Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Nibandha Mala Darsh
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निबन्धमालादर्श
In प्रचालन
अर्थात्
कानेर, (राजमान
स्वर्गवासी श्रीयुत पण्डित विषणुकृष्ण शास्त्री
चिपलूनकर लिखिन निवन्धमाला का अनुवाद
जिसको
ALLOTHEREILL
नागपुरनिवासी श्रीयुत पण्डित गङ्गाप्रसाद
जी अग्निहोत्री ने हिन्दी में लिखा
उमरी चार
लखनऊ
सुपारद साप मोहरला न भाव मा ए, प्रमे
मुशीनगलकिशार मीभाई, यागपानमें छपा
सन १९०
तिराहा नरमपना हवार इस छापेला ।
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। भूमिका। क्लेशो फलें नहिं पुनर्नवता विधत्त । ., विज्ञ पाठकगण, वर्तमान कृतविद्यलोगों की सम्पति है कि अ- पनी परोपकारिणी विद्या तथा बुद्धि सामर्थ्यसे अपनी मातृभापा की जो उन्नति अंगरेज विद्वान् मेकॉले तथा येऊन साहिव प्रभृतिने की है वही उन्नति स्वर्गवासी श्रीयुत पण्डित विष्णकृष्णशास्त्री चिपलूनकरने अपनी, जन्मभापा मराठीकी की है । यहांपर इनके पाण्डित्य का, विशेपरूप से परिचय देने की कोई आवश्यकता नहीं जान पडती क्योंकि वह इनके लेखोंके पद पद में, झलकता है। इनके लेखों की सुरसता, शिक्षादातृत्व तथा मनको सुसंस्कृत करनेकी शक्ति जैसीही कार्यकारिणी है वैसीही लेखप्रणाली सरल एवं सुवोध है, यही कारण है कि उनकी निवन्धमाला आजदिन वडे उत्साह और चावके साथ पढ़ी पढाई जाती है। जिन विद्या- रसिक कृतविद्यलोगों ने निवन्धमाला को स्वयं-पढ़ा है चा,अपने मित्र तथा अन्य साधनों द्वारा उसकी प्रशंसा सुनी, है, वे सब एक स्वर से उसकी परमोपयोगिता अङ्गीकृत करते, है । निबन्धमाला में शास्त्रीजी के लिखे हुए लगभग ३५ विपयोंपर लेख छपे हैं। इनमें से कुछ लेख तो ऐसे हैं जो एक देशीयही है अर्थात् मराठी पाठकों के लियेही लिखे गये है और शेप वैसे नहीं है क्योंकि उन में किंचित् परिवर्तन करनेसे वे सर्वसाधारण को एक से उपयोगी हो सकते हैं । चिरकाल से हमारी इच्छा थी कि हम सर्वोपयोगी लेखोंको हिन्दी में यथोचित परिवर्तनके साथ अनुवादित कर हिन्दी के रसिक तथा गुणग्राही पाठकों की सेवामें भेंटकरें; पर कई प्रति- - फूल कारणों के योग से वह आजपर्यन्त न होसका । अस्तु, आज 4 - (२) हम अपनी और तथा अपने हिन्दीहितैपी सहृदय पाठकों की ओर से हिन्दी के उन्नायक सुयोग्य मुन्शी श्रीयुत प्रयागनारायण सा- हिव नवलकिशोर मुद्रणयन्त्राधीश को अनेकानेक हार्दिक धन्यवाद देते हैं कि जिनकी सहायता से हमारी उक्तचिरलालसा और परिश्रम को अंशतः सफलता प्राप्त हुई। अर्थात् हमारे लेख हिन्दी के पठित समाज की सेवामें उपस्थित किये गये । 'अब यदि यह लेख पठित समाजद्वारा उपयोगी स्वीकृत हों तो हम समझलेंगे कि हमारे परिश्रम पूर्णरूप से सफल होगये और यदि हो सकेगा तो और लेखभी यथावकाश अनुवादितकर पाठकों की सेवा में भेंट करेंगे। । विनान् लोगोंपर यह वात भली भांति प्रकाशित है कि स्वतन्त्र ग्रन्थ लिखने की अपेक्षा किसी ग्रन्थका अनुवाद करना अधिक क्लिष्ट कार्य है । तिसपरभी मुझ कैसे मनुष्यके लिये कि जिसे ग्रन्थलेख- नादि विषयोंका अणुमात्रभी अनुभव नहीं है, वह अधिकतम क्लिष्ट है। इन सब बातों का पूर्ण विचारकर सजनलोग अनुवाद दोप के लिये हमें क्षमाप्रदान कर उसे भविष्यतमें सुधारनेकी सूचना दे हमें अनुगृहीत करेंगे। खंडवा गंगाप्रसाद अग्निहोत्री मध्यप्रदेश (नागपुर निवासी।) ७-१२-१८ - " ।
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निबन्धमालादर्शका
सूचीपत्र ॥
१ विद्वत्व और काव्यत्व
२ समालोचना
३ अभिमान
४ संपत्तिका उपभोग
१
4..
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३६
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७१
8८
५ बकृता
.
११६
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निबन्धमालादर्श। विद्वत्त्व और काव्यत्व। सौवर्णानि सरोजानि निर्मातुं सन्ति शिल्पिनः । तत्र सौरभनिर्माणे चतुरश्चतुराननः ॥ ४ || काव्यविवेचना के ग्रन्थ अंगरेजी की नाई संस्कृत में भी न होने के कारण काव्य का यथार्थरूप, कविके प्रावश्यक गुण, काव्य ईश्वरदत्त है वा परिश्रमाधीन है आदि विषयों का निरूपण किया हुया उसमें कहीं दीख नहीं पड़ता। इससे हमारा अभिमाय यह कदापि नहीं है कि उक्त विषयों का विवरण संस्कृत में कही कुछ पायाही नहीं जाता। साहित्य, काव्य तथा नाटकादि ग्रन्थों में उक्त विषय के बडे गहन एवं सारगर्भित विचार प्रदर्शित कियेहुए दीख पड़ते है । जिस हमारे देश की भाषा का चैभर मधानतः कविता ही है, और जिसमें वह ऐसी परिपक्कदशा को प्राप्त हुई दृष्टिगत होती है, वहां के लोगों के मन में उक्त विचार प्रादुर्भूत हो जहाँ तहा उल्लिखित हुए पाये जाते है यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है। यदि पैसा न हुआ होता तो प्रलयने आश्चर्य की बात थी ! तौभी इस विपय की विवेचना इंग्लेंडादि देशोंमें जिस प्रकार हुई वैसी इसके पूर्व कही अर्थात् हमारे देश वा इटाली, ग्रीसादि देशों में भी न हुई होगी ऐसा कहा जासकता है। हमारे यहा तो प्रय ২ য়য় ঈ কমল রিয়ম যাল, ঘাম শালিসিন থানা फेल विधिवही श्राधीन है।
२ । . निवन्धमालादर्श । इधर इस काव्य विवेचन * शास्त्र का लोपही होगयासा५ ॥ है । हमारे केवल संस्कृत के पण्डितों को काव्यकी अभिरुचि प्रकार की रहती है सो उनकी कविता, टीका और सभा में बड़े २ कवियों के कहेहुए पद्यों के कथनोपकथनद्वारा स्पष्टरुप से जानी जासकती है। योरोप के सामान्य पण्डितगण हमारे काव्य को जिसमकार समझबूझ सकते हैं वैसे हमारे बडे २ शास्त्री हानेवाले भी नहीं समझ सकते, यह, कहते हम तनिक भी नहर हिचकते कि हमारे काव्य के अलौकिक आनन्द का अनुभव करना यह दूरदेशस्थ लोग हमें यदि न सिखाते तो वह हमें कदापि प्राप्त न हो सस्ता } सारांश इस शास्त्र में जिसे उत्तमगति प्राप्त करनी हो उसे उचित है कि वह इस विषय के अंगरेजी ग्रन्थों का अव- लोकन करे और संतत उनका मननकरे । अंगरेजी के ग्रन्याद्वारा उसे काव्य के मर्म जानने की उत्कृष्ट शक्ति प्राप्त हो लोकोत्तर था- हाद प्राप्त करने का एक साधन उसके स्वाधीन होजायगा।। (२.) हमारा यह अभिप्राय नहीं है कि इस लेख में हम काव्य का सचिरतर विवरण करें। इस लेख में हम इतनाही दिखाना चाहते हैं कि कवित्व और विद्वत्त्व में निसर्गतः कोई सम्बन्ध है, वा * पनारस के माहित्यसुधारिधि को जन श्रीयुत वायू जगनाथदासजी थी.'- (उपनाम रणावरपाधि) सम्पादित करते थे तर आपो टक्क पत्र में साहित्यरभाकर नामक ग्रन्थ प्रकाशित करने का विज्ञापन दिया था। शोर उसका काव्यनिरूपण सजक एक खएड लिसकर प्रकाशित भी किया है। इस.अन्य से हिन्दीमें उन जुटिके पूर्ण होने की बहुत कुछ भाशा थी, पर वेद का विषय है कि हमारे विद्वानों के पठनपाठनोत्साह की मन्दता के कारण उन पत्र को श्रन्वर्धान होना पड़ा और उसी के साथ उन ग्रन्थ की पूर्णता भी अन्तर्हित होगई । पर तो भी उक्न पाबूसाहय यदि चाहे तो उर ग्रन्थ पूर्ण होसकता है। और हम उक्त बासाहब को यही परा मर्श देते है कि श्राप उस ग्रन्थ पूर्ण करने के लिये अवश्य उयोग करें।
निबन्धमालादर्श। ३ नहीं, अर्थात् जो व्यक्ति विशेष कवि हो उसे विद्वान होनाही चाहिये ऐसा प्रकृति का नित्य विधानई वा अन्यथा भी है। इस विषय का बोध होने के लिये केवल हिन्दी जाननेवालोंके अर्थ कहीं कुछ लिखापढ़ा गया हो सो बहुधा दीख नहीं पडता; अतः यह विषय नूतन होने के कारण उन्हें विशेप रोचक जानपडेगा ऐसा समझकर उसके विषय में यहा पर कुछ लिखा जाता है । (३) सब प्रथमतः संक्षेप से कविता के विपयमें आलोचना करते हैं । कविता के यथार्थरुप को जाननेवाले लोग अभी भी हमारे यहा बहुतही थोड़े पायेजाते हैं। इसका कारण यही जान पडताहै कि प्रायःलोग उसके विपय में सम्पर विचार नहीं करते और यह विचार करने की शक्तिभी बहुत थोड़ेही लोगों को है, यही कारण है कि इस विपय में उनकी सम्मति सदैव भिन्न २ रहती है । जो विलकुल अवोधहैं वे लोग तो यही समझते हैं कि छन्दोबद्ध पदरचनाही कविता है । इस पद्यरचना का विषय चाहे सो हो ! अमरकोश के श्लोक भतृहरि की कारिका, वाग्भट्ट के पंधक विषयक श्लोक आदि को चे लोग कविताही मानते है । कल बाजारके पदार्थों के मूल्य का कोष्ठक यदि कोई कवि पद्यरूप में वनारेगा, तो उस कोष्ठको भी वे लोग 'रघुवंश' और शेक्स- पियर के नाटक के सदृश काव्य में परिगणित करेंगे । अभिप्राय यह है कि बहुतेरे लोग कविता के सतत के वेप कोही कविता का स्वरूप मानने लगतेहैं । यदि वह गध का बंप धारणकरे वा गध उसका चेपधारण करे तो वे लोग दोनों की परीक्षा में धोखा खातेहै । और जो लोग उन लोगों की अपेक्षा सशान है वे सम- झते है कि जिस पद्य में यमक और अनुप्रासादि की अधिकता, होती है वही उत्तम कविता है। यह परीक्षा ठीक वैसीही है जैसे निवन्धमालादर्श । कि कोई स्त्रियों की सुन्दरता उनके आभूपणों को देख । करे । ये लोग जिस कवि की कविता में यमककी प्रचुरता पात उसके विषय में कहने लगतेहैं ऐसा कवि न हुआहै और न होगा। पर वे लोग इस वातको नहीं समझ सकते कि यमक और मास की अधिकता यद्यपि एक प्रकार की बुद्धि का मदर्शकहै पर बुद्धि और कवित्व एकही नहीं है । जैसे यह कोई सिद्धान्त नहीं कि जो मनुष्य अष्ट वा अष्टादश अवधान साधसकता है वह महान् बुद्धिमान होताही है, वा जो मल्लविद्या में अत्यन्त निपुण होताहै व प्रचण्ड शूर रहता है। अतः सेनानायक के पद के योग्य ही रहताहै । वैसेही वडे २ यमक तथा चमत्कृतिजनक,मासों के जोडने को कवित्व का दर्शक मानना व्यर्थ एवं विफल है । अप यह बात सचहै कि यमक प्रासादि संपन्न पद्यों को पढ़नेसे मनको वहुत चमत्कार जानपडताहै, पर वह चमत्कार ठीक वैसाही होगा जैसा कि उक्त उभय मनुष्योंकी कृति को देखकर अनुभूत होगा। उससे यथार्थ उपयोग बहुतही थोडा है अर्थात् कुछ काललों मन को कौतुक जानपड़ेगा इससे अधिक और कुछ न होगा ! उक्त लोगों की अपेक्षा उच्चश्रेणी के लोग वे है जो श्लेप और दुर्विदम्पता- प्रिय होते है। इस तीसरी श्रेणी में पुराने शास्त्रीगण समाविष्ट हो- सकते हैं। इन लोगों को यथार्थ कविता की रमणीयता और उसकी मुपविलासिता का परिज्ञान बहुतही थोड़ा रहता है ! न्याय मीमा- सादि शास्त्रोंकी युक्ति प्रयुक्ति तथा पूर्वपक्ष उत्तरपक्ष संपादनकी पटुता संपन्न इन प्रचण्ट मल्लोका भयावनारूप देखते ही विचारी कविता थरथर कापने लगती है । वह इन हशील लोगोंके चुंगल में छपडते ही मृतमाय होजाती है। क्योंकि ये लोग उसकी परीक्षा शास्त्रवाद प्रतिवादानुसार करते है अर्थात् युलिमयुनिदाग उसका खण्इन ५ - निवन्धमालादशे। भण्डन करतेहै ! खीचाखींचकर पदोंकी मनमानी व्यवस्था करते है और तदनुसार उनके अर्थ भी चित्र विचित्र करते है । शृङ्गार का वैराग्य और वैराग्य का शृङ्गारपूरित ऐसा चमत्कारिक अर्थ करते है जो विचारे कवि के ध्यान में कभी स्वप्नावस्था में भी न पाया होगा । यथार्थ में ग्रन्थकी दुर्दशा करना इसी को कहते हैं। सं- स्कृत में शकराचार्यकृत 'आनन्दलहरी' और 'अमरुशतक' नामक दो काव्य बहुत प्रसिद्ध हैं । इन दोनों में शृङ्गार का विषय वर्णित । पर हमारे पण्डित लोगों को शब्दों की प्रसनार्थता और एकार्थता कदापि स्वीकृत नहीं होती । यही कारण है कि एक पण्डितजी ने अपनी तीन एवं प्रखरबुद्धि के योग और एकासरी कोश की अनूठी सहायता से उक्त काव्य के शब्दों की मृङ्गारता नष्टकर उसे वैराग्य का काव्य बना दिया। इसी प्रकार जिन लोगों ने भापा काव्यके अद्वितीय ग्रन्थ तुलसीकृत रामायण की टीका कर एक एक पद्य के वीस २ पचीस २ अर्थ किये हैं उन लोगों के विषय में यही समझना चाहिये कि उन लोगों ने एक सर्वोत्कृष्ट काव्य की सुन्दरता नष्ट करने के लिये अपनी बुद्धि और समय का अपव्यय किया है। इन टीकाओं में टीकाकारों ने एक २ पद के जितने २ आशय प्रदर्शित किये हे वे सब ग्रन्धर्चा के अभिप्रेत नहीं होसकते । और ग्रन्यकर्ता के अभिप्रेतार्य के विरुद्ध उसकी पदरचना का अर्थ करना उसकी स्वर्गस्थित आत्मा को नरक यन्त्रणा देने के समान है । अस्तु; तो श्लेप को करिता का • वसी माल मूरति मुसक्यानी श्रादि चोपाइयाँ वा ये परिट ततोग पैया मा माना अर्थ करते हैं सो नहुनेरे पाठकों पर विदितही है। + मैनपुरतियासी मुन्शी शुकदेवलालजी कृत टीका बहुत उतम है । नपन फिगर प्रेम समाज से मिल मफती ह॥ 7 हा निवन्धमालादर्श। वैठे कि कौमुदी में धब्बा लगा धीरे २ जग में अंधेरा छाने लगा। चोर और उचक्कोंको अपनी मनमानी कार्यवाही करनेका सुअवसर प्राप्त होगया। मोहमयी निद्रा के भुलावे में जगत् को ऐसा भुलाया कि अपने तन धन की किसी को सुरत भी न रही। विचारी विरहिणी अवलाओं पर मन्मथ अपनी मनमानी ताड़ना करनेलगा पर उन विचारियों की पुकार किसीने न सुनी । और सुनी भी तो अनसुनीसी करदी। हाकिम का यह हाल देख विचारी चि- डिया चुनमुनी ने अपने घोंसलों में शरणली । उल्लू और रजनी चगें की वनपडी । विचारे गरीबों को अपने घर की वस्तु न मि- लती थी। हा धनवानों के यहां धन के वलसे झाड़ फानूसों का उजाला था । जब सारे जगत् में अंधेराही अंधेरा छागया तब इन का भी समय पूरा होआया । चट प्रकृतिदेवी ने इनके बदली की आज्ञा दी और उनके स्थानापन्न सूर्यदेव को किया । इस प्राज्ञा को सुनतेही चन्द्रदेवकी कान्ति न जाने कहा विलाय गई। वह शोभा किधर चली गई, यह वह चन्द्रही न रहे ! ज्यों २ सूर्यदेव की सवारी नगचाती आती थी त्यों २ यह हीन क्षीण मनमलीन होते जाते थे | इस उलट फेर को देख संसार चौकन्ना हो उठा। दवे दवाये जो जहां पड़े हुएथे चैतन्य हो वैठे । चकवेके जोडे जो जुदें हो रहे थे मिल बैठे । चातक ने बढ़के सूर्यदेव को आशीर्वाद दिया । मारे ग्रानन्द के कमल खिलपडे | चन्द्रमाको देख देखके गुलाव भी चुटकिया बजाने लगे। जया। जिससमय क्यारियों के मध्य क्रीड़ा घूमती तो झूमतीहुई फूलो की डालियां मानो उसकी मिलनलालसा से लिपटी जातीर्थी, उस समय विचारे भ्रमर की क्याही विचित्र गति होती अर्थात नतो निवन्धमालादर्श । कपालाही पर पेठने पाता और न गुलापही उसकै मनभाता, शरीर को भी मनभर न देख पाता और चम्पासे भी घिनाता, इपर तो मपुर मन्द मुस्कुरान लुभानी और उपर मन्द मुगन्धित मुशीतल वायु से हिल्लोलित विकचकजकलिया अपनी ओर बुलाती थी याही विचारा भ्रमर गुनगुनाता भुनभुनाता इधरका मारा उपर दिनभर हलाकानी उठाता । इला। * जिन ग्रन्थोंसे उक्त संग्रह उद्धृत किये गयेहै उनमें ऐसे काव्य बहुत पाये जाते है, और तो क्या यदि उन ग्रन्थ काव्यमयही मान लिये जायें तो स्यान, वाहुल्य न होगा ये ग्रन्थ और इनके सिवा मधु मालती प्रमिला अकवर, और दुर्गनन्दिनी ग्रादि हिन्दी के गद्य काव्य में आज दिन बहुत अच्छे, ग्रन्थ लिखे गये हैं । यहा पर हम अपने हिन्दी के हितैपी पाठको को, यह, परामर्श देना अपना कर्तव्य समझते है कि वे उक्त राय काव्य ग्रन्थों का अवलोकन य. वश्य करें। विशेषकर वे लोग तो अवश्यही देस जो अन्यभापा में दक्ष हों हिन्दी के हितार्थ.अपनी लेखनी संचालित कियाचाहते है। । उन काव्य के संग्रहाको पढ हमारे बहुतेरे पाठक हमारी प्रयो- यता पर हँसेंगे पर उनको यह दृढतापूर्वक जान लेना चाहिये कि जवलों उनमें उन्हें कोई बात ऐसी नहीं प्राप्त होती जो उनके चित्त पर चोट करे, तरलों उन्हें कविता का स्वादही नहीं जान पडा! हमारे पाठकों में से जो शास्त्रीलोग होंगे वे भी उक्तलेख पढ बडे चमत्कृत होंगे । वे बहुधा यही समझेंगे कि हम यह भ्रमवश न जाने क्या पढ़ रहे हैं वा लेखक ने भ्रमवश न जाने क्या लिख मारा है ? पर दोनों में से भ्रमित कोई भी नहीं है यह दिखाने के लिये उन्हीं के परिचय के कुछ पय नीचे उद्धृत करते हैं ।
१० निबन्धमालादशे । - ७ - तत्तु तीरं समासाथ तमसाया मुनिस्तदा । शिप्यमाह स्थितं पाश्र्चे दृष्ट्वा तीर्थमकर्दमम् ।। अकर्दममिदं तीर्थ भारद्वाज निशामय । रमणीयं प्रसवं च सज्जनानां मनो, यथा ॥ इदं तीर्थसमं सौम्यं सुजलं सूक्ष्मवालकम् । न्यस्यतां कलशस्तात दीयतां वल्कलं मम॥ चालकाण्ड-सर्ग २ श्राध कवि का यह काव्य किसे 'रमणीय' नहीं जान पड़ता? ऐसा कौन है जिसके चित्त को यह प्रसन्न नहीं कर सकता वा- स्तव में इसमें कोई ऐसी अनूठी उक्ति भी नहीं है । जो दृश्य नित्य प्रति ग्रामीण कोल फिरातों को दृष्टिगत हुश्रा करते है उन्हीं का इनमें वर्णन है । और यही इन पद्यों की इतनी रमणीयता का कारण हैं। उन्हें समझने के लिये यत्किंचित् भी परिश्रम नहीं उठाना पड़ता । नदी को देख प्रत्येक मनुष्य के मन में जो कल्पना निसर्गतः उत्पन्न होती हैं उन्हीं को कवि ने यहां नितान्त सरल रीति द्वारा कह दिखलाया है । इस वर्णन में कवि ने केवल एक ही अलंकार का प्रयोग किया है,-प्रयोग करने की अपेक्षा वह श्रागया है कहना बहुत समीचीन होगा। क्योंकि वह ऐसा सहज आया है-और यही कारण है कि उक्त स्थानपर वह ऐसा शो- भता है कि उसके लाने के लिये कविको यत्किंचित् भी मयन न करना पड़ा होगा। अभिप्राय यह है कि इस काव्य की जितनी प्रशंसा कीजाय थोड़ीही है । जिसने भाजलों करोड़ों मनुष्यों का रजन किया और गण्यमान्य हुआ उसकी प्रशंसा हमसे अल्प- मति करही क्या सकते हैं? इसी प्रकार आगे बढ़ के कोच पक्षी का वृत्तान्त लिखा है वह " ।
. निवन्धमालादर्श। भी कैसा हृदयंगम है। उसे पढ़कर जिसकी वृत्ति पहले की नाई ही चित्रार्पित होरहेगी उसे किसी दूसरे की उपमा कदापि न फ- वेगी-फबेगी तो एक उसी निषाद की! बात तो यह है कि सरकाव्य के लिये पयरचना, यमक, प्रास, रलेप सुतरां वर्ण मधुरतादिकों में से किसी की कोई विशेष श्रा- वश्यकता नहीं है । जिसके पठन वा श्रवण से मनोवृत्ति प्रसन्न हो लोकोत्तर आनन्द का अनुभव करती हैं और जिसका रस सहज ही अन्तःकरण में भिद जाता है वही सत्काव्य है । पर जिसके पठन वा श्रवण से यह नहीं होता तो उसके छन्द, यमक, श्लेष मृदुतादि विषय के सर परिश्रम व्यर्थ है। (५) उक्त बातों पर सम्यक् मीमांसा करने से यह बात ध्यान में श्रांती है कि कवित्व ईश्वरमदत्त गुण है। यदि कोई चाहे कि परिश्रम कर मैं उसे प्राप्त करना॒ सो नहीं होसकता । अतः मनुष्य शक्ति के परेके सौन्दर्य और मधुर स्वरादि गुण बलाद प्राप्त करने चाले को जितना यश लाभ होगा उतनाही हठात् कवि बननेवाले मनुष्य को होगा । जो अन्तर बनावटी सौन्दर्य और प्रकृतिसुलभ सुन्दरता में रहता है सोई हठात् जोडी हुई कृत्रिम कविता शोर यथार्थ करिता में पाया जाता है। जैसे बनावटी सौन्दर्यसपन्न कविता प्रयत्नाधीन है वैसेही कविता के बहिर्वेप अर्थात् छन्द, मृदु रचनादि भी परिश्रमाधीनहैं । सामान्यबुद्धि का मनुष्य भी प्रयत्न करने से उनमें निपुण हो सकता है । इतना इसमें अलरचे हो साताहै कि कोई अधिक और कोई न्यून ज्ञानसपन्न होता है। फ- विता के बहिरङ्ग भूपणों में कितनीही चमक दमक क्यों न हो पर यथार्थ रसिक को उससे चेसा लोकोत्तर थाहाद पदापि माप्त न होगा जैसा यथार्थ कविता के एक जुटकिले मात्र से होगा।
V . . १२ निवन्धमालादशा उदाहरण स्वरूप में,कतिपय पद्य नीचे संगृहीत किये जाते हैं जयकरी छन्दः। मन्तन के लक्षण सुन भ्राता । अगणितं श्रुतिपुराणविख्याता । सन्त असन्तनकी अस करणी । जिमि कुठार चन्दन आचरणी । काटै परशु मलय सुनु भाई । निज गुण देय सुगन्ध वसाई ।। दो० ताते सुरशीशन चढत जगवल्लभ श्रीखण्ड ।' अनल दाहि पीटत घनहि, परंशु वदन यह दण्ड ।। पादाकुलक। विषय अलंपट शील गुणाकर । परदुख दुख सुख सुख देखेपर ।। सम अभूत रिपु विमट विरागी । लोभामर्प हर्प भय त्यागी ॥ कोमल चित दीनन पर दाया । मन वच क्रम मम भक्त अमाया ॥ सबहिं मानप्रद -आपु अमानी । भरत प्राण सम मम ते पानी ॥ विगतझाम मम -नाम परायन । शान्त विरक्त विदित मुदितायन । शीतलता सरलता मयत्री । द्विजपद प्रेम धर्म जनु यन्त्री ।। यह सव लक्षण वसहि जासु उर । जानेहु तात सन्त,संतत फुर ।। शमदमनियम नीति नहि डोलहिं । परुप वचन करहूं नहिं बोलहिं ।। दो० निन्दा अस्तुति उभय सम, ममता मम पद कञ्ज । ते सज्जन मम प्राणप्रिय, गुण मन्दिर सुखपुञ्ज ।। तु., कृ. रा. उत्तरकाण्ड भगवद्भक्तों का उक्त वर्णन कैसा उदात्त है । इसके छन्द पद रचनादि नितान्त, सरल एवं सुवोष होने के कारण यह और भी अधिक रमणीय होगया है। ऐसे प्रसंगपर संस्कृत के शिखरिणी, पृथ्वी, मन्दाक्रान्तादि बडे २ वृत्त वा भापा के कवित्त सवैयादि मनुल वृत्त उक्त लन्दा कैसे हृदयग्राही कदापि न हो सकते ।। . . - - -- । -- निबन्धमालादर्श। -चौपाई। धन घमण्ड नभ गर्जत घोरा । प्रियाहीन डरपत मन मोरा ।। दामिनि दमकि रही घन माही । खलकी प्रीति यथा थिर नाहीं।। वरपहिं जलद भूमि नियराये । यथा नहिं धध विद्या पाये ॥ चूद श्रघात सहैं गिरि फैसे । खलके वचन सन्त सह जैसे ॥ क्षुद्रनदी भरि चलि उतराई । जस थोरे धन खल बौराई ।। भूमि परत भा डापर पानी । जिमि जीवहि माया लपटानी ॥ सिमिटिसिमिटिजलभरेतलावा। जिमि सद्गुण सज्जनपहॅावा ।। सरिता जल जलनिधि महेंजाई । होइ अचल जिमि जन हरिपाई ।। । तु. कृ. रा किष्किन्धाकाण्ड । (६) इतने संग्रह अलम् होंगे । इन्हें देख यथार्थ कवित्वका रूप पाठकों के ध्यान में आजावेगा । वह यही कि अन्य किसी की सहायता न ले केवल अर्थकी ही सुन्दरता और तबलक शब्दों की अनोखी सुष्ठता द्वारा मनको चमत्कृत करने की शक्ति । कवि के सिवा इतर मनुष्य को इस शक्ति को बोध होना असंभव है। और तो क्या स्वयं कविहीं इसका वर्णन नहीं करसकता! यही कारण है कि कवि और अन्यलोग इसे ईश्वरी मेरणा वा प्रतिभा कहा करते है। सामान्य मनुष्यों की प्रज्ञा' और प्रयत्न करिता के केवल बहिरङ्ग लक्षणपर्यन्त पहुंच सकते हैं। अतः अपने काव्यको सरस करने के लिये उन लोगों को पडे २ वृत्त, अर्थालंकार, और शब्दालकारादि की शरण लेनी पडती है । पर उक्त संग्रहों के विषय में विचार करिये | उनमें यथार्थ कविल लाने के लिये बहिरङ्ग साधनों की अणुमात्र भी सहायता नहीं लेनी पडी। दोहा. चौपाई आदि छन्द जिनमें अन्य छन्दों की नाई कुछ विशेष मधु- रता नहीं रहती और जिनकी रचना अन्य पदों की अपेक्षा सरल - - H - " १६ निवन्धमालादर्श। मीमांसा, मुतग आयुर्वेद और ज्योतिपादि शास्त्रों का भी सन्न लाया हुआ.दृष्टिगत होता है । वढते २ यह यहां तक वहा कि इधर शास्त्री.लोग काव्य का नाम सुनतेही नाक मुंह सिकोड चट 'रण्डागीतानि काव्यानि, *कह बैठते है । यह. दशा तो राने पण्डितों की हुई अब अंगरेजी के नवीन-पण्डिता का हा सुनिये । इन लोगों की सम्मति ऐसी कुछ जान पड़ती है कि गरेजी विद्या भी प्राचीन संस्कृत की नाई काव्य के लिये नितान अनुकूल है सुतरा उसके विना कविता वनाना कठिन क्या, अर्स भवही है । बा- हम यही क्यों कहै, हमें तो, ऐसा जान पड़ता मानो इन अबोध लोगों ने अंगरेजी विद्वत्ता को सब गुणों व अधिष्ठान समझ रक्खाहै।ये लोग इस नवीन विद्वत्ता को एक वर्ड अनोखी वस्तु मानते है ! ये लोग समझते है कि इसकी सहायत से सभा में उपस्थित हो बृहस्पति की नाई हम अपनी चऋताद्वार अपने श्रोतायों को आश्चर्यचकित करसकते है, और कालिदार के समान,संसार को सदा मोहित करनेवाली कविता बना सकर है, और शाक्यमुनि के सदृश मानसिक व्यापारों की उपपत्ति में कर सकते है। सारांश ये लोग समझते हैं कि उक्त परस्पर वि रुद्ध शक्तियां एक अंगरेजी विद्वत्ताद्वारा प्रकृति की उपेक्षा कर मार होसकती है। कई लोगों ने स्यात् यह भी समझ, रक्खा हो, कि जहां मनुष्य चार पांच वर्ष, विद्यालय में रह चुका कि उसे समस्त भूमण्डल के वाणिज्य, की रीति भांति राज्यव्यवस्था और युद्ध कलादि में पूर्ण निपुणता प्राप्त होजाती है । गीतशास्त्र और पाक शास्त्र के जिज्ञासु लोगों को भिन्न विद्वानों की शरण नही लेनी पडती- तात्पर्य-rhi * पाठक स्वय विचार लें-कि उपवाक्य से लोगों की काव्य मर्मज्ञता का - " - कैमा परिन मिलता।
- निरन्धमालादर्श। २७ प्रायेण सामग्रयविधौ गुणानां ।। पराङ्मुखी विश्वसृजः मत्तिः ।। } "समस्तगुण समुच्चय को एक स्थान में संगृहीत करने की विधि की इच्छा नहीं दीख पडती, वरन उसके विपरीत लक्षित होती है" ऐसा अनुमान दो * सहस्र वर्प के पर्व कालिदास को जान पडा था, और इधर भी लोग इसे ऐसाही समझते थे, वह सब सम्मति अन्यथा निश्चित होचला वा क्या, कुछ जान नहीं पड़ता। पुराफाल में होमर, थुसिडिडीस, आरिस्टॉटल आलेक्जाडर से सु. प्रसिद्ध पुरुष होने के लिये बहुत दीर्घकाल अपेक्षित था, इसके सिवा एक व्यक्ति एकही गुण में पार्थिव प्रयासों से पूर्णदक्ष हो- सता था पर जर से इधर अंगरेजों का अधिकार हुआ तब से उनकी विद्या का यहां संचारमात्र होतेही उन सब बातें एक साथ ही परिवर्तन ग्रहण करने लगी! संमति शिल्पशास्त्र जैसे उन्नत दशा को प्राप्त हो चारों ओर अपना अद्भुत प्रभाव दिखारहा है वैसेही वा उससे कहीं बदके बुद्धि अपने चमत्कार दिखानेलगी है । मानो ऐसा कुछ होगया है कि मनुष्य का मन बहुतही थोडे काल में पूर्णता प्राप्तकर प्रत्येक गुण का-बहुत सुगमता से सग्रह करने योग्य होगया हो । अस्त यह बडा भारी ज्ञान का प्रकाश ईसर की कृपा से हमारे देश को हितावह हो यही हमारी श्रा- तारेक प्रार्थना है। यह हम पूर्णतया-जानते है कि उन लेखपर लोग नानाविध थाक्षेप करेंगे। उन सबका यहा निराकरण करने के लिये एफ I * यह समय यहां निश्चयपूर्वक नहीं लिखा गया है । पर जस्तक परे पिकामा. दिस्य रामा और इस महाकवि के काली मिलता किसीने दतापूर्वक प्रमाणित महीना है सतक ननपर्चा अनुधायन करनाही हगें समुचित भार परमा -- - २० निबन्धमालादर्श वन में वनपशु कै वर्धार्थ भ्रमण करती है ऐसा वर्णन उपलभ होता है । हमारे कथासमूह में भी ऐसी कल्पनाओं की , कुछ अ- नता नहीं है । वह समुद्र से उदित हुआ सा दीख पडता है अतः तदुत्पन्न एक रन माना जाता है। उसके उदित होतेही क- मुदिनी ( मानो हर्प से ) विकसित होती है अतः उनका पति माना जाता है। रात्रि में उसके किरण प्रकाशमान होते हैं एता- पता उसका नाथ माना जाता है। उसके विपर. मृग की श्रा- कृति दिखाई देती है इस हेतु उसे मृगार मानते है; उसका दर्शन होतेही समुद्र को ( मानो आनन्दातिशयसे)बाद आती है,एता वता (दूसरी कल्पनानुसार ) उस का मित्र,और इसी प्रकार अन्धकार का शत्रु, राहुका द्वेष्य आदि माना जाता है । उसके करनिकर नेत्र और शरीर को सुख देते हैं इस हेतु वह.शीतकर माना जाता है, चन्द्रकान्त को द्रवित करनेवाला आदि भी वह माना जाता है। अब देखिये कि इस मनोहर भ्रम को तत्त्वज्ञ किस दूर कर दालता है ! वह यह वात निश्चित करता है कि चन्द्र समुद्र से लाखों कोस की दूरी पर है अतः-वह समुद्रोत्या रन नहीं माना जासक्का; समुद्र में,ज्वारभाठादि का होना, और कैरव का विकसित होना इत्यादि ये,प्रार्पणादि सृष्टि व्यापार के सब फल हैं; उसपर जो मृग दीख पडता है सो तत्रस्थ पर्वत की छाया है। जिसे राहु कहते है सो पृथ्वी की छाया है; ऐसी उपपत्ति वह करते जाता है । अन्त में, चन्द्र के करनिकर शीतल है यह सर्व साधारण का अनुभव भी उसे सहन न हो, वह उ- प्णताज्ञापक यन्त्रद्वारा चन्द्र के किरणों की उष्णता का हिसाब 'लगाता है !! लो पराकाष्ठा होगई ! इस प्रकार कवि परंपरा विर- चित सुन्दर मन्दिर का यह कविविरोधी अपने दर निरीक्षण एवं मकार से २१ निबंधमालादर्शी प्णताज्ञापक, यन्त्रोद्वारा समूल विध्वंसकर समस्त सृष्टि को जाड़कर छोडता है। उक्त संग्रह में जयदेवकविने कविता को चा नानी और तर्कपाशक्ति को प्रचण्ड आतप की जो उपमा दी है सो भी नितान्त,सरस एवं समर्पक है । क्योंकि चादनी शान्त और रमणीय होती है, और सातप उपयोगी अवश्य है पर उस की लपट किसी को नहीं सोहाती । वैसेही कविता समझने के लिये सुवोध होती है। मनका रञ्जन करती है मनको शान्ति देती' है; पर शास्त्रीय ग्रन्थ इसके उलटे रहते हैं अर्थात् समझने के लिये दुर्योर, उनका बोध होनेपर मन को प्रगल्भता भलेही प्राप्त हो पर उसका रञ्जन नहीं होता; और वाद विवाद के ग्रन्थों से तो चित्त त्ति की शान्तता नष्ट हो वह अत्यन्त क्षुब्ध होजाती है । इस से यही अभिप्राय प्रदर्शित किया गयाहै कि चन्द्रिका में पदार्थ स्पष्ट रूप से न दिखपडने के कारण, कल्पनाशक्ति को पदार्थ के अय- धार्थरूप द्वारा मनका रखन करने के लिये अवकाश मिल जाता है, पर भर दुपडरिया में पदार्थ नितान्त स्पष्ट रूप से दिखपड़ने के कारण कल्पनाशक्ति को निज कार्य साधनार्थ अवसर नहीं मि- लनेपाता और पदार्थ का यथार्थरूप सहनहीं में दृष्टिगोचर हो- जाता है । ठीक यही सिद्धान्त कल्पना और बुद्धिद्वारा सपादित ज्ञान के लिये यथाक्रम चरितार्थ होता है। (४) उक्त उपपादन से हमारे कृतविद्य एव विवेकी पाठको को यह बात विदित होचुकी होगी कि वुद्धि की प्रगल्भता मनकी उस अवस्थाका नाम है जो उसे कल्पनाशक्ति के पूर्ण विकासके अनन्तर प्राप्त होतीहै अर्थात् आदि में कल्पना का विकास होने लगता है और जब यह पूर्णता को पहुँच जाता है तर बुद्धि का विकास होनेलगता है । इसका अनुभव बहुतही सरलता से होसकता है।
. ર निबन्धमालादर्श। वचपन में लड़कों को खडखडाहट, प्रदीप की ज्योति, चांद श्रादि का वडा कौतुक जान पडताहै, इसका कारण यही है । उस समय उनकी कल्पनाशक्ति उत्तरोत्तर वृद्धि लाभ करने र गतीहै । उन्हें भूत प्रेत और राक्षसादिकों की कथा सुनने में बहु रुचि होतीहै, अंपरे में जाने आनेको वे, डरते है, इसका भी क रण यही है कि उनकी कल्पनाशक्ति इस समय बहुत जाय 'रहती है और विचारशक्ति प्राय: निद्रित रहती है। पर आ जैसा जैसा उन्हें बोध होने लगताहै। वैसे वैसे वे इन निर्मूल वार में विश्वास कम करने लगते हैं और सारासार विचार अर्या यथार्थता किस बात में हैं किस बात में नहीं है यादि की विवेचा करने लगते हैं। हमारे पाठकों में से बहुतेरों को निजके 'अनुभ का.स्मरण होताहोगा कि वाल्यावस्था में ईमाव की कहानी पढ़ को जी बहुतही चाहता था और उसका तात्पर्य पढ़ते सिर पीड़ा होने लगती थी; पर अंपवह काल व्यतीतहो मनको उस अनन्तर की दशा प्राप्त होजाने के कारण उक्त वात के विपरी अनुभव होरहा है;-अर्थात् अब कथा कहानी की अपेक्षा त स्पर्य पर विशेप दृष्टि रहती है ! अस्तु; यह वात जैसे व्यक्तिग चरितार्थ होती है उसी प्रकार राष्ट्रात भी चरितार्थ होत है। विचार के देखिये कि सब लोगों में प्राथमिक ग्रन्थ । जो पायेजाते हैं वे बहुधा कवितामें ही पायेजाते है और ये केवल अनुक्रम से ही पहले नहीं रहते किन्तु योग्यता म भी अगए रहते हैं । इन दोनों का कारण यही है कि उस अज्ञात अवस्थ * यह शब्द यहापर “ पन्तक" वाचक शब्द के अर्थ में नहीं प्रयुक्त किय गया है यहा इसका मूनार्थ " जोड़ी हुई कहानी " हो लेना चाहिये । वेदों श्री होमरके समय में लेसन कला पीपा न थी हमके वरोरे में पड़ने की मावश्यफना नहीं है को - निवन्धमालादर्श। २३ ( कल्पनाशक्ति जैसी उद्दाम और प्रचण्ड रहती है वैसी फिर कभी सी नहीं रहती। लोग इस बात से बडे आश्चर्यित होते होंगे कि वेद्वान् अर्याद सफल गुण के पागर माने जानेवाले लोग व ल्मीकि, व्यास और हामर कैसे कवि क्यों नहीं होसकते । पर इसका कारण पीछे जो उल्लिखित होचुका है उसकी आलोचना करने से समस्त विस्मय दूर होजायगा । उस मन्वन्तर से वर्तमान मन्वन्तर बहुतही निराला है । उस समय बहुधा कल्पनाशक्ति की ही प्रबलता होने के कारण वैसे जगन्मान्य काव्य ग्रन्थों की सृष्टि उस समय होगई । पर अब कल्पनाशक्ति शेप हो उसके स्थान में विवेचनाशक्ति की प्रबलता दिनोंदिन बढती जाती है अतः वह सामर्थ्य अब नहीं रहा और नानाविध शास्त्र ग्रन्थ प्रादुर्भूत हुए । अर इधर लोगों की मनःप्रवृत्ति अन्तरालय के चमत्कार, भूगर्भ की विलक्षण रचना और मनोवृत्ति संचालन के नियम जानने की ओर आकृष्ट होरही है । पहला काल मधुमास के नाई वृक्षों को पल्लवित और युसुमित करनेवाला था, पर यह वर्तमान स. मग शरन्मास के सदृश फल सस्य समृद्धि करनेवाला है। ऐसी दशामें दोनोंकी एकाधिकरणता अर्थात् एकत्र वास कव सभवहै ! (५) इन सब बातों की सम्यक् मीमासा करतेही हमारे विज्ञ पाठकों को सुधार कवितामा वावक है ' ' सानावस्था में उसकी वाद म्युटजाती है श्रादि विलसण दिखनेवाले वाक्योंका अर्थ उत्तम 'तया ज्ञात होजायगा, और उनकी सत्यता उनके मनपर प्रतिनि- बित होजायगी। अस्तु अव कवि के लक्षण, उसके प्रधान एवं गौण गुण श्रादिके विपय में बालोचना करते है । भरोसा है कि इम भालोचनाद्वारा वर्तमान विषय विशेषरूप से स्पष्ट होजायगा । (६) 'कवि' शब्द का पात्वर्य 'गानवाला'* पायाजाना है। म । '' . निवन्धमालादर्श । इस शब्द का यह अर्थ अब इधर परिवर्तित होगया है। क्योंकि गायन एक निरालाही गुण होगया है । पर पुरोकाल में सब देशों में और अभी भी वैसी अवस्था जहां होगी वहा कविलोम ही गाने वजानेवाले रहते है । संस्कृत के नाटक ग्रन्थों में यह प्राचीन व्यवस्था दीख पड़ती है । राजा के निकट स्तुति पाठकगण रहा करते थे उन्हें नाटक की परिभापा, चैतालिका और यो 'बन्दी जन' भी कहते थे। दैत्यगुरु शुक्राचार्य को इसी कारण "कवि और 'काव्य' संज्ञा प्राप्तहुई थीं । ग्रीकलोगों में-'ह्यापसोडिस्टस' ( Rhapsodists ) नाम के लोग थे, वे लोग होमर आदि प्राचीन बहुमान्य कवियों के काव्य गा बजा वा मुखाग्र का अपनी आजीविका किया करतेथे । इन काव्यपाठकों में से कोई स्वयं काव्य रचना किया करते थे । अस्तु तो उस समय लेखन कला प्रचलित न होनेपर भी हमारे वेदों की नाई उनके वे काव्य पाठक परंपरा द्वारा उन में बने रहें । यह बात पुराकाल हुई । पर इतने दूर जाने की भी कोई आवश्यकता नहीं है । यह वात अभी कुछ काल के पूर्व इधर के प्रान्तों में कहीं २ दीख पड़ती थी। पेशमा के शासनकाल में लावनी, पवाडे छन्दोबद्ध फर वे लोग स्वयं गाया करते थे, और उनकी योग्यतानुसार वे लोग पुरस्कृत भी किये जाते थे। पाठक परंपराद्वारा यह कविता अभीलों हम लोगों में बनी है । इसे छपवाकर प्रसिद्ध करना देशाभिमानी लोगों का परमकर्तव्य है क्योंकि तारा भापातत्व वेचा और रसिक लोगों पर वडाभारी उपकार होगा । तो हमारे देश में इस प्रकार 'कवि' शब्द रूढ़ हुआ अंग्रेजी भाषा में एतदर्थ वाचक जो शब्दहै * उसका अर्थ 'करनेवाला' है। अतः सामा * poct=poco' I wade' निवन्धमालादर्श । २५ न्यतः उस भापा के लोग समझते है कि कवि अर्थात् कल्पना सृष्टि का बनानेवाला यही उसका मूल अर्थ है । पर हम नहीं स- मझते कि ऐसा गहन अर्थ उन लोगों के मन में प्रथमतः आया। हो । हमारे 'कवि' शब्द की नाई 'करनेवाला अर्थात् 'पद्य जोड़ने- वाला' इतनाही,अर्थ उस समय के लिये हम अधिक युक्ति संगत मानते हैं । अस्तु यहालों केवल शब्द की व्याख्या का विवरण हुा । अव आगे कवि के आवश्यक गुणों के विषय में विचार प्रकाशित किया जाता है। (७) कवि का प्रधान गुण सहृदयता है । हृदय की शृगार, वीर, करुणादि जो भिन्न २ वृत्तिया है वे उसे अत्यन्त सूक्ष्म एव स्पष्टरूप से अनुभूत होनी चाहिये । उक्त भिन्न २ वृत्तियों का विषय इन्द्रियगोचर होतेही कवि का मन क्षुब्ध होजाता है, और उस क्षुब्धता के आवेग में उस के मुख से जो बातें विनिःसृत होती है वही यथार्थ कविता है। इसका परमोत्तम उदाहरण पूर्वोल्लिखित हमारे "मादिकवि की क्रौचवध विपय की कविता है । हमारे मापा. काव्य के भण्डार में ऐसी सर्वाङ्ग सुन्दर कविता विशेपकर गोसाई तुलसीदासजी कीही पाई जाती है ।। इनका मन अत्यन्त निर्मल एवं प्रेमी वैसेही स्वभाव नितान्त सरल अथवा गम्भीर होने के कारण जिस प्रसङ्ग की चौपाई देखिये मानो उससे वह रस टपका पडता है। यही कारण है कि आज तीन चार सौ वर्ष से उनकी चौपाई रामायण हम लोगों को ऐसी प्राणप्रिय होरही है । और जवलों उसकी आधारस्वरूप हिन्दीभापा संसार में प्रचलित रहगी तबलों * वर्डस्वर्थ नामक अग्रेज़ कवि ने फाव्य का लक्षण यों कियाहै "Poetry is the spontaneous overflow of powerful feelings". देखिये श्राप क्या कहते हैं- सरल कनित कीरति विमल, सोइ भादरहि सुशाग । .
