Sanmati Library, Jaipur

Geetamrtatranginee

Raghunathprasad · 2009/09

PDF Proofread

Front matter

No text on this page.

A
Kau
जकाश

No text on this page.

NCIC
12.sी
श्री।
गीतामृततरंगिणी
श्रीमत्सुकुलसीतारामात्मज पंडित
रघुनाथप्रसादजीकृत।
/14
श्रीमद्भगवद्गीताकी भाषाटीतकालय
सम्मति
१828
DONATED
MATARAN
CHARIZARE
2.ċċ. NOT
HEA
लाला
जयपुर
खेमराज श्रीकृष्णदास
नगर,
निज श्रीवङ्कटेश्वर" स्टीम् समे
छापकर प्रकाशित किया।
संवत् २०२३ शकाब्द १८८८
मुंबई.

मुद्रक और प्रकाशक- खेमराज श्रीकृष्णदास, अध्यक्ष-"श्रीवेङ्कटेश्वर" स्टीम्-प्रेस, बम्बई. पुनर्मुद्रणादि सर्वाधिकार "श्रीवेङ्कटेश्वर" मुद्रणयन्त्रालयाध्यक्षके अधीन है।

भूमिका। हम बडे आनंदसे सर्व सद्धर्मावलंबियोंको विदित करते हैं कि, यह "भगवद्गीता" ग्रन्थ सर्व लोगोंको धर्मग्रंथ शिरोमणि- रूपसे मान्य है। प्रायः समस्त सनातनधर्माभिमानी विज्ञलो- गोंको पाठ आता है. साधारणसे भी साधारण क्यों न हो एक आध श्लोकका तो मुखसे उच्चारण करता ही है. ऐसा इस ग्रंथका माहात्म्य है. यह क्यों नहीं हो कि, जो साक्षात् पद्म- नाम भगवान् श्रीकृष्णचंद्रजीने परम भक्त अर्जुनको श्रीमुखसे निरूपण करा है. जिसमें एकएक अक्षर तत्त्वज्ञानसे भरा हुआ है. ऐसा यह ग्रंथ है तो इसकी इतनी महिमा होना क्या आश्चर्य है ? यह ऐसी गीता सर्व उपनिषदोंके साररूप है। श्रीकृष्णजीने इसको निकाली है, अर्जुनजीने इसका प्रथम आस्वाद लिया है. इसके भोक्ता बुद्धिमान लोग हैं. यह परम पवित्र और चतुर्विध पुरुषार्थको सिद्ध करता है. ऐसा यह तत्त्वज्ञान महाभारतके भीष्मपर्वमें श्रीव्यासमुनिने ग्रंथरूपसे निरूपण किया है, यह ग्रंथ संस्कृतभाषामें रहनेसे इसका अर्थ समझनेमें सर्व साधारण लोगोंको पराधीन करता था. यह न्यूनता देखकर मैंने इस ग्रंथकी "गीतामृततरंगिणी" नामक भाषाटीका निर्माण करी. इसको प्रथम आवृत्तिमें अन्यत्र छपवाया था वह आवृत्ति हाथोंहाथ बिकगई. इस वास्ते अब इस भाषाटीकाका रजिस्टरी हक सदाहीके लिये यथोचित पारि- तोषिक पाकर बड़े उत्साहसे श्रीमान् सेठ खेमराज श्रीकृष्ण- दासजी "श्रीवटेश्वर" छापाखानाके अधिपतिको निवेदन

किया है. उन सेठ श्रीखमराज श्रीकृष्णदासजीने यह ग्रंथ परम
उत्साहसे अपने "श्रीवेङ्कटेश्वर" छापाखानामें सुन्दर मनोहर
अक्षरों में पुष्ट चिकने कागजपर छाप' सिद्ध किया है.
अब हम आशा रखते हैं. कि, इस अलभ्य मनोहर भाषा-
टीका समेत पुस्तकको संग्रह करके भगवदुक्त तत्त्वज्ञानको
पाकर परम आनंदका विद्वान् अनुभव करेंगे.
सुकुल सीतारामात्मज
• पण्डित रघुनाथप्रसाद.

युद्धप्रसंग अर्जुन # गीतामूर्ति. जय विजय VID: अथ श्रीमद्भगवग्दीतार्थवाङमयी मूर्ति वाणि पंच जानीहि पंचाध्यायाननुक्रमात् । दशाध्याया भुजाश्चैकमुदरं दौ पदांबुजे ॥१॥ एवमष्टादशाध्यायी वाङ्मयी मूर्मिरेश्वरी। जानीहि ज्ञानमात्रेण महापातकनाशिनी ॥ २ ॥ इस मूर्ति अंक डालनेका मतलब यह है कि जिस जिस अध्यायके जो जो अंग है उन उन अंगोंमे उन उन अध्यायोंके अंक लिखे है।

-
पितली
मशतका
अर्जुनः
तस्ततः
ताता

अथ श्रीभगवद्गीतामाहात्म्य। भाषाटीकासहित। ऋषिरुवाच । गीतायाश्चैव माहात्म्यं यथावत्सूत मे वद । पुराणमुनिना प्रोक्तं व्यासेन श्रुतिनोदितम् ॥१॥ नत्वा रामानुजं कृष्ण गीताचार्य जगद्गुरुम् । गीतामाहात्म्यसव्याख्यां कुर्वे प्राकृतभापया ॥१॥ अनेकप्रकारकी कथा सुनते सुनते शौनकऋषि सूतजीसे प्रश्न करते हुए कि हे सूत ? जो श्रीमद्भगवद्गीताकां वेदोक्त माहात्म्य श्रीव्यासजीने कहा है ( सो यथावत् मुझसे कहो) ॥ १॥ सूत उवाच । पृष्ट वै भवता यत्तन्महद्गोप्यं पुरातनम् । न केन शक्यते वक्तुंगीतामाहात्म्यमुत्तमम् ॥२॥ शौनकका. प्रश्न- सुनके सूतजी बोले कि जो तुमने मुझसे पूछा, वह अतिगोप्य एवं प्राचीन है; अतः गीताका, अतिउत्तम माहात्म्य कोई भी कहनेको समर्थ नहीं है ॥२॥ कृष्णो जानाति वै सम्यक् कचित्कौन्तेय एव च। "व्यासो वाव्यासपुत्रोवा याज्ञवल्क्योऽथ मैथिलः ॥३॥ सम्यक् प्रकारसे तो कृष्ण ही जानते हैं और किंचित् अर्जुन तथा व्यासजी,शुकदेवजी,याज्ञवल्क्य अथवा जनक जानते हैं॥३॥ अन्ये श्रवणतः श्रुत्वा लोके संकीर्तयन्ति च। "तस्मात्किचिवदाम्यद्य व्यासस्यास्यान्मया श्रुतम् ॥ और जन कानोंसे सुनके लोकम वर्णन करते हैं, परंतु जा- नते नहीं, इससे जैसा मैंने श्रीव्यासजीके मुखारविंदसें सुना है वैसा कुछ थोड़ा कहूँगा॥४॥ . .

(२)
गीतामाहात्म्य।
सोपनिषदो गावो दोग्धा गोपालनन्दनः।
पार्थों वत्सः सुधीभॊक्ता दुग्धं गीतामृतं महत् ॥५॥
सर्व उपनिषदें तो गऊरूप हुईं; दुहनेवाले श्रीकृष्ण और
बछरारूपी महात्मा अर्जुन प्रथम पान किये, पीछे यह गीतारूप
दूध अतिमिष्ट लोकमें प्रकट हुआ ॥ ५ ॥
सारथ्यमर्जुनस्यादौ कुर्वन् गीतामृतं ददौ ।
सर्वलोकोपकारार्थं तस्मै कृष्णाय ते नमः ॥६॥
जो भगवान प्रथम अर्जुनका सारथिपना करते करते सर्वलो-
कोंके उपकारके वास्ते अर्जुनको गीतारूप अमृत देते हुए ऐसे
आप श्रीकृष्णको मेरा नमस्कार है ॥ ६॥
संसारसागरं घोरं तर्तुमिच्छति यो जनः ।
गीतानावं समारुह्य पारं यातु सुखेन सः॥७॥
जो संसारपोरसागर तरना चाहता हो; वह गीतारूपी नाव
पर बैठके सुखसे पार पाता है ॥ ७ ॥
गीताज्ञानं श्रुतं नैव सदैवाभ्यासयोगतः।
मोक्षमिच्छति मूढात्मायाति वालकहास्यताम्॥८॥
जिसने गीतासंबन्धी ज्ञान सदा अभ्यासयोगसे नहीं सुना है
और वह मूर्ख मोक्ष चाहता है तो वह बालकोंकरके उपहासको
प्राप्त होता है ॥ ८॥
ये शृण्वन्ति पठन्त्येव गीताशास्त्रमहनिशम् ।
न ते वै मानुषा ज्ञेया देवा एव न संशयः ॥९॥
जो रातदिन गीता पढ़ते और सुनते हैं वे मनुष्य नहीं,
देवता ही हैं ऐसे जानना, इसमें संशय नहीं है ॥ ९ ॥
गीताज्ञानेन संवोध्य कृष्णः प्राह तमर्जुनम् ।
अष्टादशपदस्थानं गीताध्याये प्रतिष्ठितम् ॥ १०॥

भाषाटीकासहित। (३)
श्रीकृष्णभगवान् अर्जुनको गीताके ज्ञानसे संबोधन देकर
बोले कि इस गीताके प्रत्येक अध्यायमें अष्टादशपद (विष्णु)
का स्थान (परम पद ) स्थापित है ॥ १० ॥
मोक्षस्थानं परं पार्थ सगुणं वाथ निर्गुणम् ।
सोपानाष्टादशरेवं परं ब्रह्माधिगच्छति ॥ ११॥
हे अर्जुन | सगुण अथवा निर्गुण स्वइच्छाप्रमाण मोक्षस्थान
पर अठारह अध्यायरूप सोपानों करके परब्रह्मको प्राप्त होता
है ॥११॥
मलनिर्मोचनं पुंसां जलस्नानं दिने दिने ।
सकृद्वीताम्भसि स्नानं संसारमलनाशनम् ॥१२॥
जो प्रति दिन जलस्नान है वह मनुष्योंके शरीरमलका नाशक
है और एक बार भी इस गीतारूप जलका स्नान संसारदुःखरूप
मलका नाशक है ॥ १२॥
गीताशास्त्रस्य जानाति पठनं नैव पाठनम् ।
परस्मान्न श्रुतं ज्ञानं नैव श्रद्धा न भावना ॥१३॥
स एव मानुषे लोके पुरषो विड्राहकः।
यस्माद्गीतां न जानाति नाधमस्तत्परोजनः॥१४॥
जो गीताशास्त्रका पढ़ना पढ़ाना नहीं जानता है, न दूसरेसे
सुना, न जिसके श्रद्धा है और न भावना है वह पुरुष इस लोकमें
ग्रामस्करके समान है, क्योंकि जिससे वह गीता नहीं जानता
है इसीसे उसके सिवाय दूसरा अधम नहीं है ॥ १३ ॥१४॥
धिक्तस्य मानुषं देहं धिग्ज्ञानं धिक्लुलीनताम् ।
गीतार्थ न विजानाति नाधमस्तत्परो जनः॥१५॥
जो गीतार्थको नहीं जानता है उसके मनुष्यदेहको ज्ञानको
और कुलीनताको धिक्कार है और उससे अधिक कोई अधम
नहीं है ॥ १५॥

(8) गीतामाहात्म्य। धिक्सुरूपं शुभं शीलं विभवं सद्गृहाश्रमम् । गीताशास्त्रं न जानाति नाधमस्तत्पसे जनः॥१६॥ जो गीताशास्त्रको नहीं जानता है उसके सुंदर रूपको, सुंदर शीलको, विभवको और श्रेष्ठ गृहाश्रमको धिक्कार है और उससे अधिक अंधम दूसरा नहीं है ॥ १६ ॥ - धिक्प्रागल्भ्यं प्रतिष्ठां च पूजां मानं महात्मताम् । गीताशास्त्रे रतिर्नास्ति तत्सर्वं निष्फलंजगुः ॥१७n जिसकी गीताशास्त्रमें प्रीति नहीं उसकी हिम्मत, प्रतिष्ठा, पूजा, मान और महात्मापनेको धिक्कार है और उसका सर्व कर्म निष्फल है ॥१७॥ - धिक्तस्य ज्ञानमाचारं व्रतं चेष्टां तपो यशः। गीतार्थपठनं नास्ति नाधमस्तत्परो जनः ॥१८॥ जिसने गरितार्थका पठन नहीं किया उसके ज्ञान तथा आचार, बत, चेष्टा, तप और यशको धिक्कार है, उससे अधिक कोई जन अधम नहीं है ॥ १८॥ गीतागीतं न यज्ज्ञानं तहिल्यासुरसंज्ञकम् । तन्मोघ धर्मरहितं वेदवेदान्तगर्हितम् ॥ १९ ॥ जो ज्ञान गीताका. गाया नहीं है उस ज्ञानको आसुरी ज्ञान जा- नना, वह व्यर्थ और धर्मरहितं तथा वेदवेदांतकरके निन्दित है १९॥ यस्माद्धर्ममयी गीता सर्वज्ञानप्रयोजिका। सर्वशास्त्रमयी गीता तस्माद्गीता विशिष्यते ॥२०॥ जिससे कि गीता धर्ममयी और सर्वज्ञानोंमें प्रवृत्त करनेवाली भौर सर्वशास्त्रमयी है; इससे गीता सब शास्त्रोंसे श्रेष्ठ है ॥२०॥ योऽधीते सततं गीतां दिवा रात्रौ यथार्थतः । स्वपनाच्छन्वदंस्तिष्ठञ्छाश्वतं मोक्षमाप्नुयात्।।२१॥

भापाटीकासहित। (५)
जो निरतर रातदिन अर्थसहित गीताको सोते, चलते,बोलते और
खड़े होनेपर भी पढ़ते रहते हैं वे सनातन मोक्षको प्राप्त होते हैं ॥२१॥
शालग्रामशिलाग्रे तु देवागारे शिवालये।
तीर्थे नद्यां पठेद्यस्तु वैकुण्ठं याति निश्चितम्॥२२॥
शालग्रामके संमुख,देवमंदिरमें,शिवालयमें,तीर्थमें और नदी-
किनारेजोगीताको पढ़ता है वह निश्चय वैकुण्ठको जाता है ॥२२॥
देवकीनन्दनः कृष्णो गीतापाठेन तुष्यति ।
यथा न वैदैनिश्च यज्ञतीर्थव्रतादिभिः ॥ २३ ॥
जैसे श्रीदेवकीनंदन कृष्ण गीतांपाठसे संतुष्ट होते हैं वैसे वेद-
पाठ, दात, यज्ञ, तीर्थ और व्रतादिकोंसे नहीं संतुष्ट होते ॥२३॥
गीताऽधीता.च येनापि भक्तिभावेन चेतसा।'
तेन वेदाश्चं शास्त्राणि पुराणानि च सर्वशः॥२४॥
जिसने भक्तिभावपूर्वक चित्त लगाकरंगीताका अध्ययन किया
वह सर्व वेद, शास्त्र और पुराण भी पढ़ चुका ॥ २४ ॥
'. योगिस्थाने सिद्धपीठे शिष्टाग्रे सत्सभासु च ।
यज्ञे च विष्णुभवाग्रे पठन्याति परां गतिम् ॥२५॥
योगीके स्थानमें, विंध्येश्वरी इत्यादि सिद्धपीठमें, श्रेष्टपुरु-
षक समुख, साधुसभामें, यज्ञमें और विष्णुभक्तके संमुख पाठ
करनेसे जन मोक्ष पाता है ॥ २५ ॥...
६.गीतापाठं च श्रवणं यः करोति दिनेदिने।
क्रतवो वाजिमेधाद्याः कृतास्तेन सदक्षिणाः ॥२६॥
जो प्रतिदिन गीताका पाठ और श्रवण करता है वह सब अग्नि-
शोमादिक और अश्वमेधादिक दक्षिणासहित यज्ञ कर चुका॥२६॥
: यः शृणोति च गीतार्थ कतियेच स्वयं पुमान् ।
श्रावयेच्च परार्थं वैस प्रयावि परं पदम् ॥२७॥

१६) गीतामाहात्म्य।
जो गीताका अर्थ सुने और आप कहे दूसरोंको श्रवण कराव
ह परमपदको प्राप्त होता है ॥ २७ ॥
गीतायाः पुस्तकं नित्यं योऽर्चयत्येव सादरम् ।
विधिना भक्तिभावेन तस्य पुण्यफलं शृणु ॥२८॥
जो आदरपूर्वक नित्य गीताकी पुस्तकको विधिपूर्वक भक्ति-
भावसंयुक्त पूजता है उसके पुण्यका फल सुनो ॥२८॥
सकला चोर्वरा तेन दत्ता यज्ञे भवेत्किल।
व्रतानि सर्वतीर्थानिदानानि सुवहून्यपि ॥२९॥
वह गीताके पूजनेवाला यज्ञमें सर्व पृथ्वी दान दे चुका; तथा
सर्वव्रत सर्वतीर्थ और बहुतसे दान भी कर चुका ॥२९॥
भूतप्रेतपिशाचाद्यास्तत्र नो प्रविशन्ति वै ।
अभिचारोद्भवं दुःखं परेणापि कृतं च यत् ॥३०॥
जिस घरमें गीताका पूजन होता है वहां भूत, प्रेत, पिशाचा-
दिक और दूसरेके किये मंत्रयंत्रादिक अभिचारज दुःख भी नहीं
प्रवेश कर सकते हैं ॥३०॥
नोपसर्पन्ति तत्रैव यत्र गीतार्चनं गृहे ।
तापत्रयोद्भवा पीडा नैव व्याधिभयं तथा ॥३१॥
जिस घरमें गीताका पूजन है, वहां दैहिक, दैविक और भौतिक
इन तीनों तापोंकी पीडा और रोगकृतपीडा नहीं होती है ॥३१॥
न शापं नैव पापं च दुर्गतिं न च किंचन।
देहेऽरयः षडेते वै न बाधन्ते कदाचन ॥३२॥
वहां किसीका शाप और पाप और दुर्गति कभी नहीं होती
है तथा देहमें वर्तमान जो पांच ज्ञानेंद्रिय, एक मन ऐसे छ:
शत्रु भी पीडा नहीं करते हैं ॥ ३२ ॥

भाषाटीकासहित ।
भगवत्परमेशाने भक्तिरव्यभिचारिणी।
जायते सततं तत्र यत्र गीताभिनन्दनम् ॥३३॥
जहाँ गीताके अर्थका निरंतर विनोद होता है वहाँ भगवा-
नमें अति उत्तम अखंड भक्ति उत्पन्न होती है ॥ ३३ ॥
प्रारब्धं भुञ्जमानोऽपि गीताभ्यासे सदा रतः।
स मुक्तः स सुखी लोके कर्मणा नोपबध्यते ॥३४॥
जो सर्वकाल गीताके ही अभ्यासमें निरत है वह प्रारब्धव-
शसे संसार भी भोगता है तो भी वह मुक्त और सुखी है, तथा
कर्मके द्वारा बंधनमें नहीं आ सकता ॥ ३४ ॥
महापापादिपापानि गीताऽध्यायी करोति चेत् ।
न किंचिस्पृशते तस्य नलिनीदलमम्भसा ॥३५॥
जो नित्य गीताका श्रवण, पठन मनन करता हो और वह
देवयोगसे भूलमें ब्रह्महत्यादिक महापाप भी करडाले तो भी
जलसे कमल पत्रके समान लिप्त नहीं होता है ॥ ३५ ॥
स्नातो वा यदि वाऽस्नातः शुचिर्वा यदिवाऽशुचिः।
विभूति विश्वरूपं च संस्मरन्सर्वदा शुचिः॥३६॥
स्नान किये हो अथवा न किये हो पवित्र हो अथवा अप-
वित्र हो, विभूतियोग और विश्वरूपदर्शन अध्यायको पढ़ता
हुआ मनुष्य सदा पवित्र रहता है ॥ ३६॥
अनाचारोद्भवं पापमवाच्यादि कृतं च यत् ।
अभक्ष्यभक्षजं दोषमस्पर्शस्पर्शजं तथा ॥ ३७॥
ज्ञाताज्ञातकृतं नित्यमिन्द्रियैर्जनितंचयत् ।
तत्सर्व नाशमायातिगीतापाठेन तत्क्षणात् ॥३८॥

" (८) गीतामाहात्म्य । जो अनाचारसे और जो निन्दित शब्द बोलनेसे, अभक्ष्य- भक्षणसे, एवं न छूने योग्यके छूनेसे पाप हुए हों तथा जोजान और अजानमें नित्य इंद्रियोंसे पाप होते हैं वे सब गीतापाठसे तत्काल नष्ट हो जाते हैं ॥ ३७ ॥ ३८॥ सर्वत्र प्रतिभोक्ता च प्रतिग्राही च सर्वशः। गीतापाठं प्रकुर्वाणो न लिप्येत कदाचन ॥३९॥ जो सर्वत्र भोजन करता हो, सर्वत्र प्रतिग्रह लेता हो वह भी गीतापाठ करने पर पापोंसे लिप्त नहीं होता ॥ ३९ ॥ रत्नपूर्णी मही सर्वां प्रगृह्यातिविधानतः। गीतापाठेन चैकेन शुद्धः स्फटिकवत्सदा॥४०॥ विधिहीन रत्नपूरित पृथिवीका दान भी लेकर एक गीतापा ठसें शुद्धस्फटिकमणिके समान निष्पाप होता है ॥ ४० ॥ यस्यान्तःकरणं नित्यं गीतायां रमते सदा। सर्वाग्निकः सदाजापी क्रियावान्स च पण्डितः॥४ जिसका अंतःकरण -सदा गीतामें रमता हो वह सर्व अग्नि- होत्री, सदा जप करनेवाला, क्रियावान् और पंडित है ॥११॥ दर्शनीयः स धनवान्स योगी ज्ञानवानति। स एव याज्ञिको ध्यानी.सर्ववेदार्थदर्शकः॥४२॥ वही दर्शनयोग्य है, वही धनवान्, योगी; ज्ञानवान्, याज्ञिक ध्यानी और सर्ववेदोंके अर्थको देखनेवाला है ॥ ४२ ॥ गीतायाः पुस्तकं यत्र नित्यं पाठे प्रवर्तते। तत्र सर्वाणि तीर्थानि प्रयागादीनि भूतले॥४३॥ गीताका पुस्तक जहां नित्य पाठमें वर्तमान हो वहां पृथि- वीभरके सर्व प्रयागादितीर्थ सदा रहते हैं। ४३.।...

भाषाटीकासहित । (९) निवसन्ति सदा गेहे देहे देशे सदैव हि। सर्वे देवाश्च ऋषयो योगिनः पन्नगाश्च ये॥४४॥ और उस देशमें, घरमें और देहमें भी सब देव, ऋषि, योगी और पन्नग भी सदा निवास करते हैं ॥ ४४ ॥ गोपालवालकृष्णोऽपि नारदध्रुवपार्षदैः सहायो जायते शीघ्रं यत्र गीता प्रवर्तते ॥४५॥ : जहां गीता प्रवृत्त होती है वहां नारद, ध्रुव और सर्व पार्षदों- सहित गोपाल बालकृष्ण शीघ्र ही सहायक होते हैं ॥ १५॥ यत्र गीताविचारश्च पठन पाठनं तथा। तत्राहं निश्चितं पार्थ निवसामि सदैव हि ॥ ४६ ॥ श्रीकृष्ण अर्जुनसे कहते हैं कि हे पार्थ ! जहां नित्य गीताका विचार एवं पठन-पाठन होता है वहां मैं निश्चय सर्वदा रहता हूँ४६ गीता मे हृदयं पार्थ गीता मे सारमुत्तमम् । .. गीता मे ज्ञानमत्यग्र्यं गीता से ज्ञानमक्षयम् ॥४७॥ हे अर्जुन ! गीता मेरा हृदय है, गीता मेरा उत्तम सार है, गीता. मेरा अतिअग्रज्ञान और अक्षय ज्ञान ही है ॥ ४७.॥ गीता मे चोत्तमं स्थानं गीता में परमं गृहम् । गीताज्ञानं समाश्रित्य त्रिलोकी पालयाम्यहम्४८॥ गीता मेरा उत्तम स्थान है और गीता मेरा उत्तम गृह है, इसी गीताके ज्ञानको धारण करके मैं तीनों लोकोंको पालता हूँ. ४८॥ - गीता मे परमा विद्या ब्रह्मरूपा न संशयः। अमात्राक्षरा नित्या स्वनिर्वाच्यपदात्मिका॥४९॥ गीता मेरी उत्तम विद्या है, गीता ब्रह्मरूप है, इसमें संशय नहीं। -

१०
.
गीतामाहात्म्य ।
अर्द्धमात्रा, नाशरहित, सनातन, अनिर्वाच्यपदरूप एसी परी
वाणीरूप मेरी यह गीता है ।। ४९।।
गीतानामानि वक्ष्यामि गुह्यानि शृणु पाण्डवं ।
कीर्तनात्सर्वपापानि विलयं यान्ति तत्क्षणात्॥५०॥
'हे पांडव ! गीताके जो गुप्त नाम हैं उन्हें मैं तुमसे कहता हूँ
जिनके कीर्तनसें तत्काल सर्व पाप क्षय हो जाते हैं ॥५०॥7॥
अर्थ गीतानामानि। मत
गीता गङ्गा च गायत्री सीता सत्या सरस्वती।।
ब्रह्मविद्या ब्रह्मवल्ली त्रिसन्ध्या मुक्तगेहिनी ॥५॥
अईमात्रा चिदानन्दा भवनी भयनाशिनी रिलः
वेदत्रयी परानन्ता तत्त्वार्थज्ञानमञ्जरी॥५ोशी
अब गीताके नाम कहते हैं:-गीता १, गंगा २, गायत्री ३,
सीता ४, सत्याः५, सरस्वती ६, ब्रह्मविद्या ७, ब्रह्मवल्ली ८, विसं-
ध्या ९, मुक्तहिनी १०, अर्धमात्रा ११, चिदानंदा १२, भवनी
.१३, भयनाशिनी १४, वेदत्रयी १५, परा १६, अनंता १७ और
तत्त्वार्थज्ञानमञ्जरी १८ ॥५१ ॥५२॥
इत्येतानि जपन्नित्यं नरो निश्चलमानसः ।
ज्ञानसिद्धिं लभेच्छीघ्रं तथान्ते परमं पदम् ॥५३॥
गीताके इन १८ नामोंको नित्य मन स्थिर करके जपता रहे तो
शीघ्र ही ज्ञानसिद्धिको प्राप्त होके अंतमें मोक्षको प्राप्त होता है ५३॥
पाठेऽसमर्थः संपूर्णे तदई पाठमाचरेत् ।
तदा गोदानजं पुण्यं लभते नात्र संशयः ॥ ५४॥
जो संपूर्ण पाठ न कर सके तो आधी गीताका अर्थात् नव
अध्यायोंका पाठ करे तो एक गोदानका पुण्य प्राप्त होता है:
इसमें संशय नहीं ॥५॥

भाषाटीकासहित । (११) र पडशंजपमानस्तुं गङ्गास्नानफलं लभेत् । 'त्रिभागं पठमानस्तु सोमयागफलं लभेत् ॥५५॥ छठे अंश (तीन अध्याय) का नित्य पाठ करें तो गंगास्ना- नका फल मिलाता है और तीसरे भाग.(छः अध्याय) का नित्य पाठ करनेसे सोमयागका फल प्राप्त होता है ।।५५ ॥ तथाऽध्यायद्वयं नित्यं पठमानो निरन्तरम् । इन्द्रलोकमवाप्नोति कल्पमेकं बसेध्रुवम् ॥ ५६ ॥ दो अध्यायोंका नित्य पाठ करता रहे तो इंद्रलोकको प्राप्त होके वहां एक कल्प वास करता है ॥५६॥ एकमध्यायकं नित्यं पठते भक्तिसंयुतः रुद्रलोकमवाप्नोति गणो भूत्वा वसच्चिरम् ॥५७ ॥ जो एक ही अध्यायका निरंतर नियमसे भक्तिपूर्वक पाठ क- रता है तो वह रुद्रलोकको प्राप्त होकर वहां शंकरका गण होके. बहुतःकालपर्यंत अर्थात् कल्पपर्यंत निवास करता है ॥ ५७ ॥ अध्यायाच च पादं वा नित्यं यः पठते जनः । 'स प्राप्नोति खेलोंक मन्वन्तरशतं समाः॥ ५८ ॥ जो मनुष्य गीताका आधा अथवा पाव अध्यायका भी नित्य नियमसे पाठ करता रहे तो वह सूर्यलोकमें सौ मन्वंतरके वर्षांपर्यंत वास करता है.।। ५८॥ । गीतायाः श्लोकदशकं सप्त पञ्च चतुष्टयम् । त्रिकहिकैकमई वा श्लोकानां च पठेन्नरः । चन्द्रलोकमवाप्नोति वर्षाणामयुतायुतम् ॥ ५९॥ जो गीताके दश ओक अथवा सात, पांच, चार, तीन, दो,एक, - (१२) गीतामाहात्म्य । । अथवा आधे श्लोकका भी निरंतर पठन करे तो अयुतायुतवर्ष अर्थात दशकोटिवर्ष ( १०,००,००,०००) चंद्र लोकमें वास करता है ॥ ५९॥ "गीतार्थमेककालेऽपि श्लोकमध्यायमेव च । स्मरंस्त्यक्त्वा जनो देहे प्रयाति परमं पदम् ॥६०॥ जो एककाल भी गीताके एक श्लोकका अथवा अध्यायका अर्थ स्मरणकरताडआदेहको त्यागे तो मोक्षको प्राप्त होता है।६०॥ गीतार्थ वापि पाठं वा शृणुयादन्तकालतः। - --महापातकयुक्तोऽपि मुक्तिभागी भवेज्जनः ॥६१॥ जो अंतकालके समयमें गीताका अर्थ अथवा पाठ सुनता हुआ दहत्याग करता है वह महापातकी हो तो भी मुक्त हो जाता है ६१॥ गीतापुस्तकसंयुक्तः प्राणांस्त्यक्त्वा प्रयाति यः। स वैकुण्ठमवाप्नोति विष्णुना सह मोदते ॥६२॥ जो गीताके पुस्तकयुक्त प्राणोंको त्यागे सो विष्णुलोकको. प्राप्त होके विष्णुके समीप आनंद करता है ॥ ६२॥ गीताध्यायसमायुक्तो मृतो मानुषतां व्रजेत् । गीताभ्यासं पुनः कृत्वा लभते मुक्तिमुत्तमाम।।६३॥ जो मरण समयमें गीता पुस्तकका एक अध्याय भी समीप हो तो वह फिर मनुष्य जन्म पाकर गीताभ्यास करके मुक्त होजाता है६३ गीतोच्चारणसंयुक्तो म्रियमाणो गति लभेत् । यद्यत्कर्म च सर्वत्र गीतापाठं प्रकीर्तयेत् ॥ तत्तत्कर्म च निर्दोषं कृत्वा पूर्णमवाप्नुयात् ॥६४॥ मरते समय भी जो गीता ऐसा उच्चारण करके मरें तो भी मुक्त हो जाता है और जो जो कर्म करे उस उसमें गीता पाठ करे तो-निदोंप कर्मका संपूर्ण फल प्राप्त होता है ।। १६४ ॥ १ .. .

- , भाषांटीकासहित। १३) पितृनुद्दिश्य यः श्राद्धे गीतापाठ करोति वै । : संतुष्टाः पितरस्तस्य निरयाद्यान्ति सनतिम् ॥६५॥ .:जो श्राद्धमें पितरोंके निमित्त गीताका पाठ करे तो वे पितर संतुष्ट होते हुए नरकसे मुक्त हो जाते हैं ॥ ६६ गीतापाठेन संतुष्टाः पितरः श्राद्धतर्पिताः। पितृलोकं प्रयान्त्येव पुत्राशीर्वादतत्पराः ॥ ६६ ॥ श्राद्ध एवं गीतापाठसे प्रसन्न होकर पितृगण पुत्रको आशी- वर्वाद देते हुए पितृलोकको जाते हैं ॥ ६६ ॥ लिखित्वा धारयेत्कण्ठे बाहुदण्डे च मस्तके । नश्यन्त्युपद्रवाः सर्वे विघ्नरूपाश्च दारुणाः ॥६७॥ गीताको लिखकर गलेमें, भुजापर अथवा मस्तकमें धारण करे तो उसके विघ्नरूप दारुण उपद्रव नष्ट हो जाते हैं ॥ ६७ ॥ गीतापुस्तकदानं च धेनुपुच्छसमन्वितम् । दत्त्वा तत्सहिजे सम्यकृतार्थों जायते जनः॥६८॥ गोदान देते समय गौकी पूँछसहित हाथमें गीताका पुस्तक लेकर जिसने श्रेष्ठ ब्राह्मणको दान दिया वह सब कर चुका ॥६८॥ पुस्तकं हेमसंयुक्तं गीतायाः शुद्धमानसः । 'दत्त्वा विप्राय विदुषे जायते न पुनर्भवे ॥ ६९॥. यदि सुवर्णसंयुक्त गीतापुस्तकका दान शुद्धमनसे विद्वान् ब्राह्म- को दे तो फिर जन्म नहीं लेना पड़ता ॥ ६९ ॥ शतपुस्तकदानं च गीतायाः प्रकरोति यः । स याति ब्रह्ममदनं पुनरावृत्तिवर्जितम् ॥ ७० ॥ जो गीताके सौ पुस्तकोंका दान करे तो जिस लोकसें फिर यहाँ नहीं जन्मता है, उस वैकुण्ठको जाता है ॥ ७० ॥ ।

( १शीतादा
सार
--
पितामाहात्म्य ।
गनिदानप्रमालले सप्तकल्पावधीः समाः ।
विष्णुलोकमयामोति विष्णुनासह.मोदते॥७१॥
गीतोदानके प्रभावी विष्णुलोको सात-कल्पपर्यंत विष्णुके
साथ रहके आनंद करता है ।। ७३ ॥
त सम्यक श्रुखाच-गीतार्थ पुस्तक या प्रदापयेत् ।
नासम्मै प्रीतीस्मिभगवान्ददामि मनसेप्सितम्।।७२॥
श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो गीताका अर्थ सुनकर पुस्तकका
दान करता है उसको मनोवांछित फल देता हूँ॥७२॥
देहं मानुषमाश्रित्य चातुर्वण्र्येषु भारत ।
नशृणोति पठत्येव गीताममृतरूपिणीम् ॥७३॥
'हुस्तात्त्यक्त्वाऽमृतं प्राप्तं कष्टात्क्ष्वेडं समश्नुते ।
: पीत्वा गीतामृतलोके लब्ध्वा मोक्षं सुखी भवेत्७४
!! जो मनुष्य देह पाकर इस अमृतरूपिणी गीताको न पढ़ता
और न सुनता है वह मानो हाथमें आये हुए अमृतको त्या-
गके विषको कष्टसे पीता है, क्योंकि इस गीतारूप अमृतका पान
करके मोक्षको प्राप्त होके सुखी होता है ॥ ७३ ॥ ७४ ॥
जनैः संसारखाःगीताज्ञानं च यैः श्रुतम् ।
संप्राप्तममृतं तैश्च गतास्ते सदनं हरेः॥७५ ॥
संसारदुःखकरके पीड़ितं जिन मनुष्योंने इस गीताके ज्ञानका
सुना वे अमृत होकर विष्णुलोकको प्राप्त होते हैं ॥ ७५ ॥
गीतामाश्रित्य बहवो भूभुजो जनकादयः।
निर्धूतकल्मषा लोके गतास्ते परमं पदम् ॥७६ ॥
इस गीताका आश्रय करके बहुतसे जनकादिक राजा पाप-
रहित होकर परमपदको प्राप्त हुए हैं ॥ ७६ ॥
गीतासु न विशेषोऽस्ति जनेचावचेषु च।
ज्ञानेष्वेव समग्रेषु समा ब्रह्मस्वरूपिणी ॥ ७७॥

१५).
भाषाटीकासहित
गीतामें नीच, ऊंचका विशेष नहीं, आत्मा सबमे समान
है। इससे यह ब्रह्मस्वरूपिणी है ॥ ७७ ॥
योऽभ्यसूयति. गीतां च निन्दा वा प्रकरोति च ।
: ‘प्राप्नोति नरकं घोरं यावदाभूतसंप्लवम् ॥ ७८॥
जो गीतांकी ईर्षा और निंदा करता है. वह प्रलयपर्यंत नर-
कम रहता है ।। ५८ ॥
अहंकारण मूदात्मा गीतार्थ नैव मन्यते ।
कुम्भीपाके स-पच्येतं यावत्कल्पलयो भवेत्॥७९॥
1. जो अहंकारसे गीताके अर्थको नहीं मानता है - वह प्रलय-
कालपर्यंत कुम्भीपाक नरकमें प्रचता है।॥ ७९ ॥
गीतार्थ वाच्यमान यो न शृणोति समीपत।
श्वसकरभवां योनिमनेकां सोऽधिगच्छति ॥८॥
जोबांचते हुए गीतापाठको समीप जाकर नहीं सुनता है वह
कुत्ता और सूकरकी योनियों में बारंबार जन्म पाता है. ॥८॥
चौर्यं कृत्वा च गीतायाः पुस्तकं यः समानयेत् ।
नतस्यस्यात्फलं किंचित्पठनं च वृथा भवेत् ॥८॥
जोगीताकी पुस्तक चोरीसे लाकर उसपर पाठ करे तो उ-
सको पाठका फल किंचिन्मात्र भी नहीं मिलता, किन्तु वृथा परि-
श्रम होता है ।। ८१॥
यः श्रुत्वा नैव गीतार्थं मोदते परमादरात्
नैवाप्नोति फलं लोके प्रमादाच्च वृथाश्रमम् ।।८२॥
जों गीताके अर्थको सुनके अति आदरसे आनंदित नहीं हो-
ता उसको संसारमें (कुछ भी) फल नहीं मिलता, किन्तु प्रमा-
से उसका परिश्रम वृथा होता है ॥ ८२ ।।
'गीतां श्रुत्वा हिरण्यं च पट्टाम्बरप्रवेष्टनम् ।
निवेदयेच्च तद्वेष्टय प्रीतयें परमात्मनः ॥ ८३ ॥

(१६) गीतामाहात्म्य । गीताको सुनके सुवर्ण और पुस्तक लपेटनेका रेशमी वस्त्र उसपर लपेटकर परमात्माकी प्रीतिकेवास्ते बाँचनेवालेको देनाचाहिये८३ वाचकं पूजयेद्भक्त्या द्रव्यवस्त्राद्युपस्करैः अन्नैर्बहुविधैः प्रीत्या तुष्यतां भगवानिति॥ ८४ ॥ जिससे भगवान् प्रसन्न हो जायँ,इस बुद्धिसे द्रव्य, वस्त्र,आभूषणा. दिकोंकरके वक्ताका पूजनकरके नानाप्रकारके अन्न देनाचाहिये८४ माहात्म्यमेतद्गीतायाः कृष्णप्रोक्तं सनातनम् । गीतान्ते पठते यस्तु यथोक्तं फलमाप्नुयात् ॥८५॥ यह श्रीकृष्णका कहा हुआ सनातनगीताका माहात्म्य है इस- को गीतापाठ करके अंतमें पढ़े तो यथोक्त फल प्राप्त होता है ।।८५॥ गीतायाः पठनं कृत्वा माहात्म्यं नैव यः पठेत् । वृथा पाठफलं तस्य श्रम एव हि केवलम् ॥ ८६ ॥ गीता पाठ करके माहात्म्यको न बाँचे तो उसके पाठ कर- नेका श्रम वृथा ही है अर्थात् पाठका फल नहीं पाता है ॥८६॥ एतन्माहात्म्यसंयुक्तं गीतापाठं करोति यः । श्रद्धयायःशृणोत्येव दुर्लभां गतिमाप्नुयात् ॥८७॥ जो इस माहात्म्यके संयुक्त गीतापाठ करेगा अथवा सुने- गा वह दुर्लभ मोक्षपदको पावेगा ॥ ८७ ॥ श्रुखा पठिलागीतां च माहात्म्यं यःशृणोति वै । : तस्य पुण्यफलं लोके भवेति मनसेप्सितम् ॥८॥ इति श्रीमद्वाराहपुराणे सूतशौनकसंवादे श्रीकृष्णप्रोक्तं श्रीमद्भगवद्गीतामाहात्म्यं संपूर्णम् ॥ जो गीताको सुनकर और पढ़कर माहात्म्यको पढ़ते सुनते वे मनइच्छित फलको पाते हैं ॥ ८८ ॥ इति श्रीमन्मकुळसीतारामात्मजपण्डितरघुनाथप्रसादविरचिता श्रीमद्भगवद्गीता- माहात्म्यचन्द्रिकान्याख्या समाप्तिमगाम्॥

श्रीगणेशाय नमः।
श्रीमद्भगवद्गीता।
सान्वय-अमृततरंगिणीभापाटीकासहिता
श्रीजयति।
धृतराष्ट्र उवाच ।
धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सर्वेः ।
मामकाः पांडवाश्चैव किमकुर्वत संजय ॥ ॥
प्रणम्य परमात्मानं कृष्णं रामानुजं गुरुम् ।
गीताव्याख्यामहं कुर्वे गीतामृततरंगिणीम् ॥
जब श्रीकुरुक्षेत्रमें दुर्योधनादिक धृतराष्ट्रके पुत्र और युधि-
ष्ठिरआदिक पांडुके पुत्र अपनी अपनी सेनाओंको लेकर युद्ध
करनेके लिये तैयार हुए तब हस्तिनापुरमें धृतराष्ट्र संजयसे पूछने
लगे हे संजय ! धर्मस्थल कुरुक्षेत्रेमें युद्धकी इच्छावाले इकट्ठे
हुएं मेरे पुत्र और पांडुके पुत्रं ( युधिष्ठिरादिक) निश्चयकरके
क्यों करते हुए (सो कहो ) ॥१॥
संजय उवाच ।
दृष्ट्वा तु पांडवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा ।
आचार्यमुपसंगम्यं राजा वचनमब्रवीत् ॥२॥
ऐसे धृतराष्ट्रके वाक्य सुनकर संजय कहने लगे कि हे राजन् !
राजा दुर्योधन व्यूहरचनायुक्त पांडवोंकी सेनोंको देखकर तब
द्रोणाचार्य के समीप जाँकर वर्चन बोलते हुएँ ॥२॥
पश्यैती पांडुपुत्राणामाचार्य महतीं चमूम् ।
व्यूढां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता ॥ ३ ॥

. (१८) भगवद्गीता। [ अध्यायः- हे आचार्य । जो तुम्हारा शिष्य बुद्धिमान ऐसा द्रुपदका पुत्र धृष्टद्युम्न उसकरके यथायोग्यस्थानोंपर स्थापित पांडुपुत्रोंकी ईस सर्वोत्तम सेनाको आप देखो ॥३॥ अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि । युयुधानो विराटचे द्रुपदश्च महारथः ॥ ४ ॥ इस सैनामें जो युद्ध करनेमें भीम अर्जुनके समान बड़े धनुषधारी शूर हैं वे ये कि; युयुधान और विराट और महार) दुपैद॥४॥ धृष्टकेतुश्चेकितानः काशिराजश्वं वीर्यवान् । पुरुजित्कुंतिभोजश्च शैब्यश्च नरपुंगवः ॥५॥ धृष्टकेतु चेकितान और बली काशीका राजो तथा पुरुजित और कुंतिभोज और नरोंमें श्रेष्ठं शैब्य ॥५॥ युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान् । सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथाः॥६॥ पराक्रमी और उत्तमशक्तिवाला और वीर्यवान् धुर्धामन्यु, सुभद्राका पुत्र अभिमन्यु और सेर्व द्रौपदीके पुत्र अर्थात् प्रति- विन्ध्यादि पांच ये महारथ ही हैं ॥६॥. - अस्माकं तु विशिष्ट ये तान्निबोधैं द्विजोत्तम । नायका-मम सैन्यस्य संज्ञार्थं तान्ब्रवीमि ते ॥७॥ अब हे द्विजोत्तम । जो हमारे में हमारी सेनाके श्रेष्ठं सेनापति हैं उनको जाननेके वास्ते तुम्हारेसे कहती हूँ. उन्हें जानो ॥७॥ भवान् भीष्मश्च कर्णा कृपा समितियः। अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च ॥८॥ जो हमारी सेनामें मुख्य हैं उनमें एक आपे हो और भीष्म और कर्ण और संग्रामकेंजीतनेवाले कृपाचार्य अश्वत्थामा और विकर्ण और वैसा ही राजा सोमदत्तका पुत्र भूरिश्रवा ॥८॥ -- १ प्रथमः १:] सान्वय-अमृततरङ्गिणी भा टी०। (१९) अन्ये च बहवः शूरो मदर्थे त्यक्तजीविताः । नानाशस्त्रहरणाः सर्वे युद्धविशारदाः ॥९॥ मेरे वास्ते त्यागा है जीवन जिनने और नानाशस्त्रके प्रहार करनेवाले और भी बहुत शेर सर्व युद्धचतुर हैं ॥ ९॥ अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम् । पप्तिं विंदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम् ॥ १० ॥ हमारी सेना भीष्मकरके रक्षित है इससे असमर्थ है और इनकी यह सेना भीमकरके रक्षित है. इससे बलिष्ठं है तात्पर्य यह कि, भीष्म उभयपक्षपाती है ॥ १० ॥ ... अयनेषु च सर्वेषु यर्थांभागमवस्थिताः। भीष्ममेवाभिरक्षतु भवंतः सर्व एवं हिँ ॥११॥ i. इससे सर्व नाकेपर यथायोग्य भाग बनाये भये खड़े रहके तुम सबै ही निश्चयकरके भीष्मका ही संरक्षण करो ॥ ११ ॥ :: तस्यें संजनयन्हेरे कुरुवंद्धः पितामहः । सिंहनादं विनेद्योच्चैः शंखं दध्मौ प्रतापवान् ॥१२॥ । ऐसे सुनके बड़े प्रतापवान् कौरवनमें वृद्ध पितामह भीष्म बस दुर्योधैनको हेर्ष उत्पन्न करते करते ऊंचे स्वरसे सिंहनादसे गर्ज कर शंखकों बजाते भैये ॥ १२ ॥ . 'ततः शंखांश्च भैर्यश्चे पणानकगोमुखाः। सहसैवाभ्यहन्यंत से शब्दस्तुमुलोऽभवेत् ॥ १३ ॥ तब शंखें और मेरी और तासे नगारे रणसिंहे एक संग ही बजते मैये सो शब्द मिश्रित भारी होता भयो ।॥ १३ ॥ ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यदने स्थितौ । माधवः पांडवश्चैव दिव्यौ शंखौ:प्रदध्मतुः ॥१४॥ है (२०) भगवद्गीता। [ अध्यायः- तब जिसमें श्वेत घोड़े जोड़े हैं ऐसे श्रेष्ठ स्थपर बैठे हुँए श्रीकृष्ण और अर्जुन दिव्य शंखोंको बजाते हुए ॥ १४ ॥ पांचजन्य हृषीकेशो देवेंदत्तं धनंजयः। ... . पौड़े दध्मौ महाशंख भीमकर्मा तृकोदरः ॥१५॥ श्रीकृष्ण पांचजन्यको, अर्जुन देवदत्तको; भयंकर है.कर्म जिसका ऐसा वृकोदर अर्थात् तीक्ष्णाग्नि उदरीवाला भीम पौंड्र- नॉम महाशंखको बजाते हुए ॥ १५ ॥ ...अनंतविजेयं राजा कुंतीपुत्रो युधिष्ठिरः। नकुलः सहदेवश्व सुघोषमणिपुष्पकौ ॥ १६ ॥ कुंतीका पुत्र राजा युधिष्ठिर अनंतविजय शर्खको,नकुले और स- हदेव सुघोष और मणिपुष्पर्क शंखोंकों क्रमसे बजाते हुए अर्थात् नकुल सुघोषको और सहदेवने मणिपुष्पकको बजाया ॥१६॥ कौश्यश्च परमेष्वासः शिखंडी चे महारथः। धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजितः॥ १७॥ श्रेष्ठ धनुषवाला काशीका रोजा और महारथ शिखंडी,धृष्टद्युम्न और विराँट और शत्रुओंकरके अजित सात्यकी यादव ॥१७॥ द्रुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वशः पृथिवीपते । सौभद्रश्च महाबाहुः शंखान्दध्मुः पृथक्पृथकं ॥१८॥ हे पृथ्वीनाथ ! राजा द्रुपद और सर्व द्रौपदीके गुंत्र और महा- बाहुँ अभिमन्यु ये न्यारे न्यारे शंख बजाते हुएँ ॥ १८॥ से घोषो धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत् । नभश्च पृथिवीं चैव तुमुलो व्यनुनादयन् ॥ १९॥ . सो मिश्रित बड़ा ऐसा शब्द आकांश और पृथिवीको शब्दाय- मान करता करता धृतराष्ट्रके पुत्रोंके हृदयोंको विदीर्ण करती . हुआ ॥ १९॥ 1 प्रथमः १.] सान्वय-अमृततरङ्गिणी भाटी। (२१) अंथ व्यवस्थितान् दृष्ट्वो धार्तराष्ट्रॉन्कपिध्वजः। प्रवृत्ते शस्त्रसंपाते धनरुद्यम्य पांडवः ॥ २० ॥ हृषीकेशं ती वाक्यमिदमाह महीपते । । सेनयोरुभैयोर्मध्ये रथं स्थापय मेंऽच्युत ॥ २१॥ हे महीपते ! तब शस्त्रपतिप्रवृत्तसमयमें कपिध्वजे पांडव अ- र्जुन तुम्हारे पुत्रोंको युद्धार्थ खड़े देखके तबै धनुर्पको ऊंचा कर- के श्रीकृष्णसे ये वाक्य बोले कि हे अच्युतं । दोनों सेना- ओंके मध्यमें मेरे" रथको स्थापित करो ॥ २० ॥ २१ ॥ यांवदेतांनिरीक्षेऽह योर्डकामानवस्थितांन् । कैमयां सह योद्धव्यमस्मिनं रणसमुचमे ॥ २२ ॥ में प्रथम इन युद्धकी इच्छावाले खड़े हुओंको देगा कि इस रणखेतमें मुझको किनके साथ युद्ध करनी योग्य है:॥ २२॥ योत्स्य॑मानानक्षेऽहै ये एतेऽत्रं समागताः। -धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेयुद्धे प्रियचिकीर्षवः ॥ २३ ॥ जो ये जितने दुर्बुद्धि धृतराष्ट्र पुत्रके युद्ध में प्रियकी इच्छावाले यहां इकट्ठे हुए हैं इन युद्ध करनेवालोंको मैं देखूगों ॥२३॥ संजय उवाच। एंवमुक्तो हृषीकेशो गुंडाकेशेन भारत । सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम् ॥२४॥ भीष्मद्रोणेप्रमुखतः सर्वेषां चै महीक्षितीम् । उवाच पार्थ पैश्यैतान समवेतान् कुरूनिति ॥२५॥ संजयधृतराष्ट्रसे कहते हैं कि हे. भारतीअर्जुनकरके ऐसे कहे भय श्रीकृष्ण दोनों सेनाओंके बीच में श्रेष्ठे रथको स्थापित करके भीष्म ।

(२२) 'भगवद्गीता। [अध्यायः-
और द्रोणाचार्यके सौमने और सर्व राजाओंके सौंमने बोले कि
हे पार्थ। ये इकटे हुए जो कुरुवंशी हैं इनको देखो" २४ ॥२५॥
तंत्राऽपश्यस्थितान्पार्थः पितॄन पितामहान् ।
आचार्यान्मातुलान् भ्रात॒न्पुत्रीन्पौत्रीन्सखींस्तथा।
श्वशुरौंन् मुहूंदश्चैव "सेनयोरुभयोरपि ॥ २६ ॥
तान्समीक्ष्य से कौंतेयः सर्वान् बंधू वस्थितान् ।
कृपयों परयोविष्टो विषीदैनिदमब्रवीत् ॥२७॥
श्रीकृष्णजीके कहनेपर अर्जुन उस रणमें खड़े हुँए पिते (पि।
तासदृश भूरिवादिक काका ) पितामह (भीष्म सोमदत्तादिक)
आचार्य (द्रोणाचार्यादिक ) मामा ( शकुनि शल्यादिक )
भाता (दुर्योधनादिक ) पुत्र ( द्रौपदीमें पांचोंसे भये जो पांच )
पौत्र (लक्ष्मणादिकोंके पुत्र ) तथों सखौ ( अश्वत्थामा जयद्रः
थादिक) ससैंर (द्रुपदादिक ) और सुहृदै (कृतवर्मादिक) इ-
नको देखते भये ऐसे दोनों सेनाओंमें भी उनै सर्व बंधुंनको
खेड़े देखके" वह कुंती(त्र अर्जुन अति कृपांकरके व्याप्त खेदित
होते-होते यह बोलते हुएँ ॥२६॥२७॥
अर्जुन उवाच ।
दृष्ट्रमं स्वजनं कृष्णे युयुत्सुं समुपस्थितम् ।
सीदंति मम गात्राणि मुखंचे परिशुंष्यति ।
वेपथुश्चे शैरीरे में रोमहर्षश्च जायते ॥ २८॥ २९॥
अर्जुन कहते हैं कि हे कृष्ण ! युद्धकी इच्छावाले खेड़े
हुए इन स्वजनोंको देखके मेरे गाँत्रशिथिले हो रहे हैं और मुख
मूर्खता जाता है और मेरे शरीर में कंप और रोमांच होते
॥ २८ ॥२९॥

. प्रथमः १.] सान्वय-अमृततरङ्गिणी भा टी०। (२३), . : गोंडीवं संसते हस्तात्वचैवे परिदद्यते। नंच शैकोम्यवस्थातुंभ्रमंतीव च में मनः॥३०॥ हाथसे गोंडीवधनुष गिरा जाता है और त्वचा भी जरी जाती है और खड़े होनेको भी नहीं सकती हूँ और मेरी मर्ने भ्रमती सरीखा है ॥ ३०॥ निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव । न च श्रेयोऽपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे ॥३१॥ और हे केशव । निमित्त भी विपरीत देखता हूँ और संग्राममें स्वर्जनोंको मोरके फिर कल्याण भी नहीं देखता हूँ ॥ ३३ ॥ नं कांक्षे विजयं कृष्णं न च राज्यं सुखानि च। किन्नो"रीज्येन गोविंद किंभोगै वितेन वा ॥३२॥ हे कृष्ण | विजय और राज्य और सुखं नहीं चाहता गोविंदे । हमको राज्यकरके भोगकरके अथवा जीवनेकरके भी क्या प्रयोजन है ॥ ३२॥ येषामथे कांक्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि चें। त ईमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि चै३३॥ हमने जिनके वास्ते भोग, सुर्खे और राज्य चाहाँ था । ये प्राण और धनोंको त्यागके युद्ध में खड़े हैं ॥ ३३ ॥ - आचार्याः पितरः पुत्रांस्तथैव चे पितामहाः। मातुलाः श्वशुराःपौत्रीः श्याला संबंधिनस्तथा३४ । यें सर्व मेरे आचार्य,पितातुल्य काका,पुत्र और वैसे ही पिता- मह, मामा, ससुर,नाती पोतो,साले तथा और संबंधी हैं ॥३४॥ एतान्न हंतुमिच्छामि नतोऽपि मधुसूदन 'अपि त्रैलोक्यराजस्य हेतोः किं नु महीकृते३५॥ .

