Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai

Sanskrit Vadmay (pratham Khand)

Shastri,kanthmani · 2012/08

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प्रासंगिक वक्तव्य अमरभारती के प्रागण में संस्कृत-वाड्मय का कल्पपादप स्वकीय सौरमाविषय से समस्त विश्वको नो जीवन सुधा प्रदान करता है, उसमें विकक्षित शु. पु. संस्कृत वाङ्मय एक विशिz श्रामोदपूर्ण पुष्प-स्तव है जो थाज लगमग ५०० वर्षों से परम फल का उद्भावक माना जाने लगा है। भारतीय संस्कृति के संरक्षक जगद्गुरु श्रीवल्लभाचार्य का प्रादुर्भाव और अवस्थिति (सं. १५३५-८७ ) उस विषम परिस्थिति में हुई थी-जब देश में परकीय राज्यक्रान्ति का बोलबाला पा卐 मारतीय राष्ट्र का लोकजीवन सर्वतः पीडित, त्रासमय, अस्त-व्यस्व था, धर्मका शुद्ध स्वरूप तिरोहित-सा हो गया था, संस्कृति अनुदिन दीयमाण होकर मुमूर्षु होरही थी। वैदिकधर्म ने पाखण्ड का रूप धारण करलिया था और देश के शान्तिसुख-दायक पवित्र तीर्थस्थल, देवालय, धर्मपीठ सर्वशः नष्ट भ्रष्ट होगए थे। जनता का शासक राजन्यवर्ग पारस्परिक कलह, वैमनस्य, फूट एवं स्वार्थलोलुपता से सीणीक होकर परचक के द्वारा विनष्ट किया जारहाया तो सन्मार्ग-प्रदर्शक सुधी-समाज उदरंभरी होकर अहंकारविमूढ केवल वादविवाद पंफ में याण्ठि ड्ब चुक्ता या। मारतीय धर्म, संस्कृति, भाषा, वेश, प्राचार, विचार, समाज और जनता किस प्रलय में निशीर्ण हो जायगी! पहा नहीं जासकता था। शास्त्रों का उच्छेद हो रहा था, अन्यों के संग्रहालय मस्मसात् किये जारहे थे। कहने का तात्पर्य यह कि-मारत 'भारत' रहेगा या नहीं। यह एक समस्या उठ खडी थी। विशेषकर विश्यका उत्तरीय माग ती जिस विनाश चक्र में पस गया या उससे उवारनेका सामर्य केवल परमात्मा के हाथ की बात हो गई थी। 卐 सिकंदर लोदी, बाबर और हुमाऊं का राज्यकाल ।

महाप्रमु श्रीवल्लभाचार्य ने तात्कालिक भारतीय दुर्दशाका सर्वागीण वाडमय रेखाचित्र स्वरचित एक स्तोत्र में जिस प्रकार सींचा है, वह पठनीय और मननीय है. अध्ययन अनुशीलन से सिद्धान्त-निर्णय, सैद्धान्तिक निर्णय से साहित्य- (अन्य ) निर्माण, ग्रन्थनिर्माण से प्रचार, प्रचार से सामाजिक जागरण और सामाजिक जागरण से सस्कृति की सुरक्षा होती है, जिसका फल सम्पन्न राष्ट्र की अभिव्यक्ति है । भारत इस तथ्य का सदा से प्रयोग करता पाया है। महापुरुष जो-स्वकीय युग के ही नहीं परम्परा के भी उन्नायक होते हैं और जो- इसी लक्ष्य की पूर्ति के लिये अवतरित होते है-स्वकीय दिव्य चरित्र, आदर्श अाचरण, उद्बोधक उपदेश एवं विलक्षण प्रभाव से ममाज में एक नवीन प्रगति लाते और ईश्वरीय आदेश को पूति करते हैं महाप्रभु श्रीवल्लभ ने भी इसी पद्धति का अनुगमन किया था। उन्होने अपने जीवन-समय में राष्ट्र की बाह्य एव श्रान्तरिक वास्तविक स्थिति के परिज्ञानार्य समन भारतवर्ष की तीन वार (लगमग २५ वर्ष तक ) परिक्रमाए की, स्वकीय जीवन का प्राधे-से अधिक माग उन्होने इसी समाज-परिदर्शन और जनजीवन के जागरण में लगाया था। यह निश्चित है कि- वे देश-सस्कृति-धर्म और समाज की तात्कालिक स्थिति- अध्ययन के अन तर ही स्वकीय माहित्यिक ( वाहमय) रचना मे प्रवृत्त हुए थे और यही कारण है कि- वे शुद्धाद्वैत पुष्टिमार्गाय सिद्धातों की धानिक और - उस के कुछ वाक्य इस प्रकार है सर्वमार्गेपु नष्टेषु कली च खलर्मिणि पाखण्डअनुरे लोके कृष्ण एवं गतिर्मम ॥ १ ॥ म्लेच्छानान्तेषु देशेषु पापक निलयेषु च सत्पीटा-यप्रलोकेषु ण एव गतिर्मम . २ ॥ गंगादितीवमें दुरेवाटतेषु च तिरोहिताधिदेवेषु कृष्ण एवं गतिर्मम ॥१॥ अहकारविमूढेषु रात्म पाषानुवर्तिपु मामायनेषु प्रण एव गतिमम ॥५॥ यादिण्णाश्रय स्त्रोत्र ।

व्यावहारिक प्रतिष्ठा तो कर सके, विशेष व्यापक साहित्य रचना का समय न पासके, यहाँ तक कि- दोतीन महत्वपूर्ण प्रन्यों का व्याख्यान भी उनके द्वारा पूर्ण न किया जा सका। 卐 स. १५८७ में अपना उत्तरदायित्व सुयोग्य अात्मजों को संमलाकर वे ईश्वरीय अाजा का परिपालन कर, अनन्तचरणाम्भोजप्रसूता श्रीभागीरथी की धारा मे सदा- सर्वदा लोकपावन करते रहने के लिये ही अन्तलीन होगए । उनकी भव्य दिव्य शुद्धाद्वैत पुष्टिमार्गीय वाङ्मय-सुवा भारतीय संस्कृति के प्रवाह द्वारा जगत को श्रेय प्रेय का जीवन प्रदान करने में जागरूक और समर्थ हो गई। भगवदनामलावतार श्रीवल्लभ के अनन्तर उनके ज्येष्ठ ग्रात्मज श्री गोपीनाथजी ने पुष्टिमार्ग का व्यावहारिक स्वरूप-संरक्षण किया और कुछ समय बाद (सं. १६०० के लगभग) उनके अनुज श्रीविठ्ठलेश प्रभुचरण ने इस कर्तव्य को अपना श्रादर्श बनाया । राजनैतिक विषम उथलपुथल के समय में सस्थापित पुष्टिावरु राजनैतिक शानिमय अनुकूल वातावरण में श्रीविठ्ठलेश्वर प्रभुचरण के निरीक्षण, संरक्षण, और श्राधिपत्य को पाकर पल्लवित कुसुमित हो गया। शुद्धाद्वैत पुष्टिमार्ग, साहित्य संगीत कला और सर्वतः सुमुखी सास्कृतिक कल्याणमयो प्रवृचियों से लहलहा उठा । उस समय इसे जो स्वरूपरक्षा प्रतिष्ठा और वैभव, वस्त्र प्राप्त हुआ, वह इतिहास जीवन-चरित्र के श्रादर्श में देखा जा सकता है । वात्पर्य यह कि- श्रीविठ्ठलेश प्रमुचरण की विद्यमानता, श्राधिपत्य (सं. १५७२ १६४१ ) में शुद्धाद्वैत पुष्टिमार्ग फी निरस्तसाम्यातिशय उन्नति हुई, वह विस्मणीय नहीं है, इतिहास उसका साथी है। श्रोविडलेश्वर प्रभुचरण (श्रीगुसाइजी) ने शु० पुष्टिमार्ग की सर्वतोमुखो उन्नति के लिये वही दक्षता-कुशलता से काम लिया था । लोकपोषक पावन सिद्धान्त दुग्ध अतिधेनुओंसे अमरभारती के रूप में दुहार उन्होने जहां लबालब भक्ति दोहनी भरी, वहा उसे महानुभाव सूरदास प्रादि अष्टछावी कविभक्त और अनेक अनेक पद रचयितानों की मधुर वाणी-मिता से भी समित्रित किया था और ॐ वेदसंहिता-व्याख्यान, उपनिषद्य-प्रतिष्ठापन । गीता-दर्शन श्रादि । सुबोधिनी, अणुमाभ्य, पूर्वमीमासामाध्य श्रादि ।

प्रमुधी गोवर्दननाथ को समर्पित कर जनता को यथेच्छ पान के लिये सुलभ दिया था। उस समय से संस्कृत और ब्रजभाषा तथा अन्य लोक-माषाओं में साहित्यरचना का प्रवाह चला यह ाजमी (५०० वर्ष तक ) श्रतुण्ण है उसके श्राद्यन्त का दर्शन पालेना एक प्रकार से असमय है। उसका प्र साहित्य-रस उपादेय अपच श्रास्वान्य है। इतिहास में यह अन्वेषणीय है कि- इस छोटी सी काल-अवधि में, कि एक ही धर्मानुयायी वर्ग द्वारा इतने विपुल साहित्य का सर्जन किया गया जो-समानान्तर में सरत श्रोर ब्रज (हिन्दी) दोनों भाषाओं के माध्यम . विद्वद्वर्ग और जनसमुदाय दोनों के लिये उपयोगी सिद्ध हो सके, उनको श्रानन्द बिमोर कर सके। प्रस्तुत विषय का जो इतिहास लिखा जारहा है उसमें प्राय श्रीर प्रन्य कारों की एक लम्बी नामावली संकलित है। जिसमें भाषा-विभेद के कारण पु. पु. साहित्य दो विभागों में विभक्त कर दिया गया है (१)शु० पु. संस्कृत वाङ्मय (२) शु० पु. प्रजभाषा वाहमय । द्वितीय विभाग-जो इस प्रन्य के प्रकाशनानन्तर मुद्रित होगा के सम्बन्ध में कुछ न कहकर इस प्रासगिक वक्तव्य का लक्ष्य शु० पु. संस्कृत वाहमय और उसका अभ्युदय है। शु पुष्टिमार्गीय सैद्धान्तिक ग्रन्थगशि और सप्रदीत अन्य शास्त्रीय साहित्य का एक विपुल संग्रह उसके यत्रतत्र प्रतिष्ठित अधिष्ठानों में विद्यमान है जो- सुरक्षित-असुरक्षित मुद्रित-अमुद्रित विदित-अविदित विशीणं सभी परिस्थितियों में उपलब्ध हो रहा है। प्रस्तुत लेखक्ने जिन २ स्थानों में उसका अवलोकन किया है, पाठकों की अभिशा के लिये उसका संकेत कर देना अस्थाने न होगा :- नायद्वारा-गो. तिलाकायित श्रीगोविन्दलालजी महाराजश्री का विद्यामन्दिर -विद्या-विभाग। (स १९८५ में निगशित) 卐इस लेखक द्वारा लिखित - १-• पु० संस्कृत वाङ्मय' (प्रकाशित प्रस्तुत प्र० खण्ट और प्रकाशन-सापेक्ष अग्रिम खण्ड ।) २-'शु० पु' १ सायिवार-परिचय', एवं शु.पु. साहित्य का इतिहास ।

नाथद्वारा-गो. श्रीगिरिधरलालजी महाराज (द्वि. पीठ ) का संप्रद । (सं. १६८० में निरीक्षित ) काक्रोली-गो. श्रीब्रजभूषणलालजी महाराज (तृ. पीठ ) का विद्या- विभाग सरस्वती-भंडार ! कोटा-गो. श्रीरणछोडलालजी महाराज (प्र. पीठ) का ग्रन्थालय (सं. १९८४ में निरीक्षित) कामवन-गो. श्रीगोविन्दलालजी महागज (च. पीठ ) का विद्या-विभाग। ( १९६० मे निरीक्षित) ६ काशी-गो. भीमुरलीधरलालजी महाराज का विद्याविभाग-संग्रहालय । ( सं १९८१ में निरीक्षित) सूरत-गो. भीव्रजरत्नलालजी महाराज (प. पीठ) का संग्रहालय (सं. १६६५ में नियुक्षित) अहमदावाद-गोश्रीब्रजरायजी महाराज का प्रन्यालय । अधिकांश में कांकरोली विद्याविभाग को सुरक्षार्थ सं. २०१६ में समर्पित । (सं. १९८२ तथा सं २०१९ में निरीक्षित )卐 उक्त स्थानों में विशाल ग्रन्थ-संग्रह जिसमें सभी शास्त्रों का समावेश है विद्यमान है, और जो लगभग ४५० वर्ष की उत्कट साहित्य-सेवा का फल है। सौभाग्यतः यदि समप्र संग्रहालयों का केन्द्रीकरण किया जाय-जिस में कि न्यूनसे न्यून पसाच हजार प्रन्यों का संकलन हो सकता है, तो यह अतिशयोक्ति नहीं होगी कि-एसा विशाल मन्थ-साहालय कृचित हो होगा। राजनैतिक, सामाजिक नैतिक एवं प्राथिक क्रान्तियों के कारण क्षीणशक्ति होते रहने पर भी अभिभावकों द्वारा इस ओर कोई ध्यान नहीं दिया जाता यह एक परिताप का विषय है। यदि इस कार्य को प्रामाणिक सार्वजनिक दंग पर सुरक्षा और सदुपयोग के लिये सुव्यवस्थित किया जाय, तो यह अपनी उपमा श्राप होगा और इससे साहित्य संस्कृति एवं समाज की महती श्रभ्युन्नति होगी, इसमें सन्देह नहीं है । संEE. से लेकर स. २०१९ तक सनत परिश्रम के साथ अध्ययनद्वारा इस के अतिरिक्त-मुवनेश्वरीपीठ गोंडल में भी शु० पु. प्रन्यो का अच्छा संग्रह है जो-प्रकाशित सूची से विशात होता है।

मैने जिन श्रमूल्य निधियों का पतालगाया है, उनको श्रान्तरिक दक्षाका अवलोकन किया है उनका उपयोग भाग्य से ही किसी को अधिगत हो सकता है। इस साहित्यान्वेषण-काल में तीन चार स्थानों को छोड़ कर अवशिष्ट संग्रहालयों की जो दुर्दशा देखने में पाई है, उसे न कहकर तद्विपक एक अभियुक्ति का स्मरण करादेना हो अधिक संगत होगा । वह है :- " विद्वांसो मत्सरमस्ताः प्रभवः स्मयदूषितः श्रवोधोपहताश्चान्ये जीर्णमङ्गे सुमाषितम् । संक्षेपत:-इस अमूल्य निधि का साहित्य जगत् को परिचय दियाजाय, इसकी सार्वत्रिक मुल्यवस्था और सुरक्षा का प्रयत्न किया जाय, घशात अप्रकाशित प्रत्यों के अध्ययन प्रकाशनअनुवाद की व्यवस्था की जाय और तदयं शु० पु. सम्प्रदाय के संचालको, विद्वानों, श्रेष्ठियों एवं सर्वसाधारण वैष्णव धर्मानुयायियों का सामूहिक संगठित स्यागमय प्रयत्न होतो-उससे साहित्य, पला, धर्म, संस्कृति, समाज श्रादि का वह प्रोज्वलरूप सामने यासकता है को-याज ५०० वर्ष से शु. संप्रदाय में पनपरहा है। श्राज से १० वर्ष पूर्व मेरे हृदय में जगद्गुरु श्रीवल्लभाचार्य के द्वारा स्वरूप परिचायित इस साहित्य सुमन-समुदाय को वैजयन्ती गूथने का विचार हुअा और तदर्थ स्वकीय विगत ५० वर्षों के अध्ययन की विकसित अर्धविकसित सभी कलिकाएँ संचित की जाने लगी। महाप्रभु की प्रेणा से शुद्धाद्वैत पु. संम्प्रदाय के आन्तर और बाह्य स्वरूप-सौन्दर्य के परिचयार्थ निम्नलिखित ग्रन्यों की रचना का संकल्प जागा-जो श्राज उन्मीलित एवं निमोलित दोनों स्थितियों में निम्नलिखित रूप में विद्यमान है :- (१) शु० पु० संस्कृत वाङमय-यावदुपलम, विशात ग्रन्थराशिफा, सामूहिक परिचय, जिसमें विश्लेपणात्मक दृष्टि से अमिक विपयों का सर्वागीय परिचय हो और जो-मौलिक आधार पर, बिसरे हुए साहित्य का अनुबन्धक हो। प्रस्तुत ग्रन्य इसी प्रकार का एक मुसजित प्रयास है। इसमें सामुदायिक विश्लेषण इस प्रकार प्रशित किया गया है जैसा कि- महाप्रभु श्रीवल्लम ने स्वकीय साहित्य-राशि को विभाजित करते हुए कहा है:- " (क) वेदाः (वेद चतुष्टयी) (ख) श्रीकृष्णवाक्यानि (भगवद्गीता) (ग ) व्या सूत्राणि ( उत्तर मीमासा) चैवहि (घ) समाधिभाषा व्यासस्य (भीमागवत ) प्रमाणं तच्चतुष्टयम् अविकदं तु यत्वस्य प्रमाणं तच्च नान्यथा । (शा. निबन्ध) परत:-शु० पुष्टिमार्गीय सिद्धान्त-साहित्य प्रमाण-चतुष्टय के रूप मे उक्त प्रकार से और अनुबन्ध-चतुष्टय के रूप में निम्न प्रकार से वर्गीकृत होता है (१) प्रमाण कोटि अन्य (प्रथम प्रकरण) (२) प्रमेय कोटि (द्वितीय प्रकरण ) (३) साधन कोटि (तृतीय प्रकरण) (४) पल कोटि (चतुर्थ प्रकरण) शुद्धाद्वैत पु. साहित्य का वर्गीकरण इसी दृष्टिबिन्दु में एक मौलिक उपक्रम है-तावता प्रस्तुत साहित्य, गंभीर अध्ययन और वैज्ञानिक विभाजक रेखा से पृथक २ छाटा जा सकता है । जो पुष्टिमार्गीय साहित्य की सर्वागीण पूर्णता है। प्रथम प्रकरण में :- साहित्य के प्रमाण कोटि के अन्थों और उनके साहित्यका स्वरूप-परिदर्शन है । ऐतिह्यक्रम से रचनाओं में मूल संस्कृत तदनु व्याख्या टीका, टिप्पण एवं इतर भाषामों के अनुवाद-साहित्य का संकलन है, जो उन उन का अंग माना जा सकता है, इसके अनन्तर उन शास्त्रों के साहित्य का वर्णन है जो प्रमाण-चतुष्टय का अविरोधी है और जो-प्रमेय साधन, फ्ल किसी अनुबन्ध के अन्तर्गत नही आता। द्वितीय प्रकरण में :-प्रमेय स्वरूप के प्रतिपादक प्रन्यों और उनके उपजीवी साहित्य का संकलन किया गया है। तृतीय प्रकरण में साधन विषयक प्रन्य-साहित्य का संकलन है। यद्यपि साधन एवं पल दो विभिन्न कोटियां हैं, पर मार्गीय सिद्धान्त-दृष्टि से निःसाघनता को महत्व देने के कारण साधन एवं पल में एक प्रकार से अभेद कहा गया है । तापता साधन अवस्था ही फल-पर्यवशायिनी है भोर फल-स्थिति ही साधनामिका है। प्रसंगोरात इसका विवेचन तत्प्रकरण में किया गया है।

इस अन्य के अनन्तर प्रस्तुत साहित्य-माला के निम्न माग और भी उपस्थित किये जायगे जिनके अध्ययन, मनन से जगद्गुरु श्रीवल्लभाचार्य की वेदान्त-दृष्टि, उसके सबभौम माहात्म्य, सर्वाङ्गीण परिचय और लोकोपकारिता के साथ उसका मौलिक ऐतिहासिक साक्षात्कार होगा। (क) शु०पुष्टिमार्गीय साहित्य का इतिहास और साहित्यकार- जिसमें युगों के विभाजन के अनुसार साहित्यकारों का परिचय उनकी कृति, कृत्तियों का वेशानिक अध्ययन द्वारा साहित्य के इतिहास पर बाह्य आध्यात्मिक प्रकाश डाला गया है। (ख) शुद्धादत पुष्टिमार्गीय येदान्त-दिग्दर्शन-आन्तर आध्यात्मिक परिचय । (ग) शुद्धाद्वत साम्प्रदायिक इतिहास-बाह्य भौतिक परिचय । (घ) शुद्धोद्वत पु० साम्प्रदायिक-सांस्कृतिक परिचय । सम्पति तो भगवदिच्छानुसार प्रस्तुत अन्य का अवशिष्ट ( ०४१ से २५२ पत्रात्मक ) श्रश मुद्रित कराया जाकर सापेक्ष आवश्यक पूर्ति से इस प्रथम खण्ड को सम्पन्न कर प्रकाशित किया जारहा है-आशा हैं इतना ही अश किसी एक आवश्यक्ता की तो पूर्ति करेगा हो और फलतः सुधी-समाज की सदाशा सम्वलित समुसण्ठा इसकी सम्पूर्ति तया इतर सापेक्ष साहित्य के मुद्रण, प्रकाशन को प्रेरणा प्रदान करेगी। कार्यवाहुल्य, एवं अन्य कई मंझटों के होते हुए भी पं० मोतीदासनी चेतनदासजी अध्यक्ष चेतन प्रकाशन मंदिर (प्रेस) बडौदा ने इस ग्रन्थ की प्रकाशन-पूर्ति में सहयोग दिया है, तदर्थ वे स्मरणीय है। इतिशुभम् । पटौदा भी बैठक मन्दिर स. २०२० विधेय-- पो.कण्ठमणि शास्त्री संचालक : विद्याविभाग, कांकरोली. ॐ यह प्रन्य सम्पादित होकर प्रकाशन की अपेक्षा रखता है।

शु० पु. संस्कृत वाङ्मय विषय सूची प्रथम खण्ड [प्रमाण प्रकरण] - - नाम पत्र [१-६७] ५ (७-६५) ७ E १५ प्रथम प्रकरण शुद्धाद्वैत सिद्धान्त की प्रतिष्ठा शु० पु. वाङ्मय का वर्गीकरण प्रमाण चतुष्टय और उसका साहित्य (१) वेद स्वरूप परिचय शाखा विभाग वेद-प्रतिपाद्य वेद सम्बन्धी मान्यता वेद के प्रति विविध दृष्टि कोण वेदार्य परिधान पद्धति घेदचतुष्टय-साहित्य उपनिषद्-साहित्य (परिचय) [ दश तथा अन्य उपनिषद् म्याण्याए ] सूक्तार्य - विवरण - (अन्य ) प्रकीर्ण मन्त्र व्याख्यान (.) [गायत्री मन्त्रादि व्याख्यान] तथा प्रकोण वेदान्त प्रन्य २३ ५६ ६५

[६८-८५
द्वितीय प्रकरण
श्रीकृष्ण वाक्यानि [गीता
६८-८५
६८
श्रीकृष्ण वाक्य सम्बन्धी मान्यता
भगवद्गीता-साहित्य-व्याख्या
मीता सिद्धान्त प्रतिपादक न्य
७२
[८५-१२२
तृतीय प्रकरण
(३) व्यास सूत्राणि [ उत्तर मीमांसा ]
ध्याससूत्रों का स्वरूप परिचय
(अध्याय, पाद, अधिकरण विचार)
व्याससूत्रों पर शु• सां. साहित्य
वृहभाध्य और अणुभाष्य
वृहदभाष्य और प्रकाश ( व्याख्या)
व्याससूत्रभाष्य का नामकरण
अणुभाध्य-साहित्य (व्याख्या)
१००
[१२३-२१४]
चतुर्थ प्रकरण
(४) [ समाधिभाषा-भागवत ]
स्वरूप परिचय
पुरपार्य और भक्ति
भक्ति और भागवत
९२४

२७
मागवत और पुराण
भागवत का त्रिविध स्वरूप
प्रामाण्य
मान्यता
१३८
१४१
समाधिमाषा पर शु. सा. साहित्य (भागवतार्य निवन्धादि)
भागवत निरन्ध का प्रतिपाद्य विषय (शास्त्र स्कन्ध प्रकरण अभ्यापार्थ )
सुबोधिनी का प्रतिपाद्य विषय (धास्यार्य, पदार्य, मदारा)
व्याख्यान-पति
मापा विध्य (परिचय)
१६८
भगवत्स्वरूपता
मागवत पर शु.पु. साहित्य (व्याख्या)
सुबोधिनी रीका पर एक दृष्टि
मुबोधिनी-साहित्य
(प्रथम से द्वादश स्कन्ध तक सुबोधिनी परिदर्शन और पाख्या)
मागवत पर शुरु सिद्धान्तीय अन्य साहित्य
अन्य (अधिरुद्ध) प्रन्य साहित्य
अन्य शास्त्रों की प्रामाणिस्ता
অস্থির হার
पूर्व मीमांसा और उस पर शु• पु० साहित्य
उपवेद
पेदांग
अर्थशास्त्र और कामशास्त्र की उपादेयता
ক্লয়াম
२२४
२२५

२२८ २२९ २३० न्याय शास्त्र-तकशास्त्र योग तथा सांख्य शास्त्र ध्याकरण और कोश-साहित्य संगीत शास्त्र-साहित्य स्मृति (धर्मशास्त्र) माचार ग्रन्थ ( साहित्य ज्योतिष व्रतोत्सव पर्वोदि निर्णय अन्य वोत्सव निर्णय अन्य प्रकीर्ण उत्सव निर्णय अन्य श्रीरामायण रामायण पर प्रन्थ साहित्य महाभारत- काव्य नाटक चम्यू भगवन्माहात्म्यादि निरूपक साहित्य ऐतिह्य निरूपक साहित्य २३३ २३५ २३९ २४० २४२ २४४ शुभम् शु० पु० संस्कृत वाङ्मय प्रथम प्रकरण - शुद्धाद्वैत सिद्धान्त की प्रतिष्ठा-- वैदिक साहित्य से अनुप्राणित मारतीय धर्म, सदाचार संस्कृति वाङ्मय विश्व में तात्विक चिन्तनात्मक रूप में 'शुद्धाद्वैत सिद्धान्त' और अनुष्टाना- स्मक रूप में भक्तिमार्गान्तर्गत 'पुष्टिमार्ग' का सिद्धान्त अपना एक गौरव पूर्ण अधिष्ठान रसता है, जिसमें प्रामुरी वृत्तियों से यचरदेवीसम्पत्ति के अनुगामी जीवों को स्व-स्वरूपज्ञान, कर्तव्याकर्तव्य का अवबोध और अभ्युदय नि श्रेयस के साथ परमानन्दमय स्थिति-प्राप्ति का प्रतिपादन किया गया है। दोप निरासक अथच गुणाधायक प्रस्तुत विशद सिद्धान्त के मूल प्रवर्तक जगद्गुरु श्रीवल्लभाचाय के प्रन्य-प्रणयन के साथ हो वह भारत की पुण्य भूमि में अवतरित होता है, और अपनी वृद्धिंगत निर्मल धारा द्वारा प्रतिदिन लक्षावधि जीवों को प्राप्यायित परता है । निविध तापमंतप्त मानन-जीवन के हृदय सरोम्हों को विसित कर उन्हें चैतन्य मय बनाना ही इस ज्ञान-सहवरश्मि प्रतिफल है, जो भारतीय पारंपरिक तत्यानुचिन्तन-प्रणाली और वस्तु के स्वरूप परिप्यार या नवीनतम अनुष्ठान है। ऐतिहासिक जगत् में महाप्रभु श्रीवल्लभाचार्य के माध्यमिक शिमणकाल में ही इस श्रालोर की जगपावनी रिण का परिचय मिलने लगता है, जय ये अपने अद्धय गुरुचरणों के ममक्ष शास्त्रीय तत्वज्ञान की गम्भीर पर्चा में अपने मतीर्थ्य यधुओं को इस अपरिज्ञात चैदिन रहस्य के निर्देशन द्वारा निमत्तर पर देने और गुरुवर्य को स्वसीय अलौति प्रतिभा से प्राधर्य चक्ति । शुद्धाद्वैत सिद्धान्त प्रतिपादन का यह २ [ शु० पु० सस्कृत वाङ्मय एक मौसिक युग था, जब श्रीवल्लभ ही उसके एक मात्र प्रतिपादक और अनुगामी थे । पारपरिक धारणाओं, बौद्धिक सस्तारा एव शास्त्रगुक्ति तम्बहुल सिद्धान्त चक्र से जब बिरला ही कोई विद्वान् निकल कर उन्मुक्त ज्ञान-गगन मे श्वास लेने की स्थिति म नहीं था, ब्रह्मवाद के स्थान पर उसे मायावाद ग सॉप सूध गया था, विद्वत्समाज में विशुद्ध दृष्टि से क्सिी अपर लक्षित सिद्धान्त रत्न की सत्ता स्वीकार करने वाला नहीं था, वर फिर ज्ञान पिपासु मोमलमति विद्याध्ययनपरायण दानों की कथा तो दूर सुतरा दूर ही थी ? जो अपनी अप्रस्फुटित प्रतिभा के कारण शुस्वत्पाठशील और एपमान गुरु के लालाटिक थे । विषम परिस्थिति में भी इस विज्ञान का प्राश नहाँ तक रुकसरता था श्रीवल्लभ के प्रामाणिक सारगर्मित युक्तियुक्त कर्म-ज्ञान-भक्ति के समन्वयात्मक सिद्धान्त प्रतिपादन शैली ने चमत्कार बतलाया और शनै -शनै छानों और उनके द्वारा विद्वत्समाज में यह चर्चा का विषय बना । चारों ओर पैदिक सिद्धान्त के रूप मे अद्वैत के उपर शुद्धाद्वैत का प्रमाश छाने लगा । सर्वशास्त्रों की समन्वय-पद्धति ने विद्वत्समाज मे आदर पाया और श्रीवल्लभाचार्य इस सिद्धान्त के प्रथम सस्थापक माने जाने लगे। सामयिक परिपाटी और जैसा कि काशी सहश विद्या-केन्द्रों में अद्यावधि प्रचलित है, छानों और पडितों की मडली में समय-समय पर शास्त्रार्थों में इसी चर्चा होने लगी और कुछ समय बाद यही एक शास्त्रार्थ का मुरय विपय बन गया । जहॉ-तहाँ शास्त्रार्थ प्रसगों मे पक्ष विपक्ष को साजसज्जा प्रस्तुत होने लगी जिसमे श्रीवल्लभ से ही प्रमुख भाग लेना पड़ता था । बाल्यावस्था में ही प्राप्त होने वाली इस अप्रतिम एयाति और शास्त्रार्थ विजय ने एक बार ऐसा भी अवसर ला सड़ा पिया जर श्रीलक्ष्मण भट्टजी ने अपने पुत्र श्रीवल्लभ को ऐसे प्रसगों में भाग लेने से मना किया । समय निकलता गया, नवीन घेदान्त विचार की परिपाटी प्रसृत होती गई, अवरोध होने पर भी वाग्पति की सुर- सरस्वती अरद्ध न हो सकी, श्रीवल्लभ 'यालसरस्वती' के रूप में परयात होगये। कौटुम्बिक परिस्थिति में पितृचरण के दिवगत हो जाने पर ग्यारह वर्ष की आय में जर श्रीवल्लभ देशल की जानकारी के लिये भारत-परिजमा करने लगे ।

प्रमाण प्र०...वेद ] किया । जनजीवन की वास्तविक दशा को जांचते हुए उसकी राजनैतिक कठिनाइयों में जीवन मरण के प्रश्न में भारतीय सांस्कृतिक रक्षा के लिये उस समय जो भी प्रयत्न हुए, उन सब में भक्तिमार्ग का प्रकाश ही अमृत- सिंचन था, और जिसमें श्रीवल्लभाचार्य के अनुग्रह मार्ग ने दिव्य शक्ति का दर्शन कराकर आत्मविश्वास उत्पन्न करने में कोई कसर उठा नहीं रक्सी थी। तात्कालिक देशकाल की संहारक स्थिति का अनुभव आज के जीवन में असंभव है, उसकी भांकी तो उन थोड़े से वाक्यों से हो सस्ती है जो-प्राचार्यों ने प्रसंगोपात अपने प्रन्थों में टांके हैं। भारतीय जीवन के परिज्ञान और संरक्षण के लिये श्रीवल्लभाचार्य ने आसेतु- हिमाचल भारत की तीन चार पैदल यात्रा कर जो आदर्श स्थापित रिया वह अन्य किसी श्राचार्य के जीवन में देखने को नहीं मिलता । शुद्धाद्वैत साहित्य मे इसे 'पृथ्वी-परिक्रमा' के नाम से कहा जाता है जो बहुत कुछ सार्थक है । यह निःसन्देह है कि इस भूमंडल में भारत-आर्यावर्त की गणना कुछ विलक्षण रुप मे ही है, जिस पर प्रकाश डालना यहाँ अस्याने है। इसी भारत-तीर्थीकरण के प्रसंग में अन्तर्देशीय व्यापक रूप में श्रीवल्लभाचार्य के विशुद्ध वाङ्मय का दर्शनसौभाग्य आर्यजगत् को तब होता है जब वे नृपति-सार्वभौम महाराज कृष्णदेव की प्रायोजित अखिलभारतीय विद्वत्समा में वैष्णव-सिद्धान्त की विजय वैजयन्ती फहराते और यायन्मात्र विद्वानों से मान्य होकर कनकाभिपेक से अभिपिक्त 'असिल-भूमंडलाचार्यवर्य जगद्गुरु के श्रासन पर विराजमान क्येि जावे हैं। इस विशाल शास्त्रीय दग्विजय और अनुपम श्रीविभूपित सन्मान ने अग्रिम परंपरा के लिये शुद्धाद्वैत वाड्मय का वह अविचल रूप स्थापित कर दिया जो-'न भूतो न भविष्यति'के उदाहरण मे लोकजीवन-जीवातु का स्पष्ट दिग्दर्शक है, जो भारतीय विचारधारा का एक नया परिष्कार अथच आविष्कार है। इस महान् आयोजन के बाद और समा- नान्तर में प्राचार्यों द्वारा यह वाड्मय विश्वविदित होने के साथ ही मूर्त रूप धारण करता गया, जो आज प्रन्य-रचना के रूप में हमारे सामने विद्यमान है। सैद्धान्तिक दृष्टि से कहा जाय ? तो यह स्वीकार करने में कुछ विसंवाद नहीं है कि यह शुद्ध अद्वैतवाद आज का नहीं बहुत पुराना ४ [ शु० पू० संस्कृत-वाङ्मय और उतना ही पुराना है जितना कि वेद । श्राद्यगुरु श्रीशंकराचार्य ने केवलाद्वैत रूप में इस ब्रह्मयाद को स्वीकार करते हुए भी तरसामयिक बौद्ध-बाद की लपेट से सुरक्षित रसने के लिये इसके आसपास एक ऐसा आलवाल खड़ा किया था जो आवश्यक होने पर भी भ्रमोत्पादक था । लौकिक-पारलौकिक दोनों सत्ताओं को तिरस्कृत कर शून्यथाद की प्रतिष्ठा करने वाले प्रबल बौद्ध-सिद्धान्त के मामने जन-मानस में वैदिक सन्मान उत्पन्न कर देना बड़ा कठिन था । फलतः उन्होंने योद्धवाद से मिलते-जुलते और उससे स्वतन्त्र-विपरीत भी कुछ ऐसे सिद्धान्त की स्थापना की जो-अपना काम कर गया और आर्यजगत् वेद-ज्ञान के प्रति पुनः श्रद्धावान हो सका । श्रीशंकर ने सच्चिदानन्द परमात्मा की स्थिति मे सत् की लौकिक सत्ता का अपलाप करते हुए चित् और आनन्द की एक- रूपता द्वारा पारलौकिक सत्ता की प्रतिष्ठा की। भागवत वैदिक सिद्धान्त "सर्व ब्रह्म घेद" को स्वीकार करने के पहिले उन्होंने “आत्मैवेद" को अपनाया, और 'आत्म' शब्द के अर्थ में जीव और ब्रह्म दोनों की प्रत्यक्ष परोन सत्ता का घंट भारतीय जनता के गले नीचे उतारा । इस कड़वी-मीठी दवा ने सिद्धान्ततः स्वस्थ होकर विशुद्ध विचार की परिपाटी को जन्म दिया, भारतीय चिन्तना मे वैदिक साहित्य पर पुनः विचार की श्रास्था पनपी । श्रीरामानुज,श्रीमध्य आदि प्राचार्यों ने अपने अपने दृष्टि- कोण से वैदिक साहित्य का अनुचिन्तन किया और भारतीय विचार-धारा मे नये-नये तत्वों का समावेश प्रारंभ हुआ। पन्द्रहवीं शती तक वेदान्त के विचार-स्रोत से छोटी-बड़ी कुल्या, सरिताएँ निकलकर देश को आर्द्र बनाती रहीं, पर इसका मौलिक अजस्त्र प्रवाह तबतक अवतरित नहीं हुआ गयतक श्रीवल्लभ के प्रचार ने उसके मार्ग को अवरोधहीन नहीं बना दिया। उनके भगीरथ-प्रयत्न ने चैदिक सिद्धान्त की अतुल पावन सलिल राशि से जगत् को आप्यायित कर दिया। . श्रीवल्लभाचार्य चरण द्वारा सिंचित यह सिद्धान्त-कल्पपादप आगे चलकर अनेक शारसा, प्रशासों, पत्रों, कुसुमों और फलों से विस्तृत हुश्रा, जिसे हम वैज्ञानिक दृष्टि से निम्न विभागों में विभाजित कर प्रमाण० प्र०...वेद ] ५ शु० पु० वाड्मय का वर्गीकरण- शुद्धाद्वैत पुष्टिमार्गीय वाड्मय १ प्रमाण अन्य २ प्रमेय प्रन्य ३साधन प्रन्य ४फल ग्रन्थ इस प्रकार मुख्य विभागों के अनन्तर प्रमाणप्रन्यात्मक वाड्मय निम्न रूप मे विभक्त होता है जिसमे प्रस्थान चतुष्टयात्मक भाग विशेष और अविरुद्ध-संकलात्मक भाग गौण है। १ प्रमाण प्रन्य-विभाग (स) श्रीकृष्णवाक्य (ग) व्यास सूत्र (घ) समाधि भाषा (कोद (गीता) (ब्रह्मसून) (भागवत) अन्य (ड) (अविरद्ध और सकलन शास्त्र) फवेद चतुश्य-सहिता तथा मन्त्र-भाग, उपनिपद्-विवरण-प्रन्थ, सस्कृत टीम तथा भाषानुवाद । स-श्रीकृष्ण वाक्य-गीता)विवरण ग्रन्थ,सस्कृत तथा भापानुवाद ग-न्यास सूत्र, (ब्रह्मसून), उत्तर मीमासा-विवरण प्रन्थ, संस्कृत तथा मापानुवाद । घ-समाधिभापा (भागवत)-विवरण प्रन्थ, संस्कृत तथा भापानुवाद । हु-अन्य-अविरद्ध शास्त्र, सकलनात्मक विवरण सस्कृत तथा भापा अन्य । सम्प्रति इस प्रथम प्रकरण में प्रमाण प्रन्थों का स्वरूप २--मान्यता और ३--उसा साहित्यिक परिचय, सम्मुस रसा जा रहा है। द्वितीय मे प्रमेय प्रन्य, तृतीय में साधन ग्रन्थ और चतुर्थ मे फल प्रन्यों पर शब्द-विस्तार किया जायगा। शु०पु० वाङ्मय में प्रमाण विषयक तत्वज्ञान पर क्या विचार-धारा है ? अन्य सिद्धान्तों के साथ उसका कहाँ तक सवाद और विसवाद है?

६ [ शु० पु० सस्कृत वाङ्मय रिस-रिस ने क्तिने प्रमाणों को अगीगार क्यिा है ? आदि विषयों पर प्रस्तुत प्रन्य के सिद्धान्त-सड मे कहा जायगा । प्रसगोपात यहा प्रस्थान- चतुथ्य पर उसका दृष्टिकोण सामने रख देना अधिक उपयुक्त प्रतीत होता है। प्रमाण-चतुष्टय और उसका साहित्य- शुद्धाद्वैत सिद्धान्त की प्राधार भूमि प्रमाण-चतुष्टय पर स्थिर है | यह वाड्मय श्राधार युगायुगान्तर से अविनाश्य और अविस्म्प्य रहा माया है । श्रीवल्लभाचार्य ने भारतीय संस्कृति के प्राय प्रवर्तक घेद वेदान्त तथा तदर्थ-प्रतिपादन अन्य गभीर साहित्य को प्रमाण-कोटि म स्वीकार कर शास्त्रों के समन्वयात्मक दृष्टिकोण को अपनाया है, जो एक श्रनुपम प्रयत्न है । इस प्रकार का प्रयत्न इसके पहिले अन्यत्र दृष्टिगोचर नहीं होता । यां तो चैदिर सिद्धान्त के समर्थक या प्रतिपादक सभी प्राचार्यों ने आप्तवास्य रूप वेद, गीता और ब्रह्मसूत्र को प्रमाण मान कर अपने अर्थ का प्रतिपादन रिया है, पर उनमें सिद्धान्त की स्थापना प्रथम और उससे प्रमाणित करने की भावना बाद में दृष्टिगोचर होती है । यह कहना पडेगा मि-श्रीवल्लभ के सिवा सभी प्राचार्यों ने निगम पल्पतर फल स्वरूप भागवत की सिद्धान्त-स्थापना म उपेक्षा-सी पर दी है, उसे वे स्वीकार करते हुए भी वेद के समक्ष आसन पर आसीन नहीं पर सके, और न उन्होंने मिसी उलझी हुई गुत्थी को सुलभाने मे भागवत का उपयोग ही रिया है । श्रीवल्लभाचार्य ने भागवत को भी वही महत्व प्रदान किया जो वेद,गीता ओर ब्रह्मसूत्रों को प्राप्त था । बादरायण महर्षि व्यास यदि वेदों या व्यास क्यिा था? उन्होंने महाभारत में यदि श्रीभगवान् को अमृत वाणी गीता का प्रयन रिया था? और जैमिनि का पूर्वमीमासा के सशोवन रूप यदि उत्तर मीमासा या प्रणयन रिया था ? तो क्या कारण है ? फि-उनके द्वारा ही समाधि म अनुभूत १ गोस्वामी श्रीपुष्पोत्तम जी ने स्वकीय 'प्रस्थानरत्नावर प्रप म दराका सागोपांग निरूपण किया है जो-गभीररहस्य-वेदियों के लिये पध्ययन की वस्तु है । इसी प्रकार के प्रौर कुछ ग्रयो के मतानुसार यहाँ इसका विवरण दिया जा रहा है।

. प्रमाण प्र.....वेद ] भागवत को छोड़ दिया जाय ? जब कि-उसमें यत्र-तत्र सर्वत्र वैदिक रहस्य ही भरा हुआ है, पद-पद पर उत्तमश्लोक परब्रह्म का यशोगान किया गया है। श्रीवल्लभाचार्य ने भारतीय प्रमाण-परिशीलन की इस त्रुटि को दूर किया और नवीन दृष्टिकोण से भागवत को प्रमाण-कोटि में ला बैठाया । आपने वेद, गीता,ब्रह्मसूत्र इन तीन, शब्द-प्रमाण भूत ग्रन्यों के साथ भागवत को चौथा प्रमाण अन्य माना, और किसी भी सिद्धान्त को स्थिर करने के पूर्व उसे चारों प्रमाणों की एक वाक्यता से परखा। प्रमाण-चतुष्टच की पद्धति में उन्होंने उत्तरोत्तर को पूर्व-पूर्व-सन्देह-यारक माना । वेद में सहसा बुद्धिमान्ध से होने वाले सन्देह के निरसनार्थ श्री गीता, गीता के सन्देह-अपाकरणार्थ ब्रह्मसूत्र, ब्रह्मसूत्र में स्थित सन्देह की निवृत्ति या सष्टीकरण के लिये श्रीभागवत को प्रमाण माना और कहा कि:- जैसा भागवत निगम का सार है, उसी प्रकार वह निःशेप संशयों का निरासक है, और उसकी रचना ही एतदर्थ हुई है । - (१) वेद स्वरूप परिचय माधारणतया 'वेद' शब्द का अर्थ ज्ञान है । यह 'वेद'शब्द विद, धातु से बना है। वेद को निगम भी कहते है, जिसका तात्पर्य:- "नितरां गमयति ब्रह्म बोधयति इति परमोपनिपन्निगमः"२-ऐसा होता है, छन्दों ओर चरणों से युक्त मन्त्र को 'ऋ' कहते हैं, इसका दूसरा पर्याय 'चा भी है। गुप्तार्थ का अभिव्यंजक 'मन्त्र' कहलाता है। देव- स्तुति अथवा तत्सम्बन्धी किसी अनुष्टान में प्रयुक्त होने वाले अर्थ का स्मरण कराने वाले वाक्य को मी 'मन्त्र' कहते हैं। इस प्रकार वेद में ऋचा अथवा मन्त्रों द्वारा अनन्त गंभीर लौकिक अलौकिक सभी विषयाँ का वर्णन है, जिनमें अनन्त ज्ञानराशि भरी हुई है। १. वेद के सम्बन्ध में कहा है-रूपाणामवलोके चक्षुरिवान्यन्न कारणं दृष्टम् । तद्वददृष्टावगतो वेद वदन्यो न वेदको-हेतुः । (शब्दार्य चि०)) २. [ भा० प्र० १,१ सुबो०] , [ शु• पु० सस्कृत वाङ्मय वेद चार हैं जो-'वेद चतुट्रयी' इस नाम से अभिहित होते हैं। मन्त्रों के संग्रह का नाम 'सहिता' है। चारों वेदों को अनन्त शासाएँ हैं, जिनरी गणना ११३१ है । भाष्य मे ११३० शासाओं का उल्लेस है। यह सब चार भागों में विभक्त हैं। जिन्हें 'सहिता' कहा जाता है ।' १. ऋग्वेद--(रहच सहिता) पुराणों के अनुसार इसको २१ शाखाएँ हैं, जिनमे सम्प्रति एक मात्र शाफल-शासा उपल ध है, जिसपर सायण भाप्य है । इसके दो प्रकार से विभाग है। (क) मडल अनुवाफ और वर्ग। (स) अष्टक अध्याय और सूक्त । २ यजुर्वेद-(निगद सहिता) 'यजु' शब्द का अर्थ पूजा और स्तुति है। कहीं कहीं गद्य को भी 'यजु' कहा जाता है। ऋपेदना होता' मन्त्रों का उच्चारण करता हुआ देवों का आह्वान करता है, और यजुर्वेद का 'अध्वर्यु' याग का विधिवत् सपादन करता है, अत इसमें गर्म का प्राधान्य है, इसके अध्यायों में यज्ञ नियाओं के मन्त्र और विधियों का सग्रह है। यह कृष्ण और शुल इन दो भागों में विभक्त है। पुराणों के अनुसार कृष्ण यजुकी ११ शासाओं के नाम मिलते हैं, जिनमे १ तैत्तिरीय, २ मैत्रायणी, ३ कठयह मुद्रित हो चुकी हैं । चरस सहिता का प्रचार पतजलि के समय था, पर अब बारी की सभी अप्राप्त है । शुक्ल यजु की १७ शासाओं में माध्यदिनी या वाजसनेयी तथा काण्य यही दो शासाएँ प्राप्त होती हैं । इस प्रसर यजु की १. शारयाओं में केवल पाँच शासाएँ उपलब्ध हैं। तैत्तिरीय सहिता को तैलग इविद देश में 'श्रापस्तम्ब' शासा भी कहा जाता है, यह शासा शु. पु. के सचाला श्रीरजभाचार्य की पारपरिक शाखा है। तैत्तिरीय महिना पर सायण, यानणदीक्षित ओर भट्टभासर कृत भाष्य मिलते हैं । 'माध्यन्दिनी' शाग्मा पर उचट श्रीर महीधर दोना के भाष्य है। मायय, अनन्त देव और आनन्द भट्ट ने भी इस पर भाष्य प्रायन रिया है। १भाग-1. ५०-५३।

8 प्रमाए० प्र०...वेद ] ३. सामवेद-(छन्दोग संहिता) 'साम' शब्द का अर्थ प्रिय किंवा प्रीतिकर वचन है। गायन को भी साम कहते हैं। संगीत द्वारा देवों को प्रसन्न करने वाले को 'उद्गाता' कहते हैं। शास्त्रों के कथनानुसार साम की १००० शासा हैं, पर सम्प्रति ८ही के नाम मिलते है। आठवीं राणायणीय शाखा के विष्णु पुराण के अनुसार नौ भाग हैं। सत्यत्रत सामश्रमी ने सामवेद साहित्य पर अच्छा परिश्रम किया था। राणायणीय के विभाग मे कौथुमी पर सायण-भाष्य है । जैमिनीय शासा भी छप चुकी है। ४. अथर्व वेद-(आंगिरसी संहिता ) अंगिरा ऋपि के वंशज अथर्वानपि के द्वारा आविष्कृत होने से इसे 'अथर्व वेद' कहते हैं। ऋषि श्रागिरस गोत्री थे,अतः इसकी संज्ञा अथर्वागिरस वेद भी है। शास्त्रों के अनुसार इसकी शासाएँ हैं जिनमें 'शौनक' और 'पैप्पलाद' यही दो उपलब्ध हैं । अथर्ववेद की पैप्पलाद शाखा काश्मीर में शारदा लिपि मे प्राप्त हुई थी जो जर्मनी में छपी। शाखाविभाग- जैसा कि प्रथम कहा जा चुका है वेदों की ११३१ शाखा थी, परन्तु अर उनमें से बहुत-सी लुप्त हो चुकी हैं। श्रीवल्लभाचार्य ने एक स्थान पर लिखा है कि सम्प्रति वेद की ११ शाखाएँ प्रचलित हैं। (शा०नि० प्रकाश कारिका ८०), उनकी 'प्रकाश' टीका के 'आवरण- भग' नामक व्याख्यान मे श्रीपुस्पोत्तम जी इनका उल्लेस इस प्रकार करते हैं- ( १ ) यजु की:-१-तैत्तिरीय, २-काण्वी, ३-माध्यन्दिनी, ४-मैत्रायणी ५-मानवी। (0) ऋक की-६शांसायनी ७ आश्वलायनी। (३) साम की-- कौथुमी ६ राणायणीय । वैदिक साहित्य के प्राधार पर । [ शु० पु० सस्कृत वाङ्गमय (४) अथर्व की १० शौनकी ११ पैप्पलादी। यह एकादश है । तैत्तरीय को ही हिरण्यकेशी शाखा कहते हैं एक ही वेद ऋर यजु, साम और अथर्व इन चार नामों से चार संहिता के रूप मे विभाजित किया गया है । ऋक के द्वारा होता, यजु के द्वारा अध्वर्य, साम के द्वारा उद्गाता और अथर्व के द्वारा ब्रह्मा यज्ञा- नुष्टान तत्पर होते हैं। अतः यज्ञ के स्वरूप में इनके चार भेद हैं। इस वेद प्रतिपादित धर्म की जिज्ञासा पूर्ति इतिहास पुराण नामक पाँचवे वेद से होती है । अतः विशेपतया पॉच वेद माने जाते हैं। [भाग० प्र० ४, २१, २२ श्लोक सुबो०] महर्षि वेद व्यास ने कलिकाल के जीवों को मन्द प्रन देख कर वेद का चतुर्था व्यास किया और अपने शिष्यों को इनका अध्ययन कराया । ऋग्वेद के पैल ऋपि यजु के वैशंपायन, साम के जैमिनि और अथर्व के सुमन्तु नामक ऋषि थे । इनमे सुमन्तु दारुण कठोर थे, अतः इनकी अभिचार की ओर अधिक प्रवृत्ति थी और यही कारण था कि अथर्व मे कुछ आभिचारिक प्रयोग मिलते हैं। वेद सभी प्रकार के जीवों के मनोरथ साधक गिने जाते हैं, अतः तामसी जीवों के लिये उनके अनुरूप उसमे ऐसे प्रयोगों का होना भी संगत है। चारों वेद धारणा सामर्थ्य के अभाव मे शिष्य प्रशिष्य और तन्छिष्यों के द्वारा अनेक रूप धारण कर स्वल्स रूप में विभाजित होते गर जिन्हें शासा रुप मे कहा जाता है । अल्प मेधावी पुस्प भी इन्हें धारण कर सकें तदर्थ कृपण पत्सल भगवान् वेद व्यास ने शासा रूप में इनका विभाग किया है। वेद-प्रतिपाद्य- प्रमाण मूर्धन्य वेद के द्वारा प्रमेय स्वरुप ईश्वर का परिज्ञान होता है। यह परम तत्त्व वेदान्त में 'बस', स्मृति में परमात्मा और भागवत में चारों वेदो ये सम्बन्ध में सहित, भाप्य, प्रारण्यक, ब्राह्मण मादि कौन कौन अन्य कहाँ कहाँ को है और उनसमून्य क्या है, यह सत्र परिचय प. रामगोविन्द जी रचित 'वैदिर शादित्य' नाम ग्रन्थ से विदित हो सकता है । +भाग• द्वा०६४ से ६० ठया ७५.१ से ४॥ • माग. प्र. ४, २१, २२ श्लो. मु.। ।

प्रमाण० प्र०. वेद ] 'भगनान्' शद से अभिहित होता है। अतः इस ब्रह्मलिंग प्रमेय का ज्ञान वेद प्रमाण से होता है। यद्यपि शु० सं० की सिद्धान्त दृष्टि से जैसा कि गीता में भी कहा गया है। भगवान् श्री हरि प्रमाणादि से परिक्षात नहीं हो सकते, ये अपनी इच्छा और कृपा से ही ज्ञानगम्य और किसी रूप में सामान आविर्भूत होते हैं, तथापि श्री वल्लभाचार्य के क्यनानुसार तप और वेद वोधित युति से ही परमात्म विषयक विद्या समधिगत होती है। अतःनेदाध्ययन-परिशीजन से परम्परया परमात्मज्ञान मेंसहायता मिलती है इने अपलापित नहीं किया जा सकता। वेद, स्वकीय साधन और स्वकीयार्थ प्रतिपादक-व्यास प्रणीत महाभारत में प्रथित भगवद् गीता तथा ब्रह्म सूत्र और समाधि-भाषा (भागवत) के द्वारा निःसन्दिग्य तत्वज्ञान से जीनों को श्रेय प्राप्ति कराते हैं, यह निर्विवाद है। श्रीवल्लभाचार्य के अतिरिक्त ममी याचार्य. प्रस्थानमयी (वेद, गीता, ब्रह्म सूर इन्हीं तीन) को प्रमाण मानते हैं, पर आचार्य के सिद्धान्त में व्यास की समाधि भापा (भागवत ) एक और चौथा प्रमाण है। वास्तव में भागवत के बिना तीनों के रहस्य का विशदीकरण भी नहीं होता। दम सिद्धान्त की प्रमाण-कोटि मे श्रुति और सून की एक कोटि है, गीता और भागवत की दूसरी । इन दोनों के प्रतिपाद्य अमेय में कोई भेद नहीं है । श्रुति में परमात्मा का रूप "य: सर्वज्ञ सर्वशक्तिः" के अनुसार ज्ञान और क्रिया दोनों से युक्त कहा गया है। इमीलिये दोनों से युक्त ब्रह्म का निरूपण करना सभी प्रमाण अन्यों का लक्ष्य है। बंद के पूर्वकाएड में केवल क्रिया ( यज्ञ रूप ) का और उत्तर काण्ड में ज्ञानस्वरूप का प्रतिपादन है तो व्यास-सूर वेद के संशयों का निगररण का नामम्बन्धिनी विज्ञामा की पूर्ति करते हैं। इसलिये दोनों एक कोटि के हैं। इधर मियाज्ञानशक्ति उमय रूप मे हमें माकार परमात्मा का परिदर्गन गीता और भागरत में होता है, ज्ञान स्वम्प से गीता परमामा का जो मातात् कराती है उसका तो कोई उदाहरण है ही नहीं, घर मिया (परित) स्प में उनकी विविध लीलाओं का जो •सान यंत. निकारिता [ शु. पु. संस्कृत वाङ्गमय परिदर्शन भागवत में होता है वह वेजोड़ है । अतः यह दोनों एक कोटि के हैं। वेद में मंडश और भागवत मे पूर्णत परब्रह्म का निरूपण हुआ है। इसे श्रीवल्लमाचार्य ने यो कथन किया है:- 'यज्ञरूपो हरिः पूर्वकाडे ब्रह्मतनुः परे, अवतारी हरिः कृष्णः श्रीभागवत ईर्यते ।" (निबन्ध शा०प्र०) वेद के ब्रह्मकाड ( उत्तर काड) मे नानमिद्धि के लिये उपासना का निरूपण आवश्यक समभा गया है, अत. अग्नि, सूर्य, इन्द्र. वरण, मरुत आदि देवों की उपासना का वहाँ वर्णन मिलता है । पर यह परम रहस्य है कि ये सब परमात्मा के ही अङ्ग हैं। अगी परमात्मा है। व्यास सूत्रों मे यद्यपि यह स्पष्ट है कि परमात्मा ही इस सृष्टि का कर्ता, पालयिता और संहर्ता है, तथापि यह वहाँ स्पष्टत. प्रतिपादित है कि ऐसे सभी शब्द किम्वा नाम जिनसे प्रथम सत्ता का अवमान होता है, वे सन परमात्मा के ही वाचक हैं। उन-उन देवों में और परमा मा में अङ्गाङ्गो भाव है, व्यष्टिरूप देव और उनकी उपासना सारन रूपा है, और अगी समष्टि ब्रह्म की उपासना फल रूपा है । यही दोनों की एक वाक्यता है और इसी आधार पर प्रमाण चतुष्टय द्वारा प्रमेय रा परि- ज्ञान होना चाहिये। वेद के पूर्व काण्ड का एक अन्य अर्थ 'मृत' है, जिसे अनुष्ठीयमान धर्म कहा जाता है। यह धर्म प्रवृत्ति स्वभाव (प्रमाण वल) का पोषक है । उत्तरकाण्ड का अर्थ 'सत्य' है जिसे प्रमीयमाण धर्म कहा जाता है, जो निवृति के लिये प्रमाण वल का पोपफ है और ज्ञानरूप है। [भाग० प्र० १०, २६ श्लोक सुबो.] आर्यवर्मानुसार मानर जीनन चार आश्रमों में विभक्त है । अतः वेद चारों आश्रमों को अधिकारानुसार शिक्षा प्रदान करता है जो इस प्रकार है:- क-प्रवृत्ति मार्ग प्रतिपादक १-ब्रह्मचर्याश्रम में अध्ययन और अर्यापोध रूप से। २-गृहस्थाश्रम मे धर्मानुष्ठान रूप से प्रमाण प्र....वेद] -निवृत्ति मार्ग प्रतिपादक ३-वानप्रस्थाश्रम मे तप स्थिति और ब्रह्म जिज्ञासा की पूस्ता से। ४-सन्यामात्रम में ब्रह्मज्ञान ब्रह्म- भूय स्थिति से। वेद के अनुसार चारों आश्रमों में देत्याश जीरों के द्वारा भी धर्मानुष्ठान, यज्ञयागादि विधान सम्भव है, एतदर्थ उनके द्वारा लो:- कल्याण में वाया न आने और उसका दुरपयोग न हो तदर्थ सलमूर्ति रूप से प्रकट होकर भगवान् साविकों को ही उस धर्म में प्रेरित करते हैं और राजस तामस जीवों को उससे निवृत्त करते हैं। यदि ऐसा न होता तो समरे जीव वैदिक मायनों की ओर ही प्रयत्नशीन दीसते, पर ऐमा नहीं है । परिपाल्यमान होने पर भी समस्त वैदिक धर्म जगत में प्रवृत्त होते हैं। अनधिसरी जीवोंको वैदिक धर्म से विमुस करने के लिये परमात्मा ऐसा अवतार धारण करते हैं जहाँ वे स्वयं वेद के विरुद्ध आचरण कर वैसा ही उपदेश देते हैं। जैसे वुद्धारतार आदि । राजस, तामस भ्रातजीन उनके रहस्यार्य को न समझ कर आपातत रमणीय अमन्त्रास्त्रों के वाग्नाल में फेम जाते हैं और वैदिक धर्म से मदा निमुम्ब रने रहते हैं। [ भाग० द० २ ३४ श्लोक सुबो. ] वेद के यज्ञात्मक पूर्व काण्ड में दो प्रमार के कमों के निरूपण है। १-नित्य कर्म, २-कान्य कर्म। नित्य कर्म का फल नित्य और सम्य पर्म का फल विकृत होता है। जिमे धन, पशु, पुन आदि के रूप में व्यक्त किया जाता है। काम्य कर्म के फलों का उल्लेस पेट में निय कर्म का प्रसिद्धि के लिये किया गया है, उसका एकान्तत' अभिप्राय लौरिक-फल सिद्धि नहीं है। काम्य कर्म फल-निरूपण नित्य कर्म का अङ्ग है क्योंकि पशु पुत्र आदि लोरिक फलों के बिना नित्य कर्मा प्रावरण अधिक कठिन हो जाता है। काम्य फन का प्रतिपादन वेद का मुस्य प्ररोजन नहीं है, किसी भी प्रकार से नित्य कर्म को सिद्धि करना ही पेट का परम प्रयोजन है। साराशतः वेद में माधन और फल दोनों रूप से श्रीहरि प्रति. पाटन किया गया है, क्योंकि चे ही पुम्पार्य रूप हैं और स्वकीय यज्ञादि कर्म द्वारा अभिव्यक्त होकर जीगरों का अय साधन करते हैं।

[ शु. पुमत वाङ्गमय रूप प्रपञ्च में जो जीव भगदति रिक्त बुद्धि से आसत हो जाते हैं उन्हे माया (अहंताममतात्मा ) धन से छुड़ाने के लिये ही प्रभु ने अनुग्रह कर वेद का प्राविष्कार किया है। प्राकृतिक गुणों के अनुसार देव, मानन और दानव नाम विविध जीव पैदा हुए हैं। वे सभी स्व-स गुण भेदानुसार वैदिक ज्ञान प्राप्त करते हैं। प्रकृति वैचित्य से वेदार्थ भी उनके समक्ष भिन्न भिन्न हो जाता है और इसी लिये अनेकपाद प्रचलित होते जाते हैं जो वेद-वाद' कहलाते हैं । गीता में "वेद-वाद रता." इस विशेषण से ऐसे लोगों का ही स्मरण दिया गया है। अत विशेषतया वेद का रहस्य सममाने के लिये व्याससून, गीता और भागवत का सहारा लेना चाहिए, उन्ही को एकवाक्यता से उसका निष्कर्ष जानना चाहिए। [ सर्व नि० निबन्ध कारिका १३ से ३२ ] वेद जिसे निगम और अन्य तदविरोधी शास्र जिन्हें आगम कहते हैं-परमात्मा का ही निरूपण करते हैं । वह परमात्मा गुणातीत और सगुण दोनों रूपों से सर्वत्र विद्यमान है । अत गुणातीत स्वरूप से घेद में और सगुण सरूप से भागवतादि शास्त्रों में उसका निरूपण [भाग. नि० वि० स्क० कारिका ] पूर्व मीमासा (जैमिनि सूत्र ) पर रचित कारिकाओं में श्रीवल्लभाचार्य ने वेद प्रणिहितो धर्मो ह्यधर्मस्तद्विपर्यय ' और 'वेदो- सिलो धर्म मुल्न' आदि श्रुति वचनों के आधार पर सिद्ध किया है कि- धर्म वही है जो वेद प्रतिपादित है, वेद विरुद्ध अधर्म है, वेद ही धर्म का वास्तविक प्राचार है, अतः वेदार्थ ही धर्म स्वरूप है, और इसी लिये महर्षि जैमिनि ने व्याससूत्रों की रचना के पूर्व 'अथातो धर्म जिज्ञासा' आदि सूत्रों के द्वारा उसका सम्यक विवेचन क्यिा है । यद्यपि व्यास से कहीं कहीं उनमा मत नहीं मिलता है और भगवान वेदव्यास में भी उनके मत का उल्नेय किया है तथापि जैमिनी के द्वारा वेद के पूर्व राडार्थ का और व्यास के द्वारा उसके उत्तर काण्ड का अतिरहस्य मीमासित हुआ है, और इसी लिये मीमासारूप में दोनों का आरयान होता है, पूर्व और उत्तर उसके दो विभाग हो जाते हैं। पूर्व मीमासा कारिका २२, २४] वेद के सम्बन्ध में कई विद्वान् गदों की प्रवक्ता को स्वीशर .

प्रमाण प्र०...वेद] १५ करते हैं। वे कहते है कि विधिवाक्यों के द्वारा ही अधिकारी को कर्म करने की प्रवृत्ति होती है, अतः वेद विधि वाक्य और तदनन्तर्गत शब्द ही प्रवर्तक माने जाने चाहिये । पर श्री वल्लभाचार्य स मत है कि ब्रह्म- वाद को छोड कर शेष सभी स्थानों पर शद के अपणानन्तर होने वाली प्रवृत्ति में शब्द को कारणता प्राप्त होती है। जिसके ६ पक्ष हैं-२ शब्द स्वरूप र शब्दाभिप्रायज्ञान३शब्दभावना ४शब्द की अमिधा वृत्ति ५शन्द कीआज्ञा शक्ति ६इष्ट साधनता का ज्ञान । परन्तु यह सब प्रवृत्ति मे कारण नहीं होते । कारण तो भगवान श्री कृष्ण की इच्छा ही है, वे जहाँ जिसे जिस रूप में प्रवृत्त करना चाहते हैं,करते हैं। निवृत्त करते हैं और तदनुरूप ही उम गर्य की निष्पत्ति होती है । वेद का मूल मन्त्र गायनी इसी ओर संकेत करता है और केन छान्दोग्य आदि उपनिपदों में इसमा सष्ठी- करण हुआ है। [ सवं नि० निबन्ध० का० १७७ से १८१] वेद सम्बन्धी मान्यता- परमाप्त भगवन्निश्वास रूप वेद के सम्बन्ध में श्री वल्लभाचार्य इस प्रकार प्रतिपादन करते हैं वेदा इति, शब्द एक प्रमाणम्, तत्राप्यलोकिक ज्ञापकमे। तत्स्वतः सिद्ध प्रमाए भा प्रमाणम् । वेदाः सर्व एव काण्डद्वयस्थिताः, अर्थवादि रूपा अपि । [तस्व दी० शा० निवन्ध कारिका ७] इसका तात्पर्य है कि प्रत्यक्ष अनुमान ऐतिह्य और शब्द इनकार प्रमाणों मे शब्द ही वास्तविक विश्वसनीय प्रमाण है । अन्यों में भ्रान्तत्वादि दोप होने के कारण उन्हे एवान्ततया प्रमाण नहीं माना जा सकता । शब्दार्थ भी यही कहता है, अत. आत वाक्य रुप शब्दात्मक वेद ही अलौकिक परिवोध के लिये प्रमाण हो सकते है । शब्द प्रमाण में भी इतर साधारण शब्दों को समानता के कारण शब्दत्व रुप मे वेदो प्रामाण्य नहीं है, अपितु अलौकिक ज्ञापक शब्दत्व रूप से हम उन्हे प्रमाण मानते हैं । अर्थात् धर्मया ब्रह्म के स्वरूप जैसे अलौकिक पदार्थ तत्व से चेद के अतिरिक्त अन्य प्रमाण प्रदर्शित नहीं कर सस्ते । 'प्रावारण प्लवन्ते' 'गावो वे सत्र मासत' इत्यादि वाक्य जो लोस्रष्टि से असम्बद्ध प्रतीत होते हैं, उनमे ज्ञाता के बुद्धि-दोप से अप्रमाणिकता आती है। r [ शु० पु० संस्कृत वाङ्गमय श्रत वे सब अर्थवाद आदि भी स्वत प्रमाण भूत हैं । प्रमाण रूप से उसी को स्वीकृत पिया जाता है जो लोक से अनधिगत अर्थ को ज्ञान गम्य करता है । "लोमानधिगतार्थ-गन्तृत्व रूपस्यैव प्रामाण्यस्य स्वीकारात्"। [पावरए भग निवध ] प्रामाण्यवाद दो प्रकार का है.-१ स्वत प्रामाण्य २ परत प्रामाण्य परत प्रामाण्य-वाद में प्रवृत्ति के सामर्थ्य से ही ज्ञान की प्रमाणता का प्रहण होता है । उसके लिये भी किसी अन्य सामर्थ्य की आवश्यकता होगी, इस प्रकार की अनवस्या के हराने के लिये कहीं विश्राम करना होगा, सो आगे चल कर या तो योग सशुद्ध अन्त करण को ही प्रमाण मानना पडेगा, अथवा शुद्ध सत्व को ही प्रमाण का अनुप्राहक स्वीकार परना होगा। ऐसी अवस्था में उससे उत्पन्न होने वाले ज्ञान को स्वत प्रमाता विवश होस स्वीकार करनी होगी। इधर जब बिचार करते हैं तो योगसिद्धि और सत्व को सशुद्धि अत्युक्त साधनों से ही हो सस्ती है, यह मानना होगा । उक्त सावन जिनका महापुरुप आचरण करते हैं-का विश्वास वेद के द्वारा ही सम्भव है, अत सर्व निरपेक्ष बेद ही अन्ततो गत्या स्वत प्रमाणभूत सिद्ध होते हैं। क्योंकि उनमे ही सत्वसशोवक्ता अनधिगतार्थ गन्तृत्व भगवद्वाम्यता और भगवन्निश्वास रूपता है, वे सत्य नित्य और श्रद्धय है, निरतिशय श्रेय प्रद हैं। परत प्रामाण्य-वाद मे अनेक दोप होने के कारण स्वत प्रामाण्य वादी उन्हे (वेदा को) ही निरपेक्ष प्रमाण मानते है, अत्त समस्त वेद जो पूर्व उत्तर काण्ड दो रूपों मे अवस्थित ओर अथवादादि रूप है स्वत प्रमाण हैं, उनकी तुना पर कोई प्रारूट नहीं हो सकता। 'प्रावाण प्लवन्ते' आदि वाक्यों की यथार्थता हमे रामावतार म सेतुबन्ध प्रकरण म दीखती है । अत वेद अक्षर मान भी अन्यथार्थ का कथन नहीं करता। "वेदो- क्षरमालमप्यन्यथा न वदति" इस प्रकार श्री वल्लभाचार्य वेद के सम्बन्ध म अपनी मान्यता प्रस्तुत करते हैं। उनके अन्य कुछ वाक्य इस प्रकार हैं। १ वेदश्चाक्षर माम्मप्यन्यथा न वदति,अन्यथा सर्वत्रैव तदविश्वास प्रसङ्गात् २ वेदेक्षरमात्रमन्यथा कल्पनेऽपि दोष स्यात् । ३ तस्मात् वेदेक्षरमात्रस्याप्यसत्यार्थ ज्ञानस्याभावाद् वैदिकान न सन्देह प्रमाण०प्र० पेद ] ४ वेदोक्तादणुमात्रेपि विपरीतन्तु यद् भवेत् । तादृशं वा स्वतन्त्रं चेदुमय मूलतो मृपा [अणु०२, २०३६] भारत मा० ५० गट्टूलालाजी ने 'वेदान्त-चिन्तामणि' मे कई प्रमाण और युक्तियों के द्वारा घेदों की स्वत. प्रमाणता पर पर्याप्त प्रकाश डाला है। वेद के प्रति विविध दृष्टिकोण- वेद के स्वरुप सम्बन्ध में आचार्यों ने कई दृष्टियों से विचार क्यिा है, जो उनके विभिन्न प्रन्यों में मिलते हैं । यथा (१) वेद की वृक्ष-रूपता में कहा गया है। "व्यापि वैकुण्ठे अक्षरात्मके प्रणवचीजो वेदत्तरररित । यथा अस्माक सारघ तथा स्वर्गे कल्पवृक्षवद् वैपुण्ठेऽपि । चैदैक्समधिगम्ये शब्दरसात्मक कल्पवृक्ष । न तु लक्षणा । वेदस्य उत्कृर्प आर्थिक । निगम स एव कल्पतरुः, सर्वपलदान समर्थ किल्प स चासो तरुश्चेति कल्पतरु " [ भाग० सु० प्र० स्क० १,३] १०) वेदों की गरड-रूपतादि के प्रसग मे श्री वल्लभाचार्य ने कहा है। "वेदा हि गरडप्राया पक्षिण , तेषा मूलस्थान भगवतो मुसपद्म- मेव । यथा पञ मकरन्दादि पानार्धमागन्तुका अपि पक्षिणस्तिष्ठन्ति एतेषा तु तभीडमेव । तेहि तत्रैव लब्ध जन्मान , तत एयोद्गच्छन्ति । अन्यत्र चरन्तोपि नीडतात्पर्या व ते । छन्दसा सुपर्णत्व श्रुतिसिद्धमेव । "छन्दासि रथो मे भवत इत्यन तेषामेव रथत्वम् । 'छन्दासि सौपर्णेया इति श्रुते । सुपर्णपदेन च गरडरूपतया भगवत्समारूढा एवं ते लोके प्रचरन्ति, यनरूपं भगवन्त लोके बोधयन्ति । ऋपयो हि मन्त्र-द्रटारो मगवन्मत्रं जानन्ति । वेदाना च पुनस्तात्पर्ये विचार्यमाणे भगवत् पर्द जानन्ति प्रपन्ना चरणादन्यत्र गच्छन्त्यपि गगा वेदवत्सुनस्तत्रव प्रवेक्ष्यतीति वेदाना शान्तार्थे निरूपितम् । महात्म्य च यथा गगाया पदसम्बन्धात् । एव वेदोश्रामण्यमपि भगवत्प्रामाण्यादव । मन्त्रायुवेद पच्च तत्प्रामाण्य प्राप्त प्रामाण्यात् इति स्मृते । [भा० तृ० ५, ४०सु.] (३) एक स्थान पर प्राचार्य ने गायत्री को वेद माता बतलाते हुए कहा है - "यह वेदत्रयार्थ प्रतिपादिना है । गायत्री बीज, वेद वृक्ष है, और भागवत प्समा पल है । वेद के यज्ञ और ब्रह्मज्ञान दोनों काण्डों के अर्थ हैं, जो एक दूसरे के हेतुभूत हैं । [भा०प्र० १ १ सुबोअनु० ] [ शु० पु० सस्कृत-वाङ्मय (४) ब्रह्माजी के लिये वेद का विस्तार दिया गया है। इसलिये भगवान् का हार्दिक भार वेद में ही मिल सकता है, लोक में नहीं । इसीलिये इसे प्रभु ने अपने हृदय मे उत्पन्न किया है । [भा०प्र० १,१ सुष्अनु.] (1) "परम ब्रह्म रचित सृष्टि दो प्रकार की है ..१ रूपसृष्टि २ नामसृष्टि भगवत्स्वरूप-ध्यान के अतिरिक्त रूप सृष्टि में जो जीव आसक्त हो जाते हैं उन्हें बन्ध और सर्वत्र भगवद्भाय की स्फूर्ति से ससार में अनासक्त रहने वाले जीव को भगवन्नामात्मक सृष्टि के द्वारा मोक्ष प्राप्त होता है । अतः रूप-प्रपंच में आसक्त जीवों के निवारण के लिये प्रभु ने चेद का प्रादुर्भाव किया है । रूप-प्रपंच की उत्पत्ति, स्थिति, प्रलय नामक तीन अवस्थाएँ, नाम प्रपंचात्मक वेद में नहीं है। वेद नित्य हैं। उनकी उत्पत्ति नहीं, आविर्भावात्मक प्रकाश होता है, उनकी सर्वदा स्थिति है प्रलय नहीं, प्रपंच के प्रलय के समय भस्ना- संकोचवत् उनकी सूक्ष्मतया अवस्थिति होती है।" (६) "जैसे वर्ण अनेक भापानी मे प्रथा-प्रथा रूप से विस्तृत है, उसी प्रकार अति का भी शासाभेद से विस्तार है । तप साधन योर भग- वत्कृपा स महर्षि इसका श्रवण साक्षात्कार करते हैं अतः इसे श्रुति कहते है । ब्रह्म के समान वेद भी अविकृत हैं, जीवों के उद्घागर्थ मन. पूर्वक इनका प्राध्य सृष्टि के अादि कर्ता ओर आदि कवि ब्रह्मा के लिये हुआ है जिससे परपरया उसका ज्ञान जीवों को हो सके । वेद मे स्थित भगवान् के हार्दिक अभिप्राय की अवगति में बड़े-बड़े विद्वान् भी मोह को प्राप्त हो जाते हैं। भगवान् स्वयं या उनके प्रपन्न महापुरुप ही उसका ज्ञान करा सकते हैं।" (७) "वेद सर्वदान-समर्थ हैं, कामनाओं के द्वारा जन जीव क्लेशित होते है, तब उनकी कामना-सिद्धि के लिये वेदो के द्वारा अनेक यज्ञ योगादि साधना का प्रचार हुआ, और विभिन्न शासाओं का प्रणयन " [भाग० प्र० १, १ सुबो अनु० ] (८) शापाभेद के विषय में श्री वल्लभाचार्य का कथन है कि-'अनन्त मूर्ति यजरूप ब्रह्म को एक मूर्ति जितने भाग से प्रतिपादित की गई है वह एर शासा है । इमी प्रकार अन्य भी । यद्यपि ब्राझए को सम्पूर्ण वेद का स्वाध्याय करना विधि प्राप्त है, तथापि प्रमेय-चल के श्राश्रय पर एक ही मूर्ति सर्व मूर्ति का स्वरूप होने से अल्पगुद्धि पुरप के प्रमाण प्र...वेद ] १६ लिये भक्ति ज्ञान को उत्पन्न कर सकती है । एतावता एक शाखा का अध्ययन तो ब्राह्मण को परमावश्यक है, समय मिलने पर अन्य शासाओं का परिशीलन भी उसे आवश्यक है । ऐसा सोच कर ही भगवान वेद व्यास ने वेद को संडश: शाग्यारूप में विभाजित किया है।" [ मा० प्र० ३, २१ सु० अनु० ] (E) "श्रुति प्रतिपादित यज्ञस्वरूप विष्णु, भौतिक और कालकृत दोपों के दूरीकरण में समर्थ है । प्रजाओं की शुद्धि के साधन अग्निहोत्रादि पंचक चातुति कर्म है । यह वेद के द्वारा ही अनुष्ठान मे आ सकता है, अतः यज्ञ स्वरूप विष्णु के विस्तारार्थ वेद या चतुर्धा विभाग किया गया है, वास्तव मे तो वेद एक ही है ?" [भा०प्र० ४, १६ सु०] (१०) "वेद भगवन्निश्वास होने से भगवत्स्वरूप ही है...सृष्टि के समय उनमा अविर्भाव होता है, प्रलय के समय उनका अन्तः प्रवेश। मध्य अवस्था में वे स्वकीय तत्व का प्रतिपादन करते हैं। उनका जो भी अर्थ है वह ब्रह्म है अतः उनकी 'ब्रह्म' संज्ञा भी है। तात्पर्यतः वे नारायण स्वरुप हैं, और उन्हीं का वे विशद व्याख्यान करते हैं। उसमें दो काण्ड हैं, जो विविध रूप से ब्रह्मतत्व का निरुपण करते हैं। यथा- पूर्व काण्ड में- (क) स्वरूप से वेद भगवद्प हैं यह "एतस्यैव महतो भूतस्य निःश्वसितं यद् ऋग्वेदो यजुः" इत्यादि अति में स्वतः कथित है। (स) अर्थ से वेद भगवद्प हैं क्यों कि उनका प्रतिपाद्य अर्थ वही है। अन्य स्तचनीय देव अङ्ग और भगवान् अंगी है। (ग) फल से बेद भगवद् रूप हैं क्योंकि फल स्वरूप स्वर्गादि लोक विराट् पुरुप के विग्रहान्तः पाती हैं। (घ) साधन से बेद भगवद्प है क्योंकि यज्ञादि साधन "यज्ञोवै विष्णुः" आदि श्रुतियों के कथन से तद्प है। (ड) परंपरा से वेद भगवद्रूप है यह तो शाखों में स्वयं निति है। उत्तर गण्ड में- (क) साधन रूप से घेद भगवद् रूप है, क्योंकि उसके निर्दिष्ट साधन योग और तप दोनों को ब्रह्म रूप कहा जाता है।