निवन्धमालादर्श। यह संसार में अमेट बनी रहेगी। तो कवि का हृदय ऐसा चाहिये फि जिसमें भिन्न २ मनोवृत्तियां पूर्णरूप से प्रतिविम्बित होजायँ, अर्थात् सहृदयता यही काव्य का प्रधान लक्षणहै । यह गुण जिस में नहीं है उसकी बुद्धि कैसीही प्रचण्ड एवं प्रखर क्यों न हा पर उसका यहा अणुमात्र उपयोग न होगा। इसके उदाहरणों का हमारे देश में मिलना असम्भव है क्योंकि हमारे प्राचीन एवं, अर्वाचीन ग्रन्थ प्रणेत गणों की जीवनी वा उनका इतिहास हमें कुछभी उपलब्ध नहीं है। ऐसी अवस्था में हमें देशान्तरनिवासी लोगोंको ही उदाहृत करना पडता है। हमारे पाठकों में से बहु- तेरों को स्यात् विदितही होगा कि माचीन रोमनलोगों में सिसरो नाम का एक महान् वक्ता होगया है । यह वक्ता राजकाज में वडा निपुण एवं दस तो थाही पर इसके सिवाय यह महान् विद्वान् भी था । इसने क्याटिलैनके राजविद्रोह का दमनकर रोम नगर की रक्षाकी: इसके सिवाय इसके विपयमें यदि ऐसाभी कहाजाय कि उस घोर विपत्तिसे इसने समस्तराज्यकी रक्षा की तौभी कि- श्चिन्मान वाहुल्य न होगा । ल्याटिन भाषा में इस महान् पण्डित ने सैकडों बड़े २ ग्रन्थ रच डाले थे, पर अब उनका भागमात्र शेप रहगयाहै। कहने का अभिप्राय यही है कि यह ऐसा प्रचण्ड विद्वान् एवं वाग्मी होनेपर भी इसकी कविता ऐसी नरिस बनी कि उसे कविता* कहनाही अनुचित है ! स्वाभिमान के कारण केवल उसेही वह बहुत उपयुक्त जान पडती थी, पर अन्य लोगों * सेद का विषय यह है कि श्राजकल सही पाही तिरछी श्रादि हिन्दी के प्रेमालोग हिन्दी के काध्य को ऐसेही काव्य से पूरित करना अपना परम कर्तव्य मानते हैं। + निज कवित्त किहि लोग न नीका । सरस होय अथना बहु फीका ॥ तुलसदिास।
निवन्धमालादर्श २७ ने उसे आज पर्यन्त नीरस और अनुपयुक्तही माना है । ऐसे उदा- हरण अनेक पाये जाते हैं पर यहां पर एकही अलम् होगा । अब कुछ उदाहरण अन्य प्रकार के लिखेजाते हैं । जानसन् पोप ड्राय- , इन् आदि कैसे उद्दण्ड ग्रन्धकार होगये है सो यहा कहने की कोई भावश्यकता नहीं है । इनमें से अन्तिम दोनों ने तो अपना समस्त जीवन कविता लिखने मेंही व्यतीत किया और तीनों अपने २ समय के कवियों में अग्रगण्य थे। पर अब ये वैसे नहीं मानेजाते, और कोई २ तो कहते है इन्हें कवि कहना बडी भूल है । श्रस्तु, तो यह सब उदाहरण महान् पण्डित हो बिलकुल कवि न होने- वाले वा निदान महान् कवि न होनेवालों के हुए । पर इससे भी अधिक विलक्षण एक बात बार बार दृष्टिगत हुआ करती है वह यह है कि समय विरोप के कारण यथार्थ कचि का भी का- व्यत्व न्यूनाधिक होता है। अर्थात् कोई काव्य कभी परमोत्तम वन जाता है, पर दूसरी बार कैसाही उद्योग बार प्रयत्न भलेही किया जाय पर वैसा काव्य नहीं बन सकता । अंग्रेज कवि मिल्टन ने अपने विषय में ऐसा लिखा है कि मेरी प्रतिभा वर्ष के कुछ म- हीनों में विशेष समुज्ज्वल रहा करती थी, और बहुधा इसी के अनुसार में काव्य रचना किया करता था । पोप के विपय में जानसन ने यह लिखा है कि वीस वर्ष की अवस्था में जैसी उत्तम कविता उसने की उससे अधिक उत्तम कविता.फिर वह लिखड़ी नही सका । वही बात बैरन के सम्वन्धसे भी कही जाती। इसके विपय में इतना और भी कहा जाता है कि इसने उत्तर अवस्था में जो काव्य रचे हैं उनकी योग्यता पूर्वावस्था लिखित कान्योंकी अपेक्षा बहुतही कम है । अस्तु तो इस समस्त कथन से यह स्पष्ट- तया सिद्ध होता कि काव्य का तत्व सहयता है। अन्य में जैसी २८ निवन्धमालादर्श। यह न्यूनाधिक होती है वैसही उस ग्रन्थ को न्यूनाधिक का प्राप्त होता है । यह हठात् तो उपलब्ध होतीही नहीं; और यदि निसर्गतः माप्त भी हो तौभी सदा * कविके स्वाधीन नहीं रहती (८.) तो सामान्य मनुष्य और कवि में इतनीही विशेषता है कि कवि में सहृदयता बहुत अधिकता के साथ क्या रहती है वह सहृदयतामयही रहता है । कविता के अन्य गुणों में से यही एक प्रधान गुण है कि जिसे यथार्थतया ध्यान मे धारण करने से क विता के सकलाङ्ग का वोध बहुत सुगमता के साथ होसकता है। सहृदयता अर्थात् अन्तःकरण की कोमलता जैसे युवावस्था में व हुत प्रचुरता के साथ पाईजाती है, उसी प्रकार वह उन देशों में भी बहुत अधिकताके साथ पाईजाती है जो अज्ञान दशा में निमग्न रहते हैं। बाल्यावस्था में अन्तःकरण की रत्ति अत्यन्त सुक्षब्ध रहती है यही कारण है कि उस अवस्था में नाटक उपन्यास, और अन्यान्य काव्यों का उत्साह चढते जाता है। और उत्तम कविता भी राष्ट्र की प्राथमिक अवस्था मेंही उत्कर्ष को प्राप्त होती है। पर ये शान्त एवं सौम्य वृत्ति मनुष्य और देश की प्रौददशा के लाग पर लुप्तहोने लगती है और अन्त अन्त में तो वे बहुधा निःशेपही । * लक्ष्मी कृपापान पुरपों को यह यात विशेषकर ध्यान में रखनी चाहिये कि पब ये अपने किसी पाश्रित कवि को कुछ लिसने पढने की आज्ञा दे और उसके वक्षण संपादित करने का अनुरोध करें, और वह पराधीनवृत्ति उनकी श्राज्ञान- सार उन्हें प्रसन्न न कर सके तो पे यह दोप उसका न समझे । ऐसी अवस्था में हमारे विभवशाली पुरष यदि कहें कि कवि ध्यान देता तो हमारी प्राज्ञा का पा- लन होजाता, उसने ध्यानही नहीं दिया । यदि वह विचारपूर्वक लिसता तो "हमारी मन कामना पूर्ण होजाती । उक्त 'तोगो का यह कयन कहालों युक्ति सगत होमकता है सो विश पाठकों को उस सिद्धान्त से सहजहीं में विदित होसकताहै।
रह निबन्धमालादर्श । होजाती है। उन्ही के साथ २ विचार शक्ति की प्रबलता बढ़ती जाती है और कवित्व का हास होते जाता है। माचीन काल में जो कवि होगये है उन्हें प्रकृति और मानवी स्वभाव का बहुत उ- तम परिचय था; अाजकल की नाई उनके उक्त दोनों गुण कृत्रि- मता से पित नहीं हुए थे। एतावता उन दोनों गुणों की प्रतिमा उन के विशद मनपर मानो खचित हो वह उनके ग्रन्थों में वर्णन द्वारा प्रकट हुई । पर उनके अनन्तर जो कवि हुए उनके मनपर उक्तगुणों का यथावत् संस्कार न होने के कारण उनसे प्रकृति देवी का वर्णन प्राचीन कवियों के सदृश नही वनसका । यह क्रम व- ढते,२ यहातफ वढा फि अब प्रकृति का वर्णन नष्ट सा होगया और कविता भी एक सामान्य व्यवसाय मानी जाकर केवल गण मात्रा जोडने का काम होगई । प्राचीन कविगण स्वानुभूत बातों तथा मनोरचियों का वर्णन किया करते थे पर क्रमशः जव कीर्ति वा धन के लोभ से काव्य रचने की प्रथा निकली और कविता बनाना एक नियत व्यवसायही होगया, तब से कवियों को स्वानु- भव की कोई आवश्यकताही नहीं रही । कविता रचने के लिये सहृदयता की अपेक्षा बुद्धि और परिश्रम की विशेष आवश्यकता जान पडने लगी । परिणाम यह हुआ कि प्राचीन कविता का मनोहर अर्थसौन्दर्य नष्ट हो उसके स्थान में बडे २ वृत्त पदला- लित्य एवं मधुरता, अर्थालङ्कार, शब्दालझार आदि का धीरे २ प्रयोग होनेलगा। जो पदार्थ, जो सृष्टि चमत्कार यावज्जन्म कभी दृष्टिपथ में नहीं आये, मनकी जो वृचिया और अन्तःकरण के वि- कार जिनका कभी साक्षात् अनुभव नहीं हुमा सुतरा जिनका अनुभव होने की सम्भावना भी नहीं है उनका भी उनके अनन्तर के कषियों ने साहसपूर्वक वर्णन किया है । भला इसे जाने । १ ३२ निबन्धमालादर्श। अनुकरणशील कवियों की कविता वैसेही उपहास के योग्य होती है जैसे जन्मान्धकविकृत वनश्री का वर्णन वा तृतीय प्रकृति पुरुष कृत शृङ्गार का वर्णन होता है । (8) तौ पुराने कवियों के काव्य परमोत्कृष्ट होनेके यही सम कारण हैं । पहले तो तत्कालीन कल्पनाशक्ति की प्रबलता ने उनके काव्यको अत्यन्त पुष्ट किया, दूसरे वाह्य और अन्तःसृष्टि के शुद्धरूप संतत उनके दृष्टिपथ में प्राते रहने के कारण उनके कृ- तिम संस्कार रहित शुद्ध मनपर 'रङ्गः शुक्लपटे यथा' (शुभ्र वस्त्र पर रजकी नाई ) वे पूर्णरूपमे भिदनाते रहे । तीसरा कारण यह भी कहा जासकता है कि उन कवियों की मनोत्ति और हृदय- वृत्ति केवल स्वानुभूत होनेके कारण उनका आविर्भाव टीक वैसा ही अविकलरूप से उनके ग्रन्थों में पायाजाता है । पदार्थविज्ञान शास्त्र में जलके धर्म की जो बात कही गई है कि वह जितनी उंचाई परहो उतनीही उंचाईपर चढ़ सकताहै, सो हमारे पाठकोंमें से बहु- तेरों को ज्ञातही होगी। ठीक यही वात अन्तःकरण की वृत्तियों के लियेभी चरितार्थ होती है। जिन रत्तियोंका पहले हृदयहीको ज्ञान न होउनका वारद्वारा वर्णन यदि रसशून्य हो तो इसमें आश्चर्यही क्याहै ? यह कब संभव है कि जिसने वियोगजन्य दुःख क्या वस्तु है कभी जानाही नहीं वह पुत्रशोकादि का यथार्थ वर्णन करसके, वा जिसने अपनी समस्त यु विषय विलासादि के सेवन में व्यतीत की हो उससे रणक्षेत्रादि का वर्णन ययार्थरूप से बनसके, वा जो वसन्तऋतु में शीतल मन्द सुगन्धित समीरनका मेवन किया करता हो वह वहां बैठे २ समुद्र के तूफ़ान का यथार्थ वर्णन कर डाले । जिसने एक सामान्य टीले से वडा पर्वत कभी नहीं देखा वह हिमालय का वर्णन करने का साहस करे, वा क्षद्र नालों को . .
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२४ निवन्धमालादश । पियर-जिसे योरोपके पण्डित गण कहतेहै वह केवल योरोपकाई कवि नहीहै किन्तु समस्त मानव जातिका कविहै, * उसके ग्रन्थ इसी मालिका परिणत होतेहै । इस कविरत्नकी अजरामर कृति में जिन्हें आश्रय न मिलाहो ऐसे दोप बहुतही कम होंगे ! श्राप एक वचन क्रिया कर्ताको वहुवचनमें लिखमाराहै, बोहोमिय देशको द्वीपमान उसके किनारे बन्दर में जहाज पहुंचायाहै, दोजन लोगोके वहुत काल पूर्व हुए हेक्टरनाम वीर और आरिस्टाटस से एक प्रसंगपर वार्तालाप करायाहै-ऐसीही इस सरस्वतीके लाल की औरभी बहुत लीलाहै + भला इनको रहनेदीजिये । हम सम झते हैं कि यदि कोई शेक्सपियरके ग्रन्थों में, माधुर्य, मार्दवं प्रसा दादि गुणों द्वारा शपनी मनस्तुष्टि करना चाहे तो उसे निराशही होना पडेगा । इस कविके अनन्तर अर्थात् ड्रायडन, पोप और जान्.. सन् श्रादिके समयमें तो उक्त गुणके विपरीत अर्थात् कर्कशता, ज- टिलताके कारण उसे कोई पूछता तक न था और सम्मति यद्यपि यह कवि ऐसा जनप्रिय होगयाहै तौभी इसके ग्रन्थों में सैकड़ों दुर्वाष स्थान पाये जाते है । इसके सिवा इस कविकुलचूडामणिके ग्रन्थों में * इस उत्रिका अभिप्राय यहीहै कि ऐसे पुरुप यहुतही कम होते हैं। ईश्वर केरल मपनी लिभूरीका परिचय देने के हेतु ऐसे पुरपानीको फही २' प्रकट करता है। अत जिस देशमे वे लोग जन्म ग्रहण करें यही देश अपने को धन्य न मार्ने तो उसे ऐसा माना चाहिये कि ईश्वरने यह कृपा मानव जातिमान पर की है। + व्याकरणके अत्यन्त प्रसिद्ध दोपके उदाहरण 'जुलियस सीधार' नाटक में पाये जाते हैं । - There is , teus for his 'ove' इस कवि भूगोल सम्बन्धी ज्ञान के विषय में जानसन् ने एक स्थानपर टिप्पणीमें लिखाहै- Our author seldion ( cipes'ırell when lie 19 entangled in Geoyi iphy ( हमारे कवि जयं भूगोलके जाल में फस जाते हैं तब उस जाल से कुशलतापूर्वक बहुतही कम टूटपाते हैं। हमारे पारफ यहुधा यह जानतेही होंगे कि श्रारिस्टॉटरा सिकन्दर बादशाहका गुरघा । एतावता इस तारवेत्ताके पाक्यको हेयटरका अपने सभापणमे प्रयोग करना भीमके पालिदासका श्लोक पाने के नाई हारगजनक है । . .
निन्धिमालादर्श। ३५ औरभी दो प्रचण्ड दोप पायेजातेहै । एक श्लेप योजनामा अनि- वार्य उत्साह और दूसरा अश्लीलता । जान्सन्ने एक स्थानपर कहाहै कि हमारे कवि श्लेपालंकारके अवसरको कदापिच्यर्थ एवं विफलित नहीं होने देते थे। वही बात अश्लीलताके सम्मन्यसे भी पाई जाती है। यह दोप अन्यान्य ग्रन्थों में तो पायाही जाताहे पर जैसा कुछ अथेल्लो मेंहै वैसा अन्य नादक ग्रन्थों में नहीं है ।। अस्त, अन्त में एक बडे. निःपक्षपात अंग्रेज ग्रन्यकर्ताकी इस कविके विषयमें सम्मति प्रकाशित कर इस विषयको शेष करते हैं । इस कविने कुछ छोटे २ काव्य और भी लिखे है। उनके सम्बन्धमें, हालम. साहबने कहा है कि ये ग्रन्थ इस कविकी समुज्ज्वल,कीर्तिको कलंकित करते है । इन ग्रन्यों को वह यदि न लिखता तो बहुत उत्तम होता;। इन सन की अपेक्षा मराठीकी कविता अधिक सदोपहै । उसके बहुतेरे कति व्याकरण और पिगल । जानतेही न थे ऐसा कहाजाय तो वाहुल्य न होगा जब काव्यके गौणगुणोंकी यह दशा पाई जातीहै तब उस के यथार्थ एवं प्रधान गुण अर्थ गम्भीरतादिके-विपयमें आलोचना करनाही व्यर्थहै । उनकी कवितामें प्रसाद बहुत कम पाया जाता *Qur anchor can never resist the temptation of pun, + हि दीमें छन्दोर्णवादि पिङ्गल रसरागादि नायिकाभेद और साहित्य परिचय भाषाभूपणादि साहित्यके अनेकाने प्रत्यहैं । इनको देखभाल और दि. चारकर कविताने परिश्रम करके कारण हमारे हिन्दी कवियोंके काव्योमें मराठीकी नाई छन्दादिके दीप प्राय नहीं पायेजाते पर साथही यह कहते या खेद होताहे हि-मृतराव्य जैसा कुछ हिन्दीमें पाया जाताहै वैसा मारसफी अन्य भाषाओंके का योंमें सातहीहो । इसके व्यतिरेक हिन्दी काव्यम बड़ामारी क्षेप यहभी पाया जाताई कि कधियोंने माय वर्णमनी श्लेप और धन्दादिकों को आवश्यकतानुसार शदोंके , शुद्धरूमको विगादकर तिरस्मारा जैसे, पिनाकीके लिये पिनकी, गुरके लिये गूरा इत्यादि । अाजस्तके कथिगरा यदि उ उदाहरणोंको प्रमाणस्वरूप मागा घर और यथासम्भक कविता शरदके शुद्धस्वरूपका प्रयोग करने के लिये यावान् हुमा करें तो बहुत उसम हो । रबड़े कवियों अमुक शन्दका रूा शमुक प्रकारसे लिया तो हमें डारा भरमा करो कार दोपहरोमा माना, हमारी मगम में, मे भूत है । .
२४ निवन्धमालादश पियर-जिसे योरोपके पण्डित गण कहते हैं वह केवल.योरोपकाही कवि नहींहै किन्तु समस्त मानव जातिका कविहै, * उसके अन्य भी इसी मालिका परिणत होतेहैं। इस कविरनकी अजरामर कृति में जिन्हें आश्रय न मिलाहो ऐसे दोप बहुतही कम होंगे ! आपने एक वचन क्रियाके कर्ताको वहुवचनमें लिखमाराहै, वोहोमिया देशको द्वीपमान उसके किनारे बन्दरमें जहाज पहुंचायाहै, दोजन लोगों के बहुत काल पूर्व हुए हेक्टरनामक वीर और आरिस्टॉटल से एक प्रसंगपर वार्तालाप करायाहै-ऐसीही इस सरस्वतीके लाल की औरभी बहुत लीला +। भला उनको रहनेदीजिये । हम सम- झते हैं कि यदि कोई शेक्सपियरके ग्रन्थों में, मोधुर्य, मार्दव प्रसा दादि गुणों द्वारा अपनी मनस्तुष्टि करना चाहे तो उसे निराशही होना पडेगा । इस फैविके अनन्तर अर्थात् ड्रायटन, पोप और जान्- सन् प्राढिके समयमें तो उक्त गुणके विपरीत अर्थात् कर्कशता, ज- टिलतोके कारण उसे कोई पूछता तक न था और सम्पति यद्यपि यह करि ऐसा जनमिय होगया तौभी इसके ग्रन्थों में सैकड़ों दुर्योध स्थान पाये जाते है । इसके सिवा इस कविकुलचूडामणिके ग्रन्थों में * इस उतिका अभिप्राय यहीहै कि ऐसे पुरुप यहुतही कम होते हैं। ईश्वर फेवल अपनी विभूसिका परिचय देने के हेतु ऐसे पुरपरोको कहीं २' प्रकट करता है। अत जिस देशमें ये लोग जन्म ग्रहण कर यही देश थपने को धन्य न माने तो उसे ऐसा माना चाहिये कि ईश्वरने यह कृपा मानव जातिमान पर की है। + व्याकरणके अत्यन्त प्रसिन्द दोपके उदाहरण 'जुलियस सीज़र' नाटक में पाये जाते हैं । - Thure 1s tents for his 'ove' इस कचिके भूगोज सम्बन्धी ज्ञान के विषय में जानसन् ने एर स्थानपर टिप्पणीमें लिसाहै-- Our author seldion (cipes well when he' 18 entangler in Geography ( हमारे कवि जर भूगोलके जाल में फस जाते हैं तब उस जाल से कुशलतापूर्वक बहुतही कम छूटपाते हैं ।) हमारे पाठक बहुधा यह जानतेही होंगे कि धारिस्टॉटल सिकन्दर बादशाहका गुरथा । एतावता इस तत्ववेत्ताके चाक्यको हेक्टरका अपने सभापणम प्रयोग करना भीमके पालिदासका श्लोक पहने के नाई हास्गजनक है । . nt - निवन्यमालादर्श।' पौरभी दो प्रचण्ड दोप पायेजातेहै । एक श्लेप योजनाका अनि- हार्य उत्साह और दूसरा अश्लीलता । जान्सन्ने एक स्थानपर कहा कि हमारे कवि श्लेपालकारके अवसरको कदापित्यर्थ एवं विफलित नहीं होने देते थे * 1वही घात अश्लीलनाके सम्बन्धसे भी पाई जाती है। यह दोप अन्यान्य ग्रन्थों में तो पायाही जाताहै पर जैसा कुछ अथेनोमेंहै वैसा अन्य नाटक ग्रन्थों में नहीं है । अस्त; अन्तमें एक बड़े नि:पक्षपात अंग्रेज़ ग्रन्थकर्ताकी इस कविके विषय में सम्मति प्रकाशित कर इस विषयको शेष करते हैं । इस कापिने कुछ छोटे २ काव्य और भी लिखे है। उनके सम्मन्यौ हालम साहबने कहाई कि ये ग्रन्थ इस कविकी समुज्ज्वल कीतिको कलंकित करते है। इन ग्रन्थों को वह यदि न लिखता तो बहुत उत्तम होता। इन सब की अपेक्षा मराठीकी कविता अधिक सदोपहै । उसके बहुतेरे कवि व्याकरण और पिङ्गल । जानतेही न थे ऐसा कहाजाय तो वाहुल्य न होगा; जब काव्यके गौणगुणोंकी यह दशा पाई जाती तक उस के यथार्थ एवं प्रधान गुण अर्थ गम्भीरतादिके-विपयमें आलोचना करनाही व्यर्थहै । उनी कवितामें प्रसाद बहुत कम पाया जाता Qur author can never resist tlie teinptation on point हिदीमें छन्दोर्णादि पिङ्गल रसराजादि नायिकाभेद् और साहित्य- परिचय भाषाभूपणादि साहिरपके अनेकानेर प्रन्यई । इनको देखभाल और मि चारवर पविताने परिश्रम करने के कारण हमारे हिन्दी कवियोंके कायों में मराठीकी माई पदादिके दोष माय नहीं पायेगाते पर सार्थही यह कहते पड़ा खेर होताई कि मृतगराध्य जैसा कुछ हिन्दीमें पाया जाताह वैसा। भारतको अन्य भाषाओंके काव्यों में स्थावहोहो । इमके व्यतिरेक हिन्दी काव्यमें एक पहाभारी दोप यहभी पाया जाता कि कवियोंन प्राय वर्णमंत्री रोप चार अन्दादिकोंकी थापश्यकतानुसार-शब्दोंके शुद्धनगो - विगारकर क्षिरमारा जसे, पिनाकीके लिये पिाकी, गुरुके लिये पूरा इत्यादि । भागफलके रधिगरा पपिडा दाहरणोपो प्रमाणस्वरूप माना पर भार यथासम्म पिताम बादक शुबम्बम्पका प्रयोग करने लिये ययान् दुमा परे तो बहत-बाम हो। पर कवियों थमुक गन्दका मुक प्रकारसे लिया को उना अनुकरण करने में पता रोगह गा मारा, हमारी गग में, पदी भूना । 7 . निबन्धमालादर्श। है । मराठीके कवियों में वामन पण्डित अग्रगण्य माना जाताहै पर इस कविके पाण्डित्यकाभी इसकी कविता में विशेषरूपसे परि चय नहीं मिलता। बहुतेरे स्थलोंपर अर्थ बहुत क्लिष्टहै और इस अतिरिक्त पद रचनाके विपयमें इन पण्डितने कुछ विशेष परिश्रा कियाहो सोभी नहीं दीखपडता । अन्तमें हम अपने संहदर पाठकों को यही सिद्धकर दिखाना चाहते हैं कि पदलालित्यादि गुण काव्यकी सुन्दरताके कारण होतहै, और कही २ ये अर्थवे आनन्दमें उपयोगी होनेके व्यतिरेक स्वयंभी मानन्द उपजाते पर तौभी काव्यके सर्वस्व नहीं माने जासके । इन गुणोंका प्राय अभाव होने परभी संसारमें जिनके ग्रन्थ, चिरकाल से सम्मानि होते आये है उन महाकवियों का पीछे उल्लेख होहीचुकाहै। उन देख समझकर हमारे सहृदय पाठक सहजमेंही जानसकेंगे कि वर्ण मैत्री आदि काव्यके अप्रधान गुणहैं। - (११) उक्त गुणोंको अप्रधान फहनेमें हमारा यह अभिप्रार कदापि नहीं है कि काव्य के लिये उनकी कोई आवश्यकताही नई है। अब यह बात सच है कि केवल उन्हींके योगसे ग्रन्थको काव्यत्व प्राप्त नहीं होता, पर सत्काव्यसे यदि उनका संयोग होजाय तो इस में कोई संदेह नहीं कि, उसकी रमणीयताको वे कही बढ़ादेते हैं इसके सिवाय यह महान् रससिद्ध कविकाही सामर्थ्य है कि पहि- रगसाधनोंकी सहायता लिये विनाही लोगोंको काव्यकी सुन्दरता भासित कराना सुतरा एतद्विपरीत दोपोंसे- दूमित ग्रन्थों में भी काव्यत्व उपजाना । पर सर्वसाधारणके मनोरञ्जनार्थ रनको जैसे फुन्दनमें खचित करना पड़ताहै वैसेही काव्यको उक्त गुणों से अ. पश्य अलंकृत करना चाहिये यही वात संस्कृतके कालिदासमभृति और ल्याटिन के व्हर्जिलादि कवियों के ग्रन्यों में पाई जाती है । यही ३ . T निबन्धमालादर्श । कारण है कि उनके काव्य जिस प्रकार बड़े मार्मिक एवं रसिकों मनोरञ्जनकर उन्हें लोकोत्तर श्रानन्द प्राप्तिके साधन होतेहैं उसी प्रकार सर्व साधारणकोभी आज पर्यन्त प्रानन्द देते माये । " (१२) इस प्रकार कविके प्रधान और अमंधान गुणों का विशेष रूपसे उपर विवरण होचुका। जिन लोगोंने उन विवरणको साव- धानीपूर्वक पढा होगा और विचारा होगा वे इस विषयकी सूक्ष्मता को समझदी गये होंगे कि काव्यके प्रधान गुण सहृदयता और तजन्य वस्तुविशेषके प्रकृति सुलभगुण वर्णन करनेकी शक्ति ईश्वर प्रदत्त गुण है अर्थात् सैकडों ग्रन्योका पठन और मनन करनेसे वा वहा वादचञ्चु अथवा ग्रन्यप्रणेता होनेसे कोई उक्त गुणका लेश- मागभी प्राप्त नहीं करसकता । उद्दण्ड विद्वान् होनेसे जैसे मनुष्य चित्रं, गायन वा वादनकलामें निपुण होहीजाताहो सो नहीं माना जासकता वही बात काव्यत्सकी भीहै । रने की परख जैसे शिक्षा फे आधीन नहीं है, और चित्र तथा चादनकला का मर्म जाननेकी शक्ति जैसे ईश्वर किसी विरलेही पुरुपको देताहै उसी प्रकार काव्य- शक्ति भी किसी चिरले पुरुपकोही पप्ति होती है । यह तो कुछभी नहीं है पर इससे अधिक आश्चर्य की बात यहहै कि ऐसे प्रचण्ड पण्डित गोसेसयं काम्परचना 'न करते बनेगी इसके सिवाय वे काव्यकी यथार्थ परीक्षा वा उसका श्रास्वादन करसकेंगे या नहीं सोभी ठीक नहीं कहा जासक्ता । इसके उदाहरण स्वरूपमें इंग्लैंडके मंचण्ड । पण्टित डाक्टर जान्सन्को नाम कुछ प्रशमें लिया जासहा और इपरके हमारे पुराने शास्त्रीभी प्रायः ऐसेहीहैं। वाह्यसृष्टिका यथार्थ वर्णन करने के लिये, उस प्रदेशको किश्चित्काल लो स्वयं देखनेसे । उसके विपयमें मनमें जो कल्पना पासकती है सो उसके विवरण चित्र देखने वा वर्णन पढनेगे दीर्घकालम भी नहीं शासकती वही निरन्धमालादर्श। वात अन्तामृष्टि के विषयमेंभी घटित होती है । रस विशेषके प्रत्या अनुभवसे उसका जो रूप ध्यानमें आसक्ताहै वह केवल शुष्क वर्णनके वारवारके पढ़नेसे यदि मनमें श्राही गया तो, अस्पष्टरूप से आताहै । सारांश काव्यत्व मुतरां, रसिकताके लियेभी विद्वत्ता की विशेपरूपसे आवश्यकता नहीं है । उक्त दोनोंको उलटी उसकी वाधक होतीहै ऐसाही कहना चाहिये । उससे, यदि कोई उपयोग हुआहीहो तो कविताके उक्त बाह्य एवं अप्रधान गुण बड़े परिश्रम उठानेमे प्राप्त होसते हैं, इससे अधिक और कुछ नहीं होसक्त पर उसके तत्वोंतक उसकी गति कदापि नहीं हो पाती। (१३.) उपसंहारमें यह प्रतिपादित हुआ कि जो निसर्गत: कवि है वह स्यात् विद्वान्भी हो-जैसे कालिदास, जगन्नाथ पण्डित, राज, तुलसीदास, केशवदास, हरिचरणदास, मिल्टन् , वैरनादि वा न भीहो-जैसे शेक्सपियर, वर्स * तुकारामादि-1, पर यह, मानना अत्यन्त असंगतहै कि जितनी विद्वत्ता अधिक हो उतनी काव्यशक्ति अधिक होतीहै-1-इसका स्पष्टीकरण पीछे उदाहरण द्वारा करही दियागयाहै-सिसरो, जानसन् और हमारे पुराने शास्त्रीगण | इनके उदाहरण अधिक न देनेका कारण जो किञ्चित विचार करेगा उसे तत्क्षण ज्ञात होजायगा । विद्वत्ताको अशेप गुणों का श्रागर-मानने वाले हमारे भोले भाविकलोगोंको उसके पढ़ने से दुःख होगा। यहां हम उसे स्पष्टरूपसे नहीं लिखते, पर फिर भी सूचित किये देते है कि यह, विधान उन विद्वानोंके अभिमान वा मूर्खताफा योग्य दमन करनेवालाहै, और इसके योगसे उनलोगों ने भावी लोगों को चतुरताका, उत्तममार्ग प्रदर्शित किया ! *गतताम्दी में यह कवि स्काटलैंड देश में होगया। इसी समम्स भायें भार्थहीन इशामें व्यतीत हुई। यह जयशों मिया कृषिकर्म करतेरहा। a ।
समालोचना। -- - नीरक्षीरविक हंसाऽऽलस्यं त्वमेव तनुपे चेत् । विश्वस्मिन्नधुनाऽन्यः कुलवतं पालयिष्यति कः ।।* (भामिनीविलास) सम्मति हमारी भापामें ग्रन्यांकी समृद्धिहो उत्तरोत्तर वह उ- पति ग्रहण करते जाती है। अनुमान सैकडों छोटेगड़े, भले बुरे न्य प्रतिवर्ष प्रकाशितहुए विना कोई संवत्सर खाली नहीं जाता। न:संशय यह वार्ता हमारेलिये अत्यन्त हर्प की है क्योंकि प्रतिवर्ष काशित होनेहार ग्रन्योंमें यद्यपि सब ग्रन्थ मशंसनीय न हों अथवा उनमेंसे एकभी न हो पर इतना तो कहा जासकताहै कि उनके पितृगणोंने परिश्रम और समयका अपव्यय न कर कई मुद्रणा- नयके स्वामियोंको उनके कार्यमें सहायताही दी। परन्तु ऐसा गगनलेना पड़ा साहस है क्योंकि यह तो है ही नहीं किं प्रायःसबलोग विनोदार्थही अन्य प्रकाशित करातेहाँ । प्रथम तो जो ग्रन्थ छपवाता है वह यही समझकर छपवाताहै कि हमारे ग्रन्थको लेनेवाला कोई में कोई मिलही जायगा। दूसरे वह अपने मुद्रित करानेवाले ग्रन्थ की योग्यताको पिना समझे उसे मुद्रित करानेके लिये प्रवृत्तही नहीं होता क्योंकि यश अपयशी चिन्ता सभीको रहती है । (२) जिस प्रकार दिनोंदिन ग्रन्थों की संख्या वढती जाती है उसी प्रकार उन्हें पूर्णरूपसे लाभ देनेहारे उनके गुण दोप विवे- चक समालोचक गोंकी भी संख्याका बढ़ते जाना अत्यन्त आरश्यक है । परन्तु यह नाममात्रको भी कहीं नहीं दीखपडता । ग्रन्धोंकी आधुनिक अवस्था तो ऐसी है कि ग्रन्थोंके मुद्रित होते * हे हस 'पल और दूधको पृथक् पृयर करने के लिये यदि नही पालस्य करेगा नो संसारमै तेरे उन कुलातका पालन अन्य कान करेगा? 14 TIP - ही उनकी कुछ तो यदृच्छया व्यवस्था हो जातीहै अर्थात् कई तो लोकाश्रय से विक जाते हैं और कई सिफारिश और वसीले आदि से, पर अधिकांश ग्रन्थकर्ताकेही पास पडे रहते हैं वे इतने अधिक कि उन्हें, देख देख उसे अनुताप होने लगता कि मुझे यह कहाँसे सूझा । ग्रन्थोंका लोकाश्रय अनिश्चित होने के कारण उन्हें मुद्रित कराने के लिये ग्रन्थकर्ताओंको सहसा धैर्य नहीं होता । जिस प्रकार इंग्लैण्डमें वडे आदमी ग्रन्थकर्ताओंकी श्रेणीमें पाये जातई उस प्रकार हमारे देशमें इस समय एकभी नहीं दीख पड़ते; और वैसे लोग हमारे देशमें कब उत्पन्न होंगे इसकी ठीक ठीक तर्कणा भी नहीं होसकती । जिन आधुनिक विद्वानोंके ग्रन्थकर्ता होनेपर लोग उन्हें अवश्यमे प्राश्रय दें, अथवा जिनसे ज्ञानदृष्टि के लाभ की चातकवत् आशा करतेहैं, उन लोगोंको स्वममें भी ग्रन्थ लिखनेका विचार नहीं होता। इससे यही ज्ञात होताहै कि हमारे यंहा प्रायः वेही लोग ग्रन्थकर्ता होतेहैं जिनके पास वीसौविश्वा दरिद्रताके अतिरिक्त और कुछ नहीं रहता। ऐसे पुरुपने डरते डरते बडेही साहससे कोई ग्रन्थ प्रकाशित किया और उसे यदि किसीनेभी न पूछा तो वस वहीं उसके धैर्यका एक तो पहलेही उटपुंजिया दूसरे ऊपरसे व्यापारकी भारी ठगेकर लगकर जय श्राख खुलगई तो फिर वह काहेको ऐसे वखेडेमें पड़ने जाता है। इस प्रकार वह तो हतोत्साह होही जाताहै पर उसकी इस शोचनीय दशाको देख दूसराभी गतधैर्य होकर इस कार्यसे पीछे हटताहै । सारांश हमारे अाधुनिक ग्रन्थकारोंकी तो यह दशा है । ग्रन्थकी छराई यदि दैववशात् वसूलही होगई, तो प्रकाशक लोग समझ लेते हैं कि इस व्यवसायमें हमें याचा लाभ होचका भय यागेको देखा जायगा । सौभाग्यवशात् यदि प्रका- ।
समालोचना । - ४१ " शित सब ग्रन्थ विकगये और प्रकाशक को कुछ लाभ होहीगया तो पुनः द्वितीय संस्करणका अवसर उसे क्यों मिलनेलगायाजलों जो सैकड़ों ग्रन्थ हमारी भापामें लिपिवद्ध हुएहैं उनमेंसे जिन्हें सरकारकी ओरसे सहायता मिली है उनके अतिरिक्त ऐसे बहुतही थोड़े अन्य मिलेंगे जिन्हें द्वितीय श्रावृत्तिका सौभाग्य प्राप्त हुआ हो,। यदि होंगेभी तो वे इतने थोड़े (दो चार)कि उनका होना नहींही माना जायगा। पाठक ! देखिये यह फैसी विलक्षण बात है। जिस हमारे देश में सम्मति विद्याभिरुचि चारों ओर फैल रहीहै, जिस हमारे देशमें प्रतिवर्ष नगरमें मुद्रणालय, पुस्तकालय, समा- चारपन पुस्तकें, सभा आदि नित्य नया स्वरूप धारणकर उत्पन्न हुआ करतीहै, जिस हमारे देश देशाभिमान, विद्वत्त्व, कवित्व, वक्तृता श्रादिही चारों ओर नहा तहां दीख पडती हैं, जिस हमारे देशमें नित्यप्रति नवीन २ धर्म स्थापित होरहेहैं, देशके गतकला कौशल्यको पुनःमाप्त करनेके लिये महत् महत् प्रयत्न हो रहे है, कविताफी नूतन शाखायें स्थापित होरहीहैं, नूतन २ यन्त्र प्रस्तुत कर विलायती व्यापारियोंके दांत खट्टे करनेके लिये शतशः प्रयत्न किये जारहेहैं, कहांतर्क कहें जो वातें भारतवर्षमें और सम्पूर्ण एशिया खण्डमें कदापि किसीने श्रवणभी न कीवीं उनके-अर्थात मति डिमासयेनीस, प्रतिसिसरो और प्रतिपार्लियामेण्टका यहा बनाना इत्यादि महत् कार्योंके सियर्थ भी लोग आगे पीछे नहीं देखते हैं उसी हमारे देशमें इंग्लैण्ड कैसे सामान्य ग्रन्थकर्ताओंका ल दीख पटना, और वैसेही सैकड़ों ग्रन्थवालोंको प्रथम संस्करण के व्यतिरिक्त दूसरे संस्करणके प्रकाशितकरनेका धैर्य न होना, यह कैसे पाश्चर्यकी बात हमारी लोक सभाकी योरसे पेपित भारतवर्ष प्रतिनिधि हौसआफ कामन्समें वहाके पार्षदगणों के । ४३ निवन्धमालादर्श। साथ जव कुर्सीसे कुर्सी लगाकर बैठेंगे तब यहांकी विद्याकी उक्त स्थितिको सुनकर वहां के सभ्योंको कितना आश्चर्य होगा। वे लोग जब ऐसा समझतेहै कि देशको गौरव प्राप्त होनेके लिये उस की भाषा उन्नत दशाको माप्त होनी चाहिये, उसमें सव मकारके विषयों के वडे २ ग्रन्थ होने चाहिये, लोगोंको ऐसा विलक्षण धैर्य धारण करना चाहिये कि वे जिस कार्यके लिये प्रागेको पांव वदावे उससे फिर पीछे न हटें, कि जिससे उनकी कीर्ति दिगन्तरव्यापिनी हो, यह नियमाजो मायः सभी बडे २ राज्यों में पायाजाताहै, पर इसे हमारेही देशमें न देख उन्हें कितना आश्चर्य होगा। निःसंशय जो लोग अपनी देशभापाकी योग्यता. हलकी समझते है, उसमें कोप वा व्याकरण लिखने का विचार-जिन्हें कभी स्वममेंभी नहीं आता, वह जीवितरहे वा मरे, पर वे उसके लिये निश्चिन्तही रहते हैं, जिनके यहां पाच पचीस वर्पलोभी रहने योग्य कविता नहीं होती, जिनके यहांके महान २ वक्ताओंकी वक्तृता एकबारही सुनने से जी उकता उठताहै, जिनकी भापामें सर्वसाधारणको ज्ञान प्राप्त करनेकी कोई सम्भावनाही नहींहै, जिनके इतिहास, पदार्थविज्ञान, चिकित्सादि विषयोंके ग्रन्थ मानो लडकियोंके खेलके तुल्यहै, जिनके व्यापारियों के समाज कौशल्य-शिक्षालय, भजन पूजन, समाज, पुस्तकालय आदिका समारम्भ देखाजाय तो योरोपसे अायेहुए नवीन साहय को पेट दवा दवाकर हॅसीआवे-उन्हीं लोगों को महान् । सभा पार्लियामेण्टमें स्थान माप्त करने के लिये प्रयन करते देख ऐसां कौनहै जो चकित न होगा और दांतोंमें अगुली न दयावेगा ? अस्तु, साराशे हमारी भापाकी वर्तमान स्थिति और 'ग्रन्थपणेतृगणोंका अादर ये दोनों देश स्थितिके समीचीन सूचक है और इसीके साथ २ यहभी जान पडताहै कि जवला यह चिन्ह . । । समालोचना। ऐसेही निष्कम्प दृष्टिगोचर होते रहेंगे तपलो - देशकी -उन्नतिके लिये लोग कितनाही मराकरें पर उनका प्रयत्न सब व्यर्थ होगा। • (-३) हमें पूर्ण विश्वास है कि जो लोग यह निश्चयपूर्वक जानते हैं कि देशभाषाका सुधार और उसमें उत्तमोत्तम ग्रन्थों की सृष्टि की अधिकाई आदिका देश हितसे अत्यन्त घनिष्ट-सम्बन्ध रहदा है, उन्हें ,हमारा उक्त कथन यथार्थही जान पडेगा ।'अव उक्त बातें सम्पादित , होनेके लिये क्या होना चाहिये ? इसका विचार करते यह तो हम कहीचफेहै कि ग्रन्थोंके यथार्थ परीक्षकों का होना अत्यावश्यकहै क्योंकि उनके द्वारा भापाको बहुत लाभ पहुँचता "। इस लेखमें इसका वर्णन पीछेसे करेंगे सम्मति यह लिखते हैं कि आजकल ग्रन्थों के गुण, दोपोंका विवेचन कहातक होताहै । (४) प्रायः सवलोग यह जानतेही होंगे कि आज कलके हमारे कई समाचार पत्रोंके अग्रभागमें अगरेजी पत्रों से उद्धृत कर एक लम्बी चौड़ी मतिज्ञा लिखी रहती है कि अमुक अमुक निपयों का वर्णन इस-पत्रमें रहा करेगा । इन विपयों में से ( Literature ) अर्थात् साहित्यकी ही प्रतिज्ञा बहुधा पाईजाती है । परन्तु यदि संपूर्ण पत्र पढ़के देखाज़ाय तो तत्क्षण, ज्ञात होजायगा कि उक्त प्रतिज्ञा संज्ञा शेपही रहती है । यह अवस्था केवल एक दो अङ्कों मेंही नहीं रहती वरन इसीप्रकारमे महीनेके महीने और साल के साल व्यतीत होजाते हैं । उक्त प्रतिज्ञाकी पूर्तिमें पत्रके दोनों योर नवीन ग्रन्योंके जो विज्ञापन दियेजातेहै अथवा 'कौन कहता । है हैजेकी दवा नहीं है ' श्रादि जो मजेदार चुटकुले ,दियेजाते है यथार्थमें उनसे उनके पाटकोंको भापा का अथवा उसके ग्रन्थों का कितना ज्ञान होता होगा यह उन पत्रों के सम्पादक वा उनके पाठकही जानसकतेहै । भला इसे जाने दीजिये यह माना जास- । -- निवन्धमालादर्श। फताहै कि सम्पादकोंका यह मुख्य विषय न होनेके कारण और प्रति संख्या उक्त प्रतिज्ञाकी पूर्तिके लिये अवकाश का मिलना असम्भव होनेके कारण उसकी पूर्ति वे नहीं करसकते पर महीने दो महीने में जब कोई नवीन ग्रन्थकर्ता अपना ग्रन्थ उन्हें समालो- चनार्थ समर्पित करताहै, तब तो उक्त प्रतिज्ञा पूर्ण करनेका उत्तम अवसर उन्हें मिलताहै पर ऐसे समय पर भी हमारे सम्पादकगण जिस युक्तिका प्रयोग करते है वह बहुत लोगोंको विदितहीहै । कोई कोई सम्पादक महाशय 'माप्त ' इस शीर्पकके नीचे उक्त ग्रन्धर- णेताका नाम यथावत् छापकर उसे ग्रन्थमेपणके लिये अनेकानेक धन्यवाद देदेते हैं । बस यही उसके ग्रन्थकी समालोचनाहै। कोई सम्पादक महाशय धन्यवाद प्रकाशितकर इतना और भी लिख देते हैं कि ग्रन्थकी छपाई और जिल्दबन्दी बहुत सुन्दरहै, कागज बहुत बढ़ियाहै इत्यादि मीठी मीठी बहुत प्रशंसा करदेते है । इसे मकारकी गुणदोपविवेचनसम्पन्न समालोचना ( रसीद ) लिखने के लिये उन विद्वान् सम्पादक महाशयोंको कितना न अधिक परिश्रम करना पडता होगा ! संपूर्ण प्रशंसा कागजके कारखाने वाले को तथा छापने और जिल्दबन्दी करनेवालेकोही प्राप्त हुई और हमारे निजके लिये कुछभी न रहा यह देख उस विचारे अन्यरचयिताको कैसा संतोप होता होगा ! अस्तु; यही दो प्रकार है कि जिनके द्वारा प्रायः नूतन ग्रन्यापर सम्मतियां मकाशित की जाती है। पर इनके अतिरिक्त समालोचना करनेकी एक बढ़िया तीसरी रीति औरभी है। वह यह कि 'अमुकर ग्रन्थ हमें प्राप्त हुआ। इसके लिये हम तद्रचयिताको बहुत धन्यवाद देतेहै, इसकी समा लोचना आगामि अङ्कमें मकाशित कीजायगी। यदि इतनाभी अपने को बद्धकग्लेना मनमें न रहा तो 'समालोचना यारान्तर 1 समालोचना। प्रकाशित होगी। इतना छापदिया कि गङ्गा नहाये ।आगामि अङ्क आता है काहेको और उसमें समालोचना प्रकाशित होती है काहे इस वारान्तर वा श्रागामि संख्यामा भाना मानो अगस्त की दूसरी फेरीहीहै । भोले महात्मा बड़े बडोंसे प्रणाम करा उन्हें आश्वासनदे जैसे भुलाकर कहतेहैं कि वच्चा जरा ठहरो देखो हम भी रामेश्वरसे याते हैं ऐसा कह जो लम्बेहुए तो पुन: आपका पागमन होताही काहे कोहै । इसीप्रकार हमारे उक्त संपादक महा- गयोंफा भी समय मारलेजानेकाही अभिप्राय रहताहै । सारांश को कोई नतीन ग्रन्थ रचकर उसे पत्रसंपादकों की सेवा समालो- वनार्थ प्रेरित करताहै, उसकी मनीपा उक्त तीनों रीतियों में से ही बहुधा किसी एकद्वारा पूर्ण होती है। । भला कहिये तो सही कि उक्त विचित्र स्थितिको देखकर मनमें स्या आताहै । बहुधा मनमें यही पाता होगा कि उक्त स्थितिका कारण लोगोंके ग्रन्थावलोकनका आलस्यही है चा गुण दोप परीक्षाफा काम लोगोंको किंचित् भारी मालूम देताहै। कुछभी हो, निदान इतना तो सत्यहीहै कि ग्रन्थरचयिता गणोंका ऐसा अप- मान होना हमारी विद्वत्ता और देशाभिमान को अत्यन्त लाञ्छन है, इसके अतिरिक्त उससे भाषाकी और तद्द्वारा लोगोंकी घड़ी ही हानि होतीहै । ग्रन्थकी प्रशंसा करते समय अधिकाश उसके जिल्दवन्दी और छपाई श्रादिकीही प्रशंसा करना यह कितना अनुचित है । कसाई लोग जैसे पशुओं की परीक्षा उनके अगोंका स्पर्शकर किया करते हैं, वही हिसाब ग्रन्थोंफाभी है क्या ? साधा- रण प्रार्थना के समान धर्मपुस्तक वा जथिली प्रमोदिकाके समान ग्रन्थ को बहुत सुन्दर कपडालगा उसकी जिल्दन्दी उत्तम प्रकार की और उसपर सुन्दर मीना और जडापका काम किया तो ४४ निबन्धमालादर्श। फताहै कि सम्पादकोंका यह मुख्य विषय न होनेके कारण और प्रति संख्यामें उक्त प्रतिज्ञाकी पूर्तिके लिये अवकाश का मिलना असम्भव होनेके कारण उसकी पूर्ति वे नहीं करसकते पर महीने दो महीने में जब कोई नवीन ग्रन्थकर्ता अपना ग्रन्थ उन्हें समालो चनार्थ समर्पित करताहै, तब तो उक्त प्रतिज्ञा पूर्ण करनेका उन अवसर उन्हें मिलताहै पर ऐसे समय पर भी हमारे सम्पादकगण जिस युक्तिका प्रयोग करते हैं वह बहुत लोगोंको विदितहीहै । को कोई सम्पादक महाशय 'प्राप्त ' इस शीर्पकके नीचे उक्त ग्रन्धर- णेताका नाम यथावत् छापकर उसे ग्रन्थप्रेपणके लिये अनेकानेक धन्यवाद देदेते हैं । वस यही उसके ग्रन्थकी समालोचनाहै । कोई सम्पादक महाशय धन्यवाद प्रकाशितकर इतना और भी लिख देते हैं कि ग्रन्थकी छपाई और जिन्दबन्दी बहुत सुन्दरहै, कागज बहुत बढ़ियाहै इत्यादि मीठी मीठी बहुत प्रशंसा करदेते हैं । इस प्रकारकी गुणदोपविवेचनसम्पन्न समालोचना ( रसीद) लिखने के लिये उन विद्वान् सम्पादक महाशयोंको कितना न अधिक परिश्रम करना पडता होगा ! संपूर्ण प्रशंसा फागजके कारखाने वाले को तथा छापने और जिन्दवन्दी करनेवालेकोही प्राप्त हु और हमारे निजके लिये कुछभी न रहा यह देख उस विचारे अन्यरचयिताको कैसा संतोष होता होगा ! अस्तु, यही दो प्रकार हैं किजिनके द्वारा प्रायः नूतन ग्रन्थोंपर सम्मतियां प्रकाशित की- जाती है। पर इनके अतिरिक्त समालोचना करनेकी एक बढ़िया तीसरीरीति औरभी है । वह यह कि 'अमुकर ग्रन्थ हमें प्राप्त हुआ इसके लिये हम तद्रचयिताको बहुत धन्यवाद देते हैं, इसकी समा- लोचना श्रागामि अहमें प्रकाशित कीजायगी'। यदि इतनाभी अपने को बद्धरुग्लेना मनमें न रहा नो 'समालोचना यारान्तर ४७ - , समालोचना ।। रनेका सामर्थ्य जितना इनमें होसकताहै उतना दूसरोंमें नहीं सकता। इसका कारण यहीहै कि अंगरेजी भाषामें जानसन्, काले ओदि सुप्रसिद्ध ग्रन्थकर्ताओंके लिखे,हुए उक्त विषय पर तमोत्तम ग्रन्थहैं, उनका परिचय कालेजके छात्रोंको होताही रहता , इनके व्यतिरिक्त, उन्हें औरभी बहुत कुछ बोध होजाताहै । सीलिये किसी एक ग्रन्थ पर जैसी सारगर्भित सम्मति वे देसकते वैसी भाषा. पण्डित वा व्युत्पन्न शास्त्रीभी न दे सकेंगे। अस्तु वह तो केवल उनकी शक्तिके विपयमें कहागया अर्थात् इतना करने की उनमें शक्ति वा शक्ति नहीं तो योग्यतातोहै । इससे, यह नहीं न लेना चाहिये कि इतना वे सब करतेही हैं। शेक्सपियर साहिवकी 'नायिका कहतीहै--, : If to do were as easy as to l,now what were good to Jo chapels bad. been churches and poor men's cottages princes' palaces ! * 'वर्तमान समयमें इसी न्यायकी किंचित् रूपान्तरसे प्रचुरता दीख पडतीहै । परन्तु उस उपेक्षाके कारण देशकी जितनी हानि होती है वह प्रसिद्धहीहै । ग्रन्धाका सच्चा प्रेमी कोई न रहनेके कारण उत्तम ग्रन्थकर्ताओंको निकृोंकी श्रेणीमें दैवगतिसे रहना पडता है, अथवा अपनी योग्यता प्रकट करनी हो तो आत्मश्लाघाका अश्लाघ्य कृत्य करनेके अतिरिक्त उन्हें दूसरा मार्गही नहीं रहता। परन्तु इस मार्गका अनुधावन सदैव फलदायक नहीं होता। इसी कारण बहुधा लोग उन्हें तिरस्कृत दृष्टिसे देखने लगते हैं । इसी लिये निष्पक्षपातपूर्वक ग्रन्थोंकी योग्य प्रशसा करनेवाले यदि थोड़े * अमुफ फार्यका फरशा अच्छाहै यह जान लेना जैसा सुगमई, पैसेही उसका कामी यदि सुगम होता, तो पोटे - शियाचे पते पड़े फैखास बन जाते धौर वीर दरिद्रों की झोपड़ियाँके पिशाग्न राजभवन मौनाते | F,' ।
४६ निवन्धमालादर्श । क्या वह पुस्तक यथार्थमें पढने के योग्य होसकतीहै ? और 'तुल कृत रामायण' वा 'सूरदासजीके पद' कैसेही खराव. कागलपन खराव अक्षरोंमें छपे हों और उनकी जिल्दवन्दी कैसीही खरात हो तो क्या उनकी योग्यता कुछ कम होगई ? रद्दी लेनेवाला पत्र सारी वा अत्तार पुस्तकोंके वाह्य स्वरूपसे यदि उनकी परीक्षा के तो यह उसे फयतीहै पर स्वयं अर्थज्ञ और अत्यन्त मार्मिक का के जो लोग किसी एक ग्रन्थके गुणोंकी प्रशंसा करतेहै वेही यहि ग्रन्थकी परख पंसारी वा अत्तारके समान-करें तो यह कितन हँसीकी पातहै । यह गुण प्रशंसा क्या हुई वरन ग्रन्यकर्ताको मात्र हानिही हुई ऐसा समझना चाहिये, और उसीप्रकार उक्त गुट प्रशंसकको भी वडा संकोच मानना चाहिये । परन्तु उभय पक्ष वहुधा:यह वृचि दीख नहीं पड़ती, दोनोंको बाह्य परीक्षाही व मालूम देतीहै । साराश इस प्रकारकी ग्रन्थ परीक्षासे भापाका नि तान्त अहित होताहै क्योंकि यथार्थ परीक्षक कोई भी न होने कारण कैसाही ग्रन्थ क्यों न हो टकासेरभाजी टकासेर खाजा इस न्यायसेही उसकी योग्यता मायः स्थिर-कीजातीहै ।:.मधु मालती' भी सुरस चन्द्रकान्ताभी औरभी सुरस । राजा लक्ष्मण सिंह कृत 'शकुन्तला का' उत्कृष्ट अनुवाद जैसा वैसाही 'ऐजय लाइकइट' का एक सडा गन्दा अनुवाद भी उत्कृष्ट यह बात त निर्विवादितहै कि सब ग्रन्थ समान योग्यताके कदापि नहीं होसको पर अमावास्याकी घोर अंधेरी में जैसे मायः सव पदार्थ समान प्राकाररङ्ग एवम् सौन्दर्यके भासित होतेहै वैसेही सत्परीक्षकके म भावके कारण सय ग्रन्थ समान होजाते है । इसके कहनेकी कोई आवश्यकता नहीं है कि हमारे नूतन विद्वानोंकी स्वभापाकी ओर उपेक्षागृद्धिका होनाही उक्तकारणों में प्रधानहै क्योंकि ग्रन्थकीपरीक्षा समालोचना अमान इने अन्याय व्यपधान पिलकुल नहीं हैं श्रतएव उनगुण होप विवेचनाका काम वस्तुतः विशेषकर इन्ही मासिकपत्रोंका है। -शिमें प्रचलित राज्य, व्यापार और अन्यान्य लौकिक वार्तायोंक वेषयमें लोगों की चित्तवृत्तिको समान करना जैसे समाचारपत्रों का कर्तव्य है वैसेही मासिकपत्रोंका विद्याके सम्पन्धसेहै अर्थात् अनेकानेक विषयों के विषयमें पाठकोंको जिसके द्वारा थोड़हीम उत्तम सोरहो उसका अनुष्ठानही उनका कर्तव्य है और इसीके साथ साथ विद्याकी उन्नति के लिये सरकार वा लोगों द्वारा जो यन किये मातेहों उनकी चर्चा करनाभी इन्हींका काम है । अतएव जितने नवीन अन्य प्रस्तुतही उनमसे यथार्थमें लाभदायक कौनसे और सरकारक कौनसे है इत्यादि लोगोंको सूचित करना यहभी मासिक- पर संपादक महाशपोंकाही कर्तव्य है * विलायतके मासिक और त्रैमासिक जितने पर हमारे दृष्टिपथमें प्रातेहैं उन सबमें यह विपय भलीभांति संपादित किया हुआ दीख पड़ता । किसी एक विषय पर नीनग्रन्य लिखकर प्रस्तुत, हुमा न हुआ कि उसके विपयमें. मासिकपनों के द्वारा चर्चा होने लगतीहै । यह तो क्या पर पुस्त- कालय, वादविवादवद्धिनी सभा, चाह पानी आदि पीने के स्थान, और तो क्या भोज प्रसंग आदिमेंभी उक्त चर्चा जहा तहा चलतीही - रहती है । अस्तु; इससे यह सिद्धहुथा कि नूतन पुस्तकों के विषय में निज २ सम्मतिया प्रदर्शितकर उनमेंसे लोकाश्रयके पात्र कौन सी और अपात्र कौनसी हैं इत्यादि निश्चित करने का अधिकार प्रधानतः मासिकपत्रांकाही है । परन्तु हमारी भापामें जो पत्रहै वा थे उनसे उक्त कार्य भलीभांति जिसने किया वा जो करताहो ऐसा * यदि काशी,नगिरीप्रचारिणी पनिका इस ओर ध्यान दे तो भरोसाह कि भन्य पर पत्रिकामी उसका अनुक्रय करने लगेगी। བས - निमन्धम लोगभी रहें तो उत्तम ग्रन्थमणेताओंको उत्साह मिलताहै, उन लोगोंको उदार प्राश्रय मिलनेके कारण भाषामें उत्तमोत्तम अन्योंकी संख्या क्रमशः बढती जातीहै और उमी प्रकार नि अन्य अलग करदिये जाते हैं सुतरां उत्तरोत्तर उनका हास हो जाताहै । परन्तु यह जब नहीं रहता तब यथार्थहीमें सम्पतिई नाई क्या उत्तम और क्या अनुत्तम दोनों एकही होजानेके कार भापाको अत्यन्त हानि पहुँचती है और लोगोंको उत्तम उत्तमई ग्रन्थ मिलाकर और उनके योगसे उनकी मानसिक शक्तिया बम करें यह तो रहताहै एक थोर पर नित्यप्रति उन्हें उलटी हानियाँ उठानी पडतीहै। (६) यहां तक हमारी भाषाके ग्रन्थकर्ताओंकी आधुनिक स्थितिके विषयमें विशेषतः निरूपण हुआ । अब उक्त विषयार सामान्यतःविचार करतेहैं अर्थात् समालोचकगणोंको कौन कौन गुण और साधन आवश्यक है, समालोचना करनेकी प्रथा कब प्रचलितहुई, इससे हिताहित कौन कौनसेहैं इत्यादिका वर्णन करेंगे (७) प्रथम इस प्रथाका वृत्तान्त | हमारे देशमें यह प्राचीन समयम जैसी चाहिये वैसीनथी और अर्वाचीन कालमें तो लुग प्राय होगईथी पर अभी दस पन्द्रह वोही अंगरेजी ग्रन्थकर्ता के परिचयसे केवल कहीं २ इसका मारम्भ, होचलाई । र आधुनिक स्थितिके विपयमें लिखते हैं । यह तो अभी ऊपर लिखा चुके हैं कि अंगरेजी विद्याका फैलाव इधर उधर होने के कारण अन्योंके गुण दोप विवेचनाकी प्रथा चल निकली । प्रतिवर्ष की नवीन ग्रन्थ मुद्रित होते हैं, समाचारपत्राद्वारा उनकी घोडी बन चर्चा होती है, और इसी उद्देशसे मासिक पत्रोंकी सृष्टि हुई । हुन पत्रोंका मुख्यतम विपय भापा और विद्याही है । समाचारपत्रों । समालोचना। कहीं एक मार्मिक वचन लिखाहै कि ऐसे बहुतलोग दीख पडते कि जो हम क्या नहीं जानते यही नहीं जानते । अभिमाय इहै कि उक्त प्रकारके समालोचकगण किसी के नहीं। जिस थके दोष गुण लोगोंको विदित करने है वह ग्रन्थ स्वयं पूर्णतया "मझमें पाजाय तभी समालोचकको उचितहै कि उसकी समा- चना करनेका साहस करे । नोचेत् थोडासा समझ बझकर दि समालोचना भारम्भ करदी तो वह उक्त समालोचकके-लिये. पडम्बनामात्र होगी और, लोगोंमें सत्यका प्रचार तो रहेगा एक पोर पर मूर्खतागर्भित सम्मतियामात्र चारों ओर फैल जायेंगी। (8) दूसरा गुण, सत्यप्रीतिहै । यह गुणभी उक्त गुणों के समान पमालोचनाके लिये अत्यन्त आवश्यकहै सुतरा इसकी- योग्यता उक्त गुणोंसेभी अधिकतरहै । पर यह गुण संसारमें कचित्ही पाया नाताहै। दूसरेके ग्रन्थों की समालोचना करनेमें सत्यका अपलम्म ही समुचितहै । और समालोचना करनेका प्रधान अभिमायभी यही कि उसके योगसे सत्यका उत्कर्ष और असत्यका ह्रासहो। पर यह बहुतही थोडा देखने याताहै । आज कल तो समालो- चकगणों के सामान्यतः उद्देश्य द्वेपथुद्धि और मत्सरमय रहते है, वा गोही विनोदार्थ ग्रन्थकर्ताओंका उपहास और उनकी फजीती करने के रहतेहै । यदि यह न रहा तो यह तो अवश्यही रहता है कि हमारा नाम लोगोंको पिदितहो और उसी के साथ हमारी विद्वत्ता भी उन्हें प्रदर्शितहो। अब यह बात सत्यहै कि उक्त दुष्ट मनोवृत्तियों की.मेरणासे किसी एक ग्रन्थकी चर्चा करनेपरभी यदि उसमें असत्यताका लवलेश न भी रहा और वह दोपपात्र न भी हुई तौमी उन रत्तियों का अवलम्म सर्वथैव निन्य एवं अश्वाध्यहै । सुविचारके योगमे जिनके मानस उदार होगयेर्दै वे तो अपने.