भगवद्गीता। ( अध्याय:- हे मधुसूदन । तीनों लोकोंके राज्यके घोस्ते भी मुझको ये मारते हों तो भी इनको मॉरनेकी नहीं इच्छा करता हूँ तो" पृथिवीके वास्ते क्यों मारूंगी॥ ३५ ॥ निहत्य धार्तराष्ट्रान्नैः का प्रीतिः स्यांजनार्दन। पामेवाश्रयेदस्मीन्हत्वैतानाततायिनः ॥३६॥ हे जनार्दने ! धृतराष्ट्र के पुत्रोंको मारके हमको क्यों प्रसन्नता होगी, इन आततायियोंको मारकर हमको पाप ही लगेगी। आततायीलक्षण-"दोहा-अमि देइ विष देइ जो, क्षेत्रदारहर जोइ।। धनहर सम्मुख शस्त्र कर, आततायि षट्र होइ" ॥१॥३६ ॥ तस्मन्निाही वयं हेतु धार्तराष्ट्रान्स्वबान्धवान् । स्वर्जनं हि कथं हत्वा मुखिनः स्याम माधर्व ॥ ३७॥ जिससे कि इनके मारनेका पाप ही होगा इससे हमारे बन्धु धृतराष्ट्र के पुत्रोंको मारनेके वास्ते हम नहीं योग्य हैं, हे माधव । निश्चयपूर्वक स्वजनोंको मारके कैसे सुखी होंगे" ॥ ३७ ॥ यद्यप्यते पश्यति लोभोपहतचेतसः। कुलशेयकृतं दोषं मित्रंद्रोहे चं पातकम् ॥ ३८॥ कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापास्मान्निर्वेर्तितम् । कुलक्षयकृतं दौरे प्रश्यद्भिर्जनार्दन ॥ ३९ ॥ हे जनार्दन ! लोभकरके जिनके चित्त भ्रष्ट हो गये हैं ऐसे ये पर्योधनादिक कुलक्षय करनेके दोषको और मित्रद्रोहमें पाईंको या पेपि नहीं देखते हैं (नहीं जानते हैं) तो भी कुलक्षयकृत दोष को देखते हुएँ हम करके इसे पासे निवृत्त होनेके वास्ते कैसे न जानना चाहिये ॥ ३८ ॥३९॥ कुलक्षये प्रणश्यति कुलधर्माः सनातनाः। धर्म नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युते ॥४०॥ 1.

प्रथमः १] सान्वयं अमृततरंगिणी भाटी । (२५) । कुलके क्षय होनेसे सनातन कुलके धर्म नाश होते हैं, फिर धर्म नष्, होनेसे सर्व कुलको अधर्म जीत लेती है अर्थात कुलको अप्रतिष्ठित कर देता है ॥ ४० ॥ अधर्माऽभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यंति कुलस्त्रियः। स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसंकरः ॥ ४ ॥ हे कृष्णे | अधर्म करके कुलको अप्रतिष्ठित होनेसे कुलकी स्त्रीजना दुष्ट हो जायगी हे वृष्णिवंशोद्भव ! उन दुष्ट स्त्रियोंमें वर्ण- संकर उत्पन्न होगो ॥ ११ ॥ संकरो नरकायैव कुलघ्नांनां कुलस्यं च । पतंति पितरो ह्येषां लुप्तपिंडोदकक्रियाः ॥ १२॥ जिससे कि जिनके पिते पिंडोदकक्रिया. प्राप्त हुए बिना संसारमें पड़ते हैं. इसीसे कुलोतियोंके कुलको -वह वर्णसंकर नरके प्राप्तिके हेतु ही उत्पन्न होते हैं ॥ १२ ॥ दोषैरतैः कुलनांनां वर्णसंकरकारकैः । उत्सांद्यते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः॥४३॥ जो कुलघांती हैं उनके जो ये वर्णसंकरकारक 'दोर्षे हैं उन करके जाति धर्म और सनातन कुलधर्म नष्टे होते हैं॥४३॥ उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन । नरके नियेतं वांसो भवतीत्यनुशुश्रुम ॥४४॥ हे जनार्दन ! जिनके कुलधर्म नष्ट हो जाते हैं उन मनु- ष्योंका नरैकमें अवश्य वास होता है ऐसा सुनते हैं ॥१४॥ अहो बेत महत्पाप कर्तु व्यवसिता वयंम् ।। यंद्राज्यसुखलोभेन हेतुं स्वजनमुद्यताः ॥४५॥ ::

. .. (२६) ! ... :: भगवद्गीतों। : [अध्याय:- "अहो । कष्ट हम बड़े पापको करनेको निश्चय किये हैं जो राज्य सुखलोभ करके स्वजनोंको मारनेका उद्योग किये हैं।॥४५॥ यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं शस्त्रपाणयः । धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत् ॥ ४६ ॥ जो हाथमें शस्त्र लिये हुए धृतराष्ट्रके पुत्र अर्शस्त्रको और अप्रतीकारको अर्थात् जो मैं बदला नहीं लेता हूँ ऐसे मेरेकोरणमें मीरेंगे सो मारना भी मेरी अतिकल्याणरूप हो जायेंगा ॥ ४६॥ संजय उवाच। एवमुक्कोऽर्जुनः संख्ये रथोपस्थ उपाविशत्। विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः ॥ ४७ ॥ इति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे अर्जुनविषादयोगो नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १॥ राजा धृतराष्ट्रसे संजय कहते हैं कि संग्राममें अर्जुन ऐसे कहके बर्णिसँयुक्त धनुष डॉलके शोकव्याकुलमन होते. हुए रथके पिछाड़ी जाके :^में बैठ गये ॥ १७ ॥.:- इति श्रीमत्सुकुलसीतारामात्मजपंडितरघुनाथप्रसादविरचितायां गीतामृत-". Pw तरंगिण्यां प्रथमाध्यायप्रवाहः ॥१॥ संजय उवाच । त तथा कृपयांविष्टमथुपूर्णाकुलेक्षणम् । विषीदंतमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः ॥१॥ राजा धृतराष्ट्रसे संजय कहते हैं कि जो प्रथम अध्यायमें "। कहे वैसी ही कृपा करके व्याप्त आंसुओंके भरनेसे द्वितीयः३.) सान्वय-अमृततरंगिणी भा. टी.। (२७) नेत्र ब्याकुल विषादयुक्त उस अर्जुनसे मधुसूदन भगवान् थे बोक्य बोलते हुए ॥३॥.... कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम् । अनार्यजुष्टमस्वय॑मकीर्तिकरमर्जुन ॥२॥ ! कि,,हे अर्जुन ! जो अंज्ञानियोंके सेवनेयोग्य नरकको ले जा- नेवाला और अपकीर्ति करनेवाला यह मोह है. वह तुमको ऐसे विषमस्थलमें कैसे प्राप्त हो गया ॥२॥ क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते। शेंद्र हृदयदौर्बल्यं त्यक्वोत्तिष्ठं परंतपं ॥३॥ हे पृथाके पुत्र! तुम कायरतांको न ग्रहण करो तुममें यह नहीं योग्य है, हे परंतप । तुच्छे हृदयकी दुर्बलताकारक कायर- ताको छोड़के खड़े हो जाओ॥३॥ अर्जुन उवाच । कथं भीष्ममह संख्ये द्रोण चे मधुसूदन ।। इषुभिः प्रतियोत्स्यामि पूजाविरिसूदनः॥४॥ ऐसे कृष्णके वाक्य सुन अर्जुन बोले कि हे मधुसूदन । मैं संग्राममें भीष्म और द्रोणाचार्यसे बाणोंकरके कैसे युद्ध करूंगा। हे अरिसूदन । ये दोनों पूंजनेयोग्य हैं। यहां मधुसूदन कहनेका तात्पर्य यह है कि आप दैत्यहता हो तो सज्जनोंसे क्यों युद्ध कराते हो । अरिसूदन कहनेका तात्पर्य यह कि जो शजुनाशक हो तो भीष्मादिक पूज्योंपर बाणप्रहार स्यों कराते हो ?-॥४॥ गुरूनहत्वा हिमहानुभावाञ्च्छेयो भोक्तुं मैक्ष्यम- पीह लोके । हत्वार्थकामांस्तुं गुरुनिहैव मुंजीय भोगीन रुधिरैप्रदिग्धान् ॥ ५॥ ---

-
(२८) भगवद्गीता । ' (अध्यायः-
इस लोकमैं अति उत्तम प्रभाववाले गुरुओंको मारे विना
भिक्षाका अन्न भी खानेको कल्याण ही जानना और अर्थ याने
ट्रॅव्यकी है कामना जिनके ऐसे गुरुओंको मारके रक्तसे भरेहुए
भोगोंको भोगूंगा ॥५॥
नै चैतहि कतरन्नों गरीयो यंदाजयेम यदि वा
नों जयेयुः ॥ याने हवा नै जिजीविषामस्तेऽव-
स्थितीः प्रमुंखे धार्तराष्ट्राः ॥६॥
यह भी नहीं जानते हैं कि हमें कौन बली है न जाने हेम
जीतेंगे किंवा वे हमको जीते., जिनको मारके हम जीनी नहीं
चाहते हैं वे धृतराष्के पुत्र सम्मुख ही खड़े हैं॥६॥
कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः पृच्छामि त्वांधर्मसंमृढ
चेताः॥ यच्छेयः स्यानिश्चितं ब्रूहि तन्में शिष्य-
स्तेऽहं शाधि मा त्वां प्रपन्नम् ॥ ७॥
कापण्ये यह कि हम इनको मारके कैसे जियेंगे तथा दोष जो
कुलक्षयका दोष इन कार्पण्यः और कुलक्षयदोषों करके मेरा
क्षत्रिय स्वभाव विध्वंसित हो गया है. इसीसे धर्ममें भी मेरा चित्त
चकित हो रहा है जैसे कि क्षत्रियधर्म युद्ध अथवा भिक्षात्रभोजन
इनमें कौन कल्याणकारक है यह विचार कर चित्तं चकित हैं. ऐसा
मैं तुम्हारा शिष्य तुमको पूछता हूँ जो मेरे वास्ते निश्चय कल्याण-
': दायक हो वही कहो तुम्हारे शरणागत मुझको सिखाओ॥ ७ ॥
नहि पश्यामि ममापनुद्यौद्यच्छोकमुच्छोषण-
मिंद्रियाणाम् ॥ अवाप्य भूमावसप॑त्नमृद्धं राज्यं
सुराणामपि चाँधिपत्यम् ॥८॥

14. ऐसा जो. द्वितीयः २]. सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०। (२९३) । अरेरेरेरे । बड़ा अनर्थ है कि जो पृथ्वीमें शत्रुसहिता संपदायुक्त राज्यको और देवताओंके भी अधिपतित्वको पार्कर मेरी इंद्रि योंके सुखानेवाले शोकको दूर कर उसको मैं नहीं देखता हूं। : संजय उवाच । एवमुक्का हेषीकेशं गुंडाकेशः परंतपः । नं.योत्स्यं इति गोविदमुक्का तूष्णीं बभूव है ॥९॥ संजय धृतराष्ट्रसे कहने लगे कि शत्रुओंको संतापित करने वाला तथा गुडाका जो निद्रा उसके जीतने में समर्थ... अर्जुन हृषीकेश याने इंद्रियोंके मालिक श्रीकृष्णको ऐसे कईके फिर नहीं युद्ध करूंगा - ऐसे गोविंदसे कहके मौन हो गये ॥९॥ तमुवाच हृषीकेशः प्रहसन्निव भारत सेनयोरुभयोर्मध्ये विषीदंतमिदं वचः ॥ १quare हे भरतवंश उप्तन्न धृतराष्ट्रा दोनों सेनाओंके मध्य में युद्धके रत्साहको त्यागके शोक कर रहा जो अर्जुन उससे हँसतेसरीखे श्रीकृष्णजी यहे याने जो आगे कहेंगे सो वचन बोलते हुँए। श्रीभगवानुवाच। ' अंशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादश्चि भाषसे । गतासूनगतोसुंश्च ना शोचंतिपंण्डिताः ॥१॥ श्रीकृष्ण भगवानने निश्चय किया कि इसको धर्माधर्मका ज्ञा- न नहीं है, इससे यह धर्मको तो अधर्म और अधर्मको धर्म मान रहा है, परंतु धर्मको जानना चाहता है सो मोह गये विना यह कैसे जानेगा। सो मोह आत्मदर्शन विना नष्ट होनेका नहीं, ज्ञान विना आत्मदर्शन होनेका नहीं, सो ज्ञान निष्काम कर्म विना हो- 1 VIm (३०.) भगवद्गीता। [अध्यायात नेका नहीं और अध्यात्मशास्त्र जो आत्म-अनात्म-विवेक उप- देश याने जीव और शरीरका विवेक उसका उपदेश इस विना नि- ष्काम कर्म हो नहीं सकता, इससे अध्यात्मशास्त्रका ही उपदेश करो,ऐसा विचारके उपदेश करने लगे अब इस लोकसे लेकर अ- गरहवें अध्यायके छाँसठके श्लोकमें जो-"मा शुचः" ऐसा वाक्य है वहां पर्यंत गीताउपदेश है. यहां प्रथम भगवान कहते हैं कि हे अ- र्जुन। "त्वम् अशोच्या अन्वशोचः" याने जोशोचनेयोग्य न- ही उनकोशोचते हो और प्रज्ञावाद याने पंडितों सरीखी जो बातें उनको भाषते.याने कहते हो वे ऐसे कि, हमारे पितरोंके श्राद्ध और तर्पण न होनेसे वे स्वर्गसे नरकमें पड़ेंगे सो स्वर्गप्राप्ति और पड़ना श्राद्धादिक होने न होनेके स्वाधीन नहीं है, वे तो आपके करे पुण्य- पापके स्वाधीन हैं क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोके विशंति" इस प्रमाणसे वे पुण्य पाप सदेह आत्माके स्वाधीन हें,केवल देहके स्वाधीन नहीं हैं। यद्यपि पुत्रादिकोंके किये हुए श्राद्धादिकोंका पुण्य प्राप्त होता है। कारणं कि पुत्रांदिक सदेह आत्मसंबंधी है तथापि श्राद्ध न होनेसे स्वर्गसे पड़ना यह किसी कालमें भी होनेका नहीं इस वास्ते गताः सु' जोवे शरीर नित्य नाशधर्मी और 'अगतासु' जोजीव नित्य अमर एक रसहैं इससे “नाऽसतो विद्यते भावो नाऽभावो विद्यते स. तः"इस प्रमाणसे पंडितजन इनका शोच नहीं करते हैं, इससे तु- मंको भी शोचंना अयोग्य है. "स्वेस्वे कर्मण्यभिरतः सिद्धिं विंदति मानवः" इस प्रमाणसे स्वधर्म युद्ध ही कल्याणकारक है ॥११॥ नैवेवोह जातु नास ने त्वं "नमें जनाधिपाः। नै चैवे ने भविष्यामः सर्वे वैयमतः परमै ॥ १२ ॥ श्रीकृष्ण कहते हैं कि हे अर्जुन । जो आत्मा याने, जीवात्मा द्वितीयः२ सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी० ।। (३१) परमात्मा हैं उनके स्वभाव सुनोः-"अहं सर्वेश्वर इतः पूर्वमनादौ काले जातु नासमपि त्वासमेव" अर्थात् मैं सर्वेश्वर इस समयसे प्रथम अनादिकालमें क्या न था. क्योंकि, निश्चयकरके थोत्वं नासीः अपि तु आसीः एव" जैसा मैं था ऐसा क्या तू न था। तू भी था। "इमे जनाधिपाः किंन आसन् अपि त्वासन एव" ये सब राजा क्या न थे । अर्थात् ये भी थे। अतः परं सर्वे वयं किं न भविष्यामः अपि तु भविष्याम एवं" इस कालसे अगाड़ी क्या हम तुम ये सर्वन होंगे। अर्थात् होंगे ही इससे आत्मा. नित्य है अतःशोच करना वृथा है तथा जो यहां हम, तुम और ये ऐसा कहा इससे यह सिद्धांत हुआ. कि, जीवात्मा और परमात्मा न्यारे न्यारे हैं यह न्यारापना ही सत्य है. इसीसे श्रीकृष्णजीने भी उप- देश किया, क्योंकि अज्ञानमोहित अर्जुनको मिथ्या उपदेश कर- नेके ही नहीं, इस न्यारेपनमें श्रुति भी प्रमाण है, जैसे- नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानामेको बहूनां यो विदधाति कामा- निति"। अर्थ-जो एक नित्य चेतन परमात्मा है.सो बहुत नित्य चेतन जीवोंकी कामनाको परिपूर्ण करता है। जो कोई कहे कि यह भेद अज्ञानकृत है तो उससे कहना कि यह परमार्थदृष्टिके अधि- ष्ठाता और आत्मयाथात्म्यसे. सदा अज्ञानरहित नित्यस्वरूप परमपुरुष श्रीकृष्णमें अज्ञानकृत भेददर्शन कार्य होनेका नहीं तो भी कोई कृष्णको अज्ञ कहे तो उनकरके उपदिष्ट गीता अप्रमाण होती है। जो कोई कहे कि श्रीकृष्णने अभेद निश्चय किया है इससे वह भेद निराकृत है सो जले हुए वस्त्रके तुल्य बंधनकारक नहीं है। तब कहना कि मृगतृष्णा निराकृत जानके फिर उसमें जल लेने नाजायगा, जो गया तो वह अज्ञ है इसी तरह जो मिथ्या भेदका इसम उपदेश दिया तोइस.गीताका भी.प्रमाण न मानना चाहिये।

(३२) भगवद्गीता। [ अध्याय::- दूसरा यह कि भेद विना उपदेश भी नहीं बनेगा तथा परमा- त्मामें ऐसा भी होनेका नहीं कि प्रथम अज्ञ.थे शास्त्राध्ययनसे ज्ञानी हुए, क्योंकि जिसको शास्त्राभ्याससे ज्ञान होता है उसको किसी समयमें अज्ञान भी होता है, सो नित्यज्ञानस्वरूप.श्रीकृष्णमें यह भी नहीं हो सकता है। यहां श्रुति प्रमाण है जैसे-'यः सर्वज्ञः स सर्ववित् । पराऽस्य शक्तिविविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञान- बलक्रिया च" तथा यहां भी कहेंगे-"वेदाहं समतीतानि वर्तमा- नानि चार्जुन । भविष्याणि च भूतानि मां तु वेद नं. कश्चन" इत्यादि प्रमाणोंसे भेद ही. सिद्ध होता है, और भेद विना उपदेश किसको करे। यहां कोई कहते हैं कि, अर्जुन कृष्णका प्रतिबिंब है, आपको आप ही उपदेश करते हैं। इसपर "कहना कि दर्पण जल इत्यादिमें अपने प्रतिबिंबको देखकर जो बातें करे वह उन्मत्त याने चित्तप्रष्ट सिरीं होता है, उसके वाक्यं भी अप्रमाणित हैं, जिसको अभेदज्ञान है उसको उपदेश करनेका ही नहीं, न उसके गुरु हैं, न शिष्य है। इससे यही सिद्ध हुआ कि परमात्मासे जीव 'न्यारे हैं ॥१२॥ देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारे यौवनं जरां। तथा देहांतरप्राप्तिधारस्तत्र न मुह्येति ॥ १३ ॥ जैसे इसे देहमें जीवकी कुमार अवस्था यौवन और जराअ- वस्था होती हैं 4 से देहांतरकी प्राप्ति भी होती है; "परन्तु उसमें धीरे याने ज्ञानी पुरुष नहीं मोहता हैं ॥ १३॥ मात्रास्पर्शास्तु कौंतेय शीतोष्णसुखदुःखदाः आगमापायिनोऽनित्यास्तास्तितिक्षस्व भारत१४॥ हे कुंतीपुत्री मात्रा जो इंद्रियां, उनके स्पर्श जो शब्दास्पर्श रूप रस और गंध ये शीतै उष्णःयाने मृदु कठोर शब्द, शीबोष्ण

द्वितीयः २.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा०टी०। (३३)
शस्त्रप्रहारादिक और संयोगवियोगादिक दुःखके देनेवाले अनि-
त्य और आगापायी याने होते जाते रहते हैं, हे भारत | तुम
भरतवंशी हो उनको सहन करो ॥ १४ ॥
यं हि न व्यर्थयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ ।
समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते ॥ १५॥
हे पुरुषर्षभ । सुख और दुःख है सम जिसके ऐसे जिस ज्ञानी
पुरुषको ये निश्चयकरके नहीं पीडां करते हैं सो" मोक्ष जानेको
समर्थ होती है ।। १५ ।।
नोऽसतो विद्यते भावो नॉभांवों विद्यते सैतः ।
उभयोरपि ईष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः॥१६॥
जो गतासूनगतासुंश्च नानुशोचंति पंडिताः"इस वाक्यकरके
आत्माका स्वाभाविक नित्यत्व और देहका नाशित्व समझके
शोक न करना कहा उसीको अब 'नासतः 'इत्यादिकरके खुला-
सा दृढता करके कहते हैं कि असंत् जो नाशवान् है उसकी
स्थिरता नहीं होती है और संत् जो अविनाशी है उसका नाश
नहीं होता, तत्त्वदेर्शी पुरुषोंने इन दोनोंका भी" सिद्धांत देखा हे
सोई आगे दो श्लोकोंमें खुलासा कहेंगे ॥ १६ ॥
अविनाशि तु तेहिद्धि येने सर्वमिदं ततम् ।
विनाशमव्ययस्यास्य नै कैश्चित्कर्तुमर्हति॥१७॥
जिस आत्मतत्त्वकरके यह सर्व अचेतन तत्त्व व्याप्त है उस-
को तो अविनाशी जॉनी ! इस अविनाशीका विनाश करनेको
'कोई नहीं समर्थ है ॥ १७॥
अंतवन्तं ईमे देहां नित्यस्योक्ताः शरीरिणः।।
अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युदयस्व भारत ॥१८॥

भगवद्गीता। [अध्यायः- जो यह जीव अविनाशी है तथा अप्रमेय है याने यह इतना ही है ऐसा कहने में नहीं आता है तथा नित्य है याने सर्वदा एकसा है। ऐसे जीवके ये देह नाशवंत कहे हैं हे अर्जुन ! इससे युद्ध कैरो॥१८॥ ये एनं वेत्ति हतॉरं यश्चैनै मन्यते हंतम् । उभौ तौन विजानीतो नाय 'हति हन्यते ॥१९॥ जो इस आत्माको मारनेवालो जानता है और जो इसको अन्यकरके मैंरा मानता है वे "दोनों" नहीं जानते हैं, क्योंकि यह न किसीको मारता है न किसी करके मरता है ॥ १९ ॥ नं जायते म्रियते वा कदाचिनायं मत्वा भविता वाँ न भूयः ॥ अंजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो नै हन्यते हैन्यमाने शैरीरे ॥२०॥ यह आत्मा किसी कालमें भी जन्मता और मरता नहीं यह अजन्मा है नित्य सर्वकालमें पुराणे याने जो पहिले था वही है, न भयौ है और फिर होनेवाला भी नहीं है, शरीरके मारनेपर भी नहीं मरता है ॥ २० ॥ वेदांविनाशिनं नित्यं ये एनमेजमव्ययम् । कैथं से पुरुषः पार्थ के घातयति हंति कम्॥२१॥ जो इस आत्माको अजन्मा अङ्ख्य नित्य अविनाशी जानता है तो हे अर्जुन ! सो वह पुरुष कैसे" किसको मरवाता है और कैसे किसको मारती है ॥२१॥ बोसांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति :- नरोऽपराणि । तथा शैरीराणि विहाय जीर्णान्य- न्यानि संयाति नैवानि देही ॥२२॥ यद्यपि शरीर नष्ट होनेसे आत्माका नाश नहीं तो भी शरीर- वियोगका जो दुःख होताहै ऐसा अर्जुनका आशय जानके भगवान .

द्वितीयः २.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा टी०। (३५) कहने लगे कि जैसे मनुष्य पुराने नोंको त्यागके और नवी- नोंको ग्रहण करता है तैसे जीवं पुराने शरीरोंको त्यागके और नवीन शरीरोंको प्राप्त होती है ॥ २२ ॥ नैनं छिदंति शस्त्राणि नैं नं दहति पावकः । ने चैन क्कैदयंत्योपो न शोषयति मारुतः ॥ २३ ॥ सर्व शस्त्र भी इस आत्माको नहीं छेदि (काटि) सेंकते हैं अग्नि इसको नहीं जलाता है जेल इसको नहीं भिगो सका है और पवने भी नहीं सुखा सका है ॥ २३ ॥ अंच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशॉष्य एव च। नित्यः सर्वगंतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः ॥२४॥ यह आत्मा छेदने योग्य नहीं, यह जलाने योग्य नहीं और निश्चित भिजाने सुखाने योग्य भी नहीं है यह नित्ये सब प्रकारके शरीरोंमें जानेवाला स्थिरस्वभाव अचल और सनातन है ॥२४॥ अव्यक्तोऽयमचिंत्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते। तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि ॥ २५ ॥ अथ चैनं नित्यजतिं नित्यं वा मन्यसे मृतम् ।। तथापि खं महाबाहो नैनं शोचिंतुमर्हसि ॥२६॥ 'यह अतिसूक्ष्मतासे अप्रगट है यह विचारमें नहीं आता है यह विकाररहित कहाँ है तिसंसे इसकी ऐसा जानके शोच करनेको नहीं योग्य है।जो कि इसको नित्यजन्मा अथवा नित्यै मर्रा जॉ- नोगे तो भी हे महाभुजे अर्जुन ! तुम इस आत्माको शोर्चनेको नहीं योग्य हो ॥२६ ॥ २६ ॥ जातस्य हिं वो मृत्युभ्रुवं जन्म मृतस्य॑ चं। तस्मादपरिहार्येऽर्थे ने वं शोचिंतुमर्हसि ॥ २७ • . i. भगवद्गीता। [ अध्यायः- जिससे कि जन्मेकी मृत्यु निश्चय है और मरेका जन्म निश्चय हे तिसंसे इस निरुपाय परिणामम तुमे शोर्चनेको नहीं योग्य हो २७ अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत । अव्यक्तनिधनान्येवं तत्रं को परिदेवना ॥ २८ ॥ हे अर्जुन । मनुष्यादिक भूतप्राणी जन्मके आदिमें प्रगट न थे, जन्मके पीछे मरणके आदि.मध्य अवस्थामें प्रर्केट दीखता है,मरे पीछे भी न दीखेंगे ऐसे निश्चयसे इस विषयमें शोक क्या है॥२८॥ आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेनमाश्चर्यवहृदति तथैवं चान्यः । आश्चर्यवच्चैनमन्यः शृणोति श्रुत्वाप्येन वेदं न चैवं कश्चित् ॥ २९॥ ऐसे देहात्मवादमें शोकका परिहार किया । अब कहते हैं कि देहसे न्यारे' आत्मामें द्रष्टा, श्रोता, वक्ता और ज्ञाता भी दुर्लभ हैं। प्रथम कहे हुए लक्षणोंकरके युक्त आत्मा सर्वसे विलक्षण है यहां कोई तपस्वी पुण्यवान् इस आत्माको आश्चर्यवत् देखता है और ऐसी ही कोई आश्चर्यवत् कहता है और ऐसा ही और पुरुषे इसको आश्चर्यतुल्य सुनता है और कोई पुरुष इस आत्मा- को ही सुनके भी नहीं जानती है ॥ २९ ॥ : देही नित्यमवंध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत ! : तस्मात्सर्वाणि भूतानि ने त्वं शोचिंतुमर्हसि ॥३०॥ ..हे अर्जुन | सर्वेकी देहमें यह जीव नित्य ही अवध्य है। इससे तुर्म. सर्व भूतोंको सोचनेको नहीं योग्य हो ॥ ३०॥ स्विधर्ममपि चावेक्ष्य ने विकपितुमर्हर्सि।... धाद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत् क्षत्रियस्य न विद्यते३१॥ स्वधर्मको भी देखके दयां करनेको नेही योग्य हो, क्योंकि क्षत्रियको धर्मसंबंधी:युसे और कल्याण नहीं है. ॥३॥ " द्वितीयः २.] सान्वय-अमृततरङ्गिणी भा० टी०। (३७) यदृच्छया चोपपन्नं स्वर्गद्वारमपातम् । सुखिनः क्षत्रियोः पार्थ लमंते युद्धमीदृशम् ॥३२॥ हे पृथापुत्र अर्जुन ! जो आपसे प्राप्त हुआ और खुलो हुआ स्वर्गका द्वार ऐसे युद्धको पुण्यवान् क्षत्रियलोग पौत हैं ॥३२॥ अथ चेत्त्वमिमं धम्र्य संग्रामं न करिष्यति । ततः स्वधर्म कीर्तिचे हित्वों पापैमवाप्स्यसि॥३३॥ अकीर्ति चापि भूतानि कथयिष्यति तेऽव्ययास। संभावितस्य चाँकीर्तिमरणादतिरिच्यते ॥३४॥ जो कदाचित् तुम इस धर्मरूपं संग्रामको ने करोगे तो उससे स्वधर्म और कीर्तिको भी छोडेके पापको प्राप्त होवोगे । और जो लोगे तुम्हारी अखंडं अकीर्तिको भी कहेंगे सो अकीर्ति संभा- वित पुंरुपको मरणसे अधिक है ॥ ३३ ॥ ३४ ॥ भयाद्रणांदुपेरतं मस्यते त्वां महारथाः। येषां च त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लार्धवम् ॥३५॥ अवाच्यवादांश्च बहूँन्वदिष्यति तैवाहिताः। निदंतस्तैव सामर्थ्य तैतो दुःखतरं - किंम्॥३६॥ । श्रीकृष्णजीने अर्जुनका अभिप्राय जाना कि जो मैं बंधुओंके घेह और दयालुतासे युद्ध न करूंगा तो मेरी अकीर्ति कैसे होगी अर्थात् होनेकी नहीं ऐसा जानके बोले कि हे अर्जुन ! जिन कर्ण दुर्योधनादिक महारथोंके तुमै शूर शत्र ऐसे मान्य थे उनके ही अब युद्ध न करनेसे निंदायोग्य लघुताको प्राप्त होगे, वे ही महारथ शत्रु तुमको भैयसे संग्रामे न किया ऐसा मानेंगे, वे ही तुम्हारे शत्रु तुम्हारे सामर्थ्यकी निंदा करते हुएँ बहुतैसे वाक्य 'बोलेंगे,अर्थात अर्जुन कायर है,शोभाके वास्ते शस्त्र बांधता है, जैसे स्त्री आभूषः ..

(३८) भगवद्गीता। [ अध्याय:- गमें सर्प सिंहादिक देखके प्यारसे धारण करे और साक्षात देखके प्राण लेके भागे ऐसे जब एसी निंदा करेंगे तब उससे बड़ा दुःख कौन है सो कैहो ॥ ३५ ॥ ३६॥ हैतो वा प्राप्स्यसिस्वर्गजित्वा वा भोक्ष्यसे महीम्। तस्मादुत्तिष्ठ कौंतेये युद्धाय कृतनिश्चयः ॥ ३७॥ उस निंदाके सुननेसे रणमें मरना मारना ही श्रेष्ठ है ऐसा कहते हैं । हे कुंतीपुत्र । जो रणमें शत्रुप्रहारसे मरोगे तो भी स्वर्ग- को प्राप्त होगे, जो जीतोगे तो पृथिवीको भोगोंगे, इससे युद्धके अर्थ निश्चय करके उँठो ॥ ३७ ।। : सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयांजयौ। ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि ॥३८॥ सुख और दुःखको समान करके तथा लाभ और हानि जय और परांजय समान जानकर फिरै युद्धके अर्थ युक्त हो, ऐसी करनेसे पापको नहीं प्राप्त होंगे ॥ ३८ ॥ एषां तेऽभिहता सांख्ये बुद्धिोंगे विमा शृणु। बुद्धयों युक्तो यया पार्थ कर्मबंधं प्रहास्यसि ॥३९॥ श्रीकृष्णभगवान्ने ऐसा आत्मस्वरूप दिखाया, अब आत्म- स्वरूप ज्ञानपूर्वक मोक्षसाधनभूत कर्मयोग कहते हैं कि हे पृथा. पुत्र ! यह दुद्धि तुमसे मैंने सांख्य जो. आत्मा देहका विवेक उसमें कही और इसीको योगमें याने कर्मयोगमें सैंनो जिस बुद्धिः करके युक्त कर्मबंध जो संसारदुःख. उसको छोड़ोगे ॥ ३९ ॥ 'नेहांभिक्रमनांशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते । स्वल्पमप्यस्य॑ धर्मस्ये त्रायते महतो भयौत्॥४०॥ • . अब ज्ञानयुक्त कर्मयोगका माहात्म्य कहते हैं: इस ज्ञान: युक्त कर्मयोगमें अर्थात् निष्काम कर्मयोगमें प्रारंभका भी 1 द्वितीयः२.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा०टी०। (३९) नाश नहीं है, याने प्रारंभ होके समाप्त नै हो तो भी नाश नहीं है, इसके छूटनेका दोष भी नहीं होता है, इस निष्काम कर्मको लव- लेशमात्र भी" जन्ममरणरूप बड़े भयंसे रक्षण करता है ॥४०॥ व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेहँ कुरुनंदने । बहशाखो ह्यनंतॉर्श्व बुद्धयोऽव्यवसांयिनाम् ॥४१॥ हे कुरुनंदन । व्यवसाय जो विष्णुपरमात्मा उनमें है आत्मा नाम मन जिनका ऐसे पुरुषोंकी बुद्धि इस निष्कामकर्ममें ही वह एक है एक मोक्षसाधनके ही वास्ते हैं, जो अव्यवसायी याने परमात्मा विना याने नाना पदार्थ पशु पुत्रादिकोंके चाहनेवाले हैं उनकी बुद्धि बहुँत हैं अर्थात् अनेक कामनाओंमें लगी है और वहां भी बहुँ शाखा याने एक कार्यके वास्ते कर्म करके उसमें भी अनेक फल माँगते हैं जैसे पुत्रार्थ यज्ञमें धन धान्य आयुष्य आरोग्यका मांगना ॥ ११ ॥ यामिमी पुष्पितां वाँच पँवदंत्यविपश्चितः । वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः॥४२॥ कामात्मानः स्वर्गपरों जन्मकर्मफलप्रदाम् । "क्रियाविशेषबहुला भोगैश्चर्यगति प्रति ॥ ४३ ॥ भोगैश्वर्यप्रसक्तीनां तयोपहतचेतसाम् । व्यवसायात्मिका बैद्धिः समाधौ नै विधीयते ॥४४॥ 'हे पृथापुत्र ! जो अज्ञानीजन वेदवांदरत याने वेदोक्त कर्मसे स्वर्गादिक फल ही होता है ऐसे कहनेवाले, स्वर्गसुखके समान और सुखें नहीं है ऐसा कहनेवाले कामनामें ही चिंत्त रखनेवाले स्वर्गको ही श्रेष्ठ माननेवाले जिसे पुष्पित याने कहने मात्रमें रम- णीय जन्मकर्मरूप फैलकी देनेवाली तथा जिसमें भोग और ऐश्वर्य निमित्त बहुत उपकरण याने कर्म साधन हैं जिसमें ऐसी इस वाणीकों कहते हैं इसीसे उसी वाणीकरके अपहरण हुए हैं चित्त

।
-
(४०) भगवद्गीता। [ अध्याय
जिनके इसीसे भोग और ऐश्वर्यमें आसक्त हैं, उनके मैनमें वह
परमात्मविषयक बुद्धि नहीं प्रवृत्त होती है ॥४२॥४३॥४४॥
.
त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैर्गुण्यो भवार्जुन ।
निहो नित्यसत्त्वस्थो नियोगक्षेम आत्मवान्४५॥
हे अर्जुन ! वेदै गुण्यविषयक हैं अर्थात् तीनों गुणोंके
कर्मोंको ही कहते हैं, तुम नि याने सुख दुःख जय पराजय
लाभ अलाभ इन द्वंद्रोंसे रहित हो अर्थात् उनसे उत्पन्न हर्ष शोक-
रहित हो, नित्यसत्त्वस्थ हो यांने सात्त्विक कर्म करो, नियोगक्षेम
याने कोईसा भी लाभ और लब्धका रक्षण ईश्वराधीन न जानो,
आत्मवान् याने परमात्मामें चित्त राँखो, और निबैगुण्य हो
अर्थात् कर्मफलोंका त्याग करो ।। ४५.॥.
यावानर्थ उदपांने सर्वतः संप्लुतोदके।
तावोन्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः ॥ ४६॥
जो कहो कि वेदोक्त कर्मोंसे तुम सात्त्विक करो उसीको खुलासा
करके कहते हैं जैसे सर्वत्र जलसे भैरे हुए तालाब इत्यादिक
जलाशयमें मनुष्यका जितना प्रयोजन होता है. उतना ही लेता
है वैसे ही वेदके जाननेवाले ब्राह्मणको सर्व वेदोंमें तावान् अर्थाद
सात्त्विक कर्म ही योग्य है ॥ ४६॥
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।
मां कर्मफलहेतुर्भूमी तें संगोऽस्त्वकर्मणि ॥४७॥
तुमको कर्ममें ही अधिकार है फलोंमें नहीं; कोंके फलका
कारणे तुममें कोई समयमें भी मत हो । तुर्मको अकर्म याने
स्वधर्म योग्य युद्धादि कर्मोका न करना इसमें संगै जो निष्ठा
सो. (कदाचित् ) न हो।.१७॥
योगस्थः कुरु कर्माणि संगं त्यक्त्वा धनंजय मी
सिद्ध्यसिद्धयोःसमोभूत्वा समत्वंयोग उच्यते ॥८॥

द्वितीयः२.] सान्वय-अमृततरंगिणी भाटी । (११) हे अर्जुन | सिद्धि और अंसिद्धिमें समबुद्धि होके कर्मफलके संगको त्योगिके योगमें स्थित होते हुए कर्मोंको केरो। सिद्धि और असिद्धिमें जो समत्व है वही योग कहाँ है, अर्थात् चित्तके समाधानत्वको योग कहते हैं । तात्पर्य यह कि चित्तको समा- धान करके युद्धरूप स्ववर्णोचित कर्म करो ॥ १८ ॥ दूरेण वरं कर्म बुद्धियोगांद्धनंजय । बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणीः फलहेतवः॥४९॥ हे अर्जुन ! बुद्धियोगसे और कर्म निश्चयकरके अत्यंत नीच है, इसवास्ते बुद्धियोग जो निष्काम कर्म उसीमें ईश्वरप्राप्तिकी.. च्छा करो , फलंकी इच्छा करनेवाले कृपण हैं ॥ ४९ ॥ - बुद्धिंयुक्तो जहांतीह उभे मुकृतंदुष्कृते । तस्माद्योगांय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम् ५०॥ बुद्धियुक्त ( निष्कामकर्मी ) इस लोकमें सुकृत (पुण्यकर्म ) और दुष्कृत (पापकर्म ) इन दोनोंको त्यागता है, इससे योगके अर्थ अर्थात् बँद्धियोग जो निष्काम कर्म उसके वास्ते युक्त हो, क्योंकि यह योगे सर्व कर्मों में कुशलकारक है ॥५॥ कर्मजं बुद्धियुक्ता हिँ फलें त्यक्त्वा मनीषिणः। जन्मबंधविनिर्मुक्ताः पदं गच्छंत्यनामयम् ॥५१॥ जो बुद्धियोगयुक्त हैं वे ज्ञानी कर्मजन्य फलको त्यागके जन्मबंधनसे मुक्त होकर निश्चयकरके मोक्ष पदको जाते हैं।॥५॥ यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति । तंदगन्तासि निर्वेद"श्रोतव्यस्य श्रुतस्यच॥५२॥ जब तुम्हारी बुद्धि मोहरूप दुःखको उल्लंघन, कैरेगी तबै जो. फलादिक सुननेयोग्य और जो सुने हों उनके विषयमें वैराग्यको प्राप्त होओगे ॥५२॥ .. ..

(१२)
--
भगवदीता। {अध्यायः-
श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला।
समाधावर्चला बुद्धिस्ता योगेमवाप्स्यसि॥५३॥
जब तुम्हारी बुद्धि श्रुतिमें याने मेरे उपदेशमें विशेषकरके
आसक्त निश्चल मनमें अंचल ठहरेगी तब योगको पाओगे॥५३॥
अर्जुन उवाच ।
स्थितप्रज्ञस्य को भाषां समाधिस्थस्य केशव
स्थितधीः किप्रभाषेत किमासीत ब्रजेत किम् ५४॥
ऐसा सुनकर अर्जुन बोले-हे केशव ! अर्थात् हे जलशायी
भगवन् ! स्थिरबुद्धिः समाधिस्थकी 'कौनसी भाषा ( उसका
वाचक कौन है ) अर्थात् वह स्थिरबुद्धि किससे कहता है, स्थिर-
बुद्धि कैसें बोलता है, कैसे बैठती है और कैसे" चलता है।५४॥
श्रीभगवानुवाच ।
प्रजहोति यदा कामान्सर्वान्पार्थ मनोगतान् ।
आत्मन्येवोत्मना तुष्टः स्थितप्रैज्ञस्तैदोच्यते ॥५५॥
अब श्रीकृष्णभगवान् स्थिर बुद्धिवालेका स्वरूप कहते हैं,
यहां ऐसा न्याय है कि रहनिरीतिसे भी स्वरूपका निश्चय होता है
इससे रहनिरीति कहते हैं कि हे अर्जुन ! जब आपके मनैकरके
आ स्वरूपमें ही संतुष्ट होकर मनमें प्राप्त हुए सर्व मनोरथोंको
सर्वथा त्यागता है तब वह स्थिरबुद्धि, कहाँता है ॥५५॥
दुःखेष्वनुडियमनाः सुखेषु विगंतस्पृहः ।
वीतरागंभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुज्यते ॥ ५६ ॥
दुःखोंमें जिसका मन व्याकुल नहीं होता है. तथा सुखोंमें
निराश होता है और जिसे (पुत्रादिकोंमें ) स्नेह, भय और क्रोध
ने हो वह मुनि स्थिर्बुद्धि कहाता है ॥ ५६ ॥

-::
द्वितीयः २.] सान्वय-अमृततरङ्गिणी भा टी०। (४३)
यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्यं शुभाशुभम् ।
नाभिनंदति न दृष्टिं स्थितप्रज्ञस्तंदोच्यते ॥५॥
जो सर्वत्र स्नेहरहित होकर उसे उस शुभाशुभको पाकर भी
न शुभसे प्रसन्न हो व अशुभसे दुःखी हो तब वह स्थिरबुद्धि
कहोता है ॥ ५७॥
यदा संहरते चायं कोऽङ्गांनी सर्वशः।
इंद्रियाणींद्रियाँर्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥ ५८॥
जब यह कछुवा जैसे अपने सर्व अंगोंको समेट लेता है वैसे
इंद्रियोंके विषयोंसे अपनी सर्व इंद्रियोंको बैंच लेता है तब
उसकी बुद्धि स्थिर होती है ॥ ५८ ॥
विषया विनिर्वर्तते निराहारस्य देहिनः। । ।
रसवेज रसोऽप्यस्य पेरं दृष्ट्वा निवर्त्तते ॥ ५९॥
जो आहाररहित प्राणी इंद्रियविषयोंको नहीं सेवता उसके
विषयानुराग निवृत्त हो जाते हैं परन्तु अभिलाषा नहीं निवृत्त
होती और ज्ञानीकी वह विषयाभिलाषा भी आत्मस्वरूपको
देखके निवृत्त होता है ॥ ५९॥
यतेतो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः ।
इंद्रियाँणि प्रमाथीनि हरंति" प्रसभं मनः॥६०॥
तौनि सर्वाणि संयम्य युक्तं आसीत मत्परः। :
वैशेहि"यस्येन्द्रियाणितस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥६१॥
हे कुंतीपुत्र! आत्मदर्शन विना विषयानुराग-निवृत्त होता नहीं
और उसकी निवृत्ति विना जो ज्ञानी पुरुष (बुद्धिकी स्थिरताके
लिये ) यत्न करता है तो भी ये प्रबल इद्रियां हठपूर्वक मनको
हर लेती हैं.। इससे योगयुक्त होकर उन सर्व इंद्रियोंको नियमित
(अपने वशमें ) करके मेरे औश्रय रहे, क्योंकि जिसकी इंद्रिया
वर्शमें हैं उसकी निश्चयकरके द्धि स्थिर रहती है ॥६०॥६॥

(४१) भगवद्गीता। [ अध्यायः-
ध्यायतो विषयान पुंसः संगैस्तेषूपजायते।
संगॉत्संजायते कामः कामात् क्रोधोऽभिजायते॥
क्रोधीवति संमोहः संमोहात्स्मृतिविभ्रमः ।
स्मृतिभ्रंशाद्बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ॥३॥
बाह्य इंद्रियनकी प्रबलता और उनकों वंश न करनेमें जो दोष
सो कहा अब मनसंबंधी कहते हैं, जो पुरुष मन वश किये विना
जितेन्द्रियता चाहता है, सो होनेकी नहीं जैसे कि, जिसके मनमें
विषयोंका चिन्तवन है उस पुरुषको उन विषयोंमें संयम करते
करते भी आसक्ति होगी उस आसॅक्तिसे अभिलाषा होगी अभिः
लाषांसे क्रोध होगा कोसे मतिभ्रम होती है मतिभ्रमसे स्मरणश-
क्तिमें विभ्रम होता है स्मृतिविभ्रमसे ज्ञानका नाश ज्ञानके नाशसे
स्वरूपसे नष्ट होता है याने संसारमें भ्रमता है ॥ ६२ ॥६३॥
रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिद्रियैश्चरन् ।
आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति ॥ ६४ ॥'
प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते।
प्रसन्नचेतसो बाशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते ॥६५॥
वश्य है मन जिसका ऐसा पुरुष रागद्वेषकरके रहित और
आत्माके वश्य ऐसी इंद्रियोंकरके विषयोंका सेवन करताहूंआ
प्रसन्नताको प्राप्त होता है याने निर्मलांतःकरण होता है,तब निर्मल-
चित्ते होनेसे इसके सर्वदुःखोंको नाश होता हैं, उस प्रसन्न चित्त
वालेकी बुद्धि शीघ्र ही स्थिर होती है ॥ ६४॥ ६९ ॥
नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य ने चर्चायुक्तस्य भावना।
नेचाभावयतः शान्तिरशीतस्य कुतैः सुखम्॥६६॥

द्वितीयः २.] सान्वय-अमृततरंगिणी भाटी । (१५) अयुक्त जो समतारहित है उसकी बुद्धि नहीं स्थिर होती है और उस: अयुक्तके भावना याने आस्तिकता सो भी नहीं होती है और जिसके भावना नहीं उसके शांति नहीं, जिसके शांति नहीं उसको कहाँसे सुखं होगा ॥६६॥ इंद्रियाणां हि चरैतां यन्मेनोऽनुविधीयते। तंद्यस्यं हरति प्रेज्ञां वायुनावमिवामसि ॥ ६७ ॥ तस्मीद्यम्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः। इंद्रियाणींद्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥६॥ जिससे कि, जो मने विषयमें प्रवृत्त इंद्रियोंको अनुहर्रता है सो इस पुरुषकी बुद्धिको वायु जलैमें नावको ऐसे" हरता है। ईसीसे हे महाबाहो । जिसकी सर्व इंद्रियाँ इंद्रियोंके विषयोंसे सर्वयों रोंकी हुई हैं उसकी बुद्धि प्रतिष्ठित है. ॥ ६॥६८॥ या निशा सर्वभूतानां तम्या जोगति संयमीती 'यस्यां जाग्रति भूतानिसा निशा पश्यतो मुनेमा६९॥ सर्वभूत प्राणीमात्रोंकी जो रात्रि अर्थात् जिस विषय में सर्व सोयेसे रहे हैं ऐसी जो परमात्मविषया बुद्धि उसमें इंद्रिय संयमी जागता है याने आत्मस्वरूपको देखता है, जिस शब्दादिविषय- रूपू रात्रिमें सर्वभूत (प्राणी.) जाँगते हैं सो ज्ञानी जनेकी रात्रिरूप है ॥ ६९ ॥ आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमापैः प्रविशति यत् । "तहकोमा य प्रविशति सर्वे से शातिमाग्नोति ने कामकामी॥..७० ॥ जैसे आप ही परिपूर्ण सर्वदा एकसे भरे हुए समुंद्रमें जले बहिरसे भरता है वैसें जिसको सर्व कामना प्राप्त होती हैं सो" शीतिको प्राप्त होती है, जो कामनाओंकी इच्छा करनेवाला है.सो. शांतिको नहीं पाता है ॥ ७० ॥ - (४६) भगवद्गीता। [अध्यायः- विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः । निर्ममो निरहंकारः स शांतिमधिगच्छति॥७१ ॥ जो पुरुष सर्व अभिलाषोंको छोड़के इच्छारहित विचरता है सी ममतारहित और अहंकाररहित हुआ शांतिको प्राप्त होता है ॥ ७॥ एषां ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनों प्राप्य विमुंह्यति । स्थित्वाऽस्यांमंतकालेऽपिब्रह्मनिर्वाणमृच्छति ॥७२॥ इति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे सांख्य- योगो नाम द्वितीयोऽध्यायः॥२॥ हे पृथापुत्र अर्जुन । यह जो निष्कामकर्मरूप मैने कही सो ब्रह्म- प्राप्तिकारक स्थिति हैं ईसको पाके नहीं मोहको पाता है। इसमें अंतकालमें भी स्थित होके ब्रह्मसदृश मुक्ति पावे अर्थात् जो सर्व- काल ऐसा ही रहे उसकी मुक्तिको संदेह क्या है ॥ ७२.॥ इति श्रीमत्सुकुलसीतारामात्मजपेंडितरघुनाथप्रसादविरचिवायां गीतामस- वरंगिण्या दितीयाध्यायप्रवाहः॥३॥ अर्जुन उवाच । ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन । तकि कर्मणि घोरे मी नियोजयसि केशेव ॥१॥ ऐसे श्रीकृष्णके वाक्य सुनके अर्जुनने विचार किया कि भग- वान्ने प्रथम मुझको 'अशोच्यानन्वशोचस्त्वम्' इत्यादि वाक्यों करके ज्ञानयोग उपदेश किया फिर बुद्धियोगे,विमां शृणु' इत्या- दिकरके कर्मयोग उपदेश किया उसमें भी श्रुतिविप्रतिपन्ना.ते यदा स्थास्यति निश्चला' इत्यादिकरके निष्काम कर्मसे आत्मज्ञानकी Saint तृतीयः३.] सान्वय-अमृततरंगिणी भाटी। (४७) ही प्राप्ति कही इससे निश्चय होता है कि, कर्मयोगसे जो पीछे आत्मज्ञान कहा वही श्रेष्ठ है ऐसे विचारके अर्जुन भगवानसे कहने लगे कि, हे जनार्दन । यदि, कर्मयोगसे ज्ञानयोग तुमने श्रेष्ठ माना हो तो हे केशव ! घोर कर्ममें मुसको क्यों युक्त करते हो ॥ १॥ व्यामिश्रेणैव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव में । तेंदेकं वैद निश्चित्य येन श्रेयोऽहंमाप्नुयोम् ॥२॥ ऐसे मिश्रितं वाक्यकरके मेरी बुद्धिको मोहते हो. जिससे में कल्याणको प्राप्त होऊ 'सो एक निश्चयकरके कहो ॥२॥ श्रीभगवानुवाच। लोकेऽस्मिन द्विविधा निष्टा पुरा प्रोक्ता मयाऽनघ । ज्ञानयोगेन सांख्यानां कर्मयोगेर्ने योगिनीम् ॥ ३ ॥ ऐसे अर्जुनके वाक्य सुनके श्रीकृष्ण भगवान् बोलने लगे। हे निष्पाप अर्जुन ! इस लोकमें पूर्वकॉलमें मैंने दो प्रकारकी निष्ठा कही है सो सांख्येवालोंको ज्ञानयोगकरके और योगि- योंको कर्मयोगैकरके ॥३॥ ने कर्मणामनारंभान्नैष्कर्म्य पुरुषोऽश्नुते । नै च संन्यसनादेव सिद्धि समधिगच्छति ॥ ४॥ शास्त्रोक्त कोंके किये विना पुरुष निष्कर्मता जो सर्वेद्रिय- विषयनिवृत्तिपूर्वक ज्ञाननिष्ठा उसको नहीं प्राप्त होता है और कर्मके न करनेसे भी सिद्धिको नहीं प्राप्त होता है ॥ ४॥ ने हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् । कार्यते हावेशः कर्म सर्वेः प्रकृतिजैर्गुणैः ॥५॥ किसी कालमें क्षणभर भी कर्म किये विनों कोई भी पुरुष निश्चय .

