Sanmati Library, Jaipur

Geeta Sangrah

Sharma, Bhimsen · 2009/09

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* गीता अनुक्रमणिका द ३ ४ ४५ ५ दिशगीता जी संख्या नाम पृष्ठारम्भ पृष्ठसमाप्ति पुत्रगीता मङ्किगीता १० २१ वोध्यगीता २२ २५ पिङ्गलागीता शम्पाकगीता ४१ अजगरगीता ४६ ५३ जगालगीता ६५ ७२ तगीता. ७३ ७६ मागीता व्यासगीता ८५ १०४ १२ नारद्गीता १०५ १२५ * निवेदन * संसार में रहकर भी मनुष्य को उचित है कि जहां तक हो सके मनको परमार्थ की तरफ झुकाये क्योंकि निःश्रेयस कल्याण का हेतु परमार्थ ही है इस गीतासंग्रह में १२ गीतानों का संग्रह किया गया है जिनके विचार पूर्वक पढ़ने से मनुष्य को यथार्थ लाभ हो सकता है। ७७ नगर, 144 अपितापुत्रसंघ शील युधिष्ठिरउवाच-अतिक्रातिकालऽस्मिन् सर्वभूतक्षयावहे किन्नेयःप्रतिपद्येत तन्मेब्रूहिपितामह ! ॥१॥ महाराज युधिष्ठिर भीष्मजीसे पूछते हैं कि-हे पितामह ! इस दौड़ते हुए, सर्वनाश काल-समयको जाता हुआ जानकर मनुष्यको कौनसा कल्याण का मार्ग ढूंढ़ना चाहिये उसको भाप मुझे समझाकर कहिये ॥१॥ भीष्म उवाच-अत्राप्युदाहरन्तीम-मितिहासंपुरातनम् । पितुःपुत्रेणसंवादं तनिबोधयुधिष्ठिर ! ॥२॥ द्विजातःकस्यचित्पार्थ ! स्वाध्यायनिरतस्यवै। बभूवपुत्रीमेधावी मेधोवीनामनामतः ॥३॥ सोऽब्रवीपितरपुत्रः स्वाध्यायकरणेरतम् । मोक्षधर्मार्थकुशलो लोकतत्त्वविचक्षणः ॥ ॥४. भीग्मजी राजा युधिष्ठिरजीसे कहते हैं कि हे कुन्तीके पुत्र युधिष्ठिर ! तुम ने जो प्रश्न किया है इसी विषयले पितापुत्रका संवादरूप पुराना इतिहास कहा जाता है उसको तुम सुनो समझो । किसी वेदपाठी ब्राह्मीका मेधावी नामक उत्तम बुद्धि वाला पुन था वह लोक्ष धर्मक्षा तत्वार्थ समझने में দ্বয়াল तथा संसारके तत्वको यथार्थ जानने वाला [ अर्थात् धर्म, अर्थ, काम नोक्षों में से काम वा धनमें भासत न मुना वालब्रह्मचारी या ] मेधावी एक समय अपने वेदपाठी पितासे बोलाकि ॥३-४ ॥ पुत्रउवाच-धीर:किस्चित्तात ! कुर्यात्प्रजानन् क्षिप्रायु- श्यतेमानबानाम् । पितस्तदाचक्ष्वयथार्थयोगं ममानुपूर्व्यायेनधर्मचरेयम् ! ॥५॥ पुत्र अपने पितासे बोला कि हे पूज्य पितः ! मनुष्योंका भायु शीघ्र २ 'नष्ट हो रहा है इस बातको धीर पुरुष जानता हुआ क्या करे। हे पितः । इस बातको मुझसे क्रमपूर्वक कहिये जिससे मैं धर्मको ही फर ॥ ५॥ जब कोई.कहीं जाना चाहता है तो पहिलेसे जानेकी तयारी करता है ३ ! पितापुनसंवाद- वैसे ही अवश्य भाने वाले मृत्युझे पश्चात्को बड़ी यात्रा लिये बड़ी तयारी करो वहां शरीरादि साधन कुछ नहीं जायगा किन्तु केवल अच्छे बुरे संचि- त कर्म ही साथ जांयगे। पितोबांच-वेदानधीत्यब्रह्मचर्यणपुन । पुत्रानिच्छेत्पाव- नार्थपितृणाम् । अशोनाधायविधिवच्चेष्टयज्ञो वनंप्रविश्याधमुनिथुरेत् ॥ ६ ॥ पिताने उत्तर दिया कि है पुन्न ! ननुष्य पहिले ब्रह्मचर्याश्रममें रह कर वेदों को पढ़े पचात् माह तर्पयादि हार स्तपितरोंको तारनेकेलिये गृहाश्रम में रह कार पुत्रोंको उत्पन्न करे उसके बाद अन्याधान करके सोमयागादि यज्ञ करे पीले वनमें जाकर मुनि होने लिये प्रयत्न करे अर्थात् वानप्रस्थ होके तप करे इस प्रकार तीनों आश्रमका कृत्य पूराकर लेने पर अलोंसे मुक्त हो कर मुक्तिको प्राप्त हो सकता है [बीचके सामान्य मनुष्य के लिये यह मार्ग है]॥ पुत्रउवाच-एवमभ्याहतेलोके समन्तात्परिवारिते। अमोघासुपतन्तीपु किंधीरइवमापसे ॥ ७ ॥ पुत्र बोला कि हे पितः ! इस प्रकार नाना प्रकारके दुःखोंसे लोगोंके प्रत्यक्ष पीडित होने तथा अनेक शिथिलतादि सम्बन्धिनी विपत्तियोंने घेरे होने पर और निवृत्त न होने वाली विपत्तियों ना २ कर ऊपर गिरने पर श्री भाप धीरज बालोंके तुल्य क्या कहते हो? ॥ ७ ॥ पितोवाच-कथमभ्याहतोलोकः केनवापरिवारितः । अमोघाःकाःपतन्तीह किन्नुभोपयसीवमाम् ॥८॥ पिताने कहा कि हे पुत्र ! लोक अस्याहत ( मारा हुआ) किस प्रकार है तथा किससे घेरा हुआ है और नमोधा कौन हैं जो आती जाती हैं । हे. पुत्र ! तूऐसा वचन कहकर क्या मुझे डराना चाहता है ? ॥ ८ ॥ पुत्रउवाच-मृत्युनाम्याहतोलोको जरयापरिवारितः। अमोघारात्रयम्झापि नित्यमायान्तियान्तिच ॥ यदाहनेतज्जानानि नमृत्युस्तिष्ठनीतिह । सोऽहंक्रयप्रतीक्षिप्ये ज्ञानेनाभिहितश्चरन् ॥ १० ॥ or ar जब मैं पुत्रगीता ॥ पुत्र बोला कि हे पितः ! यह लोक, मृत्युसे मारा हुभा तथा बडा- वस्थासे घेरा हुना है माने जाने वाली ये रानियां अमोघा कहलाती हैं। इस बातको भली भांति जानता हूं कि मृत्यु बराबर प्राणियोंको ना- । रता ही जा रहा है किन्तु कोई चाहे कि मैं अभी न नहं तो मृत्यु कुछ भी काल ठहरता नहीं अर्थात् खड़ा नहीं रहता तब मैं ऐसा जानता हुआ मृत्यु की क्यों प्रतीक्षा ( इन्तजारी ) पाऊं ॥ ९ ॥ १० ॥ रात्र्यांराध्यांव्यतीताया-मायुरल्पतरंयदा । तदैववन्ध्यंदिवस-मितिविद्याद्विचक्षणः ॥ ११ ॥ गाधोदकमत्स्यइव सुखंविन्दतकस्तदा । अनवाप्नेषुकामेषु मृत्युरभ्येतिमानवम् ॥ १२ ॥ पुष्पाणीवविचिन्वन्त-मन्यत्रगतमानसम् । वृकीवोरणमासाद्य मृत्युरादायगच्छति ॥ १३ ॥ अद्यैवकुरुयच्छ्रे यो मात्वांकालोत्यगादयम् । अकृतेष्वेवकार्येषु मृत्युसम्प्रकर्षति ॥ १४ ॥ श्व:कार्यमद्यकुर्वीत पूर्वाह्नोपराह्निकम् । नहिप्रतीक्षतेमृत्युः कृतमस्यनवाकृतम् ॥ १५ ॥ कोहिजानातिकस्याद्य मृत्युकालोभविष्यति । युवैवधर्मशीलःस्या-दनित्यंखलुजीवितम् । कृतेधर्मभवेत्कोति-रिहत्यचवैसुखम् ॥ १६ ॥ पुत्र पिसासे फिर कहने लगा क्षि-हे पितः ! ए २ रात्रिके व्यतीत होने पर थोड़ा २ भायु नित्य २ घटता जाता है इसी प्रकार प्रत्येक दिन भी नायु का नाशक है इस बातको बुद्धिमान् पुरुष जान खेवे । गहरे जलमें मच्छक समान अगाध संसारमें कौन विचार शील पुरुष सुख पा सकता है ? क्योंकि मनुष्यों के मनोरथ पूरे नहीं होने पाते परन्तु मृत्यु शीघ्रतासे पासमें ला खड़ा । होता है.। पुष्पोंको बटोरते हुए की भांति अन्य कार्योंमें लगे भूले हुए पुरुष मृत्यु लेकर इस प्रकार चला जाता है जैसे मेलाको वफी ( भेनियन ) लेकर चली जावे । हे पितः ! तुम नाज ही कल्याणकारी कार्योंको लरो तुम्हारा को ४ कि युवा पितापुत्रसंवाद यह काल ध्यर्ध न पला जावे दक्षि दामोंके पूरा न होने पर ही मृत्यु मनुज्योंको खींच लेता है। मनुष्यदा कर्तव्य कि वह कलके कानशी भाज और दोपहरले पश्चात् करने योग्य कार्यको दोपहरसे पहिले कर ले। क्योंकि मनुष्यों के कान पूर्ण हो गये वा नहीं इस बातकी प्रतीक्षा मृत्यु नहीं करता। कोन जानता है कि नाज किसला मृत्यु होगा इस कारण पुरुषको चाहिये समर्थ होते ही धर्म करने लगे किन्तु यह न शोचे कि वृद्ध होंगे तब धर्म कर लेंगे अभी मानन्द भोगें। क्योंकि जीवन तामगुर है । जो धर्म क. रता है उसती इस लोकमें कीर्ति और परलोसमें उतको तुरू होता है ॥१६॥ यदि मनुष्यशो संसारकी अनित्यताका ध्यान सदा बना रहे, निरन्तर चलने वाले संसारचको घूमनेका शब्द इसके कानों में प्रत्येक समय सुनाई पड़ता रहे, संचारस्य प्रागियोंको मरते देख २ यदि मनुष्यको बार २ निरन्त- र शिका मिलती रहे, यदि मनुष्य मोहरूप मद्यको पीकर शुधि बुधि भूला न रहे किन्तु सचेत रहता हुआ अपने प्रधान कर्तव्य न डिगे तो वाल्याण- भागी हो सकता है। मोहेनहिसमाविष्टः पुत्रदारार्थमुद्यतः । छत्वाकार्यमकायंवा पुष्टि भेषांप्रयच्छति ॥ १७ ॥ संपुत्रपशुसम्पनं व्यासक्तमनसनरम् । सुन्तंव्याघ्रीमंगमिव मृत्युरादायगच्छति ॥ १८ ॥ संचिन्धानकमेवैनं कामानामविवप्तकम् । व्याघ्रःपशुमित्रादाय मृत्युरादायगच्छति ॥ १६ ॥ इदंकृतमिदंकार्य=मिदमन्यत्कृतानम् । एवमीहासुखासक्तं कृतान्तःकुरुत्तेवशे ॥ २० ॥ अज्ञानी पुरुष पुत्र, स्ला आदि लिये पर्तव्य अकर्तव्य काम करके पुत्र ली आदिको पुष्ट किया करता है । पुत्र स्वी और पशुओंसे युक्त, कार्यों में फंसे हुए उत्त नजुष्ययो मृत्यु इस प्रकार ले जाता है जैसे सोते हुए मृगको व्याधी ले जावे । कासनामोदो बटोरते हुए तथा कामों से तृप्त न हुए पुरुष को मृत्यु इस प्रकार ले जाता है जैसे बाध पशुशो ले जाये। यह काम मैंने कर लिया यह मुझे करना है और यह अन्य कार्य वीचमें पड़ा पूरा करना है इस प्रकार भाशाके सुखने भूगे हुए पुरुषको मृत्यु गप करलेता है ॥ २॥२०॥ , r . अवश्य पुत्रगीता ॥ जो भूलमें नहीं पड़ा सिन्तु हर बार सचेत रहता हुभा अपने कल्याणार्थ भी जुङ २ जप तप परोपकारादि करता जाता है उसका भी मृत्यु होता है पर धर्मका संचय करलेनेसे उसके समीप अच्छे साधनोंका बल हो जाता है जिससे वह घबराता नहीं तथा मृत्युका दुःख भी उसको अधिक पी- डित नहीं करता ॥ कृतानांफलमप्रोप्तं कर्मणांकर्मसंज्ञितम् । क्षेत्रापणगृहासक्तं मृत्युरादायगच्छति ॥ २१ ॥ दुर्बलंबलवन्तंच शूरंभीरुंजडंक्रविम् । अप्राप्तंसर्वकामार्थान् मृत्युरादायगच्छति ॥ २२ ॥ मृत्युर्जराचव्याधिश्च दुःखंचानेककारणम् । अनुषक्तयदादेहे किंस्वस्थइवतिष्ठसि ॥ २३ ॥ जातमेवान्तकोऽन्ताय जराचान्वेतिदेहिनम् । अनुषक्ताद्वयेते भावाःस्थावरजङ्गमाः ॥ २४ ॥ मृत्योर्वामुखभेत याग्रामेबसतोरतिः । देवानामेषवेगोष्ठो यदण्यमितियुतिः ॥ २५॥ निवन्धनीरज्जुरेषा याग्रामेवसतोरतिः । छित्त्वैतांसुकृतोयान्ति नैनांछिन्दन्तिदुष्कृतः ॥ २६ ॥ जिसको किये हुए कमाया का फल प्राप्त नहीं हुआ तथा जो खेती, दूकान, घर प्रादिके कामोंकी फंसावटमें भूला हुआ ऐसे पुरुषको मृत्यु लेकर चलदेता है । दुर्वल हो वा बलवान् हो, शूर मारने वाला साहसी हो वा डरपोंक हो पर मृत्यु सिसीको नहीं छोड़ता किन्तु निर्बलादि सब मनुष्योंको अपनी कामनाको वा धनादि पदार्थोंको पूर्ण प्राप्त करपानेसे प्रथम ही मृत्यु उठाले जाता है । पुत्र पितासे कहता है कि--हे पितः ! जब इस देहमें मृत्यु, जरावस्था अनेक रोग और अनेक कारण वाले अनेक दुःख निवास करते हैं तब तुम वे- खटक क्यों बैठे हो? अर्थात सचेत होजानो । न जाने कौन मृत्यु भादि शत्रु किस समय तुमको धर दबावे । उत्पन्न होते ही पुरुषके पास मारनेके लिये मृत्यु तथा जरा भवस्या आ जाती है और अवसर पाकर ये दोनों अपना - ६ पितापुत्रसंवादे- काम करती हैं। इस मृत्यु और वृद्धावस्थासे सब जडचेतन पदार्थ घिरेहुए हैं। ग्राम जनसमुदाय] में वास और ग्राम्य पदार्थोंसे प्रेम ये दो बाते ही नृत्युका मुख्य कारण हैं। देवोंका सिद्धान्त है कि वनमें तपस्यादि करनेसे मृत्यु दूर. भागजाता है । शुद्ध एकान्त निननवन नृत्युहीन देवत्यानले तुल्य है । ग्राममें वास और ग्राम्य पदार्थों में तद्पता (तन्मयता ) से प्रेम रखना ये दो दालें मानो संसारमें बांधनेकेलिये एक रज्जु (रस्सी) हैं। इस उक्त रज्जुको पुरया- त्मा धर्मशील ही काट सकते हैं पापी कदापि नहीं काट सकते २१ । २६ ॥ इन उक्त श्लोकोंमें कहे विषयपर यदि मनुप्यका ठीक २ विचार बना रहे वा यह कथन जिसके हृदय में निवास करले वह प्रेय विषयों में आसक्त होके अगाध संसार सागरको तरङ्गों में पड़ाहुना गोता खाया करे यह सन्भव नहीं। भूलमें पड़े रहना भविद्या और मृत्युका ठीक २ यथार्थरूप दीखना तथा शरीरको अनित्य समझना यथार्यज्ञान वा तत्त्वज्ञान वा विद्या नाम वे. दतत्त्वार्थज्ञता का प्राप्त होना मोक्षका हेतु है । नहिंसयतियोजन्तून् मनोवाक्कायहेतुभिः । जीवितार्थापनयनः कर्मभिर्नसबध्यते ॥ २७ ॥ नमृत्युसेनामायान्ती जातुकनित्प्रवाधते । ऋतेसत्यमसत्त्याज्यं सत्येामृतमानितम् ॥ २८ ॥ तस्मात्सत्यव्रताचारः सत्ययोगपरायणः । सत्यागमासदादान्तः सत्येनैवान्तकंजयेत् ॥ २६ ॥ अमृतंचैवमृत्युश्च द्वयंदेहेप्रतिष्ठितम् । मृत्युरापचतेमोहात् सत्येनापद्यतेऽमृतम् ॥ ३० ॥ जो मनुष्य मन, वाणी, शरीर और आक्षेपादि निमित्तोंसे प्राणियोंकी हिंता नहीं करता कराता अर्थात् नानसविचारादिसे किसीको दुख देनेकी चेष्टा नहीं करता वह जीवन मरण प्रवाह में वहांने वाले कर्मों से नहीं वन्धता । सत्यके सिवाय अन्य कोई ऐसा नहीं है जो भाते हुए मृत्युकी सेना को किसी प्रकार कदापि रोक देवे ईश्वर भगवान्ते भिन्न सब संसार असद है उसे बोड़ना चाहिये एकक सत्य ही रूप परमात्मा है उसी अपरिणामी सत्य में अमृत स्थित है। इस कारण मनुण्यशो उचित है क्षि सत्यवत, सत्ययोग, 9 . पुत्रगीता ॥ सत्यशास्त्रोंका स्वाध्याय करता हुआ तथा जितेन्द्रिय होकर सत्य से ही मृत्यु को जीत लेवे | इस शरीरमें अमृत और मृत्यु दोनों स्थित हैं । अज्ञानसे मृत्यु और सत्य भगवानके ज्ञानसे अमृत प्राप्त होता है। सब अनर्थ वा पापोंका मूल परपीड़ा रूप हिंसा तथा सब धर्म वा पुण्यों का मूल अहिंसा वा दया है हितासे बन्धनका हेतु भययुक्त संस्कार संचित होता और दया वा अहिंसाके सेवन से निर्भयता मुक्तिका हेतु होती है। प्रकाश ही अन्धकारको हटा सकता है अन्य कोई नहीं । शरीरमें नाभिसे ऊपर अर्ध भाग में रहने वाला प्रारा ज्ञान अमृत वा प्रकाश ही स्वस्थदशामें माने पर अमृत वा मोक्षका हेतु है। नाभिसे नीचेके भागमें स्थित विषया- सक्तिका हेतु अपान, अज्ञान, मृत्युषा अन्धकार ही प्रवल पड़ा संसारचक्रका "चलाने वाला है। सोऽहंाहिनःसत्यार्थी कोमक्रोधबहिष्कृतः । समदुःखसुखःक्षेमी मृत्युंहास्याम्यमर्त्यवत् ॥ ३१ ॥ शान्तियज्ञरतोदान्तो ब्रह्मयज्ञेस्थितोमुनिः । वाङ्मनःकर्मयज्ञश्च भविष्याम्युदनायने ॥ ३२ ॥ पशुयज्ञैःकहिले-माहशीयष्टुमर्हति । अन्तवद्विरिवप्राज्ञः क्षेत्रयःपिशाचवत् ॥ ३३ ॥ सो मैं हिंसा न करने वाला, सत्यको चाहने वाला काम, और क्रोधको छोड़फर सुख, दुःख को समान मानता हुआ कुशलक्षेम पूर्वक देवों के समान . मृत्युको छोड़ दूंगा। और शान्तिरूप यज्ञमें मन लगाता हुआ ब्रह्मयज्ञमें व- त्पर होऊंगा तथा उत्तरायणमें मैं जितेन्द्रियता पूर्वक मन और वाणीका उसर के कारणमें यज्ञ नाम होम करता हुआ मानूंगा कि मैं मानो देवयज्ञ ही क- रता हूं। मुझ सरीखा समझता हुआ पुरुप जिन यज्ञोंमें पशुहिंसाकी जाती है ऐसे यज्ञोंसे यजन योग्य नहीं क्योंकि इन परिमित फल वाले यज्ञोंको धर्म की भोर प्रबल वा उत्तम निष्ठा रखता हुशा परमार्थी पुरुष पिशाच-राक्षस के समान बन कर नहीं कर सकता ॥ ३१-३३ ॥ हिंसा का मूल क्रोध वा द्वेष है और हषका हेतु कामकी सूक्ष्म वासना हैं [ कामातलोधोऽभिगायते ] क्योंकि कामसे ही क्रोध होता है। काम का पितापुत्रसंवादे नाभिसे नीचे अधोभागमें रहने वाले. अपानके साथ पूर्ण मेल है तो सिद्ध हुआ कि मृत्यु वा अशान का साथी क्रोध वा द्वेष नाम हिंसा है इसी से प्रायः क्रोधी लोग ही अधिक सताये वा मारे जाते हैं। जो संसार के दुःखों से वचना वा मुक्ति चाहता है वह सबसे पहिले हिंसा शोध द्वेषादिका त्याग और दया या अहिंसाफा धारण करे ॥ यस्यबाङ्मनसेस्यातां सम्यकप्रणिहितसदा। तपस्त्यागश्त्रयोगश्च सवैपरमवाप्नुयात् ॥ ३४ ॥ नास्तिविद्यासमंचक्ष नास्तिसत्यसमंतपः। नास्तिरागसमन्दुःखं नास्तित्यागसमंसुखम् ॥ ३५ ॥ आत्मन्येवात्मनाजात आत्मनिष्ठोऽप्रजोऽपिवा। आत्मन्येवभविष्यामि नमान्तारयतिप्रजा ॥ ३६ ॥ जिसके मन और वाणी ठीक सदा जीते हुए बशमें रहते हैं तथा जिस का तप, दान और योग ठीक दशाका है वही पुरुष सबसे परे परनामा वा मोक्षको प्राप्तहो सकता है। विद्याके समान नेन, सत्यके समान तप, राग के तुल्य दुःख और त्यागके समान कहीं लुख नहीं है । मेरा आत्मा अनादि होनेके कारण किसीसे उत्पन्न नहीं हुआ है तथा यह नाला अपने रूपमें ही स्थित है यह किसी दूसरे जीवको उत्पन्न नहीं करता है अतः में अपने रूप में अवस्थित होलंगा (तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम् योगद०) मुझ सांसारिक प्रगा औलाद नहीं तार सकती है ॥ ३४-३६ ॥ मन वाणीका वशीभूत होना तथा तप, त्याग [वैराग्य] और योग नाम चित्त का समाधान एकाग्रता होना यही कल्याण वा मुक्ति का मार्ग है। विद्या शब्दसे वेद लेना चाहिये [पितृदेवगनुष्याणां वेदशनुःसनातनम् । ननु० १० १२ ] पित, देव, तथा मनुष्योंका वेद ही सनातन चशु है। सारांश यह है कि मनुष्य प्रथम विपयोंका संग छोड़ना प्रारम्भ करे और इसी में कल्याश जाने क्योंकि विषय ही वस्तुतः विप हैं केवल एक यकार विषय शब्दमें विष से अधिक है पर न्यूनता कुछ नहीं । नैतादृशंत्राह्मणस्यास्तिवित्तं ययकतासमतासत्यताच । शीलंस्थितिर्दण्डनिधानमार्जवं ततस्ततम्योपरमःक्रियाभ्यः॥

वह नेपाली - पुग्नगीता ॥ किल्लेधनसल्यवापिकिन्ते किल्लेदारलिणायोमरिष्यसि आत्मानमन्त्रिच्छगुहांप्रविष्टं पितामहास्वागतापिताच॥३८॥ प्रासाला पुत्र अपने पिताशे राहता है कि हे ब्राह्मण? पितः । ब्रालाका ऐना शान्य कोई धन नहीं है जैसी कि एकता, समता, सत्यता, शील, धर्ममें स्थिति, तपस्या करना, जोमलता और शारी'कानों से निवृत्ति वैराग्य पारना धन है । हे पितः ! अब तुम्हारा नरना' निश्चित ही है तब तुमको धन, मान्धव और सीसे मोई प्रयोजन नहीं है करण भय उपस्थित होते ही धपादिका उस धूलियत हो जाता है । जिन्न नालायो भ- ज्ञानवश मनुष्य आन नहीं सक्ता उसको तुम सोगो-चाहो । घोड़ी देर शोषो तो नही कि तुम्हारे पितामह और पिता शादि पूर्वज कहां गये ! ! ॥ ३५ ॥३८ ॥ भशानी बालक पाहाता और पाल्याणमार्गका उपदेश करने वाला मानी पुरुष पिता होता है इस ननुशीके बांधनानुसार व्यवहार में पहले मात्र पिता प्रधामी होने से पुगपत् या शिवरत् हुन्ना और जो पाहने में पुन था वही शास्त्रानुकाल उपदेश द्वारा रक्षा पासक होनेसे मुख्य पिता सुना जागो । पूर्वकालमें ऐसे २ शुद्ध संचारी पुत्र होते थे जो पिताको भी उपदेश देकर फश्याय नार्गमें लाले ॥ भीष्मउवाच-पुत्रस्यैतद्वचःशुत्वा यथाका पिताप !। तथात्वमपिवर्तन सत्यधर्मपरायणः ॥ ३८ ॥ भीमशी राजा युधिष्ठिरजीसे अन्तमें सहते हैं जिन्हे नृप ! युधिष्ठिर ! जैरोपुत्रको वचनको सुनकर पिताने किया था वैसे ही तुम भी सत्य और धर्मी परायण होकर वर्ताव प्रो ॥ ३ ॥ . इति शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि पिता पुत्रसंचादे १७५ तमोऽध्यायः ।।

अथ मङ्किगीता ॥ युधिष्ठिर उवाच-ईहमानःसमारम्भान् यदिनासादयेद्धनम् । धनतृष्णाभिभूतश्च किंकुर्वन्सुखमाप्नुयात् ॥ राजा युधिष्ठिरजी भीमजीसे पूलते हैं कि हे पितामह ! यदि मनुष्य धन प्राप्तिकेलिये बहुतले कार्योंक्षा प्रारम्भ करताहुना भी धनको न पावे तो यत- लाइये शि उस धनको चाहना वाले पुरुषको किस कार्य करने से सुख वा सन्तोष निल सकता है ॥१॥ भीष्मउत्राच-सर्वसाम्यमनायासः सत्यवाक्यंत्रभारत !। निर्वदश्चाविधित्साच यस्यस्यात्ससुखीनरः ॥२॥ एतान्येवपदान्याहुः पञ्जवृद्धाःप्रशान्तये। एपस्वर्गधर्मश्च सुखंचानुत्तमंमतम् ॥ ३॥ अत्राप्युदाहरन्तीम-मितिहासंपुरातनम् । निर्वेदान्मङ्निागीतं तन्निनोधयुधिष्ठिर ! ॥४॥ भीमजी कहते हैं कि हे भरतकुलोत्पन्न युधिष्ठिर : जित्त पुरुष में-१ सर्व समता, अनायास, ३-सत्यबोलना, ४-वैराग्य, उदासीनता और ५-नये २ कायाँका प्रारम्भ न करना ये पांच गुण होते हैं वह सुखी होता है । वृद्ध ज्ञानी पुरुष ही उक्त पांच गुणोंको शान्तिका पद-साधन कहते हैं, इन्हीं पांचोसे स्वर्ग मिलता, धर्मसंचित होता और सर्वोत्तम सुख मिलता है। इस विषयमें बुद्धजन इस पुराने इतिहासको कहते हैं जो इतिहास वैराग्यवान्-- उदासीन नङ्कि नानक युत्पने गाया है इसीसे इसका नाम मङ्किगीता हुन्ना उसको तुस सुनो समझो ॥२॥४॥ परमार्थ वा मुक्ति [ सब दुःखोंसे छूटने ] का सर्वोपरि यही द्वार है कि १ सनता, २--शान्ति, ३-- सत्यभाषण [ जना मनमें हो वही वापीते कहना] भोगोंसे उदासीनता और ५-विपभोगले नये २ उद्योगोंका न करना । किसीको शत्रु विसीको मित्र समझना कित्तीको अपना किसीको विरामा समझना इत्यादि विषनता ही दुःखका मूल है । शान्ति न रहने से व्याकुलता के साथ इधर उधर अधिक भागनेते दुःख तथा सन्तोष रखनेसे सुख हो-

w-
६
मङ्किगोता ॥
११
ता, मिथ्याभाषणसे दुःखके हेतु भय लज्जा शङ्काहोते हैं । विषयोंसे उदासी-
नता न हो तो वहां तृष्णा वा रोग ही दुःखोंका मूल है। और विषयभोग
के लिये नये २ उद्योग भविष्यत्में होने वाले दुःखोंके बीज जानो । इन्हीं
पांचोंका वर्णन मशिगीता में होगा ।
ईहमानोधनमति-भग्नेहश्चपुनःपुनः ।
केनचिद्धनशेषेण क्रीतवान्दम्यगोयुगम् ॥ ५ ॥
सुसम्बद्वौतुतीदम्यो दमनायामिनिःसृती।
आसीनमुण्ट्रमध्येन सहसैवाभ्यधावताम् ॥ ६ ॥
तयोःसम्प्राप्तयोरुष्ट्रः स्कन्धदेशमगर्षणः ।
उत्थायोक्षिप्यतौदम्यौ प्रससारमहाजवः ॥ ७ ॥
ह्रियमाणौतुतौदम्यौ रोनोष्ट्रणप्रमाधिना।
मियमाणोचसंप्रेक्ष्य मङ्किस्तनाब्रवीदिदम् ॥ ८॥
पूर्वकालमें मति नामक पुरुपने धन प्राप्तिके लिये अनेक चेष्टायें या उ-
योग किये परन्तु उनके सब उद्योग वार २ निष्फल हुए । पश्चात् मङ्किने शेष
रहे थोड़े धनसे दो बछड़े ( जिहोंने माताफा दुग्ध पीना छोड़ दिया था )
मोल लिये । वे दोनों बछड़े जोठ लगाकर फिरानेकेलिये महिने बाहर नि-
काले, निकाले हुए वे दोनों बड़े बैठे हुए जंटको बीचमें हो कर शीघ्रतासे
दौड़े उन दोनों बछड़ोंको उस प्रकार निकलते हुए देख जट सहन न करके
अपने कण्ठमें आईहुई बछड़ोंकी जुड़ी रस्सी [ जिसमें दोनों ओर बड़े घे]
को लिये उठा और उसने दोनों बछड़ोंको ऊपरको उठाके अपनी लम्बी
ग्रीवा, ( गर्दन) वेगसे फैलायी उस बलवान् जंटसे उन दोनों उठाये भरते
हुए बछड़ोंको देखकर मङ्कि यह वचन बोले किः--॥५॥ ८॥
नचैवाविहितं शक्यं दक्षणापीहितंधनम् ।
युक्त नन्नवासम्य-गीहांसमनुतिष्ठता ॥ ६ ॥
चतुर पुरुष भी प्रारब्धके बिना वाञ्छित धनको प्राप्त नहीं हो सकता
चाहे वह श्रद्धासे युक्त हुआ कितना ही उद्योग क्यों न करे ॥ ९ ॥
कृतस्यपूर्वनानथै-र्युक्तस्याप्यनुतिष्ठतः ।
इमंपश्यतसंगत्या ममदैवमुपप्लवम् ॥ १० ॥

Con नद्विबिलापे- उहयोवयनदस्तो विपनवगच्छतः । उरिक्षयकाकतालीम-सुस्पथेनेवधानलः ॥ ११ ॥ मणीवोष्ट्रयलरलेले नियोक्त्सतरोमम । शुद्धहिदैबलेटेई हठेनैवास्तिपौरुपम् ॥ १२ ॥ यदिवाप्यपरीत परिणनामकर्हि चित् । अधिसभापतदपि दैवमेवावतिष्ठते ॥ १३ तस्मादिदएबह गन्तव्यःसुखमिच्छता। सुखल्वपितिनिर्दिषणी निराशश्यार्थसाधने ॥ १४ ॥ अहोसस्य क्षेत्रोक्तं सर्वतःपरिमुच्यता। प्रतिष्ठतानहारण्यं जनकारयनिवेशनात् ॥ १५ ॥ यःकामानाप्नुयात्तन् यी तान्केवलांस्त्यजेत् । प्रापणासर्वकामानां परित्यागोविशिष्यते ॥ १६ ॥ मैं नियमाण बुरे ससाने युक्त नहीं लूं लरा उद्योगमें तत्पर हूं तथापिदेसो संयोगले दैव (मारकर ) सम्भन्धी लेसा उपाय [ विपत्ति ] है। मेरे वबड़े जधण २ से भी विषनाग, न्हीं शाया करते थे परन्तु आज पासतालीय न्याय से भामाशमार्गसे गाते हैं । मेरे प्यारे बछड़े संटक कराठमें दो नसियों स- नाम लटकते हैं यह पोबल मारन हो ता फल है हठसे कोई पुरुषार्थको प्रधान बहै तो भी नहीं हो सकता। यदि कादी मम पुल्पार्यदाई भी प्रधानता दीख प- इती है तो वहां की खोज करने का विशेष दिवारनेसे अन्तमें दैव-भारब्ध हो प्रय- ल ठहरता है।तितो शदने वाला पुरुप-उदानीमला-वैराग्यको ही पारस करे पयोतिरायबा और प्रयोजनसिद्धिसे निराश हुना पुरुष सुरपूर्वक सो- ता है। मद्धि कहते हैं सि-ओहो ! सका त्याग करते हुए और जनसके घर से राहावन को समामिल होने के लिये भवान करते हुए शुकदेव जी ने द- हुल नया शहा है वह यह है कि-" संसारमें जो पुरुप सप कानों को प्राप्त हो जावे ौर को पुरुष समानताओं को लोड़ देवे इन दोनों में जाननामों दो घोड़ने वाला समय है ॥ १०-१६ ॥

. .. मरिगीता ॥ १३ प्रारब्ध को प्रधान का वा नाननेक्षे साथ नास्तिकताका बड़ा सम्बन्ध है । पार्न पाल भवश्य भोगना पड़ता है ऐसा विश्वास ही शुगर कोको कराता तथा. नीच कामों से बचाता है। प्रारव्यानुसार किसीको लेशमात्र धनादिका सुर मिले भी तो उसके आगे पीछे वा बीच २ सब समय में दुःख अवश्य रहेंगे। धनादिकी पाहना रखने वाला कदापि दुःखोंसे बच नहीं सकता इस कारण उदासीन होने में ही सुख है थोड़ा सुख अधिक दुःखमें गिना नहीं जायगा प्रधानमें ही शब्दका प्रयोग होता है। नान्तंसर्वविधित्सानां गतपूर्वोऽस्तिकश्चन। शरीरेजीवितेचैव. तृष्णामन्दस्यवर्द्धते ॥ १७ ॥ निवर्तस्वविधित्साभ्यः शाम्यनिर्विवकामुक ! ॥ असच्चासिनिकृतो. नचनिर्विद्यसेततः ॥ १८ ॥ यदिनाहविनाश्यस्ते योमरमसेमया । मामांयोजयलोभेन वृथात्ववित्तकामुक ?.॥-१६ ॥ . संचितंसंचितंद्गव्यं नष्टुंतकपुनःपुनः । कदाचिन्मीक्ष्यसेमूढ ! धनेहांधनकामुक ! ॥ २० ॥ नकि विचार करता है कि अनादिकाल से भन तक कोई भी पुरुष मनोरथोंके पार नहीं गया और जब तक यह शरीर जीवित रहता है तब तक अक्षानी की तृष्णा बढ़ती ही जाती हैं । हे काम ! सब मनोरथों से नि- वृत्ति हो तथा उदासीन होकर शान्त हो जा। हे काम ! तू मनोरथोंमें पूर्ण न होनेसे अनेक बार तिरस्कृत हुभा दाव हारा परन्तु तुझे मनोरथों से उ- दासीनता नहीं होती। यदि तू मुझे नष्ट करना चाहता यदि तू मेरे साथ इस तरह विद्यमान है तो हे धन की कामना करने वाले काम ! मुझे लोभ में साथ व्यर्थ युक्त नत कर । हे कान ! अनेक बार इकट्ठा किया २ तेरा धन घार २ नष्ट हो गया । हे नूढ़ | धन की कामना करने वाले लोम | इस धन की आशाको कब छोड़ेगा ? ॥ १७-२० ॥ [आमृत्युतोनवमनोरथाना-मन्तोऽस्तिविज्ञातमिदमयाद्य । मनोरथाशक्तिपरस्यचित्तं नजायतेवैपरमार्थसङ्गि॥7 ॥

१४ मङ्किबिलापे- मृत्यु होने पर्यन्त अभिलाषा किसीकी पूरी नहीं होती और मनोरथों में आसक्तारहने वाले किसी पुरुषका चित्त कभी परमार्थ की ओर नहीं ल- गता । यही बात सांख्य अ ४ सू० २७ में [ न भोगाद्रागशान्तिर्मुनिवत् ॥ ] कही है कि भोगसे रागको शान्ति नहीं होती जैसे कि सोभरि मुनिका राग भोगोंसे न शान्त हुआ इस लिये विवेकसम्बन्धी विचारसे रागको शान्त क- रते हुए सुख प्राप्तिका उद्योग करे । अहोनुममबालिश्यं योऽहंक्रीडनकस्तव । किन्त्वेवंजातुपुरुषः परेषांप्रेष्यतामियात् ॥ २१ ।। नपूर्वनपरेजातु कामानामन्तमाप्नुवन् । त्यक्त्वासर्वसमारम्भान् प्रतिबुद्धोऽस्मिजागृमि ॥२२॥ नूनंतेहृदयंकाम ! वजसारमयंहढम् । यदनर्थशताविष्टं शतधानविदीर्यते ॥ २३ ॥ जानामिकामात्वांचैव यच्चकिंचित्प्रियतव । तवाहंप्रियमन्विच्छ वात्मन्युपलभेसुखम् ॥ २४ ॥ काम ! जानामितेमूलं संकल्पाकिलजायसे । नत्वांसंकल्पयिष्यामि समूलोनभविष्यसि ॥ २५ ॥ मति कहते हैं कि-हे काम ! मेरी यह बड़ी मूर्खता है जो मैं तेरा की- हुनक (खिलौना ) बना हुआ हूं। पुरुषको सर्वदा उचित है कि वह भोगों की वृष्णासे दूसरोंका सेवक कदापि न बने । इस संसारमें पहिले और पि- छले कोई भी पुरुष मनोरथों के अन्तको नहीं पहुंचे । मैं अबसे सब सांसारिक सुख भोगार्थ कार्यारम्भोंको छोड़कर सचेत हुभा जागता हूं। हे काम ! तेरा हृदय वज्नसार हीराके समान निःसन्देह अतिकठोर है जो सैकड़ों अनयारो युक्त होने पर भी सैकड़ों टुकड़े नहीं हो जाता। हे काम ! मैं तुझको और तेरे प्रिय कार्यको जानता हूं। मैं तेरा प्रिय करता हुआ अपने अन्तःकरणमें कभी सुखको प्राप्त नहीं हो सकता । हे काम ! मैं तेरी जड़को जानता हूं अर्था- त् विदित हुना है कि तू संकल्पते उत्पन्न होता है। अबसे भागे मैं संकल्प ही न करूंगा इससे तू समूल ही न रहेगा=नष्ट हो जायगा ॥ २१-२५ ॥ - महिगीता ॥ १५ यद्यपि मनुधर्मशास्त्रमें लिखा है कि विना कामनाके धर्मानुष्ठानादि शुभ कर्म भी नहीं हो सकता इस लिये कहीं कामना करना भी किसीको कर्तव्य है तथापि शुभ कर्मकी कामना अशुभको चाहनासे ही अच्छी होना मनुजी का सिद्धान्त है किन्तु शुभाशुभ सब कामनाओं के त्यागकी अपेक्षा शुभ कामना करना भी सदोष होनेसे त्यागकोटिमें रहेगा । ईहाधनस्यनसुखा लब्धचिन्ताचभूयसी। लब्धनाशेयथामृत्यु लब्धंभवतिवानवा ॥ २६ ॥ परित्यागेनलभते ततोदुःखतरनुकिम् । नचतुष्यतिलब्धन भूयएवतुमार्गति ॥ २७ ॥ अनुतर्युल एवार्थः स्वादुगाङ्गमिवोदकम् । मद्विलापनमेतत्तु प्रतिबुद्धोऽस्मिसंत्यज ॥ २८ ॥ यइममामकंदेहं भूतग्रामः समाश्रितः । सयात्वितोयथाकामं वसतांवायथासुखम् ॥ २६ ॥ नयुष्मास्विहमेप्रीतिः कामलोभानुसारिषु। तस्मादुत्सृज्यकामान्वै सत्यमेवाभायाम्यहम् ॥ ३० ॥ धनकी प्राप्तिके लिये जो उद्योग किया जाता है उसमें तो तिवाय दुःख के सुखका लेश नहीं है । जब धन प्राप्त हो जाता है तब उसकी रक्षा आदि के लिये बहुत बड़ी चिन्ता हो जाती है। और धनके नाशमें मृत्युके समान दुःख है ही। धन प्राप्ति के लिये जो उद्योग किया जाता है उससे धन प्राप्त होता है वा नहीं भी होता । उद्योगके परित्यागमें धन प्राप्त नहीं होता तथा धनके अभावमें दरिद्रतासे बड़ा लोकमें कोई अन्य दुःख नहीं दरिद्रता ही बड़ा दुःख है। यदि उद्योग द्वारा प्राप्त भी हो जाय तो उस धन लाभसे भागे को सन्तुष्ट नहीं होता किन्तु तृप्ता बढ़ती और धनके अधिक २ खोजने में लगता है अर्थ-धन, अहङ्कार वा मद [नशा] को अवश्य लाने वाला है जिसके निकट धन है उसको निर्धनको अपेक्षा थोड़ा वा बहुत मद, अहङ्कार अव- श्य होता है । इसी लिये मेरा यह विलाप करना [ रोना ] [कि मुझको धनकी तृष्णाने बड़ा दुःख दिया ] ही गङ्गा जलके समान मेरे लिये स्वादु है १६ জুলি- यही रोना मुझे पार लगादेगा । इन्नीले हे काम ! अब मैं जाग गया हूं तू मुझे छोड़ । इस मेरे प्रत्यक्ष शरीर में जो पृथिव्यादि भूतोका समुदाय जहां २ से भा २ कर ठहरा है वह चाहे तो अपने २ पृथिव्यादि कारण में भले ही जाक्षर मिलजावें। अथवा इसी शरीरने बात परे अर्थात् चाहे वह शरीर प्राश ही नर गावे वा जीवित रहे पर मुझे इसमें अर प्रीति नहीं रही। क्योंकि इस शरीरने इकट्ठे हुए परित्यादि तत्वों में ही काम लोसादि रहते हैं जो सबले एकात्र हो शरीर रूप बननेने उपड़ते हैं। जैसे महादिकी पत्ति प्रादिने मदनशा ठसाठस भरा होता है पुरियादि तन्नों में ही कामादि व्याप्त हैं शरीररूप बनने पर आत्माले शसे वे ही कानादि मया होजाते हैं तिससे कामनाओं को छोड़के सत्य [जो मदिनाशी सदा विद्यमान रहे ऐसी दशा का ही शरा लेता हूं। विकृत कार्य दशाने जो २ झगड़े वा विरोधादि द्वारा कट प्रशट होते हैं ने कारण दशा स्त्रयमेव शान्त हो जाते हैं। वार्य सब विक्षारी एका रूप में न रहने वाला ननित्य वा असत्य है और कारण अधिकारी सत्य है। पृथिव्यादि तव शरीर में भातर अपने ही सारांशरूप चांदी सुवर्णादि धन को अपनी स्वाभाविक नाकर्षणशक्तिले वते वा चाहते हैं इसीचे देहाभि- मान छूटते ही तृष्णा भी नहीं रहती ॥ २६-३० ॥ सर्वभूतान्यहंदेहे पश्यन्मनस्चिात्मनः । योगेबुद्धिश्रुतेसत्य मनोनाषिधारयन् ॥ ३१ ॥ विहरिच्चाम्यनासतः सुखीलोकान्निरामयः। यथामांत्वंपुनर्नव दुःखेनुप्रणिधास्यति ॥ ३२ ॥ त्वयाहिनेमणुनस्य गतिरन्योनविदते । तृष्णाशीऋत्रमाणांहि त्वकामप्रभवः सदा ॥ ३३ ॥ धननाशेऽधिकंदुसं मल्थेसनहन्तरम् । ज्ञातयोात्रमन्यन्ते मित्राणिचधलाच्युतम् ॥ ३४ ॥ अवज्ञानसहरतु दीपाएतराधने। धनेपुस्तकलायातु सापिनुःखैर्विधीयते .. ३५ ॥

महिगीता ॥ १७ मति विघार करते हैं शि-मैं अपने कागादि के आधार शरीर में का- भादि शत्रुओं को पालने वाले पृथिव्यादि भूतों को देखता जानता हुमा और मन में आत्मा को देखता हुआ कि भूतों से भिन्न शरीराकुछ नहीं, तथा झाल्या के यिना मन का मनस्त्व कुछ नहीं है ऐसा जानता और योग में बुद्धि, वेद में आस्तिकता-श्रद्धा और व्रल में मन को लगाता हुन्ना भासक्ति नाम ला- गालिपटी को छोड़ के सत्र उपद्रवों से रहित सुखी होकार सब लोकों में वि धरूंगा जिस से हे काम ! तू मुझ को दुःखों के बीच में फिर स पटकेगा। है काम ! शब मैं तुझे सर्वशा दया दूंगा वा हटा दूंगा तब तेरी दूसरी पोई गति नहीं है जो मुझ पर तू प्राकमया कर सके। हे काम! तुही तृष्णा, गोपा और थकावट से होने वाले दुःखों का उपादान कारण है । मैं मानता हूं कि धन का नाश तव दुःखों से बड़ा है क्योंकि ज्ञाति--भाई बन्धु कुटुम्बी और मिन्न सब धन से च्युत हुए फा सहस्रों प्रकार के तिरस्कार के हेतु फागों से अपमान क- रते हैं । इस से जानना चाहिये कि धन में भागे और पीछे बड़े दोष हैं और धन में जो सुख का लेश है वह भी बड़े दुःखों के पश्चात् सिद्ध होता है ३६--३५ जैसे दश रुपया खर्च करने पर चार आने का सुवर्ण किती मही में से निकले तो वह काम कर्तव्य नहीं ठहरता वैसे धन की प्राप्ति में सौगुणा दुःख उठाने पर यदि एकागुणा सुख धन से मिले भी तो गुशा दुःख भधिषा ही रहा इम से वह उस भी दुःख ही है वा सुख कुछ भी नहीं, जिस के लिये उद्योग वा श्रम किया जाय । [ धर्मार्थ यस्य वित्तहा वरं तस्य निरीहता] यदि कोई धर्म के लिये धनोपार्जन करता है तो बड़ी भूल है प्योंकि धनो- पार्जन अधर्म के विना कदापि नहीं हो सकता ( नानुपहत्य भूतान्युपभोगः सम्भवतीति व्यासभाष्यम् ) इसकारण उससे किया धर्म अपने की बराबर होना भी कठिन है । कीचड़ में सने हाथ कीचड़से ही धोने पर शुद्ध नहीं हो सकते ॥ धनमस्येतिपुरुषं पुरोनिघ्नन्तिदस्यवः । क्लिश्यन्तिविविधैर्दण्डै-नित्यमुवेजयन्तिच ॥ ३६॥ अर्थ लोलुपतादःख-मित्तिबुझुचिरान्मया। यद्यदालम्बसेकाम! रात्तदेवानुरुध्यसे । अतत्वज्ञोऽसिबालश्च दुस्तोपोऽपूरणोऽनलः ॥ ३७ ॥ नैत्रत्ववेत्थ सुलभं नैवत्वंधेत्यदुर्लभम् । -- " --- । १८ मकिविणापे- पातालमिवदुष्पूरो मांदुःखैर्योक्तुमिच्छसि ॥ नाहासमावेष्टुं शक्यःकामापुनस्त्वया ॥ ३८ ॥ निममासाथ द्रव्यनाशायदृच्छया। निझुन्तिपरममाप्य नायकामाग्विचिन्तये ॥ ३९ ॥ अतिक्लेशात्सहामोह नाहंयुध्याम्यबुद्धिमान् । निकृतीधननाशेन शयेसर्वाङ्गविज्वरः ॥१०॥ संसार में जिस के पास धन होता है उसे दस्यु ( हांचू) मारते नाना प्रकारके दरहोंसे होशिस करते और सदा डराते रहते हैं । मैंने इस बात को बहुत काल में शोचने २ जान लिया है कि धन की चाहना ही दुःख है। हे झारा ! तू जिस २ पदार्थ की ओर झुक्षता है उसी २ की कामना करने लगता वा उसी २ को पकड़ने लगता है इस लिये तू मूर्ख प्रशानी असन्तोषी और पूर्ण न होने वाला अमि है न तू यह जानता है कि यह पदार्थ सुलभ है न जानता है कि दुर्लभ है । मैं जानता हूं कि तू पाताल के समान पूरा होने वाला नहीं है । मुझे तू दुःखों से युक्त करना चाहता है ? हे काम ! तू ठीक सनाले कि भव आज से तू मुझ में प्रविष्ट नहीं हो सकता । वार २ धन का नाश होने से आज मैं अकस्मात् ( इत्तिफ़ाकिया) वैराग्य को प्राप्त होकर तथा सांसारिक पदार्थों से निवृत्ति करके कामों की चिन्ता को छोड़ता हूं। मैंने फाम के फन्दे में फंसकर अतिकष्टों को सहा परन्तु मूर्खतावश तब नहीं समझा कि-- तत्व क्या है। श्राज मैं धननाश से बैराग्यवान होकर तथा सुख पूर्वक जिस के किसी शरीरांश में खेद नहीं रहा ऐसा होकर सोता हूं अर्थात् में नग्न होता हूं। ऐसा विचार प्रकट होना किसी साधारण का काम नहीं है किन्तु यह वढे पुगयोदय का फल है । अङ्किनासक पुरुष का ब्राह्मण होगा भी सिद्ध होता है । धनादि पदार्थों का नाश होना यदि किसी को ज्ञान वैराग्य का हेतु हो जावे तो मानना होगा कि उत्त के भीतर जन्मान्तरीय ज्ञान प्रसुप्त में विद्यमान था जो कि उद्बोधक साधनोंको पाकर जाग उठा । जहां जिनया वीज नहीं वहां वर्षादि ऋतु में भी वह अन्न और घास नहीं उगती इसी प्रकार धनादि के नाश में ज्ञानाकुर न होने से सब किसी को ज्ञान वैराग्य नहीं होता। मानन्द दशा .

