में घजा गया। दैरो का वातावरण कुछ संकुचितसा था, परन्तु कम्तिन में जाकर इजड के नैतिक जीवन का अनुभव करने का अवसर मिला। १९१० में जराहरलालजी ने फैम्निज से यी० ए०पास कर लिया। इन ५वों में जमादरलाल के भावी जीवन की सक्षी युनियाद रखी गयीं 1 पुन:~-शिक्षा ता एक गौण यशु थी। जवाहरलाल न उसम सफलता भी साधारण ही प्राप्त की। कभी अनुत्तीर्ण हुए और न कभी पहली श्रेणी में भादर सहित हत्तीर्ण हुए। इस सम्बन्ध में पुत्र का जीवन मिता से भिन्न था। पिता पी० ए० में उत्तीर्ण न हो सका और वकालत में भार के साथ पहला नम्बर प्राप्त किया। पुत्र न कभी अनुत्तीया अध्याय २ हुआ और न कभी पहले नम्बर पर रहा। वह किस्मत का धनी था, किस्मत ने कभी उसका साथ न छोडा । धीरे धीरे परन्तु निश्चय के साथ जवाहरलाल का फदम जीवन याना में श्रागे बढता गया । इस सम्पूर्ण याना मे, उनकी अधिष्ठात्री देवता और पथदर्शक उनके पिता पं० मोतीलालजी रहे । इंग्लैंड की शिक्षा ने जवाहरलाल के चरित्र पर दो प्रभाव अकित किये। यह मानी हुइ बात है कि भारत की वर्तमान शिक्षा मनुष्य को दिमागी नियन्त्रण की शिक्षा नहीं देती। इग्लैंड के निवासियों की सर से बड़ी विशेषता यह है कि उनके जीवनों में राष्ट्रीय नियन्त्रण कूट फूट कर भरा हुआ है। देखने में उनके जीवन बडे आजाद प्रतीत होते हैं, परन्तु उनके परिनों में एक कठोर नियन्त्रण सन्निहित है, जो इग्लैंड के राष्ट्रीय जीवन को फौलाद की तरह दृढ़ बनाता है । उस निय- न्त्रण का एक घडा भाग दिमाग से सम्पन्ध रसता है। वह हरेक वस्तु को पटना के साथ और उसके असली रूप में देसने का यल करत हैं। हमारी शिक्षाप्रणाली में अनिश्चित रीति से विचारना और अनियन्त्रित रीति से काम करना सिखाती है। जवाहरलाल के जीवन में और चिन्तन में जो एक नियन्त्रण और निश्चितताकी झलक पाई जाती है, वह इग्जेंडकी शिक्षा काफ्ल है। इगलैंड में इतने समय तक रह पर अग्रेजों को समीप मे प्रभाव, जो जवाहरलाल के हृदय पर पडा, यह ५० जनाहरलाल नेहरू था कि दूरी के कारण अपन से ऊंची स्थिति रसने पानी के लिय जो एस निर्मुल आदरभाव पढ़ा हो जाता है, यह उसके हृदय से निकल गया। उसने अमेज की भलाई और बुराई फा पास से और बारीकी से दसरा है। इसकी नजरों में अंग्रेज़ यु से ढका हुआ दवता नहीं है, यह नगा राजसी प्रत्तियों वाला मनुष्य है। ऐसा साधारया मनुष्य भारतवासियों को जिस तिरस्कार की दृष्टि से दसना है, उसका जवाहरलाल ने ७ वर्ष तक रात दिन अनुमर रिया है। इस तिरस्कार म अन्यक्त भनु- भव ने जवाहरलाल + हृद्य म इट्सलेड और प्रदेश में प्रति विद्रोह का स्थायी भाव पैदा कर दिया है। यह इगलैंड में शिक्षा प्रहण करने का दूसरा पर है। कम्बित में शिक्षा पूरी करने के दो वर्ष वाद जवाहरलाल ने नैरिस्री की परीक्षा में सफलता प्राप्त कर ली। इह में ७ वर्ष तक रह कर १९१२ में वह अपनी मातृभूमि में पापिस आ गये। इन वर्षों में जवाहरलाल ने यद्यपि भारत की राजनीति में मीधा कोई हिस्सा नहीं लिया, परन्तु बात की हैसियत से भारतीय राजनीति का अध्ययन निरन्तर जारी रहा। इन दिनों भारत की राजनीति मे गोसले और तिलक का, नर्म और गर्म का सहप चल रहा था, उस सहर्ष में जवाहरलाल की सहानु भूति प० बानगङ्गाधर तिलक के साथ थी।

७ का
(३)
राजनीति मे प्रवेश
घर लौट कर जवाहरलालजी का वही रईसा ॥
नीरस जीवन व्यतीत होने लगा, जो प्राय निजायत से बैरि-
स्टरी पास करके आने वाले भारतवासियों का हुआ करता
है। मानन्द भवन में किसी चीज़ की कमी नहीं थी। पं०
मोतीलालजी पर लक्ष्मी बरस रही थी। श्रानन्द-भवन में
श्रामोद प्रमोद की सय सामग्री विद्यमान थी। कमाई की भी
बहुत चिन्ता नहीं थी, क्योंकि कमाने को पिता ही बहुत थे ।
जवाहरलालजी फा समय कचहरी और ग्रामोद प्रमोद में
घटने लगा । इस दिनचर्या को तोड़ने के लिये भी कमी शिकार
को २ थे तो वहाँ जवाहरलालनी का प्रधान कार्य
।

पं० जवाहरलाल नेहरू जङ्गलों में भ्रम का आनन्द लेना ही रहता था। शिकार को जान से मारन में उनका जी यहुत कम लगताया। उस समय भारत की राजनीति में दो दा थे। एक मामरेड पा नरम । दूसरा एक्स्ट्रीमिस्ट या गर्म । यामा: यकीन, सफा डाक्टर और शिक्षित धनमान यदि सार्वननिक जीरन में प्रवेश करना पसन्द करने थ तो प्राय नरम दल में शामिल होकर कांग्रेसी धन जाते थे। प० मोतीलालाजी भी उस समय के प्रच- मित फैशन के अनुसार नरम दन के कांप्रेमी ध। यह एक प्रान्तिक राजनैतिक फा-पेन्स मे अव्यपा पद को भी ग्रहण कर चुके थे। जब तक वकालत स पृसत न मिलती थी, और राजनीति फेवा एक शौक की वस्तु थी, तबतक तो मोतीलाल नी माह रेट यनने से सन्तुष्ट रहे, मगर वह राजनीति इनो स्वभाव अनुकूल नहीं थी। जिस आदमी को कुम्ना अपराध माम होता है, क्या वह चिरकाल सक भिक्षाचि की राजनीति से सन्तुष्ट रह सकता है। आत्मसम्मान और अधिकारों की याचना साथ साथ नहीं चल सकते । कांग्रेस की पुरानी राजनीति में मोतीलालजी तभी तक सपते रहे जब तक उन्होंने राजनीति में गम्भीरता से प्रवेश नहीं दिया। मोतीलालजी ने राजनीति में गम्भीरता से सब प्रवेश किया जब कांग्रेस के निर्षत हो जाने पर होमरूल क्षीग ने जोर पकड़ा। उन -- अध्याय ३ १ दिनों जवाहरलालजी भारत में आ चुफे थे । होमरूल के प्रान्दो- सन फे प्रसङ्ग में मिसेज़ पेसेन्ट पुछ साथियों के साथ नजरबन्द = की गई। इस समाचार ने देश में बिजली सी दौडा दी। उस - बिजली का मोतीलालजी पर भी असर हुआ और इलाहाबाद में जो होमरूल लीग कायम हुई, मोतीलालजी उसके सभापति चुने गये। जवाहरलालजी की मानसिक दशा उस समय यह थी कि उनका दिमाग और दिल प्रचलित राजनीति से सर्वथा अस- न्तुष्ट थे। फेवा शन्दों का आन्दोलन उन्हें पानी का भार खुदा सा प्रतीत होता था। होमरूम आन्दोजन में उन्हें कुछ जान प्रतीत होती थी, परन्तु यहां भी शब्दों की ही प्रधानता थी। फहना तो ठीक है परन्तु यदि कहना न माना जाय तो। इसका उत्तर उस समय की राजनीति नहीं दे सस्ती थी। राजनीति की ओर जवाहरलालजी की अभिरुचि बढ रही थी, परन्तु घांकीपुर और लखनऊ ५ कामेस अधिवशनों में सम्मि- लित होकर भी उनका दिल नहीं जमा | यदि कांग्रेस की बात न मानी जाय, तो क्या किया जाय, इस प्रश्न का उत्तर उस समय की राजनीति के पास नहीं था। इस प्रश्न का उत्तर न कांग्रेस के अधिवेशन दे सके और न होमरूल लीग । इस कारण जवाहरलालजी का मन उस समय तक राजनीति के अंधेरे आकाश में प्रकाश की रेसा को तलाश कर रहा था।

१
प० जवाहरलाल नेहरू
१६१६ में, वसन्तपातमी के दिन, दिल्ली में कमनस्विीरे
जपाहरणाली का शुम विवाद सम्पन्न हुमा । विवाह
पश्चात् जयादर और कमला पी शुगल जोड़ी ने, जीयन के पन्न
पे दिनों को शिाने प भिय पृथ्वी पे स्वर्ग फारमीर की यात्र
की और पद माम राफ वही पे सुन्दर दृश्यों का आनन्द लिया
काश्मीर नहरों की जन्म भूमि है, उसका भारया भी भसा
धारण है। यहाँ पहुच पर धूदना प्रासान नही। वन दरी-मरी
पारियों में गाय की मनमोदिनी शधि है । समाहरमालनी पर भी
उस मोहिनी शक्ति का असर हुमा और फारमीर घोड़ते हुए
मापने सकल रिया कि फिर यहाँ भाकर भामोद प्रमोद और.
भ्रमण का श्रानन्द जेंगे। परन्तु “इमर मर का और है, निधना
के मन और" उस दिन से भान तक भाप पाश्मीर नहीं जा
सबै । मातृ-भूमि की चिन्ता ने ऐमा घरा विजेल की कोठरी को
ही काश्मीर की घाटी मान लगा पडा। यह सङ्कल्प अधूरा ही रह
गया। इसी बीच में यह वाश्मीर की याना का मधुर साथी इम
संमार से प्रयाया कर गया, जिमने पहली याया को इतना प्यारा
बनाया था। आज जवाहरलाल अधूरा रह गया और काश्मीर
पाना की साध जेलयाना की साध मे रिलीन हो गई। कौन पह
सकता है कि अब जवाहरलालजी काश्मीर यात्रा की अपनी
-इच्छा को क्न पूरा कर सकेंगे और जब पूरा करेंग तर मह याना
इतनी मनमोहिनी होगी या नहीं ?

अध्याय --- m इधर भारत की राजनीति का चक्र १६१८ के अन्त में कुछ - पेग के साथ चलने लगा। योरोप के महायुद्ध की समाप्ति पर भारत का वातावरण प्राशा से भर गया था। भारतवर्ष ने - युद्ध में इङ्गलैंड की जी खोल कर मदद की थी, और उसके बदले इग्लैंड के राजनीतिज्ञों ने भी बहुत आशा दिलाई थी। श्राशा के शन्द यद्यपि अस्पष्ट थे, तो भी निश्चित से सुनाई दिये। उधर युद्ध के अन्त मे अमरीका के राष्ट्रपति डा० विलसन का प्रात्म- निर्णय सम्बधी सिद्वान्त योरप के वातावरण मे गूज रहा था। भारतवासियों के सरल हृदयों ने समझा कि शायद मोक्ष का समय समीप श्रागया। श्रन इंग्लैंड भारत के सिर पर स्वराज्य के फूल अवश्य घरसायेगा, परन्तु समय आने पर भारतवासियों को श्राश्चय से प्रतीत हुआ कि उन पर फूलों की जगह पत्थर बरसाने की तैयारी हो रही है । स्वराज्य तो कहीं अस्ताचल के पीछे जा छुपा, और रौलट एक्ट नाम से पुकारे जाने वाली प्रांधी श्रापाश में मडराने लगी। देश भर में उन काले प्रस्तावित कानूनों के विरुद्ध श्रादोजन मचा, पर कोई फल न हुश्रा । सरकार उन विलों को कानून बनाने पर तुली हुई थी । वह बना कर रही। १६१६ के प्रारम्भ में महात्माजी बीमार हो गये थे । रोगशय्या पर मे उन्होंने पायसराय को एक पत्र लिखा, जिस में उससे प्रार्थना की कि वह काले कानूनों को प्रमाणित न करे। अग्रेज जाति उस समय विजय के मद मे मम्त थी।

पं० जवाहरलाल नेहरू गांधी इलाहाबाद के पायोनियर पन ने मारतवासियों से इस आदोजन पर टिप्पणी परते हुये लिया था कि यह ब्रिटिश सिंह, जो सता के सम से घोर युद्ध में से विजयी होकर निकला है, क्य हिन्दुस्तानियों की गीदड़ भभकियों से हर सकता है। पार सराय ने कानून को प्रमाणित कर दिया। तय महात्मा ने भारत के विस्तृत क्षेत्र में उस हथियार को पेश किया जिस द्वारा यह दक्षिण अफ्रीका के परिमित क्षेत्र में सफलता प्राप्त कर चुके थे। उन्होंने देश पे सामने यह प्रस्ताव उपस्थित किया कि क्योंकि सरकार ने प्रजा की इच्छाओं का विधात किया है और नये कानून अन्यायपूर्ण है, इस कारण प्रजा उन कानुनों को अंगीकार न करे, और उन्हें तथा अन्य अन्यायपूर्ण कानूनों को मानन से इन्कार कर दे। यदि इम कार्य के फलस्वरूप जेल या कोई अन्य दण्ड मिले तो उसे सहर्ष स्वीकार किया जाय। महात्माजी के इस प्रस्ताव को पढ़ कर जवाहरलालजी की ऐसी दशा हुई कि मानो प्यासे को पानी मिल गया हो अब तक उन्हें भारत की राजनीति सोसजी मालूम देती थी। महात्मा गांधी क सत्याग्रह को मैदान में आता दस कर उन्हें प्रतीत हुमा, कि जैसे खोखल्ला स्थान भर गया। जिस शब्द की पुष्टि में कोई क्रिया नहीं, हम सोसले शब्द से तो मौन ही भला है। सत्यामह के प्रस्ताव और महात्माजी की घोषणा के दूढ़ शन्दों , अध्याय ३ ने जवाहरलालजी के हृदय को सान्त्वना सी दी। उन्होंने अनु- भव क्यिा कि इस राजनीति मे मैं भी हिस्सा ले सकता हूँ। अनुभव तो कर लिया, परन्तु एक बहुत बड़ी दिक्कत थी। ५० मोतीलालजी ऊपर के व्यवहार में चाहे कितने खुर- धरे थे, परन्तु हृदय में अपनी सन्तान से बहुत प्यार करते थे। उस समय जेज एक होना था। किसी भले आदमी के लिये जेल जाना मरने के बराबर था। मोतीलालजी को यह बात पडी भयानक और बेढगी मालूम होती थी कि उनका फूलों की सेज पर पला हुआ एकमात्र घेटा जेल चला जाय । जन उन्हें यह मालूम हुधा कि जवाहरलालजी सत्यामह में शामिल होने को तैयार, तो वह आग बबूला गये और पुत्र को उस मार्ग पर जाने से रोकने पर तुल गये । जय मोतीलालजी ने देखा कि वह पुत्र को समझाने में सफल नहीं हुए तो उन्होंने महात्माजी को इलाहाबाद बुलाया, जिसका परिणाम यह हुआ कि महात्माजी ने जवाहरलालजी को सत्याग्रह मे भाग न लेने की सलाह दी। जवाहरलालजी मान तो गये, पर दिल मे बहुत दुसी हुए। उधर राजनीति के पर्दे पर दृश्यों का परिवर्तन शीघ्रता मे होने लगा। दिल्ली में ३० मार्च को, और सारे भारत मे १ सप्ताह पीछे सत्याग्रह का दिन मनाया गया। जनता के असयत जोश, और सरकार के परस्पर संघर्ष का यह झाबाद, अमृतसर धादि में दगा, . - - हुधा कि पं. जवाहरलाल नेहरू है पीट, गोली, हत्या और अन्त में मार्शल जा तक नौयत पहुची। पंजाय पर सब से भयानक आपत्ति आई । प्राय सार प्रान्त में मार्शल ला घोपित कर दिया गया। इन घटनाओं से पहले शो सारा दश स्तब्ध सा हो गया, पर जब आहिस्ता आहिस्तः माशन मा हल्का होने क्षगा और पजाब की छाती पर अन्धकार का पर्दा उठने लगा, तब ससार को मालूम हुश्रा उर प्रभागे प्रान्त की छाती का तो रोम रोम घायल पडा है । जिर भारवासी के मीन के नीचे दिल था, वह घायल पनार की मर हमपट्टी करन के लिये यशचि शीनता से भागा । पीडितों की सेरा के काम में प० मदनमोहन मालवीय और स्वामी श्रद्धा नन्दजी अग्रसर हुए। मार्शल मा के ग्वनी परिच्छेद की वह- कीकात के लिये कांग्रेस की ओर से जो क्मेदी बनी, उसमें १० मोतालालजी और देशगन्धु चिचरेजनदास मुख्य य । ५० जनाहरजालनी ने भी अपनी मेगाय अर्पित की, जो सहप स्वीकार की गयीं। उन्हें देशबन्धुदास की सहायता करने का काम सौंपा गया। उस उन्होंने इतनी योग्यता, तत्परता और परिश्रम से निभाया कि उसी समय से देश के नेताओं की नज़र उन पर जम गई। वह नेताओं के लाडले बन गये । इस प्रकार जवाहरलालजी का भारत की राजनीति में प्रवेश हुआ।

(४)
गांव की गहराई मे
इससे पूर्व कि हम जमादरलालजी ये राजनीतिक जीवन के
दूसरे पडाय का वर्णन थारम्भ करें, दो अांतर घटनाओं की
चर्चा कर दना आवश्यक है।
उन दिनों उत्तरीय भारत में राष्ट्रीय समाचार पक्षा का अभाव
सा था। इलाहाबाद से पायोनियर और लीडर यह दो पत्र
निकलते थे। पायोनियर कट्टर सरकारी पर था और लीडर के
विचार माडरेट या नर्म थे। उसकी मौज होती तो कांग्रेस की
किसी बात का समर्थन कर दता, अन्यथा कांग्रेस को लताड
सुना देता।।
मे गर्मी पैदा होन पर प० मोतीलालजी
AR

२२ ५० जवाहरलाल नेहरू ने अनुभव किया कि एक राष्ट्रीय विचारों का दैनिक पत्र होना ही पाहिये । इसी विचार से इलाहाबाद में एक लिमिटेड फम्पनी की स्थापना हुइ, जिस की ओर से अंग्रेजी में दैनिक इण्डिपे. एडेप्ट पत्र का प्रारम्भ हुआ। उसके प्रबन्ध और सम्पादन में जवाहरलालजी का काफी हाथ था। पत्र जोशीले उत्साह का फल था। जो लोग पत्र चलाने लिये इकटे हुये, उनमें से किसी को भी पत्र मचालन का अनुभव नहीं था। सभी उस फला में नये थे। पत्र धूमधाम से निकला और जोर शोर से चला। उस के सम्पादक मि० सैयद्हुसैन एक जोशीले लेखक थे । पत्र की नीति भी निर्भीक थी। थोडे ही दिनों में पक्ष की धाक जम गई, परन्तु केवल लेखां से कोई दैनिक पत्र नहीं चल सकता। प्रबन्ध और सङ्गठन दैनिक पत्र के प्राय हैं। अनुभव-शून्यता के कारण इगिडपेरडेपट के सचालन में इन दोनों ही वस्तुओं का प्रभाव था। कुछ दिनों तक चमक दिसाकर पव बन्द हो गया और अपने पीछे एक वीर परन्तु अनियन्त्रित सिपाही की स्मृति छोड गया। दूसरी घटना सरकार की जड-बुद्धिता का नमूना थी, परन्तु उसने बनाहरलाल जी की राजनीतिक प्रतिष्ठा के स्थापित करने में बड़ा काम किया। १६२० में जवाहरलालजी की माता और पत्नी रोगी हो गयीं । स्वास्थ्य-सुधार लिये उन फो लेकर वह मसूरी गये और सवोय होटल में ठहरे । उन्हीं दिनों म सैवोय होटल में अफगानिस्तान पे राजदूत ठहरे हुये अध्याय २३ थे। यह १६१६ के अफयान युद्ध के पीछे भारत सरकार से सुबह की पातचीत फरने आये थे। जवाहरलालजी का प्रम- शान मिशन की ओर विशेप ध्यान नहीं था। वह मदीना भर तक उनसे मिले जुले भी नहीं। एक दिन यहां के पुलिस सुपरिन्टेन्डेन्ट साहिब तशरीफ लाये और जयाहरलालजी से स्थानीय सरकार की प्राशा से यह भाश्वासन मांगा कि वह अफगान मिशन के मेम्बरों से कोई वास्ता न रखेंगे। जवाहर- बालपी को यह श्राशा सर्वथा अनुचित मालूम हुई और सन्होंने भानासन देने से इन्कार कर दिया। डिस्टिक्ट मजि- स्ट्रेट ने भी जवाहरलालजी को समझाने का यन किया, परन्तु जब यह घरायर इन्कार करते रहे तो मन्हें स्थानीय सरकार की आशा मिजी कि वह. २४ घयट के अन्दर बहरादून जिले को छोड़ दें। अभी सत्याग्रह जारी नहीं हुआ था, इस कारण जवाहरलालमी मसूरी में रोगी माता और पत्नी को छोड कर इलाहायान जाने के लिये बाधित हुए। यह घटना अब पसों में छपी तो एक प्रमुख राजनीतिक की हैसियत से जवाहरलालजी की प्रतिष्ठा में वृद्धि का कारण बनी और साथ ही अमान मिशन के सदस्यों के दिल में उनके लिये प्रेम की भावना पैदा हो गई। पं० मोतीलालजी को इस घटना से बड़ा रंज हुमा और उन्होंने संयुक्त प्रान्त के गवर्नर सर हा को बड़ा तेज़ पत्र लिखा । पहले से