१८) भगवद्गीता। [अध्याय:- करके नहीं रहता है क्योंकि सर्वसत्त्वादिप्रकृतिके गुणोंकरके परवश हो कर्म करना ही पड़ता है ॥५॥ कर्मेन्द्रियाणि संयम्य ये ऑस्ते मनसा स्मरन् । 1. इंद्रियार्थान विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते ॥६॥ जो ज्ञानयोगमें प्रवृत्त होनेके लिये कर्मेंद्रियोंको हठसे संयममें रखके इंद्रियविषयोंको मनसे स्मरण करता रहता है सो मूढमति मिथ्याचार करनेवाला याने वृथायोगी कहोता है ॥ ६ ॥ :. यस्त्विन्द्रियाणि मर्नेसा नियम्यारभतेऽर्जुन। कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते ॥७॥ हे अर्जुन जो इंद्रियोंको मनसे नियममें रखके विषयोंमें आ- संक्त नहीं होता, कर्मेंद्रियोंकरके कर्मयोगको करता है वह श्रेष्ठ है ॥७॥ नियतं कुरु कर्म वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः । शरीरौत्रापि चे ते'ने प्रसिध्येदेकर्मणः ॥८॥ इससे तुम स्ववर्णोचित कर्म करो क्योंकि कर्म न करनेसे: कर्म करना श्रेष्ठ है और कर्मके विना तुम्हारा ज्ञानयोग करनेको शरीरनिर्वाह भी न सिद्ध होगौं ॥ ८॥ : यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबंधनः ।। तदर्थ कर्म कौंतेय मुक्तसंगः समाचर ॥ ९॥ : जो कर्मसे बंधन कहा है सो ऐसा कि, जो यज्ञार्थकर्म हैं उससे अन्यत्र कर्म करनेसे यह मनुष्य कर्मबंधनको प्राप्त होता है। हे कुंतीपुत्र ! तुम फलासंग हो उस यहके ही अर्थ कर्म करो॥९॥ सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः । ...अनेनं प्रसविष्यध्वमेषे वोऽस्त्विष्टकामधुक्॥१०॥ "

तृतीयः ३.] सान्वय-अमृततरंगिणी भाटी। (१९)
प्रजापति जो परमात्मा सो पुरा याने सृष्टिकालमें यज्ञसहित
प्रर्जाको उत्पन्न करके बोले कि इस यज्ञकरके तुम द्धिको प्राप्त
होओ यह येज्ञ तुम्हारे इच्छितकामनाओंको पूर्ण करनेवाली हो.
देवान भावयेतानेने ते देवां भावयतुं वः।
परस्परं भावयतः श्रेयः परमवाप्स्यथ ॥११॥
इस यज्ञके द्वारा तुम.देवताओंका पूजन कर उनको बढ़ांवो वे
तुम्हारे बढ़ाये हुए देवं तुम्हारा मनोरथ पूर्ण करते हुए तुमको
बढावेंगे ऐसे परस्पर बढ़ाते हुए तुम और देवता दोनों श्रेष्ठ
कल्याणको प्राप्त होओगे ॥ ११ ॥
इष्टान्भोगोन्हि वो देवा दास्यते यज्ञभांविताः ।
तैर्दत्तानप्रदायभ्यो यो" भुक्ते स्तेन एव सः॥१२॥
, जो यज्ञ करोगे उससे वदिते देवं तुमको इच्छित भोग-नि-
अंर्य करके देंगें उनके दिये हुए भोगोंको उनको दिये विना जो
भोगेगी. सो" चोर है इससे चोरतुल्य दंड पावेगा ॥ १२॥
"यज्ञशिष्टांशिनः संतो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः। .
मुंजते तेवघं पापा येपचंत्यत्मिकारणात्॥१३॥
देवादिपूजनरूप यज्ञका शेष याने बचे हुए अन्नादिकके भोगने
वाले सत्पुरुष सर्वपापों से मुक्त होते हैं और जो अपने ही वास्ते
अन्नको पाते हैं वे पापी पापै को ही खाते हैं ।। १३ ॥
अन्नाद्भवति भूतानि पर्जन्यादन्नसंभवः ।
यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञेः कर्मसमुद्भवः ॥ १४ ॥
कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि" ब्रह्माक्षरसमुद्भवम् ।
तस्मात्सर्वगत ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम् ॥ १५॥

(५०.) भगवद्गीता। [ अध्याय:-
एवं प्रैवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीहैं यः ।
अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ से जीवति॥१६॥
अब दिखाते हैं कि, लोकदृष्टि और शास्त्रदृष्टिसे भी सबका
मूल यज्ञ ही है सो ऐसे कि सर्वर्भूत प्राणी अन्नसे होते हैं अत्रकी
उत्पत्ति वर्षासे है सो लोकप्रसिद्ध देखनेमें आता है। वर्षा यज्ञसे
होती है यह शास्त्रप्रसिद्ध हैं सो यह श्लोक-" अग्नौ प्रास्ताहुतिः
सम्यगादित्यमुपतिष्ठति ॥ आदित्याजायते वृष्टिर्वृष्टेरनं ततः
प्रजा" ॥१॥ यज्ञकी उत्पत्ति यज्ञकर्ताके किये हुए कर्मसे
होती है वह कर्म ब्रह्मसे उत्पन्न होती है ऐसे जानो ब्रह्म नाम प्रकृ-
तिका है यहां प्रकृतिका ही रूप शरीर ब्रह्म जानना। यहां प्रथम-
श्रुतिः-"तदेतद्ब्रह्म नामरूपमन्नं च जायते" और "मम योनिर्म-
हद् ब्रह्म तस्मिन् गर्भ दधाम्यहम्" इत्यादि प्रमाणोंसे यहां यही
अर्थ है कि, प्रकृतिको ब्रह्म कहते हैं उसीका परिणाम यह शरीर
इससे कर्म होता है यह शरीर अक्षरसमुद्भव याने अक्षर जो जीव
उस करके सहित उत्पन्न होता है याने सजीव शरीर कर्मका कारक
है जिससे कि, शरीर ही कर्मकारक है इसीसे सर्वगत याने सर्वा-
धिकार योग्य शरीर यज्ञमें नित्य प्रतिष्ठित है याने यज्ञका मूल
कारण है ऐसे यहां ईश्वरके द्वारा प्रवर्तमानें इस चक्रको जो कर्मा-
धिकारी किंवा ज्ञानकर्माधिकारी नहीं अनुवर्तता है याने यज्ञ विना
शरीर पोषता है हे अर्जुन ! सो इंद्रियारीम पापऔंयुष्य वृथी
जीता है । जो चक्र कहा उसका स्पष्टार्थ यह है कि अन्नसे शेरीर,
वर्षासे अन्न, यज्ञसे वर्षा, कर्मसे यज्ञ, शरीरसे कर्म, अन्नसे शरीर
ऐसा प्रवर्तित है ॥ १४ ॥ १५॥.१६ ॥
यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्चें मानवः।
आत्मन्येदे च संतुष्टैस्तस्यै कार्य नै विद्यते ॥१७॥

तृतीयः ३.] सान्वय--अमृततरंगिणी भा०टी०। (५१) नैर्व तस्य कृतेनार्थों नातेनेहें कश्चने । नै चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रयः ॥ १८ ॥ * कर्म न करनेसे किसको दोष नहीं सो कहते हैं, किजो मनुष्य 'आत्मरति हो याने आत्मस्वरूपमें ही आनंदित रहता हो और आत्मस्वरूपसे ही तृप्त हो अन्नादिकसे प्रयोजन नहीं और आ- त्मामें ही संतुष्ट हो उसके लिये कार्य नहीं है उसके कर्म करने से न करनेसे भी यहां कुछ प्रयोजन नहीं है और इसके सब प्राणि- योंमें कोई ऐसा नहीं जिससे कुछ प्रयोजन हो" । तात्पर्य ऐसा मनुष्य कर्म करे अथवा न करे तो चिंता नहीं ॥ १७॥ १८ ॥ ... तस्मादसतः सततं कार्य कर्म समाचर । असक्तो ह्याचरनं कर्म परमाप्नोति पूरुषः॥ १९॥ जिससे कि, ऐसेको दोष न हो तुम तो द्रव्यं कुटुंबादिसे रत हो इससे कर्ममें आसक्त न होकर करनेयोग्य स्ववर्णोचित कर्मको निरंतर करो क्योंकि फलेच्छारहित कर्म करते करते पुरुष परमा त्माको प्राप्त होती है ॥ १९ ॥ कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकांदयः। लोकसंग्रहमेवापिसंपश्यन् कर्तुमर्हसि ॥२०॥ अब यह दिखाते हैं कि, ज्ञानीको भी कम ही श्रेष्ठ है । सो ऐसे जिससे कि, जनकादिक ज्ञानी भी कर्मकरके ही मोक्षको प्राप्त हुए तथा लोकसंग्रहको भी देखते हुए कर्म करनेके योग्य हो ॥२०॥ १... यद्यदाचरति श्रेष्ठस्ततदेवेतरो जनः । से यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तंदनुवर्तते ॥ २१ ॥ यहां कारण यह है कि, श्रेष्ठपुरुष जो जो आचरण करते हैं दूसरे लोग भी वैसा ही आचरण करते हैं श्रेष्ठपुरुष जो प्रमाण करते हैं सब लोग वही प्रमाण करने लगते हैं ॥२१॥ 11 (५२) भगवद्गीता। [अध्याय:- न में पार्थास्तिं कर्त्तव्यं त्रिषु लोकेषु किंचन। नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त्त एव च कर्मणि ॥ २२॥ हे पृथापुत्र अर्जुन ! तीनों लोकोंमें मुझको कुर्छ कर्त्तव्यं नहीं हैं. तां नहीं प्राप्त ऐसा भी नहीं और प्राप्त हो ऐसा भी नहीं अर्थात् सब मेरा ही है तथापि कर्ममें ही" वर्तमान रहता हूँ याने लोगोंको सिखानेके अर्थ कर्म करता रहता हूँ ॥ २२ ॥ यदि ह्यहं न वर्तेयं जातुं कर्मण्यतंद्रितः । मम वर्मांनुवर्तते मनुष्याः पार्थ सर्वशेः ॥ २३ ॥ हे अर्जुन । जो कदाचिन सावर्धान हुआ म कर्ममें न वर्त- मान रहूं तो निश्चयंकरके सेब मनुष्य मेरी ही" रीतिपर चलने लगे याने व भी निरर्थक मानके कर्म न करें ॥ २३ ॥ उत्सीदेयुरिमें लोका ने कुर्यां कर्म चैदहम् । ...संकरस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमोः प्रजा॥२४॥ जो कदाचित् मैं कर्म न करू तो ये लोक भी ऐसे जानेंगे कि, जो कर्म श्रेष्ठ होता तो श्रीकृष्ण करते इससे कर्म तुच्छ है ऐसा जानकर कर्म छोड़कर नष्ट होंगे तब मैं वर्णसंकरका कर्ता होऊँगा और इन पंजाओंका मारनेवाला होउंगा ॥ २४ ॥ सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वति भारत । कुयाहिहांस्तथाऽसक्तश्चिकीर्घौंकसंग्रहम् ॥ २५॥ हे अर्जुन ! जैसे अविद्वान् लोग कर्ममें आसक्त हो कर्म करते हैं वैसे विद्वान् आसक्त हुआ लोकसंग्रहको करनेकी इच्छा किये हुए कर्म करें ॥ २५॥ ने बुद्धिभेदं जनयेदानां कर्मसंगिनाम् । जोषयेत्सर्वकर्माणि विहान्युक्तः समाचरन् ॥२६॥ जो ज्ञानी है वह ज्ञानयोगयुक्त हो कर्म करता हुआ जो कर्म - ।

तृतीयः ३.] सान्वय-अमृततरङ्गिणी भाटी०। (५३) संगी. अज्ञानी हैं उन्हे सब कर्मोंके सेवन करनेकी प्रेरणा करे याने उनसे प्रशंसा करके कर्म करावे और बुद्धिभेद याने कर्ममें अश्रद्धा ने करावे ॥२६॥ प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः। अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति" मन्यते ॥२७॥ तत्त्ववित्त महाबाहो गुणकर्मविभागयोः । गुणा गुणेषु वर्तत इति मत्वा न सज्जते ॥ २८ ॥ हे अर्जुन ! सेब कर्म प्रकृतिके सत्त्वादिगुणों करके किये ढुए हैं जो अहंकारसे मूचित्त हैं वे मैं कर्ता हूँ ऐसी मानते हैं और जो सत्त्वादिक गुण और उनके कर्मविभागके तत्त्वका ज्ञाता है. वह जानता है कि, सत्त्वादि-गुण अपने अपने कार्योंमें वर्त- मान हैं-ऐसा जानकर. आसक्त नहीं होता है ॥ २७ ॥ २८॥ प्रकृतेर्गुणसंमूढाः संजते गुणकर्ममें । तानकृत्स्नविदो मंदान् कृत्स्नविन विचालयेत्॥२९॥ प्रकृतिके सत्त्वादिक गुणकार्योंकरके भूले हुए जो पुरुष वे सत्त्वादि गुणकर्मफलोंमें आसक्त होते हैं उन अल्पज्ञ. मंदोंको सर्वज्ञ -पुरुष कर्ममार्गसे चलायमान न करे ॥ २९ ॥ मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा । निराशीनिर्ममों भूत्वा युध्यस्व विगतज्वरः ॥३०॥ हे अर्जुन | अध्यात्म-जो स्वभाव स्वभावोऽध्यात्म उच्यते' इस-प्रमाणसे क्षत्रियका जो शूरत्वादिक स्वभाव है उसमें चित्त- को लगाकर उसे चित्तसे. सब कर्म मुंझमें अर्पण करके निराशी साने फलाशारहित निर्मम याने कर्त्तापनका ममत्वं छोड़के कर्म- बंधनभयरूप ज्वरसे छूटे हुए युद्ध करो ॥ ३० ॥ ये में मतमिदं नित्यम तिष्ठति मानवाः ।

- .. (५४) भगवद्गीता। [अध्याय:- श्रद्धावतोऽनसूयंतो मुच्यते तेऽपि कर्मभिः ॥३१॥ येवेतदभ्यसयंती ना तिष्ठति में मतम् । सर्वज्ञानविमूढांस्तान्विद्धि नष्टानचेतसः ॥३२॥ जो मनुष्य इस मेरे मैतको नित्ये धारण करते हैं और जो इसमें श्रद्धा ही रखते हैं और जो इसकी निंदारहित हैं वे भी कर्मबंधनोंसे छूट जाते हैं और जो इस मेरे. मतकी निंदा करते हुए इसको ग्रहण नहीं करते हैं सर्वज्ञान विषयमें मूंढ उन अज्ञानियोंको नष्ट हुए जानो ॥ ३१ ॥ ३२ ॥ संदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि । प्रकृति यांति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति॥३३॥ जो ज्ञानवान हैं वह भी अपने जातिस्वभावके सदृश चेष्टा करता है अज्ञ करे तो शंका ही क्या है सब भूत प्राणी अपने जातिस्वभावको प्राप्त होते हैं यहां शास्त्र क्या निग्रह करेगा॥३३॥ ; इंद्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ । तयोर्न वेशमार्गच्छेत्तौ ह्यस्य॑ परिपंथिनौ ॥३४॥ जब कर्म स्वभावसे ही हैं और उसका निग्रह नहीं तब उपाय क्या-सो कहते हैं कर्मेंद्रिय और ज्ञानेंद्रिय इनके निमित्त राग द्वेष युक्त हैं उनके वेश ने होना क्योंकि वे इसके शत्रु हैं याने जीवके बंधनकारक राग द्वेष ही हैं ॥ ३४ ॥... श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्। स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः ॥ ३५॥ जोरागद्वेषके वश होनेसे स्वधर्मका त्याग और परधर्ममें निष्ठा होती है उसका निवारण करते हुए श्रीकृष्णजी कहते हैं कि नेत्रादि इंद्रियोंकी प्रीतिसे अर्जुन स्वधर्मोको त्यागने लगे कि इन स्वजनोंको देखकर मेरे दया आती है इससे युद्ध न करूंगा,भीख - .

.
--
:
तृतीयः ३.] सान्वय-अमृततरगिणी भा०टी०। (५५)
माँग खाऊँगा उसका निवारण करते हैं जैसे कि, श्रेष्ठकारंभ
अन्यके धर्मसे न्यून भी स्वधर्म कल्याणकारक है, स्वधर्ममें मरना
कल्याणदायक है परधर्म मरनेसे भी अतिभयकारक है ।। ३५ ॥
अर्जुन उवाच ।
अर्थ केन प्रयुक्तोऽयं पीपं चैरति पूषः।
अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः॥३६॥
अर्जुन भगवानसे पूंछते हैं कि,हे वृष्णिवंशोत्पन्न कृष्ण ! आपने
कहा स्वधर्म ही श्रेष्ठ है अन्यधर्म भयदायक है ऐसा जो जानता भी
हे और स्वधर्मपूर्वक ज्ञानयोगमें प्रवृत्त होकर विषयोंको भी त्याग-
ता है तो भी फिर यह पुरुष विषयइच्छा न करता हुआ भी बला-
त्कार विषयोंमें युक्त किया सरीखा किसका प्रेरा हुआ पापों-
को करती है ॥३६॥
श्रीभगवानुवाच।
कोम एवं क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः ।
महाशंनो महापाप्मा विद्धये मिहे वैरिणम् ॥३७॥
अर्जुनका प्रश्न सुनकर श्रीकृष्ण भगवान् कहते हैं कि, जो यह
रजोगुणसे प्रकट काम याने कामैना सो बड़ापापी अतिविषय
सेवनरूपै बड़े आहारका करनेवाला यही क्रोधरूप हो जाता है
ईसको इस ज्ञान विषयमें बैरी" जानो ॥ ३७॥
धूमेनांबियते वह्निर्यथाऽऽदर्शो मलेन च।
यथोल्वेनावृतो गर्भस्तथा "तेनेदेमातम् ॥ ३८॥
जैसे अमि धुवाँकरके ढकता है और मलकरके दर्पर्ण ढकता है
मसें गर्भ जेरकरके वैसे यह ज्ञान उस कामना करके ढंका है ३८
आवृतं ज्ञानमेतेनं ज्ञानिनो नित्यवैरिणां ।
कामरूपेण कौंतेय दुष्पूरेणा लेन च ॥ ३९ ॥

भगवद्गीता। [अध्यायः--
हे. कुंतीपुत्र ! नित्य वैर करनेवाला दुःखसे भी ने भर सकने
वाला अतः अपरिपूर्ण अनिरूप इस कामकरके ज्ञानियोंका
ज्ञान: ढक रहा है काम याने विषयवासना ॥ ३९ ॥
इंद्रियाणि मनोबुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते ।
एतैर्विमोहयत्येष ज्ञानेमाश्त्य देहिनम् ॥ ४० ॥
जब शत्रुको जीतना हो तो प्रथम उसका स्थान स्वाधीन करना
इससे इस कामनाके स्थान कहते हैं सो वे ये हैं सब इंद्रियां मन
और बुद्धि ये कामनाके स्थान कहलाते हैं. यह इनके ही द्वारा
ज्ञानको आच्छादित करके जीवको मोहित करता है ॥ ४०॥
तस्मात्त्वैमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ ।
पाप्मानं प्रजेंहि "ह्येनं ज्ञानं विज्ञाननाशनम् ॥४१॥
हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठः। इससे तुम प्रथम इंद्रियोंको संर्यममें
करके स्वरूप ज्ञान और विज्ञान जो. भक्ति इनके नाश करने
वाले इस काम पापीको निश्चय मारो॥ ११ ॥
इंद्रियाणि पराण्याहुरिद्रियेभ्यः परं मनः ।
मनसँस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परंतस्तु सः॥ ४२ ॥
जो ज्ञानके विरोधी हैं उनमें विद्वान लोग इंद्रियोंको प्रबल
कहते हैं, इंद्रियोंसे मनःप्रबल है और मनसे बुद्धि प्रबल है और
जो बुद्धिसे प्रबल है वही आत्मा है ॥ १२॥
एवं बुद्धेः परं बुड़ां सस्तभ्यात्मानमात्मना।
जैहि शत्रु महाबाहो कामरूपं दुरासदम् ॥ ४३ ॥
इति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां
योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे कर्मयोगो
नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३॥

चतुर्थः ४.] सान्वय-अमृततरङ्गिणी भा० टी०। (२७.)
हे महाभुज अर्जुन ! ऐसे बुद्धिसे पर आत्माको जानकर और
स्वेच्छाचारी दुःसह कामनारूप शत्रुको जानके फिर मनको
बुद्धि करके रोके इस शत्रुको मारो ॥ १३ ॥
इति श्रीमत्सुकुलसीतारामात्मजपंडितरघुनाथप्रसादविरचितायां श्रीमद्भगवद्गीतामृत-
तरंगिण्यां तृतीयाध्यायप्रवाहः ॥ ३ ॥
प्रकृतिसंसर्गी मुमुक्षु सहसा ज्ञानयोगाधिकारी नहीं हो सकता
है इससे तीसरे अध्यायमें उसको कर्म करना ही उपदेश तथा
ज्ञानयोगीको भी कर्तृत्वत्यागपूर्वक कर्म करना ही उत्तम कहाः
और जनसंग्रहके लिये भी कर्म करना ही श्रेष्ठ कहा. अब जो
जगदुद्धारके वास्ते मन्वंतरके आदिमें इसी कर्मयोगका उपदेश
किया था उसीको इस चौथे अध्यायमें दृढ करते हैं, ज्ञान योग
भी इसीके अंतर्गत है; इससे इसकी ज्ञानयोगाकारता दिखाके
कर्मयोगका स्वरूप और भेद तथा उसमें ज्ञानांशकी प्रधानता
तथा इसी प्रसंगसे भगवदवतारनिश्चय भी कहते हैं-
श्रीभगवानुवाच ।
इमं विवस्वते योग प्रोक्तानहमव्ययम् ।
विवस्वान्मनवे प्राहे मनरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत् ॥ १॥
श्रीकृष्णभगवान् अर्जुनसे कहते हैं कि जो यह योग मेंने तुमसे
कहा वह केवलं युद्धोत्साह बढ़ानेके लिये तुमसे ही नहीं कहा
इसको कल्पकी आदिमें भी कहा है सो सुनो । मैं प्रथम इस
अव्यय कर्मयोगको सूर्यसे कहा था सूर्य वैवस्वतमनुसे कही
और मैनु इक्ष्वाकुसे कहीं ॥१॥

(५८) भगवद्गीता। [ अध्याय:-
एवं परंपराप्राप्तमिमं राजर्षयो विर्दुः ।
सं कॉलेनेहँ महता योगो नष्टः परंतपं ॥२॥
इस प्रकार परंपरासे प्राप्त इसको राजऋपियोंने जाना, डे परं-
तेप। सो यह योग इस समयमें बहुत कालसे नष्ट हुआ था ॥२॥
स एवोऽयं मयों तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः ।
भक्तोऽसि में सखी चे"तिरहस्यं ह्येतदुत्तमम् ॥३॥
वही यह पुरातन योग मैंने तुमसे आज कहाँ क्योंकि तुम
'मेरे भक्त और सखों हो" यह उत्तम रहस्य है ॥३॥
अर्जुन उवाच।
अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः।
कथमेतद्विजीनीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति ॥४॥
यह सुनकर अर्जुन कहने लगे कि,तुम्हारा जन्म अभी हुआ
विवस्वान्को जन्म प्रथम हुआ तो तुम आँदिमें उनसे कहा
इससे" इसको हम कैसे जाने ॥४॥
श्रीभगवानुवाच।
बहूनि में व्यतीतानि जन्मानि तवं चॉर्जुने ।
तान्यहं वेनिं सर्वाणि ने रेवं वेत्थ परंतप ॥५॥
श्रीकृष्ण भगवान् अर्जुनके प्रश्नका उत्तर देते हैं इसीमें अपने
अवतारका भी प्रयोजन कहेंगे सो ऐसे कि, हे परंतप ! अर्थात्
शत्रुओंको संतापित करनेवाले अर्जुन! मेरे और तेरे बहुत जन्म
न्यतीत हुए हैं उने संबको में" जानता हूँ तुमै नहीं जानते हो।।५।।
अंजोपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सेन् ।
प्रकृति स्वामधिष्ठाये संभवाम्यात्ममायया ॥६॥

चतुर्थः ४.] सान्वय-अमृततरंगिणी भाटी। (५९).
कारण यह कि, मैं अविनाशी सातयामी हूं सर्व तोंका
भी ईश्वर होते हुए तथा अजन्मा होने पर भी मेरो स्वभाव जो
सौशील्य वात्सल्य शरणागतरक्षकत्व इत्यादिक उसको आश्रित.
करके अर्थात् उस स्वभावसे ही अपने ज्ञान सहित अवतार
लेता हूँ जीवको ज्ञान नहीं रहता है, मेरा ज्ञान अखंड है, में
केवल स्वभक्तरक्षणार्थ अवतार लेता हूँ इसका कारण अमिम
श्लोकोंमें है ॥६
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
अभ्युत्थानमधर्मस्यं तदाऽऽत्मानं सृजाम्यहम् ॥७॥
हे भारत ! जब जब निश्चर्यपूर्वक धर्मकी हानि और अधर्मकी
वृद्धि होती है तब मैं" रूपंको धारण करती हूँ ॥ ७॥
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे ॥८॥
जो स्वस्वभावसे अवतार कहा वह स्पष्ट करते हैं-धर्महानि
अधर्मवृद्धि देखकर मैं साधुओंके संरक्षणके लिये और दुष्टोंके
विनाशके वास्ते युगे युगमें धर्मस्थापन करनेको अवतार
लेता हूँ ॥८॥
जन्म कर्म च मे दिव्यमेव यो वेति तत्त्वतः।
त्यकी देहं पुनर्जन्म नैति मामेति "सोऽर्जुन॥९॥
हे अर्जुन | मेरे जन्म और कर्म दिव्य याने प्राकृत नहीं हैं
ऐसा जी निश्चय करके जानता है सो" देहको त्यागकर पुनर्ज-
न्म नहीं लेता है और मुझेको प्राप्त होता है ॥ ९ ॥
वीतरोगभयकोधा मन्मयों मामुपाश्रिताः।
बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः ॥ १० ॥

११ (६०) भगवद्वीता। [अध्याय:- व्यतीत हुए हैं सांसारिक अनुराग और क्रोध जिनके तथा सर्वत्र मुझको ही जानते हैं और जो मेरे ही आंश्रित हैं ऐसे बहुत मेरे स्वरूपज्ञानरूप तपसे पवित्रं मेरी सहर्शताको प्राप्त हुए हैं ॥ १०॥ ये यथा माँ प्रपंद्यते तास्तथैव भजाम्यहम् । मेम वमनुवर्तते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ॥ ११ ॥ हे पृथापुत्र अर्जुन ! सब मनुष्य मम वर्त्म याने जो जो सकाम निष्काम वेदमें मार्ग कहे हैं वे मेरे ही कडे मार्ग हैं, उन्हीं मोर्गोंके आश्रित कर्म करते हैं, जो मुसको जैसे भजते हैं मैं उनको वैसे ही मैंजता हूं याने जो सकाम इंद्रादिरूप मुझको भजते हैं उनको तदेवाग्निस्तत्सूर्यः 'अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता" इत्यादि प्रमाणसे इंद्रादिलोक, पुत्रादि कामना देता हूं और जो निष्काम मुझको सर्वेश्वर जानकर सब कर्म कायेन वाचा मनसें- द्रियैर्वा ' इत्यादि प्रमाणसे मेरे अर्पण करते हैं उनको अपने स्वरूपवैभवको प्राप्त करता हूं ॥ ११ ॥ कांक्षतः कर्मणां सिद्धिं यजंत इह देवताः। क्षिप्रं हिं मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा॥१२॥ जो कर्मोंकी सिद्धिकी इच्छा करते हुए इस लोकमें देवता ओंको यजन करते हैं उनको निश्चयकरके शीघ्र मनुष्यलोकमें कर्मसे उत्पन्न सिद्धि होती है ॥ १२ ॥ चातुर्वयं मयां सृष्टिं गुणकर्मविभागशः। तस्ये करिमंपि माँ विद्धयकर्तारमय॑यम् ॥ १३ ॥ गुणकर्मविभागसे अर्थात् सत्त्वगुणप्रधान ब्राह्मण उनके शम- दमादि कर्म, सत्त्वरजःप्रधान क्षत्रिय उनके शूरत्वादिकर्म, चतुर्थः १.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा०टी०। (६१) रजस्तमःप्रधान वैश्य उनके कृषिवाणिज्यादि कर्म, तम प्रधान शूद्र उनके परिचर्यात्मक कर्म इस प्रकार गुणकर्मविभागकरके चातुर्वर्ण्य यह संसार मैंने सों है उसका अविनाशी कर्ता और अकर्ता भी मेरे को जानो ॥ १३ ॥ नं मां कर्माणि लिम्पन्ति न में कर्मफले स्पृहो। इति मीयो"ऽभिजीनातिकमसिन से वध्यते ॥१४॥ जो प्रथम कहा कि, मुझको अकर्ता जानो उसका कारण कहते हैं सो ऐसा, कि मुझको कर्मफलमें इच्छो नहीं इससे मेरे कर्म नहीं लिप्त होते हैं ऐसो मुझको जो" जानती है 'सो कर्मों- करके नहीं बँधती है ॥ १४॥ एवं ज्ञात्वां कृतं कर्म पूर्वैरपि मुसुक्षुभिः । कुरु कमैव तस्मात्त्वं पूर्वेः पूर्वतरं कृतम् ॥ १५॥ पूर्वसमयके मनु इत्यादिक मुमुक्षुजनोंने भी ऐसे जानके कर्म किया है इससे तुम पूर्व मुमुक्षुओंकरके किये हुए कर्मको ही करो॥ १५॥ किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः। तत्ते" कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वी मोक्ष्यसेऽशुभीत् १६॥ कर्म क्या है और अकर्म क्यों है ऐसे इस विषयमें कवि- जन भी मोहिते हुए सो" कर्म मैं तुमको कहूँगी जिसैंको जानके संसौरसे मुक्त होगे ॥ १६॥ कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः । अकर्मणच बोद्धव्यं गहनों कर्मणो गतिः ॥ १७ ॥ जिस वास्ते कि कर्म याने करनेयोग्य कर्म उसका रूप भी जानना चाहिये और विकर्म जिस एक कर्ममें विविध प्रकार है उसका रूप भी जानना चाहिये और अकर्म जो निश्चयात्मक ((६२) भगवद्गीता। [अध्यायः- बुद्धिकरके केवल ईश्वराराधनार्थ निष्काम कर्म उसका भी रूप जानना चाहिये इस वास्ते कर्मकी गति दुर्गम है ॥.१७ ॥ कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः । से बुद्धिमान्मनुष्येषु से युक्तः कृत्स्नैकर्मकृत्॥१८॥ अब कर्म और अकर्मका स्वरूप जानना कहते हैं-जो प्रारं- मित कर्ममें अकर्म याने आत्मज्ञान देखें याने. इस निष्काम- कमसे ही ज्ञान होगा इससे यह ज्ञान ही है और जो मनुष्य अकर्म जो आत्मज्ञान उसमें कर्म याने यह कर्मसे हुआ कर्म ही है ऐसा देखनेवाला मनुष्य मनुष्योंमें बुद्धिमान है वह योगी और सोई सर्व कर्मोंका करनेवाला है ॥ १८॥ यस्य सर्वे समारंभाः कामसंकल्पवर्जिताः। ज्ञानाग्निंदग्धकर्माणं तेमाहुः पण्डितं बुधाः ॥१९॥ जो कर्म प्रत्यक्ष कर रहा है उसकी ज्ञानाकारता कैसी होगी सो कहते हैं-सो ऐसी कि, जिसके सर्व लौकिक वैदिक कर्मोंके आरम्भ कामना संकल्प रहित हैं ज्ञानरूप अग्निकरके दग्ध हुए हैं बंधन कर्म जिसके उसको विद्वान् जन पंडित कहते हैं ॥ १९ ॥ १. त्यक्त्वा कर्मफैलासंगं नित्यतृप्तो निराश्रयः । कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपिनैव किंचित् करोति संः॥२०॥ जो कर्मफलका संबन्ध छोड़के निरंतर आत्मस्वरूपमें ही तृप्त नश्वर संसारके आश्रयरहित कर्ममें प्रवृत्त भी है तो भी सो कुछ नहीं करती है ॥२०॥ निरोशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः । : शारीरं केवलं कर्म कुर्वनोप्नोति किल्बिषम् ॥२१॥ जो कर्मफलकी आशारहितचित्त और मन जिसका संयममें हो जिसने परमात्मप्रीति विना और सर्व उपासना त्यागी हो सो i

चतुर्थः ४.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा०८ ०। (६३)
केल शैरीरसंबंधी कर्मको करता हुआ कर्मबंधनरूप पीडाँको
नहीं प्राप्त होता है ॥२१॥
यदृच्छालामसंतुष्टो द्वंद्वातीतो विसंत्सरः।
समः सिंद्यावर्सिद्वौच कृत्वाऽपि ननिबध्यते ॥२२॥
जो आप ही आप मिले इतने ही लोभसे संतुष्ट हो और जो
सुख दुःख लाभालाभ जय पराजय हर्ष शोक इत्यादिक बंदों
करके रहित होय मत्सर जो दूसरेका सुख न सहना उस करके
रहित कार्यकी सिद्धि और असिद्धिमें समर्बुद्धि सो कर्म करके
भी नहीं बंधन पावे ॥२२॥
गतसंगस्य मुक्तस्य ज्ञानांवस्थितचेतसः ।
यज्ञार्योचरतः कर्म संमग्रं प्रविलीयते ॥ २३ ॥
निवृत्त हुआ है आत्मानंद विना संगे जिसका और संसारखा-
सनासे मुक्त है और आत्मज्ञानमें अवस्थित है चित्त जिसको
वह जो यज्ञके अर्थ कर्म करे तो उसके बंधनकारक सर्व प्राचीन
कर्म नष्ट होते हैं. ॥ २३॥
ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुँतम् ।
ब्रह्मैवं तेने गंतव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना ॥ २४ ॥
निष्काम कर्मसे ज्ञान होता है इस भेदले कर्मकी ज्ञानाकारता
कही अब परमात्माके अनुसंधानसे उसी निष्काम कर्मकी ज्ञाना-
कारता कहते हैं-सो ऐसे कि, जिस करके हव्य अर्पण करते हैं वह
सुवादिक वस्तु ब्रह्म है याने ब्रह्मका ही काय है, घृतादिक :हव्य
भी ब्रह्म ही है ब्रह्मरूप अग्निमें वह ब्रह्मरूप हव्य ब्रह्मरूप होता
करके होमा जाता है ऐसे यह सर्व ब्रह्मरूप है उसे ब्रह्मकर्मनियम
करके ब्रॉ ही प्राप्त होने योग्यँ है ॥ २४ ॥

। (६४) भगवद्गीता। [ अध्यायः- दैवमेवापरे' यज्ञं योगिनः पर्युपासते। ब्रह्मांनावरे यज्ञं यज्ञेनैवोपजह्वति ॥ २५॥ ऐसे कर्मयोगकी ज्ञानाकारता कहके अब कर्मयोगके भेद कहते हैं-अपरे 'अकारो वे विष्णुः' इस श्रुतिप्रमाणसे जो विष्णुप- रायण हैं वे योगी दैवे यज्ञ याने प्रतिमापूजनरूप यझें करते हैं इनसे और भी ऐसे ही योगी ब्रह्मात्मक अॅग्निमें यज्ञंसाधन सामग्री- करके हवनात्मक यज्ञमें ही" हवैन करते हैं ॥ २५॥ श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यन्ये संयमाग्निषु जुह्वति । शब्दादीन्विषयानन्ये इन्द्रियाग्निषु जुह्वति॥२६॥ और कितने योगी श्रोत्रादिक इन्द्रियोंको संयमरूपं अग्निमें होमते हैं अर्थात् श्रोतादिकोंको हरिकीर्ति श्रवणादिकमें ही युक्त करते हैं और कितनेक शब्दादिक विषयोंको इन्द्रिय रूप अग्निमें हैं यानेहरिकीर्तन विना और श्रवणादिक नहीं करते हैं २६॥ सवाणीन्द्रियकर्माणि प्रार्णकर्माणि चापरे । आत्मसंयमयोगाग्नौ जहति ज्ञानदीपिते ॥२७॥ और कितने योगी सर्वइंद्रियोंके कर्मोंको और प्राणोंके कर्मोंको ज्ञान करके प्रदीप्त ऐसे मनके संयमरूप अग्निमें होमते हैं. अर्थात् मन करके इंद्रिय प्राण कर्मवृत्तियोंको संसारविषयसे निवारण करके आत्मज्ञानमें लगानेका यत्न करते हैं ॥ २७॥ ....द्रव्ययज्ञास्तेपोयज्ञा योगयज्ञांस्तथापरे । स्वाध्यायज्ञानयज्ञोच यंतयःशंसितव्रताः॥२८॥ और कितने योगी द्रव्यसे यज्ञ करते हैं.याने दानादिक करते हैं, कितनेक उपवासादिकरूप यज्ञ करते हैं. वैसे ही और कितनेक पुण्य क्षेत्रादि वास रूप योग करते हैं और कितने ढवती.यती याने यत्नशील वे वेदाध्ययन वेदार्थविचाररूपं यज्ञ करते हैं।॥२४॥ ..

. चतुर्थः ४.] सान्वय-अमृततरंगिणी भाटी । (६५) अपने जुह्वति प्राण प्राणेऽपान तथा परे। प्राणापानगती सुद्धा प्राणायामपरायणाः ॥ २९॥ अपरे नियंताहाराः प्राणान् प्राणेषु जुह्वति । सर्वेऽप्यते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषाः ॥ ३० ॥ यज्ञशिष्याऽमृतमुजो योति पँह्म सनातनम् । नाय लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतोऽन्यः कुरुसत्तम३१॥ और कितनेक कर्मयोगी प्रमाणसे आहार करनेवाले जैसे कि, आधा पेट अन्नसे भरे चौथाई जलसे और चौथाई वायुसंचा- रके लिये खाली रखे ऐसे और प्राणायामपरायण योगी अपा- नमें प्रोणका हवन करते हैं याने पूरक करते हैं; और कितनेक प्राणवायुमें अपानको हवन करते हैं याने रेचक करते हैं और कितनेक प्राण अपान दोनोंकी गतिको रोककर प्राणोंका प्राणमें ही हवन करते हैं याने कुंभक करते हैं; ये सब यज्ञके जानने- बाले यज्ञकरके पापरहित यज्ञका ही शेष अमृतरूप अन्नके खानेवाले सॉनातन बॅलको प्राप्त होते हैं। हे कुरुवंशियोंमें श्रेष्ठं अर्जुन । जो यज्ञ नहीं करता है उसको यह लोक भी नहीं है। और परलोके तो कैसे होगा ॥ २९ ॥ ३० ॥ ३१ ॥ : एवं बहुविधा यज्ञा विर्तता ब्रह्मणो मुखे।।. कर्मजान्विद्धि तान्सर्वानेवं ज्ञात्वां विमोक्ष्यसे ॥३२॥ ऐसे' बहुत प्रकारके यज्ञं वेदमें विस्तारसे कहे हैं उन सबैको कर्मज जानो याने वे कर्मसे ही होते हैं, ऐसा जानकर कर्म करके मुक्त होगे ॥ ३२ ॥ श्रेयान द्रव्यमयांद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परन्तप । सर्व कर्माऽखिलं पार्थ ज्ञोने परिसमाप्यते ॥ ३३ ॥ परंतप । द्रव्यमय यज्ञसे ज्ञानयज्ञ श्रेष्ठं है, कारण कि, द्रव्य-

..
(६६)
भगवद्गीता। [अध्याय:-
यज्ञका भी फल ज्ञान ही है। हे पार्थ । फलसहित सबै कर्म ज्ञानेमें
समाप्त होता है; याने इस ज्ञानके ही लिये यज्ञ करते हैं ॥३३॥
तहिद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवयाँ।
उपदेक्ष्यति ते ज्ञानं ज्ञानिस्तत्त्वदर्शिनः ॥३४॥
वह ज्ञाने तत्त्वदर्शी हानीजन तुमको उपदेशेंगे, तुम उनकी
सेवा और सत्कारपूर्वक नमस्कार करके उनसे प्रश्न कर जॉनो
यहां श्रीकृष्ण भगवान्ने केवल ज्ञानी जनोंकी प्रशंसाके लिये
यह वाक्य कहा है और "अविनाशि तु तद्विद्धि” यहांसे लेकर
"एषा तेऽभिहिता सांख्ये" यहांतक तो ज्ञान उपदेश कर ही
चुके हैं ॥ ३४॥
यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव ।
येन Qतान्यशेषेणे ट्रेक्ष्यस्यात्मैन्यथो मयि ॥३५॥
हे पांडुपुत्र । जिस ज्ञानको जानकर ऐसे मोहको फिर नहीं
प्राप्त होगे. जिस ज्ञानकरके सेब भूतप्राणिमात्रको आँप सदृश
देखोगे. जैसे कि, प्रकृतिसे भिन्न ये परज्ञानाकारतासे सब समान
हैं आप सहश देखे पीछे फिर मेरे" समान देखोगे याने ज्ञान
प्राप्त हुए जीव मेरी समताको प्राप्त होते हैं सो आगे कहेंगे भी.
"इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः" यहां ब्रह्मसूत्र
प्रमाण है “भोगमात्रसाम्यलिंगाच" ऐसे ही श्रुति भी प्रमाण है
"तथा विद्वान् पुण्यपापे विधूय निरंजनः परमां शांतिमुपैति"
इत्यादि प्रमाणोंसे नाम रूप रहित याने सूक्ष्मावस्थामें आत्मा
और परमात्माकी स्वरूप समता निश्चय होती है ॥ ३५ ॥
अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः ।
सर्व ज्ञानप्लवेनैव देजिनं संतरिष्यसि ॥३६॥
जो कि, सबै पापियोंसे भी तुम बड़े पापकारक. होगे तो भी
इस ज्ञानरूप नौकाँसे ही सब दुःखसमुद्रको तरोगे ॥३६ ॥

चतुर्थः १.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा टी०। (६७) यथैधासि समिद्धोऽग्निभस्मसात्कुरुतेऽर्जुन । झॉनाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा ॥३७॥ हे अर्जुन ! जैसे प्रज्वलित अग्नि समन इंर्धनको सस्म करतो है वैसे ही विज्ञानरूप अग्नि समस्त कर्मबंधनको भस्म करतो है ॥ ३७॥ ने हिं ज्ञानेन सदृशं पवित्रासिंह विद्यते । तस्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विदति॥३८॥ इस लोकमें निश्चयकरके (तप योगादिकोमें कोई भी) ज्ञानके सदृश पवित्र नहीं हैं उस ज्ञानको कुछ काल कर्म करते करते कर्मयोंगसे सिर्द्ध होकर आपमें ही आपही प्राप्त होती है ॥ ३८॥ श्रद्धावल्लभते ज्ञान तत्परः संयतेन्द्रियः। ज्ञानं लब्ध्वां परां शांतिमचिरेणाधिगच्छति ॥३९॥ ज्ञानप्राप्तिमें लगा हुआ इंद्रियोंको संयममें किये हुए श्रद्धा- वान् पुरुष ज्ञानको प्राप्त होता है उस ज्ञानको पाकर थोड़े ही कॉलमें परम शांतिको प्राप्त होती है ॥ ३९ ॥ अज्ञश्चाश्रधानश्च संशयात्मा विनश्यति । नाय लोकोऽस्तैिन पैरो नै मुखं, संशयात्मनः ॥४०॥ जो अज्ञान है और ज्ञानप्राप्तिमें श्रद्धाको भी नहीं धारण किया है और मनमें संशय रेखता है वह नष्ट भ्रष्ट संसारमें भ्रमता है. जिसके मनमें संशय है उसको यह लोक सुखदायक नहीं है, परलोक भी नहीं है उसको कहीं भी सुख नहीं है। १० ॥ योगसंन्यस्तकर्माणं ज्ञानसंछिन्नंसंशयम् । आत्मवन्तं न कर्माणि निवनन्ति धनञ्जय ॥४१॥ हे अर्जुन ! परमेश्वराराधनरूप जो निष्काम कर्म योग उस योगसे परमात्माके अर्पण किये हैं कर्म जिसने और ज्ञानसे

-
(६८)
भगवद्गीता। [अध्याय:-
संच्छिन्न हुए हैं संशय जिसके ऐसे स्थिरचित्त ज्ञानीको कर्म
नहीं बंधन करते हैं ॥ ११॥
तस्मादज्ञानसंमत हस्थ ज्ञानासिनाम॑नः ।
छित्त्वेनं संशयं योगैमातिष्ठोत्तिष्ठं भारत ॥४२॥
इति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योग- . :
शास्त्रं श्रीकृष्णार्जुनसंवादे कर्मसंन्यासयोगों
नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४॥
हे भरतवंशोत्पन्न अर्जुन ! इससे जो अज्ञानसे उत्पन्न तुम्हारे
हृदयमें स्थित ऐसे इस अपने संशयको ज्ञानखड्से छेदन करके
उठो और कर्मयोगैमें प्रवृत्त होओ याने क्षत्रियका युद्ध कर्म
करो ॥४२॥
इति श्रीमत्सुकुलसीतारामात्मजपंडितरघुनाथप्रसादविरचितायां श्रीमद्भगवद्गीता-
मृततरंगिण्यां चतुर्थाध्यायप्रवाहः ॥ ४ ॥
अर्जुन उवाच ।
संन्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योग च शंससि।
येच्छ्रेय एतयोरेक तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम् ॥ १॥
श्रीकृष्णसे अर्जुन पूँछते हैं कि, हे कृष्ण । कर्मोंका संन्यास
जो ज्ञानयोग उसको और फिर कर्मयोगको कहते हो इन दोनोंमें
जो निश्चित किया हुआ श्रेष्ठ हो उसे ही मुझसे कहो. जैसे कि,
दूसरे अध्यायमं कहा कि मुमुक्षु प्रथम कर्म करके अन्तःकरण
शुद्ध होनेपर ज्ञानयोगसे आत्मदर्शनका उपाय करे, तीसरे
चौथेमें ज्ञानीको भी कर्म करना ही श्रेष्ठ कहा, ऐसे दोनों कहते
हो जो इन दोनोंमें श्रेष्ठ हो वही कहो ॥१॥
श्रीभगवानुवाच ।
संन्यासः कर्मयोगश्चे निःश्रेयसेकरांवुभौ ।
तयोस्तु कर्मसंन्यासांत्कर्मयोगो विशिष्यते ॥ २ ॥