मङ्किगीता ॥ १९ परित्यजामिकामात्वां हित्वासर्वमनोगतीः । नत्वमयापुनःकाम ! वत्स्यसेनचरंस्यसे ॥११॥ क्षमिप्येक्षिपमाणानां नहिसिष्येविहिंसतः। द्वेष्ययुक्तःप्रियंवक्ष्या-म्यनादृत्यंतदप्रियम् ॥४२॥ दृप्तःस्वस्थेन्द्रियोनित्यं यथालव्धेनवर्तयन् ॥ नसकामंकरिष्यामि त्वामहंशत्रुमात्मनः । निर्वेदनिर्वृतिवृप्ति शान्तिंसत्यंदमंक्षमाम्। सर्वभूनदयांचैव विद्धिमांसमुपागतम् ॥ १३ ॥ हे काम ! मैं आज सब मनोरथों के साथ ही तुझ को त्यागता हूं अब से तू न मेरे पास रहेगा न मेरे शरीर में रमेगा ही, मैं आक्षेप करते हुए जनों के ऊपर क्षमा करूंगा तथा मुझ को मारते हुए प्राणियों को मैं नहीं मार- गा जब मुझ से द्वेप करने अर्थात् मेरे साथ शत्रुता रखने वाले मुझ से फटुवचन कहेंगे तक मैं उस गाली देने वा कोशने वाले के अप्रिय वचन पर ध्यान न देता हुआ उस से प्रियवचन बोलूंगा। अब से मैं जितेन्द्रिय और सन्तुष्ट हो- कर अकस्मात् विना मांगे प्राप्त हुए भोजनादि निर्वाह से करता हुभा हे काम ! अपने शत्रु तुझ को सकाम [ तेरी इच्छा पूरी ] नहीं करूंगा । हे काम ! तू जानले कि-मैं वैराग्य, सुख, तृप्ति, शान्ति, सत्य, दम, क्षमा और सब प्राणि- यों पर दया को प्राप्त हो गया हूं ॥ ४१-४३ ॥ यहां सर्वत्र काम शब्द हृदय में रहने वाली वासना लेनी हैं जिन को हृदय की ग्रन्थि वा हृदय के बन्धन भी कह सकते हैं जिस को ( भिद्यते ह- दयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः) कठ में कहा है । स्त्री वा धन सम्बन्धी सुख भोग की जो अगाध तृष्णा सूक्ष्म वा स्थूल रूप से हृदय में ठहरी हुई है वह बड़ी दृढ़ पुष्ट गांठ है वही यहां काम या संकल्प पदवाच्य है उप्त को हृदय से निकालने के लिये ऐसे ही प्रपल ज्ञान वैराग्य की आवश्यकता है जैसा मङ्कि को हुना था। तस्मात्कामश्चलीभश्च तृष्णाकार्पण्यमेवच । त्यजन्तुमांप्रतिष्ठन्तं सत्त्वस्योहरिपसाम्प्रतम् ॥ ४ ॥ प्रहायकामलोसंच सुखप्राप्तोऽस्मिसातम् । नाद्यलोभवशंप्राप्तो दुःखंप्राप्स्यायनात्मवान् ॥४५॥ से

२०
मङ्किविता-
यवत्त्यजतिकामानां तत्सुरुःस्थाभिपूर्यते ।
कामस्यवशगोलित्यं दुःखमेवप्रपद्यते ॥ १६ ॥
कामानुबन्धनुदते यत्किंचित्पुरुषोरजः ।
कामक्रोधोदवंदुःख-महाररतिरेवच ॥ १७ ॥
तिम कारण साह की भोर असते चञ्चलता छोड़ समाहित एका चित्त हुए
मुझको काम.लोभ, लगा और कृपणता दीनता तुच्छवा छोड़ देवें क्योंकि अब मैं
सत्वगुण में स्थित हूं। इस समय मैं काल लोभादिको छोड़कर सुख को प्राप्त हो गया
। अब से मैं (पूर्ववत् सूर्खतावर) अपने आपे से बाहर होकार लोभ को प्राप्त
होता हुमा कुल न पाऊंगा । कामों में से जो २ भाग छोड़ा जाता है वह २
सुख का कारण होता है और जो पुरुष काम के आधीन हो जाता है वह
नित्य दुःख तो ही प्रास होता है जो मनुष्य काम के अनुवन्ध-परिणाम वा
भारण रजोगुण को हटा देता अपने से निकाल देता है वह काम क्रोध से
होने वाले दुःख निर्लज्जता तथा सानि को भी निवृत्त कर सकता
है क्योंकि
कार के अनाव में कार्य स्वयं नहीं रहता ॥ ४४-४७ ॥
इन बालों ी जैसे भानन्द में मग्न होते हुए नङ्कि ने गाया ( मङ्कि के
गाने रोसी मतिता नाम पड़ा जानो ) वैसे एकाग्रचित्त से हम लोग भी
गादें तो हनारे संस्कारों को सुधरने में सहायता अवश्य मिले । जैसे बहुत
मीठा
न मिलने पर अड़ा मीठा भी अच्छा ही लगता है किन्तु कामा नहीं ल-
गता दैते पूर्णज्ञान वैराग्य प्राप्त न होने पर थोड़े २ ज्ञान वैराग्य भी संसारके
अनेक दुःखों से बचाते हैं अभिप्राय यह ति गृहानन में पूर्ण ज्ञान वैराग्य तो
हो नहीं सकता पर थोड़ा २ अभ्यास करता जाय तो बीच २ शान्ति सुख भी
प्राप्त होता रहे और अन्त में प्रवल ज्ञान वैराग्य द्वारा उत्तम सुख प्राप्त
हो सकता है॥
एप माविष्टोऽहं श्रीप्मेशीतमिबहूदम् ।
शाम्यानिपरिनिवोनि सुखमामेतिकेवलम् ॥४८॥
यञ्चकामसुख लोके यच्चदिव्यंमहत्सुखम् ।
तृष्णाक्षयसुखस्यैते नाहत:पोडशीकताम् ॥ १९ ॥
सालनालप्तमंकासं हिन्वाशत्रुमित्रोत्तमम् ।
प्राप्यात्रध्यंब्रह्मपुरं राजेवस्यामहसुखी ॥ ५० ॥

महिगीता ॥ २९ मति कहते है कि जेसे ग्रीष्म ऋतु में जल का शीतगुण जलाशय के ग- हरे दह में नीचे घुस जाता है वैसे यह में ब्रह्माज्ञान में प्रविष्ट होता हूं। मैं इस समय शान्त हूं मुझमें लेशमात्र भी हिलचल नहीं रही मुझे केवल सुख ही प्राप्त हो रहा है। संसार में जो काम सुख और घलोज में जो स्वर्गीय बड़ा सुख माना जाता है ये दोनों सुख तृष्णाक्षयरूप सन्तोप सुख के सोलहवें भाग के बराबर भी नहीं हैं । में प्राशा फरता हूं कि-पांच ज्ञानेन्द्रियों और छठे सर्वोपरि प्रबल शत्रु काम को सातवें अपने शरीरके सहित त्यागके अविनाशी ब्रह्मपुर नामक मोक्षपद को प्राप्त होकर राजा के समान सुखी होऊंगा ॥४-५० भीष्मउवाच॥ एतांबुद्धिंसमास्थाय मङ्किनिर्वेदमागतः । सर्वान्कामान्परित्यज्य प्राप्यब्राह्ममहत्सुखम् ॥ ५१॥ दम्यनाशकृतेमङ्कि-रमृतत्वंकिलागमत् । अच्छिनकाममूलंस तेनप्रापमहत्सुखम् ॥ ५२ ॥ भीम जी राजा युधिष्ठिर जी से कहते हैं कि हे राजन् ! मति इस उक्त प्रकारक निश्चयात्मक बुद्धिको स्थिर करके वैराग्यको प्राप्त हो गये। वह मङ्कि सव दामोंको छोड़ कर बड़े सुख वाले ब्रह्मपदको प्राप्त हुए । कैसे आश्चर्यका स्थान है कि दो बछड़ों का नाश हो जाने के कारण मति मुक्ति दशा को प्राप्त हो गये और उन मति ने काम के भूल--संकल्प को काट दिया उती से नहरसुख को प्राप्त हुए ॥ ५१--५२ ॥ यहां अनिष्ट से इष्ट सुख की प्राप्ति दिखाई गयी है । अनिष्ट नाम दुःख ही सब दशा वा काल सुख का साधक है॥ ॥ में इति शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि मङ्किगीतयाम्--१99 तमोऽध्यायः ॥

अथ बोध्यगीता ॥ भीष्मउवाच-अत्राप्युदाहरन्तीम-मितिहासंपुरातनम् । गीतविदेहराजेन जनकेनप्रशाम्यता ॥१॥ अनन्तंवतमेवित्तं यत्यमेनास्तिकिंचन । मिथिलायांप्रदीप्तायां नमेदह्यतिकिंचन ॥२ भोग्न जी राजा युधिष्ठिर जी से कहते हैं कि हे राजन् ! इस ( वैराग्य) विषय में ऐतिहासिक लोग एक और पुराना इतिहास कहते हैं कि जिस को शान्त होते हुए विदेह देश के राजा जनक ने गाया पा--अहो ? मेरे यहां. अनन्त धनादि पदार्थ होने पर भी मेरा कुछ नहीं है । मिथिलानगरी के भस्मसात् होजाने पर भी मेरा कुछ नहीं जलता ॥ भीष्मउवाच-अत्रैवोदाहरन्तीमं बोध्यस्यपदसञ्चयम् । निर्वेदंप्रतिविन्यस्तं तन्निबोधयुधिष्ठिर ! ॥३॥ बोध्यंशान्तमृपिराजा नहुपःपर्म्यपृच्छत । निर्वेदाच्छान्तिमापनं शास्त्रप्रज्ञानतर्पितम् ॥४॥ उपदेशंमहाप्राज्ञ ! शमस्योपदिशस्वमे । कांबुद्धिंसमनुध्याय शान्तनरसिनिर्वृतः ॥ ५ ॥ भीम जी राजा युधिष्ठिर जी से फिर कहते हैं कि हे युधिष्ठिर ! वोध्य- ऋषि का शान्ति विषयक इतिहास इसी (वैराग्य ) विषय में कहा जाता है उन को वैराग्य से शान्ति हुई थी उस को तुम समझो । जैसे--एक समय कभी नहुष नामक राजा ने वैराग्य से शान्ति को प्राप्त शास्त्र ज्ञान से तृस स्वरूपा- यस्थित बोध्य ऋषि से पूछा कि हे ऋषे प्राप कौन सी बुद्धि को स्थिर करके सुख पूर्वक दिन व्यतीत करते हो ? उसे मुझे बतलानो और मुझे शान्तिका उपदेश करो ३-५ बाध्यउवाच- उपदेशेनवामि नानुशास्मीहकञ्चन । लक्षणंतस्यवक्ष्येऽहंतत्स्वयंपरिमृश्यताम् ॥ ६ ॥ पिङ्गलाकुररःसर्पः सारङ्गान्वेपणंबने । इपुकारःकुमारीच पडेतेगुरवोमम ॥ ७ ॥ .

बोध्यगीना ॥
२३
योध्यऋषि ने नहुष राजा को उत्तर दिया कि हे राजन् ! मैं प्राणियोंके
कार्य को देख कर उपदेश लेता हूं परन्तु मैं किसी को उपदेश नहीं देता पर
तुम से उपदेश का लक्षाण कहता हूं उसे तुम स्वयम् विचारो। शान्ति प्राप्त
करने में मेरे-पिङ्गला, कुरर, सांप, वा में सारङ्गपक्षी, इषुकार, कुमारी ये छः
अर्थात् मनुष्यको संसार में से शिक्षा लेने की बुद्धि हो जावे तो वह एफ २
पग में सब जड़ चेतन पदार्थों से तथा सब कामोंसे कुछ न कुछ शिक्षा ले स.
कता है यह शिक्षा वड़ी पुष्ट कार्यसाधक होती है जिस को स्वयं खोज २ ग्र.
हण करता है उस को शीघ्र त्यागता नहीं उम का संस्कार प्रबल दृढ़ होता
है वैसा संस्कार साधारण विचार से सुने उपदेश का नहीं होता।
भीष्मउवाच-आशाबलवतीराजन् ! नैराश्यपरमसुखम् ।
आशांनिराशांकृत्वाहि सुखंस्वपितिपिङ्गला ॥८॥
भीष्म जी ऊपर कहे छः गुरुओं का क्रमशः व्याख्यान करते हैं कि हे
राजन् ! आशा बड़ी बलवती और दुःख को देने वाली है इसी से प्राशाका
त्याग करना परम सुखकारी है क्योंकि पिङ्गला वेश्या भाशा का त्याग क-
रके सुख पूर्वक रही सोई अर्थात् भाशा को त्याग के ज्ञान वैराग्य तथा ईश्वर
भक्ति में तत्पर होके अनन्त शान्ति सुख को. प्राप्त हुई ॥ ८ ॥
सामिषंकुररंदृष्ट्वा बध्यमानंनिरामिषैः ।
आमिषस्यपरित्यागात् कुररःसुखमेधते ॥६॥
मांस वा सामान्य भोग्य कोई वस्तु कुरर नामक पक्षी के पास था उस
के कारण उसपक्षी को जिन के पास भोजन का पदार्थ न था उन पक्षियों ने
मारा तङ्ग किया जब उस कुरर ने भोग्य वस्तु उठा कर फेंक दिया अर्थात्
त्याग दिया तब फ़िसी ने तङ्ग न किया किन्तु सुखी हो गया सब व्याधियां
मिट गई। प्रयोजन यह कि जिस के निकट अच्छे उत्तम २ धनादि भोग हैं
उसी को चोर, डांकू, भिक्षुक तथा दाय भागी आदि अनेक लोग भोगों को लेने
के लिये घेरते नोंचते खसोंटते तग करते हैं और त्यागी विरक्त के समीप
भोगार्थी कोई भी नहीं जाता जैसे जल वाले तालाव पर सैकड़ों जीव मा
घेरते हैं सूख जाने पर कोई नहीं जाता है ॥ ६ ॥

षडंगुरुकथने- गृहारम्भोहिदुःखाय नसुखायकदाचन । सर्पःपरकृतंवेश्म प्रविश्यसुखमेधते ॥ १० ॥ घर का बनाना दुःख के लिये ही होता है उस से सुख कदापि नहीं मिलता देखो सर्प दूसरे के बनाये हुए घर में घुस कर सुख पाता हैः॥ १० ॥ घर बनाने में नानाप्रकार. का कष्ट उठाने पड़ेगा.इमी.से उस में अनुरा- ग भी अधिक होगा. यही वन्धन का कारण है: उत्त घर को छोड़ना कदापि न चाहेगा पर. छोड़ने पड़ेहीगा और अपने बनाये घर में निवास का सुख. व तना ही है जितना अन्य के में होगा। अपने में दुःखमात्र ही अधिक है। सर्प घर नहीं वनाता पर: घर के विना उसे कोई दुःख नहीं है । : सुखंजीवन्तिदुतयो भैक्ष्यवृत्तिसमाश्रिताः। अगोहेणैवभूतानां सारङ्गाइवपक्षिणः ॥ १९ ॥ चातक पक्षियों की भांति किसी प्राणी से द्रोह न रखते हुए तथा भि- क्षावृत्ति से निर्वाह करते हुए मुनि लोग सुख से जीते हैं ॥ १९ ॥ जो किसी प्राणी को लेशमात्र भी कष्ट न पहुंचाता हुआ अपना निर्वाह करता है वह सुखी हैं यह शिक्षा सारङ्ग पक्षी से लेनी चाहिये। इषुकारोंनरःकश्चिं-दिषावासक्तमानसः । समीपेनापिगच्छन्तं राजाननाबबुद्धवान् ॥ १२ ॥ कोई वाणों को बनाने वाला वाण के बनाने में एकाग्रचित्त था इसी से पास में होकर जाते हुए राजा को भी वह न जानं संज्ञा कि राजा मेरे पास से निकला वा नहीं ॥ १२ ॥ चित्त को एकाग्रं करने की शिक्षा वा उपदेश इपुकार से बोध्य ने लिया चित्त की ऐसी एकाग्रता ही समाधिस्य होने का पूर्वरूप होती है। बहूनांकलहोनित्यं द्वयोःसंकथनंध्रुवम् । एकाक्रीविचरण्यामिकुमारीशङ्खकोयथा ॥ १३ ॥ बहुतों के समुदाय में नित्य कलह होता और दो के इकट्ठहोंने में भी निश्चित वाद विवाद वा वात्तोलाप होता ही है इत्त लिये मैं कुमारी की चूड़ी के तुल्य . :- -- पथ २५ . बोध्यगीता ॥ विपना यह बोयापिने कुमारी के मुह बनाने में कार जतलाया॥१३॥ संसोग ही दुःख का हेतु वा: कारण है। जो पुरुष विवेकी हो के दुःखों से बचना चाहे निर्द्वन्द अकेला रहना पसन्द करे तो एक साथ ही सहस्रों विपत्तियां भाग जाती किसी ग्रहस्प के घर पर कोई अतिथि प्राया उसू की बुद्धिमती कन्या धान कट,पर चावल निकालने, लगी। उस की सब चड़ियां बजने लगी तब . कन्या ने शोषी कि तिथि को चड़ियों की ध्वनि से हमारी निर्धनताशांत हो जावेगी, इस में उसने सौभाग्य चिन्ह होने के कारण संब तो नहीं किन्तु एक २ हाप में दोरड़ियों छोड़ी और संवा उतार लो ऐसा करने पर भी वे दोनों चूड़ियां मापस में बजने लगी, तब कन्या ने एकार और उतार ली पिर वह एक नहीं बजी इसी से बोध्यऋषि ने उपदेश लिया था। इतिशान्तिपर्वशिमोतधर्मपर्वणि बोध्यगीतायां १०६ तमोऽध्यायः ॥

*- TO RA AN + -- MM- A M me -kay "५ अथ पिङ्गलागीता ॥ युधिष्ठिरउवाच-धर्माःपितामहेनोक्ती राजधर्माश्रिताःगुमान धर्ममात्रीमणोष्ठ । वक्तुमर्हसिपार्थिव ।। मराज युधिष्ठिर जी महाराज भीम जी से कहते हैं कि हे श्रेष्ठ राजन हमारे पितामह जापने राजधर्म से लगाव रखने वाले धर्म कहे, कपा- कर प्राथमियों (ब्रह्मचारी, गहत्य, वानप्रस्, संन्यासी) धमोकोकहिये सोमउवाच - सर्वत्रविहितीधर्मः सत्यप्रत्यतप फलम् बहुद्वारस्यधर्मस्य नेहास्तिविफलाक्रिया ॥२॥ यस्मिन्यस्मिंस्तुविषये योयोयातिविनिश्रयम् सतमेवाभिजानाति नान्यभरतसत्तम । यथायथाचपय्येति लोकतन्त्रमसारवत् । तथातथाविरागोऽन्न जायतेनाप्रसंशयः॥१॥ एवंव्यवसितलोके बहुदोघेयुधिष्ठिर !! आत्ममोक्षनिमित्त यतेतमतिमावर॥५॥ भीम जी राजा गुधिष्ठिर जी महते है कि भरत कुलोत्पनों में बेह! युधिष्ठिर ! पर्म अनेक सलों में निकों ने बहा गया है जैसे--सत्य, पर रलोक में मुखदायी और अग्निहोनादि प्रत्यादि मकार के पर्व की क्रिया निकल गाों होती। युधिष्ठिर ! जो २ पुरुष जित र विषय का मिश्य कर लेता है उसी प्रविष को जानता वा जान साता। अन्य को नहीं । संसार में मनुब जैसे -लौकिक कायों वा सवारों की मसार जानता है बैठे उस को उन पदायों में वैराग्य हो जाता। युधिहिर ! इस प्रकार बहुत दोष वाले संसार को वास्तविकता जान सेनेपर बुद्धिमान पुहर को चाहिये कि वह अपने मोह लिये प्रयत्न परेर युधिष्ठिरउवाच-नष्टेधनेवादारेवा पुत्रेपितरिवामृते । यथायुद्धपानुदेच्छोकं तन्मे हिपितामह !' राजा युधिहिर जो भी जी से पढ़ते हैं कि-है पितामह ! धन, और बोके ना हो जाने पर तथा पिता वा पुनके मर जाने पर जिस उपाय के इंतिपूर्वक मनुष्य शोक को नष्ट कर रोग उपार को मुक से पहिये।

. . कमी २ - । M Me vio भीष्मउवाच-नष्टंधनेवादारवा पत्रपितरिवामृत अहोदुःखमितिध्यायन शोकस्यापचितिंचरेत् ॥७॥ !! मीणजी कहते लिशियन और ही कम हो जाने परतावा पिता बिपुर की मरजाने पर मनुष्य गोंहों । संसार में दुलाही कुत ऐसा ध्यान करता था शोक का प्रतीकार करे। अपोत-संसार में सब दुःख ही दुख विन्तु लेशमात्र कभी दुख भी मिलाती जैसे किप्रषिक दरिद निधन धाराने पैसे मिलें भी तो वहीं नहीं होती वैसे मैं सुखी हों नहीं लगा ऐसे विचार से मुखाशाबोड़ने पर गोल मिटता माती॥ HEATE THEATRE 'अत्राप्युदाहरन्तीम-मितिहासपुरातनम्। यथासेनजितविप्रः कश्चिदेत्याब्रवीत्सुहृद । पुत्रशोकाभिसनप्त राजानं शोकविहुलम् विषण्णमनसष्टी विप्रोवचनमब्रवीत् ।। भीष्म जी राजा युधिष्ठिरसे कहते हैं कि म उक्त विषय (पद्धजन ) इस पुराने इतिहास को कहते है। जैसे किसी ब्राह्मण ने राजा सेनजित के नापास प्राकर कहा था श्रोत कोई सुहद् ब्राह्मण राजा, सेनजितको शोक हलि विहुल पर शोकयुक्त और उदासीन देखकर बोला । विप्रउवाच-किनखल्वसिमूढस्त्वं शोच्या किमनुशोसि यदात्यामपिशोचन्तः शोच्यायास्यन्तितांगतिम्॥१० त्वचेवाहचर्येचान्ये त्वामुपासन्तिपार्थिव ! है . सर्वतत्रंगमिष्यामों यत एवागतावयम् ॥१९॥ Pाल राजा सेनजितसे बोला कि-हे. मूढ मनुष्यपनसे तू होता है तूं खपम् ही शोचनीय होकर पुत्र को क्यों शोक करता है। निश्चित समझ ले कि जिसकी तू शोक करता है उस को तो बहना ही क्या किन्तु तू और तेरा भी शोक करने वाले उसी दशाको प्राप्त होंगे जिस को तेरा पुत्र गया है । हे राजन् ! तुम मैं और जो तुम्हारे पास बैठे हैं ये सब वहीं जायेंगे कि जहां से धान्ये । ॥१०-११ Sr.N premsingmany 3. ॥ ..... ..--. ....

स गीतासंग्रडे- यदि मनष्यको यह निश्चयज्ञात होजाय वा ऐसे विचारोंका विसे विस्मरस न हो जिस के मन में संसार की अनित्यता का विचार सदा बना हेखि प्रान मेरे प्रिया पुत्रादि को जैसे मुझ से वियोग हुना कलें मेरा भी इन अन्य मेरे साथ प्रेम रखने वालों से वियोग होगा तिदनन्तर शेष भी एक दिन मशः परस्पर वियोग होगा तो उसका शोक सकता है। is सेनजिवाच-काबुद्धिःकिंतपोविप्र ! कसमाधिस्तपोधन !! किंज्ञानकिंवतंचैव यत्प्राप्यनविषीदसिः॥१२॥ राजा सेनजित बोला कि-हे.तपोधन ! ब्राह्मण । तुम्हारी बुद्धि तपस्या, समाधि, (योग) जान और वेदादि का अध्ययन सा वा किस प्रकार कि जिस को प्रास होकर तुम दुसित नहीं होते। ब्राह्मण उवाच-पश्यभूतानिदुःखेन व्यतिषक्तानिसर्वशः। उत्तमाधममध्यानि तेषुतेविहकर्मर्स ॥१३॥ आत्मापिचायनमम सर्वावापृथिवीमम यथाममतथान्येषा-मितिचिन्त्यनमेव्यथा ॥ १४ ॥ एतांबुद्धिमहप्राप्य नप्रहृष्येनचव्यथे ।.१५॥ ब्राह्मण बोला कि हे सेनजित ! तुम उत्तम, मध्यम और निकृष्टः सब मा, सियों को उत्तम, मध्यम और निकृष्ट दुःखों में फसा हुआ देखो । मैं जामता हूं कि यह मेरा शरीर भी.मेरा नहीं है अथवा जैसे सब पुषिवीके पार्थिव पदार्थ मेरे हैं वैसे अन्यों के भी हैं। ऐसा विचार रखने पर मुझे व्यर्या उस नहीं होता। इस उक्त निश्चयात्मक बुद्धिको प्राप्त होकर मुझे हर्ष शोक दोनों ही नहीं होते ।। १३-१५॥ TEENET सभी प्राशियों के शरीर प्रथिवी तत्वसे बने हैं। और अन्तमें उसी में मिल जाते हैं । जो राजा पृथिवीको अपनी मानता मानता है. वह भी अपने चखने कि- रने प्रादि काम पृथिवी से वैसे ही लेता है कि जैसे अन्य वे लोग जिन को पृथिवी हमारी है ऐसा अभिमान नहीं है वे. चलना फिरना प्रादि उप वहार करते हैं ऐसा वोध किसी एक भी पदार्थ के साथ हो तो शोक से बार सकता है। यथाकाष्ठंचकाष्ठंच समेयातामहोदधौ समेत्यचव्यपेयातां तद्भूतसमागमः ॥ १६:Mi fm S २९ !'T.." पिङ्गलागीता एवंपुत्राश्वपौत्राश्च ज्ञातयोयान्धवास्तथा. : तेषांस्नेहानकर्तव्यो विप्रयोगोध्रुवोहितः ॥१७॥ ब्राह्मण राजा से कहता है, कि-जैसे समुद्रावा: किसी बड़ी नदी में लहरों को झकीरों से दो लकड़ी बहती २. परस्पर मिल जावे और मिल कर फिर लहरों की कोरों से पृथक हो जावें उसी प्रकार सर्व मासियों को मिलना और एथक होना है। इस उक्त वचन के अनुसार ही-पुत्र, पौत्र, कुटुम्बी और भाई श्रादि का संयोग वियोग होता है इस से इन का स्नेह नहीं क- रना चाहिये क्योंकि इन उक्तों के साथ वियोग होना भी निश्चित-खिर है। इस संसाररूप अनन्त जलाशय में प्राणधारी इधर उधर बहते चले जा रहे हैं उन में से किसी समय में कोई:-किसी पुत्रादि के साथ किसी. अपने और उस के कर्मानुसार कर्मफलभोग के लिये किसी सम्बन्ध से श्रामिला, पोडे पोहे काल में वहीं वा जिस पिता शादि में आके मिला वह पिता आदि वहां से चल दिया वा अन्यत्र वहगया तो शो क्या? अदर्शनादापतितः पुनश्चादर्शनगतः । नत्वसौवेदनत्वन्तं कःसन्कमनुशोचसि ॥१८-...- - वह ब्राह्मक राजासे फिर कहता है कि जिस को तुम अपना पुत्र मा. नते वह न जाने कहां से श्राया था और कहां को चला गया।न तो वह तुम्हें जानता है और न तुम उल्ने जानते हो फिर बतलानो कि तुम उसके कौन होते हुए उस ( किस.) का शोक करते हो;॥१८॥ . . ! पुत्रादि किस को मानें ? स्थूल शरीर को मानें तो वह खाये पिये, अ-: बादि पदार्थों का परिणाम, रसादि होता-हुआ मांस रुधिरादि:का पिस्तु. पथिव्यादि तत्वों से बन गया था, वह उन २ तत्वों में मिल गया उसमें तु. म्हारा कुछ नहीं था। रहा आत्मा सो न वह किसी का पुत्र न पिता.न वर तीन पुरुष है केवल. तुमने मान लिया था इसी लिये दुःख हुमा... तृष्णार्तिप्रभवंदुःखं दुःखातिप्रभवंसुखम् । सुखात्संजायतेंदुःख दुःखमेवपुन:पुनः ॥ १९ ॥ सुखस्यानन्तरंदुःखं दुःखस्यानन्तरं सुखम्। सुखदुःखेमनुष्याणां चक्रवत्परिवर्ततः ॥२०॥ : सुखात्त्वं दुःखमापनः पुनरापत्स्यसेसुखम्।। -- . " om .4 -- . 7 - Par गीतास ननित्यंलभने दुःख ननित्यलभतेसुखम् ।। शरीरमेवायतन दुःखस्येचसुखस्येच ॥ २१ शरीरमेवायतनसुखस्य दुःखस्यचप्यिायतनशरीरम् । यद्यच्छरीरेणकरोतिकर्म तैनवदेहीसमुपारन तत् ॥२२॥ जीवितंचशरीरेण जात्य वसहजायते । उभेसहनिवत्त ते उभेसहविनश्यतः २३ स्नेहपाशबहुविधे-सविष्टविषयाजना अताश्च सीदन्त जलसकतसेतवः॥२४ स्नेहनतिलवत्सर्य संगचक्रनिपीड्यते तिलपौडेरिवाक्रम्य क्रेशरज्ञानसम्भवः ॥ २५ ॥ ब्राह्मण राजा सेनजित से कहता है कि-तष्णा (बा.) और दोन से दुःख उत्पन होता है तथा दास और दीनता से सुख उत्पन्न होता हैं और सुख से दुःख उत्पन्न होता है इस से बार दुःस हो दुःख अति के पश्चात् सुख और सुख पश्चात् दुःख अयोत मनुष्यों सुन प्रारदुर गाड़ी के पहिये की भांति धूम-२ कर पाते और जाते हैं राजन तुम सुख से दुःख को प्राप्त हुए हो तथा इस दुःख में सुख को फिर प्राप्त होतोगी मनुष्य नती नित्य दुःख हो पाता है और ननित्य सुख हो पाता है । शर रीर ही सुख और दुःखका स्थान मनुष्यादि जिस कर्मको जिस शरीर में करता है उस के कल को उसी शरीरे से भागता है। जन्न के साथ ही जी: वन नियत होती है अचात् शरीर का जन्म और उस का जीवन-आयु सोच बनते और साथ नष्ट होते हैं। बहुत प्रकार के प्रीति के बन्धनों युक्त मनुष्य इटंसुख की प्रास न होकर इस प्रकार दुःख पाते और गिरते इते हैं कि जैसे बाल-रेते का पुल पानी में गिरता पड़ता है। इस संसार रूपी चक्र में सब मासी इस प्रकार विद्याजन्य रोग किये जाते हैं जैसे तेल के लिये तेली-कोलू. में तिलों दबाये पीसे-पेले ॥ १९.२५ ॥ जैसे मक्खी वा चीटी प्रादि जन्तु राग नान पकड़ने लंग लिपट जाने की शक्ति होने से ही मधु-शहद के पास जाते ही बस जाते वा उस में पकड़ जाते हैं और पीड़े निकलना चाहे तो भी निकल नहीं पाते किन्तु ... 4.10A fog. - 100 yn-Re-... . पिङ्गलागीता ३१ ससी प्रियतम विषय से पट पटा करना पर सूती नाही वा बालू में नक्सी प्रादि कभी फंसते । यही दशा मनुष्यों, विषयों में सने की जानो अर्थात् मनुष्यों के मन में जो वासमा हप विषया- नुराग है वहो तिलों में चिकनाई के तुल्य स्नेह है। जैसे 'बिना होने से ही तिल कोटू में पीड़ित किये जाते हैं वैसे ही विषयानुराग के कारक ही मनुष्य संसार कप बोल में पीड़ित किया जाता संचिनोत्यशुभंकर्म कलत्रापेक्षयानरः । एकलेशानवाप्रोति परत्रेहमानवः ।। २६.1 पुत्रदारकुंटुम्यषु प्रसक्ताःसर्वमानवाः। शोकपडाणवेमग्ना जीवनगजाइवः ॥ २७॥ .. "पुत्रनाशेवित्तनाशेज्ञातिसम्बन्धिनामपि ।...... प्राप्यतेसुमहददुःखं दावाग्निप्रतिमविभो ! ॥२. ५. ग्राम राजा कहता कि- राजन मिनुष्य की प्रादि के कारण कमी को करता है परन्तु पई करने वाला प्रकला परलोक में अपने किये पाप के बल दुःख को प्राप्त होता है।पुरसी और अदुम्बों में संवा मनुष्य इसीप्रकार पनि हुए। जैसे पर्नेले बुहाथी कांच के दलदल में समायावे तर पुरुष मात्र, भाईटुम्बी और सम्ब- धियों के मार्श होने पर वन में लगे पनि से होने वाले दुख के समान तीनस को प्राप्त होते ॥ २१२६ : HTTEE कोई पुरुष, सी वा पुत्रादि को खिला पहना के के इराने लिये गरिमोरी बरे तो बोरी का अपराधी वही एक होगा किन्तु की प्रादि नहीं जी संवा पुरादि जो मनुष्यों को अधिक स्नेह वा रोग है यही उन वियोग में महादुर भगाने वाला होने से उसके मांश में अन्य दुख नहीं होता । जिसे दल म बदहापों का दल दल से मुक्त हो सकना असंभव पुत्रादि के मोह में फसे मनुष्यों को मोह रुपन्दलदल से निकल सकना - सम्भवहएक भगवद्भक्ति से ही मनुष्य पार हो सकती देवायतमिदंसर्व सुखदुःखेभवाभवी ॥ ३४ असुहृत्ससुहृवापि संशत्रुमित्रवानपि। लोक और ॥ SAT धनादि में राग ri TREET 7 .. .