२४
पं० जवाहरलाल नेहरू
अपनी जिद पर पड़ी रही, परन्तु पीछे से यह आर्डर सरकार
की ओर से वापिस ले लिया गया। पं० मोवीजामनी ने सर
फार को सूचना दी कि मैं अपने मडके पे साथ परिवार के
स्वास्थ्य की रष्टि से मसूरी जा रहा है। इस पर सरकार ने
पद प्रतिपन्य ठा जिया।
उस वर्ष अवध क किसानों में भारी आन्दोलन पैदा हो
रहा था। जो लोग देश की दशा को जानते हैं उन्हें मालूम
है कि अवध के किसान भारत पे दरिदतम प्राणी हैं। उनकी
परिस्थिति मनुष्यों की भी नहीं। सरकार और तास्तुरेदार
इन दो भारी शिक्षाओं पे नीचे भाकर उनके शरीर की हड़िय
तक पिस रही है। जमीन अनाज पैदा करे, या न करे उनके
पास साने योग्य भन्न हो या न हो, मगान को मिझना ही
चाहिए । सीधी सरह न मिलेगा, तो ताल्लुकेदार क फारिन्दे
एन पेट में से निकाल जगे। किमानों की रक्षा के लिए जो
थोड़े बहुत कानून पास हुये हैं, वह भी उस समय नहीं थे।
एक वाषा रामचन्द्र नाम का कार्यकर्ता था। उसने किसानों
में खूब जागृति पैदा की। जून के महीने की गर्मी में लगभग
२०० किसान प्रतापगढ़ के इलाके से लगभग ५० मील पैदल
घनकर अपनी दुसगाया सुनाने के लिए इलाहाबाद आये और
राजनीतिक नेताओं स फरयाद की । जवाहरलालजी मसूरी
से प्रवासित होकर इलाहाबाद में अपले दिन व्यतीत कर रहे

अध्याय ४
-~-
थे। किसानों की फहानी से उनका हृदय द्रवित होगया और
मखमल और रेशम के गदलों में मां माप के लाडचाव से
पला हुआ युवक मौसम की कठोरता और गांव की कठिना-
इयों की परवाह न करके किसानों के साथ चल दिया। रेल और
पक्की सड़क से दूर, गांव की गहराई में उन महीनों में जवा-
हरलालजी ने कई सप्ताह व्यतीत किये । किसानों की निर्धन
और दीन दशा देखकर उनका कोमल हृदय द्रवित हो गया।
किसानों की यह दशा हो रही थी कि मार खायें, और रोने
न पायें। उनके पेट में से खुर्च कर मालगुजारी निकाल ली
जाती थी और जब शिकायत करें, तो पीटा जाता था। जिन
प्रांतों में किसान ही जमीन के मालिक समझे जाते हैं, वहां
फिर कुछ खैरियत है, क्योंकि किसान के पास चार दाने बाप
जाते हैं, परन्तु जहां जमींदारी पद्धति है, वहां तो उन बेचारों
की मौत है। सरकार का पेट भरना चाहिये और जमीदार की
रईसी भी चलनी चाहिए। यह सब किस के सिर पर ! उस
गरीय किसान के सिर पर, जो रात और दिन मेहनत करक
दो समय योग्य भोजन नहीं पा सकता, न जिसके सर छुपाने
को मिट्टी का झोंपड़ा है और न लजा ढकने को पूरा कपडा।
गांव में जाकर अब जवाहरलालजी ने उनकी दशा को देखा तो
उनका कोमल हृदय रो उठा । उन दृश्यों को देखकर बाकी
वहस
त्तियाँ, जो अभी तक केवल पुस्तकें पढने

२६
प० जवाहरलाल नेहरू
-
से उत्पन्न हुई थीं, मजदूत हो गई। पहले फेवा विचार या
श्रय विश्वास पैदा होगया कि जय तफ गरीय किसानों की
दशा को नहीं सुधारा जाता, जयतक उनके परिश्रम का पूरा
फान उन्हें नहीं मिलता, तबतक समाज की दशा नहीं सुधा
सकती, और ससार मे शान्ति नहीं हो सकती । करोड़ों मनुष्य
दिनरात परिश्रम करके भूग्वे रहे और घीसियों मनुष्य बिना
परिश्रम किये केवल रिवाज और कानून के जोर पर मौज
मारें, यह सरासर अन्याय है जिसका अन्त किये बिना
मनुष्य जाति का कल्याण नहीं हो सकता। गांव की उस यात्रा
ने जवाहरलालजी को कट्टर साम्यवादी बना दिया।
जिस मनुष्य ने बचपन से पवल शारीरिक सुख का है
अनुभव क्यिा हो, जो वश यही जानता हो कि किसी शारी
रिक आवश्यक्ता को पूरा करने का उपाय पिता से कह देना
या नौकर को आवाज दे देना है, जिसके मैले कपड़े पैरिस से
धुलकर आये हों और जिसे आनन्दमान में रहने का अभ्यास
हो, वह जून की कडकती गर्मी में नगे सिर गांव में पैदल
घूम सक्गा, यह आशा किसी को भी न थी। शायद जया
हरलालनी को सय भी यह भाशा नहीं थी, परन्तु सब आध
यित हुए क्योंकि जवाहरलालजी उस कडी परीक्षा में पड़ी
सफलता मे उत्तीर्ण हुए । आपने दहात का खूब चक्कर
जगाया और किसानों को ढारस दिया। इससे पूर्व श्राप हिन्दु

अध्याय ४
२७
स्तानी मे व्याख्यान देने से यहुत घरात थे। इग्लेण्ड में इतने
वर्षों तक रहने के कारण हिन्दुस्तानी भाषा पर इतना प्रभुत्व
भी नहीं था और जवान ऐमी परदेमी सी प्रतीत होती थी,
परन्तु किसान तो अप्रेजी समझते ही नहीं थे और उनसे
कुछ कहे बिना जवाहरलालजी से रहा नहीं गया, इसलिये
लाचार होकर आपको हिन्दुस्तानी में व्याख्यान देने का अभ्यास
डालना ही पडा।
किसानों को आपके जाने से बडा आश्वासन मिला ।
उन्हें मानों मसीहा मिल गया। वह अपने दुख की क्या
लेकर दूर-दूर से आते और इलाहाबाद से आये हुए 'नेता' को
सुना कर समझते थे कि "हमार दुखों का आधा इलाज"
होगया।
वह आन्दोलन प्रतापगढ़ के इलाक से प्रारम्भ होकर शीघ्र
ही गयबरेली, फैजाबाद आदि के जिलों में फैल गया। किसान
एक धार जो भडक तो उन्हें रोक्ना कठिन हो गया। कांग्रेस
के कार्यकर्ताओं ने आन्दोलन को ठीक रास्ते पर रखने का
बहुत यल किया परन्तु इतमा विस्तृत और गहरा असन्तोष
सर्वथा शान्त फमे रह सकता था। सरकार के साथ कई स्थानों
पर आन्दोलनकारियों की टक्कर लग गई । जब कोई आन्दोलन
बहुत व्यापी हो जाय तो सरकार को ऐसी टक्कर से पडा
सन्तोप मिलता है। माडा पैदा होने पर आंदोलनकारी सरकार

२९
पं. जवाहरलाल नेहरू
के हाथ में बेल जाते हैं। भान्दोलनकारियों की भनुभव शुन्यता
ने उन्हें सरकार हाथों में शिकार की तरह दे दिया। छोटे
छोटे निमित्त मे मगड़ा हो गया, जिस पर पुलिस ने गोली
चक्षा दी। रायपरमो में जो गोली पनी, ससमें बहुत से किसान
मार गये और उनसे भी अधिक जामी हुए। ऐसे निमितों
स प्राय मभी मुख्य किमान नेता पकड़ फर नेल में डाल
दिये गये। जवाहरलालजी और उनके साथ काम करने वाले
अन्य कार्यकर्तामों न, किसानों को शान्ति और अहिमा का
पाठ पढान में कोई कसर न छोडी और सरकार के सूनी मदले
को रोकने का भी बहुत प्रयल किया गया परन्तु जब तबीयतों में
विक्षोभ पैदा हो जाता है और शक्तिशालियों का दिल झोष
से भर जाता है, तम अनुनय विनय करने वालों की कौन
सुनता है। कार्यकर्ताओं को उत्पाव के रोपने में सफलता न मिली
और वह आंदोलन जो इस शानदार तरीके पर भारभ हुआ था,
गोली, कैद और गिरफ्तारियों की घोधन में समाप्त हो गया।
उस समय तो वह आन्दोलन समाप्त-सा हो गया, परन्तु
वह किसानों पर भौर जवाहरलालजी पर बडा गहरा असर
छोट गया। किसानों पर कांग्रेस की छाप बैठ गई और जवा-
हरलालनी के हृदय पर यह बात अकित हो गई कि किसानों
की दशा को सुधारे बिना स्वराज्य असम्भव है।

(५) स्वराज्य मन्दिर मे पजाय क खूनी नाटक पर अमृतसर कांग्रेस के दिनों में सरकार ने एक हल्का सा पर्दा डालनका यत्न किया था। कांग्रेस के अधिवेशन के दिनों में सम्राट पञ्चमजाल की ओर से एक घोषणा की गई, जिस मे आशा दिलाई गई, कि भारत को श्रा- हिस्ता, भाहिन्ता, किश्तों द्वारा उत्तरदायित्वपूर्ण शासन दिया जायगा। साथ ही उन्हीं दिनों में मार्शलला द्वारा दण्डित तथा अन्य बहुत से राजनीतिक कैदियों को छोड़कर सरकार ने घाव पर मरहम लगाने की चेष्टा की परन्तु वह चेष्टा सफल नहीं हुई।

पं. जवाहरलाल नेहरू फांग्रेस ने सम्राट् की घोषणा को असन्तोपजनक और नाकाफी समझा और फेवल कुछ कैदियों के छूटने से मार्शल-मा युग घोर अत्याचार मुलाये नहीं जा सकते थे। वह असन्तोप का कारण कायम रहा। महायुद्ध के पीछे युद्ध करने वाले देशों में से जिस देश पर सय से घड़ी आफत आई यह टर्की था। टर्की ने जर्मनी का साथ दिया था। पराजय हो जाने पर यह मिन दल के पूरे पन्जे में मा गया। यह उस साथ चाहे जैसा सलूक करते । टों का सुल्तान ससार भर पे मुसलमानों का धार्मिक शिरोमणि, खली- फा कहलाता था। यह खलीफा तभी तक रह सकना था, जब तक उसके पास राज्य की शक्ति हो। पराजित टी के शासक का पद अधिकार छीन लिया गया। इसमें सामान्यतः संसार भर फे, परन्तु मुख्यत भारत के मुसलमानों में बड़ी हलचल सी मच रही थी, सिलाफ़त का नाश उई इस्लाम का नाश-मा दिसजाइ दे रहा था। १६२० में सिक्षाफ्त की रक्षा के नाम पर भारतवर्ष के मुसलमानों में जोरदार भान्दोलन उठ रहा था। मौलाना शौकत- अली और मुहम्मदनजी उसफ अगुवा थे । उन लोगों क मोध का मुग्न्य शिकार इगोंड था, क्योंकि वह उसी को टी क श्रध' पात फ लिये उत्तरदाता समझते थे। खिलाफत के कार्यकर्ताओं की एक फास दिल्ली में हुई, जिस में महात्मा गांधी ने भी अध्याय ५ भाग लिया। हकीम अजमजा, डा० अन्सारी, मौलाना श्रध्दुल- बारी आदि प्रमुख मुसलमान उस आन्दोलन में खिचते आ रहे थे । कान्फ्रेंस में महात्माजी ने मुसलमानों को अहिंसात्मक उपा. यो मे खिलाफत की लड़ाई लड़ने की सलाह देते हुये असहयोग करने की सलाह दी।। असहयोग का अभिप्राय यह था कि सर- कार के शिक्षणाजयों में बच्चे न पढाये जाय, कचहरिया में मुक- दमे न जडे जायें, कोई टाइटिल मजूर न किये जायें, हर तरह की सरकारी नौकरी छोड दी जाय और सरकार से किसी प्रकार का वास्ता नरसा जाय। मुसलमान उस समय जोश में थे। इधर देश के हृदय में पंजाब के अत्याचारों की याद ताजा थी और सम्राट की शासन- सुधार सम्बन्धी घोषणा पर भी असन्तोप था । इस प्रकार स्वराज्य, पजाब और सिलाफत इन तीन प्राधार स्तम्भों पर अस हयोग आन्दोलन का भवन सडा किया गया। मुसलमानों को अपने धार्मिक प्रश्न पर हिन्दुओं की नियात्मिक सहानुभूति बहुत ही प्यारी लगी, उस से उनके हृदय बहुत प्रभावित हुये। अनायास ही हिन्दू मुस्लिम एकता का प्रयाह देश भर में बड़े जोर से बहने लगा और देश भर में यह दो नारे मुख्य हो गये-महात्मा गांधी की जय, हिन्दू मुसलमान की जय । देश भर में जागृति और एकता की जो जहर चली, उस के गांधी थे। यह तो नहीं कहा जा सकता कि .

पं० जवाहरलाल नेहरू 1 जी बिना विशेष प्रयास के ही अपने मतहयोग और सत्यामह के सिद्धान्तों को देश के गले के नीचे उतार सके। १६२० में कांग्रेस के दो अधिवेशन हुये। कलकत्ते में विशेष अधिवेशन हुमा और नागपुर में साधारण । दोनों में एक ही विषय मुख्य था कि असह- योग और सत्यामह को स्वीकार किया जाय मा नहीं। प्रारम्भ में इस प्रस्ताव का विरोध देशबन्धु चित्तरंजनदास और ला लाजपतराय जैसे प्रभावशाली नेताओं की ओर से हो रहा था परन्तु धीर २ महात्माजी के व्यक्तिगत प्रभाव की विजय हुई और कांग्रेस ने उनके अहिंसात्मक फानून-भत और असहयोग को मजूर कर लिया। जवाहरलालनी उम समय पहली श्रणी के राजनीतिज्ञा में नहीं गिने जात थे, इस कारण इन निश्चयों पर उनका निशेप असर नहीं था, तो भी हरेक विषय पर वह अपना अलगपन रसते थे। दश में जो जागृति हो रही थी, उसे वह पसन्द करते थे, कता को यह आवश्यक समझत थे । परन्तु यह जागृति और एकता पिस सवारी पर बैठकर तशरीफ ला रही थी उसे वह ना- पसन्द करते थे और उससे घरीत थे। उस समय का मुख्य निपय सिजाफत मन रहा था। कांग्रेस की हरफ पैठक पर मज- हमी रग चढाया जा रहा था। जवाहरलालनी इसे दश के लिये बहुत खतरनाक मममते थ । राजनीति में मौलवियों और धर्मा- चार्यों को प्रधानता प्रापको यहुत अवरती थी।

अध्याय my NA परन्तु देश में मात्म-सम्मान का एक तूफान उठता दुभा देख कर अन्य देशभक्तों की तरह आपका हृदय भी कार्यक्षेत्र में कूदने के जिये अधीर हो रहा था, इसलिये सब सशयों श्रीर प्रश्नों को ताक में रखकर जवाहरलालजी आंदोलन के क्षेत्र में सोजहों श्राने कूद पडे । महात्माजी के व्यक्तित्व का भी उन पर अद्भुत असर पड रहा था। १९२० से लेकर १६३४ तक भारतवर्ष का राज. नीतिक नेतृत्व महात्मा गांधी के हाथों में रहा। यह नेतृत्व कई दृष्टियों से असाधारण रूप में सफल रहा। उस सफलता के मुरय कारण दो थे-पहला कारण महात्माजी का असाधारण व्यक्तित्व था, और दूसरा कारण महात्माजी द्वारा प्रतिपादित सिद्धान्तों का भारतीयपन था। शत्रुओं को भी स्वीकार करना पडेगा कि महात्मा गांधी एक साधारण ससार से निजक्षण मनुष्य हैं। इतना पनिन, इतना तपस्वी और इतना सच्चा होते हुये भी, इतना चतुर, इतना कार्यकुशल और इतना महान् -- परस्पर विरुद्ध गुणों का ऐसा सुन्दर मेल एक स्थान पर मिलना कठिन है। हृदय और मस्तिष्क दोनों के सुनहले गुणों की चमक एक ही केन्द्र में नहीं मिला करती। महात्मा गांधी का व्यक्तित्व चुम्बक फी तरह आकर्षक है, और विद्युत की तरह गतिशील है। देश- बन्धु दास, पं० मोतीलाल नेहरू, हकीम अजमनसा जैसे महान व्यचियों को गांधीजी के व्यक्तित्व ने जीत कर अपना बना लिया था । पराजित व्यक्ति के हृदय में प्राय हार का कांटा रह जाता ५० जवाहरलाल नेहरू है। महात्मा गाधी के चरित्र की यह सुन्दरता है, कि उनसे हारन पारो पदय में कांटा नहीं रहता, क्योंकि गांधीजो सदा कोमल ती से मारते हैं, और फिर भी चोट लगन की भाशा से सहानुभूति और उदारता की मरहम साथ रसते हैं। समता या दूसरा कारण उन सिद्धान्तों की भारतीयता थी, निनकी महा- स्मानी प्रतिपादन करत थे। अहिंसा, सत्य और त्याग यद ऐसे प्राश है, जिन्हें भारवनासी शायद सृष्टि श्रारम्म से सुनते और मानत आये हैं । राजनीतिक दृष्टि से रात रही हो या दिन, सहर फ महलों में और ग्राम की मोपडियों में रामायगा फा च्या पहने याले लोग इन आदर्शों क राग सो गाते ही रहे हैं। जय राजनीतिक मैदान में गांधीजी ने भारतीय हृदय की सब से गहरी सतह में सहानुभूति की सनसनी पैदा करन पाले उन विचारों को जनता सामने पेश किया, तब उनके दिल और दिमाग का तार तार हिल उठा | राष्ट्रीयता का जन्म तो हो ही "चुका था, महात्माजी जैसे तेजस्वी तपस्वी ने जन भारतीय जनता फो भारतीय शब्दों में, भारतीयता का सन्देश सुना कर बतलाया कि तुम्हारी राष्ट्रीय अमिनापानों के प्राप्त होने का यह मार्ग है तो यह एक दम मन्त्र मुग्ध-सी हो गई। घड़े और छोटे सभी पर उस मन्त्र का प्रभाव हुभा । जवाहरलालजी महात्माजी की धार्मि कता से, खिलाफत सम्बन्धी नीति से और अन्य अनेक ऐसी ही गौण पातों से असहमत होते हुए भी महात्माजी के महान व्यक्तित्व ।

२५ से पूरी तरह प्रभावित हुए और उस समय अधिकांश राष्ट्रीय नेताओं की तरह जैसे मन्त्र धन से बंधे हुये हों, इस प्रकार महात्माजी द्वारा दहकाई हुई उस राष्ट्रीय यज्ञाग्नि मे कूद पडे । जवाहरलालजी जीजान से आन्दोजन में पड़ गये। उनका सारा समय देश की सेवा में व्यतीत होने लगा। देश की राज- नीतिक प्रगति का ५० मोतीलालजी पर भी पूरा असर हुआ। था। पजाय की और अपध की घटनाओं ने और महात्मा गांधी क व्यक्तित्व ने उनके हृदय के प्रवाह को सर्वथा बदल दिया था। लामो की कमाई और जीवन के सय सुसों को लात मार कर वह नर-केसरी असहयोग की समर-भूमि में एक गम्भीर हुकार के साथ कद पड़ा था। अब जवाहरलालजी के मार्ग में यह धर्म- सङ्कट न रहा। पिता और हृदय दोनों की ओर से अनुमति मिल जान पर यह पूरी शक्ति के साथ कांग्रेस के कार्य में जुट गये। बड़े पिता के पुत्र थे, योग्य थे, मन, वाणी और धर्म में एक ये धौर माहसी थे, कार्यकत्ताओं की श्रेणी में प्रात देर न लगी । सयुक्त प्रांत की कांग्रेस कमेटी की बागडोर शीघ्र ही उनके हाथ में आ गई और घर पार और परिवार की चिन्ताओं को छोड कर, एकमन होकर वह कांग्रेस के कार्य में जगगये। भारत की दहकती हुई असन्तोषाग्नि पर ठडा पानी छिडाने निटिश सरकार ने एक चाल चली बसून उस - - ३ प० जवाहरलाल नेहरू समय के प्रिन्स आफ वेल्स (एडवर्ड अष्टम) को भारत में लाकर' भारतीय प्रजा की रानभक्ति को उकसाने का सन्युषा बाधा और तदनुसार १६२१ के अन्त में प्रिन्स-आफ वेल्स के मारता- गमन की घोषणा करदी। कांग्रेस को या महात्मा गांधी को प्रिन्स आव वेल्स के व्यक्तित्व से कोई शिकायत नहीं थी, परन्तु वह उस ब्रिटिश साम्राज्य का एक प्रतिनिधि यन कर पा रहा था जिस से भारतवासियों को शिकायते ही शिकायत थी । इस कारण कांग्रेस की ओर से युवराज पे स्वागत का बहिष्कार करने का निश्चय किया गया। वर्ष भर में जिम सहप की वैयारी हो रही थी, वह भा पहुचा। सरकार के लिये यह एक नया परीक्षा था। वह उपद्रव को शान्त करना चाहती थी, और हिंसा की प्रवृति को हिंसा से दयाना जानती थी, परन्तु अहिंसात्मक सत्याग्रह उसके लिये विज्ञकुल नई वस्तु थी। इतने व्यापी असन्तोष और ऐसे नये प्रकार के आन्दोलन को दुख कर वह धौदला-सी गई और जिधर भी सुझा, हाथ-पांव पजाने लगी। युवराज ने भारत में पड़ी भनिष्ट घड़ी में कदम रक्सा। अम्मई से ही अशुभ शकुन होन अगे प्रता की ओर से युव- राज का स्वागत काले कपड़ों और हडताज से होने लगा। भारत सरकार के लिये यह पड़ी सजा की बात थी कि वह सम्राट् क पुन का भारत मे उचित सत्कार न करा सकी !