" [ शु० पु० संस्कृत-वाङ्मय (स) कार्यरूप से वेद भगवद् रूप है क्योंकि योग और तप का कार्य विज्ञान है, जो श्रुति के कथनानुसार ब्रह्मवाची है । (ग) फल रूप से वेद भगवद् रूप है क्योंकि परम गति जो फल कही जाती है, परमात्मा की स्वरूप-प्राप्ति ही है। (११) जीव भगवदयुद्धि में अवस्थित अर्थ को हृद्गत कर सके एतदर्थ वेदों का प्रणयन है । भगवदभिप्रेत अर्थ का साधक होने से वेद भगवरपर है, भगवद् प है। इस प्रकार शब्द अर्थ दोनों रूपों से वेद की ईश्वरता सिद्ध होती है ।" [ भा. द्वि० ५, १,१६ सु.] (१२) एक स्थान पर श्रीवल्लभाचार्य ने वेदों को भगवान्, का पीताम्बर कहा है । उनका कहना है कि-"जिस प्रार घट आदि पदार्थों पर पड़ी हुई सूर्य की किरणें उसे प्रकाशित करती है ; आच्छादित नहीं करतीं, उसी प्रकार पीताम्बर परमात्मा के परमानन्द स्वरूप को प्रकाशित ही करता है, आच्छादित नहीं । वेद पीताम्बर रूप शब्द है और उससे लपेटा हुआ ब्रह्म का श्रीविग्रह अर्थ रूप अर्थ के गांभीर्य सौंदर्य और मनोहरता को प्रकट करता है। वेद भी अपनी शब्द-राशि द्वारा परमपदार्थ रूप श्रीप्रभु को विशेष आभासित करता रहता है । अथवा-- एक समय वेदों ने प्रभु से अपने भीतर आवद्ध हो जाने की प्रार्थना की और भगवान् छन्दो मे आवद्ध होगये । “छन्दोभि राच्छाद- यस्तन्छन्दसां छन्दस्त्वम् " आदि कई श्रुतियाँ इस अर्थ को उपोद्वलित करती हैं, तदनु भगवदिच्छा से ये सब वेद पीताम्बर स्वरूप होगये, वे तभी से भगवान् को आच्छादित किये हैं। उसी समय से पीताम्बर को वेद और वेदों को पीताम्बर माना जाता है।" [ भाग० प्र० ६,३३ सुबो० ] (१३) "जिस प्रकार परब्रह्म भगवान् अर्थ स्वरूप हैं उसी प्रकार घेद भी शब्द-राशि रूप ब्रह्म हैं, जल-राशि के समान । जैसे ब्रह्म मै सर्वत्र आनन्द प्रतिफलित होता है उसी प्रकार वेद मे सर्वत्र फलों का उल्लस है क्योंकि वह भी ब्रह्मस्वरूप ही है । शब्द प्रस्थान होने के कारण यद्यपि यह शब्द मात्र है, किन्तु उसका अर्थ परब्रह्म रूप फल है।" [ भाग० दि० २० सुबो०] प्रमाए प्र. वेद ] २१ (१४) "प्रथमाधिकार मे जिज्ञासु के लिए सभी गुणमय है । सत्वपरता ही ज्ञान की मुरयता है। ऐसी अवस्था मे वेद सात्विक प्रमाण माने जाते हैं। जहाँ तक साधारणतया जीव म्पकीय गुणात्मक वृत्तियों से प्राबद्ध होकर घेद के द्वारा स्वकीय कामनाओं की सिद्धि अधिगत करता है, फल-प्रतिपादक होने के कारण वेद भी गुणियविषयक हो जाते है, और तदर्थ ही गीता मे कहा गया है:- " गण्यविषया वेदा. निस्त्रगुण यो भवार्जुन," [२, ४५] इसा तात्पर्य वेद-प्रतिपादित विधि-निषेध-परता से तटस्थ रहने का है, पर जब साधक इन दैहिक, ऍद्वियिक, मानसिक और अन्त.. करणात्मक वृत्तियों से दूर होजाता है, उसे सर्वत्र या परमानन्दता का भान होने लगता है, वेद भी उसे भगवद्रूप परिलक्षित होने लगते हैं।। [ भाग० प्र० २, ६ सु० ] (१५) साधनावस्था में जीव को सावधान होकर चलने का शास्त्रीय आदेश है और यह वेद के द्वारा जाना जा सकता है, अतः वेद मार्ग के विरुद्ध आचरण के सम्बन्ध मे श्रीवल्लभाचार्य का "वेद-मार्ग-विरोधेन येषा करणमण वपि, ते हि पासण्डिनो ज्ञेया वेदार्थस्य विनिन्दका:"(सर्व नि०२८४) अतः पाखंड और वेदविनिन्दा होने से बचना सत्यधर्मा- चलम्बियों के लिए परमावश्यक है। वेदोक्त कर्माचरण से ही जीवों यो श्रेय प्रेय संप्राप्त हो सकता है। (१६) वेदमार्ग की रक्षा श्रीवल्लभाचार्य के सिद्धांतानुसार ब्राह्मण अत्ति- रिक्त जन से नहीं हो सकती। ब्राझण में भी जन्मजात ब्राह्मण की अपेक्षा वेदाध्यायी महान् है, उसमे भी वेदार्थवित् का ऊँचा स्थान है, बेदावित की अपेक्षा पदार्थ के सर्वसन्देह वारक और उसमें भी यज्ञादिवर्ता का वैशिष्ट्य है, उसमें भी मुक्तलिङ्ग गलितदेहाभिमानी और उसकी भी अपेक्षा निरभिमान होपर ऐहिकामुप्मिकार्थ, जो न कुछ चाहता है और न कुछ तदर्थ करता है यह उत्तम है। [भा.तृ. २६, ३२ श्लोक सुबो०] -- [ गु० पु० सस्कृत-वाङ्मय इस श्रेणीनिरूपण से विदित होता है कि वैदिकमार्ग की संरक्षा के लिए कितने विशिष्ट पुम्प की आवश्यकता है । (१७) भागवत [द्वि०७, १२ शोक ] में वर्णित है कि भगवान् ने मत्स्यावतार धारण कर वेदों की रक्षा की थी, इस श्लोक की सुनोधिनी मे महाप्रभु ने लिखा है कि जलप्लावन के समय भय के कारण ब्रह्माजी के मुख से जब वेद विगलित होगये, तो उन्हें दानवेन्द्र हयग्रीव लेकर भाग गया। मस्यावतार धारण कर प्रभु ने उसे मार कर वेदों की रक्षा की, और वे वेदा को लेकर जल मे विहार करने लगे। उस समय ज्ञान-भक्ति-प्रतिपादक अन्य वेद भी उन्हीं से उद्भूत हुए, ऐसा प्रसिद्ध है । परमात्मा के हयग्रीवायतार ने भी वेदों की रक्षा की है, इन दोनों अवतारों में यह वैशिष्टय है कि- हयग्रीवावतार मे यज्ञोपयोगी और मत्स्यावतार में सर्वोपयोगी वेदों का उद्वार हुआ था । (१८) वेद ब्रह्मस्वरूप हैं और ब्रह्म वेदमय है। इस आंतरिक रहस्य को विविध ब्रह्म भेद के द्वारा प्रदर्शित करते हुये आचार्य कहते हैं- (१) आधिभौतिक ब्रह्म उपदेशार्थ ब्राह्मण रूप में स्थित है। (२) आध्यात्मिक ब्रह्म वेदस्वरूप से प्रतिष्ठित हुआ है और, (३) आधिदैविक ब्रह्म अक्षर ब्रह्मरूप से माना जाता है । अत. ब्रह्म, वेद और वेदमूर्ति ब्राह्मण जिसमा मूल रूप ब्रह्मा है, एक ही है। इनके मध्य कोई तात्विक भेद नहीं है। [ भा० तु. ६,३० एलोक सुबो०] वेद-चतुष्टय आदिशति ब्रह्मा के चार मुख और उनके विनियोग के सम्बन्ध में (भा० तृतीय १२, ३७ की सुबोधिनी में) इस प्रकार निर्देश दिया गया है.- वेद ब्रह्मा के दिशानुसार मुस विनियोग १ ऋग्वेद पूर्व मुस से उद्गत शास्त्रपरिज्ञान होता २ यजुर्वेद दक्षिण मुस से अपर्य ३ सामवेद श्चिम स्तुति उद्गाता ४ अथर्ववेद प्रायश्चित्त रहीं-कहीं शाखों मै अथर्ववेद का समावेश अन्य वेदों में कर लिये जाने से वेदत्रयी का भी उल्लेस मिलता है। - इज्या . " उत्तर " " " २३ - " प्रमाण प्र.वेद वेदार्थ परिज्ञान-पद्धतिः- प्रस्तुत पद्धति के सम्बन्ध मे मठपति जयगोपाल भट्ट ने स्वकीय 'तैत्तिरीयोपनिषद्-भाष्य' मे सयुचिक विवेचन दिया है, वे कहते हैं:- वैदिक व्यारयान दो प्रभार से किया जाता है:-- १-शब्द शक्ति वृत्ति से प्रतीत अर्थपरता के द्वारा अथवा २-परस्पर विरुद्ध अर्थ वाली अतियों में स्वोत्प्रेक्षित तर्क के द्वारा तात्पर्य प्रतीत अर्थपरता के द्वारा । इन दो में से शब्दशतिवृत्ति प्रतीत अर्थपरता से ही विचार करना वैदिकों को संमत है । तर्क के विपय में तो "नेपा तर्फेण मतिरपनेया" श्रुति च अचिन्त्याः सलु ये भावा न तांस्तकणे योजयेत् " आदि ब्रह्मांड पुराण के कथनानुसार तथाव "पुराणं मानवतो धर्म. सांगो वेद श्चिकित्सितं, आज्ञा सिद्धानि चत्वारि न हन्तव्यानि युक्तिभिः [गौ० स्मृ०] के कथनानुसार वेदार्य मे तर्क करने का सर्वथा निषेध है। शुष्क तर्फ जो केवल शब्द-जाल तक ही सीमित रह जाता है, निरर्थक है और इसी लिये साहित्य शास्त्र भी (१) प्रभु संमित वेद, (:) मिन संमित पुराण और (३) कान्तासम्मित काव्यादि, इस प्रकार शन्दों को निधा विभाजित करता है। जिस प्रकार कोई व्यक्ति दण्ड-भय से प्रभु-समित वचन मे तर्क करने से छुटकारा नहीं पा सस्ता, उसी प्रकार पापफल के भोग-भय से कोई वेदवोधित धर्म मे तर्क करके छुटकारा नहीं पा सकता । प्रायश्चित रूपी दण्ड वेद विपरीत अन्यथा आचरण दोष का प्रतिफल है। वेद तर्क के मुस का निरीक्षण कर प्रायश्चित का विधान नहीं करता, वह तो समान रूप से उपादेय, सब के लिये धर्माचरण का आदेश देता है और विरोधाचरण के लिये दण्ड का विधान ! इस सिद्धान्त में बुद्धि विवेक का ग्रहण है, विचार को स्थान है, पर तर्क द्वारा अपलाप को नहीं। इसी लिये एक स्थान पर स्मृति में कहा गया है " आप धर्मो- पदेशं च वेदशास्त्राविरोधिना, यस्तोरणानुसधत्ते स धर्म वेद नेतर" वेद शास्त्रों में समन्वयात्मक पद्धति से किए गये तर्क को स्थान दिया गया है। "तर्काप्रतिष्ठानात्" [ व्याससूत्र २, १, ११] के कथनानुसार श्रीवल्लभाचार्य ने इस पद्धति को 'वेदयुक्ति' शब्द से अभिहित किया है। जैसा कि अन्यत्र कहा जायगा, तप, वेदयुक्ति और भगवत्कृया इन " - [ शु० पु. संस्कृत वाङ्मय साधनों से ही वेद-विद्या का परिज्ञान होता है। तर्क के सम्बन्ध में श्रीवल्लभाचार्य ने कहा है - तरौ नाम प्रत्यक्षतो दृष्टस्य पदार्थस्य निर्याझिोपपत्ति यस्मिन् पदार्थ कल्प्यमाने दृष्टोथ उपपद्यते" [भा० १२,२५ श्लोक सुबो०] कहने का तात्पर्य यह है कि वेद शास्त्रों के ममर्थित अर्थ से विरूद्व तो कोई मान्यता नहीं है । जैसा कि ऊपर कहा गया है-श्राचार्यों का अभिमत है कि -यद्यपि वेद ब्रह्म का परिज्ञान प्राप्त करने का साधन है, पर वह ब्रह्म अली फिल प्रमेय है । लौकिक वस्तु लीसि युक्ति से जानी जा सकती है, अलोरिस नहीं । ब्रह्म अलोरिक (वैदिक ) है । वेद प्रतिपादित अर्थ का अयोध शब्द साधारण विधि से नहीं हो सस्ता, उसके लिये अन्य ही साधन हैं । इन साधनों के सम्बन्ध में वे कहते हैं- "तपसा वेदयुक्त्या व प्रसादात् परदात्मन । विद्या प्राप्नोत्युस्क्लेश क्वचित् सत्ययुगे पुपान्। [शा. तत्व नि ६२.६३] इन साधनों मे तप पूर्वाह्न है, वेद-युक्ति सहसारिणी और भग- वत्प्रसाद मुरय साधन है । तत्वदीप प्रमाश की टीमा 'आवरण भग' मे श्रीपुम्पोत्तम जी ने तथा रश्मिसार श्रीयोगि गोपेश्वर जी ने उसे स्पष्ट रिया है रि यहाँ 'तप शन्द से आलोचना अर्थ न लेकर अनशनादि तपश्चर्या लेना चाहिये । जैसा कि छान्दोग्य, तैत्तिरीय आदि उपनिपदों म "पचदशाहानि माशी"० रूप मे कहा गया है । एतावता यहाँ तप (अनशनादि क्रिया ), वेद-युक्ति (वेदार्थ ज्ञान) और परमात्मप्रसाद (भक्ति) इन तीना साधनों का निर्देश किया गया है । अर्थात् वेदार्थ रूप ब्रह्म का महात्म्य-ज्ञान और स्वरूप परिचय तीनों साधनों के समन्वय से ही हो सकता है, केवल "तत्वमसि, सोह" आदि वाक्योक्त ज्ञानोपदेश से नहीं। इसके लिये देश काल दोनों की समीचीनता पचाङ्ग सम्पत्ति के साथ येद द्वारा ब्रह्म-ज्ञान किया जा सकता है । 'यमेवैप वृणुते तेन लभ्य धातु प्रसादात् आदि श्रुति-वचन भगवदनुप्रह के लिये प्रमाण स्वरूप हैं । वेद युक्ति के सम्बन्ध म स्पष्ट पिया गया है कि-जिसप्रकार श्वेत केतू- पाग्यान में न्यग्रोवफल द्वारा समझाने का उल्लेस है उसी प्रगर वैदिक युक्तियों से वेदार्थ मा परिझान किया और कराया जाना चाहिये। रश्मिगार श्रीगोपश्वरजी ने उपनिषदुक्त निवृत्करण रूप वेद-युक्ति का प्रमाण प्र०...वेद ] निर्देश करते हुए स्थूल से सूक्ष्म परिज्ञान की ओर संकेत किया है । [अणु. १, १, १ रश्मि टीका ] तात्पर्य यह कि अलौकिक वेदार्थ-परिज्ञान कुछ विशिष्ट साधनों के सहारे ही किया जा सकता है, उक्त साधनों के अतिरिक्त उसके लिये इतर साधन अकिंचिकर हैं। इस लिये स्वोस्पेक्षित तर्फ के आधार पर वेदार्थ का निर्णय करना उसके यास्तविकार्थ से कोसों दूर रहने के समान होगा। वस्तुतः इस प्रसर वेदार्थ का परिशीलन न कर शब्द की शक्तिवृत्ति से वेद जैसा कहता है, उसे उसी रूप में प्रमाण मानना चाहिये । वेदार्थ के समगाने से हम अल्पज्ञ जीवों को जो सन्देह हो या हो सस्ता हो, उसके निराक- रणार्थं भगवद्दिभूति, सर्वज्ञ महर्षि वेदव्यास ने अवतार धारण कर उन ब्रह्मसूत्रों की रचना की है, जिनका उल्लेस श्रीकृष्ण नेस्तोक्त गीता मे "ब्रह्मसूत्रपदै श्चैव हेतु मद्भि विनिश्चित.।" इस वाक्य मे किया है । ताक्ता ब्रह्मसूत्रोक्त सिद्धान्त और गीता के स्पष्टीकरण को सामने रस कर वेद का ज्ञान अधिगत करना चाहिये। अति प्रतिपादित सिद्धान्त का सन्देह श्रीकृष्ण-वास्य गीता से तज्ज्ञानोत्य सन्देह का अपनोद ब्रह्मसूत्रों द्वारा और उसका भी विशदीकरण भागवत में वर्णित समाधि भाषा द्वारा करने में ही सुकरता है। श्रीवल्लभाचार्य इसी लिये एक स्थान पर रहते हैं--भगवान् तत्प्रपन्नो वा वेदार्थ वित् । प्रस्थान-चतुष्टय की एकवाक्यता से जो रहस्य परिज्ञात होता है वही वास्तव मे उपादेय है । यद्यपि वल्लभाचार्य के अतिरिक्त अन्य आचार्यों ने भागवत को प्रस्थान चतुष्टय मे न मान कर प्रस्थान गयी को ही स्वीकार किया है, तथापि सभी ने वेदार्थ-परिज्ञान के लिये अन्य आगमों का आश्रय लिया है, यह निःसन्दिग्ध है । यह सत्र शब्द की अभिधावृत्ति के द्वारा ही सम्भव है, जिसमें अग्रिम प्रस्थान उसे पुट करते हैं। यों देखा जाय तो लौकिक तर्फ के द्वारा अलौकिक वेदार्थ रूप परमारमा श्रीकृष्ण का स्वरूप और उनकी आना रूप वेद का तात्पर्याव श्रोध हो भी नहीं सकता, अर्जुन की यह उत्ति स्वयमेवात्मनात्मानं वेत्य व पुरुषोत्तम [गीता १०,१५] क्तिनीसष्ट है । "मां विधत्तेऽभिधते मा विकल्ल्यापोह्यते त्वहम् एतावान् सर्व वेदार्थः शन्द आस्थाय मां भिदाम्"। [भाग०११,२१,४३वेदैश्च सर्वे रहमेव वेद्य "वेदान्तकृत् वेदविदेव चाई [ शु० पु० संस्कृत वाडमय "मर्वे वेदायत्पदमाम नन्ति" आदि स्मृति पुराण वचन इसी का दिग्दर्शन कराते हैं । इस लिये वैदिक अर्थ का अनुसन्धान शद शक्तिवृत्ति से प्रतीत, अपच अन्य समन्वयात्मक शास्त्रों से परिपुर रूप से करने को श्रावश्यक्ता है। वेदार्थ परिज्ञान के विपय म श्रीव भाचा श्रीकृष्ण वाक्य गीता को प्रामाणिकता देते हुए कहते है। "येदान मपि तदुक्त प्रकारेणैवनि गय" [शा० त० नि०४] सम्पूर्ण वेद मे पड्गुणैश्वर्य सम्पन्न भगवान परब्रह्म श्रीकृष्ण का ही प्रतिपादन है, यह श्राचार्यश्री का उद्घोप है-"पडगुणैश्वर्यसम्पन्नो भगवान् हयतु भ्रान्तशास्त्र ? प्रतिपन्न , दार्थोप्ययमेवेत्यवादिष्य'। [ भा० द्वि० १ ५ सुनो.] वेद के अर्थ करने के सम्बन्ध में श्रीआचार्ग ने स्वकीय पत्राव लम्वन' नामक ग्रन्थ म कहा है “ये धाश दा यता उपदेशे प्रकीर्तिता , तथेवार्थो वेद रारो कर्तव्यो नान्यथा क्वचित् । [कारिका ४] "अर्थात् पाणिन्यादि श दाचायों के करित उपदेश मे धातु और शब्दों के जो अर्थ कहे गये हे, तदनुसार ही वेदों का अर्थ करना चाहिये अन्यथा नहीं । उससे इधर उधर की कल्पना और लक्षणा करने की आवश्यक्ता नहीं है"। "श दार्थ के सम्बन्ध मे विवाद करने से लोक व्यवहार का नाश होता है और श द की अभियावृत्ति से सरलतया प्रतीयमान अर्थ के अवरोध म दुरूहता आती है " [कारिका २] वेदार्थ लोरिक नहीं है यह प्रत्यादि लोक्कि प्रमाणों से अवगत नहीं हो सकता। वेदार्थ यपि अपने श्राप में असन्दिग्ध है, तथापि भ्रान्तमति के लिये सुगमावबोय के लिये मोमासा द्वारा निर्णय किया जाता है। उसमें शमा और पूर्व पक्ष द्वारा सशय उपन्न कर पुन उसमा निराकरण करना ही चेदान्त विचार का फल है। जिस प्रकार एक सुदृढ गाडे हुए स्तम्भको पुन पुन हिलार अस्थिर करते हुए उसे दृढ किया जाता है, इसी प्रसार मीमासा का उपयोग किया जाता है। 'अमदिग्धेपि वेदार्थे स्थूणासननरन्मत , मीमामा निर्णय प्राज्ञे, दुर्बुद्धस्तु ततो द्वयम् ।" | अगु. १११] मुसोधिनी म श्रीप्राचार्य ने शन्द अर्थ का सम्बन्ध निय वत लाया है। उन्होंने कहा है कि-"यह शन्दार्य मम्मन्ध यान्य पाचयता के रूप म निय है । वाक शब्द के उधार मे ज्ञानशील व्यक्ति को प्रमाण प्र०.. वेद उसके वाच्य पदार्थ का ज्ञान हो जाता है। 'नरसिंह आदि सामेतिक शब्दों से जैसे लोक मे पुस्पों का घोय होता है उस प्रकार नहीं, किन्तु नित्य सम्बन्धवाद मे शब्द वाचर और अर्थ अभिधेय (वाय) दोनों नित्य हैं । शन्द, ब्रह्म होने से यद्यपि सभी अर्थों का वाचक है, तथापि लोक-ज्यवहार चलाने के लिये उनकी अमिधावृत्ति का मकोय कर दिया गया है और इसी कारण अमुक शब्द से अमुक पदार्थ का ही ज्ञान होता है । यह परिज्ञान शद शास्त्र की परिपाटी से होता है। शब्द ब्रह्म से सृष्टि की उत्पत्ति कैसे होती है ? एत सम्बन्ध म भागवत [४० कंध १० अ०४६ श्लोक की सुबोधिनी मे श्रीवल्लभाचार्य ने विशद विवेचन किया है । वहाँ से जाना जा सकता है। शब्द की अनुवादकता के विषय मे आचार्य ने भाग० दराम के एकादशाध्याय ५७ श्लोक की सुबोधिनी मे कहा है कि 'वेदयादिनो हि शब्दस्य नानुवाद- कत्व मन्यते, किन्तु विधायकत्वम्, अत. ईश्वरो वेद एव, तद्वाक्यादेव फलसिद्धि नतु फलसाधारनेन ईश्वरापेक्षा"। फल-सिद्ध करने वाज्ञा चेट ही ईश्वर है, उसके वाक्य से ही फल-सिद्धि होती है" आदि । तत्वदीप सर्वनिर्णय निबन्ध मे प्राचार्य का क्थन है कि-वेद म श्लिष्ट प्रयोग के कारण फल के सम्बन्ध में परोक्ष रूप से वर्णन दिया गया है । यह सर बालबुद्धि जनों की प्रवृत्ति के लिये है, जो प्ररोचनार्थ है । जैसे बालक को 'दूध पीने से तेरी शिखा बढ जायगी' ऐसा कह कर दुग्धपान मे प्रवृत्त किया जाता है, उसी प्रकार वेद लोकेपणा वालों को फल प्राप्ति का उल्लेस कर सत्कर्म म प्रवृत्त करता है । तात्पर्यंत परोक्ष कथन का प्रयोजन बालानुशासन है, और यह अनुशासन स्न्युत्पाद- नार्थ है। "श्लिष्ट प्रयोगाद् वेदस्य परोक्षकथन मतम् । चालानुशासनार्थाय रोचनार्थ तथा वच । [स० निबन्ध ] भागवत मे इसी अभिप्राय को लेकर कहा है । "परोक्षवादो वेदोय फलश्रुतिरिय नृणा न यो रोचन परम्” आदि । इन सब ना अभिप्राय यह कि- स्वर्ग आदि शद जहाँ लोकदृष्टि मे लोगात्मक फल का निर्देश करते हैं, वहाँ वे परमात मसात्मक आनन्द का भी। साधारण कर्मशील जन, परोक्ष मरवात्मक आनन्द प्रानि की अपेक्षा [ शु० पु० संस्कृत वाङ्मय विविध भोग संयुक्त लोगात्मक स्वर्ग को अधिक चाहते है, एतदर्थ उनसरी वेदोदित क्रम में अधिक प्रवृत्ति होती सद्भाग्यतः यदि उम कर्म के द्वारा उन्हे अन्त करण-संशुद्धि से ज्ञान-प्राप्ति हो जाती है तो वे उम स्वर्गात्मक लोक की एपणा छोड़ कर आगे बढ़ जाते हैं, और यदि नहीं होती तो उन्हें भोगात्मक लोक की प्राप्ति तो होती ही है, इससे वेद में प्रचना का दोष भी नहीं पाता । इस प्रकार का फल निर्देश ही वेद का "श्लिष्ट-प्रयोग' कहलाता है। सर्व निर्णय निरन्ध [ कारिका ३३, ३५ ] के तत्वदीप प्रकाश और उसकी टीका 'आवरण भग' में इस विषय पर विस्तृत प्रकाश डाला गया है। वेदार्थ-निर्णय के लिये अनेक विद्वानों ने भाग्य और टिप्पणियों की रचना की है, विभिन्न-विभिन्न दृष्टिकोण से वे अपने-अपने ज्ञान के ही अनुसार उसका निकर्ष निकालते हैं। श्रीवल्लभाचार्य ने इन सपका श्रेणी विभागत किया है। [अणुभाप्य प्र० अध्याय दि० पाद सूत्र २८ ] मे विचार करते हुये उन्होंने कहा है कि वेदार्थ-विचारक चार प्रकार के हो सकते हैं - १-केवल शब्दबल विचारक । जैसे आचार्य वादरायण आदि ! २-शब्द और अर्थ दोनों के विचारक। जैसे जैमिनि आचार्य आदि। ३-शब्दोपसर्जन के द्वारा अर्थ विचारक। जैसे आस्मरण्य प्राचार्य आदि। ५-केवल अर्थ विचारक। जैसे वादरि आचार्य आदि । तात्पर्य यह कि-प्रथम पद में शब्द ही सत अर्थ का अवरोधक है। द्वितीय पक्ष में शब्द अर्थ दोनों की समतुला होती हैं, तृतीय पक्ष मे शन्द गोण और अर्थ मुरय होता है और चतुर्थ पक्ष में शब्द का कोई महत्व नहीं होता । श्रीवल्लभाचार्य परमार्थत सत्य प्राप्त शब्दों की प्रामाणिकता रूप प्रथम पक्ष के अनुयायी हैं। अत. तदनुसार ही वे चेदार्थ-चिन्तन के पनपाती हैं। उनके इमी दृष्टिकोण का प्राश्रय लेकर वैदिक वाङ्मय पर शुद्धाद्वैन पुटिमार्ग स निम्नलिम्पिन प्रस्ताहित्य रचा गया है.- प्रमाण प्र. वद ] ६ (क)" वेदचतुष्टय (१) वेद चल्लम श्रीवल्लभाचार्य कृत। यह वेद भाष्य सप्रति भारत म प्राप्त नहीं है। 'सा० अन्य-सूची नामक अन्य में श्रीजटाशङ्कर शास्त्री ने बलिन नी लाइनरी मे इसका होना लिखा है। अत इस विषय म कुछ कहा नहीं जा सस्ता। (.) यजुर्वेद-नवायी भाष्यम् योगि श्रीगोपेश्वर जी ने इसकी रचना की है, ऐसा विदित है। शास्त्री श्याम जी शर्मा ने स० १६४५ म प्रकाशित 'मारत-शक्ति' नामर ग्रन्थ की प्रस्तावना मे, और गायत्री भाष्य की गुजराती भूमिका में ५० मग्नलाल शास्त्री ने 'वैपणच परिषद्' के सप्रहालय म इसको प्रतिमा उल्लेख रिया है। सम्प्रति अप्रकाशित और अज्ञात है। वेद-साहिय पर इसक अतिरिक्त अय प्रन्या का परिचय नहीं मिलता। उपनिषद्-माहित्य:- वैदिक ऋचात्रा के पृथक्-पृथा अर्था का, अशी परब्रह्म क स्प म समन्वय रके जिस मौलिक सिद्धान्त का निष्पादन अथवा विचार किया जाता है उसे वेदान्त' कहते हैं । वेट या अन्त, आतरिक रहस्य, सार, निचोड़। वेदपरिशीलन क फलस्वरूप महर्पियों ने जिस विचार-धारा द्वारा प्रश्नोत्तर किंवा स्वतत्र रूप से तत्व-निर्धारण किया है, उसम सभी विषयों का समावेश हो जाता है । परब्रह्म, माया, जीव, सृषि आदि तात्विक पदार्थ, कर्म, ज्ञान, भक्ति तप, योग आदि साधन और विद्या, अविद्या, ध, मोच, अमृत न, ब्रह्मत्व त्रादि सभी इग्रियों से चेदा त में विचार प्रस्तुत किये गये हैं। युत्ति प्रयुक्ति, तर्क, उद्धरण, उप्रान्त, परमत आदि पर दृशि डालते हुए अतिवचनों से जिस प्रकार सम्प्राय वरपद्मथ में इसका नामोल्लख मिलता है। .

[ शु० पु. संस्कृत वाङमय पेदान्त में गम्भार चिन्तन किया गया है, वह वास्तव म मननीय और अभ्यसनीय होने के साथ महत्वपूर्ण है। वेदान्त की इमी विचार धारा को 'उपनिषद्' शब्द से गोधिन दिया गया है । 'उपनिषद्' शद के भीतर जो मोलिक अर्थ निहित है उसे और कोई दूसरा शब्द व्यक्त नहीं कर सकता । इमम साधर री मापनावस्था से लेकर माध्य फलावस्था तक का समावेश है। श्रीयल्लभाचार्य इम 'उपनिषद्' शद के अर्थ के सम्बन्ध म कहते हैं- " उपनिपद शब्देन ब्रह्म विद्या निरूप्यते " उपनिषद् शद्ध से ब्रह्म विद्या का तापर्य लेना चाहिये । "उपोपसर्ग सामीप्ये तत् प्रतीचि समाप्यते । विविधस्य पदर्थस्य नि शब्दोपि विशेषणम्" पदल विशरण गत्यवसाधनेषु इत्यनुशासनात् । जीवात्मान परमय नयना पूरभावाद्विशीर्ण कृत्वा तत सघाताकेरल मुद्धत्य ब्रह्म प्रापयित्या तनय तमरसादयति" इति । यथा सर्वोप्यश विशीणों मवति । यथा ना सर्व भागेन तम् प्राप्नोति । यथा चा कदाचिदपि ततो न निवततते म निशब्दार्थ । एतादृशी ब्रह्म विद्ये व भवति, अत सर्वसन्देहा उपनिषदर्थ विचारेणे च निराकर्तव्या इति सिद्धान्त उक्त। [ भाग०६० उत्त० ३८, ३ मुदो. ] इस का तापर्य सक्षेपत यह है कि जिस विद्या के समधिगत करने से ब्रह्म समीप म ही प्रतिष्टित हो जाता है, उस विद्या को उपनिषद् कहा जाता है । उपचार से उस विद्या के प्रतिपादक ग्रन्थ को भी उपनिपद् कहते हैं । 'उपनिषद्' श द म उप और नि यह दो उपसर्ग पार पल धातु हैं, जिममा निशरण गति और अवसादन श्रा है। अत जिस विद्या के द्वारा जीन को ब्रह्म के ममीप जाने के लिय मोगशीर्णता होती है जिसके द्वारा ब्रम के उपकण्ठ ममीप जीय की गति होता है और जिस विद्या के द्वारा ब्रह्म के मामीप्य होने से जीन के वास्तविक रूप का अवसाद हो नाता है, वह विया "उपनिपद्' लाती है। इसम मापन और फन दोना स्पा का जहाँ उल्नेग्य है वहाँ प्रमाणिकता से प्रमाण और फल रूप से प्रमेय ब्रह्म का भा ममाश होता है। नासि याथार्य 'जान' और पारमाश्रिम ब्रह्मावगनि निजान' कहलाता है।

प्रमागा०प्र०... वेद] .. प्रस्तुत ब्रह्मायबोध, ब्रह्म-विज्ञान या ब्रह्म-विद्या भक्ति ही है, जिमसे जीत को परमश्रेय म्वरूप असण्ड निरवधि परमानन्द की संप्राप्ति होती है । आचार्य के सिद्धान्तानुसार पं० जयगोपाल भट्ट ने तेति- रीयोपनिषद् के भाष्य मे और पं०बालकृष्ण शास्त्री ने 'ईशावास्योपनिषद्' की मनस्विनी टीका में इस पर विशद विवेचन किया है । समस्त उपनिपद् वेद और उसकी किसी न किसी शाखा से मम्बद्ध है, जैसा कि प्रथम कहा जा चुका है, उनमे सभी विपयों का विचार है । यह उपनिपद् कई प्रकार की है। इनमें कुछ उपनिषदों के विषयानुसार विभाग किये जा सकते है, जैसे कुछ उपनिपद्- (१) केवल पूर्णपुरुषोत्तम और उनकी प्राप्ति के साधन का निर्देश करने वाली हैं। (२) केवल पूर्ण पुरुषोत्तम के स्वरूप प्रतिपादक है, । जैसे गोपालतापिनी कृष्णोपनिषद् आदि । (३) पूर्ण पुरुषोत्तम स्वरूप, उनकी प्राप्तियो यता के सम्पादक अक्षर ब्रह्म, ज्ञानविषयीभूत अक्षर ब्रह्म-स्वरूप को तथा पुरुषोत्तम स्वरूप जीव की, पुरुषोत्तम के साथ मर्वकाम भोगरूप फल की प्रतिपादक हैं। जैसे तैत्तिरीय, मुण्डक आदि। (४) केवल विभूति तथा तत्प्राप्ति साधन की प्रतिपादक हैं। जैसे वासुदेच, नारायण आदि। (५) केवल अक्षर ब्रह्म और तव्याप्ति साधन की प्रतिपादक है। जैसे छान्दोग्य, वृहदारण्यक आदि । (६) मुक्ति के साधन स्वरूप भक्ति, ज्ञान के अङ्ग सन्यास, वैराग्य, योग्य मारय अादि की प्रतिपादक है । जैसे मन्यामोपनिषद्, प्रारणेयोपनिषद्, गर्भ, अलात शान्ति आदि । (७) भक्ति के साधन श्रवणादि और उनके साधन शरीरादि आधिभौतिकादि विविध उपद्रव के निवारक साधन की प्रतिपादक हैं, जैसे गम्डोपनिषद् आदि[ जयगोपाल कृत त० उप० भूमिका] कहने का तात्पर्य यह है कि-आस्तिक सिद्धान्त की विचार-धारा को प्रमाणपरिपुष्ट करने के लिये जितना पल उपनिपदों के द्वारा प्राप्त होता २० [सु.पु. सस्कृत वाङ्मय है, उतना अन्य के द्वारा नहीं। और यही कारण कि-अधिकाश प्राचार्यों ने उपनिषद्-साहित्य पर अन्छा विवेचन किया है। सभी मिद्वान्न वादियों के भा-य, टीका, चिरण, टिप्पण और व्याख्यान मिलते हैं, क्योंकि श्रुतिया स रहस्य इन्हीं में समरेत है। इनकी भाषा स्पष्ट और सुन्दर है पर विचार गम्मीर और द । शुद्धाद्वैत सिद्धान्त के आकर प्रन्य-प्रामाप्य सुबोधिनी प्रभृति में स्थल-स्थल पर वैदिक प्रमाणोपन्यास के समय इन्हीं वेदान्त वाक्यों का विचार किया गया है और इन्हीं का सराय-निरास । अत पृथर अन्य रूप म आचार्य श्री ने इनपर कोई पृपा विमर्प नहीं किया है, व्यास सूत्रों का वर्ण्य विपय तो अधिमाश यही उपनिषद् हे, अत इनका माधारणतया व्याख्यान हो ही जाता है, अत बहुत ममय तर इन उपनिषदों पर स्वतन्त्र टीकामों की आवश्यकता प्रोत नहीं हुई। आगे चल कर समय उपनिषद् के रहस्य या पिंडितार्थ जानने के लिये प्रयन हुआ और उन पर सिद्धान्तगामिनी रचनाओं का युग आया । उपनिषद् अनेक थी, और सभी वैदिक शासाओं की विद्यमान थी, पर शनै शनै शासाओं के साथ ये लुप्त होगई। थैदिक साहित्य की विवेचनामें प्रधान दश उपनिषदों पर आचार्यों ने विशेष ध्यान दिया और उन पर भाव्य रचना की है । - अनिपद और १०८ उपनिपदों के सग्रह भी प्रकाशित हुए हैं जिनम प्रमान -श उपनिषदों के नाम इम प्रकार हैं- १ ईशावस्योपनिषद् शु० यजकीयाजसनयसहिता की उपनिगद् है २ केनोपनिषद् सामवेद की उपनिषद् है ३ कठोपनिषद कृष्ण यजुर्वेद की उपनिषद् है ५ प्रश्नोपनिषद् अथर्व वेद की उपनिषद् है ५ मुण्डकोपविषद् अधरं वेद की उपनिपद् है ६ माडूक्यापनिषद् अथर्व वेद की उपनिषद् है ७ तैत्तिरीयोपनिषद् यजुद की उपनिषद् है ८ तेत्तरेयोपनिषद् मृग्वेद की उपनिषद् है ६ छान्दोग्योपनिगद् सामवेद की उपनिषद् है १० बृहदारण्यकापनिषद् यजुर्वेद की उपनिषद् है प्रमाण० प्र० वेद ] 'मुक्तकोपनिषद्' में कहा गया है कि-वेद की एक एक शाखा की एक एक उपनिपद् है । [कारिका १४] यहा पर उपनिपद् की महत्ता के सम्बन्ध में बताया गया है कि- माडूक्यमेकमेवाल मुमुक्षूणा विमुक्तये २६ तथाप्यसिद्ध चेज्ञान दशोपनिषद पठ ज्ञाने लब्ध्वाचिरादेव मामकं धाम यास्यसि २७ तथापि दृढता नोचेत् विनानस्याजनासुत द्वानिशाख्योपनिषद समभ्यस्य निवर्तय २८ विदेह मुक्ताविच्छाचेदष्टोतर शत पठ २६ प्रस्तुत उपनिपद में ३० और १०८ दोनों उपनिपदों के नाम कहे गये हैं और कौन उपनिपद् किस वेद की है बताया गया है । वहा यह भी कथन है कि किस उपनिपद् का शान्तिपाठ क्या है ? सक्षेपत इस स्थान पर नयेद की १०, शु० यजुर्वेद की १६, कृष्ण यजु की ३२ और सामवेद की १६ तथा अथर्व वेद की ३१ उपनिपदों के नाम नहकर २०८ प्रसिद्ध उपनिपदों का उल्लेस है । इन १०८ उपनिपदों को भावना प्रय तथा वासनात्रय का नाशक तथा ज्ञानवैराग्यप्रद कहा गया है । [ मु० उ० प्र० अध्याय १५ ] भगवद् गीता के माहा म्य म उपनिपदों को धेनु माना गया है। गीता उनमा मधुर पय और दो धा भगवान् श्रीकृष्ण गोपाल नन्दन को बताया गया है। और यह सच ही है जीव की पारमार्थिक पुष्टि के लिये इस धेनु की सेवा ओर तत्कृपाप्राप्त अमृत दुध का सेवन आवश्यक है । श्रुति ( उपनिपद् ) धेनुओं स गीता रूपी अमृत सद्य प्रस्तुत सहज मधुर दुग्ध है, जो ब्रह्म सून मीमासा रूपी सुवर्ण पार में शकासमाधा नल से बातचित होकर भगवच्चरित ( भागवत ) माधुर्य से सपृक्त कर साविर पेय रूप में परणित किया गया है। अत मानव-जीवन की ऐहिक सम्या स्थिति और पारमार्थिक प्रतिष्टित के लिये चेदान्त (उपनिषदों) का क्तिना महत्व है ? यह जाना जा सकता है। प्रसगोपात यहाँ यह कहने मे सकोच नहीं होना चाहिये कि-शुचि स० वाड्मय अपने प्रथम युग म उपनिपदों मे सर्व प्रधान दश उपनिषदों का रहस्य, ब्रह्म सूनों द्वारा वितरित हो जाने के कारण स्वतन्त्र प्रन्य रचना 1 । [ गु० पु. मस्कृत-वाइमय का रूप धारण नहीं कर सकता। पर आगे चल कर इसरा अभाव सटया और विद्वानों ने इस ओर सतन्त्र प्रयास किया, फलत उपनिपद् प्रन्यो पर निर्दिष्ट व्यारयान लिसे गये। ईशावास्योपनिपद् और उसकी व्यारयाएँ शुल्ल यजु पी माध्य- दिनी सहिता ४० अध्यायों के विभक्त हैं। प्रारम्भिक ३६ अध्यायों में र्म काण्ड का विशेष रूप से वर्णन है, अन्तिम ४० वा अध्याय मार्मिक विवेचना पद्धति में ब्रह्म का प्रतिपादन करता है । यायन्मात्र वैदिक फर्म किस भावना से अनुष्टित होने चाहिये ? तदर्थं इस अन्तिम अध्याय में कर्म-समर्पण का रहस्य कहा गया है । इस प्रतिपादन की शैली से इस सभी उपनिपदों की मूर्धन्यता प्राप्त हुई है, और प्रधान दश उपनिपदों में यह प्रथम परिगणित की गई है। इसके प्रारम्भिक मन्त्र में 'ईशावास्य' शब्द पाने के कारण इसे यह नाम मिला है। इसके २८ मन्त्रों के द्वारा प्रतिपाद्य विपय का तात्विक विवेचन है। आचार्य भगवत्पाद श्री शार के भाष्य के आधार पर इस पर बहुत सी सस्कृत और हिन्दी की व्याख्याएँ रची गई है, अन्य श्राचार्यों के सिद्धान्तानुसार भी भाष्य व्याख्यान मिलते हे । शुद्धाद्वैत सिद्धान्त की दृष्टि से इस पर जो व्याप्यान प्रस्तुत किये गये हैं, उनक परिचय यहाँ दिया जाता है - (१) ईशावास्य-मनस्विनी व्यारया रचयिता पो० श्रीवालकृष्ण शास्त्री । शु० वा० महासभा सूरत द्वारा स० २०१० मे प्रकाशित । इस व्यारया म भक्ति को ही 'उपनिपद्-विद्या' नाम से सम्बोधित किया गया है, क्याकि भत्ति में ही ईश्वर के प्रति सर्वकर्म समर्पण की भावना को स्थान दिया गया है । उपनिषद् शद के धातु, उपसर्ग और प्रत्यय का अर्थ भी इसी धारणा को श्री वल्लभाचार्य के कथनानुसार सिद्ध करता है, यह प्रथम कहा जा चुका है। भक्ति से ही जीनो को परम श्रेय समधिगत होत है । उपनिपद वचनों में कर्म, ज्ञान, भक्ति तीनों को फल का साधक माना गया है, उसका पारस्परिक रहस्य क्या है ? और इनका विरोध भाव से दूर यह प्रश्न रहता है । मनस्विनी-ज्यारयाकार ने तीनों की सहकारिता के उपरात भक्ति का वैशिष्य सिद्ध करते हुए उसको परम- फ्ल की सिद्धि म असहाय शूर कहा है 1 कर्म का फल आत्मज्ञान, ज्ञान । किया जाय ?

. । प्रमाण प्र.." वेद ] ३५ का फल ब्रह्मज्ञान और भक्ति का फल पूर्णपुरुषोत्तमज्ञान है । यह रस स्वरूप क्षराक्षर से अतीत पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण हैं, कर्म, ज्ञान, भक्ति के द्वारा उनकी प्राप्ति ही जीव का मुख्य कर्तव्य है, यह सिद्ध किया गया है। ( काण्ड द्वय में प्रतिष्ठित वेद किंवा उपनिपद् परात्पर पुरुषोत्तम श्रीहरि के पडगुणबोधक हैं, अतः ईशावास्य के प्रथम ६ मन्त्रों में पड्गुणों का निरूपण है, सप्तम मन्त्र में अक्षर ब्रह्म और अष्टम में परब्रह्म का स्वरूप कहा गया है । इनकी प्राप्ति के लिये जीव को सगुण नवधा भक्ति ओर दरामी निर्गुण भक्ति की उपादेयता है, अतः शेप १० मन्त्रों में उसका कथन है । इस प्रकार ८ और १० इस आन्तरिक विभाग में इसमें १८ मन्त्र है । भक्ति के आलंबन श्रीप्रभु के लीलाधारक १० अवतार हैं, तदर्थ भी दस मन्त्रों की संगति है। अथवा पूर्वकांड प्रतिपाद्य यज्ञात्मक प्रजापति सप्तदश, और उत्तर काण्ड प्रतिपाद्य ब्रह्म एक विध, एतावता १८ मन्त्र प्रमेय स्वरूप सागोपांग ब्रह्म का निरूपण > प्रथम तीन मन्त्रों ( १, २, ३,)द्वारा युवत-साधक का निर्धार है, तदनु दो मन्त्रों (४, ५) में सेव्य स्वरूप, तदनन्तर दो मन्त्रों (६, ७) मे साधन और एक मन्त्र (6) में फलसेवना का वर्णन है । इस प्रकार प्रथम आठ मन्त्रों से स्वरूप का निरूपण करते हुए अधिकारी, विपय फल और साधन के द्वारा भक्ति मार्ग के उत्कर्ष को सिद्ध किया गया है। अग्रिम : से लेकर १८ तक दस मन्त्रों में प्रस्तुत विषय का वर्णन है, जिसमें ६ से लेकर १४ तक कर्म, जान मार्ग के विषय में और पंचदश से लेकर अन्तिम १८ तक भक्ति के सम्बन्ध में विचार है । इस प्रकार समस्त 'मनस्विनी-व्याख्या' अधिकार, साधन, फल और स्वरूप द्वारा भक्ति रूपिणी उपनिपद्-विद्या का महत्व कथन है । भाष्य-पद्धत्या व्यारयान शैली और पूर्वापर संगति (अनुबन्ध चतुष्टय) की दृष्टि से 'मनस्विनी-याच्या' में जितना सुन्दर विवेचन हुआ है, वह बड़ा युक्ति-संगत है । शु० सिद्धान्त-प्रतिपादक 'ईशावास्य' उपनिषद् की अन्य टीकाश्री में यह बात नहीं है । वे साधारणतया सैद्धान्तिक विवेचना ही करती हैं। २ 'मनस्विनी टीका स्वार्थ दर्शन (हिन्दी अनुवाद) पो० कंठमाण करते हैं।

[ शु० पु. सस्कृत वाङ्मय शाम्रो द्वारा उनके पित्रण द्वारा रचित मकृतटीम के भावाभिप्राय लेकर अनूदित और मम्प्रति अप्रशित है। मनम्बिनी व्यारया के प्रतिपाय आधार को लेकर हिन्दा में यह विवेचन वर्तमान काल की पद्धति पर जिज्ञासा की पूर्ति करता है। प्रतिपाद्य विषय के सम्मुस आने वाले विषयों के शरा समाधान और नवीन दृष्टिरोण की विचार-धारा, उपनिषद् और उसकी टीमा के विशेष रहस्य को विशद करती है। शु. साम्प्रदायिक यारया के आधार पर मन्त्रों के श दार्थ के साथ इसमें यिनेचन अपना स्थान रखता है। रचयिता के पाम ही इसकी प्रति विद्यमान है। ३ पालभाष्यम् रचयिता विद्वद्वर ५० श्रीनलभद्र शर्मा। बड़ा मदिर विद्यालय बबई द्वारा स. २००० म प्रकाशित । भाष्यमार ने प्रमाण बहुल प्राजल भाषा मै शुद्धाद्वैत पुष्टिमार्ग के मन्तन्या का विद्वत्तापूर्ण भाषा म विचार वैचिय द्वारा समर्थन रिया है। भाप्यार की दृष्टि, सिद्वान्तों के साथ सम्प्रदाय में प्रचलित सेवा प्रणाली की परिपुटता के प्रति विशेष है, यद्यपि यह अप्रामाणिक और युक्ति एप विचार से विरहित नहीं है, तथापि वेदप्रतिपाद्य अभिप्रायों में भारना को अत्यधिक प्रश्रय देना कुछ असगत सा जंचता है। यह असगति विद्वान भाष्यकार ने अपने व्यापर पाडित्य से अवश्य दूर की है, पर है यह विचार-धारा नमिस विकास के विपरीतसी । अस्तु । प्रस्तुत व्याख्यान म मन्त्रों द्वारा प्रतिपाद्य अभिमत इस प्रकार है। प्रथम मन्त्र में भगवदीय वस्तुओं को भगवरसमपित कर उन्हें प्रसाद रूप से ग्रहण करने का प्रतिपादन है । द्वि० मन्त्र में उत्त प्रकार की श्रावश्यक्ता रा निरूपण है । नृ० मन्त्र में दु सग-परित्याग और च० मन्त मे भगवत्प्राप्ति के विकारीका तथा पचम मे भगवत्स्वरूप का निरूपण है । पष्ठ में सर्वात्मभाव, सप्तम म भक्ति की असहायशूरता श्रीर अष्टम म भक्ति फ्लार्थ भगवद्भक्त और भगवान् के स्वस्पनी सिद्धि वर्णित है। नरम में अन्यमताश्रयण का निषेध, तथा दशम में निसन्द्रिय भगिमार्ग के समायण का क्थन करते हुए एकादश मे भक्तिमार्ग प्रतिपाग विद्या अविद्या का फल वियेचित है । द्वादश में भचि मार्गीय सभूति और असभूति का निर्देश करते हुए प्रयोदश मन्त्र म उनके फलाफल का विचार किया गया है । चौदहवा मन्त्र भक्तिमार्ग ३७ प्रमाण०प्र० वेद ] . की प्राप्ति प्रकार स उपाय निर्देश करता है । इस प्रकार एक से लेकर १४ तक मन्त्रों मे आन्तरिक विभाग के अनुसार आठ मे सागर ब्रह्म ना निर्वचन और बाकी छ मे परमत का निराकरण किया है । १४ से लेकर १८ तक चार मन्त्रों में प्राचार्य के स्वरूप का चित्रण करते हुए गुरूपसत्ति की प्रधानता सिद्ध की गई है। इस प्रकार प्रस्तुत बालभाष्य मे विद्वद्भोग्य गरिष्ठ भाषा मे उपर्युक्त दृष्टि से सिद्धान्त का प्रतिपादन हुआ है । यह कहना प्रसंगोपात आवश्यक है कि हम बालभाष्य की रचना श्री गोकुलनाथजी महाराज बंगई के निर्देश और उनके सेव्य श्री बालकृष्ण प्रभु के आश्रय मे की गई है । शु० सम्प्रदाय श्री बालभाष्य आदि ग्रन्थों के रचयिता पं० श्रीवलभद्र शर्मा जी की भाषा अपना विशेष स्थान रसती है, जो अप्रतिम है। ४ भावार्थ दीपिश टीका (सं०) पं० श्रीमोहनलाल जी शास्त्री द्वारा विरचित । रणछोड़दास पटवारी अहमदाबाद द्वारा सं० १९८३ मे प्रराशित । यद्यपि ग्रन्थकार ने इस नाम का कहीं उल्लेस नहीं किया है, तथापि उसके गुर्जरानुवाद से इसका पता चलता है । अन्य टीगओं मे जहाँ ईशावास्य के १८ मन्त्र हैं, वहाँ इस व्यारया में १७ मन्त्र ही हैं। 'पूपन्नेक' आदि मन्त्र माध्यंदिनी शासा गत न होने के कारण इसमै विवृत नहीं हुआ है । कुछ पाठभेद भी मिलता है। प्रस्तुत टीस मे शांकरभाष्य प्रतिपादित सिद्धान्त का प्रत्यक्ष विरोध कर शु० सिद्धान्न को स्थापना की गई है । टीना यद्यपि संक्षिप्त है तथापि मन्त्रार्थ के अववोध के लिये पर्याप्त है । यह विशेपता है कि कहीं भी अर्थ को सींचातानी नहीं की गई है, सरल पद्धति से अर्थ का दोहन किया गया है। प्रथम मन्त्र मे परमेश्वर-स्वरूप और उत्तम भत्तों की तदधीनता के आचरण का कयन होकर द्वि० मन्त्र में मर्यादास्थित जीवों के लिये भगवत्प्रीत्यर्थ कर्म करने का निरूपण है । तु० मन्त्र मे भगवत्प्रमादार्थ कर्म न करने से अनिष्ट फल या उल्लेस कर चोथे मे श्रवण मनन की सुगमता के लिये पुन. परमात्मा के स्वरूप का दिग्दर्शन कराया गया है । पंचन में ब्रह्म की विरुद्ध धर्माश्रयता एवं छठे मन मे सर्वत्र ब्रह्म-दृष्टि ३८ [ शु.पु. सस्कृत-वाङ्मय रखने वाले भक के मनन की सफलता कही गई है। सातवें में मफल निदिध्यासन का वर्णन है तो अष्टम मन्त्र में पढ्गुण परिपूर्ण परमात्मा कथन है, और उसकी कृपा की महत्ता का दिग्दर्शन । टीकाकार के अभिमत संहिता पाठ के अनुसार यहाँ [पाठ मंत्र पर प्रथम अनुवाक समाप्त होता है। "अन्तमः" इत्यादि नवम मन्त्र में उस फल का कथन है जिसमें प्रथम उक्त साधन फल के विपरीत मननादि करने से प्राप्त होता है, अर्थात् विरुद्ध प्राचारण करने वाले के फल का कथन है। दशम के उसी का स्पष्टीकरण, एकादश से लेकर चतुर्दश मन्त्र तक वेदार्थ ब्रह्मज्ञान के विरुद्ध अवैध आचरण करने के परिणमी या और यथार्थज्ञान के फलों का निरूपण किया गया है । पन्द्रहवें मन्त्र में निवेदन और वरण- निरूपण द्वारा उस अनीशता का परिहार किया गया है, जो मर्यादाविरुद्ध क्रियाकलाप के अनुष्ठान से आती है । 'अग्ने नय सुपथा।' इस १६ वें मन्त्र मे श्रवण मनन सेवनादि भक्ति की सार्थता के लिये परमात्मा से प्रार्थना ना निरूपण है, और सनहर्वे मन्त्र में ज्ञान के स्वरूप का। इस शासाना यह मन्त्र इस प्रकार है:- "हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुनम् योसावादित्ये पुरुषः सोसायहं ओं सं ब्रह्म ।" इसमे जीय की मुक्ति का निरूपण कर व्याख्या समाप्त की गई है। ५ भावार्थदीपिका-टीका गुर्जरानुवाद पं० मोहनलाल शास्त्री कृत संस्कृत टीका के गुजराती भापानुवाद श्रीज्येष्टालाल गोवद्ध नदास शाह । मूल प्रन्थ के साथ ही प्राशित । अनुवाद सरल और भावावगाही एवं मूल मन्थ के अर्थ को स्पष्ट करने वाला है। इसमे संक्षेप रीति से उसी विषय का प्रतिपादन है जो मूल में है। ६ 'युष्टिमार्ग-प्रपा' सं० टीस पं० श्रीसवलकिशोर जी चतुर्वेद द्वारा रचित । वल्लभ पुस्तकालय मथुरा द्वारा सं० २०१० में प्रकाशित । यह एक साधारणतया शुद्धाद्वैत सिद्धान्त की छाया लेकर रचा हुआ मन्त्रों का अर्थ है, जिसमे न तो शास्त्रीय दृष्टि से पंचाधिकरण या योई सम्बन्ध है और न रिसी सिद्धान्त का सामूहिक रूप से व्याख्यान ही प्रस्तुत किया गया है । मन्त्रों से शु० सम्प्रदायानुसार तत्वों पा ३६ बेद ] प्रमाण० प्र० ६ निचोड़-सा क्यिा गया है, जिसमं उपक्रम, उपसहार मन्त्रों के पारस्परिक सम्बन्ध जैसी कोई मौलिन बात नहीं है । टीकारार के कथनानुसार मनों में क्रमश इस प्रसार सवर्णन है। १ भोज्नाच्छादन विषयक चिन्तात्याग और भगवत्प्रसाद से निर्वाह। भगवत्परितोपार्थ कर्म। ३ गुणानुवाद में विरक्ति का फल । ४ भगवत्स्वरूप और अन्याश्रयता। ५ भगवान् को विरुद्ध धर्माश्रयता । उक्त ज्ञान से सशयोच्छेद। ७ विरहावस्था में सर्वात्मभाव का फल । ८ विरह मे ब्रह्म-साक्षात्कार । ६ भगवत्प्रीत्यर्थ न होने वाले कर्म ही अनर्थशारिता। १० ज्ञान कर्म की अलौनिस्ता। १२ भगवदीय ज्ञान कर्म का फल अमृताशन । १२ अन्धतम प्रवेश का कारण । १३ भगवत्स्वरुप सी परात्परता। १४ सभव और असभव का फल निरूपण । १५ ब्रजागनाओं की भावना से भावित विरहानुभव का वर्णन । १६ और १७ विरह कालिक फ्लावस्था के अनुभव । १८ आचार्य चरण से शरण को प्रार्थना । इस टीम के निर्माण मे श्रीबलभद्र शर्मा द्वारा रचित बालभाष्य की छाया ली गई है। पुष्टिमार्गीय प्रपा स० टीका का संक्षिप्त हिन्दी अनुवाद । अनुवादक प० रघुनाथप्रसाद चतुर्वेद । मूल ग्रन्थ के साथ प्रकाशित । जिसम भापान्तर के अतिरिक्त कोई विशेष विवरण नहीं है। केनोपनिषद् और उसकी व्यारयाएँ:- (२) केन मनस्विनी व्यारया स० रचयिता पो० श्रीवालकृष्ण शास्त्री। विद्या विभागाकरौली द्वारा स० १०१२ में प्रगशित । केन उपनिषद् तबल्यार ब्राह्मण का नवमाध्याय है । 'सवल्यार' [ ० पु० संस्कृत-वाङ्मय और 'माह्मण उपनिषद्' भी इसका नाम है। प्रारम्भिक प्रश्न में 'केन' शब्द के श्राने से इसरा यह नाम पड़ा है। (१) मनस्विनी टीका के अनुसार इसका प्रतिपाद्य विपय इस भक्ति प्रतिपादक यह उपनिषद् चार खण्डों में विभाजित है श्रीर इसके निम्न कारण हैं। () चारों वेदों का विशिष्ट अर्थ भगवत्सेवा होने के प्रतीक रूप इसके चार सण्ड हैं । (ख) भक्तिमार्ग में श्रीहरि चतुः पुरुषार्थ रूप है । और (ग)सेवामार्ग अनुबन्ध चतुष्टय पर आधारित है अतः चार सण्ड हैं। प्रथम खण्ड:-आठ मन्त्रों में बाह्य और अभ्यन्तर प्रमाण से अलौकिकेन्द्रिय ब्रह्म का प्रतिपादन है, जिसमे प्रथम मे प्रश्न और सात में उत्तर हैं। इस खण्ड मे प्रमाण के द्वारा भक्तिमार्ग की श्रेष्ठता का प्रतिपादन किया गया है । द्वि० खण्ड.-पॉच मन्त्रों में प्रमेय मे बुद्धि दोप से होने वाले पाँच प्रकार के दोषों का निरास किया गया है । इसमें प्रमेय बल से भक्तिमार्ग की श्रेष्ठता रही है। तृ० सण्ड:-बारह मन्त्र हैं। जिसमे अग्नि, वायु तथा इन्द्र के उपाख्यान द्वारा भक्ति में संभावित अभिमान दोप की निवृत्ति उमादेवी के संग द्वारा वर्णित है । अतः साधन की दृष्टि से भक्ति उदात्तता का घर्णन है। च० खण्ड:-नौ मन्त्र हैं। फलगत पंचविध दोप की निवृत्ति द्वारा फल रूप मे भक्ति के महत्व का कथन है । शेप चार मन्त्र के उपक्रम उपसंहार द्वारा प्रतिपाद्य भक्ति विषय का उत्कर्प घर्णित है । प्रतिपादन की शैली से मनस्विनी टीका मननीय है, प्रस्तुत व्याख्या की प्रारम्भिक भूमिका में पं० कंठमणि शास्त्री ने एतत्संबन्धी सभी जिज्ञासाओं पर अच्छा प्रकाश डाला है । यह भूमिका एक प्रकार से इसका संक्षिप्त अनुवाद है। (२) केन उपनिपद्-भाष्यम् सं० रचयिता पं० श्रीगोकुलदासजी शास्त्री विट्ठलनाथ प्रेस कोटा द्वारा सं० २००३ में प्रकाशित । भक्ति पुष्टिमार्गीय सिद्धान्त दृष्टि से तात्विक प्रतिपादन मे यह एक - प्रमाण प्र० वेद ] ४१ महत्वपूर्ण भाप्य है । जैसा कि मन्त्रों के प्रारम्भ मे प्रश्न-निरूपण द्वारा जिज्ञासा के अवतरण के अनन्तर समाधान है, उसका स्पष्टीकरण इस भाष्य मे किया गया है । श्रुति, गीता, भागवत, ब्रह्मसूत्रों के प्रमाण से उपनिपद् प्रतिपाद्य विषय की पुष्टि करते हुए भाष्य मे परमत का भी सडन रिया गया है । शब्दार्थ निदर्शन के साथ मन्त्र के रहस्योद्घाटन म भाप्यार ने अपने भक्ति-भावमय अनुभव का साक्षावार सा कराया है । इसकी रचना प्रथमपीठाधीश श्रीविठ्ठलनाथजी महाराज की अन्त स्य प्रेरणा से की गई है, ऐसा ग्रन्थसार का अभिप्राय है । (३) केन उपनिपद् भाष्य का हिन्दी भापानुवाद । मूल ग्रन्थकार ने ही इस अनुवाद को साथ म ही सनिविष्ट क्यिा है, जो लोक भापागत होने के कारण अभिप्राय का विशेष स्पष्टीकरण करता है । इसमे भी शका समाधानपूर्वर विपय के प्रतिपादन द्वारा सप्रमाण सैद्धान्तिर स्थन को पुष्ट पिया गया है । इस भाष्य की समाप्ति के अनन्तर ग्रन्थकार ने प्रथक रूप म शुद्धाद्वैत सिद्धान्त के अन्तर्गत 'प्रथम फलरूप नित्यलीला का वर्णन' नामक एक अनुच्छेद हिन्दी मे लिखा है । इस निनन्ध मे विद्वान लेखक ने केनोपनिपद् का सहारा लेकर अद्वैत सिद्धान्त के क्रमिक विकास पर दृष्टि डालते हुए शाराचार्य आदि सभी आचार्या द्वारा प्रतिपादित सिद्धान्ता का सामयिक समन्वय स्यिा है, साथ ही श्रीवल्लभाचार्य के भक्तिमार्ग का वैशिष्ठ्य बताकर उनके सिद्धान्त की वर्तमान-काल म उपयोगिता बताई है। पुराण, श्रुति, स्मृति, आदि के वचनों से जीव के परम कर्तव्य भगवत्सेवा की स्थापना मे उन्होंने उसको परमफलता का विवेचन क्यिा है । स्वरुप सेवा किस प्रकार और क्सि भावभावना से करना चाहिये ? तदर्थ इस विवेचन मे सुन्दर ढग से प्रकाश डाला है । तात्पर्य यह कि-इस लेस म प्राय शुद्धाद्वैत के सभी बडे बडे सिद्धान्तों की रूप रेसा और सेवा का क्या रहस्य है ? यह भी विदित हो जाता है। ३ स्ठोपनिपद्- यह कृष्ण यजुर्वेद की कठ शाखा को पनिषद् है । इसमे प्रथम श्र की प्र० घल्ली म २, द्वि० मे २४, ४० १७ मन्त्र हैं। द्वि० श्र० की [ शु० पु सस्कृत वाङ्मय च० वल्ली में १५, पञ्चम वल्ली में १५, और पाठ वल्ली में १८ मन्त्र है। इस प्रकार दो अध्यायों मे ६ वल्ली भार ११८ मन्त्र हैं । प्रस्तुत उपनिपद् में नचिकेता गोर यम के सम्पादरूप में जीवन और मृत्यु के सम्बन्ध मे सूक्ष्म विरेचन है। (१) कठोपनिपद् भाप्यम । रचयिता भा०मा०पचनदी श्रीगोवर्द्धन भट्ट । (श्रीगट्ट लालजी) विद्या वि० नाथद्वारा से स. १६८६ में प्रकाशित । भारत मातंड ने इसकी प्रथम पल्ली का सम्पूर्ण और द्वि० यल्ली के १३ मन्त्रों तक ममग्र तथा १४पर थोड़ा भाप्य रचा है। इस उपनिषद् पर तत्कृत भाग्य रचना इतनी ही है। ऐसा विदित होता है कि इसे पूर्ण करने का अवसर न पा सके थे। प्र० बल्ली में वेदज्ञान के सम्बन्ध म उत्तमाधिकारी के स्वरूप का प्रतिपादन किया गया है । द्वि० वल्ली मे वत्ता की प्रसनता पर उत्तमा धिमारी के परिज्ञानार्य श्रेय और प्रेय इन दो के स्वरूप और फल का तारतम्य कहा गया है । भाष्यकार की दृष्टि मे-प्रारम्भ मे कटु होने पर भी परिणाम म सुरा यह स्थिति को श्रेय जैमा कि रोगी के लिये भेपज वत् अपवर्गादि लक्षण कहा गया है, अथच आदि मे मधुर होकर परिणाम म दु सप्रद प्रेय-जैसा कि रोगी के लिये कुपथ्य-पशुपुत्रादि लक्षण ससार कहा गया है । गीता मे इन दोनों को साविक, राजस सुस की सज्ञा दी गई है । इस मगर नचिकेता की प्रेय के प्रति सर्वश उपेक्ष्य बुद्धि दसरर प्रसन्न होकर मृत्यु ने १२ मन्त्रों में जीय के रास्तविक स्प और लाभ का वर्णन किया है । १३ वे मन्त्र म उसका उपसहार है। १४ में मन्त्र में ब्रह्म विपया प्रश्न हैं, जहाँ उक्त भाष्य समाप्त हो जाता है। ४ मुण्डकोपनिपद्- (१) मुण्डक उपनिषद् पर मठयति जयगोपाल भट्ट कृत भाष्य है, जो अनुपल ध है । उन्होंने सरचित 'तैत्तिरीय उपनिषद्' के भाष्योपक्रम मे लिखा है "तर गोपालतापिनी कृष्णोपनिपदौतु स्पप्रार्थे एव मुडफो. पनिषद् दुरदापि खेतरपेक्षया स्वल्पेति पश्चाद् व्याख्यास्यते ।" ऐसा विदित होता है कि उन्होंने तैत्तिरीय भाष्य के अनन्तर इसकी रचना की थी। यह भी सम्भव है कि वे किसी कारणवश फिर उसे पूर्ण न मी कर पाये हों। अथर्व परिशिष्ट के अनुसार यह अपर्व शाखीय लघु उपनिषदो प्रमाण० प्र०.. वेद] मे से प्रथम है । नारायण विरचित मुंडकोपनिषद्-दीपिका मे कहा गया है कि-चीर्णे शिरोनते ध्येयं तेन मुडक उच्यते, सडपट्टं निमुंड च शौनकीयं श्रुते. शिर.।" इसमें तीन मुंडक हैं और प्रत्येक मे दो-दो सण्ड हैं। इसमें ब्रह्म-सम्बन्धी सिद्धान्त का जिस सुन्दर ढङ्ग से निरूपण है वह मननीय और गंभीरार्थ चिन्तन पर प्रकाश डालने वाला है। मंत्रों में बडी ही सरल रीति से वैदिक तत्व का विवेचन इसकी विशेषता है । शु० सिद्धान्त के अधिनाश स्थलों पर इसके मन्त्रों का प्रमाण दिया जाता है। ५ माइक्योपनिपद् दीपिका- प्रस्तुत उपनिषद् अथर्ववेदीय है । मुग्वेद को शाग्गाओं मे भी माडूके य नामक एक शाखा का नाम आता है । इसमें १२ मन्त्र हैं, जिनमें और उसके प्रकार, उमार, मकार नामक तीनों पादों तथा नसे विलक्षण प्रात्मारूप चतुर्थ पाद प्रणवात्मक ब्रह्म के स्वरुपरा वर्णन है। स्पसृष्टि के अनुसार नामसष्टि भी ब्रह्ममय है, इसम प्रतिपादन क्यिा गया है । (१) इस उपनिषद् पर श्रीपुम्पोत्तमजी कृत यह दीपिका नामा टीरा है, जो गौडपाद कारिका के विवरण के साथ पु० कार्यालय वम्बई से स. १६६० में प्रकाशित । उक्त वारिकाओ के तथ्य नामक द्वि० प्रकरण पर श्रीपुस्पोत्तम जी ने 'वैतध्य प्रकरण विवरण' नामक निवन्ध लिसा है। वेद और चेदान्तात्मक उपनिपदों का बीज प्रणव ओंकार है वह ब्रह्मवाचर है, उसके द्वारा कार्यस्प मे प्रसृत वेद भी ब्रह्म का अभिधायक है, एतावता ओंकार भी आत्म ब्रह्मरूप है । वह कार्यकारणस्प से मा व्यापक है, अत नामप्रपचरुप समस्त वाडमय जो ओंगार वाच्य का याचक है ओंगर का ही विवरण है वह चतुष्पाद है । इम प्रार इम उपनिपद् पर 'दीपिका' टीना द्वारा प्रकाश डाला और परमापिंक फल का मम्य विरेचन कर उसके वास्तविक नम्पका प्रतिपादन किया गया है। इस पर उपलय गौडपाद् प्राचार्य की २३ गरिसायों का वास्तविक अर्य निरूपण करते हुए, पतथ्य प्रकरण की ३८ कारितायों पर - [ शु० पु० सस्कृत वाङ्मय भी प्रकाश डालते हुए श्रीपुरुषोत्तमजी ने शास्त्रीय भ्रान्ति का निराकरण कर शु० वेदान्त का स्थापन किया है। गौडपाद कारिका व्यारयान के सम्बन्ध में श्रीपुम्योत्तम जी ने शा० तत्वदीप निवन्ध आवरण भंग [ कारिका ११ ] में लिसा है:- "गोडवार्तिक-प्रकरण-चतुष्टयार्थस्तु मया तव्यारयाने सोपपत्तिको निरूपित इति ततोवधेयः ।" इससे विदित होता है कि 'यावरण-भग' रचना के पूर्व इसकी रचना की गई है। ६ तैत्तिरीयोपनिषद् - कृष्णयजु की तैत्तिरीय संहिता का तैत्तिरीय ब्राह्मण है, उसका अन्तिम भाग तैत्तिरीय आरण्यक है, जिसके १० प्रपाठकों में से ७ से है प्रपाठकों को 'तैत्तिरीय उपनिपद्' कहा जाता है 1 सातवाँ प्रपाठक 'शिक्षा-वल्ली,' आठया 'ब्रह्मानन्द-बल्ली, और नववा 'भृगुवल्ली' नाम से निख्यात है। प्रथम में १२, वि० मे और तृ० मे १० अनुवाक हैं। इस पर निम्न व्याख्या उपलब्ध हैं। (१) इसके आनन्द-वल्ली नामक प्रकरण पर मठपति श्रीजयगोपाल भट्ट कृत भाष्य है। (२) प्रस्तुत भाष्य का गुर्जर मापानुवाद श्रीमूलचन्द तुलसीदास वेली वाला द्वारा रचित है ।दोनों ग्रन्थ अनुवादक द्वारा बंबई से सं०१६७५ में प्रकाशित हैं। शु० सिद्धान्त की दृष्टि से 'पानन्दवल्ली' का बड़ा महत्व है। आनन्दमय परमात्मा के आनन्द की ओर दिक्संसूचन करना उसका मुख्य लक्ष्य है । इसी पर मठपति जयगोपाल भट्ट ने विशेष मीमांसा की है । प्रस्तुत आनन्दवल्ली के अनुवाकों में मन्त्रों की कोई संरया नहीं है। छोटे-छोटे सरल किन्तु गंभीरार्थक वाक्यो मे ब्रह्मानन्द का सविस्तर वर्णन किया गया है, और जगत मै स्वल्पातिस्वल्प रूप से विद्यमान आनन्द का पारंपरिक विकास बताकर निरवधि रूप में उसे परब्रह्म में प्रतिष्ठित कहा गया है। मठपति कृत भाष्यानुमार इसमें अनुयाकों का कोई विभाग नहीं है, केवल तीन वल्लियों मे ही उपनिषद् विभक्त है। शानन्दरल्ली से अर्थानुगुण्य न होने के कारण पाठसौर्य के लिये इस प्रकार के अनुवाकों प्रमाण ..प्र. वेद ] का विभाग पीछे से पलित किया गया है, ऐसा अनुमान होता है । तीन वल्लियाँ ही इसका समर्थन करती हैं, सायण का भी यही मत है । अन्य भाष्यों में जहाँ तैत्तिरीयोपनिषद् का उपन्यास किया गया है, वहाँ भी अनुवाक के रूप मे न होकर पल्लियों के रूप में ही उसमा उल्लेख मिलता है। जयगोपाल कृत भाष्य के उपक्रम से विदित होता है कि उन्होंने उठायश प्रथम 'आनन्द वल्ली' का ही भाष्य लिया है। शिक्षावल्ली' की भाष्य रचना को उन्होंने बाद में प्रतिज्ञात किया है। पर 'आनन्द- वल्ली' के अतिरिक्त अन्य वल्लियों का स्मरा भाष्य नहीं मिलता। इसकी रचना शांकर-भाग्य के सिद्धान्त-खंडनार्थ की गई है, ऐसा प्रन्यकार का स्पष्ट कयन है। ७ छान्दोग्योपनिषद् - यह उपनिषद् सामवेद की यौथुमी शाखा के बाहरण के अन्तर्गत है, जो ४० भागों में विभक्त है । प्राथमिक २५ भागों की 'तांड्य' अथवा 'पंचविंश' संज्ञा है । इसके आगे के ५ भाग पशि ब्राझरण नाम से प्रख्यात हैं। अगले दो भाग मन्त्र, ब्राह्मण और अन्तिम ८ भाग 'छान्दो- ग्योपनिषद्' नाम से विदित हैं । यह सामवेद की तबल्यार शाखा की उपनिषद् है। [वै सा०] प्रस्तुत उपनिषद् मे ८ अध्याय या प्रपाठक हैं, जिसमें कई खण्ड और मन्त्र हैं। इस पर निम्नलिखित व्याख्यार मिलती हैं। १ छान्द-योपनिषद् काप्य-योगि श्री गोपेश्वरजी प्रणीत । अप्राशित । २ धान्दग्योपनिपद् दीपिका-श्रीपुरपोत्तमजी प्रणीत । अप्रराशित । ३ छान्दोग्योपनिषद् शुद्धाद्वैत भाष्य-भा० श्रीगोवर्द्धन भट्ट...श्रीगट्ट- लाल जी रचित-अप्रगशित । (१)(२) (३) शु० सा० दृष्टि से निर्मित १ से ३ विवरण उपलब्ध नहीं है केवल उनकी रचना श संकेत मिलता है। ४ छान्दोग्योपनिपद् भगवद्धर्म बोध-भाग्य-रचयिता श्री रमानाथ शास्त्री। प्रथमाध्याय मात्र । सं० १६८४ में नाथद्वारा से प्रकाशित । इसके अनुसार 'छान्दोन्य' शब्द का अर्थ पाल्हादकारी छन्दरूप [ शु० पु० रा कृन वाहमय ८ ५ ८ है भगवान् के स्वरूप का प्रतिपादन करना है। भगवद्गुणों के मान करने वाले भगवद्भक्त एपि'इन्दोग' कहलाते हैं । छन्दोगों की गीति गो'छान्दोग्या' कहते हैं । ऐसी गीति जिसके द्वारा भगवान् के समीप नितरा गति होती है वह उपनिषद् माहात्म्यज्ञान-पूर्विरा भक्ति है। उसको उत्पन करने वाले वेद के पाखण्ड को 'छान्दोग्योपनिषद्' कहा जाता है। सएडां अोर मन्त्रों में विविध रूप से कर्म, ज्ञान, भक्ति की उपादेयता प्रतिपादन फर परब्रह्म परमात्मा के ग्राह्यरूप का वर्णन है, जिसमे स्तुति के सम्बन्ध म विशेष विचार रिया गया है - इस प्रपमाध्याय में निम्नलिसित संड और उनके मात्र हैं। गंड-१ २ ३ ४ मन- १० १४ २२५ इसके प्रथम सड म कर्माभ्युदयरूप उपासना का प्रतिपादन है, जो प्रथम प्रसार मे उद्गीयोपासना कहलाती है। 'उद्गीथाक्षर' शब्द का तात्पर्य भगवन्नाम है, उसी के उपारयान महात्म्य-रयापन का यहाँ वर्णन किया गया है । द्वितीय सड मे अध्यात्म्यादि मिन भिन्न प्रभार से उद्गीथ की कर्मानुगत उपासना वर्णित है । तृतीय सड' मे अधिदैवत प्रारण मे ज्ञानानुगत उपासना या कथन किया है। चतुर्थ सड मे इन सब उपासनाओं में स्वरूपगत भेद नहीं है, प्रत्युत प्रकार भेद है, यह सिद्ध किया है । पश्चम स० में अधिदेव ओर अध्यात्म्य उभयविध उपासनात्रा के एमत्व स, और पष्ट संड में ज्ञानमक्ति के निरूपणार्थं तदवयभूत का , साम आदि पदार्थों का निरूपण हुआ है। सप्तम सड म अधिभूत आदि समस्त पदार्थ ब्रह्मस्वरूप हे इसे बताया गया है। अष्टम सड मे परोवरीयस्त्व गुणक उपासनान्तर का वर्णन पतिहासिक कया के उपोद्घातरूप म है । उद्गगीय विद्या म कुशल १-शिलक शालावत्य, २ -चैश्तिायन दाल्ल्य, ३--प्रवाहण जैवलि । यह तीनों परस्पर प्रश्न करते और उत्तर द्वारा स्वकीय जिज्ञासाओं का समाधान करते हैं। यहाँ सामादि लोकों का भी निरूपण होता है। नवम सड में भगवान् पुम्पोत्तम ही सर्वाश्रय है, आकाशनाम- प्रमाण० प्र० .वेदन , धारी है, यह बतलाकर ग्नके परवरीयस्त्वय गुण की स्थापना की गई है। पुरइन्द्रियादि से भी पर, वरअक्षर से भी विशिष्ट जो पूर्ण पुरुषोत्तम हैं वह परोवरीयान् कहलाते हैं, उनके भाव से परोवरीयस्त्व कहा जाता है, उन्हों के गुणों का कथन यहाँ उपलब्ध है। दशम सड मे प्रस्ताव और प्रतीहार रूप विषय में आदित्यादि देवस्थ परमात्मा ही है, इसे शारित चानायण नामक ऋपि के व्याख्यान से कहा गया है। एकादश सड मे भी सर्वसिद्धान्तस्प से इसी उपासना का स्थन है । द्वादश संड में पूर्व संड मे वर्णित अन्न की कष्टदशा या निवारण करने के लिये वेद में अन्न की उपासना का जो वरन मिलता है, वह पनिटा- धिकारी को प्रवृत्ति के लिये है, मुरयाधिकारी के लिये नहीं, यह रहा गया है। त्रयोदरा सड़ मे-पूर्व सण्ड वर्णित सामाययवरूप भक्ति विपयक उपासना कहने के बाद सामानयवरूप स्तोमाक्षर की उपासना का उपदेश दिया गया है। स्तोम अक्षर समूह को कहते हैं । लोक्गीतों मे जिस प्रकार तान साधने के लिये है रामा' आदि शब्दों की युट लगाई जाती है, उसी प्रकार साम-गायन में भी कई स्तोमाक्षर हैं, जिनमे 'हा 'उ कार' भी एक है। इस साम-गान मे गाई जाने वाली स्तोमातरों की उपासना भी अभिन्न दृष्टि से ओसरयत् परब्रह्म की ही अद्वैत-भावना से करना चाहिये, इसका निर्धारण पिया गया है। इस प्रकार शु० सिद्धान्त की दृष्टि से स्तुति-सम्बन्धी भगवद्- भक्ति का क्या महत्व है ? यह इस उपनिषद् के प्रथमाध्याय मे प्रति पादित दिया है। यह विवरण यहाँ समाप्त हो जाता है । ८ बृहदारण्यकोपनिषद्-- शुक्ल यजु की माध्यन्दिन और काण्य नामक दो शासार उपलब्ध है। दोनों को 'शतपथ ब्राह्मण' कहते हैं। अन्तिम ६ अध्याय गृहदारण्यक उपनिषद् कहलाते हैं। इसमे आरण्यक और पनिषद् दोनों ही सम्मिलित हैं । अन्य सभी उपनिपदों से वृहत् होने के कारण भी इसका नाम इस प्रकार रखा गया है । पारस्यापी अपेक्षा इसम [ शु० पु० संस्कृत-वाङ्मय - उपनिपद् भाग अधिक है । एकत्र ६ अध्यायों में ४७ ब्राह्मण और ४४२ मन्त्रों द्वारा इसमें ब्रह्म तथा तत्सम्बन्धी विपयों का प्रश्न उत्तर रूप में समीचीन विवेचन है। (१) इस पर योगि श्रीगोपेश्वरजी विरचित भाप्य सुना जाता है जो सम्प्रति अप्राप्त है। है श्वेताश्वतरोपनिपद्- कृष्ण यजु को अनुपलब्ध श्वेताश्वतर संहिता का ही अंश यह उपनिपद् है जिसमे ६ अध्याय हैं । क्रमशः १६, १०, २१, २२, १४ और २३ मन्त्रों द्वारा उक्त अध्यायों में परब्रह्म के साक्षात्कार का उपाय ध्यान, ध्यान की सिद्धि, प्रार्थना के प्रकार, ब्रह्ममहिमा, वेदान्त, सांरय योग आदि के प्रासंगिक विपयों का इसमें अच्छा स्पष्टीकरण हुआ है। इस पर श्रीपुरुषोत्तम जी विरचित श्वेताश्वतरोपनिषद्-दीपिका नामक टीमा सुनी जाती है, जो सम्पति अनुपलब्ध होने से अप्रशित है। १० कैवल्योपनिपद्- यह अथर्ववेद की उपनिपद् है । इसके प्र० सं० मे १६, द्वि० मे ५ मन्त्र है । एका २४ मन्त्रों में प्राश्यलायन ऋपि ने परिमेष्टी से ब्रह्मविद्या सम्यन्ध में प्रश्न किया है जिसके फलस्वरूप में कैवल्य का विवेचन है। इस पर भी श्रीपुरुपोत्तमजी रचित दीपिका नामक टीका सुनी जाती है, जो अप्राप्त है। ११ उपनिपदर्थमंग्रहः- प्रस्तुत नाम मे श्रीपुरपोत्तमजी विरचित एक उपनिषद् विवेचन सुना जाता है, जिसमे विभिन्न श्रुतियों के अर्थों का शु० सिद्धान्तानुसार संकलन रिया गया है। सम्प्रति यह अप्राप्त है। १२ ब्रह्मोपनिपद्- अथर्व परिशिष्ट के कथनानुसार अथर्व शासीय लघु २८ उपनिषदों मे से यह एक है । इसकी क्रम सं०१० है। इस पर श्रीपुरुपोत्तम जो निर्मित 'दीपिा' नाम की टीम सुनी जाती है। जो सम्प्रति प्राप्त नहीं है। - प्रमाण० प्र० वेद ] ४६ १३ नृमिहोत्तर तापिम्युपनिषद:- अथर्व परिशिष्ट के क्थनानुसार यह अथर्ववेद की २१ वीं उपनिषद् है । जिसमे देवों और प्रजापति के प्रश्नोत्तर-रूप में सिद्धात का प्रतिपादन क्यिा गया है। देवों की प्रार्थना पर जब प्रजापति ने परब्रह्म स्वरूप श्रीनृसिंह 'पूर्ण पुरुषोत्तम' का प्रतिवोधन किया और उनके मन्त्रराज रा उद्धार, तो प्रसव की मानाओं और मन्त्रराज के पदों की एकार्थता सिद्ध होने से देववर्ग को इस प्रकार का सन्देह हुआ कि शरीर आत्मा और ब्रह्म के अभद ज्ञानार्थ ब्रह्म वाचक ओंकार मी सगति रिस प्रकार हो सस्ती है ? इस सन्न्ह का निराकरण प्रजापति द्वारा इस नृसिंह तापिनी म दिया गया है । माडूक्योपनिषद् के समान भी ओंकार रूप परब्रह्म की आत्मा के साथ अभेदता सिद्ध करते हुए ब्रह्मानन्द परम फल की प्राप्ति का निर्देश करना इस पनिषद् का प्रतिपाद्य विषय है। इस पर श्रीपुरपोत्तमजी विनिर्मित 'दीपिका' नाम की टीया है, जो पुष्टि० मा० सि० कार्यालय बम्बई से स० १९८७ मे प्रकाशित है। इसके मन्त्रों द्वारा सिद्ध रिए हुए शराचार्य के मायावाद का खण्डन करना श्रीपुरुषोत्तम जी का लक्ष्य है । भगवद्रुप प्रपच म मायिस्ता का लवलेश भी नहीं है, इसका उपसहार म विवेचन है । इस छोटे उपनिषद् के प्रत्येक मन्त्र पर भाष्य की रचना न कर उसके उतने ही अश का विवेचन करना दीपिरा-टीका का लक्ष्य है, जहाँ मायावाद का सम्पर श्राता है। नृसिंहोत्तर तापिनी के प्रमेय वर्णन श्रीपुरपोत्तमजी ने शास्त्रार्थ निवन्ध प्ररण की 'यन्मायिस्त्व-कथन पुराणेषु प्रदृश्यते" (स०८०) इस कारिका के आवरणभग में किया है, जहाँ मायावाद का निरास करते हुए चल्लभाचार्य ने ब्रह्मवाद की चर्चा की है । इससे विदित होता है कि श्रीपुरुषोत्तमजी ने 'नृसिंहोत्तर-तापिनी' की दीपिका टीका रचना के वाद निवध के 'प्रावरणभग' टीका की रचना की है। १४ श्राधर्षण नारायणोपनिषद्--- इस पर निम्नलिखित भाष्य-रचना हुई है - [ गु० पु० सस्कृत-वाङ्मय (१) वेदान्त-विद्यालंगार भाष्य ..रचयिता गोत्रीयनिन्दाचार्य जी महाराज। प्रस्तुत उपनिपद् में नारायणस्वरुप परब्रह्म मा प्रतिपादन किया है । नारायण नाम परब्रह्म का है और तद्रप से सर्वत्र प्रतिपादित परतत्य ही समस्त प्रपंच का आदि गारण संधि-स्थिति-प्रलय-फर्ता है, यही ममस्त देवस्वरूप है, सर्वत्र व्यापक, गुणातीत रूप में विद्यमान है । उनका नाम मन्त्र..."ओं नमोनारायणाय" अष्टाक्षर सर्वकामनाओं का साधा ओर परमफलदायक है, यही प्रणवरूप है । इसके जापक निप्पाप होकर परम पद के अधिकारी होते हैं । प्रस्तुत भाग्य मे अन्य पूर्ववर्ती व्यारयागरों के सिद्धान्तों का उल्लेस पर शु० सिद्धान्त का प्रतिपादन किया गया है . उसम नारायण रूप परब्रह्म श्रीकृष्ण और उनके भक्तिमार्ग का महत्व-प्रतिपादन भाष्य, गम्भीर अध्ययन शैली से लिखा गया है, और इस शताब्दीकी एक अप्रतिम भाप्य रचना है। () वेदान्त विप्लंक भाप्य-किरणायली व्यारया। निर्माता श्रीहरि- शार शास्त्री । उक्त प्रन्य ना० प्रा० मल २० बंबई द्वारा सं० १९८७ में प्रसाशित। भाष्य के गूढार्थ-प्रकटीकरणार्थ 'विरणाचली' व्यारया में सुन्दर समन्वय है । व्यारयामार का मीमासा-पाडित्य उपनिषद् के भाष्य पर नवीन इष्टिकोण उपस्थित करता है । अथर्व परिशिष्ट के स्थनानुसार यह अथर्व-शाखीय लघु (२८) उपनिपदों मे २७ वीं है। १५ गोपाल पूर्वतापिन्युपनिपद्- इस पर निम्नलिसित दीना ग्रन्थों का परिचय मिलता है (१) गो०पू० उपनिपद् व्यारया । योगि श्रीगोपेश्वरजी कृत अप्राप्त । श्रीगोपेश्वरजी ने स्वरचित अणुभाष्य प्राश की रश्मि टीरा मे लिखा है..."कृष्णाय गोपीजनवल्लभाय स्वाहेति" श्रुत्यर्थस्तु टीकाया दुष्ठव्य. अत्र प्रयोजनाभावान लिरयते" [अणु० तृ० अ० तु. पाद ३० सूत्र रश्मि ] पं० हरिशकर शा० ने भी गो० तापिनी की भूमिका में उसमा उल्लेस पिया है । अत इमस होना सभावित है।

