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Maanasaprachaarikaa
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मानसप्रचारिका।
GOOD
अर्थात्
हुतसे कठिन और गढ़ाश्य ॥
जिसको
वैकुण्ठवाति श्रीयोव्यानिवासि प्रसिद्ध महन्त हरिऊधवप्रसाद
साधजी के शिष्य जानकीदासजी ने रचना किया
जिसमें
श्रीमदगोस्वामितलसीदासरत रामायण में वन्दना से मानस
पुराण
पैंतालीत अष्टपदी चौपाई दोहेकी टीका निर्माण
की गई है। इस टीकाके देखनेसे सबको बहुत सी
शास्त्र की सूक्ष्म बातें विदित होती हैं
श्रीमद्रामचरित्र पदाज मधुकर प्रेमानुरागियों की भक्ति
बढ़ावने और सुखबोध के निमित्त और सन्त और
साधु लोगों के अवलोकन करने के लिये
पहिली बार
लखनऊ
मुंशोनवलकिशोर के छापेखाने में छापीगई ।
मार्च सन १८८५ ई० ॥
.
प्रकटहो कि कारखानेअवधअखबार में बहुतप्रकारोंकीतुलसी दास व अन्नकविकृतरामायण मूल व तर्जुमाभाषामें होकर छपीहैं जिनका व्योरा नीचे लिखा जाताहै ।। श्री गोस्वामी तुलसीकृत रामायण मूल और भाषा टीका रामचरण सहित जिनमें रामायणक सातो कांडों में अयोध्या निवासि श्री महन्त समचरणजी ने भाषा टीका किया इस विस्तृत और सर्वालंकार युक्त टीका को टीकाकार ने सर्व पुराणों के उचित श्लोक और वेद की ऋ- चारोंसेभी भूषित कियाहै और यह पुस्तकनुमा और सनाभि पत्रे नुमा दोनों प्रकारों से पीहै। कीमत ७) श्री तुलसीकृत रामायणमूल टीका शुकदेवलाल रचित। यह टीका मैनपुरी निवासि शुकदेवलालजी ने संवत् १६२५ ई० में रचनाकी मुख्यकर इसटीका में यहगुण हैं कि श्रीतुलसीकृत रामायण के परिपूर्ण आशय को ठेठबोली में अक्षरार्थ लेकर उल्याकियाकुछभी न्यूना- धिक्यनहीं, पद पदार्थ अति रमणीय हैं और भक्ति भावको अति लक्षित कियाहै और गूढाशयों के प्रकट करने और प्रमाणकेहेतु प्राचीन पौराणि- कों के श्लोकभो संयुक कियेहैं ॥ क़ीमत २) श्रीतुलसीकृत रामायण सटीक ॥ इस रामायणमें गूढ़ाशयों की टीकाके सिवाय सविवेचनानेकार्थबोधक कोश और शंका समाधान व काव्यांग और ज्ञान के अर्थ बहुधा प्रतिपत्र मानसदीपिका आदिभी संयुक्त कीगई है ॥ कीमत ११) श्री तुलसीकृत रामायणकीमानसप्रचारिका ।। इल नवोन टीका को बैकुण्ठ वासि अयोध्याके रहनेवाले महन्त हरि ऊधवजी साधके शिष्य श्रीजानकीदासजी ने रचनाकिया इसमें श्रीमदगो- स्वामि तुलसीकृत रामायण में बन्दना से मानस पुराण की पैंतालीत अष्टपदी चौपाई दोहे की टीका निर्माणकीगई है इस सुगमटीकाके पढ़ने में सवको बहुतसीमात्रको सूक्ष्म और गढ़वातेंविदितहोती, कीमत ।)
श्रीतुलसीकृतरामायण के श्लोक, चौपाई, दोहा सोरठा, छन्द की संख्या॥ श्लोक छंद चौपाई २६६६ २६०६ ५२८ दोहा ३५६ ३१४ सोरठा ३५ १३ ३६ १३ १० ६ कांडक्रम बालकांड अयोध्याकांड श्रारणयकांड किष्किंधाकांड सुन्दरकांड लंकाकांड उत्तरकांड २ ३ ३ ५२६ ११०२ ११७७ ३१ ६२ १४६ २०५ ६ ७ १७ १४ २७ १२०५ १९६६
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जय जय जय श्रीअवध विहारी । जय जय जय श्रीजनक दुलारी॥ जय जय जय श्रीरविकुल मण्डन । जय जय जय श्रीरघुकुल नन्दन ॥ जय जय जय संतन हितकारी । जय जय जय भक्तन भयहारी ।। जय जय जय प्रभु अधम उधारण । जय जय जय दम्पति सुख कारण ।। सीताराम चरण चित लाऊं । सब संतनको विनय सुनाऊं ॥ यह यश मुद मंगल करि गाई । सब जिल्दन में दियो पाई ।। प्रकट होकि श्रीअयोध्याजी में श्रीमहाराजरामप्रसादजीको गद्दीपरजी महंतश्रीहरिउद्धवप्रसादजीहुये तिनके गिव्य श्रीजानकीदासजी विख्यात रामायणी तिन्हों ने यह टीका नाम मानसप्रचारिका सम्बत् १९३२ में किया और आपबड़ी सौभाग्यताके साथ श्रीमिथिलाजी में जायके इस. अनित्य शरीरको छोड़ खास श्रीजानकीदुल्लह जी सर्कार के महलटहल में समर्पणकिया सो श्रीतुलसी कृत रामायण में प्रथम वन्दना से और मानस पुराण पर्यंत १५ दोहा यह टीका है और सोलह कैंकर्य जोनाम धरेगये हैं सो सोलहप्रकरण जानिब के अर्थ वो ऐसे बड़े परिश्रम वो बहुत बुद्धिकीशुद्धताके साथ यह टीका हुआ है कि साक्षात् त्रीगोस्वामी तुलसीदासजी मानो टीकाकारजी के हृदय कमल में बैठने मानत का रूपक बांधाहै कि और कोई टीकामें यह भूमिका मानसशा नहीं पाया जाता और तारीफ़ यह है कि जोकोई पण्डित वा कवि तुलते नौ देख हैं तो यही पश्चात्ताप करतेहैं कि श्रीरामायणजीके शात कांडला टीका पर्ण होता तो यहटीका श्रीराम उपासकोंको प्राण बस्लम होता सो यह टीका सम्बत् ११३८ में मैं जोहौं श्रीरामदासानुदास नाम द्वारकादास परमहंस को पटना शहर में प्राप्तहुआ एक वैष्णव कामतादातली नाम के हाथसे सो दासनेजब अवलोकनका सुख लूटा तब यह अभिलाषा हुई कि पिजाय तो मानस प्रकरण लगावनेवालों का बड़ा उपकारहो तो पटना शहरमें छपावने की तैयारी सबहोचुकीथी किउसीतमय श्री अवधजीसे पत्री पहुँचीकि चले आवो तब श्रीअवधनाथ युगल सकार को अति रूपा अपनेपर जानदास तुरंत चलाया श्रीरामघाट पर बड़ी छावनी में अपने प्राणनाथ श्री १०८ स्वामीजी के दर्शनको प्राप्त हुआ - ( २ ) और जब छावनी में श्रीरामायणी महास्मोंके समाज में बैठा तो क्या देखताहू कियह श्रीमानस प्रचारिका के टीकाकारजी के साधक श्रीमा- धवदासजी रामायणी इसीटीका को खूब प्रेमसे व्याख्यान कर रहे हैं तब मेरे रामने श्रवण का सुखलिया कुछ दिन पीछे मनन करते करते यह श्रीरामजीकी प्रेरणाहुई कि इस टीकामें सबमूलपदके अर्थों में अंक लगावनेका परिश्रम महात्मोंको पड़ताहै सो जो मूल पदके अर्थ जहां तक महात्माने व्याख्या कियाहै ज्यों का त्यों निकाल के उसी जगह मूलपदके नीचेधरि दिये जायें कि अंक लगावनेका कुछ ज़रूर न हो तब एक महात्मा यमुनादासजी नाम रहतेहैं छावनी में उनसे हमारे रामने परिश्रमकरायकरके अपनीबुद्धि अनुसार तर्जुमाकर खुलासा लिखवाया सम्बत् १८४० भाद्रपद कृष्णदशमी मेंपर्णहुवा तदनन्तर कार्तिकमास में शुक्रपक्ष अक्षयनवमी गुरुबारको यहदीन सकलसाधनहीन नामावलम्बी अपने आसन पर पड़ाहुआ युगलतर्कार श्रीसीता वल्लभलालजी की झांकीहाथ में लिये माधुर्यका सुख लूटताथा कि इतनेमें खास सर्कारी कपाहुई कि श्रीकनकभवन महल टहल विश्रामी श्रीपरमहंस सीता शरण जी संत मंडली संयुक्त नामध्वनि करतेहुये इस अधम के उद्धारार्थ साक्षात् बासनपर अाय पहुंचे तब दास बोला (चौपाई) सेवक सदन स्वामिआगमन । मंगलमूल अमंगलदमन ॥ तत्पश्चात् यहपोथी हाथ में दिया देखिके कहा बहुत सहज करदिया अबकोई वसीला से छापा, होजाय सो आज्ञा शीशपर धर श्रीटीकाकारजी के प्रथम की पोथी से एक २ अक्षर शुदकरके ह्रस्व दीर्घ व्यञ्जन विसर्ग शुद्धकिया भरत दास जी वैष्णवके हस्तसे अब फाल्गुनमासमें श्रीराम कृपाते यह वसीला मिला कि पीलखाये गांवके बाबा श्रीमहाबीरदासजीकी बहुतइच्छा हुई कि यहपोथी शुद्धप्रति मिले तो उसी ग्रामके रहनेवाले श्रीपण्डित राज पूज्य सरयूप्रसादजी की सहायतासे लखनऊ में मुन्शीनवल किशोरजी के शीशाक्षरयन्त्रालय मेंबहुत जल्दीछप जायगी सो संवत् १६४० पूर्ण होने के दिन चैत्रमास अमावास्या गुरुवार को यह पुस्तक लखनऊ को भेजीगई जो उत्तम रीति से मुद्रितहुई अबमेरा आशीर्वाद है कि इस पुस्तक के छापने वाले और पढ़ने पढ़ाने वाले आनन्दपक रहैं और इसका परिपूर्ण सुख उठावें ॥ (श्रीरामदासानदास द्वारकादासपरमहंस)
লাব্য লালাঙ্কিা।
श्रीगणेशायनमः॥
श्रीसीतारामाभ्यांनमोनमः । श्रीजानकीबल्लभोविजयतेत
राम् ॥श्रीमत्परमाचार्यपरमविज्ञान शीलकविन्द
भाकरश्रीगोस्वामीतुलसीदासायनमोनमः ॥
महाराज अवधेश सुत श्रीमिथिलेश कुमारि ॥
चरणकमल बंदन करौं युगल रूप उरधारि १
सहितथियात्रीशिवचरण कमल चाललयुगधेय ॥
श्रीगणेश पद पायग श्रीमत् मारुत सेय २
श्रीवाणी श्रीआदि कवि विधिनारद सनकादि ।
व्यासादिशुकशेषतब कुम्भजादि जनकादि ३
औरौ जे रघुबीर के सेवक सांचे जानि ।।
चरणकमल बंदन करौं अतिहितमानक्रमवानि ?
रामपुरी मंगल मयी देत सकल अहलाद ।।
तहां प्रकट आचार्यभए स्वामी राम प्रसाद ५
श्री मत्परमाचार्य है तुलतिदास सुखसार ।
श्रीमद्राम प्रसाद जी विदित तासु अवतार ६
तासु शिष्य के शिष्य हैं तासु शिष्य विष्यात ॥
स्वामी हरीप्रसादज्यहि देखि गर्व छुटिजात ७
तालु शिष्यलघुमैं भयों नाम जानकी दास ॥
मानत की परिचारिका करन चहौं सुखराश ८
श्रीमतु लसीदास पद बंदिसुमिरि सियराम ॥
मानस की परिचारिका करौं यथा अभिराम
२ शयायणमानसप्रचारिका वा। वर्णस्वल्प त्राशय अमित अर्थ करे मन बोधि । श्रीमानस परिचारिका नामशेशुभ शोधि १० म० वर्णानामर्थसंधानां रसनांछन्दसा मपि ॥ मंगलानांव कर्तारौ वंदेवाणी विनायको १ टी० । वाणी विनायकौ दो अहं वंदे कथंभूतौ वाणी विनायकौ वर्णानां अर्धसंघानां रसनां छन्दतां अपीतिनिश्चयेन कारो चपुनः सर्वमंगलानां कतारी एतादृशौ वाणीविनाको अहं वंदे (इत्यन्वयः)॥ अथवार्तिक ॥ अहं कहे मैं जोहौं तुलसीदास सो वाणीजो है सरस्वती व विनायक जोहैं गणेश तिनको वदत्तहौं कथंभूतो कहे कैले हैं वाणी विनायक कि वर्णानां कहे बहुत जो हैं अक्षर पुनः अर्थ संघानां कहे तिन्ह अक्षरनके अर्थ के संघानां कहे समूह पुनः रसानांक हे तिन अर्थन का रस शृङ्गागदि पुनः छन्दतां कहे गावत्यादि व श्रीआदि जितने छन्द इन सब के कर्ता चपुनः सर्व मंगल के अपि इति निश्चय करिके कर्ताहैं तिन सरस्वतीगणेशके हम वंदतेहैं ॥ इत्यर्थः॥१॥ भवानीशंकरौवन्दे श्रद्धाविश्वासरूपिणौ ॥ याभ्यांविनानपश्यन्ति सिद्धाःस्वांतस्थमीश्वरम् २ टो० भवानीशंकरौ दो अहं वंदे कभूतौ भवानी शंकरौत्रद्धाविश्वास रूपिणौ श्रद्धाविश्वासो कथंभूतौ या विशेषणीयम् भवानीशंकगै वंदनीय त्वं या श्रद्धा विश्वासौ विनातिद्धाः स्वअंतस्थितं ईश्वरंनपश्यंति ताश्रद्धा विश्वास रूपिगौ भवानीशंकगै द्वौ अहंवंदे ( इत्यन्वयः) ॥ अथवार्तिक ।भवानी जो पार्वती शंकर जो महादेव तिनके अहंक हे मैंजो तुलसीदास तो बंदत हौं कैसे हैं भवानीशंकर श्रद्धा व विश्वास के स्वरूपै हैं वे कैसे हैं श्रद्धा विश्वास कि जौने विशेषण करि के भवानी शंकरके वंदत हो कि जा श्रद्धा विश्वास बिना अपने अन्तःकरण में जो स्थित है ईश्वर सो सिद्वाः कही सिद्धन को नपश्यंति नाम नहीं देखि परत है कैलोप्तिद्ध होइ जब वेद गुरु वाक्य में श्रद्धा होइ व तदनुकूल- अपने कर्तव्य में विश्वासहोइ कि यह जो वेद कछु करत हौं सो मेरो कल्याण करेगो ऐलादृढ़ विश्वास होइ तब जो अन्तःकरण में विराजमान ईश्वर सो देखिपरत हैअभिप्राय कि भवानीशंकरकी रूपा बिना ऐसी श्रद्धा विश्वास नहीं होतहै काहे कि श्रद्धाविश्वासके भवानी गुह संमत में ३ रामायण मानसप्रचारिका बा० । शंकर स्वरूपही हैं श्रद्धारूपभवानी विश्वासरुप महादेव ऐलेजो भवानी शंकर तिन को हन बंदत हैं (शंका ) वंदना तो भवानीशंकर की व म- हत्व श्रद्धा विश्वास की सो कैसे बने(समाधान) जब विशेषण में इतना महत्व कहे कि जा बिना स्वान्तः ईश्वरकी प्राप्ति नहीं तो विशेष्य में अधिक महत्व भयो काहेते कि श्रद्धा विश्वास भवानी शंकरके विशेषण कहाहै। जो कहौ कि अनेक विशेषण भवानी शंकरके बड़े बड़े तिनको छोड़ि बढे विश्वास क्योंकहे तो सुनो वन्दनाहेतु लिये होतहै सो इहां गमचरित करिबेके हेतु वन्दनाहै तहां श्रद्धविश्वासको प्रयोजन है ताते यहीविशेषणदिये ॥२॥ बन्देवोध मयंनित्यं गुरुंशंकररूपिणम् ।। यमाश्रितोहिवक्रोपि चन्द्रःसर्वत्रवन्धते ३ टी। गुसं अहं बन्दे कथम्भूतंगुसं बोधनयंपुनः कथम्भूतंगुरूं नित्यं पुनः कथम्भूतगुरुशंकररूपिणं कथम्भूतशंकरं यः यात्रित हिइतिनिश्चयेनबक चन्द्रःवपि इतिनिश्चयेन सर्वत्रबन्यते तस्वरूपिणंगुरूयः आश्रितोशिष्य स्यवक्रसर्वत्रबन्दनीयोभवत् एतादृशंगुरुग्रहं वंदे ( इत्यन्वयः)। वार्तिक । अहंकहे मैं जो तुलसीदास सो गुरुकोवन्दतहों कैले हैं गुरु बोधकहीज्ञानमय फेरिकैसे हैं नित्य हैं नित्यकहो सनातन हैं फेरि कैसे हैं शंकरस्वरूप हैं कि जैसे शंकरके आश्रितकै के टेढोचन्द्रमा द्वितीयाको सर्वत्र वन्दनीयहोत है तैसे गुरुके भरणहोइ तो कैसो टेढ़ निव्यहोइ सो बन्दनीय होतहै चैलेजोहैं गुरु सो मैं वन्दतहौं जाते हमारी टेढ़ीबुद्धि श्रीरामयश गावने योग्यहोइ ॥३॥ सीतारामगुणग्राम पुण्यार रायविहारिणो । वन्देविशुद्ध विज्ञानौ कवीश्वरकपीश्वरौ ४ टी। कवीश्वर कपीश्वौ द्वौ अहंबन्दे कथम्भूतौ कवीश्वर कपीश्वरी सीतारामगुण माम पुण्यारण्यविहारिणौ पुनः कथम्भूतौकवीश्वरकपीश्वरी विशुद्धविज्ञानौ एतादृशोकवीश्वरकपीश्वरौ अहंवन्दे ( इत्यन्वयः ) ॥ बार्तिक ॥ अहंकहे मैंजो तुलसीदास सो कवीश्वर जोहैं बाल्मीकि व कपीश्वरजोहैं हनुमान जीतोदोनोंके बन्द तहाँ कैसे हैवाल्मीकिहनुमानजी कि सीतारामके गुणनके ग्राम कहीसमूह सोई है एक पुण्यका वन तिस
(
रामायण मानसप्रचारिका बा।
वनके बिहारीहैं नाम रातिदिन श्रीसीतारामके गुणनमें रहतहैं फेरिकेसे
हैं कि विशुद्ध विज्ञान हैं जिनकानाम विशेष ज्ञानकही परमात्माविष प्रा.
त्माकी वृतिलयकरना चैते जो बाल्मीकि व हनुमान तिनको वन्दत हौं
जाते हमहूं विशुद्धविज्ञान में प्राप्त के सीतारामके गुणगावै ॥४॥
उद्भवस्थिति संहार कारिणीं क्लेशहारिणीम् ॥
सर्वश्रेयस्करीसीतां नतोहरामवल्लभाम् ।
टी० । सीतांचहनतः कथंभूतांसीतां उद्भवस्थिति संहारकारिणीम् पुनः
कथंभूतां सीता क्लशहारिणीम् पुनः कथंभूतांसीतां सर्वश्रेयस्करीम् पुनः
कथंभूतांसीतां श्रीरामबल्लभां एतादृशों सीतां अहंनतः ( इत्यन्वयः) ।
बार्तिक॥ अब श्रीमती श्रीजानकीजीकी वंदनाकरते हैं अहंकहे मैंजो
तुलसीदास सो श्रीजानकीजीको नमस्कार करत कैसी हैं श्रीजानकी जी
उद्भवही उत्पत्ति स्थितिकहीपालन संहार कही नाश तीनिउं की कर्तृ
हैं भाभयकि त्रिदेवकीकारणहैं फेरिकैसी हैं श्रीजानकीजी कि सर्वल शकी
हरणहारीहैं पुनः कैसीहैं श्रीजानकीजी सर्वश्रेय जो कल्याण तिनकी
कर्तृहैं फेरिकैसी हैं श्रीजानकीजी श्रीरामबल्लभां कहे प्रिया हैं देखिये तो
श्रीगोस्वामीजी रामवल्लभा कहिकै कादिखावाहै किजबकहा कि उद्भव
स्थिति व संहारकी कर्तृहैं तब यह निश्चय भयो कि श्रीजानकीजी
मूल
प्रकृतिहैं ता निवारणार्थ लशहारिणी व सर्व कल्याणकी कर्तृकहा तब
यह निश्चयभयो कि महालक्ष्मी वा विद्या स्वरूपहैं ता निवारणार्थ कहा
कि श्रीजानकीजी श्रीरामबल्लभाहैं याकहनेसेकहूशब्दजाइनहीं सकतहै
श्रीरामस्वरूपै निश्चयभयो ताते इनसबकी श्रीजानकीजी कारण हैं इस
बातका खुलासा इसीग्रंथमें देखिलेब ठौरठौर में गिरा अर्थ इसदोहामें
पुनः सती मोहप्रकरणमें पुनःस्वयंभुवमनुकेतपकेप्रकरणमें पुनःबाल्मीकि
जब स्वरूप कहाहै पुनः राज्याभिषेक समय सर्वत्र देखिलेब अच्छीतरह
विचारिक इत्यर्थः ॥ ५॥
यन्मायाबशवर्तिविश्वमखिलं ब्रह्मादिदेवासुराः यत्सत्वा
दमृवभातिसकलं रज्जोयथाहेर्धमः ॥ यत्पादःप्लवमेकमे
वहिभवाम्भोधेस्तितीर्षावताम् वन्देहंतमशेषकारणपरंरामा
ख्यमीशहरिम् ॥६॥
५ रामायण मानसप्रचारिका बा। टी०। ईशंअहं वंदे कथंभूतंईशं रामाख्यं कथंभूतंरामारख्यईशं हरिपुनः कथंभरामारपई शं यन्मायावयवर्ति विश्वखिलं ब्रह्मादिदेवासुराः पुनः कथंभूतं रामायईयत्तत्वादमृदेवनातिसकलं पर्णप्रपंचमृषैव अमृपं व भातिकैवरज्जीयथाभूमः पुनः कथंभूतंगमारख्यईशं भवांभोधेस्तितीर्षा- वतां एकएव हि इतिनिश्चयेन यत्पाद प्लवंपुनःकथंभूतंरामारयई शंअशेष कारणपरं तं रामाख्यईशं अहंवंदे (इत्यन्वयः)। बार्तिक॥अब श्रीरामचंद्रकी वंदना करतेहैं कि अहंकही मैंजोहौं तुलसी दास सो ईश्वरकेनमस्कारकरतहौं कवनईश्वर के नमस्कार करतहीं कि रामाख्यं जेहिईश्वरका रामऐलानामहैसोरामईशकसे हैं कि यमायानाम जेकरीमायाके बश हकरिके वर्तत हैं विश्वजो संसार व वह्मादि देवता व असुरकही दैत्यराक्षप्तसंपूर्ण जेकरीमायाके वशवतीहैं फेरिक से हैं रामाख्य ईश कियत्सत्वात् नाम जेकरीसत्वा ते मषा जोहै संसार सो सत्यकीनाई शोभितहै जो कहो कि जो असत्यहै सो कैसे सत्यदिखातहै तो यथानाम जैसे रात्रि में रज्जुजो रस्ती ताम अहिजोसर्प ताकी भांतिहोती है सर्पके सत्वा ते फेरि श्रीरामईश कैसे हैं कि भवजोहै संसार सोई अंभोधिनाम समुद्रहै सो तितीर्षावतांकही सो भवसमुदतरिबेकीहै इच्छाजिनके तिन को श्रीरामचन्द्र के चरण एक प्लवकही नौकाहैं एवकही वही चरणही निश्चय करिके पारकरिबको फेरि श्रीराम ईश कैसे हैं अशेष कारणकही संपूर्णकारणोंसेपरे हैं अशेषकहनेसे यह जनायो कि जितने एककेएककारण हैं नाम जहाँतक कारणहैं तिनसबकेपरे हैं एककेएक कारणकोहैं सोसुनो यह जगत् जोहै सो कार्य तेहिके कारण बह्मा विष्णु शिव काल कर्म गुण स्वभाव एते जगत्के कारणहैं इनसबका कारणमूल प्रकृति तेहि केकारण महाविष्णुहैं जिनको महापुरुष कही तिनहूसे परे श्रीरामचन्द्रजीहैं इस के प्रमाण बहुतसेहैं कहांतक लिखें एकश्रुति लिखतेहैं ( यस्यांशेनैवब्रह्मा विष्णुमहेश्वरापिजातोमहाविष्णुर्यस्यदिव्यगुणाश्च एककार्यकारणयोःपरः परमपुरुषोरामोदाशरथीवभूव इतिअथर्वण उत्तरार्दै ) पुनः इसी ग्रंथ में प्रमाण ( चौपाई.) उपजहिं जा अंशते नाना । शम्भु बिरश्चि विष्णु भग- वाना ॥ फेरि श्रीरामईश कैसेहैं हरिकही हरिहैं अपने भक्तनके सईदुःख हरिलेतेहैं तंरामायई शं अहंवंदे ऐसेजे श्रीरामाख्याई शहैं तंकहीतिनको हप्न नमस्कार करते हैं अहर्निशि कहीरातिदिन बारबार ॥ इत्यर्थः॥६॥ नानापुराणनिगमागमसम्मतं यद्रामायणेनिगदितंक्वचि ६ ॥ रामायण मानसप्रचारिका बा। दन्यतोपि स्वांतःसुखायतुलसीरघुनाथगाथा भापानिव दमतिमंजुलमातनोति ॥ ७॥ टी० । यद्रामायने नानापुराणनिगमागमसंमतं निगदितंतद्रधुनाथगाथा तुलसीभाषानिबंधं श्रातनोति कोर्थः विस्तारयति कथंभूतारघुनाथगाथा अतिमंजुलंमंजुलंकोः निर्मलं तत्प्रसंगे क्वचित् अन्यतः अपिनिबंधकस्मै प्रयोजनायस्वान्तःसुखाय (इत्यन्वयः)॥ वार्तिक ॥ श्रीगोस्वामी तुलसीदासजी कहते हैं कि यद्रामायने कहे जवने रामायण में नानापुराण औ निगम जो वेद श्री आगम जो शास्त्र तिनके संमत निगदितं कहे कथित हैं तवनी रघुनाथ गाथाको हम भाषा करि विस्तार करते हैं कैसी है रघुनाथगाथा अति मंजुलम् कहे निर्मल है तत्प्रसंगे कहे तबनी रघुनाथगाथा के संग में क्वचिदन्य कहे कचित् रुचि रामायण से अन्यतः नाम और जो कछ सचै गो लोभी कहौं गो कस्ने प्रयोजनाय भाषानिवइंकहे काहेकोभाषाकरतेहैं स्वान्तः सुखायकहे अपने अन्तःकरणके सुख केहेतु इति अवजो कोउ कहै कि वह कवन रामायण है जो गोसाई जी भाषाकीन्ह है सोसुनौ (श्लोकः) यत्पवैप्रभुना कतंतुकविनात्रीशंभुनादुर्गमम् श्रीमद्रामपदाब्जभक्तिमनिशं प्राप्नोतुरामा यनम् ॥ मत्वातद्रधुनाथनामनिरतं स्वांतस्तमःशांतये भाषावद्वमिदंचकार तुलप्तीदासस्तथामानसम्॥१॥अस्यार्थः । यद्रामायणे प्रभुनापूर्वकृतंकयंप्रभु नासुकविनाकथं सुकविना श्रीशंभुनामित्यर्थः कथंभूतंगमायनेदुर्गम पुनः कथंभूतंरामायने श्रीमद्रामपदाब्जभक्ति मनिशंप्राप्नोतु पुनः कथं भूतं रामायनं रघुनाथनामनिरतं एवंमत्वातद्रामायनं तथा मानसम् मानसम् कोर्थः शंभुनामनसास्थितमानसं तुलसीदासः इदंभापाबद्धं चकारकम्मे प्रयोजनाय स्वान्तस्तमःशान्तये (इत्यन्वयः)। अथवार्तिक । श्रीगोस्वामी तुलसीदासजी कहते हैं कि यद्रामायनंकही जवनिरामायनकोप्रभु जो श्रीमहादेवसुंदरकवि पूर्वहीकोनहै सोगमायन कैसन है अतिदुर्गमहै दुर्गनकही दुःखौकरिकै गम्यनहींपुनः कैसीहै रामा- यनकिरामचन्द्रके चरणारविन्दको भक्तिप्राप्ति करनेवालीहै अनिशंकही रा. तिदिनतर्वजीवनको फेरिकेतीहै रामायनकि श्रीरामनान करिके निरतंनाम युक्तहै अभिप्राय कि जैलेकहत सुनत श्रीरामभक्तिप्राप्ति होतिहै तैसे जिस रामायणके कहतसुनत श्रीरामनाममें प्रीतिहोतिहै एवंमत्वा नाम ऐसा Pre ७ ॥ रामायण मानसप्रचारिका बा। मानिकै तद्रामायनंनाम तवनरामायण तथा मानसं कही जवन रामायण को रचिकै महादेवजी अपनेमानलमें राखाहै ताते मानसकहातत्त्रमाण (चौपाई ) रचिमहेशनिजमानलराखा । पाइ सुसमय शिवासन भाषा॥ ताते राम चरित मानसवर । धोउ नाम हिय हरि हरषि हर ॥ इति ॥ तिसको मैंजोहैं। तुलसीदास सो इदंभाषा वढंचकार कही यह भाषा प्रबंध कीनहै कस्मै प्रयोजनाय कही काहेको भाषाकीन है कि स्वांतस्तमः कही अपने अंतःकरण की तमजो है अंधकार अविद्याके शांतयेकही नाश हेतु इत्यर्थः ॥७॥ ज्यहि समिरतसिधिहोइ गणनायक करिवरबदन ॥ करौ अनग्रह सोइ बुद्धिराशि शुभगुण सदन ८ सोठार्थ ॥ जोगणेशजीके लुमिरत मात्र कामना सिद्धि होती है सो गणेग हमारे पर अनुग्रहकरो सो कौन गणेग जिनका श्रेष्ठ हाथीका ऐसा मुखहै सोकैसेही बुद्धिकीराशि व शुभगुणकेसदनशुभगुणकही ज्ञान वैराग्य भक्ति योग दया करुणा शान्ति सन्तोष इत्यादि गुणन के स्थानहौ सो अनुग्रह करो जाते हम को शुभ गुण प्राप्ति होई तब श्री सीताराम चरित्र गाइबे योग्यहोहिं इहां गणेशजीका मंगलाचरणहै शंका न करना ग्रंथके प्रारंभ में गणेशैजीका मंगलाचरण होतहै यहपरंपरा है इसमें कुछ उपासना की न्यूनता नहीं है ॥ ८॥ मक होहिं वाचाल पंगु चढ़े गिरिवर गहन ॥ जासुकृपासोदयाल द्रवौसकलकलिमलदहन । टी० 6। यह सोरठा कोऊ भगवान में लगावते हैंकोऊ सूर्य में सो नाम तो फिसूकाहै नहीं गुण क्रियाद्वारे से जानाजाइ सो जो गुण क्रिया कहा है सो दूनहू में घटत है विष्णुमें गीताके श्लोक करि सबै जानैहैं परंतु जो विष्णुमें कही तो आगे विष्णुको कहेंगे जो कहीकै दूनऊ सोरठा विष्णु इमें लगत हैं तौनहीं बनत काहेकि क्रिया है हैं सो दयाल द्रवहु व करो सो मम उर धामतौ एकपदमें एक कर्मके साथ क्रिया नहीं होती जो कहीकी स्थान भेद करि एक रमावैकुण्ठ विष्णु को कहा व क्षीर शायी श्रीमन्नारायण को कहाती यहभी नहीं बनत काहेकी गणेश महेशकेबीच में विष्णुकी वंदना नहीं सुनीहै कितो ब्रह्मशिवके बीचमें के पंच देवतन रामायण मानसप्रचारिका बा। के बीच में सुनीहै ताते यह सोरठा पंचदेवता के मंगलाचरण करिसूर्य में लगत है काहे कि श्रीगोस्वामीजी श्री अयोध्यावासिन के मत में हैं अयोध्यावासी पंवदेवता का पूजन करि सीताराम के चाहते हैं प्रमाणं अयोध्याकाण्डे (चौपाई ) करिमज्जनपूजहिंनरनारी । गणपतिगौरि पुग- रितमारी ॥ रमारमणपददिबहोरी । विनवहिं अंजलिअंचलजोरी ॥ गजा रामजानकीरानी । अानंदअवधिवधरजधानी ॥ इसीरीतिसे गोसाईजी जो पंचदेवताके विनयकरि सीताराम यशगाइबो मांगतहैं सो दयाल सूर्य हमारेपरद्रवहु कोदयाल मूकहोंहिवाचाल पंगुचढ़े गिरिवरगहन जासु रूपा सो देखिये तो बालक महामूक व पंगुहै सो जिनकी कृपासे दिन दिन वृद्धिहोतहै तब वहीवालक जो एक मात्राउच्चारण करिवेकीसमर्थ न रही सो वेदवताहोत व जो पस्गभरि चलनेकीसमर्थ नहीं सो नदी पर्वत वनसबमें चला जातहै सो सूर्य अपनेदिननकरिकै पोपतेहैं फेरि कैसे हैं कलिमलिदहन सो दयालद्रवहु जाते रामयशगाइवे में मैंजो मूकपंगुहौं सो समर्थ होउं व कलिमल जो रोग सो निवृत्त होइं तब रामयशगावों जो कोई कहै कि एतीसमर्थ सूर्यमकहांकहाहै तो विष्णुपराण व आदित्य हृदयमें देखिलेव अथवा महात्मनसे अससुनाहै कि सूर्यभगवान् गसड़जी के पंखनको वेदपढायो है सो पंखनियत मूक हैं व अरुण जो हाथपाउं दोनोंकेपंगुतिनको इतनीकपाकिये किअपनोसारथीवनाचे अपरपूर्ववत् ॥ नीलसरोरुहश्याम तरुणअरुणवारिजनयन ॥ करोसोममउरधाम सदाक्षीरसागरशयन १० टी० । जो सदाक्षीरसागरमें बसतेहैंसो हमारेउरमें धामकरी धामकही घरवनावो श्रीसीतारामबलिबेहेतु सोकैसेहैं क्षीरसायीभगवान् नीलकमल की तद्वत् हैं श्यामनवीन लालकमल की नाई नेत्र सो धामकरो व बसो जाते रामय गगावें इत्यर्थः ॥ १० ॥ कुंदइंदु समदेह उमारमणकरुणायतन ॥ जाहिदीनपरनेह करहुकृपामर्दनमयन ११ इतिप्रथमप्रकरणम्॥१॥ टी। अब चौथेसोरठामे शिवशक्तिका मंगलाचरण करतेहैं ध्वनिकरिक अर्थ फलितहै कि उमा उमारमण रुपाकरह कैसेहैं उमा उमारमण कि रामायण मानसप्रचारिकाबा है कुन्द इन्दु समदेह पीत कुन्दके पुष्प समकोमल सुगंध मकरन्द अवउमा जीको तनु है वो चन्द्रमा समश्वेत प्रकाश अमृत मय उभारमणकोतनु है फेरि कैलहैं यगलकी कसणाके अायतन कही स्थान हैं फेरि के हैं कि जिनको दीनही पर नेह है फेरि कैसे हैं मयनजो काम तिसके मईन हैं भला शिवजीतो कामको जारि के मयन मर्दनभये पार्वतीजी कबमथन मर्दन भई सो सुनो शिवतो जराये तब मयन मर्दन भये वो पार्वतीजी बिना जरायेही मयनको मर्दन कियेहैं कैसेजानीकि जब सप्तऋषी कहा कि ( अबभा झूठ तुम्हार प्रण जारेवकाममहेश) तबपार्वती जी कहाकि तुमरे जानकामअवजारा वो हमरेजानसदाशिव योगी ॥ अकामअभोगी यह वचन से जानाकि उमा पहिलेसे मयनको मर्दन कियाहै ऐसा अर्थ पंचदेवताके पूर्णार्थ उमारमणके शब्दसे कहा ॥ ११ ॥ इतिश्रीरामचरित्रमानसपरिचारिकायांतमिष्टीवृन्द नामप्रथमकैकर्य ॥ १॥ बन्दों गुरुपद कंज कृपासिंधुनर रूपहरि ।। महामोह तमपुंज जासुवचनरविकरनिकर १ टी० । अबगुरुचरण के बंदना करतेहैं बन्दौं गुरुपद कंजकैतेहैं पदकंज कृपा सिन्धहैं फेरि कैसे हैं देखिबे को नररूप हैं भाव कि नरके ऐलेपद हैं परन्तु वास्तव हरिहैं सर्व दुःखके हरनेवाले हैं फेरि कैले हैं कि महा- मोह जोहै सोतमको जहै सो जासुकही जेहिते वचन कही नहीं बचने पावतहैं काहेते कि रवि कर निकर की समूहरबिकि णको बराबरिचरण में प्रकाशहै सोनखके साथ कहेंगे अथवा कपासिन्धु आदि स्वरूपही का विशेषण है ॥१॥ बन्दों गुरुपद पदुम परागा सुरुचि सुवाससरसअनुरागा २ टी० । अब श्री गोसाई जी गुरुपद पदुमकी पराग जो धुरीहै तिसको बन्दना करते हैं कि गुरुपद कमलकी पराग जो धूरी सों बन्दौं कैसी है धूरी कि जिसमें सुन्दरि सचिहै वो सुष्टु बास है वो श्रेष्ठ अनुराग है ऐसी धूरीहै देखियेतौ गुरुपद को कमलकी उपमा काकहिये जिस पदमें कहू से धूरी लपटिगई है तिसमें कमल को धर्म बर्तमान है धर्म काको कहीं गुण स्वभाव क्रिया यहतीनि मिले धर्मकही जो कमल में रुचिहै सोगुणवो जो कमलमें सुगन्धहै सो स्वभाव? वो जो कमल में रसहै सोक्रिया है यह ब १० रामायण मानतप्रचारिका बा। तीनिउ वस्तु धूरी में कहाहै कि सुरुचि वरन कमलमें रुचि है धूरी में ते सुरुचि है वो लुवात है दोश्रेष्ठहै अनुराग सोई सुन्दर रसहै सोनागेयूरी विशेषण में कहते हैं कि अमर मूरी की चार चरण मय है भव रोग जं अविद्या तिसके परिवार जो कामक्रोधादि तिनकोनाश करिबको यह सरि नाम दीप्तिहै वो सुरुतपशंभुतनु को बिमल करिऐश्वर्य उज्ज्वल मंगल मोदके करतीहै यह सुवास है वो मन मुकुर के मल हरि गुणन के करतीहै यह अनुराग नामरसहै अथवा अन्वयले पद लगावनाकिगुरु पद पराग पद्म बन्दीगुरुके चरणकीपराग जोहै धरी कमल तहत्तिसको वन्दत हौं कमलमें धर्म हैं सुगन्ध वो मकरन्द तैसे धूरीमें वै धर्म है सुसचि वो अनुराग सो सुरुचि जोहै सोतुगन्ध है औअनुराग जो है तो सम्यकप्रकारकोरसहै ॥२॥ अमियमूरि मय चूरणचारू शमन सकल भवरुज परिवारू ३ टी। यह स्वरूप कहि अब विशेषण कहते हैं कि वह गुरु चरण रज कैसीहै कि अमृतभूरि जो जड़ीहै तिसकी चारनाम सुन्दर चूर्ण समस्त भवरुज जो काम क्रोध लोभ मोहमद मत्सर्य इत्यादि तिनकोशमनकही नाश करिबे को ॥३॥ सुकृत शम्भुतन बिमल विभूती मंजुल मंगल मोद प्रसूती ? टी फेरिवह धूरीकैतीहै कि सुकृतजो है समस्त पुण्यसोशंभुकही शिव तनुहैतिसके विमल करिबेको विभूतिहै इहांविपर्यय अलंकारकरि कहते हैं किजैसेशंभुतनुमें लगिकै विभूति शोभितहोतिहै तैसे गुरुचरण रजविभूति में लगिकरिके समस्त सुकृतरूपी शंभुतन शोभित होत है जिस सुरूतमें गुरुचरण रजनहींपरयो सो सुरुततीहै पर शोभित नहींहै फेरि कैसीहै धीमंजुङ मंगलमोदकी प्रसूतीनाम माताहै तहां एकमलिन मंगलमोद व एकमंजुल मंगल मोदहै मलिन मंगल मोद कौन है कि विषयवस्तु पाइकै बाहर इन्द्रिनके सुखसों मंगल भीतरइन्द्रिनके सुखसों मोदयह मलिन मंगल मोदहै व जो परमेश्वर तत्व पाइकै बाहर भीतर जो सुख सो मंजुलमंगल मोदहै तिनकी प्रसूतीनाममाताहै ॥ ४ ॥ जनमतमंजुमकुरमलहरणी कियेतिलकगुणगणबशकरणी५ टी०। फेरि वह धूरीकैतीहै कि जन जोप्तमस्तप्राणी तिनकामनसोई मंजु मकुरकही दर्पण है तिनके मलहरणीहै देखिये तो मंजुनुकुर भी कहा व জানা স্বাবলম্পাহি । ११ मलहरनीकहा ती मंजतामें मलकाहै तहां अपने अपने वर्या श्रम के धर्म में रत सोई मंजुहै व भागवत् भागवत धर्मले विमुखतो मल तिसमलके हरनेवालीधरीहै फेरि कियेतिलकनाम तिप्तधूरीके धारण करने से समस्त गुणकेगण बहोते हैं कौनगुण भगवत्संबंधी ज्ञानवैराज्ञ योग दया करुणा शांति संतोष शील इत्यादि व यही गुणनमें चारिप्रयोग भी कहाहै कहा कहाहै सो सुनो अमिय मूरिमय यह चौपाई में मारण प्रयोग व वैद्यक तिद्धकिया व सुरूत शंभुतन यह चौपाई में मोहन प्रयोग लिद्ध किया व जनमनमंजु यह अाधी चौपाई में उच्चादन प्रयोग सिद्धकिया व किये तिलक यह अाधीचौपाई में बहोकरण प्रयोग लिद्धिकिया (इत्यर्थः) ५॥ श्रीगुरुपदनखमणिगणज्योती सुमिरतदिव्यदृष्टिजेहिहोती ६ टी० । अब श्रीगोसाई जी गुरुपदनख के बन्दना करते हैं देखिये तो अबहीं रजका प्रकरण पूरानहींभयो बीवमें नखकी वंदना करनेलगे तो यह भाव है कि रजकरिकै कामादि रोगनाश भयो व सुरुत शोभितभयो व उज्ज्वल मंगलमोद भयो व मलहरणनयो काशत्व न देखे तबरजके नजदीक में नखनका प्रकाशदेखि वंदनाकरने लगे प्रकाशहेतु दोनों का प्रकरण एक संगही समाप्त करेंगे कहतेहै कि श्रीगुरुपदके नखमणिगणकी ज्योतिहै जेहिके लुमिरत दिव्यदृष्टि होतिहै तेहिनखको बन्दौं यद्यपि पदमें बंदौनहीं है तयपि गोलाई जी के परंपरा करिके कहा कौन परंपरा कि गुरुं अहंवंदे व बन्दौं गुरुपकंज व बन्दौं गुरुपदपदुमपरागा यहतीनिपद बंदन व नखके साथ नहीं या गोलाई जी यह चमत्कार दिखाये कि रज व नखका मेलकरा क्या मेलकिरजके साथ बन्दौं व नवकेसाथ श्री यहले जानागया कि छंदकेहेतु एकएक को एकएकके साथ कहा परंतु एकएकके साथ दोनोंचाही सो रजकाप्रकरण न लगनेदिये बीचहीमें नखका विशेषण कहनेलगे सो अर्थ इसतरहका है कि श्रीगुरुपदरज बन्दौं व श्रीगुरुपदनख बंदों यही दोनोंका मिलाप फेरि दोहामें कहेंगे ६॥ दलन मोह तम सोसु प्रकाशू बड़ेभाग उर आवत जासू ७ टी०। बाहरदृष्टिको प्राकृतजानि नखमणिगण ते दिव्यकिये अब भी- तरके नेत्रजोहैं ज्ञान वैराग्य तिनको मोहरूप तमकरि मुंदेजानिउसीनख को सूर्यकरि कहते हैं कि श्रीगुरुपदनख कैसे हैं कि मोह तम दलिबको गुणगण बबश्ये परन्तु प्र.
रामायण मानलप्रचारिका बा। सोसुनामसूर्य हैं इहां क्रियानाम कहा काहेते कि सर्वरसके शोषनेवाले सूर्य है शाते सोखनाल है परन्तु जिन प्राणिन के बड़ेभाग होहिं तिनके उर में श्रावतहैं ।। ७॥ उघरहिं बिनलबिलोवनहियक ॥ मिटहिंदोषदुःखभवरजनीके ८ टी । उपरहि इति जब ऐलो नखरूप सूर्यहृदय में ग्रावे तब का होइ तब उपरहिं कही जो ज्ञान वैराग्य रूप नेत्र मुंदेहैं सो खुलहिं तब भव जो संसार सोई है रजनी नाम रात्री तिसकादोष दुःख मिटहि रजनीका दोष दुःख क्याहै कि अंधकार सो दोष व चोर सादिकी भय सो दुःख व भव रजनीका अविद्या सोदोष जा अविद्यामें अपनपौ भूलिगयो व तिस में काम क्रोधादि सो चौर सर्पहैं सो दुःख सब मिटि जातहै ॥ ८॥ सूझहिं रामचरितमणिमानिक॥ गुप्तप्रकटजहँ जोजेहिखानिकह टी० । जब ज्ञान वैराग्य नेत्र खुलें व भव रात्रिके दोष दुख मिटें तब का होतहै कि श्रीरामचरित जो मणिमाणिक रूप सो सूझहिं नाम देखि परतहैं गुप्त ठौर के व प्रकट ठौर के गुप्त ठौर कौन प्रकट ठौर कौन सो सुनो मणि सर्प ते होतीहै सो सर्प गुप्त यद्यपि संसार में है तदपि देव योगते मिलतहै व माणिक पर्वत ते होतहै लोपर्वत प्रकटहै उसमें माणिक गुप्तहै भेदीसे मिलतहै ताते प्रकटहै व मणिको कारणे गुप्तहै वहां किसू भेदीकी गम्यनहीं केवल ईश्वर कृपाते प्राप्त होत है तैले अनुभव वाले संत सोई सर्पहैं सो है जगत्ही में परन्तु कोई जानत नहीं उनहीं के अनुभवमें जो सीतारामचरित्र सो मणि सो अति गुप्तहै जब सीताराम कृपा करहिं तब मिलहि उसमें कोई भेदी नहीं व वेद पुराण संहिता सो पर्वत प्रकट हैं उसमें रामचरित्र माणिकरूप गुप्त सो पंडितजन भेदिन से मिलतहै सो जब गुरुपद नख उरमें बायो तब सब गुप्तप्रकट ठौर के मणि माणिक रूप रामचरित्र सो देखि परतेहैं ॥६॥ यथासअंजनआंजिग साधकसिद्धसुजान ।। कौतकदेखहिंशैलवन भूतलभूरिनिधान१० टी०। इस दोहा में फेरि रज नखका मिलाप कहते हैं दीप देहरी के न्याय करिके ऊपर नखका विशेषण कहते श्रावते हैं जब कहा कि राम चरित मणि माणिक सूझहिं कथा यथा सुश्रंजन दै सुजान शैलवन भूतल में भूरि स्थानके कौतुक देखते हैं तथा फेरिदोहाके नीचे यह चौपाई कहा रामायण मानसप्रचारिका बा० १३ कि (गुरुपदरज मुदुमंजुल अंजन । नयनअमीहादोष विभंजन ) कैसे जैले सुअंजन कहीं सिद्धांजनको जि नाम देइकरि साधक जो साधना करनेवाले सोई साधना सिद्धभये सो सिद्ध व सिद्ध अंजन बनाया सो सुजान तब अंजन देइ करिक कौतुककही तमासा देखते हैं कहां शैलवन भूतल जिस स्थानमें जौनतरहका लीला भूरिनाम समूह होताहैसोसब देखते हैं तैसे गुरुचरण रज मदुलमंजु अंजनके ज्ञान वैराग्यरूप नेत्रन में देइकरि नाम धारण करिकै तब रामचरित कौतुकको देखते हैं कौन शैल कौन वन कौन भूतल सो सुनो कि वेद पुराण शास्त्रसंहिता सो शैलतामें जो रामचरित व संसार सो वन तिसमें अंतर्यामी रूप रामके चरित व संतका हृदय सो भूतल तिनके अनुभवमें जो रामचरित सो जहां जित रंगकाहै सो सब देखते हैं ॥१०॥ गुरुपदरजमृदुमंजुलअंजन ॥ नयनअमियहगदोपविभंजन ११ टी० । गुरुपद रज जोहै सो मदुनाम कोमल व मंजुल नाम उज्ज्वल अंजन है अंजन का नाम होताहै सो इस अजनका नाम नयना अमी सो कैसोहै अंजन कि हग दोष विभंजन हग जो नेत्र तिसके दोष जो माड़ा फूलो तिमिर मोतियाबिंद इहां ज्ञान बिराग नेत्र तिनमें अहं सो दोष तिनको विशेष भंजन करैहै ॥ ११ ॥ तेहिकरिविमल विवेकविलोचन।। बरणौंरामचरितभवमोचन १२ इतिद्वितियप्रकरणः ॥२॥ टी० । तेहि गुरुपदरज अंजनकोज्ञानविराग नेत्र मेंकरि नामदेइनेत्रनको बिमलक रिकै तब श्रीरामचरित जो भवमोचन तिसको बरणौं यह तीसरी असंगति अलंकारहै (उदाहरण) और काज आरंभिये और काजैदौर॥ १२ ॥ इतिश्रीरामचरित्रमानसपरिचारिकायांत्रीगुरुपदपदरजपदनख विशेषणवंदनानामहितियकैंकर्यः २॥ बन्दोंप्रथम महीसुर चरणा मोहजनितसंशयसबहरणा १ टी० । अब श्रीगोसाई जी महाराज वाह्मणनके चरणके बन्दनाकरते हैं कि प्रथम महीसुर जो ब्राह्मण तिनकेचरण बन्दों कैसेहैं ब्राह्मणनके चरण कि मोह जनित नाम मोहसे उत्पत्ति संशय तिसके हरनेवाले हैं ( शंका ) अनेक बन्दनाकरि आयेहैं अब प्रथमपद कैसेबने (उत्तर)यह बंदनाकेसाथ १४ रामायण मानसप्रचारिका बा। प्रथम नहीं है ब्राह्मणकेसाथहै कि प्रथमपूजनीय जोब्राह्मण तिनकेचाणजन्दौं (शंका) प्रथम पजनीय तौ गणे गहैं (उतर) मोऊ बाह्मणे केद्वारागणेश पूज. नीयहैं जब जन्म होताहै तब प्रथम बाह्मणे नामकरण व नक्षत्र का फल गनिकै पुजावते हैं तब गणेशजीको पूजनहोतहै ताते ब्राह्मण सर्व कार्य में व सर्वस्थानमें व सर्व से मुख्य है पहिले सर्वकर्म में ब्राह्मण को अधिकारहै ताते ब्राह्मणको प्रथम पूजनीय कहा है अथवा प्रथम प्रकरण के साथ है कि श्रीगोस्वामीजी वाणीविनायकसेले गुरुपद नखताई बंदनाकरि सो दै प्रकरण समाप्त करे जब तोसरा प्रकरण उठाये तब प्रकरण के प्रथमही महीलुर बंदे ॥(इत्यर्थः)१ ॥ सुजन समाजसकल गुण खानी करों प्रणाम सप्रेम सुवानी २ टी० । अब श्रीगोसाई जी सुजनजो सन्तजन तिनकी समाजकेवन्दना करते हैं कैसी है सुजनसमाज कि सर्वगुण नकी खानिहै तिनको सप्रेमकही प्रेमसंयुक्त व सुष्टुवाणीले प्रणाम करतहौं ॥ २ ॥ साधुचरितशुभसरिसकपासू निरसबिशदगुणमयफल जासू३ टी० । कैसोहै साधुचरित शुभहै कपास केसदृश कपासका कैसाहैचरित्र निरस ना रसरहित व विशद व जासुनाम जा कपासका फल गुणमय कही गण जो तागतन्मयहै तैले साधु विषयरसते निरसहैं व उज्ज्यलकर्म भगवत्सम्बन्धी व जिनकाफल गुण यहै ॥ ३ ॥ जो सहिदुख परछिद्र दुरावा बन्धनीयजेहि जग यशपावा? टी। जो कपात व साधु अपनेऊपर अनेकदुःख सहिकै पराया छिद्र छपावते हैं ताहीते जगमें बन्यनीय व यशको प्रातहैं कौन दुःख सहिके पराया छिद्रछिपावते हैं सो सुनो कपास पहिलेचरखी में अोटोजातिहै पुनि धुनीजातिहै पनि कातोजाति है पुनि बिनीजातिहै इतनादुःख सहि पराये को छिद्र जो लज्जासोझिपावतहै तैले साधु प्रथजवां बम बोहित कुटुम्बको छोड़े पनि अनेक शुभकर्म जिनमें प्रथमदुःखहै पुनि अनेक तीर्थवतकरि कष्टकरते हैं तब जो कहूं एक दिन तिन्ह साधुनका सत्कार किया केवल अन्न जलमात्र तौ तिन्ह के अनेकनपाप छुटिजाते हैं इतनाकष्टपरायेकेहेतु सहतेहैं जो कहो कि साधु जो कर्म करतेहैं सो परायेकेहेतु हैं तो साधुनके कुछ न रहा सो सत्यहै तहांसाधु तो पहिलही शुभाशुभ छोड़ि भगवत् शरण भयेहैं निरवासिक हैं अब जो कछु कर्म करतेहैं काहेते कि शुभकर्म करना साध- रामायण मानसप्रचारिका बा। १५ नका सहजधर्म है परन्तु हैं कर्मनसे निरवासिक ताहीसे जो कर्म करते हैं सो पराअर्थहैं आप तो शुद्ध भगवत् शरण हैं ताहीते पूजनीयहैं ॥ ४ ॥ मुद मंगलमय सन्त समाजू जा जगजंगम तीरथराजू ५ दी। साधुनकी समाज मुदमंगलमयहै जोजगत्के बीच में जंगमतीरथ राजहैं जंगमकही चलनेवाला ५ ॥ रामभक्तिजहँ सुरसरिधारा सरसइब्रह्म विचार प्रचारा ६ टी। अबसमअधिक रूपककरि तीरथराजका धर्म साधुसमाज में कहते हैं तीरथराज जो प्रयागहै सो स्थावा है उनमें गंगाजीहैं व यमुनाजी हैं व सरस्वतीजी व तीनिउंमिले वेनीहैं सो साधुप्तमाज जंगम तीरथराज में श्रीरामभक्ति तो गंगाभक्ति व गंगासम रूपक जाते भक्ति व गंगाकीचरण उत्पत्ति है व साधुसमाजमें वह्मविचार सोसरस्वतीहै जैसे प्रयागमें सरस्वती गुल हैं तैले साधुसमाजमें ब्रह्मविचार गुप्तहै ॥ ६ ॥ विधिनिषेधमयकलिमलहरणी कर्मकथारविनन्दिनिवरणी ७ टो० । साधुसमाजमें विधिनिषेधमय जो कर्मकथा विधिकही ग्रहणनि- षेध कही त्याग तन्मय कर्मकथा सो कलिमल हरणी रविनन्दिनि कही यामुनाजीहैं जो कहो कि यमुना व कर्म कथाकी क्या समताहै सो सुनो यमुना जी सूर्य की पुत्री हैं व योवस्कर्म, सो सूर्यसेहैं सूर्यविना कोई कर्म नहीं यह समताहै ॥७॥ हरिहर कथा विराज त्रिवेनी सुनत सकल मुदमंगल देनी ८ टी। जैसे प्रयागमें गंगायमुना सरस्वती पृथक्ष्टथक शोभितहैं पुनि तीनि मिलेवेनीरूप शोभितहैं तैसे साधुसमाजमें भक्ति ब्रह्मविचारकर्म कांड यक्ष्टयक् शोभित हैं पुनितीनिउ मिले हरिहरकथा रूप शोभित है हरिहरकही भगवत् भागवत इनकीकथा त्रिकांडमें है सो साधु समाज प्रयागमें बेनी है स्नान करनेसे सर्व मुदमंगल देनी है कथा सुनेसे सर्व मुद मंगल देनी है ॥ ८॥ बटविश्वास अचल निजधर्मा तीरथराज समाज सुकर्मा ६ टी०। प्रयागमें वट है सोच्चक्षयहै साधु समाजमें विश्वास सो बटनिज धर्म में अचल सो अक्षयवट विश्वासको समता जैसे प्रयागमें अक्षय वट मुख्यहै तैले साधु समाजमें अपने धर्ममें भचल विश्वास सोई मख्य है १६ रामायण मानसप्रचारिका बा। विश्वास बिना कोई सिद्धिनहीं होत जैले तीरथराज में समाज नाम गंगा यनुला सरस्वती त्रिदेणी अक्षयवट है तैसे साधु समाज में सुकर्म भक्ति ज्ञान कर्म हरिहरकथा विश्वात येई समाज हैं । सबहिसुलभ सबदिनसबदेशा सेवतसादरसमनकलेशा१० टी० । इहांतक समरूपक कहि अब साधु समाज जंगम तीरथराज को स्थावर तीर्थराजले अधिक रूपक करि कहते हैं कि स्थावर तीर्थराज सबको सुलभ नहीं है साधु समाज सबहि सुलभ प्रयागका सबदिन मा- हात्म्य नहों एकमाघमकरके सूर्यहोहिं तबै माहात्म्य साधुसमाजका सब दिन प्रयाग एक देश में है साधुसमाज सर्वदेशमें है श्रादर सहित सेवन करनेसे कश जो है जन्म मरण सो शमन कही नाश कै जात है लश नाशने में दोउनकी समताभई परन्तु कठिन सौलभ्यका भेदहै ताते साधु समाज अधिकहै ॥ १०॥ अकथअलौकिक तीरथराऊ देइ सद्यफल प्रकट प्रभाऊ ११ टी०पनः प्रयागका माहात्म्य कहागयाहै साधु माहात्म्य अकथहै प्रयाग लौकिक है साधु समाज अलौकिक है (शंका ) साधु समाज अलौकिक कैसे (उत्तर) साधु समाजको बराबरी लोकमें अपर नहीं ताहीते अलौ- किक काहे कि अपर तीर्थ देवता सेवन करतसंते चारिफल के देवइया बहुतहैं अपना स्वरूप बनाइ लेइ ऐसाकोई नहीं साधु समाज सेवन करतसंते अपना स्वरूप बनाइ लेतहैं ताहीते अलौकिक जेकरे समान लोकमें दूसरा नहों व प्रयाग सेवन करत संते कालांतर फल देते हैं व साधु समाज सेवन करतसंते सद्यफल देते हैं यह अधिक है ॥ ११ ॥ सुनिसमुझहिंजनमुदितमन मज्जहिं अतिअनुराग ।। लहहि चारि फलअछततनु साधुसमाजप्रयाग १२ टी० । यह बातको सुनि जनजो सर्वप्राणी सो समुझहिं नाम विवा- रहिं व चलिकै प्रयागमें मुदितमन मजहिं नाम स्नान करहिं तौ तनु छुटे एकफल पावहिं व साधु समाज प्रयागमें अनुरागरूप मज्जनकर तो तनके अछत चारिफल पावहिं ऐसे साध समाज प्रयाग, देखिये तो श- रीरांतर को फल अपनेको देखिपरतहै व अछत तनुको फल अपन तथा और सबको देखि परतहै यह सद्यफल व अक्ततनु कहिवेको यहभाव जब कहा कि प्रयाग कालान्तर फल देतहैं तब यह ज्ञान जाना गया ।
रामायण मानसप्रचारिका बा। १७ कि चार वर्ष में देतहैं सोयह बातहै नहीं इस निवारणार्थ कहा कि साथ समाज प्रश्ततनु फलदेते हैं यहकहने सेजनाये कि प्रयाग शरीरांतर फल देतहैं १२ ॥ मज्जनफल पेखियततकाला काकहोहिंपिकवकउमराला १३ टी० । अब जो दोहामें अछततनु कहा सो इसमें नेमनरहा काहेकि तनु सौवर्षरहै पचासवर्षरहै पच्चीसवर्ष रहै सो न जाने कब मिलेगो यह अति व्याप्ति छुड़ावने को कहते हैं कि मज्जन फल पेखिये नाम साधुल- माजके संगका फल तत्काल देखिपरत है कहां देखिपरतहै काक होहिं पिक नाम जिन्ह प्राणिनकी वृत्ति काकवत् है काककी कौनवृत्ति कठोर बोली मलिन भोजन अविश्वास ऐसी वृत्ति जिन प्राणिन कीहै ते सत्- संगमें परिपिक जो कोयल तद्वत् वृत्ति होती है कोयल कोकवनि वृत्ति है मधुर बाणी पानादि भोजन वबक मरालहोत हैं बकमराल कैसे होत हैं कि जिन प्राणिन को बकवत् चाल है नाम दगाबाजी वो हिंसा लोउ सत्संगमें परि हंत होत नाम निस्कपटनिहि सकहोत हैं तत्काल १३ ॥ सुनि आचरज करै जनिकोई सतसंगति महिमानहिंगोई १४ टी । इस बातको सुनि कोऊ आश्चर्य न करे सत् संग की महिमा गोई नाम छपी नहीं है जो कोउ कहै कि गोई नहीं तो प्रकट कहां है तापर कहत है १४॥ बाल्मीकिनारदघटयोनी निजनिनमुखनिकही निजहोनी १५ टी० । बाल्मीकि नारद घटयोनी जो अगस्त्य तो येलब अपने अपने मुखनते अपनी अपनी होनी कहाहै बाल्मीकिजी श्री रामचन्द्र जी से नारदजी व्यासजीले अगस्त्य महादेवजीले कहा पूर्वको मलीनतासत्संगके प्रभावसे जसभये तसकहाहै १५ ॥ जलचर थलचर नभचर नाना जेजड़ चेतन जीवज़हाना १६ टी० । अब सत्संग का प्रभाव भूत भविष्य वर्तमान तीनिउ काल का कहते हैं कि जलचरजो मस्यादि थलचर मनुष्यादि नभचरपक्ष्यादि नाना वोजो जगत् में जितनेजड़ चेतन जीव हैं जहांन फारसी में जगत् को कहते हैं १६॥ मतिकीरति गति भतिभलाई जबजेहियतनजहांजेहिपाई १७ १८ रामायण मानसप्रचारिका था। टी० । मति जो बुद्धिलीरति गति भूतिमलाई रोपांची वस्तु जबनाम जवनकाल में जेहियतन नायजेहि उनसे जहानाल जेहि यस्थान में जेहिनाम जोकोई पाई है १७ ॥ सोजानब सतसंग जमाऊ लोकहुं वेदन आन उपाऊ १८ हो । सोतब तत्संग के प्रभाड ते जानव और लोक में दूसरी उपाययह पांचवस्तुके मिलनेको नहीं है १८ ॥ बिनु सतसंग विवेक न होई रामकृपाविनु सुलभन सोई १६ टी. विनु सलंग विवेकनहीं होत है कवन विवेक जो ऊपर कहा है , कि मति आदिपांच सत्संगके प्रभाव से मिलतहै यह जानना सो विवेक तवन विवेक सत्संगते होतहै सत्संगका प्रभाव सत्संगे ते जानाजात है जो कोई कहै कि जर इतना बड़ा सत्संगका प्रभाव है तब सब कोई सलंगे क्यों न करें लापर कहत हैं कि रामरूपा धिनातुलन नहीं १८ ॥ सतसंगतिमुदमंगलमूला सोइफलसिधिसबसाधनफूला २० टो । मुद मंगल का मूल सत्तंग है फेरि वही सत्संग सिद्धि फल है अपर सब साधन फूल है २०॥ शठसुधरहिंसतसंगतिपाई पारसपरसिधातुसुहाई २१ टी०। घठ जोहैं सोउ लरसंग को पायकरि सुधरि जाते हैं फैले जैसे पारसके परले ते कुधातु जो लोहा सो सुवर्य होत है यह तद्गुणा लंकार है। लाश तगुणा निज गुण त्यागि करि संगतिक गुण लेइ ॥ नासा मोतीअधरमिलि पञ्चरागविदेइ (इतितुललीभूषणे ) २१ ॥ विधिवशसुजनकुसंगतिपरहीं फणिमणिसमनिजगुण अनुसरहीं टो०। ऐसेतंत जो कहूं विधिवग्ध नाम प्रारब्ध के जोरसे कुसंगति में परिजाहिं तो जैसे सर्पक विषे मणि अपना गुण अन तरतहै तैसे संत अपने गुणलगांवें कुसंगति के गुण आप ग्रहण न करें यह अत्तद्गुणालं- कारहै ।। लक्षण ॥ तहां अतद्गुणलंगको जब गुणलागतनाहिं ॥ पियअनु रागीनायो बस्तिचनुरागिनमाहिं ( इतितुलतीभूपणे ) २२ ।। विधिहरिहरकविकोविदवानी कहतसाधु महिमासकुचानी २३ टी । अवसंतकी महिमाकी अगमता कहते हैं कि विधि जो ब्रह्माहरि
रामायण मानसप्रचारिकावा।
१६
जो विष्णु हर जो महादेव कवि शुक्राचार्य कोविद वहस्पति पाणी
सरस्वती एतेजिलि साधु की महिमा कहते में सकुचते हैं काहेकि जो
कहै सो थोर २३ ॥
सोमोसनकहिजातनकैसे साकवनिकमणिगुणगणजैसे२४
टो। तौ जोय ईश्वरकोटी लो नहीं कहिसक्त तो हमसे नहीं कहि
जात कैसे जैतेसाक वनिक जो कांचको पोतिके बेचनेवाला मणि के गुण
गणनहींकहितकत तैले २४ ॥
बन्दों संतसमानचित हित अनहित नहिंकोउ।
अंजलिगतशुभसुमनजिमि समसुगंगकरदोउ२५
टी० । बन्दी संत कैले हैं संतकी समानहैं चित्त जिनके शत्रु मित्रकोई
नहीं कैसे जैलेसुगन्धदार फूलको एक हाथले तोरे व एक हाय पर धरे
वह फूल दोनोंहाथमें बरावर सुगन्ध देइयो तैले संत को कोई मलाकर
कोई बुरा वे समान मानते हैं २५ ॥
नहु
वालविनयसुनिकरिकृपा रामवरण रतिदेहु ॥२६॥
तृतीय
टी० । संतको चित्त सरल जगत्के हितकारी ऐलो स्वभाव सनेह को
जानि बन्दौं सो हमारी बालविनय सुनि पारि श्री सीतारामजी के
चरणो रति नाम प्रीतिहड्डु २६ ॥
बदनानामवतीय कर्य ॥३॥
बहुरि बंदि खलगण सतभाये जे बिन काज दाहिने बांये १
टी० । अब श्रीगोस्वामीजी खलाणकी बंदनाकरते हैं काहे ते कि जो
खल न होहिं तो संतकी महत्त्व न खुले बहुरि नाम साधु बंदनाके प.
