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Shree Brahman Geeta
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הבובובובובובובבלוג 4. -MAIN 13.221 MARATEसाहाय ग. २५४२ ६ PUR ब्राह्मण गीता अर्थात् ॥ भगवान कृष्ण की दूसरी गीता ॥ . अनुवादक विद्यानिधि साहित्याचार्य श्री पं० व्यासदेव शम्मा शाली एम० ए० एल-एल० बो० इत्यादि प्रकाशक- सरस्वती आश्रम, दिल्ली। प्रथम संस्करण] १९९२ वि० [मूल्य केवल ।। SENTERTERESTERESTERES5555 प्रकाशक- सरस्वती आश्रम, २२१ कूचा बुलाको बेगम, दिल्ली । श्रीमान् सरस्वती आश्रम का पहला पवित्र ग्रन्थ ब्राह्मण गीता आपके हाथ में है । इस गीता की महानता को आप स्वयं अनुभव कर सकते हैं। आपका कर्तव्य है इसे भारी संख्या में मंगावे और अपने मित्रों को एक प्रति लेने के लिये प्रेरित करें। - मुद्रक- कुमार प्रिन्टिङ्ग प्रेस, बाजार गुलियां, दिल्ली।
( क ) दो शब्द यह सर्व मान्य सिद्धान्त है कि महर्षि वेदव्यास प्रणीत महा भारत भारतीय ज्ञान विज्ञान का अक्षय भंडार है। यह उक्ति सर्वथा सत्य है, कि महाभारतकार ने इस ग्रन्थ में सब ही विषयों का दिग्दर्शन कराया है अध्यात्म विषय तो इसमें कूट कूट कर भरा हुआ है । कहीं भीष्म पितामह ने उपदेश दिया है, कहीं ऋषियों ने ज्ञान का स्रोत बहाया है और कहीं पर भगवान कृष्ण ने स्वयं ज्ञान- गंगा में अर्जुन को गोते दिये हैं । विश्व विख्यात श्री मद्भगवद्गीता इसी महाभारत रूपो महा सागर का एक अनुपम रत्न है। पारखियों ने इस रत्न को बहुत प्राचीन काल में ही परख लिया था, और तब से ही यह ग्रन्थ सर्वमान्य हो गया है। भारतीय प्राचीन प्रायः सभी धर्माचार्यों ने इस पर टीकायें लिखी थीं। भगवद्गीता के स्वाध्यायी यह जानते हैं कि भगवद्गीता श्री कृष्ण जी का वह उपदेश है जो श्री कृष्ण जी ने अर्जुन को रण- स्थली में दिया था और उसका मुख्य उद्देश्य रणविमुख अर्जुन को रण में प्रवृत करना था । इसलिये वह तात्कालिक उपदेश था । इसके अनन्तर युद्ध समाप्ति पर जब सब ओर शांति स्थापित हो गई और श्री कृष्ण जी ने द्वारिका प्रस्थान की तैयारी की उस 'समयं अर्जुन के हृदय में धर्म की जिज्ञासा उत्पन्न हुई । तब श्री कृष्ण जी ने जो उपदेश दिया वह ब्राह्मण गीता के नाम से विख्यात है। यह गीता महाभारत के अश्वमेधपर्व में सोलहवें अध्याय से चौतीसवें अध्याय तक है। -- " (ख) यह गीता ब्राह्मण तथा ब्राह्मणी के सम्बाद मप में है हमालय इसका नाम ब्राह्मण गीता है। हमें यह लिखने में तनिक भी संकोच नहीं है कि ब्राह्मण गीता श्रीमद्भगवद्गीता से किमी अंश में भी कम नहीं है प्रत्युत उससे बढ़ कर है इसका मुख्य कारमा यह है कि यह उपदेश अर्जुन की जिज्ञासा पर शान्त वायु मंडल में दिया गया है। हम निःसंदेह कह सकते हैं कि निम्नलिम्वित श्लोक, ब्राह्मण गीता के लिये भी उसी प्रकार उपयुक्त हैं जिस प्रकार श्री मद्भगवद्गीता के लिये। सर्वोपनिपदो गावो दोग्धा गोपाल नन्दनः । पार्थो वत्सः सुधीभॊक्ता दुग्धंगीतामृतम् पयः ।। इस गीता का प्रतिपाद्य विषय यह है कि मनुष्य अपनी इन्द्रियों को वश में करके निष्काम कर्म तथा ज्ञान द्वारा लोक और परलोक में कल्याण प्राप्त करे। हमें पूर्ण आशा है कि सज्जन गण इस गीता का स्वाध्याय कर अभीष्ट फल की प्राप्ति के लिये यत्न शील होंगे। यदि जनता ने इसे अपनाया तो हम बहुत शीघ्र ही उन रत्नों को भी प्रकाशित करेंगे जो अब तक इस ब्राह्मण गीतावत् भारत- रूपी ज्ञानवारिधि में छिपे हुए हैं। परमपिता परमात्मा का अत्यन्त धन्यवाद है उसकी अपार कृपा से अनेक विघ्न बाधाओं के उपस्थित होने पर भी हम इसके प्रकाशन में समर्थ हुए। वसंत पंचमी १९९२ वि० व्यासदेव शर्मा .
प्रोम ब्राह्मण प्रथम अध्याय जनमेजय उवाच-- सभायां वसतोस्तन निहत्त्यारीन्महात्मनः। केशवाजुनयोः का तु कथा समभवद् द्विज ॥१॥ जनमेजय ने कहा-हे ब्राह्मण ! शत्रुओं का नाश करने के अनन्तरमहल में रहते हुये महात्मा श्रीकृष्ण और अर्जुन का क्या वार्तालाप हुआ ॥१॥ वैशम्पायन उवाच- कृष्णेन सहितः पार्थः स्वं राज्यं प्राप्य केवलम् । तस्यां सभायां दिव्यायां विजहार मुदा युतः ॥२॥ वैशम्पायन बोले-~-अर्जुन अपने राज्य को प्राप्त करके उस अत्यन्त सुन्दर महल में श्रीकृष्ण जी के सहित आनन्द पूर्वक रहने लगे ॥२॥ तत्र कंचिस्सभोद्देशं स्वर्गाद्देशसमं नृप । यदृच्छया तो मुदितौ जग्मतुः स्वजनावृतौ ॥३॥ - २] ब्रा हा ण गीता [प्रयन अध्याय एक समय वे दोनों अत्यन्त प्रसन्न नथा चपन सम्बन्धियों सहित उस महल के स्वर्ग के समान एक रमणीक स्थान में गये || ततः प्रतीतः कृष्णेन सहितः पाण्डवोऽर्जुनः । निरीक्ष्य तां सभा रम्यामिदं वचनमब्रवीत् ॥४॥ उसके अनन्तर श्रीकृष्ण जी के सहित अर्जुन महल के उस रमणीक स्थान को देख कर यह बोला ||४|| विदितं मे महाराह संग्रामे लनुपस्थिते । माहात्म्यं देवकीमातस्तच ते रूपमेश्वरम् ॥५॥ हे देवकी पुत्र महावोर ! युद्ध के आदि में जो आपने मुझे अपना दिव्य रूप तथा माहात्म्य दिखलाया था वह मुझे ज्ञान है।।५ यसगवता प्रोक्तं पुरा केशव सौहदात् । तत्सर्व पुरुषव्याघ्र नष्टं मे व्यनचेतसः ॥२॥ किन्तु पुरुषों में श्रेष्ठ हे केशव ! मित्रता के कारण जो कुछ आपने मुझे उपदेश दिया था वह सब चित्त की चंचलता से मैं भूल गया हूँ.||६|| मम कौतूहलं त्वस्ति तेष्वर्थेषु पुनः पुनः । भवास्तु द्वारकां गन्ता नचिरादिद माधव ॥७॥ अव आप.शीघ्र ही द्वारका जाने वाले हैं और उन विषयों के जानने की मेरे हृदय में वार २ उत्कट इच्छा उत्पन्न होती है ।।७।।
३ ....... ~--~-.. प्रथम अध्याय ] ना हा रण गीता [३ वैशम्पायन उवाच- एवमुक्तस्तु तं कृष्णः फाल्गुनं प्रत्यभाषत । परिष्वज्य महातेजा वचनं वदतां वरः ॥८॥ बैशम्पायन बोल यह सुन कर भापण करने में चतुर तथा • तंजम्त्री श्रीकृष्ण जी ने अर्जुन का आलिङ्गन करके यह कहा ॥८॥ वासुदेव उवाच- श्रावितस्त्वं मया गुह्य ज्ञापितश्च सनातनम् । धर्म स्वरूपिणं पार्थ सर्वलोकांश्च शाश्वतान् ॥६॥ श्रीकृष्ण बोले हे अर्जुन ! मैंने तुम्हें अत्यन्त गोपनीय तथा सनातन सम्पूर्ण धर्म का तथा नित्य लोकों का उपदेश किया था। अबुद्धया नाग्रहीर्यस्त्वं तन्मे सुसहदप्रियम् । न च साऽथ पुनर्भूयः स्मृतिमें संभविष्यति ॥१०॥ किन्तु मन्द बुद्धि होने से तुमने उसको धारण नहीं किया यह मुझे अच्छा नहीं प्रतीत होता, और आज वह उपदेश मुझे भी याद नहीं है ॥१०॥ नूनमश्रद्दधानोऽसि दुर्मेधा ह्यसि पाण्डव । न च शक्यं पुनर्वक्तुमशेषेण धनंजय ॥११॥ हे अर्जुन ! तू श्रद्धा तथा बुद्धि से रहित है मैं आज उस सम्पूर्ण उपदेश को फिर कहने में असमर्थ हूँ ॥११॥ .."
AN - ४] ब्रा ह्मण गो ता [प्रथम अध्याय स हि धर्मः सुपर्याप्तो ब्रह्मणः पदवेदने । ल शक्यं तन्मया भूयस्तथा वक्तुमशेषतः ॥१२॥ वह उपदेश ब्रह्म के प्राप्त करने में पर्याप्त था किन्तु मैं आज उस सम्पूर्ण उपदेश को दुबारा नहीं कह सकूगा ।।१२।। पर हि ब्रह्म कथितं योगयुक्तन तन्मया । इतिहासं तु वक्ष्यामि तस्थिवर्थे पुरातनम् ॥१३॥ उस समय समाधिस्थ होकर मैंने परब्रह्म का उपदेश दिया था और अब उसी विपय को स्पष्ट करने के लिये तुम्हें एक प्राचीन उपाख्यान सुनाऊंगा ।।१३।। यथा तां बुद्धिमास्थाय गतिमार्यो गमिष्यति । शृणु धर्मभृतां श्रेष्ठ गदितं सर्वमेव मे ॥१४॥ हे धर्मात्माओं में श्रेष्ठ ! तुम उस उपदेश को सुनकर ज्ञान को प्राप्त करके उत्तम गति को प्राप्त होगे, इसलिये उस सम्पूर्ण उपा- ख्यान को सुनो ॥१४॥ आगच्छवाह्मणः कश्चित् स्वर्गलोकादरिन्दम । ब्रह्मलोकाच्च दुधर्षःसोऽस्माभिः पूजितोऽभवत् ॥१५॥ हे शत्रुओं का नाश करनेवाले अर्जुन ! एकबार एक श्रेष्ठ ब्राह्मण स्वर्गलोक तथा ब्रह्मलोक से लौटकर आये और हम लोगों ने उनका आदर सत्कार किया ।।१५।। अस्माभिः परिपृष्टश्च यदाह भरतर्षभ । दिव्येन विधिना पार्थ तच्छणुष्वाविचारयन् ॥१६॥ .
प्रथम अध्याय । बामा गा गीता [५ . भग्न श्रेष्ठ ! जब हम लोगों ने श्रद्धा भक्ति में उनसे पूछा तब जो उपदेश उन्मान दिया उन्मको तुम निकाल मनि होकर सुनो नारमा उवाच- मोक्षधर्म समाश्रित्य कृपण यन्मामपृच्छथाः । भूतानामनुकम्पार्थ यन्मोहच्छद विभो ॥१७॥ तत्तेऽहं संप्रवक्ष्यामि यथावन्मधुम्दन । शृणप्वावहितो भूत्वा गदतो मम माधव ॥१८॥ नामण चोला है श्रीकृष्ण ! प्राणियों के कल्याण के लिये मोह नाशक मोक्ष धर्म के विषय में जो श्रापन प्रश्न किया है उसका मैं उचिन रीति से उपदेश कम्गा । हे कृष्ण ! तुम उसे ध्यान पूर्वक सुनो ।। १७~१८ ॥ कश्चिदिप्रस्तपोयुक्तः काश्यपो धर्मवित्तमः । आससदा दिजं कंचिद्धर्माणामागतागसम् ॥१६॥ एक समय एक तपस्वी तथा धर्म के जानने वाला काश्यप नामक ब्राहाण एक बड़े धर्माचार्य तथा शास्त्रज्ञ ब्राह्मण के पास पहुंचा ॥१९॥ गतागते सुबहुशो ज्ञानविज्ञानपारगम् । लोकतत्त्वार्थकुशलं ज्ञातार्थ सुखदुःखयोः ॥२०॥ जातीमरणतत्त्वज्ञं कोविदं पापपुण्ययोः । द्रष्टारमुच्चनीचानां कर्मभिर्देहिनां गतिम् ॥२१॥ चरन्तं मुक्तवस्सिद्धं प्रशान्तं संयतेन्द्रियम् ।
ना हा ग गीता [प्रथम अध्याय दीप्यमानं श्रिया नाया कमलाणं च सर्वशः ॥२२॥ अन्तर्धानगतिज्ञच श्रुत्वा तत्त्वेन काश्यपः । तथैवान्तर्हितः सिद्धान्तं चक्रधरैः लह ॥२३॥ संभाषमाणमेक्षान्त समासानं च तैः सह । यदृच्छया च गच्छन्तमसक्त पवनं यथा ॥२४॥ तं समासाद्य मेधावी स तदा दिजसत्तमः । चरणौ धर्म कामोऽस्य तपस्वी सुसमाहितः । प्रतिपेदं यथान्यायं दृष्ट्वा तन्महदद्भुतम् ॥२५॥ : विस्मितश्चातं दृष्ट्वा काश्यपस्तं द्विजोत्तमम् । परिचारेण महत्ता गुरु तं पर्यंतोषयत् ॥२६॥ वह ब्राह्मण ज्ञान और विज्ञान के सागर तथा लौकिक व पारलौकिक विषय में चतुर,सुख और दुख को जानने वाले, ऊंच और नीच को समझने वाले, सत्य और पुण्य के रहस्य के ज्ञाता, तथा साँसारिक प्राणियों के कर्म की गति को प्रत्यक्ष अनुभव करने वाले जितेन्द्रिय, शान्त, सिद्ध और मुक्त आत्मा की तरह से इधर उधर विचरण करने वाले एवं परमात्मा की कान्ति से युक्त थे। वे महात्मा अन्तर्धान होने की शक्ति से परिपूर्ण थे। और जिस समय वो अन्तर्धान अवस्था में सिद्ध चक्रधरों के साथ एकान्त में भापण करते हुये अपनी इच्छा से निर्लप वायु की तरह जा रहे थे तब मेधावी तथा ब्राह्मणों में श्रेष्ठ तपस्वी काश्यप ने उनकी इस अवस्था को जान कर तथा उनके समीप पहुंच कर और धर्म के जानने की इच्छा से विधिवत् उनकी सेवा की और उनके -- } w::":", प्रथम अध्याय ] ना हरण गीता [७ इन अत्यन्त अद्भुत गुणों को देख कर द्विजों में श्रेष्ठ काश्यप अत्यन्त विस्मित हुये और उनको गुरु समझ कर सेवा से सन्तुष्ट किया ॥ २०-२६ ।। उपपन्नं च तत्सर्व श्रुतचारित्रसंयुतम् । भावनातोषयच्चैनं गुरुवृत्त्या परन्तप ॥२७॥ नान तथा कर्म में श्रेष्ट काश्यप की इस भक्ति को देख कर उम महात्मा ने गुरु के कर्तव्य से उसको सन्तुष्ट किया ॥२७॥ तस्मै तुष्टः स शिष्याय प्रसन्नो वाक्यमब्रवीत् । सिद्धि परामभिप्रेक्ष्य शृण मत्ती जनार्दन ॥२८॥ काश्यप से प्रसन्न होकर और उसे शिष्य समझ कर उसने यह कहा कि तुम वह उपदेश मुझ से सुनो जिससे बड़ी भारी सिद्धि अर्थान् मोक्ष को प्राप्त कर सकते हो ॥२८॥ सिद्ध उवाच- विविधैः कर्मभिस्तात पुण्ययोगैश्च केवलैः । गच्छन्तीह गतिं मां देवलोके च संस्थितिम् ॥२६॥ सिद्ध बोला हे शिप्य ! केवल भिन्न २ प्रकार के कर्मो से तथा पुण्यों से मनुष्य इस संसार में गति को प्राप्त होते हैं और देवलोक मं निवास करते हैं ॥२९॥ न कचित्सुखमत्यन्तं न कचिच्छाश्वती स्थितिः। स्थानाच महतो भ्रंशो दुःखलब्धास्पुनः पुनः ॥३०॥..
वाम गण गीता ८] [प्रथम अध्याय न कहीं अत्यन्त सुख है और न कहीं नित्य निवास ही होना है और बड़े कष्ट से प्राप्त करके उच्च पदी से बारम्बार गिरना होता है ।॥३०॥ अशुमा गतयः प्रासाः कष्टा ने पापसेवनान्। काममन्युपरीतेन तृष्ण्या मोहितेन च ॥३१॥ मैने पापों के कारण काम, क्रोध, ताणा और मोह से युक्त होकर बहुत सी कष्ट देने वाली बुरी नतियों को प्राप्त किया था ।।३१ पुनः पुनश्च मरणं जन्म चैव पुनः पुनः । आहारा विविधा सुक्ताः पोत. नानाविधाः स्तनाः ॥ मैंन बार बार जन्म और मरण को प्राप्त किया था नाना प्रकार के भोजन किये, और तरह तरह के स्तन पिये ॥३२॥ मातरो विविधा दृष्टाः पितरश्च पृथग्विधाः। सुखानि च विचित्राणि दुःखानि च मयाऽनघ ॥३३॥ बहुन सौ माताएं देखी, बहुत से पिता देखे और विचिन सुख और दुख भोगे ॥ ३३॥ प्रियैर्विवालो बहुशः संवासश्चाप्रियः धननाशश्च संप्राप्तो लब्ध्वा दुःखेन तद्धनम् ॥३॥ अपने मित्रों में भी रहा, शत्रुओं के साथ भी रहा, और बड़े कष्ट से धन को प्राप्त करके उस धन का नाश भी देखा ॥३॥ अवमानाः सुकष्टाश्च राजतः स्वजनात्तथा । शारीरा मानसा वाऽपि वेदना भृशदारुणाः ॥३५॥ सह।
- प्रथम प्रध्याय ] प्रागण गीता [९ कादमियों में तथा अपने सम्बन्धियों से बड़े कष्टप्रद अरमान को मारा, और शारीरिक एवं मानसिफ अत्यन्त कठिन दुब भी भोगे ॥३५॥ प्राप्ता विमाननाश्चोग्रा वधपन्धाश्च दारुणाः। पतनं निरय चैव यातनाश्च यमनये ॥३६॥ और भी नरह तरह के अपमान सहे, मृत्यु के कठिन बन्धनों फो भी प्राप्त किया, नरक में गिरा और यमलोक की यातनाएं भी माहीं ॥३॥ जरा रोगाश्च सततं व्यसनानि च भूरिशः। लोकेऽस्मिन्ननुभूतानि द्वन्द्वजानि भृशं मया ॥३७॥ मैन इम मनार में द्वन्दों से उत्पन्न होने वाले कष्टों को, बुढ़ापे और गंगों को भी निरंनर प्राप्त किया ॥३७॥ ततः कदाचन्निर्वेदान्निराकाराश्रितेन च । लोकतन्त्रं परित्यक्तदुखार्तेन भृशं मया ॥३८॥ उनके बाद कभी इन दुखों से ऊब कर और अत्यन्त दुखी होकर निराकार परमात्मा की सहायता इन साँसारिक बन्धनों का परित्याग किया ॥ ३८ ॥ लोकेऽस्मिन्ननुभूयाहमिमं मार्गमनुष्ठितः । ततः सिद्धिरियं प्राप्ता प्रसादादास्मनो मया ॥३६॥ संसार में इन भोगों को भोग कर मैंने शुभ मार्ग का ग्रहण किया और तब मैंने मन को वश में कर के इस सिद्धि को प्राप्त से -~-~~ १०] ब्रा सण गीता [प्रथम अध्याय किया मनके हो वश में होने से अन्तर्धान आदि सिद्धियें प्राप्त होती है यह योग का विपय है ॥ ३९ ॥ नाहं पुनरिहागन्ता लोकानालोकयाम्यहम् । आसिद्धराप्रजासर्गादात्मनोऽपि गतीः शुभाः ॥४०॥ अब मैं फिर यहां नहीं आऊंगा, और मैं संसार को तथा सृष्टि की आदि से लेकर मुक्ति पर्यन्त तक को शुभ गतियों को देखता हूँ॥४०॥ उपलब्धा द्विजश्रेष्ठ तथेयं सिद्धिरुत्तमो । हे ब्राह्मण ! इस प्रकार मैंने इस उत्तम गति को प्राप्त किया है ॥४१॥ इतः परं गमिष्यामि ततः परतर पुनः ॥४१॥ ब्रह्मणः पद्मव्यक्तं मा तेऽभूत्र संशयः । नाहं पुनरिहागन्ता मर्त्यलोकं परन्तप ॥४२॥ इसके अनन्तर मैं फिर इससे भी उत्कृष्ट अनिर्वचनीय ब्रह्म पद को प्राप्त करूंगा इसमें तुम्हें सन्देह नहीं करना चाहिये और हे तपस्वी ! मैं फिर इस मृत्युलोक में नहीं आऊंगा ॥४२॥ प्रीतोऽस्मि ते महाप्राज्ञ ब्रूहि किं करवाणि ते । यदीप्सुरुपपन्नस्त्वं तस्य कालोऽयमागतः ॥४३॥ हे विद्वन ! मैं तुमसे प्रसन्न हूँ कहो ! मैं तुम्हारा क्या उपकार करूं जिस बात की इच्छा से तुम यहां आये हो उसके पूछने का यह समय है ॥४३॥ .
-~~~. -~~~- प्रथम अध्याय ] ना हा रण गो ता ११ अभिजाने च तदहं यदर्थं मामुपागतः । अचिर.त्त गमिष्यामि तेनाहं स्वामचूचुदम् ॥४४॥ यद्यपि मैं जानता हूँ कि तुम किस लिये आये हो तो भी क्योंकि मुझे शीघू यहां से जाना है इस लिये मैंने तुमको प्रेरणा की है ॥४॥ भशं प्रीतोऽस्मि भवतश्चारित्रेण विचक्षण । परिपृच्छस्व कुशलं भाषेयं यत्तवेप्सितम् ॥४॥ हे कुशल ! मैं तुम्हार चरित्र से अत्यन्त प्रसन्न हूँ इस लिये तुम मुझ ले कल्याणकारी बात पूछो मैं तुम्हें उपदेश दूंगा ॥४५|| बहु मन्ये च ते बुद्धिं भृशं संपूजयामि च । येनाहं भवता बुद्धो मेधावो ह्यसि कोश्यप ॥४६॥ मैं तुम्हारी बुद्धि की बड़ी प्रशंसा करता हूँ और उसकी पूजा करता हूँ क्योंकि तुमने मुझको पहचान लिया है इस लिये हे ! काश्यप तुम निस्संदेह बुद्धिमान हो ।। ४६ ।। . यह श्री ब्राह्मण उपनिपद गीता का प्रथमाध्याय समाप्त हुआ।
- १२] ब्रा हा गण गीता [द्वितीय अध्याय द्वितीय अध्याय वासुदेव उवाच- ततस्तस्योपसंगृह्य पादौ प्रश्नान्सुदुर्वचान् । पप्रच्छ तांश्च धान्स प्राह धमभृतां वरः ॥१॥ श्री कृष्ण जी बोले ! इसके अनन्तरं उस महात्मा के चरणों को छू कर धर्मात्मात्रों में श्रेष्ठ काश्यप ने अत्यन्त कठिन नथा . धर्म से युक्त प्रश्न किये ॥१॥ काश्यप उवाच- कथं शरीरं च्यवते कथं चैवोपपद्यते । कथं कष्टाच्च संसारास्संसरन्प रेमुच्यते काश्यप बोले भगवन ! किस प्रकार ये जीवात्मा शरीर को छोड़ता है और किस प्रकार इस शरीर को धारण करता है और किस प्रकार इस दुःख रूपी संसार में आकर उससे छूटता है ।।२ प्रास्मा च प्रकृति मुक्त्वा तच्छरीरं विमुञ्चति । शरीरतश्च निमुक्तः कथमन्यत्प्रपद्यते। जीवात्मा, प्रकृति अर्थात् बन्धन के कारण का परित्याग करके कैसे उस शरीर को छोड़ता है और शरीर को छोड़ कर पर- ब्रह्म को किस प्रकार प्राप्त करता है ॥३॥ कथं शुभाशुभे चायं कर्मणी स्वकृते नरः। उपभुङ्क्त क्व वां कर्म विदेहस्यावतिष्ठते ॥४॥ ॥२॥ .
छिनीय अध्याय ]
त्रा हा ग गीता
[१३
किस प्रकार जीव अपने शुभ और अशुभ कर्मों का भोग
करता है और जब यह जीवन्मुक्त होता है नब कर्म कहां
मान है. 1
पवं संचोदिनः सिद्ध : प्रश्नांस्तान्प्रत्यभाषत ।
भानुपूयण वापणेय तन्मे निगदतः शृण ॥५॥
इस प्रकार प्रश्न करने पर उस 'सिद्ध' ने जो उत्तर दिया
उनको द ग तुम यथावत सुनो ।।।।
सिद्ध उवाच--
आयुःकीर्तिकराणीह यानि कृत्यानि सेवते ।
शरीरग्रहणे यस्मिंस्तेपु क्षीणेषु सर्वशः ॥६॥
श्रायुःक्षयपरीतास्मा विपरीतानि सेवते ।
बुद्धिावर्तते चास्य विनाशे प्रत्युपस्थिते ॥७॥
सिद्ध बोला, आयु और कोर्ति के बढ़ाने वाले जिन कर्मों को
शरीर ग्रहण करने पर जीवात्मा करता है उनके नष्ट हो जाने पर,
क्षीण श्रायु होकर जीवात्मा उलटे कर्म करने लगता है और
विनाश काल आने पर इसकी बुद्धि उलटी हो जाती है ॥६--७।।
सत्त्वं बलं च कालं च विदित्वा चात्मनस्तथा ।
अतिवेलमुपाश्नाति स्वविरुद्धान्यनास्मवान् ॥८॥
भी
तव अपनी बुद्धि, बल, और समय को जानता हुआ
असमय और अपनी प्रकृति के विरुद्ध भोजन करता है और ऐसा
प्रतीत होता है कि इसे अपना कुछ ज्ञान नहीं है ॥८॥
१४ ]
ब्रा झण गीता [ द्वितीय अध्याय
यदायमलिकष्ठानि सर्वाण्युपनिषेवते ।
अत्यर्थमपि वा मुक्त न वा भुङ्क्ते कदाचन ॥६॥
और जिस समय जीवात्मा को बहुत से कष्ट उपस्थित होते हैं
तब या तो बहुत अधिक भोजन करता है या विल्कुल भोजन नहीं
करता है ॥९॥
दुष्टानामिषपानं च यदन्योन्यविरोधि च ।
गुरु चाप्यमितं भुङ्क्ते नातिजीणे दिवा पुनः ॥१०॥
एक दूसरे का विरोधी अर्थात् विपम भोजन जैसे बुरा अन्न,
गांस, तथा मदिरा का सेवन करने लगता है और बहुत अधिक
गरिष्ठ भोजन तथा अजीर्ण में भोजन करता है ॥१०॥
व्यायाममतिमात्रं च व्यवायं चोपसेवते ।
सततं कर्मलोभादा प्राप्तं वेगं विधारयेत् ॥११॥
बहुत अधिक व्यायाम करता है । बहुत अधिक स्त्री प्रसंग करता
है । और कर्मों के लोभ से मल मूत्रादि के वेग को रोकता है ।।११
रसाभियुक्तमन्नं वा दिवा स्वमं च सेवते।
अपक्कोन गते काले स्वयं दोषान्प्रकोपयेत् ॥१२॥
कभी नीरस तथा अधिक रसवाले भोजन करता है। कभी ।
दिन में सोता है। और इस प्रकार असमय में ही अपने वात,
पित्त, तथा कफ से उत्पन्न होने वाले दोपों को प्रकुपित कर
देता है ॥१२॥
द्वितीय अध्याय ] rh.. An. . ब्रा म ण गो ता [ १५ स्वदोपकोपनाद्रोगं लभते मरणान्तिकम् । अपि वोहन्धनादीनि परीतानि व्ववस्थति ॥१३॥ इस प्रकार दोपों के प्रकुपित होने से जीवात्मा प्राण नाशक रोगों को प्राप्त करता है या उटपटांग कान करने लगता है ।।१३।। तस्य तैः कारणैर्जन्तोः शरोरं च्यवते तदा । जीवितं प्रोच्यमानं तद्यथावदुपधारय ॥१४॥ इन कारणों से शरीर नष्ट हो जाता है । और जीवात्मा इस शरीर को किस प्रकार छोड़ देता है उसे तुम ध्यान पूर्वक सुनो १४ ऊष्मा प्रकुपितः काये तीनवायुसमीरितः । शरीरमनुपर्येत्य सर्वान्प्राणान् रुणद्धि चै । ॥१५॥ शरीर में तीव्र वायु से प्रेरित हुआ पित्त सम्पूर्ण शरीर में फैल कर प्राणों को रोकने लगता है ॥१५॥ अस्यथं बलवानुष्मा शरीरे परिकोपितः । भिनत्ति जीवस्थानानि मर्माणि विद्धि तत्वतः॥१६॥ पित्त अत्यन्त बलवान् एवं कुंपित होकर जीवात्मा के रहने के मर्म स्थानों में अत्यन्त कष्ट पहुंचाता है यह निश्चय से जानो ॥१६ ततः सवेदनः सद्यो जीवः प्रच्यवते क्षरोत् । शरीरं त्यजते जन्तुश्छिद्यमानेषु मर्मसु ॥१७॥ फिर शरीर के मर्म स्थानों में कष्ट होने के कारण अत्यन्त दुखी जीव इस शरीर को छोड़ देता है ॥१७॥ .