.. . -- बुद्धिमान है और - . सप्रज्ञःप्रज्ञयाहीनों देवेनलभतेसुखम् ॥ ३० ॥ नालंसुखायसुहृदो नालंदुःखायशत्रवः । नचप्रज्ञालमर्थानां नसुखानामधनम् ॥ ३॥ नथुद्धिर्घतलाभाय नजाड्यमसमृद्धये लोकपर्यायवृत्तान्त प्राज्ञोजानातिनेतरः ॥ ३२ ॥ बुद्धिमन्तंचशूरच मूढभीरुजडकविम् दुर्बलंबलवन्तच भागिनभजतेसुखम् ॥ ३३ ॥ सुख, दुःस, जन्म, मरंग, उवति, अवनति, ये सब के सब देव मारख्य] के प्राधीन है।जिस के कोई प्यारा नहीं है जिम के बहुत से प्यार है, जिस के शत्रु विद्यमान हैं, जिस के अनेक मित्र उपस्थित जो बुद्धिरहित सर्व के सब प्रारंप से ही वा दुःख पाते हैं। क्यों दि.निवली. मारापहीन को सुख-पहुंचाने और भी प्रारट्यवान् को दुःख देने में असमर्थ होते. या बुद्धि धन की प्रासि में और धन सुखदेने में प- पासन काली) नहीं हैं । बुद्धि धनलाभ के लिये और जहता.पने विनाश के लिये उपयोगी नहीं है लोह में स्वभावासही परिवर्तन होने से पाए. -पारी सुख दुःखाचनः निर्धनतादिकोशावागमन सम्बमंत्री गर्न ही समझ सकता है: अप नहीं: बुद्धिमान, पूर, मूढ, भीरु, जा बल, बलवान् कोई सों न हो भाग्यवान होना चाहिये उसी को मिलता है। संसार में अपनी शक्ति भर दिन रात तन मन से लगातार धन प्राति के लिये तथा सुख भोग के लिये प्रायः सभी मनुष्य संपाय कर रहे परन्त पूर्व वा यथोचित मुख वा धन उपाय करने वालों में से बात लता.दीसंताप में पूर्व संचित मारख्य ठहर सकता। इस कारसं मनाय, संतोष करे यही सार है परन्तु संतो, अभिप्राय यह नहीं है कि वह उद्योग न करे किन्तु सांसारिक उमति अभ्युदय सुरु वाहने बालों को बहे. २: कर्म अवश्य करने वाहिये देशोषति के काम करते हुए जो कुछ फल होता. बाय उस में संतुष्ट रहते हुए निरन्तर बर्न किया करें। Aunt -..MMera 1. १४ M TAMA भिमन्य aat -- -- पिङ्गलागीता ॥ ३३ । धेनुर्वत्सस्यगोपस्य खामिनस्तस्करस्यच । पयापिबतियस्तस्या धेनुस्तस्येतिनिश्चयः ॥ ३४ ॥ दुधारी गौ-बछड़ा, ग्वालिया, स्वामी और चोर इन सबकी है अर्थात् जो उसका दुग्ध पीता है उसीकी वह दुधारी गौ है यह निश्चित सिद्धान्त है ॥३४॥ प्रयोजन यह है कि कौन पदार्थ किस का है इस की व्यवस्था यह माने कि जिस से जिस की कुछ सुख न निले वह भी उस का हो तो धनियों का धन निर्धनोंका भी हो सकता है, पर ऐसा नहीं है इससे यही सिद्धान्त ठीक है कि जव २ जिस २ से जिस २ को सुख मिले तब २ वह २गी, घोड़ा, धन, घर, तथा पुत्रादि उस २ का है। येचमूढतमालोके येचबुद्धेःपरङ्गताः। तेनराःसुखमेधन्ते क्लिश्यत्यन्तरितीजनः ॥ ३५ ॥ संसार में जो पुरुष अत्यन्त मूढ़ हैं तथा जो मनुष्य बुद्धि के पार पहुंच गये हैं वे ही सुखी हैं बीच का ( अधकचरा) मनुष्य दुःख पाता है ॥ ३५ ॥ सत्त्वगुण में सुख रजोगुणमें दुःख और तमोगुणमें मोह प्रधान है। रजो- गुणी पुरुष बीच में पड़े बीच धार में गोते खाने वालों के समान दुःख भोगा करते हैं। मूढदशा में रहने से ही छोटे २ खाते खेलते हुए बच्चों का समय अच्छे आनन्द में कटता है चिन्ता कुछ नहीं होती। पर ज्ञानी लोग भी ऐसे ही वालकों के समान ज्ञान में मग्न रहते हैं । अन्त्येषुरेमिरेधीरा नतेमध्येपुरेमिरे । अन्त्यप्राप्तिं सुखामाहु-दुःखमन्तरमन्त्ययोः ॥ ३६ ॥ येचवुद्विसुखप्राप्ता द्वन्द्वातीताविमत्सराः। तावार्थानचाना व्यथयन्तिकदाचन-॥ ३५ ॥ अथयेबुद्धिमप्राप्ता व्यतिक्रान्ताश्चमूढताम् । तेऽतिवेलंग्रहृष्यन्ति सन्तापमुपयान्तिच ॥ ३८ ॥ नित्यंप्रमुदितामूढा दिविदेवगणाईव । अवलेपेनमहता परिभूत्याविचेतसः ॥ ३॥. - . ५ ३४ - गीतासंग्रह- धीर धर्मात्मा: पुरुषः परमार्यसम्बन्धी कार्यों के करने में रमण करते हुए प्रसन्न रहते हैं । किन्तु वे लोग संसार-सम्बन्धी कामसुखभोगादि वीचके कायाँ में भासत नहीं होते क्योंक्षि परमार्थ मोक्ष प्राप्तिको मुख निर्वाच्य है उसी को ज्ञानी लोग सुख कहते हैं और संसारका सुख भी वास्तव में दुःख ही है। जो पुरुष ज्ञानदशा के सुखको प्राप्त हो कर हर्ष, शोया, मद, ईआदि से रहित हैं.उनको हानि, लान, दुःस समादि नहीं घेरते (सताते) हैं। जो पुरुष बुद्धिको तो प्राप्त हुए नहीं परन्तु मृढता से पृथक हो गये हैं उन्हींको हर्प और शोक-अधिकता से घेरते हैं ! मूढ पुरुप संसार में बड़े अभिनान और न विद्या के शापसे बाहर हो कर सदा इच :प्रकार प्रसन्न रहते हैं जैसे.स्वर्ग में देवगा प्रसन्न रहें ॥३६-३८ ॥ संसार में विचारशील परिहत वा बुद्धिमान वे ही हैं जो बीचके भोगों में नहीं फंसते किन्तु साम क्रोध लोभ सम्बन्धी बीच के भोगोंसे उदासीन होकर परमार्थके विचारों में मग्न रहते हैं। और इनसे भिन्न पण्डित कहाते हुए भी सब सूख हैं । उक्त पं०.को संसारके दुःख भी नहीं व्याप्त होते । इसलिये जो दुःख वा बड़ी २ विपत्तियों से बचना चाहें उनको मद, अहङ्कार, राग, द्वेषादि के त्यागार्थ वहा प्रयल उपाय बड़े वेग से करना चाहिये । रागादि शत्रुनोंके फन्दसे साधारण उपाय करने वाला कोई भी बच नहीं सकता । ईश्वरका ज्ञान भक्ति, पूजा उपासना, अर्थात् वार २ स्मरण तथा शरणागति ही सयं से. बड़ा उपाय है इस उपाय के विना कोई भी पार नहीं हो सकता। सुखंदुःखान्तमालस्यं दुःखंदाक्ष्यसुखोदयम् । भूतिस्त्वेवंचियासाढे दक्षेवसतिनालसे ॥ ४० ॥ सुखवायदिवादुःखं प्रियंवायदिवाप्रियम् । प्राप्त प्राप्तमुपासीत हृदयेनापराजितः ॥ ११ ॥ शोकस्यानसहस्राणि भयस्थानशतानिच । दिवसेदिवसेमूढ-माविशन्तिनपण्डितम् ॥ ४२ ॥ बुद्धिमन्तंकृतप्रज्ञं शुश्रपुमनसूयकम् । दान्तंजितेन्द्रियंचापि शोकोनस्पृशतेनरम् ॥ ४३ ।। एतांबुद्धि समास्थाय गुप्तचित्तचरेदबुधः ।

, पिङ्गलागीता ॥ ३५ उदयास्तमयहि नशोकारप्रष्टुमर्हति ॥ ४ ॥ यनिमित्तोमवेच्छोक-स्तापोवादुःखमेवच । आयासोवायतोमूल-मेकाङ्गमपितत्त्यजेत् ॥ ४५ ॥ सुख दुःख को भेट देता है तथा बालस्य दुःखको उत्पन्न करता है और वक्षता चतुराईसे सुखका उदय होता है इसी प्रकार दक्ष पुरुप में लक्ष्मी के साथ विभव वसता है भालसी मनुण्यमें नहीं। सुख, दुःख, प्रिय, अप्रिय, कोई क्यों न हो बुद्धिमान् को चाहिये कि सुख दुःख में लिप्त होफर पराजित म होता हुआ हदय से धैर्यवान् होकर उस फो झोले भोगे । शोक के सहस्रों स्थान तथा भयको सैकड़ों स्थान प्रतिदिन मूढ पुरुषको ही घेरते हैं किन्तु प- रिडतको नहीं । बुद्धिमान, कृतथुद्धि, शास्त्र पढ़नेो खभाव वाले भनिन्दका, नन के बंगको रोकने वाले और जितेन्द्रिय पुरुषको शोक नहीं सताता । इस प्र- कार बुद्धिमान् पुरुप चिाको सावधान करो उदय और अस्तफो जानता हुना शोकको छोड़ देता है । जिस कारणसे शोक ताप दुःख और नायात खेद उत्पन्न हुमा हो उस एक अङ्गको ही छोड़ देना चाहिये ॥ ४०-४॥. जो हर्ष शोक घराता नहीं उसो दुःख भी अधिक नहीं व्यापता वा दुःख ही नहीं होला यह भी कह सकते हैं। जिसको शोक न दवा सके वह परिहन और शोफामें डूबगाने वाला ही सूर्य दा अन्वर्थ शूद्र है [ शोकेन द्र- वतीति शूद्रः ] शास्त्र पढ़ा होने पर भी शोकातुर हो जाने वाला परिष्ठत नहीं फहावेगा यही इनका लक्षण है, दूढ़ विचार वाले सत्सङ्गी दयालु पुरुप के पास इन्द्रियों तथा जन को वशीभूत रखने से शोक नहीं पाता तथा हानि लाभका तत्व जानने वालेको भी शोक नहीं व्यापता । ऐसी दशात्रों में भी जव शोक न छोड़े प्रयल हो तो [ प्रांस फूटे पीड़जाय ] सहायत्यो अनुसार उस भागका त्याग कर दे जो कई पाटों का मूल हो । जैसे योध्य ऋषिने कुररपक्षी को इसी अंशमें गुरु माना था कि कुरर पतीने पास एक मांसका टुकड़ा था उसको चाहने वाले अन्य बहुत से पक्षी उस कुररको नोंचते खसोटते महा तंग करते य जय उत्तने मांसका टुकड़ा फेंक दिया तब उसी दुशड़े पर अन्य सब पक्षी खड़ने लगे और कुरर को फिर किसी ने तंग नहीं किया वह सुखी हो गधा वैसे ही जो मनुष्य भनेक दुःखोंके हेतु को त्याग दे उस के सब दुःख उसी दुःखहेतु पदार्थ के साथ ही छूट जाते हैं ।

गीतासंग्रह- किंचिदेवममत्वेन यदाभवतिकल्पितम् । तदेवपरितापार्थं सर्वसम्पद्यतेतदा.॥ ४६ ॥ यद्यत्त्यजतिकामानां तत्सुखस्याभिपूज्यते । कामानुसारीपुरुषः कामाननुषिनश्यति ॥४७ ॥ यच्चकामसुखंलोके यच्चदिव्यंमहत्सुखम् । हृष्णाक्षयसुखस्यैते नार्हतःलोडशीकलाम् ॥ १८ ॥ जब मनुष्य किसी पदार्थमें ममता खड़ी करलेता है तब उसके सम्बन्ध से सब पदार्थ सन्ताप देने के लिये ही समर्थ होते हैं मनुष्य कामना के जिस रे अंशको छोड़ता जाता है. उससे सुख मिलता है। यह निश्चित है कि कामना तृष्णाके पीछे २.चलने वाला कामनाके साघ ही नष्ट हो जाता है। संसारमें जो कान जन्य सुख माना जाता और जो दिव्य ( स्वर्गीय:) महत्खुख कहलाता है ये दोनों ही सुख तृष्णाके नाशसे हुए सन्तोषरूपी., सुखकी सोलहवीं कला (भाग.) के भी बरावर नहीं हैं. ॥ ४६-४॥... ममता ही दुःखका मूल है. इसी कारणा: अन्य के स्त्री पुनः घनादि पदार्थों का मरण. वियोग वा नाश होने पर अन्यको वैता क्षोभ नहीं होता.जैसा कि ये मेरे हैं ऐसा विचार रखने वाले को उन २.अपनों के वियोगमें दुःख होताः है । और जो पदार्थ लौट कर जहां चला जाता है वा.जिसमें लीन हो जाता है. वह उसीका है अपना वा मेरा कहना यही मोह वा.अविद्यामात्र दुःखका मूल है। पूर्वदेहकृतकर्म शुभंवायदिवाशुभम् । :: ::: प्राज्ञमूढतथाशूरं भजतेयादृशंकृतम् ॥ ४ ॥ .: एवमेवभिलैतानि प्रियाण्येवाप्रियाणिच । जीवेषुपरिवर्तन्ते दुःखानिचसुखानिच ॥ ५० ॥ एतांबुद्धिसमास्थाय सुखमास्तेगुणान्वितः । सर्वान्कामाज्जुगुप्सेत कोपकुर्वीतष्ठतः ॥ ५ ॥ वृत्तएपहृदिप्रौढो मृत्युरेषमनोभवः । क्रोधोनामशरीरस्थो देहिनांप्रोच्यतेबुधैः । ५२ ॥ पूर्व जन्म में मन वाणी वा शरीरसे जो कुछ शुभ अशुभ कर्म किये हैं उन -- :.

है A. पिङ्गलागीता ॥ ३० का वैसा ही फल पण्डित मूढ़ और शूरको अवश्यनेव भोगना पड़ता है। इसी प्रकार प्रिय, अप्रिय, सुख और दुःख मनुष्यों में कर्मानुसार ही लौट प्राते जाते हैं । इस प्रकारको बुद्धिको स्थिर फरके पण्डित सुसते रहता बुद्धिमान्को चाहिये कि सब कामों (अभिलापों) की निन्दा करता हुआ क्रोधको सर्वथा छोड़ देवें। और पण्डित लोग इस प्राणियोंके शरीरस्थ क्रोध वो ही ननसे उत्पन्न होने वाला हृदय में स्थिर मृत्युकंप कहते मानते हैं ॥४e-५२|| मनुष्य पर जो बड़े र दुःख अस्मात ही वा विशेष प्रबल उद्योग किये विना ही आजाते. वाः उसको भोगने पड़ते हैं। उनका हेतु पूर्वजन्मकृत फर्म ही है इस प्रकार :भावीको प्रबल समझनेसें भी शोक कम होता हैं। द्वितीय यह भी कि मेरे ही किये का यह फल है। जब मैंने किया तो भोगती हूं मेरे पर अन्याय किसी ने नहीं किया इत्यादि विचारसे व्याकुलता नहीं होती अहंकारसे क्रोध पैदा होता है परमार्थी पुरुषके लिये क्रोध एक बड़ा प्रबल शत्रु है । काम और क्रोध रूप दो प्रवल शत्रुओं को जीते विना कभी कोई. परमार्थ पधमें नहीं चल सकता यदासंहरतेकामान् कूर्मोऽङ्गानीवसर्वशः। तदात्मज्योतिरात्माय-मात्मन्येवप्रपश्यति ॥ ५३ ॥ नबिभेतियदाचार्य यदाचास्मानबिभ्यतिः। ::.:.:.. यदानेच्छतिनद्वेष्ठिं ब्रह्मसंपद्यतेतदा...' जैसे कछुवा अपने अंगोंको संमेदार भीतर कर लेता है वैसे ही जब योगी. पुरुप अपनी सव कामनाओंको समाप्त कर देता है तब वह आपेमें स्थित होकर अपने में ही ज्योति स्वरूप आत्मतत्त्वको देखता है। जब मनुष्य- किसीसे भय नहीं. फरता और न इससे अन्य प्राणी- भयभीत होते हैं तथा. जय मनुष्यको कोई अभिलाषा और उसका कोई मित्र वा शत्रुः नहीं रहता. तब इसको ब्रह्मकी प्राप्ति होजाती है.॥ ५३-५५ ॥ . ब्रह्म परमात्मा सदा निर्भय है न वह कभी किसीसे डरता है । क्योंकि वह हिंसा चोरी आदि भयका कोई काम नहीं करता] तथा न उससे कोई डरता है [ क्योंकि ईश्वर किसीको न दुःख देता न देना चाहता है. दुःख देने की चेष्टा वाले से सब डरते हैं ;J और ईश्वर में राग द्वेष भी किसी से नहीं हैं ये ही गुण जब मनुष्य धारण करता है.तब ब्रह्मके तुल्य निर्दोष होनेसे उस . .. t ३८ गीतासंग्रहे- को पा सकता है अर्थात् उक्त स्वरूपको धारण करना ही जानी ब्रह्म स्वरूप मोक्षभाव है और इसीका नान स्वरूपावस्थिति है । उभेसत्यान्तेत्यक्त्वा शोकानन्दौभयाभये । प्रियाप्रियेपरित्यज्य प्रशान्तात्माभविष्यसि ॥ ५५ यदानकुरुतेभावं सर्वभूतेषुपापकम् । कर्मणामनसावाचा ब्रह्मसम्पद्यतेतदा ॥ ५६ ॥ वह ब्राह्मण राजा सेनजित्से कहता है कि हे राजन् ! तुम-सत्य-अमृत शोक--आनन्द, भय-अभय, प्रिय-अप्रिय, को छोड़कर प्राशान्तात्मा हो जानोगे। जब मनुष्य मन वाणी और फर्मसे सक्ष प्राणियोंसें पापका विचार नहीं रखता अर्थात् सवको सम देखता है तब वह ब्रह्म स्वरूप होजाता है ५५-५६ ॥ सत्य नाम चिरस्थायी सार वा प्राणका और अन्त नाम शीघ्र विगइने नष्ट होने वाले असार वा अपान: रूप मृत्युका है। ये सब ब्रहमें नहीं हैं सब पापोंसे रहित सदा निर्दोष शुद्ध ईश्वर है इसी लिये निर्दोष हुम्ला पुरुष ईश्वरको पा सकता है वा यों कहो कि चित्त खाय..नदीमें यत्तिरूप. तरंगों का उठना ही विज्ञार रूप फायिक वाचिक मानस पाप कहाता है और जब तरंगरूप विकार' नहीं उठते तव सभी काम शोधादि शान्त होजाते हैं, यही शान्तिमय ब्रह्मस्वरूप होना है। यादुस्त्यजादुर्मतिभिर्यानजीठतिजीय॑तः । योऽसौप्राणान्तकोरोग-स्तांतृष्णांत्यजतःसुखम् ॥५७॥ तृष्णा एक ऐसी बुरी बलाय हैं कि जो दुर्बुद्धि पुरुषोंसे त्यागी नहीं जाती और वृद्ध होने पर चौगुनी होती हैं किन्तु यह तृष्णारूपी रोगजीवनको नष्ट भ्रष्ट कर देता है जो पुरुष इस तृष्णाको छोड़ देते हैं वे ही सुखके भागी होते हैं वृष्शा नष्ट हुए विना कभी सुख नहीं मिलता ॥ ५॥ : तृण्णा ही एक मनुष्य के लिये, बड़ा बन्धन है इसीका छूटनाः मुक्ति है इसीका नान लोभ वा काम है यही सब पापोंका मूल कारण है। अत्रपिङ्गलयागीता गाथा:शूयन्तिपार्थिव !। यथासाकृच्छकालेऽपि लेभेधर्मसनातनम् ॥५८ ॥ संकेतेपिङ्गलावेश्या कान्तेनासीद्विनाकृता । अथकृच्छ्रगताम्चान्तां बुद्धिमास्थापयत्तदा ॥ ५ ॥ . 7 । . पिङ्गलागीता ॥ ३० ब्राह्मण कहता है कि हे राजन् सेनजित् ! इस तृष्णाके विपयमें पिङ्गला वेश्यासे कही हुई गाथायें (पहायत) सुनी जाती हैं । जैसे वह पिङ्गला खोदे समय में भी सनातन धर्मको प्राप्त होगई । अर्थात् पिङ्गला वेश्या किसी साङ्केतिक स्थानमें जाकर कान्त [ यार.] के मिलनेकी आशासे बैठी थी परन्तु दोनों का संकेत होगाने पर भी पिंगलाका कान्त [ यार ] वहां उस समय न आया यड़ी घाहना जिसके प्राप्त होनेशी थी न मिलने पर कठिन दुःखमें पड़ी पिलाने विचारको युद्धिको शान्त पार स्थित किया ॥ ५०-६० ॥ जैसे दुःख सुखका हेतु होता वैसे अधर्म दुराचरणा भी कभी कहीं धर्म वा पुरयक्षा हेतु हो सकता है। अर्थात् मनुष्यको जब दुराचरण व्यभिचारादि समोसे अनेक धके लगते पीड़ित होता वा उन कनों से जब सुख न मिलकर अपार दुःख दीखता है तब उसको अपने उस दुष्कृतमें ग्लानि होती है इस फारण उधरसे हटकर पुण्य कर्मोकी ओर ऐसा कोई २ पुरुष मुख फेरता है जैसा कि पिङ्गला ने किया । पिङ्गलोवाच उन्मत्ताहमनुन्मत्तं कान्तमन्ववसंचिरम् । अन्तिकरमणसन्तं नैनमध्यगमपुरा ॥६० ।। एकस्थूणनवद्वार-मपिधास्याम्यगारकम् । काहिकान्तमिहायान्त-मयंकान्तेतिमंस्यते ॥६१॥' अकांमाङ्कामरूपेण धूर्तानरकरूपिणः । नपुनर्वजयिष्यन्ति प्रतिबुद्धास्मिजागृमि ॥ २ ॥ अनर्थहिभत्रेदर्थो दैवात्पूर्वकृतेनवा । सम्बुद्धाहनिराकारा नाहमद्याजितेन्द्रिया ॥ ६३ ॥ सुखन्निराशःस्वपति नैराश्यम्परमसुखम् । आशामनाशांकृत्वाहि सुखंस्वपितिपिङ्गला ॥ ३४ ॥ पिङ्गला वेश्या कहने लगी कि मैं उन्मत्त हो कर .कभी उन्मत्त न होने वाले अपने सनातन कान्त-प्यारे (ईश) के पास बहुत काल से रही-बसी परन्तु श्रेष्ठ रमण-पति ( रक्षक) को पास में होने पर भी अब तक मैंने नहीं जाना। अब एक प्राशा वा वृष्णा स्तम्भ (थूना ) वाले और नौ [२ बिद्र नाक के २ कान २ आंख, १ मुख, २ नीचे मलमूत्र के इन ए नव) द्वार go गीतासंग्रह वाले इस शरीररूप घर को (बन्द) करलूंगी। अब मैं ऐसी नहीं रही कि संसारी किती मनुष्य को शान्त नाम अपना यार दोस्त नानू । अब मैं काम से रहित हो गई और अव नरक में पहुंचाने वाले ही नहीं. प्रत्युत साक्षात नरकरूप धूर्त व्यभिचारी जन मुझे न ठग सकेंगे। अब मैं अज्ञाननिद्रा से उठ खेड़ी हुई जांगती हूं प्रारब्ध वा पूर्वकर्न से अनर्थ में भी अर्थ हो जाता है और मैंने जाग कर जानलिया कि मेरा स्वरूप शरीर नहीं है किन्तु मेरा आत्मरूप है और वह आकार रहित हैं इस प्रकार ज्ञान हो जाने से मैं अव जितेन्द्रिय हो गई हूं। भाशा रहित पुरुष सुख से तोता है इसीलिये नैराश्य भाशा का न रखना परम सुख है पिङ्गला वेश्या प्राशा' को निराशा भाशा का प्रभाव ] करके सुख से सोई-रही-तुख को प्राप्त हुई ॥६१-६५ ॥ निराशः मुखी पिङ्गलावत् ” सांख्यशास्त्र के चतुध्यिाय का यह सूत्र मनुष्य भाशा-कामना-काम-लोभ वा हृष्णा-चाहना--भोग की अभिलाषा इत्यादि नाम वाले एक ही प्रवल दुर्जेय शत्रु को यदि वश में करले जीतपावे तो उस के निकट आने वाली असंख्य विपत्तियां सभी निराश हो जाती हैं। मङ्किगीता में इसी एक कामना पर सर्व लेख हुन्ना है। यही एक आशा वा भोग वृष्णा मनुष्य को भुलाने वा कर्तव्य से डिगाने वाला प्रबल शत्रु है । इत्तको वशीभूत होते ही ब्रह्मज्ञान, आत्मज्ञान, परमार्थ प्राप्ति वा निःश्रेयस निष्कण्टक कल्याणमार्ग प्राप्त होने में फिर कुछ भी विलम्ब नहीं रहता । इस लिये मुमुक्षु जिज्ञासु पुरुषं को इस तृष्णा को तोड़ने छोड़ने के लिये प्रवल उपाय शोचने तथा प्रारब्ध कर ही देने चाहिये । भीष्मउवाच -एतैश्वान्यैश्चविप्रस्य हेतुमद्विःप्रभापितैः । पर्यवस्थापितोराजा सेनजिन्मुमुदेसुखी ॥ ६५. ॥ भीन्न जी राजा युधिष्ठिरसे कहते हैं कि हे युधिष्ठिर ! उस ब्राह्मण के युक्तियुक्त पूर्वोक्त तथा अन्य ऐसे ही वचनों से राजा सेनजित् भायेमें आ कर प्रसन्न होता हुना सुखी हुआ ॥ ६॥ इति शान्तिपर्वणिनोक्षधर्मपर्वणिपिङ्गल (ला) गीतायाम्-१७४ तमोऽध्यायः । - . :- म्याकगीता ॥ अथ शम्पाकगीता युधिष्ठिरउवाच-धनिनोऽथाधनायेच वर्तयन्तेस्वत्तन्त्रिणः । सुखदुःखागमस्तेषां काकथंवापितामह ! ॥१॥ महाराजा युधिष्ठिरजी भीष्म पितालहनी से पूछते हैं कि-हे पिता मह ! इस संसार में धनी और निर्धन पुरुष किस प्रकार स्वतन्त्र होकर व- र्ताव करते हैं तथा उन को सुख दुःख की प्राप्ति कैसी वा किस प्रकार होती है सो समझा कर कहिये ॥ १॥ भीष्मउवाच-अत्राप्युदाहरन्तीम-मितिहासंपुरातनम् । शम्पाकेनेहमुक्तेन गीतंशान्तिंगतेनच ॥२॥ अब्रवीन्मांपुराक्रश्चिद ब्राह्मणस्त्यागमास्थितः । क्लिश्यमानःकुदारेण कुचेलेनबुभुक्षया ॥ ३ ॥ उत्पन्न मिहलोकेबै जन्मप्रतिमानवम् । विविधान्युपवर्त्तन्ते दुःखानिच सुखानिच ॥ १ ॥ तयोरेकतरेमार्ग यदेनमभिसंनयेत् । नसुखंप्राप्यसंहृष्येन् नालुखप्राप्यसंज्वरेत् ॥ ५॥ भीमजी राजा युधिष्ठिरसे कहते हैं कि-हे राजन् ! इस विषयमें एक पुराना इतिहास काहा जाता है जिसको शान्त वैराग्यवान् शम्पाक ना- ह्मणने कहा है । खोटी स्त्री, फटे पुराने वस्त्र और भूखसे लेशित हुए त्यागी ब्राह्मण ( शम्पाक नामी) ने मुझसे पहिले कहा था कि हे भोज्न | इस संसार में जन्मसे लेकर उत्पन्न हुए गनुण्यको अनेक प्रकारक सुख और घे- रते हैं । इससे मनुष्यको उचित है कि सुख दुःखों में से एक भी भाधीन न होवे अर्थात् सुखको प्राप्त होकर न प्रसन्न हो तथा दुःखको प्राप्त होवार घवड़ावे नहीं ॥२-५॥ उत्पन्न हुए प्राशियों को भूख लगती यह और उत्तन भोजन मि- लना सुख है फिर उसले मलमूत्र होना उनके दुर्गन्धका सहना यह फिर दुःख होता है इस प्रकार दुःखका परिणाम लुस और सुखका परिणाम दुःख पारापारीसे नाता जाता है इसी प्रकारको वर्तावों पर मनुष्यका जीवन निर्भर है इससे सिद्ध है कि सुख दुःरू दोनों स्वभावसे ही भोगने यह दुःख ६ ४२ - गीतासंग्रहे- पड़ते हैं जब देहधारी मात्र दुःखों से सर्वथा वच ही नहीं सकता तब मानले- ना चाहिये कि जैसे जल के भीतर रहने वाला जजले शीत में कदापि नहीं बचता वैसे ही संसारमें रहने वाला संसारी दुःखोंसे नहीं बवेगा इस लिये सुख दुःखमें सम रहे ॥ नवैचरसियच्छ्रेय आत्मनोवायदीशिषे । अक्रामात्मापिहिसदा धुरमुद्यम्यचैवह ॥६॥ अकिञ्चनःपरिपतत् सुखमास्वादयिष्यसि । अकिञ्चनःसुखंशेते समुत्तिष्ठतिचैवह ॥ ७ ॥ आकिंचन्यसुखंलोके पथ्यंशिवमनामयम् । अनमिन्नपथोोप दुर्लभःसुलभोमतः ॥ ८॥ अकिंचनस्यशुद्धस्य उपपनस्यसर्वतः । अवेक्षमाणलील्लोकान् नतुल्यमिहलक्षये ॥६॥ आकिंचन्यंचराज्यंच तुलयासमतोलयम् । अत्यरिच्यतदारिदा राज्यादपिगुणाधिकम् ॥१०॥ वह शम्पाक नामक ब्राह्मण भीग्मनीसे कहता है कि-हे भीष्म! तुम जो बहुत सी आशायें रखते हो यह तुम्हारे कल्याणका मार्ग नहीं है । यदि कही कि राज्यादि का केवल वोझा ले चलते हैं सो भी ठीक नहीं क्योंकि अकाम पुरुष धुरका बोझा नहीं उठाता है। यदि तुम सांसारिक सब धनादिको छोड़ दोगे तो सुख का स्वाद जानोगे । धनादि का त्यागी पुरुष ही सुख की नींद सोता और उठता है । संसारमें एक धनका त्यागी होना ही दुःखों से र- हित कल्याण स्वरूप चलने योग्य मार्ग है । इस मार्गमें कोई शत्रु नहीं है यह मार्ग सुलभ और दुर्लभ दोनों प्रकार का है। जो शुद्धान्तःकरणसे धनका त्यागी योग्य पुरुष है उसके समान तीनो लोकों में कोई पुरुष नहीं है इस वातको मैं समझ पूर्वक जानता हूं । मैंने धनादिका त्याग और राज्यको तुला ( तराजू ) से तोला है उसमें राज्यसे भारी और अधिक गुण वाला दारिद्य-धनैश्वर्यादि का त्याग हुआ ॥ ६-१० ॥ आकिंचन्येचराज्येच विशेष:सुमहानयम् । नित्योद्विग्नोहिधनवान् मृत्योरास्यगतोयथा ॥११॥ नेवास्याग्निर्नचारिष्टो नमृत्युर्नचदस्यवः । A

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शम्पाकगीता ॥
५३
प्रभवन्तिधनत्यागाद् विमुक्तस्यनिराशिषः ॥१२॥
तवैसदाकामचर=मनुपस्तीर्णशायिनम् ।
बाहूपधानंशाम्यन्तं प्रशंसन्तिदिवौकसः ॥१३॥
त्याग और राज्य में बड़ा अन्तर यह है कि-धनवान् सदा घबराया
हुमा सा रहता है तथा उस की वह दशा रहती है जैसे मरने वाले मनुष्या-
दिकी हो । और जो धनादि पदार्थों से विरक्त भाशारहित है उस पुरुष को
अग्नि. किसी प्रकार की हानि नहीं करता मृत्यु और डांकू आदि नहीं
सताते । जो पुरुष सत्र का त्याग कर-स्वेच्छापूर्वक विचरता, विना विछौनेके
पृथिवी पर सोता, बाहु ( भुज ) को उपधान-तकिया बनाता और शान्ति
का आश्रय लेता है उस की देवता (भी) प्रशंसा करते हैं ॥ १९-१३ ॥
धनादि उत्तम ऐश्वर्यकी चाहना रखने वाले बहुत मनुष्य सदा ही होते
हैं । वे लोग उसी पुरुप से धन लेनेकी चेष्टा करते दाव लगाये रहते हैं कि
जिसके पास धनादि होता है कोई चोरी करके, कोई ठग कर, कोई खुशामद
से कोई लूट कर उससे धन लेना चाहता है। जैसे किसी को अपने खाये
जाने मारे जाने का प्रतिक्षण भय लगा हो तो उसको सुख नहीं मिल सकता
इसी प्रकार धनी लोगों को प्रत्येक समय भय लगा रहता है किसी समय
उनकी ठीक सुख पूर्वक स्थिति नहीं रहती, पर निर्धनता में केवल यही दुःख
कि हमारे पास धन नहीं कैसे मिले कहां से मिले क्या करें ? इत्यादि प-
रन्तु उन को यदि धन प्राप्ति की तृष्णा शान्त हो जावे और उस के स्थानमें
परम सन्तोष हो जावे तो धनी तथा निर्धन दोनों को होने वाला दुःख उस
सन्तोषी को नहीं होता। ऐसे पुरुष को धनी तथा निर्धन दोनों ही प्रतिष्ठा
करते बड़ा पूज्य मानने लगते हैं । यही बड़प्पन पूर्वकाल में ब्राह्मणों में था
इसी गुण से राजादि को भी ब्राह्मण तुच्छ समझते थे।
धनवान्क्रोधलोभाभ्या-माविष्टीनष्टचेतनः ।
तिर्थ्यगोक्षःशुष्कमुखः पापकोभुकुटीमुखः ॥१४॥
निर्दशन्नधरोष्ठज्ज ऋद्धोदारुणभाषिता।
कस्तमिच्छेत्परिद्रष्टुं दातुमिच्छतिचेन्महीम् ॥१५॥
श्रियाह्यभीक्ष्णंसंवासी मोहयत्यविचक्षणम् ।
सातस्यचित्तहरति शारदाश्नमिवानिलः ।
तथैनंरूपमानश्च धनमानश्वविन्दति ॥ १६ ॥

- ? गीतासंग्रहे- अभिजातोऽस्मिसिद्धोऽस्मि नास्मिकेवलमानुपः । इत्येतैःकारणस्तस्य त्रिभिश्चित्तंप्रमावति ॥१७॥ धनवान् पुरुप क्रोध और लोम से युक्त होकर विचारशक्ति से रहित हो जाता है वह पापी तिरका देखता सूखे मुख से नन्नता छोड़ के वात करता, शोध लोभ के कारण नाक भी चढ़ाता, और नीचे के प्रोष्ठ को चबाता हुना कठोर बोलने वाला होता है । ऐना कौन विचारवान् पुरुष है ? जो उक्त प्र- कार के पृथिवी दाता को भी देखना चाहे ? अर्थात् कोई नहीं । लक्ष्मी-धन कर निकट में वार २ अधिक २ शाना-बसना ठहरना विवेक शक्ति रहित सूर्स को मोहित कर देता है और वह लक्ष्ली इस प्रकार उस धनी पुरुष के चित्त को हर लोती है जैसे शरद् ऋतु के बादलों को वायु उड़ा लेजावे । तथा धनी पुरुष को अपने रूपवान् और धनवान् होने का मान घेर लेता है। धनवान् पुरुष विधारा करता है कि-में कुलीन हूं मैं सिद्ध हूं मैं केवल मनुष्य नहीं हूं किन्तु देव भी हूं इन तीन कारणों से उसके चित्त को प्रमाद [नशा] हो जाता है ॥ १४-१७॥ विद्यानद, धनमद और कुलीनला का मद इन तीनों प्रकार के मदों [नशानों ] में धन का मद मर्वोपरि प्रबल वा प्रधान है। धन के साथ संव मद हो जाते हैं । इस धन के प्रमाद से मनुष्य अपने सभी कर्त्तव्य से च्युत हो जाता है और धर्माधर्म का विवेक धनवान् को नहीं रहता अर्थात् मनुष्य की अधोगति का एक बड़ा कारण धन ही है। सम्प्रसक्तमनाभोगान् विसृज्यपितृसंचितान् । परिक्षीणःपरवाना-मादानंसाधुमन्यते ॥ १८ ॥ तमतिकान्तमर्याद-साददानंततस्ततः । प्रतिपेधन्तिराजानो लुब्धासृगमिवेपुभिः ॥१९॥ एवमेतानिदुःखानि तानितानीहमानवम् । विविधान्युपपद्यन्ते गात्रसंस्पर्शजान्यपि ॥२०॥ तेषांपरखदुःखानां बुयाभेपज्यमाचरेत् । लोकधर्ममवज्ञाय ध्रुवाणामध्नुवैःसह ॥ २१ ॥ को रांगारी भोगों में अधिक लिप्त होता है वह पित्रादिके संचित भोगों नाम भोग्न पदार्थों को व्यर्थ छून-जुला व्यभिचारादि दुर्व्यगनोंमें नष्ट करके . - शम्पायगीता॥ ४५. क्षीण हुआ पराये धनादि पदार्थों को लेना अच्छा मानता है पश्चात् उस मर्यादा तोड़ने वाले तथा इधर उधर से पराया माल मारने वाले नीच रुप के पीछे राजा लोग दण्ड देने को इस प्रकार लग जाते हैं जैसे व्याध लोग वाणों से मारने के लिये हरिण के पीछे लगजावें । इसी प्रकार अनेक प्रकार के कामलोभादिअन्य अनेक दुःख मनुष्यों के पीछे लगजाते हैं जो कि आधिभौतिक, आधिदैविक, और आध्यात्मिक भेद से तीन प्रकार के हैं। इन परमदुःखों के दूर करने के लिये मनुष्य को बुद्धि से विचार कर बड़ा प्र- यत्न करना चाहिये और नित्य अनित्य का विचार करता हुन्ना मनुष्य लोक व्यवहार की कुछ परवाह न करे ॥ १८-२१ ॥ धन ऐश्वर्यादि भोगों के होने न होने सव दशा में आने वा रहने वाले दुःखों की ओपधि केवल सत् असत् का विवेक कर सकने योग्य बुद्धि से स्वयं विचार के ही कर सकता है अन्य कोई श्रोपधि नहीं है । और वे सब दुःख, संसार को दुःखमय अनित्य असार समझ सकने पर ही वैराग्य होने से नि- वृत्त हो सकते हैं अन्य कोई प्रकार दुःखों से बचने का नहीं है । नात्यक्त्वासुखमाप्नोति नात्यक्त्त्वाविन्दतेपरम् । नात्यक्त्वाचाभय शेते त्यक्त्त्वासर्वसुखीभव ॥२२॥ इत्येतद्वास्तिनपुरे ब्राह्मणेनोपवर्णितम् । शम्पाकेनपुरामह्यं तस्मात्त्यागःपरोमतः ॥२३ ॥ भीष्म जी राजा युधिष्ठिर से कहते हैं कि हे राजन् ! वह ब्राह्मण मुझ से बोला कि हे भीम ! विना त्याग किये सुख नहीं मिलता, विना त्याग किये मुक्ति नहीं प्राप्त हो सक्ती और बिना त्याग किये कोई निर्भय नहीं सो सता है । इस से तुम सब को छोड़ कर सुखी होवो । हस्तिनापुर में प- हिले मुझ से यह सब कथन शम्पाक नामक ब्राह्मण ने किया था तिस का. रण मैं त्याग को परन श्रेष्ठ मानता हूं ॥ २२ । २३ ॥ . इति शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि शम्पाकगीतायाम्-१७६ तमोऽध्यायः ॥

४
४६
गीतासंग्रह-
अथ-अजगरगीता॥
युधिष्ठिर उवाच-केनवृत्तेनवृत्तज्ञ ! वीतशोकश्वरेन्महीम् ।
किंचकुर्वनरोलोके प्राप्नोतिगतिमुत्तमाम् ॥ १॥
राजा युधिष्ठिर जी भीष्म पितामह जी से पूछते हैं कि-व्यवहारों तथा
धर्म को जानने वाले है पितामह जी! किस वर्ताव से शोक को निवृत्त कर-
ता हुआ पुरुष पृथिवी पर विंचरे और संसार में मनुष्य किस कर्म को करता
हुआ उत्तमगति को प्राप्त होता है ? [ सत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुप-
श्यतः ] इस वेद प्रमाण के अनुसार शोक मोह की निवृत्ति ही परम वा भ-
त्यन्त पुरुषार्थ है । इसी लिये राजा युधिष्ठिर ने वैसा प्रश्न किया है ॥१॥
भीष्म उवाच-अन्नाप्युदाहरन्तीम-मितिहासंपुरातनम् ।
प्रहादस्यचसंवादं मुनेराजगरस्य च ॥२॥
चरन्तब्राह्मणकंचित् कल्पचित्तमनामयम् ।
पप्रच्छराजामहादो बुद्धिमान्बुद्धिसम्मितम् ॥३॥
भीष्म जी राजा युधिष्ठिर को उत्तर देते हैं कि इस विषय में एक पु-
राना इतिहास कहा जाता है जो कि प्रहाद और अजगर ऋषि के संवाद
रूप से प्रसिद्ध है । बुद्धिमान् प्रहाद राजा ने प्रसन्न वा दृढ़ समर्थ चित्त बाले
रोग रहित किसी बुद्धिमान् ब्राह्मण ( अजगर नामक ) को फिरता हुभा दे-
खकर पूछा कि ॥२३॥
प्रहाद उवाच-स्वस्थःशुद्धीमूदुर्दान्तो निर्विधित्सोऽनसूयकः ।
सुवाकप्रगल्भोमेधावी माज्ञश्वरसिबालवत् ॥४॥
नवप्रार्थयसेलाभं नालाभेष्वनुशोचसि ।
नित्यतृप्तइवब्रह्म-नकिंचिदिवमन्यसे ॥६॥
स्त्रोतसाहियमाणास प्रजासुविमनाइव ।
धर्मकामार्थकार्येषु कूटस्थइवलक्ष्यसे ॥६॥
नानतिष्ठसिधर्मार्थी नकामेचापिवर्त्तसे।
इन्द्रियार्थाननादृत्य मुक्तारसिसाक्षिवत् ॥७॥
कानप्रज्ञाश्रुतंवाकिं वृत्तिर्वाकानुतेमुने !।
क्षिप्रमाचक्ष्वमेब्रह्मन् श्रेयोयदिहमन्यसे ॥८॥

४७ अजगरगीता ॥ राजा प्रहाद अजगर ऋषि से कहने लगे कि हे मुने ! तुम स्वस्थ, शुद्ध, कोमल, जितेन्द्रिय, आरम्भ करने की इच्छा से रहित, अनिन्दक, सुवाक, प्रगल्भ, मेधावी और प्राज्ञ होकर भी संसार में बालक की भांति विचरते • हो । न तुम लाभों को चाहते और न हानियों के होने पर शोक करते हो। हे ब्राह्मण ! तुम नित्य तृप्त से हुए संसार के द्वन्द्वों को कुछ भी नहीं मानते ऐसे प्रतीत होते हो। कालरूपी सोते ( स्रोत ) से बहाई हुई प्रजाओं में उदासीन से जान पड़ते हो । धर्म अर्थ और कान सम्बन्धी कायों में मध्य- स्थ से विदित होते हो। न तो तुम अर्थ धर्म का सेवन करते और न काममें प्रवृत्त रहते हो । किन्तु इन्द्रियों के विषयों का अनादर करके मुक्त हुए साक्षी के तुल्य विचरते हो । अब आप से प्रश्न यह है कि आप की प्रज्ञा, श्रुत ( वेदाध्ययनादि ) और वृत्ति कैसी है ? यदि कल्याणकारी समझे तो इस का उत्तर शीघ्र दीजिये ॥४-८॥ स्वस्य नाम अपने स्वरूप में अवस्थित प्रापे से बाहर न होने वाले वि. षय दोषों से जिनके इन्द्रिय वा मन दूषित नहीं होते इत्यादि लक्षणों-चिन्हों बाले योगी वा ज्ञानी लोग हुआ करते हैं। बहुतकाल के अभ्यास से मनुष्य ऐसी उत्तम दशा को प्राप्त कर सकता है जीवन्मुक्त ज्ञानी वा सिद्ध योगी लोगों में ऐसे ही चिन्ह हुआ करते हैं । भीष्म उवाच-अनुयुक्तःसमेधावी लोकधर्मविधानवित् । उवाचश्लक्ष्णयावाचा प्रहादमनपार्थया ॥ ६ ॥ पश्यप्रहादभूताना-मुत्पत्तिमनिमित्ततः । हासंवृद्धिविनाशंच नप्रहृष्येनचव्यथे ॥ १०॥ स्वभावादेवसंदृश्या वर्तमानाःप्रवृत्तयः । स्वभावनिरताःसर्वाः परितुण्येनकेनचित् ॥ ११ ॥ पश्यप्रहादसंयोगान् विप्रयोगपरायणान् । संचयांश्चविनाशान्तान् नक्वचिद्विदधे मनः ॥१२॥ भीष्म जी राजा युधिष्ठिर से कहते हैं कि हे युधिष्ठिर ! जब प्रहाद ने अनगर ऋषि से उक्त प्रकार कहा तब वे लोग धर्म के प्रकार को जानने वाले मेधावी प्रजगर ऋषि कोमल प्रिय सत्य सार्थक वाणी से प्रहाद को सं. बोधित करके कहने लगे-हे. प्रहाद ! अनिमित्त नाम स्वभाव से भूतों की उ- त्पत्तिको देखो तथा उन के हास, वृद्धि और विनाश की भोर भी दृष्टि डा- ४८ - - । गीतासंग्रहे- लो। मुझे किमी दशा के किनी पदार्थ को देखकर हर्प शोक वा सुख दुःख नहीं होते। सांसारिक प्रवृत्तियां स्वभाव से ही दीख पड़ती हैं और वे मव खभावके आधीन हैं। मैं किसीसे सन्तुष्ट नहीं होता। हे प्रहाद ! वियो- गाभिमुख संयोगों तथा विनाशाभिमुख संचयों को देख कर मेरा मन किसी पदार्थ में आमत वा विशारयुक्त नहीं होता ॥ -१२ ॥ अग्नि की स्वाभाविक दाहशक्ति से मिगी की हानि भी होती है तो भी वह किसी पर क्रोध नहीं कर सकता । इसी प्रकार संसार में सभी प्रकार के हानि नाम सुख दुःख जीवन नरणादि स्वभाव से ही होते हैं अर्थात् स्ना- भाविकता यही है कि उन हानि लाभादि इन्द्रों की निवृत्ति कदापि कोई नहीं कर सकता । इमी लिये जिन्न के बहुत शत्रु हैं उन को भी कुछ न कुछ लाभ तथा नित्त के बहुत भित्र हैं उस की भी कुछ न कुछ हानि होती ही है स्वभाव नाल रूप वाला भी ईश्वर ही है इस लिये स्वभाव से जो होता है वही ईश्वरेच्छा से हुआ जानो ॥ अन्तवन्तिचभूतानि, गुणयुक्तानिपश्यतः । उत्पत्तिनिधनज्ञस्य किंकार्यमबशिष्यते ॥ १३ ॥ जलजानामपिान्तं पर्यायेणोपलक्षये। महत्तामपिकायानां सूक्ष्माणांचमहोदधौ ॥ १४ ॥ जङ्गमस्थावराणांच भूनानामसुराधिप !। पार्थिवानामपिव्यक्तं मृत्युपश्यामिसर्वशः ॥ १५ ॥ अन्तरिक्षचराणांच दानवोत्तम ! पक्षिणाम् । उत्तिष्ठतेयथाकालं मृत्युर्बलवतामपि ॥ १६ ॥ दिविसंचरमाणानि हूस्वानिचमहान्तिच । ज्योतींप्यपियथाकालं पतमानानिलक्षये ॥ १७ ॥ इतिभूनानिसंपश्य-अनुपक्कानिमृत्युना सर्वसामान्यगोविद्वान् कृतकृत्यःसुखंवपे ॥ १८ ।। यत्वादि गुणों से युक्त अन्त-नाश वाले भूतों को देखते हुए तथा उत्पत्ति और मृत्यु को जानने वाले पुरुष के लिये कोई कार्य शेप नहीं रहता। हे प्रहाद! पाय (पारी) से ममुद्गमें अत्यन्त बड़े तथा भूक्ष्म जलजन्तु शरीरों का .