श्चात् खलगण जोहैं तिनको बन्दों कैसे हैं खल कि बिनाकाजही दाहिन
वामनाम बिनु प्रयोजन सन्मुख विमुख होतेहैं तिनको अपने सद्भाव से
बन्दौसद्भाव कही संतका स्वभावह कि सबको नमस्कार करना ॥ १ ॥
२० रामायण मानसप्रचारिका बा। परहित हानिलाम जिनकेरे उजरे हर्ष विषाद बसेरे २ टी । फेरि खल कैसे हैं पराये हितकी हानि तोई जिनको लाभ है पुनः पराये केउजरे हर्ष व बस में विवाद होतहै २ ॥ हरिहरयश राकेश राहुसे पर अकाजभट सहसबाहुसे ३ टो० । पुन कैसे हैं खलकि हरिहर यशकही भगवत् भागवतकीकथा जो हैसो राकेशनाम चन्द्रमा है तेहिको राहु रूप हैं अभिप्रायकी जहांहरिहर कथाहोतहोइ तहां जो खलपहुंचे तो कोई रीतिले घरी दुइवरी कथा बन्द करिदेहिं कोई विषयको बार्ताकरि वाकोई वादविवादकरि सोग्रहण तुल्य भयौ जो कथा उपराम होइगई तो जानौकि लर्वयास होइ गयो पुनःकस खलकि पराया अकाजकरिवेको सहस्त्रबाहु सम भटहैं ३ ॥ जे परदोष लहहिंसहसाषी परहितघृत जिनके मनमाषी ? टो। पुनाखल कैसेहैं किजे सहसाषी नामसाक्षीभरि वा साक्षीदेकरि परायोडोषको लेतेहैं व परायाहित जो घत है तिसमें माषीकीनाई परिके अंगभंगहोइ जाते हैं नामपरायके अकाज करिबेको मनोरथ सो अंगहै सो आपन बूतभरि करे जब दूसरे को अकाज न भयो तव मनोरथ नष्टभयो वहै अंगभंगहै ४॥ तेज कृशानु रोष महि षेशा अघअवगुणधनधनिक धनेशा ५ टी० । पुनः वेखल कैसे हैं कि अग्निकीनाई रातिदिन जरतेरहतेहैं वो महिषासुरको बराबरि रोप? वोपाप अवगुणके धनी कुवेरकीबराबरि हैं ५ उदय केतु सम हितसबहीके कुंभकरण सम सोबत नीके ६ टी । पुनः सबके हितकार कैलेहैं जैसे उदयकेतु अभिप्राय कि जैसे केतकेउदय में सबको को शहोत है तैसे खलनके उदयमें सबकेल्लोश होत है ताते जो वेखल कुंभकरण की नाई सोवतेरहैं तबै नीकहै कुंभकरणतो निद्रामें सोवतरह्यौहै खलविपत्ति रूप निद्रामें सोवै तबैनीक है यह कवि शापहै खलनको ६॥ परअकाजलगितनुपरिहरहीं जिमिहिमिउपलकृषीदलिगरहीं टी । पुनः खलकैसे हैं कि परायेके अकाजके लगाइकै अपना शरीर छोडिदेते हैं कैसे जैसे कपीको दलिकै हिम जो पाला वो उपल पाथर सो विलाइजातहैं नामगलिजात ७॥
रामायण मानसप्रचारिका बा। २१ बन्दों खलयश शेष सरोपा सहस बदन वरण पर दोषा ८ टी० । पुनःखलन को बन्दतहौं शेषके समान परिसहरोषा कही हर्ष पूर्वक देखि येतो शेषहजार मुवते भगवानको यथ बरणते हैं वो खल एकै मुखमें हजारमुखकी भक्ति करिकै परावादोष वरखते हैं तातेपसम कहाहै ८॥ पुनिप्रणवों एथुराजसमाना परअघसुनै सहसदशकाना , टी० । पुनः राजा पृथु के समान खलनको बंदतहौं राजाप्टथु दे कान में दशहजार कानकी शक्तिभगवान से मांतिकरि भगवत् यश सुनते हैं वो खल कानमें दशहजार कान को आवाहन करिपरावा अघ जो पाप सो सुनते हैं तातेसमताहै ॥ बहुरि शक्र सम विनवोंतेही संतत सुरा नीकहित जेही १० टी. ० । बहुरिकही फेरि खलनको शक्रजी इन्द्रतिनके समानबन्दी जो कहोइन्द्र तो नित्यही अमृतपान करते हैं तो खल संतत नाम निरन्तर सुरानाम मदिरा सो पानकरतेहैं काहेते उनकोवहै नीकलागतहै वो हित करतहैं तहां मदिराकहीअमल गांजा भांग अफीम चरस माजूम जितनी घस्तु अमलकरैं सो मंदिरा संज्ञाहैं १० ॥ वचनवजूजेहिसदापियारा सहसनयनपरदोषनिहारा ११ टी० । जो कहौ इन्द्रकेहाथमेतौ वजहै सो वड़ोप्रियहै तो खलनकेमुख में वजसम वचनपियारहै जो कहो इन्द्र तौ हज़ारनेत्र से श्रीरामजी को विवाहदेखे वो देवतनको हित देखते हैं तो खल हज़ारनेत्र की शक्तिकरि परावादोष देखते हैं ताते इन्द्रकी बराबरि बन्दौं ११ ॥ दो. उदासीन अरिमीतहित सनतजरहिंखलरीति ।। जानिपानियुगजोरिकरि विनतीक सप्रीति१२ टी० । पुनः खलकैसे हैं कि चाहै शत्रुहोइ चाहैमित्रहोइ चाहैउदासीन नाम मध्यस्थ होइ कोई कर हितनु नै तौ जरहिं यह खलकी रीतिहै सो ऐसी खलन की रीति जानिके दोनो हाथजोरिक विनती करतहौं प्रीति पूर्वक १२॥ मैं पापनिदिशिकीन्ह निहोरा तिननिजोरनलाउबभोरा १३
४
रायावणमानसप्रचारिका वा
टो। श्री गोस्वामीजी महाराज कहतेहैं कि जो कोईकहै कि क्या
खलनकी वंदनाकरतेही कावे भलाई मानेंगेनहीं मानेंगे तापरकहते हैं कि
हम खलनसे भलाई नहीं चाहतेहैं हमतौ अपनी श्रोरसों निहोरा नाम
वंदनाकीन है अपनोोरकही अपनेसाधुता गुण ले और खल अपनीओर से
नहीं चकेंगे खलई करकेने अभिप्रायकि जो वे अपनीखलई से न च ती
हम अपनी साधुताते कैसेच १३ ॥
वायसपालियअतिअनुरागा होहिंनिरामिष कबहुँकिकागा १४
॥ इति चतुर्थ प्रकरणं ॥
टी। अब जो कोई कहै कि मला तमती बिनती करते ही श्री वे
खलई ले नचूकेंगे सो कैसे तहां सुनौ जैसे वायस जो है। कौवा तिस
को अति प्रीतिसे पालौ परंतु निरामिप नहीं होता काहेते कामा उस
का गयाका वहतो कागको कागई है तैले खलको बंदना करेसे स्वलनको
कागयो खलके खलई है मैं तो अपनी साधुताते बंदना कीन है ११ ॥
इति श्रीरामचरित्र मानसपरिचारिकायां खलबंदनानाम चतुर्थ कैंकर्य ४
बंदीसंत असज्जन चरना दुखप्रद उभयबीच कछुवरना १
टी। संत असंतके चरण बंदी कैसे संत असंत हैं दुःखप्रदउभय कही
दुःखके देनेवाले दोनों हैं यह व्यंगोक्ति अलंकारहै अब दोनोंके दुःखदेने
में जो कारणतो आगे कहत हैं (शंका ) साधुलमान वो खल समाज
गुख कहि बंदना करिआये अब फेरिमिलाइकै बंदना करने में क्या हेतु
(उत्तर) जब गोस्वामीजी संतसमाज के गुण कहि बंदना करे वो खल
समाजके गुणकहि बन्दना करे तब यह जानागयाकि साधु कोई जातिहै वो
खल कोई जातिहै वो इनका देश भिन्न भिन्न है वो इनका परम्परा है कि
साधुके साधु होते हैं वो खल के खल होते हैं तो यह सब बात के संदेह
मिटायने क अर्थ दूनो के मिलाइकै बंदना करि यह जनाये कि साधु
असाधु के जाति नहीं केवळ अपनीअपनी करनीते साधुखल होते हैं-
साधु बल एकदेश एकैघर एक मातापितासे होतेहैं वो इनकी परम्परा
नहीं केवल सुसंग कुलंग पायकरि सुबस्तु कुबस्तुहोति है ताही ते संत
असंतकी बंदना के द्वार होइकरि सुसंग कुसंगके गुण दोष प्रयोत्तर
पूर्वक यह प्रकरण बन्दो संत असज्जन से लेइ सम प्रकाश तम पाख
दूहुयह दोहाताई जानब ॥ १॥
रामायण मानप्तप्रचारिका बा। ३३ बिछुरत एकप्राण हरिलेहीं मिलतएक दारुण दुखदेही २ टो।अब संत असंत जैसे दुःख देते हैं लोकहते हैं किसंतजोहैं सोविछु रत प्राण हरिलेते हैं वो खल मिलते दारुण दुःखदेतहैं देखियेतो इसक- हनिमें व्यंगशितना भरा है कि निंदा निति प्रस्तुति प्रस्तुति मिति निंदा देखियेतो जब कहा कि संतदुःवप्रद हैं तब यहनि दाभयो परंत जबकहा कि विछुरत प्राणहरिलेही तब महत् स्तुतिभई कि इतना शुभगुण उनमें है कि जिनके बिछुरे प्राणांतकेसम दुःखहोतहै वोजब संतनकेसग मिला इके खलनकी बंदनाकर तब स्तुतिभई जब कहाकि मिलतै दुःख देतहै तब महत् निभई कि इतना अवगुण खलन में है कि जिनके मिलकी कोई इच्छानहींकरे काहेतेकि जिनकेमिलनेमे परिणामवर्तमानदुःखे है २ उपजहिंएक संग जगमाहीं जलजजोंकजिमिगुणबिलगाही३ अब जो कोई पूछे कि साधु अत्ताधु कहां होते हैं तापर कहते हैं कि उपजाहिं एकसंगजगमाही जो कोई कहै कि एकसंगहोतेहैं वो एक जगह होतेहैं तो गुणदुइकैसे तापर कहते हैं कि जैले कमल वो जोंक एकैसंगहो तेहैं एकैजगहरहतेहैं परंतगुण बिलगलिगहै कमलकेदेखत चित्तप्रसन्न होत है सूघने से शरीर में सधिरकी वृद्धिहोतिहै वो जोंक देखतै डरलागेवो जो लगिजाइ तो शरीरकास धिर खींचिलेतहै तैसे साधुअसाधु३ ॥ सुधा सुरासम साधुअसाधू जनकएक जग जलधियगाधू ४ टी। एक दृष्टांत कमल जोंक काकहिकरि फेरिदूसरादृष्टांतदेते हैं की सुधासुरासम साधु जलाधू हैं सुधाको गुण साधु में वो सुराको गुण असाधु में तौ जेलेअमृत श्री मदिरा समद्रही से उपजेहै एक पिताले तैले साधु असाधु जगत्में एकैपितासे उपजतेहैं १ ॥ भलअनमलनिजनिजकरतूती लहतसुयशअपलोकविभूती५ टी ० अबदृष्टान्त कहते हैं किजैसे कमल वो जोंक वो सुधावो सुराएकै पितासे होते हैं परंतु अपने अपने गुसनले यश अय यके भागोहैं तैसे भल जो साधु धनभल जोअसाधु सो निज निज कही अपनी अपनी करतति ते सुयशनाम सुन्दरयश अपलोकनाम अयश के विभूतिजो ऐश्वर्य तित को लहतनाम प्राप्ति होतेहैं ५ ॥ सुधासुधाकरसुरसरिसाधू गरलअनल कलिमलसरिब्याधूद रामायण मानसप्रचारिका बा। टी। जो कोई कहै की साधुकी कैली करणीहै जाकरि सुयगपावते हैं वो खलकी कैली करणी है जाकरि अयशपावते हैं तापर कहते हैं सुधासुधा कर सुरसरिसाधू इहांवाचक धर्मलुता उपमाहै साधुकी करणी कसी है जैसे सुधानाम अमृत अमृत में स्वाद तोष अमरत्व गुणहै तैसे साधुकी करणी में रामनाम राम रूपस्वादहै वो इसी स्वादके पाइकरि सर्वसाधन से संतोष श्री चारिउ मुक्ति प्राप्तिसो अमरत्व पुनः साधुको करणी सुधा- कर जो चन्द्र माताकीनाई शीनलप्रकाश अहलादकारी है पुनः सुरसरि जो गंगाताकी नाई पावन वो सबको प्राप्ति ऊंचनीचको अपना स्वरूप बनाइलेना यहगुणन करिकै साधुयध को पावते हैं वोखलके गुण सुनो गरल नाम विकी नाई कटु मृत्यु देनेवाला पुनः अनलकीनाई तप्त पुनः कलिमल सरि जो कर्मनासा ताकी नाई सर्वशुभ कर्मके नासकहैं यह गुणनतेखल अयश पावतेहैं ६ ॥ गुण अवगुण जानत सबकोई जोजेहिभाव नीकतेहि सोई ७ टी० । जोकोई कहै कि गुण अवगुण पहिलेनहीं जानिपरत जोजानि परत तो काहेकोकोई अवगुणको धारण करत तापरकहते हैं कि गुण अव- गुण को सबकोई जानते हैं परन्तु जौन जिसको भावत है सोई तिसको नीकलागतहै ७॥ भलोभलाईपैलहहि लहहिनिचाईनीच ।। सुधासराहियअमरता गरलसराहियमीच ८ टी० । पूर्व जो कहा कि भल अनभल अपनी अपनी करतूति ते यश अयश पावतेहैं सो उसीको फेरि पुष्ट करते हैं कि भले जो हैं सो भलाई कोलहहीं नामपावते हैं वो नीच जो हैं सो निचाई लहहिनाम पावते हैं कैसे जैसे सुधाकी अमरत्व सराहाजात है यो विषकीमृत्युकी सराहना होत है यह कहनेका अभिप्राय कि साधु साधुतामें खुशी है भो खल खलई में खुधीहै ॥ खलअघअगुणसाधुगुणगाहा उभयअपारउदधिअवगाहाह टी० । खलनको अघ अवगुणनकी गहनि वो साधुके गुण गहनि दूनौ अथाह अपार समुद्र के बराबरिहै । ॥ तेहितेकछुगुण दोष बखाने संग्रहत्यागनबिन पहिचाने १.
२५ रामायण मानसप्रचारिका बा। टी। अब जो कोई कहै कि तुम्हें किसूके गुण अवगुणते कौनकाम तुम तौ रामयश गावनेको संकल्प कियोहै तापर कहतेहैं कि हमैं किसूसे कुछकामनहीं हमतौ गुण दोष जानने के लियेकहेहैं काहे कि गुण अवगुण जाने बिना संग्रह त्यागनहीं होतहै तौ गुण अवगुण गुणीके द्वारहोइकै जानाजातहै ताहीते गुण अवगुणको बखानिक जानाचाहतहौं जातेराम यश गावते में सहायत्वरहैगो १० ॥ भलउपोचसबविधिउपजाये गनिगुणदोषवेदविलगाये ११ टी। अब जो कोई कहै कि यहगुण दोषका विलगकरना तुमहीं से चलाहै कि अवरकोई कहाहै तापर कहतेहैं कि यह परम्पराहै भल पोच दूनौ मिलाइकै ब्रह्माउपजाये तहांवेदगुणदोष गनिकैबिलगाइदीनहै११॥ कहहिंवेदइतिहासपुराना विधिप्रपंचगुण अवगुणसाना १२ दुखसुख पापपुण्यदिनराती साधुप्रसाधु सुजातिकुनाती १३ दानव देव ऊंच अरु नीचू अमिय सजीवन माहुरमीच १४ मायाबृह्म जीव जगदीशा लक्षि अलक्षि रंक अवनीशा १५ काशीमगहसरसरिक्रमनासा मरुमालव महिदेवगवासा १६ स्वर्गनर्कअनुरागविरागा निगमागम गुण दोषविभागा १७ टी० । पुन वेदपुराण इतिहासजोभारतादितोकहतेहैं किविधिका प्रपंच गुण अवगुणले सानाहै नाममिलाहै इहां दुइरीति दिखावा है एकमल पोच विधिके उपजायेकहे दूसरा विधिका प्रपंच गुण अवगुणते साना कहे सोवेद पुराण इतिहास सबको गनिकै विलगाइदोनहैयह परम्परादिखाइ के जो गुण अवगुण भलपोच वेदादि विलगकीन सो कहतेहैं इहांसदोहा ताई अक्षराथै जानब १२॥ जड़चेतनगुणदोषमय विश्वकीन्हकरतार ॥ सन्तहंसगुणगहहिंपय परिहरिवारिविकार १८॥ टी० । शंका माया ब्रह्मजीव जगदीश विधिके बनाये कैसे उत्तर सुनो इहां बनाइबेमें तात्पर्यनहींहै गुण अवगुण सानने में तात्पर्य है यहीबरे ऊपर दुइभूमिका कहेहैं भलपोच उपजावने में वो गुण अवगुण सानने में सो माया ब्रह्मजीव जगदीशहै बह्म गुणमाया अवगुणजीव प्रपंचके भीतर अवगुण जगदीश जो त्रिदेव सो गुण ये मिले मिलाये ब्रह्माकी सृष्टि में हैं २६ रामायण मानसप्रचारिका बा। ताहीते इनको गने कुछ बना वनानहीं कहे प्रश्न दोहा में लिखतेहैं कि (जड़चेतन गुणदोषमयविश्वकीन करतार ) इस का कैसे कहोगे उत्तर सुनो जोविश्वकरतार कीन्ह है सो जड़ चेतन गुणदोष मयहै इहांकोनपद विश्वके साथहै सो यहपन्द्रह के अंककाअर्थ जानब दोहार्थ ॥ जड़ चेतन गुणदोषमय जो विश्वकोकरतारकोनहै सो यद्यपि वेदगुण दोषको विलगाइ करिकहा तथापि संतजो हैं सोई गुणग्रहणकरते हैं कैसे जैसे दूध पानी मिले हंसैदूधको गहि जलको त्यागकरते हैं तैसेगुण जो है सो दूधहै वो अवगुण जाहै सो जलहै सोसंत जोहैं तो हंसहँ गुणरूपदूधकोगहिअवगुण रूप जलकोत्यागकरते हैं १०॥ असविवेकजबदेइविधाता तबतजिदोष गुणहिंमनराता १६ टी। ऐसा विवेक हंसको ऐसो जब विधातादेहि तबदोष को तजि गुणमें मन रतहोतहै १६॥ कालस्वभाव कर्मबरिआई भलेउप्रकृतिवस चूकभलाई २० टी। ऐसा विवेक पाइकरि दोषको तजि गुणको ग्रहणकीन सो काल स्वभाव कर्मकी बरिआई नाम जबरदस्तीसे वो प्ररूत जो माया तिसके वसहोइ भलेजो सो अपनी भलाई से चूकजाते हैं २० ॥ सोसुधारिहरिजनजिमिलेही दलिदुःखदोष विमलयशदेही २१ खलउकरहिंभलपाइसुसंगू मिटहिनमलिनसुभावअभंगू २२ टी० । अबजो कोई कहै कि चक गये सो चकै रहै कि सुधरे तापर कहते हैं कि सो सुधारि हरिजन लेही जिमि जो वाचक है सो आगे की चौपाई के साथहै भले जो कालकर्मादिके वश भलाई से चूके सोभीतर भलाई बनीहै ताहीतै हरिजन जो संत सो जब कबहुँ सन्तन का संग परा तब संत उसकको सुधारिकै विमलयश जो भगवत्यश सो देते हैं किमिजिमि(खलउ करहिंभलपाइ सुसंगू) जैसेखलजेहैं ते जोकहूसुसंग में परे कालकर्मादिके बशते भलाईकरनेलगते हैं परन्तुवह जो मलिनता स्वभाव सो अभंगहै अभिप्रायकी भीतर मलीनता बनी है ताहीते जर फेरिअपने कुतंगिनमें परे तब वे भलाईको मिटाइकै निचाइदेते हैं तैसे यहपूर्वरूप गुग्णालंकारहै पूर्वरूपले संगगुणतजि फिरिअपनोलेइ २१॥२२॥ लखि सुवेष जग वंचक जेऊ वेष प्रताप पूजि अहितेऊ २३ रामायण मानसप्रचारिका बा। टी । देखिये तो जो ऊपर कहा है कि जो जेहिके भाया सो तेहिके नीकहै सो इहांतक भायाहै कि जग वंचक जो खल हैं सो सुसंगमें परि सुवेष बनाइ सुवेषके प्रतापतेपूजनीय भये २३ ।। उघरे अन्त न होइ निबाहू कालनेमि जिमिरावणराहू २४ टी। परंतु अंत में वंचकता उघरिपरतहै भलाई नाही निबहत काहेते की सुवेषका भीतरसेनिष्टा नहीं है केवल देखनमात्रकोहै क्योंकि उनको अवगुणभायाहै अब दृष्टांतदेते हैं की जैसे कालनेमि रावणराहु ये सुवेषके प्रतापसे पूजनीयभये परंतु अंतमें निचाइपैप्रकटे तैसे खलवेष प्रतापते पजनीयहोतेहैं पर अंतमेंनीचता प्रकटहोतहै २४ ॥ कियहु कुवेष साधु सनमान जिमिजगजामवंत हनुमान २५ टी० । साधुको साधुता इहांतक भायाहै की जो काल कर्मादि के वश कुसंगिनमैपर वो कुवेषउ कि येतो अपनीप्साधुता भलाईको नहीं छोड़ते हैं किमि जिमि जगत्में जामवंत हनुमान् कि भालु वानरकावेष किये हैं परंतु अपनीभलाईको नहीं छोड़े तैसे २५॥ हानिकुसंग सुसंगतिलाहू लोकहुवेदविदित सबकाहू २६ टी। अब जो पूर्वगुणदोषका विभागकियाहै सो उनगुणदोषके धारण करनेवाले के संगतिमें जो हानिलाभहै सो कहते हैं की कुसंगतिमें हानि सुसंगतिमें लाभ यह बात लोकमें विदितहै वो वेदहूमें विदित है सबके जानिबेको २६॥ गगनचरज पवनप्रसंगा कीचहिमिलै नीचजलसंगा २७ टी। तापर दृष्टांतकहतेहैं की जैतेऊईगति जोपवनकीहै सोपवनका प्रसंगपाइकरि रज जो धूरि ऐसीनीच सोउ आकाश को चढ़िजातीहैफेरि जब नीचगति जो जल तितकासंगपाया तबकीचमें मिलिजातीहै २७॥ साधुअसाधुसदनशुकसारी सुमिरहिंरामदेहिगनिगारी २८ टी। यह जड़का दृष्टांतको एक देश हानिलाभ लेइकरि फेरिचेतन का दृष्टांतदेते हैं देखिये तो साधुके सदनमें शुक वो सारी जो मयना सो राम नाम अस्मरण करते हैं वोही शुकसारी असाधु के सदन में गनि गनिगारीदेतहैं २८॥
रामायण मानसप्रचारिका बा। धूमकुसंगति कारिख होई लिखियपुराणमंजुमसिसोई २६ टी। अव जड़चेतन मिलाइकै दृष्टांत देते हैं कि पूर्व अवस्थामें धूम जड़पर अवस्थामें चेतन देखिये तो धूम कुसंगतिमें कारिवाहोतहै कवन कुसंगति लकड़ीकंडाकी संगतिमें कारिखहोतहै वो सुसंगतिमें मंजुमसि होतहै तब पुराण लिखेजातेहैं पूजनीयहोतहै कवन सुसंगते तेल बाती दीवा सज्जी सोहागा लोध लाख २६॥ सोइजलअनलअनिलसंघाता होइजलदजगजीवनदाता ३० टी० । फेरि सोईधूम शुभसाकल्यको संगपाइ वो अग्नि जल पवनका संघातनाम संघटते जदलनाम मेघहोतहै तब इतनीबड़ाईको प्राप्तिभयो कि जगतको जीवनदाता होतभयो जीवन नाम जल ३०॥ ग्रहभेषजजलपवनपट पाइकुयोगसुयोग। होइकुवस्तुसुवस्तुजगलखहिंसुलक्षणलोग ३१ टी अबसमिष्ठी दृष्टांतदेतहैं कि जैसे ग्रहजो नवरवि१सोम२ मंगल३ बुध १ वृहस्पति५शुक्र ६ शनिश्चर ७ राहु ८ केतु ८ सोयेऊंचनीच स्थान पाइकरि सुखदाई दुखदाई होतेहैं वो भेषजजोऔषध बोजलपवनवो पट जो बस्त्रये पांचो कुयोग सुयोग को पाइकरि कुवस्तु सुवस्तुहोते हैं परंतु इसबातको सुन्दर लक्षण मान जो प्राणी हैं सो लखते हैं ३१ ॥ सम प्रकाश तम पाख दुहुँ नाम भेद विधि कीन ॥ शशिसोषक पोषक समझि जगयशअपयशदीन ३२ इतिपंचमप्रकरणं॥ टी। पुनः जैसेएकमासमें वै पारख हैं सोदोऊपाख में प्रकाश वो तम समनाम बराबरि है कृष्णपक्ष की परिवा वो शुक्लपक्ष की चतुर्दशी एक घरीतम वो रात्रिभरि प्रकाश परन्तु नामका भेद जो विधि कीन है सो शशि को पोषक सोषक के संग समुझि के यश अपयश दीन है शुक्लपक्षशशि पोषक को संगवो कृष्णपक्ष शशि पोषक का संग है यह कुसंग सुसंगका हानि लाभ पांच दृष्टांत देइ करि दिखायेवो जो यह प्रकरण उठाये की साधु असाधु दोउ दुःख प्रद हैं तो यहि में जो बीच रहा तो सब विलगाइवो गुण दोषको गनि भेद समुझि दोउन को बंदे रामायण मानसप्रचारिका बा। पामें यह अभिप्राय है कि साधु जब मिले तब परमानंद भया सीता रामजी का नामरूप लीला धाम में मनलगा सब शोकादि छटे तबसाध के बंदेकी आपु मिलेई रहो जाते यह आनन्द बना रहै वो जब खल मिले तब अनेक विषय वार्ता करि उस आनंद को छुड़ाये जब खल बिछुरे तबफेरि श्रीरामजीकी सुधिभई तबखलनको बंदेकीआप विछरेई रहो जाते भजन बने इति और यह प्रकरण में जो गुण दोष गनि साधु असाधुका पहिचान कियाहै तो यह अभिप्रायहै कि रामयश गावने लग वो गुण अवगुण साधु प्रसाधु पहिचाना नहीं तो कहू जो असाधुश्रव- गुणका संगपरिजाइतौ रामयश गावने में विघ्नहोइ वो साधु गुणका संग होइतौ रामयशगावने में उत्साहहोइ यहीबरे पहिचान कीनकि साधुगुण का संगकरना वो खल अवगुण को संगछोड़ना यह बात अपने सहित जितनेरामयश के गावनेसुनने वाले हैं तिनसबकेउपदेशहै३२ ॥ इतिश्री रामचरितमानसेपरिचारिकायांसाधुप्रसाधुवन्दनानामपञ्चमकै कर्य ५॥ जड़चेतनजगजीवजत सकलराममयजानि। बन्दौंसबकेपदकमल सदाजोरियुगपानि १ अबषष्ट प्रकरण जड़ चेतनयह दोहासलेइ वो(यहि प्रकार बल मनहिं दिखाई) यह चौपाईतक जानब शंका इसका पहिचानक्या कि इहां से उहां प्रयत एकै प्रकरणहै समाधानसुनो इसग्रन्थमें प्रथम पैंतिस दोहा तकबन्दनाहैसोजहांले बन्दना उठेअरूजहांताई फेरिबन्दौं या प्रणवौं या करों प्रणाम यह शब्दनमिले तहांताई जानेकीसाभिप्राय एकही प्रकरण बीचबीच में शंका उठि आवती है कब कि जब विशेषण असहेतु पूर्वक बन्दनाकर तब शंका खड़ीभई उस का समाधान करत फेरि शंका फेरि समाधान फेरि शंका फेरि समाधान यहीतरहसे जहां तक शंका समान समाप्ति नहीं तहांतकप्रकरणजबशंका समाधान पूराभयातब दूसराबन्दना उठा वोही प्रकरणहै यहबीचवीचके शंका समाधान का उदाहरण यही प्रकरणमें कहतेहैं ॥ इतिदोहार्थ (जड़चेतन जगजीवजत)सकल जड़कही श्वासारहित चेतनकही श्वासा सहित सो सबके राम मय जानिकै सदा पदकमल बन्दौं दोउ हाथ जोरिक इहांअन्तरयामीकी बन्दनाजानना॥ देवदनजनरनागखगप्रेतपितरगन्धर्व ॥ बन्दौकिन्नररजनिचर कृपाकरहुअबसर्व २ ३० रामायण मानसप्रचारिका बा। टोगसमिष्टीबन्दनाकरिअबवेष्टीबन्दनाकरतेहैं किदेवजोहस्पतिइन्द्रा. दिवो दनुजजो प्रहलादादिवो नरजो स्वायम्भुवमन्वादि नागजोअनंतादि खग जो गरुड़ भुशुण्डि जटायु आदि प्रेत जो प्रेत राजधर्म राजादिपितर जो अर्यमादि गन्धर्व जो तुमुरादि किन्नर जो शुकादि रजनीचर विभीष. यादि एते भगवत्विभूति सबको मैं बन्दत हौं सब मिलि हमारे ऊपर कृपाकरहु २॥ आकर चारिलाख चौरासी जाति जीव नभजल थलवासी सीयराममय सब जगजानी करों प्रणाम जोरि युगपानी ? टी० । प्रश्न यह प्रसंग पुनरुक्ति साजानि परतहै काहेकि दोहामें कहा किजड़ चेतन बन्दौं फेरि कहा कि चारि खानिकै जीव बन्दौं सो दोबार कहनेका क्या हेतु उत्तर सुनौप्रथम दोहामें कहा किसबको राममयजानि बन्दौं तबयह जानिपराकी गोसाई जी केवल रामउपासकहैं काहेकि जो जेहिकर उपासक होतहै तेहि मय जगत् देखतहैतौ यहतेकेते लोग ऐसे हैं कि केवल रामजीको ब्रह्म मानतेहैं सीताजीको जीवनानते हैं सो उन का मतसिद्दिभया वो गोसायूंजी का यही मतहै तानिवारणार्थ कहते हैं कि चारिखानि वो चौरासीलाख जातिके जीवजितने जलथल नभ कही आकाशके वासी सवको सीताराममय जानिकै प्रणाम करतहौं यहकहने से जानागया कि गोसाई जी सीताराम युगलो पास कहैं वो दोनौ स्वरूप ब्रह्महैं वो यहजगत् सीता राममय है ताते पुनरुक्तिनहीं ३॥ ४॥ जानिकृपा करकिंकरमोहू सब मिलिकरहु छाड़िछलछोहू ५ टी०। यहसंकेतको जनाइकरि अबजोदेवादिवेष्टीरूपकी बन्दनाकीन है तिनप्रतिप्रार्थना करते हैं कि कृपाकर जो श्री सीतारामजी तिनकर किंकर हमहू को जानि करि कि जैसे तुमसब रूपाकरके किंकरही तैसे महू ताते सबमिलि हमारे ऊपर छोहकरी छलछोड़िकर शंका छलछोड़ना किसका समाधान दोनों तरफलगतहै कि हममें जो छलहै कि सीतारामके कहाँ वते हैं वो काम क्रोध लोभके किंकर होइरहे हैं यह छल छोडिकृपा कर- हु अथवा जो कहा कि देव दनुज नर नाग खग प्रेत पितर गन्धर्व किन्नर निश्चर एते समस्त कृपा करो सो इनमें परस्पर विरोध देखा तब कहां आपुसका विरोधरूप छलसो छांकिपाकरो आशयकी आपुसमें तुमजस चाहो तसरहो परन्त हमारे ऊपर मिलिकर कृपाकरौ ५ ॥ , करतहौं ६॥ रामायण मानसप्रचारिका बा। निजबुधिबल भरोसमोहिंनाहीं तातेविनय क सबपाहीं ६ टी। हमकोअपनी बुद्धिकाबल भरोसा नहीं तातेसबके पास विनय करन चहौरघुपति गुणगाहा लघुमतिमोरिचरितअवगाहा टी। जो कहौ कि तुम का चाहतेहो तो सुनो श्रीरघुपतिके गुणन के गाहा नाम गाथा कीन चाहतहौं जो कहौ कि करोको रोकत है तौ सुनौ हमारी मति जो बुद्धि सो लघुहै वो चरित अवगाह नामगहिरा जिलका थाह नहीं ७॥ सूझन एको अंग उपाऊ मन अति रंक मनोरथ राऊ ८ टी० । वो जितनी उपाय गुणगाथा करिबे की है तिनमें हमको एको अंग नाम अंक नाहीं सूझिपरत देखिये तो मन तौ अतिरंक वो मनोरथ अतिराउ ८॥ मतिप्रतिनीचि ऊंचिरुचिपाली चहिय अमियजग जुरैनछांछी । टीवो मति अतिनीचि वोमति कि सचि अतिऊंचि वो अति प्राची है जैसे कोईके जगत्में माठाका धोवन तौ मिलैनाहों वो चाह अमृत कि करे तैसे हमारी मतिको है कि प्राकृत काव्यकरिबे की सामर्थ्य नही वो रामगुण गाथा कीन चाहतहौं सो १ ॥ मिहहिं सज्जनमोरि ढिठाई सुनिहहिं बालवचन मनलाई १० टी० । यहमेरी ढिठाईको सज्जन क्षमाकरहिंगे मेरी बालक कि ऐसो वचन मनलगाइ करि सुनहिंगे १० ॥ ज्यौंबालककह तोतरिबाता सुनहिं मुदितमन पितुअरुमाता ११ टी। ज्यों बालक तोतरि बात कहत है तौ माता पिता मुदित मन होइकरि सुनते हैं तैसे हमारे माता पिता सज्जन हैं सो मन मुदितहोइ मोरी तोतरी कही बावरी बानीको सुनहिंगे ११॥ हँसिहहिं कूर कुटिल कुविचारी जेपर दूषण भूषण धारी १२ टी। शंका कविकी प्रार्थना देवादि प्रतिवो कहतेहैं कि सज्जन हमारी ढिठाई छमिहहिं तौ बिनय और प्रोतिकरना क्षमा औरसे करावना इहां कहनारहा कि देवादि तुम सब हमारी ढिठाई क्षमाकरो सो न कहा वो रामायण मानसप्रचारिका बा। सज्जन ढिठाई क्षमहिंगे यह कहने में क्या हेतु समाधान सुनो जब गोसाईजी देवादि प्रतिकहा कि हमारो मनमति रकहै वो रघुपति गुण गावा गहतहौं सो तुमसब मिलि रूपाकरो तब यह प्रश्नभयो कि तुम तो साधु समाजके हेतुराम गुणगावते है।।प्रमाण(साधु समाज भणित सनमान) तो यह बड़ीभारी ढिठाई उनसे क्षमा करावो तापे कहाकि उधरकातौ हम भरोसहै की वे हमारी ढिठाई क्षमहिंगे कैसे जैसे अयोध्याजीमें भरतजी वशिष्ठादिक कि सभामें कहा कि दोहा (यद्यपि जन्म कुमातुते मैंगठ सदा सदोश वापन जानिन त्यागिहैं मोहिं रघुवीर भरोश)चौपाई(तुमपे पांच मोर भल मानी। आयुष आशिष देहु सुवानी) तैसे गोस्वामीजी कहा कि सज्जनका हमें भरोसहै तुमसब रुपाकरो यह प्रश्नलुप्ता उत्तर है इत्यर्थः अवत्री गोस्वामीजी कहते हैं कि जो हमारी ढिठाईको क्षमाकरिबो हमारी बालक कि ऐसीबानी सज्जन मुदितमन सुनहिंगे सो सुनिकरि जो कर कुटिल कुबिचारीहैं तेहँसिहहिं काहेते वेपराये दूषणको भूषण किये गति दिन पराई बाणीको दूषणे देतेरहतेहैं तेहँसहिंगे १२ ॥ निजकवित्त केहिलागननीका सरसहोउ अथवा अतिफीका १३ टी। यह कहनेसे यहवात पाई गई कि उनक्ररकुटिल कुविचारिनको अपनीवाणी बड़ी प्रियहै तापर कहते हैं कि निज कबित्तनाम अपनीबाणी केहिको नहीं प्रियहोत नामसबको प्रियलागतहै जो कोई कहै कि अपनी वाणी सबको प्रिय लागतहै तो अच्छीबाणी होगी तापर कहते हैं कि सो नहीं चाहै सरसनाम अच्छीहोइ अथवा चाहै अतिफीकीहोइ अपनीबाणी सबको प्रियहै १३ ॥ जेपर भनित सुनत हरषाही तेबरपुरुष बहुत जग नाही १४ टीजेपरमणित औजेपर बाणीको सुनिकहरपते, तेबरनामश्रेष्ठपुरुष हैं वे जगत्में बहुत नाहों, थोरे, १४ ॥ जगबहु नर सरसरि समभाई जेनिज बाढ़ बढ़हिं जलपाई १५ टी। जगत्मनदी तलावकीनाई बहुतपुरुषहैं जैसेनदी तलावऊपरका जलपाइ करि अपनी बाढ़िसे बाढ़त हैं जो ऊपरका जल न पावहिं तो न बढ़हिं काहेते कि पूरणनहींहैं ताते तैसे जेनदी तलावकीनाई पुरुषहैं ते इधर उधरसे वैचारि बातसीषिकै बक्ताबनि नातेहैं फूले फूले फिरतहैं रामायण मानतप्रचारिकाका करते हैं १५॥ १ कि हमारी बराबरि कोई काहेते कि अपर्ण हैं उनकेनिज अनुभवनहीं है ऊपरई कि बात सीखे तेपराई बागीको कूपयकार अपनी वाणीको बड़ाई सजन सकृत सिंधुसम कोई देखिपूर विधु बाढ़हिं जोई १६ टी. । बोसिंधुके समतो लज्जन तकतनाल एककोई हैं जैसेसमुद्र अापु पूर्ण है वोजब चंद्रमा कि पूर्णत्व देखतहै तब बाड़ते हैं तैले सिंधु सन जो सज्जन हैं ते अपने अनुभव कारकै परिपूर्ण वो परायेकी भक्ति जबसुने तब बहुत आनंद होतेहैं १६ ॥ भागछोट अभिलाषबड करीएक विश्वास १७ पेहहिंसुखसुनि सुजनजन खलकरिहहिं उपहात ।। टी।श्रीगोस्वामीजी कहतेहैं कि देखिये तो भागतो हमारा छोटाहै वो अभिलायबड़ी है भागनाम हिस्सासोतो हमारा छोटानाम प्राकृत कविनमें बैठने लायक वो अभिलाष बड़हिस्साकीहै कि व्यास बाल्मीकिके बराबर बैठे अभिप्राय कि यहजोमै भणित करतही सो व्यास बाल्मीकिके बचन की बराबरि प्रमाणहोइ सोयह बात में हमको एढ़ विश्वास है कि सुनि के सुजनजे हैं तेतो सुखपावहिंगे वो व्यास वाल्मीकिको वचनकीवरावर मेरी भणित कोप्रमाण करहिंगे वो खलजे हैं ते उपहासकरहिंगे कि यह देखो ये व्यासवाल्मीकिकीबराबरी चाहते हैं सो नहोगा कातेकीइनकी वाणी मोटीवो प्रारूनहै कैसे उनके बराबर होगी १७ ।। खलपरिहास होइहितमोरा काकाहहिं कलकंठकठोरा १८॥ टी० । सोखलनके परिहासते हमाराहित होगा कैसहित जैतेकीकाक जोहै कउवा सो कलकंठजो कोयललिलको जोकठोरकहै तो उत्साहित कारहोइ कीजो सुनेते कहै कि देखियेतो यह दुष्टकउवा कोकिलको कठोर कहता है तैले मेरोमणितकोजब खलहँगे वोकहहिंगेकि यह तो प्राकृत वाणीहै तबयह सुनि सज्जन कहेंगे कि देखिये तो केसी यहदिव्यवाणी को दुष्टप्राकतकहे हैं सो सज्जनके मुखले बड़ाई रूप हमारोहितहोइगो १८ ॥ हंसहिबझदादुरचातकहीं हंसहिमलिनखलविमलयतकही १६ टी०। पुनःजैसईसको बकुलाहसवे चातकजोपपीहातितको दावुरहँसे तौहंसचातक की बड़ाई है कि जबबकुलाकहै हिंसकौन विवेकीहै पत्थर खाताहै ऐसा कहिहते तो भले लोगकहैं कि यह मछरी का खानेवाला दगाबाजबकुला केला मोती खानेवाले हंत विवेको को हँसताहै दुष्टहै वो दादुरकहै कि चातककी बोली अच्छीनही नेम प्रेमअच्छा नहीं गति दिन पाउपीउ करताहै यह सुनि भलेलोग कहेंगे कि देखो तो यह दादुग आपुलौ उलटा टैंगिरहाहै वो गलबल दोलताहै वो चातक को हँसताहै अाखिर नीचेतीहै तैसै जब विमल बतकहीं जो भगवत्यश तेहि केकहने वालेको मलिन मनवाले खल हँसहिंगे तब सुष्टजन जो भगवत् दास हैं ते कहेंगे कि देखिये तो खल रातिदिन बकुलाकीनाई दगाबाजीवोविषय भोगिरहे हैं वो श्रीरामयश रूपमोती के चुगनेवाले जो विवेकी हंसरूप संततिनको हँसे हैं बड़ेदुष्ट हैं पुनः ये खलकैसेहैं कि अपुती दादुरकीनाई उलटे टैंगिरहे हैं परलोकसे वृत्ति उलटि गई है वो रातिदिन विषय वार्ता कल्लबल्ल करिरहे हैं वो चातकरूपी जो संत जैसे चातक का ऊपर मुख रहताहै तैले यहराम यश विनलबतकहीके करनेवाले कोवृत्ति ऊई वोराति हिन भावनामको रटन तिन को हँसते हैं बड़े दुष्ट हैं यह सज्जननके भुख से बड़ाई रूपहितकार होगा कब जब खल हँसेंगे तब १६ ॥ कवितरसिक न रामपदनेहू तिनकह सुखदहासरसएहू २० टी०। यह अपना हितकारकहि अबहँसनेउ वालौंका हितकार कहते हैं कि जे कवित्त के रतिक नहीं नाम काव्यका देशनहीं जानते वो न श्री. रामजीके पदकमल में प्रीतिहै तिनहू को मेरी भणितहास रूप सुखदाई होगी २०॥ भाषाभणित मोरिमति भोरी हसिबे योगसे नहिंखोरी २१ टी० । यह व्यंगोक्तिकहि अब अपनी कार्पयता रूपसाधुता कहते हैं कि एकतौ भाषाहमारी भणित दूसरे मेरीभोरीमतिकी तो हँसिबेयोग्यहै हसतेहँसनेवालेको खोरिनहीं नामदोष नहीं देखियेतो भगवत् यशचाहै भाषाहोइचाईसंस्कृतहोइपरंतु हँसतेदोषहोताहै लोगोस्वामीजी अपनी साधुतासे उनहूको निरदोष किये २१ ॥ प्रभुपद प्रीतिनसामुझिनीको तिन्हैकथासुनि लागिहिफीकी२२ टी०। जो कोई कहै कि तुमतौ अपनी साधुता से अपनी भणित में दुषणदै उन्हें निदेखि कियो परंतु उसभणितमें रामनाम रामयश जो है ।
रामायण मानसप्रचारिका बा। ३५ तौने करिदोष तौ होवेकरेगो तापर कहतेहैं कि जिनको प्रभ श्रीरामजी तिनके पहमें प्रीतिनहीं वो अच्छी समुझिनहीं तिनकोतो यहकथाफीकी लगिर्व करेगी तो जिन्है फीकी लगी ततो हँसिवै करेंगे यानेयह अनि- प्रायहै किजैले(हरि मायावध जगत भूमाहों ॥ तिन्हें कहतकछ अघटित नाही) तैले जिनके रामपद प्रीतिनहीं व समुझि अच्छीनहीं ते तौबा दोषके भागी हैं उन्हें हँसते क्या दोषहोगा २२ ॥ हरिहरपदरतिमतिनकुतरको तिनकहमधुरकथारघुवरकी २३ टी०। वो जिनके हरिहर पदमें प्रीतिहै वो समुझि अच्छीहै मतिमें कुतर्क नहीं है तिनको यह रघुवर की कथा मधुरनाम मिष्ठलगैगी आशय पह किये जो हँसै तो इन्हें दोषलगे काहे कि ये उसका स्वरूप जानते हैं लो तो काहेको हँसेगे इन्हैं तो मिष्ठलगतहै २३ ॥ रामभक्ति भूषितजियजानी सुनिहहिंसुजन सराहिसुवानी २४ टो० । जिन्हें रामपदमें प्रीतिहै वो समुझि अच्छी है तेती श्रीरामभक्ति रिक भूषित जानिकै हमारी भणितको चे सुष्टजन अपनी सुंदरिवाणीसे राहिकै सुनहिंगे कवन हँसहिंगे २४ ॥ वि नहोउं नहिंचतर प्रवीना सकलकला सबविद्याहीना २५ टी० । अब जो कहाकिजे काव्यको देशनहीं जानते तेहँसेंगे तो यह कहने से सूक्ष् र यह पायागयाको येवड़े कविहैं तापर अपनी कार्परययता कहतेहैं किनतो मैं कविहीं नचतुराई में वित्पन्नहौं औ चौंसठि कलावो चौदह विद्या तिनसबते हीनहौं २५ ॥ आषर अर्थ अलंकृत नाना छंद प्रबंध अनेक विधाना २६ आपरजोहै अक्षरन कि रचना वो तिन अक्षरन का अर्थ वो अलंकार भानाहैं वोठंडवो छंदनका प्रबंध सो अनेक विधानकाहै २६ ॥ भावभेद रसभेद अपारा कवित दोष गुण विविध प्रकारा २७ टी० भावनका भेद वो रसनका भेद अपार है वो कवित्त विष दोष वो गुणविविध प्रकारकाहै २७ ॥ कवित विवेक एकनहिं मोरे सत्यकहीं लिखि कागद कोरे २८ टो।सोकलामादि वो दोषगुण अंतजो सबकहि आयेहैं सोयहसबकाव्य रामायण मानसप्रचारिका बा। के अंगहैं लोकवित्तका विवेकनाल अंग हमारे एकौनहीं यह बात को हम सत्य कोरे कागदपरलिषिकहते हैं (शंका) गोसांईजी कहते हैं कि कवित्तका विवेक एकौनहीं यह बात सत्यकोरे कागदपर लिखि कहतही सोझंठ सौगध क्यों करते हैं इनकी काव्य में तो लब काव्यका अंग देखि परत है (समाधान)श्रीगोस्वामीजी जो कहा कि कवित्तका विवेक हमारे एकौनहीं सोयहकहा कि जिले काव्य करने में कवित्तके अंगका विचार होताहै कि गण अक्षण समुझिके तब अक्षर धरतेहैं तैसन हमको नहोंचाहे काव्यांग हमारे भणित में चावे चाहै न आवे यह बात सत्य कहतहौं कोरे कागदपरलिखि मैंतो श्रीसीताराम यध का गाथा करतहौं यह कहाहै यहबात आगे दोहामें स्पष्ट कहते हैं जो कहो कि फेरि कैसे काव्यांग इनकी काव्यमें परा तो सुनौ जहां रामयश आया तहां सब बाबाच्य है काहे कि कवित्त की छंद प्रबंध कि सबकी मालिक सरस्वती हैं वोतिनकर मालिक त्रीरामचंद्रजीहैं तौ जहां राम या होइगो तहां सरस्वती प्रापैजाइंगी तब उनके पीछे सर्वकाव्यांग चले जाहिंगे तो आपई सबाय (प्रमाण ) शारददास नारि लम स्वामी । शम सूत्र धर अंतर्यामी ॥ जेहिपर कृपा करहिं जन जानी। कविउर अजिरनचावहिवानी ॥( पुनः इसका खुलासा ) भक्ति हेतु विधि भवन बिहाई ॥ सुमिस्त धारद आवत धाई ॥ इस प्रसंग में स्पष्ट है २८॥ भणितमोरि सबगणरहित विश्वविदित गुणएक ॥ सोविचारिसुनिहहिंमुमति जिनके विमल विवेक २६ टो। भवत्री गो स्वामीजी जिलबात का सौगंधकिया है उसीवातको फेरिपुष्ट करतेहैं कीमाणित मोरिसवगुण रहित अर्थात् काव्यगुण रहित परन्तु एकजो विश्वविदित गुणहै सोमेरी काव्यमेंहै सोयहवातकाविचारि कै जिनको विमल विवेकहै तेनुमती सुनहिं गे २६ ॥ एहिमहरघुपतिनामउदारा अतिपावनपुराणश्रुतिसारा३० टो०। जो कही वह कौन गुण है तो सुनो यहिमहँ नाम मेरी भणित महँ श्रीराम नामजो बड़ा उदारहै सोई है सो रामनाम कैसो है उदारहै अतिपावन है वेइ पुराण तबकासार भूतहै उदारकही बड़ेको सो रामनाम एताबड़ा है कि जिसमें ब्रह्मा विष्णु महादेव चराचर सबको अवकाश है इस बातकी व्यारण्यानामवंदनामें कहेंगे ३०॥