प्रमाण प्र०""वेद ] 1102 (२) ब्रह्मामृतभाष्य, मो० श्रीअनिरुद्वाचार्य रचित । (३) ब्रह्मामृत भाष्य-पीयूपलहरी व्यारया । गो० अनिरुद्धाचार्य द्वारा स्वकीय भाष्य पर स्वकीय टीका। (४) ब्रह्म भाप्य प्रस्तावना । श्री हरिशहर शास्त्रि लिखित । ब्रह्मामृत भाष्य और उसकी टीका पु० पुस्तकालय नडियाद से स० १९८४ मे प्रकाशित है । प्रस्तुत उपनिपद्, उसके भाप्य और विवरण मे सप्रमाण सयुक्तिक श्रीपरब्रह्म गोपीजनवल्लभ श्रीकृष्ण के गोपालमन्त्र और भक्ति सेवा तथा परमानन्द रूप लीलाफल का सम्यक विवेचन हुआ है । विशेषतया इस पर प्रकाश डाला गया है कि-गोपालतापिन्युक्त मन्त्र अन्य मन्त्रों के समान नहीं है। कामना और नियाम भाव से इसकी उपासना करने पर सभी फ्लों की संप्राप्ति होती है। यह भक्ति मार्गीय मन्त्रराज है, सर्व-समर्पण पूर्वक इसके अनुष्टान या प्राचारण साक्षात् फ्लप्रापक है । भाप्य और टीम मे शु० भ० मार्ग की दृष्टि से उसे सुव्यक्त करने का जो प्रयत्न हुआ है पूर्ण रूपेण सफल हुआ है। १६-गोपालोतरतापिन्युपनिषद्:- इस पर 'ब्रह्मामृत भाष्य' की रचना गो० श्रीअनिरुद्वाचार्य जी ने की है जो संप्रति अप्रकाशित है। - श्रुति रहस्य- रचियताः-गो० श्रीगिरिधरजी महाराज पाशी। इस पर निम्नलिखित विवरण मिलते है:- (२) अति-रहस्य-प्रमश:-पं० रामकृष्ण शास्त्री नेत काशीकृत । अति-रहस्य-प्रकाश-गुर्जरानुवाद-श्रीमूलचन्द तुलसीदास तेलीवाला कृत । यह प्रन्थ मूलचन्द तुलसीदास तेली. द्वारा बई से सं० १९८२ मे प्रगशित है। (३) श्रुतिरहस्य भापा टीका-भारतेन्दु बाबू श्री हरिश्चन्द्रजी कृत । प्रकाशित । हरिश्चन्द्र काशी। श्रुति-रहस्य नामक अन्य मे श्रीगिरिधरजी महाराज ने पूर्ण धुरपोत्तम और गुरु प्राचार्य जी के स्वरूप मे अभेद मानकर श्रुति पादा. [ मु. पु० संस्थ। वाङ्मय स्मृति पुराणादि-बचना से परमतोपन्यास एव राम-समाधान पूर्वक श्रीवल्लभाचार्य के स्वरूप का निरूपण दिया है। अन्य में "नमो ब्रह्मणे नमोस्त्वग्नये" । इस मन्त्र को मुग्य लक्ष मान कर प्रतिपादित किया गया है रि-इम मन्न में श्रीवल्लभाचार्य के स्वरूप और अवतार का प्रयोजन क्या है ? उनमे ओर परब्रह्म श्रीकृष्ण के स्वरूप में कोई भेद नहीं है । भारतीय संस्कृति मान-स्वरूप श्रीहरि और ज्ञान प्रदाता गुरु म एकात्म भाव का ही दर्शन राती है, इसी भाव ग लेकर प्रन्यकार स्वसीय सिद्वान की पुष्टि करते हैं। प्रस्तुत प्रसङ्ग में श्रीगिरिधर जी ने "चत्वारि शृङ्गा गयो अत्य "। आदि मन्त्र द्वारा अर्थान्तरों का उपन्यास परते हुये प्रतिपाद्य अग्नि-वैश्वानरावतार श्रीवल्लभाचार्य के स्यस्पा जो विचार किया है. घह माननीय है। इस मन्त्र के प्रतिपाद्य अर्थ म जिन विभिन मतों का उल्लेख होता है, उनम मुरय इस प्रसर हैं - (२) सायणाचार्य-यज्ञ स्वरूप में इसे प्रतिपादित करते हैं। (२) तैत्तिरीय ब्राह्मण के अनुसार इसका सूर्यपरक अर्थ होता है। (३) व्यापरणाचार्यों की दृष्टि में शब्दरूप का वर्णन है । (४) विद्यारण्य स्वामी इसा प्रणा परत्वेन व्याख्यान करते हैं। (A) रामानुजाचार्य -इसे वासुदेव परत्वार्थ से विवृत करते है। (६) वैष्णव धर्मानुसार -इसम गोलोक धाम का वर्णन है। श्रीगिरिधरजी मुरयार्थरूप से वेद म वर्णित अग्नि स्वरूप को लेकर उसके अवतार श्रीवल्लभाचार्य का प्रतिपादन पर एक नई दिशा का ससूचन करते हैं। अति रहस्य मे "नमो ब्रह्मणे" इस मन्त्र मे जिन आठ विशेषणों का निर्देश है वे आठ विशेषरण श्रीवल्लभाचार्य के अष्टविध रूप का विश्लेपण करते हैं, इसरा निर्देश करते हुए कहा गया है कि ये ऐश्वर्यादि पड् धर्म रूप गुण और सयोग विप्रयोगात्मक दो धर्मी रूप में है । प्रथकार की प्रान्तरिक प्रेममयी भावना ने जिस प्रकार इस विषय प्रमाण प्र०.. वेद ] का स्वरूप प्रतिष्ठित किया है, प्रत्य के उपसंहार मे उसरा उल्लेस इस प्रकार है- " यथामतिविलासेन प्रेमोल्लासेन पर्णितम् श्रीमदाचार्य चरणा. प्रसीदन्तु स्वतः सदा । रामकृष्णशाखिविरचित 'श्रुति-रहस्य प्राश' में उसके कठिनाशों का विवेचन है, ओर शवासमाधान पूर्वक प्रतिपाद्य विपय की पुष्टि । प्राय, इसी का अनुवाद भारतेन्दु कृत है । मूलचन्द तुलसीदास तेल वाला कृत गुर्जरानुवाद दोनों दीकाओं के आधार पर किया गया है। सूक्तार्थ-विवरण- भगवनिश्वास रूप वेद की संहिताओं के प्रत्येक अध्याय मे अनेकों सूक्तो द्वारा परब्रह्म परमात्मा के सरुप मा प्रतिपादन करते हुए विविध रूपों मे उसकी स्तुति की गई है, जिसके तोता वह परमाप्त महर्पि गण हैं, जिन्होंने तपःपूत होकर अनन्त साधनाओं की सिद्धि से परमात्मा के साक्षात् रूप के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त किया है । वेद के विभिन्न सूतों में जिन परमात विषयक स्तुतियों का उल्लेस है, वे प्रस्तोता के हार्दिक सन्तोप की अभिव्यक्ति के साथ अध्ययनशील साधक जीच के लिए परम कल्याणप्राप्ति के साधक भी हैं और उनमें जो गम्भीर भाव भरे हैं वे सी जिज्ञासा के पूरक भी। उदात्त दिव्य- गुणों के धाम श्रीहरि के महात्म्य-चिन्तन और नामोच्चारण से जहाँ आध्यात्मिक पाविन्य प्राप्त होता है, वहाँ पुनीत मन्त्रों के उच्चारण से वाणी का पावन भी होता है, एतावता दोनों साधनों से एक दिव्य आधिदैविक अनुभूति होती है जो-परम पद की प्रापिका मानी जाती है। वैदिक रहस्य की गंभीर समन्वयात्मक चिन्तना के अभाव मे साधारणतया ऐसा प्रतीत होता है कि इनमे विविध देवों की स्तुतियों या वर्णन होने के कारण वहुदेव-बाद का सिद्धान्त स्थापित है। इसी भ्रम के कारण अधिराश पाश्चात्य विद्वानों ने इस ओर उपसाहास्पद चेष्टा द्वारा परम रहस्य के प्रति विपरीत भावना का प्रसार दिया है।

[ शु० पु० सस्कृत-वाङ्मय यह उन गभीर चिन्तन नहीं है। परमात्मा के अनन्त दिव्य गुण समस्त विश्व म विस्तृत हैं। उनका आधिदैविक रूप देवों के रूप में अभिव्यक्त हुआ है अत देवा गो विभूति मानकर समष्टि रूप में उस परब्रह्म का प्रतिपादन वेटों म मिन्नता है, जो समस्त ज्ञान विज्ञान की राशि हैं, और जो सकाम और नियाम दोनों जीयों के मनोरथ के पूरक हे । सृष्टि की विभिन्नता प्रतिपादित करते हुये उनके मूलकारण अचिन्त्य, अनन शक्तिशाली परतत्व के प्रति अनेकत्व से एकत्व की ओर, और भेद मे अभेद की ओर लेजाना ही इन सूक्तों का “ यद्यपि शु० सिद्धान्त के प्रतिपादन में स्पले-स्थले विभिन ऋचाओं द्वारा प्रमाण पुष्टि की गई है, तथापि समूहात्मक रूप में वेदों के आख्यान की ओर बहुत कम दृष्टिनिक्षेप क्यिा गया है, इसका कारण श्रीव नभाचार्य की यह प्रानल इनि है जिसके द्वारा वे वेद के अज्ञान की कुज़ा बत्तनाते हैं। उनका इस सम्बन्ध म स्थन है कि- वदार्थ परिज्ञान के लिये क्सिी प्रकार की सींचातानी नहीं करनी चाहिये । सीवा श्रोर सरल उपाय यही है कि- य धातुशब्दा यनार्थे उपदेशे प्रकीर्तिता । तयैवार्थों वेदराशे कर्तव्यो नान्यथा रचित् ।" प्राचार्य के उक्त क्थनानुसार समन्वयात्मक रूप से वेद के अर्थ की निप्पत्ति अध्ययनशील यनि के लिये दुरह होते हुए भी असभव नहीं है, तथापि सौर्य के 1लये उनका प्रसभिर चिन अपेक्षित तो होता ही है । विभत्रसूक्तों का प्रतिपाद्य विपय क्या है ? विद्वानों ने इस ओर प्रयत्न किया है, और तदनुरूप शु० पु० बादमय में भी इम और कुछ साधना हुई है । निम्नलिसित वैदिक सूक्तों पर सस्कृत टीकाओं की रचना है जो प्राप्त है पर सप्रति अप्रमाशित । इन सूतों पर विविध नाम से च्यारयाएँ पो० श्रीपालकृष्ण शासि रचित है और जो उनके यात्मन पो० षठमपि शास्त्री के पास सुरक्षित हैं। इनकी नामावली और परिचय इस प्रकार हैं , प्रमाण० प्र०...वेद ] (१) विष्णुसूक्त "अतोदेवा अवन्तु नः०" आदि ६ ऋचाएँ । [ऋ० सं०प्र० अटक, ५ अध्याय ५ सूक्त प्रातः सवन सोमातिरेक में शंसनीय । विष्णु देवस्य] प्रतीक इस प्रकार है- १-अतोदेवा अवन्तुनः० २-इदं विष्णु विचक्रमे ३-त्रोणि पदा विचक्रमे ४-विष्णोः कर्माणि पश्यत. ५--तद् विष्णोः परमं पदं ६-तद् विपासो विपन्यवो इन मन्त्रों मे सष्टतः श्रीविष्णु के स्वरूप और महात्म्य का प्रतिपादन होने से इस पर पो० बाल- कृष्ण शास्त्री ने "विष्णुसिद्धान्त-व्युत्पति-सौरभ निर्झरिणी" नामक व्याख्या की है, जिसमे व्याकरण की व्युत्पत्ति को लेकर उक्त मन्त्रों मे पुष्टिमार्ग के सेव्य परमात्मा श्रीविष्णु (श्रीकृष्ण) के स्वरूप- माहात्म्य का प्रतिपादन है। प्रस्तुत ग्रन्थ का समर्पण योटास्य गो० श्रीविठ्ठलनाथ जी ( कन्हैयालाल जी) महाराज को किया गया है अतः इसकी रचना उनकी विद्यमानता मे हुई थी। यह अन्य श्रीबालकृष्ण शास्त्री जी द्वारा हस्त लिसित पंजिका सं० ४०, ग । ३७, स।२, क, और ३, घ मे विद्यमान है। (२) “परो मात्रया तन्वा" इत्यादि वशिष्ठदृष्ट सप्तर्च सृक्त:- [ ऋ० ५ ०६ अ०२४ मं०] इसके मन्त्रों की प्रतीकः-- १-परो मात्रया तन्या। २-नते विष्णो ३-इरावती धेनुमती० १-उरं यज्ञाय० ५-इन्द्रा विष्णु ६-इयं मनीषा ७-चपट ते विष्ट इन मन्त्रों की व्यारया का नाम 'वि० सि० व्युत्पत्ति सौरभ-निर्दारिणी' है। [ पजिका स. २, क । ३, स, और २९, प पर विद्यमान ] २६ [ प्रमाण प्र. 0 निम्नलिखित मूत्तों पर प० श्रीनालकृष्ण शास्त्री रचित 'भाष चरित्र' नामक ग्यारया है- जो अप्रकाशित हैं। (३) "प्रव पान्तमन्धसो०" प्रादि दीर्घतमा ऋपि दृष्ट पर्च द्वितीय वि णु सूक्त । [ऋ. २ ० २ ० २५ मात्र ] इसकी भन्न प्रतीर १-प्रव पान्तमन्धसो० २-त्येष मिदा समरण ३-नाई वर्द्धन्ति ४-तत्तदिदस्य पौरन० ५-वे इदस्य क्रम० ६-चतुमि सार्क नव० [प० स०५ न० ० ख० ३१ ग० ३५ स और २, पर म लिसित (४) "वैश्वानराय विपणा" इत्यादि विश्वामित्र इष्ट पचदशर्च सूत्त । ऋ० २० अ०]-इसको मन्त्र प्रतीक १ वैश्वानराय धिषणा २ सरोचयजनुपा० ३ ऋत्वादक्षस्य तरुषो० आमन्द्रस्य सनि० ५ अग्नि सुम्नाय० ६ पावक शोचे तव हि० ७ आरोदसी अपादा० नमस्य त हव्यदाति० ह तिस्रोय नस्य० १० विशा कवि विश्पति० ११ सजिन्वते जठरेषु० १२ वैश्वानर प्रत्न था० १३ ऋतावान यजियः १४ शुचिन यावनिमि१० १५ मद्र होतार शुचिच. (५) वैश्वानराय मीदुपे “आदि ऋषि वामदेव दृप्र पचदशच सूक्त है । [अ० ३ ० ५ अ० १ अनु० ] इससी मज प्रतीक १ वैश्यानराय मीढुषे० २ मा निन्दत य इमा० ३ साम द्वि बह० ४ प्रता मग्निमस० ५ अप्रातरो न योषणो० ६ इदं मे अग्ने क्यिते० ७ तमिन्वे वस मना० ८ प्रवाच्य वचस० ६ इदमुत्यन्महिमा० १० अधधु तान पिनो ० ११ अत बोचे तमसा० १२ किनो अस्य द्रविण ० १३ का मर्यादा पयुना० १४ अनिरेण वचसा० १५ अस्य श्रिय समिधा० प्रमाण. प्र. वेद. 0 सूतम्। (1) "भावामित्रोन शेयो" इत्यानि पचर्च सूक्तम [भू. २५० २ ० २६ मत्र]। [ ५० स० ३५ क ग पर विद्यमान ] (७) “नू मर्योग्यते पानि [ऋ०५ श्र० ६ अ० २५ मन्त्र,] [१० स० ख पर विद्यमान]- (6) 'ताना वास्तून्युश्मसि०' आदि सूक्तम् [ऋ०२ थ०० अ० २४ मन्त्र] [प० स० ४२, ६, क पर विद्यमान] (९) “मूर्धान दियो अरर्तिः” इत्यादि सूक्तम् , [ऋ०४ १०५ अ०६ मन्त्र] [५०स००,६ पर विद्यमान] (१०) वृक्षस्य विष्णो०, इत्यादि सतचं सूकम् [अ० ४ ०५ अ० १० मन्त्र ] इस सूक्त पर 'सिद्धान्त व्यु० सी० निहारिणी' टीका है। [५० स० २ ज पर विद्यमान] (११) "परमान सूक्तम्' इत्यादि मन्त्रा [८०६०७०३३ मन्त्र । इम सूक्त पर मक्षितार्थ लिखा गया है ।[५० स० ११, ख पर विद्यमान है- इत्यादि नाघमा हष्ट सूकम् । (१)" " ० प० [१०म०२,ज पर विद्यमान,] (१३) "चत्यारि गायोऽस्य." इत्यादि वैश्वानर सूक्तम् । [.३ . अ० १० मन्त्र] है- इम सूत पर सतितार्य विवरण है।५०रू. १, ख पर विद्यमान (१४) “प्रविष्णरे 'शूप० इत्यादि मन्त्रेषु गद्यमन्त्राभिप्राय वर्णनम्, [१०२० २०२४ मत्र] प्रमाण. प्र.." वेद. परमात्मा। मम्प्रदाय के दीक्षामन्त्र का अभिप्राय इस सूक्त के मन्त्रो में वर्णित है। [१०स०४ क पर विद्यमान ] (१५) वि गुमूक्त मन्यु नवधा भक्ति प्रतिपानम् इस सूक्त द्वारा मन्त्रों में वर्णित नवधा भक्ति का विवेचन है, [प० स०४, स पर विद्यमान] । (१६) पुरुप सूक्त अभिप्राय हिन्दी व्यारयान पो० श्रीमाल शारचित | सहस्र 'शीर्षापुरुप' प्राति पुम्प सूक्त के दिव्य स्वरूप का प्रतिपादक स्तोत्र है, जो शु० यजु० की माध्यदिनी शाखा के ३१ में अध्याय में है। इस पर ऋपि शोना पा भाष्य है, जिम मे 'अपरे' 'केचन' 'अन्य' श्रादि द्वारा अन्य भाप्यकारों का भी समेत किया गया है । यह याज्ञिर भाप्य उच्चकोटि का है। इस पर उ चट का भी भाष्य हे जो ११ वी शती में राजा भोज के शासन काल में हुए थे । उ पट श्रानन्दपुर निवामी बन्नट के पुत्र थे, पुरुष सूक्क कई स्थानो में प्रकाशित है। शु० स० की दृष्टि से उक्त विरेचन अभी तक अप्रकाशित हे पस० ४२, ३, २ पर विद्यमान है। (१७) 'विष्णोर्नु क वीर्याणि' इत्यादि पडच मूक्त [०० अ० २ ०.४ मन,] है इस सूक्त मे व्याख्यान द्वारा शु० सिद्धान्त का प्रतिपादन किया गया है। [५० स० ३५, २ पर विद्यमान ] (१८)'इद विष्णुविचन मे' इत्यादि विष्णुसूक्त । [०१ अ०० अ०७ मन्त्र] प्रस्तुत सूक्त के मन्त्रार्थ द्वारा पुष्टिमार्ग के सिद्धान्तों का सतुलन किया गया है। [५० ३७, ख पर विद्यमान ] | श्री बालकृष्ण शास्त्रि रचित उक्त सूक्तो की व्याख्याएँ सभी अप्रकाशित हैं,जो प० कएठमणि शास्त्री सग्रह में विद्यमान हैं। (१६) तैतिरीय ब्रह्मपल्ली भाष्यम्-भा० मा० श्री गट्ट, लाला जी रचित । अप्रका० । कठोपनिपदू भाष्य भूमिका से ज्ञात ।

प्रमाण ०." वैद० ] । प्रकीर्ण मन्त्र-व्याख्यान- जैसा कि प्रथम कहा जाचुका है शु० सिद्धान्त को भित्ति प्रमाण- यल पर आधारित है । प्रमाणवल में भी परमात भगवद् वचन रूप वेद पर इमका समस्त भार रखा हुआ है । यद्यपि अन्य गीता, ब्रह्मसून, भागन की समाधि-भाषा के वचनो का भी पूर्ण प्रमाणवल इसे प्राप्त है, तथापि यह वेद वचनों की पुष्टि के लिये ही या उसमें जीव बुद्धि से उठने वाले सन्देहों के निरास के लिये अथवा वैदिक रहस्य समझाने के लिये है । अतः जहाँ भी किसी रहस्य रिम्बा तात्विक सिद्धान्त का विवेचन हुआ है, वहा श्रुत्ति-वचनो को उट्ट कित करने की उपेक्षा नही की गई है। पेट की ऋचाएँ, येदान्त के वाक्य उसे परिपुष्ट करते हैं, या यों कहना चाहिये कि वेदवचनो के द्वारा पथित सिद्धान्त ही अन्य प्रमाण-पचनों द्वारा नि सन्दिग्ध कर शास्त्र में गुपित किया गया है। संक्षे त-वेद-वचनो के उपन्याम के साथ उनके अर्थ का स्पष्टी- करण सनत्र श्रावस्या ही नहीं अपरिहार्य रहा है। श्रीवलभाचार्य प्रणीत श्रसुभाष्य, सुरोधिनी तया निबन्धादि ग्रन्यो में जहा रही भी आवश्यक समझा गया है, कठिनता पाने पर या अर्थान्तर की सभापना पर पेट के वचनो का अभिप्राय सममाने में प्रमाद नहीं हुआ है । प्राचार्य के अन्य-निर्माण का समय ही ऐमा था, जर वैदिक वक्तव्य से उसकी पुष्टि परम अपेक्षित रहती थी, अन्यथा अवैदिकता श्राजाने का भय था । प्राचार्य के अनन्तर उनके ग्रन्थो पर तिलक, टीकाया विवरण लिखन यालो ने इम और अधिक सतर्कता से काम लिया और इम परिपाटी को मीमामा के अाधार पर प्रचलित किया । श्रीविठ्ठलेश्वर प्रभुचरण, श्रीपुरपौत्तमनो योगि श्रीगोपेश्वरजी श्रीट जो शास्त्रीय पद्धति से तात्विक विवेचना के पक्षपाती थे, भावना के महत्व को न घटाते हुए भी शरद-यल के आधार पर अधिक निर्भर थे। फलत. उनकी रचनाओं में धान्यस्त वाक्यों का विशदीररण अधिक मिलता है, जिसे उनके अन्यों में जहानहाँ देखा जा साता है। फिर भी मन्त्री पर स्वतन्त्र विवेचन की गभीरता का थनुभर न होने से सम्प्रदाय में इस श्रौर कोई विशाल प्रायोजन नहीं था। प्रकरणों में ममागत किमी एक पास्य के व्याख्यान से विशेष प्रयोजन ६० [ ० ० संस्कृत वाहमय की सिद्धि भी नहीं होती, एताया शुद्धाद्वैत-वाहमय में स्वतन्न रूपेण मन्त्रों का विवेचन प्रन्य रूप में मिलना पटिन है। विगत ताब्दी में इस अोर नाम मात्र का प्रयोग किया गया है। हाँ, यह निश्चित है कि- धेदमाता गायत्री के मम्बन्ध में उमके रहस्य और वास्तविक अर्थ- प्रतिपादन में एक स्तुत्य प्रयत्न का अनुष्ठान हुआ है। गायत्री मन्त्र- "श्री तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्" यह मन्त्र गायत्री नामक छन्द में होने से गायत्री कहलाता है । सविता सर्वजगत् प्रमविता परमात्मा और उनके प्रतीक सविता सूर्य से इसका सम्बन्ध होने के कारण इसे सावित्री नाम में भी व्यवहत किया जाता है। गान (भजनानुशीलन) परने बाले की रक्षक होने से भी "गायन्तं प्रायते यस्मान्” इस आधार पर इसे 'गायत्री' कहते हैं, इस प्रकार की विविध व्युत्पत्तियाँ इस मन्त्र की व्यापकता को वोधिका हैं। यह मन्त्र ऋग्वेद, ३, ६२, १०, सामवेद उत्तरार्चिक, १३, ३, ३ । में आया है। यजुर्वेद में ३, ३५। ३०,२ और ३६,३ श्रादि कई स्थानों पर मिलता है । मन्त्र में २३ ही अक्षर हैं पर यह चतुर्विशत्यक्षरा मानी जाती है सो विद्वान, ओंकार की गणना अथवा वरेण्यं को 'बरेगिय पढ़ कर इसकी पूर्ति करते हैं । २३ अक्षर वाली होने से इसको निवृद् गायत्री संज्ञा दी जाती है । यह त्रिपाद् गायत्री है, इसके प्रारंभ में भूः भुवः स्वः यह तीन व्याहृतियों लगाई जाती हैं जिसका अर्थ पृथ्वी अन्तरिक्ष और द्यौ के अधिष्ठातृ देव या सत् चित् आनन्द लिया जाता है। ब्रह्मपरक होने से इसे ब्रह्मगायत्री भी कहते हैं। वेद में त्रैवर्णिक गायत्री का भी उल्लेख है, अतः यह मन्त्र ब्राह्मणों को द्विजस्व संस्कार प्राप्ति के लिये गुरु द्वारा प्रदान किया जाता है, विप्र को वेदाधिकार इसी से प्राप्त होता है । "ता सवितुर्वरेण्यं " आदि मन्त्र क्षत्रियों और "विश्वा] रूपाणि प्रतिमुश्चते ०" श्रादि मन्त्र वैश्यों को दिया जाता है, ऐसा भी उल्लेस है, अथवा समान रूप से एक ही मन्त्र द्वारा भी उपदेश दिया जाता है। तैत्तिरीयारण्यक मे [१, ११,२] इसका विवरण है । छान्दोग्यो- पनिपद में "गयती या इद सर्व" कह कर इसकी व्यापकता का प्रति- पादन किया गया है। श्रीकृष्णवाक्य गीता मै “गायत्री छन्दसामह' ।

प्रमाण प्र०... कह कर इमको श्रेष्ठता-भगवत्स्वरुपता का प्रतिष्ठापन है । भागवत तो “यत्राविकृत्य गायनी वर्ण्यते धर्मविस्तरः, वृन्नासुर-बधोपेतं तद् मागवतमिप्यते” इस प्रमाण के आधार पर इसी मन्त्र का व्यायान है। मागवतोय दशमस्कन्ध की रासपञ्चाध्यायी गायत्री का मूर्तिमान स्वरूप है । २४ सहस्र श्लोकात्मक श्रीरामचरित्र वाल्मीकि रामायण में प्रतिसहस्त्र लोक का आदि लोक गायनी के एक-एक अक्षर से प्रारम्भ होता है ऐसा मी किन्ही विद्वानों का मत है । तात्पर्य यह कि-परमाप्त शास्त्रों में गायत्री को ब्रह्म के स्वरूप में ही देखा गया है। उपनिषदों में जहाँ प्रतिदिन सन्ध्यारन्दन का उपदेश है, वहाँ उसरा तात्पर्य गायत्री मन्त्र-जप से ही है। वर्णाश्रम-धर्म में निर्धारित षय मे द्विजों को सावित्री का उपदेश न होने से पातित्य का स्थन है-- "सावित्रीपतिता. ह्यते भवन्त्यार्यविगहिता.” । दुर्गा सप्तशती में शक्ति की “त्वमेव सन्ध्या गायत्री त्वं देवि ! जननी परा" कहकर स्तुति कीगई है । मनुस्मृति मे [२,८२] तीन वर्ष तक सावधान- तया इम मन्त्र जप से परब्रह्म प्राप्ति का वर्णन है, आद्य शंकराचार्य भी इसी की पुष्टि करते हैं। इस प्रकार भारतीय साहित्य में गायनी की यही महिमा है, यह संस्कृत मानव-जीवन को नित्य प्रति श्रोज, तेज, बल, वीर्य और बुद्धि देने वाला दिव्य मन्न है। इसस समकक्ष और कोई भी मन्त्र नहीं है। गायत्री को वेद-माता कहा गया है, इसके जप अनुष्ठान से बड़े पड़े फलों की सिद्धि बताई गई है । प्राय: सभी विद्वानों का मत है कि- इस एक ही मन्त्र में समस्त वेदार्थ भरा हुआ है। इसके साथ आचमन, मारण्याम, अघमर्पण, शुद्धि आदि कई कर्म-विधियों का प्रारम्भ . होता है। प्रस्तुत मन्त्र पर विभिन सिद्धान्तानुसार अनेक विद्वानों ने अनेक भाग्य, व्यास्यान, विवरण रचे हैं। विभिन्न भारतीय भागों और कई विदेशी भाषामों में इसके अर्थ पर विभिन्न दृष्टियों से प्रकाश डाला गया है।

[ शु० पु० संस्कृत वाङ्मय की सिद्धि भी नहीं होती, एतायता शुद्धाद्वैत-वाड्मय में स्वतन्त्र रूपेण मन्त्रो का विवेचन ग्रन्थ रूप में मिलना पटिन है। विगत शताब्दी में इस ओर नाम मात्र का प्रयोग किया गया है। हाँ, यह निश्चित है पि- घेदमाता गायत्री के सम्बन्ध में उसके रहस्य और वास्तविक अर्थ- प्रतिपादन में एक स्तुत्य प्रयत्न का अनुष्ठान हुश्रा है। गायत्री मन्त्र- "ओं तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्" यह मन्त्र गायत्री नामक छन्द में होने से गायत्री कहलाता है । सविता सर्वजगत् प्रसविता परमात्मा और उनके प्रतीक सविता सूर्य से इसका सम्बन्ध होने के कारण इसे सावित्री नाम मे भी व्यवहत किया जाता है। गान (भज सन) करने वाले की रक्षा होने से भी "गायन्तं ब्रायते यस्मात्" इस आधार पर इसे 'गायत्री' रहते हैं, इस प्रकार की विविध व्युत्पत्तियाँ इस मन्त्र की व्यापकता की बोधिका हैं। यह मन्त्र एग्वेद, ३, ६२, १०, सामवेद उत्तरार्चिक, १३, ३, ३ । में आया है। यजुर्वेद मे ३,३५। ३०, २ और ३६, ३ आदि कई स्थानों पर मिलता है । मन्त्र मे २३ ही अक्षर है पर यह चतुर्विशत्यक्षरा मानी जाती है सो विद्वान, ओंगार की गणना अथवा वरेण्यं को 'वरेगिय पड कर इसकी पूर्ति करते हैं । २३ अक्षर वाली होने से इसको निद् गायत्री संज्ञा दी जाती है । यह त्रिपाद् गायत्री है, इसके प्रारंभ में भू भुव स्व. यह तीन व्याहृतियाँ लगाई जाती हैं जिसका अर्थ पृथ्वी अतरिक्ष और द्यौ के अधिष्ठात देव या सत् चित् आनन्द लिया जाता है। ब्रह्मपरक होने से इसे ब्रह्मगायत्री भी कहते हैं। वेद में त्रैवर्णिक गायत्री का भी उल्लेख है, अत. यह मन्त्र ब्राह्मणों को द्विजस्व संस्कार प्राप्ति के लिये गुरु द्वारा प्रदान किया जाता है, चिनको वेदाधिकार इसी से प्राप्त होता है । “ता सवितुर्वरेण्यं ०" आदि मन्त्र क्षत्रियों और "विश्वारूपाणि प्रतिमुलते ०" श्रादि मन्त्र वैश्यों को दिया जाता है, ऐसा भी उल्लेस है, अथवा समान रूप से एक ही मन्त्र द्वारा भी उपदेश दिया जाता है। तैत्तिरीयारण्यक में [१, ११,२] इसका विवरण है । अान्दोग्यो। पनिपद मे 'यत्रो वा इद सर्व" कह कर इसमी व्यापकता का प्रति- पादन किया गया है। श्रीकृष्ण्याक्य गीता में "गायत्री छन्दसामहं' प्रमाए.प्र.... ....वेद] भाग्य, व्यारयान, विवरण रचे हैं। यिमिन्न मारतीय भागों योर फई कह कर इसको श्रेष्ठता-भगवत्स्वस्पताका प्रतिष्ठापन है । भागवत तो “यत्राविकृय गायत्री वर्ण्यते धर्मविस्तरः, वृनासुर-बधोपेत तद् मागवतमिप्यते" इस प्रमाण के आधार पर इसी मन्त्र का व्यारयान है । (मागवतीय दशमस्कन्ध को रासपञ्चाव्यायी गायत्री का मूर्तिमान स्वरूप है। २४ सहस्र शोकात्मक श्रीरामचरित्र वाल्मीकि रामायण मे प्रतिसहस्त्र शो का आदि लोक गायत्री के एक-एक अक्षर से प्रारम्भ होता है ऐसा मी किन्हीं विद्वानों का मत है । तात्पर्य यह कि-परमाप्त शास्त्रों में गायत्री को ब्रह्म के स्वरूप में ही देखा गया है। उपनिषदों मे जहाँ प्रतिदिन सभ्याचन्दन का उपदेश है, यहाँ उसरा तात्पर्य गायत्री मन्त्र-जप से ही है। वर्णाश्रम वर्म में निर्धारित चय मे द्विजों को सावित्री का उपदेश न होने से पातित्य राक्थन है- "सावित्रीपतिता ह्यते भवन्त्यार्यविगहिता." । दुर्गा सप्तशती मे शक्ति को "वमेव सन्ध्या गायत्री त्व देवि । जननी परा" कहकर स्तुति कोगई है । मनुस्मृति में [२,८२] तीन वर्ष तक सावधान- तया इस मन्त्र-जप से परब्रह्म प्राप्ति का वर्णन है, शाय शंम्राचार्य भी इसी की पुष्टि करते हैं। इस प्रकार भारतीय साहित्य में गायत्री की वही महिमा है, यह सस्कृत मानव-जीवन को नित्य प्रति श्रोज, तेन, बल, वीर्य और बुद्धि देने वाला दिव्य मन्त्र है। इस समक्ष और रोई भी मन्त्र नहीं है। गायत्री को वेद-माता कहा गया है, इसके जप अनुष्ठान से पडे पड़े फलों की सिद्धि यताई गई है। प्राय. सभी विद्वानों का मत है फि- इस एक ही मन्त्र मे समस्त वेदार्थ भरा हुआ है । इसके साथ आचमन, प्राणायाम, अघमर्पण, शुद्धि आदि पई कर्म-विधियों या प्रारम्भ प्रस्तुन मन्त्र पर विभिन सिद्धान्तानुमार अनेक विद्वानों ने अनेक विदेशी भाषामों में इसके अर्थ पर विभिन दृष्टियों से प्रारा डाला गया है। - होता है।

" [ शु० पु० सस्कृत वाङ्मय शुद्धाद्वैत सिद्धान्त मे गायत्री पर निम्नलिग्नित विवरण हैं। गायत्री-भाष्यम्-श्री बल्लभाचार्य विरचित । गायत्री पर श्रीवल्लभाचार्य का यह सक्षिप्त भाप्य है। भागवत के श्लोक जन्मास्य यतोन्वयादितरत . [१।१।१] की सुनोविनी टीका में उन्होंने गायत्री के समस्त अर्थ का स्पष्टीकरण किया है। अध्ययन से गायत्री-माप्य और उक्त दीमाग एक ही विशद अर्थ सामने या जाता है। शेष में समस्त गायत्री के अर्थ मा समावेश करते हुये अभिप्राय और पतिपय श दों की समानता से उनका एकात्मभाव बताया गया है, और यह इसलिये कि भागवत वेद का फल है, वेद वृक्ष है, और गायत्री बीज है। फ्ल के सम्बन्ध से भागवत में प्रतिपाद्य विपय जो कि वास्तविकतया वेद्य है, 'यालय रस' है । यही रस पूर्ण पुरुषोत्तम का स्वरूप है। "पिबत भागवत रसमालय" इस वाक्य के 'पानय' शब्द का अर्थ इस प्रकार बताया गया है -'श्रा ईपद् लयो मोन। जिससे [ जिस रस के आगे ] मोक्ष भी छोग, तुन्छ है । 'मोक्ष' से अधिक रस तो जीवों को ब्रह्मानन्द से निकालकर भज्नानन्द के सयोजन मै है" यह श्रीवल्लभाचार्य ने रासपञ्चाध्यायी नी प्रथम पारिका में रहा है । इस भजन [ सेवन ] रस के समूह को ही रास' कहा जाता है। एतावता अनन्त शक्तिधारी सच्चिदानन्दविग्रह श्रीपूर्णपुस्पोत्तम का स्वकीय दिव्य शक्तियों के साथ लीलारूप म जो निरचयि रमण हो रहा है, और जिसके विना यह व्यापक विश्व प्रपञ्च क्षण भर भी स्वरूप में अपस्थित नहीं रह सकता, रास का आविदेविक आध्यात्मिर और प्राधिभौतिक रूप है। भागवत का यही प्रतिपाद्य रास-दिव्य आनन्द तप पूत शरीर, परिमाजित इन्द्रियों, एकाग्र समाहित मन और प्रलौकिक अनु- भूति मे निमग्न अन्त करण से परमात्म-कृपा द्वारा साध्य कहा गया है । यही जीव की मनोरथान्त दशा है, जिसे स्वसविल्सवेद्य भी कहा जाता है । 'मनोरथान्त श्रुतयो यथा ययु' [ रास प०] के रुप म श्रीगोपीजनों के रास ना निरूपण इसी रूप में भागवत में मिलता है। यह मनोरथान्त रूप साक्षात् स्वरूपानन्द रास “यतोवाचो निवर्तन्ते अप्राज्य मनसा सह-"आनन्द ब्रह्मणो विद्वान्नविभेति दुतश्चन' और रसो चै स'[आदि] इन श्रुतियों के द्वारा वणित है। श्रानन्दाभि , ६३ प्रमाण...प्र. वेद ] लापुफ जीव को यह परमानन्द शारीरिक तपःसाधना के बाद बुद्धि की सबृत्तियों से अधिगत हो सकता है, अतएव उस धी-वृत्ति को सन्या प्रतिष्ठित करने की आवश्यकता है और वह परमात्मा के दिव्य मनन चिन्तन द्वारा हो सकती है, धी को सत्प्रेरणार्थ ही गायत्री में परमात्मा से प्रार्थना की गई है, अतः शुद्धाद्वैत-सिद्धान्त की दृष्टि में परम फल या पद अथवा आनन्द की संप्राप्ति के लिये गायत्री की उपासना परमावश्यक बताई गई है। श्रीमहाप्रभु वल्लभ ने इमी निरूपण के लिये गायत्री पर भाष्य रचना की है। विशद रीत्या पदार्थ का विवेचन करने के बाद भाष्य के अन्तमें तीन सारिकाओं द्वारा गायत्री और भागवत-विशेष कर तामस-फल प्रकरण रासपश्चाध्यायी के सम्वादी सिद्धान्त का निरूपण किया गया है। इस भाष्य पर निम्न लिखित विवरण है:- (१)गायच्याद्यर्थ-प्रकाशक कारिका-रचियता गो.श्री विट्ठलेश्वरजी इसमें ३५ कारिकाओं द्वारा गायत्री के अर्थ का व्याख्यान है, जो श्रीवल्लभाचार्य के भाष्य का उपवृहण है । इसमें गायत्री के प्रादुर्भाव का कारण, २४ अक्षरों का प्रयोजन, तीन चरणों का रहस्य, छन्द, ऋपि, स्वरूपाङ्ग, वर्ण गोत्र विनियोग, व्याहृति फल और शब्दार्थ सम्बन्ध में आध्यात्मिक दृष्टि से विचार है, जिसे प्रमाणों के द्वारा पुष्ट कर अन्यमत पा निराकरण किया गया है। (२) गायत्र्याद्ययं प्रकाश-कारिका विवरणम्-गोस्वामी श्रीपुरुषोत्तमजी विरचित । श्रीप्रभुचरण कृत कारिकाओं के सष्टार्थ इस विवरण मे युक्ति और प्रमाणपुरःसर प्रतिपाद्य अर्थकी स्थापना की गई है। (३) द्विजराज-सुधा-गुजराती अनुवाद । उक्त कारिता और कारिका-विवरण के आधार पर प्रो० श्रीमगनलालजी शास्त्री कृत। श्रीवल्लभाचार्य के भाग्य सहित उक्त तीनों विवरण श्रीमगनलाल जी शास्त्री सम्बई द्वारा सं० १९७२ में प्रशशित । (४) गायत्री-विवरणम्-श्री गोकुलेश्वरजी विरचित । यद्यपि यह श्रीवल्लभाचार्य न भाष्य का विवरण-सा है फिर भी विशद रूप में गायत्री पर एक व्यारया है। प्रकाशित !

[सुपु सस्कृत वाङ्मय (५) गायव्यर्थ-कारिका:-रचयिता अज्ञात-इस प्रन्य का वास्तविक नाम भी उपलब्ध नहीं होता। ७६ कारिकायों में इसके मम्बध में होने वाली शकायों का समाधान पूर्वपक्ष-खडन द्वारा किया गया है। यह अपूर्ण विदित होता है। श्री मगनलालजी शा० के 'अभिप्रायानुमार श्री पुरुषोत्तम जी के किसी अनुयायी की रचना प्रतीत होती है। प्रकाशित स० १६७३ मगनलाल शास्त्री बम्बई द्वारा । (६) गायत्र्यर्थ-विवरणम्-मठेश इन्दिरेश वृत । इसमें मन के उपर उपनिषद्, पुराणादि वचनों के प्रमाण से सिद्धातानुमार ब्रह्मवाद की स्थापना की है। अप्रकाशित-स० ११२, २८ सर० भ० शु० सा० विभाग। रचयिता प० श्री गोवर्द्धन भट्ट । [गट्ट लाल जी] भारतमार्तण्ड ने श्री श्राचार्य, श्रीविठ्ठलेश प्रभुचरण, श्रीपुरषोत्तमजी द्वारा दर्शित पयपर विद्वत्तापूर्ण व्याख्यान प्रस्तुत कियाहै। इसकी रचना गो० श्री जीवनेशनी बम्बई के सतोपार्थ हुई है। प्रकाशित- (८) गायत्र्यर्थ-व्याख्या गायत्री मत्र पर निम्नलिखित विवरण १० श्रीनालकृष्ण शास्त्री रचित प्रकाशित है, और १० कण्ठमणि शास्त्री के संग्रह में विद्यमान है। (७) गायर्य:- (क) गायअर्थ विचार:-(१० स० ३०, क पर) (ग्व) गायार्थ विवरणम्:-(१० स० ४२, १२, घ पर) (ग) गायच्या विचित्रोर्थः-(७०स० २५,ख । पर विद्यमान) দুল মালে র্দী শুশুরি সরি স্বত্ব স্বাগৰি বৰ বিক अर्थ का प्रतिपादन है।

प्रमाण प्र....वेद ] - (१) "अपस्वग्नौ हृदये" इत्यादि मन्त्र शंका-निराम:- रचयिता अज्ञात-अप्रकाशित-सर०भ० शु. यं०८४, १७,३ । निम्नलिम्वित ग्रय प. श्रीवाल कृष्ण दास्त्रि रचित प्रकाशित हैं । (२) कतिपय मंगयां मंस्कृत पद्यानुवादः-[संग्रह में पं० ४१स] (३) कतिपय मंत्रों का हिंदी पद्यानुवादः-[ संग्रह मे पं० सं०४१, ग] (४) कतिपय प्रकीर्ण मंत्राणां च्याख्यानम् -- [संग्रह में पं० स०३., स, ४२,६च. ४१, ड०४८, घ] वैदिक साहित्य ऋचा, उपनिषद् मंत्र आदि के आधार पर संकलन रूप में निम्नलिसित साहित्य की रचना प्रस्तुत की गई है। श्रुत्यर्थसारः रचयिता कन्हैयालाल-[कृष्ण] शास्त्री । शंकरदयाल शर्मा द्वारा श्रीदेवकीनन्दनजी महाराज की याज्ञानुसार जगदीश प्रेस वंबई से प्रकाशित सं० १६५१ । इसमा अन्य नाम 'वेदान्त सुधाकर' है। इसमे हिन्दी के दोहा सोरठा आदि छन्दो मे श्रुतियों के प्रमाणानुसार आठ प्रकरणों में पूर्व पक्ष उत्तर पक्ष की पद्धति पर शुः सिद्धान्त का प्रतिपादन है। इसकी रचना कामचनस्य श्रीगोविंदजी महाराज की श्राज्ञा से हुई थी। श्रुत्यर्थानन्द-सन्दोहः- रचयिता गो० श्रीवजाभरण दीक्षित। इसका 'परोक्षवादे भगनल्लीला वर्णन' नामक प्रथम प्रकरण प्राप्त है। अप्रकाशित-सरस्वती भै काकरीली शु. बं० ७५, २६, पर विद्यमान । इसमे श्रुतियों के अर्थ प्रतिपादन द्वारा समस्त मृतुओं में होने वाली भगवल्लीलाओं का वर्णन है । इस ग्रन्थ के अन्य प्रकरण भी होने चाहिये जो नहीं मिलते । इस वर्णन की उत्पत्ति मे ग्रन्थकार का कथन है कि.. वेदैःच सर्वैरहमेव वेद्यो वेदान्तद्देद विदेव चाह्म" सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति' वेदे रामायणे चैव पुराणे भारते तथा, आदावन्ते तथा मध्ये हरि. सर्वत्र गीयते' इति निश्चित्य अत्यानन्द-सन्दोहो निरुपित : परोक्षवाद : ' अर्थात् समस्त शास्त्रों मे श्रीहरि और उनको लीलाओं का वर्णन है अतः श्रुतियों में भी उनी लीनाओं का वर्णन " [ गु० पु. संस्कृत-वाङ्मय किया गया है। जिसमें कनिपय मन्त्रों में पड़ ऋतुग्री के पिनास का वाहन पाया जाता है । जो उनके अर्थ-परिज्ञान से विदित होता है। इसकी एक प्रति ले० सं० १८७० भुवनेश्वरी पीठ गोंडल में सं० २५४ पर विद्यमान है । जिस पर "गो० श्रीरामकृष्ण पौत्रेण जगाथा- मजेन श्री नजाभरण दोहितेन कृत." ऐसा उल्लेख है। वेदान्त चिन्तामणिः-रचयिता पंचनदी भाभा पं श्रीगोवर्द्धन शर्मा, (श्रीगट्टलालजी) प्रकाशित श्रीचालकृष्ण विद्यालय घरई । सं १६७४ प्रस्तुत ग्रन्थ वेदान्त के शांकर मतानुमारि 'पंचदशी' नामक ग्रन्थ की जोद मे शु. सिद्वान्त के प्रतिपादनार्थ निर्मित है । जिसे टिप्पणी के साथ पं०ीरमानाथजी शास्त्री ने परिष्कृत किया है । पयों मे पृथक्-पृथक १५ प्रकरणों के द्वारा वेदान्त के उन सभी विषयों पर सप्रमाण मयुक्तिक विवेचन है जो आवश्यक है । प्रकरण इस प्रकार हैं- १ नास्तिक्योच्छेद २ प्रमाण निरूपण ३ संक्षिप्त कार्य निरूपण ४ प्रपंच सत्य निरुपण ५ आविर्भार तिरोभाव नि० ६ अचिकृत परिणाम नि० ७ जीवोद्गम संसार नि० ८ जीवान्तर्यामि शुद्धादेतार्थ नि० ६वझ साकारत्त विक १० शक्ति धर्माभेदनि पूर्वक ११ विशिष्टादेत विचार देतमत निराकरण। १२ शैव शक्ति मत विचार १३ शुद्धादेत विशेष विचार १४ प्रति पुरुष दिग्दर्शन पूर्वक भगवद्धामोदाहरण १५ साधन फलादि सर्वविवेक। यह प्रकरण है। इसकी रचना सं. १६२१ मे की गई है। यह ग्रन्थ शु. सिद्धान्त वेदान्त के जिज्ञासुओं के लिये जितना परमावश्यक है उतना ही विद्वानो के लिये माननीय । मा० मार्तण्ड श्रीगट्टलालजी श्राशु कवि थे । उन्होंने सरल पद्यों में विवेचन प्रस्तुत कर घेदान्ती सुन्दर पाव्याकी है। वेदान्त-चन्द्रिका:-रचयिता पं. श्रीकृष्ण शास्त्री तैलंग दतिया प्रकाशित । कानपुर डायमन्ड जुविलि प्रेस । स. १६६२ । यह ग्रन्य शुद्धात सिद्धान्त के प्रतिपादनार्थ मस्त पद्या में निर्मित किया गया है । इममे चार प्रकरण हैं। यत. ॥

६७ प्रमाण० प्र० देद ] १ ब्रह्म स्वरूप पिचार २ जगनिरूपण जगत्संसार भेद ३ जीवस्वरूप निरूपण ४जीवोद्धार साधन निरूपण प्रस्तुत प्रन्य में संस्कृत श्लोकों के नीचे हिंदी में भावार्थ दिया गया है। रचना काल म. १६६१ श्रुति-ग'ता-श्रीवल्लभाचार्य विरचित । प्रकाशित । वृहत्स्तोत्र मः सा ।मं० १९८३ श्रुतिगोता नाम मे आचार्य श्री की ३० कारिकाए प्रसिद्ध हैं। इसमें उन्होंने वेद की ब्रह्मपतिपादक श्रुतियों के रहस्य का दिग्दर्शन कराया है :-"परब्रह्म भगवान् श्रीकृष्ण की लीलाओं का प्रतिपादन वेद की विभिन्न ऋचाओं में मिलता है। यही सर्वत्र अपने समिदानन्द रूप से व्यापक है, नामस्पात्मक लीला से यह जगत् प्राविभूति और तिरोहित होता है, अतः भगवद्प होने से अभिन्न निमित्तोपादन ब्रह्मारएक होने के कारण यह उसरा ही कार्य है और उमका ही अंश है । जीव ब्रह्म के अंश हैं उनरा उद्धार प्रभु की सेवा से भक्ति द्वारा मंभव है। मानन्दरा की अभिव्यक्ति हो जाने पर जीव में उसके पूरे शों स ममावेश हो जाता है। अहंताममतात्मक संसार की निवृति जीर के लिये श्रावश्यक है। और यह उसके सर्वसमर्पण से सिद्ध होती है। अविद्या-निवृति के याद जीव को अपने वास्तविक स्वरूप में अस्थान होना ही उसरा मोक्ष है, और अंशरूप से भग- यत्मेवना द्वारा उनके स्वरूपानन्द की संप्राप्ति में ही उसरा एकान्ततः श्रेय है।" श्रादि मिद्धान्त ही ऋचाओं का परम रहस्य है यह सिद्ध किया गया है। प्रन्नुन झुनिगीता की कारियों पर निम्नलिखित साहित्य मिलता है। श्रुतिगीता-व्याख्या-गो. श्रीगिरिधरजी वृत प्राशित । इसमें व्याग्गामार ने प्रार्य के अभिप्राय को स्पष्ट रिया है। राप्रपा प्रमाग प्रारम् .

शु० पु. संस्कृत वाङ्मय द्वितीय प्रकरण - श्रीकृष्ण-वाक्य सम्बन्धी मान्यता- शुद्धात साम्प्रदायिा अनुबन्ध-चतुष्टय की परिगणना मे वेद के अनन्तर परब्रह्म पूर्ण पुस्पोत्तम श्रीकृष्ण के मुखपद्म से रिनिर्गत गीता को द्वितीय प्रमाण माना गया ह । व्यास महामुनि प्रथित महाभारत के अन्तर्गत विराजमान गीता में सम्बादरूपता होने के कारण अन्य की उक्तियाँ भी हैं, मुग्यत अर्जुन के प्रश्न अोर भगवान श्रीकृष्ण के प्रत्युत्तर हैं, अत महत्व उन ही वचना को हे जिनसे सिद्वान्त का अवबोध होता है । श्रीकृष्ण-पाक्यो को महाप्रभु श्रीव नभाचार्य ने प्रमाणमोटि में स्वीकार किया है । गीता के कपन से उसके (८ अध्यायों का समावेश होता है। गीता का उपक्रम वृतराष्ट्र के प्रश्न और सञ्जय के वृत्तान्त वर्णन से है, महाभारत की परिस्थिति के अवलोकन से अर्जुन की जिज्ञासा के समाधान या उसकी विषम अस्वाभाविक प्रवृत्ति के निराकरणपूर्वक नि सन्दिग्ध स्थिति-स्थापन के रूप में भगवान श्रीकृष्ण के अमृतमय फर्म ज्ञान भक्ति के उपदेश रूप से है। जैसा कि उपक्रम है। उपसहार भी सजय के वचन द्वारा है। एतायता सजय, वृतराष्ट्र और अर्जुन के प्रासनिक कथन से पिसी सिद्धान्त की स्थापना नहीं होती, वे शास्त्रीय पद्धति में प्रमाण के अन्तर्गत नहीं हे, इसी दृष्टि को सामने रखकर श्रीवल्लभाचार्य ने 'वेदा श्रीकृष्ण पाण्यानि " अादि मे श्रीकृष्ण वास्यों को ही प्रमाण माना है। शास्त्ररूप में स्पष्ट कहा है। "एक शास्त्रं देवकी पुत्रगीत, एको देयो देवकीपुत्र एव । मन्त्रोप्येक्स्तस्य नामानि यानि, र्मा ये तस्य देवरय सेवा ।" [शा० तत्व. नि. ४] .

प्रमाण०प्र० गीता । देवकीपुत्र श्रीकृष्ण द्वारा गीत गीता के प्रति निर्दिष्ट उक्तश्लोक पर एक उपाख्यान है जो श्रीवल्लभाचार्य के समय में प्रसिद्ध हुआ था। उक्त शोक की 'पाररण भग' टीका में श्रीपुरुषोत्तमजी ने इसका उल्लेख किया है। यह श्लोक वैष्णव और मायादियो के शास्त्रार्थ निर्णय प्रसग मे श्रीजगन्नाथक्षेत्र में श्रीजगन्नाथराय जी द्वारा लिखित प्राप्त हुआ था। पुरी के राजा की निरीक्षता मे मन्दिर में चल रहे शास्त्रार्थ के मुख्य वक्ता श्रीवल्लभाचार्य थे। परास्त हो जाने पर मायावादियों ने एक कोरा पर जगनाथप्रभु के ममक्ष निर्णय लिख देन के लिये रखनाया था। सब प्रकार की राजा की सावधानी और व्यवस्था के अनन्तर इसी रूप में प्रमु का सैद्धान्तिक निर्णय मिला जिसे मभी आस्तियों ने स्वीकार किया था, और परिणामत हठाग्रहियों का नगर निष्कासन किया गया था। यद्यपि व्यामप्रोक्त होने से गीता की उतनी ही प्रामाणिकता थी फिर भी श्रीवल्लभाचार्य ने उक्त प्रत्यक्ष चमत्कार से इसे विशेष महत्व दिया थोर श्रीकृष्ण पायो को वेद के अनन्तर शास्त्ररूप में प्राथमिक्ता दी। 'शा-निरन्ध' नामक अन्य में प्राचार्य इस विषय में लिखते हैं- 'भक शामिति । अवाख्यायिका पारपर्यादेवारगन्तव्या । देवपी पुण गीत गीता । गीताया भगवास्यान्येव शास्त्रमित्यर्थः । यदानामपि तदुक्त प्रकारेण निणय" [त०नि० शा०प्र० ४ कारिका प्रकाश] इम पथन मे श्रीकृष्ण-बास्यों को वेद के समान ही प्रामाणिवता मिलती है, और वैनिक सन्देह की विनिवृत्ति के लिये उन्हें सबसे अधिक गौरव। यह तो समस्त शास्त्र सम्मत कि- भगवान् श्रीकृष्ण पूर्ण पुरुषोत्तम परग्रहा है, अत उनके कथन और येद में कोई अन्तर नहीं है। जैमा दि अन्यत्र गीता में यहा गया है "स्वयमेगात्मनात्मा न येत्य त्य पुरुपोत्तम येवाणी का रहस्य परमझ ही खोल सकता है, भामहाप्रभु ये रे पुत्र योगासनाप भी दारा जगमायमन वे पुरोहित कोनिगाहपा तिपत्रा उतरे व ज श्रीकृष्ण रघुनाथ दामोदर पे पास विधमान है। यह गाने स. १४६० में निरा 'या है। पूण प्रतिलिपि मारोती पाहिारा पत्र २६ पर मागिन की गई है। - ७० [ शु० पु. सस्कृत वाग्मय ? और उन्होंने कृपा कर श्रीकृष्णावतार में इसको मूर्तिमान किया है । ब्रा-सूत्र में गीता को 'स्मृति रूप' माना है, और इसी कारण वेद होने पर भी इसका पृथक् निर्देश किया गया है, "स्मृतित्वेन कृष्ण- वास्यानि वेदत्वेपि पृयगुक्तानि . [शा नि० का० ७ प्रकाश] " कृष्ण वास्यानुमारेण शास्त्रार्थ ये वन्ति हि, ते हि भागरता. प्रोक्ता. शुद्धास्ते ब्रह्मवादिन." इस कथन से महाप्रभु ने उन्ही विद्वानो को शुद्धन्नमवादी परमभागनत माना है जो-गीता के आधार पर सिद्धान्त का व्याख्यान करते हैं। जैसा कि कहा गया है:--श्रीकृष्ण धाम्यो को स्मृतिरूप माना गया है । इस पर प्रकाश डालते हुये प्राचार्य ब्रह्मसून भाष्य मे "स्मृतेश्च" [१, २,६] सूत्र पर लिखते हैं कि "जिन भगवान् श्रीकृष्ण के समस्त वेद निश्वास रूप है, क्या उनके वाम्य स्मृतिरूप माने जाने चाहिये ? उत्तर है जिब्रह्म केवल उपनिपवेद्य है, प्रमाणान्तर से नहीं । गीता के प्रसंग मे अर्जुन यद्यपि शिष्यरूपेण शरण पाया था,पर वह पुष्टि-भक्त नहीं था, स्वयं रथी बन पर भगवान को सारथि बनाने के कारण भगवद्वाक्य में उसे नि सन्दिग्धि विश्वास असम्भव था। तब ऐमे मध्यमाधिकारी को के समय श्रोपनिषद ज्ञान कैसे दिया जा साता था ' अत' अर्जुन को निमित्त बनाकर मूलभूत वेद अथच तदर्थ का स्मरण कराते हुये भगवान् श्रीकृष्ण ने अपने वाम्यो द्वारा सिद्धान्त का उपदेश दिया है, अत वे वास्य स्मरण 'स्मृति' रूप कहे जाते हैं। गीता मे कृपालु श्रीहरि ने प्रथम ब्रह्मविद्या का निरूपण कर अन्त मे कर्म ज्ञान भक्ति के समन्ययार्थ प्रपत्ति का उपदश दिया है जो वेद पा सार है। महाभारत में स्मरणरूप मे इसे प्रथनेवाले महर्षि व्याम भी भगवान के ज्ञानावतार हैं, तावता दोनो के द्वारा वैदिक अर्थ का स्मरण पूर्वक प्रतिपादन होने से गीता स्मृतिरूप है।" इन्ही सब मान्यताओं को लेकर सक्षेप में भारतमार्तण्ड गह लालजी ने 'वेदान्त चिन्तामणि' म पहा हे- "तनावशिष्टं हरिणा विरक्तायार्जुनाय यत् । तथा तदधिकारेण स्मृतिरूपेण सपितम् ||१३|| ७१ Arm...प्र. गोता ] वेदापि ब्रह्मवाक् साक्षात् तत्र स्यादेव वेदता। गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यैः शास्त्र विस्तरैः। या स्वयं पद्मनाभस्य मुग्नपद्मा दिनिर्गना' ॥१४॥ [प्र० प्र०] जैमा कि प्रमिद्ध है- गीता उपनिपद् और ब्रह्मविद्या है। यह वास्तव में वैदिक रहस्य का सष्टीकरण और संदेह-निवृति जिस प्रहार करती है , अन्य शास्त्र नहीं। यदि गीता के भगवद्-वाक्य इम विषार-धारा के सन्मुस न होते तो वेद-प्रतिपादित सिद्धान का हनना मौलिक और मर्वसाधारणग्राही स्प होमकता था या नहीं ? कहा नहीं जा सकता। जैसा कि कहा गया है :-"सर्वोपनिषदो गायो दोधा गोपाल नन्दनः पार्थो वत्सः सुधी भॊत्ता दुग्ध गीतामृतं महत् ।" उपनिपद, काम धेनुओं का श्रेयःप्रतिपादक यह अमृत दुग्ध भगवती गीता ही है, दोग्धा स्वयं गोपालनादन श्रीकृष्ण हैं जिन्होंने अर्जुन के लिये इसे दुह कर श्रद्धालु सभी जनों को नियाज वितरण किया है। क्या भारतीय साहित्य? क्या पाश्चात्य मा हत्यस ? भी गीता के सिद्धान्तों के ऋणी हैं। परमात्म-विपयक भक्ति और प्रेम को महत्व देने वाले सभी मत, धर्म सिद्धान्त; पंथ,गीता के अभिप्राय से ही प्रभावित हैं और उमी का अभि मत 'रूपान्तर शब्दान्तर और भाषान्तर में सर्वत्र मिलता है, ." गोदा सु गीता कर्तव्या फिमन्यैः शास्त्र विस्तरै :" यह कथन पूर्ण चरितार्थ है। शुद्धात मिद्धान्त में गीता का अनुपद प्रामाण्य है । श्रीवल्लभा- चार्य ने प्रमाण-चतुष्टय की दो कोटियाँ गिनाई हैं । निवन्ध में कहा है "श्रुति सूत्राणि एका वोटि गीता भागवत चेति अपरा।" गीता और भागवत को भगवन्छास्त्र उहोंने कहा है कि गीता भगवदुक्त और भागवत भगवत्मयधो चरित्रात्मक शाग्य हैं । वेद और प्रम-सून विशेष अधिगर परायण माधों के लिये पटनीय मननीय है, उनमें सर्वसाधारण का प्रवेश नहीं । पर गीता और भागयत उन लोगों के लिये भी उपादय है जिन्हें यहाँ अनधिारी गिना गया है।श्रीकृष्णोक्त सानिये कन्या-यारक हैं, मभी वर्ग के उन के अद्वालु गीता या पाठ मा अध्ययन और तत्यापितन सभी माधारण बुद्धि- अधिरारी। मानकर " [ शु. पु० सस्पृच पाहमय भगवद्गीता सम्बन्ध में निम्नलिखित साहित्य है:- सप्रकाश तत्वार्थ-दीप-निबन्ध-शास्त्रार्थ प्रारणम् । श्रीवल्लभाचार्य विरचित तत्वार्य दीप निबन्ध शास्त्रार्थ-प्रकरण वारिका रूप में है और इस पर स्वयं महाप्रभु की टीमा 'प्रकाश' नाम से विद्यमान है जिसके कारण इसका इस प्रकार नामारण हुआ। तस्यार्थदीप निबन्ध के तीन प्रकरण है। १ शालार्थ-प्रारण, २ सर्वनिर्णय-प्रकरण, ३ भागरतार्थ प्रकरण । यह प्रारण प्रथम है। लिखा है " इत्याकलव्य सततं शास्त्रार्थ. सर्वनिर्णय श्रीभागवत रूपं च त्रयं चन्मि यथामति-शा०नि० का०५" इसके प्रकाश मे शाखार्थ का अर्थ गीतार्थ लिखा है, जिससे विदित होता है कि इस शास्त्रार्थ प्रारण मे गीता के अनुसार विचार किया गया है । इस निबन्धप्रय को पुप्पिका में प्राचार्य ने स्वयं को" श्रीकृष्ण व्यास श्रीविष्णुस्वामिमनानुवर्ती इस रूप में लिखा है। एतायता सिद्ध होता है कि आचार्य जहाँ विष्णुस्वामिमतानुयायी थे, यहाँ उनमा सिद्धात गीता के छावार पर और उसी आधार पर शुद्धाद्वैत या सिद्धात है। इस प्रकरण मे १८५, 'गणना भेद से १० कारिकार है। इसमें वणित सिद्धान्तों का निरूपण ऐसे अधिकारियों के लिये किया गया है जो रात्रिफ भगवद् भक्त, मुनि के अधिकारी और भगवदिच्छा से अन्तिम शरीर धारण कर अवतरित हुये हैं । इन लोगों के अन्तिम शाभीष्ट की सिद्धि के लिये इस मत का निरूपण है। उपसहार में कहा गया गया है कि इस अर्थ मा निरूपण समस्त चेद, रामायण, महाभारत, पञ्चरान, तत्ससून तथा अन्य प्रमाण चतुझ्याविरोधी शालों के अभिमत को लेकर है, अत. 'प्रमाण बनमाश्रित्य शास्त्रोों विनिरूपित.' प्रारा इस श्लोकानुसार प्रमाण बल द्वारा इस शास्त्रार्थ का निरूपण किया गया है। अन्य में जहाँ सहाँ प्रमाणा के उपन्यास पूर्वक कारिकाओं और उसके स्पष्टीकरण रूप प्राश व्याख्यान में प्रमाण, प्रमेय, सायन, फ्ल के सम्पन्ध में विचार किया है और ब्रह्म जीव ससार जगत बन्च मोक्ष, विद्या, अविद्या, माया, भलि श्रादि उन सभी पर तात्विक विचार किया है, जिनका समावेश सिद्धान्त में होता है । रहना होगा कि प्राचार्य । प्रम ए.. प्र० गीता ] ७३ नीवल्लभ का सिद्धान्त सालित रूप में चदि कहीं मिलता है तो वह शास्त्रार्थ निबन्ध में, अन्यत्र तो प्रसगोपात्त विचन है। शुद्वाद्वैत के मभी तत्वों पर प्रस्थान चतुथ्य के समन्वय से जो निष्क्प निकाला गया है रही शुद्धाद्वैत पुप्रिमार्ग है, और उसका प्रत्यक्ष दर्शन इस प्रन्यरत्न म मिलता है। शास्त्रार्य निरन्ध कारिका : ओर सर्वनिर्णय निका० १८१ से विदित होता है कि अणुभाष्य-रचना के अनन्तर इसकी रचना श्राचार्य ने की थी। "भाप्ये विस्तरेणोक्तम् ' वहाँ ऐसा उल्लेख है। प्रस्तुत शास्त्रार्थ निबन्ध पर निम्नलिखित व्यारया विवरण हे-- यानरण भग व्यारया-गोवामी श्रीपुम्पोत्तमजी ने कारिका और प्रमाण दोनों ये अभिप्राय को सष्ट करने के लिये इसकी रचना की है, जिसम परमतोपन्यास पूर्व सप्रमाण शास्त्रीय रीत्या प्रतिपाद्य चिपय का समर्थन दिया गया है। प्रावरण भग के अध्ययन से अनेक शाओं का समाधान होता है और जिज्ञासा की पूति । यह रहना पडेगा कि सूत्र रूप प्राश और सरी मूलभूत कारिकाओं ग रहस्य विलेपण, गभीर परिज्ञान तब तक नहीं हो माता, जातक इम व्यापा का मनन न दिया जाय । बुद्धिमान्द्य ने श्रागत श्रावरण के विनाश के लिये श्रीपुस्पोत्तमनो ने अर्थ इस टीगग की रचना की है। 'आरग भग' टोरा की रचना नृमिहोत्तर तापिनी की दीपिरा टीग के पार पुम्पोत्तमजी ने की थी ऐमा शा० नि० की पारिता 'नास्ति अतिषु तवार्ता' ८० के श्रावरग भग टोरा म स्वय कहा गया है-- "तम रिस्तरेणोत्तरतापिन्या नीपिसारा मया यागपातमतो विशेष जिज्ञासारा ततोचलोकनीयम्" श्रीपुष्पोत्तमनी ने इम व्याम्या की रचना अपने पितृ- चरण श्रीपोतातरजी के नाम से की है, अत तहत भी मानो जाती है। तत्वार्थदीप निरन्ध शृिति टिप्पणी -प्रगग पर श्रीरल्याणराय जीने टिप्पणी की रचना की पी वो भावार्य प्रकरण पर प्राप्त और प्रगशित है । इममे विशेष म्पन्नों की व्या या की गई है।

७४ प्रमाण प्र. गीता ] तत्वार्थ -दीपप्रकाश टिप्पणानेह भाजन: नामक विस्तृत व्याख्या भारत मार्तण्ड श्रीगट्टालालानी द्वारा विरचित है। जो प्रामिा परम सारिका तक ही प्राप्त श्री प्रकाशित है, आगे रचना की गई या नहीं कहा नहीं जा माता। प्रस्तुत मस्नेह भानन का निर्माण 'दीप' के लिये श्रावश्यक या, यह सोच पर ग्रन्यमार ने गभीरता पूर्वक इसे प्रतिष्ठित किया है। यदि यह अन्य पूर्ण मिलता तो बड़ा ग्राप विचन होता । अन्धकार की रक्ति है-- 'तथा विभज्य ने मृल सना सहो या भोन् यादिक्षोदस्त्वावरण मगा रस मिद्धयति ।। द्रष्टु दीपप्रसाशे चेन् याछया स्तमानदि सत्म्नमा नन तहि पुर रत पडिताग मई प्रथम यह मस्नेह-भाजन प्रार्य समुदय नामक मामिक पत्र में सम्मई में प्रकाशित दृया था, इसके बार जेठानन्द श्रासनमल सम्बई से। योजना-श्रालालूमट्टोपनामक श्रीबालाण भट्ट ने तार्थदीप निबन्ध प्रकाश पर याजना नाम प्र.च की रचना की ह । आचार्य के निगृढ याशय या योजनार्थ यह प्रयत्न हे यह सम्पूर्ण प्रथम प्रकरण पर प्राप्त पोर प्रसाशित :- प्राइस्ट बम्बइ-स० (ELE, सुनोचना न भापा टीका-गा- श्रीनीवनलालजी विरचित और मुख्य सेवा ५ गायुलनामना शास्त्रा द्वारा प्रवटित प्रकाशित । निरन्ध क प्रकाश पारण-भग टीका के आधार पर इम ब्रसभापा टाका का निर्माण हुअा है । निमम युक्ति पूर्वक सिद्वान्त का प्रतिपादन । इममा दूमरा नाम निरन्ध-तारी नाधिना भी है । प्रा० श्रीधर शिवलाल धम्बई । म० १६६२ १ शास्त्रार्थ नियन्य गुर्जरानुनाद-शास्त्री हरिशर प्रोकारनी द्वारा रचित । इमम श्रारण भगादि टीकाग्री के अाधार पर वर्तमान शत्ता मे गुर्नरानुसार प्रस्तुन दिया है जो योजना थापरण-भग साथ अन्तिम भाग में जेठा. ग्रा. दस बम्बई में प्रकाशित है। म. १६६६ मस्त भानन प प्रेमारण प्र... गीता ] । न्यासादेश:-श्रीवल्लभाचार्य कृत 'न्यासादेश' नाम से एक श्लोक है जिसमें गीता के 'सर्पधर्मान् परित्यज्य' इस श्लोक के आधार पर उसका संक्षिप्तार्थ ग्रथित किया गया है । यह इस प्रकार है:-- न्यामादेशेनु धर्मत्यजनवचनतोकिचनाधिकियोक्ता कार्पण्यं वांगमुक्त मदितरभजनापेक्षण वा व्यपोटम् दुःसाध्येच्छोद्यमी या काचिदुपशमितारन्यसमेलने वा ब्रह्मानन्याय उक्तस्तदिह न विहतो धर्मभानादिसिद्धाः" प्रस्तुत लोक उमफी टीकायो के मा प्रकाशित है। इममे 'वामादशेपुरमा प्रयोग होने के कारण इसे न्यासादेश अन्य कहा है । गीता के तत्वीपिकार श्रीवल्लभजी सर्वधर्मान् परित्यज्य' श्लोक की व्याख्या में लिखते हैं । "एतच्च सर्व न्यामादेशेषु धर्मत्यजन- वचनतो किंचनाधिक्रियोक्तति वेशनाचार्य पये निरूपितम्" [तत्यती पत्र २०६] इस कथन से किन्हीं लोगों का ऐमा भी अनुमान है कि यह 'द्य वल्लभाचार्य कृत नहीं है । पर शु० मिद्वान्त के कुछ पर कोटि के मिद्वान पं० श्रीमग्न नालजी शास्त्री यादि इसे श्रीवल्लभ कृत ही मानते हैं; वेदान्ताचार्य से उनका यही तात्पर्य है। श्रीविठ्ठलेश प्रभु चरण ने तथा श्रीपुरुपोत्तमजी ने इस पर विवरण लिये है, अतः यह स्पष्ट है कि- यह श्रीवल्लभाचार्य रुन ही है। इस पर निम्नलिखित व्याख्यान मिलते हैं। न्यामादेश-विवरण-श्रीविठ्ठलेश्वर प्रभुचरण कृत यह विवरण न्यासादेश पद्य का है। प्रस्तुन श्लोक के गंभीर रहस्य को सममने मे इम टीका की आवश्यकता है । जिसमें पूर्वपक्ष उत्तरपक्ष-शंका समाधान पूर्वापर-मंगति के द्वारा शुद्धात सिद्धान्त के अनुसार गीता का मारांश भरा गया है। दोनों का तात्पर्य यह है कि- भगवद्भाव को संप्राप्ति के लिये लौकिक वैदिक-साधन नहीं है, उसकी प्राप्ति केवल भगवद्-धर्म प्रपत्ति से-सम्भव है, अतः इनकी साधन रूा आस्था का परित्याग कर भगपच्चरण में जाना चाहिये । भगवान् केवल भावविषय हैं, और इस प्रकार शरण जाने पर ही .

[ शु० पु० सरकृत-वाड्मय शोक की निवृद्मि हो सफ्ती है, क्योकि केवल भावलभ्य रस ही उसे निवृत कर सकता है। न्यासादेश विवरण टीका-श्रीपुरुपोत्तमजी विरचित । यह टीका संस्कृत में न्याप्सादेश पद्य पर विलखित श्रीप्रभुचरण के विवरण पर है, जो प्रकाशित है-तत्वदी० दीका के साथ । सं० १६६० न्यामादेश-हिन्दी तात्पर्य--पं० श्रीरमानाथ शास्त्रि घृत यह हिन्दी अनुवाद श्रीप्रभुचरण और श्रीपुरुपोत्तमजी के विवरण के श्राधार पर किया गया है। श्री बाशु० पाठशाला बम्बई से प्रकाशित । न्यामादेशपद्य-प्रासंगिक विवेचनम्-यह संक्षिप्त विवेचन श्रीवल्लभजी दीक्षित ने स्वकीय गीता की तत्वदीपिका टीका 'में सर्व- धर्मान्तरित्यज्य' इस शोक की कारिका करते समय प्रासंगिक रूप से किया है, और उसमें श्रीप्रभुचरण के न्यामादेश-विचरण का संकेत दिया है, ग्रन्थ के साथ मुद्रित । 'सहजं कर्म कौन्तेय' इत्यस्य विवरणेसर्वधर्मान्परित्यज्य' इत्यस्य व्याख्या--श्रीनजभूपणात्मज गिरिधरजी वृत । संस्कृत में यह छोटा मा विवेचन है जो नई दिशा से सर्वधर्मान्परित्यज्य का व्यारयान करता है । अप्रकाशित । मर० भ० कांकरोली शु० ०६२, ४ पर विद्यमान है। गीता तात्पर्यम्-श्रीविट्टलेश प्रभुचरण कृत । जैमा कि कथन है, गीता का तार्य भक्ति की मर्यादा का निरूपण है। प्रारंभ में ६, और कारिकायो में मंगलाचरण पूर्वक उपक्रम है और बाद में गद्य के द्वारा पय का प्रतिपादन । जिसमें शंका समाधान पूर्वक विवेचन है । इसका संक्षिप्तार्थ इसके हिन्दी अनुवाद के परिचय के साथ पहा जायगा । यह ग्रन्थ तत्वदीपिका दीफा के माथ सं० १६६० में श्रीमग्नलाल शास्त्री द्वारा प्रकाशित हो गया है। गीता तात्पर्ष-हिन्दी अनुवाद पं० श्रीरमानाथ शास्त्रि एन । यह अनुवाद, प्रयुचरण कृत गीता तात्पर्य या । बड़ा मन्दिर बम्बई मे सं० १६४१ में प्रकाशित ।

उचित था 7 प्रमाण० प्र० गीता ] गीता-ता पर्य के पूर्व पत सम्बन्ध में कहा गया है कि- गीता का उपक्रम कुछ असमजस जैसा लगता है क्योंकि-प्रारम में अभक्त धृतराष्ट्र और दुर्योधन की सैन्य का वर्णन है। उपदेश श्रवण की योग्यता के स्थान पर अर्जुन के शोक, मोह, अशान्ति का उल्लेस है। इन सबसे विदित होता है कि जिस तस्य का उपदेश श्रीहरि यय करने वाले है उसकी योग्यता-अधिकारिता-अर्जुन मे नहीं है । क्सिी लौरिक क्था से अर्जुन का समाधान होना उपक्रम को भाँति गीता का उपसहार भी ठीक नहीं है, कारण कि-भगवान् के उपदेशामृतपान से अर्जुन को वैरा योदय होकर रायादि लौरि सुस का त्याग होना चाहिये था, पर इसके विपरीत हिंसा जैसे निषिद्धातिनिषिद्ध कर्म में इसकी प्रवृत्ति कही गई है। इत्यादि उपक्रमोपसहार को दृष्टि से यह अप्रासगिक जचता है । एनापता गोता के तात्पर्य के प्रति शका का सहज उदय होता है कि वह क्या है ? उत्तर पक्ष मे प्रनु परराने और तदनुसार अनुवादक ने कहा है कि पार्थ-पाँचों पाडवों को भगवान ने अपना भक्त समभ कर भक्तिमार्ग मे अगीकार किया है, जैसा कि समय-समय पर युद्ध के पूर्व उनकी रक्षा करने से प्रकट है। ज्ञान धर्म के अनुसार वे शत्रुओं का सहार कर राजसुस का उपभोग कर सरते थे, पर ऐसा होने पर उस राज्य में भगवत्संन्य नहीं हो सकता था । इसके विरुद्ध अर्जुन के शोक, मोह अशाति के स्थन से मालुम होता है कि इसमे कुछ अलोरिक कारण अवश्य था। राज्य वैभव के अस्थायी सुस के लिये मानवों का हनन और उसमें भी आप्त स्वजनों का, एक आसुरी लक्षण है । इस विषय में दया आना दैवी गुण है जो भगवदोयता का लक्षण है, और वह भगवदीयता बिना भगदिन्छा के मभव नहीं । अत. इससे अर्जुन को अन्य की अपेक्षा उत्तमाधिकारिता ही सिद्ध होती है, और इस विश्लेपण के लिये ही प्रारभ मे धृतराष्ट्र और दुर्योधन जैसों का उल्लेख है । जगन् क्षय के लिये प्रयत्न करनेवाले दुर्योधन जैसे दुतों का विनाश करना [“परित्राणाय साधूना विनाशाय च दुष्पताम् ' ] भगवत्कार्य के अनुगुण था। ईश्वरीय कार्य से [सु० पु० सस्कृत वाङ्मय , विमुस होना एप ग्रार की महती कुमति है, जो जीव के श्रेय की घाघर है । इस कुमति को दूर करना करणासिंधु परमात्मा अपना कर्तव्य समझते हैं, और समय समय पर उपदेश द्वारा जीव को सावधान क्यिा करते हैं। इसी लक्ष्य की पूर्ति १८ अध्याय गीता का सदेश है। भगवान् श्रीकृष्ण ने अर्जुन की इस व धारिणी अविद्या का नाश किया और उसे मुग्य वर्त य मे सल न कराया । मर्यादामार्ग में वेद शासोदित कर्म का पालन धर्म है, वह वि धोधित है, और भक्तिमार्ग म विधिनिषेध से परे रहकर भगवदाज्ञा या परिपालन, स्नी इच्छानुसार चलना धर्म है । गीता इसी या एक -दाहरण है। अर्जुन को लक्ष्य कर जीवमात्र को इस मुरय धर्म की अोर प्रवृत्त करना ही सरा सिहारा है । र ह भावना 'सर्वधर्मान् परित्यज्ज' इस शोक म भगान्धरणागति से अत में सष्ट करदी गई है । परमभगत और श्रीकृष्ण के वास्तविर स्वरूप के परिज्ञाता महात्मा भीष्म ने अपनी •तुति के कपन में 'वुमतिर हरदा माविद्यया य यह कहकर इसकी पुष्टि की है। अर्जुन मा अन्तिम क्थन 'नष्टो मोह स्मृतिर्ल घा' आनि इसी मा प्रतिज्ञावारय है। अत अर्जुन का भगनदिन्यान्कूल गार्य में नढचित्त होकर प्रवृत्त होना, विशिष्ट महव पूर्ण कार्य है जो जीवा क्ल्याण साधन का श्रेष्ठ पल है । गीता के द्वारा सिद्ध होता है कि भगदिन्छानुसार प्रवृत्ति और निवृत्ति मानन का परम पर्तव्य है, भगवदिन्छा होने पर ही भागवतरत्न को वर्तव्य का ज्ञान हो सकता है, अन्य साधनों मे नहीं । अर्जुन रा अंगीकार पुष्टिमर्याना भक्ति में है पुरिपुष्टि म नहीं है, और इसी कारण यह उपदेश द्वारा प्राम तरज्ञान से भगवाकार्य में प्रवृत्त होना है, स्वत नहीं। श्रत शावप्रतिपाद्य विषय के गंभीर चिंतन उपक्रम-पसहार श्रीर स्याना की मगति से जो रह य निकलता है यह मननीय और यास्तविर गीता का तापर्य है । यह इस अन्य म सक्षिप्त रीत्या सममाया गया है। विट्टलेश प्रभुरण कृत गीतातारपर्य म माद्ध आठ लोगों से पूर्वपत के बाद श्राधे श्लोक और शेप गद्य द्वारा उत्तरपत पा पयन दे।

प्रमाण० प्र०...गीता ] 'गीता तात्पर्य' के हिन्दी अनुवाद मे पं: रमानायशास्त्री ने इसी रहस्य को मौलिक ढंग पर सरल रप से समभाया है । सं० १९७१ मे इसको रचना हुई है। गीतार्थ विवरणम्-श्रीविठ्ठलेश्वर प्रभुचरण प्रणीत गीतार्थ विवरण गीता के श्लोकों या अर्थ प्रतिपादन पूर्वक शु० सिद्धान्त का व्यारयान है जो-प्रारम्भिक अध्याय का ही मिलता है। सं० १९६० में श्रीमग्नलाल शास्त्री द्वारा बंबई से 'तत्वदीपिता' टीका के साथ प्रकाशित । ग्रंथ में प्रारंभिक साढ़े चौदह पद्यों द्वारा मंगलाचरण और ग्रन्थ का उपक्रम किया गया है। प्रस्तुत विवरण की रचना के सम्बन्ध में प्रन्थकार का कथन है- "भाप्यारयन यहून्येव सन्ति किंतु हरिप्रिया, न तैः मुदं समायान्ति मततात्पर्यफुजरे ।।६। निजयोधमुसिद्ध्यर्थमर्थतात्पर्यसंगती: कथयिष्यामि यज्ञात्वा तार्थो भक्तिमान् भवेत्" १७ ॥ शास्त्रीय मंगत्ति कथन के अनन्तर प्रभुचरण की उक्ति है- यावन दृश्यते विज्ञः गीतामृततरंगिणी । अय व्याख्या। तत्र प्रथमोध्याये अर्जुनस्यातस्त्वं प्रतिपाद्यते' । इस कथन से अनुमान होता है कि-गीता पर पूरा विवरण लिखा गया था, जो सम्प्रति मिलता नहीं है। इस विवरण मे ग्लोकों की संगति और विशेष शब्दों के अर्थ निरूपण के अनन्तर सिद्धान्तों रा भी कथन है। इसकी अंतिम पंक्ति इस प्रकार है-"कपिध्वज इति शस्त्र लाघवं सूचित्म'। इस से यह विदित होता है कि यह विवरण २० श्लोक पर्यन्त ही प्राप्त है । अमृत तरंगिणी टीका-गो. श्री पुरुषोत्तमजी कृत गीता को सम्पूर्ण टीका है जो काशी में प्रकाशित है । सं० १९५८ इसकी रचना श्रीपुरुषोत्तमजी ने श्रीवजरायनी के नाम से की है ऐसा भी प्रसिद्ध है । इसे गीता का शुद्धाद्वैत साम्प्रदायिक भाष्य कहा जा सकता है । प्रस्तुत टोसकार प्रन्थार्थ के सम्बन्ध में रहते हैं :- भगवान् श्रीकृष्ण पूर्ण पुस्पोत्तम इस जगत् में सर्वमुक्त्यर्थ अवतीर्ण हुग थे । उन्होंने स्वरुप से, चरित्र से, उपदेश मे और स्तुति से सभी प्रकार के जीवों का उद्धार किया था। मानव जीवों के उद्धारार्थ [ शु० पु० सस्कृत वाङ्मय और विशेष कर आगे होने वाले मनुप्य वर्ग के लिये सहाने अर्जुन को निमित्त बना कर गीता शस्त्र का उपदेश दिया और उनके लिये कर्तव्य का बोध कराया था। भगन प्रोक्त इसो भक्ति उपटेश को महर्षि वेद यास ने गीता मे ग्रथित किया जो लगभग सातसौ श्लोकों में है, जिसे 'गीतोपनिपद' 'ब्रह्म विद्या' कहा गया है । गीता का प्रतिपाद्य क्या है ? तदर्थ जीविट्ठले वर कृत गीता ता पर्य के अवलोकन का सुभाष देकर टीकाकार ने गीता के प्रस्तुत भाष्य की रचना की है, जो सम्पूर्ण (८ अध्यायों पर मिलता है। अन्य टीमों के साथ यह गुजराती यूस प्रेस बई से प्रराशित है, काशी से भी। इस सस्कृत टीका मे यत्रतत्र अन्य सिद्धा तों का उल्लेख कर त यदीप-निबन्ध, सुबोधिनी, अणुभाष्य के आधार पर शुद्धाद्वैत सिद्धान्तानुसार तात्विक विवेचन किया गया है। रमिक रजिनी टीका-श्रीफ्ल्याण भट्ट कृत, यह सस्कृत टीस गीता के सम्पूर्ण अनाओं पर उपल ध है । अहमदाबार शुद्धाद्वैत ससद द्वारा प्रराशित। इस विवरण में भी शास्त्रीय शैनी से गीता के श्लोका का अभि प्राय व्यक्त करते हुए सिद्धान्तों का प्रतिपादन है । तत्वदीपिका टीका-- गो. श्रीवल्लभी कृत । गीता के १८ अध्यात्रा पर सम्पूर्ण भक्ति भाव वोधिनी टीका सरकृत्त म उपलध है जो प० श्रीमानलाल शास्त्री वधाई द्वारा सपादित होकर प्रमाशित है । स० १६६० गीता के अभिप्राय म निबन्धकार का क्थन है कि पूर्ण पुरषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण ने अवियेफ से स्वधर्म का त्याग और परधर्म का प्रहण करने पर सनद्ध पडितमानी भक्त अर्जुन को सारय श्रीर भक्ति का उपदेश देपर शरणागति म लिया और उपदेश देकर अपने म्बस्प का परिचय कराया था। यह मोहनश परित्यक्त स्वधर्म-जो ग्मा पारपरित पर्त य था-क्षत्रिय धर्म में भगवदाज्ञा से प्रवृत्त हुश्रा, भगवान् ने अनुग्रह कर उमे मोक्ष प्रदान किया । --तचनी परम- भाग्यप सम्रमदीसमर की नी.- कमां नर्गतमेर यत्र मिल गान पिशुद्ध परम् साराच्दा पुरापोत्तमेक पिय भसिम मिहतु।

प्रमाण प्र. गीता ] = ? मर्यादा भुवि पुष्टिरुद्भमिता गत्या प्रपत्यात्मनः सर्वत्यागत एव सेयममला गीता समुद्भासते ॥ [ समाप्ति ] प्रस्तुत टीका मे अध्यायाथ के प्रारभ में कारिकाओं द्वारा सगति के निरूपण हे और उसी प्रकार समाप्ति मे उपसहति । प्रसगोपात्त अन्य मतों का विवेचन करते हुए श्राचार्य प्रदिष्ट सिद्धान्त समूह का यत्रतत्र निरूपण है। अवशिष्ट प्रमाणत्रय के वाक्यो का समन्वय इसकी विशेपता है। गीताभाष्यम्--गोस्वामि श्रीवल्लभदीक्षितात्मज श्रीबालकृष्णजी विरचित सस्कृत गीता भाष्य का नाम मिलता है, जो उपलब्ध नहीं है। इन्होंने स्वरचित तत्वार्णव भाष्य [शु०प० ४५, १३ सर० म०] मे दो बार इसका नाम स्मरण किया है। "विस्तरस्तु मत्कृत गीताभाष्ये द्रष्टच्य." पत्र १६ "एतच्चास्माभिगीताभाष्ये विततम् ॥" पत्र २० एतावता इनका रचित गीताभाष्य होना चाहिये । यह ग्रन्थक्ता श्रीहरिरायजी के अनन्तर हुआ है जैसा कि उसी अन्य मे लिखा है। "अनेदमाहुर्हरिराया " [पत्र -६] ग्रन्थ की अप्राप्ति से इसका कुछ परिचय नहीं दिया जा सकता। भगवद्धर्म गोधिनी व्याख्या-प० श्रीरमानापजी शास्त्रि कृत हिन्दी में । बडा मदिर बबई से प्रकाशित । इसमें प्रासगिक विवेचन के उपरात गीता के श्लोकों का सक्षिप्तार्थ दिया गया है, जो मूल टीका ग्रन्यो के अनुसार है। गुजराती टीका-५० श्रीजटाशकर शाखिकृत । यह गुजराती टोका साधारण श्रेणी के जनों के लिये गीताज्ञानार्थ उपादेय है, भक्ति साम्राज्य कार्यालय बडोदा से प्रकाशित । गीतामिद्धान्त प्रतिपादक ग्रन्थ- गीतार्थ विचार:-पो० श्रीबालकृष्ण शास्त्रीजी ने सस्कृत में गीता के अर्थ पर विवेचनात्मक नीचे लिसे निबन्धों की रचना की है। [प० स० ४०प० स०.६ ख 1 पर [ शु० पु० संस्कृत वाहाय १. गीताध्यायाः-निबन्धकार के अभिप्रायानुमार गीता के अध्यायो का विभाग इस प्रकार है जो पुष्टिमार्गीय सिद्धान्त की दृष्टि से मननीय है । [पं० सं ४० (ग) [क] प्रथम अध्याय में अधिकारार्थ की दृष्टि का स्पष्टीकरण है [ख] द्वि० अ० से लेकर पठाध्याय तक पॉच अध्यायो में कर्म स्रम्प का प्रतिपादन है। पॉच प्रकार का वैदिक कर्म पंचविध काल के पञ्चविध टोपो का निवर्तक है। यह पञ्चविध दोप मिद्धान्तरहस्य ग्रन्थ में कहे गये हैं। अत: पॉच अध्याय कर्म के प्रतिपादक है। [ग] सनम श्र० से लेकर नवम अध्याय पर्यन्त तीन अध्यायो मात्मा त्रिविध भेद · श्रात्मा, अक्षरब्रह्म एवं परमात्मा के विविध ज्ञान का प्रतिपादन हुया है, अत. तीन अध्याय हैं। इस प्रकार नौ अध्याय गर्म और ज्ञान योग के हैं [घ] दशम कर अष्टादश अध्याय तक अध्याय अक्षर ब्रह्म से--अतीत पूर्ण पुस्पोत्तम की नवविधा भक्ति के प्रतिपादक हैं श्रतः नौ अध्याय भक्ति स्वरूप-निरूपक हैं। इम प्रकार गीता के १८ अध्यायो मे तीन प्रकार है। कर्मयोग - इममें ज्ञान भक्ति गौण और कर्म प्रधान है । २. ज्ञानयोग-ममे पर्म भक्ति गौण और ज्ञान प्रधान है। ३. भक्तियोग--इसमें कर्म तान गौण और भक्ति प्रधान है। पर्मयोग वा फल श्रात्मभाय, ज्ञानयोग का पल ब्रह्मभाय और भक्तियोग का फल पुरुपोत्तम-भाव-म्प पुरुपार्थ का गीता निरुपण करती है । जिससे मभी जीवो का अधिकारानुमार समावेश होता है। अन्य में इम प्रसर विश्लेपण करके श्रागै श्लोको के उद्धरण द्वारा इमा ममर्थन किया गया है। २. गीतोक्त पारिभाषिकाः शब्दा: इममें पारिभाषिक शब्दों फा मंक्लन किया गया है। पं० स०.३ (क) ३. गीता मिद्धान्त-विवचनम् " इसके द्वारा मिदान्तों का ममर्थन किया गया है। पं० ०३ (स) ४. गुणत्रय स्वरूप-विचारः" गीतोक्त गुणत्रय निम्पण पर राश डाला गया है। पं. मं. ३ (२) १ । पतिपय शुरू . के स्वर ए प्रमाण प्र० गीता ] ६३ ४. गायत्रीगीतार्थयोकशक्यता इसमे गायत्री मन्त्र अर्थ से गीता का साम्य किया गया है। १० स०-३ (ग) ५. गीता-विषयानुगन्धि-श्लोस् सग्रहः'' इममे विषय के अनुसार मूल शोको का सग्रह किया गया है । ५० स०४० ( क ख ) ६. प्रकीर्ण श्लोक-व्याख्यानम् निम्न लिखित शोरो पर प्रामगिक सिद्धान्तानुमार विवेचन किया गया हे +---'सर्वधर्मान्परित्यज्य' इत्यस्य व्याख्या ५० स० २५ (ख) ख-पत्र पुष्प फल तोय' इत्यस्य व्याख्या २०१० ४२११२ (ख) ग--'मा हि पार्थ व्यपाश्रित्य' इत्यत्र व्यपाश्रयशदार्थ प०स०२(क) ७ गीता का हिन्दी भावार्थ-इसम हिन्दी भाषा म गीता के सिद्धात का निरूपण हे । ५० स०५ (क) यह सम ग्रन्थ जो कि निरन्धात्मक हे अप्रशित है और श्रीबालकृष्ण शास्त्री को हस्तलिखित पजिकात्रो मे स० २(ख) से ४० तक सुरक्षित हैं। गीता का पृथक् शरण मार्ग-५० श्रीरमानाथजी शास्त्रि कृत यह हिन्दी भाषा म लिखा हुआ निबन्ध है जो पुः युवक परिषद् बबई मे प्रकाशित हे। स. १६६६ प्रस्तुत व्याख्यानात्मक अन्य म विद्वान् लेखक ने गीता के उपर निर्मित शाराचार्य आदि सभी सिद्धान्तवादियों के व्याख्यानो पर दृष्टि निक्षेप करते हुए उनकी समालोचना का ह और गीता का मुख्य प्रतिपाद्य विपय क्या है ? इस पर शका समाधान और प्रमाणनाक्यो पन्यास पूर्वक शुद्धाद्वैत मतानुसार प्रकाश डाला है । ग्रन्थकार का अभिप्राय है कि यद्यपि गीता में विविध योग का प्रतिपादन हुअा है तथापि उसका निर्गलितार्थ शरणमार्ग हे जो श्रीवल्लभाचार्य की दृष्टि बिन्दु के अनुसार ही है। अन्य सिद्धान्तपादियो ने गीता के अनुसार नहीं प्रत्युत्त अपने मिद्धान्त के अनुमार गीता की व्याख्या की हे, अत वह समाचीन नहीं हैं। उपसहार म जो शाखो का मत होता है वही शाख का इदय है अत गीता सन्ति में परमगुह्य रूप में "मधमनपरित्यज्य' का उल्लेख करती है जो एक विलक्षण शरणमार्ग है।

४ । शु० पु. संस्कृत वाङ्मय । गीता-सार्थ दर्शन-यो कठमणि शास्त्रि कृत | हिन्दी भाषा में यह एर विस्तृत निबन्ध है जो नये दृष्टिकोण से गीता पर विचार उपस्थित करता है। अप्रकाशित और प्रन्थकार के पास सुरक्षित है। रचना काल स०-०६४ शुद्धाद्वैत सिद्धान्त की विचारसरणी पर इन प्रन्थों में पृथा, पृथा निवन्ध लिये गये हैं। जिनमे प्रकरण, अध्याय, श्लोर इन सवनी पारस्परिक सगति श विचार करते हुए भक्तिमार्गीय दृष्टि से तात्विक विवेचन है, जिसमे जीव ब्रह्म, पुस्पोत्तम, जगत् , ससार विद्या अविद्या कर्म ज्ञान भक्ति पुम्पार्थ आदि सभी विपयों का समावेश होता है । गीता में भगवान श्रीकृष्ण के द्वारा प्रसगोपात्त उपदिष्ट अयण, दर्शन, नमन, मनन, युद्ध, आदि के आदेशों का रहस्य सम्या विवेचित किया गया है। कर्म ज्ञान की अपेक्षा भक्ति इस मानव-लोके के लिये क्यों अपेक्षित और उपादेय है इसका मौलिक व्यवहारिक यारयान किया गया है-श्रादि । प्रमाण एवं युक्ति पुरम्सर प्रस्तावित यह ग्रन्थ हिन्दी मे शुद्धाद्वैत सिद्धान्त की दृष्टि से विशिष्ट स्थान रसता है। ० इति श्रीकृष्ण-पाक्य प्रमाणप्रारम् .