निवन्धमालादश।
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हमें एकभी नहीं दीख पडता। अस्तु, उक्न संपादनसे यह
हुया कि ग्रन्थों की समालोचना करनेकी प्रथा इमारी भाषा
नईही प्रारम्भ हुईहै और अद्यावधि उसका प्रचारभी बहुत
है। उसकी उन्नति भाषाद्धि और सर्वसाधारणके हितके।
अत्यन्त आवश्यकहै।
(८) यहां तक समालोचनाके इतिहासका वर्णन हुआ
अब समालोचना करनेवाले लोगोंको कौन कौनसे गुण :
श्यक उनके विषयमें लिखते है । प्रथमतः मूल ग्रन्थका ज्ञान
समालोचक चाहे कैसाही विद्वान्हो पर यदि उसे मूल
ज्ञान नहीं है तो उसका समालोचना करना व्यर्थ है । जिस
को किसी एक वस्तुका पूर्वमें ज्ञान नहीं रहता सुतरां वह उस
बिलकुलही नहीं जानता, यदि वह उसके विपयमें स्वकीय सम्मति
प्रकाशित करे तो यह तो प्रकटही है कि उसकी उक्त सम्मान
शोभाको कदापि प्राप्त न होगी। परन्तु मनुष्यकी मनोवृत्तिक
ऐसा कुछ चमत्कार है कि उसे निज अज्ञानको तर्कणा तक सहन
नहीं होसकती । ऐसे सद्विद्वान् बहुतही थोड़े मिलेंगे कि जो यह
निश्चयपूर्वक जानते है कि अमुक २ विषयको हम भलीभांति
नहीं जानते अतएर उसपर निज सम्मति प्रकाशित करनेके
लिये हम सर्वथैव अयोग्यहै । पर अन्य लोगोंमसे किसीकोभी
किसी एक त्रिपयमें पूछिये बहुत करके उत्तरमें नाही तो कभी
कहेगाही नहीं । हर कोई अपने मनमें यही समझताहै कि जितना
में जानताई उससे अधिक अन्य कोई क्या जानता होगा? और
मेरी सम्मतिम त्रुटि हो कैसे सकती है ? बहुतेरे लोगोंके मन इस
मूर्खतापूरित दुरभिमानसे दूपित होनेके कारण किसी एक विपर्य
पर यथोचित सम्मति देनेवाले लोग बहुतही थोड़े मिलेंगे । बेकन
ममालोचना। १५३ समालोचना संसारमें चिरकातलों मान्य होकर स्थिर रहेगी। -. (१०) तीसरा गुण शान्तस्वभावह। समालोच के लिये यह गुणभी अत्यावश्यकहै और उक्तगुणके सदृश यहभी कचित्ही दृष्टि- गोचर होताहै । इसका कारण ऊपरही कह चुके है । वह यहीहै कि समालोचकों की मनोवृत्तिया जैसा कि उपर कहचकेहैं, द्वेष मत्स- रादि वासनाओंसे मायः लिप्त होने के कारण, उक्न गुणको उनके निकट स्थान नहीं मिलता । क्रोध वशहो जब चित्त क्षुब्ध हो- जाताहै तव,उसमें शान्तता कैसे रहसकतीहै । इस क्षोभकेभी उद्- गार प्रकटित करने के लिये मनको कुछ थोड़ी बहुत शान्ति पाय- श्यकहै । उसके अभाव में चित्तको यदि अतिशय क्षोभही हुआ तो मनोव्यापारके यथावत् संचालनमें कठिनाई पडेगी । अर्थात् जैसे -जब मनुष्प अत्यन्त ऋद्ध होजाताहै तब उसका गला भर आताहै और उसके मुखसे पूरे शब्दतक नहीं निकलते, वैसेही जब मनुष्य कोरवशहो विवेकशुन्य होजाताहै तब उसकी उद्धिभी गडगड़ा जातीहै । बोलना क्याहै और लिखना क्याहै इत्यादि उसे जैसे दूसरे समय सूझ सकताहै वैसा उसे उससमय नहीं सूझना और वह बिलकुल बेसुध होजाताहै और विक्षिप्तकी नाई कुछ का कुछ वरीने लगताहै-वह यहांतक कि कुछ कालके पश्चात् स्वयं उसे ही अपनी विक्षिप्तताको देखकर विस्मित होना पडताहै। साराश मनशान्तताकी इतनी बारश्यकताहै कि क्रोधका वोलना वा लि- खना पदापि युक्तियुक्त होही नहीं सकता, तो पुनः सहस्रावपि पाठकगणों को मान्य होने के योग्य ग्रन्यरचना करने के लिये उस की जितनी आवश्यकताहै वह सबको विदितही है क्योंकि जर किसी विषयपर ग्रन्थ रचा जाताहै तन पहले उसे श्राद्यन्त सोच - समझकर उसकी यथायोग्य व्यवस्था करनी पड़ती है, और वाक्य निर्मल अन्तःकरणमें उन्हें कदापि याश्रयही नहीं देते। जिस किस को किसी एक ग्रन्यकर्ताके गुण दोप संसारमें प्रकटकर दिखाने लिये लेखनी उठानीहो, उसे उचितहै कि वह पहले सत्यका स्मरण कर उसीपरयारूढहो निज सम्मति लिखने के लिये कृतनिश्चयहो। केवल परमार्थ वृद्धि के हेतु यह करना उसे उचित नहीं है, किन्तु उसे यह उत्तमतया जानना चाहिये कि स्वार्थसाधनमें भी यही मागे श्रेयस्करहै क्योंकि यद्यपि वह अपने पाण्डित्य और कीर्तिश्राधिका पर आरूढहो असत्य सम्मातियां प्रकाशितकर उन्हें लोगोंके मन दृढरूपसे स्थित करे और इसीप्रकार कुछ कालतक लोगोंको धोखा दे तथा उससे अपनी तात्कालिक कृतार्थता मानले, तौभी उसे यह निश्चयपर्वक जानलेना चाहिये कि उसकी चल असत्यता कभी न कभी प्रकाशित होहीजायगी। इस विपयमें राम,जान्सन्, मेकाल आदि सर्वप्रसिद्ध उदाहरण हैं । पहलेने अपने इंग्लैडके इतिहास वहुतमा झूठा वृत्तान्त लिखाई अतएव ओज कल उसकी कीर्ति वहुतांश लप्तमाय होगई है, और दूसरे दोनोंने भी कई प्रसंगोंपर अपनी टेढेपनकी लहरमें मग्न होकर मनमाना लिख माराहै इसी लिये यदि उनकी सम्मतियां ग्रहण करनीहों तो लोग उन्हें बहुत विचार एवं सावधानीपूर्वक ग्रहण करते हैं। साराश सत्यरूप देवता का प्रताप बडाही प्रचण्डहै, उसकी प्रचएंड क्षोभाग्निमें बडे २ उ दण्ड ग्रन्थकर्ताओं की राख होजाती है फिर छोटेमोटे ग्रन्थकर्ताओं फी किधर क्या दशा होजाती है उसे कौन जान सकता है। इससे अव यहतो भलीभांति जान पडताहै कि हमारी उक्त सत्यानुकरण की सूचना स्वार्थसावनके लिये भी समुचितहै । ग्रन्थोंके विप में जो यथार्थ विवरण करेगा अर्थात् जितने गुणहों उतने गुण और जितने दोपहों उतने दोप यथावत् प्रदर्शित करेगा उसीकी समालोचना दापि न पडेगा । वहतो अपने सयुक्तिक एवं सपल प्रमाणोंको देकर मानन्दक निश्चिन्त होरहेगा और निज विपक्षियोंकी नालियोंको तृणमात्रभी चिन्ता न करेगा, क्योंकि उनके दोलके भीतरकी पोल तो उसे भलीभाति दीख पडेगी और इसके अति- रिक्ष यह इसेभी निश्चयपूर्वक जानलेगा कि उक्त प्रकारकी गा- लियोंसे जो पण्डितहैं उन्हें कदापि भ्रम नहीं होगा। प्रस्तु, साराश पनकी शान्तता यह समालोचकके लिये नितान्त आवश्यक गुणहै क्योंकि इसके योगसे उसके लेखको एक विलक्षण प्रकारका गौरव एवं भव्यता प्राप्त होती है। जैसे कि उभय पक्षके वकीलों के प्रमाण और उनके पक्षपात पूरित उत्तर प्रत्युत्तर सर सुनकर न्यायाधि- कारी अपने उच्चासनसे निष्पक्षपातपूर्वक स्वस्थ अन्तःकरणसे उचित निर्णय सुनाताहै, उसीतरह समालोचककी सम्मति वकील कैसी एकपक्षकी कदापि न रहनी चाहिये किन्तु न्यायाधिकारीके निर्णयके सदृश केवल सत्यतागर्मितही रहनी उचितहै । (११) चौथा गुण सहृदयना। जिस ग्रन्धकी समालोचना क- उनीहो उसमें अन्तःकरणके पूर्ण अभिनिवेशकी योग्यताको सह- दयता कहते हैं । यह योग्यता बहुधा सब मनुष्यों में नहीं पाईनाती यदि पाईभी जाती है तो समानतापूर्वक नहीं पाई जाती । स- सारमें जिस मतकी इतनी भिन्नता दीस पड़ती है उसका प्रधान कारण उक्त असमान सहृदयताहीहै । यहतो नैसर्गिकही है कि प्र- त्येक मनुष्य की जन्मसिद्ध प्रकृति निरालीही रहनेके कारण और पागेको जो २ अवस्था उसे प्राप्त होती जाती है वेभी सर मनुष्योंमें असमान होने के कारण, मनुष्य मनुष्य में रुचि भिन्नता उत्पन्न होती है । परन्तु उनमेंसे भी कई मनुष्योंमें उस सहृदयता का गुण अन्योंकी अपेक्षा अधिक पाया जाताहै अर्थात् दूसरों की श निवन्धमालादर्श। रचनादि अन्यगुण जितने उत्कृष्ट होसके साधन करने पड़तहे और फिर यह वार्ता तो निर्विवादित है कि क्रुद्ध मनुष्यकी अपेक्ष शान्त और स्थिरस्वभावका मनुष्य उक्त साधनाको अधिकतर सा सकेगा । दूसरी बात यह है कि यदि किसी ग्रन्थपर सम्मति देने हो और वह शान्त, गम्भीर और सभ्य रोतिपूर्वक दीजाय तो उस की योग्यता कुछ निरालीही मानी जातीहै और उसके योगसे में कार्य सिद्ध होताहै वह क्रोधके श्रावेगमें व्यर्थ चिल्लाहट, पागल कैसी उलटी सीधी गालियोंकी वक वक, आदिसे कदापि नहीं होता । उक्त दूसरे प्रकारके समालोचकसे लोगोंका मन हटजाताहै और उसीके साथ उसकी नीचता और लड़कपन संसारमें प्रक- टित होजाताहै । इसके अतिरिक्त उक्त गालिपदानसे उसके पसं को जो सबलता माप्त होनी चाहिये वहतो रहती है एक अोर पर उसकी दुर्बलता लोगों में भासित होनेलगतीहै, क्योंकि लोग यह पूर्णरूपसे समझे लेतेहै कि जब इसने गालियोंकी दृष्टि इसमकार कीहै तवतो यही ज्ञात होताहै कि इसके पास गालियों के अतिरिक्त अन्य प्रमाणोंका सञ्चय बहुतही कम होगा। इसके सिवा होलि- कोत्सवमें गाली बकने के समान गाली देनाभी ग्रन्थकर्ताओंके लिये अत्यन्त अप्रशस्तहै । मार्गमें कलह करनेवाले लोगोंमें, जैसे मॅह- जोरीसे कलहका निर्णय होताहै अर्थात् जो बहुत ज़ोरसे चिल्लाता है, उसीका पक्ष सचाहै यही आसपास के तमाशबीनलोग, समझते है । ग्रन्योंके विषयमें भी उसी नियमका अनुकरण करना नित्य एवं उपहासाईहै । ऐसा करनेवाले को अपनी योग्यता नहीं जान पडती और दूसरे लोगों को यह ज्ञात होजाताहै कि समालोचना करनेकी योग्यता इसमें जरासीभी नहीं है क्योंकि जिसके पास युक्तियुक्न प्रमाणहै वह शब्दपाण्डित्य और गातिप्रदानके बखेडे में - समालोचना।। - इतना भारी, पारितोषिक ! दूसरे एक समय पर किसीकों किसी एक कान्यकी अत्यन्त प्रशंसा करते देख एक सत्ववेत्ताने कहा कि श्रः इसमें क्या है ? हमें यह पतलामो कि इस काव्यके योगसे बाजारमं धान्य सस्ता होगया है क्या ? 'सारांश जिस विषयम अपनी गतिही नहीं है उममें पागलकी नाई प्रविष्ट होनेसे ऐसी थि- चित्र सम्मतिया उत्पन्न होती है अतएव किसीभी ग्रन्थकी समा- लोचना लिखने के लिये लेखनी उठानेके पहिलेही समालोचक को यह भली भांति सोच लेना उचितहै कि समालोचना तो हम करेंहीगे पर इस विषयमें सहृदयता माप्त करनेकी हमारी कितनी योग्यताहै ? यदि योग्यता न हुई तो सम्मति वैसीही निश्चित होगी जैसी अन्धद्वारा चित्रपटकी होसकती है । यहापर किसीको यह भ्रम उत्पन्न होगा कि प्रचुरपाण्डित्यके योगसे चाहे कोई विषय क्यों न हो उसकी समालोचना होसक्तीहै । पर यह भ्रम उक्त जान- सन् , मिल्ल प्रदिके उदाहरणोंसे पूर्णतया दूर होसकताहै । तात्पर्य निरे पाण्डित्यकी अपेक्षा इस सहदयता गुणकी मधिकतर योग्यता है। इसी लिये ग्रन्थकी समालोचना यदि प्रचुर पाण्डित्यपलसे भी फीगई हो, तोभी उन गुणका अभाव होने के कारण वह अनादर- गीय होजाती है। -(१२) इस प्रकार उत्तम प्रकारकी समालोचना करनेवाले समालोचकके आवश्यक गुणोंका यहांतक वर्णन हुमा । हम सम- झतेह इसमें अन्यलोगोंका भी शर्तभाव होसकता । अब संसार में सामान्यतः जो ग्रन्धादिकोंकी समालोचना हुप्रा करती है वह कितनी योग्यताकी रहती है और किस २ प्रकारकी दृष्टिगोनर होती है इसके विपयमें थोडासा निरूपण करना आवश्यक है। प्रथमतः सर लोग यह महनदीमें समझ मेकने कि लोक गगहार - - निवन्धमालादर्श । मनोवृत्तियोंसे वे अपनी मनोवृत्तिया विना प्रयास मिला सकते हैं इस गुणकी स्थिति मन वा हृदयकी उदारताका ज्ञापकहै और इसका अभाव उक्त दोनों मन और हृदयकी संकोचनाका दर्शकहै । अन एवं जिप्त किसीको जब किसी ग्रन्थी समालोचना करनीहो तर उसको प्रथम यह देखलेना चाहिये कि इससे सहृदयता पानेका मेरी योग्यताहै वा नहीं नोचेत् जो परिणाम होगा सो स्पष्टही है जयदेवके 'गीतगोविन्द' काव्यकी, वा मराठी राज्य के रामजासं समान कविकी सुरस लावनीकी समालोचना करनेके लिये शुका चार्य ऐसे परमहंसने यदि लेखनी परिचालित की, अथवा वृद्धर वा सृष्टिममादसे मदनव्यापारशून्य मनुष्यने उक्त कार्य स्वीक किया तो समालोचना कैसी उत्तम होगी इसका अनुमान सहज में होसकताहै। उसीमकार वर्मप्रतिपादक वा वेदान्तविपयक ग्रन की समालोचना करनेका साहस यदि कोई विलासप्रिय पुरुप के तो वह उसे कहांतक सिद्ध करसकेगा ? विशप वटलरसंज्ञक ए धर्माधिकारीने अंगरेजी भापामें उक्तविपयफ एक बहुत प्रसिद्ध ग्रन निर्मित कियाहै। उसके विपयमें कई लोगोने ऐसी सम्मतियां दीं वि उन्हें देखते हमें दुःख और आश्चर्य होताहै। शेक्सपियरके विपयां मिल्ल साहिवकी ऐसीही सम्मतिहै । कई अंगरेज कवियों तथा इति हासोंके विषयमें जानसनकी सम्मति, और हिन्दुओं की विद्यादिवे विषयमें मेकालेकी सम्मतिकी योग्यता कितनी माननी चाहिये इसे सहृदय पाठकगण भलीभांति जान सकते है | एलीजवेध, रानीके कोपाध्यक्ष कोई लार्डवर्लेसंज्ञकथे । स्पेन्सरको उसके सर्वमसिद्ध काव्यके निमित्त रानीने कुछ पारितोपिक दिया, उसे देख उक्त कोपा' व्यक्षको महदाश्चर्य हुया और उससे यह कहे विना न रहागया कि एं यह क्या पागलपनहें, एक न कुछ गीतमात्र बनानेके लिये - समालोचना। तना भारी, पारितोपिक ! दूसरे एक समय पर किसीको किसी कापकी सत्यन्त प्रशंसा करते देख एक सवरेत्ताने कहा कि 1. इसमें क्या है ? हमें यह बतलायो कि इस काव्यके योगसे जारमं धान्य सस्ता होगया है क्या ? सारांश जिस विषयम प्रपनी गतिही नहींई उममें पागलकी नाई प्रविष्ट होनेसे ऐसी थि- चन सम्मत्तिया उत्पन्न होती है अतएव फिसीमी ग्रन्थी सगा- लोचना लिखने के लिये लेखनी उठानेके पहिलेही समालोचक को यह भली भांति सोच लेना उचितहै कि समालोचना तो हम करहीगे पर इस विषयमें सहृदयता प्राप्त करनेकी हमारी कितनी पोग्यताहै ? यदि योग्यता न हुई तोसम्मति वैसीही निश्चित होगी मसी अन्धद्वारा चित्रपटकी होसकती है । यहापर किसीको यह भ्रम उत्पन्न होगा कि प्रचुरपाण्डित्यके योगसे चाहे कोई विषय क्यों न हो उसकी समालोचना होसती है । पर यह भ्रम उक्न जान्- सन्, मिल्ल श्रादिके उदाहरणोंसे पूर्णतया दूर होसकताहै । तात्पर्य निरे पाण्डित्यकी अपेक्षा इस सहृदयता गुणकी अधिकतर योग्यता है। इसी लिये ग्रन्थकी समालोचना यदि प्रचुर पाण्डित्यवलसे भी फीगई हो तोभी उक्त गुणका अभाव होनेके कारण वह अनादर- रणीय होजाती है। -(१२) इस प्रकार उत्तम प्रकारकी समालोचना करनेवाले समालोचकके आवश्यक गुणोंका यहांतक वर्णन हुश्या । हम सम- भवे इसमें अन्यलोगोंका भी अभार होसकताहै। अब संसार में सामान्यतः जो ग्रन्थादिकोंकी समालोचना हुश्रा करती है वह कितनी योग्यताकी रहती है और किस २ मकारकी दृष्टिगोचर होता है इसके विपयमें योडासा निरूपण करना आवश्यक है। प्रथमतः सब लोग यह महजहीमें समग गफतेह मिलोक नवहार निवन्धमालादर्श। में लोगोंकी बहुधा स्तुतिकी अपेक्षा निन्दाकी ओरही विशेष प्रवृत्ति रहतीहै । किमीने किंचित् ऊपर सिर उठाया, किसीकी कहीं कुछ प्रशंसा हुई न हुई कि लोगोंको वह असह्य होजाती है और तत्क्षण चारोंमोर उसके निन्दक उपस्थित होजाते हैं । यही कारण है कि पड़े ग्रन्धप्रणेतृगणों और रिशेपतः सव कवियोंने अपने २ ग्रन्थी की भूमिका खलोंके दुश्चरित्रों का वर्णन कियाहै। अस्तु; इससे यह स्पष्टतया ज्ञात होताहै कि समालोचनाके सामान्यरूपका अर्थ मूल अन्यका दूपण वा उसका खण्डन है। किसीसी प्रशंसाके निमित्त किसीने किसी एक ग्रन्थकी समालोचना कीहो ऐसा बहुधा विना स्वार्थके कहीं भी दृष्टिपथमें नहीं पाता। अब दूसरेका नाम रखने के लियेही वहुधा सवलोगोंकी प्रवृत्ति क्यों हुआ करती है इसका कारण किंचित् पिचार करनेसे तदसण विदित होजायगा कि वह स्वाभिमानहै । प्रत्येक मनुष्य यही समझताहै कि यदि संसार कोई, चतुरहै तो वह मैही हूं, सबको, उचितहै कि वे मेराही गुण वर्णन करें, और जर वह देखता है कि कहीं किसीकी प्रशंसा हुई तो (अल्पचेतस् होने के कारण ) उसे यही जान पडताहै कि उक्त प्रशंसा मेरीही प्रशता से लीगई है। यही कारण है कि बहुधा हरएक मनुष्य दुसरेकी निन्दाके लिये घात लगाये रहताहै। कई लोग कि जिन्हें लोग बुद्धिमान और चतुर मानतेहै, ऐसा समझते है कि दूसरेकी कृतिको सर्वथैव उत्तम कहकर यदि उसमें कुछ दोष * न निकाला तो, अपना, वडापनही क्या रहाँ ? आधुनिक विश्व विद्यालयकी परीक्षाओंमें परीक्षकगणोंका जो वाव दीख पडताई ठीक उसीका अनुसरण समालोचकगणभी करते है । विश्वविद्या लयके परीक्षक अपने हाथसे छात्रोंको पूरे नम्बर कभी देतेही नहीं। दृश पांच तो वे निन गौरके निमित्त एक ओर निकालकर रख समालोचना । तेहैं । बहुधा समालोचकगण ग्रन्यरचनामे असमर्थ होने पर भी सकी समालोचना करते समय -गुणोंका कुछ उल्लेखकर अन्त में छ न कुछ तो सच्चे झूठे दोप निकालकर स्तुति और निन्दाको मानही कर डालते हैं । यह व्यवहार उक्त व्यवहारकी अपेक्षा हुत अच्छाहै । पर इसीके साथ यहभी स्पष्टही है कि इसके योग : समालोचककी सत्यनिष्ठा कलक्षित एवं पित होजातीहै । श्र- र कईलोग ऐसे रहते हैं कि जिन्हें गुण और दोप दोनोंभी दिखाने । पड़तेहैं, पर दोपोंपर पाण्डित्य करना उन्हें जितना मिय लगता : उतनाही गुणोंका विवरण करना अप्रिय लगताहै । इसीलिये हले कुछ-थोड़ा बहुत गुणोंका विवरणकर अन्तमें दोपोंका पूर्ण- पसे उद्घाटन करतेहैं । इसमें संदेह नहीं कि द्वेपथुद्धि वा मात्सरी वभावके अतिरिक्त अन्यद्वारा यह घटना नहीं होसकती । किसी- केसीके सभावमें पक्षपातकी इतनी प्रबलता रहती है और प्रकृति रसी, हठीली होती कि गुण तो गुणही नहीं और दोप तो दोप ही इसके व्यतिरिक्त उसे कुछ दीखही नहीं पडता । स्वकीय मता- तुसार प्रिय ग्रन्थों में उसे सव-गुणही गुण दीख पडतेहै और दोप का लेशमात्र नहीं, दृष्टिगोचर होता, परन्तु उक्त प्रकरणके विपरीत प्रसंगमें सभी दोपमय दीख पडताहै । गुणफा लेशभी सहन नहीं होसकता। इसके कहनेकी कोई आवश्यकता नहीं है कि ऐसे समा- लोचकोंमें दुराग्रह सदा जागृतही रहताहै, कारण किसी वस्तुका केरल गुणमय,वा केवल दोपमय होना सृष्टि नियमकेही विरुद्धहै । यदि ऐसाहीहै तो यह मकटहीहै कि उक्त समालोचकगणोंको सत्य का उपमर्दनकर गुणोंको दोपों और दोपोंको गुणों के रूप देनेके लिये बहुत कुछ यत्न करना पड़ताहै। प्रस्तु; इसीमकार बहुधा ग्रन्थोंकी समालोचना अनेक प्रकारकी दीख पड़ती है ।
६० निवन्धगालादर्श। 1 * (१३) ऊपर जिन विषयों का वर्णन होचुकाहै वे अहंकारादि दुष्ट मनोवृत्तियों के फल होने के कारण थोड़े बहुत सब दूपणी है। अब सच्चे समालोचकोंके यथार्थ स्वरूपका यहां समास वर्णन करते हैं। यह तो ऊपर कही चहै कि जिस ग्रन्धकी समालोचना करनी हो उसका पूर्ण ज्ञान और उससे सहृदयता ये दोनों गुण समालो चकके लिये अत्यन्त आवश्यकहैं। पर इनके सिवा जो अन्य गुरु कहे हैं उनकी तो समालोचकों को अधिकतर श्रावश्यकता है क्योंकि उनके योगसे समालोचनाको सच्ची योग्यता और यथार्थ शोभा प्राप्त होतीहै और वह जगत्में सबको मान्य होतीहै ।' बहुत तो क्या पर स्वयं ग्रन्थकारही यदि सत्यप्रिय विद्वान् रहा तो वहभी उसे देखकर शिर हिलाये विना न रहेगा। यह समालोचना ऐसी रहनी चाहिये कि इसमें यह स्पष्ट दीखपडे कि वह निष्पक्षपातपू वैक कीगई है और इसमें सत्यनिरूपणके व्यतिरिक्त समालोचकका अपर कोई उद्देश नहीं है । गुणदोषोंको दिखानाही समालोचकों का कर्तव्यहै अतएव उन्हें समुचितहै कि वे शुद्धान्तःकरणसे दोनों को प्रकाशित करें और उनका उल्लेख करनेमें यत्किंचित्भी अयुक्ति न करें । दोपप्रकटित करते समय जहातक होसके ऐसा लिखा जाय कि यह अनुमान न होने पावे कि मूल ग्रन्थमणेताके दो को प्रकाशित करना यही समालोचकका प्रधान अभिमाय था उसी प्रकार गुणोंका वर्णन करती वारभी यदि वह उसका मित्रहो तो उसे उसकी व्यर्थ प्रशंसा करना अनुचित । साराश जो दोप हो उनका निर्भयता एवं स्पष्टतापूर्वक कथनहो और वैसेही जो गुण हो उनके लिये ग्रन्थ रचयिताफी उचित प्रशंसा कीजाय । जिस प्रकार सत्यनिष्ठ न्यायाधिकारी शत्रु मित्र भावको बिलकुल भूत फर केवल उदासीनना पूर्वक न्याय करताहै, वा सचा वणिपुर T समालोचना । चे मापसे अपने ग्राहकों को सच्चा तोल देताहै, सच्चा एवं उत्तम बत्रकार मूलाकृतिको जैसे ज्यों के त्यों चित्रपटपर उतार देता है; सी प्रकारकी समालोचना भी होनी चाहिये । (१४ ) यहां तक वर्तमान विपयकी बहुत कुछ विवेचना हुई। पत्र यहाँपर-आजकलके लोगों में वर्तमान विषयके सम्बन्धसे जो ऊईएक प्रकारके विलक्षण विचार दीख पडतेहैं, उनके विपयमें कुछ लोडासा वर्णन उचित जान पड़ताहै । उन विचारों में से पहला बड़ा चार यही दीख पड़ताहै कि जो दूसरे लोगोंके दूषण प्रकाशित करताहै वह अहंकार और द्वेपबुद्धिके वश होकरही उक्त कर्म करता है, अतएव यह बड़ा दम्भी एवं दुष्ट मनुष्यहै । यह निश्चित होने का कारण क्याहै सो पिछले लेखसे हमारे पाठकोंको ज्ञात होही चुका होगा । परन्तु यह विचार सदैव सत्यही होताहे ऐसा कुछ नियम नहीं है । अत्यन्त निकट सम्बन्ध और समस्वभाववाले मनुष्योंमें भी बहुधा मतान्तर दीख पड़ताहै और यदि वह दीख पड़ता है तो कुछ विशेष प्रारचर्यकी बात नहीं है। । यहा पर इतनाही कहना अलम् है कि उक्त दोप विवेचन उक्त हेतुओंसे जैसे होसफताहै वैसेही सत्यनिष्ठासे भी वह होसकताहै । इसलिये उक्त प्रकारके लेखकको केवल दो मनोवृत्तियों से अभि- गुन करना यह तो निरी जबरदस्तीहै । जिस समालोचकने अह- कृति वा दुष्टबुद्धि से दूसरेकी विना कारण निन्दा की उसकी उसी प्रकार निन्दा करने के लिये उस निन्दित पुरुपको वा उसके सहा- यकों को क्या किसीने मना कियाहै ? जिसको यह जान पडता होगा कि हम उक्त निन्दाके पात्र नहीं है, उसे उक्त दोषारोपणको दूर करनेकेलिये यन न कर स्वस्थ क्यों बैठना चाहिये ? उन दुरणको दर फरनेकेलिये यदि हमने शिथिलता की तो हम उक .
M - ६२ निबन्धमालादर्श। दूपण के पात्र हैं ऐसा लोग समझलेंगे यह उसे जान नहीं क्या ? साराश यह तो स्पष्टही है कि द्वेपमुलक निन्दासे भी चित् अनर्थ होनेकी पूरी सम्भावना नहीं है । अस्त; दूसरा पिच यहहै कि अपनेसे जो बड़े हैं उनके दोप-प्रदर्शित करने का अधि कार हमें नहीं है। यह विचार हमारे पुराने श्रद्धालु एवं भोले लोगोंको यदि होता तो हमें उसका कोई बड़ाभारी आश्चर्य होता क्योंकि गुरुजनों के विषयमे हमलोगों की पूज्यबुद्धि कैसी २६ है सो सबलोगों को विदितही है । पर पुरानी पागलपनकी कणाओं के दास्यत्व से नवीन रोशनीने हमें मुक्त किया है अतएव जे अपने को परम धन्य, मानते हैं, 'आजतक भारतवर्ष में इतने राजा गण, होगये पर, वर्तमान, दयालु सरकारके समान प्रजाको सिक स्वाधीनता किसीने भी न दी' ऐसा जो रातदिन गीत,गा। करतेहैं, अपने सम्मानित पूर्वजोंकी मनमानी निन्दा करनेमें जो श्रागा पीछा कदापि नही देखते हमारे प्रभुका धर्म शान्तिका साँ गरहै इसी कारण हमें आज्ञाहै कि उसे वाहुबलसे,नही वरंच लोगों के मनों को आकर्पितकर फैलावें ऐसा जो चारों ओर ढिंढोरा पी टते फिरतेहै, वे ही मेकाले, मिल्ल कैसे ग्रन्धकारों की-निन्दा प रोमाश्चित हो, कानोंमें अंगुलिया डालें, डाक्टर-विलसन् समान किसी एक व्यक्तिका किसी एक.सम्बन्धसे नाम रखने को केवर छठा महापातकही मानें, अपनी राज राजेश्वरी महारानीके चरणं पर उसकी समस्त प्रजाको उचितहै कि वह अपनी धर्मनिष्ठा सत्यप्रीति और ईश्वरप्रदत्त सदसद्विवेचना शक्ति आदिको निछा, वर करडाले, ऐसा : प्रकटमें उपदेश करें यह कैसे आश्चर्यकी चात है ! परन्तु उन अधिकार मनुष्यमात्रको है वा नहीं इसका निर्णय जो क्षणभर विचारपूर्वक करेगा उसकी समझमें सहजहीमें समालोचना। जायगा। केवल लडकपनकी बुद्धिको छोड मनुष्यों के गुण -पोंके विपयमें यत्किश्चित्भी विचार करनेकी शक्ति जिसकी द्धको हैं, उसे संसारका थोड़ासाही अवलोकन करनेसे ज्ञात जायगा कि एक सर्पगुणसम्पन्न मनुष्यका मिलना कठिन है, उसी कार जिसमें अणुमात्रभी दोप न हो ऐसे गनुष्यका मिलनाभी 'संभाई। दोपोंका सर्वथैर.प्रभाव तो एक परमेश्वरहीमें पाया ताहै। मनुष्यकेलिये, उसकी स्पृहा करना, वा उसकी स्थिति । अपनेमें मानना, इसके समान भयंकर मूर्खता और नहीं है। दि ऐसाही है वो कोई कैसाही सम्मानित क्यों न हो, उसमें कुछ कुछ दोप दीखही पड़ेंगे, वा कोई उन्हें प्रकाशित करे तो उसमें आश्चर्यही क्याहै पर कोई कदाचित्' कहेंगे कि बड़ोम दोप रहे तो छोटोको उन्हें प्रकाशित न करना चाहिये। यह कथन तो चन्द्र कलङ्की कहना, नहीं, सूर्यके बिम्बोंपरके काले दाग देखना ही, इत्यादिके समान कैसा अमयुक्त ज्ञात होता है। क्या उक्त दोनों योतियोंका प्रकाश उनके दागोंसे कम होताहै ? वा उन दागोंको चेत्र जो ज्योतिपीलोग बनातेह वे उसके द्वारा तेजकी निन्दा क- ना चाहतेहै ? यह कुछ नहीं उनका उद्देश्य इतनाही रहताहै कि उनके यथावत् स्वरूपको प्राकर विद्याकी उन्नति करें । उक्त कथनानुसार यह महद्दोप वितरण केवल निर्दोष तो, हैही है पर इसके अतिरिक्त यह अत्यन्त प्रयोजनीयभी है। दूसरे यह कि उसके पोगसे मनुष्य के स्था दम्भमा उत्कृष्ट सण्डन होजाताहै, और उसी कारण परमेश्वरकी पूर्णताकी भोर उत्तमतया उसका ध्यान ल. गताहै, कारण यह है कि उसे सुदृढ़ निश्चय होजाताहै कि मैं जिन्हें श्रेष्ठ मानताहू उनमेंभी जब अपूर्णता दृष्टिगोचर होती है तव शेप याकश्चित् क्षुद्र मनुष्यों को अपना वृयाँ दम्भ सहजहीमें समूल त्याग M निवन्धमालादर्ण। देना चाहिये क्योंकि उनको तत्क्षण यह निश्चय होजाता निदोंपी एवं सकल गुणेश्वर्यसम्पन्न सृष्टिकर्ता परमेश्वरके अन्य कोई नहीं है । और तीसरा लाभ यहहै कि बड़ों के । जो पड़ा भारी अनर्थ होताहै वह वन्द होजाताहै । किसी अंगरेज ग्रन्थरचयिताने कहा कि "बडे मनुष्योंके टोपोंके भीपण एवं भयंकर अन्य कुछ नहींहै."। यह तो प्रकटही है. मनुष्यका स्वभाव अनुकरणशील होने के कारण बड़ोंके । सहस्रावधि लोग अनुधावन करने लगतेहै और बहुतेरे तो स । लगते हैं कि उन दुर्गुणों के अनुकरणमें भी कुछ विलक्षण है पर जब उन दुर्गुणोंकाही एकबार पूर्णतया खण्डन होगया उन लोगोंको पुनः उसी प्रकार उसका वोध नहीं रहता । अस्ट इसके सिवाय ऊपर हम यह कही चुके हैं कि कोई फैसाही क्यों न हो पर उसकेभी दोपोंका प्रकाशित करना अनु है, वरन उससे कई लाभहै । तीसरा विचार यह है कि उक्त ६ विष्करण द्वारा उनका उपमर्दन होता है यह समझभी निरी ही है । ऊपर जो कहचुके हैं कि मनुष्य यदि अभिमान करे कि सवगुण संपन्नहूं तो यह उसकी प्रचण्ड मूर्खताहै । यह कथन या सत्यहै तो उसे अपने दोषोंके वर्णनका सहन न होनाभी उन में- कारान्तरगतही है । जिसकी इच्छाहो कि लोग हमारे गुणोंकी प्रशंसा करें, वही अपने दोपोंकी निन्दा श्रवण करने के लिये प्रस्तुत क्यो न रहे ? क्या उसकी यही इच्छा रहा करती है कि लोग मरे गुणमात्रको प्रकाशितकर दोषोंको आच्छादित कियाफरें ? पर जिसने जनमवृत्ति का यत्किंचित्भी अवलोकन किया होगा वा प्रेसी विवेकशून्य आशा करेगाही नहीं। इसके सिवा जैसे हम अन्योंके टोप प्रकाशित करने के लिये तणमात्रभी मंकोच नहीं .