रामायण मानलप्रचारिका बा। मंगलभवनअमंगलहारी उमासहितजेहिजपतपुरारी३१ टी०। पुनः श्रीरामनाम कैसोहै कि मंगलको भवन दो अमंगलको हरैया है वो जेहि को सहित उमा पुरारी जो श्रीमहादेव सो जपते हैं ऐसो रामनाम मेरी भणितमें है ३१ ॥ भणित विचित्र सुकवि कृतजोऊ राम नामविनुसोह न सोऊ३२ टी। देखिये तो भणित विचित्र होइ वोसुष्ट कविका कियाहोइ परंतु राम नाम बिना सोऊनहीं शोभा पावति जोकहोकैसे तो नुनौ ॥ विधबदनी सबभाति सँवारी सोह न बसन बिना बरनारी ३३ टी० । जैले चन्द्र बदनी श्रेष्ठ स्त्री सब भूषण करि सँवांरी होइ बोएक बस्त्र न होइ तो वहनारी शोभानदेइ तैसे सुकविकी भणित सर्व काव्यांग रूप भूषण से भूषित होइ परन्तु रामनाम रूप बस्त्र विनु नग्न नहीं शोभा देती ३३॥ सब गुणरहित कुकविकृत बानी रामनाम यशअंकितजानी ३४ टो० । सर्व काव्य गुणरहित वोकुकविकी बाणीका किया जो कवित्ततो राम नाम व राम यश अंकित जानिकै ३४॥ सादरकहहिं सुनहिबुध ताही मधुकर सरिस संत गुणग्राही३५ टी० । उत्त कवित्त को सादर कही आदर सहित बुध जो हैं पंडित सदसद्विवेकी तेकहते हैं वो सुनते हैं काहेते कि वे रतग्राही हैं कैसे जैसे मधुकर जो भँवरा रसपाही है कि फूलचाहै काहूको होइ उत्तम मध्यम पर भँवराको रसले काम तैसे बुधवरारूप रामयशरूप रस जहाँ पावहिं तहाही लेंहिं काव्य चाहै उत्तमहोइ चाहै मध्यम ३५ ॥ यदपि कवित गुण एकौनाही राम प्रताप प्रकट यहिमाही ३६ टी०। जो कोई कहै कि जो यह तुमने उत्तम मध्यम फूलका दृष्टांत दीनहै सो तौ भाषा संस्कृत में घटत है कळू काव्यांगमें नहीं घटत तौ काव्यांगविना कैसे रसीली होइगी काव्य रसती हईनहीं तुम्हारे काव्य में तापर कहतेहैं कि यद्यपि हमारी काव्यमें कवित्तरस एकौ नाही तदापि श्री रामजीको प्रताप यहिमा प्रकटहै ३६ ॥ सोइ भरोस मोरेमन आवा क्यहि न सुसंग बड़प्पनपावा ३७ रामायण मानसप्रचारिका बा। टी० । सोई हमारे मनमें भरोत है कि सुसंगमें किसने बड़ाई नहीं पावाहै नाम सब बड़ाई पावा है । यह कालोक्तिहै तोमरी काव्य राम यश के साथ क्यों न बड़ाई पावैगो ज़रूर पावैगी यामें यह ध्वनि है कि जितने कविहैं सोसब काव्यांग प्राकृत में कहेहैं सो एकौन जाने केवल श्रीरामजीकी प्रेरणाते राम चरित गावै तौ जे सत्कवि पंडिलहैं तेवोही श्री रामचरित्र में से सर्वकाव्यांग निकास लेतहैं कहतेहैं कि अच्छीकाव्य बनीहै। काहेते कि कौन ऐसा कवित्तका अंग वोरस है कि जो रामचरित्र में न होइ सबै है स्वाभाविक काहेतेस्वभाविकहै कि सरस्वतीको प्रसन्न- ताले सोई राम चरित हमगावतेहैं तो क्यों न सुकवि पंडितकहेंगे जरूर कहेंगे यह हमें भरोसाहै ३७॥ धूमौ तजै सहज करुवाई अगरप्रसंग सुगंध बसाई ३८ टी० । अब जो कहा किसुसंगने के न बड़ाई पाई तब यह प्रश्न भयो कि केबड़ाईपाईहै तापर कहत हैं कि देविये तो धूमजो है जड़ सो अपनी सहज करवाई को छोड़ि देताहे कब अगर आदि धपका प्रसंग पावताहै तब सुगंधित होताहै जो एती बड़ाई धूमने अगर श्रादिलकड़ी के संगमें पाई तो मेरी भणित रामयश संग में क्यों न बड़ाईपावगी३८ भणितभदेस वस्तुभलिवर्णी रामकथाजग मंगलकर्णी ३६ टी० । यद्यपि भणित हमारी भदेस है परंतु बस्तु भलीबोंगई है क- वनबक्षु बोंगई रामकथा लो रामकथाकैसी है कि जगत्के मंगल करने हारी है ३६॥ मंगलकरणिकलिमलहरणि तुलसी कथारघुनाथकी गतिक्रूर कविता सरित को ज्योसरितपावनपाथकी ४० टी०। श्री गोस्वामीजी कहते हैं कि रघुनाथली कथा जगत् के मंगल करनेवालीहै वो कलिमल जोपाप तिनके हरनेवालोहै अब जोकोई कहै कि रघुनाथकी कथा तौ जगमंगल करनेवारीहै परंतु जो सुंदरी काव्य में होइ तब तो जो कुकाव्यमें परी तब कैसे जग मंगलकारी होइगी तापर चारि दृष्टांत देकरि दिखावतेहैं जो कहो चारिदृष्टांत क्योंदियएकैमेंबोध होत तो इसकी यहवातहै कि कबि संप्रदायहै के कहूघष्टांत को एकदेश लेतहैं कहूसर्बदेश तौजहां सर्बदेशलेनेकी इच्छाभई तहां एकदृष्टांतदिये रामायण मानसप्रचारिका बा। उसमें सवाग न मिला तब दैतीनि चारि जितने में पूराहो तितनादृष्टांत देते जाहिं साभिप्राय इस बातका खुलासा दृष्टांतनके संगमे कहेंगेलो सुनो गोस्वामीजी कहते हैं किकबिता सरिता/गति क्रूरनाम टेढ़ीपरंतु रामयश सूधाहै कैसे जैसे पावनपाथकी सरितकी गतिठेढ़ी है अभिप्राय यह कि गंगा जीकी गति टेढ़ीहै पर वह जो पावनपाथहै सो नहींटेढ़ाहै वहतो अपन गुण टेढ़ाई उ में लिये है पावनता सुंदरता ताहीते पावन के संगमें टेऊ पावनहोतहै तैसे जो कुकाब्यउहोइ तो रघुनाथकी कथा के संगमें सुंदर लागतहै व रघुनाथकी कथातोसुंदरे है चाहे संदरकाव्यमें होइ चाहै कुकाव्य मेंयहतृष्टांत एकदेण्टेढ़ेसूधेकामिला ताहीतेदूसरा दृष्टांत फेरि देते हैं४०॥ प्रभुसुयशसंगति भणिताल होइहि सुजन मन भावनी ॥ भव अंग भूति मसान की सुमिरत सुहावनि पावनी ४१ टी०। श्रीगोस्वामीजी कहतेहैं कि प्रभुजो श्रीरामचंद्रजी तिनके सुयश के संगसे मेरीभणित भलिहोइ हि सुजनन के मन भावनि होइहि कैसे जैसे भव जो महादेव तिनके अंगमें मसान जो चिता तिसकी विभूति सुमिरत नाम ध्यानकरतरते सुहावनि वो पावनिहै तैसे मेरीभणित जो है सो मसानकी विभूति की नाई अशोभित वो अपावनिहै वो प्रभुजोत्री रामचंद्र तिनका सुयश श्री महादेवके तनुकीनाई है सो तिसमें लगिकरि मेगेभणित सुहावनि वो पावनि होइगी जो ऊपरकहा कि भलि होइ हि सो सुहावनि वो सुजनमनभावनि सो पावनि यह जो भलि वो सुजनमन भावनि वो सुहावनि पावनिकहाहै तामें यह ध्वनिहै कि श्रीमहादेवजीके गौर शरीरमें लगेसे विभूति सुहावनि पावनि है वो जो कालाग्नि स्वरूप महादेवकाहै तिसमें लगेसे पावनितीहै परि सुहावनि नहीं तैसे श्रीराम जीके निर्गुणयशके संग काव्य पावनितीहै परि सुहावनि नहीं वो जव त्री दशरथनन्दन राजकुमार रामयश का संगपाया तौ सुहावनि वो पावनि दोनों भई ११॥ प्रियलागिहि अतिसबहिमम भगित राम यश संग॥ दारु विचारकि करइ कोउ बंदिय मलय प्रसंग४२ टी०। दूसरेदृष्टांतमें है देश मिला सुहावन असुहावन पावन अपावन अबहीकुछबाकीहै ताहीते फेरि दृष्टांतदेतेहैं दोहामें कि मेरी भणित श्री रामयशसंगमें सबको अतिप्यारी लगैगी कैसे जैसे मलयागिरि चंदनके रामायण मानसप्रचारिका बा। संगमें सबकाठ वंदनीय होत है उत्तम मध्यम का विचार नहीं तैले श्री रामयशवंदनके संगमें मेरीभणित रूप काठका उत्तम मध्यम का विचार कोई न करेगा सब गावेंगे ४२ ॥ दो० श्यामसुरभिपयविशदअति गुणदकरहिंसवपान ॥ गिराग्राम्य प्तिय रामयश गावहिं सुनहिंसुजान४३ टी। श्याम सुरभि इति तीसरे दृष्टांतमें एकदेश उत्तम मध्यम का. मिला अबहीं किंचित् अवर रहाहै ताहीते फेरि दृष्टांतदेते हैं कि जैतेश्याम गऊहै वो उसका दूधविशद है पर अतिविशद है वोगुणदाताहै तो सबकोऊ गुण दाता दूधकेहेतु कालोगऊका सेवन करते हैं तैसे मेरी गिरा जो भणित सो ग्रामनाम भहो गवांरू श्यामगऊरूप है परश्रीसीतारामजीके यगरूप विशदगुणदाता दूधले भरीजानिकै सब सुजान सुनहिंगे वो गावहिंगे सोई सेवनाहै इहां दृष्टांतका सवींगमिला सब मिलिकरि पहिले में टेढासूधा दूसरे में सुहावन असुहावन वो पावन अपावन तीसरे में उत्तम मध्यम चौयेमें गुणद अगुणद यह पांच अंगभये जब पहिले कहा कि सूधके संग टेढ़ऊसूध होतहै तब यह प्रश्नभयो कि सूधातौभया परन्तु सुन्दरती नहीं तापर कहा कि सुन्दरकेलंग सुन्दरहोइगो तब यह प्रश्नभयो कि सूधाभयो सुन्दरभयो पर पावन तो नहीं तापरकहा कि पावनके संग पावनहोइनो तब यह प्रश्न नयो कि सूधाभयो सुन्दरभयो पावनभयो परि उत्तमतौनहीं तापैकहा कि उत्तमकेलंग उत्तमहोत है तब यह प्रश्नभयो कि सूधाभयो सुन्दर भयो पावनभयो उत्तम भयो पर गुणदाता तो नहीं तापर कहा कि गुणदाता के संग गुण दाता होइगो इहां प्रश्न पूराभया सबाग पाइ करि तब दृष्टांतकी इतिभई ४३ ॥ मणिमाणिकमुक्ताछबिजैसी अहि गिरिगजशिरसोहनतैसी ४४ टी० । अब इहापर यहशंकाभई कि काव्यकरो तुम वो(गावहिंसुनहि सुजान) यामें क्याहेतु है(समाधान)कविनकी कविता कविनके इहां नहीं सोहत संतसमाज में सोहत है ताप दृष्टांत कि जैसे मणिमाणिक मुक्ता की जैसी छबिहै तैसी अहिगिरि गजकेशिरपर नहीं सोहत मणि सर्पत होती है माणिक पर्वतते मुक्ताहाथीले परन्तु वहां शोभित तो है पर जैसी शोभाहै तैसी नहींसोहत ४४॥ नृप किरीट तरुणी तन पाई लहतसकल शोभा अधिकाई४५ रामायण मानसप्रचारिका बा। ११ टी० । वोही मणि माणिक मुक्ता राजन के किरीट में लगे वो सुन्दरी स्त्री के तनु में तो परम शोभाको प्राप्ति होते हैं सर्वप्रकारते जितनी उनकी शोभाहै तवनेउते अधिकहोतिहै १५ ॥ तैसेसुकवि कवितबुधकहहीं उपजहिंअनतअनतछबिलहहीं४६ टी० । अब दृष्टांत कहते हैं कि तैसे सुकविकी कवित्तको बुधजो पंडित सो कहते हैं कि उपजहिं अनत वो अनत छविपावतहैं सुकविन के इहां उपजतहै संतसभामें शोभित होत है ४६ ॥ भक्तिहेतु विधि भवन बिहाई सुमिरत शारद आवत धाई ४७ टी० । प्रश्न । ऐनी मणिमाणिक मुक्तारूप कवित्त कबबने उत्तर जब सरस्वती कृपाकरें प्रश्न सरस्वती कवरूपाकरें उत्तर जबकबि रामयशगावै देखिये तो जब कवि कवित्त करनेलगें तब सरस्वती को सुमिरण करतेहैं तब सरस्वती श्रीरामचन्द्र की भक्तिके हेतु ब्रह्माजी को भवन छोड़िके दौरी आवतीहै १७॥ रामचरित सर बिनअन्हवाये सोश्रम जाइन कोटिउपाये १८ टी० । जो श्रीरामचरित मानस्तर में स्नान न कराया तो इतनी दूरि श्रावनेकाश्रम जो है थकासी सो कोटिहु यत्नते नहीं जातहै अभिप्राय कि वाणीरूपसरस्वतीहै तिलवाणी से जो रामयश न गाया तौ वाणी कोटिहु यत्नसे सफल नहीं होतहै ४८॥ कविकोविदअसहृदयविचारी गावहिंहरिगुणकलिमलहारी टी०। यही बात विचारिक कविकोविद जे हैं ते श्रीरामयश गावतेहैं कलिमलहारी जानिकै ४६॥ कीन्हेप्राकृतजनगुणगाना शिरध्वनिगिरालगतिपछिताना ५० टी। वो जेकवि सरस्वतीको सुमिरिक तब सरस्वती माथापीटिकरि पश्चात्ताप करती है कि मैं केहि अपराधी के बुलायेसेआई काहेते सरस्वती पछिताती है कि सरस्वतीकेपति श्रीराम- चंद्रजीहैं प्रमाण(सुमिरिगिरापतिप्रभुधनुपाणी) तो जो उनकेपतिको छोड़ि दूसरेकेसंग संबंधदेइ तो बहुतपछितातीहै वो शापदेती है कि तेरीकविता का साधुसमाजमें अादर न होइ तौ जो साधुसभामें आदरनभया तौनिस्फ- लभया अशोभितभया वो जो श्रीसीताराम गुणगावै तौ सरस्वती प्रसन्न प्रारुतजननके गुणगावनेलग रामायण मानसप्रचारिका बा। होइकरि आशीर्वाददेतीहै कि तुम्हारी कवित्तका साधुसमाज में सन्मान होइ तौ जो साधुसमाज में सन्मानभया तो साफल्यभई ५०॥ हृदयसिंधुमतिसीपिसमाना स्वाती शारदकहहिं सुजाना ५१ टी० । अब जो कहा कि मुक्तारूप कवित्त जव सरस्वती कृपाकरहिं तब होइ सो समरूपकालंकारकरि दिखावते हैं कि जैसे समुद्र में सीपी होतीहै तामें स्वातीनक्षत्रका जलपरी तब मोतीहोतहै सोमोतीकोतरांग से वेधि डोरासेपोहि तब ब लोग पहिरते हैं तब शोभाहोतीहै तैसे हृदय जोहै सो समुद्र वो मतिसीपि सरस्वती स्वातीनक्षत्र के समान है यह सुजान कहतेहैं ५१॥ जो वर्षे वरवारि विचारू होहिकवित मक्तामणिचारू ५२ टी० । सो सरस्वतीरूप स्वातीनक्षत्र जो श्रेष्ठविचार रूप जलवर्षहिं तब कवित्त रूप मोतीहोइ चासनाम सुन्दर ५२ ॥ यक्तिवेधि पनि पोहिहहिं रामचरितबरताग ॥ पहिरहिंसज्जनविमलउर शोभाअतिअनुराग ५३ टी० । तिस कवित्त रूपमोतीको युक्तिरूप सरांगसेबेधिकै तब श्रीराम- चरित्ररूप श्रेष्ठताग जो डोरा तिसमेंपोहिकरि मालाबनावै तब उसमा- लाको जिनसज्जननका उरविमलहै तेपहिरहिं नामधारणकरें तब अन- रागरूप शोभावडी अभिप्राय कि जैसे मोतीकीशोभा गजनके इहांहोतहै वो राजनहूं के अंगकीशोभा मोतीसेहोतहै यह अन्योन्या अलंकारहै तैसे कवित्तरूपमोती रामचरित तागसेपोहा माला संतसमाजमें सोहतहै वो रामचरित तागसेपोहा कवित्त रूप माला से संतनहूं की शोभा होतीहै काहेते कि संतनकीशोभा अनुगगहै जो अनुरागनहोइ तो संतकी शोभा न होइ अनरागकही प्रीतिसोअनुराग गमचरितकवित्तसेहोतहै ५३ ॥ जे जनमें कलिकाल कराला करतब बायसवेषमराला ५४ टी० । अबजोकोई कहै कि क्या तुम्हारी काव्यमाणिकमुक्ता रूपबनीहै तापरकहते हैं कि मैतौसत् कविनको कह्योहै मैतौऐतोकिजे कराल कलि कालमेंजन्में हैं तिनकर करतबतौ कउवाको ऐसा वो भेपहंसको ऐसाहै५१॥ चलतकुपंथ वेदमगु छांडे कपट कलेवर कलिमल भाडे ५५ । रामायण मानसप्रचारिका बा। ४३ टी० । वो वेदको मार्गछोड़ि कुमार्गमें चलतेहैं । वोकपटके तौ कलेवर कही शरीर धरेहैं। वो कलिमकके भाडे नाम पात्रहैं ५५ ॥ वंचक भक्त कहाय रामके किंकर कंचन कोह कामके ५६ टो।वो भक्ततौ श्रीरामके कहावतेहैं परभक्तिके बंचकनाम ठगहैं। काहेतेकि कामक्रोध लोभके किंकरनाम टहलू होरहे हैं ताहीतेभक्ति से बंचक है (शंका)जेबंचकहैं वो कामक्रोध लोभक किंकरहैं तेश्रीरामचन्द्रजी के कैलेकहाये (समाधान) सुनों अपनी ओरसेतो वे बंचकै वो काम क्रोध लोभके किंकरहैं परंतु गुरुन करिकै पायाजो संस्कार माला तिलक छाप मंत्रनाम ताते रामजीके कहावतेहैं अथवा आपई जगत्के लोगनके ठगने केहेतु सुंदर भेषबनाइ लियेताते श्रीरामजीके कहाये ५६ ॥ तिनमहँप्रथममरेखजगमोरी धिकधर्मध्वजधंधकधोरी ५७ टी । पुनः कैसे हैं धर्मध्वजी हैं धर्मध्वजी कही दिखावने के ऊपरसे आडवर बहुत किये रहते हैं भीतर निष्टा नहीं पुनः कैसे हैं धंधक धोरी हैं धंधककही व्यर्थ धंधातिसके धोरीनाम वृथाबोझा ढोवनेवाले एतेजे धिक् हैं तिनमें हमारी प्रथम रखाहै मैतौ असहौं ५७ ॥ जो अपने अवगुण सवकहऊ वाढ़े कथा पार नहिलहऊ ५८ टी० । जोमैं अपने अवगुण सवकहने लगौंतो यहकथा वढ़िजाइ पारैन पावौं फेरि रामकथा कब करौं ५८ ॥ ताते मैं अति अल्प वखाने थोरेहि मह जानि हैं सयाने ५६ टी० । ताहीत. अतिअल्प नाम थोरे में कहेउं सयानेजे चतुरहैं तेजानि लेहिंगे. यामें यहभाव है किजे सबगुण परिपूर्ण होत हैं ते अपने मुखते आपनीन्यूनताही कहतेहैं परि यह बातको चतुरजन जानते हैं मूर्ख नहीं समुझिविविधिविधविनतीमोरी कोउनकथासुनिदेइहिखोरी ६० टी। यह हमारी विविध प्रकार की विनय सुनि करिकोऊ कथा सुनि खोरिनाम दोषनदे इहि सबकोउ सत्कार पूर्वक सुनहिंगे॥६० ॥ एतेहु पर जे करिहैं शंका मोहुंते अधिक ते जड़ मति रंका ६१ टी०। वो इतनिउँ विनती सुनि जोकोऊ शंकाकरी किक्या यह काव्य जानते ५८॥
रामायण मानसप्रचारिका बा। मुक्ता रूप बनी है तातेहाल हू ते अधिक जड़हो मतिके दरिद्री हैं ६१ ॥ कविन होहुँ नहिँचतुरकहावों मतिअनुरूपरामगुणगावों ६२ टी। काहेते किम नतो कविहोंऊं नचतुर कहावों केवल अपनीमतिके अनुरूप श्रीरामचन्द्र जीको गुणगावतहौं तौकाहेको शंकाकरना चाही६२॥ कहरघुपतिकेचरितअपारा कहमतिमोरिनिरत संसारा ६३ टी० जोकहौ कि फेरि इतना निहोरा काहेकोकरतेहौतौ सुनों देखिये तो कहां श्रीरघुपतिके अपार चरित वो कहां मोरिमति जो संसारके विषे में निरत हवै रही है ६३॥ जेहिंमारुत गिरिमेरुउड़ाहीं कहहुतूलकेहि लेखेमाही ६४ टी० देखिये तो जौनयमारुत में सुमेरुभिरि उड़िजाय तेहि के आगे तल जो सई सो कौन लेख में है यह दृष्टांत है इसका दृष्टांतयह है कि तैते जौन श्रीरामचरित्र शेषमहेश को अगम तौन में किया चाहतहौं तौ हमारा कौन लेखाहै ६४॥ समुझतअमितरामप्रभुताई करतकथा मनअतिकदराई ६५ टी० श्रीरामचन्द्रजीकी प्रभुताई अमित समुझिकै कथाकरते में मनअति कारातहै ताहीते सबके प्रति निहोरा करतहीं कि सबकोई कृपा करो तब मन सूरमा होइ रामयशमें लगै ६५ ॥ शारदशेषमहेशविधिनागमनिगमपुरान॥ नेतिनेतिकहिजास य गाकरहिं निरंतरगान ६६ टी० शारद इति अब जो कोई कहै कि तुम श्रीरामजी की प्रभुताई अगम जानते हो तो क्यों भीशमगुण गावने को बैठेही तापर कहते हैं कि काहम रामगुण गावनेको वैठे हैं यहतो परम्पराहै कि शारदजोसर- स्वती वो शेप वो महेश वो विधिकही बरा वो भागम जो शास्त्र तंत्र वो निगम जो वेद वो पराण ये सब कोई नईति नइतिकहि जा श्रीराम चन्द्र के गुण निरंतर गावते हैं तैसे हमहू अपने बूतभरिगावगे ६६ ॥ सबजानतप्रभुप्रभुतासोई तदपिकबिनुरहा न कोई ६७ टी. जो कहौकि वे सब श्रीरामजीकी प्रभुना जो अगम है तिसको नहीं जानतेहोहिंगे तापर कहते हैं कि सो नहीं श्रीरामचन्द्रजीकीप्रभूता रामायण मानसप्रचारिका बा। ४५ जो आम है सो तवनेकोसब जानत हैं परंतु बिनाकहकोई न रहा६७ ॥ तहांवेदअस कारणराखा भजनप्रभावभांतिबहुभाषा ६८ टी० जोकहो कि सब कोई जानते हैं कि श्रीरामचन्द्रजीको प्रभुताको पारनहीं तो पार तौ पावेंगे नहीं फिरि क्योंगावते हैं तापर कहते हैं कि तहां वेद ऐलाकारण राखिड़ीन है कि भजन जो है भक्ति तिसका प्रभाव बहुत भांतिका है वो बहुत भाषासे है भांतिकही नवधा प्रेमा परा सो नव धा विधिकी इसीग्रंथ में है एक बारण्यकाण्डमें लक्ष्मण जीसे रघुनाथजी कहा कि(श्रवणादिक वनभक्ति दृढ़ाही)वो दूलर शवरीसेकहासो विदित है सो नवधाके अंगबहुत हैं यहतोमांतिहै अबभाषा सुनौ देवभाषानागभाषा नरभाषानरभाषामें देशदेशकीभापा जैसेत्रीकोगलदेश तिरहुतिदेश बंगाला उड़ीला तिलंगदेश द्राविड़देश मागष्ट गुजरात मुलतान पांचाल बज देश इत्यादि सब अपनी अपनी भाषासे श्रीरामगुण गावते हैं यामें यह धुनिहै कि देवमनुजनाग सबकोऊजो श्रीरामगुणगावते हैं सो पार पावने को नहीं केवल अपनी अपनी वाणी से श्रीरामगुणगाइगाइ भक्ति करते हैं तैसे हमहू अपनी नर भाषा से श्रीराम गुणगाइ भक्ति करते हैं कछु पार पावनेको नहीं ६८॥ एकअनीहअरूपअनामा अजसच्चिदानन्दपरधामा ६६ टी. जो कोई कहै कि ज्ञान विज्ञान योगादि मुक्ति के साधनछोडिभक्ति करनेसे क्याहोता है तापर कहते हैं कि एकही जेकरे समान और नाही ताहीते एक वो अनीह कही इहांजो अनेक तरहकी चेष्टा तेहिते रहित वो अरूपकही प्राकृत रूप रहित वो अनामकही गुण रूपानामन सेरहित वो अजकहीअजन्मा वो सत्चित्वानंदमय वोलबके परे हैंधामजाको ६॥ ब्यापक विश्वरूप भगवाना तेइधरिदेहचरितकृतनाना ७० टी० पुनः कैसोहै सर्व में व्यापक है पुनः विश्वरूप है पुनः भगवान् कहीषड़ ऐश्वर्यमान है ऐतो जो ईश्वर तेहिदेह धरिकरि नाना चरित करतहैं देह धरब कैसे जैसे प्राकृत मनुष्य कहते करते हैं तैसे कहन करनासोई देह धरबहै ७० ॥ सोकेवल भक्तनहितलागी परमकृपालप्रणतअनुरागी ७१ टी० सो केवल भक्तन के हेत भक्तकही जो ऊपरभक्तिका स्वरूपकहि रायायणमानसप्रचारिका वा । आयेहैं सो तिसमें कोई प्रकारकी भक्ति जेहिमें होइ सो भक्त तेहि भक्त हेतु ईश्वर देहधारीकीनाई नाना प्रकारके चरित्र करते हैं काहेते परम कृपालु हैं वो प्रणत जो हैं शरणागतवाले तिनके अनुगगी हैं ७१ ॥ जेहिजनपरममताअरुकोहू तेहिकरुणाकरकीन न कोहू७२ टी० अब जो कोई कहै कि जब ईश्वर भक्तन के ऊपर इतनी ममता करतहैं तब कबहू क्रोधऊ करत होई तापर कहते हैं कि सो नहीं जेहि जनके ऊपर मानता वो छोह करतहैं तेहिके ऊपर फिरि क्रोधनहींकरत क्रोधतौ ते करते हैं जे अपूर्ण हैं समर्थ नहीं हैं कि अपने भक्तका अपराध क्षमा करहिं ईश्वर तो सर्व प्रकार ते परिपूर्ण हैं समर्थ हैं सो काहे को क्रोध करेगो ७२॥ गईबहोरि गरीबनेवाज सरलसबलसाहिब रघुराजू ७३ टी० जो कोई कहै कि वह ईश्वर कस समर्थ हैं कवन कवन गुण तापर कहते हैं कि गई वस्तु के बहोरि हैं वो गरीब निवाजहैं वो सरल हैं वो सबल हैं वो साहिब हैं वो रघुगज है यह छः विशेषणका उदाहरण सातौकांडमें देतेहैं सो सनौ प्रथम बालकाण्ड में विश्वामित्र की यज्ञगई वो अहल्याकी पाती बताई वो राजा जनककी प्रतिज्ञा गई सो सबको बहोरि दिये वो अयोध्याकांड में निषाद ऐसो गरीब वो मगुग्राम वासिनी गरीब वो श्रीचित्रकूट निवासी कोलभील ऐसे गरीबनको निवाजे हैं सर- लताारण्यकाण्ड में देखो कि सकल मुनिनके आत्रमन जाइ जाइ सुख दोन वो सरलता विराध खर दूषण त्रिशिरा कबंध बालि गवण कुंभकरण्य इत्यादिको कौतुकहो मारे एतेबड़े बलीहैं वो साहिब कही जो दूसरेकी साहिबी सजै सो सुग्रीव विभीषण की एतीबड़ी साहिबी सजी कि जो इंद्रादिको दुर्लभ है यहसबलता वो साहिवी चारिकांड हैं आरण्य किष्किंधा सुंदरलं का वो रघुराजत्व उत्तर काण्ड श्रीगजलीला में देखि लेव ७३ ॥ बुधवरणहिंहरियशअसजानी करहिंपुनीतसुफलनिजवानी ७४ टी० ऐसे समर्थ शीलमान जानिकै बुधजो पंडित ते हरियश गावते हैं गाइगाइ अपनी वाणीको पावन वो सुफलकरतेहैं काहेतेवाणीके पावनता वो तुफलता सत्य बोलना है सो हरियश जेता बढाइ के गावो तेता थोरहै ताते सत्यभया वो अपकारका यश गायातौ जेतागाया तेतासमाई उसमें नाहींतौ असत्य भयातबवाणीनिष्फलभई ७४ ॥
रामायण मानसप्रचारिका बा। तेहिबलमेरघुपतिगुणगाथा करिहों नाइरामपद माथा ७५ टी तेहिबलनाम प्रभुकाशील समर्थता समझिकरिमैं भी श्रीरघुपति गुणगाथा करिहौं श्रीरामचन्द्रजीको माथा नवाइकरि ७५ ।। मुनिनप्रथमहरिकीरतिगाई तेहिमगुचलतसुगममोहिंभाई ७६ टी० बजो कोई बूझै कि भला प्रभुके शीलसमर्थ्य ताके बलते तो तुम रघुपतिगुण गावोगे परि किस रीति से तापर कहते हैं कि जौनीरीति से मुनिन प्रथमही हरिकीरति गायाहै उसी मगमें चलत हमको सुगम है जो कहौ कौनीरीति से मुनिन गाया सो सुनौ जो अति अगमगम- चरित मानस तिप्त में से लेकरिके अपनी अपनी रुचि मति माफिक मुनिनने गाई है नामकोई जन्म प्रसंग बहुतकहा कोई विवाह प्रसंगकोई वन प्रसंग कोई रण प्रसंग कोई राज प्रसंग कोई बालपौगंड किशोर की लीला श्री अयोध्याजीमें बहुत कहाहै इत्यादि सब प्रसंग रामचरित मा. नसमें गतहै तैतेमभी अपनी सचिमति माफिक कहौंगो इस विधि से मन दृढ़किया कुछ मुनिनकी कही कहिबेको नहींकहा है उसी रास्ता में चलनको कहा है कि जैसेगम रामचरित मानस में मुनिगाइ करिरास्ता करि दीन है कि समस्त रामचरित मानप्त गाइबेकी समर्थनहीं किसू की जहांतक जिससे गाया जाय तहांतकगावो ७६ ॥ अतिअपार जे सरितवर जो नृप सेत कराहिं ।। चढिपिपीलिकापरमलघु बिनुश्रमपारहिंजाहिं ७७ टी० अव जोकहा कि मुनिनका कियाजोरास्ता तिसमेंहमचलेंगे तिसको वाचकलुप्ता दृष्टांतकरि दिखावतेहैं कि जैसे अति अपारजे सरितवरहैं वर कहीश्रेष्ठ यमुनागंगा आदि ताकोएकदेश कि जोमनुष्यनको विनुश्रमपार जाइवे योग्य नहीं सोवहो जोकोई राजासेतु कराइदेइ तो पिपीलि जो चिउँटी तिसको तौ अति अपारहै पिपीलिका जोपरमलघु सो विनाश्रम पार चलीजाइ तैसे श्रीराम यश बड़े बड़ेको अवसाननहीं तिसमें मुनिन गाइगाइ सेतुकरि दीन उसीरस्तामें हमको चलत सुगम है ७७ ॥ एहिप्रकार बलमनहिं दिखाई करिहौं रघुपतिकथासुहाई ७८ इति षष्ठप्रकरणम्६॥
रामायण मानसप्रचारिका बा। टी० यहि प्रकारनाम जोप्रथम प्रश्नभया कि किस प्रकार करोगे तितका दृष्टांत देकर कहा कि यहि प्रकार जैसाकहि आये हैं वो यहि प्रकारसे मनको बलदिखाइकरि श्रीरामकथा कहौंगो कसी श्रीरामकथाहै अति सुहाई नामसुंदरीहै ७८॥इतिश्री रामचरित मानस परिचारिकायां देवादि दश प्रति प्रार्थना पूर्वकप्ताभिप्राय बंदनामनप्समुझावनोनामषष्टकैंकर्यः६॥ व्यास आदिकविपुंगवनाना जिनसादर हरिचरितबखाना १ टी. अब श्रीगोस्वामीजी कविन को वंदना करते हैं कि व्यासजी प्रा. दिजे मुनीश्वर कधि हैं पुंगव नामबड़े बड़े जिनने आदर संयुक्त हरिचरित्र कोवखाना है १॥ चरन कमल वन्दो तिन केरे पुरवहु सकल मनोरथ मोरे २ टी० तिन तबके चरण कमल बंदतहीं सबकोई मिलिकरि हमारा म. नोरथपर्ण करौ२॥ कलिके कविन करौं परणामा जिन वरणे रघुपतिगुण ग्रामा ३ टी० व्यासादि तीनि पुगके कविनके कहि कलिके कविनको कहते हैं कि कलिके जितने कविहैं तिनके प्रणाम करत हैं। अबकलिक कविनका विभाग करतेहैं कि जेत्रीरघुपति गुणग्राम वरणे हैं ३ ॥ जे प्राकृत कविपरम सयाने भाषा जिन हरि चरितरखाने ? टी० वो जेप्राकृत कविहैं परंतु परम सयाने नाम चतुरहैं प्रारुतकही सामान्य देवता वो राजनके गुण कहने वाले वो भापा करि जिनने हरि चरित्र बखानेहैं ॥ भयेजे ग्रहहिंजेहोइहहिंागे प्रणवों सबहिंकपटछलत्यागे ५ टी० यह तीनि विभाग कहि अब भूत भविष्य वर्तमानके कहते हैं कि भयेजे नाम हमारे पूर्वभयेहैं व जेवर्तमानमें हैं वो जे आगेहोहिंगे तिनसब कोप्रणाम करतहौं कपटछल छांडिकै ५॥ होउ प्रसन्न देहु बर दान साधु समाज भणित सन मानू ६ टी० होउ प्रसन्ननाम सबकोई प्रसन्न होइ करि हम को यह वरदान देहुकिसाधुनके समाजमें हमारी भणितका सन्मानहोइ ६ ॥ जोप्रबंध बुधनहिं आदरहीं सोश्रम बादि बाल कविकरहीं ७ टी० जोकहोकि जोसाधु समाजभडितका सन्मान भयातौ क्याहोगा रामायण मानसप्रचारिका वा। सोसुनो जोप्रबंधको बुध जोपंडित पंडितकही जोलत् असदका विद्यकीहो सोई साधुसो जो आदर न करे तो सोकाव्य करने में जो अमलो श्रमवादि कही मिथ्या बालकवि करते हैं बालकहीमूर्ख ७ ॥ कीरति भणित भूतिभलिसोई सुरसरि समसबकरहितहोई ८ टी० पुनः काहेको साधु समाजमें भणितका सन्मानचाहतहौं कि की- रति वो भणित वो भूतितोई भली है जो सुरसरिकीनाई सबको हितहोई कीरतिकही यश भणितकही कवित भूतिकही ऐश्वर्य सो गंगाजीकेवरा- वरि सबको हितकारीहोइ तौनलीहै जैसे गंगाजीको भगीरथजी अपने कल्याण के हेतुलाये परंतु गंगाजी उनकामीकल्याणकिया वो त्रैलोक्यका कल्याणकिया तैले जबकवित ऐश्वर्य अपनो कल्याणकर सबको कल्याण कारीहोइ तौभलीहै जो आपने भरेको भई तो भलीनहीं येहीबरे कहत हौं कि जोसाधु समाजमें सन्मानभयो तो सबको हितकारी होइगी८॥ राम सुकीरति भणित भदेशा असमंजस असमोहिंदेशा : टी०। तहांत्रीसीतारामजीकी सुंदरीकीरति तोसबको हितकारीहै परंतु 'हमारी भणित जोकविताई सो भदेश भदेशकही गवारू अच्छीनही तिल कविताई से श्रीरामजीकी कीरति सुंदरि कहतहौं सो इसबातका हमको अंदेशा नाम चिंता है कि ऐसा न होइ कि हमारी भणितके संग श्रीराम कीरति अशोभितहोइ जाइ सो इसचिंताका असमंजस है कि कविताई करू कि न करू॥ तुम्हरी कृपा सुलभसवमोरे सियनि सुहावनिटाटपटोरे १० टी० । सो हेकविजनो तुम्हारी कृपाले हमको सबप्रकारते सुलभहोइ गो नाम तुमसब जो कृपा करो तो मेरी भदेश भणित में श्रीरामजी की कीरति शोभित होइगी कैसे जैसे पटोर की लियनि टाटपर शोभितहोत है तैसे मेरी भणितरूप टाटपर श्रीरामकीरतिरूप पटोर शोभित होइगी यह बाचकलुप्ताहै १० ॥ करहुअनुग्रहअसजियजानी विमलयशहिअनुहरैसुवानी ११ टी। जो ऐसा अपनेजियमें जानो कि देखीतौ यह तुलसीदास बड़ी अनारीहै कि कैसाटाटमें पाट लीवैहै तो आपनजानिक अनुग्रहकरौज अनुग्रहकरिकै पाटके लायक पटदेहु अभिप्राय कि विमलयम जो श्रीराम कीरतितिसके अनुहरितनाम योग्यसुष्टवायो देहु ११ ॥
५० रामायण मानसप्रचारिका बा। सरल कवितकीरतिबिमल सोइआदरहिंसजान ।। सहजबैरविसरायरिपु जोसुनिकरहिंबखान १२ टी० । अब श्रीगोस्वामीजी जो पूर्व कहा कि प्रसन्न होइ वरदान देहु जाते साधु समाजमें भणितका सन्मानहोइ उसमें एक शंकाभई सो समाधानकारि प्रसंग मिलावते हैं कि जो कहा कि साधु समाजमें भणितका सन्मानहोइ सो कहते हैं कि सरल तो कवितहो सरलकही जिसमें बहुधा दुत्त अक्षर न होइ वो जमक अनुप्रास साधारण होइ वो बांचत में जीभ रसलेत चलीजाइ ऐलो तो कवितहोइ वो उन कवित्त में कीरति विमल होइ तब सुजान आदर करते हैं जो कदापि कवित्त सरलभयी वो कीर्ति विमल न भई वा कीर्ति विमलभई कवित्त सरल न भयो टेढोभयी तौ साधु अादर नहीं करते जब दोनों अच्छे हो तब सुजान आदर करें वो सहजबैरी जोहै लेउ बैर बिसगइ बखान करते हैं सहज बैरी भाषा के संस्कृत वाले हैं परंतु जो सरलकवित्त वो कीर्ति बिमलहोइ तो वे भी बखानतेहैं १२ ॥ सोनहोइबिनविमलमति मोहिमतिबलअतिथोरि॥ करहुकृपाहरियशकहैं। पुनिपुनिक निहोरि १३ टी०। सो ऐतो भणित बिनु विमल मतिनहीं होतहै औ हमको मति काबल थोरा है सो आपसब व्यालादि मुनीश्वर वो कवीश्वर कृपाकरह विमल मतिदेहु जाते श्रीरामयश कहौं सो आप सबसे पुनि पुनि नाम बारबार निहोरा करतहौं १३ ॥ कवि कोविद रघुवर चरित मानसमंजु मराल ।। बालविनयसुनिसुरुचिलखिोपरहोहुकृपाल १४ इतिसप्तमप्रकर्णम् ७॥ टी। हे कविजन वो हे कोविदजन मापसबकैसे हैं कि श्रीरामचन्द्रजी को करित जोहै सो मंजुनाम निर्मल मानलर है जिसकेमगलनाम हंसही सोहमारीवाल विनय सुनिकरि वो हमारी सुंदरिरुचि लखि करिके हमारे ऊपर कृपाकरो १४॥ इतिश्रीरामचरितमानसपरिचारिकायांसमष्टी कविबन्दनानामसप्तमकै कर्यः७॥
रामायण मानसप्रचारिका बा। ५१ बंदों मुनिपदकंज रामायणजेहि निर्मयो। सखरसकोमलमंजुदोषरहितपणसहित टो। अब श्रीमोस्वामीजी महाराज कहते हैं कि मुनिपद कमल बन्दों कवनमुनि रामायण जिन्हने निर्मयो अर्थात् श्रीवास्मीकिजी जो कहो कि रामायण तो बहुत मुनिनकीन है तुम वारलीकै को कैसेकहतेही तहां अपर मुनिन जो रामायणकीन्ह है तो गौण है काहेते कोई पुराणके संगमें कोई संहिताके संगमें कोई स्मृतिनके संगमें इत्यादि पीछेपीछे रामायणप्रसंग पाइकरि कीन है वो श्री वाटलीकिजी मुरव्य रामायणे कीन्ह है अपर अन्य करवे न कीन ताहीते मुनिनमें रामायणके का मुख्यवाल्मीके हैं तिनके पदबन्दौं वो रामायण केसोहै कि सखर नाम खरके सहित परन्तु नाम- मात्र खरहै काहे नाममात्र कि खरनाम राक्षस सो तवन नामकसहै कि सकोमल नाम सुनतमें बहुत प्रियल गतहै पुनः कैसो रामायण है कि मंजु- नान निर्मल है पुनः रामायण कैसो है कि दूषणके सहित है वो निर्दोष अभिप्राय यह कि जो काब्य होतीहै तिसमें थोरा बहुत दोषदूषण परतैहै परन्तु श्रीवाल्मीकि रामायण काव्य दोष दूषणसे रहित है दोषदूषण नाम मात्रहै जो खरदूषणको कथा सो कथा कैसी है कि मंजु नाम निर्मल कि जेहिके सुनेते जन्म मरण कुटिजाइ ऐनी रामायण है अथवा पुनः कैसी रामायण है कि जिसमें पांच रसभक्तिके परिपर्णहैं कौन रस तहां सबके आगे जो है रस सो सब शबान को बोधक है जा रामायण में सवरत है सखरलकही सखारस वो कोमलरस है कोमलकहीवात्सल्य रस वोमंजुरल है मंजुरस कही टंगाररस वो दोषरहित रसहै दोषरहित रसकही शान्त रस वो दूषणसहित रस है दूषणलहित रस दास्य (का) दास्यरस दूषण सहित कैले ( उ तर) सुनो पूर्ण दास्यरस तौ तबहोइ जब स्वामी जिल राह में पदसे चलै तहां सेवक शिरसे चले तब दूषण रहितहोइ सो तो होने कोनहीं ताते दूषण सहितहै परंतु इप्स बूषणको जो दास समुझे रहै तौ स्वामी पूर्ण मानिलेत हैं (दूषणकाप्रमाण चौ०) (शिरभर जाउँउवि- तअलमोरा । सबतेसेवकधर्मकठोरा) ऐते पंचरस भक्तिके जिस रामायण में ठौरठौर भरेहैं सो ऐसो रामायण जिनने कीन्ह है तिनके पदबंदौं १ ॥ बंदी चारिउवेद भवबारिधि वोहित सरिस ॥ जिनहिनसपनेहु खेदवरणतरघुवरबिमलयश२ ઘર रामायण मानसप्रचारिका बा। टी।बड़ौचारिउवेद अयश्रीगोस्वामीजी कहतेहैं कि ऋगयजुर ताम अथर्वण चारिउवेदको बंदी कैसेहैं वेदकीभवसमुद्रके बोहितनाम जहाज जीवन के पारकरिबको जो वेदकी कही जे करें ते भवसागर तर इसमें संदेह नहीं फेरिवेदकते हैं कि श्रीरामयश वरणतेजिनको सपने खेदनहीं निःखेद रामयश वरणतेहैं २ ॥ बंदीविधिपदरेनुभवसागरजिन्हकीन्हयह।। संतसुधाशशिधेनुप्रकटेखलविषवारुणी ३ टी। विधि पदरणु बंदीविधि जो ब्रह्मातिनकेपदकी धरिबंदी कैसे विधि हैं कि जिनने यह भवसागरकीन सागरमें चौदहरत्नप्रकटे तामें कछुनीक कछ बिकारहै तैसे भवसागरमें संतसुधा शशिधेनु एतेनीक वो खल विष- वारुणी एते विकाररत्न प्रकटे ३॥ विबुधविप्रबुधग्रहचरणबंदिकहैं।करजोरि ।। के प्रसन्नपुरवहु सकल मंजुमनोरथ मोरि ४ टी। अबयह दोहामें समष्टी बंदना करतेहैं कि विवुधजो तेंतीसकोटि देवतायो विप्र जोप्तर्व ब्राह्मण बुध जो पंडित वो ग्रह जो सूर्य चंद्र मंगल बुध वृहस्पति शुक्र शनैश्चर राहु केतु येते नवसो सबको बंदिहाथ जोरि कहतहों कि सबकोई प्रसन्न होइकरिमेरे मंजु मनोरथको पूर्ण करौ ४ ॥ पुनि बंदों शारद सुरसरिता युगुल पुनीत मनोहर चरिता ५ टी० । पुनः शारदसरिता जो कविताई वो सुरसरिता जो श्रीगंगाजी तिनको बन्दौं कैती हैं युगल पुनीतहैं वो युगुल का चरितमनोहर है ५ ॥ मज्जन पान पाप हर एका कहत सुनत एक हर अविवेका ६ टी० । एक सुरसरिता जो हैं तो मज्जन पानते पाप हरती हैं वो एक शारद सरिता कविताई जो है ते कहत सुनत अविवेकह रिलेतहै ६ ॥ गुरु पितुमातु महेश भवानी प्रणवौं दीन बंध दिन दानी ७ टी। हमारे गुरुमातापिता रूप जो महेश भवानी हैं तिनको प्रणाम करतहौं कैसे हैं महेशभवानी दीनबंधु हैं वो दिन दानी कहिये रोज रोज देनेका स्वभावहै ७॥ सेवकस्वामिसखासियपीके हितनिरूपधिसवविधितलसीके ८ ।
। रामायण मानसप्रचारिका बा। ५३ टी० । पुनः कैसे हैं महेशभवानी कि सियपिय जो श्रीरामचन्द्रतिन्ह सेवक हैं स्वामी हैं सखाहैं ॥लक्ष सेवकका॥(बारबार वरमांगो हर्षि देहु त्री रंग पदप्सरोज इत्यादि)॥लक्षस्वामीका॥ (लिंगथापि विधिवत करिपूजा) लक्षसखाका॥(शंकरप्रियममद्रोहीशिवद्रोहीममदास । तेनरकरहिंकल्पभरि घोरनर्कमहँबास ) अथवा जबशिवजीकेबिवाहकी अगुवई किया यह भी सखत्वपायाजातहै वोतुलसीके तौ सर्वविधिते निरुपाधि हितकारीहैं ८ ॥ कलिविलोकिजगहितहरगिरिजा शावरमंत्रजालजिनसिरिजाह टी। देखिये तो यह कराल कलिकाल जाने मंत्र यंत्र तंत्र सब नि. फलहोइगये काहेते कि इनमें विधिनिषेध बहुतहैं सो कलिमेंहोइनाहीं सकते ताहीते सो ऐसो कलिबिलोकिकै जगत्के हितहेतु हरगिरिजा जो महेशभवानी ते शावरमंत्र का जाल नाम समूह सिरिजा ६॥ अनमिलि अक्षर छंद न जापू केवल प्रकट महेश प्रतापू १० टी० । सो वह शावरमंत्र कैसा है कि अनमिल तौ अक्षर है वो छन्द प्रबंध नहीं वो जापनहीं जैसे अपरमंत्रनमें जापकी विधि है कोई लक्ष कोईसहस्त्र कोई शत कोई एकइस ऐले सबमंत्र जानों सोतस शावरमेंनहीं केवल श्रीमहेश भवानीको प्रताप प्रकटहै नाम एकवार कहि देने सेजिस कार्य के बरेकहो वहतुरंत सिद्धिहोतहै ऐसे दयाल हैं महेश भवानी १० ॥ सो महेश मोपर अनुकूला करौं कथा मुद मंगल मूला ११ टी० । सो महेश भवानी हमारे ऊपर अनुकूल हैं ताहीते मुदमंगल की श्रीरामचन्द्र की कथा सो करतहौं यामें यह अभिप्राय है कि जेहि महेशभवानी की कृपाप्रतापते अनमिलअक्षर विनाछंद को सो सर्व कार्य साधेहै तो श्रीरामजीकी कीरति तो सर्व सिद्धि दाता स्वतः है रही मेरी भणितभदेस सो भी सर्वकार्यसाधक होइगी काहेते महेशभवानी मोरेऊपर अनुकूल हैं ताहीते ११॥ सुमिरि शिवा शिव पाइ पसाऊ वरणोंरामचरितचितचाऊ १२ टी० । शिवा जो पार्वती शिव जो महादेव तिनको सुमिरि के उनकी पसाउ जो प्रसन्नता सो पाइकरि चित्त में चाउ नाम आनंद होइकै श्री रामचरित वरणौं १२ ॥ १ ५४ रामायण मानसप्रचारिका बा। भणितमोरिशिवकृपाविभातीशशिसमाजमिलिमनहुँसुराती १३ टी। श्री शिवजीकी कृपाते मोरि भणित विभाति नाम गोभित होइ गी कैसे जैसे समाजके सहित चंद्रमा को मिलिकरि रात्री शोभित होती है चंद्रमाकी समाज नक्षत्र है तैत मेरी भणिं न रात्रीहै शिवकृपा चंद्रमा अपर व्यासादि कवि कोविदन की कृपा नक्षत्र है तिनको मिलिकरि शोभित होइगी १३ ॥ जे यहिकथा सनेहसमेता कहिहहिं सनिहहिं समझिसचेता १४ टी। अब श्रीगोस्वामीजी महेश भवानीके बलसे अपनी भाषाभणित- का फल कहते हैं कि जे कोउ यह कथाको करेंगे सुनेंगे समुझेंगे ते सचेत होहिंगे १४॥ होइहरामचरण अनुरागी कलिमलरहित समंगलभागी १५ टी० । वो श्रीतीतारामचरण के अनुगगी होहिंगे कलि मल से रहित होहिंगे सुन्दर मंगलके भागी होहिंगे होइहहिं सवपदनको क्रियाहै १५॥ सपनेहुँसांचेहुमोहिपर जोहरि गोरिपसाव ॥ तोकुर होइजाकहेउँसबभापाभणितप्रभाव १६ इत्यऽष्टमप्रकरणम् ८॥ टी० । अबजो फलकहि आयेहैं तिसको दृढ़करते हैं कि सपनेहु नामस्वप्न अवस्था में वो सांचहुँ नाम जाग्रत अवस्थामें जो हरगोरिकी हमारे ऊपर पसावनाम प्रसन्नताहै तौ भाषा भणितकही कविताई जो मेरीहै सो तिसका प्रभाव जो कहेउँहै सो फुरनाम सांचहोइगो सपने में वो जाग्रत में हरगौरिकी प्रसन्नताकाप्रसंग महात्मनसे अससुनाहै कि श्रीगोस्वामीजी प्रथम श्रीअयोध्याजी संस्कृत करिके मानस रामायण जो अपने गुरुसे सुना लो कहने लगे तबमन में यहकरुणाभई कि संस्कृत सबजीवन के हितकारी न होइगो जो भाषाहोइ तौ सब जीवनको हितकारीहोइ तब विचारे कि मानस रामायणके प्राचार्य श्रीमहादेवजी हैं तो उनकी सलाह लेइकरि करौं तब काशीको गये सो श्रीमहादेवजी परमदयालगोस्वामी जी की सब जीवनपर करुणा समुझि करि सन्यासीको रूपधरि गोस्वा- मीजीके पासजाइकरि कहा कि तुम्हारा किया जो रामायण सो हमदेखें तबगोस्वामीजी दीन्ह सो लेइकरि गुप्तकरि दोन्ह जब दुइ तीनिदिन तुम्हारीपोथी रामायण मानसप्रचारिका बा। बीते तब गोस्वामी विचारेकि मैं किसके पास जाउँ तरमहादेवजीके पास जाइ करि अनसन बूतकिया तब शिवजी सपने में कहा कि हमले आयेहैं काहे कि तुम इसथको भाषाकरो जाते सब जीवनको सुलभहोइ तब श्रीगोस्वामीजी जागिकरि प्रार्थनाकीन कि हेशंभो भाषा भणित कौन पछैगो तब शिवजी प्रत्यक्षहोइकरि कहा कि तुम भाषाकरो इसको सबकोई ग्रहणकरेगो वो सबको सुवदाई वो कल्याणकारी होइ गो तब श्रीगोस्वामीजी प्रसन्न होइ करि फेरि श्री अयोध्याजीको आये भाषा प्रबंध प्रारंभ कीन श्रीरामनौमीके दिन कुछकथा करिफेरि कुछकाल बीते काशीजीको गये यह सपने सांचेका प्रसंग जसकुछमहात्मनसे सुना सो लिखा अथवा गोस्वामीजीके ऊपर तो शिवजी सहजैमें सपने सांचे प्रसन्न हैं काहेते कि उनकी कथाका भाषाकरि प्रचारकरते हैं ताते जोकहो कि शिवजीके प्रचारको अपेक्षाकैसे जानी तो सुनो॥ शिवउवाच ॥ (पूछेहु रघुपति कथाप्रसंगा। सकललोकजापावनिगंगा) तो शिवजीापैकहा कि गंगाकी नाई सबको पावनिहै सो गोप्य नानि शिवजीकी अपेक्षा भई सो संस्कृतमें तौ गंगाकीनाई पावनिरहबैभई परन्तु अब श्रीशिवजीकीवाणी सांचहु सांचभई कब जब भाषारूपप्रवाहचली तब इत्यर्थः १६ ॥ इतिश्रीरामचरितमानसपरिचारिकायांसमष्टी बन्दनानामअष्टमकै कर्यः ८॥ बंदी अवधपुरी अतिपावनि सरयसरि कलिकलपनशावनि १ टी । इहांताई श्रीगोस्वामीजी श्रीरामजीकी यावत्चिदाचिद् विभूति है तिनसबको बन्दनाकरि अबधाममें प्रवेशकरते हैं श्रीअयोध्यापुरी अति पावनि तिनको बन्दौं अतिपावनिकही जो पावनहकोपावनकर पनः श्री सरयू जी को बन्दौं कैसी हैं सरयू कि कलि कलुष जो पाप तेहि की नशावनिहारी, १॥ प्रणवौं पुरनर नारिवहोरी ममता जिनपर प्रभुहि न थोरी २ टी। वो श्रीअयोध्याजीके नरनारि जेहैं पुनः तिनको बन्दी नाम नमस्कार करौं के हैं अयोध्यावासी कि जिनके ऊपरप्रभुकी थोड़ी ममता नहीं नाम बहुत ममताहै २ ॥ सिय निंदक अघ ओघनशाये लोक विशोक बनाय बसाये ३ टी०। जो कहौ कि कहांदेरख्यौ है ममता तापर कहते हैं कि जानकी ६ ५६ रामायण मानसप्रचारिका बा। जीकी निन्दारूप पापका समूह तितको श्रीरामजी नशाइ करि विशोक लोक जो अपनाधाम तहांबनाइकरि बताये अथवा उनके नवीन विशोक लोक बनाइ करि बसाय॥विनय में लिखा॥(निजनै नगरबसाय सियनिन्दक सब पुरवासी) वाल्मीकिजी लिखा॥अथवा धोबी प्रसिद्ध सबजानतहैं३॥ बंदों कौशल्या दिशि प्राची कीरति जासु सकलजगमाची ? प्रकटे जहरघुपति शशिचारू विश्व सुखद खलकमलतुषारू ५ टी। श्रीकौशल्या महाराणीको बन्दौं कैसी हैं प्राची दिशारूप हैं प्राची कही पूर्व सो जैसेपूर्वदिशा में चन्द्रमा उदय होतहै सो सबको सुखदायी होते हैं वो कमलका तुषार रूप दुःखदायी होतहै तैसे श्रीकौशल्या रूप पूर्व दिशा में श्रीरामचन्द्र चन्द्रमारूपप्रकटे नामउगे सो कैसेहैं कि विश्वके सुखदायी वो खलरूपकमलके दुःखदाई तुषाररूप प्रतापहै इहां विपर्यय अलंकारहै चन्द्र के योगकरि खल कमल है कहे १।५॥ दशरथ राउ सहित सबरानी सुकृत सुमंगल मूरति जानी टी० । सातौसै रानिनके सहितत्रीदशरथ महाराजको बन्दौं सर्वसुरूत के वो सुन्दर मंगलके मूर्ति जानिक ६ ॥ करौं प्रणाम कर्म मन बानी करह कृपा सत सेवक जानी ७ टी० । मन वचन कर्मते प्रणाम करतहौं अपने सुतको सेवक जानिकै मेरे ऊपर कृपाकरौ अथवा आपन सुत सेवक हमको जानिकैकपाकरहु७॥ जिनहिंबिरचिबड़भयेउविधाता महिमाअवधिरामपितुमाता ८ टो। कैसे हैं महाराज दशरथजी रानिन सहितकि जिनको विरचिनाम बनाइके ब्रह्मांजी बड़ेभये काहेते कि सर्व महिमाकी अवधि नाम मर्याद श्रीरामतिनके माता पिताको का कहिये तिनकेबनावन हारेब्रह्माजीहैं ८॥ बंदों अवध भवाल सत्य प्रेम जेहिरामपद ॥ बिछुरतदीनदयालप्रियतनतृणइवपरिहरेउह टी०। रानिनके सहित महाराजको प्रणामकरि अवमहाराजैको प्रणाम करतेहैं कि श्रीअवध भुवाल जो श्रीदशरथजी महाराज तिनको बन्दौंकैसे हैं महाराज कि श्रीराम पदमें जिनका सत्यप्रेमहै कैसे जानिये कि दीन- दयाल श्रीरामचन्द्र तिनके विरत संते अपने प्रियतन को तृणकी नाई परिहरेनाम छोड़ि दिये ॥
टी। । पासू१३ रामायण मानसप्रचारिका बा। মুক্ত प्रणवों परिजन सहितविदेहू जिनहिं रामपद गढ़सनेहू १० टी० । परिवारके सहित विदेह जो हैं श्रीराजाजनकजी तिनके प्रणाम करतहौं कैसेहैं विदेह महाराज कि जिनको श्रीरामपदमें मूढल्नेह है गूढ़ कही छिपायमान १०॥ योग भोग महं राखेउ गोई राम बिलोकत प्रकटेउ सोई १५ कैसेजानी कि योग वो भोगको डब्बाबनाइ रामस्नेह रत्नरूप गोइराखे योग नीचेकाफाल भोग ऊपरकाफाल जबरामरत्न पारखी को देखे तब प्रकट करिदीन स्नेहरूप रत्नको ११ ॥ वंदौं प्रथम भरतके चरणा जासु नेम व्रत जाइन वरणा १२ टी। अब चारिउ भाइनमें प्रथम श्रीभरतजी के चरण बन्दौं ज्यहि भरतजीको नेम धर्म व्रत बरणानहीं जाइहै १२ ॥ राम चरण पंकज मनजासू लुब्ध मधुप इव तजैन टी। श्रीसीतारामजीको चरण कमल के जिनकामन लोभी भंवरा की नाई रात्रिदिन पासनहीं छोड़ेहै १३ ॥ वंदौं लक्ष्मण पदजलजाता शीतल सुभग भक्तसुखदाता १४ टी। अबश्रीलक्ष्मणजीके पद जलजात जो कमल तद्वत् सो वन्दौं कैले हैं लपणलाल जी शीतल हैं सुखदाता हैं भक्तनको वो शुभनाम बड़े रघुपति कीरति बिमल पताका दंडसमानभयौयशजाका १५ टी। श्रीरामचन्द्रको कीर्ति विमल पताकारूप है तिसके खड़ाकरिबे को लपणलालको यश दण्डरूपहै कि गवणादि वधरूप कीर्ति श्रीरामजी की मेघनाद के बधे बिनवह कीर्तिरूप पताकाको उठनाअशक्यरह्योसो श्रीलक्ष्मण जी मेघनाद को मारे तब रावण विजय का यश श्रीराम जी को भयो १५॥ शेष सहस्त्र सीस जगकारन जो अबतरे भूमिभयटारन १६ टो। पनः श्रीलक्ष्मणजी कैसे हैं कि सहस्त्र शीयके शेषजो हैं तिन के वो जगत्के कारण रूप हैं सो भूमिजोहै पृथ्वी तिसको भयजो रावणमेघ- नाद करिकै डर तिलके टारन नाम छुड़ावनेके हेतु जो ऐसेलक्ष्मणजीसो अवतरेनाम अवतीर्णभये परधामसे आइकै १६ ॥ सुन्दर है १४॥