अध्याय ५ MY सरकार ने खिसियाना-सा होकर कांग्रेस और उसके स्वय- सेवक दलों पर आक्रमण जारी कर दिये। कांग्रेस को सत्यामद जारी करने का अच्छा हथियार मिल गया। महात्माजी * कार्यक्रम का तो मुख्य अग ही सविनय कानून भग था | सर- कार ने स्वयसेवक दलों को नियम विरुद्ध करार दकर काना भग का आसान रास्ता दिखा दिया, स्वयसेवक भर्ती होने लगे और गिरफ्तार होने जग। इलाहाबाद में उस समय कांग्रेस के फायोजय का सचालन नवाहरलालजी कर रहे थे । वहाँ भी युवराज के स्वा- गत की तैयारी प्रारम्भ होते ही स्वयसेवकों की भर्ती और हड़ताज कराने का उद्योग जारी हो गया। स्वयसेवकों की जो सूचि तैयार हुई, उसमें सब से पहला नाम पं० मोतीलालजी का था। गिरफ्तारियां प्रारम्भ हो गई। पहले ही हलो मे जो लोग पकडे गये उनमें पिता और पुत्र दोनों थे। पं० मोतीलालजी पर कांग्रेस के स्वयसेवक होने का और जवाहरलालजी पर हडताल करने की प्रेरणा के लिये पोस्टर निकालने का अभियोग लगाया गया था। अदालतों से असहयोग हो रहा था, इस कारण किसी ने कोई सफाई न दी। एफ मजेदार घटना हुई । ५० मोतीलालजी हिन्दी बहुत कम - नहीं के बराबर जानते थे। परन्तु गान्धीयता का दौर दौरा था, स्वयसेवक फे फार्म पर मोतीलालजी ने हिन्दी में हस्ताक्षर किये । अभियोग

प० जवाहरलाल नेहरू
के समय यह फार्म अदालत में पेश हुमा । मोतीलालजी क
हिन्दी हस्ताक्षर किसी ने उससे पहले देखे ही नहीं थे, तो
उन्हें पहिचानता कौन ? बड़ी उलमान पड़ी। सरकार को सुझने
लगा कि जरासी कानूनी कमी से भपराधियों का सरदार छूटा जा
रहा है, और मोतीलामजी न ही जुर्म को स्वीकार करते हैं और
न इन्कार करते हैं । तव आरिचर भले आदमियों से भरे हुए इसा-
हाबाद के बाजारों में से पट हुए मैले कपड़ों वाला एक प्राणी यह
कहने के लिये काया गया कि, मैं मोतीलालनी के हिन्दी
हस्ताक्षरों को पहिचानता हू । उस शहादत पर २० मोतीलालजी
को ६ मास का कारावास मिला | जवाहरलालजी को भी
हड़ताल की घोषणा के अपराध में उतनी ही सजा दी गई।
पिता और पुत्र दोनों इकट्ठे जसनऊ जेल में भेज दिये गये।
५. मोतीलालनी पूर समय तक जेल में रहे, परन्तु जरा-
हरलालजी के बारे मे ३ महीने के पीछे सरकार को इनहरम
हुभा दि उन्हें व्यर्थ में ही सजा दी गइ, क्योंकि हडताल की
घोपणा करना जुर्म नहीं है। ३ महीने सज़ा भोग लेने पर
उन्हें रिहा कर दिया गया।
उम समय तक दश में लगभग ३० हजार सत्याग्रही जेल
में जा चुके थे। दोनों ओर थोनी बहुत थकान भा गई थी।
दसने में भान्दोलन भी ढीला पड़ रहा था, और गिरफ्तारियों
भी कम हो रही थी । जवाहरलाल जी को सुस्ती देसकर बहुत

अध्याय दुस हुआ। उन्होंने प्रान्दोजन में फिर तेली पैदा करने का निश्चय किया और वालन्टियरों को इकट्ठा करके उन कपडे के व्यापारियों पर धरना देने लगे, जिन्होंने अपनी पहले की प्रतिज्ञा के विरुद्ध विदेशी माल बेचना प्रारम्भ कर दिया था। दो दिन के पिफेटिंग के पश्चात् श्राप गिरफ्तार कर लिये गए। आप पर यह अभियोग लगाया गया कि भापने व्यापारियों को कानून विरोधी दन पर धमकाया और उन से जुरमाने वसूज किये। मुकदमा क्या था, एक मज़ाक था। जवाहरलालजी ने उस मजाक में कोई हिस्सा न लिया, फेवन अपना एक वक्तव्य पढ़कर सुनाया, जिस में सत्याग्रह की विशद और युतियुक्त व्याख्या की। अदालत ने श्राप को दोषी करार देकर १ वर्ष ६ महीने के कारावास की सजा दी। ६ सप्ताह की अनुपस्थिथि के पीछे, आप अपनी लम्बी सज़ा भोग लेने के लिये फिर पुराने साथियों के पास जखनऊ जेल में पहुच गये। - ४२ पं. जवाहरलाल नेहरू हद और गोलियों की दनदनाहट के बीच में से होकर गुजर रही थी । युवराज कलकत्ते में जाने वाले थे, उधर कांग्रेस अधिवेशन अहमदायाद में होने वाला था, गिरफ्तारियों का जोर कम हो रहा था, मौका अनुकूल समझ कर जार्ड रीडिंग ने गोलमेज कान्भेन्स के रूप में समझौते का प्रस्ताव इशारे के तौर पर फेंक दिया। देश के बहुत नेताओं न इस मौके को गनीमव समझा और महात्मा जी को प्रेरणा की कि वह सुलह की बात चीत करने को तैयार हो जायें, परन्तु अलीबन्धु जेल में थे, महा- मानी धर्म ने यह स्वीकार न किया कि मित्रों के जेल में रहते सुलह की जाय । इस कारण सुलह की बातचीत आगे न चजी । अहमदाबाद को कांग्रेस में देश का जोश अपनी सच्चतम सीमा तक पहुंच गया था। महात्माजी के शब्दों में ऐसा जादू भरा हुआ था कि जनता स्वराज्य की अत्यन्त शीघ्र सम्भावना पर विश्वास करने लगी थी। महात्माजी को कांग्रेस ने सत्याग्रह सप्राम के लिये डिस्टेटर के पूर्वाधिकार प्रदान कर दिये। गुजरात के बारडोली ताल्लुका में सत्याग्रह की लड़ाई को प्रारम्भ करने का निश्चय किया गया था। देश में उत्सुकता थी और सरकार में भाशश। दोनों धडकत हुये हृदयों से विचार रहे थे कि अब क्या होना है कि इतने में सयुक्तप्रान्त दुर्घटना घटित हो गई। गोरखपुर जिले में चौरीचौरा नाम का एक स्थान है। यहां पुलिस के साथ जनता की टक्कर हो गई, । में एक । जिससे पुलिस की काफी हानि हई, पुलिस की चौकी जला दी गई और पुलिस के कई आदमी हताहत हुये। महात्माजी पर इस दुर्घटना का बहुत बुरा असर हुआ। उनका हृदय हिंसा के समाचारों से फाप गया। उन्हें ऐसा भान हुआ कि देश अहिंसा में सर्वथा विश्वास नहीं रखता और क्योंकि सत्याग्रह की लडाई के लिये अहिंसा अत्यन्त आवश्यक है, उन्होंने सत्याग्रह की लड़ाई को स्थगित करने का निश्चय कर लिया। १६२२के फरवरी मास में धारडोली में लाकर महात्माजी ने वर्किंग कमेटी की एक बैठक की और उसमें सत्याग्रह को स्थगित कर दिया। महात्माजी के इस निश्चय के दो परिणाम हुये। एक तो देश मे जबर्दस्त प्रतिक्रिया पैदा हो गई। यदि एक स्थान पर हिंसा होने से देश भर में सत्याग्रह की लड़ाई बन्द की जा सकती है तो सत्याग्रह तो सदा बन्द ही रहेगा, क्योंकि कहीं न कहीं हिंसा तो इमेशा कराई ही जा सकती है, राष्ट्रीयता के विरोधियों के पास ऐसे भडकाने वालों की कमी नहीं जो जनता से मूर्सता के काम करवा दें और इस प्रकार सविनय कानून को सदा असम्भव पनाये रखें । सत्याग्रह के एक दम स्थगित करने से ऐसा असर हुभा मानो राष्ट्रीयता के पूरे वेग से भागते हुए मदमस्त घोडे के माथे पर चट्टान टकरा गई हो और वह लडखडा कर पीछे गिर जाय । वह राष्ट्रीयता का उमड़ा हुआ प्रवाह ठोकर पं. जवाहरलाल नेहरू हट और गोलियों की दनदनाइट के योच में से होकर गुजर रही थी। युवराज कसते में जाने वाले थे, उधर कांग्रेस अधिवशन अहमदाबाद में होने वाला था, गिरफ्तारियों का जोर कम हो रहा था, मौका अनुज्ञ समझ कर लाई डिंग ने गोलमेज कान्फ्रेन्स के रूप में समझौते का प्रस्ताव इशारे के तौर पर फेंक दिया। देश के पहुच नेताभों न इस मौके को गनीमव समझा और महात्मा जी को प्रेरणा की कि वह सुलह की बात" चीत करने को तैयार हो जायें, परन्तु भलीमन्धु जेल में थे, महा- माजी के धर्म ने यह स्वीकार न किया कि मिटों के जेल में रहते सुलह की जाय । इस कारण सुलह की बातचीत पागन चली। अहमदाबाद की कांग्रेस में देश का जोश अपनी उच्चतम सीमा तक पहुंच गया था। महात्माजी के शब्दों में ऐसा आदू भरा हुआ था कि जनता स्वराज्य की अन्यन्त शीय सम्भावना पर विश्वास करने लगी थी। महात्माजी को कांग्रेस ने सत्याग्रह सप्राम के लिये हिक्टेटर के पृयाधिकार प्रदान कर दिये। गुजरात के पारडोली ताल्लुका में सत्यामद की लडाई को प्रारम्भ करने का निश्चय किया गया था। देश में उत्सुकता थी और सरकार में आशष्टा। दोनों धडकते हुये हृदों से विचार रहे थे कि अब क्या होना है कि इतने में सयुक्तप्रान्त में एक दुर्घटना घटित हो गई। गोरखपुर जिले में भौरीचौरा नाम का एक स्थान है। वहां पुलिस के साथ जनता की टक्कर हो गई, अध्याय ६ ४५ जेल से मुक्त होने पर जवाहरलालजी ने देश में जो कुछ देखा, उससे उनके हृदय में प्रसन्नता का सवार नहीं हुआ । राज नीतिक आन्दोलन शान्त पड गया था। इतना ही नहीं उसकी प्रतिक्रिया बहुत ही भरे रूप में दिखाई दे रही थी। देश मे स्थान स्थान पर हिन्दू मुसलमानों के झगडे पैदा हो रहे थे और कांग्रेस के अन्दर दजयन्दी का बाजार गरम हो गया था। यह दृश्य एक राष्ट्रभक्त को क्पा देने के लिये पर्याप्त था। जवाहरलालजी को भी उस दशा को देख कर घडा दुस हुश्रा। परन्तु फेवज दु सी होकर भी क्या करते । उस समय जो उपाय सम्भव था, उसे काम मे जाने के लिये उद्यत हो गये। आपने कांग्रेस के टूटे हुये वार को जोड़ने के लिये सारी शक्ति लगा दी । सर से प्रथम आपने सयुक्त प्रांत फी प्रांतिक कांग्रेस कमेटी के पुनर्जावन को हाथ में लिया। १६२२ में मरकार ने अधिवेशन में बैठे हुए प्रांतिक क्मेटी के सर सदस्यों को गिरफ्तार कर लिया था । तन से कमेटी का काम स्थगित हो गया था, उसे फिर से जीपित किया गया। इसी बीच में प्रयाग की म्युनिसिपैलिटी का चुनाव आ पहुंचा। कांग्रेस ने चुनाव में भाग लिया, और दूसरी सफलता प्राप्त की। सफल पार्टी का काम होता है कि वह अपने आद को कमेटी के समापति पद पर स्थापित करे । कांग्रेस पार्टी ने घहुन सोच विचार के पश्चा निश्चय किया कि इलाहाबाद की म्युनिसिपै.

4. जशहरजाज नेहरू । स्थावर पी को लोग और भयो ही शरीर पर टूट पड़ा । राष्ट्रीय प्रान्दोजन की यही दशा हुई। जो दशमझ नेज म मौजूद थे, पीरिराशा हुई । जा हरजासपी भी नस समय अपनानेन में अपनी पहली सय पाद रह थे। उन्हें भी पहा दुरा हुमा । जेश से छूटने पर यह महात्मानी से मिलन के जिय अहमदाबाद गये, पर उस समय तक आन्दोजन यो शिथिल होवा यसकर मकार ने माता गांधी को गिरफ्तार कर लिया था। जवाहरलालती महात्माजी स तो मिन, परन्तु उस समय जय महालाजी पर अभियोग पज रहा था। अमरा नर ने बड़ी सभ्यता शदी में महात्मानी को ६ वर के झिये पारागार भेजकर इस याव का सबूत दिया कि सरकार अपने विरोधी पी नियंजना से लाम मठाने में पूरी घरह सिद्धहस्त है। जवाहरलालजी की दूसरी यार की जेलयारा भी पूरी लम्बाई तक न चली। ६ महीने के पाद सयुक्तप्रोत के राजनीतिक कदी छोड़े जाने लगे। वह शायद एक ही ऐसा अवसर था, जप सर- कार ने कौंसिल का रहा माना। कोमिक्ष ने इस भाशय का प्रस्ताव स्वीकार किया नि राजनीतिक कैदियों को छोड़ दिया जाय । सरकार ने इस सलाह को मान लिया और. ३१ जनवरी सम् १६२० को सब राजनीतिक यन्दी छोड़ दिये गये।

अध्याय ६ मल जेल से मुक्त होने पर जवाहरलालजी ने देश में जो कुछ देसा, उससे उनके हृदय में प्रसन्नता का सञ्चार नहीं हुआ । राज- नीतिक आन्दोलन शान्त पड़ गया था। इतना ही नहीं उसकी प्रतिक्रिया बहुत ही भरे रूप में दिखाई दे रही थी। देश में स्थान स्थान पर हिन्दू मुसलमानों के झगडे पैदा हो रहे थे और कांग्रेस के अन्दर दलबन्दी का बाजार गरम हो गया था। यह दृश्य एक राष्ट्रभक्त को कपा देने के लिये पर्याप्त था। जवाहरलालजी को भी उस दशा को देस कर बडा दुस हुश्रा । परन्तु पेवल दुसी होकर भी क्या करते। उस समय जो उपाय सम्मन था, उसे काम में लाने के लिये उद्यत हो गये। आपने कांग्रेस के टूटे हुये तार को जोड़ने के लिये सारी शक्ति लगा दी। सब से प्रथम आपने सयुक्त प्रांत की प्रांतिक कांग्रेस कमेटी के पुनर्जीवन को हाथ में लिया। १६२२ में सरकार ने अधिवेशन में बैठे हुए प्रांतिक कमेटी के सब सदस्यों को गिरफ्तार कर लिया था। तब से कमेटी का काम स्थगित हो गया था, उसे फिर से जीवित किया गया। इसी बीच मे प्रयाग की म्युनिसिपलिटी का चुनाव आ पहुंचा। कांग्रेस ने चुनाव में भाग लिया, और दूसरी सफलता प्राप्त की। सफल पार्टी का काम होता है कि वह अपने श्रादमी को कमेटी के सभापति पद पर स्थापित करे। कांग्रेस पार्टी ने बहुत सोच विचार के पश्चा निश्चय किया कि इलाहाबाद की म्युनिसिपै-

१६
प०अभाहरलाल नेहरू
लिटी का चेयरमैन जवाहरनामजी को मनाया जाय। पहले हो
जवाहरलालजी ने थोड़ी अनिच्या प्रस्ट की परन्तु जब उनसे
कांग्रेस के गौरव के नाम से भपील की गई तो उन्होंने चेयरमैन
घनना स्वीकार कर लिया।
म्यूनिसिपैलिटी के चेयरमैन पनकर जवाहरक्षामजी ने
इलाहाबाद की जो सेवा की, उसे पदों के लोग अब तक याद रखे
हैं । काम में सुस्ती और भद्दापन श्रापको विजल पसन्द नहीं।
श्राप सफाई और चुस्ती से काम करते हैं, और दूसरे से भी पैसे
ही काम की भाशा रखते है। आपके समय में कमेटी के काम
में बहुत उन्नति हुई, रिश्वतसोरी और यमानी के आप रानु ।
थोडे ही समय में आपने इलाहाबाद के नागरिक शासन में रूह
अफ दी थी।
जो सार्वजनिक काम जवाहरलालनी ने अपने जिम्मे लिये
हुए थे, वही कम नहीं थे कि इतने में एक और जिम्मदारी मी
भापके कन्धों पर डाल दी गइ। आपको श्राम इंडिया कांग्रेस
फमेटी का जनरल सेक्रेटरी बना दिया गया।
उपर्युक्त तीन कामों में से एक एक ही इवना भारी था कि
साधारण भादमी के कन्धों को फुका देता, भापके पास तो
तीन काम थे, फिर भी मापने उन्हें जिस सुन्दरता से निमाया
वह इस यात का सबूत था कि भापकी कार्यशक्ति साधारण
कोटि से बहुद पढ़ी हुई है।

अध्याय ६ हमें डर है किाधरितनायक के सार्वजनिक जीवन के प्र भावेश में हम उनके नियू जीवन की चर्चा को भूल से गये हैं। जवाहरलालजी अपने मां बाप का इकलौते बेटे हैं। पिता शायद अपने बाह्य जीयन के झोलाहल में पुल को मुला सफे, परन्तु माता के जिये तो यह सब कुछ थे । कमलाजी का तो वह सर्वम्व ही थे। उनका गृहस्थ ही अभी कितने दिनों का था। एक छोटी सी बच्ची भी थी, जिसे हम जवाहरलालजी और समजाजी को पांधने वाली सोने की जज़ीर कह सकते हैं। इन तीनों प्राणियों को जवाहरलालजी की बड़ी आवश्यकता थी, परन्तु उन्हें जेज और काम से फुर्सत ही कहा थी । या तो जेल में रहते, और या सार्वजनिक जीवन में खिचे खिचे फिरते । सनका निनु जीवन प्राय समाप्त सा हो गया था। माता और पत्नी उनक लिये बहुत ही चिन्तित रहा करती थीं। दोनों के ही स्वास्थ पर जवाहरलाल जी की जीवनचर्या का असर पड़ रहा था। दोनों ही अस्वस्थ रहने जगीं । पुत्री 'इन्दिरा अभी छोटी थी, और बहुत कुछ नहीं समझती थी, परन्तु यह तो उसे भी मालूम होगया था कि पुलिस पिता जी के पीछे बुरी तरह पड़ी है और वह उन्हें आराम से नहीं बैठने देती। एक विशेष प्रकार का कड़वापन लड़की के जीवन में भी आ गया था। बाहिर की दुनिया शायद ही कभी जान सफे कि जवाहर- पं० अयाहरलाल नेहरू धमका र निश्चित कर देते थ। उन्होंने कभी जवाहर लाल जी को फमाह की चिता नहीं करने दी। यह यही चाहत 4 कि उन का पुत्र मातृभूमि की सेवा में अपना पूरा समय व्यतीत करे। फोग्रेस में इस समय दो दल हो गये थे। एक दल का पर था कि कांग्रेस कौसिमों पुनाव में हिस्मा जेकर उन पर अधिकार जमाने का यल कर और इस प्रकार किमीन किसी रूप में राजनीतिक संपाम जारी रहे। इस दल क नता श्रीयुत देश- पन्धुदास और पं. मोतीलाल नेहरू नया श्री विठ्ठलभाई पटल थे। दूसरा दल अपरिवर्तनवादी फ नाम से प्रसिद्ध था। श्रीयुक्त राजगोपाशाचाय, श्रीयुत पल्सममाई पटेल भादि नेता इस दक्ष के भगुभा थे । गया की कांग्रेस में दोनों पक्षों में खूर रस्सा- कशी हुई। देशमन्घुदास सस अधिवेशन में सभापति थ । उनका सारा प्रभाय भी कोमिन प्रवेश को कांग्रेस में स्वीकार न फरा सका। कौसिज प्रेश के नेताओं ने गया में ही स्वराज्य पार्टी फे नाम से एक दल का सालन कर लिया, और इस दल की और से फीसित प्रवेश के पय में आन्दोलन करने का प्रायोजन किया। दूसरो भोर भारिवर्तन दल भी मौन नहीं रहा । यह अपने को महात्मा गांधी का सच्चा अनुयायी और शिष्य मानते हुए कोई ऐसा कार्य नहीं करना चाहवा था जिसमें महात्माजी द्वारा ।

अध्याय बतलाये हुए असहयोग मार्ग का विधात होता हो । उस दल के नेवाओं ने भी देश में घूमकर फौसिन प्रवेश क विरुद्ध आन्दोजन करने का निश्चय किया। जवाहरलालजी की स्थिति दोनों दलों के बीचोबीच थी। वह स्वराज्य पार्टी के कार्यक्रम में विश्वास नहीं रखते थे, और स्वराज्य पार्टी की मनोवृत्ति में गिरावट की धाशङ्का देखते थे। परन्तु यह परिवर्तनवादी भी नहीं थे, क्योंकि राजनीति उनकी दृष्टि में राजनीति ही थी, धर्म नहीं । यदि समय के अनुसार नीति में परिवर्तन करना पड़े तो जवाहरलालजी उसके सब से बडे समर्थक होंगे। अपरिवर्तनवादी चाहते थे कि कांग्रेस फेवल रचनात्मक कार्यक्रम पर जोर दे, और जवाहरलालजी पेवल रचनात्मक कार्यक्रम को सेवासमिति के कार्य से अधिक कुछ नहीं मानते । ऐसी दशा में, उनके लिये एक मार्ग का निश्चय करना कठिन था। उन्हें और डाक्टर अन्सारी , फेन्द्रदल के नेता माना जाता था । आशा की जाती थी कि दोनों दलों के विरोध को यह लोग किसी न किसी प्रकार से शान्त करके कांग्रेस की एकता की रक्षा करने में सफल होंगे। अन्त तक स्वराज्य दल के प्रति जवाहरलालजी का यही सलूक रहा कि न तो वह उसमें शामिल हुए और न उसका विरोध किया। पं० मोतीलालनी जानते थे कि जड़का उनसे भिम मत रखता है परन्तु या तो वह पुद्धि स्वातन्त्र्य के इतने उस समय ।