. समालोचना। ते वैसेही अन्योकोभी हमारे विपयमें क्यों न करना चाहिये ? को सबके गुण दोपोंकी चर्चा करनेका पूर्ण अधिकार है, भेद नाही है कि कई वातोंको स्पष्टतापूर्वक कहदेने से निर्वाह हो ताहै और कार्ड वातोंमें निर्वाह नहीं होता। क्या यह भले बुरे चुनावट यथार्थमें जगके सत्य आचरणके लिये अत्यन्त आव- कि नहीं है ? निःसंशय यह अत्यन्त आवश्यक है, यदि लिखा य तो उसकी हितैपिताके विषयमें एक स्वतन्त्र लेख लिखा जा कताहै, और यही कारण है कि ज्ञानी पुरुष इस जनचर्चाका कभी रा नहीं मानते, जो गुण उनमें नहीं हैं उनकी व्यर्थ प्रशंसा होनेकी पेक्षा उनमें जो दोप है उनकेलिये निन्दित होना ये एकवार स्वीकृत -रलेंगे। उन्हें झूठी प्रशंसासे बहुत घृणा रहती है । तो फिर अपने थार्थ दूपणों के लिये वे ऋद्ध क्यों होनेलगे ? अस्तु; उक्त कारणोंसे हजही ध्यानमें आसकताहै कि ज्ञानी पुरुपोंके यथार्थ दोप मका- रात करनेसे वे कदापि क्रुद्ध न होंगे और दूसरे उनके प्रकाशित करनेमें किसीका उपमर्दन होता है यह भी निरी झूठी समझ है। परन्तु ग्रन्थप्रणेतृगणों के लिये तो उक्त कथन विशेषकर आवश्यक । यों तो व्यवहारमें नातेदार स्नेही तथा अन्यसम्बन्धी आ- देकोंकी मुरव्वतके कारण किसी व्यक्ति, विशेपके विषयमें जो पधार्थ एवं, उचित जान पडताहै उसेभी स्पष्टतापूर्वक कहते नहीं बनता । उसी प्रकार सरकारी नातेसेभी मनुष्य बद्ध होजाताहै । किसीका विचार (ख्याल) किमीके विपयमें कितनाही बुरा क्यों न हो, क्रोध, मत्सर, तिरस्कारादिसे मनुष्य मनही मनमें कितनाही तड़पता क्यों न हो, तौभी सरकारी सम्बन्धके कारण ऊपरसे उभय पक्षमें हासे हां मिला ठकुर सोहाती करनाही पडतीहै । ऐसा ही आईनकाभी वन्धन है । प्रत्यक्ष प्रचण्ड शत्रुभी हों, वे ऐसे कि - . है , ! ६६ निबन्धमालादर्श। यदि एकान्तमें भेंट होनाय तो उभय शत्रु, एक दूसरेकी वैठनेकोभी न चूकें तौभी उन्हें समाजमें निज २ सम्मतियार . पूर्वक कहते नहीं बनतीं क्योंकि उन्हें मानहानिकी नालिशका बना रहताहै ! परन्तु कोई मनुष्य ग्रन्यप्रणयन द्वारा यदि स सम्मुख आया तो उसके विषयमें उक्त सव नियम परिवर्तित हो। है। उस बिचारेको प्राडके लिये वहां कुछ नहीं मिलता। ग्रन्थकार कैसाही श्रीमान् हो, कसाही विद्वान्हो, कसाही मानी पर जो उसपर शस्त्र उठायेगा उसे उसके उक्त विभवसे तिलमार भय माननेकी आशङ्का नहीं है। उसके जो २. दोष उसकी बुद्धि आवें उन्हें निर्भयहो लोगोपर प्रकाशितकर, चाहे उस प्रकार उसकी दुर्दशा करने के लिये वह पूर्णतया अधिकृत है । श्रय र अवश्यमेव विचारणीय कि यदि ऐसाही है तो चिना कारण कि को दूपित करना, और व्यर्थ उसपर दोपारोपणकर लोगों में की योग्यता कम करनेके लिय यत्न का करना नीचता एवं अं मताहै। यह सत्य है कि ऐसा करनेवाले लोग बहुत दीख पद है, पर इससे उक्त अधिकारका सवको प्राप्त रहना बुराहै यह ति द्धान्त कदापि नहीं होमकता । सबकी भलाई और बुराई अपनी भली धुरी कृति पर निर्भर हैं । वही वात उक्त अधिकारकी भी है जो लोग सत्यके प्रेमी और सज्जन हांगे उनके द्वारा उसका उत्त ही प्रयोग होगा, और जो हठीले एवं दुष्ट होंगे उनके द्वारा बुरा होगी। अस्तु अव यदि कोई यह पूचे कि यह अधिकार सवर्ष कैसे प्राप्त हुया तो उसका संक्षेपमे उत्तर यही है कि जैसे बाजार चीजों को भला बुरा कहनेका अधिकार हर किसको है से ग्रन्थके गुण दोष विवेचना अधिकार पाठकपत्रको है । हमने कतिपय पाठको को उक्त समता हास्यजनक जान पडेगी, परन्तु समालोचना। A यथार्थम ग्रन्थकाकी और दुकानदारकी स्थिति बिलकुल एकसी । अब इधर जबसे मुद्रणालय चल निकले है, तवसे उस सा- दृश्य अधिकतर दृढ होगयाहै । पर बहुत प्राचीनकालसे यदि देखा जाय तो समस्त संसार यही एक वाजार है और उसी वाजार में निजग्रन्थरूप वस्तुको लेकर कीर्तिरूप द्रव्य प्राप्त करनेकी अाशासे ही सब ग्रन्थरचयितागण आते है। फिर यदि ऐसाहीहै तो बाजार में जो दशा दुकानदारको प्राप्त होतीहै वही यदि ग्रन्थकर्ताओं को प्राप्त हुई तो उन्हें खेद क्यों मानना चाहिये ? सहस्रावधि ग्राहक- गण और सहस्रारधि उनकी उक्तिया ! उक्त दुकानदारको मूक- भार धारणकर उन सबलोगोंकी बातें जैसे सहना पडती है, वैसे ही लोगों द्वारा निज ग्रन्थकी नाना विवि आलोचनायें और सम्मतिया ग्रन्थकारको मूफभावपूर्वक श्रयण क्यों न कर लेनी चाहिये ? अथवा रङ्गभूमिस्थ नाटक-पात्रके अभिनयकी, वा किमी सभामें फिसी पक्का महाशयने वक्तृतादी तो उसके व्याख्यान परीक्षा करने का अधिकार सब दर्शक तथा श्रोतागणोंको नहीं है क्या और उक्त उभय व्यक्ति के निज २ कलाओमें अत्यन्त निपुण होनेपरभी सालोगाने यदि थपोडी पीटकर उनका उपहास किया, तो उससे हम अपमानित हुए ऐसा जानकर उक्त उभय व्यक्तियो ने लोगोंपर यदि मानहानिकी नालिशमी तो वह उन्हें फितनी फ- वेगी ? न्यायाधिकारी उन्हें क्या समझायेगा । उक्त तीन दृष्टान्तों द्वारा हमारे पाठकोको तत्क्षण विदित होजायगा कि किसी भी अन्य की मनमानी पालोचना करनेको हर कोई पूर्णतया अधिकृत है। मानहानिका एकट हमने अनापधि तो पढा नहीं और आगे पढ़ेगे पानही सभी सदेह पर मंइतनाम्पटनया ज्ञात होता है कि यदि मेकाले, जान्सन प्रादि डे २ साइन ग्रन्यमणेतृगणों ने निज २ - । - निबन्धमालादर्श। है, इत्यादि वातें सब विचारशील पुरुषोंको पूर्णवया विदित होई अस्तु, यहभी एक बड़ा भारी लाभ मानना चाहिये कि । पाती और सहृदय ग्रन्धपरीक्षकोंके कारण बुद्धिमान् मनुष्योर साधारणलोगोंके समान मूर्ख एवं दुष्ट धनी लोगोंकी खुशामद कर को वा राजकीय उच्चपदांभिपिन जनोंके संमुख हांजी हांजी क लघुताका बोझ उठानेकी कोई आवश्यकता नहीं रहती वरन उन बुद्धिमत्ता अत्यन्त अनुकूल, उचित और शोभादायक जो नि स्पृहता और स्वतन्त्रता है वह उन्हें स्वेच्छानुकूल प्राप्त होती है * * जब से मुद्रणालयोंका प्रचार हुआ तब से यह उतम व्यवस्था मन्यकारों अनुकूल हुई। इग्लैंदमें एतद्वारा सपत्तिमान् हो पुन 'जीवन के शेष दिन स्वर न्यतापूर्वक व्यतीत करनेवाला पहला कमि पोप हुआ है । होमरके महाकाय अनुवाद द्वारा लगभग पचास हज़ारसे अधिक मुद्रा उसे प्राप्त हुई और उन्हीं कारण घर द्वार बाग बगीचे इत्यादि बड़े समारोह के साथ वह रहनेलगा। उस - - T - - And thinks to Homer since ! live and thrise Indebted to no prince or peer alive ऐसे ही सर वाल्टर स्काटको, व्यवहारमें जो १५ लाखका घाटा पायाधा, घर उसने निज उपन्यासादिकी प्रायद्वारा एक एक कोटी तक देदाला। हमारी मा रानीके सनिकटवर्ती राजकवि टेनीसनको प्राप्ति भी ऐसी ही थी । पर्ष दो वर्ष में एक भाषा काव्य रचा कि उनके तीन चार साख होगये। - - न . - अभिमान। -- . 44 . ' , अभिमानधनस्य गत्वरैरमुभिः स्थानुयशश्चिचीपतः'L' अचिरांशुविलासचञ्चला ननु लक्ष्मीः फलमानुपङ्गिकम् ।। ... ' किरातार्जुनीय.। यह विपय मानसशास्त्रका है। मानसशाख उसे कहते है जिसमें मनुष्य के मन और हृदयकी भिन्न २ वृत्तियों का वर्णन कियाजाता है । शारीरिफमें जिस प्रकारसे मानवशरीरक घटक अवयव, रन, मास और अस्थि आदिकी विवेचना रहती है उसी प्रकारसे उक्त शास्त्र, मानसिक धर्मोकी आलोचना कीजाती है। हमारे देशमें इसके पूर्व इस शास्त्र के ग्रन्थ स्यातही प्रणीत हुए हों पर अंगरेजी भापामें अपर शास्त्रों की नाई इस शाखफेभी सर्वजनान्य अनेक अन्य पाये जाते है । सारांश जिसे यह शास्त्र अधीत करनेकी इच्छा हो उसके लिये संमति अंगरेजी भाषाके व्यतिरेक अन्य साधन नहीं है। (२) इस लेखमें उक्न मनोत्ति का विवरण शास्त्ररीत्यनुसार नहीं किया जायगा । अर्थात् उसके स्वरूपविपयक सूक्ष्मविचार, उसकी उत्पत्ति का कारण, उसके प्रतिकारके उपाय प्रादिक वि- पयमें कुछ नहीं लिखाजायगा । तो यहा केवल व्यवहार प्रया- नुसार उसकी आलोचना कीजायगी । अर्थात् उसका मनुष्य में रहना योग्य वा अयोग्य है, उससे लाभ हानि क्या है ? आदिके रि- पयमें सर्व साधारणमें जिस प्रकारसे चर्चा हुआ करती है वैसेही यहां इस विषयपर कुछ विचार प्रदर्शित किये जायेंगे। * नरपर प्राय पणसे घिरकाललो रहनेनाले यगके प्राप्तिकी इच्छा करनेवाला मागी मनुष्य सपत्तिको तृणप्राय गानता है क्योंकि एक तो यह तदिन्फे समाा पवन है और इसके मिया वह उसकी वीरता का देवख अनुपनिक फलाही है।
७२ । निबन्धमालादर्श। (३) अव आदिमें इस विषयपर सर्व साधारणकी जो सम्मति पाई जाती हैं उनका संक्षेपतः उल्लेख होना चाहिये। हम यह पूर्ण तया जानते हैं कि इस लेखके विषयका उक्त नाम देखतेही हमारे बहुतेरे पाठक यह विचारेंगे कि इस विषयपर लिखनेयोग्य नई बात कौनसी है ?.यह तो आवाल वृद्ध सभी जानते है कि अभिमान बुरा होनेके कारण सर्वथा त्याज्य है तो फिर उसके विपयमें लम्बी चौडी विवेचनांकर और अधिक ज्या सिद्ध होगा ? जिस मनुष्य को सवलोग अभिमानी समझते है उसका वे तिरस्कार करते। और उस दुर्गुणके कारण उसके अपर गुणभी बहुधा लुप्तसे हो जाते हैं । संसारमें इस बात के प्रमाण ठौर २ पर पाये जाते हैं; और यही कारणहै कि वयोवृद्ध अनुभवीलोग युवा लोगोंको सदा यही उपदेशमदान किया करते है कि वे सबसे नम्रतापूर्वक बर्ताव कियो करें सो सबको विदितही है । प्राचीन तत्त्ववेत्ता लोगोंने मनुष्यके जो छः रिपु घताये हैं उन्हींमेंसे एक उक्त अभिमानभी है । इन सब बातों को जान बूझकर अब इस मनोविकार की युक्तायुक्तताके विषयमें और क्या विचार कियाजायगा। इसकी अयुक्तता तो 'वि: कार' शब्दमें भलीभाति झलकती है । एतावता वह मनुष्यके श्र- हित का कारणहै सो स्पष्टही है । अब इससे अधिक भलाई बुराई की मीमांसा होनेको और क्या शेपहै । सारांश यह दुसरा प्रति पादन-भी उक्त कैसाही निरर्थक हुा । अस्तु, इस प्रकार से इस विषयपर सवलोग- पूर्वहीसे निर्णय करचुके हैं और अब अधिक विचारने योग्य कुछ है ही नहीं, प्रायः सबलोग ऐसाही विचारेंगे। (४) परन्तु उक्त निर्णय बहुतांशमें सर्वथा सत्यही नहीं है, पौ। इस विषयपर सविस्तर उपपादन करनेके लिये अभी बहुत कुछ बाकी है, सो सर हमारे विज्ञ एवं विवेकी पाठकों को निम्नलिखित प्रबन्धद्वारा ज्ञात होजायगा । इस आगेके प्रतिपादन में आजपर्यन्त के परंपरागत कतिपय प्राचीन मत और सर्व साधारणको सम्मनि . N - ७४। निबन्धमालादर्श । उक्त शहाका समाधान करना कोई कठिन वात नहीहै । क्यालि ऊपर जो निषेध कहागयाहै वह तत्तवृत्ति की अधिकता का कहागयाहै स्वयं उस वृत्ति का ही निपेध नहीं कियागयाहै, और यह यदि ऐसा न होता तो विवाह करना पाप कर्म माना गया होता; 'काम' तीसरा पुरुषार्थ न मानागया होता, और काम; हिन्दु श्रीक आदि पुरानी जातियों में पूजा न हुई होती । इसके सिवा महात्मागणों की कथाओंमें उनके क्रोधावेश प्रभृतिका प्रशंसापूरित वर्णन उपलब्ध न होता । इसके सिवा संसारके व्यवहारमें सामा न्यतः उक्त काम क्रोधादि वृत्तियोंका योग्य प्राकलन हुआहो ऐ वहुत थोड़े उदाहरण प्राप्त होते है। उनकी दुराधर्पता तथा अनर्य हेतुक होनेके छानेक उदाहरण मिलते है। उनके अनर्थक होने से प्रचुर उदाहरण पायेजाने के कारणही लोगोंने उनपर उक्त कटा कर उक्त प्रकारसे उनका एकदेशीय वर्णन किया है । तनिक विचा करनेसे जाना जासकताहै कि उक्त मनोविकार अनर्थकारक कहा नहीं है। परम चतुर परमेश्वरने मनुप्योंमें उनकी स्थिति योंही नई की है । मनुष्यों के लिये उनका अस्तित्व अत्यन्त प्रयोजनीयहै । पर यात इतनीही है कि, मनुष्य सदा उन्हें अपने आधीन बनाये रक्खा करे, और ऐसा कभी न होनेपावे कि यही उनके आधीन होजाय । जैसे घोडेपर पैठना । घोड़ा अपना सामर्थ्य और द्रुतगति को बिलकुल मनुष्यके श्राधीन करदेताहै, और सवारी फग्नेवाला यदि चतुर एवं दक्ष हुआ तो उक्त अधिकारको बहुत उत्तमतया कामम लाताहै सो सब पर विदितहीहै । पर सवारी करनेवाला यदि अनभिज्ञ हुआ तो घोड़े के उक्त दोनों गुण उसके नाशका' कारण होंगे इसमें अणुमात्र भी संदेह नहीं है। * यह प्रथा रोमा क्यालि पम्पानुयायी लोगों में अभी तो पक्षित है। धर्माधिकारी को दिवार पदापि करना चाहिये ।
- - 7 । अभिमान । ৩৪ (५) ऊपर कामादिः मनोविकारोंके.विपयमें साधारणतया पो प्रतिपादन कियागया है वही वर्तमान लेख के विपयस्वरूप रभिमानके विपयमें भी चरितार्थ होताहै । अर्थात् वह स्वयं अनर्थ का कारण नहींहै किन्तु उसकी भलाई बुराई मनुष्यकी भलाई राई परही सर्वथा निर्भर रहती है। तो अब इससे यह सिद्ध हुआ के उन मनोविकार दो प्रकार है । एक तो वेजोविज्ञ एवं चतुरलोगों । पाये जाते है और दूसरे वे जो अबोध एवं मूर्खलोगों में दृष्टिगत तेहै । आगे इनदोनों विपयोंकी यथाक्रम विरेचना कीजाती है । (६) प्रथमतः मूर्यलोगों की बात । पहले इन्हीका वर्णन क- (नेका कारण-'दुर्जनं प्रथमं वन्दे' सर्व प्रसिद्धही है, और इसके सिवा दूसरी बात यह भीहै कि जगनियन्ता की इच्छानुसार सं- सारमें इन्हीं की संख्या अधिकहै । तो पहले पहुपक्षको समादृत करनाही, हमें उचित बोध होताहै । इतने बडे जनसमूहको गर्व एकही प्रकारसे वाधा नहीं करता किन्तु भिन्न २ द्वारोंसे भविष्ट हो पह अन्तःकरणरूप गढको अपने बाधीन, करलेताहै । किसीको अपने बलका अभिमान रहताहै । वह यही समझताहै कि संसार में यदि कोई वलवान् है तो वह मही ह, लोगों को मुझसे बहुत सावधानीपूर्वक वार करना चाहिये, गुझे किसी की कटु उति सहन न होगी, पर मै जिसे जो चाहूं सो कह ऐसा बहुतेरे समझा करते है । यह दोप विशेषरूपसे हमारे मल्लविद्याप्रिय लोगों में अधिक पायाजाता । कोई एक दो महीने अखाडेम याही क्यों न जाय और वदा जाफर कुछ पल प्राप्तको वा न भी करे पर तौभी उसके वात चीत करने और चलनेमादिमें एक विशेप मकारकी ऐंठ दिखाई देनेलगती है ! पर मानलो कि यहा जाकर कोई महान् चलिष्ठ होही गया, और लोहेकी बडी २ सयलें याँही हायसे नवादेनेलगा, या पानी भरे हुए वहे २ हएडे दातोंसे उठानेजग: वीभी उसके उन साहसकार्य प्रशंसाके पान नहीं होसकते। क्योंकि - निवन्धमालादशे। जरहि पतग विमोह पश, भार वहहि खर बृन्द ।। ते नहिं शूर कहावहीं, समुझ देखु मतिमन्द ॥ अस्त; उक्न लेखका यह अभिप्राय कदापि नहींहै कि अखादे जा मल्लविद्याके सेवनद्वारा शरीरसामर्थ्य सम्पादित करना उi किन्तु वर्तमान समयमें तो वह अनेक कारणोंसे अभीष्टहीहै; हमा कथनका तात्पर्य यहीहै कि जो सम्पादित कियागयाहै उसका सदा गर्व मानना मूर्खता का चिह्नहै । दूसरा प्रकार सम्पत्तिकाहै । श उक्त कारण की अपेक्षा अभिमानका कही वढके,कारण होती। मनुष्य कैसाही वलवाम् क्यों न हो, पर उसके पास कुछ माय और उसकी लोगोंमें मान मान्यता न होने के कारण अकेले बजे को कोई नहीं पूछता । पर एक सम्पत्ति हुई तो समस्त जनसम्प पर उसका आतङ्कसा जमजाताहै । थोडा बहुत अधिकार और लक्ष्मीजीकी सहायता मिलजाने पर बापुरे गरीबों का नाश करन तो उक्त पुरुषोंके लिये एक सहज वात होजाती है । अतः बहुते लोग उनसे नितान्त नम्र रहाकरते हैं, और अपर प्राशावद्धलो उनके निकट ठकुरसोहातीके लिये निरन्तर उद्यतही रहाकरते हैं आप बडे उदारहै, श्राप महान् गुणवान्है, आपके दिये इतने लोगों की जीविका होनी है, आदि सच्ची झुठी प्रशंसाके सिवा उनके कर्णहरमे और कोई बनिहीं नहीं पहुँचपाती; हमारे पीछे हमार कृत्रिम कार्यों को देग्य लोग हमारे विषयमें क्या कहते सुनतेहोंने श्रादिका विचार जिन्हें सममें भी नहीं होता, ऐसे लक्ष्मीके ला डिले सपूत यदि अभिमानके आगर बनजाय तो आश्चर्यही क्या है ? इन लोगोंमसे जो लोग निजके परिश्रम द्वारा ऐश्वर्यवान् एवम् विभवशाली हुए हैं उन्हें उक्त अभिमान कुछ अंशमें फवताभीहे । पर जो लोग भूतपूर्व पुरुपोपार्जित सम्पत्तिको पा अभिमान करते है उन्हें तो वह पिक्षमुलही शोभा नहीं देता। क्योंकि भले कुलमें जन्म पानातोवाधीन वातहै, अतः उसका अभिमान मानना . , व्यर्थ अभिमान। ७७ है। ऐसे कुलीन पुरुपोंका अपनी कुलीनताके लिये गर्व मानना वस्थासंग्रहके खच्चरकी नाई हास्योत्पादक है। या यदि ऐसा मानाजाय कि उनके पूर्वजोंकी समुज्ज्वल कीर्तिही उनकी दु- नीतिका विशेपरूपसे कारण होतीहै, तो स्यात अनुचित साहस कहावेगा। क्योंकि स्वच्छ शुभ्र वस्त्रपर जैसे कोई छोटासा दाग । तुरन्तही दिखाई देनेलगता है, वैसेही अभिमानका विषय जो लीनता वही इन वंशजोंकी अपकीर्तिप्रदर्शक होती है। इन लोगों वस्त्रालंकारविषयक गर्वभी ऐसाही होताहै । इस अभिमान की पर्थता सोलन नामके एक प्रसिद्ध तत्त्ववेत्ताने एक स्थानपर जैसी तमतया प्रदर्शित की है वैसी बहुतही थोडे लोगोंने प्रदर्शित की गी। किसी एक राजाने अपना अतुलविभव उसे बडे अभिमान साथ दिखलाया जिसे देख उसने एकही दो शब्दमें उसके अभिमानका पूर्णरूपसे खण्डन करदिया ! उसने कहा “ राजा तेरी अपेक्षा मोर मुझे अधिक विभवशाली प्रतीत होताहै, और उसका अभिमानी होनाभी अधिकतर यथार्थ है !" अस्तु: तीसरा मकार रूपलावण्य का है । एतद्विपयक अभिमान पुरुषों को पिल- फुल शोभामद नहीं होता; वह सर्वथा नियोंका ही विपय है। पति की नीति अपने पर दृढ़ स्थित करनेके लिये वह उनका एक प्रचण्ड साधन है अतः उसे धारण करने तथा बढ़ानेकी चेष्टा उन्दीको शोभा देती है । पुरुपोंको अपनी शूरता, चतुरता अादिका गर्व जैसे शोभामद होताहै पैसेही स्त्रियों को उनका स्पगर्विता होना फरताहै। क्योंकि वह स्त्रीजाति के लिये एक बढिया भूपण माना जाताहै । पर उनकी मृदुता, भीरता प्रभृतिगुण जैसे पुरुपोंको दोप- रूप होतेहै, वैसेही सुभगताका अभिमान और अङ्गविक्षेपादिकी अभिरुची पुरुपजातिके लिये नितान्त निन्धहै । अब अन्तिम और सबसे बड़ा प्रकरण विद्यामा रहगयाहै उसके विपयमें सविस्तर लिखना अभीष्ट जानपडताहै । क्योंकि संमति हमारा देश मानों . निधमालादर्श । घोर निद्रासे सहसा जागृत हुए कैसा जानपडताहै, और उसी यह प्रभाव है कि घरोवर विद्वत्ताके नगाडे बजतेसे दिखाई देते हैं हमारे यहा हमें ज्ञानामृत पिलानेके लिये जो चारोंओर से प्रारम्भ किये गये हैं, उनके अभीसे जो फल दृष्टिपथमें मिल उनसे अनुमान होताहै कि हमारे शिक्षागुरुलोगोंकी इच्छा सफल होगी। ज्ञानामृतका पात्र योंहीं होठोंसे लगा ईमलोगों उसका एक चूंट स्यातही पियाहो. पर इतनेहीमें चारों ओर कैसे श्राश्चर्य कौतूहल दृष्टिगत होनेलगे है। देखिये, स्वयं कालिदास होमर और मिलटन आदिके मुंहमें तमाचे लगानेवाले महान् कवि ईसामसीह, महम्मद जैसोंको एकओर रख धर्म स्थापित करनेपा आचार्यः डिमास्येनीस, सिसरोमभृति भी जिनकी सुरस पाता सुन चित्रार्पितसे होरहें ऐसे प्रचण्डवक्का; वैसेही महान २ पण्डिन शिल्पज्ञ, आदिका समुदाय प्रादुर्भूतहो उसने चारोंओर घोर आन्दो लनसा मचादिया है। इतने थोडे से समयमेंही इन सब उलटफर को देख आगे क्या होगा सो कुछ नहीं जानपड़ता । जव एक स मयावच्छेदद्वारा सहस्रों महाकवियोंका निनाद धरतीपर होनेलगेगा और सहस्रावधि प्रचण्ड वक्ताओंके वक्तृताकी एक साथही गर्जना होने लगेगी तब क्या आश्चर्य कि आकाशमण्डल वसुंधरा पर नाजाय ! साराश उक्त विलक्षण अवस्थाको देख यह कल्पना होतीहै कि, वैवलमें जो लिखा कि संसारके अन्तमें प्रभुईसाम- सीह एक हजार वर्पलों शासन करेंगे सो क्या वह परमसुखका समय नगचाने तो नहीं लगाहै ? उन मभुने अपना पहिला अवतार हमारे एशिया महादेशही लियाथा, तदनुसार अन्तिम बार यदि उन्होंने यही अवतीर्ण होना विचारा हो तो ईशर ही जाने । वात्पर्य हमारे देशमें इस अल्पकालमें विद्वत्ता आदिका जो फैलाव हुआहै, सो कुछ अपूर्वहो है । परन्तु इस विस्तारके अनुसार लोगों ज्ञान एवं विककी शद्धि कहालों हुईहै यह जो जानना चाहेगा उसे 3 - ७ - १ अभिमान। कनिरालेही प्रकारसे संतोप मान लेनापडेगा । हमारे लोगोंकी द्धिका पिलास और तज्जात साहस कार्यकलाप जो ऊपर। कहे ये हैं उनकी यथार्थताका विचार करनेसे विज्ञलोगोंको ज्ञात हो आयगा कि हमलोगों को अभी जो थोड़े कालसे शानका संस्कार चला है तजन्य यह दुर्विकार वहिर्गत होरहे हैं। मनुप्यके तिमिरा- छादित मनमें ज्ञानभास्करकी किरणोंका जव प्रवेश होने लगता तब श्रादिमें गर्वादि दुष्ट मनोवृत्ति उसे किसमकारसे दबाना हती उमझा नीचे सविस्तर वर्णन कियाजाताहै । महर्पि भईहरी की अपने नीतिशतकमें लिखते है कि:- यढा किंचिज्ज्ञोऽहं द्विप इव मदान्यः समभवं तदा सर्वजोऽस्मीत्यभवदवलितं मम मनः। यदा किंचित्किचिबुधजनसकाशादवगतं तदा मूर्योऽस्मीति ज्वर इव मदो मेव्यपगतः॥ "जनमैं यही कुछ थोडा रहुत समझने वूझने लगाथा तब हाथी की नाई मदान्ध ( मदशब्द द्वयर्थी है ) होगयाथा, और यही अभि- गान रखता था कि मैं सर्वज्ञहूं । पर आगे जैसे २ मुझे पण्डित जोगोंके सत्संगसे थोडा २ ज्ञान प्राप्त होतेगया वैसे २ मुझे वि- श्वास होते गया कि मैं मूर्खहूं। इस प्रकारसे मेरा वह मद ज्वरकी नाई क्रम क्रमशः उतरगया। कहना नहीं होगा कि उन पयकी सृष्टि कविके श्रात्मानुभवसे हुईहै । और जिनलोगोंकी दृष्टि यथार्थ ज्ञानलों पहुंच चुकी होगी उन सबको उक्त वातका प्रत्यय आही गया होगा। इसके सिवाजो मनुप्य सम्पर विचार करेगा कि अधीत करने के विपय कितने है, मानवबुद्धि, केसी अल्प है, उसे तुरन्तही वोष होजायगा कि मनुष्यका अपने ज्ञान के लिये अभिमानी होना प्रचण्ड मूर्खता है।
८२ निवन्धमालादर्श। भाग सबसे निन्न मानाजाताई, पर इतनी बडी पांच मील की उंचाई और पांच मीलकी निचाई विद्यमान होनेपर भी यह धरा तल खासा गोलाकारही दिखाई देताहै ! ! इसका प्रत्यक्ष अनुभव चन्द्रविम्बद्वारा होताहै; अर्थात् चन्द्रपर धरती की नाईही पर्वत श्रादि होनेपर भी यहां से उसका किनारा एकसा गोल दृष्टिगत होताहै । वा पृथ्वीका ही पृष्ठभाग देखना हो तो वह चन्द्रग्रहण) समय चन्द्रविम्बों पर छायारूपसे सवको दृग्गोचर होताहै । हिमा लयादि नगाधिराजोंने अपने २ उत्तुङ्ग एवं गगनभेदी हजारों शि खरोंको यद्यपि आकाशमें उपस्थित फररक्खाहै तथापि उक्त ग्रहए के समय चन्द्रविम्वोंपर धरातल की छाया खासी गोलाकार है पड़तीहै । ऐसे प्रचण्ड एवं विशाल पर्वतोंके योगसे भी उसके आकृतिमें कहीं कुछ अणुमात्र शाखासी भी नहीं दिखाई देती तात्पर्य, उक्त दृष्टान्त द्वारा हमारे विज्ञ एवं विवेकी पाठकोंको लक्षि होसकताहै कि पदार्थोंकी उंचाई जैसे सदा सापेक्षही रहतीहै ठी वही वात मनुष्यके ज्ञानकी भी है। उक्त उपपादनसे यह एक बड़ीभारी वात निर्धारित होतीहै कि ज्ञान अनन्तहै। एतावता मनुष्य कैसे अल्पज्ञ एवं क्षुद्रजन्तुको ज्ञान का गर्व मानना विलकुल शोभाषद नहीं होता । अपनेसे जिस कम ज्ञानहै उसके समीप चाहे जैसा अभिमान चल जा सकता पर उसकी यथार्थता विचारी जाय तो यही सिद्ध होगा कि उक्त अभिमान मानना वैसाही तुच्छ एवं नीच हृदयका साक्षी है जैसे कि एक चिवटा मै चिंवटी से वडाहूं मानकर अभिमान करे । यथार्थविद् लोग इसी वातको जानकर अपने ज्ञान का अभिमान नहीं मानते और अपरलोगोंकी अवहेलना वा अप- मान कदापि नहीं करते । वे अपने ज्ञानकी सीमा પારતા । -- अभिमान। '८३ को पूर्णरूपसे जानलेते हैं । इसप्रकारका मनोनिग्रहही तत्वविज्ञका सच्चा चिह्न है, और इसके विपरीत का प्रत्यय अत्यन्त मूर्खताका सूचकहै । इसीलिये किसी चतुर ग्रन्थकारने कहाहै कि तत्ववेत्ता अपनेको ज्ञानशून्य माना करता है और मूर्ख अपनेको सर्वज्ञ माना करता है । इन दोनों प्रकारके उदाहरणभी बहुत कुछ उपलब्ध होसकते हैं। हमारे बहुतेरे पाठकोंको साकेटीसकी यात विदितही होगी । उसने जब सुनाथा कि डेलफायके देवताने लोगोंको विश्वास दिलाया है कि समस्त ग्रीसदेशनिवासी लोगोंकी अपेक्षा साक्रेटीस अधिक चतुर है तव वह बडी उलझन में पडगयाथा । पह यह वात विचारता था कि, मुझे तो जानपडताहै कि मेरा ज्ञान बहुतही अल्प है । और उक्त देवताने मुझे सर्वोपरि ज्ञानसम्पन्न कहाहै अब इन दोनों परस्पर विरुद्ध वातोंका एकसाथ अस्तित्व क्योंकर सम्भूत होसकताहै ? पर आगे इस बातपर वह जैसा २ -मनन करतेगया उसे विश्वास होगया कि जो लोग अपनेको वडा चतुर एवं धुद्धिमान् मानते हैं, यास्तवमें वे अल्पज्ञही रहतेहैं, उनमें और मुझमें विशेष भेद इतनाहीहै कि मैं अपने अज्ञानको समझता हैं और वे उसे नहीं समझते! ऐसाही प्रशसनीय उदाहरण न्यूटन काभीहै । इस महान् पण्डितने ऐसे २ अनोखे आविष्कार संसार में प्रकटित किये पर तौभी उसने अपनी जीवनयात्रा शेप करनेके कुछ वर्ष पूर्व अपने विपयमें यह विलक्षण लेख लिखरक्खाहै "मेरे विपय में लोग कैसेही आश्चर्य चकितहों, पर मुझे तो यही जान पड़ता कि जैसे कोई चालक समुद्र फूलपर क्रीडा करता है और । वहांके चिकने और गोल २ कंकराको चमत्कारिक जान एकत्रित । करता है, मेरी वातभी ठीक वैसीहीहै। जिन्हें मैं नहीं जानता ऐसे । करोड़ों प्रमेयोंका सागर तो न जाने मुझसे अभी कितनी दूरी पर t निवन्धमालादर्श। है !" साराश सब, देशोंमें जो बड़े २ नामी तत्ववेत्तागण होगये है उन सवका पूर्ण सिद्धान्त यही पायाजाताहै । अब उक्त प्रकारके विपक्षका विचार करतेहै । संसारमें ऐसा विरलाही स्थलाहोगा कि जहां इसकी ऊनताहो । इन लोगोंको स्वममें भी अपने शज्ञानका बोध नहीं होता। इसके सिवा उसे जाननेकी इन्हें इच्छाभी नहीं रहतीं । इन लोगोंकी सदा यही इच्छा बनी रहती है कि सबलोग हमें सर्वज्ञताका मान दियाकरें: और इस हेतुकी सिद्धिके लिये ये- लोग अपने भरसक सब विषयों में अपनी पूर्णता एवं दक्षता दिस्व लाने के लिये अणुमात्र कसर नहीं करते हैं । पर यह हो कैसे सकताहै हो इतना अलवत्ते होसकताहै कि लोभवश जिनकी बुद्धि तिमिरा च्छादित होजातीहै उन मूर्खलोगोंको मतारित करने के लिये उन नर पिशाचोंकी उक्त दिखापटी सर्वज्ञता बहुत उपयोगी, होती है । पर साथही यहभी कहना पडताहै कि संसारमें सवही लोग तो निज हिताहित ज्ञानशून्य रहतेही नहीं कि जो उक्तदुष्टों की चालमें आजायें, अन्तमें उक्त मानवरूप राक्षसोंकी धूर्तता कि जिसे वे सर्वज्ञताके श्रावरणके नीचे छिपाये रहतेहैं, सर्वसाधारणको दृष्टिगत होजातीहै, और उनकी अधमताकाउचितफल उन्हें प्राप्त होजाताहै। तात्पर्य विज्ञ और अवोधलोगोंकी समझमें उनमकारकी विभिन्नता,पाई जातीहै।' (७) यहांलो वर्तमान विषयके एक अङ्गकी आलोचना हुई। अर्थात् अल्पज्ञलोगों में जिस प्रकार के गर्वकी स्थिति पाई जाती है उसका वर्णन, हुश्रा । अव, आगे, उक्त मनोवृत्तिकी उस अवस्थाका निर्देश किया, जाताहै जिसमें उसकी दोषरूपता नष्ट हो वह मनुष्य की कीर्ति एवं शोभाका कारण होती है। गर्न के जिन प्रकरणोंका,ऊपर विचार हुआहै वे वही हैं जो हमारी भापा सत्ताजना' 'मराह 'अहंकाRAमति-शति निन्दा 1 अभिमान । व्यञ्जक शन्दो द्वारा मदर्शित कियेजाते है । इसमें कोई संदेह नहीं 'कि ये सर्वथा सदोप होने के कारण विज्ञलोगों द्वारा अत्यन्त त्याज्यहैं । पर गर्वके ऐसेभी कुछ भेदह जो उक्त प्रकारों कैसे निन्य न होने के कारण सज्जन और बड़े नामी लोगोंमें पायेजाते है । श्रव आगे उन्हींका निरूपण किया जाता है। (८) एक भेद तो योग्यरीतिके गर्वका माना जाता है। व्यक्ति विशेपमें जो यथार्थ गुणहों, उनके विपयमें सदा उसका आत्म- रलाधा करना यद्यपि मनुष्य धर्म से वहिः है, अतः उसे सुननेवाले का जीभी उकता जाताहै; पर तौभी उसके विपयमें यथायोग्य गर्व धारण करनेसे मनुष्य सर्वथा दोपपात्रही नहीं होजाता। जो ऐसे मनुष्य के द्वेषी रहतेहैं, वा स्वभावतः जो लोग किसीका उत्कर्ष नहीं देखसकते, उन मत्सरीलोगोंको उक्त यथार्थ गर्व भी दुःसह होताहै सो ठीकही है और साथही यहभी ठीक है कि.वे तदर्थ उसकी निन्दा वा बुराई करनेमें तिलमात्र कसर छोडना अपनी उत्पत्तिको कलङ्कित करने कैसा समझतेहै; पर जो लोग,न्यायीं और सत्यके पक्षपाती होते। उन्हें उक्त यथार्थ गधारकके वर्तावमें अणुमात्रभी दोप नही दीख पडता । इसके लिये व्यवहारगत उदाहरण, ली जिये । प्रत्येक मनुष्य, जो अपनी आय और ऐश्वर्य के अनुसार व्यपना बर्ताव रख अपनी अवस्थाके अनुसार ववादि धारण क- रताहै, उसे ससारमें कोई नाम नहीं रखता । पर उस मर्यादा उल्लतितकर जो व्यर्थमें अपना आतड़ लोगोंपर जमाया चाहताहै, उसका फिसीकारण वश सामने नहीं तो पीछे, लोग, उपहासही करतेहैं, और यही ठीकभीहै । और ठीक ऐसीही अवस्था उसकी भी होतीहै जो अपनी यथार्थ योग्यता की अपेक्षा अधिक विद्वत्ता का धमएड लोगों पर प्रदर्शित किया करता है। पर संसारयें जो 4 । - । निवन्धमाबादर्श। है !" सारांश सर्व देशोंमें जो वडे २ नामी तत्ववेत्तागण होगये हैं उन सवका पूर्ण सिद्धान्त यही पायाजाताहै । अब उक्त प्रकारके विपक्षका विचार करतेहै । संसारमें ऐसा बिरलाही स्थता होगा कि जहां इसकी जनताहो । इन लोगोंको स्वप्नमें भी अपने अज्ञानका बोध नहीं होता । इसके सिवा उसे जाननेकी इन्हें इच्छाभी नहीं रहती । इन लोगोंकी सदा यही इच्छा बनी रहतीहै कि सबलोग हमें,सर्वज्ञताका मान दियाकरें; और इस हेतुकी सिद्धिके लिये ये लोग अपने भरसक सव विषयों में अपनी पूर्णता एवं दक्षता दिख- लाने के लिये अणुमात्र कसर नहीं करतेहै । पर यह हो कैसे सकता है। हां इतना अलवत्ते होसकताहै कि लोभवश जिनकी बुद्धि तिमिरा च्छादित होजातीहै उन मूर्वलोगोंको प्रतारित करने के लिये उक्त नर पिशाचोंकी, उक्त दिखापढी सर्वज्ञता बहुत उपयोगी होती है ।, पर साथही यहभी कहना पडताहै कि-संसारमें सवही लोग तो निज हिताहित ज्ञानशून्य रहतेही नहीं कि जो उक्तदुष्टों की चालमें पाजावें, अन्तमें उक्त मानवरूप राक्षसोंकी धूर्तता कि जिसे, वे सर्वज्ञताके आवरणके नीचे छिपाये रहतेहै, सर्वसाधारणको दृष्टिगत होजातीहै, और उनकी अधमताका उचितफल उन्हें प्राप्त होजाताहै। तात्पर्य विज्ञ और अबोधलोगोंकी समझमें उक्लमकारकी विभिन्नता,पाई जाती है। (७) यहांलों वर्तमान विषयके एक अङ्गकी आलोचना हुई। अर्थात् अल्पज्ञलोगों में जिस प्रकार के गर्वकी स्थिति पाई जाती है उसका वर्णन हुआ । अव आगे उक्त मनोवृत्तिकी उस अवस्थाका निर्देश किया जाताहै जिसमें उसकी दोपरूपता नष्ट हो वह मनुष्य फी कीर्ति, एवं शोभाका कारण होती है । गर्व के जिन प्रकरणों का,ऊपर विचार हुअाहे वे वही है जो हमारी भापामें 'उन्मचता' 'घमण्ड' 'अहंकार' 'शहंमति' प्रभृति निन्दा' -- --- , अभिमान ।। । - व्यञ्जक शब्दों द्वारा प्रदर्शित कियेजाते है । इसमें कोई संदेह नहीं कि ये सर्वथा सदोप होने के कारण विज्ञलोगों द्वारा अत्यन्त त्याज्य हैं । पर गर्वके ऐसेभी कुछ भेदहैं जो उक्त मकारो कैसे निन्द्य न होने के कारण सज्जन और बड़े नामी लोगोंमे पायेजाते है । अब भागे उन्हींका निरूपण किया जाता है। + (-) एक भेद तो योग्यरीतिके गर्वका माना जाताहै | व्यक्ति विशेपमें जो यथार्थ गुणहों, उनके विपयमें सदा उसका आत्म- रलाघा करना यद्यपि मनुष्य धर्म से वहिः है, अतः उसे सुननेवाले का जीभी उकता जाताहै; पर, तौभी उसके विपयों यथायोग्य गर्व धारण करनेसे मनुष्य सर्वथा दोपपात्रही नहीं होजाता। जो ऐसे मनुष्य के द्वेपी रहतेहै, वा स्वभावतःजोलोग किसीका उत्कर्ष नहीं देखसकते, उन मत्सरीलोगोंको उक्त यथार्थ गर्व भी दुःसह होता है सो ठीकही है और साथही यहभी ठीक है कि वे तदर्थ उसकी नेन्दा वा बुराई करनेमें तिलमात्र कसर छोडना अपनी उत्पत्तिको कलङ्कित करने कैसा समझतेहै; पर जो लोग न्यायी और सत्यके सिपाती होतेह उन्हें उक्त यथार्थ गर्वधारकके वर्तानमें अणुमात्रभी तोष नही दीस पडता । इसके लिये व्यवहारगत उदाहरण, ली जेये । प्रत्येक मनुष्य, जो अपनी आय और ऐश्वर्य के अनुसार अपना वर्ताव रस अपनी अवस्था अनुसार वस्त्रादि धारण क- ताहै, उसे संसारमें कोई नाम नहीं रखता, । पर उक्त मर्यादा उल्लवितकर जो व्यर्थमें अपना आतङ्क लोगोंपर जमाया चाहताहै, उसका किसीकारण वश सामने नहीं तो पीछे लोग, उपहासही करतेहै, और यही ठीकभीहै । और ठीक ऐसीही अवस्था उसकी नी होती है जो अपनी यथार्थ योग्यता की अपेक्षा अधिक विद्वत्ता का घमण्ड लोगों पर मदर्शित किया करताहै। पर संसारमें जो - ८६ निवन्धमालादर्श । अपनी यथार्थ योग्यतानुसार वर्ताव रखताहै वह जैसे पित न किया जासकता तद्वत् जो अपनी योग्यतानुरूप अपने यथार्थगुर का अपने मनमें अभिमान मानताहै वहभी दूषित नहीं होसकता पर यह बात सर्वसाधारणके विपयमें, साधारणतयाही कही ज सकतीहै । गुणवान् लोगोंमें अग्रगण्य होनेके कारण लोग जर पूज्य माने जाते है, और सवलोग जिनकी मशंसा करनेमें अप महत् प्रतिष्ठा मानतेहैं उनकी बात तो उक्त बातसे कहीं बढ़कर सामान्य प्रकारके नामीलोगोंके विपयमें तो इतनाही दीखपडता कि उनका यथार्थ गर्व उन्हें दूपित नहीं करता; पर उक्त कैसे वे जन मण्डलीको वह दोपावह न होकर उलटा उनकी विशेषशोर का कारण होताहै । इसके उदाहरण स्वरूपमें सम्राट राजाकी वा कही जा सकतीहै कि उसके अधिकाधिक विभव एवं ऐश्वर्यय प्रदर्शित करना उसकी अधिकतर शोभाका सहायक होताहै। दृष्टान्तको जो लोग यथार्थ समझेंगे उन्हें भिन्न २ देशोंमें महान् ग्रन्थकारादिकों ने आत्मश्लाघाके विषय में जो लिखाहै सो प तृणमात्र भी आश्चर्य न होगा और पढते समय हृदयवृत्ति किर प्रकार की होनीचाहिये सो भी उन्हें ज्ञात होजायगा । अस्तु भर नीचे इनके उदाहरण स्वरूपमें कुछ बातें लिखी जाती हैं। 