शु० पु० संस्कृत वाङ्मय तृतीय प्रकरण * व्याससूत्रों का स्वरूप परिचय- घेद-प्रतिपाद्य ब्रह्म के परिलान में ब्रह्मसूत्रों का सबसे अधिक उपयोग है । इन्हें महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास ने प्रणीत किये है। यह उत्तर-मीमांसा, व्याससूत्र, बादरायण मृत्र, ग्रह्म-जिज्ञासा सूत्र तथा चतुर्लक्षणी मीमासा नाम से भी यह प्रख्यात हैं। जैसा कि लक्षण पहा गया है:-'अस्पानरमसन्निन्धं सारवद् विश्यतो मुसं, अस्तोभमनव दांच सूत्रं सूत्रविदो विदुः । तथा "लघुनि सूचितार्थानि स्वरूपातरपदानि च, मर्वतः सारभूतानि सूत्राण्याहु- मनोपिणः-रश्मिगार आदि के निर्देशानुभार इन सूत्रों का यही स्वरूप है । सूक्ष्म किंच गंभीर रूप से सात्विक निर्देश करना इनका मुरय प्रयोजन है । इनकी रचना के सम्बन्ध मे कद पुराण में कहा है-कि भगवान नारायण के द्वारा सस्थापित कृतयुग का ज्ञान त्रेता में कुछ और द्वापर में पूर्ण विकृत हो गया, जिसका कारण जीवों की बुद्धि का भ्रम और अल्पज्ञता थी। गौतम ऋपि के शाप से ज्ञान अज्ञान रूप में परिणत होगया, देवगण संगीर्ण युद्धि पाले होजाने के कारण ब्रह्मा और रुद्र को साथ लेकर परमात्मा की शरण मे गये, शरण्य भगवान् विप्णु ने उन्हें श्राश्यामन दिया और कुछ राल के बाद वे पराशर से सत्यवती में व्यासरूप से अपतीर्ण हुए । भगवान वेदव्यास ने उत्सन्न बेटों का उद्धार रिया, उनम एस्था, बादराधा, चतुर्विंशतिधा, तथा शतधा और सहस्रधा विभाग किया । शिष्यवर्गो शासा-भेद से वेदाध्ययन कराया। इसके अनन्तर येदार्य के मम्पाववोध के लिये उन्होंने ब्रह्मसूतों की रचना की।

[ शु० पु० संस्कृत वाइमय जिनसे वेदप्रतिपादित सिद्धांत का निर्णय होता है। व्यास जी ने ब्रह्मसूनों की रचना द्वारा ब्रह्मा रुद्रादि देवों और मनुष्य पितर श्रादि में ज्ञान की संस्थापना की। इस प्रकार भगवान श्रीपुरुषोत्तम जगत् में ज्ञान सरूप से क्रीडा करते हैं। अणुभाष्य-माश की रश्मिनामक टोपाकार श्रीगोपेश्वरजी ने इस प्रकार का अवतरण देकर ब्रह्मसूत्र-रचना या प्रयोजन बताया है। कहने का तात्पर्य यह है कि -शास्त्रीय पचांग अधिकरण की दृष्टि से इस उत्तर मीमांसा से ब्रह्म सम्बन्धी की समस्त जिज्ञासा की पूर्ति और श्रुति के संदेहों का समाधान होता है । इसी महत्व के कारण शुद्धाद्वैत सिद्धांत के संस्थापक श्रीवल्लभाचार्य ने स्वकीय प्रमाए-तुष्टय की गणना में इन्हें तृतीय प्रस्थान के रुप में स्वीकारा है। इन ससूनों में उठने वाले सदेहों का निरास करने के लिये श्रीमहाप्रभु ने भागवत वास्यों को अंगीशर किया है। फलत: वेद का प्रत्यक्ष संशय-निरसन व्यासमूतों की दिशा से भी किया जाता है सो सयुनिक और सहेतुक है । गीता में इह हेतुमान विशेपण दिया गया है । "ब्रह्मसूर पर्दैश्चैव हेतुमद्भिनिनिश्चितै . [अ० १३, ४] महर्षि वेदव्यास उत्तरमीमांसा द्वारा नि सन्दि ध । श्रुतियों के निरापद अर्थ का प्रतिपादन करते चले जाते हैं पर जहाँ उन्हें अन्य पूर्ववर्ती या समकालीन समर्थ श्राचार्यों के मत में विभिन्नता दीखती है, मसूरी मे नामनिर्देश पूर्वक उनके मत रा उल्लेख करते हैं, जो इस प्रकार है प्र० अ०२, ५८ २. नाश्मरथ्य प्र० ०२, २६ ३. वादरि प्र. ०२,३० ४. नोट्टलामि प्र००४, २१ तथा अन्यत्र ५. काशकृत्स्न प्र० अ०४, २२ ६. पाणी जिनि तृ० श्र.१,६ ७. मात्रेय तृ० प्र०४.४३ न ऋपिया के मम्मन्ध में श्रीवल्लभाचार्य ने कहा है- "amम्मिन्नर्थ पवार प्रपयो पदार्थ चिन्ताः प्रसारभेदेन । तत्र केवल " - १. जैमिनि प्रमाण प्र० ८७ व्याम-सूत्र ] शयल पिचारा आचार्या बादरायणा शगर्थयो जैमिनि । आश्मरध्यस्तु शब्दोपसर्जनेनार्थ विचारर । केवलार्थ विचारको बाटरि" प्र० न० २,२८ अर्थात् परमाप्त वाम्य वेद के केवल शब्दल विचारक श्राचार्य बादरायण शब्द और अर्थ दोनों को सामने रसार विचार करने वाले जैमिनि हैं। श्राश्मय शब्दोपसर्जन से विचार करते हैं और बादरि केरल अर्ध पर ध्यान देकर । आचार्य नादरायण की विशेषता यह है कि ये वेद को ब्रह्म रूप और श दार्थ का नित्य सम्बन्ध होने से उसका अर्थ स्वत ही उसके साथ सम्बद्ध है ऐसा मानते हैं। वेद, प्रमत्त प्रजाप तो है नहीं, वह तो दिव्य अर्थ का प्रतिपादक है। हॉ, उसके अर्थावनोध के लिये शास्त्रीय पञ्चाङ्ग की और उसके विषय को स्पष्ट करने वाले अन्य प्रस्थानी के वाक्यों की अपेक्षा होती है जिससे समन्वय द्वारा श्रुति वचनों म विरोध न आने और आता है तो उसका परिहार क्यिा जा सके । इसी दष्टि को सामने रसकर श्रीवल्लभाचार्य का स्थन हे--"वेदाः श द एव प्रमाण तवायलौकिक नापरमेन तस्मत सिद्ध प्रमाणभाव प्रमाणम्।' और 'वेदश्च परमातोक्षरमानमप्यन्यथा न वदति, अन्यथा सर्वर तदविश्वासप्रसगात् ।" आदि । शुद्धाद्वत की दृष्टि मे ब्रह्मसूत्र उत्तरमीमासा के चार अध्याय और प्रत्येर अध्याय में चार चार पाद हैं । साभिप्राय चार अध्याय होने के कारण इस से चतुर्लक्षिणी मीमासा भी कहते हैं। अध्याय पाद नमानुसार इसके अधिकरण और सून सरया यह * प्रथमाध्यायः -समन्वयाध्याय प्रथम याद-१० अधिकरण ३० सूत्र। इसमे विचार शास्त्र समर्थनपूर्वक शब्दगत सन्देहों का निराकरण है। द्वितीय पाद-- अधिकरण ३२ सून। इसमे अन्तर्यामिस्वरूप विचार नामधेय स्वरूप का सन्देह निराकरण है। •प्रकाशानुसारी मतान्तरसमेत ब्रह्म सूत्र पाठ। प्रकाशक गुजराती भूम मुद्रण व्बई।

[ शु० पु० संस्कृत वाङ्मय दम तृतीय पाद-१० अधिकरण ४३ सूत्र । इसमे उपास्य स्वरूप का विचार नामाधार स्वरुप का सन्देह निव रण है। चतुर्थाध्याय-5 अधिकरण २८ सूत्र । इसमे मतान्तर श्रीतताभ्रम जनक प्रकीर्ण वाक्यार्थी का विचार है। द्वितीयाध्याय-अविरोधाध्याय प्रथम पाद--१२ अधिकरण ३७ सूत्र । इसमें स्मृति का विचार है। द्वितीय पाद-- अधिकरण ४५ सूत । इसमे तर्क का विचार है। तृतीय पाद-१६ अधिकरण ५३ सूत्र । इस्मे वियदादि शब्दों का विचार है। चतुर्थ पाद-१० अधिकरण २२ सूत्र । इसमे प्राण दि शब्दों का विचार है। तृतीयाध्याय--साधनाध्याय प्रथम पाद- अधिकरण २७ सूत्र । इसमें अधिकारी के जन्म निर्धारसा विचार है। द्वितीय पाद-१२ अधिकरण ४१ सूत्र । इसमें विषय की अवकृति का निरूपण है। तृतीय पाट-२५ अविकरण ६६ सूत्र । इसमे गुणोपसंहार रा वर्णन है। चतुर्थ पाद- अधिकरण ५१ सूत्र । इसमें कर्मोपसंहार का वर्णन है। चतुर्थाध्याय-फलाध्याय प्रथम पाद-७ अधिारण १६ सूत्र । इसमें फल रा विचार है । द्वितीय पाद-७ अधिकरण २१ सूत्र । इसमें म्रियमाण के फल का विचार है। तृनीय पाद-५ अधिकरण १७ सूत्र। इसमें गतिशील साधक के फल पा विचार है। चतुर्थ पाद- श्रधिकरण २२ सूत्र । इममें प्राप्त फल सिद्ध पुरुष के फल का विचार है।

प्रमाए प्र०... ..व्याससूत्र ] ६ -- इस प्रकार ब्रह्म-मीमांसा के चारों अभ्यायों के १६ पादों में संकलिन रूपेण इस प्रकार अधिकरण और सूत्र संरया है:- प्रथमाध्याय ...३४ अधिकरण द्वितीयाध्याय ..४६ अधिकरण तृतीयाध्याय ...५३ अधिकरण चतुर्थाध्याय ..२४ अधिकरण ... १३३ सूत्र १५७ सूत्र १८५ सूत्र ७६ सूत्र - इस संरया निर्देश का तात्पर्य अन्य सिद्धान्तवादियों की परि- गणना से है । श्रीशंकर, रामानुज, मध्य, निम्बार्क भास्कर, भिक्षु आदि प्राचार्य जिन्होंने इन सूत्रों पर भाष्य रचना की है, जहां सूत्रों में पाठान्तर मानते हैं वहाँ योग-विभाग मे कई सूत्रों के पृथक पृया रूप भी स्वीकार करते हैं। किन्हीं का अन्तर्भाव भी ठेकर हैं, अधिकारों का भेद भी। शुद्धाद्वैत-सिद्धान्त के अनुसार सूत्रों का व्याख्यान करने वाले, इच्छाराम निर्भयराम आदि भी कहीं-कहीं पाठान्तर के अनुसार व्यारया करते हैं । जैसा कि गीता में कहा है-ब्रह्म-सूत्र हेतुमान हैं अतः श्रीवल्लभाचार्य सिद्धान्त सूत्र के साथ हेतु को संयुक्त ही स्वीकार करते हैं। अन्य और हेतु अलग हो, यह बात दूसरी है, पर अन्य प्राचार्यों इसका कोई आग्रह नहींरक्सा । दृष्टान्त रुप मे "जन्माद्यस्य जयतः'- शास्त्रयोनित्वात् ।" यह दो सूत्र माने गये हैं और वल्लभ मत में एक हो। अस्तु, इस पद्धति में अणुभाप्य-प्रकाशकार श्रीपुरुपोत्तम जी का प्रसार अधिक ग्राह्य है। शुद्धाद्वैत सिद्धान्तानुसार व्यारयाओं में विभिन्न अधिकरण भेद भी दृष्टिगोचर होते हैं। अधिकरण-संख्या-विचार -ब्रह्म सूत्रों पर अणुभाध्य के अनुसार अधिकरणों की संख्या पर श्रीवालकृष्णशास्त्रीजी ने [स्वरचित पुञ्जिका सं० १७, क-२५, क तथा ३०, स मे] विशद विचार व्यक्त किये हैं जो मौलिक और शास्त्रीय आधार पर निर्धारित हैं। अप्रकाशित है। प्रस्तुत ग्रंथ में भाष्य के अनुसार संक्षिप्तार्थ का संकेत कर प्रत्येक पाद को सूत्र सख्या अधिकरण संख्या अथच उस मंख्या 'का' अभिप्राय to [ शु० पु० सस्कृत वाडमय पाद किंमूलक है यह निदर्शित किया है । अध्यायार्थ का पादार्थ के साथ पार उन दोनों का सूत्रों के अधिकरणो की सरया के साथ क्या सम्बन्ध है ? यह विपय एक मौलिक विचार है । इममे अणुभाष्य की विचार पद्धति का स्वारस्य विदित होता है । यह कहा जा मक्ता हे कि अणुभाष्य की शैली में यह एक वैज्ञानिस विमर्पप्रणाली है, जो बहुत कम विद्वानों ने अपनाई है। श्राचार्यचरण की यह प्रणाली सुबोधिनी सप्तार्थ विवेचन रूप में मिलती हे। जहाँ प्रकरणो की, अध्यायो की और श्लोको की सव्या श समन्वय प्रतिपाद्य विषय के माध किया गया है। ब्रह्मसूत्राधिकरण-गणना :- श्रीबालपण शास्त्रीजी की इम परिगणना से सूत्र और अधिररणों का योग इस प्रकार विन्ति होता ह प्र० प्र० पाद ३१ सूत्र १० श्रधिकरण ७ श्राधिकरण ३पाट १३ अधिकरण पाद अधिकरण द्विश्रा १पाद २३ अधिकरण २पाद अधिकरण ३पाद २७ श्रधिकरण है अधिकरण १पाद ६ अधिारण ८अधिकरण ३पाद ३६ अधिकरण ४पाद १७ अधिषरण १ पाद १४ अधिकरण ११ अधिकरण १६ सून এ অধিতে ७ श्राधिकरण ३० सूत्र ४३ सूज ८ सूत्र ३७ सूत्र ४५ सूत्र ५३ सूत्र ४पाद सूत्र ४१ सून च.. सूत्र १६ सूत्र १सूत्र ३ पाद ४पाद अधिकरणा का मक्षिप्त थभिप्राय इस प्रकार है। (१) प्र०अध्याय ममस्या प्राय है, इसम "सर्व प्रम" इस प्रकार या . प्रमाण प्र०. ध्याससूत्र ] शब्द ही प्रमाण है । अत इसकी शब्द की प्रमाणिकता से सम्बन्ध होने से यह प्रमाणाध्याय माना जाता है। प्र० पाद मे जीव जड की ब्रह्मोपादानता का क्थन है, अत पाणिनीय व्याकरणानुसार शब्द की दशविधता से १० अधिकरण हैं। अथवा नाम रूप श द लिंग भेद से निविध है। पारयात भी पुरुषभेद या यालिभेद से त्रिविध है। उपसर्ग और निपात यह दो, तथा वाक्य और महावाक्य रूप इस प्रकार शब्द १० विध माना गया है तदर्थ शब्दसन्देह के निराकरणार्थ यहाँ १० अधिकरण हैं। द्वि० पाद में आधेय रूप ब्रह्म का प्रतिपादन है, ब्रह्म आधार और जीव उसके प्राधेय है, जीव सप्त लोक्स्थ हैं इस कारण अथवा द्विविध कर्मी, द्विविध ज्ञानी और निविध भक्त इस प्रकार सप्त विधि जीयो के कारण से यहाँ ७ अधिकरण हे। तृ पाद मे आधार रूप से ब्रम का वर्णन है। १३ अधिकरणो में जड पुरस्सर सन्देह निराकरण है। जड़वर्ग त्रयोदश विध है । ५ भूत, ५ इन्द्रियाँ १ मन, १ बुद्धि, १ प्राग । अत यहाँ १३ अधिकरण हैं। घ. पाद मे जीव जड़ उभय पुरस्सर उसके धर्मी का अन्तर्यामी में भार रूप सन्देह निराकरण हे, त्रिविध गुण, प्रकृति, महत्तत्व, अहकार, माया और पुरप यह आठ हैं और तदर्थ यहाँ ८ अधि-करण हें। इस प्रकार प्रमाण सज्ञा, समन्वयाख्य प्रथमाध्याय के एकत्र ३८ अधिकरण होते हैं। (२) द्वि० अध्याय मे अविरोध द्वारा प्रमेय मे श्रद्धा का हढीकरण किया गया है, अत यह प्रमेयाध्याय श्रद्धाध्याय हे । प्रमेय के अतिरिक्त अन्यत्र अग्रद्धा का प्रतिपादन हे। प्रथम पाद मे श द और अर्थ म स्मृति प्रमाण नहीं है। वेद के श्रानुगुण्य से उसे स्वीकार किया जाता है, तदर्थ १३ अधिकरण है शब्द पूर्वोक्त १० विध है और अर्थ जड, जीन, ईश्वर रूप निविध,इस प्रकार दोनों को मिला कर १३ होते हैं। यह १३ स्मृत्युक्त प्रमाण नहीं अत स्मृति में अभद्धा ओर चेद मे श्रद्धा का प्रतिपान है। द्वि० पाद मे युक्ति भी अप्रमाणिक होने से श्रद्धेय है, इसका प्रतिपादन है । न्याय के पञ्च अवयन, विविध हेत्वाभास, इस प्रकार पाठ के कारण इसमै ८ अधिकरण हैं। तृ० पाद मे जड़, जीच, मे अश्रद्धा और अन्तर्यामी का स्वरूप पणित है। इसमें १७ अधिकरण हैं। जद जीव में प्रश्रद्धा और अन्न ६२ [ शु० पु० संस्कृत वाङ्मय र्यामी में श्रद्धा। जड़ एकादश विध है । तीन गुण, अष्ट विध प्रकृति । आत्मा द्विविध है-जीवात्मा परमात्मा। काल, कर्म, स्वभाव, अक्षर और पुस्पोत्तम का एक रूप इस प्रकार इसमे १७ अधिकरण हैं। च० पाद मे प्राण इन्द्रियादि अध्यात्म स्वरूप मा प्रतिपादन है, इसमें अधिकरण हैं। अध्यात्म नव विध है-प्राण, अपान, बुद्धि मन, पच ज्ञानेन्द्रिय । इस प्रकार अध्यात्म भी अश्रद्धेय है, अधिदेव है इस प्रकार प्रमेय संज्ञक, वेद श्रद्धाभिध, अविरोधापर नामक द्वितीय अध्याय के ४७ अधिकरण होते हैं। (३) तृ० अध्याय साधनाध्याय है, जिसमे परम गति के लिये जीव के अनुप्ठेय कर्म, ज्ञान, भक्ति का प्रतिपादन क्यिा गया है। प्र. पाद में अधिकारिदेह विपयक ६ अधिकरण हैं-ब्रह्म, क्षत्रिय वैश्य-वेदाधिकार रहित शूद्र के सिवा विधा वर्ण का अथवा गृहस्थ व्यतिरिक्त निधा आश्रमस्थ पुरुषों में प्रत्येक के अचिरादि और धूमादि मार्ग के भेद से ६ अधिकरण है। द्वि. पाद में गर्म रूप साधन का कथन है, जिसमें ८ अधिकरण हैं। वैदिर और स्मार्त धर्म प्रत्येक नित्य नैमित्तिक काम्य भेद रूप विविधता के कारण ६ प्रसार का है, और योग तथा तन्त्रोक्त यह द्विविध और मिलाने पर आठ प्रकार का होता है । अत. धर्म के प्रकार भेद के कारण यहाँ ८ अधिकरण हैं। तृ० पाद में ज्ञान स्प साधन ना कथन है। इसमें सबसे अधिक ३६,अधिकरण हैं। ज्ञान के अठारह साधन हैं जो गीता मे "अमानित्वमदम्मित्व आदि से लेकर अरविर्जन-ससदि" इत्यन्त कहे गये हैं । यह अष्टा- विध ज्ञान प्रत्येक अध्यात्मज्ञान और तत्वज्ञान स्प से द्विविध होने के कारण ३६ प्रकार का होता है । अध्यात्म ज्ञान उपनिपटू से अविरुद्ध सारय योग द्वारा तयाच तत्वज्ञान पनिपदों से प्राप्त होता है, एतदर्थ ३६ विररण हैं-इसी को शास्त्रों में “यदन्ति तत्तत्व विदस्तत्व यज्ञानमययं "इम स्प मे तत्वज्ञान प्रयच “तरति शोरमात्मविद् इत्यादि रूप में पात्मज्ञान म्प है। 1 प्रमाण प्र०... .व्यास सूत्रे ] ६३ च० पाद मे भक्ति रूप साधन का उल्लेख है। जिसके १७ अधि- करण हैं । भक्ति मर्यादा और पुष्टि भेद द्विविध होने पर अवान्तर भेद से प्रत्येक नव विधा होने से अ.ारह प्रकार की होनी चाहिये, पर मर्यादा में सरय का और पुष्टि मे दास्य का अभाव माना जाता है अतः १६ प्रकार की होती है । एक निगुण भक्ति को मिलाने पर १७ भेद होते हैं अतः यहाँ १७ अविकरण है। इस प्रकार साधनापर नामक पर्म नान भक्ति निरूपक तृतीत अध्याय मे एकत्र ६७ अधिकरण होते हैं। (४) च० अध्याय फलाध्याय है। पुरुपार्थ द्वय रूप में दुःखाभाव और सुख रुप में अंगीकार किया जाता है। दु.साभाव रूप पुरुपार्थं फर्म और ज्ञान से अधिगत होता है, सुस भक्ति से । प्र० पाद में १४ अधिकरण हैं । जिसमें चतुर्दश विध दु साभाव का कथन है । १० इन्द्रियाँ और मन, बुद्धि चित्त, अहंकार इस चतुर्विध अन्तःकरण, एकत्र १४ प्रकार के दु.ख की विनिवृत्ति कर्म के द्वारा सत्व प्रादुर्भाव से होती है तदर्थं १४ प्रधिकरण हैं । अथवा पंच महाभूत पंच इन्द्रिय और चतुर्विध अन्त.करण इनके एमनित चतुर्दश विध दु.स की निवृत्ति इसमें वर्णित है। द्वि ८ पाद मे ११ अधिकरण हैं। प्रात्मा एकादश इन्द्रिय प्राय होने के कारण उसको उनके ससर्ग से एकादश विध दुःख की संभारना रहती है जिसकी निवृत्ति प्रात्मज्ञान साधन से होती है, और यह स्थिति उनके संसर्गाभाव से प्राप्त होती है। तदर्थ ११ अधिकरण है। आत्मा को इसी अस्पृष्टता के लिये मांडूक्योपनिपद् मे 'अदृष्टमय- वहार्यमप्राह्य' आदि १२ विशेपणो से स्मरण किया गया है । इस प्रसार आदि में दो पादों कर्म ज्ञान के भेद से दुसाभाव का समर्थन किया गया है। ४० पादु मे सुसात्मक फल, भक्ति से अधिगत होता है तदर्थ ६ अधिारण हैं, ब्रह्म इन्द्रियादि से परे पष्ठ है । जैसा कि "इन्द्रियेभ्य- परं मनो मनस. सत्वं" मे कहा गया है। इपलिये उन-उन करणों से विलक्षण पड विध करणों का सुख उसे अधिगत होता है, जैसा कि 'सर्वयामः सर्वगन्धः सर्वरसः' आदि के द्वारा कहा जाता है।

१४ [ शु० पु. संस्कृत वाङ्मय च० पाद मे ७ अधिकरण हैं-भगवान् पड्गुण सहित पड्विध धर्म स्वरुप और धर्मी पुरुपोत्तम रूपसे श्रानन्दनय होकर सप्त रूप हैं, अत: भगवद्रूपात्मक आनन्द-सुख-फल रूप में भक्ति से प्राप्त होता है। अतः यहाँ ७ अविकरणों का होना संगत है। इस प्रकार अन्तिम पाद द्वय से आत्मानन्द ब्रह्मानन्दात्मक सुख या फल रूप में निरूपण किया गया है। और इस प्रकार फलनामक चतुर्थाध्याय के एकत्र ३८ अधिकरण होते हैं। इस दृष्टि से व्यास सूत्रों के अधिकरण संख्या का विचार करने पर यह निर्विवाद सिद्ध होता है कि श्रीवल्लभाचार्य की भाप्य परंपरा मे जो अविकरण विभाग निर्धारित किया गया है यह कितना युक्ति संगत और वैज्ञानिक है, और इसे अद्धय श्रीबालकृष्ण शास्त्रीजी ने प्रकट किया है। अन्य किसी सिद्धान्तवादी ने ऐसा विवेचन प्रस्तुत नहीं किया है। व्याससूत्रों की संख्या के सम्बन्ध मे प्रारंभ से मतभेद चला आता है । अनेक प्राचार्य अपने अपने अभिप्रायानुसार योग विभाग के द्वारा उन्हे पृथर और संयुक्त मानते चले पाए हैं-प्रो० गोविंदलाल भट्ट ने गुजराती अणुभाष्य को भूमिका में इसका निर्देश किया है जो इस प्रकार है-- नाम श्री शङ्कराचार्य ५५५ श्री भास्राचार्य ५४७ श्री रामानुजाचार्य श्री निम्बार्काचार्य श्री मध्वाचार्य ५६२ श्री कंटाचार्य श्री वल्लभाचार्य श्री विज्ञानभित्तु પૂ૫૬ श्रीवलदेव ५५६ प्रयेक भाष्यकार की विभिन्न परंपरा होने के कारण ऐसा मानन - सून संख्या प्रमाण प्र०व्याससूत्र ] स्वाभाविक है । इसी प्रकार पाठ भेद का समाधान भी किया जा सकता है और इसी कारण अधिकरणों में भी संकोच विस्तार दीसता है। श्रीवल्लभाचार्य के सिद्धांत के अनुसार व्याससूत्र अथवा अणु- भाप्य पर व्याख्या करने वालों में सूत्र संरया में १, का ही अन्तर श्राता है, कोई ५५४ मानते हैं तो कोई ५५५ । अधिकरणों की संख्या में भी यही बात है, कुछ विवरणकार १६२ और कुछ १६३ मानते हैं। प्रदीपनार १५६ अधिकरण स्वीकार करते हैं । इसके साथ यह तो निविवाद है कि न तो वल्लभाचार्य के मतानुवर्तियों ने और न अन्य मतानुवर्तियों ने व्याससूत्रों में से प्रक्षिप्त माना है। जैसा कि वैदिक साहित्य प्रकरण में कहा गया है वेद के दो कांड है-१ पूर्वकाण्ड जिसमें यज्ञ का प्रतिपादन है, २ उत्तरकाण्ड जिसमें ब्रह्म का प्रतिपादन है, इन्हें कर्मकाण्ड और ज्ञानकाण्ड भी कहा जाता है। इस धर्म कर्म रूप यज्ञात्मक पूर्व काण्ड का विचार महर्षि जैमिनि ने अपनी पूर्व मीमांसा में और ब्रह्मज्ञान रूप उत्तरकाण्ड का विचार महर्षि व्यास ने उत्तर मीमांसा में किया है । एतावता ब्रह्मसूत्र ब्रह्म के स्वरूप, लक्षण प्रतिपादक श्रुतियों के अर्थावबोध के लिये निर्मित हुए हैं यह सिद्ध होता है। भारत मार्तण्ड श्रीगट्ट, लाल जी ब्रह्मसूत्रों की प्रामाणिकता के सम्बन्ध में कहते है-- सत्रपूभयरूपलं वाक्यशेषत्वमुच्यते'.. १५. चेदस्य दुज्ञेयार्थत्वाच्छास्त्र सन्देह वारकम् । व्यासेनाविष्कृतं सूत्रमयं ब्रह्म निरूपकम् “१६ । तच्छिष्यो जेमिनिरपि वेदैर्धम ध्यचारयत् । एवं कृत्स्नोपि वेदार्थों मीमांसातोवसीयते .१७॥ व्यासो निणी तवान् ब्रह्म स्वरूप साधन फले। श्रुतितः स्मृतितः शास्त्रे न्यषेधत्तदसम्मतम् “१८ । 'वृक्षसूत्र पदेश्वैव हेतुमभिर्विनिश्चितैः । प्रामाएपमिति गीतामु तेस्य भागयतेपि च "१६ विदान्त घि०२) ६६ [ शु० पु. संस्कृत वाङ्मय व्यामसूत्रों पर शु० सां० साहित्य- व्याम सूत्रों पर शुद्धाद्वैत सिद्धान्त की दृष्टि से निम्न लिखित ग्रन्थों का प्रणयन हुआ है। इसका प्रारम्भ इसके संस्थापक श्रीवल्लभाचार्य के द्वारा होता है । आचार्य ने प्रस्थान चतुष्टय मे से ब्रह्मसूत्र और भागवत इन दो पर ही विवरण लिसे हैं, शास्त्रार्थ प्रकरण में प्रमाण चतुष्टय का प्रासंगिक कथन करते हुए उन्होंने कहा है:--"श्रुतिसूत्राण्येका कोटि', गीता भागवतं चेत्यपरा" अर्थात् इस मिद्धान्त में वेद और व्यास प्रणीत उत्तर मीमांसान्तर्गत सूत्रों की गणना एक कोटि, और श्रीकृष्णवाक्य (गीता ) तथा भागवत की समाधिभापा यह दूसरी कोटि है । प्रमाए चतुष्टय को जहाँ एक दृष्टि में हम युगल रूप में रखते हुए भगवदुपदिष्ट और गुरूपदिष्ट इन दो श्रेणियों में विभाजित कर सकते हैं, वहाँ ब्रह्म के परोक्ष प्रतिपादन और प्रत्यक्ष प्रतिपादन रूप अन्य दृष्टिकोण का भी उसमें समावेश कर सकते हैं। भगवदुपदिष्ट रूप मे हम वेद और गीता को गिन लेते हैं तो गुरूपदिष्ट रूप में हम व्याप्तसूत्र और भागवत को। इधर परोक्ष ब्रह्म प्रतिपादन में जहाँ वेदों का साक्षात् सम्बन्ध है वहाँ व्याससूत्र भी इसी प्रकार के हैं । प्रत्यक्ष ब्रम प्रतिपादन में जहाँ श्रीकृष्णयाम्यो की प्रधानता है वहाँ श्री भागवत भी इसी प्रकार से परिगणित होती है। अत. आचार्य का यह कथन कि-श्रुति सूत्र एक कोटि के हैं परोक्ष ब्रह्म प्रतिपादन के रूप में बहुत ठीक है, यद्यपि प्रमाण चतुष्टय की गणना में गीता के बाद व्यास सूत्रों का क्रम अाता है। श्राचार्य के इस कथन का टिप्पणीकार और यावरण भंगकार ने शब्दान्तर से इसी अभिप्राय में प्रतिपादन किया है । टिप्पणीकार कहते हैं कि श्रुत्यर्थ को लेकर सूत्रों का निर्माण होने से इन दोनो की एक कोटि और गीतार्थ को लेकर भागवत का निर्माण होने से उन दोनो की एक योटि स्वीकृत की गई है। प्रावरणभंगकार धर्म-धर्मि-निरूपण भेद फो लकर ऐमी योटि रखने पा रहस्य बतलाते हैं। ये कहते हैं हि वेद और अन्य सूनो में धर्म रूप से और गीता तथा भागवत में धर्मी रूप मे परमात्मा का प्रतिपादन किया गया है, अतः इन दो की अलग अलग कोटि है।" इन दोनों के पनातिरिक्त मेरी यह दृष्टि भी है कि भगयदुपदिष्ट योर गुरूपदिष्ट इन दो भायों से भी ऐमा विभाग किया जा सकता है।यस्तु प्रमाण प्र०. च्याम सूत्र ] मस्कृत में तात्पर्य यह कि-प्रमाण पतुष्ट्रय मे उत्तरोत्तर पूर्वपूर्व सन्देहदासता होने से ब्रह्मसूत्र भगवद्वाक्यो के सन्देहापकरण के लिये महत्वपूर्ण उपकरण है, यद्यपि वे श्रुतिगत सन्दिग्ध स्थलो का स्पष्टीकरण भी उतने ही रूप में करते हैं। व्याससून-[उत्तर मीमासा] पर वर्गीकरण रूप मे निम्नलिखित शु० सा० साहित्य का निर्माण हुआ है- १. वृहद्भाष्यम्-श्रीवल्लभाचार्य द्वारा प्रणीत व्याससूनो पर यह भाष्य आशिक रूप में उपलब्ध होता है जो अप्रकाशित और सर० भ० कारोली मे शु० व०४५, २४ पर विदामान है । यह प्रन्थ पूर्ण नहीं है और इसकी अन्य प्रति कहाँ है, पता नहीं लगा । प्रस्तुत प्रति नि० गो० श्रीबालकृष्ण लालजी महाराज के समय कहीं से लिखाई गई थी जैसा कि ऊपरी पन म लिखा है। वर्तमान प्रति मै बृहद् भाप्य का निम्न लिखित अश है-- (१) प्रथम पन से लेकर ७ पत्र पर्यन्त जिसम प्र. ० के प्र० पादीय प्रथम सूत्र से भाप्य का प्रारम्भ होता है और जो उमी सून के शुद अश तक है । अणुभाप्य से मिलान फ्रने पर विदित होता है कि श्रणुभाप्य मे जहाँ 'तथाहि न तावद् धर्मविचारानन्तर्यम्, विपर्यय समात्" यह पति है, वहाँ तक इस भाष्य का अश मिलता है। (0) तृतीय अन्याय के प्रथम पादीय प्रारमिक सूत्र से द्वि० पाद के वारहने सून तर युद्ध श्रश मे है । २७ वे पत्र पर प्रतिलिपि समाप्त है, श्रन्त को कोई पुष्पिका नहीं मिलती । तृतीयाध्याय के प्रथम पाद समाप्ति पी पुष्पिका इस प्रकार लिखी है- 'इतिश्रीमवृष्ण द्वायन मतवर्ति श्रीवल्लभाचार्य-विरचिते प्रय सूत्र श्रीमदभाप्ये तृनीयाध्यायस्य प्रथम पाद' । (पत्र १३) इसमे समा माना जा माता है कि प्रारभि स्थिति में इनी भाष्य की रचना हुई थी और याद म "श्रगुभाग्य' के नाम से उत्तम समितीकरण दिया गया, जैसा दियागे उद्धरण दिया जायगा । यह निर्षिया है कि "अगुभाष्य' की अपेक्षा यह भाप्य विस्त है। इम भाष्य का यर्य विषय “श्रणुमाप्य' पे परिराय में दिया जायगा क्यापि यह अपूर्ण है और इमरी तथा अणुभाष्य की प्रतिपाय पिपय रैली और मिद्धान्त एक ही है।

[ २० पु० स. वाङ्मय वृहद्भाष्य और अणुभाग्य- प्रस्तुत "बृहद् भाष्य" और "अणभाग्य म क्तिमा साम्य श्रोर विस्तार है यह दोनो के उद्धरण मे रिन्ति हो जायगा जो विस्तृत रूप में है वृहद्भाप्य का उद्धरण । अथान विचार्यते, वेदान्ताना विचार प्रारम्भरणीया न चेति । ननु अयुक्तोयं विषयोपन्यास , असौनतात. स्तिव' ब्रह्म-विज्ञासा कार्या न वा, मा जिज्ञास्यं न वेति युक्त मितिचे उच्यते । यदि तपन्यस्यत तहि तप कुतो नोपदिष्टम् ? तपसा । ब्रह्म यजिज्ञासि इति श्रुते वेदान्त-पाक्यानि किमिति विचार्यन्ते ? इति माशीपत प्रथैवमुपन्यासेस्याधीत्वेदवेदार्थ निश्चय प्रति वेदान्त विज्ञान हेतु वेदान्त विज्ञानसुनिश्चितार्था इति श्रुते तस्य च विचारसाध्यत्वात् शकानुदयायुक्त । अथवा कृष्णद्वैपायन-प्रतिहेतु योधनार्थ. सच सर्वेपा श्रेयो) प्रवृत्त , 'एय प्रवृत्तस्य सदा भूताना श्रेयसि द्विजा' इति जिज्ञासितमधीत च ब्रह्म यद्यत्सनातन इति देवर्षिया ब्रह्म विचारात प्रयत्नस्या कृतार्थत्व बोधितम्, तत्र च वेदार्थ निश्चयो वेदान्तपिचार बिना न भविष्यतीति सूचितम् । भने वेदान्तवाक्यै रेय ब्रह्म विचारितम् । ब्रह्म सर्ववेदार्थ इति वक्ष्यमाणसूनेषु निरूपणीयत्वाच्च । श्रतो विचार श्रावश्यक न चासौत्रत्य दोप शेपपठ्यन्तब्रह्म-पदास् परिहरिष्यते । अथोच्यते । ब्रह्मविचारान्तकृतेरकृतार्थत्ववोधने विचार-नैष्फल्य इति अन्न प्रतिविधास्याम । श्रीभागयतानुसार-व्याख्याने तथात्वा भावात्सार्थक । करणार्णवो भगवान् बादरायणो मामबोधि 'श्रीभाग चतानुसारेण सूत्राणि व्याख्याहीति' । अतोत्र तदनुसारि व्याख्यास्यते वृ०भा० पत्र १] अणुभाष्य का उद्धरण—इदमन विचार्यते वेदान्ताना विचार श्रारम्भणीयो न वेति । वितायत् प्राप्त 'नारभणीय इति' कुत "सागोध्येय स्तथा शेयो । वेद 'शब्दाश्च बोधका' नि सन्दिग्ध तदर्थाश्च लोक्वद् व्याकृते स्फुटा 'अर्थज्ञानार्थ विचार आरम्भरणीय ' तस्य च ब्रह्मरूपत्वात् तज्ज्ञाने पुरुपार्थो भवतीति न मन्तव्यम् । विचार विनापि येदादेव साङ्गादर्थ [ - प्रगाण० प्र० ""व्यासगून ] प्रतीते ' नचार्थ ज्ञानमविहितं अविचारिताच शब्दा नार्थ प्रत्याययन्ति इति वाच्यम्, ज्ञयश्चेति विधानात् [प्रारमिक अंश । कुछ मध्य का अंश.. वृहद् भाष्य का उद्धरण तात्यये नुशयनादिति [तृ० अ० प्र० पाद ८] प्रथमाहुति. सफला विचारिता । द्वितीयां विचारयितु मधिकर- पारम्भः। सोमस्य पर्जन्यहोमे वृष्टिसमिति । सोमानन्तरं वृष्टिभावे रूपरसा. दीनां हीनतया प्रतीयमानत्वात् । यागस्यावान्तरफलं तत्र उक्तम् इति सोम राजानं जुद्धति, तस्याहुतेर्वतभरति इति श्रुत्या न निश्चितम् । तत्र संशयः' कि सम्मेवान्तरफलं तर भुक्ते आहोस्विदनुशयवान् वृष्टिर्भवतीति । अनुशयो नाम शेष अनु पश्चात् शेते भोगानन्तर तिष्ठतीति योगात् 'एतद्विचारप्रयोजन तु सदासनयामिमजन्मनि सदाचारमुक्तस्य स्यादिति ।' [ वृ० भा० पत्र ७४० अ०] अणुभाष्य का उद्धरण-कृतात्ययेऽनुशयवान् इति सूत्र' प्रथमाहुतिः सफ्ला विचारता, द्वितीया विचारयितुमधिकरणारभः । सोमस्य पर्जन्य होमे वृष्टित्वमिति । सोमाद् वृष्टिभाने रूपरसादीनां हीनता प्रतीयमानत्वात् यागस्यावान्तरफल तन भुक्त इति निश्चितम् । तत्र संशयः किम् सर्वमेवान्तरफल तन मुक्ते? पाहोस्विदनुशयवान् वृष्टिर्भवतीति सद्वासनयाग्रिमजन्मनि सदाचार युक्त एन स्यादिति [प्रकाशित अणु० तृ० अ० प्र० पाद ८ सूत्र ] इत्यादिक उद्धरणो से जहां दोनो के साम्य मे एकक प्रतीत होता है वहां विस्तार और मक्षिप्त लेखन का भी परिचय मिलता है। अतः यह नि सन्दिग्ध है कि दोनो मे बृहत्व ओर लघुत्व का ही भेट है। एक बात यह भी विचारणीय है कि-आचार्यत यह "बृहद भाष्य" न तो इतना प्रसिद्ध ही हुया है। और न अधिक प्रतियों के रूप में उपलब्ध ही है ? समाधान रूपमै किन्ही लोगो का कयन है कि-श्रीवल्लभा- चार्य के अनन्तर उनके ज्येष्ठ पुत्र श्री गोपीनाथजी की पत्नी ग्रहकलह के कारण श्रीविट्ठलनाथजी की अल्पवयसत्ता में दक्षिण देश चली गई और जो भी साहित्य मिला ये अपने माय ले गई, जिसके परिणाम में वयस्य होने पर श्रीविठ्ठलनाथजी को पुन याचार्यों का साहित्य बदी । .

1 [ गु० पु० संस्कृत वाङ्मय कठिनता से सचित करना पड़ा, और इसी अव्यवस्था में इस भाष्य का अथ च सुबोधिनी का बहुत सा अश अप्राप्य हो गया। अस्तु- यह एक समस्या है । इधर स्वाध्याय करने पर और वृहद्भाष्य का परिचय लिखने पर विदित हुआ कि इसमें एक और भी श्राश्चर्य है - वृहद्भाप्य और प्रकाश- जैसा कि भागे परिचय दिया जायगा, श्रीपुरुषोत्तमजी ने अणुः भाप्य पर 'प्रकाश' नामक विवरण लिखा है, जो भाष्य के गभीर अर्थ को समर्थ ढग से प्रकाशित करता है। इसी प्रकाश टीका पर श्रीगोपेश्वर जी ने 'प्रकाश-रश्मि' नामक टीका लिसी है, जो प्रकाशित हो चुकी है । यह एक अध्ययनात्मक अन्वेषण है कि-श्रीवल्लभाचार्यकृत 'वृहद् भाष्य' श्रोर श्रीपुरपोत्तमजी कृत 'अणुभाष्य-प्रकाश' टीका एक ही है । प्रकाश की रचना के समय बृहद्भाष्य का सम्मुख होना अत्यधिक सत्य है । कारण कि श्रीपुरुपोत्तमजी ने स्वकीय पाडित्य के कारण वृहद्भाष्य को वाक्यावली को और भी अधिक विस्तृत किया है, प्रमाणवाक्यो को पूर्ण रूप म लिखा है, विभक्ति-विपरिणाम और क्रियाओ का प्रयोगान्तर किया है। अन्यथा बृहद् भाष्य और प्रकाश की शब्दावली, भाव शैली और साम्य मे कोई ऐसा अन्तर नही विदित होता जो दोनो स्वतन्त्र सिद्ध हो सके ? यह तो निश्चित् है कि 'वृहद्भाष्य के नाम से मिलने वाला ग्रन्थ पुरुपोत्तमजी कृत 'प्रकाश' ग्रन्थ नहीं है, क्योंकि जहाँ पुरुषोत्तमजीकृत प्रकाश में अणुभाष्य की प्रतीक हैं वह वृहद्भाष्य मे नही और वृहद्भाष्य और अणुभाष्य की वर्णन शैली में गौरव लाघव के सिवा कोई अन्तर नहीं । जैसा कि कहा जारहा है-श्रीवल्लभाचार्य कृत 'वृहद्भाष्य' का वाक्यविन्यास ही 'प्रकाश' नामक व्याख्यान है, और यह क्थन निमूल नहीं है, सप्रमाण है- प्रथम प्रकाशित -'अधान विचार्यतेवेदान्ताना विचार आर भगीयो न वेति' इस श्राभास पर पुरुषोत्तमजी का प्रकाश इस प्रकार है जो वृहद्भाष्य का साधारण रूपान्तर है." वेदान्तानामित्यादि- विषयायु पन्यासो न युक्त' -नन्याय C.C६ प्रमाण प्र... 'व्यासमूत्र ] 1102-१०१ ... असोप्रत्यात, किंतु ब्रह्म-जिज्ञासा कार्यों न वा ब्रह्म जिज्ञास्यं न वा, इत्येवं सूत्रानुसरणात् युक्त इति चेत् ? न तथोपन्यासे तपसा ब्रह्मा पिजिनासस्व इति श्रुत्या तपस एवोपदेशात् तदिहाय व्यासपादैः किमिति वेदान्तवाक्या नि विचार्यन्ते, तप: कुतो नोपदिश्यते ? इत्याशंका स्यात् । श्रुतिविरुद्धत्वं च भायात् 'एवमुपन्यासे त्वधीतवेदस्य बेदान्तविज्ञानसुनिश्चितार्थाः' इति श्रुतिस्फुरणात् अस्यां च श्रुतौ अर्थनिश्चयं प्रति वेदान्त विज्ञानस्य हेतुता कथनात् तस्य च विचारसाध्यवान तत्स्फूयाशंकानुयाद युक्त इति "किंच व्याम प्रवृत्ति बीजनोधनार्थत्वेनापि युक्तः । तथाहि प्रथम स्कन्धे चतुर्थाध्याये 'द्वापरे समनुप्राप्ते इत्यारम्य एवं प्रवृत्तस्य सदा भूतानां श्रेयसि द्विजाः 'इत्यन्तेन सर्वेषां श्रेयोर्थप्रति ासचरणानामुक्ता [इत्यादि प्रकाशित 'प्रकाश' प्र० प्र० पाद १ सूत्र] दुख मध्य में वृहद्भाष्य और प्रकाश का साम्य वृहद्भाप्य "[४. श्र० प्र० पाद १ सूत्र "पत्र १ ] ब्रह्मविदाप्नोति परमिति परमाप्ति-साधना-भूतज्ञानस्या- परोक्षस्यापेक्षत्वेन तस्य च शुद्धथवीनत्वेन जन्मना कर्मणा शुद्धे साधन सहिते पुरुप विद्यां जनयन्ति मर्यादायाम् । उत केरल माधनशून्ये वरण- मात्रविपये पुष्टभक्त जनयंति, इति । यथायोगे, 'जन्मकर्मारदातलाभारे- ऽपि केवलमन.शोधके पुसि जनयन्ति । [वृ० भा० पत्र १ तृ.अ.... इमी सूत्र पर प्रकाशित पुरपोत्तमजी कृत्त प्रकाश 'स साधन इत्यादि ब्रह्म पिदाप्नोति परमिति परप्राप्तिसाधनलया यज्ञानमुक्तं तदारोतमेव विवक्षितम" अतो हेतोः जन्मना कर्मणा शुचौ विचारम्प साधन महिते पुस्पे विद्यां जनयन्ति, या अथवा केयले जन्मकर्मापदाततत्याभाऽपि वरणमात्रविपये। 'तत्र दृष्टान्तः यथा योगे । यतो निर्विपयं निन्यं गनः कार्य मुमुनुणा इति श्रुतेर्जन्मादि शुद्धि- राहित्य केले यरणविपये मनः शोधनपरे च पुरुषे जनयन्ति," इत्यादि [प्रकाशित प्रकाश] इन उद्धरणों से यदि स्पष्ट पूछा जाय कि श्रीवल्लभाचार्य कृत 'वृहद् भाष्य कहाँ गया ? तो कहा जा माता है कि वह श्रीपुरपौत्तमजी के प्रकाश में अन्तर्लीन हो गया है। यद्यपि यह फटु लगेगा पर है सत्य । सौम्य रूप में यह पहा जा माता है कि ] क्थन [ शु० पु० सस्कृत वाङ्मय श्रीवल्लभाचार्य कृत वृहद भाष्य नष्ट नहीं हुआ है, वह प्रकाश के अन्तर्गत सुरक्षित है । उनके स्वतन्त्रतया विलुप्त हो जाने से भी कोई महती हानि नहीं है। वह सम्पूर्ण उपलब्ध भी होता तो अणुभाष्य और उसके प्रकाश साहचर्य से वह गतार्थक ही सिद्ध होता। इससे यह निर्विवाद हो जाता है कि प्राचार्य ने 'वृहद् भाष्य का प्रणयन अवश्य किया था और वह सम्प्रति यत्किंचत् रूप में ही नहीं 'प्रकाश में ममयेत रूप से सप्राप्त है ! प्रो. जेठालाल गोवर्द्धन शाह एम० ए० ने जिन्होंने अणुभाष्य का गुजराती अनुवाद किया हे, भूमिका में वृहद्भाप्य के रचयिता के सम्बन्ध में प्रकाश डाला हे, उन्होंन सिद्ध किया है कि "वृहद् भाप्य' नामा किसी भाप्य की रचना श्रीवल्लभाचार्य ने नहीं की। उन्होंनेन्तो जैसा कि-प्रसिद्ध हे 'अणुभाष्य' का उतना ही अश बनाया है जो विदित है । वृहद्भाष्य नाम से जो अश मिलता है वह श्रीपुरुपोत्तमजी के गुरु श्रीकृष्णचन्द्रजी का निर्मित है"। इसके प्रमाण में, प्रो० शाह गुणोपसहार पाद [ तृ० अ० तृ० पाद ] के उस अश को उपस्थित करते हे जो रश्मि के साथ प्रकाशित हुआ है । और पुरुपोत्तमजी के प्रकाश मे जैसा का तैसा मिलता है। इस अश पर तेनीवालाने जो नोट दिया है, उसमे यह श्रीकृष्णचन्द्र की कृति बताई जाती है। पर मित्रमर 'शाह' यह भूल जाते हैं कि मूल ग्रन्थ और उसके टीका ग्रन्थ में अन्तर होता है, मूल ग्रन्थ म आभास प्रतीक नहीं होती और टीका म वे स्थान-स्थान पर रहती है। विद्याविभाग कारोली में विद्यमान बृहद् भाप्य के लेख म कही भी प्रतीक नहीं है, थोर इसके विपरीत श्रीकृष्णचन्द्र जी के उस लेख म ये स्थान-स्थान पर विद्यमान हैं । जो अणुभा'य ओर बृहद्भाष्य दोनो की ही है। श्रीशाह को इसके विपरात नो यह कहने का सोर्य होना चाहिये था कि 'बृहद् भाष्य और कुछ नहा श्रीपुरुपोत्तम जी के निर्मित प्रकाश का ही विशाल रूप है श्रतएव यह उन्हीं का है। मेरा तो क्थन है कि 'वृहदभाष्य वृहद् भाष्य है और वह श्रीवल्लभाचार्य कृत है, न तो यह श्रीकृष्णचन्द्र कृत है न श्रीपुम्पोत्तमजी वृत्त दोनो ने ही वृहद् भाष्य को रूपान्तरित किया है, वह व्यापक रूप में प्रमाण प्र०... व्याससून ] 'प्रकाश' में मिलता है और तथाकथित श्रीकृष्णचन्द्र कृत उम अंश में भी जो 'गुणोपसंहार भाष्य-विवरण' नाम से मंनित किया गया है। इसके प्रमाण में अनेक स्थलों पर प्रकाश और बृहद्भाप्य के अंशों का सम्वाद किया जा सकता है, जैसा कि कुछ उद्धरणों से प्रकट हुया है। 'बृहद्भाष्य' के मध्य प्रचलित अणुभाप्य की प्रतीके देकर और उसमें थोड़ा सा शाब्दिक रूपान्तर कर उसे 'प्रकाश' का नाम दिया गया है। 'प्रकाश' नामक कोई व्याख्या पुरषोत्तमजी ने निर्मित नहीं की ऐसा मेरा कथन नहीं है, उन्होंने उसे बनाया है पर जहाँ भी हो सका है उन्होंने 'बृहदभाष्य' के अंशो को 'प्रकाश' के सांचे में ढाल लिया है। व्यासत्रभाष्य का नामकरण श्रीवल्लभाचार्य ने व्यासप्रणीत सूत्रो पर जा भाष्य रचा है, उसके नामकरण के सम्बन्ध में भी विद्वद्वर्ग में विचार-वैचित्र्य चलता है । यद्यपि भाष्य की पुष्पिका में “इतिश्री घेदव्यास-मतयति श्रीवल्लभा- चार्य विरचिते श्रीब्रहासूत्राणुभाष्य" ऐमा लेख मिलता है, तथापि इसका यह वास्तविक नाम है या नहीं ? यह शंका होती है। ऐसा कहा जाता है कि प्राचार्य ने जिस प्रकार भागवत के लिये दो टीकाओ को रचना की एक 'सूचम टोका' 'दूसरी 'सुबोधिनी' नामक बड़ो टोका, इसी प्रकार उन्होंने दो भाष्य भी रचे थे । १. अणुभाष्य, २. वृहद्भाध्या यहाँ विशेषणतया 'श्रणु' और 'बृहद्' दोनो शब्द सापेक्ष हैं, और इनके लिये पूर्वीपर का क्रम निर्धार करना सर्वसंमत नहीं हो सकता । यदि दो में से किसी एक को प्राथिमक रचना मानी जाय तो रचना के समय यह तो मानना ही पड़ेगा कि अन्यकर्ता के मानसिक क्षेत्र में रचनाद्वय का बीज विद्यमान था, पर यह एक क्लिष्ट: कल्पना जैसी बात है। इसके विपरीत यह अधिक संभव है कि-किसी ग्रन्थकार ने कोई ग्रंथ प्रारंभ किया हो ? विस्तृत हो जाने के कारण समयाभाय से उसकी पूर्ति होते न देख उसने उर्म रूपान्तर में मंक्षिप्त कर दिया हो, और ऐमो अवस्था में प्रथम रचित अपूर्ण प्रन्यको अपेक्षा संक्षिप्त अन्य की पूर्ति हो गई और आगे चलकर वह स्वनः 'अणु' या 'सूक्ष्म' नाम- घारी बन गया हो।

[ शु० पु० सस्कृत-वाइमय जैमा कि श्राचार्य-चरित में प्रकट है। उन्हे ग्रन्थरचना का पर्याप्त समय नहा मिना, ये पर्यटन, प्रचार पोर साम्प्रदायिक प्रतिष्ठान में अधिक व्यस्त रहे । एकत्र निश्चित स्थिति के अभाव में वे मम्पूर्ण भागरत का व्याख्यान भी पूरा न कर सके, वह अधूरा ही रह गया । सभर है इसी नम मे व तत्वसूत्रों पर जिस रूप मे भाष्य लिख रहे थे, लिख न सके और उसे उन्हें सक्षिप्त करना पडा। दो ग्रन्थो के सम्बन्ध में जो एक ही विषय को लेकर रचे गये हा? ऐपी परिस्थिति म स्वभावत उनके परिचय के लिये किन्ही विश्लेषक विशेषणों की श्रावश्यकता होती है और ऐमी अवस्था उन्हे 'वृहद्' या 'अणु' नाम से सम्बोधित दिया जा सकता है। 'वृहद् भाध्य' के परिचय मे अणुभाष्य के अश को उद्धृत करते हुए बताया गया है कि अणुभाष्य उसमा सक्षिणीकरण है । जैता-कि प्राय होता है किप्ती लेख में से अधिक विस्तृत अश निकाल दिया जा कर सक्षिप्त बना दिया जाता है । यही पद्धति अणुभाष्य के लिये अपनाई गई है और एक ही ग्रन्य के १ बृहद्.२ अणु दो सस्करण हो गये हैं । यद्यपि सूक्ष्म को वृहद् बनाने के लिये भी ऐमा हो सकता है तथापि इसकी बहुत क्म सभावना है। इस उहापोह से में यह कहने को बाध्य हूँ कि श्रीवल्लभाचार्य ने व्याससूत्रो पर जो भाष्य रचा था उसका नाम 'तत्वसूत्र भाष्य' था। जैसा कि सर्वप्रथम श्रीविठ्ठलेश्वर प्रभुचरण ने सर्वोत्तम स्तोत्र में 'तत्वसूत्र भाष्य' 'प्रदर्शक' रूप मश्राचार्य का नाम स्मरण किया है। जैसा कि प्राचार्य कृत पूर्व मीमाता भाष्य की पूर्ति समयाभार से न हो सकी, उपक्रान्त विस्तृत तत्यसूत्रभाष्य की भी सम्पूर्ति न हो सकी और उन्होने उसे सक्षिप्त कर दिया, यह ग्रन्थ दो म विख्यात हो गया १ बृहद्भाष्य २ अणुभाष्य । पर समयाभाव से जैसे तथाकथित 'बृहद् भाष्य' पूरा न हो सका अणुभाष्य भी, जिसे आगे चलकर श्रीविट्टलेश्वर प्रभुचरण ने पूर्ण किया था। यह वृहद्भाष्य क्सि अश तक रचा जा चुका था, कहा नहीं जा सकता तथापि जैप्सा उत्तके परिचय मे कहा गया है वह प्रथमाध्याय के प्रथमपादीय प्रथम सूत्र के कुछ अश तक और बाद मे तृ० अ० के - प्रमाण ३०...व्याससून ] २०५ प्र० पाद प्रारंभ से लेकर १२ वे सूत्र के यकिंचित अंश तम तो मिलता है। मध्य का और अन्त का भाग अनुपलब्ध है। इधर यह भी विचारणीय है कि इसी के समकक्ष 'अणुभाष्य भी तृतीय अध्याय के द्वितीय पाद के ३३ के सूत्र तक हो है, समयाभाव के कारण प्राचार्य द्वारा जन न तो उपक्रान्त वृहद् भाष्य ही पूरा हो सका और न मनिम सस्करण रूप अणुभाप्य ""ही, तव उनके अनन्तर सम्प्रदाय का भार संभालने पर श्रीविठ्ठलेश्वर ने मक्षिप्त अणुभाप्य पी तो पूर्ति कर दी, पर बृहद्भाष्य जैसा का तेसा रह गया । या तो वह अनुपलब्ध- मा था या अपूर्ण, चरितार्थ श्रतएव उपेक्षित-सा : सम्प्रदाय मे अणुभाध्य की ही प्रसिद्धि हुई और उमसी कई प्रतिलिपियाँ हो गई। इससे प्रस्थान चतुष्टय का कार्य निर्माध चलने लगा। तत्वम्न भाष्य' अगुभाप्य के रूम मामने था गया। थागे चल कर प्रन्यकारों ने अणुभाष्य पर विवरण लिखना प्रारभ किया, और उसका माहित्य विस्तृत हो गया। इमी बीच भाष्य पर. समर्थ विवरणकार उद्भट विद्वान लक्षावधि ग्रन्यकर्ता श्रीपुरुषोत्तमजी हुए और उन्होंने उस उपेक्षित बृहदभाष्य के अश नो बडे पाटर और श्रद्धा के माध स्वकीय भाष्य-प्रकाश में प्रतिष्ठित किया, अन्तर्हित कर लिया। 'वृहद्भाप्य और "श्रणुभाष्य का सम्बाद करते हुम उन्होंने प्रावश्यक स्थलो पर भाष्य की प्रतीक" (थाभास) देकर 'प्रकाश' को धारावाहिक रूप प्रदान किया । स्वकीय प्रकाश में श्रीपुरुपोत्तमनो ने ऐसे भी विपुल सन्दर्भ लिसे हैं जो उनके स्वयं के मौलिक है, पर जब तक 'वृहभाप्य' और 'प्रकाश' या सहपाठ न किया जाय, यह विभेत प्रक्ट नहीं हो सकता । उदाहरणार्थ धुन्ध अश पृहद्भाप्य के परिचय में दिये गये हैं। बृहद्भाप्य के नाम में उपलब्ध श्रश जो विद्याविमाग कांकरोली में सुरक्षित है, बृहदभाप्य के नाम से नहीं है उस पर 'श्रीमदभाप्य' नाम लिखा है. अणुभाष्य की उपलस्धि में नो इमे निर्विशेष मशा से ही सम्बोधित करना चाहिये। श्रीपुरुयोत्तमजी ने (ज० मं० १७१४) 'प्रकाश' के मंगलाचरणमें "धाचार्यगायः प्रणमामि माय-मुबोधिनीस्थान.' इतना ही कहा है। 'यामाप्य' नाम के सम्बन्ध में गुछ कहा नहीं है इसी प्रकार 'तंत्र्यासाशय गोचर पटितु ये प्यमामाप्तिम्' (A) यहां भी उमी प्रकार स्मरण . [ शु.पु. संस्कृत वाङ्मय किया है। इनके बहुत समय बाद रश्मिकार श्रीगोपेश्वरती ने [ज० सं० १८३६ ] भी भूमिका में 'भाष्य-प्रकाशे वितेनोमि रश्मिम्' ऐसा हो उल्लेख किया है। श्रीपुरुषोत्तमजी के समसामयिक भाष्य के 'गूढार्थदीपिका'- टीकाकार श्रीलालूभट्ट (बालहष्णभट्ट ) ने भी 'अणुभाष्य' नामका निर्देश नहीं किया है। ये उपक्रम में कहते है। श्रुति गीता ब्रमसूत्र श्रीमद्भागवतस्थितं, तत्वार्थ योवदद् भाष्ये तं श्रीवहभमाश्रये"३ इस प्रसंग में विस्तृत उद्धरण न देकर हम इतना ही कहना चाहते हैं कि-श्रीपुरुषोत्तमजी की 'प्रकाश-रचना के समय तक इप्त प्राचार्यकृत तत्वसूत्र व्याख्यान का नाम 'भाष्य' ही मिलता है " सभव है श्रीगुसांईजी के कथनानुसार इसकी संज्ञा तत्वसूत्रभाष्य भी हो ? पर पुरुषोत्तमजी के अनन्तर प्रायः सभी व्याख्याकारो ने उसे 'अणुभाष्य' नाम से पुकारा है । जो उन-उन टीकात्रो की उपक्रमणिका से भासित हो सकेगा। अतः यह प्रमाणित-सा हो जाता है कि-अपूर्ण खडित वृहद्भाष्य की श्रीपुरुषोत्तमजी द्वारा 'प्रकाश' में सुरक्षा कर लिये जाने पर 'अणुभाष्य' नाम प्रख्यात हुआ । इसके अतिरिक्त जब यत्रतत्र सग्रहालयो मे भाष्य का प्रथम विस्तृत रूप भी मिला तो यह 'वृहद्भाष्य" के नाम से अभिहित हो गया । एतावता यह कहने में कोई सकीच नहीं होना चाहिये कि-श्रीमद् व्याससून विवरणात्मक एक ही पन्थ वल्लभाचार्य रचा, जिसका संक्षिप्त रूप अणुभाष्य है, और प्रारभिक रूप वृहद्भाष्य। यह सब कथोपक्थन 'अणु' शब्द के सक्षिप्तार्थ को लेकर है, यदि श्रीवल्लभाचार्य का तात्पर्य 'अणु' से जीवका सकेत है तो बात दूमरी, पर इसके लिये कोई प्रबल प्रमाण नहीं है । श्रीशंकराचार्य के अनुकरण मे शारीरिक भाष्य की तरह अणु जीय भाष्य रखने की तो कोई अपेक्षा नहीं, इसकी प्रतियोगिता में तो चल्लभाचार्य इसका नाम 'ब्रह्मभाष्य' रख माते थे, क्योकि ब्रह्मजिज्ञासा ही इमका प्रकान्त प्रतिपाद्य विपय है। अस्तु- थणुभाष्य नाम के में मम्मन्ध श्रीगोविन्दलाल भट्ट का यह भी अनुमान है कि- यह नाम श्रीमध्वाचार्य कृत व्याससूत्र के भाध्य अणु- भाष्य की मंशा को लेकर रखा गया है। इसके प्रमण मे ये कहते है कि प्रमाण प्र... व्यासमूत्र ] च्याससूत्र (२,१,३) के अणुभाष्य में जो श्लोक दीखते हैं, वे थोड़े हो परिवर्तन के माथ भागयत (१०-८५-५) की सुबोधिनी में भी विद्यमान हैं, और श्रीमध्याचार्य कृत अणुभाष्य नामक ग्रन्थ से लिये गये हैं। मनाचार्य ने ब्रह्मसूत्र पर तीन प्रसार का व्यारपान किया है, १ भाष्य २ अनुव्याख्यान ३ अणुभाप्य । अतः यह अगुभाप्य नाम श्रीवल्लभाचार्य का स्वयं दत्त नहीं है, ऐमा श्रीभट्टका मत है। अणुभाष्यम्. श्रीवल्लभाचार्य विरचित 'प्रकाशित व्याम सूनों पर श्रीवल्लभाचार्य विरचित भाप्य अणुभाप्य नाम से प्रख्यात है। कई लोगों का मत है कि जिस प्रकार शंकराचार्य कृन माप्य शरीरी 'जीवात्मा' को अधिकृत कर बनाए जाने के कारण शारीरिक भाष्य कहलाता है, उमी प्रकार अणुजीव को अधित करके बनाए जाने के कारण इसका 'अणुभाष्य' नाम पड़ा है। कतिपयों का यह भी अभिप्राय है कि-श्राचार्यकृत व्यासमूनों पर एक वृद्दभाप्य या और उमफे मंतिनीकरण रूप में यह अणुभाष्य है वृहद्भाष्य का कुछ यंश मिलता भी है, जिस पर पहिले विचार किया जा चुका है । श्राचार्यचरण ने प्रस्तुत अणुभाष्य की रचना प्रारंभ से लेकर तृतीयाध्याय के द्वितीय पाट के ३४ वे सूत्र तक की है, शेष अंश की प्रति उनके द्वितीय श्रात्मज प्रभुचरण श्रीविठ्ठलनाथ जी ने । प्रमशकार श्रीपुरपोत्तमजी तथा रश्मिकार श्रीयोगी गोपेश्वरजी उक्त स्थान पर इममा सष्ट उल्लेख करते हैं। भाष्य ममाप्ति के अंतिम लोक 'भाष्पपुष्पांजलि: श्रीमदाचार्य-चरणाबुजे, नितितस्तेन तुटा भगन्तु मयि ते सहा' में भी इम क्थन की पुष्टि होती है। इस प्रगुभाप्य की रचना जैमा कि प्र० स्कन्ध [अ०१० शोक २४ और ४० स्कन्ध अ०११ सोक ४१] ३० रु० १४, ५४ की सुबोधिनी से विदित है मुसोधिनी-रचना के पूर्व होचुकी थी, इसी प्रकार मानार्थ और मानिर्णय निमन्ध की रचना के पूर्व भी इममा प्रणयन हो चुका था [शा. नि० कारिका = तथा सर्वनि का ? का प्रकाश प्रस्तुत भाष्य में प्राचार्या ने सभी श्राचार्यो के मत की समीक्षा परत मे मिद्वान्त का प्रतिपादन किया है जो अंतिमई, और जिसके गइनममूनों पर क्मिी नवीन दृष्टिकोण में विचार करने का अभी तक भाप्य १०८ [ शु० पु० संस्कृत वाङ्मय प्रसंग नहीं आया। जैसा कि-अध्ययन सं विदित है, व्यासद्वारा विस्तृत वेद, महाभारत के अन्तः प्रथित गीता और ममाधि में अनुभूत भागवत अथवा ब्रह्मसूत्र इन सभी के निश्चित तत्वार्थों में कोई अन्तर नहीं पा पाया है। चारो मानो एक ही स्वर में उस अचिन्यानन्तशक्ति परब्रह्म परमात्मा का लीला का यशोगान करते है उनमे कोई विरसता नहीं, कोई तरतम भाव नहीं । जैसा कि-प्रथम कहा गया है व्याससूत्र चार अध्याय और प्रत्येक अध्याय के चार-चार पादो के रूप से विभक्त है। इन पादो में कई अधिकरण हैं जो प्रासंगिक विवेचन को लेकर चलते हैं। समन्वय, अविरोध, साधन और फल नामक चार अध्यायो मे श्राचार्य ने व्यापक दृष्टि के व्याख्यान द्वारा व्यास के अभिमत की पुष्टि करते हुए अपने सिद्धान्त की स्थापना की है । जहाँ तक श्रीवल्लभाचार्य की रचना का प्रश्न है, उनकी रचना मेप्रामाणिक शास्त्रीयता और व्यापक पारिडा परिलक्षित होता है, वे शाम्रोक्ति के अनुसार भाव का निष्कर्ष निकालते हैं, पर इधर जहाँ श्रीविठ्ठलेश्वर की रचना का प्रसंग श्राता है, वे भी उसी पद्धति को अपनाते हुए भावनिष्पत्ति के अनुसार शास्त्र का निष्पर्ष निकालते हैं, दोनों पिता पुत्रो के लेख में यह अन्तर स्पष्ट प्रतीत हो जाता है। साधनाध्याय और फलाध्याय के कतिपय सूत्रो मे यह दृष्टि- कोण स्पष्ट झलकता है। जिसके कारण व्याख्याकारो ने दोनों के लेखो का पार्थक्य अनुभूत किया है। यह विदित नहीं हो सका कि प्राचार्यचरण इस ग्रन्थ को समयाभाव से पूर्ण नहीं कर सके ? या उसका इतना अंश लुप्त हो गया? जो कुछ वर्षों के अनन्तर उनके अात्मज के द्वारा पूर्ण हो पाया । इस भाष्य की रचना के अनन्तर साम्प्रदाय के कई विद्वानों ने उस पर विवरण, वृत्तियॉ, टीकाएँ लिखी, जिनमे कतिपय स्वतन्त्र व्याख्यान और कुछ व्याख्यानो की विवेचना रूप हैं। श्रणुभाष्य पर माहित्य... अणुभाय-प्रकाश:-व्याख्याता श्रीपुरपोत्तमजी । प्रकाशित । सं. १६६१ [चौः म० मीरिज काशी] २०६ प्रमाण प्र०"व्यासमूत्र ] . भाष्य का लक्षण जैसा कि-शास्त्रों में कहा गया है" " सूत्रार्थो वरययते यत्र पदैः सूत्रानुमारिभिः । स्वपदानि ध वर्ण्ययन्ते भाष्यं भाष्यचिदो विदुः" [भरत ] श्राचार्यचरण ने व्याससूत्रों पर इसी दृष्टि से भाप्य रचना की है। गर्भारार्थक होने के कारण उमके आन्तरिक रहस्य को समझने के लिये किसी व्याख्या की आवश्यकता रहती है, कहना पड़ेगा श्रीपुरुषोत्तम जी ने इस सर्वाश मे पूर्ण किया है । व्यास-सूत्रों के अनुमार श्रीवल्लभत उसका भाष्य भी संक्षिप्त शब्दो मे ही प्रतिपाद्य विपय का व्याख्यान करता है । तदर्थ अणुभाष्य के अर्थावबो के लिये प्रकाश नामक टीका सन्नद्ध की गई है। "प्रकाश-रचना के प्रति श्रीबालकृष्ण प्रभु से प्रार्थना करते हुए श्रीपुरुपोत्तमजी ने उपसंहार में लिखा है भाप्यायं योतिगूढ प्रकटितम- करोत् मम्प्रदाये निवृत्ते" [३० अ०४ पाद समामि शोक १]। अर्थात् मम्प्रदाय के निवृत्त हो जाने पर श्रीबालकृष्ण प्रभु ने मेरे मन में प्रेरणा कर इम अतिगूढ़ भाष्यार्थ को प्राट कराया उन्हें प्रमुदिन होरर मैं प्रणाम करता हूँ। 'सम्प्रदाये निवृत्ते का अर्थ करते हुए रश्मिकार श्रीगोपेश्वर जी कहते हैं कि-सम्प्रति श्रवणादि सरणि रूप माधन के होने पर भो निःसन्देह साधन की निवृत्ति हो जाने से निःसन्देह साधन महित सम्प्रदाय की निवृत्ति हो गई है। गेमा अनुमान होता है कि श्रीपुरुपोत्तमजी के समय भाष्यार्थ के ममझने के लिये अध्ययन-अध्यापन आदि की प्रवृत्ति सम्प्रदाय में मे लुन होगई थी, भाष्य के गंभीराध्ययन की ओर कोई लक्ष्य नही रहा था। अतः तदर्थ विशदीकरण के लिये उन को 'प्रकाश' जैमी समर्थ टीका रचनी पड़ी, जिससे आगे यह प्रणाली उच्छिन्न न हो जाय । 'प्रकाश' में भाष्य का व्याख्यान करते हुए प्रमाणपुरस्मर शास्त्रीय दृष्टि को अपनाया गया है, जिसमें भूमिरा प्रतिपादन पूर्वपत, उत्तरपक्ष और अन्य मतो की समालोचना, खंडन-गंडन पद्धति में लिरी गई है। यहानुरूल तर्क एवं अन्य शानो के प्रमाणोद्धरस से ग्रन्थयार फा मनोमुखी येदुध्य परिक्षात होता है। ।

[ शु० पु० सस्कृत वाङ्मय भाग्य प्रकाश में शंकर रामानुज, वाचस्पति मिश्र, मध्य भिनु भास्करा, प्रभाकार और शैव श्रादि व्यामसूत्र पर प्रणीत भाप्य- सिद्धान्तो की कस कर समालोचना की गई है। शैव सिद्धान्त को तो 'मतचौर' के विशेषण से स्मरण किया गया है। ब्रह्मसूत्रों में जहां अन्य श्राचार्य अधिकरण भेद-मानते हैं, श्रीपुरुषोत्तमजी उसका उल्लेख करते हैं और श्रीवल्लभाचार्य के अनुमार ही उनकी गणना करते हैं। प्रकाश की रचना ग्रन्थकार ने स्वरचित तत्वार्थ-दीप-निबन्ध की आयरण-भंग के अनन्तर की है। [शा० तत्व नि० ८७ कारिका श्रावरण भंग]। जैसा कि वृहद्भाष्य के अध्ययन में लिखा है; पुस्पोत्तमजी विरचित 'प्रकाश' वल्लभाचार्य के 'वृहद्भाप्य' का ही विस्तार है। भाष्य-प्रकाश-नरिमः-श्री गो० गोपेश्वरजी ने श्रीपुरूषोत्तमजी विरचित भाग्य प्रकाश पर 'रश्मि' नाम से विवरण लिखा है। तेलीवाला के मित्र मंडन यंबई द्वारा सं. १८८५ से १६६५ तक कई खण्डो मे प्रकाशित । प्रस्तुत 'रश्मि' नामक विस्तृत टीका में मूलग्रन्थ अणुभाप्य, उमके व्यारयान 'प्रयाश' दोनो के विशदीकरण का उद्देश्य रक्खा है। रचनाकार का क्थन है कि "यदि भाष्य-प्रकाशीय रहस्य वेत्तुमिच्छय । तदा पश्यत विद्वांसो 'रश्मि' सप्टचमत्कृतिम् [उपक्रम] रश्मि के लेखन और रचना के सम्बन्ध में वहाँ इस प्रकार उद्धरण दिया गया है - 'समातोयमध्याः समाप्तश्च रश्मिः सेवानवसरे देवीजीव वाचनार्थमय ग्रन्थः स्वयं गोपेश्वरेण लिखितः श्रीगोवर्द्धन नाथद्वारे श्रीरस्तु । मिति चैत्र शुक्ल १३ सयत् १८६७ मंगलबासरे । लेखपाठकयो-दीर्घायुर्मगलमस्तु । एतावतो ग्रन्थस्य श्लोकसंख्या ८४.४ अध्याय-चतुष्टयस्य श्लोक संख्या ४२६६६ श्रीकृष्णार्पणमस्तु कहने का तात्पर्य यह कि-ग्रन्थकार ने लगभग अणुभाष्य प्रकाश के विवरए रूप में ४२ सहस्र श्ले क लिखने का महान् प्रयत्न क्यिा है। जैमा कि विद्वद्वर्ग में प्रसिद्ध है श्रीगोपेश्वरजी योगी और मर्व वेत्ता की सन्मानोपाधि से अलंहत थे । यह नाथद्वारा में निवास करत ... " , प्रमारप्र०"व्याससूत्र १११ हुए श्रीनाथजी गोवर्द्धनौद्धरण की प्रत्यह सेवा करते थे, जिसमें दिवस का अधिकांश भाग निकल जाता है। फिर भी मेवा के अनवसर में किसी एक अन्य पर इतना विवेचन स्वयं अपने हाथ से लिखना एक महान चमत्कार सा है । अन्य के परिशीलन से स्पष्ट ज्ञात हो जाता है कि-यह जैसे सर्वानुभवी थे वैसे सवेत्ता । 'रश्मि' नामक व्याख्यान पर इनकी लेखिनी जिस अतिरभस के साथ चलती है वह दर्शनीय है। प्रसंगोपात्त अन्य शास्त्रो के प्रमाणोपन्याम और उनकी संगति को देख कर तो कहना पड़ता है.कि-यह वास्तव मे सर्ववेत्ता थे। 'रश्मि' टीना मे इन्होने अगुभाप्य और उसके विवरण प्रकाश का आशय बड़े अच्छे ढंग से प्रकट किया है श्रुति-स्मृति-पुराण आदि के वचनो से प्रतिपादित सिद्धान्त का दिग्दर्शन अध्ययन की वस्तु है, और पच ही इसके अध्येता के लिये तलस्पर्शी पांडित्य अपेक्षित है। वे स्वयं कहते है" श्रीविठ्ठलेश-पादाब्ज-प्रसादयर-लाभतः । रश्मि प्रकारे व्यतनोतु सचमतिमीश्वरः ॥२॥ पौनःपुन्यं च रभसो भ्रमादिः क्रीडया कृतः। सोढव्यः कृपया सभिः, गूढत्यारसेश्वरादपि ॥ बह्मज्ञः कृतकृत्यथ हृदीश्वरज्ञ एव च। कृतार्थश्च प्रमाणजस्तकृति ज्ञातुपश्यत ३ [उपसंहार " रश्मि] बैंयास-दर्शन न्याय-माला-गो० श्रीरघुनाथात्मज प्रजनाथ जी विरचित । प्रकाशित । इसका प्रारम्भ इस प्रकार है- नमामि कृष्ण वागीशसम्वनि-जलजद्वयम् । यद्रसास्वाद लिनः स्पेप्सितं.साधयन्ति हि ...? नुमस्तात गिरिधर यत्कृपादृष्टितो यय । जाताः श्रीमथुरायीश-पाद-पम रसालयाः२." श्रीवल्लभ गुरू' नत्वा तत्कृपातोगुभाष्यतः। यैयारुदर्शन न्यायमाला समस्यते मया “४... सरस्पती मं. कांकरोली [शु० ५० सं०४४, १०) में विद्यमान प्रति और नारायणदाम अामनमल ट्रस्ट संबई द्वारा प्रकाशित पति में एक सा ही मंगलाचरण है,पर प्रकाशित अन्य च 'श्रीरघुनायात्मज - [ शु० पु० सं. वाङ्मय ब्रजनाथ' विरचित शब्द छपा है, जब कि वि० विभाग की प्रति में केवल मंगलाचारण के अनुमार पितृनाम गिरिधर जी मिलता है, ग्रन्थकार का नाम नहीं । ग्रन्थ दोनो एक ही है पर कुछ शब्दो का पाठभेद अवश्य है। वि० बिभाग को हस्तलिखित प्रति प्र०अ० के तृतीय पाद के १५ सूत्र पर्यन्त है, पर प्रकाशित अन्य प्र० अ० के द्वितीय पाद समाप्ति पर्यन्त ही है । प्रन्थकार ने ग्रन्थ के विपय में लिखा है- न्यायांग-पंचकं चात्र विषयादि-क्रमादह । कारिकाभिः प्रवक्ष्यामि सत्राथ च यथामति ।। कहने का तात्पर्य यह फि-प्रन्यमार ने कारिकाओं के द्वारा पंचाग का वर्णन कर पद्य में व्यामसूत्रों का सक्षिप्तार्थ वर्णन रिया है जो अणुभाष्यानुसार हे । इसके द्वारा शुः सांदृष्टि से सूत्रों का अर्थ स्पष्टतः समझ में आ जाता है। वि० विभाग में विद्यमान प्रति ब्रजभूपणजी के स्वामित्व की है, अत: तत्पूर्व इसकी रचना हुई है। कुछ लोग इस प्रन्थ को इन्ही की कृति मानते हैं। वेदान्ताधिकरण-माला-गो० श्रीपुस्पोत्तमजी विरचित । तेलीवाला यंबई द्वारा प्रकाशित है। व्याससूत्रों पर कई अन्यमतावलंबी आचायों के भाप्य हैं, जिन्दान सूत्रों के वर्गीकरण के लिये अधिकरणों को पृथक्-पृथक् रूप में माना है । श्रीपुरुषोत्तमजी ने प्रमाणिक एव युक्ति पूर्वक अणुमाय में स्वीकृत अधिकरणों को ही स्वाभाविक सिद्ध किया है। उनकी परस्पर क्या सगति है ? और अमुक संरया में अधिकरणों की क्या रहस्यमय स्थिति है ? इसे स्पष्ट क्यिा है । शु० सं० के सिद्धान्त मे व्याससूनों पर अधिकरण पर स्वतन्त्र रूप से विचार करने में इस ग्रन्थ की प्राथमिकता दे। अधिकरण-माला- योगि श्रीगोपेश्वर जी विरचित । ब्रह्मसून पर भाप्यानुसारी अविकरण माला केवल चतुर्थाध्याय पर उपलब्ध है। प्राशित । अधिकरण-सग्रहः- _श्री निर्भयराम द्वारा विनिर्मित । अणुभाष्य के अनुरल व्याससूत्रों के अधिकरणों का विचार । प्रकाशित ।