१६ ] ब्रा सण गीता [ द्वितीय अध्याय वेदनाभिः परीतात्मा तदिद्धि दिजसत्तम । जातीमरणसंभिग्नाः सततं सर्वजन्तवः ॥१८॥ हे ब्राह्मणों में श्रेष्ट ! सब जीवात्मा कष्टों से दुखी हुए हुवे इस जन्म मरण के बन्धन में पड़े हुवे हैं ऐसा समझा ॥१८॥ दृश्यन्ते संत्यजन्तश्च शरीराणि विजर्षभ । गर्भसंक्रमणे चापि मर्मणोमतिसर्पणे ॥१६॥ हे द्वजों में श्रेष्ठ! जीवात्मा इसी प्रकार गर्मी में जाने पर तथा शरीर के छोड़ने पर अत्यन्त कष्ट को प्राप्त होते हैं ।। १९ ।। ताशीमेव लभते बेदनां मानवः पुनः । भिन्नसंधिरथ क्लेदमद्भिः स लभते. नरः ॥२०॥ मनुष्य इसी प्रकार से वैसी ही मर्म भेदनी पीड़ा को शरीरस्थ कफ से प्राप्त होता है ॥ २० ॥ यथा पञ्चसु भूतेषु संभूतत्वं नियच्छति । शैत्यात्प्रकुपितः कार्य तीबवायुसमीरितः ॥२१॥ यः स पञ्चसु भूतेषु प्राणापाने व्यवस्थितः । स गच्छत्यूगो वायुः कृच्छान्मुक्त्वा शरीरिणा२२ जब पंच भूत का मेल नष्ट होता है तव शीत से प्रकुपित होकर और तीक्ष्ण वायु से प्रेरित होकर जो ऊर्ध्व गति वायु है और तो वायु पंच भूतों में प्राण अपान के रूप में स्थित है वह कष्ट से शरीर को छोड़ कर निकल जाना है ॥२१-२२ शरीरं च जहात्येवं निरुच्छ्वासश्च दृश्यते । से निरुज्मा निरुच्छ चासो निःशीको हतचेतनः॥२३
14--
.
"
द्विनीय अध्याय ] ब्रा म ण गी ता
[१७
इस प्रकार उसके निकल जाने पर यह शरीर निस्तेज चेतना
रहिन ठंडा और श्वास हीन हो जाता है ।।२।।
ब्रह्मणा संपरित्यक्तो मृत इत्युच्यते नरः ।
स्रोतोभियै विजानाति इन्द्रियार्थान् शरीरभृत् ॥२४
तैरेव न विजानाति प्राण,नाहारसंभवान् ।
तत्रैव कुरुते काये यः स जीवः सनातनः ॥२५॥
जीवात्मा के निकल जाने पर यह शरीर मृत कहलाता है
और जीवात्मा जिन इन्द्रियों से रूप, रस, गंध आदि इन्द्रियों के
विपयों को ग्रहण करता है उनसे अाहारसम्भूत प्राणों को नहीं
जान सकता। जा वस्तु प्राणों को शरीर में धारण कराती हैं वही
नित्य जीवात्मा है ॥२४-२५||
तथा यद्यद्भवेद्युक्त सन्निपाते क्वचित् कचित् ।
तत्तन्मर्म विजानीहि शास्त्रदृष्टं हि तत्तथा ॥२६॥
शास्त्र का कथन यह है कि शरीर में जितनी भी संधियें हैं वे
ही मर्म स्थान है यह जानना चाहिये ॥२६॥
तेषु मर्मसु भिन्नेषु ततः स समुदीरयन् ।
प्राविश्य हृदयं जन्तोः सत्त्वं चाशु रुणाद्धि के।
ततः सचेतनो जन्तु भिजानाति किंचन ॥२७॥
उन मर्मस्थानों के, नष्ट होने पर वह जीवात्मा ऊपर को
निकलता हुआ हृदय में प्रविष्ट होकर बुद्वि को शीधू नष्ट करता है
फिर वह सचेतन प्राणी भो ज्ञान रहित होता है ॥ २७ ॥
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१८]
ना म ण गो ना [द्वितीय अध्याय
तमसा संवृतज्ञानः संवृतेष्वेव मर्मस्तु ।
सजीवो निरधिष्ठानश्चाल्यते मातरिश्वना ॥२८॥
जब ज्ञान के ऊपर तम का आवरण या जाता है और गर्म-
स्थान भी इसी प्रकार से ढक जाते हैं तब निराधार जीव को वायु
चलायमान कर देता है ।। २८ ॥
लतः स तं महोच्छ वासं भृशमुच्छ वस्य दारुणम् ।
निष्कामन्कम्पयत्याशु तच्छरीरमचेतनम् ॥२६॥
उस समय जीवात्मा लम्बी सांस को बार बार छोड़कर इस
अचेतन शरीर को कंपाता है और वाहर निकल जाता है ।। २९॥
स जीवः प्रच्युतः कायाकर्मभिः स्वैः समावृतः ।
अभितः स्वः शुभैः पुण्यः पापैर्वाऽप्युपपद्यते ॥३०॥
यह जीवात्मा इस शरीर से पृथक् होकर शरीर से किये हुए
शुभाशुभ कर्मो को प्राप्त होता है और कर्मानुसार शरीर को धारण
करता है ॥३०॥
ब्राह्मणा ज्ञानसंपन्ना यथावच्छ्रुतनिश्श्याः ।
इतरं कृतपुण्यं वा तं विजानन्ति लक्षणैः ॥३१॥
ज्ञानो तथा बहुश्रुत ब्राह्मण उसके लक्षणों से यह जान लेते हैं
कि उसने पूर्व जन्म में पुण्य किया था या पाप ॥ ३१ ।।
यथान्धकारे खद्योत लीयमानं ततस्ततः ।
चक्ष मन्तः प्रपश्यन्ति तथा च ज्ञानचक्ष षः ॥३२॥
AM द्वितीय अध्याय ] मा म ण गी ता [ १९ पश्यन्त्येवंविधं सिद्धा जीवं दिव्येन चक्षुषा । च्यवन्तं जायमानं च योनि चानुप्रवेशितम् ॥३॥ जिस प्रकार अन्धेरे में छिपे हुये तथा इधर उधर घूमते हुये पटवोजने को प्रांग्चों वाल देख लेते हैं इसी प्रकार ज्ञानी तथा सिद्ध पुरुप अपने दिव्य नेत्रों से जीवात्मा के जन्म मरण तथा गर्भप्रवेश को देखने है ।। ३२ ३३॥ तस्य स्थानानि दृष्टानि त्रिविधानीह शास्त्रतः। कर्मभूमिरियं भूमियंत्र तिष्ठन्ति जन्तवः शास्त्र के अनुसार जीवात्मा के ये तीन प्रकार के स्थान हैं जहां पर. जीवात्मा निवास करने है ये कर्म भूमि है ॥ ३४ ॥ ततः शुभाशुभं कृत्वा लभन्ते सर्वदेहिनः । इहवोच्चवाचान भोगान् प्राप्नुवन्ति स्वकर्मभिः॥३॥ सम्पूर्ण जीवात्मा अच्छे और बुरे कर्म करके अपने कर्मो के अनुसार ऊंच और नीच भोगों को यहाँ ही प्राप्त करते हैं ॥ ३५ ॥ इहैवाशुभकर्माणः कर्मभिर्निरयं गताः । अचारगतिरियं कष्टा यत्र पच्यन्ति मानवाः । तस्मात्सुदुर्लभो मोक्षो रक्ष्यश्वात्मा ततो भृशम्॥३६॥ और अशुभ कर्म करने वाले पुरुप यहीं पर कर्मा के अनुसार नरक को प्राप्त होते हैं यह अधोगति मनुष्यों के लिये दुःख कर होती है इसलिये गोक्ष वड़ी कठिनता से प्राप्त होता है अतः आत्मा को इस अधोगति से बचाना चाहिये ॥ ३६ ।।
Ou. २० ] ब्रा हा गण गी ता [द्विनीय अध्याय अध्वं तु जन्तको गत्वा येषु स्थानेष्ववस्थिताः । कीयमानानि तानोह तत्वतः संनिवोध मे ॥३७॥ प्राणी अ गति को प्राप्त करके जहां जाते हैं उसका मैं वर्णन करता हूँ तुम ध्यान पूर्वक सुनो ! 11 १७ ॥ तच्छ सत्वा नैष्ठिकी बुद्धिं बुद्धयेथाः कर्मनिश्चयम् । ताराल्पाणि सर्वाणि यवतचन्द्रमण्ड दम् ॥८॥ यत्र विभाजते लोके स्वभास, सूर्यमण्डलम् । स्थानान्येतानि जानीहि जनानां पुण्यकर्मणम् ॥३६॥ उसको सुनकर तुम्हारो समझ में कर्म की गति आ जावेगी सम्पूर्ण तारे चन्द्रमा और सूर्य जहां अपनी कान्ति से प्रका- शित होता है उन स्थानों को तुम पुण्यात्मा जोवों का स्थान समझो।। ३८ ३९॥ कर्मक्षयाच ते सर्वे च्यवन्ते वै पुनः पुनः । तत्रापि च विशेषोऽस्ति दिवि नीचोचमध्यमः ॥४०॥ कर्मो के नष्ट होजाने से वे फिर इस भूमंडल पर आते हैं और वहां स्वर्ग में भी उत्तम मध्यम और अधम ये तोन गति हैं ।।४|| न च तत्रापि सन्तोषो दृष्ट्वा दीसतरां श्रियम् । इत्येता गतयः सर्वाः पृथक्ते ससुदीरिताः ॥४१॥ वहां पर भी अत्यन्त प्रकाशमान तेज को देखकर जीवात्मा सन्तुष्ट नहीं होते किन्तु परस्पर ईर्ष्या करते हैं, इस प्रकार हमने पृथक् २ इन गतियों का वर्णन किया है ॥ ४१ ।।
२१ " तृतीय अध्याय] ब्रा ह्मण गो ता उपपत्तिं तु वक्ष्यामि गर्भस्याहमतः परम् । तथा तन्मे निगदतः शृणध्वावहितो विज ॥४२॥ हे ब्राह्मण ! अव हम इसके अनन्तर जीवात्मा किस प्रकार से गर्भ में जाता है इसका वर्णन करेंगे तुम ध्यान पूर्वक श्रवण करो ॥ ४२ ॥ श्री वारसा गीता का दूसरा अध्याय समाप्त तीसरा अध्याय ब्राह्मण उवाच- शुभानामशुभानां च नेह नाशोऽस्ति कर्मणाम् । प्राप्य प्राप्यानुपच्यन्ते क्षेत्र क्षेत्र तथा तथा ॥१॥ सिद्ध ब्राह्मण ने कहा । हे काश्यप ! इस संसार में अच्छे और बुरे कर्मों का नाश कभी नहीं होता और जीवात्मा जन्म जन्मान्तरों को प्राप्त होकर कर्मों का फल भोगते हैं ।।१।। यथा प्रसूयमानस्तु फली दद्यास्फलं बहु । तथा स्यादिपुलं पुण्यं शुद्धन मनसा कृतम् ॥२॥ जिस प्रकार फल वाला वृक्ष ऋतु काल में बहुत से फल देता है उसी प्रकार से बहुत से पुण्य शुद्ध मन से जीवात्मा करता है ।२
२२
त्रा म ग गो ता । तृतीय अध्याय
पापं चापि तथैव स्थास्पापेन सनसा कृतम् ।
पुरोधाय मनो हीदं कर्मण्यात्मा प्रवर्तते ॥३॥
और उसी तरह से अशुद्ध मन से पाय करता है क्योंकि,
जीवात्मा मन के ही द्वारा कर्म में प्रवृत होता है ॥३॥
यथा कर्मसमाविष्टः काममन्युसमावृतः ।
नरो गर्भ प्रविशति तचापि शृण चोत्तरम् ॥४॥
जिस प्रकार काम और क्रोध से घिरा हुआ तथा कर्मों से
आवृत जोव गर्भ में प्रवेश करता है उसे तुम ध्यान
पूर्वक सुनो ॥४॥
शुक्र शोणितसंसृष्टं स्त्रिया गर्भाशयं गतम् ।
क्षेत्रं कर्मजमाप्नोति शुभं वा यदि वाऽशुभम् ॥५॥
रज मे मिला हुआ वीर्य जब स्त्री के गर्भाशय में जाना है
तब कर्मानुसार जीवात्मा अच्छी और बुरी योनियों में जाता है ।५
सौक्ष्म्याव्यक्तभावाचं न च वचन सजति ।
संप्राप्य ब्राह्मणः कामं तस्मात्तद्ब्रह्म शाश्वतम् ॥६॥
अत्यन्त सूक्ष्म तथा अव्यक्त होने के कारण और परमात्मा
की आज्ञा से वह जीव कहीं पर लिप्त नहीं होता इस लिये जीवा-
स्मा नित्य है ॥६॥
तद्वी सर्वभूतानां तेन जीवन्ति जन्तवः ।
स जीवः सर्वगात्राणि गर्भस्याविश्य भागशः ॥७॥
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तृतीय अध्याय ] ब्रा का ण गौ ता
[२३
दधाति चेतसा सदाः प्राणस्थानेष्ववस्थितः ।
ततः स्पन्दयतेऽङ्गानि स गर्भश्नोतमान्वितः ॥८॥
सब प्राणियों का जीव ही मूल है। और उस जीव से ही
सम्पूर्ण प्राणी चेतना को धारणा करते हैं। वह जीवात्मा अपनी
। चेतना शक्ति से गर्भ के सम्पूर्ण अंगों में प्रविष्ट होकर प्राणों के
स्थान में निवास करना है फिर वह गर्भ चैतन्य युक्त होकर अंगों
को हिलाना है ||४-८||
यथा लोहस्य निःस्यन्दो निषिको विम्यनिग्रहम् ।
उपैति तबज्जानीहि गर्भे जीवप्रवेशनम् ॥६॥
जिस प्रकार पिघला हुआ लोहा किसी बर्तन में डाल दिया
जाता है उसी प्रकार जीव गर्भ में प्रविष्ट होता है ।।९।।
लोहपिण्डं यथा वह्निः प्रविश्य ह्यतितापपयेत् ।
तथा स्वमपि जानीहि गर्ने जीवोपपादनम् ॥१०॥
जिस प्रकार लोहे के पिंड में अग्नि प्रविष्ट होकर उसे गर्म
कर देतो है उसी प्रकार जीवात्मा गर्भ में प्रविष्ट होकर सम्पूर्ण
शरीर को चेतना युक्त कर देता है ।।१०||
यथा च दोपः शरणे दोप्यमानः प्रकाशते ।
एवमेव शरीराणि प्रकाशयति चेतना ॥११॥
जैस एक दीपक सम्पूर्ण घर को प्रकाशित कर देता है वैसे
जीवात्मा अपनी चेतनता से स्थूल सूक्ष्मादि शरीरों को प्रकाशित
कर देता है।॥ ११ ॥
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२४ ]
ब्रा र ण गो ना [तृतीय अध्याय
यद्यच्च कुरुते कम शुभ वा यदि वाऽशुभम् ।
पूर्वदेहकृतं सर्वमवश्यमुपभुज्यते ॥१२॥
जीवात्मा पूर्व जन्म में भले या वुरे जो भी कर्म करता है उन
सब को अवश्य भोगता है ।। १२ ।।
ततस्तु क्षोयते चैव पुलश्चान्यत्प्रचीयते ।
योवतन्योक्षयोगस्तं धर्म नैवावबुद्धयते ॥१३॥
जन तक मोक्ष के मार्ग को ग्रहण नहीं करना तब तक पूर्व
कर्मो को भोगता रहना है और नये कर्म करता रहता है ।। १३॥
तत्र कर्म प्रवक्ष्यामि सुखी भवति येन वै।
आवर्तमानो जातीषु यथाऽन्योन्यासु सत्तम ॥१४॥
मैं तुम्हें उस कर्म का उपदेश करूंगा जिससे जीवात्मा जन्म.
मरण के बन्धन में भी सुख को प्राप्त करता ॥ १४ ॥
दानं व्रतं ब्रह्मचर्य यथोक्तं ब्रह्मधारणम् ।
दमः प्रशान्तता चैव भूतानां चानुकरूपनम् ॥१५॥
संयमश्चनृशस्यं च परस्वादानवर्जनम् ।
व्यलीकानामकरणं भूतानां मनसा सुवि ॥१६॥
मातापित्रोच शुश्रषा देवताऽतिथिपूजनम् ।
गुरुपूजा घृणा शौचं नित्यमिन्द्रियसंयमः॥१७॥
प्रवर्तनं शुभानां च तस्मतां वृन्तनुच्यते ।
ततो धर्मः प्रभवति यः प्रजाः पाति शाश्वताः॥१८॥
तृतीय अध्याय ] ब्राह्मण गो ता [ २५ annan दान, व्रत, ब्रह्मचर्य, परमात्मा की उपासना, दम, शान्ति, प्राणियों पर दया, संयम, करुणा, संतोष, किसी प्राणी का मन से अशुभ चिन्तन न करना, माता पिता को सेवा, देवता अतिथि और गुरु की पूजा, असंग, पवित्रता, सदा इन्द्रियों का निग्रह, सत् कर्म करना, ये सज्जनों के स्वाभाविक गुण हैं इन गुणों से उस धर्म की उत्पत्ति होती है जिससे सम्पूर्ण प्रजा की रक्षा होती है १५-१८॥ एवं सस्सु सदा पश्येत्तत्राप्येका ध्रुवा स्थितिः । आचारो धर्ममाचष्टे यस्मिन् शान्ता व्यवस्थिताः॥१६ गुण सज्जनों में स्वभाव से रहते हैं, और इस आचार का नाम हो धर्म है। जिससे सदा शांति प्राप्त होती है ॥ १९॥ तेषु तस्कर्म निक्षिप्तं यः स धर्मः सनातनः । यस्तं समभिपद्यत न स दुर्गतिमाप्नुयात् ॥३०॥ इन सन्जनों के कर्मों को ही सनातन धर्म कहते हैं और जो इस धर्म का पालन करता है वह कभी अधोगति को प्राप्त नहीं होता ॥२०॥ अतो नियम्यते लोक प्रच्यवन्धर्मवमसु । यश्च योगी च मुक्तश्च स एतेभ्यो विशिष्यते ॥२१॥ ये गुंण ही जगत् में कुमार्ग से प्राणियों की रक्षा करते हैं। किन्तु योगी और मुक्तात्मा इनसे अधिक विशेष गुणों को धारण य करते हैं ।। २१॥
५
[ तृतीय अध्याय
२६] .
ब्राह्मण गीता
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.......
वर्तमालस्य धर्मेण शुलं यत्र यथा तथा ।
संसारतारण ह्यस्य कालेन महता भवेत् ॥२॥
क्योंकि इन गुणों के धारण करने से बहुत अधिक समय में
इस संसार सागर से छुटकारा मिलता है अर्थात् योगी और मुक्ति
की कामना वाला पुरुप अपने विशेष गुणों से शीघ्र ही छुटकारा
पाता है ॥ २२॥
एवं पूर्वकृतं कर्म नित्यं जन्तुः प्रपद्यते ।
सर्व लस्कारणम् येन विकृतोऽयमिहागतः ॥२३॥
इस प्रकार जीव पहले किये हुए कार्यों से जन्म धारण करता
है और ये कर्म ही जीवात्मा के बन्धन के कारण है ।। २३ ।।
शरीरग्रहणणं चास्य केन पूर्व प्रकल्पितम् ।
इत्येवं संशयो लोके तञ्च वक्ष्याम्यतः परम् ॥२४॥
यह एक बड़ा संदेहास्पद विषय है कि जीवात्मा संसार के बन्धन
में कैसे फंसा ? इसलिये में तुम्हें इस बात का उपदेश करता हूँ -४
शरीरमीत्मनः कृत्वा सर्वलोकपितामहः ।
त्रैलोक्यमसृजब्रह्मा कस्ल स्थावरजङ्गला ॥ ५॥
सम्पूर्ण संसार के अधीश्वर परमात्मा ने स्वभावतः स्थावर
जंगम रूप तीनों लोकों कीरचना की ।। २५॥
ततः प्रधानमसृजत्प्रकृति स शरीरिणाम् ।
यया सर्वमिदं ब्याह यां लोके परमां विदुः ॥२६॥
तृतीय अध्याय ।
ब्रा हाण गाता । [२७
तब सम्पूर्ण संसार की मूल कारण प्रकृति (अभिव्यक्त) प्रकट
हुई और यही प्रकृनि सम्पूर्ण संसार में व्याप्त है ॥ २६ ॥
इदं तत्क्षरमित्युक्तं परं स्वकृतमक्षरम् ।
त्रयाणां मिथनं सर्वमेकैकस्य पृथक पृथक् ॥१७॥
यह प्रकृति की अभिव्यक्ति, तथा अन्भिव्यक्ति (प्रकृति तथा
विकृति रूप) अनित्य है और जीव अमृत रूप नित्य है यह
सम्पूर्ण संसार ईश्वर जीव प्रकृति इन तीनों के ही मेल का नाम है
किन्तु वस्तुनः तीनों प्रथक् प्रथक हैं ॥ २७ ॥
अमृजत्सर्वभूतानि पूर्वदृष्टः प्रजापतिः ।
स्थावराणि च भूतानि इत्येषा पौर्विकी श्रुतिः ॥२८॥
यह प्राचीन श्रुति है कि नित्य परमात्मा ने ही सम्पूर्ण स्थावर
और जंगम संसार की रचना की है।॥ २८ ॥
तस्य कालपरीमाणमकरोत्स पितामहः ।
भूतेषु परिवृत्तिं च पुनरावृत्तिमेव च ॥२६॥
परमात्मा ने ही शरीर को अनित्य तथा प्राणियों के पुनर्जन्म
की व्यवस्था की है ।। २९ ॥
यथाऽत्र कश्चिन्मेधावी दृष्टास्मा पूर्वजन्मनि ।
यत्प्रवक्ष्यामि तत्सर्वं यथावदुपपद्यते
जिस प्रकार कोई बुद्धिमान पुरुप पूर्व काल को अपनी कथा
को कहता है उसी प्रकार में भी इस सम्पूर्ण विषय का उपदेश
करूंगा ।। ३० ॥
॥३०॥
जो व्यक्ति सुग्व , - २८ ] ब्राह्मण गीता [तृतीय अध्याय सुखदुःखे यथा सम्यगनित्ये यः प्रपश्यति । सायं चामेध्यलवातं विनाशं कर्मसंहितम् ॥३१॥ यच्च किंचित्सुखं तच दुःखं सर्वमिति स्मरन् । संसारसागरं घोरं तरिष्यति सुदुस्तरम् ॥३२॥ और दुख को अनित्य, शरीर को मल मूत्र का स्वरूप, जन्म और मृत्यु का कारण कर्म, और जो भी कुछ इस संसार में थोड़ा बहुत सुख है, उसे दुख समझता है वहीं इस कठिन संसार महोदधि से पार होता है ।। ३१-३२ ।। जातोमरणरोगैश्च समाविष्टः प्रधानवित् । चेतनावत्सु चैतन्यं सर्वभूतेषु पश्यति निर्विद्यते ततः कृरून मार्गमाणः परं पदम् । तस्योपदेशं वक्ष्यामि याथातथ्येन सत्तम ॥३४॥ जिस प्रकार परमात्मा का ध्यान करते हुए जन्म मरण तथा रोगों से युक्त होकर सम्पूर्ण चेतन प्राणियों में चेतनता को अनुभव करते हुए मुक्ति के मार्ग को ढूंढने हुए, इस संसार मे जोव विरक्ति पैदा करते हैं। उस विषय का वास्तविक उपदेश मैं तुम्हें कांगा ॥३३.-३४॥ शाश्वतस्याव्ययस्थाथ यदस्य ज्ञानमुत्तमम् । प्रोच्यमानं भया विप्र निबोबेदमशेषतः ॥३५॥ हे ब्राह्मण ! अब तुम मुझ से नित्य अविनाशो परब्रह्म विपयक ज्ञान को सुनी ॥ ३५॥ तोसरा अध्याय समाप्त
..
चतुय अध्याय ]
ना हा गण गीता
1 २९
444
चतुर्थ अध्याय
ब्राह्मण उवाच-
यः स्यादेकायने लीनस्तृष्णी किंचिदचिन्तयन् ।
पूर्व पूर्व पारित्यज्य स तीर्थों बन्धनाद्भवेत् ॥१॥
ब्रामण बोला जो पुरुप मांसारिक विषयों का ध्यान छोड़कर
नया अपने पूर्व कमों का परन्याग करके एकान्त में ब्रह्म में लीन
होना है वह इस बन्धन ने छुट जाता है ।। १ ।।
सर्वमित्रः सर्चसहः शमे रक्तो जितेन्द्रियः ।
व्यपेतभयमन्युश्च आत्मवान्मुच्यते नरः ॥२॥
जो पुरुप सम्पूर्ण संसार का मिन, सहिष्णु, शान्त, जितेन्द्रिय,
भय और क्रोध से रहित होकर आत्मा का चिन्तन करता है वही
संसार से मुक्त होता है ।। २ ।।
आत्मवत्सर्वभूतेषु यश्चरेन्नियतः शुचिः ।
अमानो निरभीमानः सर्वतोमुक्त एव सः ॥३॥
जो अपने समान ही सम्पूर्ण प्राणियों से वर्ताव करता है तथा
शुद्ध रहता है और मान अपमान की चिन्ता नहीं करता वह मुक्त
हो जाता है।॥३॥
जीवितं मरणं चोभे सुखदुःखे तथैव च ।
लाभालाभे प्रियदेष्ये यः समः स च मुच्यते ॥४॥
USMANN.
न
नाहा ग गी ना [ অনুখ অত্যায়
जीवन, मरण, सुख, दुम्ब, हानि लाभ शत्रु और मित्र में भी
जो एक सो बुद्धि रखता है बो बन्धन ने छुटकारा पाता
छुटकारा पाना है ॥४॥
न कस्यचित् स्पृहयते नाऽवजानाति किंचन ।
निन्द्रो वीतरागात्मा सर्वथा मुक्त एव सः ॥५॥
जो न किसी से कुछ कामना कारता है और न किमो का अप-
मान करता है नथा सांसारिक झंगटों से प्रधक होकर अपने पारमा
से राग द्वेपादि को छोड़ देता है वहो नुक्त होता है ।।५।।
अनमित्रश्च निर्वन्धुरनपत्यश्च यः कचित् ।
स्वक्तधर्मार्थकामश्च निराकांक्षी च मुच्यते ॥६॥
जिसे मित्रों की अभिलापा नहीं, सम्बन्धियों से सम्बन्ध नहीं
और पुत्र की भी जिसे इच्छा नहा, और जिसने धर्म अर्थ काम
का परित्याग कर दिया, और जिसे किसी वस्तु को आकांक्षा नहीं
है अर्थात् अपने आत्मा से ही जो संतुष्ट है वही मुक्ति को प्राम
होता है ।। ६ ।।
नैव धर्मी न चाधर्मी पूचर्चा पचितहायकाः ।
धातुक्षयप्रशान्तात्मा निईन्छः स विमुच्यते ॥७॥
धर्म तथा अधर्म से रहित, पूर्व कृत कर्म से शून्य और
धातुओं के नष्ट हो जाने से प्रशान्त चित्त और वन्धनों से रहित
हो कर जीवात्मा मुक्ति को प्राप्त करता है ।। ७॥
अकर्मवान् विकाक्षश्च पश्येज्जगदशाश्वतम् ।
अश्वत्थसहशं नित्यं जन्ममृत्युजरायुतम्
॥८॥
.AAN IA चतुर्थ अध्याय ] मा सण गीता [३१ वैराग्यवुद्धिः सततमात्मदोषव्यपेसका। प्रात्मयन्धविनिमोक्षं स करोत्यचिरादिन ॥६॥ इच्छा रहित तथा काम्य कर्मा का नाश करके और संसार को अश्वत्थ के समान, जन्म मृत्यु तथा वृद्धावस्था से युक्त इस संसार को मदा अनित्य समझता है । और जो विरक्त होकर नित्य अपने दोपों पर दृष्टि रखता है वह शीघू ही संसार के बन्धन से छूट जाता है ।। ८-९॥ अगन्धमरसस्पर्शमशब्दमपरिग्रहम् । अरूपमनभिज्ञयं दृष्ट्वाऽऽत्मानं विमुच्यते ॥१०॥ गन्ध, रस,स्पर्श,शब्द,रूप,और परिग्रह से रहित तथा कठिनता से जानने योग्य आत्म स्वरूप को देखता है वह मुक्त हो जाता है।१० पञ्चभूतगुणहीनममूर्तिमदहेतुकम् । अगुणं गुणभोक्तारं यः पश्यति स मुच्यते ॥११॥ पृथ्व्यादि पंच भूतों से रहित अत्यन्त सूक्ष्म, नित्य तथा गुणों से रहित किन्तु गुणों का भोग करने वाले आत्मस्वरूप को जो देख लेता हैं वह मुक्त हो जाता है ।। ११ ॥ विहाय सर्वसंकल्पान बुद्धया शारीरमानसान् । शनैर्निर्वाणमाप्नोति निरिन्धन इवाऽनलः ॥१२॥ जो अपनां बुद्धि से शारीरिक तथा मानसिक संकल्पों का रित्याग कर देता है वह शीघ्र ही इस प्रकार शान्तिको प्राप्त करता है
[चतुथ अध्याय
.