'यह बात मायः सबलोग सुनचुके होंगे कि इंग्लैंडमें अनुमान दोस वर्षके पूर्व मिल्टननामका एक बड़ा नामी कवि होगयाहै । इस कविके लेखमें आत्मश्लाघा संयुत उल्लेख ठौर २ पर पायेजातेहैं। इस कविने जव जाना कि मेरी नूतनताके कारण मेरे नरसिक समकालीनलोग मेरी विलक्षण प्रतिभाकी योग्यता नहीं समझसकते तब इसने अपने लेखमरन्धमें एकस्थानपर यह लिखा फि"मैं इससमय यदि जन्मन ग्रहण करता किन्तु इसके पूर्वही जन्मग्रहण करचुकता तो बहुतही ८७ अभिमान । उत्तम हुआ होता" *चरम अवस्थामें जब इस कविके पक्षको समूल जाश होगया और विपक्षियों की जयहुई जो कि उसके अत्यन्त विपत्तिका कारण हुई उसका भी इसने अपने काव्य में स्थान स्थान पर उल्लेख कियाहै । युवावस्थामें अत्यन्त अभ्यास करने के कारण अन्तमें इसके नेत्र जातेरहे। जिसके कारण इसे अपने बुढ़ापे के दिन बडे दुखके साथ काटना पडे, इत्यादि घटनाओंका वर्णन इसने दो मुख्य स्थानों पर कियाहै । एकतो अपने महाकाव्यके तीसरे सर्गके आदिमें और दूसरा 'स्यामसन्एगोनिसस्' नामक नाटक के भारम्भमेंही पाया जाताहै । इसके उक्त दोनों स्थलोंको-पढ़ जिनके हृदय करुण और उदात्त रससे व्याकुल नहीं होजाते उन्हें धन्य पुरुष मानना कोई अनुचित वात नहींहै । इसके सिवा दूसरा उदा- हरण बर्डस्वर्थनामक कविका है । यह कवि अभी अनुमान तीस तीस वर्षके पूर्व लोकान्तरवासी हुआहै । इस कवि की योग्यता यद्यपि उक्त कविके तुल्य न थी, तथापि वर्तमान शताब्दीमें इंग्लैंड में जो कई महान् २ कवि होगयेहैं उनमें यह सर्वसाधारणके मतसे प्रधान मानाजाताहै । पर यह मान इसे अब इधरही माप्त हुआहै । इसके जीवितकालमें छोटे वडे रसिक अरसिक विद्वान अबोध सय लोग इसकी कविताका अत्यन्त उपहास किया करतेथे । पर यह उदात्तचित कवि उन सबके व्यर्थ वकवाद की उपेक्षा कर भावी समयपर अपनी प्राशाको स्थितकर बड़े साहससे कालातिपात करता या; और अन्तमें उसीकी जीत हुई । तात्पर्य यहहै कि इस फक्केि * इसके विपयमे कुछ २ ऐसीही सम्मति इसके विपक्षी जानसन्नमी एक निरालेही दग से लिखी है " His forb is not the greatest of heroic poems only becausc it is uot the first." Liſc of Miltou -- निबन्धमालादर्श। लेखमें भी आत्मश्लाघा संयुक्त वर्णन उपलब्ध होतेहै। हमारे संस्कृ के कवियों में भी उक्त वातका प्रभाव नहीं है । अनुमान से यह वा जानी जातीहै कि उक्त वर्डस्वर्थ की नाई इमारे सुप्रसिद्ध कवि भवभूति की अवस्था हुई होगी । सामान्यतः पण्डितजन यद्यपि यह समझते कि भोजराजाके आश्रयमें जो कविरनथे उन्हीं में कालिदासादिक की मण्डलीमें उक्त कवि भी था तौभी अनुसंधानशील लोगोंने यह बात निश्चित करदीहै कि उक्त कविरत्नावलि में भवभूति न था। भवभूति के ग्रन्थों में कहीं २ ऐसे उल्लेख पायेजाते है जिनसे यह स्पष्ट होताहै कि उसे गुणज्ञोंकी प्रशंसऔिर राजसत्कार दोनों नहीं प्राप्त हुए। उलटे अरसिकों द्वारा वह अवकृत कियागया ऐसाही बोध होता है इसके प्रत्यक्षममाण स्वरूपमें नीचे एक श्लोक उद्धृत कियाजाताहै। ये नाम केचिदिहनः पथयन्त्यवज्ञां जानन्तु ते किमपि तान् प्रतिनैप यनः। उत्पत्स्यतेऽस्ति मम फोपि समानधर्मा कालो ह्ययं निरवधिविपुला च पृथ्वी । मालतीमाधव : "जो लोग चारों ओर मेरी अवज्ञा विस्तृत करतेहै उन्हें दृढ़तया समझलेना चाहिये कि उनके अर्थ मेरा यह यत्नही नहीं है । मुझे दृढ़ भरोसा है कि जिसके मनोधर्म मेरे मनोधर्मकी, नाई होंगे ऐसा, कोई न कोई कहीं होवेहीगा वा आगे उत्पन्न होगा क्योंकि काल अनन्तहै और पृथिवी विस्तीर्ण है ।" उक्त श्लोकका अनुवाद अंगरेजीमें यदि पद्यस्वरूपमें कियाजाय तो वह वर्डस्वर्थ काही लिखाहुआ है यह कहनेको कोई तनिकभी न- हिचकेगा, क्योंकि दोनों में ऐसीही घनिष्ठ साम्यता पाईजाती है। साराश अपने समयके गणानभिज्ञलोगों की निर्भमना उक्त महान अभिमान | हवियोंके ग्रन्थों में दृष्टिगत होती है और उनके उक्त लेख ऐसे प्रभा- पोत्पादक है कि उन्हें पढ़ सहृदय पाठक अत्यन्त तल्लीन होजातेहै। रसीही सुतरां इससे कहीं बढ़के उद्दण्डता संस्कृतके अर्वाचीन कवि गडितराज जगन्नाथ पण्डितकी कवितामें पाई जाती है। इसके कतिपय उदाहरण नीचे उल्लिखित किये जाते है। भामिनीविलास' के प्रथमभागमें प्रायः समस्त अन्योक्तिही हैं, वहां आदिमेंही पण्डितराज गर्जना करते है:- दिगन्ते श्रूयन्ते मदमलिनगएडाः करटिनः करिएयः कारुण्यास्पदमसमशीलाः खलु मृगाः। इदानी लोकेऽस्मिन्ननुपमशिखानां पुनरयं नखानां पाण्डित्य प्रकटयतु कस्मिन्मृगपतिः ।। " मदोदकसे जिनके गण्डस्थल मलीन होगये है ऐसे हाथी दिगन्तरमें है ऐसी जनचर्चा सुनीजाती है और आसपास केवल करुणापात्र हस्तिनी तथा क्षुद्रजन्तुही दृष्टिपथमें आते है तो ऐसे स- मयमें मृगराज सिंह अपने अत्यन्त तीन नखोंका पाण्डित्य कहां प्रकटित कर चैसेही उक्त अन्य के अन्त अन्त में श्रामूलादनसानोर्मलययलयितादाचकूलात्पयोधेः * उक्त अन्योक्ति कवि ने निज के विषय में लिसी है । उसका अभिप्राय यही है कि प्राचीनकाल में कालिदासादि महान् कवि होगये पर थर उनके से कोई नहीं पायेजाते और जो पाये जाते हैं ये यापुरे 'कारण्यास्पद' फरणा करो के योग्य, पार शुद्र पाये जाते है । ऐसी अवस्था में अब हम यदि किसी से सामना किया चाहे तो करें फिससे १ उरलोक का भावार्थ किसी भापा कवि ने यों लिखा है लोग कह दिग अन्त यस मदमत्त करी मदभन्यु घुचाते सरिधिवास करें करिणीर मृगानसिकै फरणाहिय थाले । समति गाय कहा जगतो असमान चले प्रगटै मनमासे गर्जत पेसरि पॉइतराजत नित्य मनोमन इंशमगासे ।।
है दूसरा कौन है ?) निबन्धमालादर्श। यावन्तः सन्ति काव्यप्रणयनपटवस्ते विश चदन्तु" मृद्धीकामध्यनिर्यन्ममृणमदधुरीमाधुरीभाग्यभाजां वाचामाचार्यतायाः पदमनुभवितुं कोऽस्ति धन्यो मदन्यः । "सुमेरुपर्वतके मूलसे लगाकर मलयवेष्टित सागरके कूलपर्यन्त (अर्थात् समस्त भारतवर्षमें ) जो काव्यरचना निपुण हों वे सब निश्शकहो कहै कि द्राक्षसम्भूतरसके समान अत्यन्त मधुरशीला वाणीके स्वामित्वपदका अनुभव लेनेवाला मदतिरिक्त अपर कौन धन्य पुरुष है ? (अर्थात् मेरे समान रसपूरित काव्य करनेवाला ऐसाही अन्तिम श्लोक- शास्त्राण्याफलिवानि नित्यविधयः सर्वेऽपि सम्भाविताः दिल्लीवल्लभपाणिपल्लवतले नीतं नवीनं वयः। संप्रत्युज्झितमासनं * मधुपुरीमध्ये हरिः सेव्यते सर्व पण्डिवराजराजितिलकेनाकारि लोकाधिकम् ॥ " समस्त शास्त्रोंका अध्ययन किया, सकल नित्य विधि भी साधे, दिल्लीनरेशके श्राश्रित रहकर युवावस्था व्यतीत की (अर्थात् वादशाहने अत्यन्त समारत किया) और अव विपयवासनामों का परित्यागकर मथुराक्षेत्रमें हरिकी सेवा करताहूं सारांश पण्डित- राजश्रेणीके तिलक स्वरूप (जगन्नाथने) ऐसा कौनसा लोकोत्तर कार्य है जो नहीं किया? साहित्यके अद्वितीय ग्रन्थरस गङ्गाधरके आदिमें श्राप लिखते हैं:- निर्माय नूतनमुदाहरणानि स्पं काव्यं मयाऽत्र निहितं न परस्य किश्चित् । कि सेव्यते सुमनसा मनसाऽपि गन्धः कस्तूरिकाजननशनिभृता मृगेण ॥ + कहीं कही रसभरी' भी पाठ पाया जाता है। * कहीं यही सम्पत्युज्झितघासन' भी पाठ पायाजाता है . , -- A अभिमान । १ - "मैंने इस ग्रन्थमें नये उदाहरण रचकर संनिविष्ट किये हैं, भन्यकृत उदाहरण नाममात्र को भी नहीं लिखे, क्योंकि जिस मृगर्ने कस्तुरी उपनानेकी शक्ति होती है वह पुष्पके सुगन्ध की पर- वाहही क्या करता है ?" (बलिहारी है इस दर्पोक्ति की) '' हमारे विज्ञ पाठकों को यह लक्षित होही जायगा कि उक्तश्लोकों में पण्डितराज की दिगन्तर व्यापिनी समुज्ज्वल कीर्ति प्रत्यक्षरूप से विद्यमान है। अब मराठी भापाके कवियोंके विपयम विचारांश कियाजाता है । अन्यभापा करियों की अपेक्षा इनका ढंगही कुछ निरालाहै अर्थात् उन्न भाषामें जो कवि हुए है वे मायः साधु एवं भगवद्भक्तही रहे है एतावता उनकी कवितामें उन आत्मश्लाघापूरित उल्लेख कैसे उल्लेख प्रायः नहीं पाये जाते क्योंकि साधु और अहंकारमें परस्पर अत्यन्त विरोध रहता है सो सव पण्डितलोग जानतेही है। इन कवियों के काव्यमें काव्यताका गर्व नहीं पायाजाता तो भी तुका-- राम फैसॉन निजके विपयों जो स्थान स्थानपर लिखा है उससे उनकी आत्मश्लाघा स्पष्टरूपसे जानी जाती है । इसके सिवा उडा *श्रकार बादशाह को सबोधन देकर लिखाहुधा एक श्लोक हमें उपराध हुया है वह यह है जगदलाभूपते ! वदति यद्यपि त्वां नृप मत तु हरिशर्मणो हरिरसि त्वमेव ध्रुवम् । अकबरमहीरवर ज्वलदघाँसुरमासत्त प्रजा सह जात्मना कथमयान्यथारक्षिता उहरिशर्मा न जाने कौन है ? - ६२ निवन्धमालादर्श । कैसी श्रात्मश्लाघोप्ति मोरोपंत, रघुनाथ पण्डित, और रामजोशी के ग्रन्थमें विशेषतः पाई जाती है। तौइस प्रकारसे अंगरेजी, संस्कृत और भापाके कवियोंने आत्म रचित ग्रन्थों में स्थान स्थानपर स्पष्टरूपसे जो श्रात्मश्लाघा वा दति लिखी हैं उनमें से थोडीसी ऊपर उल्लिखित' की गई। अब इसको पढ ,हमारे बहुतेरे पाठकगण बहुधा-यह विचारेंगे कि सब सज्जन लोग जो कहा करते हैं कि अपने मुंह अपनी प्रशंसा कधी न करनी चाहिये, क्योंकि वैसा करना मूर्खता का चिह्न है सो वह और उनकथन परस्परानुमोदित कैसे होसकते हैं ? उक्त कविगणों ने ऐसे ज्ञानी होनेपर भी ऐसे अनुचित कर्म क्यों किये ? उनका अनुष्ठान न जाने उन्हें उचित कैसे जानपड़ा? इसके उत्तर में हम यही कहते है कि उक्त नियम यद्यपि सामान्यतः यथार्थ है तौभी बहुत स्थानो पर वह अपवादस्वरूप होजाता है। विचारने की बात है कि निजकी प्रशंसा यद्यपि उचित नहीं है तथापि यम, गिवन् मिल्लमभृति ग्रन्थकारोंने अपनी जीवनी स्वयं लिखी हैं; तदर्थ उन्हें कोई दोष नहीं देता सुतरां वे स्वरचित जीवनचरित होने के कारण लोग उन्हें बडे चाबसे पढ़ते है। उसी प्रकारसे सीजर और बाबरने अपने २ ग्रन्थमें निनके पराक्रम का स्वयं वर्णन कियाहै तथापि वे सदोप न माने जाकर जगत्प्रियही माने गये हैं। अव देखा जाय कि उक्त प्रतिपादनसे 'क्या स्पष्ट होताहै? अर्थात् यही स्पष्ट होताहै कि निजके विषयका वर्णन यदि यथार्थ हो तो वह दोपपात्र नहीं होता । इसके सिवा दूसरी बात यह • खेदका विषय है कि समय, स्थान तथा अवस्थाकी अनुकूलता न होने के कारण हिन्दीके कधियों के विषय में कुछ भी नहीं लिसागया। हिन्दी के कवियों का वर्णन भी कुछ होजाता तो उत्तम होता। परमेश्वर की कृपासे यदि यह लेख कृतविध लोगों को स्वीकृत हो प्रयोजनीय माना जायगा तो हितीय सस्करण के समय उन अनता भी पूर्ण करदी जायगी। Sh ', अभिमान । के गुणवान् लोगोंके भावते होने के कारण जब पहले सेही- न्हें मानमान्यता माप्त होचुकती है तब उन्हें आत्मश्लाघा के नाश्रयकी कोई आवश्यकताही नहीं रहती । गुणवान् लोग सत्परी- सकों की प्रशंसासे सन्तुष्ट हो अपने परिश्रमों को सफल मान वस्थ रहते है । पर जब ऐमा नहीं होता अर्थात् गुण की चाह नही होती किन्तु उसका उपहास और अपमानही होता है, तब नैसर्गिकी सुरभिणः कुसुमस्य सिद्धा मूर्ध्नि स्थितिर्न चरणैरवताडनानि ॥ "सुगन्धित पुष्पों की प्रकृतिसिद्ध योग्यता यही है कि वे सिर- पर धारण कियेजायँ, नकि पददलित किये जायें" इस नियम को भूल जवे लोग किसी प्रचण्ड ग्रन्थकर्ताकी अवज्ञा कियाचाहते है, तव अपनी योग्यता प्रदर्शित करने के लिये आत्मप्रशंसा के व्यतिरेक उसे उपायान्तरही उपलब्ध नहीं होता । वह ग्रन्थकार यदि वैसा न करे, तो असामान्य तेजसंपन्न हीरा भी जैसे - वोध एवं मूर्खलोगों की उपेक्षा के कारण लुप्त हो खोजायगा, उसी मकार से उक्त ग्रन्यप्रणेता के गुण अप्रसिद्धहीं रहेंगे। ऊपर जिन कवियों के ग्रन्थों से पद्य उद्धृत किये गये हैं प्रायः उन सबको अपमान की घोर यन्त्रणा भोगनी पडी है तभी उन लोगों ने उसके सम्पन्न से उक्त दर्पोक्ति प्रकटित की हैं । जब हम इस प्रकार से विचार करते हैं तर सहसा उनपर दोप नहीं आरोपित करसकते। इसके सिवा ऊपर एकबार कही चके है कि अपनी योग्यता के अनुसार बढिया कपडे पहिरना जैसे अनुचित नहीं मानाजाता, और लोग उसे बुरा नहीं कहते, उसी प्रकार से ग्रन्थकार लोगों का सचा अभिमान निन्य नहीं माना जाता । इस मकार से जय विचार कियाजाता है तो यही प्रतिपादित होता है कि जो ग्रन्थ- रचयितागण जगत्पूज्य माने जाते हैं उनका आत्माभिमान राजा- निबन्धमालादर्श। • धिराजाओं के अतुल विभव की नाई कभी सदोप नहीं मानाजात वरन वह उनके भूपणका कारण मानाजाता है । पर इतनाही अलम् न होगा । ऊपर जो कई कारण प्रदर्शित किये गये हैं वे पूर्वोक्त प्रात्मश्लाघा को सदोप समझ उसकी सदा पता दूर करने के अभिप्राय से ही कियेगये हैं। अब यह दिखलाय जाता है कि प्रायः सर्वसाधारण या निदान रसिकजन उसे वैसा कदापि नहीं मानते । जैसे किसीके यावत् गुण दोप का वर्णन करना चित्रकार वा मूर्तिकार की कला के सदृश है; अर्थात् उन दो शिल्पी जिस प्रकार अविकलरूप से प्रतिमा उतारते और बनाते हैं ठीक वही काम गुण दोप विवेचकों का भी है। अब ऐसा मानल कि जिस किसी को अपनी प्रतिकृति वा प्रतिमूर्ति उत्कृष्ट वनवान हो वह बहुधा परमोत्कृष्ट चित्रकार वा मूर्तिकारकेही निकट जावेगा पर यदि उक्त परमोत्तम चित्रकार वा मूर्तिकारकोही यह इच्छा है कि अपनी कीर्तिको चिरस्थित करने के हेतु अपनी एक तसवीर वा मूर्ति अवश्य वनवानी चाहिये तो फिर उसे किसके पास जाना चाहिये ? ऐसा साहसी उसे कौन मिलनेवाला है, कि जो उसका यथेष्ट काम करसके ? और वह काम जैसा अत्युत्तम चाहिये वैसा अपर कौन करसकेगा ? ग्रीसदेशके इतिहास में तदेशीय एक सर्वो- परि मूर्तिकार के सम्बन्ध से यह वात लिखी पाईजाती है कि आ- थेन्स नगर में जब एक विशाल देवालय बन रहाथा और उसकी वाहिरकी महेराप में वहां के देवों की मूर्ति खचित की जातीर्थी उसी गडवड में उक्त मूर्तिकारने एक अपनी और एक अपने मालिक की * यह मूर्तिकार फिडियस है । कहाजाता है कि श्राज पर्यन्त इसके समान कोई मूर्तिकार हुआही नहीं। इसकी बनाई हुई जुपिटर (इन्द्र) श्रादि देवताओं की मूर्ति अधावधि यही सावधानी से रक्षित हैं, उन्हें देख भाजपर्यन्त हजारों कारीगर लोगों ने दातों में अगुली दवाई हैं। यह शिल्पी पेरिलीज़ का परम मित्र था। इसीकी एक मूर्ति उसने अपनी मूर्ति के साथ बनाई थी जिसका वृतात शालिवाशा अभिमान। 8५ मूर्ति बनाकर वहां खचित करदी और यह बात उस समय किसीको मालूम न होनेदी । पर आगे जब यह वात उसके विपक्षीलोगोंको विदित हुई तब उन लोगोंने तदर्थ उसपर अभियोग उपस्थित कर उसे सरकारसे घोर दण्ड कराया । अभिप्राय यहहै कि जो लोग महान् विख्यात होजाते है उनमें ऐसा स्वाभिमान कईवार दृग्गोचर होता है । पर हम समझते है कि जो सच्चे रसिकहै वे तदर्थ उक्त मत्सरीलोगोंकी नाई उनसे विरोध कदापि नहीं मानते वरन उन्हें अधिकतर सत्कृत करतेहैं । अव हम इस सदृशताको उक्त कवियों की ओर घटित करके कहते हैं कि जैसे फिडियसकी मूर्ति वा रे. फीलकी+ प्रतिकृति वनवानाहो तो वह काम फिडियस वा रेफील के समान और किसीसे कदापि न बनसकेगा, वैसेही पण्डितराज का मिलटन कसे महान् कविके वाणीकी मधुरता नितान्त उत्तम- तया वर्णित करनीहो तो वह काम स्वयं उनकी वाणी जितनी सरसतासे संपादित करसकेंगी वैसा अन्य किसीसे कदापि नही 'होसकेगा । सर्वसाधारण यद्यपि अपने मुंह कियेहुए अपने वर्णन को बुरा मानते है और उसे पढ़नेमें मुंह मोडते है, तथापि उक्त जैसे मसंगों पर उस वर्णनकी मधुरता और सचोटीसे चित्तवृत्ति ऐसी तल्लीन होजातीहै कि उस आनन्दातिभरमें पाठकोंका लक्ष दोपकी ओर जाही नहीं पाता । साराश जिस प्रकारसे समरभूमिमें महान् चीरोंकी वीरोक्ति यात्मश्लाघा संयुक्त होनेपर भी सुननेवालेका जी उनसे उकताता नहीं वरन उन्हें वे बडे उत्साहसे श्रवण करते हैं। वा मानवती स्त्रियोंकी रूपगर्वता जैसे उनकी मुन्दरताको विशेप रमणीक करती है और उनकी निर्भर्त्सनापूरित उक्ति उनके वल्लभों ।+ रेफील भी फिडियसको नाई अपनी विद्याम अत्यन्त निपुण होगयाहै। इसके पनाये हुए चित्र अमीलों रोमनगरमें प्रस्तुतहैं । असरय धनके लोभसे भी तत्रस्य लोग उसका देश स्वीकृत नहीं करते। इसके विपयमें भी कहाजाताहै कि मामलों इसके समान कोई चित्रकार नहीं हुआ।
. निवन्धमालादशे। को अधिकतर हृद्यवोध होती हैं, वैसेही रसिकजनभी जगत्पूज्ये कवीश्वरोंकी आत्मदर्पोक्ति पर बहुतही रीझते हैं । वे उन्हें बार बार पढ़ते हैं पर कभी तृप्तही नहीं होते; जव २ उन्हें पढ़ते हैं तब.२ अधिकाधिक तन्मय होते जाते है। (8 ) यहांलों यह वात दिखलाई गई कि मनुष्यका यथार्थ गुणों के लिये अभिमान मानना दूपित नहीं है । इस लेखका यह एक भेद हुआ। इसके सिवा गर्वके और भी कई भेदहैं कि जो अदोष स्वरूप मानेजाते है जैसे स्वाभिमान, कुलाभिमान, जातिका अभि.' मान, देशाभिमान आदि इनकी यथेष्ट विवेचना यहां स्थानाभाववे कारण नहीं होसकती। फिर कभी अवकाश मिलनेपर इसके विपर में स्वतन्त्ररूपसे आलोचना की जायगी। अब अन्तमें इस विपर पर और कुछ थोडे विचार प्रदर्शितकर इस लेखको शेप करते हैं (१०) इसी निवन्धके आदिमें हम यह बाते दिखलाही चुके हैं कि परमेश्वरने मनुष्यमें जो भिन्नर वृत्ति निर्मित की हैं वे व्यर्थ वा अनर्थमूलक नहीं है। किन्तु अपर शरीरावयवकी नाई वे मनुष्य का हित साधन में सहायकहों इसी अभिप्रायसे वे मनुष्यको दीगई हैं। पर कभी २ यहभी देखाजाता है कि मनुष्यकी अविवेकताके कारण वह उसके हितकी वाधक होतीहै । यही बात वर्तमान भा' लोच्य विषयके विषयमें भी चरितार्थ होती है । जैसे उचित समय पर मनुष्यको क्रोध अत्यन्त आवश्यकहै-अर्थात् जिस समय कोई मनुष्य योही किसीकी छेड़छाड़ करे वा व्यर्थमे उसे किसी प्रकार की हानि पहुँचानेकी चेष्टा करे, उससमय उक्त मनुष्यको उक्न नरा- धम, दुष्टात्मा, नीचचेताका दमन अवश्यमेव करना चाहिये । वैसे ही बुद्धिमान् मनुष्यके लिये यह भी उचितहै कि जो नरपिशाचे उसकी सच्ची योग्यताको सर्वसाधारणमें कलङ्कित करनेके लिये यत्न करताहै उसके साथ उसे साभिमानही रहना चाहिये। ऐसे समय पर सरलस्वभाव सज्जनको यही समुचितहै कि वह अपनी ।
ग -- अभिमान । ६७ बुद्धिसे पूर्ण काम ले, और अपनी ऋजुताको तिलाञ्जलि दे उक्त संज्ञारहित शठको पददलित करे । ऐसे समय पर शिथिलता करनेसे कभी कभी सज्जनको जो हानि उठाना पडती है वह मरणजन्य दुःखसे कहीं बढके होती है । उक्त लम्बे चौडे विवरणका आशय हमारे यथार्थविद् पाठकों को लक्षित होहीचुका होगा वह यही है कि जब कोई किसीको व्यर्थमें दवाया चाहे तव उसे उचित है कि उसके अज्ञान एव दुरा- ग्रहजन्य दूपणोंका खण्डनकर अपनी साभिमान रक्षा करे। एसा करनेसे उसकी निजकी भलाई तो होवेहीगी पर इसके सिवा जग के और भी वडे २ उपकार होंगे। । साराश उक्त मनोधर्म मनुष्य के लिये परमोपयोगी है । उक्त मनोधर्मका अस्तित्व जिस मनुष्यमें नहीं रहता वह मत्सरी एवं उप करनेवाले मनुष्यके कपट कार्यकलापोंको देख शीघ्रही गतौर्य होनाता है और अन्तमें उसे अपने समस्त गुणोंसे हाथ धो बैठना पडता है । एतावता 'नीतिशतक में' पुर्णानुभवी भर्तृहरीजी लिखने हैं कि:- कथितस्यापि च धैर्यवृत्तेर्न शक्यते धैर्यगुणः प्रमाईम् । अधोमुखस्यापि कृतस्य वह्वेर्नाधः शिखा याति कदाचिदेव ॥ 'जिसका मानस गम्भीर है उसका लोग कैसेही अपमान क्यों न करें पर वह अपने प्रकृतिजात धैर्यगुण का कदापि परित्याग नहीं करता । जैसे प्रज्वलित अग्निको उलटादो तौभी उसकी ज्वाला ऊपरहीको रहती है नीचे नहीं जाती। + ससार का पूर्ण अनुभव लेकर महर्षि महरिती ने कहा है कि नगन में सप प्रकार के माप के लिये मशा प्रचलित है पर जो अधमाधम निप्पयोजन दुसरे को हानि पहुँचानादी अपने जन्म का प्रधान अभिप्राय समझता है उसके लिये कोई सज्ञा उपाय नहीं होगी वह मगारहितही है " ये मुगन्ति निरपत पर- दिसते न जानीमदे'। - सम्पत्तिका उपभोग। - 1 अर्थमनर्थ भावय नित्यं नास्ति ततः सुखलेशः सत्यम् । शंकराचार्य । इस विपयके सम्बन्धसे हमलोगोंमें, विशेषकर पुरानी मण्डली के लोगोंमें, बड़े विलक्षण मत मतान्तर पाये जाते है । कई पीढ़ी वीतगई पर यह मत निष्फम्प चलााता है इसका कारण विचार करनेकी शिथिलता बोध होती है । पर अब ऐसा समय आगया है कि विचारकर उसकी सत्यासत्यता निश्चितही होजानी चा- हिये । एतावता इस विपयके सम्बन्धसे हमारे जो विचार है वे नीचे प्रकाशित किये जाते है। ( २ ) अर्थशास्त्रका प्रादुर्भाव हो जवसे उसका युरोप महादेश में सर्वत्र प्रचार हुआ तबसे इस विषय के सम्बन्धसे सर्वसाधारण की सम्मति बिलकुल परिवर्तित होगई है। प्राचीनकालमें वडे २, ज्ञानी ध्यानी कहानेवाले लोग जैसे सदा उसे तिरस्कृत दृष्टि से देखा करते थे और अनुमान गत् शताव्दीपर्यन्त वह अनर्थका का रण मानी जाकर समस्त जातिके। अत्यन्त हानिका हेतु समझी जाती थी, वैसेही संप्रति संपत्तिके विपयमें लोगोंके विचार उक्त विचारकलापोंकी अपेक्षा विपरीत रूप धारण कररहे है । अब लोग यह मानने लगे हैं कि समस्त सुख और समाधानका परम स्थान संपत्तिही है, उसका लोभ निन्द्य नहीं है गत्युत उसका प्रेम परम, प्रतिष्ठा एवं गौरवका कारण है। अब इयर'लोगोंका ऐसाही कुछ सिद्धान्त होगयासा दीखपडता है ! साराश आज पर्यन्त धनके विषय में लोगों के इतने मत मतान्तर हुए । इस लेख में यह निर्धारित कियाजायगा कि उक्त सब मत यथार्थ है और '. * इसका अर्थ भागे चलकर लिखाही गया है । -- - में सम्पत्तिका उपभोग। ह साथही यह भी दिखलाया जायगा कि वे सब अयथार्थ भी है । (३) अव प्रथमतः प्राचीन मतकी आलोचना की जाती हैं। मायः सव देशके महान २ ज्ञानी एवं विवेकीलोगोंका प्राचीनकाल यह मत या कि संपत्ति समस्त आपत्ति और अनिष्टका कारण है। पनवान् पुरुपको इसलोकमें बनके कारण सदा परिश्रम, चिन्ता और दुलतादि आपत्तियोंका लक्ष्य बनना पडताहै; और इससे अधिकतर भयावह वात यह है कि अर्थोपार्जनार्य और उसकी सहायतासे जो घोर पाप किये जाते है वे सब परलोकमे उसके अनन्तकाललों नरक स्थितिके कारण होतेह । अभिप्राय यहहै कि सुपकी आशामें लिसहो मनुष्य धनके लिये जो आंख मूंदकर भले पुरे सब काम करते जाताहै वह उसे कुछभी नहीं प्राप्त होता किन्तु उसे व्यर्थम परिवान्तहो संतोप सुखसे हाथ धो बैठना पडता है; और इसके अतिरिक्त परमार्थको वडीही हानि पहुँचती है । यही कारण है कि प्राचीन तत्ववत्तागण धन पर बडा कटाक्ष किया करते' थे और साथही दरिद्रता और संतोपमें जो सुखहे उसका अत्यन्त उत्कण्ठापूर्वक उपदेश किया करते थे । हमारे प्राचार्य मोहमुद्गर' के प्रारम्भमेही यह उपदेश करते है:- मृढ जद्दीहि धनागमतृप्णा कुरु तनुयुद्धे मनसि वितृष्णाम् । यल्लभसे निजकर्मोपात्तं विचं तेन विनोदय चित्तम् ।। अर्थमनर्थ भावय नित्यं नास्ति ततःसुखलेशः सत्यम् । पुत्रादपि वनभाजा भीतिः सर्वनपा कथिता नीतिः।। "रे मूढ़ ! इस धनतृष्णाको घोड । रे अमोध ! मनमें संतोप- रूप समाधान वृत्तिको धारणकर । पूर्वकर्मानुसार तुझे जो मिल जाय उसीमें यानन्द मानाकर । इस अर्थको सदा अनर्थका कारणही जानाकर । उससे - - निवन्धमालादर्श। यथार्थ मुग्ण अणुमात्रभी प्राप्त न होगा। विचारने की बात है किधन- वान् पुरुपको जर निजके पुत्रसे भी भयभीत रहना पडता है। त अन्यकी वातही क्याहै ? अतः इस उपदेशको चित्तमें भलीभांति धारणकर, ज्ञानीलोगोंने आजपर्यन्त सबको यही उपदेश किया है।" ऐसेही और भी उपदेश कई संस्कृत एवं भापाकाव्यम पाये जाते हैं । धनको तुच्छ माननेवाले लोग ग्रीक और रोमन लोगों भी बहुत होगये है। उन सबमें साकेटीज् अग्रगण्य मानाजाताहै । इसकी समस्त आयु दरिद्रावस्थामदी बीती । एकवार एक विभव- शाली भद्रपुरुपके अटूट विभव तथा बडे समारोहको देख इसने कहा कि मुझे जिनकी आवश्यकता नहीं है, और जिनके विना मेरा कार्य गुखेन संपादित होते रहताहै ऐसी वस्तु यहा बहुत टीख पड़ती हैं । दूसरी बार ऐसेही मसंगपर उसने कहा-"मैं इन लक्ष्मी कृपापात्र पुरुपोंकी अपेक्षा कहीं बहकर सुखी हूं। इस अतुल वि भासी संभाल करनेके लिये इन्हें कितनेन कष्ट उठाने पडते होंगे, फितनीन चिन्ता करनी पड़ती होगी। " अस्तुः तो उक्त प्रतिया. दन द्वारा पुराफालीन ज्ञानवान् पुरुपोंकी एतद्विपयफ सम्मतिका अनुमान तत्क्षण होसकताहै। अव उप्त मतकी यथार्थता और अयथार्थता प्रदर्शित करने के लिये विशेष परिश्रम और प्रयासकी कोई आवश्यकता नहीं है। वह यथार्थ इसलिये माना जा सकताहै कि धन के उक्त अनर्थ ऐसे हैं जो सर्व साधारणपर उत्तमतया प्रकटहै-अर्थात् वनप्राप्तिके योग से मनुष्य मदान्ध होजाताहै, उसे भिन्न २ प्रकारके दुर्गुण सूझने लगते हैं। व्यसनाभिभूत होकर वह अनन्धित कार्य करने लगता है, यह सब बातें ऐसी है जो सर्वसाधारणके दृष्टिपथमें सदा आती ही रहती हैं । धनंशाली पुरुपोंके दुराचार और गृहछिद्रोंको उनके .
" सम्पत्तिा उपभोग। नेकटस्थ पडोसीलोग पूर्णरूपसे जानते है । पनकी सहायतासे नमाने काम होसकते है, अनेक प्रकारके दुष्कर्म निधडक किये जा उरते हैं । और अपसर उपस्थित होजानेपर शामनकर्ता और डा- दर साहवकी मूठभी गरम करदी जा सकती है क्या यह सब ते किसीसे लिपी है ? क्या इन सर अनर्थों का कारण धन नहीं हैं ? अपनी लालसा पूर्ण करने हेतु जो दूसरे लोगोंको इतने कष्ट ताहै कहो वह धनशाली तौभी कुछ सुखानुभव करताहो सो हो मे सकताहै ? हम अतुल और असंख्य विभव के स्वामी हैं, सहस्रों रिचारक आज्ञा पाने के लिये मुंहकी ओर निहारते रहते हैं, जिस दार्थकी जब इच्छाहो प्राप्त होसकताहै । इच्छाके लिये कहीं कुछ या नहीं है। इतनी सामग्री उपस्थित होनेपर भी ऐमे कितने म- प्य पाये जा सकते है कि जो यह समझतेहों कि हमारे कैसा गुख और शान्ति, किसे माप्तहे ? क्या हमें अणुमात्रभी दुःख है ? क्या हमें नेशमात्रभी चिन्ताहै ? बलिहारी है धनकी ! उसकी अधिकताके साथ ही साथ हम अानन्दसागरमें मग्न होतेगये खिंद चे लोग यदि ऐसा कहमकते तो और चाहनाही क्या था ? जिन लोगोंको अ- पनी यथार्थ अास्थाका बोध नहीं है वे अवोधलोग अपनी अवस्था को ऐसीही मानते हैं। पर उससे लाभही क्या ? दूरके ढोल सोहा- वनेही जान पडते है । अन्तरस्थ वातके विपयमें जो किंचित् विचार करेगा उसे तुरन्तही ज्ञात होजायगा कि खेतमें रात दिन परिश्रम करनेवाले कृपकको भी उनके संपत्तिकी स्पर्धा न करनी चाहिये ! सदा रुजग्रसित, तजन्य शारीरिक दुर्बलता, उद्योग न रहने कारण शरीरावयवोंका शिथिल होना, मनका अवजाना, सुखोप- भोगके नित्य सेवनसे उकताना, मनोरञ्जनका अन्य साधन न होने के कारण व्यसनासक्त होना, उसके फलरूपसे शरीर और मनको , , १०२ निवन्धमालादर्श ।- अस्वस्थताकामास होना, वैसेही सदा कलह और भय श्रादि का व रहना, आदि यही साधनशालिताके सुग्व है ! सारांश यह सब जान बूझकरभी मूर्खके सिवाय धनागमकी तृष्णा, अन्य कौन करेगा। (४) परन्तु उक्त निरूपण केवल एकदेशीयहै । धन सचमुच में उक्त महान् २ अनाका कारणहै, पर साथही यह भी कहन पडताहै कि उसकी सहायतासे, वडे २ काम सिद्ध होते है । केवल व्यक्तिगतही विचार कियाजाय तो जानपडेगा कि वह दरिद्रताकी नानाविध यन्त्रणाओंसे मनुष्यका उद्धार करताहै । यही क्या कुछ छोटा लाभहै ? मनुष्य कैसाही परमतत्ववेत्ता क्यों न हो, पर क्षुधा शान्तिके उपायकी शरण लिये विन। उसका काम नहीं चलता वेसे ही शीत आतप वायु और पावस वेदान्त के अनुरोबसे तनिष्ठ म नुष्यको क्षणमात्रक लिये भी क्षमा करतेहो सो वातभी नही टीख पड़ती ! तो ऐसी अवस्थाम, जीवनके लिये अत्यन्त आवश्यक जो अन्न, वस्त्र, गृह आदि सो जिसकी सहायतासे हमें प्राप्त होते हैं, जिसके कारण वे सर पदार्थ उत्तरोत्तर अधिकाधिक अनुकूल हो जातेहै, उसके सग्रहको हम व्यर्थ कैसे कहसकते है ! इसके सिवार दरिद्रपुरुषका कहीं मान सन्मान नहीं होता. सब लोग उसे तुन्छ मानतेहैं, धनाढ्य लोग उस पर वलात् अत्याचार करसकते है कि जिसकी कही सुनाई तक नहीं होती, वह कैसाही गुणी क्यों न हो उसके समस्तगुण लुप्तसे होजाते है। नीचजनोंके संसर्ग और धनके लालचसे उसका चित्त चोरी आदि,दुर्गुणोंकी ओर संलग्न होने लगताहै; क्या यह सब थोडे अनर्थ हैं ? वैसेही परोपकारादि' परमार्थसाधन बनके सिवाय वैसी उत्तमताके साथ नहीं वनपडते । पाठक ! विचारका स्थलहै कि ऊपर दुर्वलता, दुराचारप्रवृत्ति आदि" जो अनर्थ उल्लिखित हुए है उनका सम्पत्ति से कार्य कारणरूप सम्पत्तिका उपभोग। सम्पन्न नित्यता के साथ रहताहै वा अन्यथा ? हम समझते है उनका ऐसा कोई सम्बन्ध नहीं है । वडे २ राज करनेपरभी उक्त विकारों से मुझ रहे है ऐसे पुरुपति उदाहरण इतिहासमें बहुत पाये जाते है। पार तो क्या पर, हमारे इतिहास में, कि जिसका हमें बहुतही थोडा ज्ञान है, ऐसे पुरुपरत्न उपलव्य होते है ! साराश ऊपर धन जसे अनर्थका हेतु कहागया वैसेही उससे लाभ भी होत है। '(५) उभयपक्षके सापक वामक विचार ऊपर प्रदर्शित हो चुके, मनन करनेसे विज्ञ मनुष्यको ज्ञात होजायगा कि मनुष्यकृत कार्योंका दोप बापुरी सम्पत्तिपर अर्पित करना सर्वथा अयोग्य एवं अनुचितहै । उत्तम शस्त्रको उचित स्थानपर काममें लाना वा तद्द्वारा अनर्थ कर हाहाकार उपजाना जैसे सर्वथा उसके स्वामी के आधीनहै वैसीही वात सम्पत्तिकी भी है। अग्निका उदाहरण और भी लीजिये । उसे अपने आधीन रख यदि यथोचित रीति से उससे काम लियाजावे तो उससे पाकसिद्धि, मकाश प्रभृति अ- नेक कार्य सिद्ध होते है। पर यदि वही तृणपुञ्जमें डाल दियाजावे, वा घरपर रख दिया जाये तोजोअनर्थ होगा उसे सवलोग जानते ही है ! उन दोनों उदाहरणांमें शस्त्र और अग्निको मध्यस्थ मानना चाहिये । लाभ और हानि ये दोनों उनके हाथ नहीं है । वे केवल साधन है और उन्हें जैसा साधक मिलजाताहै पैसाही फल वे देते, है। इस नीतिसे संपतिकी प्रशंसा गा निन्दा दोनों व्यर्थ ही तात्पर्य, येन थियः संश्रयदोपरढम् सभापलोलेत्ययशः प्रमृष्टम् । । इस श्लोकमे कालिदासने श्री अर्थात् संपतिकी चञ्चलता के विषयमें जो कहाहै उसीको यदि हम उसकी अनर्थवाहकता की #जिसने लक्ष्मी को अपने कोप में चिरस्थितपर उसके प्रकृति सुलभ दोप चालता को दूर कर दिया' साराश, जो कहानाता है फि लल्मी स्थिर नहीं रहती मो यह उसका दोष नहा है, तो यह दोप उसका है जिसके पास से वह चली भाती हैं। यही यदि मतिमन्द मा दुगन हो नो विचारी लक्ष्मी श्या बरे ? ! + निवन्धमालादर्श । ओर घटित करें तो उक्त विवादका थोडेसे में ही निर्णय होजायगा यहांलों व्यक्तिगत अर्थात् प्रति मनुष्यके सम्बन्धसे संपत्ति श्रालोचना की गई। अव एक जाति के सम्बन्धसे मीगासाकीजात । अनुमान गत शताब्दीके अन्तपर्यन्त संपत्ति के विषय में सबलोग की यह सम्मतिथी कि एकदेश वा जातिमें संपत्तिकी प्रचुरता हो ही उसके हासका प्रारम्भ होजाता है। जिस प्रमाणसे धनकी वारे होती जाती है ठीक उसी प्रमाणसे उसके साथ २ विलास और विपयप्रियताभी बढ़ती जाती है । यह जैसी २ वृद्धि लाभ करते जाती है वैसे २ लोग हीन क्षीण एवं दुवेल, वामनासक्त और अभिमानहीन होते जाते है। समस्त देश वा जाति उक्त अवस्था प्राप्त होतेही परचक्र द्वारा पददलित हो यात्मरक्षा के लिये असमर्थ होजाती है, और शीघही वह परराज्य के आधीन होजानी है आजलों जो जाति उन्नतावस्थाको माप्त हुई उन सबकी अन्तर ऐसीही अवस्था हुई, और सबके अवनतिकी नीव धनसमृद्धिद्वारा ही डालीगई । अस्तु; तौ उनलोगोंका कथन इस प्रकारकाहै । अब विचारांश करनेसे यह भी उक्त कथनानुसार कुछ अंशमें सत्य भ- तीत होताहै। क्योंकि संपत्तिकी अधिकताके कारण उक्त अनिष्ट ; परिणामोंका होना बहुतांशमें प्रकृतिसुलभही जान पडताहै । सं- पत्ति एक प्रकारका मदही है। वह अपना गुण दिखलाये विना बहुधा छोडती नहीं । संस्कृतमें एक कहनूतहै, 'ऋद्धिश्चित्तविका- रिणी' अर्थात् 'घनकी विपुलता चित्तको विकृत करनेवाली है'। परन्तु जो चतुरहै वह जैसे धनसे मदान्ध नहीं होता वैसेही जिम' जातिकी शासनप्रणाली तथा राज्यनीति उत्कृष्टहै उसके लिये धन की प्रचुरता अवनतिका कारण न होकर उलटी उसे अधिकतर उन्नति पहुँचाती है। इसके उदाहरण सरूपमें प्राइमरके इंग्लएड, .