४९ ठीक समय अजगरगीता ॥ भी नाश होता मैं देख रहा हूं। हे असुराधिप ! प्रहाद ! जड़ चेतन और राजाओं का भी सब ओर से स्पष्ट मृत्यु दीख पड़ता है। हे दानवोत्तम ! प्रहाद ! अन्तरिक्षमें उड़ने वाले पक्षी और बलवानोंका भी मृत्यु पर आकर उपस्थित होजाता है। हे प्रहाद ! आकाश से चलते हुए छोटे बड़े नक्षत्र, ताराओं को भी यथाकाल गिरता हुभा देखता हूं । उक्त प्रकार से सब भूतों को मृत्यु से दवाया हुभा देख जानकर सब में सामान्य-उदासीन बुद्धि रखता हुआ कृतकृत्य होकर सुखपूर्वक सोता हूं.॥.१३-१८ ॥ पूर्व कहे स्वाभाविक इष्ट अनिष्ट के यहां उदाहरण दिखाये हैं कि जैसे सूर्य चन्द्रमा प्रादि ज्योतियों का तथा पृथिव्यादि सब बड़े २ पदार्थों का भी उत्पत्ति विनाश स्वभाव से ही कल्प २ में होता है वैसे ही मनुष्यादि का भी सब जीवन मरणादि इष्ट अनिष्ट पूर्व संचित कर्म से जन्म के साथ वने स्वभाव नाम प्रारब्धानुसार ही होता है । जिसको कोई किसी उपाय से हटा नहीं सकता। इस को जो यथार्थ ठीक समझ लेता है उस को हर्ष शोक नहीं होते जिस के ध्यान में यह ठीक जंच जावे कि सुख वा सुख के हेतु तथा दुःख वा दुःख के हेतु पारापारी स्वभाव से ही भाते जाते हैं तव.हर्ष शोक घटते जाते हैं। सुमहान्तमपिनासं ग्रसेलब्धंयदृच्छया। शयेपुनरभुजानी दिवसानिबहून्यपि १९॥ आशयन्त्यपिमामन्नं पुनर्वहुगुणंबहु । पुनरल्पंपुनःस्तोकं पुनर्नवोपपद्यते ॥२०॥ कणान्कदाचित्खादामि पिण्याकमपिचग्रले। भक्षयेशालिमांसानि भक्ष्यांशोच्चावचान्पुनः ॥२१॥ शयेकदाचित्पर्य्यङ्के भूमावपिपुनःशये। प्रासादेवापिमेशय्या कदाचिदुपपद्यते ॥ २२ ॥ धारयामिचचीराणि शाणक्षीमाजिनानिच। महार्हाणिचवासांसि धारयाम्यहमेकदा ॥२३॥ नसनिपतितधर्म्य मुपभोग्यदृच्छया। प्रत्याचक्षेनचाप्येन-मनुरुध्येसुदुर्लभम् ॥ २४ ॥ 9 गीतासंग्रहे- अजगर ऋषि प्रहाद से कहते हैं कि मैं दैवयोग से प्राप्त हुएं कभी बड़े अच्छे ग्राम भोजन को लाना हूं. फनी बहुत दिनों तक विना दाये ही मोया पड़ा रहता , फिर कभी मनुष्य सुझ को बहुत मा स्वादु अन्न खिला- ने है. कभी थोड़ा अन्न मिलता, कभी अत्यन्त अल्प प्राप्त होता है कभी २ निलता ही नहीं, कभी, काों भूभी का स्वाद लेता हूं और कमी पिण्याक [ पीना को भी खाता हूं, फिर कभी शान्लि नांस उत्तम भात और मांसको खाता यहां मांस भन्नण का विधान नहीं किन्तु अनुवाद मात्र है। भक्ष्या- भय के विचार प्रमङ्ग में मांस अनक्ष्य है । परिनख्या विधिका अभिप्राय निवृति में होना सिद्ध है । अनुवाद वाक्य से विधि निषेध दोनों ही मिद्ध नहीं होते ] तथा फिर कभी जंचे नीचे प्रकार के भोजन करता हूं। कभी पलंग पर कभी पृथिवी पर सोती और कभी प्रानाद पर नेरी शभ्या होती है।किनी ममय शण और अननीले वस्त्रोंको पहिनता और किती समय बहु मृत्य (रेशमी ) वस्त्रों को धारण करता हूं। अकस्मात धर्मानुकूल प्राप्त हुए अच्छे वा बुरे उपभोग का तिरस्कार नहीं करता तथा उक्त प्रकार के अत्यन्त दुर्लभ उपभागों की कामना भी नहीं रखता कि ऐसा ही मिले ॥ १९-२४ ॥ अच्छे बुरे इष्ट अनिष्ट किमी प्रकार के भोग जिम को प्राप्त होते हुए नोभ उत्पन्न नहीं करते वह मनुष्य द्वन्द्वातीत वा गुणातीत हुआ जीवन्मु- तोंकी कोटि में नाना नायगा। ऐसी दशा वहुत काल के निरन्तर सेवन किये योगाभ्यास से प्राप्त हो नकती है ऐसी दशा प्राप्त करनेके लिये अभ्यास तथा वैराग्य का वार २ अनुशीलन ही प्रधान कारस है ।। अचलमनिधनंभिवविशोकं शुचिमतुलंविदुपामतेप्रविष्टम् । अनभिमतमसेवितंत्रिमू-व्रतमिदमाजगरंशुचिश्चरामि ॥२॥ अचलितमतिरच्युतःस्वधर्मात् परिमितसंसरणापराबरज्ञः । विगतभयकपायलोभमोहो प्रतमिदमाजगरंशुचिश्चरामि ॥२६॥ अनियतफलभक्ष्यभोज्यपेयं विधिपरिणामविभक्तदेशकालम् । हृदयसुरुमसेवितंकय्य तमिदमाजगरंशुचिरामि ॥२॥ अजगर अपि कहते हैं कि उक्त प्रज्ञार के अबल, असरण, सत्यारास्वरूप, शोज रहित, पवित्र, अनुपम, विद्वानोंके सिद्धान्तानुकूल, सिगढ़ों से असेवित और मन्त्रीवृत्त अविनाशी व्रत का मैं पविन होकर सेवन करता हूं। मैं स्थिर वृद्धि, वर्नमेवी नियतगति, संमार परमार्थ को जानने वाला तथा भय नानि लोम और मोहको शोहलर अविनाशी वा नपने व्रतका सेवन करताहूं। .

. अजगरगीता ॥ ५१ मैं अपने लिये फल, सत्य भोज्य और पेय नियत नहीं करता तथा विधाता के नियस किये फलसे देशकालका. विभाग जानता हूं। तथा हृदयको उख. कारी धर्मका सेवन करता हुआ अविनाशी धर्मका सेवन करता हूं, इस व्रतका सेवन खोटे पुरुष नहीं कर सकते ॥ २५-२७ ॥ परमार्थ ही सर्वथा कल्याणकारी निष्करटक मार्ग है मार्ग में बड़ा ही सावधान मनुष्य कभी कोई चल सकता है । राग द्वेष मोहादिमें फंसे प्राणी कदापि इस मार्गमें नहीं चल सकते । इस मार्गमें घबराहट, मृत्यु, दुःख, शोक और मलिनतादि दोष नहीं हैं। इसी कारण इस मार्गमें चलने . वाले के दुःख इसी प्रत्यक्ष शरीरमें क्रमशः लूटते जाते हैं इसी लिये वह अ- पने को कृतकृत्य मानता हुआ बड़े उत्साहसे इस मार्गके अगले २ भागों में प्रवेश करता जाता है। -इदमिदमितिहष्णयाऽभिभूतं जनमनवाप्तधनंविषीदमानम् । निपुणमनुनिशम्यतत्त्वबुद्धया व्रतमिदमाजगरंशुचिरामि॥ बहुविधमनुदृश्यचार्थहेतोःकृपणमिहार्यमनार्यमानयन्तम् । उपशमरुचिरात्मवान्प्रशान्तो व्रतमिदमाजगरंशुचिश्चरामि। सुखमसुखमलाममर्थलाभं रतिमरतिमरणंचजीवितंच । विधिनियतमवेक्ष्यतत्त्वतोऽहं व्रतमिदमाजगरंशुचिरामि ।। अजगर ऋषि कहते हैं कि यह मिला यह मिलेगा इस प्रकारकी तृष्णा से दवाये हुए पुष्कल धन जिसको नहीं मिला ऐसे पुरुपको तत्त्वबुद्धिसे भली भांति दुःखित जान बूझ कर इस अविनाशी व्रतका सेवन करता हूं। धनादि पदार्थायी प्राप्तिको लिये बहुत प्रकारसे आर्यको कृपण मनायं धनीका ना- श्रय लेता हुभा देखकर तथा शान्तिमें रुचि रखने वाला अन्तःकरणको वशी- भूत करता हुआ शान्तिशील मैं इस अपने अविनाशीव्रतका सेवन करता हूं। वस्तुतः सुख, दुःख, हानि, लाभ, रति-प्रीति, अरति-उदासीनता नरण और जन्मको प्रारब्धाधीन स्वभावसे भागमापायी देखकर भी इस अपले अविनाशी व्रतका सेवन करता हूं ॥ २८ ॥ ३० ॥ मनुष्योंको चाहिये कि लोभियोंको दिन रात धन प्राप्तिकी तृणासे द- बाया हुमा प्रायः दुःख भोगते हुओंकी अधोगतिको तथा अनार्य कंजूस ध- : नियोंकी खुशामद धन लाभार्थ आयाँको करते देखकर और सुखदुःखादिकी मैं

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गीतासंग्रहे-
प्राप्तिको पूर्व किये नियत विपाककर्मानुसार अवश्य होने वाली देखकर सं-
सारसे उदासीन रहकर परमार्थमें मन लगाना चाहिये ।
अपगतभयरागमोहदो धृतिमतिबुद्धिसमन्वितःप्रशान्तः ।
उपगतफलभोगिनोनिशम्य वृत्तमिदमाजगरंशुचिरामि॥३१॥
अनियतशयनाशनःप्रकृत्या दमनियमव्रतसत्यशौचयुक्तः ।
अपगतफलसंचयःप्रहृष्टो व्रतमिदमाजगरंशुचिश्चरामि ॥३२॥
अपगतमसुखार्थमीहनार्थ-रुपगतबुद्विरवेक्ष्यचाऽत्मसंस्थम् ।
राषितमनियतमनोनियन्तुं व्रतमिदमाजगरंशुचिश्वरामि॥३३
नहृदयमनुरुध्यवाङ्मनोवा प्रियसुखदुर्लभतामनित्यतां च ।
तदुभयमुपलक्षयन्निवाह व्रतमिदमाजगरंशुचिश्चरामि ॥ ३४॥
अजगर ऋषि कहते हैं कि मैं भय, राग मोह और अहंकारको छोड़कर
धैर्यवती बुद्धिसे युक्त होकर अत्यन्त शान्त हूं । प्राप्त हुए फलको भोगनेवाले
प्राणियोंको जान बूझकर इस अविनाशीव्रतको पवित्रता पूर्वक सेवन करता
हूं। मैं अपने स्वभावके भोजन शयन नियत नहीं रखता तथा दम, नियम
व्रत, सत्य और शौचसे युक्त हूं तथा भोजनादिके लिये फलादिका संचय
नहीं करता हुना प्रसन्नता पूर्वक पवित्रतासे इस अपने अविनाशीव्रतका से-
वन करता हूं । वुद्धिको प्राप्त करके सबको आत्मामें स्थित देखता हुआ इ-
न्द्रियोंकी चेष्टासे होने वाले दुःख भोगार्थ प्रवृत्त बुरी दशामें जाने वाले इस
चञ्चल तृष्णा वाले मनको वशमें करने के लिये इस अविनाशी व्रतका सेवन
करता हूं ! मैं प्रिय सुखको दुर्लभ तथा उनकी अनित्यता जानता हुश्रा हृद-
य मन और वाणीकी कामना पूर्ण न करके अर्थात् इनका अनुगामी न हो
कर अपने अविनाशीव्रतका सेवन करता हूं ॥३१ ३४ ॥
मनुष्यको चाहिये कि एकान्तमें बैठकर ऐसा विचार सदा किया करे कि
मैं भयादि रहित शान्त होकर परमार्थव्रतका सेवन करूं मनमें शुभ वा अशुभ
का दृढ़ संकल्प करना ही मनुष्य के सुधार विगाड़का मूल हेतु है ।
वहुकधितमिदंहिबुद्धिमद्विः कविभिरभिप्रथयद्विरात्मकीर्तिम्
इदमिदमितितनतन्त्रतन्तत् स्वपरमतैर्गहनप्रतर्कयदिः ॥३॥
तदहमनुनिशम्यविप्रपातं पृथगभिपन्नमिहाबुधैर्मनुष्यैः ।
अनवसितमनन्तदोषपारं नृपुविचरामिविनीतदोपतृष्णः॥३६॥

अजगरगीता ॥ ५३ अजगर ऋषि कहते हैं कि अपनी कीर्तिको विस्तृत तथा अपने पराये मतोंसे कठिन २ तर्क करते हुए बुद्धिमान् कवियोंने वहां २ वह २ विषय ब. हुत प्रकारसे कहा है तथा पुष्ट किया है कि यह ठीक वा यह ठीक है। उस को मैं जानता हूं परन्तु मूखौंके जाननेसे वह दूर है तथा अनिश्चित और अनन्त दोष वाला समझा गया है इस विरुद्ध गिरने (पात ) को जानकर दोष तृष्णाको छोड़ता हुआ मनुष्यों में समभावसे विचरता हूं ॥ ३५-३६ ॥ अभिप्राय यह कि बहुतसे व्याख्यानरूप ग्रन्थोंसे मनुष्यको सारग्राही होना चाहिये । जिसको सारांश समझनेकी शक्ति नहीं वह बहुतसे लेखसे कुछ फल प्राप्त नहीं करपाता और सारग्राही हुए विना परमार्थकी ओर भी नहीं चल पाता और न धर्मका मर्म जान पाता है। भीष्मउवाच-अजगरचरितंव्रतमहात्मा यइहनरोऽनुच- रेविनीतरागः । अपगतभयलोभमोहमन्युः सखलुसुखीविच- रेदिमविहारम् ॥ ३७॥ भीष्म जी राजा युधिष्ठिरसे कहते हैं कि हे युधिष्ठिर ! इस संसार में जो रागादिको छोड़कर महात्मा पुरुष अजगर ऋषिके किये व्रतका सेवन करे वह भय, लोभ, मोह और क्रोधको छोड़कर परमानन्दको प्राप्त होजावे ॥३७॥ इति शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि प्रहादाजगर- संवादे १७८ तमोऽध्यायः ॥ 69 • .

गीतामंग्रहे- 7- TAR. शृगालगीता ॥ युधिष्ठिर उवाच-बान्धवाःकर्मवित्तं वा प्रज्ञाचेहपित्तामह ॥ नरस्यकाप्रतिष्ठास्या-देतत्पृष्टीवदस्त्रमे ॥१॥ राजा युधिष्ठिर भीम जी से पूछते हैं कि-हे पितामह ! इस संसारमें १ बान्धव, २ कार्न,३ धन, ४ प्रजा- [अच्छी समझ] इन. चारों में से कौनसा प- दार्थ मनुष्यकी प्रतिष्ठा [ उत्तम स्थिति ] का हेतु है ? मैं यह आपसे पूछता हूं कृपाकर मुझसे कहिये भीमउवाच-प्रज्ञाप्रतिष्ठाभूतानां प्रज्ञालाभ:परोमतः प्रज्ञानिःश्रेयसीली प्रज्ञावर्गोमतःसताम् ॥ २॥ प्रज्ञयानापित्तायोंहि वलिरैश्वर्यसंक्षये। , प्रहादोनमुचिर्मङ्कि-स्तस्याःकिंविद्यतेपरम् ॥ ३ ॥.... अत्राच्युदाहरन्तीम-मितिहासंपुरातनम् । इन्द्रकाश्यपलंवाद तबियोधयुधिष्ठिर ! ॥४॥ वैश्यःकश्चिदपिसुतं काश्यपंसंशितव्रतम् । रथेनपातयामास श्रीमान्दृप्तस्तपस्विनम् ॥ ५॥ आतःसपतिताक्रुद्ध त्यक्त्वाऽऽत्मानमथाब्रवीत् । मरिप्याम्यधनस्येह जीवितायोनविद्यते ॥ ६ ॥ तथामुमूर्षुमासीन-मकूजन्तमचेतसम् । इन्द्रःगालरूपेण वमापेक्षधमानसम् ॥ ७ ॥ भीष्म जी उत्तर देते हैं कि हे युधिष्ठिर ! प्राणियों मनुष्योंकी प्रतिष्ठा उत्तम स्थितिका-हेतु एक नात्र प्रज्ञा है प्रज्ञाका लाभ बड़ा माना गया है। संभारमें निरन्तर दाल्याणका स्थान स्वर्ग और मत्पुरुषोंका मत प्रज्ञा हो है। ऐश्वर्यका नाश होनेयर बलि, प्रहाद नमुचि और नङ्कि प्रज्ञासे ही कृतार्थ हो गये। [जिनमें ग्रहाद और मट्टिका इतिहास इत्ती पुस्तकले भागया है ] इस कारस प्रज्ञामे परे उत्कृष्ट प्रतिष्टाका हेतु दूसरा कोई नहीं है । ऐति. हामिक जन-इस विषयमें एक पुराना इतिहास कहते हैं जो कि-इन्द्र और ५५ से न . मृगालगीता ॥ काश्यपके संवाद नालसे प्रसिद्ध है । उसे तुम समझो सुनो-किसी अभिमानी श्री- मान् वैश्यने प्रशंमित व्रतधारी ऋषिपुन तपस्वी काश्यप को अपने रथसे गिरा दिया या वह काश्यप ऋषिपुत्र गिरा देनेसे हुए अपमानके कारण दुःखित और कुपित होकर शरीर छोड़नेको इच्छासे बोला कि-मैं मर जाऊंगा मुझ निर्धनका जीवन व्यर्थ है इस प्रकार मरनेकी इच्छा वाले, बैठे हुए, मूढ, बुद्ध और चिल्लाते हुए, काश्यपसे शृगालकारूप धारण कर इन्द्रदेवने कहा॥२-७॥ प्रकृष्ट ज्ञान वा उत्तम ज्ञान, जो मिथ्याज्ञानका पूरा विरोधी है जिसको होनेपर मिथ्याज्ञानरूप हृदयका अज्ञानान्धकार नष्ट होजाता है उसी तत्त्व वोधका नाम यहां प्रज्ञा है ऐसे ज्ञान के प्राप्त होने पर ही मनुष्य स्वस्थ शान्ति दशामें ठहर सकता है । इसी ज्ञानको प्राप्तिमें प्रहाद और मङ्कि प्रादि दुःखों छूट गये । इसी ज्ञानके न होने से कश्यपगोत्री ऋषिपुत्रको महा दुःख हुआ और उपदेश मिलनेपर शान्ति सुख उसे मिला ॥ शृगालउवाच-मनुष्यग्रोनिमिच्छन्ति सर्वभूतानिसर्वशः मनुष्यत्वेचविप्रत्वं सर्वएवाभिनन्दति ॥८॥ मनुष्योब्राह्मणश्चासि नोत्रियश्चासिकाश्यप ! सुदुर्लभंतवाप्येतन् नदोषान्मर्तुमर्हसि ॥ ६ ॥ सर्वलाभा:साभिमाना इतिसत्याचतेश्रुतिः । . सन्तोषणीयरूपोऽसि लोभाचदभिमन्यसे ॥ १०॥ अहोसिद्धार्थतातेषां येषांसन्तीह पोणयः । अतीवरुपहयेतेषां येपासन्तीहपाणयः ॥ ११॥ पाणिमद्भ्यःस्पृहास्माकं तथातवधनस्यवे। नपाणिलाभादधिको लाभःकञ्चनविद्यते ॥ १२ ॥ शृगाल रूपधारी देवराज इन्द्र बोले कि-हे काश्यप ! सर्वत्र सब प्राणी मनुष्ययोनिको चाहते हैं और मनुष्यपनमें भी सब कोई ब्राह्मणपनकी प्रशंमा करते हैं। तुम मनुष्य ब्राह्मण और श्रोनिय वेदपाठी हो तुमको तीनों बातें अत्यन्त दुर्लभ प्राप्त होगई हैं अतः तुम दोपसे भरनेके योग्य नहीं हो। अभि- मानको भागे करके सब लाभ प्राप्त किये जाते हैं यह कदाचित् तुमने सत्य श्रवण किया होगा तुम्हारा रूप सन्तोष करने योग्य है तथापि तुम लोभसे अभिमान करके लाभ करना चाहते हो । ओ हो ! वे पुरुष अत्यन्त कृतार्थ प ५६ गीतासंग्रहे- हैं जिनके हाथ विद्यमान हैं। मैं उनकी योनिमें वा उनमें अत्यन्त चाहना रखता हूं जिनके हाथ हैं जैसे हमें हाथ वालोंसे चाहना है वैसे ही तुम्हें धन की स्पृहा-चाह है संसारमें हाथोंके लाभसे अधिक कोई लाभ नहीं है ।८-१२॥ मनुष्यको अप्राप्त धनादि पदार्थोंके न मिलनेका दुःख जब दवावे तब उसको चाहिये कि अपनी दशानोंको सोचे जो कि अपनेसे निकृष्ट कोटिके मनुष्यादिके निकट उखका सामान नहीं है और अपने समीप उनसे सहस्रों गुणे सुखके साधन अधिक हैं इस विचारको चित्त में स्थान देवेगा तो अ- प्राप्त पदार्थोंका दुःख न सतावेगा किन्तु परम सन्तोष प्राप्त होकर ईश्वर को धन्यवाद देगा ॥ अपाणित्वाद्वयंब्रह्मन् ! कण्टकंनोद्धरामहे । जन्तूनुच्चावचानने दशतोनकपामवा ॥ १३ ॥ अथयेषांपुनःपाणी देवदत्तौदशाडगुली। उद्धरन्तिकृमीनङ्गाद दशतीनिकषन्तिच ॥ १४ ॥ वाहिमातपानांच परित्राणानि कुर्वते । चैलमन्नसुखंशय्यां निवातंचोपभुज्जते ॥ १५ ॥ अधिष्ठायचगालोके भुञ्जतेवाहयन्तिच । उपायैर्वहुभिव वश्यानात्मनिकुर्वते ॥ १६॥ येखल्वजिहा:कृपणा अल्पप्राणाअपाणयः। सहन्तेतानिदुःखानि दिष्टयात्वंनतथामुने ! ॥ १७ ॥ देवराज फिर कहते हैं कि हे ब्राह्मण ! हाथ वाले न होनेके कारण हम अपने शरीरमें लगे कण्टकको खींच नहीं सकते तथा काटते हुए छोटे जन्तुओं को पकड़कर दूर नहीं कर सकते हैं यह अत्यन्त दुःखका स्थान है। और प- रमेश्वरके दिये हुए दश अंगुल वाले दो हाथ जिनके होते हैं वे शरीर से क्रांटा प्रादि निकालते और शरीरमें काटते हुए कीड़ोंको दूर कर देते हैं तथा वर्षा, जाड़ा घामसे वचनेके लिये परित्राण-वस्त्र, घर आदि वना लेते हैं और वस्त्र अन्न, सुख, शय्या और सुन्दर निवातस्थानादि का भोग करते हैं। वैलके ऊपर अपना अधिकार करके उसको गाड़ी आदिमें जोतते हैं तथा गौ के दुग्ध को भोगते हुए मुख से काल बिताते हैं। और बहुत उपायों से अन्य प्राणियों को अपने वश में कर लेते हैं। हे मुने ! जो जिहना रहित दीन बिना हाथ वाले हैं वे अनेक दुःखों को सहते हैं । तुम उन दुःखों को नहीं सहते तो तुन अच्छे हो १३-१७॥

५७ . श्रृंगालगीता ॥ पश्वादिकी अपेक्षा मनुष्यके शरीर में हाथ आदि सुखके साधन अधिक अवश्य हैं । मनुष्य हाथ आदि के द्वारा जितनी अधिक अपनी रक्षा कर सकता है उतनी रक्षा पशु कदापि नहीं कर सकता इसी कारण पश्चादि ति- र्यग्योनियों से मनुष्ययोनि श्रेष्ठ मानी जाती है। हम को अच्छे प्रारब्धानुसार पश्वादिसे प्रति उत्तम मनुष्य शरीर मिला इसका ईश्वर को वार २ धन्यवाद देवें और इस.मनुष्य शरीर से ही परमार्थ हो सकता है कि जिस के सिद्ध होने पर त्रिलोकी का राज्य भी तुच्छ ठहर जाता है इस से परमार्थ को नहीं भूलना चाहिये । दिष्टयात्वनशृगालोऽसि नकृमिर्नचमूषिकः । नसोनचमण्डूकी नचान्यःपापयोनिजः ॥ १८ ॥ एतावतापिलाभेन तोष्टुमर्हसिकाश्यप !! किंपुनर्योऽसिसत्त्वानां सर्वेषांब्राह्मणोत्तमः ॥१६॥ इमेमांकृमयोऽदन्ति येषामुद्धरणायवै। नास्तिशक्तिरपाणित्वात् पश्यावस्थामिमांमम ॥२०॥ अकार्यमितिचैवेभ नात्मानंसंत्यजाम्यहम् । नातःपापीयसीयोनि पतैयमपरामिति ॥ २१ ॥ मध्येवैपापयोनीनां शार्गालीयामहंगतः। पापीयस्योबहुतरा इतोऽन्या:पापयोनयः ॥ २२ ॥ श्रृंगाल रूपधारी देवराज इन्द्र ब्राह्मण से कहते हैं कि हे काश्यप ! न्मान्तरीय शुभ कर्मों के प्रताप से तुम-श्रृगाल, कृमि, मूषिक, सर्प, मण्डूक दि कोई पापयोनिज नहीं हो । इतने ही लाभ से तुम को सन्तोष करना ाहिये, तिस पर भी तुम सब प्राणियों से उत्तम ब्राह्मणों में भी उत्तम वा. लण हो अतः परमसन्तोष का स्थान है। मुझ को ये कृमि-खसोटते अको. 'टते काटते खाते हैं परन्तु हाथ न होने के कारया इन को दूर करने की शक्ति मुझ में नहीं है । हे काश्यप !.तुम ध्यानपूर्वक मेरी दीन हीन अवस्था-दशी को देखो। मैं इस श्रृगाल सम्बन्धी शरीर को अधारणीय समझ कर भी त्या- गता नहीं हूं क्योंकि आत्मघात-आत्महत्या शरीरत्याग रूप पाप से इस श्रृ- गालयोनि से भी अधमयोनि को प्राप्त हो जाऊं ऐसी सम्भायना है। पाप - गीतानंग्रहे- योनियों के बीच इस श्रृगान्तयोनि को मैं प्राप्त हुआ हूं इस से भी अत्यन्त नीची अन्य पापयोनि बहुत हैं ॥ १८-२२ ॥ यदि किसी मार्ग पर अगालादि मृग भाजाचे और वहां कोई रथ गाड़ी आदि आती हो तो ऋगालादि वहांसे भाग कर अपनी रक्षा करलेगा । परन्तु चीटी भादि अनेक कृमि मरने से अत्यन्त डरते हुए भी भाग कर अपने को बचा नहीं सकते किन्तु गाड़ी मादि से पिचकर बड़े दुःख से फड़फड़ा कर मर जाते हैं । इस कारण श्रृगालादि की अपेक्षा कृमि कोटादि योनि अत्यन्त अधोगति में हैं। इन प्रकार जब श्रृगालादि भी महस्रों योनियों में अच्छे लखी हैं तो मनुष्य कितना अधिक अच्छा हो सकता है यह शोधने वाले ‘जान लेंगे ऐसी दशा में मनुष्य अपनी जातीय उत्तमता को ध्यान में रखता हुआ भूलमें न रहे किन्तु अपने कल्याणका उपाय भी हमी विद्यमान शरीर में अवश्य करे॥ जात्यैवैकेसुखितराः सन्त्यन्येभृशदुःखिताः । नैकान्तंसुखमेवेह क्वचित्पश्यामिकस्यचित् ॥२३॥ 'मनुष्याह्यादयताप्राप्य राज्यमिच्छन्त्यनन्तरम् । राज्याद्देवत्वमिच्छन्ति देवत्वादिन्द्रतामपि ॥२४॥ भवस्त्वंयद्यपित्वाढ्यो नराजानचदैवतम् । देवत्वंप्राप्यचेन्द्रत्वं नैवतुष्येस्तथासति ॥२५॥ नप्तिःप्रियलाभेऽस्ति तृष्णानाद्विःप्रशाम्यति । संप्रज्वलतिसाभूयः समिद्विरिवपावकः ॥ २६ ॥ अस्त्येवत्वचिशोकोऽपि हर्पश्वाऽपितधात्वयि । सुखदुःखेत्तधाचोभे तत्रकापरिदेवना ॥२॥ श्रृगात रूप देवराज फिर बोले कि हे ब्राह्मण ! कोई तो जाति से अपने को अतिसुखी मानते और कोई जाति से ही अपने को अतिदुःखी मानने हैं इससे मैं किमी को कहीं सर्वदा सुखी नहीं देखता हूं। मनुष्य नाध्य होने के पश्चात् सत्य चाहते, राज्य प्राप्त होने के पीछे देवत्व और दे- बत्य के पश्चात् इन्द्र होना चाहा करते हैं । मानलो कि तुम धनाढ्य होनाक्षी परन्तु राजा और देव नहीं हो सकते । कल्पना करो कि राजा और राजा - फूल श्रृंगालगीता ॥ से देव तथा देव से इन्द्र होजाओ परन्तु तुम्हें सन्तोष कदापि न मिलेगा। क्योंकि प्रिय वस्तुझोंके लाभमें किसीकी तृप्ति होती ही नहीं है और वृष्णा [चाह] अलादि पदार्थोंसे शान्त नहीं होती है किन्तु वह भोगों से अत्यन्त बढ़ती है जैसे समिधाओं से अग्नि बढ़े । हे काश्यप ! तुम्हारे भीतर दोनों हर्ष शोक और सुख दुःख जय विद्यमान हैं तब दुःख-पश्चात्ताप-घृणा ही किस बातमी है क्योंकि धन प्राप्त होने पर भी दोनों ही बने रहेंगे॥२३-२७ ।। संसारमें केवल सुख कहीं है ही नहीं तो किसीको सुख ही प्राप्त कैसे हो सकता है ? । सभी सुखों के साथ जो दुःख व्याप्त होरहे हैं सो सर्वसाधारण के ध्यानमें नहीं जंचते किन्तु समाधिस्य तत्त्वज्ञ पुरुषोंको यह साक्षात् दीखने लगता है कि अन्नमें विषके समान सब विपय सुखोंमें दुःख मिश्रित हो रहा है। इसीसे वे लोग विषय सुखोंकी भोग तृष्णाको छोड़के विरक्त होजाते हैं। विषय दुखोंसे रहित हैं ही नहीं इसीसे विषयभोगाभिलाषी कोई पुरुष स. र्वथा मुखी नहीं है ॥ परिच्छिीवकामानां सर्वेषांचैवकर्मणाम् । मूलंबुद्धीन्द्रियग्रामं शकुन्तानिवपञ्जरे ॥२८॥ नद्वितीयस्यशिरस-श्छेदनविद्यतेक्वचित् । नचपाणेस्तृतीयस्य यन्नास्तिनततोभयम् ॥ २९॥ नखल्वप्यरसज्ञस्य कामवाचनजायते। संस्पर्शादर्शनाट्दापि शवणाद्वापिजायते ॥ ३० ॥ नत्वंस्मरसिवारुण्या नड्वाकानांचपक्षिणाम् । ताभ्यांचाभ्यधिकोभक्ष्यो नकश्चिदविद्यतेचित् ॥ ३१ ॥ यानिचान्यानिभूतेषु भक्ष्यजातानिकाश्यप ! येनामभुक्तपूर्वते तेषामस्मृतिरेवच ॥ ३२॥ जो पुरुप-अपनी तब अभिलाषा और सब कर्मोंको समाप्त करदेता तथा मूल ज्ञानेन्द्रियोंको वशमें ( इस प्रकार करलेता है जैसे कोई शुक श्रादि प- क्षियोंको पीजरे में ) करलेवे वही पुरुष सुखका भागी होता है। कहीं नहीं सुना कि अमुक पुरुष वा प्राणीका दूसरा शिर काटा गया है तथा यह भी श्रोत्रगत नहीं हुआ है कि किसी प्राणीका तीसरा हाथ काटा गया हो वा .

६० गीतामग्रह- कटे इससे सिद्ध हुआ कि जो नहीं है उससे भय नहीं होता। जो पुरुष रस नहीं है उसको देखने, सुनने और छूने से भी कान अभिलाषा नहीं होती तुम वारुणी और नडाका पक्षियों के स्वादशो नहीं जानते हो क्योंकि उन दोनोंके रससे अनभिज्ञ हो । उक्त दोनोंको सानेवाले कहते हैं कि कहीं भी उक्त दोनोंसे उत्तम भक्ष्य नहीं है। हे का काश्यप ! भूतोंमें जो बहुत्तमे : भक्ष्य परन्तु जिनका तुमने स्वाद नहीं लिया है उन का तुर्म को स्मरण भी नहीं है ॥ २८-३२ ॥ जिन विषयोंका हमको स्मरण है कि उनमें ऐसा सुख मिलेगा उन्हीं कामसुखके वा धनादिजन्य सुखके लिये हम लोग दिन रात भाग रहे हैं. और अनेक बड़े छोटे सुख वा विषय ऐसे हैं जिनका लेशमात्र भी हमको स्म- रण नहीं, इसीके अनुसार यदि इन विषयों का भी स्मरणं न होता व न रहे. अथवा हम लोग इन्द्रियोंको विषयों से पृथक् रखकर धीरे २ विषय वासना ओंको भुला देवें तो 'स्वयमेव भूले हुए विषयोंसे भी हनको हर्ष शोक कुछ न हो । यही जीवन्मुक्त दशा है ॥ अप्राशनमसंस्पर्श-मसंदर्शनमेवच। पुरुषस्यैवनियमो मन्येयोनसंशयः ॥ ३३ ॥ पाणिमन्तीबलवन्तो धनवन्तोनसंशयः। मनुष्यामानुषैरेव. दासत्वमुपपादिताः ॥ ३४ ॥ वधबन्धपरिक्लेशैः क्लिश्यन्तिचपुनःपुनः । तेखल्वपिरमन्तेच-मोदन्तेचहसन्तिच ॥३५॥ अपरेबाहुबलिनः कृतविद्यामनस्विनः । जुगुप्सितांसुकृपणां पापवृत्तिमुपासते ॥ ३६ ॥ उत्सहन्तेचतेवृत्ति-मन्यामय्युपसेवितुम् स्वकर्मणानुनियतं भवितव्यतुतत्तथा ॥ ३७॥.... देवराज इन्द्र कहते हैं कि-हे काश्यप ! खाना देखना और छूना इन तीनोंके त्यागका नियम पुरुपके लिये नियम है और मैं जानता हूं कि पु: रुषके लिये उन तीनोंका त्याग परम कल्याणकारी है इसमें कोई संशय नहीं मनुष्पोंने ही बहुतसे हाथ वाले बलवान् धनी पुरुषोंको दास बना रक्खा मनुष्य दाम वध, बन्धनादिके कोशोंमे क्लेश भी. पाते हैं परन्तु वार: वे - शृगालगीता ॥ ६१ यलेश पाते हुए भी क्रीडा करते, प्रसन्न होते और हंसते हैं । दूसरे बाहुबली, विद्वान् और मनखी पुरुष प्रतिनिन्दित दीन हीन पापवृत्ति--सेवाको करते हैं। और वे अन्य सेवावत्तिको भी सेवन करनेके लिये उत्साह करते हैं यह सब अपने २ कमों का फल है और वैसा ही होना चाहिये ॥ ३३-३७ ॥ मनुष्य इन्द्रियों के विषयोंका दास. सेवक उपासक न हो किन्तु इन्द्रियों फो वशीभूत कर सके तो वह किसीका दास न रहे, और सब बड़े २ लोग उस से दबने लगे। पराधीनता ही मनुष्य के लिये सर्वोपरि दुःख है और विषय भोगका लालच ही पराधीनताका प्रधान कारण है। इस लिये जो कोई प- राधीनताके दुःखसे बचना चाहे वह प्रथम विषय सुख भोग के संकल्पों को शिथिल करे। नपुक्कशोनचाण्डाल आत्मानंत्यक्तुमिच्छति। तयातुष्टःस्वयायोन्या मायांपश्यस्वयादृशीम् ॥ ३८ ॥ दृष्ट्वाकुणीन्पक्षहतान् मनुष्यानामयाविनः।। सुखपूर्णःस्वयायोन्या लब्धलाभोऽसिकाश्यप ! ॥ ३८ ॥ यदिब्राह्मणदेहस्ते निरातकोनिरामयः । अङ्कानिचसमग्राणि नचलोकेषुधिवकृतः ॥ १० ॥ नकेनचित्प्रवादेन सत्येनैवापहारिणा।........ धर्मायोत्तिष्ठविप्रर्षे नात्मानंत्यत्तुमर्हसि ॥४१॥ यदिब्रह्मशृणोण्येत-च्छद्दधासिचमेवचः । वेदोक्तस्यैवधर्मस्य फलंमुख्यमवाप्स्यसि ॥ ४२ ॥ । देवराज इन्द्र कहते हैं कि-हे काश्यप ! कंजर और चाण्डाल भी अपने शरी- रको नहीं त्यागता किन्तु वह अपनी योनिसे सन्तुष्ट रहता है । देखो यह कैसी विचित्र लीला है । जिनका पक्ष कोई नहीं करता ऐसे कुणिं टूटा-अ- अहीन रोगी मनुष्योंको देखो । तुम अपनी योनिमें सुखसे पूर्ण हो. तुमको लाभ प्राप्त है इससे तुम्हारा शरीर त्याग करना व्यर्थ है । हे ब्राह्मण! यदि तुम्हारा देह भय रोग रहित तथा शरीरावयव प्रसन्न और लोकमें तुम्हारा अपवाद नहीं है तो हे ब्रह्मर्षे ! शरीर त्याग मत करो प्रत्युत सम्हल कर धर्म के लिये उठी। हे ब्राह्मण ! यदि तुम मेरे बचनको सुनतें तथा उसमें श्रद्धा - ।

-- . 1 - गीतासंग्रहे- रखते हो मेरे कथनानुसारं कार्य करो तो तुमको वेदोक्त कर्म धर्मका मुख्य पाल प्राप्त होगा ॥३८-४२ ।। अन्य अनेक पापोंसे बड़ा आत्मघात पाप है । आत्मघात करने-प्र. पने आप मर जाने वाला मनुष्य विद्यमान योनिसे भी और अधोगतिको ज. न्मान्तरमें भोगता वा पाता है। मनुष्य अपनेको अत्यन्त अधम समझता हुश्रा ही आत्मघात करता है। यही अधम होनेकी बासना ही अधोगतिका का. रण होती है । धर्म, ज्ञान और वैराग्यके सामान जिसके हृदय में अधिक २ स्थान पाते जाते हैं वह कदापि भात्मघात नहीं करता। इससे आत्मघात निकृष्ट है। स्वाध्यायमग्निसंस्कार-मप्रमत्तोऽनुपालय । सत्यंदमंचदानंच स्पष्ठिामाचकेनचित् ॥ १३ ॥ येकेचनखाध्ययनाः प्राप्तांयजनयोजनम् । कथंतेवानुशोचेयु-या॑येयुर्वाप्यशोभनम् । इच्छन्तस्तेविहाराय सुखंमहदवाप्नुयुः ॥ ४४ ॥ उतजाताःसुनक्षत्रे सुतिथौसुमुहूर्तजाः । यज्ञदानप्रजेडायां यतन्तेशक्तिपूर्वकम् ॥ ४५ ॥ नक्षत्रेष्वासुरेष्वन्ये दुस्तिथौदुर्मुहूर्तजाः। संपतन्त्यासुरीयोनिं यज्ञप्रसववर्जिताः ॥ १६ ॥ उन्द्र कहते हैं कि हे काश्यप ! तुम-वेदाध्यन, अग्निहोत्रका पालन- सेवन सावधानतासे भूल प्रमाद छोड़के करो तथा सत्य, इन्द्रिय जय करते हुए किमीसे ईर्ष्या मत करो। जो कोई वेदको पढ़ते हुए यनन याजन करते हैं उनको कदापि शोक तथा बुरा ध्यान विचार न करना चाहिये । यदि वे सुधर्मी बिहार संसारी सुखके लिये इच्छा करें तो बड़े सुखको प्राप्त हो सक्त हैं । जो. पुरुष शुभ नक्षत्र तिथि और मुहूर्तमें उत्पन्न हुए हैं वे यज्ञ दान और प्रजाके लिये यथाशक्ति प्रयत्न करते हैं । और जो पुरुष वुरे नक्षत्र तिथि और मुहूर्त में उत्पन्न हुए हैं वे यज्ञादि न करते हुए आसुरी योनिको प्राप्त होते हैं ॥ ४३-४६॥ मनुष्यों को तव दशामें वेदोक्त कर्म ही उस देने वाला है इस लिये इस उत्तम मार्गको न छोड़े। तथा धमात्ना पुण्यात्मा सुहृद् विद्वानोंसे जो जन्मसे + ।

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शृगालगीता ॥
६३
शुद्ध हैं सदा मेल मीति रक्खे सत्सङ्ग करे आसुरी सम्पत्ति वाले अधर्मी
अपरसे बनावटी मुख देखी वातें करने वालोंसे मदा अन्नग रहै इस प्रकार
जिसका जीवन व्यतीत होता हो वह परम सुखको भागी हो सकता है ।।
अहमासंपण्डितको हैतुकोवेदनिन्दकः ।
आन्वीक्षिकीतर्कविद्या-मनुरक्तोनिरर्थिकाम् ॥ १७ ॥
हेतुवादान्प्रवदितो वदितासंसत्सुहेतुमत् ।
आक्रोष्टाचातिवक्ताच ब्रह्मवाक्येषुवैद्विजान् ॥ ४८ ॥
नास्तिकःसर्वशङ्कीच मूर्खःपण्डितमानिकः ।
तस्येयंफलनिर्वृत्तिः शृगालत्वंममद्विज ! ॥ १६ ॥
अपिजातुतधातस्मा--दहोरात्रशतैरपि।
यदहंमानुपीयोनि श्रृगालःप्राप्नुयांपुनः ॥ ५०॥
सन्तुष्टश्चाप्रमत्तश्च यज्ञदानतपोरतः ।
ज्ञेयज्ञाताभवेयं च वयंवर्जयितासदा ॥ १ ॥
शृगाल रूपधारी इन्द्र कहते हैं कि मैं मनुष्ययोनिमें पूर्व-पण्डित, है.
तुक और वेदनिन्दक-नास्तिक था और तर्कप्रधान न्यायविद्यामें व्यर्थ ही
प्रेम रखता था । कारणवादोंको कहने वाला, सभाओं में प्रबलवाके साथ पू.
र्वपक्षों को कारणवादसे खण्डन करता तथा वेदवाक्योंमें ब्राह्मणोंका उपहास
करता हुमा उनको परास्त करदेता था । नास्तिक, सर्वशङ्की, मूर्ख और अ-
पनेको पण्डित मानता था हे ब्राह्मण ! उसीका फल यह मुझे शृगालयोनि
प्राप्त हुई है। हे ब्राह्मण ! यदि मैं सैकड़ों दिन रातके पश्चात् भी कदाचित
शृगालयोनिसे मनुष्ययोनिको फिर प्राप्त हो जाऊतो सन्तुष्ट और अप्रमत्त होकर
यज, दान, तप,में तत्पर हुआ आत्मादिका ज्ञान प्राप्त करूं और वर्जनीयका त्याग
करदूंगा तथा फिर नीचयोनिमें लानेवाले कर्मोंको कदापि न करूंगा ॥४७-५१॥
वेदमतानुयायी या आस्तिक होनेका मुख्य प्राशय यह है कि परोक्षपर
विश्वास हो केवल प्रत्यक्ष और अनुमानका सहारा न लेवे वेदको स्वतः प्र-
माण माने। वेदमें कहा विषय तर्कानुकूल समझमें न आवे तो भी तर्कके
द्वारा उसकी ओर अरुचि न करे ।
ततःसमुनिरुत्थाय काश्यपस्तमुवाचह ।
अहोवतासि कुशली बुद्धिमाश्चेतिविस्मितः ॥ ५२ ॥