प्रमाण प्र. व्यामसूत्र प्रथम -- अणुभाष्याधिरणर्थ-कारिका-श्रीब्रजनाथ भट्ट वागरोदि कृत। अप्रमाशिन । (प्रो० जेठालाल शाह द्वारा अणुभाष्य भूमिका मे सूचित) आनन्द-निधि-मीमासा- सविशेष परिच्छेद श्रीरणछोडभट्टात्मज श्रीगोकुलहष्णभट्ट कृत यह ग्रन्थ पूर्ण मिलता है जो अप्रकाशित है । म० भडार वि० विभाग म [शु० च०७६, ०६ पर विद्यमान ऐसा विदित होता है कि ग्रन्थकार ने इस नाम का अन्य किसी विशेप आकार में बनाया होगा या पह बना रहा होगा जिसका यह क्वल प्रथम परिच्छेट है। इसकी पुप्पिका म लिखा है- "इति भीनल्लभ-चरणकमल-परायण रणछोडभट्टात्मज गोकुल कृष्णकृतो आनदनिधिमीमासाया सविशपपरिच्छेद प्रथम । 'प्रारभ में कहा है- 'तस्यानन्दनिधे शास्त्र विशिष्ट सर्ववर्त्मनाम् आनन्द निधि-मीमासा तन एपा निरूप्यते २ परमात्मा श्रानन्दमय है या नहीं, श्रुतियों में उसका ऐसा यस्प निरुपण से क्यिा गया ? इस प्रकार शका कर प्रन्यकार ने श्रुति वचनी और 'श्रानन्दमयोभ्यासात्' इस सूत्र के आधार पर अन्य प्रमाणा के द्धरण पूर्व मिद्धात की स्थापना की है जो श्रीवल्लभाचार्य के मता नुकून है। अन्य म प्रमगोपात्त अन्य मता का भी सडन कर ब्रह्म के म्यम्प जगतपादि का मक्षिप्त विरेचन दिया गया है। अणुमाप्य विकृति -गो. श्रीविठ्ठलेशात्मज वल्लभ गोस्वामि विनिर्मित । अप्रकाशित १ मर० स० काकरीली में [शु० ४५,७ पर ] विदामान । यह काक्रोलीस्य श्रीवभूषणनी को सामिर की प्रति है। इमरी अन्य प्रति नहीं मिली। प्रस्तुत भाप्य टिप्पणी गुभाष्य में प्रथमाध्याय से लेकर चतुर्था ध्याय क. चतुर्थ पादीय द्वादश सूत्र-द्वारमाध्यदुभय- तर मिलती है जो अगुभाष्य की एपमेव द्वादशागेति' प्रतीक पर्यन्त अमिम प्रय अपाय या यडिन है । पन मा ७३ पर ममाप्ति नहीं है मारभ में कोई पारिका मगलाचरण श्रादि नहीं है। मध्य म भी पाद ममानियाकोट मरेन नहीं है, केयल सूत्र म पता चलता है। म [ शु. पु० सस्कृत' वाङ्मय - . इस ग्रन्थ में अणुभाष्य का आभास देकर उसका आवश्यक सक्षिप्त विवरण लिसा गया है। प्रथमाध्याय की समाप्ति पर इस प्रकार पुष्पिका है:- इति श्रीब्रह्मसूत्राणुभाप्य विवृतौ प्रथमोध्याय समाप्त : प्रन्थ-लेखन के अनन्तर पाद अध्याय समाप्ति का सकेताक्षरी मे परिचय लिखा मिलता है । 'इसमे केवल १० अन्तिम सूत्रों सा आभास विवरण और मिल जाता तो प्रन्थ पूर्ण हो जाता, ऐमा विदित होता है कि यह प्रति कहीं की प्राचीन प्रतिलिपि से उतारी गई है, क्योकि अन्तिम ७३ वे पत्र पर एक पंक्ति ही लिखी गई है शेप स्थान छूटा हुआ है। प्रमाद बागीश्वर-श्रीवल्लभ दीक्षितात्मज श्रीबालकृष्ण जी द्वारा विरचित । अप्रकाशित । सर० भ० पाकरौली में [शु० ब०४५, १४, १५, पर ] विद्यमान । [इस अन्य मे प्रारंभ मे लेखक-भ्रम से १ मे लेकर १४ पन तक श्रीवल्लभाचार्य कृत अणुभाष्य की प्रतिलिपि कर दी गई है। जो चतुर्थाध्याय के प्रथम पाद के १४ वे सूत्र तक की है ] इसके अनन्तर प्रसादवागीश्वर नामक भाष्य विवरण पत्र स०१४ से २३ तक लिया गया है । यह 'प्रसाद वागीश्वर'नामक विवरण प्रथमा. ध्याय के द्वितीय पाद के १५ वे सूत्र तक है । इसमें स्थान स्थान पर अणुभाष्य की प्रतीक देकर उनका आशय लिखा गया है। द्वि० पाद समाप्ति पर इस प्रकार पुष्पिका लिखी गई है । "इति श्रीमवल्लभाचार्य -चरण-रजोमानार्थिना श्रीवल्लभदीक्षि- सात्मज बालकृष्णेन विरचिते प्रसाद वागीश्वर नाम्नि भाष्य विवरसे प्रथमाध्याय द्वितीय पाद-विवरणम्।" यह प्रन्थ समग्र नहीं मिलता । अन्यत्र भी अभी तक इसकी अन्य प्रति का पता नहीं चला। तत्वार्णर-भाष्यम् । [आनन्दमयाधिकरण नामा प्रकरण मात्र का भाव ] श्रीवल्लभ दीक्षितात्मज श्रीबालकृष्णजी विरचित । सर० मा काग्रीली में [शु० ५० सं० ४५, १३ पर ] विद्यमान, अप्रकाशित तथा अन्यत्र अनुपलब्ध है।

प्रमाण प्र० व्याससूत्र... ] [ ११२ प्रस्तुत ग्रंथ पत्र सं०६ से २८ तक अपूर्ण है दूसरा प्रारंभिक अंश नहीं मिलता। समाप्ति के पद्य इस प्रकार हैं-- अयं यतादात्तश्रुति-गण-परात्मत्व विभवा- दनर्वाचीनानां मतकल न च कौतूहलघरः। घरी कर्नु प्राचा वचसि मतियेशद्यममित. कृतो दीप्तं युक्त यदि तदिह वागीश-विमवः । पचाशदिपपचकार्णक महा श्रीमन्त्रराजं जपन् ध्यायन् पादसरोरुहद्वयमहोरात्रं तु गोपीपतेः पाप्यादेश विशेषमस्तविपणादोपैकहेतु हरे. गायन कार्यमशेषकल्मपहर यलार्थितो लेखने २ " इति श्रीवल्लभाचार्य-पादारविन्दाय श्रीवल्लभदीक्षात्मज चालकृष्णकृतं तत्वार्णयभाष्यं समाप्रम् । श्रीरस्तु-सं० १७६१ वर्षे पोष वदि १० भीमवारे लिखितम्" । एतावता इसकी रचना का काल सं० १७६१ के पूर्व है। प्रस्तुत अन्य मे स्वतंत्र रूप से व्याससूत्र के अानन्दमयाधिकरण पर विचार किया गया है । व्याससूत्र, श्रुतिवचन और अन्य प्रमाणों के उद्वरण मे सिद्धांत की स्थापना की गई है। एक स्थान पर लिखा है [ पत्र २७ पं०३ ] ण्य यथामति विभाव्यात, यदन्न विशेषजिनामा तहि यथा सम्प्रदायानुमारि श्रीमद्भाप्यं द्रप्टव्यम्' अतएव ऐसा मानना पड़ता है, कि यह स्वतन्त्र प्रन्य है जो प्रारंभ में खंडित दे । प्रन्थ में दो चार स्यानों में प्रन्यकार ने लिया है- 'ममजीयभेदसाधनं चास्महते अविद्यासंडने द्रष्टव्यम्' [पत्र ] "विस्तरस्तु मस्ते गीतामाध्ये द्रष्टव्यम् ' [पत्र १६ ] 'एतच्चास्माभिः गीतामाप्ये पिततम् '[पन २०] “यस्तरस्तु खंडने यस्मतते द्रष्टव्यः' [ पत्र २३ ] अप्रेदमाहुहरिराया : [पत्र २६] इस कथन से दो बातों का पता चलता है। (१) त्याच भाप्यकर्ता ने गीताभाग्य की रचना की है जो मम्मति उसनन्य नहीं है। अविद्या मंटन नामा पोई अन्य या प्रमंगो- पात्त किसी अन्य में कोई अंश अंधकार का होना चाहिये। जिसरा मुद्ध परिचय नहीं मिलता। :

[ गुरु पु० सस्कृत-वाडमय
-
(२) अन्यमार श्रीहरिरायजी से प्राचीन है।'
अणुभाष्य-टीका-श्रीगिरीशधर जी कृत । इस नाम की
दीका सुनी जाती है जो अनुपलब, अप्रकाशित है । अणुभाप्य के
गुजराती अनुवादक श्री जे. गो. शाह ने स्वकीय भूमिका में और तेली
बाला ने भी रश्मि की भूमिका में इसका नामोल्लेख किया है।
अप्राप्त होने के कारण इसका परिचय देना असभय है।
अणुभाष्य टीका-
-श्रीरामनारायण कृत । इस टीका या भी
पता चलता है जिसे श्री जे. गो० शाह ने और तेलीवाला ने लिखा है।
'अप्राप्त है।
अणुभाष्य-तत्वम् यह सुना जाता है कि कोटा के श्रीमथुरेशनी
के पुस्तक मग्रहालय में विद्यमान है, पर देखने का अवसर किसी को
नहीं आया । श्रीशाह और श्रीतेलीवाला ने भी केरल इसका नाम
निर्देश किया है।
वेदान्त कौमुदी नामक अणुभाष्य का विवरण | किसी
वल्लभदेव नामक विद्वान द्वारा रचित । यह भी अप्राप्त और अप्रकाशित
ह। परिचय नहीं दिया जा सकता।
अणुभाष्य प्रकाश:--नाम्नी टीका सस्कृत टीका गो श्रीमथुरा
नाथजी विरचित सुनी जाती है जो सम्प्रति अप्रकाशित और अप्राप्त
है। इसका नाम रणछोडदास पटवारी ने अपनी प्रकाशित सूची
म दिया है।
अणुभाष्य-सिद्धान्त टीका-नाम्नी सस्कृत टीका किसी अज्ञात
ग्रन्थकार की रची कही जाती है। यह देखने म नहीं आई और न
ही प्रकाशित हुई है अप्राप्त है । रणछोडदास पटवारी ने अपनी
प्रकाशित सूची में इसका नामोल्लेख किया है।
अणुभाष्य-टीका--इस नाम की एक टीमा म कृन म भट्ट
"सभवत प्रसाद वागीश्वर और तत्वाएंव भाष्य इन दोनो प्रथो में
रचयिता एक ही हों, पर इसके परिनान का कोई साधन नहीं मिला।

-- १२७ प्रमाम् प्र... व्याससून । श्रीगगाघर शाम्बी की रचा हुई सुनी जाती है अप्राप्त होन से परिचय नहीं दिया जा सका। रणछोडदाम पटवारी ने म्पप्रकाशित सूची म इमा नाम निर्देश क्यिा है। अणुभाष्य-यमा व्याख्या...गो० श्रीमुरलीधरजी चिरचित । उपलप । इमका निसृत्री परिमित भाग पॉच टीकाश्रा के माथ प. श्रीरमानापजी शास्त्री ने वनई से प्रकाशित किया है। म० १९७८ यह अणुभायार्थ के विशीकरण के लिय निर्मित हुई है । व्याम्याकार ब्रह्ममून निर्माण का प्रयोजन बताते हुए भाग्य-रचना के सम्बन्ध में कहते हैं 'ततश्च भाष्यकार. सुम्राकार-मर्वनता ख्यापयितुं जिनासापद- सूचितेसन्देहप्रयोजने च दृढीकर्नुमादौ तत्कृत जिषासापदनाच्य विचार आदि अणुभाष्य-निचरणम्...भाष्य-व्याख्या काशीस्थ गो श्रीगिरिधर जी महाराज-विरचित । त्रिसूनी परिमित भाग मे पच तरीका के ओर स्वतन्त्र रूप में जेठा० आमन० ट्रस्ट बबई द्वारा इमका प्रथमाध्याय म० १६६ मे और द्वितीयाध्याय म० २००७ में प्रराशित किया गया है। श्रोगिरियरजी कृत विवरण अणुभाष्य के लिये उतना ही उपयोगी और रिशेपार्य-प्रतिपादक है जितना पुरुपोत्तमजी चिरचित प्रकाश । इममें मोलिक विचारधारा को लेकर व्यापक रूप में भाष्य का सिरण प्रस्तुत किया गया है । भूमिका में कहा गया है 'श्रीकृष्णस्य कृपाप्राप्तमुसो गिरिधर मधी' कर्वे विवरण श्रीमदणुभाष्य ययामत्ति २० अणुभाष्य-गूढार्थदीपिका टीका...श्रीलालभोपनामाप्रापान कृष्ण भट्ट द्वारा रचित त्रिमूत्री परिस्ति भाग पाँच टीकाया के मार बरई से प्रकाशित । प्रस्तुत प्रन्य का अवशिष्ट भाग हमारे बने माथ, में नहीं पाया। प्रस्तुत टीका म अन्य टीराओं के अनुमार ही अगाभाष्य का प्रनिपारा अर्थ विश दिया गया है।

११८ ] [ शु० पु. संस्कृत वाङ्मय उपक्रम में व्यान्याकार की उक्ति है:-- 'श्रुति-गीता-बहासत्र श्रीमद्भागवतस्थितम् । तत्वार्थ योचदद् भाप्ये ते श्रीवल्लभमाश्रये ""३. वेदान्त-चन्द्रिका-~वेदान्त-सिद्धान्त चन्द्रिका भी नाम में प्रसिद्ध है । श्रीरघुनाथात्मज श्रीव्रजनाथजी द्वारा रचित है ऐमा श्रीगोविन्दलाल भट्ट का क्थन है ! इनके गुम का नाम श्रीवल्लभ है । वि विभाग कांकरोली में जो प्रति है उस पर श्रीरघुनाथात्मज देवकीनन्दनजी का नाम कर्तृत्वेन लिखा है जिनका जन्म सं. १६८५ है । त्रिसूत्री परिमित भाग में इम टीका के कर्ता का नाम नहीं दिया गया है । परम्मा विदित और प्रमाणित होता है कि यह रघुनाथात्मज श्रीवजनाथ जी की ही कृति है जिनके अन्य भी प्रन्थ हैं । प्रस्तुत टीका में अन्य टीकाओं के अनुमार ही अणुभाष्य का विवरण लिया गया है। इन्होंने उपक्रम में लिखा है। 'तात श्रीरघुनाथाख्यं वन्देह कृष्णरासदम् ।४। श्रीमद्रघुकुल रत्न गुन 'श्रीवल्लभाभिधम् नलागुभाप्य-विवृति प्रभा विस्तारयाम्यहम् ॥५॥ अणुभाष्यपद-प्रदीप-यह विवरण श्रीइच्छाराम भट्ट ने निर्मित क्यिा है जो ममग्र अणुभाप्य पर विद्यमान और प्रकाशित है। ८. श्रीमग्नलाल शास्त्री बंबई द्वारा प्रकाशित । म० १९८० भूमिका में ग्रन्थकार का कथन है- प्रदीपमणुभाध्यीयपदानाविवृणोम्यहम्' । चक्षुस्मता प्रकाशाय भाप्यार्थस्य पिनाश्रमम इच्छारामःकरोतीय दीयं दिव्य सुसारहम् ।४। अणुभाष्य के अर्थानुसन्धान के लिये विचार करने पर प्रकाश, विवरण और गूढार्थदीपिका के बाद इस प्रदीप का ही प्रम आता है। इच्छाराम भट्ट ने अपने पूर्ववर्ती सभी टीकाकारों का मन्तव्य लेकर इम विवरण को प्रस्तुत किया है, अतः यह महज़ में कहा जा माता है, कि इसमें अधिकांश विद्वानों के अभिप्राय का समावेश है । और मचमुच बिना श्रम के भाष्यार्थ श अवगाहन किया जा सरनाई। ग्रन्थकार ने दमकी रचना अपने गुरु श्रीगोपालजी के नाम पर की है या यो यह कि उन्हें यह ग्रन्थ ममर्पित किया है । अणुमाष्य-टिप्पणी-पंच श्रीगह लालजी द्वारा रचित अप्रकाशित [ १२६ प्रमाण प्र...'च्यासमूत्र ] भावप्रकाशिका ब्रह्मसूत्रवृत्तिः-गोस्वामी श्रीनजनाथात्मज श्रीकृष्धानन्द्र विरचित । उपलब्ध और प्रकाशित तेलीवाला बंबई द्वारा मं० १९७६. व्यामसूत्रों पर प्रस्तुत यह वृत्ति अगुभाष्य के सिद्धांतानुमार बनाई गई है। इसमें संक्षेप में भाप्य के अभिप्राय को लेकर सूत्रार्थ ममझाया गया है, यद्यपि इसका नाम वृत्ति है तथापि इसे मंतिप्त विवरण भी कहा जा सकता है। किन्ही विद्वानों का कथन है कि इसके रचयिता गो० श्रीपुम्पोत्तम जी है जिन्होंने अपने गुरु चरण के नाम से इसका निर्माण किया है। उपमहार में प्रन्थकार का यह कथन है कि- इति श्रीवक्षमाचार्य चरणाटजरजोधनः कृष्णचन्द्रस्तत्व-सूत्र वृत्ति तत्पदयोन्यंधात् १. इममे सष्ट होता है कि इसके कर्ता श्रीकृष्णचन्द्रजी ही हैं। अन्यथा कल्पना करने पर तो मर्वत्र ही ऐमा विसंवाद पड़ा हो जायगा। श्रीकृष्णचन्द्र जी श्रीपुरुपोत्तमजी के काका और दीतागुरु थे। मरीचिका ब्रह्मसूत्र-वृत्ति--श्रीप्रजनाथभट्ट विरचित । या संक्षिप्त पृत्ति अणुभाष्य के अर्थानुसन्धान पर निर्मित की गई है। नेली. वाला पंच द्वारा प्रकाशित इस मरीचिका की रचना राणा जयसिंहजी की यात्रा में की गई मा उल्लेख है। गोपेश्वरजी ने स्वकीय रश्मि टीया में भी [१, ४, १७, प्रा०] गया नाम लिया है. फलनः प्रजनायभट्ट श्रीगोपेश्वरजी में प्राचीन है। ग्रामसूत्रार्थ-कारिका--गो. भीदेयकीनन्दन जी दाग रचित कारिकाएँ हैं जो अगुभाष्य के प्राधार पर प्राप्रमग्रो के अर्थ पा परीकरण परती।। गद ग्रंथ मेरे देगन में नही पागा ना गम में प्रद्रमानों का अर्थ का पितानों ने गए गियों में उममी मीना पाने या या प्रयन।

[ शु०पु. सस्कृत वाडमय ब्रह्मसूत्र वृत्तिः--गो० श्री जीवनाचार्य ( गोकुलोत्सवात्मज) रचित । प्रकाशित | निसृत्री परिमित भाग । या शु. पुस्तकालय बबई द्वारा। ब्रह्मपुत्रार्थ-वर्णनकारिका--किसी अज्ञात ग्रन्थकार की उप. लब्ध होती है जो स० कॉकरौली मे [ शु० ब०१७ परा विद्यमान है। अप्रकाशित। यह कहा नहीं जा सकता पि-उपयुक्त ग्रन्थ और यह ग्रन्थ एक ही है या पृथक् पृथक् । जबतक कि दोनो का सवाद न किया जाय । गुणोपसंहार पादभाष्य-चिचरणम्-गोस्वामी श्रीव्रजनाथात्मज कृष्ण चन्द्र विरचित उपलब्ध है जो अणुभाष्य के तृ० अ० पाद के २५ वे सून तक मिलता है। यह रश्मि नामक टीका के परिशिष्ट में प्रकाशित किया गया है। तेलीवाला ने रश्मि का सम्पादन करते समय मूल प्रति के अर लोकन से निर्णीत किया है कि यह विवरण श्रीकृष्णचन्द्र जी रचित है। इसे इस अ० के इसी पाट के प्रकाश में समाविष्ट कर लिया है, जिस से इमका पार्थक्य जाता रहा है। तेली बाला का यह भी कथन है कि यह श्रीकृष्णचन्द्र जी तृ० पुत्र श्रीबालकृष्ण जी के द्वि० पुत्र श्रीव्रजनाथजी के पुत्र हैं और इनका जन्म स. १६५५ आ.३०७ है। पो० श्रीबालमण शाम्रोजी ने अणुभाष्य पर कुछ मौलिक माहित्य का प्रणयन किया है जो अप्रकाशित है और तदात्मज पो० मठमणि शास्त्री के पास सग्रहीत है । यद्यपि यह अपूर्ण है, तथापि अन्य कार के सहस्त लेख रूप में विद्यमान होने और नये व्यापक सिद्धान्ता- नुसार विचार होने से माननीय है । यह इस प्रकार है। (क) अणु वृत्ति- अणुभाष्य के अनुसार व्यास-सूनो पर मक्षिम किन्तु रहस्यप्रकाशक वृत्ति है, जो प्रथमाध्याय के १,२,३, पादों पर ममप्र और चतुर्थ पाद पर अपूर्ण है--रचनाकाल स. १६६४ [ पत्रिका स. २, और ३२, व ] (ख) अणुभाप्प मार अथवा अणुशत्ति सार- इसी प्रकार का भाप्यार्थ बोया अपूर्ण मन्य है, जो इसी ममय रचित हुआ है, और श्रवृत्ति नामर ग्रन्थ से अलग है। [पजिका संE और ३०,क] प्रमारण प्र.""व्याससूत्र ] [ १२१ (ग) ब्रह्मसूत्र-प्रकीर्ण विचार:-व्याससूत्रों पर अणुभाष्य की छाया लेते हुए एक विचारधारा है, जो प्रथमाध्याय के द्वितीयाध्याय के पञ्चमाधिकरण पर्यन्त विरचित है [पं० सं० १, क और ख ३७, क] (घ) ब्रह्म सूत्रीय पारिभाषिक शब्दार्थ:-व्यास सूत्रो में आने वाले विशिष्टार्थ बोधक शब्दों का अर्थ अणुभाष्य के अनुसार संकलित किया गया है। [ पं० सं० १, क] (ङ) अधिकरण संख्या विचारः-- ब्रह्म सूत्रों पर भाष्य के अनुसार अधिकरणों की संख्या और तात्पर्य पर विचार । अप्रकाशित । [पं० सं०१७ क, ५ क तथा ३० स] अणुभाप्य-बाल बोधिनी टीका-श्रीधर व्यंबक पाठक पूना द्वारा विरचित । भांडारकर पूना द्वारा प्रकाशित । इस ग्रंथ में अणुभाष्य के अभिप्राय को सरल भाषा में संस्कृत मे प्रतिपादित किया गया है, इस टीकाकार ने वास्तव में अणुभाष्य द्वारा व्याससूत्र की विवेचित शैली पर मुग्ध होकर स्वतंत्र व्याख्या की है । जो इस सम्प्रदायानुयायी की न होकर भी इसके सिद्वान्त को पुष्ट करती है, इसमें पूर्व प्रकाशित सभी उपयुक्त व्याख्या विवरणों का सारांश लिया गया है, और उसे अपनी भाषा में कहा गया है। इसके अविकरण, विषय प्रयोजन पूर्वपक्ष, उत्तरपक्ष श्रादि सभी शुद्धाद्वैत सिद्धान्त के अनुसार हैं । जहाँ तक यना है प्रन्यवार ने इसे मंक्षिप्त और छात्रोपयोगी बनाने का मुख्य प्रयन किया है। अणुभाष्य-हिन्दी भापानुवाद: -प० श्री जगन्नाथ शास्त्री जी प्रतापगढ़ द्वारा विरचित । प्रथमाध्याय के प्रथम पाद पर्यन्त । अप्रकाशित र. मं० २०६४ । इसकी रचना द्वितीय पीठाधीश श्री गिरधर लाल जी महाराज, इन्दोर ने अपने पितृचरण नि० श्रीकृष्णराय जी के स्मारक रूप से करना प्रारम्भ किया था, पर न जाने किस मंत्रणा से यह कार्य स्थगित करा दिया गया। यह यदि पूर्ण हो जाता तो अणुभान्य के हिन्दी थनुवाद की समस्या हल होगई होती। जब कि अगुभाप्य के गुजरानी दो-दो अनुयाद प्रकाशिन है। प्रस्तुत अनुयाद मे रोयक शैली से अणुभाप्य वा अभिप्राय *इसका विशेष परिचय 'व्यासमूगो का स्वरूप परिचय' में लिखा जा चुका है। ।

१२२ ] [ शु० पु० सस्कृत वाड मय गुपित किया गया है, और विद्वान लेखक ने अपने व्यापक पाडिल्य का उपयोग किया है। अणुभाष्य सार्य दर्शन-हिन्दी अनुवाद-पो० श्रीफ्ठमणि शास्त्री पिरचित अप्रकाशित और अपूर्ण [प्र० अ० प्रथम पाद । २० स० १६८०] यह अनुवाद कोटास्थ प्र. पीठाधीश गो० श्रीगिरिधर लाल जी महाराज, (श्री द्वारकेश लाल जी) की आज्ञा से लेसक ने उसकीय अध्ययन काल में किया था, पर जो प्रेरकों की प्रेरणा और अन्य कार्य समारम्भ के कारण अपूर्ण है। अणुभाष्य गुर्जर-भाषानुवाद-प्रो. श्री जेठालाल, गोवर्धनदास शाह द्वारा विरचित । अहमतामाद से लल्लूभाई छ. द्वारा प्रकाशित । म० १६८३ | दो भाग । प्रस्तुत प्रथ श्रीवल्लभाचार्य के अणुभाष्य गुजराती अनुवाद है । इसमें भूल का अक्षरश अनुवाद है जो प्रकाश प्रदीप आदि सस्कृत टीकाओं के आधार पर है जहाँ तहाँ विपय के स्पष्टीकरणार्थ परमती का भी उपन्यास और टिप्पण है। विस्तृत विवेचन और उपोद्धात में प्रासगिक विवेचना में इस माहित्य पर अच्छा प्रकाश डालते हुए शुद्धाद्वस्त सम्प्रदाय के सिद्धान्त की सप्रमाण स्परेखा सींची गई है । अणुभाप्य का यह सर्वप्रथम भाषानुवाद है। अणुभाष्यानुपाद गुजराती)-प्रो० श्रीगोविन्दलाल, हरगोविट भट्ट द्वारा रचित । जेठानन्- प्रासन टस्ट वबई से प्रशशित स० .८०१ श्रीवल्लभाचार्य चरण रचित अणुभाष्य के गुर्जरानुवाद की दूमरी कढी है। जो मम्प्रति प्र० अध्याय के रूप म ही प्रकाशित हुई है। श्री गोविंदलाल भट्ट का साम्प्रदायिक तत्वज्ञान गभीर और तल स्पर्गी है अत इस अनुवाद में सापेक्षया मौलिक्ता सारल्य और माभीर्य का होना अनिवार्य है । पूर्व के गुर्जरानुवाद की अपेक्षा इसको अधिक स्पष्ट किया गया है। अनुवादर ने उपोद्घात में प्रामगिक विपय पर वेन साहित्य और मिद्धात पर मननीय विचार व्यक्त किये हैं। श्रणुभाग्य का अंग्रेजी अनुवाद भी किया जा रहा है। इति यामसूत्र प्रमाण प्रकरणम- शु० पु० संस्कृत वाङ्मय समाधिभापा श्रीमद्भागवत.... * स्वरूप परिचय- परम कारुणिक सचिदानन्दमय श्रीहरि के 'ज्ञानावतार कृष्ण द्वैपायन महर्षि वेदव्यास प्रणीत श्रीमद्भागवत महापुराण अष्टादश साहस्त्री संहिता है । जो स्वकीय गौरव के कारण सर्वशास्त्रों में अनुपम और सर्चविध जीवों के प्रेयश्रय का साधक प्रत्यक्ष नामरूप से भगवद्रूप है। यह वेद तो नहीं पर वेदवत् है । यदि इसे "इतिहास पुराणंच पञ्चमो वेद उन्यते” के अनुसार वेद माना जाय तो इसके स्वरूपोत्कर्प की अपेक्षा स्वरूप हानि का प्रसङ्ग पाता है। जहाँ वेद केवल चर्णिक के अधिकार को लेकर पुस्पार्थ के प्रवर्तक हैं वहाँ भागवत त्रैवर्णिक के साथ ही बिना भेदभाव के स्त्री शूद्रादि के लिये भी उतनी उपादेय है, और सच तो यह है कि भगवद्वाणी रूप वेद को इस संकुचित भावना को हटाने, उसी के अभिप्राय को भाष्य रूप में व्यक्त करने और उन्मुक्त हस्त से कल्याण वितरण के लिये ही इस आविर्भाव हुआ है, जो साक्षात् परमात्मा की उस देवी इन्चा का प्रतिपल है जिसके भीतर यावामात्र जगत के संरक्षण, सवर्द्धन और सारूप्य प्रदान करने की निष्ठा निहित है। श्रीवल्लभाचार्य इसे वेद के समान पूज्य मानते हुए भी वेदवत् मानते हैं । वे इसमे वेद धर्म का अतिदेश बर लाते है। जैसा कि "कोश मे अतिदेश शन्द का अर्थ कहा गया है, निगमों में प्रतिपादित सभी धर्मों का इसमें पान्तर से विस्तृत प्रवचन है जो मानव मान के लिये अमृतवत् सम्राह्य अथच पेय है। - १२४ ] [ शु० पु. संस्कृत वाङमय पुरुषार्थ और भक्ति- जिस प्रकार वेद में नित्य और काम्य, प्राकृत और वैकृत-दो प्रकार के धर्मों का निरूपण है, भागवत मे भी पुरुषार्थों का निरूपण है। मानव के यह उपादेय प्रयत्न प्राचीन पद्धति मे चार प्रकार के माने गये हैं पर नवीन अन्येपण और ताविक विज्ञान से पॉच प्रकार के सिद्ध होते हैं। १ धर्म, २ अर्थ, ३ काम, ४ मोक्ष, ५ भक्ति (स्नेह, प्रीति ) प्रथम तीन त्रिवर्ग और चारों को मिलाकर चतुर्वर्ग कहा गया है। भक्ति मानसिक वृत्ति या इच्छा नहीं है, क्योंकि इच्छा तो प्रत्येक पुरुषार्थ की होती है । वृत्ति भी नहीं है क्योंकि यह साधन होते हुए भी फल रूप है। जिस प्रकार अन्य पुरुषार्थ साधन रूप होकर भी फलात्मक आनन्द को प्रदान करते है, चाहे वे लौकिक हो चाहे अलौकिक ? उसी प्रकार भक्ति भी परमानन्दात्मक फल प्रदान करती है, साधन और साध्य दोनों है। एक-एक के प्रति अनन्य निष्ठा में जिस प्रकार पूर्व के प्रति विराग और उपेक्षा वृत्ति जागृत होती है उसी प्रकार भक्ति में भी। भक्तिमान् या भक्तीन्छु पुरुप अनन्य निष्ठा मे शेप का उसी प्रकार त्याग कर देता है जिम प्रकार अर्थी और कामी अन्य का। अतः भक्ति शास्त्र भक्ति को स्वतन्त्र पुरुषार्थ ही नहीं परम पुरुषार्थ मानता है, और इसा फल अलोकिक परमानन्द-प्राप्ति । शास्त्रों में कई उदाहरणों या वर्णन है कि जिस प्रकार मुमुनु निवर्ग की उपेक्षा (त्याग) पर देना है उसी प्रकार भक्तीच्छु मोक्ष तक का तिरस्कार । जहाँ अर्थ और काम स्वरूपानुमार सभी प्राणियों में विद्यमान हैं, वहाँ मानय में धर्म के साहचर्य से उनकी प्रतिष्ठा मानी जाती है और इसीलिये इन्हें पुरुषार्थ कहा जाता है, पर भक्ति (स्नेह प्रेम) जहाँ यायन्मात्र प्राणियों में विराजमान है वहाँ अन्य अवशिष्ट पुरुपार्थी के माय वह महामानव का भूषण है । अत: निःमन्दिग्ध भक्ति एक स्वतंत्र पुरुपार्थ दे, और मर्वोत्कृष्ट अपरिहार्य कर्तश्य । भक्ति और भागात- श्रीभागयत भक्तिननिरा साचत-मंहिता दे, इसमा मुग्यतम प्रयोजन अहापागों के साथ भक्ति की प्रतिष्ठा करना है। यह सय उम [ १२५ प्रमाण प्र०""समाषिभापा ] महापुराण के माहात्म्य में सुविस्तर वर्णित है । दयामय परमात्मा के स्वरूप प्रीति (आनन्दमयता) के एक-एक करण को लेकर ही तो यह विश्व प्रति- ठिन है 'अस्यैव आनन्दस्य अन्यानि भूतानि मात्रामुपजीवन्ति' 'आनन्दा- द्धय खल्विमानि भूतानि जायन्ते' श्रादि श्रुति वचन इसी की पुष्टि करते हैं। यह प्रीति (भाक्त स्नेह) प्रसरणशील है, आधार पात्र के अनुसार संकुचित और विस्तृत दोनों रुप धारण करती है। वह जहाँ भौतिक पदार्थ में सीमिन हो जाती है, एकांगी, क्षुद्र विकृत स्प लेती है, जिसे मूलतः असंपृक्त हो जाने के कारण विनाश का भय बना रहता है। एक बारा जो मूल स्त्रोत से छूट गई हैं, अपावन, अतृप्तिकर, अथच उद्वेजक हो जाने से विनाशक बन जाती है, पर जहाँ व्यापकता से उसका निधि, नित्य अविरल संबंध बना रहता है वह तृप्ति, सन्तोष और परमपावनता को लेकर कल्याण-साधिका भगवतो गङ्गा के रूप में जगद्वन्द्य बन जाती है, उममें कम्मरनाशन के साथ पारनता का भी समावेश हो जाता है। परमात्म-विषयक भक्ति-जिसे शास्त्रों में “सुदृढ सर्वतोधिक स्नेह" कहा जाता है, इसी प्रकार की है; लौकिकता से दूर दिव्य स्वरूप है। और इसी का भागवत में प्रतिपादन, संस्थापन है । अत: भागवत का अनुभवैकवेद्य अनिर्वचनीय ही.माहात्म्य है। यह अपने दिव्य स्वरूप को लेकर लोक और परलोक दोनो को जीवन प्रदान करती है । भक्ति, निःस्वार्थ प्रेम, स्नेह-जो भौतिक पदार्यों की परिधि से कर अध्यात्मिक और आधिदैविक रूप में आत्मरूप व्यष्टि और परमात्मरूप समिट में होता है निर्गुण भक्ति कहलाता है । इम प्रकार की अहेतुकी अव्यवहित भक्ति ना ही निरूपण श्रीमद्भागवत में किया गया है। धर्मश्चार्थश्च नामश्च मोक्षश्च परिकोयते । मर्वत्रेर पुराणेषु । इत्यादि मत्स्यपुराण के कथनानुसार सभी पुणे में चतुर्वर्ग का परिकीर्तन है । 'पुराण-सार' नामक प्रन्य में कहा गया है कि पुराण भक्ति के दर्शन है। एतावता उनकी पद्धति के अनुमार भागवत में मो पञ्च पुस्पार्यों का वर्णन और विवरण अधिगत होता है। यह पाँच पुरुषार्थ निन्य काम्य भेद से दो-दो प्रकार के है:- १२६ ] [ शु.पु० सस्कृत वाड मय 4 १. धर्म-अतिथि पूजन सरकार आदि नित्य । पयोव्रत आदि काम्य । काम-स्वास्त्री मे ऋतुगमनादि नित्य । आग्नीघ्र का पूर्वचिति के अनुसार काम, काम्य । ३. अर्थ-ब्राह्मण का कुसूलधान्यादि संग्रह नित्य । इला के समान पुस्पद का अर्थ, काम्य अर्थ । ४. मोक्ष-सायुज्य नित्य मोक्ष । सालोक्य प्राप्ति काम्य मोक्ष । ५. भक्ति- शास्त्रोक्त स्वाभाविक भक्ति का अनुष्ठान नित्य । कामनार्थ कृत भक्ति काम्य । इस परिभाषा के अनुसार भागवत में सभी प्रकारो का वर्णन है । श्रीवल्लभाचार्य ने 'सर्वनिर्णय' श्रादि स्वसिद्धान्त-प्रतिपादक ग्रन्थों में कहा है कि-पुराण अनन्त हैं और वे सात्विक, राजम, तामस, भेद से निविध गिने जाते हैं। श्चेतवाराह कल्प के जीव विविध है, अत उनके अधिकार परत्वेन विविध प्रकारक पुराण उपलब्ध है। वेदव्यास ने उनके प्राप्तव्य फलों का उल्लेख कर उन उन पुराणों का विस्तार किया है । यद्यपि सभी पुराणो का फल मुक्ति-प्रतिपादन है और वे फलश्रुति में ऐमा ही रहते हैं, तथापि मुक्ति मात्यिक पुराणों के द्वारा ही सम्प्राप्त होती है। सभी पुराणों मे मुक्ति निरूपण का एक रहस्य है । प्राकृतिक गुणों का परित्याग कर निगुण अवस्था प्राप्त करना ही मोत है जिसमे वन्धन-विमोक का अर्थ छिपा हुआ है । गीता के अनुसार गुण ही बन्धन कर्ता है--[अ० १४ ] यह गुण सहसा विनिवृत नहीं हो जाते । साधनों के द्वारा-जो कि स्वादिकारानुसार शास्रा चरण से होते हैं- क्रमश इनरा विलय होता है। तम रज में, (ज सघ में, सब निगु एता में विलय से प्राप्त होता है, अत. जिस प्रसार तामप्ती जीय तामम पुराणोक्त साधनानुष्ठान से राजसिकता को मोक्षरूप में प्राप्त करते है, इसी प्रकार अन्य मो। अन्ततोगत्वा माविर पुराणों के प्रतिपादित साधनों के द्वारा निर्गुणता को प्राप्त कर लेते हैं। और क्योकि 'हरिदिनिगुणः माक्षात् पुरुष. प्रते. पर. ." "त भवनिगुणो भवेत् '-[ भाग ] श्रादि वचनों से भगवान् श्रीहरिप्रकृति से परापर, अतर से परनिगुगा है, उनकी सेवा करने वाला भी गुणी ना अनि- - प्रमाण प्र०""समाधिमापा ] [ १२७ क्रमण कर निर्गुणता को प्रान हो जाता है। श्रीभागवत इसो प्रसार का निर्गुणता-साधक सर्वोत्कृष्ट शास्त्र है, और उसमें अनतोगत्वा सभी के परमानन्दात्मक मोक्ष का प्रतिपादन पदपद पर क्यिा गया श्रीभागवत के सनत अभ्य स, मनन और एरातभाव अवण से भी उक्त उद्देश्य को सिद्धि होती है, अनुग्रहकातर परमात्मा शीघ्र ही ऐसे साधक श्रोता के हदय में निविष्ट होते हैं, कहा है-- धर्म. प्रोजित तिरोऽन परमोनिमत्सराणां सता "वेद्य वास्तामन वस्तुशिवद तापप्रयोन्मूलन श्रीमद्भागवते महामुनि कृतै क्विा परीश्वर सद्यो हृधपरदनेऽत्र तिमिः शुश्रूयुमिस्तत्यक्षणात् । भा०१, १, २. भागनत और पुराण- वेदों के शासा प्रशासा रूप विस्तार, गीता के प्रवचन और उत्तर मीमासा के निर्माण तथा महाभारत प्रथन के अन तर भी जव महर्षि कृष्णद्वैपायन को प्रात्मसन्तोष नहीं हुआ, तब उन्होंने भग. वप्रेरणया समागत देवपि नारद के उपदेश से समाधि मे भगवत्स्वरूप के दर्शन पर भागवत स्प भगवत्चरित्र का गान किया और निवृत्ति निरन, परमहस, सोय आत्मज, भगवान् शुकदेव को इसका अध्ययन कराया। उन्होंने भवतापदग्ध महाराजा परीक्षित को सप्ताह में अपण करा कर इमके प्रत्यक्ष चमत्कार का परिदर्शन कराया, तबसे यह महा- पुराण सासारिक जीवो के सम्लत्यपनाशन के लिये उद्घोषणा परता चला आया है। उसके द्वारा आराधकों का अनुपम क्षेम होता है। भागवन की गणना पुराणों में की जाती है। पुराण के प्रति श्रीवल्लभाचार्य ने कहा है-'पुराण वेदवत् पूर्वमिद्ध सापयोगि तत्' [ सर्व०नि०४८] अर्थात जैसा कि श्रुतिवचन है पुराण पञ्चम वेद है, रे वेद के समान ही पूर्वसिद्ध हैं। वेद की अपेक्षा इसमे विशेषता है कि-यह द्विज और द्विजेतर स्त्री शूद्रादि सभी के लिये उपयोगी है। चारों पुरपार्थ दो प्रकार के हैं. --१ ईश्वर विचारित, ०.जीय विचारित । ईश्वर विनारित वैदिय और जीय विचारित पौराणिक पुरु- पार्थ कहलाते हैं । वेद में ईश्वर विचारित ही पुमर्थ हैं और पुराण में दोना प्रकार के पुमों का पाख्यान है । अत्त, वे इस रूप में भी सर्वोप- 1 १२८ ] [ शु.पु. संस्कृत वाडमय योगी माने गये हैं। जिम प्रकार आत्मा के लिये देह गेह और उपकरण उपादेय होते हैं, उसी प्रकार धर्म के लिये भी तीनों स्थिति-स्थापक- तया अपेक्षित हैं। १. धर्मरूप आत्मा के लिये देहस्थानीय औत धर्म है, २. गेह स्थानीय स्मात धर्म, और ३. उपकरण स्थानीय पौराणिक धर्म है। उपकरण के बिना जैसे गेह और देह दोनों अकिंचिकर है उसी प्रकार धर्म भी स्मार्त और पौराणिक धर्म के बिना अनुपयोगी-सा रह जाता है। ममी प्रकार के पुस्पार्थों और नित्यकाम्य कर्मों का यथावत् भ्वरूप पुराणों के विना ममम में नहीं आ साता । तदनुसार 'इतिहास पुराणाम्यां वेदं समुपयेत् । जैसे वचन चरितार्थ होते है। 'पुराण हृदय स्मृत' का भी ऐसा ही रहस्य है । धर्मस्वरुप परमेश्वर का श्रुति- स्मृति नेनयुगल और पुरा हृदय है। तात्पर्य यह है कि-पुराणों के सइयोग मे ही कर्तव्याकर्तव्य का परिज्ञान हो सकता है और श्रीभागवत इन सव मे मूर्धन्य होने के कारण विशेप प्रभावशाली है। शाखाम्प में जैसे वेद अनन्त हैं, पुराण भी ! कल्पभेद और विविध जीवों के अविकार-निम्पण के कारण इनको संरया १८ मानी गई है। ममस्त पुराणी रा सार श्रीमद्भागवत है, एतापता अष्टादश मास्त्री इस महिता में अठारही पुराणों का समावेश सा है । यह विभाग मत्स्य पुराण के अन्तिमान्याय में, ओरल्लभाचार्य द्वारा प्रणीत 'सर्व- निर्णय निकन्य' की (४८ से ७१) कारिकाओं और उसके आपरण-भंग टीमा में बनाये गये हैं । स्थान संकोच से उनका निर्देश यहाँ नहीं किया है । इन महापुराणों के उपपुरारमा का परिचय भी वहीं से मिल सकता है। पुराणों के लनण पुराणों में ही प्रमगोपात कई गये हैं। "सर्गास्याथ विसर्गश्च वृत्तीरक्षान्तराणि च शो यशानुचरित सस्था हेतुरपात्रयः । दशमिलक्षणेयुक्त पुराण तद्विदोविद्. केचित्पञ्चविध प्राहुमहदल्य-य्यरस्थया ॥" इम क्थन में दश लत लक्षित महापुराण और पञ्च लक्षण ममिन पुराण कलान है। भागपन दशा लक्षणों के मचिस्तर प्रमाण प्र० - . समाधिभाषा ] [ १२६ स्थन से महापुराण कहलाता है, इसकी शोक सख्या १८००० हे। स्कन्ध पुराण में कहा है- ग्रथोप्टादश साहस्त्रो द्वादशस्कंध संयुत हयग्रीय ब्रह्म विद्या यत्र वृत्रवधस्तथा । गायत्र्या च समारभस्तव भागवत विदु । इस विषय मे पद्मपुराण में कहा है- इद भगयता प्रोक्त' चतु श्लोक्या स्वयभुवे । नारदाय स वै मह्य मवोचन्मुनये हम्। शुकाय ब्रह्मराताय स तु राज्ञे मन्यवे । शुकोक्त विष्णु राताय सदसि ब्रम्हवादिनाम् श्रीमद् भागवत नाम सुनधा तमस. परम् । श्री भागवत का गूल और सार चतु श्लोकी भागवत है, जिसे सबसे प्रथम भगवान प्रपितामह ने नारद को उपदेश दिया था। यह चतु श्लोकी भागवत में द्वि० २२० ६ ० ३१ से ३३ श्लोक तक मानी जाती है। याचार्यश्री ने भागवत के सम्बन्ध म 'यत्राधिकृत्य गायत्री येते धर्मविस्तर वृत्रासुरवधोनपेत तद् भागवतमिप्यते" लक्षण यह कर उसके स्वरूप का निदर्शन कराया है ! । जैसा कि महापुराण का स्वरूप लक्षण है, श्रीभागवत म यह पूर्ण अनुस्यूत है । स्वय यहाँ कहा है- " अत्र रागा विसर्गश्च स्थान पोषण भूतय मन्वन्तरेशानुक्था निरोधो मुक्तिराश्रय श्रीभागवत में द्वादश स्क्ध श्रीवल्लभाचार्य के मत से ३३. और अन्य के मत से ३३५ अध्याय तथा अठारह हजार शोक हैं, जिनमे उवाच और अध्यायान्त की पुष्पिका भी सम्मिलित है । प्रचलित पाठों में कई स्थानों पर आवश्यक 'वाचा' की न्यूनता है । भागरत का वैशिष्टय- श्रीवेदव्यास कृत भागवत में जिस धर्म का प्रतिपादन है, वह बड़ा ही व्यापक सार्वजनिक और निप्पपद है। इमसे ही वास्तविक ? १ । १३० ] [ शु. पु० सस्कृत वाडमय वेद का परिज्ञान होता है। श्रीवल्लभाचार्य ने अन्य धर्मों के साथ भागरतोक्त धर्म की तुलना करते हुए कहा है कि अन्यत्र सभी धर्मों में कापट्य की प्रतीति हे, जो भागवत में नहीं होती। उदाहरणार्थ:- वैदिक धर्म यज्ञादि के स्वर्ग फल से भ्रम होता है कि 'स्वर्ग' लोप है या श्रात्मसुख । क्योंकि स्वर्ग दोनों का नाम है। २. स्पात धर्म प्राचारादि है, इनमे प्रवृत्ति सकोचनार्थ वस्तुओं के गुण दोषादि या वयान है, जैसे 'शुद्ध य शुद्धी विधियेते समानेष्वपि' वस्तुपु' । ३. सत्यादिक भी धर्म है, पर इनमें व्यवहारार्थ व्यस्था है, जैसे कहा है "स्त्रीपु नर्म विवाहे च वृत्यर्थे प्राण सटे गो ब्रह्मणार्थे हिंसाया नानृत स्याज्जुगुप्सितम्"। ४. तपश्चर्यादि योग धर्म है। परन्तु "कर्ष यन्त. शरीरस्थं भूतग्राममचेतस " श्रादि वाक्यों से इसकी उत्तमता में भ्रम होता है ! तात्पर्य यह कि जहाँ भी विधि निपेध का सम्बन्ध है, वहीं यापट्य की सभावना है। परन्तु भागवत प्रोक्त श्रवण कीर्तन आदि भागवत धर्म में कहीं भी ऐसा नहीं है। अधिकारी प्रयोजन साधन और फ्ल इन चारों दृष्टियों से यह प्रोग्मिनत तव धर्म सबके लिये समान रुप मे अनुप्ठेय है । यह भागवत धर्म, भगवत्प्रेम, भगवत्सेवा और भगव साक्षात्कार के लिये क्यिा जाने वाला रोई भी प्रयत्न कहलाता है। इममें- अधिकारि रूप में मानव, दानव, सुर, असुर, पशु, पक्षी श्रादि कोई भी सचेतन प्रयत्नशील इस अनुष्टाता हो सकता है। २. प्रयोजन रूप में सकाम, निकाम सभी प्रकार का इसमें अङ्गीकार है। ३. माधन स्प में न केवल शास्त्रोक्त आचरण अपितु निपिद्ध मानमिक भाव काम, क्रोधमय द्वेप आदि की भी पतानता ममिलित को गई है जिमो कई पदाहरण विदामान हैं। पल म्प में भगवामानाकार भगवदानन्द सती को निर. निशय रूप म मप्रान होना है। । - .

[ १३१ प्रमाण प्र. समाधिभापा ] एतावता इस प्रकार के विशुद्ध सर्वतो मधुर भागवत धर्म का प्रतिपादक श्रीमद्भागवत शास्त्र अपनी आप उपमा है । इसरा वर्चस्व ही निराला है। जैसा कि कहा गया है, इसमें चतुर्विध विशेषताएँ प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर होती हैं- (क) निर्मत्सर सत्पुरपो के प्राज्मित तव धर्म का इसमे प्रतिपादन होने से इसमे प्रतिपाद्य विपय कृत वैशिष्ट य है । (स) तापत्रय का उन्मूला वास्तविक वेद्य वस्तु का निरूपण किया जाने से इसमे ज्ञान सम्बन्धिनी विशेषता है (ग) महामुनि वेदव्यास कृत--समाधि म अनुभूत-होने से इसम कत कृत महत्व विद्यमान है। और (घ)इसके अध्ययन पाठ श्रवणादि से वक्ता श्रोता के हृदय मे सङ्ग ही परमात्मअवस्थिति हो जाने के कारण इसमे फ्ल सम्बन्धिनी विशेषना का साक्षातार होता है । समस्त वे पुराण शास्त्र आदि की अपेक्षा भागवत मे रुपा तर से मुह मुहु पानेन्छा को जागरित करने और रुचि उत्पन्न करते रहने की सबसे अधिक चमकृति है । कहा गया है-- 'श्रादि मध्यावसानेषु वैराग्याख्यान सयुतम् । हरिलीला स्थानातामृतानन्दितसत्सुरम् ।' भा द्वा १३, ११ अर्थात् वैराग्य के कड़वे घूट को इसमें हरि कथामृत की मधु रिमा ने ऐसा सुस्वादु बना रस्सा है कि जिससे आदि मध्य अवसान सभी में श्रवण विरक्ति नहीं होती और लालसा ही उत्पन होती जाती है। इसे पीने के लिये सर्गवासी देव भी लालायित रहते हैं। राजा परीक्षित के लिये जीवन देने में इसका रञ्च मान भी विनिमय नहीं किया गया। अ य पुराणों की अपेक्षा इसमें एक अद्भुत प्रसग है जो इस रूप म कहा है। "कलिमल-सहति कालनोखिलेशो हरिरितरन न गीयते हयभीएम् । इह तु पुनर्भगवानशा मूति परिपठितानुपद कथा प्रसगै ।" भा० द्वा० १२ ६५ १३२ ] [ शु. पु० सस्कृत वाडमय मानव जीवन के उद्धार के लिये धर्माचरण की परम आवश्यकता है । इसके लिये अन्य सहयोगिया की भी अनुकूल उपस्थिति कारण मानी जाती है, जैसा कि गीता में निर्दिष्ट है, देश, काल, द्रव्य, कर्ता, मन्त्र और कर्म प्रकार इन छ की निर्दोषता से आचरित धर्म फलदायक होता है, इसमें से एक के भी विपम या असमीचीन होने पर अपेक्षित कामना सिद्धि नहीं होती । पर कलिकाल में यह सब निर्दष्ट नहीं मिल सकते । श्रीवल्लभाचार्य ने कहा है- कालादि धर्म-हेतूनामभावात् साम्प्रत किल दस्मृति पुराणानामी सव हि बाधिता। यथावत् अनुष्ठान का परिज्ञान न होने से मुरय पुरुषार्थ की ससिद्धि में अन्तराय आजाता है, एतावता किसी ऐसे प्रमेय बल से परि पुट हो। ऐसे प्रगल प्रमाण की आवश्यकता है, जो असहायशूर होकर मानवमात्र का समुद्धार कर सके। भागयत में वर्णित महात्म्य के अनुसार यही एक ऐसा शास्त्र है जो कलिकालादि सभी की उपेक्षा कर प्रयोजन की पूर्ति करा सकता है । कारण कि इसमे प्रमेय स्वरूप श्रीप्रभु का सस्प तेज अधिष्ठित है । कर्म और ज्ञान के लिये असामयिक इस कलि म तो प्रस्तुत सारतसंहिता का ही बोलबाला है। इसकी क्या सुन कर तो ज्ञान वैराग्य भक्ति का निक भी तरण हो गया था। स्वधाम मे पधारते समय भगवान श्रीकृष्ण ने उद्धव की प्रार्थना पर अपना तेज इस शान्त्र म प्रतिष्टित किया था। श्रीभागवत सर्व वेदा का सार है, रस है, यह निगम कल्पतरु का परिपक्व फल है और शुक के मुख से सस्पृष्ट हो जाने के कारण तो भक्ति रस से सराबोर होकर अमृत को तिरस्कृत कर देने वाला हो गया है । इसके अनुशीलनानन्द के प्रागे तो निर्माण लवण जैसा क्षार लगता है। पारल्लभाचार्य या पथन ६ कि- निगम कल्पतरोलित पल क्दन म काव्य के अनुसार यहा स्पा का वर्णन नही दिया गया है, प्रत्युत अक्षरात्मर व्यापि चैट म प्रणव बीन से उत्पन वेदकल्प पादप है। व्याम प म जय भगवदरतार हुआ अथवा श्रादि नारायण का प्राकट्य हुश्रा तय मूर्तिमान् यह मका रसामर पल इमलिये भूनल पर लाया गया जिमसे याय-माज जनों का पल्याण हो। रमामक ।

- प्रमाण प्र०""समाधिभापा ] [ १३३ वेद प्रतिपाद्य भगवान का रस भागवत में प्रकट हुआ है, यह निर्वाज दाडिम बोज के समान रस ही है, इसमें हेय अंश कुछ भी नहीं है। भागवत का त्रिविध स्वरूप- परमात्मा द्वारा रचित सृष्टि दो प्रकार की है, एक रूप सृष्टि दूसरी नाम सृष्टि। जिस प्रकार भगवान का स्वरूप सौंदर्य सर्वत्र ब्रह्मांड में लक्षित होता है, फिर भी उसकी पराकाष्ठा श्रीकृष्णावतार में ही उनके श्रीविग्रह से ही मूर्तिमान हुई थी, उसी प्रकार सर्व शास्त्रो में विप्र-कीर्ण होने पर भी नामसृष्टि के सौंदर्य को ऐयान्तिक परमावधि भागवत शास्त्र में ही दृष्टिगोचर होती है। भगवन्नामात्मक श्रीभागवत का स्वरूप तीन प्रकार का है:- १ आधिभौतिक स्वरूप-अठारह हजार श्लोक, द्वादश स्कंध और ३३२ अध्यायात्मक होकर जो शास्त्र स्वरूप है। इसकी दशम स्कंध को १२ वी, १३ वीं और १४ वीं अध्याय प्रक्षिप्त मानी गई है, वैसे ३३५ अध्याय हैं । अधिकांश आचार्य इसी रूप में इसे परिगृहीत करते हैं। आधिभौतिक पुस्तक रूप में देवी भावना के साथ इसका पूजन होता है, जो कल्याणप्रद है । २. आध्यात्मिक स्वरूप- जिसमा 'निगम कल्पतरो' इस श्लोक से प्रतिपादन है और जो सर्ग विसर्ग आदि दशविध भगवल्लीलाओं का वर्णनात्मक आधार है। गायत्री इसा बीज, चेद वृक्ष और स्वयं फल है। ३. आधिदैविक स्वरूप-भगवान श्रीकृष्ण का साक्षात् तेज स्वरूप श्रीअङ्ग, जिसके द्वादश स्कंध १२ अङ्ग है । प्रति दो-दो स्कन्धों में भगवान के ६ गुणों का वर्णन होने से धर्म रूप और स्वयं साक्षात् धर्मी रूप है। (भागवत के सम्बन्ध में कह सकते हैं कि वह लोक दृष्टि से एक शास्त्र है, प्रन्थ है । पौराणिक की दृष्टि में महापुराण है, वेदान्तियों की दृष्टि मे परमहंस सहिता है, भत्तो की दृष्टि में सात्वत-संहिता है तो तत्वज्ञों की दृष्टि में समाधिभापा है और वैष्णवों की दृष्टि में भगवान - .

प्रथम - पोपण ४ १३६ ] [ शु० पु० सस्कृत वाडमय द्वादश अगों के रूप में दर्शन करते हैं। इस भावना से निम्नलिखित स्पष्टीकरण होता है:- सन्ध लीला श्रीअङ्ग का अमिधेयं अधिकार दक्षिण चरण द्वितीय ज्ञान याम चरण तृतीय सर्ग १ दक्षिण बाहु चतुर्थ विसर्ग २ वाम बाहु पञ्चम स्थिति ३ दक्षिण सक्थि पा वाम सक्रिय सप्तम उति ५ दक्षिण हस्त अष्टम मन्वतंर६ दक्षिण स्तन नवम ईशानुकथा ७ घाम स्तन दशम निरोध - हृदय एकादश मुक्ति ६ मस्तक द्वादश श्राश्रय १० बाम हस्न इस प्रकार श्रीअन-विन्यास का दर्शन श्रीनाथद्वारा में विराज- मान श्रीगोवर्द्धनोद्धरण के स्वरूप में आज भी होते हैं। एतावता श्रीश्राचार्य यल्लम "इतीदं द्वादश स्कन्ध पुराणं हरिसे म." यह कर उन दोनों के स्वम्प की एकाकारता दिखलाते हैं। (भाग: त. नि० कारिका ६ मे .....) प्रामाण्य-- शुद्धाद्वैत मिद्धात की शाब्दिक प्रमागा-गणना में श्रीभागवत को तुरीयता प्राप्त है। श्रीग्लभाचार्य ने जैसा प्रथम कहा जा चुका है प्रमाण पतुष्टय में चेद, श्रीप्रायायय, च्याममृत फं पाद भागयत की समाधि भाषा को स्वीकार किया है। इस प्रकार भागवत यो:यापि चतुर्धता मिली है फिर भी यह अद्विनीय है। कारग कि उ. प्रमाण मनुष्य में पूर्व-पूर्य की सम्देह विनि पृत्ति के लिये उत्तरोत्तर पो गौर र दिया गया, और दम र भागवन को मर्म मदेश यारउता प्राम हो जाने में यह मर्यशाम्प्र मूर्धन्य और परम प्रमाण प में मपो मागे प्रनिति होजातोयना की दृष्टि में तो यही मय बुध है।

प्रमाण प्र.""समाधिभापा ] [ आर्य-संस्कृति में वेदानुयायियों में यद्यपि सभी सिद्धान्तवादियों की भागवत के प्रति वही निष्टा है जो परम भागवतों की है, तथापि श्रीवल्लभाचार्य के अतिरिक्त अन्य कोई भी प्रस्थान-ग्रन्थों में इसका उद्घोप नहीं करते । ज्ञान के ऊपर भी एकछत्र साम्राज्य स्थापित करने वाली भक्ति से या तो वे भय खाते हैं, या भागवत समन्वयात्मक रूप को वे भूले हुए हैं । इसमें प्रथम हंतु ही अधिक उपयुक्त जंचता है। श्रीवल्लभाचार्य ने भागवत को परम प्राप्त वाक्य मान कर जो निष्ठा प्रकट की है, वह सर्वोपरि है, जैसा कि अन्यत्र कथित उद्धरणों से व्यक्त होगा। श्रीवल्लभाचार्य ने तात्विक परिज्ञान और ब्रह्म-स्वरूप के अव- गाहन में श्रीभागवत की समाधिभापा को प्रमाण माना है। भागवत में तीन भापाएँ हैं। (१) लौकिक भापा, (२) परमत भाषा और (३) समाधि भापा । लौकिक भाषा में लोक सामान्य वर्णन होने के कारण उससे चमत्कृति या काव्य-रस पुष्टि के सिवाय और कुछ तत्त्व सिद्ध नहीं होता, वह स्वतः परमुखापेक्षी हो जाती है। परमत भापा वो स्पष्ट ही अन्य मतों का व्याख्यान करने के. कारण एकदेशीय मत है, व्यास का अभिप्रेत मत नहीं। अतः पारिशेष्यात् समाधि मापा ही- जिसमें महामुनि ने यथार्थ दर्शन किया है-प्रमाण सिद्धि होती है। फलतः निःस्वार्थ, निर्बाध सर्वार्थपरिवृहित होने से भागवत पूर्णरीत्या प्रमाण मानी जाती है। आचार्य ने कहा है- "वेदाः श्रीकृष्णवाक्यानि व्याससूत्राणि चैव हि समाधिभाषा व्यासस्य प्रमाणं तचतुष्टयम् । उत्तर पूर्व सन्देह वारक परिकीतितम् ।" शा०नि० तत्व० प्रस्तुत कारिका के तत्वदीप-प्रयाश, आवरण भग अथच योजना के सामञ्जस्य से यह जाना जा सकता है, कि-भागवत के किसी एक अंश को ही प्राचार्य प्रमाण नहीं मानते प्रत्युत समग्र भागवत को ही। भागवत-निबन्ध में स्वयं ही उन्होने कहा है-"तत्रोत्मर्गतः सर्वासमाधिभापेति" इसका आशय इस प्रकार है। "सम्पूर्ण भागवत जिसका परिकीर्तन करती है, यह सब प्रमेय व्यास ने स्वयं मय १३८ ] [ शु० पु० सस्कृत वाहम ममाधि में अधिगत किया है। उसका साक्षात् दर्शन किया है। "अपश्यत् पुष्प पूर्णम्' इत्यादि वाक्यों से इसका उल्लेस है। पूर्ण- पुम्पोत्तम के दर्शन के अनन्तर सर्वपदार्थ विषयक यथावत् ज्ञान व्यास को हो गया। जैसा कि श्रुति में कहा है-"यस्मिन् विदिते सर्वमिद विदित भवतीति । तय समस्त पदार्थायवोध हो जाने पर जो प्रमाण लोकरीति सिद्ध और परमत सिद्ध था उमा भी उन्होंने समाधि में अनुभन दिया था। अत, समाधि में अनुभूत होने के कारण सभी भागवत समाधिभाषा है। इसके बीच मे लौक्ति और परमत रूप से जितने अश का उन्हें अनुभव हुआ, उतना नश 'लोमि' और 'परमत' कहा जाता है।" "फिर भी स्वय व्यास के-भाषास्तु निविधा प्रोक्ता" इस क्थन से कुछ भाग विशेप समाधि-मापा मा सिद्ध होता है। यह तीनों मापाए प्रमाण गणना में आती हैं, क्योंकि यह भी मिथ्यार्थ मा प्रति- पादन नहीं करती । ब्रह्म नानानादानुरोधि है, और लोक उसका लोला- क्षेत्र है। प्रमाण की जहाँ परिभाषा है वहाँ यहा जाता है कि वह अबाधित और अनधिगत अर्थ का प्रतिपादक होना चाहिये" इस हिमार मे लौकिक और परमत दोनों भापायों में यह लक्षण घटित नहीं होता। क्योंकि लोक्कि मापा लोकरीति से ही और परमत भापा पर रीति से ही अभिप्राय व्यक्त करती है, उसमें कुछ मोलिक्ता नहीं होती। यह दोनी भापार समाधिभाषा की पोपिकाएँ है, अत मुरय प्रामाण्य देने से कोई इनका महत्य सिद्ध नहीं होता । मान्यता- शुद्धाद्वैत मिद्धात में भागवत के लिये किस प्रकार की मान्यता प्रचलित है, इसे इस प्रकार सममा जा सकता है--श्रीवल्लभाचार्य ने म्बकीय प्रन्यों में का है- रिचार और चिंतन के पिना भी श्रीभागवत के अवगण मात्र से चर दृढ़याम्ट हो जाता है, इममे भागवत सर्वोत्कृट है। [भा.प्र. १, मुनो.] भागामाज्ञाा निगम सपना का परिपाव कम है, इसरे अमृत को भी तुन्छ कर देने वाले मन्तिास का सदा पान करना P प्रमाण प्र० समाधिभाषा ] [ १३६ चाहिये । यह शुर के मुख सस्पर्श से और भी अधिक मधुर हो गया है। [ भा०प्र० १,३, सु०] ३ भागवत का स्वरूपोत्कर्प निम्न चार वातों से सिद्ध हे.- (क) प्रमेय रुप से--जिस प्रकार भगवान् स्वभक्तो के प्रति असाधारण अनुभाव रखते हैं, भागवत भी स्वीय चिन्ता के प्रति न्सी प्रकार अनुभावमय है, क्योंकि वह भगवद्रुप है । (स) प्रमाण रूप से यह निसिल निगमागम का सार जिस प्रकार सर्वप्रमाण मूर्धन्य वेद परमात्मा का प्रतिपादन करता उसी प्रकार भागवत भी प्रमेय-साधक प्रमाण है। (ग) असाधारणना से-भागवत जैसा रस अन्यत्र कहीं उप- लध नहीं होगा। (घ) साधनोत्तमता से-भागवत अध्यात्मदीप है। अन्य साधनों में तो परावलबी भार होता है, यह दीप होने के कारण स्वय आत्म परमात्म तत्व का प्राशक है, सर्व सुलभ है। सर्वभय का निरर्थक सायुज्य, वैदिक या भागवत प्रकार से ही अविगत हो सकता है। पर वैदिक प्रकार तो त्रैवर्णिक मात्र से हो उपादेय हे, उन्हीं तक सीमित है, भागवत प्रकार से सायुज्य सबके लिये सुलभ है । [भा० द्वि० १, ७, सु०] विशेषत पलि मे धर्म के साधक छै अङ्ग-देश, काल, द्रव्य श्रादि शुद्धतया दुर्लभ हो गये हैं, अत धर्माचरण से सिद्धि यद्यपि असभन हे तथापि धर्म शास्त्र के अनुसार ही आचरण करना आवश्यक है, इसम भी यदि भागवत का आश्रय लिया जाय तो उद्धार और सफलता अवश्य मिलती है-[ "सर्व नि०नि० कारिका -२४ । ६. वेद योर गीता में जिस धम का वर्णन है उसी को वेदव्यास ने सर्व निर्णय पूर्वक भागवत में कहा है। समाधि मे अनुभूत ज्ञान होने के कारण और इसम भक्ति के समिश्रण से उस धर्म मा आचरण करने पर पतित होन का भय नहीं है, क्योकि इसमे सर्व- भय मोचक और विश्वोद्धार-परायण श्रीहरि का अनुपम प्रसङ्ग वर्णित है । वर्णाश्रम धर्म आदि की अपेक्षा भागवत धर्म निरापद है। [ सर्व० निय नि०.३२, ३४] ५ १४० ] [ शु० पु० संस्कृत वाड,मय ७. नित्य श्री भागवत के पाठ से श्रीप्रभु की भक्ति सिद्ध होती है जो सर्वमनोरथ साधक है। [ सर्व०नि० निका०२४४] ८. श्रीभागवत का वृत्ति के लिये उपयोग नहीं करना चाहिए। यह आग्रह इस प्रकार का होना चाहिये कि प्राण सङ्कट में हो तो भी एतदर्थ उसका उपयोग नहीं करना चाहिए । सद्भावना से अरण कराने पर वह स्वयं वृत्ति की परिपूर्ति कर देती है। [ सर्व नि. नि. २६६, ६६७ ] साधनं परमेतद्धि श्रीभागवतमादरात् पठनीयं प्रयत्नेन निहें तुकमदम्मतः।" [ सर्व०नि० २२५ ] निष्काम और निर्दम्भ भागवतानुष्ठान परमोत्कृष्ट मगवत्प्राप्ति का साधन है। भागवत के द्वारा प्राप्त होने वाले फल का क्रम एक प्रकार से यह है--सर्वसन्देह राहित्य, सर्वन निर्भयता, परम प्रेम, भगवत्कृता, और साक्षात् भगवत्प्रवेश--[भाग नि० २२ ] १०. भगवान् श्रीकृष्ण जब तक भूमंडल पर व्यक्तरूप में लीला करते रहे, उनके स्वरुप सामर्थ्य से ही सबका उद्धार होता रहा । उस समय साधन की परमावश्यकता नहीं थी। पर जब वे स्वधाम पधारे तव जीयों या संसारभय से त्राता कोई नहीं रहा, एतदर्थ उनके नामात्मक श्रीभागवत का प्रादुर्भाव हुआ, कृपा कर उन्होंने श्रीभागवत में स्वकीय तेज प्रतिष्ठित किया और तब से भागवत द्वारा उद्धार का मार्ग खुला । मर्व प्रथम इसका उदहरण राजा परीक्षित का प्रसङ्ग है- (भाग०नि० का) ११. जगतीतल में द्विविध जीर है, एक निवृत्तिपगयण दूसरे प्रवृत्तिपरायण । प्रथम कोटि के जीव तो स्वत. भगवन्चरित्र- श्रवण में संलग्न रहते हैं, क्योंकि भगवान का मरूप ही इसी प्रकार का है। कहा गया है-- पारमारामाश्च मुनयो निर्मन्या अप्परक्तमे कुन्त्यिहेतुकी भक्ति मित्यभून गुणो हरिः। [ भा....) परन्तु प्रवृत्ति परायण जीव भगवान के प्रति चाट न होकर प्रमाण प्र... समाधिभापा ] [ १४१ विपयों के प्रति आकृष्ट होते हैं। उन्हें जो विपय रचता है, जहाँ उन्हें अधिक स्वाद प्राता है उसी ओर उनका रिझान होने लगता है। ये होन विषय का परित्याग कर उत्कृष्ट की तरफ खिचने लगते हैं। इसी धारणा को लेकर श्रीभागवत मे विपय स्प से भगवन्चरित्र प्रति- पादित किया गया है, और मोक्ष को उसका प्रयोजन नहीं बताया गया है। जीवन्मुक्त व्यास, नारद, शुक आदि की भी इमी ओर सहज प्रवृत्ति का उल्लेख किया गया है। अतः यह भागयत निवृत्तिपरायण और प्रवृत्ति परायण दोनों प्रकार के जीवों के बारर्पण का सहज मार्ग है- (भानि० प्र०=१,८३) १२. भागवत भगवान् द्वारा ही आविर्भूत की गई है । क्योंकि उनका स्वरूप वे ही जान सकते हैं । जैसा कि गीता में कहा गया है- 'स्वयमेवात्मनात्मानं वेत्थ त्वं पुरुपोत्तम"। इस धारणा को लेकर "भगवत' इदं भागवतम" इस व्युत्पत्ति के साथ "भगवताप्रोक्त" ऐसी भी इसकी व्युत्पत्ति होती है । यद्यपि गीता भी भगवत्प्रोक्त है पर यह उपदेश है, पुराण नहीं है। भागवत साक्षात्स्वरूप प्रतिपादक पुराण है, इसमे भगवत्प्रोक्त उपदेश भी हैं। (भा० नि० तृ. क का० ४४ ..) आदि। समाधिभापा-[ भागवत ] पर शु. साहित्य शुद्धाद्वैत की सैद्धान्तिक दृष्टि को समझने के लिये भागवत पर निम्नलिखित ग्रंथों का प्रणयन किया गया है- १. भागवतार्थ निबन्ध--यह ग्रन्थ श्रीवल्लभाचार्य विरचित तत्वार्थ दीप निबन्ध के अन्तर्गत तृतीय प्रकरण है जो-भागवत के अमिप्राय-परिज्ञानार्थ निर्मित हुआ है--अावश्यक उपलब्ध साहित्य के साथ प्रकाशित है। प्रस्तुत प्राय मे कारिका प्रोद्वारा प्रतिपाद्य विषय का निर्देश है और उसके आशय के लिये स्वय ग्रन्थकार ने 'प्रकाश' नामक टीका की संयोजना की है। इसमे लगभग दो हजार कारिकाएँ हैं, जिना विपय को गंभीरता से सूत्रात्मक होने के कारण समझना मठिन-सा था । कहते हैं आचार्य चरण के निकटवर्ती शिष्यवर्गस्थ माधव भट्ट, गङ्गाधर भट्ट, पद्मनाभ भट्ट, हरिहर भट्ट, ब्रह्मानन्द, कृष्णचन्द्र और दामोदर दास जी की प्रार्थना पर 'प्रकाश' की रचना की गई थी।

१४२ ]] [ शु. पु. संस्कृत वाङमय 'प्रकाश' दीका प्रारम्भ से लेकर चतुर्थ स्कन्ध की ३३ वीं कारिका तर रची गई है, और बाद में उनके पात्मज श्रीविट्ठलनाथ जी द्वारा पञ्चम सन्ध की समाप्ति पर्यन्त बनाई जा सकी। आगे द्वादश स्कन्ध तर कारिकाएँ ही हैं। पञ्चम स्कन्ध से लेकर समाप्ति तक श्रीपुरुषोत्तम जी ने 'निबन्ध-योजना' नाम से उसके अभाव की पूर्ति की। इस श्रा तरिक विभाजन का ज्ञान श्रीपुस्पोत्तमजी के प्रावरण भग से होता है। ऐसा अनुमान होता है कि 'सुबोधिनी' की निर्मिति के बाद भागवत निबन्ध को रचना या पुनः सपादन किया गया है। "अन्योन्य निर्वाहानच टीकाया निरूपितम् ।" [ भाग० नि० पारिका द्वि० १८ द्विपस्कर प्रकाश . ] तथा-पूर्वमुक्तम् [वही तृ. स्क० का० १२७,१२८] इसका पुरुपोत्तमजी ने "सुबोधिन्या" ऐसा अर्थ क्यिा है* यद्यपि अर्थ- विवेचन को पद्वति को देखते हुए इसकी रचना प्रथम और सुबोधिनी की बाद में होनी चाहिये पर विदित होता है कि सुबोधिनीप्रणयन के बाद पुन भागवतार्थ निबन्ध पा सपादन किया गया होगा। और तदर्थ ऐसा निर्देश मिलता है। मारस्वत कल्प में सर्वोद्धार प्रय नामस्वरूप से भगवान श्रीकृष्ण ने प्रादुर्भूत होकर स्वकीय प्रमेय बल से ही जगत का उद्धार पिया था। उनके समक्ष साधना की कोई महत्ता नहीं थी, जो लोग साधन- परायण थे, ये भी स्वरूप सामर्थ्य से शीघ्र सफल हो गये, पर जो नि साधन थे और साधनों का जिन्हें कोई परिज्ञान भी नहीं था वे भी सहसा भगवासम्मुख होते ही कृतार्थ होगये, अथवा स्थय प्रभु ने उनके सामने जाकर उनको कृपापीयूष से परिप्लायित कर दिया। परन्तु जय श्रीप्रभु ने अपनी नृलोर लीला का सवरण किया तब उद्धारोपाय की सुलभता के लिये गहोंने श्राभागपत में अपने तेज प्रतिष्ठान किया। प्रमाणघल से उद्धार का युग पाया, वेद याम द्वारा उसी सर्वोद्धार प्रणयन या आविर्भार हुअा। अत. भागवत निश्रित प में सभी के लिये अत्यन्त सुसकारी है। *भाग निबन्ध कारिता १० वे प्रकार से विदित होता है जि-धम दीका की रचना भी इस निब घ रचना के पूर्व हुई है। प्रयत्नात्मस्परप भागवत का प्रमाण प्र०....ममाधिभापा ] [ १४३ भागवत के अर्थपरिज्ञान से ही भगवद्प हृदय मे सुस्थिर हो सकता है । परन्तु यह अर्थ वास्तविक रुप में होना चाहिये। ऐसा सोच कर श्रीवल्लभाचार्य चरण ने भागवतार्थ तत्त्वदीप-निवन्ध की रचना की है और इस सांगोपांगता के लिये उन्होंने पूर्व उपोक्तम रूप में 'शास्त्रार्थ और 'मर्व निर्णय' नामक निबन्ध द्वय की-[शा० नि० प्रका०१,३] देखा जाय तो वास्तव में भागवतार्थ निवन्ध के लिये ही उक्त निवन्धद्वय की रचना हुई है। शास्त्रार्थ निवन्ध मे सिद्धान्ततः कुछ तत्त्वों का स्वरूप परिदर्शन करा कर एक प्रणाली स्थापित की गई है, और सर्व निर्णय निबन्ध की रचना कर प्रमाण, प्रमेय, साधन तथा फ्ल का विवेचन किया है। सर्व निर्णय में साधन के पूर्व फल का कथन है क्योंकि भागवत ही परम साधन रूप है, अत. उसे अन्त मे रवखा गया है । पल को उत्कृष्टता होने पर भी साधन की विशिष्टता पुष्टिमार्ग में अगोशर की गई है । चिन्तामणि और कल्पवृक्ष साधन हैं और उनसे प्राप्त पदार्थ फल, तथापि ये सावन क्यों न महत्त्वपूर्ण हों जिनसे अनन्त फलों का सतत लाभ मिलता रहना हो। इस लाभात्मक दृष्टि मे साधन और फल दोनों को एक रूप ही माना जाता है, और ऐसा स्वीकार करने पर श्रीभागवत साधनता और फलरुपता दोनों प्राप्त कर लेती है - तत्त्वार्थ-दीप निवन्ध की प्रथन शैली से साधन को फलरुपता प्रदान करते हुए भागवतार्थ निबन्ध की रचना प्रस्तुत की गई है । जैसा कि नाम से परिज्ञात है भागवत के अर्थावगति के लिए इसमे १ शास्त्रार्थ, २सन्धार्थ, ३ प्रकरणार्थ और ४ अध्यायार्थ का निरूपण किया गया है। ५ वाक्यार्थ, ६ पदार्थ तथा ७ अक्षरार्थ का सुबोधिनी में विचार है। भागवनार्थ प्रकरण-निबंध-के ऊपर निम्नलिखित साहित्य है-. १. भागवतार्थ--प्रकाश--आवरणभंग-यह प्रावरण भग टीका अन्य प्रकरणद्वय को भॉति इस नियन्ध पर भी श्रीपुस्योत्तमजी ने बनाई है। प्रकाशित स. १६६१ । यह विवरण प्राचार्यकृत प्रकाश के श्राशय को समभाने के लिये १४६ ] [ शु. पृ० सस्कृत वाड मय श्रीवल्लभाचार्य ने भागवत के सात अर्थी को एक सूत्र मे निरद्ध कर सिद्धान्त और परब्रह्म श्रीकृष्ण को रसस्वरूपिणी लीलाओं का वर्णन दिया है । उनका कयन है- "(१) शास्त्रे (२)सन्धे (३) प्रकरण (४)ऽध्याये (५) वाक्ये (६) पदे (७) ऽक्षरे । एकार्थ सप्तधा जानन् अविरोधेन, मुच्यते ॥" अर्थात श्रीभागवत म सात अवान्तर विभागो के परिज्ञान से अर्थारबोध करना चाहिये । उस सम्पूर्ण शास्त्र का अर्थ, उसके स्कन्धा का अर्थ, स्कन्धा के अन्तर विद्यमान प्रकरणों का अर्थ, और प्रत्येक प्रकरण अध्यायों का अर्थ -सके मध्य मे गुफित वाक्य-श्लोकों का अर्थ, वाफ्यान्त पाती पदों का अर्थ, अथच पदान्तर्यर्ती अक्षरों का अर्थ -परिज्ञान होना परमावश्यक है । जब तक शास्त्रार्थादि साता अर्थों को एकरूपता से अविरोध से-जाना न जायगा उसका स्वारस्य प्रकट न होगा। एकार्थ रूप परब्रह्म श्रीकृष्ण ही अपिरोध से सात स्वरूप है और माता एक स्वरूप है, इस प्रकार का परिज्ञाता ही मुक्ति का अधिकारी होता है। (१) शास्त्रार्थ जैसा कि प्रथम कहा जा चुका है प्रमेय स्वरूप श्रीकृष्ण ही है । परमपुरप, श्रुति के क्थनानुसार द्वादश अग है । सो भागयत साक्षात् परमात्म स्वरूप है, यह सिद्ध होता है । "इतीद्व द्वादश स्क्न्धपुराणहरिश्य स । पुराणहरे स्वरूपशव्दतो अथत च||" सो इस भगवत् स्वरूप का प्रतिपादन करना हो इम शास्त्र का मुग्य अर्थ है। भगवत्स्वरूप विविधि लीलाओं से जाना जा सकता है। किसी वस्तु को सममने के लिये दो प्रकार के मुरय लक्षण होते हैं-१ कार्य लक्षण, स्वरूप लक्षण । किमी वस्तु को कार्य से पहिचानना या म्वरूप से। अलौकिक अझ जो प्राप्त इन्द्रिया से ग्राह्य नहीं है, अपनी इन्छा से ही प्राह है कार्य मे ही पहिचाना जा सकता है। अत परमात्मा के ज्ञान के लिय रसकी कार्यपद्धति का लीलापरिकर का निरूपण होना चाहिये तदर्थ भागवत में गमको मर्ग विमर्ग प्रालि रश -भागवत .