केले है हनु ५८ रामायण मानसप्रचारिका बा। सहा सो सानुकुल रहु मोपर कृपासिंधु सौमित्रिगुणाकर १७ टी।लो श्रीलक्ष्मणजी हमारेऊपर सदाअनुकूलनाम प्रसन्नरहो काहे कि कमाके समुद्रही लुमित्राके पुत्रही सुमित्राके पुत्रकहिये को यह भाव कि जिनका कारण तुष्टमित्रहै तो कारणको गुण कार्य में परतहै वो शुभ गुनके शाकरनाम खानिहोते प्रसन्न रहौ १७ ॥ रिपुसूदन पद कमल नमामी शूरसुशील भरतअनुगामी १८ टी० । रिपुसूदनजो श्रीशबहनजी तिनके पदकमलको नमस्कारकात हों केलेहैं शत्रुहन लाल बड़शाबीर हैं वो बड़े सुशील हैं वो भरतजी के अनुगामीहैं नामपीछे चलनेवीले १८ ॥ महावीर विनवों हनुमाना राम जासु यश आपुबखाना १६ टो० । अवमहावीरको बिनवतहौं कौनमहा बीर हनुमान मान् कि जिनके यशको श्रीरामचन्द्रजी आपु बखाने १६ ॥ प्रणवौंपवनकुमार खलवनपावक ज्ञानधन जासुहृदयागारवसहिंरामशरचापधर२० टी। श्रीहनुमानजीको अपना सहायकजानि फेरि नमस्कार करते हैं कि पवनकुमारको नमस्कार करतहैं। कैसे हैं कि खलनके गण सो बन तिनके जराइबेको पावक नाम अग्निरूप हैं वो ज्ञानकेघननाम समूह जा पवनकुमारकेहृदयस्थान में श्रीरामजी धनुर्वाणलिये सर्वकालबसतेहै २०॥ कपि पतिरीछनिशाचरराजा अंगदादि जे कीस समाजा २१ टी०। कपिपति जो सुग्रीव वो ऋक्षराज जो जाम्बवन्त वो निशाचर राजा जो विभीषण वो अंगदादि जितनी कीसनकी समाजहै २१ ॥ वंदौं सबके चरण सुहा ये अधम शरीर राम जिन पाये २२ टो। तिन सबके चरण स्वहायमान बन्दों काहेते कि अधम शरीर में जिनने श्रीरामजीको पायाहै २२ ॥ रघुपति चरण उपासक जेते खग मृगसुरनरअसुरसमेते २३ टी० । अव श्रीगोस्वामीजी समष्टी श्रीराम उपासक जितने हैं तिनके नमस्कार करतेहैं कि श्रीरघुपतिके चरण कमलके उपासक जेते हैं खग नामपक्षी मृगचौपाये सुर देवता असुर देयनरमनुव्यसबके सहित २३।। वंदों पद सरोज सब केरे जे बिन काम राम के चेरे २४ टी। तिनके चरणकमल बंडौं काहेते कि जे बिनुकाज नाम स्वास्थ रहित श्रीरामजीके चेरेनाम गुलाम होइ रहेहैं २४॥ शुक सनकादिआदिमुनिनारद जेमुनिवरविज्ञान विशारद २५ टी० । शुकदेव सनकादिक नारद मुनि आदि अपरजे मुनिवर हैं विज्ञान में बड़े विशारदनान प्रवीण २५॥ वंदों सबहिंधरणिधरिशीशा करहु कृपा जनजानिन नीशा २६ टी० । तिन सबके नमस्कार करतहौं पृथ्वों में माथापरिकै । हे मुनी- श्वरौ हमको अपना जनजानिकै कृपाकरौ २६ ॥ जनकसुताजगजन निजानको अतिशयत्रियकरुणानिधानकी२७ ताकेयुग पद कमल मनावों जातु कृपा निर्मलमलिपायौं २८ टी० । पहिले बाहर आवरण की जितनी चिदाचिद् विभूति तिनको नमस्कारकिये फेरि भीतर आवरण के जितने नित्यपार्षद हैं तेवो महके वल्य सबको नमस्कार करे अब युगलसरकार जो श्री सीतारामजी तिन को नमस्कार करते हैं कि श्रीजनक महाराजकी सुता जो तिनके घुगनामदोनोपद कमल मनावौं काहेते कि जिनकी कृपाकटाक्षते निर्मल मतिपावौंगो जनक तुला पद अतिव्याप्तीजानिक कौनप्रति व्याप्तीको जनकमहाराजके चारिपुत्ता हैं। सोन जाने कौनलुताको मनाये हैं यह प्रति व्याप्ती दूरिकरिबेके हेतु कहे जग जननी तो एहू श में अतिव्याप्तीपाये कि जगन्की जननीमी बहुत पाई जाती हैं ता हेतुकहे कि कृपानिधान जो श्रीरामचन्द्र तिनके जानकी अतिशय प्रियजोहैं तिनको अब श्रीराम के जानकी अतिशय प्रियकहने से श्री सीताजीको छोड़ि अपरझे यह शब्द नहीं जातहै प्रियहोता तो बहुतन में पायाजाता अतिप्रियहोता तौभी कचित् क्वचित् पायाजात परंतु जानकी अतिशयप्रिय यह शब्द एकत्रीसीते मेंहै ताही श्री सीताजी को मनावते (इत्यर्थः) एकही अन्वयहै २७।२८॥ पनि मनवचनकर्मरघुनायक चरण कमलवंदोंसबलायक २६ चौपाई का ६० रामायण मानसप्रचारिका बा। टो० । (पुनः) मन बचन कर्मते श्रीरघुनायकजी श्रीरामचन्द्र तिनके चरणकमल बंदी कैसे रघुनायकहैं कि सबलायक हैं २६ ॥ राजिव नयनधरेधनुशायक भक्तविपतिभंजनसुखदायक ३० टी० । (पुनः) राजीव जो कमल तहत् नेत्र हैं। वो धनुष बाण धरे हैं काहेतु कि भक्तन के विपतिभंजिकै सुखदेतेहैं याहीहेतु ३० ॥ गिरा अर्थ जलबीचि सम कहि यतभिन्न न भिन्न बंदों सीताशमपद जिनहिं परमप्रिय खिन्न ३१ टो० । एथक दृथक् श्रीसीतारामको बंदि अबमिलाइक बंदना करते हैं कि श्री सीताराम पदचंदौं करते हैं श्री सीताराम कि जिनको विन्न जो दोन सो परमप्रिय है नामदीनन पर दयाहै वो सीता राम कैसे अभेद हैं कि जैसे गिरा जोवाणी वो अर्थकहनेके है पर बस्तु एक (पुनः) जैसे जल वो बीचोजो लहरि सो देखने में वो कहने में है ताहीते भेद भासतहै परंतुहै अभेद बस्तु ते बस्तु दूसरी नहीं तैसे गिरा अर्थजल बीचीकी नाई सीतारामकहनमें ढे हैं तत्वएकहै (शंका) पृथक् पृथक् तो सीतारामकी बंदना करिायेहैं अव मिलाइकै बंदनाकरने में क्या हेतु (समाधान) सुनों पृथक् पृथक् बंदना करने में यह पायाजात कि जैसे भर तादिक भाताहैं तैसे श्रीजानकिउ जीहैं यह संदेह छुड़ावने के गिराअर्थ जलबीचीका दृष्टांत देकर सीतारामजीको अभेद दिखाय यहीहेतु फेरि बंदे जो कहो कि क्या भरतादिक भातासे वो श्रीरामजीले तत्त्वका भेद है सो नहीं तत्त्वतो एकही है परंतु अंशी अंशका भेद है वो श्रीसीताराम में अंशी अंश भेदनहीं केवल ब्रह्म हैं यह बातका खुलासा गो स्वामीजी स्वायंभवमनु के तपके प्रसंगमें लिखा जब स्वायंभुवमन संकल्पकीन कि सत् वित्आनन्द मय जो ब्रह्मपरम प्रभुतिनको हमदेखें वोहब्रह्म कसोहै कि निगुण है अखंडहै अनन्तहै अनादिहै परमारथवादीजिनको चिंतवन करतेहैं वो वेइनेतिनति कहि निरूपण करतहै वो निरुपाधिहै अनुप हैं वो जेहिके अंशते ब्रह्मा विष्णु शिव नाना उपजते हैं ऐसो ब्रह्मसेवक के बस है भक्तन के हेतुलीला अपने तनुमें ग्रहणकरतेहैं लीलाकही प्राकृत मनुष्य की नाई देखिपरे वो इसेवचन बोले सो लीला जो ऐसा वाक्य वेद सत्य कहाहै तो हमारा अभिलाष पूर्ण होइगा जबऐसा संकल्पकीन तब उन्हका तपदेखि ब्रह्मा विष्णु शिव बहुतबार उनके पास आये वो कहा कि बर वह्म रामायण मानसप्रचारिका बा। ६१ मांगो परंतु गजाकी अखंड वृत्ति परब्रह्ममें लगीरहै तातेउनके बचनै न सुने तब वोहपर ब्रह्म परमात्मा अपना अनन्य दासजानि ब्रह्म बाणी बोले कि हे राजन बर मांगा तब वोहबाणी सुने तब तपकरि जो क्षीण शरीरभया रहा सो ब्रह्मपाणी सुनि तेई पुष्टभये तब राजा बोले कि हे सेवकके कल्पतरु कामधेनु हम तुम्हारे स्वरूपको नहीं जानते कि कैसा स्वरूप आपका है परंतु जो स्वरूप आपका शिव जीके मनमें वसतहै वो भुशुण्डीके मनमें वसतहै वो जौने स्वरूपको परमार्थवादी जो तत्त्ववेत्ता चिन्तवन करते हैं वो जौन स्वरूपको वेद निर्गुण सगुण कहि निरूपणकर तहैं ऐसा स्वरूप जो आपकाहै सो हम यह नेत्रनले देवहिं यह राजाकी बाणी र नि परब्रह्म प्रकटे सो युगल स्वरूप हैं सो इहां जैसा कछू ब्रह्म का स्वरूपहै अखंड सो दिखाये वो यह स्वरूप छोडि जो एक की उपालनाकरते हैं ते सखण्डब्रह्मकी उपासनाकरते हैं जो कहौ कि ब्रह्मको तौ वेदएक अनीहकहते हैं तुमयुगल कहांसे कह तेही तहां हम ब्रह्मयुगल नहींकहते ब्रह्मका स्वरूप युगल कहते हैं ब्रह्मतीएकै है एकै ब्रह्मदै स्वरूप दिखातहै इहि हेतु गो स्वामीजी दोहा में सीतारामको वंदे । इति । अब दूसराहेतु सुनों यह (दोहा) दीप देहरीके न्यायकरि दोनो तरफ बोधकहै पहिले ऊपरकी शंकाको समाधानकरि अब नीचेकी शंका को समाधान कहते हैं कि आगे श्रीगोस्वामीजी नामबन्दना करेंगे तहां कहेंगे कि बन्दों नाम रामतब यहशंकाहोइगी कि गोसांईजी केवल रामउपासक हैं युगल उपालकनहीं हैं काहे कि जो युगल उपासकहोते तो कहते कि बंटौं सोता राम नाम यहांका दूरि करिबेके हेतु पहिलही दोहा में दोनों नामकी एकताकरि वंदे कैसे एकताकिये कि जैले गिरा अर्थ जलवीची यह दोनों नाम सनातन है दोनों नामका तत्त्व एकहै गिरा कहने से अर्थका ग्रहण अर्थ कहने से गिराका ग्रहणहोतहै वो जल कहनेले बीचीको ग्रहणहोतहै काहेते कि जहां जल है तहँई बीचीहै वो वीची कहनेसे जलको ग्रहण होतहै ताते बस्तुती एकहै नाम है हैं परि सनातनहै जबसे गिराहै तबसे अर्थहै जबसे जलहै तबसे बीची है तैसे सीतापद वो रामपद यह नाम सनातन है दोनो नामका तत्त्वएकैहै दोनोनामका तत्त्वक्याहै तहां बेदमें तस्वमसी महावाक्यहै सो तत्पद ब्रह्मवाचकहै वो स्वंपदजीवबाचक वो असी पद मायाबाचक है ( प्रमाण महारामायणे श्लोक ) ब्रह्मेतितत्पदं विद्वित्वंपदोजीवनिर्मल ईश्वरोसिपदंप्रोक्तंततोमायाप्रवर्तते॥इति ॥ सो रामायण मानसप्रचारिका बा० । तत्त्वमति रामनाम वो सीतानामले सिद्धिहोत है रकारसे तत्पद सिद्धि वो रकारके मागेको दीर्घ शकार ताले त्वं पद सिद्धि होतहै वो मकार अप्तिपद (प्रमाण महारायणे श्लोक) कारस्तपदोज्ञेय स्त्वंपदाकार उच्यते ॥ मकारोलिपड़वंतत्वं अप्तिसुलोचने इति ॥ अब सीतापदसे कहतेहैं सीतानाम तोनिबार कंकनाकारलिखे तप चित्रकाव्यहोतहै तब जौन अक्षरले चाहे तोनाते उठावै तहां सीताको तासीभयो तहां तकारसे तत्पदसिद्धिहोत है वो तकारकेागे जो अकार है सो अझारसे त्वंपदसिद्धि होतहै वो दीर्घती जोहै तासे अतिपदसिद्धि होतहै (प्रमाण महासुन्दरी तंत्र श्लोक ) लिखितंत्रिविधतीताकनारूतिशोभितम् ॥ चित्रकाव्यंभ वेत्तत्रजानातिकविपण्डिताः १ तकारोतत्पदंविदित्वपदाकार उच्यते॥दीर्घ ताचधातीप्रोक्त त्वंचसिमहामुनेशाइनि(एन) दोनोनाभनकी एकताकै है किरेफ विसर्ग होइकरि सकार यो वो मकार अनुस्वारहोइकरितकारभयो तबरामकर सीताभयो वो जबसकार विसर्ग होइकार रेफभयो वो तकार अनुस्वार होइकरि मकार भयो तब सीताकर राम भयो यही तरहसे दौनौनामकी तत्वएकहै परंतुनामदोनो सनातन एकरस अखंड हैं जबसे रामनाम तबसे सीतानाम जबसे सीतानाम तबसे रामनाम गिरा अर्थ जलबीचीके दृष्टांत करि जानो (पुनः शंका) दे दृष्टांत देबेका क्या हेतु काहे कि प्रयोजन अभेदका है सोती एकै दृष्टांत में बनत है कि तौ गिरा अर्थका कित्तौ जलधीचीका है किस हेतु ( समाधान ) सुनौ जो कदापि एकै दृष्टांत देते कि तीता राम कैसे अभेद हैं कि जैसे गिरा वो अर्थ तौ तत्वाभेद तो होत परंतु सूक्ष्मते कारण कार्य पायाजाता कि जैसे गिराको विकार अर्थ है तो गिराकारणहै वो अर्थकार्य हे गिरास्त्रीलिगहै अर्थपुल्लिंग है तैलेसीताकारण है वो रामकार्यहैं तो यहि में महाविरोधपरत सर्वशास्त्र में एक शाक्तमत सिद्धि होत सोतो एक देशी इनको कहना नहीं है जो कहौ जलबाचीको दृष्टांत देते तो तत्वका अभेद तो होत परंतुकार्यकारण भेद इसमें भी परत कि जैसे जल कारण है वो बीची जलका विकार है ताते कार्यरूप है जल पुल्लिंगहै वीची स्त्रीलिंग है तैसे रामसीता है राम जल स्थाने कारण रूप है वो सीतावाची स्थाने कार्यरूप हैं ऐसा पायाजाता तो इसमें भी दोष आवता काहेते कि बहु वचनन में विरोध परत वो एक पुरुषवादीका मत सिद्धि होत सोभी एकदेशी होइ जात यह जानिकै त्री गोस्वामीजी दो दृष्टान्त दिये कि जो एककहैं कि गिरार्थ के दृष्टांत से।
रामायण मानसप्रचारिका बा। ६३ सीताकारण हैं वो शम कार्य हैं तब दूसरा कहैगा कि जलपीवीका दृष्टांत तोहै वो जब एक कहेगा कि जलजीवीके हटांतले रामकारहरू पहैं सीता कार्यरूप तब दूप्तरा कहैगा कि गिरा तो है ताते सर्वकामत यह है कि नतौ सीतारामहैं वो न रामले सीतह दोनो स्वरूप अखंड हैं दोनोनाम सनातन हैं इसमें कार्यकारण भेदनहीं दोनों स्वरूपकेवल ब्रह्म हैं वोदोनों नामबन तत्वकर वाच हैं यहोवर गोस्वामी के दृष्टांतहिये ( तत्र प्रमाण श्रीरामतापनि योपनिषद श्रुति) सीतारामौतन्मयावत्रस्यार्थः अत्ररेफः यदाग्निवीजःलीतारा मनायौ इति १ (पुनःविष्णुपुराणेश्लोक ) दौनि त्वंद्विधारूपंतत्त्वतोनित्यमेकता ॥ राममंस्थितासीता सीतामंत्र रघूत्तमः यहा शब्दात्मकोरामोसीता शब्दार्थरूपिणी ॥ यहाणीभवेत्सीता रामाश दार्थरूपवान (पुनःनि ) रामःसीताजानकीरामचन्द्रोनित्यारखण्डोचप श्यन्तिधीराः ३१ ॥ इत्यर्थः॥ इतिश्रीरामचरित्रमानसपरिचारिकायां श्रीसीतारामजीधामरूप परिकरवंदनानामनवल कैंकर्यः ॥ वंदों नाम राम रघुबरको हेतु कृशानु भानु हिम कर को १ टी। अबश्री गोस्वामीजी रामजीको चारि जो नित्य हैं नामरूपली लाधाम (प्रमाण वशिष्टसंहिता श्लोक) रामस्यनामरूपंच लीलाधाम परात्परम् एवंचतुऽयंनित्यं सच्चिदानन्दविग्रहम् १ सो लीला गावनेके हेतु प्रथम धाम बन्दना करे फेरि स्वरूप बन्दनाकर अब नाम बन्दना करते हैं की बन्दों नाम कौन नाम राम कौन राम रघुवर को नाम जो रघुकुल में प्रादुर्भाव हैं लिन रामके नामको बन्दतहों (शंका ) परमेश्वरके अनेक नामहैं सोगमैनान बन्दनेने याहेत समाधान सुनी परमेश्वर के जितने नाम हैं तिन सबका गमनाम आत्मा है प्रेरक प्रकाशक है तो जवात्मा को प्रणामकिया तब सब शरीरको होइचुका जो कहौ गमनाम सब नाम नको आत्मा कोनरी तिते है व तुम्हरेई मतसे सब नामको अात्मा है की और केहू के मतसे तौसुनौ रामनाममें पंचपदार्थहैं रेफरेफकी अकारदीर्घा कार मकारकी अकार हल मकार विन्दुरूप यह तीनि अकार व रेफविंदु ये पांच बिनु एको मंत्रनाम ऋचा सूत्र एकोनहीबनैहै यही पांचौसे सब सिद्धिहोतेहैं यही रीति से सबकर आत्माहै व सबके मतसे है वेदपुराण स्मृति रामायणके (प्रामासत्रीराम तापनियोपनिषद श्रुति) स्वभज्यो तिर्म रामायण मानसप्रचारिका बा। योनंतरूपीस्वेनैवभालते ॥जीवत्वेनेदमोयस्य स्मृष्टिस्थितिलयस्य च १ कारण वेन चिच्छक्तयारजःसत्वतमोगुणैः।यथैववटवीजस्थ प्राकृतश्चमहाद्रुमः २ तवैवरामवीजस्थंजगदेतच्चरचरम्॥रेफारूढामूर्नयास्युःमक्तयस्तिस्त्रएचचे ति ३ (पुनः महारामायणे शिव वाक्यं श्लोक ) परमेश्वरनामानिसंत्यने कानिपार्वती।।परन्तुरामनामे दसवेषानत्तमोत्तमः १ नारायणादिनामानिकी तितानिवहून्यपि ॥अात्मातेषांचलर्वेषांरामनामप्रकाशकः २(पुनः मनस्मृ. तौ)मतको टिमहामंत्राश्चित्तविभामकारका एकएवपरोमंत्रीरामइ त्यक्षर द्वयम् १ ॥पुन हारितस्मृतौचतुध्यिायः) रामायणमोह्य तत्तारकंबह्मना मकं ॥नाम्नाविणोस्तहस्त्राणांतल्यएवमहामनुः१ अनंताभगवन्मंत्रानानेन तुसमाकताः॥ योरमणसामर्थ्यात् सौंदर्यगुणसागरात् २ श्रीरामइतिना मदतस्य विष्णोःप्रकीर्तितम् ॥रमणान्नित्ययुक्तत्वादामइत्यभिधीयते ३(पुनः पद्मपुराणेशिववाक्यम् ) रामरामेतिरामेतिरमेराममनोरमे सहस्त्रनामत तल्यं रामनामबरानने १ अब श्रीगोस्वामी जी जो नाम बन्दना प्रकरण उठाया है सो पहिले नामका स्वरूप कहेंगे फेरि अंग कहेंगे फेरि फल कहेंगे नवदोहा करिके सो सूक्ष्मते प्रथमै दोहा में स्वरूप अंगफलकहिफेरि विस्तार पूर्वक पाठ दोहामें कहेंगे सो प्रसंगके साथ कहेंगे प्रथमदोहाका सुनौ जो रामनाम बन्दौं कहा सो रामनामका स्वरूप कहतेहैं कैसोराम नामहै की कुशानु भानु हिमकरको हेतु है हेतुश्लेष है दुइवस्तकाबोधक है हे तुकही कारणको फेरि हेतुकही प्रियको प्रथम कारणसुनौ कृणानुजो अग्नि तेहिकर कारण रकार है भानु तो सूर्य हैं तेहिकर कारण अकार है वो हिमकर जो चन्द्रमा तेहिकर कारण मकार (प्रमाणश्रीमन्महारा- मायणे शिववाक्यं श्लोक )रकारोवनलवीजस्याय सर्वेवाडवादवः कृत्वा मनोमलं सर्वभस्मक शुभाशुभम् १ अकारोभानुबीजंस्याह दशास्त्रप्रका शकः॥ नाशयत्वदीप्तायतविद्याहृदयंतमः २ मकारश्चन्द्रवीजंचसदम्या परिपरणम् ॥त्रितापंहरतेनित्यं गीतलत्वकरोतिच ३ जो कहोकी रामनाम कृशानुनानुहिमकर को वीजहै तो जैसे वीजवृक्ष को उत्पत्ति करि उसीमें लीन होइजातहै तब कारण मिटिगयो कार्यमात्र रहि गयो तैसे रामनाम कशानुभानु हिमकर को उत्पत्ति करि फेरि आप उनहीं में लीन होइ गयो तब राम नाम की बन्दनाकैलेबने चाहीकी कगानु भानु हिमकर को बन्दौं तहां ऐसा नहीं है कारण दोविधिके हैं एक सामान्य व एक विशेष तो सामान्य कारण कार्य में लीन होइ जातु है व विशेषकारण रामायण मानसप्रचारिका बा। ६५ कितनहु कार्य को उत्पत्ति करि आप पूर्णवनो रहत है जैसे एक बूटी होती है सो तांबामें परै तौ उसको गलाइकरि सोना करिदेतु है आप भी उसी में लीन है जातु है तो सामान्य कारण है व पारस अनन्त मन लोहा को सोना करिदेतु है आप जैप्ता का तैसा पूर्श बना रहत है तैले श्रीरामनाम विशेष कारण है अनेक अग्नि सूर्य चंद्रमाको उत्पत्ति करि बापु जैलाका तैसा पूर्णबना रहतहै अवजो कहो कि रामनाम को एतौ बड़ो विशेषण देकरि बंदने में क्याहेतु तो सुनो श्रीगोस्वामीजी अनेक बंदनाकरि पाये तब विचारो कि मैं तुरित शुद्दी चाहतहौं सो तुरित शुद्धी नतो ज्ञानसे होइगी न वैराग्य से न भक्ति से न योगसेइनसबसे देर शुद्धी होइगो व मैं तुरित शुद्दी चाहतहौं काहेते कि बिना शुद्धी श्रीरामचरित गावनो अशक्य है तब विचारो कि रामनाम जो अग्नि सूर्य चंद्र को कारण है तितमें मनबचन कर्मसे अभिनिवेशकरे से तुरित शुद्दीहोइगी काहेते कि एक रकारको कार्यजोहै अग्नि तिसमें इतना प्रभावहै कि शुभाशुभ जो कळू उसमेंपरै सो दोनोंको जराइकरि अपनो स्वरूपकरि देत है तो जब इतनो गुणकार्यमेंहै तौ कारणमे न जानेकेतौ गुण महत्वहोइगो औ अपनेको अनेक शुभाशुभकर्मकरि ग्रस्तदेखै तो जबतक शुभाशुभ कर्म बने हैं तबतक श्रीराम चरित गावने में चित्त प्रवेशनहीं करता यह जानि तब श्रीरामनाम जो अग्नि सूर्य चंद्रको कारण है तिसमें मन बचन कर्म से अभिनिवेसकरे कि रामनाम शुभाशुभ कर्मनको जराइकरि तुस्ति अपनो स्वरूपकरि देइगो तब श्रीरामचरित गावने के योग्यहोउँगो अब जो कोई कहै कि शुभाशुभ कर्मती एक रकार जो अग्निबीज है तिससे जरिगये फेरि अकार मकार बंदनेमें क्याहेतु तहां सुनौ रकार अग्निबीज करिकै शुभाशुभ कर्मतो जरे परंतु अग्निबीज ते प्रकाश थोरा पाये तो पूर्ण प्रकाशबिना दूरितक नहीं देखि परत केवल नेत्रके सामने प्रकाश होतहै सो शुभाशुभ कर्म जरने से स्वरूप व परस्वरूप देखिपरत है सो ध्यानकिया करो व रामचरित्र पूर्ण प्रकाश बिनुनहीं देखिपरत व श्रीगो- स्वामीजीकोअभिमत रामचरित्र गावनेकोहै जो स्वस्वरूपपरस्वरूप जाने का फल है तिसहेतु अकार जो सूर्यका कारणहै तिसको वंदे देखिये तो कितनहूं अग्नि बारिदेहु परंतु सूर्य बिना रात्रिनहीं जात तैसे सूर्य को बीज जो प्रकार तिस बिना अविद्या रूप रात्रि नहीं जाय यावत् अविद्या रूप रात्रि बनी है तावत् वेद शास्त्र की तत्व यथार्थनहीं देखि सयायणमानसप्रचारिका वा । परत तौ जो वेद की तत्व यथार्थ नानि परी तौ रामचरित्र कैलगाया जायगा काहे कि यह मानस वेद के निचोउ तत्व है (प्रमाणं) बरणों रघुपति विशदयश श्रुतिसिद्धांत निचोरि ॥सोशिवजी कहाहै जो कहौ कि अच्छा रकारलेशुभाशुनजरो व अकारसे अविद्या रात्रिमिटी मकार किस हेतु बंदे तहां सुनौ जब श्रीगोस्वामी जी रकार अकार बंदे तब विचारो कि रकार अग्नि बीज है सो अग्नि व वैराग्यकी एक क्रियाहै जैसे अग्नि शुभाशुभ बस्तुको भस्मकरि देतु है तैसेवैराग्यशुभाशुभ कर्मनकी वासना को जराइ देतुहै औ रकार वैराग्यको उपादान कारणभीहै तो जहारकार आयो तहां वैराग्य आवेगो व जब अकारबंदे तब विचारो कि अकार भानु को वीजहै सो भानु व ज्ञानकी एकक्रियाहै जैसेभानु उदयमें रात्रिदूरि होतिहै तैसे ज्ञानउदय में अविद्यारात्रि दूरिहोति है व अकारभी ज्ञानका उपादान कारणहै तो जहां अकार आयो तहां ज्ञानभी अवगो तबजैसे रुगानु भानुमें उष्णताहै तैसे वैराग्य ज्ञान में उष्णताहै क्या उष्णता है कि अहं वैराग्यमान व ब्रह्मास्मि तो जहां अहंकारहै तहां श्रीरामचरित्र कैसे गाया जायगा यहजानि मकारजोचंद्रबीजहै तिसकोबंदे व चंद्रमा व भक्ति कीएकक्रियाहै कि जैसे चंद्रमा कृशानुभानुके तापको शांतिकरि देत है तैसे वैराग्य व ज्ञानके तापजोहैं अहंकार तिसको भक्ति शांतिकरि देत है व मकार भक्तिको उपादान कारण है तौ जबमकार आयो तब भक्ति आवैगी तबजो बैराग्य ज्ञानकी अहंकार रूप उष्णता सो आप शांतिहोइगी तब श्रीरामचरित्रमें चित्त अच्छीतरह से प्रवेशकरैगो अबजो कहौ कि जोतुम्नने कहा कि जैसे अग्नि सूर्यको उष्णता चंद्रमा शांति करिदेतु है तैले स्कार जो वैराग्यरूप व अकार जो जानरूप तिसकी उष्णता को मकार रूप भक्ति शांति करतुहै तो चंद्रमाके प्रकाश में सूर्यको अभावहै तैसेमकारके उदय में प्रकारको अभाव होइगो सो नहीं दृष्टांतको एकदेवा लेना पुनः जैसे एक चंद्रमणि होतिहै सो उसको अग्नि सूर्य के सामने करिदेइ तौ अग्नि सूर्यको प्रकाश तो बनो रहतहै परंतु उष्णता हरिलत है सैसेरकार अकार मकार कारण वो वैराग्य ज्ञान भक्ति एकसंग बनेरहत हैं रकार प्रकारके कार्य जो वैराग्यज्ञान तितके अहंरूप उष्णताको मकारका कार्य जो भक्ति सो शांतिकिये रहतहै जो कहा कि रामनाम वैगग्यज्ञानभक्तिको कारणहै तितका (प्रमाण महारामायने श्लोक )रकारहेतुवैराग्यपरमंयच्च कथ्यते।। अकारो ज्ञान हेतुश्च मकारो भक्तिहेतुकम् १ अथ यद्यपिरकार रामायण मानसप्रचारिका बा० । ६७ के बंदौं शुभाशुभकर्म जरिगये शुद्धीभई तदपि श्रीरामदासजेहैं तेपर्णनाम कहतेहैं याहीते पराभक्तिकोलहि श्रीरामचंद्र के समीप को प्राप्ति होते हैं प्रमाणं महारामणे श्लोक)रकारो योगिनांध्ययोगच्छतिपरमंमदं॥ अकारो जानिनांध्येयस्ते सर्वेमोक्ष रूपिणः १ पूर्ण नाम मुदादासा ध्यायंत्यचल मानता ॥ प्राप्नुवंतिपरां भक्तिं श्रीरामस्य समीपक २ अब जो कहाकि हेतु श्लेषहै लो कारणको अर्थकहि आये अवप्रियको अर्थ सुनों रामनामकेसो है कि हिमकर को जैसे कृशानु भानु हेतु है इहां उपमेय वाचक लुप्ता उपमालंकार है जड़ता वो रामनाम उपमेय कृशानुभानु हिमकर उपमान जैसे वाचकहेतुधर्म यह पूर्ण उपमाहै रामनाम वो जड़ता उपमेय वो जैसे वाचक सो नहीहै ताते उपमेय वाचक लुताहै कि जैसे हिमकरकोळगानु भानु हेतुनाम प्रियहै हिमकर कही जो हिम को करै हिमकही जाड़ सो जाड़को हिमऋतु जो अगहन पूल तिसमें कृशानु वो भानु बहुत प्रिय है तैसे अहंममरूप अगहन पूस तिसमें जड़तारूप जाड़लगिरह्योहै (प्रमाण) जड़ता जाड़ विषम उरलागा ॥ तिप्त अहंमम में जो जड़ता जाड़ तिसमें रुगानु भानुरूप रामनाम सो हेतुनाम प्रियहै जैसे कगानु भानु जाड़ को शांतिकरि देतुहै तैसे रामनाम अहंममरूप जड़ताको शांतिकरि देतुहैतैसे रामनाम तो श्रीरामनामहै ताको वंदौं इत्यर्थः॥१॥ विधिहरि हरमयवेद प्रानसो अगुण अनुपम गुण निधानसो २ टी। श्रीरामनामको स्वरूपकहि अब अंगकहतेहैं किजो रामनामकृयानु हिमकर को हेतु है सो रामनाम फेरि कैसो है कि विधि हरिहरमय है व वेदको प्राणहै मयकही तदात्मक कही गुणस्वरूप एक व प्रचरात्मककही गुण स्वरूप भिन्न भिन्न सो जवत्रिदेव रज सत तमस्ते पार हैं तब रामनाम तदात्मक विधि हरिहरमय है वो जबत्रिदेव गुणाभि मानी हैं तब रामनाम प्रचरात्मक विधि हरिहरमय है कवनी रीति तदात्मक प्रचुराहनकहै तहां रकार जोहै सोविधि जो ब्रह्मा तन्मय है वो अकारजोहै सोहरि जो विष्णु तन्मयहै वो मकारहर जोमहादेव तन्मयहै कैले है किये तीनिहूरूप सूक्ष्म गुणकोसाम्यता शुरूप प्रणवमें लक्षिहोतेहैं सो प्रणव रामनामके अंशते सिद्धि होतहैं कैसेहोत है तहां रामनामषट् पदार्थते वृतहै रेफ रेफकी अकार दीर्घाकार मकारकी अकार बिंदुनाद सो येच्वों वस्तुते प्रणवसिद्धि होत है वेदकहत हैं कि दीर्घाकार उकार रूपहै तो अकार उकार मिलियो- रामायण मानसप्रचारिका बा। कारभयो वो मकार की कार सवर्णीमानिसोभी मिलिगयो रेफ अंतर. भूतभयो विंदु अनुस्वारभयो नादरूप प्रणव सिद्धिभयो(प्रमाणं महारामा- यणे श्लोक) अंशांत, रामनामनस्त्रयस्सिद्धाभवंतिहि ॥ वीजम कारसोई चसूत्र मक्तमिति श्रुतिः १ रामनाम महाविद्यषड्वस्तु भिरावृतं ॥ अर्धर कार गुरुराका रस्तथा वर्णविपर्ययः मकारं व्यंजनं चैव प्रणवंचाभि धीयते मस्यासवर्णितमत्वा प्रणवेनाद रूपधक ॥ अंतरभतो भवेद्र फः प्रणवेसिद्धि रूपिणी ३ वो रामनाम की तारकसज्ञा है वो प्रणव वह्मकर आत्मा है ताहीते प्रणवकीभी तारकतंज्ञाहै वो. प्रणव त्रिदेवको प्रात्मा है अब जवनी रीतिसे है तबनी आगे श्रुतिकहतहैं सुनों ( प्रमाणं ) तारकंदीर्घानलं विंदु पूर्वकंदीर्घानलं पुनर्मायनमश्चन्द्रायनमोभद्रायनमः इत्योतद्ब्रह्मात्मिका सच्चिदानन्दारण्यं इत्युपातितव्यमकारः प्रथमाक्षरोभवत्युकारो द्वितीया क्षरोभवति मकारस्त तीयाक्षरोभवत्यईमात्रा श्चतुर्थाक्षरोभवति विंदुःपंच माक्षरोभवति नाइषष्टाक्षरोभवति तारकत्वात्तारकोभवति तदेव तारकब- मत्वंविद्धि तदेवोपास्यमितिश्रुति श्रीरामतापिन्योपनिषदि ॥ यहरीतिसे रामनाम तदात्मकविधि हरि हर मयहै अब प्रचुरात्मक सुनों श्रीरामचंद्र की एकपाद विभूतिमें अनंत ब्रह्मांड हैं वो ब्रह्मांड ब्रह्मांडप्रति ब्रह्माविष्णु शिवह सो जो प्रणव रामनामका शरीरहै सो त्रिगुण साम्यरूप प्रणव में है सोतो निर्गुण तीनिउं अक्षरनसे उत्पत्तिहोतहैं अकारसेसत् उकारसे रज हलमकारसे तम तब श्रीरामजीते जाय मान जी ब्रह्मा विष्णु शिव सो एकएक गुणनकोलेइ अनेक ब्रह्मांडकी उत्पत्ति पालन संहारकरतेहैं (प्र. माणं श्रीमन्महारामायणे शिव वाक्यं श्लोक ) प्रकार प्रणवेसत्व मुकार श्चरजोगुणः ॥ तमोहलमकारस्यात् त्रयोहंकारमद्भवः १ प्रियेभगवतो रूपे त्रिविधोजायतेपिच ॥ विष्णुर्विधिरहं चैव त्रयोगुणविधारिणः २ ॥ इस रीतिसे रामनाम प्रचुगमकविधिहरिहरमय है अब वेदप्रमाणसुनों जैते शुद्ध पंचतत्वमय ब्रह्मांड समिष्टीरूपहै तैसे पंचतत्वके विकार मय अंहकही शरीरहै मनुष्यादिक वेष्टीरूपहैं ताते अंड ब्रह्मांड दोउ पंचतत्व बेष्टित विग्रह हैं तिनके पंचप्राण हैं प्राण अपान उदान व्यान समान एते पंचप्राण शुद्धरूप विराटमें हैं अरु पंचप्राणके पंच विकार रूप प्राण सोई मनुष्यादिकनमेंहै तैसे वेदनकेप्राण दिव्यरूप रामनामहै वेदको मूल एक डौंकार ताते वेदचारि पुनिपांच ऋग ययुर साम अथर्वण सुस्म महाभा- रतादि पांचहुवेदके जे अक्षर सो स्थूल विग्रहजानिये अस पांचहू सिद्धांत रामायण मानसप्रचारिका बा। ६६ अर्थजोहै सोईपंचप्राण रामनामहै रेफ रेफकोषकार दीर्घाकार हलमकार मकारकी अकार येपांचों वेदकेप्राण हैं जैसे प्राणस्थूल शरीरको त्यागिदियो तब शरीर मृतकभयो तैसे जेहि वेद स्मृति पुराण इत्यादिक सूत्र ऋचा श्लोक पद अक्षरनमें रेफ विसर्ग प्रकार अनुस्वार न होइ ते सब मृतक रूप होइजाई अरु बेदको सिद्धांतजोहै एकतत्व तेहिमय रामनामताते बेद प्राणकहा (प्रमाणं महारामायणे श्लोक ) रामनाम्नःसमुत्पन्नः प्रणवोमोक्ष दायकः ॥ रूपंतत्वमश्चासौ वेदतत्वाधिकारिणः १ पुनि श्रीरामनाम कैतो है अगुण कही गुणातीतहै अनूपम जाकी उपमाको कळूनही अस अनेक दिव्यगुणन को निधान नाम स्थानहै अथवा अगुण अनूपम गुण जोहैं योग वैराग्य ज्ञान शांति संतोष शील दया क्षमा करुणा आदि एते गुण अगुण अनूपम, मुक्तिकेउपहित आत्माके गुण हैं प्राकृति के गुणनहींहैं तिनगुणनके निधान रामनामहै जैसे धनकेनिधानकुबेरहैं २॥ महामंत्र जेहि जपत महेशू काशी मुक्तिहेतु उपदेश ३ टी । स्वरूप अंककहि अब फल कहते हैं कि सो रामनाम फेरिकेसो है कि महामंत्र है जेहि रामनाम महामंत्रको महेश जपते हैं आपु वो सर्व जीवनके मुक्तिहेतु काशीमें रामनाम महामंत्रको उपदेशकरते हैं ३ ॥ महिमा जासु जान गणराऊ प्रथमपूजियतनामप्रभाऊ ? टी। श्रीरामनामकी महिमा गणेशजी जानते हैं वोरामनामके प्रभाव ते प्रथम पूजनीयहैं ॥ जान अादिकवि नाम प्रतापू भयेउ शुद्धकरि उलटाजापू ५ टी. । पुनःश्रीराम नामकोप्रताप आदिकविजो बाल्मीकते जानते हैं कि उलटानान मरामराजपिकरि किरातते महामुनिभये इतनाशुद्धभये ५॥ सहस नाम सम सुनि शिववानी जपिजेई पियसंगभवानीद टी० । पुनः श्रीराम नामको महादेवके मुखसे विष्णु सहस्त्रनामके सम सुनि पार्वती शिव के संग जपि जेंवती भई एक समय श्रीमहादेव जी भोजन करने को बैठे वो पार्वतीजी से कहा कि हे प्रिये श्रावो हम तम संग भोजनकरैं तब पार्वती जी बोली कि आपु भोजनकरिये हमबहों सहस्त्रनामका पाठकरि तब जेवेंगी तब शिवजी कहाकि (रामरामेतिराम तिरमेरामेमनोरमसहस्रनामतत्तुल्यंरामनामबरानने)सो यही शिवजीके तीको ७ ७० रामायण मानसप्रचारिका बा। मुखते सुनि रामनाम को जपि संग जैवती भई यहकथा पद्म पुराण मे प्रसिद्धहै ॥ हरषे हेतु हेरि हर हीको किय भूषण तिय भूषण टी। जब शिवजीके कहते पार्वती सहस्त्रनामछोड़ि राम नाम जपेड तब शिवजी पार्वतीजीके हृदयको हेतु जो रामनाममें प्रीति सोहेरिनाम देखिकै हर्षे हर्षिकै तिय जोहैं पार्वती तिनको सर्व तियन को भूषण नाम शिरोमणि करतभये अथवा कियभूषणतिय नाम तियभूषण जो शिव जी सो तियको भूषण करतेभये नाम अबतकतियके भूषण प्रापुरहे अबतिय. को अापन भूषण बनाये अथवा किय भूषणतिय नाम शिवजी तियको भूषणकियो परन्तु भूषण तियको अर्थात् राम नामके प्रभावते भूषणकिये कछू स्त्री भावले नहीं अथवा किय भूषणतिय नाम शिवजी विचारो कि जीको हम उपदेशकीन तोको तिय भूषण कियो कैसी तिय है कि सर्व तियन को भूषणरूपहै ७॥ नाम प्रभाव जान शिव नीको काल कूट फल दीनअमीको ८ टी०। पुनः श्रीरामनामके प्रभावको नीके शिव जी जानते हैं नाम और कोऊखंडमंड जानते हैं शिवजी नीके जानते हैं कि जेहिराम नामकेप्रताप कालकूट जो हलाहल विष मृत्युका देनेवाला सो श्रमी को फल देत भयो अथवा कालकूट शिवजीके मारनेको गयो सो शिवजी रामनाम के प्रभावकरि येते शीतलभयेहैं कि इतनेबड़े शत्रुको अमी को फल देते भये अपने कण्ठ में बास देकरि रामनामको रक्षक करिदियो ८॥ दो० बर्षाऋतु रघुपति भगति तुलसी शालि सुदास ॥ रामनाम बरवर्ण युग श्रावण भादौं मास ६ टी० । सूक्ष्नते रामनामको स्वरूप अंगफलकहि अब स्थूल स्वरूप अंग फल कहाँहें प्रथम स्वरूप सुनौ ( दोहार्थ ) वर्षाऋतु रघुपति भगतियह कहि यह जनाये कि जैसे षट्ऋतुहैं तिनमें वर्षाऋतु करि सब गोभित हैं एक वर्षाऋत न होइतौ सबऋतु अशोभित होइजाहिं काहे ते कि वर्षा- ऋतु सब ऋतन की पोषकहैं तैसे षट्भक्ति में रघुपति भक्ति वर्षा ऋतुहै कौन षट्नक्ति शैव वैष्णव शाक्त सौर्य गाणपत्य रघुपति की ये षट्भक्ति में रघुपतिनति वर्ग ऋतुहै काहेकि सबभक्तिनकी पोषकहै रघुपतिकी भक्ति वित सब भक्ति अशोभित हैं तो जैसे वर्षाऋतु में शालि जो है धान सो ते आखर मधुर रामायण मानसप्रचारिका बाग ७१ अानन्दरहतहै तैले खुपतिभक्ति बर्षाऋतु, सुदास जोहैं रामरलिकतेई धानहैं अानन्दरहतेहैं वो जैले बर्षाऋतुमें दोमास होतेहैं श्रावण वो भादौं तैसे रघुपति भक्ति में रामनामजो द्वैवर्ण नाम अक्षर सोई श्रावण भादौं मासहैं या यहध्वनिहै कि जैसे श्रावण भादौं वैमासकी बर्षाऋतुहै तैसे रामनामजो युग अक्षर सोई रघुपति भक्तिहै वो अपरदासजोहैं ते अपर अन्न हैं जव गेहू चना जे कुछवर्षाको जलमिले तो कूप तलाव नदीशीत से पाकते हैं तैसे वो दासकिंचित्रघुपतिको नामले अपर देवकी उपा- सना व ज्ञानादि साधनते अपनाभला चाहते हैं वो सुदास जो श्रीसीता मामजीके अनन्य हैं तेधान हैं कि जो केवल बर्षाकेजलसे पाकते हैं अपरसे नहीं तैसे वो सुदासकेवल रामनामते अपना भलामानतेहैं अपरकी ओर तकिबैनहीं करतेइहांते युगाक्षरकी मैत्री वर्णनकरते हैं दोहा ताई ६ ॥ मनोहरदोऊ बर्ण बिलोचन जनजियजोऊ १० टी। दोऊ पाखर जो रामनाम सो मधरनाम मिष्ट वो छोटे छोटेहैं ताहीते मनोहर हैं मनको हरिलेते हैं दो सर्व वर्ण नोअक्षर तिनके विशेष लोचननाम नेत्रहैं जैसे सर्वशरीरमें नेत्र मुख्य हैं जो नेत्रनहोहिं तो सूर होइ जाइ फिरि कोई शरीर नसूझै तैसे रामनाममें अकारहै सो स्वगधिप है तेहीविना सबअक्षर अंधेहैं यह बातको हेजन सर्वप्राणियो अपने अपने जियने जोऊ नामदेखी १०॥ सुमिरत सुलभसुखदसबकाहू लोक लाहुपरलोकनिबाहू ११ टी० पुनः रामनामकैसोहै कि सुमिरतसंते वड़ो सुलभहै नाम अटपट नहीं है. के व्याकरण अादिकोईका सहाइस्वलेइ तब शुद्ध उच्चारणहोइ सोनहीं बड़ोसुलभहै वो सबको सुखदाताहै वो लोकमें लाभ रोटीलूगा परलोकमें इहां तक निर्वाह है कि जो रामनाम एकौवारकहै तो श्रीराम समीपको प्राप्तिहोइ जो मुनिनको दुर्लभहै (प्रमाणं वाराहपुराणेश्लोक) देवाच्छकरशावकेन निहतो म्लेक्षोजराजर्जरो हारामेतिहतोस्मिभूमिपति तो जल्सस्तनुत्यक्तवान् ॥ तीणोंगोष्पदवद्भवार्णवमहोनाम्नःप्रभावात्पुनः किञ्चित्रंयदिरामनामरसिकाः तेयांतिरामास्पदं १ । ११ ।। कहत सुनतसमुझतसुठिनीके रामलषण समप्रियतुलसीके १२ टी० । फेरि रामनाम कैसोहै कि कहतमें सुनतमें समुझतमें सुठिनाम अतिनीकोहै वो गोस्वामीजी कहतेहैं कि हमके तौ श्रीरामलक्ष्मणकेसम रामायण मानसप्रचारिका बा। नाम बराबरिप्रिय हैं काहेते रकार रामरूपहै वो मकार लक्ष्मणरूप अथवा जैसे रामजीके लक्ष्मणजी प्रिय हैं तैसे हमको रामनामप्रिय है अथवा जैसे लक्ष्मणजीके रामजीप्रियहैं तैसे हमको रामनाम प्रियह १२ ॥ वर्णतवर्ण प्रीतिविलगाती ब्रह्मजीव इवतहजसँघाती ११ टी० पुनः रामनाम कैसा है कि वर्ण जो दोऊ अक्षा सो बर्णत संते तौ प्रीतिविलगातीनाम कूटीसी जानिपरतहै कि रकारकोस्थान मुर्धन्यहै वो मकारको प्रोष्ठ वो नासिकाहै परंतु, दोऊ ब्रह्मजीवकी नाई सहज सँचाती जैले जीवके अंतर्यामी ब्रह्मअनादि है कवहूं वियोगनहीं तैसे रामनाम सहज सँघातीहै कोईकाल बिलग नहीं अथवा बर्णतवर्णनाम नर्णनकरतसंते बरनाम श्रेष्ठहै वो न प्रीतिविलगाती नाम प्रीतिकवनेउ काल में विलगनहीं होत ब्रह्मजीवकी नाई अथवा बर्णत वर्णनाम राम नामको जो बर्ण करि बर्णनकरै तौ प्रीति विलगाइ जातीहै काहेते कि दोनों वर्ण के बीचमें यकार अक्षरपरतहै तोप्रीति कुटिजातीहै वोये दोनों वर्ण की प्रीति कोईकाल नहीं अभिप्राय कि रामके जो युगवर्ण हैं सोय वर्गीरकार वो पवर्गीमकार नहीं हैं इनसेपरेहै तिसरामनामके संसर्गपाइ करि ये दोऊअक्षर ऊर्ध्वगति को पावतेहैं स्वरनष्टभयेते(प्रमाणं अन्येच) यन्नामसंसर्गवशाद्विवरणौ नष्टस्वरौमूर्द्धगतौस्वरानां । तद्रामपादोहदि संनिधाय देहीकथनोर्ध्वगतिप्रयांति ॥ १३ ॥ नरनारायण सरिससुमाता जगपालक विशेषजनत्राता १४ टी० । पुनः रामनाम कैसो है कि नर नारायणके सदृश सुष्ट भाता है नर नारायण जगत्को पालन करतेहैं वो रामनाम जगत्को पालन करत है वो अपनेनाम जापजनको विशेषत्रातानाम रक्षाकरते हैं १४ ॥ भक्तिसुतियकलकर्णविभूषण जगहितहेतुबिमलविधुपूषण १५ टी। भक्ति रूपा सुन्दरि स्त्रीको कलनाम सुन्दर कानके भूषण हैं अभिप्राय कि जैसे स्त्रीको कानको भूषण सुहाग सूचकहै तैसे भक्ति रूपा सुन्दरि स्त्रीको रामनाम सुहागहै जिसभक्तिमें रामनाम नहीं है तोनभक्ति विधवाजानों हनुमन्नाटक, मुक्तिरूपा स्त्रीको कर्णभूषण लिखा सो फल क्रियाकी एकता जानों भक्ति क्रिया मुक्तिफल सोमुक्तिकोभी रामनामभूष- यहै (प्रमाणं हनुमन्नाटके श्लोक) मुक्तिस्त्रीकर्णपरीमुनि हृदयवयः पक्षती तीर भूमी संसारापारसिंधीः कलिकलुषतमस्तीमतौमार्कविम्बी उन्मी- रामायण मानसप्रचारिका बा। लितपुण्यपुंजमललितलेलोचनेचश्रुतीनां कामरामेतितव समिहक- लयतांसंतसज्जनानाम् ॥ १ (पुनः ) जगत्केहितहेतु गमनाम विमल विधुजो चंद्रमा वो विमल पूषण नाम सूर्य हैं जैसे सूर्य अपनी किरण करिजलवर्षते हैं तब अनेक औषधी उपजती हैं वो चंद्रमा अपने किरण करि औषधिन कोपोषते हैं पर ये सूर्यचंद्रमा समलहैं काहेते कि पोषण शोषण दोनोहैं वो रकाररूपसूर्य वोमकाररूपचंद्रवि मल हैं कि रकार सूर्य अनेक गुणनको उत्पत्ति करतहैं वो मकार चंद्रपोषण करतहै फेरि शोषत नाहीं दिनदिन पोषतहैताते विमलहै १५ ॥ स्वादतोषसम सुगतिसुधाके कमठशेषसमधरवसुधाके १६ ॥ टी० पुनःरामनामकैसोहै कि सुगतिरूप सुधाजो अमृत तिसके स्वाद वो तोषरूपहै जैसे अमृतमें स्वाद वो तोषप्तार है नाम जहां स्वाद तोष है तवन अमृतकहावतहै जोकही स्वादबहुतन हैतहांस्वाद तौहै परतोषनहीं तैसे सुंदरिगतिमें रामनामसारहै कि जहां रामनामहै तहई सुंदरि गतिहै रकाररूपस्वाद वो मकाररूप तोषनाम जैसे अमृतभोजन करनेसे दूसरी चीज खानेको मन नहीं फेरिदूप्तरेदिनके उपाइनहीं तैसेरामनाम कहते सुगतिके हेतु फेरि दूसरेकीसाधनरूप स्वाद वो अपर उपाइरूप तृष्णासे पूर्णहोइ जातहै पुनःरामनामकैतोहै कि कमठ शेष समधर्मरूप वसुधाके धारण करने में समर्थ है अथवावसुधैके कमठ शेष समधाहै रकाररूप कमठ मकार रूप शेष जैलेकमठशेषके आधारहैतसेरकारमकारके आधारहै१६ जनमन मंजुकंजमधुकरसे जीहयशोमतिहरिहलधरसे १७ टी० । पुनः रामनामकैसोहै किजनजोहैं भगवत्दासअथवा सर्व प्राणी तिनकामन मंजुकंज नामकमल है तिप्तके आनन्ददेवको दोऊअक्षर कैसे हैं कि मधु नाम जल. वो कर नाम सूर्य है इहां जो मधु कर भवर का अर्थ किया जाइ तौ भवर आपु तो सुखीरहत है पर कमलको खेदकारी है तैसे रामनामनहीं है राम नाम तो जननके मनको आनन्दकारी है रकार जलरूप उत्पत्ति करतहै मकार सूर्यरूप पोषण करत है मधुको जलनाम अनेकार्थमेंलिखाहै ॥ मधुजल मधुपय मधुसुधा मधुसूदन गोविंद॥वो कर नाम सूर्यके किरणका सो सूर्यका गुणहै तो गुणगुणी अभेद है इहां गुण करि गुणोको ग्रहणभयो पुनः श्रीरामनाम कैसोहै कि जिदारूप यशोदा को अानंदनेको हरि जो श्रीकृष्णचन्द्र वो हलधर जो बलभद्रजी तिनके रामायण मानसप्रचारिका बा० । समानहै अभिप्राय कि जैसे श्रीयशोदा जी दिन राति हलधर के लाल पालनमें लगीरहैं वो हरि हलधर करिकै जातिकी अहोरिनी सो ब्रह्मादि कनकरि पूजनीयभई तैसे जो जीभ रातिदिन रामनाम में लगी सो है तौ चमड़ी पर यह भी ब्रह्मादिक करि पूजनीय होती है राम नाम के प्रभावले १७॥ एकछत्रकएकमुकुटमणिसबबरणनपरजोउ तुलसीरघुबरनामकेबरणबिराजतदोउ १८ टी०। श्रीगोस्वामीजी कहते हैं कि रघुबर नामके जो दोउबरण हैं सो एकजो रकार सो रेफरूपत्र वो एक जो मकार सो अनुस्वाररूप मुकुट मणिहोइकरि सब बर्णनके मायेपर शोभितहै तेतीसवर्ण अथवा छत्तीस वर्ण वो सोरह स्वर सबके माथे पर विराजमान हैं तो जोउ नाम देखो (प्रमाण महारामायणे श्लोक ) निर्वर्ण रामनामेदं केवलंचस्वराधिपम् ॥ मुकुटौछत्रसर्वेषां मकारोरेफव्यंजनम् १ ॥ १८ ॥ समुझत सरिसनामअरुनामी प्रीतिपरस्परप्रभुअनुगामी १६ टी०। युगाक्षरकी मैत्री कहि अब नाम नामी को अभेद कहते हैं कि समझतसन्ते नाम व नामीकही रूप सो सरिसनामबराबरिहै काहेते कि दोनोंकी प्रीति परस्पर है नामकी प्रीति नामोसे वो नामीकी प्रीति नाम से कैसे जैसे स्वामी सेवककी प्रीति परस्परहै जो कई कहै कि फेरिको स्वामी व को सेवक नाम स्वामी नामी सेवक की नामी स्वामी नाम सेवक तहां नाम नामोमें स्वामी सेवक नाव नहीं केवल दृष्टान्त को एक देश परस्पर प्रीति स्वामी सेवककी जैतीहै तैम नाम नामी की प्रीति है लक्ष स्वामी सेवककी प्रीतिका (पाहिनाथकांह पाहिगुसांई । भूतल परे लकुट की नाई ॥उठेगमसुनि प्रेमद्यधीरा । कहु पटकहुनिषंगधनुतीरा) ऐसे प्रसंगरामायण में ठौर टौर देखिलव १६ ॥ नामरूप दोउईशउपाधी अकथ अनादिसुसामुझिसाधी २० टी० । नामरूप दोउईगउपाधी जोऐसा अर्थकरेंकि नाम और रूपदोनों ईगजोहै ब्रह्म तिप्तमें उपाधिहै नाम जो ब्रह्म नामरूप रहित है सो देव महि गोबाह्यणके हेतु नामरूप ग्रहण करतहै ताते उपाधि है तो इसमें बहुतसे बिवादहैं परन्तु इहां यह प्रकरणे नहीं इहांती नाम नामी का रामायण मानसप्रचारिका बा। ৩ प्रकरणहै सो सुनौ कि नाम वो रूप दोनोईश जो परमात्मा तितके उप- नाम समीपअधीनाम प्राप्तिहै नामई शैके नामरूप दोनोहैं ताहोतेबरोबरि है वो नामरूप दोनोअकथहैं वो अनादि हैं जबसेनाम तवसरूप वो जबसे रूप तबसे नाम आगे पाछे कोई इस बात को सुष्ट सामुझि है जिनकी तिन साधी है अथवा नाम रूप दोउई गउपाधी नाम वो रूप दोनो ईश जो परमात्मा तिनके उपाधि है कि जो ईश्वरका नाम जपे अथवा स्व- रूप का ध्यान करे तो ईश्वर अपनो परधाम छोड़ि के चलो प्रावत यह उपाधि है पर नाम रूप दोनो अकथ अनादि हैं सुष्ट सामुझि करि साधेजातहैं यह दोनोअर्थ में नामरूपकी अभेदता तो भई परन्तु सूक्ष्मते नामरूप ते ईश कोई तीसरा पायाजातहै कि जिसके नामरूप उपाधिहैं इसहेतु तीसराअर्थ निर्विरोध करते हैं कि नाम रूप दोउ ई गनाम समर्थ है यहाँ नाम वो रूपका प्रकरण है यहां ईश तीसरापद कहनेका कुछप्रयो- जननहीं ताते ईशशब्दकाअर्थ समर्थ है कि नाम वो रूप दोनो ईशनाम समर्थ हैं व नाम रूप दोनोके बीच में उपाधी अकथ है नाम कोईनामरूप में उपाधी कहबे योग्यनहीं काहेते कि दोनो अनादि हैं यह बात को सामुझिवालौंने साधीहै नाम जिनकी सुन्दरि सामुझिहै को शिव कायभुशु गिड अगस्त्य नारद शुरुदेव इनसबने साधीहै कि नामरूप निरुपाय २० कोबड़ छोट कहतअपराधू सुनिगुण भेद समुझिहहिंसाधू २१ टी। अब जो कोईकहै कि नामरूप निरुपाधि तो हैं पर इनमें को बड़ाहै को छोटहै तापरकहते हैं कि कोबड़ा कोछोट नामनामबड़ो नामी छोट कि नामीबड़ो नामछोट सोई कहत अपराधहोत है जोकहो फेरिकुछ कहोगे तापर कहते हैं कि सुनिगुण भेद समुझिहहिं साधू हम बड़ाछोटा नहीं कहते हैं नाम वो रूपका गुण कहते हैं गुणके द्वार भेद साध समुड़ेंगे जो कहौ कौनगुण सोतो आगे चौपाइन में कहते हैं पर सूक्ष्मते इहां कहि देते हैं कि साधन अवस्थामें रूप नामकेआधीन है व प्तिद्विअवस्थामें नाम रूप एकैहै २१॥ देखिये रूप नाम आधीना रूप ज्ञान नहिं नाम विहीन। २२ टी० । अब जोकहे कि गुण नुनि भेद समझेंगे सोगुण कहते हैं कि रूप नामकेाधीनदेखिपरतहै काहेते कि नामविहीन रूपकाज्ञाननहींहोता२२ रूप विशेष नामबिनुजाने करत लगत नपरत पहिचाने २३ रामायण मानसप्रचारिका-बा। टी। देखियेतो रूप विशेषनाम साक्षात करतल में गतनान प्राति परनाम जानेबिनु पहिचान नहींपरतहै २३ ॥ सुमिरिय नाम रूप बिनुदेखे आवत हृदय सनेह विशेषे २४ टी। वो रूपदेखे बिनैनाम कोस्मरणकरै तौ रूप आप चलाआवतहै काहेते कि नामके ऊपर नामी की हृदय ते विशेष स्नेहहै ताहीते चलो श्रावतहै २४॥ नाम रूपगुणप्रकथकहानी समझत सुखदनपरतबखानी २५ टी। देखिये तो जब कहा कि साक्षात रूप प्राप्ति है परनाम बिना पहिचाननहीं वो नामके सुमिरतैरूप चलौश्रावतहै तब यह जानिपरयो कि नाम रूपसे बड़ाहै व जबकहा कि नामके ऊपर नामीकी बड़ीप्रीतिहै हृदयसे तब यह जानिपरा कि छोटके ऊपर बड़े का स्नेह होताहै ताते नामी बड़ाहै यहवातको समुझि गोस्वामीजीकहते हैं कि नाम वो रूप के गुणन की कहानी अकथ है समझते बनतहै बखानिक नहीं कहाजाइ काहेते कि कहनेमें न्यूनाधिक भासत ताहीते समुझतै सुखद है देखिये तो श्रीगोस्वामीजी नाम स्वरूप कहने में नामनामीका प्रकरण उठाये सो पहिले सरिसकहे फेरि गुणभेद कहे फेरि अकथकहानी कहि नाम नामी को अभेदकहै सो इसमें जो चमत्कारहै सो आगे शंकाकेसाथकहेंगे२५ ॥ अगुणसगुण बिचनामसुसाषी उभय प्रबोधकचतुरदुभाषी २६ टो० । यहांतक स्वरूपकहि अवअंग कहते हैं कि अगुण जो निर्गुणब्रह्म अन्तर्यामी वो सगुण जो विष्णु विराट वो सबअवतार लोसगुण ब्रह्म तिन दोनौ ब्रह्मकेबीचमें रामनाम सुन्दरसाथीहै नाम पक्षपात नहीं करते ज्यों की त्यौं कहिदेतेहैं वोदोनौ वह्म के प्रबोध करिबे में चतुर दुभाषी हैं जैसे दक्षिणदेशमें दुभाषिया होतेहैं ते उत्तरदक्षिण दोनोंदेश को वाणीपढ़ेरहते हैं जब दोनौदेशके मिलावनेकोभये तब उनकीवाणी में उनको वो उनकी वाणी में उनको समुझायकै मिलायदेतेहैं सो दुभाषी हैं व नाम चतुर दु. भाषीहै काहेते कैएकशब्दमें दोनोवनको मिलाइदेतहै कैसे कि जबकहा कि राम तब निर्गुणब्रह्म अन्तर्यामीको बोधभयौ कि रमनादाम इत्यपि सबभेरमेसोराम वो सगुणवह्मको बोधनयो कि रमक्रीड़ाधातुहै सो विष्णु विराट अवतार सबक्रीड़ाकरतेहैं ताते राम वो रघुबरकेरामकोतो साक्षात बोधभयो २६ ॥