६४ गीतासंग्रहे- समवेक्षततंविपो ज्ञानदीभ्रुणचक्षुषा । ददर्शचैनंदेवानां देवमिन्द्रंशचीपतिम् ॥ ५३ ॥ ततःसंपूजयामोस काश्यपोहरिवाहनम् । अनुज्ञातस्तुतेनाथ प्रविवेशस्वमालयम् ॥ ५४ ॥ पश्चात् यह काश्यप मुनि उठकर शृगाल रूपधारी इन्द्रंसे निश्चित हुना बोला कि ओहो ! ! तुम बड़े बुद्धिमान और चतुर हो पश्चात् काश्यप ब्राह्मण ने ज्ञानसे दीर्घ चक्षु (योगाभ्यास रीति) से उस गाल रूपधारी इन्द्रको देखा और जाना कि ये तो देवोंके देव शचीपति इन्द्र हैं। पीछे काश्यपने इन्द्रकी पूजा की और इन्द्रकी नाज्ञासे अपने घरको चलागया ॥ ५२--५४ ॥ इति शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि श्रृंगाल काश्यप संवादे १८० तमोऽध्यायः॥ सेवको सारांश यह है कि मनुष्य धनादिकी अधिक तृष्णाको छोड़े। तृष्णाके रहनेपर भी अप्राप्तिके दुःखसे संतप्त न हो संसारकी उच्च-नीच दशा कर्मानुसार देखता हुआ अपनेसे नीचोंकी अपेक्षा अपनेको उत्तम कक्षामें भा- नता हुआ सन्तोषके साथ श्रुतिस्मृति पुराणोक्त धर्मका श्रद्धा सहित सेवन करे। जैसे रोगकी चिकित्सा शीघ्र करनेसे दुःख निवृत्त होता वैसे प्रकृष्ट बुद्धि की प्राप्तिसे संसारी दुःखोंको हटाना चाहिये । है . .. इति शृगालगीता समाप्ता ॥ 4 अथ षड्जगीतारम्भः। इत्युक्तवतिभीभेतु तूष्णीभूतेयुधिष्ठिरे। पप्रच्छावसथंगत्वा भ्रातृविदुरपञ्चमान् ॥ १॥ धर्म चार्थचकामेच लोकवृत्तिःसमाहिता। तेषांगरीयानकतमो मध्यमाकोल घुश्कः ॥२॥ कस्मिंश्चात्मानिधातव्य-त्रिवर्गविजयायवै। संहृष्टानैष्ठिकंवाक्यं यथावद्वक्तुमर्हथ ॥ ३॥ ततोऽर्थगतितत्त्वज्ञः प्रथमंप्रतिभानवान् । जगादविदुरोवाक्यं धर्मशास्त्रमनुस्मरन् ॥ ४ ॥ भा०-पूर्व प्रसंग को कह कर भीम जी के चुप हो जाने पर राजा युधिष्ठिर ने अपने घर पर जाकर अपने चार भाई और पांचवें विदुर से पूछा कि धर्म अर्थ और काम पर लोगों की प्रवृत्ति चल रही है उन धर्नादि तीनों में उ- तम मध्यम निकृष्ट कौन २ है । इत्त त्रिवर्ग की प्राप्ति के लिये विशेष कर धर्मादि किस एक पर आरूढ़ होना चाहिये । आप लोग इस विषय में सा- रांश निचोड़ सिद्धान्त कहिये । तदनन्तर पहिले अर्थ गतिका तत्त्व जानने तथा स्मरण शक्ति वाले विदुर जी धर्मशास्त्र का तत्व स्मरण करते हुए निम्न प्र- कार से बोले ॥ ४ ॥ इस उपाख्यान का नाम पड्गीता क्यों हुआ सो भी हम यहीं जताये देते हैं । १-विदुर । २-अर्जुन, ३-नकुल, ४-सहदेव, ५-भीनसेन, ६-युधिष्ठिर इन छः से प्रकट हुआ और गाया नाम कहा गया उपकारी हि- तोपदेश विषय पहजगीता कहाया ॥ विदुर उवाच-बाहुश्रुत्यंतपस्त्यागः श्रद्धायज्ञक्रियाक्षमा । भावशुद्विर्दयासत्यं संयमश्यात्मसंपदः ॥ ५॥ एतदेवाभिपद्यस्व मातेऽभूञ्चलितंमनः । एतन्मूलौहिधर्मार्था-वेतदेकपदहिमे ॥ ६ ॥ धर्मणवर्षयस्तीर्णा धर्मलीका प्रतिष्ठिताः। धर्मणदेवाववृधु-धर्मचार्थःसमाहितः ॥ ७॥ धर्मोराजन् ! गुरुन्नेष्ठो मध्यगोह्यर्थउच्यते ।

" - - ६६ गीतासंग्रहे- कामोयवीयानितिच प्रवदन्तिमनीषिणः ॥ ८॥ तस्माद्धर्मप्रधानेन भवितव्ययतात्मना। तथाचसर्वभूतेषु वर्तितव्यंयथात्मनि ॥ ६ ॥ भा-बहुत होना, तप करना, त्यागी होना, श्रद्धा होना, या करना, क्षमा करना, हृदयकी शुद्धि, दया, सत्य और संयम ये सब आत्मसम्पत् हैं । इन सत्रको अपनी संपत्ति मानना चाहिये । हे युधिष्ठिर ! हे राजन्तुम इसी प्रात्म सम्पत्की रक्षा करो तुम्हारा मन अन्यत्र चलायमान न हो इसी आत्मसंपत् के भाभय से धन तथा अर्थ स्थित है और यही सम्पत् हमारा नवलम्ब है। धर्म रूप नौका से ही अपि लोग संसार मागर के पार हो गये, धर्मके सहारे से ही संसार की स्थिति है, धर्म से ही देवता बड़े उन्नति को प्राप्त हुए और धर्म के आधीन ही धन संपत्ति है । हे राजन् ! गणना में धर्म पहिला और श्रेष्ठ तथा वजनदार नान गौरव युक्त है अर्थ मध्यम और काम निकृष्ट कोटि का है ऐसा विद्वान् लोग कहते हैं । इससे अपने आप को वशीभूत करते हुए भाप को धर्म प्रधान होना चाहिये अर्थात् धर्म को सब से बड़ा मानो। और हे राजन् ! सब प्राणियों के साथ वैसा वर्ताव करना चाहिये कि जैसा स्वयं अपने माय अन्यों का वर्ताव चाहते हो। यही नात्मप्रिय धर्मका ल. क्षण सब के लिये सुगम है ॥ ९ ॥ अर्जुन उवाच-कर्मभूमिरियंराजबिहवार्ताप्रशस्यते । कृपिवाणिज्यगोरक्षं शिल्पानिविविधानिच ॥१०॥ अर्थइत्येवसर्वपां कर्मणामव्यतिक्रमः । नातेऽथैनवतैते धर्मकामावितिश्रुतिः ॥ १९ ॥. . विषयीर्थवान्धर्म माराधयितुमुत्तमम् । कामंचचरितुंशक्तो दुष्प्रापमकृतात्मभिः ॥ १२ ॥ अर्थस्यावयवावेतौ धर्मकामावितिश्रुतिः । अर्थसिद्धौविनिर्वृत्ता-वुभावतीभविष्यतः ॥ १३ ॥ तद्गतार्थहिपुरुषं विशिष्टतरयोनयः । ब्रह्माणमिवभूतानि सततंपर्युपासते ॥ १४ ॥ जटाजिनचरादान्ताः पङ्कदिग्धाजितेन्द्रियाः । मुण्डानिस्तन्तत्रश्चापि वसन्त्यार्थिनःपथक् ॥१५॥ 1 . षड्जगीता ॥ ទេ काषायवसनाश्चान्ये श्मनु लाहीनिषेविणः । विद्वांसश्चैवशान्ताश्च मुक्ताःसर्वपरिग्रहः ॥ १६ ॥ अार्थिनःसन्तिकेचि-दपरेस्वर्गकाङक्षिणः । कुलप्रत्यागमाश्चैके स्वस्वधर्ममनुष्ठिता : ॥ १७ ॥ आस्तिकानास्तिकाश्चैव नियताःसंयमेपरे। अप्रज्ञानंतमोभूतं प्रज्ञानंतुप्रकाशिता ॥१८॥ भृत्यान्भोगैर्द्विषोदण्डैयोयोजयतिसोऽर्थवान् । एतन्मतिमतांनष्ठ मतममयथायथम् ॥ १६ ॥ अनयोस्तुनिबोधत्वं वचनंवाक्यकण्ठयोः ॥ २० ॥ भावार्थ:-अर्जुन कहते हैं कि हे राजन् ! यह संसार कर्म भूमि है, इस जगत्में वार्ता नाम पुरुषार्थकी प्रशंसा है, कृषि, वाणिज्य गोरक्षा और अ- नेह विध शिल्प विद्या रूप कलाकौशलकी उन्नति करनी चाहिये । एक धन के पुष्कल होनेसे प्रायः सभी काम ठीक २ सिद्ध हो जाते हैं । वेदमें कहा है कि धनके बिना धर्म और कामकी सिद्ध नहीं होती इससे धन रूप अर्थ ही मुख्य है। धनवान् पुरुष धनसाध्य विषयोंके द्वारा उत्तम धर्मका सेवन कर सकता है जैसे उपदेशकोंके शब्द रूप विषयके द्वारा धर्मोपदेशका प्रचार कर ना, अच्छे २ वस्त्रादि दानसे स्पर्शसम्बन्धी उपकार, दर्शनीय रूपवान्का दान, अच्छे स्वादिष्ट भोजन ब्राह्मणोंको कराना इत्यादि प्रकार धनसे शब्द स्पर्श रूप रस गन्ध द्वारा धर्मका उत्तम सेवन हो सकता है । धनके द्वारा वह उत्तम कामभोग प्राप्त हो सकता है कि जो साधारण निर्धन लोगोंको कभी प्राप्त नहीं हो सकता। धर्म तथा काम ये दोनों अर्थके ही अंश घा हिस्से हैं अर्थक होनेपर दोनों धर्म काम सिद्ध हो जाते हैं । जिसके पास पुष्कल धन होता है उसकी अच्छे २ कुलीन वा विद्वान् ऐसे निरन्तर उपासना करते हैं कि जैसे सब प्राणी विधाता ब्रह्माजीको मानते हैं । मृगचर्म और जटाधारी जितेन्द्रि- य ब्रह्मचारी महात्मा विभूति लगाये मनस्वी तपस्वी तथा मुंडे हुए दिगम्बर संन्यासी गेरुवा,कपड़ोंवाले, डाढ़ी मंछ रखाये शान्त विद्वान् सब धनादिके त्यागी ऐसे लोग भी भोजन वस्त्रादिके लिये धनियोंके घर आते हैं। कोई धनार्थी :: होते हैं कोई खर्गके भोग चाहते, कोई कुल परम्परागत धर्मके प्रेमी होते कोई वेदोक्त धर्म को ही बड़ा कहते मानते हैं नास्तिक नास्तिक दोनों ही धारणा ध्यान समाधिरूप उत्तम संयममें नियत दीखते प्रकृष्ट जानका न होना -

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६८
गीतासंग्रहे-
ही अन्धकार और प्रकृष्ट ज्ञान ही मुख्य कर प्रकाश रूप है। जो
पुरुष
स्त्री
पुत्र भृत्यादिका ठीक २ पालन पोषण करता और शत्रुओंको दण्ड देता है
वही जानो अर्यवान् वा धनी है । हे बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ राजन् ! यह तो मेरी
सम्नति वा राय है । अब भाप ज़िनले काठमें वाक्य आये हुए हैं ऐसे कहने
को तयार नकुल महदेवकी भी राय जुन लीजिये । धर्मावतारका प्रश्न है
कि धर्म अर्थ, कान इन तीनों में कौन बड़ा तथा मुख्य है इस पर विदुर जी
ने धर्नको मुख्य वा श्रेष्ठ कहा
और
यह
भी जताया कि
एक धर्मका ही ठीक
ठीक सेवन करने पर भर्य और काम दोनों यथावत् पूर्णरुपसे सिद्ध हो जाते हैं
इस लिये धर्मको बड़ा श्रेष्ठ मानना चाहिये क्योंकि एक धर्मसे ही संसार
भरके उत्तमसे उत्तम स्वर्गादिके भी अर्थ और कामभोग मनुष्यको प्राप्त हो
जाते हैं। श्रेष्ठ होने से ही धर्म पहिले अर्थ वीचमें और काम सबसे पीछे
बोला जाता है कि धर्मार्थ शाम, व्यासजीने चतुःश्लोकी महाभारतमें कहा है
सि ( धादर्थयकामञ्च नकस्माननियेव्यते ) धर्मसे ही जब अर्थ और काम की
सिद्धि होती है तो उसी एकका तन मन धन सेवन क्यों नहीं किया जाता?।
इस प्रकार विदुरजीने धर्मको बड़ा कहा । तदनन्तर उक्त रीतिते अर्जुनने
अर्थ नाम धनको मुख्य कहा और माना है कि जिसके पास धन है वह यज
दानादि बड़े २ धनके काम कर सकता है। उत्तम २ त्रियां भी धनीको प्राप्त
हो सकती हैं इनसे अर्य मुख्य है अर्थले धर्न और काम दोनों सिद्ध हो सकते
हैं। यह अर्जुनशा अभिप्राय हुआ तब नकुल सहदेव बोले ।
आसीनश्चशयानश्न विचरन्नपिवास्थितः ।
अर्थयोगंदृढकुर्या-छोगैरुच्चावचैरपि ॥ २१ ॥
अस्मिंस्तुविनिर्वृत्ते दुर्लभेपरमप्रिये ।
इहकामानानोति प्रत्यक्षनात्र संशयः ॥ २२ ॥
योऽर्योधणसंयुक्तो धर्मोयवार्थसंयुनः ।
तद्वित्वामृनसंवाई तस्मादेनौमताबिह ॥ २३ ॥
अनर्थस्यनकामोऽस्ति तथाऽर्थोऽधर्मिणःकुतः ।
तस्मादुद्विजतेलोको धर्मार्थाद्योबहिष्कृतः ॥ २४
तस्माद्धर्मप्रधानन साध्योऽर्थःसंयतात्मना।
विन्धस्तेपुहिभूतेषु कल्पतेसर्वमेवहि ॥ २५ ॥

६०
॥
मानने वाले मनुष्य
पड़जगीता ॥
धर्मसमाचरेत्पूर्व ततोऽर्थधर्मसंयुतम् ।
ततःकामंवरेत्पश्चात् सिद्धार्थस्यहितत्परम् ॥ २६ ॥
भा-बैठा, लेटा, चलता और खड़ा हुआ सब हालतोंमें छोटे बड़े उपायों
द्वारा धन प्राप्त करनेका दृढ़ प्रबन्धकरे । इस परमप्रिय दुर्लभ धनैश्वर्यकी पुष्कल
माप्तिका अच्छा सिलसिला हो जानेपर इस संसारमें निःसन्देह प्रत्यक्षमें उ-
तमोत्तम भोग प्राप्त हो जाते हैं। जो धन धर्मसे युक्त होता और जो धर्म
धनसे युक्त होता है [ धन प्राप्त होनेपर उसको दान धर्मादिमें लगाना धन
को धर्म से युक्त करना है और वेदाध्ययन वा याननरूप धर्मसे धनका लाभ
। होना धर्मको धनसे युक्त करना माना जायगा ] यही स्वर्गप्राप्तिका साधन है
इससे धर्म अर्थ दोनों श्रेष्ठ माने गये हैं। निर्धनको काम सुख प्राप्त नहीं हो
सकता और चोरी वा छल कपटादि करने वाले अधीके पास प्रायः धन भी
नहीं रहता इसी कारण धर्म अर्थ दोनोंसे हीन पुरुषसे लोग डरा करते हैं।
तिससे यह पाया कि अपने आपमें रहते हुए धर्मको मुख्य
को धनप्राप्तिका उपाय करना चाहिये। विश्वासपात्र मनुष्यके सभी काम अच्छे
होते हैं इस कारण विश्वासपात्रका संपादन करना आवश्यक है। पहिले शुद्ध
अहैतुक धर्मका सेवन करे तदनन्तर धर्मसंयुक्त नाम धर्मके कामोंसे आनेवाले
धनसंचयका उद्योग करे और धनादिके प्राप्त हो जाने पर कामसुखकी प्राप्ति
के लिये विवाह करे क्योंकि धर्म और अर्थके हुए विना कामकी प्राप्ति सुख-
दायक कदापि नहीं हो सकती है।
तात्पर्य यह है कि नकुल सहदेवकी राय यह है कि तीनोंमें धर्म ही मुख्य
है इस कारण धर्मानुष्ठान पूर्वक ही धनसंचयका उद्योग करना चाहिये धनको
प्राप्त करना कठिन तथा दुर्लभ है और धर्मानुकूल धन हुए विना सुख मिल
नहीं सकता इस कारण सुखार्थीको अर्थरूप धनकी आवश्यकता है। इसके
बाद राजा पाण्डुके पुत्र भीनमेन बोले कि-
नाकाम:कामयत्यर्थं नाकामीधर्ममिच्छति।
नाकामः काममामोति तस्मात्कामोविशिष्यते ॥२७॥
कामेनयुक्ताऋषयस्तपसेतुसमाहिताः ।
पलाशफलमूलादा वायुभक्षा:सुसंयताः ॥२८॥
वेदोपवेदेवपरे युक्ता:स्वाध्यायपारगाः।
नद्वायज्ञक्रियायांच तथादानप्रतिग्रहे ॥२९॥

. गीतासंग्रहे- वणिजःकर्षकागोपाः कारवःशिल्पिनस्तथा। दैवकर्मकृतश्चैव युक्ता:कामेनकर्मसु॥३०॥ समुद्रंबाविशन्त्यन्ये नराःकामेनसंयुत्ताः । कामोहिविविधाकारः सर्वकामेनसन्ततम्॥३१॥ नास्तिनासीन्नाभविष्यत् भूतंकामात्मकात्परम् एतत्सारंमहाराज धर्मार्थावत्रसंस्थितौ ॥ ३२ ॥ नवनीतंयथादध्नस्तथाकामोऽर्थधर्मतः। श्रेयस्तैलंहिपिण्याका घृतंयउदश्वित:॥३॥ भा०-कामनाके विना धनको नहीं चाहता और कामना हुए विनाधर्मको भी इच्छा कोई नहीं करता और कामनाके विना स्त्रीसंबद्ध कामभोगको भी. प्राप्त नहीं होता इससे काम ही मुख्य है । फल फूल पत्ते खाने वाले अथवा वायुभती जितेन्द्रिय ऋषिलोग कामनासे युक्त होकर तप करनेके लिये एका ग्रचित्तसे कटिबद्ध होते हैं। तथा अन्य वेदपारग विद्वान् ब्राह्मणादि लोग: वेद उपवेदके अध्ययन में श्रद्धापूर्वक यज्ञ करनेमें तथा दान देने और दान लेने में कामना पूर्वक ही प्रवृत्त होते हैं । वनिये किसान ग्वाला बढ़ई लुहारादि: शिल्पी चित्रकारादि, दैवको प्रधान मानके कर्म करने वाले इत्यादि सब काम: नासे युक्त हो कर ही अपना २ कर्म करते हैं। कोई लोग कामना होनेपर ही समुद्र रत्नादि सोजने के लिये समुद्र में प्रवेश करते वा समुद्र के पार जाते हैं । संसारमें कामके अनेकरूप हैं. यह सब जगत् कामसे ही विस्तृत हुआ है (सोऽ कामयत वहुस्याम् ) .उस ईश्वरने कामना पूर्वक ही संसारको बनाया है ऐसा कोई प्राणी अवतक नहीं हुमान प्रव है न मागे होगा कि जिसमें कुछ:. भी कामना ही न हो। हे महाराज युधिष्ठिर ! यह काम ही सार है धर्म और अर्थ इसी कामके आश्रयसें ठहरे हैं । जैसे दहीमें घी व्यापक. है चले ही धर्म और अर्थमें सारांशरूपसे काम व्यापक है । जैसे घी निकल जानेपर दही नहीं रहता वैसे कामनाके अभावमें धर्म अर्थ भी कुछ नहीं रहते। पिण्याक से तैल और महासे घी जैसे उत्तम है वैसे ही धर्म अर्थसे काम श्रेष्ठ है ॥३३॥ श्रेयःपुष्पफलंकाष्ठात् कामोधर्मार्थयोर्वरः। पुष्पतीमाध्वीकरसः कामंआभ्यांतथास्मृतः ॥ कामोधर्मार्थयोयोनिः कामञ्चायतदात्मकः॥३४॥ -- षड्गीता ॥ ७१ नाकामतीब्राह्मणा:स्वन्नमर्थान्नाकामतीददतिब्राह्मणेभ्यः । नाकामतोविविधालोकचेष्टातस्मात्कामाप्राकत्रिवर्गस्यदृष्टः॥ सुचारुवेषाभिरलङ्कृताभिर्मदोत्कटामिःप्रियदर्शनाभिः । रमस्वयोषाभिरुपेत्यकामं कामोहिराजन्यपरोभवेन्नः ३६॥ घुद्धिर्ममैषापरिखास्थितस्य माभूदविचारस्तवधर्मपुत्र ! स्यात्संहितंसदिरफल्गुसारं ममेतिवाक्यंपरमानृशंसम् ॥३७॥ धर्मार्थकामा:सममेवसेव्या योोकभक्तःसनरोजघन्यः । तयोस्तुदाक्ष्यप्रवदन्तिमध्यं सउत्तमोयोऽभिरतस्थिवर्ग ॥३८॥ भापार्थः-जैसे वृक्षको लकड़ी से फूल फल श्रेष्ठ हैं वैसे ही धर्म अर्थसे काम श्रेष्ठ है क्योंकि धर्म अर्थका सारात्मक मूल वीज काम ही है। जैसे फूलसे मधु शहद् अच्छा है वैसे ही धर्मार्थसे काम अच्छा है । धर्मार्थका कारण और धर्मार्थरूप काम ही है ॥ ३४ ॥ कामनाके विना ब्राह्मण लोग अच्छे २ अन्न धनको नहीं लेते, कामनाके विना ब्राह्मणोंको कोई दान नहीं देता, कामना के विना चलना फिरना आदि कुछ भी क्रिया नहीं होती,तिससे काम ही तीनों में श्रेष्ठ देखा गया है ॥ ३५ ॥ और हे राजन् ! हम लोगोंमें काम ही बड़ा है क्योंकि कामनाको प्राप्त हो कर ही आप अच्छे वेषों वाली अलङ्कृत प्रसन्न वदन सुन्दरी रूपवती स्त्रियोंके साथ रमण करते हो ॥३६॥ भीमसेन पाण्डव राजा युधिष्ठिर से कहते हैं कि हे धर्मपुत्र राजन् ! मेरी यह बुद्धि उच्च कोटिकी है आप इसमें कुछ विचार न कीजिये मेरा यह उपरोक्त कथन मनुष्यों का परम हितकारी, सत्पुरुषोंको अभिमत प्रबल सार स्वरूप है ॥ ३७ ॥ धर्म अर्थ काम इन तीनोंका साथ २ ही सेवन करना चाहिये। इनमें से जो किसी . एक का सेवन करता है वह निकृष्ट, दो का सेवन करने वाला मध्यम और तीनों का एक साथ सेवन करने वाला उत्तम है ॥ ३८ ॥ अभिप्राय यह कि मन्वादि महर्षि कहते हैं कि कामना के विना संसार में कुछ नहीं होता इस से धर्मादि सबका मूल कामना ही है। भीमसेन का विचार सुनके राजा युधिष्ठिर स्वयं बोले कि- निःसंशयंनिश्चिनधर्मशास्त्राः सर्वेभवन्तीविदितप्रमाणाः । विज्ञातुकामस्यममेहवाक्य-मुक्तंय?नैष्ठिकंतत्श्रुतंभे ॥३९ ॥ इदन्त्वपश्यंगदतोममापि वाक्यंनिबोधध्वमनन्यभावाः । ! .

१२ - गीतामंग्रह- यो वै न पापे निरतो न पुण्ये नाथै न धर्म मनुजी न कामे । विमुक्तदोषःसमलोष्ठकाञ्चनो विमुच्यतेदुःखसुखार्थसिद्धः ॥४०॥ भूतानिजानिस्मरणात्मकानि जराविकारैश्चसमन्वितानि । भूयश्चतस्तैःप्रतियोधितानि मोक्षप्रशंसन्तिनतंचविद्मः ॥४१॥ स्नेहेनयुक्तस्यनचास्तिमुक्ति-रितिस्वयंभूर्भगवानुवाच । बुधावनिर्वाणपराभवन्ति तस्मान्नकुर्याप्रियमप्रियंत्र ॥४२॥ एतत्प्रधानचनकामकारो यथानियुक्तोऽस्मितथाकरोमि। भूतानिसर्वाणिविधिनियुङ्क्ते विधिर्बलीयानितिवित्तसर्वे ॥४३॥ नकर्मणाप्नोत्यनवाप्यमर्थं यद्वावितवैभवतीतिवित्त । त्रिवर्गहीनापिहिविन्दतेऽथ तस्मादहोलोकहितायगुह्यम्।४४॥ इतिमहाभा०शान्तिपर्वणि १६७ अध्याये षड्जगीता समाप्ता । भा०-इसमें कुछ भी सन्देह नहीं कि भाप सब लोग प्रमाणोंके जानने वाले तथा धर्म शास्त्रोंक्षा निश्चय मन्तव्य ठीक जानने वाले हैं। क्योंकि आप लोगों की राय सुनना चाहते हुए मेरे प्रस्तावपर आप सब ने शास्त्र सम्मत अच्छा विचार कहा ॥ ३९ ॥ परन्तु अब एकाग्रचित्तसे कुछ मेरा भी निम्न विचार अवश्य सुन लीजिये कि जो पुरय, धर्म अर्थ काम इन किसी में भी विशंप प्रेम नहीं रखता जो किसी में लिस नहीं जिसने रागद्वेषादि दोष छोड़ दिये जो मट्टी और सुवर्शको एकसा देखने वाला है वह सुख दुःख दोनोंसे पृथक् उदासीन होता है ॥ ४० ॥ हम अमुक २ मनुष्यादि हैं ऐसे जाति स्म- रण रूप जरावस्था और भनेक विचारोंसे युक्त प्राणी वार २ बोध कराये जाने पर मोक्षकी प्रशंसा करते हैं पर फिर भी ठीक २ तत्त्व नहीं जाम पाते ॥४१॥ स्नेह वा रागते युक्त पुरुषको मुक्ति नहीं होती यह भगवान् स्वयंभूने कहा है, ज्ञानी लोग निर्वाण मोक्ष में तत्पर होते हैं तिससे प्रिय अप्रिय दोनों त्याज्य हैं ॥ ४२ ॥ यही धर्मादि प्रधान है इसीको सब करें सो अपने आधीन नहीं विधाता की इच्छा बलवती है यह तुम सब जानो ॥ ४३ ॥ अप्राप्य दुर्लभ अर्थ कर्नसे प्राप्त नहीं होता जो भावी है वही होता है। त्रि- वर्ग से हीन पुरुष भी अभीष्ट सुख को प्राप्त हो समता है तिससे यह प्राया कि लोगों का हित क्या है ? यह बात गुप्त कि ज्ञान वै- राग्य की ओर तत्पर होना उत्तम हितकारी है। यह पडनगीता समाप्त हुई। । पुरुष पाप है। अभिप्राय यह अथ हारीतगीतारम्भः॥ युधि०-किंशील:किंसमाचारः किंवेद्यःकिंपरायणः । प्राप्नोतिब्रह्मणःस्थानं यत्परंप्रकृतेर्बुवम् ॥१॥ भीष्म० मोक्षधर्मनिरतो लघ्वाहारीजितेन्द्रियः । प्राप्नोतिपरमंस्थानं यत्परंप्रकृतेर्बुवम् ॥६॥ स्वगृहादभिनिःसृत्य लाभालाभेसमीमुनिः। समुपोढेषुकामेषु निरपेक्षःपरिव्रजेत् ॥३॥ नचक्षुषानमनसा नवाचाटूपयेदपि। नप्रत्यक्षपरोक्षंवा दूपर्णव्याहरेत्वचित् ॥४॥ नहिंस्यात्सर्वभूतानि मैत्रायणगतञ्चरेत् । नेदंजीवितमासाद्य वैरंकुर्वीतकेनचित् ॥५॥ भाषार्थः-राजा युधिष्ठिर भीष्म जी से पूछते हैं कि कैसे स्वभाव और कैसे नाचरण वाला किमको जानने में और क्या काम करने में तत्पर रहने वाला पुरुष प्रकृतिसे परे ब्रह्मके अटल स्थानको प्राप्त होता है ? ॥ पर भीग्म जी कहते हैं कि मोक्ष धर्मों में तत्पर रहनेवाला सूक्ष्म थोड़ा भोजन करनेवाला जितेन्द्रिय पुरुष भगवानके परम पदको प्राप्त होता है ॥२॥ अपने घरसे निकलके विरक्त होकर लाभ अलाभमें समान वृत्ति और मौन रहता हुभा उत्तम २ भोजन वस्त्रादिको अपेक्षा न रखता हुमा विचरे ॥३॥ कड़ी क्रोध भरी निगाहसे किसीको न देखे मनसे किसीका अनिष्ट चिन्तन न करे, वासीसे कटोर वा असत्य अनुचित किसीसे न बोले, सामने वा पीछे किसी की चुगली वा निन्दा कभी न करे अर्थात् किसीका दोष अपनी वाणी जानता हुआ भी कभी न कहे ॥ ४ ॥ किसी प्रागीको दुःख देनेकी लेशमात्र भी चेष्टा न करे, सबसे मिनभाव रक्वे सबको मित्रकी दृष्टिसे देखता हुआ विघरे । इस मानुप देहस्थ जीवनको पाकर किसीसे कभी वैर न सरे ॥ ५ ॥ अतिवादस्तितिक्षेत नावमन्येतकंचन । क्रोध्यमानःप्रियंब्यादानुष्टःकुशलंवदेत् ॥ ६ ॥ प्रदक्षिणंचसव्यंच ग्राममध्येनचाचरेत् । भैक्षचर्यामनापन्नो नगच्छेत्पूर्वकेतितः ॥ ७ ॥ १० गीतासंग्रहे- अवकीर्णःसुगुप्तरच वाचानह्यप्रियंवदेत् । सुदुःस्यादप्रतिरो विलब्धास्यादकत्थनः ॥ ८॥ विधूमेन्यस्तमुसले व्यङ्गारंभुक्तवज्जने। अतीतपात्रसंचारे मिक्षांलिप्सेलवैमानिः ॥ ६ ॥ अलाभेनविपोदीस्याल्लाभेवनहर्षयेत् । प्राणयात्रिकमानःस्यान्मात्रासाद्विनिर्गतः ॥ १० ॥ कोई अपने साथ अधिक बाद विवाद करे तो उसे सह लेने वदलेनें उनरो वैमा ही बाद न करे किसी का भी अपनान न करे, कोई क्रोध करानेकी चेष्टा करता हो तो उससे प्रिय बोले कोई गाली देवे तो भी उसने अनुचित पर ध्यान न देकर उससे प्रेम प्रोतिसे वोले ॥ ६ ॥ गांवके बीचसे निकलने पड़े तो सीधा २ निकल जावे दहिने बायें चल्लर न लगाने, भिक्षा न मिलने पर भी शिसीके यहां निमन्त्रण खानेको न जावे ॥ ७॥ कोई धूलि फेंके वा कोई रक्षा करे तो भी वाणीने किसीको प्रिय अप्रिय सुध न कहे, कोमल रहे क्रूरता का- ठोरता धारण न करे अन्योंका विश्वास पात्र बने पर प्रात्मश्लाघा न करे॥८॥ जब ग्राम नगरादिमें भोजन पकानेका धूम न रहे, कूटना पीसना बंद होजा वे, भङ्गार न रहें सब लोग खा पी चुके दोना पत्तलादि फेंदिये गये हों ऐसे समय तीसरे पहर गांदमें भिक्षा लेनेको जाया करे नौन रहे ॥ ६ ॥ भिक्षा न मिलने पर अनुकूल भिना मिलने पर प्रसन्न न हो जीवनकी रक्षा के लिये आठ वास मात्र भन्न प्रति दिन खाया करे अपने दण्डादि पर भी आसक्ति न करे कि यह दंड अच्छा वा यह बुरा है ॥ १० ॥ लाभसाधारणनेच्छेन भुञ्जीताभिपूजितः । अभिपूजितलाभहि जुगुप्सेतैवसर्वशः ॥११॥ नचान्त्रदोषाबिन्देत नगुणानभिपूजयेत् । शय्यासनेविविक्तेच नित्यमेवामिपूजयेत् ॥१२॥ शून्यागारं वृक्षमूलमरण्यमथवागुहाम् । अज्ञातचर्या गत्वान्यां ततोऽन्यत्रैवसंक्शेित् ॥ १३॥ अनुरोधविरोधाभ्यां समास्यादचलोध्रुवः। सुकृतंदुष्कृतंचोभे नानुरुध्येतकर्मणा ॥ १४ ॥ दुःख न न माने

७५
।
हारीतगीता ॥
नित्यतःसुसंतुष्टः प्रसन्न बदलेन्द्रियः ।
विभीजप्यपरोमौनी वैराग्यं समुपाशितः ॥१५॥
अभ्यस्तंभौतिकंपश्यन् भूतानामागतिंगतिम् ।
निस्पृहासमदर्शीच पक्षापकनवर्तयन् ।
साधारण लाभको न चाहे, अधिक आदर सत्कारके भोजनको स्वीकार
न करे शिन्तु विशेष भादर सत्कारसे होने वाली मान प्रतिष्ठाकी सदाही
चिन्दा किया करे ॥ ११ ॥ अन्नके दोषोंकी निन्दा न करे कि अन्न ऐसा २ वुरा
है अच्छे स्वादिष्ट भोजनको प्रशंसा भी न करे अर्थात् अनुकूल प्रतिकूल भी-
जनमें हर्ष शोक कुछ न करे, एकान्तमें लेटना बैठना आसन लगाना स्वीकार
करे ॥ १२ ॥ जिस शून्य घर वृक्ष मूल वन अथवा गुफा को छोड़कर कहीं भी
चला जावे और वहां लौट पार फिर भावे तो उन सूने घर भादिमें फिर न
ठहरे न कहे वान माने कि ये मेरे स्थान हैं ॥१३॥ किसी पर विशेष कृपादृष्टि
और विसीसे विरोध न करके समदृष्टि रहे चंचलताको त्यागे निश्चल स्थिर
मंति रहे । अपने कर्म द्वारा पाप पुण्य दोनों से ही उदासीन रहे ॥ १४ ॥
नित्य तृप्त संतुष्ट, प्रसन्न मुख और भांखोंसे भी प्रसन्नता प्रकाट कर, निर्भय,
मौनी, प्रणव का जप करने वाला वैराग्यवान रहे ॥ १५ ॥ प्राणियोंके श्रा-
वागमनको अर्थात् जीवन भरण को सामान्य बुद्धिसे देखे प्रार्थात् दोनों में हर्ष
शोक न माने निस्पृह और समदर्शी रहे, कच्चा वा पका जैसा अन्न सिलजावे
उलीका अल्पाहार कर लिया करे ॥
आत्मनायःप्रशान्तात्मा लघवाहारोजितेन्द्रियः ॥१६॥
वाचोनेगमनसःक्रोधवेगं हिंसावेगमुदरीपस्थवेगम् ।
एतान्वेगान्विषहद्वैतपस्वी निन्दाचास्यहृदयंनोपहन्यात् ॥१७॥
मध्यस्थएवतिष्ठेत प्रशंसानिन्दयो:समः ।
एतत्पवित्रपरमं परित्राजकआशामे ॥१८॥
महात्मासर्वतोदान्तः सर्वत्रवानपाश्रितः ।
अपूर्वचारकःसौम्यो ह्यनिकेतःसमाहितः ॥१६॥
वानप्रस्थगृहस्थाभ्यां नसंसृज्येतकर्हि चित् ।
अज्ञातलिसंलिप्सेत नचैनहर्षआविशेत् ॥ २०॥

॥ ७६ गीतासंग्रहे- विजानतांमोक्षएप शामःस्यादविजानताम् । मोक्षयानमिदंकृत्स्नं विदुपांहारितोऽब्रवीत् ॥२१॥ अभयंसर्वभूतेभ्यो दत्त्वायःप्रनजेदगृहोत् । तस्यतेजोमयालीका भवन्तिब्रह्मवादिनः ॥ २२ ॥ इति नी म०मा०शान्तिपर्वणि २७७ अ० हारीतगीता समाप्ता॥ जो चित्तको प्रशान्त स्वरूप रक्खे अल्पाहार करे मितेन्द्रिय रहे वह सं. सार सागर के पार हो जाता है ॥ १६ ॥ वाणी मन हाथ पेट और उपस्थे- न्द्रिय इन सबके वेगको रोके सहलेवे । अर्थात् कठीर बोलनेके समय वाणीके नवेगको जनमें उठे क्रोधको हाथसे मारनेके समय हाथके वेग को, अच्छे भो- जनके लिये भागनेके वेग को और उपस्थमें उठे व्यभिचारके वेगको सह लेना ही परमार्थी होना है। निन्दा करने द्वारा स्वचित्तको न विगाड़े ॥ १७ ॥ प्रशंता और निन्दा में मध्यस्य रहे संन्यासाश्रममें यही परमपवित्र काम है ॥ १८ ॥ सब प्रकार मनको वशीभूत करने वाला महात्मा किसीका आश्रय न लेकर सर्वत्र विचरे । पहिले जहां २ न गया हो वहां २ नयी २जगहों में वि. चरे अपना कोई स्थान नियत न करे सावधान सौम्य स्वभावसे रहे ॥ १९ ॥ वानप्रत्य और गृहस्यसे विशेष संसर्ग न करे, जिसके लाभकी इच्छा किसी को ज्ञात नहीं उस आत्मतत्व प्राप्ति की परन्तु में भी विशेष हर्ष न माने ॥ २० ॥ यह उक्त उपदेश बुद्धिमानोंके लिये मोक्ष स्वरूप तथा विद्वानों के लिये केवल बोझा वा अन है। महर्षि हारीत ने विद्वा नोंके लिये यह मोक्षमार्ग कहा है ॥२१॥ जो द्विज सव प्राणियोंको अभयदान देके घरसे निकलकर विरक्त होता है उस ब्रह्मवादी को प्रकाशमय लोक प्राप्त होते हैं ॥ २२ ॥ मनुस्मृति अ०६ में कहा संन्यास धर्म इस हारीत गीता से विशेषकर मिलता है। अभिप्राय यह है कि इस हारीतगीतामे कहे अनुसार वर्ताव करने वाला परिपक्ष ज्ञानी पुरुष हो सकता है ऐसे आधार विचारों का स्थिर होना ही जीवन्मुक का चिन्ह है। ज्ञानको परिपक्व दशा होनेका लनण यही है कि उत्तन रुपवती युवति वीके एकान्त में निर्विघ्न उपस्थित होने पर भी काम के वेगको उसमें दोपदी होकर रोक सके वा उस दशामें भी काम वासना ही न जागे तो इसीका नाम योग भाग्यमें दग्धवीजावस्था कहा है। यह हारीतगीता पूरी हुई। इच्छा करे किती बात H अथ-हंसगीतारम्भः युधि०-सत्यंदमंक्षमांप्रज्ञा प्रशंसन्तिपितामह !। विद्वांसोमनुजालोके कथमेतन्मतंतव ॥ १॥ भीष्म०-अत्रतेवर्तयिष्योहमितिहासंपुरातनम् । साध्यानामिहसंवाद हंसस्यचयुधिष्ठिर ! ॥२॥ हंसीभूत्वाऽथसौवर्णस्त्वजोनित्याप्रजापतिः। सवैपयेतिलोकांस्त्रीनथसाध्यानुपागमत् ॥३॥ साध्या०-शकुनेवयंस्मदेवावै साध्यास्त्वांमनुयुज्ज्महे । पृच्छामस्त्वांमोक्षधर्म भवांश्चकिल मोक्षवित् ॥४॥ श्रुतोऽसिनःपण्डितोधीरवादी साधुशब्दश्वरतेतेपतत्रिन्। किंमन्यसेश्रेष्ठतमंद्विजत्वंकस्मिन्मनस्तेरमतेमहात्मन् ॥५॥ तन्नःकार्यपक्षिवरप्रशाधि यत्कार्याणांमन्यसेोष्ठमेकम् । यत्कृत्वावैपुरुषःसर्वबन्धैर्विमुच्यतेविहगेन्द्रहशीघ्रम् ॥ ६ ॥ भाषार्थ-राजायुधिष्ठिर जी कहते हैं कि हे भीष्म पितामह जी ! वि- द्वान् मनुष्य लोक में सत्य दम क्षमा और बुद्धि की प्रशंसा करते हैं इस वि- षयमें आप का क्या मन्तव्य है सो पाहिये ॥ १॥ भीष्म जी कहते हैं कि हे । युधिष्ठिर राजन् ! इस विषयमें हंस और साध्य देवोंका संवाद रूप प्राचीन । इतिहास हम दिखाते हैं ॥२॥ पित्य अजन्मा प्रजापति परमात्मा हंसका रूप धारण करके तीनों लोकमें विचरता हुआ साध्य देवों के समीप आया ॥३॥ तब साध्य देव बोले कि हे हंस आप मोक्षतत्त्वके जानने वाले हैं इस से हम : साध्य देव तुमसे मिलकर मोक्षधर्मको पूछते हैं ॥४॥ हमने आप को धीर वादी पण्डित सुना है, हे पक्षिन् ! तुम्हारा उपदेशामृत अच्छा शब्द न निकलता है हे महात्मन् तुम क्या श्रेष्ठ मानते हो और किसमें तुम्हारा । चित्त रमता है ॥ ५॥ हे श्रेष्ठ पक्षिन् ! बहुत कर्तव्यों में जिस एक काम को अतिश्रेष्ठ मानते हो उस की शिक्षा हम को कीजिये कि जिस कान को कर- के पुरुष इस जगत् में सब बन्धनों से छूट जाता है उस कर्तव्य का उपदेश कीजिये ॥६॥ . ... न .

