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Ramgeeta
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॥ श्रीस अध्यात्मरामायणान्तरांता- रामगीता। कीरस्थलनिवानिश्रीपंडितश्रीरामगुजरातींनाह्मण- रुन-अनुवाद-पदप्रकाशिका-टीकासहिता। कर्परम्पलाननासिदेवश (शौरि ) दुनिद्रात्मज पंडितविष्णुदनकृत- विषमपदव्यायामहिताच । श्रीपंडितरामनाथशानिमिः संशोधिता। मुम्बय्यां श्रीकृष्णदासात्मजाभ्यां गंगाविष्णु, खेमराजाभ्यां स्वकीये "श्रीवेङ्कटेश्वर मुद्रायन्त्रालये मुद्रिता । संगनु १९४७ शके १८१२ ----rinaamwareneur-Arreste यह पुग्न सन् ८६का ऐक्ट फेयमुजब रजिष्टरी कराके सयंप्रकारकामा यन्माधिकारीन अपने स्वाधीन रस्साहे. -- Easan -
होत्री की
को तेजद) मेंगराहरूकरनेसे
तिसमें भी लाया व्योमनिन्दन
लावैलर"हो"लोहारकार
सन्दाले उण भाराहरला
रह तिसमेंबामन बिन्दु अनुस्वामि
लाने दूसरामंत्र "ओ" हाराजा
इक दो १२ बरतों
चितई, गोरचन्नवर ने संयोग
रोटीजसालबालसुखदा
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तीनचिः
शीतसत् ऊपीहात्। श्रीगणेशाय नमः श्रीजानकीवल्लमो-जयति, हेरम्ब शारदां शंखें रामं सीतासमन्वितं ॥ सौमित्रि सानुज भरतं प्रणमामि मुहुर्मुहुः ॥१॥ दोहा-गुरुपदपद्मपराग शुन, शिर धर पाय प्रसाद । रघुवरसीताको करौं, मतिअनुहर अनुवाद ॥ यद्यपि इस परमपवित्र पुस्तक श्रीरामगीता उपर अनेक तिलकसंस्कृत तथा नापामै हुये तथापि ऐसा कोई तिलक नहि- भया जो अल्पबुद्धियोंके समझनेयोग्य होवे और अक्षरार्थ औ भावार्थ दोनो सुगमरीतिसे जाणेजाई । इस निमित्त यह .दासानुदासपदपद्म श्रीरघुनन्दनस्वामीजीका श्रीरामदास श्रीरामगीतापर प्रसिद्धभाषामें तिलक करताहै ॥ श्रीः ॥ इसटीकामें यह रीतिहै प्रथम मूलश्लोक तत्पश्चात् भिन्न २ पदोंके अर्थ तत्पश्चात् अनुवादसमुच्चय और जहाँ संस्कृत पद लिखा जावेगा तहाँ उस्का अर्थ दो अर्धकपालके चि- न्हमे अवश्य अर्थ लिखाजावेगा और जिस स्थान विशेषार्थका प्रयोजनहे वहभी लिखाजावेगा नाम इस रामगीताकी टीका- का (रामगीतापदप्रकशिका) है । इत्यलम् ॥ करपूरस्थलनिवासी-पंडित श्रीरामदास गुजरातीद्विज ।
(४) विज्ञप्तिः। यद्यपि रामगीतापर पदप्रकाशिका टीका अत्युत्तम भईहै तथापि इस टीकामें जो २ विशेष आवश्यकता है वह सवि स्तृतकर और वेद वेदांगदर्शन धर्मशास्त्रादि द्वारा प्रमाणोसे दृ- ढकर विषमपदव्याख्या नाम टीका यथाबुद्धि करी है इस्मे जो अशुद्ध हो वह सत्पुरुषोंने शुद्धकरलेना चाहिये । प्रार्थना. यदशुद्धमसम्बद्धमज्ञानाच कृतं मया। विद्वद्भिः क्षम्यतां सर्वं बालत्वादयमञ्जलिः ॥ कर्पूरस्थलनिवासि-दैवज्ञदुनिचंद्रात्मज- पं०विष्णुदत्तशर्मा (शोरी) -
अथ रामगीतामाहात्म्या
ॐश्रीगणेशाय नमः ॥ ॥अध्यात्मरामायणोक्त
श्रीरामगीतामाहास्यं लिख्यते ॥
श्रीरामगीतामाहात्म्यं कृत्स्नं जानाति शंकरः।
तदई गिरजा वेत्ति तदई वेझ्यहं मुने ॥१॥
तत्ते किंचित् प्रवक्ष्यामि कसं वक्तुं न शक्यते ।
यत् ज्ञात्वा तत्क्षणात् लोकश्चित्तशुद्धिमवामुयात् ।
श्रीरामगीता यत्पापं न नाशयति नारद।
तन्न नश्यति तीर्थादी लोके क्वापि कदाचन ॥ ३ ॥
तन्न पश्याम्यह लोके मार्गमाणोपि सर्वदा।
रामेणोपनिपत्सिंधुमुन्मथ्योत्पादितां मुदा ॥ ४॥
लक्ष्मणायापितां गीतासुधां पीत्वामरो भवेत् ।
जमदग्निसुतः पूर्व कार्तवीर्यवधेच्छया ॥५॥
धनुर्विद्यामध्यसितुं महेशस्यांतिकेवसत् ।
अधीयमानां पार्वत्या रामगीतां प्रयत्नतः ॥६॥
श्रुत्वा गृहीत्वाशु पठन् नारायणकलामगात् ।
ब्रह्महत्यादिपापानां निष्कति यदि वांछति ॥ ७ ॥
श्रीरामगीतामात्रं तु पठित्वा मुच्यते नरः ।
दुःप्पतिग्रहदुर्भोज्यदुरालापादिसंभवं ॥५॥
पापं यत्कर्तिनातू सद्योरामगीता विनाशयेत् ॥
शालग्रामशिलाच तुलस्यश्वत्थसंनिधौ ॥ ९ ॥
(६) यतीनां पुरतस्तद्रामगीतां पठेत्तु यः ॥ स तत्फलमवामोति यदाचोऽपि न गोचरं ॥१०॥ रामगीतां पठेनच्या यः श्राद्धे भोजयद्दिजान् ।। तस्यते पितरः सर्वे यांति विष्णोः परं पदम् ॥ ११ ॥ एकादश्यां निराहारो नियतो द्वादशीदिने । स्थित्वाऽगस्त्यतरोमले रामगीतां पठेत्तुयः । स एव राघवः साक्षात् सर्वदेवैश्च पूज्यते॥ १२॥ विना ज्ञानं विना ध्यानं विना तीर्थावगाहनं । रामगीतां नरोऽधीत्य अनंतफलमश्नुते ॥ १३ ॥ बहुना किमिहोत्तेन शृणु नारद तत्त्वतः यस्य विज्ञानमात्रेण वांछितार्थफलं लभेत् ॥ १४ ॥ इति श्रीअध्यात्मरामायणोक्तश्रीरामगीतामाहात्म्य संपूर्णम् ॥ श्रीः॥ श्रीकृष्णदासात्मज गंगाविष्णु, खेमराज श्रीवेंकटेश्वर छापखाना (मुंबई.)
॥श्री॥ अथ श्रीरामगीताप्रारम्भः। Owemo श्रीमहादेव उवाच मूलम्। ततो जगन्मंगलमंगलात्मना विधाय रामायणकीर्तिमुत्तमाम् । चचार पूर्वाचरितं रघूत्तमो राजर्षिवय्यरपि सेवितं यथा ॥१॥ पदप्रकाशिका-(ततः) तिसके पीछे (जगन्मंगलमंगला- त्मना) जगतके मंगलका मंगलस्वरूपने (विधाय) विधान- करके (रामायणकीर्तिम् ) रामायणके यशको (उत्तमां) श्रे- टको (चचार ) आचरणकिया (पूर्व ) प्रथम (आचरितं) आचरणकियेको (रघु उत्तमः ) रघुकुलमे उत्तम (राजर्षि- वयः ) राजर्पियो में श्रेष्ठोने (अपि) निश्चयकर्के (सेवितं) सेवनकियको (यथा) जैसे ॥ १ ॥ अनुवादसमुच्चय-महादेव कहेहै हे पार्वति! तिसके अनंत र (पीछे) जगतके मंगलका मंगलस्वरूप रघुवंशप्रधान (र- घुवंशमे श्रेष्ठ ) श्रीरामचंद्रने उत्तमरामायणकीर्ति अर्थात् राव- (८) रामगीता णादिके वधद्वारा अपना यश विस्तार करके प्राचीन ककुत्स्था दि राजायोंके सेवित धर्मोका आचरणकिया ॥३॥ विषमपदी-श्रीः ।। ओनमो गणेशाय ॥ ससीतं सानुजं रामं प्रणम्य च गजाननं । नृगिरा रामगीतायाः स्फुट भाष्यं समारभे॥ १ ॥ ज्ञानस्याभ्युदयः स्थानं स्थानं विद्याशिवस्यच । यस्मात्रयंच संप्राप्तं तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥२॥ श्रीमन्महादेवप्रणीतस्य अध्यात्मरामायणज्ञानकाण्डस्य निर्वि- घपरिसमाप्त्यर्थं कृतं मंगलं वस्तुनिर्देशात्मकं (ग्रंथादौ मध्येऽते- च मंगलं प्रयोक्तव्यमिति स्मरणात् ) ग्रंथादौ शिप्यशिक्षार्थ निवधा- ति ॥ तत इति ॥ यद्यपि पदपदार्थललितां टीका देववाण्या देव - गुरुद्विजप्रसादात्कर्तुं समुत्सुकोऽस्मि तथापि स्पष्टप्रतिपत्त्यर्थं भा- षायां विषमपदव्याख्यां सप्रमाणां कर्पूरस्थलीयगौतमान्वयालं- कृतश्रीतुलसदिासात्मजदेवज्ञविद्वत्कुलावतंसश्रीदुनिचंद्रात्मजविष्णु : दत्तः. ( शौरि ) इत्यन्वयालंकृतः करोमि । यदत्राशुद्धसंबद्धं तत् प्रचुरपरगुणानंदिभिर्विवय्यः क्षतव्यमित्यभ्यर्थये ॥ शं। इहां वंशस्था नाम छंद है उस्का लक्षण पिंगलसूत्रमें यथा-( वंशस्था ज्तो नौ) इस्का आशय ले वृत्तरत्नाकरमेभी लिखा है ( जतौ तु: वंशस्थमुदीरितं जरौ) अर्थ । जगण । | तगण ऽऽ । फिर ज. गण । । और रगण SIS इसतरह चार गण होवे वह वंशस्थं नाम छंद होता है १२ अक्षरका ॥ इंद्रवशा तोटक श्रीपुट. इत्या- दि बहुत भेदहै १२ अक्षरछंदके है यहां जिसका संभव हो वो वहां जानणा ॥ (1) यह चिन्ह न्हस्वका है और () यह दी. घंका है यह दो सर्वत्र जानने॥ और अलंकारके दो भेद है एक अ- र्थालंकार जैसे स्वभावोक्ति उपमा रूपक आदि दूसरे शब्दालंका- र जैसे अनुप्रास यंमकादि होतेहै तो इहा अनुप्रासालंकारहै लक्ष- ण जैसे-(शब्दसाम्यमनुमासः ) अर्थ- जहां शब्दकी साम्यता हो- .
टीकात्रयोपेता। (९) वे वह अनुप्रास होताहै जैसे तकी तके साथ मकी मके साथ इस्के भी पांच भेदहै विस्तृतके भयसे नहि लिखेंजाते । इति विषमपद व्याख्या ॥१॥ मू०-सौमित्रिणा पृष्ट उदारवुद्धिना रामः कथाः प्राह पुरातनीःशुभाः। राज्ञः प्रमत्तस्य नृगस्य शापतो द्विजस्य तिर्यत्वमथाह राघवः॥२॥ पद०( सौमित्रिणा) लक्ष्मणकरके (पृष्ट ) पूछेहुये (उदा बुद्धिना) उदारबुद्धिवाले करके ( रामः) श्रीरामचंद्रजी (कथाः) कथाको (प्राह ) कहतेाये (पुरातनीः) पुराणी (शुजाः) श्रेष्ठ (राज्ञः) राजाको (प्रमत्तस्य ) प्रमादीको (नृगस्य नृगराजाको )शापतः (शापसे ) द्विजस्य (ब्राह्मण- के) तिर्येक्वं (तिय॑क्योनि अर्थात् किरलेकी देह ) अ- थाह एसे कहतेजये (राघवः) श्रीरामचंद्रजी ॥ अनु०-उदारबुद्धि अर्थात् आर्जवयुक्तचित्त लक्ष्मणकर्के पूछे हुये श्रीरामचंद्रजी पुराचीन शुभ कथा कहताये और जो २ राजालोग प्रमादयुक्त हुयेथे उनको जोरउस प्रमादका फ- ; ल भया वहनी मुनावतेभये । अर्थात् राजा नृगको किं- चित् प्रमाद होनेसे किरलेकी योनि प्राप्तहुई ॥ २ ॥ विपम-श्रीमन्महायशस्वी नृगराजा प्रतिदिन बहुतवस्त्रालंकार- युक्त धेनु (गौउ ) देताथा एक दिन प्रमादसे संकल्पित गौउ ना समझकर और ब्राह्मणको पुनः दी लेनेके भीतर उन दो ब्राह्मणोका (१०) रामगीता संवाद भया वह कहे की हमारी दूसराभी कहे की मैने राजासे ली प्रथम जिस्कि थी वह राजाके पास जा करके कहनेलगा की जै राजन तुमने प्रमादसे मुझकी गौऊ अन्यको दी और तु- अने जानकर संवाद देखा इससे हम तुमको शाप देतेहै किरले- की योनीको प्राप्तहो इस प्रमादका फलभोग ( राजाकी वेनती ना सुनता शीघ्र अपने स्थानको गया ॥ यह गाथा श्रीमद्भागव- त दशम स्कंध उत्तरखंडमे लिखी है विस्तारसै)। इहाँ इंद्रवंशाना. नाम छंद है (यथा-स्यादिन्द्रवंशा ततजै रसंयुतैः ) पिंगलमेभी लिखाहै ( इंद्रवंशा तौ जौ) अर्थ यहाँ तगण दो होवे ऽऽ । ऽार और जगण । । । रगणा होवे तो इंद्रवंशा छंद होताहै॥ २ ॥ मू०-कदाचिदेकान्तमुपस्थितं प्रमुं रामं रमालालितपादपंकजं॥ सौमित्रिरासादितशुद्धभावनः। प्रणम्य भत्त्या विनयान्वितोब्रवीत् ॥ ३॥ पद- (कदाचित् ) एक समय ( एकांतमुपस्थितं ) एकेले बेठेहुयेको (प्रभुं ) स्वामीको (राम) श्रीरामचंद्रजी को ( रमालालितपादपंकज ) रमा अर्थात् जानकाजीकर्के सेवितहै चरणकमल जिसके (सौमित्रिः) लक्ष्मणजी (आसा- दित शुद्धभावनः) ग्रहणकोहै निर्मलविचार जिसने (प्रणम्य) प्रणामकर (भक्त्या) भक्तिसे (विनयान्वितः)नम्रताकरके युक्त (अब्रवीत् )कहतामया ॥ ३ ॥ अनु०-एकसमये एकांतमै किसीस्थान बैठेहुये श्रीरामचं- द्रजीको सीताजीकरके सेव्यमान चरणकमल जिस्के ऐसे को टीकात्रयोपेता (१३) श्रीलक्ष्मणजी शुद्धभावनापाले प्रणामकर भक्तिसे विनयपूर्व- क कहते भये॥ ३॥ विषमपदव्याख्या-तात्पर्य यह है कि इस सममे लक्ष्मणजी रा- मचंद्रको गुरुभावनासे ( जिज्ञासाकी इच्छासे ) अर्थात् मुक्तिकी प्राप्तिके लिये शिष्य बनकर शुद्ध भावनासे राग द्वेष क्रोधादिको- को त्याग पूछते भये ॥ यदि कोई शंकाकरे कि भ्राता मानकर पु- छते है तो (शुद्धभावनः ) इसका अर्थ नहि वनता शुद्धभावना- से गुरुजीकोही पूछाजाता है नहि पिता भ्राता मातादि संबंधियों को इन्मे वात्सल्यादिभावसे न्यूनाधिक रागादिकोंका संभव होताहै और आगे. दोश्लोकसे परमात्मा समझ स्तुतिपूर्वक शरणागतिको मोक्ष इच्छासे प्राप्ति होताहै ।। इहा वंशस्थानाम च्छंद है ।लक्षण और अर्थ पीछे लिखाहै ॥ ३ ॥ म.-सौमित्रिरुवाच॥ त्वं शुद्धबोधोसि हि सर्वदेहिना- मात्मास्यधीशोसि निराकृतिः स्वयं। प्रतीयसे ज्ञानदृशां महामते पदान,गाहितसंगसंगिनाम्॥४॥ पदार्थ-(त्वं ) तुम (शुद्धबोधाोस) शुद्धज्ञानस्वरूप हो (हि)जिस कारणसे (सर्वदेहिनां) सर्वदेहवालोका (आ- त्मासि )अंतर आत्मा हो (अधीशोसि) ईश्वर हो (निरा- कतिःस्वयं) आप आकतिरहित हो अर्थात् तुमारा स्वरूप नहि(प्रतीयसे) प्रतीत होताहै (ज्ञानदृशां ज्ञानदृष्टिवालोंको (महामते ! ) हेमहान बुद्धिवाले (पदाब्जशृंगाहितसंग .. + (१२) रामगीता संगिनां )तुमारे चरण कमलोमै नमरकी न्याई प्रीतिहै जिन्हो को तिनके जो संगिहै ॥ अनुवाद०-हेरामचंद्रजी तुम निर्मलज्ञानस्वरूप हो और स- वैदेहवालोके अंतरात्मा हो और ईश्वर हो वास्तवसे तुम रूप- रहित हो और ईश्वर हो अपने भक्तोंकेसाथ संगकरनेवालोको ज्ञानदृष्टिसे दिखाई देतेहो ॥४॥ विषमपदी-इसस्थान श्रीरामचंद्रको निर्गुनब्रह्मरूपतासे लक्ष्मणजीने स्तवनकिया इसमे प्रमाण यह है॥ याज्ञवस्मृ०अ०३ स्मृति ६९ यथा "निमित्तमक्षरः कर्ता बोद्धा ब्रह्म गुणी वशी । अ. जः शरीरग्रहणात् स जात इति कीर्त्यते" इति स्मरणात अ- र्थ यह है कि हे परमेश्वर ! तुम सर्वका कारण नही नाशहोनेवाला कर्त्ता सृष्टिका ज्ञानरूप गुण शौर्यादियुक्त जितेंद्री और सबको वश्यक वाला जन्मरहित ऐसा तुम शरीरको धारणकर जात (उ- त्पन्नहुआ) कहा जाता है ॥ और ईश्वरका लक्षण (पातंजल द- र्शन ) योगशास्त्रमे लिखा है समाधिपादे २५ सूत्रं "क्लेशकर्मविपा- काशयैरपरामृष्टः पुरुषविशेष ईश्वरः ॥"क्लिश्यंतीति क्लेशाः ज- अर्थात् जो दुःखको उत्पन्न करे और कर्म इन्का जो विपाक (वि- पच्यते इति विपाकाः) विशेष करके पाकफल आशय वासना इ- न्करके अपरामृष्ट अर्थात् तीनोकालमे जो रहितहै ( ईशनशील ई- श्वरः) अर्थात् इच्छामात्रसे जगतके उद्धारकर्नेमे जो समर्थ है। इहाइंद्रवंशाछंदहै ॥ ४ ॥ मू०-अहं प्रपन्नोस्मि पदाम्बुजं प्रभो भवांपवर्ग तव योगिक्षावित। यथांजसाज्ञानमपारवारिधि टीकापयोपेता। (१३) सुखं तरिष्यामि तथानुशाधि मां ॥ ५ ॥ १० ( अहं)मै (प्रपन्नोस्मि)शरणागतभयाहुं (पदांबुर्ज) चरणकमलोको (प्रभो ।) हेस्वामि (अवापवर्ग) संसारसे मोक्षकरनेवाले चरणोको (तव) तेरे (योगिक्षावित) यो- गिजनोको जो भावित अर्थात् अच्छे लगतेहै (यथा) जैसे ( अंजसा) शीघ्र (अज्ञानमपारवारिधि)अविद्यारूप अपार समुद्रको (सुखं तरिष्यामि ) सुखसे तरजाऊं (तथा )ते से (अनुशाधि मां) शिक्षाकरो मुझे ॥ ५ ॥ अनुवाद-हेमभो! तुमारे चरणकमलाकी शरणको मे पा मायाहु कैसे तुमारे चरण जो संसारसे मोक्ष देनेवाले और योगिजन जिसका ध्यान करतेहै जिस प्रकार इस अविद्यारू- प समुद्रके पारको हम बिनाखेदसे पार होवे तैसे हमको शि- क्षाकरो ॥ ५॥ विषमपदी-इस्मे शंका यह है कि प्रथम रामचंद्रको लक्ष्मणजी- ने वनमे सहायतादी और क्लेशादि रामचंद्र के साथ भोगे और रा- मजीनेभी विलाप पितृस्नेहादि सब यथावत मनुष्यके काम कीये अब फिर लक्ष्मणजी ब्रह्मरूप जान और गुरु मान शिष्य बन पू. छते है यह आश्चर्य है इसमे उत्तर यह कहाजाता है कि रामचं- परमात्मा ब्रह्म है परंतु लोकोके उपकारके लिये मायोपहित हो. कर पूर्वोक्त सब काम किये परंतु किसी किसी स्थानमे समुद्रबंध- नादि वालिखरदूषणादि वध परमेश्वरता प्रगटकरने के वास्ते दि- खाये वह पिछली माश्चर्यमयी वार्ताको जान लक्ष्मणजी सब काम के पीछे मुक्तिके साधन ज्ञानके लिये फिर पूर्व ब्रह्मरूपसे स्तवनकर. ते है। और इसमे प्रमाण यह है । भरतमुनि नाटकप्रकरणमें ना
..