पञ्चमः ५.1 सान्वय-अमृततरंगिणी भा०टी०। (६९)
जब अर्जुनने प्रार्थना की तब श्रीकृष्ण भगवान् बोले कि
संन्यास जो कर्मका त्याग और कर्मयोग ये दोनों कल्याण
कारक हैं उनमें भी कर्मके त्यागसे कर्मयोग विशेष श्रेष्ठ है ॥२॥
ज्ञेयः से नित्यंसंन्यासी योनं हेष्टिन कौक्षति।
निईन्दो हि महाबाहो सुखं बंधात्प्रभुच्यते ॥३॥
हे महाबाहो ! जो न कोई वस्तुसे द्वेपे करे, न चाहना करे
वह सुख दुःखादि द्वंद्वरहित नित्य संन्यासी जानना वह सुख-
पूर्वक निश्चय बंधनसे मुक्त होता है ॥३॥
सांख्ययोगी पृथग्वालाः प्रर्वदन्ति न पंण्डिताः।
एकमप्यास्थितेः सम्यगुभयोविन्दते फलम् ॥४॥
जो मूर्ख हैं वे सांख्य योगोंको याने ज्ञानकर्मीको न्यारे कहते
हैं पंडित नहीं कहते हैं. इन दोनोंमेंसे एकमें भी अच्छी तरहसे
स्थित हुआ दोनोंके फलेको सम्यक् पाता है ॥ ४
यत्सौख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते।
एक सांख्य चयोगं च यः पश्यति स पश्यति ॥५॥
जो स्थान ज्ञानकरके प्राप्त होता है वही कर्मकरके भी प्राप्त
होता है. इससे ज्ञानको और कर्मको जो एक जानता है सो
जानता है याने विद्वान् है ॥५॥
संन्यांसस्तु महाबाहो दुःखमॉप्तुमयोगतः ।
योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म न चिरेणाधिगच्छति ॥६॥
हे महाबाहो ! यह संन्यास कर्म विना प्राप्त होना दुर्गमें है
यांने नहीं हो सकता.जो कर्मयोग युक्त आत्मज्ञानमें मन लगाये
हैं वे थोड़े ही कालमें ब्रह्मको प्राप्त होते हैं ॥ ६ ॥

२१५ (७०) भगवद्गीता। [ अध्यायः- योगयुक्तो विशुद्धामा विजितात्मा जितेन्द्रियः । सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वलपि न लिप्यते ॥ ७॥ जो कर्मयोगयुक्त है याने निष्काम कर्म करता है और वाणी जिसकी शुद्ध है याने वाणीसे हरिकीर्तन करता है और मन शुद्ध है याने मनसे हरिस्मरण करता है और जितेंद्रिय है याने इंद्रिय-. विषयको श्रेष्ठ नहीं जानता है और सर्व भूतप्राणिका आत्मा- अंतर्यामीमें मन है आत्मा जिसका सो पुरुष कर्म करता हुआ भी नहीं लिप्त होता है ॥ ७॥ नैव किंचित्करोमीति युक्तो मन्येते तत्त्ववित्। पश्यञ्फूर्णवन्स्पेशअिंघनश्नन्गच्छन्स्वपञ्छसैन् । प्रलपैन्विसृजेन्गहन्दुन्मिरेन्निमिषन्नैपि । इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तत इतिधारयन् ॥८॥९॥ इंद्रिययोंके विषयोंमें इंद्रियां वर्तमान रहती हैं ऐसे धारण करे हुए तत्त्वज्ञानी, कर्मभोगी देखता, सुना, स्पर्शता, सूंघती, खाता, चलता, सोता, श्वास लेता, बोलता, छोईता, पकड़ती; नेत्रखो- लता मीचता हुआ भी मैं कुछ भी नहीं करता हूँ ऐसे मानता है ॥ ८॥९॥ ब्रह्मण्याोय कर्माणि संगं त्यक्तां करोति यः। लिप्यते ने सं पापेन पैद्मपत्रमिवाम्भसा ॥ १०॥ जो शरीरमें याने शरीरस्थ इंद्रियोंमें कर्मोंको धारण करके याने कर्म करनेवाली इंद्रियां हैं. ऐसे जानके कर्मफलासक्तिको त्यागके कर्म करता है सो पापकरके नहीं लिप्त होता है, जल करके कमलपत्र सरीखाः ॥ १०॥ कायेनं मनसा बुद्धयाँ केवलैरिन्द्रियैरपि ।...." " --

पञ्चमः ५.1 सान्वय-अमृततरंगिणी भान्टी। (७१)
योगिनः कर्म कुर्वन्ति सङ्ग त्यत्वाऽऽत्मशेद्धये॥११॥
जो योगी हैं वे फलसंग त्यागके आत्मशुद्धिके लिये याने
आत्मगत प्राचीन कर्मबंधन छूटनेके वास्ते शरीरकरके, मैनकरके,
बुद्धिकरके, केवल इंद्रियोंकेरके भी कर्म करते हैं ॥ ११ ॥
युक्तः कर्मफेलं त्यक्ता शांतिमानोति नैष्ठिकीम् ।
अयुक्तः कामकारेण फेले सैक्को निबद्धयते॥ १२॥
युक्त याने आत्मज्ञानयोगयुक्त पुरुष कर्मफलको त्यागके ईश्व-
रनिष्ठे शांतिको प्राप्त होता है जो आत्मज्ञानयोगरहित है सो यथेष्ट
करणकरके फेलविषे आसक्त हुआ ऐसा जो जीव सो बद्ध
होता है ॥ १२॥
सर्वकर्माणि मनसों संन्यस्यास्ते सुखं वशी।
नवद्वारे पुरे देही नै कुर्वन्ने कारयन् ॥ १३ ॥
वशी याने जिसका चित्त वंश है ऐसा देहधारी जीवसों नवदा-
रका पुर जो देह उसमें मनसे काँको स्थापित करके न करता
कराता हुआँ सुख जैसे हो वैसे" ही रहती है ॥ १३ ॥
ने कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः।
नं कर्मफलंसंयोग स्वभौवस्तु प्रवर्त्तते ॥ १४ ॥
प्रभु याने अविनाशी आत्मालोक जो देवादिकशरीर उसका
ने कर्पन कम न कर्मफलके संयोगको सिरजंता है क्योंकि,
यह स्वभाव याने अनादिकालसे प्रकृतिसंसर्गकी वासना
नोंदत्ते कस्यचित्पापं न चैवं मुकृतं विभुः।
अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जंतः ॥ १५ ॥
जैसे कि, कर्तृत्व और कर्मोंको नहीं उत्पन्न करता है इसीसे
। यह जीवात्मा किसी शरीरसंबंधी पापको भी नहीं ग्रहण करता है
ने
प्रवृत्त है ॥१४॥

(७२).
भगवद्गीता।
[ अध्यायः-
और सुकृतको भी नहीं ग्रहण करता है क्योंकि जिनका ज्ञान
अज्ञानकरके ढक रहा है उस करके वे जीवे मोहको प्राप्त होते
याने अज्ञानकरके देहादिकमें आसक्ति और उससे दुःख
होता है ॥ १९॥
ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशिंतमात्मनः ।
तेषांमादित्येवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम् ॥ १६ ॥
जिनका आत्मसंबंधी ज्ञानकरके वह अंज्ञान नष्ट हुओं है
उनको वह श्रेष्ठं ज्ञानं सूर्यसदृश प्रकाश करता है याने वे संसा-
रदुःखरहित मुक्त हैं ॥ १६ ॥
तबुद्धयस्तदात्मानस्तन्निष्टोस्तत्परायणाः।
गच्छन्त्यपुनरावृत्तिं ज्ञाननिर्धतकल्मषांः ॥ १७ ॥
उस आत्मज्ञानमें ही है बुद्धि जिनकी उसीम है मन जिनका
उसीमें है निष्ठा जिनकी और वही है श्रेष्ठ स्थान जिनका इस
तरहसे ज्ञानकरके नष्ट हुए हैं मनके विकार जिनके वे पुरुष
मुक्तिको पाते हैं ॥ १७॥
विद्याविनयसंपन्ने ब्राह्मणे गैवि हस्तिनि ।
शंनि चैव श्वपाँके चपण्डिताः समर्शिनः॥१८॥
विद्या और विनय युक्त ब्राह्मणम, गऊँमें, हाथीमें, और
कुत्तों और चांडालमें भी पंडितजन समैदी होते हैं याने
आत्माको आप सदृश जानते हैं ॥ १८॥
इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः ।
निर्दोषं हिंसमें ब्रह्म तस्मद्रिणिते स्थिताः॥१९॥
जिनका मन ऐसी समतांमें स्थित है उन्होंने यहां ही संसार
जीता है. जिस वास्ते कि, ब्रह्मे: निर्दोष सर्वत्र समान है इसीसे
वे ब्रह्मप्राप्ति निमित्त स्थित हैं ॥ १९॥

BAR . -पञ्चमः५.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा टी०। (७३) में प्रेहष्येत्प्रियं प्राप्य नोदिजेंप्राप्य चीप्रियम् । स्थिरबुद्धिरसंमूढो ब्रह्मविद्रौणि स्थितः॥२॥ प्रिय वस्तुको पोकर हर्ष नहीं और अप्रियको पॉकर व्याकुल न होना ऐसा स्थिरवुद्धि विचारशील ब्रह्मका ज्ञाता ब्रह्ममाप्तिके “निमित्त स्थित है ॥२०॥.. :::: बाह्यस्पर्शेष्वसत्तात्मा विन्दत्यात्मनि यत्सुखेस सं ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षय्यमश्नुते ॥ २० ॥ शब्दादिक विषयोंमें अनासक्त हुँआ जो आत्मामें सुखको पोता है सो ब्रह्मप्राप्ति उपाय चित्तवाला पुरुष अक्षय सुखको पाती है याने मोक्ष पाता है ।। २१ ॥ ये हि संस्पर्शजा भोगी दुःखयोनय एवं ते । आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषू रमते बुधः ॥ २२॥ हे कुतीपुत्र । जो शब्दस्पर्शादिक भोग हैं वे दुःखके कारण आयंतवत हैं याने होते जाते रहते हैं. अर्थात् अल्पमुख हैं इस निश्चयसे उनमें पंडितजन नहीं रमेते हैं।॥ २२॥ शनोंतीहैव यः सोढुं प्रॉक शरीरविमोक्षणात्। कामक्रोधोद्भवं वेग संयुक्त से सुखी नरः ॥ २३ ॥ जो मनुष्य कामक्रोधके वर्गको शरीरसे निकलनेके प्रथम उस वेगको सहनकर सकता है सो योगी है, सो मनुष्य इस लोकमें सुखीं है ।। २३ ॥ योऽन्तःसुखोऽन्तरारामस्तैथातज्योतिरेवं यः । सं योगी ब्रह्म निर्वाण ब्रह्मभूतोऽधिगच्छति ॥२४॥ जो आत्मामें ही सुखी और आत्मामें ही है विश्राम जिसको तैसे ही जो अंतज्योति याने आत्मज्ञान ही करके प्रकाशित है सोही योगी ब्रह्मप्राप्ति उपायतत्पर ब्रह्मवत् मुक्तिको प्राप्त होती है २४॥ , . (७४) भगवद्गीता। [अध्यायः- लभन्ते ब्रह्म निर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः॥ छिन्नधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः ॥ २५॥ जिनके लाभ अलाभ सुख दुःखादिक दो दो उपद्रव नष्ट हुए हैं, जिनका मन ईश्वरमें लगा है और सर्वभूत प्राणिमात्रके हितमें रहते हैं इससे उनके पाप क्षीण हुँए हैं ऐसे ऋषिजनै ब्रह्मस- मान मुक्तिको पाते हैं ॥ २५॥ कामक्रोधवियुक्तानी यतीनां यतचेतसाम् । अभितो ब्रह्म निर्वाणं वर्ततेविदितात्मनाम् ॥२६॥ जो कामक्रोधरहित हैं और ईश्वरप्राप्तिके यत्न करनेवाले हैं और चित्त जिनके वश हैं ऐसे आत्मज्ञानियोंको सर्व प्रकारसे ब्रह्मसुखं वर्तमान होता है ॥ २६॥ स्पर्शान्कृत्वा बहिबाह्यांश्चक्षुश्चैवांतरे भ्रुवोः । प्राणापानौ सैमौ कृत्वानासाभ्यंतरचारिणौ ॥२७॥ यतेन्द्रियमनोर्बुद्धिर्मनिर्भीक्षपरायणः । विगतेच्छाभयँक्रोधो यैः सदा मुक्त एव सः॥२८॥ बाह्य इंद्रियोंके स्पर्श जो शब्दादिक विषय उनको बाहर याने त्याग करके फिर भौहोंके मध्यमें दृष्टिको करके नासिकाके भीतर ही संचार करे ऐसे प्राणापानोंको सैम करके जो मुनि याने मननशील पुरुष इन्द्रिय, मन और बुद्धिको वश करे, मोक्षमें ही आसक्त, इच्छा, भय और क्रोध करके रहित हो सो सदा मुक्त ही है ॥ २७ ॥२८॥ भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम् । सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वामा शान्तिमृच्छति ॥२९॥ इति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे कर्मसंन्यासयोगो नाम पञ्चमोऽध्यायः॥५॥ - षष्ठः ६.] सान्वय-अमृततरङ्गिणी भाण्टी०। (७५) अब और भी अति सुगम मुक्तिके उपाय कहते हैं. सर्व यज्ञ और तेपोंका भोक्ता, सर्व लोकोंका महेश्वर याने लोकेश्वरोंका भी ईश्वर सर्व तप्राणिमात्रका मुहद् ऐसा मुझको जॉनके भी मुक्तिको प्राप्त होता है ॥ २९ ॥ . इति श्रीमत्सुकुलसीतारामात्मजपंडितरघुनाथप्रसादविरचितायां गीतामृत- तरंगिण्यां पञ्चमाध्यायप्रवाहः ॥ ५॥ . अनाश्रितः कर्मफेलं कार्य कर्म करोति यः । ससंन्यासीचंयोगीच नै निरग्निर्न चाक्रियः॥१॥ कर्मयोग कहके अब ज्ञानकर्मसाध्य आत्मदर्शनरूप योगा- भ्यास कहते हैं. तहां कर्मयोगकी अपेक्षारहित योगसाधनत्व दृढ करनेको ज्ञानाकार कर्मयोगको योगशिरोमणि कहते हैं-सो ऐसे कि, जो कर्मफलको न चाहता हुआ स्ववर्णाश्रमोचित करने योग्य कर्मको करता है सो संन्यासी है और योगी है. जिसने अग्नि- कर्मको त्यागा है सो संन्यासी और योगी नहीं है और जिसने कियाकर्मको त्यागी है सो भी संन्यासी योगी नहीं है ॥ १ ॥ "यहां एक श्रीकृष्णका अभिप्राय और भी दीखता है, कलि- पुगमें संन्यासका निर्वाह होगा नहीं क्योंकि मनुष्योंकी बुद्धि चंचल होगी. सो देखनेमें भी आता है कि, जो घर छोड़ते हैं तो संन्यासी होके मठ बाँधके व्यापार करते हैं, जो स्त्रीविवाहित नहीं तो परस्त्रीगमन करते हैं. पुत्रोंकी जगह शिष्य करते हैं। ऐसे ही और भी सामान्य गृहस्थोंसे अधिक रखके केवल प्रपञ्चरत होते हे इससे श्रीकृष्णने निष्कामकर्म कर्ताको ही संन्यासी योगी कहा है और अग्निकर्म तथा किया त्यागनेका निषेध किया है।

. . । MA. (७६) : भगवद्गीता ! - [ अध्यायः- ये संन्यासमिति प्रार्योग तं विद्धि पाण्डवे । ने ह्यसंन्यस्तसंकल्पो योगी भवंति कश्चन ॥२॥ अब कहे हुए. कर्मयोगमें ज्ञान भी दिखाते हैं.. हे पांडुपुत्र । जिसको संन्यास कहते हैं उसको अभेदकरके योग,जानी जैसे कि, कर्मफलसंकल्पत्याग विना कोई भी योगी" नहीं होती है. अर्थात् कर्मफलको, ईश्वरार्पण किये विना योगी संन्यासी होता नहीं. जो कर्मफलको ईश्वरार्पण करता है वही योगी और संन्यासी है ॥२॥ आरुरुक्षोर्मुनेोंगे कर्म कारणमुच्यते। योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते ॥ ३॥ आत्मज्ञानकी प्राप्ति चाहनेवाले मननशीलका ज्ञानप्राप्ति- कारण कर्म कहाँ है, उसी ज्ञान प्राप्त हुएको मुक्तिकारण संकल्प- विकल्पत्यागपूर्वक कर्म ही कहां है ॥३॥ यंदा हि नेन्द्रियार्थेषु नै कर्मस्वनुषजतें सर्वसंकल्पसंन्यासी योगोख्टस्तदोच्यते ॥४॥ जब ने इंद्रियोंके विषयोंमें नै कोम आसक्त हो तब सर्वसं- कल्पोंका त्यागी योगारूढे कहाता है इससे कम करना आव- श्यक है॥४॥ हा की उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत् । आत्मैव ह्यात्मनो बंधुरात्मैवरिपरीत्मनः ॥ ५॥ ऐसे अपने वश मनके द्वारा अपना उद्धार करे अपना अवसाद याने घात अर्थात् अधोगति न करे, कारण कि, अपना मन ही अपना मित्र है और वह मन ही अपना-शत्र है.firi बंधुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना र्जितः । अनात्मनस्तुं शत्रुत्वे वर्तेतात्मैवे शत्रुवत् ॥ ६ ॥ NM- * .. AN म प४.६.] सान्वय-अमृततरङ्गिणी माल्टी। (७) जिसने बुद्धिकरके निश्चय मर्ने जीता हैंउर्स जीवात्माका मन मित्र है और जिसने मन नहीं जीता है उसका मैन शवत्वमें शत्रु सरीखी होता है ॥ ६॥ जितात्मनः प्रशांतस्य परमात्मा समाहितः । शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः॥७॥ शीत, उष्ण, सुख और दुःखोंमें तथा मान, अपमानोंमें जीता मन जिर्सने ऐसे शांतकी बुद्धि अतिशय परिपूर्ण रहती है ॥७॥ -- ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रियः । युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकांचनः ॥ ८॥ विज्ञान जो आत्मज्ञान, विज्ञान जो विशेष ज्ञान अर्थात् अनात्म आत्मविवेक इन करके जिसका मन तृप्त हो कूटस्थ याने निर्वि- कार सर्व शरीरों में आत्माको समान जाननेवाला जितेंद्रियत्वंसे जो ठीकरी, पत्थर और सोना इनको सम जान रहा है ऐसा योगी युक्त याने आत्मदर्शनयोगयुक्त कहलाता है ॥८॥ सुहन्मित्रायुदासीनमध्यस्थद्वेष्यबंधुषु । साधुष्वपि च पापेषु संमबुद्धिर्विशिष्यते ॥९॥ सुहृद् जो प्रत्युपकार विना हितकारक, मित्रं परस्पर उपर कारी, अरिंशत्रु उदासीन जो प्रीति वैर रहित, मध्यस्थ जो सबः काल प्रीति वैर, समान, द्वेष्य जो सदा ईर्षा करता हो सो, जो मदा हितेच्छु सो बंधु, जोधर्मशील सो साधु और जो पापशील मो पापी इन सबोंमें भी जो समबुद्धि हो.' सो श्रेष्ठं है ॥ ९ ॥ योगी युंजीत सततमात्मानं रहसि स्थितः। लं एकांकी यतचित्तात्मा निसशीरपरिग्रहः ॥१०॥ . PM- ॥

- ~ (७८) भगवद्गीता। [अध्याय:- एक ही बैठा, स्ववश मैनवाला, सांसारिक आशारहित, परिग्रहरहित ऐसा योगी एकांतमें बैठा हुँआ मॅनको निरंतर परमात्मामें लगाता रहे ॥ १० ॥ शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरंमासनमात्मनः। नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम् ॥११॥ तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः । उपविश्यासने युज्यायोगॅमात्मविशुद्धये ॥१२॥ अब योगाभ्यासमें आसन नियम कहते हैं-पवित्र स्थानमें न अति ऊंची, न अतिनीचा, कुशासनपर मृगचर्मादिक उर्सपर वस्त्र ऐसा स्थिर अपना आँसन बिछाँके उस आसनपर बैठकरें मैनको एकाग्र करें चित्त और इंद्रियोंके कर्म स्ववश कर अपने बंधनं छूटनेके वास्ते योगको करे ।। ११ ॥ १२ ॥ समं कायशिरोग्रीवं धारयनचलं स्थिरम् । संप्रेक्ष्य नासिकांग्रे स्वं दिशैश्चानवलोकयन् ॥१३॥ प्रशांताल्ला विगतभीब्रह्मचारिव्रते स्थितः । मैनः संयम्य मैच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः॥१४॥ अब बैठनेका नियम कहते हैं-काय जो मध्यशरीर शिर और ग्रीवा इनको अचल स्थिर और सैम रखते हुए अपने नासिका- ग्रंको देखकर और और ओर न देखता हुआ प्रशांतचित्त भय- रहित ब्रह्मचर्यव्रतमें स्थित मुझमें चित्त लगाये हुए मैनकों नियमित करके आन्सनिष्ठं पुरुष सुझमें लीन हुऔ बैठौं रहे ॥ १३ ॥१४॥ गुंजन्नेव सदात्मानं योगी नियतमानसः । शांति निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति ॥ १५॥ ऐसे नियममें मन है जिसका ऐसा योगी ऐसे ही सबकॉलमें - पष्टः ६.] सान्वय-अमृततरंगिणी भाल्टी। (७९) मनको मुझमें लगाता हुआ आनंद है परम जिसमें ऐसी मेरे सदृश शांतिको पाता है ॥ १५॥ नोत्यश्नंतस्तु योगोऽस्ति ने चैकाँतमनश्नतः। नै चौतिस्वप्नशीलस्य जाग्रेतो"नैवें चार्जुन॥१६॥ अब योगीके आहारादिकोंका नियम कहते हैं-हे अर्जुनै । जो अति भोजन करता है उसका योग नहीं सिद्ध होता है और जो कुछ भी भोजन न करे उसका भी योग नहीं सिद्ध होता है और अतिसोनेवालेका योग नहीं सिद्ध होता है, अतिजागनेवालेको भी योग नहीं सिद्ध होता है ॥ १६ ॥ युक्ताहारविहारस्य युक्तचष्टस्य कर्ममें। युक्तस्वप्नाऽवबोधस्य योगो भवति दुःखहा ॥ १७॥ जोआहार और स्त्रीप्रसंग प्रमाणमें करेगा "आहारका प्रमाणं यह कि,आधा पेट अन्नसेऔर चौथाईजलसे भरकर चौथाई पवन- संचारके लिये खाली रखे.स्त्रीप्रसंगप्रमाण यह है कि, अतिकामकी इच्छा होनेसे स्त्रीसंग करे, जो कोई यहां शंका करे कि, योगीको तो ब्रह्मचर्य कह आये हैं, जैसे कि, इसी अध्यायके चौदहवें लोक- में कहा है सो सत्य है, परंतु "ऋतौ भार्यामुपेयात्" इस श्रुतिप्र- माणसे ऋतुसमयमें स्त्रीप्रसंग करनेमें भी एक ब्रह्मचर्य है, और भी कहा है कि, "इंद्रियाणींद्रियार्थेषु वर्तत इति धारयन् ॥ कर्मेंद्रि यांणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन" इत्यादि तथा कहेंगे कि, “अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम्"तोजो योगी स्त्रीप्रसंग न करेगा तो उसके कुलमें जन्म कैसे होगा! इत्यादि प्रमाणोंसे योगी स्त्रीप्रसंग प्रमाणसे करे यह विहारशब्दका अर्थ सिद्ध है. ऐसे ही कर्ममें भी चेष्टा प्रमाणसे ही करे, अति परिश्रम न करना यहाँ भागवतका प्रमाण देते हैं "सिद्धेऽन्यथार्थे न यतेत तत्र परिश्रम तत्र समीक्षमाणः " ऐसा द्वितीय स्कंधके दूसरे अध्यायके तीसरे

-
५
भगवद्गीता [अध्यायः
लोकमें कहां है। ऐसे ही जो प्रमाणसे सोवे और प्रमाणसे ही जागे
उर्सका दुःखनाशक योग..सिद्ध होता है ॥ १७ ॥
यदा विनियंत चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते।
निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा ॥ १८॥
जब आत्मामें ही अतिनिश्चल चित्तें लगा रहता है तब
सब कामनाओंसे निस्पृह हो., वह पुरुष युक्त ऐसा कहाता
हैं॥१८॥
येथा दीपो निवातस्थो नेते सोमा स्मृता ।
योगिनो यतचित्तस्य युंजतो.योगमात्मनः॥ ३९ ॥
जैसे निवातस्थानमें धरा हुआ दीपक नहीं हिलता वैसे ही
वंश है चित्तं जिसका ऐसे योगको करनेवाले योगीके मनकी
जो उपमा सोई कही है ॥ १९ ॥
। 'यत्रोपरमते चित्तं निरुद्ध योगेसेवया ।
यत्र चैवात्मनाऽऽत्मानं पश्यन्नात्मनितुष्यति॥२०॥
योगसेवन करके विषयोंसे रोका हुआ चित्त जहाँ विश्रामको
प्राप्त होता है और जहाँ बुद्धिकरके आत्मस्वरूपका निश्चय
करता हुआ मैनमें ही संतुष्ट हो ॥ २० ॥
.
सुखेमात्यतिकं येतंबुद्धिंग्राह्यमतीन्द्रियम्
वेति यत्रं न चैवायें स्थितश्चलति तत्त्वतः ॥२१॥
जो इंद्रियोंके जानने नै अवि, बुद्धिसें ही ग्रहण करनेमें आवे
ऐसा जो अत्यंत सुख उसको जिसः योगॅमें स्थित हुँआ यह
पुरुषे जानता है ऐसे निश्चय और फिर आत्मस्वरूपसे नैचला-
यमान होजा:२१
ये लब्ध्वा चाऽपर लाभ मन्यते नाधिकं ततः।
यस्मिंन्स्थिती नै दुःखेन गुरुणापि विंचाल्यते॥२२॥

Rom
षष्ठः६.] सान्वय-अमृतंतरंगिणी भाल्टी (38)
जिसको पाकर फिर उससे अधिक श्रेष्ठ लाभ नहीं मानता
हैं जिसमें प्रवृत्त हो भौरी भी दुःखसे नहीं घबराता हैं ॥ २२ ॥
जाति विद्यादुःखेसंयोगवियोग योगसंज्ञितम् ।।
से निश्चयेन योक्तन्योयोगोऽनिविण्णचेतसा॥२३॥
उसको दुःखका संयोग और वियोगकारक योगनामक जानना
सोयोग निर्विकल्प चित्तँसे निश्चयकरके करने ही योग्य है ॥२३॥
संकल्पप्रभवान्कामांस्यको सर्वानशेषतः।
: मेनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समंततः ॥ २४॥
शनैः शनैरुपरमेदवया धृतिगृहीतया ।
आत्मसंस्थं मैनः कृत्वा ने किचिदपि चिन्तयेत२५॥
स्पर्शजन्य और संकल्पज इस भेदसे कामना दो प्रकारकी
उनमें स्पर्शज शीत उष्णादिक, संकल्पज पुत्रवित्तादिक इनमें
स्पर्शजका त्याग स्वरूपसे नहीं हो सकता इससे संकल्पज सर्व
कामनाओंकोसमग्रतासे मनसे ही.त्याकर सब इंद्रियोंको सर्वत्र से
नियमित करके विवेकशुद्ध बुद्धि करके धीरे धीरे विश्रामको प्राप्त
होना फिर मैनको आत्मस्वरूपमें स्थिर करके आत्मस्वरूपके
अतिरिक्त और किसीकी भी न चिंतन करना ॥ २४ ॥ २५ ॥
यतो येतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम्। ...
ततस्ततो नियम्यतदात्मन्येव वैशं नयेत् ॥ २६ ॥
यह मन चंचल है इसीसे आत्मस्वरूपमें स्थिर नहीं रहता
है सो यह मैन जहाँ जहां लगे वहां वहांसे इसको फिरके आत्म-
स्वरूपमें ही लगाना ॥ २६॥
प्रशांतमनसं होनं योगिनं सुखमुत्तमम् ।
उपैति शांतरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम् ॥ २७ ॥

(८२) भगवद्गीता। [अध्याय:- कारण कि, जिसका मन आत्मस्वरूपमें स्थिर है उसीसे उसका रजोगुण भी नष्ट हुआ है, उससे वह निष्पाप है, उससे वह अपने स्वरूपमें स्थिर है ऐसे इस योगीको उत्तम याने आत्मानुभवरूप सुख प्राप्त होता है ॥ २७ ॥ युजन्नेवं सदात्मानं योगी विगतकल्मषः। मुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यंत सुखमश्नुते ॥ २८ ॥ ऐसे निष्पाप योगी इसीतरह सर्वः मनको स्वरूपज्ञानमें युक्त करता करता ब्रह्मानुभवरूप अत्यंत सुखको सुखेसे पाता है २८॥ सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि। ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः ॥ २९ ॥ सर्वत्रंशत्रुमित्रादिकोंमें संमदृष्टि योग जो " द्वासुपर्णा सयुजा संखाया " इस श्रुतिप्रमाणसे सखित्वरूप संयोग उसमें लगाया है मन जिसने वैह सब जगह आपरूपको आकाशादि सर्वभूतोंमें स्थित और उन आकाशादि सर्वभूतोंको आपमें देखता है॥२९॥ ज्यो माँ पश्यति सर्वत्र सर्व चे मॅयि पश्यति । तस्याहं न प्रणश्यामि से चै मे" न प्रणश्यति॥३०॥ ऐसे जो मुझको सर्वत्र मालाके मणिकोंमें सूत्रकी तरह देर्खता है और सब जगत् सूत्रमें मणिकोंकी तरह मुझमें देखता है मैं उसके अदृश्य नहीं होता हूँ और वह मेरे" अदृश्य नहीं है ॥ ३ ॥ "सर्वभूतस्थितं यो मौं भजत्येकत्वमास्थितः। सर्वथा वर्तमानोऽपिं स योगी मैयि वर्त्तते ॥३॥ . जो एकत्वं अर्थात् सबसे मित्रभाव, ( एकत्वका अर्थ जो स्वरूपकी एकता कर तो भजन किसका करे। इससे मित्रता ही अर्थ है. वाल्मीकीयसुंदरकांडमें भी “राममुग्रीवयोरेन्यं देव्येवं सान्वय-अमृततरंगिणी भा टी। (८३) समजायत" इस हनुमानके वाक्यसे एकताका अर्थ मित्रता ही सिद्ध होता है इससे ) जो सबकी मित्रतामें रहता हुआ सब भूतोंमें व्यापंर्के मुझको भेजता है निश्चयं वह योगी सब आचरण करता हुँआ मुझमें वर्तमान है याने मेरे हृदयमें वसता है ॥३१॥ आत्मौपम्येने सर्वत्र संमं पश्यति योऽर्जुन । सुखं वा यदि वा दुःखं से योगी परमो मतः॥३२॥ हे अर्जुन | जो सुखं अथवा दुःखको अपने समत्व करके सर्वत्र समानं देखता है वेह योगी उत्तम है. यह थोक उनतीसवें शोकको स्पष्ट करनेवाला है ॥ ३२ ॥ अर्जुन उवाच । योऽयं योर्गस्त्वया प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन । एतस्याहं न पश्यामि चंचलवास्थिति स्थिराम३३ श्रीकृष्णके वाक्य सुनके अर्जुन बोले-कि, हे मधुसूदन । जी यह योग समतांसे तुमने कहाँ सो मनके चंचल होनेसे में इसकी स्थिर स्थिति नहीं देखता हूँ ॥ ३३ ॥ चैचलं हिं मनः कृष्ण प्रेमाथि बलवदृढस् । तेस्याहं निपँह मैन्ये वायोरिव सुंदुष्करम् ॥३४॥ हे कृष्णाजिससे कि यह मन चंचल इंद्रियोंका क्षोभक दृढ बली है मैं इसको रोकना पवनका रोकना जैसा दुष्कर मानती हूँ३४॥ श्रीभगवानुवाच। असंशयं महाबाहो मंनो दुनिग्रहं चलम् । अभ्यासेन तु कौन्तेयं वैराग्येण च गृह्यते ॥३५॥ ऐसा सुन श्रीकृष्ण भगवान बोले-कि, हे महाबाहो! यह मैन पंजेले है इसीसे रोकनेमें आना कठिन है, यहां संशय नहीं तो

-
(८४) भगवद्गीता;": [ अध्याय:-
भी हे कुंतीपुत्र अभ्यास करके और वैराग्यः करके रोकने में
आता है ॥ ३५ ॥
असंयतात्मना योगो दुष्प्राप इति में मैतिः ।
11 वश्यात्मना तुं यतता शैक्योऽवप्तुिएंपायतः॥३६॥
यह योग जिसने मन वशन किया उससे प्राप्त होनेका नहीं
एसी मेरी मति है और जिसने मनको वश किया है उससे यत्न
करते करते. उपायसे प्राप्त हो सकता है.॥.३६ ॥
अर्जुन उवाच।
अयतिः श्रेयोपेतो योगांच्चल्तिमानसः ।
अप्राप्यं योगसंसिद्धि को गति कृष्णं गच्छति ३७॥
"नेहाभिकमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते" इत्यादि वाक्यों
करके योगमाहात्म्यं सुना था तो भी विशेषज्ञानके वास्ते फिर
पूछते हैं जैसे कि, हे कृष्ण ! जो श्रद्धाकरके युक्त और यत्न न
कर सकों इससे योगेस-मन चलायमान हुओ इससे योगसि-
दिको न पाकर किस गतिको जाता है ॥ ३७॥
कच्चिन्नोभयविभ्रष्टश्छिन्नाभ्रमिव नैश्यति ।
अप्रतिष्ठो, महाबाहो विमूढो ब्रह्मणः पथि ॥ ३४॥
हे महाबाहो ! वेदेके मार्गमें भूलाहुओं याने स्वर्गादि प्राप्ति
निमित्त कर्म त्यागकर निष्कामकर्मरूप योगको भी.न प्राप्त हुआ
इसीसें. वह अप्रतिष्ठिते और उभयभ्रष्ट अर्थात् स्वर्गादि प्राप्ति
कारक कर्म भी छोड़ा और योग भी न मिला इसीसे कदाचित्र
छिनामकी तरह जैसे बड़े मेघमसे निकलकर मेघका टुकडा
दूसरे मेघको न प्राप्त होकर बीचमें ही नष्ट होता है वैसें ने
नष्ट हो। ३८॥
नई एतेन्में संशयं कृष्ण च्छेत्तुमर्हस्यशेषतः।
तत्वदन्यैः संशयस्यास्ये च्छेत्ता न ापपर्वते ॥३९॥

माको पाता है और उसके पीछे फिर भी उस सिद्धिके निमित्त जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्त्तते ॥४४॥ . -षष्ठः ६.]। सान्वय-अमृततरंगिणी भा०टी०। (५) है. है कृष्ण । इस मेरे संशयको अच्छी तरहसे छेदन करनेको योग्य हो क्योंकि , इस संशयको दूरकरनेवाला तुम्हारे. विना दूसरा नहीं मिलेगौं ॥ ३९॥ श्रीभगवानुवाच । । पार्थ नैवे है नॉमत्र विनाशस्तस्य विद्यते । न हि कल्याणकृतंश्चिद्दुर्गति तात गच्छति ॥४०॥ अर्जुनके वाक्य सुनके कृष्ण बोले-कि,हे पार्थ! उस योगीको नाश ने इस लोकमें ही नं परलोकमें होता है, क्योंकि,हे तात् । शुभकर्ता कोई भी दुर्गतिको नहीं पाती है.॥ १० ॥ प्राप्य पुण्यकृताँल्लोकानुपित्वा शाश्वतीः समाः। शुचीनी श्रीमंतां गेहे' योगभ्रष्टोऽभिजीयते ॥४॥ जो योग पूरा किए विना मर जाय तो भी वह योगंभ्रष्ट पुण्य करनेवालोंके लोकोंको प्राप्त होकर वहां अनेक वर्ष रहकर पवित्र और धनवालोंके घरमें जन्म लेती है ॥ ४१ ॥ . . : . अथवा योगिनामेवे कुले भवति धीमताम् ।। एतद्धि दुर्लभतरं लोके" जन्म यदीहर्शम् ॥४॥ अथवा बुद्धिमान योगियोंके कुलमें ही जन्मलेता है, जो ऐसा यह जन्म सो इस लोकमें निश्चय दुर्लभ है ॥ ४२ ॥ तंत्र तं बुद्धिसंयोग लभते पौर्वदैहिर्कम् । यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनंदन ॥ १३ ॥ हे कुरुनंदन । वहां जन्म लेकर वहीं पूर्वदेहंसंबंधी बुद्धि संयो- यत्न करता है ।। ४३॥ पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते विंशोऽपि सः । जो न करना चाहे इंद्रियजित न हो तो भी वह पुरुष उसी । (८६) भगवद्गीता। [ अध्याय:- पूर्वाभ्यासकरके उसीको प्राप्त होता है. क्योंकि, जो योगके जाननेकी इच्छा भी करे तो भी शब्दब्रह्मे याने देवादिनाम शब्द- युक्त जो प्रकृति उसको उल्लंघन कर जाता है अर्थात् मुक्त हो जाता है।॥ ४४॥ प्रयत्नाद्यतमानस्तुं योगी संशुद्धकिल्बिषः । अनेकजन्मसंसिद्धस्तंतो यांति परां गतिम् ॥४५॥ ऐसे प्रयत्नसे योग करता करता निष्पाप हुआ योगी अनेक 'जन्मोंसे सिद्ध होकर निश्चयं मुक्तिको प्राप्त होता है ॥ १५ ॥ तपस्विभ्योऽधिंको योगी ज्ञानिभ्योऽपिमतोऽधिकः॥ कमिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भँवार्जुन ॥४६॥ हे अर्जुनै । योगी जो निष्काम कर्म कर्ता है वह सकामिक तपस्वियोंसे अधिक माना है, ज्ञानियोंसे भी अधिक है और सकाम कर्म करनेवालोंसे भी 'योगी अधिक है इससे तुम योगी हो" याने निष्काम होके स्वधर्मरूप क्षत्रियकर्मसे युद्ध करो॥४६॥ योगिनोमपि सर्वेषां मंगतेनान्तरात्मना। श्रद्धावान भर्जते योमों सं "मे युक्तमो मतः॥४७॥ इति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे अभ्यास- योगो नाम षष्ठोऽध्यायः ॥६॥ जो श्रद्धांवान् पुरुष मुझमें लगे हुएं चित्त॑से (श्रद्धायुक्त हो मुझको भैजता है सो सर्व योगियोंमें भी श्रेष्ठ योगी है ऐसी मेरी अभिप्राय है ॥ १७॥ इति श्रीमत्सुकुलसीतारामात्मजपंडितरघुनाथप्रसादविरचितायां श्रीमद्भगवदीतामृत- तरंगिण्या षष्ठाऽध्यायप्रवाहः ॥ ६॥ इति प्रथमं पदकं समाप्तम् ।

सप्तमः ७.] सान्वय-अमृततरंगिणी भाण्टी। (८७) अथ द्वितीयपटूकं प्रारभ्यते। प्रथम षट्कर्म याने प्रथमके छः अध्यायोंमें ईश्वरप्राप्तिका उपायरूप भक्तियोगका अंग आत्मस्वरूपज्ञानकी प्राप्ति ज्ञान- योग और कर्मयोगसे कही. अब मध्य षट्कमें याने छः से बारह पर्यंत छः अध्यायोंमें परमात्मस्वरूपका यथार्थ ज्ञान और उस ज्ञानके माहात्म्यपूर्वक भगवत्की उपासना याने भक्ति इसीको प्रतिपादन करते हैं. इसका खुलासा अगरहवें अध्यायमें पैता- लीस श्लोक पीछे “यतः प्रवृत्तिः" यहाँसे लेके "मक्तिं लभते पराम्" इस चौवनवे श्लोकपर्यंत कहेंगे अब सातवें अध्यायमें भगवान अपना स्वरूप वैभव वर्णन करते हैं। श्रीभगवानुवाच । मय्यांसक्तमनाः पार्थ योगं युजन्मदाश्रयः । असंशयं संमग्रं मी यथाँ ज्ञास्यसि तच्छृणु ॥१॥ हे पृथापुत्र अर्जुन ! तुम मुझमें चित्त लगाये हुए मेरे आश्रित होकर योगमें युक्त हुए जैसे संशयरहित समन याने विभूतिबेलसहित मुझको जानोगे सो" सुनो ॥ १ ॥ ज्ञानं तेऽहं संविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः । यज्ज्ञात्वा "नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते ॥२॥ में तुमको इस विज्ञानसहित ज्ञानको संपूर्णकरके कहता हूं जिसको जानके फिर इस लोकमें और कुछ भी जानने योग्य नहीं रहता है ॥२॥ मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये। यतामपि सिद्धानां कश्चिन्म वेति तत्त्वतः॥३॥ मनुष्योंके हजारोंमें याने अनेक हजार मनुष्योंमें आत्मज्ञान- सिद्धिके वास्ते कोई एक यत्न करता है यन करनेवाले सिद्धोंमें भंगवद्गीता । .. ८ M FA ((.८८) 1 अध्यायः- भी कोई एक मुँझको निश्चयकरके जानती है अर्थात् ऐसा जान- -जेवाला ही दुर्लभ है ॥३॥ ...भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव चे अहंकार, इतीयं में" मिना प्रकृतिरष्टधौ ॥४॥ अपरेयमितस्त्वन्या प्रकृतिं विद्धि में" परीम् । जीवभूतां महाबाहो मॅयेदं धार्यते जगत् ॥ ५॥ हे महाबाहो ! पृथिवी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार ऐसे आठ प्रकारकरके अलहदा २ हुई यह जो मेरी" प्रकृति सो यह अपरा-याने जड है और इससे और जीवरू- को मेरी" पैरा याने चेतन प्रकृति जौनो, जिस प्रकृतिकरके यह जगत् धारण किया गया है ॥ ४ ॥५॥ : एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय। * अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रैलयस्तथा ॥ ६ ॥ सम्पूर्ण प्रोणिमात्र इन्हीं दोनोंसे प्रगट होते हैं ऐसौ. जानो सर्व जगत्का उत्पत्तिस्थान तथा प्रलयस्थान भी हूँ ॥६॥ भत्तः परतरं नान्यत् किञ्चिदस्ति धनंजय। मंयि सर्वमिदं प्रोत सूत्रे मंणिगणा इव ॥७॥ सूत्रमें मालाके मैणियोंकी तैरह मुझमें यह सर्व जगत् गुंथा है. इसीसे हे धनंजय मुझसे न्यारा और कुछ भी नहीं है ।।.७ रसोऽहमप्सु कौंतेय प्रभोऽस्मि शर्शिसर्ययोः । प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं नेषु ॥८॥ सुत्र मणिगणा इव" इसीको दिखाते हैं. हे कुंतीपुत्र जलेमें रेस चंद्रसूर्यकी कांति सर्व वेदोंमें ॐकार, आकाशमै शब्द पुरुषोंमें पुरुषार्थ में हूँ याने इन जलादिकोंके सार जो रसादिक उनका ง सप्तमः ७.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा०टी०। (८९) भी शरीर में और ये मेरे शरीर हैं ऐसे अहं शब्दका अर्थ सर्वत्र शरीर शरीरी संबंधसे जानना ॥ ८॥ पुण्यो गंधेः पृथिव्यांचे तेजश्चास्मि विभावसौ। जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु ॥९॥ पृथिवीमें पवित्र गंध और अग्निमें तेज मैं ही हूँ, सब भूत- प्राणियोंमें आयुष्य और तपस्वियोंमें तैप मैं हूं ॥९॥ बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम् । बुद्धिर्बुमितामस्मैि तेजेस्तेजस्विनामहम् ॥१०॥ हे पार्थ । सब भूतोंको सनातन उत्पत्तिकारण मुझको जानो, में बुद्धिमानोंमें बुद्धि, तेजस्वियोंमें तेज हूँ॥ १० ॥ बलं बलेवतां चाहें कामरागविवर्जितम् । धर्माविरुदो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ ॥११॥ हे भरतर्षभ । मैं जो वस्तु प्राप्त नहीं उनकी कामना और प्राप्त वस्तुमें जो अनुराग इन कामरागोंसे रहित बलेवंतोंका बल और भूत प्राणियोंमें धर्मसे अविरुद्ध काम हूँ॥११॥ ये' चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाच यें। मत्त एंवति" तान्विद्धि न वह तेषु ते मयि ॥१२॥ जो शमादिक सात्त्विक भाव और द्वेषादिक राजस और जो मोहादिक तामस भाव हैं वे मुझसे ही हैं ऐसे" उनैको जानो तो भी मैं" उनमें नहीं याने उनके स्वाधीन नहीं हूँ वे" मुझमें है-अर्थात् मेरे स्वाधीन हैं ॥ १२॥ त्रिभिणमविरभिः सर्वमिदं जगत् । मोहित नौभिजानातिमामेभ्यः परमव्ययम्॥१३॥ ।

१९.)
भगवद्गीता। अध्याय:-
इन तीनों गुणमय भावांसे मोहिते यह संब जगत् इनसे परे
अविनौशी मुझको नहीं जानौं है ॥ १३ ॥
दैवी ह्येषां गुणमयी मंम मार्या दुरत्यया।
मामेवं यें प्रपद्यन्ते मायामेता तरति ते" ॥१४॥
इस लिए यह गुणमयी दैवी याने मेरी संबंधिनी मेरी माया
दुरंत्यय है इसीसे जो मेरे शरण होते हैं वे" इस मायाको
तरते हैं ॥१४॥
ने मी दुष्कृतिनो मूढों प्रपद्यते नराधर्माः।
माययाऽपहृतंज्ञाना आंसुरं भावमाश्रिताः ॥ १५॥
मायासे हरा गया है ज्ञान जिनका ऐसे मनुष्य असुरपनेको
प्राप्त हुए निंदित कर्म करनेवाले नरोंमें अधर्म मूर्ख मुझको नहीं
प्राप्त होते हैं ॥ १५॥
चतुर्विधर्धा भेजते मों जनाः सुकृतिनोऽर्जुने ।
आंतों जिज्ञासेरार्थी ज्ञानी चभरतर्षभ ॥ १६ ॥
तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते।
प्रियो"हि" ज्ञानिनोऽत्यर्थमेहं, सैच में प्रियः १७
हे अर्जुन । एक प्रकारके जो संसारसे दुःखी (आर्त) दूसरे जान-
नेकी इच्छा करनेवाले ( जिज्ञासु ) तीसरे धनादिक चाहनेवाले
(अर्थार्थी) चौथे स्वरूपाता(ज्ञानी)ऐसे चार प्रकारके सुकृति
जन मुझको भजते हैं. हे भरतर्षभ। उनमें ज्ञानी नित्य योगयुक्त
मेरी मुख्य भक्तिवाला श्रेष्ठ है कारण कि, झानियोंको "मैं अत्यन्त
प्रिय हूँ और वह मेरे" अतिशय प्रिय हैं ॥ १६ ॥ १७ ॥
उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी वात्मैव में मतम् ।
आस्थितः स हिंयुक्तात्मामामेवानुत्तमां गतिम्॥१८॥

सप्तमः ७.] सान्वय-अमृततरंगिणी भाटी । (९१) वे सब ही उदार हैं तो भी ज्ञानी मुझको पुत्रवत् प्रिय हैं ऐसा मेरा अभिप्राय है कारण कि, वह मुझमें ही चित्तको युक्त किये हुए सर्वोत्तम प्राप्ति मेरेको" ही ध्याता है ॥ १८ ॥ बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्सी प्रपद्यते । वासुदेवः सर्वमिति से महात्मा सुदुर्लभः ॥ १९ ॥ अनेक जन्मोंके अंत में सब जगेत वासुदेवरूप है ऐसा ज्ञान- वान होता है याने वासुदेवात्मक जानकर ईर्षा दिसे रहित होता है तब मुझको भजता है वेह महात्मा अतिदुर्लभ है अर्थात् कोब्य- वधिमें कोई एक होता है ॥ १९ ॥ कामैस्तैस्तैर्हतानाः प्रपद्यतेऽन्यदेवताः । तं त नियममास्थाय प्रकृत्या नियेताः स्वयो॥२०॥ दूसरे सब तो अपनी राजस तामस प्रकृति करके राजस तामस कर्मों में लगे हुँए उन उन कामनाओंसे नष्टज्ञान हो उन उन पुत्रादिनिमित्तं नियमोंको धारण केरके अन्यदेवोंको भेजते हैं ॥२०॥ यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयाऽचितमिच्छति। तस्य तस्याचैलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम् ॥२१॥ स तया श्रद्धयाँ युक्तस्तस्या धनमीहते । लभते च ततः कामान्मयैव विहितान्हितान् ॥२२॥ अन्तवत् फैलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधूसाम् । देवान देवयजो याति मद्धती याति माम ि॥२३॥ “तदेवाग्निस्तत्सूर्यस्तदु चन्द्रमाः" इत्यादि श्रुतियोंके अर्थको स्पष्ट करनेवाली जो “यस्यादित्यः शरीरं" इत्यादि श्रुतियोंके अर्थ रूप इन श्लोकोंसे अन्य देवताओंका भी भगवान आपहीके शरीरभूत दिखाते हैं जैसे कि, जो जी भक्त जिस जिस इंद्रादिरूप - (९२) भगवद्गीता। [अध्यायः- मेरे शरीरको श्रद्धाकेरके अर्चनेको चाहता है उस उस भक्तको में वही अचलेश्रद्धा धारण करती हूँ वह भक्त उसी श्रद्धासे युक्त हो उसी इंद्रादिरूप मेरी मूर्तिको आराधन करता है और उसीसे मेरे ही करके नियमित किये हुएँ हित कामैनाओंको प्राप्त होतो हे, परंतु उनै अल्पबुद्धियोंको वह फलें नाशवान होती है जैसे कि, इंद्रादिदेवपूजनेवाले "देवोंको प्राप्त होत हैं मेरे भक्त निश्चय मुझको प्राप्त होते हैं ॥ २१ ॥ २२ ॥ २३ ॥ अव्यक्तं व्यक्तिमार्पन्नं मैन्यंते मोमबुद्धयः। परं भावमजानंतो ममाव्ययमनुत्तमम् ॥ २४ ॥ मेरे' अविनाशी सर्वोत्तम परस्वरूपको न जाननेवाले मूर्ख- लोगजो मैं सबके हृदयमें मूर्तिमान प्राप्त मुझको अव्यक्त याने अमूर्ति मानते हैं तात्पर्य इसीसे अन्य देवोंको भजते हैं ॥२॥ नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमारतः। मूंढोऽयं नौमिजानातिलोको मामेजमव्ययम२५॥ यहाँ न जाननेका कारण यह है कि, योगमायासे आच्छा- दित मैं सबको दीखता नहीं हूँ इसीसे यह मूर्ख जन अजन्मो अविनाशी मुझको नहीं जानती है ॥ २५ ॥ वेदाह समतीतानि वर्तमानानि चोर्जुन। भविष्याणि च भूतानि मी तुं वेर्दै नै कश्चन॥२६॥ हे अर्जुन ! मैं जो प्रथम हुए उनको और हैं उनको और होंगे उन सर्वभूत प्राणिमात्रोंको जानता हूँ, परंतु मुझको कोई भी नहीं जानता है ॥ २६॥ इच्छाढेषसमुत्थेन इंदमोहेर्ने भारत । सर्वभूतानि संमोहं संर्गे यौति परंतप ॥२७॥ हे भारत । हे परंतप! इच्छा और द्वेषसे उत्पन्न हुए सुख, दुम्स

सप्तमः ७.] सान्वय-अमृततरङ्गिणी भाण्टी०। (९३)
लाभ अलाभादि द्वंद्वरूप मोहँसे सर्वभूत प्राणी संसार में मोहको
प्राप्त होते हैं ॥ २७॥
येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम् ।
तें इंद्वमोहनिर्मुक्ता भैजते मां दृढव्रताः ॥ २८॥
और जिनं पुण्यकर्मवाले मनुष्योंकों पापं नाशको प्राप्त हुआ
है । इद मोहसे छूटे हुए दृढव्रती मुझको" भजते हैं ॥ २८ ॥
जरामरणमोक्षाय मांमाश्रित्य यंतंति ये'।
ते'ब्रह्म तँदिः कृत्स्नैमध्यात्म कर्मचाखिलम्॥२९॥
जो मेरे आश्रित होकर जरा मरण छूटनेके लिये यत्न करते
हैं वे उस ब्रह्मको और सर्व अध्यात्मको सर्व कर्मको जानते हैं
इन ब्रह्मशब्दादिकोंका स्पष्ट बोध आठवें अध्यायमें होगा॥२९॥
साधिभूताधिदैवं मौ साधियज्ञ च ये विदुः ।
प्रयाणकालेऽपि च मी ते विदुयुक्तचेतसः ॥३०॥
इति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिपत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे
श्रीकृष्णार्जुनसंवादे विज्ञानयोगोनाम
सप्तमोऽध्यायः ॥ ७॥
जो मुझको अधिभूत और अधिदैवसहित और अधियज्ञ-
सहित जानते हैं वे मनुष्य और मुझमें नित्ये चित्त लगाये हुए
मरणकॉलमें भी मुझको जानते हैं ।। ३०॥
इति श्रीमत्सुकुलसीतारामात्मजपंडितरघुनाथप्रसादविरचितायां गीतामृत-
तरंगिण्यां सप्तमाध्यायप्रवाहः ॥ ७॥

, भगवद्गीता। [अध्याय:- अर्जुन उवाच । किं तद् ब्रह्म किमध्यात्मं किं कर्म पुरुषोत्तम । अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किर्मुच्यते ॥ १॥ जो सातवें अध्यायमें कहा था कि, जो जरामरणसे मुक्त होनेके वास्ते मेरा आसरा करके यत्न करते हैं वे उस ब्रह्मके तथा सब अध्यात्म और सब कर्मको जानते हैं इत्यादि सुनकर 'अर्जुन कृष्णसे पूँछते हैं-कि, हे पुरुषोत्तम ! जो आपने कहा वहै ब्रौ कौर्ने है, अध्यात्म कौन है, कर्म क्या है और अधिर्भूत कौन कहलाता है और अधिदैव कौनें कहलाता है । ॥ १॥ अधियज्ञः कथं कोऽत्र दें हेऽस्मिन्मधुसुदन । प्रयांणकाले चकैथं ज्ञेयोऽसि नियतात्मभिः ॥२॥ हे मधुसूदन ! इस देहमें अधियर्ड्स कैसे हुओ और कौन है और इस लोकमें मरणकालमें जिसने मन जीता है उससे "कैसे जाननेमें आँते हो । ॥२॥ श्रीभगवानुवाच। अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते। .. भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः ॥३॥ इस प्रकार अर्जुनके वचन सुनकर श्रीकृष्ण भगवान् बोले- 'किं पर है प्रकृति जिससे याने प्रेकृतिमुक्त जो अक्षर याने मुक्त जीव सो ब्रह्म हैं स्वभाव अध्यात्म कहलाता है जो सर्व भूतप्राणि- योंकी उत्पत्ति करनेवाला विसर्ग याने सृष्टि सो कर्मसंज्ञेक है॥३॥ अंधिभूतं क्षेरो भावः पुरुषश्चाधिदैवतम् । अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभृतां वर ॥ ४ ॥ जो और भाव याने नाशवान् देहादिक सो अधिभूत है और पुरुष जो सूर्यमंडलवर्ती सो मेरा ही एकरूप अधिदेवत है.