१८ गीतासंग्रहे- हंस-इदंकार्यममृताशाःशृणोमि तपोदमःसत्यमात्माभिगुप्तिः। ग्रन्यान्विमुच्यहृदयस्यसर्वाप्रियाप्रियेवशमानयीत ॥७॥ नारुन्तुःस्यामशंसवादीनहीनतःपरमभ्याददीत.। ययास्यत्राचापरउद्विजेतनलांबदेदुपतीपापलीक्याम् ॥८॥ बाक्सायकावदनान्निःसरन्तियराहतःशीचतिराव्यहानि । परस्यनामर्मसुतेपतन्तिनान्पण्डितोनावलुजेल्परेषु ॥६॥ परदेनमभिबिध्येतवाणैर्भुशंसुतीक्ष्णरनलार्कदीप्तः । संरोष्यमाण:प्रतिहष्यतेयः सआदत्तेसुकृतंवैपरस्य ॥१०॥ क्षेपायमाणमभिषङ्गव्यलोकनिगृह्णातिज्वलितंयश्चमन्युम् । अदुष्टचेतामुदितोऽनसूयुः सआदत्तेसुकृतंवैपरेषाम् ॥११॥ आक्रुश्यमानोनवदामिकिञ्जितक्षमाम्यहंताड्यमानश्यनित्यम् नष्ठं तत्क्षमामाहुरा :सत्यंत्तथैवार्जवमानशंस्यम्॥ १२ ॥ हंस बोला कि-हे साध्यदेवो ? मैं यह कर्तव्य समझता हूं कि काम क्रोधादि सम्बन्धी सबः बन्धनों को छोड़ के प्रिय अप्रिय को अ. पने वश में करे अर्थात् प्रिय अप्रिय के आधीन न हो ॥ ७ ॥ गूढ कठोर वा प्रसिद्ध कठोर न बोले नीच से शत्रुता वा मेल न करे । इस की जिस. वाणी से अन्य लोगों को भय वा घबराहट हो ऐसी पापी लोगों कीसी जलती. हुई वाणी को न बोलें ॥८॥ मुख से कठोर वाणी रूप जो वाण निकलते हैं जिन से मारा हुआ दिन रात शोक करता है वे वाण दूसरों के नर्म स्या- नों में विंध जाते हैं समझादार मनुष्य दूसरों पर वैसे वान्वाण न छोड़े ॥ ८ ॥ यदि अन्य कोई अंग्नि सूर्यादि की गर्मीशी तरह जलते हुए से तीक्ष्ण वाणोंसे जिसके हृदयको बार बंधन करे और अन्य के क्रोध दिलाने पर भी जो कुछ न हो कर प्रसन्न रहे वह अन्य के पुण्य को ले लेता है ॥ १० ॥ मिथ्या दोष लगाने आक्षेप प्रज्वलित हुए क्रोधसंबन्धी वैगको रोकलेने वाला. अनिन्दक चित्तसे वैर न करने वाला पुरुष दोष लगाने वालेका पुण्य ले लेता है ॥११॥ हंस कहता हैं कि मुझे कोई गाली देतो मैं कुछ जवाब नहीं देता और मुझ कोई नारे पीटे तो नित्य ही क्षमा कर देता संह लेता हूं। इस सत्य भाषण कोमलता मनुष्यों को दुःख न देने की चेष्टा और क्षमा करने को आर्य लोग श्रेष्ठ कहते हैं अर्थात द्वेषवर्गक्षा सर्वथा त्याग एक प्रवल परमार्थ है ॥ १२ ॥ हृदय के

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हंसगीता ॥
वेदस्योपनिपत्सत्यं सत्यस्योपनिषदमः ।
दमस्योपनिपन्मोक्ष एतत्सर्वानुशासनम् ॥ १३ ॥
वाचोवेगंमनसःकाधगं विधित्सावेगमुदीपस्थवेगम् ।
एतान्देशान्याविषहेदुदीर्णान् तंमन्येऽहंब्राह्मणवैमुनिचः१४॥
अाधनाध्यनांव विशिष्टस्तथातितिक्षरतित्तिक्षो विशिष्टः ।
अमानुपान्मानुपोवेविशिष्टस्तथाऽज्ञानाजज्ञानविद्वैविशिष्ठः१५
अक्रुश्यमानोनानाशेन्मन्युसेवतितिक्षतु । आकोप्टारंनिर्दह-
तिसुकृतंचास्यविन्दति ॥ १६ ॥ योनात्युक्तः प्राहरूक्षप्रियंवा
योवाहतोनप्रतिहन्तिधैर्यात् । पापञ्जयोनच्छतितस्यहन्तुस्त-
स्येहदेवाःस्पृहयन्तिनित्यम् ॥ १७ ॥
वेद का सत्य तार उपनिषद्, सत्यका तार दम और दम का सार मोक्ष
है यही सब का निचोड़ शिक्षा है ॥ १३ ॥ वाणी के वेग को मन में उठे क्रोध
को वेग को नया कान करने के वेग को दुधा के बंग शो और सुन्दरी युवति
के एकान्त में निर्विघ्न उपस्थित होने पर उठे काम के वेग को इन सब उभड़
हुए प्रवल वायु के से वेगों को जो रोक ले नाम सह लेवे उसी को मैं ब्राह्मण
और मुनि मानता हूं ॥ १४ ॥ जैसे क्रोधियों में क्रोधरहित, असहनशीलों
में सहन शील और तिर्यग्योनियों में मनुष्य श्रेष्ठ है वैसे ही अज्ञानी से ज्ञानी
श्रेष्ठ है ॥ १५ ॥ कोई क्रोध कराना चाहे तो भी क्रोध न करके क्रोध को भार
दे तो वह विरक्त पुरुप फ्रोध करने वालेका नाश करता और उसके पुण्यको
प्राप्त हो जाता है ॥ १६ ॥ जो अन्य के बहुत कहने नाम अनुचित बकने पर
कठोर वा कोमल कुछ नहीं कहता मन में भी कुछ दुःख वा सुख नहीं मान-
ता और जो अन्य दुष्ट के अपने को मारने पीटने पर भी उस दुष्ट को अ-
पने धैर्यसे नहीं मारता और उस मारने वाले का अपने मन में भी अनिष्ट
चिन्तन नहीं करता उस को देवता लोग भी नित्य ही मिलना चाहते हैं ॥१७॥
पापीयसःक्षमेव श्रीयसःसदृशस्यच ।
विमानितीहतोत्कुष्ट एवंसिद्धिंगमिष्यति ॥१८॥
सदाऽहमार्यानिभृतोऽप्युपासे नमेविधित्सात्सहतेनरोषः ।
नचाप्यहंलिप्समानःपरेमि नचैवकिंचिद्विषयेनयामि ॥१९॥

गोतासंग्रहे ॥ नाहंशप्तःप्रतिशपामिकजिद दमंद्वारंह्यमृतस्येहवेदमिागुह्यंब्रह्म तदिदवाब्रवीमिनमानुपातश्रेष्ठतरहिकिज्जित् ॥ २०॥ निर्मु- च्यमान:पापेभ्यो घनल्यइवचन्द्रमाः । विरज:कोलमाका- झन् धोरोर्यणसिध्यति ॥ २१ ॥ यः सर्वेषांभत्रतिह्यर्चनी- यउत्सेधनस्तम्भइत्राभिजातः । यस्मैवाचंसुप्रसन्नांवदन्ति सवैदेवान्गच्छतिसंयतात्मा ॥ २२ ॥ अपने से बड़े छोटे वा वराबर वाले पापी के अपराध को अपमान क- रने मारने पीटने वा गाली देने पर भी जो सह लेता है वह विरक्त ज्ञानी मिद्धि को प्राप्त हो जाता है ॥ १८ ॥ में नन्त्र हुन्मा सदा सज्जनोंकी सेवा कर- ता हूं मुझ को काम करने की उमंग और क्रोध नहीं दबा सकते, मैं धन मान प्रतिष्ठा भोजनादि प्राप्ति की इच्छा से कहीं नहीं जाता और सुख के साधन धनादि का संचय भी नहीं करता ॥ १९ ॥ मुझे कोई कोशे तो मैं उसे नहीं कोशता दम को मोक्ष का द्वार जानता हूं जो वेद का गुप्त तत्त्वज्ञान है वह तुम लोगोंसे कहता हूं कि मनुष्यसे श्रेष्ठ कोई अन्य प्राणी नहीं है ॥ २० ॥ वादलों से पे चन्द्रमा के समान पाप दोषों से छूटता और निर्मल वित्र होके धीर पुरुष काल की प्रतीक्षा करता हुआ धैर्य से सिद्धि को प्राप्त हो जाता है ॥ २१ ॥ जो पुरुष संसार में ऊंचे खम्म के तुल्य प्रति प्रकट प्र- सिद्ध सब का पूजनीय हो जाता है और जिम के लिये अच्छी प्रसन्न वासी को सब कहते हैं वह संयमी हुभा देवों को प्राप्त हो जाता है ॥ २२ ॥ नतथावक्तुमिच्छन्ति कल्याणान्पुरुषगुणान् । यथैषांवक्तुमिच्छन्ति नैर्गुण्यमनुयुजकाः॥२३॥ यस्यत्राङ्मनसीगुप्त सम्यकप्रणिहितेसदा। वेदास्तपश्चत्यागश्चसइदंसर्वमाप्नुयात् ॥२४॥ आक्रोशनावमानाभ्यां नाबुधान्गर्हयेद्बुधः । तस्मात्नवर्द्धयेदन्यं नचात्मानंविहिंसयेत्॥२५॥ अमृतस्येवसंतृप्येदवमानस्यपण्डितः । सुखंद्यवमतःशेतेयोऽवमन्तासनश्यति ॥२६॥ यत्क्रोधनोयजतियददातियद्वातपस्तप्यतियज्नहोति। वैवस्वतस्तटुरतेऽस्यसर्वमोपात्रामीभवतिहिक्रोधनस्य २७॥ प.

हंसगीता ॥ ८१ पुरुषों के उत्तम गुण प्रायः लोग धैसे कहना नहीं चाहते जसे कि दोषदर्शी खोग अन्योंके अवगुणोंका वर्णन करना चाहते हैं अर्थात् गुणोंकी अपेक्षा दोषों की चर्चा जल्दी फैल आती है ॥ २३ ॥ जिस पुरुषके वाणी और मन सुरक्षित और सम्या स्थित हैं जो वेदाध्ययन तप और भी यथावत करता है वह इस सब तत्वज्ञानके उखको प्राप्त हो जाता है ॥२४॥ विद्वान्को चाहिये कि गाली देने और अपमान करने द्वारा मूखौंकी मी निन्दा कभी न करे। तथा अधिक प्रशंसादिके द्वारा अन्यको न बढ़ावे और न अपनेको अधिक कष्ट देवे ॥ २५ ॥ विद्वान्को चाहिये कि कोई अपमान करे तो उस अपमान को अमृतके तुल्य स्वीकार करे, अपमान किया हुभा विरक्त महात्मा मानन्द पूर्वफ सोता है और जो अपमान करता है वह नष्ट होजाता है। अर्थात वह अपमान जब उस महात्माको सुखदायी हो जाता है तब वही लौटकर 'अपमान करने वालेको दुःख देता है ॥ २६ ॥ क्रोधी पुरुष यज्ञ दान तप और होम जोर काम करता है यमराज उस सब को हर लेते हैं उस क्रोधीको व्यर्थ ही परिश्रम मात्र होता है यज्ञादिका फल कुछ नहीं होता इससे क्रोधको त्याग के यज्ञादि कर्म करने चाहिये ॥ २७ ॥ चत्वारियस्यद्वाराणि सुगुप्तान्यमरोत्तमाः। उपस्थमुदरंहस्तौ वाक्चतुर्थीसधर्मवित् ॥ २८ ॥ सत्यंदमह्यार्जवमानशंस्यं धृतितितिक्षामतिसेधमानः। स्वाध्यायनित्योऽस्पृहयन्परेषा मेकान्तशील्यूर्ध्वगतिर्मवेत्सः २६ सर्वांश्चैनाननुचरन् वत्सवच्चतुरस्तनान् । नपावनतमंकिञ्चित् सत्याध्यगमंक्वचित् ॥ ३० ॥ आवक्षेऽहंमनुष्येभ्यो देवेभ्यःप्रतिसचरन् । सत्यस्वर्गस्यसोपानं पारावारस्यनौरिव ॥ ३१ ॥ यादृशैःसन्निवसति यादृशांश्चीपसेवते । यादृगिच्छेच्चभवितुं ताइगभवतिपूरुषः ॥३२॥ इंस कहता है कि हे साध्य देवो ! जिसने उपस्योन्द्रिय, पेट, हाथ और वाली इन चारको ठीक सुरक्षित रख लिया वह धर्मका मर्म जान लेता है। २८॥ सत्य भाषण, मनको वशमें करना, कोमल वर्ताय, मनष्योंको दुःख देने १० गीतासंग्रहे- की चेष्टा वा न होना, ३ रखना तथा समा-सहन शीलता इन सबका अच्छा सेवन करता हुम्भा नित्य वेद पड़े कन्योंसे कुछ प्राप्त होने की तृष्णाको त्यागे और एकान्तमें निवास का स्वभाव वाला हो वह स्वर्ग प्राप्तिको योग्य होता है ॥ २८ ॥ जैसे ववक्षा गौशे चारो पनोंको पारापारीसे पीता है वैसे ही इन पूचौत सब सत्यादिका सेवन करे, परन्तु हंत कहता है कि मैं ने सत्यसे अ- धिक्ष पवित्र वा उत्तम अन्य किसीको नहीं पाया ॥ ३० ॥ मैं मनुष्यों तथा देयों में सर्वत्र विचरा करता हूं और दोनों कहता हूं कि नद्यादिके पार जाने लिये नीशाके तुल्य वर्गप्राप्ति के लिये सत्य एका उत्तम सीढ़ी बा जीना है ॥ ३१ ॥ जैनोंसे साध निकाम करता है और जैसोंका संग करता है और जैसा होना चाहता है वह पुरुष वैसा हो जाता है। अभिप्राय यह है झि जैसा होना चाहता हो वह वैत्तोंके साथ निवाल और वैसोंका ही संग करे ॥३२॥ यढिसन्त सेवतियवसन्त तपस्विनंयदिवास्तेनमेव । वासोयथारङ्गवशंभ्याति तथास्तेषांवशमभ्युपैति ॥३३॥ सदादेवाःसाधुभिःसंवदन्ते नमानुपंविपर्ययान्तिद्रष्टुम् । नेन्दुःसमास्यादसमोहिनायु-रुच्चावविषयंयासंवेद ॥ ३४ ॥ अटवर्तमालेतु हृदयान्तरपूरये । तेनैवदेवाःप्रीयन्ते सत्तांमार्गस्थितेनवै ॥ ३५॥ शिमोदरनिरताःसदैव स्तेनानरावापरुपाश्चनित्यम् । अप्रेतदीपानपितान्विदित्वा दूरादेवाःसंपरिवर्जयन्ति ॥३६॥ नदेवाहीनसत्वेनतोच्याः सर्वाशिनादुष्कृतकर्मणाया। सत्पन्नतायेत्तुनराकृतज्ञा धरतास्तैस्सहसंभजन्ते ॥ ३७॥ घो मज्जनका संग करे वह सज्जन हो जाता है, दुर्जनका संगी दुर्जन, तपस्वीका नंगी तमली और चोरका संगी चोर ऐसे ही हो जाता है कि जैसे कोरे बस पर वह २ रंग बड़जाता है ॥ ३३ ॥ देवता लोग सच्चे सीधे सादे माधुजनोंसे संवाद करते हैं पर मानुष विषयोंफो देखने के लिये देवता नहीं जाते, चन्द्रमा एक रूप नहीं रहता किन्तु पारापारीसे घटता बढ़ता रहता है, वायु नत्र.एलसा ही प्रतीत होता है। इन प्रकार संमारको जथे नीचे विषय. को को जानता है वही सुख पता है ॥ ३४ ॥ हृदयको भीतर-जो अदृष्ट चेतन..

. J . हमगीता ॥ शक्ति जीष विद्यमान है उसी जीवके श्रेष्ठ धर्म नामें स्थित होनेपर उसी जीवसे देवता लोग प्रसन्न संतुष्ट होते हैं भोजन और कामभोग में जो सदा शासक्त रहने वाले तथा चोरी करने और जो नित्य वाठोर बोलने वाले हैं ऐसे मनुष्यों को देयता लोग यह भी जानले कि उक्त दोष इनने छोड़ दिये तो भी देवता उनको दूरसे ही वर्जित कर देते हैं ।। ३६ ॥ नष्ट बुद्धि सर्वभक्षी दु स्कृत पापकर्न करने वाले मनुष्य देवोंको संतुष्ट नहीं कर पाते किन्तु सत्य भा- परा का व्रत रखने वाले धर्नमें तत्पर कृतज्ञ पुरुषोंके साथ देवता लोग मेल करते हैं । देवता दो प्रकार के हैं एक नाजान देव और द्वितीय शर्मदेव, इनमें भागान देव मुख्य हैं उन्हीं का संतुष्ट होना इस प्रकरण में कहा जानो ॥३॥ अध्याहृतंव्याहृताच्छ्रे यआहुः सत्यंवदेवयाहृतंतद्वितीयम् । धर्मवदेवव्याहत्तत्ततीयं प्रियंवदेवव्याहृतंतचतुर्थम् ॥३८॥ साध्याऊचुः । केनायमावृतोलोकः केनवानप्रकाशते । केनत्यजतिमित्राणि केनवर्गलगच्छति ॥३॥ हंसउवाच-अज्ञानेनावृतीलोको मात्सर्यानरकाशते । लोभात्यजतिमित्राणि सगात्स्वर्णनगच्छति ॥ ४० ॥ साध्याऊचुः। कारिखदेकोरमब्राह्मणानां कास्विदेको- बहुभिर्जीपमास्ते । कास्विदेकोबलवान्दुर्बलोऽपि कास्त्रिदेपां कलहनान्वति ॥४१॥ बोलनेसे न बोलने रूप मौनको अच्छा कहा है, उसी मौनसे सत्य दो- लना अच्छा, वाशीसे केवल धर्मकी ही बात कहे तो सत्यसे भी अच्छा है। धर्मसे विरुद्ध धर्मकी सत्य बात भी न कहे। और मिय ही बोले यह उससे भी अच्छा है ॥ ३८ ॥ साध्यदेव बोले कि-ये लोक किससे, नाच्छादित हैं, किस हेतुसे प्रकाशित नहीं होते और क्षिस कारणसे मित्रोंको त्याग देते हैं तथा किस कारण सुख विशेष स्वर्गको प्रास नहीं होपाते ॥ ३९ ॥ हंस बोला कि प्रज्ञानसे लोक माच्छादित हैं, मत्सरताले कारण प्रकाशित नहीं होते, लोभसे मित्रोंको छोड़ते हैं और संसारी विपयोंशा संग होनेसे स्वर्गको प्राप्त नहीं होपात ॥४॥ फिर साध्यदेव बोले वि-ब्राह्मणों में कौन एक प्रसन्न रहता, एक रहता, गीतासंग्रहे- बहुतोंके साथ कौन मिलके कौन एक बलवान् और दुबल दोनों रूप होता और कौन एक बहुत संभारी मनुष्योंके साथ कलह नहीं करता ॥४१॥ हंसउवाच । प्राज्ञएकोरमते ब्राह्मणानां पाज्ञश्चैको घ- हुभिजोपमारते। पाझएको बलवान् दुर्बलोऽपि पाज्ञ एपा कलह नान्वति ॥ ४२ ॥ साध्याऊचुः । किं ब्राह्मणानां दे- वत्वं किञ्च साधुत्वमुच्यते । असाधुत्वञ्च किन्तेषां किमेषां मानुषं मत्तम् ।। ४३ ॥ हंसउवाच । स्वाध्याय एषां देवत्वं व्रतं साधुत्वमुच्यते। असाधुत्वं परीवादो मृत्युर्मानुष्यमुच्यते ॥४४ भीमउवाच । संवादइत्ययंबेष्ठः साध्यानां परिकीर्तितः। क्षेत्रंबकर्मणांयोनिः सदावःसत्यमुच्यते ॥ ४५ ॥ इति शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि हंसगीतायां नवन- वत्यधिकद्विशतोऽध्यायः ॥ २६ ॥ फिर हंस बोला लि-ब्राह्मणोंमें एक विद्वान् ही प्रसन्न रहता, एक वि- द्वान ही सबसे मेल रखता, एक विद्वान् ही बलवान् तथा दुर्वल दोनोरूप. [ बड़े २ प्रवल दुःखोंके सहलेनेसे बलवान् और दुर्जन चौरादिसे बदला न ले सकनेसे विद्वान दुर्बल हैं ] होता और एक विद्वान् ही बहुतोंमें कलह नहीं करता अर्थात् जो ऐसा हो वही विद्वान् जानी ॥ ४२ ॥ साध्यदेव फिर वोले कि-ब्राह्मणोंमें क्या देवत्व क्या साधुपन, क्या असाधुपन और इनमें मानुपीभाव क्या है ||४३॥ फिर हंस बोला कि ब्राह्मणोंमें वेदाध्ययन करना देवत्व है, व्रत करना, साधुपन है, अन्योंकी निन्दा करना असाधुपन और मरजाना मनुप्यपन है ॥ ४४ ॥ अव अन्तमें भीष्मजी कहते हैं कि यह साध्य देदोंका हंसरूप प्रजापतिके साथ हुमा प्रतिश्रेष्ठ संवाद कहा गया यह संवाद शुभ समौका खेतरूप कारण है और भाप्रेसे विचलित न होना रूप सद्भाव ही सत्य है ॥ ४॥ इत्त हंसगीतामें प्राचरणोंका सुधार कल्याणका हेतु कहा है सत्यादिके यघोक्त सेवनसेही कल्याण हो सकता है। यही संवाद कुछ कम उद्योगप- त्य विदुरनीतिमें भी आधुका है। इति हंसगीता समाप्ता॥

अथ-व्यासगीतारम्भः॥ . युधि०-कथंनिर्वेदमापन्नः शुकोवैयासकिःपुरा । एतदिच्छाम्यहंस्रोतुं परंकौतूहलंहिमे ॥१ भीष्म०-प्राकृतेनप्रयत्नेन चरन्तमकुतीभयम् । अध्याप्यकृत्स्नंस्वाध्यायमन्वशावपित्तासुतम् ॥२ व्यासक-धर्मपुत्र निषेवस्व सुतीक्ष्णौचहिमातपौ। क्षुत्पिपासेचवायुच्च जयनित्यजितेन्द्रियः ॥३॥ सत्यमार्जवमक्रीध-मनसूयांदमंतपः । अहिंसांचानृशंस्यंच विधिवत्परिपालय ॥४॥ सत्येतिष्ठरतीधर्मे हित्वासर्वमनार्जवम् । देवतातिथिशेषेण यात्रांप्राणस्यसंलिह ॥५॥ भाषार्थः-राणा युधिष्ठिरजी भीष्म पितामहजीसे पूछते हैं कि व्यासदेव के पुत्र शुकदेवजीको किस प्रकार के उपदेशको पाकर ज्ञान वैराग्य प्राप्त हुना, यह बात मैं सुनना चाहता हूं, मुझे आश्चर्य है कि ऐसा प्रवल वैराग्य कैसे हुमा सो कहिये ॥१॥ तब भीष्मजी बोले कि स्वाभाविक प्रयनसे निर्भय विचरते हुए शुकदेवजीको व्यासजीने संपूर्ण वेद वेदाङ्गादि पढ़ाके निम्न लि- खित रीतिसे शिक्षाको सो सुनो, व्यासजी बोले कि हे पुत्र ! नित्य ही जितेन्द्रिय रहते हुए धर्मका सेवन करो, प्रबल शीत उष्णादिका सहनारूप उग्र कठोर तप करो, भूख प्यास और वायुको जीतो [ जितना चाहे उतनी देर माणका रोक सकना ही वायुका जीतना है ] ॥३॥ सत्य बोलना, कोमल वर्ताव, क्रोधका त्याग, किसीकी निन्दा न करना, मनको वशमें रखना, धर्म करने में कष्ट सहना, किसी प्राणी को न मारना और विशेषकर मनुष्यों को नसताना इन सब नियमोंका विधि पूर्वक शास्त्राज्ञानुसार पालन करो॥४॥ धर्म करने में तत्पर रहते हुए सत्यमार्ग पर डटे रहो, और सब प्रकारको कुन टिलताको त्याग कर पांच महायज्ञ करने पश्चात् शेष बचे अन्नसे प्राण रक्षा करो अर्थात् प्राणकी रक्षा करने मात्र भोजनादि करो विषय वासना वा. विष- यशक्ति बढ़ाने के लिये भोजनादि जिज्ञासु मुमुक्षुको नहीं करना चाहिये ॥५it . गीतासंग्रहे- फेनमात्रोपमेदेहे जीवेशकुनिवस्थिते । अनित्यप्रियसंवासे कथंस्वपिषिपुनक ! ॥ ६ ॥ अप्रमत्तेषुजाग्नत्सु नित्ययुक्तेषुशत्रुषु । अन्तरंलिप्समानेधु बालस्त्वनाध्यसे ॥७॥ अहस्सुगण्यमानेषु क्षीयमाणेतथायुधि । जीवितेलिप्स्यमानेच किमुत्थायनधात्रसि ? ॥८॥ ऐहलौकिकमीहन्ते मांसशोणितबद्धनम् । पारलौकिककार्येषु प्रसुप्ताभशनास्तिकाः ॥ ६ ॥ धर्माययेभ्यसूयन्ति बुद्धिमोहान्वितानराः अपथागच्छतांतेषा-मनुयाताऽपिपीडयते ॥ १९ ॥ व्यासजी कहते हैं कि हे प्रिय पुत्र ! जैसे जलने फेन पैदा होकर शीघ्र उसी जलमें लय हो जाता है वैसे शरीर पृथ्वी से प्रकट हो २ कर उनीमें लीन हो रहे हैं। अनियत समयके लिये वृक्ष पर पक्षी पावैठने के तुल्य इस शरीर रूपं पेड़ पर जीव. मा. वैठा है; पक्षीको तुल्य उड़ जाने वाला है, और स्त्रीपुत्र धनादि प्रिय वस्तुभोंका मेल रहने वाला नहीं है, ऐमी दशा देखते हुए भी तुम वेहोश क्यों सो रहे हो ? ॥६॥जब कि काम क्रोधादि तुम्हारे शत्रु डो- कुओं चोरों के तुल्य. सचेत जागते हुए हर एक समय घात लगा रहे और मौका देखरहे हैं तव तुम अज्ञान निद्रा में वेहोश पड़े हुए क्यों नहीं जागते ? ॥७॥ तुम्हारा आयु पल.२ में घटता जाता है तुम्हारे शत्रु दिन गिन रहे हैं तुम चाहते हो कि हमारा जीवन बना रहे तव इन लुटेरे कामादि शत्रुओंसे पीला बुड़ाकर उठकर क्यों नहीं मांगः जाते ? ॥॥ मांस और रुधिर जिनसे बढ़े ऐसे उत्तम २. भोजनादि द्वारा संसारी सुख प्राप्त करने में ही जो लोग दिन रात लगे हैं. और परमार्थ वा परलोक सम्बन्धी कामों के विचारसे बेहोश वे ही लोग पूरे वा : पङ्के नास्तिक हैं ॥ ॥ जो लोग अपनी प्रज्ञानग्रस्त बुद्धि होनेसे धर्म संबन्धी कामों वा विचारोंका आदर न करना वा अनादर करना रूप धर्नको निन्दा करते हैं उन कुमार्गमें चलते हुन्नों का अनुगामी भी पीड़ित होता है । धर्मको भलाके केवल संसारी भोगों में ही दिन रात लगे लोग कुपथ गाली कहाते हैं ॥ १६ ॥ ..

a. व्यासगीता ॥ येतुतुष्टाःशुतिपरा महात्मानोमहाबलाः । धम्यपन्थानमारूढारुतानुपास्वचपच्छच ॥ ११ ॥ उपधार्यमतंतेषां बुधानाधर्मदर्शिनाम् । नियच्छपरयाबुद्ध्या चित्तमुत्पथगामिवै ॥ १२ ॥ अद्यकालिकयामत्या दूरेश्वइतिनिर्भयाः । सर्वभक्षानपश्यन्ति कर्मभूमिमचेतसः ॥ १३ धर्मनिःश्रेणिमास्थाय किंचित्किंचित्समारूह । कोशकारवदात्मानं वेष्टयनावबुध्यसे ॥ १४ ॥ नास्तिकभिन्नमर्यादं कूलपातमिवस्थितम् । वामतःकुरुवित्रन्धो नरंवेणुमिवोद्धतम् ॥ १५:॥ ... और जो संतोषी महात्मा धर्म वा परमार्थके कामों में परमोत्साही अं- तियोंके अर्थमें दून:विश्वासी-धर्मानुकूल मार्ग पर चलने वाले हैं उमका स संग करो और उनसे ज्ञानके मार्गको पूछो अर्थात् : अच्छे धर्मनिष्ठ ज्ञानी घिद्वान महात्माओं का सत्संग करके उनसे अपने कल्याणकाः उपदेश प्राप्त करो ॥ ११ ॥ उन धर्म तत्वदर्शी विद्वानोंका तात्पर्य निश्चय करके धन वि- रुद्ध मार्गमें भटकने वाले अपने चित्तको निश्चित बुद्धिसे वशीभूत करो ॥१२॥ शाज.तो अच्छे प्रानन्दमें हैं कल परसोंकी बात दूर है। आगे का शोध क्यों करें, क्यों डरे, ऐसे अज्ञानी सर्वभक्षी लोग कर्म भूमिको नहीं देखते । कर्म • भूमि नाम शरीर का है वे लोग अपनी भीतरी दशाको भाप ही नहीं दे- ' खते हैं. ॥ १३ ॥ व्यास जी कहते हैं कि हे पुंन शुकदेव ! धर्मरूप नसैनी पर खड़े होकर धीरे धीरे ऊपरको घढ़ते जानो। जैसे रेशन का कीड़ा अ- पने किये कर्मसे आप ही बन्धनमें प्राजाता है वैसे तू भी अपने को ही बां- धता हुआ नहीं जानता कि मैं शापही अपनेको बांध.रहा हूं ॥ १४ ॥ धर्म मर्यादाक नाशक बांसके तुल्य ऊंचे नास्तिक मनुष्यको नदी तटके वृक्षके तुल्य नष्ट होने वाला मानकर विश्वास. पूर्वक त्यागः दो. अंर्थात् 'अधर्मी नास्तिक चाहे धनादि पाकर बढ़ भी गया हो तो भी विश्वास कर लो कि नदी तट: के वृक्षके तुल्य उसका शीघ्र नाश होने वाला है इस कारण ससे त्याग दो॥१५॥ : .

इंट
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गीतासंग्रहे
कामक्रोधंचमृत्युंच पञ्जेन्द्रिग्रजलांनदीम् ।
नाबंधृतिमयींकृत्वा जन्मदुर्गाणिसंतर ॥ १६ ॥
मृत्युनाभ्याहतेलोके जरयापरिपीडिते ।
अमोघासुपतन्तीपु धर्मपोतेनसंतर ॥ १७ ॥
तिष्ठन्तं वशयानंच मृत्यरन्वेपतेयदा ।
निर्वृतिलभतेकस्मादकस्मान्मृत्युनाशितः ॥१८॥
संचिन्त्रानकमेवैनं कामानामविहप्तकम् ।
वृकीवोरणमासाद्य मृत्युरादायगच्छति ॥ १९ ॥
क्रमशःसंचितशिखो धर्मवृद्धिमयोमहान् ।
अन्धकारप्रवेष्टव्य दीपोयत्नेनधार्यताम् ॥ २० ॥
पांच इन्द्रियारूप भल वाली नदीमें काम क्रोध और मृत्युरूप ग्राहों
से बचकर धीरज रूप नौका- पर चढ़के जन्न मरणादि रु.य कठिनाइयोंके
पार हो जानो ॥ १६ ॥ जब मृत्युसे घडाघड़ मनुष्य मारे जा रहे हैं, बद्धोव
स्यासे भनेक पीड़ित हो रहे हैं, भयंकर कालरात्रियां चली आ रही हैं, ऐसे
भयंकर संमार सागरमें धर्म रूप नौका पर चढ़के पार होजाओं ॥ १७ ॥ जब
कि खड़े बैठे लेटे हर एक दशामें प्राणीको मृत्यु खोल रहा है, तब अकस्मात
मृत्यु के मुखमें जा पहनेवाले मनुष्यको सुखं कैसे मिल सकता है? ॥ १॥ ध-
नादिका संचय करनेमें लगे कामनाओं से वृप्त न होने वाले संसारलंप बनने
उस खोजते हुऐ मनुष्यको मृत्यु ऐसे ही उठाकर ले जाता है कि जैसे भेडि-
या मेढाको उठा लेजावे . अर्थात् जैसे भेड़िया जानवरों को ले जाता है
वैसे ही मनुष्योंको मृत्यु ले जाता है इस कारण उसे भूलमें नहीं पड़े रहना
चाहिये । १६ जिसकी लौ क्रम २ से बढ़ाई गईही ऐसे धर्मका संचयरूप महा
न-दीपकको बड़े यन्न से हाथ में लेकर अन्धकारमें प्रवेश करना चाहिये।
Cत्-जैसे छोटी लौ वाला दीपक हवा लगने से युतभाता है पर मसाल
जल्दी नहीं बुतती वैसे थोड़ा धर्म-विरोधी से देव लाता है प्रबल नहीं। यह
सेन पकड़ा हो तो जैसे ठोकर लगने पर दीपक गिरके बताता है वैसे
ही दृढ़ता से न धारण किये धर्म से भी विधर्मी लोग हिंगाके अपने पक्ष में
फमाते हैं:इममे धर्मको बड़े मयनसे पकड़ना चाहिये ॥ २० ॥

व्यासगीता. संपतन्देहजालानि कदाचिदिहमानुजे । ब्राह्मण्यंलभतेजन्तुस्तत्पुत्रे! परिपालय ॥ २१॥ ब्राह्मणस्यतुदेहोऽयं नकामार्थायजायते । : इहक्लेशायतपसे प्रेत्यच्चानुत्तमंसुखम् ॥ २२ ॥ ब्राह्मण्यंबहुभिरवाप्यत्तेतपोभिस्तलव्ध्यान रतिपरेणहलितव्यम् । स्वाध्यायेतपसिदमे चनित्ययुक्ताक्षेमार्थीकुशलपरासदायतस्व ॥ २३ । अव्यक्तप्रकृतिरयंकलाशीर: सूक्ष्मात्माक्षणत्रुटिशोनिमेषरोमा । संवास्य:समबलशुलकृष्णनेत्री, मासागोद्रबतिवयोहयोनराणाम् ॥ २४ ॥ मायार्थ-जीव रूप पक्षी अनेक योनियोंके शरीर रूपी जालोंमें पड़ता फंसता हुआ कभी इस गानुपी शरीर जालमें आके ब्रामणपनको प्राप्त हो जाता है । हे पुत्र ! शुकदेव उम ब्राह्मणपनकी रक्षा करो ॥२१॥ यहं ब्राह्मण का शरीर काम सुख और धनेश्वर्यफा मुख भोगने के लिये विधाता ने नहीं यनाया है किन्तु इस शरीरसे क्लेश सहन करता हुआ तप करे और जन्मान्त- र में प्रति उत्सम स्वर्ग सुखको प्राप्त करे ॥२२॥ इस जीवको ब्राह्मणापन बहुत तपोयल से प्राप्त होता है उन लपोजन्य ब्रह्मत्व को पाकर रति सुख में लिप्त नहीं होना चाहिये किन्तु नियमसे वेदाध्ययन रूप ब्रह्मयज्ञ, तप और मन को वशीभत करने रूप. दमन करने में नित्यतत्पर क्षेम कुशल होने के लिये सदा यत्न करना चाहिये ॥२३॥ मनुष्यके आयुको घोड़ेकी उपमा दी है यथा अव्यक्तनाम प्रधान ही जिमका उपादान है, कलारूप काल विभाग जिस का शरीर नाम स्थूल भाग है, सूक्ष्म जिमका प्रात्मानाम स्वरूप है, क्षणमात्र भी जिसके ठहरने में संशय है, निमेषरूप माल विभाग ही जिमके रोम हैं, सम बल बाले शुक्न कृष्ण पक्ष ही जिसके दो नेत्र हैं, महीने ही जिसके गोड़ पंगादि भङ्ग हैं प्राणी मनुष्यादि जिम की रक्षा कर्त्तव्य समझते हैं, ऐमा म- नुष्योंका.मायु [ उमर ] रूप घोडा निरन्तर दौड़ो चला जाता है ॥ २४ ॥ . , १२ , गीतासंग्रह- संदृष्ट्वाप्रसृतमंजस्रमुग्रवेगं गच्छन्तंसततमिहान्यवेक्षमाणम् । चक्षस्तेयदिनपरप्रणेनेयंधमैतेभवतुमनःपरनिशम्य ॥ २५ ॥ येचात्रप्रचलितधर्मकामवृत्ताःक्रोशन्तःसतंतमनिष्टसंप्रयोगाः। क्लिश्यन्तःपरिगतवेदनाशरीरावहीभिःसुभृशमधर्मकारणाभिः२६ राजासदाधर्मपरःशुभाशुभस्यगोप्तासमीक्ष्यसुकृतिनांदधाति- लोकान् । बहुविधमपिचरतिप्रविशतिसुखमनुपगतंनिरव- द्यम् ॥२७॥ व्यासजी कहते हैं कि हे शुकदेव ! बड़े वेग से निरन्तर चलते हुए तथा सबको निरन्तर देखते हुए सब प्राणियों में विस्तृत उस पूर्वोक्त श्रायुरूप घोड़े को भागा जाता देखकर यदि अन्धेके तुल्य अन्योंके सहारे पर चलनेका तुम्हारा ज्ञान नहीं है तो पर नात्मतत्त्वको सुन जानके तुम्हारा मन, धर्ममें ही लगे ॥२५॥ इस जगत्में धर्मानुकूल कामसेवन से जो गिर गये पतित हो गये हैं अर्थात् व्यभिचारादि में प्रवृत्त हैं, जो निरन्तर अपने विरोधियों को कोशते हैं जो अनिष्ट दुःखको प्राप्त हो रहे हैं, नरक का दुःख भोगनेके लिये नारकी शरीर जिनको प्राप्त हुआ है बहुत से अधर्मके कामोंसे जो निरन्तर केश पा रहे हैं उनको देखकर अधर्मसे बचो ॥६॥ जो राना सदा ही धर्म परायणा होता, धर्मकी रक्षा करता अधर्मियोंको दण्ड देता, अच्छे २ संसार उपकारी काम करने वालों को उत्तन र अधिकार और पारितोषिक इनाम देता, बहुत प्रकार से नाम वहुत रूपों से विचारता है अर्थात् साम दाम दण्ड भेदादिसे काम लेने के लिये नानारूप होता इससे राजा अपूर्व प्रशस्तसुख को पा सकता है अर्थात् क्षत्रियादि लोग अपने २ कर्तव्य का ठीक २ पालन करें और ज्ञान वैराग्य नहीं भी प्राप्त करें तो भी उनका कल्याण हो सकताई परन्तु ब्राह्मणको ज्ञान वैराग्यकी प्राप्ति अवश्य करनी चाहिये ॥२७॥ श्वानोभीपणकायाअयोमुखानिवांसिबलगृध्रकुलंप- क्षिणांचसंघाः । नरकदनेरुधिरपागुरुवचननुदमुपरतविश- त्यसन्तः ॥ २८॥ मर्यादानियता:स्वयम्भुवायइहेमा:प्रभिन- . त्तिदशगुणामनोऽनुगत्वात् । निवसतिभृशमसुखंपिविषय- ,

से
और प्रद्धा,
व्यासगीता ॥
१
विपिनमवगाह्यसपापः ।.२६॥ योलुब्धःसुभृशंप्रियान्तश्चमनु-
ध्यःसततनिकृतिर्वञ्चनाभिरतिःस्यात् । उपनिधिभिरसुखक-
स्सपरमनिरयगोभृशमसुखमनुभवतिदुष्कृतकर्मा ॥ ३० ॥
मनुष्य कल्या एका मार्ग बताने वाले माता पितादि गुरुओंके हितो-
प्रदेशका भनादर करते हैं उनको नर नाम मनुष्य जहां चिल्लाते हैं उस नर-
कदन नरकमें रुधिर पीने वाले भयङ्कर शरीरधारी श्वान, लोहे के मुखों वाले
पक्षी, बलवान गीधपक्षी तथा अन्य अनेक पक्षी मरने पर उन मनुष्योंको
मोचते खाते हैं अर्थात् हितोपदेष्टा पितादिके वचनको न मानने वाले नरकों
में बड़े २ महान् दुःख पाते हैं इससे हे पुत्र तुम मेरी शिक्षाको सादर खी-
करो ॥ २८ ॥ विधाताने वेदादिशास्त्रोंके द्वारा दश प्रकार की धर्म [ शरीर
दान, रक्षा, गुरुसेवा, पाणीसे-सत्य-हित-प्रिय-जप, मनसे-दया सन्तोष
दश वा धृतिक्षमादि दश अथवा पांच अहिंसादि यम औरपांच
शोधादि नियम ये दश] मर्यादा नियतकी हैं उन धर्म मर्यादानोंको जो मन
मामी करता हुआ तोड़ता है अर्थात् धर्मसे विरुद्ध काम करता है वह पापी
यमलोक में प्रसियनबनादि नरकोंका अवगाहन करके दुःख भोगता हुमा
वहीं निवास करता है ॥२९॥ जो मनुष्य निरन्तर कोमल असत्य भाषी लोभी
निरन्तर नीच कर्मों में तत्पर, चोरी ठगी नादि करने में रुचि रखनेवाला
छल प्रपञ्च रचना द्वारा दुःखके मार्गमें प्रवृत्त और पापकर्म करने वाला है
वह बड़े २ घोर नरकों में जाकर निरन्तर दुःख का अनुभव करता है । इत्त
कारण मनुष्यको डरकर उक्त प्रकारके अधर्माको छोड़ना और धर्म मर्यादाको
कभी तोड़ना नहीं चाहिये ॥ ३ ॥
उष्णांवैतरणीमहानदीमपगाढोऽसिपत्रबनभिन्नगात्रः।
परशुवनशयोनिपतितोवसतिचमहानिरयेभृशातः ॥३१॥
महापदानिकत्यसे नचाप्यवेक्षसेपरम् ।
चिरस्यमृत्युकारिको-मनागतांनबुध्यसे ॥३२॥
प्रयायतांकिमास्यते समुत्थितंमहद्भयम् ॥
अतिप्रमाथिदारुणं सुखस्यसंविधीयताम् ॥३३॥

8 , गीतासंग्रहे- पुरामृतामणीयते यमस्वराजशासनात् ॥ नमन्त कायदारुणः प्रयत्नमार्जवेकुरुः॥ ३४ ॥ पुरासमूलबान्धवं प्रभुहरत्यदुःखवित् । तवेहजीवितंयसो नचास्तितस्यवारकः ॥ ३५ ॥ - शान अोध लोभेसे होने वाले पाप कनोंके सेवन से प्राणी मरने के पश्चात् गरम वैलरको महानदीमें घुसाया जाता, तलवारें ही जिसने पत्ते हैं ऐसे र वनमें घुमाने ले हाथ पांव आदि. अङ्गाटजाते हैं, तथा. फरसोंका जिसमें वन है ऐसे नरशमें फेंका जाता है और नहान् नरक में निरन्तर दुःख पाता हुमा वमता है ॥३१॥ इत्यादि पूर्व कपनका नाशय यही है कि ऐसे भयंकर नर सोसे हरते. पानुष्ठान करो। अब कहते हैं शिवर्गादि भोगोंक्षा भी खालंच त्यागोब्रह्मलोस वा अमरावती सुरेन्द्रभवन आदि बड़े बड़े अधिकारों की तुम प्रशंसा करते हो परन्तु परब्रह्म परमात्माको जानने का उद्योग नहीं करते। व्यातनी कहते हैं कि हे पुनः शुरचिरकालसे नाने वाली मृत्युका हेतु उद्धा: वस्थाको तुम नहीं जानते कि वृद्धावस्था अपने मृत्यु मुखमें तुमको खाने के लिये भारही है ॥३२॥ हे पुत्र! या बैठे हो इन संसारी भोगों दूरभाग जाम्रो मोक्ष मार्ग का प्रस्थान कसे विषयों में अति पीड़ित करने वाला दारुण महाभय उपयित हो रहा है। जैसे भयंकर अन्धयमें गिरजाने पर वहांते निकल- ना कठिन हैं वैसी ही दशा.विषयों में संसने पर होती है। इससे उन मासि का प्रया करो ॥ ३३॥ यनराजको भाज्ञासे प्रत्यक्षमें प्राणी मरते जाते सबके सामने श्मशानमें लेजाते हैं इस लिये तुम भावी पाल्यांगों लिये कठि न च्यादि ब्रतोंके द्वारा पुरयो लिये उपाय करी ॥ ३४॥ प्राणियोंके दुःख को न देखने वाले प्रभु' अनराज पिता नाता बन्धुनों सहित तेरे जीवनको सदले नालने हर लेते नष्ट करते हैं उन. यमरानको रोकने वाला कोई नहीं है इससे चेतो ॥ ३५॥ पुराभिवातिमारुतो यमस्ययःपुरस्सरः । पुरैकएंवनीयसे कुलप्नसाम्परायिकान् ॥ ३ ॥ पुरासहिदाएबते प्रवातिमारतोऽन्तक पुराचविभुमत्तिते दिशोमहाभयागले ॥ ३० ॥ - - .. tha- ३ - . व्यासंगीती ॥ श्रुतिश्वसंनिरुध्यते पुरातवेहपुत्रक । समाकुलस्यगच्छतः समाधिमुत्तमंकुरु ॥ ३८ ॥ शुभाशुभेपुराकृते प्रमादकर्मविप्लुते । स्मरन् पुरानतप्यसे विधत्स्वकेवलंनिधिम् ॥ ६ ॥ पुराजराकलेवरं विजर्जरीकरोतिते। बलाङ्गरूपहारिणी निधत्वकेवलंनिधिम् ॥ ४०॥ - यमराजका साथी वायु सामने ही वहरहा है सबके सामने तुम आदि माणी एक ही ले जाया जाता है इस कारण जीवनहरण होनेसे पहिले प- रलोकके हितकारी धर्मका संवय करो ॥३३॥ वह जीव कहाँ है ? इसप्रकार खोजता हुन्ना वायुरूप यमराज तेरे सामने ही चलरहा है और मृत्युरूप म: !: हाभय लानेके लिये वे प्राणियों के मारक यमदूत सव दिशाओं में सबके सा- मने भना करते हैं परन्तु प्राणियोंके अज्ञानग्रस्त होनेसे नहीं दीखते हैं ॥३॥ व्यासजी कहते हैं कि हे पुत्र शुकदेव ! विषयों में व्यग्र चित्त वा व्याकुल चित्त होने पर तुम्हारी श्रवणशक्ति भी रुकजाती है अथवा मृत्युसे पहिले श्रवणश- ति-नष्ट होजाती है इससे उत्तम समाधि कर ॥३॥ प्रमाद कर्मोंसे लिप्त शुभ अशुभ नाम पुण्य पाप जो पहिले तुमने किये हैं उनका स्मरण करते हुए तुम भन्यकर्म करनेसे पूर्व पश्चात्ताप क्यों नहीं करते है। इससे केवल धर्मकोषका विधान नाम संग्रह करो ॥ ३८ ॥ हे शुकदेव ! तुम्हारे शरीरको वृद्धीवस्था पं- हिले निर्बल करती है वह जराऽवस्था बल अङ्ग नाम इन्द्रियशक्ति और सु- रूपको हरने वाली है इसलिये केवल धर्मकोपकी स्थापना करो ॥४॥ मनुष्य के सामने ही ऐसे २ भयङ्कर मरणादि काम हो रहे हैं तो भी मनुष्य वेहोशी को त्यागार चेतसा नहीं है यही आश्चर्य है। पुराशरीरमन्तको भिनत्तिरोगसारथिः । प्रसह्यजीवितक्षये तपोमहत्समाचर ॥११॥ पुरावृकाभयङ्करा मनुष्यदेहगोचराः । अभिगवन्तिसर्वतो यतस्वपुण्यशीलने ॥ ४२ ॥ पुरान्धकारमेककोऽनुपश्यसित्वरस्ववै। - गीतासंग्रह- पुराहिरण्मयान्नगानिरीक्षसेऽद्रिमूर्द्धनि ॥ १३ ॥ पुराकुसंगतानिते सुहृन्मुखाश्वशत्रवः । विचालयन्तिदर्शनाटु घटवपुत्र ! यत्परम् ॥ १४ ॥ धनस्ययस्यराजतो भयंनचास्तिचौरतः। मृतज्चयन्नमुञ्चति समर्जयस्वतद्धनम् ॥ ४५ ॥ . रोग है सारथि जिनका ऐसे यमराज जीवनको नष्ट करनेके लिये मनुष्य के शरीरको सबके सामने बलात्कारसे नष्ट करते नाम मारते हैं इसलिये हे शुकदेव ! उग्र वा घोर तप करो ॥४१॥ मानुषीदेह सम्बन्धी कामादि विषय भेडियाके तुल्य खा लेने वाले भयंकर मव ओरसे सन्मुख प्रत्यक्ष चले आ रहे हैं। पुरय धर्म करनेका अधिक अभ्यास ही विषयरूप शत्रुनोंसे बचाता है इसलिये धर्म करनेमें लगजा ॥४२॥ संसारकी घटना पर ध्यान दो तो आगे प्रत्य अन्धकार दीखता है इससे सुकृत करने में शीघ्रता करो। जब भरण- काल समीप नाता है तब पहाड़की चोटियों पर सुवर्णके वृक्ष सामने दीखते हैं ॥ ४३ ॥ व्यासजी कहते हैं कि हे पुत्र शुकदेव ! तुमको वा तुम्हारी बुद्धि को मुखपर मिठवीला पीछे जड़कट शत्रु लोग और वुरी संगतियां प्रत्यक्ष में ही ज्ञानमार्गसे विचलित करती हैं इससे परमपद प्राप्तिका उपाय करो॥४४॥ जिस धनको राना वा चोर नहीं ले सकता और जो मरने पर भी साथ नहीं छोड़ता किन्तु साथ जाता है, हे पुत्र ! उस ज्ञान विज्ञान रूप धनको संचित करो। इस संसारमें मनुष्य के लिये सैकड़ों विपत्तियोंके मानेका भय प्रतिक्षस लगाहुना है उससे बचाने वाला धर्मानुष्ठान और विद्याज्ञान प्राप्तिको विशेष घेष्टा ही है इसलिये पुण्य धर्म करने में लगजाना चाहिये यही दुःखोंका औ- पध है ॥४५॥ नतासंविभज्यते स्वकर्मभिःपरस्परम् । यदेवयस्ययौतकं तदेवतत्रसोऽश्नुते ॥ ४६॥ परत्रयेनजीव्यते तदेवपुत्र ! दीयताम् । धनंयदक्षरंध्रुवं समर्जयस्वतत्स्वयम् ॥ १७ ॥ नयावदेवपच्यते महाजनस्ययावकम् ।