(१४)
रामगीता
यकोमे रामचंद्रको धीरोदात्त और दिव्याऽदिव्यनायक मानतेहै ल
क्षण जैसे "अविकत्थनः क्षमावानतिगंभीरो महासत्वः । स्थयानिगू-
ढमानो धीरोदात्तो दृढव्रतः कथितः ॥दिव्योपि आत्मनि नराभिमा-
नी दिव्या दिव्यः श्रीरामचंद्रः॥"यह परमेश्वरहो जो नरका अ-
भिमान अपनेमें जाने वोह दिव्यादिव्य होता है मुझको सब लो-
क परमेश्वर ना समझे इस आशयसे इत्यलं । यहां वंशस्थानाम
छंदहै ॥५॥
मू.श्रुत्वाथ सौमित्रिवचोखिलं तदा
प्राह प्रपन्नार्तिहरःप्रसन्नधीः॥
विज्ञानमज्ञानतमोपशांतये
श्रुतिप्रपन्नं क्षितिपालभूषणः॥६॥
प०-( श्रुत्वा) श्रवणकरके (अथ) इसके अनंतर
(सौमित्रिवचः) लक्ष्मणकी वाणी (अखिलं) संपूर्णको
(तदा) तिसकालमे (पाह) कहतेभये (प्रपन्नार्तिहर)
शरणागतके दुःखनाश करनेवाले (प्रसन्नधीः) प्रसन्नबुद्धिवाले
(विज्ञान)विशेष ज्ञानको (अज्ञानतमोपशांतये) अज्ञानरूपी
अंधकार की शांतिवास्ते (श्रुतिप्रपन्न) वेदयुक्त ( क्षितिपाल
भूषणः )राजाओमे भूषणरूप रामचंद्र ॥६॥
अनु०-लक्ष्मणके वचनको सुनकर शरणागत जो पुरुष
उनके दु:ख नाशकरनेवाले प्रसन्न मनचाले सर्व राजाओमें
अलंकारसूत रामचंद्रजी अज्ञानरूप अंधकारके नष्टकरनेके
लिये श्रुतियुक्त ब्रह्मज्ञानका उपदेशकरनेलगे॥ ६ ॥
टीकात्रयोपेता। (१५) विपमपदी-इस श्लोकसे पूर्व कथन जो गुरुभाव रामचंद्रमे सिद्भया ( अज्ञानके नाशलिये कहतेहै) इसवाक्यसे ॥ इहा रा- मचंद्रका विशेषण ( आतिहरः) लिखाई । इससेंयह ज्ञान होना चाहिये कि (आति) अर्थात् पीडाके नाश कनेवाला अबपीडाके भेद कहतेहे कि प्रथम पाडा तीनप्रकारकीहै १- अध्यात्मक २- आधिभौतिक ३-आधिदैविक इनभेदोसे ॥ इन्का अर्थ यह है कि जो पीडा आत्मासंबंधीहो वह आध्यात्मक कहीजातीहै इसकभी दो- भेदह पहिली (शारीरक )अर्थात शरीरका दुःख और दूसरी (२मानसिक) अर्थात् मनकी पीढा ॥ शरीरकी पीडा (वात १पि- त २ कफ३) इन तीन धातुकीजो विषमता कि घटना वधना इससे जो भई दुई पीडा । मनकी पीडा यह है की (काम, क्रोध, लोभ, मोह, भय, ईया,विषाद, संतापादि) द्वारा जो मनको अति- शय दुःखित करतीहै. (इन दोनोको शरीरांतर्गत होनेसे अध्या त्मिक पीडा कहाजाताहै । जो बाहारसे होनेवाला दुःख है वोह आधिभौतिक) और आधिदैविकसे कहा जाताहै ॥ आधिभौ तिक जैसे ( मनुष्य. पशु. पक्षि सर्प पाषाण पतन निमित्त कार- णइस्मभूतोको होनेसे आधिभौतिक कहाजाताहै ॥ देवतासंबंधि दुःखको (आधिदैविक ) कहतेहै जैसैविद्यावर अप्सरा यक्ष राक्षस गंधर्व किन्नर विनायक पूतनादि नवग्रह पिशाच गुह्यक सिद्ध भूत प्रेत दैत्य दानवादि देवताद्वारा जो होवे ।। इतने भेद प्रत्युपभेदोसे आर्ति पीडा कहीजातीहै ।। इस पीडाको विना परब्रह्मपरत्मासे कौन पुरुप दूर करसक्ताहै | इसलियेसे प्रपन्नातिहर इस विशे- पणद्वार परब्रह्म परमात्मा शुद्ध बुद्ध निरभिमान निराकार परम पुरुप रामचंद्रजीको शुद्धमन होकर लक्ष्मणजी पूछतेहै और शि- प्यभावनासे रामचंद्रजी लक्ष्मणको कहतेहै ॥ यह भेद आगे बड़े काम आवेगें इसलिये भक्तजनोने अच्छीतरह समझने गुरुद्धारा चाहिये इन्मेभी बहुत भेद है विस्तारके भयसे नहि लिखे जाते है ॥ इति ॥ ६ ॥ इहा वंशस्था छंद है.
(१६) रामगीता मू० श्रीरामचंद्र उवाच॥ आदौ स्ववर्णाश्रमवर्णिताःक्रियाः कृत्वा समासादितशुद्धमानसः ॥ समाप्य तत्पूर्वमुपात्तसाधनः समाश्रयेत्सद्गुरुमात्मलब्धये ॥७॥ प०-(आदौ) पहिले (स्व) अपने (वर्ण) ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र( आश्रम) ब्रह्मचर्य गृहस्थ वानप्रस्थ संन्या- सा ( वर्णिताः क्रियाः) वर्णितकरी क्रियाको (रुत्वा) क- रके (समासादित ) ग्रहणकिया (शुद्धमानसः) शुद्ध मन जि सने (समाप्य )समाप्तकरके( तत्पूर्व ) तिरके पूर्व (उपात्तसा- धनः) एकही की है साधन जिसने (सं) भलीप्रकार (आ- अयेत् ) आश्रयहोवे ( सद्गुरुम् )श्रेष्ठगुरुको (आत्मलब्धये) आत्माकी प्राप्तिलिये ॥ ७॥ अनु०-श्रीरामचंद्रजी कहतेहै कि पहिले अपने २ वर्ण तथा आश्रमके योग्य जौ कर्म तिन्होको कर अंतःकर्ण शु- करे फिर संपूर्ण कर्मोकी समाप्तिकर आत्मज्ञानकी प्राप्ति लिये श्रेष्ठगुरुकी शरणको प्राप्तहोवे ॥ इस श्लोकमे वर्णाश्रमके धर्म और कर्मको उपयोगी होने से संक्षेपसे वर्णाश्रमके धर्म लिखतेहै ॥ ब्राह्मणके कर्म यज्ञ १अध्ययन २दान ३करने करानेसे षः द भेद हुये ६ ।प्रथम तीनक्षत्रिय वैश्यके। नालणकी सेवा शू- - टीकात्रयोपेता। (१७) प्रका मुख्य कर्म ॥ अब ब्राह्मणके स्वाभाविक कर्म लिखतेहै (शम मनका एकाय करना (दम)इंद्रियोको वशमे स्थापनक- रना (शौच)बाहर और अंतरसे पवित्रता (विज्ञान) अपने मन- के निश्चयसे अनुजवद्वारा हृदयमे सर्वरूप परमेश्वरका सच्चा निश्चय होना (आस्तिक) परमेश्वरकेसद्भावमे और उस्की आ- ज्ञामे पूरा निश्चय होना यह कर्म ब्राह्मणके स्वभावसे उत्पन्न होतेहै ॥क्षत्रीककर्म ॥ (शौर्य)युद्धमें मन स्थिर रखना (तेज) शत्रूके बली दिखाइदेना (धृति) विपतमेशी मनको स्थिररखना (दाक्षिण्य) कर्ममें शीघ्रकारिता युद्धमे ना भागना (दान) आनं- दसहित धर्मसे उत्पन्न किया हुआ धन उत्तमपात्रको उत्तम देशकालमे देणा अथवा किसी दुःखीभयातुरको शरण देना (ईश्वरभाव) अर्थात् प्रजाकि रक्षावास्ते दुष्टोके मनमें दण्ड- देनेकी सामर्थ्य जितलाणी यह सब कर्म क्षत्रिके स्वभावसे होतेहै। वैश्यके कर्म खती करना गौ वैल पालना व्यापार क रना यह वैश्यके स्वभावज है ॥ शूद्रके धर्म नम्रता और से- वा शृद्रका स्वभावज धर्म है ॥सब वर्णीको एकसे धर्म ॥अहिं सा सत्य ना चुराणापवित्र रहना और यतेंद्रि रहणा दान क- रना दया करणी सबपर दम क्षांति करनी।ब्रह्मचारीके धर्म गु रुकी सेवा विद्याका पढना इंद्रीजित रहनाशुचिरहना अथवा सर्वत्र ब्रह्मही देखना ।। गृहस्थीके धर्म कुलाचार धर्म अतिथि पूजन ॥वानप्रस्थीका धर्म जितेंद्री अपनी स्त्रीके साथ वा उ- स्की आज्ञा ले वनमे रहना अनाका सेवन करना आत्मतत्वका (१८) रामगीता विचार नित्य करना ॥ यतिके धर्म विविध ईपणाका त्याग अर्थात् स्त्री पुत्र धन इन तीनोकी इच्छा ना होणी दंडग्रहण करना काँका त्याग ब्रह्मज्ञानका होना वैराग्य सबसे रखना मनकी स्थिरता।परमहंसधर्म परायेको दुःख ना देणा सर्व अ- च्छेमे रहना जगतको ब्रह्मरूप जानना अजपाजप करना आ. नंदमन रहना ॥ इत्यादि वर्णाश्रमके कर्मनिरूपण हो चुके सो इन्के अनुष्ठान करनेसे अंतःकरणका मल दूर होताहे शेष रहा विक्षेप और आवरण इन्के दूर करनेका उपासना उपाय है। इ सवास्ते रघुनंदनस्वामीने इस श्लोकम(समासादितशुद्धमानमः) यह पद लिखाहै तात्पर्य यह है कि उपासनाकरके मन शुद्ध- करे इहा सगुण ब्रह्मकी उपासनासे प्रयोजन है उपक्रमकी री- ति तथा उपसंहारकी रीतिसे ५८ श्लोकका अर्थ प्रगट कर- ते है जव उपासना करते २ अंतःकरणका विक्षेप दूर होजाइ तव आवरणकी निवृत्तिके अर्थ सद्गुरु आत्मदीकी शरणको प्राप्तहोवे। अथ प्रथम कर्मकांड द्वितीय उपासनाकांड तृतीय ज्ञानकांड है पहिले वर्णाश्रमोंके लिये श्रुति स्मृत्युदित कर्मोको यथावत् ईश्वरार्पण करनेसे चित्तको शुद्ध अर्थात् नि- र्वासना करे पश्चात् उपासनासे एकायमन कर समित्याणि हो कर ज्ञानप्रातिवास्ते सद्गुरुका आश्रयण कर्ना चाहिये ॥ ईश्वरार्पण कर्म करनेमे दो रीति है कर्मोंका अर्पण अपर फलका ॥ ७॥ विषमपदव्याख्या-ऊपर वर्णाश्रममकरण भाषामें बहुत अ- टीकात्रयोपेता। (१९) मा लिखाद उस्को द कने के लिये धर्मशाखके प्रमाण लिखे जानेहै ।। याज्ञ स्मृती प्रथमध्याये॥ १०८ ॥ ९ ॥ १०॥ २२ । १३ शोक ॥ "इज्याध्ययनदानानि पैश्यस्य क्षत्रियस्य च । प्रति ग्रहो- धितो विप्रे बाजनाध्यापने तथा || प्रधानं क्षत्रिय कर्म प्रजानां प- रिपालनं ॥ कुमोदपिवाणिज्यं पाशुपाल्यं विशः स्मृतं ।। शू- ट्रस्य हिमशभूपा गया जीवन चणिग्भवेत् ॥ शिल्पा विविध वे- दद्विजातिदिनमाचरन् ॥ अहिया सत्यमम्तेयं शौच मंद्रियनिग्र- हः ॥ दान दश दमः शान्तिः सर्वेषां धर्मसाधनं ॥ क्योबुद्धयर्थ- पाशशुताभिजनकर्मणां आचरेन सदृशी वृत्तिमजिद्मामशठां त- या यह नारो वाक धर्म भिन्नभिन्नतथा एकसे कहहै|अब ब्रह्म- चारीको धर्म यधारत कनहै वासव स्मृति अध्याय २५।२७।२९ २१ ३३ शोको "संध्यां मार प्रातरवेह तिष्ठेदासूर्य- दर्शनात । अधिकाय्य ततः कुर्यात्संध्ययोरुभयारेपि ॥ आहृतथा- प्पधीचीत लब्धं चाम्मै निवेदयेत् । हितं चास्य चरेन्नित्यं मनोवा गागक्रमभिः ॥ देहाजिनोपवीतानि मेखलां चैव धारयेत् । वाम- णेषु चरेद्रव्यमनिन्द्रप्वालमत्तये ॥ सत्तानिकार्यों भुशीत वाग्यतो गुर्वनुज्ञया । आपोशानक्रिया पूर्व सत्कृत्यानमकुत्सयन ॥ मधुमां- मांजनाच्छिष्टयुक्तबीमाणिहिंसनीभास्करालोकनाश्लीलपरिवादांश्च वर्ज येत ॥ ॥एक नैष्टिक नाम ब्रह्मचारी जो जायुपर्यंत ब्रह्मचर्यको धारित उनका कर्म | "नैष्टिको ब्रह्मचारी तु वसेदाचार्यसन्निधौ । तदानस्य तनये पल्या वैश्वानरेपि वा। अनेन विधिना देहं साध- यन, विजिनेंद्रियः । ब्रह्मलोकमयामोत्ति नचेह जायते पुनः ॥" अ- थगृहस्थीकधर्म । “संध्या स्रानं जपो होमो देवतानां च अर्चनं । आनिश्यं वैश्वदेवं च पट्कर्माणि दिनेदिने इत्यादि वहु वाक्य है अध वानप्रस्थिके धर्म । याज्ञव० स्मृ०३ अ०४५/४६६४८१४९॥५१॥ ५२०५३। "मुत्तविन्यस्तपत्नीकस्तया वानुगतो वनं । वानप्रस्थो ब्रह्मचारी साग्निसोपासनो व्रजेत् ॥ अफालछटेनामीश्च पितॄन्दे (२०) रामगीता वात्तिथीनपि । भृसांथ तर्पयेतश्मश्रुजटालोमभूदात्मवान् । दांत- विषवणनायी निवृत्तश्च प्रतिग्रहाव । स्वाध्यायवान ज्ञानशील सर्वसत्वाहते रतः ।। स्वप्याद्भूमौ शुची रात्री दिवा संप्रपदैनयेत् । स्थानासनविहारैर्वा योगाभ्यासेन वा पुनः॥ ग्रीमेपंचाग्रिमध्यस्थो वर्षासु स्थंडिलेशयः । आर्द्रवासास्तु हेमंते शक्त्या वापि तपश्चरे- रेत ॥ यः कंटकवितुदति चंदनैर्यश्च लिंपति । अकुद्धोपीरतुष्टश्च शमस्तस्य च तस्य च ॥ इत्यादिकं ॥ अर्थ यतिधर्म ॥ या स्मृ. ३.०५७।१८।६११६२।६।६ ।। श्लोकll " अधीतवेदो जपत पुत्रवानन्नदोनिमान । शतया च यज्ञन्मोक्षे मनः कुर्यात्तु नान्य था ॥ सर्वभूतहितः शान्तस्त्रिदण्डिसकमण्डलुः । एकाराम: परिव्रज्य भिक्षार्थ ग्राममाश्रयेत् ॥ संनिरुध्येन्द्रियग्रामं रागद्वेपो प्र- हाय च । भयं हित्वा च भूतानाममृतीभवति द्विजः ॥ कर्त- व्याशेषशुद्धिश्च भिक्षुकेण विशेषतः । ज्ञ नोत्पत्तिनिमित्तत्वात्स्वातं- ज्यकरणाय च ॥ अवेक्ष्यागर्भवासाश्च कर्मजा गतयस्तथा । आ- धयो व्याधयः क्लेशा जरारूपविपर्ययः ॥ भवोजातिसहस्रेषु पियाप्रियविपर्ययः । ध्यानयोगेन संपश्येत्सूक्ष्म आत्मात्मनि स्थि- तः॥ " इत्यादि ॥ यह प्रमाण क्रमपूर्वक जानलेणे ॥७॥ मू क्रिया शरीरोद्भवहेतुराहता प्रियाऽप्रियौतौ भवतःसुरागिणः। धर्मेतरौ तत्रपुनः शरीरकं पुनःक्रिया चक्रवदीर्यते भवः॥८॥ पद०-(क्रिया)कर्म (शरीरोद्भव)शरीरकी उत्पत्तिमें(हेतु) कारण है(आहता)आदरपूर्वक( प्रियाप्रियौ तौ)भला बुरा अ र्थात् श्रेष्ठ निषिद्ध(भवतः )होतेहै( सुरागिणा )प्रीतिवाले पुर- .