पं० जनाहरलाल नेहरू कट्टरपशपाती घे, भौर था उनका भात्माभिमा यह गवारा नहीं करता था, परन्तु यह सत्य है कि मिन विषयों पर मतभेद था, धन पर मोतीलालजी जवाहरलालजी से कमी पाहम न करा ये, और न अपनी सम्मति का योदी सन पर बात ! जवादरजालनी राजनीति में अपना मार्ग चुनने में पिताक्ष स्वतन्त्र ये। इस परिस्थिति से अवाहरलालजी का फा प्रेस के क्षेत्र में एक स्वतन्त्र और प्रमुख स्थान पन गया। यह दोनों विरोधी दलों में से किसी में भी सम्मिलित नहीं थे, और पिर भी धनगी कांग्रेस में पहुत ऊंची स्थिति थी। दोनों दलों क पिरोप से पपन फलिये ही यह फांसपे सेक्रेटरी बनाये गये थे।

(७) नाभा काण्ड १६२३ मे अकाली सिरसों का सत्याग्रह परे यौवन पर था । सत्याग्रह का उद्देश्य गुरुद्वारों का सुधार था। सिक्ख लोग निकम्मे विलासी महन्तों से छीन कर गुरुद्धारों की गदियों को गुरुद्वारा प्रबन्ध कमेटी के आधीन ला रहे थे। इस कार्य में महन्तों से और अन्त मे सरकार से सघर्ष पैदा होना स्वाभाविक ही था । उस समय संघर्ष में सविनय कानून भग के हथियार को काम में जाते थे। देशभर में सिक्खों के सत्याग्रह को बड़ी दिलघस्सी से देखा जा रहा था। उद्देश्य था सुधार और साधन था सत्याग्रह-इम कारण कांग्रेस की सिक्खी के साथ सहानु- भूति थी।

६०वाहरलाल नेहरू गुरुद्वारा मान्दोजन में से ही एक शासा निभाई। परियाणा और नाभा क सिपस शासों में परस्पर पैमनस्य पला प्राधा था। पटियाला नररा अंग्रेजी सरकार का दुलारा था, और नाभा नरश क साय भकाजियों की सहानुभूति थी। ग्रेजी सरकार ने नाभा नरेश को दोपी करार देफर गदी से उतार दिया, और नामा के शामन पे लिये एफ अप्रेज शासक नियत कर दिया। इसमे अकाली असन्तुष्ट हो गये, और उन्होंने नामा की सीमा के अन्दर अतू नाम के एक स्थान पर अपना मोर्चा जमा दिया । अकाली दल या जाफर अखएड पाठ करने लगे। नामा फे अंग्रेन शासक ने उन्हें रोकने की आज्ञा दी। इसी में अतृकापड जारी हो गया। अफाली जत्ये दूरदूर से यहां जाते, उन्हें पहले जी खोजकर पीटा जाता, और फिर गिर- प्रतार पर लिया जाता था। दिल्ली में कांग्रेस का रिशेप अधिवेशन होकर चुका था। सुख मिनों ने यहाँ सलाह दी कि घनास्थल पर जाकर जैतू के मोर्चे को देखा जाय | इस निश्चय प अनुसार प० जवाहर- जाल नेहरू, लाहौर के मि०५० सन्तानम् और मि०ए० टी० गिड्यानी जैतू के जिये रवाना हो गये। एक अत्या जैतू की ओर जा रहा था। उसके पीछे पीछे, परन्तु बिलकुल भन्नग, ती मित्र जत्थे की यात्रा को देखते हुए जा रहे थे। यह नाभा की सीमा के अन्दर घुस चुके थे। इनने में नाभा के शासक अध्याय । का हुक्म लेकर पुलिस का एक अफसर उपस्थित हुआ। हुक्म यह या कि "तुम लोग नामे की सीमा पे अन्दर मत घुसो, और यदि घुस चुके हो तो फौरन बाहर घले मानो।" तीनों मित्रों ने उत्तर दिया कि अब हम नाभा की सीमा में भा चुके है, सीमा में न पाने के हुक्म का तो कोई मतलब ही नहीं, और बाहर ले जाने वाली गाडी के श्राने में देर है। तबतक हम यहीं रहना पसन्द करते हैं, और हमारा जत्थे से कोई सम्बन्ध नही। हुक्म की अवहेलना करने पर तीनों को गिरफ्तार कर लिया गया, और हथकडी घेडी से सुसज्जित करके नाभा ले जाया गया। जेल में जाकर हथकडी वेडी तो सोल दी गई, परन्तु जो स्थान रहने को मिला, वह नरक से भी पदतर था। चयू और कीडों मकोडों के कारण नाक में दम था। जब राव में सोये तो चूहों के मारे नींद न पाई । तीनों मिनों पर दो मुकदमे इकट्ठे ही चलाये गये । एक मुक- हमा तो भाज्ञा भग के अपराध में था और दूसरा पड्यन्त्र के अपराध मे। पड्यन्त्र का मुकद्दमा तब तक नहीं चल सकता था, जब तक अभियुक्तों की संख्या कम से कम ४ न हो, इस- लिये शायद अंग्रेज शासक के हुक्म से एक बेचार बढे अकाली को भी अभियोग में नत्थी कर दिया गया था। कई दिनों तक अभियोग का नाटक होता रहा । न यहाँ कोई कानून था और न अभियोग का ढग । सभी कुछ शासक

५
प० जयाहरलाल नेहरू
के इशार से चल रहा था। जज तो कठपुतलियों से भी बदतर थे।
अभियोग बिल्कुल अल थे, इस कारण अभियुक्तों ने चाहा कि
किसी अच्छे से वकील को सफाई के लिये घुला लें, परन्तु
अप्रेज शासक का हुक्म था कि कोई बाहिर का वकील रिया-
सत में न आयगा । इस कारण सफाई दने का विचार बिलकुल
छोड़ कर केवल वक्तव्य दिये गये। परन्तु वहां तो वक्तव्य भी
व्यर्थ ही थे। दोनों अभियोग एक ही दिन समाप्त हुए। भाज्ञान
भग के अपराध में ६ मास और
पड्यत्र
करने के अपराध में
२ वर्ष की सजा का हुक्म हुआ। आज्ञा सुन कर जर वह लोग
जेल मे वापिस पहुचे, तो उन्हें सुपरिन्टेन्डेन्ट ने सूचना दी कि
वह दपड शासक के हुक्म से स्थगित कर दिये गये हैं और उन्हें
नामे की सीमा से बाहिर चले जाना चाहिये। रात की गाड़ी से
चल कर यह लोग प्रात काज दिल्ली आ गये। और इस प्रकार
यह नाभा कापड समाप्त हुश्रा । सज्ञा, और उसे स्थगित करने
की आज्ञा की प्रति मांगी जो आज तक नहीं मिली।
नामे की जेल से तो छूट प्राये, परन्तु वहाँ जिन रोग के
कीटाणुओं से वास्ता पडा था, उनसे न छूट सके। तीनों ने
सजेश से टाइफायड के परमाणु ने जिये थे, निना कारण
उन सय को कई सप्ताह तक रोग की शय्या पर लेटना पड़ा।

(८)
बेसल्स और मास्को मे
भारत की राजनीति उन वो मे बैलगाडी की चाल से
चल रही थी। धीरे धीरे, मटके खावी हुई और भावान
करती हुई वह किसी न किसी तरह आगे बढने का यल कर
रही थी। उस समय के राष्ट्रीय जीवन में स्वाधीनता की चिन्ता
पीछे पड़ गई थी और हिन्दू-मुसलमानों क साम्प्रादायिक झगड
मुख्य हो गये थे । कांग्रेस का कार्यक्रम
कौन्सिल की
कार्रवाई तक परिमित होता जा रहा था। दोनों में ही जवाहरलाल
जओ फी कोई दिलचस्पी नहीं थी । कांग्रेस के जनरल सेक्रेटरी
की हैसियत से यह गाडी तो उन्हीं को होकनी पड़ती थी।

प० जवाहरलाल नेहरू १६२३ में काग्रेस का अधिवशन कोकनाडा में हुआ । उसके सभापति मौ० मुहम्मदशी थे । मौलाना का साभाव बडा उप था। उनके साथ निभाना किसी साधारण व्यक्ति का काम नहीं था । उन्होंने अपने वर्ष में जनरल सेक्रेटरी का काम करने के लिये जवाहरलालजी को वरण किया। अगले वर्ष बेलगांव में महात्मा गांधी कांग्रेस के सभापति चुने गये। उन्होंने भी अपने वर्प में सेक्रेटरी पद के लिये जवाहरलालजी को ही चुना। इस प्रकार श्राप कांग्रेस के स्थायी जनरल सेक्रेटरी बनते जा रहे थे । कर्तव्यपालन तो कर रहे थे, परन्तु जी उचाट था, क्योंकि उनका दिल न तो मनघडन्त साम्प्रदायिक समस्या में लगता या और न ही फॉमिन की उलझना से सन्तुष्ट होता था। इसी बीच में दो छोटी २ वर्णन वरने योग्य घटनाय हुई, जिनका निर्देश पर देना आवश्यक है। फोकनाडा का मेस में हिन्दुस्तानी सेवा-दल की बुनियाद हाली गई। उसके प्रधानमन्त्री डा. हार्डीकर बनाये गये और उनके प्राग्रह पर दक्ष की प्रधानता जनाहरलालजी ने स्वीकार की। आप अकस्मात् एक और सत्याग्रह में भी शामिल हो गये। प्रयाग में कुम्भ का मेला था। उस अवसर पर पुराने विचार के लोग सिवेणी पर स्नान करने में पुराय मानते हैं, उस वर्ष सद्गम के स्थान पर किनारा सराय हो गया था, जिस से भीड के लान करने में डूब जाने का प्यारा था । सरकार ने उस

अध्याय
१६
स्थान पर लान की मनाही कर दी और एक लम्बा चौडा
जगला लगाफर वहां जाने का रास्ता रोक दिया । श्रद्धालु लोगों
को इस से यहुत कष्ट पहुंचा और उन्होंने सत्याग्रह करने का
निश्चय किया। ५० भदनमोहन मालवीय उस दल के नेता
घने और यह लोग उस जगले पे पास जाकर रेत में धरना देकर
धैठ गये। जराहरलालजी गगास्नान से मुक्ति मिलने में तो वि.
स्वास नहीं रखते, परन्तु सत्याग्रह की घात उन्हें पसन्द भा गई,
और जर मालवीयजी जैसे बुजुर्ग को धरना देते देसा तो अपने
को न रोक सके और सत्याप्रहियों में शामिल होकर मालवीयजी
के पास जा बैठे।
उधर पुलिस और फौज ने उन लोगों को घेर लिया। इसी
तरह घण्टों बीत गये, पर कोई पक्ष स स मस न हुआ। ऐसा
निष्कय सत्याग्रह जवाहरलालनी को पसन्द न आया। और
वह रत से उठकर उस जगले पर चढने लगे, जो उन के
और जनता के बीच में बनाया गया था। उनकी देखादेसी और
जोग भी जगले पर चढ़ने लगे । जवाहरलालजी जगले की
घोटी पर जा पहुचे और वहां एक घांस में बांध कर तिरक्षा
मण्डा फहरा दिया। शाम होने से पूर्व सरकार और मालवीयजी
दोनों ही थक गये। मालवीयजी की पार्टी ने रेत पर धरना
छोड फर जवाहरलालजी का अनुसरण करते हुये क्रियात्मक
सत्याग्रह कर दाना और सरकार ने मामले को तूल देना उचित
.

Har . पं० जवाहरलाल नेहरू न समझ कर वन पर किसी प्रकार की कानूनी कार्रवाई इधर कमलाजी का स्वास्य घडुन दिनों से गिर रहा था। जवाहरलाली दश क कामों में इस बुरी तरह लगे हुये थे, कि उन्हें घर की सुध चुध नहीं थी। कमलाजी अधिक रोगी होती गई, यहाँ तक कि उन्हें हस्पताल लेनाना पडा ) कानपुर कांग्रेस ५ पीछ डाक्टरों ने सलाह दी कि स्वास्थ्य सुधार के लिये कमका जो का योगेप जाना आवश्यक है । जराहरलालजी दश के मिचे हुये वातावरण से कुछ भरकाश पाहते थे । १६२६ फे माच मास में यह, कमलानी और पुत्री इन्दिरा पे साथ योरोप के लिये रवाना हो गये । १६२७ के प्रारम्भ में प० मोतीलाल जी को भी एक मुकदमे ५ सिलसिले में योरोप जाना पड़ा। वृक्ष दिनों तक मन लोग वहां साथ रहे और कई स्थानों में भ्रमण किया। जवाहरलालजी न इस यात्रा में मध्य योरोप ये नेक दशों का भ्रमण किया, और वहां के राजनीतिज्ञों से मिले। स्विजर बैंड, फ्रांस, जमना आदि देशों में जो भारतवासी बसे हुये हैं, जवाहरलालजी उनसे भी मिले, और वहां की परिस्थिति पर बात- चीत की । महायुद्ध पे पीछे योरोष की राजनीति में जो उतार चढाव होते रहे, उन अध्ययन का इस से श्रद्धा कौासा अवसर मिल सकता था।

अध्याय १ जनाहरलालजी के लिये यह कार्य और भी आसान हो गया, मन्योंकि उन्हीं दिनों बूमल्स मे संसार की अधिकारहीन जातियों की बडी कान्फरेंस हुई, जिसमें जर्मनी, चीन, जावा, पैजम्टाइन, सौरिया, मिस्र, अरप और नीग्रो देशों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। जवाहरलालजी उस कान्फरेंस मे भारत के प्रतिनिधि की हैसियत से सम्मिलित हुये। उस कान्फरेंस में बहुत ठोस काम तो न हो सका, तो भी इतना लाभ अवश्य हुआ कि अधिकारहीन देश एक दूसरे से परिचित हो गए, और कान्फरेंस के अन्त मे एक साम्राज्य विरोधी सघ की स्थापना की गई। जवाहरलालजी उस सघ के सदस्य चुने गये । कई वर्षों तक श्राप उसमें सदस्य रहे, परन्तु जब दिल्ली में सरकार के साथ सुलह के एक कागज पर अन्य भारतीय नेताओं क साथ आपने भी हस्ताक्षर कर दिये तब संघ वालों ने आपको बहुत भला बुरा लिसा, और अन्त मे सघ की सदस्यता से अलग कर दिया। प० मोतीलालजी के योरोप पहुच जाने पर सारी मण्डली ने रूस का भी भ्रमण किया। उन दिनों मास्को में सोवीट सर- फार की १०वीं वर्षगांठ का उत्सव मनाया जा रहा था। दोनों नेहरू त हुये।

पै० जवाहरलाल नेहरू
इस यात्रा से दो लाभ हुए। फमशानी का स्वारस्य पुछ
सुधर गया, और जवाहरलालजी अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति की इस
समय की दशा से परिचित और प्रभावित होगये।

(६) राष्ट्रपति के पद पर जवाहरलालजी ठीक अवसर पर भारत में यापिस आ गये। २६२२ में सत्याग्रह के स्थगित होने पर जो प्रतिक्रिया पैदा हुई थी, वह समाप्त सी हो रही थी, और भारत की राजनीति के षावावरण में अशांति के चिन्ह दिसाई दे रहे थे। देश माम्प्र- दायिक झगड़ों और केरल फौंसिल के समाचारों से ऊब कर राष्ट्रीय स्वतन्तता के लिये कोई ठोस कदम उठाने को उत्सुक था। यह नींद से उकता कर, वीरतापूर्ण कार्य-नीति के लिये लालायिव हो रहा था। मद्रास में कांग्रेस का जो अधिवेशन हुआ, उसमें विला- यत से लौट कर जवाहरलालजी सम्मिलित हुये। यह अनुभव

६४
पं. जवाहरलाल नेहरू
हो रहा था कि दर मे यानी यह रही है, दरामतों के हो
में एक मौर स्वर सुइ द रहा है, जैसे 'यह प्रस्ट करना चाहते
है, परन्तु नहीं जानत किति राम्दों में प्रकट करें। ठीक बम
समय जवाहरलालनी योरप में एक या सन्दश लेकर आये।
यह सन्देश निश्चित रूप से क्या था, यह तो शायद यह भी
मालूम नहीं था, परतु हम उसे दो भावनाओं का गिमा का
सकत हैं। उनमें से मुख्य ती साम्राज्य परुित गहरी भाषा
थी । साम्राज्य विरोधी सपने नए मन पर काफी प्रमर खाजा
या। और यह भाभर फर' रह ध कि भारत को साम्राज्य से
नाता निजकुल तोड़ रोना चाहिये। दूसरी मारना जो साथ-साथ
पा रही थी यह थी कि मनुष्य समाम ये दुर्ग का असली
इलाज साम्यनाद् के पास है। सनकी साम्यवादी प्रवृत्ति यो
पहिरो से ही थी, मासो में जाकर जय उन्होंने सोयीट सरफार
को फाय में श्रात दसा तो साम्यवाद पर उनका निवास और
भी बढ़ गया। इस प्रकार उस समय साम्यवाद मे सना हुभा
साम्राज्य विरोध उनके मन का मुग्न्य भाव था।
मद्रास की कांग्रेस में समाहरणालनी ने अपने उन
भावों को प्रस्तारों के रूप में प्रकट किया। जो प्रस्ताव उनक
जोर दने से पाम किये गये, उनमें से एक तो यह था कि
कांग्रेस का ध्येय भारतवर्ष की पूर्ण स्वाधीनता है और दूसरा

अध्याय प्रस्ताव यह था कि कांग्रेस को साम्राज्य विरोधी सङ्ग से सम्बन्ध जोड़ लेना चाहिये। दश भर मे नगीन विचारों की जागृति पड़े वग से हो रहा थी। उस कई चिन्ह थे। स्थान-स्थान पर नौजवान भारत समाश्रो और युथलोगों की स्थापना हो रही थी। मजदूरों को सङ्गठित करने के लिये कई सभायें और सा बन रह थे। किसानों संगठन का आन्दोलन भी कई प्रान्तों में जारी हो गया था। कई दिशाओं में, और कई रूपों में, नये उत्थान का प्रवाह बहता दृष्टिगोचर होता था। जवाहरलालजी एक नया प्रकाश लेकर याहर से आये 4, इससे युवक मारत उनकी ओर टिकटिकी जगाय देय रहा था और समझ रहा था कि फैले हुये शर्मययता । अन्धकार में वही प्रकाश की किरणों को सचालित करेंगे। इधर सरकार अपनी मूर्सतानों से राष्ट्रीय जागृति मे सहाय- वा देने का श्रेय लूट रही थी। भारत के मायी शामनरिधान के सम्बन्ध में रिपोर्ट करने के लिये निटिश-पार्नेमेट ने एक कमीशन घनाया था, जो साइमन कमीशन के नाम से पुकारा जा रहा था। यह घेरल गोरों का कमीशन था। देश के प्राय सभी राजनीतिक दलों ने उसका विरोध किया, परन्तु अप्रेज किसी की सुनने वाले नहीं । यह कमीशन भारत मे भेजा ही गया । देश ने उसका बहिष्कार करने का निश्चय किया। प्राय सभी पड़े नगरों में उस कमीशन का काले झपडों और हडताल से ६ ५० जवाहरलाल नेहरू সনি - स्वागत किया गया। जहां यह बात, 'साइमन पापिस जाओ' फे नार भाषाश को गुनाने लगते । इस देश व्यापी प्रतिवाद के शन्द को सुनकर सरकार पपरा गई, और उसने कई स्थानों पर लाठी और गोली से उस शब्द को दमाने की चेष्टा की। सा इमन कमीशन के दौरे ५ प्रसंग में कई ऐसी घटनायें हुई जो भारत र नैतिक इतिहास मे स्मरणीय रहंगी। माहौर में पुलिस ने लाठी प्रहार किया, जिस से ला० लाजपतराय ऐसी गहरी चोट लगी कि यह उनकी मृत्यु का कारण हुई । लखाऊ वादी दल र नेता ५० जनाहरजाज और १० गोविन्दयल्लम पन्त थे। दोनों ही नेताओं के दलों ने बड़ी वीरता से घुडसवान पुलिस और फौज के आक्रमणों का सामना किया। दोनों गहरी चोटें आई, परन्तु किसी ने भी मैदान छोडने का नाम लिया। अपने स्थान पर पतों की सरह जमे रहे। मारने घाट हाथ थक गये, पर वीरों ने अपना स्थान न छोड़ा। साइमन कमीशन की याना अपने पीछे पहुत बडी स्मृति घोड गई । वह सरकार के मार्ग में खूब काटे रिछा गई । उस जाने पे पश्चात् देश का वातावरण अधिक से अधिक गर्म हो गया। फ्लक्त्ते की कांग्रेस में महात्मा गान्धी और 4 मोतीलाल नेहरू के सम्मिलित प्रयत्न से किसी प्रकार औ- निनेशिक ढंग से राज्य का प्रस्ताव स्वीकार हो सका, अन्य पूर्ण स्वाधीनता के प्रस्ताव का स्वीकृत हो जाना कुछ फठि प्रध्याय नहीं था। जवाहरलाजनी में सदा एक निर्बलता रही है । जहाँ महात्मा गांधी उनके विरुद्ध हो, वहां वह फक जाते हैं। कम- फत्ते में उनके पूर्ण स्वाधीनवा सम्बन्धी प्रस्ताव के स्वीकार हो जाने की पूरी प्राशा थी, यदि महात्माजी अपने उदार और नरम हथियारों से जवाहरलालजी को निर्जीव करके न डाल देते । कलकत्ते में सरकार को एक वर्ष का मौका दिया गया था कि या तो वह उनमें देश की सम्मिलित मांग को पूरा करे, अन्यथा कांग्रेस पूर्ण-स्वाधीनता के भादर्श की घोषणा कर देगी। आखिर वह एक पर्प भी समाप्ति पर आ पहुचा। उस वर्ष कांग्रेस का अधिवेशन लाहौर में होने वाला था। देश का पहुमत महात्मा गांधी को प्रधान यनाने के पक्ष मे था, परन्तु महात्माजी किसी तरह भी उसके लिये तैयार न हुए। तब आल इण्डिया कांग्रेस कमेटी ने निश्चय किया कि प० जवाहर- लाल नेहरू लाहौर कांग्रेस के अध्यक्ष बनाये जाय । सारे दश ने इस निश्चय का इर्ष से स्वागत किया। देश जिस साहसिक नेतृत्व की इच्छा रसता था, उसकी उसे जवाहरलालजी से ही आशा थी। परन्तु पो इसका कि हम माहौर में पहुच कर भारत के भाफाश पर नये सूर्योदय का वृत्तान्त सुनाये, हमें थोड़ी देर के लिय दिल्ली में का गा पड़ेगा। भारत के वाय- सराय भाई भरत में लिखागा गे शौट कर एफ घोपणा की, 6