सम्पत्तिका उपभोग । १०५ फ्रान्स और प्रशियादि राज्यों का नामोल्लेख हो सकताहै। प्राचीन काल के रोमकार्थेज प्रभृति राज्यभी इसीप्रकारके थे । रोमराज्य की नीच इतनी सुदृढथी कि दो सहस्र वर्पलों उसकी स्थिति रही। और उसमें सम्पत्तिका प्रवेशहो वह उसका मायका वनजाने पर भी कई शताब्दी पर्यन्त शत्रुगण उसकी छाह तक नहीं छू पाये। और कार्थेजकी बात तो रोमसे भी बढकरहै । जिस सम्पत्तिको सम्पति राज्यको हानि पहुँचानेवाली कहरहे हैं उसी सम्पत्ति के वलसे कार्थेजका राज्य बलवान हुआथा; और उसके योगसे वह हतवीर्य न हो रोम कैसे रणकुशलराज्यसे सामना कर उसे रसा- तलमें पहुँचानेको तृणमात्रकी उसने कसर नहीं रखी थी । भला, यदि यह कहाजाय कि अन्तमें वह धन विपुलताके कारण दुर्बल होगवाहो सोभी नहीं है ! उसकी अन्तस्थ रचना इतनी उत्तमथी कि आदिमें उसमें जो शक्ति और हियावथा वह अन्तलों वैमाही चनारहा । अन्तिम समय उपस्थित होतेतक वहां के लोग जिम सराहनीय साहससे रोमनलोगों के साथ लडतेथे सो इतिहास जाननेवाले लोगोंसे छिपा नहीं है । इस निरूपणसे यह स्पष्टतया निर्धारित होता है कि राज्यकी अवनतिका दोप सर्वथा सम्पत्ति परद्दी स्थापित करना युक्तिसंगत नहीं है । अब इसके विपक्ष विपयमें विचाराश करना चाहिये कि जहां सम्पत्तिकी हवा तक लोगों को नहीं लगी या लगने दीगई वहाकी अवस्था कैसीथी। सृष्टिके प्रारम्भसे आजपर्यन्त सम्पत्ति किस चिडियाका नाम है सो अभीलों नहीं जाना ऐसे देश इस धरती पर बहुत है।आफ्रिका बहुतेरे देश, वैसेही कुछ अमेरिकाके देश, पासिफिक महासागर के कतिपय द्वीपादिके लोग अद्यावधि संसारकी यायावस्थामही है। भला, तो फिर दरिद्रताकी सहायतासे उनमें पडे सम्राट् वा १ ? १०६ निबन्धमाखादर्श। छोटे रजवाडे कितनेक हुए सो ठीक २ नहीं जाना जासकता! इसके सिवाय दूसरा उदाहरण स्पार्टनके लोगोंका कहा जासकता है । इन लोगों का राज्य स्थापित करनेवाले सुप्रसिद्ध लायकर्गने इन लोगोंको सम्पत्तिका परिचय न होने पाये इसी अभिमायसे वडे कडे ग्राइन बना रक्खेथे; और मायः अन्तलों वे उत्तमतया काममें लाये जातेरहे । भला, फिर इसका परिणाम क्या हुआ पार्टनलोगोंने कुछ दिनलों ग्रीसदेशका शासन किया सही; पर विना उतने परिश्रम उठाये आथिनियन, थीवन, मासोडोनियन, लोगोंने भी उनकी अपेक्षा अधिक काललोंशासन किया! भला यह सब जाने दीजिये आगे जब रोमन लोगोंने समूचा ग्रीस देश अपने अधिकारमें करलिया, तब सम्पत्तिके योगसे जो अशक्त नहीं हुआ था सो इन लोगोंका वीर्य कहागयाथा? साराश सम्पत्तिकी विपु- लताका सम्राट या राज्यकी उन्नति वा अवनतिका कारण होना सम्राट्वा राज्यकी दृढ़ता पर निर्भरहै और यही कारण है कि उनके नष्ट होनेका कलई सम्पत्तिको लगाना युक्तियुक्त नहीं जान पडता । (७) यहांलों पहले दो मतोंकी मीमांसा होचुकी । अब तीसरे में कितना तथ्याश है सो देखना चाहिये । यह मत आज कलकी नूतन मण्डलीका है । इनलोगों के मनकी अवस्थाके विपयमें यदि सूक्ष्मरूपसे विचार कियाजाय तो तुरन्तही लक्षित होजायगा कि, सम्पति उसने बडा विलक्षणरूप धारण किया है। पुराने विचार और पुराने मत अब किसी कामके नहीं रहे अतः उनका अनु- यापन करना उन्हें उचित नहीं जान पडता । भला सर्वथा नये मत ही ग्रहण करलिये जायें तो वैसा करनाभी अभी समुचित नहीं माना जाता । यही कारण है कि दोनोंके वीचम, लटकना उन्हें माप्त हुआ है । पुराना जो कुछ है सो सब पागलपन और कम -- सम्पत्तिका उपभोग। १०७ समझका है। पाश्चात्यलोगोंके सम्बन्धका जो२ हो सो सय चतु- रतापूरित अतः आदरणीयहै, ऐसीही कुछ २ उनकी कल्पना हो- गईसी टीखपडती है । पर एक उत्तम क्या और दूसरा निकृप क्यों वा वे यथार्थ में भले है, वा बुरे है या नहीं यह जो उनसे पूछा जाय तो, सुनहरी सिकड़ीकी घडी गलेमें लटकाना अच्छा क्यों दीखपडताह वा देशी जूता छोडकर विलायती बूट पहिरने में लाभहै इसके कारण वे जैसे वतासकेंगे वैसेही उक्त प्रश्न के भी उत्तर देंगे ! अस्तु; तौ इन लोगोंका ऐसा कुछ विचार होगयासा जानपडताहै कि आजपर्यन्त पुरानेलोगोंकी धनसश्चयके विपयमें जो निषेधात्मक सम्मतिथीं उन्हें सर्वथा झूट निश्चितकर धन सञ्चय करनाही मनुप्पका परमकर्तव्य कार्य है । हम अभी पीछे कहीचुके हैं कि वनके सिवाय न तो मनुष्यका निर्वाहही सुगमतया होसकता है और न उसे सुख शान्तिकाही लाभ होताहै इसीलिये बद्द अवश्य संग्रहणीयहै । पर उसे सुख एवं शान्तिका परमसा- धन मान उसके लिये अत्यन्त प्रेम प्रकट करना सुतरा उसके लिये नितान्त लोलुप होजाना कृपण कैसे नीच मनुष्यकोही योग्यहै ! तात्पर्य यह है कि सम्पत्ति यद्यपि सुखका साधनहै तथापि इसमें कोई संदेह नहीं कि उसके लिये अनिवार्य तृप्या उत्पन्न होतेलो उसका लोभ न छोडना परमदुःखका कारण है, और साथही यह भी स्पष्ट है कि ऐसे पुरुपसे उसका किसी प्रकारसे स्वहितार्थ चा परहितार्थके लिये विनियोग न हो पायेगा, सम्पत्ति यह केवल साधनहै, साध्य अर्थात् उपभोग्य वस्तु नहीं है, इतनामी जो नहीं समझ सकता उससे बढके मूर्ख और हतभाग्य कौन हो सकताहै ? (८).यहालों अकेली संपत्ति के सम्बन्धसे सामान्यतः थालो- चना हुई। अब इस लेखका मथान विपय जो संपनिका उपभोग उसके पिफ्यमें लिखते है।
. निवन्धमालादर्श (8) संपत्ति सवको अभीष्टहै, और प्रायः सभी उसकी प्रा के उद्योगमें लगे रहा करते है सो सवलोग जानतेही हैं। साथह यह वातभी सवलोग जानते हैं कि उसके माप्त्यर्थ जो संतत,परि श्रम करना पडते है उनका हेतु यही है कि उससे हमें सुख मार हो । अब यहा पर इतनाही विचार कर्तव्यहै कि संपत्ति प्राप्त होने पर भी ऐसे कितने जन होंगे कि जिनकी सुखलामकी इच्छ| सफल होती है। (१०) इस संपत्ति सुखके विपयमें भिन्न २ मनुष्योंकी भिन्न २ संमति पाई जाती है । प्रथमतः कृपणाचार्य । यह अपने नामके अनुरूप संपत्तिपर परम 'कृपालुता' बनाये रखते है। इन्हें उसका लवमात्रका वियोग असह्य होता है । कवडी २ और पैसा २ जोड कर वे अपने देवताकी ऐसी सेवा करते हैं कि उनके संग्रहके लिये उपमा ढूंदनेमें कविकी मति पंगु होजाती है । इस असामान्य भक्तिके उपहासार्थ कहने सुनने के लिये कथा कहानी वा कहनूत जिस देशमें न होगी ऐसा देश समस्त भूमण्डल पर एक भी न होगा यदि यह मान लिया जाय कि किसी एक गोलके मनुष्यने अपनी पृथ्वी पर श्राकर कुछ दिन' निवास किया तो निःसंदेह उसे कृपणकी कृति देख आश्चर्यचकित होना पड़ेगा ! संतत कष्ट उठाकर संग्रह करना, सदा मारणपणसे उसकी रक्षा करना, और उससे लाभ उठानेकी कल्पना तक न सहन होना ! इस पागलपनको देख वह क्या कहेगा ? बद्द सनिश्चयरूपसे यही जानेगा कि इसे किसीका तौभी शाप है। यदि ऐसा न होता तो यह जान बूझकर ऐसा प्रमाद क्यों करता !! सारांश इस मूढ़ अनु कम्पनीय जनको संपत्तिका उपभोग केवल दर्शन द्वारा प्राप्त होता है। संपत्तिका उपभोग लेनेफी यह भी एक रीतिहै । यहॉपर यह सम्पत्तिका उपभोग। हनेकी कोई आवश्यकता नहीं है कि उक्त उपभोग द्वारा सुखो- पत्तिका इष्ट हेतु यथार्थ में सिद्ध नहीं हुआ | दूसरा प्रकार वेषयवासना तृप्तिका मानाजाताहै । मनुष्यमात्रकी निसर्गतः इस मोरको प्रवृत्ति होने के कारण सम्पत्तिका व्यय इसी प्रकार से बहुत होताहै। पर यह यदि समर्याद हो तो इस में कुछ बुराई नहीं । परमेश्वर ने इस धरातल पर नाना प्रकार के मुखोपभोग के जो पदार्थ निर्मित किये है उनका उपभोग लेना सर्वथैव समुचित है, पर साथही इस बातपर भी ध्यान रहना चाहिये कि धर्म और नीति पर किसी प्रकार की बाधा वा आघात न पहुंचने पावे; हमारे शास्त्रप्रणेतृगणों ने इस विधान को तीसरे पुरुपार्थ का सा- धन कहा है। नेक विचाराश करनेसे जान पडता है कि जगनायक का सूत्रही ऐसा कुछ है। क्योंकि इन्द्रियजन्य सुख यावत् मर्यादा- कलित रहते है तावत्काल पर्यन्तही उनमें मुख की स्थिति पाई जाती है। उसके मर्याटोल्लसितसे होतेही वह दुःखरूप होने लगते है । परन्तु मनुष्य निजकी मूर्खतावश कहो न उसके विशेष विषयासक्त हो- 'जाने के कारण कहो, इस इन्द्रियजन्य सुख को वह बहुधा अपने 'श्राधीन नहीं रखसकता, वह उनके वशमें यहॉलों होजाता है कि अपने को भीपण आपत्तिग्रसित करलेताहै। सम्पाचका यथायोग्य उपभोग ले तद्द्वारा सुखी होनेवालों की अपेक्षा दुःखग्रसित होने- वालों की संख्याही अधिक पाई जाती है-अनुमान सौ में नब्बे दुम्पी पाये जाते हैं कहना अनुचित न होगा, इसी कारण को मधा- नता दे प्राचीन विज्ञलोग उक्त मकारसे धनका निषेध फिया करते थे । इस प्रतिपादन से विवेकी पाठक जान जायेंगे कि यह दूसरा प्रकार भी प्रायः सुखावह नहीं होता। (११.) अब इन दोनों अपव्ययों के व्यतिरेक सपत्तिका उपभोग - - निवन्धमालादर्श लेनेके और कौन से मार्ग हैं ? उनके विषय में विचार प्रदर्शित किये जाते है । यहांपर पुरानेलोगों की कतिपय विलक्षण सम्मतियों को विशेषरूप से स्पष्ट करना अत्यावश्यक जान पडता है । उक्त दोनों दूपित मार्गों का अनुकरण न करने परभी बहुतेरे लोग अपने धन का व्यय बहुत अविवेकता के साथ करते हैं । यह दूपित मार्ग वि. लासप्रियता की अधिकता का है । अनुमान से जान पड़ता है कि हमलोगों ने यह विलासप्रियता मुसलमानों से सीखी है । इसके मतानुसार अक्रियताही सुखकी परम सीमा जान पड़ती है । जहां बैठने उठनेकी इच्छाहो गद्दी वालिश तैयारही है, कहीं जाने आनेकी इच्छा होतेही स्थ, पीनस आदि प्रस्तुनही रहते है, वस्त्र पहराने प्रोढ़ाने और संभालने के लिये भृत्यगण उपस्थितहीहैं स्नान करवाने के लिये, अगमर्दन के लिये, हाथ धोवाने के लिये, जहा तहां परि- चारकगण विद्यमानहीं है। इतने सेवकों की सेवाका स्वीकार करते २ जो परिश्रम होते हैं मानो उनकी निवृत्तिके लिये-निद्राके समय पनचप्पी पुनः करवानाही पड़ती है । यही धनशालिता के सुखों का नित्यक्रम रहता है । लोग सुखकी परमावधि इसेही मानते हैं। और कहालों कहाजाय हमारी भाषा में अब 'सुखी' और 'धनवान' ये दोनों शब्द पर्यायवाची मानेजानेलगे है ये शब्द लोगों के एत- द्विपयक मतके समीचीन सूचक है । पुरानेलोगोंकी विभवशालिता के वर्णन प्रायः सबलोग सुनही चुके होंगे-'वाह साहब उनका क्या वेतो अमीरही है' 'घर के बाहर की धूप कैसी, होती है सो तो उन्होंने कभी जानीही नहीं है' 'पाजलों उनके पांव में कभी कंकर तक तो गडाही नहीं' 'पेटका पानी तक कभी हिला नहीं' इस प्रकार से उन्होंने विभव का उपभोग लिया है ! वाह, बलिहारी है। इस अपरम्पार-मुखकी ! पर इसका परिणाम शीघ्रही किसमकार सम्पत्तिमा उपभोगः। १११ हुआ करताथा सो भी यहां उल्लिखित होना चाहिये । जब डी घोडे पीनस आदिसे ही वाहनों का काम लिया जानेलगा, व ईश्वर दत्तवाहनों की आवश्यकता ही क्या रही ! ऐसी दशामें वों को छुट्टी मिलना वाजवीही है । शरीर के आशयों को सदा कान्न पचाने की आवश्यकता बनी रहती है पर चलाफिरी श्री परिश्रम के नाम से भोजनों के समय चौकीपर जा बैठने के लिये नो परिश्रम उठाने पडते हों, और हाथ को पात्र से उठा मुंह तक अन्न पहुँचाने में जो परिश्रम पडतेहों वही केवल-ऐसी अवस्थामें पकानों का अपने प्राश्रित वगीको-भिन्न २ रोगों को निमन्त्रित करना उचितही है ! इस प्रकार पंगु और रोगी बनजाने पर तो फिर धनशालिता के बिलास और भी बढ़जाते हैं । इसके पूर्व केवल नौकर चाकरही सेवा टहल के लिये उपस्थित रहा करते पर मब उनमें वैयों कीभी आवश्यकता होगई । एक तो पहलेही लावू साहब का आहार बहुत स्वल्प था; फिर अब यह दशा प्राप्त होने पर उसका कुछ हाल ही न पूछना चाहिये । इस प्रकार से सन्ततचिकित्सा और उपचार प्रारम्भ होजानेपर अन्त में ऐसी अवस्था प्राप्त होजाती है कि हिलना फिरना सब बन्द होजाता है। हाय यह कैसी प्रचण्ड मूर्खता है ! ईश्वरने हस्तपादादि जो अवयव मनुष्य को दिये है वे इसी अभिप्राय से दिये है कि मनुष्य उन्हें अपने प्राधीन रस दृढ करता रहे वैसा न कर पराधीन होजाना मूर्खता तो है ही पर इस पराधीन होनेको भूपण मानना मूर्यता के उच्चतम शिखर पर आसीन होनाही है । अक्रिय रहकर निश्चेष्ट पडे रहनाही यदि विभवशालिताका स्वरूपहै तो मनुष्यकी अन्त्या- चस्था को यथार्थ स्वर्गस्थिति मानना अनुचित साहस ने होगा-1 (१२) यहांलों इस समझकी अवियेकताके विषयमेंही लिखा '११२ निवन्धमालादर्श। गया। अब यह क्रियाशून्यता वास्तव में सुखदायक है वा उसके वैसे होनेका सम्भव तो भी है वा नहीं इसके विपय में विचार करते, है। किसी कामकाज के न रहने से मनुष्य को कितनी देरलों सुख- का अनुभव होता है इसका अनुभव बहुधा प्रत्येक मनुष्य को होवे। होगा। इसके उदाहरण स्वरूप में तातील का उल्लेख ठीक होगा। एक सप्ताह पक्ष वा मास दो मासकी जब कभी तातील पापडती है तव विद्यार्थियों को पहले पहल महदानन्द जानपडता है । वे. समझते है कि अब हमको इतने दिन यथेच्छ घरपर रहने को- मिलेंगे और खेल कौतूहल देखने को बहुत समय मिलेगा । इस- विचारमें पहले चार पाच दिन वहुत आनन्दसे बीतते हैं पर आगे शीघही ऐसा जी ऊबनेलगता है कि शेपदिनों का पीतना बहुत गढाने लगताहै और अन्त अन्तमें तो इतना जी उकता जाताहै, कि पुनः पाठशाला जानेवाले दिन सबको उत्कण्ठावोध होतीहै । इस चाल्यावस्था के अनुभव में सव सुग्व दुःखों की तालिका है ! संसार में ऐसी कोई वस्तु नहीं है जो केवल सुखमय हो । सुखका अनुभव होने के लिये दुःखानुभव की विशेष आवश्यकता है। पेट में जबला भूक बनी है तभीलों भोजनों के सुखका अनुभव रहता है वैसेही जपला प्यासहै तभीलों पानी पीनेका सुख, शीतहै तबलों उप्णता का सुख: और पातपहै तबलों शीतल उपचारोंका सुखानुभव होताहै। इसी प्रकार परिश्रम और विश्राम का द्वन्दुभी परस्परमें सापेक्षहै। जबल विश्राम का अनुभव विद्यमान रहता है तवलों परिश्रम सुखदायक जॉन पड़ता है, और जवलों परिश्रम का अनुभव रहता है तभील -विराम का सुखबोध होताहै । यह सब यदि सत्य है तो विन उद्योग किये योंही सुखकी आशा करना, और विना परिश्रम किये विश्रान्ति सुख प्राप्त करने की लालमा करना, मेघरहित ।
सम्पत्तिका उपभोग ११३ प्रामाश से जलाष्टिकी आशा करने कैसाही अयोग्य है । तृपातको जल से सुख होता है, भानप से व्याकुल हुए मनुष्य को । वृक्ष की छाया बहुत सुखपद घोध होती है अतः यदि कोई मनुष्य जलपान करने में सुख है इतनाही मानकर एकसा पानी पीता रहे, वा वृक्ष की छाया सुखप्रद होती हैं ऐसा समझकर सुखकी आशासे निर- न्तर छाया में बैठारहे तो हमलोग उस सिवा मूर्व के और क्या पहेंगे ? तात्पर्य उक्त विभवशालिता की बात ठीक ऐसीही है। सहमतिपादन से यही प्रमाणित होता है कि विना उद्योग के केरल अक्रियता सुखप्रद कदापि नहीं होसकती, हां दुःखप्रद अलव होसकती है ! कहो कैसे तो जैसे विना विश्राम के सतत उद्योग अत्यन्त दुःस का कारण होता है वैसे ही उसे भी जानना चाहिये । यही कारण है कि एक बडे विज्ञ एवं चतुर ग्रन्थकार ने कहा है कि "सदातनकी विश्रान्ति को लोग स्वर्ग का महान् सुख भलेही माना करें पर मै तो उसे नरक की घोर यन्त्रणामों में परिगणित करता हूँ। (१३ ) इस प्रकार से अक्रियता कहालों सुखका कारण हो सकती है सो ऊपर प्रदर्शित किया गया। पर इतनेही से अलम् न होगा। अक्रियता महान् अनर्थका कारण है यह आगे के लेख से सिद्ध होगा । अंगरेजी में एक कहनूत है कि 'खाली घरको सैतान अपना कारखाना बनाता है। इसका अर्थ यही है कि जब मनुष्य के लिये कोई काम नहीं रहता है तब उमे नाना प्रकार के कुमार्ग सूझते है । और ऐसा होना ठीकही है । क्योंकि मनुष्य के + अतियातप जो ज्यादा होई । तर छाया मुख जाने सोई॥ - तुलसीदास। * An idle hrain 14 Satani's toul klop. .
+ ११४ निवन्धमालादर्श । शरीर के व्यापार जैसे कभी रुकते नहीं वैसेही उसके मन के भी एक से चले जाते हैं । ईश्वर की योजनानुकूल बनुष्यमात्र के शारी- रिक और मानसिक व्यापार सदा सञ्चलित रहते है क्योंकि विना परिथम आजीविका चरितार्थ नहीं होसकती अतः दोनों का क्रियाचक्र सायही साथ चला करता है । पर कुछ (जिन्हें लोग भाग्यवान् मानते हैं ) लोग ऐसे भी हैं कि जिनकी आजीविका पिना परिश्रमके ही निर्वाहित होती है । ऐसी अवस्था में उनके शरीर और मन को व्यापारशून्यही रहना पड़ता है । परन्तु मनकी अवस्था व्यापारशन्य कदापि नहीं रहसकती। यही कारण है कि नानाविध दोष और दुर्गुण उसे लगजाते हैं । और धन के सहारे उनका निर्वाहभी होते जाता है, और उसी प्रकार के लोग भी शीघ्रही उसके निकट एकत्रित होजाते है। इस प्रकार से एक वार मनुष्य की कुमार्गकी ओर जहा प्रवृत्ति होगई फिर क्या देखना है उसे निरन्तर उसीकी लय लगजाती है। किसी कविने कहा है:- यौनधनसंपत्तिः प्रभुत्वमविवेकता। एकमप्यनर्थाय किमु यत्र चतुष्टयम् ।। "तारुण्य, धनान्यता अधिकार और अविचार इस चौकड़ी में से एक एकही मनुष्य को नष्ट करने के लिये बस हैं। फिर चारो जहा मिलजाते है वहाका हालही क्या पूछना है !" श्रतः ज्ञान सम्पन्न होने परभी जबलों मनुष्य की बुद्धि परिपक्क दशा को नहीं प्राप्त होती तबलों वह धनमें भलेही रहे पर तप कभी न करसकेगा यही पात जानसन ने अपने 'रासेलस' नामक उपन्यास में योगी की फया के संपन्ध से सूचित को है; और 'शान्तिशतककार' भी यही कहते है:- वनेषु दोपाः प्रभवन्ति रागिणा wr सम्पत्तिका उपभोग। गृहेषु पञ्चेन्द्रियनिग्रहस्तपः ! अकुत्सिते कर्मणि यः प्रवर्तते निवृत्तरागस्य गृहं तपोवनम् ।। "जिनके मन में पूर्ण वैराग्य का संस्कार नहीं हुआ है उनसे वन में भी मानसिक दोप होते हैं और जो घर परही रहकर इन्द्रिय- 'निग्रह करते हैं उन्हें वहाही तप का फल प्राप्त होता है । सारांश जो अनिन्द्य कर्मों का अनुष्ठान करता है और विषय लोभ से दूर रहता है उसे उसका घरही तपोवन के तुल्य है " । अभिप्राय यह कि एकान्त स्थिति में भी मनको शुद्ध रखना बडा कठिन कार्य उसे नेक अवकाश के मिलतेही वह दुष्ट वासनाओं के वश हो जाताहै। हमारे यहां धर्गाचरण में कर्ममार्ग का जो इतना भारी घाटोप पिहित किया है उसका प्रधान हेतु यही है। । (१४) अब सम्पति का एक उपभोग कहनेको और शेप रह गया है । वह धर्म है । इमे उपभोग फहना, सकृत् दर्शनद्वारा किंचित् विलक्षण जान पडेगा; पर उपभोग का अर्थ यदि 'सुख' इतनाही है, तो धर्मार्थ धन का व्यय करना भी उसका उपभोगही है। क्योंकि धर्म करनेवाले को उससे बहुत मनस्तुष्टि होती है। और यथार्थ में सम्पत्ति का सद्व्यय वहीं माना जाताहै जो परोप- कारार्थ किया जाता है, एतावता उन महात्माओं के चित्त को अर्थ के सव्यय से जो सुखलाम होता होगा उसके लिये इसके सिवा अन्य उपमा भी न फवेगी! नाना प्रकार के भूपणा से शरीर को अलंकृत कर उसी में सन्तोप मानना यह माछतजनों की संर्ण बुद्धि का फल है; म- पति के सुख का अनुभव केवल नेत्रद्वाग करना अत्यन्त मुढ भर नीर करण का ही काम है; और धनका व्यय कलस्वार्य के लिये J ११६ निवन्धमालादर्श और वह भी विषयोपभोगार्थ करना और उसकी सहायता से अनेकानेक दूपित काम करना आदि तो मानवजाति को कलकित करनेवाले पशु और राक्षसों का काम है ? सज्जनलोग सम्पत्ति का, व्पय बहुतही भिन्न प्रकारसे करते हैं ।महर्पि भर्तृहरीजी कहते हैं- श्रोत्रं श्रुतेनैव न कुण्डलेन, दानेन पाणिन्तु कईणेन ।। विभाति कायः करुणापराणां, परोपकारैर्नतु चन्दनेन ॥ "कर्ण सच्छास्त्र श्रवणद्वारा ही शोभाको माप्त होते है, कुण्डलों से नहीं, हाथ दान करने से शोभायुक्त होते है, कङ्कणों से नहीं; और जो दयाशील है उनके देह की शोभा परोपकार से है, कुछ चन्दन से नहीं है। अब यह वात स्पहरूप से निर्धारित हो गई कि सम्पत्ति के उपभोग का यही मार्ग सर्वोपरि श्रेष्ठ है । पर सम्पत्ति का धर्मार्थ त्याग करने में एक बात की ओर विशेष ध्यान देना उचित है अर्थात् पात्रापात्र विचारपूर्वक दान देना चाहिये । जो पात्र को दिया जाता है वही सद्दान है। कुपात्र को देने से दाताको उलटे दोपी होना पडता है । अब इधर पात्रापात्रविषयक विचार पहले की अपेक्षा बहुत अच्छे हो गये है सो सबपर विदितही है। उनके विषय में विशेप लिखने की कोई आवश्यकता नहीं है। इस के पूर्व ब्राध्मणों को, विशेष कर पुरोहितों को दान देने में लोग पुण्य माना करते, पर अब सर्वसाधारण की यह उत्तम सम्मति हो गई है कि आपत्तिग्रसित मनुष्यमात्र दान के लिये एक से सत्पात है। पर अभीलों यह बात नहीं दीख पडती कि इस नये मतद्वारा धर्म की कुछ वृद्धि हुई वा पहले के इतनाही रहकर वह अपर श्रेष्ठ मार्ग का अनुकरण करनेलगा। जन महान् काल किरालरूप धा-- गणकर हजारों मनुष्यों को अपने गाल में रसना प्रारम्भ करता है तर तो कालपीडित लोग धर्म के अत्यन्तपान होते है न!' - - सम्पतिका उपभोग । ११७ विषयक सबके मत इतनं सुधारसपन्न होनेपर भी यथार्थ दाता का पुण्य बहुतही-थोड़े लोग प्राप्त करते है । इन बातों से यही मानपढता है कि हमारे नई रोशनी के बालोग उतनेही सुधार का स्वीकार करते। जितना केवल एथ्य के उपयोग में था सकता है। धर्म के सम्बन्धसे दूसरी एक यहभी बात ध्यानमें रखने योग्य कि हाथ से पिलकुल पैसा न छूटने की अपेक्षा प्रशंमा के लोभ से धर्म होनाभी अच्छा है, पर वह यथार्थ धर्म नहीं माना जा सकता क्योंकि उतना परोपकार कीर्ति के लिये वेंच देने कैसाही है। पास्तमें धर्म वही है कि जो करुणाई अन्तःकरणसे निरपेक्षवृद्धिपूर्वक दिया जाता है; और वारतरमे उसीस दाता को सुख माप्त होता है। (१५ ) यहांलो सम्पत्ति के भिन्न २ उपभोगों का निरूपणकर पह दिखलाया गया कि किस प्रकार के उपभोग से उपभोक्ता को कितना सुख मिलता है । अन उपसहार में यही प्रार्थना है कि, वि- भवका सुख लेना हमदी लोग जानते हैं इस मूर्खतागर्भित दुरभि- मान को तिलाञ्जलि दे यदि हमारे राजे महाराजे और अपर जमीकृपापान धनवान् लोग इसके सम्बन्धसे युरोपियन (गोरे) लोगोंका अनुकरण करें तो वह उन्हें अत्यन्त हितावह होगा। इस कथन का यह अभिमाय कदापि नहीं है कि वे लोग धनका सदा सर्वन सद्व्ययही किया करते होंगे, वा जो वे फरते हैं वह सब उत्तमही रहता है | इस देशमें उन लोगों के जो आचरण दृष्टिपण में पाते हैं, उनसे यह सहनही अनुमान होता है कि, यहा केसेही वह भी मेमसाहब, युटलेर साहव आदिकी ही साहब पर भरलता रहती होगी, लकडा चमडा कपडाप्रादि का सामान खरीदनेमें ही बहुत से धन की आहुती दीजाती होगी, इसके सिवा मदिरादिका संवन, व्यभिचार के म्यान में सुप्रसिद्ध बाल नाप का नाच प्रभृति - .
से - ११६ निवन्धमालादर्श और वह भी विपयोपभोगार्थ करना और उसकी सहायता अनेकानेक दूपित काम करना श्रादि तो मानवजाति को कलङ्कित करनेवाले पशु और राक्षसों का काम है ? सज्जनलोग सम्पत्ति का व्यय बहुतही भिन्न प्रकारसे करते हैं।महर्षि भर्तृहरीजी कहते हैं, श्रोत्रं श्रुतेनैव न कुण्डलेन, दानेन पाणिन्तु कङ्कणेन । ' विभाति कायः करुणापराणां, परोपकारैर्नतु चन्दनेन । "कर्ण सच्छास्त्र श्रवणद्वारा ही शोभा को प्राप्त होते है, कुण्डलों से नहीं, हाथ दान करने से शोभायुक्त होते है, करणी सेना और जो दयाशील है उनके देह की शोभा परोपकार से है, कुछ चन्दन से नहीं है" । अब यह बात स्पहरूप से निर्धारित हो गई हिसम्पत्ति के उपभोग का यही मार्ग सर्वोपरि श्रेष्ठ है । पर सम्पत्ति का धर्मार्थ त्याग करने में एक बात की ओर विशेष ध्यान देना उचिन है अर्थात् पानापात्र विचारपूर्वक दान देना चाहिये । जो पात्र को दिया जाता है वही सद्दान है। कुपात्र को देने से दाताको उलटे दोपी होना पडता है। अब इधर पात्रापात्रविषयक विचार पहले की अपेक्षा बहुत अच्छे हो गये हैं सो सबपर विदितही है उनके विषय में विशेष लिखने की कोई आवश्यकता नहीं है । इस के पूर्व ब्राह्मणों को, रिशेप कर पुरोहितो को दान देने में लोग पुण्य माना करते, पर अब सर्वसाधारण की यह उत्तम सम्मति हो गई है कि आपत्तिगसित मनुष्यमात्र दान के लिये एक से सत्पात्र है। पर अभीलों यह बात नहीं दीख पडती कि इस नये मतद्वारा धर्म की कुछ वृद्धि हुई वा पहले के इतनाही रहकर वह अपर श्रेष्ठ मार्ग का अनुकरण करनेलगा। जब महान्काल विकरालरूप धा- रणकर हजागें मनुष्यों को अपने गाल में रखना प्रारम्भ करना है तर तो कालपीडिन लोग धर्म के अन्यन्तपान होने हैं न! पर . सम्पतिका उपभोगे। ११७ नविषयक सबके मत इतन सुधारसंपन्न होनेपर भी यथार्थ दाता का पुण्य बहुतही थोड़े लोग प्राप्त करते है । इन बातों से यही नानपडता है कि हमारे नई रोशनी के चावूलोग उतनेही सुधार का स्वीकार करते है जिनना केवल पथ्य के उपयोग में था सकता धर्म के सम्बन्धसे दूसरी एक यहभी बात ध्यानमें रखने योग्य कि हाथ से विलकुल पैसा न छूटने की अपेक्षा प्रशंमा के लोभ से धर्म होनाभी अच्छा है, पर वह यथार्थ धर्म नहीं माना जा सकता क्योंकि उतना परोपकार कीर्ति के लिये बेंच देने कैसाही है। वास्तवमें धर्म वही है कि जो करुणाई अन्तःकरणसे निरपेक्षद्धिपूर्वक देया जाता है; और वास्तव में उसीस दाताको सुख प्राप्त होता है ।। (१५) यहालों सम्पत्ति के भिन्न २ उपभोगों का निरूपणकर यह दिसलाया गया कि किस प्रकार के उपभोग से उपभोक्ता को केनना मुख मिलता है । अब उपसंहार में यही प्रार्थना है कि, वि- नवका सुस लेना हमही लोग जानते है इस मृर्वतागर्भित दुरभि- न को तिलाञ्जलि दे यदि हमारे राजे महाराजे और अपर नमीकृपापात्र धनवान् लोग इसके सम्बन्धसे युरोपियन (गोरे) लोगोंफा अनुकरण करें तो वह उन्हें अत्यन्त हितावह होगा। इस स्थन का यह अभिप्राय कदापि नहीं है कि वे लोग धनका सदा सर्वत्र सदव्ययही किया करते होंग, वा जो वे करते है वह सर उत्तमही रहता है । इस देशमें उन लोगों के जो याचरण दृष्टिपध आते हैं, उनसे यह सहनही अनुमान होता है कि, यहा कैसेही वहांगी मेमसाहब, बुटलेर साहव आदिकी ही साहब पर प्रबलता हत्ती होगी, लफडा चमडा कपडामादि का सामान सरीदनेम ही बहुत से धन की आहुती टीजाती होगी, इसके सिवा मदिराधिका सेवन, व्यभिनार के स्थान में समामिद्ध गॉल नामका नान प्रभृषि ११८ निबन्धमालादर्श। यूर्सता की और भी अनेक वात प्रचलित होंगी। वैसेही यहाँ आचरणों से काल के समय की इनलोगों की दानशूरतादिकाम अनुमान करलेना चाहिये । इस विषय में हम और न कहकर या कहते हैं कि उनलोगों के जितने ग्रहण करने योग्य गुण हैं वेध चश्य ग्रहण करने चाहिये। गद्दी पर तकिया लगाकर बैठने, ३ इसर का तिनका उपर उठाकर में रखने में प्रतिष्ठा न मान उन समान हमारे उमलोगों को देशाटनादि परिश्रम के काम करने चा हिये । उसी प्रकार से अक्षरशत्रु और सदा क्रियाशुन्य रहने श्रेष्ठत्ता और भूपण न मान उनके सदृश विद्यानिपुण हो संसार कीर्तिको चिरस्थित करने के लिये प्रयत्नवान होना चाहिये । दान शूरता के विषय में उन्हें हमारे पारसीदेशभाइयों को अनुकत क रना समुचित है । बडे भयावने काल में हमारे देशने उनके ध और जीवनकी रक्षाकी उसके लिये वे जो कृतज्ञता प्रकाशित कर हैं सो सबपर विदितही हैं। हम यहां यह लिखना समुचित समझते है कि उन लोगों के अभिमान का स्थल वा मान व जातिका भूषणे रूप जो महात्मा उनके यहां होगया है उसको हमारे धनी मानी- लोग अनुकृतकरें । सारांश इस प्रकार से यदि हमारे लोग अपने श्राचरणों को सुधारेंगे तो संभव है कि हमारे लोग संतति और भपत्ति के विरोध को जो दैवमत्सरकृत मानते हैं सो तुरन्तही' नध होजायगा और वे भूतपूर्व लोगों की नाई समुज्ज्वल कीर्ति मात करने के लिये समर्थ होंगे! है वक्तृता। तवा सदसि ग्रवीनु बचनं यच्छ्वतां चेतसः पोल्लास रसपूरणं श्रवणयोरक्ष्णोषिकासश्रियम् । क्षन्निद्राश्रमदुःखकालगतिहत कार्यान्तरप्रस्मृति प्रोत्कण्ठामनिशं श्रुतौ वितनुते शोकं विरामादपि ।। * (१) यह विषय परमोपयोगी है । तिसमें अब इधर चारों र लोगों का चित्त इसकी ओर विशेपरूप से आकृष्ट होने क गरण सर्व साधारण में इसकी चर्चा विशेषरूपसे होती रहती है। तिः इस बार हमने यही विचारा है कि उक्त विषयपर हमभी कुछ तरखें। और पनिकादि संपादकों का परम कर्तव्य भी यही है कि पन्न २ विपयों पर लोगों की जो सम्मति निश्चित हो गई हो नकी सत्यासत्यता का अनुसवानकर उन्हें यथार्थरूप से लिपि- द्ध करने के उद्योग में वे रहाकरें। एतावता हम इस विषय के 'नन्य से सर्व साधारण के जो मत मतान्तर पायजाते हैं उनकी गलोचना कर अपने पाठकों को इस विषयके यथार्थरूप का रिचय देनेके लिये निम्नलिखित प्रपन्य प्रकाशित करते है। (२) "वक्तृता' शब्द का अर्थ 'प्राचनपटुता' अर्थात् ' बोलने की शक्ति' है। पर यह केवल यौगिक अर्थ है। रूढिमे काल प्रव- नि शक्ति के लिये उक्त शब्द प्रयुक्त नहीं होता, तो उसमें उसकी * सभा में उपस्थित हो पा को प्रेमी यता देनी चाहिये कि जिसे सुर बोताओं के थम्त परण प्रसाही, पण वानस से सामायित हो, मैन पारधर्म पिरासित हो, पैसेही, सुधा, निमा, प्रम, दुय धौर कालगति फा परिशन रिहा अन्य समस्त कार्यों की विस्मृनि हो यता सुनने के लिये उनका शिक्षा र यन्त उस्कएिटा होता रहे पार टपके शेष होजानेपर उन्हें वेदो।
निवन्धमालादर्श। थपेक्षा अधिकतर अर्थगर्भित रहता है। वह आगे चकाके आवश्यक गुणोंके वर्णनमें स्पष्टरूप से लिखाजायगा । परन्तु यहां पर प्रसगा नुसार इतना लिसदेनाही अलम् होगा कि 'वक्ता का' प्रधान ल क्षण 'मोहकता है। अर्थात् जिस संभापण को सुनतेही श्रोताओं की चित्तवृत्ति चित्रार्पितसी हो वक्ता की भोर'याकृष्ट होजाती है उसीका नाम वकृता है। (३)हम इस विपय को निम्नलिखित चारभाग में विभक्त कर यथाक्रम उनकी आलोचना करते हैं-(१) वक्तृता का आदि पीठ जो ग्रीस देश वहां यह उत्पन्न हो इसका असर कैसे हुआ चहा इसने कहालों उन्नति लाभ की, और वहासे अन्य देशोंमें इस का प्रचार किस प्रकारमे हुआ और इसका उत्कर्ष कहालों हुआ (२) हमारे देश में यह वर्तमानरूप से थी वा नहीं आदि के निरूपण । (३) बनता की उन्नति के लिये संमति जिन उपायं की शरण लीजाती है उनकी आलोचना । (४) उक्त विषय क विवेचनाकर, वक्ता के आवश्यक गुणों का निरूपण, वकृताजनित उपयोगितादि की मीमांसाआदि के विषय में लिखेंगे। । (४) अब प्रथमतः' यह विचार करणीय है कि वक्तृता गुए की उत्पत्ति किम प्रकार होती है और उसका प्रसर होनेके लि किन किन कारणों की आवश्यकता होती है । इतिहास के अव लोकनसे यह बात जान पड़ती है कि जहां जहां लोगपालित राज्य की स्थिति थी वहा वहा उक्त गुण की स्थिति थी। उस सम संपूर्ण ग्रीसदेशमें से केवल प्राथेन्स में ही मजाकतकराज्य होने कारण मसिद्ध २ वालगरण वही उत्पन्न हुए । उस नगर के मेल स्पार्टा, थीम और मासिडन आदि अनेक राज्य थे पर उनके र पूर्ण इतिहास में एक भी सुप्रसिद्ध वना का उल्लेख नहीं पार १२१ माता । यही बात इटालीदेश के संपन्य से भी दृष्टिगत होती है। उस देश में भी ग्रीस की नाई छोटे२ अनेक रजवाडे थे, पर बडे २ विकामों का होना केवल रोम नगर के इतिहास में ही पाया जाता है। अब इधर अनुमान सौ दो सौ वर्षके भीतर यही वात इंग्लैंड की भी दीखपडती है। वहां इसकी उत्पत्ति और उन्नति तभी से 'मानी जाती है जवसे राजा प्रजा में तुमुल युद्ध हो दूसरे पक्ष को अधिकाधिक स्वतन्त्रता मास होनेलगी। वैसे ही अनुमान सौवर्ष के पूर्व जय फरासीस के देश में बड़ी धूम हुई थी और उन लोगों को क्षणिक स्वतन्त्रता माप्त हुई थी तब उतने संकुचित समय में भी यकृता का क्षणमात्र उदय हुआ था । वही घटना इधर अमेरिका के नूतन प्रजाकक राज्य में भी हुई है । अर एशिया के विषय में देखिये । एशिया महादेश में आज पर्यन्त सैकडों वडे २ राज्य हो गये, पर यह घटना एक में भी नहीं दीख पडती कि वक्ता की वक्तृता सुन लोग सहसा किसी कार्य में प्रवृत्त हो गये हों, वकृता की पाठशाला स्थापित की गई हों और पड़े चकृताचार्यों ने अपने शिष्यों को चकृता दी हो अथवा महती सभा में राज्य कार्यपाही के विषय में दो वक्ताओं ने परस्पर में पूर्वपक्ष-उत्तर पक्ष चलाये हो। हम तो यह समझते है कि 'चहा' और 'वता' इन शब्दों का अर्थ अब इधर जो समझाजाने लगा है तवाचक शब्द एशिया महादेश की किसी भाषा में न मिलेंगे। क्योंकि जा किसी शब्द का वाच्यार्थ ही लोगों के मन में कदापि नहीं पाया तौ तद्वपक्षक शब्द का भापा में न होना यथार्थ ही है। हमारे भूत- पूर्व महापयों के समय में अनेक विद्या और शास्त्रों की उन्नति हुई, यही कारण है कि ग्रीक और रोमन आदि प्राचीन राष्ट्रों में जो २ शास्त्रीयविषय पाये जाते है वे सब हमारे देश में थे । यदि १२२ निवन्धमालादर्श। न थे तो केवल दो ही-एक इतिहास और दूसरी वता'। इनमें से पहले के अभाव का कारण फिर कभी अवकाश पाकर लिखेंगे और वकृता के विषय मे तो यहां लिख ही रहे है । इस लेख द्वारा- उसके अभावका कारण पाठकों को सहज ही में ज्ञात होजायगा। वकृता के अभाव का कारण हमारे यहां की शासनप्रणाली प्रतीत होती है। हमारे देश में शासनप्रणाली एकही प्रकार की अर्थात् समस्त अधिकार एक राजा के हाथ में रहते और प्रजागण उसके श्राधीन रहा करते है यही शासनरीति प्राचीन काल से आजपर्यन्त एक सी चली आई है। एतावता यकृता का यहां कदापि मादुर्भूत न होना ठीक ही है । यवनलोगों का इतिहास तो इस सिद्धान्त की बहुत दृढता के साथ पोपकता करता है । देखिये महम्मद के अनुयायी लोगों ने अरवस्थान, ईरान, भारत और चीन प्रभृति पूर्व के देश और पश्चिम की ओर मिसर देश, आ मिका का उत्तर किनारा, स्पेन, फ्रान्स और संप्रति जिन्हें तुर्क- स्थान कहते हैं वे दो देश, इत्यादि पृथ्वी के विस्तीर्ण प्रदेश व्याप्त कर वहा भिन्न २ प्रकार के राज स्थापित किये-इसमें भी विशेषता यह है कि ग्रीक और रोमनलोगों की समस्तविद्या उन लोगों ने सीख ली, पर मजाफर्दक शासनप्रणाली की कल्पना तक उनके मन में कदापि नहीं आई। इसके सिवाय ग्रीकलोगों के चिकित्सा, ज्योतिप और अध्यात्मविद्यादि के ग्रन्थों को उन लोगों ने अपनी भाषा में लिख उन्हें बडे उत्साह से अधीत किया, पर उस भाषा में वत्ता के जो उत्तमोत्तम ग्रन्थ थे वेमात्र उनकी शासनप्रणाली के विपरीत होने के कारण उन्हें विशेप प्रिय नहीं हुए से जान पड़ते हैं। क्योंकि वे उन्हें प्रिय होकर उनके मत मतान्तर यदि उनके मन पर प्रतिविम्बित होते तो ग्रीक और रोमनलोगों के स- .