३२ ] ना स्मरण गीता
जिम प्रकार ईधन से रहित अग्नि अर्थात विना काष्टक अनि जिस
प्रकार शीघ्र ही शान्त होकर भस्मी शून हो जाता है उसी प्रकार
जीवात्मा संकल्पों के अभाव से मोक्ष पद को प्राप्त करना है ॥२॥
सर्वसंस्कारनिमुक्तो निईन्द्रो निप्परिग्रहः ।
तपसा इन्द्रियग्रामं यश्चरेन्युक्त एव सः ॥१३॥
सव संस्कारों से रहित तथा विरक्त होकर जो तप से अपनी
इन्द्रियों को वश में करता है वही मुक्त होता है ।। १३ ॥
विमुक्तः सर्वसंस्कार स्ततो ब्रह्म सनातनम् ।
परमाप्नोति संशान्तमचलं नित्यमक्षरम् ॥१४॥
फिर सम्पूर्ण संस्कारों से मुक्त होकर शान्त अविनाशी निचल
नित्य ब्रह्म की पदवी को प्राप्त होता है ।॥ १४ ॥
अतःपरं प्रवक्ष्यामि योगशास्त्रमनुत्तमम् ।
युञ्जतः सिद्धमात्मानं यथा पश्यन्ति योगिनः ॥१५॥
अब मैं उस श्रेष्ट योग का वर्णन करवंगा जिनक अाश्रय से
योगी अात्मस्वरूप का दर्शन करते हैं ॥१५||
तस्योपदेशं वक्ष्यामि यथावत्तन्निबोध से।
यैारश्चारयन्नित्यं पश्यस्यात्मानलात्मनि ॥१६॥
अव तुम उस उपदेश को सुनो कि जिससे चित्त की वृतियों
के निरोध आदि साधनों से जीवात्मा अपने अन्दर प्रभु का दर्शन
करता है ॥१६॥
इन्द्रियाणि तु संहृत्य लन आत्मनि धारयेत् ।
तीनं तप्त्वा तपः पूर्व मोक्षयोगं समाचरेत् ॥१७॥
चतुर्थ अध्याय ] ब्रामण गीता [३३ इन्द्रियों को विपयों से दूर करके मनको आत्मा में लगावे, और फिर उग्र तप को धारण करके योग करे ॥१७॥ तपस्वी सततं युक्तो योगशास्नमाचरेत् । मनोषी मनसा विप्रः पश्यन्नात्मानमात्मनि ॥१८॥ इस प्रकार तपस्वी सदा योग अर्थात् चित्त की वृतियों का निरोध करे और अपने मन के द्वारा आत्मा में ही प्रभु के दर्शन करें ।। १८ स चेच्छक्नोस्ययं साधुर्योक्तुलात्मानमात्मन्दि । तत एकान्तशील स. पश्यत्यास्मानमात्मनि ॥१६॥ जो इस प्रकार योग करके अपने प्रात्मा में ही प्रभु के दर्शन करने का प्रयत्न करता है वह विरक्त अवश्य प्रभु के दर्शन करता है ॥१९॥ संयतः सततं युक्त आस्लवान्विजितेन्द्रियः । तथा य श्रास्मनाऽऽस्मानं संप्रयुक्तः प्रपश्यति ॥२०॥ इन्द्रियों को वश में करके तथा आत्मा को पहचान कर जो निश्चलमति होकर योग करता है वह अवश्य प्रभु के दर्शन करता है ॥२०॥ यथा हि पुरुषः स्वप्ने दृष्ट्वा पश्यत्यसाविती । तथारूपमिवात्मानं साधुयुक्ता प्रपश्यति ॥२१॥ जिस प्रकार स्वप्न में किसी पदार्थ को देख . कर जागृतावस्था में भी लोग उसका अनुभव करते है उसी प्रकार समाधि में प्रभु ३४ ] ना हम गण गी ता [चतुर्थ अध्याय के दर्शन करके चोगा समाधि अवस्था ले पृथक् होकर भी उम प्रभु का दर्शन करते हैं ॥२२॥ हषीकां च यथा मुजास्फश्चिन्निप्कृप्य दर्शयेत् । योगी निष्कृष्य चास्मान तथा पश्यति देहतः ।।२२॥ जिस प्रकार पुरुप छिल्के से सींक को निकाल कर पृथक दिखला देता है उसी प्रकार योगी अपने प्रात्मा की उस दह मे भिन्न देखता है ॥२२॥ मुख शरीरमित्याहुरिषीकामात्मनिश्रिताम् । एतन्निदर्शनं प्रोक्तं योगविगिरनुत्तमम ॥२३॥ योगी पुरुप शरीर और आत्मा के भेद को स्पष्ट करने के लिये सींक और छिलके का सुन्दर उदाहरण दिया करते हैं। इसमें छिलका शरीर है और सींक शरीर में रहने वाला जीवात्मा ॥२॥ यदा हि युक्तमास्मानं सम्यक् पश्यति देहभत् । न तस्येहेश्वरः कश्चिस्त्रलोक्यस्यापि यः प्रभुः॥२४॥ जब एक शरीरधारी समाधिस्थ होकर प्रभु के दर्शन करता उस समय संसार का बड़े से बड़ा राजा भी उसके ऊपर अधिकार नहीं कर सकता ॥ २४॥ अन्यान्याश्चैव तनवो यथेष्ठं प्रतिपद्यते। विनिवृत्य जरां मृत्युन शोचति न हृष्यति ॥२॥ योगी बुढ़ापे तथा मृत्यु को जीतकर न तो कभी दुख को प्राप्त होता है और न कभी सांसारिक सुख प्राप्त करता है किन्तु अपनी इच्छानुसार भिन्न २ शरीरों को प्राप्त करता है ॥ २५ ।। ...
[ ३५
चतुर्थ अध्याय ] त्रा हा गीता
देवानामपि देवत्वं युक्तः कारयते वशी।
ब्रह्म चाव्ययमाप्नोति हित्वा देहमशाश्वतम् ॥२६॥
योनी देवनानी के ऐश्वर्य को धारण करता है तथा इस अनित्य
शरीर को छोड़कर ब्रम को प्राप्त करता है ।। २६ ।।
विनश्यत्सु च भूतेषु न भयं तस्य जायते ।
क्लिश्यमानेषु भूतेषु न स क्लिश्यति केनचित् ॥२७॥
प्राणियों के नष्ट होने पर अर्थान प्रलय के समय में भी उसे
किसी प्रकार का भय नहीं होता न अन्य प्राणियों के दुख से दुखी
होत. है । अर्थात् वह किसी के साथ कोई अपना सम्बन्ध अनुभव
नहीं करता ॥ २७ ॥
दुःखशोकमयै|रैः सङ्गस्नेहसमुचः ।
न विचाल्यति युक्तात्मा निस्पृहः शान्तमानसः॥२८॥
संग तथा म्नेह से उत्पन्न दुग्ब झाक कपी अत्यन्त कट प्रद
भाव भी उस शान्त चित्त विरक्त योगी को चलायमान नहीं कर
सकते ॥२८॥
नैनं शस्त्राणि विध्यन्ते न मृत्युश्चास्य विद्यते ।
नातः सुखतरं किंचिल्लीके कच न दृश्यते ॥२६॥
न तो उसे शस्त्रों से भय रहता है, न मृत्यु ही उसे उद्विग्न
कर सकता है इससे अधिक आनन्दमय अवस्था और कोई
नहीं है ।॥ २९॥
सम्यग्युक्त्वा स आस्मानमास्मन्येव प्रतिष्ठते ।
विनिवृत्तजरादुःखः सुखं स्वपिति चापि सः॥३०॥
३६ ] से वा म ण गीता [चतुर्थ अध्याय समाधिस्थ होकर योगी प्रभु के दर्शन करता है और वृद्धावस्था प्रभृति दुखों का नाश करके वह परमात्मा की प्राप्ति करता है ॥३० देहान्यथेष्टमभ्येति हिस्सां मानुषी तनुम् । निर्वेदस्तु न कर्तव्यो भुनानेन कथंचन ॥३१॥ इस मनुष्य देह को छोड़कर वह इच्छानुसार शरीरों को धारण करता है इस लिये समाधिस्थ सुख को भोगते हुए उस सुख उपराम नहीं होना चाहिये || ३१ ।। सम्यग्युको यदाऽऽस्मानमास्मन्येव प्रपश्यति । सदैव न स्पृहयते साक्षादपि शतक्रतोः ॥३२॥ जिस समय समाधिस्थ पुरुष अपने में प्रभु का दर्शन करता है उस समय वह परमैश्वर्यवान् 'चक्रवर्ती राज्य की भी कामना नहीं करता ॥ ३२ ॥ योगमेकान्तशीलस्तु यथा विन्दति तच्छणु । दृष्टपूर्वी दिशं चिन्स्य यस्मिन्संनिवसेत्पुरे ॥३३॥ पुरस्याभ्यन्तरे तस्य मनः स्थाप्यं न बाहातः । पुरस्याभ्यन्तरे तिष्ठन् यस्मिन्नावलथे वसेत् । तस्मिन्नावस्थे धार्य सबाह्याभ्यन्तरं मानः ॥३४॥ ध्यानावस्थित होकर पुरुप जिस प्रकार समाधि में बैठना है. वह तुम ध्यान पूर्वक सुनो । प्राचीन ब्रह्मविद्या सम्बन्धी उपदेशों को. विचारता हुआ जब जीवात्मा शरीर में रहता है तब इसका यह कर्तव्य है कि मनको बहिर्मुख वृत्ति न करके उसको अन्तर्मुख वृत्ति ann चतुर्य अध्याय] नागा गोता T३७ करे । और शरार में गहने हुए मृलाधारादि चक्र में मनको धारण करे ॥३३-३४॥ प्रचिन्यावस्थे कृत्स्नं यस्मिन्काले स पश्यति । तस्मिन्काले मनश्चास्य न च किं च सबाह्यतः॥३५॥ जर चक्र में मन स्थिः जाता तब मन वामना रहिनदी जाता है गार बाहर के वृत्तियों को समेट लेता है ।। ६., ।। सन्नियम्येन्द्रियग्रामं निर्णा निर्जने वने। कायमभ्यन्तरं कृत्स्नं मकान: परिचिन्तयेत् ॥३६॥ निर्जन वन इन्द्रियों का का नियन्त्रण करके अपने अन्दर हो एक चित्त होकर परमात्मा का ध्यान करना चाहिये ।। ३६ ।। दन्तांस्तालु च जिह्वां च गलं ग्रीवां तथैव च । हृदयं चिन्तयेच्चापि तथा सृदयबन्धनम् ॥३७॥ दांत तालु जिला कंठ ग्रीवा हृदय और नाड़ो रूप हृदय के बंधन का उस समय विचार करना चाहिये। यहां पर दाँतों से तात्पर्य आहार शुद्धि से है क्यों कि उपनिपदों में आहार शुद्धि को सबसे प्रथम मुक्ति का साधन माना है। तालु और जिह्वा से उस स्थान का प्रहण किया गया है जहां योगी जन धारणा को सिद्ध करते हैं इससे भृकुटी का भी ग्रहण किया गया है कंठ और ग्रीवा का तात्पर्य कंठकूप आदि स्थानों से है जहां पर संयम करने से भूख प्यास एवं भोगों से विरक्ति होती है हृदय से तात्पर्य हृदयस्थ ब्रह्म से है और नाड़ी रूप हृदय के वन्धन वे. हैं जहां पर योगी लोग ध्यान करते हैं इस प्रकार इस श्लोक में, सिद्ध महर्षि ने .
३८]
ब्राह्मण गौ ता [चतुर्थ अध्याय
काश्यप को अपने उपदेश का उपसंहार करते हुए मोक्ष प्राप्ति के
वे पांच साधन बतलाये अर्थान् आहार शुद्धि प्राणायाम भोगों से
निवृति, ध्यान और परमात्मा का चिन्तन ।। ३७ ।।
इत्युक्तः स भया शिष्यो मेधावो मधुसूदन ।
पप्रच्छ पुनरेवेमं मोक्षधर्म सुदुर्वचम् ॥३८॥
हे श्री कृष्ण ! मैंने जव उस बुद्धिमान शिष्य का यह उपदेश
दिया तब मेरे उपसंहार में बतलाये हुये साधनों को लक्ष्य में रख
कर उसने मुझसे यह प्रश्न किये ।। ३८ ॥
सुक्तं भुक्तमिदं कोष्ठे कथमन्नं विपच्यते ।
कथं रसत्वं व्रजति शोणितत्वं कथं पुनः ॥३९॥
तथा मांसं च मेदश्च स्नायवस्थोनि च योषिति ।
कथमेतानि सर्वाणि शरीराणि शरीरिणाम् ॥४०॥
वर्धन्ते वर्धमानस्य वर्धते च कथं बलम् ।
निरोधानां निगलनं मलानां च पृथक पृथक्ष ॥४१॥
जो भी कुछ अन्न इन शरीर में भोजन के रूप में जाता है
वह किस प्रकार पचता है और किस प्रकार उसका रस रक्त मांस,
चर्बी, आते और हड्डो बनती है किस प्रकार देह के बदन से
इनको वृद्धि होती है और इनके साथ किस प्रकार वलको वृद्धि
होती है। शरीर का मल किस प्रक.र से पृथक् २ होकर निकल
जाता है यह आहार शुद्धि विषयक प्रश्न है ।। ३९-४१ ।।
कुतो वाऽयं प्रश्वलिति उच्छ वसित्यपि वा पुनः ।
कंच देशमधिष्ठीय तिष्ठत्यात्माऽयमात्मनि ॥४२॥
चतुर्थ अध्याय ] नाकारण गीता [३९ किस प्रकार यह श्वास और प्रश्वास को लेता है । यह दूसरा प्रश्न है। और यह मान्मा शरीर के किन देश में रहता है यह चौथा प्रश्न है, ॥४॥ [ नृताय विपय योग का अधिक सहायक नहीं है इसलिये उस पर प्रश्न नहीं किया] जीवः कथं वहति च चेठमानः कलेवरम् । किं वर्ण कीदृशं चैव निवेशयति वै पुनः ॥४३॥ जीव किन प्रकार कर्म करता हुआ शरीर को धारण करना है और किन्न प्रकार नादियों के द्वारा सूक्ष्म शरीर का धारण करता है और उन नाड़ियों के क्या स्वभाव हैं फिर किस प्रकार का शरीर प्राप्र करता है।४३॥ याथातथ्येन भगवन् वक्तुमर्हसि मेऽनघ । इति संपरिपृष्टोऽहं तेन विप्रेण माधव ॥४४॥ है श्री कृष्ण ! इस प्रकार मुझमे उस ब्राक्षण ने चार प्रश्न किए और मुझसे प्रार्थना की कि हे भगवन मुझे इनका उपदेश करो ।। ४४॥ (पाठकवृन्द ! इस ब्राह्मण गीता में प्रथम २ प्रश्नों का ही उत्तर मुख्य रूप से दिया गया है और अन्तिम २ प्रश्नों का मुख्य- तया उत्तर गुरु गीता में गुरु शिष्य सम्वाद रूप से दिया गया है यदि परमात्मा की कृपा हुई और पाठकों का प्रेम बना रहा तो बहुत शीघ्र ही हम गुरू गीता को भी इस ब्राह्मण गीता से अधिक सुन्दर रूप में प्रकाशित करेंगे। पाठक प्रतीक्षा करें)।
ब्राह्मण गीता
F
[ चतुर्थ अध्याय .
801
प्रत्यगुई महापाहो यथाश्रुतस्परिन्दम ।
यथा स्वकोष्ठ प्रक्षिप्य भाग भाण्डमनो भवेत्॥४५
तथो स्थकाये प्रक्षिप्य मनोहाररनिश्चलैः ।
आस्मानं तत्र मार्गेत प्रसाद परिवर्जयेत् ॥४६"
हे कृष्ण ! तब मैंने उसे इस प्रकार उत्तर दिया कि हे बार
जिस प्रकार एक पुरुप अपने घर में किसी वस्तु को रखकर ढूंढ
लेता है उसी प्रकार अपने शरीर में एकाग्रइन्द्रियों के द्वारा मन को
सहायता से आत्मा का ढूंढना चाहिये और इस में आलस्य नहीं
करना चाहिये || ४५-४६।।
एवं सततमुद्य क्त: प्रीतामा म चिरादिव ।
प्रासादयति तद्ब्रह्म यद् दृष्ट्वा स्यात्प्रधानवित् ॥४७॥
इस प्रकार प्रसन्न चित्त होकर निला उद्योग करने से परब्रह्म
परमात्मा को जीवात्मा प्राम करता है, उनके दर्शन मात्र से ही
जीवात्मा के सम्पूर्ण अविद्यादि दोष न जाते हैं ।। ४७॥
न त्वलौ चक्षुषा ग्राह्यो न च सरपीन्द्रियः।
मनसैव प्रदीपेन महानात्मा श्यले
॥४८॥
परमात्मा को न आखों से देखा जा सकता है और न सब
इन्द्रियों के इकट्ठा करने से हो देखा जाता है किन्तु उस महान्
परमात्मा के दर्शन केवल मनके द्वारा ही हो सकते हैं ।। ४८ ॥
सर्वतः पाणिपादान्तः सर्वतोऽनिशिरोमुखः ।
सर्वतः अतिमाल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ॥४६॥
[४१ MARY चतुर्थ अध्याय ] मा म ण गीता परमात्मा की गमनशक्ति सर्वत्र विद्यमान है उसके नेत्र, शिर तथा मुख सब ओर है वह सब स्थानों की बातों को सुनता है अर्थान् परमात्मा निराकार, सर्वशक्तिमान् , तथा सर्वज्ञ है ॥४९॥ जीवो निष्कान्तमात्मानं शरीरास्संप्रपश्यति । स तमुत्सृज्य देहे स्वं धारयन्ब्रम केवलम् ॥५०॥ जीवात्मा इस शरीर से अपना निकलना अनुभव करता है और देह परित्याग करते समय केवल प्रभु का स्मरण करता है ।५० आस्मानमाखोकयति सनसा प्रहसन्निध । तदेवमाश्रयं कृत्वा मोक्ष याति ततो मयि ॥५॥. उस समय प्रसन्न होकर अपने आपको देखता है और उस प्रभु के आश्रय से ही निर्वाण पद को प्राप्त करता है ॥५१॥ इदं सर्वरहस्यं ते सया प्रोक्त हिजोसम । आपृच्छे साधयिष्यामि गच्छ विप्र यथासुखम्॥५२॥ हे ब्राह्मणों में श्रेष्ट काश्यप ! यह सब श्रेष्ट ज्ञान मैंने तुम्हें दिया है मैं तुम्हें अनुमति देता हूँ कि अब तुम सुख पूर्वक जाओ।। ५२॥ इत्युक्तः स तदा कृष्ण मया शिष्यो महातपाः। आगच्छत यथाकामं नास्त्रणः संशितव्रतः ॥५३॥ हे श्रीकृष्ण ! इस प्रकार उपदेश सुनकर वह तपस्वी तथा व्रती ब्राह्मण अपनी इच्छानुसार चलागया ॥ ५३ ।।..
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४२] ब्राह्मण गीता
आतुर्थ अध्याय
वासुदेव उवाच-
इत्युक्तवा स तदा वाक्यं मां पार्थ दिजसत्तमः ।
मोक्षधर्माश्रितः सम्यक् तत्रैवान्तरधीयत ॥५४॥
श्रीकृष्ण जी बोल ! हे अर्जुन वह नाक्ष धर्म के नाना श्रेष्ठ
ब्राह्मण मुझसे इस प्रकार कह कर वहीं पर अन्तर्धान होगये ।।१४
कविदेतवया पार्य अतोकानचेसा।
तदापि हि रथस्थस्त्वं श्रुतवानेतदेव हि ॥१५॥
हे अर्जुन ! क्या तुमने इस उपदेश को ध्यान पूर्वक सुना है ।
इस उपदेश को तुमने युद्ध के आरम्भ में रथ पर
हम भी
सुना था ।। ५५॥
नैतत्पार्थ सुविज्ञ यं व्यामि श्रेणेतिसे मतिः ।
नरेणाकृतसंज्ञेन विशुद्धनान्तरात्मना
हे अर्जुन ! मेरा ऐसा विचार है कि एक अमावधान मलिन
हृदय वाला पुरुष इस उपदेश को नहीं समझ सकता ।। ५६ ॥
सुरहस्यमिदं प्रोक्तं देवानां भरतर्षभ।
कचिन्नेदं श्रुतं पार्थ मनुष्येणेह कहिचित् ॥५७॥
हे भरत श्रेष्ट ! यह ज्ञान देवताओं को सुनाने के योग्य है।
साधारण मनुष्य इस ज्ञान के अधिकारी नहीं हैं ।। ५७ ॥
नो तच्छोतुमहाऽन्यो मनुष्यस्त्वामृतेऽनघ ।
नैतद्य सुविज्ञेयं व्यामिश्रेणान्तरात्मना ॥५॥
चतुर्थ अध्याय ] ब्राह्मण गौता • [.४३ हे श्रेष्ट अर्जुन ! तुम्हारे सिवाय और कोई पुरुष इस ज्ञान के सुनने का अधिकारी नहीं है तथा असावधान पुरुप इसे समझ भी नहीं सकता ।। ५८ ॥ क्रियावद्भिर्हि कौन्तेय देवलोकः सभावृतः। न चैतदिष्टं देवानां मर्थरूपनिवर्तनम् ॥५॥ हे कुन्ती पुत्र प्रर्जुन ! सकाम कर्म करने वाले पुरुष देवलोक अर्थान् स्वर्ग को प्राप्त होते हैं किन्तु श्रेष्ठ पुंरुप इस जन्म मरणं के बन्धन को अच्छा नहीं समझते ॥ ५९॥ परा हि सा गतिः पार्थ यत्तद्ब्रम सनातनम् । यत्रामृतत्वं प्राप्नोति त्यक्त्वा देहं सदा सुखो॥३०॥ हे अर्जुन ! परब्रह्म की प्राप्ति ही निर्वाण पद है जिस अमृत पद की शरीर छोड़कर ही जीवात्मा प्राप्त करता है और सदा आनन्द युक्त रहता है ।। ६० ।। इमं धर्म समास्थाय येऽपि स्युः पापयोनयः । स्त्रियो पैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम् ।६१ इस प्रभु पद की प्राप्ति के साधन को धारण करके पापी अर्थात् कोढ़ो कलंकी आदि पुरुप, स्त्रियें वैश्य तथा शूद्र भी उत्तम गति को प्राप्त होते हैं ।। ६१॥ किं पुनर्ब्राह्मणाः पार्थ क्षत्रिया वा बहुश्रुताः । स्वधर्मरतयो नित्यं ब्रह्मलोकपरायणाः ॥६२॥ विद्वान धार्मिक सदा ब्रह्म पद के इच्छुक ब्राह्मणों और क्षत्रियों का तो कहना हो क्या है ॥६॥ 1 ४४ । ब्रा झण गीता [ ननुर्थ अध्याय ऐतुपयलयुधिष्टमुपायाश्चत्य साधने । सिद्धिं फलं च मोक्ष दावस्य च विनिर्णयः ॥६३॥ यह हमने हेतु पूर्वक मोक्ष धर्म का उपदेश किया है और उसके साधन भी बतला दिये है जिन दुग्वां का अन्त अनेक प्रकार को सिद्धिये और माक्ष प्राप्त होता है ॥३३॥ कोतापर सुखं स्वन्यत् किंचिल्ल्यालरतर्षभ। बुद्धिमान श्रदधानश्च पराक्रान्तश्च पाण्डव ॥६॥ यः परित्यज्यते देस्यों लोकसारमसारवत् । एतपायैः स विमी परां गतिमवाप्तुते ॥३५॥ हे अर्जुन ! इससे अधिक सुख और कुछ भी नहीं है. हे अर्जुन जो बुद्धिमान् श्रद्धालु पुरुप इस नानाविध भंडागे से परिपूर्ण संसार को तुच्छ वस्तु समझ कर छोड़ देना है वह पूर्वक्ति शम भादि साधनों से शीघू हो मोक्ष को प्राप्त करना है ।।६४-६५!! एतावदेव वक्तव्यं नातो भूयोऽस्ति किंचन । परमासान्नित्ययुक्तस्य योगः पार्थ प्रवर्तते ॥६६॥ केवल इतना ही उपदेश करना है और इससे अधिक नहीं है । हे अर्जुन ! जो ६ मास तक नित्य साधन करता है वह योग को प्राप्त होता है।॥ ६॥ श्री ब्राह्मण गीता का चतुर्थाध्याय समाप्त हुश्रा ।
पचम अध्याय । ना म ण गीता . [ ४५ -~ पंचम अध्याय वासुदेव उवाच- अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । दम्पत्योः पार्थ संवादो योऽभवद्भरतर्षभ श्रीकृष्ण जी वोले-त्रामण ने जो पहले प्रश्न किया था उस विपय को स्पष्ट करने के लिये एक प्राचीन उपाख्यान प्रसिद्ध है जो एक पति पत्नी सम्बाद के रूप में है, उसे हे अर्जुन ! तुम सुनो ॥१॥ ब्राह्मणी प्रारमण कंचिज्ज्ञानविज्ञानपारगम् । दृष्ट्वा विविक्त आसोनं भार्या भर्तारमब्रवीत् ॥२॥ एक ब्राह्मणी ज्ञान तथा विज्ञान में कुशल अपने पतिदेव को एकान्त स्थान में बैठा हुआ देख कर बोली ॥२॥ कं नु लोकं गमिष्यामि त्वामहं पतिमाश्रिता । न्यस्तकर्माणमासीनं कीनोशमविचक्षणम् ॥३॥ भार्याः पतिकृताँल्लोकानाप्नुवन्तीति नः श्रुतम् । स्वामहं पतिमासाद्य कां गमिष्यामि वै गतिम् ॥४॥ हे पतिदेव ! मैंने यह सुना है कि पत्नी अपने पति के तप के प्रभाव से गति को प्राप्त करती है मुझे बतलाओ कि मैं तुम जैसे पति को प्राप्त करके किस अवस्था को प्राप्त करूंगी क्योंकि तुमने यज्ञादि कर्मों का परित्याग कर दिया है और तुम मेरे पति निष्ठुर तथा अविचारवान हो ॥३-४|| . .