ANP
पं० याहरलाल नेहरू
जिनमें यह प्राशा दिमाई कि भारत को भोपनिनेशिक ढग का
शासन मिल जायगा और शासनविधान पर विचार करने क
लिये एक गोलमेज वापरल्स चुसाइ जायगी, निममें सभी
विचारों के भारतवामी निमन्त्रित किये जायेंगे। इस घोषणा
को बहुत महत्वपूर्ण समझ कर विचार करने व जिये सय
राजनीतिक दलों पे नेता दिल्ली में इससे किये गये। कांग्रेस,
लिमरन और मुस्लिम लीग सय के प्रतिनिधियों ने मिल कर एक
धत्तव्य तैयार किया, जिममें घोषणा पर सन्तोप प्रगट करते हुये
बह शने पेश की गई थी, निनके स्वीकार कर लेने पर मारतवासी
गोलमेश कान्मन्स में घठने को उद्यत हो सकेंगे। उस चाव्य
पर महात्मा गांधी और पं. मोतीलालनी के साथ साथ सर
तनबहादुर सष्ट और मि० जिना क भी हस्ताक्षर थे। इससे
समझा जा सकता है कि यह वत्तव्य न तीतर था न थटर । सप
के विचारा का प्रतिनिधि बनने की चेष्टा मे यह किसी के विचारों
का प्रतिनिधि भी न रह सका।
५० जनाहरलाल नेहरू और श्री सुभाषचन्द्र बोस से भी उस
घचव्य पर हस्ताक्षर करने को कहा गया। पहले तो दोनों ने
इन्कार पिया, परन्तु महात्माजी के बहुत समझान में और श्राग्रह
पर जवाहरलालनी ने उस पर हस्ताक्षर कर दिये। कहते हैं कि
जवाहरलालजी पर उन हस्ताक्षरां का ऐसा बोम पडा था कि
पई रातों तक वह नींद नहीं ले सके। एक बार तो दुखी होकर

अध्याय उन्होंने महात्माजी को लिख दिया था कि मैं कांग्रेस का प्रधान नहीं बन सकूगा । पर महात्माजी की बात को न मानना या उन्हें दुःस्त्री करना जवाहरलालजी की शक्ति से बाहर है । जवाहरलाल जी ने हस्ताक्षर भी कर दिये और प्रधान भी बने। उधर वाय- सराय ने उन बिल्कुल नर्म शतों को मानने से इन्कार कर दिया, इस कारण लाहौर में राष्ट्रीय गाड़ी के पूरे घेग से चलने के रास्ते में कोई विघ्न न रहा। जाहौर में जवाहरलाल जी का बहुत शानदार स्वागत हुआ। उनके माता पिता पुत्र की लोकप्रियता पर फूले न समाते थे। जम जलूस उस मकान के नीचे से गुजरा, जहाँ पण्डित मोतीलालजी सपत्नीक बैठ हुये लड़के के जुलूस को देख रहे थे, तो जवाहरलालजी श्री माता ने रुपयो की वर्षा करके अपने हृदय के उल्लास को प्रगट किया था। उस दिन माता को अपने पुन की तपस्या के कारण हुय सब क्लेश भूल गये थे। अधिवेशन में भी जवाहरलालजी को पूरी सफलता प्राप्त हुई। ३१ दिसम्बर को रात के १२ बजे ठीक एक वर्ष व्यतीत हो जाने पर कांग्रेस ने हर्पसूचक जयकारों के म य में इस श्राशय का प्रस्ताव स्वीकार दिया कि कांग्रेस का लक्ष्य भारतवर्ष के लिये पूर्ण स्वाधीनता प्राप्त करना है।

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(१०)
जेल के अन्दर और बाहर
अब हम जवाहरलालजी के जीवन के उस भाग पर आते हैं
जिसे हम उनका जेल जीवन कह सकत हैं। जेल तो वह इससे
पूर्व भी गये थे, परन्तु अब तो जेल उनका घर धनने वाला था।
जेल उनका स्थायी निवास स्थान बन रहा था और बाहर की
दुनिया कभी-कभी तफरीह का स्थान ।
लाहौर की कांग्रेस ने देश के वातावरण को खूब उत्तेजित
और जानदार बना दिया । जनता में जागृति पैदा हो रही थी। उस
में देश की स्वाधीनता के लिये कुछ न कुछ करने की इच्छा
हो गई थी। देश में क्रान्ति का सा वातावरण पैदा हो रहा था।
उत्पभ

७२ पं० जाहरलाल नेहरू यह तूफान, जो रात्री के तट पर एक हाथ भर का सा दिसाई देता था, शीघ्र ही श्राफाश मे फैलने लगा, यहां तक कि १६२६ की समाप्ति के पूर्व ही वह चारों दिशाओं में फैल गया। वह तूफान नमक सत्याग्रह क रूप में अवतीर्ण हुश्रा। महात्मा गांधी उस तुफान फे अगुवा थे। उन्होंने सच्चे सत्याग्रही की भांति मारत के वायसराय को सूचना दी कि या तो भारतवासियों की मांग पूरा करो, अन्यथा हम नमक कानून को तोड़ कर सत्या प्रह युद्ध को जारी कर देंगे । वायसराय का उत्तर तो निश्चित ही था । इन्कार पाकर महात्माजी ने युद्ध का शह यजा दिया और समुद्र तट पर नमक कानून को तोड़ने के लिये सत्याग्रहाश्रम से दगडी यात्रा प्रारम्भ कर दी । इस प्रकार वह संग्राम प्रारम्भ हुआ, निस ने ससार को अहिंसात्मक कानून-भग ये चमत्कार दिसा कर आश्चर्य में डाल दिया था। इलाहाबाद में अप्रैल १६३० के दूसरे सप्ताह में नमक- सत्याग्रह प्रारम्भ हुआ। १४ अप्रैल को जवाहरलालजी गिरफ्तार हो गये। जेल मे ही उनका मुकदमा हुआ। सत्याग्रह मे कोई सफाई तो दी ही नहीं जाती, फेवल वक्तव्य दिया जाता है । जज ने श्रापको दोपी ठगया और ६ महीने जेल की सजा दी। श्राप गिरफ्तारी के ममय कांग्रेस के प्रधान थे। अपने यीचे कार्य को चलाने के लिये आपने प० मोतीलालजी को प्रधान निर्वाचित कर दिया। यह भी मज़दार मामला हुआ कि लाहौर मे पिता ने ।

मव्याय पुत्र को कांग्रेस को गद्दी सौंपी थी, और भय पुन ने पिता को पापिस कर दी। प्रारम्भ में आपको अाले हा जेल में रहना पड़ा। परन्तु थोडे ही दिनों पीछे ५० मोतीलालजी और टा. महमुद भी उसी पैरफ मे श्रागये और इस प्रकार काफी रौनक हो गई । सत्याग्रह समाम की यह पहली सजा ११ श्रस्तृयर को समाप्त होगई और आप जेल से रिहा हो गये। परन्तु देर तक यादिर रहना असम्भव था। समाम जारी या, और जराहरमालनी संमामकाज में चुप हाकर नहीं बैठ सकते | आपको क्या इवना समय मिला कि मसूरी जाकर अपने बीमार पिता को देस मफत ! जब आप तीन दिन के पीले मसूरी से लौट रहे तो पहले देहरादून में और फिर मस- नऊ में सरकारी नोटिस भापके पीछे-पीछे घूम रहा था। इलाहा- बाद श्राकर प्रापका इतना ही अरसर मिला कि प्रांत + किसानों की एक विराट् सभा करफ उन्हें करबन्दी का आदेश दे मकें । अभी जेल से आये हुये मेले कपडे घुलने भी न पाये थे कि येवल ८ दिन पाहिर रह कर आप फिर गिरफ्तार कर लिय गये, और नैनी जेन में पुराने साथियों के पास भेज दिये गये। इस बार आपको लम्बी सजा दी गई। २ वर्ष की सख्त जेल और ७००) जुर्माना, जुर्माना न देने पर ५ महीने की और जेल । प्रकार सम मिला कर २ साल ५ महीने की सजा हुई।

- ५० जवाहरलाल नेहरू परन्तु यह सजा पूरी नहीं भोगनी पडी । १६३१५ प्रारम्भ में भारत का यातावरण मरकार और पामेस में मुह की यात चीत क समाचारों से भर गया था। प्रारम्भ स्थिर से हुई, यह मालुम नहीं, परन्तु उस वातचीत का श्रेय प्राय सर तैनबहा- दुर सप्त भौर मि० जयकर को ही दिया गया। यह जोडा सप्रू जयराम से मशहूर हो गया था ! उपर पं० मोतीक्षालनी फा स्वास्थ्य प्रतिदिन गिरता जा रहा था। पिता की धीमारी और सुजह की बातचीत का महारा रोकर सरकार ने २६ जन- वरी १६३१ क दिन जवाहरलालजी को रिहा कर दिया। १६३१ का धर्ष थायसराय और. महात्मा गांधी की सुबह को यातचात, तथा मधि और गोलमेज कान्फरेन्म में सम्मिलित होने के लिये महात्माजी की विलायत-यात्रा में व्यतात हो गया। इधर जवाहरलालजी को पहले पिता की और कमजाजी की बीमारी की चिन्ता में व्यस्त रहना पड़ा। पं० मोतीलालजी की ६ फरवरी को मृत्यु हो गई। उसके पीछे स्वास्थ्य सुधार के लिये जवाहरलालनी न पत्नीसहित सीलोन की यात्रा की, जिससे दोनों क स्वास्य को बहुत लाभ हुआ। १६३१ की समालि होने से पूर्व ही दश का वातावरण फिर गर्म होने लगा। महात्मानी गोलमेज़ कान्स से विलकुल निराश हो कर भारत लौट रहे थे | इधर सरकार का दमन- घर सरहद मे, बगाल में और अन्य स्थानों पर भी पूरे जोर अध्याय १० से घूम रहा था। संयुक्त प्रान्त में रिसानी की ऐसी दुर्दशा थी कि जवाहरलालजी नतृत्व म कांग्रेस ने उन्हें करबन्दा की सलाह दी थी। ऐसी दशा में देर तक जवाहरलालनी स्वतन्त्र कैसे रह सकत 4। महात्माजी क भारत में पान से पूर्व ही सरकार ने सग्राम की रंगस्थली तय्यार कर दी थी। जवाहर- लालजी को श्राज्ञा दी गई कि वह इलाहायाद म्युनिसिपलिटी की सीमा से बाहर नहीं जा सस्ते। जवाहरलालजी मला ऐसे प्रतिबन्ध फो कहां मह सकत थे ? उन्होन डिस्ट्रिक्ट मेजिस्ट्रेट को जिस दिया कि मैं तुम्हारी आज्ञा की उपेक्षा करूंगा, और २६ दिसम्बर को मि० शेरवानी और वह घम्बई का टिकट लेकर रज पर सवार हो गये, तथा गिरफ्तार कर लिय गये। मि० शेरवानी को जिस जुर्म मे ६ महीने की जेल की सजा मिली, जवाहर- लालजी उसी अपराध में २ वर्ष कारागार क अधिकारी समझे गये । ५००) जुर्माना भी मांगा गया था । इस बार प्रारम्भ मे यह परली के जेल मे रखे गये और फिर गर्मी के दिनों मे देहरादून तबदील कर दिये गये । सजा के शेप दिन आपने वहीं व्यतीत क्येि, और माता की सस्त पीमारी क फारण ३० अगस्त १९३३ ५ दिन, समय से पूर्व ही वह रिहा कर दिये गये। आन्दोलन शिथिल हो चुका था और सरकार भी ढीली पड गई थी, इससे आशा थी कि शायद इस बार जवाहरलालजी ५० जवाहरलाल नेहरू 1 परन्तु यह सजा पूरी नहीं भोगनी पड़ी। १६३१५ प्रारम्भ मे भारत का वातावरण सरकार और कांग्रेस में मुजद की बात चीत क समाचारों में भर गया था। प्रारम्भ घिर मे हुई, यह मालूम नहीं, परन्तु उस यातचीत का श्रेय प्राय मर बहा दुर मधु और मि० जयकर को ही दिया गया। यह जोडा मधु जयकर के नाम से मशहूर हो गया था। उधर पं० मोतीजालनी का स्वास्थ्य प्रतिदिन गिरता जा रहा था। पिता फी यीमारी और सुजद की बातचीत का सहारा लेकर मरकार न २६ जन- परी १६३१ के दिन जवाहरलालजी को रिहा कर दिया। १६३१ फा यष वायसराय और महात्मा गांधी की मुजह की यातचीत, तथा मधि और गोलमेज पान्फरेन्स में सम्मिलित होने के लिये महात्माजी की विलायत-यात्रा में व्यतीत हो गया। इधर जवाहरजालना को पहले पिता की और फमझाजी । की बीमारी की चिन्ता में व्यस्त रहना पड़ा। पं. मोतीलालनी की ६ फरवरी को मृत्यु हो गई। उमझे पीछे स्वास्थ्य सुधारक लिये जवाहरलालनी ने पलीसहित सीलोन की याना की, जिससे दोनों के स्वास्थ्य को बहुत लाभ हुआ । १६३१ को समाप्ति होने से पूर्व ही दश का वातावरण फिर गर्म होने लगा। महात्माजी गोलमज कान्स से बिलकुल निराश हो कर भारत जौट रह थे । इधर सरकार का दमन- चर सरहद में, घंगाल में और अन्य स्थानों पर भी पूरे जोर श्रयाय १० से धूम रहा था। संयुक्त प्रान्त में किसानों की ऐसी दुर्दशा थी कि जवाहरलालजी के नेतृत्व में कांग्रेस ने उन्हें वर-वन्दा की सलाह दी थी। ऐसी दशा में देर तक जवाहरलालनी स्वतन्त्र कैसे रह सकत थे। महात्माजी के भारत में पान मे पूर्व ही सरकार ने सग्राम की रंगस्थनी तय्यार कर दी थी । जवाहर- लाननी को श्राज्ञा दी गई कि वह इलाहावाद म्युनिसिपालिटी की सीमा से बाहर नहीं जा मफत । जवाहरलालजी भला ऐसे प्रतिबन्ध को कहाँ सइ सफत थे? उन्होने डिस्ट्रिक्ट मैजिस्ट्रेट को लिख दिया कि मैं तुम्हारी श्राज्ञा की उपेक्षा करूंगा, और २६ दिसम्बर को मि० शेरवानी और वह वम्बई का टिकट लेकर रल पर सवार हो गये, तथा गिरफ्तार कर लिये गये। मि० शेरवानी को जिस जुर्म में ६ महीने की जेल की सजा मिली, जवाहर- जाजजी उसी अपराध मे २ वर्प कारागार के अधिकारी समझे गये । ५००) जुर्माना भी मांगा गया था। इस बार प्रारम्भ में वह परजी के जेल में रख गय और फिर गर्मी के दिनों में देहरादून तबदील कर दिये गये। सजा क शेष दिन आपने वहीं व्यतीत पिये, और माता की सरत वीमारी के कारण ३० अगस्त १६३३ ५ दिन, समय से पूर्व ही वह रिहा कर दिये गये। आन्दोलन शिथिल हो चुका था और सरकार भी ढीली पड गई थी, इससे आशा थी कि शायद इस या' THIS

७
Mor
पं० जवाहरलाल नेहरू
को शीघ्र जेज न जाना पड़ेगा, परन्तु जबाहरलासनी देश की
परिस्थिति से परशा घ और सरफार जवाहरमामजी की
पढ़ती हुद साम्यवादी प्रवृति से परशान थी। देर तक निर्वाह
होना कठिन ही था। १५ जनवरी को निहार में भूकम्प हुआ।
आप अपनी माता के स्वास्थ्य के सम्बन्ध में अच्छे साफ्टरों
की सलाह लेने फलकने गये ध। वहीं मापने एक व्याख्यान
में वर्तमान परिस्थिति पर अपने विचार प्रकट किये । कसकते
से श्राप पटना गये और वहां से या० राजेन्द्रप्रसाद पे साथ
जाकर मुरम्प पीडिस स्थानों का निरीक्षण किया। मुंगेर में
तो थापन फावडा उठा कर वपहरात को सोदने का काम भी
जारी कर दिया था। इस प्रकार भूकम्प पीड़ितों की सेवा क
काय फो सचेत करके आप इलाहाबाद पहुचे ही थे कि पुलिस
का अफसर गिरफ्तारी का परवाना लेकर आ पहुचा और जवा-
हरलालनी गिरफ्तार पर कलकत्त ले जाये गये। गिरफ्तार
कलकत्ते के मापण पर ही हुई थी। यह गिरफ्तारी १२ फरवरी
१६३४ को हुई।
इस धार फिर दो वर्ष जेल की सजा मिली। प्रारम्भ मे कुर
दिनो तक श्रापको अलीपुर जेल में रक्या गया, परन्तु जब यह
सास्थ्य निगड़ने लगा, तब ७ मई को देहरादून नेम मे मे-
दिये गये । जब कमलाजी अधिक रोगी हो गई, तब जवा
हरलालजी को फिर इलाहाबाद लेजाकर ११ दिन फलि

अध्याय १० रिहा किया गया। कमजाजी को जब डाक्टरों ने भुवाली के सैनीटोरियम मे भेजने की सलाह दी, तब उनके पास रहने के लिए जवाहरलालजी अलमोडा जेल में मेजे गये और फिर कमला जी का स्वास्थ्य अधिक ही अधिक बिगडदा गया, यहाँ तक कि उन्हें १९३५ के मई मास में इलाज के लिए यूरोप ले जाना पड़ा। योरप जाकर भी फमजाजी के स्वास्थ्य में कोई विशेष उन्नति न दिखाई दी, तब ३ सितम्बर १६३५ को सरकार ने जवाहरलालजी को अपनी पत्नी के पास विलायत जाने के लिए जेल से मुक्त कर दिया। अगले ही दिन ४ सितम्बर को आप हवाई जहाज से वियाना के लिए रवाना होगये। इस प्रकार १६३० और १९३५ के वीर में ५ वर्ष जवाहर- लालजी ने अधिकतर जेल में और कम समय बाहर व्यतीत किया। फिर कांग्रेस की गद्दी पर जवाहरलालजी पे वियाना पहुंचने पर यह प्राशा हुई थी किमलाजी का स्वास्थ्य सुधर जायगा, परन्तु प्रतीत होता है कि यीमारी गहराई तक पहुंच चुकी थी। उस पतिमा ने गृहस्थ-जीवन के १८ वर्ष जिन चिन्तामों और व्ययानों में व्यतीत किये थे, उन्हें आज प्रत्येक भारतपासी जानता है।

७६
५० जवाहरलाल नेहरू
जवाहरजाजनी का ६६ पीसदी हृदय देश को मिल चुका था।
पति चयन १ फीसदी वृदय मे क्या कोर युवती सुसी गह
मक्ती है ? परन्तु उस दयी के मुंह पर न कोई शिकायत थी,
और न उदासी । एक ही इच्छा थी कि पति के चरणचिन्हों
पर चल कर अपने जीवन को सफल बनाऊ, और यथासम्भव
पी की सेवा कर सई। एक मार जय सत्यामह में हिस्सा लेती
हुई श्राप गिरफ्तार हुई तो आपने दश के नाम जो संदेश दिया
था, इसमें कहा था कि श्रान मैंने अपने पति के चरण चिन्हों
पर चलन पी अभिशापा को पूरा कर लिया है । कममानी ने
देश को यहुत कुछ दिया था। अपना शरीर दिया, अपना मा
दिया, और सबसे उत्तम यस्तु जो उस मानिनी रमणी ने दी, यह
अपना सम्ब-अपना पति था। कमलाजी जवाहरलालजी के
सांप्रामिक मार्ग मे कभी एक नहीं बनी।
जर जवाहरलालमी क्मसाजी ये स्वास्थ्य सम्म में
बहुत चितित होन लगे, तर उनके सामने प्रस्ताव रखा गया
कि यदि दगड-काल में किसी राननीतिक काम में भाग न लेने
का वायदा करो, तो मुत्त दिये जा सक्त हो। उस समय निस
व्यक्ति ने श्राश्वासन देन का सब से अधिक विरोध दिया, वह
कमलाजी थीं । तेज़ घुसार म पड़ी थीं । इशारे से जवाहरलालनी
को पास बुलाया और कान पर मुह लगाकर कहा कि श्रासासन
देने की क्या बात चल रही है ? देसना, कोई श्राश्वासन न देना।"

अभ्याय १० n- ऐसी वीरांगना भाग्यों से मिलती है। ५० जवाहरलालजी भाग्यशाली हैं कि उन्हें प० मोतीलालजी जैसे पिता, श्रीमती स्वरूपरानी जमी माता और कमलाजी जैसी पत्नी मिली। कमलाजी का शरीर बहुत क्षीण हो चुका था। योरोप का । जलवायु, योरोप फी डाक्टरी का इलाज और पति की उपस्थिति भी उनरे जीवन को न बचा सकीं। वह देशभक्ता पतिपरायणा वीर रमणी २८ फरवरी सन् १६३६ के दिन इस लोक के बन्धनों से मुक्त होकर उस लोक में चली गई, जहां सती त्रियों का उचित स्थान है । पति के हाथों में प्राण-त्याग करना स्त्री का परम- सौभाग्य समझा जाता है । क्मलाजी को वह भी प्राप्त हो गया। इधर कांग्रेस का अधिवेशन समीप पा रहा था। देश को उसके लिये प्रधान का चुनार करना था। कुछ वर्ष पूर्व कांग्रेस फ प्रधान का चुनाव केवल एक रिवाजी वस्तु थी, परन्तु थन देश अपने राष्ट्रपति मे उसका सर्वस मांगता है। सही व्यक्ति रा- ट्रपति पद पर विठाया जा सकता है, जिस का एक २ क्षण देश पेअर्पित हो । इस दृष्टि में ही राष्ट्रपति का चुनार काफी कठिन काम था, परन्तु एफ और उलझन ने तो उमे यहुत ही विकट धना दिया था। महात्मा गांधी राजनीति से अलग हो चुके थे। गत १५ वर्षों तक उन्होंने कांग्रेस द्वारा देश को रिश्ती के चष्ट्र पो सम्हाला था । उनके नेतृत्व में देश ने बहुत उन्नति को, इसमें मन्देह नहीं परन्तु दो तीन वर्षों से महात्माजी, अनुभर पर रहे - vi