प्रमाण प्र० समाधिभाषा [ १४७ विध लीलाओं का दिग्दर्शन कराया गया है । अतः सॉगोपाङ्ग इस स्वरुप का साक्षात् कराना ही भागवत का लक्ष्य है और एतदर्थ ही इस शास्त्र की प्रवृत्ति है । एतावता यही इसका सक्षिप्त शाखार्थ है। योग की व्यान- परिपाटी में ईश्वर की चिन्तना के विषय में स्वयं भागवत ने कहा है-- "श्रदीन लीला हसितेक्षणो ल्लसद् भ्र भंग संसूचित भूर्यनुग्रहम् । ईक्षेती चिन्तामय मेन मीश्वरं यावन्मानो धारणया वतिष्ठ ते ॥ भा० द्वि०२, १२। इस श्लोक को सुबोधिनी में श्रीवल्लभाचार्य ने 'अदीन लीला' आदि दस विशेषणों से भागवत की तृतीय से लेकर द्वादश स्कन्ध पर्यन्त दश लीलाओं का संकेत किया है क्योंकि वे भगवान् और भागवत के रूप में कोई अन्तर नहीं देखते । विस्तार भय से यहाँ उसका कथन नहीं किया गया है । श्लोक की प्रथम अर्खाली का एक-एक शब्द एक-एक लीला का बोधक है। (२) स्कन्धार्थ-पुराण के लक्षणानुसार महापुराण भागवत में सर्ग, विसर्ग, स्थान, पोषण, उति, मावन्तर ईशानुकथा, निरोध, मुक्ति और आश्रय इन दस लीलाओं का कथन है । लीलाओं के श्रवण करने का अधिकार किसे है ? उसकी योग्यता कैसी अपेक्षित है ?, उसमें क्या गुण होना चाहिये ? आदि सहज जिज्ञासा होती है अत: किसी स्थान पर इसका भी निरूपण अपेक्षित है । इसके साथ ही श्रोता के लिये किन-किन साधनों की अपेक्षा होती है ?, कौन से अङ्ग आवश्यक है ?, यह भी विचारणीय है, और यह बातें प्रथम हो जाननी चाहिये। एतातता यह सब भागवत के द्वादश स्कन्धों मे निरूपित हुआ है। फलत : प्रथम में अधिकारी का द्वितीय में साधन का और तृतीय से लेकर द्वादश तक सर्ग आदि दशविय लीलाओ का, सविस्तर प्रतिपादन है । इस प्रकार द्वादश लीलाओं का कथन भागवत के १० स्कन्धों में है। इन प्रत्येक स्कन्धों का कार्य कारण सम्बन्ध है, पूर्व स्कन्ध उत्तर स्कन्ध का कारण अथवा साधन है । यद्यपि प्रत्येक मे पृथक्-पृथक् बातो का कथन है तथापि ये एक दूसरे से सम्बद्ध हैं जिसे इस प्रगर समय जा सकता है-

१४८ ]
पु० सस्कृत वाडमय
१. अधिकारी का निरूपण प्रथम स्कन्ध में है।
२. वे अधिकारी साधन सम्पन्न होने चाहिये। साधन युक्त
पुरुष ही लीलाश्रवण कर सकते हैं, अत: श्रवण का अङ्ग का निरूपण
द्वितीय स्कन्धार्थ है।
प्रथम लीला सर्ग-सृष्टि है, अतः तृ० में उसका कथन है।
४. सृष्टि में जीव ही मुख्य हैं, अत: सृष्टि-जीवों के विसर्ग
धर्मादिपुरुषार्थ का वर्णन चतुर्थ स्कन्ध में कहा गया है ।
५. पुरुषार्थ सिद्ध पुरुषों को उन-उन की मर्यादा के साथ
सस्थापित करना । स्थान, पंचम स्कन्ध का अर्थ है।
६, मर्यादास्थित जीवों में से किन्ही पर अनुग्रह-पुष्टि करना
पष्ट का अभिप्राय है।
७. जो पुष्ट हैं उनके वैषम्य दोष की विनिवृत्ति के अर्थ वासनाओं
--ति-का निरूपण सप्तम स्कन्धार्थ है।
वासना की निवृत्ति के लिये जिन सद्धमों की उपादेयता
होती है वे अष्टम में कहे गये हैं।
६. निवृत्तदोप और सद्धर्म परायण भक्तों का चरित्र नवम स्क०
में कहा गया है जिससे उनका स्वरूप जाना जा सके ।
१०, भक्तों की आसक्ति-निरोध-भगवान् मे होता है, अतः
दशम में उनके स्वरूपबोधार्थ श्रीकृष्ण के चरित्रों का प्रतिपादन हुअा है ।
११. आसक्त जीवों को स्वरूप व्यवस्थिति रूप मुक्ति का
एकादश में।
१२. व्यवस्थितों का भगवदाश्रय द्वादश स्कन्धार्थ है।
इम प्रकार समप्र द्वादश स्कन्ध एक दूसरे से पूर्णतया मम्बद्ध है।
'मागवत-निवन्ध' मे सात अयों में से प्रथम चार शास्त्रार्थ,
प्रकरणार्थ, स्कन्धार्थ और अध्यायार्थ का प्रतिपादन रिया गया है:-
सदनन्तर अन्य तीन याक्य (लोक), पद और अक्षरों का अर्थ
सुयोधिनी में स्पष्टतया कहा गया है।

प्रमाण प्र."ममाधिभाषा ] [ १४८ (३) प्रकरणार्थ-और (४) अध्यायार्थ-स्कन्धार्थ तदन्तर्गत प्रकरणार्य तथा तदन्तःपाती अध्यागर्थ पर गोष्ठीशाल श्रीघनश्याम भट्ट ने 'भागवत-प्रकरण विभाग' में अच्छा प्रकाश डाला है:-जो स्कन्धों के अनुसार इस प्रकार है:- १ -प्रथम स्कन्धार्थ । अधिकारि--श्रोता यता का निरूपण ( १६ अध्याय । अधिकारी । । प्रारणार्थ -क. साधारणाधिकारी प-मध्यमाधिकारी ग-उत्तमाधिक (अध्याय १, २, ३) (०४, ५, ६,) (अ०७ से १६) ३ क. प्रकरण साधारणाधिकारि-निरूपण- १ अध्याय में-श्रोता के जिज्ञासुल और वक्ता के श्रुतभागवतरण का वर्णन है। २ अध्याय में--श्रोता के मात्सर्यराहित्य और वक्ता को चातुर्यस्व गुण का कथन है। ३ अध्याय मे--श्रोता की श्रवण प्रीति और वक्ता के गुह्यज्ञा- नवत्त्व का कथन है। ख. प्रकरण-मध्यमाधिकारि-निरूपण---- ४ अध्याय में--ओना और पत्ता को भगवत्कृपा का वर्णन है। ५ अध्याय मे~-श्रोता वक्ता दोनों के भगवदीयत्व का वर्णन है ६ अध्याय में श्रोता और वक्ता दोनों के भगवदेकत्व का वर्णन है ग. प्रकरण-उचमाधिकारि-निरूपण--- ७ अध्याय से ? चरण २, हस्त २, जानु २, माहू २, स्तन २, २६ अ० पर्यन्त हृदय १, शि १, ( १३-अ.) अंग ओर अंगी रूप से एक अधिक, इस प्रकार १३ अ० हैं। ।

] [ शु० पु. सस्कृत वाड मब । अधिकारि- निरूपणामक प्रथम स्कन्ध में इस प्रकार प्रसरण विभाग है अधिकारी प्रथम मध्यम और उत्तम भेद से विविध होते है, अत इस स्कन्य म तीन प्रकरण है। (क) साधारणाधिकारि-प्रकरण मोना और वक्ता दोनों क समान गुग्गों श सकलन अपेक्षित है । जिसमें वक्ता के लिय जिज्ञासुत्व, अमात्सर्य और प्रेरणादर यह तीन गुण अवश्यमेव अपेक्षित हैं, इसा प्रसार श्रोता के लिये श्रुतभागवतार, चातुर्थ और गुह्यज्ञानपत्ता यह अपेक्षित है, इस लिये एक एक अध्याय म इनका उक्त रूप म कथन है । एतदर्थ तीन यध्याय इस प्रकरण म विद्यमान है। (स.) मध्यमाधिमारि-प्रकरण म भी इसी प्रकार श्रोता वक्ता के तीन तीन गुण अपेक्षित हैं, जिन्ह एक एक अध्याय के द्वारा कहा गया है । श्रोता के गुण हे १ भगर कृपा, २ भगवदीयत्व,३ भगवदेक्ता नत्व । यही वक्ता के लिये परमापेक्षित है। अत तीन अभ्यायों से इस प्रकरण की समाप्ति है। (ग) उत्तमाधिमारि-प्रकरण में दृढ वैराग्यश्च की अपेक्षा होती है, और वह भगवदेकतानता से सिद्ध होती है। भगवान पूर्ण पुरुषोत्तम स्वरूप होने से उनके द्वादश अगों का तथा अगीरूप से उन के आधिक्य के लिये एक और इस प्रकार तेरह अध्यायों में इस प्रकरण की समाप्ति होती है। इस प्रकार तीन प्रकरण और १६ अध्यायों में अधिकारि- निरूपरणात्मक प्रथम सध का प्रतिपादन है। २-द्वितीय स्कधार्थ-साधन-निरूपण । (१० अभ्याय) साधन - प्रकरण ३ क-तत्रध्यान स-हत्प्रसाद ग-मनन (अध्याय १,२) (५०३, ४) (अ०५ से १०) २ ६ क-प्रफरण- -तलध्यान-निरूपण १ अध्याय में-स्थूल ध्यान का निरूपण है।

प्रमाण प्र. "ममाधिभाषा ] [ १५१ २ अध्याय मे-सूक्ष्म- स्वरूप-ध्यान का निरूपण है। ख. प्रकरण हृत्प्रसाद निरूपण- ३ अध्याय में-श्रोता के हृत्प्रमाद का कथन है । ४ अध्याय में-वक्ता का हृत्प्रसाद वर्णित है। म. प्रकरण मनन-निरूपण दो प्रकार का होता है:- १ उत्पत्ति से तीन अध्याय में- ५ अध्याय में-अनित्य में जनन वर्णन से -जहरूपतया ६ अध्याय में-परिच्छिन्न में ममागम से- जीव रूपतया ७ अध्याय में-नित्य अपरिन्छिन्न में समागम से--भगवत्- प्राकट्यतया। भगवत्प्राकट्य दो प्रकार का है (१) श्रावेश (२) अवतार दो उत्पत्ति से तीन अध्याय में- ८ अध्याय में आशका--निरूपण । १ अध्याय मे--उत्तर-कथन । २० अध्याय में-फल-निरूपण । इम प्रसार साधन निरूपणात्मक द्वितीय स्कन्ध मे प्रकरणीय विभाग हैं:-मावन, १ तत्वथ्यान, २ हृत्प्रसाद,३ मनन इस भेद से तीन प्रकार का है अतः यहाँ तीन प्रकरण और दस अध्याय हैं। (क) तत्वध्यान स्थूल और सूक्ष्म भेद से दो प्रकार का होता है। अत. इस प्रकरण में दो प्रकार की अपेक्षा है। ( ख ) हृत्प्रसाद-हार्दिक प्रमन्नता-श्रद्धा रूप होती है। श्रद्धा भी श्रोता और वक्ता के सम्बन्ध से द्विविध अपेनित है अतः यहाँ मी दो अध्यायों से उसका कथन है। (ग) मनन-उत्पत्ति और उपपत्ति के कारण दो रूप होता है और यह प्रत्येक जनन, ममागम और प्राकट्य भेद से छः प्रकार का होता है, अत. यहाँ छै अध्यायो से इसका विवेचन है। मनन-जड (जिसमा जनन होता है ) जोय (जिमका ममागम होता है) और १५२ ] । शु० पु० सस्कृत वाङमय परमात्मा (जिसका प्रारभ्य होता है) से सम्बन्धित है, एतानता इसमें पट् अध्याय हैं। इस प्रकार द्वितीय स्कन्ध मे तीन प्रकरण और दस अध्यायो से साधन-अङ्ग का प्रतिपादन मिलता है। ३. स्कन्धार्थे । सर्ग लीला निरूपण। (३३ अध्याय) सर्ग . ख-- प्रकरण-फ-लीरिक सर्ग --अलौक्कि सर्ग। बन्धसृष्टि मुक्ति सृष्टि (अध्याय १ से १६) (अ०२० से ३३) (१६) (१४) क. प्रकरण-पन्ध सृष्टि--५ अवान्तर प्रकरण । १-१ अ० से ६ तक गुणातीत सृष्टि का वर्णन है। (६ अध्याय) २--७ अ० से तक सगुण सृष्टि का वर्णन है।। (३ अध्याय) 3--१०० से ११ तक काल-सृष्टि का कथन है। (२ अध्याय) ४-१२ अ० में सत्य सृष्टि का वर्णन है। (१ अध्याय) ५-१३ अ० से १६ तक जीव-सृष्टि उपोद्घात है। (७ अध्याय) इस प्रकार १६ अध्यायों में पञ्चधा बन्ध-प्रकार से सृष्टि का निरूपण प्रथम प्रकरण में है। श्रीशुकाचार्य के अभिप्राय से यह प्रकरण विभाग है। ख. प्रकरण- मुक्ति सृष्टि । ५ अमान्तर प्रकरण । ६-२० अ० से ४ तक तमुक्ति का वर्णन है । (५ अध्याय) ७-२५० में पाल मुक्ति का कयन है (१ अध्याय) ८-२६ अ० से २७ तक गुणातीत मुक्ति का वर्णन है। (२ अध्याय) --२८० में सगुण मुक्ति का वर्णन है। (१ अध्याय) ५०-६ अ० से ३३ तक जीव-मुक्ति पा क्यन है। (५ अध्याय) इस प्रकार १४ अध्यायों से मोक्ष प्रकार से सृष्टि का द्वितीय प्रकरण में निरूपण है। यह शुराचार्य के अभिप्राय से है।

प्रमाण प्र० समाधिभापा [ १५३ मैत्रेय सपि के अभिप्राय से इम सन्ध मे १ अधिकार प्र० - सृष्टि प्रकरण ३ उपपत्ति प्र० और ४ फल प्रकरण ऐसे चार और अपान्तर दश ही प्रकरण हैं। इसका विशेप विवरण घनश्याम भट्ट ने भागवत प्रकरण विभाग में किया है। सर्गादि दशविध लीलाएँ तृतीय से लेना द्वादश तक दस सन्धों में परिणत की गई हैं। अत इस स्कन्ध मे सर्ग-सृष्टि-नीला का वर्णन है। सृष्टि लौकिक अलोकिक भेद से द्विविध है, अतः मुरय दो प्रकरण है । यद दोना सृष्टि तेतीस प्रकार की होती है। वृहदारण्यक के निर्देशानुसार ३३ देवता (द्वादश आदित्य, एकादश रुद्र और आठ वसु) तथा इन्द्र और प्रजापति रूप से हैं, अत. इसमे ३३ अभ्याय है। यह अलौकिक सृष्टि-भेद है। लौकिक स्मृष्टि भी .८ तन और चतुर्विध भूतबीज और काल इस प्रसार ३३ प्रकार की होती है अत उसम भी यही अध्याय हैं। लोरिक-वन्ध--सृष्टि में अपातर पाँच प्रकरण हे, ५ गुणातीत सृष्टि, सगुण सृष्टि, ३ काल सृष्टि. ४ मुक्त जीर सृष्टि, ५ भुक्त जीर सृष्टि उपोद्घात एं। गुणातीत सृष्टि में ६ अध्याय है, वह तत्व और मार्य भेद से द्विविय और प्रतिवन्ध निवृत्ति, शुद्धि, तीर्थाटन और अवणासक्ति इन 'चारों को मिला कर वार्णत करने से इममें ६ अध्याया की अपेक्षा है। मगुग्ण मृष्टि साधिर, गनम, तामस विविध भेद वाली है अत. इम प्रकरण म तीन अध्याय अपेक्षित हैं। फाल स्यूल ओर मूक्ष्म भेद में द्विविध है अत. काल-सृष्टि प्रागा में दो प्रक मुक्त नीच-मष्टि र हो प्रारी है शत एफ हो अध्याय है। मुक्तजीप-मृष्टि के योद्घात ग वर्णन मात अध्यायों में किया गया है। इम प्रसार १६ अध्याया मे यन्ध सृष्टि का विस्तार कहा गया है। जैमामि उपर कहा गया है मुत्ति लष्टि भी पाँच प्रकार की है, अन. इममें भा पार प्रमाण है। श्रीर १० श्रयायों से इस निम्रग। . है 1 [ शु० पु० संस्तृत वाडमय तत्वमुक्ति के प्र० में पाँच अ० हैं। एक से मोक्ष के उपोद्घात का और चार से पुरुष-मुक्ति का प्रतिपादन हुआ है। कालमुक्ति-निरूपण द्वारा मुरय भक्ति पा क्थन है, जिसके लिये एक ही अन्याय है। गुणातीत मुक्ति लीला निरूपण में दो अध्यायों से ज्ञान का निरूपण है। मगुण मुक्ति लीला-प्रकरण मे एक अध्याय से योग का निरूपण है। जीवमुक्ति लीला-प्रकरगा मै पहिले एक श्र० से योगशेषाभूत भक्ति का नि० है । बाद दो अध्यायों से वैगम्य दो अभ्यायों से स्त्री जीव मुक्ति का कथन है। इस मुक्ति-मृप्रि-प्रकरण मे १४ अध्यायो मे प्रतिपादन है । इनमे बरिणत उपाख्यानों के अध्ययन से यह मन सहज ही समझ में आ जाता है। विस्तार भग से यहाँ प्रमगो रा नाम निर्देश नहीं किया गया है। इस प्रकार सर्ग लीलारूप तृ० मध के १६ मे १० प्रकरणी बन्ध और मुक्ति द्विविध सृष्टि का प्रतिपादन है। ४--चतुर्थ-स्कन्धार्थ विसर्ग निरूपण (३१ अध्याय) विसर्ग-~-पुरुषार्थ । T प्रकरण-रुधर्म सार्थ ग-साम घ-मोक्ष (१०५ से ७ (१८ मे १०) (३.८ १३ मे २३) (२४ मे३१) ५ १ प्रारणा-धर्म पुस्पार्थ । १ अध्याय मे ७ ता. १ अग्निष्टोम, : उक्य, पोटगी, ४ अनियर ५ श्राप्त, ६ थाम, याज्ञपय, यात धर्मों का वर्णन । * प्रार-अर्थ पुरपार्थ । ८ अध्याय मे १ तर, · माधन स, माध्य में, ३ मनृपदंश में ५ दोनिवृत्तिम, ५ फल प्रानि में । ३ प्रकरण - Tाम पुग्चार्य । १५ ग्राम .६ तर, श्रयान-16 प्रकरणा- (११ प्रद)१ गाविभाव माम प्र०,३ यामप्र , .

१५६ ] [ पु० पु० संस्कृत वाङ मर जीव-जय नहा-जय (अ००५) । अ०२६) • स्थान शब्द के यौगिमार्थ-स्थिति के अनुसार द्वि० पक्ष स्थान-सर्वत्र स्थिति क-देशस्थिति स-पालस्थिति ग-आत्मस्थिति भूभुवः स्वः। मास ऋतु लोक आदित्य । जीवात्मा परमात्मा ३ १२ २ स्थान स्थिति ५ 1 क-स्वरूप-स्थिति य-देश-स्थिति (३ प्रकरण) ( 3 प्रारण) १. अध्याय १ से ६ भगवान से स्थिति का वर्णन है। श्रध्याय ७ से १५ योग से स्थिति का वर्णन है । ३. अध्याय १५ में ज्ञान से स्थिति का वर्णन है। म-देश-स्थिति ४. अध्याय १६ से २० भूमिति का वर्णन है । ५. अध्याय २१ से २३ भुवः स्थिति का वर्णन है। ६ अध्याय ४ से २६ स्वःस्थिनिया वर्ग स्थान शब्द के दो अर्थ होते हैं (१) " अनुमार भगवान की सर्वत्र विजय, और। स्थानम्" के अनुसार सर्वत्र स्थिति । अतः यो किया जाता है। प्रथम पक्ष-विजय करने का भगवान् प्रत्येक पदार्थ को भग्नी-मरनी करते है। यह पदार्थ प्रापन और अप्राकृन र प्रारत पदार्थ :४ है, अतः प्रत्यय . प्रमाण ० "समाधिभापा] [ २४ अध्याय है, और अप्राकृत पदार्थ जोय तथा ब्रह्म हा से द्विविय है, एतारता दोनों को मिला कर २६ अध्याय में इस विजय का प्रति- पादान है। द्वितीय पक्ष-स्थिति करने का तात्पर्य दन-उन तत्वो में जिनसे मृष्टि है सकीय विद्यमानता-सत्ता का प्रवेश करना है। देश तीन प्रकार के हैं, जो लोकात्मक है। इसलिये तोन अभ्याय इसमें अपेनित हैं । १. माम, ५ ऋतु ३ लोक--ज्योतिर्मय । । श्रादित्य ओर • जीवात्मा परमात्मा मिला कर २६ होते हैं। अतः प्रत्येक के लिये एक-एक अध्याय अपेचित्त है, मो इस स्कन्व में २६ अध्याय हैं। १. स्वरूप-स्थिति की दृष्टि से तीन प्रकरण हैं। प्र०१ में भगवान की स्वरूपस्थिति में १ से ६ अध्याय है। पड्गुणों से। प्र० मे अध्याय हैं, जिनमें अपांग योग के द्वारा भगवान् की पडगुण सम्पन्नता रा उल्लेख है, अतः योग से स्थिति के लिये ७ से लेकर १४ तक पाठ अध्याय है। प्र. ३ मे १५ वाँ एक अध्याय है जिममें ज्ञान से स्थिनि का वर्णन है, या स्थिति में फत्र १५ अध्याय हैं। .. देश-स्थिति की दृष्टि से तीन प्रकरण हैं। प्र०५ में भूमि पंच भूत प्रधान होने से इस भू-प्रकरण में पांच अध्याय हैं, जो १६ से तक है। प्र०५ में भुगर्लोक में तीन गुणों का प्राधान्य होने से तन्निर्दशक २१, २२-३ तीन अध्याय हैं। प्र.६ मे स्वर्लोक भी निगुणात्मक है अतः इसमें भी तीन अध्याय अपेक्षित हैं अतः २४, २५, २६ यह था यहां है। इस देश स्थिति प्रकरण में ११ अध्याय हैं और दोनों मिला कर २६ अध्याय है। इस पार स्थान लीला के ६ अध्याय और ६भारणों में विश्य का प्रतिपादन है, जिनका सप्टीपरए उपाख्यानों में होता है।

[ पु० पु. संस्कृत वाड मय जीव-जय ब्रह्म-जय (अ००५) ( अ०२६) • स्थान शब्द के यौगिमार्थ-स्थिति के अनुसार द्वि० पक्ष स्थान-सर्वत्र स्थिति -देशस्थिति ख-भालस्थिति ग-अात्मस्थिति भूभुवः स्व.। मास ऋतु लोक आदित्य । जीवात्मा परमात्मा १२ ३ १२ २ स्थान स्थिति ५ क-स्वरूप-स्थिति स-देश-स्थिति (३ प्रकरण) (३ प्रमरण) १. अध्याय १ से ६ भगगन से स्थिति का वर्णन है। अध्याय ७ से १५ योग से स्थिति का वर्णन है । ३. अध्याय १५ में ज्ञान से स्थिति का वर्णन है। रा-देश-स्थिति ४, अध्याय १६ से ५० भूमिति का वर्णन है । ५. अध्याय २१ से २३ भुवः स्थिति का वर्णन है। ६ अध्याय २४ से २६ स्त्र स्थिति का वर्णन है। स्थान शब्द के दो अर्थ होते हैं (१) 'स्थिति वैकुठविजयः' के अनुमार भगवान की सर्वत्र विजय, और (२) "स्थीयते अस्मिन् इति स्थानम्' के अनुमार सर्वत्र स्थिति । अतः यहाँ दो प्रकार से विचार किया जाता है। प्रथम पक्ष-विजय करने का तात्पर्य स्वाधीन करना है। भगवान् प्रत्येक पदार्थ को अपनी-अपनी मर्यादा के अनुमार स्थापित करते हैं। यह पदार्थ प्राकृत और अप्राकृत दो प्रकार के हैं। प्रारत पदार्थ ४ है, अत प्रत्येक पर विजय प्राशन स्प प्रमाण . समाधिमापा] ܢܝܙ २४ अध्याय है, और अप्राकृत पदार्थ जीव तथा ब्रह्म रूप से विविध है, एतारता दोनों को मिला कर २६ अध्याय में इस विजय का प्रति- पादन है। द्वितीय पक्ष-स्थिति करने का तात्पर्य उन-उन तत्या में जिनसे मृष्टि है समीय विद्यमानता-सत्ता प्रवेश करना है। देश तीन प्रकार के हें, जो लोकात्मक है। इसलिये तीन अध्याय इसम अपेक्षित हैं । १. माम, ५ ऋतु ३ लोर-योतिर्मय । । आदित्य और • जीवात्मा परमात्मा मिला कर ०६ होते हैं । अत. प्रत्येक के लिये एक-एक अध्याय अपेक्षित है, सो इस सन्य में २६ अध्याय है। १. सरूप-स्थिति की दृष्टि से तीन प्रकरण हैं। प्र. १ मे भगवान् की सरूपस्थिति मे १ से ६ अध्याय हैं। पड्गुणों से। म०२ मे अध्याय हैं, जिनमें अष्टाग योग के द्वारा भगवान् की पडगुण सम्पन्नता का उल्लेख हे, अत. योग से स्थिति के लिये ७ से लेकर १४ तक आठ अध्याय हैं। प्र० ३ मे १५ वॉ एक अध्याय है जिनमें ज्ञान से स्थिति का वर्णन है, स्वरूप स्थिति में एकत्र १५ अध्याय हैं। २. देश-स्थिति की दृष्टि से तीन प्रकरण हैं। ३० ४ मे भूमि पच भूत प्रधान होने से इस भू-प्रकरण में पाच अध्याय हैं, जो १६ से २० तक है। प्र०५ में भुगर्लोक मे तीन गुणो का प्राधान्य होने से तनिर्देशक २१, २२ २३ तीन अध्याय हैं। प्र.६ में स्वर्लोक भी त्रिगुणात्मक है अत इसमें भी तीन अध्याय अपेक्षित हे अत. २४, २५, २६ यह अ. यहा है। इस देश स्थिति प्रकरण में ११ अध्याय हैं और दोनों मिला फर २६ अध्याय हैं। इस प्रकार स्थान लीला के २६ अध्याय और ६ प्रकरणों में विषय का प्रतिपादन है,जिनका सप्टीकरण उपाख्यानों से होता है।

१५८ ] [ - पु. संत वाङमय ६---पष्ठ फन्वाय-पापण-निरूपण (१६ अध्याय) पोपण -पुष्टि . प्रत्रण र नाम र व्यान ग अर्चन ३ ( १०१ मे ३) (अ०४ से २७) (अ०१८, १६) अरण कीर्तन स्मरण । म्पक १५ गुण । बाह्य और प्राभ्यन्तर । १ प्रारण नाम-म चण कीर्तन और स्मरण की विविधता के कारण १ से ३ अध्याय है। प्रकरण ध्यान रुप सम्बन्धी १४ गुणों के कारण ४ से १७ तक चतुर्दश अध्याय म वर्णित हैं । ३ प्रकरण अर्चन, वाव और आभ्य तर भद से द्विविध है श्रत इसके लिये १८, १६ दो अध्याय हैं। स्थित पदामों की अभिवृद्धि को पोपण कहते है। यही 'पुत्रि शद यान्य वह तत्व है जो पुगिमार्ग का मूल आधार है । प्रातुत पष्ट सच में इसी अनुप्रह का वर्णन है । "पापण तदनुग्रह" और "कालादि गायक अनुग्रहापरनामा वीर्य विशेष रूपो भगवद्धर्म पुष्टि इस सुबाधिनी की परिभापा क अनुसार जीव क काल, कर्म, स्वभाव का भी बाधक होकर भगवान का नो विशेष पगम्म रूप अनुग्रह जोनों पर प्रार होता है उसे पोषण' कहा जाता है। यह अनुग्रह नाम, ध्यान और अर्चन को निमित्त बना कर प्रकट होता है अत इम मधम तीन प्रारम्ग है। नाम अपण कीतन और स्मरणात्मर त्रिविध भक्ति पर प्राचारित है अत इस प्रथम प्रारण म म म तीन अभ्याय द्वारा इसका वर्णन हुया है। ध्यान भगवदृप से मागन्धित है । यह १४ गुण घाला है अत ४ मे १७ अध्याय पर्यत १४ अ. मे इसका निरूपण है भगवान श्रादरि चौदह गुपा म ध्यय होत है- स्यम्प स मोनप्रद हैं • रस मे पानाप्रद है ३ गय से भक्ति ४ स्पर्श स मारहारी क .

प्रमाण प्र०. समाधिभाषा ] [ १५६ ५. माद मे मनोहर है। ६. योग से आम प्रवेश-प्रद हैं ७. द्वेप से बालमोक्षप्रद है - मामी रूपसे मसुखदाताहै ६, हीन भाव से दुखप्रद है १०. केवल रूप से मालार्धप्रद है, ११. प्रमीत-नातज्ञान रूप से योगप्रद हैं १२. भेद रुप से मृत्यु प्रद हैं १३. यथास्थित रुपमे जानप्रद है १४. स्नेह से वश्य हैं। इस प्रकार ध्यान-प्रकरण मे १४ अध्याय हैं जो ४ से १७ तक हैं ग. अर्चन, वाह्य और आभ्यन्तर भेद से द्विविध है प्रतः १८ और १६ इन दो अध्यायों मे इमरा वर्णन है। इसके अतिरिक्त जैसा कहा गया है पुष्टि कर्म, काल और स्वभाव को बाधिमा है-अत: इस रूप में उसका सन्धार्थ इस प्रकार होगा। . . क. र्म पॉच प्रकार के हेतुओं पर अलंबित है-१ अधिष्ठान, २ कर्ता, ३ करण--इन्द्रिय, ४ चेपा, ५ देव । भगवनुग्रह इन सरका चाधक होकर फल प्रद होता है अन• इसके लिये १ से ५ अध्याय वर्णित हैं। काल, द्वादश मासानक है । पुष्टि काल की बाधा है अतः इसके लिये ६ से लेकर १७ तक द्वादश अध्याय वर्णित है। स्वभाव, देव और प्रासुर भेद से द्विविध है अतः १८ ये अध्याय मे देव और १६ वे में आसुर स्वभाव के बाध का प्रतिपादन है। इस प्रकार पुष्टि (पोषण, अनुप्रह ) का निरूपण १६ अध्यायों में किया गया है जिनमें तीन प्रकरण है। ७-मप्तम स्कन्धार्थ-ऊति कर्मवासना-निरूपण (१५ अध्याप) ग. ऊति-कर्मपामना प्रकरगा क. असहासना स, सहासना ग. मित्रयासना (१ से ५०) (६ से १० प्र०) (११ से १५ १०) पंचपी अविद्या पचपर्श अविद्या पच पर्या अविद्या [ शु० पु. संस्कृत वाइ,मय अथवा कर्म - क- आध्यात्मिक स- आधिदैविक ग-आधिभौतिक ( पाँच अ०) (पाँच अ०) (पाँच श्र०) १ प्रारण--१ से ५ अध्याय तक असद्वासना के अविद्या के पाँच पों का निरूपण है। २ प्रकरण--६ से १० अ. तक सद्वासना से अविद्या के पांच पयों का निरूपण है। ३ प्रकरण--२१ से १५ १० तक मिश्रवासना से अविद्या के पांच पों का निरूपण है। अथवा कर्म आध्यात्मिक आदि भेद से विविध है और प्रत्येक के अविद्या के पांच पर्व होते हैं, तावत्ता प्रत्येक में एक-एक अन्याय का प्रसंग है । अविद्या के पाच पर्वः--१ स्वरूपाज्ञान - देहा- ध्यास ३ इन्द्रियामास ४ प्राणाध्यास ५ अन्तःकरणाध्यास है। किंच धर्म के गीता के अनुमार पाच हेतु होते हैं- १ अधिष्टान • रो ३ करण ४ चेष्टा ५ देव । इम प्रकार यह पाँनां श्रा यामिरादे भेद से पन्द्रह प्रकार के हैं। इन मप्तम स्कन्ध में जिममे कर्मवासना का निस्पण ६, और जिमे उनि लीना कहा जाता है, धि में भगवान का एक प्रगर का सीनों के प्रति पत्नपात भासित होता है, जिससे मृष्टि म उनके प्रति यौपम्य दोप महज ही प्राजाता है। हम दोप में परिहारार्थ यह यह गया है कि-प्रमु घान मर्यादा के अनुमार यामना के अनुम् जीयो को फल प्रदान करने है, पतायता वामना मे बचने के लिये उसरा यियन करना अपेनित होता है। जीवों को यह बामनाएं उक्त प्रसार में परदगार की हो जाती है, यह यनाने में लिये पन्द्र' अयाय इम म्बन्ध में प्रनिप्रित है।

-- प्रमाण प्र..."समाधिभाषा ] [ १६१ इस प्रकार पन्द्रह अध्याय और तीन प्रकरण में उति लीला का निरूपण किया गया है, जिसके प्रत्येक प्रकरण में पांच पांच अध्याय हैं। ८-अष्टम स्कन्धार्थ-मन्यन्तर-सद्धर्म-निरूपण । ( २४ अ.) मन्वन्तर -सद्धर्म- । ६ . प्रकरण क. हरिस्मरण ख. दान ग. स्योक्तनिर्वाह : घ, मत्स्य चरित्र' (१से ४ अ०) (५ से १४०) (१५ से ३ अ०) (२४ वां अ०) १० १ १ प्रकरण-१ से ४ अ० तक धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष-चतुर्विध पुरुषार्थ का वर्णन है। २ प्रकरण-५ से १४ अ० तक दस अध्यायों में गुणों के मिश्रित नव और निगुण इस तरह दश विध दान का निरूपण है । ३ प्रकरण-१५ से २४ अ० तक अध्यायों में दानोक्त प्रकार के अनुसार नव विध स्वोक्त निर्वाह का प्रतिपादन है। ४ प्रकरण-२४ वे अ० में एक अध्याय से धर्मवक्ता मत्स्यावतार का प्रतिकथन है। इसे प्रकार अनुप्रहीत-पुष्ट-भक्तों के आचार निरूपण में सद्धर्म- सदाचार का निरूपण मन्वन्तर लीला कहलाती है। (द्वि० स्क. सुबो० प्र० १ श्लोक ) गनु आदि महर्पि द्वारा प्रोक्त महान् धर्म विविध है-१ आपत्ति में हरिस्मरण, २ सपत्ति में सर्व दान, और स्वोक्त वचन का निर्वाह । इस स्कन्ध में इसी त्रिविध सिद्धर्ग का प्रतिपादन है, इस विविध धर्म के वत्ता स्वयं मत्स्यावतार-धारी श्री हरि है, अतः अन्त में उनका चरित्र है। इम प्रकार २४ अध्याय और चार प्रकरणों में अष्टम स्कन्धार्थ को मन्यन्तर सद्धर्म निरूपण लीला का प्रतिपादन है। है--नवम स्कन्धार्थ ईशानुकथा निरूपण ( २४ श्र०) प्रकरण स्था क हरिकथा म हरिभक्त कथा [ शु० पु० सस्कृत वाङमय ईशानुक्था का पल क. दुस निवारण ख सुख प्राप्ति म --- ५ सगुणभक्तद्वारा २ ज्ञानीभक्तद्वारा ३ भगवञ्चरितद्वाप भत्तद्वारा भगवटारा । । १ से अ०) (१०वा अ०) 1(१४ से -३ अ०)(२४वॉन) 1 कर्म जान भक्ति (११वा, १२वां, १३ वा अध्याय) सदाचार में विष्णु भक्ति का नाम वंशानुकथा' कहा जाता है। ( भा० द्वि० सु०प्र०१ श्लोक) नवम स्वम म ईश और उनके अनुवर्ती भक्तों की क्या है, इसके अवण का फल दो प्रकार का है, १ दुख निवारण और २.सुसप्रानि । १. प्रकरण--दु ग्य निवारण चार प्रकार स सभव है। १ सगुण भक्तों द्वारा जो गुणभेद से नाविध होते हैं और इमीलिये १ से. तान्नका वर्णन है । ज्ञानीभत्त द्वारा जो एक प्रकार का है अत ११३० में उमा वर्णन है। ३ भगान्धरित्र द्वाग, जी फर्म, जान, भषि इम भेद में तीन प्रकार हैं, अत १ मे लेकर १४ तर मश उनका वर्णन है। प्रकरण-मुरा-प्रानिदो प्रकार मे मभर है-- १ भगरदनुवर्ती -भक्त द्वारा जो विविधगुग्ण भेद मनी प्रकार और निगम्प पर इस तरह १० प्रकार होते हैं, प्रत यहाँ प्रमरा. १५ मे लेकर अनबनी अ. में इमरा यान है। - - प्रमाण प्र.'"समाधिभाषा ] १६२. २. भगवद्वारा जो एक प्रकार का है, अतः एक अ० चौबीम के द्वारा इसका प्रतिपादन है। ईशानुकथा रूप नवम स्कन्ध में सूर्यवंशीय भत्तों के और भगवान श्री राम के चरित्र १२ अ० में वर्णित हैं, १३ से २४ तक चन्द्र वंशीय भक्तों और श्रीकृष्ण के चरित्र की सूची है। इस प्रकार २४ अ. इस स्कंध में हैं । १३३ अ० में कथित निमि वंश का संबंध सूर्यवंश के साथ होने से उस अका संबंध इधर भी गिना जाता है। १०-दशम स्कंधार्थ-निरोध निरूपण (अ० ८७ और ३ प्रक्षिप्त) निरोध प्रकरण १ जन्म प्र.२ तामस प्र.३ राजस प्र.४ साविक प्र.५ गुण प्र. (४०) (८ अ०) (२८ अ०) (२१ अ०) (६ अ०) १ प्रकरण जन्म प्रकरण (१ से ४ अ.) । । । ब्यूह प्राकट्य--१ वासुदेव २ संकर्पण ३प्रधम्न ४ अनिरुद्ध (१ अ०) (१०) (१०) ( १०) २ प्रकरण-तामस प्रकरण (५ से ३२ अ.)-(२८ अ०) प्रमेय प्र. फल प्र प्रमाण प्र० साधन प्र० (७ अ०) (७ अ०) (७ अ०) ५ मे ११ अ० १२ से २८ अ०१६ से २५ अ० २६ से ३२० ३ प्रकरण- राजम प्रकरण (३३ से ६०अ०-२= अ.) - - प्रमेय प्र० । प्रमाण प्र० साधन प्रक फल प्रक (७०) (७ अ०) (७०) (७०) ३३ से ३६ अ. ४० से ४६ अ०४७ से ५३ १०५४ से ६०० १६४ ] [ शु. पु. मस्कृत वाडमय ४ प्रकरण-सात्विक प्रकरण (६१ से ८१ अ०-२११०) प्रमेय प्र० माधन न फल प्र० (७ अ०) (७०) (७०) ६१ से ६७ अर ६८ से ७४ अ० ७५ से १० प्रमाण, प्रमेय, सारन और फल यह चारी ऐश्वर्यादि ६ धर्म और सप्तम धर्मी, इस प्रकार सात भेट से प्रत्येक गुण सात प्रकार का होता है, अत निगुण मे सात सात से इनका निरूपण होने के कारण प्रत्येक मे मात अध्याय है। सात्विक भाव में प्रमाग की थावश्यक्ता नहीं होती, साविक भक्ता का अन्त मरण ही प्रमाण होता है, अत इम प्रकरण में प्रमेय, माधन और पल यह तीन ही प्रकरण है। ५ प्रकरण गुण प्रकरण ( ८२ से ८७ अ०-६ अ०) - ज्ञान ८२ वा श्वर्य धर्म यश श्री० वैराग्य (१०)(१०) (१०) (१ श्र०) ( १०) (१ अ०) ८४ ८७ वा दशम स्कन्धा-तर्गत १२, १३ और १८ यह तीन अन्याय कोतुक लीला के निरूपन और प्रक्षिप्त माने जाते हैं, अत इस मरया का परिवर्जन पर अध्याय मग्या गिननी चाहिये। पत्र दोनों को मिला कर इम स्पध में ६० अ० है । उक्त अध्यायों की प्रक्षिप्तता के ममर्थन में इमका प्रतिपादा एक प्रथक प्रन्य ६ जिसरा परिचय यागे दिया जा रहा है। निरोष लीला प्रतिपादर शम संघ पुम्पोत्तम का हृदय स्थानीय है। हृदय म भायामिका अभियक्ति होता है। यह भाव देनादि- विषया रति, प्रेम, भक्ति आदि नामों से अभिहिन होती है। हृदय की यह पन्ध प्रान्तर गृत्ति १ पात्मन्य, : दाम्पत्य, ३ मग्न्य भाय की प्रमाण प्र०...ममाधिभापा ] अनुकारिणी होती है, अतः इस स्कंध में तीनों धाराओ का व्यापक प्रतिपादन है, जो वरवस हृदय को आकर्षित कर लेता है। अंगोपांग के साथ इन विविध मात्विक वृत्तियों का प्रांजल निरूपण अन्यत्र कहीं नहीं मिल सकता। भक्तों के प्रपंच का अभाव और स्वकीय शक्तियों के साथ परमात्मा का भत्त-हृदय में शयन (निवाम) निरोध कहलाता है। प्रापचिक विषयों से हटाकर भक्त को स्वविषयों के प्रति लीला द्वारा आकृष्ट करना भी निरोध है। जिसका इस स्कंध में निरूपण है। ( भा० द्वि० स्क० सुबो० प्र० अ० १ श्लोक) यह निरोध ही महाफल माना जाता है । इसके पाँच प्रकरणो का संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है-- १. जन्म प्रकरण-चार अध्यायो मे चतुर्विध व्यूह प्राकट्य लीला का कथन है । क्रमशः अध्यायों में १ विषय हेतुता, २ अवतारो- द्यम, ३ रूपान्तर-स्त्रीकरण, और ४ माया से नाट्य का क्थन है। २. तामस प्रकरण- प्रमाण, प्रमेय, साधन और फल की दृष्टि से इसके अवान्तर विभाग हैं, जिना प्रत्येक का ६ धर्म और ७ वो धर्मी इस तरह सात-सात रुप मे कथन हैं, अत: २८ ० हैं। मध्यवर्ती तीन प्रक्षिप्त अध्याय मिला लेने पर ३५ वे अ० पर इस प्रकरण की समाप्ति है। ३. राजस प्रकरण--इसमे भी उक्त प्रकार से विभागों के कारण हो २८ ० हैं। प्रदिप्त को मिला लेने पर ६३ वे अ० पर इसकी समाप्ति है। ४. सात्विक प्रकरण--इसमे प्रमाण की आवश्यकता न होने से केवल प्रमेय, साधन, और फल के लिये उक्त प्रकार से प्रत्येक के लिये सात-सात अहोने से २१ अध्याय में इसकी यूति है। प्रक्षित को मिला लेने से ८४ अ० पर इसकी पूर्ति है। ५. गुण प्रकरण--जिसमे. भगवान के पविध गुणों के निरू- पण में एक-एक अध्याय से ६ अध्याय हैं, प्रक्षिप्त को मिला लेने पर ६० श्र०पर इम स्कंध की पूर्ति हो जाती है। जैसा कि अपर कहा गया है, १२, १३, और १४ यह तीन । भु० पु. संस्कृत वाड, मय अवसहरण और ब्रह्मस्तुति के प्रक्षिप्त है, यद्यपि इन पर श्रीवल्लभा- चार्य ने सुबोधिनी टीका रची है, दशम के उक्त प्रकरणों के आधार पर ८७ ही अन्याय स्वीकार किये गये हैं। और इसी आधार पर ३३२ अध्यायों की गणना की जाती है। श्रीवल्लभाचार्य ने दशम को निरोध रूप में और अन्य तिलक- कारो ने इसे आश्रय रूप माना है । इस दशम विभाग के लिये सुबो- धिनीकार ने परिज्ञानार्थ एक कारिका लिग्यो है जिससे उसका सम्या परिचय मिलता है। (१) चतुर्भिश्च (२) चतुर्भिश्च (३) चतुर्भिश्च (४) त्रिभि स्तथा । (५) पडभि विराजते योऽसौ पञ्चधा हृदये मम । (१) चतुर्भिश्च-जन्म प्रकरण के चार अध्यायों से । तामस प्रकरण के प्रमाण, प्रमेय, साधन, फल अध्यायो से। राजस (४) प्रिभिः--साधिक प्रकरण के प्रमेय, माधन, और फल अध्यायों से। (५) पभि.-ऐश्वर्यादि ६ गुणां से ६ अध्यायों से । इस प्रकार पञ्चधा-पाँच प्रकरण है। ११-एकादश स्कन्धार्थ-मुक्ति निरूपण-(३१ अ०) मुक्ति (२) " " " " " । प्रकरण क-जीव मुक्ति (१ अ० से ५) य-ब्रह्मा मुक्ति ( ३० और ३१ अ०) प्राभाय मुक्ति मायुज्य मुक्ति शानद्वारा भक्ति द्वारा पैराग्य, मांख्य, योग, तप, भक्ति (६ से २० (१० २५० ३५० ४१०५०) ४ तत्व) प्रमाण प्र० समाधिमापा ] [ १६७ एकादश स्कन्धार्थ मुक्ति है। निष्प्रपञ्च भत्तों को स्वस्प लाभ होना मुक्ति कहलाता है, जिसरा सीधा अर्थ अन्यथा रुप का त्याग पर स्वरूपारस्थान भी है। अत इस सब मे इसी का प्रतिपादन है। इसमें इस प्रकार प्रारण हैं- १ प्रपरण-जीव मुक्ति में अविद्या के नाश और विदा-प्राप्ति के द्वारा ज्ञान से ब्रह्मभाव की प्राप्ति रूप मुक्ति का वर्णन है। घिद्या-ज्ञान के पाँच पर्व है-१ वैराग्य, मारय, ३ योग, ४ तप, ५ भक्ति । इनका एक-एक अध्याय से वर्णन है, अत. प्रथम से लेकर पाँच अध्याय इसमें प्रयुक्त है । इसके अधिकारी राजर्षि जनर हैं। जीर मुक्ति का दूसरा प्रसार मायुज्य मुक्ति है। २४ तत्वों का अतिक्रमण ही सायुज्यभाव कहलाता है, अत ६ १० से लेकर २६ अ० तक इन २४ तत्वों का संकेत है-यह सायुज्य भाव भक्ति से लभ्य है जिसके अधिकारी उद्धर , अत इसमें -४ ० हैं। २ प्रकरण-ब्रह्म मुक्ति है, जिसमें ३० और ३१ यह दो अ० हैं । अहन्ता अयच ममतात्मक मानव नायरा परित्याग करने के कारण यहाँ ब्रह्म की मुक्ति का उपदेश किया गया है, एतदर्थ दो अ. इस प्रकार एकादश रफ्ध के मुक्ति लीला का ३१ अध्यायों द्वारा प्रतिपादन है। १२-द्वादश स्कंधार्थ-आश्रय-निरूपण (१३ अ०) प्राश्रय प्रकरण ५ क-कृष्णाश्रय स-जगदाश्रय ग वेदाश्रय घ-भक्तियोगाश्य ड-भागवताश्रय (१,२,३, अ०) (२|| अ०) (२अ०) (३ अ) (३ अ०) ६,७०८ से १० अ०११ से१३अ मुक्त जीया का ब्रह्म स्वरूप से अवस्थित होना आश्रय कहलाता है। द्वादश स्कय में आश्रय लीला का निरूपण है जिसके लिये निन- लिखित प्रकरण है- ४,५] श्रा

१६८ ]
[ शु: पु० सस्कृत वाडमय
१ प्रकरण-कृष्णाश्रय प्रकरण है, जिसका प्रथम तीन अ० मे
कथन है।
२ प्रकरण-जगदाभय प्रकरण है, जिसका चौथे, पॉचयें, और
छठे अ० के प्राधे भाग में अढाई अ० में प्रतिपादन है।
३ प्रकरण-येदाश्रय प्रकरण है । छठे अध्याय का प्राधा और
सातवां पूर्ण अध्याय डेढ़ अध्याय इसके अन्तर्गत है ।
४ प्रकरण-भक्तियोगाश्रय है, जिसका ८, १०, तीन अध्यायो
में विस्तार है।
५प्रकरण-भगवताश्रय है, जिसका निरूपण भी ११, १२, १३
तीन अध्यायों में है।
इन सब अध्याओं की संगति का सहेतुक वर्णन भोगवत निबन्ध
के सुन्दर ढग से कहा गया है, विस्तार भय से यहाँ संक्षिप्त परिचय
दिया गया है।
भागवत साक्षात् श्रीकृष्ण स्वरूप है, अत. इसमें भी तद्बोधक
६ धर्मों का समावेश इस प्रकार है-
१ और २ स्कन्धों से ज्ञान का निरूपण है।
३ और ४ सन्ध से वैराग्य का निरूपण है।
५ और ६ स्कन्ध से वीर्य का निरूपण है।
७ और = स्कन्ध से ऐश्चर्य का निरूपण है।
। श्रीर १० स्कन्ध से यश का निरूपण है।
११ और १. स्कन्च से श्री का निरूरण है।
(भा० नियन्य प्र० स० कारिका ४० मे ४२)
इम प्रसार श्राभय निरूपक द्वादश स्कन्ध में १३ अध्याय और
पाँच प्रकरण रहे हैं।
सुबोधिनी का प्रतिपाद्य विषय, भागवतीय वाक्यार्थ,
पदार्थ और अक्षरार्थ।
जैसा कि प्रथम कदर जा चुका है, भागवत शाग्र ग उम
अन्तर्मन सन्या पा फन्धानगंत प्रकरणः या और प्रकरणान्तर्गन

प्रमाण प्र० उपलब्ध समाधिमापा ] [ १६६ अध्यायों , नथा तदन्तर्गत वाक्यों का, श्लोकों का, और श्लोकान्न पाती पदा का अथच पदान्त पाती अक्षरों का, यह सर मात प्रकार का अर्थ भागरत का प्रतिपादनीय है। प्रथम चार का निरूपण 'भागवत निबन्ध' मे और शेप तीन का 'सुघोधिनी' नामक भागवत-व्याख्या में है। इन सातो का एकत्र समन्वयात्मक अविरोधी अर्थ ही मौलिक सिद्धान्त का सम्यक् निरूपक होता है । एतारता मुबोधिनी-परिज्ञान के लिये भागवत निवन्ध का अध्ययन परमावश्यक है। भागवतार्थ-परिज्ञान की परिपाटी में श्रीवल्लभाचार्य ने सर्व प्रथम सूक्ष्म टीका का प्रणयन किया है, इसके अनन्तर भागवत तस्वदीप निबन्ध को और बाद में सुनोविनी की रचना हुई है। सुबोधिना म कई स्थलों पर 'सूदमटीका' का नामोल्लेख मिलता है। भागवत- निवन्ध की कई कारिकाएँ तो सुबोधिनी होती ही हैं। व्याख्यान-पद्धति- प्राचार्य कृत सुबोधिनी और अन्य व्याख्याओं का परिचय आगे दिया जारहा है। प्रस्तुत सुबोधिनी म अव्यायानुमार श्लोकों का अर्थ पूर्वापर-सगति रूप में कहा गया है । इसके साथ यह भी निरूपित है कि श्लोकों में आगत पदों का स्वारस्य क्या है । यह पद-स्वारस्य ही वास्तव में पदार्थ है, जिसमे प्रकृति प्रत्यय का अक्षरार्थ भी संमिलित किया जाता है, ऐसे अव्यय जो एकाक्षरात्मक हैं उनके अर्थ की गभीरता का दर्शन कराना भी टीकाकार ने त्यागा नहीं है-श्लोकों में पाठ भेद का अगीकार परते हुए उसकी समीचीनता या अनुपयुक्तता मा भी दिग्दर्शन मिलता है । इस प्रकार वाक्यार्थ-जिसे श्लोकार्थ कहा जा सकता है के सार पदार्थ और अक्षरार्थ का समावेश सबोधिनी टीका की विशेषता है । जहाँ तक अन्य टीका का प्रश्न है, इस प्रकार का सूक्ष्म विवेचन अन्यत्र उपनध नहीं होता । अन्य टीकाकारों के अभिमत को सूचित करने और उनकी दृष्टि को समालोचना करने में भी सुसोधिनीकार का व्यापक पाडित्य छिपा नही रहा है, विभिन्न कोशों और शब्दानुशासन तथा धातुपाठो का आश्रय लेकर भी वाक्यार्थ की सगति लगाने का चमत्कार भी इस विवेचना में दर्शनीय है। .

१७. ] [ शु० पु० सस्कृत वाडमय उक्त व्यापक व्यारयान की रचना के विषय में स्वय प्रथकार वल्लभाचार्य कहते हैं कि-"इस निरानन्द लोक मे श्रानन्द रूप भागवत के अर्थ का निरूपण वाम्पति वैश्वानर श्रीप्रभु के अतिरिक्त अन्य कोई नहीं कर सकता, अत उन्होंने जैसे भागवत के प्राकट्यार्थ येदव्यास का अवतार धारण क्यिा था, उसी प्रकार मनुष्य रूप में मुझे भी प्रकट कर कृपावलोग्न द्वारा ऐसी सामर्थ्य प्रदान की है, और अाज्ञा प्रदान की है । अत मैं भगवान विष्णु और व्यास को प्रिय लगने वाली पद्धति पर भागवत के गूढार्थ को प्रकट कर रहा हूँ।" [अर्थ तस्य विवेचितु० सु० प्र० स्क० प्र० अ० भू.] "भागवत की व्यारया में वल्लभाचार्य ने न तो लक्षणा का ही सहारा लिया है और न न्यून पद से अन्य पद का अनुसन्धान ही किया है । परोक्ष-क्थन-जैसा कि पुरजनोपाख्यान है-को छोड़ कर यथार्थ प्राशय प्रगट करने की प्रतिज्ञा की है। "गमाया श्रोष" इस वाक्य में जैसे शब्द की एक शक्ति, लक्षणा द्वारा गगातटवर्ती घोप का बोध किया जाता है उस प्रकार भागपत में मुख्य अभिधा शक्ति का परित्याग कर गौण अर्थ का स्वीकार नहीं दिया गया है। न्यून पद रख कर अन्य पद की पूर्ति का प्रसग भी इस स्थान पर नहीं लाया गया है। कुछ स्थल ऐसे हैं जहाँ परोक्ष रूप से अर्थ का कथन है, यहाँ उसका परोक्ष रूपेण कथन कर मूल अर्थ की और सकेत हुधा है, ऐसे स्थलों का परित्याग कर शेप सभी स्थलों पर वास्तविक अर्थ का ही निरुपण भागवत की मुबोधिनी टीका म किया गया है- (सु०प्र० स्क० प्र० अ० कारिका) उपयुक्त सात प्रकार के अर्थ की अविरोध रूप से सगति करते हुए सुबोधिनी मे यद्यपि विषय का प्रतिपादन है तथापि प्राचार्य ने व्यवहारवश उत्तरोत्तर सातो अथों में पूर्व-पूर्व की अपेक्षा दुर्बलता तो स्वीकार की है। उसे भगवान् की लीला हो भागयत शास्त्र का अर्थ है, पर जहाँ प्रकरण आदि मे अन्य राजा आदि का भीतिर चरित्र आजाता है, यहाँ उसे उसी रूप में मानते हुए तादृशी भगवलीला का अंगीकार किया है, अत यहाँ शास्त्रार्थ की अपेक्षा प्रमाणार्थ में दुर्यलता का पाना महज दो है, और इसे व्यायाकार ने माना है- (सुमार. ना भूयारिका) शन्द की प्रमाण प्र० - समाधिभापा ] [ १७१ भापात्रैविध्य सुबोधिनीकार ने भागवत में तीन भाषाएँ स्वीकार की हैं। भाषा का तात्पर्य यहाँ दर्शन-प्रकार से है । अर्थात् भागवत में त्रिविध वर्णन है- (१) लौकिक भापा (२) परमत भापा (३) समाधि मापा-- १. लौकिक भापा से तात्पर्य उस प्रकार के वर्णन से है जहाँ भागवत में लोकसिद्ध वर्णन प्रस्तुत किया गया हो, यथा नदी, पर्वत, ऋतु, नगर आदि की शोभा और नागरिक व्यवहार का उल्लेख, जिसमें किसी सिद्धान्त की रूपरेमा नहीं निकलनी। इसे काव्यात्मक ढंग का वर्णन कहा जा सकता है। जैसे "नाना द्रुमलताकीर्ण" " अथोपस्युप- वृत्तायां कुम्वुटान् कूजजोऽशपन्" आदि लोकस्थिति का उल्लेख । २. परमत भापा, जहाँ अन्य ऋपियों के अभिमत का कथन है, जैसे “केचिदाहुरजं जातं." " एव वदन्ति राजर्षे ऋषयः केचनान्विताः" आदि । सम्वाद रूप में जहाँ ऋपियों द्वारा तत्वज्ञान का कथन है वहाँ अधिकाश परमत है। ३. समाधिभापा से तात्पर्य उस सिद्धान्त से है जिसे-महर्षि वेदव्यास ने शुकाचार्य के द्वारा व्यक्त किया है। उन्होंने स्वयं समाधि में जिस परम तत्व में साक्षात् किया है, उसका प्रतिपादन करने वाला सिद्धान्त 'समाधिभाषा' कहलाता है। लौकिक और परमत के विश्लेषण के अनन्तर शेष भाषा समाधिभाषा कही जा सकती है। यों तो समग्र भागवत वेदव्यास द्वारा निर्मित है, तथापि विश्लेपण की दृष्टि से उसमें कुछ सम्वादात्मक प्रसंग भी हैं जिन्हे पृथक रूप में मानना पड़ता है। प्रस्तुत समाधिदृष्ट तत्वानुसन्धान के लिये सूत ने स्वयं एक स्थान पर कहा है- "अपश्यत् पुरष पूर्ण माया च तदुपाश्चयाम् । अनर्थोपशम साक्षाद् भक्तियोग मधोक्षजे ॥" भा० प्रस्फ०७,६ समाधिभापा के मूल परिशान के लिये वल्लभाचार्य ने स्वयं कहा है . १७२ ] [ शु० पु. संस्कृत वाङमय "सरूपोवतीर्याद्य मगलादि पुरःसरम् ।।१७।। प्रसंग पूर्वकं चाह समाधावुपलभ्य हि । साकार ब्रह्म शुद्ध हि, माया तच्छक्तिरुत्तमा । तया सर्वत्र समोह. साक्षाद् भक्तिश्च मोचिका १८ इममर्थ हरिश्चाह ब्रह्मणे, नारदाय सः (भाग० नि०प्र० स्कन्धार्थ ) उक्त विविध भाषाओं में जहाँ परस्पर कथानक मे विरोध-सा भासित होता है उसका समाधान सुबोधिनीकार ने यह कह कर किया है कि- “एसे प्रसंग कल्पान्तर के हैं-"धाता यथा पूर्वफ्ल्पयत्" इस श्रुति के अनुसार सृष्टि कुछ परिवर्तन के साथ यथापूर्व ही होती रहती है, आवश्यक परिवर्तन होने से उसमें एकरूपता कहीं-कहीं नहीं आती- अतः उसे एक दूसरे का विरोधक या अप्रामाणिक नहीं मानना चाहिए"- (प्र० स्क० म०प्र० अ० कारिका ८) "भागवतीय प्रसंग में जहाँ जिस भाषा का प्रयोग हुआ है यहाँ सुबोधिनी मे प्रायः उसका उल्लेख किया गया है। लौकिक और परमत भाषा समाधिभापा की पोपिका हैं अतः ये दोनों भी अमान्य नहीं हैं।" (कारिका )। इस प्रकार सुयोधिनी में भागवत-निबन्ध से बचे हुए तीन अर्थों का व्याख्यान किया गया है। स्वय यल्लभाचार्य ने अन्य के प्रारम्भ में अर्थ तस्य विवेचितु नहिविभुः० इत्यादि में सुबोधिनी की मान्यता और गांभीर्य का कथन किया है, वह वास्तव में भागवत का हार्द प्रकट करने में अद्वितीय व्याख्या है। इधर श्रीहरिरायजी ने भी उस मम्बन्ध में यहा है- 'माश्रितो यल्लभाधीशो न च दृष्टा सुबोधिनी नाराधि राधिकानाथो वृथा तज्जन्म भूतले" भगवत्स्वरूपता- भागवत के द्वादश स्थन्ध, भूपण भुपयांग श्रीप्रभु के द्वादश बाभूपण और स्वरूप भी माने जाते है जो इस प्रशर है- प्रथम और द्वितीय स्कन्ध-दोनों चरणों के पादांगुलीय है। तृतीय और चनुयं मन्य- दोनों चरणों के नूपुर । प्रमाण प्र.""समाधिभाषा ] [ १७३ पंचम स्कन्ध-कांची है। पष्ट स्कन्ध-हार है। सप्तम अष्टम स्कन्ध -दोनो बाहुओं के अंगद वलय है। नयम फन्म-निष्फ है। दशम स्कन्य-पूर्वाद्ध कठभूपा है। उत्तराद्ध कुंडन है। एकादश स्कन्ध-चक्रीशलाका युग है। द्वादश स्कन्ध-चूडामणि है । अन्य पक्षान्तर में दशम स्कन्ध उत्तराद्ध को कुंडल और चको- शलाका का युग्म रूप, एकादश को चूडामणि और द्वादरा को उर्मिका रूप भी माना जाता है। द्वादश अंगों के द्वादश आभूपणों के मौलिक स्वरूप और सन्धों के वर्य विपय का मामन्जस्य मिलाने पर उक्त कयन चरितार्थ हो जाता है। भागवत पर शु० पु० साहित्य शुद्धात सिद्धान्त की दृष्टि से चतुर्थ प्रस्थान भागवत पर निम्न लिखित साहित्य की रचना हुई है, जो प्रकाशित और अप्रकाशित दोनों रूपों में है। इसका परिचय इस प्रकार है- भागवत सूक्ष्म टीका-श्री वल्लभाचार्य विरचित, अपराशित । प्रस्तुत टीका का कुछ थोड़ा सा अंश (प्र० स्कः प्र० अध्याय का प्रथम तथा द्वितीय श्लोक पर्यन्त) सरस्वती-भंडार कांकरोली के संग्रह में (८०३३, १६ पर) विद्यमान है । वेदस्तुति-अंश पर-सूक्ष्मटीका श्रीवल्लभाचार्य कृत प्रकाशित-पुष्टिसुधा कार्यालय घंधूगा द्वारा शेप अंश अनुपलब्ध है । इस प्रन्थ की सूचना स्वयं आचार्यश्री ने स्वरचित प्रन्थों में दो तीन स्थानों पर को है: - :- 卐श्री बालकृष्ण गाम्नि कृत लेख पं० ३ पत्र ११३ । * इस सूक्षमटीका के दशमस्कन्ध के प्रारम्भिक २० पत्र सेसीवाला ने जूनागढ के देवकीनन्दनलालजी के सग्रह में देखे हैं । देखो 'नवल विशेष' मूचना गुजराती मे सन्यासनिर्णय प्रकाशन के अन्त मे।

१७४ ] [ शु.पु. संस्कृत वाड.मय क-भागवत प्रकरण निवन्ध कारिका १०६ । 'एतनिबन्धात्पूर्व मेव सूक्ष्मा या टीका कृता' ख-भागवत प्रकरण तै० स्कन्ध कारिका १५० । ग -भागवत प्रकरण २० स्कन्ध कारिका १०४। इन उद्धरणों से विदित है कि-इस ग्रंथकी रचना भागवत निबन्ध के पहिले हुई है -यह सम्पूर्ण ग्रन्थ अद्यावधि प्राप्त नहीं हु प्रा। ऐसा अनुमान है कि इस सूक्ष्म टीका के अनन्तर बृहत् टीका के रूप में सुबोधिनी का प्रणयन हुआ है । सुबोधिनी टीका पर एक विहंगम दृष्टि- भागवत टीका सुबोधिनों की रचना अन्य कई समर्थ तत्ववेत्ता तत्तत्सम्प्रदायानुयायी टीकाकारों की कतिपय टीकाओं की रचना बाद हुई है। ऐसी अवस्था में यदि उसमे विलक्षण मोलिक और प्रामाणिक तत्व का विवेचन न किया गया होता तो उसकी इतनी ख्याति न होती। भागवत के रहस्य पर अन्य विद्वानों के अभिप्राय के सम्यक् पर्यालोचन का जितना अवसर श्रीवल्लभाचार्य को मिला है उतना अन्य को नहीं । एतावता गंभीरता और विलक्षण विचार-पद्धति का श्राश्रय लेकर इससे रचना हुई है यह मानना पड़ता है। स्थान-स्थान पर अन्य विद्वानों के अभिमतों का उल्लेस और उनकी समालोचना सुबोधिनी में की गई है, जिससे इनका सहज परिज्ञान हो सकता है। अन्य प्रचलित पाठभेदों म जहाँ स्वास्य की रक्षा हो सकी है, उसे स्वीकार किया गया है और जहाँ यह अप्रामगिक प्रतात हुआ है सुधारा गया है । 'सुबोधिनी व्याख्या की प्रणाली सूनात्मक है, इसका अर्थावयोध तब तक असमय है जब तक भागवत-निमन्ध का पर्यालोचन न किया जाय । श्राचार्य कृत अन्य मिद्धान्त प्रन्यों का अवलोकन भी तत्वज्ञान के लिये परम आवश्यक है क्योंकि सुबोधिनी स्वतन्त्र प्रन्थ नहीं है समे भागवत के श्लोकों के वर्णन पर सिद्धान्तों या निरूपणा है। और ये मम पिपरे हुए जहा तहाँ ही मिलते हैं। मुबोधिनी में प्रारम्भ और प्रावश्यक स्थलों पर कारिकाओं द्वारा वाव्याश का स्पष्टीकरए ६, जिनसे अप्रिम प्रतिपाच विषय का एक म्थूल दर्शन-सा हो जाता है। प्रत्येक श्लोक और उसमें कथित शन्दी फा प्रमाए प्र." समाधिभापा ] [ पर परस्पर क्या सम्बन्ध है ? इसको जितना निरूपण इस टोका में मिलेगा अन्यत्र नहीं। यद्यपि श्रीधरी और चूर्णिमा टीका के समान इस टोका का उपयोग धारावाहिक कथा के रूप में नहीं किया जा सकता, तथापि प्रसंग और श्लोकों का स्वारस्य तथा शब्दों की मार्मिकता समझ लेने पर इसके द्वारा कथा-प्रवचन में जो विशेषता आती है वह इसकी इकाई है जैसा कि प्राचार्यजी का कथन है सुबोधिनी टीना के वस्तु निरुपण के तीन पहल हैं-१. श्राध्यात्मिक, .. आधिदैविक, और २. आधिभौतिक । आधिभौतिक रूप में श्रीभागवत ग्रन्थ पुस्तक रूप में जिसे परमोत्कृष्ट काव्य स मूर्धन्य कहा जा सकता है, आध्यात्मिक रूप में इसे तत्वज्ञान-प्रद सात्वत-संहिता कहा जाता है, और आधिदैविकता मै तो यह भगवस्वरूप और लीला का अवगाहन कराती है। जैसा कि प्रख्यात है- -समप्र द्वादशस्कन्धात्मक भागवत सुबोधिनी पूर्ण नहीं मिलती। ऐसा अनुमान होता है श्रीश्राचार्य ने अन्तिम समय में इसकी रचना की है, और इसी कारण प्रचारमय व्यस्त जीवन में उसे पूर्ण करने का अवसर उन्हें नहीं मिला । 'अन्त करण प्रबोध' नामक ग्रन्थ में एक श्लोक है- "आज्ञा पूर्व तु या जाता गगासागर-सगमे यापि पश्चात् मधुक्ने न कृत तद्वय मया देह-देश-परित्यागस्तृतीतो लोक गोचर." ॥६॥ इस पर श्रीव्रजरायजी कृत विवरण में जो स्पष्टीकरण है उस पर ध्यान देने से उक्त कथन की सिद्धि हो जाती है । वहाँ लिखा है- "प्रायमर्थ -भगवता श्रीभागवतार्थ-अक्टनाय पूर्वमाज्ञप्तम् । तत्सूक्ष्मटीका करणेन कृतम् । ततः सुबोधिन्यां उपचयो ग्रन्यबाहुल्यात्मा प्रारब्धस्तदा देह-परित्याग आज्ञप्त । ततस्तद्विवाय निरोध एव विवृतः। ततोमुचौ वित्रीयमाणायां देश-परित्याग आज्ञप्तः। अर्थात् आचार्य ने भागवत के अर्थ प्राशनार्थ प्रथम सूक्ष्म टीका की रचना की और बाद में सुबोधिनी को, तृतीय स्कन्ध की पूर्ति के समय उन्हें देहत्यागार्थ भगवदाज्ञा प्राप्त हुई, अतः उन्होंने मध्यवर्ती स्कन्धों का परित्याग कर दशम स्कन्ध-निरोधलीला '-का व्याख्यान पुसस्कृत वाङ्मय का - प्रारम्भ किया। इसके बाद जब वे एकादश-मुक्ति लीला-सन्ध विवरण करने लगे तब उन्हें देशत्यागविपयिणी पुन. भगवदाज्ञा हुई।" एतावता यह निर्विवाद है कि सुबोधिनी की रचना प्रथम, द्वितीय तृतीय स्कन्ध तक और बाद में दशम पूर्ण और एकादश के चार अध्याय के आगे कुछ अंश तक होपाई है, जैसा कि साहित्य आज भी मिलता है। उक्त कथन से यह भी सिद्ध है कि भागवत की सूक्ष्म दीका का निर्माण पूर्ण रूपेण हुआ है, यद्यपि वह सम्प्रति उपलब्ध नहीं है । सुबोधिनी-साहित्य--- सुबोधिनी और उस पर घिरचित साहित्य इस प्रकार है- प्रथम स्कन्ध सुबोधिनी- १ से लेकर १६ अध्याय तक पूर्ण | इसकी एक हस्तलिग्यित प्राचीन प्रति सं० १७०८ का० शु० १० रवि का लिखित स० भंडार कांकरोली के संग्रह में (वं० १, १ शु०) है । मं० १६७१ मे शुरु सिद्धांत कार्यालय बंबई से प्रकाशित । प्रस्तुत स्कन्ध की सुबोधिनी पर निम्न लिखित साहित्य है जिसके अध्ययन से भून ग्रन्थ का स्वारस्य स्पष्टतः परिज्ञात हो सकता है (१) प्र. ६० सुबोधिनी-प्रकाश-गो० श्रीपुरुषोत्तमजी सूरत द्वारा रचित । प्रका० सं० १६८३ तेलीवाला बंबई । यह 'प्रकाश' समग्र स्कन्ध पर मिलता है जिसमें मूल ग्रन्थ का सैद्धान्तिक सप्रमाण विवेचन है । पर पक्ष संडन के साथ स्वसिद्धान्त-स्थापना और रहस्य समभाने में 'प्रकाश' से बढ़ कर अन्य कोई टीश सुबोधिनी पर नहीं है । म०१७ पोप कृ०४ गुर की लिखित प्रति नडियाद पु०पुस्तक में विद्यमान है, जो उमरेट निवासी औदीन्य टोलकिया ज्ञातीय व्याम हृदयरामात्मज जीवराज की लिखित है। एक अन्य प्रति अज्ञातकाल श्रीपुरुपोत्तमजी द्वारा स्वयं मंशोधित नाथद्वारा विद्या वि० में है। (२)प्रस० सु०-लेख । रचयिता गो० श्रीवल्लममी (विट्टलेशात्मज ) अप्रकाशित 1 इस अन्य की मूचना केलीवाला ने प्र०१० मु. प्रशश में दी है। .

प्रमाण प्र०"समाधिभापा ] [ १७७ -कर्ता (३) प्र० स्क० सु० विवरण, रच. चाचा श्रीगोपेश्वरजी, अप्रकाशित, इसकी सूचना तेलीबाला ने 'प्रकाश' की भूमिका (४) प्र० रक० सु० विवरण-गो० श्रीगोकुलोत्सवजी कृत अप्रकाशित । ( इसकी सूचना तेलोवाला ने रक्त 'प्रकाश' की भूमिका मे दी है। (५) प्र. स्क. प्रथमाध्याय सु० स्वतन्त्र व्याख्या- अज्ञात । अप्रकाशित सर० भ० कां० शु० बं० ३३, १७ । (६) प्र० स्क. सुबोधिनो टिप्पणी-जयगोपाल भट्ट कृत (अप्राप्त अप्रकाशित) (अन्धकार ने इसका परिचय भक्तिवर्धिनी की स्ववृत्त टीका में वीजदाढच प्रकार सु०) में दिया है:-"कृष्ण शब्दस्य श्रीमद् गोपीजन विशिष्टकृष्ण परत्त्वंतु मत्कृत प्रथमरकाध सुबोधिनी टिप्पण्यां-कर्ताज्ञः सकल स्वेति पद्यव्याख्याने मया सप्रपञ्च मुक्त मिति तवावलोपनीयम् ।" (७) प्र० स्क० सु० गुर्जर भाषानुवाद-शास्त्री छगनलालजी अमरजी बंबई कृत । प्रकाशित । ) प्र० स्क० सु० गुर्जर अनुवाद ...पं० जटाशंकरजी कानजी शास्त्री भ्राफा कृत्त । प्रकाशित सं० १६६६ । प्रकाशक-वाडीलाल नगीनदास शाह, चंबई । स्वतन्त्र व्याख्यान- (१) प्र० स्क. सुबो० प्रथमाध्याय प्रारंभ कारिका-व्याख्या गो० श्रीहरिरायजी कृत ! अप्रकाशित । सर. मं. कां० शु०० ३३, १८ । (२) निर्णयार्णव के प्र० तरंग मे श्री लालूभट्टजी ने प्र० स्क० कुछ स्थलो पर विचार व्यक्त किये हैं, प्रकाशित । (३) अर्थ तस्य विवेचितुम् ( प्र० स्क० ३० अ० सु० मंगला. चारण कारिका) इत्यत्र व्याकरणद्वारा प्रयोग सिद्धि । चतुगुणोपाध्याय कृत | अप्रकाशित सर० मं० कां० शु०० ३४, २२ । श्रीभागवत की सभी सम्प्रदाय की एकत्र पाठ टीकापो का प्रकाशन धोनित्य स्वरूप ब्रह्मचारी द्वारा वृन्दावन स० १९६० में किया था जो राम्प्रति अप्राप्त है, इसमें ही सर्वप्रथस सुबोधिनी टीका का प्रकाशन हुआ था। ( - १७८ ] [ सु. पु० सस्कृत वाड.मय (४) श्रीकृष्ण कृष्ण सस वृष्णयः (प्र. स. अ. ३ श्लोक ) इत्यत्र विवरणम् ! पो. श्रीबालकृष्ण शास्त्रि वृत्त । अप्रकाशित । पो० क्ठमणि शा के सग्रह में उपलब्ध । 4) गतासुमुरग रुषा (प्र. स्क १८ अ ३० श्लोर) इत्यत्र विचार । अज्ञात कत्र क अप्रकाशित ! सरभ० का० शुरू ११२, ७ बघा ( ६ ) परीक्षित सर्पहनन समर्थनम (प्र० स० १० श्लोक ) म्य लेख त्रिगृह गोवर्धन शर्मा मथुरा कृत अप्रकाशित । सर० म० का श० ब० ११२,८। प्रथम स्कन्ध सु० परिदर्शन- प्रस्तुत कन्ध की सबोधिनी द्वारा आनन्द रुप श्रीहरि को गीए- लीला श्रोता और वक्ता के अधिकार का निरूपण है, जो स्कन्धार्थ है, इसके १ स १९ अ तक के अर्थ का ससूचन भागवत्त निबन्ध म किया जा चुका है, इस प्रकार शास्त्र, स्कन्ध प्रकरण और अध्याय इन चारा के अर्थ का छोड़कर शेष तीन का यहाँ विवेचन है। प्रत्येक १० के अमु सख्याक श्लोका द्वाग विषय की सगति ना यारयान प्रति ध्याय के श्रादि तथा आव यक होने पर मध्य म और श्लोका प वारया, पार्थ और अक्षरार्थ का अविरोध स्प म क्यन कया ग । है। त्रिविपदर्शन केम्प म इसका चस्प इस प्रकार है-- (१) आधिभौतिर-मागवत शास्त्र प्रथम सन्ध, २६ अध्याय और तदन्त मितन हा मोक। ( ) श्रा स्मिक-श्रानन्द मा श्रीहरि की गौण लालrमक श्रोता वक्ता चिारा निम्पण । भा. निन- निनिधन स. के प्रसार विषया लक्षणा श्री गुग्णा या वर्गान है, भगवद्वम म्प म यह नया EिH है। ( ३ ) आरिदेविर परापर श्रीरा के प्रानन्दमय विप्र में प्र.स. तदीय प्रतिण चरणारविन्द है।

प्रमाण प्र०"समाधिमाषा ] [ १७६ प्र. क. में प्रोता के लक्षण सम्बन्ध में कहा गया है -"तीर्थय महान् शुचिः कृष्णं प्रच्छति यत्नेन कृपासत्संग संभवे" अर्थात् जो व्यक्ति तीर्थ संमेवन और भगवत्समर्पणात्मक यज्ञ से विशेष पवित्र है वह राजा परीक्षित के समान मुरय श्रोता है। (१) यागादि करने की आसक्ति शिष्य संग्रह और वत्ता की अपेक्षा अपने उत्तमत्व का अभिमान यह शौनक के साधारण श्रोता होने का लक्षण था । अतः वे साधारण श्रोता माने गये है। ( भा० नि- प्र० स्क० कारिमा ३०) (२ ) वैरा य के साधन विज्ञान का आग्रह और नारद के सम्यार के द्वारा प्रतिशोधन होने से व्यास को मध्यम श्रोता के लक्षणों वाला माना है । ( उक्त कारिका ३१) ( ३ ) शुशोक्तिमात्र से निःसन्दिग्यता तथा अन्य गुणों के कारण पर नित में मुग्य श्रोता के लक्षणों का समावेश होता है, अतः वे मुरय है। ( उक्त कारिता ३२, ३३ ) प्र०का में वक्ता के लक्षण के सम्बन्ध में कहा गया है- 'वक्ताधिकारी सर्वज्ञ सम्प्रदायेन सन्मुखात् । श्रत भागरतो भक्तो ह्यविरक्त स्तथादिमः। (भा० नि० प्र० स्क. २६) (१) पुराण प्रवचन की वृत्ति होने के कारण सूतजी को शुक्वत् पल सिद्धि न होने से उन्हे साधारण वत्ता माना गया है। (भा०नि०प्र० स० कारिका २७ ) (२) कार्यादेशी भगवद्विभूति स्प, होने पर भी दृढ वैराग्य भाव के कारण नारद को मध्यम वक्ता माना गया है । ( उक्त कारिका २८) ( ३ ) पौराणिक प्रवचन के वृत्ति रूप साधारण लक्षण और कार्यावशिता स्प मध्यम लक्षण से ऊपर सततभागवतानुशीलन एवं दृढ गाय को स्थिति के सारण शुक्राचार्य को मुख्य वक्ता माना गया है । उनकी मुक्ति न होकर 'न्हें कथा के द्वारा जीवनमुक्ति अवस्था प्राप्त है । ( उक्त पारिका ..)