७७ रामायण मानसप्रचारिका बा। राम नाम मणि दीपधरु जीहदेहरीद्वार तुलसीभीतरबाहिरोजौचाहसिउजियार २७ टी। श्रीगोस्वामीजी कहतेहैं कि रामनामरूप मणिदीप जीभरूपद्वार की देहरीपर धस मणिदीप कहिबे को यह भाव कि तेलदीपकसउपाधि होतहै पवन पाखीकी उपाधिहै वो मणिदीप निरुपाधि होत है कि जेहिको काम क्रोधादि पवन पाखी नहीं बुझाइसके है.॥ जो भीतरबाहर उजि- यार चाहति भीतर का उजियार चतुष्टअंत:करण समहोते हैं बाहरका उजियार दशौइन्द्री बशहोतिहै फेरि कामादि चोरन की नहीचलै अथवा इहां सगुण निर्गुण का प्रकरण है ताते ऐसा अर्थ करना कि रामनाम मणिदीप जिह्वा मुखरूपहारके देहरीपर धस जो भीतरबाहर उजियार चाहप्ति तौभीतरका उजियार निर्गुणवह्म अन्तर्यामी देविपरतहै वो वा- हरका उजियार सगुण ब्रह्मके जे चरित वेदपुराण शास्त्र संहितन में सो सब देखिपरतहैं वो स्वरूप देखिपरतहै २७ ॥ नामजीहजपि जागहियोगी बिरतिबिरंचिप्रपंचबियोगी २८ टो। श्रीगोस्वामीजी नामकास्थूल स्वरूप कहि स्थल अंगकहनेलगे कि निर्गुण सगुणदोऊ नामाधीन हैं यहअंगकहते समयदेखा कि चारिप्रकारके भक्त जोहैं ज्ञानीजिज्ञास अर्थार्थी आर्त वो पांचवा प्रेमी यह पांचौकेनामे अाधार हैं सो यहभी नामको अंगहै ताते इहां अगुण सगुण कि वीजधरि दीन आगे विस्तार पूर्वक कहेंगे बीच में पांगै भक्तन की नामाधार वृत्ति सुनहु प्रथम ज्ञानी भतकी कहतेहैं कि योगी जोहैं योगी कही अचंचल चित्तको वृत्तकी आत्मा परमात्माका योगनाम मिलाप कियाहै जिननेसो योगीते योगी नामहीको जीभतेजपि संप्ताररूप रात्री में जागतेहैं (प्रमाण) यहजगजामिनि जागहिं योगी॥ पुनः गीता॥या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्तिसंयमी ॥यस्यां जागर्ति भूतानि सानिश पश्यतो मुने॥ पुनः नाम को जीभिते जपि योगी वैराज्ञमें प्रारूढ़हवै करिविरंचिके प्रपंचतेवियोगी नामरहित हैं २८॥ ब्रह्म सुखहि अनुभवहिँअनूपा अकथअनामयनामनरूपा २६ टी।पुनः वे ये गीनामजपि बह्मसुखको अनुभव करतेहैं वोह ब्रह्मसुख कैसोहै कि अनूपहै जाकी उपमाको ककूनहींहै पुनः अकथहै नाम कहबे रामायण मानतप्रचारिका बा। में नहीं आवैहै पुनः अनामयहै मामय कही रोगषट् विकार काम क्रोध लोभ मोह मद मत्सर एतेरोग से रहित है पुनः प्राकृत नाम रूप से रहितहै २६॥ जाना चहहिं गढ़ गतिजेऊ नाम जीह जपिजानहिं तेऊ ३० टी०। अवजिजासू भक्तकी कहतेहैं कि गूढ़ गतिकोजोजानाचहै तेराम नाम जिबाते जपिक जानें गूढ़ गति कही आत्मा परमात्माकी गति बड़ीगूढ़ है ते रामैनाम के जिताते जपतेजानी जातहै शंका अंतःकरण ते जपने को न कहा जिह्वा ते जपने को कहा इस में क्या हेतु काहे की सब करतूति को अंतःकरणैसे करनेका विधान है वो ये वारवार जिह्वाते जपने को कहते हैं समाधान सुनौ सब करतति अंतःकरण से करने का विधान है वो राम नाम भी अंत:करण से जपने का विधान है परंतु अंतःकरण के जपनेसे जीवन मुक्तहोतहै भक्ति नहीं मिलत वो श्रीरामसमीपकोनहीं प्राप्तिहोत वो जिह्वा के जपे ते प्रेमापराभक्ति प्राप्ति होतिहै वो नित्य श्री सीतारामजी के समीप को प्राप्तिहोत है ताहीते वारंवारजिह्वा से जपने को कहते हैं ( प्रमाण महारामाणे श्लोक ) अंतर्नतिजेनाम जीवन्मुक्ता भवंतिते ॥ तेषांनजायतेभक्तिर्नचरामःसमीपकाः १ जिह्वयाप्यंतरेवणे रामनामजपंतिये॥ तेचप्रेमापराभक्ती नित्यंरामसमीपकाः२।३०॥ साधक नामजपहिलयलाए होहिं सिद्धअणिमादिकपाए ३१ टीच अवअर्थार्थी भक्तकी कहतेहैं कि साधक जोहैं सिद्धिन के साधने वाले ते लय लगाय के रामनाम जपहिं तौ अणिमादि आठौ सिद्धिन को पाइ करि सिद्धहोइ जाहिलय कही सहजा वृत्ति सोवत जागत उठत बैठत बोलत चलत एकरस रामनाम में लगेरहें ३१ ॥ जपहिं नामजनारतभारी मिटहिं कुसंकटहोहिंसुखारी ३२ अवार्त भक्तकी कहते हैं फिजनजो भक्तजन अथवा सर्वजन सोभारी आर्त में जो रामनामजपहितौ सर्बकुतंकट मिटिजाहिं वोसुखीहोहिं३२ ॥ राम भक्त जग चारिप्रकारा सुकृती चारिउअनघउदारा ३३ टी। अबचारिउ भक्तनको मिलाइकरि कहैहैं कि श्रीरामभक्त जगत्में चारिप्रकारकेहैं जो ऊपर कहि आयेहैं सो चारिउ सुरुती वो चारिउ अनध. वो चारिउ उदारनाम बड़ेहैं ३३ ॥
७६ रामायण मानसप्रचारिका बा। चहुं चतुरनकहँ नाम अधारा ज्ञानी प्रभुहिविशेषपियारा ३१ टी। चारिउचतुरनकेत्रीरामनामकोआधारहै चतुरकहनेकायहभावहै कि आपन सकाम तो रामजीते याचतेहैं दूसरेते नहीं याचते ताहीते चतुर परंतु चारिउ में ज्ञानी भक्त जोहै सो प्रभु जो श्रीरामचंद्र तिनको विशेष प्रिय है काहेते कि निष्कामीहै जो कही और भक्त नहीं प्रिय हैं सो नहीं प्रिय तौ सबहैं परंतु तीनिभक्त सकामीहैं जिज्ञासूअर्थार्थीबा ताते प्रिय तो हैं परसामान्य वो ज्ञानी तिष्काम है ताते विशेष प्रिय है ३४॥ वहँयुग चहंश्रुतिनामप्रभाऊ कलिविशेषनहिंआनउपाऊ ३५ टीबजोकोईकहै कि चारिउ भक्तनको गतिनामके आधारहै कलियुगे में है कि औरौ युगन में तापर कहते हैं कि चारिउ युगन में वो चारिउ वेदनमें श्रीरामनामको प्रभाव जगमगाइ रह्योहै वो रामनामको अधारहै परंतु कलि में विशेष काहेते कि और युगन में सात्विक गुणर है तातेश्वर उपाइ भी होइ सक्ते रहैं वो कलियुग जो मलकर मूल तमोगुण मय सोतिस में दूसरा उपाय नहीं होइसकत केवलनाम को प्रभावहै ताते कलिमें रामनाम छोड़ि दूसरा उपायनहीं ३५ ॥ सकल कामना हीन जे रामभक्तिरसलीन नामसुप्रेमपियूषहृदतिनहुँकियेमनमीन३६ टीचारिउ भक्तनकी कहि अब प्रेमी जो पांचवें भक्त तिनकीकहते हैं कि सकल कामनातेहीन कैकेजे श्रीरामचन्द्रको प्रेमाभक्ति रसमेंली न ढरहेहैं तिनहूं ने रामनामको जो सुष्टुप्रेम सो पियूरनाम अमृत को हद नाम कुण्ड तिसमें अपने मनको मीनकरि दियोहै ३६ ॥ अगुण सगुण दुइब्रह्मस्वरूपा अकथअगाधअनादिअनूपा ३७ टी० । अबजो पूर्व अगुण सगुणकाबीज बोये हैं सो विस्तारकरिकहते हैं कि ब्रह्मके दो स्वरूप एक निर्गुण अन्तर्यामी एक सगुणविष्णु विगटवो सब अवतार तिनमें मुख्य श्रीदशरथनन्दन स्वरूप सो ब्रह्मके दोनों स्व- रूप कैसे हैं कि अकथहैं कोई कथिकै पारनहीं पावत तातेअकथ वोअगाध हैं जाकीथाहसे शेषमहेश नहींपावें वो अनादिजाकीआदिमध्य अन्तनहीं जानाजाइ वो अनूप जाकी उपमाको कोईनहीं ३७॥ मोरे मत बड़नाम दुहूते कियेजेहि युग निजबसनिजबूते ३८ रामायण मानसप्रचारिका बा। टी । पर श्रीगोस्वामी जी कहते हैं कि मोरे मतमें तो नाम निर्गुण सगुण दोनोंते बड़ोहै काहे कि जेहि नामने अपने बूतकही अपने बलते दोनोंको बस कियोहै ३८॥ प्रौढ़सुजनजनजानहिंजनकी कहँउँप्रतीतिप्रीतिरुचिमनकी ३६ टी। अब जोकोई कहै कि क्या व्यास बाल्मीकि अगस्त्य जैमिनि शांडिल्य गौतम पराशर इन सबते तुम्हार न्यारा मतहै तापर कहतेहैंकि नहीं प्रौढ़ सुजन जनजेहैं ब्यासादि ते जनजो हूँ मैं सो तिसकी जानतेहैं क्या जानतेहैं कि जो मैं अपनेमनकी प्रीति वो प्रतीति वो रुचि कहतहीं कि रामनाम अगुण सगुण ते वड़ो है सो समस्त प्रवीणन को मतहै यह जानते हैं ३६॥ एक दारु गत देखियेएकू पावक सम युग ब्रह्म विवेकू ४० टी। अब जौने रीतिसे अगुण सगुण ते रामनाम बड़ो है सो कहते कि युग ब्रह्म जो निर्गुण सगुण तिनका विवेक पावक सम है कि जैले एक पावक दासकही काष्ट तिप्तमें गतनाम प्राप्ति है वो एक प्रत्यक्ष देखि परतहै तैसे निर्गुण ब्रह्म सर्व में व्यापक है गुप्त वो सगुण ब्रह्म प्रत्यक्ष देखि परत है ४०॥ उभय अगम युग सुगम नामते कहउं नामबड़ब्रह्मरामते ४१ टी०। परन्तु उभयनाम दूनौ अगम, जानिबेको फेरि दूनौ रामनाम ते सुगमहै ताहीते ब्रह्म जो निर्गुण वो रामजोसगुण तिनते श्रीराम नाम को बड़ो कहतहौं ४१॥ व्यापक एक ब्रह्म अबिनाशो सत चेतन घनानंदराशी १२ टी० । ब्यापक एक ब्रह्मकही वृहत्वो अविनाशी वो सतकही एकरस कबहू बिनसे नहीं वो चेतनजो सबको चेतन कियेहैं वो सघन आनन्द की राशि यह सात विशेषण निर्गुण ब्रह्मकेहैं ४२ ॥ असत्रभुहृदयप्रछतअविकारी सकलजीवजगदीनदुखारी ४३ टी० । सो ऐसो सातो विशेषण के युक्त प्रभु समर्थ अविकारी सबके हृदयमें अछतनाम रहते वोसकल जीवजगमेदीन दुखारी हैरहेहैं काइते कि ऐसे ब्रह्मके जाने बिना ४३ ॥
रामायण मानसप्रचारिका बा। ८१ नामनिरूपणनामयतनते सोउप्रकटतजिमिमोलरतनते ४४ टी० । जो ऐसो ब्रह्म सबमें प्राप्त वो जानेविनु सब जीव दुःखीसोऊ नाम निरूपणकही नामको अर्थ समुझे अथवा नाम यतनते कही अह- निश रामनामके जपते प्रकटत नाम प्रत्यक्ष होत है तब दुष्टनिटिजातहै कैसे प्रकटत है जैसे रतनते मोल मोलकही द्रव्य रतनके परखे ते रतन को मोल प्रकटतहै अथवा रत्नको व्यापार करते करते रतन को मोल प्रकटत है तैसे रामनामको निरूपण जो अर्थ सो पारिख है वो जपनासो व्यापारहै वो मोलकही द्रव्य सो निर्गुण ब्रह्मसो प्रकटतनाम प्रत्यक्षहोत है तब जीव सुखी होतहै ४४ निर्गणतेयहिभांतिबड़नामप्रभावअपार ।। कहउँनामबड़रामतेनिजविचारअनसार ४५ ।। टी० । अब श्रीगोस्वामीजी कहतेहैं कि निर्गुण ब्रह्म ते यहीभांति राम नाम बड़ो है जो कहौ रामनामका इतनै प्रभाव है तापर कहते हैं किनाहीं नामका प्रभाव अपारहै अब जैसे गमसे नाम बड़ोहै सो अपने विचार के अनुसार कहतहौं सो सुनौ (शंका) पूर्वनाम बो नामीके प्रकरण में कहा की को बड़छोट कहत अपराध वो इहां कहते हैं कि कहो नामबड़ रामते सो यामें क्याहेत (समाधान) सुनौ इहां श्रीगोस्वामीजी श्रीराम जीके है स्वरूप दिखावा है दोनो प्रकरण में जब नामकोत्वरूप कहा तब नाम नामीको अभेदकाहा वो जब नामको अंग कहनेलगे तव कहते हैं किरामते नामबड़ोहै तहां श्रीरामजीके व स्वरूप हैं एकपर एक अवर पर- स्वरूपकवन है जवन स्वायंभुव मनु केहेतु अवतार भयोसो पर काहेते कि ज्यौंकात्यौप्रादुरभावहै वो तिनहीके नाम को बंदना करते हैं स्वरुपअंग फलकहिकरिवा अवर स्वरूपकी कौन जौन जैबिजे वो जलंधरके वो नारद के शापकेहेततीनिकल्पमें जो अवतारलो अवरकाहेते कि चतुर्भुजक्षीरसाई श्रीमन्नारायण वो बैकुण्ठवासी विष्णुमो दुभुज श्रीरामस्वरूपअवतरे यह वातको अागेविस्तार पूर्वक कहेंगे इहां सूक्ष्मते जनाये जोकहो हमकैसे जानकी दोस्वरूपदिखाये तहांलुनौ जबकहो की रघुबर को रामवंदौं वो फेरि कहाकिनामनामी समुझतमें सरिसहैं तवएक स्वरूप दिखाये वो जब कहा कि अगुण सगुणते नामबड़ा हैसो अगुणते जैसेनामबड़ाहै सोक हे जबसगुणते नामको बड़ाकहनेलगे तबकहते हैं किकहौं नाम वड़ राम रामायण मानसप्रचारिका बा। ते तहां सगुणानजोहैं तिनतेनालको बड़ाकहे सगुणरामकवन जो क्षीर- साई को बैकुण्ठवासी राम अवतार तो सगुण राम यह दूसरे स्वरूप दिखाये जो वोही राम जिनके नाम के बहना करते हैं तिन्ह रामते नाम को बढ़ाकहै लोनहींबन याने विरोध परत हैं एकतौ पूर्व नामनामी को प्लरिन कोसो दूसरे चगुण सगुशने नाम को पड़ा कहतेहैं तो प्रकरण अगुण मगुण काहे इहां वोह रामका कुछ प्रयोजन नहीं इहांती सगुणराम से बड़ाक हैं ताते दो स्वरूप सिद्धि भये॥ राम भक्त हितनरतनुधारी सहिसंकटकियसाधु सुखारी ४६ नामस प्रेम जपत अनयासा भक्त होहिं मुदगल बासा ४७ इपिहितरामसुकेतुसुताकी सहित सेनसुतकिये विवाकी ४८ सहितदोषदुखदासदुराशा दलयनामनिमिरविनिशिनाशा राम एक तिय तापस तारी नामकोटि खल कुनतिसुधारी५० भंजेउ राम आप भव चापू भवभय भंजन नाम प्रताप ५१ दंडकवनप्रभु कीन्हसुहावन जनमन अमितनामकियपावन५२ निशिचरनिकरदलेरघुनंदन नामसकलकलिकलुषनिकंदन५३ शबरी गीध सुसेवकन्हि सुगति दीन्ह रघुनाथ ॥ नाम उधारे अमित खल वेदविदितगुणगाथ ५४ राम सुकंठ विभीषण दोऊ राखे शरण जानि सबकोऊ ५५ नाम अनेक गरीब निवाजै लोक चंद वर बिरद विराज ५६ रामभालु कपिकटक बटोरा सेतुहेतु सम कीन्हन थोरा ५७ नाम लेत भवसिंधुसुखाहीं करहु विचार सुजनमनमाही ५८ राम सकुल रण रावणमारा सीयसहितनिजपुर पगुवारा ५६ राजा राम अवधरजधानी गावत गुण सुरमुनिवरवानी ६० सेवक सुमिरतनामसप्रीती बिनुश्रनप्रबलमाहदलजोतो ६१ शिरत सनेह मगनसुखअपने नामप्रसादशोचनहिसपने ६२ टी० । अबजौनेप्रकारले सगुखरामतेनामबड़ाहै सो कहते हैं परंतु इहांभी रामायण मानसप्रचारिकाबा अंधकारचमत्कारी दिखावते हैं कादिखावते हैं कि निर्गुणको नामाधीनकहि नामकोबड़ोकहे वो सगुण ते बड़ो कहते हैं नामको परि नामाधीन नहीं काहेते रामस्वरूप है वो रामनाम है ताहाते गुणकयाको तार तवहिराम ते नामको बड़ोंकहते हैं कवनगुख कृयाकीमतहित कारी दोनौंहैं राम वो नाम परि भेदकाहै कि सहि सकट को अनायास एक वो अनेक यही विधि से है दोहा ताई गुण हया का भेद जानौ इहां से हो दोहा ताई अक्षरार्थसिद्धिहै ४६॥ ब्रह्म राम ते नाम बड़ बर दायक बर दानि ।। रामचरित शत कोटि महँ लियमहेशजियजानि ६३ टो।दोहार्थ ) श्री गोस्वामीजी कहतेहैं कि यहि विधिले बल जो है अंतरयामीनिर्गुण तिनते बो राम जो लशुपतिनले त्रीरामनाम बड़ोहै वो फोरि रामनाम कैलोहे की बरदायकवरहानि नाम जितने बरदेने वाले हैं तिनहुकोबरदानी है ऐसो श्रीरामनामको अपने जियजानिक महेश जो श्रीमहादेवजी सोतोकोटि राम चरित्रोले ग्रहणकरिलीन जब लोकोटि रामायणको बाटा कीन्ह तब है अक्षर बचे तीनि भागकरले वोही आयु लैलोन्ह १३(शंका)सगुणरामसे नामबड़ाहै यह प्रकरण में चापभंगसे दंडक बनपावनकहै सो इसमेकांडक्रमभंगभयो यार्ने क्याहेतु (समाधान) सुनो यह सब तरहको चरित्र गावनेका तो कुछ काने नहीं केवल भक्तहित कारित्ववोपुरुषत्व कहनाहै तो अयोध्या कांडमें नपायेताते कांड क्रमभंग भयो जोकहौकी निषादसे चरण धुवाये वो ग्राम बातिनी गवारिनिन पर रुपाकरेचित्रकूट के कोलकिरातनको सनाथ किये यहतौ भलहितकारित्व देखिपरत है तहां सुनौ यह चरित्र श्रीप्साकेत विहारीको है जिन्ह के नाम को बन्दना करते हैं कुछ नारायण राम वो विष्णु रामको यहचरित्र नहीं है काहेते कि यह चरित्र मानसरामायण में है सो मानसरामायण त्रीसा केतबिहारी रामके चरित्रको प्रतिपाइकहै अपरग्रंथमें यहचरित्रनहींसुनि परतहै सो इहांभी श्रीगोस्वामीजी गुप्तले स्वरूप दिवाये कि अयोध्या कांड का भक्त हितकारी जो चरित्र सो नामैका है काहेते कि नामनामी अभेदहै वो जौनरामसेनामबड़ाहै तिनका चरित्र अयोध्याकांड में भक्तहित कारित्व नहीं है ताहीते कांडक्रम भंगकिये अवजो कोई कहै कि यह जो तुम कै राम कहतेही कि एक साकेतविहारीराम जो स्वायम्भुवमनुके हेत रामायण मानसप्रचारिका बा। अवतरे वो एकनारायण वो विष्णुराम जो जय विजय जलंधर नारदशाप हेतु अवतरे तो यह बात इसीग्रंथ में है कि औरकोई ग्रंथमें तहांसुनो राम है नहीं रामतो एकहैं पर क्षीरलाई वो बैकुंठवासी रामस्वरूप धरते ताते वै कहने में आवते हैं वो जो तुमनेकहा कि यह बात इसीग्रंथमें है कि औरकहू सो हमको तो इसीग्रंथका विश्वास है परंतु अपरके वोधहेतु अपर अंथका प्रमाण लिखते हैं सो सुनो ॥ शिवसंहिता में लिखा ॥ श्लोक ॥ ज्ञात्वास्वपार्षदीपातौ राक्षसोप्रबरौप्रिये । तहानारायण साक्षाद्रामरूपेण नायते १ प्रतापीराववासखाभानावसहरावण । राघवेणतदासाक्षात्साकेता दवतीर्यते २ अथ वार्तिक ॥ श्रीमहादेवजी कहते हैं कि हे प्रिये ज्ञात्वा नाम जानिकै कि स्वपार्षदो नाम अपने पार्षद जो हैं जय विजय ते जब विप्रशापते राक्षसहोतभये रावण कुम्भकर्ण तदानाम तब साक्षात्नारायण जो हैं सो श्रीरामस्वरूपढे अवतरे वो जब श्रीरामइच्छाते प्रतापी वो बलवर्यनामे रामसखा सो रावण वो कुम्भकर्ण होतभये तदानाम तब साक्षात्राघव साकेतसे अवतीर्ण होते भये अवतीर्ण नाम उतरिाये २ (पुनः) स्कन्दपुराणेनिर्वाणखंडेरामगीतामें लिखा (श्लोक ) भार्गवो यंपुरा भत्त्वास्वीचक्र नामते विधिः । विष्णर्दाशरथीभूत्वा स्वीकरोत्यधुनापुनः । संकर्षणस्ततश्चाईस्वीकरिष्यामिशास्वती एकमेवत्रिधायातं तुष्टिस्थित्यंतहे तवेर अथवार्तिक ॥ श्रीरामचन्द्रजीसेमहादेवजीकहतहैं कि श्रीरामचन्द्र येजोविधिहै बह्मा सो पूर्वभार्ग व जोह परसुराम सो परसुरामरूप हबैकरि आपका रामनामस्वीचक्रे नाम ग्रहण करतेभये पुनः विष्णुजोहै सोदाश- रथी स्वरूपढेकरि तुम्हारोनाम स्वीकारनाम ग्रहणकियेह अधुनानाम इस कालमें वो हमजोहैं सो संकर्षणनाम बलभद्रस्वरूप करि आपकानाम स्वीकरिष्यामिनाम ग्रहणकरत हैं परि एकदाईनाहीं सास्वत नामनिरंतर वारवार काहेत कि एकजोहैं आप सो उत्पत्तिपालन प्रलयके हेतु तीनि स्वरूप भयेही इस शंकाको समाधान अपनी मति माफिक लिखे ६३॥ नामप्रसाद शंभुअविनाशी साजअमंगल मंगल राशी ६४॥ टी० । अबनाम को फलकहते हैं कि नामैके प्रसादते अविनाशी शंभु जोहैं सोअमंगल साजमें मंगलकी राशि भयेहैं ६४॥ शुकसनकादिआदि मुनियोगी नामप्रसादब्रह्मसुखभोगी६५॥ टी० । शुकदेव सनकादि आदि मुनि वो योगीजेहैं ते नामैके प्रसादते बह्म सुखभोगीहैं ६५॥
८५ रामायण मानसप्रचारिका बा। नारदजानेउ नामप्रतापू जगप्रियहरिहर हरिप्रियाप६६ ॥ टी। नामके प्रतापको नारदजी जानते हैं जा नाम प्रताप जानते जगत्के प्रियजोहैं हरिहर सो हरिहरके आपुप्रियह ६६ ॥ नामजपतप्रभु कीन्हप्रसादू भक्त शिरोमणि भे प्रहलादू ६७ ।। टी०। रामनाम जपतसंत प्रभु प्रहलाद के ऊपर इतना प्रसन्न भयेकी भक्त शिरोमणि करिदीन ६७ ॥ ध्रुवसँगलानिजपेउ हरिनामू पायउ अचल अनूपमठामू ६८ हो । ध्रुव गलानि सहित नाम जपे विमाता कटु वचन कहे ता गलानि के मारे हरि नाम जपे सो नाम के प्रसाद अचल अनूपम ठाम पावत भये ६८॥ सुमिरि पवनसुत पावन नामू अपनेवश करिराखेउराम ६६ टी०। पुनः श्रीहनुमान्जू पावननाम को सुमिरिकरि श्रीरामजीको अपने वश करिलीन्ह ६६॥ अपतअजामिल गजगणिकाऊ भयेमक्तहरि नामप्रभाऊ ७० टी। अपतनाम पतित अजामिल वो गज वो गणिका हरिनाम एक उच्चारण करि मुक्तभये ७०॥ कहउँकहांलगि नामबड़ाई रामनसकहिं नामगुणगाई ७१ टी। श्रीगोस्वामीजी कहते हैं कि मैं नामका प्रभाव बड़ाई कहांतक कहौं जो श्रीरामचंद्र अपने रामनामको गुण जो कहाचाहैं तौ नहि कहि सकै काहेते न कहिसके कि अपने नामको गुण अपने मुखते कहने में संकोच होत है ताहीत नाही कहिसकते जो रामचन्द्रजी संकोचनकरें तो नामके गुणकहिसके और कोई न कहिसकै (शंका) बन्दना तौ रामनाम की करतहैं वो गजगणिका अजामिल ध्रुव ये सबतो कोई नारायणनाम कोई बासुदेव कोई हरिनामकहै हैं सो रामनाममें कैसे घटेगो(समाधान) सुनो इसबातका निराकरण इस चौपाई में है कि विधि हरिहर मयवेद प्राण सो रामनाम सबनामनको आश्माहै तौ शरीरका करतव्य आत्मामें पर्यवसान होतहै इत्यर्थः ७१ ॥
८६ रामायण मानसप्रचारिका बा। नामरामकोकल्पतरु कलिकल्याणनिवास ॥ जोसुमिरतभयभांगते तुलसीतुलसीदास ७२ टी०। (दोहार्थ)श्रीरामचन्द्रजीको नाम कलिकाल में कल्पतरूहै जिस में सर्वकल्याणको निवास है जो रामनामके सुमिरतमें जोहौं तुलसीदास सो भांगते तुलसीभये भांगसमान अपावन सो तुलसीकेसमान पावन भये ७२ ॥ चहुंयुगतीनिकालतिहुँलोका भयउनामजपिजीवविशोका ७३ टी। जो कोईकहै कि रामनाम कलिकाले में कल्पतरु है कि प्रोगे युगनमें तापर कहते हैं कि जोऐसेघोरपापरूप कलिकाल में कल्पतरूहै तो अपरयुग तो पुण्यमयहै तो क्यों न होइगो तथापिकहतेहैं सो सुनो चहु युगनाम चारिउ युगनमें वो तीनिउंकालमें वो तीनिउंलोकमें शमै नाम जापकरि जीवविशोक भयेहैं ७३ ॥ वेद पुराण संत मतएहू सकल सुकृत फल रामसनेहू ७४ टी० । बेद वो पुराण वो संत सबको मत यही है कि सब सुस्तको फल रामनाममें स्नेह होना यावत सुरूत हैं जप तप यज्ञ ज्ञान ध्यान योग समाधि वैराग्य पूजासत्संग इनसबकर फल रामनाममें स्नेहहोना७४ ॥ ध्यानप्रथमयुगमखविधिदूजे हापरपरितोषनप्रभुपजे ७५ टी० । अबजो कहाकी चारिउ युगमें नामजपि जीव विशोक भयेहैं सो जवनिरीतिले चारिउ युगमें जपतेहैं सो कहते हैं कि प्रथमयुगजो है सात युग तिसमें दश हजारवर्ष ध्यान पूर्वक नाम जपि जीव विशोक होते हैं वो दूजो युग जो है त्रेतातिसमें हजा वर्ष यज्ञपूर्वक नाम जपि जीवविशोक होतहैं वो द्वापर यु में सौवर्ष पूजा प्रभुका परितोषण है तिल पूर्वकनाम जपिजीव विगोक होतेहैं ७५ ॥ कलिकेवलमलमलमलीना पापपयोनिधिजनमनमीना ७६ टी। जब महाघोर कलिकाल आयो सो कैलोहै कि केवल मल जो पाप तिलका मूलनामजरि पुनः कैसो महामलीन तिस कलिकालनेपाप रूप पयोनिधि नाम समुद्र तामें जनजोहैं सर्वप्राणो तिनका मनमीनहोइ रहाहै तहां नतो ध्यान होइसके न यज्ञ न पूजा ७६ ॥
रामायण मानसप्रचारिका बा।
में
नामकामतरुकालकराला सुमिरतशमनसकलजगजाला ७७
टो। तहां ऐसे करालकाल में नामजो कामतरु तितके सुमिरतमात्र
सकल जगजाल शमनहोइ जाते हैं ७७॥
रामनामकलिअभिमतदाता हितपरलोकलोकपितुमाता ७८
टो। कलिमेंरामनाम अभिमतनाम बांछितफल दाताहै वो यह लोक
माता पिताकीबरोबर पालन करतहै वोपरलोक हितकारीहै ७८ ॥
नहिं कलि कर्म न भक्ति विवेकू रामनाम अवलंबन एक ७६
टी. वेदजोतीनिकांडमय है कर्मउ पालना ज्ञान लोकलि में नतो यथार्थ
कर्म होइ सके न यथार्थ भक्ति न विवेक नामज्ञान तिसमें केवलरामनाम
का अवलंबहै दूलर एको अवलंब नहीं कल्याण करिबेको कवल श्रीराम
नामसे कल्याण है ७६॥
कालनेमि कलिकपटनिधानू नामसुमतिसमरथहनुमानू ८०
टी० । यह जो कलिकाल कपटको स्थान लो कालनेमिनामे राक्षस है
तिसके नाम करिबेको रामनाम समर्थ हनुमानहैं बड़ोलुमतिमान ८० ॥
राम नाम नरकेसरी कनक कशिप कलि काल ॥
जापकजनप्रहलादजिमिपालहिंदलिसुरशाल ८१
टी०। पुन श्रीरामनामकसोहैं तिहरूपहैं वो रामनामकेजापकजन जे
हैं ते प्रहलादहैं तिनके दुःखदेधेको यहकलिकालहिरण्यकशिपुनामे दैत्य
है सो जैले नृसिंहजी सुरशालनाम देवतनको शाल देने वाला है जो हिरण्य
कशिपु तिलको दलिनाम नाशकार प्रहलादकोपाले तैसे रामनाम नृत्तिह
कलिकालरूप हिरण्यकशिपुको दलिकरि जापकजनरूप प्रहलादकी रक्षा
वो पालन करतेहैं ८१ ॥
भाव कुभाव अनखालसहूं नाम जपतमंगलदिशिदशहूँ ८२
टी। ऐसेरामनामकोभावतेजपैवाकूभावस वा अनखाइकहीरितिबाइके
वा अलसाइनाम सबसे हारिमानिक तौ तेहिकोदशौदिशामें मंगल है ८२॥
सुमिरि सो नामरामगुणगाथा करौंनाइ रघुनाथहिं माथा ८३
इतिप्रका १०॥
रामायण मानसप्रचारिका बा। टी। अब श्रीगोस्वामीजी महाराज कहते हैं कि जो ऐलोरामनामहे तितको सुनिरिकै वो श्रीरघुनाथजूको माथनवाइकै श्रीरामजी के गुणन की गाथाकरों ८३॥ यहनवदोहा नाम बंदना स्थूल प्रकरण इसके अावांतर सूक्ष्म सात प्रकरण है (तत्प्रमाण) नामबन्दना सातविहार प्रथमस्वरूप अंग असफल कहि दूजे युग अक्षर निस्तार तीजेनामीनाम सरिसकहि चौथभक्तन को अाधार पांचव अगुण सगुण ते बड़कहि छठये फल उद्धार सतयें चारित युगनामहिकोजानकि दासनिहार १ ॥ इति श्रीरामचरित्रमानसपरिचारि कायांताभिप्रायनामबन्दनानामदशमोंकैंकर्यः १० ॥ मोरि सुधा रिहिं सोसबभांती जासु कृपानहिं कृपाप्रघाती १ टी। अब इसप्रकरण में दुइदोहाताई श्रीगोस्वामी जी अपनी का- पण्यता वो स्वामी श्रीरामचन्द्र के गुण वरणन करतहैं कि जेहि रघुनाथ जीको माथनवाइ रामगुणगाथाकरतहों तो रघुनाथजी हमारी सबप्रकार ते सुधारहिंगे काहेते कि जासुरूपानाम जेहि श्रीरघुनाथजी की कृपानहीं रुपायाती नाम जिसके ऊपर कृपाहोती है तितकेऊपर कपासे परिपूर्ण नहींहोती बारम्बार कृपाहोते रहति है ऐसा नहीं कि एकबार कृपाकरे फेरिकोई चूक परै तौ न कृपाकर श्रीरघुनाथजीको तौ अलस्वभावहै कि जेहिपर कोईरीतिसे जो कृपाकरेंतो उससेवारबारचकपरतौ अवररूपाकर तैजाहिं असजानिक कि हमने कृपा नहीं करी जाते चक गयोहै। देखि येतौ सेवककी चूक अपने माथे धरिलेते हैं। ताते हमारी सब प्रकारते सुधारहिंगे १॥ रामसु स्वामि कुसेवकमोसे निजदिशि देखिदयानिधिपोसे २ टी। श्रीगोस्वामीजी महाराज कहते हैं। कि श्री रामजी ऐसे सुष्ट स्वामीहैं कि हमारे सरीखे कुसेवकनको अपनी दिशि देखिकै पोपे नाम पोषण कीन्ह है । काहेते कि दयानिधिहैं २॥ लोकहु वेद सुसाहिबरीती बिनय सुनत पहि चानत प्रीती ३ टीजो कोई कहैकी कुसेवक का पोषण कैसे बने तापर कहतेहैं कि यह बात लोकहु में पाई जातिहै वो वेदहू में कि सुसाहिब जोहैं तिनकर यह रीतिहै की विनय सुनतै प्रीतिको पहिचान लेतेहैं ३ ।। - रामायण मानसप्रचारिका बा० । गनी गरीब ग्राम नर नागर पण्डित मढ़ मलीन उजागर ४ टोजोकही कि किसकी विनय सुनिप्रीति पहिचानते हैं सोसुनौ गनी कही गनती वाल धनी वो गरीब वो ग्राम कही गवार वो नरनागर कही चतुरनर वोपण्डित वोमूर्ख वोमलीन कही कुल मलीनक्रिया मलीन वो उजागर कही कुलीन क्रिया मान ४ ॥ शुकविकुफबिनिजमति अनुहारी पहिसराहतसबनरनारी ५ टी० । वोशुकवि वो कुकबि एते दश अपनी अपनी मतिकी अनुहारि सबनर नारि अपने राजाको सराहना करते हैं ५॥ साधु सुजान सुसील नृपाला ईस अंसभव परमकृपाला टी० । सो नृपाल नामराजा जो ईश्वर के अंत ते भवनाम उत्पन्न सो कैलोहैं कि साधुनाम समीचीन परोपकारीहै वो बड़ो सुजानहै वो सुसील हैवो परम कृपालुहै ६ ॥ सुनिसनमानहिसवहिसुवानी भनितभक्तिमतिगतिपहिचानी७ टी०। एजोचारिगुणगजामहेसोयहीगुणन से सबकीविनय सुनिक अपीन सुष्टवाणी से सबका सन्मान करतहैं जो पूर्व दश कहियेह सोउनहीं मैं किसू की भनितदार किसूकी भक्तिद्वार किसूको मतिद्वार किसूकी गति द्वार ढेकरिअपने में प्रोति पहिचान सन्मानत हैं किसकी भनित किसकी भक्ति किसकीमति किप्तकी गतितहासुनी सकवि पंडित की भनितवोगनी नागरकीभक्तिवो उजागर की मति वो गरीब व गवार मूर्खमलीन कुकवि इनपांच की गति तहां सुकवि वो पंडित अच्छी कविताई (श्लोक) बनाइ राजाकी सेवा करते हैं यह भनितहै वो गनी जो धनवान तो धनदेइकरि वो नरनागर जो चतुर सो चतुराई से राजाको देशकोशको कार्यकरि सेवा करतहै सो भक्ति वो उजागर जो कुलवान् क्रियावान सोराजाको उत्तममति लिखाइकरि सेवा करतहै यह मति वो गरीबादि पांचजोहैं सो अपनी गतिजो दशासो निवेदनकरि राजाकी सेवाकरते हैं यह गतिहै तहां दश जोहैं सो चारि क्रियासे राजाको सेवाकरतेहैं वो राजामें जो चारिगुण हैं सो एक एक गुणले एक एक क्रियाको पालतहै कौनगुणते कौन क्रियाको पालतहै तहां सुनौ सुजान गुणस्ते भनित क्रियाको वो साधुगुणसे भक्ति क्रिया वो भीलगुणसे मतिक्रिया वो कृपालु गुणले गति क्रिया ७ ॥
रामायण मानसप्रचारिका बा। यहप्राकृत महिपाल सुभाऊ जानशिरोमणि कोशलराउ ८ टी। देखिये तो इतना स्वभाव प्राकृत महिपालन में है तोजानशिरो- मणि कोशल राउ में नजाने कितना स्वभाव होइगो जो प्रारूत राजा प्रारूतीके चारि गुणसे गरोबादिका पालन पोषणकरतेहैं कछ जाननहीं है जान जिलको अपनेवरूपका ज्ञान होइ तो बिनाकहे सबकेमनकोजान लेतहैं तो कौशलगऊ महाराजतौ जानको कहै जानजोहैं ब्रह्मा शिवादि तिनहू के शिशरोमथिहैं तो हमसरीखे कुसेवकनका क्योंन पालन पोषण करेंगे जरूर करेंगे काहेते कि श्रीरामचन्द्र महाराज के राज्य में गनीकोहै अष्टलोकपाल वो नागर सरस्वती गणेश वोपण्डित वृहस्पति वो उजा- गर ब्रह्मा अपने दशौपुत्रनके सहित वो सुक शुकविशुक्र व्याप्त वाल्मीक वो गरीबादि पांच गोस्वामी जी कहते हैं कि हम सरीखे जिन को कछु आवतनहीं केवल श्रीरामचन्द्र महाराजैकी तिहै तो श्रीरामचन्द्रहमारा सबकारले पालन पोषणकरेंगे ८॥ रीझत राम सनेह निसोते कोजग मंद मलिन मति मोते। टी० । अबजो कोई कहै कि श्रीरामचन्द्र तो निसोत स्नेहसे रीझते हैं तब पालन पोषण करते हैं तुमतौ मतिमन्द वो मलीनही निर्मल तैलवत् धारतो सनेह है नहीं कैसेपोषण करेंगे तापरकहते हैं कि यद्यपि श्रीराम- चन्द्र निलोतकही निर्मल तैलवत् धारस्नेहसे रीझते हैं वो यद्यपि हमरे बरोबरि मलिन मतिमंद कोई नहीं ॥ शठ सेवक की प्रीतिरुचि रखिहहिं रामकृपालु ॥ उपलकियेजलजानजेहि सचिवसुमतिकपिभालु १० टी० । तदपि शठ सेवक जोमहू तेहिकी प्रीतिवो सचि श्री रामचन्द्र दाखहिंगे काहेते कि रूपालु हैं ऊपर प्रारूत राजा को दृष्टांत देकरि श्री रामचन्द्र को जान शिरोमणिश्व गुण कहे अब रूपालुत्व गुण कह- तेहैं जो कही कपालुता कहां देखे तो सुनौ जे श्री रामचन्द्र उपल जो पत्थर जड़लिलको जल जान नाम नौकाकरवो वानरभालुको सुमतिमान सचिवनाम मन्त्रीकिये ऐसे कृपालु हैं १० ॥ हौहंकहावतसबकहत रामसहतउपहास ॥ साहेब सीतानाथ से सेवकतुलसीदास११ रामायण मानसप्रचारिका बा। टी। अब अपने में श्रीरामचन्द्रकी कृपालुता दिखावते हैं कि देखिये तो जो हम से कोई पूछत है कि तुम को हौ तौ में कहत हों कि हम श्रीरामजीके दास हैं तथा औरभी सबकोउ कहतहलो येतौबड़ी उपहास श्रीरामजीसहिलेते हैं कौन उपहासकी लाहित लीलानाथकी जाकी सेवा काई के अधिकारी ब्रह्मा विष्णु शिव सनकादि नारद शुरुदेव सूर्य इन्द्र चंद्र वृहस्पति एते सब तेहिसीतानाथ को सेवक तुलसीदास इह बड़ो उपहासहै सो रामजी सहते हैं काहेते कपालु हैं ११ ॥ अतिबडिमोरिढिठाईखोरी सुनिअघनरकहुंनाकसिकोरी १२ टी। येतीबड़ी मेरीढिठाई की खोरि जो दोष सो सुनिकरि अध जो पाप वो नरक सोहमसे नाक सिकोरत भये अब यह नाकलिकोपयौ कि यह मेरो संबंधी पापी कैसो रामदास कहावनेलगो है देखिलहिंगे काहे ते कि ऐसे पापीको क्या श्रीरामजी अंगीकार करते हैं नहीं करते ताते देखिलेहिंगे वो नरक यह नाम लिकोम्यो की यहतौ मेरो अधिकारी है रामदास कहावने लग्यो देखिलेहिंगे १२ ॥ समुझिसहमिमोहिअपडरअपने सोसुधिरामकीननहिंसपने१३ टी। श्रीगोस्वामीजीकहते हैं कि अधवोनरककानाकसिकोरनासमझिके हम अपने अपडरसे सहमिनाम डरगये कि जो श्रीरामजीहमारी डिठाई को खोरी को ख्याल करें तो हम क्या करेंगे परंतु सो सुधि नाम जो हमारीढिठाई कीखोरी सो श्रीरामजी सपने में सुधि नहींकीन सपनेनाम भूलिहु के कि यह बड़ो ढीठ है हमारी सेवकाई के योग्यतो है नहीं दो सेवक कहावने लगा ऐसी सुधि नहींकीन हमको अंगीकार कीन्ह १३ सुनिअवलोकिसुचितचखुचाही भक्तिमोरिमतिस्वामिसराही १४ टी० । अबजो कोई कहै कि भलातुमकैसेजान्यौ कि हमारी ढिठाई की सुधि श्रीरामजी नहीं करे हमको अंगीकार किये लापर कहते हैं किसुनि नाम संतगुरु महात्मन से सुना तथा अवलोकि नाम वेद शास्न पुराण स्मृति में अवलोका फेरि सुचित चखुचाही नाम सुन्दर चित्तरूप चखु नाम नेत्रले चाहीनाम देखे नाम विचारे तबकादेविपरचौकीमोरी मति माफिकजो मोरेमें भक्तिहै सो स्वामी जोश्रीरामचन्द्र तिनकी सराहीमई है वोह कौन भक्तिहै जो तुममें है तो सुनौ महू कहावत यह जो भक्ति ॥
१२ रामायण मानसप्रचारिका बा। है सो श्रीरामचन्द्रकी सराहीहै रामचन्द्रकहते हैं कि जीव एकबार कैसहू कहै कि हम तुम्हारे हैं तो हम उसकी सब प्रकारते रक्षाकरते हैं यहबात को हम संत गुरुसे सुने तथा वेदादिमें अवलोके वो अपने सुन्दरचित्त से विचारि निश्चजाने जो कही स्वामीकहां सराहीहै तो सुनो श्री मद्रामा- यणवाल्मीकीय में कहाहै ॥ श्लोक ॥ सरुदेवप्रपन्नायतवास्मीतिचजायते॥ अभयंसर्वभूतभ्योददाम्येतत्वूर्तमान १ ॥ ऐलप्रसंग अनेक ठौर हैं १४ ॥ कहत नसाइ होय हियनीकी रीझतरामजानिजनजीकी १५ टी। गोस्वामीजी कहते हैं कि कहत करतकै नसाइउजाइ परिनी की जोहिये में होइ नीकी क्या कि हम श्रीरामजीके हैं यह नीफीजो हिय में होइ तौ श्रीरामजी हियेकीनीकी जो है उसीपर रीझते हैं काहेकि जन के जीकी जानते हैं १५॥ रहति न प्रभु चितचूककियेकी करतसुरतिसवारहियेकी १६ टी० । अबजो कोई कहै कि भला एकबारके कहे रामरीझ जाते हैं तो कोई चूकपरे परखीझउ जाते होइंगे तापर कहतेहैं कि रहति न प्रभु वित चक किये कि जो एकबार प्रभुका भया सो बहि से करतकरत जो चकिउजाइ तो प्रभु अपने चित्त में नहीं लावतेहैं वोह जो एकबार कहा कि हम आपके हैं सो श्रीरामजी सो सौवार उलीको देखते हैं वोसुरति करते रहते हैं उसकी चूककी ओर नहीं देखते हैं इसका उदाहरण मागे तीनि चौपाई एक दोहामें कहते हैं तो सुनौ १६ ॥ जेहिअधबधेउव्याधजिमिवाली फिरिसुकंठसोइकोनकुचाली१७ टी। देखियेतो जौनेपापसे वालीको व्याधा इवमारे कौने पाप बंध वधरति कहि कियौ वचन निरुतरबालि सो वहीपापको सुधीव कियेतबे श्रीरामइतनउनकहे कि तुमका कियो काहेते सुप्रीव शरणभये हैं १७ ॥ सोइकरतूतिविभीषणकेरी सपनेहुसोनरामहियहेरी १८ टो० पुनः वही करतूति विभीषण किये कि अगम्यागमन ज्येष्ठ भ्राता की पत्नी माताके तुल्य है सो सुग्रीव विभीषण दोऊ गमन किये सो इस अपराधको श्रीरामजी सपने नाम भूलिहू के अपने हृदय में नहीं देखें नाम नहीं लाये १८॥
रामायण मानसप्रचारिका वा। ८३ तेहि भरतहिभेटतसनमाने राजसभारघुराजबखाने १६ टी. सुग्रीव विभीषण के पाप के बोरीतौ को देखत है और उलटाइ- तना सत्कार करे कि जब भरतजी से रघुनाथजी मिलनेलगे तब भरत वसिष्ठ ऐले सुचालीके सामनेते सुग्रीव विभीषणको सन्मान किये कि ये हमारे बड़े उत्तम सेवकहैं वो राज सभा में श्रीरघुनाथजी सुश्रीव विभीषणको वखान किये १६॥ प्रभुतरुतरकपिडारपर तेकियेापुसमान ।। तुलसीकहूं न रामसे साहिवशीलनिधान २० टी० पुनः देखिये प्रभु जिसतरु के नीचे बैठे तहां वानर ऊपर डार पर बैठे इतनीबड़ी चूक कि स्वामी नीचे वो सेवक ऊपर बैठे सो तिन वानरनको अपने समानकिये का जब श्रीअयोध्या जीमें आयेतब अपना स्वरूपसबकोदेतेभये (प्रमाण) हनुमदादि सबवानरबीरा । घरे मनोहर मनुज शरीरा ॥ तो मनोहर मन जो राघव हैं सो श्रीराघवजी के समान सब होतेभये गो स्वामीजी कहते हैं कि श्रीरामचन्द्रजीके समानसाहिब कहून शीलके निधान काहेको वानरन की चकके बोर दृष्टीनकरेकेबल उनके हिये की सुरति कर तेरहे जो सब छोडिकै शरणभये हैं वो श्रीराम चन्द्र कहेभी हैं कि जो एक बार हमारी शरण आया सो उससे चूकभी जाइ तो हम त्याग नहीं करते (प्रमाण ) वाल्मीकीय रामायये ॥ श्लोक ॥ मित्र भावे न संप्राप्य नत्य जेयं कथंचन ॥ दोषोयद्यपितस्य स्यात् सतामेत दगरहितं १ । २० ॥ रामनिकाईरावरी है सबहीको नीक जो यह साँचीहै सदा तोनीकोतुलसीक २१ टी अबश्री गोस्वामीजी कहते हैं कि जो राम रावरी निकाई सब को नीक है वो सदा सांची है तौ तुलसीको नीकैनीक है २१॥ यहि विधिनिजजुणदोषकहि सबहिबहुरि शिरनाइ । बरणोरघुबरविसदयश सुनिकलिकलुषनसाइ २२ इतिएकादशप्रकरणम् ११॥
रामायण मानसप्रचारिका बा। टी० यहि विधिले अपना गुण वो दोषकहिकरि गुण कौन दोष कौन सनौ गुन हम श्रीराम जीके हैं वो दोष मलिनमति मंद कुसेवकादि जो कहै सो कहिकरि फेरि वाणी विनायकादि वी रामनामवेतपय्यत सबको शिरनवाइकरि श्रीरामचन्द्र को विशद यश वरणौ जो सुनिकरि कलि के कलुष जो पाप सो नसाइ यह बंदनाकी दूसरी आवृत्ति है इतिअथवा ॥ यहि विधि निजगण दोषकहि निज शब्दको द्वै जगह अर्थ है सो केले की यहि बिधि नाम जैसे ऊपरकहि आय सो निज नाम हमरे स्वामीजी श्री रामतिनकर गुण वो निज नाम अपना दोष कहि अपरपूर्ववत् २२ ॥ इतिश्रीरामचरित्रमानसप्रचारिकायां ग्रंथकार निजकार्पण्यता वो स्वामी श्रीरामचन्द्र गुणवर्णनोनामएकादशककर्यः ११ ॥ यागबलिकजो कथा सुहाई भरद्वाजनिवरहि सुनाई १ टी० अबत्री गोस्वामीजी श्रीमन्मानस रामायण की परंपराकहते हैं कि जौनिकथा शोभायमान श्रीयाज्ञवल्क्य जी भरद्वाज मुनि जी श्रेष्ठ तिनको सुनाई है १॥ कहिहोंसोइसंबादबखानी सुनहुसकलसज्जनसुखमानी २ टी० सोइ संबाद हम बखानिक कहते हैं तिसकोप्तकल सज्जनसुख 'निकै सुनहु २॥ शंभु कीनयह चरितसुहावा बहुरिकृपाकरिउमहिसुनावा ३ टी० जो कहौ कि यहरामचरित्र मानसकहां से भया है तो सुनौ यह मानत शोभाय नान पूर्वही में शंभु जो महादेव सो कोन बहुरि कपा करि कोईकाल में उमाजो पार्वती तिनको सुनावाहै ३ ॥ सोशिवकाकभुशुण्डिहिदीन्हा रामभक्ति अधिकारीचीन्हा ४ टोल फेरि सोई शिवजी कोई काल में लोमसमनि के द्वार अपने आशीर्वाद की परीक्षा लेइ करिकै काकभुशुण्डिजी को देते भये श्रीराम भक्तिके अधिकारीजानिकै ॥ तेहिसनयागबलिकमनिपावा तिनमुनिभरद्वाजप्रतिगावा ५ टी । तेहिसननाम तेही काकभुशुण्डि से कोई कालमें श्रीयाज्ञवल्क्य मुनि पावाहै ते याज्ञवल्क्य जी भरद्वाज मुनि की प्रति कहते भये ५ ॥
१५ रामायण मानसप्रचारिका बा। ते श्रोता बकता समशीला समदरशी जानहिं हरि लीला टीते श्रोता बक्ता याज्ञवल्क्य वो भाद्वाज समशील हैं नामबरो बरिहै शील दोनौ मुनिन को फेरि कलेंहैं श्रोतावक्ता समदी हैं वो हरि तरह से जानते हैं ६॥ जानहिं तीनिकालनिजज्ञाना करत लगतामलकसमाना ७ टी० । पुनः दोनौ श्रोता बक्ता कैसेहैं की अपनेज्ञानते तीनिउँकाल को जानते हैं भूत भविष्य वर्तमान कैसदेखते हैं जैसे हाथ में आवरा का फल लेइ तो सब देखिपरत है तैसे ७॥ औरोजे हरिभक्त सुजाना कहहिंसुनहिसमुझहिंविधिनाना ८ टो। जब श्रीयाज्ञवल्क्यजी भरद्वाज प्रति श्रीरामचत्रि मानसकहा तव लोकमें ख्यातभया काहेते की जब प्रयाग में याज्ञवल्क्यजी भरद्वाज मुनिसेकहा तव वहाँपर अनेकमुनिरहैं तिनसबसुना उन्ह औरन्ह से कहा इसीरीतिसे जेसुजानहरिभक्त हैं तापसमेंकहतेसुनतेहैं अनेकविधिसे ८॥ मैंपुनिनिज गुरुसनसुनी कथासोशूकरखेत समझीन हितसवालपनतब अतिरहेउअचेत : टी। अब जो कोई पूछ की भला तुमकहांपायोहै तापरकहते हैं की पुनः वहीकथा जो धभुकीन्ह फेरि काकभशुडिहि दीन तिन्हसे याज्ञव- स्क्यपायेते भरद्वाजप्रतिगाये सो कथा कहू से हमारेगुरूजी को प्राप्तिभई सो हम अपनेगुरूजी से सुना कहां सुना सूकरखेत नाम वागहक्षेत्र जो श्रीअयोध्याजी से पश्चिमभागमें श्रीसरयू घाघराकोसंगमहै तहांपर अथवा सूकरनाम जो सुष्टुवस्तुकोकर सोकोहै संतसंग सो सत्मंग क्षेत्रमें अपने गुरू लेसुनी परंतु समझो नहीं तस जस श्रीरामचरित्र मानसको स्वरूप काहेते की तव वाल्य अवस्था अति अचेतरहउँ ॥ श्रोता बकता ज्ञान निधि कथा राम कीगढ़ १० टी। श्रीरामकथा जो अतिगूढ़ है नाम छिपाइमान तिसके समुझिवे को श्रोता वो वक्ता जब दोनौज्ञानकै निधिनाम समुद्रहों हित व यथार्थ समुझिपरतहै सो हमारेगुरूजी तौ ज्ञानकेसमुदरहैं परंतु मैं जो जड़जीव कलिमलसेवसित वो विशेषमूढ़ सो कैसे समुझौं १० ॥ Dahe.