५० जवाहरलाल नेहरू
थे कि यह और देश पूरी वह एकमत नहीं रहे, इसजिये एक मार्ग
पर पस भी नहीं सकते । इन वर्षों में जो महानुभाष प्रधान पनवे
रहे हैं, वह महात्माजी के अनुयायी ही रहे है। इस वर्ष महालान
पन पर से अपना दाय छोड़ना चाहत थे, और देश मी परि
पर्तन के लिये उत्सुक था। ऐसे कठिन समय में महात्मा गांधी
की दूरदर्शिता और समझदारी ने देश की मुसीयव का हल पत
लाया। महात्मानी प्रधान पद के लिये जवाहरलाशनी का नाम
पेश दिया और देश ने उसे महर्ष स्वीकार कर लिया।
कमलाजी के धारोप मान को लेकर अकेले जवाहरलालजी
१० मार्च को अपने देश में वापस भा गये। राष्ट्र ने उनको
लखनऊ में होने वाली कांग्रेस के प्रधानपद को सुशोभित करने
के लिये चुनाव किया। राष्ट्र ने यह चुनाव बड़ी आशा
से
किया था। एक ऐसे सिंघये की जरूरत थी जो भूतकाल
जन्जीरों को तोड कर देश का नया रास्ता दिखा सके, जो १५
साम की लीक को छोड़ फर नई लीक पर चलने का साहम करे
और जो फांस को अमीरों के साथ २ गरीबों की, मजदूरों
और किसानों की भी प्रतिनिधि पना सके। देश जवाहरलालजी
से एक नये जोरदार तूफानी नेतृत्व की आशा राना था। हर्ष की
चाव है कि जवाहरलालजी भी देशफी इस भावना से परिचित है।

(११)
लखनऊ कांग्रेस
को प्रस का अधिवेशन लखनऊ मे अप्रैल (१६३६) के दूसरे
सप्ताह में होने वाला था। देश ने बहुत बडे अधिक मत से ५०
जवाहरलाल जी को उसके सभापतित्व के लिये निर्वाचित किया।
इतनी छोटी उम्र में ऐसे कठिन समय मे दूसरी बार राष्ट्रपति चुने
जाना कोई छोटी बात नहीं थी। यह सष्ट था कि देश को अपने
मुल्क के नेता पर अपरिमित विश्वास था । देश समझता था
कि वर्तमान भार में से वही नौका को निकाल सकेगा।
इयर प० जवाहरलाल जी एक कठिनाई का अनुभन कर रहे
थे। यह कई वर्षों तक भारत के राजनीतिक प्रवाह से अलग
--

-
प० जहरमान महात
यमग से रहे थे। या तो यह जम रहे या दिरा में। प्रय
जिन राजनीति का यह क्या कागजी अध्ययन हो कर मर में
जनता की अपनी दशा फा, और मस्मिन के वानरिक भाका
का ४६ व्यतिगत अनुभव नहीं था। दश ५ मा मे मिशन
तर का उन्हें असर नहीं मिला था।
इम प्रभाव की पूनि क जिरे मात्र मास प अन्त में दिल्ल
की कामेस की कार्यकारिणी का पर विशेष अधिवेशन सुतार
गया। दिल्ली उन दिनों भारतय मागरजीयन का पन्द्रर..
मना हुआ था। महात्मा गांधी हरिता पस्ती में ठहर हुए थे।
असेम्बली का अधिवेशन हो रहा था, जिस कारया स नई दिल्ली
में दश प राजनीतिक दिमाग परत्र होगह थे। उही दिनों
कापस कार्यममिति का अधियशन दिल्ली में घुला लिया गया।
५० जवाहरजामती प्रात काम एक्सप्रेस से दिल्ली पहुंचे।
दिल्ली निवासियों के हृदय अपने तपसी राष्ट्रपति म स्वागत
लिये उमड़े पड़ते शहर सजाया जा रहा था, और जलूस
पूरी तय्यारी हो चुकी थी, परन्तु ५० जवाहरलालजी का पली
वियोग से पिन हदय उम प्रदर्शन को सहने प लिये तय्यार ने
हुआ! जलूस का विचार छोड़ना पड़ा । श्राप ने फ्रज इत।
स्वीकार किया कि मोटर पर सवार होकर सारे शहर में से गुलप
गये, ताकि जनता सर्वथा निराशन हो।
की

अध्याय ११ ३ जगमग एक मताह तक हरिजन बस्ती में नेताओं का परा मर्श होता रहा । ५० जवाहरलालजी ने महात्मा गांधी, सर- रियल्लभभाई पटेल, पा० रागेन्द्रप्रसाद श्रादि सय नेताश्रो से वासपूर्वक वार्तालाप किया, और दश की दशा को जानन की ष्टिा की। देश भर की आँखें उन दिनों दिल्ली की ओर लगी हुई । अकस्मात् ५० मदनमोहन मालवीयजी भी दिल्ली पधार य, और चिडला हाउस मे ठहर | प० जवाहिरलालजी तथा न्य कांग्रेसी नेता पिडला हाउस मे जाकर माननीयजी से मिले, और नेशनलिस्ट पार्टी को कांग्रेस में मिला दने की सम्भावना (विचार किया। इस प्रकार देश की वर्तमान परिस्थिति से हुत पुछ परिचित होकर एक सप्ताह के पश्चात जवाहरलालजी उन कांग्रेस के लिये अपना प्रारम्भिक भाषण तैयार करने हायाद से रवाना हो गये। ६ अप्रैल को म्वराज्य भवन में कांग्रेस की कार्यसमिति का धिवेशन हुश्रा, उसमे को प्रेम के सामने आने वाले प्रस्तावों 'रूप निर्धारित क्यिा गया । इस समय तक ५० जवाहिरलाल अपने विचारों को बहुत कुछ स्थूल रूप दे चुके थे । कार्यसमि- ५ सामने जो प्रस्ताव पेश हुये, उन में से कई जवाहरलालजी दीर्घ चिन्तन के फल थे, उनमें से दो मुख्य थे। एक तो विदेशों राधीय आन्दोलन के समाचार पहुंचाने के सम्बन्ध में, और दूरों तथा किसानों के साथ पांग्रेस के सम्बन्ध को दंड पं. जवाहरलाल नेहरू करने क मम्बन्ध में। समिति में आपने आगामी शामनविधान : में को प्रेसी लोगों के प्रोहदे लेने का भी विरोध किया, परन्तु समिति उस ममय फाद आखिरी निर्णय करने को तैयार नहीं था, इसजिये मामला सलाई म पड गया । इशाहायाद में किंग कमी का जो अधिवशन हुआ, उसमें सब से पड़ी बात यह हुई कि पडितजा को अपनी स्थिति समझने का अवसर मिला। कार्य- समिति का अधिक मत पडितजी क विशेष-साम्यवादी प्रस्तावों का विरोधी था। उधर इलाहाबाद में कार्यसमिति कांग्रेस के प्रस्तायों की रूप रसा बनान म लगी हुई थी और इधर जपनऊ में राष्ट्रीय महा सभा अविवशन का रंगमञ्च तैयार हो रहा था। उसनऊ का अस की यारी में अनेक प्रकार के विघ्न उपस्थित हुए। स्वागत फारिणी क मार्ग में परस्पर झगड़ों के कारण पग पग पर विध उपस्थित होते रहे, परन्तु अन्त में गत वर्ष के राष्ट्रपति बायू राजे न्द्रप्रसाद पे प्रयल से रिश्ती भवर से निकल कर किनारे पे पास पहुच गइ, और अधिवेशन पी तारीख आते भाते का प्रेम पण्डान का ढांचा तैयार होकर सडाहो गया। ८ अप्रैल को मनोनीत राष्ट्रपति रज द्वारा लपनऊ पहुंचे। उसी दिन उनका जलूस निकाला गया। सनऊ वालो ने दिम सोल कर अपने सम्मानित और लाइले राष्ट्रपति का स्वागत किया, और जलूस निकाला। शहर तोरणी और निरगी पता-

निवाचिनी सभा ने श्रापका साथ दिया, परन्तु कई विषयों पर
अध्याय ११
कानों से खूब सनाया गया था। उस ननाची शहर ने नवापी
सजघर से देश के हृदय सम्राट का अभिनन्दन किया। पडितजी
की इच्छानुमार उनका जलुस पैदल ही निकाला गया था। कुछ
देर तक तो वह पैदल जलूस अच्छे सिलसिले से चला, परन्तु
एक वो जनता की दर्शाभिलाषा, और दूसरे नियन्त्रण का
प्रभाव-शीन ही पैदल जलूस असम्भव होगया। धक्के पर
धक्का पड़ने लगा, और अन्त मे पडितजी को घोडे पर सवार
शेना पडा । सार शहर मे घूम कर यह जलूस नामधारी जन
- समूह कांग्रेस-पण्डाल में पहुचा, और वहां कौमी नारे, और
महात्मा गाधी तथा जवाहरलाल के जय-जयकारो में तितर नितर
होगया । जलूस के समय में बहुत गर्द था, और उससे भी बहुत
शोर था, और उस गई तथा शोर में जो एक वस्तु असन्दिग्ध
रूप में चमक रही थी, वह जनता का प० जवाहरलाल से अगाध
४ दिन तक कार्यसमिति और विषय निर्वाचिनी समिति का
दौर रहा । कांग्रेस के खुले अधिवेशन के लिये प्रस्तावों का निर्माण
होता रहा। इस प्रसग में वह पार पडितजी को प्रधान की हैसि-
यत से अपने विचार प्रकट करन पडे । आपने अपने विचार बडी
सष्टता से कहे। उनका मुकाव साम्यवादी था। प्राय विषय
प्रेम था।
।
१६ आपके साथ सहमत न हो सकी। विषयनिर्वाचिनी ने
+

प० जवाहरलाल नेहरू मापकी वात को सदा मादर से सुना, परन्तु सम्मति लेने क समय सतना से काम लिया। १२ अप्रैल को पां प्रेम का पुजा अधियशन प्रारम्भ हुआ। ५० जयाहरजालजी समापतित्व न उस अधिवेशन की शान को दुगुना कर दिया था। जनता में उत्साह भी था और उसुकता भी। जगभग एक लारा दर्शकों व जय-जयकार के मध्य में प० जवाहरनाजनीन दूसरी यार को प्रेस को गद्दी को सम्भाला। श्रापका प्रारम्भिक भाषण भपन टग का अनूठा था । उसमें आपने अपने हृदय को खोलकर रख दिया था। यह ठीक है कि उसमें जवाहरलालनी एक राजन तिक दार्शनिक के रूप में दिखाई धत है, व्यावहारिक राजनीतिक के रूप में नहीं, परन्तु स्मरगा रखना चाहिये कि दार्शनिक नीव के बिना कोई राजनीतिज्ञ बहुत उची सतह तक नहीं जा सकता। फेवल व्यापार की सफलता पर जीने वाला राजनीतिक नेता जाति की फिरती को दूर तक नहीं ले जा सकता महात्मा गांधी की यही निशेषता है कि उनकीरान- नीति की नींव एक गहर तत्वज्ञान पर है। प० जवाहरलालजी यो अपने अनुयायियों से ऊचा याने वारनी वस्तु भी यही है कि उन की नीति पर दाशनिक भित्ति पर सड़ी हुई है। प्रारम्भिक भापण में, आपने अपने व्यवहार की भित्ति का जिर स्पष्ट और विशद निषेचन कर दिया था। यह भाषण अधिक्त रूप से परिशिष्ठ में दिया गया है।

त
सुने रिलेशन ममी मान मी प मैपीमार
किनारे, जिसमें नितिन पर शिया मा!!
ममें से साय ऐसेय,सिर १० प्रमादरमालती की
बाम थी विरों में प्रकाशन समान्य में जो धीमा सिपा
माया, मह पसिनी यामाहामा दीपायगाantar
নাময় ঘিীবিদায়ীসগ্রী বিষাখা।
अनवा क मम्यन्य के साथ कांग्रेस सम्पन्ध फो भधि
काने के उपायों पर विचार करने के लिये जो फमेटी मनाई गई
श्री, उसका नाम भी पsिtी मे ही रमा था। शेष प्रस्ताव
माय माझी थे, जिन्हें मुरानी कार्यसमिति स्वयं उपस्थित परमी ।
पनि सर्वथा पं० सवाशाली हाथ में शताशो मनाया
माई मरियान हो जात, परशु अग्यिा भागीय ममिनि और
प्रतिनिधि गगन में मासमिति का पहप था, इम कारण
अन्वायर्यो पर राष्ट्रपमिमी अयाट मुहर लग ममी।
ऐमी पशा में यदिको माधारण व्यक्ति हो आता सो उम्मक
मन पर कामा बगना, और इस प्यपदार में जिमना
मा जानी ! म प समाहरलालजी की महत्ता कसपमै पढ़ा
चिन्द मममता कि TET प्रत्यक्ष में हिमाई रयानी
अांशिक
निको पानी प्रानिक शनि म मनमारती
दुई-मपात में पति या प्रेम क मा को प्रापन
जना का शल्य AREILर, समिर मुकाम स्वीकार किया

प० जवाहरलाल नेहरू देशभक्ति के रस से सराबोर एक विशाल भात्मा क लिये ही यह सम्भव था। कांग्रेस के अधिवेशन में कई बार ऐसा प्रसङ्ग पाया कि अ० भा० समिति या खुले अधिनेशन ने राष्ट्रपति के स्पष्ट निर्देश को स्वीकार नहीं किया, परन्तु राष्ट्रपति ने राष्ट्र के हरेक निर्देश को सुले दिल से स्वीकार किया। यह घटना ५० जवाहर- जामनी के जीवन में सब से अधिक बल अक्षरों में लिसी जायगा। असिज भारतीय समिति और खुले अधिवेशन में भी कई छोटी छोटी ऐसी घटनायें हुई, जिनसे प० जवाहरलालजी के चरित्र की विशेषता ही प्रकट होती थी । पण्डित जी अधीर है, और यही एक गुण उन्हें अपने समय र अन्य नेताओं से अलग करता है। यह राष्ट्रीय सेना की वर्तमान चाल से सन्तुष्ट नहीं । पह उस तेन करना चाहत है। युवक भारत में उसकी लोक- प्रियता का यही मूल कारण है। यह अधीरता कोई प्रागन्तुक चीज़ नहीं, यह पडितजी ये परित्र का एक टुण्डा है । यदि कोई पता आपकी राय में चतुझा योजता हो, या कोई गजन बात कर रहा हो, तो भाप उसे याश्त नीं कर सकत ।-उसे रोप देत है। यदि वह फिर भी जारी रहे, तो श्राप सभापति के प्रासन पर से उठ कर उस मामने पड़े होकर भी उसे रोक देने में अपनी हाक नहीं ममझते । इसे साधारण व्यवहार से पसन्द नहीं किया जाना, परन्तु भाप सापारणा है पहा ? *-

कंग कमेटी में पंडितनी ने कुछ प्रतिनिधि साम्यवादी दल मे मी
६
साधारणत लखनऊ का मेस के निश्चय से देश सन्तुष्ट था,
भिर गाडी को सफलता से चला सकेंगे या नहीं ? क्योंकि
= निश्चय पूर्णरूप से पडितजी को अभिमत नहीं थे। नई
अध्याय ११
भाउडस्पीकर के माइक्रोफोन को ठीक करने के लिये एक
गरीगर म्टज के पास खड़ा रहता है, परन्तु आवश्यकता होने
रमाए उसकी इन्तिजार नहीं करते । सभापति फ भासने पर
उठ कर स्वयम् ही माइक्रोफोन को ठीक करने लगते हैं।
नापका मत है कि जो काम हम कर सकते हैं, उसे दूसर पर ही
यो छोडें । आपका मत ठीक भी है । दूसरा सभापति सोयेगा
माइक्रोफोन को ठीक करने में मेरी हेठी होती है, परन्तु
वाहरलालजी अनुभव करते हैं कि मेरी ऊंचाई इतनी काफी है
: माइक्रोफोन को छूने से कम नहीं हो सकती।
कई वर्षों के निरन्तर जेलवास और प्रवास के कारण घाहिर
असली जगत से जवाहरलालजी कुछ दूर से हो गये थे।
साऊ की कांग्रेस ने वह दूरी दूर करदी। आपने श्रसजी जगत
अनुभव किया । आपने देश के लोकमत की तत्कालीन दशा
ठीक तरह देखा और समझा । उससे श्राप सचाई ५ अधिक
मीप पहुच गये, और आगामी वर्ष नेतृत्व करने के अधिक
-ग्य होगये।
"
m
न्तु कुछ लोग यह सन्देह प्रकट करते थे कि पं० जवाहरलालजी
m

६०
प० जवाहरलाल नेहरू
-
ले जिये थे, परन्तु तो भी अधिक अंश तो पुराने कांग्रेसियों का
ही रहा । सन्देह था कि यह लोट, देर त साथ साथ चल
सफेगा या नहीं?

ए. (१२) १६.३६ को प्रेम के जीवन में १६३६ का वर्ष अप्रैल के तीसरे सप्ताह में प्रारम्भ हुभा । उस वर्ष का अवतार सन्देहभरी आशा में हुआ। कांग्रेस की यह पद्धति रही है कि वर्ष का राष्ट्रपति कांग्रेस की नीति का प्रतिनिधि और पकील होता है । गया- कांग्रेस को छोड़ फर अन्य किसी अपरार पर भी कांग्रेस और इस सभापति में मनभेद नहीं हुआ ! खाऊ में यह स्पष्टता से दिखाई दे रहा था कि राष्ट्रपति में और प्रतिनिधियों के बहुमत में कई आवश्यक विपयों पर भिन्नता है। जो नई कार्यससमिति बनी, उसमें भी अधिक संख्या उन्हीं लोगों की

पं० जवाहरलाल नेहरू
जवाहरलालजी के खुले और निरन्तर साम्यवाद के समर्थन को
हानिकारक या कम से कम अनावश्यक समझते थे।
यह कौन नहीं जानता कि स्पष्टवादिता १० जवाहरलाल
का विशेष गुण है। यह किसी नीति या डर से प्रेरित होक
अपनी सम्मति को दवा नहीं सकत । लोगों का सन्देह था रि.
आपका कार्यसमिति के साथ निबाह होगा या नहीं।
दूसरी ओर भाशा भी यहुत थी। भारतवर्ष प्राशाभरी दृष्टि
से आपके नेतृत्व की ओर दस रहा था। राजनीतिक वायु
मण्डल में पतझड का सा समा बध रहा था। वसन्त की श्राव
श्यकता थी, जिसकी श्राशा फेवन प० जवाहरलालजी में थी।
इसे सदा ५० जराहरलालजी की महानुभावता का सबूत
मममा जायगा कि आपने लोगों के सन्देहों को निम्न सिद्ध
करके प्राशाओं को बहुत दूर तक पूरा कर दिया । वर्ष के अन्त
में जब हम इस वर्ष के राजनीतिक जीवन पर दृष्टि डालते हैं तो
हमें कहना पड़ता है कि आपने वर्षभर में चमत्कार कर दिया
है। तीन वर्ष पूर्व तक कांग्रेस के प्रधान का पद एक श्राभूषणे
समझा जाता था। बा० राजेन्द्रप्रसाद ने एक नया माग निकाला,
और. एक नया रिवाज़ फायम किया। आपने अपनी कमजोर
सेहत की पर्वा न करते हुए वर्षभर देश मे दौरा जगाया,
और
कोने कोने में जाकर राष्ट्रीयता की जोत जगाई, जिससे देश में
गर्मी कायम रही। ५० जवाहरलालनी ने उसी पद्धति का मा

प्रध्याय १२
६३
करण किया, और वर्षभर अथक फाम रिया। केवल ८ महीनों
के कांग्रेमी वर्ष में आपने जितना काम किया, उतना शायद ही
कोई दूसरा आदमी काम कर सकता। भारत पे प्राय हरेक
प्रान्त में दौरा लगाया, फांस के सम्पूर्ण प्रबन्धसम्बन्धी कार्यों का
निरीक्षण किया, थीसियों जम्बे छोटे वक्तव्य निकाले, और
सम्पूण राजनीतिक जीवन का मार्ग प्रदर्शन किया, और यह सब
काम ऐसी सुन्दरता से किया कि सन्देहशील लोगों के सब
सन्देह दूर हो गये।
वह दौरे भी अन्ठे थे । समाचारपत्रों ने उन्हें तूफानी दौरे
लिसा है, परन्तु यह शद भी उनकी पूरी शान का वर्णन नहीं
कर सकता। तुफान कुछ घण्टों के लिये प्राता है, महीनों तक
जारी नहीं रहता। यदि यह तूफान ही था, तो वहुत लम्या और
असाधारण तूफान था । एक एक दिन में बीस बीम जल्से, और
सन में व्याख्यान, मुबह के ६ बजे से रात के ११ बजे तक
भागदौड और परिश्रम, २४ घपों मे सैकडों मीलों का
मोटर का भ्रमण, और इसी काम को ८ महीनों तक जारी रक्सा
-स्या यह कार्य साधारण इच्छाशक्ति द्वारा पूरा हो
सकता था?
मागडोर को
रातदिन दौरे पर रहते हुए भी आपने देश की राजनीतिक
ढीला नहीं होने दिया । उसे बडी सावधानता
अखा। कोई ऐसी घटना हुई कि जिस पुर
श्रीर

६२
५० जनाहरलाल नेहरू
गाइरनामनी में खुले और निरन्तर साम्यवाद के समर्थन को
हानिकारक या कम से कम अनावश्यक सममले थे।
यह कौन नहीं जानता कि सटवादिता पं. जवाहरलाणवी
फा विशेष गुण है। यह किसी नीति या हर से प्रेरित होकर
अपनी सम्मति को दया नहीं सक्त । लोगों का सन्देह था कि
आपका कार्यसमिति क साथ शिवराह होगा या नहीं।
दूसरी भोर माशा मी यहुत थी। भारतर्प भाशाभरी दृष्टि
से भापके नेतृत्व की ओर दस रहा था। राजनीतिफ वायु
मण्डल में पतझड़ का सा समा यंघ रहा था। वसन्त की भाव
श्यकता थी, निराकी पाशा पवन प० जवाहरलालजी मे थी।
इस सर्वदा ५० जवाहरलालजी की महानुभावता का सबूत
समझा जायगा कि आपने लोगो + सन्देहों को निमूल सिद्ध
करक आशाओं को यहुन दूर तक पूरा कर दिया । वर्ष के अन्त
में जब हम इस वर्ष ये राजनीतिक जीवन पर दृष्टि डालते हैं तो
हमे कहना पडता है कि भापने वर्षभर में चमत्कार कर दिया
है । तीन वर्ष पूर्व तक कांग्रेस के प्रधान का पद एक भाभूपण
समझा जाता था । बाय राजेन्द्रप्रसाद ने एक नया मार्ग निकाला,
और एक नया रिवाज़ कायम किया। आपने अपनी कमजोर
सेहत की पर्वा न करते हुए वर्षभर देश में दौरा लगाया,
कोने कोने में जाकर राष्ट्रीयता की जोत जगाई, जिससे देश में
गर्मी कायम रही। ५० जवाहरलालनी ने उमी पद्धति का अनु
और
-