- ४६1 ना ह्म ण गीता [पंचम अध्याय एवजुक्तः स शान्तात्मा तामुवाच हसन्निव । सुभगे नाभ्यसूयामि वाक्यस्यास्य तवाऽनघे ॥५॥ बाल यह सुन कर वह शान्त स्वभाव बाहारण कुछ मुस्कराकर हे भगवति ! मैं तुम्हारे इन बचनों से प्रसन्न नहीं हूँ |५|| ग्राह्य दृश्यं च सत्यं वा यदिदं कर्म विद्यते एतदेव व्यवस्पन्ति कर्म कर्मेति कर्मिणः यह जो भी कुछ ग्रहण करने योग्य दीक्षा, व्रत श्रादि दृश्य- मान कर्म हैं इसी को कर्मकांडी पुष्प, कर्म के नाम से पुकारते हैं.६ मोहमेव नियच्छन्ति कर्मणा ज्ञानवर्जिताः । नैष्कम्यं न च लोकेऽस्मिन्मुहर्तमपि लभ्यते ॥७॥ ज्ञान से रहित कर्मकांडी पुरुप अपने शरीर का कष्ट देकर केवल मोह को प्राप्त करते हैं और वे एक क्षण भी कर्म रहित नहीं रह सकते ॥७॥ कर्मणा मनसा बाचा शुभं वा यदि वाऽशुभम् । जन्मादिमूर्तिभेदान्तं कर्मभूतेषु वर्तते रक्षोभिर्वध्यमानेषु दृश्यद्रव्येषु वर्त्मसु । श्रामस्थमात्मना तेस्यो दृष्टमायतनं मया ॥६॥ जन्म तथा मृत्यु के बन्धन में पड़े हुये नाना योनियों को प्राप्त होकर इस कर्मयोनि में पड़े हुये जीव जो भी मन, वचन, तथा कर्म से भले वा बुरे कर्म करते हैं उन सब दृश्यमान को का विनाश दुष्ट पुरुष करते हैं इस लिये मैं तो अपने प्रात्मा में हो पंचम अध्याय ] ब्राह्मण गीता [४७ प्रभु के दर्शन करता हूँ। और मैंने प्रभु के दर्शन का स्थान प्राप्त कर लिया है ।।८-९॥ यत्र तद्ब्रह्म निर्बन्दं यत्र सोमः सहाग्रिना। व्यवायं कुरुते नित्यं धीरो भूतानि धारयन् ॥१०॥ स्त्र ब्रह्मादयो युक्तास्तदक्षरमुपासते । विद्वांसः सुव्रता यत्र शान्तात्मालो जितेन्द्रियाः॥११॥ यह स्थान वे हैं जहां पर इडा और पिङ्गला ये दोनों नाड़िये बुद्धि को प्रेरणा करने वाली वायु के साथ संचरण करती हैं। और जहां पर निर्लेप ब्रह्म रहता है उसी स्थान पर ध्यान लगा कर विद्वान्, व्रती, शान्तचित, तथा जितेन्द्रिय ब्रह्मादि ऋषि उस नित्य ब्रह्म की उपासना करते हैं ॥१०-११॥ घाणेन न तदा यं नास्वाचं चैव जिह यया । स्पर्शनेन तदस्पृश्यं सनसा स्ववगम्यते ॥१२॥ वह ब्रह्म नासिका जिव्हा तथा त्वचा इन्द्रिय का विषय नहीं है किन्तु वह केवल मन से ही जाना जा सकता है ॥१२॥ चक्ष षामविषय च यत्किंचिच्छुचणात्परम् । अगन्धमरसस्पर्शमरूपाशब्दलक्षणम् नेत्र तथा कानों से भी ब्रह्म नहीं जाना जा सकता इसलिये ब्रह्म गंधादि पांचो विपयों से रहित है ।। १३ ।। यतः प्रवर्तते तन्त्रं यन्त्र च प्रतितिष्ठति। प्राणोऽपानः समानश्च व्यानचोदान एव च ॥१४॥ . -- ४८] ब्रा ह्मण गीता [पंचम अध्याय तत एव प्रवर्तन्ते तदेव प्रविशन्ति च । समानव्यानयोर्मध्ये प्राणापानौ विचेरतुः ॥१५॥ तस्मिन्लीने प्रलीयेत समानो व्यान एव च । अपानप्राणयोर्मध्ये उदानो व्याप्य तिष्ठति । तस्माच्छयानं पुरुषं प्राणापानौ विमुञ्चतः ॥१६॥ उस ब्रह्म से ही सृष्टि की उत्पत्ति होतो है, उसमें ही इस सृष्टि का लय हो जाता है। प्राण, अपान, समान, व्यान और उदान भी उसीसे प्रवृत्त होते हैं और उसी में लीन हो जाते हैं समान और व्यान के बीच में प्राण और अपान रहते हैं जब प्राण पूर्वोक्त स्थान में लीन हो जाता है तब समान और व्यानं भी विलीन हो जाते हैं अपान और प्राण के बीच में उदान रहता है इसीलिये मृत शरीर और अपान भी छोड़ देते हैं ।। १४-१६ ।। प्राणानामायतत्वेन तमुदान प्रचक्षते । तस्मात्सपो व्यवस्यन्ति भद्गतं ब्रह्मयादिनः ॥१७॥ उदान में ही प्राणों का अन्तर्भाव होता है इसलिये ब्रह्मवादी पुरुप नासिका और भौं के बीच में ही ध्यान लगाते हैं ॥ १७ ॥ प्राण अपनादि वायु के ती शरीरस्थ भेदों से पांच भेद हैं, ये आपस में एक दूसरे के किस प्रकार आश्रय रहते हैं यह संक्षेप से यहां पर कहा गया है इस विषय का विशद् विवेचन आगे किया . जावेगा। यहां केवल इतना ही समझना चाहिये कि इन पांचो प्राणों में जिस प्राण की मुख्यता है उसका निवास स्थान वही है को प्राण
पंचम अध्याय
ग्रामण गीता
[४९
जहां पर इडापिजला नाड़िों बुद्धि से प्रेरित वायु के साथ निवास
करती है उस स्थान को ही ध्यान लगाने का साधन ब्रह्मवेत्ता योगी
ऋषियों न यताया है।
तेषामन्योन्यभक्षाणां सर्वेपां देहचारिणाम् ।
। अग्निवैश्वानरो मध्ये सप्तधा दोव्यतेऽन्तरा ॥१८॥
इन एक दूसरे के भक्षक तथा शरीर में रहने वाले पाँचो प्राणों
में से समान प्राण के स्थल अर्थात् नाभि स्थल में वैश्वानर
(जठराग्नि ) रहना है और वह अन्दर सात विधियों से प्रकाश
करता है।॥ १८॥
घाणं जिहवा च चतुश्च त्वच नोनं च पश्यमम् ।
मनो वुद्धिश्च सप्तैता जिह वा वैश्वालराधिः ॥१६॥
नासिका, रसना, नेत्र, त्वचा, श्रोन, मन और बुद्धि ये सात
उस वैश्वानर अग्नि की जिह्वायें हैं ॥१९॥
घेयं दृश्यं च पेयं च स्पृश्यं भव्य तथैव च।
मन्तव्यमय वोद्धव्यं ताः सत सलिधो मम ॥२०॥
घाता भक्षयिता द्रष्टा स्प्रधा श्रोता च पश्चमः ।
मन्ता वोद्धा च ससैले भनन्ति परमविजः ॥२१॥
घेये पेये च दृश्ये च स्पृश्य श्रव्ये तथैव च।
मन्तव्येऽप्यथ योद्धव्ये सुभगे पश्य सर्वदा ॥१२॥
हवींष्यग्निषु होतारः सप्तधा सस सक्षम् ।
सम्यक्प्रक्षिप्य विद्वांसो जनयन्ति स्वयोनिषु॥२३॥
५०
त्रामा ग गी ना [पंचम अध्याय
पृथियो वायुराकांशमापो ज्यानिष्ट पञ्चमम् ।
मनो बुद्धिश्च ससौना योनिरित्यय शब्दिताः ॥२४॥
इसी प्रकार इन सानों के मान ही रिपय जय वैश्वानर अग्नि
की समिधायें हैं। इन सानो विपयों का अनुभव करने वाले,
सात ही उस अग्नि के ऋविन है । इस प्रकार विद्वान पुरुष
इन सात प्रकार की अग्नियों में मानों प्रकार के विषयों का, साता
प्रकार के अनुभवों द्वारा अपने कारणों में चना करते हैं. नत्र वे
विद्वान् पृथ्वी, वायु, आकाश, जल, अग्नि, गन, और बुद्धि प्रादि
को उत्पन्न करते हैं और इन्हें हो चैतन्य की अभिव्यक्तिका स्थान
कहते हैं ।।२०-२४
हविर्भूता गुणाः सर्वे प्रविशन्त्यग्निजं गुणम् ।
अन्तर्वास जित्वा च जायन्ते स्वास्लु योनिपु ॥२५॥
गंध आदि गुण उस अग्नि में पड़ कर अग्नि न उत्पन्न होन
वाले गंधादि ज्ञान रूप बुद्धि की प्रवृत्ति में प्रवेश करते हैं।
अन्दर रह कर अपने २ कारणों में फिर, उत्पन्न होते है अर्थात्
देखे हुये रूपादि जितने विषय हैं वे सब सुपुप्ति आदि अवस्थाओं
में वासना रूप चित्त में रह कर जागृत अवस्था में फिर जप..
हो जाते हैं ।।२५॥
तत्रैव च निरुध्यन्ते प्रलये भूतभावने ।
ततः संजायते गन्धस्ततः संजायते रसः
ततः संजायते रूपं ततः स्पोऽभिजायते ।
॥२६॥
पनम पयाग प्रमाण माना । ५१ - ततः मंजायन शब्दः संशयनत्र जायते । ततः संजायन निष्ठा जन्तल्लसधा विदुः ॥२७॥ 'पौREAR न होना नव "न्दर ही विलीन हो जाने और कार नाका याग करने हुये उसम्म गंध, रस प, पर्श. स. गाय और निटाइम सात गुणों की अभि- मिली :-|| अनव प्रकारण प्रगृहीतं पुरातनः । पूर्णाहुनिभिरागृणास्तिभिः पूर्वन्ति तेजसा ॥२८॥ वाशीम गिनीनी प्रकार से इस विषय को समझा है कान मालिका प्राग और उनके संस्कारों की परम्परा नामिका यादि के ग्यमाप जाना है, इस प्रकार ज्ञान ज्ञाता और जगनतीनों द्वारा उन परब्रह्म के आश्रय से ही यह नीनों लोक परिपूर्ण है। यह नीन भी उसकी ही न्योति से प्रकाशित इस नियं सत्ता वाले हैं ।।२८|| से श्रीनाराण गीता का पांचवा अध्याय समाप्त -14 ५२] ना ह्मण गाता [पष्टम अध्याय षष्ठ अध्याय झिए उवाच अवाप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । लिवोध दशहोतृणां विधानमथ यादृशम् ॥१॥ ब्राह्मण ने कहा हे सुभगे ! जिस विषय को हमने ज्ञाता, ज्ञान ज्ञय के उपाख्यान से कहा है उसी विपय का दश होताओं के उपाख्यान से भी प्राचीन ऋपियों ने वर्णन किया है उसे तुम सुनो ॥१॥ श्रोत्रं स्वचक्ष षी जिह वा नासिका चरणी करौ। उपस्थं वायुरिति वा होतृणि दश भामिनि ॥२॥ कान, त्वचा, नेत्र, रसना, वाणी, नासिका, हाथ, पैर, सूत्रे- न्द्रिय तथा गुदा ये दश होता हैं ॥२॥ शब्दपशो रूपरसो गन्धो वाक्यं क्रिया गतिः । रेतोमूत्रपुरीषाणां त्यागों दश हवींषि च ॥३॥ शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध, बोलना, क्रिया, गति, वीर्यमूत्र, तथा मल का त्याग ये दश हवि है ।।३।। दिशो चायू रविश्चन्द्रः पृथव्यग्नी विष्णुरेव च । इन्द्रः प्रजापतिर्मिनमग्नयो दश भामिनी ॥४॥ दिशा, वायु, सूर्य, चन्द्रमा, पृथिवी, अग्नि, विष्णु, इन्द्र, प्रजापति, और मित्र थे दश अग्नियें हैं ।।४।।
1 ५२ ht-1.. पष्टम अध्याय । गीता दशेन्द्रियाणि होतृणि हवींपि दश भामिनी । विषया नाम समिधा हयन्ते तु दशाग्निपु ॥५॥ काम वादिनमाला. दिशादि दश अग्नियों में शब्द आदि हा प्रकार नवनीय नामयो की प्राइनि देने हैं ||५|| चित्तं भुवन वितच पवित्रं ज्ञानमुत्तमम् । मुविभक्तमिदं सर्वं जगदासोदिति श्रुतम् ॥६॥ मन, म य का ना ! पुण्य और पाप रूपी संस्कार ही इस यज्ञ में दक्षिण रूप से दि जाते हैं। और इसके अनन्तर जो वस्तु शेर गजाता है वही उनग ज्ञान है और ज्ञान हो उसमें निप्र नहीं होना किन्न सम्पूर्ण संसार मे पृथक् रहता है यह प्राचीन ऋपियों का वचन है अर्थान विषयों का नाश मनके द्वारा ही करना चाहिये, 'अन्य साधना से नहीं ॥३॥ सर्वमेवाथ विज्ञेयं चित्तं ज्ञानयवेक्षते । रेतः शरीरभृत्काये विज्ञाता तु शरीरभृत् ||७|| ज्ञातव्य बन्नुओं को शेय, सब पदार्थो के प्रकाशक को ज्ञान तथा सूक्ष्म और स्थूल शरीर के अभिमानी जीव को ज्ञाता कहते हैं । शरीरभृद्गाहपत्यस्तस्मादन्यः प्रणीयते। मनचाहवनीयस्तु तस्मिन्प्रक्षिप्यते हविः जीवात्मा ही पाई पत्य ( हृदय ) अग्नि है जोकि, शरीर में अन्य भाव से रहता है और मुख ( मन ) आहवनीय अ.ग्न
ब्रा म ण गो ता परम अध्याय
,
स्वला है इस अग्नि में ही हवि डाली जानी है ||८||
ततो वाचस्पतिज्ञ तं मनः पर्यवेक्षते ।
रूपं भवति वैवर्ण समानुद्रवते मनः 18
तदनन्तर वह हवि ही वाणी कप हो जानी है पुनः मन उत्पन्न
होकर उस वाणो को देखता है तत्पश्चात् उप रहित वायु मनका
अनुगामी होता है ।।५।।
ब्राहाण्युवाच-
कस्मानाग भवत्पूर्व कस्मात्पश्चान्लनोऽभवत् ।
मलसा चिन्तितं वाक्यं यदा समभिपद्यते ॥१०॥
ब्राह्मणी बोली जब वाणी मन से चिन्ता करने के अनन्तर
उत्पन्न होती है तब आपने यह कैसे कहा कि वाणी प्रथम उत्पन्न
होती है और मन उसके अनन्तर ||१||
केल विज्ञानयोगेन मतिश्चित ससास्थिता
समुनोता नाध्यगच्छस्को चैतां प्रतिवाधते ॥१२॥
और किस प्रमाण के अनुसार आपने यह कहा है कि प्राण,
मन के आधीन है और सुषुप्ति अवस्था में प्राण मन के साथ रहने
पर भी मन की तरह लय नहीं होता और कहो ! प्राण की ज्ञान
शक्ति का कौन अपहरण करता है ।।१।।
ब्राह्मण उवाच
तापमानः पतिर्भूत्वा तस्मात्प्रेषस्यपानताम् ।
तां गतिं मनसः प्राहुर्मनस्तस्मादपेक्षते ॥१२॥
-MAAh যন গা । याग गीता [५५ नाता का भने । पान, जाग, का पति होकर उस को रोका रम्यका । म प्रायोति के आधीन है किन्तु प्राण मन को गति प्राचीन नहीं है । अर्थात इसी लिये मन का लय होने पर भी प्राग का लग नहाना ॥१२॥ प्रश्नं तु वाङ्मनसोर्मा यस्मात्यमनुपृच्छसि । तस्मात्त वर्तयिष्यामि तयोरेव समाह क्यम् ॥१३॥ नुमने जो मुझ से बागी और मन के विषय में प्रश्न किया है, उनका उत्तर में मन और वाणी के सम्वाद के रूप में ही तुम्हे सुनारंगा ॥१३॥ उभे वाङ्मनसी गत्वा सूतात्मालमपृच्छताम् । आवयोः श्रेष्ठमाचक्ष्य च्छिन्धि नौ संशयं विभो॥१४॥ एक बार मन और बागी दोनों जीवात्मा के पास जाकर बोले कि महाराज हम दोनों पर कौन श्रेट है, यह बतला कर हसारा मन्देह दूर कीजिगं ॥ १४ ॥ मन इत्येव भगवास्तदा प्राह सरस्वतीम् । अहं वै कामधुक् तुभ्यमिति तं प्राह बागथ ॥१५॥ जोवान्मा ने उत्तर दिया मन ही श्रेष्ट है। तब वाणी ने कहा कि तुम्हारे लिये में ही कामनाओं की सिद्धि करने वाली हूँ तब तुमने मन को श्रेष्ठ क्यों बनलाग ।।१|| ब्राह्मण उवाच- स्थावरं जङ्गमं चैव विद्धयभे सनसी लम।
५६ ] ना माग गीता [पष्टग अध्याय स्थावरं सत्सकाशे वे जलमं विषय नव मन ने कहा, स्थावर अर्थान वाहा इन्द्रियों का विश्य और जंगम अर्थात् श्रातीन्द्रिय विषय मन के ही प्राचीन है किन्तु वाय इन्द्रियों का विषय मरं अधिक समीय और प्रनान्द्रिय विषय वाणी के अधिक समीप है ॥१३॥ यस्तु ते विषयं गच्छेन्मन्त्री वर्णः स्वरोऽपि वा। तन्मलो जङ्ग नाम तस्मादपि गरीयली किन्तु हे वाणी जो अतीन्द्रिय मन्त्रवर्ण तथा स्वर मंग विषय है वह वाणी के ही द्वारा प्रकट होता है इस प्रकार मांसारिक विषयों पर मेरी और पारलौकिक विषयों पर वाणी की प्रधानता है ॥१७॥ यस्मादपि सलोधिस्ते स्वयम यस्य नोयने । तस्मादुच्छ बालधासाय प्रवक्ष्याशिलरस्पति ॥१८॥ किन्तु हे सुन्दरी ! तुम सदा अपनी प्रधानता के लिंग चंद्रा करती हो इस लिये मैं अपने को तुम में श्रेष्ट मामा करना हूँ ॥१८॥ प्राणापानान्तरे देवी बग्दै नित्यं स्म तिति। प्रेयसाणा महाभागे विना प्रापमपानती। प्रजापतिमुपाधावत्प्रसीद भगवन्निति ॥१६॥ वाणी प्राण के द्वारा प्रेरित होकर प्राण और अपान के अन्दर सदा निवास करती है किन्तु जब इसे प्राण की सहायता नहीं यथम अध्याय ] ना मण गीता [५७ मिलनी और अधोगति को प्राप्त होती है तब यह प्रजापति के पास जाकर कहनी है कि भगवान मुभा पर कृपा करो ।।१९।। ततः प्राणः प्रादुरस्नाचमाप्याययन्पुनः । यस्मादुच्छ्वाससासाय न वाग्वदति कर्हि चित्॥२०॥ नव प्रजापति नागा को उन्पन्न करता है और वह प्राण वाणी को पुष्ट करता है तदनन्तर वागी उच्छवाम को प्राप्त होकर अव्यक्त रुप हो जाती है। घोषिणी जातनिर्धापा नित्यमेव प्रवर्तते। तयोरपि च घोपिण्या लियो पैद गरीयसो ॥२१॥ वाणी, व्यक्त तथा अव्यक्त भेद से दो प्रकार की हैं जिनमें अव्यक्त रूप वाणी श्रेष्ठ कही गयी है क्योंकि वह प्राण और मन के श्राधीन नहीं है ।।२१।। गौरिव प्रस्रवत्यर्थात् रसत्तमशालिनी । सततं स्यन्दते छपा शाश्वतं ब्रह्मवादिनी ॥२३॥ जिस प्रकार गाय उत्तम रस का प्रदान करती है । उसी प्रकार व्यक्त वाणी निरन्तर ब्रह्म का उपदेश देती है ॥२२॥ दिव्यांदिव्यप्रभावेन भारती गौः शुचिस्मिते। एतयोरन्तरं पश्य सूक्ष्मयोः स्यन्दमानयोः ॥२३॥ व्यक्त तथा अव्यक्त रूप में प्रभाव वाली "वाणी" हैं और इन दोनों अवस्थाओं में जिस प्रकार यह उत्तम पदार्थों का प्रदान करती हैं उसे तुम ध्यान से देखो ॥२३॥ .
५८ ] त्रा ग गीता [ पृष्टम अध्याय ... ब्राह्मण्युवाच- अनुस्पन्नेषु वाक्येषु चोद्यमाना चिवतया । किं नु पूर्व तदा देवी व्याजहार सरस्वती ॥२४|| ब्राह्मणी बोली ! हे महागज ! अव्यक्तदान व पूर्व वागी हिस अवस्था में रहती है यह वनलाइ ||२|| प्रीक्षण उवाच--- प्राणेन या संभवते शरीरे प्राणादयानं प्रतिपद्यते च । उदानभूता च विज्य देहं व्यानेन सर्व दिवमात्र- पोति ॥२५॥ ततः समाने प्रतितिष्ठनीह इत्येव पूर्व प्रजजरूप आणी। तस्मान्मनः स्थावरत्वादिशिष्टं नया देवी जङ्गमस्वाद्विशिष्टा ॥२६॥ ब्राह्मण ने कहा है देवि ! पहिलं बाणी गर्गन्ध प्राण वाय न प्रस्फुरित होती है और फिर. यह अपान वायु में जाकर गिलनी है तदनन्तर उदान वायु के सहारे से शरीर को छोड़ कर व्यान वायु के सहारे से मस्तिष्क में पहुंचतो है तब समान वायु के आधार पर व्यक्त अवस्था को प्राप्त होती है इस लिय सांसारिक विपयों का अधिष्ठाता होने के कारण मन श्रेष्ट है। और अनोन्द्रग विपयों की अधिष्ठात्री होने के कारण वाणी श्रेष्ट है अर्थात मन को ही चेष्टा से प्राण आदि वायु वाणी को उत्पन्न करत है और वह वाणी व्यक्त अवस्था में पहुंच कर लोक का बड़ा कल्याण करती है इसलिये मन पष्टम प्रयाग 1 और वागी दोनों ही पनी पापनी अवस्था में उपकारक होने से श्रेष्ठ ।"-६॥ शन्द शास्त्र में भी बाद ही वर्णन अाना है कि आत्मा, बुद्धि से विषयों को जानकर बोलने की इच्छा से मन को प्रेरणा करता है और मन शरीरन्ध अग्नि का प्रेरित करना है और अग्नि वायु को अंगणा करना है नब वायु नालु, बाद स्थानों में पहुंच कर अव्यक्त घारगी को व्यन करना है इस सम्पूर्ण अध्याय का तात्पर्य यह है शि पुस्प इन्द्रियों पं. द्वारा जिस प्रकार के भी विपयों का भोग करना, उसका चैमा हो मन बनता है, वैसे ही वारण वन जाती है और यदि वह विवचन लिया जाय कि जीवात्मा के ऊपर मन का अधिक प्रभाव होता है. या वागी का, तो शास्त्र यह निश्चय करता है कि प्रभाव दानों का समान है यद्यपि मन इन्द्रियों का अधिष्ठाता मान के कारण जीवात्मा पर वाहा विषयों का अधिक प्रभाव उत्पन्न करता है, नत्र यह वायां व्यक्त तथा अव्यक्त दोनों रूप से जीवात्मा पर प्रभाव डालती हैं इसलिये वाणी का भी प्रभाव मन पर कम नहीं होता। इसलिये जो पुरुप कल्याण की कामना करता है यह आहार शुद्धि से मन तथा संकल्प विकल्पात्मक अव्यक्त वाणो तथा व्यक्त वाणी इन सब की ही पवित्रता का उद्योग करता है श्री बामण गीता का पष्टाध्याय समाप्त
ना हा रण गीता
[सप्तम अध्याय
सप्तम अध्यायप्रारम्भ
-
ब्राह्मण उवाच-
अन्नाप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरानलम् ।
सुभगे सतहोलणां विधानमिह यादृशम् ॥१॥
ब्राह्मण वोला ! इसो विषय को सात होताओं के उपाख्यान
से भी कहा करते हैं । उस उपाख्यान को तुम सुना ॥ १ ॥
प्राणश्चतुश्च जिह वा च त्वक् श्रोत्रं चैव पञ्चमम् ।
मनोबुद्धिश्च सौते होतारः पृथगाम्भिताः ॥२॥
नाक, चक्षु, जिह्वा, स्वचा, श्रोत्र, मन और बुद्धि ये सात
प्रथक् प्रथक् "होता" हैं ।। २॥
सूक्ष्ोऽवकाशे तिष्ठन्तो न पश्यन्तीतरेतरम् ।
एतान्दै लतहोत स्वं स्वभावाद्विद्धि शोभते ॥३॥
ये सूक्ष्म अवकाश में रहते हुए भी परम्पर एक दूसरं को नहीं
देखते । यह इनका स्वाभाविक धर्म है इस बात को हे सुभगे ! तुम
अच्छी तरह समझलो ॥ ३॥
ब्राह्मण्युवाच-
सूक्ष्मेऽनकाशे सन्तस्ते कथं नान्योन्यदर्शिनः ।
कथं स्वाचा भगवन्नेलदाचच मे प्रयो
॥४॥
ब्राह्मणी बोलो हे भगवन् ! सूक्ष्म स्थान में रहने हुए यह
परस्पर अनभिज्ञ कैसे रहते हैं। और इनका क्या स्वभाव है। यह
कृपा कर बतलाइये ॥४॥
NAA.
-
ममम अध्याय ] बारामा गी ना
[ ६१
ब्राह्मण उवाच---
गुणाज्ञानमविज्ञानं गुणज्ञानमभिज्ञता।
परस्परं गुणानेते नाभिजानन्ति कर्हि चित् । ॥५॥
भाषण श्रीला : नाना कार्य अपने अपने गुणों को जानते
और नशे के गुणों का ना जानने इसलिये ये एक दूसरे से
"अनभित गाने ।। '५॥
जिा वा चतुस्नथा श्रोत्र' बङ्मनो बुद्धिरेव च ।
न गन्धानधिगच्छन्ति प्राणस्तानधिगच्छति ॥६॥
जिहा: नेत्र. कान बचा, मन, बुद्धि गन्ध को ग्रहण नहीं कर
सकता किन्तु नानिका ही उनका प्रक्षण करती है ।। ६ ।।
धाएं चक्षुस्तथा श्रोत्र वमनो बुद्धिरेव च ।
रसानधिगच्छन्ति जिहवा तानधिगच्छति ॥७॥
नासिका, नत्र, कान, वचा, मन, बुद्धि, ये रस को ग्रहण नहीं
कर सकतो किन्तु रसना ही इन का ग्रहण करती है ॥ ७ ॥
घाणं जिद्द वा तथा श्रोन त्वङ्मनो बुद्धिरेव च ।
न रूपाण्यधिगच्छन्ति चक्षुस्तान्यधिगच्छति ॥८॥
नासिका, रसना, कान, त्वचा, मन, और बुद्धि, ये रूप का
महण नहीं कर सकतो किन्तु चक्षु ही रूप का ग्रहण करती है।।८
घाणं जिह वा ततश्चक्षुः श्रोत्र बुद्धिर्मनस्तथा ।
न स्पीनधिगच्छन्ति स्वक्च तानधिगच्छति ॥६॥
, ६२] ब्रा मा रए गा ता सप्तम अध्याय नासिक', रसना, नेत्र, कान, बुद्धि, और मन, ये स्पर्श का ग्रहण नहीं कर सकते, त्वचा ही स्पर्श का ग्रहण करती है ॥९॥ घाणं जिह वा च चक्षुश्च त्वझनोबुद्धिरेव च । न शब्दालधिगच्छन्त श्रोत्र तानधिगच्छति ॥१०॥ नासिका, रसना, चक्ष, त्वचा, मन, और बुद्धि, ये शब्द का ग्रहण नहीं कर सकने, किन्तु कान ही उसका ग्रहण करता है ॥ १० घाणं जिह वा च चतुश्च स्वक् श्रोत्रं बुद्धिरेव च । संशयं लाधिगच्छन्ति सनस्तमधिगच्छति ॥१०॥ नासिका, रसना, चक्षु, त्वचा, श्रीत्र, और बुद्धि संकल्प वि- कल्प को ग्रहण नहीं करते किन्तु मन ही इनका ग्रहण करना है।।११ ध्राणं जिह वा च चतुश्च स्वक् प्रोन्नं सन एव च । न निष्ठामधिगच्छन्ति बुद्धिस्तमधिगच्छति ॥१२॥ नासिका, जिह्वा, नेत्र, त्वचा, श्रीत्र तथा मन किसी वस्तु का: निश्चय नहीं कर सकतं यह कार्य बुद्धि का है ।। १२ ।। अन्नाप्युदाहरन्तिममितिहासं पुरातनम् । इन्द्रियाणां च संवाद सनसश्वैव भामिनि ॥१३॥ इस विषय के वर्णन में भी एक पुगतन उपायान है जिसमें इन्द्रियें और मन का सम्वाद है ॥ १३ ॥ मन उवाच नाघाति मामृते घाणं रसं जिह वा न वेत्ति च । रूपं चक्षुर्न गृह पाति स्वक् स्पर्श नाक्युध्यते ॥१४॥ --
सप्तम अध्याय ] ना म ण गीता
[६३
न श्रोत्रबुध्यते शब्दं मया हीनं कथंचन ।
प्रवरं सर्वभूतानामहमस्मिसनातनम् ॥ १५ ॥
मन बोला ! मेरे विना नासिका सूघ नहीं सकती, रसना रस
का ग्रहण नहीं कर सकती, आँख रूप को नहीं देख सकती,
त्वचा स्पर्श का ग्रहण नहीं कर सकती, कान-शब्द नहीं सुन
सकते अर्थात् इन्द्रियं मेरी सहायता के बिना कुछ भी नहीं कर
सकती इसलिए मैं तुम सब से श्रेष्ठ हूँ ॥ १४-१५ ।।
अगाराणीच शून्यानि शान्तार्चिष इवाग्नयः ।
इन्द्रियाणि न भासन्ते सया हीनानि नित्यशः॥१६॥
मेरे बिना इन्द्रिय सूने घर की तरह से और लपटें रहित
अग्नि की तरह से शून्य होती है ।। १६ ।।
काष्ठानीवाशुष्कोणि यत्तमानैरपीन्द्रियः।
गुणार्थान्नाधिगच्छन्ति मामृते सर्वजन्तवः ॥१७॥
सम्पूर्ण प्राणी मेरे बिना केवल इन्द्रियों की सहायता से
सीली लकड़ियों की तरहसे विपयोंका ग्रहण नहीं कर सकते ॥१७॥
इन्द्रियाण्यूचुः-
एवमेतद्भवेत्सत्यं यथैतन्मन्यते भवात् ।
ऋतेऽस्मानस्मदर्था त्वं भोगान् भुक्त भवान् यदि
इन्द्रिये बोली यदि आप हमारी बिना सहायता के सम्पूर्ण
विषयों का ग्रहण करलें तो जो आपने कहा है वह यथार्थ है ॥१८॥
..