रह्यौं तदपि । ६६ रामायण मानसप्रचारिका बा। तदपिकही गुरुवारहिवारा समुझिपरीकछुमतिअनुसारा ११ टी। यद्यपि मैं जड़जीव कलिमलग्रसित विशेष हमारेगुरूजी जो ज्ञानकेप्तागर वो परमदयाल सो वारंवारकहे तव अपनी मतिके अनुसार कछु समुझिपरी यामें यह अभिप्रायहै की शिष्य जोकैसड मूढ़होइ वो गुरू जो यथार्थ तत्त्ववेत्ताहोंहिं वो दयालु तौ वारवार उपदेश करि शिष्यको वोधकारिदेहिं ११ ॥ भाषा वंध कर बमैं सोई मोरे मन प्रबोध जेहि होई १२ टी० । जो हम अपनेगुरूसेसुना सो उसकोभाषा बंधकरेंगे जातेहमारे मनकोप्रवोधहोइ संका भला गुरूके कहेते प्रबोध न भया जाते कहते हैं की हम भाषाबंधकरेंगे तब हमको प्रवोधहोइ तौ इनकाभाषा करनागुरू के कहनेसे श्रेष्ठभया सो यामें दूषनपरतहै सो क्या हेतु समाधान सुनौ यामें दूषण नही काहेते की श्रीगोसाई जी अस नही कहा की गुरूजी के कहनेसे नही समुझिपरेउ हम भाषाकरें तव समुझिपरे येतौकहते हैं की जो हप्न गुरूजी से सुना वारंवार सो समुझिपरा उसको हम भाषा करें जाते गुरूकी कही बस्तु भूलि न जाइ वो और कोउ सुनै समु.तब हमारे मनमें प्रकर्ष करिक बोधहोइ कि जो हमारे गुरूजीकहा सो हम को फलितभया हमारा कल्याण भया वो और कभी कल्याण होगा तब हमारे गुरुजीको परमानन्द होइगो काहे कि गुरूकी कही जो शिष्य धारणकरतो गुरूको विशेष आनन्द होतहै याहीहेतुकहे १२ ॥ जस कछु बुधिविवेक बलमेरे तसकहिहैं। हियहरिकेप्रे १३ इतिहादशप्रकरणम् १२॥ टी। अब जो कोई कहै कि भला जो मानत महादेवजी कोन वो काकभुशुण्डिहि दीन्ह तिन्ह ले याज्ञवल्क्यमुनिपायेतेभरद्वाज प्रतिगायवो वहीतुम अपनेगुरूसेसुन्यो सो मानप्त सबकहोगे तापरकहतेहैं किसमस्त मानस कहनेकी किसूको समर्थनहीं जसकछु हमरे बुद्धि वो विवेक का बलहै तप्त हियेके हरिकीप्रेरणासे कहूगोहि येकेहरि अन्तर्यामी (अथवा) क्षीरसाई जिनको पूर्वहृदय में धाम करायाहै सो अब बोरामयश गावनेमें सहाइकरेंगे (अथवा) हरिनामहनुमानजी गोस्वामीजीके इष्टहैं सोइष्टको ६७ रामायण मानसप्रचारिका बा० ! सबकोई हृदय में राखतहै तो उनहीकोकहा (अथवा) त्री राम हरि को कहा काहेते कि पूर्वहों कहि आयेहैं कि मोरि सुधारहि सो सब भांती तिनहीको कहा १३॥ इतित्रीरामचरितमानसपरिचारिकायांत्रीमन्मानस रामायणपरम्परावर्णनंनामहादशककर्यः १२ निज संदेह मोह भ्रमहरनी करों कथा भवसरितातरनी १ टी। अबश्री गोस्वामीजी मानस महाहम कहतेहैं पचालतीनि तिर- पन विशेषण कहिकरि तिसमेंपच्चीस विशेषण स्त्रीलिंग करिबो अवाइस विशेषण पुल्लिंग करि कहतेहैं कियह जोमै कथाकरतहौं सोकैतीहै कि निजनाम हमारे संदेह वो मोह वो भमकी हरने वाली है १ (पुनः) भव सरिताकेतरणीनाम नौकारूपहै २ । १ बुधविश्रामसकलननरंजनि रामकथा कलिकलुखविभंजनि २ टो० । (पुनः) बुधजोहैं पण्डित सदसद्विवेकी तिनको विश्राम स्थली है ३ (पुनः) सर्वजन जो प्राणी तिनको रंजनिनाम आनन्द देने वाली है ? (पुनः) श्रीराम कथा कैसी है कि कलि के कलुष जो पाप तिन को विशेष भंजनि है ५॥२॥ रामकथा कलि पन्नगभरनी पुनिबिबेक पावक कहँअरनी ३ टी० । (पुनः) रामकथाकैलीहै कलिरूप पन्नग नाम सर्पताको भरणी नाम मयूरी है (प्रमाणं) भरणीमयूर पत्नीयात् (इतिमेदनीकोसे) पनि विवेकरूपपावकजोअग्नि तिलकोउत्पत्तिकरनेको अरनीनामलकड़ी है।३ रामकथा कलिका मद गाई सुजन सजीवनि मरि सोहाई ४ टी०। (पुनः) रामकथा कैसीहै कलिमें कामधेनु गऊ है ८ (पुनः) सुष्ट जननके सजीवनिकी सुहावनीजरिहै । ॥ सोइवसुधातलसुधातरंगिनि भवभंजनि भूमभेक भुअंगिनि ५ टी० । (पुनः) सोई रामकथा व सुधातल नाम पृथ्वी तामसुधा नाम अमृतकी तरंगिनीनाम नदीरूपहै १० (पुनः भवभय भंजनि है ११ (पुनः) भूमरूप भेक जो मिठुका ताकोभुगिनि नामसर्पिणीहै १२ । ५ साधुविवुधकुलहितगिरिनंदिनिद आप 00 रामायणमानसप्रचारिका वा। भूपतिविचारके कुंभजलोभ उदधिअपारके १८ टी० ।(पुनः)विचाररूप राजाके सचिवनाम मंत्री वो सुंदर भटनाम सि- पाही हैं १० पुनः लोभरूप अपार समुद्रके सोखिबको कुंभजनाम अग- स्ति रूप हैं ११ । १८॥ कामकोह कलिमलकरिगनके केहरिसावकजनमनबनके १६ टी० । (पुनः)कामक्रोध वो कलिमलजो पाप सो करि नाम हाथीन के गण,तिनके नालकरिबेको सिंहबच्चारूप है हितौ बनमें रहत है राम चरितसिंह जनजो प्रानी तिन्हके मन वनके रहनेवाले हैं १२ । १८॥ अतिथिपूज्य प्रीतम पुरारिके कामदघन दारिददवारि के २० टी० । (पुनः)पुरारि जो महादेव तिन्हको अतिथीकेबरोबरि प्रीतम वो पूज्य १३ पुनः दारिद्ररूप दवारीके शांति करिबेको कामद धननाम मेघ है मंत्रमहामणि विषयब्यालके मेटतकठिन कुअंकभालके २१ टी०।(पुनः)विषयरूप सर्पके विष उतारिबेको मंत्र तथा महामणि जो सर्प रहतहै सोहैं १५ पुनः भालके कठिन कुअंक मेटनेवाले हैं १६।२१॥ हरनमोहत मदिनकर करसे सेवक शालिपालजल धरसे २२ टो०। (पुनः) मोहरूप तप्तके हरनेको सूर्यके किरिणके समान हैं १७ पुनः अपने सेवकरूप शालिजो धान तिन्हको पालिवे को जलधर नाम मेघरूप हैं १८ ॥२२॥ अभिमत दानि देवतरुबरसे सेवतसुलभसुखदहरिहरसे २३ टो०। (पुनः) बांछित फल देवेको कल्पतरू रूप हैं १८ पुनः सेवतसंते कस सुलभ है जैले हरिहर २०॥ २३ ॥ शुकविशरद नभमनउड़गनसे राम भक्तजनजीवनधनसे २४ टो०। (पुनः) सुष्टु कविनका मन सरदनभनाम आकाशहै तहांके विम ल उडगणहैं २१ पुनः श्रीराम भक्तन के तौ जीवन तथा धनरूप यईहैं २२॥ २४॥ सकलसुकृतफलभरिभोगसे जगहितनिरुपधिसाधुलोगसे २५ रामायण मानसप्रचारिका बा। १०१ टी० । (पुनः) सर्व सुकृतनके फलको भूरिभोग रूप है २३ पुनः जगत् के कैसे हितकारी हैं जैलेलाधुलोग निरुपाधि हितकारी हैं २४ ॥ २५ ॥ सेवक मन मानस मरालसे पावन गंग तरंग मालसे २६ टी० । (पुनः) श्रीरामजीके सेवकन के मन मानसके मराल नाम हंस रूप हैं पुनः पावन कैसे हैं जैसे गंगाजी की तरंग की माला नाम समूह तस हैं २६॥ कुपथ कुतर्क कुचालि कलि कपट दंभ पाषण्ड ॥ दहन राम गुणग्राम जिमि ईधन अनल प्रचंड २७ टी० .। (पुनः) रामगुणमाम कैसे हैं कि कुपथ जो सत्मार्गसे भिन्न वो कुत्सित तर्कवोकुस्तितचाली वो कलिनाम कलह वो कपटनाम बनाई बात वो दंभनाम पुजाइबे हेतु सुवेष बनावना वो पाषंड नाम वेद से भिन्न प्रतिपाद्यकरै इतनेको कैसे जरावते हैं जैसे समूह ईंधनजो लकड़ी तिसको प्रचंडअनल जलावत है अनलनाम अग्निका है २७॥ राम चरित राकेश कर सरिस सुखद सब काहु ॥ सजनकुमुद चकोरचित हित विशेष बड़ लाहु २८ इतित्रयोदशप्रकरणम१३॥ टी० । (पुनः) श्रीरामचरित कै हैं जैसे चंद्रमाकी किरण सबको सुख- दाई तप्तहैं वो सज्जनको चित्त जो है सो कुमद वो चकोर है तेहि को विशेष हितकारीहैं वो उनहींको बड़ो लाभहै २८॥ इतिश्रीरामचरित मानसप्रचारिकायां श्रीमन्मानस माहात्म्यवर्णनो नामत्रयोदशकर्यः १३॥ कीन्ह प्रश्न जेहिभाँतिभवानी जेहिविधि शंकरकहाबखानी २ टी० । अबजो यह संशय है कि यह प्रसंग कहूं मिलता नाही तिसके दूरि करनेवाला प्रकरणकहते हैं कि जौनभांतिसे भवानी संशयकीन्हहै वो जौनी विधिले शंकर बखानिक कहाहै १॥ सो सब हेतु कहीं मैं गाई कथा प्रबंध बिचित्र बनाई २ १०२ रामायण मानसप्रचारिका बा। टी० । सो सवहेतु नाम कारणमैं कहौंगो गाईनाम विस्तारपूर्वक कैसे कहौंगो कि विचित्र कथाकोप्रबन्ध बनायकरि २॥ जेयह कथा सुनी नहिं होई जनि आश्चर्य करै सुनिसोई ३ टी० । अबत्रीगोस्वामीजी कहतेहैं कि जो कोऊ यहमानलकथा न सुने होइ सो सुनिकरि आश्चर्य न करै ३॥ कथाअलौकिकसुनहिंजेज्ञानी नहिंआश्चर्यकरहिंअसजानी ? टी। यहकहि अबअपने मनको निस्संदेहकरते हैं कि यह अलौकिक कथाको सुनि जे ज्ञानीते नहीं आश्चर्य करेंगे ऐसा जानिकै यामें यह अभिप्रायहै कि अज्ञानी जेहैं ते तो संदेहकरबैकरेंगे ताको तुमक्याकरोगे ज्ञानी नहीं आश्चर्य मानेंगे?॥ राम कथा के मिति जगनाहीं असप्रतीतितिन्ह केमनमाहीं ५ टी। ज्ञानीकासमुझिक संदेह नहींकरते कि श्रीरामकथाकी जगत्में मितिनाम मर्यादनहीं कि इतनैहै ऐसीप्रतीति उनज्ञानिनके मनमेंहै ५ ॥ ताना भाँति राम अवतारा रामायण शत कोटि अपारा ६ टी। काहेले ऐसीप्रतीति उन्हके मन में है कि श्रीरामजीके अवतार नाना भांतिकेहैं वो रामायण शतकोटि अपर अपारहै ६ ॥ कल्प भेद हरिचरित सुहाये नाना भाति मुनीशन गाये ७ टी। तिस अपार सुहाये हरि चरित्रमें मुनीशन नानाभांतिके कल्प भेदगायेहैं तो जहां नानाभांतिके कल्पभेद हरिकथाहै तहां एकएककल्पकी एऊकथाहै ७॥ करिंपनसंशय असजियजानी सुनियकथा सादररतिमानी ८ टी. ऐसा अपनेजीमें जानिके ज्ञानी अपने मनको तथा औरको कह- तेहैं कि संशव न करो रामकथाको मिति नहीं है सुन्दर प्रीतिपूर्वक कथा सुनिय भादर सहित ८॥ राम अनंत अनंत गुण अमिति कथा विस्तार सुनि आश्चर्य न मानिहैं जिन्हके बिमल विचार : टी। अब श्रीगोस्वामीजीकहते हैं कि श्रीरामअनन्त वो रामजीके गुण
रामायण मानसप्रचारिका बा।
१०३
अनन्त को रामकथाको अमित विस्तारहै सो सुनिकै जिनको विमलवि-
चारहै ते आश्चर्य काहेको करेंगे न करेंगे ॥
यहि विधि सबसंशयकरिदूरी शिरधरि गुरुपदपंकजधुरी १०
टी। अब श्रीगोस्वामीजी कहतेहैं कि यहि विधिसे सब संशयकोदूरि
करि वो गुस पदपंकजकी धूरि जोहै तिसको माथेपर धरि जिसको पूर्व
बंदनाकरि आयेहैं १०॥
पुनिलबहीविनवों करजोरी करतकथा जेहिलागनखोरी ११
टो। अब श्रीगोस्वामोजी बन्दनाकी तीसरीत्रावृत्तिकरि बन्दनाको
समाप्त करते हैं कि पुनः सबको हाथजोरि विनती करतही जाते कथा
करतेमें कोई खोरी न लगै ११ ॥
सादरशिवहिनाइअबमाथा वरणों विशद रामगुणगाथा १२
२४॥
टी०। पादर सहित शिवजूको माथ नवाइकै अब श्रीरामगुण गाथा
जो अति विशद है सो बरणौं नाम कहतहौं १२ ॥
इतिश्रीरामचरितमानसप्रचारिकायांतर्वसंशयनिवारणकोयह प्रसंग
कहू मिलतनहींवर्णनोनामचतुर्दशक कर्यः १४ ॥
संवत सोरह से इकतीशा करौंकथा हरिपद धरि शीशा १
टी। अब आपुजो कथा करते हैं तितकी जन्म तिथि वो जन्म भूमि
वो जन्म कुण्डली वो नाम करण वो नामार्थ वो फल सब कहते हैं कि
सोरहले इकतीत के संवत में कथा करतहौं श्रीराम जी के पदमें माथ
१
नौमी भौमवार मधुमासा अवधपुरी यह चरित प्रकाशा २
टो० । नौमी तिथि वो भौम नाम मंगल बार वो मधुनाम चैत्रमास
शुक्लपक्षं अर्थात् श्रीरामनौमी यह तिथिपत्रकहि अब भूमि कहते हैं कि
श्रीअवधपुरी में यह रामचरित्र को प्रकाश कीन्ह २ ॥
जेहिदिनरामजन्मश्रुतिगावहिं तीरथसकलतहांचलिआवहिं ३
टी । अब तिथि भूमि दोनोंकी महत्व कहते हैं कि कैसीहै अवधपुरी
रामायण मानसप्रचारिका बा। वो नौमी तिथि कि जेहि दिन रामजन्म अर्थात् श्रीरामनौमी के दिन वेद कहते हैं कि सर्वतीर्थ श्रीअयोध्याजीको आवते हैं ३ ॥ असुर नाग खग नर मुनि देवा आइकरहिं रघुनायकसेवा ? टी० । असुर नाग खग नर मनिदेवता येसकलाइके श्रीरामजी की सेवा करते हैं ४॥ जन्म महोत्सव रचहिं सुनाना करहिंरामकल कीरतिगाना ५ टी। वो सुजान जोहैं तो श्रीरामजन्न के महान उत्सव को रचना करते हैं वो रामजीको कलनाम सुन्दरि कीर्ति को गान करतेहैं ५ मज्जहिं सज्जन उन्दबहु पावन सरयू नीर ॥ जपहिराम धरिध्यानउर सुन्दरश्यामशरीर ६ टी। वो सज्जननके बहुवन्द श्रोसरयूजीकोनीर अति पावनतिसमें मज्जन नाम स्नान करते हैं वो राम श्यामसुन्दर को हृदय में ध्यान धरि षडाक्षर आदि मंत्रको जाप करते हैं ६ ॥ दरश परस अरु मज्जनपाना हरै पाप कह वेद पुराना ७ कैलीसरयूहैं की दरशकरनेसे वो परसकरने से वो मज्जन वो पानकरने सेसर्वपाप हरिलेतीहैं यह वेद पुराणकहतहैं ७ ॥ नदीपुनीत अमितमहिमाप्रति कहिनसकशारदाविमलमति ८ टी० । पुनः सरयू के तीहैं कि पुनीतनाम अति पावनि नदीहैं वो अति अमितमहिमाहै जिन्हकी जे हिमहिनाको शारदा जो सरस्वती जिन्हकी धमलमति ते नहीं कहिसकहैं ८॥ राम धामदा पुरी सुहावनि लोकसमस्तविदितजगपावनि : टी। श्री श्री अयोध्याजी कैसी हैं सो कहते हैं कि सुहावनि पुरी जो अयोध्या सो श्रीरामधामकोदेतीहैं वो सर्वलोकनमें विदितहैं वो जगतुके - पावनकरनहारी हैं शंका रामधाम तो अयोध्यै जी हैं वह राम धाम कौन जिसको अयोध्याजीदेतीहैं समाधान सुनो अयोध्याजीके के स्वरूप हैं एक नित्य एकलीला सो लीलास्वरूप प्रकृति मंडल में रहती हैं परंतु उनको प्रकृतीको विकारनहींलागत और को प्रकृतिकोविकारहरिके अपने नित्य स्वरूपको देतीहैं अथवा धामनाम स्वरूपको सो श्रीरामस्वरूपकोदेती ॥
कावा १०५ चारिखानि जगजीव अगरा अवधतजे तननाहिसंसारा १० टी० । जो कोऊहै कि उत्तमकर्मधर्म करनेहारे परुषन को राम धाम देतीहोहिंगी तापकहते हैं कि श्रीअयोध्याजीकैसी हैं कि चारिखानि जो अंडज पिंडज उमज उद्भिज तिसमें जगत् केबीच में अपारजीव परेहैं सो चारिवानिमको कोई जीव अवधनेतनुतजै तौ फेरि चारिखानिरूपसंतार तिसमें नपरे उससे कटि जाइहै तनुतजनमात्र साधनहै १० ॥ सबविधिपुरी मनोहरजानी सकलसिद्धिप्रदमंगलखानी ११ टी० । सबविधि इति-सबविधिले श्रीअयोध्यापुरीको मनोहर वो सर्व सिद्धिनकीदेनेवाली दो मंगलकी खानिजानिकै ११ ॥ विमलकथाकरकीन्हअरंभा सनतनयाहि काममद दंभा १२ टी० । विमलेति-विमलकथाको आरंभकीन जो कथासुनत्तसं ते काम मददंभ नशाइजाते हैं १२ ॥ रामचरितमानस्लयहिनामा सुनत श्रवण पाइयविभामा १३ टी। अब नामकरनकरतेहैं कि रामचरितमानस यह कथाको नामहै जेहिरामचरित मानस के अवर केतुने ते तुरित विश्रामको प्राप्तहोतहै १३ ।। मनकरिविषयअनलवनजरई होइ सखी जो यहि सरपरई १४ टी । मनरूपहाथी विषयरूपवन में अनेक कामनारूप अग्निझे जरि रह्योहै सो जो यह रामचरितमानस रमें परै तौ सुखी होइजाइ १४ ॥ रामचरितमानस मनिभावन. विरचेउ शंभु सुहावनपावन १५ टी० । अब नामको फलकहतेहैं कि रामचरितमानस जो है सो मुनि जो मननशील तिनके मनको भावन है वो बड़ो सुहावन वो पावन जानि शम्भु विरचे १५॥ त्रिविधदोषदुखदारिददावनकलिकुवालिकुलिकलुषनसावन१६ तीनि प्रकारको दोष कायिक वाचक मानसिक वो दुःख देहिक दैविक भौतिक वो दारिद जो तृष्णा इन सबको दवन करनेवालो है वो कलिकी कुचालि जो हैं कुलिनाप्न सब वो कलुष जो पाप इनको नाश करनेवालोहै १६ ॥ रचिमहेशनिजमानसराखा पायससमयशिवासनभाखा १७ टी।
रामायण मानतप्रचारिका बा।
टी० । अब नामको अर्थ कहते हैं कि यह चरित्रको रचिकै श्रीमहादेव
जी आपने हृदयमानस में राखे फेरि कोई सुन्दर समय पाइ शिवाजोहैं
पार्वतीतिन भाषतेभये १७ ॥
ताते रामचरित मानस वर धरेउनामहियहरिहरपिहर १८
टो। ताते इनका नाम रामचरितमानस श्रेष्ठ महादेवजी हृदय से
हेरि नाम 'ढिके हर्षपूर्वक धरतेभये १८॥
कहौंकथास्वइ सुषदसुहाई सादरसुनहुसुजन मनलाई १६
इतिपञ्चदशप्रकरणम् १५॥
टो। अब श्रीगोस्वामी जी महाराज कहतेहैं कि जो कथा को महा-
देवजी रचि मानसमें राखा वो समयपाइ शिवाले भाषाहै सोई सुखदायी
कथा में कहतहीतिप्सकोहेसुजनजनो बादरसहित मनलगाइकैसुनी १६॥
इतिश्रीरामचरितमानसपरिचारिकायांत्रीमन्मानसजन्मतिथिवज
न्मभूमिवजन्मकुण्डलीवोनामकरणवनामार्थफलवर्णनं
नामपञ्चदशक कर्यः १५॥
जसमानसज्यहिविधिभयो जगप्रचारज्यहिहेत ॥
अवस्वइकहौं प्रसंगसब सुमिरि उमा दृषकेतु १
टी। अब यहांले मानस प्रकरण आठ दोहा ताई पैंतिस के दोहा से
तैतालिस दोहाताई जानौ (दोहार्थ ) जसमानस नाम जैसा मानस का
स्वरूपहै वो जेहि विधि भयो नाम जौने प्रकारसे मानस भयो है वो जौने
हेतु जगत् में प्रचार भयोहै सो सब प्रसंग अब कहतहौं उमा जो पार्वती
व वृषकेतु जो महादेव तिनको सुमिरिकै १ ॥
शंभुप्रसादसुमतिहियहुलसी रामचरितमानसकवितुलसी २
टी० । अब जो पर्व कहा कि मति अतिनीचि सो बारवार के विनती
करनेसे शम्भु प्रसन्नभये सो कहते हैं कि शम्भुप्रसादनाम महादेवजी के
प्रसन्नतासे सुन्दरि मति हृदय में हुललीनाम जो नीचीरही, सो ऊंचीभई
तब श्रीरामचरित मानसको कवि तुलसीभयो २ ॥
करउ मनोहर मतिअनुहारी सुजनसुचितसुनिलेहुसुधारी २
रामायण मानसप्रचारिका बा। १०७ टी। अब श्रीगोस्वामीजी महाराज कहते हैं कि अपनी मतिके अनुः हारि मनोहर जो रामचरितमानस है तिसको करतहों तो हे सुजनों तुम्हारा जोसुन्दर चितहै तौने लेनिकै सुधारिलेहु नाम जोहमसे कहत न बने सो आप सब सुजन हैं सुवारि लहु यह गोलाई जी महाराज की कार्पण्यता है सो जानौ कि जो अप बड़े हैं सोऔरनको बड़ा मानते हैं अपनेको छोटा ३॥ सुमतिभूमि थल हृदय अगाधू वेद पुराण उदधि धनसाधू ४ टी० । अब जो दोहामें कहाकि मानस का जैसा स्वरूपहै वो जौनी विधिसे भयोहै वो जौने हेतुजगत् में प्रचारभयो सो सबकहेंगे तौन जौने प्रकार सेभयोहै सो कहते हैं कि श्रीमहादेवजी जौने प्रकारले रामचरित को अपने मानस में भरघरे सोतो महादेवजी जान परिहमरे इहां जैसे भयोहै सो कहतही तितको हे नुजनों चित्तल गाइकै सुनौ अव तुल्यताव- यवरूपकालंकार करि कहते हैं जैसे किंपुरुषखंड में मानसरहै तहांप्रथम भूमिहै तैसे इहां सुन्दरमति जो बुद्धि सो भूमिहै इहां सर्व धारणत्वगुण लेयकरि सुमति की वो भूमिको तुल्यताभई उहां अगाधथलनाम कुंड है जिसमें जल थंभतहै इहां हृदय अगाधयल है अगाध कही गहिरा हृदय चारिहैं मन बुद्धि चित्त अहंकार सो इहां बुद्धिदय जानों और कोई इहां शंका न करो कि बुद्धितौ भूमिके रूपकमें कहि आयेहैं अबथलकेरूपकमें बुद्धिको फेरि कहना कै सेबनै तहांबुद्धि आठप्रकारको है (प्रमाणवाल्मीकी यरामायणे) समुद्र के किनारे हनुमान जी कहाकि अंगद आठौबद्धिकरिके युक्तहैं तहां टीकाकार पाठौबुद्धिका स्वरूपलिया (श्लोक) शुश्रूषात्रवणं चैवग्रहणधारणतथा॥ ऊहापोहार्थविज्ञानंतत्वज्ञानंचधीगुणाः १ सो भूमिके साथ ग्रहण बुद्धिवो थलके साथधारण बुद्धि जानौ इति उहां समुद्र तहां से मेघजल लेइकरि बर्षतेहैं इहांवेद पुराण सो समुद्र हैं वो साधुजो सो मेघहैं इहांताधु को मेघ कहा तहां जैसे समुद्र में खारा वो मीठा जल मिश्रितभराहै और फिलको समर्थनहीं कि वारा वो मीठाको विलगकरे सबकेहाथ खारा जललगत है उहांपर एकमेवहीकी शक्ति है कि खारा में से मीछाजल निकाप्तिकै सर्वत्र वर्षते हैं तैलेवेद पुराण में कर्मकांड ज्ञान- कांड उपासनाकांड मिलाहै सो और सबके हाथ कर्मज्ञान लगत है सो खाराजलहै वो उपासना मीठाजलहै सो एक साधुही उसमेंसे निकाप्ति सकतेहैं यह समताहै साधु वो मेघकी ४ ॥
१०८ मानसप्रचारिका वरषहिं राम सुयश बरवारी मधुर मनोहर मंगल कारी ५ टी० । उहां मेघ समुद्रसे बरनाम श्रेष्ठ जललैकरि वर्षते हैं सो जल कैलोहै मधुरनाममिष्टहै वो मनोहरनाम स्वच्छ निर्मलहै वो मंगलकारी नामरोगहारकहै यह जब मेयके मुखले जलकुट्योतब का गुणक हैं जल भूमिमे परेगा तब दूसरोगुण कहेंगे भूमिकेयोगसे तैले इहालाधु श्रीगम- चन्द्रजी को सुन्दर यमरूप वरवारि वर्षतेहैं सुन्दर बनाइ कै कहना सोई वर्षनाहै सो रामयश वरवारि कैतोहै मधुरमनोहर मंगलकारीहै ५॥ लीलासगुणजोकहहिवखानी सोइ स्वच्छता करैमल हानी ६ टी०। अब जो कोई कहै कि जल में तो मधुर मनोहर मंगलकारी प्रत्यक्षहै तैले रामसुयश जलकेसाथ मधुरत्ववो मनोहरत्ववो मंगलकारित्व क्याहै सो कहतेहैं कि रामसुयशमें जो सगुण लीला वखानिक कहते हैं स्वई स्वच्छतानाम निर्जलता सो मनोहरहै वो सर्वमल जो मैलतिनको हानिकरहै जो कहौ कि राम यम वो सगुण लीला हमजाना चाहते हैं तो सुनों जैसे जलकेसाथ जलकी निर्मलता वो मधुरता वो निरोगता है तैलेशमसुयशके साथ सगुणलीला वो प्रेमभक्तिहै तहांसुयशकाहै कि जब कहाकि बोराम बड़ेउदार हैं शीलमानहैं वाग्मी, धैर्यमान् हैं दीनदयालु हैं गरीबनिवाज हैं पतितपावन हैं अधमोद्धारणहैं अशरण शरण हैं सुन्दर हैं ऐले अनंत यशवेदकहतेहैं सो जलहै वो जबत्रीरामजी अवतार लेइकरि लीलाकरें तबसबको प्रत्यक्ष दिखाइदिये जबथहलीला बरखानिकैकहने लगे तवयह जो मैलरहा कि कोजाने रामजीएतेगुणहैं किनहींसोहानि भई मनस्वच्छ भयो रामजी के यश में प्रीतिभई यह रामयश जल की मनोहरताहै ६॥ प्रेम भक्ति जो वरणि न जाई सोइ मधुरता सो शीतलताई ७ दी। अमिष्टता वो प्रोतलता जो मंगलमय तितकोकहतेहैं कि श्री शमयशने जो प्रेमलक्षणा स्वाभाविक है सोई मधुरता वो शीतलताहै वह प्रेमलक्षणाको वर्णन नहीं होताताहै काहेते कि वह दशामात्रहै कहने में नहीं चाहे जैले मिष्टवस्तु के खानेसे नुखद होइ जातहै तैसे प्रेमके होने से बोलचंद है जातहै यह मधर वो प्रेमकी तुल्यता भई वो प्रेमके साथ द्वैगुणदिये मधुरता वो शीतलता सो प्रेममें तो अनन्त गुणहैं परन्तु ये द्व रामायण मानतप्रचारिका बा। १०६ गुण मुख्यहैं ताते दिये जो जल में मंगलकारीनिरोगताकहे सो रामयश में प्रेम सोई मंगलकारी है काहे कि काम क्रोधादि जोरोगहैं तिनको हरिके शीतलकरिदेइ हैं सोई मंगलमय भयो यह रामसुयश जल जब बेदपुराण समुद्रले लेइकरि साधुरूपमेषके मुखसेछब्योहै तबके गुणकहेहैं जबबुद्धि रूप भूमि में परेगो तब फेरिबुद्दिके योगसे गुण कहेंगे जब कवितारूप नहीं चलेगी तब कविताके योगसे फेरि गुण कहेंगे वहीरामसुयशके गुण तीनि ठौर तीनियोगसे कहेंगे साधु मेघमें बुद्धि भूमि कविता नदीने ७॥ सो जलसुकृत शालिहित होई राम भक्त जन जीवन सोई ८ टी० जलवो रामसुयश दोनोंका स्वरूपकहि अवफेरिरूपककहते हैं कि जैले उहां मेघजल बर्षतेहैं तब गालि जोधान तिसको हितकारी होतहै नाम वृद्धि होतहै तब सर्वजननको जीवन होत है तैसे इहां श्रीगमयश जोजलहै सो सुरुतरूप शालिको हितकारीहै नाम रामयशको पाइ सुकृत बढ़तहै तब श्रीराम भक्तजनको जीवनहोत है सोई सुकृतरूपशालिहैं ८॥ मेधामहिगत सोजलपावन सकिलिश्रवणमगुवलेउसुहावन : टी० । उहांमेघबर्षे तबभूनिमें पस्यो तब इधर उधरले सकिलिकै एक रास्ता होइकरि थल जोमानसर तहांको चल्यो इहां साधुरूपमेघ रामयश रूप जलबर्षे तब सो पावन जलमेधा जो ग्रहणद्धि जो पूर्वकहिआये हैं कि सुमति भूमि तिसमें गतनाम प्राप्तभयो तब सकिलिक अवणबुद्धिके मगुनाम रास्ता बैंकरि सुहावन रामय ग हृदय जो धारण बुद्धिरूप थल तहांको चल्यो॥ भयोसुमानससुथलथिराना सुपदशीतरुचि चारुचिराना १० टी। जैसे उहां जलसमिटिकै सुन्दर मानसरूप सुन्दर थलभस्यो भ रेकै थिर भयो तब चिगना भयो तब उसमें पूर्वगुण प्राप्त भयो कौन गुण वासनाम दीप्तमान जो पूर्वमनोहर कहाहै वो रुचिनाम स्वादमान जो पूर्व मधुर कहाहै वो शीतनामनिरोग जो पूर्वमंगलकारी कहाहै यहतीनि मिलिकै सुखद होतभये चिराना काकोकही जो तिसालाको बस्तुहोइ हां जलमें तिसाला क्याहै कि बर्षाऋतु, नया वो शरद ऋतुम पुराना हिमऋतु चिरानाभयो तव पूर्वगुण प्राप्तभयो तैसे इहां सुमति भूमि समिटिश्रवणमगु हृदय थल भरयो भरिकै थिरभयो फेरि चिरानाभयो व इसमेंभी पूर्वगुण प्राप्तभयो कौन गुण वही जो पूर्वकहा है कि सगुण रामायण मानसप्रचारिका बा। लीला वो प्रेमलक्षणा भक्ति सो बुद्धिरूपभूमिके योगते कछु मलिनहोइ गयोरहै सो जब स्थितताको प्राप्तभयो फेरि चिराना भयो तब निर्मल जैतो रह्यो तेसो होतभयो जो कहौ कि जलप्लाथ तो वर्षा शरदऋतु में हिमऋतुमें नया पुराना चिराना कहेउ तैसे रामयशके साथ नवा पुगना चिराना क्याहै सो सुनो प्रथान जब साधुनके मुख से रामयश सगुणलीला सहित सुन्यो उपमा उपमेय दृष्टांत द्राष्टांत पूर्वक तब बुद्धिके योगसे सब बात ग्रहण भई जो ऊपरकी बातहै सोई मलीनताहै यह बर्षाऋतु है तानेनवा जैले वर्षामें जलभमिकी उपाधिले मलिन रहतहै जब शरद पायो तब सब धूरिमाटी छूटी तैसे जब प्रथम रामयश ग्रहण होत तब राजसी तामसी बुद्धि के योगकरिके ऊपरकी बातसे मलिन रहतहै जब मनन कियो तब जितनीऊपरकी बातेरहीं राजसी तामसीके योगसे सोकूटिगई यह शरदऋतु केतुल्य पुरानाहै वो जवनिदिध्यासनाम अच्छी तरहसे अभ्यास कियोतबजैसो रामयशमें सगुण लीला वो प्रेम लक्षणा भक्ति रूप भधर मनोहरमंगलकारी सो प्रत्यक्ष भयो यह हिमऋतु रूप चिराना है जब चिरानाभयो तब चारुनाम दीप्तलो मनोहर वो रुचिरूप स्वादसो मधुरताहै वो शीतरूप निरोग्यतो मंगलकारीहै इहांताई जौनी प्रकारसे श्रीगोस्वामीजीके हायमें मानस भयोहै लोकहे १० ॥ सुठि सुंदर संवाद वर विरचेउ बुद्धि विचारि ।। तेयहिपावन सुभगसर घाट मनोहर चारि ११ टी। अब श्रीगोस्वामीजी जैलो मानसकास्वरूप अपने हृदयमे देखि परयोहै सोकहते हैं सावय वतुल्य रूपकालंकार करिकै किजैसे उतमानस में चारिउ तरफ घाटवंध्योहै तैसे यह पावन वो सुभग नाम सुन्दर राम चरित्र मानसमें अपनी अपनी बुद्धि के विचारसे अति सुंदर वो श्रेष्ट चारिसंवाद जो घिरचेहैं सो मनोहर चारिघाट, चारिसंवाद कौनप्रथम श्रीगोसाई जीको वो संतनको दूसरो याज्ञवल्क्य वो भरद्वाज जी को तीसरो महादेव पार्वतीजीको वो चौथो काकभुशुण्डि वो गरुड़ जीर्को लक्ष संवादप्रथममें पुनिनिज गुससनसुनी( कहिहाँ सोइसंवाद बखानी॥ सुनहु सकल सज्जन सुखमानी) दूसरो कहौं युगल मुनिवर्यकरि मिलन सुभगसंवाद तीसरो कहौं सुमति अनुहारि अब उमाशंभुसंवाद चौथो कहाभुशुण्डिवखानिसुनाविहंगनायकगरुड़लो संबादउदारअबकुछ अक्षरन रामायण मानसप्रचारिका बा। की प्राशयले के वो कुछ प्रकरणको अभिप्रायलेके जो अपनी अपनी बुद्धिके बिचारसे चारिउ बक्ता विरचे हैं सोरचना कहतहौं जहां चारिघाट कहा तहां घाट नमें कुछ विचित्रता होवे करेंगी सोजो आसयश्रीगोस्वामीजीकी प्रेरणाले समुझि पस्यो सोकहतहैं। सोसुनों किजैसे लोक में प्रसिद्ध चारि घाट हैं सोएक राजघाट जहां उत्तमपुरुष नहाते हैं वो एक पंचाइती जहां सब कोई नहाते हैं वो एक पनिपट जहाँ स्त्रीगण नहाते हैं वो एक गौ घाट जहाँ लूला लँगड़ा सबपहुंचते हैं तैसे लक्षणा करिके उस मानस में जानों जोराजघाट है ति तमें उत्तमदेवता जोइंद्रादि सो स्नानपान करतेहैं वो जो पंचाइतीघाट हैं तिसमें मध्यम देवता प्रथमगण स्नानकरते हैं वो जो पनिघट झंझरीदार है सो तिसमें देवांगना स्नान पान करती हैं वो जो गौवाट है तिसमें अनेक देवबाहन वो लूले लँगड़े स्नान पान करते हैं तैसे यह रामचरित्र मानसमें जोगरिसंवाद रूपचारि घाटहैं सो प्रथम गोसाई जी को संवाद जोहै सो गौ घाटहै काहेते कि दीनतापूर्वक संवादहै लक्षदीनताको (करनचहौंरघुपति गुनगाहा । लघुमति मोरिचरि तअवगाहा। सूझनएकौअंगउपाऊ। मनअतिरंक मनोरथ राऊ ॥मतिअति नीचि ऊँचिरुचिबाकी । चहिय अमिय जगजुरेन छांछी) इत्यादिजहाँ जहाँ गोसाई जीको वचन है तहां तहां दीन अधीन तै पूर्वक है सो अति सरलहै जामेतबको निर्वाह है जे आचार विचारसे रहितहैं तपशुहैं वो जे सर्व कर्म धर्म से गतहैं ते लूला लँगरा हैं तेउदीन अधीन घाटद्वे के राम चरित्र मानसमें स्नान पान तुल्य श्रवण धारण करते हैं यहदीनता रूप गौ घाट है वोदूसरो याज्ञवल्क्य संवाद जोहै सो पंचायतीघाटहै काहेते कर्मपूर्वक संबादहै कैसे जानी सो सुनौ कर्मकांड को येही स्वरूप है कि प्रथम गौरी गणेश महेशको मंगलकरे सो याज्ञवल्क्यजी किये कब जब प्रथम कहाकि (तात सुनहु सादर मन लाई ॥ कहौं रामकी कथा सु. हाई )यह संकल्प करिफेरि कर्म पूर्वक कहनेलगे तहां शिव महत्व शक्ति महत्त्व गणेशमहत्व कहि तब श्रीराम कथा कहे सूक्ष्मते तीनिउं को लक्ष प्रथम शिवमहत्व (शंकरजगतवंद्यजगदीश ॥सुरनरमुनिसबनावहिंसीसा) पुनः( सत्र सुर विष्णु बिरंचि समेता गधे जहांशिव कृपा निकेता) प्रथक प्रथक तिन्ह कीन्ह प्रशंसा ॥ भये प्रसन्न चन्द्रअवतंसा)इत्यादिवचनसे जानो लक्षशक्ति महत्व को ( मयना सत्यसुनहु ममबानी । जगदंवा तव सुताभवानी )प्रजाअनादि शक्तिअविनाशिनि । सदाशंभुअर्धेग निवासिनि।।
रामायण मानसप्रचारिका बा। जगभवपालनि लयका रिनि ॥ निजइच्छा लीला बपुधारिनि ) इत्यादि वचनले जानो वो लक्षगणेशमहत्त्व को (मुनि अनुशासन गणपतिहि पूजे शंभभवानि ॥कोउनिसंशयकरैजनि सुर अनादिजियजानि)इत्यादिवचन सेजानो यह तीनिउंको महत्व कहिबेने याज्ञवल्क्य जीको यह अभिप्राय है कि आपुतौ श्रीसीतारामज के परमउपासक हैं परि मनि मननशील परम दयालुसो विचारेको शैवोपासक वो शक्तिउपासक वो गणेशोपा- सकजो, तिन्ह को रामचरित्र मानस में स्नान करावना चाहिये ताते कर्म पूर्वक तीनिउंको महत्व कहे जाते अपने अपने इष्टको महत्व सुनिकरि सबइस ग्रंथ में लगेंगे तब रामचरित्र मानतको प्राप्त होंहिँ गे अपनेअपने इष्ट उपासना के सहित राम चरित्र मानप्त में स्नान पान तुल्य श्रवण धारण करते हैं यह कर्मपूर्वक रामचरितमानस को पंचाइती घाट है वो तीसरो शिवजको संवादहै सोगजघाट है काहेतेकि शिवजूको प्रथम वचन ज्ञानपूर्वक है लक्ष ( झुठोसत्य जाहिबिनु जाने । जिमि भुजंग बिनुरजुपहि- चाने ॥ जेहि जानेजगजाइहेराई । जागेयथा स्वपन भमजाई। जातुसत्य तातेजड़माया ॥ भाससत्यइवमोहसहया)(दोहा)रजतसीपमहंभासजिमि यथा भानुकर बारि ॥ यदपि सृषा तिहुकाल सो भमनसकेकोउटारि ॥ (चौपाई)इहि विधिजगह रि प्राश्रितरहई । यदपि असत्यदेतदुःख अहई ॥ ज्योसपनेसिरकाटे कोई । बिनुजागे न दूरिदुःखहोई ॥ जानुरूपानसभूम मिटि जाई गिरिजासोकपालुरघुराई ॥ इत्यादिवचनज्ञानमययहजानोज्ञान का यही स्वरूपहै कि परमेश्वरसत्य वो जगत्काप्रपंच असत्य ज्ञानमें घाट जामें उत्तम पुरुष तुल्य ज्ञानी सो स्नान पान तुल्य श्रवण धारण करते हैं यह ज्ञान पूर्वक राम चरित मानसको राजघाट है वो चौथो काकभुशुं- डि जीको संवादहै सो पनिघटहै काहेतेकि काकभुशुंडि जी को प्रथमबचन उपासनामें है लक्ष(प्रथमहिअतिअनुरागभवानी॥ रामचरित लरकहेसिबखा नी) वो जबमहिमाकहनेलगेतवऊ प्रथम उपासना में कहेकि राम काम शतकोटि सुभगतनु इत्यादि बचनसे जाना जोकहो कि उपासना की वो पनिघटकी तुल्यता कैसे तो सुनौ जैसे पनिघट झंझरीदार परदा सहित बनताहै तिसमें स्त्रीगणस्नान करती हैं ओ अपनी सखिनमें बोलती बत- लातीहैं अपरको नहीं देखतीहैं स्पष्ट झंझरी के तनक देखती हैं अपने अपनेपतिसे काम राखतीहैं तैले उपासनामें वचन पनिघट है जहां श्री सीतारामजी के स्वरूपानन्य उपासक जे अपनेउपासकनमें अपनेस्वामी रामायण मानस प्रचारिका बा। ११३ की वार्ता करतेहैं अपरको जे रामचरित सुनेतो कहैं और कितूको वार्ता न कहैं जोकोईको तौतनिकतुनिलेहिं ऐसीउपासनामयव वन काकभुशुण्डि कोहै कि जहांकोई मालाचणभो नहीं केवल स्वामीको वार्ता कहताते पनिघटतुल्यहै जिसद्वार कै करि सबस्वरूपानन्य उपासक जोहैं सो स्त्रोतुल्य हैं काहेतेकि स्त्रीकी वो स्वरूपानन्य उपासककी एक क्रियाहै सोई स्नान पान तुल्यश्रवण धारण करते हैं अब जो कोई कहै कि एक मानसरमहादेव कीन्हतिसही को सब कहा है सोउनमें ज्ञानउपासना कर्मदीनता कहांते प्रायोउहांती जोपकको सिद्धांत तोतयकोचाही तहाँ लुनौसबकोसिद्धांत एक रामचरित मानस है वो चारिउ वक्ता श्रीसीतारानज के परम उपा- सकहैं परंतु रामचरित मानस चारिभांतिके घाटबँधे हैं काहेते कि जो शिवजी मानस कीन्ह है सो अति तुर्गमहै (प्रमाणं ) यत्पूर्वप्रभुनारूतंसुक विनाश्रीशम्भुनादुर्गमम् । सो सर्व जीवन के प्रात हेतु चारिघाट चारि तरहके बांधिहीन जाते ज्ञानीजे हैं तेज्ञानघाट ढकरि रामयश जलकोप्राप्त होहिं वो उपासक जो हैं सो उपासना घाट करि रामयश जलको प्राप्त होहिं वो पंचाइती भक्त जे तकर्म घाट करि रामयशजलको प्राप्त होहि व कर्म धर्मके पंगुजे हैं ते दीनवाट है करि राम यश जलको प्राप्त होहिं देखिये तो एक श्रीराम चरित मानस के आश्रित ज्ञान उपासना कर्म दीनता सब है जो कहोकि इतनी व्याख्या कौन अक्षरसे कियोहै तो सुनो जो दोहामें लिवाहै कि ! शुठिनुन्दर संवादबरविरचेउवुद्धिविचार । जो अपनी अपनी बुद्धि के विचारसे संबाद विरचेहैं तो उसमें कुछथै लक्षणता है तबतौ चारिघाट कहे हैं नाहीतौ घाट को कौन नेमहै यहमें अपनी मति अनुरूप कह्यों है आगे जो सबसंतकह सोसही ११ ॥ सप्तप्रवंध सुभगसोपाना ज्ञाननयन निरखतमनमाना १२ टी। अब सीढिरको रचनाकहते हैं कि जैलेउसमानत में सोपाननाम सीढ़ीबँधी हैं तामे कच जलके आवांतर हैं कछूबाहरहे तैसे इहारामचन्ति मानसमें सप्त प्रबंधनाम सातकांड जोहैं सोईसीढ़ी हैं सोसरकेबाहरभीतर बँधिरहीहैं वो सातौ सीदिनमें रामयग जलभरिरह्योहै परिपूर्ण वोइनहीं सीढ़िन पर बैंकरि कवितारूप नदी चलेगी वो सीढ़ी नीचेसे बंधत हैं तेहि में नीचे ऊपर बड़ी होतीहैं बीच में छोटी तैसेइहांभीहै बालकांडसे प्रारंभ वो उत्तर समाप्त सो बाल अयोध्या व नीचे की बड़ी सीढ़ी हैं वो लंका उत्तर है ऊपर की बड़ी सीढ़ी हैं वो पारण्य किष्किंधा सुन्दर १११ की छोटी पेरलियां हैं आगे जो कोईकहै कि वे सीढ़ी कैसे बँधीहैं किसब में जल परिपूर्ण है वो सीढ़ी देखि परती हैं तो सुनौ ग्रंथकार प्रापैलिखते हैं कि उन सीढिनके यह नेत्रले देखे मनमानतहै वो यह सीढ़िनकोजब जानके नेत्रसे देखें तब जैसो सीढिनको स्वरूपहै सो समुझि के मनमा- नतहै ककू यह नेत्रनसे नहीं देविपरत है जैसे लोक में प्रसिद्ध है कि नीचे की सीढ़ीवापि करिके ऊपरकीसीढ़ी बँधतीहै तैसे इहां कांडनमें एककांड का फल श्रुति वो दूसरेकांडका मंगलाचरण सो दावनिहै वो कांडन का संबंध मिलावना सोई जोड़है कि जैसे बालकांड में कहा कि । बायराम व्याहिघरजबते । बलेअनंदनवधातबतबते॥ वो अयोध्याकांडमें कहा कि जबतेरामव्याहिघराये । नितनवमंगलमोदबधाये। यह दूनोकांडकासंबंध सोई जोड़ है बीचमें जोकहा सोसीढ़िनकीदाबनिहै यही प्रकार से सब कांडनमें जानो अयोध्या कहा कि । भरतचरितकरिनेम तुलसीजेसादर सुनहिं । वोआरण्यके आदि में कहा कि । प्ररणभरतप्रीतिमैगाई। वोआरण्यके अन्तमैकहाकि । घिरनाइबारहिवारचरणब्रह्मपुरनारदगये। वोकिष्किंधा कांड के आदिमकहाकि।बागेचलेबहुरिरघुराई । अंत में कहा कि । कपिसेन संगसंहारिनिमिचररामसीतहिचानिहैं । त्रिलोक्यपावन सुयशसुरमुनिनार- दादिवखानिहैं।वो सुन्दरके आदिमें कहाकि । जाम्बवंतकेवचनसुहाये । वो अंतमेकहाकि । निजभवनगवनेउसिंधुश्रीरघुवीरयहमतभायऊ । यहचरित कलिमलहरण जसमतिदास तुलप्तीगायऊ ॥ वो लंकाके आदिमें कहा कि । सिंधुवचनसुनिरामसचिवबोलिप्रभुनसकहेउ । वोअंत कहाकि। प्रभुहनुमं तहिकहाबुझाई। धरि हिजरूपश्वधपुर जाईभरतहिकुगलहमारिनुनावहु । तासुकुशललैतुम्हचलिआबहु ॥ तुरितपवनसुत गवनतभयऊ । तब प्रभु भरद्वाजपहँगयऊ ॥ वो उत्तरके आदिमेकहाकि । रामविरहसागरमहँ भरत मगनमनहोत । विप्ररूपधरिपवनसुत पाइगयोजनुपोत ॥ अब इहां फल वो मंगलाचरणके उपरांत येदोहालंका के अंतका वो एक दोहा उत्तर के आदिका ये दो सीढ़ीकेदाबनिमें हैं काहेकिउत्तरकांड ऊपरकी सीढ़ी है सो बड़ी है ज्यादादाबनि चाहतीहै १२ ॥ रघुपतिमहिमाअगुणवाधा वरनवसोइवरवारिअगाधा १३ टी। जैसे उस मानसकोजल गंभीर जो है सो अगाध ताकोसूचतहै तैसे इहां अगुण कही गुणातीत वो भवाधा कही वाधारहित वो वरनाम श्रेष्ठ वो नवनामनवीन जो रघुपतिकीमहिमा सो रामयशजलकी अगाध. ॥