और मजबूती से थामे रसा। कोई ऐसी घटना हुई कि जिस पर
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यागडोर को भी दीजा नहीं होने दिया। उसे पड़ी सावधानता
प्रयाय १२
६३
करण दिया, और वर्षभर प्रथक काम किया। फेवल ८ महीनों
के कॉमेसी वर्ष में आपने जितना काम किया, उवना शायद ही
कोई दूसरा आदमी फाम कर सकता। भारत के प्राय हरेक
प्रान्त में दौरा लगाया, काँग्रेस के सम्पूर्ण प्रवन्धसम्बन्धी कार्यों का
निरीक्षण किया, बीसियों लम्बे छोटे वक्तव्य निकाले, और
सम्पूर्ण राजनीतिक जीवन का मार्ग प्रदर्शन किया, और यह सब
काम ऐसी सुन्दरता से किया कि सन्दहशील लोगों के सब
सन्देह दूर हो गये।
वह दौर भी अन्ठे थे । समाचारपत्रों ने उन्हें तूफानी दौरे
निसा है, परन्तु यह शब्द भी उनकी पूरी शान का वर्णन नहीं
कर सकता । तूफान फुछ घण्टों के लिये पाना है, महीनों तक
जारी नहीं रहता । यदि यह तूफान ही था, तो बहुत लम्मा और
भसाधारण तूफान था । एक एक दिन मे बीस बीस जल्से, और
सन में व्याख्यान, सुबह के ६ पजे से रात फे ११ बजे तक
मागदौड और परिश्रम, २४ घण्टों मे सैक्डों मीलों का
मोटर का भ्रमण, और इसी काम को महीनों तक जारी रक्खा
था-क्या यह कार्य साधारण इच्छाशक्ति द्वारा पूरा हो
रातदिन दौरे पर रहते हुए भी प्रापने देश की राजनीतिक
सकता था।

१४
५० अशाइरसाल नेहरू
देश को मानप्रदर्शनी भावी, सोयापन उस पर
पषध्य कामना, या करितमिर्विका तार द्वारा उनपर
सन्नति धन में कमा विशम्प नहीं किया। अन्तराष्ट्रीय घटनारे
सापक रिचार के दायरे से पाहर नहीं रह सकी। श्री
सीनियर की स्वाधीनता पर इटाका भाममण स्पन में साम्य'
वार और सक्तिवाद का सर्प जैसी मर्चवा विदेशी घटनाओं पर
सम्मति प्रकट करने की भी आपने देश को समादी, और देश
ने भापको सलाह को माना ।
आप विचार साम्यवादी है। कार्यसमिति के विचार इससे
मिल है। इससे मय था कि शायद दोनों देर सकन निमा सका
परन्तु राष्ट्रपति के गद्दी पर बैठते ही मापने राष्ट्र की स्वाधीनता
को प्रचार और आन्दोलन का मुन्ध लक्ष्य बना लिया। आपने
अपने व्यारयानों में स्पष्ट रूप से यह पोपणावरदी मि हमारा
पटना काम राष्ट्रीय स्वाधीनता प्राप्त करता है, जब हम साधीन
हो जायेंग, तर माम्यवादा सिद्धान्ता के अनुसार समाजको
साटन पाने का मन करेंग। इस पापसाने का मेन की आंतरिफ
प्रशाम्गि कोएर दम शान्त करा दिया और हमारी राष्ट्रीय सेना
एक इच्छा शक्ति से प्ररित होकर, हरपूरित जयकार घोस्ती
हुमागे बढने लगी।
दरा ने आपका भी स्वागत किया जनवाने जमा प्रमा
और सरकार इससे पूर्व लोकमान्य विजक और महामा गांवों के
ने
7

ध्रध्याय १२ निये प्रदर्शित किया था, वैसा ही ५० जवाहरलाल के लिये भी प्रदर्शित करके दिगा दिया कि बुढा भारतवर्ष अब भी अपने हित पर बलिदान करने वालों को पहिचानता और आदर दना जानता है। यह सत्कार न राजाश्रो को मिलता है, और न महाराजाओं को। वह तो केवल उन्हीं लोगों को मिल सकता है, को देश की स्वाधीनता के लिये अपने तन मन धन को स्थान करते हैं। मारतर्प अाज भी ऊचे श्रादर्शवाद और अदम्य साहस का मान कर सकता है, और यही वर्तमान घने अन्ध- कार में प्रकाश की एकमास रेखा है। इस वर्ष एक विशेप पात यह हुई कि आपका जो श्रात्मपरित प्रकाशित हुआ, यह प्रात्मचरित आपने जेल में मिला था। यह फेवन आत्मचरित' न होकर, अपने जीवामान की राजनीतिक घटनाओं का एक गहरा निरीक्षण भी है। उसे हम यदि १६३६ का सबसे महत्वपूर्ण प्रन्थ कडे, नो अनुपिा न होगा। भाषा में योज और प्रपाह । भावों में पूर्ति और प्रौढ़ता है। घटनाओं और यगियों पर नो मानतियां प्रयाशित की गा, यह ऐसी मार्मिक ६ कि उनसे किसी भी सामान होत हुये भी आप उग का सत्कार किये बिना नही रह सपत्त । ५० जवाहरलालमी पर भौतिक शरीर में गो मामा है, यह हा प्रारमचरित फी प्रत्येक रही है, यही कारण है कि पुस्सा इसी सोच- ६ पं. जवाहरलाल नेहरू प्रिय हुई है। वर्ष भर में इसके कई मस्करण प्रकाशित होकर विक बुरे हैं। - तीसरी बार राष्ट्रपति आठ मास क निरन्तर प्रयत्न से प० जवाहरलालजी ने देश मे एक अद्भुत स्मृति पता कर दी है। आजादी का शव यजा फर आपने सोतों को जगा दिया। जहाँ भीड पडी, पहा पहुचे, और जिस अग में निर्मलता दसी, उसी को सभालने का प्रयत्न किया | थाठ ही महीनों म यह दशा हो गई कि लोगों को जवाहरलालजी को राष्ट्रपति मममन को श्रादत-सी पड गई। अब वह जवाहरलाल और राष्ट्रपति इन दो शब्दों को पयायवाची सा समझने लगे हैं। एक और भी बात है ! रोगी का जैसा रोग हो, वैसी दुका दी जाती है। देश की दशा वैसी ही है, तो उसका उपाय भी वही होगा। देश की जो दशा १६३६ के चौध भाग में थी, १२३ भाग में भी लगभग वही दशा है। कोई भाग- मणात्मक जगी कार्यक्रम हमारे सामने नहीं, महात्मा गांधी राज' नीतिक सभाम का सेनापतिल दाइ चुरे हैं । देश साम्राज्यविरोधी भावनाओं से भरपूर है, धारामभार्था चुनाव में कांग्रेस हिस्सा लेन का निश्चय कर चुकी है, जिस के लिये मन दलों का एक मापडे फनीचे खडे रहना श्रावश्यक है। ऐसी दशा में देश अध्याय १२ को ऐसे सेनापति की आवश्यकता है, जो समर्थ हो, जानदार हो, तजस्वी हो, का मेस में विद्यमान भिन्न भिन्न दलों को एक छन. छाया नीचे ना सफे। यह कार्य ५० जवाहरलाल जी जितना अच्छा कर सकते हैं, इस समय उतना अच्छा दूसरा कोई व्यक्ति नहीं कर सकता। इस कारण, जय वर्ष के अन्त में यह प्रश पैदा हुआ कि १६३६ के लिये राष्ट्रपति की गद्दीपर क्मेि निठाया जाय, वो देश ने बहुत लगभग सर्वसम्मति मे नेहरूजी को यह सम्मान रदान किया। राष्ट्रपति पद के चुनाव के लिये मैदान में तो पई नेता जाये गये, परन्तु प्राय उन सभी ने अपने नाम वापिस ले लिये। इस प्रसग मे कुछ ऐसी भी बातें होगई जो न होती तो अच्छा होता । पहले यह भ्रान्ति पैदा होगई कि प० जवाहरलालजी नये वर्ष में राष्ट्रपति नहीं रहना चाहते । उसके निवारण के लिये नेहरूजी ने एक वक्तव्य निकाला, जिसमें यह प्रकट किया कि यदि उन्हें राष्ट्रपति चुना गया, तो वह इन्कार नहीं करेंगे। उस वक्तव्य ये कुछ शब्दों से यह भ्रम पैदा होगया कि आप अपने राष्ट्रपति पद पे लिये चुनाव को साम्यवाद के पक्ष में देश का मत प्रदर्शन समझेंगे। इस पर देश में बहुन यचैनी सी उत्पन्न होगई, क्योंकि दश राष्ट्रपति का चुनाव क्वल साम्यवाद के पक्ष पर ही नहीं करना चाहता था। देश जिस व्यक्ति से वर्षभर सब से अधिक सेवा लेना चाहता है, उसे राष्टपति बनाता है। यह 4. हरदा नहर घुनाय किसी एक सावि रिशेप के फारय नहीं होता। उसमें पहजी सेवाये, व्यापत्य और समय की आयत्यता-दाममी पातों का ध्यान रहता है। पर पं. जवाहरजाजी को मालूम हुआ कि उनय पाय से फिर एक युक्ति पैदा हुई है नो इशेने एक वरव्य निकाला निमसे यह स्पष्ट कर दिया कि उनका यह भाशय नहीं था कि उन्हें राष्ट्रपति पद के लिये पुराना माग्यवाई का समर्थन करता है। यह यदि राष्ट्रपति पुो गये, तो उसी नीति पर कार्य करेंगे, जिस पर १९३६ में करते रहे हैं। आप १६३६ में देश को यह सन्देश दते रहे हैं कि सब गीण भेदों को गुजा कर पूर्ण स्वाधीनता २ नाम पर एक हो जायो । १६३६ में भापका यही जगीनारा रहा है और आगामी वर्ष भी यही रहेगा। इस वक्तव्य के निकलने पर कोई श्रम शेप 7 रहा । अन्य उम्मदवारी ने अपने नाम वापिस ले लिये और प० जवाहरलाल- जी १६३७ ५ लियें निविरोध रूप से राष्ट्रपति चुने गये।

--
१
परिशिष्ट
पं० जवाहरलाल नेहरूका अभिभाषण *
(अभिभापण के कुछ श्रावश्यक अश)
पाद बहुत बरसों के में आज फिर इस जगह से श्राप के
सामने हाजिर हुआ है, बहुत यरस जो कि झगडे और
कशमकश और श्राम मुसीबत से भरे थे। हमारे लिये फिर से
मिज़ना अच्छा है। मेर जिये एक इतना बड़ा जमाय अपने
पुराने साथियों और दोस्तों का देखना अच्छा है । हम लोग
तो ऐसे मजबूत बन्धनों में एक दूसरे से बंधे हैं जो टूट नहीं सकत ।
में फिर से उस पुरानी हिम्मत की मालक को महसूस करता हू
और आपकी अजहद मेहरवानी और मुहब्बत का अनुभव करता
हूँ । मेर लिये तो सप से चंडी खुशकिस्मती यही है कि एक
* यह भाषण लखनऊ कांग्रेस के सभापति पद से दिया गया था।

प० जवाहरलाल नेहरू
पड़ी भानादी की लड़ाई में मैं भाप सप लोगों के साथ एक
सिपाही की ईमियत से रहा । आप लोगों को देखकर मरी हिम्मत
पढ़ती है और घन मिलता है, हालांकि इस मजमे में भी मुझे
बुद्ध परेमापा मालूम होता है। कितने ही हमारे प्यार साथी
और दोस्त हमें छोड़ कर चल दिये। लड़ाई और फ्शमकश की
सकलीफ से व इस दुनिया में मामूली निदगी के दिन पूर नहीं
कर सके। एक के बाद एक वे चले जाते हैं और हमारा दिल
सूना हो जाता है और मन दुस से भर जाता है। शायद अपनी
मिहनत क याद उनको शान्ति मिलती है और यह मुनामिन भी
क्यांकि ६ इसका हक रखत थे। बहुत कुछ करने के बाद
घे
आराम करत हैं।
मैं परशानी की हालत में और एक थर हुए पन्चे की तरह
से भारतमावा की गोद में गान्ति की सोज मे आया हू । यह
सांत्वना मुझे भरपूर मिली। हजारों ने प्रेम और मुहरत से भर
हुए हाय मेरी तरफ बढाये, करोडों ने अपने प्रेम का सामोश
सन्देश मेरे दिल को मेगा । किस तरह से मैं आपका शुमिया
अदा कर, हिन्दुस्तान पे रहनेवालो, से अपने दिन के गहरे
भानों को शन्दों में आपके सामने रयू ?
अन्तर्राष्ट्रीय परिस्थिति
हम अपनी कौमी लडाई में भम्न थे और जो शफल उसने
अग्टितयार की, उस पर हमारे महान नेता और हमार राष्ट्रीय म्व

दिवसाई देती थी। महायुद्ध मे टूटा हुआ यूरोप अपने फों
होमी लडाई कलिये उससे मना सावरा चाहें तो हमे पूरे दृश्य
जो दसगे कि ऊपरी फरक होत हो भी सब के बीच में ऐसा
गर म इस चन्दबनी सम्बन्ध को एकवार पहिचान में तो
परिशिष्ट
१०१
माव की जबरदस्त छाप थी। हमें इस बात का सयान भी बहुत
कमया कि बाहर की दुनिया मे क्या हो रहा है। लेकिन हमारी
कड़ाह उस यडी आजादी की लड़ाई का एक हिस्सा थी और जो
हाकन हमें हिना रही थी ,वे दुनिया भर मे और करोड़ों लोगों को
भी हिला रही थीं और उनमे तरह तरह के काम करवा रही थीं।
धारा एशिया, भूमध्यसागर में लेकर जापान तक, इम्मामी पश्चिम
से धौद्ध पूर्व तक हिल गया था। अफ्रीका में भी यह नई रूह
सभालने की कोशिश कर रहा था और यूरोप से एशिया तक एक
पडे हिस्से में सोवियट मुरक बहुत दुश्मनों का मुकाबला करके
काशिश कर रहा था कि एक नई इनसानो की आज़ादी र खयाल
को और ममाज की चरारी क भाव को फैलाये। इस दुनियां
भर की श्राजादी की लडाई के बहुत हिस्से थे' और बहुत शकले
कीं। और इन फौंको देखकर हम गलतफहमी हो जाती थी और
म नहीं समझ सकते कि मव की बुनियाद एक ही है । लेकिन
मगर हम इस भेद की असलियत को समझना चाहें और अपनी
से समझने की कोशिश कसी चाहिये। अगर हम ऐसा करेंगे
जो अवस्थायी व मदलन पर भी कायम रहता है।
म्यधरहा,

१०२
पे० जवाहरजाज ाहरू
दुनिया की शामत सममान में हम, सहन न्यासानी होगी,
और हमार कौमी मसलों का दुनिया-क मसलों में जो स्थान है
मह भी हमठीक तौर से विवाद बने सगा | मय हमरस
मात-को समझेगे कि हिन्दुस्तान और हिन्दुस्तान के पासले को
हम यामी दुनिया से अलग नहीं कर सकत । अगर अलगाकरें
तोहम उनसनी ताक्तों को भूल जाते है, जोकि मम्मकतारे
इतिहास को बना रही हैं, और उनसे जो ताकत बढ़ती हैजससे
पी को भागग कर-दत हैं। ऐसा करने से मोहमपनों
की अहमियत तक मो नहीं समझ सकत और अगर इसे हास
वो मसलों को हल से करेंगे ? म छोटे छोट सवालोम और.
मगों मे, जैसे कि हिन्दू मुस्लिम -सवाल है, भूले भतको की
सरह-रह-जाते हैं और बडे मामलों को निकाल भूल जाते हैं ।
हम अपनी ताकत को जाया करत है (जैसे हमार मरमादा के
माइ) कानूनी पचीदगियों में और हुमत क तरीकों की
महसमें।
भारत और साम्यवाद
इस तरह हम देखते हैं कि प्राजक्ताकी दुनिया मे तो बड़े
बड़े गिरोह है। एक तरफ माम्राज्यवाद और फामिन्टवाद और
दूसरी तरफ समाजयार और राष्ट्रवाद । कहीं कहीं ये एक दूसरः
से कुछ मिजत से मालूम होत हैं और उनको एकदम अलग करना

परिशिष्ट मुश्किल है क्योंकि फासिस्टवाद और साम्राज्यवाद के देशों में आपस का विरोध है और पराधीन देशों का राष्ट्रवाद कभी कभी थोडासा फासिस्टवाद का रूप ले लेता है। लेकिन असल फर्क तो इन दोनों गिरोहों में है, और अगर हम इसे याद रखें तो दुनिया की हालत और उसमें अपना स्थान समझने में हमे श्रा- सानी होगी। हम लोग जो आजाद हिन्दोस्तान के लिये कोशिश कर रहे है, कहाँ है ? जाहिर है कि हम दुनिया की आगे बढ़ने वाली उन ताकतों के साथ हैं जो साम्राज्यवाद और फासिस्टवाद के खिलाफ खडी हैं। हमको भारत में एक साम्राज्यवाद का यानी अग्रेजी साम्राज्यवाद का सास मुकाबला करना है । यह सब से पुराना है और आज की दुनिया में सब से ज्यादा फैला हुआ है । पर ताकतवर होते हुए भी वह दुनिया के साम्राज्यवाद का फेवल एक अग है और यही हिन्दुस्तान की पूरी आजादी और उसका सम्बन्ध ब्रिटिश साम्राज्य से तोड़ने के लिये आखिरी दलील है। भारत के राष्ट्रवाद में, भारत की आजादी मे और ब्रिटिश सा- म्राज्यवाद मे मैल की गुन्जाइश नहीं है। और अगर हम इस साम्राज्यवाद के फन्द मे फसे रहेंगे तो हमारा नाम और हमारी हैसियत चाहे जो रहे, और ऊपर उपर चाहे जितनी राजनीतिक ताकत हमे मिल जाय, दरअसल हम बधे ही रह जायगे, पीछे घसीटने वाली ताकतों से हमारा सम्बन्ध बना रहेगा और

१०४
पं० अपारिजाल नेहरू
पूजीवाद का माजी स्वार्थ हमें याता रहगा, आम जनता की
परयादी इमी तरह जारी रहगी और हमारा कोई जरूरी सामा
जिक मसला हल न हो पायेगा। सच्ची राजनीतिक आजादी भी
कभी न मिल सकगी, और गडी बडी सामाजिक वयदीलिया तो
हम कर हीन सकेंगे।
जाती आजादी का प्रभाव
एक पास पर मैं जरूर कुछ कहना चाहता है, क्योकि यह
ऐसी बात है जिसे मैं निहायत जरूरी समझता हू, और जिसकी
मेरे दिल में यही कदर है। यह यह कि हमारे मुल्क में जाती
आजादी पिलकुल ही छीन ली गयी है। जिस हकूमत को प्रिमि
नल मा अमेंडमेंट ऐक्ट और ऐसे कानूनों पर भरोसा करना पड़ता
दै, जो छापाखानों और किताबों को दवाती है, जो सैकडों संग
ठनों को गैरकानूनी फरार दे सकती है, जो पिता मुकदमा
चलाये लोगों को कैदखानों में बन्द रखती है, और जो वह सब
कार्रवाइयां कर सकती है जिन्हें हम अपन मुल्क में आज देख
रह है, उस हुकूमत को कायम रहने का कोई हक नहीं है। मैं
अपने आपको ऐसी हालत के अनुकूल नहीं था सस्ता । मैं
इसे नाकाविल-पदाश्त समझता हू । तिस पर भी मैं दखता हू
म मेरे पहुत से दशवासी उससे मुश हैं। कुछ उसकी मदद भी
करत हैं और कुछ की तो ऐमी भादत होगयी है कि जप ऐसे

परिशिष्ट
१०५
मसले पेश होते हैं तो वे भाराम से बीच में पैठे जाते हैं, न
इधर राय रखते हैं, न उधर । मैं अक्सर यह सोचता है कि उन
लोगों में और मेरे ऐसे ख्याज के लोगों में किस तरह मेल हो
सकता है। हम कांग्रेसवाले ऐसे सब सहयोग का स्वागत करते
है जो भारत की आजादी की लडाई मे मिल सकता है। हमारा
दरवाजा ऐसे लोगों के लिये बराबर बुना है जो आजादी ये
तरफदार हैं और साम्राज्यवाद के विरोधी हैं । लेकिन हम
साम्राज्यवाद के दोस्तों और दमन के तरफदारों को नहीं पाहत
और न हम उन्हीं को साथ ले सकते हैं जो जाती भाजादी को
दबाने में मिटिश हुकूमत का साथ है। हमारा इनका रास्ता
अग अलग है । हम एक दूसर के विरोधी है।
आम लोगों का सहयोग
हमारे लिये खास मामला यह है कि आजादी की लड़ाई में
हम किस तरह से मुल्क मे सामाज्यवाद की मुसालिफ सप
साकतों को इफट्ठा कर सकते हैं, और हम किस तरह से साधारण
जनता को और मध्य श्रेणी के बड़े हिस्से फो, जो आजादी
चाहता है, एक साथ लाकर आजादी की लड़ाई के लिये खडा
कर सकते हैं। कभी कभी मिलकर मुगविला फरने की बात
होती है, लेकिन जहाँ सफ मैं समझ सकता हू इसका मतलब
यही है कि ऊपर के लोगों में किसी तरह का मेल कर लिया