अष्टमः ८.] सान्वय-अमृततरङ्गिणी भा०टी०। (९५) देहधारियोंमें श्रेष्ठं अर्जुन | इस देहेमें अधियज्ञ में हूँ यौने जीपका पूज्य में हूँ ॥४॥ अंतकाले च मामेव स्मरन्मुक्का कलेवरम् । यः ग्रंयाति स मदोवं याति नास्त्यत्र संशयः॥५॥ जो पुरुष अंतसमयमें मुझे ही स्मरण करता करता देहको त्यांगके इस लोकसे जाता है सो मेरी समताको प्राप्त होती है इसमें संशय नहीं ॥५॥ ये यं वापि स्मरंन भौवं त्यजत्यंते कलेवरम् । "तं तमेवैति कौन्तेय सर्दा तदावभावितः ॥६॥ जो मेरा सदा और अंतकालमें भी स्मरण करते करते शरीर त्यागे सो तो मुझहीको पावे अथवा जो जो भाव याने वस्तु अथवा कोई प्राणीको सुमिरता सुमिरता सदा उसीमें लवलीन भया हुआ अंतमें देहेको त्यागता है, सो हे कुंतीपुत्र ! वह उसी उसीको" प्राप्त होता है ॥६॥ तस्मात्सर्वेषु कालेषु मॉमनुस्मरे युद्धध च। मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयः॥७॥ इस कारण सेब कालमें मुझको समिरो और युद्ध करो ऐसे मुझमें मन बुद्धिको लगाय हुँए मुझे ही पाओगे, इसमें संदेह नहीं ॥७॥ अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नोऽन्यगामिना। परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिंतयेन् ॥ ८॥ हे पृथापुत्र! सदा अभ्यासयोगयुक्त आत्मस्वरूप विना दूसरेमें नहीं जानेवाला ऐसे चित्तकरके मेरा चिंतन करता करता देदीप्य- मान अतिउत्तम ऐसा जो परमपुरुष मैं उस मुझमें लय होतो है८॥ कवि पुराणमनुशासितारमणोरणीयांसम स्मरेद्यः ।

-
(९६) भगवद्गीता।
अध्याय:-
सर्वस्य धातारमचिंत्यरूपैमादित्यवर्ण तमसः पर-
स्तीत् ॥ प्रयोणकाले मनसाऽचलेन भक्त्या युक्तो
योगबलेन चैवै ॥ चवोर्मध्ये प्राणमविश्य सम्यक
से तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ॥९॥१०॥
१ . जो कोई भक्तिकरके युक्त पुरुष मरणसमयमें अर्चल मनके
द्वारा, और योगबलँकरके भौंहोंके मध्य में निश्चल अच्छी तरहसे
प्राणोंको प्रवेश करके अर्थात् कुंभक करके जो सर्वज्ञ, पुरातन,
सबका शिक्षक, सूक्ष्मसे सूक्ष्म, सर्वको पालनेवाला, नहीं चिंत-
नमें आता है रूपै जिसका, सूर्य सरीखा है प्रकाशमान जो
पुरुष और प्रकृतिसे पर उसको सुमिरौं है सो उस पर देदी-
प्यमान पुरुषको प्राप्त होता है ॥ ९॥ १० ॥
यदक्षरं वेदविदो वेदन्ति विशंतियद्यतयो वीतरागा।
येदिच्छतो ब्रह्मचर्य चरंतितने पैदं संग्रहेण प्रवक्ष्ये११
वेदके जाननेवाले जिसको अक्षर कहते हैं, वीतराग ईश्वरप्रा-
प्तिका यत्न करनेवाले जिसको प्राप्त होते हैं, जिसेको चाहनेवाले
ब्रह्मचर्यको आचरते हैं, उसै पर्दैको तुमसे संक्षेपकरके कहूंगा३१॥
सर्वहाराणि संयम्य मनो हदि निरुध्य छ।
मून्याधीयात्मनःप्राणमौस्थितोयोगधारणास १२॥
ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्ममिनुस्मैरन् ।
यः प्रेयाति त्यजन देहं से यौति पैरमा गैंतिम्॥१३॥
जो योगी देहेको त्यागतो त्यागता सर्व इंद्रियोंको संयममें
करके और हृदयमें मनको रोकेके अपने प्राणों को मस्तकमें चढीके
योगधारणों में स्थिर भया हुऔं 'ॐ' इस एक अक्षर ब्रहाँका उच्चा-
रण करता करता मुझेको सुमिरतों सुमिरता देह त्यागके जाती है
सो" अतिउत्तमै गतिको प्राप्त होता है ॥ १२॥ १३ ॥

अष्टमः ८.] सान्वय-अमृततरंगिणी भाण्टी। (९७) अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः। तस्याहं सुलभैः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः॥१४॥ हे पृथापुत्र । जो अनन्यचित्त मुझको नित्य निरंतर सुमिरता है उस नित्ये मेरे संयोग चाहनेवाले योगीको मैं सुलमै हूँ॥१४॥ मांमुपेत्य पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम् । नोप्नुवंति महात्मानः संसिद्धि परमां गताः॥१५॥ यहांसे अध्यायसमाप्तिपर्यंत ज्ञानी जो केवल्याथीं उसकी मुक्ति और ऐश्वर्य चाहनेवालेकी पुनरावृत्ति कहते हैं-सो ऐसे कि, जो मेरी उपासनारूप परम सिद्धिको प्राप्त हुए हैं वे महात्मा- जन मुझको प्राप्त होकर फिर दुःखके घर नाशर्वान् जन्मको नहीं प्राप्त होते हैं ॥ १५॥ आब्रह्मभुवनांल्लोकोः पुनरावर्तिनोऽर्जुने । मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म नै विद्युते ॥ १६ ॥ हे अर्जुन ! ब्रह्मलोकपर्यंत सर्वलोक, पुनराँवर्ती हैं और हे कुंती- पत्र | मुझको प्राप्त होकर फिर जन्म नहीं होती है ॥ १६ ॥ सहस्रयुगंपर्यंतमहर्यद्बह्मणो विहुँः । रात्रि युगेसहस्रां तां तेऽहोरात्रविदो जनाः ॥१७॥ ब्रह्मलोकपर्यंत पुनरावृत्ति देखनेको ब्रह्माके दिनरात्रिका प्रमाण दिखाते हुए उसको जाननेवालोंकी श्रेष्ठता कहते हैं-जो ब्रह्मांका- इजार चतुर्युगीपर्यंत दिर्ने और हजार चतुर्युगीपर्यंत रात्रिको जान ते हैं। मनुष्य दिन रातके जाननेवाले हैं,याने दीर्घदर्शी हैं १७॥ अव्यक्तायतयः सर्वाः प्रेभवत्यहरांगमे। रात्र्यांगमे प्रलीयते तत्रैवाव्यक्तसंज्ञके ॥ १८॥ दीर्घदर्शित्व दिखाते हैं सो ऐसे कि, ब्रह्माके दिनके आगममें .. :

.in (९८) भगवद्गीता। . . [ अध्यायः- ब्रह्माके शरीरसे सर्व जीवोंके शरीर होते हैं रात्रिके आगममें उसी ब्रह्माके शरीरमें लीने होते हैं ॥ १८॥ भूतामः स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते । रांच्यागमेऽवशः पार्थ प्रभवत्यहरागमे ॥ १९॥ हे पृथापुत्र ! वही यह भूतप्राणीसमूह कर्मपरवशे हुआ जन्म ले. लेके रात्रिके आगममें लीन होता है, दिनके आगममें उत्पन्न होता है ॥ १९॥ परस्तस्मात् भावोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तांत्सनातनः । यः से सर्वेषु भूतेषु नश्यत्से न विनश्यति ॥२०॥ उस ब्रह्माके जड़प्रकृतिशरीरसे श्रेष्ठे और जो अव्यक्त सनातन भाँव है याने शुद्धचेतन है सो सर्व आकाशादि और शरीर नष्ट होनेसे भी नष्ट नहीं होती है ॥२०॥ अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तस्तैमाहुः परमां गतिम् । य प्राप्य ने निवर्तन्ते तैद्धाम परमं मैम ॥२१॥ वह अव्यक्त अक्षर ऐसे कहाँ है 'कूटस्थोऽक्षर उच्यते' उसकी परमगति कहते हैं जिस शुद्धरूपको प्राप्त होके नहीं लौटते हैं वह मेरी सर्वोत्तम धौम है, याने जैसे प्रकृतिमें मेरा शरीर है और जीव भी मेरा शरीर है परंतु जैसे सर्व घर किसी पुरुषका उसमें निजमंदिर श्रेष्ठ होता है तैसे जीव प्रकृति और जीवमें में रहता हूँ इससे वह मेरा मुख्य शरीर है. यह कैवल्यमुक्ति कही, अब ऐश्वर्यप्राप्ति कहते हैं ॥ २१ ॥ पुरुषः से पैरः पार्थ भक्त्या लेभ्यस्त्वनैन्यया। 'यस्यांतःस्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम्॥२२॥ हे पृथापुत्र । ये सर्व भूतप्राणी जिसके अंतस्थ हैं और यह सर्व . - अष्टमः ८.] सान्वय-अमृततरंगिणी भाल्टी । ( ९९) जगत् जिंसकरके विस्तारित है 'सो पर पुरुष याने परमात्मा अनन्यभक्ति करके प्राप्त होने योग्य है ॥ २२ ॥ यंत्र काले वनावृत्तिमाईत्तिं चैवं योगिनः । प्रोता याँति त कालं वक्ष्यामि भरतर्षभ ॥३३॥ हे पुरुषोंमें श्रेष्ठोजिस कालमें देहत्याग कर गये हुए योगी अना- वृत्तिको और आवृत्तिको जाते हैं उस कालैको मैं कहता हूँ॥२३॥ अग्निज्योतिरहः शकः षण्मास उत्तरायणम् । तंत्र प्रयातां गच्छति ब्रह्म ब्रह्मविदो जैनाः॥२४॥ जिस कालमें अग्नि प्रकाशक है तथा दिन शुक्ल पक्ष है ऐसे छः महीने उत्तरायण उसमें गये हुए ब्रह्मज्ञानी जैन ब्रीको प्राप्त होते हैं ॥२४॥ धूमो रात्रिस्तथा कृष्णः षण्मांसा दक्षिणायनम् । तत्रं चांद्रमसं ज्योतियोगी प्राप्य निवर्तते॥ २५ ॥ जिस कालमें धूम रात्रि तथा कृष्णपक्ष छः महीने दक्षिणायन इसमें गया हुआँ योगी चांद्रमेस ज्योतिको याने स्वर्ग पाके यज्ञादि फल भोगके" फिर यहाँ जन्म लेती है ॥ २५ ॥ शुक्लकृष्णे गती ह्येते जर्गतः शाश्वते मते । एंकया यात्यनाईत्तिमन्ययाऽऽवर्त्तते (नः ॥ २६ ॥ शुल्क कृष्ण मार्ग जगत्के सनातन नियमित हैं एककरके मुक्तिको जाता है दूसरेकरके फिर जन्मता है ॥ २६ ॥ नैते ऐती पार्थ जॉनन्योगी मुंह्यति कश्चन। तस्मात्सर्वेषु कालेषु योगयुक्तो भँवार्जुने ॥ २७ ॥ हे पृथापुत्र । इन मागाँको जानता हुआ कोई भी योगी नही मोहित होता है.हे अर्जुन।इससे सर्व कालमें योगयुक्त हो ॥२७॥ . ये - (१००) भगवद्गीता। [अध्याय:- वेदेषु यज्ञेषु तपस्सु चैवं दानेषु यत्पुण्यफलं दिन ष्टम् । अत्येति तत्सर्वमिदं विदित्वा "योगी पैरें स्थानमुपैति चौद्युम् ॥ २८॥ इति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे. श्रीकृष्णार्जुनसंवादे अक्षरब्रह्मयोगो नास अष्टमोऽध्यायः ॥८॥ मनुष्य इसको जानके फिर जो पुण्यफल वेदाध्ययनमें,यईमें तपमें और दोनमें कहाँ है उसे सैबको अतिक्रमण करता है याने उससे भी अधिक फल पाता है, फिर योगी होके सर्वोत्तम आदि स्थानको पाता है, याने मुक्त होता है ॥ २८ ॥ इति श्रीमत्सुकुलसीतारामात्मजपंडितरघुनाथप्रसादविरचितायां श्रीगीतामृत- तरंगिण्यामष्टमाऽध्यायप्रवाहः ॥ ८॥ इंदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे । ज्ञान विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्॥१॥ सप्तम और अष्टम अध्यायोंमें अपनी स्वरूपप्राप्ति भक्तिसेही कही अब नवसमें अपना सर्वोत्तम प्रभाव और भक्तिका भी प्रभाव कहते हैं-सो ऐसे कि, हे अर्जुन ! इस अतिगुप्त करनेयोग्य विज्ञानसहित ज्ञानको असूया जो पराये गुणमें दोष लगाना उसकरके रहित जो तुम तिनसे कहूंगा जिसको जाँनके संसार- दुःखसे छूटोगे ॥१॥ राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम् । प्रत्यक्षावगेमं धये सुसुखं कर्तुमव्ययम् ॥ २॥ यह भक्तिज्ञान राजविद्या और गोप्य वस्तुओंमें सर्वोत्तम पवित्र

सम्मति
नवमः ९.] सान्वय-अमृततरंगिणी भाल्टी
अतिउत्तम प्रत्यक्षफलंरूप धर्मयुक्त करनेको भी अतिसुगम और,
अविनाशी है ॥२॥
982
अश्रद्दधानाः पुरुषां धर्मस्यास्य परंतप ।
अप्राप्य मां निवर्तते मृत्यसंसारवमनि ॥३॥
हे परंतप अर्जुनै । इस धर्मसंबंधी श्रद्धाको न धारण करनेवाले
पुरुष मुझको प्राप्त हुए विना मृत्युरूप संसारमार्गमें फिरते
रहेते हैं ॥३॥
मयो ततमिदं सर्व जंगदव्यमूर्तिना।
मत्स्थानि सर्वभूतानि में चाहे तेष्ववस्थितः॥४॥
न चे मैत्स्थानि मतानि पश्य में योगमैश्वरम् ।
भूतभृन्नै च भूतस्थो ममात्माँ भूतभावनः ॥५॥
यह सर्व जगत् अतिसूक्ष्म अंतर्यामीप मुझ करके व्याप्त है।
इससे सर्वभूत प्राणी मेरे स्वाधीन हैं और मैं उनमें नहीं स्थित
हूं याने उनके स्वाधीन नहीं हूँ और वे भूत प्राणी मुझमें स्थित
नहीं हैं याने जैसे घड़े जल तैसे नहीं हैं मेरे" ईश्वरसंबंधी इस
योगैंको देखो भूतोंका भरने पोषनेवाला भी मेरी आत्मौ याने
मेरा शरीरभूत जीवात्मा भूतोंको धारण करनेवाला और भूतोंमें
स्थित नहीं है॥४॥५॥
यथाऽऽकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान् ।
तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय ॥ ६ ॥
जैसे महान् वायु नित्य ही आकाशमें रहा हुआ मेरे आधारसे
सर्वत्र विचरता है तैसे ही सर्व भूते मेरे आधार हैं ऐसे निश्चय
1982
सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृति यान्ति मामिकॉम ।
कल्पाये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम७ि॥
करो॥६॥

(१०२) भगवद्गीता । [ अध्याय:- हे कुंतीपुत्र । प्रलयकालमें सर्व भूतं प्राणी में री प्रेकृतिमें लीन होते हैं, कल्पकी आँदिमें में उनको फिर अनेक प्रकारसे उत्पन्न करती हूं ॥७॥ प्रकृति स्वामवष्टभ्ये विसृजौमि पुनः पुनः। भृतग्राममिमं कृत्स्नंसर्वशं प्रकृतेर्वशात् ॥८॥ अपनी प्रकृतिको आश्रय देके प्राचीन स्वभावके वर्शसे परवंश संपूर्ण इस भूत प्राणी समूहको वारंवार सृजती हूं ॥ ८ ॥ ने चे मां तांनि कर्माणि निबैनन्ति धनंजये। उदासीनवदासीनमसंक्तं तेषु कर्मसु ॥९॥ हे अर्जुन जो कहोगे कि,ऐसे विषमसृष्टि सृजनेवालेको विष- मताके वैषम्यनिर्दयत्वदोष क्यों न लगेंगे। तहाँ सुनो, जो सृष्टयादिक कर्म करता हूँ उन कर्मोंमें आसक्तं और उदासीन रख स्थित ऐसे मुझको कर्म बंधन नहीं करते हैं ॥ ९॥ मंयाऽध्यक्षेण कृतिः सूर्यते सचराचरम् । हेतुनाऽनेनं कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते ॥१०॥ हे कुंतीपुत्र । जब मैं अध्यक्ष याने सर्वकृत्यका सम्हारनेवाला होता हूँ तब मुझ करके प्रकृति चराचर जगतको उत्पन्न करती है इस कारण करके जगले उत्पन्न होता है ॥१०॥ अवजानति मी मूर्ती मानुषीं त मास्थितम्। परं भविमानतो ममै भूतमहेश्वरम् ॥ ११॥ मोर्षांशा मोधकर्माणो मोघंज्ञाना विचेतसः । राक्षसीमामुरी चैर्वे प्रकृति मोहिनीं श्रिताः ॥१२॥ जो राक्षसी और आसुरी, आपसरीखी मोहकारक प्रकृतिको : धारण कर रहे हैं याने ऐसे स्वभाववाले, निष्फल

नवमः ९.] सान्वय-अमृततरगिणी भाल्टी। (१०३)
निष्फलं कर्मवाले, निष्फलज्ञानवाले वे भ्रष्टचित्तै पुरुष जो सर्व
भूतोंके ईश्वरोंका भी ईश्वर ऐसे मरे प्रभावको न जानते हुए
सुर्ख अतिकरुणासे मनुष्यरूपर्शरीरमें स्थित मेरी" अवज्ञा करते
हैं॥ ११ ॥ १२ ॥
महात्मनस्तु मां पार्थ दैवी प्रकृतिमाश्रिताः।
मैजंत्यनन्यमैननसो ज्ञात्वाभूतांदिमव्ययम्॥१३॥
हे पृथापुत्रं । दैवी प्रकृतिको प्राप्त हुए महात्माजने मुझको
सर्वभूतोंका आदि और अविनाशी जानके अनन्यमनवाले
होकर मुझको ही भजते हैं ॥ १३ ॥
सततं कीर्तयतो मां यतंतचं दृढव्रताः।
नमस्यंतश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासत॥१४॥
अब महात्माओंके भजनकी रीति कहते हैं जैसे कि, निरंतर
मेरों कीर्तन करते हुए और दृढसंकल्प किये हुए मेरीप्रप्तिके वास्ते
यत्न करते और भक्तिकरके मुझको नमस्कार करते हुए नित्य मेरे
समागमैकी इच्छा करनेवाले मेरी उपासना करते हैं ॥ १४ ॥
ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजतो मामुपासते।
एकत्वेने पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम् ॥१५॥
और कितनेक महात्मा एकत्वकरके याने सख्यभावसे और
कितनेक पृथक्त्वसे याने दास्यभावसे ऐसे बहुर्धा याने कोई
वात्सल्य और कोई शृंगार इत्यादि भावना करके सर्वतोमुख
यांने सर्वव्यापी मुझको ज्ञानयज्ञे करके पूजते हुए उपासना
अहं कतरह यज्ञः स्वधोऽहमहमौषधम् ।
मंत्रोऽहमहमेवाज्यमहमैग्निरहं हैतम् ॥ १६ ॥
अब अपना सर्वव्यापित्व दिखाते हैं-सो ऐसे कि, भगवान
कहते हैं कि, कतु याने अग्निष्टोमादिक श्रौत यज्ञ मैं हूँ, यज्ञ जो
:
करते हैं ॥१५॥

(१०१) भगवद्गीता। [अध्याय:-
स्मार्त चिमहायज्ञे सो मैं हूँ, स्वधा जो पितृनके श्राद्धादिकर्म
सो मैं हूँ, औषध याने अन्न सो मैं हूँ, मंत्र में "हूँ, आज्य
याने शेत सो मैं हूँ, अग्नि मैं हूँ, होम मैं हूँ, यह निश्चय
है ॥१६॥
पिताऽहमस्य जगतो माता धातो पितामहः ।
वेचं पवित्रमोङ्कार ऋ साम यजुरेव च ॥ १७ ॥
गतिर्भर्ती प्र#ः साक्षी निवासः शरणं सुहृत् ।
प्रभवः प्रलयस्थानं निधानं बीजमव्ययम् ॥ १८॥
इस जगत्का पिता, माता,धांता,पितामह जो जानने योग्य
सो और पवित्र है सो और ओंकारे, वेद, सामवेद और यजुर्वेद
इस जैंगत्की गति, पालनकर्ता, स्वामी, शुभाशुभकर्मोका साक्षी,
रहनेका स्थान, इच्छितवस्तु देनेवाला और अनिष्टका निवारक
सुहँद, उत्पत्ति और नाशका स्थान, धारणकरनेवाला, अवि-
नांशी, उत्पत्तिकारक सर्व मैं ही हूँ ॥ १७ ॥ १८ ॥
तपोम्यहमहं वर्ष निगृहाम्युत्सृजामि च।
अमृतं चैवै मृत्युश्च सदसचाहमर्जुनं ॥ १९ ॥
हे अर्जुन ! अग्नि और सूर्यरूप होके मैं दी तपाता हूँ मैं ही
ग्रीष्मादि ऋतुओंमें वर्षांको बंद करता हूँ और वर्षाऋतुमें वर्षता
है, अमृते और मृत्यु और सैत् और असत में" निश्चय हूँ॥१९॥
विद्या मां सोमपाः पूतपापा यज्ञैरिष्ट स्वर्गति
प्रार्थयते ॥ ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोकमश्नंति
दिव्यान दिवि देवभोगान् ॥२०॥ ते"ते"
अक्कास्वर्गलोकं विशालंक्षीणे" पुण्ये मैंर्त्यलोकं
विशति ॥ एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना गतागतं
कामकामा लभते ॥ २१॥

- नवमः ९.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा०टी०। (१०५); इस तरहंसे महात्मा ज्ञानियोंका व्यवहार और अपना वैभव.. कहा. अब सकाम जनोंकी रहनि रीति कहते हैं जैसे कि, त्रैविद्या याने ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेदोक्त इंद्रादिदेव निमित्त यज्ञ करनेवाले सोमपान किये हुए पापरहित यज्ञोंकरके. इंद्रादिरूप मुझको आराधनकरके स्वर्गकी प्राप्ति मानते हैं व पुण्यरूप इंद्रलोकमें प्राप्त होके वहां स्वर्गमें दिव्यं देवभोगोंको भोगते हे, फिर वे उस विशाल स्वर्गलोकैको भोगके पुण्य क्षीण होनेसे- इस मनुष्यलोकॅमें प्राप्त होते हैं. ऐसे वेदयी धर्मको केवल वारंवार करते हुए सकामी जैन गतागत याने स्वर्ग जाना मनु ष्यलोकको आना फिर जाना- फिर. आनौ. ऐसे फलको पीते हैं ॥ २० ॥.२१॥ अनन्यांश्चिन्तयन्तो माँ ये जनाः पर्युपासते। तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥२२॥ जो मनुष्य अनन्य होकर मेरा चितवन करतें मुझको भेजने है उन नित्य मेरे संयोग चाहनेवालोंका योग जो धनादिककी और मेरी प्राप्ति क्षेम जो. धनादि संरक्षणः और अपुनरावृत्ति इनको मैं प्राप्त करता हूँ॥ २२ ॥ 'ये'ऽप्यन्यदेवताभक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विताः। तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम् ॥२३॥ जो कि,' औरदेवताओंके' भक्त उनको श्रद्धायुक्त पूजन करते हैं वे भी मेरा ही पूजन करते हैं; परंतु हे कुन्तीपुत्र ! वे अविधिपूर्वक पूजन करते हैं याने विधिपूर्वक नहीं ॥ २३ ॥ अहं हिं सर्वयज्ञानां भोक्ता चे प्रभुरेव च । नैतुमाममिजानन्ति तत्त्वेनाऽतश्च्यवन्ति ते २४॥ में निश्चय करके सर्व यज्ञोंका भोक्तों और स्वामी भी हूं परंतु .

NT . (१०६) भगवद्गीता। [अध्याय:- सकामिक जन मुझको ऐसे निश्चय करके नहीं जानते हैं इससे जन्म मरणको प्राप्त होते हैं ॥ २४ ॥ योति देवव्रता देवान पितॄन्याँति पिर्तृव्रताः। भूतानि यौति भूतेज्यायोति मद्यौजिनोऽपि माम।। अहो जो. कहोगे कि, एक ही कर्ममें संकल्पमात्रसे कैसे भेद हुआ तहाँ सुनो जो इंद्रादि देवोंको भक्तिपूर्वक आराधन करते तो उनहीको प्राप्त होते हैं, पितृभक्त पितरोंको प्राप्त होते हैं, जो कोई भी राजा साधु चोर इत्यादि भूत प्राणीकी सेवा संगति करते है वे उनहीकी संमताको प्राप्त होते हैं, जो मेरी भक्ति करते हैं वेनिश्चय मुझको प्राप्त होते हैं याने मेरी समताको पाते हैं॥२५॥ पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो में भक्त्या प्रयच्छति। तैदेहं भक्त्युपहृतमईनामि प्रयतात्मनः ॥ २६ ॥ यदि कहो कि, बडोंको प्रसन्न करनेके लिये बड़े उपाय चाहिये तो-जो कोई पत्र, पुष्प, फल, जले मुझको भक्तिसे अर्पण करता है मैं उस शुद्धचित्तं भक्तके भक्तिपूर्वक अर्पण किये हुए उस पत्रादिक पदार्थको स्वीकार करती हूँ ॥ २६... यत्करोषि यदनासि यज्जुहोषि ददासि यत् । यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्वं मदर्पणम् ॥ २७ ॥ ज़ुभाशुभफलेरेवं मोक्ष्यसे कर्मबन्धनैः । संन्यासयोगयुक्तात्मा विर्मुक्तो मामुंपैष्यसि ॥२८॥ हे कुतीपुत्र ! मुझको ऐसा सुलभ जानकर जो कुछ भी तुम करो; जो खाओ, जो हवन करो, जो देओ, 'जो तप करो उसैको मेरे अर्पण किये हुए करो, ऐसे करते हुए जो कर्मबंधनकारक हैं उन शुभाशुभ फल कर्मों करके छूटोगे ऐसे ही इस कर्मफल अर्पण संन्यासयोगयुक्त चित्तवाले तुम मुक्त भये हुँए मुझको प्राप्त होयेंगे ॥ २७ ॥२८॥ -- 21 नवम: SIT सान्वय-अमृततरंगिणी भाटी । (१७) समोऽहं सर्वभूतेषु ने में विष्योऽस्तिनं प्रियंका || ये मजन्ति तुमा भक्त्या मैयि ते तेषूचाप्यहम२९ सर्वभूतोपेर सम हूं. मुझे नै कोई.अप्रिय न कोई प्रिय है परंतु जो मुझेको भक्तिकरके भेजते हैं वे मेरे हेर्दयों और उनके हृदयमें निश्चय करके में रहता हूँ ॥ २९ ॥ अपि चेत्सुदुरांचारो भजते मॉमनन्यभाव । साधरेव से मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो.हिं से॥३०॥. लिक्षिप्राभवति धर्मात्मा शवच्छान्ति निगच्छति कौंतेय प्रतिजानीहि नै में भक्तः प्रणश्यति ॥३१॥ क्वचित कोई पुरुष अति दुराचारी भी हो और वह मुझको अनन्यभाव याने औरको न भाग. देता हुआ सर्वत्र 'मुझकोही जानकर सब मेरे अर्पण करता हुआ भेजता हो वह साधु ही है ऐसे मानना चाहिये, जिससे कि वह सम्यक् निश्चय किये है उससे वह शीघ्र ही धर्मात्मा होगी और मोक्षको ही प्राप्त होगा कुन्ती तुम यह निश्चय जानो कि मेरौं भक्त नाशको नहीं पता अर्थात मुक्त हो जाता है ॥ ३० ॥ ३ IDIORAT मी हिँ पाथ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयौनया। स्त्रियो वैश्यास्तथा शुद्रास्तेपियौन्ति पर गतिमश्र किं पुनैब्राह्मणोंः पुण्या भक्ती राजर्षयस्तों। अनित्यमसख लोकमिमं प्राप्य भैजस्व माम३३॥ प्रथापुत्रा निश्चयपूर्वक मुझको आश्रय करके जो पपियोनि भी हो तथा ची वैश्य से भी मोक्ष पाते हैं. जोहावित्र पाक्षिण तथा क्षत्रिय भक्त है उनकी मोक्षमें फिराक्या शिका है। इससे अनित्यै दुःखरूप इसे लोको पौकर मुझैको भैनोसरा३३॥ AL WEST MARS PHANTEST IPORN

।
(१०८) भगवद्गीता। (अध्यायः-
मन्मना भर्वे मद्भक्तो मद्योजी माँ नमस्कुरुं।
मोमेवैष्यसि युक्त्ववैमात्मानं मत्परौयणः ॥ ३४ ॥
इति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योग- :
शास्ने श्रीकृष्णार्जुनसंवादे राजविद्याराजगुह्य-
योगो नाम नवमोऽध्यायः ॥ ९॥ .
भजनेकी रीति यह है कि,मुझमें ही मनको युक्त किये हुए रहो,
! मेरे ही भक्तं मेरा ही पूजन करनेवाले बनो मुझे ही नमस्कार
; करो, ऐसें मैनकों मुझमें युक्तकरके मेरे ही परायण हुए मुझको
ही प्राप्त हो जाओगे ॥ ३३ ॥
इति श्रीमत्सूकुलसीतारामात्मनपंडितरघुनाथप्रसादविरचितायां श्रीगीतामृततरं-
गिण्यां नवमाध्यायप्रवाहः ॥९॥
सप्तमादिक तीनों अध्यायोंमें श्रीकृष्णजीने अपना भगवत्तत्त्व
और विभूति वर्णन की. जैसे कि, सप्तममें “रसोऽहमप्सु कौंतेय"
अष्टममें "अधियज्ञोऽहमेवात्र" इत्यादि, नवममें “अहं क्रतुः”
इत्यादिकरके संक्षेपसे कहीं उनको और भक्तिकी आवश्यकता
अब. दशमाध्यायमें विस्तारसे कहते हैं-
श्रीभगवानुवाच ।
भूय एव महाबाहो शृणु में परमं वचः।
यंत्तेऽहं प्रीयमाणाय वक्ष्यामि हितकाम्यया॥१॥
श्रीकृष्ण भगवान् कहते हैं-कि, हे महबाहो ! मेरा सर्वोत्तम
वाक्ये फिर भी सुनो, जो वाक्य प्रीतियुक्त जो तुम तिन तुमसे
तुम्हारे हितके वास्ते में" कहती हूं ॥३॥

दशमः १०.] सान्वय-अमृततरंगिणी भाटी । (१०९) ने में' विदुः सुरगर्णाः प्रभवं ने महर्षयः । अहमीदिहि देवांनां महषीणां चै सर्वशः ॥२॥ मेरो जन्म हुआ ऐसा न देखें और महर्षि भी नहीं जानते है, कारण कि, मैं देवोंकी और सेब महर्षियोंकी भी आदि हूं ॥२॥ यो मोमजेमेनादि चे वेत्तिं लोकमहेश्वरम् । असंमूढः सं मत्र्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥३॥ जो मुझको अजन्मा और अनादि लोकमहेश्वर जानता है वई मर्नुष्योंमें ज्ञानी, सब पापोंकरके छूटा है ॥ ३ ॥ बुद्धिर्ज्ञानमसंमोहः क्षों सत्यं दमः शमः । सुखं दुःखं मैंवो भावो मैयं चीभर्यमेव चै॥४॥ अहिंसी समता तुष्टिस्तपो दानं यशोऽयशैः । भवति भावी भूतानां मत्तै एव पृथग्विधौः ॥५॥ बुद्धि, ज्ञान, अव्याकुलता, क्षेमा, सत्ये, दम, शम, सुख, दुःखे, उत्पत्ति, नाश, मैय और अभय और अहिंसा, समती, संतोष, तप, दाने, यश, अयशै ये पृथक् पृथक् भूतोंके भाव मुझसे ही होते हैं ॥ ४॥५॥ महर्षयः सप्त पूर्वे चत्वारो मनर्वस्तथा । मद्भावां माना जातो येषी लोक इमाःप्रजीः॥६॥ सात महाऋषि अर्थात् मरीचि वसिष्ठादिक महाऋषि, चार इनके भी पूर्वजै याने सनकादिक ऋषि तथा चौहद मैनु मेरे संक- पण मन इच्छा प्रमाणं उत्पन्ने हुए जिनके लोकमें ये प्रजा हैं। एतो विर्भूति योगं च मम यो वेत्तिं तत्त्वतः । सोऽविकंपेन योगेनै युज्यते नात्र संशयः ॥७॥ जो पुरुष मेरी महर्षि इत्यादिकोंकी उत्पत्तिरूप इस विभूतिको

-
..(११०) :
'भगवद्गीता! [अध्यायः-
और कल्याणगुणादिरूप योगको तत्त्वसे जानता है सो अचलें
भक्तियोगकरके मुक्त होता है इसमें संशय नहीं हैं ॥ ७ ॥
अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्व प्रवर्त्तते ।
ना
इति मत्वा भजते माँ बुंधा भावसमन्विताः ॥८॥
में संबको उत्पत्तिस्थान हूँ मुझसे सेब प्रवृत्त होता है ऐसा
मुझको मानकर भावसंयुक्त ज्ञानी जैन मुझको भजते हैं ॥८॥
मचित्ता मदतप्राणा बोधयन्तः परस्परम् ।
कथयंतश्च मां नित्यं तुष्यति चै रमति च ॥९॥
उनका भजनप्रकार यह है कि मुझमें ही जिनका चित्त है,
श्वासोच्छास पर मेरा स्मरण करते रहते हैं, परस्पर एक दूस-
रेको उपदेश करते हुए निश्चयपूर्वक सुझको यांने मेरे ही गुणग-
णोंको कहते कहते निरंतर संतुष्ट होते हैं और मेरी की हुई
क्रीडायें करने लैंगते हैं ॥९॥
तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम् ।
ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयाति ते॥१०॥
इस प्रकार व निरंतर मेरे संगी मुझको प्रीतिपूर्वक भजनेवाले
उनको उसे बुद्धियोगेको देता हूँ कि, जिससे व मुस्को प्राप्त
होते हैं ॥ १०॥
तेषामेवानुकम्पार्थमहंमज्ञानजं तमः ।।
नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वंता॥११॥
उनकी ही दयाके लिये उनकी मनोवृत्तिमें स्थित हुआ मैं
प्रकाशित ज्ञानरूप दीपकसे उनके अज्ञानजन्य तिमिरका नाश
करता हूं ॥११॥
अर्जुन उवाच ।
परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान् ।
पुरुषं शाश्वतं दिव्यमादिदेवमंजं विभुम् ॥१२॥

-
दशमः १०.] सान्वय-अमृततरंगिणी भाण्टी । (१११)
हस्त्वामृषयः सर्वे देवर्षिनारदस्तथों।
अँसितो देवेलोव्यासःस्वयं चैवै ब्रवीषि मे ॥१३॥
ऐसे श्रीकृष्णजीके वाक्य सुनके अर्जुन बोले-कि, आप पर-
ब्रह्म हो, श्रेष्ठ प्रभाव हो, पवित्र हो, परम सर्व ऋषिजन ऑपको
अविनाशी दिव्य पुरुष आदिदेव अंजन्म व्यापक ऐसे कहते हैं,
वे ये जैसे कि, देवऋषि नारद तथा अॅसित देवले व्यास और
औप भी मुँझसे कहते हो ॥ १२ ॥ १३ ॥
सर्वमेततं मन्ये यन्मों वेदसि केशव।
नै हिते" भगवन् व्यक्तिं विदुर्देवों नैदानवाः॥१४॥
हे केशवं । जो मेरेसे कहते हो यह सर्व सत्यं मानता
कारेण कि, हे भगवन ! तुम्हौरी उत्पत्तिको ने देवर्ती जानते है
ने दानव जानते हैं ॥ १४ ॥
स्वयमेवात्मनात्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम ।
भूतभावन भूतेश देवदेवं जगत्पते ॥ १५॥
हे पुरुषोत्तम ! हे भूतभावन ! हे भूतेश ! हे देवदेवें । हे जगे-
त्पते आप आपको आपकीही बुद्धिसे आपही जानते हो ॥१५॥
वक्तुमर्हस्यशेषेणे दिव्या ह्यात्मविभूतयः।
याभिविभूतिभिौंकोनिमांस्त्वं व्याप्य तिष्ठसि१६
जो दिव्यं आपकी विभूति हैं उनको समग्रतासे कहनेको योग्य
हो जिन विभूतियोंकरके ईन लोकोंमें व्यापक रहे हो ॥ १६ ॥
कथं विद्यामहं योगी खां सर्दा परिचिन्तयन् ।
केंधु केषु च भावेषु चिन्त्योऽसि भगवन्मयो॥१७॥

-- (१२) भगवद्गीता। [अध्यायः- में भक्तिसमाधिस्थ हुआ आपको सर्दा ध्याता हुओं कैसे जानूं, हे भगवन् ! आप सुंझकरके कौन कौनसे सैंपोंमें ध्याने- योग्य हो ॥ १७॥ विस्तरेणात्मनो योग विभूति , जनार्दन । भूयः कथंय तृप्तिर्हि शृण्वतो नास्ति मेंऽमृतम् १८ हे जनार्दन । अपनी प्राप्तिका उपाय और विभूति याने वैभव है सो विस्तारसे फिर कहो याने,संक्षेपसे कहा, अब विस्तारसे कहो, क्योंकि, इस अमृतरूप माहात्म्यको सुनते सुनते मेरी" प्ति नहीं होती है ॥ १८॥ श्रीभगवानुवाच । हंत ते कथयिष्यामि दिव्या यात्मविभूतयः। प्राधान्यतः कुरुश्रेष्ठ नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे१९॥ ऐसे सुनके भगवान् बोले-कि, हंत याने हे अर्जुन ! तुम्हारेसे दिव्य अपनी विभूतियोंको प्रधानतासे याने मुख्य मुख्य कहूँगा क्योंकि, हे कुरुश्रेष्ठ | मेरे विस्तारको अन्त नहीं ॥ १९ ॥ अहेमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः। अहंमादिश्च मध्यं च भूतानामत एव च ॥ २० ॥ हे गुडाकेशा सर्व भूतोंके अंतःकरणमें स्थित हुआ में सर्व - तोंका अंतर्यामी हूँ और में ही आदि और मध्य और अंतभी हूँ अब यहांसे मैं मैं कहते जायेंगे. यहां ऐसा अर्थ करना कि, जैसे आदित्योंमें विष्णु नाम आदित्य में हूं ऐसे कहनेसे यह हुआ कि, विष्णु आदित्य मेरी श्रेष्ठ विभूति है, याने उसमें मेरी शक्ति ज्यादा है. ऐसा ही जहां मैं ही हूँ शब्द आवै तहां समझना. विशेष गीतावाक्यार्थबोधिनी टीकामें मैंने लिखा है, वहां श्रुतिस्मृति ‘योंका भी प्रमाण दिया है सो देख लेना ॥२०॥ ܘܢܝܺ ॥ इसमी सान्वय-अमृततरङ्गिणी भा०टी०। (११३) आदित्यानामहं विष्णुंज्योतिषां रविरंशुमान् मरीचिर्मसंतामस्मि नक्षत्राणामहं शशी ॥२१॥ द्वादश आदित्योंमें विष्णुनाम आदित्य में है, ज्योतियों में किरणवत सूर्य उनचास मरुतोंमें भरीचि मरुत्, नक्षत्रोंमें चंद्रमा ॥२१॥ वेदानां सामवेदोऽस्मि देवानामस्मिं वासवः । इंद्रियाणां मनश्चास्मि भूतानामस्मैि चेतनों ॥२२॥ वेदोंमें सामवेद हूँ देवोंमें इंद्र हूँ और इंद्रियोंमें मैन हूँ मतप्राणियोंमें चेतना हूं ॥ २२ ॥ रुद्राणां शंकरश्चास्मि वित्तेशो यक्षरक्षसाम् । बसूना पावकश्वास्मैि मेरुः शिखरिणामहम् ॥२३॥ रुमि शंकर है, यक्षराक्षसोंमें कुबेर, अष्टवसुओंमें अंनि, शिखरवालों में मेरुपर्वत मैं" हूँ ॥ २३ ॥ पुरोधसां च मुख्यं मां विद्धि पार्थ बृहस्पतिम् । । सेनानीनामहं स्कँदः सेरसामस्मि सागरः ॥२४॥ कारण हे पृथापुत्र । पुरोहितीमें मुख्य बृहस्पैति मुझको ही जानो सेनापतियोंमें स्वामिकार्तिक, सरोवरोंम समुद्र में ही हूँ २४॥ महषीणां भृगुरहं गिरामसम्येकॅमक्षरम् । यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मैि स्थावराणां हिमालयः॥२५॥ महर्षियोंमें भृगु, वाक्योंमें एक अक्षर याने "ओम्":"मैं हूँ पनामें जपयज्ञ, स्थावरोंमें हिमाचल हूं ॥ २५ ॥ अश्वत्थः सर्ववृक्षाणां देवर्षीणां चे नारदः । । गंधर्वाणां चित्ररथः सिद्धानां कपिलो मुनिः॥२६॥ PRIOR

-
(११४) भगवद्गीता। [अध्याय:-
सर्ववृक्षोंमें पीपैर और देवऋषियोंमें नारंद, गंधवों में चित्ररथ,
सिंधोंमें कपिलमुनि हूं ॥ २६ ॥
उच्चैःश्रवसमश्वानों विद्धिं माममृतोद्भवम् ।
ऐरोवतं गजेन्द्राणां नराणां च नराधिपम् ॥२७॥
घोडोंमें अमृतसे उत्पन्न उच्चैःश्रवाको, हॉथियोंमें ऐरावतको
और मनुष्योंमें राजा मुझे ही जॉनो ॥ २७ ॥
आयुधानामहं वज्रं धेनूंनामस्मि कॉमधुक् ।
पंजनश्वास्मि कंदर्पः संपणामस्मैि वासुकिः ॥२८॥
आयुधोंमें वैज्र, धेनुओंमें कामधेनु मैं हूँ, उत्पत्तिकारक
कामदेव हूँ, एकशिवाले सोंमें वासुकिसर्प मैं हूँ" ॥ २८ ॥
अनंतश्चास्मि नांगानां वरुणो योदसोमहम् ।
पितॄणामयाँ चास्मैि यमः संयमतामहम् ॥२९॥
अनेक शिरवाले सपोंमें शेषजी मैं हूँ, जलजीवोंमें में वरुण
हूँ पितरोंमें अर्यमां, शासन करनेवालोंमें मैं" यम हूँ ॥२९॥
प्रेहादश्चास्मि दैत्यांनां कालः कॅलयतामहम् ।
मुंगाणां च मृगेंद्रोऽहं वैनतेयश्च पंक्षिणाम् ॥३०॥
दैत्योंमें प्रवाद हूँ अनर्थकारकोंकी गिनतीकारकोंमें में काल
हूँ, मृगोंमें मैं सिंह हूँ पक्षियोंमें गरुड हूँ ॥३०॥
पवनः पवतामस्मि रोमः शस्त्रभृतामहम्।
अषाणां मकरश्चास्मि स्रोतसामस्मैि जाह्नवी॥३१॥
पवित्रकारकोंमें पवन हूँ, शस्त्रर्धारियोंमें रोम साक्षात् में
हूँ यहां अवधारणमात्र विभूति है, मच्छोंमें मकर हूँ; प्रवाहवा-
लोंमें श्रीभागीरथी हूँ ॥ ३१ ॥
सर्गाणामांदिरन्तश्चं मध्यं चैवाहमर्जुन।
अध्यात्मविद्या विद्यानां वादः प्रवदतामहम् ॥३२॥

-- दशमः१०.] सान्वय-अमृततरङ्गिणी भा. टी.। (११५) सर्ग जो ब्रह्माके दिवस उनमें आदि उत्पत्तिकारक, अंत प्रलय- कारक और मध्य रक्षक भी मैं ही हूँ। हे अर्जुनं । सर्वविद्या- ओंमें अध्यात्मविद्या, वाद करनेवालोंमें वाद याने सिद्धांत में ॥ ३२ ॥ अक्षराणामकारोऽस्मि इंडः सार्मासिकस्य च । अहमेवाक्षयः कालो धाताह"विश्वतोमुखः ३३॥ अक्षरोंमें अकार हूँ, समासोंमें इंद्रसैमास, अक्षय काल में चौ- तरफ मुखे जिसके ऐसा संबोंको भरनेपोषनेवाला में हूँ॥३३॥ मृत्युः सर्वहरेश्चाहेमदेवश्च भविष्यताम् । कीर्तिःश्रीचिनारीणां स्मृतिमेधा धृतिः क्षमा३४ सर्वको हरनेवाला मृत्यु मैं और अपनी बढ़ती चाहनेवालोंमें उइवे याने बढती में हूँ स्त्रीजनोंमें कीर्ति, श्री, वा, स्मृति मेधी, धृति और क्षमा मैं हूँ ॥ ३४ ॥ बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छैदसामहम् । माँसानां मार्गशीर्षोऽहमृतूंनां कुसुमाकरः ॥३५॥ तैसें सामवेदक मंत्रोंमें बृहत्सांम, छंदोंमें गायत्रीमंत्र में महीनों में मार्गशीर्ष, ऋतुओंमें वैसंत मैं हूँ" ॥ ३५ ॥ पेतं छलयंतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम् । जयोस्मिं व्यवसायोस्मैि सत्त्वं सत्त्ववैतामहस३६ छलकारियोंमें जूवा और तेजस्वियोंमें तेज मैं हूँ जीतनेवालों में जय हूँ, निश्चयवालोंमें निश्चय हूँ”, उदौरोंमें उदारती में "(३६ वृष्णीनां वासदेवोऽस्मि पांडवानां धनंजयः । मुनीनामप्यह व्यासः केवीनार्मेशनाः कविः॥३७॥ वृष्णिवंशियोंमें वासुदेव यहां वसुदेवपुत्रत्वमात्र विभूति जानना पांडवोंमें अर्जुन तुम हो, सो श्रेष्ठ विभूति हो. इससे तुम [ अध्यायः- । (११६:). भगवद्गीता। भी मैं हूँ, मुनियोंमें व्यास मैं हूँ, कवि जो शास्त्रदशी उनमें शुक्राचार्य कवि मैं हूँ ॥ ३७॥ दंडो दमयंतामस्मि नीतिरस्मि जिगीषताम् । मौनं चैवास्मिं गुह्यांनां ज्ञानज्ञानवंतामहम् ॥३८॥ स्ववशकर्ताओंमें दंड हूँ', जय चाहनेवालोंमें नीति हूँ' गुप्त- करनेके उपायोंमें मौन हूँ, ज्ञानियोंमें" ज्ञान हूँ ॥३८॥ - यच्चापि सर्वभूतानां बीजं वेदहमर्जुन। नेतदस्तैि विना यत्स्योन्मयों भेतं चराचरम्॥३९॥ ...हे अर्जुन ! सर्वभूतोंका जो आदिकारण है सो में हूँ, जी चराचर भूते "मेरे विनी होय सो नहीं हैं ॥ ३९ ॥ नांतोऽस्तिं ममं दिव्यानां विभूतीनां परंत। एषे तूद्देशैतः प्रोक्तो विभतेर्विस्तरो मया ॥ ४० ॥ हे अर्जुन ! मेरी दिव्य विभूतियोंका अंत नहीं हैं परंतु यह विभूतिका विस्तार मैंने संकेतमात्रसे कहाँ है ॥ ४० ॥ यद्यहिभतिमत्सत्त्वं श्रीमदृर्जितमेव वो। तंत्तदेवावगच्छे वं मम तेजोऽशंसेम्भवम् ॥४१॥ जो जो प्राणी ऐश्वर्यवान्, शोभायमान अथवा बड़ा हो सो सो मेरे तेजके अंशयुक्त है ऐसे तुम जानो ॥१३॥ अथवा बेहुनैतेन किं ज्ञातेन वार्जुन विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जैगत्४२॥ इति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योग शास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंबादे विभूतियोगो... नाम दशमोऽध्यायः ॥१०॥...... .