व्यासगीता ॥ अपक्कएषयावके पुरामलीयसेत्वर ॥ ४८ ॥ नमारपुत्रवान्धवा नसंस्तुतःनियोजनः । अनुव्रजन्तिसंकटे वजन्तमेकपातिनम् ॥ ४ ॥ यदेवकर्मकेवलं पुराकृतंशुभाशुभम् । तदेवपुत्रसार्थिकं भवत्यमुत्रगच्छतः ॥ ५० ॥ जैसे विवाहके समय दहेजमें मास हुए यौतक नामी धनमें से अन्यभाई हिस्सा नहीं ले सकते जिसको वह यौतक दहेज धन मिलता है वही उसे भोगता है वैसे ही विद्या धनमें भी कोई हिस्सेदार नहीं हो सकता ॥ ४६ ॥ परलोक में जिस से सहायता मिले, हे पुत्र ! वही विद्यादान यहां देना चा- हिये जो विद्याधन अधल अविनाशी है उत्त का स्वयं अपने लिये भी तुम उपार्जन अवश्य करो ॥ ४ ॥ कुछ लोग ऐसा विचार किया करते हैं कि सं- सारी भोग भोगकर पीछे अन्तमें परमार्थका विचार करलेंगे सो ऐसा विचार ठीक नहीं क्योंकि भोग प्राप्त कर पानेसे पहिले ही मृत्युरूप ग्राह घसीट लेता है। किसी महापुरुषने शीरा वो हलुमा पकाने का प्रारम्भ किया जबतक वह भोजन नहीं पकपाया तभीतक यमराजका वारगट लेकर यमदूत भागये। इसलिये हे पुत्र ! शीघ्रतासे घोर तप करो जिस तपोमय किले में यमदूत प्रवेश नहीं कर सकते हैं ॥४८॥ जब मनुष्यके ऊपर मरणभयका महासंकट उपस्थित होनाता है तब सम्म मरते हुए एकमाणीके साथ मातापुत्र वा प्रेमी मित्र इ- त्यादि कोई भी नहीं जाता ॥ ४ ॥ व्यामजी कहते हैं कि हे पुत्र शुकदेव ! जो पुण्य पापरूप शुभाशुभ कर्म पहिले तुम कर चुके हो केवल वेही साथी ब- मके परलोकमें साथ जाते हैं । इसलिये मनुष्यको परलोकमें सहायता करने के लिये कुछ খুন। सञ्चय अवश्य करना चाहिये ॥ ५० ॥ हिरण्यरत्नसज्जयाः शुभाशुभेनसञ्चिता'। नतस्यदेहसंक्षये भवन्तिकार्यसाधकाः ॥ १ ॥ परत्रगामिकस्यते कृताकृतस्यकर्मणः । नसाक्षिआत्मनासमी नृणामिहास्तिकश्चन ॥ ५२.॥ मनुष्यदेहशून्यकं भवत्यमुत्रगच्छतः ।

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गीतासंग्रहे ॥
प्रविश्यबुद्धि वक्षषा प्रदृश्यतेहिसर्वशः । ५३ ।।
इहाग्निसूर्यबोयवः शरीरमाश्चित्तास्वयः।
तएवत्तस्वलाश्मिणो भवन्तिधर्मदर्शिनः ॥६॥
अहर्निशेषुसर्वतः स्पृशत्सुसर्वचारिषु।
प्रकाशगूढवृत्तिनुः स्वधर्ममेवपालय ॥ ५५ ॥
शुभ अशुभ कर्म करने द्वारा जिन लोगोंने सुवर्ण रत्नादि धनका संचय
किया है उनका अन्तझाल होनेके समय वह धन कार्यमाधक्ष नहीं होता ॥५॥
परलोझमें जाने नाम मरनेके स्वभाव वाले कुछ किये कुछ न किये तेरे शुभा-
शुभ कर्मका साक्षी श्रात्माके तुल्य ननुव्यों में अन्य कोई नहीं है। इससे ऐसा
कदापि नहीं मानना चाहिये कि यहां एकान्त में मुभाको कोई नहीं देखत्ता
इसलिये छिपकर पाप न करे | साक्षि-प्रात्मना] इनमें [ इकोसवर्गाशाक
ल्यस्यहखश्च ] सूत्रद्वारा प्रकृतिभाव और इस्त्र होनेसे सन्धि नहीं हुमा ५२॥
मृत्युके समय कर्ता भोक्तारूप मनुष्य का शरीरं साक्षी आत्मा में लीन होता
हुआ शून्य सा हो जाता है । कारमात्मदृष्टि से विद्यमान होने पर भी स्थल
दृष्टि से मानुपदेह नष्ट होजाता है. परन्तु योगी विद्वानों को ज्ञानचक्षुसे वही
मानुष शरीर सूक्ष्मरूपमें दीखता है ॥ ५३॥ इस जगत्में अग्नेि वायु और सूर्य
ये तीनों मुख्य देवता सर्वत्र व्यापक हैं ।. तदनुसार प्रत्येक शरीर में भी वि-
यमान रहते हुए धर्मदर्शी धर्मात्मा पुरुषको अग्न्यादि देवं अपने साक्षी
जने चाहिये। मनुशीने कहा है कि [ तांस्तु देवाः पश्यन्ति ]. उन छिपके
पाप करने वालोंको ये ही अग्न्यादि देव देखते हैं ऐसा दृढ़ विश्वास होजाय
तो छिपकर कोई पाप न करे ॥ ५४॥ दिनरात्रिरूपकालविभागों के कालाभि-
मानी कालात्मक देव. भी अधिष्ठानरूपसे प्रसिद्ध और अभिमानी देवरूपसे
गुप्तकालात्मक देव सबके सर्वत्र साक्षी हैं इससे भी अपना धर्म करो छिपके
पाप कभी मत करो ॥ ५५ ॥
अनेकपारिपन्धिके विरूपरौद्रमाक्षिके।
स्वमेवकर्मरच्यता खकर्मतरगच्छति ॥ ५६ ॥
नतंत्रसंविभज्यते स्वकर्मणापरस्परम् ।
तथाकृतस्त्रकर्मजं तदेवभुज्यतेफलम् ॥ ५० ॥

९७ . व्यासगीता ॥ यथाऽप्सरोगणाःफलं सुखंमहर्षिभिःसह । तथाऽऽनुवन्तिकर्मजं विमानकामगामिनः ॥८॥ यथेहयत्कृतंशुभं विपाप्मभिःकृतात्मभिः । तदानुवन्तिमानवास्तथाविशुद्धयोनयः ॥ ५ ॥ प्रजापतेःसलोकतां वृहस्पतेःशतक्रतोः । व्रजन्तितेपरांगतिं गृहस्थधर्मसेतुभिः ॥ ६० ॥ विरूप भयङ्कर वा घृणित मलिन मल मूत्र काम क्रोधादि अनेक शत्र मनुष्य के कल्याण में विघ्न डालने वाले हैं। इससे स्वयं धर्म करना चाहिये अपना ही किया धर्म वहां जाता है ॥ ५६ ॥ अपने किये पुण्य धर्म में से वहाँ जन्मान्तर में कोई वांट नहीं सकता अपना २ कर्म जमा २ शुभाशुभ किया होता है वैसा ही फल उस २ को मिलता है ॥ ५७ ॥ जैसे महर्षियोंके साथ अप्सरात्रों को स्वर्ग का सुख प्राप्त होता है वैसा ही कामरूप विमान पर जाने वाले मनुष्यों को भी अपने २ दान पुण्य यज्ञादि कर्म का फल म- हर्षियों के साथ सत्संग दर्शनादि से होता है । स्थूल महाभूतों के शरीरों वाली कोई अप्सरा नहीं हैं किन्तु सिद्ध सूक्ष्म दिव्य रूपअप्सरानों को महर्षियों के सत्संग से समाधिजन्य मानससुख होना इष्ट है ॥ ५८ ॥शुद्ध जितेन्द्रिय लोग जिस प्रकार इस जन्ममें पुण्य धर्म करते हैं उसका शुभ फल परलोक में उन को उसी प्रकार से प्राप्त होता है ॥ ५॥ गृहस्थ ब्राह्मणादि लोग गृहस्थधर्म का ठीक २ सेवन करके उसी धर्म रूप पुल के द्वारा ब्रह्म लोक पहस्पतिलोक और इन्द्रलोकादि में परमोत्तम स्वर्गाधिकारों को प्राप्त होते हैं । यह स्वर्गीय आनन्द मोक्ष की अपेक्षा निकृष्ट होने पर भी मानुष भोगापेक्षया बहुत बड़ा उत्तम भानन्द होता है । ६० ॥ सहस्रशोऽप्यनेकशः प्रवक्तुमुत्सहामते । अधुद्विमोहनःपुनः प्रभुर्निनायपावकः ॥ ६१ ॥ गतात्रिरष्ठवर्षता ध्रुवोऽसिंपञ्चविंशकः । कुरुष्वधर्मसंचयं वयोहितेऽतिवर्त्तते ॥ ६२ ॥ पुराकरोतिसोऽन्तकः प्रमादगोऽमुखाँचमूम् । १३ . - द 4. AMA गीतासंग्रह- यथागृहीतमुत्थितस्त्वरवधर्मपालने ॥ ६३ ॥ ... यथात्वमेवपृष्ठतस्त्वमग्रतोगमिप्यसि । तथागतिंगमिष्यतः किमात्मनापरेणवा, ॥ ६४ !! - यदेकपातिनासता भवत्यमुत्रगच्छता। भयेषुसांपरायिक निधत्स्वकेवलंनिधिम् ॥ ६५ ॥ व्यास जी कहते हैं कि हे पुत्र शुकदेव ! हम महस्रों वा भनेक प्रकार से ऐसा परमझान धर्न का उपदेश तुम को कर सकते हैं निर्वृद्धि, मनुष्यों को मोहित करने और बुद्धिमान् धर्मात्मानों को पवित्र करने में समर्थ धर्म ही सब संचार को चलाता है ॥ ६१॥ हे शुकदेव तुम २४. चौवीश वर्ष के हो चुके पच्चीसवां वर्ष विद्यमान है तुम धर्म का संचय करो अवस्या तुम्हारी दिन २ वीती जा रही है ॥ ६२ ॥ हे पुत्र ! प्रमादयुक्त पुरुषों के यहां गमन: करने वाला वह यमराज सत्र के सामने जब तक तेरी इन्द्रिय सेना को मुखा नाम भोग हीन भूतमाय न कर पाने अर्थात् मृत्यु भाकर न दवाले तभी तक ग्रहण किये शरीर रक्षा करते हुए उठो चेतो और धर्मपान में शीघ्रता करो ॥ ६३ ॥ जिस प्रकार आगे और पीछे तुच ही एक, आत्मा को जान लोगे.तब आगे पीछे दोनों गतियों के गमन कर्ता होगे तवा अन्य भा; व मिट जायगा। तब अपने शरीर तथा पुत्रादि के साथ भेद मिट जायगा u६४ा अनेक प्रकार के भय उपस्थित होने पर किमी को, साथी न बना है परलोक को एकाकी जरते हुए तुम परलोक के हितकारी शुद्ध-निष्काम वा निर्गश,धर्म वा ज्ञान रूप कोश नाम खजाने को स्थापित वा सुरक्षित करो अर्थात् शुद्ध ज्ञान वा धर्म की ही-खजाने के तुल्य रक्षा करो ॥ ६॥ सकूलमूलवान्धवं प्रभुहरत्यसङ्गवान् । F नसन्तितस्यनारकाःकुरुष्वधर्मसन्निधिम् ॥६६॥ . इदंनिदर्शनंमया तवेहपुत्रसाम्प्रतम् ।. . स्वदर्शनानुमानतः प्रवर्णितंकुरुष्वतत् ॥ ६॥ दधातियःस्वकर्मणा ददातियस्यकस्यचित् । अबुट्ठिमोहजैर्गुणैः सएकएवयुज्यते ॥ ८ ॥ 4 - .

. व्यासगीता ॥ श्रुतंसमस्तमश्नुते प्रकुर्वतःशुभाःक्रियाः । तदेतदर्थदर्शनं कृतज्ञमर्थसंहितम् ॥ ६ ॥ निबन्धनोरज्जुरेषा याग्रामेक्सतोरतिः । छित्त्वैतांसुकृतीयान्ति नैनांछिन्दन्तिदुष्कृतः ॥७०॥ बालकाबद्ध और तुल्यावस्था वाले युवाओंके सहित सभी मनुष्यादिको किसी से मेल वा प्रेम न रखने वाले प्रभु यमराज हर लेते अर्थात् मार डा- लते हैं किन्तु वृद्धों को ही मारे ऐता नियम नहीं है उन यमराज को कोई भी रोकने वाले नहीं हैं इससे हे शुक ! तुम धर्म के गढ़ में घुसो ॥६६॥ हे पुत्र हमने देखे.वा अनुमान किये के अनुसार इस समय यह घोड़ा सा- दिग्दर्शन मात्र हितोपदेश वर्णन किया है उस का तुम पालन करो सुनलेने मात्र से इष्ट की सिद्धि नहीं होगी ॥ ६ ॥ जो मनुष्य अपने परिश्रम से अ- पने शरीर को पुष्ट करता है और जिस किसी फल की प्राप्ति के लिये दान धर्मादि भी करता है वह अज्ञान और विपरीत ज्ञान से होने वाले दुःखादि बन्धनों से एक ही युक्त होता है अर्थात् एक ही दुःख भागी होता है प६८॥ नित्य २ शुभ पुण्य कर्मों का ही प्रारम्भ करते हुए मनुष्य का वेदोक्त ज्ञान स- मस्त ब्रह्माण्ड में व्याप्त हो जाता है सो यह सर्वात्मता होना ही मोक्षास्य परम पुरुषार्थ का दर्शन है अन्य नहीं, सर्वज्ञता और सर्वात्मता को देने वा- ली इस विद्या का उपदेश कृतज्ञ को ही कर्तव्य है कृतघ्न को नहीं ॥ ६ ॥ गांव.नाम अधिक जन समुदाय सघन वस्ती बड़े शहर में जो वमने की रुचि है, वही बांधने वाली रस्सी है पुण्यात्मा लोग इस रस्सी का छेदन कर हा- लते और पापी लोग इस इच्छा रूप बन्धन को नहीं काट पाते हैं अर्थात् परमार्थी को एकान्त सेवन की रुचि बढ़ानी चाहिये ॥ ७० ॥ किन्तेधनेनकिंबन्धुभिस्ते किन्तेपुत्रैःपुत्रकयोमरिष्यसि । आत्मानमन्विच्छगुहांपविष्टंपितामहास्तेझगताश्वसर्वे ॥७९॥ .:: श्वःकार्यमद्यकुर्वीतपूर्वाह्न चापराह्निकम् । नहिप्रतीक्षतेमृत्युः कृतंवास्यनवाकृतम् ॥ ७२ ॥ - अनुगम्यविनाशान्ते निवर्त्तन्तेहबान्धवाः ॥ ।

१०० गीतासंग्रह अग्नीप्रक्षिप्यपुरुषं ज्ञातयःसुहृदस्तथा ॥ ७३ ॥ नास्तिकान्निर नक्रोशान्तरान्पापमतेस्थितान् वामतःकुरुविस्रब्धं परंग्रेप्सुरतन्द्रितः ॥ ७ ॥ एवमभ्याहत्तेलोंके कालेनोपनिपीडिते। सुमहद्वैमालम्व्य धर्मसर्वात्मनांकुरु ।। ७५ ।। व्यास जी कहते हैं कि हे पुत्रं शुक ! जब कि तुझ को मरण समय धन पुत्रादि वेवश छोड़ने ही पड़ेंगे तब इन धन पुत्रादिसे तेरा क्या प्रयोजन है। अर्थात् धनादि का लालच त्याग के और हमारे पितामहादि जैसे न रहे वैसे मुझे भी यहां रहना नहीं ऐसा शोचकर गूढ प्रात्मतत्त्वका खोजकर॥१॥ कल करने के काम को मानकर और मध्याहू के वाद करने के काम ध्यान्ह से भी पहिले कर क्योंकि मृत्यु यह नहीं देखता कि इस का काम हो चुका वा शेषं पड़ा है। मनुष्य के मरने पर उसको श्मशान के चितार अग्नि में प्रज्वलित होते छोड़ कर कटम्बी मित्र और भाई बन्ध सब लौट आते हैं ॥ १३ ॥ पापकर्म करने में दत्त चित्त निर्दयी और अनीश्वरवादी तथा वेदं विरोधी नास्तिक मनुष्यों को (विश्वास रखता हुआ कि इन का संग होने से दुःख ही होगा) त्याग दे और आलस्य निद्रा छोड़के परमात्म प्राप्ति का उपाय, कर ॥ ४ ॥ कोई रोगपीड़ा से कोई राजदण्ड से कोई अन्न धनादि के न मिलने से कोई चोरी हो जाने से और कोई: प्रियवियोग के दुःख से शिर धुन २ के रो रहा है इत्यादि अनेक प्रकारों से लोगों को नष्ट भष्ट होते. और मृत्युकाल से पीड़ित होते देख २ कर बड़े धैर्य से कटि बद्ध होकर सर्वात्मा से धर्म करना भारम्भ कर अर्थात् जप तप पाठ पूजन में लगना अथेमंदर्शनोपायं सम्यग्योवेत्तिमानवः । सम्यक्स्वधर्मकृत्वेह परत्रसुखमश्रुते ॥ ६ ॥ नदेहभेदेभरणविजानता नचप्राणाशात्वनुपालितेपथि धर्महियोवर्द्धयतेसपण्डिती ययंवधर्माच्च्यवतेसमुह्यति॥७॥ प्रयुक्त्योःकर्मपथिस्त्रकर्मणीःफलप्रयोक्तालभतेयथाकतम व्यासगीता ॥ १०१ निहीनकर्मानिरपंप्रपद्यतेत्रिविष्टपंगच्छतिधर्मपारगः॥८॥ सोपानभूतंस्वर्गस्य मोनुष्यंप्राप्यदुर्लभम् । तथात्मानंसमादध्याद भश्यतेनपुनर्यथा ॥७॥ अब इस मागे कहे ज्ञानके उपायको जो मनुष्य ठीक २ जानता है वह इस जन्ममें सम्यक् अपने धर्मको करके परलोकमें सुखका भागी होता है ॥८|| शरीर.बदल जाने पर भी समझदार विज्ञानियों का मरण नहीं होता अर्था-- र जिनको दृढ़ विश्वास है कि घर वा वस्त्रोंके तुल्य शीर बदलता है और मैं चेतनात्मा नष्ट नहीं होता उसका भरणभय छूट जाता है। और धर्म दर्शा शिष्ट पुरुषों के बताये मार्ग पर चलने वाले का नाश वा हानि कदा- पि नहीं होती ऐसा विश्वास वा निश्चय होजाना भी बड़ा हितसाधक है । जो पुरुष धर्मको दिन २ बढ़ाता है वही पण्डित वा विद्वान् है और जो धर्म से गिरता है वही अज्ञानान्धकूपमें गोते खाता है 199॥ अपने श्रौतस्मात वा अभ्युदय और निःश्रेयस इन दो प्रकार के अपने कर्मों को कर्मपथ नाम शास्त्रोक्त वा शिष्टातरीति पर निर्भर करता है उसको कर्मका यथावत् नि- यत उत्तम फल अवश्य होता है इसमें कुछ सन्देह नहीं और धर्मके पारजाने घाला मनुष्य स्वर्गको प्राप्त हो जाता है। धर्म के पार जाना यही है कि मानस वाधिक कायिक तीनों प्रकारके दश विध धर्मसे क्षण भर भी न डिगे और दश विध अधर्नसे प्रति क्षण वचता ही रहे ॥८॥ स्वर्गकी सीढ़ी रूप मनुष्य जन्म पा- कर अपने को ऐसी सावधानीसे सम्हालना चाहिये कि जिससे फिर इस सीढ़ी से नीचे तिर्यगादियोनि में सहस्रों लाखों वर्षके लिये न गिरजावे ॥ ९ ॥ यस्यनोत्क्रामतिमतिः स्वर्गमार्गानुसारिणी। तमाहुःपुण्यकर्माणमशोच्यपुत्रवान्धवैः ॥८०० यस्यनापहताबुद्धिर्निश्चयेावलम्बते । स्वर्गकृतावकाशस्य नास्तितस्यमहद्भयम् ॥८९ तपोवनेषुयेजातास्तत्रैवनिधनंगताः । तेषामल्पतरोधर्मः कामभोगानजानताम् ॥ २॥ यस्तुभोगान्परित्यज्य शरीरेणतपश्चरेत् ।, . - .

१०२. गीतासंग्रहे ॥ नतेनकिञ्चिन्नप्राप्तं तन्मेबहुमतंफलम् ॥ ८॥ मातापिटसहस्राणि पुत्रदारशतानिच अनागतान्यतीतानि कस्यतेकस्यवावयम् ॥४॥ वर्गमार्गका अनुसरण करने वाली जिम मनुष्य को मति बुद्धि धर्मका उल्लंघन नहीं करती पुत्र और वान्धवों से शोच न करने योग्य उस मनुष्य को विद्वान् लोग पुण्यात्मा कहते हैं कि जिस मनुष्यकी वुद्धि काम क्रोधा- दि से नष्ट भष्ट नहीं होती किन्तु दृढ़ निश्चय के साथ धर्मः परारूद रहती है और जिसने स्वर्गमें अपना दखल शुभ कर्म संचय द्वारा कर लिया है उसके लिये मरणानन्तर नरकादि का बड़ा भय नहीं हैं। जो लोग तपोवनों में ही उत्पन्न हुए और वहीं तप करते र मृत्यु को प्राप्त हो गये समारों वि- घंध मोगोंको का जिनको नहीं लगा भोगों का मर्म निन ने नहीं जाना अर्थात् विषय भोग की खुजली जिनको नहीं लगी उनकी धर्म योड़ा वा छोटा है ॥८शा परन्तु जिनको विषय भोगोंकी खुजली वा चस्का लग चुकाई जो मनुष्य विषयों में फस चुके हैं वे यदि विषयों के महा दलदलसे निकलकर अर्थात् विषय भोगोंको त्यांग के शरीरसे तप करें तो उनको बड़ा धन्यवाद हैं वनको जानो सभी प्राप्त होगया ॥८६॥ माता पिता स्त्री पुत्र इष्ट मित्र इत्यादि सहस्रों वा असंख्य हो चुके और आगे असंख्य माता पितादि होंगे तथा सहस्रों असंख्योंके माता पिता स्त्री पुत्र हुम भी हुए और होंगे परन्तु विचार पूर्वक शोचो तो कोई भी किसी को माता पिता स्त्री पुत्रादि नहीं 'सिद्ध होता इससे मोहमें मत फोन ४॥ अहमेकोनमेकश्चिन्नाहमन्यस्यकस्यचित् । नतंपश्यामियस्याहं नतपश्यामियोमम ॥८॥ नतेषांभवताकाव्ये नकायंतवतरपि। स्वकृतस्तानिजातानि भवाश्चैवगमिष्यति ॥६॥ इहलोकेहिधनिनां वजन:खंजनायते । स्वजनस्तुदरिद्राणां जीवतामपिनश्यति ॥८॥ संचिनीत्यशुभंकर्म कलनापेक्षयानरः।

३ व्यासगीता ॥ १३ तताक्नेशमवाप्नोति परत्रेहत्तथैवच ॥८॥ : 'पश्यतिच्छिन्नभूतहि जीवलोकस्वकर्मणा। तवकुरुष्वतथापुत्र कृत्स्नंयत्समुदाहृतम् ॥८॥ - उसी पूर्वोक्त बातको फिर खोल कर कहते हैं कि ज्ञानी परमार्थी पुरुष ऐसा ध्यान किया करे कि मैं अकेला हूं मेरा कोई नहीं है, न मैं किसी अन्य का हूँ उसको मैं नहीं देखता कि 'जिसका हूं और उसको भी मैं नहीं देखता कि जो मेरा ही किन्तु बहती हुई नदीमें तरंगोंको हिलोरों से जैसे कई लकड़ी आनिले वैसे ही माता पिता स्त्री पुत्रादिको 'संयोग होकर वियोग होजाता हैं। वियोग होजाने पर उन संवन्धियोंसे भाप का कुछ काम नहीं रह जातां और न उनका मापसे कुछ काम वा मतलव रहता है। वे सापके सम्बंधी और भाप सब लोग अपने २ कर्मानुसार अपनी २ योनि में चले गये और चलेजांनोगे। इससे मोह नाल में मतफंसी ॥८६यह भी 'अभिमान मत करों कि सहस्रों लाखों मनुष्य हमारे रक्षक वा साथी हैं क्योंकि संसार में धनादि के लोभसे धनियों के प्रायः सभी सगे बन जाते और दरिद्री लोगोंके खास सवन्धी भी उनको जीवित में ही त्याग देते हैं इससे यही सिद्ध हुआ कि "स्वारथ लागि करें सब प्रीती, in स्त्री पुत्रादि के पालनार्थ वा उनके संतोषार्थ मनुष्य अंशुभ कमों द्वारा धनादि पैदा करता है उसीसे इम जन्म और उस जन्म और जन्मान्तर में क्लेशोंको प्राप्त होता है । अपने कर्म से ही मनुष्य अपने मरने के समय ऐसे अन्धकारमें मग्न होता है जिससेयह सभी जीवलोक संसार नष्ट हुआ दीखता है। इस लिये व्यास जी कहते हैं कि हे पुत्र शुकदेव उस सबकाम को करो कि जो उपदेश हमने किया है ॥९॥ तदेतत्संप्रदृश्यैव कर्मभूमिप्रपश्यता। शुभान्याचरितव्यानि परलोकमभीप्सता ॥६॥ मासर्तुसंज्ञापरिवर्त केन सूर्यागिनारात्रिदिवेन्धनेन । स्वकर्मनिष्ठाफलसाक्षिकेण भूतानिकाल:पचतिप्रसा॥ धनेनकिंयन्नददातिनाष्णुते बलेनकियेनरिघुनबाधते। श्रुतेनकियेननधर्ममाचरेत किमात्मनायोनजितेन्द्रियोवशी॥६२ १०४. गीतासंग्रहे- भीष्म-इद्वैपायनवंचो हितमुक्तनिशम्यतु । शुकोगतःपरित्यज्य पितरंभीक्षदेशिकम् ॥ १३ इति मोक्षधर्मे ३२१ अ० व्यासगीता समाप्ता ॥ मानव जन्म रूप कर्म भनिको देखते हुए मनुष्यको उचित है कि वह ऐमा शोच विचार अवश्य करे कि मैं इस मानुषं जन्म रूप स्वर्ग की सीढ़ी पर चढ़के भी फिर नीचे गिरा तो फिर मेरा पता न लगेगा इस परलोक में स्वर्ग सुख चाहता हुआ शुभ पुरय धर्म जप तप पाठ पूजन भक्ति उपासना करने में सन्न को लगावे ॥ ७ ॥ मनुष्य को अपने किये, कर्न में जो निष्ठा नाम नासक्ति है उसी से होने वाले फल के साक्षी मास तया ऋतुरूप संसाके प्रवर्तक ऐसे सूर्य रूप अग्नि से रात्रि और दिन को ईधन बनाकर कालरूप रसोइया भोजन- रूपसे बलात्कार प्राणियोंको पका रहा है और सब पक्रा: २ कर. काल खाता जाता है.॥१॥ उस-धन का होना व्यर्थ है जो न दान पुण्य में दिया जाय और न भोगा. जाय वह चल व्यर्थ है जिससे शत्रुको न दवा सके वह शास्त्रका पढ़ना व्यर्थ है जिससे धर्म न करें और उस शरीरका होना दुःखदायी हानि कारक है कि जो जितेन्द्रय और प्रात्माके वंशीभूत न Heen अब भीष्म जी कहते हैं कि शुकदेव जी व्यासनी के ऐसे पूर्वोक्त हितो, पदेश को सुनकर और मोक्षमार्गोपदेशक अपने पिता व्यासजी को त्याग विरक्त होकर वन को चले गये ॥ ३॥ यह शंकदेव को किया उपदेशः रुप व्यासगीता समाप्त हुआ।

. . अप-नारदगीता भी-देवर्षिन्नुमोदृष्ट्वा नारदंगमुपस्थितम् । अन्नपूणनिधिना बंदोत्तनाम्यपूजयत् ॥१॥ नारदोऽयानबोन्प्रीती भूष्टिधनभूतांबर । त्यांप्रेयसायत्त योजनामीसित्तष्टगत् ॥२॥ नारदपवनःशुन्या गुबमोबावभारत । शानिमाला केहि बरगातेनमांगीतुमर्हसि ॥३॥ नारद नवजिज्ञासनांपूर्व-मृमीणांभावितात्मनाम् । सनत्कुमारोभगवा-निवधनमब्रवीत् ॥४॥ नाग्निमिवासमंचल-गास्निगत्वसमंतपः । नास्तिरागगनंदुःखं नास्ति न्यागसमसुखम् ॥५॥ भीmat मुभिरि फटने विजय शुगदेगी पगमें तप गोभ देययन यह नारद जी मा गये । मन परियार उपदेश भारद जोपो में देर यही मधुपर्क विधि में पू. गशिपा IREL माय नारद जी योगे कि हे ध- गाहमानों में बंटा गुफदय : यि कि तुम तो इन फिम पाण्यामा से युक्रे ॥६॥ नारद जी या पायर नगर हे गान् युधिष्ठिर । शुकदेय बाल शिक्षक में गी यान मनाय पा लिये मनपरि अन्यन्त मिलतारी पुर सोनिय ॥ ३ ॥ तय नारद जी बोले कि एक बार निगापि मानािपियों की एक बड़ी ममा में या प्रश उठा था कि म भंमार में मन में बाग तय गया तब एम यो हार में पदमय की सभापति मर्वमान्यमगवान गमत् गुमार गी ने या कहा था कि ॥ विद्या मंमार में कोई यह नहीं । सूर्यका प्रकाश भी पिद्या गजु मे फग है, मत्यारण गमागाई तप नहीं है, गग के मार संमार अन्य कोई दुःख का हेतु नहीं है, नाग ही सोपरि दाराशायी है और त्याग नान ये- 'राग्य यो तुम्य पोई मुख देंगे माला न त्याग ही सर्वोपी उस का . १४ ६ १०६ गीतासंग्रहे निवृत्तिःकर्मण:पापात् सतलपुण्यशीलता । सहवृत्तिःसमुंदाबारः गोयएतदनुत्तमम् ॥ ६ ॥ मानुष्यससुखप्राप्य यःसज्जतिसमुह्यति । नालंदुःखमोक्षाय संयोगोदुःखलक्षणम् ॥ ७ ॥ सक्तस्यबुद्धिलति मोहजालंबिवर्धिनी। मोहजालावृतोदुःख-मिहचामुत्रसोऽश्नुते ॥ ८॥ सौपायात्तु कामस्य क्रोधल्यचविनिग्रहः। कार्य:श्रेयोऽर्थिनातौहित्रयोघातार्थमुद्यता ॥ ॥ नित्यंक्रोधात्तपोरक्षेत् शियरक्षेच्चमत्सरांत् । विद्यामानावमानाभ्या-मात्मानंतुप्रमादतः ॥१०॥ हिंसा असत्यभाषया छल कपट चोरी व्यभिचारादि, पापकर्म से बच सकना, निरन्तर पुण्य धर्म करने में चित्त लगाना, धर्मानुकूल जीविका और सदाचार धर्म का पालन करना यह अति उत्तम कल्याण का मार्ग हैं ॥ ६ ॥ मनुष्य जन्मके काम क्रोध लोभादि दुःख हेतु विषयों को प्राप्त होकर जो प्राणी भासक होता हैं वह मोह जाल में फंस जाता है वह दुःखों को बुटाने में समर्थ नहीं हो सकता क्योंकि संयोग ही दुःख का लक्षण है [ योग सू० प्रा० ३.१ १७ में जड़ चेतन का संयोग ही दुःख का कारण बताया है ] ॥ ७॥ स्त्री पुत्र ध- नादि में जो शासक्त है उसकी बुद्धि मोह जाल को बढ़ाती हुई धर्मपथ में डिग जाती है । मोहजाल से ढंपा हुआ वह प्राणी इस लोक परलोक में दुःख ही भोगता है In अपना कल्याण चाहने वाले मनुष्य को सर्वात्मा में तथा सर्वोपाय से प्रथम कान और शोध के महामवल वेग को रोकना चाहिये क्योंकि ये काम क्रोध ही सर्वोपरि कल्याण मार्ग में लुटेरे वा डाकू है इन दो वा एक काम के वशीभूत होते ही अन्य समझी शत्रु नष्ट हो जाते योगाभ्यास और वैराग्य तथा ईश्वर प्रणिधान के द्वारा काम क्रोध की वास: नाओं के नाशका उपाय करना वोत्तम है ॥ ६ ॥ तपः का नाशक क्रोध इस कारण क्रोध से तप को बचाने, मत्सरता के त्यांग से लक्ष्मी को रक्षाकरे, मानापनान को त्याग रो विद्या की रक्षा और वृद्धि करे तथा भल प्रमादसे शरीर दो मचावे । अर्थात् मत्परतादि लक्ष्मी शोभादि के नाशक हैं;cil . . .. M.

. नारदगीता॥ १०३ आनृशंस्यपरोधर्मः क्षमाचपरमंवलम् । आत्मज्ञानंपरज्ञानं नसत्णदुविद्यतेपरम् ॥ ११ ॥ सत्यस्यवचनं शेयः सत्यादपिहितंवदेत् । यद्भूतहितमत्यन्त-मेतत्सत्यंमतमम ॥ १२ ॥ सर्वारम्भपरित्यागी निराशीर्निष्परिग्रहः । येनसर्वपरित्यक्तं सविद्वान्सचपण्डितः ॥ १३ ॥ इन्द्रियैरिन्द्रियार्थान्यवरत्यात्मवशैरिह । असज्जमानःशान्तात्मा निर्विकारःसमाहितः ॥१४॥ आत्मभूतैरतदभतः सहचैवविनैवच । सविमुक्तःपरयो नचिरेणाधितिष्ठति ॥ १५ ॥ मनुष्योंको दुःख न देनेकी चेष्टा ही मुख्य नाम यहा धर्म है इसीसे स- नुष्यादि प्राणियोंको दुःख देने की चेष्टा बालेका अन्य धर्म करना व्यर्थसा है। क्षमा धर्म ही बड़ा वल है, आत्माको जीतलेना ही सर्वोत्तम ज्ञान है परन्तु सत्यले परे अन्य कुछ भी उत्तम इससे नहीं है कि सत्यस्वरूप.ही परमात्मा है ॥ १९ ॥ नारदजी कहते हैं कि सत्यवचन बोलना कल्याणकारी है परन्तु जिसमें प्राणियोंका वास्तविक हित हो वह सत्यसे भी उत्तम होता है इस कारण मेरी [ नारदको सम्मति वा राय है कि जो प्राणियों का अत्यन्त हितकारी वचन है वही सत्य है। जो रात्य दीखने पर भी हितकारी नहीं वही सत्याभास भतत्य है ॥ १२ ॥ परमार्थी मनुष्य सब कानोंके भारम्भ शो त्यागे सब आशाओं को छोड़े और संसारी भोगोंका भर्जन रक्षण भी न करे वास्तव में जिसने सब ही त्याग दिया वही विद्वान् और वही पण्डित है उत्त की अपेक्षा सभी मूर्ख हैं ॥ १३ ॥ जो मनुष्य अपने वशमें किये मात्मस्वरूप इन्द्रियों से शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, विषयोंका सेवन करता है और सावधान निर्विकार शान्तखरूप रहता हुभा विषयों में मासक्त नहीं होता अर्थात् रू- पवती युवतीको देखके वालवत जिसका मन विकृत नहीं होता और विषयों के समक्ष होने न होने में जिसका चित्त एकसा ही रहता है वह संसार व- न्धनोंसे छूटकर बहुत ही थोड़े कालमें परम कल्याणको मास हो जाता है ॥१५॥ अदर्शनमसंस्पर्श तथाऽसंभाषणंसदा। यस्यभूतैःसहमुने ! सनयोविन्दतेपरम् ॥ १६ ॥ .

अन्य सन्तोष निराशास्त्वमचापलमा १६ गीतासंग्रह महिस्यात्सर्वभूतानि मैत्रायणगतश्चरेत् । नेदजन्मसमासाद्य नरकुतिकेचित् ॥ १७ ॥ आकिचा एतदा पर शेय आत्मजस्यजितात्मनः ॥ १८ परिग्रहपरित्यज्य भवतात ! जितेन्द्रियः अशोकस्थानमातिष्ठ इहंचामुन्नचाभयम् ॥ १६॥ निरामिषानशोचन्ति त्यजेदामिपमात्मनः । परित्यज्याभिषसौम्य दुःखतापादिमोक्ष्यसे ॥ २० ॥ नारदजी वाहते हैं कि हे मुनि शुकदेव । उक्त रीतिसे भिन्न परमार्थीके के लिये एक लार्ग यह भी है कि जिसका देखना स्पर्श करना तथा संभाषण भरना रूपं व्यवहार अन्य ननुध्यादिको साथ दछ भी न रहे वह भी शीघ्र ही परम काल्याणका भागी हो जाता है।॥ १६ ॥ किसी प्रासीको दुःख देनेको बेष्टा न करे सभीसें नित्रभाव रक्खें पापियों से उदासीन बृत्ति रक्त और मानुष लन्न पार किसी भी वैर न करें ॥ १७॥ परमार्थी आत्मज्ञानी जितेन्द्रिय पुरुषको नशा त्यागी, सम्यक संतोपी तया आशा और चपलताको पाप- रित्यागी होना चाहिये ॥ १८ ॥ हे तात! वेदा ! शुकदेव सर्वोपरि कल्याण घाइते हो तो अजेन रक्षाको त्यागार जितेन्द्रिय बनो और जन्म जन्मान्त- रोंमें निर्भयता दिखाने वाले शोक नाशक शालार्गपर भारद होजाओ upen अहंकार नमकारकी. सूक्ष्मवासनाओं सहित जो. भोगोंका त्याग कर देते हैं वे फिर हिंसीका शोचं नहीं करते इससे मनुव्यको पाहिये कि अपने भोगोंको त्याग देवे । नारद जी कहते हैं कि : हे सौम्य शुभदेव । तुन भोगोंका त्याग करके ही दुःख और तापसे मुक्त होजानोगे.. अर्थात् जसे एकालदर्शी पुरुषके शोक और नोइ निवृत्त हो जाते हैं उसी प्रकार पर्व वैराग्य होने पर शोक मोड़की निवृत्ति हो जाती यही उत्तम सुख है ॥ २० ॥ सपोनित्येनदान्तेन मुनिनासंयतात्मना । अजितंजेतुकामेन भाव्यंसङ्गेष्वसङ्गिना ॥ २१ ॥ गुणसंगेध्वनासक्त एकचर्यारत सदा ब्राह्मणोनचिरादेव तुखमायात्यनुत्तमम् ॥ २२ ॥ ' - - . - नारदगीसा ॥ १०० द्वन्द्वारामेषुभूतेषु यएकोरमतेमुनिः । विद्धिप्रज्ञानदृप्ततं ज्ञानतृप्तीनशोचति ॥ २३ ॥ ! "शुभर्लभतिदेवत्वं व्यामिश्नर्जन्ममानुषम् । अशुभैश्चाप्यधोजन्म कर्मभिर्लभतेऽवशः ॥ २४ ॥ तत्रसृत्युजरादुःखेः सततंसमभिद्रतः । संसारेपच्यतेजन्तु-स्तत्कथंनावबुध्यसें ॥ २५ ॥ 3 . परमार्थी मनुष्यको शपने शरीर वा इन्द्रियोंको वशमें करके मौन रहते नित्य तप करते और मनका दमन करते हुए, जो अंश नजीत पाया हो उसको जीतनेकी इच्छा और उद्योग करते हुए कित्तीके प्राङ्गों में प्रासक्त नहीं होना चाहिये ॥ २१ ॥ ज्ञानी महात्मा आदि कहानेमें हर्ष न नानके आसंक्त न हो, एक परमात्म विचारमें सदा सत्पर रहता हुआ ब्राह्मण बहुरा शीघ्र ही - त्युत्तम सुखको पाता है ॥ २२॥ सुख दुख हानि लाभादि द्वन्द्वोंमें रमनेवाले मासियोंमें जो मुनि हर्ष शोक रहित, मुन्ना विचरता है उसको तुम ज्ञानसे वत हुश्रा मानो और शान तृप्तका लक्षण यही है कि वह शोक नहीं करता ॥ २३ ॥ शुभ पुण्य फर्मों की अधिकतासे देवयोनि प्राप्त होती है पाप पुण्यकी समकोटियों में मानुष योनिमें जन्म लेता और अशुभ पाप कर्मों के बढ़शानेसे पश्चादि. वा नारकी योनियों में जन्म होता है। इस प्रकार मृत्यु और वृद्धा- 'वस्था वा रोगादि जन्य सैकड़ों उपद्गवोंसे पवराया प्राणी संसार रूप बड़ी कड़ाही में डालकर रांधा जारहा है ऐसी दशाको देखते हुए हे शुकदेव! तुम सघेत क्यों नहीं होते ? सहनों दुःख इधर- उधर से जब घेरते चले पाते हैं तब भी तुम भूलमें क्यों पड़े हो ॥ २४ ॥ १५ ॥ अहितैहितसंज्ञस्त्व-मधूवेध्रुवसंज्ञकः । अनर्थचार्थसंज्ञस्त्वं किमर्थनावबुध्यसे ॥ २६ ॥ संवेष्ट्यमानंबहुभि-मोहात्तन्तुभिरात्मजः । कोषकारइवात्मानं वैष्टयन्नावबुध्यसे ॥ २७ ॥ अलंपरिग्रहेणेह दोपवाहिपरिग्रहः । कृमिहिकोषकारस्तुं वध्यतेस्वपरिग्रहातुं ॥ २८ पुत्रदारकुंटुम्बेषु सक्ताःसीदन्तिजन्तवः । 3 १३० : -गीतासंग्रहे- सरःपकार्णवेममा जीणीवनगजाइव ॥ २८ ॥ महाजालममाकृष्टान् स्थलमत्स्यानिवोदधृतान् ।। स्लेइजालसमाकृष्टान् पश्यजन्तन्दुःखितान् ॥ ३० ॥ हे मनुष्य ! तू अहितको हितं मानता, भनित्य, संसारी विष पोंको स्थायी समझता और अनर्यकारी धनादिको अर्थ सिद्ध मानता है सो तू सचेत क्यों नहीं होता ! ऐसी भूलमें क्यों पहा है ॥ २६ ॥ जैसे रेशमका कोहा अपने ही किये कानसे आप ही. रेशनके गट्टे में बन्द होके मर जाता है बैसे मनुष्य अपने ही कानों ने अपनेको बन्धनमें डालता हुभा, भी सचेत क्यों नहीं होता ॥ २३ ॥ संसारी भोगोंके संग्रह और रक्षा करने में अनेक दोष हैं. इस लिये इस भर्जन रक्षण रूप परिग्रहले परनार्थी मनुष्य को अवश्य हाथ खींचलेना चाहिये । रेशमका कीड़ा. अपने ही परिग्रहसे माराजाता है ॥ २८ ॥ तैसे सा- लावके गहरे दलदल में फंसजाने पर वनके बुड्ढे हाथी घरा २ करः मरजाते हैं. इस कीचड़से निकल नहीं पाते वैसेही स्त्री पुत्र कुटुम्बादिके स्नेह रूप दलदल में फंसे हुए मनुष्य भी सहस्रों दुःख भोगते हुए घबरा २ के वहीं नरजाते हैं किन्तु रागरूप कीचड़से बाहर निकलके ज्ञान वैसम्य के शुद्धमार्गमें नहीं प्रापगते ॥ २६ जैसे बड़े जाल में फंसाके अलाशयते बाहर स्थलमै साँचे जानेपर मकलियां मरती हुई तडफडाती विलबिलाती हैं वैसे ही हे शुकदेव ! स्नेह रूप जानमें फने इष्ट वियोगादिके दुःखोंसे वहफड़ाते विलंबिलरते हुए मनुष्यों को तुम देखो और देखकर स्नेह वा रागके जाल तुन मतं फंसो। कुटुम्बपुत्रदारच शरीरं सञ्चयोश्चये । पारक्यमध्रुवंस किस्वसुकृतदुष्कृतम् ॥३१॥ यदासर्वान् परित्यज्य गन्तव्यमवशेनते। अनधैकिंग्रसक्तस्त्वं स्वमर्थनानुतिष्ठसि ॥३२॥ अविनान्तमनालम्बमपाथेयमदेशिकम् । तमाकान्तारमध्वानं कथमेकोगमिष्यसि ॥३३॥ नहित्वांप्रस्थितकश्चित्पृष्ठतोऽनुगमिष्यति ॥ सुकृतंदुष्कृतंचत्वां यास्यन्तमनुपास्यति ॥३॥ .FA .. . 1 -नारदगीता ॥ १११ :: विद्यार्कर्मचशौचंच ज्ञानंचबहुविस्तरम् ।। .. अर्थार्थमनुसार्यन्ते सिद्धार्थश्चविमुच्यते ॥३॥ श्री पुत्र कुटुम्बी अपना शरीर और संचित किया धनादि सामान यह संबं अपना नहीं किन्तु पराया है अपना वही है जो अपने संग जाने वाला सुकृत दुष्कृत रूप ध धर्म है। स्त्री पुत्रादि अपने तभी हो सकते थे कि जो अपने संग जाते ॥३१॥ जव कि सब स्त्री पुत्रादिको छोड़के वेवशं तुझको जाने पड़ेगा तवे हे मनुष्य 1 तू अनर्थ कारक कामादि में कों फंसा है । इष्ट सुखके हेतु अपने परमार्थ को क्यों नहीं सम्हालता ॥३२॥ जब तू शरीर छोड़के म रने पर जिस मार्गमें जावेगा उसमें विश्राम के लिये कोई पहाववा सराय नहीं है. उसमार्गमें कोई आलम्ब नाम सहारा भी नहीं है, बीचमें खाने पीने को अन्न जल भी नहीं मिलता है, इस मार्गको कोई दिशा भी नियत नहीं हैं कि किधर जाना है, किन्तु केवल भयंकर अन्धकाराच्छन्न मार्ग है, हे मनुष्य ऐसे भयंकर मार्ग में मरण समय तू अशेला कैसे जायगा ?॥३३॥ शरीर छोड़के 'यहां से कूच करते समय तेरे पीछे २ कोई भी स्त्री पुत्रादि नहीं 'जावेगां किन्तु आते हुए तेरे पीछे केवल सुकृत दुष्कृतनाम पाप पुण्य जावेंगे ॥ ३४ ॥ विद्या कर्म धर्म शौच और बहुत विस्तृतज्ञान का व्याख्यान. इन सब को धन कमाने के उपयोग में प्रायः लोग लगाते हैं किन्तु विद्यादि से अपना परमार्थ करना लोग नहीं जानते और यदि कोई विद्यादिसे परमार्थ करता है तो वही कृतार्थ होकर संसारके सब दुःख बन्धनों से मुक्त होजाता है ॥३५॥ निवन्धनीरज्जु रेषा याग्रामेबसतोरतिः । छित्त्वैतांसुकतोयान्ति नैनांछिन्दन्तिदुष्कृतः ॥६॥ रूपकूलांमनःस्त्रोतां स्पर्शद्वीपरिसावहाँम् ॥३०॥ क्षमारित्रांसत्यमयीं धर्मस्थैर्यबटारकाम्। त्यागवाताध्वगांशीघ्रां नौतार्यातांनदीतरेत् ॥३॥ त्यजधर्ममधर्मच तथोसत्यानतेत्यज । उभेसत्यानतेत्यक्त्वा येनत्यजसितंत्यज ॥३॥ त्यजधर्ममसंकल्पा-दधमंचाप्यलिप्सया। उभेसत्यानृतेबुद्ध्या बुद्धिपरमनिश्चयात् ॥ ४० ॥ 1 १