.
६४ ]
वा म ण गीता [सप्तम अध्याय
स्यस्मासु प्रलीनेषु तर्पणं प्राणधारणम् ।
भोगात् भुङ्क्त सवाल सत्यं यथैतन्मन्यते तथा १६
यदि हमारे न रहने पर आप प्राणों का धारण कर सके और
सव भोगोंको भोग सकें तो! आपका कहना सर्वथा सत्य है ।।१९।।
अथवाऽस्मातु लोने लिष्ठस्तु विपयेषु च ।
यदि संकल्पयाण सुङ्क्ते मोगान् यथाथवत्॥२०॥
या हमारे लोन हो जाने पर, और विपत्रों के रहने पर, यदि
आप केवल संकल्प से ही उन विषयों का ज्ञान प्राप्त करलें तब भी
आपका कहना सत्य मानलें ॥ २० ॥
अथ चेन्मन्यसे सिद्धिमस्मदर्थेषु निस्यदा ।
घ्राणेन रूपमादरस्व रसमादरच चक्षषा ॥२१॥
श्रोत्रेण गन्धानादत्स्व स्पर्शानादस्व जिह क्या ।
त्वचा च शब्दमादत्स्व बुद्धया स्पर्शलथापि च ॥२२॥
यदि आप यह समझते हैं कि हमारे विपयों में ही सिद्धि है.
तो आप नासिका से रूप का ग्रहण करके दिखाओ, नेत्रों से स्वाद
को पहचानों। कानों से सुगन्ध और दुर्गन्ध का अनुभव करो,
रसना से गर्मी और सर्दी को जानो, और त्वचा से शब्द को सुनो
या बुद्धि से ही स्पर्श का अनुभव करो ।। २१---२२ ।।
बलवन्तो ह्यनियमा नियमा दुर्बलीयसाम् ।
भोगान पूर्वानादस्व नोच्छिष्टं मोक्कमहति ॥२३॥
माम अध्याय ] नाका सा नीता [६५ पाप नो बनवान है इसलिए शाप के लिए तो कोई नियम न होना चाहिए क्योंकि नियग दुर्बलों के लिए होते हैं। अतः अपूर्व भागों को स्वयं प्रान कगे, और हमारे द्वारा भोगे हुए विषयों को रच्छिष्ट भोजन की नमाने मत खाओ ।। २३ ।। यथा हि शिप्या शास्तारं श्रत्यर्थमभिधावति। ततः श्रुतमुपादाय अत्यनुपतिष्ठति ॥२४॥ विषयानवमस्माभिर्दशितान भियन्यसे। अनागतानतीताश्च स्वप्ने जागरणे तथा ॥२५॥ जिस प्रकार एक शिष्य अपने गुरु से उपदेश ग्रहण करता है और फिर उस उपदेश को सुनकर उसके अर्थ का विचार करता है इसी प्रकार तुम हमसे दिग्वलाय हुगे भूत तथा वर्तमान विषयों को स्वप्नावस्था तथा जागृतावस्था में जानने हो ।। २४-२५ ।। मनस्यं गतानां च जन्तूनालल्पचेतसाम् । अस्मदर्थ कृत कार्ये हन्यते प्राणधारणम् ॥२६।। छोटे जन्तु वैमनस्य को प्राप्त होकर हमारे ही द्वारा प्राण को धारण करते हैं ।। २६ ॥ बहनपि हि संकल्पान मस्या स्वप्नानुपास्य च । वुभुक्षया पीड्यमानो विषयाने धावति ॥२७॥ मनुष्य संकल्प विकल्प रूप विपयों का भोग करके और के आनंद को करके भी अनुभव से पीड़ित होकर भूख हमारे द्वारा विपयों को ही भोगने की इच्छा करता है ॥२७....... स्वपनावस्था
८
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६६ ] ब्रा हा रण गी ना [सनम अध्याय
अगारमद्वारमिय प्रविष्य संकल्पभोगान् विषये
निवद्वान् । प्रापचये शान्तिमुपैति निन्यं दामनेयेड-
निज्वनितो यथैव ॥२८॥
सुपुग्नि तथा ममाधि अवस्था में जब मनका इन्द्रियों के साथ
सम्बन्ध नहीं रहना तब अन्य विषयों का प्रवेश बंद हो जाने से
वासनास्थिन विषयों का भोग करके जीवात्मा इस प्रकार शान्नि
को प्राप्त करता है जिस प्रकार काष्ट के समान हो जाने पर जलना
हुआ अग्नि शान्त हो जाना है ॥८॥
( इससे पूर्व श्लोक में यह बताया जा गुका
तक मन का इन्द्रियों में सम्बन्ध रहना
जीपात्मा विषय भागों में जिम रहता है, और जब मनका
इन्द्रियों से सम्बन्ध नहीं रहना अर्थात मुपुप्नि और समाधि
अवस्था में जीवात्मा विपयों में विनिवृत्त हो जाता है। गोंकि
इन्द्रियों का सम्बन्ध न होने से विपयों का भांग नहीं हो सकता
यह ठीक इसी प्रकार होता है जैसे लकड़ियों के न मिलने ने
अग्नि शान्त हो जाती है । यहां पर यह भी चिन किया गया है
कि इन्द्रियों का प्राधान्य इस कारगण भी है कि गन उनके विना
किसी विषय का ग्रहण नहीं कर सकता )
कामं तु नः स्वेषु गुणेषु सङ्गः कामं च नान्योन्य-
गुणोपलब्धिः। अस्मान्विना नास्ति तपोपलब्धिस्ता-
उन समय नर
बढ़ते स्वां न भजेत्प्रहर्षः ॥२६॥
[ ६७ अष्टम अध्याय ] त्राा ण गो ता चाहं हमारा सम्बन्ध अपने गुणों से ही है और चाहे हम परम्पर एक दूसरे पं. गुणों को न जान नमें किन्तु हे मन ! तुम हमारे बिना किसी विषय का ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकते और तुम्हारे बिना हम भी किसी विषय का उपभोग नहीं कर सकते ॥२९॥ श्रीनागण गीता का सप्तम अध्याय समाप्त अष्टम अध्याय ब्राह्मण उवाच- अत्राप्युदाहरन्तोममितिहासं पुरातनम् । सुभगे पञ्चहोतृणां विधानमिह यादृशम् ॥ १॥ नायगा बाला प्रिये ! इस ही विषय का वर्णन पांच होताओं के. सम्बाद मप उपायान से भी प्राचीन आचार्यो'ने कहा है ।।१ पाणापानावुदानश्च समानो व्यान एच च । पश्चहोतृ स्तथैतान्दै परं भावं थिदुर्बुधाः ॥२॥ पारण, अपान, उदान, समान, और व्यान ये पांच होता हैं और इस विपय को ही प्राचीन आचार्यों ने उत्तम तत्त्व कहा है ।। ब्राह्मण्युवाच-- स्वभावात्सप्त होतार इति मे पूर्विका मतिः । यथा वै पञ्च होतारः परो मावस्तदुच्यताम् ।
an.. merica ६८] ब्रा रा गीता [अष्टम अध्याय ब्राह्मणी चोली महाराज ! मान होताओं के उपाख्यान से जिस विषय का आपन वर्णन किया है उसे में सुन चुकी हूँ। अब उससे उत्तम जो पांच होताओं का उपायान है उसे सुनाइये ।।३।। नाग उवाच प्राणेन संतो वायुरपानो जायते लतः । अपाने संभृतो वायुस्ततो व्यानः प्रवर्तते ॥ ४ ॥ व्यानेन संभृतो वायुस्ततोदानः प्रवर्तते । उदाने संवृतो बायुः समानो नाय जायते ॥ ५ ॥ ब्राह्मण बोला हे सुभगे ! वायु प्राण के द्वारा पुष्ट होकर अपान रूप, अपान से पुष्ट होकर व्यान रूप, व्यान से पुष्ट होकर उदान रूप, उदान से पुष्ट होकर समान रूप हो जाना है । अर्थान् वायु ही शरीर में स्थान भेद से पांच प्रकार का हो जाता है ॥४-५।। ( मुख और नासिका के द्वारा जो वायु शरीर में आता है उसे प्राण, गुदा आदि इन्द्रियों से जो आयु शरीर से बाहर निकलता है उसे अपान, नाभी में रहने वाले वायु को सगान, सम्पूर्ण शरीरस्थ वायु को व्यान, और कण्ठस्थ वायु को उदान कहते हैं) तेऽपृच्छन्त पुरा सन्तः पूर्वजातं पितामहम् । यो नः श्रेष्ठस्तमाचक्ष्व स नः श्रेष्ठो भविष्यति ॥६॥ एक समय यह पांचों प्राण प्रजापति के पास गये और बोले महाराज ! जो हम में श्रेष्ठ है उसे बतलाइये फिर हम उसे ही श्रेष्ठ समझा करेंगे॥६॥ 7 " अष्टम अध्याय ] ना हा ण गीता NAMANA41 ..... ArANANNA ब्रह्मोवाच- यस्मिन्प्रलीने प्रलयं व्रजन्ति सर्वे प्राणाः प्राण- भृतां शरीरे। यस्मिन्प्रचीर्णे च पुनश्चरन्ति स वै श्रेष्ठो गच्छत यन्त्र कामः ॥ ७ ॥ प्रजापति बोले जिसके शरीर में से निकल जाने पर अन्य भो निकल जाते हैं और जिम जान से यह फिर आजाते हैं वही तुग सत्र में श्रेष्ठ है बम जाओ ! यही नियम इसका निर्णय करेगा ॥७॥ माण उवाच- मयि प्रलोने प्रलयं ब्रजन्ति सर्वे प्रोणाः प्राणभृतां शरीरे । मयि प्रचीर्णे छ पुनश्चरन्ति श्रेष्ठो ह्यह पश्यत मां प्रलीलम् || प्राण बोला मेरे चले जाने पर शरीर में अन्य अपानादि नहीं रहते और मेरे आ जाने पर यह सब आ जाते हैं इसलिये मैं श्रेष्ठ हूँ देखो ! मैं जाता हूँ ॥८॥ - ब्राह्मण उवाच- प्राणः प्रालीयत ततः पुनश्च प्रचचार है। समानश्चाप्युदोनश्च वचोऽब्रूतां पुनः शुभे ॥६॥ ब्राह्मण बोला, यह कह कर प्राण चलागया और फिर आगया तब उससे समान और उदान ने कहा ।। ९ ।। .
ता vvv ७० ] ब्री झण गी [अष्टम अध्याय न त्वं सर्वमिदं व्याप्य तिष्ठसीह यथा वयम् । न त्वं श्रेष्ठो हि नः प्राण अपानो हि वशे तव । प्रचचार पुनः प्राणस्तलपानोऽभ्यभाषत ॥१०॥ हे प्राण तू इस सम्पूर्ण शरीर में हमारी तरह व्यापक नहीं इसलिये तू श्रेष्ठ नहीं है । क्यों कि तेरे बिना भी हम शरीर में रह सकते हैं । केवल अपान ही तेरे बस में है नत्र अपान ने कहा ।।१० अपान उवाच- मयि प्रलीने प्रलयं ब्रजन्ति सर्वे प्राणाः प्राण- मृतां शरीरे। मयि प्रचीर्णं च पुनश्चरन्ति श्रेष्ठो ह्यहं पश्यत मां प्रलीनम् ॥ ११ ॥ अपान बोला, मेरे चले जाने पर औरों की स्थिति नहीं हो सकती और मेरे आ जाने पर सब आ जाते है इसलिये मै श्रेष्ठ हूँ देखो ! मैं जाता हूँ ।। ११ ॥ ब्राह्मण उवाच व्यानश्च तमुदानश्च भाषमाणमथोचतुः । अपान न त्वं श्रेष्ठोऽसि प्राणो हि वशगस्तव ॥१२॥ ब्राह्मण वोला, कि तब व्यान और उदान ने कहा हे अपान तुम श्रेष्ठ नहीं हो । केवल प्राण ही तुम्हारे वश में है ।। १२ ।। अपानः प्रचचाराथ व्यानस्तं पुनरनवोत् । श्रेष्ठोऽहमस्मि सर्वेषां श्रूयतां येन हेतुना ॥१३॥ ." - : अष्टम अध्याय ] नाम गा गीता [७१ अपान फिर आगया तब व्यान ने कहा कि जिस कारण श्रेष्ट हूँ यह सुना ॥ १३॥ मयि प्रलोने प्रलयं व्रजन्ति सर्वे प्राणाः प्राण- भतां शरीरे। मयि प्रचीणे च पुनश्चरन्ति श्रेष्ठो लहं पश्यन मां प्रलीनम् ॥ १४ ॥ मरें चने जाने में मत्र चले जाने हैं मेरे पाजाने से सब श्रा जाने हैं इमलिय में श्रेष्ट हूँ देखो मैं जाता हूँ ॥ १४ ॥ ब्रामण उवाच- पालीयत ततो व्यानः पुनश्च प्रचचार है। प्राणापानावुदानश्च समानश्च तमब्रुवन् ॥१५॥ बामण वोला तव व्यान चला गया और फिर आगया। उस समय प्राण, अपान उदान और समान ने कहा ।। १५ ॥ न त्वं श्रेष्ठोऽसि नो व्यान समालस्तु वशे तव । श्रेष्ठोऽहमस्मि सर्वेषां श्रूयतां येन हेतुना ॥१६॥ व्यान तुम श्रेष्ट नहीं हो कंवल समान ही तुम्हारे बस समान बोला जिस कारण मैं श्रेष्ठ हूँ उस सुनो ।। १६ ।। मयि प्रलीने प्रलयं ब्रजन्ति सर्व प्राणाः प्राण- भृताँ शरीरे । मयि प्रचीर्णे च पुनश्चरन्ति श्रेष्ठो यहं पश्यत मां प्रलीनम् ॥ १७॥ मेरे चले जाने से सब चले जाते हैं मेरे आजान से सब आ जाते हैं देखो में जाता हूँ ॥ १७ ॥ Khe हे
७२ ]
ब्रा झण गीता
[अष्टम अध्याय
Phone
समानः प्रचचाथि उक्षामस्तवाच ह।
श्रेष्ठोऽहमस्मि सर्देवांश्यतां येत हेतुना ॥१८॥
समान भागया ! फिर उदान ने कहा कि जिस कारण में श्रेष्ट
हूँ वह सुनो ! १८ ॥
मयि प्रलीने प्रतयं जति सर्व प्राणाः प्राण- .
भृतां शरीरे। मयि सचीवं च पुनश्चरन्ति श्रेष्टो
ह्यहं पश्यत मां नलीनम् ॥ १६ ॥
मेरे चले जाने पर शरीर में कोई भी नहीं रह सकता मेरे श्रा
जाने पर सब आ जाते हैं अत: मैं श्रेष्ठ हूँ देखो मैं जाता हूँ ॥१९॥
लता प्रालीयनोदाला पुनश्च प्रवचार है।
জান্তাহালী শুক্লাহ ঘনফুল নয়।
उदान न स्व श्रेष्ठोऽति व्याट एव शेतक॥२०॥
तब उदान चला गया, और फिर वापिस आ गया उस समय प्राण
अपान समान और व्यान ने कहा हे ! उदान तुम श्रेष्ट नहीं हो
केवल व्यान ही तुम्हारे वश में है ।। २० ॥
ब्राह्मण उवाच
ततस्ताननवीमा समवेत्तान्प्रजापतिः।
सर्वे श्रेष्ठा न वा श्रेधाः सर्वे चान्योन्यर्मिणः॥२१॥
सर्वे स्वविषये श्रेष्ठाः सर्वे चान्योन्यधर्मिणः ।
इति तानब्रवीत्सर्वान्समवेतान्प्रजापतिः ॥२२॥
मष्टम अध्याय ] माया मा गी ता [७३ ब्राह्मण घोला, नव उन सबसे प्रजापति ने कहा ! तुम सब श्रेष्ठ हो और श्रष्ट नाही भी हो । एक दूसरे से स्वतन्त्र नही हो सत्र श्रेष्ट भी हो और मन्त्र एक दूसरे के आश्रित भी हो अर्थात् तुम में में किसी एक के लय हो जाने से तुम श्रेष्ठ हो किन्तु तुममें । कोई भी म्वाधीन नहीं है इमलिग श्रेष्ठ नही हो ॥ २१-२२ ।। एक: स्थिरश्चास्थिरश्च विशेपारपंच वायवः । एक एव ममैवात्मा बहुवायुपचीयते ॥२३॥ जिस प्रकार एक प्राग भी घिर तथा अस्थिर होकर विविथ स्थानों के भेद ने पांच नामों को धारण करता है इसी प्रकार एक ही आत्मा त्यान भंद से भिन्न रूपों में दिखाई देता है ॥ २३ ।। परस्परस्य सुहृदो भावयन्तः परस्परम् । 'स्वस्ति व्रजत भद्रं वो धारयर परस्परम् ॥२४॥ तुम्हारा कर्तव्य है कि परस्पर मित्र भाव से एक दूसरे का ध्यान रखने हुये एक दूसरे की सहायता करो ॥ २४ ॥ श्रीवाहारण गीता का अप्ठम अध्याय समाप्त ७४.] [नवम अध्याय ब्राह्मण गीता । - लवम अध्याय ब्राह्मण उवाच अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । नारदस्य च संवादकृषेर्दवमतस्य च ॥१॥ ब्राह्मण बोला इस विषय में एक प्राचीन उपाख्यान है जो नारद तथा देवमत ऋमि के सम्बाद रूप में है ॥१॥ देवमत उवाच जन्तोः संजायमानस्य किंतु पूर्व प्रवर्तते । प्राणोऽपानः समानो वा व्यानो घोक्षन एव च ॥२॥ 'देवमत ने पूछा ! जव प्राणी शरीर को धारण करता है उस समय प्राण, अपान, समान, व्यान और उदान इन में से पहिले, किस की प्रवृत्ति होती है ।। २ ।। भारद उवांच-- येनायं सृज्यते जन्तुस्ततोऽन्यः पूर्वमेति तम् । प्राण द्वन्दं हि विज्ञेयं तिर्यगूर्वमधश्च यत् ॥३॥ नारद जी बोले ! जो इस प्राणी को उत्पन्न करता है और उससे भी पूर्व रहता है उसको प्राण द्वन्द्व तिर्यक् उर्ध्व और अधः कहते है ।। ३॥ देवमत उवाच केनायं सृज्यते जन्तुः कश्चान्यः पूर्वमेति तम् । प्राणद्वन्दं च मे ब्रूहि तिर्यगूलमधश्च यत् ॥४॥ .. ..
--- नवम अध्याय ] ना का ग गीता [७५ देवमन ने कहा, किन कारण से यह जीवात्मा जन्न मरण के बन्धन में प्राता है और कौन इससे पूर्व रहता है । प्राण द्वन्द्व, निर्यक, ऊर्ध्व, और अधः किसे कहते हैं ॥४|| नारद उवाच संकल्पाजायते हपः शब्दादपि च जायते । रसारसंजायते चापि रूपादपि च जायते ॥५॥ महर्षि नारद बोल, मंकल्प स हर्प उत्पन्न होता है, शब्द, रस, नथा रूप में भी हर्प उत्पन्न होता है ।।५।। (अर्थान प्रानन्द स्वरूप परमात्मा इस संसार का असाधारण कारण है और विपय वासना भी इस जगत का कारण है तात्पर्य यह है कि सृष्टि के दो प्रयोजन है एक तो ईश्वर के गुणों को सफलता: दुसरा जीवात्मा के वासना रूप कर्मों का भोग) शुक्काच्छोणितसंसृष्टारपूर्व प्राणः प्रवर्तते । प्राणेन विकृते शुक्र ततोऽपानः प्रवर्तते वासना संयुक्त अष्ट से जीवात्मा शरीर धारण करता है और उस शरीर से जब अष्ट विकृत हो जाता है तब मृत्यु होती है ॥६ शुक्रात्संजायते चापि रसादपि च जायते । एतद्रूपमुदानस्य हर्षो मिथनमन्तरा पूर्व जन्म में संचित, अष्ट और वासनाओं से जीवात्मा जन्म मृत्यु के बन्धन में फंसता है, और इस कार्य कारण के मध्य में जीवात्मा निवास करता है ।।
ब्रा हा रण गो ता
[नवम अध्याय
७६ ।
शामास्संजायते शुक्र शुक्रात्संजायते रजः ।
समानव्यानजनित सामान्ये शुक्रशोणिते
॥ना
प्राणापानाविदं बन्दसवा चोचं च गच्छतः ।
व्यानः समानश्च वोभौ तिर्यद्वन्दत्वमुच्यते
॥६॥
ज्ञान से अवष्ट उत्पन्न होता है, और अवष्ट से प्रवृत्ति उपन्न
होती है और यही अष्ट और प्रवृति जीवात्मा के बन्धन का
कारण है । यही एक मिथुन ऐसा है जो जीवात्मा को ऊंच या
नीच गतियों में ले जाता है। व्यान और समान, के प्रभाव से
तिर्यक् गति उत्पन्न होती है ।।८–९।।
अग्नि देवताः सर्ग इति देवस्य शासनम् ।
संजायते प्रामणस्य ज्ञानं बुद्धिसमन्वितम् ॥१०॥
श्रुति कहती है कि जीवात्मा ही कर्मों का कती तथा भोक्ता
है। और जब यह ज्ञान की इच्छा करता है तब श्रुति के श्रेष्ठ
ज्ञान को प्राप्त करता है ॥१०॥
तस्य धूमस्तमोरूपं रजो भस्म सुतेजसः ।
सर्व संजायते तस्य यत्र प्रक्षिप्यते हविः ॥११॥.
उस उत्तम तेज युक्त अग्नि का तमोरूप धूप और रजों रूप
भस्म है जिसमें हवि रूपी भोग्य वस्तुएँ डाली जाती हैं और उस
अग्नि रूप जीवात्मा से ही इनको उत्पत्ति होती है ।।११।।
सवतत्समानो व्यानश्च इति यज्ञविदो विदुः ।
माणपानावाज्यभागौ तयोर्मध्ये
हुताशनः ॥१२॥
[७७ 1 नवम अध्याय ] ब्रा म ण गी ता तत्त्व वेत्ता ऋपियों का मत है कि बुद्धि से तमोगुण तथा रजोगुण उत्पन्न होता है। प्राण और अपान अर्थात् जीवन और मृत्यु ही इस अग्नि के लिये घृत रूप है ॥१२॥ (इन श्लोकों में यह बताया गया है कि यद्यपि इस सम्पूर्ण सृष्टि का कर्ता आनन्द स्वरूप परमात्मा ही है किन्तु जीवात्मा के बन्धन का कारण इसकी काम और वासना है ) सात्विक बुद्धि को धारण करके यह जीवात्मा उत्तम गति को प्राप्त करता है और रजोगुण तथा तमोगुण के आश्रय स संसार में ऊंच तथा नीच गतियों को प्राप्त करता है। एतद्रूपमुदानस्य परमं ब्राह्मणा विदुः । निईन्द्रमिति यरोतत्तन्मे निगदतः शृणु ॥१३॥ ज्ञानी पुरुप जीवात्मा के बन्धन के कारण को तथा इन ऊंचो नीची गतियों को जानते हैं । अब मैं तुम्हें वह ज्ञान वताऊंगा कि जिससे यह जीव परब्रह्म के समीप जाता है और बन्धन से छूटता है ॥१२॥ अहोरात्रमिदं बन्दं तयोर्मध्ये हुताशनः । एतद्रपदानस्य परमं ब्राह्मणा विदुः ॥१४॥ सच्चासच्चैव तद्दन्द्धं तयोर्मध्ये हुताशनः । ॥१५॥ ऊच समानो व्यानश्च व्यस्यते कर्म तेन तत् । तृतीयं तु समानेन पुनरेव व्यवस्यते । ॥१६॥ एतद् पमुदानस्य परमं ब्राह्मणा विदुः ..... ७८ ] ब्राह्मण गीता [ नवम अध्याय विद्वान् ब्राह्मण यह समझते हैं कि वस्तुनः जीवात्मा ज्ञान और अज्ञान, उत्पत्ति और ग्रलय, कार्य और कारगण में लिप्त नहीं होता और जिस संकल्प तथा अदृष्ट के द्वारा यह बन्धन में आता है वह संकल्प ही कर्मों का कारण है और इस संकल्प को अच्छी तरह जान लेने पर ही विद्वान तत्ववेत्ताओं के हृदयों में परमात्मा का ज्ञान प्रकाशित होता है ।।१४-१३॥ शान्त्यर्थ व्यानमेकं च शान्तिर्ब्रह्म सनातनम् । एतद् पनुदानस्य परमं ब्राह्मणा चिनुः ॥१७॥ कार्य कारण ज्ञान और परब्रहा के ज्ञान का ही नाम शान्ति है । और इस ज्ञान के उदय होने से हो हृदय में परब्रह्मा का प्रकाश होता है |१७|| इस अध्याय में यह बतलाया गया है कि जीवात्मा के बन्धन का कारण क्या है और जो पुरुप इस बन्धन के कारण को तत्त्वत: जान लेता है वही इस बन्धन से मुक्त होकर शान्ति प्राप्त करता है । इस अध्याय में प्राण अपानादि शब्द उन अर्थों में प्रयुक्त नहीं हुये हैं जिन अर्थो में पहले लिख आये हैं । यह सब आलंकारिक भापा है और अलंकार से ही जीवात्मा के वन्धन तथा मोक्ष का कारण इस अध्याय में बतलाया गया है। के श्री ब्राह्मण गीता का नवम अध्याय समाप्त .
राम अध्यार] बाहा गा गी ता [७९ दशम अध्याय ब्राह्मण उवाच- भोप्युदाहरन्तोममितिहासं पुरातनम् । चातुहर्होत्रविधानस्य विधानमिह यादृशम् ॥१॥ प्राग बोला हे देवि ! इस विपय में भी चार होताओं का एक प्राचीन उपाख्यान है || तस्य सर्वस्य चिधिवद्विधानमुपदिश्यते । शृणु मे गदतो भद्र रहस्यमिदमद्भुतम् ॥२॥ मैं अब उस यज्ञ का वर्णन करता हूँ। तुम उस अद्भुत तत्त्व को ध्यान पूर्वक सुनो ॥२॥ करणं कर्म कर्ता च मोक्ष इत्येव भाविनि । चत्वार एते होतारो यैरिदं जगदावृतम् ॥३॥ हे बुद्धिगति ! करण, कर्म, कर्ता, और मोक्ष यह चार होता है। और यह सम्पूर्ण जगत इनके द्वारा आवृत है ।।शा हेतूनां साधनं चैवं शृणु सर्वमशेषतः । घ्राणं जिह वा.च चतुश्च स्वक्च श्रोत्रं च पञ्चमम् । मनो बुद्धिश्च सप्त ते विज्ञेया गुणहेतवः . :॥४॥ यद्यपि हम पहले दश घाण आदि सात होता बतला चुके हैं किन्तु यह नहीं बतलाया कि किस का कौन कारण हैं इस लिये इस विषय को अब कहते हैं ध्यान पूर्वक सुनोः । नासिका, . -
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८०]
ना झा रा गीता [दशम अध्याय
जिव्हा, आंख, त्वचा, श्रोत्र, मन और बुद्धि यह अविद्या से
उत्पन्न होते हैं ॥४॥
गन्धो रसच रूपं च शब्दः स्पर्शश्च पञ्चमः ।
मन्तव्यमय बोद्धव्यं सौते कर्महेतवः ॥५॥
गन्ध, रस, रूप, स्पर्श, शब्द, विचार, और ज्ञान, कर्म से
उत्पन्न होने हैं ||५॥
घ्राता भक्षयिता द्रष्टा बक्ता श्रोता च पञ्चमः ।
मन्ता बोद्धा च सौते विज्ञयाः कर्तृहेतवः ॥६॥
सूंघने वाला, खाने वाला, बोलने वाला, सुनने वाला,
विचार
करने वाला, और जानने वाला, यह कर्ता से होते हैं ।।६।।
स्वगुणं अक्षयन्त्येते गुणवन्तः शुभाशुभम् ।
अहं च निर्गुणोऽनन्तः ससते. मोचहेतवः ॥७॥
यह सकारण सातो अपने २ अच्छे और बुरे कर्मों का भोग
करते हैं और जीवात्मा इनका भोक्ता नहीं इसलिए यह सात मोक्ष
के भी कारण हैं अर्थात् जव यह बुद्धि उत्पन्न होती है कि इन्द्रिय
ही अपनी विषयों का भोग करती है और जीवात्मा इन इन्द्रियों
पृथक् है तभी मोक्ष प्राप्त होता है ॥णा
विदुषां बुध्यमानानां स्वं स्वं स्थानं यथाविधि ।
गुणास्ते देवताभूताः सततं भुञ्जते हविः
बुद्धिमान् पुरुष यह समझते हैं कि यह इन्द्रिये ही अपने
भोगों का भोग करती हैं ॥८॥
.