१५० ] । शु.पु. संस्कृत वाङ्मय २. द्वितीय स्कन्ध सुमोधिनी- १ से लेकर १० अ० तक पूर्ण 'प्रकाशित' इसकी एक हस्त लिसित प्रति सं० १७०F फा० शु० ७ चन्द्रवार की सर० भ० का० मे शु. बन्ध सं० १, २ मे विद्यमान है 'लेसक भज्ञात' शु०सि० कार्यालय वाई से प्रकाशित स० १६७६ । प्रस्तुत स्कन्ध पर निम्न लिसित साहित्य है- (१) द्वि० स्क० सु० 'प्रकारा' श्रीपुरषोत्तमजी रचित । प्र० स्क० के अनुसार इसमें भी सुबोधिनी का स्पष्टीकरण है। ग्रन्थकार ने स्वरचित प्रहस्तवाद 'प्रस्थान रत्नाकर भाध्य प्रकाश' नृसिंहोत्तर तापिनी एवं अधिमांश वाद अन्यों के अनन्तर इसकी रचना की है क्योंकि प्रकाश में स्थान स्थान पर इनका नाम निर्देश है। यह ग्रन्थ वालकृष्ए शु० महासभा सूरत द्वारा स० १६८८ में प्रकाशित । (२) द्वि० स्क० सु० लेस, गो. श्रीवल्लभजी (विट्ठलेशात्मज) रचित । मप्रमाशित (इसकी सूचना प्रभाशित प्रकाश टीका की भूमिका मे पं० चिम्मनलाल शा० ने दी है) (३) द्वि० स्क० सु० विवरण-गो० श्री चाचागोपेशजी कृत 'अप्रकाशित' (सं०२ के अनुसार सूचना से विज्ञात)। (४) द्वि० स्क० सु० विवरण । 'गो० गोकुलोत्सव जी कृत' 'अप्रकाशित' (सं०२ के अनुसार सूचना से विदित) (५)द्वि० स्कः सु० गुर्जर भाषानुवाद 'शास्त्री कल्याणजी- कानजी भाई कृत' प्रकाशित स. १६८ याडीलास नगीनदास बबई द्वारा (६) द्वि० का सु० भाव वोधिनी दीमा हिन्दी भाषानुवाद- देवपि 'श्री रमानाथजी शास्त्री कृत' प्र० अध्याय सं० १६६८ में विद्या- विभाग नाथद्वारा से प्रकाशित द्वितीय तृतीय और चतुर्थ अध्याय नाथद्वारा स्व० शास्त्री जी के पुन द्वारा प्राशित स०२००६ । ऐसा विदित हुआ था कि उक्त भावबोधिनी टीका सम्पूर्ण स्कन्ध पर की गई है,.पर प्रन्यकार अपने सामने प्रथमाध्याय ही प्रकाशित कर धके और दिवगत हो गये। बाद में उनके पुत्र श्रीनजनाथ प्रमाण प्र० ममाधिभाषा ] [ १८१ - शास्त्री जी आगे के तीन अध्याय छपा सके और वे भी स्वर्गवासी हो गये । अब अन्य उनके पुत्रो के समीप हो तो कहा नहीं जा सकता। (इसी प्रन्य-प्र०अ० के अन्त में द्वि० स्कभागवत निबन्ध का हिन्दी अनुवाद भी ग्रन्थ कार कृत मुद्रित हुआ है। स्वतन्त्र लेख- (१) अदीन लीला हसिवेक्षणोल्लसत् (द्वि० स्क२ अ. १२ श्लोक) इत्यत्र विवरणम् । पो० श्रीवालकृष्ण शास्त्री रचित 'अप्रकाशित' ५० कंठमणि शा के सं० में विद्यमान । (0) निरस्त साम्यातिशयेन-(द्वि० स०४ अ०१४ शोक ) इत्यत्र स्वतन्त्र लेस 'श्री हरिरायजी कृत' अप्रकाशित' (सर० भं. शु० व० ३४,२६) (३) शृणवत्' श्रद्धया नित्यं । (द्वि० स०अ० ४ शोक ) इत्यन स्वतन्त्र विवरण । अज्ञात क् क । अप्राशित [ सर० भं. का० शु०व० ३४, ०४] (४) निर्णयार्णव के प्र० तथा द्वि० तृ० तरङ्ग मे लालूभट्टजी ने द्वि० स्कन्ध के कुछ स्थलो पर कुछ विचार व्यक्त किये हैं। प्रकाशित द्वितीय स्कन्ध सु० परिदर्शन- प्रस्तुत स्कन्ध सुबोधिनी मे आनन्द स्प श्रीहरि की गौण लीला रूप साधनों का निरूपण है । जो स्कन्धार्थ है । भा०नि० म शेष अर्थ का निरूपण करके अन्तिम तीन अर्थ सु० मे विवरित है। प्रथम स्कन्ध वत् प्रत्येक अध्याय के आदि मे तथा अन्यत्र मी कारिकाओं द्वारा विषय की सगति का प्रादुभाव है। श्लोक संख्या की भी मगति वहीं कही गई है। १ से १० अ० तक भागवत अवरण के साधनों पर प्रकाश डाला गया है। इसका विविध स्वरूप है १. आधिभौतिक- "भागयत अन्य का यह द्वितीय स्कन्ध है जो दस अध्यायों में विभक्त है । प्रत्येक अध्याय में कई श्लोक हैं। २. अध्यात्मिक-आनन्दमय श्रीहरि की गौण लीला मे १२ [ शु० पु० सस्कृत वाद मय माधना का निरूप । क्यिा गया है । नि० के अनुसार निर्दिष्ट विषयो, लक्षण और गुणों का वर्णन है । भगवद्धर्म स्वरूप में यह स्कन्ध ज्ञान ३. आधिदैविक--पूर्ण पुरुपोत्तम श्रीकृष्ण के रसमय विग्रह म द्वि. स. उन वाम चरण रुप में अवस्थित है। तृतीय स्कन्ध सुबोधिनी-- १ से ३३ अध्याय पर्यन्त समग्र प्रकाशित । सं० १६८५, नाथद्वारा वि विभाग । इसकी प्राचीन प्रति स. १७०१ माघ शुरु ५ बुध की लिखित । सर० भ० का शु० २०१३पर विद्यमान है। प्रस्तुत स्कन्ध की सुबोधिनी पर निम्नलिखित व्यारयाए हैं। (८) तृ. स. सु० प्राश। गो० श्रीपुरुपोत्तम जी कृत । सुबोधिनी के साथ नाथद्वारा से प्रकाशित । शुद्ध प्रति न मिलने से प्रारम्भिा ५ अ० तक पुस्तकान्त मे छापा गया है। बाद मे मूल के साथ । पूवत सुबोधिनी का विवरण है । इमको प्राचीन प्रति १० भ० काकरौली मे शु. ब० ३०१३ पर विद्यमान है। (२) तृ. स्क० सुबोधिनी लेख-गो. श्रीवल्लभजी कृत । अप्रमाशित । स्वतन्त्र लेख (३) "तस्यारविंद नयनस्य पदारविंद ।" [ २९०३ अ. १५ श्लोक ४३ ] इत्यत्र स्वतन्त्र लेस । अज्ञात कहूँ क-अप्रकाशित । सर० भशुम्ब० ३४,६। तृ० स्क० सुबोधिनी परिदर्शन-- इस सन्ध में आनन्द रूप श्रीहरि की दश विध लीलाओं के अन्तगत प्रथम सर्ग लीला का प्रतिपादन है । श्रुति के अभिप्रायानुसार परब्रह्म की रमण करने को इन्छा से सत्वादि गुणा के वैषम्य से पञ्च. महाभूत, पञ्चतन्मात्रा, एकादरा इन्द्रियों और चतुविध अन्त करण की उत्पत्ति के प्रकार को सर्ग कहा जाता है। यही रूपान्तर म अरोरी ईश्वर मा स्थूल शरीर ग्रहण कहलाता है । भा० निबन्ध के निर्देशानुमार प्रमाण प्र० - समाधिभाषा ] E१८३ इमके अन्याय प्रकरण आदि का विवरण व्हाँ है, और शेष का उक्त अध्यायों मे क्थन है। प्रत्येक अध्याय के आदि और यथावश्यक स्थान में कारिाओं द्वारा ग्लोकों की गरम्परिक स्थिति स्पष्ट की गई है। इसका त्रिविध रूप है- १. श्राविभौतिक- --भागवन प्रथ के तृ० स्क० की ३३ अ है जिसमे अनेक श्लोकों से प्रतिपाद्य विषय का वर्णन है। २. श्रा'यात्मिक--आनन्दमय परमात्मा की प्रथम सर्ग नाम्नी लीला का निरूपण है । भा० निट के अनुसार तत्र निदिष्ट लागों, गुणा और क्थानक के रूप मे वक्तव्यांश का स्पष्टीकरण हैं। भगवद्धर्म स्वरूप मे इसके वैराग्य का निरूपण मिलता है। ३. प्राधिदैविक - पूर्ण पुरुषोत्तम के रसमय विग्रह . मे यह स्कन्ध दक्षिण बाहु स्थानीय है । चतुर्थ स्कन्ध सुबोधिनी। इप्रकी रचना नहीं हुई है। इस सन्ध में विसर्ग लीला का प्रतिपादन है । पिसर्ग का तात्पर्य ब्रह्माजी द्वारा चराचर विश्व की उत्पत्ति है। इस सन्ध के निबन्ध में शास्त्रार्थ, स्कन्धार्थ, प्रक्ररणार्थ ओर अन्यायार्थ का कथन है, शेष तीन का निरूपण अवशिष्ट रह जाता है। इस स्कन्ध में एक से लेकर ३१ अ० है। सुबोधिनी न होने के कारण इस पर अन्य व्याख्याएँ नहीं हैं। कुछ स्वतन्त्र विवरण भी उपलब्ध नहीं होते। इन सन्धरा त्रिविध स्वरूप है १. प्राधिभौतिक -भागवत का १ से लेकर ३१ श्रम चतुर्थ स्कन्ध है। प्रत्येक अ० में कई स्लोक है। २. प्राध्यात्मिक--आनन्द स्प श्री हरि की दशविध लीलाश्री मे तृतीय वि-ग-लीला का प्रतिपादन है । भगवद्धर्म में इसमें पैरा य का निम्परा है। तक यह -- १८४ ] [ गु० पु० सस्कृत वाड.मय ३. श्राधिदैविक -पूर्ण पुस्पोत्तम के रसमय विग्रह में यह स्कन्ध बाम बाहु स्वरूप है जो श्री गोवद्ध नोद्धरण के स्वरूप मे उर्ध्व है? पञ्चम स्कन्ध सुमोधिनी-इसकी रचना नहीं हुई। इस क ध में भगवान् की स्थिति लीला का निरूपण है। स्थिति जिसे कहीं कहीं स्थान भी कहा गया है । परिभाषा के अनुसार स्थिति वैकुण्ठ विजय --चराचर में सर्वोत्कर्ष रूप से परमात्मा का सर्वत्र निवास कहलाता है । यावन्मात्र सृष्ट जगत के उपर मर्यादा पूर्वक उसे पालन द्वारा जो उत्कर्ष प्राप्त है वह विजय स्थिति या स्थान है। इस स्कन्ध के अन्त इसी लीला का कथन है । सुबोधिनी न होने के कारण इस पर किसी विशेष व्याख्या की उपलब्धि नहीं होती। निम्नलिखित प्रसङ्ग पर स्वतन्त्र लेख मिलता है-- (१) एवमेवास्मिन्नेवे वपृ।' (५ २०१६ अ० १६ श्लोक) के ऊपर तथा अहो अमीपा किमकारिशोभन । स्क० ५ अ० १६ श्लोक २१) पर अज्ञात कर्तृक स्वतन्त्र लेख (सर० भ० के शु० ५० ३४, ६२) अप्रकाशित । इसका विविध रूप है--- १. आधिभौतिक :--भागवत का पश्चम स्कन्ध है जिसमें २६ प्र० और प्रत्येक म कई श्लोक हैं। २. आध्यात्मिक- आनन्द रूप श्री हरि की दशविध लीलाओं में तृ० स्थिति लीला का प्रतिपादन है। भा० नि० के अनुसार तत- निदिष्ट लक्षणों और गुणों का वर्णन कथा प्रसङ्ग रूप में है। भगवद्धर्म स्वरूप मे यह वीर्य गुण का प्रतिपादक माना जाता है । ३. प्राधिदैविक-पूर्ण पुस्पोत्तम के रसमय विग्रह में दक्षिण सविथ-उस-स्वरूप है। पष्ट स्कन्ध सुमोधिनी-इसकी रचना नहीं हुई है। प्रस्तुत सन्ध म पोपण। पुष्टि लीला का निरुपण है । सप्टि एवं प्रमाण प्र....ममाधिभाषा ] [ १६५ and F - - अनुप्रविष्ट जीवों पर स्वाभाविक अनुप्रह कर उन्हें परिपोपित करना पुष्टि लीला कहलाती है। इस स्कन्ध मे इसी का कथन है। सुबोधिनी न होने के कारण इस पर विशेष कोई व्याख्यान नहीं है। प्रासंगिक स्वतन्त्र लेग्य इस प्रकार मिलते हैं- १. सन्मनः कृष्ण पदारविन्दयोः (६ स्क० १ ० १६ शोक) इत्यत्र स्वतन्त्र लेस । गो० श्री देवकीनन्दनजी कृत । अप्रकाशित ।' (सर० भ० शुक्रबं० ३४, १५) २. वृत्रासुर चतुःशोकी-(६ स्क० ११ अ० २४, २५, २६, २७ लोक ) इन्द्र द्वारा वध किये जाने के पूर्व वृत्रासुर ने जो भगवरप्रार्थना की है उसको 'वृन-चतुःश्लोको' कहते हैं । भधिमार्ग की दृष्टि से यह बड़े महत्व की है। इसके चार श्लोक भक्तिमार्गीय चतुर्विध पुरुषार्थ का बोध कराते- हैं, और इनमें उनका वास्तविक स्वरूप प्रकट किया गया है। क-अहं हरे तब पादेक मूल । इसम पुष्टिमार्गीय धर्म है। स-न नाक पृष्ठं नच पार० । इसमे ग-अजात पक्षा यव मावरं । इसमे काम है। घ-ममोत्तम श्लोकजनेषुसल्यं । इसमे पुष्टिमार्गीय मोक्ष है:। इस श्लोक चतुश्यी पर निम्न लिखित साहित्य की रचना हुई है। (१) वृ० चतुःश्लोकी सूक्ष्म टीका-श्री वल्लभाचार्य कृत । अप्रकाशित । सर० भ० शु० २०३४,४७ । (२) वृ० चतुःश्लोकी (कारिकाः) गो० श्रीविठ्ठलेश प्रभुचरण कृत । वृहत्स्तोत्र स० साल में प्रकाशित । चार श्लोको द्वारा इसका रहस्य स्थन है । इसे पात्मा तुःश्लोकी भी कहा जाता है। (३) पृ. चतु श्लोकी व्याख्या-गो. श्री विठ्ठलेशप्रभुचरण वृन । प्रकाशित। (४) वृ. चतुःश्लोकी व्याख्या-टिप्पणो प्रभुचरण हत व्याख्या पर गो. हरिरायजी कृत । प्राशित । (५) वृ. चतुःश्लोकी प्रकाश । प्रभुचरण कृत व्यास्या पर गो . श्री पुरुषोत्तमजी कृत विवरण | प्रकाशित । अर्थ है। " " " " [ शु० पु० सस्कृत बाड मय (६) वृ० चतु शोकी-सुबोधिनी ब्रजभाषा टीका । अज्ञात क्त का प्रकाशन जे प्रा दरट फ्ड बम्बई द्वारा (७) वृक्ष चतु शोको-प्रभुचरण कृत व्याख्या या गुजराती भापानुवाद । शास्त्री छगनलाल जी कृत। प्रकाशित बंबई स० १६४६ । (८) वृत्रासुर चतु शोकी-प्रभुचरण व्यारया का गुजराती भाषान्तर शास्त्री चिम्मन लालजी वृत्त । प्रकाशित । (1) वृत्रासुर चतु श्लोकी व्याख्या लेख। गोश्रीवल्लभजी कृत । श्री प्रभुचरण कृत व्याख्या पर लेख है, अप्रकाशित, सर० भ० शु० घ०३४, ३७॥ (१०) वृनासुर चतु शोको व्याख्या टिप्पणी-गो० श्रीगोपेश्वरजी कृत-ममोत्तम श्लोक इत्यत्र । अप्रकाशित सर० भ० शुक्रव०३४, ७५ । प्रस्तुत लेख में श्रीहरिरायजी कृत लेख से अधिक साम्य है। (१९) अह हरे तर पादैक मूल० इत्यत्र स्वतन्त्र लेख-पो. श्री बालकृष्ण शास्त्री कृत अप्रकाशित । ५० कठमणि शा० के सुग्रह म । (१२) वृत्रासुर चतु श्लोको-हिन्दी भाषान्तर । रूपकिशोर शर्मा कृत प्रका. जे. प्रा. बबई इस स्कन्ध का निधि स्वरूप- १ आधिभौतिक-भागवत का पाठ सन्ध है जिसमें १६ अ. और प्रत्येक में कितने ही श्लोक हैं। २ आध्यात्मिक-आनन्द रुप श्री हरि की दशविध लीलाओं में चतुर्थ-पुष्टि-लीला का निरूपण है। भा०नि० के अनुसार तत् निर्दिष्ट लक्षगा और गु गाका निरूपण कथात्मक ढग पर किया गया है । भगवद्धर्म रूप में यह वीर्य गुण का निरूपक माना जाता है। ३ आधिदैविक-पूर्ण पुरुषोत्तम के रसमय विप्र म यह वाम सक्थि-उर-है। ७. सप्तम स्कन्ध गुमोधिनी-इसकी रचना नहीं हुई यह स्क ध 'उति' लीला का प्रतिपादक है । कर्म के द्वारा वृद्धि पाने वाली वासनाओं का नाम 'अति कहा जाता है। यह कर्ममयी पासना जाव की विविध गतियाँ प्रदान करती है । इसमें १५ अा है। इस स्क-य की सुबोधिनी की रचना न होने से विसी प्रकार के व्यास्थान या स्वतन्त्र विवरण नहीं मिलते ।

प्रमाण प्र०"ममाधिभाषा ] [१८ इसरा त्रिविध रूप:- १. आधिभौतिक-भागवत का सप्तम स्कन्ध है, जिसमें १५ अ. और प्रत्येक में कई रलोक हैं। २. आध्यात्मिक-~-आनन्द रुप श्रीहरि की दशविध लीलाश्री में पंचम 'अति' लीला का प्रतिपादन है । भा०नि० के अनुमार दत्र- तत्र निर्दिष्ट लक्षणी और गुणों के विषय का कथानक वर्णन किया गया है। भगवद्धर्म में इसमें ऐश्वर्य गुण का कथन है । ३. श्राधि दैविर-पूर्ण ब्रह्म के रसमय विग्रह में सप्तम एक-ध दक्षिण हस्त रूप से विद्यमान है जो श्रीगोवर्द्ध नोद्धरण के स्वरूप में फटिपर तिदित है, बद्ध मुष्टि है जिसमें वासनाओं के सर्जक भक्तों के मन को अपने वश में कर रक्सा है। 'मुष्टी कृत्य मनांसि न " ८. अष्टम स्कन्ध सुबोधिनी-म, स्कन्ध को पोधिनी का प्रणयन नहीं हुआ है। इसमें मन्यन्तर लीला के प्रतिपादन से भगवान के द्वारा नियुक्त अनुप्रहीत मन्वन्तराधिपतियों की धर्म-व्यवस्था के द्वारा इम लीला या वर्णन किया गया है। इसमें २४ अ. है। मुयोधिनी के न होने से किसी अन्य व्याव्या या प्रारगिक विवेचन इस सम्ध में नहीं मिलता। इस त्रिविध रूप है:- १. प्राविभीतिक-भागरत का अष्टम सन्ध है, जिसमें २४ प. है, और प्रत्येक में कई श्लोकों द्वारा विषय का निम्पण है। २. आध्यात्मिक-प्रानन्द रूप श्री हरि की दश विध लीलापों में से पठ-मद्धर्म या मन्वन्तर लीला का कथन है। भा०नि० के अनुसार तरतत्र निर्दिष्ट लक्षणों गुणों से कथात्मक रूप से वस्तु-निरूपण है। भगरधर्म से यह उनका ऐश्वये निस्पक स्कन्ध है। ३. आधिदैविक -परम श्रीरमण के रममय विग्रह में अप्टम स्कन्ध दक्षिण स्तन स्प माना जाता है। मागयत के एक अन्य वचन मारा: धर्मरतनादहिएत:" मन्वन्तरात्मक धर्म की उत्पत्ति मी इमो स्तन से दे। ६. नरम स्कन्ध मुसोधिनी-इस स्कन्ध को सुपोधिनी का प्रथन नहीं हुमा है।

१८ ] [ शु० पु० संस्कृत वाडमय प्रस्तुत सन्ध मे 'ईशानुकथा' का वर्णन है । भगवान् के अवतार और उनके अनु-अनुचरों-के चरित्र का वर्णन 'ईशानुकथा' कहलाती है। इसमे २४ अ० है। सुबोधिनी के निर्माण न होने से उसके विवरण रूप में या स्वतन्त्र रूप से किसी व्याख्या का प्रणयन नहीं हुआ इसमा विविध रूपः- १. आधिभौतिक-भागवत का नवम स्कन्ध है, जिसमे ४ अ० और प्रत्येक में कई श्लोक हैं। २. आध्यात्मिक-आनन्द रुप श्री हरि को दश लीलाओं में से सप्तम लीला ईशानुकथा'इसमे वर्णन है । भाग० नि के अनुसार तनतन निर्दिष्ट लक्षणों और गुणों के द्वारा भगवस्था का निरूपण है। भगवद् धर्म रुप मे इस स्कन्ध में यश का निरूपण है। ३. आधिदैविक-परमात्मा श्रीकृष्ण के रसमय विग्रह में यह सन्ध वाम स्तन रुप माना जाता है। भगवच्चरित्र और भक्त चरित्र भी धर्म स्वरूप होने से वक्षःस्थल रुप है। १०. दशम स्कन्ध सुबोधिनी- १ से लेकर ६० अ० तक समग्र प्रमशित-इसके दो खंड है- क–पूर्वाद्ध--१ से ४६ अ तक जिसमें १२, १३, १४ यह तीन अ० प्रक्षिप्त माने जाते हैं-- स-उत्तरार्द्ध-५० से १० अ० तक-- इस प्रकार सम्पूर्ण दशम मे ६० अ० हैं और प्रक्षिप्त को छोड़कर ८७ । यद्यपि उक्त अध्याय त्रयी पर सुबोधिनी विद्यमान है । दशम के अध्याय विभागार्थ आचार्य का कथन है- (१) चतुर्भिश्च (२) चतुर्मिश्च (३) चतुर्भिश्च (४) त्रिभि रतथा (६) पनि विराजने योसौ पंचवा हृदये मम । ( द० स्क० कारि) तदनुसार विभाग इस प्रकार है- (१) जन्म-प्रारण सुबोधिनी--१ से ४ श्र० तक। (२) तामस-प्रकरण, प्रमाण, प्रमेय, साधन, फल प्रकरण प्रत्येक सात सात से २८ श्र० । (३) राजस-प्रकरण, प्रमाण, प्रमेय, माधन, पल प्रारण प्रत्येक पात साद अ० से २८ अ० । - ।

-- [ शु.पु. सस्कृत वाङ्मय प्राप्ति। भर्भाव हुधा ।* स्पष्टार्थक होने के कारण इस पर किसी प्रकार को टीका या विवरण नहीं है। इसी अनुक्रमणिका के श्रवण से महात्मा सूरदास जी और परमानन्ददास जी के हृदय में भगवल्लीला की स्फुरण हुई और उन्ह प्रेम लक्षणा भक्ति के सिद्ध हो जाने से लीला गान की सामर्थ्य की फलस्वरूप 'सूरसागर' और 'परमानन्द सागर' का प्रादु इसी प्रकार सुबोधिनी में भी सात्विक प्रकरण में ऐसा ही कम भेद विद्यमान है। यहाँ छह यह अ० से गुणा-ऐश्वर्य वीर्य आदि का निरूपण किया गया है। पर धर्मी स्वरूप-प्रमेय धर्मी, साधन धर्मी और फलधर्मी का अ त के सलग्न तीन ० म वर्णन है-अर्थात् लगातार १८ अ० तक प्रमेय साधन और फलों के वर्णन की समाप्ति के अन तर उनके धर्मी तीनों स्वस्पा का एक साथ ही वर्णन है। निबध मे इस प्रकार की नम विवक्षा नहीं है-घोधिनी में तो प्रमेय साधन फल निरूपक साविक प्रकरण के अवातर प्रकरण में खै छै मध्यायो द्वारा धर्म, अर्थ और काम पुरुषार्थ का वर्णन है अर्थात प्रमेय में धर्म का सावन म अर्थ और पल में काम का, धर्मि निरूपक तीन अध्यायों म मोक्ष का निरूपण है। इस प्रभार साविक प्रकरण के इन २१ अध्यायो में पुम्पार्थ चतुप्रयो को भी विवक्षा है, एतावता दोना क्रम मिलते हैं-(निर्भय राम कृत कारिका व्यारया द० स्क० सु०) दशम सन्ध के स्कन्धार्थ मम्बन्ध म सुबोधिनी म पर्याप्त प्रकाश भाला गया है । इस विषय म दो धारणायें चलती हैं- (१) दशम सन्ध निरोध' लीला का प्रतिपादक है। (.) दशम स्कन्ध 'पाश्रय लीला का प्रतिपादक है। भागवत की मुदित आठ टीकाओं म अपने अपने सम्प्रदाय के अनुसार दोनों पक्षो को सिद्ध किया गया है। श्रीयत्नमाचार्य जैसा कि प्रथम कहा गया है निरोधार्य कोही मा यता प्रदान करते हैं, जो कि फम प्राप्त है। पण्याप (वार्ता १६६७ मम्मान) वि.पि.मररोसी प्रान । + - प्रकार प्रमाण प्र... समाधिभाषा ] [ १६ प्रस्तुत दशम स्कन्ध सुबोधिनी अपने विवरण व्यारयान और टिप्पण के साथ समप्र प्रकाशित होगई है। जो आगे निर्दिष्ट अवान्तर * प्रकरणों के खंड रूप में है। इसकी हस्तलिखित प्राचीन प्रति इस प्रकार है- १ पूर्वाद्ध-सं० १६४६ आ० कृ. १३ । लेखक-रघुनाथ शर्मा । सर० भ० शु०५०६,१. २ उत्तरार्द्ध-सं० १७०८ । लेखक-भगवानदास । सर० भं० शु० पं० १६. १. सर० भ० में अग्य भी कई प्रतियां विद्यमान हैं। दशम स्कन्ध का सुबोधिनी प्रकरण-विभाग इस प्रकाशित है। २-(प्रथम) जन्म प्रकरण अध्याय द्वयी-सुबोधिनी (१,२, अ०)प्रमा० सं० १६८३ | इसमें निम्नलिखित साहित्य समाविष्ट है- क-विवृति-टिप्पणी। श्रीविट्टलेश्वर प्रभु विरचित । इसका द्वि० नाग 'विति प्रकाश' भी है। इसकी पांडु लिपि सूरत के बड़े मन्दिर में विद्यमान है, यह मूल अन्य दशम के सुबोधिनी विवरण पर एक अन्य के रूप में प्रक्षिप्त अ० वयो को छोड़ कर १ से ३२ १० पर्यन्त भ्रमर गीत के साथ सं० १९७७ में प्राशित की गई है जो श्रीगुसाई जी को हस्तलिग्नित मूल प्रति से सम्बादित है। टिप्पणी में सुबोधिनी के रहस्य और पठिनाश का प्रकाशन और विवेचन है। इसके बिना सहसा मूलप्रन्थ का अभिप्राय सममना दुरूह सा हो जाता है । स-सुयोधिनी-टिप्पिणयोः प्रकाश-गो० श्री पुरपोत्तमजी रचित । इसग सुबोधिनी और प्रभुचरण मृत टिप्पिणी दोनों के अर्थ फा विशदोररणा है । यह 'प्रकाश' ग्रंथकार ने अपने पितृ चरण श्रीयदुपति तनुज पीताम्यर जी के नाम पर रचा है। प्रभुचरण वृत टिप्पणी को प्रति जिसमें १, मे ३२० है सर० म. सक० मे २० २७, ३ पर किमान है, दिममा ने. काल सं० १७७२, प्रा. शु. १५ भूगु है। * r १६२ j [ शु० पु० सस्कृत वाड मय ग-सुबोधिनीन्लेस-गो. श्री वल्लभजी महाराज कृत । सुबो- चिनी का भावार्थ--जो स्वतन्त्र रुप से विवेचन है। घ--सुबोधिनी योजना-० श्रीलालूभट्टोपनामक श्रीवालकृष्ण चिरचित । इसमें 'विवृति' के सन्देह का विनन्मन किया है। ड-मुबोधिनी गारिका-व्यारया--पं० निर्भयराम भट्ट कृत-- सुमो० की प्रारम्भिक आर्याओं की व्यारया इसके निर्माण का हेतु है । च-शास्त्र-रीत्या युमुत्सु-बोधिका-श्री गो. योगिगोपेश्वर जी कृत । १, २ अ० के साथ ३, ४ अ० पर्यन्त ग्रंथ रूप में सं० १६६४ में प्रकाशित । सुबोधिनी, टिप्पणी, प्रकाश और लेस सभी के आधार पर विशद विवेचन है। छ-टिप्पिणीस्थ मङ्गलाचारण । 'नमः श्रीकृष्ण पादाञ्जः' इत्यत्र स्वतन्त्र लेस-श्रीगोपेश्वर जी कृत-टिप्पिणी के परिशिष्ट में प्रका। ज-'नमामि हृदये शेपे इत्यस्य टिपिणया मुले 'अनुशयन शब्दस्य' इत्यत्र स्व. लेयः गोस्वामी श्रीहरिराय जी कृत । प्रका० उक्त परिशिष्ट में। भ-जन्म प्रकरण अ० द्वयी गुर्जर भाषानुवाद-~श्रीहरिशङ्कर शास्त्री कृत । प्रस्तुत अनुयाद में प्रथम श्लोक का और बाद में सुनो. धिनी का अनुवाद है। प्र.प्र. जन्म प्रमरण ३, ४ अध्याय सुबोधिनी। श्री वल्लभाचार्य विरचित । प्रथम और द्वि० अध्याय के समान यावत्प्राप्य साहित्य के साथ जिसमा उपर निर्देश दिया गया है। प्रकाशित है सं० १९८५ । इमकी हस्तलिखित मूल प्रति श्री त्रिभङ्गीरायजी मन्दिर वंबई के मंग्रहालय में है। गुजराती अनुवाद श्री नानूलाल गाँधी, एम, ए. कृत । प्रकाशित है। स० 'विष्णो ऊर्याणिशंसनः (द. १ अ ) इत्यत्र व्याख्या- सर- भंका- शुभ व १०८ प्रकाशित । 'मथरा भगवान् यत्र नित्यं ( द. १०) इत्यन संशयनिरासः अज्ञात क्तः। अप्रमा० सरः भंयांक शु० सं०७४ / प्रमाण प्र०"समाधिभापा ] १६३ (क) द्वितीय ठामम प्रकरणावान्तर प्र० प्रमाण प्रारण । सुबो (द० स०५ से ११ अ०) -- तथा कौतुक लीला प्रतिताध्यायत्रयी । (द० स्क० १२, १३, १४ अ० सुमो०) प्रकाशिव मं० १९८४ | तेलीवाला बम्बई द्वारा । निम्नलिखित मादित्य के साथ। (क) टिपिणी, श्री विट्टलेश्वर प्रभुचरण रचित, श्रीमती टिप्पिणी के नाम से सतन्त्र प्रन्य रुप में प्रशशित । (स) प्रकाश--श्रीपुरुपोत्तम जी विरचित । ठामस प्रमाण श्रीर प्रमेय द्वय प्राश नाम से स्वतन्त्र रूप में प्रकाशित । सं. १६८९ | (अ५ से ११ तया १२ से १७ अ० तक) (ग) सुबोधिनी-लेख गो० श्रीवल्लभजी कृत (५ से २५ अ० तक) (घ) सुबोधिनी-योजना-दीक्षित लालूभट्ट जी कृत । (ड) सुनोधिनी-चारिपार्थ-प० निर्भयराम भट्टकृत । (५ से २२ अ० पर्यन्त) ग, घ, ड, नामक तीनों प्रन्थ श्री भा० द० स्क० सुबोधिन्या. विवरणत्रयम् नाम से प्रयम् प्रन्य रूप में प्रकाशित सं० १६६३ । लेख घोर कारितार्थ को मूल प्रतियाँ अन्यकार द्वारा मशोधित सर० भ० का में विद्यमान हैं। (प) तामम प्रकरण मुगोः गुर्जर मापानुयाद-श्रीनानूलाल गांधी त । इममे ५ से ११ अ० प्रकरण के तथा प्रतिप्र के तीनों अध्यायों का अनुवाद है। प्रका० म० १६६७ । स्वतन्त्र लेग्व १--'नन्द स्वात्मज उत्पन्न'० (द स्क० ५ ० १ श्लोर) दस्पर विचार. श्रमात । अप्रकाशित । मर भं० शु० २०७०, २० तथा ८,१,२॥ 15-भगत: गम्यि दंष्ट्रय मि (६० ११-८०५ श्लोर)इया लेग । गो. श्री विट्टलेपर पृत । श्रप्राशिव मा० भ० शु. ५०३४,३।

१६४ ] [ शु० पु. संस्कृत वाइ,मय ३-सद्यो नष्ट स्मृतिगोपी० (द० स्क०८ अध्याय ४४ श्लोक) इत्यत्र लेखः । अज्ञात कत क । अप्रकाशित । मर० भ० शु० ब०७२,। ४-सद्यो नष्ट स्मृतिईपी. इत्यत्र टिप्पणयुपरि विचार: गो. श्रीव्रजभूषण जी कृत । अप्रकाशित । सर० भं० शुरु बं०८८, १,१। ५--नित्रायनैः सेतुबन्धे० (द. १४६१) इत्यस्य विवरणे प्रमणोपी त्यादेः टिप्पणे कारिकाभिरर्थ निरूपणे सूक्ष्म रूपेणेत्यादि विवरणम् । गो० श्री हरिराय जी कृत । प्रकाशित टिप्पणादि के परिशिष्ट में। प्रक्षिप्त अध्याय त्रयी के सम्बन्ध में सुबोधिनी-कार ने प्रारम्भ में कहा है- कथा मात्र हरे र्वाच्यं सर्वत्रेत्यत्र केचन । का वक्त भागवती क्याचित् सिद्धा मलौकिकीम् ॥१॥ योजयित्वात्वाधुनिका अभ्याय प्रितयं जगुः शब्दार्थ संगीतीनाहि स्पष्टा तत्र विरुद्धता र इसी आधार पर श्रीगोपेश्वर जी तथा श्रीगिरिधर जी ने अपने अपने विवरणों में कहा है कि १ पूर्वा पर प्रकरण विरोध, २ भग- वल्लीलाओं की अनुक्रमणिकाओं में अनुल्लेख. तथा ३ कई टीकाकारी के अभिप्राय आदि कारणों से यह अध्याय प्रक्षिप्त है। इन अध्याय त्रयों पर निम्नलिखित साहित्य उपलब्ध होता है- १- अध्याय त्रय प्रक्षिप्तत्व स्मर्थनम् । श्री गोपेश्वरजी कृत । प्रकाशित :-अध्याय त्रय प्रक्षिप्तत्व समर्थने जपमाला। पं० श्रीगङ्गाधर भट्ट विरचित । प्रकाशित । ३- अध्याय त्रय प्रक्षितत्व समर्थनम्-गो. श्रीगिरिधरजी विचित । प्रकाशित । यह तीनों प्रन्थ मा शु० महा मभा सूरत द्वारा प्रकाशित हैं। (द्वि०) तामस प्र.अान्तर द्वि० प्रमेय प्रकरण सुबोधिनी- इममे मूल १५ से लेकर २१ अध्याय तक का समावेश है। प्रतिम अध्याय त्रय की संख्या न गिनने पर इमे १२ मे १८ अ. यहा जाता है । (यह संख्या का व्यतिनम-तीन अभ्याय का परक अन्त १६५ प्रमाण ३०' गमाधिभाषा ] तक चला गया है। इस पर निम्नलिखित मादित्य है। जिममा विव. रण प्रथम के अनुसार समाना चाहिये । क-टिप्पणी-श्रीचिट्ठलेश्वर प्रभुचरण कृत, प्रकाशित । स-प्रकाश-गो० श्रीपुरुषोत्तमजी कृत । प्रकाशित । ग--लेस--गो० श्रीवल्लभजी कृत । १२ से १८ अ०। -योजना-श्रीलालू भट्ट त । १२ से १८ अ० -फारिसर्थ-श्री निर्भयराम भट्ट कृत । १२ से १८ १० अन्तिम तीनों प्रन्थ मा० ६० स्क. सुबोधिन्याव्याख्यात्रयम् नाम से प्रकाशित है। घ-तामस प्रमेय प्रकरण सु० गुर्जर भापानुवाद । श्री नानूलाल गॉधी कृत । प्रकाशित सं० १४६। इम प्रकरण का अन्तिम अध्याय 'वेणुगीत' नाम से प्रसिद्ध है, जिस पर निम्नलिखित साहित्य रचा गया है। (१) वेणुगीत (अक्षण्वदां फलमिदं इत्यादि १८वां अध्याय) सुबोधिनी-गुजग्रती भाषानुवाद-श्री मगनलालजी शास्त्री समस्त टीकाओं के आधार पर प्रस्तुत । प्रकाशित-सं० १६६३ । (२) वेणुगीत सुरोधिनी-जमापानुवाद । स्वामी गोपीनाथजी के पारमज श्री रूपकिशोर शर्मा । प्रकाशित । म्वतन्त्र विवरण (१) 'पूर्णाः पुलिन्द्य उरुगाय० । (द०१८ अं० १७ श्लोक) इत्यत्र सतन्त्र लेग्र । अज्ञात क क । प्रकाशित । (२)'गोप्यः किमाचरदयं (द०१८ अशोक) इत्यत्र स्वतन्त्र लेख गो० श्री देवकीनन्दनजी कृत । अप्रकाशित ! सर० म० शु० यं०३४,७.1 (३) बर्दापी नटवर वपु.' (द०१८ १०५ श्लोक) इत्यत्र स्वतन्त्र लेसः। पो० यालकृष्ण शाषी रचित,कंठमणि शा के मंग्रह में। (४) 'धन्यास्तु मूढमतयोपि' (६० १८ अ०११ श्लोक) इत्यत्र स्वतन्त्र लेसः। गो. श्रीगोकुलनाथ जी कृत । प्रकाशित । सर. भं०४० यन्ध ३४, २६1 (५) 'गायश्च कृष्ण मुम्बः। (६०१८ शोक १३) इत्यत्र स्व० लेस श्रीहरिययजो मृत । प्रचशित ।

[ 'गु० पु० मंस्कृत वाड प्रय 4 . भोक) इत्यन (द्वि०) तामस प्र० अपान्तर तृ० साधन प्रकरण सुबोधिनी, -मूलतः २२ अ० से २८ अ० तक । क्रम से १६ से २५ अप्राशित सं०१६८८ प्रथम के अनुसार ही ग्रन्थ रूप में निम्नलिखित साहित्य उपलब्ध होता है। क-टिप्पणी-श्री विट्ठलेश्वर प्रभुचरण कृत | प्रशशित । --लेख। श्रीवल्लभजी कृत । ग-योजना-त्रीलालू भट्ट जी कृत । प्रकाशित । घ-कारिकार्थ-पं० निर्भयराम कृत । प्रशशित । अन्तिम तीन अन्य व्यारयात्रय नाम से प्रकाशित हैं। -तामस साधन प्रकरण मु० गुजराती भावानुवाद । श्री धीरजलालजी साँसलिया कृत । प्रकाशित १६६१ स्वतन्त्र लेख (१) 'कात्यायिनि महामाये' (द०१६ अ०४ . म्वतन्त्र लेग्यः । गो० श्री मुरलीधरात्मज श्री पुरुषोचमकन । अप्रकाशित सर० म० शु० यं०१०६,३६ । (द्वि०) तामस प्र० अमान्तर चतुर्थ फल प्रकरण सुबोधिनी -राम पंचाध्यायी अमान्तर क्रोम प्रान २६ से ३२ अ० माधारणतः से ३५ अ० प्रकाशित । मं० १६.01 इम प्रारण पर निम्नलिपित साहित्य है। फ-टिप्पणी- श्री विठ्ठलेश्वर प्रभुचरण हत। सतन्त्र प्रन्य रूप में पूर्ववत् । र-टिपरणी व्याख्या-श्री गोपेश्वरजी कृत। अप्रकाशित । सर० भ०शु० १०११३, २७॥ ग-लेग। श्री वल्लमजी महाराज कृत । मुयोपिनी के माथ प्रकाशित । मं० १९८०। प-योजना-श्रीलाल्मली मृत । स्वतन्त्र प्रकाशित मं.१६८? --कारिकार्य-श्रीनिर्भयगम मट्टयन । व्यान्यायय हे माय प्रकाशित प-तामम फल प्रकरगा मुयोधिनी गुर्जरभारानुवाद।

प्रमाण प्र. ""ममाधिमापा ] [ १० श्री गोविन्दलाल भट्ट कृन । प्रकाशित सं० १६६L | समस्त साहित्य के आधार पर। छ-रासपंचाध्यायो सुयो० गुर्जरमापानुगाद-प्रो० जेठालाल शाह एम.ए कृत लल्लूभाई अहमदाबाद द्वारा प्रकाशित । ज--युगल गीत 'वामवाहु कृत' आदि सुबोधिनी गजराती मापान्तर--द०३२ अाश्री मगनलाल शा० कृत प्रश० स० १९८६ म-युगलगीत सुबोधिनी-हिन्दी भापानुवाद-६० श्रीमाधव शर्मा, काशी प्रकाशित अनुवाद द्वारा । प्रस्तुत 'तामस-फल-प्रकरण' रास-पश्चाध्यायी नाम से भी प्रसिद्ध है । इसे श्रीभागवत का हृदय माना जाता है। निःसाधन जीवों पर प्रमुफी अतिशय करणा-स्वरूप दान रूप में प्रकट होने के कारण इसे 'क्ल-प्रकरण' रहा गया है। राजस और मात्विक जीष अपने साधना. नुष्ठान अथवा तदीय प्रामह के द्वारा स्वयं शरण परायण होकर प्रभु को प्राप्त करने का प्रयत्न करते हैं, पर जो तामस जीव हैं उनसरा उद्धार तो श्रीहरि की कृपा बिना असंभव हो जाता है अतः यह रास-पश्चाध्यायी गिसे स्वरूपानन्द दानात्मक रस-समूह की अभिरया से निदिष्ट किया जा सकता है, सनसे मौलिक और सरस प्रकरण है, इस पर भक्ति- मार्गीय समो आचार्यों का ध्यान दे, श्रीवल्लभाचार्य भी इसे दशम निरोध लीजा का फल स्वीकार करते हैं, अतः सुयोधिनी पर इस प्रकरण में जहाँ विशेष पल है वहाँ अन्य व्याख्या और सान्त्र विवेचन भी इम पर अतिशय मिलते हैं। इस प्रकरण में आगत विषयों पर जो स्वतन्त्र लेग्गदि मिलते हैं वे इस प्रकार हैं। १-भगवानपिता रात्री-(०६६ म०१ श्लोक)। गोस्वामी श्री विट्टलेभर प्रमुधरण कृत । प्रकाशित पल प्रकरण सु. --प्रमानन्दात् समुदत्य। (६०.६, १...) इति कारिका पाग्या । गो० श्रीप्रभूषण जी रचिट । अप्रकाशित । मर० शुरु ३३, २०॥ समाप्रसरण पत्र प्राधित सेस वामम फल प्र. मुबोधिनी रे माय प्रालित है। के साथ। ५० [ शु० पु० सस्कृत वाडमय । । ३-तदोडुराजः ककुभैः करैः (द० २६, २) इत्यत्र स्वतन्त्र लेख । गो० श्रीहरिरायजी कृत । प्रकाशित । ४-तदोडुराजः ककुभः करैः (""",,) इत्यत्र स्वतन्त्र लेख । अज्ञात् क्त के । प्रकाशित । ५-चर्पणयः अत्र परिभ्रमण शक्त्यः (२०२६, } स्य: लेख.। अज्ञात कतक प्रका० । ६-काम क्रोधं भय । ( द० २६, १५ । ) इन्यत्र स्वतन्त्र लेख । अज्ञात क्तक । प्रकाशित । ७-अथवा मदभिस्नेहात् । (द०१३) इत्य स्व० लेखः । अज्ञात च क । प्रकाशित । ८-एतच्च भजनं न विपयवत् । (६०२६, ३१) इत्यत्र स्व० लेख । गो० श्रीरघुनाथात्मज देवकी नन्दन कृत | प्रकाशित । इत्यत्र स्व. लेख: अन्नात फक प्राशित । १०-मैव विभो ईति भवान । (द० २६, ३१) । इत्यत्र स्व० लेखः । अजात कतृक प्रा। ११-क्रिया सर्यापि सैवान (द० २६, ४.) इत्यत्र स्वाचार्य कारिकाशय-विवरणम् । गो० श्रीहरिरायजी कृत । प्रकाशित । १२-" " इत्यत्र स्व. लेपन गो० श्रीगोकुलनाथजी कृत । अप्रकाशित, अमान । १३--तत्रैवान्तर धीयत । (द० २६, ४) इत्यत्र स्व. लेख. । श्रीहरिराय जी कृत । प्रकाशित । १४-जयति तेषिक जन्मना (द० २८, १) इयन स्व. लेखः । अज्ञात क क । प्रशशित । १५-न सलु गोपिसानन्दनो (६०८, ४) इत्या स्व. लेयः अज्ञात क्क । प्रकाशित । " " " - " " इम प्ररण वे स्वतन्त्र राशित सेप तामस पन प्रारण मु. माप प्रमाणित हैं।

प्रमाग प्र... ममाधिमापा ] [ १६९ 1 ::-- १६-प्रणत देहिनां पाप० इत्यत्र प्रणतानां कथं पापमुपाने, इत्यत्र विचारः । (द०२८, ११) श्रीगोकुलनाथनी कृत । प्रकाशित । १७ पाल्यानां चर्म न परिधेयम् इत्यत्र (द.२८, ११) स्व० विचार: । गो० श्रीहरिरायत्री कृत प्रकाशित । १८--दिन परिनये नील० (द०२८, १०) इत्यत्र आभासे टिप्पणी । अज्ञात कतृक । अप्रकाशित । सर भ. शु० य०३४, ५। १६-तामामाविरभूत (द० २६, २) इत्यत्र स० लेग्यः । श्रीप्रभुचरग कृत । प्रकाशित । इत्यस्थामासे विवृती श्राशयः । गो० श्रीहरिराय जी कृत । प्रकाशित । २१-पोडश गोपिका संरया तात्पर्य वर्णनम् ।(२०२०, १३) पं० श्री तुलजाराम भट्ट कृत । प्रकाशित । - भजतोनुभजन्त्येक-२०८, १६-३त्यन प्रीण दीपिका। श्री पाहाड हरिएपण विरचित । प्रकाशित । ३- कुंडलै गण्ड लोले । (द० ३० ८) इत्यत्र स्वतन्त्र लेग्वः, अशात कफ प्राशित । २४-ताभिर्विधूत शोकाभिः । (द. ३०, १०)" अज्ञात क्त का प्रकाशित । -५-नमर गायक रास गोएयां । इत्यत्र स्व. लेखः । अज्ञात कत का प्रकाशित। ~ अतः परं रारा दामोदर यत् । " प्रकाशित --सोम्भ स्थलं युवतिभिः । इत्यत्र स्व० लेम्यः । श्रीहरिरायजी पृन । अप्रकाशित । सर० भ० शु० २०३४, १३ । ८-एवं शाराशु विराजिता । (द. ३०.६) स्यग्र स्वर लेगः अमात क्त का अप्रकाशित । 1-मणिधर: क्यषिट् । (१, ३,15) इयत्र पर लेपः श्रात पत्र । प्रमाशित । ३०-देयम्गीगामपि येगुनादेन विस्मोपत्ति । यत्र स्व० हेन । (८.३० अ०) जात रत। " " २०० [ सुपु० संस्कृत वाइ मय ३१-यथा यथा भक्तानां स्व० (द०३० अ०) इत्यत्र स्वतन्त्र लेसः : अज्ञात कतक । प्रकाशित । ३२-टिप्पण्यां। तेन लोके सत्यं व्रतं चेत्यारभ्य धर्मीचेति पोडशधा इत्यन्ते प्रन्थे सत्यं वित्रियदे । स्व० लेखः गो० श्रीकल्याणराय कृत प्रकाशित । टिप्पणी के परिशिष्ट में। ३३-कृष्णविक्रीडितं-इत्यत्र स्वतंत्र लेखः गो० श्रीहरिरायजी कृत । सर० भ०३४/२५ (भा०६०२/१९) ३४-वेणुगोते एव दशविध लीला उक्ताः द्वितीय टीमायाम्- इति निर्देश-स्व० लेख अज्ञात कर्तृक क्रोडपत्र । पो० एठमणि शास्त्री के संग्रह में ३५–श्रीमानोगूढः पुष्टिमार्गेतत्त्वम् - इत्यत्र स्व. लेस | गो. श्रीहरिरायजी कृत । वेणुगीत सुबोधिनी में प्रकाशित । ३६-'वृन्दावन 'गुणातीत' इति कारितोपरि स्वतन्त्र लेख: भज्ञात क क । वेणुगीत सुबोधिनी में प्रकाशित । ३५-एवं संप्रार्थितो गोपः इत्यत्र स्वतन्त्र लेपः । अज्ञात कतक अप्रका० । मथुरेश पु० भ० काकरोली वय १४४४ ३६--गोपिका गीत सुबोधिनी-गुर्जर भापानुवाद-पं० श्रीमगन लालजी शास्त्री कृत । प्रकाशित चुन्नीलाल परीख बबई डाग। ३६-गोपिका गीत सुबोधिनी-हिन्दी भापानुगद-पं० श्रीमाधव शर्मा काशी कृत। प्रकाशित अनुवादक द्वारा। -वेणगीत सुयोधिनी ब्रजभाषानुवाद । अज्ञात तक। अप्रकाशित | सर० भ० काकशु०५०६३, ७ क. (तृतीय) राजस प्रकरणायान्तर प्रथम प्रमाण प्रकरण- मुमोधिनी-(द० स्क. २३ से ३६ अ० पर्यन्त) प्रमशित । सं० १६६५ तेली याला चयई। इमका निम्नलिखित माहित्य उपलब्ध होता है। (फ.) लेब-गो0 श्रीवल्लभजी महाराज पृत ! प्रकाशित मूल प्रन्थ के साथ। (प) राजम प्र प्रकरण मुयो. गुरभाषानुवाद-पीनानलाल जा गांधी यता प्रसाशित स०:४।

प्रमाण प्र०...ममाधिभापा ] [ २०१ ख. तृतीय रा०. प्रकरणावान्तर द्वि० प्रमेय प्रकरण सुबोधिनी-(द० स्क० ४० से ४६ अ०) प्रकाशित सं० १९८५-यहाँ प्रक्षिप्त के तीन अध्याय की संरया जोड़ देने पर ४६ अ० हो जाते है। अतः यहां पूवार्द्ध समाप्त है । इसका निम्नलिखित साहित्य उपलब्ध है- (क) लेख-गो० श्रीवल्लभजी महाराज कृन । प्रकाशित सं० १६८५ मूल ग्रंथ के साथ । (ब) राजस प्रमेय प्रकरण-गुर्जर भापानुवाद--श्री नानूलाल गांधी कृत । प्राशित । इस प्रकरण का ४३ वां अ० (प्रतिप्त सं० मिलाकर ४७ वां अ०) 'भ्रमर-गोत' कहलाता है। इसकी सुबोधिनी साथ में प्रकाशित है । इसके ऊपर निम्नलिखित साहित्य उपलब्ध है-- १-भ्रमर गीताध्याय टिप्पणी-गो० श्री विठ्ठलेश्वर प्रभुचरण विरचित । श्रीमती टिप्पणी नामक ग्रन्थ के रूप में प्रकाशित स. १६५७ तथा प्रकरणस्थ सुबोधिनी के परिशिष्ट मे भी प्रकाशित ! सं० १९८५ । सुबोधिनी के कठिनांश का विवेचन किया है। २-भ्रमर-गीत-सुबोधिनी प्रकाश-गो० श्री पुरुपोत्तम जो विर- चित । प्रकाशित । मूल ग्रन्थ सु० के साथ । ४५ तथा ४६ अध्याय का । ३-भ्रमर-गीत सुयोविनी-दीपिका । गो० श्री हरिरायजी कृत । प्रकाशित मुल ग्रंथ के साथ। ४--भ्रमरगीनीय पद्य संशयोच्छेद-गो० श्रीहरिरायजी कृत । स्वतन्त्र टिप्पण-ततस्ता कृष्ण संदेशः इति शोक सुबोधिन्याः प्रका। ५-त्रिचत्वारिंशाध्याय--भ्रमरगीत सुवोधिनी--विवृति-गो. श्रीश्यामलात्मज ब्रजरायजी कृत । प्रकाशित । सं० १९८५ । मूल सुनो के परिशिष्ट में। ६--भ्रमर गीत-दीपिका । श्रीहरिकृष्ण पाहाड कृत । प्राशित सं० १६८५ । सुवोधिनी ४३, १४ अ० के सुबोधिनी,टिप्पणी, लेख प्रकाश श्रादि के कठिनांश विवेचनार्थ लिखी गई है। ७-समृदधर सुधां म्वां० (६० ४३ अ० १३ श्लोक) स्वतन्त्र लेख :

२०२ । [ गु: पु० मस्कृत वाड.मय ... गो० हरिरायजी कृत । प्रकाशित मूल ग्रथ सुबोधिनी के साथ । ग. (तु.) राजस प्र० अपान्तर तनीय साधन प्रकरण सुबोधिनी-न्न्तगई प्रारम्म १ से ७ अ० पर्यन्त (साधारण गणना ५० से १६ तक प्रकाशित स. १६७६ । तेलीवाला । बबई । इसकी मूल हस्तलिखित सुबोधिनी श्रीगोकुलाधीश क मन्दिर यबई में विद्यमान है। प्रस्तावना क अाधार पर । इस प्रकरण पर निम्नलिखित माहित्य मिलता है.. +-विवरण टिपणी-सभवत लेस । गो० श्रीवल्लभनी महारान कृत माना जाता है । टाना पर नाम नहीं मिलता । प्रकाशित । स-राजस साधन प्र० सु० गुर्जरभाषानुवाद- थ. (तृतीय) राजस प्र. श्रमान्तर चतुर्थ फल प्रकरण सुबोधिनी-द० उत्तरार्द्व ८ से १४ अ० पर्यन्त-प्रकाशित स० १६८१ तेलीवाला बगई। इम पर निम्नलिग्नित साहित्य मिलता है- क- लेग्म-गो आवल्लभजी महारान कृत। प्रकाशित स० मूल के साथ। मानस पन प्रकरण सु० गुर्जरंभापानुबाद । क. (चतुर्थ) मात्तिक प्रकरणामान्तर प्रथम प्रमेय प्रकरण सुनोधिनी-३० उत्तः १५ से २१ अ० पर्यन्त । प्रकाशित स० १६८२ । यह प्रथम कहा जा चुका है कि साविक प्रकरण मे प्रमाण प्रारण नहीं है। श्रत इममें केवल १ अ. ही होंगे। इसम निम्नलिखित साहित्य मिलता है- क-नेस । गा श्रीवनभनी महारान त । प्रकाशित मूल के साथ। म साविक प्रमेय प्रकरण सुयो• गुर्जरमानुबाद-नानृनाल गांधीत प्रश्चशित। रणछोड़ दाम पटवारा १० भएडार । नाथ द्वारा मे। ग्य. (तुर्थ) माविक प्र० श्रयान्तर द्वि. माधन प्रारण प्रमाण." समाधिभाषा ] [ २०३ । सुबोधिनी -द० २०२२ से २८ अ० पर्यन्त । प्रकाशित सं० १९८६ । तेलीवाला चंबई। इसमें निम्नलिखित साहित्य उपलब्ध है- क-लेस । गोश्रीवल्लभजी महाराज कृत | प्रकाशित मूल ग्रन्थ के साथ। स--सात्विक साधन प्र. सु. गुर्जरानुवाद । श्रीनानूलाल गांधी कृत । प्रकाशित सं० २०२३ । वाडीलाल नगीनदास शाह चंबई द्वारा ग. (चतुर्थ) सात्विक प्र. अवान्तर तु० फल प्रकरण- सुबोधिनी द. उत्त० २१ से ३५ अ० पर्यन्त । प्रकाशित सं० १९८७ । तेलीवाला वंवई। इस पर निम्नलिखित साहित्य है। -लेख-गो० श्रीवल्लभजी महाराज कृत । प्रकाशित । मूल के साथ । ख-सात्विक फल प्रकरण सुवा- गुर्नरानुवाद । श्रीनानूलाल गांधी कृत । प्रकाशित सं० २०१५ च. गुण प्रकरण सुबोधिनी-- ---दशम उत्तराद्ध २६ से ४१ अ. पर्यन्त | प्रकाशित सं० १४ | तेलीवाला ववई । यहा उत्तरार्द्ध समाप्त होता है। इस पर निम्नलिखित साहिय है--- -लेख-गो• श्रीवल्लभजी महाराज कृत । प्रकाशित मूल के साथ। ख-गुण प्रारण सुबो गुर्जरानुवाद | श्रीनानूलाल गांधी कृत । प्रकाशित सं० २००४ । वाडीलाल नगीनदास शाह क्यई द्वारा। स्वतन्त्र लेख १-पीत शेपं गदाभृतः । (द. २० ३६ अ०५५, ५६ श्लोक)। इत्यत्र स्वतन्त्र लेख प्रकाशित प्रकरण सुबोधिनी के साय । २-पीत शेषत्वं साधयामः (" 1) इति स्व. लेख: प्रमाशित प्रकरणस्य सुबो के साथ। क- " २०४ ] [ गु० पु. संस्कृत वाड मय ३--गायन्तीति मन्त्र जप प्रकारः। अज्ञात क क । अप्रा. मर० भं० १२ प्रस्तुत प्रकरण मे अ०८ के १४ से ४१ श्लोक पर्यन्त 'वेदम्तुति' नामक प्रकरण है, जिसे 'श्रुति-गीता' भी कहते हैं। इस पर श्री वल्लभा चार्य कृत सुबाधिनी तो प्रकरण मे छपी ही है पर सूक्ष्म टीका नाम से भी एक टीम छपी है जो सुवाधिनी ही है। प्रारम्भ मे श्रीवल्लभाचार्य वृत तोस कारिका हैं, जिनमे वर्ण्य विषय का संक्षिप्तार्थ कहा गया है। यह यारिकाएँ श्रुति गीत नाम से पृथकू भी प्रकाशित है। पृ. स्तोत्र मरित्सागर। वेद स्तुति पर निम्नलिखित माहित्य है- १-श्रुति गीता कारिंसा-श्रीग्लभा वार्य कृत । प्रकाशित । उपर निदिष्ट। २-श्रुति गीतार्य-गो० श्रीविट्टलेश्वर चरणप्रभु कृत, अप्रमाशिव । गर० मं शु० ५० ११३, ४३ । ३-श्रुति गीतार्थ व्यारयानम्-गो. श्रीगिरिधर दीक्षित (प्रथम पुत्र ) संगलित । अप्रमाशित स. १८८६ पा० शु: १५ के दिन मठेरा श्रीनाथ भट्ट द्वारा लिखित-अवलोकन से विदित है कि यह सुबोधिनी के प्रस्तुत प्रारग के मंक्षिप्त चास्यों का ही संग्रह है । पृथक् ग्रंथ नहीं। ४-श्रुनि गीता कारिका गुर्जर भापानुवाद-६० श्रीमगनलाल कानि कृत । प्रा०प्र० भा० सुधा० ५-वेद स्तुति गुर्जर भापान्तर-धानानूलाल गाधी कृत । प्रका- शित प्रकरण सुबो० के माथ । ६-चंद स्नुति सुयोधिनी हिन्दी भाषान्तर-पं० गिरिधर शर्मा की पुत्री शकुन्तला ल । प्रकाशित स. ६E=I गुजराती के आधार पर । दशम सन्ध-गुबोधिनी-परिदर्शन-- भागवत दशम पन्ध में यद्यपि १ से १० अध्याय तक भग- बल्लीला-वर्णन है तथापि प्रामाणिक रीत्या ८७ अध्याय ही माने गये हैं। पूर्गद्ध, १ से १६ तक और उत्तराद्ध ५० से १० तफ गिना जाता है। प्रारम्भ के १२, १३, १५ यह ३० प्रतिम गिने गए हैं। इह तीन १० पद्म पुगण में यगिन कथा के अाधार पर सम्मिशिन किये गये हैं। 1 प्रमाण प्र. 'समाधिभापा ] [ २०५ यह देख कर कि भागरत में श्रीकृष्ण के प्रति सभी देवों का प्रव्हीभाव वर्णित है, सभी उनकी शरण में आये हैं, परन्तु ऐसी किसी लीला का वर्णन नहीं है जिसमे ब्रह्माजी भी कर शरण मे प्रान हुए हो? अतः इस त्रुटि की पूर्ति के लिये यह वत्सहरण का प्रसङ्ग किसी भक्त विद्वान् द्वारा रचा गया और यथा स्थान समिलित किया गया है। उक्त अ० के प्रक्षिप्त मानने के कई कारण हैं जिन पर अनेक टीकाकारों ने विचार किया है। तथापि भगयल्लोला और उनम नामो- च्चारण का लोम सवरण न हो सस्ने के पारण उस पर सभी ने व्याग्याओं की रचना की है। ऐसा होने पर भी उसके प्रक्षिप्त होने की सिद्धि निम्नलिखित हेतुओं से होती है। १. ६० स्वर का ११ वां अ० के समाप्ति का जो श्लोक हे उसकी सगति १८ वें अ० के प्रारमिक श्लोक मे मिलती है। अर्थात् इन तीन अ. के रचयिता ने पूर्वापर सङ्गति बैठाने के लिये ११ वे अध्यायान्त का कौमार लीला ममाप्ति सूचक ५६ वा श्लोक पुनः उसी रुप में १५ वीं अध्याय के अन्तिम ६१ श्लोक के रूप में रख दिया है, जो पुनरुक्ति है । यदि ऐमा न किया नाता तो लीला का मध्य में समावेश कठिन था। ऐतावता यह तीव अ० प्रक्षिप्त हैं। २. ब्रह्माजी की तपश्चर्या मे प्रमन्न होकर श्रीहरि ने सृष्टि करने के लिये वरदान रूप मे इन्हें कहा था, "भवान् कल्प विकल्पेषु न विमु- ह्यति कर्मसु" ( भा० द्वि०६, ३६) अर्थात् ब्रह्मा को मोह नहीं होने का वरदान था. फिर समाधि रूप भागवत मे उत्त विरोध रूप ब्रह्मा को मोह का वर्णन इन अध्यायों में आता है, जो असगत दीखता है। अतः तीन श्र० प्रक्षिप्त माने जाने चाहिए ५--भगवान् की चकीय आरमा, देह और शक्तियों के साथ जोहा 'निरोध' कहलाता है । प्रभु की श्री पुष्टि कीर्ति इला श्रादि १२ शक्तियाँ हैं। देह की ७२ नाड़िया गिनी जाती है। शयन (विद्यमानता) जामत स्वप्न सुपुप्ति भेद से निविध है. अतः १२, ७२, ३ इसका संग्लन ८७ होता है। यही दशम स्कन्ध की अ० सरया है. अत. इन तीन अधिक अभ्यायो का किसी प्रकार समावेश नहीं होता। अतः वे प्रक्षित है। इन मुख्य कारणो और प्रथम निर्दिष्ट हेतुओं से यह प्रक्षिप्त है।

२०६ ] [ शु० पु० सस्कृत वाङ्मय द० स्कन्धार्य निरोध, किम्वा आश्रय- इस सम्बन्ध मे कुछ टोकाचारों में मतविभिन्नता है, कोई इसका अर्थ क्रम प्राप्त निरोध करते हे ता कोई आश्रय । वैसे तो जैसा कि प्रथम कहा गया है भागवत मे सभी व्यारयाकार दश लीलाएँ मानते हैं और एक एक स्कन्ध से एक २ लीला का निरूपण स्वीकार करते हैं, तथापि या आकर मतभेद आ जाता है। तृतीय से लेकर द्वादश ता सर्ग से लेकर आश्रय का निरूपण पक्ष श्रीवल्भाचार्य का है, और ये इस क्रम से द्वितीय सन्ध में वणित परिभाषा या अक्षरश अनुपालन करते है । अत इस भागवतीय आधार पर द० सन्ध का अर्थ निरोध ही सिद्ध होता है, श्राश्रय नहीं । निरोव और प्राश्रय इन दोनों पर थोड़ा प्रासङ्गिक विवेचन आस्याने न होगा। १, निरोध-- 'निरोधोस्यानुशयनमात्मन सह शत्तिभि " ( भा. द्वि० सन्ध १०,६) इस लक्षणानुसार परब्रह्म की स्वकीय शक्तियों के साथ अनु शयम-अवस्थिनि, क्रीडा-विहार निरोध कहलाता है। इन लीलाओं का द० स्कन्ध मे ही पूर्ण समावेश है न कि द्वादश मे। इसी प्रकार श्राश्रय का अर्थ जैसा कि आगे कहा जायेगा, द्वादश २० म ही घटता है। 'निरोध' शद के प्रकृति प्रत्यार्थ को देखते हुए भगवान् के द्वारा स्वकीय भक्तों का सासारिक आसक्ति से अवरोध कर स्सविषयक आसक्ति कराना, विपयों से रोक कर अपने प्रति आसक्त करने की जो लीला द० सन्ध में वर्णित है वह द्वा० में नहीं है। अत स्कन्धार्थ निरोध ही आता है। जीच के मानसिक विकार, इन्द्रियों की विपय भावना तब तक परि समाप्त नहीं होती जव तक वह ब्रह्मीभूत नहीं हो जाता। इन सबा कारण मे विलय सभी मानते हैं। ऐसी अवस्था मै तदाकार वृत्ति हो जाने पर जीय के लिये अत्यन्तिक प्रलय ही है, इस अवस्था में और मुक्ति में कोई अन्तर नहीं रहता। इधर भक्तिमार्गीय सिद्धान्ता नुसार जैसा कि श्रुति कहती है-"सोलुते सर्वान् कामान् सह ब्रह्मणा ममारण प्रल समाधिभाषा ] [ २०७ विपश्चिता" की स्थिति तभी हो सकती है जब उसकी साविक शुद्धि के अनन्तर उसके देह, प्राण, मन, इन्द्रिय, वृद्धि और विषयों म परमानन्दमयत्ता (ब्रह्ममयता) होजाय । द० स्क० में कथित लीलाओं द्वारा हम देखते हैं कि भक्तों की- जिन पर अकारण वरुण के कारण ही -द्धारार्थ अवतार होता है-प्रपञ्च विस्मृति पूर्वक पूर्ण भगवदासक्ति का ही दशम स्क्न्ध मे प्रसङ्ग निरूपण है । भगवान् अपनी लीलाओं के द्वारा स्वकीय समस्त शक्तियों के साथ भक्त के अन्त करण में अनुशयन करते हैं। अत भा० द० स० का अर्थ निरोय ही सिद्ध होता है । वोपदेव आदि कतिपय विद्वान् दशम स्क० का अर्थ यद्यपि निरोध मानते हैं। पर वे इसा अर्थ भूमि का भार उतारना और तदर्थ दुष्ट राजन्यों का नाश करना मानते हैं। उनके कथनानुसार भगवद्- चतार एतदर्थ ही हुआ था, और इसी को वे द० स्क० रा अर्थ स्वी- कार करते हैं। इनका यह कथन द्वि० स्वन्ध की परिभाषा के विरुद्ध पड़ता है, जो शब्दार्थ नहीं है। इनके इस अर्थ को ही यदि निरोध' शब्दार्थ माना जायगा तो न सभी मम्बन्धों को निरोध स्वीकार करना पडेगा जिनमें यह लक्षिण लक्षित होता हो । एतायता निरोध और यह शुद्ध परिभाषा के रूप में दशम में ही पूर्ण चरितार्थ होता है अत वही इस स्कन्ध का अर्थ है। २.याश्रय- प्रामासश्च निरोधश्च यतश्चाध्यवसीयते । सामय पर ब्रह्म परमात्मेति शव्यते [ वि०१०,७) आश्रय शद का लक्षण द्वि० स० में इस प्रकार कहा गया है- जिसने आभास-उत्पत्ति और निरोध-प्रलय होता है और मध्यगत भार विधारों को जिससे प्रकाश मिलता है, वह आश्रय कह लाता है, -से ही परनझ परमात्मा शब्द से कहा जाता है। अर्थात घर ही प्राश्रय है। श्राश्रय दो प्रकार हैं-१ शास्त्रीय मार्ग म प्रपत्ति द्वाग और २-ज्ञानमार्ग म मायुज्य द्वारा । .

२०८ ] [ शु० पु० सम्कृत वाड मय अथवा उत्पत्ति, स्थिति, प्रलय द्वारा प्राश्रय सिद्ध होता है। प्रपत्ति क्रिया से श्राश्रय पाँच प्रकार का और ज्ञान से आठ प्रकार का होता है । इन दाना का उक्त शोक की सुबोधिनी में स्पष्ट विवेचन है । अत विस्तार भय से यहा कहना अप्रासगिक है। द ०० अर्थ के सम्बन्ध म श्रीधराचार्य का विभिन्न मत है। . 'अत्र सगों विसर्गच स्थान' आदि श्लोक में कोई कम नहीं है। जिसमे लीला उसी प्रकार प्रति स्कन्ध म मानी जाय । भागरत में दशम सन्ध में जो परमात्मा स्वरूप श्रीकृष्ण आश्रय है उनका वर्णन है । अत वही शम सन्धार्थ है।" श्रीप्राचार्य निरोध शद का अर्थ प्रलय मानते हे और इसीलिये कहत हैं कि दशम म कहीं भी प्रलय का वर्णन नहीं है वह द्वादश म ह । अत वे दशम का अर्थ श्राश्रय श्रीर द्वादश रा अर्थ निरोध स्वीकार करते हैं। लीला के प्रानुनमिक श्रवण और पूर्वापर के विरोध होने पर मी पण करने से पल म पिसी प्रकार का तारतम्य नहीं याता, क्याकि सभी लीला मुक्तिफल री साधिकार है। अत श्रीधराचार्य स्पष्टत दशम म अाअयार्य की सिद्धि पर बल देते हैं। पर ऐसा मानने पर कुछ विचारणीय प्रसङ्ग आते हे जा आँखा से योभल नहीं क्यि जा मस्ते । वे इस प्रकार हैं- १-अनुक्रम के स्वीगार न करने से लीलाप्रा की परस्पर कार्य कारणता का नाश होता है। पूर्व पूर्व लीला उत्तरोत्तर लीला की कारण है, और यह दोना मिनकर भगवन्माहाम्य ज्ञान को सिद्धि करते हैं, जिससे पल सिद्धि होती है। यह सब लीलाएँ पट म त तु की तरह प्रातमोत है, जिससे शानन्द प श्रीहरि की लीला जो भागवत शास्त्र का अर्थ है-मिद्ध होती है । प्रारम्भिक परिज्ञान से ही उत्तर का परि- मान होता है अन्यथा उसकी निष्पत्ति असभव हो जाती है। आश्रय के परिज्ञान के लिय ही अन्य नय लीलान्या का परिचय कराया जाता है और तदर्थ ही कहा गया है- दरामस्य रिशुद्धयय नसानामिह लक्षणमा भा०वि०१०॥ वर्णयन्ति महात्मा शृतेनायेंन चाजसा ।।

प्रमाण प्र०" समाधिभाषा ] [ २०६ लीला परिगणना में नवम संस्था निरोध पर ही आकर टिकती है अत नर लीलाआ के श्रमण से दशम आश्रय लीला स्वभावतः प्राप्त होने के कारण दशमसन्ध का अर्थ निरोध आता है न कि आभय। २-क्रम विरोध के साथ ही जहाँ दशमसन्धार्थ आश्रय की सिद्धि होती है तो फिर अन्य दो अवशिष्ट लीलाओं के श्रवण की आवश्यकता नहीं रहती। एतावता दशमस्कन्धार्थ निरोध ही है, आश्रय नहीं । निरोध के बाद मुक्ति और आश्रय मानने पर जो सौष्ठर रहता है वह कुछ अन्य हो विशेषता रसता है । ३-परब्रह्म स्वरूप श्रीकृष्ण के स्वरूप का प्रतिपादक होने से ही यदि दशम को आश्रय माना जाय तो जहाँ अन्य स्कन्धो में उनका वर्णन आया है वहाँ भी आश्रय मानना पडेगा, और इस प्रकार सन्धार्थ रूप लीलाओं में साकर्य आ जायगा। भागवत तो भगवान् श्रीकृष्ण के स्वरूप प्रतिपादनार्थ रची गई है, ऐसी अवस्था में सभी स्कन्ध आश्रय प्रतिनिरूपक हो जायेंगे । ४-द्वितीय सन्ध के भीतर जिस प्रकार के आश्रय का लक्षण कहा गया है वैसा लक्षण द्वादश में ही मिलता है, दशम में नहीं । अत. दशम स्कन्ध मे आश्रय का निरुपण न होकर निरोध का है। ५-परब्रह्म श्रीकृष्ण ही अन्ततोगत्वा सर्व के श्राश्रय हैं, अन्तत प्रतिष्टान है, पराकाष्ठा है, अत उस आश्रय रुप मे उनका अन्त में ही निरुपण अधिक सगत है। इधर भक्ति मार्ग में निरोध रूप साधन को ही फलरुप स्वीकार करने म जो भत्तों को विविध चरित्रभरण से परमानन्द की प्राप्ति होती है, वही उनका चरम लक्ष्य है। आश्रय पुस्पार्थ नहीं प्रत्युत स्वत सिद्ध पारमार्थिक फ्ल है। भागवत में श्रीहरि जो आनन्द के निकेतन और तद्रूप हैं, भत्तों के निरोघ्र के लिये मनुष्याकृति रूप में अवतार धारण कर नग्वन लीलाओं का प्राचारण करते हैं, जिससे भत्तों को स्वरूपासति प्राप्ति होती है । इन भक्तों में अधिकाश ऐसे भक्त होते हैं जो नि साधन होने के कारण स्वोद्धार म मर्यथा असमर्थ हैं, संत एष दयाद्रविन होकर अनुग्रह करने वाले प्रभु प्रमेय बल से ही उनका उद्धार करते हैं, २१० ] [ शु० पु० सस्कृत वाइमय यत प्रमाण बल-शास्रीय पद्धति-से उनकी उधृति असंभय है क्योकि वे उसके अधिकारी नहीं हैं। अतः यह सब निरोव से ही संभव होने के कारण दशम को निरोव प्रतिपादक माना गया है। भगवान के भक्त गुणपम्य से कई प्रकार के हैं। जिनम तामस राजस, सात्विक निगुण आदि भेद और उपभेद हैं। विविध भक्तों की आसक्ति के अर्थ विभिन्न लीलाओं चेष्टाओं की अपेक्षा और उनमे विदग्धता की आवश्यकता है जो चतुर नट में ही संभव है, नटवरवपु भगवान् स्वीय लीलाओं द्वारा सर्थ विव भक्तों का उद्धार करते हैं। यह निरोध द्वारा ही संभव है। अतः भागवत के आधार पर दशम को निरोध लीलारूप ही माना जा सक्ता है। (भा० निबन्ध द० १० कारिका १५, २०) साधारण रीत्या अथवा लीलाप्रा की अद्भुतता के कारण सभी लीलाओं में सभी लीलाओं का साक्षात्कार महानुभाव भत्तों को होता है, तथापि किसी स्कन्ध के अमुक अर्थ प्रतिपादन करने के पक्ष में तो क्रम प्राप्त अर्थ को ही प्रधानता दी जा सकती है। इसी क्रम में भागवत दशम स्कन्ध के वेणुगीत में दश विध लीलाओं का इस प्रकार निरूपण मिलता है । जैसा कि प्रथम कहा गया था, मेरे समीप एक प्राक्कोडपत्र है जिसमे इसमा लेस इस प्रकार है- अथ वेणु गीतेएम दश विध लीला उक्ताः । द्वितीय टीकायाम् अवतार इति ॥ लोकेऽवतीर्यापि पुष्टि भक्तोषु लीलाया भावात्मक- दशविधलीला प्रकटयतीति सूचितम् । १. पूर्व वेणुनादात्मिका सर्ग लीला । २ ततो भत्ताना तदनुभवेन विगाढ भावेन तद्दर्णन रुप विसर्गा लीला । ३. ततो विविध लीला स्थान भूत निकुंजादि भावनामिका स्थानलीला | ४. ततो भगवान् रदना वक्षनागत्यानुगृत्य स्वानन्देन पोपयिष्यति इति द्विा पोपणलीला । ५. ततो हरिणी पुलिन्दी भाग्याभिनन्दन रुपा ऊतिलोला। ६. ततो मन्वन्तराणि सद्धर्म इति वाफ्यात् सद्धर्म रूप श्रीगोवर्द्धन भक्ति वर्णनेन मन्वन्तर लीला । ७. ततो गोदोहन सामयिका गत -- प्रमाण प्र.."समाधिभाषा ] [ २११ स्पन्दन गतिमता इत्यादि भगवढीय चरित्रवर्णन रूपेशानुकथा । ८. तत. सर्व लीला फल स्पो निरोध. स्पष्ट एव । ६. ततो विरहेण तदेक्मावापचिमुकि लीला । १०. ततः सायमागमनेन पूर्वभाव प्रापण माश्रयलोला । एव लीलाप्रकटनम् । इसमा त्रिविध रूप १--आधिभौतिक भागवत अन्य का दशम स्कन्ध है, जिसमें पूर्वार्ध और उत्तरार्ध दो संड हैं प्रथम में १ से ४६ अ० और द्वितीय में ५० से ३० अ० तक ४१ अ० है। शुरु सिद्धान्त की दृष्टि से १२, १३, १४ यह तीन अ० प्रक्षिप्त हैं । भा० निबन्ध के अनुसार इसमे पाँच प्रकरण हैं । इसमें विविध गुणभेद से और एकविध निर्गुण भेद से एक इम प्रभार चतुर्विध भत्तों का तथा प्रभु के पधर्मों का निरूपण करते हुए भाववर्द्ध चरित्र का क्था स्प मे वर्णन है। उक्त तीन अ० कौतुक लीला के सम्मिलित करने पर शेप ८७ य० के साथ एकत्र ६०० में इसकी परिसमाप्ति होती है। २-याध्यात्मिक . यानन्द स्प नाहरिकी निरोध लीला का वर्णन है । भागरत निबन्ध के अनुमार तत्तल्लक्षणों, गुणों का प्रति- पादन है। भगवद्धर्म स्वरूप में यह श या प्रतिपादक है। ३-आधिदैनिक...परब्रह्म श्रीकृष्ण के रसमय विग्रह में दशम स्कन्ध हृदय स्थानीय है। ११ एकादश स्कन्ध सुबोधिनी- प्रस्तुत स्कन्ध में ३१ अ० हैं, पर समग्र पर सुबोधिनी न होकर केवल १ से ४ अ० तथा पचमाध्याय के तृतीय श्लोर पर्यन्त प्राप्त हैं, म. १६६८ में प्रकाशित इसके आगे समयाभाव से सुगेधिनी का प्रणयन नहीं हो सका, ऐमा प्रसिद्ध है। इस अंश पर व्याख्याएँ इस प्रकार हैं :- (१) एकादश स्कन्धार्थ निरपण कारिका। श्रीवल्लभाचार्य वृत । प्राशित । इसमें १४ फ रिकाओं द्वारा इस सन्ध के फलितार्थ का क्थन है। (3) सुबोधिनी प्रकाश गो० श्री पुरुषोत्तमजी कृत । प्रकाशित । मूलअन्य के साथ स. १६६० । ।

२१२ ] [ शु० पु० संस्कृत वाङ्मय (३) एकादश स्क० पु० टिप्पणी-गो० श्रीहरिरायजी कृत। अप्रकाशित । सर० म० कांग० शु० ०२६, ३४ (४) सुबोधिनी लेख-गो० श्रीवल्लभजी महाराज कृत । अनुपलब्ध है । इसकी रचना की गई थी, ऐमा विदित हुआ है। (५) एकादश स्फ० स्वतंत्र १३ कारिवा-व्यारया-श्रीलालूभट्ट कृत प्रकाशित } निर्णयार्णव ग्रन्थ द्वि० तरंग। स्वतन्त्र लेख- (१) एकादश स्कन्धोपरि सूचनिका सूक्तिः -श्री योगि गोपेश्वरजी कृत । इसका बहुत थोड़ा अश प्राप्त है जो मूल के साथ प्रकाशित है। '(२) कायेन वाचा मनसेन्द्रियैर्वा (एका० २, ३६) इति पद्य तात्पर्यनिरूपएम्-गो० श्री विठ्ठलेश्वर विरचित । प्रकाशित । मूल के साथ। (३) रामेण सार्द्ध मथुरा प्रणीते-(एका० १२, १० से १४ श्लोक ) इत्यत्र श्लोक चतुष्टय व्यारयानम् । अज्ञात क्तृक प्राशित । मूल के साथ। (४) नृदेहमाद्य सुलभं-(एका० २०, २७) इत्यत्र स्वतन्त्र स्वतन्त्र लेखः । गो० श्री देवकीनन्दनजी कृत प्रकाशित । मूल के साथ। इत्यत्रव्याख्या । गो. श्री विट्ठलेश्वर प्रभुचरण कृत भप्रकाशित । सर० म० कांक० शु० बं०३४,४२३ इत्यत्र व्याख्या। पो० श्रीबालकृष्ण शास्त्रि कृत । अप्रकाशित । पो० कंटमणि शा० के संग्रह में विद्यमान । (७) एकादश स्कन्धार्थ-पो० श्री बालकृष्ण शास्त्र विरचित । अप्रकाशित । ५० कंठमणि शा० के संग्रह में विद्यमान । पं० ३४, क...। (८) 'लोकाश्चलोयानुगताश्च' इत्यत्र स्वतंत्रलेखः । अज्ञात- कर्तृक सर० म० ३४, १०। ... ... ... ...