टीकात्रयोपेता। (२१) षको (धर्मेतरी)पुण्य पाप(तत्र)तिसविषे (पुनः)फिर(शरीरक) शरीर(पुनः)फिर(क्रिया)कर्म(चक्रवत्)चक्रकी न्याई(ईयते) कहतेहै(भवः)संसार ॥ ८॥ अनु०--आदरसे करी हुई क्रिया अर्थात् शुभाशुभ कर्म शरीरकी उत्पत्तिविषे कारण है सो काम्यकर्म यज्ञादिकविषे प्रीतिवाले पुरुषोको पाप पुण्य राग द्वेष युक्त होनेसे वारंवार जन्म कर्म होतेहै शरीर हुआ तो कर्म हुये फिर कर्मोंसे शरी- र इसीतरां कुलालचक्र वा रथचक्रकी न्याई संसार होताजा- ताहै ॥ ८॥ विषमपद०-आहता क्रियाकिआदरसे अर्थात् अहंकारको लेकर यह मै करताहै और मेराहै इस वासनासे जो कीयाजाये वह वह अवश्य भोगना पहताहै (रागिणः) अर्थात् रागद्वेषवाले पुरुषको नहि अन्यको । रागद्वेषकालक्षण (पातंजल. योग साधनपाद सू० (सुखानुशयी रागः) (दुःखानुशयी द्वेषः )सुखसाधनं राग दुख- साधनदेष ॥ यह लक्षणहै । इनके पाकमे ( १२ सूत्र ) प्रमाण है । यथा (क्लेशमूलः कर्माशयो दृष्टादृष्टजन्मवेदनीयः) अर्थ वासनासे किये जो कर्म क्लेशमूल इस जन्म पर जन्ममे फलद्वारा कर्मका भाग जाना जाताहै जाति आयु भोगरूपी ॥ (प्रियाप्रियौ तौ भवतः सुरागिणः) इसमेप्रमाण पातंजलदर्शन साधनपादमू. १४ (ते ल्हादपरितापफला: पुण्यापुण्यहेतुत्त्वात्।) अर्थ वोह पूर्वोक्तकर्म अच्छा और बुरा फल देतेहै पुण्यपापके हेतु होनेसे । (चक्रवदी यते) अत्रप्र०" जातस्य हि ध्रुवो मृत्युधुवं जन्म मृतस्यचाइति मू-अज्ञानमेवास्यहि मूलकारणं तद्धानमेवात्रविधीविधीयते।
mar । (२२) रामगीता विद्यैव तन्नाशविधौपटीयसी न कर्म तज्जं सविरोधमीरितम्॥९॥ पद०-( अज्ञानं ) अविद्या (एव) निश्चय करके (अ- स्य ) इसका (हि) जिसकारणसे (मूलकारणं) कारणाकी जड (तत्) तिसका (हानं ) नाश (एव) निश्चयसे ( अत्र- विधौ ) इस विधिमै (विधीयते ) विधान कराताहै (विद्या) ज्ञान ( एव) निश्चयसे (तन्नाशविधौ ) तिस अज्ञानके नाश विषे (पटीयसी) चतुर (न कर्म) कर्म नहि (सज्ज) तिस अज्ञानसे उत्पन्न (सविरोधं ) विरोधवाला (ईरितं) क- हाहै ॥९॥ अनुवा०-संसारका मूल कारण अज्ञान है इसके नाशवा- स्ते विद्याका उपदेशकरते है जिस लिये अविद्याका नाश-' क विद्याही है अज्ञानसे उत्पन्नभयाकर्म अज्ञानका नाशक नहि होसक्ताहै ॥ ९॥ विषमपद०-अविद्या और विद्याका लक्षण लिखतेहै वैशेषिकद- र्शन प्र० २ आन्हिकं (इंद्रियदोपात् संस्कारदोषाच्चाविद्या॥१०॥ ( अदुष्टं विद्या ) पातंजलदर्शन सा० (अनित्याशुचिदुःखानात्म- निसशुचिसुखात्मख्यातिरविद्या इतराविद्या ) अर्थ इंद्रिय और संस्कारदोषसे अनित्यमे निस अपवित्रमे पवित्र दुःखमे सुखका जो ज्ञान वह अविद्या है और जो यथार्थज्ञान वह विद्या कह- लाताहै ॥९॥ मू०-नाज्ञानहानि च रागसंक्षयो भवेत्ततःकर्म सदोषमुद्भवेत्॥
टीकात्रयोपेता। (२३) ततःपुनःसंसृतिरप्यवारिता तस्माहुधो ज्ञानविचारवान भवेत् ॥१०॥ पदः (न) नहि ( अज्ञानहानि) अज्ञानका दूर होना (नच ) औरनही (रागसंक्षयः) संसारके पदार्थोकी प्रीतिका नाश (भवेन ) होताह (ततः ) तिससे (कर्म सदोप) सदोप कर्म (उद्भवेत् ) उत्पन्न होताहै (ततः) तिसके पीछे (पुनः )फि र(संसृतिः) संसारका (अप्पबारिता) अनिवृत्ति (तस्मात् ) निस कारणसे (बुधः) बुद्धिमान (जानवान् ) विचारवाला ज्ञानकी (जवेव ) होवे ॥ १० ॥ अनु०-कमसे ना तो अज्ञानका नाश होवेहै और ना सं- सारके पदार्थोकी प्रातिका नाश किंतु एक और कर्म दोपयु- क उत्पन्न होवेहे जन्ममरणरूप संसारकी निवृत्ति होवैनहीं इसवास्ते बुद्धिवानको उचित है की ज्ञानकी विचारवाला हो वै अर्थात् ज्ञानके मार्गमे लगे ॥ १० ॥ विय-शंका कहते है कि पीछे रामचंद्रजी ज्ञान जो है व- हं अविद्याका नाशक है इसको लेकर इस श्लोकमे ज्ञानवान होना. चाहिये ऐसे लिखतेहै इसमे कोई पूर्वपक्षी ॥शंका करतेहै तुमारी अविद्या हेतु जो पूर्वोक्त तीनमकारका दुःख उस्के नाश- के लिये ज्ञानकी प्राप्तिहै ॥ र्याद वह वाह्य पदार्थसे नाशको प्राप्त होवे तो ज्ञान महान कठिन आंतरिककी कुछ इच्छा नहि ॥ लो- कोकी कहावतभी है (अर्के चेन्मधु पिन्देत किमर्थ पर्वतं व्रजेत् । दृष्टस्यार्थस्य संसिद्धौ कोविद्वान् यत्नमाचरेत इति ) अर्थ यह है कि यदि अर्कमे शहित मिले तो पर्वतमंकीउजाना 1 जो दृष्टपदार्थ (२४) रामगीता से सिद्ध होवे तो उस्मे यत्न किउ करना । जैसे कि (अध्यात्मिक) शारीरिक पीडाके लिये वैद्यशास्त्रमे बहुतलीलावती गंगाधर ज्य- रांकुशादिजिनमे प्रतिज्ञा हैं कि यदि इस रोगको ना हटावे. तो हमारेको यह हो उनसे शरीरसैं तापादिक सब हटते है । और मनके दुःख दूरफर्नेका उपाय सुंदर स्त्री दुग्ध घृत सुगंध वस्त्र भूषणादि (अर्थात मनकी इच्छा पूर्ण होती इत्यादि पदा. थसे मानसिक पीड़ा नष्ट होजाती है ॥ आधिभौतिक दुःखके नाश करनेके लिये । नीतिशास्त्रका अभ्यासः (यथा "नाज्ञातकुलशील. स्य वासो देयो न कस्यचित्") अर्थ जिस पुरुषका कुल औ स्व- भाव ना देखाहो उस्के साथनहि रहणा ( और धर्मशास्त्रके पठने- से यथा जलं पिबेन्नांजलिना शयानं न भबोधयेत् । नासैः क्रीडे- न धर्माधितैर्वान संविशेष ॥) "इत्यादि (तथा। वैद्यशासके पढनेसे (यथा “ वर्षातपादिषु छत्री दंडी राज्यटवीषु च)। अर्थ वर्षा और धूपमे छतरी रात और मार्ग जाणोमे दंड रखणा चाहिये) इत्यादि शास्त्रोमे बहुत शिक्षाहै जिससे प्राणीका दुःख तीनकालमे कभीना हो ॥ और (आधिभौतिक) दुःखके नाशम मणि मंत्र रसायनादि लिखेहै फिर ज्ञानकी क्या आवश्यकता यत्न फिर किऊकरना इसका उत्तर देतेहै कि पूर्वोक्त यद्यपि ठीक २ दुःखके नाश कहै तथापि दुःखका अतिशय करके नाश नहिहोता जैसे इस काल औषधादियोंसे दुःखनाश होगया सम पाप फिर दुःखउत्पन्न होताहे जैसे मंत्र औषधी नीतीसे तपका नाश किया फिर नष्टभया कीऊ होता क्या उसमे औष- धादि नहिभये यदि आप शास्त्रके अभ्यास होनेसे ना दुःखहोणेदे- गे तो जन्म मरणका दुःख कैसा नाशकरेंगें फिर ज्ञानकी आवश्य- कता माननीपडैगी ॥ फिर पूर्वपक्षी इसमे कहताहै कि धनका साधन जो यज्ञादि उनसे आरामपूर्वक मोक्षकी प्राप्ति होतीहै (इ. समे प्रमाण है यथो स्वर्गकामो यजेत) स्वर्गका लक्षण ( "यन्न - टीकात्रयोपेता। (२५) दुःखेन संभिन्नं न च ग्रस्तमनंतरं ॥ " अभिलापोपनीतं च तवमुख स्वःपदास्पदं)॥" यदि तुम कहो कि सुख दुःखकी उत्पत्ती कारणहै तो स्वर्ग अच्छा नहि ॥ तो फिरदुःखके हो- नेसे स्वर्ग अच्छा नहि तो हम कहतेहै कि सोमयागसे अमृत अ- र्थात् जन्ममरणसे रहित होजाताहै प्रमाण यथा (अपामसोमम- मृताअभूमेति ) फिर ज्ञान नाचाहिये । सिद्धांत कहतेहै जिससे फिर शंका ना हो ॥ यज्ञ कोई प्रहर मे कोई दिन रातमे वा संवत भे होते हैं उस्का फल दिव्यवर्प १००।१०००१०००० । तक भोग फिर पुण्य क्षीणहोनेसे दुःखको प्राप्तहोतेहै यथा ॥("तस्माद्यास्या' म्यहं तात दृष्ट्रमं दुःखसंनिधि । त्रयीधर्ममधर्माढचं किंपाकफल- मंनिभम् ।)" इति मार्कण्डेयवचनात् ॥ जो तुम कहतेहै सोम- यागसे अमृत होजाताहै उस्का अर्थ प्रलयपर्यंत जीवनका है न. , हि मोक्षका प्रमाण यह है (" आभूतसंप्लवस्थानं अमृतत्वं हि भाष्यते)" इति स्मरणात् इस लिये अविद्याका दृष्ट साधन ध- नादिकोसे नाश ना होनेकर्के रामचंद्र कहतेहै (तस्माइधो ज्ञान- विचारवान् भवेत् ) ज्ञानका उपदेश कर्ते है ॥ कपिलदेव कहतेहै (न दृष्टात्ततसिद्धिनिटत्तेप्यनुवृत्तिदर्शनात ) सांख्य प्रवचनभाष्य- १ अ० मू०२ ॥ १०॥ मू०-ननु क्रिया वेदमुखेन चोदिता यथैव विद्या पुरुषार्थसाधनं ॥ कर्तव्यता प्राणभृतःप्रचोदिता विद्या सहायत्वमुपैति सा पुनः॥११॥ पद-(मनु) शंकाहै (क्रिया )कर्म (बेदमुखेन चोदिता) वेदनेही कथन कीयाहै ( यथैव ) जैसे (विधा) ज्ञान रुपार्थसाधनं ) मोक्षका साधन है ( कर्रव्यता) करने। (३) (२६) रामगीता ग्य (प्राणभूतः) प्राणियोकों (प्रचोदिता) कथन कियाहै (वि- यासहायत्व) ज्ञानकी सहायताको (उपैति) प्रामहोवेहैं (सा) सोकर्म (पुनः) फिर ॥११ ॥ अनुवा-हेजगवन् अमिहोत्रादिक कर्मभीतो वेदने कहे- हैं तोफिर क्यो कर्म निन्दित हुवा जैसे ज्ञान मोक्षका साधनहै तैसे कर्मभी मोक्षका साधन चाहिये तिसपर श्रीरामचंद्रज़ी: कहतेहै हे लक्ष्मण मनुष्योकों निष्काम कर्म कर्णायोग्यह।यही चित्तकी शुद्धिवास्ते चितकी शुद्धि ज्ञानमे हेतुहै इसमे हेतु य- हहै कि नहि वेदने स्वर्गादि पदार्थों के लिये यागादि कर्मवि धान किये कि जिस स्वर्गमें महाविपयरूप प्रमाद होताहै ति- स स्थानमे कुशल कहाहै यदि वेद थोडे दुःखसे वचाय कर बडे स्वर्गाहिप्रमादमे मेरदेवे तो वेदहि दुःखदाताचये इससे - स्पष्ट प्रतीत होताहै कि निष्काम कर्म करनेसे चित्तशुद्धिद्वारा ज्ञान होताहै ॥ ११ ॥ विषमपद-चित्तकीअशुद्धिमे उदाहरण. ("मलिनो हि यथा दर्शी रूपालोकस्य न क्षमः। तथा विपक्वकरणं आत्मज्ञानस्य न क्षमम् ) या स्मृ०३अश्लो०४१ ॥ ११ ॥ मू-कर्माकृतौ दोषमपि श्रुतिर्जगौ तस्मात्सदा कार्यमिदं मुमुक्षुणा॥ न तु स्वतंत्रा ध्रुवकार्यकारिणी विद्या न किंचिन्मनसायपेक्षते॥१२॥ -- टीकात्रयोपेता। (२७) पद- (कर्मारुती)कर्म ना करनेमे(दोष)दोषको(श्रुति)वेद (जगी)कहताहे(तस्मात्)तिससे (सदा सदैव (कायं )कर्नेयोग्य है (इद)यह (मुमुक्षणा)मोक्षकी इच्छावालेने (नत ऐसे नहि (स्वतंत्रा)अपने आधीन है (ध्रुवकार्यकारिणी)निश्चित का- म करनेवाली(विद्या)ज्ञान(न.)नहि (किंचित् )थोडासा (मन- सामनकर्क (अपि)निश्चयसे(अपेक्ष्यते)इच्छाकरती ॥१२॥ अनु० प्रतिवादी कहैहै कौका ना करना वेदमे दोष लि- खाह तिस कारणसे मोक्षकी इच्छावालोंको कर्म करना उ- चितह सिद्धांति उत्तर देताहै विद्या अर्थात् ज्ञान स्वाधीन है निश्चलकार्य नाम मोक्षका साधनरूप इसवास्ते मोक्षरूपिका- >के करनेवालीहै और वह ज्ञान कीसी कर्मकी सहायता- कि इच्छा नहिकरता ॥ १२॥ विपमपद०-"उपनीयगुरुं शिष्यं महान्याहृतिपूर्वक विदमध्याप- येदेनं शौचाचारांश्च शिक्षयेत् ॥ या. स्मृ.१०" अ.१२। कर्म कर्ने मे यह स्मृति प्रमाणहै ॥ और श्रुतिप्रमाणहै यथा. यजु. शुक्ल अ० ४। मंत्र २-कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषे शतसमाः । एवं त्वाय नान्यथतोस्ति न कर्म लिप्यते जने। कर्मके नाशकरनेमै प्रत्य- वाय-अर्थात दोप होताहै। इसमे श्रुति प्रमाणहै यथा-अथर्ववेद. ३खं."यस्याग्निहोत्रदर्शपौर्णमासचातुर्मास्य मनाययणमतिथिवर्जि- तञ्च ॥ आहुतमवैश्वदेव विधिना हुतमासप्तमांस्तस्य लोकान् हिन- 1. स्तिः ॥” इति ॥ अर्थात जिस्के अग्रिहोत्रादि कम्मै अतिथिपूजा वैश्वदेव पंचाहुति नहिहै उस्के सातलोककी अग्निदेवता नष्ट करताहै ॥ १२ ॥ म.-न सत्वकायोपि हि पदध्वरः - (२८) रामगीता प्रकांक्षतेन्यानपिकारकादिकान् ।। तथैव विद्या विधितः प्रकाशितै- विशिष्यते कर्ममिरेख मुक्तये ॥१३॥ पद--(न) नहि (सत्वकार्य ) सत्वका कार्य (अपि) निश्चयकर्के (हि) जिससे (यद्वत् ) जैसे (अध्वरः) यज्ञ (प्रकांक्षते ) इच्छाकरताहै (अन्यान ) दूसरे (अपि) नि. (कारकादिकान ) कारकाकी। (तथा) तेसे ( एव )निश्च- यसे (विद्या) ज्ञान (विधितः प्रकाशितैः ) वेदविधिमे प्रका- श कियेहुऐ (विशिष्यते )विशेषहोतेहै (कर्मनिः) कर्मोसे (ए-. व) नि० (मुक्तये) मुक्तिवास्ते ॥ १३॥ अनु०-प्रतिवादी कहेहै कि जो तुमने कहाहै विद्या कि- सीं कर्मकी सहायता नहि चाहती सो सत्य नहिहै क्यो कि कर्म ज्ञानकी सहायता अवश्य कर्ताहै दृष्टांत देते है जैसे य. ज्ञ गंगातीरादिक उत्तमदेश ग्रहणादिक उत्तम काल इत्यादिक और सामयीकी इच्छाकरताहै और इनद्वारा अधिकफल प्र- दाताहोताहै तैसे ज्ञान विधिवाक्यसे प्रकाशकिये जो अग्रिहो- त्रादि कर्म है तिनकी सहायतासे शीघमुक्तिदायकहोताहै। १३ विषमपद०- "अधीतवेदो जपलत्पुत्रवानन्नदोनिमान शक्त्या च यज्ञकृन्मोक्षे मनः कुर्यात्तु नान्यथा ॥ " अर्थात् वेद पढ गाय ज्यादिजप (अनुष्ठान कर गृहस्थी होवे तो पुत्रवान अन्नदाता भनीयोवाला अर्थात् अग्नीका अनुष्ठान करनेवाला यथाशक्ति य. ज्ञादिक करके मोक्षमै मनको करे अन्यथा न ) इत्यादिवाक्यसे यं-
टीकात्रयोपेता।
(२९)
प
न मोक्षका उपकारक सिद्ध होताहै ॥ यथा. देशे काले च पात्रेच
तहानं सात्विक विदुः ॥ इत्यादि ॥ १३ ॥
मू-केचिद्वदंतीतिवितर्कवादिन-
स्तदप्यसदृष्टविरोधकारणात् ॥
देहाभिमानादभिवईते क्रिया
विद्यागताहंकृतिनःप्रसिद्धयति॥१४॥
पद०-(केचित् ) कोई एक (वदंति ) कहतेहै (इति)
ऐसा (वितर्कवादिनः) नैयायिक ( तत् ) सो (अपि) नि-
श्वयसे (असत् ) झूठहै ( दृष्टविरोधकारणाव ) प्रत्यक्षविरो-
धकारण होनेसे( देहाभिमानात् शरीरके अभिमानसे( आधि-
वर्द्धते ) उत्पन्न होवेहै (क्रिया) कर्म(विद्या) ज्ञान (गताऽ
हंकृतिनः ) निरहंकार होनेसे (प्रसिध्यति )प्रगट होवैहै१४ ॥
अनुवा-कोई वितर्कवादि कहैहै कि ज्ञान और दोनो
मिलकर मुक्तिका साधनहै सो यह बात सत्य नहिं क्यों कि
ज्ञान और कर्मके कारणमें प्रत्यक्ष विरोध है देखिये देहादि
अनात्मपदार्थोमे आत्मबुद्धि होनेसे कर्म उत्पन्न होवेहै और
निरहंकारसे ज्ञान उत्पन्नहोताहै जिनके कारणमैं ही विरोध
है उनका मिलना केसे बने इस लिये ज्ञान और कर्म दोनो
मिलकर मोक्षकांसाधन नहि होसक्ते ॥ १४ ॥
विपमपद०-नैयायिक सप्त पदार्थके ज्ञानसे मुक्ति मानतेहै. ल.
द्रव्य .९ । गुण २४ । कर्म ५ । सामान्य । विशेष. । समवाय ॥
अभाव ४ इनका यथार्थ ज्ञानादिसे मुक्ति होतीहै ॥ १४ ॥
.(३०)
रामगतिा
मू विशुद्धविज्ञानविरोचनांचिता
विद्यात्मवृत्तिश्चरमेति अण्यते ॥
उदेति कर्माखिलकारकादिभि-
निहति विद्याऽखिलकारकादिकम् ॥१५॥
पद०-(विशुद्ध )विशेषकर्के शुद्ध (विज्ञान) विशेषज्ञान
(विरोचन )विचार (अंचिता) प्राप्तहूया (विद्या) ज्ञान
(आत्मवृत्तिश्चरमति )आत्माकी पिछली वृत्ति (भण्यते)
कहीदाहै (उदेति ) प्रगटहोताहै (कर्म) यज्ञ (अखिलकार-
कादिभिः ) संपूर्णसामग्रीयोंकर्के ( निहति ) नाशकरतीहे
(विद्या )ज्ञान (अखिलकारकादिकं ) संपूर्ण कारकांको॥१५
अनुवा०-प्रतिवादिके अनुमानको दूषण देतेहै ॥ कहते
है कि निर्मलविज्ञानकी उत्पत्ति कर्नेवाले जो वेदांतवा
क्य तिनके समूहके विचारनेसे अंतःकर्णमें ब्रह्ममयभावनाका
होना अर्थात् जगत् सर्व ब्रह्ममय भासना ऐसी वृत्तिका नाम
विद्या है (ब्रह्माहमस्मि इति )अब विद्या और कर्मके विरोधको
दिखलावतेहै ॥ यज्ञादिकर्म संपूर्ण अंगोके सहित होकर फल-
को देताहै विद्या दूरकरतीहै कर्तृत्वादि बुद्धिको नाशकर
सकल व्यापारसे रहित होकर ब्रह्ममे मनकी समाप्ती को वि-
या कहतेहै । क्योकि कर्मद्वारा चित्तकी शुद्धि तद्दारा ज्ञान-
की उत्पत्ती होतीहै किंतु ज्ञानका फल जो मोक्ष तिसकी उ-
पत्तिमे किसी कर्मकी अपेक्षा नहि करती वह मोक्ष स्वयं-
सिद्ध है याने विद्या और कर्ममै विरोध है ॥ १५॥
टीकात्रयोपेता।
(३१)
विषमपद-प्रथमः कर्मकरना पीछे ज्ञानप्राप्ति इस्मे प्रमाण य-
. शुक्ल..४० अ० ऋ०" विद्यां चाविद्यां यस्तदेदोभय ५ सह
अविद्यया मृत्यु तीवो विद्ययामृतमश्रुते" ॥ अर्थ यह है। अविद्या-
सै मृत्यूको तर विद्यासे अमृत होताहै ॥ १५ ॥
मू०-तस्मात्त्यजेत् कार्य्यमशेषतः सुधी-
विद्याविरोधान्न समुच्चयो भवेत् ॥
आत्मानुसंधानपरायणः सदा
निवृत्तसर्वेन्द्रियत्तिगोचरः॥१६॥
.. पद--(तस्मात् ) तिस कारणसे (त्यजेत् ) त्यागे(का-
य)कर्मको (अशेषतः) संपूर्णताक (सुधीः) विद्वान् (वि-
याविरोधात् ) ज्ञानके विरोधसे (न) नहि ( समुच्चयो भवेत्)
एकठा होता (आत्मानुसंधानपरायणः सदा ) सोहं इस ज्ञा-
नवाला (निवृत्त त्यागीह (सर्व) संपूर्ण (इंद्रियवृत्चिगोचरः)
इंद्रियोके विपयोंको जिसने॥ १६ ॥
. अनु०-तिस. कारणसे श्रेष्ठबुद्धि वाला पुरुष कर्मके संपू-
र्णताकरके त्याग देवे कर्म त्यागे पर जो कर्तव्य है सो कहतेहै
आत्मामे वृत्तिको लगावे और सर्वइंद्रियों के विषयोंसे वृत्तिको
निवृत्तकरे इहा कर्मका त्याग इस प्रकारका है सकाम कर्म
तो संपूर्णताकर त्यागदेवे और नित्य नैमित्तिक कर्म अंत:-
कर्णकि शुद्धिहोनेतक अवश्य करने योग्यहै और नाकरनेते
प्रत्यवायसे अंतःकरण मलीन होजाताहै इस वास्ते करने
योग्यहै वैसे निष्काम कर्म सदा करने चाहिये ॥ १६ ॥