वता। १२३ भी दृश प्रजासत्तात्मक राज्य उनके उतने सुविस्तीर्ण प्रदेश में कहीं हुआ होना । उक्त प्रजाफर्तुक शासनप्रणाली की कल्पना पूर्व- दिशीयलोगों के मन को कैसी अत्यन्त अपरिचित है इसका उत्कृष्ट प्रत्यय हमें हमारे घर ही में मिलता है। आजकल हमारे देश में पति- वर्प सहस्रों सभा स्थापित होती है और शीघ्र ही लयको भी प्राप्त होजाती है । इसका मुख्य कारण हमें यही प्रतीत होताहै कि यह सभामणाली अन्यदेशीय होने के कारण यहां के जनप्रचारमें उसका बीजारोपण होने के लिये अभी पुष्फलसमय की आवश्यकता है। आज सहस्रों वर्षों से जनप्रत्ति का जो वहाव चलाश्राता है उसे अभी एकाएक नृतनरूप देना चाहें तो यह कैसे होसकता है ? अस्तु ती उल उल्लेखसे यही सिद्ध होता है कि एशिया महादेश के लोग मजाफरीक राज्यप्रणाली को पिलकुल न जानते थे एता- वता संस्कृत, पारसीक और भी आदि भाषाओं में ग्रीक और ल्याटिन भापा की नाई वकृता के ग्रन्थ नहीं लिखे गये, । सो कोई आश्चर्य की बात नहीं है। (५) उक्त प्रतिपादन का अभिप्राय हमारे निवेकी पाठकों के चित्त में शाही गया होगा कि वकृता का उदय और उत्कर्ष होने का कारण देश में एक विशेपप्रकार के शासनप्रणाली की आवश्यकता है । यह विशेष प्रकार प्रजाकतक शामनमणाली है । यव यदि कोई यह प्रश्न करे कि वक्ता की उत्पत्ति और अभिवृद्धि का कारण उक्त शासनमणाली ही क्यों है, और इतर देशोंमें उन दोनों का आविर्भाव क्यों न हो, तो इसका उत्तर देना कोई कठिन कार्य नहीं है। देखिये कि मनुष्य वा देश का गुण प्रकट होने के लिये प्रसंग विशेप की आवश्यकता है। यदि वह न हाथ पावे तो वह गुण दृग्गोचर कदापि नहीं होसकता । मानलो किसी व्यक्तिविशेष को परमोत्तम वामृता की शक्ति माप्त है पर जबतक उसके प्रकरित होने १२४ निवन्धमालादशे। का यथेष्ट अवसर नहीं माप्त होता तबतक उक्त शक्ति को उस पुरुष के आश्रित ही रहना पडता है। और कहांलों कहें विना अवसर माप्त हुए उसकी वह शक्वि स्वयं उसे भी नहीं जान पडती । तो इस प्रति पादन से यह वात लक्षित होती है कि, जहां प्रजासत्तात्मक शा- सनप्रथा रहती है और समाज वा सभा की बहुमतिद्वारा सदा राजकार्य सम्पादित होते है, वहां मेधावी पुरुषों को समाज का सभा के सभ्यों की सम्मति अपनी सी करलेने के हेतुवकृता कैसा सुदृढ साधन और नहीं उपलब्ध होता । जिसके पास वह पूर्ण- रूप से रहती है उसीकी मूठी में सब लोग, रहते हैं । और समस्त राज्य में उसीकी तूती बोलती है । अस्तु; तौ समस्त शासनप्रथाओं में केवल प्रजाकर्तृक शासनप्रणाली वकृता के उदय का अनुकूल कारण है; क्योंकि अन्यप्रथा में राज्यकार्य का सम्पादित होना बहुसम्मति पर निर्भर न होने के कारण, अधिक जनों का चिच अपनी शोर आकृष्ट करनेवाली कला वक्ता की आवश्यकता ही प्रतीत नहीं होती। तो इससे यह स्पष्ट ही है कि जब उक्त कलाका मूल ही न रहा तो उसका विस्तार क्योंकर होता। (६) उक्त दो लेख परिच्छेद में सामान्यतः यह लिखागया? कि वकृता का उदय होने के हेतु किस प्रकार की अवस्था आव- श्यक है । अब पाठकों को उसकी यथार्थता का परिचय देने के लिये कतिपय इतिहासप्रसिद्ध उदाहण नीचे प्रकाशित करते है। (७) पाला और वडा भारी उदाहरण ग्रीसदेश का है। इस देश के इविहास के सम्बन्धसे यह कहानाताहै कि जिसने ग्रीस * अब इधर हिन्दी में नाटक उपन्यामादि के छोटे मोटे अन्य लिखे जाने लगे हैं। पर इतिहास के विषय में सिवाय रायू कार्तिकप्रसादजी सहकारी सम्पादक भारतजीबन बारस के और कोई उसकी चैा तक नहीं करता। ऐसी दशा में ग्रास और रोम के इतिहास का हिन्दी में स्वम देखना भी पड़े साहस का कार्य - होगा।
वकृता। १२५ का इतिहास नहीं पढाउसने मानवी बुद्धिके अद्भुत चमत्कार अणु- भान भी नहीं देखे । पृथ्वीके सब खण्डोंकी अपेक्षा छोटा जो युरोप- खण्ड उसके पिवरण चित्रपटमें यह देश पूरा पीताभर मीन भरेगा। इतना छोटा होने पर भी इसके कीर्ति के नगाडे आज पर्यन्त सं- पूर्ण जगत् में बजते है और उसी प्रकार जगत्मलयलों बजते र- इंगे। इसकी अपेक्षा सौ और हजार गुना बडे देश और भी कई है; और बहुतेरे देशों में परमेश्वर के पुत्र ने आकाश से अपत्तीर्ण हो वहा के लोगों को विश्वास दिलाया है कि तुम्हारा देश परमेश्वर को अत्यन्त मिय है। पर उन देशने श्राकार में इतने छोटे और परमेश्वर को अप्रिय होने पर भी निज के बुद्धिसामर्थ्य द्वारा जो उज्ज्वल कीर्ति प्राप्त की है सो अद्यावधि अन्यदेशने माप्त नहीं की, और हम समझते हैं कि अब आगे और कोई देश प्राप्त भी न करसकेगा। अस्तु; तो इस देश के विपय में वर्तमान विषय के सम्बन्ध से यही दिखलाना है कि आदि में चट्टता यही उत्पन्न हुई और शीघ्र ही उन्नति के शिखर पर जा पहुँची; यहीं से अन्यदेशों में उसका प्रचार हुआ, और सम्पति भी उसकी स्थिति जो देश देशान्तरों में पाई जाती है उसका मुख्य कारण यही देशहै । इस देशमें यकृतानेजो उन्नति और पूर्णता लाभ की उससे अधिक आज दो हजार वर्ष में और कहीं नहीं प्राप्त की। जल प्रतिपादन से विज्ञपाठकों को तत्क्षण लक्षित हो- जायगा कि इस वकृतारूप महौध की उत्पत्तिका स्थल पाथेन्स का प्रजाकतक राज्य हैं । इस नगरमें प्रजासत्तात्मक राज्यप्रथा ने भाचीन कालमें जो सीमा प्राप्त की थी सो उसने और कहीं नही प्राप्त की थी और सम्मति भी यह सीमा उसे कही नहीं प्राप्त है। राज्य के सर्व साधारण की सम्मति से जो बात निश्चित होती - . १२६ निवन्धमालादर्श। उसे प्रमाणित मान तदनुसार सब कार्यवाही होती । तो ऐसे समय में सकललोगों के समीप उपस्थित हो जो वकृता देता और समस्त लोगों की सम्मति निज की सम्मति के अनुसार कर लेता वही राज्यमें मुख्य माना जाता; और समस्त राज्यसूत्र उसीके हाथ में रहते । आथेन्स नगर में जितने उच्चपदाभिपित राजकर्मचारी हुए उतने. सब उक्त गुणविशिष्ट थे; उक्त गुण की पूर्णता के कारण ही उनका अधिकार दीर्घकाल लों निर्विन चला जाता । उक्त कर्मचारियों में अन्तिम डिमासथेनीस हुआ है । उसकी वकृता शक्ति की घोपणा आज समस्त भूमण्डल पर गुञ्जायमान हो रही । मासिडन देशाधिप फिलिप ने जब संपूर्ण ग्रीस देश को पद- दलित करने का मंसूबा बांधा था, तब उक्त वक्ता कैसे जो कतिपय देशाभिमानी थे उन्हें गहरी चिन्ता में मग्न होना पड़ा था। उन लोगोंने अपनी संपूर्ण वकृताशक्ति और प्रचण्ड उद्योगकाण्ड द्वारा लोगों को उत्साहित करके उक्त नराधिप के साथ लडने के लिये रणक्षेत्रमें उपस्थित कराया था। इस समय और सब रज- वाडे मासिडन के विरोधी थे; पर फिलिप की युद्धविद्याविशारद सेना और उसके साहस के सन्मुख किसी के किये कुछ न हो- सका उस लड़ाई में वह समस्त देश एक बार जो पराजित हुआ सो फिर वह अपना शिर ऊपर न उठा सका । उक्त प्रकार से तौ डिमासथेनीस प्रभृति देशाभिमानी पुरुषों का पक्ष यद्यपि गिर गया तथापि उनके परिश्रम सर्वथा व्यर्थ एवं विफलित नहीं होने * उस युद्ध इ० स० के पूर्व ३३८ के साल में हुा । सय से प्रोस देश जो पराधीन हुआ सो उसे दो हजार वर्ष एक से पराधीनता में काटने पदे । उसकी हा दोन दशा का अन्त १८२७ के साल में हुआ तब से इमर पर वह स्वत नता का अनुभव ले रहा है। पर पहले की बात जो एकगार गई सो गई हो गयी।
वकृता। १२७ पाये। क्योंकि संसारमें यावत्काल पर्यन्त देशैकनिष्ठा और वकृता की सराहना होती रहेगी तबलों उनके नाम जगत् में अवश्य ही लिये जाया करेंगे। और तो क्या उनके परमशत्रु फिलिप को भी विशाल सैन्यों की अपेक्षा कहीं अधिक उनसे भयभीत होना पड़ा था-वह यहातक कि श्राथेन्स नगरमे जो वारा सुप्रसिद्ध वक्ता थे उन्हें उपपदान (धूस) द्वारा अपने वश करनेके लिये उसे पार्थिव प्रयत्न करने पडेथे; वह ग्रीस का गिरता काल होने के कारण उन वारा में से कई लोग अन्तरग उसे अनुकूल हो- गये थे । अस्तु; तौ प्रजाकर्तृक शासनप्रणाली के कारण ग्रीसदेश में उक्त प्रकारसे वक्तृता का आविर्भाव हुआ और उक्त कथना- नुसार उसने उतनी उन्नति लाभ की थी। (८) हम समझते है कि विपयनिरूपण के अनुरोध से समस्त ग्रीस देश ही क्या किन्तु जगत् में जो डिमासथेनीस अद्वितीयवक्ता माना गया, उसके थोडे से जीवनवृत्त का उल्लेख यहां पर अप्रासं- गिक और अनुचित न होगा । श्रतः उसका संक्षेपतः कथन करते है । इस भुवनविख्यात महान् वक्ता ने आथेन्सनगर में जन्म ग्रहण किया। संसार में भागे इसने विशाल कीर्ति और योग्यता माप्त की पर आदि में इसके ख्याति की नैसर्गिक सामग्री सर अपूर्ण थी। अर्थात आदि में इसका थावाज कोता और वर्णोचार अस्पष्ट था वैसेही अङ्गविक्षेप भी श्रोताओं के चित्त को श्राकृष्ट करने के योग्य नथे । उक्त जनता के कारण इसे एक मसग पर बहुत ल- जिजत होना पड़ा था। यह पहला ही मसग या कि जर यह समा वकृता देनेको उपस्थित हुआ था। पर उऊ लज्जा और अपमान के कारण यह हतोत्साह नहीं होगया । सौ उन दोपों से दूर करने तथा वक्ता के भारश्यक गुणों को संपादित करनेके हेनु यह में १२८ निवन्धमालादर्श । एक सा परिश्रम करते रहा । वह इस प्रकार कि अपने घर को, घडा और गम्भीर करने के हेतु वह समुद्रके तीरपर एकान्तमे जाया फरता, और जब समुद्र की प्रचण्ड तर उभड़ने लगती और मेघों की नाई गर्जना करने लगतीं तव वहां वडे आवेगसे वक्ता दिया करता । बोलते वोलते उसे श्वास बहुत भर आया करता उसका अवरोध करने के लिये वह छोटी २ पहाड़ियों पर योही जाया आया करता । ऐसा करते २ कुछ काल में श्वासका अवरोध वह पूर्णरूप से करने लगा ।वर्णाचार स्पष्टरूप से न होता था अंतः उसने मुंहमें वारीक बारीक कंकर भरकर बोलना प्रारम्भ किया। और इस युक्तिद्वारा अल्प समयमें ही उसने उक्त न्यूनता दूर कर दी। इस प्रकार वाणी के राकल दोपों का निरसन कर उसे अन्यान्य गुणों से संयुक्त करने तथा लोगों का मन मोहित करनेकी शक्ति प्राप्त करने के अर्थ उसने उद्योग करना प्रारम्भक्रिया । आ. थेन्स में रङ्गभूमि पर नाटक अभिनीत हुआ करते थे; अतः अङ्ग विक्षेप कलाचतुर नटों के पास जाकर उसने अङ्गविक्षेपादि का ज्ञान प्राप्त किया । अपनी वकृता को प्रौढ, रसभरित और जन मनोरञ्जन करनेवाली करनेके हेतु उसने सुप्रसिद्ध इतिहासकार थुसिडिडीस के ग्रन्ध को अपने हाथ से पाठ वार लिखा। इस प्रकार कई वर्ष लो प्रचण्ड परिश्रम जब डिमासथेनीस ने किये तब अपने देश भाइयों के चित्त पर प्रभाव उत्पन्न करनेवाली सर्वाङ्ग सुन्दर चकृता शक्ति उसे प्राप्त हुई और वह बहुमान्य माना जाने लगा और देशहित के गुरुतर कार्य उसके हाथ से संपादित यह निर्धारित वार्ता है कि व्यक्ति के गुणविशेष को पूर्णरूप से भाटित होने के लिये प्रसंग विशेपकी अत्यन्त आवश्यकता रहती है डिमासथेनीस को अपनी सर्वगुणोपेत वकृता द्वारा अपने देश 4 चकृता ।। १२३ की सेवा करने के हेतु कौनसा अवसर उसके हाथ लगा और देशसेवा उसने कैसे विपम प्रसंगपर फी सो इतिहासज्ञ लोगों से छिपी नहीं है । अभी ऊपर उल्लिखित होही चुका है कि मासिडन सान्त के नराधिप फिलिप ने अपनी शासनसीमा बढा समस्त ग्रीस देश को पददलित करनेका मंसूवा वांधा था। इसीअपसर पर उक्त वक्ता के समस्त गुण पूर्णरूप से प्रकाशित हुए । इस अवसर की सकी वकृताएं ऐसी परमोत्कृष्ट है कि समस्त जगत् उन्हें समाहत कर वैसी वकृता को उसी के नाम से पुकारते है अर्थात् किसी याक्तिपर जब कोई वक्ता बहुत आक्षेप करता है तो उसे अंगरेजी फिलिपिक' कहते है ! इन वकृताओं से मासिडन के राजा ऐसे पयभीत रहा करते थे कि लोगों ने डिमासथेनीस को अपने आ- न करने के लिये प्राथेन्स के कई लोगों से कई वार गुप्तभाव । मन्त्रणा,की; और अन्त में उक्त प्रान्त के राजा के भय के कारण तो इस महान् वक्ताको विपप्रयोग द्वारा आत्महत्या करनी पड़ी। ऐसा चण्ड प्रभाव उपजानेवाली वक्तृताएं कैसी उत्तम होंगी सो हमारे वेवेकी पाठकगण स्वयं अनुमान- करसकते है और इसीसे ग्रीक मूल ग्रन्थों की योग्यता भी विचार सकते हैं। (६) दूसरा उदाहरण रोम का लीजिये । इस नगर में पूर्व से प्रजाकक शासनप्रथा प्रचलित होने के कारण यकृता की प्रत्यन्त आवश्यकता और चाह थी। यहा इन लोगों में श्रेष्ट और सामान्य जन ऐसे दो पक्ष थे । इतिहासज्ञ लोगों पर बात भलीभांति प्रकाशित है कि जब एक बार उन लोगों में ।' डिमासयनीस की पत्ता के विषय में मेकाले साहय ने एक बार मा लियो कि उनमें से कई ऐमी उत्तम ६ कि उनमें या ण्य गदी उधर नहीं करते यनतार 7 -- १३० निवन्धमालादर्श। कलह उत्पन्न हो वादविवाद हो रहा था तब पहले पक्षवाले एक चतुर वक्ताने इसाव के कथासंग्रह में से 'उदर और अवयव' की वार्ता उदाहृत कर दूसरे पक्ष के लोगों का समाधान किया और कलह को मिटा दोनों पक्षवालों में मेल करादिया। इससे यह स्पष्टरूप से निर्धारित होता है कि उस समय रोमनलोग कैसे सीधे सरल स्वभाव के मनुष्य थे और वकृता को कितने प्राचीन काल से जानते थे। यही बात आगे पि-हसराजा के मन्त्री सिनिपसकी भी पाई जाती है । उसके विषय में इतिहास में यह लिखा है कि उसकी जनचित्ताकर्षक वकृता की सहायता से जितने शहर जीते गये उतने राजा के कृपाणवलं से भी नहीं पराजित किये गये। जब उसने रोम नगर में या अपनी अनोखी वकृता द्वारा क्षणभर के लिये रोम के लोगों को भी मुग्धकर तन्मय करडाला था और अन्त में जब एक वयोवृद्ध एवं प्रज्ञाचक्षु सभ्य ने सेनेट सभा में उपस्थित हो उसके फैलाये हुए मोहजाल को दूरकर पिन्हस की कपट नीति सब लोगों को लक्षित करादी थी तब उन लोगों ने सचेत हो उक्त चना को रोमनगर से तत्क्षण चले जाने की आज्ञा दी थी। इस बात को भी इतिहासवेत्तागण जानतेही है। इसी प्रकार से आगे सिपियो, केटो प्रभृति और भी सुप्रसिद्ध राजकर्मचारी गण उक्त कला में अत्यन्त निपुण थे और जो २ राजकान में अंगुया हुआ उसे वकृता एक अत्यन्त आवश्यक उपयुक्तता हुई। मेरियंस और सीजर ये दोनों बडे विख्यात सरदार हो गये है, और फुछ काललो तो ये दोनों संपूर्ण राज के आधारस्तम्भ ही माने जाते थे पर तौभी उन्हें उक्त कला में निपुणता प्राप्त करना ही पड़ी थी। पहले की वकृता का परिचय 'अनेक विद्यामूल-तत्व संग्रह नामकी पाया जाता है और सरा तो वक्रता वकृता। १३१ में इतना निपुण था कि स्वयं सिसरो ने तदर्थ उसकी प्रशंसा की; और उस समय उसकी अपेक्षा किंचित् न्यून यदि दूसरा कोई माना जाता था तो वह सीजर ही,था। सीजर के अनन्तर यूटस और आंटनी इतिहासप्रसिद्ध वक्ता हुए । इन दोनों की वकृता का शेक्सपियर कवि ने अपने सर्व प्रसिद्ध नाटक में बड़ी चतुरता से संग्रह किया है । उसे मननपूर्वक पढने से उस समय की रोमनगर की घटना मानो रूप धारणकर दृष्टिपथ में माने लगती है और साथही वकृता के प्रचण्ड सामर्थ्य का बोध स्पष्ट- रूप से होजाता है । देखिये, जिस प्रकार चाय की प्रबलता द्वारा संपूर्ण समुद्र जिस दिशा को चाहिये उभडने लगता है, उसी -प्रकार से प्रथम वक्ता के अर्थात् श्रूटस के अपनी संक्षिप्त एवं देश- कालानुमोदित वकृता देतेही समस्त लोगों को विश्वास होगया कि सीजर का बध बहुतही ठीक किया गया; जो सबलोगों की स्वतन्त्रता का हरण किया चाहता था उस दुरात्मा का यथोचित रीति से-दमन किया गया। पर वहीं जव आंटनी ने अपनी करुण- रसगर्भित वकृता दी तव उसके सुनतेही. सवलोगों की चित्त- त्ति पलट गई । जो लोग अभी सीजर को गालिप्रदान करते थे वेही उसके यथार्थ गुण का वर्णन सुन करुणासावित हो गये और जिन ग्रूटस आदि हत्या करनेवाले लोगों की अभी उन्होंने प्रशंसा की थी उनका मटियामेट करने के लिये वे दात हॉट चवाते उन्हीके पीछे दौड पड़े ! तो वक्तृता का अद्भुत सामर्य निश्चित करने के लिये अपर उदाहरण की अब कोई श्रावश्य- कता नहीं है ? साराश जालों रोमनगर में प्रजा की सत्ता थी तरलों वह उन कथनानुभूल चकृता की उन्नति का कारण हुई और उसीकी सहायता से उसने वैसी पूर्णता लाभ की थी । श्रव । १३२ निवन्धमालादर्श । पूर्व उल्लेखानुसार पीछे कहे हुए सिसरो का थोडासा वृत्तान्त यहां देते है । यह तो पीछे कही चुके है कि रोमनलोगों में यह अद्वितीय वक्ता माना गया है और डिमासथेनीस के व्यतिरेक इससे श्रेष्ठ और कोई वक्ता नहीं हुआ। “(१०.) सिसरो के माता पिता बडे से कुछ कुलीन न थे। इसने और उक्त मेरियस ने एकही ग्राम में जन्म ग्रहण किया था और दोनों ने निज के साहस से ही आगे यश और कीर्ति प्राप्त की। मेरियस ने सेना विभाग में प्रवेश किया और सिसरो ने आइन का अभ्यासकर शीघ्रही कीर्ति संपादित की । सिसरो की योग्यता के और भी दो तीन विज्ञ वकील थे; पर उनलोगों के साथ इसका कई वार वादविवाद हुआ जिसका परिणाम यही हुआ कि उन लोगों को इससे मतिद्वन्द्वता शीघ्रही परित्यक्त करना पडी । इस प्रकार से जब न्यायसभा में उसका दवाव और गौ- रव वढा तब उत्तरोत्तर सर्व साधारण में भी उसकी मान प्रतिष्ठा अधिकाधिक होने लगी। उसे क्रमशः राज्य के उच्चपद मिलते गये और अन्त में उसने कौनसेलका पद प्राप्त किया । जिस साल में उक्त उच्चतम पद मिसरोको मिला उसी साल में रोमनगरही को क्या किन्तु सम्पूर्ण राज्य को एक अचिन्त्य घोर आपत्ति ने आ घेरा । यह रोम के इतिहास में "क्याटिलैन का गुढ" के नाम से प्रसिद्ध है । पर सिसरो ने बडी चतुरता से उक्त गुढ का विध्वंस किया। और उस घोर विपत्काल में राजधानी और राज्य की रक्षा की । अस्तु; तो जो सिसरो रोम के राज्य में एक याकश्चित् वकील था सो उक्त प्रकार से एक बहुमान्य व्यक्ति हो गया और पापे, सीजर आदि रणधुरन्धर की श्रेणी में समादृत हुआ । पर भय और संकट वडप्पन को सदा पिछियायेही रहते है और * और वकृता ससार के नराधम दुष्टात्मागण भले मानुपों को सदा छलाही फ- रते हैं। ठीक यही अवस्था सिसरो की भी हुई । उसके इस प्र- कार रोमनलोगों को उपकृत कर रखने और अपनी वसुंधराभूपण जाह्नवी समान समुज्ज्वल कीर्ति से उन्हें सदा के लिये भूपित कर रखने पर भी, स्वयं उन्ही लोगों ने अपने देश से उसे दो चार बहिष्कृत किया । और अन्त में रोमनगर में दुष्टों की प्रभुता स्थापित हो, भयावनी विपत्ति ने लोगों को दवाया, उसी अशान्ति 'हलचल के समय में इस भुवनविख्यात वक्ता का देहान्त हुआ। उसके शत्रुओं ने हत्यारों द्वारा उस का उत्तमान (सिर) का मॅगाया, और सेनेट सभा में जिस सर्वोपरि उच्चस्थान पर आरूढ हो वह सब श्रोताओं को मुग्धकर छोडता था उसी स्थान पर उन लोगों ने उसका सिर कील दिया! शिव ! शिव ! बलि- हारी है इस जघन्यता की!! ऊपर सिसरो के ऐतिहासिक चरित्र का वर्णन हुआ । अब जिस गुण के कारण वह विश्वविदित हुआ है उसके सम्बन्ध से कुछ वृत्तान्त नीचे लिखा जाता है। ऊपर कही चुके हैं कि पहले पहल सिसरो आइन का अभ्यास कर वकीली का व्यवसाय करता था। इस व्यवसाय का वकृता से जैसा कुछ निकट सम्बन्ध है उसे हमारे विवेकी पाठक जानते ही है । तो इस वक्ता की यकृताशक्ति प्रथमतः उक्त व्यवसाय के कारण उत्कर्ष को प्राप्त हुई । उस समय प्राथेन्स और होडस ये दो यकृता की उत्तमोत्तम पाठशाला के मुप्रसिद्ध स्थान थे। एतावता उक्त दोनों स्थानपर सुप्रसिद्ध शिक्षादक्ष गुरु के पास सिसरो ने कई वर्पलों वकृता का अभ्यास किया । उसके योग से न्यायसभा में उसका विशेष रूप से दवाव पड़नेलगा - १३४ निवन्धमालादर्श। और पूर्व कथनानुसार उसका वह दवाव एवं प्रभाव उसकी अर्म रामर ख्याति और जनप्रियता का कारण हुआ। आगे वह उत्त रोत्तर उच्चपदाभिपिक्त होते गया और उन पदों का कार्य उसने ऐसी दक्षता और सत्यता से किया.कि दिनों दिन उसकी अखण्ड कीर्ति वृद्धिलाभ करते गई । उस समय रोमनलोग संदाचरण और नीति के पथ से बहुतही च्युत हो रहे थे अतः सिसरो की नीतिपरायणता और निस्पृहता विशेष रूप से उन लोगों में सम्मानित होने लगी । उसके पास वकृता कैसा सुतीक्ष्ण शख शेने के कारण सर्वसाधारण तो उससे भयचकित रहतेही थे पर पडे २, अमीर और रईस भी उसे डरते थे। एकवार उसके विप- क्षियों को सला नाम के एक प्रसिद्ध सरदार ने बहुत कुछ सहा- यता दी पर उसने उनके पक्ष को खण्डनकर अपनाही पक्ष स्था- पित किया। और हेरीस नाम के अत्याचारी सूवेदार के दात उसने किस प्रकार खट्टे किये सो इतिहासमर्मज्ञों को विदितही है । आगे क्याटिलेन नामक नरपिशाच ने जो अनर्थ उपस्थित किया था उसका उसने जिस प्रकार से दमन किया सो पीछे उल्लिखित होहोचुका है। उस कठिन अवसर पर सिसरो की बहुतही चाह हुई और वही समय आगे उसके भाग्योदय और अतुलविभव का कारण हुआ। इस समय की उसकी सेनेटसभा की कहे हुए व्हेरस के सम्बन्ध की वकृता की नाईही प्रसिद्ध हैं पर इतने परही, समाप्ति, नहीं हुई -1-तौ उक्त घोरतर दो आपत्तियों की अपेक्षा रोम,का अधिक गुरुतर विपत्तिसे पाहत होना और उसके कारण सिसरो-की-चकृता का पूर्णरूप से विकास पाना अभी शेपही-था। यह दारुण अवस्था सीजर के वध समय की है। छप्पन मनुष्यों ने सभा में एकत्रित हो ज्योंही सीजर का,बध - पता पीछे - वकृता। " १३५ किया त्योंही समस्त राज्यन्यूह, जिसकी रचना उसने प्रचण्ड परिश्रम से की थी, एक चारही नष्ट भ्रष्ट होगया और उसके कारण सब राजभर में कई वर्पलों अधाधुंधी मची रही । इस समय पूर्वलिखित आंटनी सीजर का कृपापात्र होने के कारण लोगों का चित्त अपनी ओर आकृप्टकर स्वयं राजा बन बैठने के लिये चाल चल रहा था। इस बात के जानतेही सिसरो और उसके सदृश अपरलोग जो प्रजातक राज्य के अभिमानी थे इसका विरोध करने लगे । पर पाटनी को अपने पक्ष के लोगों की पूर्णसहायता होने के कारण उनके विरोध से कोई हानि न पहुँचसकी। अन्त में जब उसने सोचा कि, सिसरो के आक्रमण से बचना वड़ा कठिन कार्य है तब वह वहा से चम्पत होगया । पर फिर भी सिसरोने उसका पीछा नहीं छोड़ा। उस पर आक्र- पण करने के हेतु उसने रोमनगर से सेना भेजी । कहने का प्रभिमाय, यह है कि इस समय सिसरो को अपनी ,वकृताशक्ति का सर्वस्व प्रकटित करना पड़ा। इस समय की पाटनी के विरुद्ध ही यकृता में उसपर इतना आक्षेप किया है कि उसके लिये पीले हा हुआ 'फिलिपिक' शब्द प्रयुक्त किया जाता है । ये वक्तृताएं प्रनुमान बीस पच्चीस हैं। इन, सबको सुनने के लिये आंटनी रोम गर में नहीं रहसका। पहली दूसरी वकृता सुनतेही वह इतना घबड़ाया कि 'फाटय भूमि तो जाउं समायी' वाली बात होगई। और फिसी प्रकार अपने पाण पचा वहां से भागने की वह चिन्ता करने लगा। और जब वह रोम से निकल आल्प्स पर्वत के पार हो गया तब उसके जीमें जी या फिर वहां ठहरकर उसने कई युक्तिमयुक्ति द्वारा अपने विपक्षी सरदारों को, जो उस पर आक्रमण करने के लिये भेजे गये थे, प्रसन्नकर अनुकूल कर वो । निवन्धमालादर्श । लिया। और फिर एक बार रोमनगर में अपनी प्रभुता स्थापित कर पूर्व कथनानुसार सिसरो से अपना वैर लिया । अस्तु; सरस्वती की ऐसी विलक्षण महिमा है ! (१११) पाठकों को वकृता के दो आदिपीठों का वृत्तान्त सुना चुके । अब दैववशात् हमारे देश का जिस देश से संघटन हुआ है उस इंग्लैडदेश के विषय में वकृता के सम्बन्ध से कुछ लिखते हैं । पीछे एक स्थान पर 'उल्लिखित होही चुका है कि इंग्लैंड में अनुमान दो सौ वर्ष के पूर्व जब राजा और प्रजा में भयावना युद्ध हुआ था तभी से उस देश में वक्ता की प्रवृत्ति हुई, और वह उसी समय क्यों हुई. इसका कारण भी पीछे कहा जाचुका है । अव उक्त देश के प्रसिद्ध २ वक्तागणों के नाम नीचे प्रकाशित किये जाते है। । उक्त भयंकर युद्ध के समय भी पार्लिमेंट महती सभा में ऐसे फई सभ्य थे जो नामी वक्ता माने जाते थे। उनकी नामावलि इति- हास में प्रसिद्ध है, पर वह वक्तृता के सम्पन्ध से वैसे प्रसिद्ध न होने के कारण यहां प्रकाशित नहीं किये जाते । इसके अनन्तर भी कई वर्पलों इंग्लैंड में अच्छे २ वक्ता होते गये, पर उक्त कारण: वश ही उनके नाम का निर्देश यहां नहीं हो सकता। अब इस' बात का यदि विचार किया जाय कि, उक्त लोगों के नाम, केवल उन्हींके समय में प्रसिद्ध रहे और फिर क्यों अप्रसिद्ध हो गये, तो इसके दो कारण जान पडते है । एक तो यह कि संपति इंग्लैंड में जो एकाउपयुक्त कला आज कई वर्षों से प्रचलित है,सो उस, समय न थी। यह कला संक्षिप्तलिपि अर्थात् वक्ता के वकृता देते समय ही उसकी : वक्तृता को शीघ्रतापूर्वक अविकलरूप से लिख लेने की युक्ति है। आजकल यह युक्ति भली भाति पूर्णता को पहुँच F- - - वकृता। १३७ माने के कारण और चारों ओर यह प्रसिद्ध होनेके कारण बिलकुल सामान्य वक्तागणों की वकृताएं भी अविकलरूप से लिपिवद्धफर तत्क्षण चारों ओर जितनी अधिकता के साथ चाहिये वितरित कर दी जासकती है। पार्लिमेंट महतीसभा के सभ्यगण अरुणोदय के प्राक् अपने २ घर पहुँचने तक नहीं पाते कि उनकी वकृताएं छपकर चारों ओर वितरित होजाती है। और शीघही कुछ काल के अनन्तर जगत् भर में उनका नाम मसिद्ध होजाता है ! आजकल के वक्तृगणों को ये सब गते अनुकूल हैं; पर भूतपूर्व वक्ताओं को इनमें से कुछ भी अनुकूल न थीं। सभागृह के भीतर जो कुछ होता हो सोई होता था और कायों की मशंसा लोगों में जो फैलती थी सो केवल श्रोताओं कथनोपकथनद्वारा ही फैलती थी । और तो क्या पर गत- ताब्दी के पूर्वार्ध के अन्तअन्तलों भी पार्लिमेंट की वक्तृताएं सर्व साधारण को विदित होने का कोई अच्छासा साधन न था, उस समय के पत्रों में केवल उनका साराश प्रकाशित हुआ करता ग। केवल एक पत्र में वे वक्तृताएं पूर्णरूप से प्रकाशित हुआ करती थी, सो भी ज्योंकी त्यों प्रकाशित होती हों सो नहीं तो वल उनका प्राशय उनमें पाजाया करता था। * अस्तु तो वक्त संक्षिप्त लिपि की युक्ति आविष्कृत होनेके पूर्व वक्ताओं के प्रसिद्ध होने वडी अडचन थी; और यही कारण है कि तत्का. जीन, बहुतेरे वक्ताओं की, वाकृता के विषय में अव कीर्तिमात्र रोप रहगई है । और तो क्या पर अभी जिसका देहान्त हुए पूरे * यह मेंटलमेन्सम्यागमन' नाम का कागज़ उस समय इंग्लैंड में लिया या। इसमें न घेताए जानसन् लिखा करता था । लोगों से जो टिप्पणी प्राप्त होतीयों उन्हीकी सहायता से पह इनर्की रचना किया करता था। - - . १३६ निवन्धमालादर्श । लिया,। और फिर एक बार रोमनगर में अपनी प्रभुता स्थापित कर पूर्व कथनानुसार सिसरो से अपना वैर लिया । अस्तु, सरस्वती की ऐसी विलक्षण महिमा है ! (११.) पाठकों को वकृता के दो श्रादिपीठों का वृत्तान्त मुना चुके । अव दैववशात् हमारे देश का जिस देश से संघटन हुआ है उस इंग्लैडदेश के विपय में वकृता के सम्बन्ध से कुछ लिखते है । पीछे एक स्थान पर उल्लिखित होही चुका इंग्लैंड में अनुमान दो सौ वर्ष के पूर्व जब राजा और प्रजा में भयावना युद्ध हुआ था तभी से उस देश में वक्तृता की प्रवृत्ति हुई, और वह उसी समय क्यों हुई इसका कारण भी पीछे कहा जाचुका है । अव उक्त देश के प्रसिद्ध २ वक्तागणों के नाम नीचे प्रकाशित किये जाते है। । उक्त भयंकर युद्ध के समय भी पार्लिमेंट महती सभा में ऐसे फई सभ्य थे जो नामी वक्ता माने जाते थे। उनकी नामावलि इति- हास में प्रसिद्ध है, पर वह वक्तृता के सम्बन्ध से वैसे प्रसिद्ध न होने के कारण यहां प्रकाशित नहीं किये जाते । इसके अनन्तर भी कई वर्पलों इंग्लैंड में अच्छे २ चक्का होते गये, पर उक्त कारण- वश ही उनके नाम का निर्देश यहां नहीं हो सकता। अब इस' वात का यदि विचार किया जाय कि, उक्त लोगों के नाम, केवल उन्हींके समय में प्रसिद्ध रहे और फिर क्यों अप्रसिद्ध हो गये। तो इसके दो कारण जान पड़ते हैं। एक तो यह कि संप्रति इंग्लैड में जो एक उपयुक्त कला आज कई वपों से प्रचलित है ,सो उस, समय न थी । यह कला संक्षिप्तलिपि अर्थात् वक्ता के वकृता देते समय ही उसकी वक्तृता को शीघ्रतापूर्वक अविकलरूप से लिखः लेने की युक्ति है। आजकल यह युक्ति भली भांति पूर्णता को पहुँच 1 है वकृता। १३७ जाने के कारण और चारों ओर यह प्रसिद्ध होनेके कारण बिलकुल सामान्य वक्तागणों की वकृताएं भी अविकलरूप से लिपिबद्ध कर तत्क्षण चारों ओर जितनी अधिकता के साथ चाहिये वितरित कर दी जासकती है । पार्लिमेंट महतीसभा के सभ्यगण अरुणोदय के प्राक् अपने २ घर पहुँचने तक नहीं पाते कि उनकी वक्तृताएं छपकर चारों ओर वितरित होजाती हैं और शीघही कुछ काल के अनन्तर जगत् भर में उनका नाम प्रसिद्ध होजाता है ! आजकल के वक्तृगणों को ये सब बातें अनुकूल है; पर भूतपूर्व वक्ताओं को इनमें से कुछ भी अनुकुल न थीं। सभागृह के भीतर जो कुछ होता हो सोई होता था और वक्ताओं की मशंसा लोगों में जो फैलती थी सो केवल श्रोतामों के कथनोपकथनद्वारा ही फैलती थी । और तो क्या पर गत- शताब्दी के पूर्वार्ध के अन्तअन्तलों भी पार्लिमेंट की वक्तृताएं सर्व साधारण को विदित होने का कोई अच्छासा साधन न था, उस समय के पत्रों में केवल उनका सारांश प्रकाशित हुया करता था। केवल एक पत्र में चे वकृताएं पूर्णरूप से प्रकाशित हुआ करती थीं, सो भी ज्योंकी त्यों प्रकाशित होती हो सो नहीं तो फेवल उनका श्राशय उनमें पाजाया करता था। * अस्तु, तो उक्त संक्षिप्त लिपि की युक्ति आविष्कृत होनेके पूर्व वक्ताओं के मसिद्ध होनेमें पड़ी अड़चन थी; और यही कारण है कि तहक्का- लीन बहुतेरे वक्ताओं की वकृता के विषय में अब कीर्तिमात्र शेप'रहगई है । और तो क्या पर अभी जिसका देहान्त हुए पूरे * यह नेटलमेन्सम्यागमैन'मामपा फागज़ उस समय गय में निकलता या । इसमें रायताए जानसन् खिला करता था। खोगा से जो टिप्पणी माता होती थी उन्हीं की सहायता से यह इनकी रचना किया करता था। - -- - १३८ निबन्धमालादर्श। सौ वर्ष भी न पीते होंगे उस पिट्टनामक विख्यातवक्ता की में वक्तृताएं अब केवल अंशतः उपलब्ध होती है और अपरीके तो उक्त कला के अभाव के कारण कब की लुप्त होगई।'' • दूसरा उदाहरण यह माना जा सका है कि मूल का रूप जैस उत्तम होगा वैसाही उत्तम चित्रकार वा मूर्तिकार उसे अपन कृति में उतार सकेगा अथवा विपय उत्तम होने के कारण कनि की प्रतिभा जिस प्रकार उत्तेजित हो काव्य को विशेष रमणीयता प्राप्त होती है, उसी प्रकार से वक्ता को भी प्रसङ्गविशेप ! अनुकूलता आवश्यक है । हमारे विवेकी पाठकों को इस सिद्धान्त का प्रत्यय पिछले महान् दो वक्ताओं के वृत्तान्त से हो ही चुक होगा, तो यह भी उक्त वक्ताओं की कीर्ति उनके जीवनकाल वे पश्चात् संसार में न रहने का एक वडा कारण माना जासकत है। जिस विषय के उत्तेजनार्थ उन लोगों ने अपनी वक्तृताशनि प्रकाशित की वह विपय सर्वसाधारण को उपयोगी न जानपडने के कारण उस पर आधेय होनेवाली उनकी कीर्ति भी शीघ्रई विनष्ट होगई । और इसके सिवाय यह भी माना जासकता कि वे विपय सामान्य योग्यता के होने के कारण उनकी वक्तृतार भी उन विषय पर सामान्यही हुई होंगी । पदार्थविज्ञान शास्त्र जल के दबाव का जो नियम है कि वह जितनी उँचाई पर रहत है उतनीही उँचाई तक नलद्वारा दूसरी ओर चढसकता है, वई नियम समस्त कलाकलाप के लिये चरितार्थ होता है । सारा शिल्पी की चतुरता विपय की योग्यता और अनुकूलता पर निर्भ है। तो इससे यही अनुमित होता है कि इधर के कई नाम चक्कायों के पूर्वके अनेक वक्ताओं की कीर्ति चिरस्थित न उन दो ही कारण है। होने } वकृता। १३६ अब इंग्लैंडदेश में जिनकी कीर्ति विशेषरूप से स्थिर है और उसका चिरस्थित होना भी सम्भव जानपडता है ऐसे कुछ अ- त्यन्त प्रसिद्ध वक्तामों का यहापर उल्लेख किया जाता है। इन सर में समय, और कुछ अंश में योग्यता में भी प्रथम माना जाने चाला विलियम्पिट्ट अपर नाम लार्डच्याधम हैं । इसने हौसआफ कामन्स में' माविष्ट हो वहा बहुत मानमान्यता प्राप्त की। अपनी प्रभावोत्पादक वक्तृता की सहायता से इसने उन सभा को अपनी सी कर कुछ काल पर्यन्त तो समस्त राज्य सूत्र अपनेही हाथ में कर लिये थे । उस समय इसकी बराबरी का फाक्सनामक एक और भी प्रसिद्ध वक्ता था। वह भी इसके ऐसा प्रजापक्ष का था और अन्तलों वह उसी पक्ष का बनारहा | उक्त च्याथम् का देहान्त होनेपर उसका दूसरा पुत्र विलियपिट्ट, जो अन्तलों इसी सादे नाम से प्रसिद्ध रहा, उसका स्थानापन्न हुआ। इसके यकृता सत्यमियता और राजनिष्ठादि गुण अपने पिता कैसेही थे। पर बात यह हुई कि राजकाज सम्पादन में जैसा कुछ यश इसके पिता को मिला सो इसे नहीं प्राप्त हुया, वा यही मान लियाजाय कि, वह सुख इसे वदा न था। राज्य में इसके पिता का दवाव और प्रभाव अच्छा होने के कारण युरोप, अमेरिका और भारतादि में अंगरेजों का उत्कर्ष होता गया; पर इसके समय में तो लोगों को इग्लैंडके ही वचने की शङ्का थी ? अब यह बात सच है कि इसके समय में भी अंगरेजों को बहुत जयलाभ हुआ, और जो पराजय हुआ उसका कारण यह कदापि नहीं कहा जासकता । क्योंकि आगे फिर थोडेही समय में अंगरेज लोगों का त भय भी दूर हो गया, पर तौभी जबलों यह जीतारहा तवलों इंग्लैंड की दशा दुर्दशाही रही । उक्त प्रसंग इस शताब्दी १४० निवन्धमालादर्श। के श्रादि में नेपोलियन वादशाह ने सब जगत् भर में जो उपद्रव किया था सो है । नेपोलियन ने प्रायः समूचे युरोप को उलटा एशिया पर भी चाल की थी, और सव युरोपभर में अंगरेजों की तो उसने मिट्टी खराव करडाली थी; और एक साल तो उस ने इंग्लैंड पर ही थाक्रमण करने काघात लगाया था ये बातें सब इतिहासज्ञों को विदितही है तो इसी अन्तिम भयावने घोर विप- त्काल के लागपरउक्त पिट्ट मृत्यु को प्राप्त हुआ। * आगे वेलिंगटन ब्लचर, कुटु साफा | आदि सरदारों ने फरासासी लोगों को पराजित कर चारोंओर से मांसपरही जो लगातार आक्रमण किया उसे देखने के लिये वह न वचा, अस्तु; इसी समय और - * पिष्ट १८०५ के साल में स्वर्गवासी हुा । इस वर्ष टाफलगार में अगरेज की पढ़ी जीत हुई और आगे दोही महीने में नेपोलियन को आटालिम में जयलाम हुधा जिसके द्वारा सम्पूर्ण युरोप उसके हाथ लगा। इस युद्ध के समा चार ने पिट के हृदय पर ऐसा घातक नाघात किया कि, फिर उसे सभलमे ही नई दिया। सोनपत पानपत के युद्ध समाचार सुन नानासाहिब की जो अवस्था हु यी ठीक वही अवस्था उसकी हो पागे शायही उसका देहान्त हुआ । उक्त समय पर युरोप की भघिप्यत् अवस्था के विषय में वह ऐसा हताश होगया था कि उन सपाद को सच्चा सा जानते ही उसने कह दिया कि, सम्मुख रखे हुए युरोप घे उस विषरणचित्र को अब गूडकर रस घो। अब श्रागे पाच पचास घर्षलो उसक कोई प्रावश्यक्ता उपस्थित न होगी। सुनते हैं अन्त समय उसके मुंह से या १ शम्द 'हा! अब मेरे देश की क्यो गति होगी' निकले थे। ये घेलिंगटन कौन हैं सोते हमारे पाठफ जानतेही होंगे । जिनने पामीराध को गरी पर चिठलाया, टीपू और सेंदिया को पराजित किया, और जिनका नाम वेबसलीपुष्ट के कारण सबके जिद्वापर स्थित होरहा है, वे यही साहब हैं । औ अपर दोनों सरदार यथाक्रम प्रशियन और शियन लोगों के प्रसार . .
वकृता।। १४१ भी बहुतेरे बना हुए । पर उन सबमें वर्क और शेरडियान ही मुख्य मानेजाते हैं। इनमें से पहले का आगे सविस्तर वृत्तान्त दिया जायगा उसीके साथ दूसरे के विषय में भी उल्लेख कर दियाजायगा, अतः दोनों के सम्बन्ध से यहां कुछ विशेष लिखने की कोई आवश्यकता नहीं है। इसके अनन्तर आजपर्यन्त,भी इंग्लैंड में इस गुण की (वकृता) स्थिति बहुत कुछ पाई जाती है। इसके पूर्वके मेकाले कैसे कुछ ग्रन्थकर्ता, और संप्रति के ग्ल्याड्स्टन्, डिली बाइट प्रभृति उच्चपदाभिपित राजकर्मचारी गणों की भी नामी वक्ताओं की श्रेणी में गणना की जाती है । और अब इधर चिलायत में विद्या का फैलाव अधिकाधिक होने के कारण यकृता का अभ्यास और तज्जन्य ख्याति का उत्साह बडी २ सभाओं से ले छोटी पाठशाला की कक्षालों पहुँच गया है। ऐसी दशा में इस गुण का उक्त देश में लुप्त होजाना बहुधा संभव नहीं है। (१२) अब उक्त कथनानुसार यहां पर वर्क का थोड़ा सा वृत्तान्त लिखा जाता है। इसका प्रधान कारण तो यह है कि, यह भुवनविख्यात पुरुप वक्तागणों में वडा नामी ग्रामी। माना जाता है। पर इसके सिवाय इसके विपय में यहां यह भी उल्लि- खित होने योग्य है कि पाण्डित्य और बुद्धिमत्ता में इसकी वरावरी करनेवाले लोग इंग्लैंड में थोडेही हुए होंगे । पाठकों को इस जगद्विख्यात वक्ता का परिचय देने का एक तीसरा कारण और भी यह है कि अनुमान सौ वर्ष के पूर्व फासेट साहब की नाई पालिमेंट में यह अपने देश की ओर से सात वर्पलों एकसा लड़ते रहा । यह सब वृत्तान्त श्रागे यथास्थान पर लिखा ही जायगा। अस्तु वर्क जानसन् का समकालीन था । इन दोनों -- १४२ निबन्धमालादर्श। में बड़ी मित्रता थी, और दोनों परस्पर को बहुत मानते थे * वैसेही धन संपत्ति के सम्बन्ध से भी ये दोनों सम, समानही रहे । पर अपने २ गुणों में इन्होंने सबकी अपेक्षा श्रेष्ठता प्राप्त की । जैसे जानसन् ने सब ग्रन्थकारों की अपेक्षा. उच्चतम आसन प्राप्त किया, वैसेही वकृता और राजकाजसम्पादन में वर्क से बढ़कर अधिक दक्ष कोई नहीं हुआ । लगभग सौ वर्ष के जव अमेरिकन लोगों का इंग्लैड के लोगों से घोर विरोध चला जाता था और कई दूरदर्शी एवं उदारचित्त 'मनुष्य उन लोगों के पक्ष में सदा वकृता दिया करते थे ऐसेही लोगों में इसकी गणना की जाती थी । इस समय की इसकी वकृताएं सुन प्रा. श्चर्यचकित हो स्वयं लाट च्याथेम को भी सिर हिलाना पडा था । वर्क की वकृता का यह प्रथम प्रसंग था; इतः , पर उसकी वकृता धीरे धीरे चारों ओर विख्यात होनेलगी, और क्रमश: उसके जीवन के अन्तपर्यन्त वह कीर्ति मन्दिर के शिखरपर प्रा. रूढ़ होगई । उस समय पार्लिमेंट के सभ्यों में यह सर्वोपरि माना, जाता था । इ. स. १७८६ के साल में फान्सदेश में प्रजावर्ग में जो घोर हलचल हुई-जिसके कारण फ्रान्सदेश में दो तीन साल में ही श्राकाश पाताल एकसे होगये और जिस अचिन्त्य आपत्ति के कारण समस्त युरोप भयभीत हो सम्पूर्ण देश में प्रशान्तता * यह कहने में कोई विशेषता नहीं है कि उस समय के और लोगों की नाई पर्क भी जानसन् को मानता था। पर इसमें अवश्य विशेषता जान पड़ती है कि जानसन् यहा अमिमानी और लोगों को तृणप्राय माननेवाला होने परमी वर्क फो मित्र मान उसका समादर किया करता था और उसके विषय में कहा परता था कि यदि कोई मनुष्य कहीं जाता हो और वीचही में मेह घरसने लगे और पसगवशाद उसे उस समय क्षणभर धर्क के पड़ोस में ठहरना पड़े तो वह मनुष्य तरक्षण जान जायगा कि यह कोई लोकोत्तर पुरप है।
वकृता। १४३ 'एकसी छाईरही-उसीके सम्बन्ध से इस वक्ता की वक्तृताशक्ति पूर्णरूप से उदय को प्राप्त हुई । पर इस समय इसका चित्त पुत्र- शोक से अत्यन्त उद्विग्न और विह्वल होनेके कारण और फान्स भर में हाहाकार मच पारिस राजधानी साक्षात् यमपुरी होजानेके कारण यहांके लोगों के विषय में इसके मन में जो सन्ताप और घृणा भरगई थी उसके और अन्यान्य कारणों के योग से, सद्योदित चन्द्र का प्रकाश जैसे मसन्नता और आहाद- दायक नहीं होता, वैसेही उक्त मसंग की इसकी वकृता की वापिलाससम्पन्न वक्तृता की नाईं रमणीक नहीं है । उक्त दुष्ट विकारों के पटल से उसकी समुज्ज्वल बुद्धि आच्छादित होजाने के कारण उसका शुद्धरूप उन वक्तृता में दृष्टिगत नहीं होता। यही सब कारण है कि जिनके योग से चर्ककी ये अन्तिम वक्तृताएं सर्वोत्तम नहीं मानीजातीं । एतावता उक्त प्रसंग के पूर्व उसकी वक्तृता का जो विकास हुआ उसीको परमोत्कृष्ट मानते हैं। भारत के प्रथम बडे लाट वारन्हेस्टिंग्स के अपना पद छोड़ विलायत लौट जानेपर वर्कमभूति वक्तागणों ने उनके विपक्ष में पार्लिमेंट में जो आवेदनपत्र उपस्थित किया था और उनपर वाइस दोप आरोपितकर उन्हें प्रमाणित करने को जो वक्ता दी थींचे उन लोगों की कीर्ति को संसार में चिरस्थित करने के लिये पूर्णरूप से समर्थ हैं । पीछे आयेन्स और रोमनगर की प्रचण्ड चतता के जो उदाहरण दिये गये हे उनकी घरापरी की इंग्लैंड में “यदि वक्तृता हुई है तो उक्त मसंगकी ही वकृता हुई हैं । अस्तु तो वर्क का नाम भारतवासी मनासमूह को अधिक प्रिय होनेका कारण उसकी उक्त प्रसगकी उक्त वक्तृता है । रसिक एवं उदारचेतस लोगों की समाजमें उसका नाम चिरम्मरणीय बनारहेगा यह स्पष्टही है।
१४४ निवन्धमालादर्श। १ । क (१) पिछले अङ्क में वकृताके एकभाग का निरूपण किया गया। अब इसअङ्क में इस बातका विचार किया जाता है, कि हमारे देश में वकृता किसरूपसे थी और कैसी थी। (२) गत संख्या में वक्तृता की उत्पत्ति के विषय में लिखती बार अपने देश के विषय में यह बात लिख ही थाये है कि यहां की शासनमणाली उसकी उत्पत्ति और अभिवृद्धि को अनुकूल न थी । अर्थात् श्रान्स और रोम में मजाकक राज्यप्रणाली प्रचलित होने के कारण वह गुण जैसे वहां निसर्गतः उत्पन्न हो वहांके लोगों में उत्तरोत्तर वृद्धिलाभ करते गया; वैसा, यहां कभी भी नहीं हुआ। इससे कोई सहसा यही कहेगा कि, जब हमारे देश में इस गुण का अभावही रहा है तो इसके विषय में कोई लिख पदही क्या सकता है। ऐसा मानलेना कहालों युक्तिसंगत होता हैं सो आगेके लेख से स्पष्ट हो जायगा । (३) वकृता यह एक ऐसा गुण है कि इसकी स्थिति संसार में उसके प्रारम्भ से रहनी चाहिये । अर्थात् यह कहना अनुचित साहस न समझा जायगा कि, इस गुण को मादुर्भाव संसार में भगवती सरस्वती के जन्म के साथही साय हुआ है । मानवी भाषा का जव.से प्रचार हुआ तभी से थोड़े मनुप्य इस गुण विशिष्ट हो इतर मनुष्यों को मोहित करने के लिये समर्थ होने लगे होंगे । योही अनुसंधान करनेसे यमुधातल पर यह बात लक्षित होती है फिचौर ग्रामीणलोगों में भी फिसी २ मनुष्य फा यातचीत करनेका दंग एसा जुध विलक्षण रहना है कि का बहुत सहमही में इमरे का चिच अपनी मोर प्रसार करने माता है । उमफी याणी का ऐसा र भा रहता है फिसर से .