रामायण मानसप्रचारिका बा. ११५ तासूचैहै महिमाकाकहा है महत्त्वतितकालय सुनो । नेतिने तिजेहियेद निरूपा । निजानंदनिरुपाधिअनूपा ॥ शंभु विरंचि विष्णुभगवाना । उपज हिंजातुअंशतेनाना (पुनः)देखेथिवविधिविष्णुअनेका । अमित प्रभावएक तेएका ॥ वंदतचरणकरतप्रभुलेवा (पुनः)कीन्हत विरोधतेहिदेयक । शिव विरंचिहरिजाकसेवक ॥ (पुनः)तमहिनादिख गमशकप्रयंता । नम उड़ाहिं नहिं पावहिंअंता ॥ तिमिरघुपतिमहिमाअवगाहा । तातकबहु कोउपावकि थाहा ॥ रामकामशतकोटिनुभगतन । दुर्गाकोटिअमित अरिमर्दन ॥ इहां से लेइकरि वो निरूपमन उपमाान रामलमान रामनिगमक हैं जिमि कोटिशत खद्योतरविसमकहतअतिलबुतालहैं। इहांतकलबमहिमाकावर्णन है सो महिमा रामयशजलकी अगाधताहै नाम रामयशबड़ोअगाध है कि जामें शेष महेश की बुद्धिको अवसाननहीं १३ ॥ रामसीययशसलिलसुधासम उपमावी चिविलासमनोरम १४ टी०। जैसे उस मानसकेजल में मधुरमनोहर मंगलकारी जो गुण है तिसमें पुष्टीहलादहै तैसे इस मानस के रामयश जल में सगुण लीला मनोहर वो प्रेमलक्षणा मधुरमंगलकारी जो गुण हैं तिसमें रामलीययुगल को मिलिके लीलापर्वक यश सोई सुधालम नाम पुष्ट अहलाद कारक है इहां जो सुधासमको पुष्टी ग्रहलादको अर्थ कियाहै सो यह आशयलकै कि जो मिष्ठता अर्थ करें तो मिष्ठता वर्णन होइचुकाहै वो सुधामें पुष्टता वो श्रहलादसारहै ताते ऐसो अर्थकियोहै अब गमतीयमिलित लीलायश को उदाहरणसुनौ । समैजानिगुरु प्रायसुपाई । लेनप्रसूनचलेदोउभाई ॥ इहां से लेइकरि वो जानिगौरिअनुकूल । इहां प्रयंत युगलसरकारको फूलवा- टिकामें मिलापविहार वो परस्पर चक्षु संभोग वो परस्पर कटाक्षन की तीरंदाजी सबसखिनको हासविलासमयदश दोहायहप्रसंगत्रीसीताराम जू को लीलायशहै सो यह प्रसंग इसग्रंथका सारभूतहै जिसमें श्री सी- ताराम उपासकन को पुष्टीग्रहलाद है सोई सुधासम जानो (पुनः)दूसरा उदाहरण सूक्ष्मते है आरण्यकांड में फटिकशिला की लीला (चौ०) एक वारचुनिकुसुमसुहाये । निजकरभूषणरामबनाये ॥ सीतहिं पहिरायेप्रभु सादर । बैठेफटिकशिलापरभाधर ॥ इहां रासकी लीला है ताते गुप्तकहा इत्यादि जो सीतारामजीको लीलापूर्वकयाहै सोई रामयश जलकोसुधा सम नामपुष्टी वो अहलादकारकहै सब रामभक्तनको जो सीतारामदोउन को मिलायश न होइ तो पुष्ट अलाद न होइ इत्यर्थः अरु जैसे उस ११६ रामायण मानसप्रचारिका मानस में अनेकछोटीबड़ी लहरिउठत्तीकै तैसे इसमानसमें जो छ टीबड़ी उपमाहै सोई वीचीनामलहरिहै उपमाकाकहावे मुखजनुचन्द्र है नेत्रजन कमलहै नातिकाजनक है दंतजनुदाडिमहै इत्यादि जहाँ जनमनु जानी मानौमनहुऐसापर सो उपमाहै सो तो इसमानस में बहुत है परमैंदो तीनिउदाहरणहेतुलिखतही (चौ०)अगरधूपबहुजनुअंधियारी । उचबीर मनहु असनारी ॥ भवनवेदध्वनिऋतिमृदुवानी । जनुखग मुखरसमयसुख सानी ॥ मंदिरमणिसमूह जनुताश । नृपगृह कलसलोइंदुउदारा ॥इत्यादि ऐसीजनुमनुकीवचनजहां सोई सो उपमा सोई बहुत लीलहरि हैं ११॥ पुरइनि सघन चारु चौपाई युक्तिमंजुमणि सीपिसुहाई १५ टी। अवतीनिपरिखा बांधते हैं एकतदलीन एकतदगत एकतदाश्रय सो पहिले जोमानलमेंलीन, तिनको रूपककहते हैं लीनकही जो क्षण भरि बाहिर न होइ उस में मिलारहै जैसे उसमानसमें पुरइनि फैलरही है सीपीहै उसमें मोतीहै तैसे इसमानसमें चासनाम सुन्दरि दीप्तिमान चौपाई जोहैं सोई पुरइनिहैं परिसघन हैं पुरइ नि वो चौपाईकी तुल्यता इसदेश लेकरि कहा कि जैसे पुरइनि के वोट से जल बँपा रहतहै तैसे चौपाइनके वोटसे रामयय जलनाही देखिप है केते विमुखजीवचौपाई देखे वा सुने तब कहते हैं कि यह तो भाषाहै इसको का कहना सुनना ई नहीं जानते कि इन्ह चौपाइनमें जो रामयश भराहै सो श्लोकन में कहूढूंढ़े न मिलैगो नौ जे रामयश जलकेप्यासे हैं वो रामतत्त्वके जनैयाहैं ते तो यही चौपाईके आवांतर जो रामयशहै तिल को पान करते हैं अस युक्ति जोहै सो मंजुमणि नाम मोतीहै युक्ति का कहावेहै कि जो क्रियास कर्मको छपाइदेइ (प्रमाणं भाषाभूपण अलंकारे चाईदोहा) यहैयुक्तिकीन्हे क्रिया कर्मपायेजाइँ।। इति ( उदाहरणयुक्तिको ) बहुरिगौरिकरध्यानकरे हू । भूपकिशोरदेखिकिनलेहू। (पुनः) राज्यदेनकहिदीन्हवन मोहिनशोक दुखलेश । तुमबिनभरतहिं भूपतिहिं प्रजहिप्रचंडकलेय. ॥ (पुनः) कोउ नृपहोउहमहिं काहानी । (पुनः) ममअनुरूपपुरुषजगमाहीं । देखेउँखो- जिलोकत्तिहुनाहीं ॥ तातेप्रबलगिरहेउकुमारी। मनमानाकछुतुमहिं नि- हारी ॥ (पुनः) प्रभुप्रतापबड़वानलभारी । सोखेउप्रथमपयोनिधिवारी॥ तवरिपुनारिरुदनजलधारा । भरचोपयोधिभयोतेहिखारा ॥ (पुनः) दश मुखदेखिसभाभयपाई। विहँसिवचनकहयुक्तिवनाई ॥ शिरीगिरेसंतत रामायण मानसप्रचारिका बा। ११७ शुभजाही। मुकुटखसेकसअशकुनताही ॥ इत्यादि वचन जहां होइ सो कहावै युक्ति सो इस मानसकी मोतीहै युक्तिकी वो मोतीकी कवनअंग से तुल्यता है कि जैसे मोती जल से होतीहै वो सारहीन होतीहै केवल पानीको बुल्लाहै परि बड़े मोलको होतीहै बो शोभायमान होतीहै तैसे युक्ति जोहै सो उक्तिकै होतीहै ताते सारहीनहै परि सुनत नीक लागत है ताते सुन्दरिहै वो जालेकहौ सोप्रसन्नहोतहै तातेबडेमोलकीहै सो सीपि सुहाई इहां सुहाई बुद्धिको जानना सो बुद्धि जोहै सोयुक्तिरूपमोतीकी सीपीहै इहां पूर्व जो अष्टप्रकारकी बुद्धि कहाहै सो उहाँ पोहानाम बार बार कहना सुनना यह जो बुद्धिहै लिसीमें युक्तिरहतीहै १५ ॥ छंदसोरठासुन्दरदोहा सोइबहुरंगकमल कुलसोहा१६ टी० । जैसे उसमानसमें बहुरंगके कमल फूलेहैं तैसे इस मानस में सुन्दर छन्द वो सुन्दर सोरठा वो सुंदरदोहा जोहैं सोई बहुरंगके कमल कुलहैं शोभायमान अब जो बहुरंग कमलको तुल्य छंद सोरठा दोहाको कहे तिसको रंग त्रिगुण मय जानो जो सतोगुण वाणीमें छंदादि हैं सो श्वेतरंगके कमल हैं वो जो रजोगुण वाणी है सो लालरंगके कमलहैं वो जो तमोगुण वाणीमें हैं सो श्यामरंग के कमल हैं वो जितने छंद सोरठा दोहाहै सो त्रिगुणवाणीमें हैं देखिये तो ग्रन्थकार चारिवस्तुको इसग्रंथ में नेम करिदीन है चौपाई छंद सोठा दोहा आगेऔर पिंगलसे कोऊ अन्य उक्ति युक्ति कहै तो कहा करै परंतु यहां तौ चारि को नेम है को जाने कौन पिंगलसे १६॥ अर्थअनूप सुभावसुभाषा सोइपराग मकरंद सुवासा १७ टी। जैसे उस मानसके कमलमें अपने अपने रंगमाफिक परागनाम रजहै वो मकरंदनाम रस है वो बासनाम सुगन्धहै तैसे इसमानसमें त्रि- गुणवाणीमें जो छंद सोरठा दोहारूप कमल है तामें अनूप अर्थजोहै सो परागहै जैसे पराग फल में प्रकट रहतहै तैसे अर्थ अक्षर में प्रकट रहतहै वो सुन्दर भावजोहै सो मकरंद नाम रस है जैसे रसफूलके आवांतररह- तहै तैसे भाव शब्दके भीतर रहतहै वो सुन्दर भाषा जो है देश देशकी सोसुगन्धहै जैसेसुगन्ध इधरउधरउड़तढे तैसे भाषादेशदेशकीउड़ती है१७॥ सुकृतपुंजमंजुल अलिमाला ज्ञानविरागविचार मराला१८ टो। जैसे उसमानसमें कमलनपर भवर रसलेइरहेहैं वो हंससुगन्ध ११ रामायण मानसप्रचारिका बा०। लेइरहेहैं तैसे इस मानप्तमें सुरूतकेपुंज नाम समूह सोई मंजुल नाम निर्मल अलि नाम भवरन की श्रेणी हैं सोई यह छंदादि रूप कमलन के सुन्दर भावरूप रसको ग्रहण करेंहैं यहां सुकृतकही पुण्यको पुण्य काको कही सुनौ पुण्य एकजगमेनहिंदूजा । मनकम वचन विषपद पूजा ॥ सो इस मानस ग्रन्थमें विप्रपूजन बहुतहै ठौरठौर ताते पुंज कहा वो ज्ञान वैराग्यको जो विचार सो हंस है गुणरूप दूध को ग्रहण करहै वो अवगुण जलको त्यागकरेहै यहां कमलके योगसंभवर वो हंसको तदलीनकेसाथ कहेहैं परंतु है एतद्गत १०॥ ध्वनिअवरेबकवित गुणजाती मीनमनोहरतेबहुभाती १६ टी। जैसे उस मानसमें बहुभांतिकी मीन नाम मछरीहैं तैसे इस मानसमें चारिभांतिकी कविता जोहै ध्वनिकाध्य अवरेव काव्यगुण काव्य जाति काव्यसोई बहुभांतिकी मनोहरमीनहध्वनिकाव्यकाकोकही शब्दार्थ भिन्नीध्वनिः ॥शब्दके अर्थसे कुछ बिलक्षण निकसे ताको ध्वनिकही पुनि वाहीको व्यंग्यकहीऐतेअभिप्रायकही (प्रमाणं तुलसीभूषणेदोहा) वर्णअर्थ ते अधिकजहँउपजावेकछुवात । धन्यततासोंकहतहै जाकोमतिअवदात १ तिसकोलक्ष्यापुनित्राउबयहिबेरियाकाली।अप्लकहिमनविहँसीयकाली। (पुनः ) गौतमतियगतिसुरतिकरि नहिंपरसतिपदपानि। मनविहँसेरघुवं- शमणिप्रीतिअलौकिकजानि (पुनः) रामसप्रेमकहामुनिपाहीं। कहहुनाथ हमकेहिमगजाहीं॥मुनिमनविहँसिरामसनकहहीं। सुगमसकलमगतुमकहँ अहहीं (पुनः) उमारामगुणगूढ़ पण्डितमुनिपावहिं विरति । पावहिंमोह विमूढ़ जेह रिविमुखनधर्मरतिइत्यादिवचनजहांहोइ। सोधुन्यात्मककाव्य जानौ सो इस मानसरके बड़ी मीन है सौरी पढ़िना रोहूआदि जैसे जल के भीतर रहतीहैं कोई भेदीजाने है तैसे ध्वनिशब्दन के भीतर रहती है कोई भेदी जाने है यह तुल्यता है पुनि अवरेव काव्य काको कही जाको अक्षर लवटिकै अर्थसिद्धि होइ ताको लक्ष्य ॥ रामकथा कलि विटपकुठारी (पुनः ) रामकथाकलिपन्नगभरणी (पुनि ) आगेचलेबहुरि रघुराया (पुनः) इहांहरीनिशिचरवैदेही । विप्रफिरहिंहमखोजततेही।इ- त्यादिवचनजहांहोइसोप्रवरेवकाव्य जानौ सोइस मानसरकेवासीमीन जो पुच्छमुखमिलाइकैचलती हैं (पुनः) गुणकाव्य काकोकहीजो के तीनि अक्षरको पदहोइ वो पदपदमें जमक अनुप्रास आवृत्तचलोजाइ तामें तीन भेदहैं भोज प्रसाद माधुर्य सो माधर्यगुण उपनागरिका वाणी में होतहै वो %3D रामायण मानसप्रचारिका बा। प्रसादगुण कोललावाणीमें वो अोजगुण परुषावाणी में(प्रमाणंतुलसीभूष- णे दोहा) त्रिविधिकृत्य माधुर्यगुण उपनागरिकाहोइ । मिलिप्रसाद पुनि कोमलापरुषानोजसमोइ ॥ अब उपनागरिका माधुर्यगुणकोलक्ष्य॥दोहा॥ रामचन्द्रमुख चन्द्रछवि लोचन चारुचकोर । करतपान सादरसकल प्रेम प्रमोद नथोर (पुनः) लक्ष्यकोमलाप्रसादगुणको।लागेबिटपमनोहरनाना। बरणवरण घरबेलिविताना (पुनः) भवभवविभवपराभवकारिणि । (पुनः) लक्ष्यपरुषाअोजगुणको । धिगधर्मध्वजधंधकधोरी (पुनः)काईकुमतिकेकयी केरी (पुनि) खगकाककंकण्टगाल । कटकट हिँ कठिनकराल(पुनः) धरुधरु मासमासधहमारू । इत्यादि ऐसेपद जहाँहोहिँ ताकोगुण काब्यकही सो इस मानसरकेसिधरी मोनहैं जो छोटी छोटो दश बीस इकट्ठा मिलिक चलती हैं तैले गुणकाव्य वैचारिपद मिलिके चलतहै ताते तुल्य है (पुनः) जातिकाव्य काकोकही जाको आठ दश बारह चौदह अक्षर को पदहोइ व पदको अर्थ स्पष्टहोइ व जैतो जाको रूप गुण होइ तेसो तिसमें साज वर्णनकरे (प्रमाणंतुललीभूषणे दोहा ) जाकोजैसो रूपगुणकहि येतेहिकी साज। तासो जातिस्वभावकहिवरणतसबकविराज॥ताकोलक्ष्यसुनो। मन जाहिराचीमिलिहितोइबर सहजसुन्दरसविरो। करुणानिधानसुजानगील सनेह जानतरावरो (पुनः)विद्या विनयनिपुणगुणगीला। खेलहिँ खेलसकल नृपलीला(पुनः)राजकुमारिविनयहमकरहीं।तियस्वभावकछुपूछतडरहों। स्वामिनिअविनयक्षमौहमारी। बिलगुनमानबजानिगवारी॥ कोटिमनोज लजावनिहारे । सुमुखिकहहु कोत्रहहिँ तुम्हारे (पुनः) खायउँफलमोहिं लागीभूखा । कपिस्वभावतेतोर उँसखा ॥ इत्यादि जहां ऐसापदपरै ताको जातिकाव्यकही सोइ समानसरको चेल्हवा मीन है जो चमकत चलतहै तैसे जातिकाव्य चमकतचलतहै यहतुल्यताहै इहांतक तदलीनकहे अब तद्गत कहते हैं जो भवर हंस कहेहैं तिन्हसहित १६॥ अर्थ धर्म कामादिक चारी कहब ज्ञान विज्ञान विचारी २० नवरसजपतप जोगविरागा ते सबजलचर चारुतड़ागा २१ टी० । इहां वैचौपाईको एकही अन्वय जानब कि जैसे उलमानसमें बहुतभांतिके जलचर हैं जो कोई कहे कि क्यामीन जलचरनहीं है जोमीन को जलचरसे बिला बर्ण नकरे सोलुनो मीनजोहै सो सदाजलमें लीन ररहतिहै पलभरि बाहरनहींहोइहै ताते उसकोतदलीनमेंकहे व अपरजल १२० कै रामायण मानसप्रचारिका बा। चर जोहैं सोजल में रहते हैं जब वुशीमई तब घरी घरीपहरभरिदिनभरि बाहर भी चले जाते हैं ताते तदगत से इस मानसरमें अर्थ धर्म काम मोक्ष ज्ञान विज्ञान नवरत जप तप योग विराग एते उन्नील जोबिचारि कहब सोई इस चारुतड़ागके जलचरहैं अब इनसबको बिलगबिलग स्वरूप कहते हैं मयउदाहरण के अर्थकही द्रव्य राज्यकाज हाथी घोड़ा भूषणवसन एते सबअर्थ कहावै हैं सो अर्थादि उन्नीस जो कहिआये हैं सो तो रामयश्च में स्वाभाविक है परंतु जिज्ञासू के बोध अर्थ कछु उदाह- रण कहत हौं काहे ते कि स्वामीजी कहे कि अर्थादि उन्नीस बिचारि के कहब ताते ग्रंथ में उदाहरण देत हैं सो सुनो अर्थ केहिको सिद्ध भयो है तहां सुग्रीव विभीषण को मुख्य और सबको दान में (प्रमाणं ) तेहि अवतरजोजेहि विधियावा । दीन्हभूपजोजेहि मनभावा ॥ गजर- थतुरगहेमगोहीरा । दीन्हेपनानाविधि वीरा ॥ ( पुनः ) राजदीन्ह सुग्रोवकहँचादकहँ युवराज । ( पुनः ) समिलि जाहुविभीषश्चताथा । सारेहुतिलककहेउरघुनाथा ॥ तुरतचलेकपि जुनिप्रभुवचना । कीन्होजाइ तिलककीरचना ॥ सादरसिंहासनबैठारी। तिलकलारिस्तुतिअनुसारी ॥ इत्यादिसेजानो १ अब धर्मसुनो धर्म कहीं अपनो अपनों वर्णाश्रम को कर्म वो स्त्रीके पातिव्रत. एतेकहावै धर्म लोधन काकोप्तिद्धभयो है अहल्या जूको वो ( रामराज्य में सर्वकोला ) यहिभांतितिधारीगौतमनारी बार बारहरिचरणारी । जोप्रतिमनभावासोवरपावागइपतिलोकअनन्दभरी॥ (पुनः) वर्णात्र ननि जनिजधाम निरतवेदपथलोग । चलहिं सदापावहिं सुख नहिंभवशोकनरो। ॥ इत्यादि ले जानो २ अब कामतुनो कामकही कामना किंतु कामकही स्त्री भोग सो दोनों काम केहिकेसिद्ध भये हैं तहां विश्वामित्र जनकमहाराज वो दंडकवासी मुनिनको कामनासिद्ध भयोहै वो हरगिरिजाको भोग लिद्धभयो ( लक्ष्य ) गाधि नुवनमनचिन्ताब्यापी। हरिविनमरहिं ननिश्वरपापी ॥ सो ॥ मारिअतुर द्विजनिर्भयकारी । अ- स्तुतिकरहिंदेवमुनिझारी ॥ (पुनः जनकमहाराजको ) मोहिकृतकृत्यकी न्ह दोउ भाई (पुनः ) जो सुख सुयशनुलभमोहिस्वामी ॥ (पुनः दंडक मुनिनको ) निश्चरहीनकरोंमहि भुजउठायप्रणकोन्ह । सकलमुनिनके पा अमन जाइ जाइसुखदीन ॥ (पुनः ) हरगिरिजाविहारनितनयऊ । यहि विधिविपुलकालचलिगयऊ ॥ इत्यादि प्रसंगले जानो ३ अब मोक्ष सुनो मोक्षकही शरीरादि बंधनसे छूटना ताको(लक्ष्य) असकहियोगअगिनितनु १ ६ रामायण मानसप्रचारिका बा। १२१ जारा । रामरूपाबैकुंठसिधारा ॥ (पुनः ) अविरलभक्तिमांगिया गृद्धग- यउहरिधाम । तेहि कोक्रियायथोचित निजकरकीन्हीराम ॥ (पुनः) नि इचरअधममलायतनु ताहिदीननिजधाम । गिरिजातेनरमंदमति जेनभज हिंश्रीराम ॥ (पुनः शवरी ) तजियोनपावकदेहहरिपद लीनभइ जहँनहिं फिरे ॥ दोहा ।। जातिहीनअघजन्ममहि मुक्तकीन्ह असनारि । महामंदमन सुखचहति ऐसेप्रभुहि बिसारि ॥ इत्यादि से जानो ? अब ज्ञानसुनोयहां ज्ञान कही स्व अनुभवते सर्व मानछोडिकै सबमें ब्रह्मरूप देखे (लक्ष ) ज्ञान मान जहाँएको नाहीं। देखत ब्रह्म रूप सब माही ५ अब विज्ञान सुनो विज्ञानकही विशेषज्ञान जहां ब्रह्म जोव की एकताहै ( लक्ष ) सो हमस्मिइतिवृत्तिखंडा । दीपशिश्वासोइपरमप्रचंडा ॥ (पुनः) सोतता हितोहिनहिभदा । वारिवीचइवगावहिंवेदा ॥ इत्यादि ६ अब नवरसकह तेहैं तिनको नामसुनो टंगार १ हास्य २ करुणा ३ रौद्र ४ वैभत्स्य ५ भ यानक ६ वीर ७ अद्भुत ८ शांत ६ (प्रमाणं भाषाभूषणे दोहा )बीरभया नकहास्ययुतअद्भ तकरुणाचार ॥ शांतविभत्स्य नुरौद्रयेरसपतिरसदंगार सो यह नवरसका उदाहरण एकश्लोक टंगारमाला ग्रंथका देते हैं फेरि इसथ में देंगे (श्लोक ) हंगारोजनकगृहेरघुवरादास्यकतोद्वैनस्यात् कारुण्योनु जरोदनेवरबधेरौद्रोद् ताकाककै ॥ वैभत्त्योहरिबंधनेभयकरः सोतोरणेबीरहा शांतःत्रीभुवनेश्वरोभवहरीद्रामादसोभून्नव १ (इति)। दोहा ॥ गनिटं गारअरुहास्यरस करुणारौद्रसबीर । भयविभत्स्य अद्भुतवि सद शांतिकसुभगगंभीर ॥ इति जनकपुरमें शृंगाररतको वर्णन ( लक्ष ) नारिषिलोकहिंहरपिहिय निजनिजरुचिअनुरूप ॥ जनुसोहतिगारधरि मूरतिपरमअनूप १ यह प्रकरण में तौ नवोरस वर्णन हैं परंतु एक एक को उदाहरण सबकांडनमें देते हैं अयोध्याकांड छोडिकै काहेते कि अयोध्या कांड करुणामय है ( अबहास्यरत सूर्पणखाप्रति लक्ष) ममअनुरूपपुरुष जामाहीं । देखेउवोजिलोकतिहु नाहीं ॥ तातेप्रबलगिरहिउकुमारी ॥ मनमानाककुतुमहिंनिहारी ॥ सीतहिचितइकहीप्रभवाता । बहकुमारमो रलघुभ्राता ॥ गइलक्ष्मणरिपुभगनीजानी। प्रभुविलोकिबोलमृदुवाणी । सुंदरिसुनुमै उनकरदासा । पराधीननहितोरसुपाप्ता ॥ इत्यादि । अबकरु पारसतुनो करुणाकही दूसरेके दुःखमें दुःखित होइ सो जब लक्ष्मण के शक्तिलगी तहां रघुनाथजू दिखाये ( लक्ष ) इहारामलक्ष्मणहिनिहा री। बोलेबचनमनुजअनहारी ॥ (पुनः ) प्रभुप्रलापसुनिकान विकलभये ५ १२२ रामायण मानसप्रचारिका बा। वानरसकल । आइगयेहनुमान जनुकरुणामहँवाररस ॥ इत्यादि ३ अब रौद्र कहते हैं रौद्र कही क्रोध को सो खर दूषण के बधमें ( लक्ष ) कोपेउ समर श्रीराम । चले विशिष निलित निकाम ॥ अवलोकि खरत- रतीर । मरिचले निश्चर वीर ॥ भये क्रोध तीनिउभाइ। जो भागिरण तेजाइ ॥ तेहि बधब निजहमपाणि । फिरेमरन मन महँठानि ॥ आयुध अनेक प्रकार । सम्मुख ते करहिं प्रहार ॥ रिपु परम कोपेउ जानि । प्रभु धनुष सरसंधानि॥(इत्यादि) ४ अवअद्भु तरसकहते हैं अद्भ तकहीजो कबहुन भयाहोइ सो काकभुशुंडिजी को श्रीरामजी दिखाये बाहरभी- तर (लक्ष ) सप्तावरण भेदिकरि जहलगि गतिरहिमोरि । गयउँ तहां प्रभु भुज निरखि व्याकुल भय बहोरि (पुनः भीतर) उदरमांझ सुनु अंडज राया। देखेउँ बहु ब्राह्माण्ड निकाया ॥ इत्यादि यह प्रसंग भरि अद्भुत रस जानौ ५ अब वैभत्स्यरस कहते हैं वैभत्स्यकही जहां रसा भालहोइ सो जब रघुनाथजी नागबंधन अंगीकार कीन्हतबदिखाये(लक्ष) नागपास बशभयउखरारी । स्ववश अनंत एक अविकारी ॥ रणशोभाल- गि आपुबंधायो । देखिदशा देवन भयपायो ॥ इत्यादिवचन से जानो ६ अबभयावनरससुनो भयावनकही जो कळूदेखि सुनिक भयहोइ सोसेतु बँधेपर रावणको भयमई (लक्ष ) सुनत श्रवण बारिधिबंधाना । दशमुख बोलि उठा अकुलाना ॥ बाँध्यौ जलनिधि नीरनिधि उदधि सिंधुवारीश । सत्यतोय निधिकंपतीजलधि पयोधि नदीश ॥ व्याकुलता निजसमुझिब- होरी । विहँसिचला गृहकरिमतिभोरी॥ इत्यादिसेजानो अबवीररससुनो वीररसकही जो रणमें उत्साह पूर्वकलर सो राम रावणके युद्ध में है (लक्ष) सुनि दुर्वचन कालबश जाना । बिहँसि बचन कह कृपानिधाना ॥ सत्य सत्य तव सब प्रभुताई ।जनि जल्पति दिखाउ मनुताई (पुनः रावण) जीतेहु तेभट संयुगमाहीं । सुनु तापसमैं तिन्हसम नाहीं ॥ रावण नाम जगत यश जाना । लोकपजाके बंदीखाना ॥ खरदूषण विराध तुममारा । बधेउव्याधइव बालिबिचारा ॥ निशिचर सुभट सकल संहारेहु । कुम्भ- करण घननादहिमारेहु ॥ आजुबैरसब लेउंनिबाही । जो रणभूमि भागि नहिं जाही ॥ इत्यादिलेजानो ८ अब शांत रससुनो शांतकहीजामे मोक्ष को अधिकारहोइ सो रामराज्य में सबमोक्षाधिकारी भये (लक्ष ) रामरा ज्य नभगेशनुनु सचराचरजगमाहिं । कालकर्म स्वभाव गुण कृत दुःखका- हुहिनाहिं।। (पुनः)रामभक्ति रत सबनरनारी । सकल परम पदके अधि १ रामायण मानसप्रचारिका बा। १२३ कारी ॥ इत्यादिसेजानों । इतिनवरस॥अबजपको लक्षसुनो ॥ असकहि लगे जपनहरिनामा(पुनः) जपहिंसदा रघुनायक नामा (पुनः) जीहनाम जपु लोचन नीरू (पुनः ) रामराम रघुपति जपत श्रवणनयन जलजात (पुनः ) जपौंमंत्र शिवमंदिरजाई ।। इत्यादिले जानो अब तपको लक्ष सुनो ॥ उरधरि उमा प्राणपतिचरणा । जाइ विपिन लागीतप करणा ॥ अति सुकुमारि न तनुतपयोगू । पतिपद सुमिरि तजेउसबभीगू ॥ संवत सहस मूलफल खाये । सागबाइशत वर्ष गँवाये । कछुदिन भोजनवारि बतासा। किये कठिन कछदिन उपवासा ॥ वेलपात महिपरत सुखाई। तीनि सहस संवत्तसो खाई ॥ पुनिपरि हरेउ सुखानेउपरना । उमहि नाम तब भयउ अपरना ॥ देविउमहिंतपरवीन शारोरा । ब्रह्मगिरा भइ गगनगंभीरा ॥ (पुनः) पुनि हरिहेतु करणतप लागे। वारिअहार मूल फल त्यागे (पुनः) विधिहरिहर तप देखि अपारा ॥ इत्यादि प्रसंग से जानो । अब योगकहते हैं योगकही अष्टांगयम १ नियम २ आसन ३ प्राणायाम ? प्रत्याहार ५ ध्यान ६ धारणा ७ समाधि ८ मुख्य समाधि जामें आत्माको परमात्मा विषे योजनकरना सो कहावै योग सो नारद जीकीन्ह ( लक्ष ) निरविशैल सरि विपिन विभागा। भयउ रमापतिपद अनुरागा ॥ सुमिरत हरिहि शाप गतिवाधी। सहजविमल मन लागिल- माधी ॥ इत्यादिसे जानो अब विराग कहते हैं विरागकही विगतरागः विरागः तिसको उदाहरण सुनो। जानियतबहिं जीवजगजागा । जब सब विषय विलास विरागा ॥ (पुनः) कहियतातसो परमबिरागी। तृणतम सिद्धि तीनिगुण त्यागी॥ इत्यादिसजानो अर्थादिको स्वरूप उदाहरण अपनी मतिके माफिक कहा जो कोई और कछू कहे तो सही २१ ॥ सुकृतीसाधुनामगुण गाना तेविचित्र जलविहगसमाना २२ टी। जैसे उसमानसर में जलबिहग रहतेहैं कुक्कुटादिक तैसे इस मानसरमेंसुरूतीगुणगाननाम साधुगुणगान जोहैं सोई कुक्कुटादिजलविहंग हैं विचित्र भांति भांति के अब उदाहरण सुनो (लक्ष सुकृतिन के ) हम सबसकलसरुतकीराशी । भयेजगजन्मि जनकपुरबासी ॥ जिन्ह जानकी रामछबिदेखी । कोसुकृती हमलरिस विशेषी ॥ (पुनः) केहिसुरूतो केहि घरी बसाये । धन्य पुण्यमय परमसुहाये। पुण्यपुंज मगुनिकट निवासी। तिनहिँ सराहत सरपरबासी॥ इत्यादि सकती गण गण जानो अब साध १२४ रामायण मानसप्रचारिका बा। गुणगण सुनो नारद प्रति श्री रामजीकहापुनः भरती प्रति श्रीरामजी कहा पुनः गरुड़पति श्रीकाकभुशुण्डिजीकहा(सबकालक्ष)सुनमुनि साधन के गुणकहऊं । ज्यहिते मैंउनके बशरहऊ॥(इहांसे लेइकरि वो ) सुनमुनि साधुन के गुणजेते । कहि न सकहि शारद श्रुतितेते ॥ इहांपर्यंत (पुनः) संतनके लक्षण सुनु भाता । अगणित अति पुराणविख्याता ॥ इहां से वो । सुनहु तात मायारूतगुण अरु दोष अनेक । गुणयहउभय न देखिये देखिय सो अविबेक ॥ इहाँ पर्यंत (पुनः ) परउपकारबचन मनकाया । संतसहजस्वभाव खगराया ॥ इत्यादिप्रसंगसाधुगुण गानजानो अब नाम गुणगानसुनो । ब्रह्मरामते नामबड़ बरदायक बरदानि॥ इहांनव दोहानाम गुणगान है (पुनः)यद्यपिप्रभुकेनामअनेका। अतिकह अधिकएकतेएका॥राम सकल नामनते अधिका । होउनाथअघवगगणवधिका ॥ राकारजनीभक्ति तव रामनामसोइ सोम ॥ अपरनामउडुगणविमल बसहु भक्तउर ब्योम।। (पुनः) तीरथ अमित कोटियत पावन । नामअखिलअघपुंज नसावन॥ इत्यादि प्रसंग नाम गुण गान जानो एते सब यह मानसर के विचित्र जल विहंग हैं २२॥ संतसभा चहूं दिशि अमराई श्रद्धा ऋत बसंत समगाई २३ टी। इहांतक तद्गत स्वरूप कहि अबतदाश्रय कहते हैं जोतड़ाग के बाहर उसके आश्रय हैं इहां जैसे उस मानसरके चहुओर अमराई लगीहै तैसे इस मानसरके चहुओर संतमंडली जो है सोई अमराई है इहां संतसभा चहु दिशि अमराईसेले अरुते यहि तालचतुर रखवारे तक ग्रंथसे बाहिरकी बात वर्णनहै तातेग्रंथकोउदाहरणनहीं कहते कहूं कहूप्रसंग पाइकै प्रमाण देहिंगे जैसे उहाँ अमराई में वसंतऋतु है तैसे इहां संतसभा अमराई में श्रद्धाजो है सोई बसंत ऋतु समगाई है जैसे बसंतऋतु करिकै अमराई शोभित होत है तैसे श्रद्धाले संतसभा २३ ॥ भक्तिनिरूपण विविधविधाना क्षमादयाद्रुमलताविताना २४ टी। जैसे उस अमराई में अनेक तरह के द्रुमनाम रक्षहैं अंब जामुन कटहर बड़हर अमिली महुआ तिन्ह द्रुमन पर अनेक तरहकी लता जो वेलिसोवितान इव चढिकै छाइरही हैं तैसे संतसभा अमराई में अनेक तरहके उपासक जोहैं सोई अनेक तरह के द्रन हैं वो विविध विधान की भक्ति निरूपण जोहै निरूपण कही अर्थसो भजन सेवा धातुहै भक्तिकही रामायण मानसप्रचारिका बा। १२५ सेवाप्तो बहुतविधि की है नवधा प्रेमापरा॥ नवधा में भेद॥श्रवण १ कीर्तनर स्मरण ३पादसेवन ४ अर्चन ५ बंदन ६ दास्यपन ७ सख्यपन ८ आत्म- समर्पण (प्रमाणं भागवते श्लोक) श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पाद सेवनं ॥ अर्चनंवदनं दास्यं सरव्यमात्मनिवेदनं १ (पुनः) नवधाकही संतन कोसंग १ कथाप्रसंगमेरत २ मान रहित गुरुपद सेवन ३ गमगुणगान १ मंत्रजाप ५ शमदमादि संतनके बहुकर्म ६ सबकोराममयदेखे वो संतको रामते अधिक जाने ७ यथालाभ तथासंतोष न देखेपरदोष ८सबसेसरल छलहीन रामभरोस दीनता हर्षनाश्ती ८ (प्रमाण मानसरामायणे) प्रथम भक्तिसंतन करसंगा। दूसरिस्त मम कथा प्रसंगा ॥ गुरुपद पंकज सेवा तीस रिभक्ति अमान । चौथि भक्ति महगुण गण करै कपट तजि गाभ ॥ मन्त्रजापममदृढ़ विश्वासा। पंचमभजनसोवेदप्रकाशा ॥ छठदमशीलविर तिबहुकर्मा । निरतनिरंतरसज्जनधर्मा ॥ सप्तमयममोहिमयजगदेखा। मोतेसंतअधिककरिलेखा ॥ अष्टमयथालाभसंतोषा । सपनेहुनहिं देखेपर दोषा ॥ नवमप्तरलसबसनछलहीना । ममभरोसहियहर्षनदीना॥ इत्या दि भक्तिनिरूपणजानो तो विविधविधानकी भक्तिनिरूपण वो क्षमा क्षमा कही कोई अपराधकरै ताकोसहि जाइ वो दया जोमनवचनकर्म से पराये को दुःख न देना सो दया सो ये तीनिउँ भक्तिनिरूपण वोक्षमा वो दया तरूप अमराई में विताननाम छाइरहीहै २४ ॥ संयमनियमफूल फल ज्ञाना हरि पद रतिरसवेदवखाना २५ टी०। जैसे उस अमराई में अनेकरंगके फूल फूलेहैं तैसे संत सभा में संयम नियम दश दश जो हैं संयम कही अहिंसा १ सत्य २ स्तेय ३ ब्रह्मचर्य १ दया ५ क्षमा ६ नम्रता ७ धृति ८ अल्पभोजन १ शौच १० पुनिनेम शौच१ होमर तप ३ दान विद्याध्ययन ५ इंद्रिय निग्रह वत चांद्रायणादि ७ उपवास ८ मौनता : त्रिकालस्नानसंध्या १०(प्रमाणगाय- त्रीभाष्यश्लोक)अहिंसासत्यमस्तेयंब्रह्मचर्य दयार्जवं। क्षमाधुतिमिताहारः शुचिश्चसंयमादश ११ शौचेज्याचतपोदानंस्वाध्यायोपस्थनिग्रहं ॥ वतोप वासमौनानि स्नानंचनियमादश २ एते संयमनियमफूलह (पुनः) उस अमराईके फूलन मेंफललगेहैं वो फलमेरसहै तैसे इससंतप्तमा अमराई के संयमनियम फूलनमें ज्ञानफल है जैसे फूलमें फललगे तबफूलगोभित होइ है जो फलनलगा तो फूलस्थाहै तैते संयमनियमकरेसे जो ज्ञानहोइ तौ संयमनियमशोभितहै जो संयमनियन बहुतकिया वो ज्ञाननभया तो १२६ रामायण मानसप्रचारिका बा। जानौ संयमनियमवृथाहै वो हरिपद रति नामप्रीति सो ज्ञान रूप फल को रसजानौ यह वेदकहाहै कि जैसे फललगा वो पकरसनभया तो फल कैसोलागतहै मिष्ठनहीं तैसेज्ञानभया वो हरिपद प्रीतिनभई तो वह ज्ञान अशोभितहै २५॥ औरौ कथा अनेक प्रसंगा तेशुकपिकबहु वरण बिहंगा २६ टी०। जैसे उस मानसरकी अमराई में अनेकवर्णके पक्षी शुक पिका- दिरहते हैं तैसे इलमानप्तरके आसरे जो संतसभा अमराई है तिसमें जो औरकथापुराणादिके अनेकप्रसंग कहतेलुनतेहैं सोई अनेकरंग के पक्षी हैं। इहां शुकपिकादि पक्षीनकी वो औरोकथाप्रसंगकी तुल्यता इसदेशमें है कि जैसे अन्य स्थानके पक्षी आइकरि मानसर में चोंचभरि जल पीकरि तनकराई में बिल में फेरि अपने स्थानको गये तैसे अनेकन कथा को प्रसंग जब रामचरित मानसहोनेलगा तब कोई प्रसंगपाइकरि दृष्टांतहेत वा कोई प्रमाणहेतु कहेजातेहैं सोई चोंच भरनाहै वो कुछधेर संत सभा अमराई में बिलमि परस्पर कहतसुनत फेरि जिस ग्रंथ में आये तहां को गये लक्ष्य औरकथाप्रसंगका सिविदधोचिहरिचंदकहानी (पुनः) सिविधी चिवलिजोकछुभाषा(पुनः)परशुरामपिताज्ञारावी । मारीमात लोकसब साखी (पुनः) तनयययातिहियौवनदयऊ । इत्यादि प्रसंग जहांजहांहोइ सो औरोकथाजानो २६ ॥ पुलकबाटिकाबागबन सुखसबिहंगबिहारु ॥ मालीसुमनसनेहजल सींचतलोचनचारु २७ टी० । जैसे उस अमराई में तीनि परिखा हैं प्रथम वाटिका नाम फुलवारी जामें केवल फूलै फूले हैं रस में सुगंध दारता में भँवरा वो राय मुनि आदि छोटीछोटो पक्षी जोकेवल फूलैका रसग्रहण करत हैं वो दूसर परिखा बाग जामें म जामनि कटहर बड़हर तामें फल लगे हैं तिस फल को अनेकशुकादिपक्षी ग्रहणकरते हैं वो तीतर परिखा-- वन है जामें अनेक तरह के वृक्ष हैं अनेक तरह के फल हैं तिन्ह फलन को बनके अनेक तरह के पक्षीग्रहण करते हैं तैसेइस मानसरके संतसभा रूप अमराई में तीनि भांतिकी पुलकावली जोहै सोई बाटिका बागबन है तीनि भांतिकी पुलकावली कवनिहै तहां सुनौ जैसे अमराई समष्टी एकहै फेरि उसीमें तीनि परिखाको बाटिका बाग बन तैले संत सभा रामायण मानसप्रचारिका बा। १२७ समष्टी एक है फेरि उसमें त्रिकांडी है भक्तिकांड ज्ञानकांड कर्मकांडतो जो भक्तिकांड की पुलकावली है सो बाटिका नाम फुलवारी है जैसे फुल- वारीमें सबदिन जलकी नहरि लगीरहेहै तैसे भक्तिकांडकी पुलकावली में बारबार अश्रुपात होत है ताहीते पुलक रूपबाटिका बारहमास फूले रहते हैं तिप्त पुलकरूप फूलमें श्री सीतारामजूके गुणस्वरूप माधुर्यसो- ईरसहै तामें जो अपने भावनानुकूल भयो सुखसोई रायमुनिश्रादिक विहंगहै सो विहारपूर्वक माधुरी रस को ग्रहण करैहै वो जो ज्ञानकांडकी पुलकावलीहै सो बागहै कि जैसे बागमें छह महीना बर्षदिन में कहू एकदिन जलदिया जातहै तैसे ज्ञानकांड में पुलकावली थोरी है तामें जीवनमुक्त फल है ब्रह्मानन्द रसहै वो अपनी बुद्धि के अनुकूल जो भयो सुखसो शुकादि विहंगहै सो बूमानन्दमें बिहरे हैं वोजो कर्मकांडकीपुल- कावलो है सो बन है कि जैसे बनकोऊ सींचत नहीं देवके भरोसेहोतहै तैले कर्मकाण्डकी पुलकावली देवाधीन है जामें अर्थ धर्म काम उत्तम मध्यम निकृष्ट फल लगेहैं वो अहंकार पूर्वक जो भयो सुखसोई उत्तम मध्यक निकृष्ट तीनिभांतिके विहंगहैं फलनको भोगरूप रस ग्रहण करें, वो तीनिउँके सुन्दर मन तोई मालीहैवो तीनिउँके भावानुकूल जोसनेह सो जलहै नेत्रपटहै चारुनाम सुन्दर तेहिसेलेले नामनेत्र भरिभरिपुलक रूपबाटिका बागबन सोचते हैं २७ ॥ जे गावहिं यह चरित सँभारे तेयहितालचतुर रखुबारे २८ टी । जैसे उत मानसर में देवतन के प्रवीन रक्षक बैठेहैंचहु फेरकी जौनेकोऊ जलको बिगारे नाथूकि खकारिक तैसे इतमानत रामचरित को जे सँभारिकै गावते, तेई यह रामचरित मानस के चतुर रखवारे हैं इहां संभारव कही स्मरण को जे रातिउदिनयही में लगे रहते हैं विचा- रत रहतेहैं तेई पूर्वा परसँभारे रहते हैं कि जामें कोई बिजाती एक चौपाई वा एक दोहा लेइकरि अानको प्रानै अर्थ करै सोई विगारना तुल्य है सो तितकी वाणी को पूर्वा पर प्रसंग से खंड करि देना सोई रखुवारी है २८॥ सदासुनहिंसादरनरनारी तेइसुर बरमानस अधिकारी २६ टी। इहां ताई तदात्रय कहि अब अधिकारी अनधिकारी मार्ग की कठिनाई कठिन ताको निवारण सब कहते हैं कि जैसे उस मानसर में १२८ रामायण मानसप्रचारिका बा। देवता स्नान पान करतेहैं वोई अधिकारीहैं तैसे इस मानसरके जे नर नारि आदरपूर्वक सदासुनते हैं तेईदेवरूप अधिकारीहँ २६ ।। अतिखलजेविषयीबककागा यहिसरनिकटनजाहिंअभागा३० संबकभेक सिवारसमाना इहांन विषय कथा रसनाना ३१ तेहिकारण आवतहिय हारे कामी काकबलाक विचारे ३२ टी० .। अब अनधिकारी कहते हैं कि जैसे उस मानसमें कउवाबकुला नहीं जाते काहेतेकि उनका आहार जो घोंघीतिवारमिढुका सोउहांनहीं है ताते हारिकनहीं जाते इहां तीनिचौपाईकी एकही अन्वय जानब तैसे इस मानसमें जे अति खलहैं अतिरवल कहीकिजे समुझते हैं मानतेनहीं अपनो हठ करतेहैं ते अतिखल तेई काकहैं वोजे विषयोहैं अत्यंत विषय में पाशक्तते बकुलाहैते दोऊखल व बिषयी अभागेकाक वलाक यहि सर के निकट नहीं जाते काहे कि घोंघी तिवार मिढ़का के समान यहां नाना विषयरस की कथानहीं हैताते आवतसंतेहृदयले हारिजाते हैं काहेते बि- चारेहैं नाम उनका चारायहां विगत है नाम नहीं है ३० ॥ ३१ ॥ ३२ ॥ आवत यहिसर अतिकठिनाई रामकृपाविन आइनजाई ३३ टो। अब कठिनता कहते हैं कि जैसे उस मानसके जाना कठिन है इष्टकोरूपाबिना नहीं जाइसके तैसे इसमानसके आवतअतिकठिनाई है बिना श्री रामचन्द्रको पानहीं आयाजाइहैं ३३ ॥ कठिनकुसंग कुपंथकराला तिनकेवचनव्याघूहरि ब्याला ३४ टी। जैसे उसमानसकी रास्ता कठिन है व मार्ग में व्याघ्र सिंह सर्प हैं ताते कराल हैं तैले इस मानसर के जो कुलंगी स्वार्थी हैं तेई कठिन पंथहैं व तिन्हहों कुसंगिनके वचनजो हैं सोई सिंह व्याघ्र सर्प हैं सोई करालहैं जे अपनेते बड़े ते डाटिके बन्द किये तिन्हका वचन सिंहहै व जे अपनेते बरोबरिकेहैं ते ईर्षाकरिकै बन्दकिये तिन्हको वचन व्यावहै । व जेअपनेतेछोटेहैं ते अनेकतर्ककहि बन्दकिये तिन्ह केवचन सर्पहैं३१॥ गृह कारज नाना जंजाला तेअति दुर्गम शैल बिशाला ३५ टी० । जैसे उस मानसके रास्तामें बड़े बड़े पहाड़ हैं ताते मार्ग अत्ति कठिन द्वैगयो न पहाड़चुके न रास्ता वराइ तैले इस मानसके कुलंगी रामायण मानसप्रचारिका बा०। १२६ रूप रास्तामें जो नानागृहकार्यको जंजालहै सोई बड़ेबड़े पर्वतहैं दुर्गम जो दुःखौंकरिकै गम्पनहीं सोनगृहकार्यचु कै न कुतंगिन से छुट्टी मिल३५॥ वनबहुविषममोहमदमाना नदीकुतर्कभयंकरनाना ३६ टी०। जैसेउस मार्ग में विषमवन है तैसे कुसंगिन में मोह मद मान सोई विषमवन है कि गृहकार्यसे चाहे खालि उमिले पर मोह मद मान ये बड़े कठिन हैं व जैसे उस रास्तामें भयंकर नदीहै तैसे इसमार्गमें जो नानाकुतर्कहैं सोई भयंकरनदीहै कुतर्क कही भाषा क्या सुनना (पुनः) शूद्रकेमुखसे क्या सुनना (पुनः) वक्ता अभिमानीहै (पुनः) हमको कोऊ मानदेइ कि नहीं इत्यादि कुतर्क ३६ ॥ दो. जे श्रद्धासंबलरहित नहिं सन्तनकर साथ ॥ तिन्हकहमानस अगमअति जिनहिनप्रियरघुनाथ३७ टो। जैसे उसमानसके जाइबेमें रास्ताकठिन विशालपहाड़ कराल सिंह व्याघ्र सर्प (पुनः) नदी वन विषमहै परन्तु तीनवस्तु जो होइ तो ठेलिपेलि जाइसके तीनवस्तु कौनकी पास खर्चहोइ अथवा कोई बड़े आदमीको संगहोइ अथवा उससरके अभिमानी देवतासे प्रीतिहोइ जो यहि तीनमें एकौ न भयो तो मानसकोजाना अगमहै तैसेइसमानसरके आइबे में कुसंगी व तिनके कठिन वचन व गृहकार्य को नानाजंजाल व मोह मद मान व कुतर्क एते विषम हैं परंतु जो श्रद्वारूप खर्च अथवा सज्जननकोसंग अथवा इसमानतके अभिमानी जो रघुनाथ तिन्हसेप्रीति होइतो इसमानप्तमें आइसकैजो श्रद्धा न भई व सज्जनोकोसंग नभयो व रघुनाथप्यारेनहाँहे तिन्ह गरीबनकोइप्समानतकाआनाअतिधगमहै३७॥ नोकरिकष्ट नाइपुनिकोई जातहिनींदजुड़ाईहोई ३८ टी । जैसे उहां सर्व सहाइ हीन कष्टकरिके जो जाइ तौ जातही जूड़ीतापहोइ तैसे इहां सर्व सहाय हीन जो ईर्षारूप कष्टकारकै अवै तो पावते नीदरूपजुड़ाई होइ जुड़ाईकही जूड़ीताप ३८ ॥ जड़ताजाड़ विषमउरलागा गयहुनमज्जनपावअभागा ३६ टी। जैते उहां जूड़ीके मारे जाडलगा गयहुपर मज्जन न पाया तैसे इहां नींदकेमारे विषमकही तीक्ष्ण जड़तााइगई सोभावनेहुपर श्रवण नाम सुनानहीं ३६॥
१३० रामायण मानसप्रचारिका बा। करिनजाइ सरमज्जनपाना फिरिआवैसमेत अभिमाना ४० टी०। जैले उहां जाड़के मारे स्नान पान नहींकरिंगयो मैलके सहित प्याला फिरिमायो तैसे इहां जड़ता के मारे श्रवण धारण तौ भयो नहीं अभिमानरूप मैल केसहित आशारूपी पियासा फिरि आयो ४०॥ जोबहोरिको उपंछनावा सरनिन्दाकरिताहिबुझावा ४१ टो० । जो कोई उनले बहोरिकै पूंछने पाया कि मानसका हालकही तो वे अभागे दोनोसरके जानेवाले दोनों तरकी निन्दाकरिकै समुझायढ़िये पकनेकहा कि उतै मानसमें क्याहै जाइनमरनाहै वो पुरइनि बहुतसे है वो जल तो जैसो इहां तैसो उहां वो इतै मानप्तमें क्याहै नोंदनमरनाहै वो चौपाई तौहै वो रामकथा तो हम घरहीमें कहिलेतेहैं व्यासतौ लोभ केमारे कथा बांचते हैं यह सुनिकरि जिसको जाने वने को मन रह्यो सो भी मिटिगयो ४१॥ सकलविघ्ननहिँब्यापहितेही रामसुकृपाविलोकहिजेही ४२ टी । एते रास्ता आदि वो जाड़अंत प्रयंत जीविघ्न सो तेहिप्राणीको नहींव्यापतेहैं जेहिके श्रीरामसुष्ट कपादृष्टि से देखें ४२ ॥ सोइसादरसरमज्जनकरई महाघोरयतापनजरई ४३ टो० । सोई प्राणी सादरकही आदरसंयुक्त रामचरित मानसमें मज्जन नाम सुनतेहैं ते महाघोर जो त्रैताप देहित दैविक भवतिक तिसमें नहीं जरतेहैं मानसके प्रतापते सदाशीतल रहतेहैं ४३ ॥ तेनरयहसरतजहिनकाऊ जिनकेरामचरणभलभाऊ४४ टी० । ते प्राणी यह मानतरको कबहूनही तजते के जिन्हकेश्रीसीता रामपद कमल में भलोभाव नाम प्रीतिहै. ४४ ॥ जोनहाइचहयहिसरभाई तौसतसंगकरौमनलाई ४५ टी० । अब श्री गोस्वामीजी महाराज मानसके प्राप्ति के मुख्य उपाय कहते हैं कि जो कोई यहि मानसमें हो भाई नहावाचाहै तो मनलगाइके सतसंगकर १५ ॥ असमानसमानसचषचाही भइकविबुद्धिविमलप्रवगाही ४६ रामायण मानसप्रचारिका बा टी० । यहां ताई जैसी मानस को स्वरूप है सो कहे वो अधिकारी अनधिकारी कहि साधनबताये अब जौनेहेतु नाम कारणकरिके जगत् प्रचारभयोहै सो कहते हैं कि असमानस कसमानस जस ऊपरकहिआयेहैं संवादरूप घाटसेलेइ वो सँभारिक गावनेवाले चतुर रखवारताई से ऐसे मानसको जब मानसनाम हृदयके ज्ञान विरागरूप चषुजो नेत्र तिन्ह से चाहीनाम देखा तब जो शंभुके प्रसादसे कबिकी बुद्धि हुलती रही सो अवगाहन करतिभई नाम गोतालगावति भई तब विमल नामस्वच्छ भई जो पूर्वकहा कि मतिप्रतिनीचसोशंभुप्रसादसे ऊंचीभई जबमानस को देखा वो गोता लगाया तब विमल होइगई ४६ ॥ भयौहृदयानंद उछाहू उमँगेउप्रेमप्रमोदप्रवाहू ४७ टी० । वोजबगोतालगायाबुद्धिनिर्मलभई तब हृदय में अानंदकोउत्साह भयो वो जब उत्साहभयो तब वह जो भरोभयोमानससोप्रेमप्रमोद रूप प्रबाह उमँगेउजगत् मेंप्रचारहीने कोहेतयही है कि जब ऐसे मानसको मानस के नेत्रन से देखि स्नानकरि बुद्धि निर्मल भई तब मारे उत्साह के न रहागया प्रेम प्रमोदरूप प्रवाह उमँगेउ सो प्रबाह कविता रूप नदी है. करिचली तब जगत् में प्रचार भयो (इत्यर्थः) शंका ॥ पूर्व गोस्वामीजी कहा कि जो मानस महादेवजू पूर्वहीकोनफेरिकाकभुशुंडिहि दीन्ह तिन्ह से याज्ञवल्क्यमुनि पाये ते भरद्वाज प्रतिगाये सो कहू से हमारे गुरू जी पाये तिन्हसे हम सुने सो भाषाप्रबद्ध करते हैं वो अब कहते हैं कि वेद पुराण समुद्रसे लेकरि साध मेघ वर्षे तब मानस हृदय भरा सो उभंगि करि कवितारूपनदी चली तो जो गुरूसे सुना सो कहांगयो यहती पूर्व वचन में विरोधभासतहै। समाधान॥सुनो यहजो श्रीगोस्वामीजी सावयव मानसको रूपक कहे हैं तो उसमें चित्तदेउ कि जैसे पूर्वमानसमें जलपूर्ण निर्मल भरोहै उसी में मेघको जल प्राप्ति भयो तब वह जो जलभरारहा सो उमँगेउ उमँगिकैनदीचलीतैसेजो अपनेगुरूजीसे महादेवकृत मानस सुने रहे सो हृदय स्थल में भरारहा जब ऊपरसे साधुनके मुखसे जहां तहां सुने सो जौने क्रमसे अपने गुरू से सुनेरहे तोने सेविति क्रम सुने सोई मलिन होइगयो जब मनन किये तब देकेदेखि परयो तबअच्छी तरहसे वहजो गुरू की कहनीरही सो उसमेंसावयव मानलकोरूपदेखि परयो तब आनंद लै वहीजोगुरूकी कहनी सो उमँगेउ तब कविता रूप नदी चली १७॥