(३२) रामगीता "विषमपद-आत्मानुसंधानमे श्रुति यथा ("आत्मा वा अरेन्द्र ष्टव्यः श्रोतव्यो मंतव्यो निदिध्यासितव्यः" इति अब जिस तर ह निवृत्त हो विषयोंसे मुमुक्षको आत्मज्ञान होवे वह श्रुति लिखते है " ईशावास्यमिद ५सर्व यात्कञ्च जगत्यां जगत् । तेन त्यक्ते न भुञ्जीथा मागृधः कस्यस्विद्धनम् ॥") यजु. शुक्ल. ४० अ. १॥ संपूर्ण जगतपरमेश्वरसे आच्छादितहैइत्यादि भावनासे ११ मूल्यावच्छरीरादिषु माययात्मधी- स्तावद्विधेयो विधिवादकर्मणाम्॥ नेतीति वाक्यैरखिलंनिषिध्य त- ज्ज्ञात्वा परात्मानमथ त्यजेत् क्रियाः॥१७॥ पद-(यावत् ) जितना चिर (शरीरादिषु ) शरीरादि पदार्थोमे (माययात्मधीः) अज्ञानसे आत्मबुद्धि है ( तावत्) तितना चिर (विधेयः) कर्ना योग्य है (विधिवादकर्मणां) कर्मोका (नेति )नहिहै ( निषिध्य ) दूषणदे (तत् ) तिसका- रणसे (ज्ञात्वा ) जान (परात्मानं )परआत्माको (अथ)पी- छेसे (त्यजेत् ) त्यागदेवे (क्रिया) कर्म ॥ १७॥ अनु०-जबतक शरीरादि पदार्थोमे जीवको मायासे आ- त्य बुद्धि है तबतक विधिपूर्वक कर्मका अनुमान करतारहै और अहंबुद्धि नाशहोनेवर नानाश्रुति वाक्यसे सर्व जगतको मिथ्या समझ जगतसे भिन्न स्वरूप आत्माको जानकर कर्म- को त्यागदेवे ॥ १७ ॥ विषमपद- (शारीरादिषु माययात्मधीः) मै करता है मेरा- दीकात्रयोपेता। (३३) काम मै भोक्ता इत्यादिकका त्याग(नेतिनेतीतित्यागाद्विवेकवतिः) अर्थ इदं दृश्यमानं जगत नसत्यम् एवं तत्वाभ्यासान्नास्मि नमे नाहमित्यपरीशेपं ! अविपर्ययादिशुद्धं केवलमुत्पद्यते ज्ञानम् (६४) "झानिनाऽज्ञानिना वापि यावदेहस्य धारणं । तावद्धाश्रममो- तं कर्तव्यं कर्म मुक्तये ॥ ॥ इति ॥ १७ ॥ मू०-यदा परात्मात्मविभेदभेदक विज्ञानमात्मन्यवक्षाति भास्वर ॥ तदैव माया प्रविलीयतेजसा सकारका कारणमात्मसंसृतेः॥१८॥ पद० (यदा ) जब (परात्म) ब्रह्म (आत्म) जीवा- त्मा (विभेद ) भेद (भेदकं ) दूरकरनेवाला (विज्ञान )विशे- प ज्ञान (आत्मनि ) अंतः करणविपे (अवनाति) प्रगटहो- ताहै ( भास्वरं) प्रकाश वाला (तदा) तव (एव) निश्चयक- रके (माया) अविद्या (प्रविलीयते) नष्टहोतीहै ( अंजसा) शीघ्र (सकारका ) जन्मांतरके पापोंसहित (कारणं )कार- णहै (आत्मसंसृते ) जीवके जन्मका ॥ १८ ॥ अनु० चित्त शुद्ध होनेपर परमात्मा परब्रह्मसे जीवा- त्मामे जो उपाधिोदहै तिसके दूरकरनेवाला प्रकाशरूप विज्ञान अंतःकरणविषे प्रकाश करताहे तब पूर्वजन्मके पापसहित माया नाशहोतीहै तब कर्मभी नष्टहोतेहै वह माया पूर्वकर्मके साथ मिल जीवका जन्महेतु है ॥ १८॥ विषमपद-अव अभेदजीवब्रह्मकेविषे प्रमाण देतेहै यजुर्वेदीय (३४) रामगीता कठोपनिपत. ३-तृतीया वल्ली- ( "आत्मानथिनं विद्धि शरी- र ५ रथमेव तु॥ बुद्धिन्तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च ॥ ३ ॥ इंद्रियाण हयानापियाश्स्तेए गोचरान । आत्मेंद्रियमनोयु- तं भोक्तेत्याहुर्मनीपिणः।।४॥") जीवका निरूपण है यह आगे ब्रह्मकू लिखतेहै (“ इंद्रियेभ्यः परा हार्था अर्थेभ्यश्च परं मनः ।म- नसश्च परा बुद्धिर्बुद्धरात्मा महान् परः ॥ १० ॥ महतः परम- व्यक्तमव्यक्तातत्पुरुपः परः । पुरुपान्न परं किश्चित्सा काष्ठा सा परा गतिः ॥ ११ ॥ एप सर्वेषु भूतेषु गूढात्मा न प्रकाशते । - श्यते त्वग्रया बुद्धया सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः ॥ १२ ॥ "यह व्रमहै इसका अंश मायायुक्त होकर जीव कहलाताहै वास्तवसे एकहींहै जैसे सूर्यका प्रतिबिंब घटादिपदार्थोमे मायाकर अनेकप्रकारका दिखलाईदेताहै वास्तवसे एकही है ज्ञानको सर्वोत्कृष्ट फल प्रतिपा- पादन कर्तेहै “ यस्तु विज्ञानवान् भवाते समनस्कः सदा शुचिः स तु तत्पदमाप्नोति यस्माद् भूयो न जायते ॥५॥ विज्ञानसारथि र्यस्तु मनःमग्रहवानरः । सोऽध्वनः पारमाप्नोति तद्रिष्णोः परमम्प- दम्-८॥" इत्याद ॥ १८ ॥ मू-श्रुतिप्रमाणैरपि नाशिता च सा कथं भविष्यत्यपि कार्यकारिणी॥ विज्ञानमात्रादमलाद्वितीयात् तस्मादविद्या न पुनर्भविष्यति ॥ १९॥ पद--(श्रुतिप्रमाणः) वेदके प्रमाणोसे (अपि ) निश्च- यकर (नाशिता च सा) नष्टकीहुई वह अविद्या (कथं) कैसे (भविष्यति ) होवेगी (कार्यकारिणी) कर्मके करने- वाली (विज्ञानमात्रात् ) विज्ञान स्वरूपते (अमलात ) नि- टीकात्रयोपेता। (३५) मलते (अद्वितीया ) केवलते (तस्मात् )तिस विज्ञानते (अविद्या) अज्ञान (न)नहि (पुनः ) फिर (भविष्यति) होवेगा ॥ १९ ॥ अनुवा-तत्त्वमसिआदिक वेदश्रुति महावाक्योंसे उत्प- अजय ज्ञानसे नाशको प्रान जो अविद्या वह किसप्रकार अ- सत्य कार्य करनेवाली होसक्तीहै और केवल निदिध्यासना- दिद्वारा ज्ञान होनेसे नाशहोतीहै तब फिर उस्के कार्य कब होसते है जैसे भांतिके कारण रज्जूमें सर्प नम हुवाहै जब र- जुहैयह यथार्थ ज्ञान होजावे तो फिर सर्पका श्रमकहां॥१९॥ विषमपद यथा"चित्राचारपटत्यागे त्यक्तं तस्य हि चित्रकं । प्रस्ताविरमेत चेत्थं ध्यायिनां के स्मरादयः न विरोधी न चोत्पत्तिन बद्धो न च मुक्तकः । न गुमान वै मुक्त इत्येपा परमार्थता ॥ बंधमोक्षा सुखं दुःखं मोहापत्तिश्च मायया ।। स्वप्ने यथात्मनः ख्यातिः संमृतिर्न तु वास्तवी ॥ असत्र किंचित् पश्यति अनन्वागतस्तेन भवति । "इतिश्रुतेः मू०-यदि प्रनष्टा न पुनः प्रसूयते कर्ताहमस्येतिमतिःकथं भवेत्॥ तस्मात्स्वतंत्रान किमप्यपेक्षते विद्याविमोक्षाय विभाति केवला।।।२०। पद००(यदि) जिसकालमे (प्रनष्टा) नाशहूई (म )नहि पुनः) फेर (प्रसूयते) उत्पन्नहोती(कर्ताह)मे कर्नेवाला हूँ १ (३६) रामगीता ( अस्य ) इस पुरुषको (इति मतिः) ऐसी बुद्धि (कथं) कैसे (भवेत् ) होवे (तस्मात् ) तिस कारणसे (स्वतंत्रा अपने आधीन (न) नहि (किमप्यपेक्षते) किंचितमात्र दू- सरेकी इच्छा करती (विद्या) ज्ञान (विमोक्षाय ) मोक्षके वास्ते (विज्ञाति ) प्रकाशहै (केवला) इकेली ॥२०॥ अनुवा०- जब अविद्या नष्ट होकर फिर उत्पन्नही नहि होती तो अहं बुद्धि अर्थात् मै करताहूं यह बुद्धि कैसे होस- क्तिहै इससे यह सिद्ध भया कि विद्या स्वतंत्र है दूसरी किसी वस्तूकी इच्छा नहि रखती आपही आप मोक्षकेवास्ते प्रका- शमानहै ॥२०॥ विपमपद०-अर्थात् कारणके नाश होनसे कार्यकाभी नाश हो ताहै जैसे कुलाल चक्र चीवर मृत्तिकाके नाशसे कार्यरूप घट- का नाश होताहै तद्वत् अज्ञानके नाशसे अहंकाररूप कार्यका नाश अवश्यहोताहै ॥२०॥ मू०--सातैत्तिरीयश्रुतिराह सादरं न्यासं प्रशस्ताखिलकर्मणां स्फुटम्॥ एतावदित्याह च वाजिनां श्रुति- नि विमोक्षाय न कर्मसाधनम्॥२१॥ पद०-(सा) सौई (तैतिरीयश्रुति) तैतरीयशाखाकी श्रुति (आह) कहती है ( सादरं ) आदरसो (न्यासं ) त्याग ना (प्रशस्त ) श्रेष्ठहै (अखिलकर्मणां) संपूर्ण कर्मोंका (स्फु- टं) प्रसिद्ध (एतावत् ) इतनाहि (इति ) ऐसे (आह) 1 टीकात्रयोपेता। कहतीहै (वाजिनां श्रुतिः) वाजिसनेयोकी श्रुति (ज्ञान विमोक्षाय) ज्ञान मोक्षके वास्ते (न)नहि (कर्मसाधनं ) क- र्मसाधन ॥ २१ ॥ अनु०-प्रसिद्ध और स्पष्ट और सावधानतासे तैत्तरीय- श्रुति कर्मके त्यागको कहतीहै वैसे वाजसनेयियोकी श्रुतिमी कहतीहै अर्थात् मोक्षकी प्राप्तिवास्ते ज्ञानही साधन है कर्म नहि ॥ २१॥ विषमपद०-वाजसनेयी श्रुति यथा-प. ४० अ.मं ३ ॥ "असु- ानाम ते लोका अंघेन तमसा वृताः। तास्ते प्रेत्यापि गच्छन्ति ये के पात्महनो जनाः * ॥ ३ ॥" अर्थ जो पुरुष अज्ञानीह वह असुराके यो लोक अंधकारसे युक्त उन्को प्राप्तहोताहै ॥ज्ञान- की मशंसा जैसे। यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्येवानुपश्यति । स- र्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते ॥६ । यस्तु सर्वाणि भूतान्या स्मैवाभूद्विजानतः । तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः ॥७॥ भावार्य यह है कि जो पुरुष अपनेमे सर्वको और सर्वमे आपको अनुभवकर्ताहै वह जन्मता नहि और कहा मोह शोकादि एकत्व है- सनेवालेमें ॥ २१॥ मू०-विद्यासमवेन तु दर्शितस्त्वया ऋतुर्न दृष्टान्त उदाहृतः समः॥ फलैः पृथक्वाबहुकारकैः क्रतुः संसाध्यते ज्ञानमतो विपर्ययम् ॥२२॥ प०-(विद्यासमत्वेन )ज्ञानके बरावर (तु )फिर (दर्शि- (४) (३८) रामगीता तः) दिखायाहै (त्वया) तुमने (ऋतु) यज्ञ (न) नाहि ( दृष्टांत उदाहृतः ) दृष्टांत कहा (समः) बरावर (फलै पृथक्त्वात् ) फलोके जुदा होनेते (बहुकारकैः) बहुत सामयाँ और बहुत साधनोंसे (ऋतुः ) यज्ञ (संसाध्यते) अलपिकार सिद्ध होताहै (ज्ञानं ) ज्ञान(अतः) इसते (विपर्यय) विपरी- तहै।॥ २२ ॥ अनुवा०-- (१३) श्लोकमे जो तुमने कहाहै कि वि- द्याके तुल्य यत्नहि है परंतु उस्का दृष्टांत वहिकहा (क्यो) किं यज्ञ फलमैत्री जुदा है और बहुकारक अर्थात भिन्नरहो- नेसे आर यज्ञादि क्रिया अहं मम बुद्धि अर्थात् मै करताहुँ मेरा यह कर्म है इस अभिमानते होताहै और अतर वाहिर व्यापार और देश काल नियमद्वारा सिद्ध होताहै इस हेतुसे ज्ञान कर्मसे विपरीत है क्यों कि ज्ञानकी उत्पत्ति अहंकारके त्यागसे होतीहै ॥ २२॥ विषमपद०-जैसा यज्ञादिमे अहंकारसे युक्त आत्मा होताहै वो- ह इष्टिमें उदाहरणदेहै (ॐतत्सच्छ्रीपरमेश्वरप्रीतये दर्शपौर्णर्मासा- भ्यामहं यक्ष्ये-तत्र सद्यः पूर्णमासेष्टयाऽहं यक्ष्ये ) ब्रह्मवरणं यथा (तत्र भूपते भुवनपते महतो भूतस्य पते ब्रह्माणं त्वां वृणीमहे ) वृत्तोजपति-(ॐअहं भूपतिरहं भुवनपतिरदं महतोभूतस्य पतिःइत्या दि)वाक्योमें यजमान ब्रह्मा. ऋत्विम्, पत्नी. आमीघ्र. अध्वर्यु इनका भेद मे करताहै यह प्रतीति होतीहै आत्म ज्ञानमे एकता प्रतीति होतीहै यथा-शुक्ल. यजुर्वेदअ.३२ । अनु०।१।मं० १ ॥ "तदेवाग्निस्तदादित्यस्तद्वायुस्तदुचन्द्रमाः । तदेव शुक्र तब्रह्म ता ।
टीकात्रयोपेता। (३९) मापः सं प्रजापतिः ॥ १ ॥ (सर्व खल्विदं ब्रह्म मेह नानास्ति किंचन)" इत्यादिश्रुति एकता कहतीहै ब्रह्ममे (भाव यह है कि प्रथम निष्काम यज्ञादिक कर्म कर चित्त शुद्धकरे पीछे ब्रह्मवि- द्यामे मानवान् भये मुक्ति निश्चयसेहोतीहै (ज्ञानान्मुक्तिः) (ब घोविपर्यधात् इस तरह कर्मकाण्ड और ज्ञानकाण्ड वेदोक दो सार्थक भये ॥ २२ ॥ म०-सप्रत्यवायो त्यहमित्यनात्मधी- रज्ञप्रसिद्धानतु तत्त्वदर्शिनः। तस्माइधस्त्याज्यमविक्रियात्मशि- विधानतः कर्म विधिप्रकाशितं ॥२३॥ पद०-(स) साथ (प्रत्यवायः ) कर्म ना कर्नेका पा- पवाला (हि) निश्चयकर्क (अहं) में हूं (इति) ऐसी (अ. नात्मधीः) अनात्मबुद्धि (अज्ञपसिद्धा) अज्ञानीकी होवेहै (नतु ) नहि (तत्वदर्शिनः) ज्ञानीको (तस्मात् ) तिसका- रणसे (बुधैः) बुद्धिमानोने (त्याज्य )त्यागने योग्यहै (अवि- क्रियात्मभिः (नहिया विकारको आत्मा जिनका तिनोंने (विधानतः) नियमसे ( कर्म विधिप्रकाशितं) विधिवाक्योसे प्रगटजया जो कर्म ॥ २३॥ अनुवा०- यदि कहो कि कर्मके ना कर्नेसे पाप होता इस अनुत्नवसे कर्म करना उचित है कि जैसे लोग कहते कि हम पापी है यह बुद्धिअज्ञानीको होवेहै ज्ञानीको नहिहै इसंवास्ते जो कर्म नाना नियमोंके साथ सकामी पुरुषोके लिये विधि- (४०) रामगीता वाक्योंसे प्रगटाये । ज्ञानीको उन्का त्यागकरना उचितहै२३ विषमपद-भावार्थ यह हैकि कर्मका करना फलकी इच्छ। नाकरणी.ज्ञानवान्पुरुषको चाहिये ॥ २३ ॥ मू.-श्रद्धान्वितस्तत्त्वमसीतिवाक्यतो गुरोः प्रसादादपि शुद्धमानसः॥ विज्ञाय चैकात्म्यमथात्मजीवयोः सुखीभवेन्मेरुरिवाप्रकम्पनः ॥२४॥ पद--(श्रद्धान्विताः) श्रद्धायुक्त (तत्त्वमसीतिवाक्यतः) तत्त्वमसिमहावाक्यसे (गुरोः) गुरुकी (प्रसादात् ) प्रसन्नतासे (अपि) निश्चयसे (शुद्धमानसः)निर्मल है मन जिस्का (वि- ज्ञाय )जानकर (च) फेर (ऐकात्म्यं ) एकता (अथ) इ- सते पीछे (आत्मजीवयोः) आत्मा और जीवका ( सुखी भवेत् ) सुखी होवे (मेरुरिव ) मेरुपर्वतकी न्याई (अपकंप- पनः)अचल ॥ अनुवा०--श्रद्धायुक्त और शुद्ध मन होकर तत्वमसिमहा- वाक्य और सद्गुरुकी कपासे जीवात्मा और परमात्माकी ऐ- क्यता जानकर सुखी और मेरुकी न्याई अचल होवे॥२४॥ विषमपद-तत्त्वमेव त्वमेव त्वं एवं श्रुतिशतोदितं ॥ इत्यादिवा- क्योसे जीवब्रह्मकी एकता कर स्थिरचित्तभये मेरुकी न्याई ॥२४॥ मू०-आदौ पदार्थावगतिर्हि कारणं वाक्यार्थविज्ञानविधौ विधानतः॥ -- टीकात्रयोपेता। (४१) तत्त्वंपदार्थों परमात्मजीवको असीति चैकात्म्यमथानयोर्भवेत् ॥ २५॥ पद० (आदी ) पहिले (पदार्थ) पदका अर्थ (अवगति) जानणा (हि) निश्चयसे (कारणं) कारणहै (वाक्यार्थ ) वाक्योका अर्थ (विज्ञान ) अच्छीप्रकार जानणा (विधौ) विधिमं ( विधानतः ) विधिपूर्वक (तत् त्व) इन्का अर्थ (परमात्मजीवको) परमात्मा और जीवात्मा (असि)तू है (इति) यह (च) पुनः (ऐकात्म्यं ) एकता दोनोकी (अथ) पीछे (अनयोः) दोनोकी (भवेत् ) होवेहै ।। २५ ॥ अ०-वाक्यके अर्थ जाननेवास्ते प्रथम पदोका अर्थ जा- नना मुख्य कारणहै इसवास्ते तत्त्वमसि इस महावाक्यके अर्थ जाननेसें प्रथम इस्के पदोका अर्थ जानना चाहिये ॥ सो इस महावाक्यके तीन पदहै तत् १ त्वं २ असि ३ इन तीनोंमेसें तत्पदकाअर्थ सर्वज्ञता आदिगुणोंवाला परमात्मा है और त्वं पदका अर्थ जीवह इन दोनोंको एक जाननेवाला असि पदहै अर्थात् यह जो परमात्मा सोई जीव है ॥२५॥ विषमपद--(वाक्यार्थज्ञाने पदज्ञानस्य कारणता) इसन्यायसो अथ वाक्यका लक्षण कहतेहै (साहित्ये “ अन्वितैकार्थबोधे तु- वाक्यं पदसमुच्चयः)" अर्थ-योग्य अर्थके बोधनमे जोपदसमूह है । वोह वाक्यहोताहै यथा-जननी सुताननं सस्नेहमीक्षते।माता- पुत्रमुखको साथ नेहके देखती है। इहा जो पदोंकी युक्त एकवाक्य- ता है इसको वाक्य कहते है ।। २५ ।। .
(४२) रामगीता म.--प्रत्यक्परोक्षा दिविरोधमात्मनो- विहाय संगृत्य तयोश्चिदात्मताम् ।। संशोधितां लक्षणया च लक्षितां ज्ञावा स्वमात्मानमथायो भवेत् ॥२६॥ प०-(प्रत्यक् ) प्रत्यक्ष (परोक्ष) जो ना दीखे (आदि) आदिके (विरोधं) असमता (आत्मनः) आत्माकी (विहाय) त्यागकर (सं)अलीप्रकार (गृह) ग्रहणकरके (तयोः) दोनोकी (चिदात्मता) चेतनता (संशोधितां) भलीप्रकार शोधीहुई (लते क्षणया) लक्षणासे (च) और (लक्षितां) दिखाईहुई(ज्ञात्वा- जानकरके (स्वं)आपनू (आत्मानं)आत्माको (अथ) इस) पीछे (अद्वयः) द्वैतरहित (भवेत् ) होवें ॥ २६ ॥ अनु०- यदि कहो कि सर्वज्ञ परमात्मा और अल्पज्ञ जीव को एक समझना विरुद्ध है तोइस्का उत्तर यह है जब जीव ब्रह्मकी जी अल्पज्ञ सर्वज्ञता इन्को त्याग चेतनमात्रको देखिये तो जीवब्रह्म एक है अथवा लक्षणाद्वारा और युक्तिद्वारा वि- चारकर्के देखिये जैसे जीवात्मा चिन्मयहै तैसे परमात्मा चि- न्मय है तौभी चित्त अंशमै जीवात्मा परमात्मा एकही हैं तैसे ही आपने आपको चिन्मय जानकर अद्वय होवे ॥ २६ ॥ लक्षणकहा काव्यप्रकाश द्वितीयोल्लासमे " मुख्यार्थबाधे तद्योगे रुढितोऽथमयोजनात् । अन्योर्थो लक्ष्यते यत् सा लक्षणारोपिता किया . ॥ १ ॥ अर्थ यह है कि जिस विषम-लक्षणका टीकात्रयोपेता। (४३) स्थान मुख्य अर्थ ना बने उसस्थान मुख्य जो अर्थ है उस्को लेकर प्रसिद्धता ( मशहूरी) से वा प्रयोजनसे (कार्य) जिस शक्ति और द्वारा अर्य प्रतीत होवे उस शक्तिका नाम लक्षणाहै ॥ यथा-( यष्टयः प्रविशति) कीसीने कहा की उस स्थान दंड (लाठी) प्रवेश होतेहै विचारना चाहिये कि दंड तो जल है कैसे प्रवेश होताहै नहि होता इस दंडका प्रवेशरूप मुख्य अर्थ नाबना फिर दंडवाले पुरुप प्रवेशहोवेहै यह अर्थ लक्षणाद्वारा प्रतीतमया ॥ इसीका नाम लक्षणाहै ॥ २६ ॥ म.--एकात्मकत्वाज्जहतीन संभवेत् तथाजहल्लक्षणता विरोधतः॥ सोयंपदार्थाविव भागलक्षणा युज्येत तत्त्वंपदयोरदोषतः॥२७॥ प०-(एकात्मकत्वात् ) एकस्वरूप होनेसे (जहति) जह वलक्षणा (न) नहि (संभवेत्) होसक्ति (तथा) तैसे(अजहवल क्षणता) अजहत् लक्षणा (विरोधतः)विरोध होनसे (सोयं पदार्थो) सो यह है पदार्थ (इव) न्याई (भागलक्षणा) त्याग लक्षणाकर्क (युज्येत )जोडे (तत्त्वंपदयोः) तत् त्वं इन्दोय पदोंको (अपदोपतः) विना दोपते ॥ २७ ॥ अनु०-इस श्लोकमें दो लक्षणा कहाँहै एक जहत् दूस री अजहत् सो जहत स्वार्था लक्षणा उस्को करतेहै कि जै से कोई कहे कि गंगामे वास करताहै तो इस कहणेसे समझा जावहै कि यह गंगाके तटकेपर रहनेयोग्य स्थानमें वासकर (.४४) रामगीता वा है क्यो किंजलप्रवाहमयीगंगामें वासकरनाअसंभवहै औ- र अजहत् लक्षणामी नहि वनती क्यो कि जैसे कोई कहै कि संपूर्ण काकसे दधि वचायो इस कहनेमें एकको दवि रक्षक कहकर दूसरेको दधिनाशक कहे तो यहली लक्षणा बननहि किंतु काक बिडाल आदिक सबसे दधिकी रक्षा प्रतीतहोती हैइसलिये जीवात्मा और परमात्माकी एकता दोसे कहनीचा हिये जैसे सोई यह देवदत्त है इहां (तत्ता) (इदंता) त्या गके एक देवदत्त प्रतीतकरना येही लक्षणा निर्दोष है जीवात्मा से जीव उपाधि औरपरमात्मासे परम उपाधि को दूरकर देखे तो आत्मामात्र रहजाताहै इस निर्दोषलक्षणासे जीवात्मा औ र परमात्माका ऐक्य ज्ञान प्राप्त होताहै यहि निर्दोष लक्षणा कहलातीहै ॥ २७ ॥ विषमपद०-इस श्लोकमे परमात्मा श्रीरामचंद्रजीने जहतरक्षणा और अजहतलक्षणा दो भेद लक्षणाके कहेहै । उस्का लक्षण लिख- तेहै ॥ काव्यप्रकाश । द्वि००(स्वसिद्धये पराक्षेपः परार्थे स्वमसम- पणं २ उपादानं लक्षणंचेत्युक्ता शुदैवसाद्विधा ) अर्थ यह है कि मुख्य अर्थकी सिद्धिवास्ते लक्ष्य अर्थके वोधनमे मुख्य अर्थ- के ग्रहण करनेसे उपादान लक्षणा होतीहै उदाहरण जैसे (नूपुर शब्द कर्तेहै ) इहा नूपरवाले नट. भट. वेश्या आदि चेतन्यवा ले पुरुषोंका ज्ञान होताहै । उस्का उपादान लक्षणा अर्थात् अज- हत्स्वार्थी लक्षणा कहते है ॥ जो मुख्य अर्थको त्याग पर अर्थको कहै सो लक्षणलक्षणा होतीहैजैसे कोई जैसे शत्रूको कहें (कि तुमने बहुत उपकार किया वडीभारी मैत्री दिखाई। (अब फिर ऐसा कर- ता सुख से १०० वर्ष जीव ) यह वात शत्रुमें घटती नाहे की । 4. ४ .. टीकात्रयोपेता। (४५) शत्रुसे कब भला होताहै इनलिये उपकाररूप जो मुख्य अर्थ की बाधा भई फिर जहवलक्षणासे अपकारादिकोंका अतिशय अर्थ मालूम होताहै । ( कि हे दुष्ट तुमने बहुत भारीदुष्टता दिखाई ।अब तुम इसीक्षणोमे मर ऐसे कामकर्ता) इत्यादि उलटी प्रतीतिको ज- हल्लक्षणा करतीहै इसलिये जहतत्स्वार्था कहलातीहै ॥ २७ ॥ अल- मति गाहावगाहेन ॥ मूरसादिपञ्चीकृतभूतसंभवं भोगालयं दुःखसुखादिकर्मणाम् ॥ शरीरमाद्यं तव चादिकर्मजं मायामयं स्थूलमुपाधिमात्मनः॥२८॥ १०-(रसादिपंचीकृतभूतसंभ) रसासे लेकर जो पांच भूत तीनसे वनाहुआ (भोगालय) भोगोंका घर (दुःखसुखादि कमणी) दुःखसुखादिकर्मका (शरीर) स्थूल शरीर (आयत- बत् ) आदिअंतवाला (आदिकर्मज) संचितकर्मोंसेउत्पन्नभया (मायामयं) मायावाला (स्थूलं) बडा (उपाधि) उपाधि (आ- त्मनः) आत्माकी॥ २८ ॥ अनु०-पृथिवी है आदि जिनके ऐसे जो पांच भूत अर्था- त् पृथिवी जल अग्नि वायु आकाश इन पांचौभूतोसे वनाहुआ यह स्थूल शरीर सुखदुःखादिकौके भोगनेका घरहै उत्पत्ति नाशवालाहै पूर्वकर्मसे उत्पन्नभयाहै मायाका विकाररूप है यह शरीर आत्माकी स्थूल उपाधिहै ॥ पंचीकर्णकी व्यवस्थाऐसे है प्रथम पांचभूतोके दो २ भाग कर्ने फिर एक रामगीता भाग भूतोंका जुदाधरे दूसरे भागके चारभाग करे अपने प्रथम अर्धभागको त्यागके दूसरे चारोंभूतोके अर्धभाग मै यह चारो छोटे भाग मिलावे इसतरा पांचोंमे पाचोंके मि- लनेसे पंचीकर्ण होवैहै इस्का प्रकार अच्छीतरह तत्वबोध मे लिखाहै ॥ २८॥ वि०-उपाधीका लक्षण कहतेहै यथा साध्यस्य व्यापको य- स्तु हेतोरव्यापकस्तथा स उपाधिः ॥" साध्यव्यापकत्वे सति हे तोरव्यापकत्वमुपाधेलक्षणं यथा ध्वंसो विनाशी जन्यत्वात् ध्वंस नाशवालाहै उत्पन्न होनेसे इहा होना यह उपाधि नहिं विनाशि- को प्राक् अभाव होनेसे ॥ २८ ॥ मू-सूक्ष्मं मनोबुद्धिदशेंद्रियैर्युतं प्राणैरपंचीकृतभूतसंभव ॥ भोक्तुःसुखादेरनुसाधनं भवे- च्छरीरमन्यहिदुरात्मनो बुधाः॥२९॥ पद--(सूक्ष्म) सूक्ष्मशरि (मनोबुद्धिदशेंद्रियैर्युत) मन औ- रबुद्धि और दशइंद्रियोंकरके मिलाहूया (पाणैः) प्राणोंकर- के मिलाया (अपंचीकतभूतसंभवं) अपंचीकतभूतोंसे बना हुआ (भोक्तुः) भोगनेका (सुखादेः) सुखदुःखादिकोंके (अनुसाधन) साधन (भवेत् ) होताहै (शरीर) देह (अन्यत्) दूसरा (विदुः) जानतेहै ( बुधाः) बुद्धिवान् ॥२९॥ अनु-मन और बुद्धि दश इंद्रिय प्राणसे मिलाया अ- पंचीकत पांचोभूतोंसे बनायाहै स्थूलशरीरमे भोगोके भोग .