.. . वकृता। १४५ उसका बोलना चित्रार्पित से हो सुनाही करते है । ठीक यही बात समस्त जाति की श्राद्यावस्थामें भी दीख पडती है। देखिये कि, युरोप महादेश के समस्त देशों में ग्रीस कैसा पुराना और देश नहीं है, और उस देश की भापा में होमरकृत 'इलियड',' नामक काव्य ऐसा माचीन अपर ग्रन्थ नहीं है । पर उसमें भी वता का आविर्भाव स्पष्टरूप से दृष्टिगत होता है । ग्रीस देश के जिन राजालोगों ने दायनाम के नगर पर धावा किया था उनमें भिन्न २ गुण विशिष्ट अनेकलोग थे। उनमें युलिसिस नाम का राजा बड़ा नामी वका था। वैसेही भारत युद्ध प्रसिद्ध पितामह भीम- की समानता का नेष्टर नाम का एक वृद्ध राजा उक्त काव्य में विख्यात है। उसकी वक्तृताशक्ति तो उक्त युलिसिस की अपेक्षा कही बढ़कर थी । उक्त राजाओं में जब कभी परस्पर में विरोधभाव उद्भूत होजाता था और वे आपस में लडने लगते तब अपनी प्रभावोत्पादक वक्तृताद्वारा वही उन्हें समझाया - झाया करता था। होमर कवि ने अपने अजरामर काव्य में उक्त वक्ताओं को बड़ी चतुरता से व्यवहृत किया है । जो ग्रीस देश कुछ काल के अनन्तर वकृतागुण के उच्चतम शिखरपर दृढस्थित हुथा उसकी आद्यावस्था उनमें लक्षित हो वकृता की उत्पनि पूर्णरूप से झलकती है । तौ युरोप के अत्यन्त माचीन काल की दशा का पता यों लगता है । अब इधर एशिया में देखिये । इसके अत्यन्त प्राचीनदेश भारत और चीन ये दो है। इनमें से दूसरे के सम्बन्ध से संसार को अभी लो विशेष परि- 'चय उपलब्ध नहीं हुया है, एतावता उसके विपय में कुछ भी 'नहीं लिखाजा सकता । रहा भारत सो,उसके , विषय में हमारे पास चीन की अपेक्षा बहुत कुछ सामग्री उपस्थित है। अब उस ।
, निवन्धमालादर्श। सामग्री से यह भलेही प्रमाणित न हो सके कि वक्तृता की स्थिति ग्रीसदेश की नाई हमारे देश में भी थी; पर इसमें कोई संदेह नहीं है कि युरोपके उक्त काव्यं की समानता के हमारे इधर के 'रामायण' और विशेषतः 'महाभारत' काव्य में वकृता गुण की स्थिति बहुते भाचीनकाल से पाई जाती है। हां इतना अवश्य है कि हमारे उक्त ग्रन्थान्तर्गत वकृताशब्द का अर्थ पाश्चात्य वकृताशब्द के अर्थ का अनुधावन नहीं करता । अंथवा उक्त ग्रन्थों में ही क्यों कहें भारत में श्राजभी उक्तशब्द की वही अवस्था है। - ।, (४) वकृत्वगुण की अभिवृद्धि का एक अपर 'गुरुतर कारण यह भी कहा जाता है कि उसके उज्ज्वल बने रहने का साधन सदा अनुकूल रहता है। अन्य कलाओं के लिये ऐसी अनुकू- लता स्यात ही रहती हो । क्योंकि काव्यरचना, चित्रकारी, वादनकला, नाना प्रकार की शिल्पविद्या नाट्य, मल्लविद्या, युद्ध- कुशलता प्रभृति में से किसी एक का अभ्यास करने के लिये जैसे भारी घटाटोप और परिश्रम करने पड़ते हैं सो पाठकों विदितही है। कविता का अभ्यास करने के लिये कागज, लेखनी और रोशनाई आदि का सदा संग्रह रखना पड़ता है और संतत गणमात्रा जोड़ने की गहरी चिन्ता में मग्न रहना पड़ता है। उसी प्रकार चित्रउतारना, वाजा बजाना, कुरती वा कसरत करना आदि किसी कार्य में अभ्यस्त होने के पूर्व उसकी पूरी २ सामग्री एकत्रित करलेना पड़ती है तब कहीं जाकर वह साध्य होता है। और इसके सिवा यह कार्य ऐसे हैं कि इन्हीं के लिये संतत उ. योग करते रहो तो शीघ्रही जी उकता जाता है। इनके सिवा पापाण की मूर्ति बनाना, घर वनाना आदि भी आधष J दकृता। स १४७ परिश्रम के कार्य है । युद्धादि प्रसंग किसी के स्वाधीन के ही नही । अस्तु, तौ अपर कलाओं का संतत अभ्यास रखने के लिये सामग्री की सिद्धि और परिश्रम आदि की नितान्त आवश्यकता रहती है और ये आवश्यकता ऐसी हैं कि इनका सदा अनुकूल रहना दुःसाध्य है । पर वक्ता की वातही कुछ निराली है । उस की सामग्री उपलब्ध करने के लिये न तो वैसे कुछ परिश्रमही करना पड़ते हैं और न उनकी प्राति के लिये बहुत समयही आवश्यक है । परमेश्वर ने अपने असीम चातुर्य चल से मनुष्य- जाति को जो अद्भुत नैसर्गिक उपकरण दिये है वे सदैव सिद्धही रहते हैं । निक्षा, दन्तपंक्ति और वर्णोच्चार के कराठ ताल्वादि स्थान प्रभृति साधन प्रकृतिसुलभ होनेके कारण वे वक्ता के इच्छामात्र की मार्ग प्रतीक्षा किया करते हैं । अपर कलायों के उपकरणों की नाई इन्हें सुसज्जित करने के हेतु दीर्घसमय परिश्रम और स्थलकालादि की अनुकूलता की भी आवश्यकता नहीं रहती। इसके व्यतिरेक वे काल की कुटिलता से भी गुक्त है अर्थात् अन्यसाधनों को समय का हेरफेर दवा सकता है पर वक्ता के उक्त साधनों को वह किसी प्रकार की हानि नहीं पहुंचा सकता, यही कारण है कि बहुधा वे वक्ता के जीवनकाल लों उसके सहायक बने रहते हैं । उक्त प्रतिपादनद्वारा चलता के उपकरण की उत्कृष्ट अनुकूलता स्पष्टरूप से निर्धारित होती है। दूसरे इसके विषय में यदि यह भी कहा जाय कि इतर कलाओं की नाई इसका अभ्यास बहुत श्रमदायक नहीं है तो भी मुब अनुचित न होगा क्योंकि वकृता तो केवल वोलचाल का काम है। पर इसका तीसरा साधन तो उन दो की अपेक्षा अधिक आश्चर्यजनक है । वह ऐसा कि नित्य की योलचाल और व्यव- - .
। १४८ निरन्धमालादर्श। हार में इस गुण का योही उत्कर्ष होते रहता है। अर्थात् नित्य की बातचीत वा इष्टमित्रों के साथ वार्तालाप करती चार सहज ही में प्रवचनशक्ति प्रयुक्त हो उसके भिन्न २ गुण अनायास उत्तरोत्तर वृद्धि लाभ करते जाते है । अपर कला में निपुणता संपादित करने के अर्थ जिस प्रकार निराली खींचाखींच में फंसना पडता है उस प्रकार इसमें नहीं फंसना पड़ता । इसमें वो एक पन्थ दो काज सधते है वे ऐसे कि व्यवहार का व्यवहार और अभ्यास का अभ्यास दोनों साथ ही साथ परिपक होते जाते हैं और फिरभी खूबी यह है कि परिश्रम तनिक भी नहीं जान पड़ता और उलटा मनोरञ्जन होते रहता है। (५) तो इस प्रकार यह गुण और गुणों की अपेक्षा स्वभाव- सिद्ध होने के कारण अत्यन्त प्राचीनकाल से सवदेशों में निःसंदेह पाया जाता होगा; और पूर्व उल्लेखानुसार उसका सदा व्यवहार में प्रयोग होते रहने के कारण यहभी स्पष्टतया ल. क्षित होता है कि सब देश और सब काल में उसका अच्छी उन्नति को प्राप्त होना बहुत कुछ सम्भव है । साथही यह भी कहना पड़ता है कि ज्ञानसंपन्नदेश में उक्त गुण जिस रूप से दृष्टिगत होगा वैसा वह अज्ञान, लोगों के देश में नहीं दीखपडे गा। अर्थात् भूतपूर्व बड़े बडे वक्ताओं की वकृताओं में वा अब इधर की वकृताओंमें जैसे शब्दलालित्य, अलंकार और विषयों नुकूलतादि गुण पाये जाते हैं वैसे उनकी वकृता में नाममात्र को भी नहीं पाये जाते प्रत्युत कभी.२ अपशब्दों की अधिकता और विपयविभाग की व्यवस्था में भी वहुत, गडबड पाई जाती है। सभा में उपस्थित हो उस समय उसे जो कुछ -सूझपडेगा वही उन वक्ता बोलेगा। सारांश पहिले वक्ता की वकृतामे - -- -- .
वस्तृता। रसिकता, कोमलतादि गुण जितनी अधिकता के साथ पाये जाते है; वैसे वे दूसरे की वक्तृता में नहीं पाये जाते उनमें माय: उहा- मवाही पाई जाती है, और वह इतनी अधिक रहती है कि स्थल विशेषपर कोमल चित्तवाले मनुष्य को उसके श्रवण करने में पहुत कष्ट वोध होता है और वह उसे अत्यन्त कर्णकटु जान पड़ने लगती है । इस प्रकार उक्त दोनों वकृताओं में स्थूलरूप से आकाश पाताल का अन्तर भलेही जानपडे पर वकृता का वीज जो मोहकता सो दोनों में गर्भित रहती है। अतः पहले पुरुष की प्रवचनपटुता के अर्थ जिस प्रकार वकृतासंज्ञा चरितार्थ होती है उसीमकार दूसरे के लियेभी वह घटित होसकती है। दोनों में यदि कुछ भेद रहताही है तो वह वैसाही रहता है जैसा कि पुरस्त्री और वनस्त्री की रमणीयता में दृग्गोचर होता है। अर्थात् दोनों का माकृतिक सौन्दर्य वास्तव में समानही रहताहै पर पहलीको हीरा मोती और सुवर्ण के श्राभूपण तथा बढ़िया वस्त्रोद्वारा जैसे विशेष शोभा माप्त होती है, और उसकी वोलचाल की ढंग उत्तम प्रकार का होनेके कारण नागरिक रसिकों को उससे अधिकतर प्रसन्नता होती है, ठीक वही वात पहली वकृता की है । पर जो सच्चा रसिक और मार्मिक है, जो अन्तरङ्ग गुणों का अनुसंधान करने में परम चतुर है उसे दूसरी व- कृता भी पहली की नाईही मुग्ध करडालती है, सुतरा मकृति सुलभ सुन्दरता के कारण उसे वही अधिकतर अभीष्ट होती है । इसके उदाहरण स्वरूप में राजा दुष्यन्त की बात कही जा सकती है कि जिस प्रकार महर्पि कएव के तपोवन में वास करनेवाली शकुन्तला फा वल्कलाच्छादित मुग्घलाचण्य और अप्रगल्भतादिही अन्त:- पुरवासिनी स्त्रियों की समुज्ज्वल वेपरचना तथा नाट्याचार्य - - १५० निवन्धमालादर्श । शिक्षित अगविक्षेप की अपेक्षा, उसे विशेष प्राहादप्रद हुई। (६) अब इस बात की आलोचना की जाती है कि, पुरा भा- रतवर्ष में वकृता किस रूप से थी और अब इधर उसने कौनसा रूप-धारण किया है और संमति- वह किस नवीन रूप में पाई जाती है । अपने देश की प्राचीनकालीन वकृता के विषय में कोई बात निश्चित करने के लिये यद्यपि कोई प्रमाण विशेषरूप से उपलब्ध नहीं होते तथापि यह कहना अनुपयुक्त साहस'न समझा जायगा कि उस समय भी लोगों को वकृता का चाव और उत्साह था । पुराणादि प्राचीन ग्रन्यों में वकृता भुण की अधिष्ठात्री भगवती सरस्वती का वर्णन स्थान स्थानपर उपलब्ध होता है, और सुरगुरु बृहस्पति की भी इसी गुण के सम्बन्ध से विशेप-मशंसा पाई जाती है, और आजकल जब कभी हम किसी मनुष्य को अच्छा वक्ता कहा चाहते है तो उसके बोधार्थ उक्त शब्दका ही प्रयोग करते हैं, इत्यादि बातों द्वारा उक्त बात के प्रमाणित होनेमें कोई संदेह नही रहने पाता। उसी प्रकारसे वाग्मी' वाग्वर' प्रभृतिशब्दों के प्रयोग — रामायण' के समय से पाये जाते हैं, यहभी उक्त-वातही को, हदरूप से, प्रमाणित करता है । इसके सिवाय इस बात में तो कोई शङ्काही नहीं उपस्थित होती कि जिस समय संसार के अपर देश अज्ञान की गाढ निद्रामें घुर्राटे भर रहे थे और जब भारत में धर्म और जनव्यवस्थादि के सम्बन्ध से, सैकड़ों हेरफेर हो नये मत, नूतन दर्शन नवीनपन्थ आदि के विषय में घोररूप से आंदोलन होते रहता था तब यह गुण हमारे देश में विशेपरूप से जागृत होगा। ब्राह्मण, जैन,, वौद्ध और चार्वाकप्रभृति लोगों के वर्मविषयक वादविवादों, और नैयायिक मीमांसक, सांख्यवादी आदि के वकृता। पदार्थमात्र विषय के सूक्ष्म विचारों की जिस समय चारों ओर बहुत चर्चा हुया करती थी उस समय अनेक नामी वनागण हुएं होंगे ऐसा कहना स्यात अनुचित न होगा | अब इसपर कोई यह शङ्का करे कि उक्त बात का ग्रन्थों में न तो कहीं कुछ आधारही मिलता है और न अपर युक्तियुक्त प्रमाण ही उपलब्ध होता है ऐसी दशा में वह सत्य होगी यह कैसे मानलिया जावे, तो उसके उत्तर में हम यह कहते हैं कि उक्त उल्लेख के लिये केवल, अनुमानही सुदृढ़ प्रमाण है, मिश्रदेश के पर्वतमाय वि. शाल ,सूच्यग्रस्तम्भों को (मीनारों को) देखकर वा दक्षिण मान्तकी भव्य एवं विस्तीर्ण श्रेणीको देखकर प्राचीन मिसरी लोगों तया आर्य लोगों का बुद्धिसामर्थ्य जिस प्रकार अनुमान- सिद्ध प्रतीत होता है, उसीमकार से उक्त वकृता के विषय में यद्यपि कहीं कुछ आधार नहीं मिलता तौभी उसकी स्थिति मानलेने में कोई बाधा नहीं है । क्योंकि जिस समय आजकल की मुद्रणकला की नाई ग्रन्थ मकाशित करने का साधन अनु- कूल न होने के कारण पूर्वपक्ष उत्तरपक्ष के वाद विवाद जो होते थे सो प्रायः वार्तालाप द्वाराही हुआ करते थे ऐसी दशा में निःसंदेह लेखन कला की अपेक्षा वकृताचातुर्यकोही अत्यन्त उत्तेजना और प्रोत्साह मिला होगा। जिन वादविवादों को हुए आज अनुमान दो सहस्र वर्ष बीत चुके हैं पर तौभी 'शंकराचार्य 'मण्डनमिश्र' 'कुमारिलभट्ट' प्रभृति के नामे केवल जनश्रुति- परंपरा के प्रवाहद्वारा हमलों श्री पहुंचे हैं, यौर जिनका परिणाम ऐसा विशाल हुमा कि प्राधे एशिया महादेश में नूतन - धर्म का - १५२ निवन्धमालादर्श । प्रचार , हुआ * वह वाक्पाण्डित्य कैसे प्रभावोत्पादक होंगे उसका विवेकी पाठक सहजही में अनुमान कर सकते हैं ! तात्पर्य यह है कि प्राचीन भारत में इस, गुणकी स्थिति थी यह बात प्रमा- पित करने के लिये यद्यपि प्रत्यक्ष प्रमाणं नहीं मिला तो भी वह अनुमान से सिद्ध होता है। यह अनुमान की बात वक्तृता की नाई और कलाओं के लिये भी चरितार्थ होती है । जैसे नाट्य कला और चित्रकारी । इन कलाओं के सम्बन्ध से अपर, देशों की प्रशंसा होते समय हमारे देश का नामोच्चारण लों नहीं किया जाता । ग्रीसदेश में राशस नाम का एक सुविख्यात नट होगया है। और अनुमान सौ वर्ष के पूर्व उसकी वरावरी का गेरिकनाम का एक नट इंग्लैंड में हुआ है । हमारे यहां साफोक्लीज़ और शेक्सपियर की, वरावरी के नाटक फर्तागण हुए है इस वो लगता है पर उक्त नटों कैसे नट हुए हैं वा नहीं इस बात का कुछ भी पता नही चलता | उसी प्रकार से ग्रीसदेश में प्रापिलीज़ इटाली में रेफील और इंग्लैंड में जानसन् के परम मित्र रेनाल्डसमभृति वडे निपुण चित्रकार हुए हैं। पर प्राचीन काल में हमारे देश में कोई वडा चित्रकार था ऐसी वात कहीं भी श्रुतिपथ में नहीं आती । पाठक ! विचारिये तो इन दो अभावों का कारण क्या हो सकता है । जिस मारे देश में 'शाकुन्तल' 'उत्तर रामचरित मृच्छकटिक कैसे * इतिहासप्रिय लोगों से यह यात छिपी नहीं है कि वैदिक और बौद धर्मावलम्बी लोगोंमें माटेस्टट और क्याथेलिक पन्यानुयायी लोगों के समान दी फाल लो.यादविवाद होता रहा और अन्त में चौद्ध धर्मका पराजय हो उसे नका, विभेट और चीन आदि देशों में जाना पड़ा। बौद्धों की संख्या भनुमान मनुष्यजाति की संख्या के प्राधे के लगभग है। सुमात्रा, जानावि द्वीपों में भभोजो हिन्दुधर्मक्रे चिह्न पाये जाते है।
चकृता। नाटकों की सृष्टि करनेवाले कविगण समुत्पन्न हुए उसी हमारे देश में उन्हें उत्तम प्रकार से अभिनीत करनेवाला क्या कोई भी नट नहीं हुआ ? वैसेही अशोक, चन्द्रगुप्त, विक्रमादित्य र शालिवाहन सदृश महान् पृथ्वीपति जब शासन करते थे और बहुधा मत्येक संस्कृत नाटक में चित्रपट, आलेख्य और तृलिकादिका सदा वर्णन भाया करता था तब क्या जगद्विख्यात कोई भी चित्रकार नहीं हुआ ? हमारे विवेकी पाठकों के ध्यान में यही बात श्रावेगी कि उक्त दोनों बातें असंभव है, और जवकि हमारे देवोपम पूर्वपुरुषों ने अपर कला और विद्या में असामान्य कीर्ति समाप्त की तब यह कव संभव है कि उक्त दोनों कलाओं में उन लोगों ने कुछ भी पूर्णता न प्राप्त की हो ! अब इस पर कोई यह प्रश्न करे कि अच्छा हमने मानलिया कि उन लोगों ने उन दोनों कलाओं में बहुत कुछ पूर्णता और निपुणता प्राप्त की थी पर फिर वह ऐसी निःशेप क्यों होगई कि उनका पीछे कुछ पता निशान तक न रहा, तो उसका उत्तर यही हो सकता है कि उक्त दोनों कला और वक्ता ये ऐसी कला हैं कि जो निसर्गतः अचिरस्थायिनी अर्थात् दीर्घकाल लों ने ठहरनेवाली है। मानलो फिकिसी उत्कृष्ट नट ने बहुत उत्तम अभिनय किया पर उसे चिरस्थित करदेनेके लिये उसके पास कोई साधन है क्या ? वह जवलों रंगस्थल पर विद्यमान है भीलों उसकी चतुरता देख लीजिये । क्या कोई यह वात कह सकता है कि जिस प्रकार से किसी शिल्पी की बनाई हुई कोई वस्तु दीर्घकाल लो रह सकती है या किसी उत्तम कवि का रचा हुआ काव्य एक बार लिपिबद्ध होचुका तो जगत्प्रलय पर्यन्त उसकी रक्षा हो सकती है उसी प्रकार से उन अभिनेता २० g - । २५४ निवन्धमालादर्श। की कृति भी चिरस्थित हो सकती है। हां बहुतही हुआ तो वह उसकी जीवनयात्रा लों लोगों के मनोरञ्जन का कारण अवश्य हो सकती है । उसका जीवन शेष होतेही उसकी समस्तकला उसके साथही शेष हो जाती है । जो मूर्ति एकवार की लुप्त हो जाती है सो पुनः नही दीखपड़ती ! ठीक यही बात चित्रकार कीभी होती है । चित्र का आधार जो कागज़ वस्त्र वा भीत जवलों बने रहते है तभीलों चित्र की स्थिति रहती है। इसके सिवाय रंगकी चमक दमक तो उक्त आधार की अपेक्षा और भी शीघ्र नष्ट होजाती है । कालचक्रानुसार संसार में प्रकृति- देवी हेरफेरकी याज्ञा दिया करती है, उस समय वह महान् चित्रकार की ओर ध्यान देकर आज्ञा देती हो सो तो कुछ हैही नहीं । ग्रीसदेश का प्रापिलीज नाम का चित्रकार जिसका कि पीछे उल्लेख हो चुका है, उसके 'उतारे हुए चित्र अब कहीं उत चित्रकार सिकन्दर गादशाह का श्राश्रित था। यह विधासम्पग होने के कारण बादशाह इससे बहुत स्नेह मानते थे। इतिहास में इसके सम्बन्ध ने कई बारयायिका प्रसिद्ध है। उनमें से यहा पर दो लिखी जाती हैं। एक बार उक्त राजपुन अपो स्नेही की चित्रशाला में गया । वहा पर अनेक चित्र प्रस्तुत हो गये थे और अनेक प्रस्तुत हो रहे थे । सिकन्दर- पादशाह को चित्रकारी का विशेष ज्ञान न होनेपर भी उसने अपने अतुल राजविभव के अभिमान में 'मग हो वहा के चित्रों में कुछ जनता प्रदशित की । उत्तर में प्रापिलीज ने कहा मित्र । जराधीमे स्वर से योलिये, क्योंकि उस ओर जो लड़के रंग घमते बैठे है वे आपकी बात साकर हँसी करेंगे। इस उत्तर से सिकन्दर को बहुत 'लजित होना पड़ा था। दूसरी बात यह है कि, उक्त चित्रकार ने सिफन्दर के प्रसिद्ध बुसेफेल्स् नाम के घोडेका उसीके नाप का चित्र उतारा था। यह ऐसा सर्वाङ्ग सुन्दर वना था कि इसे देस कोई सहसा चित्र नहीं कह सकता था। सिकन्दर ने उन चिन की नाई इसमें भी कुछ दोप प्रदर्शित किये, इस पर प्रापिलीज़ ने उसे उत्तर तो कुछ भी नहीं दिया पर उसके उक्त घोडेको वहा उपस्थित करनेके लिये शनुरोध किया। उसका उन घोड़ा ज्योंही वहा पाया और उसने उक चित्र को देखा त्योंही उसे अपने सरीखा घोड़ा जान वह हिनहिनाने लगा । तब धापिलीज़ ने सिकन्दर से कहा कि श्रापकी अपेक्षा आपके घोडेको चित्रकारी tar विशेष , 1 ववृत्ता। १५५ उपलब्ध नहीं होते इसका कारण भी उक्त कारण से भिन्न नहीं है। और यही बात उन देश के मूर्तिकारों के विषयमें भी कही ना सकती है क्योंकि वहां के मूर्तिकारों की ख्याति आजपर्यन्त नैसी बनी है वैसी चित्रकारों की नहीं है, तो इससे यही निर्धारित होता है कि जिन लोगों की कृति तुरन्तही वा थोडे काल के अनन्तर नष्ट होनेवाली रहती है उनके दृष्टिपथ से वहिः होनेही उनके विषय में यह कहना कि अमुक २ देश में उनकी स्थितिही न थी युक्तिसंगत नहीं जान पडता । ठीक यही गात वक्तृता की भी है। पहले तो अभी इधर जबलों सतितलिपि की मथा यूरोपमें भी आविष्कृत नहीं हुई थी तदलों महान् वाग्मी की वक्तृता तत्क्षण लिखलेने का साधन अनुभूल न था । दूसरे, कई वक्तृत्ता ऐसी होती है कि जिनकी उपयोगिता प्रसंग वि- शेपसे ही सम्बन्ध रखती है। यह यहा लो कि कुछ काल के अनन्तर, यही वकृता पुनः श्रमण की जॉय वा पढी जॉय तो अत्यन्त नीरसयोव होने लगती है। और तो क्या पर पूर्वो- लिखित शेरिडयान नाम के वाक् पण्डित की जिस वक्तृता ने उस समय लोगों के मनपर प्रवल संस्कार किया था और जिसे सयं फारस साहिव ने एक प्रसंगपर परमोत्तम कहा था *, वही आज पढ़ी जाती है तो उसमें पैसा अद्भुत गुण कुछ भी लक्षित नहीं होता। डिमास्थेनीसकी भी थोडीसी सर्वमसिद्ध वक्तृताओं के,व्यतिरेक अपर सव वक्तृताएं अब ऊपर कैसीही शुष्क एवं * हमारे मननशील पाठकों को पिछले अमें पाससाहिब का परिचय मिलही चुका है। रिसीने एकगार से यह पूछा था कि धापने इतने दिनों से पार्लिमेंट में अनेक वताए मुनी है तो कहिये उनमें से सर्वोत्तम श्राप किसे मानते है। उत्तर में श्रापो कहा कि बेगमों के सम्बन्ध से दी हुई शेरिस्पान् की यकृता को ।। , n - - निवन्धमालादर्श । नीरस मानी जानी लगी है । इसका कारण स्पष्टही है । अग्ने के ठंडे होनाने पर जैसे उसकी रुचि/जाती रहती है वैसेही किसी प्रसङ्ग विशेष पर जो वकृता लोगों को रुची हो वही उक्त अवसर के वीतजाने पर पुनः पहले कैसी लोगों को क्योंकर रुच सकती है ? और इसके अतिरिक्त वकृता के स्वयं श्रवण करने और पढ़ने में भी बहुधा बहुत अन्तर पड जाता है । महान् २ वाक्पण्डितों की वक्ताओं में तो उक्त भेद बहुतही पाया जायगा, क्योंकि वक्तृता अर्थात् खड़े होकर बोलदेना इतनाही नहीं है; तौ ऊंचे और चित्ताकर्पक स्वर, अगविक्षेपोंकी चञ्चलता और चपलता, मुखमण्डल पर भिन्न २ मनोवृत्तियों का आविर्भाव, और इसके सिवाय अपर छोटी मोटी बातें श्रादिके सम्मेल को वकृता कहते है + ।' इसके सिवाय वक्तृता स्थल की शोभा, सब श्रोताओं की सजधज आदि द्वारा पहलेहीसे प्रसन्नहुए चित्त पर वक्ता की वकृता का जैसा उत्तम संस्कार हो' सकता है वैसा केवल शुभ्रपर काला किये हुएको पढ़कर नहीं हो सकेगा यह स्पष्टही है । और तो क्या पर केवल सुनने और पढ़ने की क्रियाओं में भी सुखके सम्बन्ध से बडों भारी अन्तर रहता है । पढ़नेसे जैसे तत्क्षण जी उकता जाता है वैसा सुनने से नहीं उकताता | साराश वकृत्व सभाकी सजावट को देख स्वयं वकृता सुनने और उसे दूसरे दिन वा फिर कभी समा- चार पत्रों वा ग्रन्थों में पढ़ने में बहुतही अन्तर पड़जाता है । + एक बार दिमासथेनीससे किसीने पूछा कि वक्ता के लिये नितान्त श्राय- श्यक पात कौनसी है। उत्तरमें उसने कहा " और दूसरी-" नाट्य इस कलाम विलियमपिट कैसे निपुण थे सो मेकाले साहब के तद्विषयक निबन्धद्वारा भली भाति ज्ञात होता है। - -- नाट्य " मला तीसरी-"नाट्य - । वकृता। १५७ तिसमें भी लौफिक प्रसंगविशेप के कारण लोगों के मन उद्विग्न हो जाते हैं उस समय वक्तृता का जैसा प्रभाव होता है वैसा आगे उस समय के वीत जानेपर नहीं होता । अभिप्राय यह है कि जैसे कमलपत्रस्थ जलविन्दुको मोतीकी शोभा प्राप्त होती है, वा सायंकाल के समय भगवान् सूर्यदेवकी, कोमल एवं सुनहरी किरण समूह के संस्कार से पाश्चात्त्य मेघों को अनोखी शोभा प्राप्त हो विलक्षण दृश्य दृष्टिगत होता है, वैसे ही प्रसंगविशेष की वकृता की शोभा और उसका प्रभावही कुछ चमत्कृति- जनक होता है। मनकी वह दशा उस समय के साथ ही लुस हो जाती है। कहो कैसे ? तो जिस मकार से उक्त मेघमण्डल क्षणभर अपनी अपूर्व शोभा दिखा सूर्य के अस्ताचलावलम्बित होतेही अधिकतर कान्तिहीन और निस्तेज दीख पड़ने लगता है। उक्त प्रतिपादन से हमारे विचारवान् पाठकों को यह बात लक्षित हो चुकी होगी कि महान २ वक्ताओं की वकृता भी लिपिबद्ध करने से नीरस हो जाती हैं। यही समझ उनका संग्रह करने के लिये किसीने उद्योग न किया हो यहभी संभव जान पडता है । इसके सिवाय यही बात विचाराई है कि प्राचीनकाल में हाथ से ग्रन्थ लिखने के कठिन परिश्रम से बचानेवाला मुद्रणकला का साधन भी अनुकूल न था । यही सब कारण है कि जिनके अभाव के कारण हमारे देश की प्राचीन वकृता का आज हमें कुछभी खोज पता नहीं लगता और यह सब ठीकही हैं । ग्रीक और रोमन लोगों की नाई इति- हास लिस रखने की यदि हमलोगों में प्रति होती वो निदान आज इतनी थाह तो अवश्यही लगजाती फि अमुफ २ समयपर अमुक २ प्रसग के कारण अमरु २ पण्डित अपनी धारामवाह - - - - -- - निबन्धमालादर्श । सी वकृता के कारण बहुत विख्यात हुआ है । पर इतिहास के अभाव के कारण श्राज दिन, हमें वहभी आधार. अनुकूल नहीं है । एतावता इस कला की स्थिति, केवल अनुमानसेही सिद्ध करनी पड़ती है। उसके लिये प्रत्यक्षप्रमाण स्वरूप में कुछभी नहीं उपलब्ध होता। तौभी जिस प्रकारसे किसी अरण्य में, चारोंओर राख और कोयलेके ढेरको देख प्रत्यक्ष दावानल की ज्वाला देखनेकी कोई आवश्यकता नहीं रहती वा, धरती में खचित कियेहुए बाड़े और ऊपर आयेहुए,कूपों को देख ,प्रत्यक्ष भूमिकम्प देखने की कोई आवश्यकता नहीं रहती, वैसेही आधे एशिया महादेश में फैलाहुआ भारत का धर्म ,और उसके पुराकाल के अनेकानेक पथ तथा भिन्न २ मत आदि प्रत्यक्ष वक्तृत्व ग्रन्थों की अपेक्षा इस कला के विपय में विशेष निर्णा- यक माने जा सकते हैं। । (७) यहां लो प्राचीन काल के विषय में इस गुणके सम्बन्ध से अालोचना की गई । अव मध्यकाल अर्थात् पा- चीन और वर्तमानकाल के बीच के काल के विपय में विचार करते हैं । इस कालके विपयमें भी पिछले काल की नाईही, कुछ प्रमाण नहीं मिलते । वौभी हमारे देश के एक भाग के विपय में निदान एक दो शताब्दीपर्यन्त का वृत्तान्त लिखने के लिये हमें बहुत कुछ सामग्री मिल सकती है । यह भाग महाराष्ट्रदेश और उक्त शताब्दी इसके.पूर्व का समय मानना चाहिये । (८) हमारे, ग्रन्थावलोकनप्रिय पाठकों, को विदितही होगा फि,, उक्त देश.का पुरातन ,विभव नष्ट हो कई शताब्दी वीत जानेके अनन्तर एका प्रदेश के लोगों ने, एकबारगी सिर ऊपर उठाया था और अल्पकाल में ही सब देश अपने अधिकार में, .
वकृता। - १५४ करलिया था। आर्यलोगों का धर्म उनकी विद्या और उनके प्राचारादि लुप्त होजाने का जो कठिन अवसर प्राप्त हो गया या वह दूर होजानेका कारण उक्त समय का उन लोगों का उत्कर्षही कहा जा सका है। इन अतुलपराक्रमी लोगों ने सम्पूर्ण देशमें जो स्थान स्थानपर तालुके और बड़े २ राज्यों की स्थापना की उनके योग से यवन और म्लेच्छों के उच्छेदनद्वारा आर्यों के धर्मादिको पर जो ग्लानि छाती जाती थी वह नष्ट हो मानों आर्यों का पुनरुज्जीवनही हुआ था। हमारी प्राचीन विद्या और कला को उत्तेजना मिल हमारे गत विभव की कान्ति और शोमा हमलोगों को पुनः बहुत कुछ माप्त हुई। इसीके साथ २ बडे २ राज्यों में पाये जानेवाले धैर्य, साहस, शूरता, सत्यप्रियता और बुद्धि की प्रगल्भतादि भिन्न २ समुज्ज्वल गुणों की भी उन्नति हुई। इनके प्रमाणस्वरूप में जो उदाहरण महाराष्ट्रदेश के इतिहास में उपलब्ध होंगे उनसे अधिक विश्वासपात्र उदाहरण किसी अपर प्राचीन वा अर्वाचीन देश के इतिहास में न मिलेंगे। अस्तु, वक्तृता भी उक्त गुण मालिका में सेही एक है। जिन लोगों ने मराठों का इतिहास सविस्तर पढ़ा होगा, और जो लोग उनके देश के गत सौ वर्ष की दशा पर सम्यक् विचार करेंगे उन्हें उक्तगुण की स्थिति के विषय में अणुमात्र भी शड्डा न र- हेगी। पीछे हम यह बात कही आये हैं कि प्राचीन ग्रीस और रोमके इतिहास से वकृता का जो अर्थ लगभग समस्त संसार ने ग्रहण किया है, और जो अर्थ अब इधर हमारे देश में भी सर्व साधारण में समझा जानेलगा है, वह उक्त शब्द का केवल एक- देशीय अर्थ है । वकृत्व सभा में उपस्थित हो तत्रस्य श्रोतागणों को - १६० निबन्धमालादर्श । 'भारत माता के पुत्रगण 'मित्रगण' 'देश भाइयो' आदि सच्चे झूठे कुछभी सम्बोधन कर बड़े गम्भीर स्वर और भाषाके अनर्गल प्रवाहसे प्रोत्साहनोत्पादक वाक्पाण्डित्य को जैसे वकृता कहते है। वैसेही रणक्षेत्रस्थ शूगें प्रति कहे हुए सेनानायक के वीर्योत्साह मेरक शब्द, वा देवालय में धर्मोपदेशककृत धर्मविष- यक व्याख्यान, वा विज्ञ पिता घर गृहस्थी के विषय में अपने पुत्र को जो उपदेश करे, इत्यादि सब उक्त वकृता की अपेक्षा किसी प्रकार से ऊन नहीं जान पडते । जो गुण पण्डितसमाज में झलकेगा वही उक्त प्रसंगों में भी पाया जायगा । सुवर्ण और रजत की माकृतिक योग्यता जानने के लिये यथार्थ परीक्षक के समीप जैसी उनपर सिके की आवश्यकता नहीं रहती और वह तत्क्षण उनकी योग्यता जानलेता है उसी प्रकार से संसार के सामान्य व्यवहारों में भी सच्चे मर्मज्ञ को उक्त गुण का आवि- र्भाव तुरन्तही ज्ञात होजाता है । तात्पर्य यह है कि पेशवाओंकी पुरानी राजधानी में और अन्यत्र यद्यपि वकृता के लिये प्राथेन्स और रोमकी नाई बड़े २ विशाल सभामन्दिर नही बनाये गयेथे, और छोड्सद्वीपके सदृश वहां उस कला की शिक्षा देने के लिये पाठशाला नहीं खोली गई थीं तथापि इसमें तिलमात्र भी संदेह नही है कि उक्त गुणकी स्थिति उक्त राजधानी में अनेकरूप से थी। इस कथनकी यथार्थता निम्नलिखित लेख से और भी स्पष्ट होजायगी। (६) यदि यह सत्य है कि मनुष्य की कार्यदक्षता देख उसके भिन्न २ गुणों का अनुमान किया जा सकता है, तो हम समझते हैं कि जिस महान् पराक्रमी पुरुप ने हिन्दुओं को दास्य मुक्तकर - अनुमान सौ डेढ़ सौ वर्ष लों उन्हें स्वतन्त्रता के सुख और राज- ܦܕ वकृती। विभव का अनुभव कराया उसमें वकृतां गुण निःसंदेह होगा । इसके पूर्व सिकन्दर मभूति जो अनेक रण धुरन्धर महान् विख्यात शासनकर्ता हो गये है उनमें से बहुतेरों की राज्यसाधन सामग्री उनके पूर्वजों नेही पहले प्राप्त कर रक्खी थी । एतावता सिकन्दर, सीजर नेपोलियन आदि राज्यकर्ताओं की बात ठीक वैसीही हुई जैसे किसी शिल्पी को उत्तम प्रकार के सव हथियार मस्तुत कर- देनेपर वह अपनी कार्यकुशलता दिखला सके । पर जिसने मराठी राज्य की नींव डाली उसे समस्त राज्य विश्वकर्मा की नाई न- तनही बनाना पड़ा था। उसके पास राज्य माप्ति के साधनों में से यदि कोई सामग्री थी ही तो वह उसके वज्र समान सुदृढ़ एवं हएपुष्ट शरीर और विशालबुद्धि के अतिरिक्त और कुछ न थी। जिन मालवी लोगों की किसानी, और मजदूरी करते २ अनेक पीढ़ी बीत गई थीं, और जिन्हें अत्यन्त भोले एवं भीरु होने के कारण विना चीफटाक किये पर राज्य का 'अत्याचार सहन करनेकी टेंब पड़ गई थी, उन्हीं के स्वभाव को शिवाजीने इस प्रकार परिवर्तित करदिया कि वे अभिमानी यवनों से साहसपू- र्वक लड़ने के लिये समर्थ हुए । और तो क्या पर जिन लोगों को अपने धर्म, देश आदि की दशा का तनिक भी परिज्ञान न था उन्हें उसने यवनों का ऐसा विरोधी और अपना अनुयायी बना लिया कि उन लोगों ने रणोत्साहित हो अपना सिर हथेली पर ले पाणपण से उसकी आज्ञा का पालन किया । सिंहगड पर कल्याण फाटक के निकट जो दुर्घटना हुई कि जिसका स्मरण- मात्र करनेसे शरीर रोमाञ्चित हो कम्पायमान होने लगता है सो इतिहासज्ञ लोगों को विदितही है। साराश.शिवाजी ने मालवी लोगों को जो अपने वस करलिया था सो उन्हें द्रव्य के लालच + निवश्वमालादर्श। वा अन्य साधनद्वारा नहीं किया था किन्तु अपनी वाक्पटुताद्वारा किया था ।, भोलेभाले ग्रामीण मालवीलोगों को अपने वश में, करलेने के लिये शिवाजी ने उक्त गुण जिस प्रकार प्रदर्शित किया उसी प्रकार से विजापुर दरवार के अनुभवी वकील से वातचीत कर उसपर अपना दर्प स्थापित करने तथा,आगे मुग़ल सरदारों को अन्तरङ्ग अपने पक्ष का कर लेने में भी उसने उक्त गुण प्रक- दित किया था। तात्पर्य महाराष्ट्रदेश के इतिहास में पहला बना शिवाजीही पाया जाता है जो कि उक्त इतिहास का मुख्य आ. धार स्तम्भ है । उक्त इतिहास में दूसरा वक्ता वाजीराव पाया. जाता है कि जिसने, मराठी राज्य का अधःपतन देख अपनी बुद्धि और पराक्रम के वलसे उसे संभाला और मुगल, पठान, मराठे और फिरंगी आदि को ब्राह्मणों की शूरता और आतङ्क से भय- भीत और कम्पित किया । यह पेशवा सैनिक और राजकाजद- क्षतादि बहुत्तेरी बातों में शिवाजी की समता पा सकता है। और महाराष्ट्रदेश के सारे इतिहास में शिवाजी के अतिरिक्त और कोई इससे श्रेष्ठ नहीं पाया जाता । मराठों का इतिहास लिखनेवालों ने इसके वकृत्व गुण का, उल्लेखं अपने ग्रन्थों में किया है । उक्त उल्लेख के सिवाय और उसने शाहू महाराज को जैसा कुछ अपने चुगल में कर रक्खा था आदि बातों से चकृता गुण उसे किस प्रकार से अनुकूल था सो स्पष्ट रूप से जान पड़ता है। इतिहास जाननेवाले, लोगों को यह विदितही होगा कि आदि में पेशवाने तो पेशवाई का अधिकार अपनी वाकपटुता के वलसेही प्राप्त किया था । यह बात भी इतिहास में प्रसिद्धही है कि जब रिन्या ने घोर उपद्रव सातारा,पर भी प्राक्रमण करना विचारा था तब वालाजी ने बड़ी चतुरतार्वक उससे संधिः की बात चीतकर . . - -- वकृता। १६३ अन्त में उसे विलकुल अपनासा कर उलटा शाहूसेही कर दिखाना उससे स्वीकृत करालियाथा। वैसेही प्रत्येक अवसर पर शाहको चर्तु- रतापूरित मन्त्रणा देनेवाला और अतिविकट प्रसंगपर माणपण से उसे साथ देनेवाला मन्त्री उक्त पन्तही-था। यह पेशवा घोड़ेपर सवारी किस उत्तमता के साथ कर सकता था सो भी ग्रन्याप- लोकनेमियलोगों से छिपा नहीं है जब आप घोड़ेपर सवार होते थे पापको संभालने के लिये दोनों ओरसे दो परिचारकों की आवश्यकता होती थी ! तौभी दिल्ली पर्यन्त थापने विजय लाभकर, अपनी अन्तिम चढ़ाई में, स्वराज्य चौथाई और सर- देशमुखी आदि हकों की चादशाही सनदें माप्तकर अपने स्वामी को ला समर्पित की। इन सब बातों से यही यात निर्धारित होती है कि उक्त सब कार्यसाधन में उसे खड्ग की सहायता की अपेक्षा वाणी की रसालताही प्रधानतः उपयोगी हुई होगी। इस गुण के लिये पिछले अङ्क में पिइस राजा.के जिस सिनि- यस मन्त्री का उल्लेख किया गया है उसकी उपमा इसे बहुतही युक्तिसंगत होगी । प्रस्तु; अब दूसरे पेशवा बाजीराव बल्लालकी वकृता का वर्णन करते है । शाहू के दरवार में समस्त मन्त्री मण्डली की अपेक्षा उक्त पेशवा वडा हठीला था, देश देशान्तरों में मराठों की विजयिनी पताका जो फहराती थी, सो इसीके.म. भाव से । उस समय श्रीपतिराव नाम का कोई प्रतिनिधि था, जो उसकी मभुता के डाह के कारण सदा उससे ईर्ष्या और द्रुप.किया करता था। एक बार बाजीराव ने राजा से मार्थना की कि यदि आज्ञा हो तो मैं स्वयं हिन्दुस्तानपर आक्रमण करें यह घाव उक्त प्रतिनिधि को विदित होने पर उसने घोररूप से विरोधकर राजा को समझाया कि, पाजीराव की प्रार्थना राज- + + . १६४ निवन्धमालादर्श। नीति अनुमोदित नहीं है । साथही उसने राजा को यह सूचित किया कि कर्णाटक के, जो देश अपने अधिकार से निकल गये हैं प्रथम उन्हें प्राप्त करनेके, लिये उद्योग करना उचित है पश्चात् मुगलोंपर चढ़ाई करनी चाहिये । उत्तर में वाजीराव ने निवेदन किया कि.यदि शिवाजी महाराज की बुद्धि प्रतिनिधि कैसी,होती, तो उन्हें यह वात तत्क्षण सूझती कि पहले विजापुर और गोवल- कोएड को विजय करलेना चाहिये और पश्चात् युक्तिपूर्वक कर्णा: टक में पदारोपण करना चाहिये । पर आप बड़े अभिमानी साहसी, आपकी बुद्धि बड़ी विशाल; आपने एकबारगीही कर्णाटक विजय करलिया । इस प्रकार से पुराने एवं विस्तीर्ण वृक्ष के मूलपर कुठाराघात करने से उसकी समस्त शाखायें पतित हो नीचे श्रा- जायेंगी यह जो उक्त प्रतिनिधि ने मंसूबा बांधा था उसका बाजी- राव ने पूर्णरूप से खण्डनकर अन्त में शाहू महाराज से प्रार्थना की कि यदि श्रीमान् की आज्ञा होगी तो मैं कृष्णानदी से ले कटक नदीपर्यन्त कृपानाथ की विजयिनी पताका स्थापित, करदूंगा । पे- शवा की वीर्योत्साहयुक्त उक्त प्रार्थना को सुन शाहू महाराज तन्मय हो गये और श्रीमान् के हृदय में श्रीमान् के पितामह के वीरतादि गुणों का सञ्चार हो श्रीमान् ने गद्गदकएठ हो कहा " धन्य है, आपके पूर्वपुरुप बड़े, उदारचेतस् थे, उनके सन्तान आप भी बड़े योग्या हैं।". हमको दृढ़ विश्वास है कि आप मराठों की विज- यिनी पताका हिमालय के शिखर पर स्थापित करेंगे | •, वाजीराव बल्लाल के पूर्व जो चार पेशवा सिंहासनारूढ़ हुए उन में से उक्त दोनों की नाई वाक्पटुता के विषय में किसीकी भी कहीं विशेष प्रशंसा उपलब्ध नहीं होती। अन्तिम पेशवा की प्रशंसा ग्रन्थों में अलबत्ते दीख पड़ती है। इन अन्तिम कुलाहारको प्रायः 4.
probibly hara bad a very different conclusion 1 हमारे विपक्षीलोग पह कहने में नेक भी न हिचकेंगे कि हमने यह निराधार प्रगसा the Mahrattas, then ably ruled by Baji Rao, the second It If Baji Rao had been near Delhi wbep Nadır Shub arrived, it 16 not improbable that he would bave joined the cinperor in the defenco of the empire, and could he have done so, or the Blabratta troops have been cmploved as ausiliaries, Nadir Shab's invasion frould -वकृता। १६५. सबलोग भली भांति जानते है। इनके जघन्य कार्योंने केवल इन्हीं के नाम को कलङ्कित नहीं किया है किन्तु इसने, इनके पूर्वजों की वेमल कीर्ति कौमुदी को भी धब्बा लगाया है। पेशवाई,की चर्चा होतेही,--जिसने पूनापत्तन वसाया, जिसके भय एवं पातक से भयचकित हो नादिरशाह को पूना से पिछले पाव लौटना पड़ा, * जिसने सम्पूर्ण चन्द्र के समान पूर्णाधिकार प्राप्त कर यवन म्लेच्छ प्रभृति द्वारा दीर्घकाललों संतापित जगती को, मुहूर्तमात्र के लिये शीतलता प्रदान की, जिसको नराधम दुरात्मागण साक्षात् काल और सन्मार्गानुयायी पिता तुल्य धर्म का अवतार मानते थे, जिस राजेन्दु को उन्नति के अनन्तर शीघ्रही दुर्भागरूप राहु ने ग्रसित किया, जिस रणवाकुरे को ख का विशाल विजय पराजय की यपेक्षा अधिक दुःख का कारण हुआ-इन समस्त राज परंपरा ती सर्वथा विस्मृति हो, जिस सुन्दर सोहावने दिखाई देनेवाले ट सांप ने कालियाके सदृश सबके जीवन हेतु राज्यस्वरूप दह को अपने प्रवल विपसे तुरन्तही विषमय करडाला, दुर्जनरूप नकों को उसमें आश्रय, प्रदान किया, और अपनी मा के जीवित काल . * उन उल्लेख को पद हमारे पाठकों को प्राय श्राश्चर्यित होना पडेगा और योही लिखमारी है। लीजिये प्रमाण भी पद लीजिये “ The ravages of the Persiang were confined to Hindustan, and their departure was bastened by fear of Peshwa "Varlın's British India-P.6. - - - - 1 Taylor's Manual P. 381, १६८ निवन्धमालादर्श । के अन्तःकरण को शुद्ध जान उसने दो बार धोखा खाया। अन्त अन्त में माहुली में अगरेजों से युद्ध करने की तैयारी जर हो रही थी उस समय जान्मालकम साहब से बाजीराव की जो बातचीत हुई थी तब भी. उसी प्रकार से उसने उक्त साहब को यह विश्वास करा दिया था कि वह कम्पनी सर्कार का परम हितैपी है। उक्त साहब ने उसके विषय में केवल विश्वासही नहीं, करलिया, किन्तु कलकत्ते को यह लिख भेजा कि ठग और पिण्डारियों का दमन करने में हमें पेशवा से बड़ीभारी सहायता मिलेगी। इस सहायता का अभिप्राय उक्त साहब बहादुर को अल्पकाल ही में मिलगया होगा। तीसरी बात गङ्गाधरशास्त्री की, कही जाती है । उस भोलेभाले ब्राह्मण को लोग सदा यही मन्त्रणा दिया करतेथे कि आप पेशवा और त्र्यम्बकजी डोंगरा से बहुत बचे रहा करें; पर दोनों की कुटिल नीति को न समझ कालपाशाकृष्ट हो उसने उसके साथ पएढरपुर के लिये प्रस्थान किया। वहां पहुंचतेही उनके कपटपूरित आदर सत्कार से उसकी सुध बुध एकवारही जाती रही । सारांश जिस सरस्वती के प्र- साद ने ब्राह्मण वादशाही की नींव डाल, पहले पेशवा की कीर्ति को अधिकतर समुज्ज्वल किया वही अन्तिम पेशवा की कीर्तिको पित कर उक्त राज्य को मटियामेट करने का कारण हुआ।* * सहश्य पाठकगण, इस लेख को स्वर्गवासी श्रीयुत विष्णुकृप्पशास्त्री विप लूनकरजी ने लगभग छ निबन्धों में शेष किया है। उनमें से यहा लों दो मि बन्धों का अनुवाद हुआ। इसे पढ़ यदि आपलोग प्रसन होंगे और समझेंगे कि शेष निबन्धों का अनुवादित होना आवश्यक है तो मैं उन्हें भी अनुवादितकर प्राप लोगों की सेवा में उपस्थित करूमा ।। 5 ३ ।
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