एका सान्वय-अमृततरंगिणी भाल्टी०। (११७.) के अर्जुनाअथवा इस बहुत ज्ञानकरके तुम्हारे क्या प्रयोजन है दिइसे सर्व जगतको एक अंशकरके धारण किये हुए स्थित९४२ इति श्रीमत्सुकुलसीतारामात्मजपंडितरघुनाथप्रसादविरचितायां श्रीगीतामृततरंगिण्यां दशमाध्यायप्रवाहः ॥ १० ॥ अर्जुन उवाच। मदनग्रहाय परमं गुह्यमध्यात्मसंज्ञितम् । भव्यत्त्वयोक्तं वचस्तेने 'मोहोऽयं विगतो मम ॥१॥ जब भगवान्ने अपनी विभूति कही और उसमें अपने स्व- रूपका वर्णन किया तब सुनके अर्जुन देखनेकी इच्छा करकें बोले कि हे मगवन् ! मेरे अनुग्रहके वास्ते सर्वोत्तम गोप्य अात्म- संज्ञित याने आत्मज्ञानविषयक जो वर्चन आपने कहा, उससे मेरा येह मोह गयाः॥ १॥ अवाप्ययो हिं भूतानां श्रुतौ विस्तरशो मया । मित्वतः कमलपत्राक्षे माहात्म्यमपि चाव्ययम् ॥२॥ कारण कि ये कमलदलनयन ! भूतप्राणियोंके उत्पत्ति, औपसे मैंने विस्तारपूर्वक सुने और आपका: अक्षय माहात्म्य भी सुना ॥२॥ एवमेतद्यथात्थे त्वमात्मानं परमेश्वर। 1 द्रष्टुमिच्छामि ते रुपमैश्वरं पुरुषोत्तमः॥३॥ महि परमेश्वर तुम अपने आपको जैसे कहते हो यह ऐसा ही हापुरुषोत्तम । तुम्हारे ज्ञान शक्ति बला ऐश्वर्य, वीर्य तेज न छ ऐश्वर्ययुक्त रूपको देखनेको मैं चाहता हूं॥३॥ri उन्यसे यदि तच्छेक्यं मया द्रष्टुमिति प्रभो। गंगेवर ततो मे विदेशयात्मानमव्ययम् ॥४॥.

। . - . ne - (११८) भगवद्गीता। [अध्याय:- हे प्रभो ! जो वह रूप मुझर्केरके देखनेको योग्य है ऐसा मानते हो हे योगेश्वर । तो तुम अविनाशी अपने रुपको मुझको दिखाओ ॥ ४॥ श्रीभगवानुवाच । पश्य में पार्थ रूपाणि शतशोऽथ सहस्रशः। नानाविधानि दिव्यानि नानांवर्णाकृतीनि चा५॥ एसे वचन सुनके भगवान बोले-कि. हे पृथापुत्रासकंडों फिरे इंजीरों अनेक प्रकारके दिव्य और अनेक वर्ण आकारके मेरे पोंको "देखो ॥५॥ पश्यादित्यान वसुने रुद्रांनश्विनौ मरुतस्तथा। बहून्यदृष्टपूर्वाणि पैश्याश्चर्याणि भारत ॥६॥ इहकस्थं जगत्कृत्स्नं पयाये स.राचरम् । ममं देहे गुडाकेश यचौन्यद्रष्टुमिच्छसि ॥७॥ हे भारत । मेरी देहेमें द्वादर्श सूर्य अष्ट वसु११ रुद्र अश्विनी- २०४९ मरुत् देखो तथा जो प्रथम न देखे ऐसे बहुत आश्चर्य देखो हे गुडाकेश ! इसे मेरे देहमें संचराचर सेंब जगत् एक ही ठिकाने ईंकडे आजै देखो और जो और भी देखनेको चाहते हो उसे भी देखो॥६॥७॥ नं तुं मां शक्य॑से ट्रैष्टुमनेनैवं स्वचक्षुषा । दिव्यं ददामितें चक्षः पश्य में योगैमेश्वरम् ॥८॥ इसे अपनी दृष्टिकरके मुझको देखनेकी ने समर्थ होगे इससे तुमको दिव्ये नेत्र देता हूँ तिस करके मेरे ईश्वरसंबंधी-योगको देखो"॥८॥ संजय उवाच । . ऐवमुक्तां ततो रोजन्महायोगेश्वरो हरिः। .

TTER एका सान्वय-अमृततरंगिणी भाल्टी।। (११९) दर्शयामास पार्थाय परंमं रूपमैश्वरम् ॥ ९॥ : संजय धृतराष्ट्रसे कहते भये-कि हे राजन् ! महायोगेश्वर प्रकरण ऐसे केहके फिर सर्वोत्तम ईश्वरसंबंधी रूप अर्जुनको देखात भये ॥ ९॥ अनेकवस्त्रनयनमनेकाद्धदर्शनम् । अनेकदिव्याभरणं दिव्यानेकोर्येतायुधम् ॥ १९ ॥ जिस रूप में अनेक मुख और नेत्र हैं और अनेक अद्भुत दर्शन हे अनेक दिव्य आभूषणयुक्त हैं और दिव्य अनेक उठाये आय, जिसने ॥१०॥ दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगंधानुलेपनम् । सर्वाश्चर्यमय देवमनंत विश्वतोमुखम् ॥ ११॥ दिव्यं माली और वस्त्र धारण किये हैं दिव्य चंदनादि गंधका: लेपन किया है सर्व आश्चर्यमय प्रकाशमान अंतरहित और सब रिजिनमो मुख है ऐसा रूप अर्जुनको दिखाते भये ॥ १३ ॥ दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेयुगदुत्थिता । यदिभी सदेशी साँस्यौदासस्तस्य महोत्मनः॥१२॥ जो आकर्शिमें हजारों सूर्योको एक समयमें उत्पन्न भयाः आ तेज हो. सो तेंज उन महात्मा भगवान्के तेज समानाही तंत्रस्थं जगत्कृस्नं प्रविभक्तमनेकधा। अपश्यदेवदेवस्य शेरीरे पांडवस्तदा ॥ १३ ॥ उस दिवोंके भी प्रकाशक श्रीकृष्णके शरीरमें उस समयमें मानक प्रकारका न्याराः न्यारा एकही ठिकाने इकट्ठा ऐसे सर्व गितको अर्जुन देखते भये ॥३३॥ HT (१२०) भगवद्गीता। [ अध्याय:- ततः से विस्मयाविष्टो हृष्टरोमो धनंजयः। प्रणम्य शिरसा देवं कृतांजलिरमौषत ॥१४॥ तब विस्मय करके व्याप्त रोमांचंयुक्त वह अर्जुन कृष्णको मस्तकसे प्रणाम करके हाथ जोडे हुए बोले" ॥१४॥ अर्जुन उवाच। पश्यामि देवास्तव देवं देहे सर्वांस्तथा भूतवि- शेषसंघान्॥ ब्रह्माणमीशं कमलासनेस्थमृषींचे सर्वानुरगौच दिव्यान् ॥ १५॥ अर्जुन कहते हैं-कि, हे देवं । तुम्हारे शरीरमें देवोंकी तथा सर्व भूत प्राणियोंके समूहोंको तथा ब्रह्माको और कमलासन जो ब्रह्मा उनमें स्थित जो ईश्वर याने आप ही उनको और सर्व ऋषियोंको और दिव्य सौको देखता हूँ॥ १५॥ अनेकाहूदरवक्त्रनेत्रं पश्यामि त्वां सर्वतोऽनंत- रूपम् ॥ नोन्त नै मध्यं न पुर्नस्तवादिं पश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूपं ॥१६॥ हे विश्वेश्वर । हे विश्वरूप ! तुमको सर्व ओरसे अनेके भुजा उदर मुख और नेत्रवाले अनंतरूप देखता हूँ तुम्हारा ने अन्त मध्ये नै फिर आदि देखता हूं ॥१६॥ किरीटिनं गैदिन चक्रिणं च तेजोराशिं सर्वतो दीप्तिमंतम् ॥ पश्यामि त्वां दुर्निरीक्ष्यं समंता- हीप्तानलार्कयुतिमप्रमेयम् ॥ १७॥ तुमको किरीटवाने गदावाने चक्रवाने और तेजकी राशि सवे ओरसे प्रकाशैमान सर्व ओरसे दुनिरीक्ष्य प्रदीप्त अनि और सूर्यो- की कांतिसरीखी कांतिमान् और अपरिमितरूप देखता हूं॥१७॥ ।

N
एका० ११.] सान्वय-अमृततरंगिणी भाण्टी। (१२१)
खमक्षरं परम वेदितव्यं खेमस्य विश्वस्य पर
निर्धानम् ॥ वैमव्ययः शास्वतधर्मगोप्ता सनी:
तनस्त्वं पुरुषो मतो में ॥ १८॥
मुमुक्षु-जनोंकरके जानने योग्ये सर्वोत्तम विष्णु आप हो इस
विवके श्रेष्ठं आधार आप हो सनातनधर्मके रक्षक अविनाशी
आप हो सनातन पुरुष आप हो यह मैंने जाना है ॥ १८ ॥
अनादिमध्यांतर्मनंतवीर्यमनंतबाहुं शर्शिसूर्यने-
त्रम् ॥ पश्यामि त्वा दीप्तहुतांशवक्त्रं स्वतेजसा
विश्वमिदं तपेन्तम् ॥ १९॥
नहीं है आदि,मध्य और अंत जिनके अनंत हैं पराक्रम जिनके
अनंत हैं भुजा जिनके चंद्र सूर्य नेत्र हैं जिनके प्रदीप्त हैं अग्निस-
दश मुख जिनके जो आपके तेजकरके इस विश्वको तपार्यमाने
कर रहे हों ऐसे तुमको देखता हूँ ॥ १९ ॥
द्यावापृथिव्योरिदमंतरं हि व्याप्तं त्वयैकेन दिशश्च
सेर्वाः ॥ दृष्ट्वाऽद्भुत रूपमुं तवेर्दै लोकेंचयं प्रैव्य-
थितं महात्मन् ॥ २०॥
है महाशरीर । यावापृथिवीका यह अंतर याने इस ब्रह्मांडका
पोल आप एक करके व्याप्त हैं और सर्व दिशा व्याप्त हैं अर्थाद
उचाई करके ब्रह्मांड पोल और चौड़ाई करके सर्व दिशा पूर गयी
हैं ऐसे ऑपके इस अद्भुत उग्र रूपको देखके तीनों लोके याने
तीनों लोकोंके वासी देव मनुष्यादिक व्याकुल हैं ॥ २० ॥
अंमी हि त्वौं सुरसंघा विशंति केचिदीतोःप्राञ्ज-
लयो गणति स्वस्तीत्युक्त्ती महर्षिसिद्धसंघाः
स्तुवंति वा स्तुतिभिः पुष्कलाभिः ॥ २१ ॥

(१२२) भगवद्गीता। [अध्यायः ये देवताओंके समूह आपके समीप प्राप्त हुए हैं कितनेके भय- भीत हाथ जोरे हुएँ तुम्हारे गुण नाम उच्चारण करते हैं महर्षि और सिद्धोंके समूह स्वस्ति ऐसे"कह के अनेक प्रकारकी स्तुतियों करके तुम्हारी स्तुति करते हैं ॥२१॥ रुद्रादित्या वसवो ये चे सांध्या विश्वेऽश्विनौ : मरुतश्चोष्मंपाश्चै ॥ गंधर्वयक्षासुरसिद्धसंघों "वीक्षते त्वों विस्मिताश्चैव सर्वे ॥२२॥ एकादश रुद्र द्वादश आदित्य अष्टं वसु और जो साध्य नामक उपदेव तेरह विश्वेदेव, दो अश्विनीकुमार, उंचार्श मरुद और पितर और" गंधर्व यक्ष देवता और सिद्ध इनके सैमूह ये सैर्व विस्मित हुए तुमको देख रहे हैं ॥ २२ ॥ रूपं महत्ते बहुवक्त्रनेत्रं महाबाहो बहुबाहरुपादम्। बहूदरं बहुदंष्ट्राकरांलं दृष्ट लोकाः प्रैव्यथिता- स्तैथाहैम् ॥ २३॥ हे महाबाहो । बहुत हैं मुख और नेत्र जिसमें, बहुत हैं भुज जांघ और चरण जिसमें बहुत हैं उदर जिसमें बहुत दाढों करके विकराल ऐसे तुम्हारे महत् रूपको देखके लोक व्याकुल में तेसेही" मैं भी व्याकुल हूं ॥ २३ ॥ नभःस्पृशं दीप्तमनेकवर्ण व्यत्तिाननं दीप्तविशा- लनेत्रम्॥दृष्ट्या हि त्वा पंव्यथितान्तरात्मा धृति नै विन्दामि शमं चै विष्णो॥२४॥दंष्ट्रींकरालानि चैते" मुंखानिदृष्ट्वैव कालानलसन्निभानि॥दिशो ने जाने नैं लेंभे चै शैर्म प्रेसीद देवेश जर्गन्निवास ॥२५॥अमी चैत्वी (दृष्ट्या दिशो नै जनिति शमंने ।

• ११.] सान्वय-अमृततरंगिणी भाण्टी । (१२३) लभते इति पूर्वेण पंचविंशतितमेन पद्येनान्वयः) धृतराष्ट्रस्य पुत्राः सर्वे सहैवावनिपालसंधैः।भीष्मो द्रोणः सूतपुत्रस्तथाऽसौ सहास्मदीयैरपि योध- मुख्यैः ॥ २६ ॥ वैवाणि ते स्वरमाणौ विशति दंष्ट्रींकरालानि भैयानकानि ॥ "कैचिबिलग्ना दशनांतरेधू संदृश्यन्ते चूर्णितेरेत्तमाङ्गः ॥२७॥ हे विष्णो ! नभ जो प्रकृतिसे परे परम आकाश वैकुंठ तहां पर्यंत हे स्पर्श जिनका जो प्रकाशमान अनेक वर्णयुक्तरूप तथा मुखे फैलाये प्रदीप्तं और विशाल नेत्र ऐसे आपको देखके जिससे कि, व्याकुलचित्त होकर धीरजैको और शांतिको नहीं प्राप्त होता हूं और डाँटें हैं कराल जिनमें और कालानलके तुल्य हैं ऐसे तुम्हारे मुंखोंको देखके ही दिशाओंको नहीं जानता हूं और सुखको भी नहीं प्राप्त होता हूं और राजाओंके समूहों करके सहित ये सब धृतराष्ट्रके पुत्र तथा भीष्म द्रोणे यह कर्ण और हैमारे योद्धाओंमें मुख्य जो हैं उनकरके सहित तुमको देखके दिशाओंको नहीं जानते हैं और सुखको नहीं प्राप्त होते हैं "ऐसे प्रथमके पच्चीसवें श्लोककरके अन्वय है")ये सब अतिवेगको प्राप्त हुये डीटें हैं कराल जिनमें ऐसे भयानक औपके मुंखोंमें प्रवेश करते हैं कितनेक त्रुणित होकर मस्तकोंकरके सहित तुम्हारे दांतोंकी संधियोंमें पटके हुए दीखते हैं इससे हेदेवेश हे जगन्नि- वास ! आप कृपौ करो याने हम सब डरते हैं इससे आप प्रथम सरीखे सौम्यरूपको धारण करो ॥ २४ ॥ २५ ॥२६॥२७॥ यथा नदीनां बहवोऽम्ववेगाः समद्रमेवाभिमखा द्रवंति। तथा तैवामी नरलोकवीरा विशन्तिवत्रा- ण्यमितो ज्वलन्ति ॥२८॥ - न (: १२४): ' , " भगवद्गीता। [ अध्याय:- जैसे नैदियों के बहुतसे पानीके वेग समुद्रकेही संमुख धावते हैं वैसे ये नैरलोकवीर तुम्हारे प्रज्वलित मुंखोंमें प्रवेश करते हैं२८॥ यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतंगा विशन्ति नाशाय समृद्धवेगाः॥तथैव नाशाय विशन्ति लोकास्त- वीपि वाणि समृडवेगाः॥२९॥ जैसे' अतिवेगवंते पतंगे अपने ही नाशके वास्ते प्रदीप्ते अग्निमें प्रवेश करते हैं तैसें ही अतिवेगवंते ये लोग भी अपने विनाशके वास्ते तुम्हारे मुँखोंमें प्रवेश करते हैं ॥२९॥ लेलिसे समानः संमंताल्लोकान्समग्रान्वदेने- ज्वलंद्भिः॥ तेजोभिरीपूर्य जगत्समैग्रं मौसस्त- वोनी:प्रेतपति विष्णों ॥३०॥ हे विष्णो । प्रज्वलित अपने मुखोंकरके सर्व लोगोंको सब ओरसे घेरते हुए चाटे जाते ( खाये जाते ) हो तुम्हारे उभे प्रकाश सेंब जगत्को अपने तेजैसे परिपूरित करके तप रहे हैं३॥ आख्याहि में कोभवानुग्ररूपो नमोऽस्तु ते देव- वर प्रैसीद ॥ विज्ञातुमिच्छामि-भवतैमाद्यं ने हि प्रजानामि तव प्रवेत्तिम् ॥ ३१ ॥ हे देववर ! ऐसे उग्ररूप आप कौन हो सो मुझसे कहो,क्योंकि तुम्हारी प्रवृत्तिको मैं नहीं जानता हूँ जो आप आदि हो उनको जाननेकी इच्छा करता हूं. आप कृपा करो आपको नम-. स्कार हो॥३३॥ श्रीभगवानुवाच । कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धोलोकॉन्समाहर्तृ- मिह प्रवृत्त । तेऽपि त्वों ने भविष्यति सर्वे येऽवस्थिताः प्रत्येनीकेषु योधाः ॥ ३२ ॥ .

..
एका. ११.] सान्वय-अमृततरंगिणी भाल्टी०। (१२५)
ऐसे सुनके श्रीकृष्ण भगवान् बोले--कि,मैं इन लोगोंके क्षय-
के वास्ते बढ़ा हुआ कॉल हूं यहां इन लोगोंकों संहार करनेके
लिये प्रवृत्त हुआ हूं जो ये यो( तुम्हारी शसेनाओंमें, खंडे
है ये सेब तुम्हारे विना निश्चयपूर्वक न रहेंगे ॥ ३२ ॥
तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व जित्वा शत्रून् भुवं
रोज्यं समृद्धम् ॥ मयवते निहताः पूर्वमेव निमित्त-
मात्र भैव सव्यसाचिन् ॥ ३३ ॥
हे सव्यसाचिन् हे अर्जुनै जिससे कि ये मेरेहींगे इससे तुम उठो
यर्श लो शत्रुओंको जीतकर समृद्ध राज्यको भोगो" प्रथम ही
सबै मैंने" मार रखे हैं तुम तो निमित्तमात्र होओ" ॥ ३३ ॥
द्रोणंच भीष्मं च जयद्रथं च कर्ण ताऽन्यानपि
योधंवीरान् ॥ मया हतास्त्वं जैहि मी व्यथिष्ठा
युध्यस्व जेतासि रैणे संपत्नान् ॥ ३४॥
द्रोण और भीष्म और जयद्रथ और कर्ण तथा और भी शूर
वीर मेरे मारे हुए इनको तुम मारो मैंत दुःखित होओ" रणमें
शत्रुओंको जीतोंगे युद्ध करो ॥ ३४ ॥
संजय उवाच ।
एतच्छुत्वा वर्चेनं केशवस्य कृतांजलि।पमानः कि
रीटी। नमस्कृत्वा भूर्य एवाह कृष्णं संगद्दं भीत-
भीतः प्रणम्य ॥ ३५॥
संजय धृतराष्ट्रसे कहते हैं-कि, किरीटी जो अर्जुन वह श्रीकृ-
ष्णके इतने वचन सुनके कांपते कॉर्पत हाथ जोड़े हुए नम-
स्कार करके फिर भी भयभीत हो प्रणाम करके गद्गदकंठयुक्त
श्रीकृष्णसे बोले ॥ ३५॥

A (१२६) : :: :: भगवद्गीता । [अध्यायः- अर्जुन उवाच । "स्थाने हृषीकेश तवे प्रकीा जगत्प्रहृष्यत्यनुर- ज्यते च ॥ रक्षांसि भीतानि "दिशो ट्रैवंति सवें नैमस्यंति च सिद्धसंघाः ॥ ३६॥ अर्जुन. कहते हैं-कि, हे हृषीकेश-। तुम्हारी उत्तम. कीर्तिकरके जर्गेन आनंदित होता है और आपसे प्रीति करता है, राशंस भयको प्राप्त होकर सेंब दिशाओंको भागते हैं और सेब सिद्धर्स- सूह नमस्कार करते हैं सो यह योग्य ही है ॥३६॥ कस्माच्च ते नं नमेरन महात्मन् गरीयसे ब्रह्मणो- ऽप्यादिक। ॥ अनंत देवेश जैगन्निवास बैंमक्षरं सैंदसैतत्परं यत् ॥३७॥ हे महात्मन् । ब्रह्मासे भी बडे आदिकर्ती जो आप ऐसे ओ- पको वे क्यों नं नमन करें अर्थात् करें ही गे । हे अनेन्त । हे देवे- शै! हे जैगन्निवास । जो अक्षर याने जीवतत्त्व सत् जो कार्य स्थूलप्रकृति असत् जो सूक्ष्मप्रकृति कारण तत्पर जो शुद्ध औत्मा सो सब आप हो अर्थात् सबके अंतर्यामी हो ॥ ३७ ॥ त्वमादिदेवः पुरुः पुराणस्त्वंमस्य विश्वस्यं परं नि- धानम् ॥ वेत्तासि वेद्य चे पैर च धीम त्वया तैतं विश्वमनन्तरूप ॥ ३८॥ आप आदिदेव पुराण पुरुष हो तुम इस विश्वके परम आधार हो इसके जाननेवाले और जानने योग्य और इसके सर्वोत्तम वास- स्थान हो" हे अनंतप। यह विधं तुमसे व्याप्त है ॥ ३८॥ वायुर्यमोऽग्निवरुणः शशांकः पितामहस्त्वं प्रपि- -

एका०.११. सान्वय-अमृततरंगिणी भाल्टी। ( १२७)
तामहश्च ॥ नमो नमस्तेऽस्तु सहसकृत्वः ऍन-
श्व भूयोपि नमो नमस्ते ॥ ३९ ॥
पवन अग्नि यम वरुण चंद्र पितामह और प्रपितामह तुम
हो इससे तुमको हजारों वार नमोनमः हो फिर और फिर भी
तुमको वारंवार नमस्कार है ॥ ३९ ॥
नमः पुरस्तादर्थ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत
एव सर्व ॥अनंतवीर्यामितविक्रमस्व सर्व सैंमा-
नोषि ततोऽसि सर्वः ॥ ४०॥
हे सर्व । तुमको अगाड़ी और पिछाड़ीसे नमस्कार और
तुमको सब ओरसे भी. नमस्कार हो । हे अनन्तवीर्य । आप
अनंत बल और अमित परीक्रम तुम सबमें व्यापक हो ईसीसे
तुम सर्वरूप हो ॥१०॥
सखेति मत्वा प्रसँभ यदुक्तं हे कृष्ण हे यादव हैं
सैखेति ॥अजानेता महिमानं तवेदं मया प्रमादा-
प्रणयेने वाऽपि ॥४१॥यँच्चीवहाँसार्थमसँस्कृतो
ऽसि विहारशय्यासनभोजनेषु॥एकोऽथाऽप्यच्युत
तत्समक्षं तैरक्षामये त्वामहमप्रमेयम् ॥ ४२ ॥
हे अच्युत ! तुम्हारी महिमांको और इस विश्वरूपको न जान-
नेवाला जो मैं उसे मैंने प्रमादसे अथवा प्रेणयसे भी सैखा
ऐसे मानके हे कृष्ण । हे योदव ! हे सैखे ! ऐसे हठेसे जो"
कहा" हो और क्रीडा शयन आसन तथा भोजनकालमें
अकेली अथवा और उन सखाओंके ससुख हँसीके वास्ते जो"
आपका अपमान किया हो सो परिमितिरहित जो आप उन
आपसे में क्षमा कराता हूं ॥४१॥ १२ ॥

(१२८) भगवद्गीता। [अध्यायः-
पितासि लोकस्य चराचरस्य त्वमस्य पूज्यश्चं
गुरुगरीयांनाने त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुतोऽ
न्योलोकत्रयेऽप्यप्रेतिमप्रभाव ॥४३॥ तस्मात्प्र-
णग्य प्रैणिधाय कायं प्रसादये सानहमीशमी-
डम् ॥ पितेव पुत्रस्य संखेव संख्युः प्रियः
प्रियायार्हसि देवें सोढुंम् ॥ ४४ ॥
हे सर्वोत्तमप्रभाव ! आप इस चराचर लोकके पिता हो और
सब गुरुओंसे बडे गुरुहो. इसीसे पूज्य हो तीनों लोकमें भी आपके
सैमान और नहीं हैं तो कहांसे और अधिक होगा. इसँसे मैं"
शरीरको पृथिवीपर धारण किये हुए प्रणाम करके ईश्वर अतः
स्तुति करनेयोग्य आपको प्रसन्न करता हूं, हे देवें । जैसे पुत्रके
प्रियके वास्ते पिती, संखाके प्रियके वास्ते सैखा ऐसे मेरे प्रिय
आप हो सो मेरे प्यार के वास्ते मेरे अपराध सहनेको योग्य
हो ॥ ४३ ॥४४॥
अदृष्टपूर्व हर्षितोऽस्मि दृष्ट्वाभयेन चे प्रव्यथितं
मंनो में ॥ तदेव में" देर्शय देवे रूपं प्रेसीद
देवेश जैगन्निवास ॥४५॥
जो रूप मैंने और किसीने भी प्रथम नहीं देखा था उसको
देखकर चेकित हुआ हूं और भयंसे मेरी मन व्याकुल है, हे देवे
मुझको वही प्रथमका रूप दिखावो हे देवेश ! हे जगनिवास |
आप मुझपर प्रसन्न हो ॥ १५ ॥
किरीटिनं गदिनं चक्रंहस्तमिच्छामि त्वां द्रष्टुं-
मेहं तथैवें ॥तेनैव सैंपेण चतुर्भुजेन सहस्रबाहो
मैंव विश्वमतें ॥४६॥

एकाए-33 सान्वय-अमृततरंगिणी भाण्टी 1 ( १६९) हे सहस्रबाहो । हे विश्वमंत्तें ॥ मैं वैसा ही किरीटयुक्त गदा- युक्त वहस्त आँपको देखेना चाहता हूं इस बास्त उसी चतु- र्भुज रूपकरके युक्त होओ॥ ४६॥ श्रीभगवानुवाच मैंया प्रसन्नेन तैवार्जुनेदं रूपं पर दर्शितमा- मेयोगात ॥ तेजोमयं विश्वमनंतेमाद्यं यन्में लंदन्येन न दृष्टंपूर्वम् ॥ ४७॥ ऐसी अर्जुनकी प्रार्थना सुनके भगवान् बोले-कि, हे अर्जुन । जो तेजोमय विश्वरूपै अंतरहित सर्वका आदि तुम्हारे विना और किसीने नहीं प्रथम देखा सो यह पर रूप प्रसन्न भेने"..स्वकीय सत्यसंकल्परूप योगसे तुमको दिखाया ॥४७॥ नवेदयज्ञाध्ययनैर्न दोनैन च क्रियाभिन तपोभि- सयैः ॥ एवंरूपः शक्य अहं लोके ट्रैष्टु खेद- न्येन कुरुप्रवीर ॥ ४८॥ हे कुरुवंशियोंमें श्रेष्ठ वीर ! ऐसे बैपको मैं इस मनुष्यलोकमें तुम्हारे विना औरोंको न वेदपाठ, यज्ञ और मंत्रजपकरके, नंदाने करके और नै योगक्रियाकरके, न उ तपकरके दिखानेको योग्य हूँ ॥४८॥ मो तें व्यथा माँ चैविमूढभावो दृष्टा रूपं घोरें- मीहरूममेदम् ॥ व्यपेतभीः प्रीतमनाः पुनस्त्वं तदेव में रूपमिदै प्रेपश्य ॥ १९॥ ऐसे घोरै मेरे इस रूपको देखकर तुमको व्यथा मत हो और मोहंभाव भी मत हो, भयरहित प्रसन्नमन तुम वही यह मेरों रूपं फिर देखो"॥१९॥ -- .

(१३.). .. भगवद्गीता । - - [.अध्यायः
संजया उवांच।
इत्यर्जुनं वासुदेवस्तथोक्कों स्वकं रूप देर्शयां-
मास भूयः ॥ आश्वासयामास – भीमेन"
भूत्वा पुनः सौम्यव(महात्मा ॥५॥
संजय धृतराष्ट्रसे कहते हैं-कि, वसुदेवपुत्र कृष्ण ऐसे अर्जु-
नको कर्हेकर पूर्ववत् अपने रुपको फिर दिखाये और जो बडे
शरीरयुक्त थे सो सौम्यरूप होके" फिर भयभीत अर्जुनको
आश्वासन देने लगे ॥५०॥
अर्जुन उवाच ।
दृष्ट्वेदं मानुषं रूपं तवं सौम्यं जनार्दने ।
इदानीमैस्मि संहत्तः संचेताः प्रकृतिं गतः ॥५१॥
तब अर्जुन बोले-कि, हे जनार्दन । तुम्हारे इस सौम्यें
मानुष रूपको देखके अब सचेते हुआ अपने स्वभावको प्राप्त
हुआ सावधान हूँ॥५१॥
श्रीभगवानुवाच ।
मुटुर्दर्शमिदं रूपं दृष्टवानसि येन्ममें।
देवा अप्यस्य रूपस्य नित्यं दर्शनकांक्षिणः ॥५२॥
अर्जुनके वाक्य सुनकर श्रीकृष्ण बोले-कि, हे अर्जुन जो
अतिदुर्लभंदर्शन इस 'मेरे रूपको तुम देखे इस रूपके देवता
भी निरंतर दर्शनाभिलाषी रहा करते हैं ॥५२॥
नाहं वेदैन तपसा नै दानेने चेज्यया।
शक्य एवंविधो ट्रैष्टुं दृष्टवानसिौ यथा ॥५३॥
भक्त्या खनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन ।
ज्ञातुं ट्रैष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं चै परंतपै ॥५४॥

M .. द्वाद० १२.] सान्वय-अमृततराङ्गणी भा टी०। (१३३ ) । है अर्जुन । जैसे मुझको तुम देखते हुएं इस प्रकारका मैंने वेदोंकरके ने तपकरके नै दौनकरके और न यज्ञकरके देखने के योग्य हो सकता हूं। क्यों कि, हे परंतप । ऐसा में" अनन्य भक्तिकरके निश्चयपूर्वक जाननेको और देखनेको समीप प्राप्त होनेके भी योग्य हो सकती हूँ ॥ ५३॥ १४ ॥ 'मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः संगवर्जितः । निर्वैः सर्वभूतेषु यः से मामेति पांडव ॥५५॥ इति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे विश्वरूपदर्शनयोगो नाम एकादशोऽध्यायः॥११॥ हे पांडव । जो मनुष्य मेरे लिये लौकिक वैदिक संब कर्म करता है मुझको ही सबसे अतिउत्तम मानता है मेरा ही भक्त है मेरे संबंध विना अन्यसंगोंकरके रहित है और सर्वभूत प्राणि- योंमें निःर हैं सो मुस्को प्राप्त होता है ॥२५॥ इति श्रीमत्सुकुलसीतारामात्मजपंडितरघुनाथप्रसादविरचितायां श्रीमद्भगवद्वीवामृत- तरंगिण्यामेकादशाऽध्यायप्रवाहः ॥ ११ ॥ अर्जुन उवाच। एवं संततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते। ये चॉप्यक्षरमव्यक्तं तेषों के योगवित्तमाः॥१॥ ऐसे प्रथम आत्मज्ञानकी महिमा श्रीकृष्णजीने वर्णन की और कहा कि मैं भक्तिसे ही जानने तथा देखने और प्राप्त होनेमें आता हूँ सो दोनोंको सुनके अर्जुन पूंछते हैं-कि, निरं- तर भक्तियोगयुक्त हुए जो भक्त ऐसे जो आपने पीछेकी अध्यायके अंतमें कहा है तैसे आपकी उपासना करते हैं और जो इंद्रियोंके अदृश्य अक्षर याने आत्मस्वरूप उसकी उपासना

.
(१३२) भगवद्गीता। . [ अध्यायः
करते हैं उन दोनोंमें अतिश्रेष्ठ कौन हैं, आत्मज्ञानी श्रेष्ठ हैं कि,
आपके उपासक श्रेष्ठ हैं सो कहोः॥ १॥..
श्रीभगवानुवाच ।
मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते।
श्रद्धया परयोप्तास्ते में 'युक्ततमा मताः ॥३
ऐसा अर्जुनका प्रश्न सुनके श्रीकृष्ण भगवान् बोले-कि, जो
निरंतर भक्तियोगयुक्त हो मुझमें मनको लगाके पर्रम श्रद्धांकरके
पुंक्त मुझकों मैंजते हैं वे" योगियोंमें श्रेष्ठ मेरे" मान्य हैं ॥२॥
ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते॥ सर्वत्रगम-
चित्यं चै कूटस्थमचलं ध्रुवम् ॥ संशियम्येन्द्रिय-
ग्राम सर्वत्र समबुद्धयः॥ ते प्राप्नुवन्ति मोमेव
सर्वभूतहिते रताः ॥ क्लेशोऽधिकतरस्तेषाम-
व्यक्तासक्तचेतसाम् ॥ अव्यक्ता हि गतिर्दुःखें,
देहवद्भिरवाप्यते ॥ ३ ॥४॥५॥
जो कोई इंद्रियसमूहको नियममें रखके सर्वत्र समर्बुद्धि सर्व-
भूतोंके हितमें रत हुए अनिर्देश्य याने देवादिशरीरोंकरके कहनेमें
न आवे ऐसे अव्यक्त याने इंद्रियगोचर नहीं " सर्वत्रगं" याने,
सर्वत्र देवादिशरीरोंमें रहनेवाला अचिन्त्य याने ध्यानमें न
आव और कूटस्थ याने सर्वत्र एकसा रहे अंचल याने स्वस्वरू-
पहीमें स्थिर इसीसे नित्य ऐसे अक्षरकों याने आत्मस्वरूपको
मैंजते हैं अर्थात् आत्मस्वरूपहीका अनुसंधान करते हैं वे भी
मुझको "ही प्राप्त होत हैं. परन्तु आत्मज्ञान : दशा दुःखैपूर्वक
देहधाग्यिों करके प्राप्त होती है इससे उन अव्यक्तासक्तचित्तोंकों
अतिशय क्लेश है ॥ ३॥४॥५॥

द्वाद. १२.], सान्वय-अमृततरंगिणी मा०टी०। (१३६) ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्परः। अनन्येनैव योगेर्न भी ध्यायन्त उपासते ॥६॥ तेषामहं समुदंर्ता मृत्युसंसारसागरात्। भवामि नै चिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम् ॥ ७॥ हे पृथापुत्र ! जो कोई सर्व कर्मोंको मुझमें अर्पण करके मेरे ही शरण भये हुए अनन्य भक्तियोगकरके मुझको ध्यावत पूजते ऐसे मुझमें लगाया है चित्त जिन्होंने उनका मैं थोडेही कॉलमें मृत्युदुःखरूप संसारसागैरसे उद्धारकर्ता होऊँगा ॥६॥७॥ मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशर्य। निवेसिष्यसि मय्येव अंत ऊर्व नै संशयः ॥८॥ इससे तुम मुझमें ही, मैनको लगावो, मुझमें ही बैद्धिको लगावो इस मन, बुद्धिके लगाये पीछे मेरे ही समीपे रहोगे इसमें संशय नहीं है ॥ ८॥ अर्थ चित्तं समाधातुं न शक्नोषि मंयि स्थिरम् । अभ्यासयोगेने ततो मामिच्छोप्तुं धनंजय ॥९॥ हे: अर्जुन ! जो कदाचित मुझमें चित्तको स्थिरै समाधान कर नहीं सकते हो तो अभ्यासयोगकरके मेरे" प्राप्त होनेको इच्छेते रहो॥९॥ अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि मैत्कर्मपरमो भवे । मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन्सिदिमवाफ्यसि ॥१०॥ जो अभ्यासमें भी असमर्थ होओ तो मेरे पूजनादिक कोंमें मुख्य स्थिर होई: मेरे अर्थ भी, कर्मों को करते करते. मेरी प्राप्ति- रूप सिद्धिको प्राप्त होओगे ॥ १० ॥ अथैतंदप्यशकोऽसि कत मद्योगमाश्रितः। सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुरु यतात्मवान् ॥११॥ .

(१३४) भगवद्गीता। [अध्याय:-
जो कि, तुम यहभी करनेको अशक्त हो तो मनको सावधान
किये हुए मेरे भक्तियोगका आश्रय किये हुए सर्व कर्मफलका
त्यांग केरो ॥११॥
श्रेयो हि ज्ञॉनमभ्यासाज्ज्ञांनाद्धयानं विशिष्यते ।
ध्यानाकर्मफलत्यागस्त्यागाच्छतिरनंतरम् ॥१२॥
जिससे कि, अभ्याससे कल्याणकारक ज्ञान होता है ज्ञानसे
विचार (यानी ध्यान ) होता है विचारसे कर्मफलत्यागें होता है
कर्मफलके त्यागसे फिर शांति याने संसारसे वैराग्य होता है१२॥
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव चे।
निर्ममो निरहंकारः समदुःखसुखः क्षमी ॥ १३ ॥
संतुष्टः सततं योगी यंतात्मा दृढनिश्चयः ।
मय्यर्पितैमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स में प्रियः ॥१४॥
जो सर्वभूतोंको नै द्वेषकारक हो और सबका मित्र हो और
दयालु भी हो ममतारहित अहंकाररहित सुखदुःखमें सम क्षमा-
वान् यथालाभसंतुष्ट निरंतर भक्तियोगवान् जितचित्त दृढनि-
श्वेय मुझमें मन, बुद्धिको लगायें हो सो मेरों भक्त मुझको
प्रिय है ॥ १३ ॥ १४॥
यस्मान्नोटिजते लोको लोकान्नोद्विते . यः।
हर्षामर्षभयोडेगैर्मुक्तो यः स च में प्रियः ॥ १५॥
जिससे कोई भी जन्तु बांस न पावै और जो किसीसे भी
दुःख न पावै और जो हर्ष, ईर्षा, भय और उद्वेगोंकरके रहित
हो" सो मेरी प्रिय है ॥ १५॥
अनपेक्षः शुचिर्दा उदासीनो गतव्य॑थः।
सारंभपॅरित्यागी यो मद्भक्तःसे में" प्रियः॥१६॥

द्वाद१२.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा०टी०। (१३५) जो मनुष्य ,मेरे संबध विना सर्वत्र अपेक्षारहित शुचि याने शुद्धः आहारी और बाहर मृत्तिका जलादिकरके और अंदर चित्त- की शुद्धता करके पवित्र स्वधर्म अनुष्ठानमें चतुर शत्रुमित्रादिर- हित शास्त्रोक्त कर्म करनेमें व्यथारहित सर्व आरंभोंके फल और ममताका त्यागी हो ऐसा मेरा भक्त सो मुझको प्रिय है ॥ १६॥ यो ने हष्यति न दृष्टिने शोचति ने कांक्षति । शुभाशुभपरित्यागीभक्तिमान्य से 'मे प्रियः॥१७॥ जो सुखकारक वस्तु . पाके नै हर्षे, दुःखकारक पाके न द्वेष करे, शोकनिमित्तमें न शोक करे और हर्षकारककी न इच्छा करे जो शुभाशुभं कर्मफलोंका त्यागी हुआ ऑक्त हो सो मुंझको प्रिय है ॥ १७॥ सैमः शंत्री चे मित्रे चे तथा मानापमानयोः। शीतोष्णसुखदुःखेषु समः संगविवर्जितः ॥ तुल्य- निंदास्ततिमानी संतष्टो येन केनचित् ॥ अनिके तः स्थिरमतिर्भक्तिमान्मे प्रियो नरः ॥१८॥१९॥ तथा शचे और मित्रमें समे तैसे 'ही. मान अपमानमें शीत उष्ण सुखदुःखोंमें सम विषयोंकी आसंक्तिरहित हो निंदा स्तुति तुल्य मान, मितभाषी जो स्वतःप्राप्त हो इसीकरके संर्तुष्ट, 'घरमें अनासक्त स्थिखुद्धि भक्तिमान् मनुष्य मेरो प्रिय है।।1८॥१९॥ ये तु धामृतमिदं यथोक्तं पर्युपासते। :: श्रद्दधाना मेत्परमा भक्तास्तेऽतीव में प्रिया॥२०॥ इति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे भक्ति- योगो नाम द्वादशोऽध्यायः॥ १२॥ Mam 3.

+- ( १३६), भगवद्गीता। [अध्याय: जो कोई श्रद्धा धारे हुए मुझको सर्वोत्तम जाननेवाले भक्त इस यथोक्त धर्मरूप अमृतको याने मुझमें मन लगाना इत्यादि धर्म्यरूप अमृतको सेवते हैं व मनुष्य मेरे" अतिशय प्रिय हैं॥२०॥ इति श्रीमत्सुकुलसीतारामात्मजपंडितरघुनाथप्रसादविरचितायो श्रीगीतामृततरंगिण्यां द्वादशाध्यायप्रवाहः ॥ १२ ॥ इति द्वितीयं षट्कं समाप्तम् ॥ . । अथ तृतीयं षट्कम् । श्रीभगवानुवाच । इंदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते। एतद्यो वेर्ति तं प्राहुँ क्षेत्र इति तद्विदः ॥ १॥ प्रथमके छः अध्यायोंमें ईश्वरप्राप्तिका उपायभूत उपासना और उपासनाका अंगभूत आत्मस्वरूपज्ञान कहा और उस आत्मस्वरूपज्ञानकी प्राप्ति ज्ञानयोग कर्मयोगनिष्ठासे होती है ऐसे कहा । मध्यके छह अध्यायोंमें परमात्मस्वरूपका यथार्थ- ज्ञान और उसके माहात्म्यज्ञानपूर्वक उपासना जिस उपास- नाको भक्ति भी कहते हैं सो कह. चुके । अब अंतके छह अध्या योंमें प्रकृतिपुरुषका निरूपण और इस प्रपंचका प्रकृतिपुरुषके योगसे होना कहेंगे और प्रथम बारह अध्यायोंमें जो कहे परमा- त्मस्वरूपका यथार्थ निश्चय और कर्मज्ञानभक्तिस्वरूप और इन- के ग्रहणकें न्यारे न्यारे प्रकार कहेंगें। तहां तेरहवें अध्यायमें देह और आत्मके स्वरूप और आत्मस्वरूपप्राप्तिका उपाय तथा प्रकृतिमुक्त आत्माका स्वरूप और उसके प्रकृतिसंबंधका कारण और प्रकृतिपुरुषविवेकका अनुसंधानप्रकार कहेंगे । श्रीकृष्ण भगवान कहते हैं कि हे कुंतिपुत्र । यह शरार क्षेत्र ऐसा कहाँ - प्रयो• १३.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा टी०। ( १३७) है जो इसको जानता है . उसको देहात्मज्ञानिजन क्षेत्रह ऐसी कहते हैं याने देह क्षेत्र और आत्मा क्षेत्रज्ञ है ॥ १॥ क्षेत्रज्ञं चापि माँ विद्धिं सर्वक्षेत्रेषु भारत । : क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोनि यतज्ज्ञानं मैतं मम ॥२॥ हे भारत | सर्व क्षेत्रोंमें याने सर्व देहोंमें क्षेत्रज्ञ जो जीव और में जो परमात्मा उस मुझको भी जानी जो क्षेत्र और क्षेत्रज्ञका ज्ञान याने इनका विवेकज्ञान है 'सो ज्ञान मुंझको अंगीकार है । यहाँ जो शरीरोंमें आत्मा परमात्मा दोनों कहे उसपर श्रुति प्रमाण है सो. यह "द्वा सुपर्णा सयुज़ा सखाया समानं वृक्षं परि- पस्वजाते ॥ तयोरेकः पिप्पलं स्वादत्त्यनभन्नन्योऽभिचाक- शीति ॥". अर्थ-दो पक्षी संग संग रहनेवाले परस्पर संखा एक- सहश वृक्षपर रहते हैं उनमें से एक उस वृक्षके स्वादु फल खाता है. दूसरी खाये विना प्रकाशता है अर्थात् ईश्वर और जीव सदा संग रहते हैं, परस्पर सखा एकसरीखे देहमें रहते हैं उनमें जीव शरीरजन्य कर्मफलोंका भोक्ता है और ईश्वर साक्षिमात्र प्रकाशक है। दूसरा यह अर्थ होता है कि, क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ मैं ही हूँ अर्थात् इन दोनोंका अंतर्यामी हूँ तो भी देहांतर्यामी जीव जीवांतर्यामी परमात्मा ऐसे भी यही अर्थ सिद्ध हुआ। जो यहाँ जीव और ईश्वर एक ही कहते हैं उनको " उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः" यहां अर्थकी पंचाइत होनेकी अंतर्यामित्वमें तो "ईश्वरः सर्वभूतानां हद्देशेऽर्जुन तिष्ठति ॥ न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चरा- 'घरम्” और “यस्यात्मा शरीरं य आत्मनि तिष्ठन् य आत्मा- नमंतरो यमयति यमात्मा न वेद स ते आत्मा 'अमृतः" इत्या- दिक श्रुति भी प्रमाण हैं ॥२॥ तत्क्षेत्रं यच्चे याहव च यतिकारि यतेश्च यंद। मैं चै यो" यत्प्रभावश्च तत्सेमासेन में शृणु ॥३॥ " (१३८) भगवद्गीता। [ अध्याय:- सो क्षेत्र जिस व्यका है और जिनके आश्रयंभूत है और जिन विकारोंकरके और जिस प्रयोजनके वास्ते उत्पन्न हुआ है और जिस रूपसे वर्तमान है और वह क्षेत्र जो है याने जैसे रुपयुक्त है और जैसे प्रभाववाला है सो संक्षेप करके मुँझसे सुनो ॥३॥ ऋषिभिर्बहुधा "गीतं छन्दोभिर्विविधैः पृथक् ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुम॑द्भिर्विनिश्चितैः ॥४॥ वह क्षेत्रक्षेत्रज्ञका यथास्वरूप बहुत प्रकारकरके पराशरादिक ऋषियोंने और ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद ऐसे अनेक प्रकार वेदोंने और ब्रह्मके प्रतिपादन करनेवाले जो ब्रह्मसूत्र याने व्यासकृत शारीरिक सूत्ररूप पदोंने जो कारणयुक्त निश्चय याने सिद्धान्त करनेवाले उनने भी क्षेत्रक्षेत्रज्ञके स्वरूपको न्यारा न्यारा कहा है सो मैं संक्षेपसे कहूँगा तुम मुझसे सुनो ॥ ४॥.. महाभूतान्यहंकारो बुद्धिरव्यक्तमेव च । इंद्रियाणि दशैकं च पंचे "चेन्द्रियगोचराः ॥५॥ इच्छा देः सुखं हुँःखं संघातश्चेतना धृतिः। एतत्क्षेत्रं समासेन सर्विकारमुदाहृतम् ॥ ६॥ , पंचमहाभूते, अहंकार, बुद्धि याने महतत्त्व और अव्यक्त याने सूक्ष्मरूप प्रकृति ये क्षेत्रके उत्पत्तिकारक द्रव्य हैं अब विकार याने कार्य कहते हैं देश और एक ऐसे ग्यारह इंद्रियां हैं जैसे कि कान त्वचा, नेत्र, जीभ और नासिका ये पांचज्ञानइंद्रियां; वाणी, हाथ, पाय, गुदा और लिंग ये पांच कर्म इंद्रियां, एक मन. ऐसे ग्यारह इंद्रियों और शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध ये पांच इंद्रियोंके विषय हैं ये सोलह विकार हैं इच्छौ, द्वेष, सुख दुःखे संघात याने सविकार भूत समूह चेतनों जो ज्ञानशक्ति, धृति, जो धीरज ऐसे संक्षेपसे विकारसहित यह क्षेत्र कहा ॥५॥६॥ - + . प्रयो० १३.] सान्वय-अमृततरंगिणी भाटी । (१३९) अमानित्वमदमित्वमहिसो क्षीतिरार्जवम् । आचार्योपासनं शौच स्थैर्यमात्मविनिग्रहः ॥७॥ अब क्षेत्रकार्यों में आत्मज्ञानसाधनके वास्ते ग्रहण करनेके गुण कहते हैं जैसे-कि, श्रेष्ठ जनोंमें मानका न चाहनो लोक दिखा- नेको धर्म, कर्म रूप दंभ न करना परपीडारूप हिंसाको न करना अपनेसे बलहीनके अपरॊध सहनरूप क्षमा रखना, सबसे सरल स्वभाव रहना, मन, वचन, कर्म करके गुरुकी सेवा करना मृत्तिका जलादिसे बाहर और शुद्ध चित्तसे ईश्वरस्मरणरूप अंतर ऐसा शौच करना आत्मज्ञानमें स्थिर रहना मनको सर्वत्रसे निवारण करके ईश्वरमें लगाना ॥ ७ ॥ 1. इंद्रियार्थेषु वैराग्यमनहंकार एव च। जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखंदोषानुदर्शनम् ॥८॥ इंद्रियविषयोंमें गुणधुद्धि नै करना और देहमें और देहसंबंधी पदार्थोंमें अहंबुद्धि ने करना, जन्म मृत्यु वृद्धावस्था अनेक रोग ऐसे शरीरमें इन दुःखरूप दोषोंका विचारना ॥८॥ असक्तिरनभिष्वंगः पुत्रदारगृहादिषु । नित्यं चे समंचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु ॥९॥ आत्मा विना अन्यत्र आसंक्तिरहित पुत्र स्त्री और घर इत्या- दिकोंमें अति मिलाप न रखना और इष्टं और अनिष्ट वस्तुकी प्रोप्तिमें निरंतर समचित्त रहना ॥९॥ मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी। विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि॥ १० ॥ मुझमें अनन्ययोग करके अखंड भक्ति एकांत रहने में प्रीति जनसभामें अप्रीति ॥१०॥ :