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गीतासंभहे.
अधिक जन समुदायमें जो वसने की त्तचि हैं यही बांधने वाली रस्सी
है, पुण्यात्मा लोग इम-रस्तीको तोड़ो एकान्तमें तप करते हैं परन्त... पापों
लोग दिन २ इसी रसीमें ट्रेडता से वधते जाते हैं ॥३६॥ ऐसी नदी को तर
पार जावे कि जिस में रूप-ही तट है, मन ही जिसका प्रवाई: वेग
स्पर्श ही जिसमें द्वीप है रस विषय तृणवत जिसने बहा जाता है. गन्ध
शिसमें कीचड़ शब्द ही जिसमें नलं है, स्वर्गके मार्ग में जो कठिनाई से बहती
है, तना ही जिसमें कर्णधार वा पतवार है, धर्न पर थिर होना ही जिसकी
किनारे पर ठहराने बाली रस्सी है, त्याग रूप वायुके मार्ग में चलने वाली
ऐनी सत्य स्वरूप नौका से पार होने योग्य है ॥ ३ ॥ ३ ॥ कामना पूर्वज
होने वाले धर्म अधर्म तथा नत्य सिध्या दोनों का त्याग करके जिसने तुम,
को त्यागा है उस को तुम भी त्यानो अर्थात् स्वादि उत्तम सुख भोगः की.
कामनासे किया धर्म भी बन्धन का हेतु है इससे उसका त्याग कहा, सत्य मिध्या
दोनों का त्यागना नौन होने के लिये कहा है। विषय वा धनादि भोग मनुष्य
को त्याग देते हैं नाम जैसे २ भोग चाहता है बैने प्राप्त नहीं होते इससे उन
भोगों को त्याग देवे ॥३en संकल्पके त्यागने कान्य धर्न को छोड़ों, तृष्णाके
त्याग द्वारा अधर्मको त्यागों। बुद्धि से सम्या निश्चय करके सत्य निध्या दोनों
का त्याग कर मुनि होजानो और परम निश्चय द्वारा बुद्धिशों स्थिरकरो. igu
अस्थिस्थूणस्नायुयंत मांसभोणितलेपनम् ।
चर्मावनलुदुर्गन्धि पूर्णसूत्रपुरीषयोः ॥ ४ ॥
जराशोकसमाविष्ट रोगायतनमातुरम् ।
रजस्वलमनित्यंत्र भूतावासमिसंत्यज ॥ ४२ ॥
योजन्तुःस्वकृतस्तैस्तैः कर्मभिनित्यदुःखितः।
सदुःखप्रतिघातार्थ हन्तिजन्तूननेधा ॥ १३ ॥
ततःकर्मसमादत्त पुनरन्यनवंबहु ।
तप्यतेऽथपुनरतेन भुक्त्वाऽपथ्यमिबातुरः ॥४४
अजखमेवमोहान्धी दुःखेषुसुखसंज्ञितः ।
अध्यतेमथ्यतेचैव कर्मभिर्मन्धयत्सदा ॥ १५ ॥

दुःख पाता है वैसे नारदगीसा॥ १९३ इस मानुषी शरीर रूप घर में हड्डियों की धूनी, नसों के बंधन, मांस और रूधिर से लेस लीप किया गया है, तथा यह शरीर रूप घर चामसे बंधा और मल मूत्र की दुर्गन्धि से ठसा उस भरा हुआ है, बुढ़ापा और शोक से युक्त, रोगों का घर, नित्य दुःली, मल मूत्रादि के विद्रों से प्रत्येक समय मलिनता निकलती है और यह भूतों का निवास स्थान है इस से ऐसे अनित्य घृणित देह को त्याग ने की इच्छा कर ॥ ४१ । ४२॥ जो प्राणी अपने किये उन २ कर्मों से नित्य दुःखित है वह अपने दुःख को नष्ट करनेके लिये अनेक प्रकार से अन्य जीवों को मारता वा दुःख पहुंचाता है, उससे फिर नया बहुत पाप उसके परले पड़ जाता है फिर जैसे कुपथ्य करके रोगी यह भी उस पाप कर्म से पीडित होता है ॥ ४३ । ४४ बुद्धि मोहान्धकाराच्छन्न होने से दुःखों में ही निरन्तर सुख मानता है। और उन्हीं अपने किये कर्मों से मन्थान के तुल्य सदा ही मथा जाता है इस से संसार में सब दुःख ही हैं ऐसा विचारते हुए मुमुक्षु को सबसे उदासीन होना चाहिये ॥ ४५ ॥ ततोनिबद्धःस्वांयोनि कर्मणामुदयादिह । परिभ्रमतिसंसारं चक्रवबहुवेदनः ॥ ४६ ॥ सत्वंनिकृत्तबन्धस्तु निवृत्तश्चापिकर्मतः । सर्ववित्सर्वजित्सिद्धो भवभावविवर्जितः ॥ १७ ॥ संपमेननवंबन्धं निवय॑तपसोबलात् । संप्राप्ताबहवःसिद्धि मप्यबाधांसुखोदयाम् ॥ ४८ ॥ यह प्राणी कर्म बन्धनों से बंधा हुना और बहुत पीड़ा भोगता हुआ नये २ कर्म फलों का उदय होने से गाढ़ी के पहिये के तुल्य संसार में सब ओर भमण करता है उस भमण में दुःख से छूटने के लिये घबराता हुमा भी प्रबज जाल में फंसे पक्षी वा मछली के समान छूट नहीं सकता ॥ ४६ ॥ नार- द जी कहते हैं कि हे वेटा शुक्रदेव ! सो तुम बन्धनों को काट के और कर्मों से निवृत्त होकर संकल्प वा मनोरथों का वर्जन करते हुए सर्वेन्द्रियों को जीतने वाले और सर्वत्र सत् असत् के जानने वाले हो जाओ ॥ ४ ॥ अब तक भ- नेक ऋविनहर्षि धारमाध्यान समाधि रूप पारिभाषिक संपम से नवीन ब- १५ - 41 * - ah ११४ गीतामंग्रह- न्धनों की निवृत्ति करके सुख को प्राप्त कराने वाले सर्व बाधा रहित सिद्धि को तपोबल से पास हो गये हैं मो हे शुकदेव ! तुम भी उसी प्रकार तपोबल से सिद्धि को प्राप्त हो जाओ ॥ ४ ॥ अंशोकंशोकनाशार्थं शास्त्रंशान्तिकरंशिवम् । " निशम्यलभतेबुद्धिं तालव्ध्वोसुखमेधते ॥४॥ शोकस्थानसहलाणि भयस्थानशतानि । दिवसेदिवसेमूढ-माविशन्तिनपण्डितम् ॥५०॥ तस्मादनिष्टनाशार्थ-मितिहासनिबोधमे। तिष्ठतेचेद्वशेबुद्धिर्लभतेशीकनाशनम् ॥५१॥ अनिष्टसंप्रयोगाच्च विप्रयोगात्प्रियस्यच । मनुष्यामानसैदुःख-युज्यन्तेस्वल्पबुद्धयः ॥५२॥ द्रव्येषुसमतीतेपु येगुणास्तानाचिन्तयेत् ॥ नतानाद्रियमाणस्य स्नेहबन्धैःप्रमुच्यते ॥५३॥ जिस सांख्य योग वेदान्तादि के पढ़ने विचारने से शोक नष्ट होता है ऐसे शान्तिकारक कल्याणकारी शास्त्रको शोक निवृत्तिके लिये सुन नानके उस उत्तम बुद्धि को मनुष्य प्राप्त होता है कि जिसे पाकर सुखपूर्वक भागेर उन्नतिके मार्गने बढ़ता है ॥४॥ हजारों शोक स्थान और सैकड़ों भयस्थान प्रतिदिन मूर्खके सामने उपस्थित हुन्ना करते हैं परन्तु पण्डित विद्वान्को शोक वा भय नहीं दवाते, चाहें यों कहो कि जिसे शोक भयादि न दवा सकें वही परिडत है तथा अन्य मूर्ख हैं ॥५॥ नारदजी कहते हैं कि हे शुकदेव ! यदि तुम्हारा मनवशमें है तो ध्यान देके हमारा उपदेश सुनो ऐसे ज्ञानोपदेश से शोक नष्ट हो जाता है ॥५१॥ निर्बुद्धि वा अल्पमति मनुष्योंका यही चिहू है कि वे अपने पर कोई भनिट विपत्ति भाजाने पर वा प्रिय स्त्री पुत्रादिके वियोगमें मद्य दुःख मागरमें डूब जाते हैं ॥५१॥ जो पदार्थ नष्ट हो चुके उन शुष्प गुग का चिन्तन न करें क्योंकि उन गुणोंका चिन्तन वा आदर करने वाले मनुष्य स्नेह बा मेनके बन्धनों से बूट नहीं सकता इस लिये मुख भोग से उदासीन होना ही कल्याणकारी है. ॥५२॥ S । को

नारदगौता ॥
दोषदर्शीभवेत्तत्र यत्ररागःप्रवर्तते ।
अनिष्टवर्द्धितंपश्येत्तथाक्षिविरज्यते ॥४॥
नार्थीनधर्मोनयशी योऽतीतमनुशोचति ।
अप्यभावेनयुज्येत तच्चाऽस्यननिवर्त्तते ॥५५॥
गुणैर्भूनानियुज्यन्ते वियुज्यन्तेतथैवच ।
सर्वाणिनैतदेकस्य शोकस्थानहिविद्यते ॥६॥
मृतंबायदिवानप्ठं योऽतीतमनुशोचति ।
दुःखेनलभतेदुःखं द्वावनझुप्रपद्यते ॥७॥
नाशुकुर्वन्तियेवुध्या दृष्ट्वालीकेषुसन्ततिम् ।
सम्यकप्रपश्यतःसर्व नात्रुकर्मोपपद्यते ॥५॥
विरक्त ज्ञानी पुरुप की जिन २ पदार्थों में राग वासना विद्यमान हो
उनमें दोप दृष्टि करे अर्थात इस रागको ही अनिष्ट बढ़ाने वाला देखे तो
शीघ्र ही वित्तमें वैराग्य आजाता है ॥५४॥ वीती हुई बातों का शोक करने
में धर्म अर्घ और यशका कुछ भी लाभ नहीं है किन्तु शोकसे धर्नादिका अभाव
वा नाश तो अवश्य होता है और शोक करने वालेका दुःख निवृत्त नहीं होता॥५५॥
अच्छे गुण युक्त वस्तु प्राणियों को प्राप्त होते और उनका वियोग भी होता
है यह सभीके लिये नियम है कित्ती एकके लिये नहीं, यह इष्ट वियोग ही
दुःख शोक का कारण है ॥५६॥ जो कोई. मेली प्रिय मर गया वा खो गया
उसका जो शोक करता है वह एक पहिले दुःखसे द्वितीय शोक जन्य दुःखको
प्राप्त होता है इससे शोक करने में दो अनर्थ होते हैं। परशोक छोड़ देने
से दोनों दुःख मिटजाते हैं ॥५॥ संसारमें इष्ट अनिष्ट सुख दुःखके सिलसिला
को क्रमसे निरन्तर विचार के साथ जो देखते हैं वे प्रिय वियोग में रोते नहीं
सब संसार को सम्यक देखने वाले का रोना नहीं बनता ॥८॥
दुःखोपघातेशारीरे मानसेप्युपपस्थिते ।
* यस्मिनशक्यतेकर्तुं यत्नस्तन्नानुचिन्तयेत् ॥ ५ ॥
भैषज्यमेतद्दुःखस्य यदेतन्नानुचिन्तयेत् ।
चिन्त्यमा हिनव्येति भूयश्चापिप्रवर्धते ॥ ६०॥

. PRE गीतासंग्रहे- प्रज्ञयामानसंदुःखं हन्याच्छारीरमौषधैः । एलद्विज्ञानसालय नबालैःसमतामियात् ॥ ६१ ॥ अनित्यंयौवनरूपं जीवितंद्रव्यसंचयः । आरोग्यप्रियसंवासो गृध्येत्तत्रनपण्डितः । नजानपदिकंदुःख-मेकाशोचितुमर्हति । अशोचन्प्रतिकुर्वीति यदिपश्येदुपक्रमम् ॥ ६३ ॥ शारीरिक दुःख नष्ट होजाने पर यदि मानस दुःख भाजावे और उसको हटानेका कोई उपाय न दीखे तो उसकी चिन्ता वा शोक न माने ॥ ५ ॥ दुःखको हटानेका औषध यही है कि जो चिन्ता न करना अर्थात् दुःखको न मानना क्योंकि चिन्ता करनेसे दुःख नष्ट नहीं होता किन्तु और भी अ- धिक २ बढ़ता है इससे उदासीनता ही श्रेयस्करी है ॥ ६ ॥ बुद्धिो उत्तम . विचारसे नानस दुःखको तथा औषधि सेवनसे शारीरिक दुःखको नष्टकरे यही समझदारोंका कर्तव्य है किन्तु अज्ञानियोंके तुल्य दुःखमें घबड़ावे नहीं ॥ ६९ ॥ युवावस्था, उत्तमरूप, जीवन, धनशा संचय करना, नीरोगता और प्रिय वस्तुका संयोग ये सब अनित्य हैं सदा रहने वाले नहीं है इससे उमझदार विद्वान यौवनादिमें लिप्त वा आसक्त न होवे ॥६२ ॥ जो दुःख मा विपत्ति देश भर पर भाई हो उसे अकेला अपने पर मानके शोक न करे किन्तु शोक न करे किन्तु शोकातुर न होता हुभा विपत्तिको हटामेका उ- द्योग तो करे जो देखें कि मैं इनमें कुछ भी सफलता प्राप्त कर सकता हूं तो अवश्य ही दुःख निवृत्तिका उपाय करे ॥ ६३ ॥ सुखादबहुतरंदुःखं जीवितेनात्रसंशयः । स्निग्धत्वंचेन्द्रियार्थेषु मोहान्मरणमप्रियम् ॥ ६४ ॥ परित्यजतियोदुःखं सुखंचाप्युभयनरः । अन्यतिब्रह्मसोऽत्यन्तं नतंशोचन्तिपण्डितोः ॥ ६५ ॥ त्यज्यन्तेदुःखमाहि पालनेनवतेसुखाः । दुःखेनचाधिगम्यन्ते नाशपांनचिन्तयेत् ॥ ६६ ।। अन्यामन्यांधनावस्यां प्राप्यवैशेषिकीनराः । -

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नारदगीता ॥
६१७
अनायान्तिविध्वंसं संतोषंयान्तिपण्डिताः ॥ ६७ ॥
सर्वेक्षयान्तानिचयाः पतनान्ताःसमुच्छ्याः ।
संयोगाविप्रयोगान्ता मरणान्तहिजीवितम् ॥६॥
विद्वाम् विचारशीलोंने सम्यक आन्दोलन करके यह निर्णय कर लिया
है कि मनुष्य के जीवन में सुखको अपेक्षा दुःख ही अधिक है इसमें
कुछ
भी
न्देह नहीं है तथा इन्द्रियोंके विषयों में प्रेम होनेसे मोह घश अप्रिय मृत्यु
शाकर घेर लेता है । ६४ ॥ जो मनुष्य संसारी सुख दुःख दोनोंको छोड़ता है
अर्थात् हर्ष शोक नहीं मानता वह साक्षात् ब्रह्म होजाता है विद्वान् लोग
उसे शोक सागरसे पार हुमा कहते हैं ॥ ६५ ॥ धनादि ऐश्वर्य त्यागने में ब-
हुत दुःख होता और धनकी रक्षा करने में भी सुख नहीं है और दुःखसे ही
धन प्राप्त होता है इस लिये धनका नाश होनेपर चिन्ता न करे । क्योंकि
जो सब कालमें दुःखका हेतु है उसके नाश, तज्जन्य दुःखका भी नाश जानो।
६६ ॥ धन प्रासिको भिन्न २ न्यूनाधिक खास र अवस्थाको प्राप्त होकर साधा-
रण मनुष्य तृप्त न होते हुए अन्तमें नष्ट हो जाते हैं परन्तु पण्डित लोग
संतोष कर लेते हैं ॥ ६७ ॥ सभी संधयोंका अन्तमें नाश होता, सभी उत्र-
तियां अन्तमें अवनत होतीं, सभी संयोगोंका अन्तमें वियोग होता और
सभी जीवन अन्तमें मरणको प्राप्त होजाता है इस लिये संघय उन्नति संयोग
और जीवनको मुखका हेतु नहीं भागना चाहिये ॥ ६८ ॥
अन्तोनास्तिपिपासायास्तुष्टिस्तुपरमसुखम् ।
तस्मात्सन्तोषमेवेह धनंपश्यन्तिपण्डिताः ॥ ६ ॥
निमेषमात्रमपिहि वियोगच्छन्नतिष्ठति ।
स्वशरीरेष्त्रनित्येषु नित्यंकिमनुचिन्तयेत् ॥ ७० ॥
भूतेषुभावंसंचिन्त्य येबुद्ध्यामनसःपरम् ।
नशोचन्तिगताध्वानः पश्यन्तःपरमाङ्गतिम् ॥७१॥
संचिन्वानकमेवैनं कामानामवितृप्तकम् ।
व्याघ्र पशुमिवासाद्य मृत्युरादायगच्छति ॥ ७२ ॥
तथाप्युपायंसंपश्येद् दुःखस्यपरिमोक्षणम् ।
अशोचनारभेच्चैव मुक्तश्चाव्यसनीभवेत् ॥ ७३ ॥

.११८: गीतासंग्रहे- ज्ञानियों ने ठीक जान लिया है कि तृष्णा का अन्त नहीं है. इसी का- रण संतोष में ही बड़ा सुख है इसी कारण विद्वान् लोग संतोष को ही बड़ा धन जानते मानते हैं ॥ ६९ ॥ एक क्षण भर भी आयु का घटना बन्द नहीं होता ऐसी दशा में अपने शरीरों के अनित्य होने पर ज्ञानी को यह शोच- ना चाहिये कि नित्य वस्तु क्या है ? नित्य वस्तुको जान लेना ही ज्ञान है, ॥ ७० ॥ प्राणियों में मुख्य सत्ता का चिन्तन करके जो लोग मनसे परे चेतना- माँ को जानते हैं वे परनपद को देखते हुए संसार मार्ग से पार हुए शोक नहीं करते अर्थात् ज्ञान होते ही शोक मोहं नष्ट हो जाते हैं ॥ १ ॥ तृप्त न होकर कामनाओं का संचय करते हुए ही मनुष्य को मृत्यु ऐसे उठा ले जाता है कि जैसे वाघ पशु को उठा लेजावे ॥ ७२ ॥ यद्यपि मृत्य रूप बाघ मुख वायें खड़ा है तो भी दुःख से बचने बा छूटने का उपाय ज्ञान दृष्टि से देखें। शोक को त्याग के परमार्थ का प्रारम्भ करे. और 'चित्तं से विषयों की आसक्ति को छोड़ता हुआ व्यसनों का त्याग करे । अर्थात् परमार्थ तत्त्वज्ञान में पहुंचते ही पहाड़ों के तुल्य बड़े २ दुःख भी नष्ट हो जाते हैं ।-७३ ॥ शब्देस्पर्शचरूपेच गन्धेषुचरसेषुच । नोपभोगात्परंकिजिद्धनिनोवाऽधनस्यवा ॥ ५४॥ प्रक्सिंप्रयोगादभूतानां नास्तिदुःखंपरायणम् । विप्रयोगात्तुसर्वस्य नशोचेत्प्रकृतिस्थितः ॥७५ ॥ धृत्याशिश्नोदररक्षेत्पाणिपादचचक्षुषा। चक्षःोत्रेचमनसा मनोवाचंचविद्यया ॥ ७६ ॥ प्रणयंप्रतिसंहृत्य संस्तुतेवितरेषुच । बिचरेदसमुन्नदुः ससुखीसंचपण्डितः ॥ ७७ अध्यात्मरतिरासोनो निरपेक्षोनिरामिषः । आत्मनैवसहायेन यश्चरेत्ससुखीभवेत् ॥ ७८ ॥ शब्द स्पर्श रूप रस. और गन्ध इन पांचो विषयों में धनी वा निर्धन दोनों ही को भोगने से भिन्न अन्य कुछ लाभ नहीं है ।। १४ ॥ जिस वस्तु नाश में महादुःख होता है उसके प्राप्त होने से पहिले कुछ भी दुःख वा सुख नहीं होता इस कारण.. प्राप्ति से पहिले की, दुशा को शोचता हुआ शोक न ... के . . नारदगीता ॥ ११९ करे ॥ ७५, म उपस्थेन्द्रिय और उदर को रक्षा रखने के लिये धैर्य से काम लेवे अर्थात् अनुचित काम और अभोज्य से बचने में धीरज रक्खे .प्रांखों से देख- ता हुमा,हाथ पांव की रक्षा करे मानस विचार से प्रांख कान की रक्षा करे और विद्या के द्वारा मन और वाणी को अनुचित से बचाने अर्थात् मन वाणी को विद्याभ्यास में लगाने ॥ १६ ॥. प्रशस्त और निन्दित दोनों से आसक्ति को हटाकर जो पुरुष , ,शान्ति शील उदासीन भावसे विचरे वही सुखी और वही पण्डित है ॥ 99 ॥ जो अपने अध्यात्म नाम भीतरी विचार में स्थिर रहता हुमा अर्थात् बाहरी अनुकूल प्रतिकूल विषयों में हर्ष शोक कुछ न मानता हुमा केवल परमात्मा की सहायता से ही विचरे वही सुखी जानो ॥ ८॥ सुखदुःखविपर्यासो यदासमुपपद्यते । नैनंप्रज्ञासुनीतंवा त्रायतेनापिपौरुषम् ॥७॥ स्वभावादयत्नमातिष्ठेद यत्नवान्नावसीदति । जरामरणरोगेभ्यः प्रियामात्मानमुद्धरेत् ॥८०॥ रुजन्तिहिशरीरोणि रोगा:शारीरमानसाः। सायकाइवतीक्ष्णाग्राः प्रयुक्तादृढधन्विभिः ॥८६॥ व्यथितस्यविधित्साभिस्ताम्यतोजीवितैषिणः अवशस्यविनाशाय शरीरमपकृष्यते ॥२॥ सवन्तिननिवर्तन्ते स्रोतांसिसरितामिव । आयुरादायमर्तानां रात्र्यहानिपुनःपुनः ॥३॥ जब सुखके समय विपत्ति रूप दुःख ना जाता है अर्थात् सुखके बदले दुःख माता है तब नीति वा बुद्धिमानी और पुरुषार्थ इनमें से कोई भी दुःखं से नहीं बचाता ॥७॥ रोगादि रूप दुःख-श्राने से पहिले स्वभाव से ही प्रतिकूलात्मक दुःख निवृत्ति के लिये यन्न करता रहे सदा यत्न करने वाला दुःख नहीं पाता और मोक्षार्थ यत्न करता हुआ, जरावस्था, मरण और रोगादि के चक्करसे अपने प्रिय आत्माको बचावे ॥८०॥ जैसे प्रवल धनुष धारीने छोड़े पने वाण शरीरोंमें विंधकर पीड़ित करते हैं वैसे ही 'शारीर और मानस . . . .

M १२० गीतासंग्रहें- रोग प्राणियों के शरीरों को पीडित करते हैं ॥८१॥ नये २ कामोंकी इच्छात्रों से पीडित ग्लानि युक्ति जीवन चाहता हुमा वेवश प्राणीके विनाशके लिये शरीर लेंचा जाता है अर्थात् प्राशीके अधोगति अर्थ शरीर तंग किया जाता है ॥२॥ जैसे नदियोंके जो प्रवाह तृगादिके सहित आगे २ वहते चले जाते हैं वे फिर पीछे लौट कर नहीं आते वैसे ही प्रायुको लेकर दिन रात रूप कालके प्रवाह जो चले जा रहे हैं वे फिर लौट कर नहीं भाते ॥३॥ व्यत्ययाह्ययमत्यन्तं पक्षयोःशुक्लकृष्णयोः । जातान्माजरयति निमेपन्नावतिष्ठते ॥४॥ सुखदुःखानिभूनाना-मजरोजरयत्यसौ। आदित्योहस्तमभ्येति पुनःपुनरुदेतिच ॥८॥ अदृष्टपूर्वानादाय भावानपरिशङ्कितान् । इष्टानिष्टान्मनुष्याणा-मस्तंगच्छन्तिरात्रयः ॥८६॥ योयमिच्छेदयथाकामं कामानांतदवाप्नुयात् । यदिस्यान्नपराधीनं पुरुषस्यक्रियाफलम् ॥६॥ संयताश्चदिक्षाश्च मतिमन्तश्चमानवाः । दृश्यन्तेनिष्फलाःसन्तः प्रहीणा:सर्वकर्मभिः ॥८॥ शुक्ल के वाद कृष्णपक्ष और कृष्णाके वाद शुक्लपक्ष पारापारीसे प्रायानाया करते हैं और वह पाना उत्पन्न हुए मनुष्योंकी प्रायुको प्रतिक्षण घटाता हुमा एक क्षण भर भी नहीं ठहरता ॥४॥ यह वार २ सूर्यके उदय अस्तसे होने वाला दिनरात आदि कालका प्रवाह स्वयं अजर अमर रहता हुआ प्रा- णियोंके सुख दुःखोंको नीर्स करता अर्थात् सुखको नष्ट करके दुःख को लाता और दुःखको नष्ट कर फिर सुखको लाता है ॥८॥ जिन कामाकी शंका भी नहीं है कि ऐसे काम होंगे तथा जिमको पहिले कभी नहीं देखा ऐसे मनुष्य के इष्ट अनिष्ट भावों नाम पदार्थों को माथ लेकर दिन रात चले जा रहे हैं। कल जो २ मनुष्यादि वा धनादि मौजूद थे वे अाज न रहे कल का दिन उनको साथ ले गया ॥८६॥ यदि मनुष्यके काँका फल ईयर वा दैवके आधीन न होता तो जिसकी गो इच्छा होती वह अपनी उस कामनाको पूरी कर लेता ॥८॥ संयमसे रहने वाले चतुर बुद्धिमान् मनुष्यभी सबको से हीन निष्फल अर्थात् दुःखी और दरिद्र दीखते हैं ॥८८H नारदगीता ॥ १२१ अपरेवालिगाःसन्तो निर्गुणा:पुरुपाधमाः । आशीर्भिरप्यसंयुक्ता दृश्यन्तेसर्वकामिनः ॥ ८६ ॥ भूतानामपरःकश्चिद्धिंसायांसततोत्थितः वञ्चनायांचलोकस्य स्वसुखेष्वेवजीर्यते ॥ ९ ॥ अचेष्टमानसासीनं श्रीःकञ्चिदुपतिष्ठते । कश्चित्कर्मानुसृत्यान्यो नाप्राप्यमधिगच्छति ॥१॥ केषांचित्पुत्रकामाना-मनुसन्तानमिच्छताम् । सिद्धौप्रयतमानानां नचाण्डमुपजायते ॥२॥ गर्भाच्चाद्विजमानानां क्रुद्धादाशीविपादिव । आयुष्मान्जायतेपुत्रः कथंप्रेत्यइवाभवत् ॥ १३ ॥ तथा अन्य महामूर्ख निर्बुद्धि भव गुणोंसे रहित नीच ऐसे लोग धन पुत्रादि सघ कामनाओंसे पूर्ण दीखते हैं । कि जिनको सज्जन वा धर्मात्मा लोग अच्छा नहीं कहते मानते ॥ ८ ॥ तथा अन्य कोई पश्वादि प्राणियों की हिंसा निरन्तर प्रवृत्त रहने वाले और पानेक प्रकार से लोगोंको ठगने वाले मनुष्ण जन्मभर मरणापर्यन्त दुःखी दीखते हैं ॥ ७० ॥ और धनकी पैदायशका कुछ भी काम न करते किन्तु चुप बैठे हुए किमी के पास निरन्तर धन चला आता है । तथा कोई अन्य बहुत परिश्रम करके भी अप्राप्य धनादिको नहीं प्राप्त होता ॥ १ ॥ कोई लोग चाहते हैं कि हमारे बाद हमारे सन्तान ही हमारी संपत्तिके मालिक हों ऐसे अनेक श्रीमान् पुत्र होने के उपाय धारते हुए भी निवेश दीखते हैं गर्भस्थिति नहीं होती ॥ २ ॥ और अनेक लोग व्यभिचारादि करते हुये चाहते हैं कि कहीं गर्भ न रहनाय मापके तुल्य गर्भ रहनेसे डरते हैं उनके यहां चिरजीवी रुष्ट पुष्ट ऐमा पुत्र उत्पन्न होता है जो जानो मरके फिरसे जीवित होगया हो ॥ ९३ ॥ देवानिष्ट्वातपस्तप्त्वा कृपणेःपुत्रगुद्धिभिः । दशमासान्परिता जायन्ते कुलपसिनाः ॥ ६ ॥ व्याधिभिर्मध्यमानानां त्यजतांविपुलंधनम् । वेदनांनापकर्षन्ति यतमानाचिकित्सकाः ॥ ५ ॥ १ १६ . २ १२२ गीतासंग्रहे-. तेचापिनिपुणवैद्याः कुशलाःसंभृतौपधाः । व्याधिभिःपरिक्लश्यन्ते मृगाव्यारिवार्दिताः ॥ ६ ॥ तेपियन्तःकपायांच सीपिविविधानिच । दृश्यन्तेजरयामना नगानागैरिवोत्तमैः ॥ ७ ॥ केबाभुविचिकिन्सन्ते रोगार्त्तान्मृगपक्षिणः । वापदानिदरिद्वांश्च प्रायोना भवन्तिते ॥ ८ ॥ और कहीं ऐमा दीखता है कि अच्छे नानी प्रतापी पुत्र होने के लिये देवतोंका पाराधन और तप किया तब दश महीने तक गर्भ रहा परन्तु अन्तमें कुल कलंकी कुपुत्र पैदा होते हैं ॥ ४ ॥ अनेक लोग महाभयङ्कर रोगोंसे पीड़ित होते हुये रोग निवृत्ति के लिये बहुत धन खर्च करने वाले रोगियों के दुःखको यन्त्र करते हुए भी वैद्य डाक्टर दूर नहीं कर पाते ॥ ५ ॥ और वे अच्छे २ नामी चतुर वैद्य अच्छी २ श्रौषधियोंको रखने वाले होने पर भी रोगोंसे ऐसे पीडित होते हैं कि जैसे वधिक लोगोंसे मृग पीडित किये जाते हैं ॥ ६ ॥ वे लोग अनेक प्रकारके औषधोंसे बनाये घृतोंको क- पायोंको पीते और च्यवनप्राशादि पौष्टिक औषधोंका सेवन करते हुए भी बुढ़ापेसे ऐसे नष्ट हुए दीखते हैं कि जैसे अच्छे हाथी पहाड़के टुकड़ों को गिराक नष्ट करते हैं ॥ ॥ और यह भी देखने शोचनेको घात है कि भू- मगहलने जंगलके हरिणादि मृग वा पनियोंक्षी चिकित्मा कौन करता है? अर्यात् जंगलके अनेक जीव और दरिद्री गरीव लोग प्रायः रोगोंसे पीडित होते ही नहीं ॥८॥ घोरानपिदुराधर्षान् नृपतीनुग्रतेजसः । आक्रस्यादरोगाः । पशून्पशुगणाइव ॥ ८ ॥ इतिलोकमनाक्रन्दं मोहशीकपरिप्लुत्तम् । स्रोतसासहसाक्षिप्तं हियमाणंवलीयसा ॥ १० ॥ नधनेननराज्येन नोग्रेणतपसातथा। स्वभावमतिवर्त्तन्ते येनियुक्ताःशरीरिणः ॥ १०१ ॥ नमियेरन्नजीयैरन् सबैस्युःसर्वकामिनः । - नारदगीता ॥ १३ नाप्रियंप्रतिपश्येयुरुत्थानस्यफलेसति ।। १०२ ॥ उपर्युपरिलोकस्य सर्वोगन्तुंसमीहते । यततेचयथाशक्ति नचतद्वर्त्ततेतथा ।। १०३ ॥ संसार में जो बड़े २ तेजस्वी प्रतापी किसी से न दयने बाले किन्तु बड़ेर शूर सिंहादि को पहने मारने वाले देश भरके राणानों पर भी आक्रमण करके रोग ऐसे ही दया लेते हैं कि जैसे सिंह गीदड़ों को दवा लेवे ॥ ॥ मनुष्य को संमार की ऐसी दशाओं को देखते हुए चित्त में शान्ति स्थापित करनी चाहिये । इस प्रकार शोक मोह और दुःखादि से घेरे हुए लोगों को प्रति यली कालप्रवाह ऊंच नीच दशा में गिरा रहा है ॥१०॥ जो २ प्राणी अपने २ प्रवल स्वभाव में बंधे हुए हैं उन का वह काम क्रोधादि के गढ़ों में गिराने वाले खभाव की वामना धन से राज्य से वा घोर तप करने से भी दूर नहीं होती ॥ १०१ ॥ यदि मनुष्यादि प्राणियों की सभी इच्छा पूरी होने लगें तो न कोई मरे न घुइहा हो और न अप्रिय को देखे किन्तु सबकी सब कामना सिद्ध हो जावें ।। १०२ ॥ संमार में सभी प्राणी ऊंची २ दशा में जाने की चेष्टा स्वभाव से ही करते हैं और यथाशक्ति वैमा ही यत्न भी करते हैं। परन्तु यैमा न होता और न हो सकता है ॥ १०३ ।। ऐश्वर्यमदमत्तांश्च मत्तान्मद्यमदेनच । अप्रमत्ताःशठाःशूराः विक्रान्ताःपर्युपासते ॥ १० ॥ क्लेशा परिनिवर्तन्ते केपांचिदसमीक्षिताः । खंस्वंचपुनरन्येषां नकिंचिदधिगम्यते ॥ १०५ ॥ महच्चफलवैषम्य दृश्यतेकर्मसन्धिषु । वहन्तिशिविकामन्ये यान्त्यन्येशिविकागताः ॥ १०६॥ सर्वेपामृद्विकामाना-मन्येरथपुरस्सराः । मनुष्याश्चशतस्वीकाः शतशोविगतखियः ॥ १० ॥ द्वन्द्वारामपुभूतेषु गच्छन्त्येकैकशोनराः । इदमन्यत्पदंपश्य नात्रमोहंकरिष्यसि ॥ १० ॥ संसार में यह भी देखा जाता है कि जिन को अपने धनी वा राजा प्रमाद वा नशा से रहित पराक्रमी शूरवीर मूर्स लोग सेवा करते हैं ॥१०४॥ किन्हीं लोगों के दुःख विना ही देख भाल किये स्वयं नष्ट हो जाते हैं, तथा गीतासंग्रहे- रईन होने का नशा चढ़ा है या जो मद्य को नशा में मस्त हैं उन लोगों की ॥ कन्हीं को स्वयं ऐसे दुःख माघेरते हैं कि जिनका कुछ भी कारण खोजने पर नहीं मिलता ॥ १०५ ॥ और कहीं ऐसा विषम उलटा फल दीस्ता है कि पालकी में चढ़ के चलने वाले दुःखी और उसी पालकी वा पीनस का वोझा उठाने वाले सुखी हैं। जैसे पालकी में चढ़े रोगी रईस रोग पीड़ा से चिल्लाते और कहार मानन्द करते हैं ॥ ९०६ ॥ कुछ राजा रईस लोग ऐसे हैं कि जिनके रथादि सवारी के मागे पीछे भृत्य लोग दौड़ा करते हैं। किन्हीं के घर में सैकड़ों स्त्रियां हैं वे सब काम भोग के विना दुखिया और सैकड़ों पु- रुष स्त्रियों के विना दुःखी हैं ॥ १०७ ॥ हर्ष शोक हानि लाभ सुख दुःखादिमें रमने वाले प्रायः ऐसे ही सब दुःखी दीखते हैं । अर्थात् ८१ श्लोफ से इधर संसार में नाना प्रकार के दुःख दिखाये हैं अब नारद जी कहते हैं कि हे शुकदेव जी ! यह आगे कहा विचार और देखो जिस से फिर तुम को मोह नहीं होगा ॥ १८ ॥ त्यजधर्ममधर्मंच उभेसत्यान्तेत्यज । उभेसत्यानृतेत्यक्त्वा येनत्यजसितंत्यज ॥१०॥ एतत्तेपरमंगुह्य-माख्यातमृषिसत्तम । येनदेवाः परित्यज्य मर्त्यलोकंदिवंगताः ॥ १० ॥ ततोमुहूत्तसंचिन्त्य । निश्चितङ्गतिमात्मनः । परावरज्ञोधर्मस्य परांनशेयसींगतिम् ॥११॥ कथंत्वहमसंश्लिष्टो गच्छेयंगतिमुत्तमाम् । नावतयंयथा भूयोयोनिसंकरसागरे ॥११२॥ तुम धर्म अधर्म दोनोंको छोड़ो, सत्य असत्य दोनोंको छोड़ो इन दोनों सत्य असत्यको छोड़के जिस मनोरथ करके तुन हीन हो उसे भी छोड़दो। जैसे प्रकाश अन्धकारादि दो २ साथ ही साथ आगे पीछे लगे रहते हैं। वैसे ही अधर्म के साथी धर्मका तथा असत्य के साथी सत्यका त्याग कहा जानो ॥१८९ नारद जी कहते हैं कि हे उत्तम ऋषि शुकदेव जी ! यह परमरहस्य .

-- नारदगीता ॥ १२५ विचार हम ने तुम से कहा है कि जिस ज्ञानके प्रभावसे देवता लोग मर्त्य- लोक को छोड़ के स्वर्गको प्राप्त हुए हैं ॥ १९० ॥ इसके पश्चात् एक मुहूर्तमात्र धर्म के तत्त्वज्ञानी शुकदेव जी ने अपनी परम निश्रेयसगति का निश्चित वि चार करके अपने मन में कहा कि हम संसारके सब झगड़ों से मुक्त होकर ऐसी उत्तमगतिको कैसे प्राप्त हों कि जिस से चौरासौ लाख योनियों के म. हाभयंकर भगाध संसार सागर में डूबने के लिये फिर न लौटें ॥१९१ । ११२॥ परंभावंहिकाङ्क्षामि यतोनावर्ततेपुनः । सर्वसङ्गान्परित्यज्य निश्चितीमनसागतिम् ॥१३॥ तत्रयास्यामियत्रात्मा शर्ममेऽधिगमिष्यति । अक्षयश्चाव्ययश्चैव यत्रस्थास्यामिशाश्वतः शि: नतुयोगमृतेशक्या प्राप्तुंसापरमागतिः । - अबवन्धीहिबुद्धस्य कर्मभिनौपपद्यते ॥१९भा. तरमादयोगसमास्थाय त्यक्त्वागृहकलेवरम् वायुभूतःप्रवेक्ष्यामि तेजोराशिदिवाकरम् ॥११६॥ इति मोक्षधर्मपर्वणि ३३१ अध्याये नारदगीतापूर्णा ॥ महर्षि शुकदेवजी फिर कहते हैं कि हम उस भावकी काङ्क्षा करते हैं कि जिस से फिरकभी दुःख सागर में नहीं पड़े सब चराचर वस्तुओंको मनसे भुलाकर मन से अपनी गति निश्चित करके वहां जागंगा जहां मेरे प्रात्माको पूर्ण शान्ति प्राप्त होगी और जिस दशामें अजर अमर अभय हो कर अनन्त काल तक स्थिर रहूंगा ॥ १९३ । ११४ ॥ परन्तु पूर्ण योग समाधिस्थ हुए विना वह परमगति [ मोक्ष ] किसी को कभी प्राप्त हो नहीं सकती और ज्ञानी पुरुष का शेष कमाँ से बन्धन हो नहीं सकता तिससे योगसमाधि में स्थित होके और इस शरीर रूप अशुद्ध महामलिन घरको त्यागकर वायु के तुल्य अपने सूक्ष्म स्वरूपसे तेज स्वरूप प्रादित्य मण्डलमें प्रवेश करूंगा ॥ १९५ । १९६ ॥ ऐसा विचार करके शुकदेव जी योग समाधिस्थ होकर और स्थूल शरीर को छोड़ के मोक्षको प्राप्त हुए । यह मोक्षधर्म पर्वमें नारदगीता समाप्त हुई। और गीतासंग्रह पुस्तक भी समाप्त हुन्ना ।। सेठी नग --

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Geeta Sangrah

Author
Sharma, Bhimsen
Title
Geeta Sangrah
File name
Geeta Sangrah
Text
OCR done
Citation
1911
Published
2009/09
Publisher
Etawah, Brahm Press
Language
Sanskrit
Pages
129
Library
Sanmati Library, Jaipur
Classification
Geeta
DLI number
345584
Barcode
99999990233918.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
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Copyright permitted
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