टीकात्रयोपेता। (४७) नेवाला सूक्ष्मशरीर कहावेहैं इसको लिंगशरीरभी कहतहै यह शरीर (सतारह) तत्वोंका वनाहै इस्के वियोगकी मरण क- हतेहै नेत्रादिकोंका विषय ना होनेसे सूक्ष्म कहलाताहै और स्थलशरीरसे भिन्न है ॥ संकल्परूप मन निश्चयकर्नेवाली बुद्धि नासिका १ जिव्हा २ नेत्र ३ त्वचा ४कर्ण५यह पांच ज्ञानेंद्रिया है ॥ वाणी १ हाथ २ चरण ३ गुहा ४ लिंग ५ यह कर्मेंद्रिया है। प्राण अपान व्यान उदान समान यह पांच प्राणहै ॥ २९ ॥ वि०-प्रथम शरीरके भेद लिखतेहै ॥ सांख्यतत्वकौमुद्याम् ॥ सूक्ष्मा १ मातापितॄजा २ सहमभूतै ३ स्त्रिधा विशेषाः स्युः । मूक्ष्मास्तेषां नियता मातापितॄजो निवर्तन्ते ॥” अर्थ-सूक्ष्म १ मा- तापितासंबंधिर पंचभूतसंबंधि३ तीन प्रकारका तनु है (तिन्मे मू- क्ष्म सदा रहताहै और मातापिताका तथा पंचभूतोंसे उत्पन्नभया शरीर नष्टहोताहै इहा तनुशब्दकी अपेक्षासे सूक्ष्मा यह स्त्रीलिंग प- गहै । " स्त्रियां मूर्तिस्तनुस्तनू । इत्यमरः ॥ सूक्ष्म होनेसे लिंग- शरीर कहलाताहै ॥ शंकाहैकि लिंगशरीरविना स्थूलके किऊ नहि रहताहै उत्तर-तसवीर जैसे विना कागज वृक्षं विना जैसे छाया नहि रहती इस प्रकार विना स्थूल शरीरके सूक्ष्म अर्थात लिंगशरीर नहि रहताहै ॥(बुद्धिलक्षण “अध्यवसायो बुद्धिः॥" मनलक्षण "सुखा- । दिग्राहकं मनः)" " मनोग्रामं सुखं दुःखमिच्छा द्वेषोमतिः कार ॥ इति मुक्तावल्यां ॥ दशइंद्रियोमे प्रमाण यथा- "बुद्धींद्रियाणि चक्षुः श्रोत्रघ्राणरसत्वगाख्यानि ॥ वाक्पाणिपादपायूपस्थान क- मंद्रियाण्याहुः॥” इति सांख्यतत्त्वकोमुद्यां ॥ प्राणों के भेद (प्राणो- पानः समानचोदानव्यानौ च वायव:- इत्यमरः । अथ-माणा- दि वायु किस २ स्थानमें रहतेहै ॥ उत्तर-नासिका हृदय नाभि T में '' (४८) रामगीता पादका अंगुष्ठमें वर्तनेवालाप्राणहै । गलके पीछे पृष्टमे पादमे गु- दामें लिंगमें पाचवों में वर्तनेवाला. अपानहै ॥.हृदय नाभीके.मध्य- मे सर्वसंधियोंमे वर्तनेवाला समान वायुहै १ हृत कंठ तालुमस्त-: क भ्रू (भ्रूकुटै) मध्य वर्तनेवाला उदानहै ४ सर्वशरीरमें वर्तनेवा- ला व्यान वायुहै १ यह पांच भेदहै ।। मू०-अनाद्यनिर्वाच्यमपीह कारणं मायाप्रधानं तु परं शरीरकम् ।। उपाधिदात्तु यतः पृथस्थितं स्वात्मानमात्मन्यवधारयेत् क्रमात्॥३० पद०(अनादि) जिसका आदि नहि (अनिर्वाच्य) जो. कहानेमे ना आवे (अपि निश्चयकर्के) इह (इसशरीरमें) का- रणं कारणदेह (माया) ब्रह्मकि मायाशक्ति (प्रधान) प्रकृति (तु) फेर (परं शरीरक) ईश्वरकाशरीर (उपाधिभेदात्) उपाधिके भेदसे (तु) फिर (यतः ) जिसकारणतें (पृथक्) भिन्न (स्थितं ) स्थितहै (स्व) आपने (आत्मानं ) आत्मा को (आत्मनि ) परमात्मामें (अवधारयेत्) धारणकरे (क्रमा- त) क्रमसें.॥ ३०॥ अनु०-प्रथम दोश्लोकों मे जीवके सूक्ष्म स्थूल दोशरीर कह अब तीसरा कारणशरीर कहते है जो उपाधिसे है कैसा है अनादि सत् असत् किसी प्रकारसे कहनेयोग्य नहि वह शरीर मायारूप अर्थात् ईश्वरस्वरूप सर्वसंपादक और स्थूल सूक्ष्म शरीरका कारण और आत्माका मुख्यशरीर मायारूप .
टीकात्रयोपेता। (४९) कहलाताहै इसलिये इस मायाकत उपाधिको त्यागकरके क्रम से श्रवण मनन निदिध्यासनके द्वारा ब्रह्म जीवमें भेद बुद्धिको दूरकर परमात्मामें अनेदजाने ॥ ३० ॥ विषमप० आत्मान मात्भन्यवधारयेत् क्रमात । इसमें श्रुतिः आत्मा वा अरे द्रष्टव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः" इति- कैसे श्रवणादिक कर्ने चाहिये-यथा श्रोतव्यः श्रुतिवाक्येभ्यो मत- व्यश्वोपपत्तिभिः । मत्वा च सततं ध्येय एते दर्शनहेतवः ।। इति ॥ ३०॥ मू०कोशेष पंचस्वपि तत्तदाकृति विभाति संगात्स्फटिकोऽमलोयथा। असंगरूपोऽयमजोऽदयो यतो विज्ञायतेऽस्मिन्परितो विचारिते॥३१॥ प०-(कोशेषु) कोशोमें (पंचमु ) पांचोंमें (अपि)निश्चय करके (तत्तदारुतिः) तिस २ स्वरूपवाला (विभाति) प्रकाशहोताह (संगात् ) संगसे (स्फटिकः)बिलोर (अमलः) निर्मल (यथा) जैसे (असंगरूपः) नहिहै संगवाला रूप जि स्का (अयं) यह आत्मा (अजः) जन्मरहित (अद्वयः) द्वितीयरहित (यतः) जिससे (विज्ञायते) जानाजाताहै (अस्मिन्) इस महा वाक्यमें (परितः) चारोऔरते (विचा रिते) विचारकियेसे ॥ ३१ ॥ अनु०-यह आत्मा पंचकोशोमें जिसके साथ संगकरता है तिसरकोशका स्वरूपहो दिखाईदेताहै जैसे शुद्ध. विलौर (५०) रामगीता जिसररंगके पुष्पादिकोके साथ युक्त होता, तिसरंगवाला प्रतीत होताहै वास्तवसे आत्मा संगरहित जन्मरहित अद्वय अर्थात् जिसके साथका ना होवेहै इसलिये तत्त्वमसि इस म हावाक्यसे विचाराजाताहै। पंचकोश कहतेहै अन्नमय प्राण मयरमनोमय विज्ञानमय:आनंदमयषस्थूलदेहको अन्नमय १पंचकर्मेंद्रिय और मनको मनोमयको २ पंचज्ञानेंद्रिय और बुद्धिको विज्ञानमय ३ पंचप्राणको प्राणमयटकारणशरीरभूत अविद्यामलिनसत्वप्रधान और प्रिय मोद प्रमोद इन तीनोद चियोसहित आनंदमय कोश कहतेहै ॥ ३२ ॥ विषम०-कोशो विपे भिन्नर प्रतीतिमे प्रमाण "कुसुमवञ्च मणे" मणिमें कुसुमो की न्याई ॥ तमेवानु वदति तस्मिंश्चिद्दर्पणे स्फारे समस्ता वस्तुदृष्टयः । इमास्ताः प्रतिविति सरसीव तटदु- माः ॥” इति ॥ अर्थ तिस चित्तरूपी दर्पणमें संपूर्ण वस्तु प्रती-- तहोती है जैसे जलमें तटके वृक्ष अनेक दिखाई देते है वास्तवसे जलमें नहिं इसतरह येह जगत् चैतन्यमें दिरवाई देता है मा- यासे यथार्थतासे चैतन्य शुद्धहै इस हेतुसे असंग अज अद्वय है असंगोयं पुरुषः, सांख्यप्रवचनमें लिखाहै ॥ श्रुत्तिभीकहतीहै । यथा “अणोरणीयान्महतो महीयानात्माऽस्य जन्तोनिहितो गुहा- यो । तमक्रतुः पश्यति वीतशोको धातुःप्रसादान्महिमानमात्मनः॥" यजु कठ० ड. मं २०॥ तथाच " अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं तथाऽरसन्नित्यमगन्धवञ्च यत् । अनाद्यनंतन्महतः परं ध्रुवं निचाय्य तन्मृत्युमुखात्ममुच्यते ॥" य० क. ड. तृ० में १५ ॥ ३१ ॥ मू.बुद्धेखिधा उत्तिरपीह दृश्यते .
टीकाधयोपेवा । स्वप्नादिक्षेदेन गुणत्रयात्मनः । अन्योऽन्यतोऽस्मिन्व्यभिचारतामृषा नित्ये परे ब्रह्मणि केवले शिवें।। प०-(बुद्धेः) धुद्धिकी (त्रिधावृत्तिः) तीनप्रकारकी अ वस्था (अपि) निश्चयकरके (इह) इस आत्मामें (दृश्यते) दिखाईदेताहै (स्वमादिभेदेन) स्वमादिदकर्के (गुणत्रयात्मनः) तीनगुणवाली बुदिह (अन्योऽन्यतः) एकको दूसरेते (अस्मि न् ) इस आत्मामैं (व्यभिचारतः) विरुद्ध होनेसे( मृषा) झूठा है (नित्ये) नित्यमें (परे) गुणत्रयातीतविषे (शिवे) आनं दरूपवि ॥ ३२ ॥ अनु०-यह जो जाग्रत् स्वम सुषुप्ति तीन अवस्था दि साई देती है सो सत्व रज तम गुणवाली बुद्धिका धर्म है आत्माका नहि स्वत्वका जाग्रत् रजका स्वम तमका सुषुप्ति धर्म है इसलिये साक्षीस्वरूप निर्गुण आत्माको इन तीनो अब स्थावाला मानना मिथ्या है क्योंकि जायत अवस्थामें स्वम सुषुप्तिका नाश स्वममें जाग्रत सुषप्तिका नाश सुषुप्तिमें जायत स्वमका नाशहै इस हेतुसे उत्पत्तिनाशरहित तीनोगुणोंसे परे सर्वव्यापक असंगरूप आनंदमय सर्वदा एकरस आत्मामै परस्पर व्यभिचारी धर्म इनतीनोका असंभवहै ॥ ३२ ॥ विषम० कहाभीहै. "जाग्रत् खप्नं सुषुप्तं च गुणतो बुद्धिवृत्तयः । यासो.विलक्षणो जीवः साक्षित्वेन व्यवस्थितः ॥ इति “सत्वं -- (५२) रामगीता- रजस्तम इति माकृतं तु गुणत्रयं । एतन्मयी च प्रति माया या वैष्णवी श्रुता ॥" म०-देहेंद्रियप्राणमनश्चिदात्मनां संगादजस्त्रं परिवर्तते धियः॥ वृत्तिस्तमोमूलतयाऽज्ञलक्षणा यावद्भवेत्तावदसी भवोद्भवः॥३३॥ पद० (देह) स्थूल शरीर (इंद्रिय) दश (प्राण) वायु (मनः) मन (चिदात्मनां) चेतन आत्माके (संगात् )संगसे (अजस्रं ) निरंतर (परिवर्तते) वर्तमानहोताहै (धियः) बुद्धिका (वृत्तिस्तमोमूलतया) बुद्धिकी वृत्ति अज्ञानरूप (अ ज्ञलक्षणा) अज्ञानलक्षणावाली (यावत् ) जबतक (असौ) इसको (भवः) संसार ( उद्भवः) उत्पत्तिहै ॥ ३३॥ अनु०-शरीर इंद्रिय प्राण मन चिदात्मा इन सर्वको ज वतक आपसमें संबंधहै तबतक इस जीवको जन्ममरण होता है क्यों कि रजतमोप्रधाना बुद्धि संसारका कारण है इस्का त्याग ही योग्य है ॥ ३३ ॥) विषमपद० यथा रजसा तमसा चैवं समाविष्टो भ्रमनिह । भा. वैरनिष्टैः संयुक्तः संसारं मतिपद्यते ॥ अविद्यामाहुरव्यक्तं सर्गप्र- लयधर्मिणम् ॥ सर्गप्रलयनिर्मुक्त विद्यां वै पांचविंशकम् ॥ " अर्थात रजतमप्रधाना अज्ञान रूपा बुद्धि जन्ममरणमें हेतु । और सत्वम- घाना ज्ञान रूपा बुद्धि मोक्षका कारण है ।। इति ॥३३॥" .. मूग्नेति प्रमाणेन निराकृताखिलो . टीकात्रयोपेता (५३) हृदा समास्वादितचिद्घनामृतः। त्यजेदशेषं जगदात्तसद्रसम् पीत्वा यथाम्भःप्रजहाति तत्फलं॥३४॥ पद०(नेतिप्रमाणेन) नेति प्रमाणकरके (निराकतः) दू रकियाहुआ (अखिलः) संसार (हृदा) मनकर (सं) अ- च्छी तरह (आस्वादित) चखयाहै अर्थात् स्वादलीनाहै ( चिद्धनामृतः ) आत्मरूपी अमृत (त्यजेत् ) त्यागदे वे (अशेष जगत ) सर्वजगतको (आत्तसद्सं ) ग्रहणकीया है रस जिससे (पीत्वा) पानकरके (यथा) जैसे (अंगः)जलं (प्रजहाति ) त्यागदेता है (तत्फलं) तिसके फलको ॥३४॥ अनु०-महावाक्यके अनुसार जो करना चाहिये उस्को कहतेहै कि इस जगतको मिथ्यारूप जानकर सत्वंगुणयुक्त म नके द्वारा चिद्घनामृत अर्थात् ब्रह्मसुखको पानकर देह इंद्रि यादि और संपूर्ण जगत् को त्यागदेवे और उदासीन रहै यदि कहो कि देह इंद्रियादिद्वारा जगत्का ज्ञान हुआ फिर किऊकर इन्द्रियादि जगत्को त्यागे इस्मे दृष्टांत यह है कि जिस प्रकारसे तृषावाला पुरुष नारकेल और नारंगि आदि फलके बीचका मीठा जल जो सारशूत है उस्को पानकर जैसे फिर नारकेल आदिक जो शेष वस्तु है उसको त्यागताहै तैसे इस संपूर्ण दृश्यरूप जगतके सारांश ब्रह्मको मानकर शेष निःसार वस्तुको त्यागदेवे ॥ ३४॥ विषमपद श्रुतियथा-अथांत आदेशो नेति नेति नह्येतस्मादिति
(५४)
रामगीता
नेत्य न्यत् परमस्ति स ऍष आत्मा नेति नेती त्यादि । तयांच॥
"अस्थिस्थूणं स्नायुयुतं मांसशोणितलेपनं । चविनद्धं दुर्गन्धि-
पूर्ण मूत्र रीषयोः ॥ जराशोकसमाविष्टं रोगायनमनातुरम् । र-
जस्वलमसन्निष्ठं भूतावासमिमं सजेत् ॥ नदीकूलं यथा वृक्षो वृक्षं वा
शकुनिर्यथा । तथा त्यजन्निमं देहं कृच्छ्रागाहाद्विमुच्यते ॥ ३४ ॥
मू-कदाचिदात्मान मृतो न जायते
नक्षीयतेनापि विवईत नवः।
निरस्तसातिशयः सुखात्मकः
स्वयं प्रभुःसर्वगतोऽयमद्वयः ॥३५॥
पद (कदाचित् ) कमी (आत्मा) ब्रह्म (न) नहि (मृतः).
मरताहै (न.) नहि (जायते ) जन्मताहै (न) नहि (क्षीय
ते) घटताहै (न) नहि (अपि) निश्चयसे (विवर्द्धते) बंद
ताहै (नवः) नवीनहै (निरस्तसर्वातिशयः) सबसे बडाहै (सु
खात्मकः) सुखस्वरूपहै (स्वयंप्रः) स्वयंप्रकाशहै सब व
स्तुमै (अयं) आत्मा(अद्वयः) अद्वयहै ॥ ३५॥
अनु०-यह आत्मा न कभी मरता ना जन्मता ना घटता
ना बढता न कॅश होता न मोटा होताहै एकरसरहताहै सवं
से बडा है सुखस्वरूप है स्वयंप्रकाश है सर्व वस्तुमै व्यावहै अद्वि
तीय है अर्थात् जिसके साथ का दूसरा नहि ॥ ३५॥
विषमपंद० श्रुतिप्रमाणं " न जायते म्रियते वा विपश्चिन्नार्य
कुतश्चिन्न बभूव कश्चित् । अजो नित्यः शाश्वतो ऽयम्पुराणो न ह-
न्यते इन्यमाने शरीरे ॥ १८॥
टीकात्रयोपता (५५)
हता चेन्मन्यते हन्तुं हतश्चन्मन्यते हतम् । उभो तौ न विजानी
तो नायं हन्ति न हन्यते॥१९॥ "यकठ.उप० तृतीया वल्ली|॥३५॥ .