प्रमाण प्र..."समाधिभापा, [ २१३ :- एकादश स्क० सुबोधिनी परिदर्शन- इसमें ग्राम प्राप्तमुक्ति लीला का प्रतिपादन है । जीव का अन्यथा स्वरूप, जो उसे माया की मोहिका शक्ति अविद्या के द्वारा प्राप्त हो जाता है-का विद्या के द्वारा निरास होजाना, आनन्दमयता की अधि- गति होजाना ही मुक्ति कहलाती है, 'मुक्तिहित्वान्यथा रुपं स्वरूपेण व्यवस्थितिः इस परिभाषा से स्वरूपावस्थान मुकि कही जाती है। भागवत नि० के अनुसार इस के अनान्तर प्रकरणों से उसका परिज्ञान हो सकता है, सम्पूर्ण सुबोधिनी उपलब्ध नहीं है। इसका त्रिविध स्प है:- (१) आधिभौतिक-भागवत शास्त्र का एकादश पन्ध है जिसमें ३१ अध्याय और कई अवान्तर प्रकरण है, प्रत्येक अ० के कई श्लोक हैं। (२) आध्यात्मिक-श्रानन्द रूप श्री हरि की मुक्ति लीला का प्रतिपादन है, भाषा नि० के अनुसार तल्लक्षणों का और गुणों का प्रतिपादन है । भगवद्धर्म रुप में यह श्री का निरूपक माना जाता है। (३) आधिदैविक-पुस्पोत्तम श्रीकृष्ण के रसमय विग्रह में यह स्कन्ध श्री मस्तक स्थानीय है। १२ द्वादश स्कन्ध सुबोधिनी की रचना नहीं हुई अतः यह प्राप्त नहीं है। और उस पर विशेष कोई टीका आदि भी नहीं मिलती। स्वतन्त्र लेख- (१) कया इमा स्ते कथिता महीयसा-(द्वा० ३, १४) इत्यत्र गो० श्री विट्टलेश्वर विरचित २० कारिका । जिनमें पाश्रय पर विचार किया गया है। प्रकाशित । (२) उक्त कारिकाओं पर व्यारया-गो. श्री पुरुषोत्तम जी फूत । उक्त दोनों स्वतन्त्र लेस एकादश सन्ध मु. के साय प्रकाशित है। सं. १६१०॥ द्वा० स्कन्ध सुबोधिनी परिदर्शन- इस स्कन्ध में क्रम प्राप्त श्राश्रय लीला का निरूपण है। जगत् का प्राविर्भाव निरोध और तिरोणन जिमके द्वारा होता है, कार्य या २१४ ] [ गु० पु० संस्कृत वाङ्गमय जिसमे पर्यवसान होता है उस पारण रूप को जो परमार्थतः श्रीहरिका स्वरूप है श्राश्रय कहा जाता है। इसमें १३ अ० है, जिनका प्रकरण विभाग भाग निवन्ध मे कहा गया है। इसका त्रिविध स्वरूपः- १. प्राधिभौतिक--भागवत शास्त्र का द्वादश स्कन्ध है जिसमे १३ १० हैं। प्रत्येक श्र. मे पई श्लोक हैं। आध्यात्मिक-आनन्द रूप श्रीहरि की आश्रय लीला का यहाँ निरूपण है । भा० नि० के अनुसार तत्तल्लक्षणों और गुणो का वर्णन है। भगवद्धर्म स्वरूप में इस सन्ध में श्री का वर्णन है। ३ श्राधिदैविक--परब्रहा श्रीकृष्ण के रसमस विग्रह में द्वादश समय मे वामन्त्रीहरत स्वरूप मारा जाता है। ॥ इति श्री सुबोधिनी विवेचन ।। भागवत पर शुद्धाद्वैत सिद्वान्तीय अन्य साहित्य- सुबोधिनी टीका के अनुसार अन्य प्राचार्य या विद्वान महानु- भावो ने भागवत् पर व्याख्या तथा समीक्षा प्रथ भी लिखे है,सुबोधिनी को जहाँ भागवत का भाष्य कहा जा सकता है वहाँ अन्य टीकाएँ उसकी कथानक शैली को प्राथमिाता देकर साधारणतया सिद्धान्त का विवेचन करती हैं, श्रीधरी और चूर्णिका के श्रावार पर जैसे भागवत को कथा में प्रवचन-सौर्य मिरता है उसी दृष्टि को सामने रख कर कुछ टीमों की सम्प्रदाय मे रचना की गई है। जो इस प्रकार हैं--- टीका ग्रन्थ-- (१) बाल प्रबोधिनी-भागवत् टीका-गो. श्री गिरिधरजी महाराज काशी कृत । प्रकाशित । हरिप्रसाद भागीरथ जी चंबई का है। यह व्याख्या प्रथम स्क० से लेकर द्वा० तक है। (२) रस-प्रबोधिनी भागवत टीका-श्रीमुकु ददास काशी निवासी कृत । अप्रकाशित । सर० मं० काक० शु०५० ३५, ३६, ३७. इसका दशम पूर्वाद्ध अनुपल्म्च है, लेसन काल सं० १६१६ फा. शु-१० रात्रि । लेखक अज्ञात ।

प्रमाए० प्र०...वेद ] [ २१५ (३) भागवत गुजराती भापान्तर-श्री कल्याणजी शास्त्री कृत । प्रकाशित । जिला प्राथमिक मण्डल बंबई द्वारा। (४) भुवोध-रत्नाकर- (सुबोधिनीस्थ संग्रह मवसावलिः) गुजराती अनुवाद सहित । प्रकाशित । समीक्षा ग्रन्थ-- ५-भागवत-स्वस्प विपयक्-शंकानिरासवादः.. गो० श्री पुरुपो- त्तमजी विरचित । यह ग्रन्थकार में विरचित वादग्रंथों में त्रयोदश है, जो सर्वनि नि० के परिसिप्ट में जे० प्रा० ० बंबई द्वारा प्रकाशित है सं० १६६६. ... ६-भागवत कथासार-सन्दोहः...... गो० श्रीहरिरायजी वृत. अप्रकाशित.... .....सर० मं० कारं० शु० बं०७४, १४. ५-भागवत मुधासारः...."दास" कृत० अप्रकाशित सर० मं० कांक० शु०६६४,१०. ७-भागवत सुधासारः...."दास" कृत. अप्रसाशित. सर० मं० कोक० शुलपं०६४, १०. ८-भगवरस्वरूपत्वेन भागवत स्वन्धवर्णनम्.. अज्ञात कर्तृक अप्रकाशित सर० मं० कांक शु० बं० ११०, ३६. -भागवतार्पत्वसिद्धिः...अज्ञातकर्तृक....अप्रका० सर० म० कांर० शु० बं०७३, १८. १०-सुबोधिनीस्थ सारस्तीश्लीम कथा समर्थनम् (अज्ञातस्तक) अप्रकाशित सर० म० कांग्रौली शु० ब०८८, ६१. ११-भागवत तत्व प्रदीपिका...अनात कर्तु क. अप्रकाशित सर० म० कॉक शु० ५० ११०, ३६ १०-विद्याभागवतावधिः इति श्लोकव्याख्यानम् अज्ञात वतृक अप्रकाशित सर मं० शु० यं०७३, २८ (१३) भागवत विजयवादः नेत श्रीराम कृष्ण भट्ट कृत प्रकाशित । सनिर्णयपरिशिष्ट जे० आर० ट्रस्ट यम्मई । इसकी रचना सं० १६०४ को हुई है।

२१६ ] [ शु० पु० रास्कृत वाङ्गमय (१४) भागरत सिद्वान्त विजयवादसार प. श्री गगाधर शाषित अप्रकाशित सर० म० शु० ५० १०५,५॥ (१५) भागवत प्रमाण भास्करः अज्ञात कर्तृक प्रसाशित सर्वति० परिशिष्ट में जे० प्रा०८० यंई। (१६) दुर्जन मुख चपेटिका...सागरस्थ श्री गगाधर भट्ट कृत । (१७) टीका प्रशस्तिरा ..श्री गगावर भट्टात्मज ओ कन्हैयालाल शास्त्रि कृत.. यह दोनों ग्रन्थ सर्वनिः नि० के परि- शिष्ट में जे० आ०२० द्वारा स० १६६६ के प्रकाशित । (१८) दुर्जन-मुस चपेटिका .श्रीराम चन्द्राश्रम विरचित उक्त प्रथ के साथ प्रकाशित समान नामधारी दोनों ग्रन्थ पृथक हैं। (११) भागवत निर्णय सिद्धान्त श्रीदामोदर कृत उक्त प्रथ में साथ प्रकाशित। (२०) भागवतीयाध्यात्म स्वरूप वर्णनम् पो० श्रीरालकृष्ण शास्त्रि विरचित । अप्रकाशित स्व० मोहनलाल जी पड्या द्वारा कठस्थ और श्री ब्रजभूपणलाल जी महाराज द्वारा सकलित । हिन्दी। इसका कुछ संस्कृत भाषा का रूप पो० कठमणि शा० सग्रह में विद्यमान है। (२१) भागतार्थ विचार पो० श्रीपालण शास्त्रि कृत । अप्रकाशित । पो० कर. शा० के सग्रह मे विद्यमान । (२२) भागवतोय कतिपय श्लोकार्थ विचार पो० श्रीमाल. शा. वृत्त । अप्रकाशित | पो० कठ. शा० के सग्रह में ५० ५,६,१५, २७, ३६ म। (२३) भागवत के अवशिष्ठ कतिपय उवाच-निनच पो० कण्ठ- मणि शास्त्री द्वारा अप्रकाशित । (५) अन्य अविरुद्ध ग्रंथ साहित्य अन्य शास्त्रों की प्रामाणिकता-- भारतीय तत्वचिन्तन प्रणाली म दो परस्पर विरोधी भावनाएँ प्रचलित हैं,(१)श्रास्तिक प्रणाली जो अस्ति . सत्ता को लेकर चलती है, (२) नास्तिक प्रणाली जो नास्ति प्रभाव को लेकर चलती है।

प्रमाण प्र० समाधिभापा ] [ २१७ यद्यपि पारमाथिक रुप मे जहाँ ज्ञान, ज्ञाता, इय का अभाव हो जाता है, एकरूपता हो जाती है, अतिरिक्त किसी वस्तु को सत्ता भले ही रहती हो उमका पार्थक्येन जाता कोई नहीं रहता, और जिसे निर्वाण, कैवल्य, तद्रूपता कहा जा सकता है, वहाँ 'नास्ति' को अवकाश दिया जा सकता है पर केवल अभाव पर ही सारे ज्ञान की नींव नहीं रक्सी जा सस्ती । भाव अभाव एक वस्तु के दो रूप है, एक विभिन्नता जो भेदसहिष्णु श्रभेद प्रकार से व्यक्त की जाती है तो दूसरी अनिर्वच नाव एकाकारता है, निषेध शेपो जयतादशेष', और पूर्णमद पूर्णमिद' तथा 'सर्व सल्विदं ब्रह्म श्रादि वाक्यों और 'नासदासीनो सदासीत', "नह नानास्ति किंचन" आदि वाक्यो के सामान्य समन्वय म स्वीकार करना पड़ता है, किसत्ता' 'भाव' एव पारमार्थिक सत्य अवश्य है जिसे पाणी यवहार म नहीं लाया जा सकता, तथापि उसे यावच्छक्य व्यक्त दिया जाता है, वह परम सत्ता स्वयमेव व्यक्त होती रहती है। 'छाति चेन्न प्रतिषेध मात्रत्वात', (७० सूत्र २, १, ५ ) म इस पर अनुशीलन पूर्वक निर्णय किया गया है, अत प्रस्तुत स्थान म उस पर विचार अप्रासगिक सा है, तथापि इतना कहना पडता है कि इसी भाव को लेकर विद्वानों द्वारा अनेक वाद प्रचलित किये गये हैं, और इसी कारण अनेक शास्त्रों की रचना हुई है । वेद, वेदानुवर्ती अन्य शास्त्र और विचारस्वातन्य को लेकर चिविधि आगमों का प्रचलन हुआ है, क्या प्रसग, उपाख्यान, दृष्टिविन्दु आदि के आधार पर विशाल वाङमय का निर्माण किया गया है,विविध शास्त्रों में जिनका विषयानुबन्धी वर्गीकरण किया गया है सभी प्रकार के ग्रथों का समावेश होता है, जिनमे कितने ही वेदानुकुल होने से प्रमाण है, क्तिने ही सहायक, समर्थक अथच साधक होने से उपादेयता को प्राप्त करते है, तो पतिपय पारलौकिकता मे अनुपयोगी होने के कारण त्याज्य नहीं तो उपेक्षणीय गिने जाते हैं।" इसके अतिरिक्त कुछ ऐसे ह जो विरोधी होने से बहिष्कार्य माने जाते हैं। श्रीवल्लभाचार्य ने नास्ति पक्ष पर वेदानुकूल दृष्टि से विचार और उसरा सडनीय अश क्या है ? और उसे समर्थन क्सि रूप में मिल सकता है, इसका निर्धार तथा प्रमाण परिगणना में किसका क्तिना समावेश होता है। रस पर ध्यान दिया है।

२१८ ] [ शु.पु. संस्कृत वाडमय । अविरुद्ध शास्त्र- प्रमाण परिगणना में प्राचार्य श्री ने जहाँ प्रस्थान चतुष्टय महत्व दिया है यहाँ उन्होंने गौण रूप में उन सब शास्त्रों को भी प्रामा- णिकता दी है जो इन चारों से सम्पादित है, इनके विरोधी नहीं हैं। उन्होंने इनका नाम 'अविरुद्ध शास्त्र' रक्सा है। तत्स्थल पर कहा गया है, 'अविरद्ध तु यत्त्वस्य प्रमाणं तच्च, नान्यथा (शा० नि० कारिमा ८) .इसी का स्पष्टीकरण प्राचार्यवर्य ने शब्दान्तर में इस प्रकार किया है.... एतद्विरुद्ध यत्सर्वन तन्मानं कथंचन...(शा. नि० कारिका १) संगति-- तत्वनिर्धार की प्रणाली में जहाँ सिद्धान्तनिप्पत्ति होती है और जिज्ञासु, ज्ञानी भक्त की गोटि मे पहुँच जाता है, वहाँ ऊपर उठकर उसे व्यापक दृष्टि से तत्वों का निर्धार करने के लिए ही नहीं अपितु स्वीकार करने के लिए प्राचार्य उपदेश देते हैं-'अथवा सर्वरूपत्वान्नाम लीला- विभेदतः (शा०नि०६) ठीक तो है। सर्व ब्रह्मस्वरूपता के अङ्गीकार मे जब रूप सृष्टि का अभेदभाव है तब नामसृष्टि ही कैसे छट सकती है, वह भी तो ईश्वरी कृति है, ब्रह्म रूप वेद पा हो तो सब वाडमय व्यवहार हैं, जहाँ रूप सृष्टि में कार्यकारण का अभेद है वहाँ नामसृष्टि में भा भेद-भाव के विगलित हो जाने पर ब्रह्ममयता का भान होना ही चाहिये, और इसीलिये प्राचार्य यावन्मात्र शब्दराशि का ब्रह्म का माम समझ कर प्रमाण रूप उररीकृत कर लेते हैं । तात्पर्य यह कि वेद की सर्वोपरि प्रमाण मूर्धन्यता के अनन्तर उसके श्रर्थानुसन्धान के लिय शेष तीन प्रस्थानों का क्रमिक विकास शु• पुष्टिमार्ग के सिद्धान्त मे स्वीकार किया गया है, और इन्हीं सव के अभिप्राय को विशद करने वाले, उसके भेद प्रकार, उपाय, पद्धति और समन्वय प्रणाली के निर्देशक सभी शास्त्रों को अविरोध भाव की प्रतिपादन की शैली मे मान लिया गया है। यद्यपि साधनावस्था में विरोध भाव के उपोद्दलक सिद्धान्तों से बचते रहने का निर्देश मिलता है। पर जहाँ दृद भाव का परिपाक हो जाता है, वहाँ किसी प्रकार की प्रच्युति का भय न होने से सभी वाड्मय को ब्रह्मभाव के कारण प्रमाण मान लिया गया है । रुपसृष्टि मे जैसे आपाततः भिन्न भाव भासित प्रमाण• प्र०...] [ २१६ होता है, वास्तविक नहीं है, उसी प्रकार नामसृष्टि में भी 'सर्व ब्रह्म' की भावना और उसकी विविध लीलाओं को चरितार्थता से किसी प्रकार की आपत्ति नहीं होती। वैदिक रहस्य के परिज्ञानार्थ दो मीमांसाओं का प्रणयन हुआ है :- (१) धर्म-मीमांसा जिसका नाम 'पूर्वमीमांसा' अथवा 'जैमिनो मीमांसा' भी है। (२) ब्रह्म-मीमांसा-जो 'उत्तर मीमांसा' और 'ब्रह्मसूत्र- मीमांसा भी कही जाती है। जिसका विवरण प्र० प्रकरण में किया गया है। पूर्व मीमांसा- प्रथम मीमांसा में वेदप्रतिपाद्य यज्ञयागादिकर्मकांड का सविस्तार विवेचन है, तो उत्तर मीमांसा में ब्रह्मविद्या सम्बन्धी विचारों का अव- गाहन । यह निश्चित है कि चादरायण व्यास रचित मीमांसा के पूर्व जैमिनी मीमांसा की रचना हो चुकी थी, और इसीलिये इनके विशेषण 'पूर्व' और 'उत्तर' शब्द के साथ दिये गये हैं। वेद ज्ञानराशि होने के साथ ब्रह्मरूप होने से ज्ञानस्वरूप भी हैं, ज्ञान की सीमा नहीं, वह जहाँ अनन्त है, उसके प्रकार भी अनन्त हैं, उसकी इदमित्यता भी निर्धारित नहीं है। 'सर्व विज्ञानमानन्दं ब्रह्म' इस श्रुति वाक्य में बड़े गंभीर भाव का प्रति फलन है-और उसी प्रकार 'सत्यं ज्ञान मानन्दं ब्रह्म' में मी ब्रह्म का यह स्वरूप लक्षण है। जहां 'सर्व' और 'सत्य' शब्द इस परिदृश्यमान जगत् को ब्रह्मरूप बताता है, वहाँ नाम 'शब्द' ज्ञान को भी उद्र प, और इसी विध भावात्मक जगत को भी यह तीनों विशेषण इसी वस्तु का निर्देश करते हैं। वेद के अर्थ का अवरोध जिज्ञासु और ज्ञानी की अधिकार स्थिति पर निर्भर है, एतावता उसके अर्थपरिज्ञान में विमिन्नता हो जाना सहज है, विचार स्वातन्त्र्य से भी इसमें वैषम्य मंभव है। अत: जैमिनि वेद के प्रतिपाद्यांश में यदि पृथक दृष्टि से विचार प्रस्तुत करते हैं तो कोई आश्चर्य नहीं, वे अपने सम्प्रदाय के एक महान् प्राचार्य हैं। वेद के वाक्य 'यज्ञोच विष्णुः' में जहाँ व्यास कर्म । २२० । [ गु०१० मंस्कृन वाय को गौणता देकर से साधन रूप में मान कर ज्ञान और श्रानन क्रमश. उच्चकोटि और फ्ल मानते हैं, वहाँ जैमिनि कर्म को प्राधान्य देकर अपूर्व अन्न म्प में ज्ञान और प्रानन्द का सी में ममावेश का लेते हैं । ब्रह्म के स्वरूप लक्षण या तटस्थ लनणों म व्याम के मात्र जहाँ उनका मतभेद है. ये अपना प्रथर मिद्वान्त प्रतिपादित करते हैं । यही कारण है कि वेदव्याम उसे उपयुक्त नहीं समझते, कई स्थाना पर एनके अभिमत का प्रतिवाद करते दृष्टिगाचर होते हैं। उत्तर मीमासाकार ने जहाँ स्वकीय सूत्रों में अन्य प्राचार्यगर का उल्लेख किया है वहाँ ये मतभेद के कारण जैमिनि के अभिमत को विकल्प रूप में या प्रतिवाद स्प म कह जाते हैं। व्याम सूत्रों म जहाँ नैमिनि का नाम उल्लेख है वह इस प्रकार है- १. प्रथमाध्याय-हि० पाद-८, ३१ सूत्र । तृ० पार -३२ सू71 च० पाद २८ मत्र। २ तृतीयाध्याय-द्वि. पाद-४० सूत्र । च० पाद-२ १८ ३६ सूत्रा ३. चतुर्थाध्याय-तृतीय पाद-१३ सूर । चतुर्थ पाद ११ म । आदि। कहने का अर्थ यह है कि वेदव्यास ने अन्य प्राचार्यों की अपेक्षा जैमिनि का अधिक उल्लेस किया है, जैसे जैमिनि व्याम के शिष्य भी हैं, उन्होंन सामसहिता का अध्ययन वेदव्यास से ही पिया है, यद्यपि कई स्थान पर जैमिनि क माथ झ्यास का मतैक्य नहा है तथापि वे उनका समादर करते हैं। पूर्व मीमांसा पर शु० पु० साहित्य- श्रीवल्लभाचार्य ने महर्षि जैमिनि के मतोल्लेस समय लिखा है- वेदार्थ चिन्तना में चार प्रकार के भेद हैं, उनके चार श्राचार्य है, जा प्रकारभेद से विचार प्रस्तुत करते हैं- (१) केवल शब्द-उल-विचार के समर्थक-ग्राचार्य बादरायण । (0) शद और अर्थ दोना के विचार समर्थक-याचार्य जैमिनि ।

प्रमाण प्र०""समाधिभापा ] [ २२१ (३) शब्द के उपसर्जन द्वारा अर्थ के विचारसमर्थक- प्राचार्य प्राश्मरथ्य । ४) केवल अर्थ विचार के समर्थक-आचार्य वादरि। इस कोटि से विचार करने पर बौमिनि का अधिकांश मत श्राचार्य बादरायण के साथ मिलता है। अणुभाष्य में आचार्य श्री ने लिखा है-'अतःसाकार ब्रह्मवाद एय जोमिनेः सिद्धान्तः' अर्थात् जैमिनि प्राचार्य साकार ब्रह्मवाद के समर्थक हैं... (अणुभाष्य १, २, २८) यही कारण है कि व्यास के साथ अधिकाश मेल खाने के कारण हो श्रीवल्लभाचार्य ने उनी मीमासा पर भाष्य-रचना की है। यह एक शोचनीय प्रसग सा है कि यह माप्य समप्र नहीं रचा जा सका और उसका थोड़ा सा ही अश मिलता है। इसका परिचय इस प्रकार है-- पूर्व मीमांसा-कारिका- ओवल्लभाचार्य कृत--प्रकाशित-वृ० स्तो• स• सागर में । पूर्व मीमासा के सार रूप में 'पूर्वमीमासा-कारिका' नाम से प्रन्थ की रचना है जो ४२ कारिकाओं में है, इसमें उक्त मोमासा का उद्देश्य समझाया गया है। सामान्यतः प्राचार्य का कथन यह है कि-लौकिक और वैदिक इस प्रकार के दो मार्ग है। दोनों नित्य है। लौकिक तो प्रवाह रूप से और वैदिक स्वरूप से। लोक के अर्थ को और येद मे शब्द की प्रधा- नता है। पहिला जलवत् और द्वितीय अग्निवत् है। परस्पर विरोधी होने के कारण दोनों को अलग अलग रखना चाहिये। जल से अग्नि पा माक्षात् स्पर्श होते ही जैसे अग्नि नष्ट हो जाती है, लौकिक दृष्टि से स्पृष्ट होते ही वेद मार्ग भी नष्ट हो जाता है, पर यह वेदमार्ग लौकिक मार्ग को सहसा बाधित नहीं कर सकता। इस प्रकार होने पर भी जैसे पात्रस्थित जल को अग्नि नष्ट कर सकती है उसी प्रकार अधिकारि के बिचस्थ लोरिक आसक्ति को वेदमार्ग नष्ट कर सकता है, अतः उसका पात्रान्तरित रूप में व्यवहार होना चाहिये। त्रिवर्णी और शूद्र वर्ण को यथाधिकार पुरुषार्थ का अनुष्ठान करना चाहिये, इनमें मुख्य होने के कारण नाहह्मण को मोक्षान्त चतुर्विध पुरुषार्थ करने की योग्यता है ।

२२२ ] [शु० पु० सस्कृत वाङ्गमय 'वेदोखिलो धर्म मूलं', वेदप्रणिहितो धर्मः श्रादि आप्त वाक्यो के अनुसार धर्म का रहस्य जानने के लिये वैदिक अध्ययन की भाव- श्यकता है। धर्म ही वेदार्थ स्वरूप है, और वेद ही द्विजातियो के लिये परम नि:अयस है, अत: वेदार्थ-ज्ञान के लिये धर्म और वेद दोनों का रहस्य जानना अनिवार्य है। वाक्याथ का निर्धार मीमांसा के अति- रिक्त अन्य साधन से असंभव है, एतावता मीमांसा का परिज्ञान भी आवश्यक समझ कर महर्षि जैमिनि ने 'अथातो धर्म जिज्ञासा' नाम से धर्मजिज्ञासा का प्रारम्भ किया है । मीमांसा रचना का यही हेतु है,जिसमें कर्म रूप आचरण के लिये उसके सभी अंग उपांगों पर पर्याप्त प्रकाश डाला गया है।" इसीलिये श्राचार्य श्रीवल्लभ ने पूर्व मीमांसा पर भाष्य रचना को आवश्यक समझा और उसके लिये पूर्व मीमांसा कारिकाओं को कृति की। पूर्व मीमांसा-(जैमिनि सूत्र)-भाष्य- श्री वल्लभाचार्य रचित इसका निम्न अंश उपलब्ध हैं- (क) प्रथमाध्याय चतुर्थ पाद. वृत्ति. १३ सूत्र पर्यंत अपूर्ण । अप्रकाशित सर० भं० शु० २०५३।६५ (ख) द्वितीयाध्याय प्रथम पाद-भावार्थ पाद भाष्य । यह अंश सर० भ० शु० ब०५३, १७ पर विद्यमान है, और भावार्थ पाद भाष्य नाम से तेलीवाला चंबई द्वारा प्रराशित । पूर्व मीमांसा भाष्य विवरणम्- गो० श्रीपुरुषोत्तमजी कृत अप्रकाशित और अप्राप्त । इस विवरण की रचना प्रकार ने स्वरचित 'अणुभाप्यप्रकाश के पूर्व करली थी। लिसा है :-"इदंयथातथा भावार्थाधिवरणभाष्ये * अन्य पर वर्ता का नाम निर्देश नहीं है । प्रारम्भ में लिखा है :-- "श्रीकृष्ण वागपिपति सनय श्री विठ्ठलनाथ चरण सरसिजेम्यो नमोनम. उक्त समाना पंदमध्य घामात्सर्व प्रथं स्थान" एताया किसी वहान त प्रतीत होती है। ० . प्रमाण प्र० " समाधिभाषा ] [ २२३ व्युत्पादितमाचार्य चरणैः । ममापि तद्विवरणे निपुणतरं प्रपञ्चित मिति नात्र लिख्यते ।" (अणु० प्र० १२११३) सर० भ० सं० ५३, ३ पर गो० श्रीयदुपति कृत भावार्थ पाद- भाष्य विवरण नाम से कुछ अंश मिलता है, जो इन्हीं श्रीपुरुपोत्तमजी कृत ग्रन्थ का अंश है। पूर्व मीमांसा कारिका विवरणम्- गो० श्रीपुरुषोत्तम जो रचित । प्रका० 'पुष्टिभक्ति सुधा' में इसी की एक प्रति "जैमिनि-भाष्य-भावार्थपाद-विवरणम् ।" नाम से भुवनेश्वरी पीठ गोंडल के संग्रह में स० १०४ पर विद्यमान है, जिसका ले० सं० १८५४ है और पत्र २४. अन्य पूर्ण है। श्रावार्य श्री ने पूर्व मीमांसा-भाष्य की रचना द्वि० क सुबो- धिनी के पूर्व कर ली थी। उन्होंने लिखा है :-वाक्यार्थस्या पूर्वत्वात् भावनापक्षश्च पूर्व मीमांसा भाष्य एवनिरा कृतः" (द्वि०स्क०सु० २२५) उपवेद- वेद-चतुष्टयो के चार उपवेद इस प्रकार हैं :- (१) आयुर्वेद ऋग्वेद का उपवेद । ब्रह्म प्रजापति धन्वन्तरि द्वारा प्रणीत। (२) धनुर्वेद-यजुर्वेद का उपवेद । महादेव द्वारा रचित विश्वामित्र द्वारा व्यवहृत । (३) गान्धर्व वेद-सामवेद का उपवेद । महर्षि भरत द्वारा प्रणीत। (४) स्थापत्य वेद-अथर्व वेद का उपवेद । विश्वकर्मा द्वारा प्रणीत। इन चारों उपवेदों का धर्मानुष्ठान में उपयोग है, अतः वे प्रमाण भूत । यथा-श्रायुर्वेद के द्वारा आरोग्य सिद्ध से धर्मानुसरण में सहायता मिलती है । धनुर्वेद के द्वारा श्रात्म संरक्षण और पररक्षण का कार्य होता है, अतः वह धर्मोपयोगी है । गान्धर्व वेद के द्वारा उद्वेग को शान्ति होती है अतः चितस्वास्थ्य के लिये यह भी धर्मानुष्ठान का - [ शु० पु. सस्कृत वाङ्गमय . रपयोगी है। स्थापत्य के द्वारा यज्ञ के साधन सुक स्र का वेदी गृह प्रसादादि यस्तु निर्माण की सुकरता मिलती है, अतः वह भी धर्म का उपयोगी है। इस प्रकार चारो उपवेद धर्म के उपयोगी होने के कारण अवि- रोधी में प्रमाण हैं। इसी प्रकार जो अन्य शास्त्र ऐहिक उपयोग के माथ पारमार्थिक उपयोग में फलपर्यवसायी होते हैं वे सभी अविरोधी भावना से प्रमाणान्तः पाती हैं, पर जो केवल ऐहिक उपयोग की सिद्धि करते है, वे विरोधी, एतावता अप्रमाण हैं। आयुर्वेद का उपयोग केवल क्षणभगुर शरीर के संरक्षण और अभिवर्द्धन के लिये किया जाता है तो वह परमार्थ साधना में किसी प्रकार प्रमाणभूत नहीं है। इसी प्रसर यदि धनुर्वेद का उपयोग हिंसा विनाश भयोत्पादन के लिये किया जाता है तो वह भी निरर्थक और हेय है। ऐहिक सन्तुष्टि प्रथच विलास के लिये यदि गान्धर्व और स्थापत्य का प्रयोग है तो वह भी परमार्थ- दृष्ट्या अनुपादेय होने के कारण अप्रामाणिक है, यह व्यवस्था है। उपवेदी के स्वरूप एवं प्रतिपाद्य विषय के सम्बन्ध मे सर्व नि. निबन्ध मे ( कारिका ७८, ७) और उसके आयरगा भंग टीका में पर्याप्त प्रकाश डाला गया है। इस प्रकार ४ वेद, ४ उपवेद, ६ अग, १ पुराण समुदाय, १ स्मृत्तियां (१८), १ पूर्व मीमासा. १ उत्तर मीमांसा । इस प्रकार एकत्र अप्टादश विद्याओं का उपयोग वेद प्रतिपादनीय धर्म के संबंध में होता है, अतः इन सब को प्रमाण कोटि में परिगणित किया गया है। वेदांग- वेद साक्षात् नारायण स्वरूप है, अतः पट गुणों के रूप में उसके ६ अग माने गये हैं। (१) शिक्षा, (२) क्ल्प, (३) व्याकरए, (४) निरुक्त, (५) छन्द, (६) ज्योतिप। श्री वल्लभाचार्य मत में इन छहों का उपयोग और प्रयोजन वेद की सर्वान रक्षा है। (म नि० निवन्ध का०७२) आपने पहा है कि वेद का संरक्षण स्वरूप, अर्थ और अनुशन इन तीन प्रकारों से संभव है, एक एक प्रयोजन के लिए दो-दो का निर्माण इस प्रकार है- .

[ २२५ प्रमाण प्र...वेद ] (१) शिक्षा और (२) छंद शान वेद का स्वरूपात संरक्षण करते हैं अन्यथा उसमें व्यतिकम की संभावना है। (३) व्याकरण और (४) निरुक्त शास्त्र वेद के अर्थ का संरक्षण करते हैं, अन्यथा विपरीत ज्ञान हो जाने का भय है। (५) ज्योतिप और (६) कल्प शास्त्र अनुष्ठान के द्वारा वेद का संरक्षण करते हैं। अन्यथा फलवैपरीत्य का भय है। इस प्रकार का अनुमान है कि यह वेदपुरुप के छ गुण हैं, इनमें ज्योतिप ऐश्वर्य का, कल वीर्य का, शिक्षा यश का और छन्द श्री गुण का बोधक है। इसी प्रकार व्याकरण ज्ञान का और निरुक्त वैराग्य का ज्ञापक है । इन छह गुणों की उत्कृष्टता से वेद के भगवद्प होने की पुष्टि होती है। आचार्य के कथनानुसार जहाँ उक्त विविध संरक्षण के लिये इनको नितान्त आवश्यकता है वहां उन्हें उसी रूप में प्रमाण मान लिया गया है और उनपर किसी प्रकार अर्थान्तर के सिद्धार्थ अन्य रचना को महत्व नहीं दिया गया है। वे छहों यथावस्थित वेदविग्रह को शोभा बढाते और उसे साकारता प्रदान करते हैं। अपने स्पष्टार्थ द्वारा वैदिक अभिधान को व्यक्त करते हैं। तावता अविरुद्ध प्रनाण हैं। अर्थ शास्त्र और काम शास्त्र की उपादेयता:- भारतीय मानवजीवन की उदात्तता, पुरुषार्थ-चतुष्टय की परिपूण साधना में सन्निहित है. .मोक्ष' जिसे चाहे जिस परिभाषा में कहा जाय दु.ख निवृत्ति पूर्वक परमानन्दानुभूति का नाम है । एकागीन सुख- जो केवल इस लोक में देह के साथ साथ ही सम्बद्ध है की अपेक्षा, सांगोण सुख जो यत्रतत्र सर्यन कालबाधा से विरहित है नित्य सत्य है पुरपार्थ है, उपादेय है, अनिवार्य और आवश्यक है। चारों पुमर्थ परस्पर विरोधी भाव से अन्योन्य सहायक होकर अनुष्ठेय हैं विधेय हैं, धर्म और मोक्ष के विरोधी रूप में शेष दोनों त्याज्य या उपेक्षणीय, अनावश्यक हैं। धर्म (कर्म) के आचरण के लिये, अर्थ काम सहायक और साधक है धर्म की सर्वत्र आवश्यकता है, वह जीवन को परिपूर्ण करने, प्रकाशमान बनाने और फलोन्मुखी प्राप्तव्य, ०२६ । शु० पु० सस्कृत वाङ्मय करने में अपरिहार्य शाधन है। अर्थ काम की उपेक्षा करके सीधा मोक्ष मार्ग का पथिक भी धर्म को छोड नहीं सकता। क्रमश आगे बढने वाला तो उसे अवलम्ब रूप में सीकार करता ही है, लोक व्यवहार में अर्थ एव काम के सामञ्जस्य अथवा उनकी स्थिविस्थापकता के लिये, स्थायित्व के लिए, भी धर्म की उपेक्षा नहीं की जा सकती। वात्सर्यंत धर्म और मोक्ष यही दो पुरुषार्थ मानव जीवन के लिये अपरित्याज्य हैं और इनको लेकर ही, प्रधान शास्त्रों की निर्मिति हुई है । अर्थ और कास, जो लौकिक स्थिति में सर्वथा उपेक्षणीय नहीं हैं भक्तिमार्गीय अनुष्ठान में उनके प्रकार का सशोधन अवश्य किया जा सकता है। भक्ति मार्गीय चार पुरुषार्थ की तो बात ही अलग है, वे तो ज्ञानी भक्त के कठभूपण हैं, उनका जीवन है, प्राण है, आत्मा है । * लौकिक व्यवहारोपयोगी अर्थ काम के प्रतिपादक शास्त्रों को श्रीवल्लभाचार्य के सिद्धान्त मे कितनी प्रामाणिकता किंरूप में प्राप्त है इस पर सर्व निर्णय निनन्ध में विचार किया गया है। ( कारिका . ७६,८०) अर्थ शास्त्र:- - अर्थोपार्जन, उसका सरक्षण तथा वृद्धि आदि का प्रतिपादक होने से अर्थशास्त्र अर्थ द्वारा धर्मसाधक होने से प्रधान रूप से प्रमाण नहीं है । अर्थ, जहा तक धर्म का उपयोगी है, उसकी सीमा में चलता है, धर्म का बाध नहीं करता वहीं तक सार्थक है, अन्यथा पचदश अनयों का उरादक हाने से विपरीत फळा दाता हो जाता है, तायता अर्थशास्त्र की प्रामाणिकता वहीं तक है । इसका विशेष समावेश न्याय (नीतिशास्त्र) में किया जाता है। स्वतंत्र पुरुषार्थ न होने से इस पर शुद्धाद्वात वाइमय में कोई प्रय रचना नहीं की गई। धर्मापयोगी रूप में इसका परिज्ञान प्रचलित शास्त्रों द्वारा किया जा सकता है। काम शास्त्र- पारस्यायन प्राणीत काम शाख लीरिक सुसाद्वायर है। यामाश रूपेण, प्रियता होने के कारण मोक्ष के स्वरूपातिस्परप नदाहरण रूप म • इसका सटीारण भागयत प्र. प्रसरण में वृत्रासुर धतु धार में परिचय में दिया गया है।

है जो वैदिक युक्ति से विरोधी है। वल्लभाचार्य ने मीमांमानुकूल प्रमाण प्रसमाधिमापों ] [ २२७ कहा जा सकता है। धर्म-सम्बन्ध में उसका साक्षात् उपयोग नहीं है, और प्रत्यक्षतः मोक्ष का तो वह प्रबल शत्रु है । अतः काम प्रतिपादक शास्त्र को प्रामाणिकता नहीं दीजाती। 'पुने कृष्ण प्रिये रति.' (निरोध• लक्षण) इस आचार्य वाक्य के अनुसार भगवदीय सन्तान परम्परार्थ इसका वैध उपयोग अभिप्रेत है। स्वतन्त्र पुस्पार्थ न होने से इस पर शुद्धाद्वैत वाड्मय में कोई रचना नहीं हुई है। न्याय शास्त्र- "पुगण न्याय मीमांसा." आदि वाक्य में जिस न्यायशास्त्र का प्रहण हे वह नीतिशाखवाची है, अतः यहां भी न्यायशास्त्र से नीति शास्र का ही अर्थ लेना चाहिये। इस नीति शास्त्र के द्वारा लोकिक- व्यवहार चातुर्य से धर्मादिअनुष्ठान में सौर्य आता है अतः यह प्रमाण चतुष्टय के अनुरूप ग्राह्य है । इसके द्वारा आचार में सहायता मिलती है, अतः धर्माविरोधी यह प्रमाण है। यहां न्याय शब्द से अक्षपादादि विरचित शास्त्रों का अभिप्राय नहीं लेना चाहिये, क्योंकि वे प्रमाणचतुष्प्रय के अनुकूल नहीं है,और ईश्वर का याथाठध्येन निरूपण नहीं करते । अत. वे प्रमाण नहीं है। (सर्व०नि०८२) लौकिक व्यवहार चातुर्य के लिये जिस नीति की आवश्यकता है, वह भारतादि शास्त्रों में प्रतिपादित यथावस्थित रूप में प्राह्य है। अतः उस पर कोई अन्य रचना नहीं हुई है। तर्फ शास्त्र से प्रामाणिकता में उस शास्त्र का प्रण करना चाहिये जो मोमांसा के अनुकूल हो, और जिसके लिये कहा गया है......... “यस्तणानुमन्यते स धम वेद नेतरः' । मीमासा के अनुकूल वेदार्थ- प्रतिपादन में जो तर्कशास्र सहायक है वह प्रमाण है । (सर्व नि०५२) तर्काप्रतिष्ठानात् “इस व्यास सूत्र (1१।११) मे ऐसे तर्क को अप्रतिष्ठा तर्क को "वैदिक युक्ति" नाम से सम्बोधित किया है । 'तपसा वेद- युक्त्या च प्रमाणात्परमात्मनः" (शानि० कारिका० ६७ ) इसर या तर्क प्रमाण योटि में गिना गया है। तर्क शास्त्र- २२८ ] [ शु० पु० संस्कृत वाङ्मय परपक्ष निग्रहात्मक शब्दांवर तर्क काम शुद्धाद्वैत सिद्धान्त में अनपेक्षित है अतः उस पर कोई अन्य रचना नहीं हुई है। योग तथा सांख्य शास्त्र- भगवद् गीता तथा भागवत में कथित सारय और योग यद्यपि मनर्थ निवृत्ति और तात्विक निर्धार करते हुए सत्व विवृद्धि द्वारा लक्ष्य के साधकांप्रमाण हैं तथापि वे भागवत शास्त्र को प्रतिकूल स्थिति में बालादि साधनों की अपेक्षा रसने के कारण असहाय शूर नहीं है। परमुखापेक्षी होने से उन्हे साक्षात् प्रमाण गणना में लेने से कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं होता। ईश्वर प्रतिपादक सारय भागवत के एकादश स्कंध और कपि- लोक तृ• कंध में वर्णित सांख्य के रूप में साधारणतया माह्य है। अधांग योग मी जो कायक्लेश के सिवाय साधना में सहायक है प्रमाण भूत है, क्योंकि गीता में "कर्पयन्तः शरीरस्थं भूतमाम मचेतसः (१७१६) आदि में ऐसे विधान को आसुरी गिना है। वाममार्गियों द्वारा प्रवृत्त सांख्य और योग काल्पनिक अथवा मोहोत्पादक होने से प्राश नहीं, अप्रामाणिक है । ( सर्व नि०७०) तत्वनिर्धारार्थ ईश्वर प्रतिपादक सांख्य की उपयोगिता और उपादेय तत्वों का परिज्ञान भागवत के तृ० स्कंध कपिल देव के और उद्धव के प्रति एमादश स्कंध में कथित श्रीकृष्णोपदेश से सहज हो सकता है, एतदर्थ स्वतन्त्र ग्रन्य-रचना की आवश्यकता नहीं समझो गई फिर भी प्रमेय प्रकरण में सूचित सिद्धान्त और वाद अन्यों में इनका उस्लेस किया गया है । इसी प्रार योग द्वारा प्राप्त फारूप अष्ट सिद्धियाँ मो अनुप्रह- मार्ग में तुच्छ है अतः इस दृष्टि से इस पर भी कोई अन्य रचना नहीं की गई है । जहाँ तक चिचवृत्तिनिरोध रा प्रश्न है, इसकी निप्पचि के अर्थ तनुजावित्तजा सेवा द्वारा मानसी सिद्ध करने से इसका पूर्ति हे जाती है, और अत्यधिक फ्लरूप में। व्याकरण और कोश-- व्यारण और पोश का निकट सम्यग्य है, व्याकरण के द्वारा पति यय के निर्देश से शध्दसिदिती है, और कोश समानार्थक इस शास्त्र का उपयोग भगवल्लीला गुणगान में और भगवल्लीना- नुकरण रासादि में होता है। नृत्य और सगीत दोनों मानसिक शुद्ध साधक माने जाते हैं । “गुणगाने सुखावाप्तिः गोविन्दस्य प्रजायते" प्रमाण ०""समाधिभाषा ] [ २२६ शब्दों का सामूहिक परिज्ञान करता है। आचार्यश्री ने सर्व निर्णय नि० में जैसा कहा है “पदद्वयं 'सुप्ति गन्तं ताभ्यां चलति वाक्पतिः” (१७४) अर्थात् शब्द ब्रह्मात्मक रूप श्रीहरि के सुबन्त निडन्त दो चरणारविन्द हैं जिनके द्वारा वे गतिविलास प्रदर्शित करते हैं। व्याकरण और निरुक्त दोनों का संभूय अर्थसिद्धि करना प्रयोजन है। लौकिक और वैदिक दोनों प्रकार के अर्थज्ञान से मानव का उभयविध कर्तव्यनिर्धारित होता है। व्याकरण के द्वारा शब्दसिद्धि हो जाने पर भी समानार्थक शब्दों का संकलन आवश्यक है एतदर्थ वैदिक शब्दो का संग्रह निघंटु और लौकिक शब्दों का संग्रह कोश नाम से होता है। वैदिक शब्दों के संग्रह की प्रामाणिकता का जहाँ तक प्रश्न है शु० पु० वाङ्मय में वेदांग रूप में निरुक्त और निघण्टु को यथा- वस्थित स्वीकार किया गया है। प्रकरणादि के अनुसन्धानपूर्वक लौकिक व्यवहार निष्पत्ति के लिये कोश की प्रामाणिकता में भी कोई विसंवाद नहीं है । शब्द और अर्थ को पारस्परिक योजना और अर्थावबोधकता के लिये आचार्यश्री ने सर्वनिर्णय निबन्ध में बहुत स्पष्ट निरूपण किया है, अतः उस पर यहां कहना संगत नहीं है (स.नि. ७६-७८) कोश साहित्य- शब्दार्थ,संग्रहः-पो० श्रीबालकृष्ण शास्त्रि संकलित...अप्रकाशित इसमें वैदिक, कर्मकांडीय, उपनिपदीय और व्यावहारिक शब्दार्थों का संकलन किया गया है। पो० कंठमणि शा. के, संग्रह में विद्यमान । गोविन्द बालकोश:-पो० श्रीबालेकृष्ण शाखि विरचित । अप्रकाशित ! पद्यात्मक । अपूर्ण। पो० क. शास्त्री के संग्रह में विद्यमान। संगीत शास्त्र:- भावना द्वारा जिनमें किसी प्रकार का विकार न हो भगवद्भक्ति के २३० [ शु० पु० संस्कृत वाड़मय' (निरोध लक्षण ६) इस प्रकार का प्राचार्य का वाक्य इसकी पुष्टि करता है । अधिरभेद से संगीत विविध भावापन्न हो जाता है, और उसके गान में भी वदनुरूप फल की छाया आती है, इसका मार्मिक विवेचन आचार्यश्री ने जलभेद" नामक ग्रंथ मे किया है। तावता मानसिक तल्लीनता और भगवासंकीर्तन भक्ति के लिये इसका समुचित शास्त्रीय उपयोग होता है। शु० पुष्टिमार्ग में इस सकीर्तन भक्ति के लिये अष्टछाप आदि के भक्त कवियों द्वारा भाषा में रचना तो हुई ही है, पर संस्कृत में भी विविध अष्टक स्तोत्र चतुष्पदी, पट्पदी, अष्टपदी और अनेक गीतिकाओं का निर्माण किया गया है जिनके रचयिताओं में श्रीविठ्ठलेश्वर प्रभुचरण और श्री हरिरायजी का विशेष स्थान है। संगीत में प्रयुक्त होने वाले ऐसे छोटे-छोटे ग्रन्थ का वर्गीकरण साधन भक्ति प्रकरण में किया गया है, अत: उनका,यदा उल्लेस अनावश्यक है। जहाँ तक शास्त्रीय संगीत के परिज्ञान का प्रश्न है, पुष्टिमार्ग की सेवाप्रणाली में इसका प्रत्यहं उपयोग होने से आवश्यक है। पर तदर्थं प्रचलित शास्त्रों से किसी प्रकार का पैमत्य न होने से उनको अथावस्थित उपयोगार्थ स्वीकार किया गया हैं । इस पर पृथक् प्रन्थ रचना नहीं हुई। कुछ ग्रंथ इस प्रकार है- अष्टपदी गीतिकाएं। गो० श्रीविठ्ठलेश प्रभु० तथा श्रीहरिरायजी कृत प्रसिद्ध हैं, जिनका उल्लेख साधन भक्ति में किया गया है यह विविध रागों में गेयगीतिकाए हैं। सगीत सूत्र-टीका-मठपति श्रीजयगोपाल भट्ट रचित । यह व्याख्या वाग्देवी श्री सरस्वती के प्रणीत सूनों पर है। अप्र. काशित | इस टीकारा परिचय यमई से प्रकाशित होने वाले "गुजराती" पन्न के सवत १९७० के दीपावली विशेपाक में दी गई थी। यह मेरे देखने में नहीं पाया। संगीत दर्पण-पी० श्रीहरिवल्लभ शास्त्रि विरचित (अप्रकाशित । संगीत रानाकर का गद्यावानुवाद । पो० कंठमणि शास्त्र के संमहम मम्पादित विद्यमान । सर० मं० -- प्रमाण प्र..."समाधिभाषा ] [ २३१ स्मृति (धर्म) शास्त्र- प्रस्थान-चतुष्टय तथा पुराण महाभारत श्रादिके अनुकूल सम्बाद- तया ऋपियों द्वारा समय-समय पर रचित उनको स्मृतियां, जिनकी संख्या १८ वर्णाश्रम आचार व्यवहार-ज्ञान के लिये प्रमाण गिनी जाती है। शु० सम्प्रदाय में निम्न लिखित प्रस्तुत आवश्यक विपय का प्रतिपादन करने वाले, संक्षिप्त सारस्वरूप ग्रन्थों का प्रणयन हुआ है, जिनमें सप्रमाण आचार-व्यवहार का परिपालन हो सके। यद्यपि "धर्मः प्रोभितके तवः" (भा० प्र० १, २,) श्लोक की सुबोधिनी में आचार में भी प्रवृत्ति सकोचादि से गुण दोप विधान के कारण और सत्यादि में व्यवहार के सन्निपात होने के कारण तदुक्त धर्म में कापट्य की संभावना का उल्लेख प्राचार्यों ने किया है, पर वह पारमार्थिक- त्या है । लोक में उसकी आवश्यकता होने से स्वीकार करते हैं। यह प्राचार व्यवहार शरीर और प्रान्तर भाव की शुद्धि के लिये भगवत्सेवापयोगी होने के कारण अपेक्षित है, जिससे सतत मनोयोग- पूर्वक अनुष्टान से सत्वशुद्धि और ध्रु वा स्मृति का उदय होता है। बुद्धि के नैर्मल्य से पावनता आकर आत्मा प्रसादोन्मुख होती है। जिससे प्रमेय के प्रति स्नेह रुचि का आविर्भाव और क्रमशः फलतया परमानन्द को अधिगति होती है । इस विषय के अन्य इस प्रकार है:- आचार ग्रन्थ:-- द्रव्य शुद्धि-गो० श्री पुरुपोत्तमजी कृत । प्रमाशित । वृ• स० सागर- यंबई । प्रस्तुत गन्य मे सस्कृत गद्य मे स्मृतियों के प्रमाण- वाक्योपन्यास पूर्वक उन सभी विपयों पर प्रकाश डाला गया है जो शुद्धि के सापेक्ष हैं। गन्थाकार ने इन सब हरिसे वोपयोगी वचनों को कारिका के रूप में सन्नद्ध किया हैं 1 उपक्रम में लिखा है कि यद्यपि निबन्धादि गन्थों में इसका स्पष्ट निर्णय है तथापि बुद्धिदोप से बर्यावयोध में संभाव्य वाचा के निरासार्थ इसका सष्टीकरण किया है। सभी प्रकार की अपेक्षित शुद्धियों का संकलन कर उनके तारसम्य च निर्णय वस्तुतः शुद्धि की उनमन को - दूर कर देता है।

२३२ [ शु० पु० संस्कृत वाङ्मय ग्रन्थाकार ने 'द्रव्य शुद्धि" के अनन्तर श्रात्मशुद्धि पर जोर देकर भक्ति को उसका परम साधक माना है। प्रस्तुत ग्रन्थ पर निम्नलिखित विवरण है- ब्रजभापा टीका-अज्ञात कत का अप्रकाशित । सर० मं० शु० बं०७१,२ प्रजभाषानुवाद-श्रीनन्द किशोरजी शास्त्री । नाथद्वारा विद्याविभाग से प्रकाशित। गुजराती भापाटीका-विश्वनाथ गोयन मि० कृत प्रकाशित विद्याविभाग गुजराती भाषानुवाद-श्रीमाधवजी शास्त्रि कृत प्रकाशित स० शुद्धि-निबन्ध- अज्ञात कर्तृक । अप्रकाशित । सर० म०७६, १ । सूर्य चन्द्र ग्रहण विधि-भाषा-अज्ञात क क । अप्रकाशित सर भं० ६२,४।१४। जलपान-विचार-पं० श्री कन्हैयालाल शास्त्रि कृत । अप्रकाशित सर० भं०७१,१०॥ पादशुद्धिा-गो० श्री द्वारकेश जी कृत । अप्रका० । सर० भ० १०६, ५० धर्म शास्त्रीय निर्णय के आधार पर समाज गत अपावन के निरासार्थ अशौच की व्याख्या की गई है। यह श्राशौच देहमम्बन्धी कर्मानधिकारिता का द्योतक है, अतः शरीरशुद्धि के लिये नियत समय तक पुष्टिमार्ग में इसके परिपालन की आवश्यकता है। यह आशौच दो प्रकार का है (१ जन्म सम्बन्धी (२ मरण सम्बन्धी । इस पर नीचे लिसे प्रन्यों का निर्माण हुआ है । आशौच निर्णय-प० श्री निर्भयराम भट्ट कृत (रचनामाल स०१८५३ काकरोली) प्रकाशित । स १९८१ नाथद्वारा विद्या विभाग। इसका मूल आधार धर्म सिन्धु, स्मृत्यर्थसार, भदोजिदादित कृत श्राशीच च प्रकरण, त्रिशच्छलोकी, मिताक्षरी टीका आदि है। प्रजभाषानुवाद-५० श्री नन्दक्शिोर जी शास्त्रि त । गुजराती अनुयाद-प भी नन्दविशोर जी शास्त्री कृत मूल प्रन्य के माथ प्रकाशित।

अप्रका० सर० 6 प्रमाण प्र०"समाधिभापा ] [ २३३ सुतक-निर्णय. भाषा-वत्सा भट्ट कृत. मं०७१, ११ ॥ सुदक-द्वयमुडना देश. भापा-वंशी भट्ट कृत अप्रका० सर० मं०६२,४,१५। ज्योतिष व्रतोत्सव पर्वादि निर्णय ग्रन्थ-- शु० सम्प्रदाय उत्सव प्रधान है क्यों कि इसमें प्रानन्दमय श्री हरि की लीलाओं की प्रधानता है। श्री प्रभु की दैनिक सेवा-पद्धति इसी क्रम से प्रचलित होती है। इन व्रत उत्सव पर्वादि के मूल कारणों में, जहाँ वैष्णवी भावना है, भक्ति का अधिक समावेश है, वहाँ पौरा- णिकता के आधार पर ऐतिहासिक विचार को भी प्रश्रण दिया गया है। इनकी स्थिति स्यापकता में स्मृत्यादि धर्म शास्त्र और निर्णय सापेक्ष ज्योतिप शास्त्र का भी पूर्ण अवलम्ब है । सदाचार को महत्त्व देते हुए इन दोनों के निर्णय में 'वैष्णव पक्ष' को हो सर्वाश में महत्त्व दिया गया है, 'स्मृति पक्ष' को गौगाता। इस हेतु यह सभी निर्णय एक विशेप पद्धति पर सम्मानित होते हैं। तिथि नक्षत्रादि से संयुक्त होने के कारण यद्यपि इन्हें ज्योतिप शास्त्र का सहारा लेना पड़ता है तथापि वे उसी कक्षा तक बाध्य है जहाँ तक उनकी वैष्णवी भावना का वाध नहीं होता। संक्षेपतः पूर्वापरता, गौण मुख्यता और सदाचार को मान्यता देकर 'सभी निर्णयों का विधान किया गया है। यह वन, पर्वोत्सव आदि निम्न रीत्या विभाजित किये जा सकते हैं- (१) धार्मिक-जिनमें पुण्य सम्पादनार्थ विशेष आचार क्रियाओं का समावेश होना हो। जैसे मेप संक्रान्ति, मकर संक्रान्ति आदि। (२) पौराणिक-जिन में भगवान् और उनके अवतार आदि को लीलाओं का समावेश हो । जैसे श्री कृष्ण जन्माष्टमी, श्री राम- नवमी आदि। (३) ऐतिहासिक-जिनमें महापुरुषों के जन्मोत्सवादि का संकलन किया गया हो। जैसे श्री वल्लभाचार्य प्राकट्योत्सव आदि।

२३४ ] [ शु० पु. संस्कृत वाङ्मय इन के निर्णय में प्राप्त शास्त्रों के वचनों की संगति, विरद्ध मत पाखंडन, और स्वकीय साम्प्रदायिक सिद्धान्तानुसार निर्णय अपेक्षित होता है । तिथि,नक्षत्र के ऊपर आधारित होने वाले कई उत्सव इनके सामञ्जस्य पर सम्पादित होते हैं, ऐसी स्थिति-(जिसे स्मार्त भावना कहा जाता है ) से इसमें यद्यपि वैष्णवता के आग्रह होने पर भी कोई निर्णय धर्मशास्त्र के विरुद्ध प्रचलित नहीं है। परस्पर विरुद्ध प्रतीत होने वाले बचनों की मीमांसा प्रणाली से संगति द्वारा निर्णय दिया जाता है। कध्यमान व्रतोत्सवादि का मूल श्री बलभाचार्य के चे संक्षिप्त किन्तु सार रूप संकेत हैं जो प्रसङ्ग वश यत्र तत्र कहे गए हैं । भागवत द० स्कन्ध में श्री कृष्ण प्रादुर्भावाध्याय तथा सर्व निर्णय नि० के "एकादश्युपवासादि कर्तव्यं वेधवर्जितम् (२४५)" आदि वचन और उनके विवरण द्रष्टव्य हैं । सुबोधिनी ( द्वि० शE) मे व्रतोपवासादि को आचार्य श्री ने भगवदीय देह-साधक रूप में स्वीकार किया है। महाप्रभु के अनन्तर श्री विट्टलेश्वर प्रभु चरण ने विस्तृत पद्धति पर, जन्माष्टमी, रामनवमी और दोलोत्सव जसे महत्व पूर्ण उत्सयों का प्रासङ्गिक विवादापहारक निर्णय किया। आगे चल कर यह निर्णय अन्य का रूप धारण करते गए । प्रभुचरण के सात पुत्रों में से कतिपय ने और आगे चलकर विशेषतया सूरतस्थ गो० श्री पुरुषोत्तमजी ने इस पर व्यापक और प्रांजल निर्णय एवं विभिन्न विद्वानों ने प्रासङ्गिग अयया सामूहिक विवरण लिसे, जो अपने अपने दृष्टिकोण से निर्णय करते हैं। इन्हें नीचे लिसे विभागो में बाँटा जा सकता है- (क) वत्सिव-निर्णय ग्रंथ-जिनम चर्प के मासिक क्रम से, सभी अधिकांश या कतिपय उत्सवो के निर्णय हैं। सभी प्रन्थों में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के वैशिष्ट्य के कारण प्राथमिकता दीगई है। यहाँ से वपत्सिवी का परिगणन होता है। (स) प्रकीर्ण-निर्णय प्रन्थ-जिनमे रिसी एक विशेष प्रत, सय को लेर निर्णय किया गया है, यह निर्णय म्यतन्त्र और किमी, पूर्व प्राथलेग की व्याच्या रूप में भी है। (ग) प्रायझिक-निर्णय प्रन्य-जिसमें किसी विशेष प्रसङ्ग यो लेकर निणय दे।

उत्सर निर्णय सम्बन्धी सभी प्रय जिनकी रचना २००० तक हो चुकी है, " उनिय प्रथ समुच्चय' नाम से श्री बा० ३०१० महासमा सूरतद्वारा प्रकाशित हो चुके हैं। वायं प्रकाशक का नाम नहीं लिखा गया है। । २३५ प्रमाण प्र०"समाधिभापा ] वर्षोत्सव निर्णय ग्रन्थ- इन प्रन्यों में जन्माष्टमी-(भा. कृ.८) से लेकर रक्षाबन्धन (प्रा. शु० १५) तफ का निर्णय दिया गया है। निम्नलिसित अन्य उपलब्ध हैं। उत्मव-प्रतान--गो० श्री पुरुषोत्तम जी कृत । प्रकाशित शास्त्रीय वचनाकी संगति संडन-मडन पद्धति पर निश्चित सिद्धान्त प्रति- पादन में यह ग्रन्थ सबसे अधिक प्रमाण माना जाता है। इस पर निम्नलिसित व्यारयाएं हैं- उत्सव प्रतान-टिप्पणी-अनात कर्तक । प्रकाशित । उ.मर-प्रतानोदाहरणानि-पं० श्री गंगाधर भट्ट कृत | प्रकाशित । उत्सव निर्णय-प्रतान टीका--पं० गंगाधर भट्ट कृत । प्रकाशित । सर० मं०१०४,१०। उत्सव प्रतान हिन्दी भापानुयाद-कृष्णशास्त्री सुत पं. जगन्नाथ शास्त्री कृत । प्रकाशित । उत्सव प्रतान सन्दोह(ब्रजमापा सार) अज्ञात कर्तक । प्रकाशित (श्री पुरुपोत्तम जी कृत प्रवान का सार ) कतिपयोत्मव-निर्णय-गो० श्री कल्याण राय विरचित । प्रका० सम्वत्सरोत्सव-स्सिलता-गो० श्री ब्रजराय जी कृत । प्रकाशित । उत्सव-निर्णय--गो. श्री बल्लभ जी कृत । प्रकाशित । उत्सव-नाला-गो० श्री हरिराय जी कृत । प्राशित । उत्तव-मानिका-आत्रेय ( वालकृष्ण भट्टात्मन) श्री गोकुल- चन्द्र मह कृत । प्रकाशित । योत्सर-निर्णय-भट्ट श्री रामकृष्ण शास्त्री कृत | प्रकाशित उत्सर निर्णय भापा-गो- श्री जीवन जी महाराज वृतः ।

[ शुरु पु० संस्कृत वाङ्मय उत्सव-निर्णय-टिप्पणी-पंच. श्री गटूलाला जी कृत । प्रा०। प्रतोत्सव-पर्यादि निर्णय-पं० श्री निर्भय राम भट्ट कृत । प्ररा० व्रतोत्सव-पर्वादि निर्णय-गुर्जरानुवाद. श्री दयाराम कवि कृत । प्रकीर्ण। प्रदोत्सव-घटिका-दृधान्त-भट्ट गंगाधर शास्त्री कृत | प्रका। हायनोत्सव-रत्नावलिः-क्षत्रिय लालदास कृत । प्रका० । कर्तव्य-वृत विवेक भास्करोदय-क्षत्रिय श्रीकृष्णचन्द्र कृत । प्रका० .व्रतोत्सव निर्णय ब्रजभापा-भट्ट तुलजाराम कृत । प्रका० । सम्वत्सरोत्सव-विवेक-विग्रह श्री गोवर्द्धन शर्मा कृव । प्रका० । चर्पोत्सव विधि-प्रकाश-मठेश श्री इन्दिरेश कृत | प्रका०।* व्रतोत्सव-पर्यादि निर्णय-पं० श्री रमानाथ शास्त्री देवर्षि कृत । प्रकाशित । सम्वत्सरोत्सव-विधि प्राशः-अज्ञात कर्तक । अप्रका० सर० मं० ११२, ३८,३६ । (संभवतः वर्पोत्सव विधि प्रकाश और यह एक ही हैं) चन्द्रग्रस्तोदय निर्णय-संग्रह श्री गोवर्द्धन शर्मा कृत । प्रका (ख) प्रकीर्ण उत्सव निर्णय ग्रन्थ- इस विभाग में विशेष महत्त्व पूर्ण उत्सव के निर्णयमे उन्हीं ग्रन्थों अथवा लेसों की सूची दी जा रही है जो तद्विषयक संग्रह में न होकर स्वतन्त्र प्रन्थ है। जन्माष्टमी-निर्णय-(भा• कृ०८) गो. श्री विट्ठलेश्वर प्रभुचरण कृत। प्रका० इस पर निम्नलिखित विवरण, अनुवादादि प्रकाशित हुए हैं-- (क) जन्माष्टमी निर्णय-गो० रघुनाथजी कृत । प्रकाशित । (ख) जन्माष्टमी निर्णय-गो. हरिराय जी कृत । प्रकाशित । * इसके नाम 'सम्मरस रोत्सव विधि प्रकाश' और 'सर्वोत्सव प्रकाश भी मिलते हैं। * यह समाज अन्य (उत्सव निर्णय पंथ सम क्रम) में वासु० महासभा सूरत से प्रशशित हुये ।

उक्त सभी प्रकाशित अन्य सेष मादि 'उत्सव निर्णय समुच्चय में प्रमाण प्र.."समाधि भाषा ] [ २३७ (ग) जन्माष्टमी निर्णय-गो० श्री चाचा गोपेशजी कृत | प्र० । (घ) जन्माष्टमी-प्रयाश-प्रतान ग्रन्थे घनश्यामात्मज गो० श्री पुरुषोत्तम जी कृत । प्रका० । (ड) प्रभु प्राकट्ये शुद्ध जन्माष्टमी विचार-श्रीवल्लभजी कृत प्रकाशित । दान एकादशी-(भा० शु० ११) महोत्सवे (शृंगार समुत्या. नादि विषयक)। श्लोका:-अज्ञात कर्तक । अप्रमशित । सर० मं० ८८,३३॥ वामन जयन्ती व्रत निर्णय-(भा० शु०१२) मो० श्री देवकी नन्दन जी कृत प्रकाशित । नृसिंह वामनजयन्त्युत्सव वैशिष्ट्य निरूपणम-गो० श्रीहरिराय जी कृत । प्रकाशित । पु. पु. नडियाद । गुजराती अनुवाद सहित । वामन जयन्ती निर्णय-गो० श्री वल्लभ जी-सुत गोपाल जी कृत प्रकाशित । वामन जयन्ती-निग्रह श्री गोवर्द्धन भट्ट कृत प्रकाशित । वासन द्वादशी महोत्सवे-(शृङ्गारसमुत्थान प्रातः सेया प्रार्थना पंचामृत) श्लोमा अज्ञात क क । अप्रकाशित । सर० म० ८८, ३३ । सरस्वती स्थापन-पूजन प्रकार-आश्विन शु० ) प्रकाशित गो० श्री द्वारकेश जी कृत। विजया दशमी-निर्णय-(आश्विन शु० १०) गो० श्री पुरुषोत्तम जाकृत प्रकाशित। विजयावाद--श्री गापाल कृष्ण सत्कवि कृत प्रकाशित । यह गंगाधर मट्ट कृत विजयादशमी वाद का संडन है। विजयादशमी निर्णय-वाशिष्ठ (गंगाधर सुत) गोवद्धन भट्ट वृत्त प्रकाशित । गो० श्री पुरुषोत्तम जी कृत विजया निर्णय का विवेचन है। सूरत से प्रकाशित है।

९३८ ] [ हु.पु. संस्कृत वाङ्मय विजया दशमींवाद -अन्य नाम-विजया वैजयन्ती-पं० श्रीगंगाधर भट्ट कृत प्रकाशित। विजया दशमी-निर्णय विवेक-विग्रह श्री गोयन शम कृत । शरद पूर्णिमा निर्णय-गो० श्री रघुनाथ जी कृत प्रकाशित । इसमें पूर्णिमा का निर्णय करते हुए किरीट धारण में चतुर्दशी का त्याग कर पूर्णिमा को प्रशस्त बनाया गया है । दीपोत्सव निर्णय-(फा. कृ० ३०) अज्ञात तक प्रसाशित । दीपोत्सव-गोवर्द्धन पूजन निर्णय--अन्नात कर्तृक अप्रकाशित । सर. मं० ११२, ४१ । दोलोत्सव निर्णय सूचना पत्रम्-गो• श्री प्रभुचरण विट्ठलेश्वर कृत प्रकाशित । यह पत्र पंड्या जी नृसिंह लाल जी नाथद्वारा के समीप है। दोलोमर प्रतीक प्रकाशः-- :--निग्रह भट्ट श्रीगोवद्धन शम कृत प्र. सम्वत्सर प्रतिपनिर्णय-गो० श्री द्वारकेशजी कृत । अप्रकाशित सर०म० ११२, २४ । अधिक चैत्रे संवत्सरारंभ-निर्णय-ब्रजभाषा पं० श्री गटू लालाजी कृत प्रकाशित । चैत्राधिके मासे शुद्ध चैत्र सम्वत्सरोत्सब विधेय-निर्णय- संस्कृत तथा प्रजभापा । त्रिग्रह श्री गोवर्द्धन शम कृत प्रकाण ।' राम नवमी निर्णय-गो० श्री प्रभुचरण विट्टलेश कृत प्रकाशित । इस अन्य के ऊपर निम्नलिसित विवेचन है- (क) रामनवमी-निर्णय बालप्रबोधिनी टीमा-वि० क० श्री बलभद्र शम कृत। (ख) रामनवमी-निर्णयानुवाद-प्रजभापा शास्त्रि छगन लाल जी, अमर जी कृत प्रकाशित । (ग) रामनवमी-निर्णय विवेक-प्रजमापा शास्त्रि छगन- लाल जी, अमर जी कृत प्रकाशित । रामनवमी विषयक संक्षिप्त विचार-पं० गोप न भट्ट पं० भी गह लाला जी कृत प्रकाशित ।

" " " " काव्यवत् अप्रामाणिक नहीं है। उसकी पाव्यता तो केवल सर्गनिवन्धन है। जमे भी भागवत-इमी लिए शु० पु० सिद्धान्त में उसे पूर्ण प्रमाण प्रमाण प्र." समाधिमाषा ] [ २३६ रामनवमी निर्णय-ब्रजभापा शास्त्रि नन्द किशोर जी कृत प्र. रामनवमी व्रत विचार--अज्ञात कर्तृक-प्रका०। रामनवमी-नियंप विवेक-त्रि० श्री गोवर्द्धन शर्मा कृत प्र० रामनवमी-ना-ममं प्रकाश-1, रामनवमो निर्णय-प्रानन्दीलाल जी शास्त्रि कृत प्रका० । रामनवमी विवेक विचार-, रामनवमी-विचार-- रामनवमी-निणय-गुर्जरमाषा, पं० मूलचन्द शास्त्रि अमदलो कृत प्रका०। रामनवमी-निर्णय-गुर्जर भापा पं० श्री मग्नलाल जी शास्त्रि कृत प्रका श्री रामायण.. मर्यादापुरुषोतम साक्षात् भगवान् श्री रामचन्द्र के कलिफल्मपन्न चरित्र निरूपक आदि काव्य, महर्षि वाल्मीकि प्रणीत रामायण भागवत पुराण के समान ही प्रमाणभूत है। यद्यपि अनेक महर्पियो ने श्री रघुनन्दन के चरित गान द्वारा अपनी रचना को पावन करते ही लोकोपकार किया है तथापि वह महर्षि पुगव श्रीवाल्मीकि के समकक्ष नहीं पहुँचता है। वाल्मीकि रामायण मागवत के अनुसार ही समाधि में अनुभूत होने से प्रमाण कोटि में है। प्रति कल में पतितपायन पुण्यश्नोक श्री राम का प्राकट्य होता है। प्रत्येक कल्प में पूर्वापेदया कुछ तारतम्य होता है, अत: यह चरित शतकोटि प्रविस्तर माना जाता है। रामायण आदिकाव्य होते हुए भी , माना गया है । ( सर्व नि:नि००१) २४० ] [ शु० पु० सस्कृत वाङ्मय श्री बल्लभाचार्य ने शा०नि० की "अयमेव निप्पलै रपि वेद- वाक्यै रामायण सहित भारत पचरात्रे" ( १०४ ) इस कारिफा में इसके आधार भी स्वकीय सिद्धान्त निष्पादन को स्वीकारा है। यह मोच का साधन और परमफन है भागवत मै श्री शुकाचार्य ने भगवान् श्री राम को 'अस्मत्प्रसाद सुमुख', (स्क ६ श्लो) में साक्षात् आनन्द रूप से वर्णित किया है । श्रीराम सूर्यवंशी होने से द्वादश कलाओं से परि- पूर्ण हैं तो श्री कृष्ण चन्द्रवंशी होने से पोडश फ्ला परिपूर्ण । एक मर्यादापुरुपोत्तम हैं तो दूसरे पूर्णपुरुषोत्तम । दोनों एक ही स्वरूप होने से परम आराध्य, उपास्य अथच भजनीय हैं। रामायण के निर्माता महर्षि बाल्मीकि साम्प्रतिक वैवस्वत मन्य- न्तर के २८ वे नेतायुग में प्रादुर्भूत हुए थे और इन्होने श्री रामचरित गाकर लोक को उद्धार का मार्ग बताया । (सर्व०नि० ८१) बाल्मीकि विरचित रामायण के अतिरिक्त अन्य महर्पियों की रचित रामायणें भी हैं जो कल्पभेद से अनुभूत रामचरित्रों को लेकर कुछ विभिन्नता के साथ उपाख्यान प्रस्तुत करती हैं। पर ये बाल्मीकि रामायण के आधार पर ही प्रमाणभूत हैं । स्वतन्त्र नहीं । श्रापस्तम्बम्ब और वशिष्ट द्वारा रचित रामायण इसी के सम्बाद से मान्यता प्राप्त करती है। श्री बल्लभाचार्य की 'रामायणमनन्त हि पुराणमिव सन्मतम' (सर्व०नि००१) के विवरण प्रावरण भग के कथनानुसार विज्ञात होता है कि आपस्तम्बोक्त का प्रचार दक्षिण देश में है । इन रामायण मे जहाँ पारपरिक श्रवण के अनुसार चरित का कथन है वहाँ बाल्मीकि रामायण मे समाधिजन्य अनुभूति से । इसलिये वही प्रमाण है । रामायण पर शु० सा० साहित्य- १ श्री रामायण लोरेश्वरी टीमा-श्री बल्लभाचार्य कृत । अप्रसाशित, अनुपल ध । सावली-गुजरात में प्राप्त सामग्री और लेस से विदित हुआ था कि श्री वल्लभाचार्य ने स० १५६५ विजयदशमी के दिन इस 'लोकेश्वरी' दीका की रचना पूर्ण की थी । उल्लेख था कि-"वाल्मीकि लोकेश्वरी ढीरा आचार्य चक्रवर्ति श्रीवल्लभ कृत | विजय दशमी सपूर्णा !

भारत का प्रणयन कर उन्होने अपने विशाल ज्ञान को लिपिवद्ध प्रमाण प्र०"अन्य शास्त्र] [२४१ श्रीराम-लीलाकृपाकटाक्ष प्रेरणयाश्रीमहाभागवत लोकगुरु,आचार्य- चक्रवति...नित्य पाटकम पंच सप्त (ति) आवृत्तिः संपूर्णा । कार्तिक शु. ११ अब्द. १५६५...(कांक. इतिपत्र ४१) यह टीका प्राप्त नहीं है । इसका केवल उल्लेख ताडपत्रों में मिला था, जो असावधानी से नष्ट होगए। इसका पूर्ण विवरण 'गुजराती' नामक साप्ताहिक पत्र ( बंबई से प्रकाशित) दीपावली सं १९८५, ८६ के विशेषांक में छपा था। २. रामगीतम्-फधिकलानिधि देवर्षि श्रीकृष्ण भट्ट रचित । जयदेव कविरचित गीतगोविन्द अनुसार श्रीरामलीला विहार । अप्र० (पो० कंठमणि शा. के संग्रह में) ३. 'मा निषाद प्रतिष्ठां त्वं'-इत्यत्र रामायणीय पात्र चरित्र- निरूपणम् । पो० श्री बालकृष्ण शखिकृत । अप्रका० (पो० कंठमणि शास्त्री के संग्रह में) मा निषाद प्रतिष्ठां त्वं'- इत्यत्र मन्त्रार्थ-प्रतिपादनम्। बालकृष्ण शा० कृत० अप्रका० ( पो० कंठमणिशानी के संगह में) ५. रघुनाथनाम नाटकम् । रचयिता अमर कवि। अप्रका. अहमदाबादस्थ गो. श्री व्रजरायजी द्वारा प्रदत्त साहित्य में प्राप्त (वि. विभाग कांक. सं. २०१९) भगवान श्रीरामचन्द्र और अहमदाबादस्थ नटवरलाळ श्यामलाल प्रभु-गृह के अधिपति गो. श्रीरघुनाथजी महाराज की समतुलना में रचित रचना सं. १९४५ । अंक ७। पत्र २९ पूर्ण । महाभारत- संस्कृत साहित्य में जो स्थान महाभारत को प्राप्त है यह अन्य किसी ग्रन्थ को नहीं। "जो महाभारत में है यही अन्यत्र है। जो महाभारत में नहीं वह अन्यत्र नहीं," ऐसा पक प्रवचन है। महर्षि वेदव्यास ने जहां १८ पुराणों की रचना की है वहां महा- कर दिया है। भागवत में कहा गया है 'कृतषान भारत सर्वार्थ परिचितम्' (प्र०५३) ४. - , २४२] शु० पु. संस्कृत वाङ्मय प्रस्तुत लक्षश्लोकात्मक ग्रन्थ में जहां पांडवों का इतिहास है यहा शान, यिज्ञान, नीति, व्ययहार, धर्म, उपदेश भादि सभी विषयों का प्राजल धर्णन है । यधपि प्रतगोपात्त भगवान श्रीकृष्ण के दिव्य चरित्रों का भी उसमे संकलन है, पर उसे प्राधान्य नहीं दिया गया है, और यही कारण है कि-इस महान ग्रन्थकी रचना के बाद भी वेदव्याम की अन्तरात्मा प्रसन्न नहीं हुई, उन्हे स्पीय कृति से संतोप नहीं हुआ । फलत. देवर्षि नारद के उपदेश से उन्होने श्रीभागवत की रचना की (भाग० प्र ५। १३) कहने का तात्पर्य यह कि- महाभारत में विशद रीत्या महत्वपूर्ण ज्ञान का सागर लहरा रहा है। इतमें अन्य ऋपियों के मतों का भी उल्लेख है और व्याप्तामिमत भी विद्यमान है। तायता पारमार्थिक तत्वनिर्धार में प्रस्थान-चतुष्टयी क अविरोधी समी सिद्धान्त प्रमाणभूत है. इससे पारमार्थिक भावना का परिपाक होता है ।(श्रीवल्लभाचार्य ने शास्त्रार्थ नि. की अन्तिम कारिका अर्थोयमेव निखिलैरपि वेदवावयै. रामायणे. सहित भारत पचरात्र ( शा. नि० कारिका १०४ ) में महाभारत को । प्रामाणिकता प्रदान की है। जैसा कि- अन्यत्र कहा गया है " वेदे रामायणे चेय पुराणे भारते तथा, आदायन्ते तथा मध्ये हरि सर्वत्र गीयते" रामायण महामारत तथा पुराण..... भागवतादि...सभी वेद के समकक्ष ही गिने जाते हैं। महाभारत पर किसी शु० पु. साहित्य का निर्माण नहीं हुआ है, पसा करने की काई आवश्यकता भी नहीं थी। उसका अर्थ, प्रतिपाद्य विषय स्पष्ट है। काव्य नाटक चम्पू आदि- सस्कृत साहित्य में महाभारत, पुराण आदि के स्थानको को लेकर अनेक काव्य नाटक आदि की रचना की गई है। उनमें देवाजाय तो वास्तविकता कम और काल्पनिकता अधिक है। अलकार, छन्द, रस आदि के द्वारा उनमें विचित्रता का समायश . " ) (क) भगवन्माहात्म्यादि-निरूपक । जिनमें श्रीहरि के (ख) साम्प्रदायिक ऐतिह्म-निरुपक । जिनमें सामूहिक रूप में इतिहास और आचार्य तथा विद्वानों के चरित्र, स्तुति है। इन प्रन्थों में नाम से ही उनका परिचय प्राप्त होजाता है मत घटनामाधली क साथ नहीं दिया जारहा है। प्रमाण प्र. ' अन्य शास्त्र [२४३ किया गया है, पर ये पारमार्थिक रूप में किसी प्रयोजन को सिद्ध नहीं करते । धर्म के सम्बन्ध में उनका कोई तात्यिक उपयोग नहीं होता, एतावता उनकी प्रमाणिकता का कोई प्रश्न नहीं उठता। सफल काव्य नाक के निर्माता की कीर्ति या उससे हानेघाला आर्थिक दाम ही उमको रचना का फल माना जा सकता है। अध्ययन करनेघाले को साहित्यिक निपुणता और साहित्य का ज्ञान प्राप्त होता है, इसके अतिरिक्त अन्य कोई धार्मिक उपयोग नहीं है। (सर्व०नि०८०) शुद्धाद्वैत-बाडमय में जिन काव्य-नाटय-चम्पू आदि का निर्माण हुआ है वे सस्कृत-साहित्य के रत्न तो हैं ही, उनमें लोकसम्बन्धी वर्णन न होकर भक्ति-उपाख्यानों का समावेश है, अत उनका विशेष महत्व है। ये एक प्रकार से पाणी को पायन करने और अन्तरात्मा को दिव्य आनन्द से विभोर करने के साधन-से है, वे स्तोन भी है और चरिन भी । तापता भक्ति क उदय में उनका समावेश किया जा सकता है। यद्यपि कतिपय स्तोत्र, स्तष, अष्टक आदि की परिगणना फाव्यों में की जा सकती है, पर उनका उपयोग भक्ति के साधनाग रूप में किया जाता है। यह काव्य-आदि जिनका यहा परिचय दिया गया है, उस उपयोग में अन्तर्भूत नहीं है। यह प्रधानरूप से साहित्यिक आनन्द के प्रदाता हैं। यह साहित्य निम्न लिखित विभागों में वर्गीकृत किया जा सकता है - क्या-चरित्र, स्वरूप और कार्य का वर्णन है।

२४] [शु० पु. संस्कृत वाङ्मय (क) भगवन्माहात्म्यादि-निरुपक साहित्य :- गीतगोविन्द-विवृतिः- गो. श्रीविठ्ठलेश प्रभु. धिरचित । अप्र- काशित ( मर० भ० सं०६११२) इमकी प्रथमाष्टपदी-विवृति अपूर्ण । ले० सं० १८६९ पत्र ६ । भुवनेश्वरी पीठ गोटल में सं०७० पर यिद्यमान है। गीतगोविन्द-विवृति:- गो. श्रीब्रजपालजी रचित अप्रका (सर० भै ६१ । २६ तथा ७४ | ४३ पर विद्यमान ) गीतगोयिन्द व्याख्या-गूढार्थ दीपिका :- रचयिता मोपाल भट्ट ( उदाभकथि दामोदर भट्टात्मज पंचनदि-वशज)। इन्होंने गीतगोविन्द पर शु• सम्प्रदाय के भावानुसार टीका की रचना की है जो अहमदायाइस्थ गो. श्रीब्रजरायजी महाराज द्वारा प्रदत्त ग्रन्थ-राशि में उवलम्व हुई है। असावधानी से पुस्तक का प्रथम पत्र कुछ खंडित है, शेष ग्रन्थ १२६ पृष्ठों में लिखा है। * गीतगोविन्द-व्याख्या-अज्ञात कर्तृक । अप्रका• । सर० भ० ८३,२ पर विद्यमान । घिवृति- गुजराती टीका। अज्ञात कर्तृक । पत्र ५४, भुषने० पी० गाँडल सं० ७१ पर विद्यमान । " * अहमदावादस्थ गो० श्रीवजरायजी महाराज द्वारा समर्पित गीत- गोविन्द की एक और टीका उदलब्ध हुई है। इसपी अन्तिम पुध्यिका और लेखन काल इस प्रकार है :- " महामहोपाध्याय दिनेश्वर मिश्वात्मज श्रीशंकर मिन रचिताया शालिनाथ कारितायो गीतगोविन्द-टीकायां रसमंजरी नामवेयाया द्वादशः सर्गः । संवत् 1८४८ धावण वदी एकादश्या श्रीकांकरोली मध्ये कृष्णमहेन स्वावलोकनार्य मलेसि।

प्रमाण प्र० “पठनीय - .. कृष्णामिसार काव्यम्- पच० श्रीगटू. रचित । स्मारक-संग्रहालय अन्य शास्त्र] [२४५ पल्यपयोधि-जले- (गीतगोविन्द पद्य) इत्यस्य व्याख्या. गो० श्री पल्लमजी कृत अप्रका। सर० भ०६०, ११०२ सरसिजनयने- इतिपद्यव्यारया- गो० श्रीविठ्ठलेश्वर कृत. ले० सं० १८३५ । पत्र ७ भु० पीठ गोटल सं० २८५ पर विद्यमान । भागवत-माहात्म्य-चन्द्रिका-क्षत्रिय कृष्णचन्द्र रचित । इसका प्रारम इम प्रकार है प्रयत्नेन श्रीभागवतमादरात् इत्यालापयतो वन्दे स्वाचार्यप्रधानहम् 1" इसके अन्त में इस प्रकार पुष्पिका है श्रीमदाचार्यमाश्रित्य कृष्णचन्द्रो हि बाहुज श्रीमागपत-माहात्म्य-चन्द्रिको निर्ममे स्वयम् ।" अहमदाबादस्थ गो. श्रीब्रजरायजी महाराज द्वारा प्रदर ग्रन्थों में उपलब्ध। रसाब्धि-महाकाव्यम्- गो. श्रीदेवकीनन्दनजी रचित. प्रका० तेलीयाला बबई। अनिरुद्ध-विजय काव्यम्- गो. श्रीवल्लभजी (विट्ठलेशात्मज) रचि अप्रका०। अनिरुद्धोदय गो० श्रीगोकुलनाथजी रचित अप्रका०। नटवरलाल मन्दिर अहमदाबाद सग्रह से प्राप्त । मनोदूत काव्यम्-मठेश इन्दिरेश रचित । प्रकाशित । तेलीबाल धवई । गुर्जरभाषानुवाद सहित । हृदयदूत काव्यम्- देवर्षि हरिहरभट्ट रचित । अप्रकाशित । मैं मथुरानायशास्त्री जयपुर के द्वारा विदित । हृदयदूतकाव्य टीका- पच० श्रीग(लालजी भा० मा० रचित पठोपनिषद् भूमिका में उल्लिखित । अप्रकाशित। यमुना लहरी-काव्यम्-पचः श्रीगठ्ठलालजी भा० मा० रचित भुषने० पीठ गोंदल सं० १९४ पर । ले० स० १९३५ । - बम्बई में विद्यमान ।

२४६ ] [शु० पु• सस्कृत पारमय रुधिमणी चम्पू -पच० श्रीगठ्ठ० रचित । स्मारय सग्रहालय बबई । रचना स० १९४२ के पूर्व । बार कृष्ण धम्पू - गो. श्रीजीधनेशजी महाराज रचित । ग्रन्थकार द्वारा प्रकाशित | बम्बई । बालकृष्ण चम्पू-व्याख्या- प. श्रीवैधनाथशासि रचित। मूल ग्रन्थ के साथ प्रका.1 एलेपार्थ-विशति - श्रीकन्हैयालालशास्त्रि रचित । अप्रकाशित । सप्तस्वरूपान्नकूट प्रशस्ति - श्रीकन्हैयालाल शानि रचित । अप्रकाशित । सर० भ० ११५, ५६ । रास-रसवर्णनम्- हरिभक्त रचित । ३ अध्याय । पूर्ण । अप्रकाशित । भुवनेश्वरी पीठ गोंडल स ५.९ पर विद्यमान । काकरोली- मन्दिरवर्णनम्-वैष्णव गणपति रचित । अप्रका• सर० भ०८९,६। गगास्तुति - ५० श्रीगोविन्द भट्ट (नेत हरिकृष्णात्मज ) रचित । अप्रकाशित । ७१ श्लोक । रचना स० १९३३ । पोठमणिशास्त्री व सग्रह में विद्यमान। भगवत्सलाप पीयूष भाषाटीका- कृष्णदास कृत । अप्रका० । मुब. पीठ गोंडल स. १७४ । स्तुति-पारिजातम्- देवर्षि प. श्रीरमानाथ शास्त्रि रचित । प्रका• बा० शु० पुस्तकालय धम्बई । प्रेमपयोधि --भक्त कवि नन्ददासकृत भ्रमरगीत का सस्कृत रूपान्तर। प० श्रीगिरिधर शर्मा नपरत्न रचित । प्रकाशित सरस्वती सदन झालरापाटन । घिजयेश नामार्धशतम्- रचयिता अमर कधि । अहमदाबादस्थ गो. श्रीब्रजरायजी द्वारा प्रदत्त साहित्य में प्राप्त (घि विभाग काष. स. २०१९)। राजराजेश्वर मरुस्थल्यायधीश श्रीमहाराज विजयेशनाम्ना अर्था शतम् । रचना स १९४२। पूर्ण । पत्र ४४ ।

श्रित . अप्रका० रचना सं. १६१. इसमें पांच प्रकरण है। संस्कृत गधमापा म-प्रमाण पुरस्सर प्रथम प्रकरण में प्रसंगी सर्पमम्मदायोत्पत्ति, चतुर्थ में श्रीवल्लमाचार्य-चरित प्रमाण प्र."अन्य शास्त्र [२४७ पुष्टिमार्ग के सिद्धान्तानुसार कुछ प्रकीर्ण स्वतन्त्र श्लोकों की व्याख्याए इस प्रकार है :- “वेदानुद्धरते - इति जयदेवकृत इलोक-व्याख्यानम्-पो० श्री बालकृष्ण शास्त्रि कृत । अप्रकाशित । कंठमणि शा. के संग्रह में । पं० सं० २३ ग । कमलाकुच इति जयदेवकृत अष्टपदी-व्याख्यानम् । श्री बालकृष्ण शास्त्रि कृत पं० सं०२३ ग। अप्रका. नत्या सरस्वती देवीं- इति लघुकौमुदीस्थ मंगलश्लोक-व्याख्या अप्रका• धी वा. शा. कृत पं० सं०४क। 'वंशीविभूषित करात् '-इति श्लोक-विवरणम् श्री वा. शा. कृत अप्रका० पं० सं० २३ च और ३२ क । 'भाइलेपादनुचुम्बना '- इत्यत्र लेखः । अज्ञातकतक । सर• मं०६१-३५ तथा ७३-२० । 'जानीत परमं तत्चं'-इति श्लोक-हिन्दी व्याख्या 1 अज्ञात कर्तृक सर• भं०६१-२५ । एको देवः केशी वा शिवो पा'-इति श्लोक-व्याख्या । अज्ञात कर्तृक । स. भं०८२-७-१२। (ख) ऐतिह्य निरूपक माहित्य :- माघय-पत्रिका- श्रीमाधव भट्ट कृत...अप्रकाशित । अप्राप्त । श्री घल्लभाचार्य के चरित्र पर प्रकाश डालने वाले इस परिचय प्रीकन्हैयालाल शाविरचित वल्लभ-दिग्विजय ' की उपक्रमणिका में मिलता है. जिसमें इसे आधाररुप गिना गया है। सम्प्रदाय- प्रदीप- श्रीगदाधरदास दियेदि रचित । प्रकाशित । पात्त भक्ति, द्वि. प्र. में यिष्णुस्वामिचरित, १०, ग्रन्थ का .

२४८] [शु० पु० संस्कृत वाङ्मय और पचम में श्रीकृष्ण-स्यरूप ब्रम्ह पानिरूपण है। जिससे सम्प्रदाय की स्थिति पर पूर्ण प्रकाश पडता है। इसका संपादन प्राचीन प्रतियों के पाठभेद ये आधार पर किया गया है। सम्प्रदायप्रदीपालोक- उक्तग्रन्थ का हिन्दी भाषानुषाद पो० कठ- मणि शाघि रचित । सम्प्रदाय-प्रदीप-गुजराती भाषानुयाद......प. श्री जटाशंकर शानि रचित । उक्त तीनों ग्रन्थ विद्याविभाग' काकरोली द्वारा प्रकाशित है। यल्लम-दिग्यिजय (यदुनाथदिग्विजय ) गो. श्रीयदुनाथजी विरचित। घल्लभ -दिग्विजय - हिन्दी भापानुवाद । साहित्याचार्य प. श्री पुरुषोत्तमजी चतुर्वेद कृत । यह दोनों ग्रन्थ नाथद्वारा विधाविभाग से प्रकाशित है। घल्कम -दिग्विजय:- गुजराती भाषानुवाद घल्लभ-दिग्विजय - श्रीकृष्णशाखि (कन्हैयालालजी) विरचित । वल्लभ दिग्विजय- हिन्दी भाषानुयादा पं० शकर दयालु मिश्र कृता यह दोनों प्रन्थ अनुवादक द्वारा माधव वाग चन्दबाग बंबई से प्रकाशित है। प्रस्तुत ग्रन्थ प० श्रीगगाधरशानि-पुत्र श्री कन्हैयालालजी शास्त्री ने श्रीवल्लभाचार्य के चरित्र सम्बन्ध में लिखा है। मैने इस ग्रन्थ की मूल प्रति 'भक्ति-भदार' बीकानेर में बहुत समय पूर्व देखी थी, जो अब संभयतः गो.धीनजरत्नलालजी महाराज सूरत के पास विद्यमान है। इस ग्रन्थका जो अंश प्रकाशित हुआ है वह केवल तीन प्रस्थान तक ही है, जिसमें श्रीवल्लभाचार्य का मथुरा-प्रवेश तक का हो वृत्तान्त है। " " " प्रभाग प्र.."अन्य शास्त्र . [२४९ इसकी रचना 'सम्प्रदाय-प्रदीप', श्रीयदुनाथजी कृत 'दिग्विजय' और माधय-पत्रिका' आदि ग्रन्थों के आधार पर हुई है। इस दिग्विजय में प्रारंम में कधि का आत्म- परिचय और आगे दक्षिण देश और यहां का जाति. परिचय देते हुए श्रीवल्लभाचार्य के पूर्व पुरुषों तथा उनका संक्षिप्त इनिवृत दिया गया है- जो प्रादुर्भाव से लेकर भारत-परिक्रमण में मथुरा पधारने तक है। इस की रचना 'शंकर-दिग्विजय' की प्रति- स्पर्धा में की गई है । तथापि भाषा भाष और काव्यात्मक वर्णनशैली की ओजपूर्णता से यह उससे न्यून नहीं है, यह स्पष्ट है। प्रकाशित अंश पद्यात्मक है। इसका द्वितीय ब्रजयात्रा-खंड अनुषाद सहित उक्त अनुवादक द्वारा पृथक् देवकीनन्दन प्रेस, यबई से प्रकाशित है। पल्लमाख्यान-संस्कृत व्याख्या- गो. श्रीब्रजरायजी रचित । प्रकाशित । 'घल्लमाख्यान' गुजराती भाषा में श्री विठ्ठलेश्वर प्रभुचरण के सेषक श्रीगोपालदासजी फा रचित है जो अनेक स्थानों से प्रकाशित है और गुजरवैष्णों द्वारा प्रतिदिन स्तोत्ररूप में गाया . 1 जाता है। यह सर्वप्रथम प्रन्थ है जिस की गुजराती भाषा पर संस्कृत व्याख्या की गई है। वरळमाख्यान-विधृतिः- गोलभीमारकेशजी रचित । अप्रकाशित । सर. भं०७३ । १८ और एक प्रति अज्ञात कर्तृक सं० यस्लमाख्यान टीका- गो० श्रोग्रजामरण दीक्षित रचित । इसकी पक प्रति ले.सं० १९५० पत्र १० भुय. पीठ गोंडल में सं. २२८ पर विद्यमान है। ७२।२ पर विद्यमान ।

Sanskrit Vadmay (pratham Khand)

Author
Shastri,kanthmani
Title
Sanskrit Vadmay (pratham Khand)
File name
Sanskrit Vadmay (pratham Khand)
Text
OCR done
Citation
1944
Published
2012/08
Publisher
Kankroli.,kanthmani Shastri
Language
Sanskrit
Pages
259
Library
Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
DLI number
311502
Barcode
99999990320383.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
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