१३२ रामायण मानसप्रचारिका बा। चलीसुभगकवितासरितासो रामविमलयशजलभरितासो४८ सरय नाम समंगल मला लोक वेद मत मंजल कुला ४६ टी। अब यहांस सावयव साक्षात् सस्य वो कविता सरयू को अभेद तद्रूपका लंकार करिकै कहते हैं यहां चौपाईकोएकहीअन्वय जानबकि जैसे वह मानस उमँगेउ तबनदी चलीसो नदीको नाम श्री सरयूजी वो सरयूजी को है करारहै तैसे श्री गोस्वामी जी महाराज कहते हैं कि जब श्वानंदके उत्साहसे प्रेमप्रमोद यहमानसउमँगेउ तबकवितारूप नदीबहि चलीसो कविताको नाम सरयूपरची सोकविता सरयू समजूके विमल यशरूप जलसे भरिता नाम परिपूर्ण भरिके चलीहै वो दोनोंसरयू मंगल को मूलहै वो लोकमत वो वेदमतजो कवितामेंकहे जाहिँगे सोईकविता सरयूके दोनोंकरारहैं जैसेदोनों करारकेबीचमें सरयूको प्रवाह चलोजात है तैसे लोकमत वो वेदमत दोनोंके बीचमें कवितासरयू चलेगो वो जैसे सरयू एककरारे लगिकै चलतीहैं तहां जल गहिरा रहतहै वो दूसरे करारे उथल रहतहै तैसे कविता सरयू जोहैं सोवेदमतकिनारे लगिकै चलती हैं तहां रामयश जलगहिरारहतहै वो लोकमतकिनारे ऊथलरहतहै लक्ष्य॥ लोकमतको नांदीमुख श्राद्धकरि जातकर्म सबकीन्ह (पुनः)धरियनाम जो मुनिगुनिराखा (पुनः)वनमृगयानित खेलहिं जाई (पुनः) कौतुकबिनोदप्र- मोद प्रेमनजाइ कहिजा नहिंअली (पुनः)लोकरीति जननीकरहिंबरदुल हिनि सकुचाहिं।इत्यादिजहांलौकिकप्रसंगपरे तहांलोकमतजानो लक्ष्य॥ वेदमत बारबारशिशु चरणनपरहीं (पुनः) जोआनंदसिंधुसुखराशी। सोक रते त्रैलोक्यसुपासी ॥ सोसुखधाम राम अप्सनामा । अखिललोकदायक वित्रामा (पुनः) जे मृगरामबाणकेमारे। तेतनुतजितुरलोकसिधारे(पुनः) सुरलखे रामसुजान पूजे मानसिक असनदए (शंका) यह वेद मत कैसे उत्तर॥ अंतर्यामित्वगुण से इत्यादि प्रसंगवेद मत जानो सोयह बात बोधहेतु लिखेनतु यहकविताईग्रंथभरि लोकवेदमतकेभीतर है १८१८ ॥ नदीपुनीतसुमानसनंदिनि कलिमल तृणतरुमूलनिकदिनि५० टी०। कवितासरयू वो साक्षात् सरयू दोनों पुनीतनदी हैं काहेते कि सुकही सुष्टुमानस नंदिनिहैं वो कलिमलजो पापसोहै तरु तृण तिसको मूल सहित निकंदिनि नाम नाशकरनेहारी हैं दोनों सरयू ५० ॥ दो० श्रोतात्रिविधिसमाजपुर ग्रामनगरदुहुंकल ।
रामायण मानसप्रचारिका बा। १३३ संतसभाअनुपमअवध सकलसुमंगलमूल ५१ टी० । जैसेसरयूके दोनों किनारे पर पुर गांव नगर बसतेहैं पुरकही जो दशबीसघरकेजोसालसालबसत उजरत रहतहै वो गावकही जो चारि सौधरहोइँ सो कळूकालमें बसत उजरत रहत है वो नगरकहीह जारघरसे लेइअनगनतिनहोइ सो बहुकालरहतहैकछुबड़ा विघ्नपाइकरिउजरत है वो श्रीसरयूके किनारेपर श्रीअयोध्याजीहैसोएकहैवो कोईकाल में उजरैनहीं तैले कविता सरयूके किनारे पर पुरयामनगरकाहै तहांसुनौ जो श्रोतन की समाजहैसो त्रिधाहै एकआरतत्रोताहै जे अपने प्रारतिके निवियर्थ कथा सुनतेहैं तो पुरहै जो वैचारिदिनसुने फेरि वैचारिदिन छोडदिए ताई भदएकलोकभारत एकपरलोक भारतसोजोलोकारतहैंसो लोकमत के किनारेपरबसे हैं वो जो परलोक भारतहैं सो वेदमतके किनारेपरबसे हैं वो दूसर अर्थार्थी श्रोताहैं जे अर्थ के हेतु कथा सुनते हैं तेयामहैं जो कछुकाल सुनतेहैं फेरि कछुकाल दूसरे साधन में लगि जाते हैं तामें है भेद एक लोकार्थी हैं अन्न वस्त्रके सोलोक मत किनारे परबसतेहैं वो एक परलोक स्वर्गादिकके अर्थी हैं सो वेदमतकिनारेपरबतेहैं वो तीसरे जिज्ञात श्रोता हैं जो वस्तु जानने केहेतु कथा सुनतेहैं सोनगरहैं जो सर्व कालसुनते हैं कोई बड़ो विघ्न पाइजाइ तबैकूट तामें के भेद एक लोककी चतुराई सीखबहेतु सुनतेहैं ते लोकमतकिनारे परबतेहैं वो एक रामतत्त्वजानिवे केहेतु सुनते हैं तेवेद मत किनारेपरबसे हैं इति ॥ त्रिबिधात्रोतावो ज्ञानी संतनकी सभाजोहै सोकैसे ज्ञानीसंतहैं किजिन्हकोकोईपक्षार्थकी चाहना नहीं केवल रामयश सुनते हैं सोई अनूपम श्रीअयोध्याजीहैं सोसर्व काल बनेरहते हैं कैसो विधन आवैतौवे नहीं छोड़ते (प्रमाण)कोटिबिघ्न जिमि संतकहँ तदपि नीतिनहित्याग ॥ सोसंतवेद मत किनारे पर सकलमंगल कोमूल श्रीअयोध्या विषैवसेंहैं इसमेंयहभावहै किजैसेत्रीलग्यूजी अयोध्यै के हेतु आई हैं वो जितना माहात्म्यअयोध्यामें है तितना अनते नहीं वो श्रीसरयूकरिकै श्रीअयोध्यैकी शोभाहै परस्पर मिलिरहेहैं अयोध्य में सरयू वो सग्यतट अवधतैले कविता साधुतमाज केहेतुबनी है(प्रमाण)साधुसमाज भणित सनमान । वो साधु इससमाजमें शोभादेतहैंवो जैसाशोभा महत्व साधुसमाजमैं है तैसी अनत नहीं वो एहीकरि साधुसमाजभी शोभितहै ऐतपरस्पर मिले हैं रामकथा वो साधुसमाज ५१ ॥
रामायण मानसप्रचारिका बा। राम भक्ति सुरसरितहिजाई मिलीसुकीरतिसरयुसुहाई ५२ टी० । जैसे सरयू मानसतेचली वो कुछ दूरिचलि सुरसरिता जोगंगा जी तिनमें जाइमिली तैसेकीति सरयू रामभक्ति सुरसरीमें जाइ मिली अबइहां पर यह बात समझनेकी अपेक्षाभई किराम यश जलको क्या स्वरूपहै वो वही यशकी कीर्ति रूपनदीचली तिसका क्यास्वरूपहै तहां कैलाशके प्रकरणमें चारिदोहामें रामयशकोस्वरूपकहाहै । अगुणहिँ सगु- यहिँ नहि कछुभेदा।यहि चौपाई से लेइकरि वो । सुनिशिवके भमभंजन बचना। यहां पर्यंत गेयहीके भीतरजो कछु तलावके प्रकरणजे कहि , आएहैं सो सब साहित्त्व जानो वो यही रामयश उमगि कीर्तिरूप प्रबाह चलीसोकहाँल।सुनुगिरिजाह रिचरित नुहायोविपुलविशदनिगमागमगाय॥ इहांसचली वो रामभक्तिसुरसरीमेंमिलो कि जब स्वायंभुवमनु महाराज सबकेभक्ति को निराकरण करि एक श्रीरामभक्तिको दृढ़कीन्ह (प्रमाण) विधिहरिहरतपदेखियपारा मनुसमीपायेबहुबारा ॥मागहुबरबहुभांति लभाये।परमधीरन हिचलहिं चलाये ॥ ऐसीअखंडवृत्ति श्रीरामभक्तिमेलगी रहै कि यह सबके वचन महाराजको सुनै न परे यह राम भक्तिरूप सुर- सरिमें कीर्ति तस्यूजायमिली अब जो कोईकहै कि तुमतौ सुनुगिरिजा हरिचरित सुहावा ॥ यहांसे कीर्ति सरयू कहतेहौ तौ वर्णानां इझं से लेइकरि वो अप्सनिज हृदयविचारि इतनी कविताई कहां डागगे तहां सुनौ यहतौ हमपहिलेही कछतड़ागके प्रकरण कहिचायकछयहीकीति सरयूके रूपकरें कहेंगे ताते यहिबातको अच्छीतरहसे समुझौ ५२ ॥ सानुजरामसमरयशपावन मिलेउमहानदसोनसुहावन ५३ टी० । (पुनः)जैसे सरयू गंगा मिलिचलीागे आइकरिमहानद शोण- भद्र बड़ो सुहावन सो मिलो तैसे अनुजजो श्रीलक्ष्मणज तिन्हके सहित श्रीरामजीको समरयश जो पावन सोई सुहावन महानद शोण आइ मिलो (शंका) समस्यश वो पावन कैसे (समाधान) श्रीरामयश तो सबै पावनहै परंतु समरयशपावन इससेकही कि जामें सर्वधर्मकोनिर्बाहभयो त्रैलोक्य अानन्दभयो देवता सुवासबसे ऋषिसब निष्कंटक भये ताते पावन (पुनः शंका ) कौनअंगलेइकरि शोणकियो लमर यशकी एकता है (प्तमाधान) जैसे शोणकीधारा बड़ीतीब है वो जब बहत है तब भयावन लगतहै परंतु मगह ऐसीधरती पावनीको पावनकियो तैसे समरदेखत रामायण मानसप्रचारिका बा। १३५ में सुनतमें बड़ोतीबू भयावन है परंतु बड़ेबड़े पापीराक्षस मोक्ष भये हैं यहअंगते तुल्यता भई ५३॥ जुगविचभक्तिदेवधुनिधारा सोहतिसहितसुविरतिविचारा५४ टी० । जैते सरयू शोणके बीचमें गंगाजी शोभित हैं तैप्से सुंदर वैराग्य वो विचारके सहित भक्तिरूप देवध्वनि कीर्तिरूप सरयू वो समर यश रूप शोणकेबीचमें शोभा देती हैं जो कहौ भक्ति में विरति विचार क्याहै तहां सुनो जब श्रीमहाराज स्वायंभुवमनु विचार कीन्ह कि । होइनविषयवि- रागभवनबस तभाचौथपन । हृदयबहुतदुखलाग जन्मगयोह रिभक्तिविनु ॥ यहजोठीककीन्ह सो विचारबोबिचारकरिकै तब । बरबशराजसुतहिनृप दीन्हा । नारिसमेत गवन वनकीन्हा ॥ यह वैराग्यहै सो विचार विरागके सहित जोभक्ति सो कीति य शके मध्य में शोभादेतीचली ५४ ॥ त्रिविधितापत्रासकत्रिमुहानी रामस्वरूपसिंधुसमुहानी ५५ टी०। (पुनः) जैसे मानतते सरयू चली गंगामें मिलिफेरि शोणमिले ता त्रिमुहानी भई सोत्रिमुहानीकैसी है कि त्रयतापकी त्रासकरनेवाली सो तीनिमिलिक समुद्रके सन्मवचली समुद्रकोमिली फेरिमिलिककुछ दूरि धारिचलीगई तैले कैलास प्रकरण चारि दोहा मानप्तते कीर्तिसरय चली वो जोस्वायंभुवमनुविषे अखंड श्रीरामभक्ति तहां मिलिफेरि अनु के सहितरामजीके ताडकामारीच सुवाहुक समरकै यशपावन शोण सो मिल्यो तब त्रिमुहानीभई सो त्रिमुहानी तीनिउँतापको त्रासकरत श्री रामचन्द्रकोराजसिंहासनपर विराजमान स्वरूपको सन्मुखचलीसो मिली फेरि जो पीछे नित्य चरित वर्णन कौनकी। प्रथम तिलकवशिष्ट मुनि कीन्हा । इहांते लेइकरि देवस्तुति वेदस्तुति शिव स्तुति कपिनकी विदा इहां प्रयंत राज्याभिषेकहै आगे नगरका वर्णन पुरबासिनका वर्णन उप- वनका जाना पुरबालिन को समुझावना वशिष्ठ जी को एकांत में श्रावना शीतल अमराई को जाना यह सबनित्य चरित्र को वर्णन सो समुद्र मिलिकुछदूरि धार निकल जानाहै ५५ ॥ मानसमूलमिलीसुरसरिही सुनतसुजनमनपावनकरिही ५६ टी० । अब कछु दोनों त्रिमुहानीको फल कहतेहैं किजैसे मानसमूल जो सरयू जिन्हको मानसहै मूलसो कहावै मानस मूलसो सुरसरिहि में १३६ रामायण मानसप्रचारिका बा। मिली सो स्नान पान करने से जनमन पावन करती है तैसे रामयश मानस मल जिलको ऐसी कीर्ति सरयूरामक्ति सुरसरिमें मिलीसो सुनतसंते सुजननके मनकोपावन करिहि निश्चयकरिकै ५६ ॥ बिचविचकथाविचित्रविभागा जनुसरितीरतीरबनबागा ५७ टो। अब यहांते श्रीगोस्वामीजी महाराज सिंहावलोकन करि की. ति सरयू वो साक्षात् सरयूको रूपक कहते हैं कि जैसे सरयके तीरतीर बनवाग है कछु जलको स्पर्श किये तैसे कीत्ति सरयूके तीर तीर नाम लोक वेदमत दूनों तीरपर बीचबीच में विचित्र भागा विभाग की कथा 4 सोई जलको स्पर्श किये बनबाग तुल्य है जैसे बनबाग करिके नदी की शोभा होतीहै तैसे बीच बीचमें विचित्र विभाग कथासे कीति शोभित होतीहै छोटाप्रसंगबागबड़ाप्रसंगबनजानो( लक्ष्य)बिचबिचकथाप्रसंगको जबमानसते कीर्तिसरिचली तबबीचमें जलंधरकी कथाकाप्रसंग परासो छोटाहैसो बागफेरि नारदके मोहकाप्रसंगवो बड़ाबागहै (पुनः)भानुप्रताप का प्रसंगवन है (पुनः)रावणको जन्म दृढ़विजय(पुनः)देवतन का विचार यह वेदमत तीरके बनवागढ़(पुनः)महादेवके विवाह के उपरान्त जेव- नार वो दायज वो बिदा समयमें रोवना यह सब लोकमत तीर के बन बाग हैं यहीरीतिसे जहां लौकिक प्रसंगपरे तहांलोकमत तीरकेबनबाग वो जहां बैदिक प्रसंगपरै तहां वेदमत तीरके जानो (पुनः) शिवपार्वतीके विहारसे लेइकरि षट्मुख जन्मकर्म एतेप्रसंग कीति सरयूके तीरकेबन बागहैं यही रीतिसे सातोकाण्ड में जानौ जहां प्रसंग छोड़ि दूसरी कथा कहनेलगे उसको पराकरि फेरि प्रसंग मिला कहिचले जैते अयोध्या- काण्ड में कहाकि । ततमगु भयेउन रामकहँ जसभा भरतहिंजाता यहां से प्रसंग छोड़िकुछ मगुबासिनकी कहिफिरि देवदरबार की कहि प्रसंग मिलायेकि । यहि विधि भरतवले मगुजाही ५७ ॥ उमामहेशविवाहबराती तेजलचर अगणितबहुभांती ५८ टी । जैसे सरयजीमें अनेक भांति जलचर हैं तैसे कीर्ति सरयू में महादेव पार्वतीके विवाह के बरातीजोहैं तो अनेकभांति के अगणित जल- चरहैं जैसे जलचरमें कोई देखनेमें सुंदरहै कोई भयावन हैं तैसे उमामहेश के विवाह के बराती ब्रह्मा विष्णु इन्द्रादिदेवता सोतो देखने में सुन्दर हैं वो महादेवकी समाज भयावन है ५८॥
रामायण मानसप्रचारिका बा। १३७ रघुवरजन्मअनन्दबधाई भवर तरंग मनोहरताई ५६ टी । जैसे सरयू जी में भवरवो तरंगहैं तैसे रघुबर जो श्रीरामतीनिउँ भाइनके सहित तिनके जन्नकी आनंदवो बधाईजो बजतीहैं सोईमनो- हर भवर वो तरंगहैं आनंद जोहै सो भवरहै काहेते कि जैले भवरमेपर से निकति नाहीं सकत डूबिजातहै तैसे रघुबर जन्मके आनंद में सबमग्न होइ गये इहांतक मग्न हैं कि ॥ मासदिवस कर दिवसभा मर्म न जाने कोइ ॥ रथसमेतरविथाकेउ निशाकवनविधिहोइ ॥यहभवरतुल्यहैवोअनेक प्रकारकी बधाई बजती हैं सोई तरंगहैं जैसेतरंगमें शब्दहोत है तैसेबंधाई में शब्दहै अबानन्द बधाईको लक्ष सुनो ॥ अवधपुरीरघुकुलमणिराऊ । (सेलेइकरिवो) अनुपम बालक देखिनजाई । रूपराधिगुणकहिनसिराई। पर्यतजानो ५६॥ बालचरित चहुंबन्धु के वनज बिपुल बहुरंग ॥ नृपरानीपरिजनसुकृत मधुकरबारिविहंग ६० टी जैसे सरयूमेंबहुतरंगके कमलफूले हैं तिन कमलन पर मधुकर बैठि रसलेतेहैं वो अनेकप्रकारके विहंगसुगन्धलेतेहैं तैसे कीर्तिसरयूमें चारिउ भाइन को बालचरित्र जो अनेकतरह का कबहूँ आंगन में खेलत संते खम्भनमें परिछाहों देखते हैं कबहुँ घर घरजाइ आखिमुंदवलि खेलते हैं कबहुँ गलिनमें गुल्ली डंडा खेलतेहैं कबहूँ शिकारको जाते हैं इत्यादि जोहैं सोई बहुरंगके कमलफूलेहैं तिन्हपरनृपजो श्रीचक्रवर्ती महाराजा दशरथजी वोश्रीमहारानी श्रीकौशल्या आदि सबरानी तिन्हकासुकत जो है सो मधुकरहै जो लालन पालन चुंबन आलिंगन आदि सो रस लेना है वो परिजन जो परिवार के जन वो समस्त पुरवासिन के सुरुत जल विहंगतुल्यहैं जो अनेक तरहके चरित्र देखते हैं सोई सुगंध लेना है अब बालचरित्रकालक्षणतुनो ( मुनिजनधनप्तर्वसशिवप्राणा। बालकेलिरस त्यहिसु वमाना) इहसिलेकरि वो (ब्यापककलअनीह अज निर्गुणनाम नं रूप ॥ भक्तहेतुनानाविधि करतचरित्रअनूप ) इहांपर्यतजानो इहां जो बहुरंग कहाहै सो तीनिरसमें जानो दास्य सख्य वात्सल्य दास्य धूमरो रंगहै सख्य पीतरंग वात्सल्य चित्ररंग तिसका लक्ष एक एक चौपाई सुनो (बन्धुतखासबलेहिं बुलाई । वनमगयानितखेलहिंजाई ) यह सरख्य रसपीतरंग है (बालचरित हरिबहुविधिकीन्हा । अति अनंवदासनकहँ ११ -1 १३८ रामायणमानसप्रचारिका वा। दीन्हा) यहदास्यरसधूमरंगहै ( भोजनकरतबोलजबराजा । नहिं आवहिं तजिवाल समाजा) यहवात्सल्य रस चित्ररंगहै ६०॥ सीय स्वयंबर कथा स्वहाई सरितस्वहावनिसोछबिछाई ६१ टी० । जैसे सरयू छबिहै जाते स्वहावनिहै तैसे की ति सरयू में श्री जानकीजीके स्वयंवरकी सुहाई कथा जोहै सोई वहावनिछबि छाइरही है स्वयंवरकथाका (लक्ष) (तबमुनि सादर कहाबुझाई ) इहांसे लेइकरि (गौतमतियगतिसुरतिकरि नहिंपर पति पदपाणि) इहां पर्यंतजानोबीच में दसदोहा फुलवारीकी कथा तड़ागके प्रकरणमें रामतीय यश सलिल सुधासमके साथहै वो किंचित् किंचित् जल गुणके साथ कहेंगे सो गुण तो जलके साथैरहतहै सो जानो ६१ ॥ नदी नाव पटुप्रश्न अनेका केवट कुशल उतर सविवेका ६२ टी० । जैसे सरयूमें नावहै उसके खेवनेवाले केवट हैं तैसे कीर्ति नदी में अनेक प्रश्न जो सुन्दर सुन्दरहैं सोई नावहैं वो तिन्ह प्रश्ननके विवेक पूर्वक उत्तर जोहैं सोई कुशलनाम चतुर केवट खेवैयाहैं लक्ष प्रश्नोत्तरके (कह हुनाथ सुन्दरदोउबालक । मुनिकुलतिलककि नृपकुलपालक ॥ कह मुनि विहँसिकहेउनृपनीका । वचनतम्हार न होइअलीका ( पुनः निषाद को प्रश्न लक्ष्मण जीको उत्तर (पुनः) ग्राम वासिन्हको प्रश्न श्रीजानकी जीको उत्तर (पुनः) श्रीरामजोकोप्रश्न वाल्मीकिजूकोउत्तर(पुनः) लक्ष्मण जको प्रश्न रघुनाथजूको उत्तर (पुनः) नारवजूको प्रश्नरघुनाथजीकोउत्तर (पुनः) सुवेलपर श्रीरघुनाथजीको प्रश्न सब बानरनको उत्तर इत्यादि जहांजहां प्रश्नोत्तर हैं सो सबनाव केवटजानो ६२ ॥ सुनि अनुकथन परस्पर होई पथिकसमाज सोहसरिसोई ६३ टी। जैसे उसनावपर चढ़े पथिकनके समाज शोभा देते हैं परवह समाज नदीके बाहरकीहै तैसे जो अनेकप्रकारकेप्रश्नोत्तर तिन्हको सुनि के जो परस्पर अनुकथन करते हैं कहते हैं कि क्या प्रश्नका उत्तरनिबहाहै सोई पथिकनकी समाजकीर्ति सरमें शोभादेते हैं पूर्व जो श्रोतन की समाज त्रिविध कहि आयेहैं तिन्हहों में दोकोटी किये कि एकसुनतेभरि हैं ते पुरग्राम नगरमें हैं वो एकसुनिकरि अनुकही पीछे परस्पर कथन करतेहैं ६३॥
रामायण मानसप्रचारिका बा। १३६ घोर धार भृगु नाथ रिसानी घाट सबंधु राम वर बानी ६४ टो। जैसे सरय में तीधारहै तैले कीर्ति सरयू में भृगुनाथ जोपरशु- राम तिनको क्रोध जोहै सोई घोर भयावन तीब्धार है जो क्रोध देखि के श्रीजनकजी ऐसे धीरगंभीर डरिगये औरकी क्याचली (लक्ष) बोलत लप- यहि जनक डेराही( पुनः )अतिडर उतर देत नृपनाहीं ॥ इत्यादि वो जैसे सरयू मेंतीबूधारको रोकिकै सुन्दर घाटबँधे हे तैसे इंधु जो श्रीलक्ष्म- गजू तिनके सहित श्रीरामचन्द्र की बरबानीजोहै सोई सुन्दर घाट बंधि रह्योहै जैसे धारको रोकिकै जब घाटबांधनेलगे तब पहिलेगच्चको तीब धार तोरिदेतिहै जब बड़ोपुरुषत्व करे कि धारको रोकनेकोगच्चपरगच्च गच्च देतेजाइ तबबंधिक तय्यारहोतहै तैसे जब प्रथम भृगुनाथबोले । अतिरिस बोले बचन कठोरा । कहुजड़ जनक धनुरक्यइं तोरा ॥ यह घोरधार देखिश्रीरघुनाथजी प्रथमगोलागलाये ॥ नाथशंभुधनुभंजनहारा । होइहिइककोउदासतुम्हारा ॥ सोधाराकेमारे गोलानभाजब कहे कि। सेवक सोजोकर सेवकाई । अरि करनी करि करे लराई ॥ सोलुनि श्री लषणलाल बिचारे कि सरकारकी बात इनने उड़ाया तब आप लागे गोलागलावने वो धारा तोरनेलगे दशपांचबेर में धार शिथिल द्वैगई तब पीछेले श्रीरामजी सँवारिक घाटतय्यार करिदियो ६४ ॥ सानुजरामबिवाहउछाहू सोशुभउमगसुखदसबकाहू ६५ टी०। जैते सरयूजीमें उमंगहोतहै सोसबको सुखदाई होतहै काहेते कि सरयूको उमंग शुभहै ताते तैसे कीर्तिसरयू में तीनिउं भाइन के सहित श्री रामचन्द्र के विवाह का उत्साह जोहै सोई उमंग सबकोशुभ नाम मंगल वो सुख देनेवालाहै (लक्ष बिवाह उत्साह को दोहा ) राम- चन्द्रमुखचन्द्रछवि लोचनचारुचकोर । करतपान सादरसकल प्रेमप्रमोद न थोर ॥ इहांसेलेइकरि वो (लियरघुबीरविवाह जेसप्रेमगावहिंसुनहि ॥ तिहकहंसदाउछाह मंगलायतनु रामयश )इहांतक जानो ६५ ॥ कहतसुनत हरषहिं पुलकाहीं. तेसुकृती मनमुदित नहाही६६ टी०। जैसे सरयूजीमें सुरूती प्राणी स्नानकरत हैं तैसे कीर्तिसरय को जेकहत व सुनत हर्षत पुलकत हैं नाम कहत हर्षहिं व सुनत पुल. कहिं तेईसुस्ती मनमुदितह के नहातेहैं ६६ ॥
१४० रामायण मानसप्रचारिका बा। रामतिलकहित मंगलसाजा पर्वयोग जन जुरेउसमाजा ६७ टी०। जैसे सरयजीमें पर्वयोग परतहै जामें बहुतसे लोग वटुरते हैं तैसे कीर्तिसरयू में श्रीराम राज्यतिलककेहेतु सर्वमंगल के साजसाजेगये सोई मानो पर्वयोगहै(लक्षरामतिलकको) आपुछत युवराजपद रामहिं देहिनरेश ॥इहांसेलेइकरिव नाममंथरामंदमति ताई आगेमंथरा केकयी सम्बाद केकयीक कुमतिके भीतरजानो ६७ ॥ काईकुमति केकयी केरी परी जासुफल विपतिघनेरी ६८ टी। जैसे सरयूमें पर्वयोगलगे पर कहू काई परिगई जलविगरिगया तितकाफल दुःखहोताहै तैसे कीर्तिसरयूमें केकयीजूकी कुमतिजोहै सो काई तुल्य है जामें पर्वयोग तो गवैकीन पर ताको फल घनेरी विपत्तिपरी जितनेरामतिलकरूप पर्वयोगमें आनन्दर हैं जिनकेऊपर बड़ीबिपत्तिपरी (लक्ष केकयीककुमति व घनेरीविपत्तिको) नाममंथगमंदमतिसे सजिबन साजसमाज ताई इधर व जब सुमन्त जी लवटि आये तहांसे व पितु हित भरतकीन्ह जसकरणी ताई ६८॥ दो० शमन अमित उतपातसब भरतचरित जपयाग ।। कलिखलअघअवगुणकथन तेजलमलबककाग६६ टी० । जैसे सरयूजीमें काईलगनेले जलबि गरयो तब अच्छलोग जप पुरश्चरण वो यज्ञकरिकै विघ्नकोशांतिकरतेहैं तैसे कीर्तिसरयूमें जोकेकयी की कुमतिरूप काई लगनेसे जो उत्पात भयो सो श्रीभरतजूको चरित जोहै सबउत्पातके शमननाम नाशकरिबको जपयज्ञरूपहै जोश्रीरामचन्द्र की पांवरी सिंहासनपर बैठारी सबके प्राणको अवलंब दीन भरत चरित अयोध्याकांडमें एकसौछिहत्तर दोहाके ऊपरसे समाप्तिताईजानो परन्त बीच बीचमें भरतजीको स्वभाववर्णन है जो जलगुणकेसाथ शीतलता ब- वर्णन है वो सरयूजीके एकदेशमें देशभूमिके योगसे घोंघी सिवार रूपमल रहतहै तिसके साफकरिबे को काक बकरहतेहैं तैसे कीर्ति सरयमें कवि- ताईके योगसे कहू एकदेशमें प्राकृत दृष्टांतादिक जोहैं सो मलहैं घोंघी सिवार तिन्ह के साफकरिवेको कलिको अघकथन जोहै उत्तर कांडमें सो वकुला है वो खलनको अवगुण कथन जो उत्तर कांड फूलबाटिका महँ भरतजीते श्रीरामचन्द्र कहाहै सो काकहै येदोनो कथनरूप बकुलाकाक रामायण मानसप्रचारिका बा। १४१ प्राकृत दृष्टांतादि मलप्ताफ करतेहैं कि सामान्य पुरुष जो सो प्रारुतदृष्टां- तादि जब लुने तब सबछोड़ि उसी में चित्त देते हैं वह कहते हैं कि रामा- यण में लिखाहै यहनहीं जानते कि यह तो काव्य का अंगहै तिनके कलि अवकथन वो खल अवगुण कथनसुनि कुछग्लानिभई सोईसफाईहै६६ ॥ कीरतिसरितछहूंऋतुरूरी समयसुहावनिपावनिभूरी ७० टी० नदीको रूपककहनेलगे सो नदीमें जितनी सहायत्वरही सोच- योध्याकांड भरिमें होगई किंचित् उत्तर कांडमें पाया आगे पारण्य कि- किंधा सुन्दर लंका यह न मिले ताते ऋतुप्रकरण उठाय कि जैसे सरयू छवों ऋतुमें रूरीनाम सुन्दरिहै पर समय २ अतिसुहावनि पावनिहै का- र्तिक रामनौमी आदि तैसे कीर्ति सरित जोहै सो छवोंऋतु में सुन्दरिहै पर समय समय यहभी सुहावनिपावनि है भूरी कही बहुत ७० ॥ हिमहिमशैलसुताशिवब्याहू शिशिरसुखदप्रभुजन्मउछाहू ७१ टो. • । अब जो कहा कि कीति सरि छवों ऋतुमेरूरीहै वो समयसमय अधिक स्वहावनि पावनिहै सो अबकीर्ति तरिमें ऋतुदिखावतेहैं धर्मलेके कि जैसे सरयूमें हिमऋतु आयो तब जाड़होतहै परंतुभोजनको पचाइ डारतहै तातेबड़ेलोग खुशोरहते हैं तैसेकीति सरयूमें हिम शैलसुता जो पार्वती वोशिवजीके विवाहकी कथा सो हिमऋतुहै किजामें प्रथममयना भाविकोदुःखसोजाड़तुल्यहै वो फेरिपाछे सबदेवताअपनोस्थानपाइखुशी भये सोई भोजन पचावनाहै वो जैसे सरयू में शिशिरऋतु जबआयोतब होरीहोतीहै तामें रंगनकोबाहुल्यता होतीहै वो सब लोग आनन्दपूर्वक गान बाजा बजावते हैं तैसे कीत्ति सरयूमें श्रीरामजन्मको उत्साहजो है सोई शिशिरऋतु है जामें अनेक रंग के गान वाजा नृत्य होतेहैं वो गली गली अरगजा कुंकुमकीचढेरहीहै अब दूनौको लक्ष (कंचनथार सोहवर पानी । परिछनचलोंहरहिहर्षानी) इहांसे लेइ करि वो (हरगिरिजा कर भयउविवाहू । सकलभुवन भरिरहाउछाहू ॥ इहांतकजानो हिमऋतु वो लक्षप्रभु जन्मउत्तवको (नांदीमुखश्राहकरिजातकर्मसबकीन्ह ) इहां से लइकरिवो (धोउनामगुरुहृदयविचारी) ॥ इहांपर्यंत जानाशिशिरकतु ७१ वर्णब रामविवाह समाज सोमुदमंगलमयऋतुराजू ७२ टी। श्रीरामचंद्र के विवाहकी समाजको जो वर्णन है सो मुदमंगल ११२ रामायण मानसप्रचारिका बा। मयऋतुराजबसंतहै जैसेवसंतऋतु सर्ववृक्ष पल्लवफूलसे नानारंग के शो- भित होते हैं तैसे श्रीरामविवाहकीसमाजहै मयमण्डपकी रचना वोबरात को बनाव जो हाथिनपर झूल अंबारी घोड़ेन पर जीनपोश स्थन पर चॅदवा नानारंगके लगेहैं वो पयदलन में नानारंगको भूषण बसन पहिरे हैंसोई बसंत की शोभा बनिरहीहै वो जैसे बसंत ऋतुराज है तैसे सब लीला को रामविवाह समाज राजाहै ( लक्ष राम विवाह समाज को) हाटबाट मंदिर सुरबाप्ता । नगर सँवारहु चारिहुपासा ॥ इहांसे लेइकरि वो। बामदेव आदिक ऋषय पूजत सकल महीश ॥ इहांपर्यतजानौ७२।। ग्रीषमदुसहरामबनगवनू पंथकथापरातपपवन ७३ टी० । जैते सरयूमें ग्रीष्म ऋतु परत है सो है तो गरम पर सरयू में शीतलहै वो सुखद वर्षाको अागमहै जितना ग्रीष्म तपै तितनी वर्षा होइ तैसे कीर्ति सरयू में श्रीराम बनगवन की कथा जो है सोग्रीष्म ऋतुहै ग्रीष्मऋतु में घाम पवन तीक्ष्ण होतहैं रामबन गमनमें पंथ कथा जोहै सो परनाम तीक्षण घाम पवनहैं (लक्ष रामबनगवन वोपंथकथा को) सजिवन साज समाज सब बनिता बंधुतमेत । बंदिविप्र गुरु चरण प्रभु चलेकरि सबहिं अचेत ॥ इहांसे लेइकरिवो बैठि बिटपतर दिवस गवाये ॥ इतना अयोध्याकांडवो ॥ जहँ जहँ जाहिं देव रघुराया । करहिं मेघ नभ तहँतहँ छाया ॥ इतना आरण्यकांड में जानौ सो वन गवन की कथाहै तौ विरहरूप ताप देनेवाली परन्तु श्रीरामकीति सरयकेसाथ त्रिताप हरिलेतहै ताते शीतलहै वो राक्षसनके युद्धरूप वर्षाको आगम है जातेसबको सुख होइगो ७३ ॥ बरपाघोरनिशाचररारी सरकुलशालिसमंगलकारी ७४ टी० । अब बर्षाऋतु कहते हैं कि निशाचरनसे जो घोरगरी भई है सोई बर्षाऋतु हैजैसे बर्षाऋतु में धानके आनंद मंगल होत है तैलेनिश चरन की रारी में देवकुल जो शालिनाम धानहैं तिनको मंगलकारीभयो (लक्ष निशाचान की रारि को) मिलाअतुर बिराध मगजाता । श्रावत ही रघुशीर निपाता ॥ यह प्रथम पुरवइया चली मेघ आये ( पुनः ) तेहि बूझा सब कहेसि बुझाई । यातुधान सुनिसेन बनाई ॥ इहां से लेइकरि धुदेखि खरदूहण केरा । इहांपर्यत बड़ाभारी दवंगराहै वो ॥ कतहु होइ निश्चर सन भेटा । प्रानलेहिं इकएक चपेटा (पुनः) कछमारेकछु ॥ ॥ रामायण मानसप्रचारिका बा। १४३ जाइपकारे । वोलंका जराइकै ॥ पूछघुझाइ खोइ श्रम । पर्यन्तयह एक दवंगराहै फेरिजब कुंभकरण मेघनाद रावणकी रारी सो घोर बर्षा है काहेते किजामें घोरवर्षा को रूपकभारीहै ( लक्ष ) यहिकेबीच निशाचर अनी । कप्तमसाति आई अतिघनी ॥ देखिचलेसन्मुखकपिभट्टा । प्रलय कालके जनु घनघट्टा॥ व इहांसे लेइकरिवो ॥ बहुभट बहेचढ़े खगजाहीं जनुनावरि खेलहिं सरिमाहीं ॥ इहांपर्यंतघोररारि आगेरावणके युद्धभरि कुवारी वर्षा है ७४॥ रामराज्यसुखविनयबड़ाई विशदसुखदस्वइशरदसुहाई ७५ टी० । श्रीरामचन्द्र के राज्यको सुख वो विनय वो बड़ाई सो कीर्ति सरिमें शरदऋतु पस्योहै सो कैसोहै कि विशदनाम उज्ज्वल वोलुखदाता वो स्वच्छ शोभायमान रामराज्य में इहांतक ब्रह्माण्ड भरि सातौदीप उज्ज्वल भये कि श्रीमन्नारायण क्षीर समुद्र ढूढ़ते है वो महादेव कैलाश हृढ़ते हैं वो इन्द्र ऐरावत हाथी ढूंढ़ते हैं वो राहु चंद्रमाढूढ़ते हैं वो ब्रह्मा हंस ढूंढ़तेहैं (प्रमाणं) हनुमान्नाटके ॥श्लोक ॥ महाराजश्रीमन्जगति यश सातेधवलिते पयःपागवार परमपुरुषोयंमृगपते ॥ कप: कैलाशंकुलिश भद्रौमंकरिवरं कलानाथराहुःकमलभवनोहं समधुना इति ॥ (लक्ष) रामराज्य तुख विनय बड़ाई ॥ वो ॥ रामराज्य बैठे त्रैलोका ॥ इहांसेवो रामराज्यनभगेशसुनु सचराचर जगमाहिं । कालकर्म स्वभावगुण कृतदुख काहुहिनाहिं ॥ यहां पर्यंत जानो ७५ ॥ सतीशिरोमणिसियगुणगाथा स्वइगुण अमलअनूपमपाथा७६ टी०बइहांसेगुणकहतेहैं कि सतिनकी शिरोमणि श्रीजानकीजीतिनके गुणगाथ जोहैं सो यह अनूपम रामयगजलकोनिर्मलतागुण है जो कहौ कि एकबेरनिर्मलतागुणतगुणलीलाको तौसुनो उहांप्रथमतौ साधुरूप मेधके मुखतेजबळूट्योहै तबकहेफिरिजबबुद्धिरूपभूमि परयोतब वहीगुण कळू बुद्धिके गुणलियेकहे फेरिजब कवितारूप नदीमें पायो तब कळू कविता के गुण लियेकहे वो जोअच्छे विचारो तो सगुणलीला वो सियगुण गाथा एकै देखिपरत? काहेते कि जहाँ श्रीजानकीजको स्वरूपकहाहै तहां श्री रघुनाथ जानकी को एककहा है वो जब अवतारदशा में लीलाकहे तब जानकी जूको सेवकमें कहा सो यही रामयशको निर्मलकरैहै जो कदा- चित् श्रीजानकी जी ऐसा लीला प्रकरण में न करती तो शोभा न होती १११ रामायण मानसप्रचारिका बा। ताते विचारिलेउ अब सिय गुणगाथाको (लक्ष ) पति अनुकूल सदारह सीता । शोभाखानि सुशील विनीता ॥ जानति रूपासिंधु प्रभुताई । से- वतिचरण कमल मनलाई ॥ यद्यपिगृह लेवक सेवकीनी । विपुल सकल सेवाविधिलीनी ॥ निजकरगृह परिचर्या करहीं । रामचन्द्र आयसु अनु- सरहीं ॥ जेहि विधिरूपा सिन्धु सुखमानहिं । स्वइकरि सिय सेवा विधि जानहिं ॥ कौशल्यादि सासु गृहमाहीं । सेवहि सबहिं मानमद नाहीं ॥ उमारमा ब्रह्मानिवंदिता । जगदंबा संतत मनिन्दिता ॥ जासुकृपाकटाक्ष सुर चाहतचितवनि सोइ । रामपदारविन्दरतिरहति स्वभावहिखोइ ७६ भरतस्वभावसुशीतलताई सदाएकरसबरणिनजाई ७७ टी। श्रीभरतजी को सुन्दर भाव जो है सोई श्रीराम यश जल जो कवितरूप नदीमें भरोहै तितका शीतलगुण है पर सदा एकरस सो भरत जीको सुन्दर भाव वर्णा नहींजाइ है जो कहो वर्णा नहीं जाइहै तो कहतेहौ क्या तहां भावनहीं कहा है भावकीदशा कही है जो दशादेखि के भाव अकथढ गयो है (लक्ष भावदशा कि अयोध्याकी सभा में) सानी सरलरसमातुवाणीसुनिभरतव्याकुलभये। लोचन सरोसह श्रवत सोंचत विरहउर अंकुर नये । सो दशा देखत समय तेहि विसरी सबहि सुधि देहको ॥ (पुनः) रामसखासुनि स्यन्दन त्यागा । चले उतरि उमगत अनुरागा ॥ (पुनः) मांगउँ भीष त्यागि निज धमू। भारत काह न करें कुकम ॥ असजिय जानिसुजान सुदानी । सुफलकरौ जग याचकबानी ॥ (दोहा) अर्थन धर्मनकामरूचि पद न चहौं निर्वाण । जन्मजन्न रतिराम पद यहबरदाननआन ॥ जानहिं राम कुटिल करिमोहीं । लोग कहैं गुस साहिबद्रोही ॥ सीताराम चरण रतिमोरे । अनुदिन बढ़े अनुग्रह तोरे ।। (प्रसंगभरिपुनः) करतप्रणामचलेदोउभाई । कहतप्रीतिशारद सकुचाई ॥ इत्यादि चित्रकूट कीसभा भरिमें ठौर ठौर है वो जबफिरि श्रीअयोध्याजी में नन्दीग्राम में बैठे तब इत्यादि प्रसंग सुन्दर भावदशाके जानो ७७ ॥ अवलोकनिबोलनिमिलनि प्रीतिपरस्परहास ॥ भायप भलि चहुँ बन्धुकी जलमाधुरीसुवास ७८ टी० । चारिउभाइनकीपुसमें परस्पर अवलोकनिजोहै वोबोलनिनोहै वो मिलनिजोहै वो प्रीतिजोहै वो हास्यजोहैसो यह जलकी माधुरी नाम मिष्ठगुणहै वो चारिउ भाइनको भायप जोहै सो यहजलकीसुगन्धतागुणहै रामायण मानत प्रचारिका बा १४५ अबक्रमहीतेसबको(लक्ष्य)सुनोअनुरूपदर दुलहिनिपरस्पर लखि सकुचि हिय हर्षहों । यामें ध्वनि करिकै अबलोकनि वो हास्य दोऊ सिद्धिहोत हैं वो । जिन वीथिन्ह विहरहिं सब भाई (पुनः) अनुज सखा सब लेहि बुलाई । वनमृगयानितखेलहिं जाई। यहिपदमें ध्वनिकरिक बोलनिसिद्धि होतिहै वो । बरवशलियेउठायउर लायेकृपानिधान । भरतरामकी मिलनि लखि विसरेउसबहि अपान ॥ मिलिप्तप्रेम रिपुसूदनहि केवट टेउराम । भूरिभाग्यभेटे भरतलक्ष्मणकरतप्रणाम । भेटेउ लषण ललकि लघुभाई । इत्यादि वो उत्तरकांडमें मिलापचारिउ भाइनकोहै अब प्रीतिसुनो। सेव- हिंसानुकूलसबभाई। रामचरणरतिप्रतिअधिकाई। हनिधिविधिहिमना- वतरहहीं । कबहुँकपालुहमहुंकछु कहहीं ॥ रामकरहिभातनपरप्रीती। इत्यादि परस्पर प्रीतिजानो सो यहबोलनिअादिवो हास्यतपांच जोहै सो यह जलकी माधुरीनाम मिष्ठगुणहै अब भायपसुनो। जनमेएकसंगसब भाई।भोजनशयनकेलिलरिकाई। कर्णवेधउपवीतविवाहू।संगसंगसंबभयंउ उछाहू ॥ विमलवंशयह अनुचितएका । बंधुविहाय बड़े हिअभिषेका ॥ यह राघवकी वोअब भरतकीबोरसुनो।विनुरघुवीरविलोकिंवासारहेप्राणसहि जगउपहासू ॥ रामपुनीतविषयरसरूखोलोलुपभूमिभोगकेभूखे ॥ कहलगि कहौंहदयकठिनाई । निदरिकुलिसजेहिलहीबड़ाई ॥ यह भायपकिभरत बिना श्रीरामचन्द्र पिताकीदई राज्य अङ्गीकार न करे वो सोई भरतजी गुरु मातापिता स्वामी सबकी दईराज्य श्रीरामबिनु नकरे श्रीरामपाव हरीको राज्यसिंहासनपर बैठारि अापुराज्यके कामकाज देखते रहे वो ले- क्ष्मणजी श्रीरामचन्द्रमें शामिल वो शत्रुघ्नजी श्रीभरतजी में शामिल हैं यह भायपजलको सुवासगुणहै ७८ ॥ आरतिविनयदीनतामोरी लघताललितसवारिनयोरी ७६ टी० । अबजलको हलुकई गुण श्रीगोस्वामीजी महाराज कहते हैं कि हमारी आर्ति वो विनय वो दीनता जो इसग्रंथमें ठौरठौर है सो लघुता है परथोरी नहीं बहुतहै लघुतासुवारिमें लालित्य है कुछ अशोभित नहीं काहेकि जो सायत जलमें सबगुण होइ एकहलुकई न होई तो वह जल बादी होताहै ताते लघुतालालित्यहै जो गोस्वामीजीइतनीलघुता अपनी न कहते विनय न करते तो अभिमानीसूचित होते तब ऐसोनिर्पक्ष एक अंगीग्रन्थ चलनो अशक्यरह्यो सोई बादीतल्य भयो जन स्वामीज की है रामायण मानसप्रचारिका मा। आतिविनय दीनता सुनी तबसबकोऊ सराहिकै धारण किये ताते हलु. कई लालित्यहै (लक्ष्य) मंगलाचरण में बहुत है वर्णानांसे लेइवो ३५दोहा ताई बीच में और प्रसंगभी है ७८ ॥ अद्भुतललितसुनतगुणकारी आशपियासमनोमलहारी ८० टी०। ऐसो अद्भ तनाम आश्चर्य जलको सुनतमात्र गुणकारीहै कौन गुणकारी कि आशारूपपियास वो मनकोमलजोपापतिसकोहरिलेतहै८०॥ रामसुत्रेमहिपोषतपानी हरतसकलकलिकलुषगलानी ८१ टी०। (पुनः ) यह जल कैसोहै कि रामचन्द्र विषे जो प्रेम तिस पोषने वालाहै नाम प्रेम को बढ़ावतहै वो सकल कलिको कलुषजो पाप वो ग्लानि तिसको हरिलेतहै ८१ ॥ भवश्रमसोखकतोषकतोषा शमनदुरितदुखदारिददोषा ८२ टी०। (पुनः)यह कैसो.है किभवश्रमजोजन्ममरणतिसकोसोखक नाम मिटावने वाला है (पुनः)संतोषऊको संतोषकरनेवालाहै वो दुरित जो दु. स्कृत करणी वोदुःख वो दारिद्र वोदोष इन सबकोनाशकरनेवालाहै ८२।। कामक्रोधमदमोहनशावन विमलविवेकविरागबढ़ावन ८३ टी०। (पुनः) काम क्रोध मद मोह इनसबकेनशावने वालाहैवोविम- ल विवेक वो विमल वैराग्यतिप्तको बढ़ावनि हारोहै ८३ ॥ सादरमज्जनपानकियेते मिटहिंपापपरितापहियेते ८४ टी। ऐले राम यश रूप जल में सादर कही आदर पर्वक मज्जन तुल्य श्रवण वो पान तुल्य धारण कियेते पाप तथा परिताप हृदय ते मिटि जाते हैं ८४॥ जिन्हयहिबारिनमानसधोये तेकायरकलिकालबिगोये ८५ टी। अब श्री गोस्वामीजी महाराज कहतेहैं कि जिन्ह प्राणिन यह रामयशरूप वारिमें अपनो मानस नधोयो नाम इसमानसको धारणकर अपने मनको न शुद्धकियो ते कायर नाम कपटी, तिनको कलिकालवि- गोये नाम ठगिलियोहै ८५॥ तृषितनिरखिरविकरभववारी फिरहिमृगाजिमिजीवदवारीट
रामायण मानसप्रचारिका वा।
टी । ते प्राणी तृषित मृगाकीनाई विषयरूप मृगतृष्णाको रातिदिन
धावतेफिरतेहैं दुःखित_कै कुछ हाथनहीं लागतहै ८६ ॥
दो० मतिअनुहारिसुबारिगुण गणगणिमनअन्हवाइ ।।
सुमिरिभवानी शंकरहि कहकविकथासुहाइ ८७
इतिषोड़शप्रकरणम्।
टी। अब श्री गोस्वामीजी महाराज कहतेहैं कि अपनी मतिके अनु.
हारि सुवारि जो श्रीरामयश तेहिको गुण गण कही समूह तिनको गनि
कही विचारिक मन अन्हवाइकही मनको उसी में प्रवेशकरि श्री भवानी
शंकरको सुमिरिकै तब कवि जोमैं तुलसीदास सो श्रीरामचन्द्रकीसुहाई
कथा जोहै सो कहतहौं देखिएतौ जो मन मतिको पूर्वरंक कहारहा सो
शंभुके प्रसादते मतिहुलसी हुलसिकै रामयश मानसको अवलोकनिकरि
उत्तीमें गोतालगाइ विमलभई तब रामयग मानसको गुणगण विचारने
लगी तो विचार मनको प्रवेशकरि दोनों विमलभये तब कवि रामकथा
कहनेको उद्यतभये ८७॥
इतिश्रीरामचरित्रमानसप्रचारिकायांमानससरयूरूपक
वर्णनोनामषोडगोकर्यः१६॥
यह प्रचारिका पढ़नेवालोंपर प्रकटहोय कि जो पोड़गकर्य लिखा
सो षोड़श प्रकरण जानो॥
दोहा॥
संवतदश नौसे गनौ और बत्तिस जान ॥
मानसकीपरिचारिका जन्मलियोपतमान १
इति ॥
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कीमत ( ३ ) श्रीगोस्वामितुलसीदासकृतबहुतमोटे अक्षरोंकीरामायणमूल ॥ इसको बालक और वृद्धभी सुगमतासे पढ़सक्तेहैं और इसमें श्रीराम- चरित्र के विशेष रावणविजय, श्रीगंगाजीकी कथा, रामदलसेना संख्या, महिरावण, नारान्तक,सुलोचना आदिकी कथा के क्षेपक भी संयुक्तहैं और जगह २ सर्व कथात्रों के अनुसार तसवीरें भी शामिल कीगईहैं--पत्थर में कपीहै कीमतहिनाई कागजकी १॥ सपेद काग़ज़ के २) तथा छोटी रामायण मूल ॥ इसमें भी सब ऊपर के आशय संयुक्तहैं पत्थर के छापेकी कीमत१) अन्य छोटी रामायण टैप के छापे की काग़ज़ गुन्दा सपेद ऊपर के लिखे सब अलंकारों समेत कीमत 1) गीतावली गोस्वामि तुलसीदास कृत॥ अनेक रागों में रामचन्द्रजीके बालचरित्रादि समस्तलीला युक्त हैं । तथा सटीक इसमें सुख बोध और सबके समझने समझानेके लिये भाषा टीका संयुक्तहै कीमत ) तुलसीदासकृत कवितावली रामायण।। प्रसिद्ध तुलसीदास कृत कवित्त्वों मेरामायण है ॥ तथा सटीक॥ इसमेंभी अतिसरल टीका शामिल कीगईहै कीमत।।-) तुलसीदास कृत दोहावली॥ इसमें सातसौ दोहोंमें विचित्र रामचरित्र वर्णितहै - श्री तलसीकतरामायणमलकेसर्वकांडअलगरमीमिलसक्त हैं १ बाल कांड क्रीमत 10 अयोध्या कांड कीमत U ३ अरण्य कांड १ किष्किधा कांड DI ५ सुन्दर कांड ६ लंका कांड क्रीमत ७ उत्तरकांड. कीमत क्रीमत कीमत -05 50 कीमत (१) तुलसीकृत रामायण का कोष ॥ इसमें सातोंकांड रामायणके कठिन शब्दोंके अर्थविवेचनासहित) तुलसी कृत रामायण का इतिहास॥ इसमें सातों कांडरामायणके अन्तर्गतसंयोगिकइतिहास, कीमत- ।। श्री महाल्मीकि रामायण सातोंकांडभाषा॥ इल प्रसिद्ध धौर प्रमाणिक संस्कृत रामायण का यन्त्रालय के अति वित्त व्ययले अवध मण्डलान्तर्गतअयोध्या संस्कृत पाठशालाके तृतीया- ध्यायक पंडित महेशदत्त जी शुक्ल ने प्रत्यक्षर देवनागरी भाषा के अनु- सारउल्थाकिया और श्लोकार्थ जानने के निमित्त प्रति श्लोक केउल्था के उपरांत अंकभी रखदिये कि लोक लगाने में भूम न पड़े परिपूर्ण सातोंकांड विद्यमानहैं अक्षर अतिस्पष्ट कि वह और बालकभी सुगमता से पढ़ सके हैं ५) श्री रामायण रामविलास इस रामायण को अवध मण्डलान्तर्गत पीरनगर निवासि ईश्वरी प्र. साद शर्मा ने संस्कतवाल्मीकि का आप लेकर दोहा चौपाई कवित्वादि पद्यमें रामाश्वमेध की कथा पूर्वक रचना किया उत्तमोतम छापीहै ।। रामायस अध्यात्मविचार। कोलाय नगर निवासि पंचोली पंडित यमुना शंकर मागर बामण कृत-इसमें वेदान्तशास्त्र के बिचार कर्ता अधिकारी पुरुषों के विचारार्थ श्री रामचरित्र को अध्यात्म बिचार( वेदान्त मास्त्र) कोरीति श्रुति सम- न्वय पूर्वक निर्मित किया कि वेद के अनुसार ही समचरित्र वर्णन कियाहै केवल बालकांड छपकर तब्धार है कासज बहुत गुन्झ सपेद कीमता) बहुत समायण ॥ परमप्रेमी लालमनी रचित-इसमें श्रीमहारानी सीताजी की कराल शक्तियों का उपजकर महिरावणके मानहोनेकीलीला भाषा पद्य वर्णन कीगई है ॥ जोमनष्य वह पस्तके मोललेनामा उनको ताजगना और किफायत सेभी मिलसकती हैं रूपाकरके खतपत्रकेद्वारा छापेमानेको इतिलाअदें ।।
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