मूलं. एवंविधज्ञानमये सुखात्मके
कथं भवो दुःखमयःप्रतीयते ॥
अज्ञानताध्यासवशात्प्रकाशते
ज्ञाने विलीयेत विरोधतःक्षणात् ॥ ३६॥
पद० ( एवंविधे) इसप्रकासे (ज्ञानमये) ज्ञानस्वरूप (सुखा
त्मके ) सुखरूप (कथं ) कैसे (भवः) संसार (दुःखमयः) दुःख
रूप (प्रतीयते ) प्रतीतिहोताहै (अज्ञान) अज्ञानसे (अध्या
सवशात् ) अध्यासके वशसे (प्रकाशते ) प्रगटहोताहै (ज्ञाने)
ज्ञानसे (विलीयेत ) दूरहोताहै (क्षणात्) एकक्षणसे ॥३६॥
अनु०-इसप्रकार विकाररहित और ज्ञानरूप सुखस्वरू
प आत्मामैजन्ममरणादि संसारका दुःख किसीप्रकार नहि हो
सक्ता यह केवल अज्ञानके आधीन हुए अंतःकरणमैं अहंम
मताबुद्धि उत्पन्नहोतीहै मनके द्वारा कल्पनामात्र है और बुद्धि
भममात्र है इसवास्ते अज्ञानविरोधी ज्ञानके उत्पन्नहो ऐसे
कारणभूत अज्ञानका नाश होगा जब कारणका नाश आया तो
जो कार्य संसार है उस्कानी नाश होगा जैसे चमसे रज्जूमें स
र्पज्ञान था जब प्रकृति रज्जूका ज्ञान हुंआ तब तत्काल ही
सर्पके होनेकी बुद्धिका नाश होताहै इसीप्रकार जान
लेवै.॥३६॥
(५६) ; रामगीता विषमपद० इहा ज्ञानमय इस पदसे ज्ञान क्या है यह प्रतीति होवेहै । ज्ञानकालक्षण इसलिये लिखतेहै (यथा-)" अव्यक्ताद्यवि. शेषान्ते विकारेऽस्मिश्च वर्णिते । चेतनाचेतनान्यत्वज्ञानेन बानमुच्य ते ॥ " अर्थ अव्यक्तसे विशेषपर्यंतमै जो चेतन अचेतनाका अभेद है वह ज्ञानहै अब जिसमकार आत्मा की अकर्ता है वह कहते है ॥ “निरिच्छे संस्थिते रत्ने यथा लोहा पर्वते । सत्तामात्रेण देवेन तथा चायं जगज्जनः ॥ अत आत्मान कर्तृत्वम कर्तृत्वं च संस्थितम् । निरिच्छत्वादकर्तासौ कर्ता सन्निधिमात्रतः ॥" अर्थ। जैसे इच्छारहित चमकपत्थरमे लोहा प्राप्तहोता है। तेसे जग- त सत्तामात्रसे देवमे है। इसलिये कर्ता और अकर्ता है । निरि- च्छासे अकर्ता और समीपतासे कर्ता है ॥ ३६ ।। मूलं यदन्यदन्यत्र विभाव्यते भ्रमा दध्यासमित्याहुरमुं विपश्चितः। असर्परूपे हि.विभावनं यथा रज्ज्वादिके तहदपीश्वरे जगत् ॥३७॥ पद०( यत् )जो (अन्यत् ) और पदार्थ (अन्यत्र ) और पदार्थमें (विज्ञाव्यते) अतीतहोताहै (नमात् ) नमसे (अध्यासमित्याहुः) अध्यास ऐसे कहतेहै ( अमुं) इसकू (वि पश्चितः) बुद्धिमान (असर्परूपे) नासर्पमें (अहि) सर्पकी(वि भावनं ) भावना (यथा) जैसे (रज्ज्वादिके) रज्वादिकामैं (तद्व त् ) तिसकी न्याई (अपि) निश्चयसे ( जगत् ) संसार है ॥ ३७॥ अनु०-नमके आधीन हो अन्य वस्तुमै जो अन्यवस्तु
टीकात्रयोपेता। (५७)
का ज्ञान उस्को अध्यास कहतेहै जैसे रज्जुमें सर्पज्ञान तैसे ई
श्वरमें देहादिसंसाररूप ज्ञान होवेहै सो यह अध्यास
केवल आत्मज्ञानके अभाव होनेसे असत्यमें सत्यका ज्ञान हो
ताहै ॥ ३७॥
वि० शुक्तिकायां रजतम् । अर्थात् सिप्पिमें समसे रजतकी मां-
तिकी न्याई ईश्वरमें जगत है ।। अर्थात प्रतिबिंबरूपसे है जैसे दर्प-
णमें मुख ॥ ३७॥
मूल विकल्पमायारहिते चिदात्मके
ऽहंकार एषःप्रथमःप्रकल्पितः॥
अध्यास एवात्मनि सर्वकारणे
निरामये ब्रह्मणि केवले परे ॥ ३८॥
पद०(विकल्पमायारहिते) मायाकि कल्पनासे रहित(चि
दात्मके) चेतनमें ( अहंकार एषः) एक अहंकार (प्रथम)
पहिला (प्रकल्पितः) कहाहै (अध्यास एव ) वह अध्यास
भी है (आत्मनि) आत्मामैं (सर्वकारणे) सर्वके कारणमें (नि
रामये) नीरोगमें (ब्रह्मणि ) व्यापकमें (केवले) श्रुद्धमें (परे)
परमें ॥ ३८ ॥
अनु०-आत्मामें जो जगत्का ज्ञान होताहै सो अध्यास
मात्र है सर्वविकल्पका कारण जो माया तिसके संगसे रहित ज्ञा
नस्वरूप सर्वकाकारण आनंदमय विकारशून्य व्यापक जोआ
माहै उस आत्मासे प्रथम अहंकारकल्पना भया उस्को अ
ध्यास कहतेहै वोह सर्वसंसारका कारण जानो ॥ ३८॥
(५८) रामगीता विषमपद विकल्पके भेद कहतेहै "(अष्टविकल्पो दैवस्वैय्यिग्यो- नश्च पंचधा भवति । मानुष्य वैकविधः समासतो भौतिकः सर्गः॥" अर्थ बाझ १ प्राजापत्य २ ऐंद्र ३ पैञ्यगांन्धर्व ५ याक्षराक्षस पैशाच ८ ये है अष्ट प्रकारकी देव सृष्टि है और पशु १ मृग २ पक्षि ३ सर्प ४ स्थावर ५ ये है तिर्यक्सृष्टिहै । और मानुष्य १ एक प्रकारको सृष्टिहै यद्यपि ब्राह्मणादि बहुत भेद है तथापि इहा एक मनुष्य व्यक्ति लई जाती है ॥ ३८ ॥ मू०इच्छादिरागादिसुखादिधर्मकाः सदा धियः संश्रुतिहेतवः परे॥ यस्मात् प्रसुप्तौ तदक्षावतः परः सुखस्वरूपेण विक्षाव्यते हि नः॥३९॥ पद०(इच्छादि ) इच्छासे आदिले (रागादि) प्रीतिसे आ दिले (सुखादि) सुखसे आदिले (धर्मकाः) धर्म (सदा) सदै व (धियः) बुद्धिके है (संसृति हेतवः) जन्मका कारण (परे) परमात्माविषे (यस्मात् )जिसकारणसे (प्रसुप्तौ)सुषुप्तिविषे(त त्)तिसबुद्धिके (अभावतः) ना होनेसे (परः) परमात्मा (सु खस्वरूपेण ) सुखरूपकरके (विभाव्यते)प्रतीविहोवेहै (हि) निश्चयसे (नः) हमको ॥ ३९॥ अनु०-सर्वसाक्षी आत्मासे जो संसारकी कल्पना है सो केवल ईच्छा उपेक्षा राग द्वेष सुख दुःख आदिक इंद्वधर्मवा लीबुद्धीहि है अर्थात् इसप्रकारकी बुद्धिके होतेही संसारका अनुभव होताहै जब इसप्रकारकी बुद्धिसे रहित होताहै तब
टीकात्रयोपेता। (५९)
संसारका नाश होजाताहै जैसे सुपुप्तिकालमें बुद्धिके अभाव
होनेसे आत्मासुखरूप प्रतीति होताहै और संसार दुःखरूपी कु
छत्ती नहि प्रतीतहोता क्यों कि निद्रासे उठकर यह जानाजा
ताहै कि हम सुखसे शयनकर्तेथे वह शयन आत्माके तुल्य सुख
रूप निश्चय होताहै इससे जानाजाताहै कि संसार केवल बुद्धि
के धर्मसे है आत्माका यह धर्म नहिं ॥ ३९ ॥
विषमपद० फक्तं च “सुपुप्तावस्थया चक्रपमरेखा शिलोदरे ।
यथास्थिता चितेरन्तस्तथेयं जगदावली ॥ (तत्सन्निधानादधि-
छातृत्वं च मणिवत) अर्थ जैसे अयस्कान्त मणिकी समीपत्तासे श-
ल्यका निकलना खतः सिद्ध है तद्वत आत्मामें इच्छादिकोंसे संसार
म् अनाद्यविद्योद्भवबुद्धिबिंवितो
जीवःप्रकाशो य इतीर्यते चितः।।
आत्मा धियःसाक्षितया पृथक स्थितो
बुद्धया परिछिन्नपरः स एव हि ॥४०
पद०( अनादि) आदिरहित (अविद्या) मायासे (उद्भ
व) उत्पन्नाया (बुद्धिबिंवितः) बुद्धिकी छाया (जीवः)
जीवात्मा(प्रकाशः)प्रकाशरूप (अयं) यह आत्मा (इति) ऐ
से)(ईर्यते) कथनकियाजावेहै (चितः) चितरूपहै (आत्मा)
परमात्मा (धियः) बुद्धिका (साक्षितया) साक्षिहोनेसे (पृ
थक) जिन्न (स्थितः) स्थितहै (बुद्धचापरिच्छिन्न) बुद्धिके
धाँसे रहित (परः) सर्वसे परे (तत्) सोआत्मा (एव हि)
निश्चयकरके ॥ ४० ॥
(६०) रामगीवा अनु०-अनादिअज्ञानसे प्रगटाया जो बुद्धिमें प्रतिबिंबितचे तन्यका प्रकाश उस्को जीव कहते है बुद्धयधिष्ठान चैतन्यका अर्थात् जिससे बुद्धिकल्पित है वह वृत्तिका साक्षी होकर पृ थक् स्थित है सो बुद्धिक अपरिच्छिन्न है अर्थाद बुद्धिगु णोंसे उस्का आच्छादन नहिंहोताहै ॥४०॥ विषम० भिन्नतामै प्रमाण " अभिन्नपि हि वुध्यात्मा विपर्यास निदर्शनैः । ग्राह्यग्राहकसंवित्तिभेदवानिव लक्ष्यते ।" इति ।। अर्थ आभिन्नभी आत्मा बुद्धिक संशयावपर्यास भेदोसे भेदवाला मालूम होताहै जैसे यह ग्राह्य है और यह ग्राहकहै ॥ ४० ॥ म.चिबिंबसाक्ष्यात्मधियां प्रसंगतः त्वेकत्र वासादनलाक्तलोहवत् ॥ अन्योन्यमध्यासवशात् प्रतीयते जडाजडत्वं च चिदात्मचेतसोः॥४१॥ पद०(चिह्निब)चिदात्माका बिंब (स)साथ (अक्षि) इंद्रिय ( आत्म) परमात्मा (धियां) बुधिके प्रसंगसे (तु) फिर (एकत्र वासात् ) एकस्थान वासहोनेसे (अनल) अ मि (आक्त) युक्त (लोह) लोहा (वत् ) न्याई (अन्योऽ न्यं) परस्पर (अध्यासवशात् ) अध्यासक्शसे (प्रतीयते)प्र तीतिहोताहै (जड)अचेतन (अजडत्व)चेतनता (चिदात्म) चतन (अचेतसः) जडका ॥ ४५ ॥ अनु०-चित्प्रतिबिंब अधिष्ठान चित्बुद्धि इनके अभेद अर्थात् एकाकारग्रहणसे बुद्धि पुरुषके.धर्म परस्परमें आरोप टीकात्रयोपेता। (६१) ण करीदेह कर्तृत्वादिरूप बुद्धिके धर्म आत्मामें इसकी चेतन- ता बुद्धिमें आरोपणकरीह जैसे तमलोहेमें प्रकाशकत्व दाहक- स्वादि अनिके धर्म आरोपण कियेजातेहै ॥ ४१॥ विषमप०-सुगमहै ॥४१॥ मूल०-गुरोःसकाशादपि वेदवाक्यतः संजातविद्याऽनुभवो निरीक्ष्यते। स्वात्मानमात्मस्थमुपाधिवर्जितं त्यजेदशेषं जडमात्मगोचरम् ॥४२॥ पद०-(गुरोःसकाशात) गुरुद्वारा (अपि) निश्चयकर (वे दवाक्यतः) वेदवाक्यसे (संजात) उत्पन्नभया (विद्या) ज्ञान (अनुभवः) स्वयंसिद्ध ज्ञान (निरीक्ष्यते) मालूमहोता है (स्व) अपने (आत्मानं) आत्माको (आत्मस्थं ) परमा माविषे स्थितको (उपाधिवर्जितं) नामादिउपाधिरहितको (त्यजेत् ) त्यागदेवे (अशेष) संपूर्णको (जड) जडपदार्थको (आत्मगोचरं ) इंद्रियोंके विपयको ॥४२॥ अनु०-गुरुमुखसे और वेदवाक्यसे श्रवण मनन कर फि र तदारा ज्ञानरूप आत्माका अनुभव कर अर्थात् निदिध्या- सन करके उस ज्ञानानंदस्वरूप और नामरूपादिउपाधिरहित अपने आत्माको आपने हृदयमें स्थितहुयेको देखे अर्थात् अपरोक्ष संपूर्ण जडपदार्थ यो यह दृश्यरूप जगत् है इस्को त्याग करे आत्मसत्तासे भिन्न सत्ताशून्य समझे ॥ ४२ ॥ (६) anna . .. (६२) रामगीता- विषमपद-गुरुद्वारा ब्रह्मज्ञानकी प्राप्तीमें श्रुत्ति प्रमाण है अथ-. वेद मुंडक प० । मुंडक ॥ ("परीक्ष्य लोकानकर्मचित्तान ब्रह्मणो निर्वेदमायानास्त्यकतः कृतेन । तद्विज्ञानार्थ स.गुरुमेवामि- गच्छेतू समित्पाणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम् ॥ ४२ ॥ मूलं-प्रकाशरूपोहमजोहमद्वयो सकृतिभातोहमतीव निर्मलः। विशुद्धविज्ञानधनो निरामयः संपूर्ण आनंदमयोहमक्रियः॥४३॥ पद०(प्रकाशरूपः) प्रकाशरूप है (अहं) मै (अजः) जन्मसे रहित (अह) मै. (अद्वयः) जिस्के साथ का नहि (असहदिशागतः) बहुत प्रकाशरूप हो ( अहं ) मैं (अतीवनिर्मलः ) अतिशय शुद्धहै (विशुद्धविज्ञानघनः) बहुत शुद्धचैतन्य एकरस स्वरूप है निरामयः) रोगरहित हैं (सपूर्ण आनंदमयः) संपूर्ण आनंदरूपहै (अहं) मै (अक्रियः) कर्तृत्वा दिअभिमानरहित है। ४.३॥ अनु०--जिंस स्वरूपसे आपने आपको जानना चाहिये स्कोदोश्लोकमें कहतेहैं मैस्वयंप्रकाशरूप हूं घटादिकोंकी ई.सजातीय विजातीय स्वगत भेदत्रयाशून्यहूं अर्थात में औरणकाशकी इच्छा नहिरखताःएसाहूं. हूँ कर्ता भोक्ता आदि अजिमानसे रहितहूं और संपूर्ण देशांकाल वस्तुको सीमासेः रहित आनंदस्वरूपःहूं: 2 हित हूँ॥ ४३...... :
. - - टीकात्रयोपेता। (६३) विषमपद०-"अजोनित्यः शाश्वतोऽयंपुराणो न हन्यते हन्यमा- ने शरीरे " इत्यादि श्रुति प्रमाण है ॥ पीछे निरूपणभी कराहै ।। मू०-सदैव मुक्तोहमचिन्त्यशक्तिमा नतीन्द्रियज्ञानमविक्रियात्मकः । अनंतपारोहमहर्निशं बुधै- विशावितोहं हृदि वेदवादिभिः॥४४॥ पद-(सदा) नित्य (एव) निश्चय (मुक्तः) जन्मादिदुः- वरहित (अहं) मै (अचिंत्यशक्तिमान् ) अचिंतशक्तिवाला आत्मारूप ( अतींद्रिय) इंद्रियोंके विषयसे. परे (ज्ञानं ) ज्ञा- नरूप (अविक्रियात्मकः) विकारहीन (अनंतपारः) नहीं है पार जिस्का (अहं )हम (अहर्निशं) दिनरात ( बुधैः) बुद्धि वानोंने (विभावतः) भावना करीताहै ( अहं) मै (हृदि) हृ- दयमें (वेदवादिभिः) वेदवादियोंने ॥ ४४ ॥ अनु०--मै सदा मुक्तहूं अर्थात् भूतभविष्यवर्तमान इन तीनों कालोसे मुक्त हूं सर्वधर्मरहित हूं और अचिंत्यशक्तिवा ला आत्मारूप और इंद्रियोंके विषयसे परे अर्थात् मन वाणि से परे सर्वविकारोंमे रहितहूं और अनंतपार हूं अर्थात् जिस का पार नहीं ऐसाहूं और वेदवादी पंडितजन अपने हृदयसे रात्रिदिन भावना करतेहै सो ज्ञानस्वरूप परमात्मा मैं हुँ॥४४ वि०-यथा-" यन्नदृश्यमग्राह्यमगोत्रमवर्णमचक्षुः श्रोत्रं तदपाणि पादं नित्यं विभुं सर्वगत मुसूक्ष्म तदव्ययं यद्भूतयोनि परिपश्यति धीराः॥" अथर्ववेद मुण्डक उपनि० प्रथमखंड मं०॥ इत्यादि ॥४४ . ६४) रामगीता मूल०--एवंसदात्मानमखंडितात्मना विचारमाणस्य विशुद्धभावना। हन्यादविद्यामचिरेण कारकै रसायनं यदुपासितं रुजः॥४५॥ पद०-(एवं) ऐसे (सदा) नित्य (आत्मानं ) आत्माका (अखंडित) एकरस (आत्मना)आत्माकर्के (विचारमा- णस्य ) विचारवालेकी (विशुझावना) बहुतशुद्धभावनासे (हन्यात् ) दूरकर्ताहै (अज्ञ) अज्ञानको (अचिरेण ) शी- ब्रही (कारकैः) देहांतरकर्मोंके सहित (रसायनं ) औषधी भेद (यद्वत्.) जैसे (उपासितं ) सेवन किया ( रुजः) रो। ग ॥४५॥ अनु०-ऊपर दो श्लोकोमें कहीहुई भावनाका फल कहते हैं इस प्रकार सदा आत्माको एकरस भावना करता जो वि- चारवान् पुरुष है सो अपने अज्ञानको मायाके कर्मोंसहित दू रकर्ताहै जैसे सिद्ध औषधीसेवनकर्नेसे रोग नष्ट हो जाताहै, ॥४५॥ विष०-अखंडितात्मा अर्थात हर्षशोकादिकोंसे रहित एकरस है आत्मा जिसका ॥४५॥ मूल०--विविक्त आसीन उपारतेंद्रियो विनिर्जितात्मा विमलांतराशयः। विभावयेदेवमनन्यसाधनो टीकात्रयोपेता। (६५) विज्ञानहक् केवल आत्मसंस्थितः॥४६॥ पद०-(विविक्त) एकांत (आसीन) स्थित (उपारतेंद्रि- यः) इंद्रियोंके अर्थसे उपशम (विनिर्जितात्मा) जीतलीयादै अपना आपजिसने (विमल)निर्मल (अंतराशयः)अंतःकरणका आशय (विभावयेत् ) भावनाकरे ( एवं ) ऐसे (अनन्यसाध नः) छोडदि सब साधन (विज्ञानहक् ) ज्ञानदृष्टिवाला (के वल) एक (आत्मसंस्थितः) आत्मामें स्थितहै ॥ ४६॥ अनु०. अब ध्यानका वर्णन कर्तेहैं कि निर्जनस्थानमें वैठे योगशास्त्रकी रीतिसे पद्मासन लगाय इंद्रियोंको वश्यमें क र मायाका नाश फर प्राणके द्वारा अंतःकरणको वशीभूत क रके शुद्धमनसे ज्ञानमात्र दृष्टि राखे और जगान जानेदे अथवा दृश्यरूप इस जगत् और समस्त विषयोंसे रहित अर्थात् नि विकल्पसमाधिसे युक्त हो मुक्तिसाधन तत्वज्ञान विन और को ई साधन नहि इस प्रकार निश्चयकर संगरहित आत्मामें सर्व की समाप्ति जाने। विषमपद० इस श्लोकमें (आसीनपदको लेकर पद्मासनसे वैठे) एसे श्रीरामजी पंडितमहात्माओनेटीकामेंलिखा ॥ अब योगशास्त्रके । अनुसार पद्मासनको कहतेहै कि यथा शिवसंहिता योगप्रकरण- तृतीयपटलमें लिखाहै ॥ यथा- " उत्तानौ चरणौ कृत्वा ऊरुसंस्थौ प्रयत्नतः । ऊरुमध्ये तथोत्तानौ पाणी कृत्वा तु तादृशौ ॥ १ ॥ नासाग्रे विन्यसेदृष्टिं दंतमूलं च जिव्वया । उत्तोल्य चिबुकं वीक्ष्य उत्थाप्य पवनं शनैः ॥ २॥ -- - शमगीता यथाशक्त्या पश्चातु रेचयेदविरोधितः । इदं पद्मासनं प्रोक्तं सर्वव्याधिविनाशनम् ॥ ३॥ यह प्रशासन कहाहै इस्को समाधिमें उपयोगि कहतेहै पातंजलदर्शन साधनपाद. सूत्र ४६ तत्र स्थिरसुखमासनम् । " अर्थ पद्मासन दण्डासन स्वस्तिकासन इत्यादिकोके लगानेसे शरीर स्थिर और निष्कंप होता तो ध्यान शुद्ध होताहै ।। ४६ ।। मू०-विश्वं यदेततत्परमात्मदर्शनं विलापयेदात्मनिसर्वकारणे॥ पूर्णश्चिदानन्दमयोऽवतिष्ठते नवेदनात्यं न च किंचिदांतरं ॥४७॥ पद०-(विश्वं) जगत् (यत्) जो (एतत्) इतना परमा मदर्शनं) परमात्मरूप (विलापयेत्) लयकरे (आत्मनि) आ- त्माविषे (सर्वकारणे )-सर्वजगतके कारणों (पूर्णचिदानंदम यः) पूर्णचेतन आनंदरूप (अवतिष्ठते.) शेष रहिताहै (न) नहीं वेद जानताहै (बाह्य) वाहिर (न) नहीं (च) और (किंचि- त्) थोडा (अंतर) भेद ॥४७॥ अनु०--ध्यानके अनंतर जो करनाचाहिये सो कहतेहै । यह जो जगत् दिखाई देताहै सो सब परमात्मारूप है इस ज गतको परमात्मा मैलयकरे अर्थात् जैसे उत्पत्तिकमसे आत्मा से जगत् उत्पन्नहुआहै उसी प्रकार आत्मामें लयकर जो वि. चारकर देखे तो केवल पूर्ण आनंदरूप आत्माही रहजाताहै ना कुछ आत्मासे वाहिर वह फिर योगी ना कुछअंतरकी वस्तु जानताहै ।। ४.७॥