से
॥८॥
NA
॥६॥
दशम अध्याग] वा गा गीता
[८१
भनन्नान्यथोऽविदान्मसत्येनोपपद्यते।
भास्मार्थे पाचयनन्न ममत्वेनोपहन्यते
जो मन वन्तुनः भाग न करता हुआ भी अहङ्कार से यह
सममता कि मैं अपने लिए भोग करता है वह इस अहङ्कार से
ही बन्धन में फंसा रहता है।
अभक्ष्य भक्षणं चैव मद्यपानं च हन्ति तम् ।
स चान्नं हन्ति तं चान्न स हत्वा हन्यते पुनः॥१०॥
अहवाग पुग्पही श्रमच्य वस्तुओं को खाने लगते हैं मद्यपान
करने लगते हैं। वे अन्न को खाते हैं और अन्न उन्हें खालेता
है। इस प्रकार वे जन्म और मृत्यु के बन्धन में फसे रहते हैं।।१०॥
हन्ता ह्यन्नमिदं विहान्पुनर्जनयतीश्वरः ।
न चान्नाजायते तस्मिन् सूक्ष्मो नाम व्यतिक्रमः॥११॥
जो विद्वान पुरुष अ.. आदि का नाश करता है अर्थात् इस
तत्त्व का निश्चय रूप से समझ लेता है । कि मैं वस्तुतः भोक्ता नहीं
हँ किन्तु इन्द्रियें भोग करती हैं वह जन्म और मृत्यु के बन्धन से
छूट जाना है क्योंकि उस पुरुप में संसारिक इन्द्रिय जन्य भोग
किन्चित् भी विकार उत्पन्न नहीं करते ।।११।।
मनसा गम्यते यच यच्च वाचा निगद्यते ।
श्रोत्रेण श्रूयते यच्च चक्षुषा यच्च दृश्यते
॥१२॥
स्पर्शन स्पृश्यते यच्च घ्राणेन घ्रायते च यत् ।
मनः षष्ठानि संयम्य हवींष्येतानि सर्वशः ॥१३॥
--~-.
-
के
नाम से
८२]
त्रामा गा गीता [ दशम अध्याय
जो भी कुछ मन तथा वाणी आदि इन्द्रियों से व्यापार होना
है उस सवको अन्न कहा
है और उन सबको ही अग्नि
में आहुति रूप से जला दना श्रेष्ट कर्म है ।। १२-१३॥
गुणवत्पावको मोदीब्यतेऽन्तः शरीरगः ।
योगयज्ञः प्रवृत्तो मे ज्ञानवन्दि प्रदोड्यः ।
प्राणस्तोत्रोऽपनि शस्त्रः सर्व त्याग मुदक्षिणः॥१४॥
मेरे अन्दर एक अत्यन्त श्रेष्ठ अग्नि प्रदीप्त हो रहा है उसमें
ज्ञान रूपी अग्नि को उत्पन्न करने वाला योग रूपी यज्ञ हो रहा
है । उस यज्ञ में प्राण स्तोता है, अपान बुवा आदि शस्त्र है उस
यज्ञ की दक्षिणा स्वस्व त्याग है ॥१४॥
कर्ताऽनुमन्ता ब्रह्मास्मा होताऽध्वयुः कृतस्तुतिः ।
ऋतं प्रशास्ता तच्छस्त्रमपवर्गोऽस्य दक्षिणा ॥१॥
अहंकार मन और बुद्धि उस यज्ञ में क्रमशः होता अध्वर्यु
और उद्गाता रूप से स्तुति करते हैं सत्य वचन उस यज्ञ का
प्रशास्ता है और कैवल्य दक्षिणा है ॥१५॥
ऋचश्चाप्यत्र शंसन्ति नारायणविदो जनाः ।
नारायणाय देवाय यदविन्दन्पशून्पुरा ॥१६॥
ऋग्वेद में भी इस यज्ञ का वर्णन है इस यज्ञ के द्वारा ही
जिज्ञासु पुरुष परमात्मा को प्राप्ति के लिये इन्द्रियों का होम
करते हैं ॥१६॥
. एकादश अध्याय अध्याय ब्रा म ण गो ता [८३ तत्र सामानि गायन्ति तत्र चाहुनिदर्शनम् । देवं नारायणं भीरु सर्वात्मानं निबोध तम् ॥१७॥ हे भोरू ! इस यज्ञ में जिसके उद्देश्य से जिज्ञासु पुरुष साम- गान करते हैं दृष्टान्त रूप से कहते हैं उस सर्वात्मा पर ब्रह्म को | तुम जानो ॥१७॥ श्रीब्राह्मण गोता का दशम अध्याय समाप्त :- एकादश अध्याय ब्राह्मण उवाच- एक शास्ता न द्वितीयोऽस्ति शास्ता यो हृच्छ- यस्तमहमनुब्रवीमि । तेनैव युक्तः प्रवणादिवोदकं यथा नियुक्तोऽस्मि तथा वहामि ॥१॥ ब्राह्मण ने कहा, वह एक ही सवका शासक है जो सबके हृदयों में विराजमान है उस परमात्म देव ही की आज्ञा से मैं इस प्रकार स्वाभाविक रूप से कार्य करता हूँ जिस प्रकार जल स्वाभाविक रूप से नीचे की ओर जाता है ।।१।।
." टट] ब्रा हा गा गा ता । एकादश अध्याय एको गुरुनास्ति ततो द्वितीयो यो हृच्छयस्त- महमनुब्रवीमि । तेनानुशिष्टा गुरुणा सदैव लोके द्विष्टाः पन्नगाः सर्व एवं ॥२॥ वह एक हो संसार का गुम्क है जो सब के हृदयों में निवास करता है उसकी आज्ञा से संसार में सर्प आदि अपने स्वभाव नाशकारी कर्मों में प्रवृन होते हैं ।।२।। एको बन्धुर्नास्ति ततो द्वितोयो यो हृच्छयस्त- महमानुन्नवीमि । तेनानुशिष्टा बान्धवा बन्धुमन्तः सप्तर्षयः पार्थ दिवि प्रमान्ति ॥३॥ वह एक ही सबका बन्धु है जो सबके हृदयों में निवास करता है उसकी आज्ञा से पुरुप एक दूसरे से प्रेम करते हैं और उसो को आज्ञा से श्रेष्ठ पुरुप यश प्राप्त करते हैं ।।।। एकः श्रोता नास्ति ततो द्वितीयो यो हृच्छ- यस्तमहमनुक्रवीमि । तस्मिन्गुरौ गुरुवासं निरुष्य शको गतः सर्वलोकामरत्वम् ॥४॥ वह एक ही श्रोता है जो सबके हृदयों में निवास करता है उस गुरू के पास रह कर ही इन्द्र ने अमृत्व को प्राप्त किया ॥४॥ एको देष्टा नास्ति ततो द्वितीयो यो हृच्छयस्त महमनुब्रवीमि । तेनानुशिष्या गुरुणा सदैव लोके द्विष्टाः पन्नगाः सर्व एव ॥५॥ .
ninh
एकादश अध्याय माग गो ता [८५
वह एकही संसार में जः जो हृदय में निवास करना
उनी को माता
में दृष्ट चुरे गाव में प्रवृन होते हैं ।।५।।
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
प्रजापतौ पन्नगानां देवपणां च संचिदम्
इस विषय में भी एक प्राचीन उपाख्यान है जिसमें प्रजापति
के समीप रानसों, देवनाओं और ऋपियां का सम्वाद है ॥६॥
देवर्षयश्च नागाश्चाप्यतुराश्च प्रजापतिम् ।
पर्यपृच्छन्नुपासोनाः श्रेयो नः प्रोच्यतामिति ॥७॥
एक वार प्रजापति के समीप देवता, ऋपि, नाग, और असुर
गये और बोले है ! महाराज हमें कल्याणकारी उपदेश दीजिये ॥७
तेषां प्रोवाच भगवान् श्रेयः समनुपृच्छताम् ।
ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म ते श्रुस्वा प्राद्रवन्दिशः ॥८॥
प्रजापति ने केवल, ॐ शब्द का उच्चारण किया, इस उप-
देश को ग्रहण करके वे अपने यथा स्थान को चले गये ।।
तेषां प्रद्रवमाणानामुपदेशार्थमात्मनः ।
सर्पाणां दंशने भावः प्रवृत्तः पूर्वमेव तु.. ॥६॥
उस ॐ नामक उपदेश के भावों पर विचार करते हुये सांपों
ने काटना प्रारम्भ कर दिया अर्थान ॐ शब्द के उच्चारण में पहले
मुख खोलकर फिर बन्द किया जाता है और यह क्रिया काटने में भी
होती है इस लिये उन्होंने उस उपदेश का तात्पर्य क्वल काटना
ही समझा ॥९॥
ब्राह्मण गीता एकादश अध्याय ८६ "41 असुराणां प्रवृत्तस्तु दमभावः स्वभावजः । दानं देवा व्यवलिता दससेव महर्षयः ॥१०॥ राक्षसों ने इसका अर्थ दम्भ मममा अर्थात्, उन्होंने केवल होठों की गति पर ध्यान दिया इस लिये उन्होंने इसका तात्पर्य केवल जपादि का अभिनय प्रदर्शन म्प दम्भ समझा । देवताओं ने इसका अर्थ दान समझा। क्योंकि लौकिक संस्कृत भाषा में यदि कोई बस्तु किसी से मांगता है तो उसका उत्तर ॐ यह स्वीकारार्थक बोला जाता है इस लिये देवताओं ने इसका अर्थ दान समझा । ऋषियों ने इसका अर्थ दम अर्थात् इन्द्रिय निग्रह समझा। क्योंकि ॐ शब्द के उच्चारण में पहिले होठों को आगे बढ़ाकर फिर सिकोड़ लिया जाता है ॥ १० ॥ एक शास्तारमासाद्य शब्देनैकेन संस्कृताः । नानान्यवसिताः सर्वे सर्पदेवर्षिदानवाः ॥११॥ इस प्रकार एक गुरु को प्राप्त होकर और केवल एक शब्द के ही उपदेश से नाग, 'असुर, देवता और ऋपि अनेक व्यापारों में लग गये ॥११॥ शृणोत्ययं प्रोच्यमानं गृह णाति च यथातथम् । पृच्छतस्तदतो भूयो गुरुरन्यो न विद्यते ॥१२॥ वे स्वयं अपने गुरु हैं, शिष्य रूप से प्रश्न करके गुरु रूप से उसे सुनते हैं और उस पर विचार करके उत्तर देते हैं ॥ १२ ॥ (यहां पर यह समझना चाहिये कि एक ही उपदेश अधिकारी .
एकादश अध्याय] नाकारण गो ता
[८७
भेद से भिन्न भिन्न भावों को उत्पन्न करता है अर्थात् यद्यपि सब
जीवात्मा एक ही प्रकार के हैं और उनके साधन भी एक से ही
हैं तथापि वे नकार यश भिन्न २ प्रवृतियों में लग जाते है और
एक शब्द के ही अपने भावनानुसार भिन्न अर्थ समझ कर भिन्न
भिन्न मार्गों के यात्री हो जाते हैं।)
'तस्य चानुमते कर्म ततः पश्चात्प्रवर्तते ।
गुरुयोद्धा च श्रोता च देष्टा च हृदि निःसृतः॥१३॥
और उस जीवात्मा की इच्छा से ही सब कर्म होते है वहीं
अपना गुरु शिष्य श्रोता और द्वेष्टा है और हृदय में निवास
करता है ।। १३॥
पापेन विचरलोके पापचारी भवत्ययम् ।
शुभेन विचरलोके शुभचारि भवस्युतम् ॥१४॥
संसार में पाप करने के कारण पापी, धर्म करने के कारण
धर्मात्मा कहलाता है ॥ १४ ॥
कामचारी तु कामेन य इन्द्रियसुखे रतः।
ब्रह्मचारी सवैष य इन्द्रियजये रतः ॥१५॥
इन्द्रियों के वशीभूत होकर, इन्द्रियों के सुखों में लगकर कामी
कहलाता है और इन्द्रियों को जीत कर ब्रह्मचारी कहलाता है ॥१५
अपेतव्रतकर्मा तु केवलं ब्रह्मणि स्थितः।
ब्रह्मभूतश्चरंल्लोके ब्रह्मचारी भवत्ययम्
॥१६॥
८८ ] ना म ण गीता [ एकादश अध्याय सब काम्य कर्मों का त्याग करकं ब्रह्म में ध्यान लगाकर नियम पूर्वक रहता हुन्, ब्रह्मस्थ कहलाता है।। १६ ।। ब्रय समिधस्तस्य मानिनसंभवः । आपो ब्रम गुरुर्वा स ब्रमणि समाहितः ॥१७॥ . ब्रह्म ही उसकी समिधा है, ब्रह्म ही उसकी अग्नि है, ब्रह्म हो उसका जल है, ब्रह्म ही उसका गुरु है, और इस प्रकार वो ब्रह्म में लीन हो जाता है ॥१७॥ एतदेवेश सूचमं नामचर्य विदुर्बुधाः । विदित्वा चान्वपद्यन्त क्षेत्रज्ञेनानुदर्शिताः ॥१८॥ ब्रह्मचर्य के इस सूक्ष्म स्वरूप को विद्वानों ने जाना है और ज्ञानवान पुरुप उन्हीं के उपदेश के अनुसार इस अवस्था को प्राप्त करते हैं।॥ १८॥ इन श्लोको में ब्रह्म शब्द दो अर्थो में प्रवृत हुआ है अर्थात् ब्रह्म नाम इन्द्रियों का भी है और ब्रह्म नाम परमात्मा का भी है केवल इन्द्रिय निग्रह कर लेने पर ही पूर्ण ब्रह्मचारी नहीं कहला सकता, पूर्ण ब्रह्मचारी वह है जो इन्द्रिय निग्रह पूर्वक अपने आप को परब्रह्म की उपासना में लगावे । यही इन श्लोकों का तात्पर्य है, श्री ब्राह्मण गीता का एकादश अध्याय समाप्त द्वादश अध्याय ] 'नोमण गाता 16- -R द्वादश अध्याय ब्राह्मण उवाच- - A सङ्कल्पदंशमशकं शोकह हिमातपम् । मोहान्धकारतिमिरं लोभव्याधिसरीसृपम् ॥१॥ विषयकात्ययाध्वानं कामक्रोधविरोधकम् । तदतीत्य महादुर्ग प्रविष्टोऽस्मि महदनम् ॥२॥ ब्राह्मण बोला, हे सुभगे ! संकल्प रूपी डांस और मच्छरों से युक्त, शोक और हर्प रूपी सर्दी और गर्मी से युक्त, मोह तथा अन्धकार रूपी अन्धेरै से युक्त, लोभ और व्याधि रूपी सों से युन, काम और क्रोध रूपी विघ्नों से युक्त, तथा प्राणियों के द्वारा अकेले ही पार करने योग्य मार्ग को पार करके में अब बड़े भारी वन में प्रविष्ट हुश्रा हूँ ॥१-२॥ ब्राह्मण्युवाच- क तदनं महाप्राज्ञ के वृक्षाः सरितश्च काः। गिरयः पर्वताश्च व कियस्यध्वनि तदनम् ॥३॥ ब्राह्मणी बोली हे विद्वन् ! वह बन कहां है। कौन उसके वृक्ष हैं! कौन उसको नदिये है ! गिरि पर्वत उसके क्या हैं ! और वह - वन कितनी दूर है ।।३॥
: माला उवाच नैलदस्ति पृथग्भावः किंचिदन्यत्ततः सुखम् । नैतदस्त्यपृथग्भावः किंचिद्द खतरं ततः . ॥४॥ ब्राह्मण बोला--प्रिये ! उससे कोई वस्तु पृथक् नहीं है, न उससे कोई अधिक सुख है । उसके समीप भी कोई नहीं है, और उससे अधिक दुख भी कहीं नहीं है ॥ ४ ॥ तस्माद्दूस्वतरं नास्ति न ततोस्ति महत्तरम् । नास्ति तस्मात्सूक्ष्मतरं नास्त्यन्यत्तत्समं सुखम्॥५॥ न उससे कोई छोटा है न उससे कोई बड़ा है न उससे अधिक कोई सूक्ष्म है । न उसके बराबर कोई सुख है ।।५।। मनत्राविश्य शोचन्ति न प्रहृष्यन्ति च द्विजाः। न च विभ्यति केषांचित्तेभ्यो विभ्यति केचन ॥३॥ विद्वान् लोग उसमें प्रविष्ट होकर शोक और हर्ष से मुक्त हो जाते हैं । न वे किसी से डरते हैं न उनसे कोई डरता है ।।६।। तस्मिन्वने सप्त महाद्र माश्च फलानि सप्ताऽति- थयश्च सप्त । सप्ताश्रमाः सप्त समाधयश्च दीक्षाश्च सौतदण्यरूपम् ॥७॥ उस वन में सात बड़े वृक्ष हैं, सात ही उनके फल हैं, सात अतिथि हैं, सात आश्रम हैं, सात समाधि हैं, सात दीक्षायें हैं यही उस महावन का स्वरूप है। अर्थात् महत्, अहंकार और
:
-
।
-
are मार] माग गो ता
[९१
पांग ना । गन्न. प. रम, गंध, स्पर्श, संशय
चौरनियापनों में । इन्द्रियों के अधिष्ठाता सात
नपान वा निशि। पांचों ज्ञानेन्द्रिय मन और
नामयिक गाने के प्राश्रम हैं राग आदि सात समा-
भने पनि का मान दीक्षा हैं |७||
पज वर्णानि दिव्यानि पुष्पाणि च फलानि च ।
। मजन्तः पादपास्तत्र व्याप्य तिष्ठन्ति तनम् ॥६
पांर रंग वाले लन्दर फूल और फलों को उत्पन्न करने वाले वृक्ष
कम बनती है। अर्थात मन रूपी वृक्ष से अनुभव रूण पाच
मन्न, नीर उन पलों में प्रीति रूप पांच फल उत्पन्नहोते हैं ।।८।।
मुवर्णानि द्विवर्णानि पुष्पाणि च फलानि च ।
सृजन्तः पादपास्तत्र व्याप्य तिष्ठन्ति तदनम् ॥६॥
सुन्दर नयादी वर्ण वाले पुष्पों और फलों को उत्पन्न करने
बाल वृक्ष उस बन को घर रहते हैं अर्थात् पांचों इन्द्रियें अपने २
भिन्न स्वभाव वाल पुष्पों को उत्पन्न करती हैं और तज्जन्य सुख
और दुग्नु नपी फलों को उत्पन्न करती हैं ।।९।।
सुरभीणि द्विवर्णानि पुष्पाणि च फलानि च ।
सृजन्तः पादपास्तन्त्र व्याप्य तिष्ठन्ति तदनम् ॥१०
सुगन्धित तथा दो वर्ण वाले फूलों और फलों को उत्पन्न
करने वाले वृक्ष उस वन को घेरे रहते हैं। अर्थात् यज्ञादि वृक्ष -
म्वर्गादि रूप बहुत से फलों और फूलों को उत्पन्न करते हैं ॥१०॥
--- ९२] ना म ण गीता [ द्वादश अध्याय सुरभीण्येकवर्णानि पुष्पाणि च फलानि च । सृजन्तः पादपास्तत्र व्याप्य तिष्ठन्ति तदनम् ॥११ सुगन्धित तथा एक वर्ण वाले फलों और फूलों को उत्पन्न करने वाले वृक्ष उस बन को घेरे रहते हैं अर्थात् ध्यानादि वृक्ष सुख रूपी बहुत से फूलों और फलों को उत्पन्न करते हैं ।।१।। बहून्यव्यक्तवर्णानि पुष्पाणि च फलानि च । विसृजन्तौ महावृत्तौ तदनं व्याप्य तिष्ठतः ॥१२॥ बहुत से अव्यक्त रूपवाले, फूलों और फलों को उत्पन्न करने वाले दो महा वृक्ष उस नन को घेरे रहते हैं अर्थात मन और बुद्धि रूपी वृक्ष अतीत, अनागत और वर्तमान रूप अन्यक्त बहुत से फूलों और फलों को उत्पन्न करते हैं ॥१॥ एको वन्हिः सुमना ब्राह्मणोऽन्न पञ्चेन्द्रियाणि समिधश्चात्र सन्ति । तेभ्यो मोक्षाः सप्त फलन्ति दीक्षा गुणाः फनान्यतिथयः फलाशाः ॥१३॥ एक आत्मा, मन और बुद्धि रूपी स्रुवाओं से पाँचों इन्द्रियों को समिधा बनाकर यज्ञ करता है तव उन सबके लोन हो जाने पर मोक्ष रूपी फल को प्राप्ति होती है यही दीक्षा है और अतीथि अर्थात् दिव्य गुण युक्त पुरुष उस फल की आशा करते हैं । इसका तात्पर्य यह है कि केवल वही पुरुष मोक्ष रूपी फल को प्राप्त करते हैं जिनके कर्म स्वार्थ न होकर परार्थ होते हैं । उपनिषद् में भी कहा है कि जब पांचों ज्ञानेन्द्रियां मन के साथ रहती हैं और द्वादश अध्याय नाहा ग गा ता [९३ wom 19 बुद्धि अपने व्यापार को मार देती है उस अवस्था का ही नाम परमगान गाः प्राधा इस यज्ञ से ही प्राप्त होती है ।।१।। भातिथ्यं प्रतिगृह णन्ति तत्र तत्र महर्षयः । अर्चितेषु प्रलीनेपु तप्वन्यद्रोचते वनम् ॥१४॥ इन्द्रियों में अधिष्टता देव जय उस प्रातिथ्य अर्थात् उस फल कोम्बीकार कर लीन हो जाते हैं उस समय वह अवस्था अत्यन्त चिरहती है ॥१४॥ प्रज्ञावृक्ष मोक्षफलं शान्तिच्छायासमन्वितम् । ज्ञानाश्रमं तृप्तितोयमन्तः क्षत्रज्ञ भास्करम् ॥१५॥ येऽधिगच्छन्ति तं सन्तस्तेपां नास्ति भयं पुनः । ऊचं चाधश्च तिर्यक्च तस्य नान्तोऽधिगम्यते ॥१६॥ जो नुमुक्ष मोक्षरूपी फल, शान्तिरूपी छाया, ज्ञान रूपी श्राश्रम, तृप्ति रूपी जल, और अन्तःक्षेत्रज्ञ रूपी सूर्य से युक्त, प्रज्ञा रूपी वृक्ष पर चढ़ जाते हैं उन्हें फिर किसी वस्तु का डर नहीं रहता। वह प्रज्ञारूपीवृक्ष दिशाओं से सीमित नहीं है।।१५-१६।। सप्त स्त्रियस्तत्र वसन्ति सद्यस्त्ववाङ्मुखा भानुमत्यो जनित्र्यः । ऊर्ध्व रसनादत प्रजाभ्यः सर्वान् यथा सत्यमनिस्यता च ॥१७॥ जब जीव उस प्रज्ञा वृक्ष पर चढ़ जाता है तब ज्ञानयुक्त तथा शीघ्र फल देने वाली और ज्योतिमय सात स्त्रियं नीचे मुख करके प्रजाओं के लिए ऊपरकी और रसों को पहुंचाती है । अर्थात् जिस
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९४ ]
ना म ण गीता [द्वादश अध्याय
समय एक जीव जीवन्मुक्त अवस्था को प्राप्त होता है उस समय
घाण आदि सात वृतियें जो केवल संकल्प रूप से ही रहती है
अन्तर्मुख वृति होकर त्रिपयों का ग्रहण करती है। इस विषय को
दृष्टान्त से बतलाया है कि जीवन्मुक्त और मूर्ख पुरुषों में
इतना हो भेद है जितना नित्य और अनित्य वस्तु में भेद है ॥१५॥
तत्रैव प्रतितिष्ठन्ति पुनस्तत्रोपयन्ति च ।
सप्त सतर्षयः सिद्धा वसिष्टप्रमुग्वैः सह ॥१८॥
उस प्रज्ञा वृक्ष पर ही मन और बुद्धि सहित पांच इन्द्रियें
रूपो सिद्ध सप्तर्षि वसिष्ठादि की तरह से रहते हैं। और वहीं पर-
लीन हो जाते हैं ॥१८॥
यशो व भगश्चैव विजयः सिद्धतेजसः ।
एतमेवानुवर्तन्ते सप्त ज्योतीषि भास्करम् ॥१६॥
उस अवस्था में ही यश, दीप्ती, सौभाग्य आदि सात सिद्धिये
इस जीवात्मा को प्राप्त होती हैं ॥१९॥
गिरयः पर्वताश्चैव सन्ति तत्र समासतः ।
नद्यश्च सरितो वारि वहन्त्यो ब्रह्मसंभवम् ॥२०॥
वहां पर बहुत से गिरि और पर्वत भी हैं। और नदिय ब्रह्म
से उत्पन्न होने वाले जल को बहाती हैं ॥२०॥
नदीनां संगमश्चैव वैताने समुपह वरे ।
स्वात्मतसा यतो यान्ति साक्षादेव पितामहम् ॥२१॥