(१४०) भगवद्गीता। :: [ अध्यायः अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम् । एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञान यदतोऽन्यथा ॥११॥ आत्मसंबंधी ज्ञानकी नित्यता तत्त्वज्ञानके प्रयोजनका विचा- रना ऐसे यह ज्ञान कहाँ जो इससे अन्यथा है सो अझॉन है१३ ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वाऽमॅतमश्नुते । अनादिमत्परं ब्रह्म नै सत्तैनीसैदुच्यते ॥ १२ ॥ जो जाननेयोग्य है सो कहता हूँ जिसको जानके मोक्षको पाता है वह ऐसा है कि, अनादि याने जन्मरहित है मैत्पर याने उससे श्रेष्ठ मैं ही हूँ वह केवल मेरे स्वाधीन है ब्रह्म याने प्रकृतिमुक्त शुद्ध चैतन्य जीवात्मा है वह आत्मौ नै सत् नै असत् कहनेमें आता है याने कार्य कारण दोनों अवस्थाओं करके रहित है १२॥ सर्वतः पाणिपादं तत् सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् । सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ॥ १३ ॥ वह जीवात्मा, सब ओरसे हाथ पांववला है सबै ओरसे नेत्र मस्तक और मुखवाला है सब ओरसे कानवाला है लोकमें वस्तु- मात्रमें व्यापक होके रहता है यह स्वरूपं मुक्तजीवका कहा। मुक्तद्- शामें जीवकी.समता, परमात्माके सरीखी है सो यहां गीतामें भी कहेंगे " इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः" सूत्र भी है “भोगमात्रसाम्यलिंगाच" और "तथा विद्वान् पुण्यपापे विधूय निरंजनः परमं साम्यमुपैति" ऐसे जो परमात्माकी समता कही है तो परमात्मासरीखा स्वरूप होनेमें क्या शंका है ॥ १३ ॥ सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम् । असक्तं सर्वभृच्चैवं निर्गुणं मुणभोक्तृ च ॥१४॥ सर्व इंद्रियोंकी वृत्तियों करके भी विषयोंको जाननेमें समर्थ है -- त्रयो०.१३.] सान्वय-अमृततरङ्गिणी भा०टी०। (१४१) और आप स्वभावसे सब इंद्रियोंकरके रहित भी हैं याने इंद्रियोंकी वृत्ति विना भी विषयोंको जाननेमें समर्थ हैं आप स्वयं देवादिश- रीरोंमें आसक्त नहीं हैं और सब देवादिशरीरोंको धारण करने वाला है सत्त्वादिगुणरहित और गुणोंका भोगनेवाला है ॥१॥ बहिरंतच भूतानामचरं चैरमेव च। सूक्ष्मत्वातंदविज्ञेय दूरस्थं चांतिके" च तैत्॥१५॥ वह आत्मा मुक्तावस्थामें पृथिव्यादि भूतोंके बाहरे और वृद्धा- वस्थामें भीतर रहता है स्वयं आप अंचर है और देहसंयोगसे चर होता है। सूक्ष्म है इससे जानने योग्य नहीं है वह अज्ञानियोंको दूर है और ज्ञानियोंको सैंमीप है ॥ १५ ॥ अविभक्त चं भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम । भूतभर्तृ चे तज्ज्ञेय' ग्रसिष्णुं प्रभविष्णु चे ॥१६॥ वह पृथिव्यादि भूतविकार देवादि शरीरोंमें एकरस रहता है और अज्ञानियोंको देवादिशरीरोंमें ..देवादिशरीरोंके सदृश दीखता है कि यह देव यह मनुष्य पशु इत्यादिक विभक्तसरीखा स्थित दीखता है और सबभूतोंका पोषक है और अनादिक भूतों- का भक्ष है देहरूपसे आहार करनेवाला है और उसी अन्नादि विकारसे उत्पत्तिकर्ता भी है ऐसे जानने योग्य है ॥ ६॥ ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते । ज्ञान ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य धिष्ठितम् ॥१७॥ वह सूर्यादिक ज्योतियोंको भी प्रकाशक है सूक्ष्मकारणरूप प्रकृतिसे परे याने न्यारों कहता है ज्ञानरूप जाननेयोग्य ज्ञानसे प्राप्त होने योग्ये संबंके हृदयमें रहता है याने संब देव मनुष्य पशुपक्ष्यादि.शरीरोंके हृदयमें रहता है:॥ १७ ॥ 4TA

(१४२) भगवद्गीता। [अध्याय:-
इंति क्षेत्र तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समासतः।
मद्भक्त एतद्विज्ञाय मदावायोपद्यते॥१८॥
ऐसे 'महाभूतान्यहंकारः' यहांसे लेके, 'संघातश्चेतना धृतिः'
यहां पर्यंत क्षेत्र कहा तथा “अमानित्वं " यहांसे लेके "तत्त्व-
ज्ञानार्थदर्शन" यहांपर्यंत ज्ञान कहा और “अनादिमत्परं"यहाँसे
लेके "हदि सर्वस्य धिष्ठित" यहांपर्यंत ज्ञेय याने जानने योग्य
आत्मस्वरूपं यह संक्षेपसे कहा इतनोंको जानके मेरी
भक्त होके मुझसरीखे स्वरूपको प्राप्त होता है ॥ १८॥
3. प्रकृति पुरुषं चैवं विद्धनांदी उँभावपि ।
विकारांश्च गुणांश्चैवं विद्धि प्रकृतिसंभवान ॥१९॥
प्रकृतिको और पुरुषको याने जीवको इन दोनोंको भी अनादि
याने सनातनै जानो जो बंधनकारक इच्छा द्वेष सुख दुःखादिक
विकार इनको और मोक्षकारक अमानित्व अदंभित्वे गुण
इनको निश्चयपूर्वक प्रकृतिसंभव जानो अर्थात् इच्छादिविकार-
युक्त प्रकृति पुरुषको बंधनकारक और अमानित्वगुणयुक्त मोक्ष-
दायक होती है ॥ १९॥
कार्यकारणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते।
पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुंच्यते ॥ २० ॥
अब एकसंग रहे हुए प्रकृतिपुरुषोंके कार्यभेद कहते हैं जैसे कि,
जो प्रकृतिपरिणाम देहकारण मनसहित इंद्रियां इनका व्यापार
करानेमें कारण प्रकृति कही है सुखदुःखोंके .भोक्तापनेमें कारण
पुरुष कहां है। याने भोगसाधनकर्मकी आश्रय प्रकृति परिणाम
और पुरुषयुक्त देह तथा सुखादिभोक्तृत्व आश्रय पुरुष है ॥२०॥
- पुरुषः प्रेकृतिस्थो हि मुंक्त प्रकृतिजान गुणान् ।
कारणं गुणसंगोऽस्य सदसद्योनिर्जन्ममु ॥२१॥

त्रयो० १३.] सान्वय-अमृततरगिणी भाण्टी (१४३) जिसवास्ते कि, यह पुरुष प्रकृतिहीमें रहा हुओ प्रकृतिजन्य गुणोंको भोगता है इसीसे इसका ऊँच नीच योनियोंमें जन्म लेनेमें कारण प्रकृति गुणोंका याने सत्त्वादिगुणोंका संग ही है अर्थाव उन गुणोंकी आसक्तिहीसे ऊंच नीच जन्म होते हैं ॥ २१ ॥ उपद्वेष्टाऽनुमन्ता चे मर्त्ता भोक्ता महेश्वरः । परमात्मेति चाप्युक्तो" देहेऽस्मिन् पुरुष पैरः २२॥ इस देहमें यह पुरुष देखनेवाला है याने चौकसी करनेवाला है और अनुमोदन देनेवाला याने सलाह देनेवाला है और इस देहका पोषनेवाला है और भोगनेवाला है और इसका महेश्वर है जैसे कि, इस देहमें ईश्वर इन्द्रिय विषय इत्यादि हैं उनका भी ईश्वर है ऐसे इस देहसे यह जीव न्यारा भी है परंतु अज्ञानसे केवल यह देहँ ऐसा कहाँता है ॥२२॥ ये ऐवं वेर्ति पुरुष प्रकृति चे गुणैः सह। सर्वथा वर्तमानोऽपि ने से भूयोऽभिजायते ॥२३॥ जो ऐसे इस जीवको और गुणोंकरके सहित प्रकृतिको जाना है.सो सर्व प्रकारसे संसारमें रहती है तो भी फिर नहीं उत्पत्रं होता है ॥२३॥ ध्यानेनात्मनि पश्यति केचिदात्मानमात्मना। अन्ये सांख्येनं योगेन कर्मयोगेन चापरे ॥२४॥ अन्ये वेवमानन्तः श्रुत्वाऽन्येभ्य उपासते। तेऽपि चातितरत्येव मृत्यु श्रुतिपरायणाः ॥२५॥ कितनेक पुरुष अपने अंतःकरणमें बुद्धिसे विचार करके इस जीवात्माको जानते हैं और कितनेक सांख्ययोगकरके जानते हैं और कितनेकै कर्मयोगकरके याने ईश्वरार्पण कर्म करते करते

.
(११४), 'भगवद्गीता । [अध्याय:-
जानते हैं और कितने दूसरे ऐसे नहीं जानते हुए दूसें-
रोंसे सुनके उपासना करते हैं याने सुनके प्रथमसरीखें उपाय
करके जानते हैं और कितनेक केवल श्रद्धायुक्त श्रेवण ही करते
रहते हैं तो वे भी" संसारको तैरते हैं ॥२४ ॥ २५॥
योत्संजोयते किंचित्सत्त्वं स्थावरजंगमम् ।
क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगाद्विद्धिं भरतर्षभ ॥ २६ ॥
हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन.। जितेने कुछ स्थावर और
जंगम प्राणी उत्पन्न होते हैं उनको क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके संयोगसे
याने शरीर और जीवके संयोगसे जानी ॥ २६ ॥
समं सर्वेषु भूतेषे तिष्ठन्त परमीश्वरम् ।
विनश्यत्स्वविनश्यंतं यः पश्यतिसं पश्यति ॥२७॥
जो कोई सर्व भूतोंमें सर्मे रहे हुए केवल मन इंद्रियादिकों
ई*वर इस जीवको इन इंद्रियादिकोंके नाश होते हुए भी इसको
नाशरहिते देखता है.याने जानता हैं सोई जानता है; ॥२७॥
समं पश्यंन हिं सर्वत्रं समवस्थितमीश्वरम् ।
ने हिनस्त्यात्मनात्मानंततो यातिपरांगतिम॥२८॥
सर्व देवादि शरीरोंमें एकसरीखे रहे हुँए इस मन इंद्रियादि-
कोंके ईश्वर जीवात्माको समें देखता हुआ जो कि बुद्धिपूर्वक
अपने आपको नहीं हैनता है याने संसारमें नहीं गिराता है उसे
से वह परम गतिको याने मुक्तिको पाता है ॥२८॥
पंकृत्यैव चे कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः।
यः पश्यति तथात्मानमकतार से पश्यति ॥२९॥
जी सर्व कर्मोको पँकृति करके ही याने प्रकृति विकार इंद्रि:
करके ही करे हुए जानता है और तैसें ही अपने आपको
अकत्ती जानता है सो जानता है ॥२९॥

.
प्रयो० १३.] सान्वय-अमृततरगिणी'भा टी०। (१४५)
यदा भूतपृथामावमैकस्थमनुपश्यति ।
तत एव चे विस्तार नौ सैद्यते ती ॥३०॥
जब भूतोंका""पृथग्भाव "याने देवमनुष्यादिक शरीरोंकी
छोटाई बड़ाई मोटाई पतलाई इत्यादि न्यारे न्यारे भावोंको
एकस्थ याने एक प्रकृतिहीमें देखतॊ है और उसी प्रकृतिमें पुत्रादि-
रूप विस्तारको देखताहै तब शुद्ध स्वरूपको प्राप्त होता है॥१३॥
, अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्ययः ।
शरीरस्थोऽपि कौंतेय ने करोति नै लिप्यते॥३१॥
हे कुंतीपुत्र । यह जीवात्मा अनादिपनसे अविनाशी है केव-
लं शरीरमें रहाँ हुआ भी निर्गुणपनेसे ने कुछ कमाको करता है
मैं उन कर्मफलों करके लिप्त होती है ॥ ३१ ॥
यथा सर्वगत सौक्षयोदाकाशं नोपंलिप्यते।
सर्वत्रावस्थितो देहे तात्मा नोपंलिप्यते ॥३२॥
जैसे सर्वत्र प्राप्त भैया हुआ आकाशं सूक्ष्मतासे उन भूतोंके
गुणोंकरके लिप्त नहीं होता है तैसे सर्व देवादि शरीरोंमें रहा
आ जीवात्मा देहगुणोंकरके नहीं लिप्त होती है ॥ ३२॥
यथा प्रकाशयत्येक कृत्स्नं लोकमिमं रविः ।
क्षेत्र क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारते ॥३३॥
हे भारत | जैसे एक सूर्य इस सर्व लोकोंको प्रकाशता है
तसे .यह जीवे सर्व शरीरको प्रकाशती है ॥ ३३॥".
क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवमन्तरं ज्ञानचक्षुषा । . . .
मृतप्रकृतिमोक्षं च ये वििित ते परम् ॥३४॥
इति श्रीमद्भगवद्गीतांसूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे
श्रीकृष्णार्जुनसंवादे प्रकृतिपुरुषविवेकयोगो
नाम त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३॥

(१४६) भगवद्गीता। [अध्यायः- जो कोई ज्ञानदृष्टिकरके क्षेत्र और क्षेत्रज्ञका ऐसे अंतरेको और भूतप्रकृतिके मोक्षको जानते हैं वे मुझको प्राप्त होते हैं ॥ ३० ॥ इति श्रीमत्सुकुलसीतारामात्मजपंडितरघुनाथप्रसादविरचितायां श्रीमद्भगवदीता- मृततरंगिण्यां त्रयोदशाऽध्यायप्रवाहः ॥ १५ ॥ ..परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम् ।। यज्ज्ञात्वा मुनयः सर्वे पैरां सिद्धि मितो गताः॥१॥ श्रीकृष्ण भगवान अर्जुनसे कहते हैं-कि सर्व ज्ञानों में उत्तम प्रसिद्ध भया हुआ ज्ञान फिर कहता हूं जिसको जानके सेर्व मुनि- जैन यहांसे श्रेष्ठ सिद्धिको याने परमपदको जाते भैये ॥ १॥ इंदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमार्गताः । सर्गेऽपि नोपजायते प्रलये नै व्यथंति ॥२॥ जो कहता हूं इस ज्ञानको प्राप्त होके मेरी सधर्मतोको याने मेरे समान रूप वैभषको वेमुनिजन प्राप्त होते हुए वे उत्पत्तिका लमें न उत्पन्न होत है और प्रलयमें न दुःखी होते हैं ॥२॥ मम योनिर्मही तस्मिन् गर्भ धाम्यहम् । संभवः सर्वभूतानां ततो भवति भारते ॥ ३ ॥ हे भारत । मम महद्ब्रह्म याने मेरी प्रकृति सर्व भूतोंकी योनि याने उत्पत्तिस्थान है मैं उस प्रकृतिमें जीवरूप गर्भको धारण करता हूं तब उससे सर्व भूतोंकी उत्पत्ति होती है. ॥३॥ सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः संभवंति योः।। तासां ब्रम महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता ॥ ४ ॥ हे कुंतीपुत्र । देव मनुष्यादि सर्व योनियोंमें जो देही उत्पन्न चतुर्द. ११.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा टी।(११७) होते हैं उन संबकी महंत ब्रह्म याने प्रकृति कारणे है मैं" चेत- नरूप बीजका देनेवाली पितो हूं ॥ ४ ॥ सेत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसंभवा । निबंधंति महाबाहो देहें देहिनमव्ययम् ॥ ५॥ हे महाबाहो ! सत्त्वगुण रजोगुण और तमोर्गुण ये प्रकृतिसे उत्पत्र गुणं इस देहमें अविनाशी जीवको बंधन करते हैं ॥६॥ तत्रं सत्त्वं निर्मलेत्वात्प्रकाशकमनामयम् । सुखसंगेन बनौति ज्ञानसंगेने चानघे ॥ ६ ॥ हे निष्पाप | उन गुणोंमें सत्त्वगुण निर्मलतासे प्रकाशैक पाने शुभाशुभ कर्मोका दिखानेवाला रोगरहित है इसीसे यह मुखकी आसक्तिसे और ज्ञानके संगे करके बांधती है याने ज्ञानसुखसे शुभकर्म शुभकर्मसे स्वर्गादि फिर उत्तम कुलमें जन्म 'फिर ज्ञानसुख ऐसे बांधता है ॥ ६॥ रजो रंगात्मकं विद्धि तृष्णासंगसमुद्भवम् । तन्निबधांति कौंतेयं कर्मसंगेनं देहिनम् ॥ ७॥ हे कुंतीपुत्र ! तृष्णा और स्त्री धनादिमें आसक्तिका करने- बाला रजोगुण विषयादिकमें प्रीति उपजानेवाला जानी वह जीवको कर्मसंगसे बांधता है जैसे प्रीत्यात्मक कर्मसे उन कर्म- संगियोंमें जन्म फिर कर्म फिर जन्म ऐसे ॥ ७ ॥ तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम् । प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति भारते॥८॥ हे भारत । सर्वदेहधारी जीवोंको मोहनेवाला तमोगुण अज्ञानका कारण जानो वह प्रमाद आलस और निद्राकरके बंधन करता है ॥ ८॥ संत्त्वं सुखे संजयति रजः कर्मणि भारत। --- - . (१४८) भगवद्गीता। .[अध्याय:- ज्ञानमात्य तु तमः प्रेमादे संजयेत्युत ॥ ९ ॥ हे भारत.! सत्त्वंगुण मनुष्यको सुखमें लगाता है रजोगुण कर्ममें तमोगुण ज्ञानको ढकके फिर प्रमादमें लगाती है ॥९॥ रजस्तमश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारते। .. रजः सत्त्वं तमश्चैव तैमः सत्त्वं रजस्ती ॥४॥ हे भारत ! यद्यपि ये गुण प्रकृतिके हैं तो भी विपरीतताका कारण यह कि, रजोगुण और तमोगुणको. जीतके सत्त्वगुण प्रबल होता है और रजोगुणे सत्त्वगुणको जीतके तमोगुण प्रबल होता है तैसी ही तमोगुण सत्त्वर्गुणको जीतके रजोगुण प्रबल होता है यहां कारण प्राचीनकर्म और नित्य आहारादिक है।॥१०॥ सर्वहारेषु देहेऽस्मिन् प्रकाश उपजायते । ज्ञानं यदों तदो विद्याहिटद्धं सत्त्वमित्युते ॥ ११॥ लोमैः प्रतिरारंभः कर्मणामशमैः स्पृहाँ। रजस्येतानि जायते विवढे भरतर्षभ ॥ १२ ॥ हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ | इस देहेमें जर्वे सर्व नेत्रादि द्वारों में प्रकाश याने वस्तुका यथार्थ निश्चय सोई ज्ञान उत्पन्न हो तब सत्त्वगुण बढी है ऐसा जाना और रजोगुणके बढनेसे लोम जो धनादिक खरचे विना और मिलनेकी इच्छा प्रवृत्ति यांने प्रयोजन विना चंचलता कौका आरंभ इंद्रियलोलुपती विष- यईच्छा इतने, उत्पन्न होते हैं ॥ ११ ॥ १२॥ : अप्रकाशोऽप्रतिश्च प्रमांदो मोह एव च। तमस्येतानि जायते विवेढे कुरुंनंदन-॥ १३॥ हे कुरुनंदनं । तमोगुणके बढनेसे विवेककी हानि निरुबमता और न करनेकाँ करना और विपरीतज्ञान इतने ये होते हैं"१३॥

4 चतुर्द० १४.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा०टी०। (१४९) यंदा सत्त्वे प्रवडे तु प्रलयं याति देहभृत् । तंदोत्तमविदां लोकानेमलान्प्रतिपद्यते ॥ १४॥ जब सत्त्वगुणके बढ़ते समयमें देहधारी प्रलय याने मृत्युको प्राप्त हो तब आत्मज्ञानियोंके शुद्ध लोकोंकों प्राप्त होती है अर्थात् आत्मज्ञानियोंके कुलमें आत्मज्ञान जाननेयोग्य शरी- रोंको प्राप्त होता है." लोकस्तु भुवने जनेः" इस प्रमाणसे यहाँ लोकशब्द जनवाची है ॥ १४॥ रजसिं प्रलयं गत्वा कर्मसंगिषु जायते।। तथा प्रलीनस्तमंसि मूढेयोनिषु.जायते ॥ १५ ॥ रजोगुणकी 'वृद्धिमें मृत्युको प्राप्त होंके कर्मसंगियोंमें जन्म लेता है याने उनमें जन्म लेके सकाम कर्म करके स्वर्गको जाता है फिर उनहीमें जन्म लेके फिर कर्म करके स्वर्गमें ऐसे ही फिरता रहता है तथा. तमोगुणमें मरा हुआ नीचे योनिमें जन्मता है वहाँ भी वैसा ही क्रम जानना ॥ १५ ॥ कर्मणः सुकृतस्याः सात्त्विकं निर्मलं फलम् । : रजसँस्तु फेलं दुःखमज्ञानं तैमसः फलम् ॥ १६ ॥ सुकृतं कर्मको फल सात्त्विक निर्मले कहते हैं याने उसके करते. २ किसी जन्ममें मुक्त होता है और रजोगुणी कर्मका फल दुःखं याने उस सकामसे स्वर्ग स्वर्गसे मृत्युलोक फिर स्वर्ग:ऐसे संसारदुःख ही है तमोगुणी कर्मको फले अज्ञान है याने उससे नरक ही है॥१६॥ सत्त्वात्संजायते ज्ञान रजसा लोभ एव चें। प्रादमोही तमसो भवेतोऽज्ञानमेव च ॥ १७ ॥ सात्त्विक कर्मसे ज्ञान होता है और सैजससे लोभ ही होता है तामससे प्रमाद और मोह होते हैं और अज्ञान भी होता है। १७॥

- (१५०) भगवद्गीता। [अध्याय:- ऊर्ध्वं गच्छंति सत्त्वंस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसोः । जघन्यगुणत्तिस्था अधोगच्छंति तामसाः॥१८॥ सात्विककर्म करनेवाले मुक्तिको पाते हैं रॉजस कर्मवाले मध्यमें ( स्वर्ग मृत्यु लोकमें ही रहते हैं जैसे पुण्यसे स्वर्ग, पुण्य क्षीण होनेसे मनुष्यलोक फिर पुण्यसे स्वर्ग ऐसे वारंवार मध्यमेही रहते हैं तमोगुणी नीचगुणकी वृत्तिमें वर्त्तनेवाले तामसी नीचजाति पशु कीटादिकमें जन्मते रहते हैं ॥ १८ ॥ नान्य शुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टाऽनुपश्यति । गुणेभ्यश्च पैर वेत्ति मैद्धावं सोऽधिगच्छति ॥१९॥ जब विवेकी पुरुष सत्त्वादिगुणोंके विना और किसीको कत्र्ती नहीं-जानता है और अपने आपको गुणोंसे न्यारी जानती है तब सो मेरी साम्यताको प्राप्त होता है ॥ १९ ॥ गुणानेतानंतीत्य त्रीन्देही देहंसमुद्भवान् जन्ममृत्युजरादुःखैर्निर्मुक्तोऽमृतमश्नुते ॥२०॥ यह देहधारी जीव देहमें उत्पन्न हुए इन सत्त्वादि गुणोंको उल्लं- घन करके जन्म मृत्यु और जरापनके दुःखोंकरके छूटा हुआ मोक्षको पाता है गुणयुक्त नहीं ॥ २० ॥ अर्जुन उवाच । कैलिङ्गैस्त्रीन्गुणानेतानतीतो भवति प्रभो। किमाचार कथं चैतौस्त्रीनगुणा तिवर्त्तते ॥२१॥ ऐसे सुनके अर्जुन पूंछते हैं कि, हे प्रभो ! कौनसे चिह्नोंक- रके इन तीन गुणोंको उल्लंघन किया हुआ होता है वह कैसे आचरणवाला होता है और इन तीनों गुणोंको कैसे उलंधैन कर सकता है ॥२१॥ ... . Pr- .

चतुर्द. १४.1 सान्वय-अमृततरंगिणी भाटी। (१५१)
श्रीभगवानुवाच।
प्रकाशं च प्रवृत्ति चे मोहमेवेंच पांडवं ।
ने दृष्टि संप्रत्तानि नं नित्तानि कौक्षति ॥ २२ ॥
उँदासीनवदासीनो यो गुणैर्न विचाल्यते।
गुणी वर्तत इत्येवं योऽतिष्ठति "नेङ्ते ॥ २३ ॥
समदुःखसुखैः स्वस्थैः समेलोष्टाश्मकाञ्चनः ।
तुल्यप्रियाप्रियो धीरेस्तुल्यनिंदात्मसंस्तुतिः ॥२४॥
मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः।।
सर्वारंभपरित्यागी गुणातीतः स उच्यते ॥२५॥
अर्जुनका प्रश्न सुनके भगवान् कहते हैं-कि, हे पांडपुत्र! जो
परेन प्रकाश सत्त्वगुणके कार्य आरोग्यादिक और रजोगुणका
कार्य प्राति और तमोगुणका कार्य मोहँ ये प्रवृत्त हों तो इनका
त्यांग नहीं चाहता है तथा निवृत्त हुए इनकी प्रवृत्ति नहीं
चाहता है। उदासीन सरीखी स्थित हुआ गुणों करके नहीं
चलायमान होता है। आप ही" अपने २ कार्यों में गुणें वर्त-
मान है ऐसी विचार कर जो" स्थिर है चलायमान नहीं होता
मुखःखमें सम स्वस्थ और ठीकरी कंकर पत्थर और सोना
जिसके सम है जिसको प्रिय अप्रिय तुल्य हैं ऐसा जो धीरे
अपनी निंदा स्तुति समान जानता है, मान और अपमान
तुल्स, मित्र शत्रुपक्षमें तुल्य मेरे सेवनादि विना सर्व आरंभोंका
त्यागी सो गुणातीते कहाता है ॥२२॥ २३ ॥ २१ ॥२५॥
मी , योऽव्यभिचारेण मॅक्तियोगेन सेवते ।।
से गुणान्समैतीत्यैतान्ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥२६॥

१ " (१५२) भगवद्गीता। [ अध्याय ब्रह्मणो हिं प्रतिष्ठाऽहममृतस्याव्ययस्य चे। शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकांतिकस्य च॥२७॥ इति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशाले श्रीकृष्णार्जुनसंवादे गुणत्रयविभागयोगो नाम चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥ जिसवस्तेि कि, मरणधर्मरहित और इसीसे. अविनाशी.जो ब्रह्म याने मुक्तजीव उसका और सनातन धर्म जो भक्तियोग उसका और मुख्य सुखे जो स्वस्वरूपकी प्राप्ति उसका में" आधार है इसीसे जो" अखंडित भक्तियोगकरके मुझको भेजता है; सो ईन. गुणोंको उल्लंघन करके मेरी, सैंमताको प्राप्त होता है ॥ २६ ॥ २७॥ इति श्रीमत्सुकुलसीतारामात्मजपंडितरघुनाथप्रसादविरचित्तायां श्रीमद्भगवढी 'तामृतंतरंगिण्या चतुर्दशाध्यायप्रवाहः ॥१४॥ श्रीभगवानुवाच । ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरय॑यम् छंदांसि यस्य पर्णानि येस्तं वेदै मैं वेदवित् ॥१॥ तेरहवें अध्यायमें क्षेत्ररूप प्रकृति और क्षेत्रज्ञ पुरुष याने जीव. इनका स्वरूप कहीं । शुदं जीवात्माको भी प्रकृतिसंबंधी गुणों के प्रवाहनिमित्त देवादिक आकारसें परिणामको प्राप्त हुई जो प्रकृति उसका सम्बंध अनादि कहा. चौदहवें अध्यायमें कहा कि इस जीवकों जो कार्य और कारण अवस्थाओंमें यह गुणसंगप्रवाह लप्रकृतिसंबंध सो भगवानहीने किया है ऐसे कहके विस्तार- सहित गुणसंगप्रकारको कहके कहा कि, गुणसंगनिवृत्तिपूर्वक स्वस्वरूपकी प्राप्ति भगवद्भक्तिमूलक ही है.अब पंद्रहवें अध्यायमें पञ्चद०१६] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०।(१५३ ) जो भजने योग्य भगवान् अपने कल्याण गुंणादिकोंकरके बद्ध मुक्त दोनों प्रकारके जीवोंसे विलक्षण (न्यारे) उनको पुरुषोत्त- मत्व कहनेको जो यह बन्धन आकारसे विस्तरित प्रकृतिका परिणाम विशेष संसार उसको पीपरवृक्षरूप कल्पित करके श्रीकृष्ण भगवान् कहने लगे-कि,जिसके वेदं पत्ते अर्थात् जैसे पत्तोंकरके वृक्ष बढ़ता है वैसे ही यह संसाररूप वृक्ष वेदोक्त कर्म करके बढ़ता है। इससे वेद पत्तारूप हैं, ऊर्ध्वमूल याने सत्यलोकमें ब्रह्मा जिसका मूल है अधःशाख याने सत्यलोकसे नीचे जो देव मनुष्य कीट पतंगपर्यंत शरीर ये उसकी शाखा है ऐसा अव्यय याने सम्यक् ज्ञानप्राप्ति होनेसे प्रथम अज्ञानदशामें प्रवाहरूप करके छेदनेके अयोग्य इसीसे अज्ञानकरके अविनाशी है ऐसा इस संसारको अश्वत्थ याने पीपरवृक्षरूप श्रुति कहती है उसको जो" जानती है सो वेदका जाननेवाला है अर्थात् वेद इस संसा- रके छेदनेका उपाय कहता है तो जो इसको जानेगा तो छेदनेका भी उपाय जानेगा इससे वह वेद जाननेवाला है ॥ १ ॥ अंधश्चोर्ध्वं प्रस्तांस्तस्ये शाखा गुणप्रवृद्धा ""विषयप्रवालोः ॥ अधेश्च मूलान्य संततानि कर्मानुबंधीनि मैनुष्यलोके ॥२॥ अब उस संसारवक्षकी और भी विलक्षणता कहते हैं जैसे कि सत्त्वादिगुणोंकरके बढ़ी हुई और शब्दादिक विषय जिनके प्रवाल याने कोंपर याने जो नये एक दिनके निकले हुए पत्ते वैसे पत्ते जिनके विषय हैं ऐसी उस वृक्षकी शाँखें नीचे मनुष्यलोकमें और ऊपर देव गंधर्वादिलोकोंमें फैले रही हैं अर्थात् नीचकर्मसे नीचे मनुष्योंसे भी नीच पश्वा- दिशरीर ऊपर उत्तमकर्मसे उत्तम देवादिशरीररूप शाखें फेल रही हैं। नीचे मनुष्यलोकमें : भी उसकी कर्मानुसारी

(१५४) भगवद्गीता। [अध्याय:-
मुल फैली" रही हैं अर्थात् मनुष्यलोकमें जो ऊंच नीच
कर्म वही मूलरूप हैं। ऊंच नीच पदवी कर्म विना नहीं तथा
कर्म मनुष्यशरीर विना नहीं होता है ॥ २ ॥
नेरूपमस्येह तथोपलभ्यते नांतोनचादिन"चे
संप्रतिष्ठा ॥ अश्वत्थमेन सुविरूँढमूलमैसंगश-
स्त्रेण इंटेन छित्त्वा ॥ ३॥ ततः पदं तत्परिमार्गि-
तैव्यं यस्मिनगा न निवर्तति भूयः । तमेव
चाय पुरुषं प्रैपये यतःप्रत्तिः प्रसृती पुराणी॥४॥
इस संसारवृक्षका इस लोकमें जैसा कहा है वैसा रूप अंज्ञा-
नीजनोंके नहीं जाननेमें आता है न उसका अंत और नं
आदि और ने स्थिति जाननेमें आती है ऐसे दृढमूल इस पीप-
र वृक्षको अँतिदृढ वैराग्यहप शस्त्रसे छेदन कैरके फिर जिससे
यह प्राचीन प्रवृत्ति याने गुणमय भोगरूप संसारप्रवाह विस्त-
रित है जैसी आदि पुरुषकै शेरणागत होके उस पदको ढूंढ़ना कि,
जिसमें गये हुए मुनिजन फिर इसे संसारमें नहीं आते हैं॥४॥
निर्मानमोहां जितसंगदोषां अध्यात्मनित्या
विनिवृत्तकामाः ॥ हंढविमुक्ताः सुखदुःखेसर्गि-
च्छंत्यमूढाः पदमव्ययं तेत् ॥५॥
जो मानमोहकरके रहित हैं और जिसने संगदोषोंको जीता
है तथा जो अध्यात्मशास्त्रमेही नित्य वर्तमान हैं और जिनकी.
कामना निवृत्त हो जो सुखदुःखसंज्ञक इंद्रोंसे छूटे हुए हैं वे
ज्ञानीजन उसे अविनाशी पदको प्राप्त होते हैं याने स्वस्व
रूपको प्राप्त होते हैं- ॥५॥

पञ्चद० १५.] सान्वय-अमृततरंगिणी भाण्टी। (१५५): नं तद्भासयते सूर्यो ने शशांको न पावकः। यद्गत्वों ने निवर्तते तैद्धाम परमं मम ॥६॥ सूर्य उस आत्माको नहीं प्रकाश सकता है। ने चंद्रा और नं अग्नि प्रकाश सकता है जिसे रूपको याने शुद्ध आत्मस्व रूपको प्राप्त होके नहीं संसारमें आते हैं वह मेरी परम धाम है याने मेरे रहनेका मुख्य स्थान मेरा शरीर है इस जगह "यस्यात्मा शरीरम्" यह श्रुति भी प्रमाण है ॥ ६॥ ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः। मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति ॥७॥ जो यह ऐसा वर्णन किया सो यह मेरा ही सनातन अंश है. याने जैसे प्रकृति और अनंतजीव मेरे ही हैं उनमें यह एक : मेरा ही है मेरी ही विभूति है. सो यह इस जीवलोकॅमें जीव- भूत याने अति संकुचितज्ञान हुआ - पांच ज्ञानेंद्रिय और एक मन ऐसे मनसहित छः प्रकृतिविकार इस देहमें रही हुई इंद्रियोंको बचता फिरता है ॥ ७ ॥ शरीरं यदेवाप्नोति यचोप्युत्क्रामतीश्वरः । गृहीत्वैतानि संयोति वायुगंधीनिवाशयात् ॥८॥ जब यह जीव शरीरको प्राप्त होता है और जब वर्तमान- शरीरसे जाता है तब यह मन इद्रियोंका ईश्वर अपनी सेना- रूप. इन इंद्रियोंको जैसे ले जाता है पवन पुष्पादिक गंधस्था- नसे गंधको वैसे ग्रहण करके ले जाता है ॥ ८॥ श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च। अधिष्ठाय मैंनश्वार्य विषयानुपैसेवते ॥ ९॥ : यह जीवात्मा श्रोत्र इंद्रियं याने कान नेत्र और स्पर्शन जो SEX -- भगवद्गीता। [अध्याय:- त्वचा इंद्रिय रंसना जो जिह्वा और घाण जो नासिका और मैन इनको आश्रयकरके विषयोंको सेवती है ॥ ९॥ उत्क्रामंतं स्थितं वोऽपि भुंजानं वा गुणान्वितम् । विमूढां नानुपश्यति पैश्यंति ज्ञानचक्षुषः ॥ १०॥ :, यह जो गुणोंकरके युक्त आत्मा उसको देह त्यागनेको अथवा देहमें रहते हुएको अथवा विषय भोगते हुएको भी अज्ञानी जन नहीं देखते जिनके ज्ञानदृष्टि है वे देखैते हैं॥३०॥ यतंतो योगिनश्चैनं पश्यत्यात्मन्यवस्थितम्। . यततोऽप्यकृतात्मानो"नैनं पश्यत्यचेतसः॥११॥ योगिजन प्रयत्न करते करते अपने अंतःकरणमें रहें हुए इंस आत्माको देखते हैं और जो विषयासक्त हैं वेजो शास्त्रद्वारा उपाय: करें तो भीवे अज्ञांनी इस आत्माको नहीं देख सकतें ॥ ११ ॥ यंदादित्यगतं तेजो जगासयतेऽखिलम् । यचंद्रमसि यच्चोग्नौ तत्तंजो विहि मार्मकम् ॥१२॥ .... जो सूर्यों में रहा हुआ तेज सर्व जगत्को प्रकाशित कर रहा और जो तेज चंद्रमा और जो अग्निमें है उसे तेजको मेरों ही तेज जानो ॥ १२ ॥ गांमांविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसाँ। पुष्णामि चौषधी सैर्वाःसोमो भूत्वा रसात्मकः॥१३॥ मैं पृथ्वी में प्रविष्ट होके अपने अचिंत्य सामर्थ्यकरके सब भूतोंको धारण करता हूं और अमृतमयं चंद्रे "होके सर्व औषै- धियोंको पैलता हूं.॥ १३॥ अहं वैश्वानरों भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः । प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम् ॥ १४ ॥ .

पञ्चदः० १५.] सान्वय-अमृततरङ्गिणी भा०टी०1८. १९७) : मैं जठराग्नि होके सर्व प्राणियोंके देहेमें रहा हुआ प्राण और अपान संयुक्त भक्ष्य,भोज्य,लेहा, पेय ऐसे चार प्रकारके अनेको पचौता हूं.॥ १४ ॥ सर्वस्य चाहें हदि सन्निविष्टो मत्तः स्मृतिर्ज्ञान- 1. मपोहेनं च ॥ "वेदैश्च सर्वैरहमेव "वेद्यो वेदांत- कटेदेविदेवं चौहमे ॥ १५॥ मैं सबके हृदयमें प्रविष्ट हूं और सबके स्मृति ज्ञॉन और विचार मुझसे होते हैं" और सर्व वेदोंकरके" ही जानने योग्य हूं और वेदांतका कतो और वर्दैका जाननेवाला मैं ही हूँ १५॥ हाविमौ पुरुषौ लोके क्षरंश्चाक्षर एवं च। क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते॥१६॥ उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः । यो"लोकत्रयमांविश्य विमर्त्यव्यय ईश्वरः॥१७॥ इस लोक में क्षेर और अक्षर ऐसे ये दो प्रकारके पुरुष हैं उनमें सर्व शरीरधारी भूते प्राणी क्षर और मुक्त जीव अक्षर कहौता इन दोनोंसे उत्तम पुरुष और है जो परमात्मा ऐसे" कहोता है जो अविनाशी ईश्वर त्रिलोकीमें प्रवेश करके सर्व त्रिलो- कीका भरण पोषण करता है ॥ १६॥ १७ ॥ यस्मात्क्षरमतीतोऽहंमक्षरांदपि चोत्तमः । अंतोऽस्मि लोके वेदे" चे प्रथितैः पुरुषोत्तमः॥१८॥ जिसवास्ते कि मैं बद्धावस्थ जीवसे श्रेष्ठं और मुक्तसे भी उत्तम हूँ इससे स्मृति और वेदमें भी पुरुषोत्तम प्रसिद्ध हूँ ॥ १८ ॥ यो मौमेवमसमटो जानाति पुरुषोत्तमम्। सं. सर्वविद्भजति माँ सर्वभावेन भारत ॥ १९ ॥ -.

(१९८), भगवद्गीता। [अध्याय:-
हे भारत । जो सम्यक्ज्ञानी पुरुष ऐसे मुझको पुरुषोत्तम
जॉनता है सो सर्वज्ञे है इसीसे वह सर्वभाव याने माता पिता
मुहद् धनादिक मुझको जानके मुझकोही भेजता है ॥ १९॥
इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मर्याऽनघ ।
एतेबुडा बुद्धिमान्स्यात्कृतकृत्यैश्च भारत॥२०॥
इति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योग-
शास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे पुराणपुरुषोत्तम-
योगो नाम पञ्चदशोऽध्यायः ॥१५॥
हे निष्पापं । ऐसे यह अतिगोप्य शास्त्र मैंने कहाँ हे भारत ।
सको जाने के बुद्धिमान और कृतकृत्य होती है ॥ २० ॥
इति श्रीमत्सुकुलंसीतारामात्मजपंडितरघुनाथप्रसादविरचितायां श्रीमद्भगवद्गीतामृत-
तरंगिण्या पञ्चदशाऽध्यायप्रवाहः ॥१५॥
.
ऐसे तेरहवें अध्यायसे पंद्रहवेंकी समाप्तिपर्यन्त क्षेत्र और क्षेत्र
ज्ञका विवेक और गुणत्रयका विभाग और क्षराक्षर याने, बद्ध
मुक्त जीवोंका स्वरूप तथा परमात्माका पुरुषोत्तमत्व और
सामर्थ्य कह चुके । अब सोलहवें अध्यायमें जीवकी शानव-
श्यता और देवासुरसम्पत्तिविभाग कहेंगे ।
श्रीभगवानुवाच ।
अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थिंतिः ।
दान दमैश्चे यज्ञैश्चै स्वाध्यायैस्तपै आर्जवम् ॥१॥
अहिंसा सत्यमॅक्रोधस्त्यागः शांतिरपैशैनम् ।
दया भूतेष्वलोलॅप्त्वं मॉर्दवं हीरचालम् ॥२॥

.
पोडम० १६.] सान्वयं-अमृततरंगिणी मा टी०। (१५९)
तेजें:क्षमा धृतिः शौचमैद्रोहो नातिमानिता।
भैवेति संपदं दैवीमभिजातस्य भारत ॥ ३ ॥
श्रीकृष्ण भगवान् अर्जुनसे कहते हैं-कि, हे भारत ! देवी
संपदाको प्राप्त हुएं मनुष्यको निर्भय रहना अंतःकरणकी शुद्धि,
प्रकृतिसे भिन्न आत्मा है ऐसी निष्ठा सुपात्रको कुछ देना और
मनको विषयोंसे निवृत्त करना और निष्कामतासे भगवानके
पूजनरूपं पंचमहायज्ञोंका करना वेदमन्त्रादिकोंको जप एकादशी
व्रतादिप तप सर्वसे सरल रहना जीवमात्रको पीडा न देना
हित और यथार्थ भाषण कोका न करना उदारता शांति याने
इंद्रियोंको वश करना चुगली न करना भूतप्राणिमात्रेपर दया
परस्त्रीधनादि पर इच्छा न करेंना अँकरता लज्जा व्यर्थ कामको
न करना तेजें क्षमा याने सहनशीलता धीरज पवित्रता द्रोहकों
न करना मान प्राप्तिके वास्ते अति मानका न करना ये २६
गुण होते हैं ॥१॥२॥३॥
दंभो दोऽभिमानश्च क्रोधेः पारुष्यमेव चें।
अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ संपदमांसुरीम. ॥४॥
हे पृथापुत्र ! आँसुरी संपदाको प्राप्त हुए मनुष्यके दंर्भ दर्प
और अभिमान क्रोध और केटु भाषण और अज्ञान ये लक्षण
होते हैं ॥४॥
दैवी संपंहिमोक्षीय निबंधायासुरी मा।
'मा शैचः संर्पदं दैवीमंभिजातोऽसि पांडव ॥५॥
हे पांडुपुत्र ! दैवी संपदा मोक्षके वास्त है आसुरी बन्धनके
वास्ते निश्चय की गयी है तुम दैवी संपदाँको प्राप्त हुए हो मैत
शोचो ॥५॥
हो भूतसगों लोकेऽस्मिंन्दैव आसुर एव च ।
देवो विस्तरशः प्रोक्त आसरं पार्थ मे शृणु ॥६॥

(१६० ) . भगवद्गीता। [अध्यायः- हे पार्थ ! इस लोकमें दो प्रकारके प्राणी हैं एक देव और दूसरे आंसुर, देवे विस्तारसे कहा आसुरको सुनो॥६॥ प्रतिं च निंतिं च जैना न विदुरासुराः । ने शौचं नाऽपि"चाचारो नै सैय॑ तेषं विद्युते ॥७॥ असुर स्वभाववाले मनुष्य संसार सांधन और मोक्ष साधन भी नहीं जानते हैं उनमें ने शुचिता और नै शास्त्रीय आचरण हैं उनमें नै सत्य भी रहता है ।। ७ ॥ असत्यमप्रतिष्ठं ते जगंदाहुंरनीश्वरम् । अपरस्परसम्भूतं किमन्यत्कामहैतुकम् ॥८॥ वे असुरंप्रकृति मनुष्य इस जगत्को कोई तो असत्य याने मिथ्यों और भ्रम कहते हैं कोई अप्रतिष्ठे याने इसका कोई आधार नहीं ऐसा कहते हैं कोई अनीश्वर कहते हैं स्त्रीपुरुषके परस्पर संयो- गसे हुए विना और जगत् क्या है केवल कामहीके निमित्तसे याने स्त्रीपुरुषके संयोगसेही होता है ऐसा कहते हैं ॥ ८॥ 'एतां दृष्टिमवष्टभ्यं नष्टांत्मानोऽल्पबुद्धयः। प्रमर्वत्युग्रकर्माणः क्षयाये जगतोऽहिंताः ॥९॥ वे अज्ञानी जन खानपानादिक अल्पपदार्थमें बुद्धिवाले ऐसी सर्मुझको ग्रहण करके उग्र कर्म करनेवाले याने परस्त्रीधन पुत्रा- दिकोंके हरण करनेवाले सर्वके अंहित जगतके नाशके वास्ते प्रवृत्त होते हैं ॥ ९ ॥ काममाश्रित्ये दुष्पूरं दंभमानमान्विताः । मोहांगृहीत्वाऽसद्ग्राहांन्प्रवर्ततेऽशुचिव्रताः ॥१०॥ जो दुःखसे भी न पूरी होय ऐसी कामनांके आश्रित होके दंभ मान और मदयुक्त भये हुए मोहंसे असदाहोंको ग्रहण करके याने 1- . . पोडशः १६.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा०टी०। (१६१) मारण मोहन वशीकरण के उपाय करनेमें भ्रष्ट आचरण स्वीकार करके अपवित्र व्रत भूतादि सेवनेवाले बनकर उनही . मारणा- दिक कामोंमें प्रवृत्त होते हैं ॥ १० ॥ चिन्तामरिमेयां चं प्रलयान्तामुपाश्रिताः। कामोपभोगपरमा एतावदिति निश्चिताः ॥ ११॥ अपार और मरणांत त्रिताको प्राप्त हो : कामोपभोगमें तत्पर इतना ही सुख है ऐसा निश्चय किये हुए ॥ ११ ॥ आशापाशशतैर्बद्धोः कामक्रोधपरायणाः । ईंहन्ते कामभोगार्थमन्यायेनार्थसंचयर्यान् ॥ १२॥ सैकडों आशाकी फांसियोंकरके बँधे हुए काम और क्रोधके स्वाधीन हुए कॉमभोगके वास्ते अन्यायकरके इव्यसंचर्यका उपाय करते रहते हैं.॥ १२॥ इदमयं मया लब्धंमिमं प्राप्ये मनोरथम् । ईदमस्तीदमपि में भविष्यपि पुनर्धनम् ॥ १३ ॥ मैंने आज यह पाया ईस मनोरथको पाँऊँगा. मेरे यह धन है" फिर यह भी होगा ॥ १३ ॥ अंसौ मया हतः शत्रुर्हनिष्ये चापरानपि । ईश्वरोहमह भोंगी सिद्धोऽहं बलवान्मुखी॥१४॥ मैंने यह वैरी मारा और औरोंको भी मारूंगा मैं ईश्वर हूं में" भोगी हूं. में सिद्ध हूं मैं बलवान हूं मैं सुखी हूं ॥ १४ ॥ आंढ्योऽभिजनवानस्मैि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया। यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य इत्यज्ञानविमोहिताः॥१५॥ मैं योग्य हूं उत्तम कुलमें जन्मा हूं मेरे सैंमान और कौन है . (१६२) भगवद्गीता। [अध्याय:- यज्ञ करूंगा दोन दूंगा आनंद करूंगा ऐसे" अज्ञानमें मोहे गहते हैं ॥ १५॥ अनेकचित्तविभ्रान्ता मोहजालसमारताः। प्रसक्ताः कामभोगेषु पंतंति नरकेऽशुचौः ॥ १६ ॥ अनेक जगह चित्त लगनेसे भ्रमिष्ट मोहके जालमें फंसे हुए जो.कोमभोगमें आसक्त वे अपवित्र नरैकमें पडते हैं ॥ १६ ॥ ओमसंभाविताः स्तब्धौ धनमानमंदान्विताः। यंजते नामयज्ञैस्ते देभेनाविधिपूर्वकम् ॥ १७ ॥ जो आपको आप ही श्रेष्ठ मान रहे हैं और. अनम्र हैं धन मान मदयुक्त हैं 4 दंर्भसे अविधिपूर्वक नाममात्रके यज्ञोंकरके यजन करते हैं ॥ १७ ॥ अहंकारं बलं दैप काम क्रोधं चं संश्रिताः। मामात्मपरदेहेषु प्रहिषतोऽभ्यसूयकाः ॥१८॥ अहंकार बैल देपं काम और क्रोध ग आश्रय कर रहे हैं ऐसे वे अपने और औरोंके देहोंमें रहे हुए मुझसे द्वेष करते हुए मेरी निंदा करते हैं ॥ १८॥ तानह द्विषतेः क्रन्सिंसारेषु नराधमान् । क्षिपाम्यजसंमशुभानासुरीलेव योनिषु ॥ १९ ॥ , मैं जैन द्वेष करनेवाले करें अशुभ नराधमोंको संसारमें आसुरी ही योनियोंमें वारंवार पटकता हूं ॥ १९ ॥ आसुरी योनिमापन्ना मूढो जन्मनिजन्मनि । मांमप्राप्यैव कौन्तेये तो यात्यधमांगतिम्॥२०॥ हे कंतीपुत्र । वे मूर्ख जन्मजन्ममें आँसुरी योनिकों प्राप्त हो मुझको न प्राप्त होके फिरें अधमगतिको प्राप्त होते हैं॥ २० ॥ ;.; - पोडशः १६.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा टी०। (१६१ त्रिविध नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः । काम क्रोधस्तथा लोमस्तस्मादेतत्रयं त्यजेत्॥२१॥ काम, क्रोध तथा लोभ यह तीन प्रकारका नरककों द्वार अपना नाशनेवाला है याने संसारमें भ्रमानेवाला है इससे इन तीनोंको त्यागना चाहिये ॥ २३॥ . एतैविमुक्त कौन्तेय तमोहास्प्रिंभिर्नरः ।... आचरत्यात्मनः श्रेयस्ततो याति पैरां गतिम्॥२२॥ हे कुंतीपुत्रं । इन तीनों नरैकद्वारोंसे छूटा हुआ मनुष्य अपने कल्याणका साधन करता है उससे परमपदको प्राप्त होती है ॥ २२॥ यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्त्तते कामकारतः। नसं सिद्धिमाप्नोति नै सेख नै परां गतिम् ॥२३॥ जो शास्त्रविधिको त्यागके स्वइच्छाप्रमाण चलता है सो न सिद्धिको पाता है न सुखैको न मोक्षको पाता है ॥ २३ ॥ तस्माच्छास्त्रं प्रमाण ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ । ज्ञात्वां शास्त्रंविधांनोक्तं कर्म कर्तुमिहाहसि ॥२४॥ इति श्रीमद्भगवद्गीतासुपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे देवासुरसंपद्विभागयोगो नाम षोडशोऽध्यायः ॥१६॥ इससे तुमको कार्याकार्यव्यवस्थामें शास्त्र प्रमाण जानके इस लोकमें शास्त्रविधानोक्तं कर्म करना योग्य है ॥ २४ ॥ इति श्रीमत्सुकुलसीतारामात्मजपंडितरघुनाथप्रसादविरचितायां श्रीमद्भगवद्गीतां- मृततरंगिण्यां षोडशाऽध्यायप्रवाहः ॥ १६ ॥.