टीकात्रयोपेता। () वि०-सर्वत्र, आत्मदर्शन होना चाहिये ॥ ४७ ॥ - मू०--पूर्व समांधेरखिलं विचिंतये- दोंकारमात्रं सचराचरं जगत्॥ तदेव वाच्यं प्रणवो हि वाचको विभाव्यते ज्ञानवशान्न बोधतः॥१८॥ पद०-(पूर्व) पहिले (समाधेः ) समाधिके (अखिलं) संपूर्ण जगत् (विचिंतयेत् ) चिंतनकरे (ॐकारमात्र) ॐका कारस्वरूप (सचराचरं जगत्) जडचतनरूप जगतको (तत्) सोई (एव) निश्चयकर्के (वाच्यं ) जाननेयोग्य (प्रणवः) ॐकार (हि) जिसकारणसे (वाचकः) बोधकरानेवाला (विभाव्यते) जाणीताहै (अज्ञानवशात् ) अज्ञानके वशसे (न) नहि (बोधतः) ज्ञानसे ॥४८॥ अनु०--समाधिसे पहिले संपूर्ण जगतको मायोपहित ब्रह्म रूप जानकर अर्थात् सर्वं खल्विदं ब्रह्म इस चिंतनको करे इस्का वाचक ॐकारहै ईश्वरवाच्यहै इत्यादिविचारशी बोधसे पूर्वकालमें होसक्तीहै ॥ ४८ ॥ विषमपद०-परमात्मा श्रीरामचंद्रजी (समाधीसे प्रथम चराचर जगतको ॐकाररूप जाने) ॐकार. वाचक है ब्रह्म वाच्यहै ऐसे क- हतेभये अब उन्के आशयको लै ओंकारमै सर्वजगतकी उत्पत्तिमै बुद्धिअनुसार कहतेहै कि (अम्) अ१२ म् ३ इन तीनोको ॐ कहतेहै अर्थात् सत्व रज तम इनके ऐक्यताको ॐ कहतेहै सत्वम- धान विष्णु १ रजमधान ब्रह्मा २ तमप्रधान शिव ३ प्रगटभये अथ
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रामगीता
अन्से जैसृष्टिकी उत्पची है वह कहते है कि सत्व रज तमान्की
साम्याअवस्थाको प्रकृति अर्थात् माया कहतेहै प्रकृतिसे माद अर्था-
त महत्तत्वभयो महबसे अहंकार उत्पन्न भयो अहंकारसे पंचतन्मात्रा
उत्पन्नभई अर्थात शब्दस्पर्श २ रूप ३ रस ४ गंधपइन पंचतन्मात्रासे
दश इन्द्रिया अर्थात् नेत्र १ कर्ण २ नासिका ३ रसना ४ त्वचा
वाणी १ हाथ २ पाद ३ गुदा ४लिंग ५ इन दश इन्द्रिया भई पांच
सन्मात्रसे पंच भूत भये जैसे शब्द तन्मात्रसे शन्दका गुण आका-
श शब्दतन्मात्राके साथ स्पर्शतन्मात्रसे वायु शब्द स्पर्शतन्मात्रके साथ
रूपतन्मात्रसे तेज शब्दस्पर्शरूपका गुणभया पीछे शन्दस्पर्शरूपत-
पात्रकेसहित रसत्तन्मात्रसे जल शब्दस्पर्शरूपरसका गुण भया
फिर शब्दस्पर्शरूपरसतन्मात्रासहित गंधतन्मानासे पृथिवी-शब्द-
स्पर्शरूपरसगंधका गुण भई यह पांचभूत भये और उभयात्मक
मन और कार्यकारणका विलंबी आत्मा ॥ यह सर्वसृष्टि सत्व रज
तम अकार उकार मकारमें अंतरगतहै इन तीनोको कहतेहै ।।
सलिये समाधि ओंकारका जप और उस्का ज्ञान उपकारक है
जैसे योगशास्त्रमें लिखाहै कि"तस्य वाचकः प्रणव तिस परमात्मा
का वाचक अर्थात कहनेवाला प्रणव है इस हेतुसे ओंकारके ज्ञान-
की आवश्यकता है यथा-" तजपस्तदर्थभावनम् " समाधिमें ति-
स ओंकारका जप और अर्थज्ञान-की भावना चाहिये ॥ और
इसी आशयको लेकर छान्दोग्यउपनिषदमें लिखाहै कि " ओं
कारपूर्वं हि योगोपासनं-यानि नित्यानि कम्माणि" इत्यादि
श्रुतिस्मृतिविचारशास्त्रद्वारा ओंकारका जप अर्थ और सृष्टिका
कारण कह अब मोकारका परमोत्कृष्ट माहात्म्य अतिविहित लिख-
है । अथर्ववेदीयप्रश्नोपनिषत् पंचमप्रश्नेयथा- "अथहनं शैव्यास-
त्यकामः पप्रछ । स यो ह वै तद्भगवन्मनुष्येषु प्रायणान्तमोंकार-
मभिध्यायीत । कत्तमंवाव स तेन लोकं जयतीति ॥ १॥
टीकात्रयोपेता। तस्मै स होवाच एतद्वै सत्यकाम परञ्चापरञ्च ब्रह्म यदोङ्कार- स्तस्माद्विद्वानेतेनैवायतनेनैकतरमन्वेति ॥ २ ॥ स ययेकमात्रमभिध्यायीत स तेनैव संवेदितस्तूर्णमेव जगत्याम- मिसम्पद्यते । तमृचो मनुष्यलोकमुपनयन्ते स तत्र तपसा ब्रह्मचर्ये- ण अदया सम्पनो महिमानमनुभवति ॥ ३ ॥ अथ यदि दिमात्रेण मनसि सम्पद्यते सोऽन्तरिक्ष यजुभिरुनीय- 1 स सोमलोक स सोमलोके विभूतिमनुभूय पुनरावर्तते ॥ ४ ॥ यः पुनरेतन्त्रिमात्रेणैवोमित्येतेनैवाक्षरेण परं पुरुषमभिध्यायीत स तेजसि सूर्ये सम्पन्नः । यथा पादोदरस्त्वचा विनिर्मुच्यत एवं रवै स पाप्मना विनिर्मुक्तः समामभिरुन्नीयते ब्रह्मलोकं स एतस्मा- जीवधनात्परात्परं पुरिशयं पुरुपमीक्षते तदेतौ श्लोकौ भवतः॥ ५॥ तिस्रो मात्रा मृत्युमत्यः प्रयुक्ता अन्योऽन्यसक्ता अनविमयुक्ताः क्रियासु बाह्याभ्यन्तरमध्यमासु सम्यक् प्रयुक्तासु न कम्पते ज्ञः ३ ऋग्भिरेतं यजुभिरन्तरिक्ष स सामभिर्यत्तत्कवयो वेदयन्ते । त- मोकारेणैव वायतनेनान्वेति विद्वान यत्तच्छान्तमजरममृतमभयं पर- श्चेति ॥ ७ ॥ इति पञ्चमः प्रश्नः" ॥ अम् प्लुत उच्चारण करना चाहिये ॥४८॥ मू०--अकारसंज्ञः पुरुषो हि विश्वको युकारकस्तैजस ईर्यते क्रमात् ॥ प्राज्ञो मकारः परिपठ्यतेऽखिलैः समाधिपूर्व न तु तत्त्वतोभवेत्॥४९॥ पद०-(अकारसंज्ञः) अकारहै नाम जिसका (पुरुषः)पुरु पहै (विश्वकः) विश्व है नाम जिस्का (हि) निश्चयसे (ट कारकः) उकारहै नाम जिसका (वैजसः ) तैजसनामवाला रामगीता । (ईयते) कहाजाताहै (क्रमात् ) क्रमसें (प्राज्ञः .) प्राज्ञना महै (मकारः) मकार है नाम जिसका (परि ) चारोंऔरसे (पठचते ) पढीताहै (अखिलैः) संपूर्णलोकोंने (समाधिपूर्व) समाधिसेपहिले (नतु ) नहि (तत्वतः ) वास्तवसे (भवेत्.) होवैहै ॥ ४९॥ अनु०-अब प्रणवका अर्थ विस्तारसे कहतेहै कि अका- रसंज्ञाका वाच्य वह पुरुषहै जो जाग्रतअवस्थाका साक्षी वि- श्व नामसे विराट कहाजावेहै और उकारके प्रतिपादनकर्नेवा- ला पुरुषका तैजसहै जो स्वभावस्थाका साक्षी लिंगदेहाभिमा नी हिरण्यगई है और मकारके वाच्य पुरुषका नाम प्राज्ञ है जो सुषुप्तिअवस्थाका साक्षी है और कारणदेहका अभिमानी है इसप्रकारको भावना समाधीके पहिले रखणी चाहिये औ र जब साक्षात्कार ब्रह्मज्ञान उत्पन्न होजावे तब सर्वको ब्रह्म स्वरूप देखें ॥४९॥ विषमपद० " सत्वान्जागरणं विद्याद्रजसा स्वप्रमादिशेत् । म. स्वापनं तु तमसा तुरीयं त्रिषु संततम् ॥" इति (समाधिपूर्व) समाधिके पूर्व, अथ समाधि क्या है इस शंकाका उत्तर "समाधि श्चित्तवृत्तितिरोधचित्तकी जो वृत्ति राग द्वेष काम क्रोधादि उनसे निवृत्तकर जो मनको एकभावनामें स्थितकरना वह समाधि कहला- तीहै ॥ ४९॥ मू०--विश्वं त्वकारं पुरुषं विलापये- दुकारमध्ये बहुधा व्यवस्थितं.
टीकात्रयोपेता। (७१) ततो मकारे प्रविलाप्य तैजसं : द्वितीयवर्ण प्रणवस्य चांतिमे॥५०॥ पद०(विश्व ) विश्वकू (तु) फिर ( अहंकारं ) अहंकार को (पुरुष) पुरुषको (विलापयेत् ) लयकरे (उकारमध्ये) उकारके बीच (बहुधा) बहुतप्रकारका (व्यवस्थित स्थित को (ततः)तिस्के पीछे (मकारे) मकारमें (पविलाप्य) लय करे (तैजस ) तेजसकू (द्वितीयवर्ण) द्वितीयअक्षरको (प्रण णवस्य) ॐकारके ( अंतिमे) अंतके वर्णमें ।। ५०॥ मू०--मकारमप्यात्मनि चिद्घने परे विलापयेत् प्राज्ञमपीह कारणं॥ सोऽहं परब्रह्म सदा विमुक्तिम- विज्ञानहङ् मुक्तमुपाधितोऽमलः॥ ५१॥ पद० (मकारं) मकारको (अपि) निश्चयकर्के (प्रविलाप्य) लयकरे (तैजसं ) तैजसकू (अपि) निश्चयकर्के (आत्मनि) आत्मामे (चिरने )चिदघनमें (परे) परात्मामें (विलापये 'त् ) लयकरे (प्राज्ञं) प्राज्ञको (अपहि) निश्चयसे इहां (का रणं) कारणको (सः) सो आत्मा (अहं) मेहूं (. परब्रह्म) प- रब्रह्मको (सदा) सदैव (विमुक्तिमद ) मुक्तिवाला (विज्ञान दृक् ) विज्ञानदृष्टिवाला (मुक्त )छुटाहुआ (उपाधितः) उपा घिसे ( अमलः) शुद्धहै ॥५१॥ अनु० ॥ इन दोनो श्लोकोंमें लयका प्रकार कहतेहै स्थूल है (७२) रामगीता शरीरमें भोगाभिमानीरूप जो विश्वपुरुष स्थित है उस्कों और उस्के वाचक अकारको उकारमें लीनकी भावना करे और लिंगदेहाभिमानी पुरुष तैजस उस्के वाचक उकारको जिसमें विश्व पुरुष लीन हुआहै मकारमें लयकरे और कारणशरीरा भिमानी प्राज्ञको और उस्के वाचक मकारको जिस्मे विश्व और तैजस दोनो लयहुएहै ज्ञानस्वरूप आत्मामें लय होनेकी भावना कर अपनेको संपूर्णके लयकरनेका अधिष्ठाता और नित्यमुक्त परब्रह्मका स्वरूप जाने ॥ शंका-यदि कहो कि अ हंपदार्थको जो रागद्वेषादिसे मलीन होरहाहै उस्मे ब्रह्मकी भा बना कैसे होसक्तीहै । उत्तर--अहं सर्व उपाधि अर्थात् माया दिसे निर्मल और सर्वदा ब्रह्मसाक्षात्कार साधनकर्नेके योग्य है इसलिये ऐसी भावना करनी उचितहै ॥५०॥ ॥५१॥ विषमपद० (विभुक्तिमत्) इस शब्द को लै मुक्तिका अर्थ कहते है, कि (मुच ) धातुसे “ स्त्रियां तिन " सूत्रसे क्तिन्प्रत्यय है।) अर्थ 'मुच्यते कर्मबंधनात, इति मुक्तिः पाप पुण्यरूप कर्मोंसे अत्यं- त निवृत्तिको मुक्ति कहतेहै ॥ १० ॥ ११ ॥ मू०--एवं सदा जातपरात्मभावनः स्वानंदतुष्टः परिविस्मृताखिलः॥ आस्ते स नित्यात्मसुखः प्रकाशकः साक्षाद्विमुक्तोचलवारिसिंधुवत् ॥५२॥ पद०(एवं ) ऐसे (सदा) नित्य (जात) उत्पन्नई (परात्म भावना) परमात्माकी भावना (स्व) आपने (आनंद) आनं दीकात्रयोपेता (७३) दकर्के (तुष्टः) प्रसन्न (परि) चारोंऔरते (विस्मृतः) शुला- दिया (अखिलः) सर्व (जगत्) संसार (आस्ते) स्थितहोताहै सः) सो पुरुप (नित्य ) सदा (आत्मसुखः) आत्माके सुख- वाला (प्रकाशकः) स्वयंप्रकाश( साक्षात्) प्रत्यक्ष (विमुक्तः) छुटाहुआ (अचल ) स्थिर (वारि) जल (सिंधु) समुद्र (वत्) न्याई ।। ५२॥ अनु०-पूर्वश्लोकानुसार भावनावालोंका लक्षण कहतेहै इसप्रकार सर्वकालमें जिस पुरुषको परात्मभावना भई सो पुत्र स्त्री धन देहादिकोको विस्मरण करताहुआ जो परिणाममें दुः- खदायक विषय है उन्को त्याग विरक्तहो स्वस्वरूपके आनं- दको प्रानहोताहै नाम रूप भेदसे रहित हो तरंगरहित समुद्रव- व विषयसंबंधरूप लहरीसे रहित हो स्थिर रहताहै॥५२॥ विपक-सुगमहे ॥ १२ ॥ म.एवं सदाभ्यस्तसमाधियोगिनो निवृत्तसर्वेन्द्रियगोचरस्य हि ॥ विनिर्जिताशेषरिपोरहं सदा दृश्यो अवेयं जितषड्गुणात्मनः ॥५३॥ पद० (एवं ) इसप्रकार (सदा) सदैव (आयस्त) आया- सकियाहै (समाधियोगिनः) समाधीवाले योगिको (निवृत्त) रहित (सर्व) संपूर्ण ( इंद्रियगोचरस्य) इंद्रियोंके विषयोंको (हि) निश्चयसे (विनिर्जित) जीतलियाहै (षड्गुणात्मनः) छैगुणवाले आत्माको जिनोंने ॥ ५३ ॥ ... (७) . (७४) रामगीता अनु०-इसप्रकार योगाभ्यासी पुरुष संपूर्ण इंद्रियोको शब्द स्पर्श रूपरस गंध विषयोंसे निवृत्त कर तथा अंतःकरणके आ- श्रय जो कोष कामादि वह नाशकर समाधिसे युक्त हो आत्म- दर्शन करताहै ॥ आत्माके छैगुण यह है सर्वज्ञत्व नित्यतृप्त त्वरबोधस्वरूपत्वइनित्यत्व४अलिप्तत्व५अनंतरूपत्व६॥५३ विषमपद " जनयंत्यर्जने दुःखं तापयंति विपत्तिषु । मोहयं- ति च संपत्तौ कथमर्थाः सुखावहाः ॥१॥" अर्थात, अर्जनमें दुःख नाशमें संताप वृद्धिमे मदको धन देतेहै ज्ञान के लिये कैसे धनादि सुखको प्राप्तिवाले हौ, अर्थात् नही ॥ १३ ॥ मू०ध्यात्वैवमात्मानमहर्निशं मुनि- स्तिष्ठेत्सदा मुक्तसमस्तबंधनः ।। प्रारब्धमश्नन्नभिमानवर्जितो मय्येव साक्षात्प्रविलीयते ततः॥ ५४॥ पद०(ध्यात्वा) ध्यानकर (एवं ) इसप्रकार (आत्मानं) आत्माको (अहर्निश ) दिनरात (मुनिः) मननकर्नेवाला (ति. ठेव) स्थितहोवे (सदा) सदैव (मुक्तसमस्तबंधनः) छूटगयेहै सर्व बंधन जिसके (प्रारब्धमश्नन् ) प्रारब्ध भोगताहुआ (अ- भिमानवर्जितः) अभिमानसे रहित (माथि) मेरेमै (एव) निश्च- यसे ( साक्षात् ) प्रत्यक्ष (प्रविलीयते) लयहोताहै (अंततः) अंतकालमें ॥ ५४॥ अनु०-इसप्रकार योगी दिनरात्र आत्मध्यानमें तत्पर हु- टीकात्रयोपेता। (७५) आ सर्वबंधनसे मुक्त प्रारब्ध भोगताहुआ आत्मामें लीनहोवेहै यदि दैववशसे जीवन्मुक्त अभिमानशून्य होकरकेभी विषय- भोग करे तौनी वह फिर उसी व्यक्तिसे हमारेमें लय हो जायगा ॥ ५४ ॥ वि० अर्थात् जो पुरुप विपयोंका त्याग समझकर दैववशसे अर्थात् आवश्यक कार्य खानपानादि वा पालनादिक करे उन्मे आसक्त न होवे अभिमान ना करे तो वहभी हमारेमें लय होजा- यगा । आत्माका ध्यानकर्ना कहतेहै " असंभवति सर्वत्र दिग्भू- भ्याकाशरूपिणि । प्रकाश्ये यादृशं रूपं प्रकाशस्यामलं भवेत् ॥ त्रिजगत् त्वमहं चेति दृश्ये सत्तामुपागते । द्रष्टुः स्यात् केवलोभाव- स्ताशी विमलात्मनः । ज्ञान नैवात्मनो धर्मो न गुणो वा कथञ्च- ना झानस्वरूप एवात्मा नित्यः पूर्णः सदाशिवः॥" इत्यादि॥१४॥ मू आदौ च मध्ये च तथैव चांततो भवं विदित्वा भयशोककारणं ॥ हित्वा समस्तं विधिवादचोदितं अजेत् स्वमात्मानमथाखिलात्मनाम्॥५५॥ पद०(आदौ) आदिमें (च) फिर (मध्ये) मध्यमें (च) . फिर (तथा ) तैसे (एव) निश्चयसे (च) और (अंततः) अंतकालमैं (भवं) संसारको.(विदित्वा) जानकर (अयशो- ककारणं) अयशोकके हेतुको (हित्वा) त्यागकर (समस्तं संपूर्णको (विधिवादचोदितं ) काम्यकर्मको (भजेतु ) भजन करे (स्व) अपने (आत्मानं) आत्माको (अथ.) इसते अनंतर (अखिलात्मना) सर्वात्माको ॥ ५५॥.