... उदयपी वालाश में जननी एसी नदियों का संगम होता तर यामानाज्ञान परब्रहा को प्राप्त करता है ॥२१॥ कृशाशाः सुव्रनाशाश्च तपसा दग्धकिल्विषाः । श्रात्मन्यात्मानमाविश्य ब्रह्माणं समुपासते ॥२२॥ विषय वामनानों को नष्ट कर और तप से पापों को जलाकर अपने मामा ने ही अपनी बुनियों को लगा कर जीवात्मा परब्रह्म की उपासना काना शममप्यन्त्र शंसन्ति विद्यारण्यविदो जनाः । तदरण्यनभिप्रेत्य यथाधीरमजायत ॥२३॥ मनबन की विधा को जानने वाले पुरुप शम को भी प्रशंसा करन जोर धीर पद को प्राप्त करते हैं ॥२३|| एतदेवशं पुण्यमरण्यं ब्राह्मणा विदुः । विदित्वा चानुतिष्ठन्ति क्षबजेनानुदर्शिना ॥२४॥ विद्वान ब्रामण ऐसे ही सुन्दर वन को पुण्य समझते हैं। और नाना के उपदेश से उसे जानकर प्राप्त करते हैं ॥२४॥ श्री ब्राह्मण गीता का द्वादश अध्याय समाप्त ब्रा म ण गी ता [ त्रयोदशअध्याय NAGAnnnnnn. nnnnn त्रयोदश अध्याय बालाण उवाच- गन्धान्न जिघ्रालि रसान्न वेदमि रूपं न पश्यामि न च स्पृशामि । न चापि शन्दान्विविधान् । पृणोमि न चापि संकल्पमुपैमि कंचित् ॥१॥ ब्राह्मण बोला ! मैं गन्ध, रस, रूप, स्पर्श, तथा शब्द आदि वेपयों का ग्रहण नहीं करता हूँ और न किसी प्रकार की कामना करता हूँ ॥१॥ अर्थानिष्टान्कामयते स्वभावः सर्वान्देष्या- प्रद्विषते स्वभावः । कामदेषानुद्भवतः स्वभावात् प्राणापानौ जन्तुदेहान्निवेश्य ॥२॥ जिस प्रकार प्राण और अपान प्राणियों के शरीर में प्रविष्ट होकर बिना इच्छा और द्वेप के भी अपने व्यवहार को करते हैं इसी प्रकार मेरी इन्द्रियें भी स्वभाव से ही विपयों का ग्रहण तथा परि- त्याग करती है।।२।। तेभ्यश्चान्यांस्तषु नित्यांश्च भावान् भूतात्मानं लक्षयेरन् शरीरे। तस्मिंस्तिष्ठन्नास्मि सक्तः कथं- चिस्कामक्रोधाभ्यां जरया मृत्युना च ॥३॥ योगी लोग वाम घाण, घूय आदि विषयों से अतिरिक्त वासना रूप घाण घूय श्रादि विषयों में नित्य अनुगत जो विषय प्रयोदश अध्याय ] +A11 . -AN. नाभण गीता [ ९७ हैं उनमे भी पृथक जीवात्मा को शरीर में समझते हैं। और क्योंकि में भी उमी अयन्धा में इमलिए काम,क्रोध, बुढापा, और मृत्यु मुझे कष्ट नहीं पहुंचा सकते ।।३।। अकामयानस्य च सर्वकामा न पिविषाणस्य व सर्वदोषान् । न मे स्वभावेषु भवन्ति लेपास्तोयस्य- बिन्दोरिव पुष्करयु ॥४॥ जिम प्रकार कमलपत्र पर जल का कोई प्रभाव नहीं होता, इसी प्रकार मुझपर भी इच्छा द्वेषादि का कोई प्रभाव नहीं होता क्योंकि मैं न किसी वस्तु की कामना करता हूँ और न किसी से देप करता हूँ ॥४॥ निस्यस्य चैतस्य भवन्ति नित्या निरीक्ष्यमाणंस्य बहुस्वभावः । न सज्जते कर्मसु भोगजालं दिवीव सूर्यस्य मयूखजालम् ॥५॥ जिस प्रकार सूर्य की किरणें आकाश में रहती हैं पर आकाश में लिप्त नहीं होती इसी प्रकार नित्य जीवात्मा इन अनित्य भावों में रहता हुश्रा भी लिप्त नहीं होता ।:५|| मन्त्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । अध्वर्यु यतिसंवादं तं निबोध यशस्विनि ॥६॥ हे प्रिये ! इस विषय का एक याज्ञिक और सन्यासी. सम्बाद से प्राचीन उपाख्यान है उसको सुनो ॥६॥ के
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९८]
ब्राह्मण गीता
[त्रयोदश अध्याय
प्रोक्ष्यमाणं पशु दृष्ट्वा
यज्ञकर्मण्यथाऽब्रवीत्।
यतिरध्वर्युमासीनो हिंसेयमिति कुस्सयन् ॥७॥
एक बार एक सन्यासी न किसी याज्ञिक ब्राह्मण को यज्ञ में
पशुप्रोक्षण करते हुये देखकर उससे कहा कि हिंसा करना आपको
उचित नहीं ॥७॥
तमध्वयुः प्रत्युवाच नायं छागो विनश्यति ।
श्रेयसा योच्यते जन्तुर्यदि अतिरियं तथा ॥5॥
यांज्ञिक बोला-मैं इस वकर का विनाश नहीं कर रहा हूँ किंतु
यज्ञ में हनन करने से इसका कल्याण होगा ऐसा सुना जाता है।।८
यो ह्यस्य पार्थिवो भागः पृथिवीं स गमिष्यति ।
यदस्य चारिज किंचिदपस्तत्संप्रवेक्ष्यति
॥
सूर्य चक्षुर्दिशः श्रोत्रं पाणोऽस्य दिवमेव च ।
आगमे वर्तमानस्य न मे दोषोऽस्ति कश्चन ॥१०॥
; जो इसका पार्थिव भाग है वह पृथ्वी में मिल जायेगा । जो
जलीय अंश है वह जलमें प्रविष्ट हो जायगा। चाक्षप भाग सूर्य में
और श्रोत्रीय भाग आकाश में और प्राण दिशाओं में चले जायेंगे।
इसलिए मुझे इस शास्त्रीय कर्म के करने में कोई दोपत्नहीं है।९-१०।।
यतिरुवाच ,
प्राणैर्वियोगे छागस्य यदि श्रेयः प्रपश्यसि ।
छागार्थे वर्तते यज्ञो भवतः किं प्रयोजनम् ॥११॥
~-~~-~- -~- दश अध्याय मानता सन्यासी ने कहा ! यदि बकरे के प्राण वियुक्त हो जाने से बकरे का कल्याण है तो यह यज्ञ केवल बकरे के ही लिये है आप का कोई प्रयोजन नहीं होना चाहिए ।।१।। अत्र स्वां मन्यतां भाता पिता माता सखेति च । मन्त्रयस्वैनमुन्नीय परवन्तं विशेषतः ॥१२॥ इस यज्ञ में बकरा आपको भाई, पिता, माता और सखा जाने और आप री इस पराधीन बकरे को ऊर्ध्व गामी करने का विशेष प्रयत्न कीजिये ।।१२।। एवमेवानुमन्येरंस्तान् भवान्द्रष्टुमर्हति । तेषामनुमतं श्रुत्वा शक्या कर्तुं विचारणा ॥१३॥ जव जन्तु आप को इस भावना से देखेंगे तब आप उनका कल्याण करने में समर्थ होंगे और उनकी बात पर विचार करेंगे॥१३॥ माणा अप्यस्य च्छागस्य प्रापितास्ते स्वयोनिषु । शरीरं केवलं शिष्टं निश्चष्टमिति मे मतिः ॥१४॥. यदि आप मन्त्र के द्वारा इस पशु के प्राण आदि सब तत्त्वों को यथास्थान पहुंचादेंगे तो केवल जड़ शरीर शेष रह जायेगा॥१४॥ - + : इन्धनस्य तु तुल्येन शरीरेण विचेतसा। हिंसा निर्देष्टुकोमानामिन्धनं पशुसंज्ञितम् ॥१५॥ प्राण रहित शरीर इन्धन के समान है औ जो लोग चेतना रहित शरीर के द्वारा यज्ञ करने के अभिलापी होते हैं, पशु ही उन के इन्धन हुआ करते है ॥१५॥ है [त्रय. १००J ........ अहिंसा सर्वधर्माणामिति वृद्धानुशासनम् । यदहिवं भवेत्कर्म तत्कार्यमिति विद्महे ॥१६॥ किंतु प्राचीन आचार्यों को यह आज्ञा है कि अहिंसा ही सब धर्मों में श्रेष्ठ है और जिस कार्य में हिंसा न हो वहीं कर्म करना चाहिए ॥१६॥ अहिंसेति प्रतिज्ञेयं यदि वक्ष्याम्यतः परम् । शक्यं बहुविधं कर्तु भवता कार्यदूषणम् ॥१७॥ यदि मैं यह प्रतिज्ञा करलूं कि मन वचन और कर्म से कभी हिंसा न करूँगा, तब आप मेरे कार्यों में बहुत से दोप देंगे ||१७|| अहिंसा सर्वभूतानां नित्यमस्मासु रोचते। प्रत्यक्षतः साधयामो न परोक्षमुपास्महे ॥१८॥ मेरा विचार तो यह है कि सब प्राणियों के साथ हिंसान करना ही उत्तम है किंतु मैं केवल प्रत्यक्ष हिंसा को ही दूपित बतला रहा हूँ, परोक्ष को नहीं ॥१८॥ अध्वर्युरुवाच- भूमेगन्धगुणान् भुङ्क्षे पिवस्यापोमयान् रसान् । ज्योतिषां पश्यसे रूपं स्पृशस्यनिलजान्गुणान् ॥१९॥ शृणोष्याकाशजान् शब्दान्मनसा मन्यसे मतिम् । सर्वाण्येतानि भूतानि प्राणा इति च मन्यसे ॥२०॥ याज्ञिक बोला ! तुम भूमि से गन्ध, जल से रस, अग्नि से Linn अध्याय-aratur रूप, वायु से स्पर्श, प्रकाश से शब्द, मन से विचार, ग्रहण करते हो और यह भी विचार करते हो कि इन सव पदार्थों में प्राणी रहने हैं ।। १९-२०॥ 24357 प्राणादाने निवृत्तोऽसि हिंसाया वर्तते भवान् । नास्ति चेष्टा विना हिंसां किंवात्वं मन्यसे द्विज॥२१ और श्रापन अहिंसा का व्रत धारण कर रक्खा है क्या ! इन विषयों के भागने में हिंसा नहीं होती। वस्तुतः कोई कर्म हिंसा बिना हो हो नहीं सकता कहिये अब आप क्या कह सकते हैं ।।२१ यतिरुवाच- अचरं च क्षरं चैव द्वैधी भावोऽयमात्मनः । अक्षरं तत्र सद्भावः स्वभावः क्षर उच्यते ॥२२॥ सन्यासी बोला ! प्रात्म क्षर और अक्षर भेद से दो प्रकार का है। जिस समय जीवात्मा इन्द्रियों के वशी भूत होता है उस समय उसे क्षर और जब वह इन्द्रियों को अपने वशीभूत कर लेता है तब उसे अक्षर कहते हैं ।। २२ ।। प्राणो जिह वा मनः सत्त्वं सद्भावो रजसा सह । भावैरेतैर्विमुक्तस्य निईन्द्रस्य निराशिषः ॥२३॥ समाय सर्वभूतेषु निर्ममस्य जितात्मनः । समन्तात्परिमुक्तस्य न भयं विद्यते कचित् ॥२४॥ प्राण, जिह्वा, मन, और सत्व, यह सद्भाव कहलाते हैं और इन भावों से विमुक्त होने पर तथा द्वन्दों से रहित होने पर और 64 ता जयादश अाशाओं के छोड़ देने पर जीवात्मा सब प्राणियों में समदर्शी हो जाता है और अहकार को नष्ट करके अपने आपको जीत लेता है ऐसी अवस्था में, वह हिंसा से नहीं डरता ।। २३-२४ ।। अध्वयु रुवाच- सद्भिरेवेह संवासः कार्यो मतिमतां वर । भवतो हि मतं श्रुत्वा प्रतिभाति मतिर्मम ॥२५॥ याज्ञिक ने कहा । है श्रेष्ठ आपको वात सुनकर मुझे यह निश्चय हो गया है कि सज्जनों के साथ ही रहना चाहिये ।। २५।। भगवन् भगवद्बुद्धया प्रतिपन्नो ब्रवीम्यहम् । व्रतं मन्त्रकृतं कतुन पराधोऽस्ति मे द्विज ॥२६॥ हे महाराज ! इस समय आपकं उपदेश से मैं ज्ञान वान हो गया हूँ। और मैं यह समझ गया हूँ कि अहिसामय विहित.यज्ञ के करने से मैं अपराधी नहा हूँगा ॥ २६ ॥ ब्राह्मण उवाच- उपपत्या यतिस्तूष्णीं वर्तमानस्ततः परम् । अध्वर्युरपि निर्मोहः प्रचचार महामखे ॥२७॥ ब्राह्मण बोला!याज्ञिक की इस युक्ति को सुनकर सन्यासी चुप हो गया । और याज्ञिक मोह हीन होकर अहिंसामय यज्ञ करने लगा२७ एवमेतादृशं मोक्षं सुसूक्ष्मं ब्राह्मणा विदुः । विदित्वा चानुतिष्ठन्ति क्षेत्रज्ञनार्थदर्शिना ॥२८॥ ज्ञानो पुरुष इसे ही मोक्ष का सूक्ष्म मार्ग बताते हैं और ज्ञानी पुरुषों के द्वारा इसको जानकर इसका पालन करते हैं ॥२८॥ श्री ब्राह्मण गीता का त्रयोदश अध्याय समाप्त चतुर्दश अध्याय ] ब्रा प्ला ण गी ता [१०३ चतुर्दश अध्याय ब्राह्मण ज्याच- अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । कार्तवीर्यस्य संवादं समुद्रस्य च भाविनी ॥१॥ ब्रामण बोला ! इस विषय में भी एक प्राचीन उपाख्यान है जिसमें कार्नवीयं और समुद्र का सम्वाद है ।। १ ।। कार्तवीर्यार्जुनो नाम राजा वाहुसहस्रवान् । येन सागरपर्यन्ता धनुषा निर्जिता मही ॥२॥ कार्तवीर्य अर्जुन नामक एक बड़ा बली राजा था जिसने अपने बल से समुद्र पर्यन्त पृथ्वी को जीत लिया था। स कदाचित्समुद्रान्ते विचरन्बलदर्पितः । अवाकिरन शरशतैः समुद्रमिति नः श्रुतम् ॥३॥ हमने यह सुना है कि एक वार समुद्र के किनारे घूमते हुये उसने अपने वल के अभिमान से समुद्र को अपने बाणों से आच्छा दित कर दिया ॥३॥ तं समुद्रो नमस्कृत्य कृताञ्जलिरुवाच ह । मा मुश्च वीर नाराचान् ब्रुहि किं करवाणि ते ॥४॥ समुद्र ने राजा से हाथ जोड़कर तथा 'नमस्कार करके कहा ! हे वीर तुम वाणों को मत छोड़ो कहो मैं आपकी क्या सेवा करूं ॥४ ॥
-~- १०४ ] ब्रा म ण गीता [चतुर्दश अध्याय मनाश्रयाणि भूतानि त्वद्विसृष्टैर्महेषुभिः । वध्यन्ते राजशार्दूल तेभ्यो देवभयं विभो ॥५॥ हे महाराज आपके वाणों से मेरे आश्रय में रहने वाले प्राणी दुख पा रहे हैं । कृपाकर उन्हें अभय दान दीजिये ॥ ५ ॥ अर्जुन उवाच-- मत्समो यदि संग्रामे शरासनधरः कचित् । विद्यते तं समाचक्ष्व यः समासीत मां मृधे ॥६॥ कार्तवीर्य अर्जुन ने कहा ! यदि कोई धनुर्धारी युद्ध में मेरा सामना कर सके तो बतलाओ॥६॥ समुद्र उवाच- महर्षिर्जमदग्निस्ते यदि राजन्परिश्रुतः । तस्य पुत्रस्तवातिथ्यं यथावस्कर्तुमर्हति ॥७॥ समुद्र बोला, हे राजन् ! आपने महर्षि जमदग्नि का नाम सुना होगा उसका पुत्र आपका आतिथ्य अच्छी तरह करने में समर्थ है ७ ततः स राजा प्रययौ क्रोधेन महतावृतः। स तमाश्रममागम्य राममेवान्वपद्यत फिर वह राजा अत्यन्त क्रुद्ध होकर महर्षि जमदग्नि के पुत्र परशुराम के पास गया ॥८॥ स रामप्रतिकूलानि चकार सह बन्धुभिः । नायासं जनयामास रामस्य च महात्मनः ।
चतुर्दश अध्याय ] नाहा गा गीता [१०५ वहां उसने अपने सम्बन्धियों के सहित परशुराम जी के विरुद्ध यात न ऐसे कार्य किये जिन से उन्हें बहुत कष्ट पहुँचा ॥९ मतस्तंजः प्रजज्वाल रामस्थामिततेजसः । प्रदहन रिपुसैन्यानि तदा कमललोचने ॥१०॥ है सुन्दरी । उस समय अत्यन्त तेजस्वी परशुराम जी का राक्रम प्रकट गया और वह कार्तवीर्य अर्जुन की सेना को दग्ध करने लगा ॥१०॥ ततः परशुमादाय स तं पाहुसहस्रिणम् । चिच्छेद सहसा रामो बहुशाखमिव द्र मम् ॥११॥ परशुराम जी ने अपने फरस से सहस्र बाहु पर इस तरह प्रहार करना प्रारम्भ किया जिस तरह वृक्ष को काटा जाता है।।११ तं हतं पतितं दृष्ट्वा समेताः सर्ववान्धवाः । असीनादाय शक्तींश्च भार्गवं पर्यधावयन् ॥१२॥ कार्तवीर्य अर्जुन को मरा हुआ देख कर उसके सब साथी नलवार और शक्तियों को लेकर परशुराम जी के ओर दोड़े ॥१२॥ रामोऽपि धनुरादाय रथमारुह्य सस्वरः । विसृजन शरवर्षाणि व्यधमस्पार्थिवं बलम् ॥१३॥ परशुराम भी रथ पर चढ़ कर धनुष को लिये हुए अस्त्रों की या करने लगे । तथा अपना बल प्रदर्शित करने लगे ॥ १३ ॥ ततस्तु क्षत्रियाः केचिजामदग्न्यभयार्दिताः। विविशुगिरिदुर्गाणि मृगाः सिंहार्दिता इव ॥१४॥ - . सह। १०६] ब्रा म ण गी ता [ चतुर्दश अध्याय उस समय बहुत से क्षत्रिय परशुराम जी के बल से डर कर ऐसे गिरि कन्दराओं में छिप गये जैसे सिंह के भय से मृग छिप जाते है ॥ १४॥ तेषां स्वविहितं कर्म तद्भयान्नानुतिष्टताम् । प्रजा वृषलतां प्राप्ता ब्राह्मणनामदर्शनात् ॥१५॥ तव क्षत्रियों ने परशुराम जो के भय से अपने कर्तव्य का परित्याग कर दिया और ब्राह्मणों के अभाव से सम्पूर्ण प्रजा शूद्रत्व को प्राप्त हो गई ॥ १५ ॥ एवं ते द्रविडाभीराः पुण्ड्राश्च शपरैः वृषलत्वं परिगता व्युत्थानात् क्षत्रधर्मिणः ॥१६॥ इस प्रकार क्षात्र धर्म नष्ट हो जाने से द्राविड़, आभीर, पुन्ड्र और शबर भी शूद्रत्व को प्राप्त हो गये ॥ १६ ॥ ततश्च इतवीरासु क्षत्रियासु पुनः पुनः । बिजस्त्पादित क्षत्रं जामदग्न्यो न्यकृन्तत ॥१७॥ क्षत्रिय विधवाओं से ब्राह्मणों के द्वारा जो क्षत्रिय संतान उत्पन्न हुई उसे भी परशुराम जी ने मार दिया ॥ १७ ॥ एकविंशति मेधान्ते रामं वागशरोरिणी। दिव्या प्रोवाच मधुरा सर्वलोकपरिश्रता ॥१८॥ इस प्रकार परशुराम जब इक्कीस वार क्षत्रियों का विध्वंस कर चुके तव सम्पूर्ण संसार में प्रसिद्ध दिव्य वाणी ने उनसे कहा।। १८॥
"ता -~-- . चनुदा मायाव] ..... राम राम निवर्तस्व कं गुणं तात पश्यसि । चत्रयन्धृनिमान्प्राणप्रियोज्य पुनः पुनः ॥१६॥ पागम करो, म नरम क्षत्रियों के वारवार विध्वंस कामना काम होगा ।। १ ।। तथैव तं महात्मानमृचीकप्रमुखास्तदा । पितामहा महाभाग निवर्तस्वेत्ययात्रवन् ॥२०॥ शनीक प्रभृनि महापुरुषों ने भी उन्हें इस कार्य के करने से गंका 11॥ पितुर्वधममृप्यंस्तु रामः प्रोवाच तानुषीन् । नाहन्तीह भवन्तो माँ निवारयितुमित्युत ॥२१॥ अपने पिता की मृत्यु को न सह सकने के कारण परशुराम जी ने उन ऋपियों में कहा,कि आपका निषेध करना ठीक नहीं है।।२१ पितर नाईसे क्षत्रबन्धू'स्त्वं निहन्तु जयतां वर । नेह युक्तं त्वया हन्तु ब्राह्मणेन सता नृपान्॥२२॥ ऋपि बोल ! 'आप ब्राह्मण हैं आपको क्षत्रियों का वध करना उचित नहीं है ।। २२ ।। श्री ब्राहाण गीता का चतुर्दश अध्याय समाप्त । ऊच:- १०८ ब्रा हा ण गो तापञ्चदश अध्याय -~~-~- पंचदश अध्याय पितर ऊचुः- अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । श्रुत्वा च तत्तथा कार्य भवता द्विजसत्तम ॥२॥ पितरों ने कहा ! हे ब्राह्मण श्रेष्ट परशुराम ! इस विषय में एक प्राचीन उपाख्यान है उसे सुनकर आपको कार्य करना चाहिये ।।१।। अलको नाम राजर्षिरभवत्सुमहातपाः । धर्मज्ञः सत्यवादी च महात्मा सुदृढव्रतः ॥२॥ एक महातपस्वी, धर्मात्मा, सत्यवादी, महात्मा, व्रती, राजर्पि अलर्क थे।।२।। स सागरान्तां धनुषो विनिर्जित्य महीमिमाम् । कृत्वा सुदुष्करं कर्म मनः सूक्ष्मे समादधे ॥३॥ उसने धनुष से सम्पूर्ण पृथ्वी को जोत कर ब्रह्म की प्राप्ति में अपने मन को लगाया ॥३॥ स्थितस्य वृक्षमूलंषु तस्य चिन्ता बभूव ह । उत्सृज्य सुमहत्कर्म सूक्ष्म प्रति महामते ॥४॥ एक समय वह वृक्ष के नीचे खड़ा हुआ यह सोचने लगा। कि मैं कर्म का परित्याग कर ब्रह्म को जानने का यत्न करूँगा ।।४।।
[र
अलर्क उवाच:-
०७
तच्छ्त्वाऽप्यविचिन्त्याथ ततो वचनमब्रवीत् ॥८॥
पपरा गाना गा ता"
मनमो में बलं जातं मनो जिस्वा ध वो जयः ।
भन्यत्र याणान्धास्यामि शत्रुभिः परिवोरितः ॥५॥
पला विचार करने लगा--कि मन बड़ा बलवान है मन के
सामने नही जाना स लिगे मैं अब वाहवाइन्द्रिय रूपी शत्रुओं को
जाननलिये उनपर वाणों का प्रयोग करूँगा ||५||
यदिदं चापलाकर्म सन्मित्याश्चिकीर्षति ।
मनः प्रति सुतीक्ष्णाग्रानहं मोक्ष्यामि सायकान् ॥६॥
मन अत्यन्त चपल है और सब प्राणियों को जीतने की इच्छा
काना। इसलिये मैं अयं अत्यन्त नाक्ष्ण बाणों का मनपर
योगा ॥६॥
मन उवाच-
नेमे चाणास्तरिष्यन्ति मामलर्क कथंचन ।
तवैव मर्म भेत्स्यन्ति भिन्नमर्मा मरिष्यसि ॥७॥
मनन कहा । हे अलर्क इन वाणों का मुझ पर कुछ प्रभाव
न होगा। यह तेरे ही मर्मस्थानों को वेधगे । जिससे तू मर
अन्यान् वाणान्समीक्षस्व यैस्त्वं मां सूदयिष्यसि ।
इसलिये तुम उन बाणों का प्रयोग करो. जिनसे तुम . मुझेमार
सकोगे । यह सुनकर अलर्क विचारने लगा और बोला ॥८॥
जायगा ॥७॥
अलके उवाच- आघाय सुवहून्गन्धास्तानेव प्रतिगृध्यति । तस्मात् घ्राणं प्रति शरान् प्रतिमोक्ष्याम्यहं शितान्॥६। अलर्क बोला । नासिका बहुत से गन्धों को घने पर भी फिर गंध की ओर ही रुचि रखती है इस लिये मैं नासिका पर तीक्ष्ण बाणों का प्रयोग करूंगा ।।९।। घ्राण उवाच- नेमे बाणास्तरिष्यन्ति मामलर्क कथंचन । तवैव मर्म भेत्स्यन्ति भिन्नमा मरिष्यसि ॥१०॥ नासिका ने कहा हे अलर्क । यह बाण मेरा कुछ नहीं कर सकते किन्तु तेरे हो मर्म का भेदन करेंगे । जिससे तू मर जायगा ॥१०॥ अन्यान्वाणान्समीक्षस्व यैस्त्वं मां सूयिष्यसि । तच्छ्यस्वा स विचिन्त्याथ ततो वचनमब्रवीत्॥११॥ इसलिये तुम उन बाणों का प्रयोग करो जिनसे मुझे मार सकोगे। यह सुनकर अलर्क बिचार करके बोला ।। ११ ।। अलर्क उवाच- इयं स्वादून रसान् भुक्त्वा तानेव प्रतिगृध्यति । तस्माज्जिह वांप्रति शरान्प्रतिमोक्ष्याम्यहं शितान्१२ - अलर्क बोला-रसना स्वादिष्ट रसों का भोग करके फिर उन्हीं 4-4 --- ~~ पञ्चदश अध्याय ] ब्राह्मण गी ता [१११ की इच्छा करती है। इसलिये मैं रसना पर ही तीक्ष्ण वाणों का प्रयोग करूंगा।॥ १२॥ जिव्होवाच- नेमे बाणास्तरिष्यन्ति मामलर्क कथंचन । तवैव मर्म भेत्स्यन्ति भिन्नसर्मा मरिष्यसि ॥१३॥ रसना ने कहा हे अलर्क ! तुम इन वाणों से मुझे नहीं जीत सकते ये तेरे ही मर्म का भेदन करेंगे जिससे तू मर जायेगा ॥१३॥ अन्यान्वाणान्समीक्षस्व यस्त्वं मां सूदयिष्यसि । तच्छत्वा स विचिन्त्याथ ततो वचनमब्रवीत् ॥१४ इसलिये तुम ऐसे वाणों का प्रयोग करो जिन से मुझे मार सको यह सुन कर अलर्क ने सोचा और कहा ॥ १४ ॥ अलर्क उवाच- स्पृष्ट्वा त्वग्विविधान् स्पर्शास्तानेव प्रतिगृध्यति । तस्मात्वचं पाटयिष्ये विविधैः कङ्कपत्रिभिः ॥१५॥ अलर्क बोला त्वचा नाना प्रकार के स्पर्शो का अनुभव करके भी स्पर्श को की ग्रहण करने की इच्छा करती है इसलिये मैं तीक्ष्ण वाणों से इस त्वचा को ही काट डालूगा ॥ १५॥ स्वगुवाच- नेमे बाणास्तरिष्यन्ति मामलर्क कथंचन । तवैव मम भेत्स्यन्ति भिन्नमर्मा मरिष्यति ॥१६॥ . ..