१०६
६
पै० जवाहरलाल नहर
जाय जिससे मुमकिन है कि अवाम को नुकसान पहुंचे। कमिस
का ऐमा पयाल कभी भी नहीं हो सकता और अगर वह इसका
साथ दे तो वह सन लोगों को पोका देगी निनफे फायदे के लिये
जड़ने का उसका दावा है, और फिर उसके जिन्दा रहने की ही
कोई यजह न रह जायगी। सय के मिलकर मुकाबिला करने का
मतलब सो यही हो सकता है कि सामाज्ययाद की मुरगमिफत
हर तरह से की जाय और इसमें ताकत पाने के लिये किसानों
और मजदूरों का भमजी नौर से साय देना लाजिमी है।
शायद आप लोगों को ताज्जुब हो रहा हो कि मैंने इतने
तफसील से राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय मामलों की बुनियाद का
जिक क्यों किया है और अभीतक उन मसलों की चर्चा भी नहीं
की है जो आपके दिमाग में हैं। मुमकिन है कि आप लोग
उकता गये हो । पर मुझे यकीन है कि अपने मसला को देखन
का ठीक तरीका यही है कि हम उन्हें दुनिया के पर्दे पर ठीक
स्थान पर रस कर देखें । मेरा यही यकीन है कि दुनिया की
घटनाओं का आपस में एक बहुत घडा नजदीकी ताल्लुक है।
हमारे राष्ट्र का मसला दुनिया के पूजीवाद-सामाज्यवाद के
मसले का फेवल एक अंग है। अगर हम हरएक घटना को एक
दूसरी से भाग पर दखेंगे, और उनके बीच के सम्बन्ध को नहीं।
सममेंगे, वो हम गलत राय कायम करेंगे।

परिशिष्ट समाजगाद कर मुझको यकीन है कि दुनियां के मसलों और हिन्दुस्तान के मसलों को हल करने का मिर्फ एक तरीका है और वह समाज- वाद है। अब में इम लफ्ज को इस्तमाल करता हूँ तो उम इन्सान परस्ती फ मदिग्ध मानी में नहीं लेकिन वैज्ञानिक और आर्थिक मानी मे इस्तेमाल करता है। साथ ही समाजवाद एक आर्थिक सिद्वान्त से ज्यादा मानी रसता है। वह जिन्दगी का एक चुनियादी उसूल है और इस वजह से भी वह मुझे अपनी तरफ खींचता है। सिरा समाजवाद के में कोई दूसरा तरीका नहीं देसना जिससे अपने हिन्दुस्तानी भाइयों की गरीबी, राजय की बेकारी, गिरी हुई हालत और गुजामी हम दूर कर सकते हैं। म नहीं कह सकता कि यह नयी व्यवस्था हिन्दुस्तान में क्य और कैसे श्रावेगी । म सोचता है कि हर मुल्क अपने तरीके पर और ऐसे रूप में उसे अपनायेगा जो उसकी फौमी जहनियत के मुताविक हो । पर उस व्यवस्था के उनियादी उसूलों को कायम रखना होगा और सारी दुनिया की उस व्यापक व्यवस्था फे साथ जुटाये रखना होगा जो मौजूदा अतरी और पदनजमी की हालत में पैदा होगी। इस तरह समाजवाद मरे लिये सिर्फ एक आर्थिक सिद्धान्त की बात नहीं है जिसे मैं पसन्द करता हु, बल्कि वह मेरे लिये

१०८
पं० जवाहरलाल नेहरू
एक जीवित धर्म है जो मेरे दिमाग और दिक्ष की चीज है । मैं
हिन्दुस्तान की आजादी को हासिल करने के लिये कोशिश इस
लिये करता हू, कि मर भीतर का फौमी जजया विदेशी हुमत
का बरदाश्त नहीं कर सकता। इससे भी ज्यादा मैं उसके लिये
कोशिश इस वजह से करता है कि सामाजिक और आर्थिक
व्यवस्था में रद्दोबदल होने के लिये यह एक जरूरी कदम है।
मैं चाहता हू कि कांग्रेस समाजवादी संस्था हो जाये और दुनिया
की उन ताक्र्ता के साथ हाथ मिलाकर आगे बढे जो नयी तह
जोय के लिये काम कर रही हैं। लेकिन यह भी महसूस करता
ह गि आज कांग्रेस की जैसी धनारट है उसमे ज्यादातर लोग
इतनी दूर जाने के लिये तैयार नहीं होंगे। हम एक राष्ट्रीय
मस्या 4 लोग हैं और हम राष्ट्रीय सतह पर ही सोचते तथा
काम करत हैं।
गौ मैं इस मुल्क में समाजवाद की बढ़ती दिल से पाहता
इ, पर मेरी यह इच्छा नहीं है कि मैं को प्रेस में इस सवाल को
जबर्दस्ती उठाकर अपनी आजादी की लडाई क रास्ते में दरदुर्द
पदा करू | मैं अपनी सारी ताकत से उन सब लोगों के साथ
सुशी उशी शिरकत करूंगा जो आजादी के लिये काम कर रहे
हैं, फिर चाहे वे समाजवादी सिद्धान्त से इस्तिजाफ ही क्यों न
रयत हों।

परिशिष्ट १०६ खदर कांग्रेस की मौजूदा विचारधारा में समाजवाद किस प्रकार सगत है ? मैं समझता हू कि वह उससे असगत है । मैं मुल्क मे क्ल-कारखानों की तेजी से पढती होने में विश्वास करता हू, और मैं समझता हू कि लोगों को रहन सहन को ऊंचा करने तथा गरीबी से लड़ने का सिर्फ यही एक तरीका है। फिर भी मैंने श्राज्ञ से पहले कांग्रेस के सादी के प्रोग्राम मे दिली शिरकत की है और मैं उम्मीद करता है कि प्रागे मी मैं ऐसा ही करूँगा, क्योंकि मैं विश्वास करता हूँ कि हमारी मौजूदा माली हालत में म्यादी और देहाती उद्योग धन्धों का एक मास स्थान है। उनकी एक सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक कीमत है जिसे नापना बहुत मुश्किल है पर यह उन लोगों की निगाह मे साफ है जिन्होंने उनके असर को देखा है। नया शासन-विधान अब में उस सवाल पर आता हू जो शायद आप लोगों के दिमाग में भरा हुआ है। वह है निटिश पार्लमेपट का बनाया हुश्रा हमारा शासन-विधान और उसके सम्बन्ध में हमारी नीति । यह एक्ट को मेस फे पिछले इजलास के बाद बना है, फिर भी उसी समय सफे कागज के रूप में हमें इसका बुद्ध जायका मिल गया था। इसकी धाराधों के सम्बन्ध में को प्रेस के सभापति के प० जवाहरलाल नेहरू मह न पद पर आसीन हमार पूर्ववर्ती ने अपने प्रेनिरेन्शल एड्रेस में जो उत्तम विवेचना की है उससे बढिया आलोचना मैंने नहीं दसी है। कांग्रेस ने उस प्रस्तावित विधान को ठुकरा दिया और उससे कुछ भी ताल्लुक न रखना तय किया। नया एस्ट, जैसा कि सब को नालूम है सफेद कागज से भी गया बीता है और हमारे नरम मे नरम तथा पूँक पॅक कर कदम रसने वाले राज- नीतिज्ञों तक ने उसकी निन्दा की है। प्रत जब हमने सफेद गज को ही ठुकरा दिया है तब गुलामी के इस नये परवाने मे हमारा क्या सबन्ध है जो साम्राज्यशाही के बन्धनों को मजबूत करने और हमारी यरीध जनता को और चूसते रहने के लिये धना है। थोडी दर म जिय अगर हम उसकी बातों को भूल भी जाय तो क्या हम उस अपमान और उस चोट को भी भूल सरने हैं जो उसके साथ साथ जगी है ? हमारी इच्छाओं का बुरी तरह ठुकराया जाना, नागरिकों की आजादी का युचला जागा और यह फैला हुआ दमन, जो हमारे सिर पर पड़ा, क्या मुलाया जा सश्ता ? अगर वे हमे इस येइज्जती के साथ स्वर्ग का तान भी दते तो क्या हम उसे अपनी कौमी हज़त और स्वाभिमान के विरुद्ध समझ कर ठुकरा न दते ? तब इसकी क्या रिसात है? इम विधान की ओर हमारा माव सिर्फ एक ही हो सकता है और यह है हमेशा विना किसी कसर के विरोध करते रहना और

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११२ प. जवाहरलाल नेहरू चुनाव में भाग धुनापों में हिस्सा लेने की हमारी दुसरी खास वजह यह होगी कि हम कांग्रेस के सन्देश को मासों वोटरों और करोडौं गैर-वोटरों तक पहुचा दें और उन्हें अपने प्रोपाम और नीति को बता दें ताकि जनता यह समझ ले कि हम न फेवल उनके लिये खडे हैं बल्कि हम उन्हीं में से हैं और उनके सामाजिक सया आर्थिक योमो को हटाने की उनकी कोशिशों में उनके साथ सह- योग करना चाहत हैं। हमारी अपील और हमारे सन्देश केवल वोटरों तक ही परिमित न होगे, क्योंकि हमे यह याद रखना चाहिये कि हमारे करोडों भाइयों को बोट दन का हक नहीं है और उनको ही हमारी मदद की सबसे ज्यादा जरूरत है, क्योकि ये हमारे समाज को सबसे नीचे की सतह पर है और वे शोपण से सब से ज्यादा तकलीफ पा रहे हैं। पद-ग्रहण का प्रश्न स्वाभिमान की बात तो रहने दीजिये, यह मामूली समझ की भी बात है कि नये प्रानून के अनुसार सरकारी पद ग्रहण करने से हमारा नुकसान ज्यादा है, फायदा कम । हम उससे ज़्यादा फायदा उठा नहीं सकते। अगर ऐसा है, तो उस कानून के खिलाफ जो टीका की जाती है वही गलत ठहोगी, पर हम जानते हैं कि वह गलत नहीं है, ठीक है। जिन बड़ी चीजों के

परिशिष्ट
लिये हम कोशिश कर रह हैं, जो महान् उद्देश्य हमारे सामन
हैं व फीके पड जायगे और हमारा सारा ध्यान छोटी मोटी
पानों में लग जायगा तया समझौतों और मज़हनी झगडों के
जगन में हम अपने आपको सो यैठेगे, और जिस भ्रम मे हम
फौग यही सार मुल्क में छा जायगा। अगर कौंसिनों में हमारा
बहुमत हो, और सिर्फ उसो हालत मे वजारत लेने का सपाल
सडा हो सकता है, तो सारी अवस्था ही हमारी मुट्ठी में श्रा
जायगी और हम पीछे हटने वालों और साम्राज्यवादियों को
उसमे फायदा उठाने से रोक सकेंगे। पद-प्रहण से हमारी असली
तारन नहीं बढेगी बल्कि वह ऐसी बहुत मी बातों के लिये जिन्हें
हम कनई नापसन्द करते है, जिम्मेदार बनाकर हमे कमजोर
जरूर कर देगी।
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और अगर हमारा अल्पमत हो तो सरकारी पद लेने का
सवाल ही पैदा नहीं होता । पर हो सकता है कि हम बहुमत के
पास पास हों और दीगर लोगों और अन्य समूहों के सहयोग से पद
महण कर सकते हों। लोगों की स्वाधीनता या आर्थिक या अन्य
प्रकार की मांगों के खास खास मौको पर हम औरों का हाथ
बेटा । यह यात चुरी नहीं है बशर्तेकि ऐसा करना हमार
सिद्धान्तों क रिपक्षाफ न हो। पर औरों के भरोसे सरकारी पद्
प्रहण करने से बढकर खतरनाक और नुक्सानदह दूसरी चन्द

११४ प जाहरणान नहरू ही बातों का रम्यान में कर सकता हूँ। यह हालत तो नाकामिल बरदाश्त हो जायगी। इससे मेरी यह कतई राय है कि कांग्रेस में लिये सरकारी पद प्रहया व पक्ष में राय देना, यहां तक कि उसयार में जरा भी इधर उधर करना, यडी भारी भूल होगी। हम एक ऐसे गळे में गिरेंगे जिसमे निकलना मुश्किल हो जायगा। व्यावहारिक रानीति, कांग्रेस की परम्परा तथा यह मनोवृत्ति निसे लोगों में पैदा करने की कोशिश हम करते आये हैं, यह सय इस विरुद्ध हैं। मनोविज्ञान की दृष्टि से, ऐसी रहनुमाई का नतीजा बहुत ही नुक्मानदेह होगा। अगर हम चाहत हैं--और जरूर चाहते हैं कि मुल्क में फ्रान्ति हो तो हमे लोगों में प्रान्ति की मनोवृत्ति पैदा करनी होगी, और जो जो पात इसमें बाधा है यह हमारे पक्ष के लिये भी घातक हैं। साम्प्रदायिक निर्णय शासन विधान के सम्बन्ध में एक और धात है जिस पर चडी बहस छिड़ गई है। यह साम्प्रदायिक निर्णय है। बहुतों ने इसकी निन्दा जोरों से की है, और मैं समझता हूँ कि ठीक की है। शायद ही किसी ने इसके लिये अच्छी बात कही हो। फिर भी इस बारे में मेरी अपनी नज़र औरों से कुछ अलग है। यह इस या उस फिरके को क्या देता है, इससे मेरा कोई सरो

परिशिष्ट
११५
कार नहीं है। मैं उसके बुनियादी खयालात को देखता है।
वह हिन्दुस्तान को, खासकर मजहबी बुनियाद पर, अलग
श्रग टुकड़ों में बांटता है और इस तरह जोस्तन्त्र और आर्थिक
नीति के प्रचार को बहुत कठिन बनाता है। सच तो यह है कि
साम्प्रदायिक निर्णय और लोकतन्त्र एक साथ नहीं रह सकते ।
मानना पड़ता है कि आजकल की हालत में, और जमतक हमारी
रामनीति पर मध्यवर्ग का प्रभुत्व है, तबतक साम्प्रदायिकता जड से
उसाडी नहीं जा सकती। पर मुस्लिम या सिख मित्रों के लिये
कुछ रियायत कर देना एक पात है, और इस बुराई को दूसरे
बहुत से फिर्को में फैलाना और इस तरह निर्वाचन दोनों और
कौसिलों को कई खानों मे घांट डालना बिलकुल दूसरी और
इससे बहुत ही ज्यादा खतरनाक बात है। यदि लोकतन्त्र सफल
होना है तो फिकाना बन्दोबस्त का नाश होना ही चाहिये, और
नाश होगा इसमें मुझे कोई सन्देह नहीं है। पर यह उन सपायों
से न जायगा जो इस लडाके विरोधियों ने अपनाये है। इन
उपायों से तो उस निर्णय के बने रहने में मदद मिलती है,
क्योंकि इससे एक ऐसी हालत पैदा होती है जिसमे आपस फा
मेंल हो नहीं सकता । मेर मत से इस सवाल पा सच्चा इस तो
तय होगा जन सप समूहों और मजहबो को एक-से लागू होने-
वाले, मजहबी और फिकाना सीमाओं को तोड़ने यारो भाथिका
प्रश्न जनता के सामने उपस्थित होंगे।

१ ६ पं०जवाहरलाल नेहरू रूम से सबक रूम प सम्बन्ध में पज साहवार की भाईक नद किताव निकली है जो बहुत अच्छी और मन पर गहरा असर डानने पाली है। उममें यह पढ़ कर पड़ी दिलचस्पी मालूम होती है कि किस तरह सारा सोवियट शासन विधान होकतन्य व्यापक और जीवित भाधार पर मनाया गया। रूम ऐसा देश नहीं माना जावा जहा पश्चिम ये ढग का मोफत व चालू दो, फिर भी सर्व- साधारण में लोकतन्त्र का असली रूप जितनी ज्यान मात्रा में वहां मौजूद है, धनना शायद ही और किसी दश में हो । यहाँ ये छलास गांरा और शहरों में लोकतन्त्र का जालमा फेला रएर की 'अपनी मोरियट (चायत) है, जिसमें हमेशा यह मुमाहिसे होते रहते हैं, जो नीति निर्धारित करन में मदद दते हैं और जो उपर की कमेटियों के लिये प्रतिनिधि चुना फरते हैं। नागरिकों की इस मस्था में १८ वर्ष में ज्यादा उन्न की सारी आयादी शामिल रहती है। एक और पडी सरया मान तैयार करने या उत्पन्न करने वाला की और एक तीसरी सस्या जो इतनी ही पडी है, माल की खपत करने वालों की है। इस तरह यहाँ परोडो स्त्री पुरुप यरायर सार्वजनिक मामलों पर यहस परते और देश के शासन में सुले श्राम हिस्सा लेते रहते हैं। ससार के इतिहास में लोकतन्न के तरीकों का ऐसा व्यावहारिक प्रयोग और कहीं नहीं हुआ।

परिशिष्ट इसमे शक नहीं कि यह हमारे यूते फ बाहर की पात है । इस के लिये हमार राजनीतिक और आर्थिक ढांचे मे ही नहीं, दूसरी मातों में भी रदोनदज की जरूरत है, तभी हम इसकी श्राजमाइश कर सकते हैं। फिर भी हम अपनी मौजूदा हालत में रूस की मिसाल से फायदा उठा सकते हैं और अपनी थोडी सी ताकत के मुताविक को मेस की छोटी संस्था में लोकतन्त्र के विकास की कोशिश कर सकते है और नीचे की कमेटी को जानदार पना सकते हैं। जनता के साथ सम्बन्ध बढ़ाने का एक और उपाय हमारे लिये यह है कि हम माल पैदा करने वालों का सद्गठन करें और फिर कांग्रेस के साथ उनकी सस्थाओं का ताल्लुक करा दें या दोनों में सहयोग कराने की कोशिश करें। लडाई के प्रोग्राम की चर्चा लड़ाई क प्रोग्राम की चर्चा भी इधर होती रही है। इसका ठीक ठीक मतलन क्या है, मैं कह नहीं सकता। अगर राष्ट्रीय पैमाने पर सीधी लड़ाई या सत्याग्रह छेडन से मराजय हो तो मैं कहूगा रि निकट भविष्य में मुझे इसकी कोई उम्मीद नहीं मालूम होती । जबार हम किमी यडे काम के लिये तैयार नहीं हो जाते, तब तक हमें कोरी डींग न होकनी चाहिये । हमारा काम इस समय यह है कि हम अपनी राजतियों को सुधारें, ११८ प० जवाहरलाल नेहरू M अपने चन्द भाइयों के दिमाग से अपने को हमेशा हारा हुमा समझने की मनोवृत्ति दूर करें और अपनी सस्था का ऐमा सगठन करें जिसमें जनता से उमका ज्यादा निम्ट का सम्बन्ध स्थापित हो और हम जनता में काम कर सकें। यह परत जल्द आ सकता है-शायद जितना हम समझते हैं उससे भी जल्द-जप हमारा इम्तिहान लिया जाय । भाइये, हम लोग उसकी तैयारी करें। सत्याग्रह या और कोई ऐसा भान्दोलन जम हम पाई तय अपनी इच्छा के मुताबिक शुरू या बन्द कर दने की चीज नहीं है, वह बहुत-सी बातों पर मुनहसर है, जिनमें से कुछ हमारे काव के बाहर हैं, पर इन दिनों में जब चारों ओर क्रान्तियां हो रही हैं और दुनिया में बार यार सकट पा रहा है, घटनाएं. अक्सर हमारे विचारों क बनिस्बत ज़्यादा तजी से आगे बढ़ रही हैं। हमे मौतें की कमी न पडेगी। भावी युद्ध और भारत दुनिया में लड़ाई छिडन की श्राशा फैल रही है और तरह वरह की खबरें उड़ाई जा रही हैं। इस खौफनाक खेल में हमारी जगह कहाँ है ? दुनिया पर यह जो श्राफत आने वाली है, उसमें हम कौन सा हिस्सा लेना चाहेंग? हम कह नहीं सक्ने । जो हो। साम्राज्यवादियों का मतलन पूरा करने के लिये हमें अपन आपको उनके हाथ की कठपुतली न बनने दना चाहिये । हम जडाई में परिशिष्ट शरीक होना चाहते है या नहीं, यह कहने का हक हमें हासिल होना चाहिये और विना हमारी मजूरी के हमारी तरफ से किसी तरह का सहयोग नहीं होना चाहिये । जब वह वक्त पायगा तब शायद हमे इस मामले में कुछ कहने का मौका न मिले, इसलिये कामेस को अभी से साफ साफ लफ्जों में कह देना चाहिये कि वह किसी भी साम्राज्यवादी जग में भारत के शरीक होने के खिलाफ है। हम ऐसे हरएक लड़ाई को सामाज्यवादी जग कहेंगे, जो किसी साम्राज्यवादी मुल्क की तरफ से छेडा जाय, फिर चाहे उसका मशा कुछ भी क्यों न बताया गया हो। इस वजह से हमें ऐसी लडाई से दूर ही रहना चाहिये और हिन्दु स्तानियों की जान व हिन्दुस्तान का पैसा उसमे वरषाद न करने देना चाहिये। हमारा कर्तव्य लेकिन कोई भी नेता चाहे वह कितना ही बडा क्यों न हो, केले सारा योग नहीं उठा सकता। हम सबको अपनी ताक्त और लियाफ्त के मुताबिक इसमे हिस्सा घटाना चाहिये और असहाय होकर किसी दूसरे के भरोसे नहीं बैठ रहना चाहिये कि वह हमारे लिये जा कर देगा। नता आते हैं और जाते हैं, हमारे बहुत से प्रिय कप्तान और साथी हम जल्दी ही छोडकर चले गये, लेकिन हिन्दोस्तान और उसकी आजादी की लडाई बराबर

५० जवाहरजाज
चली जा रही है। यह मुमकिन है कि हम में से बहुतों को और
तकलीफ सहनी हो या मर जाना दो ताकि हिन्दुस्तान जिन्दा रहे
और भाजाद हो। सम्भव है कि श्रम भी हमारा मजिले मक
सूद इम से दूर हो और हम खुशी खुशी अब भी रेगिस्तानों पे
बीच से सफर करना पड़े, लेरिन हमारे दिलों से हमारी
वह अमर श्राशा कौन छीन सकता है, जो अबतक धायन
फांसी के तख्त और असीम तरलीफो और दुसा के बाद में
पची हुई है ? हिन्दुस्तान के उस जजने को कुचलने का साहस
कौन करेगा, मो इतने बलिदानो के बाद बार बार जन्म लेत
* शुमम्

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Pt.jawahar Lal Nehru

Author
Shri Indra
Title
Pt.jawahar Lal Nehru
File name
Pt.jawahar Lal Nehru
Text
OCR done
Citation
1939
Published
2011/04
Publisher
Delhi,arjun Printing Press
Language
Sanskrit
Pages
136
Library
Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Classification
Literature
DLI number
552304
Barcode
4990010033049.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
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