(७६) रामगीता अनु०--आदि मध्य अंत तीनो अवस्थामें दुःखका कार- ण अर्थात् आदिमें धनके इकठेकर्नेसे मध्यमें रक्षाकर्नेसे अंतमें नाशहोनेका चौरराजादिक्षयका जो कारण संसार है इस लि- ये समस्तकामनासहित कर्मोका त्यागकर संपूर्ण जीवोंके स्वरू- पात्मा परमेश्वरका भजनकरे क्योंकी यह धर्म सवधर्मोसे उ- तमहै ॥ ५५ ॥ विषमपद०-उक्तञ्च: "इज्याचारदमाहिंसा दानं स्वाध्यायकर्म च । अयं तु परमो धर्मो यद्योगेनात्मदर्शनम्॥” इति स्मृतौ । या०. १ अध्याये॥ इज्याध्ययनदानानि तपः सत्यं धृतिः क्षमा ॥ अलोम इति मांगौयं धर्मस्याऽष्टविधः स्मृतः ॥” इति स्मरणात् ।। और धन दुःखदाता कैसे है यथा “जनयंत्यर्जने दुःखं तापयांत. विपत्तिषु । मोहयति च संपत्तौ कथमर्थाः सुखावहाः ॥” इति॥५५ मू०आत्मन्यभेदेन विभावयन्निदं भवत्यभेदेन मयात्मना तदा॥ यथा जलं वारिनिधौ यथा पयः क्षीरेवियद्योम्न्यनिले यथाऽनिलः॥५६॥ पद०(आत्मनि) आत्मामें ( अभेदेन) अनेदकरके (वि- भावयन्) भावना करताहुआ (इदं) इसजगत्को (भवति) हो ताहै (अभेदेन) अनेदकर्के (मयात्मना) मेरा आत्मा (तदा) तब (यथा)जैसे (जलं) जल (वारिनिधी) समुद्रमें (यथा) जैसे (पयः) दुग्ध (क्षीरे) दुग्धमें (वियंव) आकाश (व्यो- नि) आकाशमें जैसे (अनिलः) वायु ॥५६॥ A टीकारयोपेता। (७७) अनु०-आत्मा सवका अधिष्ठाता अर्थात् आश्रयहै सोइ महू सो तुम हमारे और आपणे जीवस्वरूपमें जिसकाल अगे- दत्तावना करोगे उसी क्षणमें जीव और परमेश्वर में अभेद हो जावेगा जैसे संपूर्ण नदियोंका जल समुद्र में जाकर समुद्र कहा- ताहै और जिन्नररंगकी गौका दुग्ध मिलनेसे केवल दुग्ध कहा ताहै घटाकाश महाकाशसे मिल महाकाश कहाताहै मशककी वायु महावायुसे मिल महावायु कहातीहै इसीप्रकार जीवन झका अभेद होयेगा तो जीवही ब्रह्महै ॥ ५६ ॥ वि० "एक एव हि भूतात्मा भूते भूते व्यवस्थितः । एकथा बहु- धा चैव दृश्यते जलचंद्रवत् ॥ नित्यः सर्वगतो ह्यात्मा कूटस्थो दोप- जितः। एकः स भिद्यते शक्या मायया न स्वभावतः। अनेन प्र- कारेणात्मन्यभेदः ॥ " अर्थ एकही परमात्मा सर्वभूतोमें व्यापकहै : जलमें चंद्रमाकीन्याई जैसे घटोंमे बहुतचंद्रमा प्रतीत होतेहे वास्तवसे एकही है ।। ५६ ॥ मू०इत्थं यदीक्षेत हि लोकसंस्थितो जगन्मृपैवेति विभावयन्मुनिः ।। निराकृतत्वाच्छ्रतियुक्तिमानतो यथेंदु दो दिशिग्भ्रमादयः ॥५७॥ पद०(इत्थं) ऐसे ( यत् ) जो ( ईक्षते) देखे (हि)नि- श्वयसे (लोकसंस्थितः) संसारकी व्यवस्था (जगत) जगत- को (मृपा) झूठ (एव) निश्चयकर्के (इति) ऐसे (विज्ञाव-
(७८)
रामगीता
यन् ) भावनाकरता (मुनिः) मननकर्नेवाला (निराकृतत्वा-
त्) असत्य होनेसे (श्रुति) वेद (युक्ति) प्रसिद्धयुक्ति (मा-
नतः) प्रमाणसे (यथा) जैसे (इंदुशेदः) चंद्रमाका भेद अ-
र्थात् दोपकारका देखना (दिशि) दिशामें (दिग्नमादयः)
दिशाका श्रम ऐसहि और श्रम ॥ ५७ ॥
अनु०-तत्वज्ञानियोको जगत्के सत्य होनेका श्रम जिस
प्रकार अपने आप छुटजाताहै सो कहतेहै जीवन्मुक्त अवस्था-
के प्राप्तहूयेसे लोकव्यवहारकर्म करताहुआ यह भावना करेहै
कि जगत् मिथ्याहै और जीव और परमात्मा एकहीहै इस
विचारके होनेसे जगतकी सत्य भावनाका नाश होता है। जैसे
चंद्रमाका यथार्थ ज्ञान होताहै तो चंद्र दोका भेद नष्ट होजा-
ताहै ऐसी दिशाकामी जो पुरुष नमताहै उस्को वृक्षादि सर्व
पदार्थ नमते मालुमहोतेहै जब वैठताहै तो सबका श्रमणज्ञान
हटता है श्रुति युक्ति दृष्टांतके अनुसार इन श्रमोंकीवत् जीव
ब्रह्मका भेद नाशहोजाताहै ॥ ५७ ॥
वि०-श्रुतियुक्तिप्रमाणद्वारा जो सिद्ध है वह धर्म है " आर्ष
धर्मोपदेशं च वेदशास्त्राविरोधिना । यस्तणानुसंधत्ते स धर्म वेद
नेतरः॥" इति मनुः ॥ १७ ॥
मू०--यावन्न पश्येदखिलं मदात्मकं
तावन्ममाराधनतत्परो भवेत् ॥
श्रद्धालुरत्यूजितभक्तिलक्षणो
यस्तस्य दृश्योहमहर्निशं हृदि ॥ ५८॥
टीकात्रयोपता (७९) पद०(यावत् ) जबतक (न) नहि (पश्येत् ) देखे (अखिलं जगत् ) सर्वजगतको (मदात्मक) मेरास्वरूप(ताव- त्) उतना काल (मम) मेरी (आराधन) सेवामें (तत्परः) तत्पर (भवेत् ) होवे (श्रद्धालुः) श्रद्धावाला (अत्यूर्जित) बहुतबधा (भक्तिलक्षणः) भक्तिलक्षणवाला (यः) जोहै (त- स्य) तिस्को (दृश्यः) दिखाईदेणेवाला (अहं ) मै (अहर्नि- शं ) दिनरात्र ( हृदि) हृदयमें ॥ ५८॥ अनु०- जबतक इस पुरुषको सर्वजगत् मेरा स्वरूपदिखाई नादेवे तबतक मेरा आराधन मन लगाकर करिहै जो पुरुष ऐसे श्रद्धावाला हो मेरी भक्ति करता है उस्के दिन रात्र हृदय में दिखाइदेताहूं ॥ ५८॥ वि०-आशय यह है कि जिस पुरुषका चित्त पूर्वकर्मोंकर ना शु- दहोवे और मेरा स्वरूप यथार्थतासे सर्व जगत् नादेखे फिर चि. त्तशुद्धिके लिये निष्कामकर्मोंसे मुझकी जो सगुणमूर्ति है उस्का ध्यान पूजनकरे प्रमाण. श्रु. य. वे. ४ अ. मं २ ॥ कर्माणि जिजीविषच्छत५ समाः । एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे ॥ " अर्थ कि सर्व जगतमें ब्रह्ममय भावना ना होवे तो १०० वर्षतक निष्काम कर्म करे इसप्रकार तुमको मोक्ष होगा और तरासे नहि और निष्काम किये हुये दुष्कर्म तुमको नहि प्राप्तहोगें। इस द्वारा सगुण निर्गुण दो प्रकारकी उपासना कहदी श्रीरामचंद्रजीने फिर सगुणउपासनाको अंतमे प्रगट करेगे । इति ॥ १८ ॥ “ कुर्वन्नेवेह मू०--रहस्यमेतच्छ्रुतिसारसंग्रह (८०) रामगीता मयाविनिश्चित्य तवोदितं. प्रियं। यस्त्वेतदालोचयतीह बुद्धिमान समुच्यते पातकराशिभिः क्षणात्॥५९ ॥ पद०(रहस्यं) गुह्यवार्ता (एतत् ) यह (श्रुतिसारसंग्रह) वेदोके सारका संग्रह (मया) मैने (विनिश्चित्य) बहुतनिश्चयक- र (तव) तुमको (उदित) कहाहै (प्रियं) श्रेष्ठ (यः) जो (एत- व)इस्को (आलोचयति )विचारताहै (सः) सो (मुच्यते) छूटजाताहै (पातकराशिभिः) पापोंके समूहसे (क्षणात्) क्ष- णमात्रसे ॥ ५९॥ अनु०--श्रीरामचंद्र भगवान लक्ष्मणसे कहतेहैं यह जो गो- प्यवार्ता मैने बहुत निश्चयकर तुमको कहीहै सो संपूर्ण वेदोंका साररूप है अर्थात् वेदोका सिद्धांतसंग्रह है जो पुरुष बुद्धि. श्रेष्ठवाला इस्को विचारेगा वह पुरुष पापोंके समूहसे एक क्षणमैं छूटजावेगा ॥५९॥ विषमपद०-श्रीरामचंद्रजी वेदोंके सारको लक्ष्मणसे कहकर अंत- में ज्ञानका फल पापोंकी अत्यंत निचि कहतेहै सो यजुर्वेद कठवल्ली उपनिषदमें लिखाहै । द्वितीया वल्लि यथा-- एतद्धयेवाक्षरं ब्रह्म एतदेवाक्षरम्परं । एतद्धयेवाक्षरं ज्ञात्वा यो गच्छति तस्य तत् ॥ १३ ॥ एतदालम्बनं श्रेष्ठमेतदालम्बनं परं । एतदालम्बनं ज्ञात्वा ब्रह्मलोके महीयते ॥ १७ ॥ यस्त्वविज्ञानवान् भवति समनस्कः सदा शुचिः। स तु तत्पदमाप्नोति यस्माद्भूयो न जायते ॥ व. ४ । ॥८॥ " . . टीकात्रयोपेता। (८१) विज्ञानसारथिर्यस्तु मन प्रग्रहवानरः। सोऽध्वनः पारमाप्नोति तद्विष्णोः परमं पदम् ॥ ४॥९॥" मू०-भ्रातर्यदीदंपरिदृश्यते जग- न्मायैव सर्व परिहत्य चेतसा। मद्भावनाभावितशुद्धमानसः सुखीभवानन्दमयो निरामयः॥६०॥ पद०-(धातः) हेमाई! (यत् )जो (इदं)यह (परि) चारों औरसे ( दृश्यते ) दीखताहै (जगत्) संसार (माया) मायाहै. (एव)निश्च०(सर्व) संपूर्णको (परिहत्य ) त्यागदेवे (चेत- सा) चित्तकरके (मद् ) मेरी (भावनानावितशुद्धमानसः) भा- वनासे शुद्धमन हो ( सुखीभव) सुखी हो (आनंदमयः) आ: नंदस्वरूप (निरामयः) रोगसे रहित ॥६०॥ अनु०--श्रीरामचंद्रजी पूर्वकथनकी दृढता करनेवास्ते फिर ऐक्यता कहतेहै की हे भातर ! यह जो जगत् दिखाई देताहै सो केवल मायामात्र है इस्को त्याग अर्थात् उदासीन हो हमारी भावनाद्वारा अंतःकरणको शुद्ध करके संपूर्ण दुःखों- से निवृत्त होकर सुखी आनंदरूप सर्वसंसारके रोगोंसे रहि- तहो ॥ ६०॥ विषमपद०-अब फिर रामचंद्रजी लक्ष्मणजीको भ्रातबुद्धिसे कहतेहै यदि तुम कहो कि पीछेभी भ्रातबुद्धिसे कहा है तो इहा फिर पिष्टपेषणकी क्या जरूरत थी-आशय यहहै कि प्रथम गुरुभावना- से आत्मज्ञानको दृढकर अब भ्रातृवात्सल्यतासे प्रीतिद्धिके लिये
(८२)
रामगीता
भ्रातर ! इस शब्दको कहकर कहतेहै । पीछे यह शब्द नहिकहा६०
मूल०--यःसेवते मामगुणं गुणात्परं
हृदा कदा वा यदि वा गुणात्मकं ।
सोऽयं स्वपादाञ्चितरेणुभिःस्पृश-
न्पुनाति लोकत्रितयं यथा रविः ॥६॥
पद०-(यः) जो (सवते) सेवना करताहै (मां) मुझको
(अगुणं ) गुणरहितको (गुणात्परं ) गुणोंसे परेकों (हृदा)
हृदयकरके (कदा) कभी (वा) अथवा (गुणात्मक) गुणा-
त्माको (सः) सो ( अयं) यह (स्व) अपने (पाद) चरणसे
(अंचित) पूजीहुई (रणुभिः) धूलिकरके (स्पृशन् ) स्पर्श
करताहुआ (पुनाति ) पवित्रकरताहै (लोकत्रितयं) तीनलो-
कको (यथा) जैसे ( रविः) सूर्य ॥ ६ ॥
अनु०-जो कोई पुरुष शुद्धअंतःकरणसे मेरी सेवाकरता
है निर्गुण जान अथवा गुणोसे परे जान अथवा गुणवाला जा-
नकर सो पुरुष अपने चोंकी धूलीसे स्पर्श करताहुआ तीन
लोकको पवित्रकरताहै जैसे सूर्यभगवान जगतको पवित्रकर-
ताहै ॥ ६१ ॥
विषमपद०-इहां सगुण निर्गुण दो उपासनाकहीहै।सगुण उपा-
सना रामतापनी, गोपालतापनीउपनिषत् और चारों वेदमें लिखी
है" इदं विष्णुर्विचक्रमें वेधा निदधे पदम् " इत्यादि । “नमो भ-
वाय"." यो वै रामः स भगवान्" इत्यादि बहुत लिखाहै। विषमप-
दव्याख्या होनेसे नहि लिखेजाति ॥ ६ ॥
a टीकात्रयोपेता। (८३) मूल०--विज्ञानमेतदखिलं श्रुतिसारमेकं वेदान्तवेद्यचरणेन मयैव गीतं ॥ यः श्रद्धया परिपठेद्गुरुभक्तियुक्तो मद्रूपमेति यदि मद्वचनेषु भक्तिः॥६२॥ इति श्रीसेतो अध्यात्मरामायणे उत्तर- काण्डे उमामहेश्वरसंवादे पंचम सर्गः॥५॥ ॥श्रीः॥शुभश्रीः॥ ॥७॥ श्रीः ॥७॥ पद०-(विज्ञानं )विज्ञानको (एतत्) इस (अखिलं) सं- पूर्णको (श्रुतिसारं ) वेदके सारको (एक) एकको (वेदांत- वेद्यचरणेन ) उपनिपदोंकर्के जाने जातेहै चरण जिस्के (मया) मैने (एव) निश्चयकरके (गीत) कथनकीयोंको (यः) जो(श्रद्ध- या ) श्रद्धाकरके (परिपठेत् ) पढताहै (गुरुभक्तियुक्तः) गुरु- की भक्तिवाला (मद्रूपमेति) मुझके रूपको प्राप्तहोताहै (यदि) जब (मद्वचनेषु) मेरेवचनोंमै (भक्तिः) प्रीति ॥ ६२॥ अनु०-जो पुरुप इस हमारे कहेहुए संपूर्ण वेदोंके साररू- प-विज्ञानको पढेगा सो कर्म क्याहै जगतका जन्मादि जो क- हो कि केवल पाठमात्रसे इस प्रकारका महत्फल कैसे होवे- गा तो कहतेहैं कि जब हमारे वचनमें विश्वास करके गुरुके वाक्यको मान और भक्तियुक्त होइ तो अवश्य उस फलको पावेगा ॥ इति-महापुरुषाक्तजनकरुणया तनुमनधनतःकता. थीकतविश्वजनायुर्वेदसमुद्रात्सकलरसरत्नराशीनादायनिरामय - (८४) रामगीता कतसर्वनरगीयमानगुण ( गुजराति ) वैशालंकारचूडाम णिभिषग्वरपडितश्रीरामदासलतरामगीतापदप्रकाशिकाटीकास माप्तिमगात् ॥ शुभम् । शं । श्रीः ।। प्रार्थना ॥ दोहा-सम्वत् विक्रमनृपति शुभ, खयुगांकमान ३९२०॥ श्रावणकृष्णएकादशी, बार सुधाकर जान ॥ १ ॥ द्विजगुरजरश्रीराम, करपूरस्थलनगरमें । भाषातिलकललाम, कीयो रामगीताउपर ॥ २ ॥ मै निजमतिअनुसार, कियो तिलक यह । सज्जनलेहुसुधार, चूक परी जो होई जिह ॥ ३॥ रघुवरगीताकोतिलक, रघुवर ज्ञाननिधान ॥ पूर्ण भयो रघुवरकपा, रहन सकलअज्ञान ॥ ४॥इतिश्रीः॥ विषमपद-अंतश्लोकमें रामचंद्रजी ब्रह्मस्वरूप अपनेको कहतेहै किवेदांतकर जानेजातेहै चरणजिसके ऐसे मेने तुमारेको उपदेश कि- या जो पुरुष गुरुभक्तियुक्त पढे तो सोवोह मेरा स्वरूप होता है यदि मेरे वचनोमे भक्ति होवेसो यह वाक्य अधिकारीभेदसे कहाहै कि जै सारअधिकारी तैसार फल है प्रमाण सांख्यप्रवचनभाण्यमे लिखा 'कि “ अधिकारी विद्यात् न नियमः" जो पुरुष गुरु परमेश्वरके .वाक्य यथार्थ माने वह उत्तम जो गुरुकेही वचन माने वह मध्यम जो परमेश्वरके वाक्य अपने अनुमानके साथ माने वह अधम है इत्यादि भेदहै । इस श्लोकमे वसंततिलका नाम छन्दहै (तल्लक्षणं) उक्ता वसंततिलका तभजा जगौ गः॥" अर्थ तगणऽऽ । भग 'ण ।। जगणदो।।१।। २ द्वय गुरुऽऽहोवे तो वसंततिलका नाम छंद होताहै ॥ इति-श्रीगौतमगोत्र (शोरि) अन्वयालंछ.
टीकात्रयोपेता। (८५), तकपूरस्थलराजधानीनिवासिदेवशदुनिचंद्रात्मजपण्डितविष्णुदत्तकृत विषमपदण्याख्या रसवेदांकचंद्रमिते वैक्रमे १९४६ पौपकृष्णनवम्या सोमेसमाप्तिमगात् । शुभमस्तुअजामराचित्यरूपसगुणब्रह्मरामचं द्रप्रसादात् ॥ श्री श्रीः॥ वर्णनम् । यस्तर्कवादानखिलान्प्रचक्षे योगौतमीयश्च महायशस्वी। तस्यान्वयालंकृतिरत्नजातो दैवज्ञविद्वान्दुनिचंद्रनामा ॥१॥ भाता यस्य च लक्ष्मणः सुविमलाविख्यातकीर्तिर्यशः- सेवाराधनपूजने च निपुणः श्रीरामचंद्रस्य यः॥ आज्ञायामपि सोदरस्य कुशलो जेष्ठस्य सौमित्रिवत ताभ्यां च प्रणिपत्य विष्णुदत्तः कुरुतेच टोकांशुभाम्॥२॥ (?) श्रीरामनाथगुरुपंकजपादरेणु- मादाय मूभिं च बहूपममन्यमानः । स्वात्मानमप्यथ च वेदविदां वरिष्ठ गोपालशास्त्रिसुगुरुं च मुहुः प्रणामः ॥ ३ ॥ हरिभक्तं महात्मानं शास्त्रिणं प्रणमाम्यहम् । यस्य संगात्समालब्धं ज्ञानं विज्ञानमेव च ॥४॥ मित्रं च साधुरामं च विष्णुदासं तथैव च । अन्यान स्वाध्यायवर्गान स्वान् नमस्कुर्मः पुनः पुनः ॥५॥ श्रीहरिः परमेश्वरो विजयतेतराम् ॥ इदं पुस्तकं गोविन्दशाविणा यथाप्रति शोधितं मुंबथ्यां श्रीक- ष्णदासात्मजाभ्यां गंगाविष्णुखेमराजगुप्ताभ्यां स्वकीये"श्रीवे । कुटेश्वर" नाम्निमुद्रणालये मुद्रयित्वा प्रकाशितम्॥सं. १९४७ (८) --- जाहिरात. सर्व साधारण प्रियपाठकोंपर विदित हो कि हमारे यंत्राल- यमें हिन्दीभाषा व संस्कृत व संस्कृत टीकाकी अनेकानेकपु- स्तके,सर्वप्रकारकी अत्यंत शुद्धता पूर्वक उत्तम विलायती कागज पर छपकर विक्रयार्थ तैयार हैं जैसे वैदिकग्रंथाः,पु- राणग्रंथाः, धर्मशास्त्रग्रंथाः, फर्मकाण्डग्रंथाः, व्याकरणग्रंथाः न्यायग्रंथाः, ज्योतिषग्रंथाः, काव्यग्रंथाः, अलंकारग्रंथाः, ना-. टकथाः, चंपुग्रंथाः, कोशग्रंथाः, वैधकग्रंथाः, प्रकीर्णग्रंथाः छंदोग्रंथादि श्रीमद्भागवत सटीक भाषाटीका ॥ इसका टीका ऐसा परमोत्तम सरल ब्रजभाषामें किया गयाहै कि सर्व पाठक गणोंको तो उपयोगही है परंतु कथा बांचनेवाले विद्ववंदोंको अत्यंत लाभकारी है कथा संबंधित कथासे अधिक उत्तमोत्तम भक्ति ज्ञान मार्गी दृष्टांतभी जहां तहां दिये गये हैं कीमत १५ रु. शुकसागर भाषा श्रीमद्भागवतका अक्षरार्थ भाषाऽनुवाद और कथासे अधिक उत्तमोत्तम अति पावन मन भावन सुख उपजावन दृष्टांत दियेगये हैं कीमत ७ रु० मार्कण्डेयपुराण. नवीन छपाहुआ टाईपका उत्तमकागज और श्याहीका श्लिष्ट शब्दोंकी टिप्पणी सहित इस्के अंतर्गत जो दुर्गासप्तशती है उसपर शान्तनवी टीकामूल्य ५ रु.
१ जाहिरात (८७) शाम्तनवीटीका सहित दुर्गासप्तशती नवीन छपकर तैयार है मूल्य १ ॥ रु. तुलसीकृतरामायण (बड़े अक्षरका अति उत्तम ) १ सम्पूर्ण क्षेपक तथा तुलसीदासजीका जीवनचरित्र, माहात्म्य, बरवारामायण, श्लोकार्थ, छन्दार्थ, प्रसं- गार्थ, गूढार्थ, शब्दार्थ, स्तुत्यादि रामजन्म तथा वनवासादि तिथिपत्र; पंचीकरणका, नक्शा३८०० टिपणी सह अत्यन्त विस्तारपूर्वक कीमत ५ रु. २ तुलसीरुतरामायण क्षेपकसह मझले टाईपका (श्लोकार्थ, गूढार्थ, प्रसंगार्थ, इतिहास व दृष्टांत स- हित २७१८ टिप्पणीके जिसमें संपूर्ण क्षेपक हैं ३ तुलसीकतरामायणबारीकगुटका श्लोकार्थ, गूढार्थ, प्रसंगार्थ, व इतिहास व दृष्टांत सहित २५९५ टि- प्पणीके जिसमें संपूर्ण क्षेपक हैं कीमत २॥ रु. ४ ब्रजबिलासमोटाअक्षरका कीमत ...५/रु. ५ भक्तमाला रामरसिकावली बडी महाराज रघुराज- सिंहकृत सतयुग, त्रेता, द्वापर कलियुगके संपूर्ण हरि भक्तोंका जीवन चरित कीमत ....५० ६ भक्तमालहरिभक्तिप्रकाशिका भाषा कीमत ...४९० ७ पंचदशीभापा वेदान्त आत्मस्वरूपजीकत की०४रु.
(८८)
जाहिरात
८ रागरत्नाकर भजन गानेका अति उत्तम कीमत २२०
९ भजनामृत इसमें मंगल गोरी होली जयध्वनि पद वि-
नय आरती इत्यादि अनेकप्रकारके भजन, साधु
नकेवास्ते अतिउत्तमहै कीमत
१रु.
१० विदुरनीतिहिंदुस्थानी कीमत ...४आना
वाग्भट अर्थात् अष्टांगहृदय
संस्कृतमूल भाषाटीका
सर्व गृहस्थमात्रकेलिये अत्यंत प्रयोजनीय आयुर्वेदका
सार है ऐसापरमोत्तम अनुभविक रामवाणओषधे हैं कि,
कलियुगमें रोगियोंके रोग दूर करनेको साक्षात् कल्पतरु है
और केवल इसही अन्थके पढनेसे वैद्यप्रमाणिक गिनाजाता है
एक एक पुस्तक अवश्यलेना चाहिये कीमत १० रु.
शिवस्वरोदय भाषाटीका कीमत... || आना
शिवसंहिता भाषाटीका कीमत...
१) रु.
पुस्तक मिलनेका ठिकाणा
श्रीकृष्णदासात्मज गंगाविष्णु,खेमराज
"श्रीवेंकटेश्वर" छापाखाना (बम्बई.)