११२ ] ब्रा म ण गी ता [पञ्चदश अध्याय त्वचा ने कहा हे अलर्क यह वाण मुझे कुछ भी हानि नहीं पहुंचा सकते, यह तेरे ही मर्म का भेदन करेंगे। जिससे तू मर जायगा ॥१६॥ अन्यान्बाणान्समीक्षस्व यैस्वं मां सदयिष्यसि । तच्छ्रुत्वा स विचिन्त्याथ ततो वचनमब्रवीत्॥१७॥ तू उन वाणों को ग्रहण कर जिनसे मुझे मार सके । यह सुन कर और विचार कर अलर्क ने कहा ॥ १७ ॥ अलर्क उवाच- श्रुत्वा तु विविधान शब्दास्तानेव प्रतिगृध्यति । तस्माच्छोत्रं प्रति शरान् प्रतिमुंचाम्यहं शितान् ॥१८ अलर्क बोला-कान विविध प्रकार के शब्दों को सुनकर भी शब्द सुनने की हो इच्छा करते हैं इसलिये मैं कानों पर तीक्ष्ण वाण छोडूंगा ॥ १८ ॥ श्रोत्रमुवाच- नेमे बाणास्तरिष्यन्ति मामलर्क कथंचन । तवैव मर्म भेत्स्यन्ति ततो हास्यसि जीवितम् ॥१६॥ कान बोल हे अलर्क ! यह वाण हमारी कुछ भी हानि नहीं कर सकते किन्तु तेरे ही मर्म का भेदन करेंगे जिससे तेरा जीवन नष्ट हो जायगा ।। १९॥ अन्यान्याणान्समीक्षस्व यैस्त्वं मां सूदयिष्यसि । "तच्छ्रुत्वा स विचिन्त्याथ ततो वचनमब्रवीत् ॥२० तस्माद् बुद्धिं प्रति शरान्प्रतिमोश्याम्यहं शितान् । पथदश अध्याय में गागांता' इनलिये न उन बाणों का प्रयोग कर जिसमे तू हमें जीत सो गा सुनकर और विचार कर अलर्क ने कहा ॥ २० ॥ अलर्क उवाच- दृष्ट्वा रूपाणि बहुशस्तान्येव प्रतिगृध्यति । | तस्माचक्षुर्ह मिष्यामि निशितैः सायकरहम् ॥२१॥ अलर्क ने कहा नेत्र बहुत से रूपों को देख कर भी रूप देखने को इच्छा करना है इसलिये मैं तीक्ष्ण वाणों से नेत्र को ही मारूंगा ॥२१॥ चतुरुवाच- नेमे वाणास्तरिष्यन्ति मामलर्क कथंचन । तवैव मर्म भेत्स्यन्ति भिन्नमर्मा मरिष्यसि ॥२२॥ नेत्र ने कहा है अलर्क यह वाण मुझे नहीं मार सकते । तेरे ही मर्म का भेदन करेंगे जिससे तु मर जायगा ॥ २२ ॥ अन्यान्वाणान्समोक्षस्व यैस्त्वं मग सूदयिष्यसि । सच्छरुत्वा स विचिन्त्याथ ततो वचनमब्रवीत्॥२३ इसलिये तू उन वाणों का प्रयोग कर जिन से तू मुझे जीत सके । यह सुन कर और विचार कर अलर्क ने कहा ॥२३॥ अलर्क उवाच- इयं निष्ठा बहुविधा प्रज्ञया स्वध्यवस्यति। ।
नोहण गीता । पञ्चदश अध्याय अलर्क बोला-बुद्धि अनेक प्रकार के विचारों को उत्पन्न करती है। इस लिये मैं बुद्धि को ही तीक्ष्ण बाणों से मारूंगा ॥२४॥ घुद्धिरुवाच- नेमे बाणास्तरिष्यन्ति मामलर्क कथंचन । तवैव मर्म भेत्स्यन्ति भिन्नमा मरिष्यसि । अन्यान्यापान्समीक्षस्व यस्त्वं मां सूदयिष्यसि ॥२५. बुद्धि ने कहा-हे अलर्क । यह बाण मुझे नहीं मार सकते यह तेरे मर्मों का ही भेदन करेंगे जिससे तू मर जायेगा। इसलिये मुझपर विजय प्राप्त करने के लिये अन्य बाणों का प्रयोग कर ॥ २५ ब्राह्मण उवाच- ततोऽलकस्तपो घोरं तत्रैवास्थाय दुष्करम् । नाध्यगच्छत्परं शक्त्या बाणमतेषु सप्तसु ॥२६॥ ब्राह्मण बोला-तदन्तर उस वृक्ष के नीचे बैठकर ही अलर्क ने बड़ी तपस्या की। किन्तु पांचो इन्द्रिय मन और बुद्धि पर एक भी बाण का प्रयोग न कर सका ॥२६॥ सुसमाहितचेतास्तु स ततोऽचिन्तयत्प्रभुः । स विचिन्त्य चिरं कालमलको दिजसत्तम ॥२७॥ हे ब्राह्मण श्रेष्ठ! तब अलर्क ने अपने चित्त को एकाग्र करने का बहुत प्रयत्न किया और चिरकाल तक इसी अभ्यास में लगा रहाणा ।
पशपायाय ] मारा गो ता [११५
नाध्यगच्छापरं श्रेयो योगान्मनिमतां वरः।
म एकानं मनः कृत्वा निश्चलो योगमास्थितः ॥२८॥
हिन्म स गजर्षि को इस प्रकार के राज योग से कुछ भी
कम्पाला प्रान नया तब उसने इस हठयोग को छोड़ कर ध्यान
सोनपने मन को निम्नल करना प्रारम्भ किया।।२।।
इन्द्रियाणि जघानाशु बाणेनकेन वीर्यवान् ।
योगेनास्मानमाविश्य सिद्धिं परमिकांगतः ॥२६॥
परम नपस्वी.अलर्क ने एक हा बाण से इन्द्रियो को जीत लिया
और फिर योग बल से परम सिद्धि प्राप्त की ||२९||
विस्मितश्चापि राजर्षिरिमां गाथां जगाद ह ।
अहो कष्टं यदस्माभिः सर्व वाह्यमनुष्ठितम् ॥३०॥
गाजर्षि अलर्क ने नत्र अत्यन्त विस्मित होकर इस उपाख्यान
को सुनाया और कहा कि हमने पहले वाह्य आडम्बरों में अपना
ममय नष्ट किया यह दुख है ॥३०॥
भोगतृष्णासमायुक्तः पूर्व राज्यमुपासितम् ।
इति पश्चान्मया ज्ञातं योगोन्नास्ति परम् सुखम् ॥३१
मैंने पहले भाग और तृष्णा से युक्त राज्य प्राप्ति का प्रयत्न
किया किन्तु मुझे बाद में यह पता चला कि योग से अधिक कोई
मुख का साधन नहीं है ॥३॥
इति त्वमनुजानीहि राम मा क्षत्रियान् जहि ।
पो धोरमुपातिष्ठ ततः श्रेयोऽभिपत्स्यसे ॥३२॥
-.. ११६ ] नाम ण गो ता [ षोड़श अध्याय हे परशुराम । इस उपाख्यान पर विचार करते हुये आप क्षत्रियों का वध न करो और तपस्या करो जिससे कल्याण प्राप्त हो !|३२|| हत्युन्तः स तपो घोरं जामदग्न्यः पितामहः। प्रास्थितः सुमहाभागो ययौ सिद्धिं च दुर्गमाम् ॥३३ वृद्धो से यह उपाख्यान सुनकर परशुराम जी ने बड़ी भारी सपस्या को और अत्यन्त कठिन सिद्धि प्राप्त की,॥३३॥ श्री ब्राह्मण गीता का पंचदश अध्याय समाप्त षोड़श अध्याय ब्राह्मण उवाच- त्रयो वै रिपवो लोके नवधा गुणतः स्मृताः। प्रहर्षः प्रीतिरानन्दस्त्रयस्ते सात्त्विका गुणाः ॥१॥ ब्राह्मण बोला ! संसार में मनुष्यों के तीन शत्रु है जो अपने गुणों से नौ प्रकार के है जिनमें प्रहर्ष, प्रीति, और आनन्द ये सात्विक गुण है । इष्ट को प्राप्ति के निश्चय होने पर जो सुख होता है उसे प्रहर्ष, इष्ट की प्राप्ति में जो आनन्द होता है उसे प्रीति, और इष्ट धन्नु के भोगने से जो सुख होता है उसे आनन्द कहते हैं ।।१।।
--.-~~- षोड़श अध्याय ] ना म ण गो ता [ ११७ तृष्णा क्रोधोऽभिसंरम्भो राजसास्ते गुणाः स्मृताः । श्रमस्तन्द्रा च मोहश्च त्रयस्ते तामसा गुणाः ॥२॥ नम्णा काध, और द्वेप का अभिनिवेप ये तीन राजस गुण । श्रग, तन्त्रा और मोह ये तीन नामस गुण है ।।।। मातानिकृत्य धृतिमान् वाणराङ्घरनन्द्रितः । जेतु' परानुत्सहते प्रशान्तास्मा जितेन्द्रियः ॥३॥ बुद्धिमान पुरुष सावधानता से शमादि वारणों के द्वारा इन शत्रुओं को जीतने का प्रयत्न करता है ।।३।। अत्र गाथाः कीर्तयन्ति पुराकल्पविदो जनाः । अम्बरीपेण या गीता राज्ञा पूर्व प्रशाम्यता ॥४॥ प्राचीन इतिहास वेत्ता इस विषय में उपाख्यान भी सुनाते हैं जिन्हें पहले प्रशान्त चित्त महागज अम्बरीष ने कहा था|४|| समुदोर्णेषु दोषेषु बाध्यमानेषु साधुषु । जग्राह तरसा राज्यमम्बरोषो महायशाः ॥३॥ राग आदि दोपों के बढ़ने पर और शमादि गुणों के क्षीण होने पर अम्बरीप ने राज्य पदवी को प्राप्त किया ॥५॥ स निगृह्यात्मनो दोषान्साधून्समभिपूज्य च । १ जगाम महतीं सिद्धिं गाथाश्चेमा जगाद ह ॥६॥ . और शीघ्र ही उसने शमादि से दोषों को नष्ट करके परम सिद्धि को प्राप्त किया और यह कथा कही ।शा- । ११८] ना श ण गो ता [पोड़श अध्याय भूपिष्ठ' विजिता दोषा निहताः सर्वशत्रवः । एको दोषो वरिष्ठश्च वध्यः स न हतो मया ॥७॥ मैंने सम्पूर्ण दोष रूपी शत्रुओं को जीत लिया, किन्तु एक ऐसा प्रबल दोष है जिसे मैं नहीं जीत सका जा यत्प्रयुक्तो जन्तुरयं वैतृष्ण्यं नाधिगच्छति । तृष्णात इह निन्नान धावमानो न बुध्यते ॥८॥ उस दोप के हो कारण मुझे वैराग्य उत्पन्न नहीं होता। और तृष्णा के कारण मैं नीच कर्मों में प्रवृत हो रहा हूँ और फिर भी मैं उसे नहीं जानता || अकार्यमपि येनेह प्रयुक्तः सवते नरः । तं लोभमसिभिस्तोदणेनिकृन्तसं निकृन्तत ॥६॥ जिस कारण मनुष्य बुरे कर्म करता है उस लोभ को तीक्ष्ण खड़गों से काटना चाहिये ।।९।। लोभाद्धि जायते तृष्णा ततश्चिन्ता प्रवर्तते। स लिप्समानो लभते भूयिष्ठं राजसान्गुणान् । सवातौ तु लभते भूविष्ठ तामसान्गुणान् ॥१०॥ लोभ से तृष्णः, तृष्णा से चिन्ता उत्पन्न होती है । और पदार्थ के प्राप्त होने पर रजोगुण तथा असफलता में तमोगुण घढ़ता है ॥१०॥ स तैर्गुणेः संहतदेहबन्धनः पुनः पुनर्जायति [ ११९ यो प्राचाय ] महा गण गो ता कर्म घेह ते । जन्मक्षये भिन्नविकीर्घदेहो मृत्यु पुन- गच्छति जन्मनैव ॥११॥ इन गुणों के भाव ने प्राणी चार बार जन्म और मरण के बकर में तस्मादेतं सम्यगवेक्ष्य लोभं निगृह्य धृत्या- 'ऽऽस्मनि राज्यमिच्छेत् । एतद्राज्यं नान्यदस्तीह राज्यमात्मैव राजा विदितो यथावत् ॥१२॥ इसलिये इन यात पर विचार करके धर्य से शरीर के अन्दर हो लोभ को नष्ट कर के राज्य की इच्छा करनी चाहिये । इस प्रकार लोग को नष्ट करना ही राज्य है और आत्मा ही इस राज्य फा राजा है। इति राज्ञाऽम्यरीपेण गाथा गीता यशस्विना। अधिराज्यं पुरस्कृत्य लोभमेकं निकृन्तता ॥१३॥ लोभ को निग्रह करने वाले राजा अम्बरीष ने अधिराज्य ( मोक्ष )के विषय में यह उपाख्यानं कहा है ।।१।। श्री ब्राह्मण गीता का षोड़श अध्याय समाप्त
१२० ]
ब्रामण गीता
[ मप्रदश अध्याय
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सप्तदश अध्याय
एक समय एक ब्राह्मण
ब्राह्मण उवाच-
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
ब्राह्मणस्य च संवादं जनकस्य च भाविनी ॥१॥
ब्राह्मण वोला-इस विपय में ब्राह्मण और जनक का एक
प्राचीन उपाख्यान है |शा
ब्राह्मणं जनको राजाऽऽसन्न कस्मिंश्चिदागसि ।
विषये मे न वस्तव्यमिति शिष्टयर्थमन्त्रवीत् ॥२॥
कुछ अपराध किया, महाराज
जनक ने उसका सुधार करने के लिये उसे देश त्याग का दंड दिया
इत्युक्तः प्रत्युवाचाथ ब्राह्मणो राजसत्तमम् ।
आचक्ष्व विषयं राजन् यावांस्तव वशे स्थितः ॥३॥
यह सुनकर ब्राह्मण ने राजा से कहा हे राजन् मुझे यह बत-
लाइये कि आपका कितना राज्य है या
सोऽन्यस्य विषये राज्ञो वस्तुमिच्छाम्यहं विभो ।
वचस्ते कर्तुमिच्छामि यथाशास्त्र महोपते . ॥४॥
हे राजन ! में शास्त्रानुसार आपकी आज्ञा का पालन करत'
हुआ किसी दूसरे राज्य में जाकर रहूँगा ||४||
इत्युक्तस्तु तदा राजा ब्राह्मणेन यशस्विना ।
मुहरूष्णं विनिःश्वस्य न किंचित्प्रस्यभाषत ॥५॥
समदश अध्याग ] व्राहा गा गीता [ १२१ माागज जनक यह सुनकर गर्म २ सांस लेते रहे, और कुछ नघाले 11 तमासीनं ध्यायमानं राजानममितौजसम् । करमलं सहसाऽगच्छद्भानुमन्तमिव ग्रहः ॥६॥ महाराज जनक ध्यान में लीन हो गये और उस समय उन पर ला मोह छा गया जैसा ग्रहण के समय सूर्य पर अन्धकार छा जाता है ॥६॥ समाश्वास्य ततो राजा विगते कश्मले तदा । ततो मुहुर्तादिव तं ब्राह्मणं वाक्यमब्रवीत् ॥७॥ मोह नष्ट होने पर आश्वासित होकर महाराज जनक ने ब्राह्मण में कहा जा जनक उवाच- पितृपैतामहे राज्ये वश्ये जनपदे सति । विषयं नाधिगच्छामि विचिन्वन् पृथिवीमहम् ॥७॥ जनक बोले-हे श्रेष्ठ ब्राह्मण ! अपने पूर्वजों के राज्य पर अधिमढ़ होकर भी मैं यह नहीं समझता कि सम्पूर्ण पृथ्वी पर मेरा कहां राज्य नाध्यगच्छं यदा पृथ्व्यां मिथिला मागिता मया। नाध्यगच्छं यदा तस्यां स्वप्रजा मागिता मया ॥६॥ जव मैंने सारी पृथ्वी पर कहीं भी अपना राज्य न देखा तब है ॥८॥ १ [ सनदश अध्याय M १२२] ब्रा ह्म गा गीता मिथिला नगरी में देखना प्रारम्भ किया और जब वहां भी न मिला तब अपने बन्धुवों में देखना प्रारम्भ क्रिया ॥५॥ नाध्यगच्छं यदा तस्यां तदा मे कश्मलोऽभवत् । ततो मे कश्मलस्यान्ते मतिः पुनरुपस्थिता ॥१०॥ . जब वहाँ भी राज्य नहीं मिला । तब माह ने मुझे घेर लिया। मोह के नष्ट होने पर मेरे हृदय में यह विचार उत्पन्न हुआ i॥१०॥ तदा न विषयं मन्ये सर्वो वा विपयो मम । आत्माऽपि चायं न मम सर्वा वा पृथिवी मम ॥११॥ .. अब मुझे निश्चय है कि मेरा कहीं भी राज्य नहीं, और सब जगह है । यह शरीर भी मेरा नहीं, और सम्पूर्ण पृथ्वी भी मेरी है ॥११॥ यथा मम तथोऽन्येषामिनि मन्ये द्विजोत्तम । उच्यतां यावदुस्साहो भुज्यतां यावदुष्यते ॥१२॥ हे श्रेष्ठ ब्राह्मण--जो मेरी अवस्था है वही सबको है अतः जहाँ आपकी इच्छा हो आनन्द पूर्वक निवास करो ॥१२॥ ब्राह्मण उवाच- पितपैतामहे राज्ये चश्ये जनपदे सति । ब्रूहि का मतिमास्थाय ममत्वं वर्जितं स्वया ॥१३॥ ब्राह्मण बोला हे राजन ! अपने पूर्वजों के राज्य पर शासन करते हुये भी किस विचार से आपने ममत्व को त्याग दियाहै ।।१३।। ॥१२॥ - ब्रा स्मग ता . सप्तदश अध्याय ] [१२३ कां वै वुद्धिं समाश्रित्य सों वै विषयस्तव । नावैषि विषयं येन सा वा विषयस्तव ॥१४॥ किस तरह से आपका अधिकार सम्पूर्ण पृथ्वी पर है और .क्यों आपका शरीर पर भी अधिकार नहीं। यह मेरी समझ में नहीं पाया ॥१४॥ जनक उवाच- अन्तवन्त्य इहावस्था विदिताः सर्वकर्मसु । नाध्यगच्छमहं वुद्धया ममेदमिति यद्भवेत् ॥१५॥ जनक ने कहा-संसार की ऊंच और नीच अवस्थायें और कर्म नश्वर हैं इसलिये मैं यह नहीं कह सकता कि यह वस्तु मेरी है ॥ १५॥ कस्येदमिति कस्य स्वमिति वेदवचस्तथा । नाध्यगच्छमहं वुद्धथा ममेदमिति यद्भवेत् ॥१६॥ वेद भी यही कहता है कि यह सब पदार्थ परमात्मा के हैं इस लिये मैं समझता हूँ कि कोई भी पदार्थ मेग नहीं है ।। १६ ।। एतां बुद्धिं समाश्रित्य ममत्वं वर्जितं मया । शृणु वुद्धिं च यां ज्ञात्वा सर्वत्र विषयो मम १७॥ करके मैंने अहंकार को छोड़ दिया है, अब तुम यह सुनो कि मैं सब पदार्थों पर कैसे अपना अधिकार इस विचार को धारण समझता हूँ ।। १७॥
१२४ ] ब्राह्मण गौ ता [मप्रदश अध्याय नाहमात्मार्थमिच्छामि गन्धान घाणगतानपि । तस्मान्मे निर्जिता भूमिर्वशे तिष्ठति नित्यदा ॥१॥ नासिका में स्थित गन्ध को भी मैं अपनी तृप्ति का कारण नहीं समझता इसलिये सम्पूर्ण पृथ्वी मर वश में है और मैंने उसे जान लिया है।॥ १८ ॥ नाहमात्मार्थमिच्छामि रसान्नास्येऽपि वर्ततः । आपो मे निर्जितास्तस्मादशे तिष्ठन्ति नित्यदा ॥१६॥ मुख में स्थित रसों को भी मैं अपनी तृनि का कारण नहीं समझता इसलिये सम्पूर्ण जल पर भी मैंने अधिकार कर लिया है१९ नाहमास्मार्थमिच्छामि रूपं ज्योतिश्च चक्षुषः । तस्मान्मे निर्जितं ज्योतिर्वशे तिष्ठति नित्यदा ॥२०॥ नेत्र के विपय रूप को भी मैं अपनी तृप्ति का कारण नहीं समझता इसलिये मैंने अग्नि पर भी अपना अधिकार कर लिया है ॥२०॥ नाहमात्मार्थमिच्छामि स्पर्शास्त्वचि गताश्च ये। तस्मान्मे निर्जितो वायुर्वशे तिष्ठति नित्यदा ॥२१॥ स्पर्श को भी मैं अपनी तृप्ति का कारण नहीं समझता इसलिये वायु पर भी मैंने अधिकार कर लिया है ॥ २१ ।। नाहमात्मार्थमिच्छामि शब्दान् श्रोत्रगतानपि । तस्मान्मे निर्जिताः शब्दा वशे तिष्ठन्ति नित्यदा॥२२ ...AANDr.AAAA-.-~~~ ममदश अध्याय ] या कारण गी ता [ १२५ मानों को भी में बनी तृपि का कारण नहीं समझता । दुनिने माकाश पर नी मग अधिकार कर लिया है ।। २२ ।। नाहमास्मार्थमिच्छामि मनो नित्यं मनोन्तरे मनी मे निर्जितं तस्मादशे तिष्ठति नित्यदा ॥२३॥ 11 विषयों को भी में श्रात्मा की तृप्ति का कारण नहीं मगगना। पन: मन पर भी गंग अधिकार है ।। २३ ।। देवेभ्यश्च पितृभ्यश्च भूतेभ्योऽतिथिभिः सह । इत्यर्ध सर्व एवेति समारम्भा भवन्ति वै ॥२४॥ मागंश यह है कि मैं अपनी तृप्ति के लिये कुछ भी कम नहीं करना । किन्नु मय कर्म देवना, अनिथि,पितर, तथा भूनों, के लिये करना है अर्थान में नत्र कर्म केवल नर्तव्य बुद्धि से प्राणी मात्र के हितार्थ ही करता हूँ ।। २४ ॥ ततः प्रहस्य जनकं ब्राह्मणः पुनरब्रवीत् । त्वजिज्ञासार्थमोह विद्धि मां धर्ममागतम् ॥२५॥ तब ब्राह्मण हंसकर जनक से बोला-मैं धर्म का स्वरूप हूँ और तुम्हारी परीक्षा के लिये ब्राह्मण वेश में आया हूँ ।। २५ ।। त्वमस्य ब्रह्मलाभस्य दुर्वारस्यानिवर्तिनः सत्त्वनेमिनिरुद्धस्य चक्रस्यैकः प्रवर्तकः ॥२६॥ मुझे निश्चय होगया है कि इस समय संसार में आप ही सन्य गुण रूप नेमि से युक्त ब्रह्म प्राप्ति रूप चक्र के संचालक हैं ॥२६॥ श्री ब्राह्मण गीता का सप्तदश अध्याय समाप्त १२६ ] ब्रा म ण गो ता [अष्टादश अध्याय अष्टादश अध्याय - ब्राह्मण उवाच- नाऽहं तथा भोरु चरामि लोके यथा स्वं मां तर्जयसे स्वबुद्धया। विप्रोऽस्मि मुक्तोऽस्मि वनेच- रोऽस्मि गृहस्थधर्मा व्रतवांस्तथाऽस्मि ॥१॥ ब्राह्मण बोला-हे प्रिये तुमने मुझे जो समझकर कटु शब्द कहे थे मैं उनका पात्र नहीं हूँ | मैं तो ब्राह्मण हूँ जीवन मुक्त हूँ यन रहता हूँ, गृहस्थ हूँ और व्रतों का पालन करता हूँ ॥ १ ॥ नाहमस्मि यथा मां त्वं पश्यसे च शुभाशुभे । मया व्याप्तमिदं सर्व यत्किंचिज्जगतीगतम् ॥२॥ हे देवि ! जो तुम मुझे देखती हो मैं वह नहीं हूँ मेरा ज्ञान सम्पूर्ण संसार में व्याप्त है ।। २॥ ये केचिज्जन्तवो लोके.जङ्गमाः स्थावराश्च ह । तेषां मामन्तकं विद्धि दारूणामिव पावकम् ॥३॥ जिस प्रकार अग्नि लकड़ी का नाश कर देती है उसी प्रकार मैंने सब सांसारिक पदार्थों के विपय भोगों का नाश कर दिया है । राज्यं पृथिव्यां सर्वस्यामथवाऽपि त्रिविंटपे । तथा बुद्धिरियं वेत्ति वुद्धिरेव धनं मम ॥४॥ स्री में तथा सम्पूर्ण पृथ्वा पर मेरा हो अधिकार है यह मैं समझता हूँ और बुद्धि ही मेरा धन हैं ।। ४ ।। -- ---VV4 अष्टादश अध्याय ] ना हरण गीता [ १२७ एका पन्या ब्राह्मणानां येन गच्छन्ति तद्धिदः । गृहेपु वनवासेषु गुरुवासंपु भिक्षषु ॥५॥ प. पुरुष चार गृहली, बानप्राथी, ब्राह्मचारी, या सन्यासी हो उसका सही मार्ग है। अर्थात किसी प्राश्चम में भी रहना हुआ पुरुष सान से मोक्ष को प्राप्त कर सकता है और यह ही एक कन्नाग का मार्ग है।॥ ५॥ जिरेभिरव्यङ्गरेका बुद्धिरुपास्यते । नानालिंगाश्रमस्थानां येषां बुद्धिः शमात्मिका ॥६॥ वाव चिन्ह कुछ भी हो, वर्णाश्रम कुछ भी हो, किन्तु शम रूप बुद्धि की प्राप्ति ही मोक्ष का एक मत्र साधन है ।। ६ ।। ते भावमेकमायान्ति सरितः सागरं यथा । बुद्धयाऽयं गम्यते मार्गः शरीरेण न गम्यते ॥ आग्रन्तवन्ति कर्माणि शरीरं कर्मवन्धनम् ॥७॥ जिस प्रकार सम्पूर्ण नदिये एक सागर में जाकर गिरता हैं उसी प्रकार सब कर्त्तव्य, ज्ञान के आश्रित होते हैं। बुद्धि से ही परब्रह्म की प्राति होती है शरीर से नहीं क्योंकि शरीर से उत्पन्न होने वाले कर्म अनित्य हैं । और शरीर कर्मों का कारण है ॥७॥ तस्माते सुभगे नाऽस्ति परलोककृतं भयम् । तद्भावभावनिरता ममैवास्मानमेष्यसि ॥८॥ हे प्रिय-तुम मेरा अनुकरण करके ज्ञान प्राप्ति का ही यत्न कर जिससे तुम्हें जन्म मरण का भय न रहे ।। ८॥ श्री ब्राह्मण गीता का अष्टादश अध्याय समाप्त १८] ब्रा ह्मण गी ना [ एकोनविंशति अध्याय एकोनविंशति अध्याय ब्राह्मण्युवाच- नेदमल्पात्मना शक्यं वेदितु नाकृतात्मना । बहु चाल्पं च संक्षितं विप्लतं च मतं मम ॥२॥ ब्राह्मणी बोलो-हे पति देव आपने अत्यन्त सूक्षम तथा महान ज्ञान का उपदेश मुझे संक्षेप में दिया है 1 इसे छोटी बुद्धि वाला तथा अकृतात्मा धारण नहीं कर सकता ।। १ ।। उपायं तं मम ब्रहि येनैषा लभ्यते मतिः । तन्मन्ये कारणं त्वत्तो यत एषा प्रवर्तते ॥२॥ मुझे वह उपाय बतलाइये जिससे आप जैसी बुद्धि उत्पन्न हो २ ब्राह्मण उवाच- अरणी ब्राह्मणी विद्धि गुरुरस्योत्तरारणिः। तपाश्रुतेऽभिमथनोतो ज्ञानाग्निर्जायते ततः ॥३॥ ब्राह्मण बोला हे प्रिय-बुद्धि एक लड़की है और गुरु दूसरी लकड़ी है तप और स्वाध्याय से जब इन दोनों लकड़ियों को रगड़ा जाता है तब मन रुपी अग्नि उत्पन्न होती है ।।३।। ब्राह्मएयुवाच- यदिदं ब्राह्मणो लिङ्गं नेत्रज्ञ इति संज्ञितम् । ग्रहोतुं येन यच्छक्यं लक्षणं तस्य तत्क नु ॥४॥ ब्राह्मणी बाली महात्मन्-लोग जीव.त्मा को ज्ञानस्वरुप कहते इसलिये कृपया यह बतलाइये कि किस प्रकार ज्ञान के द्वारा जीवात्मा परब्रह्म को प्राप्त करता है। और उसका क्या लक्ष्ण है।।४ D -- .. एकोनविंशति अध्याय ] ब्रा र ण गी ता [ १२९. -"."..- ब्राह्मणउवाच- 124357 अलिङ्गो निर्गुणश्चैव कारणं नास्य लक्ष्यते । उपायमेव वक्ष्यामि येन गृह्यत वा न वा ब्राह्मण बोला-ब्रह्म अशरीरी निर्गुण तथा नित्य है उसकी प्राप्ति का वह उपाय बतलाऊंगा जिस के ज्ञान पूर्वक धारण से प्राप्ति और अज्ञानता से अप्राप्ति होती है ।।५।। सम्यगुपायो दृष्टश्च भलरैरिव लक्ष्यते । कर्म बुद्धिबुद्धित्वाज्ज्ञानलिङ्गैरिवाश्रितम् ॥६॥ जैसे भौरों के उड़ने से इस बात का ज्ञान हो जाता है कि उस स्थान पर सुगन्धित मधु है। ऐसे ही श्रवण, मनन आदि उपायों द्वारा कर्म शोधित बुद्धि से ज्ञान को प्राप्त कर लिया है। अर्थात यदि एक पुरुष केवल श्रवण मनन आदि के ही आश्रय रहता है ज्ञान और कर्म का आश्रय नहीं लेता तो हजारों प्रयत्न करने पर भी वह सिद्धि को प्राप्त नहीं होता॥६॥ इदं कार्यमिदं नेति न मोक्षेषूपदिश्यते । पश्यतः शृण्वतो वुद्धिरास्मनो येषु जायते ॥७॥ मोक्ष मार्ग में यह उपदेश नहीं दिया जाता कि यह कर्तव्य है और यह अकर्तव्य है। उस समय श्रवण और मनन से यह ज्ञान स्वयं हो उत्पन्न होता है || यावन्त इह शक्यरंस्तावन्तोंशान्प्रकल्पयेत् । अव्यक्तान व्यक्तरूपांश्च शतशोऽथ सहस्रशः ॥८॥ इस लोक में पृथ्वी आदि जितने भी व्यक्त अथवा अव्यक्त पदार्थ हैं उसका प्रथक् प्रथक् यथार्थ ज्ञान प्राप्त करना चाहिये । ......
- ve १३० ] त्रा म ण गो ना [ एकोनविंशनि अगाय सर्वान्नानार्थयुक्तांश्च स्वान्प्रत्यक्षहेतुकान् । यतः परं न विद्यतोऽभ्यासे भविष्यति ॥३॥ सव पृथिवी आदि पद वा को उचित रूप से जान लेने पर मत्र से श्रेष्ठ परब्रह्म का साक्षात्कार निरन्तर अभ्यास के द्वारा होना है .. श्रीभगवानुपाच- ततस्तु तस्या ब्रामण्या मतिः क्षेत्रजसंन्ये । क्षेत्रज्ञानेन परतः क्षेत्रज्ञेभ्यः प्रवर्तते ॥१०॥ श्रीकृष्ण जी बोले-हे अर्जुन ! इस उपदेश को सुनकर ब्रामगी के हृदय में ब्रह्मज्ञान उत्पन्नहुआ। और ब्राह्मणी ने विषय वासनाको का नाश करके परब्रह्म का प्राप्ति की ||१०|| अर्जुनउवाच- कनु सा ब्राह्मणी कृष्ण क चासो ब्राह्मणभः । याभ्यां सिद्विरियं प्राप्ता तावुभौ वद मेऽच्युन ॥११॥ अर्जुन बाला-वे श्रेष्ट ब्राहाण और ब्राहाणी कौन है जिन्होंने इस प्रकार परब्रह्म की प्राप्ति की । वे दोनों इस समय कहां रहते हैं ॥११ श्रीभगवानउवाच- मनो मे ब्राह्मणं विवि बुद्धिं मे विद्धि ब्राह्मणीम् । क्षेत्रज्ञ इति यश्चोक्तः सोऽहमेव धनंजय ॥१२॥ श्री भगवान बोले-हे अर्जुन ! इस सम्पूर्ण गीता में जिन ब्राह्मण और ब्राह्मणी का मैंने वर्णन किया है वह कोई पुरुप विशेष न थे किन्तु मेरा मन हो ब्राह्मण है और मेरी बुद्धि ब्राह्मणी है और ब्रह्मज्ञान का अधिकारी जीवात्मा मैं स्वयं हूँ ॥१२॥ श्री ब्राह्मण गीता का एकोनविंशति अध्याय समान .
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*OOOOOOO प्राध्यास्मिक ज्ञान का महान भण्डार गीता संग्रह महाभारत जैसे विशाल ग्रन्थ में जिस प्रकार श्री मदभगवत- गीता, ब्राहाणगीता आदि अनमोल रत्न भरे पड़े थे वैसे होमहाभारत में हजारों हो अनमोल रत्न भरे पड़े हुए । हमने महाभारत के हजारों रत्नों में में फेवल दश रलों का संग्रह किया है इस पवित्र ग्रन्थ में पिता पुत्र सम्बाद, बोध गोता, मङ्किगीता, पिङ्गल गीता, शम्पा गीता, अजगर गीता, शृगाल गीता, चिरकारि गीता और विचख्युगीना आदि का संग्रह किया है। बहुत सुन्दर हिन्दी अनुवाद सहित शीघ हो प्रकाशित होंगी। अभा से आर्डर दीजिये। सरस्वती आश्रम, कूचा बुलाकी वेगानं० २२१ दिल्ली। @िeg
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