. (१६४), . भगवैद्रीता। [ अध्यायः अर्जुन उवाच । थे शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजंते.श्रद्धयान्वितामा तेषां निष्ठां तु का कृष्ण सत्त्वंमोहो रजस्तमः॥१॥ सोलहवें अध्यायमें ईश्वरतत्त्वका ज्ञान और ईश्वरप्राप्तिको उपाय इनके मूल कारण वेदही हैं ऐसे कहा और अंत में कहाँ कि, शास्त्रविधिहीन कर्म करनेवालेको सुखादिक नहीं हि सो सुनके अर्जुन बोले-कि, हे कृष्ण ! जो शास्त्रविधिको त्यागके श्रद्धांकरके युक्त यजन करते हैं उनकी क्या निष्ठा. हैं सत्त्वगुण है किंवा रजोगुण तमोगुण हैं ॥ १॥ विविधा भवंति श्रद्धा देहिनों सौ स्वभावजी सात्त्विकीराजसी चैवं तामसी 'चेति ती शृणं ॥२ अर्जुनका प्रश्न सुनके श्रीकृष्ण भगवान कहते हैं-कि, सी- त्त्विकी और राजसी और तामसी ऐसे तीन प्रकारको निश्चय श्रद्धो होती है." सो देहधारियोंकी स्वभावंसेही होती है उसको मुंनो ॥२॥ सत्त्वानुरूंपा सर्वस्य श्रद्धां भवेति भारत श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छंद्धः स एव सेः हे भारत ! सबकी श्रद्धा अंतःकरणके अनुरूप होती है यह पुरुष श्रद्धामय है. जो जिस श्रद्धावाला होता है. सों वही होती है जैसे सात्त्विकी श्रद्धावाला सात्त्विक इत्यादि ॥ ३ ॥ यजंते सात्त्विका देवाने यक्षरक्षांसि सजसा । प्रेतान् भूतगणांश्चान्ये यजते तामसां जनाः ॥४॥ सात्त्विक पुरुष देवताओंको पूजते हैं, रोजसी यक्षराक्षसोंको और अन्य तामसी जने प्रेत भूतगणोंको पूजते हैं ॥४॥ / सप्तदः:१७:] सान्वय-अमृततरंगिणी भाटी । (१६९) अशास्त्रविहितं घोरं तप्यते ये तंपो जनाः। दभाहंकारसंयुक्ताः कामरागवलान्विताः ॥५॥ कैर्षयतः शरीरस्थं भूतैग्राममचेतसः। मी चैति शेरीरस्थं तान्वियासरनिश्चयाँन ॥६॥ दंभ और अहंकार संयुक्त कामना और विपयानुराग इन- की ही सेनासे युक्त वे मनुष्य अशास्त्रविहित यांने जो शास्त्रप्र- सिद्ध नहीं ऐसे घोर तपको तपते हैं वे अज्ञानी जने शरीरमें रहे.ए. भूतसमूहको और अंदर शरीरमें स्थित मुझको भी दुःखें देते हैं उनको आसुर निश्चय याने, असुरपनेमें निश्चय जिनका: रेसे उनको जॉनो॥६॥६॥ आहारस्वपि सर्वस्य विविधो भवति प्रियः । हास्यजस्तपैस्तथा दानं तेषों भेदैमिमं शृणु ॥७॥ आहार भी सर्वका तीन प्रकारका प्रिय होता है और यज्ञ तथा तप दान ये भी तीन प्रकारके हैं इनका भेदे यह सुंनो ॥ ७॥ आयुःसत्त्वबलारोग्यसंखप्रीतिविवर्द्धनाः । रस्याः स्निग्धाः स्थिरांहद्योआहाराःसात्त्विकप्रियाः॥ जो आहार आयुष्य होशियारी बल आरोग्य सुख और प्रीतिके बढानेवाले हो मधुरादिरसयुक्त स्निग्ध स्थिर याने बहुतकाल रह- नेवाले हैदयके वर्द्धक ऐसे आहार साँत्त्विक जनोंको प्रिय होते हैं ८ कटुम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः । आहारों राजसस्येष्टो दुःखशोकामयप्रदाः ॥९॥ अतिकटु जैसे बहुत मिर्चवाला पदार्थ अतिखट्टा अतिलोन- वाला बड़ा वगैरह अति गरमागरम अति तीक्ष्ण राई आदि मिश्रित अति रूखे और दाहकारक राजसियोंके प्रिय आहार दुख शोक और रोगोंके देनेवाले होते हैं ॥ ९ ॥ TO

(१६६) भगवद्गीता। [ अध्यायः
यातयामं गतरंसं पंति पर्युषितं च यत् ।
उच्छिष्टमपि चांमध्यं भोजनं तामसप्रियम् ॥१०॥
जिस भात वगैरेको एक पहर बीता हो वह ठंढा पैदार्थ
रसविहीन. दुगर्धेवाला और बासी और उच्छिष्ट भी ऐसा अपे-
वित्र भोजन तामसियोंको प्रिय होता है ॥ १० ॥
अफलांकांक्षिभिर्यज्ञो विधिदृष्टो य इज्यते ।
यष्टव्यमेवेति मनः समाधाय से सात्त्विकः ॥११॥
यज्ञ करना ही योग्य है ऐसे मनको समाधान करके फल-
इच्छारहित मनुष्योंने विधिपूर्वक जो यज्ञ किया हो सो" यह
सात्त्विक है ॥ ११॥
अभिसंधार्य फलं दम्भार्थमपि चैवं यत्।
इज्यते भरतश्रेष्ठ ते यज्ञं विद्धि' राजसंम् ॥१२॥
हे भरतश्रेष्ठ । जो फलकी इच्छाँकरके और दंभके वास्ते मी.
यज्ञ करे उस यज्ञको राँजस जानो ॥ १२॥
विधिहीनेमसृष्टान्नं मंत्रहीनमदक्षिणम् ।
श्रेताविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते ॥ १३ ॥
जो विधिहीन चित अन्नहीन मंत्रहीन देक्षिणारहित और
अंधारहित यज्ञ हो सो तामसँ कहा है ॥ १३ ॥...
देवहिजगुस्प्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम् ।
ब्रह्मचर्यमहिंसा चे शारीरं तर्प उच्यते ॥ १४॥
देव ब्राह्मण गुरु और विद्वानोंका पूजन शुचिता सरलता
ब:चर्य और परपीडावर्जन यह शरीरसंबंधी तप कहा है ॥१४॥
अनुढेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत् ।
स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वा यं तपं.उच्यते ॥१५॥

सप्तद० १७.] सान्वय-अमृततरगिणी भाटी०। (१६७ जो वचने उद्धेगकारक न होये और सत्यप्रिय हित होर्य और वेदपाठ मंत्रजपादिकोंका अभ्यास यह वाणीमये तप कहाँ है ॥ १५॥ मनप्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः। भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते ॥ १६ ॥ मनकी प्रसन्नता सदयपना याने कर न होना, मितभाषण मनको वश करना और अंतःकरणकी शुद्धता यह इतनां तप मानसं कहांता है ॥ १६॥ श्रद्धया परयाँ तप्तं तपस्तंत्रिविधं नरैः। अफलोकांक्षिभिर्युक्तैः सात्त्विकं परिचक्षते ॥ १७॥ फलकी इच्छा न करनेवाले योग्य पुरुष तिनकरके परेम ट्रांकरके तपाहुआ सो तीनों प्रकारका याने मानस, कायिक चिक तैप सात्त्विक कहाँ है ॥ १७ ॥ । सत्कारमानपूजार्थं तपो दंभेने चर्वं यत'। क्रियते तदिहे प्रोक्त रीजसं चलमध्रुवम् ॥ १८ ॥ जो तप, सत्कार मान और पूजाके वास्ते और दंभकरके भी किया जाता है सो. यहां शास्त्र में राजस चले और नौशमान कहा है ॥ १८॥ मूढग्राहेणात्मनो यत्पीडया क्रियते तपः। परस्योत्सादनार्थं वा तत्तामसमुदाहृतम् ॥ १९ ॥ जो तप दुराग्रह करके आपनी पीड़ाके निमित्त अथवा दूसरेके बिगाड़के वास्ते किया हो सो तामस कहा है ॥ १९॥ दातव्यमिति यहांनं दीयतेऽनुपकारिणे । देशे काले च पात्रे च तद्दीनं सात्त्विकस्मृतम् ॥२०॥ जो दान देना ही चाहिये ऐसी बुद्धिकरके कुरुक्षेत्रादि देशमें और महणादिकालमें जिससे फिर कुछ अपना उपकार न होय -- . (१६८) भगवद्गीता। [अध्याय:- ऐसेको तथा वह पात्र याने तपस्वाध्याय करके रक्षक होय उसको दिया जाय सी दोन सात्विक कहा है ॥ २०॥ यत्तु प्रत्युपकारार्थ फर्लमुद्दिश्य वो पुर्नः। दीयते च परिक्लिष्टं तंद्राजसैमुदाहृतम् ॥ २१ ॥ जो प्रत्युपकारके वास्ते अथवा फर्लके निमित्त करके फिर भी राहुवगैरह ग्रहनिमित्त उग्रदान दिया जाय 'सो राजेस कहा है ॥२१॥ अदेशकाले यदानमपात्रेभ्यश्च दीयते। असत्कृतमवज्ञातं तेत्तामसमुदाहृतम् ॥ २२ ॥ जो दांने तिरस्कार अवज्ञापूर्वकै देशकालविना और कुपा- बौंको दिया जाता है सो दोन तामसे कहा है ॥ २२ ॥ ओं तत्संदिति निर्देशो ब्रह्मणविविधः स्मृतः ।।" ब्राह्मणांस्तेने वेदाश्च योश्च विहिताः पुरौ ॥२३॥ ओं तंत् संत ऐसे. तीने प्रकारका वेर्दका निश्चय-जाना गया है "याने ओंशब्दसे कर्मका स्वीकार करना उचित है, तत् शब्दसे तदर्थ याने परमेश्वरार्थ करना उचित है सत्से श्रेष्ठकर्म साधु- वृत्तिसे करना ऐसा वेदका निश्चय है" उसी निश्चयकरके युक्त ब्राह्मण याने वेदकर्म करनेवाले तीनों वर्णकर्मस्वीकारार्थ और वेद जो ईश्वरार्थकर्मको प्रतिपादन करते हैं और यज्ञ दान जो सत्कर्म य मैंने पूर्वकालमें स्थापित किये हैं ॥२३॥: तस्मादोमित्युदाहृय॑ यज्ञदानतपक्रियाः॥ प्रवेति विधानोक्ताः सततं ब्रह्मवादिनाम् ॥२४॥ जिससे कि वेदवादीतीनों वर्ण कर्म स्वीकारार्थ हैं इससे ओं ऐसे कहिकेयाने कर्म स्वीकार करके वेदवादी तीनों वर्णो की वि- विसे कही हुई यज्ञ दान,तपकी क्रियायें निरंतर प्रवर्त होती हैं २०॥

सप्तद० १७. सान्वय-अमृततरंगिणी भाटी । (१६९)
तदित्यनभिसंधार्य फलें यज्ञतपाक्रियाः ॥
दानक्रियाश्च विविधाः क्रियते मोक्षकांक्षिभिः २५॥
तत् याने कर्म तदर्थ है याने पमेश्वरार्थ है ऐसी बुद्धिसे फले-
कर अनुसंधान नहीं करके यज्ञ, दान, तप, क्रिया और अनेक
प्रकारकी दान किया मोक्षके चाहनेवालों केरके की जाती हैं।॥२५॥
सद्भावे साधुभावे चे सैदित्येतत्प्रयुज्यते ॥
प्रशंस्ते कर्मणि तथा सच्छन्दः पार्थ युज्यते ॥२६॥
हे अर्जुन । श्रेष्ठपनेमें और साधुभावमें सत् ऐसा यह वाक्य
युक्त करते हैं तथा श्रेष्ठ कर्ममें भी सैदशब्द युक्त करते हैं॥२६॥
यज्ञे तपसि दाने चे स्थितिः सदिति चोच्यते॥
कर्म चैव तदर्थीयं संदित्येवाऽभिधीयते ॥ २७ ॥
जो यज्ञमें, तपम और दानमें स्थिति है सो सतं ऐसे
कहाँती है और जो ईश्वरार्थ कर्म हैं सो सत् निश्चय हैं ऐसे" कहते
हैं इन चारों लोकोंमें ॐ तत् सत् इनका खुलासा किया है।॥२७॥
अश्रद्धयाँ हुतं देत्तं तपस्तप्तं कृतं चयत् ।।
असदि त्युच्यते पार्थ नै च तत्प्रेत्यै नो इहँ ॥२८॥
इति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे
श्रीकृष्णार्जुनसंवादे श्रद्धात्रयविभागयोगो नाम
सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७॥
हे पृथापुत्र ! जो श्रद्धाविना होमाहुआ हवन दियो दान
तपाईआ तप और कियाहुआ कर्म है सो असर ऐसी कैहाता
है सोने परलोकमे ने इस लोकमें सुखदायक है ॥ २८॥
इति श्रीमत्सुकुलसीतारामात्मजपंडिवरघुनाथप्रसादविरचितायां श्रीमद्भगवदी-
वामृततरंगिण्यां सप्तदशाऽध्यायप्रवाहः ॥१७॥

(१७०) भगवद्गीता। [अध्याय:- अर्जुन उवाच । संन्यासस्य महाबाहोतत्त्वमिच्छामि वेदितुम् ॥ त्यागस्यं चे हृषीकेश पृथक्केशिनिषूदन ॥१॥ अब इस अठारहवें अध्यायमें सर्वगीताका सारांश निरू- पण होगा, तहां अर्जुन प्रश्न करते हैं कि, हे महाबाहो ! हे हेषी- केश । हे केशिनिषूदन ! संन्यासका और त्यागको तत्त्व न्यारा न्यारा जाननेको चाहती हूं ॥ १ ॥ श्रीभगवानुवाच। काम्यानां कैमणां न्यासं संन्यांसंकर्वयो विः । सर्वकर्मफलत्यागीहुस्त्यांगं विचक्षणाः॥२॥ ऐसा अर्जुनका प्रश्न मुनिके श्रीकृष्णभगवान् बोलतेभये कि, कवि जो सारासारविवेकी वे कामनावाले कर्मोके छोड़- नेको संन्यास जानते हैं और विचक्षणं जो तत्त्वज्ञानी हैं वे सर्व- कर्मोंके फलत्यागको त्याग कहते हैं ॥२॥ त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहर्मनीषिणः । यज्ञदानत कर्म नै त्याज्यमिति" चापरे ॥३॥ कोई एक ज्ञानीपुरुष दोषवाला कर्म त्यागना चाहिये ऐसे कहते हैं और कितनेक और आचार्य यज्ञ, दान, तप, कर्म नहीं त्यागना चाहिये ऐसे कहते हैं ॥ ३ ॥ निश्चयं शृणु में तत्र त्यांगे भरतसत्तम।। योगो हिं पुरुषव्याघ्र त्रिविधैः परिकीर्तितः॥४॥ यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत् । यज्ञो दानं तपेश्चैवं पावनानि मनीषिणाम् ॥५॥ हे भरतसत्तम ! उस त्यांगमें मेरों निश्चयं सुनो हे पुरुष में श्रेष्ठ! --

अष्टाद० १८.] सान्वय-अमृततरङ्गिणी मा टी०। (१७१)
जिससे कि, त्याग तीन प्रकारकों कहा है ईसीसे यज्ञ, दान
तपरूप कर्म, नहीं त्याग करना ही योग्य है क्योंकि यह दॉन
और तैप ये ज्ञानियोंको" भी पवित्र करनेवाले हैं॥४॥५॥
एतान्यपि तु कर्माणि संगं त्यक्त्वा फलानि चै।
कर्तव्यानीति में" पार्थ निश्चितं मतैमुत्तमम्॥६॥
हे पार्थ । ये यज्ञादिक भी कर्म ममता और फलों को त्यागके
करनेयोग्य हैं ऐसो निश्चय कियाहुआ मेरों उत्तम मत है ॥६॥
नियतस्य तु संन्यासैः कर्मणो नोपपद्यते ।
मोहात्तस्यं परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः ॥७॥
कारण कि, जो नियमित संध्यादि पंचमहायज्ञादिक हैं उस
कर्मका त्यागें नहीं हो सकता है जो मोहसे किया उसका त्यागे
सों तामस कहाता है॥ ७॥
दुःखमित्येवं यत्कर्म कायक्लेशभयांत्यजेत्।
सं कृत्वा राजसंत्यागंनैव त्यागैफलं लभेत् ॥८॥
जो, कर्म दुःख ऐसे शरीरंक्लेशके भयसे ही त्यागे वह त्यागने-
वाला रोजस त्यागको करके त्यागके फैलको नहीं पाता है ॥८॥
कार्यमित्येवं यत्कर्म नियतं क्रियतेऽर्जन ।
सत्यक्त्वों फलं चैव से त्यागैःसात्त्विको मतः॥९॥
हे अर्जुन ! जो कर्म करनेही योग्य है ऐसीबुद्धिसे ममता
और फलको त्योगिके नियमित याने उचित है ऐसी ही
बुद्धिसे कियाजाय सो त्याग सात्त्विक जाना है ॥९॥
नं दृष्ट्यकुशलं कर्म कुंशले नोनुषंजते।
त्यागी सत्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशयः॥१०॥

(१७२) भगवद्गीता। [अध्यायः- जो सत्त्वगुणयुक्त बुद्धिमान, संशयरहित कर्मफलांगी है सो अकुशलको याने संसारेकारक कर्मको न निंदा है ने कुशल याने यज्ञादिक कर्ममें आसक्त होता है ॥ १० ॥ नं हिं देहभृतां शक्यं त्यक्तं कर्माण्यशेषतः। यस्तु कर्मफलत्यागी से त्यागीत्यभिधीयते॥११॥ जिसवस्ति कि, देहधारी सब कर्म त्यागनेको समर्थ नहीं हो सकता है इससे जो कर्मफलंका त्यागी हैं वह त्यागी ऐसी कहा है ॥ ११ ॥ अनिष्टमिष्ट मिश्रं च त्रिविध कर्मणः फलम् । भवत्यत्यागिनां प्रेत्यं न च संन्यासिनांकर्चित् ॥१२॥ अप्रिय प्रिय और मिश्रित ऐसा कर्मकां तीन प्रकारका फल कर्मफलानुरागियोंके मरेपर होती है और कर्मफलत्योगि- योंको कहीं भी नहीं होता ॥ १२ ॥ पञ्चैतॉनि महाबाहो कारणानि निबोधे में। सांख्ये इंतति प्रोत्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम् ॥१३॥ हे महाबाहो ! संबकर्मोंकी सि के वास्ते ये पांच कारण सांख्यसिद्धांतमें कहे गये हैं सो मेरेसे सुनो ॥ १३ ॥ अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथंग्विधम् । विविधांश्च पृथके चेष्टा दैवं चैवान पंचमम॥१४॥ वे ये कि, अधिष्ठान याने आधार अर्थात् शरीर तथा कर्ता याने जीव इस जीवके कर्त्तापनमें "ज्ञोऽज एव" "कर्ता शास्त्रा- र्थत्वात्" यह ब्रह्मसूत्र प्रमाण है, और न्यारे न्यारे प्रकारके करण याने मनसहित पंच इंद्रियोंके व्यापार और अनेक प्रकारकी न्यारी चेष्टा याने पांच प्रागवायुओंकी चेष्टा और अष्टाद० १८.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा टी०। (१७३) यहां पांचवां दैव याने अंतर्यामी अर्थात् मैं हूं इस विषयमें “परात्तु तच्छुतेः" यह ब्रह्मसूत्र भी प्रमाण है। इसका शंकासमा- धान वाक्यार्थबोधिनीमें किया है ॥ १४ ॥ शरीरवाइमनोभियत्कर्म प्रारभतेऽर्जने। न्याय्यं वो विपरीतं वा पंञ्चैते" तस्य हेतवः॥१५॥ हे अर्जुन ! शरीर वाणी और मन करके जो न्याय अथवा अन्यायपूर्वक जो कर्म प्रारंभ किया जाता है उसके ये पांच कारण हैं ॥१५॥ तत्रैवं संति करिमात्मानं केवलं तु यः । पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न से पश्यति हुँर्मतिः ॥१६॥ ऐसे सिद्धांत होनेपर भी तहाँ जो केवल आत्माको का जानता है सो दुईद्धिपुरुष अकृतद्धित्वसे याने यथार्थनिश्चय- कारक बुद्धिहीन होनेसे नहीं जानता है ॥ १६ ॥ यस्य नोहचतो भावो बुद्धिर्यस्ये न लिप्यते । हत्यापि से .माँल्लोकानी हति" नै निबध्यते ॥१७॥ जिसके अपने कत्तापनका भाव नहीं है जिसकी बुद्धि कर्ममें नहीं लिप्त होती है सो ईन लोकोंको मारके भी न मारती है ने पापमें बँधता है तात्पर्य यह कि, तुम भीष्मादिकके वधसे डरते हो जो मनुष्य ममता अहंतारहित होके स्वधर्माचरण करता है उसको उस कर्मजन्य पापपुण्यका भय नहीं होता ॥ १७ ॥ ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिवि) कर्मचोर्दैना। करणं कर्म कतैतिं विविधः कर्मसंग्रहः ॥ १८ ॥ ज्ञान जो कर्तव्यकर्मका जानना ज्ञेय जो वह कर्म, परि- ज्ञाता उसके सम्यक् जाननेवाले ऐसे तीन प्रकारका शास्त्रवि- धान है तहां करण जो कर्म करनेकी साधनसामग्री जैसे यज्ञमें घुवादिक युद्ध में शस्त्रादिक, कर्म जो करना हो, कर्ता करनेवाला ( १७४) भगवद्गीता। [अध्यायः- ऐसे तीन प्रकारका कर्मके वास्ते संग्रह है अर्थात् इनहीसे होस- केगा इनविना नहीं ॥ १८॥ ज्ञानं कर्म च कर्तेति त्रिधैवं गुणभेदतः। प्रोच्यते गुणसंख्याने यथावैच्छणु तान्यपि॥१९॥ ज्ञान कर्म और कत्ती ऐसे ये गुणभेर्दकरके सांख्यशास्त्रमें तीन प्रकारहीके केहे हैं उनको भी यथावत् सुनो ॥ १९ ॥ - सेर्वभूतेषु येनैक भावमव्ययंमीक्षते । अविभक्तं विभक्तषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम् २०॥ जिस ज्ञानकरके ब्राह्मण क्षत्रियादि विभागयुक्त सर्वभूतोंमें आत्मा विभागरहित याने समान है ऐसे अविनाशी एक भाँवको देखता है उसे ज्ञानको सात्त्विक जानना ॥२०॥ पृथक्वेन तु यज्ज्ञान नानाभावान पृथग्विान् । वेर्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञान विहिं राजसम् ॥२१॥ और जो सब भूतोंमें अनेक भावाविष्ट यानी ब्राह्मणादि छोटे - बडे उत्तम मध्यम दृश्यमान भेदयुक्त आत्माको भी उत्तम मध्यम न्यारे न्यारे जानता है इस न्यारेपनेकरके जो ज्ञान है उँस ज्ञानको राजैस जौनो ॥ २१ ॥ : येत्तु कृत्स्नवैदेकस्मिन कार्ये संक्तमहैतुर्कम् । अतत्त्वार्थदेल्पं च तत्तामसमुदाहृतम् ॥ २२॥ जो कि' एक ही कमें आसक्त हो उसेही सर्वफलयुक्त जाने पर वास्तवमें वह निरर्थक हो, कारण कि इसमें तत्त्वार्थ नहीं है और तुच्छ है यानी भूतादि आराधनरूप ज्ञान सो तामैस कहीं है ॥ २२॥ नियंत सङ्ग्रहितमरागद्वेषतः कृतम् । अफलप्रेप्सुना कर्म यत्सात्त्विकर्मुच्यते ॥२३॥ 11 अष्टाद० १८.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा टी । (१७५) जो कर्म फलकी इच्छा न करनेवालेने जानकर कर्त्तव्य फला- संगरहित और राग द्वेष विना किया हो सो सात्त्विके कहाँ है२३॥ यत्तुं कामप्सुंना कर्म सहिंकारेण वा पुनः । क्रियते बहुलायासं तंद्रासमुदाहृतम् ॥ २४ ॥ जो बहुत परिश्रमयुक्त कर्म, कामनाकी प्राप्तिकी इच्छाकरके अर्थवा फिर अहंकारसहित किया हो सो राजस कहाँ है ॥२४॥ ...अनुबंधं क्षयं हिंसामनवेक्ष्य चे पौरुषम् मोहादारभते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते ॥ २५ ॥ जिस कर्मके परिणामका दुःख द्रव्यादिकका क्षय तथा प्राणि- पीडा और अपने पुरुषार्थको न देखके मोहँसे जो कर्म आरंभ किया जाता है सौ तामस कहोता है ॥ २५ ॥ मुक्तसंगोऽनहंवांदीघृत्युत्साहसमन्वितः । सिद्धघसिद्धयोनिर्विकारःकर्ती सात्त्विक उच्यते २६ जो पुरुष कर्मफलासक्तिरहित अर्थात मैं कर्ता हूं ऐसे न मान- नेवाला धीरज और उत्साहयुक्त तथा सिद्धि और असिद्धिमें निर्विकार हो सो कर्त्ता सात्त्विक कहाँता है ॥२६॥ रागी कर्मफलप्रेप्सुलुब्धो हिंसात्मकोऽशंचिः। हर्षशोकान्वितः कर्ती राजसः परिकीर्तितः॥२७॥ जो कर्ममें आसक्त होके कर्मफलको चाहनेवाला लोभी अर्थात् कर्ममें यथार्थ खर्चका न करनेवाला प्राणिपीडा करनेवाला अप- वित्र हर्षशोकयुक्त हो सो कत्तौ राजस कहा. है ॥ २७ ॥ अयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शंठो नैष्कृतिकोऽलसः । विषादी दीर्घसूत्री च कर्त्ता तामस उच्यते ॥२८॥ । जो शास्त्रोक्त कर्मके अयोग्य विद्याहीनं अनम्र मारणादिकर्ममें - . (१७६) भगवद्गीता। [अध्यायः- तत्पर ठगं आलसी विषाद करनेवाला और घड़ीके काममें एक दिन बितानेवाला हो सो कर्ती तामस कहाता है ॥ २८ ॥ बुद्धेमेंदें धृतेश्चैवं गुणतस्त्रिविधं शृणुं। प्रोच्यमानमशेषेणं पृथंकेन धनंजय ॥२९॥ हे धनंजय ! संपूर्ण न्यारा न्यारा मेरा कहा हुआ गुणोंकर- के तीन प्रकारका बुद्धि और धीरेजका भेदै सुनो॥२९॥ प्रतिंचं नितिं च कार्याकार्ये भयाभये । बैंध मोक्षं चैयां वेति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी ३०॥ हे पार्थ! जो बुद्धि प्रवृत्तिता निवृत्ति कार्य अंकार्य और भय अभय बंध और मोक्षको जानती है सो सात्त्विकी कहाती है ३० यया धर्ममधर्म चे कार्य चाकार्यमेव च। अयथावत्प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजैसी॥३१॥ हे पृथापुत्र | जिस बुद्धिकरके धर्म और अधर्म तथा कार्य और अकार्यको भी उलटों जानै सो बुद्धि राजैसी है॥ ३१ ॥ - अधर्म धर्ममिति यां मन्यते तमसावृता । सर्वार्थाविपरीतांचे बुद्धिः सा पार्थतामसी ॥३२॥ हे पार्थ! जो बुद्धि अॉनसे ढकी हुई होनेके कारण अधर्मको धर्म यह तथा सव अर्थोंको उलटे मौन सो तामसी है॥ ३२॥ धृत्या ययाधारयते मन नाणेन्द्रियक्रियाः। ..योगेनाव्यभिचारिण्याधृतिःसां पार्थ सात्त्विकी३३ हे पार्थ ! जिसे अखंडमोक्षसाधनरूपधारणाकरके योगवलसे मन प्राण और इंद्रियोंकी क्रियाको धारण करे सो धारणा सात्त्विकी है॥३३॥ ययां तु धर्मकामार्थीन् धृत्यां धारयते नरेः । .. प्रसंगेन फलाकांक्षी धृतिः सा पार्थ रोजसी॥३४॥ -- -- अष्टाद.१८] सान्वय-अमृततरंगिणी भा टी०। (१७७) : हे पार्थ ! फलकी इच्छा करनेवालों पुरुष फैलकी इच्छाके प्रसंगसे जिर्स धारणार्करके धर्म अर्थ कामोंको धारण करता है सो धारणा रीजसी है ॥ ३४ ॥ यया स्वप्नं भयं शोक विषादं मदमे छ। ने विमुंचति दुर्मेधा धृतिः सा तामसी मता ॥३५॥ दुष्टबुद्धि पुरुष जिस धारणाकरके स्वप्न भयें शोक विषाद और मंदको नहीं त्यागता है उस धारणाको तामसी मानते हैं ॥३५॥ सुखं विंदानी त्रिविधं शृणु में भरतर्षभ । अभ्यासाद्रमते यत्रं दुःखांतं चै निगच्छति ॥३६॥ यत्तदंग्रे विमिव परिणामेऽमृतोमम् । तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तैमात्मबुद्धिप्रसादजम् ॥३७॥ . : हे भरतश्रेष्ठ अब सुखे भी तीन प्रकारका मुझसे सुनो, जिस सुखमें अभ्यास करनेसे मन रमता है और दुःखका नाश होता है, जो उसके पहिले विषतुल्य तथा अंतमें अमृततुल्य हो वह आत्म- बुद्धिकी प्रसन्नतासे उत्पन्न हुआ सुख सात्त्विक कहाँ है॥३६॥३७॥ विषयेन्द्रियसंयोगांद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम परिणामे विषमिव तंत्सुखं राजेसं स्मृतम् ॥ ३८॥ जो विषयेंद्रियके संयोगसे. प्रारंभ में अमृततुल्य हो और अंतमें विपके तुल्यं हो सो सुर्ख राजेस कहाँ है ॥ ३८॥ देने चौर्नुबंधे च सुखं मोहनमात्मनः। निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम् ॥ ३९ ॥ जो प्रारंभमें और अंतमें भी अपना मोहक सो ऐसा निद्रा आलस और प्रमादसे उत्पन्न सुखं तामस कहाँ है ॥ ३९ ॥ नै तेदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेष वा ए॒नः ।

( १७८) भगवद्गीता। [अध्यायः-
सत्त्वं प्रेकृतिजैर्मुक्तं यदेमिः स्यांत्रिभिर्गुणैः ॥ ४० ॥
जो वस्तु प्रकृति से उत्पन्न इन सत्त्वादि तीनों गुणोंकरके
मुक्त हो सो पृथिवीमें"वा स्वर्गमें वो फिर वहां भी देवोंमें
नहीं है॥४०॥
ब्राह्मणक्षत्रियविंशां शूद्राणी चे परंतप ।
कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः॥ ४१ ॥
हे परंतप । ब्राह्मण क्षेत्रिय वैश्योंके और शूद्रोंके स्वभावेसे
उत्पन्न गुणोंकरके कर्म न्यारेन्यारे किये हैं ॥ ११ ॥
शेमो दमस्तपः शौचं क्षौतिरॉर्जवमेव च ।
ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम्॥४२॥
शम जो बाह्यइंद्रियोंका संयम, दमै अंतःकरणका संयम, तप
शास्त्रोक्त व्रतादिक, शौर्च बाह्य और आभ्यंतर, क्षमा और सर-
लता, ज्ञान स्वस्वरूप परस्वरूपका जानना, विज्ञान जो स्वरू-
पज्ञान होनेपर ईश्वरभक्ति करना, आस्तिक्यं जो वेदशास्त्रके
वाक्योंमें विश्वास, ये सब ब्राह्मणके कर्म स्वभावसे ही हैं।॥४२॥
शौर्य तेजो धृतिर्दाक्ष्य युद्धे चौप्यपलायनम् ।
दानमीश्वरभावश्चे क्षात्रं कर्म स्वभावजम् ॥ ४३ ॥
शूरपना तेज याने जिससे दूसरे डरे धीरज चतुराई और
युद्धमें भागना नहीं उदारता और प्रजाको स्वाधीन रखना यह
क्षत्रियको स्वभावज कर्म है ॥ १३ ॥
कृषिगोरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावर्जम् ।
परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम् ॥४४॥
खेती करना गाई. पालना वणिज करना यह वैश्योंका स्वा
भौविक कर्म है तथा तीनों वर्गों की सेवॉलप कम शूद्रका
स्वभावसे है ॥४४॥

अष्टाद. १८.] सान्वय--अमृततरंगिणी भा०टी०। (१७९) स्वे स्वे कर्मण्येभिरतः संसिद्धि लभते नरः । स्वकर्मनिरंतः सिद्धिं यथा विदति तच्छ ॥४५॥ ऐसे आपआपके कर्ममें तत्पर हुआ मनुष्य सिद्धिको यानी मोक्षको प्राप्त होता है, स्वकर्मनिष्ट पुरुष जैसे मुक्तिको पाती है सो'मैंनो ॥ ४५ ॥ यतः प्रत्तिभंतानां येन सर्वमिदं तंतम् । स्वकर्मणां तमभ्यर्च्य सिद्धि विदतिमानव॥४६॥ जिस ईश्वरसे भूत प्राणियोंकी उत्पत्ति हुई तथा रक्षण होता है जिर्स करके यह सर्व विश्व व्याप्त है उस ईश्वरको आपके स्वाभाविक कभीसे पूजके मनुष्य मोक्षको प्राप्त होता है ॥४६॥ श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् । स्वभावनियंत कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्॥४७॥ अतिउत्तम परधर्मसे अपना धर्म गुणहीन भी कल्याणका- रक है. अपने जातिविहित कर्म करता हुआ पापको नहीं प्राप्त होती है. यह तात्पर्य कि तुम्हारा हिंसात्मक भी धर्म है तो भी तुम्हारा कल्याण उसीसे है ॥ १७ ॥ संहज कर्म कौन्तेये सदोषमपि ने त्यजेते। सरिंभा.हिं दोषेणे वूमेनाग्निं रिवाहताः ॥४८॥ : हे कुंतीपुत्र ! दोषयुक्त भी अपने वर्णोचित धर्मको ने त्या- गैना क्योंकि सर्वज्ञान कर्मादिकः आरंभं दोषकरके युक्त हैं जैसे धूवाँकरके अग्नि युक्त है ॥ १८ ॥ असंक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः । नैष्कर्म्यसिद्धि परंमा संन्यासेनाधिगच्छति॥४९॥ सर्व कर्मोंमें बद्धिको आसक्त न करनेवाला मनको वश किये -- ( १८०) भगवद्गीता। [अध्याय:- हुए वांछारहित पुरुष परमं नैष्कर्म्यसिद्धिको याने आत्मज्ञा- नको त्यागकरके प्राप्त होता है ॥ १९ ॥ सिद्धि प्राप्तो यौँ ब्रह्म तथाँऽऽग्नोति निबोध मे। समासेनैव कौन्तेय निष्ठा ज्ञानस्य या परी॥५०॥ हे कुन्तीपुत्र ! उस आत्मज्ञानको प्राप्त हुआ जैसे ब्रह्मको पुरुष प्राप्त होता है वैसे संक्षेपकरके मुझसे सुंनो, जो" ध्या- नात्मज्ञानकी परम निष्ठा है याने उपायकी सीमा है उसे भी॥५०॥ बुद्धयाँ विशुद्धया युक्तो धृत्यात्मनि नियम्यं चें। शब्दांदीविषयास्त्यकारीगद्देषौ व्युदस्य चै॥५१॥ विविक्तसेवी लैंवाशी यतवाक्कायमानसः । ध्यानयोगपैरो नित्यं वैरीग्यं समुपाश्रितः ॥५२॥ अहंकार बैलं दै कामं क्रोधं परिग्रहम विमुच्य निर्ममः शांतो ब्रह्म याय कल्पते ॥५३॥ सो जैसे कि, शुद्धबुद्धिकरके युक्त और धारणाले मनको वश करके शब्दादिक विषयोंको त्यागके और रागद्वेषोंको त्यागके एकांत बैठा हुआँ अल्पौहारीशरीर वाणी और मनको वश किये हुए नित्य ध्यानयोगपरायण वैराग्यको धारण किये हुए अहंकार बल दैप कॉम क्रोधैं ममता, इन सबको त्यागके निर्ममैं शांत हुआ पुरुष आत्मज्ञानमय होती है ॥५१॥ १२ ॥५३ ॥ ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा ने शोचति नै कक्षिति। समः सर्वेषु भूतेषु मैद्भक्तिं लभते परीम् ॥ ५४॥ ऐसे आत्मज्ञानमय हुआ प्रसन्नमनयुक्त ने कोई वस्तु मेरे सिवाय जो खो गयी तो उसको न सोचता है नै चाहता है सर्व भूतोंमें समदृष्टि हुआ अतिउत्तम मेरी भक्तिको प्राप्त होती है अष्टाद०१८.] सान्वय-अमृततरंगिणी भाण्टी०। (१८१) याने सर्व जगत्को मेरे शरीरभूत परम विभूति जानके पक्षपात- रहित सर्वमें मुझहीको देखता हुआ मेरा ही स्मरण मनमें करता है कि, ये सब मेरे स्वामीके हैं यही परमभक्ति है ॥ ५४॥ भक्त्या मामभिजानातियावान्यश्चास्मितत्त्वतः। ततो माँ तत्त्वतो ज्ञात्वा विर्शते तदनन्तरम् ॥५५॥ में जितना और जो हूँ उतना और वैसा मुझको भक्तिक- रके निश्चयपूर्वक जानता है फिरै मुझको निश्चयपूर्वक जोनके मुझहीको उसके पीछे प्राप्त होता है ॥५५॥ सर्वकर्माण्यपि सदो कुर्वाणो मद्यपाश्रयः। मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम् ॥५६॥ मेरा आश्रित जन सब लौकिक वैदिक कर्मोंको भी सदो करैता हुआ मेरे अनुग्रहेसे सनातन नाशरहित पदको प्राप्त होता है।५६॥ चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्ये मत्परः। बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्तः सततं भव ॥५७॥ मेरे परायण हो' चित्तकरके सर्व काँको मुझमें स्थापित करके याने मेरे अर्पण करके, ज्ञानयोगको आश्रय करके निरं- तर मुझमें चित्तको लगाये हुए स्थित रहो ॥ ५ ॥ मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादातरिष्यसि। अर्थ चेत्त्वमहङ्कारान्न श्रोष्यसि विनक्ष्यसि ॥८॥ सुझमें चित्त लगाये हुए मेरे अनुग्रहसे सर्व संसारदुःखोंको तरोगे जो कदाचित् तुम अहंकारसे मेरा उपदेश नं सुनोगे तो नष्ट होगे" ॥२८॥ यदहकारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे । मिथ्यर्व व्यवसायस्तै प्रकृतिस्त्वा नियोक्ष्यति॥५९॥ जो अहंकारका आश्रय करके ने युद्ध करूंगा ऐसे मानोगे सो ५.

(१८२) भगवद्गीता। [अध्याय:- भी तुम्हारीं निश्चय वृथा होगक्योंकि तुमको तुम्हारा जातिस्व- भाव ही युद्धमें लगा देगा ॥१९॥ स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा। कर्तुं नेच्छसि यन्मोहाकरिष्यस्येवशोऽपितत्॥६०॥ हे कुंतीपुत्र । जो युद्ध मोहसे करनेको नहीं चाईते हो सो अपने क्षत्रियस्वभावजन्य अपने कर्मकरके बंधे हुए परवशै हुए भी करोगे.॥ ६॥ ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति। भ्रामयनं सर्वभूतानि यन्वारूढानि माययो॥६१॥ हे अर्जुन | ईश्वर अपनी मायांकरके यंत्र जोशरीर उनमें रहे हुए सब भूतोंको भ्रमाता हुआ सर्वभूतोंके हृदयस्थ में स्थिते है६३॥ तमेवं शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत। तत्प्रसादापरी शातिस्थान प्राप्स्यसि शाश्वतम्६२॥ हे 'भारत । सर्व भावना करके उसी परमात्माके शरण हो उसीके अनुग्रहसे परम शांति और सनातन स्थानको प्राप्त होवोगे॥१२॥ इति ते ज्ञानाख्यातं गुह्याद्गुह्यतरं मया । विमृश्यैतंदशेषेण यथेच्छसि तथौं कुरु ॥६३ ॥ मैंने यह गोप्यसे भी गोप्य ज्ञान तुमको कहाँ है इसको तरहसे विचारके जैसा चाहो.वैसी करो।। ६३ ॥ सर्वगुह्यतमं भूयः शृणु में परमं वचः । इष्टोऽसि में दृढमंतिस्ततो वक्ष्यामि ते"हिंतम६४॥ सर्वगोप्यमें भी अतिगोप्य मेरी परम वायं फिर सुनो मेरे : अतिदृढ़ प्रिय हो तिससे तुमको यह हित उपदेश करता हूं॥६॥ मन्मनां सर्वे मदतो मद्यांजी माँ नमस्कुरु । मामेवैष्यसि सत्यं ते तिजाने प्रियोऽसि में"६५॥ ।

अष्टाद. १८.] सान्वय-अमृततरंगिणी मा०टी०। (१८३) मुझमें मनको लगांवो मेरे भक्त हो मेरा पूजन करनेवाले. हो मुझको नमन करो मुझको ही प्राप्त होगे तुमसे सत्य प्रतिज्ञा करता हूं क्योंकि मेरे" प्रिय हो ॥ ६९ ॥ सर्वधर्मान् परित्यज्य मॉमेकं शरणं वर्ज। अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि माँ शुचः६६॥ हे अर्जुन | तुम सर्व धर्मोको परित्यांगकर याने सर्व धर्मोके फलको त्यागके अर्थात् “यत्करोषि यदनासि” इत्यारभ्य "तत्कुरुष्व मदर्पणम्" इस रीतिसे मेरे अर्पण करके मुख्य मेरे' शरण प्राप्त हो अर्थात् "स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धि विंदति मानवः" इस प्रमाणसे मुझको पूज्य और मुझको प्राप्य जानके मेरी आज्ञा करो याने मेरा पूजन जानके स्वधर्मरूप युद्ध करो मैं तुमको इन भीष्मादिकोंको युद्धमें मारने इत्यादिक सर्व पापोंसे मुक्त करूंगा तुम मैत शोच करो. यहां इस श्लोकमें कोई विद्वद्भूषण अर्थ करते हैं कि, चातुर्मास्ययाग श्राद्ध पितृ- तर्पण इत्यादि कर्मरूप धर्मोको त्यागके मेरे शरण हो याने मुझको और आपको एक ही जानो इस एकताज्ञानरूप भक्ति करो तब विचारना चाहिये कि, प्रथम तो "उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः" इत्यादि प्रमाणसे जीवब्रह्मकी स्वरूप एकता नहीं हो सकती है मुक्त होनेपर भी “मम साधर्म्यमागता" और "भोगमात्रसाम्यलिंगाच" तथा "निरंजनः परमं साम्यमुपैति" इत्यादिक गीता ब्रह्मसूत्र और श्रुति प्रमाणसे भी भोगादिकमें समता होती है एकता नहीं जहां एकता भी कही है तहां अंत- र्यामीभावसे अथवा "द्वा सुपर्णा" इत्यादि श्रुतिप्रमाण सखा- पनसे कही है दूसरे भज सेवायाम्' धातुका भक्तिशब्द होता है, भक्ति याने सेवा सो भी एकतामें बननेकी नहीं इससे जीव- परमात्मासे न्यारे परमात्माके स्वाधीन हैं यह सिद्ध हुआ तब

-
(१८४) भगवद्गीता। [ अध्याय:-
जो अर्थ किया कि, मेरी और आपकी एकतारूप भक्ति करो
सो यह अर्थ तो सिद्ध हुआ नहीं. अब जो धर्मको त्यागनेका
अर्थ किया वहाँ “धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे"।
"श्रेयान्स्वधमों विगुणः"। "स्वधर्मे निधनं श्रेयः" इत्यादि
वाक्योंमें विरोध आता है इस वास्ते सर्व धर्मोंका फल त्यागके
निष्काम और ईश्वरपूजनरूप जानके करना यही सिद्ध होता
है. यहां इसी अध्यायमें प्रमाण हैं "निश्चयं शृणु मे तत्र त्यागे
भरतसत्तम । त्यागो हि पुरुषव्याघ्र त्रिविधः परिकीर्तितः"
यहांसे लेके "संगं त्यक्त्वा फलं चैव स त्यागः सात्त्विको मतः॥
यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते” इत्यादि और भी
कहे हैं. ग्रंथ बढनेके भयसे नहीं लिखते हैं, मुझजन इतनेमेही
समझके धर्माचरण करेंगे ॥ ६६ ॥
इदं तें नातपस्काय नाऽभक्ताय कदाचन ।
नचांशुश्रूषवे वाच्यं नैच मां योऽयसूयति ॥६७॥
हे अर्जुन ! जिसने तैप न किया हो तथा मेरा और मेरे
जनोंका भक्त न हो और जो उपदेष्टाकी सेवा न करे और जो
मेरी निंदा करे उसको तुम येह कभी ने कहना ॥ ६७ ॥
इयं दं परमं गुह्यं मंदक्तेष्वभिधास्यति ।
भक्ति मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्य संशयः॥६॥
जो इस परम गोप्ये गीताशास्त्रको मेरे भक्तोंमें प्रसिद्ध करेगा
वह मुझमें परम भक्तिको करके मुझको ही प्राप्त होगा इसमें
संशय नहीं ॥ ६८॥
नं च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः ।
भविता ने चमे तस्मादन्यः प्रियतरो वि॥६९॥

43
अष्टाद०१८] सान्वय-अमृततरंगिणी भा०टी०। ( १८५)
उस गीताको भक्तोंमें प्रसिद्ध करनेवालेसे अधिक मेरो प्रिय-
कारक पृथिवीपर मनुष्योंमें दूसरा कोई नहीं हैं और ने उसके
बराबर इतर मुइँको प्रिय होगा॥ ६९ ॥
अध्येयते च ये इमं धर्म्य संवादमांवयोः ।
ज्ञानयज्ञेन तेनॉहमिष्टः स्यामिति में" मैतिः ॥७॥
जो मेरे तुम्हारे इस धर्मवर्द्धक संवादरूप गीताका अध्ययन
करेगा उस करके मैं ज्ञानयज्ञसे पूजित होऊँगी ऐसी मैं
मानता हूं ॥ ७० ॥
श्रद्धावाननंसयश्च श्रृंणुयादपि यो नरः ।
सोऽपि मुक्तःशुभाँल्लोकानप्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम्७१
जो मनुष्य निंदारहित और श्रद्धायुक्त श्रवण भी करेगा सो भी
संसारसे मुक्त होके पुण्यकर्म करनेवालोंके सुखंद लोकोंको
प्राप्त होगा ॥ ७॥
कच्चिदेतच्छतं पार्थ वयैकारण चेतसा ।
कच्चिदज्ञानसंमोहः प्रनष्टस्ते धनंजय ॥ ७२ ॥
भगवान् पूंछते हैं-कि, हे पृथांपुत्र धनंजय ! इस ज्ञानको
तुमने एकाग्रचितसे सुना कि नहीं जो सुना तो अज्ञानेजन्य
मोह तुम्हारा नष्ट हुआ कि नहीं सो कहो ॥ ७२ ॥
अर्जुन उवाच ।
नष्टो माहः स्मृतिलब्धा त्वत्प्रसादान्मयांच्युत।
स्थितोऽस्मि गतसंदेहः करिष्ये वचैन तैव ॥ ७३ ॥
श्रीकृष्णके वचन सुनके अर्जुन कहते हैं-कि,हे. अच्युत !
तुम्हारे अनुग्रहसे मोह नष्टं हुआ और मैंने ज्ञान प्राप्त कियाँ
अब संदेहरहित स्थित हूँ आपको वचन जो स्वधर्मरूप युद्ध
करनेकी आज्ञा सो करूंगी ॥ ७३ ॥

(१८६) भगवद्गीता। [अध्याय:- संजय उवाच । इत्यह वासुदेवस्य पार्थस्य चे महात्मनः। संवादसिममश्रौषमद्भुतं रोमहर्षणम् ॥ ७४ ॥ संजय धृतराष्ट्रसे कहते हैं-कि, हे राजन् ! ऐसे' यह श्रीकृष्ण और महात्मा अर्जुनका अतिअद्भुत रोमांचकारक संवाद मैंने" सुनी ॥ ७॥ व्यासप्रसादाच्छृतवानेतेदगुह्यमेहं परम् । योग योगेश्वराकृष्णोत्साक्षात्कथयतः स्वयम् ७५॥ मैं' यह अतिगोप्यं योग साक्षात् स्वयं कहते हुएँ योगेश्वरे श्रीकृष्णके मुखसे वेदव्यासजीके अनुग्रहसे सुनता हुआ ॥७॥ राजन संस्मृत्य संस्मृत्य संवादमिमंमद्धतम् केशवार्जुनयोः पुण्यं हृष्यामि च मुहुर्मुहुः ।।७६।। हे राजन् । इस श्रीकृष्ण और अर्जुनके अद्भुत पुण्यदायक संवादको सुमिर सुमिरके वारंवार हर्षित होता हूं ॥ ७६॥ तेच संस्मृत्य संस्मृत्य रूपमत्यहतं हरेः। विस्मयो में महान राजन दृष्यामि चै पुनः पुनः७७ हे राजन् ! उस अद्भुत भगाल्के रूपको भी सुमिर सुमिरके बड़ा विस्मय होता है और वारंवार हर्षित होता हूं ॥ ७७ ॥ यंत्र योगेश्वरः ऋष्णो यत्र पार्थों धनुर्धरः।। तंत्र श्रीविजयोतिर्धवा नीतिमतिर्मम ॥.७८.॥ इति श्रीमद्भगवदीनानानिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योग- शास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे मोक्षसंन्यास- योगो नाम अष्टादशोऽध्यायः ॥ १८ ॥ . 1 अष्टाद. १८.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा०टी०। (१८७) हे राजन् । जहां योगेश्वर श्रीकृष्ण हैं और जहां धनुषधारी अर्जुन हैं तहाँही अचल संपदा, अचेल विजय, अचल वैभव और अचल नीति है यह मेरी निश्चित मत है ॥ ७८॥ इति श्रीमत्सुफुलसीतारामात्मजपंडितरघुनाथप्रसादविरचितायां श्रीमद्भगवद्गीता- मृततरंगिण्यां अष्टादशाऽध्यायप्रवाहः ॥ १८ ॥ अवराध्यकभूसंख्ये विक्रमार्कस्य संवति । माघमासे दले शुभे द्वितीयायां तिथौ बुधे॥१॥ इयं संपूर्णतां याता गीताऽमृततरंगिणी । श्रीमद्भागवताचार्यानुग्रहात्स गुरुर्मम ॥३॥ समाप्तोऽयं ग्रंथः।

(वेदान्त-ग्रन्थाः) की. रु. भा. अष्टावक्रगीता-श्रीअष्टावक्रमुनिप्रणीत भाषाटीकास- हित। ब्रह्मविद्या जाननेका अतिसरल सुगमोपाय - अवधूतगीता-काशीनिवासी स्वामी परमानन्दजी- कृत भाषाटीकासहित अद्वैत (ब्रह्म) सुधा-सुमुक्षुजनोंको अत्युपयोगी ब्रह्मनिरूपणका अपूर्व ग्रन्थ •-१२ गणशगीता-स्व. विद्यावारिधि पं० ज्वालाप्रसादजी मिश्रकृत भाषाटीकासहित (गणेशपुराणान्तर्गत) .-८ तत्त्वबोध-शंकरानन्दी भाषाटीकासहित, बड़ा देवीगीता-(देवीभागवतान्तर्गत) स्व. वि. वा. पं. ज्वालाप्रसादमिश्रकृत भाषाटीकासहित । नित्य पाठ करने योग्य 1257-१० पञ्चदशी-श्रीमद्विद्यारण्यमुनिप्रणीत, श्रीरामकृत 'पददीपिका' और मोडकोपनामक श्रीमदच्युत- राय पण्डितकृत 'पूणानन्देन्दुकौमुदी' नामक संस्कृतटीकाद्वयसहित । पञ्चदशी ६० मिहिरचन्द्रकृत अत्युत्तम भाषाटीका तथा पूर्वोक्त सवालंकारोंसहित बृहत् सूर्तीपत्र अलग है सो मगाकर देख लीजिये 9828 मुस्तक मिलनेका ठिकाना- खेमराज श्रीकृष्णदास, गङ्गाविष्णु श्रीकृष्णदास, “ोवेङ्कटेश्वर" स्टीम् प्रेस, "लक्ष्मावकटेश्वर" स्टीम् प्रेस मुंबई.. कल्याणhivaar icc.No. रो नगर

No text on this page.

विरेश्वर स्टीम प्रेम बम्बई mama

No text on this page.

Geetamrtatranginee

Author
Raghunathprasad
Title
Geetamrtatranginee
File name
Geetamrtatranginee
Text
OCR done
Citation
1966
Published
2009/09
Publisher
Steem-press Mumbai
Language
Sanskrit
Pages
202
Library
Sanmati Library, Jaipur
Keywords
Granth
DLI number
322428
Barcode
99999990252903.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
ZGWm8bcvh3R
Download PDF

Geetamrtatranginee